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मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

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विश्व स्तर पर, 1970 के बाद प्रगतिशिलियों, एन जी ओ, और वामपंथियों के साथ मिलकर संशोधनवाद सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों को उत्पादन के स्थान कारखानों और फार्मों से खींचकर, बुर्जुआजी की इच्छानुसार, मंडी में ले गया. मार्क्स की पूंजी पर आधारित यह फिल्म, उनका भंडाफोड़ करती है और संजीदा लोगों को मार्क्सवाद का सही अध्ययन करने के लिए प्रेरित करती है. मूलरूप से फिल्म अंग्रेजी में हैं जिसे हिंदी में डब किया गया है. इसे भारतीय सन्दर्भ में रखने के लिए कुछ तस्वीरों और दृश्य में बदलाव भी किया गया है. http://kapitalism101.wordpress.com/2010/08/20/law-of-value-5-contradiction से विशेष आभार सहित.

मूल्य के नियम_5_विरोधाभास

मूल्य के नियम  में मार्क्स हमेशा विसंगतियों की चर्चा करते हैं. परन्तु ये गोल चकोरों और सैन्य ज्ञान से संबंधित विसंगतियां नहीं होती. ये विसंगतियां पूंजीवादी समाज के सामाजिक संबंधों के अन्दर की विसंगतियां हैं. कुछ लोग इनके लिए शब्द विरोधाभास का प्रयोग करना ज्यादा पसंद करते हैं.

बहुत क्षोभ के साथ हम जानते  हैं कि आधुनिक समाज सामाजिक विसंगतियों से भरा पड़ा है. धन की प्रचुरता के साथ  अत्यधिक गरीबी, अत्याधिक बेरोजगारी के बावजूद  ज्यादा काम, बैंकों द्वारा घरों की कुर्की, नस्ली श्रेष्टता और तनाव, औरतों के खिलाफ हिंसा, श्रम संघर्ष, दूषित वातावरण, पुलिस की बर्बरता, गैंग हिंसा, समूहों की घृणा, जनसँख्या का अत्याधिक उजाड़ा और बहुत से युद्ध.  मार्क्स की दिलचस्पी इन सभी  विसंगतियों में हैं. लेकिन इनमें  से किसी एक  से भी वे अपना विश्लेषण शुरू नहीं करते.

इसके विपरीत वे अपेक्षित साधारण सी लगने वाली चीज – जिन्स से शुरू होते हैं. क्यों ? क्योंकि जिन्स पूंजीवाद के सामाजिक संबंधों की सबसे बुनियादी चीज है. लोगों के परस्पर संबंध जिन्स विनिमय का रूप ले लेते हैं. जिन्स सामाजिक संबंधों की बुनियादी कार्यकर्त्ता है.  इसलिए अगर हम यह जानना चाहते हैं कि कैसे ये सभी सामाजिक विरोधाभास परस्पर संबंधित हैं, हमें जिन्स से शुरुआत करनी होगी.

जैसाकि हमने पहले ही देखा है कि जिन्स में विरोधाभास निहित है. : इसका एक उपयोग मूल्य है और दूसरा मूल्य (जैसाकि हमने देखा है कि मूल्य विनिमय मूल्य के पीछे छुपा होता है इसलिए, पहले हमने कहा था कि विरोधाभास उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य के बीच है, बाद में हमने इसे उपयोग मूल्य और मूल्य में संशोधित कर लिया. ) शुरू में देखने पर यह इतना अधिक विरोधाभासी नहीं लगता. लेकिन जैसे ही हम इसे बारीकी से देखते हैं तो महतवपूर्ण विरोधाभास उभर आते हैं.

ऐसा क्यों होता है कि लोगों को मंडी में अपनी श्रम, धन के बदले बेचना पड़ता है. क्योंकि वे स्वयं अपने जीवन निर्वाह के साधन नहीं जुटा पाते. यही पूंजीवाद का विलक्षण पहलू है. पूर्व में मौजूद उत्पादन की विधियों में लोगों की बहुसंख्या किसी न किसी प्रकार के उत्पादन के साधनों का उपयोग कर सकती थी,  जिनसे वे अपने जीवन निर्वाह के साधन जुटा लेते थे. कई बार लोग आपस में चीजे बदल लेते थे परंतू वे ऐसा अपने ही प्रयोग के लिए अतिरिक्त उत्पादन के द्वारा करते थे. अपने अतिरिक्त उत्पादन की विक्री विशेषरूप से विनिमय के लिए उत्पादन से पूर्णतया भिन्न है.

‘प्रारंभिक एकत्रीकरण नाम की लंबी हिंसात्मक और ऐतिहासिक प्रक्रिया  के द्वारा , उत्पादन के इन साधनों का निजीकरण हो गया और इनपर  पूंजीपति नामक वर्ग के लोगों का कब्ज़ा हो गया. जबकि पहले लोग सीधे अपने उपयोग के लिए श्रम किया करते थे, लेकिन अब उन्हें अपनी रोजी चलने के लिए मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.

