समाज और संस्कृति

प्रकृति और जीवन प्रशिक्षण का इतिहास

Posted on Updated on

कड़ी जोड़ने के लिए देखें : .

प्रकृति और जीवन पद्धति

जिस प्रकार लोग पृथ्वी पर फैलते गए उसी प्रकार पृथ्वी के साथ मानव के संबंधों की बहुत परिष्कृत व्यवस्था बनती गयी. विख्यात नवजाति विज्ञानी लेविन और चेबोक्सारोव  के सुझाव अनुसार इन व्यवस्थाओं को जीवन-यापन या जीवन निर्वाह की संस्कृति कहना चाहिए. इसकी परिभाषा उन्होंने इस प्रकार दी है,

“किसी ठोस प्राकृतिक परस्थितियों में बसे जनगण के सामाजिक-आर्थिक विकास के निश्चित स्तर पर उनके जीवन निर्वाह और संस्कृति की जो विशेषताएँ उस जनगण के लिए लाक्षणिक होती हैं, उन विशेषताओं को ऐतिहासिक तौर पर अस्तित्व में आई समग्रता के जीवन-निर्वाह की संस्कृति-प्रारूप कहा जाता है. निश्चित भूगोलिक परस्थितियों से जुड़े जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूपों की धारणा विज्ञान के लिए बहुत लाभप्रद सिद्ध हुई हैं. इसके परिणामस्वरूप जनगण की संस्कृति में समानताओं और विभिन्नताओं के अनेक प्रश्नों के उत्तरों की खोज संभव हुई.हैं.”

लेविन और चेबोक्सारोव इसी बात पर जोर देते हैं. उन्होंने अपने प्रस्तावित रूपों को मात्र जीवन-यापन प्रारूप ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक जीवन-यापन प्रारूप कहा है. ऐसा कहना अकारण नहीं है. बात यह है कि जीवन-यापन संबंधी कार्यकलापों की दिशा और भूगोलिक परिवेश बहुत हद तक जनगण की भौतिक संस्कृति की विशेषता – पद्धतियों और आवासों के प्रारूप, परिवहन साधन, भोजन और गृह-गृहस्ती का सामान, वेशभूषा आदि निर्धारित करते हैं. नवजाति विज्ञानिकों ने विश्व में कई दर्जन जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूपों की गणना की है. इनकी सही सही गिनती बताना कठिन है क्योंकि अलग-अलग विज्ञानी अपने सिद्धांतों के लिए अलग-अलग वर्गीकरण का वैज्ञानिक आधार तैयार करते हैं. इसलिए भिन्न-भिन्न प्रकार के आंकडों की प्रस्तुति होती है. लोग कहाँ-कहाँ नहीं रहते ? उत्तरी ध्रुव प्रदेश में और उष्ण कटिबद्ध में, तिब्बत के पर्वतों में और एशिया , ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के रेगिस्तानों में! संसार के कोने-कोने में लोग बसे हुए हैं. कडाके की ठण्ड और झुलसा देने वाली गर्मी में भी! खतरनाक हिंसक जानवरों के बावजूद वे हर जगह रहने में सफल हुए हैं क्योंकि वे वहां की भूगोलिक परस्थितियों के अनुरूप संस्कृति या दूसरी प्रकृति का निर्माण करने में सफल हुए हैं.

एस्किमो लोगों के जीवन को लें. उनका जीवन कितना कठिन हैं. वहां ऐसा कुछ नहीं है कि वहां बहुत ज्यादा वनस्पति हो या उनके लिए बहुत ज्यादा वृक्षों या खाने-पीने का चुनाव करने की सहूलियत हो. उनका प्राकृतिक क्षेत्र अनेक महीनों की सर्दी और कई महीने लंबी रात – छः महीनों की रात और कहीं-कहीं तो आठ से दस महीनों की भी रात है. चारों तरफ बर्फ ही बर्फ ! निसंदेह कनाडा के प्रसिद्ध  नवजाति विज्ञानी और अनुसंधानकर्त्ता फारली मोइक का यह कहना दरुस्त है कि उत्तरी ध्रुव प्रदेश बर्फ द्वारा जमीं हुई नदियों और हिमकवच से जकड़ी हुई झीलों का ही नहीं बल्कि सजीव नदियों का भी जगत है जहाँ गर्मियों में नीला गगन झांकता है, जहाँ तटों पर फूलों का कालीन बिछता है और जहाँ पर हरी-भरी विशाल चरागाहें भी हैं. उत्तर ध्रुव प्रदेश एक विशाल भूखंड है जहाँ जबरदस्त गर्मी भी होती और भयानक ठण्ड भी. यहाँ लोग शिकारी और मछली पकड़ने वाले बनकर ही अपने अस्तित्व को बनाये रख सकते थे.

उपरोक्त जानकारी हासिल करने से  हमारा आशय क्या है? हमें बताया जाता है कि मूलरूप से हम शाकाहारी हैं. हमें फलां खुराक खाने और फलां खुराक न खाने के सुझाव दिए जाते हैं. हमें बताया जाता है कि फलां खुराक ही हमारे लिए परमात्मा द्वारा निर्धारित की गयी है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. जब तक मनुष्य स्वयं उत्पादन की क्रिया में शामिल नहीं  हुआ तब तक उसे  अपनी खुराक के लिए उस इलाके की परस्थितियों और उपलब्धता पर निर्भर रहना पड़ता था.

उत्तरी ध्रुव के मूल निवासी तरह-तरह के मकान बनाते थे. कुछ जनजातियाँ उत्तरी अमेरिका के तटों पर तहखाने रुपी मकान बनाते थे. जमीन में गढा खोदकर पत्थर की दीवारें खड़ी की जाती थीं जो जमीन से थोडी ऊपर की ओर उभरी होती थीं. इन्हें छत से ढांप दिया जाता था. मकान के अन्दर पहुँचने के लिए गहरी सुरंगों से होते हुए जाया जा सकता था. इन सुरंगों की दीवारें भी पत्थरों की बनी होती थीं जिनके ऊपर भी पत्थरों के छत होती थीं. अलास्का में इस प्रकार के मकानों में पत्थर के स्थान पर लकड़ी के तख्ते इस्तेमाल किये जाते थे. बहुत ही संकरी सुरंग द्वारा इसके अंदर प्रवेश किया जा सकता था. ऐसा दुश्मनों और जंगली जानवरों से बचाव हेतू किया जाता था. लेकिन अगर न पत्थर हो और न ही लकड़ी, तब क्या किया जाये? इस स्थिति में लोग मकान बनाने हेतू बर्फ का प्रयोग करते थे. आज भी ग्रीनलैंड के मैदानों में एस्किमों लोग अपने प्रसिद्ध मकान इग्लू बनाने के लिए बर्फ का प्रयोग करते हैं. एस्किमों राज-मिस्त्रियों की मुहारत हैरानकुन है. बर्फ की सीलियों को काटकर  इस प्रकार रखा जाता है कि एक गोल गुबंद खडा हो जाता है. इन बर्फ की दीवारों को मजबूत करने के लिए इस गुबंद के अन्दर एक दिया जो सील मछली की चर्बी से जल रहा होता है, ले जाया जाता है. इसकी गर्मी से बर्फ की दीवारों की अन्दर की ओर की कुछ बर्फ पिघल जाती है और दीवारों से थोडा-थोडा पानी सरकाना शुरू हो जाता है. इसके बाद ठंडी हवा को अन्दर प्रवेश करने दिया जाता है जिससे यह पानी जम जाता है और सीलियाँ आपस में मजबूती से जुड़ जाती हैं और इनके बीच का खालीपन ख़त्म हो जाता है. इसके पश्चात कुछ ही घंटों और दिनों में इग्लू की दीवारें बहुत मजबूत हो जाती हैं क्योंकि इनपर बर्फ का जमना जारी रहता है. इग्लू में प्रवेश करने का ढंग बहुत अजीब है. यह अकेला ऐसा मकान है जिसमें बर्फ की ही बनी हुई लम्बी सुरंग द्वारा फर्श से (दीवार में दरवाजा नहीं रखा जाता) प्रवेश किया जाता है.

संसार के दूसरे मकानों के मुकाबले इग्लू को आरामदायक कतई नहीं कहा जा सकता. इसकी ऊंचाई लगभग दो मीटर और व्यास तीन-चार मीटर होता है. इस थोडी सी जगह में भी दो परिवार रहते हैं. अगर चाहें तो इग्लू को बड़ा भी बनाया जा सकता है. अपनी सभाए आयोजित करने के लिए एस्किमों लोग बारह-बारह मीटर व्यास के इग्लू भी बनाते हैं. वहां मकान सामग्री बर्फ है जिसकी कोई कमीं नहीं है. लेकिन समस्या यह है कि मकान को गरमाने के लिए सील की चर्बी के दीये और मानवी शरीर से निकलने वाली गर्मी की आवश्यकता होती है. इसलिए स्वाभाविक है कि मकान जितना छोटा होगा उतना गर्म भी आसानी से होगा. इसमें गर्मी में भी रहा जा सकता है. यह सर्दी से ही नहीं गर्मी से भी बचाव करता है. वैसे तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश में गर्मी की ऋतु बहुत छोटी होती है और गर्मीं की इस ऋतू में भी वहां कोई विशेष गर्मीं नहीं होती. गर्मियों में इग्लू में प्रवेश करने के लिए फर्श के साथ दीवार में सुराख़ किया जाता है. बर्फ की दीवारें रोशनी को अन्दर जाने देती हैं. इसमें खिड़कियाँ भी रखी जा सकती हैं. दीवारों में सुराख़ किया जाता है और बर्फ की पतली और पारदर्शक पर्त लगा दी जाती है. आमतौर पर ऐसा किया भी जाता है. ऐसा लगता है कि यूरोप के मकानों की बनवाट के बारे में जानकारी होने के पश्चात एस्किमों लोगों ने इस प्रकार की खिड़कियाँ लगाने के प्रयोग करने शुरू कर दिए थे. पहले ऐसा नहीं था.

सदियों पहले इग्लू किस प्रकार के रहे होंगे, यह कोई भी नहीं बता सकता. इन मकानों की आयु ज्यादा लंबी नहीं होती. इसलिए इन मकानों की खोज पुरातत्वविदों को निराश ही करती है. हाँ, हम इतना जरूर जानते हैं कि इग्लू में बसने वाले लोगों की सभ्यता के तत्त्व मौजूद हैं. यहाँ खिड़कियों में समुद्री जीवों की पारदर्शक अंतड़ियों का प्रयोग किया जाता था. घर के अन्दर चारों तरफ समूर वाले जानवरों की खालें टंगी होती थीं. परंतु यहाँ भी ग्रीनलैंड की भांति सारा फर्नीचर बर्फ का ही होता था जो चमड़े और समूर से ढंका होता था. सारा फर्नीचर बर्फ के बेंचों के रूप में होता था जिनपर लोग बैठते, खाना खाते और आराम करते थे. वैसे औजारों और हथियारों के लिए इग्लू की काख में बर्फ की छोटी-छोटी कोठियां भी बनाई जाती थीं.  जमीन में गढा खोदकर उसमें खाने-पीने की वस्तुएं भी रखी जाती थीं. बेरन जलडमरू के मध्य तटों पर रहनेवाले एलउत लोग व्हेल मछली की पसलियों को जमीन में गाड़कर और उनपर सुखी घास बिछाकर घर बनाते थे. बाद में व्हेल मछलियों की हड्डियों के स्थान पर समुद्र में आनेवाले वृक्षों के तनों का प्रयोग होने लगा. ये मकान ग्रीनलैंड के इग्लू मकानों से कहीं अधिक बड़े होते थे. इन मकानों का क्षेत्रफल सौ वर्ग मीटर से भी अधिक हो सकता था. पर बड़े मकानों में लोग और भी अधिक तंगी का शिकार होते थे. इस प्रकार के मकानों में लगभग पचास परिवार अपने-अपने रहने का हिस्सा टाट द्वारा बाँट लेते थे.

उपरोक्त सभी कौमें उस जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूप का उदाहरण हैं जिसमे प्राकृतिक संपत्ति को मात्र हस्तगत किया जाता है. यहाँ कोई उत्पादन नहीं किया जाता. यह भी उस उपकरण की प्रतिनिधि है जिसको समुद्री जीवों के उत्तर ध्रुवीय शिकारी कहा जाता है. एस्किमों, तिप्ता, एलउत आदि का शिकार बहुत विभिन्नता लिए हुए नहीं है. व्हेल, सील, वालरस, सफ़ेद रींछ आदि का ही शिकार किया जाता है. इनका शिकार आसानी से किया जा सकता है क्योंकि एक या दो प्रकार के जीवों के शिकार के लिए बहुत अधिक मुहारत की आवश्यकता नहीं पड़ती. पत्थर, हड्डी, व्हेल के बालों और समुद्र में बहकर आनेवाली लकड़ी से कई तरह के औजार – लड़ाई के और गृह-गृहस्ती में काम आनेवाले  – बनाये जाते थे. लकड़ी के ढांचे और खालों को तानकर बनायीं गयी इनकी नावें हलकी फुलकी होती थीं. व्हेल के शिकार के लिए एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश जाने के लिए बनी इन नोकाओं में एक सौ से भी अधिक व्यक्ति बैठ सकते थे.

उत्तर ध्रुवीय निवासी लोगों के वस्त्र गर्म और आरामदायक होते थे. अन्तरिक्ष में जानेवाले लोगों के वस्त्र इन्हीं लोगों के वस्त्रों की नक़ल अनुसार बने हुए हैं. यूरोपीय लोगों का कोट पैंट भी किसी हद तक इन लोगों के वस्त्रों के आधार पर बनाया गया है. उत्तर ध्रुवीय प्रदेश और शीतोष्ण और उष्ण कटिबद्ध प्रदेश , जहाँ-जहाँ पर लोगों ने ख़ास किस्म का शिकार अपना लिया – फंदे, जाल, धनुष और बर्छिया बना ली और बंजारे  शिकारी और कंदमूल इकठ्ठा करनेवालों के स्थान पर लम्बे समय के लिए रहने के लिए बस्तियों का निर्माण कर लिया गया – वे वहां के स्थाई निवासी बन गए और उन्होंने औजारों और आहार के भण्डारण के तरीकों को खोज निकला. दूसरे शब्दों में, जहाँ हस्तगतकरण पर आधारित जीवन पद्धति ने उत्तम रूप धारण कर लिया वहां बहुविधि-भौतिक-आत्मिक संस्कृति का निर्माण हुआ और जटिल संरचनाएं प्रकट हो गयीं.

हस्तगतकरण से उत्पादन की ओर – अगली किश्त में

भोजन की खोज द्वारा दूसरी प्रकृति का निर्माण

Posted on Updated on

http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio2/Home/Kashmir30aug09.mp3?attredirects=0&d=1

पिछली बार हमने मानव की जैविक जरूरतों जैसे भोजन, आराम करना आदि के बारे में चर्चा की थी. अब हम इनपर एक-एक करके विस्तार से चर्चा करेंगे. सबसे पहले भोजन की खोज द्वारा दूसरी प्रकृति के निर्माण की चर्चा. कई धार्मिक लोग कहते हैं कि जिसे चोंच मिली है उसे चुगा भी मिलेगा, परमात्मा पत्थरों में भी कीडों को देता है, उबलते पानी में भी जीव मिलेगा. जबकि सभ्यता और सस्कृति का इतिहास इससे उल्ट खून-पसीने से लबरेज है. हमारे बड़े-बूढेरे कंदमूल इकठ्ठा करते थे और शिकार किया करते थे. हाथ में लाठियाँ लिए वे वनों, मैदानों, तपते रेगिस्तानों में घूमते रहते थे. उन्हें खाए जा सकने वाले फलों, सब्जियों और कन्दमूलों की हजारों किस्मों के गुण और लक्षणों का पता था. अब हम उनके नाम और पहचान से अनभिज्ञ हैं. शिकारी अपने शिकार की आदतों के जानकर थे.

२० सदी के एक प्रसिद्द नरविज्ञानी लुई स्विकी अफ्रीकनों की परंपरागत शिकार विधियों का निरक्षण करते हुए इस नतीजे पर पहुंची कि खरगोश को पकड़ना कोई मुश्किल कार्य नहीं है. हमारे यहाँ भी अगर हम खरगोश पकड़ने वालों से बात करें तो  हमें पता चल जाता है कि दिन के समय खरगोश जिस रास्ते से होकर गुजरता है, उसी रास्ते से ही वापस आता है. ख़रगोश और अन्य जंगली जानवरों को जिन्दा रहने के लिए भोजन बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है. उन्हें अपनी उर्जा को बचाकर रखना होता है. निश्चित मार्गो पर चलकर ही वे ऐसा कर सकते हैं. शिकारियों को बस उनके रास्ते में बैठना या जाल अथवा शिकंजा लगाना होता है. लुई स्विकी लिखती हैं कि खरगोश शिकारी को देखते ही दौड़ना शुरू कर देता है. खरगोश की यह खासियत है कि मुड़ते समय वह अपने कानों को पीछे पीठ के साथ सटा लेता है. शिकारी समझ जाते हैं कि यह अब बाएं या दायें मुडेगा. मान लीजिये शिकारी दायीं और भाग रहा है और उसका अनुमान सही रहता है तो शिकार सीधा उसकी झोली में आ गिरेगा. अगर वह बायीं और भी मुडेगा तो वह पास की किसी झाडी में छुपेगा. खरगोश यह जानता है कि उसकी चमडी का रंग उसे छुपाने में मदद करेगा. लेकिन मानव की आँखे तो सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज को देखने के योग्य है. मानव बेशक तेज नहीं दौड़ सकता लेकिन बुद्धिमान होने के कारण उसे जानवरों की आदतों के बारे में पता है. मनुष्य के शरीर का गठन इस प्रकार का है कि शिकार के दौरान वह बाखूबी अपने ज्ञान का उपयोग कर सकता है.

शिकार के समय प्राचीन मानव ही नहीं बल्कि आज के मनुष्य भी बड़ी सहनशीलता का सबूत देते हैं. जैसे पानी में कांटा डालकर लम्बे समय तक मछली के फंसने का इंतजार करना. इसी प्रकार शिकार करते समय वे अपने कुत्तों के पीछे मीलों दूर तक निकल जाते हैं. मैक्सिको के तारामोरा इंडियन हिरणों का तब तक पीछा करते हैं जबतक वे थककर निढाल नहीं हो जाते. वे दो-दो, तीन-तीन दिनतक जानवरों का पीछा करते रहते हैं. रास्ते के हर छोटे टुकड़े पर हिरण मानव को आसानी से पीछे छोड़ देता है. पर मानव उसके पैरों के चिह्नों की खोज जारी रखता है. खोज बताती है कि यह मानव नहीं बल्कि हिरण ही होता है जो मानव से पहले थकता है. अगर शिकारी पशुओं के रास्ते जानता है या उसे विश्वास है कि पशु अपने प्राणों की रक्षा करते हुए वक्र रेखा में दौड़ता जायेगा तो शिकारी अपनी उर्जा और ताकत बचाते हुए सीधा उसके पास , अनुमानित स्थान पर पहुँच जाता है.

शिकारी और कंदमूल के संग्रहकर्त्ता उद्यमी और जिज्ञासू लोग थे. पशु-पक्षी और वनस्पतियों के बारे, अपने चौगिरदे और संसारव्यापी  घटनाओं के बारे, हर नई जानकारी उनके ज्ञान और अनुभव को बढाती रही. इस काल के दौरान मानव प्रकृति से उसकी देन लेता रहा और साथ-साथ प्रकृति की नई-नई देनों को लेने की तरकीब सीखता गया. शिकारी और संग्रहकर्त्ता उन हालातों में जीने के अनुकूल सिद्ध हुए. वे पृथ्वी के बड़े भूभाग पर बस गए. ऐसा उस समय से बहुत पहले हुआ जब उनके पूर्वजों ने धरती में पहले बीजों की बुआई की और अपने मित्र और सेवकों की खोज की. पर्वतों के उस पार क्या है? अनजान झील,  बड़ी नदी के उस पार क्या है?  ये सदैव उनकी जिज्ञासा का केंद्र रही हैं. प्राचीन काल से रहस्य मानव को भयभीत ही नहीं करता रहा बल्कि आकर्षित भी करता रहा है. और मानव की ज्ञान की प्यास आज भी शांत नहीं हुई है.

अज्ञात और अनजान खतरों से टक्कर लेने वाले लोग हर युग में पैदा हुए हैं. परंतु इन मतवाले लोगों की खोजों को बढाचढा कर नहीं देखना चाहिए. लोगों को नगरों, पर्वतों, सागरों नदियों से पार लेजाने वाली शक्ति यात्रा का चाव नहीं बल्कि उनकी मजबूरी, उनकी जरूरत थी. यूरोप के निवासी बर्फ नदियों के दक्षिणी किनारे पर रहने वाले पशुओं का शिकार करने के लिए वैसे-वैसे ही पीछे चलते रहे जैसे-जैसे नदिया पीछे उत्तर की ओर खिसकती गयी और जानवर पीछे हटते गए. वे अब उन वनों में नहीं रह सकते थे जहाँ पशु-पक्षियों की संख्या कम हो गयी थी. उदाहरण के लिए सूखे के कारण शिकार की संख्या में कमी हो गयी. अपने इलाके में आहार की पूर्ति कम हो गयी. लोगों का एक दल अलग होकर अपने लिए एक नया आवास ढूँढने के लिए निकल पड़ा. या ऐसा हुआ कि बस्ती में कहीं ओर से कुछ नए लोग आ गए. उन्हें भूख ने अपने इलाके से खदेड़ दिया था. उन्होंने यहाँ इस नए इलाके को अपने लिए ठीक समझा. उनकी संख्या और ताकत यहाँ के मूल निवासियों से अधिक थी. इस स्थिति में  मूल निवासियों के लिए मारे जाने या उस इलाके को  छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं था.

अमेरिकन इतिहासकार बी. हार्पर ने ऑचएलैउत और मैक्सिकन और उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले एक्सिमों लोगों की जीवन पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन किया है. तुले सभ्यता के एक्सिमों लोगों ने चार सौ वर्षों के दौरान अलास्का से ग्रीनलैंड तक पांच हजार किलोमीटर की दूरी तय की. प्रति वर्ष साढे बारह किलोमीटर. इसके विपरीत द्वीपों पर बसने वाले लोगों की प्रवास की गति कम थी. इस अंतर के पीछे क्या कारण है? एलैउत  लोग उपजाऊ भूमिपर बसे हुए होने के कारण लम्बे समय तक उसी स्थान पर बसे रहते थे जबकि उस स्थान पर जहाँ ज्यादा भ्रमण प्रकट होता है उस बारे में बी. हार्पर लिखते हैं कि यह निरक्षण नई बस्तियों के बसाए जाने से भी संबंधित हो सकता है. अमेरिकी इंडियनों के बूढेरों ने महाद्वीपों पर भू-स्थल के रास्ते प्रवेश किया. यह एक जीव-जंतु रहित मरूस्थलीय इलाका था. वे इसे जल्दी से जल्दी पार कर देना चाहते थे जबकि इसके विपरीत एलैउत लोगों को रास्ते में समृद्ध समुद्रीय परिवेश मिला. इससे नई दुनिया की ओर प्रस्थान करने की उनकी रफ्तार में कमी आई.

कभी तेज तो कभी धीमे, कभी पैदल तो कभी तैरकर या नावों की मदद से, अपने सफ़र को जारी रखते हुए, मनुष्य दक्षिणी ध्रुव के अलावा संसार के हर भू.भाग पर पहुँच गया. आदिम युग के कंदमूल इकठ्ठा करने वाले और शिकारी लोगों को कई बार लंबे समय तक भूखा रहना पड़ता था. धीरे-धीरे अपने अनुभव के द्वारा मानव ने सीखा कि जो कुछ भी सामने आता है, उसे खाना ठीक नहीं है. बल्कि कुछ विशेष पक्षियों और मछलियों का शिकार ही ठीक है. आज से कई दस हजार वर्षों पहले एशिया और यूरोप के मैदान और कटेशिया और उत्तरी अफ्रीका के निवासियों की उदर-पूर्ति शिकार द्वारा ही होती थी. क्रीमिया के पत्थर युग से पूर्व की अनेक हड्डियों के नमूने प्राप्त हुए हैं. इनकी गिनती से पता चला कि ६८.५ प्रतिशत हड्डियाँ जंगली गधों, घोडों और जैबरे आदि की थीं. सौंची नगर के नज़दीक हुई खुदाई और खोज से पता चलता है कि कई दस हजार वर्षों पूर्व जहाँ बसने वाले लोग विशेषतय बैल का मांस खाते थे जबकि मध्य एशिया के लोगों का  प्रमुख आहार भैंसे का मांस था.

एक लाख वर्ष पूर्व विशेषीकरण और  हथियारों के विकास ने लोगों की शिकार करने की दक्षता के लिए बेहतर उपाय निकालने में मदद की. शिकार करने के कुछ दुखदायी नतीजे भी निकले. प्राचीन गुफाओं के अध्ययन से पता चलता है कि वहां पर रहने वाले जीवों की कई प्रजातियाँ बिलकुल विलुप्त हो गयी क्योंकि अपने पेट की आग भूझाने के लिए मानव इन्हें पूरी तरह से चट कर गए. पुरातत्त्वविदों के अनुसार ५० व्यक्तियों के एक समूह को ६०० ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति के हिसाब से एक वर्ष के लिए ११ टन मांस की जरूरत पड़ती थी. मैन्मथन के शिकार के साथ १०० वर्गकिलोमीटर के क्षेत्र में लगभग डेढ टन मांस ही मिलता था. इसका अर्थ यह हुआ कि बच्चो समेत एक ५० व्यक्तियों के समूह को सात-आठ सौ वर्ग किलोमीटर तक के शेत्र में शिकार करना पड़ता था. इस उदाहरण से स्पष्ट है कि साढे पांच हजार वर्गकिलोमीटर के विशाल भू-भाग पर केवल तीस-पैंतीस हजार लोग ही गुजर-बसर कर सकते थे.

प्रकृति और जीवन प्रशिक्षण का इतिहास –

इसी आलेख की अगली कड़ी में  download-button.

