assimilating the legacy of the proletariate

डार्विन के जन्मदिन पर विशेष

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जीव विकास का सिद्धांत – डार्विन और वाद-विवाद

डॉ अमृत

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

डार्विन की उपलब्धियां

डार्विन के आलोचक

नव-डार्विनवाद

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

बीते वर्ष 2009 के 12 फरवरी के दिन, मानव  प्रकृति विज्ञानी चार्ल्स डार्विन का दो सौवां जनमदिन था और संयोगवश 150 साल पहले ही नवम्बर 1859 में ही मनुष्य की वैज्ञानिक समझ का एक  मील पत्थर चार्ल्स डार्विन द्वारा लिखित पुस्तक ‘ जीवों की उत्पत्ति’ छपी थी । इन दोनों ही ऐतिहासिक  दिनों की याद को समर्पित 2009 का वर्ष, डार्विन के सिद्धांत को आम लोगों में प्रचारित करने और इस पर हो रहे हमलों का जवाब देने के लिए पूरी दुनिया में मनाया गया । इन कार्यक्रमों की समाप्ति 12 फरवरी 2010 को होगी । इसके अलावा पिछले कुछ सालों में 12 फरवरी का दिन डार्विन दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है ।

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के शहर सर्युस्बरी में हुआ । उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे और दादा इरासमस डार्विन एक प्रकृति दार्शनिक, डॉक्टर और कवि थे । पिता की इच्छा थी कि डार्विन डॉक्टर बनें लेकिन उनकी रूचि प्रकृति विज्ञान में थी । 1828 में पिता ने डार्विन को पादरी बनाने के लिए क्राईस्ट कॉलेज, कैम्ब्रिज में दाखिल करवा दिया  । यहाँ उनका मेल वनस्पति विज्ञान के प्रोफैसर स्टीवन हैन्स्लो से हुआ और वहां काम करने लगे । डार्विन पहले ही लामारक के जीव विकास सम्बन्धी विचारों को पढ़ चुके थे और अब इनकी रूचि और भी बढ़ गयी । इसी दौरान वह प्रकृति का ध्यान से निरीक्षण करने में लग गये और कीड़े मकौड़े तथा पौधे एकत्रित करने में जुट गये । 1831 में उनकी पढाई पूरी हो गयी ।

इंग्लैण्ड में विभिन्न स्थानों पर प्रकृति का निरीक्षण करने के लिए घूमते-घूमते, उनके प्रोफेसर हैन्स्लो ने, उनकी सिफारिश एक सर्वेक्षण करने जा रहे जहाज पर बतौर प्रकृति विज्ञानी कर दी । डार्विन के पिता नें इनकार कर दिया, लेकिन आखिरकार डार्विन ने किसी न किसी तरह उन्हें अपनी यात्रा का खर्च उठाने के लिए मना ही लिया और 27 दिसंबर, 1831 को डार्विन एच. एम. एस. बीगल नामक जहाज पर सफ़र के लिए निकल पड़े । किसे पता था कि यह सफ़र जीव विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति लाने वाला है और पृथ्वी पर मौजूद जीवों और पौधों की उत्पत्ति और विभिन्नता के बारे में  मनुष्य की सदियों पुरानी अवधारणाओं को सदा के लिए बदलने वाला है ।

अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन नें तथ्यों का भण्डार इकट्ठा  कर लिया और अक्तूबर 1836 में इंग्लैंड वापिस आने पर अध्ययन में जुट गये । उनके द्वारा पृथ्वी की सरंचना संबंधी लिखे गये लेखों की वजह से , वह अपनी यात्रा से लौटने से पहले ही काफी प्रसिद्ध हो चुके थे । वापसी पर उनके संबंध उस समय के कई बड़े-बड़े विज्ञानियों से बन गये और वे कई साईंस सोसायटियों के मैम्बर चुने गये । अपने सफरनामे के बारे में किताब लिखते वक्त बहुत ज्यादा मेहनत के दबाव के चलते 1838 में वे बीमार हो गये और डॉक्टरों के कहने पर उन्हें लन्दन वापिस अपने पिता के घर जाना पड़ा । पर यहाँ भी उनकी खोजी रूचि कायम रही । वह अपना ज्यादा समय दुधारू पशुओं को पालने वाले किसानों के साथ बातें करते हुए और उनके द्वारा पशुओं की नसल सुधार के कामों का निरीक्षण करते हुए बिताते थे । हृदयस्पंदन और जठरीय रोग के दर्दों की ये बीमारी इसके बाद डार्विन का उम्र भर पीछा करती रही ।

अपने अध्ययन के आरंभिक वर्षों में ही, डार्विन जीव विकास संबंधी अपनी दो महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं का विकास कर चुके थे । ये दो अवधारणाएं- ‘ प्राकृतिक चयन’ (Natural Selection) और ‘योग्यतम का बचाव’ (Survival of the fittest) थी । डार्विन की अवधारणाओं ने यह पक्के तौर पर सिद्ध कर देना था कि प्रकृति पल-पल बदलती है । यह अपने आरम्भकाल से एकसमान नहीं रही जैसाकि उस समय की धार्मिक शिक्षाओं में बताया जाता था । डार्विन को पता था कि उसकी खोजों का समाज के कठमुल्लों की तरफ से भयंकर विरोध किया जायेगा । कुछ इस डर की वजह से और कुछ अपनी खोजों को प्रमाणिक तौर पर और मजबूत बनाने के लिए प्रकृति में से तथ्य इकट्ठे करने और अध्ययन करने के कारण डार्विन 1859 तक अपनी इस क्रान्तिकारी खोज को प्रकाशित न कर सके ।

1856 के शुरुआती दिनों में चार्ल्स डार्विन के दोस्त चार्ल्स लिल को एक और विज्ञानी अल्फ्रेड वालेस का पत्र मिला जिस में वालेस ने डार्विन की अवधारणाओं के साथ मिलती जुलती बातें कहीं । इसके बाद लिल ने डार्विन को अपनी खोजों को छपवाने के लिए कहा और उसके कहने पर डार्विन ने, जीवों की प्रजातिओं की उत्पत्ति’ (Origin of Species) से सम्बंधित एक खोज पत्र लिखना शुरू किया । जून, 1858 में डार्विन को वालेस का पत्र मिला जिसमें उसने ‘प्राकृतिक चयन’ की धारणा का  जिक्र किया । 1859 में 1 जुलाई के दिन , डार्विन और वालेस ने इकट्ठे ही अपनी खोजों के बारे में खोज पत्र पढने का निर्णय किया, पर अपने बेटे की मृत्यु की वजह से डार्विन इसमें शामिल न हो सके । आखिरकार नवम्बर में डार्विन की पुस्तक’ जीवों की उत्पत्ति’ (Origin of Species) छप कर लोगों में पहुँच गयी ।

जैसाकि उम्मीद ही थी, किताब की काफी प्रशंसा हुई और कुछ ही दिनों में इसके पहले संस्करण की सारी प्रतियाँ बिक गयीं । वैज्ञानिकों में बहुतों ने डार्विन की उपलब्धियों के साथ सहमती प्रकट की, चाहे कुछ वैज्ञानिकों ने डार्विन की अवधारणाओं का सख्त विरोध भी किया । सबसे ज्यादा भयानक विद्रोह धार्मिक कठमुल्लों और कट्टरपंथियों ने किया और डार्विन के भद्दे कार्टून बना कर बांटे गये । जब डार्विन नें यह रहस्योदघाटन किया कि मनुष्य का विकास बंदरों की एक नसल एप (Ape) से हुआ है तो इसका प्रचंड विरोध हुआ । डार्विन का चेहरा बन्दर के धड़ के ऊपर लगा कर उसकी खिल्ली उड़ाई गयी । लेकिन उनकी खोजों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कट्टरपंथी चर्च ने अब उसकी खोजों को अपने धार्मिक लबादे में फिट करना शुरू कर दिया ।

अपने खोज कार्य जारी रखते हुए, डार्विन ने इसके बाद ‘मनुष्य की उत्पत्ति’ (Descent of Man) और अन्य कई किताबें लिखीं । 19 अप्रैल, 1882 के दिन 73 वर्ष की उम्र में इस महान विज्ञानी की मृत्यु हो गयी जो अपने पीछे छोड़ गया मानवता को अपनी बेमिसाल उपलब्धियां ।

डार्विन की उपलब्धियां

एच. एम. एस. बीगल के साथ अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन ने अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्य इकट्ठे किये । गैलापैगोस टापू पर उनका ध्यान घरेलू चिड़ियों जैसे पक्षियों की एक नस्ल पर गया । इन पक्षियों की शक्ल-सूरत आपस में काफी मिलती जुलती थी और ये पक्षी मुख्य धरती पर पाए जाने वाले इसी किस्म के पक्षियों से भी मिलते जुलते थे । पर टापुओं पर रहने वाले पक्षी कीड़े खाकर गुजारा करते थे जबकि दक्षिण अमेरिका की मुख्य धरती वाले पक्षी पौधों के बीज खाते थे । कीड़े खाने वाले पक्षियों की चोंच बीज खाने वाले पक्षियों से लम्बी थीं । अतः डार्विन ने यह परिणाम निकला कि किसी कारणवश यह पक्षी मुख्य धरती से टापुओं पर आ गए । बदलते हालत में जीवन निर्वाह के लिए उन्हें कीड़ों पर निर्भर होना पड़ा । लेकिन आम तौर पर कीड़े वृक्षों के तनों में गहरे छुपे होते थे, अतः समयानुसार टापुओं पर लम्बी चोंच वाले पक्षी अस्तित्व में आ गए ।

इसी तरह उन्होंने दक्षिणी अमेरिका के तट के साथ साथ एक दक्षिण अमेरिकी जानवर ‘सलौथ’  के अवशेषों का अध्ययन किया । इन आलोप हो चुके जानवरों का आकार हाथी जितना था, परन्तु उस समय के अमेरिकी सलौथों का आकार काफी छोटा था, डार्विन ने अपने अध्ययन से यह परिणाम निकला कि छोटे आकार के सलौथ अलोप हो चुके सलौथों से ही विकसित हुए हैं ।

इस तरह डार्विन ने उस समय तक खोजे गए विभिन्न अवशेषों का अध्ययन किया । उनके समय तक अवशेषों पर खोज करने वाले वैज्ञानिकों को धरती कि सतह पर चट्टानों की अलग अलग परतें मिलीं और प्रत्येक परत में अलग अलग किस्म के जानवरों और पौधों के अवशेष मिले । डार्विन ने अपने अध्ययन से यह जाना कि नीचे की परत से ऊपर की तरफ आते हुए, इन परतों में जानवरों और पौधों के विकास का सिलसिला सीधा-सीधा नजर आ रहा था । उस समय तक यह भी पता लग चुका था कि चट्टानों की एक परत जमने में लाखों साल लग जाते हैं । इससे डार्विन का यह निश्चय पक्का हो गया कि धरती पर जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहा है, और यह बदलता रहा है । डार्विन इस नतीजे पर भी पहुँच गए कि जीवन की उत्पत्ति किसी सरल रूप में हुई और इस सरल रूप से विकसित होते हुए जीवों और पौधों की अलग अलग प्रजातियाँ अस्तित्व में आयीं और इस प्रक्रिया में लाखों वर्ष लगे।  आज वैज्ञानिक यह जान चुके हैं कि धरती की उम्र लगभग 4.5 बिलियन वर्ष है । जीवन के प्रथम प्रारूप 3.5 मिलियन वर्ष पहले अस्तित्व में आये । मनुष्य का जनम कोई एक लाख वर्ष पहले ही हुआ है ।

अपने पुश्तैनी घर में रहते समय डार्विन ने देखा कि किसान ज्यादा दूध देने वाले पशुओं का चयन करके और उनका प्रजनन करवाकर ज्यादा दूध देने वाले पशुओं की गिनती बढ़ा लेते हैं । उन्होंने इसको ‘कृत्रिम चयन’ (Artificial Selection) का नाम दिया । लेकिन उन्होंने इससे आगे चलते हुए अपने पास उपलब्ध अन्य तथ्यों के आधार पर यह सिद्धांत दिया कि प्रकृति में भी इस तरह की ‘प्राकृतिक चयन’ की प्रक्रिया घटित होती है ।

इसको एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है । एक ख़ास किस्म का उड़ने वाला कीड़ा पक्षियों द्वारा खाया जाता है । इस कीड़े की दो किस्में हैं – एक सफ़ेद पंखों वाला जो ज़हरीला नहीं है और दूसरा चमकीले रंगों वाला ज़हरीला कीड़ा । धीरे धीरे पक्षी पंखों के रंग से ज़हरीले कीड़े को पहचानने लगते हैं और उसे खाना बंद कर देते हैं । शुरू में चमकीले पंखों वाले कीड़ों की गिनती काफी थी, लेकिन कुछ ही पीढ़ियों बाद चमकीले रंग वाले कीड़ों की बहुतायत हो जाएगी क्योंकि उनके पास प्रजनन करने के और अपने से आगे नए कीड़े पैदा करने के मौके सफ़ेद पंखों वाले कीड़ों से तुलनात्मक रूप में ज्यादा हैं । इस तरह चमकीले पंखों वाले कीड़े प्राकृतिक चयन के ज़रीये बहुतायत में आ जाते हैं ।

इस तरह डार्विन ने देखा कि प्रकृति में जीव जन्तु बहुत ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं लेकिन प्रत्येक जीव प्रजाति की संख्या को नियंत्रण में रखने के लिए किसी तरह का कोई नियम होना जरूरी है । यहीं से उन्होंने अपने दूसरे, जो कि मुख्य रूप में विवाद का कारण बना, ‘योग्यतम के बचाव’ के सिद्धांत को रूप दिया । उनके मुताबिक वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार सबसे योग्य जीव ‘जिंदा रहने के संघर्ष’ में कामयाब हो जाते हैं और प्रजनन कर पाते हैं और बाकी मर जाते हैं । इस तरह जिंदा रहने के लिए लाभकारी गुण चुनिन्दा रूप में अगली पीढ़ियों में चले जाते हैं ।

इन दोनों सिद्धांतों के आधार पर डार्विन नें यह नतीजा निकाला कि लाभकारी लक्षणों और वातावरण के अनुसार ढलने के लिए जीवों में आये बदलाव, जो कि पीढी दर पीढ़ी जीवों में संचारित हो सकते हों, इकट्ठे होते रहते हैं और समय आने पर एक बिलकुल ही नयी प्रजाति के अस्तित्व में आ जाने का कारण बनते हैं ।

डार्विन के सिद्धांतों की अपनी खामियां भी हैं । लेकिन फिर भी डार्विन के सिद्धांत आधुनिक जीव विकास के सिद्धांत की बुनियाद हैं । उनके दिए गए सिद्धांतों के बिना आज भी किसी जीव विकास के सिद्धांत की कल्पना संभव नहीं  । डार्विन की सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण  देन थी, संसार के सदा-सदा स्थिर रहने वाली अवधारणा का सदा सदा के लिए अंत ! यही बात डार्विन के विरोधियों को सबसे ज्यादा चुभती है ।

इन सिद्धांतों के अलावा डार्विन की मानवता को और भी बहुत महत्त्वपूर्ण और क्रांतिकारी देन है । डार्विन के दोस्त, टॉमस हक्सले नें उस समय दिखाया कि शारीरिक रचना के पक्ष से मनुष्य बहुत हद तक ऐप (Ape) के साथ मिलता जुलता है । 1871 में डार्विन नें अपनी पुस्तक ‘मनुष्य का विकास’ प्रकाशित की । इस पुस्तक में उसने मनुष्य की सांस्कृतिक विकास और मनुष्यों में पाए जाने वाली लैंगिक, शारीरिक, और सांस्कृतिक विभिन्नताओं की व्याख्या के लिए ‘लैंगिक चयन’ का सिद्धांत पेश किया । इस पुस्तक में उन्होंने जोर दिया कि सारे मनुष्य एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं और यह विकास अफ्रीका महांद्वीप में हुआ । उस समय अलग-अलग नस्ल के मनुष्यों को अलग अलग प्रजातियाँ मानने और कुछ नस्लों को दूसरी नस्लों से बेहतर मानने और उनके अलग-अलग तौर पर विकसित होने के सिद्धांतों का काफी बोलबाला था, लेकिन डार्विन के द्वारा एक ही पूर्वज से सारे मनुष्यों के विकास के सिद्धांत को पेश करने के बाद बाकी सिद्धांत धीरे धीरे प्रभावहीन हो गए । डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता अब डी.एन. ए. के अध्ययन से भी हो चुकी है ।

डार्विन के आलोचक

जैसे ही डार्विन नें, बाईबल की अवधारणा, कि धरती की उम्र 6000 साल है और संसार की रचना’ परम परमेश्वर प्रभु’ नें 6 दिनों में और सदा सदा के लिए की थी, पर चोट की और इसको अपनी खोजों द्वारा तीतर-बीतर कर दिया; तो धार्मिक कट्टरपंथियों नें उसके खिलाफ जेहाद छेड़ दी । लेकिन अब समय बदल चुका था, अब मध्य युग का सामंती ढांचा नहीं रहा था, अब पूंजीवादी ढांचा अस्तित्व में आ चुका था, और विज्ञान की जरूरत उसके लिए जिंदा रहने की शर्त था, इसलिए थोड़े ही समय में डार्विन के सिद्धांतों को वैज्ञानिकों की तरफ से मान्यता मिल गयी । अब डार्विन के सिद्धांत को पूंजीवादी प्रबंध को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और उसके क्रांतिकारी अंश को को छुपाने की कोशिशें होने लगीं ।

‘अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष’ और ‘ योग्यतम का बचाव’ नामक डार्विन की अवधारणाओं को पूंजीवादी प्रबंध को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और आज भी इसी प्रकार की दलीलें देने वालों की कमीं नहीं है । लेकिन ये सिद्धांतकार ‘अपने अस्तित्व के लिए सर्वहारा के संघर्ष’ से भी उतना ही डरते हैं जितना जोर ये पूँजीवाद को जायज ठहराने के लिए लगाते हैं । ‘ योग्यतम का बचाव’ के सिद्धांत द्वारा पूंजीवादी शोषकों को जायज ठहराने और अल्पमत द्वारा विशाल बहुमत की लूट को ठीक सिद्ध करने की कोशिशें लगातार होती रही हैं । पर यह राग अलापने वाले जन संघर्ष की जगह शान्तिपूर्ण सुधारों और कानूनी कार्रवाई द्वारा गरीबी ख़त्म करने जैसे भद्दे सिद्धांतों को भी साथ-साथ पेश करते रहते हैं । इन दलीलों के बिना भी देखा जाये तो दूसरे जानवरों और मनुष्यों में बहुत अंतर है । मनुष्य वातावरण के साथ खुद भी बदलता है और उसे भी अपने अनुकूल ढाल लेता है, जबकि यह गुण दूसरे जानवरों में बहुत कम विकसित है । इसके अलावा मनुष्य उत्पादन प्रक्रिया में प्रकृति के साथ संघर्ष करता है और जीवन निर्वाह के लिए औजारों का निर्माण करता है । और चूँकि यह सब सामूहिक रूप में ही संभव है, इसलिए ‘योग्यतम का बचाव’ की अवधारणा मनुष्यों पर लागू ही नहीं होती. और तो और, पूंजीवादी प्रणाली में जब भी इन औजारों की (बहुतायत) हो जाती है तो संकट आ जाता है, फिर बहुतायत होने के बावजूद संघर्ष की अवधारणा की तो इसमें कोई गुन्जाईश ही नहीं रह जाती ।

इससे भी बढ़कर, डार्विन की यह अवधारणा मुख्य तौर पर अलग अलग जीवों की प्रजातियों और किसी जीव प्रजाति की जनसँख्या को कंट्रोल में रखने तक ही सीमित रहती है । पहली सूरत में यह अवधारणा मनुष्यों में आपस में लागू नहीं होती, दूसरी सूरत में , जिन यूरोपीय देशों की जनसँख्या वृद्धि दर शून्य हो चुकी है पूंजीवादी दैत्य वहां भी लोगों को संघर्ष करने के लिए मजबूर कर रहा है । जिन देशों में जनसँख्या बढ़ रही है, वहां डार्विन के योग्यतम के बचाव के सिद्धांत के मुताबिक पूंजीपतियों की संख्या बढ़नी चाहिए, लेकिन हो तो इसके विपरीत रहा है, गरीबों (अयोग्यों) की संख्या बढ़ रही है और पूंजीपतियों की या तो स्थिर है या कम हो रही है ।

चर्च और अन्य धार्मिक कट्टरपंथी, जिनमें सिर्फ इसाई ही नहीं, अन्य सभी धर्मों के पादरी-पुजारी भी शामिल हैं, के विरोध और डार्विन के सिद्धांतों को तोड़-फोड़ कर की गयी व्याख्याओं से भी पूँजीवाद का कुछ नहीं संवर सका । इस सबके बावजूद इस पूंजीवादी प्रबंध को डार्विन के सिद्धांतों और पूरे जीव विकास के सिद्धांत से ही खतरा बना हुआ है । एक बार फिर मध्य-युगीन काले दौर के सिरे से खारिज किये जा चुके गैर-वैज्ञानिक ईश्वरवादी सरंचना के सिद्धांत को नए लबादे में सजा कर लोगों पर थोपा जा रहा है और लोगों में भौतिकवादी वैज्ञानिक नज़रिये की पकड़ को कमजोर करने की कोशिशें हो रहीं हैं । इन सब कोशिशों के पीछे हर तरह के धार्मिक कट्टरपंथी और फासीवादी ताने-बाने से लेकर सरकारों, कोर्पोरेट जगत, और लोक कल्याण प्रपंच रचने वाली संस्थाएं शामिल हैं ।

इस नए प्रचारित किये जा रहे सिद्धांत का नाम है ‘सचेतन सृजन'(Intelligent Design) । इनके ज्यादातर तर्क तो डार्विन के समकालीन विरोधी विलियम पैले (William Paley)  से उधार लिए हुए हैं । इस दलील के अनुसार, जैसेकि किसी जटिल जेब घड़ी या किसी आधुनिक मशीन या कंप्यूटर जैसे यन्त्र बनाने के लिए किसी सचेतन शक्ति यानीकि मानव दिमाग की जरूरत होती है, उसी तरह जैसे किसी बहुत ही जटिल मानव अंग जैसेकि आँख, दिमाग, या अन्य जीव जंतुओं को पैदा करने के लिए या सृजन के लिए भी किसी सचेतन शक्ति की जरूरत है, जोकि इनके अनुसार ईश्वर ही हो सकता है  । यह बिलकुल वैसे ही जैसे कोई कहे कि दूध भी पानी की तरह तरल पदार्थ है इसलिए यह पानी की ही तरह धरती में से नल लगाकर निकाला गया होगा या फिर पानी दूध की तरह किसी गाय-भैंस को दुहने से मिलता होगा । खैर इनके तर्क की थोड़ी और छानबीन करते हैं । घड़ी या मशीन बनाने के लिए बहुत सारे मनुष्यों को इकट्ठे होकर या अलग अलग रहकर औजारों का इस्तेमाल करते हुए और भट्टियों में लोहा पिघलाते हुए श्रम करना पड़ता है, और दूसरी तरफ इनके ईश्वर के औजार और भट्टियाँ कहाँ हैं और वह दिखाई क्यों नहीं देते, तो ये भाग निकलेंगे ।

इसी तर्क को थोडा और आगे लेकर जाइये – घडी, मशीन या कंप्यूटर को बनाने वाला सचेतन मानव  दिमाग बहुत जटिल है, तो इतने जटिल मानव दिमाग को बनाने वाली शक्ति तो और भी जटिल होगी । फिर इस और भी जटिल शक्ति को बनाने के लिए और भी ज्यादा जटिल शक्ति – और इस यह जटिलता का पहाड़ा कभी न ख़त्म होने वाला थोथा तर्क बन जाता है ।

एक और तर्क के अनुसार जीवाणु (Bacteria) को गति प्रदान करने वाले हिस्से फ्लैजिला (Flagella), मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली या उसकी आँख जैसे अंग इतने ज्यादा विकसित हैं कि इनके किसी और कम विकसित रूप से विकसित होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता और अपने कम विकसित रूपों में इनकी कोई उपयोगिता संभव भी नहीं होगी; यह तर्क भी थोथा सिद्ध किया जा चुका है. जैसे कि आँख के विकास की विभिन्न अवस्थाओं के विकसित रूप जैविक संसार में पाए जाते हैं. कीट-पतंगे में आँखों का इस्तेमाल होता है और उससे कम विकसित प्राणियों में भी । इसी तरह गाय-भैंसों की आँखों की बनावट काफी हद तक मनुष्य की आँखों से मेल खाती है, लेकिन उनमें रंग पहचानने की योग्यता नहीं होती, और वे चीज़ों को काले और सफ़ेद रंग की अलग शेड्स में ही देख सकती हैं । लेकिन कोई पागल ही यह कहेगा कि उन्हें आखों का कोई लाभ नहीं या फिर उनकी आँखें बेकार हैं । प्रतिरक्षा प्रणाली भी हर तरह के प्राणी में मौजूद है और फ्लैजिला के विभिन्न स्तरों के विकसित रूप जीवाणु (Bacteria) में पाए जाते हैं । लेकिन जैसेकि प्रत्येक विचारवादी का काम होता है, एक तर्क के प्रमाणित हो जाने के बाद कोई दूसरा कुतर्क ढूँढने की बौद्धिक कसरत में लग जाना । और तो और, इनकी विज्ञान की किताब ‘बाइबल’ में धरती की उम्र 6000 साल बताई गयी है और सृष्टि के सृजन में ईश्वर को 6 दिन लगे. आज के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर धरती की उम्र 4.5 बिलियन वर्ष या इससे भी ज्यादा आंकी गयी है और जीवन की उत्पत्ति के आरंभिक प्रमाण भी 3.5 बिलियन साल पुराने हैं.

एक और काम, जो यह ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांतकार करते हैं, वह है- वैज्ञानिक सिद्धांतों में किन्हीं छोटी सी त्रुटियों को ढूंढना और फिर उसकी आधार पर पूरे सिद्धांत के ऊपर विवाद खड़ा करना. और इन त्रुटियों को विज्ञान द्वारा दूर कर लेने पर ऐसी ही कोई और तुच्छ कोशिश । यह है नया विज्ञान – जो अपने आप को प्रमाणित करने में असमर्थ है, लेकिन दूसरी सिद्धांतों की छोटी सी त्रुटियों को भी आधार बनाकर हो हल्ला मचाता है । एक और बहुत ही ‘शानदार’ विचार, जो ऐसे विज्ञानी लोग अक्सर प्रचार करते हैं, वो है- साईंस को ईश्वर भरोसे रहने वाली ‘आस्तिक साईंस’ बनाना जिससे कि ये समझते हैं कि विज्ञान को और वैज्ञानिकों को बहुत फायदा मिलेगा और विज्ञान को सही दिशा मिलेगी ।

इस पूरे ‘विज्ञान'(?) को लोगों में प्रचारित करने और लोगों के दिमागों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता का कूड़-कबाड़ा ठूसने के काम को पूरा करने के लिए अमेरिका और इंग्लैंड में शक्तिशाली राजनैतिक लाबी है, और इसमें कोई हैरानी की बात नहीं इस लाबी का मुख्य हिस्सा राजनैतिक हलकों की दक्षिणपंथी फासीवादी धारा है । जैसाकि होता ही है फासीवाद को वित्तीय सहायता की भी कोई कमी नहीं है ।

यह प्रतिक्रियावादी शक्तियां अमेरिकी सरकार पर लगातार यह दबाव बनाती रही हैं कि धार्मिक विश्वास पर आधारित स्कूलों का खर्च सरकार उठाये, इन स्कूलों में मुख्य तौर पर ईसाई मिशनरी स्कूल हैं । अमीर संस्थाओं ने इस प्रचार मुहीम के लिए लाखों-करोड़ों डॉलर खर्चे । अकेली वाल्टन फैमिली फाऊंडेशन नें 2006 में 28 मिलियन डॉलर इस तरह का दबाव बना रहे संगठनों पर खर्च किये । याद रखा जाना चाहिए कि यह फाऊंडेशन वाल-मार्ट के सहारे चलती है, जो कि ट्रेड-यूनियनों के सबसे खूंखार विरोधियों में से जानी जाती है ।

एक और अमेरिकी संस्था, टेम्पलटन फाऊंडेशन नें वर्ष २००६ में ६० मिलियन डॉलर, उन व्यक्तिओं के प्रोजेक्टों के लिए बांटे, जो ‘विज्ञान’ और अध्यात्मवादी विचारों का मेल मिलाप कराने की कोशिशों में जुटे हुए हैं । इन व्यक्तिओं में अमेरिका और इंग्लैंड के अलावा पूरी दुनिया के अध्यापक, विद्यार्थी, पत्रकार, शोध-कर्त्ता और युनिवर्सिटियों के प्रोफैसर, अकादमीशियन शामिल हैं. यू. एस. क्रॉनिकल ऑफ़ हायर एजुकेशन में छपे एक लेख के अनुसार उपरोक्त संस्था नें २५० मिलियन डॉलर से ज्यादा की धनराशी विज्ञान की इस तरह की ‘सेवा’ के लिए खर्ची । यह संस्था खुले-आम पूँजीवाद तथा मुनाफा आधारित उद्यम की हिमायत करती है ।

इस तरह की एक संस्था वार्डी फाऊंडेशन ब्रिटेन में काम करती है । यह संस्था मुख्य तौर पर वार्डी कार बिजनैस के मुनाफे पर चलती है । इसका मुख्य काम भी ईसाई मूल्यों और मान्यताओं का प्रचार करना और स्कूल खोलना है । इस संस्था के स्कूलों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता को विज्ञान के तौर पर पढ़ाया जाता है ।

भारत में भी ऐसी संस्थाएं मौजूद हैं. इनमें से एक है- कृष्णा कान्सैंस (चेतना). यह संस्था भी अपने अन्य कामों के साथ-साथ ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांत का प्रचार करने के लिए जगह जगह व्याख्यानों का आयोजन करती है और पर्चे बांटती है ।

पूंजीवादी प्रतिक्रियावादी शक्तियों के उपाय सिर्फ नए सिद्धांत घड़ने और उनका प्रचार करने तक ही सीमित नहीं हैं, वह पूंजीवादी सत्ता को अपने ‘विज्ञान’ (?) को लोगों पर थोपने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं । स्कूलों में ‘सचेतन सृजनात्मकता’ के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए अमेरिकी अदालत में केस किया गया । सारे पूंजीपति ऐसे सिद्धांतकारों और ऐसे सिद्धांतों के पक्ष में खड़े हैं । मिसिसिपी, उकलहामा और न्यू मैक्सिको की प्रतिनिधि सभाओं में वर्ष 2009 के दौरान डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत को एक ‘विवादग्रस्त सिद्धांत’ का दर्ज़ा देने या फिर दूसरे सिद्धांतों की शिक्षा देने के बिल दाखिल हो चुके हैं । लुसिआना स्टेट की प्रतिनधि सभा तो एक ऐसा ही बिल पास भी कर चुकी है और गवर्नर बॉबी जिंदल ने हस्ताक्षर भी कर दिये हैं ।

इस तरह की ही लड़ाई टेक्सास में चल रही है, जिसके अनुसार कक्षाओं में अध्यापकों को डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत की आलोचना करनी अनिवार्य हो जायेगी । यह सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं, इंग्लैंड में भी ऐसी ही कोशिशें जारी हैं, और यूरोप के कई और देशों में भी बाइबल की उत्पत्ति की धारणा को स्कूलों के सिलेबस में पढ़ाने के उपाए किये जा रहे हैं । भारत में भी वह दिन दूर नहीं, यहाँ भी ज्योतिष को तो पहले ही विज्ञान का दर्ज़ा मिल चुका है ।

और तो और कानास यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर पाल मिरेकी को डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता करने की वजह से जान से मारने की धमकियाँ दीं गयीं, उसको बुरी तरह पीटा गया जिस वजह से उन्हें अस्पताल दाखिल करवाना पड़ा । उन्हें  उस पद से हटा दिया गया और उनसे अपराधियों की तरह पूछताछ की गयी ।

आम तौर पर विज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्य या किसी संग्रहालय के निर्माण के लिए कोर्पोरेट जगत चंदा मुहैया करवाता है । लेकिन नवम्बर 2005 में जब ‘अमेरिकन मियुसियम ऑफ नैचुरल हिस्ट्री’ को नए सिरे से बनाने और जीव विकास के सिद्धांत को लोगों में प्रचारित करने की बात हुई तो किसी भी कोर्पोरेट घराने नें चंदा देने की ज़हमत नहीं उठायी और इस संग्रहालय द्वारा लगाई गयी प्रदर्शनी ‘डार्विन’ को मीडिया में कोई कवरेज नहीं दी गयी । लेकिन जब 25 मिलियन डॉलर की लागत से ‘ईश्वरवादी उत्पत्ति’ के संग्रहालय को बनाने की बात चली तो कोर्पोरेट जगत नें दिल खोलकर चंदे मुहैया करवाए । इस संग्रहालय में डायनासोरों को मनुष्यों के साथ रहते हुए दिखाया जा रहा है । इस तरह पढ़ाया जाता है कि भयानक बाढ़ आने से पहले मनुष्य और डायनासोर इकट्ठे धरती पर रहते थे । वैज्ञानिक इस बकवास को कब का रद्द कर चुके हैं । डायनासोर लगभग 63 मिलियन वर्ष पहले धरती से अलोप हो चुके हैं और मनुष्य जैसे पहले प्राणी की उत्पत्ति 4 से 10 मिलियन वर्ष से पुरानी नहीं । यह है वह विज्ञान जिसे पूँजीवाद पढ़ा रहा है और फाईनैंस कर रहा है । जबकि पूंजीवादी टहलुये यह डींग मारते नहीं थकते कि पूँजीवाद के बिना विज्ञान का विकास रुक जाएगा ।

नव-डार्विनवाद

एक और  छुपा हुआ हमला हुआ है डार्विन के सिद्धांत पर । यह छुपा हुआ इस अर्थ में है क्योंकि यह स्वयं को डार्विन के मानने और फैलाने के चोगे में छिपाकर रखता है, इसका नाम है नव-डार्विनवाद । इसीका ही विस्तारित रूप है, आधुनिक जीव विकास का सिद्धांत ।

नव-डार्विनवाद शब्द का प्रयोग सबसे पहले वीज़मैन (Weissman ) नाम के विज्ञानी के सिद्धांत के अनुयायियों के लिए किया गया । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में १८९५ में वीज़मैन ने यह सिद्ध किया कि वातावरण के प्रभाव अधीन किसी जीव में होनेवाले बदलाव आगमी पीढ़ी के जीवों में संचारित नहीं हो सकते । इसको वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज्म थियूरी’ कहा जाता है । इस सिद्धांत ने मुख्य तौर पर लैमार्क के जीव विकास के सिद्धांत पर चोट की और जीव विज्ञानियों ने लैमार्क के ‘वातावरण के प्रभाव के अधीन आनेवाले बदलाव का कारण जीव विकास होने के सिद्धांत ‘ को पूरी तरह रद्द कर दिया । अपने सिद्धांत को सही सिद्ध करने के लिए वीज़मैन ने कुछ प्रयोग किये जिनमें चूहों की पूँछें काटने वाला प्रयोग सबसे प्रसिद्ध है ।

वीजमैन के इस प्रयोग में, पीढ़ी दर पीढ़ी चूहों की पूँछें काटी गयी, पर हरवार चूहों की अगली पीढ़ी में पूंछ उग आती थी. इससे उसने यह नतीजा निकाला कि शरीर पर पडनेवाले प्रभाव वंशानुगत तौर पर अगली पीढ़ियों में संचारित नहीं होते. सबसे पहले तो इस प्रयोग में बहुत बड़ी खामियां है – जैसेकि जीव विकास प्राकृतिक स्थिति में होता है और उसे बहुत लंबा समय लगता है । दूसरा उस गुण की, जो प्रकृति में संचरण के लिए जीव के लिए लाभदायिक होता है, प्राकृतिक देन होता है । इस प्रयोग को करने से पहले चूहे के लिए पूंछ की उपयोगिता है या नहीं, के बारे में  कुछ भी निर्धारित नहीं किया गया । इसके अलावा नये अध्ययनों और खोजों से यह स्पष्ट हो गया है कि शारीरिक तौर पर पडनेवाले बाहरी प्रभाव, एक जीव से उसकी, जहाँ तक कि कई पीढ़ियों तक भी संचारित हो सकते हैं और इससे विज्ञान की एक पूरी शाखा ‘ऐपीजैनेटिक्स’ अस्तित्व में आ गयी है.

वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज़्म थियूरी’ और डार्विन की ‘प्राकृतिक चुनाव’ को आधार बनाकर ही आधुनिक जीव विकास अस्तित्व में आया । इस सिद्धांत के अनुसार जीवों में आये अलग-अलग बदलावों में कुछ बदलाव, जो जीव के लिए वातावरण में संचरण और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, प्रकृति द्वारा चुन्न लिए जाते हैं । भाव कि जिस जीव में ये लाभदायिक बदलाव आते हैं, उस जीव को वातावरण में जिंदा रहने का ज्यादा मौका मिलता है और इसलिए उस द्वारा प्रजनन करने के अवसर भी ज्यादा होते हैं और धीरे-धीरे बदलावों वाले जीवों की गिनती मुख्य हो जाती है और समय पाकर और बदलावों के जमा होते जाने के कारण एक नयी प्रजाति अस्तित्व में आ जाती है । यहाँ तक बिलकुल डार्विन के सिद्धांतानुसार है. पर आधुनिक जीव विकास संबंधी सिद्धांतानुसार बदलावों के आने का कारण वातावरण और हालात अनुसार स्वयं को ढलने की जीव की जरूरत नहीं, बल्कि बदलाव जीव के जीनस में संयोगवश होनेवाले  आकस्मिक परिवर्तन हैं । इस प्रकार नव-डार्विनवादी प्राकृतिक परिस्थितियों का जीव पर पड़नेवाले प्रभावों से बिलकुल मुकर जाते हैं ।  यहां से शुरू हुआ यह विचारवादी तर्क बढ़ता हुआ यहाँ तक चला जाता है कि मानव की बनावट और स्वभाव सबकुछ पहले ही निश्चित है और इसे मानव की सामाजिक परिस्थितियों को बदलने से बदला नहीं जा सकता और ऐसा करने के प्रयत्न गैर-वैज्ञानिक और प्रकृति के विरुद्ध हैं और डार्विन विरोधी हैं । नव डार्विनवादी परम्परा में से मुख्य हैं – रिचर्ड डाकिंज़ और स्टीवन पिंकर ।

बीसवीं शताब्दी के पिछले अर्द्ध की महत्त्वपूर्ण खोज पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों की बनावट और अन्य लक्षणों संबंधी सूचना संचारित करनेवाला रसायन डी.एन.ए. है. १९५३ में वाटसन और क्रिक ने डी.एन.ए. की बनावट का मॉडल विकसित कर लिया और इसके बाद जीनज़ की खोज हुई. जीन डी.एन.ए. एक विशेष प्रकार से डिज़ाईन किया गया और यह शरीर के किसी एक हिस्से या लक्ष्ण संबंधी सूचना जमा रखता है, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह सूचना संचारित करता है, जैसे आँखों का रंग, आदमी का कद, चमड़ी का रंग, जीव के बालों का रंग आदि. जीन कोशिका के केन्द्रक (नीयूक्लियस) में पड़े रहते हैं और कोशिका की क्रियायों को रेगूलेट करते हैं । इस खोज के पश्चात कुछ विज्ञानियों ने प्रत्येक मानवी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक या सामाजिक, का आधार जीन के रूप में डी.एन.ए. के टुकड़े को बना दिया । जीव विकास होता है तो जीनों में सांयोगिक बदलावों से होता है, कोई मनुष्य अपराध कर लेता है तो उसके जीन में नुक्स है, अगर कोई उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेता है तो उसके जीन बेहतर हैं, अगर कोई आलिशान घर में रहता है, तो उसके जीन ही इतने काबिल हैं, अगर कोई पूंजीपति अमीर बनता जा रहा है और मजदूर दिन प्रतिदिन गरीब तो अमीर पूंजीपति के जीन गरीब मजदूर के जीनों से बेहतर हैं, अगर किसी को क्रोध अधिक आता है तो उसमें क्रोध वाले जीन अधिक हैं इत्यादि ।

रिचर्ड डाकिंज़ ने मानव की संस्कृति और स्वभाव की व्याख्या करने हेतू एक नया सिद्धांत पेश किया, कि हर व्यक्ति में स्वभाव के अलग-अलग लक्षणों के लिए, जैसे क्रोध, लालच, परोपकार, खीझना, हंसमुख होना आदि के लिए जीनज़ की तरह ही ‘मीमज़’ (Memes) होते हैं । चाहे अभी तक इन ‘मीमज़’ का पता-ठिकाना नहीं चला है । उसके अनुसार ‘मीमज़’ ही मानव का स्वभाव और सभ्यता तय करती हैं और इन्हें बाह्य वातावरण और मानव की परिस्थितियों के बदलने से बदला नहीं जा सकता । लेकिन अगर थोडा बारीकी में जाएँ, तो देखेंगे कि हर समाज और मानव समूह की सभ्यता प्रत्येक पीढ़ी के साथ बदलती रहती है, बल्कि एक मनुष्य के स्वभाव और सभ्यता में उसके जीवन काल में परिवर्तन आते रहते हैं । अगर डाकिंज़ के अनुसार चलें तो हर अपराधी की सन्तान अपराधी होगी, शराबी की शराबी, गुस्सैल की सन्तान गुस्सैल, शर्मीले  की संतान शर्मीली और हंसमुख की सन्तान हंसमुख. और इससे भी बढ़कर मानव सारी उम्र एक जैसा ही बना रहेगा । पर हम देखते हैं ऐसा बिलकुल नहीं होता, प्रतिदिन डाकिन्ज़ साहेब का सिद्धांत मानव जीवन द्वारा गलत साबित किया जाता है । असल में इस प्रकार के सिद्धांत सिर्फ इसलिए निर्मित किये जाते हैं ताकि लोगों को मुर्ख बनाया जा सके । दूसरे महारथी स्टीवन पिंकर का ‘विकासवादी मनोविज्ञान’ का वर्णन भी कुछ इसी प्रकार का ही है । बस पिंकर साहेब ‘मीमज़’ के स्थान पर मॉडियूल (Module) शब्द का प्रयोग करते हैं । इनके अनुसार भी मानव स्वभाव को, इसलिए मानव समाज को बदला नहीं जा सकता । इस सिद्धांत को मनोविज्ञानियों द्वारा पूर्णतया रद्द किया जा चूका है । ज्यादातर मनोविज्ञानी यह मानते हैं कि मानव स्वभाव चाहे कुछ हद तक वंशानुगत होता है पर ज्यादातर यह सामाजिक हालात और मानव के छोटी उम्र में पालन-पोषण, माता-पिता का प्यार, सेहत और शिक्षा पर निर्भर करता है ।

इस सोच के कारण, बहुत समय तक यह समझा जाता रहा कि मानव के विकास दौरान सबसे पहले दिमाग का आकार बड़ा हुआ, उसने अपने हाथ का प्रयोग और सीधा खड़ा होना सीखा, इसी कारण से ही वह भाषा का प्रयोग करने लगा और अपने दिमाग द्वारा सोचने से ही वह समूह बनाकर, फिर मानव समाज के रूप में रहने लगा । पर, असल में, जैसाकि एंगेल्ज़ ने अपने आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ में पेश किया था, सबसे पहले मानव के पूर्वज वृक्षों से उतरकर धरती पर चलने लगे जिस दौरान वे सीधा खड़े रहकर चलना सीखे । इस प्रकार अगले पंजे चलने से मुक्त होकर अन्य कार्यों के लिए प्रयुक्त होने लगे, जिस कारण मानव औजारों का प्रयोग करने लगा, जो बाद में भाषा और सामाजिक उत्पादन का कारण बना । इसके साथ ही हाथों का प्रयोग होने के कारण दिमाग का आकार बड़ा होने लगा, जो हाथों के विकास होने से कहीं बाद में जाकर हुआ । इन सच्चाईयों को आधुनिक जीवाश्म विज्ञान ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है ।

इसके बारे में ज्यादा विस्तार से जॉन पिकार्ड के आलेख “एंगेल्ज़ और मानव विकास’ में पढ़ा जा सकता । जीनज़ में आनेवाली तब्दीलियों के जीव विकास में भूमिका के बारे में ब्रिटिश विज्ञानी जे. बी. एस. हालडेल ने भी अपने आलेखों में विस्तार सहित लिखा है ।

हाल्डेल ने १९२९ में जीवन के पहले रूपों की  उत्पत्ति के रहस्यों से आवरण उठाया । हालडेल के समय में ही, एक सोवियत विज्ञानी, अलेग्जान्द्र उपरेन भी उन्हीं नतीजों पर पहुंचा, इसलिए इस थियूरी को उभयनिष्ठ तौर पर उपरेन-हाल्डेल मॉडल कहा जाता है । इन दोनों विज्ञानियों ने अपने खोज कार्यों में द्वंदात्मक भौतिकवाद को लागू करते हुए इस सिद्धांत की खोज की । १९५३ में मिलर और युरे ने प्रयोगशाला में इस थियूरी को सही सिद्ध कर दिया । अब इस सिद्धांत को थोडा सुधार कर के.आर. एन.ए. मॉडल का रूप दे दिया गया है ।

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

द्वंदात्मक भौतिकवादी नजरिये के जन्मदाता, मार्क्स और एंगेल्ज़, ने डार्विन की खोजों का पुरजोर समर्थन किया । इसके अलावा इसके अधूरेपन और भविष्य में इसके और विस्तारित होने की पेशनगोई भी की । डार्विन की खोजों ने मार्क्स-एंगेल्ज़ के भौतिकवादी नजरिये को प्रकृति में और स्पष्टता से सिद्ध किया । जनवरी १८६१ में मार्क्स ने एंगेल्ज़ को लिखा, “डार्विन की पुस्तक (जीवों की उत्पति – अनु.) बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इसने मुझे वर्ग संघर्ष के लिए प्राकृतिक आधार प्रदान किया है । पर इसमें हमें विकास के अपरिपक्व तरीके को भी सहन करना पड़ता है । अपनी सभी सीमाओं के बावजूद, न सिर्फ उदेश्यवाद (Taleology) (हर वस्तु के पीछे कोई न कोई उदेश्य होता है. अनु.) की प्राकृतिक विज्ञान में विद्यमान धारणा पर निर्णायक चोट है, बल्कि अपने तार्किक मतलब की भी अच्छी तरह व्याख्या करती है ।”

‘डियूरिंग विरुद्ध’ पुस्तक में एंगेल्ज़ ने लिखा, ” जीव विकास का सिद्धांत अभी अपने प्रारंभिक चरणों में है और इसमें कोई शक नहीं कि भविष्य की खोजें हमारी अब तक की जीव विकास संबंधी धारणाओं, डार्विन की खोजों समेत, को बदल देंगी ।”

इसी प्रकार एंगेल्ज़ ने ‘डाईलेक्ट्स ऑफ नेचर’ में भी डार्विन के ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ के सिद्धांत का मूल्यांकन कुछ इस प्रकार किया, ” डार्विन से पहले तक, उसके अबतक के पक्के अनुयायी भी प्रकृति में सामंजस्यपूर्ण सहयोग पर जोर देते हैं, कि कैसे पौधे, जीव, जंतुओं को खाद्य-खुराक और आक्सीज़न प्रदान करते हैं और जीव जंतु पौधों को बदले में खाद, अमोनिया और कार्बोनिक एसिड (कार्बन डाईआक्साईड – अनु.) प्रदान करते हैं । जैसे ही डार्विन का सिद्धांत सामने आया, इन्हें हर जगह संघर्ष ही दिखाई देने लगा । दोनों ही नजरिये अपनी-अपनी सीमाओं के अन्दर ठीक हैं, पर दोनों ही एक समान तरह से एकतरफा और तुअस्बग्रस्त हैं । जैसे प्रकृति में निर्जीव वस्तुओं के संबंध अनुरूपता के टकराव दोनों तरह के होते हैं, वैसे ही सजीव वस्तुओं में भी सचेतन और अचेतन सहयोग के साथ-साथ सचेतन और अचेतन संघर्ष भी होता है । इसलिए, प्रकृति के संबंध में, सिर्फ संघर्ष को ही सबकुछ मान लेना ठीक नहीं । बल्कि ऐतिहासिक जीव विकास और जटिलता की पूरी दौलत को एक छोटे से और एकतरफा वाक्यांश ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ में बाँधने की इच्छा करनी बचकाना ही होगी । इसका कुछ भी मतलब नहीं है ।

‘डार्विन का जीवित रहने के लिए संघर्ष’ का सिद्धांत समाज में प्रचलित अवधारणाओं जैसे सबकी सबके खिलाफ जंग, की हौबिस की थियूरी , मुकाबले की बुर्जुआ अर्थशास्त्र की अवधारणा और माल्थस की जनसंख्या संबंधी अवधारणा का प्रकृति विज्ञान में लागू करने का प्रयत्न हैं । जब ऐसा करके सफलता हासिल कर ली गयी है (बेशक इस मूलभूत आधार, माल्थस की थियूरी पर आज तक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है), यह आसान हो जाता है कि प्रकृति विज्ञान की अवधारणाओं को समाज के इतिहास पर लागू कर दिया जाये और इसे बिलकुल सीधे-सादे तरीके से कहा जाता है कि इस तरह ये प्रस्तुतियां समाज के चिरस्थायी नियमों के तौर पर सिद्ध की जा चुकी हैं । ” (मार्क्स-एंगेल्ज़,  सम्पूर्ण रचनाएँ, जिल्द  25, पेज, 583-584, अंग्रेजी एडिशन 1987, प्रगति प्रकाशन.)

“जीवित रहने के लिए संघर्ष – सबसे बड़ी बात यह है कि इसे पौधों और जनसँख्या की अधिक बढौतरी तक ही सीमित रखा जाये, जोकि पौधों और निम्न जंतुओं के विकास के कुछ चरणों में वास्तव में होता है । परन्तु इन्हें उन परिस्थितियों में, जिसकी जीव-जंतुओं और पौधों को नए वातावरण पर भू-परिस्थितियों वाले नए भूभागों में परवास से बिलकुल अलग रखा जाना चाहिए जिनमें जीवों की प्रजातियाँ बदलती हैं, पुरानी मर जाती हैं और नई विकसित उनका स्थान ग्रहण कर लेती हैं, जनसँख्या में अधिक बढौतरी हुए बिना ही । नए वातावरण में जो जीव स्वयं को ढाल लेते हैं, जीवित रह जाते हैं और लगातार बदलावों से स्वयं को एक नई प्रजाति में विकसित कर लेते हैं पर ज्यादा स्थिर जीव मर जाते हैं और विलुप्त हो जाते हैं, साथ ही मंझोले जीव-रूप भी विलुप्त हो जाते हैं । यह सब कुछ किसी भी माल्थसवाद के बिना संभव है और होता है भी है, और अगर यह लागू भी होता है तो यह उस प्रक्रिया को, ज्यादा से ज्यादा थोडा तेज कर देता है ।”वही पेज, 582-83)

“चलें तर्क करने के लिए ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ नाम के वाक्यांश को मान भी लें । एक जानवर ज्यादा से ज्यादा इकठ्ठा कर सकता है, पर इन्सान तो उत्पादन करता है । वह जीवित रहने के साधन तैयार करता है, ज्यादा विस्तारित शब्दों में, जोकि प्रकृति ने उसके बिना न बनाये होते । यह जानवरों पर लागू होनेवाले नियमों को मानव समाज पर अपरिपक्व तरीके से लागू करना मुश्किल बना देता है । उत्पादन के कारण जल्दी ही ‘जीवित रहने का संघर्ष’ शुरू हो जाता है, पर यह संघर्ष जीवित रहने के साधनों के लिए नहीं, बल्कि मनोरंजन और विकसित होने के साधनों के लिए होता है । यहाँ – क्योंकि विकसित होने के साधन भी सामाजिक तौर पर पैदा होते हैं – जानवरों पर लागू होनेवाले नियम पूरी तरह से  आधारहीन हो जाते हैं । अंत में, पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में, उत्पादन का स्तर इतना ऊँचा हो जाता है कि समाज जीवित रहने, मनोरंजन और विकसित होने के साधनों का अब और पूरी तरह उपयोग नहीं कर सकता क्योंकि उत्पादन करने वालों के बड़े हिस्से को इन साधनों के उपयोग करने से गैर-कुदरती तरीके से और जबरन हटा दिया जाता है । और इसीलिए संतुलन कायम रखने के लिए एक संकट (आर्थिक संकट – अनु.) प्रत्येक दस वर्षों बाद न सिर्फ जीवित रहने के, मनोरंजन और विकसित होने के साधन, बल्कि उत्पादन शक्तियों के एक बड़े हिस्से का भी विनाश कर देता है । इस प्रकार, यह ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ कुछ इस तरह का रूप धारण कर लेता है – बुर्जुआ समाज द्वारा पैदा की गई वस्तुएं और उत्पादक शक्तियों की पूंजीवादी प्रणाली के विनाशकारी, विध्वंशकारी प्रभावों से रक्षा करने के लिए, सामाजिक उत्पादन और वितरण का अधिकार, इस कार्य के लिए अयोग्य हो चुकी पूंजीपति जमात के हाथों से छीन लें और इसको उत्पादन करनेवाले जन-समूहों को सौंप दें -और यह है समाजवादी क्रांति ।

“वर्ग संघर्षों के क्रमिक सिलसिले के तौर पर इतिहास का बोध, इनको ‘जीवित रहने के संघर्ष’ के बहुत कम विभेदन वाले चरणों तक सीमित कर देने से विषय-वस्तु और गंभीरता के पक्ष के लिहाज से कहीं अधिक अमीर है ।” (वही, पेज -584 -85 )

“डार्विन को पता नहीं था कि उसने मानवता, विशेषतया अपने देववासियों पर कितना कड़वा व्यंग्य लिख दिया है, जब उसने यह दिखा दिया कि ‘मुक्त प्रतिस्पर्द्धा’ , जीवित रहने के लिए संघर्ष जिसको अर्थशास्त्री सबसे ऊँची ऐतिहासिक उपलब्धि समझते हैं, जानवरों की दुनिया में एक आम स्थिति है । जैसे उत्पादन की क्रिया ने मानव को अन्य जानवरों से जीव-वैज्ञानिक तौर पर विभेदन प्रदान किया, उसी प्रकार सामाजिक पक्ष से भी ; सिर्फ चैतन्य तौर पर सामाजिक उत्पादन के ढांचे, जिसमें उत्पादन और वितरण योजनाबद्ध तरीके से होगा, मानवता को अन्य जानवरों से श्रेष्ठता प्रदान करेगी । इतिहास विकास इस प्रकार को दिन-प्रतिदिन आवश्यक ही नहीं बना रहा, बल्कि अधिकाधिक संभव भी बना रहा है ।” (वही, पेज -331 )

जैसे एंगेल्ज ने ‘ डियूरिंग विरुद्ध’ में यह कहा था कि जीव विकास के सिद्धांत अभी और विकसित होंगे, उसी प्रकार डार्विन को भी अपने सिद्धांत में विद्यमान खामियों का अहसास था ।

जीवाश्म विज्ञान के अनुसार, कैंबरियन युग (६००-७०० मिलियन वर्ष) से पहले की चट्टानों में जीवों के बहुत कम अंश मिलते हैं और वह भी ‘परोकेरीआईक’ नाम के आरंभिक जीव-रूप ही मिलते हैं । पर इससे बिलकुल बाद की चट्टानों में एकदम ही अलग तरह के बहुभांति जीव-रूप मिलते हैं । इनमें वर्तमान में मौजूद जीवों के लगभग बहुत जीव-रूप मिल जाते हैं. इसको ‘कैंबरियन धमाका’ कहा जाता है । यह ध्यान रखना चाहिए कि यह ‘कैंबरियन धमाका’ कोई रातों-रात हो गयी घटना नहीं थी, बल्कि कई मिलियन वर्षों में होनेवाली घटना थी, पर भू-वैज्ञानिक तौर पर देखा जाये तो पृथ्वी की उम्र के मुकाबले यह घटना एक धमाके की तरह ही तेजी से होनेवाली घटना थी । इसके पश्चात् अनेक प्रजातियाँ अस्तित्व में आ गयीं । डार्विन के समय भी इस तथ्य का ज्ञान था । बाद में यह भी सिद्ध हो गया कि समय-समय पर पृथ्वी पर कुछ इस प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं, चाहे ये परिस्थितियाँ कई मिलियन वर्ष लंबी होती हैं, पर फिर भी भू-वैज्ञानिक तौर पर बहुत छोटी होती हैं, जिस दौरान पृथ्वी पर उस वक्त मौजूद बहुत सारी प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं और उनके स्थान पर नई प्रजातियाँ पैदा हो जाती हैं जो समय के साथ धीरे-धीरे विकास करती हैं, विकास के इस चरण में, जब नई प्रजातियों के अस्तित्व में आ जाने के बाद के समय में ‘प्राकृतिक चुनाव’ अहम भूमिका निभाता है । इस तरह जीवों की प्रजातियों के तेजी से विलुप्त होने की अब तक छः घटनाएँ हो चुकी हैं ।

सबसे बड़ी विलुप्त होनेवाली स्थिति २५० मिलियन वर्ष पहले पेकिअन्योक-मीजोयोक युगों के बीच पैदा हुई जब जल और थल दोनों जगहों के ५० फीसदी जंतुओं और रेंगने वाले ८० फीसदी जंतुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो गयीं । इस प्रकार की अंतिम घटना ६३ मिलियन वर्षों पहले हुई जिसके परिणामस्वरूप अन्य अनेक प्रजातियों समेत डाइनासोर भी विलुप्त हो गये । पर ये घटनाये जीव विकास के राह में रूकावट नहीं बनती हैं, बल्कि जीव विकास को नए और उच्च धरातल पर ले जाती हैं । क्योंकि इन घटनाओं से नई प्रजातियाँ अस्तित्व में आती हैं जो पहले वाली प्रजातियों के मुकाबले अधिक विकसित होती हैं ।

‘कैंबरियन धमाके’ की डार्विन अपनी खोजों के आधार पर व्याख्या करने में असफल थे, पर उस समय डार्विन ने यह कहा कि किसी कारण जीवाश्म संबंधी मानव जानकारी अभी अधूरी है और भविष्य में यह जानकारी मुकम्मल हो जाएगी । पर समय के साथ यह पता चला कि जीवाश्म संबंधी जानकारी बिलकुल सही थी और जीवाश्म में अधूरापन इतना भी अधिक नहीं है कि ‘कैंबरियन धमाके’ को सिर्फ जानकारी का अधूरापन कह कर काम चला लिया जाये । इसी प्रकार कई बार प्रजातियों के बीच के रूप भाव ‘लिंक प्रजाति’ भी नहीं मिलती, उन स्थितियों में डार्विन के सिद्धांतों के अनुसार नई प्रजाति की उत्पति की व्याख्या करनी मुश्किल हो जाती है ।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, अमरीका के भू-विज्ञानी स्टीफन जे गोल्ड और नीलज़ ऐलड्रिज़  ने १९७१ में जीव विकास का नया सिद्धांत पेश किया, जो न सिर्फ डार्विन के सिद्धांत के महत्त्व को बनाये रखता है, बल्कि इस और अधिक अमीर बनाते हुए जीव विकास के सिद्धांत को इस काबिल बना देता है, जिससे ‘कैंबरियन धमाका’ और तेजी से प्रजातियों के विलुप्त होने से पैदा होनेवाली घटनाओं की सटीक व्याख्या होती है । इस सिद्धांत का नाम है – ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ .

