The Enigma of Capital and the Crises of Capitalism

पूंजीवादी संकट : अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता – अंतिम किश्त

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इससे पहले, कड़ी जोड़ने के लिए देखें :

1. पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

2. पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

मैं इन विकल्पों के बारे में और अधिक जानने के लिए अधीर था. क्या उनके उदारवादी विश्वास के केंद्र में, यह विरोधाभास नहीं था कि वर्तमान संकट से पूंजीवाद के विकल्प निकल सकेंगे ? कुल मिलाकर, संगठित श्रम की वास्तविक तबाही के साथ-साथ व्यक्तिवाद का फैलाव जिसने, निश्चित रूप से, सामूहिक कार्रवाई के रूपों के विकास के विरुद्ध शक्ति झोंकी दी है, नव-उदारवाद के परिणामों में से एक रहा है. हार्वे को यह स्वीकार करने में प्रसन्नता है कि पूंजीवाद विरोधी लहर की कोई भी संभावना. मानसिक अवधारानाओं के मूल में परिवर्तन. पर निर्भर करती है. और इसकी कोई संभावना नहीं है कि इस सन्दर्भ में, अकादमी की ओर से कोई नेतृत्व मिलेगा. नए क्लासिकीय अर्थशास्त्र और तर्कसंगत राजनीतिक सिद्धांत का चुनाव, ऐसे, जैसे कुछ भी न घटित हुआ हो और शेखीखोर व्यावसायिक स्कूलों द्वारा एक या इससे अधिक, नए व्यावसायिक नीति शास्त्र संबंधी कोर्स या लोगों के दिवालियेपन से कैसे धन कमायें, इनके अलावा, उनके पास देने के लिए कुछ नहीं होगा. अंत में, संकट मानव के लालच से जन्मा है जिसके लिए कुछ नहीं किया जा सकता. न ही हम, परम्परावादी मार्क्सवादी सर्वहारा की चेतना के अचानक उत्थान की उम्मीद कर सकते हैं. बीते समय में, इन औद्योगिक कामगारों को  सदैव क्रांति के अग्रगामी सैन्य दस्ते माना जाता था. परन्तु, हार्वे का सुझाव है कि यह गलती थी. फैक्ट्री श्रम को ‘सच्चा वर्ग चैतन्य’ मानने की आसक्ति रही है लेकिन इस वर्ग की भूमिका सदैव बहुत सीमित रही है, अगर भ्रमित न भी हुए हों, तब भी वामपंथियों के भी गलत विचार रहे हैं . जंगलों और खेतों में काम करनेवाले, गैरकानूनी मजदूर बस्तियों में कैजुयल श्रम के अनौपचारिक सेक्टर में, घरेलू सेवक, और अधिक सामान्य रूप से सेवा सेक्टर में और उत्पादन के विस्तृत क्षेत्र या निर्मित परिवेश में लगी हुई मजदूरों की विशाल सेना और शहरी खाईयों (प्राय शाब्दिक), इन सबको दूसरे दर्जे के अभिनेता नहीं माना जा सकता.

इन कामगारों, जिन्हें कई बार इनकी जिन्दगी और रोजगार की प्रकृति की अनिश्चतता को दर्शाने के लिए, बेठिकाना’ श्रम (देखें : Precarious, Precarisation, Precariat ) की श्रेणी में रखा जाता है, की संख्या में, नए उदारीकरण द्वारा थोपी गयी, बदली अवस्था के श्रम-संबंधों के कारण पिछले 30 वर्षों में भारी बढौतरी हुई हैं.

और हार्वे एक और प्रवर्ग का ज़िक्र करते हैं जिसका स्वत्वहरण हो चुका है. इसमें शामिल हैं वे सभी किसान और ग्रामीण जनसंख्या जिन्हें उनकी भूमि से खदेड़ा जा चुका है, वैधानिक ( राज्य द्वारा मंजूरशुदा ) और गैर-वैधानिक, बस्तीवादी, नव-बस्तीवादी या साम्राज्यवादी हथकंडो द्वारा अपने प्राकृतिक संसाधनों और अपनी जीवन पद्वति से वंचित कर दिया गया है और जोर-जबरदस्ती से विनिमय मण्डी … बलपूर्वक पैसे-कौड़ी और टैक्स संबंधों  में धकेल दिया गया है.