संस्कृति की विभिन्नता और मानव का विकास – अंतिम किश्त

Posted on Updated on

इससे पहले :

प्रत्येक व्यक्ति अपने जनगण के प्रतिनिधि के तौर पर उस जनगण की  लाक्षणिक सांस्कृतिक विशेषताओं का वाहक होता है. जैसे एक व्यक्ति जब किसी अन्य स्थान पर जाता है तो उसने अगर पगडी बांधी हुई है तो वह अपने जनगण का प्रतिनिधित्व ही कर रहा होता है. इस प्रकार की विशेषताएँ जैव या आनुवंशिक या शारीरिक रूप से प्राप्त नहीं होती बल्कि  इन्हे हम अपने माता-पिता या बड़े-बुढेरों से ग्रहण करते हैं. कोई व्यक्ति किस जाति का है यह बात उसके जन या वंश द्वारा और इससे भी बढ़कर उसके पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा द्वारा निर्धारित होती है जिसके दौरान वह व्यक्ति उस नवजाति  जिसमें वह पैदा हुआ है, उस नवजाति के लक्षण जड़ीभूत करता है. अलग-अलग  देशों में लोगों के रीति-रिवाजों , आदतों और आचार-विहार की विलक्षणता असीम प्रतीत होती है और मानव संस्कृति की  भिन्नता की वह अभिव्यक्ति है जो पहली नज़र में ही स्पष्ट नज़र आती है. समस्त विश्व के लिए ऐतिहासिक विकास की एकसमान नियमों की सीमाओं के अन्दर लोगों ने जीवन-पद्धति के सैंकडों-हजारों रूपान्तरों का निर्माण किया है. संसार को प्रवर्तित करते हुए लोग स्वयं खुद को इस संसार के और इन परिवर्तनों को भी अनुकूल ढालते हैं. वे भविष्य की अपनी-अपनी राह तलाशते हैं और राह का निर्माण भी करते हैं. संसार की प्रत्येक जाति, प्रत्येक राष्ट्र एक विशेष जीवन-पद्धति का सुन्दर प्रयोग है, उस जीवन-पद्धति का जो आदतों और प्रथाओं से, नियमों और नैतिकता से, कला और उस सबसे जिसे संस्कृति कहते हैं, से निर्मित होती है. जीवन-पद्धति की नवजाति विशेषता हर जाति के ठोस, ऐतिहासिक व्योरों का प्रमाण है.प्रत्येक जाति की विलक्षणता अपने भूगोलिक प्रवेश और दूसरे जनगण के साथ उत्पादन के माध्यमों के द्वारा अनन्त क्रिया की विशेषता की प्रतिछाया है. उदाहरण के लिए हमारे पहरावे में बाहर से आनेवाले शासक वर्गों का असर रहा है और अब पश्चिम के परिधानों का असर पड़ रहा है. इस प्रभाव के आदान-प्रदान के दौरान इसमें सामंजस्य ही नहीं होता है बल्कि इसमें टकराव भी होता है.

दिक और काल में, पांचों महाद्वीपों में, अनेक शताब्दियों के दौरान मानव जाति का सांस्कृतिक विकास होता आया है. आओ हम अब बारीकी से परखे कि संस्कृति किन-किन कार्यभारों को निभाती आई है. अपनी सारी विविधता के साथ संस्कृति को उन सभी सफल और असफल उत्तरों का कुलयोग माना जा सकता है जो लोगों के सामाजिक अस्तित्व के क्षेत्र में, और अस्तित्व द्वारा पैदा हुई उनकी सामाजिक चेतना के क्षेत्र में, मानव और मानव दलों की जरूरतों के लिए निर्मित होते हैं. संस्कृति के भिन्न-भिन्न प्रकार इन जरूरतों की पूर्ति करते हैं. हमारी वे कौन-कौन सी जरूरते हैं जिनकी पूर्ति संस्कृति द्वारा होती है? सबसे पहली जरूरत है उदर-पूर्ति, पेट भरना, सोना, तंदरूस्त रहना अपने वंश को जारी रखना. ये सभी जरूरतें तो पशुओं की भी हैं परंतु जीवन के लिए जरूरी इन जरूरतों की मानव जब पूर्ति करता है तो उसमें कई विशेषताएं शामिल होती हैं. ये जरूरतें दूसरी प्रकृति अर्थात संस्कृति के द्वारा पूर्ण होती हैं. जैव-जरूरतों की पूर्ति के उपायों में मनुष्य ने गहरे परिवर्तन किये हैं. इनके सिलसलों में कार्ल मार्क्स की एक टिपण्णी बड़ी ध्यान आकर्षित करने योग्य है. वे कहते हैं कि भूख तो भूख है बेशक वह  मांस को पकाकर छूरी-काँटों की मदद से खाकर मिटाई जाती है – यह भूख उस भूख से बिलकुल भिन्न है जिसके लगने पर हाथों, नाखूनों और दांतों द्वारा कच्ची बोटियों को निगला जाता है. दूसरी प्रकृति द्वारा रक्षात्मक कामों की पूर्ति के लिए जीवन-जरूरतों की तुष्टि में ऐसा रुपान्तरण स्पष्ट रूप में प्रकट होता है. यह दूसरी प्रकृति मनुष्य की वर्षा से रक्षा छत द्वारा करती है, उसके शरीर पर चोगा-कुरता आदि पहनाती है और सिर पर पगडी या टोपी. इस सबको आधारभूत जीवन-निर्वाह की संस्कृति कहा जाता है.

संस्कृति का कहीं अधिक महत्वपूर्ण काम कुछ और भी है, वह है इस संसार का कायाकल्प जो मानव की उन जरूरतों का उत्तर प्रस्तुत करता है जो किसी अन्य जीव की नहीं हैं. यह उत्तर सबसे पहले भौतिक संपत्ति और उत्पादन साधनों और औजारों के उत्पादन में प्रकट होते हैं. लोगों का परस्पर मेलजोल जरूरी होता है. इसके अनुरूप ही संस्कृति उनको मेलजोल के ऐसे साधन प्रदान करती है जो केवल मनुष्य को ही प्राप्त हैं. किसी भी समाज का अस्तित्व केवल तभी बना रह सकता है जब उसके सदस्य आचार-विहार और रहन-सहन के निश्चित नियमों का पालन करें. कोई ऐसा समुदाय नहीं है जिसमे उसके जीवन को नियमित करने के मानक न हों. कोई भी ऐसा विकसित समाज नहीं है जिसके पास उसके समाज और उसके आर्थिक आधार और उत्पादन के संचालन की प्रणाली न हो. लोगों के परस्पर संबंधों का नियमन भी संस्कृति करती है. मानव वंश जारी है. मानव जाति के लंबे इतिहास में प्रेम का जो रुपान्तरण हुआ है, यह शायद संस्कृति के विकास की सबसे अधिक ज्वलंत अभिव्यक्ति है. वंश जारी रखने की सहज वृति तो सभी जीवों में है लेकिन मनुष्य में यह एक उदात भावना बन गयी है जिसने आत्मिक भावना से भरपूर मनुष्य में श्रेष्ट, सच्चे मानवी गुणों को उभारा है. मानव वंश का पुनरुत्पादन लोगों की नई पीढियों को शिक्षित करने की जरूरत के साथ गहरे रूप से जुडा हुआ है. यह शिक्षा-दीक्षा और चरित्र-निर्माण किसी भी समाज का सबसे महत्वपूर्ण कार्यभार होता है क्योंकि इसकी बदौलत ही समाज संस्कृति के लगातार विकास के कार्य को जारी रख सकता है. आराम भी मनुष्य की एक बड़ी जरूरत है. अपने मूल में यह जैव जरूरत है लेकिन काफी हद तक इसकी पूर्ति संस्कृति के साधनों से ही होती है. एक और शुद्ध मानवी जरूरत है, जिसे मानव ने लाखों वर्ष पूर्व ग्रहण किया है, वह है संसार का ज्ञान प्राप्त करने और उसकी व्याख्या करने की मनुष्य की भूख. यह कहा जा सकता है कि ज्ञान और विज्ञान और कला की उत्पति का सेहरा इस बात को है कि मानव ने मानव जाति की खोज की, मानवता को जाना, इतिहास में अपने स्थान को समझा. संस्कृति की घटनाये बहुआयामी हैं, मनुष्य के सामने अपने अलग-अलग पहलू उभार सकती है. होमर की प्रस्तुतियां कभी नृत्य की धार्मिक रचनाएँ थीं लेकिन प्राचीन साहित्य का रस लेते हुए हम इसके बारे में नहीं सोचते. विज्ञान आज एक विराट शक्ति है लेकिन किसी ज़माने में यह मनुष्य की व्यवहारिक समस्या को हल नहीं करता था बल्कि यह केवल जादू द्वारा उनका मनोरंजन मात्र करता था.

आनेवाले आलेखों में हम देखेंगे  कि किस प्रकार मानव ने इस संसार को अपने रहने लायक बनाया और संस्कृति के आर्थिक पहलू का विकास किया और किस प्रकार इसने  सबसे पहले जीव की नर्सैगिक जरूरत – उदर पूर्ति की संस्कृति को विकसित किया.

संस्कृति की विभिन्नता और मानव का विकास – दूसरी किश्त

Posted on Updated on

ऑडियो और प्रथम किश्त के लिए यहाँ क्लिक करें : .

भोजन पकाने की विधियों में भी नवजाति संस्कृति की विशेषता प्रकट होती है. पहले पंजाब में तंदूर की रोटी ही प्रधान रही है .कई इलाकों में इसे हाथों द्वारा थपथपाकर फैलाया जाता था तो कई इसे किसी और तरह से बनाते थे. लेकिन अब रोटी के बनाने में एक ही तरह का तरीका प्रधान होता जा रहा है. रोटी किस अनाज की बनाई जानी है, इसमें भी विभिन्नता थी. पंजाब में और अमेरिका और लैटिन अमेरिका के देशों में मक्के की रोटी रही है, कई जगह चने की तो कहीं बाजरे की. गेहूं की रोटी तो बस कल ही की घटना है. पहले तो गेहूं की रोटी को पकाया जाता था और सब्जी बनायीं जाती थी लेकिन सिर्फ घर में आये मेहमान के लिए.

यूरोपियन लोग एक-दूसरे से मिलते समय हाथ मिलाते हैं पर जापानी और चीनी और बहुत सारे भारतीय लोग हाथ मिलाना पसंद नहीं करते. हमारे यहाँ आमतौर पर बड़ों के पैर-छूहने की परम्परा रही है. बहुतेरे जापानी और यूरोपियन लोग इस तरह से सोचते थे कि अंजान लोगों से किस प्रकार हाथ मिलाया जा सकता है. पंजाबी औरतें आपस में गले मिलती हैं लेकिन अब यह कम होता जा रहा है. वियनावासी कहता है कि मैं हाथ का चुम्बन लेता हूँ लेकिन हाथ चूमता नहीं जबकि वारसावासी किसी औरत से मिलते समय सचमुच हाथ का चुम्बन लेते हैं. अंग्रेज अपना पत्र ‘डियर’ से शुरू करता है बेशक वह इसे क्रोध में आकर ही लिखे, बेशक उसने पत्र के प्राप्तकर्त्ता पर कोई अभियोग ही लगाना हो ! इसाई गिरजे में प्रवेश करते समय अपना सिर नंगा कर लेते हैं जबकि यहूदी, मुस्लमान और सिक्ख इसे ढक लेते हैं. यूरोपियन लोगों का शोक का रंग काला हैं जबकि चीन और भारत का सफ़ेद. जब चीनी लोग पहलीबार किसी यूरोपवासी या अमेरिकन व्यक्ति को किसी औरत की बाँहों में बाहें डालकर या चूमते हुए देखते हैं तो उन्हें बहुत शर्म महसूस होती है. यूरोप के लोग बच्चों को समझाते हैं कि अगर किसी के घर जाएँ तो जूठन नहीं छोड़नी है लेकिन चीनी अंत में परोसी गयी चीज को छोड़ देते हैं. अगर ऐसा नहीं होता है तो मेजवान उसे भूखा समझेगा.

प्रत्येक राष्ट्र को अपनी संस्कृति साधारण, सहज और एक उसी की ही सही लगती है. लेकिन दूसरे जनगण का व्यवहार अटपटा और चकित करने वाला लगता है. भारतीय हैरान होते हैं कि यूरोपियन औरतें अपने पति को नाम लेकर बुलाती हैं. बुल्गारिया के लोग ‘हाँ’ कहने के लिए अपने सिर को दायें-बाएं घुमाते हैं और ‘नहीं’ के लिए आगे-पीछे. घाना की संपती जाति में दामाद अपनी सास से बात नहीं कर सकता. हमारे यहाँ राजस्थान में भी ऐसा है और सास अपने दामाद से भी पर्दा करती है. एक बार एक स्विस यात्री न्यू चिली में शिकार के बाद पपुया कबीले के मुखिए के साथ भोजन कर रहा था. वह हड्डी पर बचे हुए थोड़े से मांस को मुखिया के लिए छोड़ देता था. इस बचे हुए गोश्त को पूरा खाने के बाद ही वह मुखिया हड्डी फेंकता था. उसके दोस्त ने पूछा कि इसका मतलब क्या है? तो उसने बताया कि अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो मुखिया नाराज होगा. यहीं मित्रता की निशानी है. हमारे लिए यह ऐसा होगा जैसे किसी कुत्ते के साथ व्यवहार किया गया हो.पंजाब में भी मित्रता के लिए एक ऐसा ही मुहावरा है कि उन दोनों की रोटी दांतों तले पिसती है, दोनों की एक ही बुरकी है.

बातचीत करते समय बीच की दूरी कितनी हो, इसपर भी  अलग-अलग राष्ट्रों में अलग-अलग धारणाएं हैं हैं. उत्तरी अमेरिकावासी को यह पसंद नहीं है कि कोई उसके बिलकुल साथ सटकर बातचीत करे. उसके लिए बीच की दूरी कम से कम ७५ सेंटीमीटर होना आवश्यक है जबकि लेटिन अमेरिकावासी के लिए यह दूरी बहुत ज्यादा है.

सुन्दरता की अवधारणायें भी भिन्न-भिन्न हैं. कौन सुन्दर है, कौनसा रंग सुन्दर है, लम्बा होना सुन्दर है या फिर ठिगना, इस बारे में भी जनगणों में बहुत अधिक विभिन्नता पाई जाती है. उदाहरण के लिए प्राचीन समरात लोगों को  सिर का प्राकृतिक रूप पसंद नहीं था. वे इसे सुन्दरता के लिहाज से अपनी कल्पना के अनुसार बदलते थे. इनके रहने के स्थानों की खुदाई के दौरान पुरातत्त्वविदों को बड़े हैरान करने वाले खोपड़ियों के आकार बरामद हुए हैं. अपने सिर के आकार में तबदीली करने वाले केवल समरात लोग ही नहीं थे बल्कि पेरू के इंक लोग जिनकी सभ्यता स्पेनियों ने नष्ट कर दी, भी ऐसा करते रहे हैं. वे सिर को दो हिस्सों में बाँट लेते थे. बच्चों के सिर की हड्डियाँ नर्म होती हैं. वे इस पर एक पट्टी बाँध लेते थे. इससे बीच में एक दरार पड़ जाती थी. सुन्दरता की धारणाएं कुछ सामाजिक कारकों से भी जुडी होती हैं. जैसे कि बहुत से जनगणों में लम्बे नाखून इस बात का प्रतीक हैं कि उन्हें धारण करनेवाला व्यक्ति बहुत बड़ा है और वह शारीरिक श्रम से मुक्त है.  पूर्व के कुछ देशों में नाखूनों को खतरनाक आकार तक बढ़ने दिया जाता है और इसे कुलीन वंश के होने का चिह्न समझा जाता है. कभी-कभी लोग नाखूनों पर चाँदी के खोल चढा लेते हैं. कहीं-कहीं लम्बे नाखूनों का मतलब धार्मिक व्यक्ति होने से भी है.

कुछ लोग नत्थ पहनते हैं तो कुछ लोग इसपर बड़े हैरान होते हैं जबकि उनकी स्वयं की औरतें कानों में गहने पहनती हैं. मलाया और मौरी कबीले के लोग अपने बच्चों की नाक को चपटा रखना पसंद करते थे जबकि इसके एकदम विपरीत १६वीं शताब्दी के फ्रांस में बाज जैसी नाक का होना बहुत सुन्दर माना जाता था और वहां की औरतें अपने बच्चों की नाक को खींचती रहती थीं ताकि वह पतली और लंबी हो जाये. कहीं-कहीं लम्बी गर्दन होना सुन्दरता की निशानी माना जाता है. जार्जिया के लोग बच्चों को इस प्रकार सुलाते थे कि उसका सिर पीछे की ओर लटक जाये. इस तरह से वे उसकी गर्दन को लम्बा करते थे. पूर्वी अफ्रीका के लोग औरतों की गर्दनों को लंबा करने के लिए छल्ले डालते जाते हैं. इस प्रकार मानव शरीर को बनावटी आकार देने की बहुत सारी विधियां रही हैं. इसी प्रकार मानव अंगों पर गोदने का रिवाज भी रहा है. कई इलाकों में सीधे आकार की टांगे सुन्दर मानी जाती हैं. घूमंतरू और पशुपालक कबीले के लोगों में वक्राकार टांगे अच्छी और सुन्दर मानी जाती है. इससे चलना और दौड़ना आसान होता है. मरू-भूमि के लोगों की टाँगे सीधी होती हैं जबकि जहाँ बैलों से हल चलाया जाता है, वहां लोगों की टांगे खम्म धारण कर लेती हैं. इसलिए काल्मिक लोग बच्चों के पालने में एक कूपी रख देते थे ताकि टाँगें थोडी सी टेढी हो जाएँ.  प्राचीन युनानवासी सीधी टांगों को ही सुन्दर मानते थे. न्यूजीलैंड के मौरी कबीले के आदिवासी बच्चे के घुटने पर थोड़े-थोड़े समय के बाद चोट मारते रहते थे ताकि उसकी टांगे सीधी रहें. ओशियाना के कुछ कबीलों में दांत तोड़ देने का रिवाज रहा है. वहां टूटे हुए दंत का मुंह सुन्दर माना जाता रहा है. प्राचीन मैक्सिको की माया सभ्यता के लोगों के बारे में एक रुसी लेखक लिखते हैं कि माता अपनी बच्ची को सुन्दर बनाने के लिए माथे और सिर के पीछे एक-एक फटी बांध देती थी ताकि उसका माथा सीधा, चौडा और सपाट हो जाये. इसी प्रकार उसके सामने के बालों की लटों से एक गोली बांध दी जाती थी. इसे लगातार देखने पर उस लड़की की नज़र तिरछी हो जाती थी. इसे सुन्दर समझा जाता था जबकि हमारे यहाँ इसे सुन्दर नहीं नुक्स समझा जाता है. पश्चिमी और दक्षिण एशिया के लोग बड़ी आँखों को सुन्दर मानते हैं.

अगली किश्त :

संस्कृति की विभिन्नता और मानव का विकास

Posted on Updated on

http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio2/Home/culturaldevelopment.mp3?attredirects=0

यह आलेख उपरोक्त पंजाबी ऑडियो का हिंदी रूपांतरण है

संस्कृति है क्या ? संस्कृति दूसरी प्रकृति है. एक वह प्रकृति है जिसका प्रसार हम अपने चारों तरफ पाते हैं. यह प्रकृति मनुष्य से स्वतन्त्र तौर पर निर्मित और विकसित हुई और इसके निर्माण और विकास का इतिहास भी मानव से पहले का है. दूसरी प्रकृति वह है जिसे मानव ने निर्मित किया है और मानव इस दूसरी प्रकृति के निर्माण के दौरान स्वयं इस प्रकृति की रचना भी बना है. अर्थात मानव और दूसरी प्रकृति के अंतरविरोध द्वारा गतिशील संस्कृति और मानव के बीच द्वंदात्मक रिश्ता है.

संस्कृति की विभिन्नता

सही-सही कहा जाये तो नवजाति संस्कृति के लोग एक-दूसरे से इसलिए भिन्न हैं क्योंकि भिन्न-भिन्न जनगण एक समान ज़रूरतों की पूर्ति हेतू की जाने वाली आवश्यक क्रियायें आमतौर पर अलग-अलग तरीकों से करते हैं. उदाहरण के लिए बैठने की क्रिया को लीजिये. हम भारतीय नीचे भूमि पर ही बैठ जाते हैं जबकि यूरोपियन लोग ऐसा नहीं करते. रूसी लोग या यूरोपियन लोग खाना खाते समय मेज-कुर्सी का प्रयोग करते हैं, लेकिन हम जो हलवाहक कौमें रही हैं, नीचे धरती पर बैठकर ही खाना खा लेते रहे हैं या फिर पीढे बगैर का प्रयोग करते रहे हैं. और खाते समय केवल हाथों का प्रयोग करते हुए खाना खाते रहे हैं जबकि कश्मीरी लोगों को हाथों द्वारा रोटी तोड़कर खाना नहीं आता. हमारे लिए यह यूं लगता है जैसे कि यही, हमारे वाला तरीका ही, सही है. प्रत्येक संस्कृति के लोग ऐसा ही अनुभव करते हैं. वे ऐसा अनुभव करते हैं कि उनका स्वयं का ढंग सही और प्राकृतिक है जबकि दूसरों का नहीं. जैसे पंजाब के माझा इलाके की स्त्रियाँ रोटी के जिस तरफ चुपड़ लगाती हैं वहीँ दोआब की स्त्रियाँ इसके विपरीत ओर चुपड़ लगाएंगी. अगर ये दोनों एक जगह इकट्ठी हो जाएँ तो एक दूसरी से संबोधित करते हुए कहेगी कि वे लोग रोटी के गलत ओर चुपड़ लगाती हैं जबकि दूसरी स्त्री कहेगी चुपड़ लगाने का उनका तरीका गलत  हैं. इस प्रकार अगर बैलों को लें तो हम देखते हैं कि गाडीवानों और हलवाहकों के बैलों को हांकने के लिए भी अलग-अलग दिशाएं लेनी पड़ती हैं. जापानी लोगो उकडूं बठकर खाना खाते हैं जबकि काफी लोग कालीन बिछाकर. यूरोप के लोग एक लंबे अभ्यास के बिना चौकड़ी लगाकर बैठ ही नहीं सकते. और न वे उकडूं बैठ सकते हैं. यूरोपियन औरतों के लिए घुटनों के बल लंबे समय तक बैठना बहुत कष्टदायक है लेकिन जापानी औरतों के लिए यह बिलकुल सहज क्रिया है. जापान में कुर्सी पर बैठने का रिवाज बड़ी मुश्किल से प्रचलित हुआ. अफ्रीका के जूलू कबीले के लोगों के आराम करने का तरीका बहुत अजीब किस्म का है. वे एक टांग पर खड़े होकर, बगुले की तरह, आराम करते हैं. वे एक टांग पर खड़े हो जाते हैं और दूसरे पैर की ऐडी को घुटनों की डिस्क पर सटाकर आराम करते हैं. वैसे ही जैसा घोड़ा अपने एक तरफ के दोनों पैरों पर झुककर आराम कर लेता है. मलाया के लोग सोते समय अपने सिर के नीचे चौंकी रख लेते हैं. दक्षिण अफ्रीका के आदिवासी लोग वृक्षों की लटकती हुई टहनियों के बीच झूले से बनाकर, वहीँ आराम कर लेते हैं.

इस प्रकार विभिन्नताएं अनगिनत हैं. अगर इस प्रकार की विभिन्नताएं कौमों या समूहों से संबंधित हों, तो उन्हें कौमी-क्षेत्रीय या नवजाति-क्षेत्रीय  विभिन्नताएं कहा जाता है. खाना, सोना या आराम करते समय अपनी मांस-पेशियों को तनावमुक्त करना होता है. यह क्रियायें मूल रूप से जैविक क्रियायें हैं. जैविक क्रियायों के आधार पर अपनी संस्कृति का निर्माण करते समय, मानव ने एक ही समान क्रिया की पूर्ति हेतू भिन्न-भिन्न प्रकार के ढंगों को विकसित किया है. इस प्रकार मानव की इन जैविक क्रियायों की पूर्ति ने ही सामाजिक-सांस्कृतिक रूप धारण कर लिया. ठीक-ठीक कहा जाये तो एक नहीं अनेकों रूप धारण कर लिए हैं. नवजाति की विशेषता इस तथ्य में भी प्रकट होती है कि लोग किस प्रकर काम करते हैं, किस प्रकार के औजारों का प्रयोग करते हैं, किस प्रकार के वे मकान बनाते हैं, उनका पहरावा कैसा है इत्यादि.

प्राचीन काल में लुहार कुल्हाडी और कस्सी जैसे औजारों को अलग-अलग रूप में बनाते रहे हैं.औजारों के निर्माण में भी किसी स्थान की विशेष ज़रूरतों के हिसाब से अलग-अलग रूपों में विभिन्नता पाई जाती है.अतीत में रूसी लोग लकडी के मकान बनाते रहे हैं. जब भी उन्हें, किसी कारण वश, अपने इलाके को छोड़ना पड़ता और किसी अन्य क्षेत्र में, जहाँ लकडी प्रयाप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होती थी, जाना पड़ता, वे वहां तहखानों में रह लेते लेकिन सोचते यही थे कि जब भी वे मकान बनायेंगे, बनायेंगे लकड़ी के ही. लेकिन लंबा समय उसी स्थान पर गुजारने के बाद ही वे लोग वहां की स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल मकान-निर्माण हेतू करने लगे. उक्रेनी किसान, आमतौर पर, बैलगाडी का प्रयोग करते हैं, रूसी किसान घोडागाडी का. इसी प्रकार पंजाब के किसानों की बैलगाडी हरियाणा के किसानों की बैलगाडी से अलग तरह की होती है. आगे पंजाबियों में भी, दोअब, माझा और मालवा के किसानों की बैलगाडियों के रूप में भी विभिन्नता पाई जाती है. माझा और दोअब के किसान बैलगाडी के जुल्ले को केवल एक रबड़ के टायर से ढीला-ढाला बांध लेते थे. इससे होता यह था कि एक बैल आगे और दूसरा  बहुत पीछे रह जाता था लेकिन मालवा के किसान जुल्ले को रस्सियों द्वारा मजबूती और कलात्मक तरीके से बांधते रहे हैं. हरियाणा के किसानों की लकड़ी की गाड़ी पर लोहे का फाल चढा होता था.

एक ज़माने की, उज्बेक लोगों की कशीदाकारी की हुई टोपी देखें तो उनके उज्बेकी होने का पता चल जाता था. रूसियों की टोपी रूसी, यूरोपियन देशों की अलग-अलग तरह की टोपियाँ होती हैं. हमारे यहाँ राजस्थान के  हर जिले की अपनी अलग-अलग पगड़ी है. पगड़ी देखकर ही पता चल जाता है कि यह व्यक्ति किस जिले का रहनेवाला है. इसी प्रकार पंजाब में जट्टों की पगड़ी बनियों की पगड़ी से भिन्न प्रकार की होती है. बनिए, आमतौर पर, पीछे से, पगड़ी को उठाकर, सिर के निचले भाग को नंगा रखते हुए और एक तरह किनारा छोड़कर पगड़ी बांधते रहे हैं जबकि जाट पगड़ी की शुरुआत जूड़े (बालों की गांठ) से किया करते थे. पटियाला वालों की पगड़ी पटियाला-शाही नाम से मशहूर रही है. इस प्रकार औरतों के पहरावे के बारे में भी कहा जा सकता है. पंजाब के माझा और दोअब की औरते जब घर से ओढ़ना लेकर निकलती थी, उसे ‘दुहरा’ कहा जाता था. मालवा की औरतों द्वारा अपनी चुन्नरी को कानों के ऊपर से ओढ़ने के कारण पहचाना जा सकता था. लेकिन अब पहरावे में एकरूपता आती जा रही है. पुरषों में पैंट, शर्ट और कोट जबकि औरते ब्लाउज़  और स्कर्ट. भारतीय औरतों में साडी-ब्लाउज़ के अलावा  सलवार-कमीज़ का प्रचलन बढ़ता जा रहा है. अब कौमी पहरावे तो केवल त्योहारों के समय ही नज़र आते हैं.

इससे आगे, देखें : .