गोल्ड और ऐलड्रिज़ ने  अपने निबंधों में यह काफी हद तक सिद्ध कर दिया कि जीव विकास की प्रक्रिया हर समय एक ही रफ़्तार से सीधी रेखा में नहीं चलती बल्कि इस प्रक्रिया में धीमें और लटकते हुए अंतरालों में कुछ पड़ाव ऐसे आते हैं जब जीव विकास की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है । इस तीव्र दौर में धीमें विकास के दौरान जमा हुए मात्रात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तनों में बदल जाते हैं । गोल्ड के अनुसार जीव विकास सदैव प्रगतिशील ही नहीं होता, बल्कि कई बार विपर्ययवादी भी होता है, क्योंकि कई जीव जीवित रहने के लिए दूसरे जीवों के परजीवी बन जाते हैं, जैसे की वृक्षों पर लटकती हुई अमरबेल, अलग-अलग परजीवी कीड़े आदि ।

डार्विन इस प्रकार की संभावना से अनजान नहीं थे । ‘जीव की उत्पति’ के पांचवें एडिशन में डार्विन लिखते हैं, “समय के जिन खण्डों में प्रजातियों में परिवर्तन आते हैं, वे प्रजातियों के लगभग स्थिर रहनेवाले समय खण्डों के मुकाबले छोटे होते हैं ।” चार्ल्स डार्विन, जीवों की उत्पति, १८६९ लन्दन, जॉन मरे, पांचवां एडिशन, पेज -५५१)

इस सिद्धांत के प्रस्तुत करने के समय से ही गोल्ड और ऐलड्रिज़ का बाकी बहुत सारे विज्ञानियों द्वारा निरंतर विरोध होता रहा है क्योंकि छलांगों द्वारा जीव विकास का सिद्धांत पूंजीवाद के बंधक चाकर गुलामों को हजम नहीं होते और वे धीमें और लटकते हुए बदलावों के सिद्धांत को ही एकमात्र सही सिद्धांत सिद्ध करने पर तुले रहते हैं । इस विरोधी शिविर में एक बार रिचर्ड डाकिनज़ और जॉन मेरिनार्ड स्मिथ प्रमुख रहे हैं । अपने मृत्यु के वर्ष, २००२ तक, गोल्ड ने अपने सिद्धांत की डटकर हिमायत की और अन्य तरह के शंकों का निवारण किया. चार्ल्स डार्विन के बाद, स्टीफन जे गोल्ड को जीव विकास के क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा नाम माना जाता है ।

गोल्ड के सिद्धांतों की रोशनी में आज, छलांगों द्वारा जीव विकास के सिद्धांत को अधिकाधिक मान्यता मिल रही है और जीव विकास विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे तरीकों की खोज हो रही है जो इस सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं ।

गोल्ड अपनी पुस्तक ‘पांडाज थंब’ में लिखते हैं, ” सोवियत यूनियन में विज्ञानियों को एक अलग तरह की दार्शनिक शिक्षा मिलती है – एंगेल्स द्वारा, हीगेल से लेकर, और विकसित किये गये द्वंदात्मक नियमों की शिक्षा. द्वंदात्मक नियम स्पष्ट तौर पर धीमे-तेज विकास के हामी हैं. वे मात्रा के गुणों में परिवर्तन की बात करते हैं । यह अजीब लग सकता है, पर ये बताते हैं कि किसी प्रणाली में धीरे-धीरे इकठ्ठे होनेवाले परिवर्तन या तो दबाव के परिणामस्वरूप वह प्रणाली ऐसी स्थिति में पहुँच जाती है, जब एकदम छलांग द्वारा परिवर्तन होता है. पानी को गर्म करो, यह उबल जायेगा, मजदूरों को अधिकाधिक दबायो, क्रांति हो जाएगी । ऐलड्रिज़ और मुझे यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि बहुत पहले रूसी जीवाश्म विज्ञानी भी हमारी ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ मॉडल जैसे जीव विकासी सिद्धांतों की धारणाएं रखते हैं । ”

अपनी पुस्तक ‘डार्विन के बाद अब तक’ में, गोल्ड, एंगेल्स के आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ का वर्णन करते हुए लिखते हैं, ” असल में, उन्नीसवीं शताब्दी में एक बहुत ही शानदार आलेख प्रकाशित हुआ, जिसके लिखनेवाले के बारे में जानकर, बहुत से पाठक हैरान हो जायेंगे – फ्रेडरिक एंगेल्स । (बेशक यह जानकर, कि एंगेल्स भी प्राकृतिक विज्ञान में गहरी दिलचस्पी रखते थे और वे अपने दर्शन ‘द्वंदात्मक भौतिकवाद’  को एक मजबूत आधार पर निर्मित करते हैं । वे अपनी पुस्तक ‘प्रकृति में द्वंदवाद’ को पूरा न कर सके ) उनकी मृत्यु के बाद, १८९६ में एंगेल्स द्वारा लिखित ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ प्रकाशित हुई  पर पश्चिमी विज्ञान पर इसका कोई असर न हुआ ।” क्योंकि उनके  अनुसार पश्चिमी सोच में पक्षपात बहुत गहराई तक पैठ कर चुका था ।

असल में देखा जाये तो डार्विन के सिद्धांतों पर होनेवाले सैद्धांतिक हमले असल में द्वंदात्मक भौतिकवादी दर्शन को नकारने के नाकाम परन्तु योजनाबद्ध प्रयत्न हैं । आज की परिस्थितियों में परजीवी हो चुके पूंजीवाद को सबसे अधिक खतरा मार्क्सवादी भौतिकवादी दर्शन से है क्योंकि यह वह दर्शन है जो समाज को गति में दिखाता है और वर्णन करता है कि प्रत्येक वस्तु गति में है । जैसे जीव विकास एक निरंतर गतिमान क्रिया है, वैसे ही, मानव समाज भी निरंतर गतिमान है । मानव समाज में भी प्राचीन मिट जाता है और नया उसका स्थान ग्रहण कर लेता है । इसी तरह आरंभिक कबीलाई समाजों के स्थान को गुलामदारी प्रबंध ने ग्रहण किया और फिर सामंतवाद और पूंजीवादी प्रबंध । प्रत्येक प्रबंध अपनी उम्र भोगकर इतिहास के रंगमंच से रुखसत हो गया और उसके स्थान को नये प्रबंध ने संभाल लिया । पूंजीवाद के चाकर इस सच्चाई को नकारने के लिए, हर उस सोच, वैज्ञानिक खोज या मानवीय कोशिश को सबसे पहले दबाने की कोशिश करते हैं, अगर ऐसा नहीं होता है, तो उसकी इस तरह से व्याख्या करने की कोशिश करते हैं कि उसके अन्दर का भौतिकवादी तत्त्व ख़त्म हो जाये और वह पूंजीवादी प्रबंध को सदैव से न्यायोचित ऐलान करने लगे ।

उन्नीसवीं शताब्दी में, जब पूंजीवाद के उभार का दौर था, उस वक्त पूंजीवादी चाकरों की कोशिश होती थी कि किसी वैज्ञानिक खोज से होनेवाले फायदा अधिकाधिक उठाया जाये और इस खोज से आम लोगों तक पहुँचने वाली भौतिकवादी चेतना को किसी न किसी तरह से दूर किया जाये । इससे भी अधिक, अगर हो सके तो उन खोजों को पूंजीवादी-चिरस्थायी तौर पर लोगों की नजरों में परिपक्व सिद्धांत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाये । इस प्रकार फासीवाद को जायज ठहराने के लिए पूंजीवादी चाकरों ने विज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया । नस्ल सुधारने को एक विज्ञान का दर्जा दिया गया । इस तथाकथित विज्ञान के आधार पर उन्नीसवीं शताब्दी के पूरार्द्ध में अमरीका में २०,००० लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गयी और नाज़ी जर्मनी में ३.७५,००० लोगों को नपुंसक बना दिया गया । इस काम को सिरे चढाने के लिए बाकायदा कानून बनाये गये । अमरीका के लगभग सभी राज्यों में कानून बनाकर नस्ल सुधारने के विभाग तक बनाये गये ।

विज्ञान के नामपर इस प्रकार के मानवता विरोधी कारनामे बाद में भी जारी रहे । बेशक उपरोक्त किस्म के नस्ल सुधार को विज्ञान द्वारा रद्द किया जा चुका है, पर यह अलग-अलग रूपों में सामने आने लगा जैसेकि साईको सर्जरी । इसके अनुसार सामाजिक समस्याओं का इलाज भी दिमाग का आपरेशन करके किया जा सकता है । इस तरह के ही दो तथाकथित विज्ञानी, वर्तमान मार्क और फ्रैंक इरविन ने यह सुझाव भी पेश कर दिया कि शहरों में होनेवाले दंगे भी दिमागी परेशानी के कारण होते हैं और इसका इलाज झुग्गियों में रहनेवाले लोगों के नेताओं के आपरेशन द्वारा हो सकता है और ऐसा किया भी गया । ऐलन वूड्स और टेड ग्रांट के अनुसार – १९७१ में, अमरीका में ऐसे ही लोगों का इलाज करने के लिए उचित ‘बीमारों’ की सूची मांगी गयी । आपरेशन द्वारा इलाज के लिए भेजे गये आदमियों में अप्रैल, १९७१ के कामगारों की हड़ताल के नेताओं में से एक शामिल था । ये हैं पूंजीवादी चाकरों के कारनामे और वैज्ञानिक खोज !

जीव विज्ञान से बाहर दूसरे विज्ञानों में भी यही स्थिति है । क्वांटम भौतिकी के दार्शनिक नतीजे ‘कोपनहेगन व्याख्या’ इसकी ज्वलंत मिसाल है । जैसे-जैसे पूंजीवाद और अधिक परजीवी होता जा रहा है, उतना ही अधिक यह विज्ञान-विरोधी भी होता जा रहा है । पहले तो यह विज्ञान से निकलने वाले भौतिकवादी परिणामों को बिगाड़ता था, पर अब तो यह विज्ञान के विकास में ही रूकावट बनता जा रहा है ।

पूंजीवाद ने पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाले जीवाश्मों को पण्य (commodity) बना दिया है । जीवाश्मों की पूरी दुनिया में फैली एक मंडी है । पूरी मानवता की धरोहर, ये जीवाश्म कुछ लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति बनते जा रहे हैं । ऐसा एक उदाहरण एक ४७ मिलियन वर्ष पुराने एक कैमूर के जीवाश्म का है । यह अभी-अभी ‘ढूँढा’ गया । यह जीवाश्म दूध पिलाने वाले ऊपरी श्रेणी के और आरंभिक दूध पिलाने वाले प्राणियों के बीच एक महत्त्वपूर्ण लिंक है । पर यह जीवाश्म १९८३ से लेकर २५ वर्षों तक एक जीवाश्म इकठ्ठे करने के शौक़ीन व्यक्ति की व्यक्तिगत सम्पत्ति बना रहा । इस प्रकार और भी जीवाश्मों को, जो व्यक्तिगत सम्पत्ति हैं, किराए पर खोज-कार्यों के लिए दिया जाता है ।

मेडिकल क्षेत्र के बारे में तो जितना कहा जाये उतना ही कम है । दवा कम्पनियां, उस खोज-कार्य जिसमें से मुनाफे की संभावना कम हो या मुनाफे पर चोट करता हो, पर धेला भी नहीं खर्च करतीं । ऐसे कार्यों के लिए अक्सर लोगों को जेब से खर्च उठाना होता है या फिर सरकारों के सामने नाक रगड़नी पड़ती है । बहुत से ऐसे खोज-कार्य बीच में ही बंद हो जाते हैं या फिर बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं ।

स्टेम सैल रीसर्च का भी इसीलिए विरोध हो रहा है । बेशक यह विरोध नैतिक और धर्म के चोगे के नीचे हो रहा है । इसका विरोध करनेवाले भी वही हैं, जो समलैंगिक और गर्भपात संबंधी कानूनों का विरोध करते हैं । और इन फासीवादी समूहों को आशीर्वाद किसका है, यह भी सबको पता है ।

इसी प्रकार १९९० में शुरू हुई, बैटरी से चलनेवाली बिजली की कार की परियोजना भी तेल कंपनियों, ऑटो कंपनियों और अमरीका सरकार की मिलीभगत से ठप होकर रह गयी है और यह कार कभी भी सड़क पर नहीं उतर सकी । इस बैटरी से चलनेवाले व्हीकल ने जहाँ प्रदुषण को कम करना था, वही तेल की खपत भी कम करनी थी, पर यह सब तेल कम्पनियों को किस तरह बर्दाश्त होता, इसलिए मिलमिलाकर पूरी परियोजना को कोल्ड स्टोर में रख दिया गया ।

इस प्रकार साफ़ है कि लोगों में भौतिकवादी चैतन्य के प्रसार को रोकने के लिए और इसे कुंठित करने के प्रयासों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में, जीव विकास के सिद्धांत पर, जोकि उतने ही प्रमाणों से सिद्ध हो चुके हैं जितने प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है पृथ्वी प्लेट जैसी नहीं, बल्कि गेंद जैसी, सूर्य पृथ्वी के नहीं, पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और सूर्य और चन्द्र ग्रहण किसी राहू-केतू के कारण नहीं बल्कि सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा के एक रेखा में आ जाने से लगते हैं, विवाद पैदा कर वैज्ञानिक प्राप्तियों और सिद्धांतों के उन क्रांतिकारी अंशों को कमजोर करने की कोशिशे हो रही हैं जो किसी भी वस्तु के चिरस्थाई होने की अवधारणा के परखचे उड़ा देते हैं । इसके साथ ही विज्ञान और दर्शन को मानवता की भलाई के लिए उपयोग के स्थान पर पूंजीवाद की पूरी अधिसंरचना इन्हें मुनाफे की चौहदी में कैद करने और श्रमिक लोगों की अधिकाधिक रत निचोड़ने के साधन मात्र बनाने के लिए दिनरात पंजों के बल खड़ी रहती है । इसलिए वर्तमान समय में, न्याय और समानता पर आधारित शोषण रहित समाज के सृजन का स्वप्न देखनेवाले लोगों के लिए यह जरूरी है कि भौतिकवादी वैज्ञानिक चैतन्य के हक़ में खड़े होने और डार्विन के सिद्धांतों समेत विज्ञान के हर क्षेत्र में हो रहे विचारवादी हमलों का और वैज्ञानिक तथ्यों को विकृत करके पूंजीवाद की सेवा करनेवालों का मुंह-तोड़ जवाब देने के लिए तैयारी करें ।

पंजाबी पत्रिका, नवें समाजवादी इन्कलाब दा बुलारा ‘प्रतिबद्ध’ के जनवरी, २०१० अंक से आभार सहित |

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अमेरिका में क्रांति नजदीक है : रेमंड लोट्टा – अर्थशास्त्री

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नोट : गिरिजेश राव के एतराज को स्वीकार करते हुए इस वीडियो से संबंधित सामग्री से परिचय करवाने की कोशिश के रूप में, निम्नलिखित सामग्री को हिंदी में छापा जा रहा है.

इस संक्षिप्त से इंटरवियू  में रेमंड लोट्टा का कहना है कि हमारे अधिकत्तर दुखों का कारण है – विश्व पूंजीवाद, जिसका नेतृत्व अमेरिका करता है. जलवायु संकट और मौजूदा वित्तीय संकट जिससे विश्व पूंजीवाद बाहर नहीं निकल रहा है – इसका कारण बाहर नहीं, पूंजीवाद के अंदर, उसकी कार्यप्रणाली की विशेषताओं में ही छुपा हुआ है. इसे उल्ट कर ही हम पूंजीवाद द्वारा निर्मित आपदाओं से मुक्ति पा सकते हैं.

हमारे बुद्दिजीवियों के एक बड़े हिस्से द्वारा २० शताब्दी के कम्युनिस्ट तजुर्बों को एकतरफा ख़ारिज करने का शक्तिशाली रुझान पाया जाता है. यह एक अराजकतावादी दृष्टिकोण है. सही दृष्टिकोण, इन तजुर्बों को इनकी प्राप्तियों और कमियों समेत स्वीकार करने में है जबकि बुद्धिजीवियों के एक बड़े हिस्से द्वारा इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया जाता है. उनके अनुसार समाजवाद के  उन तजुर्बों ने समाजवाद को एक असफल सामाजिक व्यवस्था घोषित कर दिया है. वे इसे तजुर्बे के तौर पर नहीं लेना चाहते. वे समाजवाद से इस प्रकार की अपेक्षा पाले रहते हैं जैसे यह एक पूर्ण प्रणाली हो. वे इसमें किसी भी प्रकार का नुक्स नहीं देखना चाहते जबकि इसका मतलब होगा – गतिहीन और वर्ग-संघर्ष से मुक्त स्थिति. वे यह मानने को तैयार नहीं होते कि पूंजीवाद और समाजवाद में फर्क केवल इतना ही होता है कि सत्ता पूंजीपतियों के हाथ में न होकर मेहनतकशों के हाथ में होती है. वे इल्ज़ाम लगाते हैं कि वहां तानाशाही थी जबकि पूंजीवाद लोकतंत्र को वे एक आदर्श और सबसे बढिया मॉडल होने का श्रेय देते हैं. लेकिन इसकी हकीकत उस वक्त खुल जाती है जब चुनावों में आम आदमी ठगा जाता है और सत्ता सदैव पूंजीपति वर्ग के के पास ही रहती है. रेमंड लोट्टा का कहना  है कि पूंजीवाद भी तानाशाही होता है. एक ऐसी तानाशाही जिसमें पूंजीपतियों की अल्पसंख्यक आबादी मेहनतकशों पर शासन करती है क्योंकि वह उत्पादन के साधनों की मालिक होती है. अपनी इसी सामाजिक हैसियत से वह मेहनतकशों को उजरती गुलाम बना डालती है. जब मेहनतकश आबादी सत्ता हासिल कर लेती है उसे समाजवाद कहते हैं. लेकिन इसका मतलब यह हरगिज नहीं होता कि सामन्तो और पूंजीपतियों के अल्पसंख्यक वर्ग का खात्मा हो गया. वे समाजवाद में मौजूद रहते हैं. उनसे संघर्ष चलता रहता है.

रेमंड लोट्टा का कहना है कि संघर्ष का नतीजा मेहनतकशों की हार में भी हो सकता. चीन में समाजवाद के तजुर्बे के दौरान इसे माओ ने नोट कर लिया था. माओ का कहना था कि क्रांति के बाद क्रांति सतत रूप से जारी रहनी चाहिए, वर्ना देर-स्वर जीती हुई क्रांति हार जाएगी.

सोवियत यूनियन और चीन के तजुर्बे यही कहते हैं. वहां मजदूर वर्ग अपने दुश्मन वर्ग से हार चुका है. दूसरे शब्दों में, क्रांतियाँ असफल नहीं हुई लेकिन वे हारी जा चुकी हैं. वर्ग-संघर्ष समाजवाद का एक बुनियादी लक्ष्ण होता है. समाजवाद अपनी उच्चत्तर मंजिल साम्यवाद में क्यों प्रवेश नहीं कर पाया ?, इस प्रश्न का उत्तर समाजवाद जोकि पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच का संक्रमण काल होता है, में चलनेवाले वर्ग-संघर्ष में ही है जिसके पहले तजुर्बों में मेहनतकश आबादी बुर्जुआ तत्त्वों से मात खा चुकी है. लेकिन मेहनतकशों को यह नसीहत देना कि समाजवाद एक असफल प्रणाली है – इसका मतलब है कि वे समाजवाद पर नए तजुर्बे न करें. क्या इसके बिना उस समाज की स्थापना संभव है जिसे राज्य-विहीन और वर्गविहीन  समाज कहा जाता  है ? हारी हुई क्रांतियों से जरूरी सबक ग्रहण करते हुए, मेहनतकश वर्ग ने नये समाजवादी तजुर्बे हासिल करने है. इसके अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है. उसे अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास से सीखना होता है. इसके विपरीत सिद्धांत-अभ्यास-सिद्धांत एक विचारवादी नजरिया है जिसे मेहनतकश वर्ग ख़ारिज करता है.

“क्या अमेरिका के लोग समाजवाद अपनायेगे ?” इस  प्रश्न के उत्तर में रेमंड लोट्टा का कहना है, ” कठोर शब्दों में कहा जाये तो अभी नहीं”. लेकिन वे क्रांतिकारी लोगों द्वारा क्रांति के लिए की जानेवाली कोशिशों को सघन और व्यापक करने का आह्वान करते हैं.

मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दावली – कुछ विरासत से और कुछ …

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कुछ  मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दों  को परिभाषित करने की एक कोशिश लेकिन बहुत से मतभेद हो सकते हैं. आओ,  सब मिलकर मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दों को परिभाषित करें.

वैज्ञानिक समाजवाद : ‘यूटोपिया’ और आदर्श समाजवाद के विपरीत मार्क्स एंगेल्ज़ द्वारा परिभाषित समाजवाद- पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच की स्टेज. एक संक्रमण काल. पूंजीवाद  से इस लिए अलग कि सत्ता पर कब्जा सर्वहारा वर्ग का, इसलिए सर्वहारा का जनतंत्र या सर्वहारा का बुर्जुआ पर अधिनायकवाद वैसे ही जैसे बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकवाद के चलते  पूंजीवादी बुर्जुआ जनतंत्र. साम्यवाद से दोनों भिन्न क्योंकि दोनों में वर्गों का सतत संघर्ष जारी. इतिहास की कुटील और टेडी-मेढी चाल के चलते ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ का ऐतिहासिक रूप से एक बार हारना – एक कड़वी सच्चाई. कुछ विद्वानों और विशेषकर बुर्जुआ चाटुकार बुद्धिजीवियों द्वारा साम्यवाद को बदनाम करने के लिए इस “वैज्ञानिक समाजवाद ” को ही साम्यवाद का नाम देना.

चीन में भी,नकली समाजवाद का चरित्र आज पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। चीन में समाजवाद की सारी उपलब्धियाँ समाप्त हो चुकी है। कम्यूनों का विघटन हो चुका है। खेती और उद्योग में समाजवाद के राजकीय पूँजीवाद में रूपान्तरण के बाद अब निजीकरण और उदारीकरण की मुहिम बेलगाम जारी है। अब यह केवल समय की बात है कि समाजवाद का चोंगा और नकली लाल झण्डा वहाँ कब धूल में फेंक दिया जायेगा। माकपा और भाकपा अपने असली चरित्र को ढँकने के लिए आज चीन के इसी “बाज़ार समाजवाद” के गुण गाती हैं।

संशोधनवाद : संशोधनवाद उस सिद्धांत का प्रतिनिधि जो मार्क्सवादी सिद्धांतों को तोड़-मरोड़ कर विकृत करता है ताकि यह (मार्क्सवाद) बुर्जुआ वर्ग के हितों के लिए नुकसान रहित बन जाये. प्राय: यह मार्क्सवाद को सुधारवाद बना देता है. संशोधनवाद का सम्बन्ध स्तालिन की मृत्यु के बाद ख्रुश्चेव और माओ त्से तुङ के बाद देङपंथी टोली से भी लिया जाता है जिनके नेतृत्व में बुर्जुआ वर्ग सर्वहारा वर्ग पर पुन: अधिनायकवाद स्थापित कर सका.

वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद : लेनिन की एक उक्ति है कि किसी भी दल में संशोधनवाद के कर्मों की सजा  कतारें वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद में चुकाती हैं. भारत में अगर नकसलबाडी जैसा वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद उभरा तो निश्चित रूप से इसके दूसरे सिरे (ध्रुव) पर संशोधनवाद था. वामपंथी कम्युनिस्टों में अधिकतर मिडल क्लास के लोग आते हैं – पूँजी के सताए ये लोग क्रांति के एजेंडा पर तो तुंरत पहुँच जाते हैं लेकिन अवाम को चेतन करने की लंबी और मुश्किल रणनीति या प्रोग्राम बनाने से घबराते हैं.

विरोधों की एकता : ब्रहामंड में विद्यमान पदार्थ, व्यापार (phinomenon), व्यक्ति, समाज, अवधारणा आदि को समझने के लिए दो मुख्य विरोधी ध्रुवों की निशानदेही. किसी भी व्यापार के अस्तित्व या गतिशीलता (dynamism) की ज़रूरी शर्त. अन्य गौण विसंगतियां या ध्रुवों द्वारा किसी एक के साथ अभेद होना.

उदाहरण के लिए पूंजीवाद विवाह संस्था जिसमें विवाह एक अवधारणा है जिसका एक सिरा दो व्यक्तियों के मिलन का तो दूसरा दो बराबर की पूंजियों के मिलन का है. देखना यह है कि इन दोनों सिरों से गतिमान विवाहिक सम्बन्धों की विसंगति (contradiction) किसके पक्ष में हल होती है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा सिरा प्रधान है और कौनसा गौण. चूंकि पूंजीवाद में दो पूंजियों के मिलन का सिरा प्रधान होता है इसलिए इसे दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो पूंजियों का मिलन ही कहा जाता है जबकि गौण सिरे पर दो व्यक्ति भी मिलते हैं- प्यार करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं – ये बच्चे पूंजी के सच्चे वारिस होते हैं. अगर ऐसा नहीं होता है तो .. तो.. बच्चों को बागी करार दिया जाता है.

गोर्की ने कहा था कि इस संसार को परिभाषित करना बड़ा ही आसान है क्योंकि लोग दो कामों में लगे हुए हैं :

१. धन के ढेर लगाना और

२. अपने हिस्से के श्रम को दूसरों से करवाना.

यही पागलपन इस दुनिया की सच्चाई है पर इसे ही आदर्श माना जाता है.

जुन्कर या प्रशियाई : प्रशिया -जर्मनी के अधीन एक राज्य, यूरोप के अन्य देशों के विपरीत, बिस्मार्क की अगुआई में यहाँ, पूंजीवाद ने सामंती व्यवस्था को  क्रांतिकारी ढंग से तबाह न करके, बुर्जुआ जनतंत्र के विकास का एक लम्बा और पीडादायक तरीका अपनाया. भारत की आज़ादी की क्रांतिकारियों की अगुआई में जारी लहर कांग्रेस की अगुआई में जारी लहर से हार गयी. भगत सिंह का यह शक कि कांग्रेस अंग्रेजों से समझौता कर लेगी, का सच होना भी एक कड़वी सच्चाई है, आज़ादी के बाद क्रांतिकारी दलों की दयनीय स्थिति और भारत के बुर्जुआ राज्य का विकास जुन्कर या प्रशियाई विकास से मिलता जुलता,  या सामंती समाज की कोशिकायों को तबाह न करते हुए उन्हीं कोशिकायों में बुर्जुआ समाज की कोशिकायों की  घुसपैठ – यही कारण है कि भारत इस इक्कीसवीं सदी में भी एक विकसित बुर्जुआ राज्य होते हुए भी सामंती बुराईयों-कद्रों-कीमतों को, व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं बल्कि संस्थागत तौर पर भी संभाले हुए है. देखे : 1857, आरंभिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता

आधार : सभ्य समाज में उत्पादक शक्तियों के विकास की स्टेज, उत्पादन के साधनों पर किस वर्ग का कब्ज़ा, मनुष्यों के आपसी उत्पादन सम्बन्ध या आर्थिक सम्बन्ध. “राजनितिक अर्थशास्त्र जिंसों के आपसी संबंधों का अध्ययन न होकर मनुष्यों के आपसी संबंधों का विज्ञान है”- एंगेल्स

अधिरचना : आधार तय करता है कि अधिरचना कैसी हो. न्यायपालिका, विधानपालिका, कार्यपालिका, धर्म, नैतिकता, दर्शन और स्वयं राज्य रुपी संस्था अधिरचना के ही अंग है.

विचारवादियों के विपरीत मार्क्सवादियों के अनुसार इनका विकास ऐतिहासिक है जबकि विचारवादियों के अनुसार अधिरचना के ये अंग सदैव विद्यमान रहें हैं. वर्ग-संघर्ष के इतिहास अनुसार जब आधार के दोनों विरोधी ध्रुवों से गतिमान इस आधार की विसंगति किसी एक के पक्ष में हल होना छोड़ देती है तो उसी वक्त अधिरचना में तनाव आ जाता जिसे आधार और अधिरचना का द्वंद इन्कलाब द्वारा सुलझा लेता है. अगर ऐसा नहीं होता तो भी धीरे-धीरे, पीडादायक तरीके से विसंगतियाँ हल तो हो ही जाती हैं. इस पीडा से बचने के लिए क्रांतिकारी चेतना की शक्ति का प्रयोग करते हैं ताकि इन्कलाब हो. चेतना की भूमिका उसी प्रकार जैसे किसी संवेदनशील पदार्थ पर बाहर से इलेक्ट्रोन की बमबारी करके पदार्थ की प्रकृति को बदला जा सकता है या फिर जैसे एक बीज जो खोल में सुरक्षित है, उसे भिगोकर, बीजकर उसके विरोधों की एकता को भंग किया जा सकता है, बीज का निषेध ही पौधा है, पौधे का निषेध, फूल….फल…और फिर बीज, लेकिन बीज वही बीज नहीं जो पहले था, यह ज्यादा विकसित है.

आधार और अधिरचना पर मार्क्स द्वारा लिखित ‘पूंजी’ पृ. 100, नोट- 32, देखें ;

“अर्थशास्त्रियों का तर्क-वितर्क अजीब ढंग का होता है. उनके लिए केवल दो प्रकार की ही संस्थाएं हैं : बनावटी संस्थाएं और प्राकृतिक संस्थाएं. सामंती संस्थाएं बनावटी संस्थाएं हैं, बुर्जुआ सस्थाएं प्राकृतिक संस्थाएं हैं. इस बात में वे धर्मशास्त्रियों से मिलते हैं. वे लोग भी दो प्रकार के धर्म मानते हैं. उनके अपने धर्म छोड़कर उनकी दृष्टि में बाकी हर धर्म मनुष्यों की मनगढ़ंत है, जब के अपने धर्म के बारे में वे समझते  हैं की वह ईश्वर से उद्भूत हुआ है.-(Karl Marx, Misere de la Philosophie, Response a la philosophie de la misere par M. Proudhon, 1847, p. 113) मि. बस्तिया के हाल पर सचमुच हंसी आती है. उनका ख्याल है की प्राचीन काल में यूनानी और रोमन लोग केवल  लूट-मार के सहारे ही जीवन बसर करते थे. लेकिन जब लोग सदियों तक लूट-मार करते हैं , तो कोई ऐसी चीज हमेशा होनी चाहिए , जिसे वे लूट सकें; लूटमार की चीजों का लगातार पुनरुत्पादन होते रहना चाहिए. परिणाम स्वरूप इससे ऐसा लगेगा कि यूनानियों और रोमनों के यहाँ भी उत्पादन की क्रिया थी. चुनांचे उनके यहाँ कोई अर्थव्यवस्था भी रही होगी, और जिस प्रकार बुर्जुआ अर्थव्यवस्था हमारी आधुनिक दुनिया का भौतिक आधार है, उसी प्रकार वह अर्थव्यवस्था यूनानियों और रोमनों की दुनिया का भौतिक आधार रही होगी. या शायद बस्तिया के कथन का अर्थ यह है कि दास प्रथा पर आधारित उत्पादन विधि लूटमार की प्रणाली पर आधारित होती है ? यदि यह बात है, तो बस्तिया खतरनाक ज़मीन पर पांव रख रहे हैं. यदि अरस्तू जैसा महान विचारक दासों के श्रम को समझने में गलती कर गया, तो बस्तिया जैसा बौना अर्थशास्त्री मजदूरी लेकर काम करने वाले मजदूरों के श्रम को कैसे सही तौर पर समझ सकता है ? मैं इस अवसर से लाभ उठाकर अमेरिका में प्रकाशित एक जर्मन पत्र के उस एतराज का संक्षेप में जवाब देना चाहता हूँ, जो उसने मेरी रचना, Zur Kritik der Politschen Oekonomie, 1859 पर किया है. मेरा मत है कि प्रत्येक विशिष्ट उत्पादन-प्रणाली  और उसके अनुरूप सामाजिक सम्बन्ध, या संक्षेप में कहें, तो समाज का आर्थिक ढांचा ही वह वास्तविक आधार होता है, जिस पर कानूनी और राजनीतिक उपरी ढांचा खडा किया जा सकता है और जिसके अनुरूप चिंतन के भी कुछ निश्चित सामाजिक रूप होते हैं; मेरा मत है कि उत्पादन की प्रणाली आमतौर पर सामाजिक, राजनितिक एवं बौद्धिक जीवन के स्वरूप को निर्धारित करती है. इस पत्र की राय में, मेरा यह मत हमारे अपने ज़माने के लिए तो बहुत सही है, क्योंकि उसमें भौतिक स्वार्थों का बोलबाला है, लेकिन वह मध्य युग के लिए सही नहीं है, जिसमें कैथोलिक धर्म का बोलबाला था, और वह एन्थेंस और रोम के लिए भी सही नहीं है, जहाँ राजनीति का ही डंका बजता था. अब सबसे पहले तो किसी का यह सोचना सचमुच बड़ा अजीब लगता है कि मध्य युग और प्राचीन संसार के बारे में ये पिटी-पिटाई बातें किसी दूसरे को मालूम नहीं है. बहरहाल इतनी बात तो स्पष्ट है कि मध्य युग के लोग केवल कैथोलिक धर्म के सहारे या प्राचीन संसार के लोग केवल राजनीति के सहारे जिंदा नहीं रह सकते थे. इसके विपरीत, उनके जीविका कमाने के ढंग से ही यह बात साफ़ हो जाती है कि क्यों एक काल में राजनीति और दूसरे काल में कैथोलिक धर्म की मुख्य भूमिका थी. जहाँ तक बाकी बातों का सम्बन्ध है, तो, उदाहरण के लिए, रोमन गणतंत्र के इतिहास की मामूली जानकारी भी यह जानने के लिए काफी है कि रोमन गणतंत्र का गुप्त इतिहास वास्तव में उसकी भूसंपत्ति का इतिहास है. दूसरी और, डॉन क्विकज़ोट बहुत पहले अपनी इस गलत समझ का खामियाजा अदा कर चूका है कि मध्य युग के सूरमा-सरदारों जैसा आचरण समाज के सभी आर्थिक रूपों से मेल खा सकता है.

इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34) की हिफाजित में

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“कोट, कपड़ा, आदि उपयोग-मूल्य, अर्थात पण्यों के ढांचे, दो तत्त्वों के योग होते हैं – पदार्थ और श्रम के. उन पर जो उपयोगी श्रम खर्च किया गया है, यदि आप उसे अलग कर दें, तो एक ऐसा भौतिक आधार-तत्त्व हमेशा बचा रहेगा, जो बिना मनुष्य की सहायता के प्रकृति से मिलता है. मनुष्य केवल प्रकृति की तरह काम कर सकता है, अर्थात वह भी केवल पदार्थ का रूप बदलकर ही काम कर सकता है. यही नहीं रूप बदलने के इस काम में उसे प्रकृति की शक्तियों से बराबर मदद मिलती है. इस प्रकार हम देखते हैं कि अकेला श्रम भौतिक संपत्ति का, अथवा श्रम के पैदा किये हुए, उपयोग-मूल्यों का एकमात्र स्रोत नहीं है जैसा कि विलियम पैटी ने कहा है, श्रम उसका बाप है और पृथ्वी उसकी माँ है. (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

“विश्व की सभी परिघटनाएं , चाहे वे मनुष्य के हाथ का फल हों अथवा प्रकृति के सार्विक नियमों का परिणाम, वास्तव में सृजन नहीं बल्कि पदार्थ के रूपों में परिवर्तन है. मानव बुद्धि जब कभी उत्पादन के विचार का विश्लेषण करती है, तो उसे केवल दो ही तत्त्व दिखाई पड़ते हैं – एक जोड़ना, दूसरा तोड़ना; यही बात मूल्य ” (उपयोग-मूल्य, हालाँकि फिजियोक्रेटों के साथ वाद-विवाद के इस अंश में वेर्री के मन में भी यह बात पूरी तरह साफ़ नहीं है कि वह किस प्रकार के मूल्य की चर्चा कर रहा है) “अथवा धन के उत्पादन के संबंध में भी लोगू होती है, जब मनुष्य द्वारा पृथ्वी, वायू, और जल को अनाज में रूपांतरित कर दिया जाता है, या एक कीड़े के चेपदार स्त्राव को रेशम में, या धातु  के अलग-अलग टुकडों को एक घड़ी में बदल दिया जाता है.” _Pietro Verri, Meditazioni sulla Economia Politica (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

श्रम और पण्य-मूल्य दोनों का चरित्र दुहरा है लेकिन हम यहाँ पण्य-मूल्य के दुहरे चरित्र के सामान्य विश्लेषण तक सीमित  रहेंगे. पण्य-मूल्य के दोहरे चरित्र में पहली विशेषता उसके उपयोग मूल्य से है जैसे पानी, धुप, वायू, आदि. ये सभी धन का एक रूप हैं लेकिन ये पण्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि इसमें मानवी श्रम नहीं लगा है और इन्हें हासिल करने के लिए भुगतान के किसी भी रूप की आवश्यकता नहीं पड़ती.

पण्य की दूसरी विशेषता उसमें लगे मानवीय श्रम से सम्बंधित है जिस कारण उसका विनिमय मूल्य होता है.

अरस्तू का हवाला देते हुए मार्क्स लिखते हैं.”अरस्तू कहते हैं कि विनिमय समानता के बिना नहीं हो सकता, और समानता उस वक्त तक नहीं हो सकती, जब तक की दोनों वस्तुएं एक ही मापदंड से न मापी जा सकती हों.” “लेकिन यहाँ आकर वे (अरस्तू) ठहर जाते हैं और मूल्य के रूप का आगे विश्लेषण करना बंद कर देते हैं.

मार्क्स आगे लिखते हैं ,” अरस्तू की प्रतिभा का चमत्कार इसी बात में प्रकट होता है कि उन्होंने पण्यों के मूल्यों के अभिव्यक्ति में समानता का सम्बन्ध देखा. वह जिस समाज (गुलाम और मालिक-गुलाम) में रहते थे, केवल उसकी विशेष परिस्थितियों ने ही उन्हें यह पता नहीं लगाने दिया कि इस समानता की तह में ‘सचमुच” क्या था.(मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. 79)

“महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” सूत जी [इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34)] द्वारा पांडे जी के  इस कथन की स्वीकृति के  साथ हम भी सहमत हैं लेकिन यह भी जोड़ देना चाहते हैं कि यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” गति में होने के कारण हमेशा बना नहीं रह सकता क्योंकि पांडे जी के परदादा जो  कुरता पहना करते थे वह बामुश्किल दस या पंद्रह लोगों की श्रम का फल था और अंत में जिसके पास इसे बेचने का अधिकार (अगर था तो ) वह  दस या पंद्रह पर एक  का ही था. लेकिन आज इन्होने जिस 100 रूपए की शर्ट को पहना हुआ है उस पर लगी हुई श्रम, अगर हम कहें कि, विश्व के सौ करोड़ लोगों की श्रम है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

पूँजीवाद की सबसे बड़ी विसंगतियों में एक श्रम का इतने उच्च धरातल पर समाजीकरण परंतु इसके विपरीत श्रम के उत्पादों पर मुट्ठीभर लोगों का मालिकाना हक़ जिनकी संख्या निरंतर घटती जा रही  है …. यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है जबकि यह विसंगति और अधिक गहराती जा रही है …देखना है कि इसका क्लाईमैक्स कहाँ होता है

उपरोक्त वस्तुगत और साक्षात उदाहरण उन बुद्दिजीवियों के मुहं पर तमाचा है जो मार्क्सवाद को आयातित और अप्रासंगिक बताते हैं. बल्कि यह साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा शोषित  भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए पहले से अधिक, कहीं अधिक प्रासंगिक है.  इस बात को लेनिन ने नोट कर लिया था और मार्क्स के  शब्द “कम्युनिस्म का हौवा यूरोप पर मंडरा रहा है”  को दरुस्त करते हुए, बदले हुए हालात में उन्होंने कहा कि,” विश्व पूँजी के साम्राज्यवाद में प्रवेश करने के कारण क्रांतियों का धुरा अब यूरोप न होकर पूर्व है.”

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी आपके इतना भर लिख देने से कि  “महालक्ष्मी श्रम से उत्पन्न नहीं होतीं, वे श्रम के लिये मानव को प्रेरित करती हैं। महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” काम नहीं चलेगा. बात को तर्क-वितर्क से आगे बढाएं.

और आपका फ़िक्र कि “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.

….मार्क्स के इन शब्दों “To leave an error unrefuted is to encourage intellectual immorality. ...के साथ हम अपने आलेख को विराम देते हैं और पांडे जी से आशा करतें हैं कि वे बहस को आगे बढाएँगे.

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मई दिवस का इतिहास

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अलेक्जेण्डर ट्रैक्टनबर्ग

अनुवाद : अभिनव सिन्हा

मई दिवस का जन्म काम के घण्टे कम करने के आन्दोलन से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। काम के घण्टे कम करने के इस आन्दोलन का मज़दूरों के लिए बहुत अधिक राजनीतिक महत्त्व है। जब अमेरिका में फैक्ट्री-व्यवस्था शुरू हुई, लगभग तभी यह संघर्ष उभरा।

हालाँकि अमेरिका में अधिक तनख्वाहों की माँग, शुरुआती हड़तालों में सबसे ज्यादा प्रचलित माँग थी, लेकिन जब भी मज़दूरों ने अपनी माँगों को सूत्रबद्ध किया, काम के घण्टे कम करने का प्रश्न और संगठित होने के अधिकार का प्रश्न केन्द्र में रहा। जैसे-जैसे शोषण बढ़ता गया, मज़दूरों को अमानवीय रूप से लम्बे काम के दिन और भी बोझिल महसूस होने लगे। इसके साथ ही मज़दूरों की काम के घण्टों में आवश्यक कमी की माँग भी मजबूत होती गयी।

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में ही अमेरिका में मज़दूरों ने “सूर्योदय से सूर्यास्त” तक के काम के समय के विरोध में अपनी शिकायतें जता दी थीं। “सूर्योदय से सूर्यास्त” तक – यही उस समय के काम के घण्टे थे। चौदह, सोलह और यहाँ तक कि अट्ठारह घण्टे का कार्यकाल भी वहाँ आम बात थी। 1806 में अमेरिका की सरकार ने फ़िलाडेल्फिया के हड़ताली मोचियों के नेताओं पर साजिश के मुकदमे चलाए। इन मुकदमों में यह बात सामने आई कि मज़दूरों से उन्नीस या बीस घण्टों तक काम कराया जा रहा था।

उन्नीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक काम के घण्टे कम करने के लिए हड़तालों से भरे हुए थे। कई औद्योगिक केन्द्रों में तो एक दिन में काम के घण्टे दस करने की निश्चित माँगें भी रखी गयीं। `मैकेनिक्स यूनियन ऑफ फ़िलाडेल्फिया´ को , जो दुनिया की पहली ट्रेड यूनियन मानी जाती है, 1827 में फ़िलाडेल्फिया में काम के घण्टे दस करने के लिए निर्माण-उद्योग के मज़दूरों की एक हड़ताल करवाने का श्रेय जाता है। 1834 में न्यूयॉर्क में नानबाइयों की हड़ताल के दौरान `वर्किँग मेन्स एडवोकेट´ नामक अखबार ने छापा था – “पावरोटी उद्योग में लगे कारीगर सालों से मिड्ड के गुलामों से भी ज्यादा यातनाएँ झेल रहे हैं। उन्हें हर चौबीस में से औसतन अट्ठारह से बीस घण्टों तक काम करना होता है।”

उन इलाकों में दस घण्टे के कार्य-दिवस की इस माँग ने जल्दी ही एक आन्दोलन का रूप ले लिया। इस आन्दोलन में हालाँकि 1837 के संकट से बाधा पड़ी, लेकिन फ़िर भी यह आन्दोलन दिन-पर-दिन विकसित होता गया, और इसी के चलते वांन ब्यूरेन की संघीय सरकार को सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए काम के घण्टे दस करने की घोषणा करनी पड़ी। पूरे विश्व-भर में काम के घण्टे दस करने का संघर्ष अगले कुछ दशकों में शुरू हो गया। जैसे ही यह माँग कई उद्योगों में मान ली गई, वैसे ही मज़दूरों ने काम के घण्टे आठ करने की माँग उठानी शुरू की। पचास के दशक के दौरान लेबर यूनियनों को संगठित करने की गतिविधियों ने इस नयी माँग को काफी बल दिया, हालाँकि 1857 के संकट से इसमें भी अवरोध आया था। यह माँग कुछ सुसंगठित उद्योगों में इस संकट के आने से पहले ही मान ली गयी थी। यह आन्दोलन मात्र अमेरिका तक ही सीमित नहीं था। यह आन्दोलन हर उस जगह प्रचलित हो चला था जहाँ उभरती हुई पूँजीवादी व्यवस्था के तहत मज़दूरों का शोषण हो रहा था । यह बात इस तथ्य से सामने आती है कि अमेरिका से पृथ्वी के दूसरे छोर पर स्थित आस्ट्रेलिया में निर्माण उद्योग के मज़दूरों ने यह नारा दिया – “आठ घण्टे काम, आठ घण्टे मनोरंजन, आठ घण्टे आराम” और उनकी यह माँग 1856 में मान भी ली गई।

`काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की अमेरिका में शुरुआत

वह संघर्ष, जिससे `मई दिवस´ का जन्म हुआ, अमेरिका में, 1884 में, `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन से शुरू हुआ। हालाँकि इससे एक पीढ़ी पहले भी एक राष्ट्रीय श्रम संगठन, `नेशनल लेबर यूनियन´ ने, जिसने एक जुझारू सांगठनिक केन्द्र के रूप में विकसित होने की आशा जगाई थी, छोटे कार्य दिवस का प्रश्न उठाया था और इस पर एक आन्दोलन खड़ा करने का प्रस्ताव रखा था। गृहयुद्ध के पहले साल (1861-62) ने कुछ राष्ट्रीय ट्रेड यूनियनों का लोप होते देखा। ये युद्ध शुरू होने के ठीक पहले बनी थीं। इनमें `मोल्डर्स यूनियन´, `मेकिनिस्ट्स और ब्लैकस्मिथस यूनियन´ प्रमुख थीं। लेकिन आने वाले कुछ सालों में कई स्थानीय श्रमिक संगठनों का राष्ट्रीय स्तर पर एकीकरण भी हुआ। इन यूनियनों को एक राष्ट्रीय संघ की जरूरत साफ दिखाई देने लगी। 20 अगस्त, 1866 को `नेशनल लेबर यूनियन´ बनाने वाली तीन ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि बाल्टीमोर में मिले। राष्ट्रीय संगठन के निर्माण के लिए जो आन्दोलन चला था उसका नेतृत्व विलियम एच. सिल्विस ने किया था। वह पुनर्गठित `मोल्डर्स यूनियन´ का नेता था। सिल्विस हालाँकि एक नौजवान आदमी था लेकिन उस समय के श्रमिक आन्दोलनों में उसकी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी। सिल्विस का प्रथम कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल के नेताओं से भी सम्पर्क था जो लन्दन में थे। उसने `नेशनल लेबर यूनियन´ को इण्टरनेशनल की जनरल काउंसिल से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रेरित किया और उसमें मदद भी की।

1866 में `नेशनल लेबर यूनियन´ के स्थापना समारोह में यह प्रतिज्ञा ली गई: “इस देश के श्रमिकों को पूँजीवादी गुलामी से मुक्त करने के लिए, वर्तमान समय की पहली और सबसे बड़ी जरूरत यह है कि अमेरिका के सभी राज्यों में आठ घण्टे के कार्य दिवस को सामान्य कार्य दिवस बनाने का कानून पास कराया जाए। जब तक यह लक्ष्य पूरा नहीं होता, तब तक हम अपनी पूरी शक्ति से संघर्ष करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं।”

इसी समारोह में कार्य दिवस को आठ घण्टे करने का कानून बनाने की माँग के साथ ही स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधियों के अधिकार की माँग को उठाना भी बहुमत से पारित हुआ। साथ ही यह तय हुआ कि इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए “ऐसे व्यक्तियों का चुनाव किया जाए जो औद्योगिक वर्गों के हितों को प्रोत्साहित करने और प्रस्तुत करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हों।”

`आठ-घण्टा दस्तों´ (आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग के लिए बने मज़दूर संगठन) का यह निर्माण `नेशनल लेबर यूनियन´ द्वारा किए गए आन्दोलन का ही परिणाम था। और `नेशनल लेबर यूनियन´ की इन गतिविधियों के ही परिणामस्वरूप कई राज्य सरकारों ने आठ घण्टे के कार्य दिवस का कानून पास करना स्वीकार कर लिया था। अमेरिकी कांग्रेस ने ठीक वैसा ही कानून 1868 में पारित कर दिया। इस `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की उत्प्रेरक नेता थीं बोस्टन की मेकेनिस्ट इरा स्टीवर्ड

हालाँकि शुरुआती दौर के श्रमिक आन्दोलन का कार्यक्रम और नीतियां प्राथमिक स्तर थीं और हमेशा उनका प्रभाव नहीं दिखता था, लेकिन फ़िर भी वह स्वस्थ सर्वहारा नैसर्गिकता पर आधारित थीं। वे एक जुझारू मज़दूर आन्दोलन की नींव बन सकतीं थीं। लेकिन बाद में सुधारवादी नेता और पूँजीवादी राजनीतिज्ञ इन संगठनों में घुस गये और उन्हें गलत मार्ग पर अग्रसर कर दिया। बहरहाल, चार पीढ़ियों पहले, अमेरिकी श्रमिकों के राष्ट्रीय संगठन एन. एल. यू., यानी `नेशनल लेबर यूनियन´ ने स्वयं को “पूंजीवादी गुलामी” के विरुद्ध घोषित किया और स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधि के अधिकार की माँग की।

सिल्विस का लन्दन में इण्टरनेशनल के साथ सम्पर्क जारी था। चूंकि सिल्विस `नेशनल लेबर यूनियन´ का अध्यक्ष था, एन. एल. यू. ने, 1867 के अपने सम्मेलन में अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर वर्ग आन्दोलन के साथ सहयोग करने के प्रस्ताव को स्वीकार किया, और 1869 में इण्टरनेशनल की जनरल काउंसिल के आमन्त्रण को स्वीकार किया और इण्टरनेशनल के बेसिल कांग्रेस में अपना एक प्रतिनिधि भी भेजा। दुर्भाग्य से, सिल्विस की एन. एल. यू. के सम्मेलन से पहले ही मृत्यु हो गयी और शिकागो से छपने वाले `वर्किन्गमेन्स एडवोकेट´ के सम्पादक ए. सी. कैमरॉन सिल्विस के स्थान पर प्रतिनिधि के रूप में सम्मेलन में गए। जनरल काउंसिल ने एक विशेष प्रस्ताव के तहत अपने इस आशावादी नौजवान अमेरिकी श्रमिक नेता की मृत्यु पर शोक जताया-

“सबकी आँखें सिल्विस पर रुक गई थीं। सिल्विस के पास अपनी महान क्षमताओं के अलावा अपनी सर्वहारा सेना के जनरल के रूप में दस वर्ष का अनुभव था – और सिल्विस अब नहीं रहे।” सिल्विस की मौत `नेशनल लेबर यूनियन´ के ह्रास का एक बहुत बड़ा कारण बनी। और यह ह्रास जल्दी ही एन. एल. यू. के अन्त के रूप में सामने आया।

`काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन पर मार्क्स के विचार

आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग करने का निर्णय `नेशनल लेबर यूनियन´ ने अगस्त, 1866 में लिया। उसी वर्ष सितम्बर में पहले इण्टरनेशनल की जेनेवा कांग्रेस में इस आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग निम्न रूप से दर्ज हुई – “काम के दिन की वैध सीमा तय करना एक प्राथमिक शर्त है जिसके बिना मज़दूर वर्ग की स्थिति में सुधार या उसकी मुक्ति का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता….. यह कांग्रेस आठ घण्टे के कार्य दिवस का प्रस्ताव रखती है।

” 1867 में प्रकाशित `पूँजी´ के पहले खण्ड के “कार्य दिवस” पर आधारित अध्याय में मार्क्स ने `नेशनल लेबर यूनियन´ द्वारा शुरू किए गए `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की ओर ध्यान दिलाया हैं। `पूँजी´ का यह हिस्सा काफी प्रसिद्ध है क्योंकि इसमें मार्क्स ने काले मज़दूरों और श्वेत मज़दूरों के वर्ग हितों की एकता के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है:

“जब तक दास प्रथा गणराज्य के एक हिस्से पर कलंक के समान चिपकी रही, तब तक अमेरिका में कोई भी स्वतंत्र मज़दूर आन्दोलन पंगु बना रहा। सफेद चमड़ी वाला मज़दूर कभी भी स्वयं को मुक्त नहीं कर सकता जब तक काली चमड़ी वाले मज़दूरों को अलग करके देखा जाएगा। लेकिन दास प्रथा की समाप्ति के साथ ही एक नए ओजस्वी जीवन के अंकुर फूटे। `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन के साथ ही वहाँ गृह-युद्ध का श्रीगणेश हुआ। `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन – एक ऐसा आन्दोलन था जो तेजी के साथ अटलांटिक से हिन्द तक, न्यू इंग्लैण्ड से कैलिफोर्निया तक फैल गया।”

मार्क्स ने इस बात की ओर ध्यान खींचा कि, किस तरह लगभग साथ-साथ, वास्तव में दो हफ्रतों के अन्दर, बाल्टीमोर में एक मज़दूर सम्मेलन ने आठ घण्टे के कार्य दिवस को बहुमत से पारित किया और इण्टरनेशनल की जेनेवा कांग्रेस ने ठीक वैसा ही निर्णय लिया। “इस तरह अटलांटिक के दोनों ओर मज़दूर आन्दोलन ने `उत्पादन की परिस्थितियों´ में गुणात्मक विकास किया।” यह कथन इसी बात को बताता है कि किस तरह कार्य दिवस की सीमाओं को तय करने का आन्दोलन चला और `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन के रूप में साकार हुआ।

जेनेवा कांग्रेस का निर्णय अमेरिकी `नेशनल लेबर यूनियन´ के निर्णय से कैसे मेल खाता है, उसे इस कथन में देखा जा सकता है – “चूँकि कार्य दिवस की सीमाएँ तय करने की माँग पूरे अमेरिका के मज़दूरों की माँगों को प्रस्तुत करती है, इसलिए यह कांग्रेस इस माँग को पूरी दुनिया के मज़दूरों के एक आम मोर्चे का रूप देती है।” इण्टरनेशनल की कांग्रेस पर, इसी मुद्दे पर अमेरिकी मज़दूर आन्दोलन का और जबर्दस्त प्रभाव पड़ा, लेकिन 23 साल बाद।

अमेरिका में मई दिवस का जन्म

1872 में जब पहले इण्टरनेशनल का हेडक्वार्टर लन्दन से न्यूयार्क आया, तो पहला इण्टरनेशनल एक अन्तरराष्ट्रीय संस्था के रूप में समाप्त हो गया, लेकिन औपचारिक रूप से इसका अस्तित्व 1876 तक बना रहा। इण्टरनेशनल पुन: गठित हुआ और दूसरे इण्टरनेशनल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरे इण्टरनेशनल की पेरिस कांग्रेस (1889) में पहली मई को उस दिन का रूप दिया गया जिस दिन दुनिया भर के मज़दूर अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टियों और ट्रेड-यूनियनों के रूप में संगठित हों, और अपनी सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक माँग – आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग के लिए संघर्ष करें। पेरिस कांग्रेस का यह महत्त्वपूर्ण निर्णय, शिकागो में पांच साल पहले लिए गए एक निर्णय से प्रभावित था। यह निर्णय पांच साल पहले शिकागो में एक नवनिर्मित अमेरिकी मज़दूर संगठन-`द फेडरेशन ऑफ ऑर्गनाइज्ड ट्रेड एण्ड लेबर यूनियन्स ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स एण्ड कनाडा´ जो बाद में अपने संक्षिप्त नाम `द अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, के प्रतिनिधियों ने लिया था। 7 अक्टूबर, 1884 को इस संगठन के चौथे सम्मेलन में निम्न प्रस्ताव पारित हुआ:

“फेडरेशन ऑफ ऑर्गनाइज्ड ट्रेड एण्ड लेबर यूनियन्स ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स एण्ड कनाडा” यह तय करती है कि, पहली मई, 1886 से आठ घण्टे का कार्य दिवस वैध कार्य दिवस होगा और हम मज़दूर संगठनों से आग्रह करते हैं कि, वे अपने अधिकारक्षेत्र के अनुसार, अपने नियमों को ऐसे निर्धारित करें कि वे इस प्रस्ताव के अनुकूल हों।”

लेकिन इस प्रस्ताव में कहीं भी यह नहीं बताया गया था कि किस तरह यह संगठन पहली मई को `आठ घण्टा दिवस´ के रूप में प्रचलित करेगा। यह बात खुद इस बात की गवाह है कि जो संगठन 50,000 से ज्यादा सदस्यों का भी नहीं है, वह बिना उन फैक्टरियों, मिलों और खदानों में संघर्ष किए, जिनमें उसके सदस्य काम करते थे, और `काम के घण्टे की आठ करो´ आन्दोलन को बिना मज़दूरों की और बड़ी आबादी में प्रसारित किए यह कैसे घोषित कर सकता था कि “आठ घण्टे का कार्य दिवस वैध कार्य दिवस होगा।” इस प्रस्ताव का यह कथन कि “फेडरेशन से जुड़ी सभी यूनियनें ” अपने नियमों को इस प्रकार निर्धारित करें कि वे इस प्रस्ताव के अनुकूल हों”, इस बात से सम्बन्धित है कि वे यूनियनें अपने सदस्यों को विशेष हड़ताल-सहायता देंगी जो पहली मई, 1886 से हड़ताल पर जा रहे हैं। हो सकता है कि वे इतने अधिक समय तक हड़ताल पर रहें कि उन्हें यूनियन से सहायता की जरूरत पड़े। चूंकि हड़ताल के समय में मज़दूरों के पास जीविका चलाने का कोई साधन नहीं होता था, इसलिए यूनियनें उन्हें हड़ताल के समय विशेष सहायता देतीं थीं। चूंकि यह हड़ताल राष्ट्रीय स्तर पर थी, और उन सभी संगठनों को शामिल करती थी जो फेडरेशन से जुड़ी हुई थीं, अत: इन सभी यूनियनों को अपने नियमानुसार अपने सदस्यों से हड़ताल के लिए स्वीकृति प्राप्त कर लेनी थी, ख़ासकर इसलिए भी क्योंकि, इन हड़तालों में उनके फंडों का खर्चा भी शामिल था। यह बात जरूर याद रहे कि यह फेडरेशन यानी आज का `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ स्वैच्छिक और संघीय आधार पर बना था, और राष्ट्रीय सम्मेलन के निर्णय सिर्फ फेडरेशन से जुड़ी यूनियनों पर लागू थे, वह भी तब, जब यूनियनें उन निर्णयों का समर्थन करें।

मई दिवस की तैयारियां

1877 में जबरदस्त हड़तालें हुई। इन हड़तालों के दमन के लिए बड़े पूँजीवादी कारपोरेशनों और सरकार ने सैनिक दस्ते भेजे, जिनका रेलवे और स्टील कारखानों के दसियों हज़ार मज़दूरों ने बहादुरी से प्रतिरोध किया। इन संघर्षों का पूरे मज़दूर आन्दोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा। यह अमेरिका में पहला ऐसा जन-उभार था जो राष्ट्रीय पैमाने पर हुआ था और अमेरिकी मज़दूर-वर्ग द्वारा संचालित था। इन संघर्षों में ये मज़दूर राज्य और पूँजी की मिली हुई शक्तियों से भले ही हार गए, लेकिन इस दौर के बाद अमेरिकी मज़दूर समाज अपनी वर्ग स्थिति की ज्यादा गहरी समझ, एक बेहतर जुझारूपन और बहुत ऊँचे हौसले के साथ उभरा। यह एक तरह से पेन्सिलवेनिया के उन कोयला मालिकों को एक उत्तर था जिन्होंने एन्थ्रासाइट क्षेत्र के खदानकर्मियों के संगठन को तोड़ने की कोशिश में दस जुझारू खदानकर्मियों को फांसी दे दी थी।

हालाँकि 1880-90 का दशक अमेरिकी उद्योग और घरेलू बाजार के विकास के नजरिए से सर्वाधिक सक्रिय दशक था, लेकिन 1884-85 के वर्ष में मन्दी का एक झोंका आया। वास्तव में यह 1873 के संकट के बाद आवर्ती चक्रीय क्रम में आई हुई मन्दी का ही दौर था। इस दौर में मौजूद बेरोज़गारी और जनता द्वारा झेली जा रही कठिन तकलीफों ने छोटे कार्य दिवस के आन्दोलन को एक नई गति दी।

जल्दी ही बने मज़दूरों के उस संगठन, `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ ने उस समय यह संभावना देखी कि `आठ घण्टे के कार्य दिवस´ के नारे को एक ऐसे नारे की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है जो उन सारे मज़दूरों को एक झण्डे के नीचे ला सकता है जो न ही फेडरेशन में हैं न ही `नाइट्स ऑफ लेबर´ में। `नाइट्स ऑफ लेबर´ मज़दूरों का एक बहुत पुराना संगठन था जो लगातार बढ़ रहा था। फेडरेशन यह समझ चुका था कि सभी मज़दूर संगठनों के साथ मिलकर ही आठ घण्टे के कार्य दिवस के आन्दोलन को सफल बनाया जा सकता है। यही समझकर `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ ने `नाइट्स ऑफ लेबर´ से इस आन्दोलन में सहयोग की अपील की।

फेडरेशन के 1885 के सम्मेलन में आने वाले साल की पहली मई को हड़ताल पर जाने का संकल्प दोहराया गया। कई राष्ट्रीय यूनियनों ने, ख़ासकर बढ़इयों की और सिगार बनाने वालों की यूनियनों ने तो हड़ताल की तैयारियों के कदम भी उठा दिए। पहली मई की हड़ताल के लिए हो रहे आन्दोलनों ने तुरन्त असर दिखाना शुरू कर दिया। हड़ताली यूनियनों के सदस्यों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होने लगी। `नाइट्स ऑफ लेबर´ संगठन ने अपने विकास में कई छलांगें लगाईं। नतीजतन 1886 में मज़दूरों का यह जुझारू संगठन अपने शीर्ष पर था। यह बात सामने आई कि उस दौरान `नाइट्स ऑफ लेबर´ ने, जो फेडरेशन से ज्यादा प्रसिद्ध था, और एक बेहद जुझारू संगठन के रूप में जाना जाता था, अपने सदस्यों की संख्या दो लाख से बढ़ा कर सात लाख कर ली थी। फेडरेशन वह संगठन था जिसने इस आन्दोलन की शुरुआत की थी, और हड़ताल की तारीख निश्चित की थी, उसके सदस्यों की संख्या में भी वृद्धि हुई, और मज़दूरों की विशाल आबादी में उसका सम्मान भी काफी बढ़ा।

जैसे-जैसे हड़ताल की तारीख करीब आती जा रही थी, यह बात सामने आ रही थी कि `नाइट्स ऑफ लेबर´ का नेतृत्व, ख़ासकर टेरेंस पाउडरली का नेतृत्व आन्दोलन को नुकसान पहुंचा रहा है, और यही नहीं वह अपने से जुड़ी यूनियनों को हड़ताल में हिस्सा न लेने की सलाह दे रहा है। फेडरेशन अभी भी लगातार मज़दूरों के बीच लोकप्रिय होता जा रहा था। दोनों संगठनों के जुझारू मज़दूर सदस्यों की कतारें लगातार, उत्साहपूर्वक हड़ताल की तैयारियां कर रहीं थीं। कई शहरों में `आठ-घण्टा दस्ते´ और इसी तरह के अन्य जत्थे उभरे। इनके उभरने से पूरे आन्दोलन में मज़दूरों के बीच जुझारूपन की भावना में जबर्दस्त बढ़ोत्तरी हुई। इस लहर से असंगठित मज़दूर भी अछूते नहीं रहे।, वे भी बढ़-चढ़ कर आन्दोलन में हिस्सा लेने लगे। अमेरिकी मज़दूर वर्ग के लिए एक नई सुबह आ रही थी।