बेशक, हार्वे वंचित और स्वत्वहरित लोगों के महान गठबंधन के सपने की बात करते हुए खुश होते हैं, लेकिन, वे तस्लीम करते हैं कि इस प्रकार के ग्रुपों से निर्मित होनेवाली बहुत सी लहरों की संभावना स्थानीय पहलकदमी वाली और यहाँ तक कि  उत्पादन-विरोधी भी हो सकती हैं. परन्तु इस हद तक कि उनमें से अधिकतर उसी स्थान, जैसे मेट्रो शहरो में, मौजूद हैं और वे (जैसाकि, औद्योगिक क्रांति के प्रारंभिक काल में, फैक्ट्री कामगारों के साथ होना माना जाता है)  साझे कार्यभार तैयार कर सकते हैं और अपने-अपने अनुभवों के साथ, इस रूप-रेखा को गढ़ सकते हैं कि वह क्या है जिसे साझे तौर पर किया जा सकता है, कैसे पूंजीवाद कार्य करता है.

और भी बहुत से ग्रुप हो सकते हैं, जो पूंजीवाद के विरुद्ध इस साझे कार्यभार में सम्मिलित हो सकते है जैसे, भारत और ब्राज़ील में विस्थापन और स्वत्वहरण के प्रतिरोध से पैदा हुई लहरे और पहचान के सवाल पर,औरतों, बच्चों, समलिंगियों, और नस्लीय और प्रजातीय और धार्मिक अल्पसंख्यक  लोगों की आजादी की लहर, जिनकी इस ‘सूर्य के नीचे समान स्थान की मांग’ रही है.

उन सभी लोगों के लिए जो अपने-अपने तरीकों से पूंजीवाद की सीमा और असफलता से बच निकलने की इच्छा रख्ते हैं, शब्द ‘कम्युनिस्ट’ के लेबल का प्रयोग अनुचित होगा. ‘कम्युनिज्म’ एक ऐसा  भारी भरकम शब्द है कि इसे राजनीतिक भाषणों में पुन:प्रयोग करना बड़ा मुश्किल है. शायद, हमें इस लहर को, हमारी लहर को, पूंजीवाद विरोधी या फिर स्वयं को ‘रोष की पार्टी’ कहना चाहिए जो वाल-स्ट्रीट की पार्टी और इसके अनुचरों, इसके धर्ममण्डको को हर जगह हराने के लिए तैयार हो और उसे वहां ले जाकर छोड़ दे.

बेशक ये साहसी शब्द थे, लेकिन RSA के प्रश्नकाल के दौरान, मैंने महसूस किया कि यद्यपि वहां काफी लोग थे जो हार्वे के आर्थिक विश्लेषण को मानने को तैयार थे, लेकिन वहां ऐसे लोग भी थे जो पूंजीवाद विरोधी लहर के उत्थान के बारे में उनके सीमित से राजनीतिक आशावाद को भी स्वीकृत करने पर राजी नहीं थे. इसलिए, जब मैंने उन्हें अकेले पाया, तो मैंने इस पर थोडा और बोलने के लिए कहा. क्या यह सही नहीं है कि लोगों का वह अधिकतर हिस्सा जिसे वे  पूंजीवाद विरोधी गठबंधन कहते हैं, उनमें अपनी-अपनी दयनीय स्थिति को छोड़कर, ऐसा बहुत थोडा है जो साझा हो. इतिहास में मुश्किल से ही ऐसा है, जिसने इस प्रकार के बलहीन ग्रुपों द्वारा किसी प्रकार के बदलाव को प्रभावित किया हो.

मैं नहीं मानता कि यह सही हो. ‘पेरिस कम्यून’ किसने पैदा किया ? ‘बेठिकाना’ कामगारों और निर्माण व्यवसाय के श्रमिकों की अहम भूमिका रही थी. जो सच है वह यह कि लोग, जिनके पास सुरक्षित रोजगार नहीं हैं, इनके लिए सांगठनिक रूप ढूँढना बहुत मुश्किल होता है. यही कारण है कि अमेरिका में बहुत थोड़े लोग मिलेंगे जो यूनियन बनाने में दिलचस्पी रखते हों. लेकिन मानव अधिकार संगठन जैसी ‘अप्रकट’ ( covert ) यूनियन बनाने में इच्छुक लोगों की संख्या अधिक से अधिक होगी. अगर आप अपने को मानव अधिकार संगठन बनाने के लिए निरुपित करते हो, तो आप श्रम कानून के अधीन नहीं आते हो. एक मानव अधिकार संगठन अस्थाई श्रमिक को संगठित कर सकता है और फिर भी कह सकता है “हम यूनियन नहीं है”. वे बेघरों के साथ भी ऐसा ही करते हैं. मैं बेघरों की ‘Picture the Homeless’ के लिए काम करता हूँ जो, सक्रिय रुप से, इन नए सहस्वामित्व वाले घरों पर कब्ज़ा करने की बाते करती है और बेघरों को वहां बसाती है.

