फ़्रांस

हैती के भूकंप से संबंधित हमारी पोस्ट के पूरक से पहले

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इस ब्लॉग के आलेख, हैती के लोगों के भूंकप में मारेजाने का दोषी विश्व-पूंजीवाद नहीं तो और कौन है, पर एक ब्लॉगर  द्वारा उठाये गये सवालों की रौशनी में यह जरूरी हो जाता है कि इस पोस्ट का पूरक  भी दिया जाये क्योंकि उनके दृष्टिकोण और हमारे दृष्टिकोण में जो बुनियादी भेद है, वह जैसेकि वे लिखते हैं,

“हैती में भूकंप, ज्योतिष, पूंजीवाद और समाजवाद जैसे विषयों में क्या साम्यता है। अगर चारों को किसी एक ही पाठ में लिखना चाहेंगे तो सब गड्डमड्ड हो जायेगा। इसका कारण यह है कि भूकंप का ज्योतिष से संबंध जुड़ सकता है तो पूंजीवाद और समाजवाद को भी एक साथ रखकर लिखा जा सकता है पर चार विषयों के दोनों समूहों को मिलाकर लिखना गलत लगेगा, मगर लिखने वाले लिख रहे हैं।”

जबकि हम किसी परिघटना को उसकी समग्रता (totality ) में देखने की कोशिश करते हैं — एकांगी तरीके से नहीं. तकनीक, प्रकृति, उत्पादन प्रक्रिया (श्रम-प्रक्रिया), दैनिक जीवन का पुनरुत्पादन, सामाजिक संबंध और मानसिक अवधारणाएं को किसी मकानिकी फ्रेमवर्क में नहीं बल्कि उन्हें कहीं अधिक व्यापक और विस्तृत  – इनके बीच संबंधों और विरोध से उपजी गतिकी से – सांगोपांग तरीके से,  समझना जरूरी है ( इस तरीके से संबंधित डेविड हार्वे का व्याख्यान Reading Marx’s Capital – Class 8, Chapter 15, पाठकों के लिए सहायक हो सकता है.) एकांगी तरीके का अध्ययन और विश्लेषण सतही ही नहीं गुमराह करनेवाला होता है. परन्तु ज्यादातर लोग यही तरीका अपनाते हैं जो की निसंदेह गलत है.


ब्लॉगर महोदय द्वारा उठाये गए अन्य प्रश्नों का जवाब देना भी इस ब्लॉग की जिम्मेदारी है. जल्दी ही इस पोस्ट का पूरक प्रकाशित कर दिया जायेगा.

हैती के लोगों के भूंकप में मारेजाने का दोषी विश्व-पूंजीवाद नहीं तो और कौन है

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पहले हैती के बारे में :

* 90 लाख की आबादी वाला कैरिबियन राष्ट्र हैती, कभी फ़्रांस का उपनिवेश रहा है. यह काले लोगों का विश्व का सबसे प्राचीन गणतंत्र है जिसे, आजाद हुए इन लोगों ने, बगावत द्वारा 1804 में स्थापित किया.

* यह अमेरिका का सबसे गरीब देश है जिसकी प्रति व्यक्ति आय $560 है. UNDP मानव विकास तालिका में शामिल 177 देशों में इसका स्थान 146 वाँ है.

* आधी से अधिक आबादी 1 डालर प्रतिदिन से कम पर और 78 प्रतिशत आबादी 2 डालर प्रतिदिन से कम पर गुजारा करती है. शिशु मृत्यु दर बहुत अधिक है – 1000 पर 60 बच्चे. 15 और 49 के बीच HIV की मौजूदगी 2.2 प्रतिशत है.

* हैती का मूलभूत ढांचा पूर्णतया जर्जर हो चुका है. वनों की अंधाधुंध कटाई ने केवल  2 प्रतिशत भू-भाग पर ही वन छोड़े हैं.

* चावल की घरेलू और विदेशी बिक्री में 50 प्रतिशत की गिरावट आई और पूंजीवाद की मंदी ने वहां के किसान को तबाह कर दिया. इन उजड़े हुए किसानों के कारण Port-au-Prince की आबादी केवल 20 वर्षों में दुगनी – 40 लाख हो गयी.