मज़दूरों के मिजाज को समझने का सबसे अच्छा रास्ता है कि, उनके संघर्षों की गम्भीरता और विस्तार के बारे में अध्ययन किया जाये, उसे समझा जाये। एक समय में मज़दूरों के लड़ाकू मिजाज को उस दौरान हुई हड़तालों की संख्या से समझा जा सकता है। पिछले सालों में हुई हड़तालों की संख्या के मुकाबले 1885 से 1886 के दौरान हुई हड़तालों की संख्या, उस समय के मज़दूरों के उस जबर्दस्त लड़ाकूपन को दर्शाती है जो उस समय आन्दोलन को आगे बढ़ा रहा था। मज़दूर पहली मई 1886 की महान हड़ताल की तैयारियां तो कर ही रहे थे, लेकिन 1885 में ही हड़तालों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हो गयी थी। 1881 से 1884 के दौरान हड़तालों और तालाबन्दियों का औसत था मात्र 500 प्रति वर्ष, और उसमें भाग लेने वाले मज़दूर थे औसतन 1,50,000 प्रति वर्ष। 1885 में हड़तालों और तालाबन्दियों की गिनती 700 तक जा पहुंची और भाग लेने वाले मज़दूरों की संख्या बढ़कर हो गई 2,50,000। 1886 में तो हड़तालों की संख्या 1885 की तुलना में दोगुनी होकर 1,572 जा पहुंची और उसी अनुपात में हड़तालों और तालाबन्दियों में हिस्सा लेने वाले मज़दूरों की संख्या भी बढ़कर 6,00,000 हो गयी। इन हड़तालों की व्यापकता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1885 में इन हड़तालों से प्रभावित प्रतिष्ठानों की संख्या 2,467 थी और अगले साल ही यह संख्या बढ़कर 11,562 जा पहुंची। `नाइट्स ऑफ लेबर´ के नेतृत्व की खुली गद्दारी के बावजूद यह अन्दाजा लगाया गया कि, लगभग 5 लाख मज़दूर `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन में सीधे शिरकत कर रहे थे।

हड़ताल का केन्द्र शिकागो था, जहाँ हड़ताल सबसे ज्यादा व्यापक थी, लेकिन पहली मई को कई और शहर इस मुहिम में जुड़ गए थे। न्यूयार्क, बाल्टीमोर, वाशिंगटन, मिलवॉकी, सिनसिनाटी, सेंट लुई, पिट्सबर्ग, डेन्ट्राइट समेत अनेक शहरों में शानदार हड़तालें हुईं। इस आन्दोलन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसने अकुशल और असंगठित मज़दूरों को भी हड़ताल में खींच लिया था। उस दौरान वे अनुनादी हड़तालें काफी प्रचलित थीं। पूरे देश में एक विद्रोही भावना फैल चुकी थी, बुर्जुआ इतिहासकार “सामाजिक युद्ध” और “पून्जी से घृणा” की बातें कर रहे थे, जो उस दौरान सुस्पष्ट होकर सामने आ चुकीं थीं। साथ ही वे मज़दूरों की उन कतारों की बातें कर रहे थे, जो उस समय आन्दोलन के रथ को आगे बढ़ा रहीं थीं। यह कहा जा सकता है कि पहली मई को हड़ताल करने वाले मज़दूरों को आधी सफलता मिली और जहाँ वे आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग नहीं मनवा सके, वहाँ भी वह काम के घण्टों में पर्याप्त कमी करवाने में सफल रहे।

शेष अगली पोस्ट में …यहाँ देखें

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-4

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एजेण्डा पर कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की एकता का

सवाल : एक सर्वभारतीय पार्टी के गठन की ओर

नक्सलबाड़ी में सशस्त्र किसान विद्रोह के विस्फोट के तुरन्त बाद पूरे देश में माकपा की पार्टी कतारों में और पार्टी के बाहर के कम्युनिस्ट तत्त्वों के बीच संशोधनवाद के विरुद्ध विद्रोह की लहर दौड़ पड़ी। बंगाल से बाहर, उत्तर प्रदेश, बिहार, आन्ध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, असम, उड़ीसा और त्रिपुरा में पार्टी-कतारों के विद्रोह से अराजकता और विभाजन की स्थिति उत्पन्न होने लगी। भारी संख्या में नये युवा तत्त्व भी इस क्रान्तिकारी लहर की ओर आकृष्ट हुए। पार्टी के भीतर और बाहर, स्वयंस्फूर्त ढंग से क्रान्तिकारी ग्रुप बनने लगे। यदि केवल प. बंगाल का उदाहरण लें तो वहाँ `निशान´, `पदातिक´, `भित्ति´, `सूर्यसेन´, `छात्र फ़ौज´ आदि कई ग्रुप सक्रिय हो गये थे, जिन्होंने संशोधनवाद विरोधी सैद्धान्तिक संघर्ष और क्रान्तिकारी प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1966 से ही सक्रिय `चिन्ता ग्रुप´ और पार्टी के भीतर गठित `अन्तर्पार्टी संशोधनवाद विरोधी कमेटी´ की पहले ही चर्चा की जा चुकी है।

अलग-अलग राज्यों में माकपा के भीतर संशोधनवाद विरोधी संघर्ष को नेतृत्व देने वालों में आन्ध्र प्रदेश के डी.वी. राव और नागी रेड्डी तो राष्ट्रीय स्तर के नेता थे और केन्द्रीय कमेटी के सदस्य भी रह चुके थे। इनके अतिरिक्त बिहार में सत्यनारायण सिंह, उत्तर प्रदेश में शिवकुमार मिश्र, जम्मू-कश्मीर में आर.पी. सर्राफ़ सहित कई राज्य स्तरीय नेतृत्व के लोग भी थे। बंगाल में सुशीतल राय चौधरी और सरोज दत्त राज्य स्तरीय नेता थे, परिमल दास गुप्त और असित सेन प्रसिद्ध ट्रेडयूनियन नेता और सिद्धान्तवेत्ता थे। उपरोक्त राज्यों में तारों का बड़ा हिस्सा विद्रोहियों के साथ था।

14 जून 1967 को कलकत्ता के राममोहन लाइब्रेरी हॉल में नक्सलबाड़ी में किसानों की हत्या और दमन के विरोध में तथा संग्रामी किसानों के समर्थन में कुछ ऐसी मज़दूर यूनियनों के आह्वान पर एक जनसभा हुई, जिनका नेतृत्व माकपा की संशोधनवादी, अर्थवादी नीतियों से असन्तुष्ट था। इसमें एक प्रस्ताव पारित करके `नक्सलबाड़ी और कृषक संग्राम सहायक कमेटी´ की स्थापना की गयी जिसका सचिव प्रसिद्ध ट्रेड यूनियन नेता और माकपा की कलकत्ता ज़िला कमेटी के सदस्य परिमल दासगुप्त को बनाया गया। देश भर के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तत्त्वों से सम्पर्क स्थापित करने का काम सबसे पहले इसी कमेटी के बैनर तले शुरू किया गया।

प. बंगाल राज्य कमेटी के मुखपत्र `देशहितैषी´ का दफ़्तर उस समय क्रान्तिकारी तत्त्वों के नियन्त्रण में आ गया था। उसके सम्पादक मण्डल में सुशीतल रायचौधरी और सरोज दत्त शामिल थे और बहुमत भी उन्हीं के साथ था। 28 जून 1967 को माकपा नेतृत्व ने बलपूर्वक उन सबको निकाल बाहर करके दफ़्तर पर कब्ज़ा किया। इसके एक सप्ताह बाद बांगला साप्ताहिक `देशव्रती´ का प्रकाशन शुरू हुआ जो मार्क्सवादी-लेनिनवादियों का पहला मुखपत्र था। इस समय तक माकपा नेतृत्व देशव्यापी छँटनी मुहिम शुरू कर चुका था। पूरे देश में नक्सलबाड़ी के पक्ष में मुखर एक हज़ार से भी अधिक नेताओं-कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाल बाहर किया गया। अकेले बंगाल में ही निष्कासित लोगों की संख्या चार सौ से अधिक थी। बंगाल के निष्कासित लोगों में चारु मजूमदार, कानू सान्याल, सौरेन बसु, सरोज दत, सुशीतल रायचौधरी, परिमल दासगुप्त, असित सेन, सुनीति कुमार घोष आदि प्रमुख थे। बिहार से सत्यनारायण सिंह, गुरुबख्श सिंह, उत्तर प्रदेश से शिवकुमार मिश्र, महेन्द्र सिंह, श्रीनारायण चतुर्वेदी, आर.एन. उपाध्याय, पंजाब से दया सिंह, जगजीत सिंह सोहल, बलवन्त सिंह आदि कई नेता निष्कासित लोगों में शामिल थे। इसके बाद तो निष्कासन का यह सिलसिला 1969 तक कई किश्तों में लगातार चलता रहा। नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के पक्ष में पीकिंग रेडियो के प्रसारणों ने भी कार्यकर्ताओं को पक्ष चुनने के लिए प्रेरित करने में एक अहम भूमिका निभायी। पाँच जुलाई, 1967 को `पीपुल्स डेली´ (चीनी पार्टी का मुखपत्र) में `भारत में वसन्त का वज्रनाद´ शीर्षक लेख छपा, जिसमें नक्सलबाड़ी का समर्थन करते हुए माकपा के नवसंशोधनवादियों को भी ग़द्दार और भारतीय शासक वर्ग का चाकर घोषित किया गया था। इसके बाद `पीपुल्स डेली´ में कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के पक्ष में कई टिप्पणियाँ छपीं। इनका एक दूरगामी नकारात्मक प्रभाव यह था कि आगे चलकर चारु मजूमदार ने इसका लाभ अपनी लाइन की अन्तरराष्ट्रीय मान्यता के रूप में प्रचार करके उठाया। एक दूसरा नकारात्मक प्रभाव यह था कि चीनी पार्टी की धारणा के हिसाब से, भारतीय कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों ने कार्यक्रम के प्रश्न पर सोच-विचार को एजेण्डे से ही हटा दिया और यह मानकर चलने लगे कि भारत में भी चीन की तरह नवजनवादी क्रान्ति और दीर्घकालिक लोकयुद्ध का रास्ता ही लागू होगा। लेकिन तात्कालिक तौर पर चीन की पार्टी की अवस्थिति ने भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तेज़ करके क्रान्तिकारी पक्ष की मदद की।

11 नवम्बर 1967 को `नक्सलबाड़ी और कृषक संग्राम सहायक कमेटी´ की ओर से अक्टूबर क्रान्ति दिवस मनाने और मार्क्सवादी-लेनिनवादी के प्रचार के लिए कलकत्ता के शहीद मीनार मैदान में एक जनसभा बुलायी गयी जिसमें चारु मजूमदार ने खुले मंच से अपना अन्तिम भाषण दिया। इस सभा में पारित प्रस्ताव में सोवियत संशोधनवाद की भत्र्सना करते हुए चीन की पार्टी का समर्थन किया गया और माकपा को भी एक संशोधनवादी पार्टी बताते हुए उसकी निन्दा की गयी। इसके तुरन्त बाद, पूर्व योजना के अनुसार, सात राज्यों के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी प्रतिनिधियों की एक बैठक हुई जिसमें महत्त्वपूर्ण राजनीतिक-सांगठनिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श के बाद `भा.क.पा. (मा.) के क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी´ (ऑल इण्डिया कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ़ दि रिवोल्यूशनरीज़ ऑफ़ दि सी.पी.आई. (एम.)) का गठन किया गया और उसकी ओर से एक घोषणा जारी की गयी। इस तालमेल कमेटी ने अपने चार मुख्य कार्यभार निर्धारित किये : (1) मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में सभी स्तरों पर जुझारू और क्रान्तिकारी संघर्षों का ख़ासकर नक्सलबाड़ी की तरह किसान-संघर्षों का विकास करना और उनके बीच तालमेल कायम करना, (2) मज़दूर वर्ग और अन्य मेहनतकशों के जुझारू संघर्षों का विकास करना, अर्थवाद से लड़ना और इन संघर्षों को कृषि क्रान्ति की दिशा में मोड़ना, (3) संशोधनवाद और नवसंशोधनवाद के विरुद्ध समझौताहीन सैद्धान्तिक संघर्ष चलाना और माओ त्से-तुङ विचारधारा को, जो वर्तमान युग का मार्क्सवाद- लेनिनवाद है, लोकप्रिय बनाना और इसके आधार पर पार्टी के भीतर के और बाहर के सारे क्रान्तिकारी तत्त्वों को ऐक्यबद्ध करना, और (4) माओ त्से-तुङ विचारधारा की रोशनी में भारतीय परिस्थिति के सुनिश्चित विश्लेषण के आधार पर क्रान्तिकारी कार्यक्रम और रणकौशल तैयार करने की ज़िम्मेदारी लेना।

देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों से सम्पर्क स्थापित करने का काम पहले से ही मुख्यत: सुशीतल रायचौधरी कर रहे थे। उन्हें ही तालमेल कमेटी का सचिव चुना गया और उनके सम्पादन में अंग्रेज़ी मासिक मुखपत्र `लिबरेशन´ निकालने का निर्णय लिया गया। इसका पहला अंक नवम्बर, 1967 में प्रकाशित हुआ।

आन्ध्र प्रदेश में माकपा के शीर्ष नेताओं में से दो – टी. नागी रेड्डी और डी.वी. राव भी माकपा नेतृत्व के संशोधनवाद के विरुद्ध शुरू से ही संघर्षरत थे। उन्होंने नक्सलबाड़ी का पक्ष लिया था। लेकिन उनका विचार था कि माकपा के भीतर जब तक सम्भव हो, रहते हुए संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष चलाया जाना चाहिए ताकि कतारों के बड़े हिस्से को क्रान्तिकारी पक्ष के साथ खड़ा किया जा सके। इस मसले पर चारु मजूमदार के साथ उनका मतभेद था। अप्रैल, 1968 में माकपा का बर्दवान प्लेनम हुआ जो मुख्यत: विचारधारात्मक प्रश्न पर केन्द्रित था। प्लेनम में पारित होने वाले दस्तावेज़ `विचारधारात्मक विचार-विमर्श के लिए´ का मसौदा पहले वितरित हो चुका था और उस पर डी.वी.-नागी ने तीखे मतभेद दर्ज कराये थे। यही दस्तावेज़ प्लेनम में पारित हुआ। इसके अनुसार, सोवियत पार्टी जहाँ दक्षिणपन्थी भटकाव का शिकार थी वहीं चीन की पार्टी “वामपन्थी

” संकीर्णतावादी भटकाव का शिकार थी। इसमें चीनी पार्टी पर माकपा के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप का आरोप भी लगाया था। माकपा के मध्यमार्ग का संशोधनवादी चरित्र अब एकदम नंगा हो चुका था। जम्मू-कश्मीर और आन्ध्र प्रदेश की राज्य कमेटियों ने दस्तावेज़ के मसौदे का विरोध किया। विरोध का एक मुद्दा यह भी था कि दस्तावेज़ में भारत सहित सभी पिछड़े देशों में लोकयुद्ध को संघर्ष के सार्वभौमिक रूप के तौर पर स्वीकार नहीं किया गया है और मुख्य लाइन के तौर पर भूमि क्रान्ति को ख़ारिज कर दिया गया है।

बर्दमान प्लेनम के तुरन्त बाद तालमेल कमेटी ने 14 मई ´68 को हुई अपनी दूसरी बैठक में अपने नाम से `भा.क.पा. (मा.) के अन्दर के´ वाक्यांश को हटाकर अपना नया नाम रखा `कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी´ (ए.आई.सी.सी.सी.आर.) और इसका नेतृत्व चारु मजूमदार को सौंपा गया। दूसरी बैठक के बाद तालमेल कमेटी ने अपनी `दूसरी घोषणा´ जारी की जिसमें कहा गया था कि नवसंशोधनवादी भी डांगेपन्थियों की तरह प्रतिक्रान्तिकारी शिविर में शामिल हो चुके हैं, वे कृषि क्रांति की पीठ में सक्रिय रूप से छुरा भोंक रहे हैं और जो लोग अभी भी माकपा के भीतर अन्तर्पार्टी संघर्ष की सम्भावना देखते हैं वे संशोधनवाद के विरुद्ध लड़नेवालों में भ्रम का बीज बो रहे हैं तथा उनको संगठित और शक्तिशाली होने से रोक रहे हैं। इस अन्तिम वाक्यांश में वस्तुत: डी.वी.-नागी ग्रुप की परोक्ष आलोचना की गयी थी। तालमेल कमेटी की इस दूसरी बैठक में पंजाब के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी भी शामिल हुए थे। बर्दवान प्लेनम के तुरन्त बाद, डी.वी.-नागी के नेतृत्व में माकपा की आन्ध्र कमेटी का बहुसंख्यक हिस्सा विद्रोह करके पार्टी से अलग हो गया। जम्मू-कश्मीर के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी भी पार्टी से बाहर आ गये थे। डीवी.- नागी द्वारा पार्टी के भीतर चलाये गये संघर्ष का नतीजा था कि आन्ध्र में बहुसंख्यक कार्यकर्ता पार्टी से बाहर आ गये थे। डी.वी. राव-नागी रेड्डी-चन्द्रपुल्ला रेड्डी आदि ने `आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी´ (ए.पी.आरसी. सी.) का गठन किया जो ए.आई.सी.सी.सी.आर. से जुड़कर उसकी आन्ध्र राज्य कमेटी के रूप में काम करने लगी। आन्ध्र ग्रुप और चारु मजूमदार के नेतृत्व के बीच शुरू ही से कुछ अहम मतभेद मौजूद थे। चारु मजूमदार के नेतृत्व वाले हिस्से का मानना था कि नागी रेड्डी ग्रुप चीनी पार्टी की लाइन को पूरी तरह से स्वीकार नहीं करता है। इसका एक आधार यह था कि नागी रेड्डी ग्रुप सोवियत संघ को सामाजिक-साम्राज्यवादी न कहकर सिर्फ़ संशोधनवादी कहता था। यह प्रश्न बुनियादी विचारधारात्मक न होकर वस्तुगत आकलन का था, जिसे चीनी पार्टी के कठमुल्लावादी अनुकरण के चलते बुनियादी बना दिया गया। दूसरा अहम मतभेद यह था कि अखिल भारतीय तालमेल कमेटी चुनाव बहिष्कार को एक रणनीतिक प्रश्न मानती थी और उसे क्रान्ति की प्रक्रिया की शुरुआत से अन्त तक लागू करने की बात करती थी जबकि आन्ध्र ग्रुप इसे रणकौशल का प्रश्न मानता था और इस मामले में परिस्थिति-अनुसार निर्णय की बात करता था। इस प्रश्न पर उनकी अवस्थिति क्लासिकीय लेनिनवादी सूत्रीकरण के अनुरूप थी। तालमेल कमेटी नक्सलबाड़ी को माओ विचारधारा का भारत में पहला प्रयोग मानती थी, जबकि आन्ध्र ग्रुप का कहना था कि माओ विचारधारा का पहला प्रयोग तेलंगाना में हुआ था और नक्सलबाड़ी उसी की अगली कड़ी है। तालमेल कमेटी जनसंघर्ष के खुले रूपों, आर्थिक मुद्दों पर संघर्ष और जनसंगठनों की उपेक्षा कर रही थी, जिससे आन्ध्र ग्रुप सहमत नहीं था। तालमेल कमेटी का ज़ोर प्रारिम्भक मंज़िल से ही छापामार संघर्ष संगठित करने पर था, जबकि आन्ध्र ग्रुप का कहना था कि जनान्दोलन की प्रक्रिया में संघर्ष के उच्चतर रूप के तौर पर सशस्त्र संघर्ष शुरू होगा, स्वयंसेवक दस्ते, स्थानीय दस्ते और नियमित छापामार दस्ते अस्तित्व में आयेंगे और आधार-क्षेत्रों का निर्माण होगा। कुछ सशस्त्र दस्तों की कार्रवाई के बजाय उनका ज़ोर क्रान्तिकारी जनप्रदर्शनों, क्रान्तिकारी जनान्दोलनों, क्रान्तिकारी ग्राम सोवियतों की स्थापना और सशस्त्र जनसंघर्षों पर था। इस प्रश्न पर भी संघर्ष मूलत: “वाम” दुस्साहसवाद और जनदिशा के प्रश्न पर था। इन मूल मुद्दों के अतिरिक्त, दोनों पक्षों के बीच जनवादी कार्यक्रम (तालमेल कमेटी `लोक जनवादी क्रान्ति´ शब्दावली का प्रयोग करती थी जबकि आन्ध्र ग्रुप `नव जनवादी क्रान्ति´ शब्दावली का) की कुछ तफ़सीलों, व्याख्याओं और ज़ोर को लेकर था जो हालाँकि गौण था लेकिन यहाँ भी अप्रोच की भिन्नता महत्त्वपूर्ण थी। तालमेल कमेटी चीनी पार्टी के कार्यक्रम का अन्धानुकरण करती थी जबकि आन्ध्र ग्रुप उसकी आम दिशा और फ्रेमवर्क को मानते हुए भी, एक हद तक, भारतीय परिस्थिति की सच्चाइयों को उसमें समाहित करने की कोशिश करता था। तालमेल कमेटी का आन्ध्र ग्रुप पर एक आरोप यह भी था कि वह श्रीकाकुलम सशस्त्र संघर्ष को ज़ोर-शोर से नहीं, बल्कि महज़ रस्मी समर्थन दे रहा है। इस प्रश्न पर आगे चर्चा की जायेगी।

इन मतभेदों के बावजूद, पहली बैठक के बाद आन्ध्र प्रदेश की तालमेल कमेटी अखिल भारतीय तालमेल कमेटी से जुड़ गयी। यह तय किया गया कि प्रयोग करते हुए मतभेद के मसलों पर बहस की प्रक्रिया जारी रहेगी क्योंकि तालमेल कमेटी का उद्देश्य ही यही है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। 7 फ़रवरी, 1969 को निहायत एकतरफ़ा और मनमाने तरीके से आन्ध्र प्रदेश कमेटी को अखिल भारतीय तालमेल कमेटी से निकाल दिया गया और बातचीत करने के उनके बार-बार के अनुरोध पर कान तक नहीं दिया गया।

तालमेल कमेटी का गठन ही इस उद्देश्य से किया गया था कि माओ विचारधारा पर आम तौर पर सहमत देश भर के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आपस में बहस-मुबाहिसा करके और अपने प्रयोगों के अनुभवों का आदान-प्रदान करते हुए भारतीय क्रान्ति की रणनीति, आम रणकौशल और रास्ते के सवाल पर एक राय बनायें तथा भारतीय परिस्थितियों के अध्ययन के आधार पर कार्यक्रम तैयार करें। पर तालमेल कमेटी शुरुआत करते ही लक्ष्य विमुख हो गयी। नक्सलबाड़ी संघर्ष के नेतृत्व के “वामपन्थी” लाइन के आगे घुटने टेकने के बाद चारु मजूमदार ने इस लाइन को ज़ोर-शोर से पूरे देश के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच बढ़ावा दिया। आम क्रान्तिकारी कतारों में यह धारणा थी कि नक्सलबाड़ी के निर्माता और नेता चारु मजूमदार ही थे और उनकी लाइन को चीनी पार्टी का पूरा समर्थन हासिल है। बंगाल का एक गुट, जिसमें विशेष तौर पर सरोज दत्त, सौरेन बसु, सुनीति कुमार घोष शामिल थे, चारु को भारतीय क्रान्ति का महान नेता सिद्ध करने में जुट गया था। सत्यनारायण सिंह, कानू सान्याल आदि भी बढ़-चढ़कर उनकी प्रशंसा में जुटे थे। `तराई किसान संघर्ष की रिपोर्ट´ में हालाँकि चारु की लाइन के आगे कानू सान्याल आदि की जनदिशा की लाइन का आत्मसमर्पण मुख्य पहलू था, लेकिन उसमें व्यापक जनसंघर्ष के विकास का एक ब्योरा भी था। पर उस रिपोर्ट को तालमेल कमेटी ने देश भर के क्रान्तिकारियों के बीच न तो कभी चर्चा का विषय बनाया, न खुद ही कभी उस पर चर्चा की। इस पूरी स्थिति का लाभ उठाकर चारु मजूमदार तालमेल कमेटी को एक पार्टी की तरह चलाने लगे और स्वयं उसके स्वयंभू एकछत्र नेता जैसा व्यवहार करने लगे। तालमेल कमेटी विभिन्न कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी ग्रुपों के बीच तालमेल करने के बजाय पार्टी की केन्द्रीय कमेटी जैसा आचरण करने लगी। विभिन्न ग्रुपों को अपने मुखपत्र बन्द करने का निर्देश जारी किया जाने लगा। मतभेदों और उठाये जाने वाले सवालों पर स्वस्थ बहस के बजाय, अलग विचार प्रकट करने वाले लोगों व ग्रुपों के खिलाफ़ कुत्सा-प्रचार करके और उन पर तोहमतें लगाकर निकाल बाहर किया जाने लगा। तालमेल कमेटी ने भारतीय परिस्थितियों का अध्ययन-विश्लेषण करके भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम और रणकौशल तय करने के बुनियादी कार्यभार को तो पूरी तरह से तिलांजलि दे दी। यह घोषित कर दिया गया कि भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम, रणकौशल और रास्ता हूबहू चीनी क्रान्ति जैसा होगा। लेकिन नक्सलबाड़ी टाइप किसान संघर्ष और चीनी रास्ते की दुहाई देते हुए चारु मजूमदार व्यवहार में घनघोर आतंकवादी लाइन लागू करने की बात कर रहे थे। मज़दूर वर्ग के नेतृत्व की बात करते हुए भी ट्रेड यूनियन कार्यों व मज़दूर वर्ग के बीच हर प्रकार की जनकार्रवाई को अर्थवाद-सुधारवाद कहकर ख़ारिज किया जा रहा था। पार्टी को “देहात-आधारित पार्टी” होना था। और वहाँ भी, किसी प्रकार की जनकार्रवाई, आर्थिक संघर्ष और खुले राजनीतिक प्रचार से बचते हुए सीधे सशस्त्र दस्तों का निर्माण करके भूस्वामियों के खिलाफ़ `ऐक्शन´ करना था (जल्दी ही चारु ने इसे स्पष्ट करते हुए `ख़ात्मे की लाइन´ यानी वर्ग शत्रुओं की हत्या की लाइन दी जो व्यक्तिगत आतंकवाद का नग्न रूप था)।

आन्ध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम ज़िले के गिरिजन नक्सलबाड़ी की घटना के करीब आठ वर्ष पहले से भूस्वामियों के शोषण-उत्पीड़न और पुलिस उत्पीड़न के विरुद्ध आन्दोलन चला रहे थे। वह इलाका डी.वी. राव.-नागी रेड्डी धड़े के प्रभाव क्षेत्र में नहीं था। कम्युनिस्ट पार्टी के संशोधनवादियों ने इस संघर्ष को आगे विकसित करने की कभी कोई कोशिश नहीं की। नक्सलबाड़ी की ख्याति के बाद श्रीकाकुलम के नेताओं ने तालमेल कमेटी से सम्पर्क स्थापित किया और चारु मजूमदार को अपना नेतृत्व करने के लिए आमन्त्रित किया। जनवरी ´69 में चारु मजूमदार श्रीकाकुलम गये और वहाँ सशस्त्र संग्राम को “वामपन्थी” आतंकवादी लाइन पर आगे बढ़ाने का दिशा-निर्देश दिया। श्रीकाकुलम में जनवरी ´69 से भूस्वामियों के घरों-गोदामों पर छापामार दस्तों के हमलों और सफ़ाये की लाइन की शुरुआत हुई। चूँकि गिरिजनों का आन्दोलन लम्बे समय से जारी था इसलिए शुरुआती सशस्त्र कार्रवाइयों को व्यापक जनसमर्थन भी हासिल हुआ। बाथापुरम्, पद्मपुर, बूड़ीबांका, आकूपल्ली और गरुड़भद्र में छापामार हमलों और भूस्वामियों-सूदख़ोरों की हत्या की घटनाओं को काफ़ी ख्याति मिली। चारु मजूमदार गुट ने इसे लोकयुद्ध का संकेत बताया। चतरहाट-इस्लामपुर की विफलता के बाद, श्रीकाकुलम में पहली बार चारु मजूमदार की आतंकवादी लाइन व्यापक स्तर पर लागू हुई। पुलिस ने घनघोर दमन की कार्रवाई शुरू की। मई 1966 में, संघर्ष के एक मुख्य नेता पंचाद्रि कृष्णमूर्ति, उनकी पत्नी निर्मला और पाँच अन्य छापामार पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। तमाम दमन के बावजूद श्रीकाकुलम संघर्ष 1970 तक जारी रहा। मई 1970 में भा.क.पा. (मा-ले) के स्थापना-सम्मेलन के कुछ महीने बाद ही गिरिजनों के लोकप्रिय नेता वेंकटापु सत्यनारायण और आदिमाटला कैलाशम् सहित कई और नेताओं की हत्या हो गयी तथा नागभूषण पटनायक और अप्पाला सूरी गिरफ़्तार हो गये। लगभग नेतृत्वविहीन हो चुका आन्दोलन फिर जल्दी ही बिखर गया। इस तरह एक व्यापक आधार वाले, लम्बे समय से जारी जनसंघर्ष को “आतंकवादी” रास्ते पर विमुख करके पराजय के गर्त में धकेल दिया गया।

जनवरी ´69 में श्रीकाकुलम संघर्ष का नेतृत्व हाथ में आ जाने के बाद, चारु मजूमदार को यह उचित अवसर प्रतीत हुआ कि क्रान्तिकारी जनदिशा की पुरज़ोर वकालत करने वाले डी.वी.-नागी ग्रुप से छुटकारा पा लिया जाये और फिर फ़रवरी ´69 में निहायत नौकरशाहाना तरीके से उन्हें तालमेल कमेटी से निकाल बाहर किया गया। डीवी.- नागी के नेतृत्व में आन्ध्र प्रदेश में माकपा से पार्टी का बहुसंख्यक हिस्सा बाहर आया था। कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी राजनीति का इतना व्यापक जनाधार और कार्यकर्ताओं का आधार देश के किसी राज्य में नहीं था। आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी को निष्कासित करने में चारु को मिली सफलता कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए एक भारी धक्का थी जिसने पार्टी गठन की प्रक्रिया को शुरू होते ही गम्भीर नुकसान पहुँचाया।

तालमेल कमेटी में बहस-मुबाहिसे के जनवादी माहौल का गला घोंट दिये जाने और नौकरशाहाना और संकीर्ण गुटपरस्त कार्यशैली के हावी होने के बाद, बंगाल के और पूरे देश के कई छोटे-छोटे ग्रुप तो उसमें शामिल ही नहीं हुए। कई ग्रुप जो शुरू में इससे सम्बद्ध हुए थे, बाद में अलग हो गये। `चिन्ता´/`दक्षिण देश´ ग्रुप का उल्लेख पहले आ चुका है। नक्सलबाड़ी विद्रोह के पाँच महीने बाद इस ग्रुप ने 24 परगना ज़िले के सोनारपुर में किसान संघर्ष संगठित किया था जिसे जबरदस्त पुलिस दमन का शिकार होना पड़ा था। इसमें ग्रुप के एक संस्थापक नेता चन्द्रशेखर दास की हत्या भी कर दी गयी थी। सोनारपुर के अतिरिक्त 1968-69 के दौरान इस ग्रुप ने हावड़ा, हुगली, मेदिनीपुर, बीरभूम, मालदा और बर्धमान ज़िले के कुछ क्षेत्रों में भी किसानों में काम संगठित किया तथा दक्षिणी कलकता, आसनसोल और दुर्गापुर में औद्योगिक मज़दूरों के बीच ट्रेड यूनियन मोर्चे पर काम किया। दक्षिण देश ग्रुप के लोगों का 1966 के अन्त में ही चारु मजूमदार और दार्जिलिंग के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों से सम्पर्क हो चुका था। नक्सलबाड़ी के तुरन्त बाद चारु मजूमदार से फिर उनकी बातचीत हुई। तालमेल कमेटी बनने के बाद चारु मजूमदार से कई अहम मतभेदों के बावजूद दक्षिण देश ग्रुप उससे सम्बद्ध हुआ, लेकिन नौकरशाहाना तौर-तरीके के चलते और मतभेदों के सुलझने की प्रक्रिया नहीं चलते देख, जल्दी ही उसे अलग हो जाना पड़ा। दक्षिण देश ग्रुप की राजनीतिक सोच कई मायनों में दकियानूसी और यान्त्रिक थी, लेकिन उन्होंने राजनीति और सांगठनिक कार्यशैली-विषयक कुछ बुनियादी महत्त्व के प्रश्न उठाये। जनसंगठन और पार्टी संगठन के अन्तरसम्बन्ध और छापामार संघर्ष के विकास, चुनाव के इस्तेमाल, वर्गों के रणनीतिक संश्रय के अमली रूप आदि कई प्रश्नों पर वे स्वयं अतिवामपन्थी भटकावों के शिकार थे, लेकिन बिना किसी राजनीतिक कार्य के गुप्त दस्तों के गठन और `ऐक्शन´ को छापामार-युद्ध बताने और सफ़ाये की लाइन को वे “वामपन्थी” दुस्साहसवाद मानते थे तथा साथ ही, चारु की लाइन को स्वयंस्फूर्ततावाद और अराजकतावाद का भी शिकार मानते थे। चीन की पार्टी के प्रति उनका रवैया अनुकरणवादी था और विभिन्न सांगठनिक प्रश्नों पर वे शुद्धतावादी रोमानी नज़रिये के शिकार थे, लेकिन इस प्रश्न को उन्होंने गम्भीरता के साथ रेखांकित किया कि तालमेल कमेटी को भारतीय परिस्थितियों के अध्ययन-विश्लेषण के आधार पर भारतीय क्रान्ति के कार्यक्रम एवं रणकौशल के निर्धारण के अपने लक्ष्य को पूरा करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए जबकि वह उसकी उपेक्षा कर रही है। उनका भी यह मानना था कि नक्सलबाड़ी नहीं बल्कि तेलंगाना भारत में माओ विचारधारा का पहला प्रयोग था और नक्सलबाड़ी उसका जारी रूप है। इन प्रश्नों पर तालमेल कमेटी में जनवादी ढंग से बहस चलाने के बजाय चारु गुट ने उपेक्षा करने, कुत्सा प्रचार करने और लेबल चस्पाँ करने (`देशव्रती´ में लिखकर भी) का काम किया। यही नहीं, तालमेल कमेटी का पार्टी की तरह इस्तेमाल करते हुए और स्वयं पार्टी नेतृत्व जैसा व्यवहार करते हुए चारु गुट ने `दक्षिण देश´ का प्रकाशन-वितरण बन्द करने के लिए भी कहना शुरू कर दिया। इस स्थिति में `दक्षिण देश´ ग्रुप ने तालमेल कमेटी से अपने को अलग कर लिया। लेकिन साथ ही यह निर्णय भी लिया कि ग़लत नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वे एकता कायम करने की कोशिशें जारी रखेंगे। आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी के निष्कासन और दक्षिण देश ग्रुप के अलग होने के बाद, तालमेल कमेटी के कामों की समीक्षा किये बग़ैर और बुनियादी लक्ष्यों को पूरा किये बग़ैर 22 अप्रैल, 1969 को जब अचानक भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना की घोषणा की गयी और एक वर्ष के भीतर पार्टी कांग्रेस का निर्णय लिया गया तो यह दक्षिण देश ग्रुप के लिए आश्चर्य की बात थी। अपने विचारों और मतभेदों को लेकर उसने भा.क.पा. (मा-ले) नेतृत्व को एक पत्र भेजा, जिसका उसने कोई उत्तर नहीं दिया। तब दक्षिण देश ग्रुप ने अलग राह पकड़ी और 20 अक्टूबर 1969 को `माओवादी कम्युनिस्ट केन्द्र´ नाम से एक अलग केन्द्र की स्थापना की।

क्रान्तिकारियों की पश्चिम बंगाल तालमेल कमेटी (डब्ल्यू.बी.सी.सी.आर.) ने भी अखिल भारतीय तालमेल कमेटी के समक्ष राजनीति, संगठन और कार्यप्रणाली-विषयक कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल उठाये और “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन के साथ अपने मतभेद रखे। उसके प्रश्नों और मतभेदों की भी पूरी तरह से अनदेखी की गयी और यह संगठन भी तालमेल कमेटी में शामिल नहीं हुआ।

मतभेद के बुनियादी और अहम मसले उठाने वाले अगले दो व्यक्ति थे परिमल दासगुप्त और असित सेन। परिमल दासगुप्त तालमेल कमेटी के काम के एक-डेढ़ वर्ष बाद ही आनन-फानन में पार्टी-गठन के निर्णय से सहमत नहीं थे। वे लम्बे सैद्धान्तिक संघर्ष और व्यावहारिक कामों के बाद संशोधनवाद और अवसरवाद से मुक्त क्रान्तिकारी पार्टी की स्थापना के पक्षधर थे। यह सही है कि कोई भी क्रान्तिकारी पार्टी भटकावों से अन्तिम मुक्ति की गारण्टी नहीं दे सकती और यह भटकाव पार्टी में सिर उठाते ही रहते हैं जिनके विरुद्ध पार्टी में सतत दो लाइनों का संघर्ष चलाना पड़ता है। लेकिन इस आदर्शवादी विचलन के बावजूद परिमल दासगुप्त की अवस्थिति इस मायने में सही थी कि कार्यक्रम-निर्धारण के लिए भारतीय परिस्थितियों के अध्ययन-विश्लेषण सहित अपने किसी भी लक्ष्य को तालमेल कमेटी ने वास्तव में अर्जित नहीं किया था और कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच वास्तविक राजनीतिक एकता कायम करने के लिए वे बहस और अनुभवों के आदान-प्रदान की ज़िम्मेदारी लगभग पूरी तरह से छोड़ दी गयी थी। इस मतभेद के बाद परिमल दासगुप्त और उनके समर्थकों ने अखिल भारतीय तालमेल कमेटी से अलग होकर एक समान्तर तालमेल कमेटी बनायी (जो कालान्तर में निष्क्रिय हो गयी) जिसने एक दस्तावेज़ निकालकर चारु मजूमदार के साथ अपने मतभेदों का उल्लेख किया। उक्त दस्तावेज़ में कहा गया था कि चारु मजूमदार माओ के रास्ते से भटककर चे ग्वेवारा के निम्न-बुर्जुआ क्रान्तिवादी रास्ते का अनुसरण कर रहे हैं। माओ विचारधारा राजनीति के आधार पर जनगण को संगठित करने की बात करती है जबकि चे ग्वेवारा का रास्ता उसे मुठभेड़ों के ज़रिये संगठित करने का था। दस्तावेज़ के अनुसार, गुप्त दस्तों के ज़रिये छापामार युद्ध को क्रान्तिकारी आन्दोलन का एकमात्र रास्ता बताना, अर्थवाद से बचने के नाम पर ट्रेड यूनियन आन्दोलन का विरोध, देहाती क्षेत्रों में आधार क्षेत्र के निर्माण के नाम पर शहरी मज़दूरों और मध्य वर्ग के आन्दोलनों के प्रति घृणा-भाव, छोटे-छोटे ग्रुपों द्वारा संघर्षों के ज़रिये ही भूमि क्रान्ति को आगे बढ़ाने का प्रयास और वर्ग संगठन और जन संघर्षों के बिना ही क्रान्तिकारी संघर्ष की कोशिशें – चारु की लाइन के ये सभी संघटक अवयव चे ग्वेवारा से उधार लिये गये हैं, यह माओ विचारधारा का विकृतिकरण है और इन रुझानों को ठीक किये बिना बनायी जाने वाली पार्टी कालान्तर में एक आतंकवादी पार्टी बनकर रह जायेगी।

1 मई, 1969 को कलकता के शहीद मीनार मैदान की जिस जनसभा में कानू सान्याल ने भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना की घोषणा की थी उसकी अध्यक्षता असित सेन ने ही की थी, लेकिन कुछ सप्ताह बाद ही नेतृत्व के साथ पहले से ही चले आ रहे अपने गम्भीर मतभेदों के हल नहीं होने के कारण उन्हें अलग हो जाना पड़ा। चारु मजूमदार की लाइन के साथ असित सेन के मतभेद शुरुआती दौर से ही मौजूद थे। चारु मजूमदार का मानना था कि ज़मीन की लड़ाई किसानों को क्रान्तिकारी रास्ते से भटकाकर अर्थवाद और संशोधनवाद के दलदल में धँसा देती है, अत: उन्हें सिर्फ़ राज्यसत्ता पर अधिकार के लिए लड़ना चाहिए। उनका कहना था कि नक्सलबाड़ी में किसान ज़मीन के लिए नहीं बल्कि राज्यसत्ता पर अधिकार के लिए लड़ रहे थे। असित सेन का मानना था कि कोई भी वर्ग पहले अपनी वर्गीय माँग पर ही संगठित होता है, ज़मीन के लिए संघर्ष जनवादी क्रान्ति के लिए किसानों की तैयारी के लिए ज़रूरी पहला कदम होता है। चारु मजूमदार की लाइन के विपरीत असित सेन ट्रेड यूनियनों को मज़दूरों के लिए क्रान्ति का प्राथमिक स्कूल मानते थे और मज़दूर वर्ग के आन्दोलनों और ट्रेड यूनियनों को आवश्यक मानते थे। वे “देहात-आधारित” पार्टी की अवधारणा का विरोध करते थे और पार्टी के मज़दूरवर्गीय हिरावल चरित्र पर बल देते थे। चारु मजूमदार गुट का तर्क था कि भा.क.पा. (मा-ले) विशुद्ध सर्वहारा पार्टी है क्योंकि उसके अधिकांश नेता सशस्त्र संघर्ष के क्षेत्र से आये हैं। असित सेन का तर्क था कि मात्र कुछ कॉमरेडों के सशस्त्र संघर्ष के क्षेत्र से जुड़े होने से पार्टी का निम्न-पूँजीवादी वर्ग-चरित्र बदल नहीं जाता। मुख्य प्रश्न विचारधारा का है और मज़दूर वर्ग से पार्टी कतारों में भरती का है। साथ ही, व्यापक वर्ग संघर्ष की उपेक्षा करके मात्र क्रान्तिकारी राजनीति देने पर भी क्रान्तिकारी सेना का हिरावल नहीं तैयार हो सकता। असित सेन का कहना था कि आर्थिक माँगों की लड़ाई को संशोधनवाद कहकर मज़दूर आन्दोलन से दूर हट जाना मज़दूर वर्ग को संशोधनवाद और हर तरह के प्रतिक्रियावादी विचारधारा के हवाले कर दिये जाने के समान है। व्यक्ति-हत्या या ख़ात्मे की लाइन को उन्होंने नरोदवाद और चे ग्वेवारा के निम्न-पूँजीवादी रोमानी सिद्धान्त का सम्मिश्रण बताया। असित सेन का कहना था कि वर्ग शत्रुओं की हत्या और जायदाद-ज़ब्ती कभी भी वर्ग संघर्ष का मुख्य रूप नहीं हो सकते। साथ ही, जिस प्रकार जनता के स्वत:स्फूर्त सशस्त्र संघर्ष और क्रान्तिकारी राजनीति के नेतृत्व में चलने वाले सशस्त्र संघर्ष में मौलिक अन्तर होता है, उसी प्रकार निम्न-पूँजीवादी क्रान्तिकारी दुस्साहसियों द्वारा प्रारम्भ किये गये सशस्त्र संघर्ष और मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ विचारधारा से लैस मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी के नेतृत्व में चलने वाले वर्ग-संघर्ष में भी मौलिक अन्तर होता है। हरेक बात छापामार संघर्ष के ज़रिये सोच-समझ ली जायेगी, चारु मजूमदार की इस धारणा का खण्डन करते हुए असित सेन ने अपने दस्तावेज़ में लिखा कि यदि सशस्त्र संग्राम करने से अपने आप सही क्रान्तिकारी पार्टी बन जानी होती तो भारत में क्रान्ति कभी की हो गयी होती। उन्होंने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि चारु की लाइन क्रान्तिकारी पार्टी के मुख्य तत्त्व – मज़दूर वर्ग को सशस्त्र संघर्ष से एकदम अलग कर देती है!

यह सही है कि परिमल दासगुप्त और असित सेनगुप्त द्वारा प्रस्तुत चारु मजूमदार की “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन की आलोचना विचारधारात्मक रूप से उतनी सुसंगत और सांगोपांग नहीं थी, जैसी कि डी.वीराव- नागी रेड्डी ग्रुप या आगे चलकर पंजाब क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी (हरभजन सिंह सोही ग्रुप) द्वारा प्रस्तुत आलोचना थी। फिर भी उन्होंने “वामपन्थी” दुस्साहवाद की प्रकृति, वर्ग-चरित्र और मुख्य अभिव्यक्तियों की बुनियादी तौर पर सही शिनाख्त की थी। समस्या यह थी कि एक गहरी विचारधारात्मक समझ और सांगोपांग दृष्टि न होने के कारण उन्होंने सवाल का़फ़ी देर से उठाये और अलग-अलग समयों पर उठाये। जब आन्ध्र कमेटी से मतभेद चला और उन्हें नौकरशाहाना ढंग से निकाल बाहर किया गया, उस समय उन्होंने सही अवस्थिति नहीं ली थी। यही नहीं, स्वयं अलग होने के बाद भी उन्होंने जनदिशा की बुनियादी एकता के बावजूद उनसे (यानी आन्ध्र कमेटी से) तालमेल बनाने की कोशिश नहीं की। अपनी स्वयं की विचारधारात्मक कमज़ोरी और विचलनों के चलते “वामपन्थी” आतंकवादी लाइन का विरोध करने वाले ग्रुप और व्यक्ति आपस के गौण मतभेदों को अतिरिक्त अहमियत देते रहे और इस कारण से भी अतिवामपन्थ और जनदिशा के बीच ध्रुवीकरण की प्रक्रिया प्रभावित हुई। यह भी एक तथ्य है कि संशोधनवादी भटकाव और कतिपय विचारधारात्मक उलझाव परिमल दासगुप्त और असित सेन के चिन्तन में भी मौजूद थे (जैसे परिमल दासगुप्त सोवियत पार्टी को संशोधनवादी तो मानते थे, लेकिन साथ ही उन्होंने “पश्चिमी साम्राज्यवादी दख़लन्दाज़ी के विरोध” के तर्क के आधार पर चेकोस्लोवाकिया पर सोवियत संघ के आक्रमण को उचित ठहराया था), लेकिन वे सुसंगत संशोधनवादी न होकर `जेनुइन´ मार्क्सवादी-लेनिनवादी ही थे। उनके जीवन के उत्तरवर्ती दौर ने इस बात को सही सिद्ध किया। दोनों जीवनपर्यन्त कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धारा से ही जुड़े रहे और 1996 में अपनी मृत्यु से पूर्व असित सेन भा.क.पा. (मा-ले) (जनशक्ति) ग्रुप के साथ जुड़े हुए थे। मूल और मुख्य बात यह है कि यदि ए.आई.सी.सी.सी.आर. सही जनवादी ढंग से तालमेल और राजनीतिक बहस की भूमिका निभाती तो ऐसे योग्य और ईमानदार लोग बहस-मुबाहिसे के दौरान अपने भटकावों से मुक्त होकर क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन में शानदार भूमिका निभा सकते थे, लेकिन तालमेल कमेटी पर आतंकवादी लाइन के नौकरशाहाना वर्चस्व ने ऐसा होने नहीं दिया। ऐतिहासिक आकलन की दृष्टि से आज मुख्य बात यह है कि कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन को विघटन और तबाही की दिशा में धकेलने में जिस लाइन ने कुंजीभूत भूमिका निभायी, कतिपय कमियों के बावजूद परिमल दासगुप्त और असित सेन जैसे लोगों ने भी उस लाइन की मूल प्रकृति की निशानदेही की और उसकी आलोचना प्रस्तुत की।

ए.आई.सी.सी.सी.आर. के काल में चारु मजूमदार की “वामपन्थी” लाइन की सुसंगत, तार्किक और सांगोपांग समालोचना प्रस्तुत करने वाले और दृढ़ विरोध करने वालों में आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी (डी.वीराव- नागी रेड्डी ग्रुप) के बाद दूसरे स्थान पर पंजाब के एक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धड़े का नाम आता है जिसका नेतृत्व हरभजन सिंह सोही कर रहे थे। 1970 के बाद, भा.क.पा. (मा-ले) काल में एक अलग ग्रुप के तौर पर काम करते हुए कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के इस हिस्से ने जनदिशा को ठोस रूप में सफलतापूर्वक लागू करते हुए पंजाब में “वामपन्थी” आतंकवादी धारा को व्यवहार में भी फ़ैसलाकुन शिकस्त दी। मा.क.पा. की पंजाब इकाई में मतभेद और विवादों की शुरुआत नक्सलबाड़ी विद्रोह के तत्काल बाद हो गयी थी और जल्दी ही माओवादी रुझान वाले कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाल दिया गया। इन क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों ने राज्य स्तर पर एक तालमेल कमेटी गठित की जिसके सचिव दया सिंह थे। दया सिंह सुलझे हुए कम्युनिस्ट थे और “वामपन्थी” लाइन के बारे में उनके भी कुछ `रिजर्वेशंस´ थे। लेकिन कमोबेश 1968 के अन्त से तालमेल कमेटी में हावी “वामपन्थी” लहर का पंजाब में भी भारी प्रभाव था और उदारतावादी प्रवृत्ति के चलते दया सिंह बहुमत के हिसाब से चलने के हामी थे। आतंकवादी लाइन पर पंजाब में सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत 1969 में हुई। कुछ `ऐक्शंस´ के बाद ही पुलिस दमन, गिरफ़्तारियों और फर्जी मुठभेड़ों का धुआँधार सिलसिला शुरू हो गया। मार्च 1970 के अन्त में भा.क.पा. (मा-ले) (तब तक पार्टी की घोषणा हो चुकी थी) की पंजाब राज्य कमेटी के सचिव दया सिंह, रोपड़ ज़िला कमेटी के सचिव बलवन्त सिंह, वयोवृद्ध ग़दरी बाबा और पटियाला के नेता हरिसिंह मृगेन्द्र की पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी। पंजाब में मा-ले आन्दोलन से जुड़ने वाले ग़दर पार्टी के पुराने लोगों में बाबा निरंजन कालसा और बाबा भुजा सिंह भी थे। इनकी भी बाद में पुलिस ने गिरफ़्तारी के बाद फर्जी मुठभेड़ दिखाकर नृशंस हत्या कर दी। “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन पंजाब में पार्टी कांग्रेस के बाद भी कुछ दिनों तक जारी रही। करीब नब्बे के आसपास वर्ग शत्रुओं का सफ़ाया किया गया जिनमें अधिकांश सूदख़ोर थे। पंजाब में देश के अन्य कुछ पिछड़े हिस्सों की तरह ज़मीन और सामन्ती उत्पीड़न का सवाल 1967-70 के दौरान भी नहीं था, लेकिन सूदख़ोरों के खिलाफ़ न केवल ग़रीब बल्कि मँझोले किसानों में भी गहरी नफ़रत थी। पंजाबी समाज में राज्य के विरुद्ध जुझारू वीरतापूर्ण संघर्षों-कुर्बानियों की एक लम्बी परम्परा रही है। कम्युनिस्ट कतारों में विचारधारात्मक समझ के अभाव में इस परम्परा ने “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के लिए खाद-पानी का काम किया। अकेले इस एक राज्य में 1974 तक फर्जी मुठभेड़ों में सौ से कुछ अधिक क्रान्तिकारी मौत के घाट उतारे जा चुके थे और दर्ज़नों क्रान्तिकारी जेलों में लम्बी सज़ाएँ भुगत रहे थे।

पंजाब में राज्य स्तरीय तालमेल कमेटी के गठन के बाद से ही भटिण्डा-फिरोज़पुर कमेटी के लोग सफ़ाये की लाइन, आर्थिक संघर्षों, जन संघर्षों और जन संगठन के निषेध की लाइन और लोक युद्ध के उद्गम और विकास की आतंकवादी समझ का दृढ़तापूर्वक विरोध कर रहे थे। क्रान्तिकारी संघर्षों के असमान विकास और मज़दूर वर्ग के नेतृत्व के प्रश्न पर भी उनकी चारु की लाइन से भिन्न राय थी और जनदिशा के अमल के प्रश्न पर वे अडिग थे। जब भा.क.पा. (मा-ले) के गठन और कांग्रेस की घोषणा हुई तो उन्होंने इस पर भी अपनी अलग राय रखी। कठिन अलगाव झेलकर और “ग़द्दार”, “संशोधनवादी”, “जनता के दुश्मन” आदि “उपाधियाँ” पाकर भी वे अपनी अवस्थिति पर दृढ़ रहे और क्रान्तिकारी आतंकवाद की शक्तिशाली लहर का सामना करते रहे। इसके बावजूद वे औपचारिक तौर पर पहले तालमेल कमेटी, और पार्टी-गठन की घोषणा के बाद भा.क.पा. (मा-ले) का हिस्सा बने रहे। फ़रवरी 1970 में, पार्टी कांग्रेस के ठीक पहले भटिण्डा-फिरोज़पुर कमेटी भा.क.पा. (मा-ले) से अलग हो गयी और `पंजाब कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कमेटी´ (पी.सी.आर.सी.) के नाम से इसने अपना पुनर्गठन किया। आगे चलकर उसने पंजाब में जनदिशा को सफलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से लागू किया और चारुपन्थी धारा को एकदम अलग-थलग और निश्शक्त बना डाला। इसकी चर्चा आलेख में आगे यथास्थान आयेगी।

ए.आई.सी.सी.सी.आर. के पूरे काल में, तालमेल कमेटी द्वारा निर्धारित सभी कार्यभारों को तिलांजलि देते हुए तालमेल कमेटी के स्वरूप को नकारकर उसे एक केन्द्रीकृत पार्टी की तरह इस्तेमाल करते हुए और स्वयं एकछत्र नेता सदृश नौकरशाहाना व्यवहार करते हुए तथा चीन की पार्टी के लेखों एवं प्रसारणों द्वारा मिलने वाली मान्यता एवं नक्सलबाड़ी के घोषित नेता होने की साख का लाभ उठाते हुए चारु मजूमदार ने एक-एक करके अपनी लाइन के विरोधी ग्रुपों और व्यक्तियों को ठिकाने लगाया और तालमेल कमेटी पर अपनी लाइन का वर्चस्व स्थापित होते ही पार्टी-गठन के लिए आगे बढ़ गये। इस प्रक्रिया में उन्हें इस बात से भी मदद मिली कि उनकी लाइन के कई विरोधी स्वयं या तो “वामपन्थी” या दक्षिणपन्थी विचलन के शिकार थे, उनकी (यानी चारु की लाइन के विरोधियों की) लाइन सुसंगत नहीं थी, विरोध के स्वर एकसाथ नहीं बल्कि अलग-अलग उठते रहे तथा जनदिशा के पक्षधर ग्रुपों और लोगों के बीच भी आपस में कई मसलों पर अहम या गौण मतभेद थे। जैसे-जैसे तालमेल कमेटी से विरोध-पक्ष का सफ़ाया होता गया, चारु की लाइन का “वामपन्थी” अवसरवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नग्न और विकृत रूप में सामने आता चला गया। पहले वे गोलमोल भाषा में जनसंघर्षों की या भूमि क्रान्ति के कार्यक्रम की या मज़दूर वर्ग के संघर्षों की बात करते थे, लेकिन अब उन्होंने हर प्रकार की जनकार्रवाई, खुले काम, आर्थिक संघर्ष और राजनीतिक प्रचार-कार्य को सिरे से ख़ारिज करते हुए यह कहना शुरू किया कि “ख़ात्मे की लड़ाई ही वर्ग संघर्ष का उच्चतर रूप और छापामार संघर्ष का आरम्भ दोनों ही है”, इसी के द्वारा भारी किसान जनसमुदाय जागृत होगा, इसी के द्वारा मुक्तांचल-निर्माण और क्रान्तिकारी सेना-निर्माण की समस्या हल होगी और इसी से प्रेरित प्रचण्ड स्वयंस्फूर्त जन-अभ्युत्थान राज्यसत्ता पर वज्रघात करेगा। पार्टी कांग्रेस से तीन माह पहले छापामार कार्रवाई के बारे में लिखे गये अपने एक लेख में उन्होंने लिखा कि छापामार दस्ते बिल्कुल गुप्त और स्वतन्त्र होंगे, उन पर पार्टी कमेटी का भी नियन्त्रण नहीं होगा, उनको बनाने का तरीका एक-एक व्यक्ति को पकड़कर, उसके कान में फुसफुसाकर किया जायेगा, इसकी भनक पार्टी की राजनीतिक इकाइयों को भी नहीं होगी और इसके लिए निम्न-बुर्जुआ बुद्धिजीवियों को पहल करनी होगी। यही नहीं, लोकयुद्ध की दीर्घकालिक प्रवृत्ति को ठुकराते हुए उन्होंने ख़ात्मे की लाइन से प्रेरित प्रचण्ड देशव्यापी विद्रोह की भी कल्पना की और कांग्रेस के पहले के काल में ही, पार्टी-गठन की घोषणा के बाद, 1969 में सत्तर के दशक को मुक्ति के दशक में बदल देने का नारा दिया।

वस्तुत: यह रणदिवे काल के “वामपन्थी” भटकाव का ही एक अत्याधिक विकृत और भोंड़ा संस्करण था जिसका मार्क्सवाद-लेनिनवाद से और जनवादी क्रान्ति विषयक माओ के विचारों से कुछ भी लेना-देना नहीं था।

सिद्धान्त-निरूपण के साथ ही क्रान्तिकारी आतंकवाद का व्यवहार भी देश के विभिन्न हिस्सों में ज़ोर-शोर से जारी था। देश के विभिन्न हिस्सों में चारु की लाइन से प्रेरित कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी छिटपुट, बिखरे हुए रूप में, दस्ते बनाकर `ऐक्शन´ और ख़ात्मे की लाइन लागू करते थे और कुछेक कार्रवाइयों के बाद ही सबकुछ बिखर जाता था। श्रीकाकुलम के बाद “वाम” दुस्साहसवाद का दूसरा बड़ा प्रयोग बंगाल के मिदनापुर ज़िले के दो थानों डेबरा और गोपीवल्लभपुर में हुआ। उस समय तक तालमेल कमेटी पार्टी-गठन की घोषणा कर चुकी थी। सितम्बर ´69 से यहाँ कार्रवाइयों की शुरुआत नवगठित पार्टी की प. बंगाल-बिहार-उड़ीसा सीमा आंचलिक कमेटी ने की थी जिसके सचिव असीम चटर्जी और मुख्य संगठनकर्ता सन्तोष राणा, मिहिर राणा, गुणधर मुर्मू आदि थे। उल्लेखनीय है कि शुरुआत यहाँ भी व्यापक जन पहलकदमी और जनान्दोलन के रूप में हुई। अत्याचारी ज़मींदारों के खेत काटने के अभियान में 40,000 किसानों ने हिस्सा लिया। गाँवों में किसान कमेटियों ने अपनी सत्ता कायम करके लोक अदालतें लगाकर ज़मींदारों, सूदख़ोरों को दण्डित किया। ज़मींदारों और धनी किसानों के खेतों में काम करने वाले मज़दूरों की मज़दूरी पाँच गुनी कर दी गयी। लेकिन इस शुरुआत के बाद दस्तों की आतंकवादी कार्रवाइयों ने जनान्दोलन को तबाह कर दिया। अप्रैल 1970 तक साठ वर्ग शत्रुओं की हत्या की जा चुकी थी। इस मुहिम को डेबरा और गोपीवल्लभपुर थानों से बाहर खड़गपुर लोकल, सांक्राइल, केशापुर और चाकुलिया में फैलाया गया। लेकिन बढ़ते दमन और गतिरोध के साथ ही नेतृत्व में मतभेद भी पैदा होने लगे और लाइन पर सवाल भी उठने लगे। 1970 के मध्य तक यह आन्दोलन बिखर चुका था।

बिहार के मुजफ़रपुर ज़िले के मुसहरी अंचल के लगभग बारह गाँवों में भी भूमि आन्दोलन की शुरुआत 1969 में जनान्दोलन के रूप में हुई जिसमें लगभग दस हज़ार किसानों ने हिस्सा लिया। शुरुआती दौर के बाद वहाँ भी सफ़ाये की लाइन लागू हुई और फ़रवरी ´70 तक दस वर्ग-शत्रुओं की हत्या कर दी गयी। यहाँ भी डेढ़ वर्ष के भीतर आन्दोलन गतिरोध का शिकार होकर बिखर गया।

उत्तर प्रदेश में लखीमपुर ज़िले के तराई अंचल के पालिया में जनवरी-फ़रवरी 1968 में किसानों का आन्दोलन जन-पहलकदमी और जन-भागीदारी के साथ शुरू हुआ। ग़रीब किसानों और मज़दूरों ने पीलीभीत तराई फार्म और पतियान, घोला, इब्राहीमपुर के फार्मों पर (यह एक दीगर प्रश्न है कि मुद्दा यहाँ ज़मीन का होना चाहिए था या नहीं, क्योंकि ये फार्म पूँजीवादी भूस्वामियों के फार्म थे जो मज़दूरों से काम लेकर मुनाफ़े की खेती करते थे) फार्म मालिकों के गुण्डा गिरोहों से मोर्चा लेकर ज़मीन पर कब्ज़ा किया। फिर “वामपन्थी” लाइन के हावी होने का दौर आया और दमन ने भी ज़ोर पकड़ा। एक वर्ष के भीतर यह आन्दोलन भी बिखर गया।