डेविड हार्वे ने अपना अल्प समय, ब्रिटेन में अपनी नयी पुस्तक प्रकाशित कराने  में, लगाया. उसके साथ अपनी मीटिंगों के दौरान, मैं एक ऐसे व्यक्ति से प्रभावित था जो एक अमेरिकन विश्वविद्यालय ( हालाँकि उनका जन्म ब्रिटेन का है ) का  अकादमी होने के बावजूद मार्क्सवाद का झंडा, ऊँचा उठाये हुए था . यहाँ उनका स्वागत समारोह उनके लिए अनुकूलित होने की वजाय, खुद उनके ही प्रवेशाधिकार पत्र से था. लेकिन अमेरिका में उनके व्याख्यानों और पुस्तकों की स्थिति कैसी है ?

“इसे मुख्य मीडिया में कैसे लिया जाता है. वे इसका उत्तर पूर्ण चुप्पी से देते हैं. मेरे काम का रिवियू होना बड़ा मुश्किल है. लेकिन मुझे इसका अभ्यस्त होना पड़ता है. मैं लोहे की छत के नीचे हूँ. दूर बेसमेंट में काम करता हुआ. किसी हद तक विक्टर ह्यूगो की कहानी की तरह. मैं सीवरों में विध्वंस का कार्य कर रहा हूँ.

क्या वे बेख़ौफ़, बहिष्कार होने के डर के बिना, शब्द मार्क्सवाद का प्रयोग कर सकते हैं ? ” इसमें बड़ी मुश्किल है. वहां एक ‘फोक्स न्यूज़’ नाम से उद्योग है जो ओबामा को मार्क्सवादी कहने में व्यस्त है.  यह मेककार्थिज्म की लंबी विरासत है. हम इस स्थिति को तस्लीम नहीं करते कि मेककार्थिज्म का इस देश पर कितना गंभीर असर है और 1950 से पहले की स्थिति को दोबारा प्राप्त करना कितना मुश्किल है .

“लेकिन कुछ स्थान हैं, जहाँ मैं खुलकर बोल सकता हूँ. वहाँ समाजवादी वर्कर पार्टियाँ हैं और रेवोलुशनरी कम्युनिस्ट पार्टी है. उनका न्यूयार्क में बुक-स्टोर है और मैं कई बार वहाँ जाता हूँ और बातचीत करता रहता हूँ. लेकिन वहाँ, मार्क्स का पूर्ण रूप से पुन:मूल्यांकन हो रहा है. 30 वर्ष पहले यह बड़ा हठधर्मी और कट्ठ्मुल्ला था. लेकिन अब यह बहस और बातचीत के लिए अधिक खुल्ले मैदान की तरह है. और इस अर्थ में, मैं उम्मीद करता हूँ कि एक और मार्क्सवाद, एक और कम्युनिज्म संभव है.

परन्तु फिर भी, अगर यह सच है कि मार्क्सवाद पर अब तत्परता से बहस होती है, क्या लोगों के रवैये में, निश्चित रूप से, इसके परिणाम या इसके अनीश्वरवाद संबंधी, न्यूनीकरण नहीं रहा है ?

“आप नहीं जानते कि अमेरिका में तेज़ी से बड़ा होता हुआ धार्मिक ग्रुप कौनसा है ? वे मुझे सवाल करते हैं. मोर्मनों का. अनीश्वरवादी ? उनकी असीम वृद्धि हुई है. मुझे नहीं पता कि आपने इसपर ध्यान दिया है. लेकिन ओबामा ने अपने उदघाटन भाषण में सभी धर्मों का ज़िक्र किया और अनीश्वरदियों को भी शामिल किया. पहली बार. और वह जानता है कि वह क्या कर रहा है. क्योंकि बहुत से इन्डिपेनडेंट भी अनीश्वरवादी हैं. एक अनीश्वरवादी लहर उदय हो रही है. धार्मिक रूढ़ीवाद चिंतनीय है लेकिन इसकी स्थिति अल्पसंख्यक की है. अधिकतर धर्म रेडिकल लेफ्ट विंग या रेडिकल राईट विंग हैं और इस प्रकार का विचार कि अमेरिका में धर्म केवल रुढ़िवादी हो सकता है, बहुत अनुपयुक्त लगता है. पादरियों का एक विंग है जो कह रहा है कि हमें सामाजिक असमानता और ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ कुछ करना चाहिए. इसलिए पादरियों की लहर एकतरफा नहीं है.