सो इस तथ्य से कि हम विनिमय के लिए, न कि सीधे उपयोग के लिए उत्पादन करते हैं, संपत्तिशाली और संपत्तिहीन के बीच सामाजिक विरोधाभास का पता चलता है. खुली मंडी में पहले से ही काम पर जबरदस्ती विद्यमान होती है. और इस जबरदस्ती को लागू करने के लिए किसी न किसी प्रकार की हिंसा की आवश्यकता पड़ती हैं, चाहे यह राज्य , निजी सेना या भाड़े के बटमार द्वारा हो. उत्पादन के साधनों का निजीकरण करने के लिए, हिंसा जरूरी थी और संपत्ति के सभी वैधानिक पह्लूयों को लागू करने के लिए जरूरी बनी हुई है.

अपनी जीविका को मंडी से प्राप्त करने के लिए उन्हें कोई अन्य चीज बेचनी पड़ती है. चूँकि उत्पादन के साधन निजी होते हैं, इसलिए उन्हें अपनी श्रम बेचनी पड़ती है. निसंदेह श्रम वास्तव में बेचीं नहीं जा सकती. इसकी जगह हम अपनी श्रम की क्षमता : श्रम-शक्ति बेचते हैं. हम कार्य समय की निश्चित मात्रा बेचते हैं, चाहे इसे घंटों, हफ़्तों या वर्षों में मापा जाये. यही कारण है कि मूल्य श्रम समय की अभिव्यक्ति है.

हमारी स्वयं की सृजनात्मक क्रियाशील क्षमता, वही वस्तु जो हमें इन्सान बनाती है और समाज से जोडती है, श्रम-शक्ति कहलाती है, श्रम-शक्ति जिन्स बन जाती है जिसे हम किसी को बेचते हैं. श्रम-शक्ति का,  अन्य जिन्स की भांति, उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य होता है और आपने अनुमानित किया, इनमें विरोधाभास है. विनिमय मूल्य हमारे कार्य समय के लिए भुगतान की गयी मजदूरी होती है. इसे जीविका पर खर्च द्वारा निर्धारित किया जाता है. यह भोजन, रिहाईश, कपडे, और परिवहन पर खर्च के बराबर होता है. लेकिन हमारी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य ऐसा है कि यह मूल्य सृजित कर सकता है. यही श्रम-शक्ति के दो विरोधी पहलू हैं, एक तरफ इस पर मजदूरी खर्च होती है तो दूसरी और यह मूल्य पैदा करता है.

हो सकता है आपको 5 डॉलर प्रति घंटा दिए जा रहे हो और आप 20 डॉलर प्रति घंटा की दर से मूल्य सृजित कर रहे हों. अगर ऐसा है तो आपका शोषण हो रहा है. वास्तव में, आपके शोषण की दर चार सौ प्रतिशत है. श्रम-शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास के कारण ही शोषण संभव होता है.

शोषण पूंजीवाद की पहेली – मुनाफे के अस्तित्व – को स्पष्ट करता है. पूंजीपति दिन की शुरुआत कुछ धन से करते हैं जिसे वे उत्पादन में  निवेश कर देते हैं. दिन की समाप्ति पर उनके पास कुछ जिंसों की मात्राएँ होती हैं जिन्हें वे शुरू में  खर्च किये गए धन से अधिक मूल्य पर बेच देते हैं. ऐसा लग सकता है कि इनका मुनाफा क्रय -विक्रय करने से हुआ है. हालाँकि केवल क्रय-विक्रय करने से भी मुनाफा अर्जित किया जा सकता है. लेकिन केवल क्रय-विक्रय करने से मुनाफा पैदा नहीं होता. क्योंकि खरीदना और बेचना जीरो-राशी खेल है. जब हम जिंसों का विनिमय करते हैं तो हम उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं. इस प्रक्रिया द्वारा समाज की कुल राशी के मूल्य में कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसा संभव हो सकता है कि किसी एक को चुना लग जाये. परन्तु मंडी में, किसी एक व्यक्ति का लाभ दूसरे के लिए हानि होता है. लेकिन जिंसों की खरीदफरोख्त से औसत मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती. परन्तु वास्तविक मुनाफा औसत मूल्य में वृद्धि से ही संभव है. किसी समाज के जीडीपी की कुल राशी के मूल्य में वृद्धि मुनाफे  के इस विस्तार से ही होती है.