बावजूद इन विफलताओं के, मुक्ति संघर्ष के निरन्तर अग्रवर्ती विकास के चारु के दावे जारी थे। कारण यह था कि एक जगह “वामपन्थी” लाइन की विफलता सामने आती थी, तब तक दूसरे किसी क्षेत्र में ज़ोर-शोर से इसका अमल शुरू हो चुका होता था। फिर भी 1970 के अन्त तक पूरे देश में मा-ले आन्दोलन की “वाम” आतंकवादी मुहिम पिट चुकी थी और चतुर्दिक व्याप्त गतिरोध एक ओर कतारों में निराशा पैदा कर रहा था, दूसरी ओर नेतृत्व में मतभेद और फूट की ज़मीन तैयार कर रहा था। इसकी चर्चा लेख के अगले हिस्से में पार्टी कांग्रेस के बाद के काल के घटना-प्रवाह के विवरण और समाहार के दौरान की जायेगी। यहाँ पार्टी-कांग्रेस तक का घटनाक्रम संक्षेप में बताकर हमें इस हिस्से का समापन करना होगा। ए.आई.सी.सी.सी.आर. से आन्ध्र प्रदेश कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कमेटी के निष्कासन (7 फ़रवरी ´69) के बाद चारु को लगने लगा था कि “वामपन्थी” लाइन के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हटायी जा चुकी है। अपने पहले के विचार को एकाएक बदलते हुए उन्होंने अचानक यह विचार रखना शुरू किया कि अब सर्वभारतीय पार्टी गठन का उपयुक्त समय आ गया है। तालमेल कमेटी के कामों की कोई भी समीक्षा नहीं हुई। कुछ लोगों ने विरोध किया, फिर सहमत हो गये। परिमल दासगुप्त को निकाले जाने के बाद इस निर्णय का एकमात्र शेष विरोधी भी रास्ते से हट गया। 22 अप्रैल 1969 को तालमेल कमेटी ने अपने को भंग कर भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना की और 1 मई 1969 को कलकता के शहीद मीनार मैदान में आयोजित जनसभा में कानू सान्याल ने इसकी घोषणा की। 27 अप्रैल के अधिवेशन में पार्टी की आरजी (कांग्रेस तक के लिए) नेतृत्वकारी कमेटी के रूप में केन्द्रीय सांगठनिक कमेटी का गठन किया गया जिसके कुल ग्यारह सदस्य थे : चारु मजूमदार, सुशीतल रायचौधरी, सरोज दत्त, कानू सान्याल, सौरेन बसु, शिवकुमार मिश्र, सत्यनारायण सिंह, आर.पी. सर्राफ़, पंचाद्रि कृष्णमूर्ति, चौधरी तेजेश्वर राव और एल. अप्पू। चारु मजूमदार को कमेटी का सचिव चुना गया। एक वर्ष के भीतर पार्टी कांग्रेस बुलाने का निर्णय लिया गया। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने पार्टी-स्थापना का स्वागत किया और उसे मान्यता प्रदान की। पीकिंङ रेडियो से 22 अप्रैल ´69 के प्रस्ताव का, 1 मई की जनसभा में कानू सान्याल के भाषण का और जनसभा में पारित प्रस्तावों का प्रसारण हुआ। इससे कतारों में नवगठित पार्टी की मान्यता बढ़ी और नये उत्साह का संचार हुआ। 1969 के अन्त में एक पार्टी प्रतिनिधिमण्डल ने चीन की गुप्त यात्रा भी की।

अप्रैल 1970 में पार्टी कांग्रेस की तैयारी के लिए केन्द्रीय सांगठनिक कमेटी ने तीन दिनों की बैठक की। बैठक में सत्यनारायण सिंह, शिवकुमार मिश्र और सौरेन बसु को पार्टी कार्यक्रम का मसविदा तैयार करने की तथा सुशीतल रायचौधरी, आर.पी. सर्राफ़ और सरोज दत्त को राजनीतिक प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी।

भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना कांग्रेस (जिसे कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास की निरन्तरता की दृष्टि से आठवीं कांग्रेस कहा गया) 15-16 मई 1970 को कलकता में हुई जिसमें प. बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, आन्ध्र, त्रिपुरा, तमिलनाडु, केरल, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसके पूर्व राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे पर उत्तर प्रदेश राज्य सम्मेलन में काफ़ी बहस हुई थी जिसमें छापामार संघर्ष के ही संघर्ष के एकमात्र रूप होने, सफ़ाये की लाइन और चीन की पार्टी के प्रति निष्ठा को क्रान्तिकारियों की एकरूपता की एकमात्र शर्त बनाने का विरोध किया गया था। कांग्रेस में आर.एन. उपाध्याय ने इस बहस की रिपोर्ट रखी। स्पष्ट था कि उ.प्र. में चारु की लाइन के विरोध का पक्ष प्रधान था। लेकिन राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे के पक्ष में सत्यनारायण सिंह के वक्तव्य के बाद उसे पारित कर दिया गया। पार्टी-कार्यक्रम चीन की लोक जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम पर आधारित था। इसमें भारतीय समाज को एक अर्द्धसामन्ती, अर्द्ध-औपनिवेशिक समाज बताते हुए और आज़ादी को नकली आज़ादी बताते हुए अमेरिकी साम्राज्यवाद, सोवियत सामाजिक साम्राज्यवाद, सामन्तवाद और दलाल-नौकरशाह पूँजी को भारतीय जनता के चार मुख्य शत्रु बताया गया था। भारत को अमेरिकी और सोवियत साम्राज्यवाद का (एकसाथ) नवउपनिवेश बताया गया था लेकिन तत्कालीन दौर का मुख्य अन्तरविरोध व्यापक भारतीय जनता और सामन्तवाद के रूप में बताया गया था। यह कार्यक्रम चीन की पार्टी के विश्व परिस्थितियों के आम आकलन को निगमनात्मक तरीके से भारत पर लागू करते हुए तैयार किया गया था और विसंगतियों से भरा हुआ था। इसके पीछे ठोस परिस्थितियों के स्वतन्त्र अध्ययन-विश्लेषण की कोई भूमिका नहीं थी। आगे लेख में नवजनवादी कार्यक्रम की तमाम विसंगतियों-अन्तरविरोधों की चर्चा उस स्थान पर की जायेगी जहाँ मार्क्सवादी-लेनिनवादी शिविर में इस पर सवाल उठने का प्रसंग आयेगा, इसलिए यहाँ हम उसके विस्तार में नहीं जा रहे हैं। राजनीतिक प्रस्ताव भी इसी कार्यक्रम के अनुरूप था। साथ ही, उसमें रणकौशल और रास्ते से जुड़े विविध प्रश्नों पर रखी गयी अवस्थिति में “वाम” अवसरवादी लाइन की पूरी छाया मौजूद थी। रही-सही कोर-कसर चारु मजूमदार ने अपने वक्तव्य से पूरी कर दी जिसमें उन्होंने साफ़-साफ़ शब्दों में पुरज़ोर तरीके से आतंकवादी लाइन की हाँक लगायी थी।

यहाँ यह चर्चा भी ज़रूरी है कि कांग्रेस में सौरेन बसु ने (सरोज दत्त भी उनके साथ थे) चारु मजूमदार के व्यक्तिगत प्राधिकार को औपचारिक तौर पर स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। असीम चटर्जी ने प्रस्ताव के पक्ष में यहाँ तक कह डाला कि केन्द्रीय कमेटी और चारु मजूमदार के बीच विरोध होने पर मैं चारु मजूमदार का साथ दूँगा। कानू सान्याल ने बस इतना कहा कि तराई रिपोर्ट में चारु मजूमदार की भूमिका का और ज्यादा उल्लेख करना ज़रूरी था। सत्यनारायण सिंह ने इसका मुखर विरोध किया। शिवकुमार मिश्र और आर.पी. सर्राफ़ ने भी दबी जुबान से विरोध प्रकट किया। सुशीतल रायचौधरी ने माओ के उद्धरणों की पुस्तक से पार्टी कमेटी को शक्तिशाली बनाने सम्बन्धी सारे उद्धरण पढ़ सुनाये और इस प्रस्ताव को माओ की शिक्षाओं के विपरीत बताया। आम सहमति नहीं बनने के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका लेकिन बाद के दौर में केन्द्रीय कमेटी में मौजूद चारु समर्थक कॉकस ने वस्तुत: चारु के प्राधिकार वाली स्थिति को ही लागू किया, जिसके आगे केन्द्रीय कमेटी का कोई मतलब ही नहीं रह गया था। यह सर्वथा स्वाभाविक था क्योंकि “वामपन्थी” दुस्साहसवादी विचारधारात्मक-राजनीतिक लाइन केवल और केवल नौकरशाहाना और फरमानशाहाना केन्द्रीयता की सांगठनिक लाइन के माध्यम से ही प्रभावी हो सकती है।

कांग्रेस ने एक बीस-सदस्यीय केन्द्रीय कमेटी का चुनाव किया जिसके सदस्य थे : चारु मजूमदार, सुशीतल रायचौधरी, सरोज दत्त, कानू सान्याल, सौरेन बसु, सुनीति कुमार घोष, असीम चटर्जी (प. बंगाल), सत्यनारायण सिंह, गुरुबख्श सिंह (बिहार), शिवकुमार मिश्र, महेन्द्र सिंह (उत्तर प्रदेश), वेंकटाप्पु सत्यनारायण, आदिमाटला कैलाशम्, नागभूषण पटनायक, अप्पाला सूरी (आन्ध्र प्रदेश), एल. अप्पू, कोदण्डरामन (तमिलनाडु), आम्बाडि (केरल), आर.पी. सर्राप़+ (जम्मू-कश्मीर), और जगजीत सिंह सोहल (पंजाब)। कमेटी के सचिव चारु मजूमदार चुने गये।

आठवीं कांग्रेस में स्वीकृत कार्यक्रम, राजनीतिक प्रस्ताव, राजनीतिक-सांगठनिक रिपोर्ट और चारु मजूमदार के वक्तव्य को यदि एकसाथ रखकर देखा जाये तो यह बात एकदम साफ़ हो जाती है कि कांग्रेस द्वारा स्वीकृत लाइन की विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ विचारधारा के विपरीत थी। हम यहाँ कार्यक्रम में प्रस्तुत भारतीय समाज के विश्लेषण और चरित्र-निर्धारण का फ़िलहाल उल्लेख नहीं कर रहे हैं। मूल बात विचारधारा की है। यदि कोई क्रान्तिकारी पार्टी जनदिशा और जनवादी केन्द्रीयता की सांगठनिक लाइन को सुसंगत ढंग से लागू करती है तो अनुभवों के समाहार और अन्तर्पार्टी बहस-मुबाहिसे के द्वारा वह क्रान्ति के कार्यक्रम विषयक ग़लती को ठीक भी कर सकती है। लेकिन यदि पार्टी का विचाराधारात्मक आधार ही ग़लत हो तो सही कार्यक्रम भी महज़ काग़ज़ का टुकड़ा बनकर रह जायेगा। भा.क.पा. (मा-ले) का गठन मार्क्सवाद-लेनिनवाद के आधार पर नहीं बल्कि “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के आधार पर हुआ था। आठवीं कांग्रेस ने एक सर्वभारतीय पार्टी-गठन के कार्यभार को कतई पूरा नहीं किया। मूलत: और मुख्यत: क्रान्तिकारी जनदिशा को लागू करने वाले जो मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठन थे (और जो संगठन “वामपन्थी” या दक्षिणपन्थी भटकाव के अपेक्षाकृत कम शिकार थे), वे भा.क.पा. (मा-ले) के बाहर ही रह गये थे। इसलिए, 1970 में गठित भा.क.पा. (मा-ले) के बारे में ज्यादा से ज्यादा इतना ही कहा जा सकता है कि वह गम्भीर “वामपन्थी” अवसरवादी भटकाव से ग्रस्त एक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन था, एक सर्वभारतीय क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी कतई नहीं था।

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-2

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-3

(अगले अंक में जारी)

फैज़’ की गज़लों की गायिका इकबाल बानो के निधन पर

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http://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/HumDekhenge%28IqbalBano%29CompletePoem.mp3?attredirects=0

डॉन में छपी रिपोर्ट के अनुसार प्रख्यात ग़ज़ल गायिका इकबाल बानो मंगल को चल बसीं. उस्ताद चाँद खान की शिष्या इकबाल बानो 1935 में दिल्ली में पैदा हुईं. 1952 में वे पाकिस्तान चली गयीं जहाँ उन्होंने रेडियो पाकिस्तान से अपने कैरियर की शुरुआत की. उसी वर्ष 17 साल की उम्र में उन्होंने एक भूस्वामी से इस शर्त पर शादी की कि वह उनके गायन कार्य में सहायक होगा. 1957 में, लाहौर आर्ट काउन्सिल में उनका प्रथम गायन कंसर्ट हुआ.

बेशक उन्हें ग़ज़ल गायिका और विशेषतया फैज़ अहमद ‘फैज़’ की गज़लों की गायिका के तौर पर अधिक जाना जाता है लेकिन उन्होंने पाकिस्तान की फिल्मों गुमनाम (1954), कातिल (1955). इन्तेकाम (1955), सरफरोश (1956), इश्के-लैला (1957) और नागिन (1959) में पार्श्व गायिका के रूप में भी अपना स्वर दिया.

1974 में उन्हें तमगा-ए- इमतियाज़ से नवाजा गया.

प्रसिद्व पाकिस्तानी कवि ‘फैज़’ जिनकी रचनाओं को उन्होंने बड़े उत्साह से गाया,की सपुत्री सलीमा हाश्मी कहती हैं,”इकबाल बानो हमारे परिवार के दिलों और दिमागों में विशेष स्थान बनाये रखेंगी.”

1985 में जब तानाशाह जिया उल हक़ द्वारा फैज़ के क्रांतिकारी काव्य के गायन की मूक मनाही थी, को याद करते हुए हाश्मी कहती हैं ” उनकी प्रेरणा और समर्थन हमारे सबसे महान वसीलों में से एक हो गुज़रे जब उन्होंने अपने अति-उत्साहित श्रोताओं में “हम भी देखेंगे” गाने की जुरअत की. मुझे अब भी याद है कि किस तरह आवेशित श्रोतागण अपनी फरमाईशों को दोहरा रहे थे”. तत्पश्चात यही गीत उनके लिए ‘राष्ट्रीय गीत’ बन गया जिसे वह अपने प्रशंसको के लिए सदैव गाती रहती थीं.

“वास्तव में, यह बानो ही थीं जिन्होंने 1981 में पहली बार ‘फैज़’ के काव्य का गायन शुरू किया, ऐसा मानना है हाश्मी का.

उपरोक्त फ्लैश प्लेयर आईकोन से उनकी यह ग़ज़ल सुने जिसका टेक्सट  टूटी हुई बिखरी हुई से साभार लिया गया है.

हम देखेंगे

लाजिम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिसका वादा है

जो लौह-ए-अजल में लिखा है

जब जुल्मो-सितम के कोहे-गरां

रुई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव तले

जब धरती धड़ धड़ धड़केगी

और अहले -हकम के सर ऊपर

जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी

हम देखेंगे

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएंगे

हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएंगे

सब ताज उछाले जाएंगे

सब तख्त गिराए जाएंगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ायब भी है हाज़िर भी

जो नाज़िर भी है मन्ज़र भी

उट्ठेगा अनल – हक़ का नारा

जो मैं भी हूं और तुम भी हो

और राज करेगी खल्क-ए-ख़ुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-3

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तैयार होती ज़मीन,

वह ऐतिहासिक विस्फोट

और उसके बाद

नवम्बर, 1964 में जब कलकत्ता के त्यागराज हॉल में पार्टी कांग्रेस हो रही थी, उस समय बाहर कुछ लोगों के एक छोटे से ग्रुप ने पर्चे बाँटकर नयी पार्टी के नेतृत्व पर भी मध्यमार्गी और संशोधनवादी भटकाव का शिकार होने का आरोप लगाया। पार्टी कांग्रेस से ज्यादातर प्रतिनिधि निराश और संशयग्रस्त होकर लौटे। 1965 के जनवरी महीने में नवगठित माकपा के महासचिव पी. सुन्दरैया गिरफ़्तार हुए और फिर सरकारी अनुमति से इलाज के लिए सोवियत संघ गये। वहाँ से लौटने के बाद सोवियत नेतृत्व के कई सकारात्मक पहलू गिनाते हुए उन्होंने लिखा कि सोवियत पार्टी की बातों में भी दम है। इधर, महान बहस के दस्तावेज़ निचले स्तर के संगठनकर्ताओं-कार्यकर्ताओं तक भी पहुँचने लगे थे और उन्नत चेतना वाले कार्यकर्ताओं का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा यह समझने लगा था कि संशोधनवाद और मार्क्सवाद के बीच मध्यमार्ग अपनाने की कोई गुंजाइश ही नहीं है और ऐसा करने का एकमात्र मतलब होगा संशोधनवाद के पाले में खड़ा होना। यह समय था जब दक्षिण वियतनाम, फिलीप्पींस और मलाया से लेकर अफ़्रीकी देशों और लातिन अमेरिकी देशों में जारी राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों और नवउपनिवेशवाद-विरोधी सशस्त्र संघर्षों में राष्ट्रीय बुर्जुआ नेतृत्व माओ के दीर्घकालिक लोकयुद्ध की सामरिक रणनीति को लागू कर रहा था और इनमें से अधिकांश संघर्ष विजय की दहलीज़ पर खड़े थे। अफ़्रीकी मुक्ति संघर्ष के अमिल्कर कबराल, क्वामे एन्क्रूमा, जूलियस न्येरेरे जैसे नेता माओ की सामरिक रणनीति के अवदान को घोषित तौर पर स्वीकार कर रहे थे। राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों के साथ मोलतोल करके मदद करने तथा उन्हें शासकों के साथ बातचीत की टेबुल पर बैठकर मोलतोल करने और सुलह-सफाई के ज़रिये सत्ता हासिल करने का सुझाव देने वाले ख्रुश्चेवी संशोधनवादी ज्यादा से ज्यादा बेनकाब होते जा रहे थे। क्यूबाई मिसाइल संकट के समय अमेरिकी धौंस के सामने ख्रुश्चेव के घुटने टेकने के बाद सोवियत शासन के चरित्र के बारे में दुनिया भर की कम्युनिस्ट कतारों के भीतर पहले ही सवाल पैदा हो चुका था। साम्राज्यवादियों के साथ लगातार सुलह-सफाई की उसकी नीति भी उसे शंकाओं के घेरे में खड़ा कर रही थी। 1965 के अन्त में इण्डोनेशिया में कम्युनिस्टों का अभूतपूर्व बर्बर दमन हुआ और इस घटना ने भी भारत के कम्युनिस्ट कतारों के सामने स्पष्ट कर दिया कि यदि कोई पार्टी विशाल जनाधार और कैडर-शक्ति के बावजूद गुप्तता, कैडर-भरती, कार्य संस्कृति के अनुशासन और सामरिक तैयारी के मामले में ढिलाई बरतेगी तो बुर्जुआ राज्यसत्ता बर्बर सैन्यबल से उसे कुचलकर खून के दलदल में धँसा देगी। इस घटना ने भारतीय कम्युनिस्ट कतारों को भी सोवियत और चीनी रास्तों के विचारधारात्मक फ़र्क को समझने में काफ़ी मदद की और वे इसी रोशनी में माकपा के नये नेतृत्व के बारे में भी सोचने लगे। `महान बहस´ के तत्काल बाद चीन में 1964 से `महान समाजवादी शिक्षा आन्दोलन´ की शुरुआत हो चुकी थी। यह आन्दोलन वस्तुत: समाजवादी निर्माण के प्रश्न पर चीनी पार्टी के भीतर संशोधनवाद और क्रान्तिकारी लाइन के बीच के संघर्ष का ही एक रूप था और इस दौरान महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की पूर्वपीठिका तैयार होने लगी थी। इस आन्दोलन से सम्बन्धित चीनी पार्टी के दस्तावेज़ भी माकपा से जुड़े बुद्धिजीवियों और चेतनशील कार्यकर्ताओं तक पहुँच रहे थे और चीज़ों को समझने में सहायक बन रहे थे। सातवीं कांग्रेस में जनान्दोलन की लम्बी-चौड़ी बातों के उलट, कांग्रेस के ठीक बाद कहीं भी भूमि संघर्ष संगठित करने या मज़दूरों की राजनीतिक-आर्थिक माँगों को लेकर जुझारू आन्दोलन संगठित करने की नेतृत्व की ओर से कोई पहल नहीं दीख रही थी। नियमित अनुष्ठान से अलग क्रान्तिकारी राजनीतिक प्रचार एवं शिक्षा की कोई कार्रवाई भी नहीं संगठित की जा रही थी, जो किसी नवगठित पार्टी के लिए आवश्यक कार्यभार होता है। पार्टी-नेतृत्व का मुख्य या लगभग पूरा ज़ोर कांग्रेस-विरोधी व्यापक संयुक्त मोर्चा बनाकर आगामी चुनावों में कांग्रेस का विकल्प प्रस्तुत करने की तैयारी पर था। हालाँकि अपने चुनावी चरित्र पर पर्दा डालने के लिए वह लगातार “जनान्दोलनों को मज़बूत बनाने वाली संक्रमणकालीन सरकारों की स्थापना” (वह “संक्रमणकाल” आज तक जारी है!) की ही बात कह रही थी। 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय भी पार्टी ने बुर्जुआ अन्धराष्ट्रवाद-विरोधी और युद्ध-विरोधी क्रान्तिकारी प्रचार का कोई भी कार्यक्रम हाथ में लेने का साहस नहीं किया। राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय पटल की ये सारी घटनाएँ और विश्व-इतिहास के उस दौर में चतुर्दिक आगे बढ़ते मुक्ति संघर्षों के ज्वार माकपा की कतारों की चेतना का क्रान्तिकारीकरण करने में, उन्हें संशोधनवाद और क्रान्तिकारी मार्क्सवाद के बीच अन्तर करना सिखाने में तथा माकपा नेतृत्व के असली चरित्र को पहचानने में मदद पहुँचा रहे थे। पार्टी नेतृत्व का व्यवहार स्वयं उसके चरित्र को उजागर करता जा रहा था।

नवगठित पार्टी-नेतृत्व के चरित्र पर प्रश्न उठाने वाले कुछ लोगों ने सातवीं कांग्रेस के तत्काल बाद, पार्टी के भीतर गुप्त तरीके से (उनका आकलन था कि नौकरशाह पार्टी नेतृत्व पार्टी के भीतर उन्हें बुनियादी सैद्धान्तिक मुद्दों पर कतई बहस नहीं चलाने देगा और ऐसा करते ही उन्हें उग्रवादी और दुस्साहसवादी बताकर किनारे लगा दिया जायेगा। उनका यह सोचना एकदम ठीक था, तमाम मसलों पर माकपा नेतृत्व के बाद के व्यवहार ने यही सिद्ध किया) सैद्धान्तिकी संघर्ष चलाने के लिए कन्हाई चटर्जी, अमूल्य सेन और चन्द्रशेखर दास की पहल पर, उन्हीं की अगुवाई में एक गुप्त क्रान्तिकारी केन्द्र का गठन किया। इस केन्द्र की ओर से मार्च, 1965 में `चिन्ता´ नामक बुलेटिन का पहला अंक निकला और पार्टी कतारों के बीच (विशेषकर बिहार और बंगाल में) इसे गुप्त रूप से बाँटा गया। ठीक इसी समय, चारू मजूमदार ने भी अपने प्रसिद्ध आठ दस्तावेज़ों की श्रंखला का लेखन प्रारम्भ किया। 28 फ़रवरी, 1965 को इस श्रंखला का पहला दस्तावेज़ `वर्तमान स्थिति में हमारे कर्त्तव्य’ उन्होंने पूरा किया। माकपा के नवसंशोधनवाद के विरुद्ध बिगुल फूँकने वाली ये दो निर्णायक पहलकदमियाँ अलग-अलग, लेकिन एकदम एक ही समय में ली गयीं। इनके अतिरिक्त, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब के कई लोग सातवीं कांग्रेस के बाद से ही पार्टी नेतृत्व को संशोधनवादी रास्ते का राही मानने लगे थे और इस मसले पर सोच-विचार रहे थे कि पार्टी के भीतर संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष चलाने का रास्ता क्या हो सकता है? कुछ लोग (विशेषकर पार्टी बुद्धिजीवी) ऐसे भी थे, जिन्होंने पार्टी को संशोधनवादी मानकर उसकी सदस्यता छोड़ दी थी या सदस्यता के बावजूद निष्क्रिय हो गये थे।

मार्च, 1965 से लेकर 1966 के मध्य तक `चिन्ता´ बुलेटिन के कुल छह अंक निकले। इसके बाद इस क्रान्तिकारी केन्द्र के सूत्रधारों को उग्रवादी और दुस्साहसवादी करार देकर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। निष्कासन के बाद, संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष और भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल से जुड़े विविध प्रश्नों पर बहस को व्यापक आधार पर चलाने के लिए 1966 के मध्य से कन्हाई चटर्जी-अमूल्य सेन के नेतृत्व वाले इस ग्रुप ने `दक्षिण देश´ नाम से एक खुली पत्रिका का नियमित प्रकाशन शुरू किया। चारु मजूमदार अगस्त, 1966 तक अपनी `आठ दस्तावेज़ श्रंखला´ के छ: दस्तावेज़ लिख चुके थे। सातवाँ और आठवाँ दस्तावेज़ उन्होंने क्रमश: 1967 के फ़रवरी और अप्रैल महीने में लिखा, जब नक्सलबाड़ी में किसानों के बड़े-बड़े जुलूस निकलने लगे थे और मई में शुरू होने वाले किसान-विद्रोह की ज़मीन तैयार हो चुकी थी। इन दस्तावेज़ों और `चिन्ता´ के अंकों की विषयवस्तु की चर्चा से पहले नक्सलबाड़ी के बारे में यह जानना ज़रूरी है कि इस विद्रोह की वस्तुगत परिस्थितियाँ किस प्रकार वहाँ मौजूद थीं और नक्सलबाड़ी में किसान संघर्षों और कम्युनिस्ट आन्दोलन की किस प्रकार पहले से ही एक परम्परा रही थी।

दार्जीलिंग ज़िले के सिलीगुड़ी सबडिवीज़न स्थित नक्सलबाड़ी क्षेत्र का ग्रामीण इलाका तराई अंचल है। वहीं से पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है। खेती के अलावा इस इलाके में चाय बाग़ान भी हैं, जो गाँवों से एकदम लगे हुए हैं। इस क्षेत्र के किसानों और बाग़ान मज़दूरों के बीच कम्युनिस्ट पार्टी ने व्यवस्थित ढंग से काम की शुरुआत 1951 में की। दार्जीलिंग ज़िला ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत एक `नॉन-रेग्यूलेटेड एरिया´ था। 1947 के बाद भी वहाँ के माहौल पर इसकी छाप थी। इलाके में चाय बाग़ान मालिक प्लाण्टर-भूस्वामियों और जोतदारों (भूस्वामियों) की निरंकुश सत्ता कायम थी। बाग़ान मज़दूरों की कोई यूनियन नहीं थी और बाग़ान मालिकों का आतंक इतना था कि वे इस दिशा में सोच तक नहीं सकते थे। किसी भी राजनीतिक पार्टी का कार्यकर्ता जोतदारों की मर्ज़ी और इजाज़त के बग़ैर किसानों की झोंपड़ियों तक पहुँच भी नहीं सकता था। इन कठिन परिस्थितियों में पार्टी ने इस क्षेत्र में काम शुरू किया। चारु मजूमदार उस सिलीगुड़ी लोकल कमेटी के नेता थे, जिसके अन्तर्गत नक्सलबाड़ी क्षेत्र आता था।

चारु मजूमदार 1930 के दशक में पाबना (अब बांगलादेश) के एडवर्ड कॉलेज में पढ़ते समय कम्युनिस्ट छात्र-छात्राओं के सम्पर्क में आये और कम्युनिस्ट बने। इण्टरमीडियट की फाइनल की परीक्षा छोड़कर वे जलपाईगुड़ी ज़िले के देवीगंज थाने (अब बांगलादेश) के पचागढ़ में किसानों के बीच काम करने लगे। कम्युनिज्म की प्रारिम्भक शिक्षा उन्हें माधवदत्त से मिली और फिर वे जलपाईगुड़ी के कम्युनिस्ट नेता शचिन दासगुप्त और वीरेन दत्त के सम्पर्क में आये। किसानों के अधियार आन्दोलन में भागीदारी के बाद उन्होंने लालमनिहार जं. (दिनाजपुर ज़िला) से लेकर जलपाईगुड़ी तक के रेल मज़दूरों और दुआर के चाय बाग़ान के मज़दूरों के बीच संगठनकर्त्ता के रूप में काम किया। उत्तर बंगाल के करीब 70 लाख किसानों के प्रसिद्ध तेभागा आन्दोलन (1946-47) में भी वे सक्रिय रहे। उल्लेखनीय है कि तेभागा आन्दोलन का प्रत्यक्ष नेतृत्व जब बर्बर दमन का प्रतिरोध करने के लिए किसानों की सशस्त्र प्रतिरक्षा संगठित करने के बारे में सोच रहा था, उसी समय मुस्लिम लीग सरकार के कोरे आश्वासनों के बाद प्रादेशिक नेतृत्व ने आन्दोलन वापस ले लिया। तब प्रादेशिक नेतृत्व की तीखी आलोचना करने वालों में चारु मजूमदार भी थे। 1947 में देश के विभाजन के बाद चारु मजूमदार का मुख्य कार्यक्षेत्र जब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांगलादेश) में चला गया तो वे जलपाईगुड़ी ज़िले के उस हिस्से में चाय बाग़ान मज़दूरों, रेल मज़दूरों और आदिवासी किसानों के बीच काम करने लगे, जो भारत में आया था। रणदिवे काल की अतिवामपन्थी लाइन और पार्टी के ग़ैरव़कानूनी करार दिये जाने के दौर में चारु जेल में थे। वहीं उन्हें तेलंगाना संघर्ष के दौरान पार्टी में जारी बहस और आन्ध्र दस्तावेज़ के बारे में पता चला। जेल में उन्हें माओ और चीनी पार्टी की लाइन के पक्षधर के रूप में जाना जाता था। तेलंगाना संघर्ष वापस लिये जाने के बाद, मार्च 1952 में चारु जेल से रिहा हुए। अब उनका नया कार्यक्षेत्र दार्जीलिंग ज़िले का सिलीगुड़ी सब-डिवीज़न बना जहाँ की लोकल कमेटी का नेतृत्व चारु मजूमदार ने सम्हाला। 1951 में पार्टी ने नक्सलबाड़ी क्षेत्र के गाँवों के किसानों और चाय बाग़ान मज़दूरों के बीच कामों की शुरुआत की। इसी समय कानू सान्याल ने भी यहाँ पूर्णकालिक संगठनकर्त्ता के रूप में काम करना शुरू किया और जंगल सन्थाल, दम लाल मल्लिक, खोदनलाल मल्लिक आदि स्थानीय कार्यकर्ताओं की एक टीम तैयार हुई।

1951 से लेकर 1954 तक का दौर नक्सलबाड़ी में किसानों और बाग़ान मज़दूरों के संगठित होने का प्रारम्भिक दौर था, लेकिन इलाके में जोतदारों के अत्याचार का इतना अधिक बोलबाला था कि उनके साथ खूनी झड़पों के बिना शुरुआती काम भी असम्भव था। पार्टी संगठनकर्ताओं ने जोतदारों की अवैध वसूलियों और अत्याचारों के विरुद्ध किसानों को संगठित करते हुए निकटवर्ती चाय बाग़ान मज़दूरों को भी उनके पक्ष में संगठित किया। इस तरह, स्थानीय स्तर पर, व्यवहार में मज़दूरों और किसानों का संयुक्त मोर्चा तैयार हुआ और 1955 से 1957 के बीच नक्सलबाड़ी के किसानों-मज़दूरों ने एक साथ मिलकर लगातार संघर्ष चलाये। जोतदारों और बाग़ान मालिकों के निरंकुश अत्याचार के चलते इस इलाके के किसानों और मज़दूरों को शुरू से ही अपने आत्मरक्षार्थ परम्परागत हथियारों की मदद लेनी पड़ी। यह एक महत्त्वपूर्ण कारण था कि नक्सलबाड़ी के किसानों में उस समय से ही कानूनी और शान्तिपूर्ण तरीके के बारे में कोई भ्रम नहीं था। 1955 का चाय बाग़ान मज़दूरों का बोनस आन्दोलन हालाँकि एक आर्थिक संघर्ष था, लेकिन हज़ारों मज़दूरों-किसानों ने इसमें भी अपनी जुझारू एकजुटता और लड़ाकूपन का प्रदर्शन किया और न केवल बाग़ान मालिकों के भाड़े के गुण्डों को बल्कि पुलिस को भी पीछे हटने पर मज़बूर कर दिया। एक मौके पर दस हज़ार हथियारबन्द बाग़ान मज़दूरों और किसानों ने पुलिस बल को निश्शस्त्र होने के लिए मज़बूर कर दिया था। नक्सलबाड़ी में वर्ग-संघर्ष के विकास की दृष्टि से 1955-56 का यह दूसरा दौर विशेष महत्त्व रखता है। 1958-62 के काल को नक्सलबाड़ी में किसानों-मज़दूरों के संघर्ष के विकास का तीसरा दौर कहा जा सकता है। इस दौरान पश्चिम बंगाल किसान सभा ने `बेनामी´ ज़मीन पर किसानों द्वारा फिर से कब्ज़ा का नारा दिया। लेकिन सिलीगुड़ी की सबडिवीज़नल किसान समिति के नक्सलबाड़ी में हुए सम्मेलन ने इस आह्वान को वास्तविक भूमि-सुधार की उद्देश्य-पूर्ति के लिए अधूरा मानते हुए जोतदारों की ज़मीन की कुल उपज ज़ब्त करने का आह्वान किया। सम्मेलन ने किसानों का आह्वान किया कि वे सारी फसल काटकर अपनी जगहों पर रखें, मालिकाना का सबूत पेश करने पर ही किसान समितियाँ जोतदारों को उनका हिस्सा दें और पुलिस एवं जोतदारों से फसल को बचाने के लिए किसान हथियारबन्द हो जायें। इस आन्दोलन के दौरान, सिर्फ़ 1958-59 के वर्ष में दो हज़ार किसान गिरफ़्तार हुए और उन पर सात सौ आपराधिक मुकदमे पुलिस ने दर्ज किये। जोतदारों और पुलिस से किसानों की सशस्त्र झड़पें हुई और जोतदारों के हथियार छीनने की कई घटनाएँ घटीं। किसान 80 फीसदी फसल अपने कब्ज़े में लेने और उसका बड़ा हिस्सा पुलिस द्वारा छीने जाने से बचाने में सफल रहे।

पूरे आन्दोलन के दौरान एक भी नेतृत्वकारी संगठनकर्ता को पुलिस गिरफ़्तार नहीं कर पायी। चारु मजूमदार इस आन्दोलन से सीधे नहीं जुड़े थे। उसके संगठनकर्ता कानू सान्याल, जंगल सन्थाल, कदम मल्लिक आदि थे। चारु मजूमदार की एक नकारात्मक भूमिका यह ज़रूर रही थी कि राज्य किसान सभा के नेताओं के निर्देश पर, संघर्ष के नेताओं और भागीदार किसान कार्यकर्ताओं से सलाह-मशविरा किये बिना ही, उन्होंने संघर्ष वापस लेने की घोषणा कर दी थी। इसके बावजूद, नक्सलबाड़ी के किसान कमोबेश 1962 तक इस संघर्ष की उपलब्धियों की हिफ़ाज़त में सफल रहे।

1962-64 के दौर को नक्सलबाड़ी में किसानों के संघर्ष और उनके बीच पार्टी कार्य के विकास का चौथा दौर माना जा सकता है। 1962 के भारत-चीन सीमा-युद्ध के समय और उसके बाद के वर्षों में घनघोर अन्धराष्ट्रवाद और कम्युनिज्म-विरोध के माहौल में भी नक्सलबाड़ी क्षेत्र के कम्युनिस्ट कार्यकर्ता दृढ़तापूर्वक इस अवस्थिति पर खड़े रहे कि हमलावर चीन नहीं है और यह युद्ध साम्राज्यवादियों की शह और अपनी विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षा से भारतीय शासक वर्ग ने छेड़ा है। किसानों-मज़दूरों में कम्युनिस्टों की साख इतनी मज़बूत थी कि वे दृढ़तापूर्वक उनके साथ खड़े थे। उस समय सही अवस्थिति लेने वाले कम्युनिस्टों की गिरफ़्तारी की जो मुहिम चली थी, उसके तहत अकेले नक्सलबाड़ी में सौ किसान-मज़दूर गिरफ़्तार हुए थे। इन कठिन वर्षों में भी जोतदारों और टी-प्लाण्टरों के हमलों और सत्ता के दमन का मुकाबला करते हुए इस क्षेत्र के किसान-मज़दूर अपनी सांगठनिक ताकत को बनाये रखने में सफ़ल रहे थे। 1964 में दार्जीलिंग ज़िले के मज़दूर, किसान और मध्यवर्गीय कार्यकर्ताओं ने संशोधनवाद के विरुद्ध जमकर संघर्ष किया और डांगेपंथियों  को पूरी तरह से अलगाव में डाल दिया। सिलीगुड़ी सबडिवीज़न के कार्यकर्ता दृढ़तापूर्वक ख्रुश्चेवी संशोधनवाद का विरोध कर रहे थे और चीनी पार्टी के पक्ष का समर्थन कर रहे थे।

नक्सलबाड़ी में जोतदारों-बाग़ान मालिकों के बर्बर दमन की जो विशेष परिस्थितियाँ थीं और वहाँ के किसानों-मज़दूरों के बीच कम्युनिस्ट कतारों के काम और कम्युनिस्ट नेतृत्व में उनके जुझारू संघर्षों का जो डेढ़ दशक लम्बा इतिहास था, उसने नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह और उस पर क्रान्तिकारी कम्युनिज्म के विचारधारात्मक-राजनीतिक वर्चस्व-स्थापना का आधार तैयार किया था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जुझारू संघर्षों का यह सिलसिला ही स्वत: विकसित होकर 1967 में नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के रूप में सामने आया। ऐसा मानना स्वयंस्फूर्ततावादी भटकाव होगा। नक्सलबाड़ी सशस्त्र किसान विद्रोह महज़ एक विद्रोह नहीं था। वह एक क्रान्तिकारी किसान-उभार था, जिसका नेतृत्व क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों के हाथों में था। नक्सलबाड़ी ने संशोधनवाद को सहज वर्ग-प्रवृत्ति से ख़ारिज नहीं किया था, बल्कि उसके पीछे एक सचेतन विचारधारात्मक नेतृत्व की भूमिका थी, चाहे उस नेतृत्व की अपनी सैद्धान्तिक कमज़ोरियाँ-विसंगतियाँ जो भी रही हों। चारु मजूमदार की सकारात्मक और नकारात्मक भूमिका का सवाल इसी मुद्दे की विवेचना से जुड़ा हुआ है।

1964 में माकपा के गठन के बाद, पार्टी कांग्रेस के ठीक पहले पूरे पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारी हुई। अक्टूबर 1964 से लेकर 1965 के पूर्वार्द्ध तक सिलीगुड़ी सबडिवीज़न के लगभग सभी पार्टी कार्यकर्ता गिरफ़्तार किये जा चुके थे। चारु मजूमदार तबतक दिल की बीमारी से ग्रस्त हो चुके थे और बीमारी के कारण ही उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया गया था। बाद में, 1965 के अन्त में उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया। 1964 से जून, 1966 के बीच जेल में रहने के दौरान दार्जीलिंग ज़िले के पार्टी कार्यकर्ताओं ने माकपा नेतृत्व के संशोधनवाद को जानने-समझने का काम किया, उसके विरुद्ध दृढ़तापूर्वक स्टैण्ड लिया और इस नतीजे पर पहुँचे कि चीनी मार्ग ही भारतीय मुक्ति-संघर्ष का भी मार्ग होगा। जेल में बन्दी इन कार्यकर्ताओं ने संशोधनवाद के विरुद्ध अपनी राजनीतिक तैयारी भले की हो, लेकिन माकपा नेतृत्व के विरुद्ध उन्होंने कोई दस्तावेज़ लिखने और उसे कतारों के अन्य हिस्सों तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की। यदि वे जेल से बाहर होते तो ऐसा करते या नहीं करते, यह अटकल की बात है और इतिहास की वस्तुगत सच्चाइयों की जाँच-पड़ताल करते हुए इस अटकल का कोई महत्त्व नहीं है। चारु मजूमदार का यह योगदान असन्धिग्ध है कि उन्होंने आठ दस्तावेज़ लिखकर माकपा के नवसंशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद में एक बुनियादी भूमिका निभायी। हाँ, इस बहुप्रचलित धारणा को ज़रूर संशोधित करने की ज़रूरत है कि ऐसा करने वाले वह अकेले व्यक्ति थे। ठीक उसी समय `चिन्ता ग्रुप´ (आगे चलकर `दक्षिण देश´ ग्रुप) ने भी अपनी बुलेटिन के ज़रिये कलकत्ता में यह काम शुरू कर दिया था और यह बुलेटिन चारु की दस्तावेज़-श्रन्खला की तुलना में पश्चिम बंगाल की कतारों की अपेक्षाकृत बड़ी संख्या तक पहुँच रहा था। आगे चलकर नक्सलबाड़ी किसान-संघर्ष की चमक और उसके निर्माता के रूप में चारु मजूमदार और उनके आठ दस्तावेज़ों की ख्याति के चलते `चिन्ता´ ग्रुप के प्रयास अपने महत्त्व के समुचित मूल्यांकन से काफ़ी हद तक वंचित रह गये। जहाँ तक नक्सलबाड़ी किसान-संघर्ष के निर्माता के रूप में चारु की और उनके आठ दस्तावेजों की भूमिका का प्रश्न है, उसका सही मूल्यांकन उस समय के ठोस तथ्यों की पड़ताल के बाद ही किया जा सकता है। अत: उनकी हम यहाँ संक्षेप में चर्चा करेंगे।

फ़रवरी, से सितम्बर 1965 के बीच चारु मजूमदार ने तत्कालीन राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए और उन परिस्थितियों में कम्युनिस्टों के कार्यभारों का विश्लेषण करते हुए पाँच लेख लिखे : `वर्तमान स्थिति में हमारे कर्त्तव्य´, `संशोधनवाद के खिलाफ़ संघर्ष कर जनता की जनवादी क्रान्ति को सफ़ल बनायें´, `भारत के स्वत:स्फूर्त क्रान्तिकारी सैलाब का स्रोत क्या है´, `आधुनिक संशोधनवाद के खिलाफ़ संघर्ष चलाते जायें´ और `1965 किस सम्भावना का निर्देश दे रहा है।´ इसके बाद वे गिरफ़्तार कर लिये गये। जेल में बीमारी गम्भीर हो जाने के कारण उन्हें कलकत्ता के एक अस्पताल में भर्ती किया गया और वहीं से वे 7 मई 1966 को रिहा कर दिये गये। अगस्त, 1966 में उन्होंने अपना छठवाँ लेख लिखा। प्रसिद्ध `आठ दस्तावेज़ श्रँखला´ के इन छ: लेखों में चारु मजूमदार ने जो स्थापनाएँ दी थीं, संक्षेप में उनका उल्लेख यहाँ ज़रूरी है।

इन दस्तावेज़ों के अनुसार, किसान सभा और ट्रेड यूनियन के ज़रिये आंशिक माँगों पर आन्दोलन चलाते रहने के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलकर राजनीतिक सत्ता के लिए संघर्ष करना होगा। राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा का अर्थ सरकार पर कब्ज़ा करना नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष द्वारा इलाकावार सत्ता-दख़ल करना है। चीन का रास्ता ही भारत की मुक्ति का रास्ता है और सशस्त्र संघर्ष हमारा फ़ौरी कार्यभार है। इसके लिए क्रान्तिकारी कार्यकर्ता तैयार करने होंगे और गुप्त ढाँचा खड़ा करना होगा, फिर गुप्त सशस्त्र दस्ते बनाने होंगे, जोतदारों पर हमले करने होंगे, उनके घरों में आग लगानी होगी, फसल कब्ज़ा करनी होगी और हथियार एकत्र करने होंगे। राजनीतिक प्रचार एवं उद्वेलन की कार्रवाई की पूरी उपेक्षा करते हुए इन लेखों में यह स्थापना दी गयी थी कि `ऐक्शन´ (जोतदारों पर `काम्बैट ग्रुपों´ के सशस्त्र व्यक्तिगत हमलों) के प्रभाव से ही जन-गोलबन्दी की शुरुआत हो जायेगी। यद्यपि इन दस्तावेजों में जन संगठनों और जनान्दोलनों को उसी तरह से सुधारवादी-संशोधनवादी काम नहीं करार दिया गया था, जैसाकि चारु मजूमदार ने कमोबेश 1969 से कहना शुरू कर दिया था, लेकिन सशस्त्र जनसंघर्षों के विकास में जनआन्दोलनों की कोई भूमिका बताने की बजाय सीधे गुप्त सशस्त्र दस्तों के निर्माण और ऐक्शन से ही कार्रवाई की बात की गयी थी, यानी पार्टी के कार्यभारों में जनआन्दोलन संगठित करने की कार्रवाई और राजनीतिक प्रचार की कार्रवाई की सीधे-सीधे उपेक्षा की गयी थी और सीधे छापामार संघर्ष से शुरुआत की बात की गयी थी। दस्तावेज़ों में आर्थिक संघर्षों को ही अर्थवादी करार देते हुए उनकी आलोचना की गयी थी और कहा गया था कि मज़दूरों के आन्दोलनों को समर्थन देते हुए भी पार्टी ट्रेडयूनियन व कानूनी संघर्षों में अपना समय जाया नहीं करेगी। छठे दस्तावेज़ में माकपा को स्पष्ट शब्दों में एक संशोधनवादी पार्टी बताते हुए कतारों से उसके ढाँचे को तोड़कर नेतृत्व के विरुद्ध विद्रोह का आह्वान किया गया था और यह कहा गया था कि माकपा-नेतृत्व जनान्दोलनों को महज़ सरकार बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है और उसके कांग्रेस विरोधी संयुक्त मोर्चे के नारे का एकमात्र अर्थ है बुर्जुआ वर्ग का दुमछल्ला बनना। इसी दस्तावेज़ में यह भी स्पष्ट कहा गया था कि सोवियत पार्टी के संशोधनवाद की मुखालफ़त किये बिना क्रान्तिकारी संघर्ष आगे नहीं बढ़ सकता और आज की दुनिया में माओ ने लेनिन का स्थान ग्रहण कर लिया है, अत: उनका विरोध करने वाले वास्तव में संशोधनवाद के विरोधी नहीं हैं। दरअसल, इसकी पृष्ठभूमि में माकपा की केन्द्रीय कमेटी की हाल ही में हुई वह बैठक थी जिसमें एक प्रस्ताव पारित करके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा भारत सरकार की आलोचना को ग़लत ठहराया गया था और यह भी कहा गया था कि सोवियत नेतृत्व की आलोचना करना अभी उचित नहीं है क्योंकि इससे लोगों के मन में समाजवाद के प्रति भरोसा घट जायेगा। इसके अतिरिक्त इन दस्तावेज़ों में, भारतीय व्यवस्था के संकट, गहराते दमन और बढ़ते जनाक्रोश की चर्चा के साथ ही चीन और पाकिस्तान के खिलाफ़ भारतीय शासक वर्ग द्वारा अन्धराष्ट्रवादी लहर उभाड़ने की कड़ी निन्दा की गयी थी तथा सोवियत संघ के सहयोग से बने सार्वजनिक क्षेत्र को भारतीय एकाधिकारी पूँजीपति वर्ग के हित में खड़ा किया गया उपक्रम बताया गया था।

30 अगस्त ´66 को जारी चारु का छठा दस्तावेज़ `भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का माओवादी केन्द्र´ की ओर से जारी किया गया था। वस्तुत: इस नाम का केवल प्रतीकात्मक महत्त्व था क्योंकि ऐसा कोई केन्द्र उस समय तक अस्तित्व में नहीं आया था और इस दस्तावेज़ का लेखन अकेले चारु ने ही किया था। चारु मजूमदार के पहले लेख से ही दार्जीलिंग की कम्युनिस्ट कतारों के बीच (जो जेल से बाहर थे), बहस की शुरुआत हो चुकी थी। चारु के जेल जाने तक उनके पाँच दस्तावेज़ सीमित लोगों तक ही पहुँच सके थे। मई में जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने चुने हुए पाँच छ: युवा कार्यकर्ताओं को पाँच दस्तावेज़ों में निरूपित लाइन के प्रचार के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भेजा। बुर्जुआ प्रेस में भी इन दस्तावेज़ों की ख़बरें प्रकाशित हुई और इस तथ्य से अन्य इलाके के माकपा कार्यकर्ता और जेल में बन्दी लोग भी परिचित हुए।

अगस्त 1966 तक प्रकाशित छ: दस्तावेज़ों की अन्तर्वस्तु पर यदि ग़ौर करें तो अन्तरराष्ट्रीय संशोधनवाद और माकपा के नवसंशोधनवाद से रैडिकल विच्छेद की इनमें दो टूक शब्दों में चर्चा की गयी थी और माओ विचारधारा को क्रान्तिकारी विचारधारा के रूप में स्थापित किया गया था। यह इनका मुख्य सकारात्मक पहलू था। लेकिन साथ ही, ये दस्तावेज़ भारतीय परिस्थितियों का अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम निर्धारित करने के कार्यभार की जगह उसे तयशुदा मानकर चलते थे और यह विचार रखते थे कि भारतीय क्रान्ति का रास्ता पूरी तरह से चीनी क्रान्ति का रास्ता होगा। पर चीनी क्रान्ति में सशस्त्र छापामार युद्ध का रास्ता क्रान्तिकारी जनदिशा के आधार पर विकसित हुआ था, जबकि चारु मजूमदार जनकार्रवाइयों की उपेक्षा करते हुए शुरू से ही गुप्त सशस्त्र दस्तों के निर्माण और उनके `ऐक्शन´ पर ज़ोर दे रहे थे और इन्हीं के द्वारा जन-गोलबन्दी पर बल दे रहे थे। उनके अनुसार, चूँकि इन कार्रवाइयों को व्यापक जन समुदाय का समर्थन प्राप्त होगा, अत: इन्हें आतंकवाद नहीं कहा जा सकता। यही लाइन आगे चलकर नग्न “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन के रूप में सामने आयी, लेकिन वस्तुत: इस भटकाव के तत्त्व इन छह दस्तावेज़ों में ही स्पष्ट रूप में मौजूद थे।

जेल से दार्जीलिंग के पार्टी कार्यकर्ताओं की रिहाई के बाद, सिलीगुड़ी लोकल कमेटी के नेतृत्वकारी संगठनकर्ताओं के साथ चारु मजूमदार की बातचीत हुई। उनमें इस बात पर आम सहमति बनी कि माकपा के संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष करना होगा, भारत की मुक्ति का रास्ता चीन का रास्ता होगा, भूमि क्रान्ति को सशस्त्र संघर्ष के ज़रिये ही पूरा किया जा सकता है तथा, भूमि क्रान्ति की राजनीति का किसानों-मज़दूरों के बीच प्रचार करना होगा, उन्हें संगठित करना होगा और गुप्त पार्टी संगठन का निर्माण करना होगा। लेकिन कानू सान्याल सहित लोकल कमेटी के पार्टी संगठनकर्ताओं का विचार था कि मज़दूरों और किसानों के जन संगठन और जनान्दोलन अपरिहार्य हैं, राजनीतिक काम सशस्त्र कार्रवाई की तैयारी की अनिवार्य पूर्वशर्त है, `पॉलिटिक्स इन कमाण्ड´ के बिना `ऐक्शन´ का कोई मतलब नहीं है, जन संघर्षों के द्वारा ही संघर्ष के उच्चतर रूप विकसित किये जा सकते हैं और शहरी क्षेत्रों में भी जनसंगठन बनाने होंगे। चारु मजूमदार इस विचार से सहमत नहीं थे। ऐसी स्थिति में यह समझौता हुआ कि सिलीगुड़ी लोकल कमेटी के संगठनकर्ता नक्सलबाड़ी में अपनी लाइन लागू करेंगे और चारु मजूमदार की लाइन को उनके पक्षधर नये कार्यकर्ता नक्सलबाड़ी से सटे पश्चिमी दिनाजपुर ज़िले के चतरहाट-इस्लामपुर इलाके में लागू करेंगे।

चतरहाट-इस्लामपुर में चारु मजूमदार के छ: दस्तावेज़ों के आधार पर काम की शुरुआत हुई। गुप्त दस्तों ने कुछ जोतदारों के घरों को जलाया और कुछ फसल भी रात में काट ली गयी। जनसंगठन बनाने या जनान्दोलन की कोई कोशिश नहीं की गयी। जल्दी ही `कॉम्बैट ग्रुप´ लुम्पन तत्त्वों के जमावड़े बनने लगे। 1967 में, जब नक्सलबाड़ी उभार शिखर पर था, उस समय चतरहाट-इस्लामपुर में जोतदारों ने गुप्त `कॉम्बैट ग्रुपों´ के ज्ञात सदस्यों के घरों पर संगठित होकर हमला किया। पूरी किसान आबादी ने उनका समर्थन किया। ग्रुपों के कार्यकर्ता किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये और ये गुप्त दस्ते जल्दी ही बिखर गये। इस तरह चारु की लाइन का पहला प्रयोग बुरी तरह विफल रहा।

नक्सलबाड़ी में जनदिशा लागू की गयी। ज़िला कमेटी में बहुमत को पक्ष में करने के लिए क्रान्तिकारी पार्टी कार्यकर्ताओं ने माकपा के भीतर विचारधारात्मक संघर्ष चलाने का निर्णय लिया। ज़िला कमेटी के 26 सदस्यों में से 20 ने सिलीगुड़ी लोकल कमेटी की राजनीतिक लाइन को स्वीकार किया और फिर ज़िला कमेटी के भीतर एक गुप्त कमेटी का गठन किया गया। व्यापक प्रचार के बाद, दार्जीलिंग ज़िले के पहाड़ी और मैदानी इलाके के ज्यादातर बाग़ान मज़दूर गुप्त ज़िला कमेटी की राजनीतिक लाइन का समर्थन करने लगे थे। संशोधनवादी यूनियन नेताओं से असन्तुष्ट बाग़ान मज़दूर आर्थिक माँगों को लेकर जुझारू संघर्ष के लिए कमर कसने लगे। 1966 के उत्तरार्द्ध का पूरा समय ऐसा था जब दार्जीलिंग ज़िले में नक्सलबाड़ी किसान उभार की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी। सितम्बर 1966 में चाय उद्योग में हुई नौ दिनों की आम हड़ताल इस दौर की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। जलपाईगुड़ी ज़िले में हड़ताल जब टूटने की ओर अग्रसर थी, उस समय भी दार्जीलिंग में मज़दूर डटे हुए थे। लाल झण्डा यूनियन के मज़दूरों के साथ ही अन्य यूनियनों के मज़दूर और बाग़ानों के असंगठित मज़दूर भी हड़ताल में शामिल हो गये थे। इससे भयभीत संशोधनवादी नेता पूरी कोशिश कर रहे थे कि कोई `सेटलमेण्ट´ हो जाये। दार्जीलिंग में 25,000 से अधिक मज़दूरों ने दमन करने आयी पुलिस का जमकर मुकाबला किया जिसमें पुलिस की गोली से एक मज़दूर शहीद हुआ। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान, खेती-बाड़ी के व्यस्त समय के कामों के बावजूद, नक्सलबाड़ी के किसान दृढ़तापूर्वक हड़ताली मज़दूरों का साथ देते रहे। पुलिस के साथ कई बार उनकी झड़प भी हुई। बिना किसी बुनियादी माँग के पूरा हुए, हड़ताल वापस लेने की वजह से संशोधनवादी मज़दूरों में एकदम अलग-थलग पड़ गये। गुप्त ज़िला कमेटी और लोकल कमेटी के कार्यकर्ताओं ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाया। प्लाण्टेशन यूनियनों की शाखा सम्मेलनों ने भूमि क्रान्ति के कार्यक्रम के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। पर्वतीय क्षेत्र के चाय बाग़ान मज़दूरों के वार्षिक सम्मेलन ने संशोधनवादी नेताओं की कठोर निन्दा करते हुए उन्हें ट्रेड यूनियनों से निकाल बाहर किया। नक्सलबाड़ी के प्लाण्टेशन मज़दूरों के वार्षिक सम्मेलन ने भूमि-संघर्ष शुरू करने के लिए किसानों का आह्वान करते हुए प्रस्ताव पारित किया। इस तरह, चारु मजूमदार की “वाम” संकीर्णतावादी लाइन का विरोध करते हुए नक्सलबाड़ी में और समग्रता में दार्जीलिंग ज़िले में, कानू सान्याल और अन्य पार्टी संगठनकर्ताओं ने जो लाइन लागू की, उसके परिणामस्वरूप इलाके में मज़दूरों और किसानों का जुझारू और मज़बूत संश्रय अस्तित्व में आया, पुरानी ट्रेड यूनियनों और जनसंगठनों पर क्रान्तिकारी लाइन का वर्चस्व स्थापित हुआ और नयी यूनियनों व अन्य जनसंगठनों का निर्माण हुआ। मज़दूर-किसान संश्रय की मज़बूती को इस बात से समझा जा सकता है कि नक्सलबाड़ी उभार के दौरान चाय बाग़ानों के मज़दूरों ने उसके समर्थन में तीन बार आम हड़तालें की थीं।

`आठ दस्तावेज़ श्रँखला´ के सातवें और आठवें दस्तावेज़ – `संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष कर सशस्त्र पार्टीजन संघर्ष गठित करें´ और `संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष करके ही किसान संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा´ – चारु मजूमदार ने दार्जीलिंग ज़िले में, और विशेषकर सिलीगुड़ी के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में मज़दूरों-किसानों के जनान्दोलनों की उपरोक्त घटनाओं के बाद लिखे। सातवाँ दस्तावेज़ फ़रवरी 1967 के आम चुनाव के ठीक पहले और आठवाँ दस्तावेज़ अप्रैल, 1967 में लिखा गया। दार्जीलिंग में विरोधी लाइन के सफल व्यवहार ने चारु मजूमदार को विवश किया कि वे अपने इन दस्तावेज़ों में खुली जनकार्रवाइयों, आर्थिक संघर्षों और राजनीतिक प्रचार की कार्रवाई का महत्त्व स्वीकार करें, लेकिन ये दस्तावेज़ भी अतिवामपन्थी भटकाव से मुक्त नहीं थे। इन दस्तावेज़ों में जनता को संगठित करने के प्रारम्भिक चरण से ही हथियार संग्रह और गुप्त सशस्त्र दस्ते संगठित करने की बात की गयी थी, जनकार्रवाइयों की और जनसंगठन बनाने की कोई स्पष्ट योजना नहीं रखी गयी थी, उन्हें प्रकारान्तर से सशस्त्र कार्रवाइयों की पूरक मात्र का दर्जा दे दिया गया था, क्रान्तिकारी शहरी मध्यवर्ग और मज़दूर वर्ग के समक्ष उनके वर्गीय माँगों पर संघर्ष या साझा संघर्ष का कोई कार्यक्रम नहीं रखा गया था, उनका एकमात्र कार्यभार भूमि संघर्ष का समर्थन करना और उसमें भागीदारी करना बताया गया था, तथा भूमि क्रान्ति के ठोस कार्यक्रम और नारे तय करने की आवश्यकता की जगह बस सशस्त्र दस्तों के द्वारा भूस्वामियों की फसल और ज़मीन पर कब्ज़े की बात की गयी थी। इन दस्तावेज़ों का सकारात्मक पक्ष यह था कि इनमें एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन पर ठोस रूप में ज़ोर दिया गया था तथा माकपा नेतृत्व की वर्ग सहयोगवादी राजनीति और हर प्रकार के संशोधनवाद के विरुद्ध समझौताहीन संघर्ष करते हुए किसान संघर्ष को आगे बढ़ाने की बात की गयी थी। आने वाले समय ने यह सिद्ध किया कि चारु ने जनदिशा पर सफल अमल और उससे निर्मित माहौल के दबाव में बस थोड़े समय के लिए अपने कदम पीछे खींच लिये थे, अन्यथा अपनी लाइन पर वे सर्वथा सुसंगत और दृढ़ थे। नक्सलबाड़ी में जनदिशा का नेतृत्व करने वाले लोगों की विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण जैसे ही आन्दोलन में गतिरोध पैदा हुआ, वैसे ही चारु ने विकल्प के तौर पर अपनी लाइन आगे बढ़ा दी, हर प्रकार के खुले, कानूनी और आर्थिक संघर्ष के रूपों, जनान्दोलनों और जनसंगठनों को संशोधनवाद बताते हुए गुप्त सशस्त्र दस्ते बनाकर वर्ग-शत्रुओं के सफाये को ही छापामार-युद्ध घोषित कर दिया और अत्यन्त भोंड़े विकृत रूप में आतंकवादी लाइन पेश की। लेकिन यह अभी आगे की बात है।

1966 में दार्जीलिंग ज़िले में, विशेषकर नक्सलबाड़ी क्षेत्र में संशोधनवाद के विरुद्ध जो संघर्ष चल रहा था और मज़दूरों-किसानों के जो जुझारू संघर्ष लगातार विकसित हो रहे थे, सिलीगुड़ी लोकल कमेटी का नेता और दार्जीलिंग ज़िला कमेटी का सदस्य होने के नाते इन सबमें नेतृत्वकारी भूमिका चारु मजूमदार की ही मानी जा रही थी। संशोधनवादी, दार्जीलिंग के बाहर की कम्युनिस्ट कतारें और बुर्जुआ दायरे के लोग भी यही समझ रहे थे। चारु मजूमदार और नक्सलबाड़ी के स्थानीय संगठनकर्ताओं के बीच के मतभेद की जानकारी दार्जीलिंग ज़िला कमेटी के भीतर काम कर रही `गुप्त कमेटी´ तक ही सीमित थी। अक्टूबर, 1966 में माकपा राज्य कमेटी और केन्द्रीय कमेटी के कुछ नेतागण चारु मजूमदार को समझाने सिलीगुड़ी आये, पर उन्होंने उनकी बात मानने से इन्कार कर दिया। इसके पहले जुलाई, 1966 में भी बंगाल राज्य कमेटी के सचिव प्रमोद दास गुप्त उन्हें समझाने-बुझाने के लिए सिलीगुड़ी आये थे और विफल लौट गये थे।