अंतिम क्षणों में, ICA में, अपने प्रकाशकों से मिलने की हड़बड़ी से पहले, वे और मैं अकेले रह गये. मैंने उन्हें, उनके व्याख्यान और उनकी 75 वर्ष की अवस्था में भी, अपने विषय प्रति, नौजवान अकादमियों के मुकाबले अधिक प्रत्यक्ष तत्परता के लिए धन्यवाद कहा. इसीसे,  एक और सवाल निकल आया. हालाँकि मैं जानता था कि उनकी स्वयं की न्यूयार्क शहर की ‘सिटी यूनिवर्सिटी’ रेडिकल विचारकों के लिए कुछ-कुछ सुरक्षित सा ठिकाना मुहैया करवाने के लिए प्रसिद्ध रही है , लेकिन क्या उन्हें इस तरह का खतरा महसूस नहीं होता कि, ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों की अपेक्षा उनके विश्वविद्यालयों का रुझान ज्यादा मैनेजमेंट वाला होता जा रहा है जोकि बड़े व्यवसाय या राज्य से जुडा हुआ हो ?

” हाँ, सही है. और खतरा दो तरह से आता है. एक तो सीधे-सीधे दमन द्वारा. परन्तु जो दूसरा और महत्वपूर्ण खतरा है वह यह कि वे अकादमियों से विश्विद्यालय के लिए अधिक धन कमाने की मांग रखते हैं. मेरे एक डीन हैं जो कह रहे हैं कि मैं अधिक धन अर्जित नहीं कर पा रहा हूँ. उनका कहना है कि जहाँ तक धन का सवाल है, मैं बेकार हूँ. इसलिए मैंने उनसे पूछा कि मैं क्या करूँ ?  क्या मुझे जनरल मोटर्स द्वारा मुहैया करवाए गए फंडों से मार्क्सवादी अध्ययन के लिए संस्थान खड़ा करना चाहिए ? और डीन ने कहा, ” हाँ, यह अच्छा विचार है. अगर आप यह सब कर पायें तो मैं आपका समर्थन करूंगा . “

बाहर उनका इंतजार करती हुई टैक्सी की ओर बढ़ते हुए, वे अब भी, मंद-मंद मुस्करा रहे थे.

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पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

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हार्वे की ओर इस कशिश के पीछे कुछ और भी कारण हैं. सावधानीपूर्वक तराशी हुई उनकी दाढ़ी और भले चचा जैसे रूप-रंग में, वे, काफी हद तक, एक भद्र क्रांतिकारी जैसे दीखते हैं. वे बेमिसाल वाक्पटुता के मालिक हैं. मार्क्सवाद की मौजूदा प्रासंगिगता पर उनकी पुस्तकें और व्याख्यान – अढाई लाख से अधिक जिज्ञासू विद्यार्थियों द्वारा उनके इंटरनेट पर उपलब्ध पूंजी पर व्याख्यानों को डाउनलोड किया जाना – एक तरह का साहित्यिक उत्साह और मार्क्स को उनकी श्रेष्टता के साथ  आह्वान करने के विश्वास का भाव. वे उस वक्त विशेषरूप से अकाट्य होते हैं जब वे पूंजीवाद का, अनंत प्रवाह के रूप में, वर्णन करते हैं, कि कैसे यह निरंतर अपनी रुकावटों को पार कर जाता है, जैसे ही इसे मुनाफा कमाने के नये अवसर मिल जाते हैं.इसे एक उपमा ही कहेंगे कि वे सत्रहवीं सदी के अपने हमनाम ‘विलियम हार्वे’ को प्रसंतापूर्वक इस बात का श्रेय देते हैं कि कैसे वे  शरीर में खून को प्रणालीबद्ध रूप से दौड़ता हुआ दिखाया करते थे. यहाँ उसी उपमा को काम करते हुए देखा जा सकता है.

“एक तरफ अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं और क्रेडिट के फेरीवाले जौंक की भांति विश्वभर के लोगों का ‘ढांचागत समन्वय’ कार्यक्रमों और हर तरह की तिकडमों ( जैसे क्रेडिट कार्ड की फीस का एकदम दोगुना हो जाना ) द्वारा जितना खून चूस सकते हैं,चूसते रहते हैं – कोई फर्क नहीं पड़ता के वे कितने गरीब हो चुके हैं. दूसरी और केन्द्रीय बैंक अपनी अर्थव्यवस्थाओं में बाढ़ ले आते हैं और ग्लोबल बॉडी पोलीटिक में इस उम्मीद के साथ कि इस तरह के आकस्मिक आधानों से वह रोग ठीक हो जायेगा जिसे रेडिकल रोगनिदान और हस्तक्षेप की जरूरत है,  अत्यधिक तरलता का विस्तार कर देते हैं.