हम अब भी लालगढ़ में हैं – चत्रधर महतो

Posted on Updated on

हम अब भी लालगढ़ में हैं, ऐसा कहना है लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) के आदिवासी नेताओं का. मंगलवार, 30 जून को आन्दोलनकारी आदिवासी नेता चत्रधर महतो ने इस बात से इंकार किया कि वह लालगढ़ छोड़कर भाग गया है. उसने कहा कि वह अभी भी पश्चिमी बंगाल के इस अशांत इलाके में “मेरे अपने लोगों के साथ” है. ” मैं अभी भी लालगढ़ में रुका हुआ हूँ और मेरे इस क्षेत्र से भागने का सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि मैंने कोई जुर्म नहीं किया”, ‘पुलिस अत्याचार के खिलाफ गठित लोक समिति’ (PCAPA) जिसने सात महीने पहले एक वस्तुत: ” मुक्त क्षेत्र ‘की स्थापना के खिलाफ नेतृत्व किया था, के मुखिया महतो का ऐसा कहना है. महतो और एक अन्य  PCAPA के सदस्य एक प्राइवेट बंगाली टेलिविज़न चैनल पर बातचीत कर रहे थे. महतो ने स्टार आनंद के साथ टेलीफोन पर इंटरव्यू देते हुए कहा,

“लालगढ़ से भागने का सवाल ही नहीं पैदा होता. मैं पूरी तरह से लोगों के साथ हूँ और उनके साथ बना रहूँगा. पुलिस अत्याचार के खिलाफ लालगढ़ में मैंने एक जनवादी लहर शुरू की थी.”

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार झूठ  द्वारा उसका सम्बन्ध  माओवादी गुरिल्लाओं के साथ जोड़कर उसकी छवि को दूषित करने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा “वे मुझे माओवादी सिद्ध करना चाहते हैं जोकि मैं नहीं हूँ.”

पहले सुरक्षा बलों और राज्य सरकार का कहना था कि PCAPA के  महतो, सिद्धू सोरेन और कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी और बिकाश जैसे कुछ अग्रणी नेता अशांत क्षेत्र से उस वक्त से भगौड़े हैं जब 18 जून को केंद्रीय अर्धसैनिक और राज्य पुलिस के द्वारा राज्य की राजधानी कोलकत्ता से 200 किलोमीटर दूर  संयुक्त सुरक्षा आपरेशन शुरू हुआ. पुलिस का कहना था कि महतो भाग खडा हुआ था और उसने बांकुड़ा  जिले में पनाह ले ली थी और सोरेन ने पश्चिमी मिदनापुर के शलबोनी में जबकि दो बड़े माओवादी पड़ोस के झारखण्ड की ओर कूच कर गए. सोरेन ने टेलिविज़न चैनल से यह भी कहा कि

“मैं अब कांटापहाड़ी  क्षेत्र में हूँ. मैं क्यों भागूं जब मैंने कुछ गलत नहीं किया है? हमने तो केवल पुलिस संत्रास के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई है जो कि हमारा जनवादी अधिकार है”. “हमारा आंदोलन बंद नहीं किया जा सकता जब तक कि वे (बल) अनावश्यक रूप से हमारी महिलाओं और बच्चों को तंग करना बंद नहीं करते. अब हम अपने भविष्य की कार्रवाई की योजना पर काम कर रहे हैं.”, ऐसा उनका कहना है.

लालगढ़ तब से उबल रहा है जब पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव भटाचार्य और दो अन्य केंद्र सरकार के मंत्री  श्री राम विलास पासवान और श्री जितिन प्रसाद के पथरक्षक दल के रूट पर बारूदी सुरंग फटी थी. इस ब्लास्ट के बाद पुलिस पर  अत्याचारों का आरोप लगाते हुए स्थानीय क्रुद्ध आदिवासियों ने, जिन्हें माओवादियों का समर्थन हासिल था, आन्दोलन शुरू किया और पश्चिमी मिदनापुर जिले से इस क्षेत्र को काटते हुए और सिविल प्रशासन को खदेड़कर वस्तुतः प्रशासन अपने हाथ में ले लिया. राज्य के तीन पश्चिमी जिलों मिदनापुर, बांकुडा और पुरुलिया के इक्कीस पुलिस स्टेशनों के क्षेत्र में माओवादी सक्रिय हैं. Fraternally, PratyushGet Yourself a cool, short @in.com Email ID now!

pratyush1917@in.com द्वारा marxist-leninist-list@lists.econ.utah.edu पर प्रेषित ईमेल से साभार

इस चिट्ठे की ओर से

विकास तो होना ही चाहिए, विकास उनके लिए सर्वोपरि है चाहे इसके लिए कोई अपनी ज़र-ज़मीन से उखड जाता है. यह बात नहीं है कि आदिवासियों की भलाई के लिए उन्हें माओवादियों से मुक्त करवाया जा रहा  है बल्कि अपने मुनाफे की हवस के लिए इन्हें विकास तो करना ही है – हम भी मानते हैं कि विकास ज़रूरी है लेकिन पूंजीवाद के विकास का रूप अब किसी भी प्रकार से रोल मॉडल नहीं रह गया है. मुनाफे की हवस से हर चीज जो प्राकृतिक है , उसे बलात नष्ट किया जाता है.वनों की अंधाधुंध कटाई, अधिक से अधिक कृषि उपज लेने के लिए  कृषि योग्य भूमि पर बढ़ता हुआ कृत्रिम खाद, कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों का बोझ , बेशी मूल्य की जमाखोरी से बेशी उत्पादन और प्रदुषण – पूंजीवादी के अराजक उत्पादन और वितरण ढांचे ने इस पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है. लेकिन पूंजीवाद की यह अराजकता सभ्यता की दौड़ में पिछडे आदिवासियों पर किसी बर्बर हमले से कम नहीं होती. फिर भी पूंजीवाद एक तीर से दो शिकार करता है – एक उनके प्राकृतिक संसाधनों की लूट और दूसरा उन्हें एक ऐसी सभ्यता में खींचता है जहाँ उनकी किस्मत में  सबसे सस्ती श्रम-शक्ति की पूर्ति करना लिखा होता ताकि यह  मांग से अधिक बनी रहे और  मजदूरी की दर निम्न से निम्न रहे. पूंजीवाद के अपने तरीके और तर्क से आदिवासी आबादी को इस तरह सभ्यता में खींचने की परिणति इन आदिवासियों के लिए  उज़रती गुलाम, बच्चों के भिखारी और औरतों के  वेश्यावृति में रुपानान्तरण में होती है.

“बुर्जुआ वर्ग ने, जहाँ पर भी उसका पलडा भारी हुआ, वहां सभी सामंती, पितृसत्तात्मक और काव्यात्मक संबंधों का अंत कर दिया.  उसने मनुष्य को अपने “स्वाभाविक बड़ों” के साथ बांध रखने वाले नाना प्रकार के सामंती संबंधों को निर्ममता से तोड़ डाला; और नग्न स्वार्थ के, “नकद पैसे-कौडी” के हृदयशुन्य व्यवहार के सिवा मनुष्यों के बीच और कोई दूसरा सम्बन्ध बाकी नहीं रहने दिया. धार्मिक श्रद्धा के स्वगोपम आनंदातिरेक को, वीरोचित उत्साह और कूपमंडूकतापूर्ण भावुकता को उसने आना-पाई के स्वार्थी हिसाब-किताब के बर्फीले पानी में डुबो दिया है. मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को उसने विनिमय मूल्य बना दिया है, और पहले के अनगिनत अनपहरणीय अधिकारपत्र द्वारा प्रदत्त स्वातंत्रों की जगह अब उसने एक ऐसे अंत:करणशून्य स्वातंत्र्य की स्थापना की है जिसे मुक्त व्यापार कहते हैं. संक्षेप में, धार्मिक और राजनीतिक भ्रमजाल के पीछे छिपे शोषण के स्थान पर उसने नग्न, निर्लज्ज, प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की स्थापना की है…”

“…सभी स्थिर और ज़डीभूत सम्बन्ध, जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वाग्रहों तथा मतों की एक पूरी श्रृंखला जुडी हुई होती है, मिटा दिये जाते हैं, और सभी नए बनने वाले सम्बन्ध ज़डीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं. जो कुछ भी ठोस होता है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है, और आखिरकार मनुष्य संजीदा नज़र से जीवन के वास्तविक हालत को, मानव-मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है.”

मार्क्स और एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ से लिया गया उपरोक्त उद्धरण चरितार्थ हो रहा है लेकिन विडम्बना देखीए कि यह सब उनके नेतृत्व में  हो रहा है जो खुद को मार्क्सवादी कहलाते हैं.

सांस्कृतिक मोर्चे पर अन्तरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण का प्रश्न

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कहने की आवश्यकता नहीं कि जीवन के हर क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का नज़रिया व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भों में हर-हमेशा अन्तरराष्ट्रीयतावादी होता है। लेकिन आज पूँजी के भूमण्डलीकरण के नये दौर में, एक ओर जहाँ बुर्जुआ राष्ट्रवाद क्षरित-स्खलित होकर, अपनी ऐतिहासिक सकारात्मकता खोकर फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद का लगभग समानार्थी-सा बन गया है, वहीं सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावादी चेतना का ज्यादा मज़बूत और व्यापक भौतिक आधार भी तैयार हुआ है।

सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावाद के दो सन्दर्भों की चर्चा प्रकारान्तर से ऊपर के दो उपशीर्षकों के अन्तर्गत आ चुकी है। पहली बात, राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियों का दौर बीतने के बाद राष्ट्रवाद के रणनीतिक नारों का झण्डा सर्वहारा वर्ग और मुक्तिकामी जनों के विरुद्ध अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। अन्तरविरोध आज सीधे-सीधे श्रम और पूँजी के दो शिविरों के बीच है। संस्कृति के मोर्चे पर आज यह एक अति महत्त्वपूर्ण काम है कि हम फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद सहित प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ राष्ट्रवाद की संस्कृति का व्यापक भण्डाफोड़ और विरोध करें और श्रम की संस्कृति का, अन्तरराष्ट्रीयतावादी श्रमिक एकजुटता के विचार का विकल्प सामने रखें। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति दो चीज़ें हैं। राष्ट्रवाद एक बुर्जुआ परिघटना के रूप में जब अपनी ऐतिहासिक प्रासंगिकता खो देगा, तब भी देशभक्ति की भावना व संस्कृति बनी रहेगी। वह बुर्जुआ देशभक्ति की संस्कृति न होकर सर्वहारा देशभक्ति की संस्कृति होगी। सर्वहारा वर्ग ही अपने देश की जनता, संस्कृति और प्रकृति को वास्तविक प्यार करता है और अपने देश में समाजवाद की विजय के बाद वह समाजवादी मातृभूति की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार रहेगा।

दूसरी बात, जब हम अपनी सांस्कृतिक-वैचारिक परम्परा की बात करते हैं तो इसका एक पक्ष है हमारे देश की मुक्तिकामी जनता के इतिहास की विरासत और दूसरा पक्ष है, पूरी दुनिया के सर्वहारा संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों से जुड़ी सांस्कृतिक विरासत और पूरी दुनिया की मुक्तिकामी जनता की सांस्कृतिक विरासत। यही संस्कृति के क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का सही-सन्तुलित अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिया है।

जब हम सांस्कृतिक क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग के अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिए की बात करते हैं तो उसका मतलब सिर्फ यही नहीं होता कि पूरी दुनिया के सर्वहारा वर्ग के कला-साहित्य की समृद्ध सम्पदा को हम अपनी विरासत के रूप में स्वीकार करते हैं, इसका मतलब यह भी होता है कि यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन काल के मानवतावादी, जुझारू भौतिकवादी, जनवादी साहित्य तथा उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप और रूस के महान यथार्थवादी और क्रान्तिकारी जनवादी साहित्य की पूरी परम्परा का हम अपने को उत्तराधिकारी मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि समूचे विश्व के समग्र क्लासिकीय साहित्य-सम्पदा को हम अपनी विरासत मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि किसी भी देश के सर्वहारा का क्रान्तिकारी सांस्कृतिक आन्दोलन विश्व मज़दूर आन्दोलन के अतिरिक्त, सभी देशों के राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों, प्रतिरोध संघर्षों और जन-आन्दोलनों के दौर के कला-साहित्य की विरासत को अपनाता है, उनका द्वन्द्वात्मक विश्लेषण करता है तथा उनके ज़रूरी अवयवों को आत्मसात कर लेता है। यह महज़ एक सैद्धान्तिक `अप्रोच´ का सवाल नहीं, ठोस व्यावहारिक कार्रवाई का मुद्दा है। एक उदाहरण लें। अफ्रीकी जनता के प्रतिरोध-संगीत, अमेरिकी अश्वेतों के प्रतिरोध संगीत, मेक्सिको व लातिन अमेरिकी देशों की अधूरी क्रान्तियों और किसान संघर्षों के दौरान सृजित क्रान्तिकारी संगीत – इन सभी में पूंजी की सत्ता, वर्चस्व और उत्पीड़न के प्रतिरोध के तत्त्व हैं, समानता के स्वप्न हैं, संघर्ष की आग है। भारतीय सर्वहारा का संगीत आन्दोलन अपने देश के जन संघर्षों के गीत-संगीत और लोक संगीत के अतिरिक्त उपरोक्त अन्तरराष्ट्रीय विरासत को भी अपनाएगा और इस सतत्-सुदीर्घ प्रक्रिया में सर्वहारा संगीत की सार्वभौमिक सम्प्रेषणीयता, उसकी एक सच्ची “अन्तरराष्ट्रीय भाषा” विकसित होगी। यही बात सर्वहारा के समाजवादी यथार्थवादी थिएटर और सिनेमा के लिए, तथा साहित्य के लिए भी लागू होती है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ , शिशिर-बसंत 2002 से साभार

न तो इतिहासग्रस्त, न ही इतिहास विमुख!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

पूर्वोक्त चर्चा से इतिहास के प्रति हमारा दृष्टिकोण भी स्पष्ट हो जाना चाहिए, लेकिन हम, कुछ ठोस उदाहरणों सहित, अलग से इस विषय को रेखांकित करना ज़रूरी समझते हैं। इतिहास के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो हर-हमेशा ज़रूरी होता है, लेकिन ख़ास तौर पर नई शुरुआतों या इतिहास के किसी नये दौर की भौतिक-आत्मिक स्थितियों को जानने-समझने के दौर में, द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी इतिहास-दृष्टि से सूक्ष्म विचलन भी हमें कालान्तर में लक्ष्य से कोसों दूर लेकर चला जाता है। निरन्तरता और नूतनता के द्वन्द्व से इतिहास आगे डग भरता है। इसमें भी कभी निरन्तरता का पक्ष प्रमुख होता है तो कभी नूतनता का। निर्णय की जटिलता तब अधिक होती है जब नूतनता का पक्ष प्रमुख होता है।

अतीत के शरणागत या इतिहासग्रस्त होने से कम हानिकारक इतिहास-विमुख होना नहीं होता। जैसा कि अबू तालिब ने फर्माया है, `यदि तुम इतिहास पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर तोप से गोल बरसाएगा।´

इसी दृष्टि से, आज परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्वों को पहचानते हुए, परम्परा के ज़रूरी अवदानों की पहचान करते हुए साहित्य-कला-संस्कृति के इतिहास के पुनर्मुल्यांकन की ज़रूरत है। प्रश्न चाहे इतिहास के हों या साहित्येतिहास के, ग़लत सैद्धान्तिक फ्रेम, अधूरे तथ्य-संग्रह और अटकलबाज़ी के द्वारा अपने अतीत और नायकों का अनावश्यक महिमा-मण्डन सर्वहारा क्रान्ति और साहित्य-कला-संस्कृति के वर्तमान और भविष्य को भयंकर क्षति पहुँचाएगा, और यहाँ तक कि ऐसे तर्कों और निष्पत्तियों का पुनरुत्थानवादी शक्तियाँ भी लाभ उठाएँगी। परम्परा के प्रति सही रुख का यह सवाल हिन्दी साहित्येतिहास के पुनर्मुल्यांकन से जुड़ा हुआ एक ज़रूरी और अतिप्रासंगिक प्रश्न बना हुआ है।

इसके अतिरिक्त, इतिहास के प्रति सही दृष्टिकोण के सवाल को हमें और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। यह और भी ज़रूरी इसलिए है कि आज प्राच्यवाद, उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तर-मार्क्सवाद, `सब आल्टर्न´ इतिहास-दृष्टि और क्वाण्टम भौतिकी के कोपेनहेगन स्कूल के अनिश्चितता सिद्धान्त के सामाजिक अनुप्रयोग आदि के प्रहार का मूल लक्ष्य ही है – इतिहास-विकास के नियमों की द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी अवधारणा। इन लोकवादी, बुर्जुआ समाजशास्त्रीय और “नववामपन्थी” इतिहास-दृष्टियों के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष का मुख्य रणक्षेत्र संस्कृति का प्रदेश ही बन रहा है।

साथ ही, यह आज के सर्वहारा नवजागरण का मूलभूत कार्यभार है कि सर्वहारा विचारधारा, क्रान्तियों के इतिहास और सर्वहारा कला-साहित्य की महान उपलब्धियों को विस्मृति के अन्धकार से बाहर लाया जाए और इनके बारे में फैलाए जा रहे तमाम विभ्रमों की धूल-राख को झाड़कर वास्तविकता को सामने प्रस्तुत किया जाए। बीसवीं शताब्दी में पूरी दुनिया में सर्वहारा कला-साहित्य के क्षेत्र में जो काम और प्रयोग हुए, उनकी पुनर्प्रस्तुति बेहद ज़रूरी है। आज बेशक उन्हें मॉडल मानकर उनका अनुकरण करने से हमारा अभीष्ट नहीं प्राप्त होगा, पर उनसे परिचित हुए बिना भी आगे कदम बढ़ाना हद दर्जे का बचकानापन ही होगा। हमारे देश में प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलन का जो इतिहास रहा है, उसका भी इसी दृष्टि से अध्ययन ज़रूरी है।

इतिहास की वास्तविकताएँ भी निश्चल-निरपेक्ष नहीं होतीं। इतिहास के हर मोड़ पर, हर नये चरण की पूर्वबेला में हम मानव सभ्यता के अतीत और जातीय-देशीय स्मृतियों की पुनर्यात्रा करते हैं, और हर बार, सम्मुख उपस्थित कार्यभारों की दृष्टि से इतिहास की “नये सिरे से खोज करते हैं” और उसके उन पक्षों पर ध्यान देते हैं, जो विगत इतिहास-यात्राओं में अनालोकित-उपेक्षित रह गए थे। जीवन के विकास की नई मंज़िलें और सम्भावित दिशाएँ हमारे सामने अतीत के नये-नये आयामों-पक्षों को देखने की नई सूक्ष्मदर्शता और व्यापकता देती चलती हैं और फिर अपनी पारी में, अतीत का हर नया पर्यवेक्षण विकास की दिशाओं की समझदारी को ज्यादा ठोस, ज्यादा उन्नत बनाता चलता है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

धार्मिक कट्टरपन्थ फ़ासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर सही क्रान्तिकारी रणनीति अपनाओ!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर समकालीन धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी उभार की वैचारिक-ऐतिहासिक समझ में गम्भीर दृष्टि-दोष दीखते हैं और इनका प्रतिरोध भी प्राय: रस्मी, प्रतीकात्मक और कुलीनतावादी सीमान्तों में कैद दीखता है।

नाटकों, कविताओं और कहानियों में प्राय: हिन्दुत्ववादी कट्टरपंथियों का विरोध `सर्वधर्म समभाव´ की ज़मीन से या बुर्जुआ मानवतावाद या बुर्जुआ जनवाद की ज़मीन से करने की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। यह सर्वहारा संस्कृतिकर्मी का सिरदर्द नहीं है कि संघ परिवार ने संविधान और न्यायतंत्र को ख़तरे में डाल दिया है। इसकी चिन्ता संविधान और न्यायतंत्र के पहरुए करें। हम यदि इसका हवाला भी देंगे तो पूरी व्यवस्था के चरित्र और फ़ासीवाद के चरित्र को समझाने और `एक्सपोज़र´ के नज़रिए से देंगे। लोगों की निजी धार्मिक आस्थाओं के अनुपालन के जनवादी अधिकार के प्रति अपनी पूर्ण प्रतिबद्धता ज़ाहिर करते हुए भी, हमें “उदार हिन्दू” या “रैडिकल हिन्दू” का रुख अपनाने के बजाय धर्म के जन्म और इतिहास की भौतिकवादी समझ का प्रचार करना होगा, धर्म के प्रति सही सर्वहारा नज़रिए को स्पष्ट करना होगा, धर्म और साम्प्रदायिकता के बीच के फर्क को स्पष्ट करते हुए एक आधुनिक परिघटना के रूप में साम्प्रदायिकता की समझ बनानी होगी तथा संकटग्रस्त पूँजीवाद की विचारधारा और राजनीति के रूप में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार का विश्लेषण प्रस्तुत करना होगा। हमें यह स्पष्ट करना होगा कि भारत में धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी उभार यहाँ की पूँजीवादी व्यवस्था के सर्वग्रासी संकट की राजनीतिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति होने के साथ ही, पुनरुत्थान और विपर्यय के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में, धार्मिक कट्टरपन्थ के विश्वव्यापी उभार का भी एक हिस्सा है। इसका सम्बन्ध मूलगामी तौर पर, विश्व पूँजीवाद के ढाँचागत संकट से है, आर्थिक कट्टरपन्थ की वापसी के दौर से है तथा बुर्जुआ जनवाद के निर्णायक विश्व-ऐतिहासिक पराभव के दौर से है।

यह सर्वहारा की अवस्थिति नहीं हो सकती कि वह निर्गुण भक्ति आन्दोलन के सहारे, गांधीवादी मानवतावाद के सहारे या नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के सहारे या संविधान पर ख़तरे की दुहाई देते हुए साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का विरोध करे। कबीर और निर्गुण भक्ति आन्दोलन की सन्त परम्परा जनता की महान सांस्कृतिक परम्परा है, पर यह आन्दोलन मध्ययुगीन सामन्ती निरंकुश स्वेच्छाचारिता, ब्राह्मणवादी जातिगत उत्पीड़न और कर्मकाण्डों के विरुद्ध किसानों-दस्तकारों के “नये धार्मिक” तर्कों पर ही आधारित था। आज का धार्मिक कट्टरपन्थ मध्ययुगीन प्रतिक्रियावादी अधिरचना के बहुतेरे तत्त्वों को अपनाए हुए है, लेकिन यह एक आधुनिक परिघटना है, इसकी जड़ें वित्तीय पूँजी के वैश्विक तंत्र और भारतीय पूँजीवादी राज, समाज, उत्पादन और संस्कृति की रुग्णता में हैं। गांधी की आत्मा का आवाहन भी साम्प्रदायिकता के प्रेत से निपटने में काम नहीं आ सकता, क्योंकि गांधी के मानवतावाद में धार्मिक पुराणपन्थ और धार्मिक `यूटोपिया´ का जो स्थान था, उसके चलते धर्म के धार्मिक कट्टरपन्थी इस्तेमाल के विरुद्ध वह आज जनता के वैचारिक सांस्कृतिक अस्त्र की भूमिका निभाने में कतई अक्षम हो चुका है। एक मरियल किस्म के भौतिकवाद की ज़मीन पर खड़ी नेहरू की धर्मनिरपेक्षता को भी आज पुनर्जीवित कर पाना ठीक उसी प्रकार सम्भव नहीं है जिस प्रकार नेहरूवादी “समाजवाद” के दिनों को वापस लौटा लाना।

यह इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुसंगत समझ का अभाव ही है कि भगवान सिंह जैसे रचनाकार साम्प्रदायिकता को सुनिश्चित सामाजिकार्थिक भौतिक आधार से उद्भूत सांस्कृतिक-राजनीतिक परिघटना के रूप में नहीं बल्कि एक मनोवैज्ञानिक समस्या या रुग्णता के रूप में देखते हैं (`उन्माद´ उपन्यास)।

जहाँ तक धार्मिक कट्टरपन्थ के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यावहारिक-आन्दोलनात्मक कार्रवाइयों का सम्बन्ध है, इनका स्वरूप अत्यन्त संकुचित, अनुष्ठानिक और कुलीनतावादी है तथा इनकी अन्तर्वस्तु मुख्यत: सामाजिक जनवादी है। वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों की अधिकांश कार्रवाइयाँ शहरी मध्यवर्ग तक सीमित हैं। संघ परिवारी फ़ासिस्टों की आक्रामक कार्रवाइयों के विरुद्ध दिल्ली-बम्बई के अभिजात सांस्कृतिक अड्डों पर रस्मी विरोध-प्रदर्शन, साम्प्रदायिक दंगा ग्रस्त क्षेत्रों में टीमें भेजना और रिपोर्टें (वह भी प्राय: अंग्रेज़ी में) जारी करना, उन्नत चेतना वाले शिक्षित मध्यवर्ग तक सीमिति साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ-कहानी-निबन्ध आदि लिखना, कुछ गोष्ठी-सेमिनार व अन्य आयोजन तथा कभी-कभार कुछ नुक्कड़ नाटक जैसे कार्यक्रम – विगत लगभग डेढ़ दशक के फ़ासीवादी उभार के ग्राफ के समान्तर हमारी सांस्कृतिक जन-कार्रवाइयों की यही स्थिति है। दरअसल, राजनीतिक दायरे में संसदमार्गी वामपन्थ संसदीय-संवैधानिक सीमान्तों के भीतर, मुख्यत: संसदीय जनवाद की हिफ़ाज़त के नारे के साथ, मतदान की राजनीति को धुरी बनाकर, फ़ासीवाद का जैसा विरोध कर रहा है, काफी कुछ वैसा ही सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हो रहा है।

फ़ासीवाद की वैचारिक समझ के लिए गम्भीर विमर्श और जनता के जनवादी अधिकारों पर फ़ासिस्ट डकैती का फौरी विरोध ज़रूरी है, लेकिन सवाल यह है कि फासिज्म के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष करने वाले मज़दूर वर्ग और बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी को जागृत, शिक्षित और गोलबन्द करने के लिए हम क्या कर रहे हैं? धार्मिक कट्टरपन्थ के हर पहलू पर सीधी-सादी भाषा में पर्चे, पुस्तिकाएँ लिखकर उनका व्यापक वितरण, औद्योगिक क्षेत्रों में और गाँव के ग़रीबों के बीच गीतों-नाटकों आदि के ज़रिए व्यापक शिक्षा और प्रचार के काम क्यों नहीं संगठित हो पा रहे हैं? क्या इसके लिए वामपन्थी लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के भीतर व्याप्त मध्यवर्गीय कुलीनता-कायरता और सुविधाभोगी स्वार्थपरता ज़िम्मेदार नहीं है?