नवम्बर, 1966 में दार्जीलिंग ज़िले में एक किसान सम्मेलन हुआ जिसमें यह तय हुआ कि बटाईदार किसान फसल का कोई भी हिस्सा जोतदारों को नहीं देंगे। फ़रवरी, 1967 में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें जंगल सन्थाल और सौरेन बसु को क्रमश: फाँसीदेवा और सिलीगुड़ी से पार्टी का टिकट मिला। इस चुनाव के मसले पर भी दार्जीलिंग के पार्टी कार्यकर्ताओं और कुछ नये कार्यकर्ताओं में मतभेद था। दार्जीलिंग के कार्यकर्ताओं का निर्णय था कि इस चुनाव का इस्तेमाल क्रान्तिकारी राजनीति के प्रचार के लिए किया जाये और ऐसा ही किया गया। इसका पर्याप्त लाभ मिला। चुनाव के ठीक बाद, बटाईदारों ने जोतदारों के विरुद्ध फसल-ज़ब्ती का आन्दोलन शुरू कर दिया। किसानों के कई इलाका सम्मेलन हुए जिनमें जोतदारों के कब्ज़े की ज़मीन ज़ब्त करने का आन्दोलन शुरू करने के लिए प्रस्ताव पारित किये गये। 7 मई 1967 को सिलीगुड़ी सबडिवीजनल किसान सम्मेलन हुआ जिसमें यह निर्णय लिया गया कि किसान जोतदारों की ज़मीन पर कब्ज़ा और किसान समितियों के माध्यम से उनके पुनर्वितरण का काम शुरू कर दें, जोतदारों के प्रतिरोध का मुकाबला करने के लिए हथियारबन्द हो जायें और गाँवों में किसान समितियाँ प्रशासन का काम अपने हाथों में ले लें। इस समय तक पश्चिम बंगाल में ग़ैरकांग्रेसी दलों की संयुक्त मोर्चे की सरकार सत्तारूढ़ हो चुकी थी जिसमें माकपा सबसे बड़ी पार्टनर थी और उसका चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा होता जा रहा था। 8 मई से नक्सलबाड़ी, खेरीबाड़ी, फाँसीदेवा और सिलीगुड़ी थानों के कई गाँवों से किसान-विद्रोह की शुरुआत हो गयी।

नक्सलबाड़ी किसान-उभार के विस्तार में जाने से पहले यह ज़रूरी है कि प. बंगाल में और देश के अन्य हिस्सों में माकपा के नवसंशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष और विद्रोह की जो प्रक्रिया 1964 से लगातार आगे बढ़ रही थी, उसकी चर्चा के छूटे हुए सिरे को पकड़कर आगे बढ़ायें। ऊपर हमने कन्हाई चटर्जी-अमूल्य सेन के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट ग्रुप की और उसके द्वारा प्रकाशित `चिन्ता´ बुलेटिन के छ: अंकों की चर्चा की है। `चिन्ता´ ने अपने अंकों में प्रकाशित लेखों में भूमि क्रान्ति के प्रश्न को और इसे पूरा करने के लिए सशस्त्र संघर्ष की अपरिहार्यता को, क्रान्ति के दीर्घकालिक लोकयुद्ध के मार्ग के प्रश्न को, भारतीय राष्ट्र के नवऔपनिवेशिक चरित्र के प्रश्न को और संशोधनवाद के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष के प्रश्न को व्यवस्थित ढंग से उठाया। कतारों के बीच वितरित होने वाला यह गुप्त प्रकाशन काफ़ी लोकप्रिय हो रहा था और बंगाल में संशोधनवादियों के लिए खासा सिरदर्द पैदा कर रहा था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि माकपा के केन्द्रीय मुखपत्र `पीपुल्स डेमोक्रेसी´ और `स्वाधीनता´ में तथा राज्य कमेटी के मुखपत्र `देशहितैषी´ में `चिन्ता´ के लेखों के विरुद्ध कई लेख प्रकाशित हुए। 1966 के मध्य में `चिन्ता´ से जुड़े या उससे मिलते-जुलते विचार रखने वाले पश्चिम बंगाल के कई क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को “उग्रवादी” करार देकर संगठन से बाहर कर दिया गया। तब बहस को और व्यापक स्तर पर आम कतारों तक पहुँचाने के लिए कन्हाई चटर्जी-अमूल्य सेन के ग्रुप ने `दक्षिण देश´ नामक खुली पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। 1966 से लेकर अक्टूबर 1969 में `माओवादी कम्युनिस्ट केन्द्र´ के गठन तक `दक्षिण देश´ पत्रिका ने साम्राज्यवाद, नवउपनिवेशवाद, सोवियत सामाजिक साम्राज्यवाद, भारतीय राष्ट्र के चरित्र, भारतीय क्रान्ति की रणनीति और रणकौशल सम्बन्धी समस्याओं, क्रान्तिकारी प्रचार कार्य की जनदिशा, छापामार संघर्ष, संशोधनवाद, अर्थवाद, संसदवाद, स्वत:स्फूर्ततावाद आदि विषयों पर कई महत्त्वपूर्ण लेख छापे। इन लेखों ने माकपा के संशोधनवाद के विरुद्ध कतारों की शिक्षा में विशेष मदद की। साथ ही, इसी पत्रिका के ज़रिये दक्षिण देश ग्रुप ने आगे चलकर ए.आई.सी.सी.सी.आर. पर हावी चारु मजूमदार गुट की लाइन की परोक्ष आलोचना रखते हुए मतभेद के प्रश्नों पर अपनी अवस्थिति भी रखी। इस कालखण्ड की चर्चा लेख में आगे आयेगी। पत्रिका ने इस ग्रुप के आरम्भिक राजनीतिक सुदृढ़ीकरण में काफी सहायता की और इसकी अवस्थिति से सहमत कार्यकर्ताओं को लेकर एक प्रारिम्भक सांगठनिक ढाँचा भी खड़ा हो गया, जिन्हें लेकर मज़दूरों, छात्रों, बुद्धिजीवियों के बीच कामों की शुरुआत हुई। 1966 के अन्त से इस ग्रुप ने 24 परगना ज़िले के सोनारपुर इलाके में किसानों के बीच काम की शुरुआत की जहाँ 1967 के अक्टूबर में, नक्सलबाड़ी विद्रोह के पाँच महीने बाद किसानों का सशस्त्र संघर्ष भड़क उठा जिसे मोर्चा सरकार के बर्बर पुलिस दमन का सामना करना पड़ा।

1966 में ही बंगाल में स्वत:स्फूर्त ढंग से खाद्य आन्दोलन की शुरुआत हुई, जो विशेष रूप से कलकत्ता और निकटवर्ती क्षेत्रों में अधिक तेज़ था। उस समय माकपा के, बंगाल के केन्द्रीय और राज्य स्तरीय नेताओं की पूरी पुरानी पीढ़ी जेल में थी और पार्टी गतिविधियों के संचालन के लिए लगभग सभी युवा और नये चेहरों को लेकर एक नया राज्य स्तरीय नेतृत्व संगठित किया गया था। इस नये नेतृत्व ने खाद्य आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए सभी वाम पार्टियों का एक संयुक्त मोर्चा बनाया। लेकिन इस मोर्चे के नेता स्वयंस्फूर्त आन्दोलन को नेतृत्व देने की बजाय जनता के पीछे-पीछे रेंग रहे थे। जबर्दस्त पुलिस दमन से आन्दोलन तो बिखर गया, लेकिन माकपा के नये राज्यस्तरीय नेतृत्व की युवा पीढ़ी ने इसके समाहार के आधार पर, अन्य वाम दलों को छोड़कर, स्वयं अपने बूते पर इस आन्दोलन को पुनस्संगठित करने और आगे ले जाने की एक योजना बनायी। यह तय किया गया कि आन्दोलन को विस्तारित करके गाँवों तक ले जाया जाये, भूस्वामियों की फसल बलपूर्वक ज़ब्त करने का नारा दिया जाये और प्रभावी प्रतिरोध की तैयारी के लिए ज़रूरी संगठन खड़े किये जायें। इसी समय पुरानी पीढ़ी के नेतागण जेल से छूटकर बाहर आये। शहीद मैदान मीनार में जनता का गर्मजोशी भरा अभिनन्दन स्वीकार करते हुए इन नेताओं ने खाद्य आन्दोलन में जनता की जुझारू भागीदारी की प्रशंसा की और आन्दोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प प्रकट किया। लेकिन मंच से नीचे उतरते ही उन्होंने आगामी फ़रवरी, 1967 में होने वाले चौथे आम चुनाव में संयुक्त मोर्चा बनाकर भागीदारी करने के लिए भाकपा नेताओं के साथ बन्द कमरों में मीटिंगें शुरू दीं। यह कतारों में व्याप्त भावना के एकदम विपरीत था, जो भाकपा को दुश्मन से कम कुछ भी नहीं समझती थीं। खाद्य आन्दोलन के जुझारू तेवर को भूख हड़ताल का नरम रास्ता अपनाकर कुन्द बनाने के भाकपा के प्रयासों का अनुभव अभी ताज़ा ही था। नतीजतन, कतारों ने पुराने नेतृत्व की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी। जो नया युवा नेतृत्व था, उसने देखा कि जेल से लौटने के बाद पुरानी पीढ़ी के नेता `देशहितैषी´ और `नन्दन´ के सम्पादकमण्डल के कामों में कदम-कदम पर हस्तक्षेप कर रहे हैं और रोक लगा रहे हैं जो रैडिकल क्रान्तिकारी लाइन पर प्रचार-कार्य को जारी रखना चाहता था। खाद्य आन्दोलन में भाकपा की भूमिका को उजागर करने के लिए मार्क्सवाद-लेनिनवाद संस्थान की ओर से प्रकाशित पुस्तिका `भूख हड़ताल का दर्शन´ के वितरण को रोक देने का निर्देश जारी किया गया। जेल जाने से पहले मार्क्सवाद-लेनिनवाद संस्थान की शुरुआत का जिस नेतृत्व ने स्वागत किया था और समर्थन दिया था, उसी ने बाहर आने के बाद इसके कामों को तरह-तरह से रोकना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि बुनियादी मार्क्सवाद की विभिन्न स्तरों पर चलने वाली कक्षाएँ भी रोक दी गयीं और कहा गया कि कक्षाओं में केवल पार्टी कार्यक्रम के सूत्रों के औचित्य की ही व्याख्या की जानी चाहिए। खाद्य आन्दोलन को जुझारू ढंग से आगे बढ़ाने की सारी योजनाओं को स्थगित कर दिया गया। यहाँ तक कि जनता की क्रान्तिकारी पहलकदमी को खोलने वाले स्थानीय आंशिक संघर्षों को भी तरह-तरह की तिकड़मों से और नौकरशाहाना तौर-तरीकों से रोका जाने लगा। इन सभी कार्रवाइयों के चलते, माकपा के गठन के समय से ही जारी अन्तर्पार्टी संघर्ष और अधिक गहरा हो गया। भाकपा के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिशें चुनाव के पहले तो परवान नहीं चढ़ सकीं लेकिन चुनाव के बाद भाकपा, कांग्रेस से अलग होकर बनी बांगला कांग्रेस और सभी ग़ैर कांग्रेसी विपक्षी दलों को साथ लेकर माकपा ने संयुक्त मोर्चे की सरकार बनायी जिसमें गृह और पुलिस विभाग के मन्त्री ज्योति बसु बने। माकपा नेतृत्व का एकमात्र तर्क यह था कि मोर्चे की सरकार में पार्टी के शामिल होने से रैडिकल भूमि-सुधारों के लिए संघर्ष सहित वर्ग संघर्ष को गति मिलेगी और पुलिस दमन से जनता का बचाव होगा। लेकिन कतारों के सामने पार्टी नेतृत्व का संशोधनवादी-संसदवादी-अर्थवादी और नौकरशाह-चरित्रा ज्यादा से ज्यादा नंगा होता जा रहा था। नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के फूट पड़ने की घटना और राज्य सरकार द्वारा उसके बर्बर पुलिस दमन ने माकपा नेतृत्व को कतारों के सामने पूरी तरह से नंगा कर दिया था। 1967-68 के दौरान कलकत्ता और कुछ ज़िलों में तो ऐसी स्थिति थी कि यदि नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद गठित `कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी´ (ए.आई.सी.सी.सी.आर.) में चारु की वामपन्थी आतंकवादी लाइन हावी नहीं होती और यदि जनसंगठनों और जनकार्रवाइयों का पूर्ण परित्याग नहीं किया जाता तो मज़दूरों, किसानों, छात्रों, बुद्धिजीवियों के मोर्चे पर कार्यरत कतारों का बहुलांश क्रान्तिकारी धारा के साथ आ खड़ा होता और माकपा के लिए कम से कम प. बंगाल में, अस्तित्व का संकट पैदा हो जाता।

ज्ञातव्य है कि कलकत्ता में 1965 से ही माकपा के भीतर सुशीतल राय चौधरी, सरोज दत्त, परिमल दास गुप्त, असित सेन, प्रमोद सेनगुप्त आदि ने `अन्तर्पार्टी संशोधनवाद विरोधी कमेटी´ बना रखी थी। इस कमेटी से चारु मजूमदार ने 1966 के मध्य में सम्पर्क स्थापित कर लिया था। `पार्टी के भीतर पार्टी बनाने´ का नारा उन दिनों खूब प्रचलित हुआ था और माकपा के भीतर इसी तरह के संशोधनवाद-विरोधी ग्रुप बंगाल के विभिन्न अंचलों के अतिरिक्त आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में भी अस्तित्व में आ चुके थे। 1966 के अन्त में दार्जीलिंग ज़िले के क्रान्तिकारी धड़े के साथ `दक्षिण देश ग्रुप´ का भी सम्पर्क स्थापित हो चुका था और 1967 के प्रारम्भ में चारु मजूमदार के साथ उनकी लम्बी बातचीत हुई। दक्षिण देश ग्रुप चुनाव में जंगल सन्थाल और सौरेन बसु को प्रत्याशी बनाये जाने के निर्णय से सहमत नहीं था, बावजूद इसके संशोधनवाद-विरोधी संघर्ष को व्यापक बनाने, किसानों के बीच यथाशक्ति काम को मज़बूत बनाने और परस्पर घनिष्ठ सम्पर्क रखने पर दोनों पक्षों में सहमति बनी थी।

8 मई 1967 की सुबह, नक्सलबाड़ी और निकटवर्ती तीन थानों के कुछ गाँवों से एक साथ किसान विद्रोह की शुरुआत हुई। बड़ी संख्या में तीर-धनुष से लैस किसान लाल झण्डा उड़ाते हुए जोतदारों के कब्ज़े की ज़मीनों और फसलों पर कब्ज़ा करने लगे। उनकी बन्दूकें भी ज़ब्त की जाने लगीं। इसी दौरान नक्सलबाड़ी थाने के एक गाँव में घटने वाली एक छोटी-सी घटना ने संघर्ष को नया मोड़ दे दिया। बिगुल नामक एक भूमिहीन किसान को दीवानी अदालत से कुछ ज़मीन पर अधिकार मिला था जिसे स्थानीय जोतदार ईश्वर टिर्की ने मार-पीटकर बेदखल करने की कोशिश की। इस पर स्थानीय किसानों ने एकजुट होकर ईश्वर टिर्की के लठैतों को मार भगाया। ख़बर मिलते ही, हमेशा की तरह 23 मई ´67 को किसानों को सबक सिखाने और जोतदार की मदद करने जब पुलिस पहुँची तो तीर-धनुष से लैस तीन हज़ार किसानों ने उसे घेर लिया। इस झड़प में कई लोग घायल हुए जिनमें पुलिस टुकड़ी के भी तीन आदमी थे। इनमें से इंस्पेक्टर सुनाम वांगदी की दो दिनों बाद अस्पताल में मौत हो गयी। विद्रोही किसानों को कुचलने के लिए उसी दिन, यानी 25 मई को पुलिस की एक बड़ी सशस्त्र टुकड़ी फिर गाँव में पहुँची। उस समय वहाँ किसान विद्रोह के पक्ष में स्त्रियों का एक जुलूस निकल रहा था, जिस पर पुलिस ने अन्धाधुन्ध फायरिंग की। इसमें सात स्त्रियों और दो बच्चों सहित दस लोग शहीद हो गये। इस घटना ने बारूद की ढेरी में पलीता लगाने का काम किया। देखते ही देखते पूरे नक्सलबाड़ी में विद्रोह की आग धधकने लगी। ज़मीन और फसल पर कब्ज़े की मुहिम तेज़ हो गयी। हज़ारों की तादाद में किसान जगह-जगह एकत्र होते थे, जोतदारों की ज़मीन पर झण्डे गाड़ते थे और ज़ालिम जोतदारों के घरों पर भी धावा बोलते थे। नक्सलबाड़ी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। 25 मई हत्याकाण्ड के विरोध में चाय बाग़ान मज़दूरों ने हड़ताल कर दी। सिलीगुड़ी में रेल और बिजली मज़दूरों का एक बड़ा जुलूस निकला। शिक्षक, छात्र और आम मध्यवर्ग के लोग भी सड़क पर उतरे। सत्तारूढ़ माकपाई संशोधनवादियों में बदहवासी का आलम था। राज्य के तत्कालीन भूमि और भू-राजस्व मन्त्री हरे कृष्ण कोनार एक और मन्त्री, भाकपा के विश्वनाथ मुखर्जी को साथ लेकर भागे-भागे सिलीगुड़ी पहुँचे। कोनार अभी हाल ही में वियतनाम से वर्ग संघर्ष के अनुभवों से “लैस” होकर लौटे थे! भूमि-प्रश्न के पुराने विशेषज्ञ थे। नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह की गम्भीर स्थिति से निपटने के लिए उनसे अधिक उपयुक्त व्यक्ति भला और कौन हो सकता था! कोनार सिलीगुड़ी पहुँचकर न तो दार्जीलिंग ज़िला कमेटी के लोगों से और न ही सिलीगुड़ी के किसान संगठनकर्ताओं से मिले। इसकी जगह सुखना फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में शीर्ष पुलिस अधिकारियों के साथ गुप्त बैठक करके वे लौट गये। उधर माकपा के राज्यस्तरीय नेताओं ने सिलीगुड़ी के कई दौरे किये और भूमिगत किसान नेताओं के आत्मसमर्पण की कोशिशें करते रहे। उनका तर्क वही पुराना था कि चूँकि वे अब मन्त्रीमण्डल में हैं, इसलिए आन्दोलन वापस ले लिये जाने पर किसानों की शिकायतें दूर कर दी जायेंगी। लेकिन कार्यकर्ताओं को संशोधनवादी नेतृत्व पर अब रत्ती भर भी भरोसा नहीं रह गया था। ग़ौरतलब है कि माकपा नेताओं ने किसानों की हत्या पर कोई भी शोक नहीं जतलाया। इसके उलट, प्रमोद दासगुप्त ने बयान दिया कि इंस्पेक्टर सुनाम वांगदी की हत्या की प्रतिक्रिया में पुलिस ने उक्त कार्रवाई की थी।

आन्दोलन वापस लिये जाने की सरकारी कोशिशों की विफलता के बाद एक पखवारे का समय भी न बीता था कि राज्य पुलिस और केन्द्र सरकार के अर्द्धसैनिक बलों ने नक्सलबाड़ी में प्रचण्ड दमन चक्र की शुरुआत कर दी। दो हज़ार से भी कुछ अधिक लोग गिरफ़्तार कर लिये गये। फिर भी कानू सान्याल और जंगल सन्थाल सहित कुछ नेतृत्वकारी संगठनकर्ता भूमिगत रहकर संघर्ष को जारी रखने की कोशिश करते रहे। जंगल सन्थाल कुछ महीनों बाद गिरफ़्तार हुए। कानू सान्याल डेढ़ वर्ष बाद गिरफ़्तार किये जा सके। पूरे इलाके में आतंक-राज कायम किये जाने के बावजूद, इस किसान उभार को कुचलने में सरकार को तीन महीने से भी कुछ अधिक समय लग गया।

इस जन-विद्रोह ने नक्सलबाड़ी के किसानों की क्रान्तिकारी पहलकदमी और सर्जनात्मकता को निर्बन्ध कर दिया। `नक्सलबाड़ी कृषक समिति´ द्वारा निर्धारित फ़ौरी कार्यक्रम को लागू करते हुए किसानों ने जोतदारों के कब्ज़े की ज़मीन को अपने कब्ज़े में लेकर किसान समितियों के माध्यम से उसका पुनर्वितरण शुरू कर दिया। भू-स्वामित्व सम्बन्धी पुराने सरकारी काग़ज़ात और क़र्ज़ सम्बन्धी काग़ज़ात को सार्वजनिक सभाओं में जला दिया गया। जोतदारों और सूदखोरों के कर्जों को रद्द कर दिया गया और क़र्ज़ के एवज में गिरवी पड़ी ज़मीनें व अन्य सामान किसानों को वापस कर दिये गये। जोतदारों द्वारा जमा किया गया अनाज और किसानों से ज़ब्त किये गये हल-बैल और अन्य सामान ज़ब्त करके उन्हें किसानों में बाँट दिया गया। ज़ालिम जोतदारों, उनकी मदद करने वाले गुण्डों और सूदखोरों पर किसान समितियों ने खुली अदालतें लगाकर सज़ाएँ सुनायीं और उन्हें तामील किया। कुछ मामलों में मृत्युदण्ड भी दिये गये। बुर्जुआ कोर्ट-कानून-प्रशासन की मान्यता को ख़ारिज करते हुए किसान समितियों ने घोषित किया कि केन्द्रीय और इलाकाई क्रान्तिकारी कमेटियों के निर्णय ही कानून होंगे। गाँवों के आम प्रशासन – चौकीदारी, आपसी विवाद के निपटारे, स्कूलों की व्यवस्था आदि कामों को भी किसान समितियों ने अपने हाथों में लेने की घोषणा कर दी। जोतदारों के प्रतिरोध का किसानों ने हथियारबन्द होकर मुकाबला किया और इन कामों की शुरुआत की। लेकिन यह प्रक्रिया बहुत दिनों तक जारी नहीं रह सकी और बहुत आगे तक नहीं जा सकी। राज्य और केन्द्र के पुलिस बलों ने जब दमन की सुसंगठित मुहिम चलाई और नेतृत्व के ज्यादातर लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया तो संघर्ष धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगा और बिखरने लगा। फिर भी सरकार को स्थिति पर पूरी तरह से नियन्त्रण स्थापित करने में सितम्बर माह तक का समय लग गया।

इस दौरान नक्सलबाड़ी पूरे देश में चर्चा का केन्द्रीय विषय बना रहा। देश के अख़बारों में नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह और उसके नेतृत्व की कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी राजनीति की ख़बरें प्रमुखता के साथ छपती रहीं। कैबिनेट सब-कमेटी ने नक्सलबाड़ी का दौरा किया। बुर्जुआ अर्थशास्त्री, राजनीतिक सिद्धान्तकार, पत्रकार, मार्क्सवादी व बुर्जुआ अकादमीशियन और सरकारी कम्युनिस्ट – सबकी कमोबेश एक ही राय थी कि यदि नक्सलबाड़ी जैसे विस्फोटों से और उनके सम्भावित “भयावह” नतीजों से बचना है तो बुर्जुआ भूमि-सुधारों की गति थोड़ी और तेज़ करनी होगी, भूमि हदबन्दी कानून को कम से कम कुछ हद तक प्रभावी बनाना होगा, किसानों के मालिकाने के सवाल के बुर्जुआ हल की दिशा में कुछ प्रभावी कदम उठाने होंगे और भूमिहीनों में ज़मीन वितरण के कुछ बुर्जुआ सुधारवादी कार्यक्रम सरकारी-ग़ैरसरकारी स्तर पर हाथ में लेने होंगे। यह वह समय था जब भारतीय पूँजीपति वर्ग राष्ट्रीय बाज़ार के दायरे और पहुँच-पकड़ के विस्तार के लिए गाँवों में प्राक्पूँजीवादी सम्बन्धों को बदलने की प्रक्रिया में ऊपर से, और क्रमिक परिवर्तन के “प्रशियाई मार्ग” पर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा था। देश के कुछ हिस्सों में उभरे कुलकों-फार्मरों की प्रेशर-लॉबियाँ कांग्रेस पर इसके लिए दबाव भी बना रही थीं। इधर साम्राज्यवादी भी सीधे “सहायता” और अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों के ज़रिये भारत सहित तीसरी दुनिया के अधिकांश महत्त्वपूर्ण देशों में गाँवों में पूँजीवादी विकास करके कृषि में पूँजी निवेश का स्कोप बढ़ाना चाह रहे थे और इसलिए “हरित क्रान्ति” मार्का कृषि-नीतियों पर अमल के लिए वे भारत, इण्डोनेशिया, मलयेशिया, फिलिप्पींस, श्रीलंका आदि देशों के बुर्जुआ वर्ग को पूरी मदद देने के लिए तत्पर थे। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में साम्राज्यवादियों और भारतीय पूँजीपति वर्ग के अपने वर्ग-हितों के तकाज़े से, पहले से ही जारी भूमि सम्बन्धों के क्रमिक पूँजीवादी रूपातरण की प्रक्रिया एक नये दौर में प्रवेश कर रही थी। नक्सलबाड़ी किसान-उभार ने इस प्रक्रिया को और तेज़ करने और सुव्यवस्थित ढंग से बुर्जुआ भूमि-सुधार को लागू करने के लिए भारतीय शासक वर्ग पर दबाव बनाया जिसके चलते भारतीय समाज के पूँजीवादी रूपान्तरण की प्रक्रिया तेज़ हो गयी, देश के जिन हिस्सों में अभी भी भूमि सम्बन्धों की प्रकृति मुख्यत: प्राक्पूँजीवादी थी, या जहाँ अभी भी प्राक्पूँजीवादी अवशेष बहुत अधिक थे, या फिर जहाँ एक संक्रमणशील पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था मौजूद थी, उन सभी हिस्सों में पूँजीवादी संक्रमण की गति तेज़ हो गयी। सत्तर के दशक में ही देश के अधिकांश हिस्से में गाँवों में पूँजीवादी वर्गीय संरचना और पूँजीवादी ध्रुवीकरण की स्थिति एकदम स्पष्ट हो चुकी थी। नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के तत्काल बाद, जयप्रकाश नारायण ने विनोबा के सर्वोदय, भूदान, ग्रामदान में कूदकर उसमें जान डालने की पूरी कोशिश की। यह अनायास नहीं कि मुशहरी (बिहार) में और देश के अन्य “नक्सल प्रभावित” इलाकों और भूमि-संघर्ष के सम्भावना सम्पन्न क्षेत्रों में ही जयप्रकाश नारायण ने डेरा डालकर ताकत लगाने का काम किया था और वर्ग संघर्ष की आग पर ठण्डे पानी के छींटे डालने का काम किया था। बंगाल में बरगादारों के पंजीकरण के द्वारा ज़मीन के मालिकाने को आंशिक ढंग से और बुर्जुआ रास्ते से हल करके माकपा के नेतृत्व वाली वाम सरकार ने गाँवों में पूँजीवादी विकास की राह बनाने का वही काम किया जो प्रशा के बिस्मार्क ने और ज़ार के मन्त्री स्तालिपिन ने किया था। इससे भूमि संघर्षों का तनाव विघटित हो गया और गाँवों में वर्ग-सम्बन्धों में बदलाव के साथ ही बंगाल के गाँवों में नये पैदा हुए निरंकुश कुलकों में माकपा का नया सामाजिक आधार तैयार हुआ। कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि नक्सलबाड़ी किसान-उभार का एक महत्त्वपूर्ण अनुवर्ती प्रभाव और उपजात (बाई प्रोडक्ट) यह था कि बुर्जुआ भूमि सुधार की गति तेज़ करने के लिए भारतीय शासक वर्ग पर एक दबाव निर्मित हुआ और भारतीय समाज के पूँजीवादीकरण की प्रक्रिया मुकम्मल होने की समयाविध सिकुड़कर थोड़ी और छोटी हो गयी। बहरहाल, नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह का यह लक्ष्य नहीं बल्कि वस्तुगत प्रभाव था। लेकिन इस प्रभाव ने भी वस्तुगत तौर पर समाज-विकास की गति पर प्रगतिशील प्रभाव ही छोड़ा। पूँजीवादी वर्ग-सम्बन्धों के स्पष्ट और तीव्र होने के साथ ही यह समझना और तय कर पाना अधिक आसान हो गया कि भारतीय क्रान्ति की प्रकृति अब राष्ट्रीय जनवादी न होकर समाजवादी ही होगी।

पर जैसाकि ऊपर कहा गया है, उपरोक्त प्रक्रिया नक्सलबाड़ी का उपजात, अनुवर्ती प्रभाव था। यह एक ऐतिहासिक जनविद्रोह का शासक वर्ग की नीतियों पर पड़ने वाला प्रभाव था। देश के एक सुदूर छोटे-से अंचल के जनउभार ने शासक वर्ग को सोचने के लिए विवश ही इसलिए किया कि इसमें निहित क्रान्तिकारी सम्भावनाएँ स्पष्ट थीं। नक्सलबाड़ी किसान-उभार के दमन और बिखराव के बावजूद, पूरे देश के कम्युनिस्ट आन्दोलन पर उसका जो प्रभाव पड़ा, उसने इस बात को और अधिक स्पष्ट कर दिया। नक्सलबाड़ी कोई स्वयंस्फूर्त किसान-विद्रोह नहीं था। उसके पीछे ऐसे उदीयमान कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तत्त्व सक्रिय थे जो संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद करके नयी क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन के लिए संकल्पबद्ध हो चुके थे। इन कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तत्त्वों को ख्रुश्चेवी संशोधनवाद के विरुद्ध चीन की पार्टी द्वारा चलायी गयी `महान बहस´ से विचारधारात्मक दिशा मिली थी और 1966 से चीन में पार्टी और राज्य के पूँजीवादी पथगामियों के विरुद्ध शुरू हुई `महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति´ ने उन्हें यह राह सुझायी थी कि पार्टी के नेतृत्व पर हावी संशोधनवादियों के विरुद्ध विद्रोह करके नये क्रान्तिकारी केन्द्र की स्थापना ही एकमात्र उचित और सही रास्ता है। अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में जारी विचारधारात्मक बहस में पक्ष न लेने वाले मध्यमार्गियों का संशोधनवादी चरित्र माकपा के गठन और उसके बाद नेतृत्व द्वारा उठाये गये कदमों से काफी हद तक साफ़ हो चुका था। नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के प्रति उनके रुख़ ने उन्हें एकदम नंगा कर दिया। यही कारण था कि नक्सलबाड़ी के तुरन्त बाद, पूरे देश में माकपा के भीतर कतारों में विद्रोह की लहर फैल गयी। पराजय के बावजूद, नक्सलबाड़ी ने ऐतिहासिक मूल्यांकन की दृष्टि से महान उपलब्धि हासिल की। देश के एक गुमनाम से ग्रामीण अंचल ने इतिहास को इस तरह प्रभावित किया कि वह क्रान्तिकारी कम्युनिज्म की धारा का एक प्रतीक और एक प्रस्थान-बिन्दु बन गया। लगभग अठारह वर्षों तक संसदवाद के पंककुण्ड में दबे रहने के बाद तेलंगाना की स्पिरिट और परम्परा फिर से नक्सलबाड़ी में उभर आयी और पूरे देश में फैल गयी। आगे चलकर, विचारधारात्मक कमज़ोरी और उससे पैदा हुए विविध नकारात्मक पक्षों के चलते नक्सलबाड़ी से उत्पन्न हुई राजनीति भारतीय क्रान्ति की नेतृत्वकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन तथा क्रान्ति के अग्रवर्ती विकास के रूप में भले ही आगे न बढ़ सकी हो, नक्सलबाड़ी से पैदा हुई क्रान्तिकारी वाम की धारा आगे चलकर भले ही फूट और विघटन का शिकार हो गयी हो, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उस समय हावी संसदीय जड़वामनवाद पर नक्सलबाड़ी ने जो निर्णायक प्रभावी चोट की, उसका भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास में हरदम महत्त्व बना रहेगा। नक्सलबाड़ी के कुछ और पहलुओं को समेटते हुए सांगोपांग समाहार से पहले यह ज़रूरी है कि नक्सलबाड़ी किसान-उभार के तुरन्त बाद वाम राजनीति के दायरे के घटना-प्रवाह पर चर्चा कर ली जाये।

जैसाकि चारु मजूमदार ने 11 नवम्बर 1967 को शहीद मीनार मैदान में हुई जनसभा में अपने भाषण में स्वयं स्वीकार किया था, नक्सलबाड़ी के नेता वे नहीं बल्कि कानू सान्याल, जंगल सन्थाल, कदम मल्लिक और खोकन मजूमदार आदि स्थानीय संगठनकर्ता थे। ऊपर यह चर्चा की जा चुकी है कि अपने आठ दस्तावेज़ों की श्रँखला में चारु मजूमदार ने भूमि-क्रान्ति की शुरुआत जनदिशा के बजाय “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के आधार पर करने का जो प्रस्ताव रखा था, उसे ठुकराकर नक्सलबाड़ी का निर्माण हुआ था। नक्सलबाड़ी किसान-उभार वास्तव में क्रान्तिकारी जनदिशा का सत्यापन और “वाम” दुस्साहसवाद का मूर्त नकार था। लेकिन यह कहना ग़लत होगा कि इसमें चारु और उनके आठ दस्तावेज़ों की कोई भूमिका ही नहीं थी, क्योंकि `आठ दस्तावेज़´ के दो पहलू थे। उसका अहम पहलू यह था कि उसने संशोधनवाद और संसदीय जड़वामनवाद पर निर्णायक चोट करते हुए एक सर्वभारतीय क्रान्तिकारी पार्टी के पुनर्निर्माण और पुनर्गठन का स्पष्ट प्रस्ताव एजेण्डे पर उपस्थित किया। उसका नकारात्मक पक्ष यह था कि उसने भारतीय आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक संरचना का अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल के निर्धारण के बजाय, न केवल चीनी क्रान्ति के कार्यक्रम व मार्ग के अन्धानुकरण का नारा दिया बल्कि सभी प्रकार की जनकार्रवाइयों, जनसंगठनों के महत्त्व को रद्द करते हुए और आर्थिक संघर्षों के साथ ही राजनीतिक शिक्षा एवं प्रचार के महत्त्व को भी नकारते हुए छापामार किसान संघर्ष को सशस्त्र गुप्त दस्तों के `ऐक्शन´ का समानार्थक बनाकर प्रस्तुत किया। नक्सलबाड़ी के नेतृत्व ने इस दूसरे पहलू को ख़ारिज किया, लेकिन पहला पहलू उसका विचारधारात्मक-राजनीतिक आधार बना। कानू सान्याल आदि संगठनकर्ता भी जेल में रहने के दौरान माकपा नेतृत्व के संशोधनवाद के विरुद्ध राजनीतिक तौर पर स्वयं को तैयार कर चुके थे, लेकिन उसके विरुद्ध दस्तावेज़ों की श्रँखला लिखने, उसे कतारों तक ले जाने की कोशिश करने और कानू आदि के जेल से बाहर आने के बाद `आठ दस्तावेज़´ के रूप में माकपा नेतृत्व के विरुद्ध विद्रोह की कार्रवाई का सैद्धान्तिक आधार मुहैया करने का काम तो चारु मजूमदार ने ही किया। यानी एक ओर यदि यह कहना ग़लत है कि नक्सलबाड़ी किसान उभार के नेता और निर्माता चारु थे, वहीं यह तो स्वीकारना ही होगा कि उसका विचारधारात्मक आधार तैयार करने में चारु की बुनियादी रूप से एक अहम भूमिका थी। कहा जा सकता है कि माकपा-राजनीति से निर्णायक विच्छेद करने में चारु की भूमिका निर्णायक थी। चारु नहीं होते तो मुमकिन था कि नक्सलबाड़ी संघर्ष साठ के दशक में उस इलाके में कम्युनिस्ट नेतृत्व में चले बहुतेरे रैडिकल आर्थिक और जनवादी (या संकुचित सीमा वाले राजनीतिक) माँगों पर चलने वाले जन संघर्षों की ही अगली कड़ी बनकर रह जाता। चारु की संशोधनवाद-विरोधी संघर्ष की निर्णायकता के पीछे कहीं एक “वाम” दुस्साहसवादी का निम्न-बुर्जुआ अधैर्य हो सकता है (क्योंकि उनकी “वाम’ दुस्साहसवादी लाइन आद्यन्त सुसंगत थी), लेकिन उस समय तो उस निर्णायकता का सकारात्मक पहलू ही प्रभावी था। कहा जा सकता है कि नक्सलबाड़ी के बाद के दौर में क्रान्तिकारी वाम राजनीति के गतिरोध, पराभव और विघटन के लिए चारु की “वामपन्थी” आतंकवादी लाइन ही ज़िम्मेदार बनी, लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि चारु नहीं होते तो नक्सलबाड़ी किसान-उभार शायद क्रान्तिकारी वाम राजनीति का एक प्रस्थान बिन्दु और प्रतीक-चिन्ह नहीं बन पाता। प्रसिद्ध उक्ति है कि संशोधनवाद करने के पाप का दण्ड मज़दूर आन्दोलन “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के रूप में भुगतता है। भारत में भी 18 वर्षों के संशोधनवादी दौर के बाद पेण्डुलम का सिरा दूसरे सिरे तक जाने का अन्देशा था और इतिहास की इस द्वन्द्वात्मक विडम्बना का व्यंग्य शायद यह होना था कि संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद की प्रक्रिया में एक ऐसे व्यक्ति को इतिहास के एक नायक का दर्जा हासिल करना था, जिसकी विचारधारात्मक-राजनीतिक क्षमता नेतृत्वकारी स्तर तक की कदापि नहीं थी और जो अधैर्यशील, आदर्शवादी, भावुक निम्न-बुर्जुआ क्रान्तिकारिता से ग्रस्त था। चारु के समस्त उपलब्ध राजनीतिक लेखन के आधार पर यह कहना ग़लत नहीं होगा।

नक्सलबाड़ी की घटना के क्रान्तिकारी प्रतीक-चिन्ह बनने में जहाँ एक सकारात्मक पक्ष है, वहीं एक नकारात्मक पक्ष भी है। नक्सलबाड़ी किसान-उभार के बाद, पूरे देश की कम्युनिस्ट कतारों में संशोधनवाद के विरुद्ध विद्रोह की एक लहर फैल गयी। पूरे देश में माकपा की क्रान्तिकारी कतारें विद्रोह करने लगीं। अनुभवसंगत धरातल पर माकपा के संशोधनवाद के विरुद्ध जो शंका, अविश्वास और बेचैनी की भावना थी, उसे नक्सलबाड़ी ने विद्रोह की दिशा देकर तरल परिस्थिति को अवक्षेपित कर दिया। देश के विभिन्न राज्यों में क्रान्तिकारी पक्ष के जो नेतृत्वकारी संगठनकर्ता थे, वे तो `महान बहस´, चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति और माकपाई मध्यमार्ग की विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु से कमोबेश वाकिफ थे, लेकिन आम कतारों के लिए संशोधनवाद और क्रान्तिकारी मार्ग के बीच फैसला करने का एकमात्र सीधा-सादा पैमाना बस यह बन गया कि कोई व्यक्ति नक्सलबाड़ी के पक्ष में है या विपक्ष में। इससे कतारों का ध्रुवीकरण तो तेज़ गति से हुआ, लेकिन ऐसे किसी भी विचारधारात्मक संघर्ष की सुदीर्घ प्रक्रिया में कतारों की जो विचारधारात्मक-राजनीतिक शिक्षा होती है और सांगठनिक सुदृढ़ीकरण से पूर्व विचारधारात्मक- राजनीतिक सुदृढ़ीकरण की जो आवश्यक प्रक्रिया होती है, वह नहीं हुई। अपनी विचारधारात्मक-राजनीतिक कमज़ोरी के चलते क्रान्तिकारी नेतृत्व ने इस पर कोई बल भी नहीं दिया। यह भी एक कारण था कि आगे चलकर कतारें आसानी से “वामपन्थी” दुस्साहसवाद की लहर में बह गयीं और अपनी पारी में, “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन ने कतारों की विचारधारात्मक-राजनीतिक सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया के आगे बढ़ने की रही-सही सम्भावना का गला भी घोंट दिया। कल्पना करें, यदि 1967 में नक्सलबाड़ी की घटना नहीं घटित हुई होती। तब क्या भारत में मार्क्सवादी-लेनिनवादी धारा पैदा ही नहीं होती? ऐसा नहीं था। आठ दस्तावेज़ों का लेखन, `चिन्ता´ ग्रुप का संशोधनवाद-विरोधी संघर्ष और माकपा के भीतर संशोधनवादी नेतृत्व के विरुद्ध कतारों के असन्तोष और संशोधनवाद- विरोधी धड़ेबन्दियों की विविध रूपों में नक्सलबाड़ी विद्रोह से पहले के दौर में मौजूदगी इस बात का संकेत देती हैं कि उस स्थिति में संशोधनवाद के विरुद्ध लम्बा विचारधारात्मक संघर्ष चलता जो अपनी तार्किक परिणति तक पहुँचकर किसी वैकल्पिक क्रान्तिकारी नेतृत्वकारी केन्द्र को जन्म देता। ग़ौरतलब है कि एशिया, अफ़्रीका और लातिन अमेरिका के बहुतेरे देशों में (और यूरोप-अमेरिका में भी) साठ के दशक में `महान बहस´ और चीन की महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति से विचारधारात्मक मार्गदर्शन प्राप्त करके क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कतारों ने ख्रुश्चेवी संशोधनवादी नेतृत्व से विद्रोह करके मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टियों एवं संगठनों का गठन किया था। भारत में भी ऐसा ही होता, इसी की सम्भावना अधिक थी और उस स्थिति में लम्बे विचारधारात्मक संघर्ष के दौरान कतारों की राजनीतिक शिक्षा और सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया बेहतर ढंग से चलती। यानी नक्सलबाड़ी ने संशोधनवाद से विच्छेद और ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तीव्र और संक्षिप्त बना दिया, लेकिन इस तीव्रता और संक्षिप्तता ने दो लाइनों के सघन-सुदीर्घ संघर्ष की प्रक्रिया के दौरान होने वाले कतारों के विचारधारात्मक-राजनीतिक सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव छोड़ा। आज वस्तुगत तौर पर, भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन का जो इतिहास हमारे सामने है, उसमें नक्सलबाड़ी एक मील के पत्थर का स्थान रखता है, लेकिन उसी से जुड़ा हुआ जो अन्तर्निहित दूसरा पहलू है, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। उसकी अनदेखी करके नक्सलबाड़ी की गौरवशाली क्रान्तिकारी परम्परा का पुनरुज्जीवन और विस्तार तो कतई सम्भव नहीं है, भावविन्हल परम्परा-पूजा का अनुष्ठान भले ही सम्पन्न कर लिया जाये।

नक्सलबाड़ी के ऐतिहासिक मूल्यांकन से ही जुड़ा एक और पहलू है, जिस पर यहाँ चर्चा ज़रूरी है क्योंकि चार दशक बाद पश्चदृष्टि से देखने पर चीज़ें आज अधिक साफ़ दीखती हैं। नक्सलबाड़ी उत्तर-औपनिवेशिक काल के एक ऐसे दौर में हुआ, जब पूरा भारत असमान रूप से एक संक्रमण से गुज़रते हुए एक लम्बी संक्रमण-अवधि के कमोबेश मध्यबिन्दु पर खड़ा था। सत्तारूढ़ भारतीय पूँजीपति वर्ग विगत दो दशक से बुर्जुआ सत्ता का सुदृढ़ीकरण करते हुए अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर तथा आयात-प्रतिस्थापन की नीतियों को लागू करते हुए अपने औद्योगिक-वित्तीय आधार का विस्तार कर रहा था और साथ ही वह गाँवों को पूँजीवादी राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी में समेट लेने के लिए भूमि सम्बन्धों को भी, ऊपर से, बुर्जुआ क्रमिक भूमि सुधार की नीतियों को लागू करते हुए, बदलने के लिए चेष्टाशील था। यह प्रक्रिया पूरे देश में असमान रूप से जारी थी। जैसे, जम्मू-कश्मीर में सापेक्षत: सर्वाधिक रैडिकल भूमि-सुधार सबसे पहले हुए। साठ के दशक के मध्य तक स्थिति यह थी कि पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में पूँजीवादी खेती की प्रवृत्ति ज़ोर पकड़ चुकी थी और कुलक वर्ग शक्तिशाली बन चुका था। देश के कई क्षेत्रों में सामन्ती भूस्वामियों की मौजूदगी के साथ ही उन्हीं के बीच से कुछ पूँजीवादी भूस्वामी भी पैदा हो चुके थे और बड़े काश्तकारों के बीच से कुछ कुलक भी पैदा हो चुके थे। कुछ क्षेत्रों में सामन्ती अवशेष ज्यादा थे, कुछ में कम थे, कुछ पिछड़ी हुई किसानी अर्थव्यवस्था की संक्रमणशील अवस्था में थे और कहीं अर्द्धसामन्ती भूमि सम्बन्धों का पहलू ही अभी प्रधान था। बंगाल, बिहार, उड़ीसा जैसे राज्यों में उस समय, या तो अर्द्धसामन्ती भूमि-सम्बन्धों की प्रधानता थी या मज़बूत सामन्ती अवशेष मौजूद थे। बंगाल में जब तक बरगादारों के पंजीकरण के द्वारा मालिकाने का सवाल आंशिक तौर पर हल नहीं हुआ था। जब तक भूमि-सम्बन्धों का अर्द्धसामन्ती स्वरूप मुख्यत: कायम था। नक्सलबाड़ी किसान-उभार ऐसे ही समय में हुआ। पूरे देश के क्रान्तिकारी कतारों को नक्सलबाड़ी टाइप भूमि-संघर्ष विकसित करने का नारा दिया गया। इस नारे की पहली विसंगति तो यही थी कि यह नक्सलबाड़ी की संशोधनवाद- विरोधी विचारधारात्मक विरासत की जगह नक्सलबाड़ी के रास्ते को ही पूरे भारत के लिए सामान्य बनाकर प्रस्तुत कर रहा था और विचारधारा और कार्यक्रम के प्रश्न को परस्पर गड्डमड्ड कर रहा था। उस पर से अतिरिक्त बात यह कि जब यह नारा दिया जा रहा था, उस समय नक्सलबाड़ी का लेबुल लगाकर वस्तुत: “वामपन्थी” आतंकवाद की लाइन बेची जा रही थी। लेकिन हम कहना यह चाहते हैं कि यदि पूरे देश में नक्सलबाड़ी की क्रान्तिकारी जनदिशा वास्तव में लागू भी की जाती तो सफ़ल नहीं होती। देश के जिन हिस्सों में पूँजीवादी भूमि-सम्बन्ध विकसित हो चुके थे और जहाँ संक्रमणशील अवस्था थी, वहाँ न तो चार वर्गों के रणनीतिक संश्रय के आधार पर भूमि-क्रान्ति को लागू कर पाना सम्भव था, न ही छापामार संघर्ष का विकास और आधार-क्षेत्र का निर्माण सम्भव था। पूरे देश की स्थिति उस समय भी ऐसी नहीं रह गयी थी कि देहातों में मुक्त क्षेत्र का निर्माण करके गाँवों से शहरों को घेरते हुए दीर्घकालिक लोकयुद्ध की सामरिक रणनीति को अमल में लाया जा सके। अर्द्धसामन्ती-अर्द्धऔपनिवेशिक चीन से भिन्न उत्तर- औपनिवेशिक दौर के भारत में एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता थी जिसके सामाजिक अवलम्ब व्यापक थे, अधिक विकसित राज्यसत्ता, सैन्यतन्त्र, और संचार-यातायात व्यवस्था थी। यहाँ न तो चीन जैसी स्थिति थी, न ही वियतनाम, कम्बोडिया और सैन्य तानाशाही वाले लातिन अमेरिकी देशों जैसी स्थिति थी। एक समस्या यह भी थी कि चीन की पार्टी के 1963 के विश्व सर्वहारा क्रान्ति की आम दिशा-विषयक दस्तावेज़ में या लिन प्याओ के 1965 के लेख `लोकयुद्ध की विजय अमर रहे´ में तीसरी दुनिया के देशों में लोक जनवादी क्रान्ति का जो आम सूत्रीकरण दिया था, वह एशिया, अफ़्रीका, लातिन अमेरिका के अधिकांश उपनिवेशों और नवउपनिवेशों के लिए तो ठीक था, (और आम तौर पर उस समय सही था) पर उसके फ्रेमवर्क या स्कीम में भारत, मिश्र, इण्डोनेशिया, मलाया, आदि ऐसे नवस्वाधीन देश पूरी तरह से फ़िट नहीं होते थे जहाँ पूँजीवादी संक्रमण की प्रक्रिया जारी थी। चीन की पार्टी द्वारा भारतीय बड़े पूँजीपति वर्ग को दलाल और भारत को नवउपनिवेश मानने का सूत्रीकरण भी सच्चाई से मेल नहीं खाता था। समस्या यह थी कि उत्तर औपनिवेशिक समाजों के परिवर्तनशील यथार्थ की गतिकी को पकड़ने की बजाय उसे औपनिवेशिक दौर की निरन्तरता मानकर चलने की प्रवृत्ति अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में हावी रही थी और चीन की पार्टी के भारत-विषयक सूत्रीकरण भी इस दोष से मुक्त नहीं थे। समस्या यह भी थी कि बिस्मार्ककालीन प्रशा, जारकालीन रूस या कमाल अतातुर्ककालीन तुर्की की स्थितियों से अलग एक उत्तरऔपनिवेशिक समाज में सत्तारूढ़ बुर्जुआ वर्ग (जो साम्राज्यवाद का कनिष्ठ साझीदार था लेकिन राज्यसत्ता का स्वामी था और सीमित बुर्जुआ जनवाद को अमल में ला रहा था), पहली बार बुर्जुआ भूमि-सुधार की वैसी ही नीतियाँ लागू कर रहा था, इसलिए इसे पुराने फ्रेमवर्क को तोड़कर ही समझा जा सकता था, जो नहीं हुआ। बहरहाल, मूल प्रसंग पर लौटते हुए, हम कहना यह चाहते हैं कि यदि नक्सलबाड़ी टाइप संघर्ष का मॉडल पूरे देश में वास्तव में लागू करने की कोशिश भी होती, यदि जनदिशा लागू भी होती, तो भी, 1967-70 में पूरे देश में ऐसी परिस्थितियाँ नहीं थीं कि कोई सफलता मिल पाती। ज्यादा से ज्यादा, देश के अर्द्धसामन्ती भूमि-सम्बन्धों वाले इलाकों में, मज़बूत सामन्ती अवशेषों वाले इलाकों में ही ऐसा हो पाता और उसकी तार्किक परिणति महज़ इसी रूप में सामने आती कि बुर्जुआ वर्ग उन क्षेत्रों में बुर्जुआ भूमि सुधारों की गति तेज़ कर देता। यह अनायास नहीं है कि आगे चलकर जिन मा-ले संगठनों ने क्रान्तिकारी जनदिशा के आधार पर लोक जनवादी कार्यक्रम को लागू करने की कोशिश की भी, वे सफल नहीं हो सके और लम्बे गतिरोध की परिणति के तौर पर आज वे संगठन मालिक किसानों के लाभकारी मूल्य और लागत मूल्य की कमी की वर्गीय माँगों को लेकर लड़ने वाले मार्क्सवादी नरोदवादी बन चुके हैं। तात्पर्य यह कि 1967-70 में भी नक्सलबाड़ी पूरे देश के लिए एक सार्विक परिघटना नहीं हो सकता था। यूँ कहें कि, यदि क्रान्तिकारी जनदिशा लागू भी होती तो नक्सलबाड़ी के रास्ते की राष्ट्रव्यापी सफलता 1967 में सन्दिग्ध थी और इसलिए नक्सलबाड़ी भी बहुत दिनों तक टिका नहीं रह पाता। नक्सलबाड़ी के बाद गठित कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी यदि अध्ययन और प्रयोग के आधार पर भारतीय क्रान्ति के कार्यक्रम के निर्धारण के अपने काम को पूरा करने में कोताही नहीं बरतती तो क्रान्तिकारी जनसंघर्ष निरन्तरता की प्रक्रिया में ही अपनी कार्यक्रममूलक दिशा बदल लेते। लेकिन उस स्थिति में भी, नक्सलबाड़ी किसान-उभार का ऐतिहासिक विचारधारात्मक महत्त्व संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद के मोड़-बिन्दु के रूप में अक्षुण्ण बना रहता।

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, नक्सलबाड़ी सशस्त्र किसान विद्रोह चारु मजूमदार की “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन पर सही क्रान्तिकारी लाइन की विजय पर आधारित था। लेकिन सत्ता के दमन के बाद, संघर्ष जब गतिरोध का शिकार हुआ तो जनदिशा को लागू करने वाले कानू सान्याल आदि नेतृत्व के लोगों ने विचारधारात्मक अपरिपक्वता के चलते स्वयं को विकल्पहीन और किंकर्त्तव्यविमूढ़ अवस्था में पाया। इस स्थिति में चारु मजूमदार ने अपनी आतंकवादी लाइन को फिर आगे बढ़ाया और नक्सलबाड़ी के नेतृत्व ने उसके आगे पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर दिया। आर्थिक संघर्षों के महत्त्व को पूरी तरह नकारने वाले चारु मजूमदार का कहना था कि नक्सलबाड़ी में किसान ज़मीन या किसी आर्थिक माँग के लिए नहीं लड़कर राज्यसत्ता के लिए लड़े थे। सितम्बर 1968 में कानू सान्याल ने नक्सलबाड़ी का सार-संकलन करते हुए `तराई क्षेत्र के किसान आन्दोलन पर रिपोर्ट´ नामक जो दस्तावेज़ लिखा, उसमें उन्होंने चारु की इसी स्थापना को दुहराया। पुन: 1974 में अपनी अवस्थिति बदलकर उन्होंने “वामपन्थी” दुस्साहसवाद की आलोचना करते हुए `मोर अबाउट नक्सलबाड़ी´ शीर्षक जो लेख लिखा उसमें यह लिखा कि भूमि क्रान्ति में ज़मीन और राज्यसत्ता के प्रश्न अन्तर्ग्रन्थित होते हैं और नक्सलबाड़ी में भी ऐसा ही था। यह न तो सैद्धान्तिक तौर पर सही है, न ही व्यावहारिक तौर पर ऐसा हुआ था। भूमि क्रान्ति के दौर में किसान ज़मीन के मालिकाने की माँग के लिए अपना संघर्ष शुरू करते हैं। पार्टी इस बात का लगातार प्रचार करती है कि इस प्रश्न को राज्यसत्ता के साथ संघर्ष करके ही हल किया जा सकता है। किसान पार्टी नेतृत्व में जब ज़मीन और फसल पर कब्ज़े की मुहिम चलाते हैं तो उन्हें ज़मींदारों और राज्यसत्ता के दमनतन्त्र का सामना करना पड़ता है, जिसका मुकाबला करने के लिए वे हथियारबन्द होते हैं( स्वयंसेवक दस्ते जनमिलिशिया और छापामार दस्ते बनाते हैं और संघर्ष क्रमश: इलाकावार सत्ता दख़ल की मंज़िल तक विकसित होता है। इस प्रक्रिया में ज़मीन का सवाल आगे बढ़कर राज्यसत्ता का सवाल बन जाता है। नक्सलबाड़ी में भी यही प्रक्रिया जारी थी, जिसे कानू सान्याल ने न तो 1967 में समझा और न ही 1974 में समझा। 1974 में “वामपन्थी” आतंकवाद की आलोचना करते हुए दक्षिणपन्थी अवसरवादी भटकाव के दूसरे छोर पर जा खड़े हुए थे, जिसकी चर्चा इस लेख में आगे की जायेगी। तराई किसान रिपोर्ट में उन्होंने किसान सम्मेलन द्वारा निर्धारित “दस महान कार्यों” को पूरा करने में नेतृत्व देने में निम्न-पूँजीवादी भटकावग्रस्त नेतृत्व की विफलता, नेतृत्व का जनता में भरोसा न होने, एक शक्तिशाली जनाधार के अभाव, एक मज़बूत पार्टी ढाँचे के अभाव, राजनीतिक सत्ता की स्थापना और क्रान्तिकारी भूमि-सुधार के बारे में रूपवादी पहुँच और पुरानी संशोधनवादी सोच के असर तथा सामरिक मामलों की ग़ैरजानकारी को नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह की विफलता के लिए ज़िम्मेदार बताया था। वास्तव में यह एक सतही, रूपवादी और सार-संग्रहवादी समाहार था। सच्चाई यह है कि नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह शुरू होने से पहले नेतृत्व ने दूर की सोचकर कोई व्यवस्थित तैयारी की ही नहीं थी। किसानों की सशस्त्र प्रतिरक्षा आगे किस प्रकार छापामार दस्तों के निर्माण की अवस्था तक विकसित होगी और दमन की स्थिति में अपनी सशस्त्र शक्तियों को अन्य क्षेत्रों में किस प्रकार बिखराया जायेगा, इसकी कोई योजना नहीं थी। निकटवर्ती जंगलों और पर्वतीय क्षेत्रों में पृष्ठभागीय आधार बनाने की कोई योजना नहीं थी। उल्लेखनीय है कि स्थिति को सँभालने के लिए, काफ़ी बाद में, 1968 में मिरिक के पहाड़ी इलाके में एक पृष्ठभागीय क्षेत्र विकसित करने की कोशिश की गयी जो सफल नहीं हुई। इससे भी अहम बात यह थी कि स्थितियाँ तब तक सँभालने लायक रह ही नहीं गयीं थी। और इससे भी अहम बात यह थी कि एक सुसंगठित कम्युनिस्ट पार्टी के अभाव में दीर्घकालिक लोकयुद्ध की परिस्थिति होने पर भी उसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। ऐसी स्थिति में यदि एक योग्य नेतृत्व होता तो कुछ समय तक संघर्ष को स्थगित या विलम्बित करने के लिए रणकौशलात्मक स्तर पर शत्रु से कुछ समझौते की राह भी चुन सकता था, पर बिना जनता के बीच गहन राजनीतिक प्रचार और तैयारी के, यदि यह किया जाता तो निरुत्साह और बिखराव पैदा होना लाज़िमी होता। नक्सलबाड़ी में भी यही स्थिति थी।

इन्हीं परिस्थितियों में नक्सलबाड़ी के नेतृत्व ने चारु की लाइन के आगे पूरी तरह से घुटने टेक दिये। तराई रिपोर्ट में कानू सान्याल ने नक्सलबाड़ी के पूर्व चारु की लाइन और जनदिशा के बीच के संघर्ष और चतरहाट-इस्लामपुर प्रसंग की कोई चर्चा नहीं की है और विशेष तौर पर नक्सलबाड़ी संघर्ष में चारु के योग्य नेतृत्व की भूमिका को रेखांकित किया है। इन तथ्यों का उल्लेख उन्होंने पहली बार 1974 में किया। विचारधारात्मक कमज़ोरी से जन्मी इस अवसरवादी आत्मसमर्पणकारी प्रवृत्ति ने “वामपन्थी” आतंकवाद के हावी होने में निश्चय ही काफ़ी मदद पहुँचायी। बहरहाल, नक्सलबाड़ी का ऐतिहासिक महत्त्व उस घटना की स्थानीयता में निहित नहीं था। मुख्य बात यह थी कि उसने संशोधनवाद से निर्णायक संघर्ष और रैडिकल विच्छेद तथा एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन की अनिवार्य आवश्यकता के सन्देश को पूरे देश की कम्युनिस्ट कतारों तक पहुँचा दिया था। कम्युनिस्ट कतारों में एक नये उत्साह और ऊर्जस्विता का संचार हो चुका था। संशोधनवादी बदहवास थे। बुर्जुआ वर्ग इस नयी लहर को गम्भीर चुनौती के रूप में देख रहा था।.…जारी

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-2

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निकट अतीत की पृष्ठभूमि : नक्सलबाड़ी-पूर्व दो दशकों के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन

नक्सलबाड़ी में क्रान्तिकारी किसान-उभार के ऐतिहासिक महत्त्व के वस्तुगत आकलन के लिए यह जानना ज़रूरी है कि भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में ये हालात क्यों और किस प्रकार तैयार हुए कि पश्चिम बंगाल के एक सुदूर तराई अंचल में स्थानीय कम्युनिस्ट संगठनकर्ताओं के नेतृत्व में किसानों का हथियारबन्द जन-विद्रोह शुरू हुआ (जो बमुश्किल तमाम सिर्फ़ ढाई माह तक ही चला) और उसके पक्ष-विपक्ष में पूरे देश का कम्युनिस्ट आन्दोलन बँट गया तथा वह घटना संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद का मानक, प्रस्थान-बिन्दु, रूपक और प्रतीक-चिन्ह बन गयी। नक्सलबाड़ी तेलंगाना के छूटे हुए सिरे को पकड़कर आगे विस्तार दे सकता था, पर ऐसा नहीं हो सका। कई रूपों में नक्सलबाड़ी के बाद, मा.ले. आन्दोलन की मुख्य धारा ने रणदिवे-कालीन “वामपन्थी” संकीर्णतावाद को ही और अधिक विकृत भोंडे़ रूप में दुहराया। मज़दूर आन्दोलन संशोधनवादी पाप की कीमत अतिवामपन्थी भटकाव के दण्ड के रूप में चुकाता है। लेनिन की इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए 17 वर्षो लम्बे संशोधनवादी दौर की प्रतिक्रिया नक्सलबाड़ी किसान उभार के दो वर्षो बाद “वामपन्थी” आतंकवाद के रूप में सामने आयी। लेकिन इन बातों को अहसास के गहरे धरातल पर जाकर समझने के लिए तेलंगाना किसान संघर्ष और उसके उत्तरवर्ती सत्रह वर्षो के पार्टी इतिहास की अति संक्षिप्त चर्चा यहाँ ज़रूरी है। नक्सलबाड़ी के ऐतिहासिक महत्त्व और उसकी ऐतिहासिक विफलता – इन दोनों को ही समझने के लिए यह चर्चा ज़रूरी है।