ऐसा लगता है कि हम पहेली या किसी विरोधाभास में उलझ गए हों. मंडी में समानता और संतुलन का राज्य चलता है. मंडी में विनिमय द्वारा जिंसो के मूल्य का संरक्षण होता है. किसी एक व्यक्ति का लाभ किसी दूसरे व्यक्ति की हानि से इस प्रकार बराबर हो जाता है कि जिन्स विनिमय से अन्तर्जात संतुलन बना रहता है. परन्तु मुनाफा ऐसी अद्भुत घटना है जो जिंसों की खरीदफरोख्त होने से संभावय लगती है. कहीं न कहीं विषमता से मुनाफा पैदा हो सकता है.लेकिन थोड़े से ज्यादा पैदा होना. यह सब किस प्रकार संभव हो सकता है?

इस पहेली को हल करने के लिए मार्क्स हमें मंडी से आगे उत्पादन के  रहस्यमई क्षेत्र में देखने के लिए कहते हैं. उत्पादन में, जहाँ श्रम के शोषण से मूल्य का विस्तार हो जाता है. शोषण मंडी में विनिमय के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करता क्योंकि यह विनिमय में नहीं होता. श्रम-शक्ति को उसके मूल्य पर खरीदा जाता है. उस श्रम शक्ति के उत्पादों को उनके मूल्य पर बेचा जाता है. इन विनिमयों द्वारा कोई मुनाफा नहीं होता. मंडी से मुनाफा बिलकुल नहीं आता, बल्कि श्रम प्रक्रिया से आता है. श्रम के मूल्य से अधिक और ऊपर किया गया श्रम मुनाफे की मात्रा का निर्धारक है. जबकि मंडी समानता और संतुलन की क्षेत्र बनी रहती है, उत्पादन असमानता और शोषण का क्षेत्र है. और यह विरोधाभास श्रम शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास होने से ही संभव है.

अगली किश्त मार्क्स के मूल्य के नियम पर आधारित एनिमेटिड हिंदी डब फिल्म : अंतिम किश्त में समाप्य

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इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34) की हिफाजित में

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“कोट, कपड़ा, आदि उपयोग-मूल्य, अर्थात पण्यों के ढांचे, दो तत्त्वों के योग होते हैं – पदार्थ और श्रम के. उन पर जो उपयोगी श्रम खर्च किया गया है, यदि आप उसे अलग कर दें, तो एक ऐसा भौतिक आधार-तत्त्व हमेशा बचा रहेगा, जो बिना मनुष्य की सहायता के प्रकृति से मिलता है. मनुष्य केवल प्रकृति की तरह काम कर सकता है, अर्थात वह भी केवल पदार्थ का रूप बदलकर ही काम कर सकता है. यही नहीं रूप बदलने के इस काम में उसे प्रकृति की शक्तियों से बराबर मदद मिलती है. इस प्रकार हम देखते हैं कि अकेला श्रम भौतिक संपत्ति का, अथवा श्रम के पैदा किये हुए, उपयोग-मूल्यों का एकमात्र स्रोत नहीं है जैसा कि विलियम पैटी ने कहा है, श्रम उसका बाप है और पृथ्वी उसकी माँ है. (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

“विश्व की सभी परिघटनाएं , चाहे वे मनुष्य के हाथ का फल हों अथवा प्रकृति के सार्विक नियमों का परिणाम, वास्तव में सृजन नहीं बल्कि पदार्थ के रूपों में परिवर्तन है. मानव बुद्धि जब कभी उत्पादन के विचार का विश्लेषण करती है, तो उसे केवल दो ही तत्त्व दिखाई पड़ते हैं – एक जोड़ना, दूसरा तोड़ना; यही बात मूल्य ” (उपयोग-मूल्य, हालाँकि फिजियोक्रेटों के साथ वाद-विवाद के इस अंश में वेर्री के मन में भी यह बात पूरी तरह साफ़ नहीं है कि वह किस प्रकार के मूल्य की चर्चा कर रहा है) “अथवा धन के उत्पादन के संबंध में भी लोगू होती है, जब मनुष्य द्वारा पृथ्वी, वायू, और जल को अनाज में रूपांतरित कर दिया जाता है, या एक कीड़े के चेपदार स्त्राव को रेशम में, या धातु  के अलग-अलग टुकडों को एक घड़ी में बदल दिया जाता है.” _Pietro Verri, Meditazioni sulla Economia Politica (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

श्रम और पण्य-मूल्य दोनों का चरित्र दुहरा है लेकिन हम यहाँ पण्य-मूल्य के दुहरे चरित्र के सामान्य विश्लेषण तक सीमित  रहेंगे. पण्य-मूल्य के दोहरे चरित्र में पहली विशेषता उसके उपयोग मूल्य से है जैसे पानी, धुप, वायू, आदि. ये सभी धन का एक रूप हैं लेकिन ये पण्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि इसमें मानवी श्रम नहीं लगा है और इन्हें हासिल करने के लिए भुगतान के किसी भी रूप की आवश्यकता नहीं पड़ती.

पण्य की दूसरी विशेषता उसमें लगे मानवीय श्रम से सम्बंधित है जिस कारण उसका विनिमय मूल्य होता है.

