सी पी आई ( एम एल ) लिबरेशन

मालवा का मजदूर आन्दोलन’ मजदूरों के आवास प्रश्न सम्बन्धी समाधान का निम्न बुर्जुआ प्रयत्न

Posted on Updated on

‘मालवा का मजदूर आन्दोलन’

मजदूरों के आवास प्रश्न सम्बन्धी समाधान का निम्न बुर्जुआ प्रयत्न
सुखविं
दर

“आवास प्रश्न के लिए बड़े पूँजीपतियों  तथा निम्नपूंजीपतियों दोनों के समाधानों का सारतत्व यह है कि मजदूर के पास रहने के लिए अपना घर होना चाहिए.” – फ्रेडरिक एंगेल्स  (“The Housing Question” Marx Engles, Selected Works part-2, page299).  इस लेखन में आगे दिए गए सारे हवाले भी इसी पुस्तक में से हैं,  (हर जगह अनुवाद हमारा)

बीते दिनों सी पी आई (ऍम एल) लिबरेशन की अगुवाई में मानसा और कुछ अन्य ग्रामीण मजदूरों की तरफ से अपने गाँवों की पंचायती ज़मीनों पर कब्जे किये गए और बाद में इस मजदूर संघर्ष को सरकारी दमन का सामना भी करना पड़ा.  इस तरह से लिबरेशन ने गाँव के मजदूरों के आवास प्रश्न का हल करने की कोशिश की, चाहे फ़िलहाल उसे अपने मकसद में सफलता नहीं मिली.

लिबरेशन के मुताबिक “आवास के लिए ज़मीन और गुजारे के लिए रोजगार गारंटी……..पंजाब के समूचे ग्रामीण और शहरी गरीबों तथा मजदूरों का एजेंडा है.”  इस लेख में हम केवल “गरीबों और मजदूरों के आवास के लिए जमीन” के सवाल पर ही चर्चा करेंगे क्योंकि  “गरीबों और मजदूरों के गुजारे के लिए रोजगार की गारंटी ” की मांग का चरित्र आवास प्रश्न से बिलकुल भिन्न है. आवास के लिए ज़मीन और गुजारे के लिए रोजगार की गारंटी पंजाब ही क्यों पूरे देश के मजदूरों का एजेंडा है. देश ही क्यों आज के पूंजीवादी विश्व में सारे देशों के मजदूरों का एजेंडा है. मजदूरों के लिए आवास की कमी का जन्मदाता ही दरअसल पूंजीवादी ढांचा है. असमान आर्थिक विकास पूंजीवादी समाज का एक अनिवार्य अंग है. एक तरफ तो औद्योगीकरण की बदौलत बड़े बड़े आधुनिक महानगर अस्तित्व में आते हैं तो दूसरी तरफ कई इलाके आर्थिक और सांस्कृतिक विकास से लगभग अछूते जहालत और पछडेपन के अँधेरे में धकेल दिए जाते हैं. औद्योगीकरण, शहरीकरण को गति देता है. करोड़ों लोग गाँवों से शहरों में धकेल दिए जाते है. कल के ग्रामीण किसान अब औद्योगिक पूंजीपतियों के लिए बेशी मूल्य पैदा करने के लिए फैक्ट्रियों में हड्डियाँ गलाने के लिए शहरों की गन्दी बस्तिओं में आकर रहने लगते हैं. इस तरह शहरों में आबादी बढ़ने की वजह से शहरों में घटिया से घटिया जगहों के लिए भी किरायेदार मिल जाते हैं. आज मुंबई, दिल्ली जैसे अनेक महानगरों की लगभग आधी आबादी किरायेदारों की ही है. इसमें शहरों में खाली पड़ी जगहों पर ‘नाजायज’ कब्जे करके झुग्गियां बनाकर रहने वाली बहुत बड़ी गरीब आबादी शामिल नहीं है क्योंकि यह आबादी किरायेदारों में शुमार नहीं होती. लुधियाना जैसे औद्योगिक महानगरों में मुर्गीखानों की तर्ज़ पर बने गंदे आंगनों के एक-एक कमरे में चार-चार पांच-पांच मजदूर ठूसे हुए हैं. शहर का कोई भी फ्लाई-ओवर ऐसा नहीं मिलेगा जिसके नीचे झुग्गियों की भरमार न हो. झुग्गियों वाले इलाके यहाँ हरदिन खुमी(Mushroom) की तरह उगते रहते हैं. इसके इलावा यहाँ एक बहुत बड़ी आबादी उन बेघरों की है, जिनके पास रहने के लिए किराए का कमरा भी नहीं है. फुटपाथ, पार्क और रिक्शा ही इनका रैनबसेरा हैं. एक अंदाज़े के मुताबिक़ केवल दिल्ली में ही डेढ़ लाख लोग बेघर हैं(हिन्दोस्तान टाईम्स,9 जनवरी 2010).यही हालात देश के अन्य महानगरों के हैं. यही हालात तीसरी दुनिया के सारे मुल्कों के महानगरों के हैं.और थोड़े फर्क के साथ यही हालात पूंजीवादी ‘स्वर्ग’ यानि विकसित पूंजीवादी देशों के महानगरों के हैं. यह समस्या उतनी ही पुरानी है जितना कि पूँजीवाद.

भारत जैसे कम विकसित पूंजीवादी देशों में जहाँ आज भी ग्रामीण आबादी की बहुतायत है, वहां ग्रामीण इलाकों में ग्रामीण गरीबों और मजदूरों के आवास की समस्या दूसरे रूप में सामने आती है. पंजाब के मालवा के गाँवों में ग्रामीण मजदूर के आवास की समस्या का वर्णन लिबरेशन की अगुवाई में चलने वाला मजदूर मुक्ति मोर्चा कुछ इस तरह से करता है,” ग्रामीण मजदूरों के भारी बहुमत के पास आवास के नाम पर आज भी वही ज़मीन है, जो 1958-60  में हुई मुरब्बेबंदी के समय गाँवों में लाल लकीर के अन्दर उनके बुजुर्गों के पास थी….पिछले 50 सालों में हमारी (ग्रामीण मजदूरों की – लेखक) 3-4 पीढियां जवान होकर कई परिवार बन चुके हैं. खेती के कामों का मशीनीकरण हो जाने की वजह से न तो हमें गुजारे लायक काम मिल रहा है और न ही जिले (मानसा) में कोई फैक्टरी लगाई गयी है…..ज़मीन की कीमतें गाँवों में भी शहरों की तरह आसमान छू रही हैं….जिस वजह से हम अक्सर एक छोटे से कमरे में पूरा-पूरा परिवार पता नहीं कैसे दिन काटने के लिए मजबूर हैं. हममें से बहुतों के पास तो रोटी पकाने के लिए कोई अलग जगह भी नहीं है और न ही नहाने धोने, पशु बाँधने, लकड़ी-इंधन रखने, पशु-विष्ठा सँभालने और शौच जाने के लिए कोई जगह है.” (‘लोक मोर्चा’ नवम्बर 2009,पृष्ठ 25 से हिन्दी में अनुवादित).

