सागर मंथन’

उनको डर है कि कहीं उनकी मौत का कारण मिलावटी दूध न हो

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बात एक फिकरे में की जाये तो बुद्धिजीवी मिलावटी दूध पीने से मरेंगे नहीं. वैसे बुद्धिजीवी लफ्ज भी कोई ऐसा लफ्ज नहीं है जो, वर्गों में बँटे समाज में, कोई सेक्युलर सी चीज हो.  अगर हमारे प्रथम वाक्य की सच्चाई पर आपको शक हो रहा है, तो सुनो ! बुद्धिजीवी मरता है परजीवियों की सेवा करते हुए या फिर मेहनतकशों की. मिलावटी चीजे खाने से होनेवाली मृत्यु , मृत्यु होती ही नहीं. होता तो बस इतना है कि लूटेर वर्ग की सेवा में हाजिर बुर्जुआ वर्ग का बुद्धिजीवी जो कई साल पहले मर चुका होता है, कब्र में आराम फरमाता है.

एक बुद्धिजीवी वर्ग है जिसने एक नयी चीज ईजाद कर डाली है. वह बुद्धिजीवी जरा परमहंस टाईप का है जो पूंजीपतियों और मजदूरों के बुद्धिजीवियों से ऊपर होने के कारण ‘मुक्त चिन्तनं’ रुपी ‘दंड प्राणायाम’ द्वारा तंदरूस्त रहता है. बहरहाल अगर ऐसा बुद्धिजीवी है तो इस प्रकार के कठिन ‘योगासन्न’ करनेवाले बुद्धिजीवी की प्रतिरोधक क्षमता के मुकाबले बाबा रामदेव के योगासनं की बिसात ही क्या है ! ‘बढती उम्र के साथ सुरक्षित संभोग’ के नुस्खों-टोटकों की मदद से ‘500 वर्षों तक कैसे जीयें’ – इतना कुछ तो कोई भी ‘योगस्वामी  समझा देगा. मगर हमारे ‘परमहंस टाईप’ और ‘मुक्त चिन्तक’ बुद्धिजीवी ‘मुक्त चिन्तनं’ रुपी ‘दंडप्राणायाम’ द्वारा ‘एक्सरसाईज’ करते हैं, जिससे इन 500 वर्षों के जीवन की सार्थकता खोजने पर ‘चिन्तनं’ से जो ‘सागर मंथन’ होता है, उसके  परिणामस्वरूप ‘अमृतपान’ से, वे अमर हो गए हैं. सो मिलावटी दूध पीकर मरने से तो दूर हैं वे.

बात अगर ‘सागर मंथन’ की चली है तो थोडा इस पर भी. ब्रह्मा की दिति और अदिति पत्नियों से पैदा हुए देव और दानव भाईयों ने ‘पौराणिक काल’ में ‘सागर मंथन’ किया था. शेषनाग की रस्सी बनायीं गयी थी जिसके खतरेवाले – यानिकी मुख की ओर के सिरे पर दानव थे. ‘रक्तबीज’ नामक दानव ‘अमृत’ ले उड़ा था और देवतायों ने उसे काटकाटकर मारना शुरू कर दिया. मगर ‘रक्तबीज’ का रक्त जहाँ-जहाँ गिरता गया, और रक्तबीज पैदा होते गये. मौका देखकर, उस वक्त की सियानिसियास्त ने, रक्तपात बंद करवा दिया था.

भारत में मोटापा परजीवी वर्ग के लिए चिंतनीय है तो अमेरिका में बुर्जुआ वर्ग, हमारी धरती के  मुक्त चिंतकों की मेहनत के सदके, इससे मुक्त हो रहा है. मगर वहाँ का सर्वहारा वर्ग अब भी बहुसंख्यक है. वह जंक फ़ूड’ खाने को अभिशप्त है और  मोटापे का शिकार बनता जा रहा है. खैर, हमारा यहाँ का स्थानीय ‘मुक्त चिन्तक’ स्थानीय बुर्जुआ वर्ग की चेतना में इतना इजाफा तो कर ही देगा कि वे थोडा सा और अधिक सियाने हो जाएँ. सियाने होने की देर है, वे सभी भौतिक पदार्थ जैसे ‘ओरगेनिक फ़ूड’ तो पहले से ही, उनकी सेवा में हाजिर होने के लिए, और  हमारे सर्वहारा वर्ग के हाथों से निकलने के लिए छटपटा रहे हैं ?

उत्पादन प्रक्रिया रूपी वर्तमान ‘सागर मंथन’ के उस सिरे पर जहाँ शेषनाग का सिर है, सर्वहारा लगा हुआ है. उत्पादन रूपी अमृत के बड़े हिस्से का रस्सावदान परजीवी पूंजीपति और उनके चाटुकार कर रहें हैं. मगर मुक्त चिंतको की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वे ‘रक्तबीज’ नहीं है. अलबता इस ब्लॉग की ओर से मुक्त चिंतकों को इस फिकरे के साथ शुभकामनाएं  – “तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हो पचास हजार” ?

तथाकथित मुख्य धारा की संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियों के 99 फीसदी से भी अधिक ‘बुद्धिजीवी’ कम्युनिस्ट काडर ने मार्क्स की पूंजी पढ़ी ही नहीं. और जनाब सोचते हैं कि मजदूर और किसान के शोषण का स्थान मंडी है.

हमारे एक  पुराने कामरेड अनाज मंडी या लेबर चौक में किसानों के लिए अधिक भाव और मजदूरों की मजदूरी में बढौतरी (पूंजीवाद की चौहदी के भीतर की लड़ाई) के लिए कवायद में मशगूल रहते हैं. हालाँकि हमारे विश्लेषण का ऐसा कोई अति वामपंथी ‘वर्ज़न’ नहीं है कि इस प्रकार का कोई संघर्ष न हो. हम तो इतना कहना चाहते हैं कि पूंजीवाद द्वारा विकसित आधुनिक मंडी ऐसा स्थान है जहाँ ‘कमोडिटी’ के रूप में उपलब्ध श्रम-शक्ति और किसानों के अनाज का मूल्याँकन सही और वैज्ञानिक तरीके से होता है. जहाँ धोखाधड़ी की गुंजाईश ‘वर्चुयली’ शून्य होती है. सो इन बुद्धिजीवियों का चिंतन कोई घबराहट पैदा नहीं करता, ‘पूंजी’ लिखने के बाद मार्क्स के लिए विश्व के बुद्धिजीवियों को संबोधित करना कोई बड़ी समस्या नहीं थी. सो उन्होंने कह दिया कि अगर आपमें से कोई भी ईमानदारी से मेरे ‘पूंजी’ लिखने के प्रोजेक्ट पर लगा होता, तो वही नतीजे निकलते जो मेरी पुस्तक में निकले हैं. मगर हमारा यह 99 फीसदी तथाकथित मार्क्सवादी काडर अनुभववादी होने के कारण क्लासिकीय मार्क्सवादी पुस्तकों को ‘आस पडौस’ पर रोब झाड़ने के लिए रखता है. सिद्धांत और अनुभव में क्या फर्क होता है, भाड़ में जाये ये सब !

और अंत में, फ्रेडरिक एंगेल्स के ये शब्द : ” हर चीज तर्क के सिंहांसन के संमुख अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करती है या  अस्तित्व त्याग देती है .