अरस्तू का हवाला देते हुए मार्क्स लिखते हैं.”अरस्तू कहते हैं कि विनिमय समानता के बिना नहीं हो सकता, और समानता उस वक्त तक नहीं हो सकती, जब तक की दोनों वस्तुएं एक ही मापदंड से न मापी जा सकती हों.” “लेकिन यहाँ आकर वे (अरस्तू) ठहर जाते हैं और मूल्य के रूप का आगे विश्लेषण करना बंद कर देते हैं.

मार्क्स आगे लिखते हैं ,” अरस्तू की प्रतिभा का चमत्कार इसी बात में प्रकट होता है कि उन्होंने पण्यों के मूल्यों के अभिव्यक्ति में समानता का सम्बन्ध देखा. वह जिस समाज (गुलाम और मालिक-गुलाम) में रहते थे, केवल उसकी विशेष परिस्थितियों ने ही उन्हें यह पता नहीं लगाने दिया कि इस समानता की तह में ‘सचमुच” क्या था.(मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. 79)

“महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” सूत जी [इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34)] द्वारा पांडे जी के  इस कथन की स्वीकृति के  साथ हम भी सहमत हैं लेकिन यह भी जोड़ देना चाहते हैं कि यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” गति में होने के कारण हमेशा बना नहीं रह सकता क्योंकि पांडे जी के परदादा जो  कुरता पहना करते थे वह बामुश्किल दस या पंद्रह लोगों की श्रम का फल था और अंत में जिसके पास इसे बेचने का अधिकार (अगर था तो ) वह  दस या पंद्रह पर एक  का ही था. लेकिन आज इन्होने जिस 100 रूपए की शर्ट को पहना हुआ है उस पर लगी हुई श्रम, अगर हम कहें कि, विश्व के सौ करोड़ लोगों की श्रम है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

पूँजीवाद की सबसे बड़ी विसंगतियों में एक श्रम का इतने उच्च धरातल पर समाजीकरण परंतु इसके विपरीत श्रम के उत्पादों पर मुट्ठीभर लोगों का मालिकाना हक़ जिनकी संख्या निरंतर घटती जा रही  है …. यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है जबकि यह विसंगति और अधिक गहराती जा रही है …देखना है कि इसका क्लाईमैक्स कहाँ होता है

उपरोक्त वस्तुगत और साक्षात उदाहरण उन बुद्दिजीवियों के मुहं पर तमाचा है जो मार्क्सवाद को आयातित और अप्रासंगिक बताते हैं. बल्कि यह साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा शोषित  भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए पहले से अधिक, कहीं अधिक प्रासंगिक है.  इस बात को लेनिन ने नोट कर लिया था और मार्क्स के  शब्द “कम्युनिस्म का हौवा यूरोप पर मंडरा रहा है”  को दरुस्त करते हुए, बदले हुए हालात में उन्होंने कहा कि,” विश्व पूँजी के साम्राज्यवाद में प्रवेश करने के कारण क्रांतियों का धुरा अब यूरोप न होकर पूर्व है.”

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी आपके इतना भर लिख देने से कि  “महालक्ष्मी श्रम से उत्पन्न नहीं होतीं, वे श्रम के लिये मानव को प्रेरित करती हैं। महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” काम नहीं चलेगा. बात को तर्क-वितर्क से आगे बढाएं.

और आपका फ़िक्र कि “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.

….मार्क्स के इन शब्दों “To leave an error unrefuted is to encourage intellectual immorality. ...के साथ हम अपने आलेख को विराम देते हैं और पांडे जी से आशा करतें हैं कि वे बहस को आगे बढाएँगे.

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नई समाजवादी क्रान्ति का उद्घोषक ‘बिगुल’ के मई-2009 अंक की विषय – सामग्री

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bigul naya ank bigमज़दूर वर्ग के लिए सबसे बुरी बातों में से एक शायद यह है कि मई दिवस को आज एक अनुष्ठान बना दिया गया है। यह मई दिवस के महान शहीदों का अपमान है। मई दिवस मज़दूरों के मक्कार, फरेबी, नकली नेताओं के लिए महज़ झण्डा फहराने, जुलूस निकालने, भाषण देने की एक रस्म हो सकता है, लेकिन वास्तव में यह उन शहीदों की कुर्बानियों की याददिहानी का एक मौका है, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी देकर पूरी दुनिया के मज़दूरों को यह सन्देश दिया था कि उन्हें अलग-अलग पेशों और कारख़ानों में बँटे-बिखरे रहकर महज़ अपनी पगार बढ़ाने के लिए लड़ने की बजाय एक वर्ग के रूप में एकजुट होकर अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा। काम के घण्टे कम करने की माँग उस समय की सर्वोपरि राजनीतिक माँग थी…

मई दिवस अनुष्ठान नहीं, संकल्पों को फौलादी बनाने का दिन है!