लगभग यही हालात देश के अन्य ग्रामीण इलाकों के हैं. यह है पूंजीवादी ढाँचे के अंतर्गत मजदूरों के आवास सम्बन्धी समस्या का विराट रूप. तो फिर इस समस्या का हल क्या है? सी पी आई (ऍम एल) लिबरेशन इसका हल ग्रामीण और शहरी मजदूरों में ज़मीनों का वितरण करके करना चाहती है. अगर बात सिर्फ लिबरेशन की होती तो हम इसका नोटिस नहीं लेते. क्योंकि लोक लुभावन नारे सुधारवादी, संसदमार्गी राजनीती का एक अंग होते हैं. नक्सलबाड़ी आन्दोलन की पैदावार यह पार्टी सातवें दशक के अंत तक वामपंथी दुस्साहसवाद का शिकार रही. आठवें दशक के शुरू में इसने संसदीय राजनीति की तरफ ऐसा मोड़ काटा कि अब यह पार्टी पूरी तरह संसदवाद की पटरी पर चढ़ चुकी है. और जिस पार्टी के साथ हमारे विचारधारा के समेत अन्य अनेक बुनियादी मसलों पर मतभेद हों उस पार्टी के साथ मजदूरों के आवास प्रश्न के बारे में बहस चलाने की कोई तुक नहीं बनती. लेकिनं मजदूरों के आवास के प्रश्न को आवास के लिए ज़मीनों के वितरण से हल करने की पहुँच सिर्फ लिबरेशन की ही नहीं है. मानसा जिला और अन्य जगहों पर लिबरेशन की अगुवाई में मजदूरों की तरफ से पंचायती ज़मीनों के कब्जे के लिए जो संघर्ष चला, उसको लेकर लिबरेशन और लाल परचम वालों में वाद-विवाद भी चला. परचम पक्ष का गिला सिर्फ यही था कि यह संघर्ष विभिन्न इंकलाबी पक्षों की तरफ से सांझे तौर पर क्यों नहीं लड़ा जा सका, जबकि इस संघर्ष की मूल मांग मजदूरों की रिहायश के लिए ज़मीन की मांग पर दोनों पक्षों की सम्पूर्ण सहमती है. इसके अलावा पंजाब के समूचे वामपंथी आन्दोलन, इंकलाबी काडर और इंकलाबी आन्दोलन के हमदर्द वामपंथी बुद्धिजीवियों में इस सवाल पर व्यापक भ्रम पाए जा रहे हैं. इसलिए यह जरूरी हो जाता है की इस सवाल पर मार्क्सवादी पहुँच को स्पष्ट किया जाये.

मजदूरों के आवास का प्रश्न और मार्क्सवाद

मार्क्सवाद अपने जन्म से ही बुर्जुआ, निम्न बुर्जुआ विचारधाराओं से टक्कर लेकर ही विकसित हुआ है. शुरू से ही मार्क्सवाद को आंतरिक और बाहरी हमलों का लगातार सामना करना पड़ा है.मार्क्सवाद ने हर बार इन हमलों का मुंह तोड़ जवाब दिया है. पिछले लगभग 150 साल की लम्बी अवधि के दौरान मजदूर आन्दोलन की राह रूशनाते हुए और विरोधी विचारधाराओं के साथ लगातार लोहा लेते हुए आज मजदूर मुक्ति का यह विज्ञान मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के रूप में विकसित हो चुका है.

जब बुर्जुआजी मार्क्सवाद से सीधी टक्कर में हार गई तो उसने मजदूर आन्दोलन के अन्दर ही अपने एजेंट ढूँढने शुरू किये. 1896 में फ्रेडरिक एंगेल्स के देहांत के बाद बर्नस्टीन पहले ऐसे एजेंट के रूप में सामने आया. उसने बदले हालातों की दुहाई देते हुए मार्क्सवाद में संशोधन का नारा बुलंद किया. इस संशोधन का मतलब था मार्क्सवाद के बुनियादी तत्व को ख़त्म करके उसे बुर्जुआजी के अनुकूल ढालना. इस तरह से मजदूर आन्दोलन में संशोधनवाद का जन्म हुआ. विकसित पूंजीवादी देश जिनमें से कई अपने सर्वोच्च पड़ाव साम्राज्वाद के पड़ाव में दाखिल हो रहे थे, इस बदले भौतिक हालातों नें भी संशोधनवाद के पनपने में भूमिका निभाई. मजदूर आन्दोलन में संशोधनवाद के जन्म से ही मार्क्सवाद और संशोधनवाद के दरमियान हर मजदूर आन्दोलन के हर व्यवहारिक कदम पर टकराव चला आ रहा है.

जो देश अभी नए-नए पूंजीवादी विकास की राह पर थे, वहां छोटे मालिकों (निम्न-बुर्जुआ) की भरमार थी. इन देशों में (मार्क्स-एंगल्स के समय जर्मनी और फ़्रांस) छोटे मालिकों के नजरिये से पूंजीवाद की आलोचना के रूप में निम्न बुर्जुआ समाजवाद अस्तित्व में आया. मजदूर आन्दोलन की समस्याओं के हल के लिए निम्न बुर्जुआ समाजवाद नीम हकीमी और पश्चगामी नुस्खे पेश करने लगा. रूस में यह रुझान नरोदवाद के रूप में सामने आया. आज दुनिया के अल्प विकसित पूंजीवादी देशों में इस रुझान का अच्छा खासा अस्तित्व है. शुरू से ही मार्क्सवाद को निम्न बुर्जुआ समाजवाद के नीम हकीमी और पश्चगामी प्रोग्रामों के विरुद्ध जबरदस्त संघर्ष करना पड़ा है.

मजदूरों के आवास प्रश्न पर भी निम्न-बुर्जुआ समाजवाद के पैरोकारों प्रूधों और उसके जर्मन चेले मूल्बर्गर का नीम हकीमी और पश्चगामी प्रोग्राम सामने आया. बुर्जुआ समाजवाद और निम्न बुर्जुआ समाजवाद द्वारा आवास प्रश्न पर पेश प्रोग्राम की धज्जियाँ उड़ाने का कार्यभार संसार मजदूर वर्ग के महान अध्यापक फ्रेडरिक एंगल्स के हिस्से आया. इस कार्यभार में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक’आवास प्रश्न सम्बन्धी’(शहीद भगत सिंह यादगारी प्रकाशन लुधियाना की तरफ से पंजाबी में प्रकाशित) में पूरा किया.

यह लेख हम फ्रेडरिक एंगल्स की इसी किताब को आधार बनाकर लिख रहे हैं. इस पुस्तक में मजदूरों के आवास प्रश्न पर निम्न-बुर्जुआ समाजवादी प्रूधों, उसके जर्मन चेले मूलबर्गर और बुर्जुआ समाजवादी श्री ज़ाक्स के विचारों की आलोचना है, और साथ ही फ्रेडरिक एंगल्स यह भी बताते हैं कि मजदूर वर्ग आवास के प्रश्न को कैसे सुलझाएगा. बुर्जुआ समाजवाद और निम्न बुर्जुआ समाजवाद के आवास प्रश्न सम्बन्धी विचारों का सारतत्व यह है कि मजदूरों के पास रहने के लिए अपना घर होना चाहिए या उन्हें घर के मालिक बनाया जाना चाहिए. मौजूदा पूंजीवादी प्रणाली के अंतर्गत मजदूरों को घर के मालिक बनाने का पैंतरा फ्रेडरिक एंगल्स के मुताबिक पश्चगामी, मूर्ख्तापूरण और नामुमकिन है.