सभी मार्क्सवादियों की भांति, डेविड हार्वे भी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच मौज-मस्ती करते हैं. जैसेकि उन्होंने अपने व्याख्यान के बाद मेरे साथ अपने इन्टरवियू में बताया, ” मैं द्वन्द विज्ञानी हूँ. समाज में मौजूद विसंगतियों की खुदाई करने में मेरा विश्वास है. और मैं उनको प्रगतिशील बदलाव की गति के मार्ग के लिए प्रयोग करता हूँ. यह चिंतन और व्याख्या करने का तरीका है, जिसे प्रयोग में लाना बड़ा ही आसान है, अगर आप इसका प्रयोग इस तरह से करें कि लोग इसके साथ स्वयं को अभेद पायें बजाय इसके कि आपको कहना पड़े कि इसे समझने के लिए आपको हेगेल के तीनों और मार्क्स  के चारों खण्डों का अध्ययन करना पड़ेगा. बढ़िया नाटक, हेलमेट ( शेकस्पियर का एक नाटक ) की संरचना द्वंदात्मक है. अगर ऐसा न होता तो यह बहुत उबाऊ होता. और यही कारण है कि मुझे इतिहास और ऐतिहासिक बदलाव बहुत आकर्षित करते हैं.

अपनी [RSA ] के साथ बातचीत और अपनी उम्दा पठनीय पुस्तक में हार्वे, थेचरवाद के वर्षों के दौरान, नवउदारीवादी क्रांति से पैदा हुई विसंगतियों पर ,लुत्फ़ उठाते हैं. इससे पहले पूंजीवाद की समस्याओं को पूंजी के संबंध में श्रम की शक्ति को रखकर परिभाषित किया जाता था. नए यूनियन विरोधी विधान और ग्लोबल आउटसोर्सिंग के विकास, जिससे पूंजीपति अविकसित देशों की भोली-भाली जनता के श्रम को निचोड़ सकें, द्वारा संगठित श्रम को पीछे हटने के लिए मजबूर करके ही मुनाफे संभव हो सकते थे. परन्तु इसके तुरंत बाद एक नयी समस्या खड़ी हो गयी. अब, चूँकि वास्तविक उजरत बहुत घट गयी थी, पूंजीवाद द्वारा उत्पादित वस्तुओं को मजदूर वर्ग द्वारा खरीदना किस प्रकार संभव हो सकता था ? इसका हल आसान क्रेडिट में ढूंढा जाने वाला था.

क्रेडिट का अधिकतर हिस्सा, आवास बाज़ार में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक नयी समस्या थी. इस कर्ज का अधिकतर भाग आवास बाज़ार को ईधन मुहैया करवाने के रूप में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक और विरोधाभास था. एक तरफ बैंकों ने बिल्डरों को क्रेडिट की लंबी-लंबी स्कीमें थमा दी ताकि वे और अधिक घरों का निर्माण कर सकें. और उसी वक्त, उन्हीं बैंकों ने, उन लोगों को कर्ज दे दिया जो इस नयी खड़ी की गयी संपत्ति को खरीदना चाहते थे. यह पोंजी स्कीम – एक निवेश संबंधी घोटाला जिसमें शुरू के निवेशकों को मिलनेवाला तथाकथित लाभ नए जुडनेवाले निवेशकों के फंडों से सीधा प्राप्त हो जाता है – का सटीक उदाहरण था. अन्य सभी पोंज़ी स्कीमों की भांति, पूरी ईमारत उस वक्त भरभराकर गिर गयी जब निवेशकों ने नकदी वसूलने का फैसला किया.