मज़दूरों का त्योहार मई दिवस आठ घण्टे काम के दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आन्दोलन से पैदा हुआ। उसके पहले मज़दूर चौदह से लेकर सोलह- सोलह घण्टे तक खटते थे। सारी दुनिया में अलग-अलग इस माँग को लेकर आन्दोलन होते रहे थे। अपने देश में भी 1862 में ही मज़दूरों ने इस माँग को लेकर कामबन्दी की थी। लेकिन पहली बार बड़े पैमाmay day 2ने पर 1886 में अमेरिका के विभिन्न मज़दूर संगठनों ने मिलकर आठ घण्टे काम के दिन की माँग पर एक विशाल आन्दोलन खड़ा करने का फैसला किया।

एक मई 1886 को पूरे अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 फैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे। शिकागो महानगर के आसपास सारा रेल यातायात ठप्प हो गया और शिकागो के ज़्यादातर कारख़ाने और वर्कशाप बन्द हो गये। शहर के मुख्य मार्ग मिशिगन एवेन्यू पर अल्बर्ट पार्सन्स के नेतृत्व में मज़दूरों ने एक शानदार जुलूस निकला….

मई 1886 का वह रक्तरंजित दिन

मशहूर भारतीय फ़िल्मकार सत्यजित रे ने अपनी एक फ़िल्म अमेरिका में प्रदर्शित की तो पहले शो में ही बहुत से अमेरिकी फ़िल्म बीच में ही छोड़कर आ गये क्योंकि सत्यजीत रे ने फ़िल्म के एक सीन में भारतीय लोगों को हाथों से खाना खाते हुए दिखाया था जिसे देखकर उन्हें वितृष्णा होने लगी थी। लेकिन अगर उन्हें इंसान के हाथों से सीवरेज की सफाई होती दिखला दी जाती तो शायद वे बेहोश हो जाते। सिर्फ अमेरिकी ही क्यों, इस नर्क के दर्शन से तो बहुत से भारतीय भी बेहोश हो जायेंगे। लोग अपने घरों में साफ-सुथरा टायलट इस्तेमाल करते हैं लेकिन वे शायद ही कभी सोचते हों कि उनके इस टायलट को साफ रखने के लिए इस दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो अपनी जान दे देते हैं। सिर्फ इसलिए कि दूसरे लोग एक साफ-सुथरी, ‘‘हाइजेनिक’’ ज़िन्दगी जी सकें….

चेन्नई के सफाई कामगारों की हालत

माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है…..

चीनी विशेषता वाले ”समाजवाद” में मज़दूरों के स्वास्थ्य की दुर्गति

हर साल करोड़ों स्‍त्री-पुरुष गाँवों में फसल का काम ख़त्म होते ही रोज़गार की तलाश में देश के महानगरों की ओर चल पड़ते हैं। निर्माणस्थलों, ईंटभट्ठों और पत्थर की खदानों में कमरतोड़ काम करने हुए ये रेल की पटरियों के नीचे या सड़कों के किनारे, या गन्दे नालों के किनारे बोरी या पालिथीन की झुग्गियों में रहते हैं, और अक्सर आधा पेट खाकर ही गुज़ारा कर लेते हैं

प्रवासी मज़दूर: चिकित्सा सेवाओं के शरणार्थी

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मधुबन, मऊ। प्रशासन की उपेक्षा और संवेदनहीनता से तंग आकर मधुबन तहसील के अन्तर्गत फतेहपुर मण्डाव ब्लाक के कई गाँवों के नरेगा मज़दूर अपनी  माँगों और मर्यादपुर ग्राम सभा की 5 माँगों को लेकर 22 अप्रैल से क्रमिक अनशन पर बैठे थे। इन गाँवों में मर्यादपुर, डुमरी, लखनौर, भिडवरा, जवाहिरपुर, गोबबाडी, रामपुर, अलीपुर-शेखपुर, ताजपुर, बेमडाड, गुरम्हा, छतहरा, लघुआई, लऊआसात शामिल थे। अनशन पर जाने से पूर्व उन्होंने ज़िला और तहसील स्तर पर हर जगह बार-बार पत्र लिखकर, ज्ञापन देकर अपनी आवाज़ पहुँचाने की कोशिश की, लेकिन मज़दूरों की आवाज़ कहीं नहीं सुनी गयी।