फ्रेडरिक एंगल्स लिखते हैं,”पूंजीवादी तथा निम्नपूंजीवादी समाजवाद को जर्मनी में ठीक इस घड़ी तक सशक्त प्रतिनिधित्व प्राप्त है. एक ओर, उनका प्रतिनिधित्व काटेडेर-समाजवादी तथा सब रंगों के लोकोपकारी कर रहे हैं जिनके बीच मजदूरों की अपनी आवास स्थलियों का स्थाई स्वामी बनने की इच्छा अब भी बड़ी भूमिका अदा कर रही है तथा इसलिए जिनके विरुद्ध मेरी पुस्तक अब भी सामयिक है.(उपरोक्त पृष्ठ २९८).” और भारत में भी अभी निम्न बुर्जुआ समाजवाद की प्रभावी प्रतिनिधिता है.यहाँ भी लिबरेशन वालों व औरों की कमी नहीं जो मजदूरों को उनके रिहायशी मकानों के मालिक बनाने की कोशिशों में हैं. लिबरेशन की तरफ से पिछले दिनों मालवा के कुछ इलाकों में लड़ा गया संघर्ष भी इन्हीं प्रयत्नों की एक कड़ी था.इसलिए इनके लिए फ्रेडरिक एंगल्स की “रचना आज भी प्रासंगिक है.”

प्रूदोंवादी मूल्बर्गर मजदूरों के रिहायशी घरों की समस्या की पेशकारी इस तरह करता है,”हम यह दावा करने में संकोच नहीं करते कि हमारी स्तुत्य शताब्दी की पूरी संस्कृति पर इस तथ्य से बड़ा और कोई क्रूर व्यंग्य नहीं हो सकता कि बड़े शहरों में 90 प्रतिशत तथा इससे अधिक आबादी के पास ऐसा आवास नहीं है जिसे वह अपना कह सके. नैतिक तथा पारिवारिक अस्तित्व, घरबार का मूल बिंदु सामाजिक भंवर में डूबता जा रहा है…. इस मामले में हम वहशियों के बहुत नीचे हैं. कन्दरावासी के पास अपनी कन्दरा, आस्ट्रेलियाई के पास अपनी मिट्टी की झोंपड़ी, रेड इंडियन के पास अपना चौका-चूल्हा होता था, लेकिन आधुनिक सर्वहारा त्रिशंकु बना हुआ है.”(उपरोक्त पृष्ठ 310-311). फ्रेडरिक एंगल्स इस पर टिप्पणी करते हैं,”इस विलाप में प्रूदोंपंथ अपने पूरे प्रतिक्रियावादी रूप में मौजूद है.”(उपरोक्त पृष्ठ 311)

हमारे यहाँ भी मजदूरों के बेजमीने और बेघर होने के विलाप सुने जा सकते हैं. ये विलाप न सिर्फ देश के निम्न-बुर्जुआ समाजवाद के सियासी लेखन बल्कि गीतों, कविताओं में भी सुने जा सकते हैं.

निम्न-बुर्जुआ समाजवाद मजदूरों के आवास प्रश्न का हल कैसे करता है? ”मकानों को किराये पर उठाने की व्यवस्था का अंत करना परम आवश्यक बना दिया जाता है तथा उसे इस मांग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि हर किरायेदार को अपने आवास का मालिक बना दिया जाये.”(फ्रेडरिक एंगल्स उपरोक्त पृष्ठ 314) प्रूदोंवादी मूल्बर्गर के शब्दों में आवास प्रश्न की समस्या इस प्रकार हल की जाएगी,”किराये पर उठाये जाने वाले मकानों का विमोचन हो जायेगा…..समाज….इस तरह मकानों के स्वतन्त्र, आज़ाद स्वामियों का कुल योग बन जाता है. (उपरोक्त पृष्ठ 314 एंगल्स द्वारा दिया हवाला)

बुर्जुआ और निम्न-बुर्जुआ समाजवादी मजदूरों को मकानों के मालिक क्यों बनाना चाहते हैं और इससे मजदूरों को क्या फायदा होगा? बुर्जुआ समाजवादी श्री ज़ाक्स के शब्दों में पढ़ें,”ज़मीन का स्वामी बनने की इंसान में अन्तर्निहित अभिलाषा  में कुछ विलक्षणता है; यह ऐसी ललक है जिसे आज के कामकाजी जीवन की आपाधापी कम नहीं कर सकी है. यह आर्थिक उपलब्धि के जिसका प्रतिनिधित्व भू-स्वामी करता है, महत्त्व की अचेतन अनुभूति है. इसके साथ व्यक्ति सुरक्षित स्थिति हासिल करता है; कह सकते हैं कि उसके पाँव धरती पर मजबूती से जम जाते हैं, तथा प्रत्येक उद्यम(!) उसमें सबसे स्थाई अधर प्राप्त करता है. परन्तु भू-स्वामित्व के वरदान इन भौतिक लाभों की परिधि से कहीं अधिक व्यापक हैं. ज़मीन के किसी टुकड़े को अपना कहने का जिस किसी को सौभाग्य प्राप्त है, वह आर्थिक स्वतंत्रता की उच्चतम परिकल्पित मंजिल पर पहुँच चुकता है; उसके पास ऐसा भू-क्षेत्र है जिस पर वह प्रभुसत्ताप्राप्त अधिकार के साथ राज कर सकता है; वह स्वयं अपना स्वामी है; उसे कुछ सत्ता उपलब्ध होती है और ज़रुरत पड़ने पर निश्चित समर्थन मिल जाता है; उसका आत्मविश्वास तथा उसके साथ उसकी नैतिक शक्ति बढ़ती है. इसी कारण हमारे समक्ष मौजूद प्रश्न में स्वामित्व का गहन महत्त्व है….मजदूर को, जो आज आर्थिक जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों के प्रहार के सामने असहाय है और अपने मालिक पर निरंतर आश्रित रहता है, इस अस्थिर स्थिति से कुछ हद तक बचाया जा सकेगा; बह पूंजीपति बन जायेगा और उसकी स्थावर सम्पदा द्वारा उसके लिए उधार हासिल करने की संभावनाओं के द्वार खोले जाने के परिणामस्वरूप बेरोजगारी तथा कार्य अक्षमता के खतरों से उसकी रक्षा की जाएगी. उसे इस तरह सम्पत्तिहीनों की पांतों से ऊपर उठाकर सम्पत्तिधारी वर्ग के बीच पहुँचाया जा सकेगा.” (उपरोक्त पृष्ठ 329, एंगल्स द्वारा दिया हवाला)

‘लोक मोर्चा’ भी मूल्बर्गर की ही तरह ज़मीन के लिए तड़प की चर्चा करता है,”19 मई को मानसा डी.सी. कार्यालय पर हुए बेमिसाल मजदूर एकत्रीकरण ने यह दर्शाया कि मजदूरों में अपनी ज़मीन के लिए कितनी तड़प है और कैसे वो इसके लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं. (लोक मोर्चा,नवम्बर 2009 पृष्ठ 13,) मजदूरों की संपत्ति-च्युत्तता के विलाप और उनके लिए ज़मीन के लाभकारी होने का वर्णन और भी वामपंथी पत्रिकाओं में देखा जा सकता है.