* हैती की केन्द्रीय सरकार द्वारा दक्षिण के साथ भेदभाव के कारण अलगाववादी शक्तियां भी सिर उठा रही हैं.

हैती के लोगों की गरीबी और वर्तमान दशा के कारणों का पर्दाफाश करना होगा. क्या कारण है की पोर्ट-औ-प्रिंस गरीब और ग्रामीण लोगों से भरा हुआ है ?  क्यों उनकी संख्या एकदम 40 लाख तक जा पहुंची है ?

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आगे घुटने टेकने से पहले, चावल हैती का प्रमुख निर्यात रहा है. साम्राज्यवादियों, विशेषतया अमेरिका के हितों की पूर्ति हेतू 1980 में मुक्त बाज़ार और उदारवादी नीतियों के चलते, हैती की सीमा को खोल दिया गया, जिससे व्यापार रुकावटों के समाप्त हो जाने से चावल, जिसे अमेरिका में सब्सिडी मिलती थी, हैती के लिए निर्यात होने लगा और वहां का चावल उद्योग नष्ट हो गया. ( यहाँ यह बता देना जरूरी है कि विकसित और विकासशील और गरीब देशों के बीच अन्तरविरोध से विकासशील और गरीब देशों की बुर्जुआ सरकारों और उनके एन. जी. ओ. का मकसद इस अन्तरविरोध का फायदा अपने बुर्जुआ वर्ग को दिलाना होता है. इसलिए वे अंतरराष्ट्रीय मंचों और सम्मेलनों में विकासशील और गरीब देशों की दयनीय स्थिति का वास्ता देकर विकसित और साम्राज्यवादी देशों से जोड़तोड़ और सौदेबाजी करने में और स्वयं के देशों की जनता को बरगलाने में कामयाब हो जाते हैं. हकीकत में ये देश अपने देश की मेहनतकश जनता को लूटते और शोषण करते समय कोई रियायत नहीं देते.)

और इन नीतियों का फायदा किसे हुआ ? अमेरिका की भोजन सामग्री निर्माता कम्पनियों ने हैती के बाज़ारों में निर्यात करके करोड़ों कमाए. विदेशी कारपोरेशनों, जो हैती के नगरों में अपनी दुकाने खोलने में सफल रहे, ने गांवों से शहरों की ओर पलायन करने वाली सस्ती श्रम का जीभरकर शोषण किया. और हैती के लोगों के हिस्से में आई गरीबी, जिल्लत और तबाही.

हैती में आये भूकंप से मरनेवाले और प्रवाभित होनेवाले लोगों की संख्या लाखों में होने का अनुमान है. दुःख का विषय है कि इसे इस प्रकार पेश किया जाता है जैसेकि ये ऐसी प्राकृतिक आपदाएं हैं जिन पर मानव  काबू पाने में अक्षम है. या फिर ज्योतिष और तथाकथित अंकवैज्ञानिक माहिर इसे अपनी सच हो चुकी भविष्यवाणी के रूप में भुनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते. कहने को वे कहेंगे कि काश उनकी यह भविष्यवाणी गलत साबित होती तो मासूम लोग इस असामयिक मौत की आगोश में जाने से बच जाते. इसमें भी इनका फायदा होता है क्योंकि इसे अपराधबोध स्वीकृति के रूप में भुनाने का एक और मौका होता है.

ऐसे क्षणों में, इस कयामत के कारणों की पड़ताल राजनीतिक और सामाजिक सन्दर्भ में रखकर करना महत्त्वपूर्ण है. इस सन्दर्भ के बिना हैती के लोगों की मुश्किलों और उनके मसलों के हल नहीं ढूंढे जा सकते.उन्हें समझा नहीं जा सकता.  हिलेरी क्लिंटन का कहना ” यह कयामत ऐसे है जैसे कोई बाइबिल का फरमान हो जो हैती और हैती के लोगों का साये की तरह पीछा कर रहा है.”  इस प्रकार की बनावटी परन्तु आलोचनात्मक दीखने वाली टिप्पणी जो हैती के लोगों की पीडाओं के लिए भगवान को दोष दे – इससे अमेरिका और फ़्रांसिसी साम्राज्यवादी अपने चेहरे  छुपा नहीं सकते.