देहाती मज़दूर यूनियन द्वारा 8 दिन की क्रमिक भूख हड़ताल

5करीब डेढ़ महीने तक चली देशव्यापी चुनावी नौटंकी अब आख़िरी दौर में है। ‘बिगुल’ का यह अंक जब तक अधिकांश पाठकों के हाथों में पहुँचेगा तब तक चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे और दिल्ली की गद्दी तक पहुँचने के लिए पार्टियों के बीच जोड़-तोड़, सांसदों की खरीद-फरोख्त और हर तरह के सिद्धान्तों को ताक पर रखकर निकृष्टतम कोटि की सौदेबाज़ी शुरू हो चुकी होगी। पूँजीवादी राजनीति की पतनशीलता के जो दृश्य हम चुनावों के दौरान देख चुके हैं, उन्हें भी पीछे छोड़ते हुए तीन-तिकड़म, पाखण्ड, झूठ-फरेब का घिनौना नज़ारा पेश किया जा रहा होगा। जिस तरह इस चुनाव के दौरान न तो कोई मुद्दा था, न नीति – उसी तरह सरकार बनाने के सवाल पर भी किसी भी पार्टी का न तो कोई उसूल है, न नैतिकता! सिर्फ और सिर्फ सत्ता हासिल करने की कुत्ता घसीटी जारी है।

चुनावी नौटंकी का पटाक्षेप: अब सत्ता की कुत्ताघसीटी शुरू

नौजवान भारत सभा, बिगुल मज़दूर दस्ता और अखिल भारत नेपाली एकता मंच ने मिलकर अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस मनाया और भारत एवं नेपाल की मेहनतकश जनता के भाईचारे को और मज़बूत बनाने का संकल्प लिया।

मई दिवस के दिन सुबह ही गोरखपुर की सड़कें “दुनिया के मज़दूरों एक हो”, “मई दिवस ज़िन्दाबाद”, “साम्राज्यवाद-पूँजीवाद maydayका नाश हो”, “भारत और नेपाली जनता की एकजुटता ज़िन्दाबाद”, “इंकलाब ज़िन्दाबाद” जैसे नारों से गूँज उठीं। नगर निगम परिसर में स्थित लक्ष्मीबाई पार्क से शुरू हुआ मई दिवस का जुलूस बैंक रोड, सिनेमा रोड, गोलघर, इन्दिरा तिराहे से होता हुआ बिस्मिल तिराहे पर पहुँचकर सभा में तब्दील हो गया। जुलूस में शामिल लोग हाथों में आकर्षक तख्तियाँ लेकर चल रहे थे जिन पर ‘मेहनतकश जब जागेगा, तब नया सवेरा आयेगा’, ‘मई दिवस का है पैगाम, जागो मेहनतकश अवाम’ जैसे नारे लिखे थे….

मई दिवस पर याद किया मज़दूरों की शहादत को

कारपोरेट जगत में हमेशा ही मजदूरों का मनमाना शोषण होता रहा है लेकिन अब सरकारी उपक्रम भी बेहयाई से श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। वैसे तो मेट्रो रेल कारपोरेशन में श्रम कानूनों के खुले उल्लंघन की ख़बरें कर्मचारियों के आन्दोलन की बदौलत सामने आने लगी हैं लेकिन बेंगलोर मेट्रो तो इसमें भी दो कदम आगे निकल गयी है। वहाँ बच्चों से मज़दूरी करायी जा रही है ताकि कम पैसे पर उन्हें अधिक से अधिक निचोड़ा जा सके। केन्द्र और राज्य सरकार के निवेश और जापान बैंक के सहयोग से मिलने वाले 9,000 करोड़ के बजट के बाद भी बंगलोर मेट्रो के निर्माण के लिए बच्चों का खून और पसीना बहाया जा रहा है।..

बच्चों के खून-पसीने से बन रही है बेंगलोर मेट्रोदिल्ली मेट्रो की ट्रेनें

metro

दिल्ली मेट्रो की ट्रेनें, मॉल और दफ्तर जितने आलीशान हैं उसके कर्मचारियों की स्थिति उतनी ही बुरी है और मेट्रो प्रशासन का रवैया उतना ही तानाशाहीभरा। लेकिन दिल्ली मेट्रो रेल प्रशासन द्वारा कर्मचारियों के दमन-उत्पीड़न की हर कार्रवाई के साथ ही मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन और ज़ोर पकड़ रहा है। सफाईकर्मियों से शुरू हुए इस आन्दोलन में अब मेट्रो फीडर सेवा के ड्राइवर-कण्डक्टर भी शामिल हो गये हैं। मेट्रो प्रशासन के तानाशाही रवैये और डीएमआरसी-ठेका कम्पनी गँठजोड़ ने अपनी हरकतों से ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों की एकजुटता को और मज़बूत कर दिया है।

मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन

मित्रवत साथियो,
क्या आप जानते हैं कि शोषण करने वाला शोषण सहने वाले से ज्यादा गुनहगार होता है। और सभी जानते हैं, शोषण सहने वाला अधिक परिश्रमी होता है और शोषण करने वाला ऐयाशबाज़ होता है और हवेली में आरामदेह जीवन बिताता है।
लेकिन ऐसा क्यों?