नक्सलबाड़ी स्वातन्त्रयोत्तर भारत के इतिहास के एक ऐसे दौर में हुआ जब नेहरू की पूँजीवादी नीतियों के समाजवादी मुखौटे की असलियत उजागर हो चुकी थी। महँगाई और बेरोज़गारी से त्रस्त आम लोग सड़कों पर उतर रहे थे। छात्र-युवा आन्दोलन, मज़दूर आन्दोलन और महँगाई-विरोधी जनान्दोलनों का अविराम क्रम जारी था। पूँजीवादी संसदीय राजनीति के दायरे के भीतर इस व्यापक मोहभंग और जनाक्रोश की अभिव्यक्ति 1967 के आम चुनावों के बाद, पहली बार देश के नौ राज्यों में ग़ैरकांग्रेसी सरकारों के गठन के रूप में सामने आयी। लेकिन अहम बात यह थी कि 1947 के बाद के वर्षो में और तेभागा-तेलंगाना-पुनप्रा-वायलार और नौसेना-विद्रोह के दिनों के बाद, पहली बार देशव्यापी स्तर पर जनसमुदाय में व्यवस्था-विरोधी भावनाएँ और क्रान्तिकारी परिवर्तन की आकांक्षाएँ उमड़-घुमड़ रही थीं जिन्हें दिशा और नेतृत्व देने वाली कोई क्रान्तिकारी शक्ति राजनीतिक रंगमंच पर मौजूद नहीं थी। स्मरणीय है कि यही वह समय था जब वियतनामी क्रान्ति अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध विजयोन्मुख थी और पूरी दुनिया में, यहाँ तक कि पश्चिमी देशों में भी छात्र-युवा, बुद्धिजीवी और मेहनतकश सड़कों पर उतरकर उसका समर्थन कर रहे थे। अफ़्रीकी देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष एक के बाद एक जीतें हासिल कर रहे थे और लातिन अमेरिका में भी सैनिक जुण्टाओं के विरुद्ध प्रतिरोध संघर्ष उफान पर थे। फ्रांस में छात्र आन्दोलन और अमेरिका में अश्वेतों, स्त्रियों और युवाओं के आन्दोलनों तथा युद्ध-विरोधी आन्दोलन का अविराम सिलसिला जारी था। सोवियत संशोधनवाद के विरुद्ध चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलायी गयी `महान बहस´ के बाद, 1966 से चीन में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का तूफ़ान शुरू हो चुका था, जो न केवल पूरी दुनिया के मेहनतकशों और कम्युनिस्ट कतारों को संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष करने और क्रान्ति का मार्ग चुनने के लिए प्रेरित कर रहा था, बल्कि बड़े पैमाने पर युवाओं और बुद्धिजीवियों को भी माओ के विचारों और चीनी सांस्कृतिक क्रान्ति के युगान्तरकारी प्रयोग की ओर आकृष्ट कर रहा था। यह अन्तरराष्ट्रीय माहौल भारत की उन्नत चेतना वाली कम्युनिस्ट कतारों को और रैडिकल छात्रों-युवाओं-बुद्धिजीवियों को भी गहराई से प्रभावित और प्रेरित कर रहा था। इधर देश के भीतर, संशोधनवादी नेतृत्व से कम्युनिस्ट कतारों का मोहभंग निराशा से आगे बढ़कर आक्रोश और विद्रोह की भावना में परिणत होता जा रहा था। 1964 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद नेतृत्व के एक हिस्से को संशोधनवादी घोषित करते हुए दूसरे हिस्से ने जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का गठन किया था तो रैडिकल कतारों का बहुलांश उसमें इस उम्मीद से शामिल हुआ था कि नयी पार्टी तेलंगाना की विरासत को आगे बढ़ाते हुए क्रान्तिकारी संघर्षो में उतरेगी, लेकिन जल्दी ही यह स्पष्ट होने लगा कि अपने तमाम भ्रामक रैडिकल तेवर के बावजूद माकपा के नेतृत्व भी अर्थवादी-संसदवादी सीमाओं का अतिक्रमण करने के लिए तैयार नहीं है। चीन की पार्टी द्वारा खुर्श्चेवी संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष (`महान बहस´) के दस्तावेज़ भारत के कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों को जब मिले (टूट के कगार पर खड़ी भाकपा के डांगेपन्थी धड़े ने ही नहीं बल्कि बासवपुनैया-सुन्दरैया-नम्बूदरीपाद-रणदिवे धड़े ने भी इस पॉलिमिक्स को कतारों तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की, और उन्हें तब तक अँधेरे में रखा जब तक कि ये दस्तावेज़ अलग स्रोतों से कतारों तक नहीं पहुँच गये) और फिर इस बहस से भारत की कम्युनिस्ट कतारों के अग्रिम तत्त्व परिचित हुए, तो यहाँ भी संशोधनवाद के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के लिए एक नयी दिशा मिली। 1966 में चीन में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के शुरू होते ही वहाँ पार्टी के भीतर के बुर्जुआ हेडक्वार्टर को ध्वस्त करने के माओ के आह्वान ने भारतीय कम्युनिस्ट कतारों को भी नेतृत्व पर काबिज़ संशोधनवादियों के विरुद्ध खुली बग़ावत की प्रेरणा दी।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर दो लाइनों का संघर्ष किसी न किसी रूप में तेलंगाना किसान संघर्ष के समय से ही जारी था। इसमें नेतृत्व का एक पक्ष संशोधनवादी विचलन का शिकार था और दूसरा पक्ष जो कतारों की क्रान्तिकारी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता था, वह भी विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण विसंगति, अनिर्णय और अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट नेतृत्व और बड़ी पार्टियों पर मार्गदर्शन के लिए निर्भरता की प्रवृत्ति का शिकार था। इसके परिणामास्वरूप, यह दूसरा पक्ष भी 1950 का दशक शुरू होते-होते संशोधनवादी पंककुण्ड में जा गिरा और दोनों पक्षों के बीच मतभेद का मुद्दा सिर्फ़ यह रह गया कि राष्ट्रीय जनवाद के नारे के तहत नेहरू सरकार के प्रति सहयोग का रास्ता अपनाया जाये या लोक जनवाद के नारे के तहत मुख्यत: संसदीय विपक्ष की भूमिका निभाते हुए कुछ रैडिकल जनान्दोलन भी चलाये जायें।

तेलंगाना किसान संघर्ष कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चला पहला ऐसा सशस्त्र संघर्ष था जिसके परिणामस्वरूप 16000 वर्ग मील का क्षेत्र – जिसमें तीन हज़ार गाँव शामिल थे – मुक्त किया गया था और लगभग डेढ़ वर्षो तक इस क्षेत्र की सारी शासन-व्यवस्था किसानों की गाँव कमेटियों के हाथों में थी। कुल 4,000 किसान और पार्टी के छापामार इसमें शहीद हुए और दस हज़ार कम्युनिस्ट कार्यकर्ता तीन से चार वर्षो तक जेलों में बन्द रहे। इस दौरान कुल 30 लाख एकड़ ज़मीन किसानों में बाँटी गयी, बेदखली और बेगार प्रथा बन्द कर दी गयी और न्यूनतम मज़दूरी लागू कर दी गयी।

फ़रवरी-मार्च 1948 में जब भाकपा की दूसरी कांग्रेस में दक्षिणपन्थी पी.सी. जोशी को हटाकर बी.टी. रणदिवे को पार्टी महासचिव बनाया गया, उस समय तेलंगाना किसान संघर्ष सशस्त्र छापामार संघर्ष की मंज़िल तक पहुँच चुका था। ग़ौरतलब है तेलंगाना के प्रतिनिधियों के ज़ोर देने के बाद ही दूसरी कांग्रेस की थीसिस में तेलंगाना संघर्ष के महत्त्व का उल्लेख करते हुए उसे समर्थन दिया गया और पूरे देश में ऐसे संघर्ष संगठित करने तथा मज़दूर वर्ग से भी उनके समर्थन में आन्दोलन करने का आह्वान किया गया। लेकिन इस आह्वान के पीछे “वामपन्थी” अवसरवादी रणदिवे की यह सोच थी कि इससे पूरे देश में सशस्त्र आम विद्रोह की स्थिति पैदा हो जायेगी। रणदिवे ने युगोस्लाविया की टीटोपन्थी संशोधनवादी पार्टी के एक सिद्धान्तकार एडवर्ड कार्डेल्ज़ के विचार के आधार पर यह थीसिस पेश की कि जनवादी और समाजवादी क्रान्तियाँ एक साथ होनी चाहिए, और कम्युनिस्टों को न केवल बड़े बुर्जुआ को बल्कि सभी बुर्जुआओं को अपने हमले का निशाना बनाते हुए देशव्यापी आम हड़ताल और सशस्त्र विद्रोह का मार्ग अपनाना चाहिए। इस “वामपन्थी” दुस्साहसवाद ने भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन को जो क्षति पहुँचायी, वह इतिहास का एक तथ्य है। साथ ही, इस लाइन ने तेलंगाना संघर्ष के अग्रवर्ती विकास को भी रोकने का काम किया। मई, 1948 में आन्ध्र की पार्टी इकाई ने रणदिवे थीसिस का विरोध करते हुए अपनी यह लाइन रखी कि भारतीय क्रान्ति का चरित्र रूसी क्रान्ति से भिन्न है और यह चीन में जारी नवजनवादी क्रान्ति से काफ़ी हद तक समानता रखती है, यहाँ चार वर्गों का संयुक्त मोर्चा बनाना होगा और दीर्घकालिक लोकयुद्ध का मार्ग अपनाना होगा। आन्ध्र थीसिस में माओ त्से-तुँग के नवजनवाद के सिद्धान्त को प्रासंगिक बताते हुए भारत में सर्वहारा क्रान्ति को दो अवस्थाओं में सम्पन्न करने की योजना प्रस्तुत की गयी। रणदिवे ने इस थीसिस का विरोध करते हुए माओ के विचारों का भी विरोध किया और उन्हें टीटो और अल-ब्राउडर की श्रेणी का संशोधनवादी तक कह डाला। दो वर्षो तक पार्टी पर रणदिवे-लाइन के वर्चस्व ने तेलंगाना संघर्ष को भारी क्षति पहुँचाई। देश के विभिन्न हिस्सों में किसान संघर्षो को तेलंगाना की राह पर आगे बढ़ाने और मज़दूर वर्ग के संघर्षो को उनके साथ जोड़ने के बजाय “वामपन्थी” दुस्साहसवाद ने पार्टी को जन समुदाय से अलग-थलग कर दिया और कतारों की पहलकदमी को पंगु बना दिया गया। 1949 में चीनी क्रान्ति के बाद, 1950 में कोमिन्फॉर्म ने माओ के नवजनवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया। सोवियत पार्टी के एक सिद्धान्तकार जुकोव ने उपनिवेशों और अर्द्धउपनिवेशों में चार वर्गों के संश्रय को अनिवार्य बताया और दूसरे सिद्धान्तकार बालाबुशेविच ने तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करते हुए उसे कृषि क्रान्ति का अग्रदूत और भारतीय जनता की लोक जनवादी सत्ता स्थापित करने का प्रथम प्रयास बताया। अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व से नयी दिशा मिलते ही भारत में भी रणदिवे की “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन रातोंरात अलग-थलग पड़ गयी। मई-जून 1950 में राजेश्वर राव पार्टी के महासचिव बने और पार्टी ने आन्ध्र-थीसिस को आधिकारिक लाइन के तौर पर स्वीकार किया। लेकिन इस समय तक, पहले ही काफ़ी देर हो चुकी थी। देशव्यापी स्तर पर संघर्ष के विस्तार की सम्भावनाओं का, ग़लत लाइन काफ़ी हद तक गला घोंट चुकी थी और नयी बुर्जुआ सत्ता को अपने सुदृढ़ीकरण के लिए तीन वर्षो का कीमती समय मिल चुका था। चूँकि “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन की पराजय पूरी पार्टी में चले दो लाइनों के अन्दरूनी संघर्ष की परिणति नहीं थी बल्कि कोमिन्फॉर्म और सोवियत पार्टी की अवस्थिति के हिसाब से चलने की प्रवृत्ति का नतीजा थी, इसलिए पार्टी कतारें सही-गलत के बारे में विभ्रमग्रस्त थीं। विभ्रम का यह सिलसिला पहले से ही चल रहा था और 1947 से तो लगातार जारी था। राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय घटनाओं के प्रति ग़लत अवस्थिति अपनाने और फिर उन्हें आनन-फानन में उलट देने तथा पार्टी नेतृत्व में लगातार दो छोरों की विरोधी लाइनों की मौजूदगी के चलते कतारें निराश हो रही थीं। इसी समय भारतीय सेना ने हैदराबाद में प्रवेश किया। निजाम के आत्मसमर्पण के बाद, भारतीय सेना ने कम्युनिस्ट छापामार दस्तों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। छोटे-छोटे छापामार दस्तों में बँटी जनता की सशस्त्र सेना का सामना अब उन्नत हथियारों से लैस 50-60 हज़ार संख्या वाली सेना से था। फिर भी बहुत कठिनाइयों और अभूतपूर्व दमन के बाद ही भारतीय सेना छापामार दस्तों को पीछे धकेल सकी। मलाया सरकार की ब्रिग्स योजना की ही तरह ऐसे गाँव बसाये गये जहाँ के निवासियों को सेना के नियन्त्रण में रहना था। जंगलों की दो हज़ार आदिवासी बस्तियों को नेस्तनाबूद कर दिया गया और लोगों को यातना शिविरों में रखा गया। छापामार गाँवों को छोड़कर निकटवर्ती जंगलों में चले गये और वहाँ भी सेना का दबाव बढ़ने पर दूरवर्ती जंगली क्षेत्रों में बिखर गये।

उल्लेखनीय है कि पार्टी के बम्बई मुख्यालय में हावी एस.ए. डांगे, घाटे और अजय घोष आदि का दक्षिणपन्थी धड़ा शुरू से ही आन्ध्र लाइन का विरोध कर रहा था। तेलंगाना में सेना-प्रवेश के बाद वहाँ भी रवि नारायण रेड़्डी के नेतृत्व में कुछ लोग संघर्ष को वापस लेने के लिए दबाव बनाने लगे, हालाँकि आन्ध्र कमेटी का बड़ा हिस्सा फिर भी संग्राम को जारी रखना चाहता था। उसका मानना था कि फ़ौरी तौर पर नुकसान के बावजूद, संघर्ष को जारी रखना और देश के अन्य अनुकूल परिस्थितियों वाले भूभागों में उसका फैलाव मुमकिन है। इस समय दक्षिणपन्थी धड़े का हाथ मज़बूत करने मेँ ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी और उसके एक नेता रजनी पामदत्त ने विशेष भूमिका निभाई। दत्त का मानना था कि शीतयुद्ध की नयी विश्वपरिस्थितियों में भारत के कम्युनिस्टों को सशस्त्र संघर्ष के रास्ते को छोड़कर विश्व शान्ति आन्दोलन को मज़बूत बनाने का काम करना चाहिए और साम्राज्यवादी शिविर से भारत सरकार के दूर रहने और समाजवादी खेमे से नज़दीकी रिश्ता बनाने तथा कोरियाई जनयुद्ध का समर्थन करने के लिए नेहरू सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। इसी विचार का विकसित रूप आगे चलकर भाकपा के दक्षिणपन्थी धड़े के राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा की सोच और “प्रगतिशील” बुर्जुआ नेहरू सरकार के प्रति सहयोग- समर्थन की नीति के रूप में सामने आया। पार्टी के संशोधनवादियों ने आधिभौतिक निगमनात्मक पद्धति से अन्तरराष्ट्रीय अन्तरविरोधों के ही अनुसार राष्ट्रीय अन्तरविरोधों को भी देखने तथा दोनों में विरोध होने पर अन्तरराष्ट्रीय अन्तरविरोधों के हिसाब से अपना कार्यभार तय करने का काम एक बार फिर किया। यह ग़लती द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी की गयी थी और उसके पहले भी की जाती रही थी। ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक समिति ने भारतीय पार्टी को लिखे गये एक पत्र में अपने उपरोक्त सुझावों के साथ ही कानूनी कामों में लगने तथा डेढ़ वर्षो बाद होने वाले आगामी आम चुनाव पर ज़ोर दिया और साथ ही नेतृत्व को बदलने की भी राय दी क्योंकि राजेश्वर राव के नेतृत्व वाली केन्द्रीय कमेटी जनवादी तरीके से नहीं चुनी गयी थी। इन परिस्थितियों ने पार्टी में दक्षिणपन्थी नेतृत्व के हाथ मज़बूत करने का काम किया। 1 जुलाई, 1950 को राजेश्वर राव की जगह अजय घोष पार्टी के महासचिव बनाये गये। पार्टी में मौजूद मतभेद, संकट और विभ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए, एक बार फिर अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व पर भरोसा किया गया और चार सदस्यों का एक प्रतिनिधिमण्डल 1951 के प्रारम्भ में सोवियत पार्टी के नेतृत्व से बातचीत करने के लिए मास्को गया। इसमें दो – राजेश्वर राव और बासवपुनैया तेलंगाना संघर्ष के नेता थे, जबकि अन्य दो – अजय घोष और डांगे उसका विरोध कर रहे थे। सोवियत पार्टी की ओर से स्तालिन, मालेंकोव, मालरोव और सुस्लोव ने बातचीत की। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, इस बातचीत के बाद भारतीय प्रतिनिधिमण्डल भारत लौटा तो पहली बार भारत में जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम का एक मसौदा तैयार किया गया और एक नीति-विषयक वक्तव्य जारी किया गया। नीति-विषयक वक्तव्य रणकौशलात्मक लाइन के वृहद दस्तावेज़ का ही एक अंश था जिसे कानूनी तौर पर प्रकाशित किया गया। उपरोक्त दोनों दस्तावेज़ों में हालाँकि सशस्त्र संघर्ष का जिक्र नहीं था लेकिन रणकौशल-विषयक दस्तावेज़ में “अपरिपक्व विद्रोह और जोखिम भरी कार्रवाइयों से सावधान रहते हुए” किसानों के छापामार युद्ध के साथ ही मज़दूरों की वर्गीय हड़तालों और संघर्ष के अन्य रूपों के इस्तेमाल की बात कही गयी थी। उसमें इस धारणा को भी ग़लत ठहराया गया था कि देश के किसी हिस्से में सशस्त्र विद्रोह तभी शुरू किया जा सकता है, जब पूरे देश में विद्रोह की स्थिति तैयार हो। दस्तावेज़ के अनुसार, किसी एक बड़े भूभाग में किसान संघर्ष के ज़मीन-ज़ब्ती के स्तर पर पहुँचने के बाद, व्यापक जनान्दोलन और छापामार युद्ध यदि ठीक तरह से संगठित हों तो देश भर के किसानों को उद्वेलित करके संघर्ष को उच्च धरातल पर पहुँचा देना सम्भव है। किसान-संघर्ष के बारे में सोवियत पार्टी के आम सुझाव सही थे, पर तेलंगाना संघर्ष के बारे में ठोस निर्णय भारतीय पार्टी के नेतृत्व को लेना था, जिस पर दक्षिणपन्थी अवसरवादी हावी हो चुके थे। केन्द्रीय कमेटी ने आन्ध्र की कमेटी को संघर्ष केवल तब तक जारी रखने को कहा जब तक पार्टी सरकार से उसे स्थगित करने की शर्तो पर बातचीत पूरी न कर ले। इन शर्तो में किसानों के कब्ज़े की ज़मीन ज़मींदारों को वापस न करना, कैदियों की रिहाई, मुकदमे वापस लेना और पार्टी से प्रतिबन्ध हटाना प्रमुख थीं। लेकिन केन्द्रीय कमेटी के इस निर्णय के विपरीत अजय घोष के नेतृत्व वाले दक्षिणपन्थी धड़े और आन्ध्र के रवि नारायण रेड्डी गुट ने बिना शर्त संघर्ष वापसी के लिए दबाव बनाना शुरू किया। पार्टी की इस स्थिति का लाभ उठाकर नेहरू सरकार ने किसी भी शर्त को मानने और बातचीत करने से इन्कार कर दिया। मई, 1951 तक केन्द्रीय कमेटी में आन्ध्र के सदस्य भी मान चुके थे कि अब आंशिक छापामार संघर्ष भी जारी रख पाना सम्भव नहीं है। अक्टूबर, 1951 में पार्टी ने बिना किसी शर्त, निहायत घुटनाटेकू ढंग से संघर्ष वापस लेने की घोषणा कर दी। जंगल के छापामार नेताओं को इसकी ख़बर बाद में लगी। पार्टी अब पूरी तरह से संसदीय राह पर चल पड़ी। दक्षिणपन्थी धड़े के सामने उसके विरोधियों ने आत्मसमर्पण कर दिया और कतारों में भारी पस्ती का माहौल फैल गया।

आज पश्चदृष्टि से देखने पर कहा जा सकता है कि तेलंगाना संघर्ष की तत्कालीन पराजय कई कारणों से उस समय लगभग तय हो चुकी थी। इसका सर्वोपरि कारण यह था कि पार्टी बोल्शेविक ढंग से एकीकृत नहीं थी और उसमें ऊपर से नीचे तक “वाम” और दक्षिण के धड़े मौजूद थे, इसलिए वह भारतीय क्रान्ति को नेतृत्व देने में अक्षम थी। 1946 से 1951 के बीच पहले पी.सी. जोशी काल के दक्षिणपन्थी भटकाव ने, फिर रणदिवे काल के “वामपन्थी” भटकाव ने और फिर अजय घोष काल के दक्षिणपन्थी भटकाव ने पूरे देश स्तर पर और तेलंगाना के स्तर पर पार्टी के कार्यो को काफ़ी नुकसान पहुँचाया था। यह एक ऐसा संक्रमण-काल था, जब नयी सत्ता के सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थीं लेकिन नौसेना-विद्रोह, तेभागा-तेलंगाना-पुनप्रा वायलार के किसान संघर्षों और देशव्यापी मज़दूर आन्दोलनों को एक कड़ी में पिरोकर जनक्रान्ति की धारा को आगे बढ़ाने में पार्टी-नेतृत्व नाकाम रहा। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती तो कांग्रेस की समझौतापरस्ती का पहलू और नंगा होकर सामने आता और पार्टी के नेतृत्व में यदि जनवादी क्रान्ति जल्दी पूरी नहीं भी होती तो या तो दीर्घकालिक लोकयुद्ध मज़बूत आधार पर, आगे की मंज़िलों में प्रविष्ट हो गया होता या जनसंघर्षों के दबाव में नेहरू सरकार भूमि क्रान्ति के कार्यभारों को हालाँकि प्रशियाई मार्ग से ही सही और ऊपर से ही सही लेकिन तेज़ी के साथ पूरा करने को विवश हो जाती और तेज़ पूँजीवादी विकास के साथ भारत जल्दी ही समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में प्रविष्ट हो जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1951 तक, पार्टी-नेतृत्व में मतभेद के चलते तेलंगाना संघर्ष को इतना नुकसान पहुँच चुका था कि कम से कम, फौरी तौर पर उसकी पराजय सुनिश्चित हो चुकी थी। फिर भी, उस समय यदि नेतृत्व पर दक्षिणपन्थी धड़ा काबिज़ नहीं होता और पूरी तरह से आत्मसमर्पण करने के बजाय, फौरी तौर पर पीछे हटने और अपनी सैन्य शक्ति को दुर्गम जंगल क्षेत्रों में बिखरा देने के बाद, नये सिरे से उस क्षेत्र में तथा देश के अन्य ऐसे भूभागों में किसान-संघर्ष संगठित किये जाते, तो स्थिति को सँभालकर फिर से आगे बढ़ने का अवसर मिल जाता। इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राजेश्वर राव के नेतृत्व में जिस धड़े ने तेलंगाना में सही लाइन ली थी, वह भी विचारधारात्मक रूप से कमज़ोर था। इसके चलते, कुछ समय तक केन्द्रीय कमेटी में प्रभावी होने के दौर में भी वह अपनी लाइन का देशव्यापी स्तर पर सुदृढ़ीकरण नहीं कर सका, विरोधी लाइन के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के बजाय उसने समझौता करने का रुख़ अपनाया और अन्तत: घुटने टेक दिये। इस बुनियादी तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि 1951 तक भारत की पार्टी के पास न तो जनवादी क्रान्ति का कोई सुसंगत कार्यक्रम था, न ही कोई भूमि-क्रान्ति का कार्यक्रम (एग्रेरियन प्रोग्राम)। 1951 में सोवियत पार्टी की राय से, जब कार्यक्रम और रणकौशलात्मक लाइन के दस्तावेज़ तैयार हुए तब तक नेतृत्व पर दक्षिणपन्थी काबिज़ हो चुके थे, पार्टी संशोधनवाद की राह पर आगे बढ़ चुकी थी और तेलंगाना संघर्ष की पराजय तय हो चुकी थी। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि चीनी क्रान्ति जैसे दीर्घकालिक लोकयुद्ध के मार्ग का पक्षधर धड़ा, अपनी सही अवस्थिति के बावजूद, यदि स्थितियाँ उसके अनुकूल होतीं, तब भी संघर्ष को किस हद तक आगे ले जा पाता, यह संदिग्ध है, क्योंकि विचारधारात्मक रूप से यह धड़ा भी काफ़ी अपरिपक्व था और भारतीय परिस्थितियाँ हूबहू चीन जैसी नहीं थीं। क्रान्ति पूर्व अर्द्धऔपनिवेशिक चीन एक प्राक्औपनिवेशिक मंज़िल में था, जबकि 1947 के बाद का भारत विउपनिवेशीकरण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो पाने के बावजूद एक उत्तर औपनिवेशिक समाज था, जिसकी एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता थी, जो एक ऐसे औद्योगिक पूँजीपति वर्ग के हाथों में थी, जो चीन जैसा दलाल पूँजीपति वर्ग नहीं था। अपनी इस प्रकृति के चलते आगे चलकर राष्ट्रीय बाज़ार के निर्माण के लिए, प्रशियाई मार्ग से सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण का मार्ग अपनाना और साम्राज्यवादियों का कनिष्ठ साझीदार होते हुए भी अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर अपने आर्थिक विकल्पों का विस्तार करना इसके लिए अपरिहार्य था। भारतीय पूँजीपति वर्ग के इस चरित्र की ओर सबसे पहले इतिहासकार डी.डी. कोसम्बी ने इंगित किया था। इस मायने में 1951 का कार्यक्रम वर्ग-सम्बन्धों की दृष्टि से तत्कालीन समय में क्रान्ति की मंज़िल और मार्ग का तो ठीक निर्धारण कर रहा था लेकिन भारतीय पूँजीपति वर्ग और राज्यसत्ता के चरित्र के मूल्यांकन में सटीकता और स्पष्टता की कमी के चलते वह भारतीय समाज के विकास की दिशा के बारे में कुछ नहीं कहता था। वह इस बात को स्पष्ट नहीं करता था कि सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति यदि सम्पन्न नहीं होती, तो भारतीय पूँजीपति वर्ग ग़ैरक्रान्तिकारी रास्ते से, ऊपर से क्रमश: भूमि सम्बन्धों को बदलने का काम करता ही, क्योंकि यह उसके वर्गहित का तकाज़ा था। वह इस बात को भी स्पष्ट नहीं करता था कि एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता और सापेक्षत: अधिक पूँजीवादी विकास के कारण, 1947-51 के दौरान राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की मंज़िल होते हुए भी, दीर्घकालिक लोकयुद्ध के चीनी रास्ते को हूबहू यहाँ लागू कर पाना सम्भव नहीं था। उस समय चीनी पार्टी ने भी आगाह किया था कि हर उपनिवेश-अर्द्धउपनिवेश- नवउपनिवेश में छापामार किसान संघर्ष के चीनी अनुभव को आँख मूँदकर दुहराया नहीं जा सकता। इन जटिल, तरल संक्रमणकालीन स्थितियों में, यदि सब कुछ तेलंगाना में सही लाइन लागू करने वाले धड़े के अनुकूल होता, तो भी यह कह पाना मुश्किल है कि अपनी विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण, वह संघर्ष को कहाँ तक आगे ले जा पाता और चीनी क्रान्ति के मार्ग के अन्धानुकरण की प्रवृत्ति से बच पाता भी या नहीं। भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के उत्तरवर्ती दौर का इतिहास तो यही बताता है कि ऐसा बहुत मुश्किल होता।

बहरहाल, इतिहास में जो घटित हुआ, वह यह कि पार्टी 1951 में ही शान्तिपूर्ण संविधानवाद का रास्ता अपना चुकी थी और मुख्यत: और मूलत: मेंशेविक और काउत्स्कीपन्थी यूरोपीय पार्टियों के साँचे में ढल चुकी थी। 1951 से लेकर 1962-63 तक इसमें दो लाइनों का संघर्ष वस्तुत: संसदवाद-अर्थवाद की नरम धारा और रैडिकल धारा के बीच संघर्ष के रूप में ही मौजूद रहा। कतारों का बड़ा हिस्सा क्रान्तिकारी आकांक्षाओं और चरित्र वाला था। (हालाँकि सुधारवादी तत्त्वों की नयी भरती लगातार जारी थी), लेकिन अपनी विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण वह नेतृत्व के रैडिकल संशोधनवादी धड़े को ही क्रान्तिकारी मानता था। जो नरमपन्थी उदारवादी धड़ा था, उसका नेतृत्व डांगे, मोहित सेन, भवानी सेन, भूपेश गुप्त, दामोदरन, जी. अधिकारी आदि के हाथों में था और मध्यमार्गी अजय घोष भी मूलत: उन्हीं के साथ थे। दूसरे धड़े का नेतृत्व सुन्दरैया, गोपालन, बासवपुनैया, प्रमोद दासगुप्ता आदि के हाथों में था। पहले धड़े की राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की थीसिस यह थी कि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस में मौजूद धड़ा प्रगतिशील राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग का प्रतिनिधि है और नेहरू सरकार विउपनिवेशीकरण और भूमि-सुधारों के राष्ट्रीय जनवादी कार्यभारों को अंजाम दे रही है, इसलिए भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को उसके प्रति मुख्यत: सहयोग का रुख़ अपनाना चाहिए। साथ ही, यह सरकार समाजवादी शिविर के प्रति भी दोस्ताना रुख़ रखती है। इसे मज़बूत बनाने के लिए और साथ ही विश्व शान्ति आन्दोलन को मज़बूत बनाकर शीतयुद्ध का प्रतिकार करने के लिए नेहरू सरकार के प्रति सहयोगी रुख़ अपनाना ज़रूरी है। दूसरी ओर रैडिकल संशोधनवादी धड़े का यह मानना था कि भारत में राज्यसत्ता का बड़ा साझीदार बड़ा पूँजीपति वर्ग है जो साम्राज्यवाद के साथ समझौते कर रहा है और राष्ट्रीय जनवादी कार्यभारों को कतई पूरा नहीं करना चाहता। इसके विरुद्ध चार वर्गो के रणनीतिक संश्रय के आधार पर लोक जनवादी क्रान्ति के लिए संघर्ष करना होगा, जिसका केन्द्रीय तत्त्व भूमि क्रान्ति होगा। ऊपरी तौर पर देखने पर यह कार्यक्रम क्रान्तिकारी लगता था, लेकिन वास्तविकता यह थी कि क्रान्तिकारी किसान संघर्ष को पुनस्संगठित करके तेलंगाना किसान-संघर्ष की परम्परा को आगे बढ़ाने की कोई ठोस कार्य-योजना इसके वाहक धड़े ने कभी प्रस्तुत नहीं की। जगह-जगह भूमिहीनों के बीच ग़ैरमजरुआ, पंचायती व सीलिंग से निकली ज़मीन बाँटने, सरकार पर भूमि-सुधारों की गति तेज़ करने के लिए दबाव बनाने, न्यूनतम मज़दूरी जैसी माँगों पर संघर्ष करने, संसद में नेहरू की नीतियों के खिलाफ़ रैडिकल भाषण देने और औद्योगिक मज़दूरों की बोनस, वेतनवृद्धि व अन्य सुविधाओं को लेकर आन्दोलन संगठित करने के अतिरिक्त लोक जनवादी क्रान्ति का कार्यक्रम देने वाले धड़े ने और कुछ भी नहीं किया। यहाँ यह उल्लेख भी कर दिया जाना चाहिए कि 1955-56 के दौरान अजय घोष, नम्बूदरिपाद, डांगे, जगन्नाथ सरकार, बालकृष्ण मेनन आदि कुछ लोग इस तरीके की बात कर रहे थे कि भारतीय सत्तारूढ़ बुर्जुआ भी बिस्मार्ककालीन प्रशा की तरह, ऊपर से, भूस्वामित्व ढाँचे का क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण कर रहा है, लेकिन फिर वे इस मसले पर कायराना और अवसरवादी ढंग से चुप्पी साध गये। यूँ तो एक संशोधनवादी पार्टी के लिए कार्यक्रम के सही-ग़लत होने का कोई मतलब नहीं होता, लेकिन यह ज़रूर है कि भूमि सम्बन्धों के रूपान्तरण से जुड़े पक्षों पर उस समय यदि बहस चली होती तो नक्सलबाड़ी के बाद, कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच भी यह मुद्दा बहस के एजेण्डे पर आसानी से आ जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।, कहा जा सकता है कि पहला धड़ा जहाँ एकदम सामाजिक जनवादी आचरण करते हुए पार्टी को बुर्जुआ वर्ग की गोद में बैठा देना चाहता था, वहीं दूसरा धड़ा रैडिकल अर्थवादी-ट्रेडयूनियनवादी-संसदवादी विरोध की कार्रवाइयाँ चलाते हुए एक ज़िम्मेदार संसदीय विपक्ष, व्यवस्था के भीतर सक्रिय एक `प्रेशर ब्लॉक´ और व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा-पंक्ति की भूमिका निभाना चाहता था। लेकिन इस धड़े के संशोधनवादी चरित्र को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि संसदीय और आर्थिक संघर्षों के अतिरिक्त इसने 1951 से 1964 तक किसानों के क्रान्तिकारी भूमि संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए तथा मज़दूर वर्ग के बीच क्रान्तिकारी राजनीतिक प्रचार एवं राजनीतिक संघर्ष संगठित करने के लिए कुछ भी नहीं किया। पूरी पार्टी के कानूनी बना दिये जाने और चवन्नियाँ सदस्यता सहित सभी मेंशेविक ढंग-ढर्रों को अपना लेने पर इस धड़े ने कभी कोई सवाल नहीं उठाया। 1958 में हुई पार्टी की पाँचवीं (विशेष) कांग्रेस (अमृतसर) में जब सोवियत पार्टी की बीसवीं कांग्रेस में स्वीकृत खुर्श्चेवी संशोधनवादी नीतियों को अपनाया गया और पार्टी संविधान की प्रस्तावना से `क्रान्तिकारी हिंसा´ शब्दावली को हटा दिया गया तो एक भी प्रतिनिधि ने इसका विरोध नहीं किया। नक्सलबाड़ी किसान-उभार से जन्मी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धारा के भी नेतृत्व की विचारधारात्मक कमज़ोरी को समझने के लिए यहीं पर यह उल्लेख भी ज़रूरी है कि इस कांग्रेस में भावी मा-ले नेतृत्व के कई लोग भी प्रतिनिधि के रूप में मौजूद थे। उनमें डी.वी. राव (केन्द्रीय कमेटी के सदस्य भी थे) और नागी रेड्डी तो राष्ट्रीय स्तर के नेता माने जाते थे जबकि कई अन्य राज्य स्तर के नेता थे। छठी कांग्रेस (विजयवाड़ा, 1961) में दो परस्पर-विरोधी कार्यक्रम के मसौदों पर अवश्य गम्भीर मतभेद सामने आया, लेकिन सोवियत प्रतिनिधिमण्डल के खुर्श्चेवपन्थियों के बीच-बचाव से फूट को टाल दिया गया। उल्लेखनीय है कि 1956-61 के दौरान खुर्श्चेवी संशोधनवाद का विरोध परोक्ष रूप से करते हुए चीन की पार्टी स्तालिन और सर्वहारा क्रान्ति के मार्क्सवादी-लेनिनवादी उसूलों के पक्ष में सकारात्मक तौर पर अपने मुखपत्रों में लिख रही थी, लेकिन संशोधनवाद पर खुला हमला बोलने की जगह वह पार्टी-स्तर पर बातचीत के ज़रिये मतभेदों को हल करने की कोशिश कर रही थी। उसे उम्मीद थी कि पूरी सोवियत पार्टी शायद खुर्श्चेव के साथ न हो और बातचीत करके सोवियत पार्टी को सही रास्ते पर लाया जा सकता है तथा विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन को फूट से बचाया जा सकता है। इसी प्रक्रिया में 1957 और 1960 के अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट सम्मेलनों द्वारा पारित दस्तावेज़ों में चीन की पार्टी ने अपनी अवस्थिति दर्ज कराने के बावजूद समझौते भी किये। इन विचारधारात्मक समझौतों के चलते इन दस्तावेज़ों में कई संशोधनवादी प्रस्थापनाएँ शामिल हो गयी थीं, जिनका पूरा लाभ पूरी दुनिया की पार्टियों के संशोधनवादियों ने उठाया। चीन की पार्टी की उम्मीदों का इतिहास के अनुभव समर्थन नहीं करते थे और उसका आचरण सुधारवाद और संशोधनवाद के विरुद्ध तत्क्षण संघर्ष छेड़ देने के मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के आचरण से मेल नहीं खाता था। संशोधनवाद के विरुद्ध खुले संघर्ष में चीन की पार्टी द्वारा किये गये अनावश्यक विलम्ब से पूरी दुनिया के कम्युनिस्ट आन्दोलन में संशोधनवादियों को लाभ मिला। कतारों को दिग्भ्रमित करने और अपना सुदृढ़ीकरण करने में उन्होंने इस अन्तराल का भरपूर लाभ उठाया। भारत के कम्युनिस्ट नेतृत्व को तो दुनिया की किसी बड़ी पार्टी या मान्य अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व से दिशा पाये बिना सोचने की आदत ही नहीं थी। ऐसे में, पाँचवीं और छठी कांग्रेस में खुर्श्चेवी संशोधनवाद पर सवाल उठाने का भला सवाल ही कहाँ उठता है? कतारों की क्रान्तिकारी स्पिरिट भी 1951 के बाद से लगातार क्षरित हो रही थी। अब स्तालिन की आलोचना और संसदीय मार्ग की स्वीकृति ने उनमें और अधिक पस्ती और निराशा पैदा करने का काम किया।

1962 में भारत के चीन युद्ध के समय डांगेपन्थी धड़े ने अपनी वर्ग-सहयोगी लाइन की तार्किक परिणति के तौर पर अन्धराष्ट्रवादी अवस्थिति अपनायी और चीन को हमलावर मानते हुए नेहरू सरकार की सीमानीति को पुरज़ोर समर्थन दिया। उस समय चीन पश्चिमी शक्तियों की घेरेबन्दी और कुत्साप्रचार के घटाटोप का शिकार था, फिर भी पश्चिमी मीडिया और पश्चिमी बुद्धिजीवियों का बहुलांश भारत-चीन सीमा विवाद में अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों की शह और अपनी क्षेत्रीय विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षा के चलते उकसावे और हमले की कार्रवाई के लिए भारत को ही ज़िम्मेदार मानता था। कई पुस्तकों में इन तथ्यों की सविस्तार चर्चा मिलती है जिसमें अमेरिकी पत्रकार नेविल मैक्सवेल की पुस्तक सर्वाधिक प्रसिद्ध है। भारत में भी पुराने क्रान्तिकारी पं. सुन्दरलाल सहित कई लोग नेहरू की विस्तारवादी नीतियों और हमले की कार्रवाई के कटु आलोचक थे और तथ्यों को सामने लाने वाली कई पुस्तकें व लेख यहाँ भी लिखे गये लेकिन अन्धराष्ट्रवादी प्रचार की लहर में वे व्यापक जनता तक नहीं पहुँच सके। भारत की कम्युनिस्ट कतारें सीमा-विवाद सम्बन्धी इस सारी सामग्री से परिचित नहीं थीं, लेकिन अपने सहज वर्ग-बोध से समाजवादी चीन को विस्तारवादी और हमलावर मानने को वे तैयार नहीं थी और भारतीय बुर्जुआ सत्ता के प्रतिक्रियावादी तथा विस्तारवादी चरित्र को भी वे भली-भाँति समझती थीं। भारी अन्धराष्ट्रवादी लहर का मुकाबला करते हुए भारत की कम्युनिस्ट कतारों के बड़े हिस्से ने नेहरू सरकार की हमलावर विस्तारवादी सीमा-नीति का विरोध किया। पार्टी-नेतृत्व के भीतर डांगेपन्थियों का विरोधी जो दूसरा धड़ा था (जो कि अल्पमत में था), उसने डांगेपन्थियों के बहुमत द्वारा ली गयी लाइन को मार्क्सवाद-विरोधी और बुर्जुआ राष्ट्रवाद के अवसरवादी सिद्धान्त पर आधारित घोषित किया। लेकिन आने वाले समय की घटनाओं ने सिद्ध किया कि ऐसा सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावाद के प्रति प्रतिबद्धता के चलते नहीं, बल्कि क्रान्तिकारी कतारों को अपने पक्ष में करने के लिए किया गया था। चीनी “हमले” के मिथक के पीछे की सच्चाइयों को साहसपूर्वक उजागर करने और अन्धराष्ट्रवाद-विरोधी प्रचार का कोई कार्यक्रम हाथ में लेने के बजाय, इस दूसरे धड़े की ओर से राममूर्ति ने पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में एक वैकल्पिक प्रस्ताव पेश किया जिसमें सिर्फ़ इतना ही कहा गया था कि चीन और भारत दो महान पड़ोसी देश हैं, उन्हें आपसी युद्ध में नहीं उलझना चाहिए क्योंकि इससे दोनों देशों को तबाही-बर्बादी का सामना करना पड़ेगा। लेकिन इस कायराना जोड़तोड़ के बावजूद वे बच नहीं सके। भारत सरकार ने उनमें से अधिकांश को, डांगे द्वारा दी गयी सूची के आधार पर, गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया।

1963 के उत्तरार्द्ध से, `क्रान्ति या शान्तिपूर्ण संक्रमण?´ के बुनियादी विचारधारात्मक प्रश्न पर, भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन में शायद पहली बार अभूतपूर्व आयामों वाली एक ऐसी बहस की शुरुआत हुई जिसने समूची पार्टी कतारों को अपनी ज़द में ले लिया। 1957 से 1962 के बीच सोवियत पार्टी और चीनी पार्टी का जो भी साहित्य भारत की कम्युनिस्ट कतारों के एक हिस्से तक पहुँच पा रहा था, उससे यह बात तो स्पष्ट हो ही चुकी थी कि चीन की पार्टी न केवल तोग्लियाती और टीटो के संशोधनवाद का विरोध करती है, बल्कि वह खुर्श्चेव के तीन “शान्तिपूर्णों” के सिद्धान्त और उसके द्वारा प्रस्तुत स्तालिन की आलोचना को भी स्वीकार नहीं करती है। लेकिन पूरे देश की व्यापक कतारों तक सोवियत लेखन की ही पहुँच थी। चीनी पार्टी का साहित्य ज्यादातर कुछ महानगरों के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों और प्रबुद्ध कतारों तक ही पहुँच पाता था। पार्टी नेतृत्व अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के बीच जारी मतभेदों से परिचित था, लेकिन उसके दूसरे धड़े ने भी कभी चीनी पार्टी की अवस्थिति को कतारों तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की। जून, 1963 में चीनी पार्टी ने पहली बार बहस को खुला करते हुए खुर्श्चेवी लाइन के विरुद्ध विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन की वैकल्पिक आम दिशा का दस्तावेज़ प्रस्तुत किया। इसके बाद सितम्बर 1963 से लेकर जुलाई 1964 के बीच क्रमश: नौ निबन्धों के ज़रिये चीनी पार्टी ने ख्रुश्चेवी नकली कम्युनिज्म को पूरी तरह बेनकाब करते हुए सोवियत पार्टी को पूँजीवादी रास्ते का राही घोषित किया। यही बहस अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास में `महान बहस´ नाम से प्रसिद्ध हुई। उस समय आधिकारिक पार्टी-लाइन का विरोध करने वाले धड़े का बड़ा हिस्सा जेल में था। जो लोग बाहर थे, उन्होंने `महान बहस´ के दस्तावेज़ों को पार्टी-कतारों तक पहुँचाने के लिए कुछ भी नहीं किया। ये दस्तावेज़ मुख्यत: बुद्धिजीवियों के बीच से पार्टी कतारों तक पहुँचे और फिर वहां से तेज़ी से फैले। अब पहलकदमी पूरी तरह से कतारों के हाथ में थी। जुझारू कतारों के बड़े हिस्से ने चीनी अवस्थिति का समर्थन किया। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि चीनी “हमले” के दुष्प्रचार और अन्धराष्ट्रवादी लहर का निशाना दरअसल चीनी पार्टी की क्रान्तिकारी लाइन है, इसलिए कतारों ने अन्धराष्ट्रवाद के विरुद्ध साहसिक प्रचार-कार्य पूरी तरह से अपनी स्वतन्त्र पहल पर करना शुरू किया। यह मुहिम बंगाल में सर्वाधिक सशक्त थी। कलकत्ता के शहीद मैदान में एक भारी रैली हुई और फिर सड़कों पर जुलूस निकाला गया। जिसका प्रमुख नारा था : `चीन का हौवा खड़ा करने वाले साम्राज्यवाद के एजेण्ट हैं।´ पूरी स्थिति को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि पार्टी का बांगला मुखपत्र `स्वाधीनता´ नेतृत्व के 16 आधिकारिक पार्टी-लाइन विरोधी गुट के नियन्त्रण में होने के बावजूद इस पूरे मसले पर चुप्पी साधे हुए था। दूसरी ओर, पार्टी कतारों की पहल पर शुरू हुआ नया साप्ताहिक `देशहितैषी´ और नया मासिक `नन्दन´ इस पूरे प्रश्न पर जुझारू मुखरता के साथ स्टैण्ड लेकर लिख रहे थे और संशोधनवाद पर चोट कर रहे थे।

आधिकारिक पार्टी-लाइन विरोधी पक्ष के नेतागण जब जेलों से बाहर आये तो स्थितियाँ उन्हें अपनी समझ और नियन्त्रण की सीमा से परे प्रतीत हुई। जेल जाने से पहले वे चीनी लाइन के साथ जोड़कर देखे जाते थे, हालाँकि वे स्वयं ऐसा नहीं कहते थे। जेल में उनके भीतर भी मतभेद पैदा हो गये थे। कुछ उदारपन्थियों का कहना था कि सोवियत और चीनी पार्टी – दोनों की अवस्थितियाँ ग़लत हैं जबकि उनके विरोधियों का कहना था कि चीनी अवस्थिति मुख्यत: सही है। आधिकारिक लाइन विरोधी नेतृत्व का एक छोटा-सा हिस्सा जो बंगाल में गिरफ़्तारी से बच गया था और भूमिगत होकर पार्टी की राज्य कमेटी के रूप में काम कर रहा था, उसने `पृथ्वीराज´ छद्मनाम से एक दस्तावेज़ निकाला था जिसमें यह स्पष्ट कहा गया था कि अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में मतभेद मार्क्सवाद के बुनियादी उसूलों पर हैं। लेकिन यह कहने के बावजूद, `पृथ्वीराज´ इकाई के एक सदस्य समर मुखर्जी ने स्पष्ट कर दिया था कि वे फूट के लिए अपनी ओर से कोई पहल नहीं करेंगे। जेल से बाहर आये नेताओं की भी यही सोच थी, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि कतारों में यह भावना प्रचण्ड रूप में मौजूद है कि पार्टी नेतृत्व पर हावी डांगेपन्थियों के बहुमत के साथ सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में विचारधारात्मक मुद्दे से कतारों का ध्यान हटाने के लिए आधिकारिक पार्टी-लाइन विरोधी धड़े ने राष्ट्रीय अभिलेखागार से डांगे का वह पत्र निकलवाकर ख़ूब ज़ोर-शोर से कतारों में बाँटना शुरू कर दिया, जो उसने ब्रिटिश सत्ता को जेल से माफ़ीनामे के तौर पर भेजा था। लेकिन यह जुगत काम न आयी। विचारधारात्मक संघर्ष और तीखा हो गया और इन नेताओं के सामने इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प शेष नहीं बचा कि वे एक नयी पार्टी के गठन की दिशा में आगे कदम बढ़ायें। इस उद्देश्य से तेनाली (आन्ध्र प्रदेश) में एक कन्वेंशन बुलाया गया। लेकिन नेताओं के इस धड़े की नीयत और चरित्र को इस बात से समझा जा सकता है कि इस कन्वेंशन के ऐन पहले ज्योति बसु समझौते का एक प्रस्ताव लेकर भूपेश गुप्त और राजेश्वर राव से मिलने उड़कर दिल्ली पहुँचे। उनकी शर्त थी कि यदि अगली पार्टी कांग्रेस 1962 की सदस्यता के आधार पर हो और यदि डांगे को पार्टी-चेयरमैन पद से हटा दिया जाये, तो नयी पार्टी बनाने का विचार छोड़ा जा सकता है। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि ऐसे नेतृत्व के लिए, फूट का मुद्दा विचारधारात्मक-राजनीतिक नहीं था, बल्कि संसदीय राजनीति के दायरे में ही अधिक नरम या अधिक गरम नीतियों-रणनीतियों को लेकर था। `पृथ्वीराज दस्तावेज़´ में सोवियत व चीनी पार्टी के बीच के मतभेदों को विचारधारात्मक बताते हुए चीनी अवस्थिति का स्पष्ट समर्थन किया गया था जबकि राष्ट्रीय परिषद में हावी डांगेपन्थियों ने यह प्रस्ताव पारित करवाया था कि चीन आक्रमणकारी है। इन दोनों लाइनों के एक ही पार्टी में सहअस्तित्व की बात सोचने वाले लोग परले दरजे के अवसरवादी ही हो सकते थे।

ऐसे अवसरवादी नेतृत्व के प्रति रैडिकल कतारें शुरू से ही सशंकित थीं, फिर भी उन्हें यही लगा कि डांगेपिन्थयों से अलग होने के बाद इस नये नेतृत्व के ढुलमुलपन पर दबाव बनाकर नयी पार्टी को रास्ते पर लाया जा सकता है। कतारों को तब और आश्चर्य हुआ था जब, जिस नेतृत्व से एक क्रान्तिकारी लाइन लागू करने की अपेक्षा थी, वह दमनकारी राज्य मशीनरी की भरपूर सक्रियता के समय खुले तौर पर एक कांग्रेस के लिए एकत्र हुआ और फिर वही हुआ जो होना था। आधिकारिक-लाइन विरोधी सभी अग्रणी नेताओं को शान्तिपूर्वक उठाकर जेल में डाल दिया गया। जब अन्धराष्ट्रवादी लहर के खिलाफ़ रैडिकल कतारें सड़कों पर थीं, उस समय नेतृत्व के इस धड़े को जेल शायद अधिक महफ़ूज़ जगह लगी। कतारों के इस नये नेतृत्व के प्रति शंकाओं को तब और अधिक बल मिला जब नयी पार्टी (माकपा) के गठन के लिए प्रस्तावित कांग्रेस के लिए इसने मसौदा पार्टी कार्यक्रम वितरित किया। हालाँकि लोक जनवादी क्रान्ति की बात करते हुए इसमें मजदूर वर्ग के नेतृत्व, मज़दूर-किसान संश्रय पर आधारित संयुक्त मोर्चे और भूमि-क्रान्ति के धुरी होने की बात की गयी थी, लेकिन इसमें संशोधनवाद और सुधारवाद के कई तत्त्व थे और भविष्य में क्रान्तिकारी लाइन को पूरी तरह से छोड़ देने की तमाम गुंजाइशें इसमें अन्तर्निहित थीं, जिन्हें रैडिकल कतारों के एक बड़े हिस्से ने भाँप लिया। नतीजतन, कांग्रेस की तैयारी के लिए आयोजित पार्टी कन्वेंशन के सभी स्तरों पर तीखी बहसें उठ खड़ी हुई। यहाँ तक कि पार्टी कांग्रेस तक में कार्यक्रम का एक वैकल्पिक मसौदा पेश किया गया, लेकिन पुराने नौकरशाहाना ढंग से, जोड़तोड़ के बहुमत के सहारे हर रैडिकल आलोचना को दबा दिया गया। पार्टी कार्यक्रम के मसौदे के सिर्फ़ कुछ शब्दों में छोटे-मोटे बदलाव किये गये।

इतना कुछ होने के बावजूद, रैडिकल कतारें यह समझने में विफल रहीं कि जो नयी पार्टी गठित की जा रही है, वह भी नेतृत्व और नीतियों की दृष्टि से एक संशोधनवादी पार्टी है। उन्हें अपेक्षा थी कि इस पार्टी के भीतर दो लाइनों का संघर्ष चलाकर और मध्यमार्गियों को ठिकाने लगाकर इसे क्रान्तिकारी रास्ते पर उन्मुख किया जा सकता है। इस विभ्रम के लिए पार्टी की विचारधारात्मक कमज़ोरी का लम्बा इतिहास, राजनीतिक शिक्षा के अभाव की लम्बी परम्परा और निपट संशोधनवाद का चौदह वर्षों लम्बा दौर ज़िम्मेदार थे। नवगठित पार्टी ने सर्वहारा क्रान्ति के मूलभूत विचारधारात्मक प्रश्न पर जो अवस्थिति अपनायी उसकी सारवस्तु स्पष्टत: संशोधनवादी थी। खुर्श्चेवी संशोधनवाद की आलोचना करने के बावजूद माकपा-नेतृत्व का मानना था कि चीनी पार्टी अतिवामपन्थी संकीर्णतावादी भटकाव की शिकार है। सोवियत संघ के बारे में उनका कहना था कि वहाँ की पार्टी संशोधनवादी भटकाव की शिकार है किन्तु राज्य और समाज का चरित्र अभी भी समाजवादी है। यह अवस्थिति अपने आप में हास्यास्पद रूप से विसंगतिपूर्ण थी। लेनिन की परिभाषा के अनुसार, संशोधनवादी पार्टी का मतलब है समाजवादी मुखौटे वाली बुर्जुआ पार्टी। ऐसी कोई पार्टी यदि राज्य पर काबिज़ हो तो राज्य का चरित्र सर्वहारा अधिनायकत्व का नहीं, बल्कि बुर्जुआ अधिनायकत्व का ही होगा और उस राज्य के होते समाजवादी समाज का विघटन केवल समय की बात होगी। 1955 से 1964 तक सोवियत संघ का समाजवादी तानाबाना पूरी तरह विघटित हो चुका था और उसका स्थान राजकीय इजारेदार पूँजीवाद ले चुका था। 1968 में चेकोस्लोवाकिया पर हमले के बाद, सोवियत संघ का साम्राज्यवादी चरित्र भी नंगा हो गया। बाद के दशक के दौरान, राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों को मदद देने के नाम पर उनमें फूट डालने, उन्हें सशस्त्र संघर्ष का रास्ता छोड़ समझौते की नसीहत देने, नवस्वाधीन देशों का सहायता के नाम पर शोषण करने और पूर्वी यूरोपीय देशों की जनता का शोषण करने की सोवियत नीति ने सोवियत संघ के सामाजिक साम्राज्यवादी चरित्र को दिन के उजाले की तरह साफ़ कर दिया। लेकिन माकपा नेतृत्व सोवियत संघ को तब तक समाजवादी मानता रहा जब तक राजकीय पूँजीवाद का स्थान पश्चिमी ढंग के निजी पूँजीवाद ने नहीं ले लिया और सोवियत संघ का विघटन नहीं हो गया। माकपा की थीसिस के अनुसार, पैंतीस वर्षों तक एक संशोधनवादी पार्टी के शासन में राज्य और समाज का चरित्र समाजवादी बना रहा। मार्क्सवाद के साथ इससे बड़ा मज़ाक भला और क्या हो सकता है! और बात केवल इतनी ही नहीं थी। धीरे-धीरे माकपा ने सोवियत पार्टी को संशोधनवादी कहना भी बन्द कर दिया।

पूँजीवादी पुनर्स्थापना के कारणों और समाजवादी संक्रमण की अवधि में जारी वर्ग संघर्ष की प्रकृति के बारे में माओ त्से-तुङ के विश्लेषण और सैद्धान्तिक निष्पत्तियों पर माकपा ने कभी विस्तार से कुछ नहीं लिखा, लेकिन महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के प्रयोग को वह शुरू से अस्वीकार करती रही और ल्यू शाओ-ची व देङ सियाओ-पिङ के उत्पादक शक्तियों के विकास के संशोधनवादी सिद्धान्त को मार्क्सवादी मानती रही। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि वह आज के चीन के “बाज़ार समाजवाद” नामधारी नग्न पूँजीवाद को समाजवाद मानती है और सांस्कृतिक क्रान्ति को देङपंथियों के सुर में सुर मिलाते हुए एक “अतिवामपन्थी भूल” और “महाविपदा” घोषित करती है। वैसे, आम तौर पर मध्यमार्ग अपनाने वाली हर संशोधनवादी पार्टी की तरह माकपा अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के हर अहम विचारधारात्मक मसले पर प्राय: चुप्पी का ही रवैया अख्तियार करती रही है और विवश होने पर ही अपनी संशोधनवादी अवस्थिति को रखती रही है। `महान बहस´ में चीन की अवस्थिति को कथनी में सही मानते हुए भी उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों-नवउपनिवेशों में क्रान्ति सहित विश्व सर्वहारा क्रान्ति की आम दिशा के बारे में चीनी पार्टी द्वारा 1963 में प्रस्तुत अवस्थिति की जगह उसने खुर्श्चेवी संशोधनवादी आम दिशा को ही सारत: स्वीकार किया। माओ की मृत्यु के बाद, चीन में प्रतिक्रियावादी तख्तापलट करके सत्तासीन हुए पूँजीवादी पथगामियों ने सोवियत पार्टी को जब बिरादराना पार्टी कहना शुरू कर दिया, तो माकपा ने इसका कोई विरोध नहीं किया और उनके इस कुटिल पैंतरापलट को चुपचाप स्वीकार कर लिया। माकपा का यह संशोधनवादी चरित्र समय बीतने के साथ ही ज्यादा से ज्यादा नंगा होता गया, लेकिन विचारधारात्मक अवस्थिति और पार्टी की प्रकृति की दृष्टि से देखें तो अपने जन्मकाल से ही यह एक संशोधनवादी पार्टी थी।

यानी संकीर्ण अनुभववादी पर्यवेक्षण के बजाय, यदि पार्टी संगठन के लेनिनवादी उसूलों के नज़रिये से देखा जाये तो माकपा का संशोधनवादी चरित्र 1964 में ही एकदम साफ़ था। 1951 से ही जारी पार्टी के एकदम खुले, कानूनी, संसदीय चरित्र और कार्यप्रणाली को माकपा ने यथावत जारी रखा। पार्टी-सदस्यता की प्रकृति इसमें मेंशेविकों से भी गयी-गुज़री थी। अमृतसर कांग्रेस में पार्टी संविधान में किया गया बदलाव भी 1964 की सातवीं कांग्रेस में यथावत कायम रखा गया। लोक जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम के अनुसार, क्रान्ति का मार्ग दीर्घकालिक लोकयुद्ध का ही हो सकता था, लेकिन इसका कोई उल्लेख करने की जगह पार्टी कार्यक्रम में कपटपूर्ण भाषा में “संसदीय और ग़ैरसंसदीय” रास्ते का उल्लेख किया गया। कोई भी क्रान्तिकारी पार्टी बुर्जुआ संसदीय चुनावों का परिस्थिति अनुसार रणकौशल के तौर पर ही इस्तेमाल करती है। संसदीय रास्ते को ग़ैर संसदीय मार्ग के समकक्ष रखना अपने आप में संशोधनवाद है। यूँ बाद में मा-ले आन्दोलन की “वामपन्थी” दुस्साहसवादी धारा के चुनाव-बहिष्कार के नारे का विरोध करते हुए माकपा लेनिन के हवाले से यही कहती थी कि एक रणकौशल के तौर पर चुनाव का इस्तेमाल किया जा सकता है और वह यही कर रही है। लेकिन विगत तीन दशकों से बुर्जुआ व्यवस्था के अन्तर्गत एक राज्य में शासन करते हुए वह बुर्जुआ नीतियों को भरपूर वफ़ादारी के साथ लागू करती रही है और जनसंघर्षों की तैयारी के लिए चुनाव व संसदीय मंच का इस्तेमाल करने की जगह लगातार हर जनान्दोलन को कुचलने के लिए राज्यतन्त्र का बर्बर निरंकुश ढंग से इस्तेमाल करती रही है। अपना यह चरित्र वह नक्सलबाड़ी किसान उभार का बर्बर दमन करके साठ के दशक के अन्तिम वर्षों में ही नंगा कर चुकी थी।