मजदूरों के आवास प्रश्न के समाधान के रूप में मजदूरों को मकानों के मालिक बनाने में बुर्जुआजी भी दिलचस्पी रखती है,”आवास प्रश्न के प्रूदोंपंथी समाधान-सम्बन्धी अनुभाग में यह सिद्ध किया गया था कि इस प्रश्न में निम्न पूंजीपति वर्ग की कैसे प्रत्यक्ष दिलचस्पी है.परन्तु बड़े पूंजीपति वर्ग की भी उसमें बहुत दिलचस्पी है भले ही वह प्रत्यक्ष न हो……मौजूदा समाज की सारी बुराईयों के आधार को बरक़रार रख्नने और साथ ही स्वयं बुराईयों को मिटाने की इच्छा पूंजीवादी समाज का सारतत्व है. जैसा कि कम्युनिस्ट घोषणापत्र में पहले ही लक्षित किया जा चूका है, पूंजीवादी समाजवादी “पूंजीवादी समाज को बरक़रार रखने के लिए समाज की बुराईयों को दूर करना चाहते है”;वे चाहते हैं कि “पूंजीपति वर्ग हो, लेकिन सर्वहारा न हो” (फ्रेडरिक एंगल्स उपरोक्त पृष्ठ 323-326).

मजदूरों को संपत्ति के साथ बांधना किसके पक्ष में है?

भारत की ज्यादातर कम्युनिस्ट पार्टियां और ग्रुप आज भारत की अवास्तविक समझ पर खड़े हुए हैं. इनके अनुसार भारत एक अर्ध-सामंती अर्ध-बस्तीवादी देश है और यहाँ चीन की तरह की नव जनवादी क्रांति होगी. लेकिन ऐसा भारतीय समाज केवल इनकी कल्पना में ही बसता है. भारत की स्थितियां इनके इस कल्पना लोक से बिलकुल भिन्न हैं. भारतीय समाज आज से लगभग 4 दशक पहले 1960 के दशक के अंत में ही नव जनवादी क्रांति का पड़ाव पार करके समाजवादी क्रान्ति के पड़ाव में दाखिल हो गया था. आज भारत अपनी अलग विशेषताओं वाला पूंजीवादी भारत है. नव जनवादी क्रांति के कार्यक्रम को मानने वाली ज्यादातर पार्टियाँ/ग्रुप इस समय धनी किसानों के मुनाफे बढाने की लड़ाई में मशरूफ हैं. इस तरह ये पूंजीवादी बाज़ार की ‘बुराईयों’ के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. इनका व्यवहार भी इनके सिद्धांत की पुष्टि नहीं करता.

सी.पी.आई.(माओवादी) देश के सबसे पिछड़े इलाकों में सक्रिय है. इस पार्टी का व्यवहार अपने ‘रेड कॉरिडोर’ जो कि देश का सबसे पिछड़ा हिस्सा है, में भी भारतीय समाज के सामंती होने की पुष्टि नहीं करता. भारत के इस सबसे पिछड़े इलाके में भी पार्टी की लड़ाई सामंतों के विरुद्ध नहीं (जो कि वहां है ही नहीं) बल्कि पूँजी और भारतीय राज्यसत्ता के विरुद्ध है.

आज के भारतीय समाज में निम्न पूंजीपतियों मुख्यता किसानों के सर्वहाराकरण की प्रक्रिया बहुत तेज है. किसान किसी सामंती लगान की वजह से नहीं, बल्कि पूँजी के तर्क से सर्वहारा बन रहे हैं. यहाँ की ज्यादातर कम्युनिस्ट पार्टियां/ग्रुप इन छोटे मालिकों को बचाने अर्थात उनको ज़मीन के छोटे से टुकड़े के साथ बांधकर रखने और सर्वहारा बन चुके कल के किसानों को फिर से छोटे मालिक बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं. इनमें से ज्यादातर ग्रुपों का मानना है कि ‘ज़मीन हलवाहक की’ का नारा भारत की कृषि क्रांति का केंद्रीय नारा होगा.

जब समाज सामंती, अर्ध-सामंती पड़ाव में था, तो बुर्जुआ जनवादी या नयी जनवादी क्रांतियों के दौरान भूमिहीन काश्तकार किसानों में ज़मीन के वितरण ने इतिहास में एक शानदार प्रगतिशील भूमिका निभाई थी. परन्तु आज के पूंजीवादी समाज में जहाँ संपत्ति का वितरण नहीं, बल्कि संपत्ति का समाजीकरण इतिहास के एजेंडे पर आ चुका है, वहां सम्पत्तिहीनों के बीच संपत्ति का वितरण एक पश्चगामी नारा बन चुका है. यह आज के भारत के लिए भी उतना ही वास्तविक है जितना कि छोटे मालिकों की प्रचुरता वाले मार्क्स-एंगल्स-लेनिन के समय के समाजों के लिए वास्तविक था. और मजदूर वर्ग के इन महान शिक्षकों नें इस प्रश्न पर काफी कुछ लिखा है. मजदूरों के आवास प्रश्न के बुर्जुआ और निम्न बुर्जुआ हल के बारे में भी यही सच है. फ्रेडरिक एंगल्स लिखते हैं,”पूर्ववर्ती काल के ग्राम्य घरेलू उद्योग, जो सागबाड़ी और खेती से जुड़ा हुआ था, कम से कम उन देशों में, जहाँ उद्योग विकसित हो रहा था, मजदूर वर्ग के लिए सहनीय तथा यत्र-तत्र सुविधाजनक भौतिक स्थिति का आधार और साथ ही उसकी बौद्धिक और राजनीतिक नगण्यता का आधार था. हाथ की बनी वस्तु तथा उसकी लागत मंडी कीमत को निर्धारित किया करती थीं; श्रम उत्पादकता आज की तुलना में सर्वथा न्यून होने के कारण मंडी नियमतः पूर्ती की तुलना में अधिक तेजी के साथ विकसित होती थी. गत शताब्दी के लगभग मध्य तक इंग्लैण्ड में और अंशतः फ्रांस में-विशेष रूप से वस्त्र उद्योग के मामले में-यही होता रहा. परन्तु जर्मनी में, जिसने उस समय तीसवर्षीय युद्ध की तबाही के बाद अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों के अंतर्गत अपना पुनरूद्धार शुरू ही किया था, स्थिति निस्संदेह सर्वथा भिन्न थी. उस समय जर्मनी का एकमात्र घरेलू उद्योग था लिनेन वस्त्र का बुनाई उद्योग,जो विश्व मंडी के लिए उत्पादन कर रहा था, वह करों तथा सामंती सेवाओं के भार से इतना दबा हुआ था कि उसने कृषक बुनकरों को शेष कृषक समुदाय के अत्यंत निम्न जीवन स्तर से कभी ऊपर नहीं उठाया.फिर भी ग्रामीण औद्योगिक मजदूर उस समय कुछ हद तक सुरक्षापूर्ण अस्तित्व का उपभोग कर रहा था.