ऐसा सवाल एक नहीं है बल्कि बहुत अधिक संख्या में हैं। लेकिन इन सवालों का जवाब एक ही है और वह है `अज्ञानता´। जो दिमाग़ और आँख होते हुए भी उन पर पट्टी बँधी हुई है। जो आज के हालात में `जानवर और मनुष्य एक समान जीने को मज़बूर है´, ऐसा क्यों? आप खुद समझिये और विचार कीजिये। आपके घर बैल होगा, अगर नहीं भी होगा तो सुने तो ज़रूर होंगे, बेचारा कितना मासूम परिश्रमी होता है। पूरे साल का अनाज पैदा करने में सहायता करता है। क्या उसका अधिकार नहीं है कि सोने के लिए पलंग मिले, उसका मालिक हमाम साबुन से नहाये तो उसे भी नहाने का हक हो, उसे भी अच्छे कपड़े मिलें, उसे भी खाने को अच्छा भोजन मिले, आपकी सम्पति में भी आधा हक हो…

आपस की बात

……..इसके अलावा और भी…

माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है

‘बिगुल’ लक्ष्य और स्वरूप पर बहस

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working power - manual as well as mental
power of the working people

नई समाजवादी क्रान्ति के उद्घोषक ‘बिगुल’ से सम्बंधित 72 पन्नों पर फैली अप्रैल 1996 से अक्टूबर 1999 लगभग साढे तीन साल चली इस दिलचस्प बहस में आप पाएंगे:-

बिगुल के लक्ष्य और स्वरूप पर बहस विशेष सम्पादकीय (बिगुल प्रवेशांक, अप्रैल 1996) एक नये क्रान्तिकारी मज़दूर अख़बार की ज़रूरत………………………………………………………2

(बिगुल के स्वरूप पर आत्माराम का पत्र, (जुलाई-अगस्त 1996) कुछ ज्यादा ही लाल… कुछ ज्यादा ही अन्तरराष्ट्रीय…………………………………………………..७

(सम्पादक बिगुल का जवाब), (जुलाई-अगस्त 1996) इतने ही लाल… और इतने ही अन्तरराष्ट्रीय की आज ज़रूरत है ………………………………….८

(अप्रैल 1999) `बिगुल´ के लक्ष्य और स्वरूप पर एक बहस और हमारे विचार ……………………………….10

(अप्रैल 1999, लेनिन का लेख) मज़दूर अख़बार – किस मज़दूर के लिए? …………………………………………………………….१३

(जून-जुलाई 1999, पी.पी. आर्य का पत्र) आप लोग कमज़ोर, छिछले कैरियरवादी बुद्धिजीवी हैं और `बिगुल´ हिरावलपन्थी अख़बार है!…………………………………………………………………………………………………………….15

(जून-जुलाई 1999, सम्पादक, बिगुल का जवाब) 1999 के भारत के `क्रीडो´ मतावलम्बी ………………………………………………………………..20

(अगस्त 1999, विश्वनाथ मिश्र का जवाब) सर्वहारा वर्ग का हिरावल दस्ता बनने की बजाय उसका पिछवाड़ा निहारने की ज़िद ……..32

(अगस्त 1999, अरविन्द सिंह का जवाब) भारतीय मज़दूर आन्दोलन की पश्चगामी· यात्रा के हिरावल सेनानी ………………………34

(अक्टूबर 1999 – विशेष बहस परिशिष्ट, पी.पी. आर्य का पत्र) बिगुल के लक्ष्य और स्वरूप पर बहस को आगे बढ़ाते हुए ……………………………………..37

(अक्टूबर 1999 – विशेष बहस परिशिष्ट, सम्पादक, बिगुल का जवाब) बहस को मूल मुद्दे पर एक बार फ़िर वापस लाते हुए ……………………………………………..53

(अक्टूबर 1999 – विशेष बहस परिशिष्ट, ललित सती का पत्र) `बिगुल के लक्ष्य और स्वरूप´ पर जारी बहस : एक प्रतिक्रिया ………………………………..68

(अक्टूबर 1999 – विशेष बहस परिशिष्ट, देहाती मज़दूर यूनियन के कार्यकर्ताओं का पत्र) देर से प्रकाशित एक और प्रतिक्रिया ……………………………………………………………………69

\’बिगुल\’ लक्ष्य और स्वरूप पर बहस — पीडीऍफ़ फाइल – यहाँ क्लिक करें


उजाले के दरीचे-‘विहान’ संगीत मण्डली के गीत

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क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गाए जायेंगे?
http://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/ujaalekedariche.mp3?attredirects=0
हाँ, जुल्मतों के दौर के ही गीत गाए जायेंगे!
‘विहान’ आपके बीच आया है
एक अँधेरे समय में,
अँधेरे के बारे में सच्चाईयां बयान करते गीतों को लेकर |
और उजाले की उम्मीदों के गीतों को लेकर |
ज़िन्दगी की तकलीफों और जद्दोजहद के गीतों को लेकर
और साथ ही सपनों और भविष्य का संगीत लेकर |
हमारे गीत आज की जिंदगी के अँधेरे में
उजाले के दरीचे बन सके,
इसी उम्मीद के साथ, इन्हें लेकर हम आपके बीच आये हैं |
डाउनलोड करने के लिए लिंक या copy link location to put in the \’url\’ of your player in the computer