हमें याद रखना होगा कि मज़दूरों और अन्य मेहनतकश वर्गों के बीच धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी राजनीति के असली “चाल-चेहरे-चरित्र” को नंगा करना हमारा सर्वोपरि दायित्व है। सच्चे वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों को याद रखना होगा कि फ़ासीवाद के रस्मी सामाजिक जनवादी संशोधनवादी विरोधों ने प्रकारान्तर से उसकी मदद ही की है। सामाजिक-जनवादी विभ्रमों से छुटकारा पाए बग़ैर मध्यवर्ग का रैडिकल जनवादी हिस्सा भी धार्मिक कट्टरपन्थ के विरुद्ध आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार नहीं हो सकेगा और सर्वहारा वर्ग के साथ क्रान्तिकारी संयुक्त मोर्चा में शामिल नहीं हो सकेगा। तकरीबन 75 वर्षों पहले कही गई भगतसिंह की ये बातें आज भी प्रासंगिक हैं और सांस्कृतिक मोर्चे के सेनानियों को भी इन पर अवश्य ही ग़ौर करना चाहिए, “लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब मेहनतकशों और किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए। और इनके हत्थे चढ़ कुछ नहीं करना चाहिए। संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता और देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा। इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जाएँगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी…” (साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज´)

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कला-साहित्य-संस्कृति में “लोकवाद” और “स्वदेशीवाद” का विरोध करो!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

प्रतिक्रिया के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में विश्व-पूँजी की संयुक्त शक्ति ने जनता के जीवन पर जो सर्वतोमुखी हमला बोला है, राजनीति की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी उसका प्रतिरोध भविष्य के बजाय अतीत की ज़मीन पर खड़े होकर करने की एक पराजयवादी-पुनरुत्थानवादी और लोकरंजकतावादी प्रवृत्ति मौजूद है। इस प्रवृत्ति के प्रभाव-उच्छेदन के बिना, एक वैज्ञानिक इतिहास-दृष्टि के आधार पर, जनता के सांस्कृतिक आन्दोलन का पुनर्निर्माण नहीं किया जा सकता। विस्तार से बचते हुए, हम अपनी बात यहाँ कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहेंगे।

पहले “लोकवाद” के कुछ उदाहरण लें। आज भारत जैसे देशों में जो रुग्ण-निरंकुश किस्म का पूँजीवादीकरण हो रहा है, वह पूँजीवादी रूपान्तरण के क्लासिकी ऐतिहासिक उदाहरणों से सर्वथा भिन्न है। यहाँ कुछ भी सकारात्मक नहीं है। सामन्ती पार्थक्य की जगह पूँजीवादी अलगाव, सामन्ती निरंकुश स्वेच्छाचारी तंत्र की जगह पूँजीवादी सर्वसत्तावाद। एक पुरातन आपदा की जगह एक नूतन विपदा जिसने पुरातन के कई सांस्कृतिक मूल्यों को ज्यों का त्यों अपना लिया है। हमारे कला-साहित्य में अकसर उन चीज़ों के लिए शोकगीत या रुदन के स्वर सुनाई पड़ते हैं, जिन्हें इतिहास की अनिवार्य गति से नष्ट होना ही था। जैसे कविगण कभी-कभी तो उत्पादन और दैनिन्दन इस्तेमाल की उन पुरानी चीज़ों को भी बहुत आह भरते हुए याद करते हैं जो अन्य चीज़ों द्वारा विस्थापित कर दी गई और जिन्हें स्वाभाविक गति से, अतीत की वस्तु बन ही जाना था क्योंकि यही इतिहास का शाश्वत नियम है। लोटा, दातुन और कठही हल के लिए रोने की ज़रूरत नहीं। कठही हल की जगह ट्रैक्टर को आना ही था। मशीनों को हर हाल में मानवविरोधी चित्रित करना भी एक ग़ैर सर्वहारा, बुर्जुआ पर्यावरणवादी नज़रिया है। मशीनें मानवीय कौशल और चिन्तन की महान उपज हैं, दोष मशीनों का नहीं बल्कि उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व की व्यवस्था का है जिनके चलते मशीनें मुनाफे की अन्धी हवस का उपकरण बनकर मनुष्य और प्रकृति को निचोड़कर तबाह कर डालती हैं।

इसी तरह की अतीतगामी दृष्टि वाले रचनाकार अकसर पूँजीवादी अलगाव के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करते हुए प्राकृतिक अर्थव्यवस्था वाले प्राक्-पूँजीवादी समाजों की उस रागात्मकता और उन काव्यात्मक सम्बन्धों को महिमामण्डित करने लगते हैं जिन्हें पूँजी की सत्ता ने आने-पाई के ठण्डे पानी में डुबो दिया। प्राक्पूँजीवादी, ग्रामीण समाजों की रागात्मकता का काल्पनिक आदर्शीकरण करने वाले प्राय: उसकी पृष्ठभूमि में मौजूद सामन्ती निरंकुशता तथा स्त्रियों और दलितों के बर्बर दमन की अनजाने ही अनदेखी करने की कोशिश करते हैं और श्रम की संस्कृति के वर्चस्व वाले नये, भावी समाज को नहीं बल्कि अनिवार्यत: नष्ट होने वाले अतीत को अपना प्रेरणा-स्रोत बनाने लगते हैं। इसे किसानी “समाजवादी” यूटोपिया का एक रूप भी कहा जा सकता है।

“लोकवाद” का एक और कूपमण्डूकतापूर्ण संस्करण यह भी है कि कई प्रगतिशील कवि-लेखक गण नागर जीवन की हृदयहीनता, नग्न बुर्जुआ लूट-खसोट, आपाधापी और अलगाव की आलोचना करते हुए आहें भरते हुए गाँवों को याद करते हैं, और वर्ग-निरपेक्ष रूप में शहर की हृदयहीनता और गाँवों के “सामूहिक जीवन” की तुलना करते प्रतीत होते हैं। यह `अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है´ का नया संस्करण है। यह सही है कि पूँजीवादी समाज में गाँव और शहर का अन्तर लगातार बढ़ता जाता है और शहर की समृद्धि गाँवों को लूटकर ही फलती-फूलती है। पर इस तथ्य को वर्ग-निरपेक्ष रूप में नहीं देखा जा सकता। शहरों में भी बहुंसख्यक आबादी निचोड़े जाने वाले सर्वहारा और अर्द्धसर्वहारा की और परेशानहाल निम्न-मध्यवर्ग की ही है। एक छोटी सी आबादी है जो गाँवों को लूटती है और शहर के उजरती गुलामों को भी। जो शहर की भारी मज़दूर और निम्न-मध्यवर्गीय नौकरीपेशा आबादी है वह गाँवों से ही पूँजी की मार से दर-बदर होकर शहर आई है और यह दुरवस्था फिर भी इतिहास की दृष्टि से प्रगतिशील कदम है। जो आबादी गँवई सुस्ती और कूपमण्डूकता के दलदल से बाहर पूँजीवादी जीवन की बर्बर हृदयहीन अफरातफरी के बीचोबीच धकेल दी गई है, वही पूँजी की सत्ता के लिए कब्र खोदने का काम करेगी। ग्रामीण जीवन की शान्ति के लिए बिसूरने वाले सफेदपोश प्रगतिशील प्राय: ग्रामीण कुलीनों (प्राय: सवर्णों) की ही अगली पीढ़ियाँ हैं। यदि वे ग़रीब किसान, खेत मज़दूर या दलित के बेटे होते या स्त्री होते तो उजरती गुलामी का शहरी नर्क भोगते हुए ग्रामीण निरंकुशता, सुस्ती और कूपमण्डूकता के अँधेरे में वापस नहीं जाना चाहते। जाएँगे तो वे भी नहीं जो गाँवों को खूब याद करते हैं। दरअसल यह अपराध-बोध की कुछ वैसी ही रिसती हुई गाँठ है, जैसी गाँठ के चलते, अनिवासी धनिक भारतीय पाश्चात्य समृद्धि की पत्तल चाटते हुए भारत और भारतीय संस्कृति को खूब याद करते हैं और इस नाम पर यहाँ की सबसे प्रतिक्रियावादी शक्तियों और सबसे प्रतिक्रियावादी मूल्यों के पक्ष में जा खड़े होते हैं। प्रगतिशीलता का ठप्पा बरकरार रखने और “नागर-बोध ग्रस्त” होने के आरोप से बचने के लिए बहुतेरे रचनाकार दशकों पुरानी स्मृतियों और चन्द एक दिनों के दौरों और अख़बारी तथ्यों के आधार पर आज के ग्रामीण जीवन के यथार्थ का कलात्मक पुनर्सृजन करने की कोशिश करते हैं जो वास्तविकता से कोसों दूर होता है। ऐसा वे इसलिए भी करते हैं कि स्मृतियों के सहारे गाँव पर लिखना आसान है, पर उन्हीं के शहरों में उजरती गुलामी का जो रौरव नर्क एक समान्तर दुनिया के रूप में मौजूद है, वहाँ के जीवन के रूबरू होने लायक मज़बूती उनके दिल-गुर्दे में कतई नहीं है।

“लोकवाद” के अन्य कई रूप हैं। जैसे कि संगीत की दुनिया को लें। क्रान्तिकारी संगीत की दुनिया में लोक संगीत से काफी कुछ हूबहू उधार ले लेने – लोकगीतों की पैरोडी करने तक की प्रवृत्ति मौजूद है। लोक गीत-संगीत की परम्परा हमारी अपनी परम्परा है और उससे काफी-कुछ लेना होगा, लेकिन हूबहू नहीं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक के साथ छाँट-बीनकर। लोकसंगीत क्रान्तिकारी गण संगीत का समानार्थक नहीं हो सकता। लोकसंगीत का आधार आदिम जनजातीय जीवन की सामूहिकता, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के किसानी जीवन और दस्तकारी में मौजूद रहा है और कालान्तर में उसका स्थान इतिहास का संग्रहालय ही होगा। उसके कुछ संघटक तत्त्व नये सर्वहारा संगीत में, निरन्तरता के पहलू के रूप में मौजूद रहेंगे। लोकसंगीत सदियों के सांस्कृतिक संस्कारों-आदतों के चलते जनता में लोकप्रिय होता है, लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं कि नई क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु के लिए उसके रूप उपयुक्त होंगे।

नुक्कड़ नाटकों और रंगमंच पर भी लोकरंजकतावाद अनेक रूपों में मौजूद है। प्राय: देखने में यही आता है कि प्रगतिशील नाटककार और नाट्य-निर्देशक भी तर्कबुद्धि, विश्वदृष्टिकोण और आलोचनात्मक विवेक पर बल देने वाले `एपिक थिएटर´ या द्वन्द्वात्मक थिएटर की जगह भावना, अनुभूति और तदनुभूति पर बल देने वाले परम्परागत `ड्रामेटिक थिएटर´ की शैली और तकनीक को ही अपनाते हैं। नुक्कड़ नाटकों में कुछ हद तक पहली धारा की शैली को अपनाया गया है, लेकिन फिर भी दर्शकों को भावनात्मक आवेश से आप्लावित कर देने वाली शैली भी काफी चलन में है, जहाँ विचार पक्ष काफी कमज़ोर पड़ जाता है, जैसाकि प्राय: गुरुशरण सिंह के नाटकों में दिखाई पड़ता है।

“लोकवाद” का ही एक रूप “स्वदेशीवाद” भी है। राजनीति की तरह कला-साहित्य में भी आज यह प्रवृत्ति काफी मज़बूत है। आज आम जनता के जीवन और संस्कृति पर विश्व-पूँजी के चौतरफा हमले का प्रतिकार वामपन्थी धारा का भी एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रवाद की उस ज़मीन पर खड़ा होकर करने की कोशिश कर रहा है, जिस पर खड़े होकर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई लड़ी गई थी। यह अजीब-सी बात है कि कुछ पुराने गाधीवादी, सर्वोदयी, मध्यमार्गी सुधारवादी और एन.जी.ओ. वाले ही नहीं बल्कि क्रान्तिकारी वामपन्थी भी भूमण्डलीकरण के विरुद्ध “स्वदेशी” का झण्डा उठाए हुए हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और उनके सहयोगियों के विरुद्ध गांधीवाद द्वारा सुझाए गए स्वदेशी और स्वराज्य के राष्ट्रवादी नारों को आज का रणनीतिक नारा बनाना नये दौर की लड़ाई को पुराने दौर की लड़ाई के हथियारों से लड़ने की बचकानी कोशिश है। आज जनता की वास्तविक मुक्ति की लड़ाई “स्वदेशी” या किसी अन्य पूँजीवादी राष्ट्रवादी नारे के झण्डे तले लड़ी ही नहीं जा सकती। अपने बीच के तमाम अन्तरविरोधों के बावजूद, आज देश की बड़ी पूंजी और छोटी पूँजी – दोनों की नियति, हित और अस्तित्व साम्राज्यवाद के साथ जुड़ चुके हैं। अपने आपसी अन्तरविरोधों के बावजूद, देश के सभी छोटे-बड़े पूँजीपति साम्राज्यवादी पूँजी के निर्बाध प्रवाह के लिए राष्ट्रीय अर्थतंत्र को पूरी तरह खोल देने के पक्षधर हैं। उनके किसी भी हिस्से का चरित्र राष्ट्रीय या जनपक्षधर नहीं रह गया है। आज का मूल प्रश्न यह नहीं है कि विदेशी शासन और विदेशी पूँजी के वर्चस्व को नष्ट करके देशी उद्योग-धंधों को फलने-फूलने का अवसर दिया जाए। आज का मूल प्रश्न यह है कि पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली, सामाजिक ढाँचा और संस्कृति अब पूरी तरह मानवद्रोही हो चुकी है। इतिहास इन्हें नष्ट करके ही आगे डग भर सकता है। कह सकते हैं कि जो सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक मिशन था, वह अब फौरी कार्यभार बन चुका है। आज का नया नारा यही हो सकता है – उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले सामाजिक वर्गों के पूर्ण नियंत्रण के लिए संघर्ष! ज़ाहिरा तौर पर, सांस्कृतिक वर्चस्व का संघर्ष भी इसी संघर्ष का अनिवार्य और आधारभूत सहवर्ती होगा। साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी जनमुक्ति क्रान्तियाँ आज इतिहास के एजेण्डे पर हैं। राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के दौर के शौर्यपूर्ण संघर्षों-कुर्बानियों से हम प्रेरणा ले सकते हैं और संघर्ष के रूपों से काफी कुछ सीख सकते हैं, पर उस दौर के रणनीतिक नारे आज के नारे नहीं हो सकते।

इतिहास में यह ग़लती पहले भी होती रही है कि मुक्तिकामी जनता के हरावल, नये संघर्षों को गौरवमण्डित करने के लिए, नई प्रेरणा लेने के लिए अतीत की क्रान्तियों का पुन:स्मरण करने के बजाय उन्हीं की भोंडी नकल करने लग जाते रहे हैं। चाहते थे वे अतीत की क्रान्तियों से क्रान्तिकारी स्पिरिट लेना और हुआ यह कि वे अतीत के शरणागत हो गए, अतीत के नारों से नई लड़ाई लड़ने की कोशिश करने लगे और क्रान्ति की आत्मा के पुनर्जागरण के बजाय उसकी प्रेतात्मा मँडराने लगी। यह स्वाभाविक है कि अतीत के महान संघर्षों से अभिभूत होकर, हम अनजाने ही उनकी नकल करने लग जाते हैं। महान क्रान्तियाँ भावी क्रान्तियों के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करने के बजाय सर्जनात्मक अन्वेषण को जकड़ने वाली बेड़ियों का काम करने लगती हैं और नये का अन्वेषण करने के बजाय हम अतीत से समस्याओं का समाधान माँगने लगते हैं। कार्ल मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी की उदीयमान सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम बसन्त-प्लावन के दौर में कहा था, “उन्नीसवीं शताब्दी की सामाजिक क्रान्ति अतीत से नहीं वरन् भविष्य से ही अपनी प्रेरणा प्राप्त कर सकती है।” सर्वहारा क्रान्ति के नये विश्व ऐतिहासिक चक्र की समारम्भ-बेला में यह महान युक्ति एक बार फिर, नये अर्थ-सन्दर्भो के साथ, प्रासंगिक हो उठी है। जब श्रम और पूँजी की शक्तियाँ आमने-सामने खड़ी हों तो क्रान्तिकारी कला-साहित्य का काम श्रम की संस्कृति को सर्जना का मार्गदर्शक बनाना और श्रम की दुनिया में क्रान्ति की अन्तश्चेतना का पुनर्सृजन करना है। अतीत के शरणागत होने, जिसे इतिहास की नैर्सैगिक गति से नष्ट होना है उसके लिए शोकगीत गाने तथा अतीत से नारे, आदर्श, प्रतिमान और प्रादर्श उधार लेने की प्रवृत्ति से मुक्त होना होगा। जनता के पास संस्कृति के नाम पर जो कुछ भी मौजूद है, उन सबको प्रगतिशील मानने का नज़रिया एक अवैज्ञानिक नज़रिया है। यही “लोकवाद” है जिससे हमें छुटकारा पाना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाए बिना सांस्कृतिक मोर्चे पर सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन के कार्यभारों को पूरा कर पाना सम्भव नहीं होगा। दलित-मुक्ति के प्रश्न की उपेक्षा करके सर्वहारा क्रान्ति या जन-मुक्ति की परियोजना के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। सहशताब्दियों से सर्वाधिक व्यवस्थित और सर्वाधिक बर्बर शोषण-दमन के शिकार दलित देश की कुल आबादी में लगभग तीस प्रतिशत हैं और उनमें से 90 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की कतारों में शामिल हैं। यह आबादी यदि सम्पूर्ण जनता की मुक्ति और स्वतंत्रता-समानता की वास्तविक स्थापना की परियोजना के रूप में सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति को स्वीकार नहीं करेगी तो उसकी विजय असम्भव है। दूसरी ओर, समाजवादी क्रान्ति परियोजना से जुड़े बिना दलित-मुक्ति का प्रश्न भी असमाधानित ही बना रहेगा (क्योंकि पूँजीवादी दायरे के भीतर सुधार की सम्भावनाएँ अब समाप्तप्राय हैं) तथा समाजवादी क्रान्ति को लगातार चलाए बिना समाज को उस मुकाम तक पहुँचाया ही नहीं जा सकता जब जाति और धर्म के आधार पर किसी भी तरह का अन्तर बचा ही नहीं रह जाएगा।

इस प्रश्न की द्वन्द्वात्मक समझ की कमी के अभाव में अतीत में कम्युनिस्ट आन्दोलन और वाम जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन में वर्ग-अपचयनवाद (class-reductionism) का विचलन गम्भीर रूप में मौजूद था। आज इसी विचलन का दूसरा छोर वर्ग-विसर्जनवाद (class-liquidationism) या वर्ग-निषेधवाद के रूप में मौजूद है जब इस हद तक के फतवे दिए जा रहे हैं कि वर्ग-विश्लेषण की क्लासिकी मार्क्सवादी पद्धति से भारतीय जाति-व्यवस्था का विश्लेषण ही सम्भव नहीं है। दलित मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के “दलितवादी” चिन्तन के प्रति निहायत अनालोचनात्मक, आत्मसमर्पणकारी, समन्वयवादी रवैया अपनाया जा रहा है। यह एक घातक विसर्जनवादी, सुधारवादी प्रवृत्ति है जिसका आज खूब बोलबाला है। आज हिन्दी में जो दलित-लेखन हो रहा है, वह पक्षधर साहित्य है, प्रतिरोध का साहित्य है, रैडिकल आलोचनात्मक यथार्थवादी साहित्य है। लेकिन यह सच है कि यह सम्पूर्ण दलित आबादी के बजाय, मुख्यत: उस मध्यवर्गीय दलित का प्रातिनिधिक स्वर है, जिसका आर्थिक प्रश्न तो एक हद तक हल हो चुका है और अब सामाजिक अपमान व भेदभाव ही जिसके लिए केन्द्रीय प्रश्न है। इसीलिए समकालीन दलित लेखन का तेवर चाहे जितना तीखा हो, वह ठोस विकल्प के रूप में इसी व्यवस्था के भीतर कुछ सुधारों की माँग करता है, दलित-प्रश्न की समूल समाप्ति की कोई परियोजना नहीं प्रस्तुत करता तथा क्रान्ति के नाम से बिदकता है। यह अनायास नहीं कि जिन आन्दोलनों-संघर्षों में दलित आबादी की बहुतायत होती है या जो आन्दोलन गाँवों में दलित उत्पीड़न के ही किसी मुद्दे पर होते हैं उनसे यह दलित `भद्रलोक´ कोसों दूर रहता है। दलित साहित्य चूँकि अम्बेडकरवाद को ही अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त मानता है, अत: दलित अस्मिता की पहचान और उनके प्रतिरोध-आन्दोलन को संगठित करने में डा. अम्बेडकर की ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार करते हुए भी यह ज़रूरी है कि उनके विचारों की विस्तृत, तर्क और तथ्यपूर्ण विवेचना की जाए। प्रश्न यह है कि अम्बेडकर की दार्शनिक विश्वदृष्टि क्या थी? उनके मूलभूत राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचार क्या थे? दलित हितों के अर्जन और हिफाजित के अन्तरिम प्रावधानों और प्रतिरोध आन्दोलन के प्रोग्राम के साथ ही क्या डा. अम्बेडकर के पास दलित-प्रश्न के सम्पूर्ण और अन्तिम समाधान की कोई दूरगामी सांगोपांग परियोजना थी? ब्राह्मणवाद और जाति प्रश्न का `एक्सपोज़र´, विश्लेषण और भर्त्सना ज़रूरी है, लेकिन लगातार, लम्बे समय तक यहीं रुके रहना और इसे ही दलित आन्दोलन का पूरा प्रोग्राम बना देना कहाँ तक उचित है?

हम समझते हैं कि सामाजिक बदलाव एक वैज्ञानिक प्रश्न है और विज्ञान के प्रश्न निस्संकोच, बेलागलपेट बहस की माँग करते हैं। दलित-प्रश्न को लेकर मार्क्सवाद पर अधूरेपन का लेबल मात्र लगाने के बजाय इस पर मुद्देवार, विस्तृत बहस होनी चाहिए, अम्बेडकर के विचारों और दलित आन्दोलन के इतिहास पर भी बहस होनी चाहिए तथा दलित प्रश्न के वर्ग-विश्लेषण के साथ-साथ समकालीन दलित साहित्य को भी विश्लेषण के एजेण्डे पर लाया जाना चाहिए। तर्क-विचारहीन दलित-हित समर्थन का शोरगुल आज दलित प्रश्न पर सही कार्यदिशा अपनाने में गम्भीर विघ्न पैदा कर रहा है।

स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

समाजशास्त्रीय विमर्श की ही भाँति कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी आज बुर्जुआ नारीवाद के विविध नये-नये रूपों और किस्मों का खूब बोलबाला है। नववामपन्थी “मुक्त चिन्तक” स्त्री-प्रश्न पर क्लासिकी मार्क्सवाद के “अधूरेपन” और “यांत्रिकता” को स्वीकारते हुए बुर्जुआ नारीवादियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हैं।

एक गहरे वैचारिक कुचक्र के तहत सर्वहारा क्रान्ति और पार्टी-सिद्धान्त को पुरुष स्वामित्ववाद और स्त्री-उत्पीड़न के तत्त्वों से युक्त बताया जा रहा है और स्त्री-आन्दोलन की स्वायत्तता की वकालत करते हुए आधी आबादी को जन-मुक्ति-संघर्ष की ऐतिहासिक परियोजना से काटकर अलग करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। बुर्जुआ नारीवाद की सभी किस्में उन उच्च-मध्यवर्गीय स्त्रियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनका `स्वर्ग´ इसी व्यवस्था में सुरक्षित है। वे पुरुष-वर्चस्ववाद का विरोध तो करना चाहती हैं, लेकिन इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना में जमी उसकी जड़ों को नहीं देख पातीं क्योंकि इस व्यवस्था के वर्ग-उत्पीड़क चरित्र से उन्हें कोई शिकायत नहीं। एन.जी.ओ. प्रायोजित नारीवादियों का एक हिस्सा स्त्रियों, दलितों, विस्थापितों के उत्पीड़न और पर्यावरण के प्रश्न पर अलग-अलग जनसंघर्षों की हिमायत करता है लेकिन इन सबको एक ही मुक्ति-परियोजना के अभिन्न अंगों के रूप में नहीं देखता और विचारधारा और राजनीति के प्राधिकार को स्वीकार नहीं करता। यह अराजकतावाद और संघाधिपत्यवाद (syndicalism) का ही एक नया रूप है। भारत में तीव्र पूँजीवादीकरण से हुए मध्यवर्ग के विस्तार और बुर्जुआ संस्कृति के आच्छादनकारी प्रभाव ने बुर्जुआ नारीवाद के सामाजिक आधार को व्यापक बनाया है। सर्वहारा क्रान्तियों की विफलता से पैदा हुए परिवेश और बुर्जुआ वैचारिक-सांस्कृतिक प्रचार के प्रभाव में, निम्न-मध्यवर्गीय शिक्षित युवा स्त्रियों का एक बहुत बड़ा रैडिकल हिस्सा भी व्यापक मेहनतकश आबादी और आम मेहनतकश स्त्रियों के संघर्षों से जुड़ने के बजाय फिलहाल बुर्जुआ नारीवादी लहर के साथ बह रहा है। साहित्य-कला-संस्कृति की दुनिया में जारी स्त्री-विमर्श में पुरुष-वर्चस्ववाद के प्रश्न को एक समाज-निरपेक्ष, स्वायत्त प्रश्न के रूप में ही प्रस्तुत किया जा रहा है। स्त्री-मुक्ति के किसी व्यावहारिक सुदीर्घ कार्यक्रम के बिना सिर्फ़ गर्मागर्म लफ्फजी का अविराम सिलसिला जारी है। रचनात्मक लेखन का भी परिदृश्य हूबहू ऐसा ही है।

इस बेहद ज़रूरी और बुनियादी सवाल पर पुरज़ोर हस्तक्षेप की ज़रूरत है। नारीवादी विचारों और नारीवादी रचनाओं की सुव्यवस्थित आलोचना और मीमांसा प्रस्तुत की जानी चाहिए। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मार्क्सवाद स्त्री-प्रश्न को हल करने का कोई मॉडल या बना-बनाया फार्मूला नहीं प्रस्तुत करता बल्कि स्त्री की पराधीनता के इतिहास और आधारभूत कारणों की पड़ताल करता है तथा वर्गों के उन्मूलन की सुदीर्घ ऐतिहासिक परियोजना के एक अंग के तौर पर स्त्री-उत्पीड़न की समाप्ति की भी तर्कसम्मत सोच उसी प्रकार प्रस्तुत करता है जिस प्रकार मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण-उत्पीड़न के हर रूप के उन्मूलन की भविष्यवाणी करता है। आम स्त्रियों के बीच यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा क्रान्ति की तैयारी के प्रारम्भ-बिन्दु से ही स्त्री-प्रश्न उसके एजेण्डे पर अनिवार्यत: उपस्थित रहेगा, लेकिन स्त्री-पुरुष असमानता के भौतिक-ऐतिहासिक आधारों के नष्ट होने के बाद भी यौन-भेद और पुरुष-वर्चस्व की सहशताब्दियों पुरानी संस्कृति समाज में एक लम्बे समय तक मौजूद रहेगी और सतत् सांस्कृतिक क्रान्तियों की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही उसका निर्मूलन सम्भव हो सकेगा। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि स्त्री-मुक्ति की तमाम बुर्जुआ नारीवादी अवधारणाएँ इस प्रश्न के सम्पूर्ण हल की कोई दिशा नहीं बतलातीं, क्योंकि वे खुशहाल मध्यवर्गीय स्त्रियों से नीचे की स्त्रियों को सम्बोधित नहीं होतीं। साथ ही, मार्क्सवाद के नाम पर, स्त्री-प्रश्न पर प्रस्तुत की जाने वाली वर्ग-अपचयनवादी अवस्थिति की भी प्रखर आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