लेकिन हम इतने अधिक लोगों की उस क्षेत्र में, जो उदाहरणतय, मैन्युफेक्चरिंग जैसे क्षेत्र में निवेश के मुकाबले संदिग्ध हो, में निवेश की इच्छा की किस प्रकार व्याख्या करेंगे ? और यही है वह जहाँ, हम हार्वे के विश्लेषण की गरी की झलक पाते हैं. वे तर्क देते हैं की बीतें दिनों वित्तीय संकटों में हुए प्रवर्धनों को उत्साहित करने के लिए जो चीज थी, वह थी, पूंजीवाद की तीन प्रतिशत की मिश्रित दर से वृद्धि की प्रतिबद्धता. बीते समय में, सीमित विश्व में जिसमें इतनी अधिक अविकसित मंडियां हों , अमेरिका और ब्रिटेन के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना संभव था. लेकिन अब जबकि चीन और भारत भी उसी दर या उससे भी अधिक दर से विकसित हो रहे हैं, पूंजीवादी उद्यमों के लिए अपने बेशी-मुनाफों का निवेश करने का क्षेत्र सिकुड़ रहा है. वर्तमान समय में, £1.5 ट्रिलियन नए निवेश की खोज में पड़े हैं. २० वर्षों के समय में, वे £ 3 ट्रिलियन हो जायेंगे. इसलिए उसका अनुसन्धान हुआ, जिसे हार्वे ‘फ़र्ज़ी मंडियां’ : व्युत्पादन (derivatives ) की मंडियां, भविष्य में व्युत्पादन के व्युत्पादन और कार्बन  ट्रेडिंग कहना पसंद करते हैं. शुरू में, ये इनमें निवेश करनेवालों को, उद्योग में निवेश की तुलना में अधिक प्रतिलाभ देने का वायदा करते है लेकिन वे, जैसाकि हमने अपने दम पर देखा है, अंतिम रूप में, भ्रम साबित होते हैं .

जैसे-जैसे [RSA ] के श्रोताओं की ध्यान-मुद्रा साफ़ होती जाती है, इस दलील से प्रभावित न होना मुश्किल लगता है और विशेषरूप से तब, जब इसे, पिछले बारह महीनों के दौरान अन्य अर्थशास्त्रियों की टूटी-फूटी टिप्पणियों के कोंट्रासट में रखते हैं. परन्तु मैं अपनी उस वक्त की बेचैनी को दबा नहीं सका जब हार्वे  मौजूदा स्थिति पर रेडिकल हल पेश करने की और बढ़ रहे थे, जहाँ ऐसा लगता था कि यह ताज़ा पूंजीवादी संकट इसके कफ़न के लिए अंतिम कील साबित होगा. मैं इसलिए चौकस था कि इस तरह की भविष्यवाणियाँ पहले भी कई बार हुई थीं. पूंजीवाद, हमें बहुत से सिद्धान्तकारों द्वारा बताया गया था , 1973 के तेल संकट,या IMF के 1976 के संकट , या 1987 के काले सोमवार के साथ या 1992 के काले बुधवार के साथ, अपने चरम बिंदु पर पहुँच गया था. परन्तु भविष्यवाणियाँ फेल साबित हुईं. बार-बार पूंजीवाद, जीवित रहने में, सफल रहा. इसलिए क्या मौजूदा स्थिति में कुछ ऐसा है जो वास्तव में अलग हो ?

ऐसी कोई बात नहीं है जिसने मुझे परेशान किया हो. हार्वे इतनी तैयारी में हैं कि वे पूंजीवाद द्वारा संकटों पर काबू पाने और कुशलतापूर्वक मुनाफा कमाने के नए रास्तों की खोज को तस्लीम नहीं कर पाते. बीते समय में, इसने अपने इस मकसद को हासिल करने के लिए कई अतार्किक तरीके खोजे थे. और इसने ऐसा ही किया, जैसे हार्वे अपनी पुस्तक ‘पूंजीवाद की पहेली’  [ The Enigma of Capital ] में इसके द्वारा युद्ध के रास्ते से, परिसम्पत्तियों के अवमूल्यन से, उत्पादक क्षमता के अपकर्ष से, अपसर्जन और अन्य सृजनात्मकता की तबाही द्वारा, अपनी समस्याओं का हल करता रहा है. इन सभी समाधानों से चौंकानेवाले परिणाम निकले हैं. मानव जीवन अस्त-व्यस्त और जहाँ तक कि तबाह हो जाता है, सारा कैरियर और जीवनभर की उपलब्धियां खतरे में पड़ जाती हैं, गहरे पैठ कर चुके विश्वास को चुनौती मिलती है, रूह घायल हो जाती है और मानव के गौरव का परित्याग कर दिया जाता है. सृजनात्मक तबाही शानदार, सुन्दर, बुरे और अच्छे – सभी पर भारी पड़ती है. संकट, हम निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं, ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’ है.