इस साईट और इससे सम्बंधित साइटों पर उपलब्ध ऑडियो प्रोग्रामों को सुनने के तरीके

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http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio/Home/bigulmixed.mp3?attredirects=0
1.दिखाई देने वाला चिन्ह (icon) flash player का है, जिसे दायें और से क्लिक करने पर इस पर उपलब्ध फाइल चलना शुरू हो जायेगी.
2. इन प्रोग्रामों को हमारे द्वारा बताए गए लिंक्स से डाउनलोड किया जा सकता है जिन्हें बाद में लगभग सभी प्लेयर्ज़ पर चलाया जा सकता है. हमारे प्रोग्रामों की audio bitrate kb/s 16 जिससे 8 मिनट का ऑडियो प्रोग्राम लगभग एक mb जगह घेरता है.
3.अपने कम्पूटर पर उबलब्ध किसी भी प्लेयर में सीधा चलाने के लिए :
a drag your mouse over to the link,
b, clik right and select the copy link location,
c, now select ‘file’ of any player,(winamp window media player, for example) select ‘play url’ and paste the ‘link location’ there and ‘ok’.
if you are connected to the internet server, the program will start playing within no time.
उदाहरण के लिए दिखाई देने वाला चिन्ह (icon) flash प्लेयर के दबाने से ‘bigul mixed’ की एक घंटा 29 मिनट की फाइल चलनी शुरू हो जायेगी जिसमें आप गीत, भाषण, ,खबरें आदि सुन सकेंगे.
या निम्नलिखित लिंक को अपने माउस के दायें ओर से दबाकर ‘कॉपी लिंक लोकेशन’ चुने और अपने कम्पूटर पर उपलब्ध प्लेयर्स के फाइल में जाकर ‘url’ पर डाल दें और ‘ok’ दबाएँ, प्रोग्राम शुरू हो जायेगा.
download or copy link location

कार्ल मार्क्स की पूंजी (प्रथम खंड) का ऑडियो (इंग्लिश)

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प्रथम खंड की सभी फाईलों को सुनने या डाउनलोड करने के लिए \'यहाँ क्लिक\' करें

सपार्टकस हिन्दी नाटिका यूटयूब पर

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लगभग ३३ मिनट की इस लघु नाटिका को यूटयूब पर देखा और वहां से डाउनलोड किया जा सकता है. पंजाब लोक सभ्याचार मंच द्वारा मंच पर इसे खेला गया और वहीं से विडियो रिकॉर्डिंग हुई. amandeephundal द्वारा पोस्ट की गई इस विडियो के संकुचन में विडियो उतना साफ नहीं है लेकिन प्रभावशाली सवांद के कारण इस कमी को नजरंदाज़ किया जा सकता है. badal-sarkar-2

इस लघु नाटिका के लेखक हैं बादल सरकार जिसे हंसा सिंह और क्रांतिपाल के निर्देशन में तैयार किया गया. नवचिंतन कला मंच, ब्यास की इस पेशकश में मजदूर वर्ग के पितामह और पहले ऐतिहासिक बागी ‘सपार्टकस’ के नेतृत्व में गुलामों द्वारा  ईसा से कई सदियों पहले गुलाम-मालिक सम्बन्धों पर आधारित रोमन सभ्यता की नींव हिला देने के दृष्यों के लम्हों को पेश किया गया है. मजदूर वर्ग के नाटककारों को इतिहास को वर्ग-संघर्ष की निरंतरता में देखना चाहिए और उसकी प्रासंगिगता को वर्तमान में बुर्जुआ-उज़रती गुलाम सम्बन्धों से जोड़कर देखना चाहिए न की अतीत में घटित महज एक आकस्मिक घटना. बुर्जुआ-उज़रती गुलाम सम्बन्धों से उपजे संघर्ष में बुर्जुआ राज्य द्वारा मज़दूरों पर आये दिन जुल्म वरपा  होते ही रहते हैं. काश अपने पर होने वाले जुल्मों पर वर्तमान उज़रती गुलाम अतीत की इस घटना को बैक-फ्लैश में याद करते दिखाए होते !

इसकी उच्च क्वालिटी की वी.सी.डी. के लिए संपर्क करें–अत्तरजीत : 094175-81936

उच्च क्वालिटी की वी.सी.डी. को डाउनलोड करने के लिए इस पेज को क्लिक करें : Spartacus – Hindi Drama