भारत में यह नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक अनिवार्यत: आधारभूत कार्यभार है कि व्यापक जनसमुदाय के बीच अन्धविश्वास, धार्मिक कुरीतियों, मध्ययुगीन निरंकुशता, नई बुर्जुआ निरंकुशता और धार्मिक मूलतत्त्ववादी फासीवादी विचारों से निरन्तर सिंचित-पोषित स्त्री-उत्पीड़न और पुरुष-वर्चस्व के तमाम रूपों के विरुद्ध एक रैडिकल सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार आन्दोलन की उद्वेलनकारी लहर पैदा की जाए। इसके बाद ही सामाजिक-राजनीतिक सरगर्मियों में आधी आबादी की पहलकदमी और भागीदारी बढ़ाने के प्रयास सार्थक और प्रभावी हो सकते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा के राजनीतिक और सांस्कृतिक हरावल अपने निजी आचरण-व्यवहार से यह सिद्ध करें कि वे दोहरे-दुरंगे लोग नहीं, बल्कि स्त्री-मुक्ति के सच्चे-सक्रिय पक्षधर हैं। समाज और व्यावहारिक स्थितियों की दुहाई देकर, निजी और पारिवारिक जीवन में पुरुष-वर्चस्ववादी आचरण करने वाले (जैसे घरेलू गुलामी को प्रश्रय देने वाले, दहेज व जाति-धर्म आधारित विवाहों को स्वीकार करने वाले, स्त्री-विरोधी सामाजिक आचारों को व्यावहारिकता की दुहाई देकर स्वीकारने वाले, अपने परिवार में प्रेम-विवाह जैसी चीज़ों का प्रत्यक्ष-परोक्ष विरोध करने वाले, आदि-आदि) पाखण्डी-कायर-धूर्त मध्यवर्गीय प्रगतिशीलों और संशोधनवादी कम्युनिस्टों ने स्त्री-समुदाय को सर्वहारा क्रान्ति के प्रवाह से काटकर अलग करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। अत: इस प्रश्न पर सांस्कृतिक आन्दोलन की शुरुआत हमें अपने निजी जीवन और आचरण से करनी होगी।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कला-साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों का विरोध करो!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

जिस तरह राजनीति के क्षेत्र में, उसी तरह कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी आज वामपन्थ के नाम पर सामाजिक जनवादी/संशोधनवादी प्रवृत्तियों का काफी बोलबाला है। इनके अनेक रूप हैं। सिर्फ कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की ही यहाँ चर्चा की जा सकती है।

अधिकांश कवि-लेखक-आलोचक आज अपने लेखन में यूरो कम्युनिज्म और पश्चिमी नववामपन्थ के नये-पुराने पुरोधाओं से निरे अनालोचनात्मक ढंग से काफी कुछ उधार लेते दीखते हैं। सोवियत संघ और चीन में सर्वहारा क्रान्तियों के बाद, समाजवादी संक्रमण के महान सामाजिक प्रयोगों के दौरान कला-साहित्य-नाटक-सिनेमा-संगीत आदि के क्षेत्र में जो भी सैद्धान्तिक और प्रयोगात्मक काम हुए थे, आम तौर पर उनके प्रति उपेक्षा का रुख दिखाई देता है। हम यह नहीं कहते कि उस दौर में गलतियाँ नहीं हुई, पर महान क्रान्तिकारी परिवर्तनों के दौर के कला-साहित्य का ऐतिहासिक-आलोचनात्मक अध्ययन अकादमिक वामपन्थी “मुक्त-चिन्तन” से उधार लेने के बजाय कहीं अधिक उपयोगी होगा।

नववाम के सुर में सुर मिलाते हुए ज्यादातर कवि-लेखक बुर्जुआ मानवतावादी स्वर में लिख-बोल रहे हें और वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा अधिनायकत्व की निरन्तरता के बुनियादी उसूलों पर कायम सर्वहारा मानवतावाद को बिना सांगोपांग तर्क और आलोचना के खारिज करते प्रतीत होते हैं।

यह कला-साहित्य में सामाजिक-जनवादी प्रवृत्तियों के बोलबाले का ही नतीजा है कि न केवल संशोधनवाद और क्रान्तिकारी वामपन्थ की विभाजक रेखा कला-साहित्य में मिट सी गई प्रतीत होती है, बल्कि कल के लोहियावादी, “लघु मानव” वादी परिमलिये आज के स्थापित वामपन्थी समालोचक माने जा रहे हैं। रघुवीर सहाय की शिष्ट-संयमित मध्यवर्गीय असन्तोष की कविता और केदारनाथ सिंह की कुलीन, सजी-सँवरी कविता को आज सुधी आलोचकों का एक संगठित धड़ा वामपन्थी काव्य-धारा के प्रतिमान या प्रातिनिधिक प्रवृत्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है और बहुतेरे नये कवि इन धाराओं को आदर्श मान रहे हैं। रेणु की जनपक्षधरता निस्सन्धिग्ध हो सकती है, लेकिन उनके प्रकृतवादी यथार्थवाद को और उनके लोहियावादी समाजवादी विचारों के निरूपण को प्रेमचन्द की राष्ट्रीय जनवादी धारा का विस्तार घोषित करना सर्वहारा साहित्य की वैचारिक समझ पर सवाल खड़े करता है। यथार्थ-चित्रण के नाम पर निषेधवादी-अनास्थामूलक दृष्टि से जनता के जीवन को प्रस्तुत करने वाले और कहीं-कहीं खिल्ली तक उड़ाने वाले श्रीलाल शुक्ल यदि उच्चासन पर बिठाए जा रहे हैं तो यह वामपन्थी कला-साहित्य की दुनिया में सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों के ज़बर्दस्त प्रभाव का ही द्योतक है।

इधर विस्मृत मार्क्सवादी आलोचकों-लेखकों के पुन:स्मरण का काम खूब हो रहा है। यह ज़रूरी और उपयोगी तभी हो सकता था जब इसे आलोचनात्मक, तर्कसम्मत पुनर्मूल्यांकन की दृष्टि से किया जाता। लेकिन प्राय: ऐसा नहीं हो रहा है और पुरानी पीढ़ी के मार्क्सवादी लेखकों के तमाम विचलनों को भी श्रद्धाभाव से स्वीकारा जा रहा है या फिर उनकी अनदेखी की जा रही है।

साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन के नाम पर एक नई नववामपन्थी प्रवृत्ति सामने आई है जो पुराने सामाजिक जनवादी विचारों को अकादमिक आडम्बरपूर्ण पण्डिताऊपन की चाशनी में लपेटकर परोस रही है और नयेपन के फैशनेबल आग्रहियों के मध्यवर्गीय मन को खूब भा रही है। `सन्धान´ पत्रिका इस धारा की अग्रणी प्रतिनिधि पत्रिका है। कला-साहित्य की क्रान्तिकारी वामपन्थी धारा का एक ज़रूरी कार्यभार है कि वह इस विचार-सरणि का सांगोपांग विश्लेषण प्रस्तुत करे और इनके द्वारा फैलाए जा रहे विभ्रमों के धुएँ-कोहरे को छाँटने का काम करे।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ , शिशिर-बसंत 2002 से साभार

वामपन्थी” कलावाद-रूपवाद और मध्यवर्गीय लम्पटता का विरोध करो!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

यह बिन्दु भी उपरोक्त बिन्दु से जुटा हुआ है। सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र की पराजय और क्रान्तिकारी वामपन्थी आन्दोलन की विघटन-विफलता के परिणाम जिन रूपों में सामने आए हैं, उनमें से एक यह भी है कि वामपन्थी और जनवादी का लेबल लगाकर घूमने वाले ऐसे “छैलों” की कविता-कहानी-नाटक की दुनिया में भरमार है जो अपने जीवन में तो हर तरह का अवसरवादी कुकर्म करते ही हैं, रचना के धरातल पर भी उनके मूल आग्रह कलावादी होते हैं। ख़ास तौर पर कविता के क्षेत्र में तो रूपवादी “वामपन्थ” का ज़ोर इतना अधिक है कि पुरोगामी और प्रतिगामी की विभाजक रेखा ही वहाँ धूमिल कर दी गई है। इसी तरह कहानी के क्षेत्र में यथार्थवाद के नाम पर प्रकृतवादी आग्रहों के बोलबाले का एक रूप मध्यवर्गीय लम्पटता का घटाटोप भी है। भारतीय जन-जीवन और संस्कृति की तबाही के सबसे नंगे, बर्बर और तेज़ रफ़्तार दौर में फूहड़-कामुक, यौनलोलुप और रुग्ण विवरण “यथार्थ-चित्राण” के नाम पर कहानियों से लेकर आत्मकथाओं के “भोगे हुए यथार्थ” और संस्मरणों के “बनारसी ठाठ” के रूप में खूब प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

इन घटिया प्रवृत्तियों के वास्तविक स्रोत को, इनके वर्ग-चरित्र को सविश्लेषण उजागर करना होगा, सर्वहारा संस्कृति के इन रेशमी रूमालधारियों को, इन भंड़ैतों, छैलों और रागरंग-प्रेमियों को बेनकाब करना होगा और इनके विरुद्ध समझौताविहीन संघर्ष चलाना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर विचारधारात्मक संघर्ष

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

वर्ग-संघर्ष की वैज्ञानिक चेतना को विकसित करने के लिए हमें कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर भी वर्ग-संघर्ष को तीखा करने का काम करना होगा। हमें श्रम की दुनिया में क्रान्ति की वस्तुगत आवश्यकता को एक बार फिर आम जनगण की उद्दाम, दुर्निवार आकांक्षा में रूपान्तरित कर देना है। साहित्य का, समग्र संस्कृति कर्म का कर्तव्य है कि वह लोगों को निराशा और विभ्रमों से छुटकारा दिलाकर तमाम मानवद्रोही शक्तियों और मानवद्रोही व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह में उठ खड़ा होने के लिए तैयार करे। जीवन के अन्य सभी मोर्चों की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हमें आज “नये संघर्षोंको गौरवमण्डित करने के लिए”, “सम्मुख उपस्थित कार्यभार को कल्पना में वृहद आकार देने के लिए”, “एक बार फिर क्रान्ति की आत्मा को जागृत करने के लिए” अतीत के संघर्षों की महानता-महत्ता और वैचारिक परम्परा का पुनरान्वेषण करना है। इस दृष्टि से सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आज की पहली प्राथमिकता वैचारिक कार्य और वैचारिक तैयारियों की है।

किसी भी मोर्चे पर नई तैयारियाँ हर-हमेशा विचारधारात्मक धरातल से ही शुरू होती हैं। भविष्य का विजेता वर्ग अपने विरोधी को सबसे पहले विचारधारात्मक मोर्चे पर ही शिकस्त देता है। सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आज पहली ज़रूरत वैचारिक सफ़ाई और तैयारी की, वैचारिक आक्रमणों के प्रतिकार की और वैचारिक प्रत्याक्रमण की है। ध्यान रखना होगा कि यह बुनियादी काम है, पर एकमात्र नहीं। और यह भी याद रखना होगा कि इसे “अध्ययन-कक्ष के योद्धा” और निठल्ले विमर्शक नहीं, बल्कि जनता के बीच सक्रिय सांस्कृतिक सेनानी ही अंजाम दे सकेंगे। विपर्यय, पुनरुत्थान और संक्रमण के समय में इतिहास का पुनरीक्षण, वर्तमान का विश्लेषण और भविष्य की दिशा तय करने का काम केन्द्रीय बन जाता है, अत: विचार-पक्ष पर केन्द्रीय ज़ोर स्वाभाविक हो जाता है।

अतीत में ऐसा कई बार हुआ है कि ऐतिहासिक संक्रमण कालों में संस्कृति का क्षेत्र विचारधारात्मक संघर्ष का अहम मोर्चा, और कभी-कभी तो मुख्य रंगमंच बन जाता रहा है। यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन-काल के इतिहास की बस हम याद दिलाना चाहेंगे।

लेकिन जब हम कहते हैं कि आज संस्कृति का क्षेत्र विचारधारात्मक संघर्ष का केन्द्रीय रणांगन बना हुआ है तो यह इतिहास-निगमित सूत्र के दुहराने के रूप में नहीं बल्कि इस समय मौजूद स्थिति के वस्तुगत मूल्यांकन के रूप में कहते हैं। हम देखें, राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में तो स्थिति यह है कि वर्तमान परिस्थितियाँ बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों के मुँह से मार्क्सवादी प्रस्थापनाएँ उगलवा रही हैं। सीधे विचारधारा के क्षेत्र में, मार्क्सवादी दर्शन या समाजवादी प्रयोगों की शिक्षाओं को तोड़ने-मरोड़ने का काम तो हो रहा है, पर वास्तव में बुर्जुआ वर्ग कोई नया हमला बोल ही नहीं सका है। जिन मुद्दों पर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारिम्भक दो दशकों तक मार्क्सवाद बुर्जुआ विचारधारा को परास्त कर चुका है, उन्हें ही भाड़े के कलमघसीट कुछ यूँ उठा रहे हैं मानो यह एकदम नई बात हो, मार्क्सवाद पर कोई नया सवाल हो। समाजवाद की फ़िलहाली पराजय को लेकर जो भी बातें की जा रही हैं, उनके उत्तर लेनिन के अन्तिम दौर के चिन्तन से लेकर माओ के सांस्कृतिक क्रान्ति-कालीन चिन्तन तक में मौजूद हैं।

देखा जाए तो अधिक षड्यंत्रकारी और प्रभावी ढंग से, अमूर्त बौद्धिक निरूपणों-सूत्रीकरणों का वाग्जाल रचते हुए, विगत दो दशकों के दौरान जो “सांस्कृतिक विमर्श” हुए हैं और जो नये सामाजिक, सांस्कृतिक और सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त गढ़े गए हैं, उन्होंने द्वन्द्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी जीवन-दृष्टि पर सर्वाधिक प्रभावी चोटें की हैं। इन नये विमर्शों-सिद्धान्तों में हम उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर-मार्क्सवाद, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद, प्राच्यवाद, `सबआल्टर्न´ इतिहास-लेखन आदि-आदि-सभी को शामिल कर रहे हैं। इनके तर्क भी दरअसल नये नहीं हैं। इनमें हीगेल का विदू्रप है और नीत्शे से लेकर स्पेंग्लर तक की अनुगूँजें हैं, पर “सांस्कृतिक विमर्शों” में इन्हें प्रभावी ढंग से नया और समकालीन बनाकर पेश किया जा रहा है। संशोधनवादियों और अकादमिक वामपन्थियों का एक हिस्सा पक्ष-परिवर्तन करके इस जमात में शामिल हो गया है, दूसरा हिस्सा इनसे काफ़ी-कुछ उधार लेकर समन्वयवाद की राह चल रहा है और तीसरा हिस्सा इनका आधा-अधूरा, मरियल और अमूर्त अकादमिक विमर्श की ही भाषा में जवाब दे रहा है। सही ईमानदार, वामपन्थी लेखक-संस्कृतिकर्मी प्राय: दिग्भ्रमित हैं और ख़ास तौर पर जनपक्षधर युवा बुद्धिजीवियों पर इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे सांस्कृतिक मोर्चे की वैचारिक तैयारी और नई कतारों की तैयारी का काम भी प्रभावित हो रहा है।

संस्कृति के मोर्चे पर एक और दृष्टि से नये पुनर्जागरण और नये प्रबोधन के वैचारिक कार्यों को देखना-समझना ज़रूरी है। पुनरुत्थान के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में, वित्तीय पूँजी की “अन्तिम विजय” के इस दौर में, फ़ासीवादी प्रवृत्तियों का नया उभार एक विश्वव्यापी परिघटना है और हमारे देश में भी इनका श्मशान-नृत्य जारी है। वैचारिक धरातल पर, अतीत की ही तरह, इतिहास और संस्कृति के विकृतिकरण पर इनका मुख्य ज़ोर है। इसलिए भी, एक ओर जहाँ इनसे निर्णायक संघर्ष के लिए मेहनतकश जनता की लामबन्दी का काम तेज़ करना होगा, वही संस्कृति के क्षेत्र में इनके मुकाबले के लिए जमकर वैचारिक कार्य करना होगा और व्यापक प्रचार-कार्य भी।

सच पूछें तो आज समूचे बुर्जुआ वर्ग का दर्शन ही तर्कणा और जनवाद के मूल्यों से इतना रिक्त हो चुका है कि फ़ासीवादी विचार-दर्शन से उसकी विभाजक रेखा धूमिल हो गई है। यह अनायास नहीं है कि तमाम किस्म की “उत्तर” विचार-सरणियाँ आज बुर्जुआ पुनर्जागरण और उसकी मानववाद और इहलोकवाद की परम्परा को तथा बुर्जुआ प्रबोधनकाल और उसकी तर्कणा और जनवाद की विरासत को ही सिरे से खारिज करने का काम कर रही हैं। उस महान क्रान्तिकारी विरासत का वास्तविक वारिस तो सर्वहारा वर्ग ही है। उन्नीसवीं शताब्दी में सत्तारूढ़ होते ही बुर्जुआ वर्ग ने स्वतंत्रता-समानता-भ्रातृत्व के लाल झण्डे को धूल में फेंक दिया था तो सर्वहारा वर्ग ने उसे आगे बढ़कर उठा लिया था। आज जीवन में मानववाद और तर्कणा के प्राधिकार को स्थापित करने की लम्बी लड़ाई एक बार फिर एक उग्र चरण में है। यह सर्वहारा मानववाद और द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी तर्कणा के झण्डे को ऊँचा उठाने का समय है। यह आज के नये पुनर्जागरण और नये प्रबोधन का केन्द्रीय काम है और संस्कृति का मोर्चा ऐसे समय में बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

निचोड़ के तौर पर संस्कृति के मोर्चे के वैचारिक कार्यों को ठोस रूप में कुछ यूँ निरूपित किया जा सकता है :

(1) सबसे पहली बात तो यह कि सर्वहारा-संस्कृति के सर्जकों-शिल्पियों को मार्क्सवादी दर्शन और राजनीतिक अर्थशास्त्र का एक हद तक अध्ययन अवश्य करना होगा, तभी वे बुर्जुआ विभ्रमों से मुक्त हो सकते हैं, बुर्जुआ सांस्कृतिक विचारों का प्रतिकार कर सकते हैं और सामाजिक जीवन की प्रतीतियों की सतह भेदकर सारभूत यथार्थ को पकड़ सकते हैं।

(2) हमें साहित्य-कला-संस्कृति की मार्क्सवादी वैचारिकी के अध्ययन-मनन का काम करना होगा। पहले किया भी हो तो नये सिरे से करना होगा, विस्मृतियों की कालिख पोंछनी होगी। अतीत के सैद्धान्तिक बहसों-विमर्शों और प्रयोगों का नये सिरे से अध्ययन करना होगा और महत्त्वपूर्ण चीज़ों को पुनर्प्रस्तुत करना होगा।

(3) हमें तमाम “उत्तर” विचार-सरणियों की, अन्य नये-नये बुर्जुआ और “नववामपन्थी” संस्कृति-सिद्धान्तों की वैज्ञानिक आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

(4) हमें आज के बुर्जुआ मीडिया-विशेषज्ञों और बुर्जुआ संस्कृति उद्योग के सिद्धान्तकारों के नये-नये सिद्धान्तों की सांगोपांग चीर-फाड़ करनी होगी।

(5) हमें आज के सामाजिक यथार्थ और नई सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटनाओं-प्रवृत्तियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करना होगा और इस प्रक्रिया में मार्क्सवादी कला-दर्शन और सौन्दर्य-शास्त्र को समृद्ध और समकालीन बनाने की सतत्-प्रक्रिया को नया संवेग देना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

नए सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन— महत्तव्पूर्ण सामजिक-आर्थिक सरंचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में सृजन और आन्दोलन के सभी कार्यों को आज एकदम नये सिरे से संगठित करने की ज़रूरत है। हम सर्वहारा क्रान्ति की पक्षधर अवस्थिति से यह बात कह रहे हैं।

समय और समाज जब जनता के प्रचण्ड वेगवाही सांस्कृतिक आन्दोलन की माँग कर रहे हैं, तब कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में अराजकता, विभ्रम, भटकाव, अवसरवाद और ठहराव का बोलबाला है। ताकत कम नहीं है, पर कोशिशें बिखरी हुई हैं। जहाँ ईमानदारी और मेहनत से लगी हुई टीमें हैं, वहाँ वैचारिक समझ कमज़ोर है और अनुभववाद तथा `लकीर की फकीरी´ का बोलबाला है। निस्संकोच कहा जा सकता है कि प्रगतिशील वाम सांस्कृतिक धारा पर आज प्रच्छन्न बुर्जुआ और निम्न-बुर्जुआ धाराएँ हावी हैं। एक ओर नामधारी वाम के पुराने मठाधीशों-महामण्डलेश्वरों की गद्दियाँ और अखाड़े हैं तो दूसरी ओर विश्व के नये यथार्थ के अवगाहन और अतीत की “जड़ीभूत” विचारधारात्मक चिन्तन-पद्धतियों के पुनरीक्षण का दावा करने वाले अकर्मक “नव-मार्क्सवाद” के नौबढ़ प्रणेताओं के अड्डे हैं। क्रान्तिकारी वाम शिविर से जुड़े कई एक सांस्कृतिक संगठन और टोलियाँ हैं, पर उनका विचार-पक्ष कमज़ोर है। वे कला-साहित्य-संस्कृति की द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी समझ से, अपनी समृद्ध वैचारिक विरासत से और अतीत के सर्जनात्मक प्रयोगों से अपरिचित हैं। वे भरपूर जोश से क्रान्तिकारी आन्दोलन और प्रचार की कार्रवाइयों में लगे हैं, लेकिन वैचारिक समझ के अभाव में उनके सांस्कृतिक कार्य दिशाहीन और निष्प्रभावी होकर रह जा रहे हैं।

हमें इस भंवर से बाहर निकलना होगा। क्योंकि हमारे देश और समूची दुनिया के सामने आज यह प्रश्न पहले हमेशा की अपेक्षा अधिक ज्वलन्त और भयावह रूप में खड़ा है – या तो समाजवाद, या फिर बर्बरता! कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी यही प्रश्न केन्द्रीय है।

अकर्मण्य वैचारिक समझ घोड़े की लीद से बेहतर नहीं होती। वास्तविक आशावाद नियतत्ववादी नहीं होता। यदि हम आशावादी हैं तो हमें अपनी आशाओं को फलीभूत करने के लिए जी-जान से जूझना होगा। अकर्मक ज्ञान और अन्धा आशावाद – इन दोनों से बचना होगा।

नये सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन – महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संरचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

आज की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की इस निबन्ध में सविस्तार चर्चा सम्भव नहीं है और इसकी ज़रूरत भी नहीं है। लेकिन अलग से यह करना ही होगा क्योंकि सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुनिश्चित समझ के बिना संस्कृतिकर्मी भी अपने समय के जीवन के मर्म को नहीं पकड़ सकते। इसके बग़ैर वे सतह की परिघटनाओं को ही सारभूत यथार्थ मानकर प्रस्तुत करेंगे। इसके बिना वे भविष्य की ओर जारी यात्रा की गतिकी को नहीं समझ सकते और अपने कार्यभार नहीं निर्धारित कर सकते। आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, हमारे देश के आम लोगों का जीवन सर्वग्रासी संकट के जिस विषैले-दमघोंटू अन्धकार में घुट रहा है, उसकी हम यहाँ सूत्रवत चर्चा करेंगे। इतनी चर्चा पृष्ठभूमि के तौर पर ज़रूरी है।

हम आज भी साम्राज्यवाद के युग में जी रहे हैं जिसकी बुनियादी अभिलाक्षणिकताओं को और उन्नीसवीं शताब्दी के `स्वतंत्र प्रतियोगिता के युग´ से जिसकी भिन्नताओं को लेनिन ने उद्घाटित किया था। लेकिन आज, सतह की परिघटनाओं-प्रवृत्तियों के पर्यवेक्षण के आधार पर भी यह महसूस किया जा सकता है कि स्थितियों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं। विश्व-पूँजीवाद के असमाधेय संकटों की, साम्राज्यवाद की अभूतपूर्व आक्रामकता की, नई तकनोलॉजी के प्रयोग की, तीसरी दुनिया के देशों में निर्बन्ध पूँजी-निवेश और लूट की, इन देशों के बुर्जुआ शासक वर्ग के आत्म समर्पण की, मज़दूरों से अतिलाभ निचोड़ने की नई-नई तरकीबों और उनके छिनते अधिकारों की, सट्टेबाज़ी और अनुत्पादक प्रवृत्तियों की, सूचना-संचार के तंत्र की नई प्रभाविता की, फ़ासीवादी शक्तियों के नये उभार की और पहले से भिन्न तमाम लक्षणों-प्रवृत्तियों की चर्चा तो आम तौर पर होती है। इन तमाम बदलावों के पीछे सिर्फ़ यही कारण नहीं है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम संस्करण आज पराजित और विफल हो चुके हैं और सोवियत संघ के नेतृत्व में नामधारी समाजवादी (वस्तुत: राजकीय पूँजीवादी) ढाँचे वाले देशों का शिविर विघटित हो चुका है। इससे भी बुनियादी कारण (और ये दोनों अन्तर्सम्बन्धित हैं) यह है कि साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की कार्यप्रणाली और लगातार पैदा होने वाले अपने संकटों को निपटाने के उसेक तौर-तरीकों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं, और इनके चलते, विश्व पूँजीवाद के समूचे परिदृश्य में कुछ महत्त्वपूर्ण नई चीज़ें पैदा हुई हैं। इन बुनियादी कारणों को समझने की ज़रूरत है। इन बदलावों की पृष्ठभूमि के बनने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हो चुकी थी, गत शताब्दी के आठवें दशक से इनके लक्षण सतह पर उभरने लगे थे और अन्तिम दशक के दौरान एक नया बदला हुआ परिदृश्य एकदम सामने आ चुका था।

पहली बात, वित्तीय पूँजी की जो वरीयता और निर्णायक भूमिका उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में स्थापित हुई थी, वह गत शताब्दी के आठवें दशक तक चरम वर्चस्व में रूपान्तरित हो चुकी थी। दुनिया भर में निवेशित कुल पूँजी का तीन-चौथाई से भी अधिक आज सट्टा बाज़ार, मीडिया, मनोरंजन उद्योग और अन्य अनुत्पादक कार्रवाइयों में लगा हुआ है। वित्तीय पूँजी ने वास्तविक उत्पादन से स्वतंत्र होकर सम्पूर्ण विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व कायम कर लिया है और कीन्स की आशंका को हूबहू साकार करते हुए, उद्योग सट्टेबाज़ी के भंवर में सतह पर तैरने वाला बुलबुला बनकर रह गया है। आज जो पूँजी का विश्वव्यापी प्रसार दीख रहा है, वह सट्टेबाज़ी, मुद्रा-बाज़ारों में ऋण-सर्जन में सतत् वृद्धि और मुद्रा-पूँजी के अन्तरराष्ट्रीय आवागमन के रूप में है। साम्राज्यवाद के दौर में पूँजी के जिस परजीवी, परभक्षी, अनुत्पादक और जुआड़ी चरित्र की चर्चा लेनिन ने की थी, वह उस समय से कई गुना अधिक हो चुकी है।

आज विश्व-स्तर पर बुर्जुआ जनवाद के बचे-खुचे मूल्यों के भी निश्शेष होने, तरह-तरह की मूलतत्त्ववादी-नवफ़ासीवादी राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के सिर उठाने, तर्कणा और मानववाद के विरुद्ध नानाविध सांस्कृतिक उपक्रमों-उद्यमों के जन्म लेने तथा साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में माल-अन्धभक्ति, निरंकुशता, अतर्कपरकता, कलावाद-रूपवाद और मानवद्रोही प्रवृत्तियों के नये-नये रूपों के उभरने की ज़मीन यही है।