मशीनों के प्रचलन पर यह सब बदल गया. अब मशीनों से निर्मित वस्तुएं कीमतें निर्धारित कर रही थीं तथा इस कीमत के साथ घरेलू औद्योगिक मजदूर की उजरत घट गयी. परन्तु मजदूर को यह स्वीकार करना पड़ता था, वर्ना उसे किसी और काम की तलाश करनी पड़ती थी. और वह सर्वहारा बने बिना, अर्थात अपना छोटा-सा घर, बाग़ या खेत-वह चाहे अपना हो या लगान पर हो- छोड़े बिना यह नहीं कर सकता था. बिरले ही मामलों में वह इसके लिए तैयार होता. इस तरह हाथ से काम करनेवाले पुराने देहाती बुनकरों की सागबाड़ी तथा खेती ऐसा कारण बन गया जिसके परिणामस्वरूप जर्मनी में यांत्रिक करघे के विरूद्ध हथकरघे का संघर्ष इतने लम्बे समय तक चलता रहा और उसका कोई निर्णायक अंत नहीं हो सका. इस संघर्ष में ख़ास तौर पर इंग्लैण्ड में पहली बार यह चीज़ सामने आई कि जो परिस्थितियां पहले मजदूर की-अपने उत्पादन साधनों का स्वामी होने की- अपेक्षाकृत समृद्धि के आधार का काम देती थीं, वे ही अब उसके लिए अड़चन तथा बदकिस्मती का कारण बन गयीं. उद्योग के क्षेत्र में यांत्रिक करघे नें उसके हथकरघे को पराजित कर दिया, कृषि में छोटे पैमाने की खेती की तुलना में बड़े पैमाने की खेती का पलड़ा भारी हो गया. परन्तु जहां बहुत-से लोगों का सामूहिक श्रम तथा मशीनों और विज्ञान का उपयोग उत्पादन के दोनों क्षेत्रों में सामजिक नियम बन गए, वहां मजदूर को उसके मकान, बाग़, खेत तथा हथकरघे नें निजी उत्पादन की पुरानी पड़ चुकी विधियों और हाथ से किये जानेवाले श्रम के साथ बाँधा रखा. घर और बाग़ का स्वामित्व अब इधर-उधर जाने की पूर्ण स्वतंत्रता से कहीं कम लाभप्रद था. कोई भी कारखाना मजदूर हाथ से काम करनेवाले देहाती बुनकर की जगह लेने को तैयार नहीं था जो धीरे -धीरे परन्तु निश्चित रूप से भूख से मर रहा था.” (उपरोक्त पृष्ठ 299-300)

आगे वह लिखते हैं,”यहीं आधुनिक मजदूर के लिए मकान तथा भूस्वामित्व का “वरदान” अपनी पूरी भव्यता के साथ दिखाई देता है. जर्मन घरेलु उद्योगों में जितनी कम शर्मनाक मजदूरी दी जाती है उतनी और शायद कहीं नहीं दी जाती, शायद आयरिश घरेलु उद्योगों तक में नहीं. मजदूर का परिवार अपने छोटे से बाग़ या खेत से जो कुछ कमाता है, उसे पूंजीपति प्रतियोगिता का लाभ उठाकर मजदूर की श्रम शक्ति की कीमत से काट लेता है. मजदूर को जो भी उजरत दी जाती है उसे स्वीकार करने के लिए वह विवश होता है; एक तो इसलिए कि ऐसा न करने पर उन्हें कुछ भी नहीं मिलेगा और वे अपनी खेती की उपज के सहारे ही जिंदा नहीं रह सकते और दूसरे इसलिए कि यही खेती तथा भूस्वामित्व उन्हें अपने स्थान से बांधे रखते हैं तथा कोई दूसरा रोज़गार तलाश करने के लिए इधर-उधर नहीं देखने देते. यह है वह आधार जो छोटी-छोटी वस्तुओं की एक पूरी श्रृंखला में विश्व मंडी में प्रतियोगिता करने की जर्मन क्षमता को बरकरार रखता है. पूँजी पर पूरा मुनाफा सामान्य मजदूरी से काटा जाता है तथा पूरा अतिरिक्त मूल्य खरीददार को भेंट किया जा सकता है. अधिकाँश निर्यातित  जर्मन वस्तुओं के असाधारण रूप से सस्ते होने का यही रहस्य है.”…..” यहाँ हम स्पष्ट रूप से देखते हैं कि पूर्ववर्ती ऐतिहासिक मंज़िल में जो वस्तु मजदूरों की अपेक्षाकृत समृद्धि का – अर्थात कृषि का उद्योग से सम्बन्ध, मकान, बाग़, खेत तथा निस्संदेह आवास-स्थल के स्वामित्व का- आधार थी, वह आज, बड़े उद्योग के प्रभुत्व के अंतर्गत मजदूर के लिए सबसे विकट बाधक ही नहीं, वरन पूरे मजदूर वर्ग के लिए सबसे बड़ी बदकिस्मती भी बनती जा रही है, पृथक-पृथक ज़िलों में तथा उत्पादन की अलग-अलग शाखाओं में ही नहीं, वरन पूरे देश में भी मजदूरी को सामान्य स्तर से बेमिसाल नीचे रखे जाने का आधार बनती जा रही है. इसलिए यदि बड़े तथा निम्न पूंजीपति, जो मजदूरी से इन असामान्य कटौतियों पर जीवित रहते है तथा उनसे अमीर बनते हैं, घरेलू उद्योग के लिए तथा इस बात के लिए उत्सुक हैं कि मजदूर अपने मकानों के मालिक हो और यदि वे यह मानते हैं कि नए घरेलू उद्योगों की स्थापना समस्त ग्रामीण विपत्तियों को दूर करने का एकमात्र उपचार है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है!” (उपरोक्त पृष्ठ-301-302)