परन्तु निसंदेह, उनकी जिज्ञासा यह दिखाने की है, कि वर्तमान संकट पिछले सभी संकटों, जिनपर काबू पा लिया गया था, की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है और उनकी जिज्ञासा यह सुझाव देने की होती है कि प्रत्येक समझदार व्यक्ति के पास ‘पूंजीवाद विरोधी अभियान’ में शामिल होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है, लेकिन फिर भी, वे भविष्यवेत्ता बनने से बहुत दूर हैं.

क्या पूंजीवाद वर्तमान सदमे से बच निकलेगा ? हाँ, बेशक. लेकिन हार्वे विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि इसकी भारी कीमत चुकानी होगी. लोगों की अधिकतर आबादी को अपनी मेहनत के फल को उन्हें देना होगा, जो सत्ता में हैं, अपने बहुत से अधिकारों और अपने साधनों की सख्त मुशक्त से हासिल की गयी कीमत ( आवास से लेकर पेंशन फंड, हर वस्तु) का त्याग करना होगा और प्रचुर मात्रा में, परिवेशी अपकर्ष का दर्द झेलना होगा. केवल इतना ही नहीं कि अपने जीवन स्तर में कटौती बल्कि इसका अर्थ होगा बहुत से गरीब लोग, जो पहले ही जीवित रहने का संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए भूखमरी. थोड़े से राजनीतिक दमन से कहीं अधिक, आनेवाली अशांति का गला घोंटने के लिए, पुलिस हिंसा और मिलट्री राज्य नियंत्रण की आवश्यकता पड़ेगी. जिस वक्त,  हार्वे यह सब कह रहे थे, ठीक उसी वक्त, एथेन की गल्लियों में लड़ाई बढ़नी शुरू हो गयी थी.

यद्यपि, इस सब का मतलब निराश होने से नहीं है. संकंट विरोधाभास और संभावनाओं के वे क्षण होते हैं, जिनसे विकल्प के तरीके, समाजवादी और पूंजीवाद विरोधी, सभी जन्म लेते हैं.

अगली अंतिम किश्त में समाप्य

पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

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इससे पहले, लिंक जोड़ने के लिए देखें : वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पोंजी स्कीम जैसी है ?

विश्व आर्थिक मंदी ने एक बार फिर सारी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को मार्क्स की ओर मुड़ने के लिए मजबूर कर दिया है.  ‘द्वंदात्मक भौतिकवादी’ भूगोलवेत्ता ‘डेविड  हार्वे’ जो चालीस वर्षों से मार्क्स की पूंजी पढ़ा रहें हैं और जिन्हें पहली बार गंभीरता से लिया जा रहा है, से ‘लॉरी टेलर’ की मुलाकात पर आधारित यह आलेख ‘http://newhumanist.org.uk’ से लिया गया है.

डेविड हार्वे तुरंत अपनी तरंग में आ जाते हैं. “पूंजीवाद” वे रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स ,  लन्दन के हाल में अपने श्रोताओं से कहते हैं, “कभी भी अपने संकटों का समाधान नहीं करता. यह उन्हें केवल एक स्थान से दूसरी स्थान पर ले जाता है. ब्राज़ील से रूस, से अर्जन्टीना, से अमेरिका, से ब्रिटेन, से यूनान”.

जैसे ही वे इन बार-बार आनेवाले संकटों,  और विशेषरूप से, 1970 के बाद से उनकी बारंबारता में नाटकीय बढौतरी के कारकों का विश्लेषण करना शुरू करते हैं, मैं अपनी नज़र, श्रोताओं पर डालता हूँ. मैं अपनी चैयरमेन की सीट से देख सकता हूँ कि व्याख्यान सभागार खचाखच भरा हुआ है. कोई भी कुर्सी खाली नहीं है और लगभग दर्जन एक श्रोता गलियारे में खड़े हुए हैं. रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स [RSA]   के लंच-समय के व्याख्यानों में, अक्सर, अच्छी हाजिरी होती है लेकिन क्या कमरे में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति ने इस बात को तस्लीम कर लिया था कि जो कुछ वे आज इस वक्ता से सुनने जा रहे हैं, वह आज के पूंजीवाद का विश्लेषण है जो मार्क्स से शुरू होकर मार्क्स पर ख़त्म होता है, ऐसा विश्लेषण जोकि कई प्रकार से वैसा ही है, जैसा मैंने ७० और ८० के दशक में सैंकड़ों नीरस सभाओं में कट्टर समाजवादियों से सुना था.