जहाँ तक कार्यक्रम का प्रश्न है, माकपा ने अपने लोक-जनवादी कार्यक्रम के अन्तर्गत भारतीय बड़े पूँजीपति वर्ग का चरित्र दलाल न मानकर दोहरी प्रकृति का माना था और कुल मिलाकर इसकी स्थिति साम्राज्यवाद के कनिष्ठ साझीदार की मानी थी, जो वास्तविकता के अधिक निकट था। लेकिन सत्तारूढ़ पूँजीपति वर्ग के इस चरित्र का अन्तर्निहित तर्क यही हो सकता था कि वह अपने औद्योगिक-वित्तीय हितों के अनुरूप, ऊपर से, एक क्रमिक प्रक्रिया में, प्रशा के जुंकर-टाइप रूपान्तरण से मिलते-जुलते रास्ते से अर्द्धसामन्ती भूमि-सम्बन्धों को बदलने की कोशिश करे, सामन्ती भूस्वामियों को पूँजीवादी भूस्वामी बनने का अवसर दे (और जो ऐसा न करें, उन्हें उजड़ने के लिए स्वतन्त्र छोड़ दे), धनी काश्तकारों को मुनाफ़ाखोर कुलक बना दे, अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर तथा आयात-प्रतिस्थापन की नीति अपनाकर अपने आर्थिक हितों की हिफ़ाज़त एवं विस्तार करे तथा सुदूरवर्ती गाँवों तक को एक राष्ट्रीय बाज़ार के अन्तर्गत लाने की कोशिश करे। वास्तव में हुआ भी यही (और यह प्रक्रिया 1964 में गति पकड़ चुकी थी)। माकपा से जुड़े अर्थशास्त्री देश में पूँजीवादी विकास की सच्चाई को अंशों में स्वीकारते भी रहे हैं, हालाँकि इस तर्क को उसकी स्वाभाविक निष्पत्ति तक पहुँचाने से कन्नी काटते रहे हैं। माकपा भारतीय पूँजीपति वर्ग के चरित्र-निरूपण से निगमित तर्क को उसके नतीजे तक पहुँचाने की जगह, आज तक यही मानती है कि भारत विगत आधी सदी से लोक जनवादी क्रान्ति की मंज़िल में ही खड़ा है। वैसे किसी संशोधनवादी पार्टी के लिए क्रान्ति के कार्यक्रम का कोई खास मतलब नहीं होता। भारत में समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल मानने वाली कई छोटी-छोटी संशोधनवादी पार्टियाँ भी हैं, जो गाँवों और शहरों के सर्वहाराओं को लेकर लगातार अर्थवादी-ट्रेडयूनियनवादी कवायद करती रहती हैं और संसद-विधानसभाओं के चुनाव लड़ती रहती हैं, या फिर मात्र सिद्धान्त-चर्वण करती रहती हैं। लेकिन माकपा सापेक्षत: एक बड़े सामाजिक आधार वाली पार्टी है, जिसे गाँवों में बड़े मँझोले मालिक किसानों को और शहरों में छोटे बुर्जुआओं और उच्च मध्यवर्ग को हर हाल में अपने साथ रखना है, वरना उसके वोट बैंक को भारी नुकसान पहुँचेगा (संगठित मज़दूरों के आर्थिक हितों को लेकर, मरियल ही सही, लेकिन कानूनी और अर्थवादी लड़ाइयाँ लड़कर तथा संसद में वेतन संशोधन, पी.एफ., पेंशन, सेवाशर्तों आदि पर सत्ता का विरोध करने का पाखण्ड करके वह उनमें अपना वोट बैंक बनाये रखती है, पर मात्र इसी आधार पर उसकी चुनावी गोट लाल नहीं हो सकती)। इसलिए गाँवों के बड़े मालिक किसानों, शहरों के छोटे बुर्जुआओं और उच्च मध्य वर्ग के प्रति वर्ग-सहयोगवादी रवैया अपनाने में लोक जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम में निहित चार वर्गो के रणनीतिक संश्रय की सोच माकपा को एक सैद्धान्तिक आड़ देने का काम करती है। इसीलिए माकपा आज भी लोक जनवादी कार्यक्रम की बात करती है।

बहरहाल, यह तो आगे की बात हुई। हमें 1964 के काल में वापस लौटना होगा। माकपा का जो संशोधनवादी चरित्र आज उसके घनघोर जनविरोधी सामाजिक-जनवादी चरित्र के रूप में एकदम नंगा हो चुका है, वह अपने जन्मकाल से वैसा ही था। लेकिन चूँकि माकपा नेतृत्व उस समय डांगेपन्थी संशोधनवादियों पर हमले कर रहा था और चूँकि वह दबी-जुबान से ही सही लेकिन खुर्श्चेवी संशोधनवाद का विरोध करता प्रतीत हो रहा था इसलिए आनुभविक ढंग से चीज़ों को देखने के आदी, निम्न सैद्धान्तिक समझ और चेतना वाली कतारों के बड़े हिस्से ने उन्हें क्रान्तिकारी समझा। फिर भी यह एक निर्विवाद सच्चाई है कि कतारों का एक बड़ा हिस्सा उन्हें संशय की दृष्टि से देख रहा था और मध्यमार्गी ढुलमुलपन का शिकार मान रहा था। जो अधिक चेतनशील कार्यकर्ता थे, वे 1964 की कांग्रेस के बाद मायूस थे, पर उन्हें कोई विकल्प नहीं दीख रहा था। एक बड़ा हिस्सा ऐसा था जो नेतृत्व को संशोधनवादी मानते हुए भी, पार्टी के साथ फ़िलहाली तौर पर ही था और इंतजार की मानसिकता में था। बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं का एक अच्छा-खासा हिस्सा ऐसा भी था, जो इस नये नेतृत्व से कोई उम्मीद नहीं रखने के कारण निष्क्रिय हो गया था। कुल मिलाकर कहें, तो एक सर्वभारतीय पार्टी के गठन से जिस उत्साह, उम्मीद और जोश का माहौल होना चाहिए था, वह कहीं भी नहीं था।.…जारी

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-3

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-4

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1

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एक सिंहावलोकन -दीपायन बोस

कुछ चीज़ें धकेल दी गयी हैं

अँधेरे में

उन्हें बाहर लाना है,

जड़ों तक जाना है

और वहाँ से ऊपर उठना है

टहनियों को फैलाते हुए

आकाश की ओर।

सदी के इस छोर से

उठानी है फिर आवाज़

`मुक्ति´ शब्द को

एक घिसा हुआ सिक्का होने से

बचाना है।

जनता की सुषुप्त-अज्ञात मेधा तक जाना है

जो जड़-निर्जीव चीज़ों को

सक्रिय जीवन में रूपान्तरित करेगी

एक बार फिर।

जीवन से अपहृत चीज़ों की

बरामदगी होगी ही एक न एक दिन।

आकाश को प्राप्त होगा

उसका नीलापन,

वृक्षों को उनका हरापन,

तुषारनद को उसकी श्वेताभा

और सूर्योदय को उसकी लाली

तुम्हारे रक्त से…

– शशि प्रकाश

इतिहास की कई एक हारी गयी लड़ाइयाँ ऐसी भी हैं जिन्होंने देश-विदेश के जीवन और भविष्य की दिशा को जीती गयी लड़ाइयों की तुलना में कम नहीं, बल्कि कभी-कभी तो कुछ अधिक ही प्रभावित किया। ऐसी अल्पजीवी घटनाएँ धूमकेतु के समान क्षितिज पर प्रकट हुई और विलुप्त हो गयीं, लेकिन लोक-स्मृतियों में अपना अमिट स्थान सुरक्षित कर गयीं और आने वाली पीढ़ियों को लम्बे समय तक, इतिहास-निर्माण के लिए आगे डग भरने को प्रेरित करती रहीं। 1967 का नक्सलबाड़ी किसान-उभार भारतीय इतिहास के स्वातन्त्रयोत्तर काल की एक ऐसी ही महान ऐतिहासिक घटना थी।

नक्सलबाड़ी का क्रान्तिकारी जन-उभार एक ऐतिहासिक विस्फोट की तरह घटित हुआ जिसने भारतीय शासक वर्ग के प्रतिक्रियावादी चरित्र और नीतियों को एक झटके के साथ नंगा करने के साथ ही भारत की कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) सहित संशोधनवाद और संसदमार्गी वामपन्थ के विश्वासघाती जन-विरोधी चरित्र को उजागर करते हुए भारत के श्रमजीवी जनसमुदाय को यह सन्देश दिया कि सर्वहारा क्रान्ति के हरावल दस्ते के निर्माण एवं गठन के काम को नये सिरे से हाथ में लेना होगा। नक्सलबाड़ी के तत्काल बाद, सर्वहारा वर्ग की एक अखिल भारतीय पार्टी के गठन की दिशा में तूफ़ानी सरगर्मियों के साथ एक नयी शुरुआत हुई, लेकिन जल्दी ही यह नयी शुरुआत “वामपन्थी” आतंकवाद के भँवर में जा फँसी। तमाम घोषणाओं और दावों के बावजूद, कड़वा ऐतिहासिक तथ्य यह है कि देश स्तर पर सर्वहारा वर्ग की एक एकीकृत क्रान्तिकारी पार्टी नक्सलबाड़ी के उत्तरवर्ती प्रयासों के परिणामस्वरूप वस्तुत: अस्तित्व में आ ही नहीं सकी। 1969 में जिस भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा-ले) की घोषणा हुई, वह पिछले सैंतीस वर्षो से कई ग्रुपों और संगठनों में बँटी हुई, एकता और फूट के अनवरत सिलसिले से गुज़रती रही है। नक्सलबाड़ी की मूल प्रेरणा से गठित जो कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन भाकपा (मा-ले) में शामिल नहीं हुए थे, उनकी भी यही स्थिति रही है। इन सभी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठनों के जिस समूह को कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी शिविर कहा जाता रहा है, उनमें से कुछ आज भी “वामपन्थी” दुस्साहसवादी निम्न-पूँजीवादी लाइन के संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण को अमल में ला रहे हैं, कुछ दक्षिणपन्थी सिरे की ओर विपथगमन की प्रक्रिया में हैं तो कुछ सीधे संसदमार्गी वामपन्थियों की पंगत में जा बैठे हैं, कुछ का अस्तित्व बस नाम को ही बचा हुआ है तो कुछ बाकायदा विसर्जित हो चुके हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो नववामपन्थी “मुक्त चिन्तन” की राह पकड़ कर चिन्तन कक्षों में मुक्ति के नये सूत्र ईजाद कर रहे हैं। इस त्रासद स्थिति के कारणों की पड़ताल ज़रूरी है और आगे हम ऐसा करने की एक कोशिश भी करेंगे, लेकिन इतना तय है कि नक्सलबाड़ी में 1967 में घटी घटना भारतीय इतिहास का एक मोड़-बिन्दु और भारतीय वामपन्थ के इतिहास का एक सन्दर्भ-बिन्दु थी। इस घटना ने, और यहाँ से शुरू हुई मार्क्सवादी-लेनिनवादी राजनीतिक धारा ने पूरे भारतीय राजनीतिक परिदृश्य को, सामाजिक ताने-बाने को और सांस्कृतिक-साहित्यिक आन्दोलन को गहराई से प्रभावित किया। भारतीय समाज और राजनीति का स्वरूप वैसा कतई नहीं रह गया जैसा कि वह पहले था। बुर्जुआ मीडिया ने क्रान्तिकारी वामपन्थ के लिए एक नया शब्द ईजाद किया – नक्सलवाद, और पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग ज़िले के उस सुदूर ग्रामीण अंचल ने इतिहास में अपना स्थान सुरक्षित करा लिया। आज अपने ढंग से, बुर्जुआ राजनीतिज्ञ और व्यवस्था के सिद्धान्तकार-सलाहकार भी स्वीकार करते हैं कि “नक्सलवाद समस्या” कानून-व्यवस्था की नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक है और इसका समाधान भी सामाजिक-आर्थिक ही हो सकता है।

नक्सलबाड़ी का क्रान्तिकारी जन-उभार भारत में क्रान्तिकारी वामपन्थ की नयी शुरुआत और संशोधनवादी राजनीति से निर्णायक विच्छेद की एक प्रतीक घटना सिद्ध हुआ। इसने मज़दूर-किसान जनता के सामने राज्यसत्ता के प्रश्न को एक बार फिर केन्द्रीय प्रश्न बना दिया। तेलंगाना-तेभागा-पुनप्रा वायलार और नौसेना विद्रोह के दिनों के बाद, एक बार फिर देशव्यापी स्तर पर जनसमुदाय की क्रान्तिकारी ऊर्जा और पहलकदमी निर्बन्ध हुई, लेकिन “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के विचारधारात्मक विचलन और विरासत के तौर पर प्राप्त विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण भारतीय सामाजिक-आर्थिक संरचना एवं राज्यसत्ता की प्रकृति की ग़लत समझ और उस आधार पर निर्धारित क्रान्ति की ग़लत रणनीति एवं आम रणकौशल के परिणामस्वरूप यह धारा आगे बढ़ने के बजाय गतिरोध और विघटन का शिकार हो गयी। अब पिछले चार दशकों में गंगा में काफ़ी पानी बह चुका है। 1967 में सामाजिक संक्रमण की जो दिशा थी, उस दिशा में यात्रा काफ़ी आगे के एक सुनिश्चित मुकाम तक पहुँच चुकी है। प्रतिक्रान्तिकारी ढंग से, ऊपर से, क्रमिक विकास के रास्ते से, शासक वर्गो द्वारा किये पूँजीवादी भूमि-सुधारों ने किसान आबादी के विभेदीकरण, सर्वहाराकरण और विस्थापन को तीव्र करने के साथ ही गाँवों में भी पूँजी और श्रम के अन्तरविरोध को एकदम स्पष्ट और अत्याधिक तीखा बना दिया है। पूँजीवादी माल-उत्पादन की प्रणाली का वर्चस्व वहाँ निर्णायक ढंग से स्थापित हो चुका है और प्राक्-पूँजीवादी अवशेषों का दायरा अत्याधिक संकुचित हो चुका है। देश में देशी-विदेशी पूँजीपतियों के उद्योग-धन्धों और औद्योगिक सर्वहारा आबादी का भारी विस्तार हुआ है। भूमण्डलीकरण के दौर की नवउदारवादी नीतियों को स्वीकार कर भारतीय पूँजीपति वर्ग ने राजकीय उद्योगों का लगातार, बड़े पैमाने पर निजीकरण किया है और विदेशी पूँजी के लिए राष्ट्रीय बाज़ार को लगभग पूरी तरह से खोल दिया गया है। भारतीय पूँजीपति वर्ग आज की नयी परिस्थितियों में, विश्व पूँजीवादी तन्त्र में साम्राज्यवादी लुटेरों के कनिष्ठ सहयोगी एवं भागीदार की भूमिका में व्यवस्थित हो चुका है। कृषि और उद्योग – दोनों ही क्षेत्रों में आज देशी-विदेशी पूँजी और श्रम के बीच का अन्तरविरोध एकदम स्पष्ट हो चुका है।

1960 के दशक में भी समाज-विकास की यही दिशा थी, लेकिन तब एक संक्रमणशील तरल परिस्थिति थी और विकासमान सारभूत यथार्थ को पहचानकर क्रान्ति की मंज़िल का निर्धारण उच्च विचारधारात्मक क्षमता वाले परिपक्व नेतृत्व, गहन पर्यवेक्षण एवं अध्ययन तथा राजनीतिक वाद-विवाद की एक लम्बी प्रक्रिया की माँग करता था। नक्सलबाड़ी से उभरा नेतृत्व ऐसा नहीं था, और “वामपन्थी” संकीर्णतावाद ने जनवादी ढंग से विचारों के आदान-प्रदान की सम्भावनाओं का गला घोंट दिया। चीनी क्रान्ति के मार्ग के अनुसरण का नारा दिया गया, लेकिन उस पर भी यदि जनदिशा लागू करते हुए अमल किया जाता तो शायद अनुभवों के समाहार से सही नतीजों तक पहुँचा जा सकता था। पर पहले “वामपन्थी” आतंकवाद और फिर दक्षिणपन्थी विचलनों ने इस सम्भावना के द्वार भी रुद्ध कर दिये। आज पीछे मुड़कर जब हम इतिहास को देखते हैं और विश्लेषण-समाहार करते हैं, तो ज़ाहिर है कि चार दशक पहले के समय में पीछे लौटकर ग़लतियों को ठीक नहीं किया जा सकता। तब से भारतीय समाज काफ़ी आगे निकल आया है। जो 1967 या 1970 में हो सकता था या होना चाहिए था, आज उसकी स्थिति ही नहीं है। नक्सलबाड़ी किसान-उभार आज नहीं हो सकता। उस दौरान, जहाँ तक, जिस हद और मुकाम तक, चीज़ें सही ढंग से विकसित हुई, वह हमारी विरासत है लेकिन उसकी पुनरावृत्ति नहीं की जा सकती। इतिहास निरन्तरता और परिवर्तन के द्वन्द्व से आगे बढ़ता है। नक्सलबाड़ी और वहाँ से पैदा हुई क्रान्तिकारी वाम धारा के सन्दर्भ में, निरन्तरता के पहलू पर परिवर्तन का पहलू आज प्रधान है। यानी हम वस्तुगत परिस्थितियों और क्रान्ति की मनोगत शक्तियों – इन दोनों ही के सन्दर्भ में एक नये दौर में जी रहे हैं। फिर भी यह तय है कि उस दौर के इतिहास के सही, वस्तुपरक सार-संकलन के बिना, इस दौर में भी कोई नयी शुरुआत आगे नहीं बढ़ सकती। जो विचारधारात्मक भटकाव, पहुँच और पद्धति की जो ग़लतियाँ उस समय सही कार्यभार और सही मार्ग के निर्धारण में बाधक बनी थीं, उनका यदि सही-सटीक, बेलागलपेट विश्लेषण नहीं किया गया तो वही ग़लतियाँ किसी भी नयी यात्रा को बार-बार विपथगामी बनाती रहेंगी। यह जानना ही होगा कि अतीत के किन प्रेतों से हमें पीछा छुड़ाना है और अतीत की किस विरासत को आत्मसात करके उसे आगे विस्तार देना है।

इतिहासग्रस्त होकर इतिहास का निर्माण नहीं किया जा सकता। इतिहास के प्रेत तब तक किसी आन्दोलन या देश का पीछा करते रहते हैं जबतक कि उसके सभी सकारात्मक-नकारात्मक अनुभवों का समाहार करके उन्हें आत्मसात न कर लिया जाये और फिर इसके बाद भी, हम जब कभी नयी परिस्थितियों के रूबरू होते हैं तो नयी ज़मीन पर खड़े होकर, एक बार फिर इतिहास के साथ आलोचनात्मक रिश्ता कायम करते हैं।इतिहास, वस्तुत: अतीत के साथ वर्तमान का निरन्तर जारी संवाद होता है। इतिहासग्रस्तता से मुक्ति और नयी परिस्थितियों में भारत में सर्वहारा क्रान्ति की तैयारी – इन दोनों ही उद्देश्यों से (जो एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं), आज नक्सलबाड़ी का आलोचनात्मक पुनरावलोकन ज़रूरी है। जैसा कि हम कह चुके हैं, आज नक्सलबाड़ी और वहाँ से शुरू हुई प्रक्रिया को, उसकी ग़लतियाँ सुधारकर दुहराया नहीं जा सकता। लेकिन नक्सलबाड़ी से शुरू हुई प्रक्रिया की विफलता और विपथगमन और तज्जन्य दीर्घकालिक गतिरोध के कुछ बुनियादी कारण ऐसे भी हैं जिन्हें समझना आज बेहद ज़रूरी है। इसी उद्देश्य से यहाँ हम नक्सलबाड़ी किसान-उभार और वहाँ से शुरू हुए कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के इतिहास की चर्चा करेंगे। ज़ाहिर है कि नक्सलबाड़ी की ऐतिहासिक महत्ता और विफलता के आधारभूत कारणों की पूरे भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास की पृष्ठभूमि के बिना ठीक-ठीक शिनाख्त नहीं की जा सकती। नक्सलबाड़ी भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास का एक नया मुकाम था, पर यह उस इतिहास की निरन्तरता से विच्छिन्न कोई आकिस्मक घटना नहीं थी। यूँ कहें कि नक्सलबाड़ी और वहाँ से शुरू हुई कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धारा के सिर पर भी इतिहास का एक बोझ था, जिससे वह उबर नहीं सकी। भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास का एक नया मोड़-बिन्दु होने के बावजूद, नक्सलबाड़ी और उससे जन्मी नयी धारा ऐतिहासिक निरन्तरता के कुछ बुनियादी नकारात्मक पक्षों से मुक्त नहीं हो सकी। आगे हम देखेंगे कि इन सभी नकारात्मक पक्षों की कुंजीभूत कड़ी थी विचारधारात्मक कमज़ोरी जिससे भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन शुरू से ही ग्रस्त था। हम इस कमज़ोरी की निरन्तरता के वस्तुगत ऐतिहासिक कारण पर भी अपने कुछ अन्तिम विचार संक्षेप में रखेंगे। यह चर्चा इसलिए भी ज़रूरी है कि हम समझ सकें कि नक्सलबाड़ी और कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन की सकारात्मक-नकारात्मक – दोनों ही उपलब्धियों के लिए ऐतिहासिक संयोग-दुर्योग या कुछ व्यक्तियों की भूमिका बुनियादी नहीं थी। हाँ, नेतृत्व की भूमिका इस मायने में ज़रूर अहम थी कि इतिहास का सही-सटीक समाहार करने और ठोस परिस्थितियों का अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल तय करने का काम उसे ही करना था। हम यहाँ कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास के विस्तार में तो नहीं जा सकते, लेकिन इसके कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं और मुकामों का यहाँ पृष्ठभूमि के तौर पर उल्लेख ज़रूर करेंगे जो कहीं न कहीं नक्सलबाड़ी किसान उभार से जन्मे कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन की महत्ता और विफलता के ऐतिहासिक मूल तक पहुँचने में हमारी मदद करेंगे।

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास की कुछ बातें

: एक सामान्य परिप्रेक्ष्य

भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन का इतिहास लगभग नौ दशक पुराना है। नक्सलबाड़ी किसान उभार के समय तक यह आधी शताब्दी की यात्रा पूरी कर चुका था। इस पूरी यात्रा के दौरान इसने गौरवशाली संघर्षो और शौर्यपूर्ण बलिदानों के अनेक कीर्तिस्तम्भ स्थापित किये, लेकिन यह विचारणीय मुद्दा आज भी हमारे सामने यक्षप्रश्न की तरह खड़ा है कि राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन पर कम्युनिस्ट धारा अपना राजनीतिक वर्चस्व क्यों नहीं स्थापित कर पायी? वह भारतीय पूँजीपति वर्ग और उसकी प्रतिनिधि राजनीतिक पार्टी के हाथों से राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व क्यों नहीं छीन पायी? इसके कारण हम किसी ऐतिहासिक संयोग या कुछ व्यक्तियों की भूमिका में नहीं ढूँढ़ सकते। ऐसा करना अनैतिहासिक होगा।

बीसवीं शताब्दी के समूचे भारतीय इतिहास का यदि सिंहावलोकन किया जाये और उसके प्रमुख मोड़-बिन्दुओं की गहन पड़ताल की जाये तो कम्युनिस्ट आन्दोलन की विफलता के बुनियादी कारणों की शिनाख्त की जा सकती है। भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन की सारी कमज़ोरियों की कुंजीभूत कड़ी रही है इसकी विचारधारात्मक कमज़ोरी। इस कमज़ोरी के कारण ही, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, उस दौर में भी, जबकि यह संशोधनवाद के दलदल में नहीं जा धँसी थी और बुनियादी तौर पर इसका चरित्र सर्वहारावर्गीय था, कभी भी संगठन के बोल्शेविक उसूलों के अनुरूप इस्पाती साँचे में ढली हुई और जनवादी केन्द्रीयता पर अमल करने वाली पार्टी के रूप में काम नहीं करती रही थी। पार्टी-गठन के बाद लम्बे समय तक इसका ढाँचा ढीला-ढाला और संघात्मक बना रहा और लेनिनवादी अर्थो में इसका नेतृत्वकारी निकाय भी संगठित नहीं था। पहली बार, ब्रिटेन, जर्मनी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टियों के एक संयुक्त पत्र (मई, 1932), `कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल´ में प्रकाशित एक लेख (फ़रवरी-मार्च, 1933), और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के एक और पत्र (जुलाई, 1933) द्वारा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के ग्रुपों में बिखरे होने, ग़ैर बोल्शेविक ढाँचा एवं कार्यप्रणाली तथा पार्टी-निर्माण विषयक कार्यभारों की उपेक्षा की आलोचना करने और आवश्यक सुझाव दिये जाने के बाद, दिसम्बर 1933 में `भाकपा की अस्थायी केन्द्रीय कमेटी के केन्द्रक´ का गठन हुआ, जिसे कुछ और लोगों को सहयोजित करके बाद में केन्द्रीय कमेटी का नाम दे दिया गया। इसके बाद ढाई वर्षो तक पार्टी महासचिव पद को कामचलाऊ प्रबन्ध के तहत कोई न कोई सम्हालता रहा। अप्रैल 1936 में पी.सी. जोशी के महासचिव चुने जाने के बाद यह स्थिति समाप्त हो सकी। लेकिन इसके बाद भी पार्टी के बोल्शेविकीकरण की प्रक्रिया को कभी भी सहज ढंग से अंजाम नहीं दिया गया। पी.सी. जोशी के नेतृत्वकाल वाले दक्षिणपन्थी भटकाव के दौर में, पार्टी सदस्यता की शर्तो, कमेटी-व्यवस्था और गुप्त ढाँचे के मामले में पर्याप्त ढिलाई-लापरवाही बरती जाती थी जो 1942 में पार्टी के कानूनी घोषित किये जाने के बाद और बढ़ गयी थी। उल्लेखनीय है कि पार्टी की पहली कांग्रेस भी उसके कानूनी घोषित होने के बाद ही जाकर (23 मई-1 जून, 1943, मुम्बई) सम्भव हो सकी। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भारत के कम्युनिस्ट राज्यसत्ता के दमन एवं ग़ैरकानूनी होने की स्थितियों में पार्टी कार्यो के सुचारू संचालन के लिए बोल्शेविकों और अन्य दक्ष लेनिनवादी पार्टियों की तरह तैयार नहीं थे। एक जनवादी केन्द्रीयता वाले बोल्शेविक ढाँचे के काफ़ी हद तक अभाव के चलते ही, संशोधनवादी विपथगमन की पूर्ववर्ती अवधि में भी दो लाइनों के संघर्ष के सुसंगत संचालन का पार्टी में सदा अभाव रहा। “वामपन्थी” और दक्षिणपन्थी अवसरवादी प्रवृत्तियों का सहअस्तित्व हमेशा बना रहा, कभी एक तो कभी दूसरी लाइन पार्टी पर हावी होती रही और कभी दोनों की विचित्र खिचड़ी पकायी जाती रही। संकीर्ण गुटवाद की प्रवृत्ति केन्द्रीय कमेटी के गठन के बाद भी, हर स्तर पर निरन्तर मौजूद रही। सच कहा जाये तो पार्टी नेतृत्व ने पार्टी निर्माण को कभी एक महत्त्वपूर्ण कार्यभार माना ही नहीं। कतारों की विचारधारात्मक-राजनीतिक-व्यावहारिक शिक्षा के ज़रिये बोल्शेविकीकरण और दोष-निवारण पर कभी ज़ोर नहीं दिया गया।

यह पार्टी की विचारधारात्मक कमज़ोरी और नेतृत्व की बौद्धिक अक्षमता-विपन्नता ही थी, जिसके कारण भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्र्सवाद की सार्वजनीन सच्चाइयों को भारत की ठोस परिस्थितियों में लागू करने में हमेशा न केवल विफल रही, बल्कि ऐसा प्रयास तक करने की बजाय हमेशा ही अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व और बड़ी एवं अनुभवी बिरादर पार्टियों का मुँह जोहती रही। ज्यादातर कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल के प्रस्तावों-सर्कुलरों, उसके मुखपत्रों में प्रकाशित लेखों, सोवियत पार्टी के लेखों और ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के रजनीपाम दत्त जैसे लोगों के लेखों के प्रभाव में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी अपनी नीतियाँ और रणनीति तय करती रही। इससे अधिक त्रासद विडम्बना भला और क्या हो सकती है कि 1951 तक भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के पास भारतीय क्रान्ति का कोई कार्यक्रम तक नहीं था, केवल कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल द्वारा प्रवर्तित आम दिशा और दिशा-निर्देशों के अनुरूप लिखे गये कुछ निबन्ध, प्रस्ताव और रणकौशल एवं नीति-विषयक दस्तावेज़ मात्रा ही थे जो बताते थे कि भारत में राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति का कार्यभार सम्पन्न करना है। मुख्यत: भूमि क्रान्ति (एग्रेरियन रिवोल्यूशन) का कार्यभार होने के बावजूद, कोई भूमि कार्यक्रम (एग्रेरियन प्रोग्राम) तैयार करना तो दूर, भूमि-सम्बन्धों की विशिष्टताओं को जानने-समझने के लिए कभी कोई विस्तृत जाँच-पड़ताल तक नहीं की गयी थी। ऐसी स्थिति के होते हुए, यदि पार्टी राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन की नेतृत्वकारी शक्ति नहीं बन सकी, अनुकूल स्थितियों का लाभ उठाने से बार-बार चूकती रही और जन संघर्षो में कम्युनिस्ट कतारों की साहसिक भागीदारी और अकूत कुर्बानियाँ व्यर्थ हो गयीं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पहली बार पार्टी नेतृत्व ने, अपने एक प्रतिनिधिमण्डल की स्तालिन और सोवियत पार्टी के अन्य नेताओं से वार्ता के बाद, 1951 में एक कार्यक्रम और नीति-विषयक वक्तव्य तैयार करके जारी किया जिसे अक्टूबर, 1951 में पार्टी के अखिल भारतीय सम्मेलन और फिर दिसम्बर, 1953 में तीसरी पार्टी कांग्रेस में पारित किया गया। क्रान्ति की मंज़िल और आम दिशा के बारे में मूलत: और मुख्यत: सही होते हुए भी लोक जनवादी क्रान्ति का यह कार्यक्रम कई मायनों में अन्तरविरोधों-विसंगतियों से भरा हुआ था। भारतीय पूँजीपति वर्ग और राज्यसत्ता के चरित्र तथा भूमि सम्बन्धों के रूपान्तरण एवं समाज-विकास की आम दिशा के बारे में इस कार्यक्रम के मूल्यांकन यथार्थ से मेल नहीं खाते थे, इसे आगे चलकर समय ने एकदम स्पष्ट कर दिया। यहीं पर इस तथ्य का उल्लेख भी कर दिया जाना चाहिए कि 1955-56 के दौरान पार्टी नेतृत्व का एक हिस्सा ऐसा सोचने और कहने लगा था कि भारतीय बुर्जुआ राज्यसत्ता सामन्ती भूमि सम्बन्धों को ऊपर से, क्रमिक प्रक्रिया में (बिस्मार्ककालीन प्रशा और कमाल अतातुर्ककालीन तुर्की की तरह) रूपान्तरित करने और सामन्तवाद को नियिन्त्रात करने का काम कर रही है। लेकिन अपनी बात को साहसपूर्वक उसकी तार्किक परिणति तक पहुँचाने के बजाय उन्होंने निहायत कायराना अवसरवाद के साथ चुप्पी साध ली। बहरहाल, इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस समय तक पूरी तरह से खुली और संसदमार्गी हो चुकी पार्टी संशोधनवाद की राह पर आगे बढ़ चुकी थी और कार्यक्रम के प्रश्न पर यदि सही दिशा में कुछ सोचा भी जाता तो उसका कोई मतलब नहीं था क्योंकि संसदीय वामपन्थियों के लिए क्रान्ति का कार्यक्रम केवल कोल्ड स्टोरेज में रखने की चीज़ होता है।

अपने विचारधारात्मक दिवालियेपन के चलते भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व ने औपनिवेशिक भारत के उत्पादन-सम्बन्धों और अधिरचना के सभी पहलुओं (जिनमें जाति व्यवस्था, स्त्री प्रश्न और राष्ट्रीयताओं का प्रश्न भी आता है) का ठोस अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल के निर्धारण की कोई स्वतन्त्र कोशिश वस्तुत: की ही नहीं और अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व और बड़ी बिरादर पार्टियों के आकलनों के हिसाब से ही हमेशा निर्णय लेता रहा। ऐसी स्थिति में वह संयुक्त मोर्चा, मज़दूर आन्दोलन और अन्य प्रश्नों पर बार-बार दो छोरों के भटकाव का शिकार होता रहा। ज़ाहिर है कि ऐसे में अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में समय-समय पर पैदा होने वाले विचलन और भारत-विषयक ग़लत या असन्तुलित मूल्यांकन भी भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन को प्रभावित करते रहे। इस स्थिति की तुलना यदि हम चीन से करें तो बात और अधिक स्पष्ट हो जाती है। चीन में 1921 में कम्युनिस्ट पार्टी ने एक निहायत कमज़ोर ज़मीन पर छोटी-सी ताकत और वैचारिक अधकचरेपन के साथ शुरुआत की थी। लेकिन शुरू से ही चीन की पार्टी ने पार्टी-निर्माण के कार्यभारों पर – पार्टी के बोल्शेविकीकरण पर, कतारों की राजनीतिक शिक्षा पर, पार्टी कमेटियों के सुदृढ़ीकरण एवं कार्यप्रणाली पर, अनुशासन एवं अन्तर्पाटी जनवाद पर विशेष ज़ोर दिया। चीनी पार्टी लगातार दो लाइनों के बीच संघर्ष के द्वारा आगे विकसित हुई। वह अपनी ग़लतियों से सीखने में सक्षम थी और इसीलिए पराजय या विफलताओं के झटके कभी उसकी कमर नहीं तोड़ पाये। माओ त्से-तुन्ग ने कोमिण्टर्न द्वारा निर्धारित उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में लोक जनवादी कार्यक्रम की आम दिशा को स्वीकारते हुए, चीन की विशिष्ट स्थितियों के ठोस अध्ययन के आधार पर चीनी भूमि क्रान्ति के ठोस रूप और नारे तय किये, चीनी पूँजीपति वर्ग के दलाल और राष्ट्रीय हिस्सों की मौलिक ढंग से पहचान की तथा नवजनवादी क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल तथा दीर्घकालिक लोकयुद्ध के क्रान्ति-पथ की ठोस रूपरेखा तैयार की। ऐसा करते हुए कई बार उनके विचार कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल और स्तालिन के चीनी क्रान्ति विषयक सुझावों से कदापि मेल नहीं खाते थे, पर अपने देश की ठोस परिस्थितियों के ठोस अध्ययन और व्यवहार से निकले निष्कर्षो को साहसपूर्वक प्रस्तुत और लागू करने में उन्होंने कभी कोई हिचक नहीं दिखायी। चीनी क्रान्ति की सफलता के पीछे यही बुनियादी कारण था और इसी विशिष्टता का हमें भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के नेतृत्व में नितान्त अभाव दीखता है। 1949 में चीनी नवजनवादी क्रान्ति की निर्णायक विजय होने तक भारत की कम्युनिस्ट पार्टी अभी भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम तक प्रस्तुत नहीं कर पायी थी। हाँ, अब मुँह जोहने और अनुकरण करने के लिए उसे एक और बड़ी बिरादर पार्टी ज़रूर मिल गयी थी। चूँकि माओ त्से-तुन्ग के नेतृत्व में चीन की पार्टी ने ही खुर्श्चेवी संशोधनवाद के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष चलाया, इसलिए 1960 के दशक में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से बाहर आये कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के नये नेतृत्व को यह सर्वथा उचित लगा कि वह चीनी पार्टी द्वारा प्रतिपादित विश्व सर्वहारा क्रान्ति की आम दिशा के दस्तावेज़ के ही हिसाब से भारत में भी साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधी क्रान्ति की मंज़िल मान ले और उत्पादन सम्बन्धों, वर्गीय संरचना और राज्यसत्ता के चरित्र के अध्ययन की कोई जहमत न उठाये। उससे भी आगे बढ़कर, चीनी पार्टी के भारत-विषयक आकलनों को हूबहू अपना लेने के बाद, क्रान्ति-पूर्व चीन जैसी ही वर्गीय संरचना की कल्पना करके चीनी क्रान्ति के मार्ग को हूबहू लागू करने की घोषणा करते हुए भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा-ले) ने भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन की पुरानी परम्परा को ही आगे बढ़ाया था। इस स्थिति में बदलाव की सम्भावना तब और धूमिल हो गयी, जब पुरानी परम्परा के ही अनुसार, पेण्डुलम संशोधनवाद से हटता हुआ “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के दूसरे छोर तक जा पहुँचा और फिर उसके बाद “वामपन्थी” और दक्षिणपन्थी अवसरवाद के सहअस्तित्व के लम्बे दौर की शुरुआत हो गयी। बहरहाल, इस दौर की चर्चा हम आगे विस्तार से करेंगे।

यहाँ पर यह प्रश्न उठाना भी स्वाभाविक है कि भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन की बौद्धिक विपन्नता के वस्तुगत ऐतिहासिक कारण आखिरकार क्या थे? हालाँकि इस प्रश्न का सुसंगत उत्तर विस्तृत ऐतिहासिक-सामाजिक पड़ताल की माँग करता है, जो इस निबन्ध की सीमाओं को देखते हुए यहाँ सम्भव नहीं है। फिर भी भारत के कम्युनिस्ट नेतृत्व की विचारधारात्मक कमज़ोरी और अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व या बड़ी बिरादर पार्टियों का मुँह जोहने की प्रवृत्ति के सर्वाधिक मूलभूत कारण का संक्षिप्त उल्लेख तो यहाँ किया ही जा सकता है। किसी भी देश में कम्युनिस्ट आन्दोलन अचानक शून्य से नहीं पैदा हो गया और उसकी सफलता-असफलता या उसके नेतृत्व की परिपक्वता-अपरिपक्वता महज़ इत्तफ़ाक नहीं था। इन सबके पीछे देश-विशेष के इतिहास में वर्ग-संघर्ष के सुदीर्घ, गतिमान सिलसिले और उससे नि:सृत बौद्धिक-सांस्कृतिक विरासत की निरन्तरता का महत्त्वपूर्ण योगदान था। वैज्ञानिक समाजवाद का जन्म यदि यूरोप में हुआ और सबसे पहले उसने यूरोपीय मज़दूर-आन्दोलन में जड़ें जमायीं, तो इसके ऐतिहासिक वस्तुगत कारण थे। पुनर्जागरण काल ने मध्ययुगीन जड़ता को तोड़कर इतिहास की जिस तीव्र वेगवाही यात्रा की शुरुआत की थी, वह बीच के कुछ उत्क्रमणों-विपर्ययों की दशाब्दियों को छोड़कर, निरन्तर जारी रही और प्रबोधन काल और पूँजीवादी जनवादी क्रान्तियों के दौरों से होती हुई उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक आ पहुँची, जहाँ बुर्जुआ वर्ग द्वारा  धूल में फेंक दिये गये मुक्ति के लाल झण्डे को सर्वहारा वर्ग ने उठा लिया और वर्ग-संघर्ष के नये ऐतिहासिक युग में वैज्ञानिक समाजवाद उसका मार्गदर्शक सिद्धान्त बना। यूरोपीय मज़दूर वर्ग को विगत चार शताब्दियों के इतिहास की प्रचण्ड गतिमानता ने समृद्ध बौद्धिक-दार्शनिक विरासत से लैस किया था। मुख्यत: उपनिवेशों की लूट से घूस खाकर यूरोपीय मज़दूर वर्ग का उन्नत हिस्सा जब कुलीन और सुविधाजीवी हो गया तो क्रान्ति के तूफ़ानों का केन्द्र पश्चिम से पूर्व की ओर स्थानान्तरित होने लगा और पहली सर्वहारा क्रान्ति रूस में हुई जो पूर्व-पश्चिम सेतु पर स्थित था। रूस एक ऐसा देश था जो जारशाही निरंकुशता और सामन्ती भूदासता की बेड़ियों में जकड़ा था, पर वहाँ पूँजीवाद का क्रमिक मन्थर विकास भी जारी था। वह कमज़ोर, उत्पीड़ित राष्ट्रों का जेलखाना और विशाल सैन्य शक्ति से सम्पन्न था, लेकिन पश्चिमी यूरोपीय देशों के शोषण का शिकार भी था। विकसित यूरोप की पूँजी का चरागाह होने के बावजूद वह एक स्वतन्त्र देश था जो स्वयं पड़ोसी पूर्वी यूरोपीय देशों का उत्पीड़क था। रूस में पूरब का पिछड़ापन और बर्बर शोषण-उत्पीड़न भी था और वहाँ का बौद्धिक समाज यूरोप के वैचारिक केन्द्रों की दार्शनिक-सांस्कृतिक-वैज्ञानिक सरगर्मियों से जीवन्त रूप से जुड़ा हुआ था। रूस कभी गुलाम नहीं बना, अपने अतीत से कभी विच्छिन्न नहीं हुआ और उसे अपने पिछड़ेपन का अहसास भी था। इसी ज़मीन पर उन्नीसवीं शताब्दी में रूस के महान क्रान्तिकारी यथार्थवादी साहित्यकार और बेलिंस्की, हर्ज़न, चेर्नीशेव्स्की, दोब्रोल्यूबोव आदि जैसे महान क्रान्तिकारी जनवादी दार्शनिक पैदा हुए। लेनिन और उनके सहयोद्धाओं की पीढ़ी को यह महान वैचारिक-सांस्कृतिक सम्पदा विरासत के तौर पर मिली थी जिसने उन्हें स्वतन्त्र तर्कणा का साहस दिया था। चीन अपनी तमाम मध्ययुगीन जड़ता और एशियाई सुस्ती के बावजूद, अपनी स्वतन्त्र आन्तरिक गति की निरन्तरता से कभी पूर्णत: विच्छिन्न नहीं हुआ था। कई साम्राज्यवादी देशों की लूट और आंशिक कब्ज़ों के बावजूद तथा कई पराजयों के बावजूद, चीन कभी पूर्णत: औपनिवेशिक गुलामी का शिकार नहीं हुआ। इसीलिए, वहाँ यदि एक दलाल पूँजीपति वर्ग था तो एक राष्ट्रीय पूँजीपति वर्ग भी था। यदि बुद्धिजीवी समाज का एक हिस्सा बौद्धिक उपनिवेशन का शिकार था, तो दूसरा, स्वतन्त्र चिन्तन का साहस रखने वाला राष्ट्रवादी हिस्सा भी था। बौद्धिक-वैचारिक सम्पदा की दृष्टि से चीन विगत कुछ शताब्दियों के दौरान पीछे छूट गया था, लेकिन गुलाम नहीं होने के कारण सुदूर अतीत की बौद्धिक-वैचारिक सम्पदा से चीन के राष्ट्रवादी बौद्धिक समाज का सम्बन्ध टूटा नहीं था और पश्चिम के अवदानों को सम्मोहित दास भाव से ग्रहण करने की प्रवृत्ति से भी वह मुक्त था। साथ ही, चीन के कम्युनिस्ट आन्दोलन को डा. सुन यात-सेन और 1911 की अधूरी जनवादी क्रान्ति की विरासत भी मिली थी। यही कारण था कि निहायत कमज़ोर विचारधारात्मक ज़मीन से शुरुआत करने के बावजूद, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व का मुँह जोहने और भक्तिभाव से निर्देश-पालन के बजाय अपने देश की ठोस परिस्थितियों का विश्लेषण करके चीनी क्रान्ति का स्वरूप एवं मार्ग स्वयं निर्धारित करने का साहस किया।

भारत का प्राचीन इतिहास तूफ़ानी सामाजिक संघर्षो से भरा हुआ और विपुल दार्शनिक-सांस्कृतिक सम्पदा से समृद्ध रहा था। सुदीर्घ मध्यकालीन गतिरोध के टूटने के संकेत (पूँजीवादी विकास और निर्गुण भक्ति आन्दोलन से लेकर सतनामी विद्रोह जैसे किसान संघर्षो तक के रूप में) अभी मुखर हो ही रहे थे कि इसके उपनिवेशीकरण की शुरुआत हो गयी जो एक शताब्दी के दौरान (उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक) पूरी हो गयी। उपनिवेशीकरण ने भारतीय समाज की स्वतन्त्र आन्तरिक गति को पूरी तरह से नष्ट करके इसके ऊपर एक औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना आरोपित कर दी। इस आरोपित औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के घटक नये वर्ग इतिहास की अभिशप्त सन्तानें थे। भारतीय पूँजीपति वर्ग और भारत के बुद्धिजीवी किसी पुनर्जागरण और प्रबोधन की प्रक्रिया से विकसित नहीं हुए थे। वे ऐतिहासिक जड़ों से विच्छिन्न और औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना की उपज थे। यही कारण था कि भारतीय पूँजीपति वर्ग के किसी रैडिकल हिस्से ने भी कभी कोई क्रान्तिकारी संघर्ष नहीं किया और समूचे पूँजीपति वर्ग ने उपनिवेशवाद के विरुद्ध आद्यन्त `समझौता-दबाव-समझौता´ की नीति अपनाई तथा जन संघर्षो और विश्व परिस्थितियों का लाभ उठाकर सत्ता हासिल की। उसके इस व्यवहार ने उसे जनता के साथ छल करने और शासन चलाने की करिश्माई कुटिलता तो सिखाई, लेकिन दार्शनिक-वैचारिक सम्पदा के मामले में वह कंगाल ही था। भारतीय बुद्धिजीवी समुदाय का जो हिस्सा रैडिकल राष्ट्रीय जनवादी था, उसके राष्ट्रवाद और जनवाद को भी तर्कणा और भौतिकवाद की वह समृद्ध ज़मीन हासिल नहीं थी, जैसी यूरोपीय या रूसी बुद्धिजीवी वर्ग को थी। साथ ही, औपनिवेशिक मानसिकता के चलते स्वतन्त्र चिन्तन के बजाय यूरोप का अन्धानुकरण या अतीत की ज़मीन पर खड़े होकर यूरोपीय ज्ञान सम्पदा का कुंठित अन्ध-विरोध भारतीय  बुद्धिजीवियों की आम प्रवृत्ति थी। भारत के मज़दूर वर्ग के सामने विरासत के तौर पर अपनाने के लिए बुर्जुआ पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की कोई सम्पदा नहीं थी। मध्यवर्गीय रैडिकल राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों का जो हिस्सा वैज्ञानिक समाजवाद के विचारों का कायल होकर मज़दूर आन्दोलन से जुड़ा, वह भी औपनिवेशिक सामाजिक संरचना में जन्मे होने के ऐतिहासिक अभिशाप से मुक्त नहीं था। उसके पास न तो ऐतिहासिक निरन्तरता का बोध था, न ही किसी भी देश की क्रान्ति या वर्ग-संघर्ष के विचारधारात्मक सारतत्त्व को आसवित करने और अपने देश की ठोस परिस्थितियों का अध्ययन करके उनमें उसे लागू करने का बौद्धिक विवेक एवं साहस था। मज़दूर आन्दोलन में वैज्ञानिक समाजवादी विचारधारा को लाने वाले इन बुद्धिजीवियों ने यही विरासत भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के नेतृत्व को दी जिससे वह आज तक मुक्त नहीं हो सका है। औपनिवेशिक मानस भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के नेतृत्व में इस रूप में मौजूद रहा है कि सफल क्रान्तियों, उन्हें नेतृत्व देने वाली पार्टियों एवं उनके नेताओं तथा अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व का अन्धानुकरण लगातार, कमोबेश इसकी एक आम प्रवृत्ति रही है।

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के नेतृत्व के चिन्तन में मौलिकता, साहस और गहराई के अभाव के जिस कारण की हमने ऊपर चर्चा की है, ज़ाहिर है कि वह एकमात्र कारण नहीं है। अन्य अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन उपरोक्त कारण एक बुनियादी वस्तुगत ऐतिहासिक कारण है, इतना हम विश्वासपूर्वक कह सकते हैं। यह एक अप्रिय सत्य है, लेकिन उस ज़मीन को पहचानना बेहद ज़रूरी है, जिस पर खड़े होकर हमें नयी शुरुआत करनी है। औपनिवेशिक अतीत की इस ज़मीन को पहचानकर हम उसके अभिशापों से आज अधिक सुगमता से मुक्त हो सकते हैं क्योंकि उस अतीत को हम आधी सदी पीछे छोड़ आये हैं। औपनिवेशिक या यान्त्रिक भौतिकवादी इतिहास-दृष्टि से मुक्त होकर भारतीय इतिहास का अध्ययन करने के लिए परिस्थिति भी आज अधिक अनुकूल है। दूसरे, आज की दुनिया में देश-विदेश की ऐतिहासिक सीमाओं से मुक्त होकर सोचने और विश्व बौद्धिक सम्पदा को आत्मसात करने के लिए अधिक अनुकूल वस्तुगत परिस्थिति है। तीसरे, आज ऐसा कोई अन्तरराष्ट्रीय केन्द्र या नेतृत्व या समाजवादी देश नहीं है, जिसका अन्धानुकरण किया जा सके, इसलिए परिस्थितियाँ स्वयं अपनी राह ढूँढ़ने के लिए बाध्य कर रही हैं। चौथे, देश-दुनिया के हालात में बदलाव इतने स्पष्ट हैं कि आधी सदी पहले की किसी क्रान्ति की नकल करने की कोशिश सिर्फ़ कोई जड़मति ही करेगा। यानी स्वतन्त्र रूप से ठोस परिस्थितियों के ठोस विश्लेषण के लिए परिस्थितियाँ आज अधिक अनुकूल हैं। नक्सलबाड़ी का समाहार करते हुए मूल प्रसंग से कुछ हटकर यह ऐतिहासिक चर्चा इसी आशा के साथ की गयी है कि नयी सदी की नयी सर्वहारा क्रान्तियों के इस दौर में भारत के सर्वहारा क्रान्तिकारियों की नयी पीढ़ी अतीत से सबक ले और भारतीय कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन को एक नयी दिशा दे।

पृष्ठभूमि के तौर पर इस चर्चा के बाद हम अब मुख्य विषय पर लौटते हैं। नक्सलबाड़ी किसान संघर्ष की कोख से जन्मे भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन या मार्क्सवादी-लेनिनवादी धारा के सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं के विश्लेषण-समाहार से पहले संक्षेप में यह जान लेना ज़रूरी है कि भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के भीतर वे परिस्थितियाँ किस रूप में तैयार हुई कि कम्युनिस्ट कतारों का बड़ा हिस्सा संशोधनवाद से विच्छेद और संशोधनवादी नेतृत्व से विद्रोह करने की स्थिति तक जा पहुँचा, नक्सलबाड़ी किसान उभार जिसका निमित्त बना। साथ ही, नक्सलबाड़ी में विस्फोट की परिस्थितियाँ किस रूप में तैयार हुई, किसान-उभार का ज्वार किस प्रकार उठा और आगे बढ़ा, इन तथ्यों और घटना-क्रम से भी, संक्षेप में परिचित हो लेना ज़रूरी है। …..जारी

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-2

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-3

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-4

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-7. विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

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7. विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

“विनिमय का अपना अलग इतिहास है और यह विकास के विभिन्न मंजिलों से होकर गुजरा है. एक वक्त था, उदाहरण के लिए मध्ययुग में, जब केवल फ़ाजिल चीजों यानि केवल उन चीजों का जो जनता की ज़रूरतों से अधिक उत्पादित होती थीं, का विनिमय किया जाता था. दूसरा वक्त आया जब न केवल उत्पादन का अधिशेष बल्कि उद्योग का सम्पूर्ण उत्पाद वाणिज्य के क्षेत्र में पहुँचने लगा. यह वह वक्त था जब उत्पादन पूर्णतया विनिमय पर निर्भर हो गया था. अंत में वह दिन भी आ गया जब उन चीजों का जिन्हें पहले अहस्तान्तरणीय समझा जाता था, विनिमय और मोल-टोल होने लगा. वास्तव में वे चीजें बेचीं भी जाने लगी. वे चीजें भी जो अभी तक सौंपी जाती थीं, विनिमय नहीं की जाती थीं, दी जाती थीं, बेची नहीं जाती थीं – सतीत्व, प्रेम, अभिमत, विज्ञानं, अंतरात्मा आदि – वाणिज्य के हवाले कर दी गयीं. यह बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार और सार्विक धन -लोलुपता का वक्त है या राजनितिक अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो यह एक ऐसा वक्त है जबकि हर चीज़ चाहे भौतिक हो या आत्मिक, बिक्री योग्य माल बन गयी है, उचित मूल्य-निर्धारण हेतु बाज़ार में ले जायी जा रही है.” ((मार्क्स, द पॉवर्टी ऑफ फिलासफी, बीपीएच, कलकत्ता, पृ. 26)

“जब किसी माल में विनिमय-मूल्य को संभाले रखने और जमा करने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है, तब मुद्रा के प्रति लालच का जन्म होता है. मालों का परिचलन बढ़ने के साथ मुद्रा की, अर्थात उस सर्वथा सामाजिक रूप की जिसका हर वक्त इस्तेमाल किया जा सकता है, शक्ति बढती जाती है. १५०३ में जैमाका से लिखे पत्र में कोलंबस बताते हैं : “सोना एक आश्चर्यजनक वस्तु है. जिसके पास पास है वह जो भी चाहे हासिल कर सकता है. सोना आत्माओं के स्वर्ग तक जाने का रास्ता बना सकता है.” मुद्रा चूंकि यह खुलासा नहीं करती है कि कौनसी चीज़ उसमें रूपांतरित हुई है, इसलिए हर चीज़ चाहे वह माल हो या न हो, सोने से बदली जा सकती है. हर चीज़ बिकाऊ बन जाती है और हर चीज़ खरीदी जा सकती है. परिचलन वह विशाल सामाजिक दहनपात्र बन जाता है जिसमें हर चीज़ डाली जाती है और जिसमें से हर चीज़ मुद्रा का रूप धारण करके निकल आती है. यहाँ तक कि संतों की हड्डियाँ तक इस कीमियागिरी के सामने नहीं ठहर पाती हैं. इसमें से ज्यादा नाजुक चीजें, वे पवित्र चीजें जो मनुष्यों के व्यापारिक लेन-देन से बाहर हैं, तो इस कीमियागिरी के सामने और भी कम ठहर पाती हैं. जिस प्रकार मालों के बीच मात्रात्मक भिन्नता का लोप मुद्रा में हो जाता है उसी प्रकार मुद्रा बेरहमी से सबकुछ सपाट कर देने वाला, अपनी ओर से हर तरह के भेदभाव समाप्त कर देती है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, अंग्रेजी संस्करण, 112-13) capital

औद्योगिक क्रांति की पूर्वसंध्या पर ब्रिटेन में विद्यमान काव्यात्मक और पितृसत्तात्मक संबंधो को एंगेल्स ने अपनी कृति इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की दशा (द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, लंदन, 1892) में भली-भांति चित्रित किया है. १८४५ में लिखते समय इस पुस्तक में वह उन बुनकरों का चित्र प्रस्तुत करते हैं जो अभी भी भूमि के छोटे टुकड़े पर मालिकाना हक़ रखे हुए थे : “मेहनतकशों के इस वर्ग का नैतिक और बौद्धिक जीवन किस तरह का था , इसका अनुमान लगाने के लिए कल्पना की उड़ान की आवश्यकता नहीं है. वे शहर से कटे रहते थे जहाँ वे कभी नहीं जाते थे (क्योंकि घुमंतू एजेंट उनसे धागा और कपड़ा खरीद लेते थे और बुनकरों को इसके बदले में मजदूरी दे दिया करते थे). यहाँ तक कि साड़ी जिंदगी शहर के पास गुजारने के बावजूद, अपने बुढापे में वे कहा करते थे कि उन्होंने वहां अभी तक कदम नहीं रखा. यह स्थिति तब तक चलती रही जब तक कि मशीन के प्रवेश ने उन्हें आजीविका के साधन से वंचित नहीं कर दिया और उन्हें रोजगार की खोज में शहर जाने को मजबूर नहीं कर दिया. बुनाई के काम से मिली छुट्टी के दौरान वे अपनी छोटी जोत में खेती करते थे जिसकी वजय से उनका बौद्धिक और नैतिक स्तर अपने इलाके के भूधर किसान से मिलता-जुलता था जिससे वे स्वेच्छा से मेल-जोल बढाते और सर्वाधिक आत्मीयता के सम्बन्ध बनाए रखते थे. अपने इलाके के प्रमुख भूस्वामी ज़मींदार को वे सहज ही अपना श्रेष्ठ समझते थे. वे अपने छोटे-मोटे झगड़ों के निपटारे के लिए उससे सलाह लेने जाते और इस पूज्य सम्बन्ध को बनाये रखने के लिए उसे यथोचित सम्मान भी देते थे. वे ‘सम्मानीय लोग’ माने जाते थे जो अच्छे पति और पिता हुआ करते थे. वे सदाचारी जीवन बिताया करते थे क्योंकि उन्हें अनैतिक बना देने वाला कोई प्रलोभन मौजूद नहीं था यदि यह तथ्य ध्यान में रखा जाये कि उन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में शराबखाने और चकले नहीं हुआ करते थे. और चूंकि मेरा मेज़बान जिसके भटियारखाने में वे कभी-कभार अपना गला तर करने जाते थे, उन्हीं की तरह “भला” आदमी, या शायद असामी किसान होता जिसे अपनी अच्छी बियर अपनी अच्छी श्रेणी पर गर्व हुआ करता और जो छुट्टी के दिन या त्यौहार पर अपनी दूकान बंद कर देने की सावधानी बरतता. बच्चे घर पर रखे जाते थे, उन्हें आज्ञापालन की शिक्षा दी जाती थी और उनका लालन-पालन परमेश्वर पर श्रद्धा बनाये रखने वाले माहौल में किया जाता. जब तक नौजवान अविवाहित रहते, यह पितृसत्तात्मक सम्बन्ध उन्हें दृढ़ता से बांधे रखता था. विवाह होने तक बच्चे ग्रामीण सादगी और अपने बाल सखाओं के निकट साहचर्य में रहकर बड़े होते थे. यद्यपि विवाह के पहले स्त्री-पुरुष के बीच अन्तरंग संबंध कायम होना लगभग सामान्य था तो भी इन जोड़ों के बीच यह बात बिलकुल साफ़ हुआ करती थी कि यह वैवाहिक समारोह का पूर्वाभ्यास मात्र है जिसे कालांतर में संपन्न कर दिया जाता था. संक्षेप में,उन दिनों अंग्रेज़ कारीगरों और शिल्पकारों की सक्रीय जिंदगी और सेवा-निवृति का वक्त एकांत में, बौद्धिक गतिविधि और प्रचंड व्याकुलता का उनकी जीवन-शैली में कोई स्थान लिए बिना, बीत जाता था जो आज भी (1845) जर्मनी के कुछ हिस्सों में पाया जाता है. शायद ही कभी उन्हें पढना आता और बिरले ही वे लिखना जानते. वे नियमित रूप से गिरजाघर जाते थे, कभी भी राजनीती पर बात नहीं करते थे, कभी भी कोई सामूहिक षड़यंत्र नहीं रचते थे, गंभीर चिंतन के लिए वक्त नहीं निकालते थे, शारीरिक रंगरेलियों और क्रीडाओं को बहुत पसंद करते थे, बाइबिल के प्रवचन को पारम्परिक श्रद्धा के साथ सुनते थे और अपने से श्रेष्ठों को पूरी नम्रता के साथ नीचे झुककर और श्रद्धापूर्वक सम्मान देते थे. लेकिन बौद्धिक दृष्टिकोण से वे मृत थे, जिंदगी से उनका सरोकार अपने संकीर्ण हितों, अपने करघे और अपने छोटे बगीचे तक सीमित थे और उनकी सीमित दुनिया के पार समग्र मानवता को आलोड़ित करने वाले प्रचंड आन्दोलन की कोई समझ नहीं थी. वे अपने शांत और निष्क्रिय जीवन के आदी हो गये थे. यदि औद्योगिक क्रांति नहीं हुई होती, तो उन्हें उस जिंदगी से निजात नहीं मिलती जो रूमानी किस्म की मोहकता के बावजूद मानवीय अस्तित्व के लायक नहीं थी. सच्चाई यह है कि वे इन्सान नहीं थे बल्कि मात्र मशीन बन गये थे जो उन कुलीनों के एक छोटे से समूह की सेवा कर रही थी जोकि अभी तक इतिहास का आधार रहे थे. (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ 2-4) The Condition of the Working Class in England — Frederick Engels

पूंजीवादी समाज का प्रधान घटक, नकद भुगतान, बुर्जुआ की मनोवृत्ति का प्रमुख प्रेरक तत्त्व है. इसलिए इस नारे “मुद्रा को बटुवे में रख लो” का जन्म हुआ. एंगेल्स निम्न पंक्तियों में इसका सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं : “जब तक उसके मजदूर अपने जीते जी उसके लिए प्रचुर धन अर्जित करते रहते है, अंग्रेज़ बुर्जुआ को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे भूख से मर रहे हैं या नहीं. हर चीज़ की कीमत मुद्रा में आंकी जाती है और हर वह चीज़ जो मुद्रा न अर्जित कर पाती हो उसे उपहासास्पद, अव्यवहारिक और विचारधारात्मक मूर्खता समझा जाता है…उसके लिए मजदूर इन्सान न होकर मात्र एक ‘कारीगर’ होता है और मजदूर के सामने भी बुर्जुआ उनकी चर्चा इसी तरह करता है. जैसाकि कार्लाईल कहते हैं कि बुर्जुआ यह मानता है कि “नकद भुगतान एक इन्सान और दूसरे इन्सान के बीच का एक मात्र सम्बन्ध है.” यहाँ तक कि वह बंधन जो पति को पत्नी के साथ बाँधता है, सो में से निन्यानबे मामलों में नकद मुद्रा के रूप में व्यक्त किया जा सकता है. दासत्व की दयनीय स्थिति जो मुद्रा ने बुर्जुआ पर थोपी है, उसने अंग्रेजी भाषा पर भी अपनी छाप छोड़ दी है. यदि आप यह बताना चाहते हैं कि किसी व्यक्ति के पास 10,000 पाउंड हैं तो उसे इस तरह कहा जाता है कि ‘अमुक व्यक्ति की कीमत 10,000 पाउंड है.’ जिसके पास धन होता है वह ‘सम्मानीय समझा जाता है और तदनुसार उसे महत्त्व दिया जाता है : उसकी गणना बेहतर किस्म के लोगों’ में की जाती है और वह ज्यादा असर डालता है. वह जो कुछ भी करता है उसके साथियों के लिए मानक बन जाता है. यह अवांछित मनोवृत्ति सारी भाषा में समां गयी है. सभी सम्बन्धों को व्यापारिक शब्दावली से उधार लिए गए शब्दों में व्यक्त किया जाता है और इसका समाहार आर्थिक श्रेणियों में किया जाता है. आपूर्ति और मांग का सूत्र अंग्रेजों के समग्र जीवन दृष्टिकोण को व्यक्त करता है. इसलिए मानवीय गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र में स्वतन्त्र प्रतिस्पर्द्धा का होना आवश्यक है, इसलिए शासन, चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में अवरोधहीनता और अहस्तक्षेप की नीति का पालन आवश्यक है. जल्दी ही अहस्तक्षेप की नीति धर्म के क्षेत्र में प्रवेश कर जायेगी क्योंकि जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा है राजकीय चर्च का चुनौतीरहित प्राधिकार ज़्यादा तेज़ी से ध्वस्त होता जा रहा है.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ 277)

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-6. बुर्जुआ वर्ग का राजनितिक विकास

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6. बुर्जुआ वर्ग का राजनितिक विकास

यहाँ पर लेखकों का मंतव्य सर्वप्रथम और प्रमुख रूप से फ्रांसीसी बुर्जुआ के राजनितिक विकास पर विचार करना है. अन्यंत्र मार्क्स लिखते हैं : “बुर्जुआ वर्ग के इतिहास को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है. पहले चरण के दौरान सामंती व्यवस्था और निरंकुश राजतन्त्र के अधीन बुर्जुआ वर्ग के रूप में विभेदीकृत होता है. दूसरा चरण तब आता है जब यह वर्ग के रूप में पहले से ही संगठित हो जाता है, सामंती सामाजिक व्यवस्था और राजतन्त्र को उखाड़ फेंकता है और पुरानी व्यवस्था के स्थान पर बुर्जुआ व्यवस्था स्थापित कर लेता है. पहले चरण को दूसरे चरण की अपेक्षा ज्यादा वक्त लगा और अपनी कार्यसिद्धि के लिए अधिक उर्जा व्यय करनी पड़ी”. (मार्क्स, द पॉवर्टी ऑफ फिलासफी, बीपीएच, कलकत्ता, पृ.136-37)  [The Poverty of Philosophy Answer to the Philosophy of Poverty by M. Proudhon]

बाहरवीं और तेरहवीं शताब्दी में, फ्रांसीसी कम्यून सामंती जागीरदारों के खिलाफ संघर्ष में उलझे हुए थे और सामंतों की बीच झगडों का उसने फायदा उठाया. (जिसकी एंगेल्स घोषणापत्र के बाद के संस्करणों की टिपण्णी में बताते हैं कि “कम्यून” नाम इटली और फ्रांस के शहरी समुदायों ने तब अपनाया था जब उन्होंने सामंती स्वामियों से स्व-शासन का अधिकार क्रय कर लिया था.) चौदहवीं शताब्दी के प्रारन्भिक वर्षों में उन्होंने स्टेट्स जनरल के प्रतिनिधित्व की मांग की. इस सभा को पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करना था. 1356 से 1358 तक पेरिस के व्यापारियों के अध्यक्ष एतियन मार्सेल (मृत्यु 1358) के नेतृत्व में, पेरिस के बुर्जुआ ने स्टेट्स जनरल को वास्तविक प्रातिनिधिक संस्था में बदलने की कोशिश की जिसकी बैठक, राजा के बुलावे की प्रतीक्षा किये बिना निर्धारित अवधि पर की जा सके. निरंकुश सम्राट ने विभिन्न श्रेणियों (पुरोहित वर्ग,कुलीन वर्ग आदि  के बीच मतभेदों का फायदा उठाकर बुर्जुआ पक्ष से समझौता कर लिया. बुर्जुआ वर्ग “थर्ड एस्टेट” (राज्य का तीसरा स्तम्भ), कर-योग्य श्रेणी, केंद्रीकृत राजतान्त्रिक राज्य का एक मान्यता-प्राप्त अंग बन गया जिसने राजकीय तंत्र का उपयोग व्यापारिक और औद्योगिक विकास के हित में करने के लिए अपनी सारी शक्ति केन्द्रित कर दी. इस आन्दोलन के शीर्ष पर वे बुर्जुआ धन्नासेठ थे जिन्होंने उन दरबारी कुलीनों के साथ मिलकर जो समर्थन के लिए इस उभरती ताकत की ओर उन्मुख हो गए थे, राजतंत्रीय शक्ति का उपयोग अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति के एक साधन के रूप में करने की कोशिश की. इस नीति की असफलता ने, क्योंकि यह मेहनतकश जनता के निर्मम शोषण और निम्न-बुर्जुआ हितों की पूर्ण उपेक्षा पर आधारित थे, महान फ्रांसीसी क्रांति का रास्ता साफ़ कर दिया जो अठारहवीं शताब्दी के अंत में भड़क उठी थी. नेपोलियन के मध्यवर्ती शासन (1815 में समाप्त हो गया था) और बूर्बो वंश की पुनप्रतिष्ठा के बाद 1830 में क्रांति हुई और “जुलाई राजतन्त्र” की स्थापना हुई जोकि बुर्जुआ मताधिकार पर आधारित संसदीय सरकार का क्लासिकीय रूप था.