मजदूर वर्ग की मुक्ति संपत्ति के मालिक बनने में नहीं बल्कि संपत्ति से मुक्त होने में है. आधुनिक क्रांतिकारी वर्ग- सर्वहारा वर्ग – के निर्माण के लिए उन नाभि-रज्जू को काटना नितांत आवश्यक था जिससे पुराने ज़माने का मजदूर ज़मीन से जुड़ा हुआ था. हाथ से काम करनेवाला बुनकर, जिसके पास करघे के अलावा अपना छोटा-सा घर, बाग़ और खेत होता था, अपने सारे दुःख-कष्टों तथा सारे राजनीतिक दबाव के बावजूद शांत, संतुष्ट,”धर्मपरायण और प्रतिष्ठा प्राप्त” व्यक्ति था. वह अमीर, पादरी तथा पदाधिकारियों के आगे सिर झुकाया करता था और आंतरिक रूप से पूरी तरह दास था. यह ठीक आधुनिक, बड़े पैमाने का उद्योग ही है जिसने श्रमिक को, जो पहले से ज़मीन से बंधा जुआ था, पूर्णतया संपत्ति-च्युत सर्वहारा बना दिया, उसे तमाम परंपरागत बेड़ियों से मुक्त कर दिया, एक<<Vogelfrei>>(दो अर्थों वाला शब्द-’पक्षी की तरह मुक्त’,’विधि-बहिष्कृत’) सर्वहारा बना दिया; यह ठीक आर्हिक क्रान्ति ही है जिसने एकमात्र ऐसी अवस्थाओं का सृजन किया है जिनके अंतर्गत पूंजीवादी उत्पादन के रूप में मेहनतकश वर्ग का शोषण अपने अंतिम रूप समेत मिटाया जा सकता है. और तब विलाप करते हुए यह प्रूदोंपंथी सामने आते हैं और मजदूरों को घर-बार से बाहर निकाले जाने पर इस तरह सिसकियाँ भरते हैं मानों यह उनकी बौद्धिक मुक्ति की ठीक पहली शर्त नहीं, बल्कि प्रतिगामी पग है. (उपरोक्त पृष्ठ 311)

पूंजीवाद प्रतिदिन आबादी के बड़े हिस्से को सर्वहारा में बदलता है. इस संपत्ति-च्युत सर्वहारा की मुक्ति अब अतीत की और झाँकने में नहीं (जो कि किसी भी हालात में प्राप्त नहीं किया जा सकता और ऐसी इच्छाएं रखना मानवीय इतिहास के पहिये को पीछे की तरफ मोड़ने के तुल्य होगा) बल्कि पूँजीवाद के पार देखने में है.”बड़े पैमाने पर पूंजीवादी उत्पादन के प्रचलन के बाद मजदूरों की स्थिति भौतिक रूप से और बिगड़ी है, इस पर केवल पूंजीपति वर्ग संदेह करता है. परन्तु क्या हमें इसलिए पीछे मुड़कर मिस्त्र देश में मांस की हांडियों, (वह भी इनेगिने), छोटे पैमाने के देहाती उद्योग की ओर, जो केवल दासवत आत्माएं पैदा करता था, अथवा ‘वहशियों” की ओर ललचायी दृष्टि से देखना चाहिए? बात इसके विपरीत है. बड़े पैमाने के आधुनिक उद्योग द्वारा सर्जित, ज़मीन से बाँधनेवाली बेड़ियों समेत विरासत में मिली सारी बेड़ियों से मुक्त और बड़े शहरों में झुण्ड के झुण्ड भरता जा रहा सर्वहारा ही महान सामजिक रूपांन्तरण का कार्य संपन्न कर सकता है जो समस्त वर्ग शोषण तथा समस्त वर्ग शासन का अंत कर देगा, घर-बार वाले पुराने ग्रामीण बुनकर यह कभी न कर पाते; वे इस तरह के विचार को अमल में लाने की इच्छा करना तो दूर रहा, उसे दिमाग में नहीं ला सकते थे. (उपरोक्त पृष्ठ 311-312).