विश्व-स्तर पर पूँजी का विकास शेयर बाज़ारों और जुआघरों का `बाई-प्रोडक्ट´ बन जाने के चलते संकट के विस्फोट और महाध्वंस का भय हमेशा साम्राज्यवादियों-पूँजीपतियों के सिर पर सवार रहता है। बीच-बीच की अल्पकालिक राहतों के बावजूद, दीर्घकालिक मन्दी का दौर विगत तीन दशकों से लगातार मौजूद है। कभी तेज़ कभी मद्धम होता व्यापार युद्ध, बड़े-बड़े घरानों में से कुछ के तबाह होने का या किसी और द्वारा निगल लिये जाने का तथा नई-नई इजारेदारियों के गठन का सिलसिला लगातार जारी है। उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों, पूर्वी यूरोप के देशों और भूतपूर्व सोवियत संघ के घटक देशों के बाज़ार को साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी के लिए पूरी तरह खोल दिया है और चीन में “बाज़ार समाजवाद” की पिपिहरी बजाने वाले नये शासकों ने भी उसके स्वागत के लिए लाल गलीचे बिछा दिए हैं, पर पश्चिमी पूँजी का अजीर्ण रोग लगातार मौजूद है।

भूतपूर्व समाजवादी देशों में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना और राजकीय पूँजीवाद के सोवियत “समाजवादी” ढाँचे के विघटन के बाद पश्चिमी ढंग के पूँजीवादी ढाँचे की स्थापना मुख्यत: उन देशों के आन्तरिक वर्ग-संघर्ष का परिणाम थी, लेकिन इसमें साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की तथा साम्राज्यवादी घुसपैठ, घेरेबन्दी और षड्यंत्र की भी एक अहम भूमिका थी। इसी प्रकार, उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के तहत, एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों के बाज़ारों में साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी खुला चरागाह बना देने, सार्वजनिक क्षेत्र के विघटन का बुर्जुआ राज्य की बची-खुची “कल्याणकारी” भूमिका के निरस्तीकरण और “श्रम-सुधारों” के पीछे साम्राज्यवादी देशों के दबाव के साथ ही इन देशों के सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग की अपनी आवश्यकता और विवशता भी है। इन देशों में सत्तासीन होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोधों का लाभ उठाते हुए और जनता को निचोड़कर राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा कर एक सीमा तक पूँजीवाद का विकास किया। अब यह सिलसिला संतृप्ति-बिन्दु तक जा पहुँचा था। नई तकनोलॉजी, पूँजी और बाज़ार की अपनी ज़रूरतों के चलते साम्राज्यवादियों के गिरोह के दिशा-निर्देशों पर चलना अब इनके सामने एकमात्र विकल्प था। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर का यही सारतत्त्व है। इस नये दौर में पूँजी का वैश्विक प्रवाह एकदम निर्बन्ध हो गया है। साम्राज्यवादी शोषण इस नये दौर में प्रत्यक्ष राजनीतिक शासन या नियंत्रण के माध्यम से काम नहीं कर रहा है। राजनीतिक-सामरिक बल-प्रयोग और दबाव का अनिवार्य पहलू मौजूद है, लेकिन साम्राज्यवादी शोषण की प्रक्रिया मुख्यत: उस विशाल अन्तर के ज़रिए काम करती है जो विकसित देशों और पिछड़े देशों की उत्पादक शक्तियों के बीच बना हुआ है।

भारत और तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों के पूँजीपति वर्ग के किसी भी हिस्से का अब राष्ट्रीय चरित्र नहीं रह गया है। साम्राज्यवाद से विनियोजित अधिशेष में अपने हिस्से को लेकर देशी पूँजीपति वर्ग के अन्तरविरोध मौजूद हैं और वे समय-समय पर उग्र भी हो जाते हैं। देश के भीतर इजारेदार और ग़ैर इजारेदार पूँजी के बीच, बड़ी और छोटी पूँजी के बीच भी अन्तरविरोध हैं, पर वे ग़ैरदुश्मनाना अन्तरविरोध हैं। पूँजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा अब साम्राज्यवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए जनता के अन्य वर्गों के साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है।

राष्ट्रीय प्रश्न की ही तरह भूमि-प्रश्न भी अब सामाजिक क्रान्ति के एजेण्डे पर अपने पूर्ववर्ती रूप में उपस्थित नहीं रह गया है। प्रतिक्रियावादी “प्रशियाई” मार्ग से प्राक्पूँजीवादी भूमि-सुधारों के रूपान्तरण का काम पूँजीवादी व्यवस्था में सम्भव हदों तक, मुख्यत: पूरा हो चुका है। पुराने सामन्ती भूस्वामियों का एक बड़ा हिस्सा पूँजीवादी भूस्वामी बन चुका है। पहले के बड़े काश्तकार आज के बड़े मालिक किसान-कुलक बन चुके हैं। किसान आबादी का तेज़ विभेदीकरण गत तीन दशकों की एक महत्त्वपूर्ण परिघटना है। निम्न-मध्यम और छोटे किसान उजड़कर सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की पाँतों में शामिल हो रहे हैं। उच्च-मध्यम किसान धनी किसानों की कतारों में शामिल हो रहे हैं। पिछले दशक के दौरान यह प्रक्रिया और अधिक तेज़ हो गई है। गाँवों में भी श्रम और पूँजी का अन्तरविरोध ही प्रधान हो गया है। जहाँ अभी पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था की संक्रमणशील स्थिति है, वहाँ भी यही स्थिति है। वहाँ से भारी संख्या में उजड़कर किसान आबादी शहरों और विकसित पूँजीवादी खेती वाले इलाकों की ओर पलायन कर रही है। सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के आज सिर्फ़ अवशेष ही मौजूद हैं। गाँवों में वित्तीय पूँजी की पैठ मज़बूत हुई है, वे राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी में आ गए हैं, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था की जड़ता टूट गई है और कृषि और सहायक क्षेत्रों में भी माल-उत्पादन प्रभावी प्रवृत्ति बन गई है।

इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारतीय मध्यवर्ग का भी विगत कुछ दशकों के दौरान तेज़ विस्तार और विभेदीकरण हुआ है। मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों (प्रोफेसरों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों, नौकरशाहों, विशेषज्ञों आदि का) का एक बड़ा हिस्सा आज पूरी तरह से व्यवस्था के पक्ष में खड़ा हो चुका है। आम नौकरीपेशा, तबाहहाल मध्यवर्गीय कतारों से यह एकदम अलग खड़ा है। मध्यवर्ग के निचले संस्तरों की करीबी मेहनतकश वर्गों से बन रही है, हालाँकि उनकी निराशा, पिछड़े मूल्यों, जातिगत संस्कारों आदि का लाभ उठाकर धार्मिक कट्टरपन्थी ताकतें उनके एक हिस्से को अपने प्रभाव में लेने में फ़िलहाल कामयाब हैं। उच्च मध्यवर्ग आज उदारीकरण-निजीकरण के प्रवक्ता-समर्थक और धुर प्रतिक्रियावादी संस्कृति के संवाहक के रूप में व्यवस्था से नाभिनालबद्ध है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि हमारा पिछड़ा हुआ पूँजीवादी समाज आज राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के बजाय एक ऐसी नई समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में है जिसकी अन्तर्वस्तु साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी है। राष्ट्रीय जनवाद के अधूरे पड़े काम भी आज इसी के कार्यभारों में समाहित हो गए हैं। इस काम में सर्वहारा वर्ग का साथ मुख्यत: गाँव और शहर की भारी ग़रीब आबादी देगी और मध्यवर्ग और मध्यम किसानों के नीचे के संस्तर देंगे। बीच के संस्तर ढुलमुल सहयोगी होंगे। पूंजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा, खुशहाल मालिक किसान और उच्च मध्यवर्ग अब किसी भी सूरत में मेहनतकशों के रणनीतिक संश्रयकारी नहीं बनेंगे।

लेनिन के समय और आज के समय के बीच का एक महत्त्वपूर्ण फर्क यह है कि राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियाँ आज विश्व सर्वहारा क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण संघटक तत्त्व नहीं रह गई हैं। एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के अर्द्धऔद्योगीकृत पिछड़े देश ही आज भी साम्राज्यवाद की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं, पर इनमें से अधिकांश देशों में सामाजिक क्रान्तियों का एजेण्डा बदल चुका है। अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण, विश्व-सर्वहारा क्रान्ति के दूसरे चक्र में, वस्तुगत परिस्थितियों की दृष्टि से, इन्हीं देशों में सम्भावित हैं, पर इन क्रान्तियों की अन्तर्वस्तु अब साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी होगी। ये देशी-विदेशी पूँजी के संश्रय के विरुद्ध केन्द्रित नई समाजवादी क्रान्तियाँ होंगी, जो न केवल चीनी क्रान्ति से, बल्कि कई मायनों में सोवियत समाजवादी क्रान्ति से भी भिन्न होंगी।

सामाजिक शक्तियों के इस नये ध्रुवीकरण के अनुसार ही सांस्कृतिक मोर्चे के कार्यभारों की बुनियादी रूपरेखा तय होगी। कहा जा सकता है कि आज हमारी लड़ाई राष्ट्रीय जनवादी संस्कृति की नहीं बल्कि सर्वहारा जनवादी संस्कृति की, या कहें कि सर्वहारा संस्कृति की है। अब लोगों को यह बताने का अनुकूल समय है कि सिर्फ़ सर्वहारा जनवाद ही वास्तविक जनवाद होता है, कि आज सिर्फ़ दो ही मुख्य सांस्कृतिक पक्ष हैं – पूँजी की संस्कृति का पक्ष और श्रम की संस्कृति का पक्ष, और लोगों को इन्हीं दो के बीच अपना पक्ष चुनना होगा। कला-साहित्य के दायरे में व्यक्तिवाद और अलगाव की संस्कृति पर निर्णायक प्रहार के लिए आज निजी स्वामित्व की नैतिकता पर ही प्रश्न खड़े करने होंगे, लोभ-लाभ, बाज़ार और माल के रहस्यवाद की संस्कृति के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करना होगा, सम्पत्ति सम्बन्धों की तफसीलों को प्रस्तुत करना होगा और बुर्जुआ अधिकारों तथा अन्तरवैयक्तिक असमानताओं की सामाजिक-ऐतिहासिक बुनियादों को उद्घाटित करना होगा। इन्हीं बुनियादी कार्यभारों के इर्दगिर्द हमें राजनीतिक सत्ता, साम्राज्यवादी लूट और षड्यंत्र आदि के भण्डाफोड़ के प्रचारात्मक और आन्दोलनात्मक, रुटीनी और फ़ौरी, सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्य भी संगठित करने होंगे। सामाजिक जीवन में जो सामन्ती सांस्कृतिक मूल्य मौजूद हैं, वे सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग और साम्राज्यवादियों के लिए एकदम उपयुक्त हैं, अत: उन्होंने उन सभी को अपनाकर अपने सांस्कृतिक तंत्र का अंग बना लिया है। तर्कणा और भौतिकवाद की जगह अन्धविश्वास, रहस्यवाद आदि ही आज बुर्जुआ वर्ग की ज़रूरत हैं। जाति-समस्या, दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न को भी आज इसी नज़रिए से देखना होगा। इन मुद्दों पर जनवादी सुधार की पैबन्दगीरी का समय बीत चुका है। ऐसा करना महज़ बुर्जुआ गुलामगीरी होगी। सामाजिक मुक्ति के ये बुनियादी प्रश्न समाजवादी परियोजना के अनिवार्य बुनियादी मुद्दे हैं।

साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की संस्कृति में भी आज कोई अन्तरविरोध नहीं है। दोनों में सहयोग और एकता है, और काफ़ी हद तक तो एकरूपता भी है। राष्ट्रवादी संस्कृति की ज़मीन से साम्राज्यवादी संस्कृति का विरोध आज इतिहास की बात बन चुका है। सामाजिक-आर्थिक संरचना और सामाजिक-राजनीतिक क्रान्ति के स्वरूप के आधार पर, जनपक्षधर संस्कृति कर्म की सर्वाधिक सामान्य रूपरेखा की इस चर्चा के बाद, हम पूँजी के भूमण्डलीकरण के इस नये दौर की कुछ और नई प्रवृत्तियों की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

हम समझते हैं कि साम्राज्यवाद की आज की अति उग्र आक्रामकता के पीछे उसकी शक्ति नहीं, बल्कि उसका असमाधेय ढाँचागत संकट है। समाजवाद की तात्कालिक विफलता, तीसरी दुनिया के शासक वर्गों की घुटनाटेकू मुद्राओं और विश्व-क्रान्ति की धारा की वर्तमान संकटग्रस्तता के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था में उछाल या त्वरण के कोई विश्वसनीय संकेत नहीं हैं। साझा हितों के लिए, एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका में अमेरिकी सामरिक हस्तक्षेपों और कुचक्रों के पीछे सभी साम्राज्यवादी देश एकजुट दीखते हैं, लेकिन यह दौर-विशेष की विशिष्टता है। साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोध एक बार फिर गहरा रहे हैं और आने वाले दिनों में नये व्यापार-युद्धों और शक्ति-समीकरणों के संकेत अभी से मिलने लगे हैं।

अत: कहा जा सकता है कि ऊपरी तौर पर एकतरफ़ा ढंग से पूरी दुनिया की जनता पर हावी दीखता साम्राज्यवाद अन्दर से खोखला हो रहा है। यह आज भी कागजी बाघ ही है, बल्कि पहले से भी अधिक कागजी है। आज यह अपनी जड़ता की शक्ति से जीवित है और इसलिए जीवित है कि सर्वहारा क्रान्तियों और समाजवादी प्रयोगों का सिलसिला, पहले चक्र की विफलता के बाद, अभी फिर से गतिमान नहीं हो सका है।

इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय और पुनरुत्थान का यह समय अभूतपूर्व संकट का समय है। बुर्जुआ क्रान्तियों के प्रवाह को भी पराजय और पुन:स्थापन के दौरों से गुज़रना पड़ा था पर उनका संकट इतना विकट और लम्बा नहीं था। लेकिन जो क्रान्ति दूरगामी तौर पर, सहशताब्दियों लम्बे, वर्ग-समाज के समूचे इतिहास के विरुद्ध निर्देशित है, जो इतिहास की सर्वाधिक युगान्तरकारी और पहली `सचेतन क्रान्ति´ है, उसकी अवधि लम्बी होना, कठिनाइयाँ विकट होना, पराजय प्रचण्ड होना और रास्ता जटिल और आरोह-अवरोहपूर्ण होना, ऐतिहासिक दृष्टि से स्वाभाविक प्रतीत होता है।

विगत लगभग दो शताब्दियों के विश्व-इतिहास का समाहार करते हुए कहा जा सकता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच विश्व-ऐतिहासिक महासमर के पहले चक्र की शुरुआत हुई। पेरिस कम्यून (1871), अक्टूबर क्रान्ति (1917) और चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति (1966-76) इस यात्रा के तीन महानतम कीर्ति स्तम्भ – तीन मील के पत्थर थे। रूस में स्तालिन की मृत्यु के बाद संशोधनवादी पार्टी और राज्य पर काबिज हो गए और वहाँ समाजवाद का मुखौटा कायम रखते हुए नये नौकरशाह बुर्जुआ वर्ग ने राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा किया। एक ओर सामाजिक साम्राज्यवादी सोवियत संघ ने विश्व के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों के साथ विश्वासघात किया तथा उन्हें विघटित करने और अपना पिछलग्गू बनाने की कोशिश की। दूसरी ओर पश्चिमी साम्राज्यवादी शिविर के सामने एक चुनौती प्रस्तुत करके और साम्राज्यवादी शिविर के अन्तरविरोधों को उग्र बनाकर उसने वस्तुगत तौर पर विश्व-पूँजीवाद के संकट को बढ़ाने का काम भी किया। साथ ही, सोवियत संघ की मौजूदगी और दो अतिमहाशक्तियों के शिविरों के बीच की उग्र प्रतिस्पर्धा का लाभ पिछड़े देशों के शासक वर्गों ने भी उठाया। पश्चिमी खेमे की थोपी गई शर्तों का आंशिक विरोध सोवियत “सहायता” के सहारे करने में वे सफल रहे। सोवियत संघ में और पूर्वी यूरोप के देशों में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद भी चीन में सर्वहारा सत्ता की मौजूदगी और समाजवादी प्रयोगों के सिलसिले से पूरी दुनिया में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों और सर्वहारा क्रान्तियों की धारा को प्रेरणा और संवेग मिलता रहा। सोवियत संघ और अपने देश के प्रयोगों के विश्लेषण के आधार पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और माओ त्से-तुङ ने समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को उद्घाटित करने और पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने के उपाय विकसित करने और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के रूप में उन्हें अमल में लाने का युगान्तरकारी काम किया। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद वहाँ भी पूँजीवादी पुनर्स्थापना हो गई। इसका मुख्य कारण यह था कि 1949 से लेकर सांस्कृतिक क्रान्ति शुरू होने तक, वहाँ भी बुर्जुआ वर्ग ने समाज में अपने आधार के विस्तार के साथ ही पार्टी और राज्य के भीतर भी अपने समान्तर सदर मुकाम कायम कर लिए थे। दूसरे, अनुकूल विश्व-परिस्थितियों से भी उन्हें शक्ति मिली। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो सर्वहारा क्रान्ति के पहले संस्करणों की पराजय अप्रत्याशित नहीं लगती। मार्क्स-एंगेल्स और लेनिन ने पहले भी इस बात की चर्चा की थी कि समाजवादी संक्रमण की दीर्घावधि में वर्ग-संघर्ष लगातार जारी रहेगा, पूँजीवादी पुनर्स्थापना के ख़तरे लम्बे समय तक मौजूद रहेंगे। लेनिन ने पूँजीवादी पुनर्स्थापना के विभिन्न स्रोतों का उल्लेख किया था। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान माओ ने एकाधिक बार कहा था कि पूंजीवादी तत्त्वों के सत्तासीन होने की सम्भावनाएँ लम्बे समय तक मौजूद रहेंगी और समाजवाद की निर्णायक विजय के लिए कई सांस्कृतिक क्रान्तियों की आवश्यकता होगी। इस दृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र का, पराजय के रूप में समापन मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि को सत्यापित ही करता है। क्रान्तियों के विगत प्रयोगों की विफलता विचारधारा की पराजय नहीं है। पूँजीवाद इतिहास का अन्त नहीं है। यह स्वयं अपने भीतर से समाजवाद की आवश्यकता पैदा करता है। और उसकी वाहक शक्तियों को भी। विश्व पूँजीवाद की वर्तमान स्थिति स्वयं इसका प्रमाण है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच वर्ग-महासमर का पहला विश्व-ऐतिहासिक चक्र 1976 में चीन में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद समाप्त हो गया और अब दूसरे विश्व-ऐतिहासिक चक्र की शुरुआत हो चुकी है। इन दो चक्रों के बीच के संक्रमण-काल में एक महत्त्वपूर्ण घटना यह घटी है कि समाजवाद के नाम पर कायम, सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के राजकीय पूँजीवादी ढाँचे विघटित हो गए हैं। चीन के “बाज़ार समाजवाद” का पूँजीवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा हुआ है और यह तय है कि देर-सबेर इसे भी विघटित हो जाना है। समाजवाद के बारे में भ्रम पैदा करने वाले स्रोत समाप्त हो गए हैं। इधर भूण्डलीकरण के दौर में ऐसी स्थिति पैदा हुई है कि संशोधनवाद, सामाजिक जनवाद, अर्थवाद, ट्रेड यूनियनवाद आदि की सीमाएँ भी मेहनतकश जनता को स्पष्टत: दीखने लगी हैं और उसे यह बताने के लिए अनुकूल स्थितियाँ तैयार हुई हैं कि वास्तविक प्रश्न राज्यसत्ता का है, राजनीतिक संघर्ष का है। संशोधनवादी-सुधारवादी प्रवृत्तियों का आधार मध्यवर्ग और कुलीन मज़दूरों में मौजूद है, पर उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की चपेट में इनका भी एक हिस्सा अब आने लगा है और उसकी चेतना का भी `रैडिकलाइज़ेशन´ हो रहा है। परम्परागत चुनावी वामपन्थी और ट्रेड-यूनियन सुधारवाद की, व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति के रूप में प्रभाविता कम होने के साथ ही साम्राज्यवाद और पूँजीवादी व्यवस्था ने इधर नये सिरे से एन.जी.ओ.-सुधारवाद के रूप में एक नई सुरक्षा-पंक्ति खड़ी करने की कोशिश की है। एन.जीओ. व्यवस्था-विरोध का छद्म खड़ा करते हुए एक नये `सेफ्टी वॉल्व´ का और `ट्रोजन हॉर्स´ का काम कर रहे हैं, जनहित के कार्यों से बुर्जुआ राज्यसत्ता को पूरी तरह पीछे हटने का मौका दे रहे हैं, और साथ ही, सस्ता श्रम निचोड़ने का ज़रिया भी बने हुए हैं। इनका विश्वव्यापी नेटवर्क फण्ड-बैंक-डब्ल्यू.टी.ओ. की तिकड़ी का ही अनिवार्य पूरक तंत्र है। यह आश्चर्यजनक नहीं कि पुराने गांधीवादियों-समाजवादियों से लेकर नकली वामपिन्थयों और भगोड़ों की सभी किस्में आज एन.जी.ओ. के साथ मधुयामिनी मना रही हैं।

सर्वहारा क्रान्ति के दो विश्व ऐतिहासिक चक्रों के बीच की विशिष्टता यह रही है कि उसने समाजवाद को बदनाम करने वाले नकली लाल झण्डे को चींथकर धूल में फेंक दिया है, सुधारवाद और “कल्याणकारी राज्य” के कीन्सियाई नुस्खों की असलियत साफ़ कर दी है और विश्व पूँजीवाद की घोर मानवद्रोही बर्बरता को एकदम उजागर कर दिया है। एक बार फिर, उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप की तरह, पूरी दुनिया में श्रम और पूँजी की ताकतें एकदम आमने-सामने खड़ी हैं। साम्राज्यवादी भेड़िये और तीसरी दुनिया के देशों में सत्तारूढ़ उनके छुटभैये मेहनतकशों से अतिलाभ निचोड़ते हुए उनके एक बड़े हिस्से को लगातार सड़कों पर धकेल रहे हैं और तबाह कर रहे हैं। दूसरी ओर विश्व स्तर पर युद्ध और विनाश का जो कहर वे बरपा कर रहे हैं, वह कुल मिलाकर विश्वयुद्धों की तबाही से कम नहीं है। दूसरी ओर, दुनिया के पिछड़े देशों से लेकर समृद्ध देशों तक में एक बार फिर विद्रोह का लावा खौल रहा है। जगह-जगह जन-उभारों और आन्दोलनों के ज्वार भी उठने लगे हैं। इस पूरी स्थिति का समस्यापरक पक्ष यह है कि सर्वहारा क्रान्ति की मनोगत शक्तियाँ अभी कमज़ोर और बिखरी हुई हैं। विगत पराजयों का सार-संकलन अभी पूरा नहीं हुआ है। साथ ही, नई सर्वहारा क्रान्तियों की प्रकृति और रास्ते को समझने के लिए, परिस्थितियों में आए नये बदलावों को समझने का काम भी अभी बहुत कम हुआ है। लेकिन, ठहराव के दौर के संकटों और चुनौतियों के बजाय आज हम एक नई शुरुआत के दौर के संकटों और चुनौतियों के रूबरू खड़े हैं। इसी नये दौर के कार्यभारों को हम एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और नये सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभारों के रूप में देख-समझ रहे हैं।

एकदम ठोस शब्दों में कहें कि सर्वहारा क्रान्ति के नए संस्करण की सर्जना के लिए हमें सबसे पहला काम यह करना है कि अतीत की सर्वहारा क्रान्तियों और संघर्षों के इतिहास को विस्मृति के अँधेरे से बाहर लाना है, तमाम मिथ्या-प्रचारों और विभ्रमों की धूल-राख उड़ाकर उसे जनता के सामने प्रस्तुत करना है। हमें सर्वहारा क्रान्ति की विचारधारा के बारे में फैलाई जा रही भ्रान्तियों और झूठे प्रचारों का प्रतिकार करते हुए उसे मेहनतकश जनता के वर्ग-सचेत संस्तरों तक और उनके पक्ष में खड़े परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों तक लेकर जाना है। यह सर्वहारा पुनर्जागरण का पक्ष है। एक नये सर्वहारा प्रबोधन के केन्द्रीय कार्यभार क्या हैं? हमें सर्वहारा वर्ग की विचारधारा को आज के विश्व-ऐतिहासिक सन्दर्भों में जानना-समझना है। मार्क्सवाद एक गत्यात्मक विज्ञान है। अतीत की क्रान्तियों का अध्ययन हम भविष्य की क्रान्तियों के लिए कर रहे हैं। महानतम क्रान्तियों का भी अनुकरण नई क्रान्तियों को जन्म नहीं दे सकता। अतीत के प्रयोगों से सीखते हुए स्थितियों में आए परिवर्तनों को सदा-सर्वदा ध्यान में रखना होता है। और फिर नये चक्र की सर्वहारा क्रान्तियों का रंगंमच तो पूर्व की अपेक्षा कई महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ लिये हुए है। इतिहास के अध्ययन, वर्तमान जीवन के अध्ययन और सामाजिक प्रयोगों के त्रिकोणात्मक संघातों के बीच ही नई क्रान्तियों के मार्गदर्शक सूत्र और रणनीति का विकास होगा। यह समय घनघोर वैचारिक बहस-मुबाहसे का होगा। साथ ही, यह जनता के बीच शिक्षा और प्रचार का तथा प्रारिम्भक स्तर के सामाजिक प्रयोग का समय होगा। यही नये सर्वहारा प्रबोधन का केन्द्रीय कार्यभार है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये दोनों कार्यभार अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ गुंथे-बुने हैं और इन्हें साथ-साथ अंजाम दिया जाएगा। यह भी स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि यह पूरी प्रक्रिया सर्वहारा क्रान्ति की हरावल शक्ति को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया की सहवर्ती होगी, पूर्ववर्ती या अनुवर्ती नहीं।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’

शिशिर-बसंत 2002 से साभार

प्रेम, परम्परा और विद्रोह

Posted on Updated on

कात्यायनी

बाबू बजरंगी आज एक राष्ट्रीय परिघटना बन चुका है। अहमदाबाद के इस शख्स का दावा है कि अब तक वह सैकड़ों हिन्दू कन्याओं को “मुक्त” करा चुका है। “मुक्ति” का यह काम बाबू बजरंगी मुस्लिम युवकों के साथ हिन्दू युवतियों के प्रेमविवाह को बलपूर्वक तुड़वाकर किया करता है। ज़ाहिर है कि अन्तरधार्मिक विवाहों, या यूँ कहें कि दो वयस्कों द्वारा परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध कायम करने के स्वतन्त्र निर्णय को संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बावजूद बाबू बजरंगी का “मुक्ति अभियान” यदि अब तक निर्बाध चलता रहा है तो इसके पीछे गुजरात की भाजपा सरकार द्वारा प्राप्त परोक्ष सत्ता-संरक्षण का भी एक महत्त्वपूर्ण हाथ है।

लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा, जो साम्प्रदायिक कट्टरपन्थी नहीं है, वह भी अपने रूढ़िवादी मानस के कारण, अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक प्रेम-विवाहों का ही विरोधी है और बाबू बजरंगी जैसों की हरकतों के निर्बाध जारी रहने में समाज के इस हिस्से की भी एक परोक्ष भूमिका होती है। समाज के पढ़े-लिखे, प्रबुद्ध माने जाने वाले लोगों का बहुलांश आज भी ऐसा ही है जो युवाओं के बीच प्रेम-सम्बन्ध को ही ग़लत मानता है और उसे अनाचार एवं अनैतिकता की कोटि में रखकर देखता है। बहुत कम ही ऐसे अभिभावक हैं जो अपने बेटों या बेटियों के प्रेम-सम्बन्ध को सहर्ष स्वीकार करते हों और अपनी ज़िन्दगी के बारे में निर्णय लेने के उनके अधिकार को दिल से मान्यता देते हों। यदि वे स्वीकार करते भी हैं तो ज्यादातर मामलों में विवशता और अनिच्छा के साथ ही। और जब बात किसी अन्य धर्म के या अपने से निम्न मानी जाने वाली किसी जाति (विशेषकर दलित) के युवक या युवती के साथ, अपने बेटे या बेटी के प्रेम की हो तो अधिकांश उदारमना माने जाने वाले नागरिक भी जो रुख अपनाते हैं, उससे यह साफ हो जाता है कि हमारे देश का उदार और सेक्युलर दिलो-दिमाग़ भी वास्तव में कितना उदार और सेक्युलर होता है! यही कारण है कि जब धर्म या जाति से बाहर प्रेम करने के कारण किसी बेटी को अपने ही घर में काटकर या जलाकर मार दिया जाता है या किसी दलित या मुस्लिम युवक को सरेआम फाँसी पर लटकाकर मार दिया जाता है या उसकी बोटी-बोटी काट दी जाती है या उसके परिवार को गाँव-शहर छोड़ने तक पर मज़बूर कर दिया जाता है तो ऐसे मसलों को लेकर केवल महानगरों का सेक्युलर और प्रगतिशील बुद्धिजीवी समुदाय ही (ग़ौरतलब है कि ऐसे बुद्धिजीवी महानगरीय बुद्धिजीवियों के बीच भी अल्पसंख्यक ही हैं) कुछ चीख़-पुकार मचाता है, शासन-प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की जाती है, कुछ प्रतीकात्मक धरने-प्रदर्शन होते हैं, कुछ जाँच टीमें घटनास्थल का दौरा करती हैं, अखबारों में लेख-टिप्पणियाँ छपती हैं (और लगे हाथों फ्रीलांसर नामधारियों की कुछ कमाई भी हो जाती है), टी.वी. चैनलों को `मुकाबला´, `टक्कर´ या ऐसे ही नाम वाले किसी कार्यक्रम के लिए मसाला मिल जाता है और कुछ प्रचार-पिपासु, धनपिपासु सेक्युलर बुद्धिजीवियों को भी अपनी गोट लाल करने का मौका मिल जाता है। जल्दी ही मामला ठण्डा पड़ जाता है और फिर ऐसे ही किसी नये मामले का इन्तज़ार होता है जो लम्बा कतई नहीं होता।
मुद्दा केवल किसी एक बाबू बजरंगी का नहीं है। देश के बहुतेरे छोटे-बड़े शहरों और ग्रामीण अंचलों में ऐसे गिरोह मौजूद हैं जो धर्म और संस्कृति के नाम पर ऐसे कारनामों को अंजाम दिया करते हैं और बात केवल धार्मिक कट्टरपन्थी फासीवादी राजनीति से प्रेरित गिरोहों की ही नहीं है। ऐसे पिताओं और परिवारों के बारे में भी आये दिन खबरें छपती रहती हैं जो जाति-धर्म के बाहर प्रेम या विवाह करने के चलते अपनी ही सन्तानों की जान के दुश्मन बन जाते हैं। देश के कुछ हिस्सों में, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाति-बिरादरी की पंचायतों की मध्ययुगीन सत्ता इतनी मज़बूत है कि जाति-धर्म के बाहर शादी करना तो दूर, सगोत्रीय विवाह की वर्जना तक को तोड़ने के चलते पंचायतों द्वारा सरेआम मौत की सज़ा दे दी जाती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ्ऱफरनगर, सहारनपुर, मेरठ आदि ज़िलों से लेकर हरियाणा तक से हर वर्ष ऐसी कई घटनाओं की खबरें आती रहती हैं और उससे कई गुना घटनाएँ ऐसी होती हैं जो खबर बन पाने से पहले ही दबा दी जाती हैं। इन सभी मामलों में पुलिस और प्रशासन का रवैया भी पूरी तरह पंचायतों के साथ हुआ करता है। अपने जातिगत और धार्मिक पूर्वाग्रहों के चलते पुलिस और प्रशासन के कर्मचारियों की सहानुभूति भी पंचायतों के रूढ़िवादी बड़े-बुजुर्गों के साथ ही हुआ करती है। यहाँ तक कि न्यायपालिका भी इन पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होती। आये दिन दिल्ली-मुम्बई से लेकर देश के छोटे-छोटे शहरों तक में पार्कों-सिनेमाघरों-कैम्पसों आदि सार्वजनिक स्थानों पर  घुसकर बजरंगियों-शिवसैनिकों और पुलिस द्वारा प्रेमी जोड़ों की पिटाई को भी इसी आम सामाजिक प्रवृत्ति से जोड़कर देखा जाना चाहिए क्योंकि आम लोग ऐसी घटनाओं का मुखर प्रतिवाद नहीं करते।
कहा जा सकता है कि प्रेम करने की आज़ादी सहित किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत आज़ादी, निजता और निर्णय की स्वतन्त्रता के विरुद्ध एक बर्बर किस्म की निरंकुशता पूरी भारतीय सामाजिक संरचना के ताने-बाने में सर्वव्याप्त प्रतीत होती है। सोचने की बात यह है कि उत्पादन की आधुनिक प्रक्रिया अपनाने, आधुनिकतम उपभोक्ता सामग्रियों का इस्तेमाल करने और भौतिक जीवन में आधुनिक तौर-तरीके अपनाने के बावजूद हमारे समाज में निजता, व्यक्तिगत आज़ादी, तर्कणा आदि आधुनिक जीवन-मूल्यों का सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व आज तक क्यों नहीं स्थापित हो सका? भारत में सतत विकासमान पूँजीवाद मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं के साथ इतना कुशल-सफल तालमेल क्यों और किस प्रकार बनाये हुए है? इस बात को सुसंगत ढंग से केवल ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है।
यह सही है कि आज का पश्चिमी समाज समृद्धि के शिखर पर आसीन होने के बावजूद, आर्थिक स्तर पर असाध्य ढाँचागत संकट, राजनीतिक स्तर पर पूँजीवादी जनवाद के क्षरण एवं विघटन तथा सांस्कृतिक-सामाजिक स्तर पर विघटन, अलगाव, नैतिक अध:पतन और अराजकता का शिकार है। पारिवारिक ढाँचे का ताना-बाना वहाँ बिखर रहा है। अपराधों, मानसिक रोगों और आत्मिक वंचना का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है। पूरी दुनिया को लूटकर समृद्धि का द्वीप बसाने वाले पश्चिमी महाप्रभुओं से इतिहास उनकी करनी का वाजिब हिसाब वसूल रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि पश्चिम में नागरिकों के आपसी रिश्तों और परिवार सहित सभी सामाजिक संस्थाओं में जनवाद के मूल्य इस तरह रचे-बसे हुए हैं कि कैथोलिक, प्रोटेस्टेण्ट, यहूदी, मुसलमान, श्वेत, अश्वेत – किसी भी धर्म या नस्ल के व्यक्ति यदि आपस में प्यार या शादी करें तो सामाजिक बहिष्कार या पंचायती दण्ड जैसी किसी बात की तो कल्पना तक नहीं की जा सकती। हो सकता है कि परिवार की पुरानी पीढ़ी कहीं-कहीं इस बात का विरोध करे, पर यह विरोध प्राय: उसूली मतभेद के दायरे तक ही सीमित रहता है। जहाँ तक समाज का सम्बन्ध है, लोग इसे किन्हीं दो व्यक्तियों का निजी मामला ही मानते हैं। यह सही है कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका आदि देशों में अश्वेतों और अन्य आप्रवासियों का पार्थक्य, दोयम दर्जे की आर्थिक स्थिति और उनके प्रति विद्वेष भाव लगातार मौजूद रहता है और पिछले कुछ दशकों के दौरान कुछ नवनात्सीवादी गिरोह इन्हें हिंसा और गुण्डागर्दी का भी शिकार बनाते रहे हैं। धनी-ग़रीब के अन्तर और वर्ग-अन्तरविरोध भी वहाँ तीखे रूप में मौजूद हैं। लेकिन सामाजिक ताने-बाने में वहाँ निजता और व्यक्तिगत आज़ादी के जनवादी मूल्य इस तरह रचे-बसे हैं कि धर्म या नस्ल के बाहर प्रेम या विवाह को मन ही मन ग़लत मानने वाले लोग भी इसका संगठित और मुखर विरोध नहीं करते। पश्चिम में `मैचमेकर्स´ द्वारा परिवारों के बीच बातचीत करके शादियाँ कराने की परम्परा उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ही दम तोड़ने लगी थी। प्रेम और विवाह के मामलों में वहाँ के समाज में मुख्य और स्थापित प्रवृत्ति युवाओं को पूरी आज़ादी देने की है। इसका मुख्य कारण है कि मानववाद, इहलौकिकता, वैयक्तिकता और जनवाद के मूल्यों को सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों और क्रान्तियों के कई शताब्दियों लम्बे सिलसिले ने यूरोपीय समाज के पोर-पोर में इस कदर रचा-बसा दिया था कि साम्राज्यवाद की एक पूरी सदी बीत जाने के बावजूद, पश्चिमी पूँजीवादी राज्यसत्ताओं के बढ़ते निरंकुश चरित्र और पूँजीवादी जनवाद के पतन-विघटन की प्रक्रिया के समापन बिन्दु के निकट पहुँचने के बावजूद, तमाम सामाजिक विषमताओं, आर्थिक लूट, सामाजिक- सांस्कृतिक-नैतिक अध:पतन तथा पण्यपूजा (कमोडिटी फेटिशिज्म) और अलगाव (एलियनेशन) के घटाटोप के बावजूद, वहाँ नागरिकों के आपसी रिश्तों और मूल्यों-मान्यताओं में व्यक्तियों की निजता और व्यक्तिगत आज़ादी को पूरा सम्मान देने की प्रवृत्ति आज भी इस तरह स्थापित है कि उसे वापस पीछे नहीं धकेला जा सकता। पंचायती न्याय की मध्ययुगीन कबीलाई बर्बरता के बारे में, अन्तरधार्मिक-अन्तरजातीय विवाह करने पर सामाजिक बहिष्कार, अपना गाँव-शहर छोड़ने के लिए विवश होने या हत्या से कीमत चुकाने के बारे में या प्रेमी जोड़ों की पार्कों में सामूहिक पिटाई जैसी घटना के बारे में वहाँ का एक आम नागरिक सोच तक नहीं सकता।
यूरोपीय पूँजीवादी समाज पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (रेनेसाँ-एनलाइटेनमेण्ट- रिवोल्यूशन) की शताब्दियों लम्बी प्रक्रिया से गुज़रकर अस्तित्व में आया था। इस प्रक्रिया में अधिकांश मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं का वर्चस्व वहाँ लगभग समाप्त हो गया था। यद्यपि सत्तासीन होने के बाद यूरोपीय पूँजीपति वर्ग ने चर्च से “पवित्र गठबन्धन” करके तर्कणा और जनवाद के झण्डे को धूल में फेंक दिया और पुनर्जागरण-प्रबोधन के समस्त मानववादी-जनवादी आदर्शोँ को तिलांजलि दे दी, लेकिन ये मूल्य सामाजिक-सांस्कृतिक अधिरचना के ताने-बाने  में इस कदर रच-बस चुके थे कि सामाजिक जनमानस में इनकी अन्तर्व्याप्ति को समूल नष्ट करके मध्ययुग की ओर वापस नहीं लौटा जा सकता था। पूँजीवाद के ऐतिहासिक विश्वासघात और असली चरित्र को उजागर करने में उन्नीसवीं शताब्दी के आलोचनात्मक यथार्थवादी कला-साहित्य ने भी एक विशेष भूमिका निभायी। यह तुलनात्मक अध्ययन अलग से पर्याप्त गहराई और विस्तार की माँग करता है, जो यहाँ सम्भव नहीं है।
भारतीय इतिहास की गति और दिशा इस सन्दर्भ में यूरोप से सर्वथा भिन्न रही है। यहाँ मध्ययुगीन सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संरचना का ताना-बाना जब अन्दर से टूटने-बिखरने की दिशा में अग्रसर था और इसके भीतर से प्रगतिशील पूँजीवादी तत्त्वों के उद्भव और विकास की प्रक्रिया गति पकड़ रही थी, उसी समय देश के उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गयी। उपनिवेशीकरण की व्यवस्थित प्रक्रिया ने एक शताब्दी के भीतर भारतीय समाज की स्वाभाविक आन्तरिक गति की हत्या कर दी और यहाँ की संक्रमणशील देशज सामाजिक- आर्थिक संरचना को नष्ट करके ऊपर से एक औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना आरोपित कर दी। निश्चय ही भारतीय मध्ययुगीन सामाजिक-आर्थिक संरचना की अपनी विशिष्टताएँ थीं, यह यूरोपीय सामन्तवाद से काफी भिन्न था और यहाँ पूँजीवादी विकास की बहुतेरी बाधाएँ-समस्याएँ भी थीं। लेकिन ये बाधाएँ पूँजीवादी विकास को रोक नहीं सकती थीं। प्राक्-ब्रिटिश भारत में पूँजीवादी विकास के उपादान मौजूद थे। यदि भारत उपनिवेश नहीं बनता तो उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ ही पूँजी भारतीय समाज के पोर-पोर में घुस जाती और फिर वह समय भी आता जब एक सर्वसमावेशी सामाजिक झंझावात के साथ यहाँ भी इतिहास को तेज़ गति देने वाला पूँजीवाद अपनी भौतिक-आत्मिक समग्रता के साथ अस्तित्व में आता। मध्ययुगीन समाज के परमाणु के नाभिक पर सतत प्रहार उसे विखण्डित कर देते और ऊर्जा का अजस्त्र स्रोत फूट पड़ता। मुख्यत: किसानों-दस्तकारों की शक्ति से संगठित मध्यकालीन भारत के भक्ति आन्दोलन और किसान-संघर्षों ने इस दिशा में एक पूर्वसंकेत दे भी दिया था। तमाम पारिस्थितिक भिन्नताओं के बावजूद भारतीय भक्ति आन्दोलन और यूरोपीय धर्म-सुधार आन्दोलन में तात्त्विक समानता के बहुतेरे अवयव मौजूद दीखते हैं। भारतीय इतिहास हूबहू पुनर्जागरण-प्रबोधन-बुर्जुआ क्रान्ति के यूरोपीय मार्ग का अनुकरण करता हुआ आगे बढ़ता, यह मानना मूर्खता होगी। रूस और जापान जैसे देशों ने भी पूँजीवादी विकास का अपना सापेक्षत: भिन्न मार्ग चुना था और यूरोप में भी जर्मनी और पूर्वी यूरोपीय देशों का रास्ता ब्रिटेन, फ़्रान्स, अमेरिका आदि देशों से काफी भिन्नता लिये हुए था। लेकिन इतना तय है कि यदि भारत का उपनिवेशीकरण नहीं होता तो अपनी स्वाभाविक गति और प्रक्रिया से यहाँ जो पूँजीवाद विकसित होता, वह आज के भारतीय पूँजीवाद जैसा रुग्ण-बौना-विकलांग नहीं होता। उसमें इतनी शक्ति होती कि वह मध्ययुगीन आर्थिक मूलाधार के साथ ही अधिरचना को भी चकनाचूर कर देता। यहाँ भी यूरोपीय पुनर्जागरण-प्रबोधन की भाँति कुछ आमूलगामी सामाजिक-सांस्कृतिक- वैचारिक तूफान उठ खड़े होते जो मानववाद, जनवाद और तर्कणा के मूल्यों को समाज के रन्ध्र-रन्ध्र में पैठा देते। ऐसी स्थिति में भारतीय मानस भी प्राचीन भारत की भौतिकवादी चिन्तन-परम्परा का पुन:स्मरण करता और दर्शन-कला-साहित्य से लेकर जीवन-मूल्यों तक के धरातल पर जुझारू भौतिकवादी चिन्तन की एक सशक्त आधुनिक परम्परा अस्तित्व में आती। लेकिन उपनिवेशीकरण ने इन सभी सम्भावनाओं को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। अंग्रेज़ों ने न केवल पूरे देश को समुद्री डाकुओं से भी अधिक बर्बर तरीके से लूटा-खसोटा, बल्कि उनकी नीतियों ने यहाँ कृषि से दस्तकारी और दस्तकारी से उद्योग तक की स्वाभाविक यात्रा की सारी सम्भावनाओं की भ्रूण हत्या कर दी। भूमि के औपनिवेशिक बन्दोबस्त ने भारत में एक नये किस्म की अर्द्धसामन्ती भूमि-व्यवस्था को जन्म दिया। विश्व-प्रसिद्ध भारतीय दस्तकारी तबाह हो गयी और भारत की आर्थिक- सामाजिक संरचना अपनी स्वतन्त्र गति और स्वतन्त्र सम्भावनाओं के साथ अकाल मृत्यु का शिकार हो गयी। इसकी दिशा और नियति पूरी तरह से ब्रिटिश वित्तीय पूँजी के हितों के अधीन हो गयी।
जिसे भारतीय इतिहासकार प्राय: भारतीय पुनर्जागरणय् की संज्ञा से विभूषित करते हैं, उसमें यूरोपीय पुनर्जागरण जैसा क्रान्तिकारी कुछ भी नहीं था। वह कोई महान या प्रगतिशील जनक्रान्ति कतई नहीं थी। वह औपनिवेशिक सामाजिक- आर्थिक संरचना के भीतर पले-बढ़े एक छोटे से पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की आवाज़ थी जो स्वामिभक्त ब्रिटिश प्रजा के रूप में कुछ अधिकारों की याचना कर रहा था। भारतीय समाज में सुधारों की इसकी माँग और इसके सुधार आन्दोलनों का प्रभाव शहरी मध्य वर्ग तक सीमित था और किसानों-दस्तकारों तथा आम मेहनतकश जनता उससे सर्वथा अछूती थी। आज़ादी की आधी सदी बाद भी भारतीय बौद्धिक जगत की निर्वीर्यता, जनविमुखता और कायरता इसी बात का प्रमाण है कि भारतीय इतिहास में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी कोई चीज़ कभी घटित ही नहीं हुई। हमारी सामाजिक संरचना में जनवाद और तर्कणा के मूल्यों के अभाव और आधुनिक पूँजीवादी जीवन-प्रणाली के साथ मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं का विचित्र सहअस्तित्व भी दरअसल इसी तथ्य को प्रमाणित करता है।
औपनिवेशिक काल में भारत में जिस पूँजीवाद का विकास हुआ, वह किसी क्रान्तिकारी परिवर्तन का नहीं, बल्कि ब्रिटिश वित्तीय पूँजी के हितसाधन के लिए उठाये गये कदमों की गौण गति का परिणाम था जो उपनिवेशवादियों की इच्छा से स्वतन्त्र था। इस मरियल, रीढ़विहीन पूँजीवाद की स्वाभाविक गति को भी उपनिवेशवाद ने कदम-कदम पर नियन्त्रित और बाधित करने का काम किया। लेकिन इतिहास की गति शासक वर्गों की इच्छानुकूल नहीं होती और उनके द्वारा उठाया गया हर कदम स्वयंस्फूर्त ढंग से एक प्रतिरोधी गति एवं प्रभाव को गौण पहलू के रूप में जन्म देता है और फिर कालान्तर में यह गौण पहलू मुख्य पहलू भी बन जाया करता है। औपनिवेशिक काल में भारत में पूँजीवाद का विकास इसी रूप में हुआ और फिर उपनिवेशवाद के संकट, अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पद्धा और विश्वयुद्धों का लाभ उठाकर भारतीय पूँजीपति वर्ग ने अपनी शक्ति बढ़ाने का काम किया। अपनी बढ़ती शक्ति के अनुपात में ही इसकी आवाज़ भी मुखर होती गयी और फिर एक दिन इसने राजनीतिक आज़ादी भी हासिल कर ली, लेकिन यह राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति जैसा कुछ भी नहीं था। भारतीय पूँजीवाद ने साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद करने के बजाय उसके कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका निभायी और भूमि क्रान्ति के जनवादी कार्यभार को भी एक झटके के साथ पूरा करने के बजाय क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण का दुस्सह यन्त्रणादायी प्रतिगामी पथ अपनाया। ज़ाहिर है कि ऐसी स्थिति में सामाजिक-सांस्कृतिक- वैचारिक अधिरचना में भी, औपनिवेशिक काल और उत्तर-औपनिवेशिक काल में कभी क्रान्तिकारी परिवर्तन की कोई प्रक्रिया घटित ही नहीं हुई। यूरोपीय पूँजीवाद कम से कम पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया में जनता के साथ जुड़ा हुआ और प्रगतिशील मूल्यों का वाहक था। भारत में ऐसी कोई प्रक्रिया घटित ही नहीं हुई। भारतीय पूँजीपति वर्ग ने शुरू से ही प्राक्-पूँजीवादी मूल्यों- मान्यताओं के साथ समझौते का रुख़ अपनाया और साम्राज्यवाद की सदी में क्रमिक विकास की प्रक्रिया में जिन बुर्जुआ मूल्यों को इसने क्रमश: अपनाया, वे तर्कणा, मानववाद, जनवाद और जुझारू भौतिकवाद के मूल्य नहीं थे, बल्कि सड़े-गले प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ मूल्य ही थे।

भारतीय पूँजीवाद कृषि से दस्तकारी और दस्तकारी से उद्योग की स्वाभाविक प्रक्रिया से नहीं जन्मा था। यह बर्गरों की सन्तान नहीं था। यह आरोपित औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना की सन्तान था और इसका विकास उपनिवेशवाद के अनिवार्य आन्तरिक अन्तरविरोध का परिणाम था। क्रान्तिकारी संघर्ष के बजाय इसने `समझौता-दबाव-समझौता´ की रणनीति अपनाकर राजनीतिक स्वतन्त्रता तक की यात्रा तय की। इसका चरित्र शुरू से ही दुहरा था। राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्यधारा का नेतृत्व करते हुए इसने जिन वायदों-नारों पर जनसमुदाय को साथ लिया, उनसे बार-बार मुकरता रहा और विश्वासघात करता रहा। ज़ाहिर है कि औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से पैदा हुआ और साम्राज्यवादी विश्व-परिवेश में पला-बढ़ा पूँजीवाद ऐसा ही हो सकता था। भारतीय समाज के औपनिवेशिक अतीत की इस त्रासदी को समझना ही राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के दौरान और आज के भारत में विभिन्न वर्गों की भूमिका को, उनके संघर्षों की कमज़ोरियों को, मूलाधार और अधिरचना के विविध पक्षों को, भावी परिवर्तन की दिशा और समस्याओं को तथा आज के आधुनिक पूँजीवादी समाज में पण्य-पूजा और अलगाव आदि पूँजीवादी विकृतियों के साथ-साथ मध्ययुगीन बर्बर परम्पराओं-रूढ़ियों-मान्यताओं के विचित्र सहमेल को समझने की एक कुंजीभूत कड़ी है। औपनिवेशिक अतीत के जन्मचिह्न  केवल भारतीय पूँजीपति वर्ग ही नहीं बल्कि अन्य वर्गों के शरीर पर भी अंकित हैं। पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया के हाशिये पर खड़ा रूस बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक मध्ययुगीन बर्बरता के आगोश में जकड़ा हुआ था, लेकिन चूँकि औपनिवेशिक गुलामी ने उसकी स्वतन्त्र आन्तरिक गति का गला नहीं घोंटा था, इसलिए उस देश में हर्ज़ेन, बेलिंस्की, चेर्निशेव्स्की, दोब्रोल्यूबोव जैसे क्रान्तिकारी जनवादी विचारकों और पुश्किन, गोगोल, लर्मन्तोव, तुर्गनेव, तोल्स्तोय, दोस्तोयेव्स्की, कोरोलेंको, चेख़व आदि यथार्थवादी लेखकों ने अपने कृतित्व से तथा उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यवर्गीय क्रान्तिकारियों ने अपने शौर्य से न केवल एक भावी युगान्तरकारी क्रान्ति की ज़मीन तैयार की, बल्कि क्रान्तिकारी जनवादी विचारों से पूरे सामाजिक मानस को सींचने का काम किया। चीन भी निहायत पिछड़ा और साम्राज्यवादी लूट-खसोट से तबाह देश था, लेकिन भारत की तरह उसका पूर्ण उपनिवेशीकरण नहीं हो सका। इसीलिए न केवल उस देश ने सुन यात-सेन, लू शुन और माओ जैसे जननायक पैदा किये, बल्कि वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी ने अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व पर अन्धी निर्भरता और अनुकरण के बजाय अपनी क्रान्ति का मार्ग स्वयं ढूँढ़ा। चीनी क्रान्ति ने आधी सदी के भीतर ही उत्पादन-सम्बन्धों के साथ-साथ चीनी जनमानस में गहराई तक पैठे मध्ययुगीन बर्बर मूल्यों, रहस्यवाद और धार्मिक रूढ़ियों को काफी हद तक उखाड़ फेंका था। इस तुलना के द्वारा (ध्यान रखते हुए कि हर तुलना लँगड़ी होती है) हम कहना यह चाहते हैं कि उपनिवेशीकरण की त्रासदी ने न केवल भारतीय पूँजीपति वर्ग को, बल्कि बुद्धिजीवियों और सर्वहारा वर्ग सहित हमारे समाज के सभी वर्गों को प्रभावित किया तथा उनके वैचारिक-सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों को कमज़ोर बनाने का काम किया। निश्चय ही, राष्ट्रीय आन्दोलन और वर्ग-संघर्ष की ऊष्मा ने भारत में भी राधामोहन गोकुल और राहुल सांकृत्यायन जैसे उग्र परम्पराभंजक चिन्तक, भगत सिंह जैसे युवा विचारक क्रान्तिकारी और प्रेमचन्द जैसे महान जनवादी यथार्थवादी लेखक को जन्म दिया, लेकिन क्षितिज पर अनवरत प्रज्वलित इन मशालों की संख्या बहुत कम है, क्योंकि औपनिवेशिक भारत में किसी युगान्तरकारी वैचारिक- सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन की ज़मीन ही बहुत कमज़ोर थी। कोई आश्चर्य नहीं कि तिलक जैसे उग्र राष्ट्रवादी तथा युगान्तर-अनुशीलन के मध्यवर्गीय क्रान्तिकारी राष्ट्रीय मुक्ति का नया वैचारिक आधार तर्कणा एवं भौतिकवादी विश्वदृष्टि आधारित मानववाद-जनवाद के आधार पर तैयार करने के बजाय खोये हुए गौरवशालीय अतीत की पुनर्स्थापना और धार्मिक विश्वासों का सहारा लेते थे। गाँधी भारतीय परिस्थितियों में, बुर्जुआ मानववाद की प्रतिमूर्त कहे जा सकते हैं, लेकिन जनमानस को साथ लेने के लिए उन्होंने रूढ़ियों, धार्मिक अन्धविश्वासों और पुरातनपन्थी रीतियों का भरपूर सहारा लिया। इससे (महात्माय् बनकर) जनता को साथ लेने में तो वे सफल रहे लेकिन साथ ही, रूढ़ियों-परम्पराओं को पुन:संस्कारित करके नया जीवन देने में भी उनकी भूमिका अहम हो गयी। राष्ट्रीय आन्दोलन की विभिन्न धाराओं के अधिकांश मुख्य नायकों के विचारों की तुलना यदि वाल्तेयर, दिदेरो, रूसो या टॉमस पेन, जेफर्सन, वाशिंगटन या हर्ज़ेन, चेर्निशेव्स्की आदि के उग्र रूढ़िभंजक विचारों से करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रीय आन्दोलनकालीन अधिकांश भारतीय राष्ट्रीय जनवादी विचारकों ने काफी हद तक (भविष्य की कविता) के बजाय (अतीत की कविता) को अपना आदर्श और प्रेरक-स्रोत बनाया और फलत: अपने दौर में एक प्रगतिशील भूमिका निभाने के बावजूद, दूरगामी तौर पर, वस्तुगत रूप में पुनरुत्थानवादी और रूढ़िवादी यथास्थितिवाद की ज़मीन को ही मज़बूत करने का काम किया।
आज़ादी मिलने के बाद के छह दशकों के दौरान हमारे देश में सामन्ती भूमि- सम्बन्धों के टूटने और पूँजीवादी विकास की जो क्रमिक, मन्थर प्रक्रिया रही है, वह आर्थिक धरातल पर तो घोर यन्त्रणादायी और जनविरोधी रही ही है, मूल्यों- मान्यताओं-संस्थाओं के धरातल पर भी यह प्रक्रिया कुछ भी ऊर्जस्वी और सकारात्मक दे पाने की क्षमता से सर्वथा रिक्त रही है। भारतीय पूँजीपति वर्ग किसी भी सामाजिक आन्दोलन में जनसमुदाय की पहलकदमी और सृजनशीलता के निर्बन्ध होने से हमेशा ही आतंकित रहा है। इसीलिए हमारे देश में पूँजीवादी विकास का रास्ता “नीचे से” नहीं बल्कि “ऊपर से” अपनाया गया, यानी जन-पहलकदमी और सामाजिक आन्दोलनों के बजाय बुर्जुआ राज्यसत्ता की नीतियों पर अमल के द्वारा यहाँ पूँजीवाद का क्रमिक विकास हुआ, जिसकी सबसे तेज़ गति चार दशक बाद 1990 के दशक में देखने को मिली, जब पूरी दुनिया साम्राज्यवादी भूमण्डलीकरण की चपेट में आ चुकी थी।
ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक तौर पर समझा जा सकता है कि बुर्जुआ जनवाद के स्वस्थ-सकारात्मक मूल्य क्यों हमारे समाज के ताने-बाने में पैठ ही नहीं पाये। किसी नागरिक को जो सीमित जनवादी और नागरिक अधिकार तथा व्यक्तिगत आज़ादी संविधान की किताब और कानून की धाराएँ प्रदान करती भी हैं, उन्हें न केवल पुलिस और प्रशासन का तन्त्र उस तक पहुँचने नहीं देता, बल्कि मध्ययुगीन रूढ़ियों-परम्पराओं का सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व भी उन्हें निष्प्रभावी बनाने में एक अहम भूमिका निभाता है। रूढ़ियों का यह सामाजिक- सांस्कृतिक वर्चस्व ही वह प्रमुख उपादान है, जिसके ज़रिये प्रभुत्वशाली वर्ग और उसकी राज्यसत्ता आम जनता से अपने शासन के पक्ष में “स्वयंस्पफूर्त”-सी प्रतीत होने वाली सहमति प्राप्त करती है।