हैती के लोगों की मौत और तबाही केवल इस १२ जनवरी को आनेवाले भूकम्प के कारण ही नहीं है. दो शताब्दियों तक पहले फ़्रांसिसी और बाद में अमेरिका, हैती के लोगों की धन-संपदा को लुटते रहे – बलात्कार करते रहे, ठगते रहे और जनवादी तरीके से चुने हुए उनके नेताओं का अपहरण करते रहे. थोडा समय पहले ही अमेरिका ने वहां अपनी ‘अधिग्रहण बल’ की टुकड़ियों को तैनात किया है जिन्होंने हैती के लोगों को असुरक्षित इमारतों में, एक दूसरे के ऊपर-नीचे रहने, खुले स्थानों पर खाना पकाने, अपने पास बचे रेत-कंकड़ मिले आटे से अपने बच्चों का पेट भरने के लिए मजबूर कर दिया है. ‘अधिग्रहण बल’ का उद्देश्य कुछ और नहीं बल्कि उन्हें संगठित होने से रोकना है ताकि वर्तमान स्थिति यूं ही चलती रहे. इनके चलते ही इस गोलार्द्ध का यह देश सबसे गरीब रहा है. बेरोजगारी, उचित आवास की कमी, पराधीनता और अधिकारविहीन जनता के दुखों का कारण भी अमेरिका के अधिग्रहण से हुआ है.

विश्व-पूंजीवाद की सरकारें और उनकी मानव हितैषी एजेंसियां अपने दानवीर होने के मुखौटे पहनकर सहायता के लिए पहुँच गयी हैं जिन्हें बुर्जुआ मीडिया द्वारा ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे इनके दिलों में इन पीड़ित लोगों के प्रति सच्ची हमदर्दी हो. लेकिन वहां कार्यरत कुछ सामाजिक संस्थाओं ने इन लोगों से सहायता न लेने की और इन साम्राज्यवादी देशों की नीतियों का पर्दाफाश करने की हिम्मत दिखाई है. वे सलाम की हक़दार हैं.

यह सही है कि हमारे ग्रह की प्लेटें भूकम्प पैदा करती है लेकिन तबाही के लिए जिम्मेदार मौजूदा विश्व पूंजीवादी व्यवस्था ही है. संसाधनों का वितरण और योजनायें उनके असर को कम करने और बाद में उनके असर से निपटने के लिए निर्णायक भूमिका अदा करती हैं. हैती और उसका पडौसी देश क्यूबा – ये दोनों देश भयंकर तूफानों के साझे गवाह हैं.परन्तु 2008 में आनेवाले क्रमबद्ध तूफानों से जहाँ हैती में मरनेवाले लोगों की संख्या 800 थी वहां क्यूबा में केवल 10 लोग ही अपनी जान गंवा सके. यह इसलिए हुआ कि क्यूबा का समाज विदेशियों और पूंजीपतियों के मुनाफे और हितों के लिए संगठित नहीं हैं बल्कि उसके केंद्र में वहां की जनता के हित हैं.पश्चिम  गोलार्द्द का सबसे गरीब देश हैती जोकि औपनिवेशिक प्रणाली की सबसे क्रूर विरासत है, जिसके लोगों के जीवन को उत्तर औपनिवेशिक लूट ने और अधिक कष्टदायी बना दिया है. ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि विश्व साम्राज्यवादी पूंजीवाद, जो लोगों के दुखों का असली कारण है, का पर्दाफाश किया जाये. अमेरिकन साम्राज्यवाद, जिसकी नीतियों ने वहां के चावल उद्योग को नष्ट कर दिया है और लोगों को गन्दी बस्तियों में धकेल दिया है – अगर हैती के लोगों के भूंकप में मारेजाने का दोषी विश्व-पूंजीवाद नहीं तो और कौन है ?