यदि मौजूदा पूंजीवादी प्रणाली में मजदूर घरों के मालिक बन भी जाएँ तो इसका इसका मजदूर वर्ग पर क्या प्रभाव पड़ेगा. फ्रेडरिक एंगल्स के शब्दों में,”श्री ज़ाक्स यह मानते प्रतीत होते हैं कि इन्सान मूलतः किसान है, अन्यथा वह हमारे बड़े शहरों के मजदूरों के दिल में ज़मीन पाने की वह अभिलाषा होने की बात न कहते जिसे और किसी ने उनमें नहीं पाया है. बड़े शहरों के हमारे मजदूरों के लिए स्थानान्तरण की स्वतंत्रता अस्तित्व की प्रथम शर्त है तथा भू-स्वामित्व उनके पांवों पर केवल बेड़ियों का ही काम देगा. उन्हें अपने मकान दें,उन्हें फिर ज़मीन से बाँध दें, बस इस तरह आप कारखानों के मालिकों द्वारा मजदूरी में कटौती कर उन द्वारा प्रतिरोध किये जाने की शक्ति को कुचल डालेंगे. कोई भी मजदूर मौका पड़ने पर शायद अपना मकान बेच सकेगा परन्तु बड़ी हड़ताल या आम औद्योगिक संकट की हालत में हड़ताली मजदूरों के सारे मकानों को बाज़ार में बिक्री के लिए प्रस्तुत करना पड़ेगा और तब इस कारण उनके ग्राहक ही नहीं मिलेंगे और यदि मिलेंगे भी तो उन्हें उनकी लागत कीमत से कहीं कम पर बेचना पड़ेगा. और यदि उन सब के लिए ग्राहक मिल भी जाएँ तो श्री ज़ाक्स का सारा महान आवास सुधार मिट्टी में मिल जायेगा तथा उन्हें फिर नये सिरे से काम शुरू करना पड़ेगा. (उपरोक्त पृष्ठ 330)…..”परन्तु हमारे मजदूर के इस पूंजीवादी रूप का एक और भी पहलू है. आइये, यह मान लें कि किसी औद्योगिक इलाके में यह  प्रथा है कि प्रत्येक मजदूर का अपना छोटा-सा मकान है. ऐसी स्थिति में उस इलाके का मजदूर वर्ग बिना किराये दिये रहता है; आवास व्यय अब उसकी श्रम शक्ति के मूल्य में शामिल नहीं होते. परन्तु श्रम शक्ति की उत्पादन लागत में हर कटौती, यानी मजदूर की जीवनावाश्यक्ताओं की कीमत में प्रत्येक स्थायी कटौती “राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांत के लौह कानूनों के आधार पर” श्रम शक्ति के मूल्य के ह्वास के समतुल्य होती है और इसलिए अन्ततोगत्वा मजदूरी भी उसी अनुपात से घटेगी. इस तरह मजदूरी में औसतन गिरावट किराये की मद में बचाई गयी औसत राशि के बराबर होगी, यानी मजदूर अपने ही मकान के लिए किराया पहले की तरह नकद रूप में मकान-मालिक को नहीं, वरन कारखाना-मालिक को,जिसके लिए वह काम करता है, अदत्त श्रम के रूप में देता है, इस तरह मजदूर की बचत, जिसे वह अपने छोटे-से मकान पर लगाता है, एक अर्थ में पूँजी बन जाएगी परन्तु यह पूँजी उसकी  नहीं, वरन, उस पूंजीपति की होगी जिसके लिए वह काम करता है.(उपरोक्त पृष्ठ 331)…..”प्रसंगतः,जो कुछ ऊपर कहा गया है, वह उन तमाम तथाकथित सामाजिक सुधारों पर लागू होता है, जो बचत करने या मजदूर की आजीविका के साधनों को सस्ता बनाने तक सीमित हैं. या तो ये सुधार सर्वव्याप्त हो जाते हैं और फिर मजदूरी में संबंधित कमी आती है या फिर वे बिलकुल इक्के-दुक्के प्रयोग मात्र रह जाते हैं और फिर इक्के-दुक्के अपवादों के रूप में उनका अस्तित्व ही यह सिद्ध करता है कि व्यापक रूप में उनका कार्यान्वयन उत्पादन की वर्तमान पूंजीवादी पद्धति से मेल नहीं खाता. आइये, यह मान लें कि किसी एक इलाके में उपभोक्ता सहकारिताओं की आम शुरुआत मजदूरों के जीवन निर्वाह साधनों की लागत 20 प्रतिशत घटाने में सफल हो जाती है. इसलिए उस इलाके में अन्ततोगत्वा मजदूरी में 20 प्रतिशत गिरावट आयेगी, कहने का मतलब है, उसी अनुपात से जिस अनुपात से जीवन निर्वाह साधन मजदूर के बजट में शामिल होते हैं. यदि मजदूर, उदाहरण के लिए, अपनी साप्ताहिक मजदूरी का तीन-चौथाई भाग इन जीवन निर्वाह साधनों पर खर्च करता है तो मजदूरी में अंततः गिरावट 3/4*20=15 प्रतिशत के बराबर होगी. संक्षेप में, ज्योंही इस तरह का बचत-सम्बन्धी कोई सुधार सर्वव्याप्त हो जाता है, मजदूर की मजदूरी उसी अनुपात से घट जाती है. हरएक मजदूर के लिए बचत से हासिल होनेवाली 52 टेलरों की स्वतन्त्र आय की व्यवस्था करें, तो उसकी साप्ताहिक मजदूरी अंततःनिश्चित रूप से एक टेलर घट जाएगी. इसलिए वह जितनी बचत करेगा, वह उतनी ही कम मजदूरी प्राप्त करेगा. इसलिए वह अपने हित में नहीं, वरन पूंजीपति के हित में बचत करता है. (उपरोक्तपृष्ठ 331-332)…..”दूसरे शब्दों में श्री ज़ाक्स को आशा है कि मकान के हस्तगत होने से अपनी सर्वहारा स्थिति में परिवर्तन होने के साथ-साथ मजदूर अपना सर्वहारा स्वरूप भी खो बैठेंगे तथा इस तरह वे अपने पूर्वजों की तरह- वे भी मकान-मालिक थे- एक बार फिर आज्ञाकारी चाटुकार बन जायेंगे. प्रूदोपंथियों को इस पर विचार करना चाहिए. (उपरोक्त पृष्ठ 332). मजदूरों को संपत्ति के साथ बांधना सिर्फ शोषक वर्गों के हितों की ही पूर्ति करता है.”सत्ताधारी वर्ग के सबसे चतुर नेताओं की कोशिशों का हमेशा यह लक्ष्य रहा है कि  छोटे -छोटे संपत्ति स्वामियों की संख्या बढती रहे ताकि सर्वहारा के विरुद्ध अपने लिए एक सेना तैयार की जा सके. गत शताब्दी की पूंजीवादी क्रांतियों नें सामंतों तथा चर्च की बड़ी-बड़ी जागीरों को छोटे-छोटे भू-खण्डों में बांटा- ठीक उसी तरह जिस तरह स्पेनी जनतंत्रवादी अपने यहाँ अब भी मौजूद बड़ी जागीरों को बांटना चाहते हैं- और इस तरह उन्होंने छोटे भूस्वामियों का एक वर्ग पैदा कर दिया जो तब से समाज में सबसे प्रतिक्रियावादी तत्व तथा शहरी सर्वहारा के क्रांतिकारी आन्दोलन की राह में स्थाई बाधक बना हुआ है. नेपोलियन तृतीय का इरादा सरकारी ऋण के छोटी-छोटी राशियों के बांड जारी कर शहरों में ठीक ऐसा ही वर्ग तैयार करने का था, और श्री दोल्फुस तथा उनके सहयोगियों ने अपने मजदूरों को छोटे-छोटे घर वार्षिक किश्तों पर बेचकर उनकी सारी क्रांतिकारी भावना का गला घोंटने और साथ ही इस संपत्ति द्वारा मजदूरों को कारखाने से बाँधने का प्रयास किया था. इस तरह प्रूदों की योजना ने मजदूर वर्ग को राहत पंहुचाना तो बहुत दूर रहा, वह सीधे उनंके ही विरुद्ध सिद्ध हुई.” (उपरोक्त पृष्ठ 317).

मजदूरों के आवास प्रश्न की समस्या का समाधान क्या है ?

पूंजीवादी प्रणाली नें मजदूरों के लिए घरों की कमीं पैदा की है, और इसका समाधान भी इस पूंजीवादी प्रणाली को उखाड़ कर और समाजवाद के निर्माण से ही संभव है. मौजूदा पूंजीवादी प्रणाली के अंतर्गत ही आवास प्रश्न की समस्या का हल ढूँढने की कोशिश एक यूटोपिया है, और ऐसी कोशिशें मजदूर आन्दोलन में विपथगमन का कारण बनेंगीं और पूंजीवादी प्रणाली की आयु और लम्बी करेंगीं. फ्रेडरिक एंगल्स लिखते हैं,”आवास की इस कमीं को दूर करने का एक ही साधन है- मेहनतकश वर्ग का सत्तारूढ़ वर्ग द्वारा किये जानेवाले शोषण तथा उत्पीड़न का पूरी तरह ख़ात्मा कर देना.” (उपरोक्तपृष्ठ 305).

मजदूरों के लिए घरों की कमीं को पूरा करने के लिए देहात और शहर के बीच के विरोध को दूर करना भी आवश्यक है. यह भी पूंजीवादी प्रणाली को जड़ से उखाड़ कर समाजवादी व्यवस्था के निर्माण से ही संभव है. ”इसलिए स्वयं अपनी स्वीकारोक्ति के अनुसार आवास प्रश्न का पूंजीवादी समाधान शहर और देहात के बीच विरोध के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया है. और यहाँ हम समस्या के मर्म बिंदु में पहुँच जाते हैं. आवास प्रश्न तभी हल किया जा सकता है जब समाज का इतना पर्याप्त रूप से रूपांतरण हो जाये कि शहर तथा देहात के बीच विरोध मिट जाये जिसे वर्तमान पूंजीवादी समाज नें चरम बिंदु पर पंहुंचा दिया है. इस विरोध को मिटाना तो रहा दूर, पूंजीवादी समाज उल्टे इसे नित्यप्रति उग्र बनाने के लिए विवश होता है. प्रथम समकालीन कल्पनावादी समाजवादी ओवेन तथा फुरिये ने इसे सही ढंग से पहचाना है. उनके आदर्श ढाँचे में शहर तथा देहात के बीच यह विरोध नहीं रह जाता. फलस्वरूप यहाँ ठीक श्री ज़ाक्स के दावे के उलट होता है- आवास प्रश्न का समाधान सामाजिक प्रश्न के साथ ही समाधान नहीं करता, बल्कि सामाजिक प्रश्न के समाधान से ही, यानी उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति के खात्मे से आवास प्रश्न का समाधान संभव हो जाता है.आवास प्रश्न के समाधान की अभिलाषा और साथ ही आधुनिक बड़े शहरों को बरकरार रखने की इच्छा बेतुकी चीज़ है. परन्तु आधुनिक बड़े शहरों को केवल उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति के खात्मे से  ही मिटाया जा सकता है, और एक बार यह काम शुरू हो जाने पर हर मजदूर के लिए छोटे-से घर का स्वामित्व प्रदान करने से सर्वथा भिन्न प्रश्न उठ  खड़े होंगे.” (उपरोक्तपृष्ठ 333). आगे फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं, ”जब तक उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति कायम रहेगी, आवास प्रश्न अथवा मजदूरों की दशा पर असर डालनेवाले किसी भी अन्य सार्वजनिक प्रश्न का समाधान करने की आशा करना मूर्खतापूर्ण है.समाधान तो उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति के उन्मूलन में तथा स्वयं मजदूर वर्ग द्वारा जीवन निर्वाह के तमाम साधनों तथा श्रम के तमाम साधनों के हस्तगतकरण में निहित है.” (उपरोक्त पृष्ठ 352-353).