कोई कारण नहीं था कि मैं फिक्रमंद होता. इस पर भी कि हार्वे ने तुरंत मार्क्स के प्रति अपना कर्ज तस्लीम किया और बार-बार वे मार्क्स को उद्घृत करते रहे. फिर भी, तीस मिनट के व्याख्यान में, किसी भी क्षण,  उनके अमीर श्रोताओं में बेचैनी  का कोई चिह्न नहीं था और समापन पर, प्रश्नौतर काल में, केवल एक श्रोता का सुझाव था कि मार्क्स को छोड़कर कुछ भी, हमारे मौजूदा आर्थिक संकट को समझने के लिए, सबसे बढ़िया हो सकता है.

निसंदेह, उस आर्थिक सिद्धांत को, जिसे सोवियत यूनियन के ढह-ढेरी हो जाने पर, भले ही अतार्किक रूप से ही सही, इतिहास में जगह दे दी गयी थी, स्वीकार करने की चाहत के पीछे एक बढ़िया कारण था. बिलकुल सीधी सी बात है कि विश्वभर के अर्थशास्त्रियों की,  इतिहास में अभी-अभी  घटित हुई घटनाओं पर एक भी संतोषजनक व्याख्या देने की पूर्ण असक्षमता. इसी तथ्य को श्रोताओं के सामने सही और साफ-साफ तरीके से प्रस्तुत करने में, हार्वे पूरी तरह से माहिर हैं.

अपनी ताज़ा पुस्तक, ‘पूंजी की पहेली और पूंजीवाद के संकट’ की प्रस्तावना में, वे यह कहानी सुनाते हैं, ” जब प्रतापी महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने नवंबर 2008 में, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के अर्थशास्त्रियों से यह पूछा कि क्यों नहीं वे मौजूदा आर्थिक संकट की आमद को देख पाए ( एक ऐसा सवाल जोकि निसंदेह प्रत्येक व्यक्ति की जबान पर था, लेकिन जिसे कोई सामन्ती शासक ही, इस तरह, हलके अंदाज में पूछ सकता था और उत्तर की अपेक्षा पाल सकता था ) तो अर्थशास्त्रियों के पास, देने के लिए, कोई जवाब तैयार नहीं था. छह महीने के मुख्य नीति निर्धारकों के साथ मिलकर किये गए अध्ययन, जुगाली और गहन विचार-विमर्श  के बाद, ब्रिटिश अकादमी के गलियारे में एकत्रित हुए सभी अर्थशास्त्रियों ने, एक साझे पत्र में, प्रतापी महारानी के सामने स्वीकार किया कि वे ,किसी हद तक, उस दृष्टि को खो चुके हैं जिसे वे ‘प्रणालीबद्ध जोखिम’ के नाम से जाना करते थे.

हार्वे, इस एपिसोड की स्विफटियन विडंबना का रस्सावदान करते हुए कहते हैं, “शिक्षित अर्थशास्त्रियों की अपनी असफलता पर बहानेबाजी करने की नाकाम कोशिश का यह दृश्य है, उस वक्त, जब वे बुरी तरह से डरे हुए सचेत हैं कि उनमें से किसी ने भी कपडे नहीं पहने हुए हैं. परन्तु यह सब उनको (हार्वे को) मार्क्स को जगाने का पूर्ण तरीका मुहैया करवाता है. किंकर्तव्यविमूढ़, वे अर्थशास्त्री, उन छः महीनों के लंबे अन्तराल के बाद, अंत में, यह पहचान गए थे कि उनकी असफलता का वास्तविक रहस्य क्या था.  जर्नलिस्टों और टिपण्णीकर्त्ताओं द्वारा पेश किये गये अधपक्के सिद्धांतों को भूल जाईये.  ताज़ा संकट, हार्वे अपने [RSA] के भावविभोर श्रोताओं से कहते हैं, किसी मानवीय कमजोरी या अप्रयाप्त वित्तीय बन्दोबस्त या किन्सियाई दृष्टि को त्यागने से या अंग्रेजों या अमेरिकियों या यूनानियों की विलक्षण सांस्कृतिक असफलताओं के कारण सिर के बल खड़ा नहीं हुआ है. यह पूंजीवाद की प्रणालीबद्ध असफलता है.  और इस प्रकार की असफलता पर विश्वसनीय लगने वाली केवल एक ही व्याख्या है, जिसे बूढ़े भले मार्क्स में खोजा जा सकता है.

[RSA] द्वारा तैयार की गयी इस कार्टून फिल्म की पार्श्व-ध्वनी, स्वयं हार्वे के उपरोक्त व्याख्यान का ही ऑडियो है.

शेष अगली किश्त [पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’] में