नीदरलैंड में, नागरिकों, ने सामंती संस्थाओं के खिलाफ अविराम संघर्ष किया.यह संघर्ष कभी-कभी वास्तविक गृह-युद्ध (उदाहरण के लिए 1324 का वाइप्रे और ब्रूगे के नेतृत्व में फ्लेमिश नगरों का विद्रोह जो कई वर्षों तक चला)  का रूप धारण कर लेता था. सोलहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश के दौरान नीदरलैंड के बुर्जुआ ने मध्यवर्ती और निम्न कुलीनों के सहयोग से हैप्सबर्ग वंश के शासन के खिलाफ राष्ट्रीय विद्रोह का नेतृत्व किया और लम्बे और तीखे संघर्ष के बाद लोलैंड ने विदेशी शासन से स्वतंत्रता प्राप्त कर ली. नीदरलैंड पहला बुर्जुआ राज्य बना और सत्रहवीं शताब्दी के बाद से ही अन्य सभी बुर्जुआ राज्यों के लिए मॉडल बन गया जोकि कालांतर में पश्चिमी यूरोप में स्थापित हुए.

इटली के स्वतन्त्र नगर गणराज्य, भूस्वामी कुलीनों के शासन के जुवे को उतार फेंकने के बाद, धीरे-धीरे व्यापारिक और औद्योगिक अल्पतन्त्र का रूप धारण करने लगे. लेकिन उत्तरी इटली की व्यापारिक प्रधानता (जहाँ पर व्यापारिक पूंजीवाद का विकास यूरोप के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा पहले हो गया था) के ह्नास के साथ-साथ नगरों में पूंजीवाद के विकास में गतिरोध आ गया. इस प्रकार इन व्यापारिक नगरों ने अपना पहले वाला महत्त्व खो दिया और उन्नीसवीं शताब्दी में ही इतालवी बुर्जुआ के सुदृढीकरण की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू हो पाई.

ग्रेट ब्रिटेन में नगरीय समुदाय ने संसदीय प्रतिनिधित्व बहुत अरसा पहले हासिल कर लिया था लेकिन औद्योगिक पूंजीवाद का विकास आरंभ होने के बाद ही ब्रिटिश बुर्जुआ का सलाहकार और याचक की भूमिका से संतुष्ट होना ख़त्म हो गया और राजनितिक सत्ता के लिए उसका संघर्ष उग्रतर होता चला गया. संसदीय युद्ध जो 1641 से 1649 तक चला, चार्ल्स प्रथम को फांसी और ओलिवर क्रोमवेल के नेतृत्व में राष्ट्रकुल की स्थापना के बाद ख़त्म हुआ. स्टुअर्ट वंश की पुनप्रतिष्ठा की अल्पावधि के बाद क्रांति 1688 में नए रूप में भड़क उठी और इस मर्तबा संसदीय राजतन्त्र स्थापित करने में सफल हो गयी. अब बुर्जुआ को भूस्वामी अभिजातों के रूप में सुयोग्य मित्र मिल गया था जिसका बुर्जुआकरण तेजी से हो रहा था. आर्थिक क्षेत्र में सत्ता बुर्जुआ के अधिक प्रभावशाली संस्तर के अधीन हो गयी जैसाकि फ्रांस में भी इसके बाद घटित हुआ. 1832 में चुनाव सुधारों और 1846 में अनाज कानून के बाद उन्नीसवीं शताब्दी काफी आगे बढ़ गयी थी तब जाकर विश्व बाज़ार के शोषण के लिए एकजुट समग्र बुर्जुआ वर्ग के लिए ब्रिटिश राज्य ज्वाइण्ट-स्टॉक कंपनी में तबदील हो गयी.

जिन देशों में राजनितिक एकता स्थापित नहीं हो पाई थी उनमें राजनितिक केन्द्रीकरण का सटीक अध्ययन जर्मनी और इटली जैसे देशों के उन्नीसवीं सदी के इतिहास में किया जा सकता है. जहाँ तक फ्रांस का सवाल है इस प्रक्रिया ने विशेषतया तीव्र और विशिष्ट रूप धारण कर लिया था. यहाँ पर बुर्जुआ राजनितिक केन्द्रीकरण 1789 और 1815 के वर्षों के दौरान हो गया था हालाँकि 1830, 1845-50 और 1870-75 के दौरान इसे परिपूर्ण किया गया.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-5. औद्योगिक क्रांति और मशीन से उत्पादन का विकास

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5. औद्योगिक क्रांति और मशीन से उत्पादन का विकास

अठारहवीं शताब्दी के अंत में नयी मशीनों के आविष्कार से औद्योगिक क्रांति शुरू हुई थी जिसके परिणामस्वरूप पूंजीवादी मैन्युफैक्चर का स्थान बड़े पैमाने के उत्पादन ने लिया था. इसमें इंग्लैंड ने नेतृत्व प्रदान किया था और मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि यह क्रांति उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम अर्धांश के पहले समाप्त नहीं हुई थी. इसकी शुरुआत कुछ अदद खोजों और आविष्कारों, प्रमुख रूप से पशु-प्रजनन, कृषि, खनन, वस्त्र-उत्पादन के क्षेत्रों में, के साथ हुई थी. इसे शुरुआती संवेग मिला उन यंत्रों के विस्तार से जिन्हें वर्किंग मशीन के नाम से जाना जाता था. इन वर्किंग मशीनों ने कारीगरों के औजारों और मैन्युफैक्चर करने वाले श्रम को विस्थापित कर दिया. 1733 में जान के (1733 से 1764 तक फला-फूला) ने अपनी फ्लाई-शटल का पेटेंट प्राप्त किया जिससे शटल को आगे पीछे ले जाने के लिए केवल एक व्यक्ति की जरूरत रह गयी थी. यांत्रिक कताई के विकास में प्रथम चरण पूरा करने का काम लेवी पाल (मृत्यु 1759) के आविष्कार से संपन्न हुआ जिन्हें 1738 में इसका पेटेंट प्राप्त हुआ और जिसकी सहायता जान वायट (1700-1766) ने की थी. “बिना अँगुलियों के कताई करने” में समर्थ मशीन के रूप में इसकी चर्चा की गयी है (कैपिटल, खंड 1,392). 1766 में जेम्स हरग्रीव्ज़ (1778 में मृत्यु) जो एक बुनकर और बढ़ई था, ने सूती कपडा के मैन्युफैक्चर में इस्तेमाल की जाने वाली स्पिनिंग- जेनी का आविष्कार किया. 1767 में रिचर्ड आर्कराईट (1732-1792) ने प्रसिद्व कताई ढांचे का आविष्कार किया जिसका मुख्य महत्त्व ताना का प्रावधान किया जाना था जिसका हरग्रीव्ज़ के आविष्कार में अभाव था. सैम्युअल क्राम्पटन (1733-1827) जोकि एक परिश्रमी  किसान और बुनकर था, ने कताई चट्टी के  आविष्कार में पॉँच साल लगाए और इस मशीन ने सबसे बारीक धागा बनाने में हरग्रीव्ज़ और आर्कराईट की मशीन को पीछे छोड़ दिया. पहले पावरलूम का आविष्कार एडम कार्टराईट (1743-1823) द्वारा 1785 में ही कर लिया गया था लेकिन इसके कुछ सालों बाद ही सूती कपडा मिल के मालिक जान होरक्स (1768-1804) द्वारा ही यह आविष्कार लोक-सुलभ बन सका. उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक तक वस्त्र-उद्योग में, पावरलूम ने पुराने किस्म के हैंडलूम का स्थान ले लिया था.

अठारवीं शताब्दी के दौरान खनन-उद्योग के विकास (1700 में कोयला उत्पादन 214,800 टन से बढ़कर  1770 में 7,205,400 टन हो गया था) ने पानी निकालने वाली मशीन के सार्विक उपयोग को आवश्यक बना दिया. वाष्प-शक्ति का पहला व्यवहारिक उपयोग खानों से पानी बाहर निकालने के काम में  ही किया गया. वाट के इंजन ने वाष्प-चालित पम्पों के उपयोग को व्यापक बनाने का ही काम किया जिसकी शुरुआत न्युकोमेन (1663-1729)  द्वारा की गयी थी. वाट का नया पम्प दुहरा काम करने वाला इंजन था जिसका और सुधार उस पेटेंट के ज़रिए किया गया जो उसने 1784 में प्राप्त किया. अब उस चालक बल. जिसका अभी तक लगभग पूरे तौर पर केवल खनन उद्योग में उपयोग किया जा रहा था, का लाभदायक ढंग से उपयोग कताई मीलों और पावरलूम को चलाने में किया जाने लगा और इस प्रकार उर्जा के स्रोत के रूप में वाष्प ने जल का स्थान ले लिया. उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश में वस्त्र-उद्योग में वाष्प शक्ति का उपयोग लगभग सार्विक हो गया था. इसके बाद वाष्प-चालित परिवहन की बारी आई. 1807 में रॉबर्ट फुल्टन स्टीफेंसन  (1765-1815) ने वाष्प-चालित नौपरिवहन की खोज को परिपूर्ण किया और जार्ज स्टीफेंसन (1781-1848) ने रेल इंजन बनाया जिसका सफल परिक्षण 1814 में हुआ. पांच साल बाद प्रयोग के लिए उसने रेल की पटरी बिछ्बायी. 1819 में पहले वाष्प-पोत ने अमेरिका से यूरोप की यात्रा की और इसी समुद्री यात्रा में 26 दिन का वक्त लगा. वर्ष 1825 में इंग्लैंड में पहला रेलमार्ग जनसाधारण के लिए खोल दिया गया. 1830 में ब्रिटिश रेलमार्ग लगभग 57 मील लम्बाई में बिछ गया था, 1840 में 843 मील और 1850 में यह दूरी 6630 मील तक पहुँच गयी थी.

कृषि के क्षेत्र में, पुरानी तीन-खेत व्यवस्था का स्थान फसलों के चक्रानुसरण ने ले लिया. रॉबर्ट बेकवेल (1725-1795) ने पशुधन प्रजनन के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों से इसे कारखाना उद्योग की एक शाखा जैसा बना दिया और बाज़ार की विभिन्न ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के जानवरों का उत्पादन करने में उसने आश्चर्यजनक कुशलता का परिचय दिया. लम्बे बालों वाली लीसेस्टर भेड़ और लम्बे सींगों वाले डिश्ले मवेशी, जोकि बहुत प्रसिद्द थे, के प्रजनन में उसे विशेषज्ञता हासिल थी. पुराने ग्रामीण सम्बन्ध अब ज्यादातर पूंजीवादी उत्पादन की दशाओँ के अनुकूल होते जा रहे थे. भूस्वामी कुलीन वर्ग और भूमिहीन किसान के साथ-साथ बड़ी जोत वाले किसान का उदय हुआ जोकि सार रूप में औद्योगिक पूंजीपति था जो भूमि पर उज़रती मजदूर के श्रम का शोषण करता था और इस प्रकार अपने लिए लाभ और भूस्वामी के लिए लगान निकालता था. उन्नीसवीं शताब्दी में कृषि में पूंजीवादी प्रवृत्ति बहुत सुस्पष्ट हो गयी थी.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-4. मैन्युफैक्चर

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[‘कम्यूनिस्ट घोषणापत्र’ पर राजनीतिशास्त्र के कई विद्वानों ने व्याख्याएँ और टिप्पणियां लिखी हैं. इनमें अब तक सर्वाधिक गंभीर, वैज्ञानिक और सटीक व्याख्याएँ-टिप्पणियां क्रांति के बाद मास्को में स्थापित मार्क्स-एंगेल्स इन्स्टीट्यूट के निदेशक डेविड रियाज़ानोव की ही मानी जाती रही हैं. 1923 में प्रकाशित कम्यूनिस्ट घोषणापत्र की ये व्याख्याएँ-टिप्पणियां तत्काल पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गयीं और अधिकांश कम्यूनिस्ट पार्टियों ने इन्हें पाठ्यपुस्तक-सा बना लिया था. रियाज़ानोव की घोषणापत्र पत्र पर विस्तृत, व्याख्याओं को यहाँ श्रंखलाबद्ध रूप से प्रकाशित किया जा रहा है जो कि कम्युनिज्म के गंभीर अध्येताओं के साथ ही युवा कार्यकर्त्ताओं और इस युग की परिवर्तनकारी विचारधारा को समझने में रूचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए आज भी बहुमूल्य और बेहद उपयोगी सिद्ध होंगी–संपादक ]

4. मैन्युफैक्चर

यहाँ पर हम औद्योगिक विकास के चरण के रूप में मैन्युफैक्चर की चर्चा कर रहे हैं. ऐतिहासिक दृष्टि से स्वतन्त्र कारीगर के खिलाफ प्रतितुलन के रूप में मैन्युफैक्चर का विकास हुआ था. जब व्यापारिक पूंजीपति स्वतन्त्र कारीगरों को अपने जाल में फंसा लेता है तब वह व्यापारी-उद्धमी के रूप में स्वंतंत्र कारीगरों को बड़ी संख्या में एक छत के नीचे इकठ्ठा कर देता है जो किसी नियत कार्य (उदाहरण के लिए दर्जी का काम) के एक या दूसरे हिस्से को पूरा करने के लिए काम करते हैं या फिर किसी माल के विभिन्न हिस्सों को बनाते है, फिर इन हिस्सों को जोड़कर कोई एकल उत्पाद (जैसेकि बैलगाडी) बनाया जाता है. इस तरह के मैन्युफैक्चर का लाभ, इसकी शुरुआत के आरम्भिक दिनों में, इस बात में निहित है कि उत्पादन का बहुत विस्तार हो जाता है और अनावश्यक व्यय कम हो जाता है. इस आधार पर एक व्यवस्था निर्मित होती है जिसमें ज्यादातर विशेषीकृत श्रम की आवश्यकता होती है जब तक कि मैन्युफैक्चर एक एकीकृत प्रक्रिया में रूपांतरित न हो जाये जिसके अंतर्गत पृथक अनुभाग की निगरानी उन मज़दूरों द्वारा की जाती है जो स्वयं किसी वस्तु का एक गौण हिस्सा बनाते हैं जबकि उनके पूर्वगामी पूरी वस्तु को बनाया करते थे. इस प्रकार इस प्रक्रिया में वे एक औजार बन जाते हैं. इंग्लैंड में, हॉलैंड में और बाद में फ्रांस में पूंजीवादी उत्पादन का मैन्युफैक्चरिंग काल सोलहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में आरम्भ हुआ और अठारहवीं शताब्दी की आरम्भिक दशाब्दियों में अपने चरम पर पहुंचा. [यहाँ पर यह ध्यान रखना जरूरी है घोषणा पत्र के रचयिताओं ने ऊपर व्याख्यायित सीमित अर्थों में “मैन्युफैक्चरिंग” शब्द का प्रयोग किया है न कि वृहद् अर्थों में जो “मशीन के उत्पादन” को भी समेट लेता है जिसका उल्लेख अगली टिपण्णी में किया गया है.]

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-3. मध्ययुगीन अर्थव्यवस्था का ह्नास, भूगोलिक खोजों का युग और विश्व-बाज़ार की शुरुआत

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3. मध्ययुगीन अर्थव्यवस्था का ह्नास, भूगोलिक खोजों का युग और विश्व-बाज़ार की शुरुआत

पंद्रहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश के पहले से ही छोटे पैमाने के उत्पादन पर आधारित मध्ययुगीन समाज अपकर्ष की सक्रिय प्रक्रिया से गुज़र रहा था. देश और विदेश में विनिमय के साधनों की त्वरित वृद्धि के परिणामस्वरूप वित्तीय अर्थव्यवस्था के उदय ने वित्तीय और व्यापारिक पूँजी के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं. ग्रामीण क्षेत्रों में सामंती शुल्क का भुगतान जिन्स  के रूप में किया जा रहा था; स्वतन्त्र किसान और भूदासों की छोटे पैमाने के कृषि उत्पादन की स्थिति एक साथ ख़राब हो रही थी; सामन्ती जमींदार फार्मर बनते जा रहे थे और मुद्रा के रूप में धन इकठ्ठा करने के लिए प्रत्येक साधन का इस्तेमाल कर रहे थे. सामन्ती जागीरदारों ने विशाल कर्मचारी समुदाय और दरबारी लोगों को निकाल दिया. इन बेसहारा लोगों और उन बेदखल किसानों, जिन्हें उस भूमि से वंचित कर दिया गया था जिसे वे और उनके पूर्वज अनगिनत पीढियों से जोतते आ रहे थे, ने “हट्टे-कट्टे बदमाशों और आवारा लोगों” की कतारों में वृद्धि कर दी जो राजमार्ग पर गतिरोध उत्पन्न कर देते थे और शहरों में भीड़-भाड़ कर देते थे. स्वतन्त्र शिल्प-संघ जिनमें उस्तादों और कारीगरों के बीच अनबन से दरार पड़ गयी थी, व्यापारिक पूँजी के अधीन हो गए.

धातुकर्मीय उत्पादन, वस्त्र उत्पादन, नौपरिवहन, युद्ध-सामग्री उत्पादन, घड़ी-निर्माण, खगोलीय यंत्रों के क्षेत्रों में हुए अनेक तकनीकी सुधारों; छापाखानों का आविष्कार; वैज्ञानिक अनुसन्धान की प्रगति, विशेषतया खगोलीय विश्व में नयी खोजों – इन सबने उत्पादक शक्तियों के विकास को जोरदार संवेग प्रदान किया और उद्धमी मानसिकता के व्यक्तियों को पहल करने के लिए प्रोत्साहित किया. भूमध्य सागर के पश्चिमी हिस्से या अटलांटिक महासागर के तटवर्ती क्षेत्रों (जेनोआ या लिस्बन) जैसे बंदरगाहों में व्यवसाय का संचालन करने वाले व्यापारियों और मैन्युफैक्चर करने वालों, तथा एशियाई व्यापार पर एकाधिकार रखने वाले और पूर्वी भूमध्य सागर के स्वामी वेनिसवासियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा ने पुर्तगालियों, जेनेवावासियों और स्पेनी व्यापारिक दु:साहसियों को इंडीज़ के लिए नए मार्ग की तलाश के लिए उकसाया. पुर्तगाल के राजा जोआओ और गांट के जान की पुत्री अंग्रेज़ राजकुमारी फिलिप्पा के चौथे पुत्र महान नौसंचालक राजकुमार हेनरी (1394-1460) ने पंद्रहवीं शताब्दी के आरम्भिक अर्द्धांश में ही भौगोलिक खोजों में किये गए योगदान के लिए ख्याति प्राप्त कर ली थी. उसने अफ्रीका के तट पर स्थित उन स्थानों के लिए जहाज भेजे जो अब तक अनजान थे और 1418 तथा 1420 में उसके कप्तानों ने पोटों सान्टो और मडीरा की दुबारा खोज की. अजोर्स की खोज के लिए समुद्री अभियान भेजने का श्रेय भी उसको जाता है जिसका पुर्तगालवासियों द्वारा उपनिवेशीकरण तेजी से आगे बढा. 1460 तक राजकुमार हेनरी के पोत भूमध्यरेखा के निकटतर स्थानों, केप वर्डे से करीब एक सौ लीग से आगे तक पहुँच गए थे. इसके बाद 1486 में बार्थोलेम्यू (1455-1500) ने केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाया. इसके पहले कि  पुर्तगाली इंडीज़ के नए मार्ग की खोज के लिए अगला अभियान भेज सकें, जेनेवावासी नाविक क्रिस्टोफ़र कोलम्बस (1446-1506) ने अपने अभियान में पश्चिम की ओर रूख़ किया और 1492 में वेस्ट इंडीज़ के टापुओं की खोज की. जान कैबर (1450-1557)  1497 में अमेरिका के उत्तरी तट पर उतरा. लेकिन इसके एक साल बाद ही वास्को डि गामा (1451-1512) ने डियाज़ द्वारा शुरू किये गए काम को पूरा किया और भारत के समुद्री मार्ग का पता लगाया. दो वर्ष बाद “फ्लोरेंसवासी नाविक अमेरिगो वेस्पूची (1451-1512) ब्राजील के तट तक पहुँच गया और उसी के नाम पर अमेरिकी महाद्वीप का नामकरण हुआ. 1500 में पुर्तगाली सेनापति पेड्रों अल्वारेज़ कैब्रल (मृत्यु 1526) जिसे उसके राजा ने डिगामा के मार्ग का अनुसरण करने के लिए नियुक्त किया था, को प्रतिकूल हवाओं ने अपने मार्ग से इतना दूर हटने के लिए बाध्य कर दिया कि वह उस साल गुड फ़्राइडे के दिन ब्राजील के तट पर जा पहुँचा. अंत में 1520 में फर्डीनण्ड मैगलन (1470-1521), पृथ्वी का चक्कर लगाने वाला पहला नाविक, उस जलडमरूमध्य से होकर प्रशांत महासागर में पहुँच गया जो अभी भी उसके नाम से जाना जाता है.

इन समुद्री यात्राओं और खोजों के कारण विश्व बाज़ार का इतना अधिक विस्तार हो गया कि इसने सौलहवीं शताब्दी के बढ़ते उत्पादन को खपा लिया. इसी शताब्दी में समकालीन बुर्जुआ युग का जन्म हुआ.

मेक्सिको में कार्टेज़ (1485-1547), पेरू में पिजारो (1476-1541) जैसे शुरुआती अत्याचारी विजेताओं द्वारा नए खोजे गए देशों की निर्मम लूट और आदिवासियों के उन्मूलन का स्थान सोलहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश में ही, दास श्रम की सहायता से अछूती भूमि के सुव्यवस्थित शोषण ने ले लिया. कुछ शताब्दियों में ही अफ्रीका उन श्वेतों का आखेट-क्षेत्र बन गया जो अमेरिकी बाज़ार के लिए नीग्रो दासों की तलाश में रहते थे. 1508 से 1860 के बीच “परोपकारी” पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी और सर्वोपरि रूप से ब्रिटिश दास व्यापारियों के शिकार लगभग डेढ़ करोड़ नीग्रो अटलांटिक महासागर के पार जहाजों में भरकर लाये गए थे और उतनी ही संख्या में इस समुद्री यात्रा में मर गए थे. “लिवरपूल दास व्यापार का प्रशस्ति गान करते हैं. उदाहरण के लिए 1795 में लिखी डॉ. आइकिन की पूर्व उद्धृत रचना को देखा जा सकता है जिसमें लिखा है कि दासों का व्यापार ‘निर्भय साहसिकता की उस भावना से मेल खाता है जो लिवरपूल के व्यापार का विशेष गुण हैं और जिसकी सहायता से लिवरपूल इतनी तेजी से अपनी वर्तमान समृद्धि प्राप्त कर सका है; उससे जहाज़ों और नाविकों को बड़े पैमाने पर काम मिला है और देश के मैन्युफ़ैक्चरों के बने सामान की मांग बढ़ी है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1 पृ 885) उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब इंग्लैंड के सूती वस्त्र उद्योग ने अमेरिका के दक्षिण प्रान्तों में कच्चे कपास के उत्पादन को अतिरिक्त संवेग प्रदान किया, तब अटलांटिक महासागर के पार दास-प्रथा राष्ट्रीय संस्था बन चुकी थी और दासों का प्रजनन एक वाणिज्यिक उद्धम बन चुका था.

बोलीविया में 1545 के बाद से और मेक्सिको में 1548 से सोने और चाँदी की खानों की खोज और दोहन ने यूरोपवासियों के हाथों में सोने और चाँदी के विशाल सुरक्षित भंडार बनाने में योगदान किया. 1501 से 1544 तक चाँदी के उत्पादन की कीमत 460 मिलियन मार्क के आसपास थी. (‘मार्क’ पौण्ड औंस भार प्रकृति वाले अंग्रेजी पौण्ड का आधा होता है) 1546 से 1600 तक उत्पादन 2880 मार्क तक बढ़ गया था. उन चाँदी के सिक्के के मूल्य, जो परिचलन में थे, में भी समानुपातिक वृद्धि हो गयी थी.

ब्रिटेनवासियों द्वारा उत्तरी अमेरिका का योजनाबद्ध उपनिवेशीकरण 1620 में आरंभ हो चुका था. फ्रांसीसियों ने इसका अनुसरण किया. आरंभ में ईस्टइंडीज़ के शासन संचालन का काम पुर्तगालियों के हाथों में था. लेकिन 1600 में डच और ब्रिटिश ने लगभग एक साथ एक विशेष अभियान आरंभ किया जिससे धीरे-धीरे, अपने यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों (पहले पुर्तगालियों और बाद में फ्रांसीसियों) से संघर्ष करते हुए उन्होंने ईस्ट इंडीज़ पर अधिकार कर लिया. चीन से व्यापारिक सम्बन्ध कायम करने वाले यूरोपीय लोग , पुर्तगाली थे जिन्होंने 1557 में मकाओ पर अधिकार कर लिया. 1684 के बाद ही अंग्रेज़ चीन के तट पर स्थापित हो सके.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-2. हेक्स्टहाउज़ेन, मॉरेर और मॉर्गन

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2. हेक्स्टहाउज़ेन, मॉरेर और मॉर्गन

कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र के बाद के संस्करणों में एंगेल्स (1820 -1895) ने “समस्त मानव-समाज के इतिहास” वाक्यांश के बाद निम्न टिपण्णी जोड़ दी थी : ‘अर्थात समस्त लिपिबद्ध इतिहास” 1847 में समाज का आदिम इतिहास अर्थात लिखित इतिहास से पहले का सामाजिक संगठन बिलकुल अज्ञात था.उसके बाद हेक्स्टहाउज़ेन ने रूस में भूमि के सामुदायिक स्वामित्व का पता लगाया,  मॉरेन ने सिद्ध किया कि यही सामुदायिक स्वामित्व समस्त ट्यूटन नस्लों के इतिहास का सामाजिक आधार था और धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता गया कि भारत से लेकर आयरलैंड तक समाज का आदि रूप ग्राम समुदाय था जिसमें भूमि का स्वामित्व समुदाय के पास होता था. गोत्र के असली स्वरूप और कबीले के साथ उसके सम्बन्ध की मॉर्गेन की महत्ती खोज द्वारा विस्तार से इस आदिम कम्युनिस्ट समाज का आन्तरिक संगठन. अपने ठेठ रूप में, अनावृत हुआ. इस आदिम समाज के विघटन के साथ समाज का अलग-अलग वर्गों में विभाजन आरंभ हुआ तो कालांतर में विरोधी वर्ग बन गए.”

ऑगस्ट फ़ान हेक्स्टहाउज़ेन (1792-1866) प्रशिया के एक सामंत थे. 1843 में निकोलस प्रथम के अनुरोध पर भूमि कानूनों, कृषि की समस्याओं और किसानों के जीवन के बारे में पड़ताल करने और रिपोर्ट देने के लिए वह रूस गये. (रूसी ग्रामीण जीवन का अध्ययन) नाम की रचना में उनके श्रम का परिणाम संग्रहित है. जिसका पहला खंड 1847 में, और तीसरा खंड 1852 में, कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र के प्रकाशन के लगभग पॉँच वर्ष बाद प्रकाशित हुआ. तीसरा खंड मुख्यतया रूसी कृषि पंचायती संस्थाओं के बारे में है. रूस में यात्रा के दौरान हेक्स्टहाउज़ेन के साथ अलेक्सांद्र हर्ज़न थे जिनकी क्रांतिकारी राजनितिक रचनाओं ने बाद में उन्हें इतनी प्रसिद्धि दी. अपने मित्र से प्रभावित होने के कारण हेक्स्टहाउज़ेन ने रूसी कृषि पंचायती संस्थाओं के महत्त्व पर बल दिया जिन्हें वह सर्वहारा विकास की अवधि से गुज़रने की “महामारी’ से रूस को बचाने का एक साधन मानते थे.

जार्ज लुडविग फान मॉरेर (1790-1872) महान जर्मन इतिहासकार, कानूनविद, राजनेता और जर्मनी की प्राचीन संस्थाओं पर कई रचनाओं के लेखक थे. कई खंडो वाली इन रचनाओं का प्रकाशन अठारह सौ पचास और साठ के दशक में हुआ था और इनमें जर्मनी की ग्रामीण और नगरीय पंचायती संस्थाओं पर सर्वांगीण  रूप से विचार किया था. पुराने दृष्टिकोण के खिलाफ (जिसके अवशेष कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र में भी पाए जाते हैं) मॉरेर ने सिद्ध किया कि मध्ययुग के आरंभ में नगर क्षेत्रों का विकास मध्ययुगीन दास-प्रथा से उदभूत न होकर स्वतन्त्र ग्रामीण समुदाय (मध्युगीन मार्क) से हुआ था.

अमेरिकावासी लुईस हेनरी मॉर्गन (1818-1881) (Ancient Society Or Researches in the Lines of Human Progress from Savagery through Barbarism to Civilization By Lewis H. Morgan, LL. D) नृवंशविज्ञानी  और आदिम सामाजिक संगठनों के अध्येता थे. वह इराक्यू इंडियनों के बीच रहे, उन्हीं के जैसा जीवन जिया था और उनके आचरण तथा रीती-रिवाज का अध्ययन किया. उनका मत था कि एतिहासिक विकास में बुनियादी महत्त्व के कारक तकनीक के क्षेत्र में खोजों, आविष्कारों, जीवन की भौतिक परिस्थितियों के विकास में निहित हैं. मानव परिवार के विकास, विशेषतया सगोत्रता एवं विवाह सम्बन्धी रीती-रिवाज़ सम्बंधित  उनके विचारों की ओर एंगेल्स आकृष्ट हुए और 1884 में पहली बार प्रकाशित अपनी पुस्तक परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति (The Origin of the Family, Private Property and the State) में इनका विवेचन किया. इस पुस्तक में एंगेल्स ने इतिहास के आरंभ से समाज के विकास की दिशा का पता लगाने और वर्ग समाज में इसके क्रमिक परिवर्तन को समझाने की कोशिश की है.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-1. 1847 में कम्युनिस्टों को सताया जाना

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1. 1847 में कम्युनिस्टों को सताया जाना

वर्ष 1846 में पोप के पद पर चुनाव के समय पायस नौवां स्वयं को उदारतावादी कहता था. परन्तु समाजवाद के प्रति उसका रुख जार निकोलस प्रथम (1796-1855) से कम शत्रुतापूर्ण नहीं था, और उसने 1848 की क्रांति से पहले ही यूरोपीय पुलिसमैन की भूमिका अदा की. ऑस्ट्रियाई साम्राज्य का चांसलर और यूरोपीय प्रतिक्रियावाद का मान्य नेता मेटरनिख 1773-1859) और उस समय का असाधारण इतिहासकार गीज़ो (1787-1874), जो 1840 से फ्रांस की विदेश नीति का संचालन कर रहा था और बाद में इस मंत्रालय का प्रधान बना, के खास तौर पर करीबी संबंध थे. गीज़ो बडे वित्तीय और औद्योगिक बुर्जुआ वर्ग का बौद्धिक नेता था. वह सर्वहारा वर्ग का कट्टर दुश्मन था. प्रशियाई सरकार की मांग पर गीज़ो ने मार्क्स (1818-1883) को पेरिस से निकाल दिया. जर्मन पुलिस ने न केवल जर्मनी में कम्युनिस्टों को चैन से नहीं रहने दिया बल्कि विदेश में फ्रांस बेल्जियम और यहाँ तक की स्विट्ज़रलैंड में भी इसी तरह परेशान किया. इसके लिए उन्होंने उपलब्ध पूरी ताकत का इस्तेमाल किया और कम्युनिस्ट प्रचार में बाधा उत्पन्न करने के लिए सब तरह के हथकंडे अपनाती रही एवं इसे भूमिगत हो जाने के लिए विवश कर दिया. फ्रांसीसी उग्र – परिवर्तनवादी मारास्ट (1802 – 1852), कार्नेट (1801 -1888) और मारी (1795 -1870) ने न केवल समाजवादियों और कम्युनिस्टों के खिलाफ बल्कि लेद्रू – रोलां (1807 -1874) और फ्लोकन (1800 -1866) के नेतृत्व वाले तत्कालीन सामाजिक जनवादियों के खिलाफ भी वैचारिक हमला किया.

कात्यायनी की दो कविताएँ – ‘अपराजिता’ और ‘वह रचती है जीवन और ……’

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अपराजिता

(सृष्टि ने नारी को रचते समय बिस्तर, घर, जेवर, अपवित्र इच्छाएँ, इर्ष्या, बेईमानी और दुर्व्यवहार दिया. – मनु)

हाँ

उन्होंने यही

सिर्फ यही दिया हमें

अपनी वहशी वासनाओं की तृप्ति के लिए

दिया एक बिस्तर,

जीवन घिसने के लिए, राख होते रहने के

लिए

लाद दिया उस पर तमाम अपवित्र इच्छाओं

और दुष्कर्मों का भार |

पर नहीं कर सके पराजित वे

हमारी अजेय आत्मा को

उनके उत्तराधिकारी

और फिर उनके उत्तराधिकारियों के

उत्तराधिकारी भी

नहीं पराजित कर सके जिस तरह

मानवता की अमर – अजेय आत्मा को,

आज भी वह संघर्षरत है

नित – निरंतर

उनके साथ

जिनके पास खोने को सिर्फ जंजीरें ही हैं

बिलकुल हमारी ही तरह !


वह रचती है जीवन और ……

(नारी की रचना इसलिए हुई है कि पुरुष अपने पुत्रों, देवताओं से वंश चला सके – ऋग्वेद संहिता)

नारी की रचना हुई

मात्र वंश चलाने के लिए,

जीवन को रचने के लिए

-उन्होंने कहा चार हज़ार वर्षों पहले

नए समाज-विधान की रचना करते हुए |

पर वे भूल गए कि

नहीं रचा जा सकता कुछ भी

बिना कुछ सोचे हुए |

जो भी कोई कुछ रचता है – वह सोचता है |

वह रचती है

जीवन

और जीवन के बारे में सोचती है लगातार |

सोचती है –

जीवन का केंद्रबिंदु क्या है

सोचती है –

जीवन का सौन्दर्य क्या है

सोचती है –

वह कौनसी चीज़ है

जिसके बिना सब कुछ अधूरा है,

प्यार भी, सौन्दर्य भी, मातृत्व भी…

सोचती है वह

और पूछती है चीख -चीखकर |

प्रतिध्वनि गूंजती है

घाटियों में मैदानों में

पहाडों से , समुद्र की ऊँची लहरों से

टकराकर

आज़ादी !!! आज़ादी !!! आज़ादी !!!

‘बिगुल’ लक्ष्य और स्वरूप पर बहस

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working power - manual as well as mental
power of the working people

नई समाजवादी क्रान्ति के उद्घोषक ‘बिगुल’ से सम्बंधित 72 पन्नों पर फैली अप्रैल 1996 से अक्टूबर 1999 लगभग साढे तीन साल चली इस दिलचस्प बहस में आप पाएंगे:-

बिगुल के लक्ष्य और स्वरूप पर बहस विशेष सम्पादकीय (बिगुल प्रवेशांक, अप्रैल 1996) एक नये क्रान्तिकारी मज़दूर अख़बार की ज़रूरत………………………………………………………2

(बिगुल के स्वरूप पर आत्माराम का पत्र, (जुलाई-अगस्त 1996) कुछ ज्यादा ही लाल… कुछ ज्यादा ही अन्तरराष्ट्रीय…………………………………………………..७

(सम्पादक बिगुल का जवाब), (जुलाई-अगस्त 1996) इतने ही लाल… और इतने ही अन्तरराष्ट्रीय की आज ज़रूरत है ………………………………….८

(अप्रैल 1999) `बिगुल´ के लक्ष्य और स्वरूप पर एक बहस और हमारे विचार ……………………………….10

(अप्रैल 1999, लेनिन का लेख) मज़दूर अख़बार – किस मज़दूर के लिए? …………………………………………………………….१३

(जून-जुलाई 1999, पी.पी. आर्य का पत्र) आप लोग कमज़ोर, छिछले कैरियरवादी बुद्धिजीवी हैं और `बिगुल´ हिरावलपन्थी अख़बार है!…………………………………………………………………………………………………………….15

(जून-जुलाई 1999, सम्पादक, बिगुल का जवाब) 1999 के भारत के `क्रीडो´ मतावलम्बी ………………………………………………………………..20

(अगस्त 1999, विश्वनाथ मिश्र का जवाब) सर्वहारा वर्ग का हिरावल दस्ता बनने की बजाय उसका पिछवाड़ा निहारने की ज़िद ……..32

(अगस्त 1999, अरविन्द सिंह का जवाब) भारतीय मज़दूर आन्दोलन की पश्चगामी· यात्रा के हिरावल सेनानी ………………………34

(अक्टूबर 1999 – विशेष बहस परिशिष्ट, पी.पी. आर्य का पत्र) बिगुल के लक्ष्य और स्वरूप पर बहस को आगे बढ़ाते हुए ……………………………………..37

(अक्टूबर 1999 – विशेष बहस परिशिष्ट, सम्पादक, बिगुल का जवाब) बहस को मूल मुद्दे पर एक बार फ़िर वापस लाते हुए ……………………………………………..53

(अक्टूबर 1999 – विशेष बहस परिशिष्ट, ललित सती का पत्र) `बिगुल के लक्ष्य और स्वरूप´ पर जारी बहस : एक प्रतिक्रिया ………………………………..68

(अक्टूबर 1999 – विशेष बहस परिशिष्ट, देहाती मज़दूर यूनियन के कार्यकर्ताओं का पत्र) देर से प्रकाशित एक और प्रतिक्रिया ……………………………………………………………………69

\’बिगुल\’ लक्ष्य और स्वरूप पर बहस — पीडीऍफ़ फाइल – यहाँ क्लिक करें


सही विचार आखिर कहाँ से आते हैं?

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माओ त्से तुंग

सही विचार आखिर कहाँ से आते हैं? क्या

वे आसमान से टपक पड़ते हैं? नहीं। क्या वे

हमारे दिमाग में स्वाभाविक रूप से पैदा हो जाते

हैं? नहीं। वे सामाजिक व्यवहार से, और केवल

सामाजिक व्यवहार से ही पैदा होते हैं वे तीन

किस्म के सामाजिक व्यवहार से पैदा होते हैं –

उत्पादन-संघर्ष, वर्ग-संघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग

से पैदा होते हैं। मनुष्य का सामाजिक अस्तित्व

ही उसके विचारों का निर्णय करता है। जहाँ एक

बार आम जनता ने आगे बढ़े हुए वर्ग के सही

विचारों को आत्मसात कर लिया, तो ये विचार

एक ऐसी भौतिक शक्ति में बदल जाते हैं जो

समाज को और दुनिया को बदल डालती है।

अपने सामाजिक व्यवहार के दौरान मनुष्य विभिन्न

प्रकार के संघषो में लगा रहता है और अपनी

सफलताओं और असफलताओं से समृद्ध अनुभव

प्राप्त करता है। मनुष्य की पाँच ज्ञानेन्द्रियों-आँख,

कान, नाक, जीभ और त्वचा – के जरिये वस्तुगत

बाह्य जगत की असंख्य घटनाओं का प्रतिबिम्ब

उसके मस्तिष्क पर पड़ता है। ज्ञान शुरू में

इन्द्रियग्राह्य होता है। धारणात्मक ज्ञान अर्थात विचारों

की स्थिति में तब छलाँग भरी जा सकती है जब

इन्द्रियग्राह्य ज्ञान काफी मात्रा में प्राप्त कर लिया

जाये। यह ज्ञानप्राप्ति की एक प्रक्रिया है। यह

ज्ञानप्राप्ति की समूची प्रक्रिया की पहली मंज़िल

है, एक ऐसी मंज़िल जो हमें वस्तुगत पदार्थ से

मनोगत चेतना की तरफ ले जाती है, अस्तित्व

से विचारों की तरफ ले जाती है। किसी व्यक्ति

की चेतना या विचार (जिनमें सिद्धांत, नीतियाँ,

योजनाएँ अथवा उपाय शामिल हैं; वस्तुगत बाह्य

जगत के नियमों को सही ढंग से प्रतिबिम्बित

करते हैं अथवा नहीं, यह इस मंज़िल में साबित

नहीं हो सकता तथा इस मंजिल में यह निश्चित

करना सम्भव नहीं कि वे सही हैं अथवा नहीं।

इसके बाद ज्ञानप्राप्ति की प्रक्रिया की दूसरी मंज़िल

आती है, एक ऐसी मंज़िल जो हमें चेतना से

पदार्थ की तरफ वापस ले जाती है, विचारों से

अस्तित्व की तरफ वापस ले जाती है, तथा जिसमें

पहली मंज़िल के दौरान प्राप्त किये गये ज्ञान को

सामाजिक व्यवहार में उतारा जाता है, ताकि इस

बात का पता लगाया जा सके कि ये सिद्धांत,

नीतियाँ, योजनाएँ अथवा उपाय प्रत्याशित सफलता

प्राप्त कर सकेंगे अथवा नहीं। आम तौर पर,

इनमें से जो सफल हो जाते हैं वे सही होते हैं और

जो असफल हो जाते हैं वे ग़लत होते हैं, तथा

यह बात प्रकृति के खिलाफ मनुष्य के संघर्ष के

बारे में विशेष रूप से सच साबित होती है।

सामाजिक संघर्ष में, कभी-कभी आगे बढ़े हुए

वर्ग का प्रतिनीधित्व करने वाली शक्तियों को

पराजय का मुँह देखना पड़ता है, इसलिए नहीं

कि उनके विचार ग़लत हैं बल्कि इसलिए कि

संघर्ष करने वाली शक्तियों के तुलनात्मक बल

की दृष्टि से फिलहाल वे शक्तियाँ उतनी ज्यादा

बलशाली नहीं हैं जितनी कि प्रतिक्रियावादी

शक्तियाँ; इसलिए उन्हें अस्थायी तौर से पराजय

का मुँह देखना पड़ता है, लेकिन देर-सबेर विजय

अवश्य उन्हीं को प्राप्त होती है।

मनुष्य का ज्ञान व्यवहार की कसौटी के

जरिये छलाँग भर कर एक नयी मंज़िल पर पहुँच

जाता है। यह छलाँग पहले की छलाँग से और

ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। क्योंकि सिर्फ यही

छलाँग ज्ञानप्राप्ति की पहली छलाँग अर्थात  वस्तुगत

बाह्य जगत को प्रतिबीम्बित करने के दौरान बनने

वाले विचारों, सिद्धांतों, नीतियों, योजनाओं अथवा

उपायों के सही होने अथवा गलत होने को साबित

करती है। सच्चाई को परखने का दूसरा कोई

तरीका नहीं है। यही नहीं, दुनिया का ज्ञान प्राप्त

करने का सर्वहारा वर्ग का एकमात्र उद्देश्य है उसे

बदल डालना। अकसर सही ज्ञान की प्राप्ति केवल

पदार्थ से चेतना की तरफ जाने और फिर चेतना

से पदार्थ की तरफ लौटने की प्रक्रिया को, अर्थात

व्यवहार से ज्ञान की तरफ जाने और फिर  ज्ञान

से व्यवहार की तरफ लौट आने की प्रक्रिया को

बार-बार दोहराने से ही होती है। यही मार्क्सवाद

का ज्ञान-सिद्धांत है, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का

ज्ञान-सिद्धांत है।

हमारे साथियों में बहुत से लोग ऐसे हैं जो

इस ज्ञान-सिद्धांत को नहीं समझ पाते। जब

उनसे यह पूछा जाता है कि उनके विचारों, रायों,

नीतियों, तरीकों, योजनाओं व निष्कर्षों,  धारा-प्रवाह

भाषणों व लम्बे-लम्बे लेखों का मूल आधार

क्या है, तो यह सवाल उन्हें एकदम अजीब-सा

मालूम होता है और वे इसका जवाब नहीं दे

पाते। और न वे इस बात को ही समझ पाते हैं

कि पदार्थ को चेतना में बदला जा सकता है और

चेतना को पदार्थ में, हालाँकि इस प्रकार की

छलाँग लगाना एक ऐसी चीज़ है जो रोज़मर्रा की

ज़िन्दगी में मौजूद रहती है। इसलिए यह आवश्यक

है कि हम अपने साथियों को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद

के ज्ञान-सिद्धांत की शिक्षा दें, ताकि वे अपने

विचारों को सही दिशा प्रदान कर सकें, जाँच-

पड़ताल व अध्ययन करने और अनुभवों का

निचोड़ निकालने में कुशल हो जायें, कठिनाइयों

पर विजय प्राप्त कर सकें, कम से कम गलतियाँ

करें, अपना काम बेहतर ढंग से करें, तथा पुरज़ोर

संघर्ष करें, जिससे हम चीन को एक महान और

शक्तिशाली समाजवादी देश बना सकें तथा समूची

दुनिया के शोषित-उत्पीड़ित लोगों के व्यापक

समुदाय की सहायता करते हुए अपने महान

अन्तरराष्ट्रवादी कर्तव्य को, जिसे हमें निभाना है,

पूरा कर सकें।

(मई १९६३)

\’बिगुल\’ जनवरी 2009 से साभार

नताशा- एक महिला बोल्शेविक संगठनकर्ता एक संक्षिप्त जीवनी

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–एल. काताषेवा

रूस की अक्टूबर क्रान्ति के लिए मज़दूरों को संगठित, शिक्षित और प्रशिक्षित करने के लिए हज़ारों बोल्शेविक कार्यकर्ताओं ने बरसों तक बेहद कठिन हालात में, ज़बर्दस्त कुबानियों से भरा जीवन जीते हुए काम किया। उनमें बहुत बड़ी संख्या में महिला बोल्शेविक कार्यकर्ता भी थीं। ऐसी ही एक बोल्शेविक मज़दूर संगठनकर्ता थीं नताशा समोइलोवा जो आखिरी साँस तक मज़दूरों के बीच काम करती रहीं। इस अंक से हम `बिगुल´ के पाठकों के लिए उनकी एक संक्षिप्त जीवनी का धारावाहिक प्रकाशन कर रहे हैं। हमें विश्वास है कि आम मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं को इससे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। – सम्पादक

……..ओदेस्सा छोड़ने के नताशा के फैसले ने उन्हें काफी तकलीफ दी। मज़दूर उनके वहाँ से चले जान का ग़लत अर्थ न निकालें, इसके लिए उन्होंने ओदेस्सा के सामाजिक-जनवादी संगठन के ग़लत रणकौशलों पर स्पष्ट और मुखर बयान दिया। उनका पत्र इस प्रकार था :

मैं  ओदेस्सा कमेटी के सदस्यों (बोल्शेविकों) के समक्ष बयान देती हूँ कि निम्न कारणों से स्थानीय संयुक्त संगठन में बने रहना मुझे सम्भव नहीं जान

पड़ता : पहली बात तो यह कि रणकौशलात्मक सवालों पर बोल्शेविकों और मेंशेविकों के बीच की असहमतियाँ अभी भी इतनी गम्भीर हैं कि इस समय

एकता करना समझौते के रास्ते पर कदम बढ़ाना है और एकमात्र सच्चे क्रान्तिकारी रणकौशलों से किनारा करने के समान है, जिसे बोल्शेविक अभी तक अपनाते आये हैं, और जिसने उन्हें वामपन्थी और सही अर्थों में आरएसडीएलपी (रूसी सामाजिक जनवादी पार्टी) का क्रान्तिकारी धड़ा बनाये रखा है। महत्त्वपूर्ण मसलों पर असहमत होते हुए एकता करना सिर्फ यांत्रिक ही होगा और स्थानीय परिस्थितियों में व्यावहारिक तौर पर इसका नतीजा

बोल्शेविकों पर मेंशेविकों का वर्चस्व होगा, जबकि, मौजूदा हालात में वर्चस्व के लिए सैद्धांतिक  लड़ाई निश्चित रूप से निरर्थक होगी और सिर्फ नये मतभेद,

टकराव और नये विभाजन का कारण बनेगी। यह एकता काम को और भी असंगठित करेगी और चीज़ों को सुधारने में कोई मदद नहीं करेगी। मैं यह भी मानती हूँ कि यहाँ जो एकता हुई है वह पार्टी अनुशासन की सभी धारणाओं का बुनियादी तौर पर उल्लंघन करती है, जिसका बोल्शेविकों ने मेंशेविकों की पार्टी विरोधी और विघटनकारी प्रवृत्तियों के खिलाफ  अपने संघर्ष में हमेशा ही ज़ोरदार बचाव किया है। मैं बाहरी ज़िलों की एक बैठक में बोलने वालों में से उस एक व्यक्ति के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूँ जिसने घोषणा की थी कि `हमें तीसरी कांग्रेस की काग़ज़ी घोषणा पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है´, मुझे लगता है कि स्थानीय संगठन को पूरी पार्टी (यानी बोल्शेविकों) की सहमति के बिना मेंशेविकों के साथ एकता जैसा महत्त्वपूर्ण फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं है, और इस मामले में एकमात्र उचित और विश्वसनीय रास्ता पार्टी के तमाम कार्यकर्ताओं की चौथी कांग्रेस बुलाना है। एकता के रास्ते पर समझ में न आने वाली हड़बड़ी से आगे बढ़ रहे ओदेस्सा के संगठन ने केन्द्रीय

कमेटी या बोल्शेविकों की दूसरी कमेटियों को सूचित करना भी ज़रूरी नहीं समझा। उसने सेण्ट पीटर्सबर्ग और मास्को की कमेटियों के उस उदाहरण की भी सिरे से अवहेलना की जिन्होंने सिर्फ संघीय लाइन पर ही एकता को सम्भव माना था। इस तरह स्थानीय संगठन को स्थापित केन्द्रों और पार्टी की सीमाओं से बाहर रखकर, एकता ने पार्टी सम्बन्धों में और भी अफरातफरी पैदा कर दी है, ख़ासकर तब जबकि हम मानकर चलें कि चौथी कांग्रेस ने पार्टी के दोनों धड़ों के बीच सिर्फ संघीय आधार पर ही एकता का निर्णय किया था। तब ओदेस्सा का संगठन, एकता करने वाले संगठन के तौर पर, किसी भी पार्टी से बाहर होगा। संक्षेप  में मैं कहूँगी कि जिन लोगों के नेतृत्व में मैंने कई महीने काम किया है, अब तक जिन्हें मैं गम्भीर राजनीतिक सिद्धांतों  वाले भरोसेमन्द नेता मानती थी, वे हालात का सामना करने में अक्षम साबित हुए हैं। ऐसे महत्त्वपूर्ण क्षण में जब बाहरी ज़िलों के अपेक्षाकृत कम विश्वसनीय हिस्से एकता का रुझान दर्शा रहे थे, उन ढुलमुल कॉमरेडों को प्रभावित करने

के नज़रिये से बातचीत करने के बजाय वे बहाव के साथ बह गये और अपनी असंगति से उन सिद्धांतों  को नीचा दिखाया, पहले मैं उन्हें, जिनका पैरोकार

मानती थी। वही दिग्गज जो हफ्ते  भर पहले तक एकता की बात भी नहीं सुनना चाहते थे, किसी जादू के ज़ोर से उन्होंने एकता का पक्ष लेना शुरू कर दिया, और यह कहते हुए उसका औचित्य सिद्ध  करने लगे कि जब बाहरी ज़िले एकता चाहते हैं तो संघ का आग्रह करना अटपटा जान पड़ता है। यह सच है कि उनमें से कुछ ने दावा किया कि सिद्धान्तत: वे संघ के पक्ष में हैं, लेकिन बाहरी ज़िलों की बैठकों में उन्होंने एकता के सवाल का कोई विरोध नहीं किया, और हमारे नेताओं ने पार्टी में हुए पिछले विभाजन के बारे में लोकरंजक शब्दावली, जैसेकि उसे `सिर्फ नेताओं ने उकसाया था´, कि वह एकता में बाधा डालने की इच्छा रखने वाले `मुट्ठीभर´ बुद्धिजीवियों का काम था, का जवाब सिर्फ शर्मनाक और आपराधिक चुप्पी से दिया। इस तरह की सैद्धांतिक  अस्थिरता ने स्थानीय नेतृत्व में मेरा सारा विश्वास हिलाकर रख दिया और

उपर्युक्त  कारणों के साथ मिलकर इसने मुझे ओदेस्सा का संगठन छोड़ने पर विवश कर दिया।

लेकिन  प्रचारक नताशा की यह आपत्ति अपना लक्ष्य पूरा न कर सकी। वह डाकपेटी में पत्र डाल ही रही थीं कि उन्हें गिरफ्ऱतार कर लिया गया। उन्हें रोस्तोव जेल में डाल दिया गया और उनका पत्र ज़ारशाही के एजेण्टों के हाथ लग गया (1917 की क्रान्ति ने ओखराना राजनीतिक पुलिस’ के धूल भरे अभिलेखागार से निकालकर इसे सार्वजनिक किया।

जीवनी की पूर्ण सामग्री हेतु निम्न लिंकों पर जाएँ

‘बिगुल’ जनवरी 2009

‘बिगुल’ फरवरी 2009


इस साईट और इससे सम्बंधित साइटों पर उपलब्ध ऑडियो प्रोग्रामों को सुनने के तरीके

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http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio/Home/bigulmixed.mp3?attredirects=0
1.दिखाई देने वाला चिन्ह (icon) flash player का है, जिसे दायें और से क्लिक करने पर इस पर उपलब्ध फाइल चलना शुरू हो जायेगी.
2. इन प्रोग्रामों को हमारे द्वारा बताए गए लिंक्स से डाउनलोड किया जा सकता है जिन्हें बाद में लगभग सभी प्लेयर्ज़ पर चलाया जा सकता है. हमारे प्रोग्रामों की audio bitrate kb/s 16 जिससे 8 मिनट का ऑडियो प्रोग्राम लगभग एक mb जगह घेरता है.
3.अपने कम्पूटर पर उबलब्ध किसी भी प्लेयर में सीधा चलाने के लिए :
a drag your mouse over to the link,
b, clik right and select the copy link location,
c, now select ‘file’ of any player,(winamp window media player, for example) select ‘play url’ and paste the ‘link location’ there and ‘ok’.
if you are connected to the internet server, the program will start playing within no time.
उदाहरण के लिए दिखाई देने वाला चिन्ह (icon) flash प्लेयर के दबाने से ‘bigul mixed’ की एक घंटा 29 मिनट की फाइल चलनी शुरू हो जायेगी जिसमें आप गीत, भाषण, ,खबरें आदि सुन सकेंगे.
या निम्नलिखित लिंक को अपने माउस के दायें ओर से दबाकर ‘कॉपी लिंक लोकेशन’ चुने और अपने कम्पूटर पर उपलब्ध प्लेयर्स के फाइल में जाकर ‘url’ पर डाल दें और ‘ok’ दबाएँ, प्रोग्राम शुरू हो जायेगा.
download or copy link location

सपार्टकस हिन्दी नाटिका यूटयूब पर

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लगभग ३३ मिनट की इस लघु नाटिका को यूटयूब पर देखा और वहां से डाउनलोड किया जा सकता है. पंजाब लोक सभ्याचार मंच द्वारा मंच पर इसे खेला गया और वहीं से विडियो रिकॉर्डिंग हुई. amandeephundal द्वारा पोस्ट की गई इस विडियो के संकुचन में विडियो उतना साफ नहीं है लेकिन प्रभावशाली सवांद के कारण इस कमी को नजरंदाज़ किया जा सकता है. badal-sarkar-2

इस लघु नाटिका के लेखक हैं बादल सरकार जिसे हंसा सिंह और क्रांतिपाल के निर्देशन में तैयार किया गया. नवचिंतन कला मंच, ब्यास की इस पेशकश में मजदूर वर्ग के पितामह और पहले ऐतिहासिक बागी ‘सपार्टकस’ के नेतृत्व में गुलामों द्वारा  ईसा से कई सदियों पहले गुलाम-मालिक सम्बन्धों पर आधारित रोमन सभ्यता की नींव हिला देने के दृष्यों के लम्हों को पेश किया गया है. मजदूर वर्ग के नाटककारों को इतिहास को वर्ग-संघर्ष की निरंतरता में देखना चाहिए और उसकी प्रासंगिगता को वर्तमान में बुर्जुआ-उज़रती गुलाम सम्बन्धों