मौजूदा पूंजीवादी पद्धति में घरों की कमीं केवल मजदूरों के लिए ही नहीं है. मजदूरों के इलावा शहरी निम्न-बुर्जुआ भी घरों की कमीं के शिकार हैं. बुर्जुआजी के लिए घरों की कोई कमीं नहीं है. इनके पास न सिर्फ अपने रहने के लिए जरूरत से बड़े घर हैं, बल्कि इनके पास अनेक घर हैं जो कि खाली ही रहते हैं, बस इन घरों की देखभाल के लिए एक-आधा नौकर इन विशाल भवनों के एक कोने में छोटे से कमरे में रहता है. 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में एक करोड़ साठ लाख मकान खाली पड़े थे. लुधियाना जैसे औद्योगिक महानगरों में तैयार घरों की कई कालोनियां देखी जा सकती हैं, जो कि खाली पड़ी हैं. इसके अलावा सभी बड़े शहरों में अनेकों देशी-विदेशी रियल इस्टेट कम्पनियां धड़ा-धड़ मकान बनाए जा रही हैं, जिनके लिए ग्राहक नहीं मिल रहे हैं. आज के समय में घरों की कमीं की समस्या नहीं है, समस्या है इनके सही इस्तेमाल की.

जैसेकि उत्पादन के सभी साधनों का असली मालिक मजदूर वर्ग है, क्योंकि यही इनको इस्तेमाल करता है और इसने ही इनका निर्माण किया है. उत्पादन के इन साधनों को पूंजीपति वर्ग से छीन लेना मजदूर वर्ग की मुक्ति के लिए एक बुनियादी शर्त है. उत्पादन के साधनों की तरह ही, पूंजीपतियों के घरों का भी असली मालिक मजदूर वर्ग ही है. एक, इसलिए कि यह घर उसके श्रम से बने हैं, दूसरा यह मजदूर वर्ग की श्रम शक्ति की लूट के ज़रिये बने हैं. इसलिए उत्पादन के साधनों की ही तरह मजदूर वर्ग पूंजीपतियों के घरों पर भी कब्ज़ा करेगा. एंगेल्स लिखते हैं,”चूँकि भावी समाज के संगठन के लिए कोई काल्पनिक प्रणालियों की रचना हमारा काम नहीं है, इसलिए यहाँ इस प्रश्न का विवेचन करना सर्वथा निरर्थक होगा. परन्तु एक चीज़ निश्चित है – बड़े शहरों में यह सारी “मकानों की कमी” दूर करने के लिए मकान पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं बशर्ते उनका विवेकपूर्वक उपयोग किया जाये. यह स्वभावतः तभी हो सकता है जब मौजूदा मकान-मालिकों के मकानों को हस्तगत करके मौजूदा गृहहीन मजदूरों अथवा भीड़भरे घरों में रहनेवाले मजदूरों को उनमें बसा दिया जाये. सर्वहारा ज्यों की राजनीतिक सत्ता हासिल कर लेगा, तब सामाजिक कल्याण के हितों से प्रेरित इस तरह का पग उठाना उतना ही सुगम होगा जितना आधुनिक राज्य द्वारा अन्य प्रकार के सम्पत्तिहरण तथा रिहायशी घरों को अपने अधिकार में किया जाना.” (उपरोक्तपृष्ठ 317-318). इसी सम्बन्ध में वे आगे लिखते हैं, ”परन्तु आरम्भ में प्रत्येक सामाजिक क्रान्ति को स्थिति को उसी रूप में ग्रहण करना होगा जिस रूप में वह उन्हें पाती है और अपने पास मौजूद साधनों की मदद से सबसे विकट बुराइयों से निपटाना पड़ेगा. और हम पहले ही देख चुके हैं कि सम्पत्तिधारी वर्गों के वैभवपूर्ण निवास स्थानों के एक भाग को हस्तगत कर तथा शेष भाग में जबरदस्ती किरायेदार बसाकर आवास की कमी से तत्काल छुटकारा पाया जा सकता है.” (उपरोक्तपृष्ठ 33-334).

निश्चय ही हमारे प्रतिद्वंदी यह सवाल उठाएंगे कि क्रान्ति का रास्ता तो अभी बहुत लम्बा है, और जब तक मजदूर वर्ग पूंजीवादी पद्धति को उखाड़ नहीं फैंकता तब तक क्या मजदूर को ऐसे ही नरक भरे हालातों में रहने दिया जाये. एंगेल्स ऐसे प्रश्नों के प्रति भी सचेतन थे. इसलिए वह लिखते हैं, ”जहां आधुनिक समाजवाद के आधारभूत सिद्धांतों को तथा उत्पादन के सभी साधनों को सार्वजनिक स्वामित्व में रूपांतरित करना न्यायोचित माना जाता है, वहां यह भी घोषित किया जाता है कि इनकी पूर्ति दूर भविष्य में ही संभव है जो व्यवहारतः सर्वथा अगोचर है. इसलिए कहा जाता है कि फ़िलहाल तो सिर्फ सामाजिक पैबंद लगाने का सहारा लेना पड़ेगा और परिस्थितियों के अनुसार “मेहनतकश वर्गों के” तथाकथित “उन्नयन” के लिए सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी प्रयत्नों तक के लिए सुहानुभूति प्रदर्शित की जा सकती है.” (उरोक्तपृष्ठ 298). आगे वह लिखते हैं. ”बड़े पैमाने के उद्योग और शहरों के वर्तमान विकास के साथ यह सुझाव उतना ही असंगत हो गया है जितना कि यह प्रतिक्रियावादी है और हर व्यक्ति द्वारा अपने आवास के व्यक्तिगत स्वामित्व का पुनः आरम्भ किया जाना पीछे की ओर एक कदम होगा.”(उपरोक्त पृष्ठ 371).

साभार प्रतिबद्ध  (प्रतिबद्ध से हिंदी में अनुवादित)

Advertisements