कहा जा सकता है कि भारतीय बुर्जुआ समाज क्लासिकी अर्थों. में, पूरी तरह से एक नागरिक समाज नहीं बन पाया है, क्योंकि न केवल प्राक्-बुर्जुआ समाज की विविध सामुदायिक अस्मिताएँ, बल्कि मूल्य-मान्यताएँ-संस्थाएँ भी आज प्रभावी और वर्चस्वकारी रूप में मौजूद हैं। लेकिन ये मूल्य-मान्यताएँ-संस्थाएँ किसी सामन्ती अभिजन समाज की नहीं, बल्कि भारतीय बुर्जुआ वर्ग या कहें कि भारतीय बुर्जुआ समाज के नये, आधुनिक अभिजन समाज की सेवा करती हैं। जो भारतीय बुर्जुआ वर्ग नये बुर्जुआ मूल्यों के सृजन में जन्मना असमर्थ था उसने एक क्रमिक प्रक्रिया में अर्द्धसामन्ती आर्थिक सम्बन्धों को तो नष्ट किया लेकिन सामन्ती मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं को संकुचित संशोधन-परिष्कार के साथ अपना लिया और बुर्जुआ राज और समाज की सेवा में, या कहें कि पूँजीवाद की सेवा में सन्नद्ध कर लिया। यह कृषि और औद्योगिक उत्पादन में तो बुर्जुआ तर्कपरकता की शिक्षा देता है, लेकिन कला-साहित्य-संस्कृति और सामाजिक जीवन में अवैज्ञानिक मध्ययुगीन मूल्यों को अक्षत बने रहने देता है और न केवल बने रहने देता है, बल्कि उन्हें खाद-पानी देने का काम भी करता है।
कुछ उदाहरण लें। दहेज़ एक पुरानी सामन्ती संस्था है। लेकिन आज शहरों के आधुनिक मध्य वर्ग और व्यापारियों में इसका चलन सबसे ज्यादा है। दहेज़ के लिए स्त्रियाँ जला दी जाती हैं और फिर दहेज़ बटोरने के लिए एक और शादी का रास्ता साफ हो जाता है। यानी दहेज़, व्यापार या उद्यम के लिए पूँजी जुटाने का एक माध्यम बन गया है, न कि सामन्ती शान का प्रतीक रह गया है। यही कारण है कि पहले दहेज़ का खूब प्रदर्शन होता था, पर आज यह छिपाकर, पर्दे की ओट में ले लिया जाता है। सभी बुर्जुआ चुनावी पार्टियाँ अपनी नीतियाँ बुर्जुआ शासक वर्गों के हितसाधन के लिए तैयार करती हैं और आम लोग भी जानते होते हैं कि उनमें से कोई भी उनकी ज़िन्दगी में कोई महत्त्वपूर्ण बदलाव नहीं ला सकती, लेकिन भारत में वोट बैंक की राजनीति किसी भी लोकलुभावन आर्थिक वायदे या राजनीतिक नारे से अधिक जातिगत समीकरणों पर आधारित होती है। जातियों और उनकी पंचायतों के मुखियाओं के माध्यम से आम जनता की जातिगत एकता के संस्कारों का लाभ उठाकर, उनके वोट आसानी से हासिल कर लिये जाते हैं। भारत के चुनाव विशेषज्ञों की सारी विशेषज्ञता इस बात में निहित होती है कि वे जातिगत सामाजिक समीकरणों को किस हद तक समझते हैं। टेलीविज़न आधुनिकतम प्रौद्योगिकी-आधारित एक ऐसा माध्यम है जो जनमानस और सांस्कृतिक मूल्यों को बदलने में शायद सबसे प्रभावी भूमिका निभा सकता है। लेकिन टेलीविजन पर धार्मिक प्रचार के चैनलों की संख्या एक दर्जन के आसपास है, जबकि विज्ञान-तकनोलॉजी-वैज्ञानिक जीवनदृष्टि पर केन्द्रित एक भी चैनल नहीं है। न्यूज़ चैनलों से लेकर मनोरंजन के चैनलों तक सर्वाधिक सामग्री जादू-टोना, भूत-प्रेत, अन्धविश्वास, परम्परा-पूजा और रूढ़ियों के प्रचार से जुड़ी होती है।
इन सभी उदाहरणों के माध्यम से हम कहना यह चाहते हैं कि भारतीय समाज एक ऐसा, विशिष्ट प्रकृति का पूँजीवादी समाज है जिसमें उत्पादन और विनिमय की प्रणाली के स्तर पर पूँजी का, बाज़ार का वर्चस्व स्थापित हो चुका है, पर इस विशिष्ट प्रकृति के पूँजीवाद ने अधिकांश प्राक्-पूँजीवादी मूल्यों- मान्यताओं-संस्थाओं को तोड़ने की बजाय अपना लिया है तथा विविध रूपों में पूँजी और पूँजीवादी व्यवस्था की सेवा में सन्नद्ध कर दिया है। हमारे समाज में तमाम मध्ययुगीन स्वेच्छाचारी मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही अलगाव, पण्य पूजा, व्यक्तिवाद और बुर्जुआ निरंकुशता जैसे पतनशील बुर्जुआ मूल्यों का एक विचित्र सहमेल मौजूद है। पुरानी बुराइयों के साथ नयी बुराइयों का यह सहअस्तित्व बुर्जुआ समाज के हर प्रकार के अन्याय को सामाजिक स्वीकृति प्रदान करने का काम करता है। यह एक ऐसा बुर्जुआ समाज है जिसमें प्राक्-नागरिक समाज के मूल्यों-मान्यताओं का सहारा लेकर शोषक वर्ग शासित वर्ग में यह भ्रम पैदा करता है कि व्यवस्था उनकी सहमति (कन्सेण्ट) से चल रही है। इस रूप में शासक वर्ग शासित वर्गों पर अपना वर्चस्व, यानी सहयोजन के साथ प्रभुत्व, स्थापित करता है, जैसाकि प्रत्येक नागरिक समाज में होता है। इस वर्चस्व के ज़रिये बुर्जुआ राज्य की रक्षा होती है और अपनी पारी में, राज्य अपनी संस्थाओं के ज़रिये इस वर्चस्व को बनाये रखने में भूमिका निभाता है। यानी भारत का बुर्जुआ समाज एक ऐसा नागरिक समाज है, जिसमें शासक वर्ग के वर्चस्व को बनाये रखने में प्राक्-नागरिक समाज की अस्मिताओं-मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं की अहम भूमिका होती है। इन अर्थों में यहाँ की स्थिति यूरोपीय नागरिक समाजों से काफी हद तक भिन्न है।

लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर आज प्राक्-नागरिक समाज के मूल्यों-मान्यताओं के विरुद्ध संघर्ष करके एक यूरोपीय ढंग के नागरिक समाज (यानी बुर्जुआ समाज) के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित किया जा सकता है। इतिहास के इस दौर में यह सम्भव नहीं है। हम पीछे मुड़कर बुर्जुआ पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया नये सिरे से शुरू नहीं कर सकते। इतिहास की विशिष्ट गति से आविर्भूत जो भी भारतीय बुर्जुआ समाज हमारे सामने मौजूद है, उसे नष्ट करके ही इसकी सभी बुराइयों से छुटकारा पाया जा सकता है जिनमें मध्ययुगीन मूल्य-मान्यताएँ भी शामिल हैं। नये सिरे से एक आदर्श बुर्जुआ समाज नहीं बनाया जा सकता। वर्तमान बुर्जुआ समाज का विकल्प एक ऐसा समाज ही हो सकता है, जिसमें उत्पादन मुनाफे के लिए नहीं बल्कि सामाजिक आवश्यकताओं को केन्द्र में रखकर होता हो, जिसमें उत्पादन, राजकाज और समाज पर बहुसंख्यक उत्पादक जनसमुदाय का नियन्त्रण कायम हो। ऐसे समाज में न केवल श्रम-विभाजन, अलगाव और पण्य पूजा की संस्कृति नहीं होगी, बल्कि तर्कणा, जनवाद और व्यक्तिगत आज़ादी का निषेध करने वाली सभी मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं का अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा। ज़ाहिर है कि यह सबकुछ एक झटके से नहीं हो जायेगा। राजनीतिक व्यवस्था- परिवर्तन और आर्थिक सम्बन्धों के परिवर्तन के साथ-साथ और उसके बाद भी सतत समाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही ऐसा सम्भव हो सकेगा।
हरेक राजनीतिक आन्दोलन की पूर्ववर्ती, सहवर्ती और अनुवर्ती सामाजिक- सांस्कृतिक आन्दोलन की स्वयंस्फूर्त धाराएँ अनिवार्यत: उपस्थित होती हैं। लेकिन इन सहवर्ती-अनुवर्ती धाराओं की स्वयंस्फूर्त गति एवं परिणति पर नियतत्त्ववादी ढंग से ज़ोर नहीं दिया जाना चाहिए। यानी, यह मानकर नहीं चला जाना चाहिए कि राजनीतिक व्यवस्था-परिवर्तन और आर्थिक सम्बन्धों के बदलने के साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक अधिरचनात्मक तन्त्र भी स्वत: बदल जायेगा। आर्थिक मूलाधार से आविर्भूत-निर्धारित होने के बावजूद अधिरचना की अपनी सापेक्षत:  स्वतन्त्र गति होती है और उसे बदलने के लिए अधिरचना के धरातल पर भी सचेतन प्रयास की, अधिरचना में क्रान्ति की, आवश्यकता होती है। राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों को जन्म और गति देती है और साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया को मज़बूत, गतिमान और गहरा बनाते हैं। भारत में औपनिवेशिक दौर, राष्ट्रीय आन्दोलन और उसके बाद पूँजीवादी समाज-विकास का जो विशिष्ट इतिहास रहा, आज के समाज में मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं की मौजूदगी उसी का एक प्रतिपफल है। जो काम राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के दौर में हो सकता था, वह नहीं हुआ। सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ता किंचित सुगबुगाहट और ऊपरी बदलावों के बावजूद बनी रही। अब एक प्रबल वेगवाही सामाजिक झंझावात ही इस जड़ता को तोड़कर भारतीय समाज की शिराओं में एक नयी ऊर्जस्विता और संवेग का संचार कर सकता है। यह तूफान पूँजीवादी सामाजिक-आर्थिक संरचना और राजनीतिक व्यवस्था के साथ ही उन सभी नये-पुराने मूल्यों और संस्थाओं को भी अपना निशाना बनायेगा जो इस व्यवस्था से सहारा पाते हैं और इसे सहारा देते हैं।

प्रेम की आज़ादी के प्रश्न को भी इसी ऐतिहासिक-सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य में देखा-समझा जा सकता है। व्यक्तिगत और खण्डित संघर्ष इस प्रश्न को एजेण्डा पर उपस्थित तो कर सकते हैं, लेकिन हल नहीं कर सकते। सामाजिक ताने-बाने में जनवाद और व्यक्तिगत आज़ादी के अभाव और मध्ययुगीन कबीलाई, निरंकुश स्वेच्छाचारिता के प्रभुत्व को तोड़े बिना, परम्पराओं और रूढ़ियों की जकड़बन्दी को छिन्न-भिन्न किये बिना, प्रेम की आज़ादी हासिल नहीं की जा सकती। इसलिए यह सवाल एक आमूलगामी सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति का सवाल है। हमें भूलना नहीं होगा कि प्रेम और जीवनसाथी चुनने की आज़ादी का प्रश्न जाति-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न से तथा धार्मिक आधार पर कायम सामाजिक पार्थक्य की समस्या से बुनियादी रूप से जुड़ा हुआ है। इन प्रश्नों पर एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन ही समस्या के अन्तिम हल की दिशा में जाने वाला एकमात्र रास्ता है। और साथ ही, इसके बिना, राजनीतिक व्यवस्था-परिवर्तन की किसी लड़ाई को भी अंजाम तक नहीं पहुँचाया जा सकता। जो समाज अपनी युवा पीढ़ी को अपनी ज़िन्दगी के बारे में बुनियादी फैसले लेने तक की इजाज़त नहीं देता, जहाँ परिवार में पुरानी पीढ़ी और पुरुषों का निरंकुश स्वेच्छाचारी अधिनायकत्व आज भी प्रभावी है, जिस समाज के मानस पर रूढ़ियों-परम्पराओं की ऑक्टोपसी जकड़ कायम है, वह समाज बुर्जुआ समाज के सभी अन्याय-अनाचार को और बुर्जुआ राज्य के वर्चस्व को स्वीकारने के लिए अभिशप्त है। इसीलिए, कोई आश्चर्य नहीं कि संविधान और कानून की किताबों में व्यक्तिगत आज़ादी और जनवाद की दुहाई देने वाली बुर्जुआ राज्यसत्ता अपने तमाम प्रचार-माध्यमों के ज़रिये धार्मिक-जातिगत रूढ़ियों-मान्यताओं, अन्धविश्वासों और मध्ययुगीन मूल्यों को बढ़ावा देने का काम करती है, क्योंकि इन्हीं के माध्यम से वह जनसमुदाय से अपने शासन के लिए एक किस्म की “स्वयंस्फ़ूर्त” सहमति हासिल करती है और यह भ्रम पैदा करती है कि उनका प्रभुत्व जनता की सहमति से कायम है। जो समाज भविष्य के नागरिकों को रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह करने की इजाज़त नहीं देता, वह अपनी गुलामी की बेड़ियों को खुद ही मज़बूत बनाने का काम करता है। इन्हीं रूढ़ियों-परम्पराओं के ऐतिहासिक कूड़े-कचरे के ढेर से वे फ़ासिस्‍ट गिरोह खाद-पानी पाते हैं जो मूलत: एक असाध्य संकटग्रस्त बुर्जुआ समाज की उपज होते हैं। “अतीत के गौरव” की वापसी का नारा देती हुई ये फ़ासिस्‍ट शक्तियाँ वस्तुत: पूँजी के निरंकुश सर्वसत्तावादी शासन की वकालत करती हैं और धार्मिक-जातिगत- नस्ली-लैंगिक रूढ़ियों को मज़बूत बनाकर व्यवस्था की बुनियाद को मज़बूत करने में एक अहम भूमिका निभाती हैं। बाबू बजरंगी और प्रेमी जोड़ों पर हमले करने वाले गुण्डागिरोह इन्हीं शक्तियों के प्रतिनिधि उदाहरण हैं।

प्रेम की आज़ादी का सवाल रूढ़ियों से विद्रोह का प्रश्न है। यह जाति-प्रथा के विरुद्ध भी विद्रोह है। सच्चे अर्थों में प्रेम की आज़ादी का प्रश्न स्त्री की आज़ादी के प्रश्न से भी जुड़ा है, क्योंकि प्रेम आज़ाद और समान लोगों के बीच ही वास्तव में सम्भव है। प्रेम के प्रश्न को हम सामाजिक-आर्थिक मुक्ति के बुनियादी प्रश्न से अलग काटकर नहीं देख सकते। सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति के एजेण्डा से हम इस प्रश्न को अलग नहीं कर सकते। इस प्रश्न को लेकर हमारे समाज में संघर्ष के दो रूप बनते हैं। एक,फौरी तथा दूसरा दूरगामी। फौरी तौर पर, जब भी कहीं कोई बाबू बजरंगी या धार्मिक कट्टरपंथियों का कोई गिरोह या कोई जाति-पंचायत प्रेमी जोड़ों को ज़बरन अलग करती है या कोई सज़ा सुनाती है, तो यह व्यक्तिगत आज़ादी या जनवादी अधिकार का एक मसला बनता है। इस मसले को लेकर क्रान्तिकारी छात्र-युवा संगठनों, सांस्कृतिक संगठनों, नागरिक अधिकार संगठनों आदि को आगे आना चाहिए और रस्मी कवायदों से आगे बढ़कर प्रतिरोध की संगठित आवाज़ उठानी चाहिए, संविधान और कानून रस्मी तौर पर हमें जो अधिकार देते हैं उनका भी सहारा लेना चाहिए और व्यापक आम जनता के बीच अपनी बात ले जाकर समर्थन हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। यह प्रक्रिया युवा समुदाय और समाज के प्रबुद्ध तत्त्वों की चेतना को `रैडिकल´ बनाने का भी काम करेगी। लेकिन मात्र इसी उपक्रम को समस्या का अन्तिम समाधान मान लेना एक सुधारवादी दृष्टिकोण होगा। यह केवल फौरी कार्यभार ही हो सकता है। इसके साथ एक दूरगामी कार्यभार भी है और वही फौरी कार्यभार को भी एक क्रान्तिकारी परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।
प्रेम की आज़ादी का प्रश्न बुनियादी तौर पर समाज के मौजूदा आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक ढाँचे के क्रान्तिकारी परिवर्तन से जुड़ा हुआ है और इस रूप में यह बुर्जुआ समाज-विरोधी नयी मुक्ति-परियोजना का एक अंग है। जातिगत-धार्मिक रूढ़ियों से मुक्ति और स्त्रियों की आज़ादी के प्रश्न से भी यह अविभाज्यत: जुड़ा हुआ है। इस रूप में इस समस्या का हल एक दीर्घकालिक संघर्ष के परिप्रेक्ष्य के बिना सम्भव नहीं। व्यवस्था-परिवर्तन के क्रान्तिकारी संघर्ष की कड़ियों के रूप में संगठित युवाओं के आन्दोलन, सांस्कृतिक आन्दोलन, स्त्री-आन्दोलन और नागरिक अधिकार आन्दोलन की एक लम्बी और जुझारू प्रक्रिया ही इस समस्या के निर्णायक समाधान की दिशा में भारतीय समाज को आगे ले जा सकती है। यही नहीं, व्यवस्था-परिवर्तन के बाद भी समाज की हरावल शक्तियों को सामाजिक- सांस्कृतिक अधिरचना में सतत क्रान्ति की दीर्घकालिक प्रक्रिया चलानी होगी, तभी सच्चे अर्थों में समानता और आज़ादी की सामाजिक व्यवस्था कायम होने के साथ ही रूढ़ियों की दिमाग़ी गुलामी से और मानवद्रोही पुरातनपन्थी मूल्यों के सांस्कृतिक वर्चस्व से छुटकारा मिल सकेगा और सच्चे अर्थों में आदर्श मानवीय प्रेम को ज़िन्दगी की सच्चाई बनाया जा सकेगा, जो कम से कम आज, सुदूर भविष्य की कोई चीज़ प्रतीत होती है।
अब इस प्रश्न के एक और पहलू पर भी विचार कर लिया जाना चाहिए। चाहे अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक विवाह करने वाले किसी युवा जोड़े पर जाति- बिरादरी के पंचों द्वारा बर्बर अत्याचार का सवाल हो, चाहे एम.एफ. हुसैन के चित्रों के विरुद्ध हिन्दुत्ववादी फासिस्टों की मुहिम हो, या चाहे नागरिक अधिकार, जनवादी अधिकार और व्यक्तिगत आज़ादी से जुड़ा कोई भी मसला हो, इन सवालों पर पढ़े-लिखे मध्य वर्ग का या आम छात्रों-युवाओं का भी बड़ा हिस्सा संगठित होकर सड़कों पर नहीं उतरता। ऊपर हमने इसके सामाजिक-ऐतिहासिक कारणों की आम चर्चा की है। लेकिन उस आम कारण के एक विशिष्ट विस्तार पर भी चर्चा ज़रूरी है, जो आज के भारतीय समाज में प्रगतिशील एवं जनवादी माने जाने वाले बुद्धिजीवियों की स्थिति और आम जनता के विभिन्न वर्गो के साथ उनके रिश्तों से जुड़ी हुई है।
जब भी अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक प्रेम या विवाह करने वाले किसी जोड़े पर अत्याचार की या नागरिक अधिकार के हनन की कोई घटना सामने आती है तो दिल्ली या किसी राज्य की राजधानी या किसी अन्य महानगर की सड़कों पर कुछ थोड़े से मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी उसके प्रतीकात्मक विरोध के लिए आगे आते हैं। (दिल्ली में) मण्डी हाउस से होकर जन्तर-मन्तर तक, कहीं भी कुछ लोग धरने पर बैठ जाते हैं, किसी एक शाम को मोमबत्ती जुलूस या मौन जुलूस निकाल दिया जाता है, एक जाँच दल घटना-स्थल का दौरा करने के बाद वापस आकर प्रेस के लिए और बुद्धिजीवियों के बीच सीमित वितरण के लिए एक रिपोर्ट जारी कर देता है और कुछ जनहित याचिकाएँ दाखिल कर दी जाती हैं। इन सभी कार्रवाइयों का दायरा अत्यन्त सीमित और अनुष्ठानिक होता है। इनका कर्ता-धर्ता जो बुद्धिजीवी समुदाय होता है, वह केवल तात्कालिक और संकुचित दायरे की इन गतिविधियों से अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री करके अपने प्रगतिशील और जनवादी होने का “प्रमाण” प्रस्तुत कर देता है। व्यापक आम आबादी तक अपनी बात पहुँचाने का, प्रचार और उद्वेलन की विविधरूपा कार्रवाइयों द्वारा उसे जागृत और संगठित करने का तथा ऐसे तमाम मुद्दों को लेकर सामाजिक- सांस्कृतिक आन्दोलन संगठित करने का कोई दूरगामी-दीर्घकालिक कार्यक्रम उनके एजेण्डे पर वस्तुत: होता ही नहीं। उनकी अपेक्षा केवल सत्ता से होती है कि वह संवैधानिक प्रावधानों-कानूनों का सहारा लेकर प्रतिक्रियावादी सामाजिक-राजनीतिक ताकतों के हमलों से आम लोगों के जनवादी अधिकारों और व्यक्तिगत आज़ादी की हिफाज़त सुनिश्चित करे। लोकतन्त्र के मुखौटे को बनाये रखने के लिए सरकार और प्रशासन तन्त्र भी कुछ रस्मी कार्रवाई करते हैं, कभी-कभार कुछ जाँच, कुछ गिरफ़्तारियाँ होती हैं और कुछ कानूनी कार्रवाइयाँ भी शुरू होती हैं और फ़िर समय बीतने के साथ ही सब कुछ ठण्डा पड़ जाता है।
दरअसल सत्ता और सभी पूँजीवादी चुनावी दलों के सामाजिक अवलम्ब ज़मीनी स्तर पर वही प्रतिगामी और रूढ़िवादी तत्त्व होते हैं, जो सामाजिक स्तर पर जाति-उत्पीड़न, स्त्री-उत्पीड़न और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अलगाव एवं उत्पीड़न के सूत्रधार होते हैं। इसलिए हमारे देश की बुर्जुआ सत्ता यदि चाहे भी तो उनके विरुद्ध कोई कारगर कदम नहीं उठा सकती। यदि उसे सीमित हद तक कोई प्रभावी कदम उठाने के लिए मज़बूर भी करना हो तो व्यापक जन-भागीदारी वाले किसी सामाजिक आन्दोलन के द्वारा ही यह सम्भव हो सकता है। इससे भी अहम बात यह है कि ऐसा कोई सामाजिक आन्दोलन सत्ता के कदमों और कानूनों का मोहताज नहीं होगा, वह स्वयं नये सामाजिक मूल्यों को जन्म देगा, जनमानस में उन्हें स्थापित करेगा और रूढ़िवादी शक्तियों एवं संस्थाओं के वर्चस्व को तोड़ने की आमूलगामी प्रक्रिया को आगे बढ़ायेगा। इस काम को वह बुद्धिजीवी समाज कतई अंजाम नहीं दे सकता जो प्रगतिशील, वैज्ञानिक और जनवादी मूल्यों का आग्रही तो है, लेकिन समाज में उन मूल्यों को स्थापित करने के लिए न तो कोई तकलीफ झेलने के लिए तैयार है और न ही कोई जोखिम उठाने के लिए तैयार है।

जो बुद्धिजीवी आज वामपन्थी, प्रगतिशील, सेक्युलर और जनवादी होने का दम भरते हैं तथा तमाम रस्मी एवं प्रतीकात्मक कार्रवाइयों में लगे रहते हैं, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर निगाह डालने से बात साफ हो जायेगी। प्राय: ये महानगरों में रहने वाले विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के प्राध्यापक, मीडियाकर्मी, वकील, फ्रीलांसर पत्रकार व लेखक तथा एन.जी.ओ. व सिविल सोसाइटी संगठनों के कर्ता-धर्ता हैं। कुछ थोड़े से डॉक्टर, इंजीनियर जैसे स्वतन्त्र प्रोफेशनल्स और नौकरशाह भी इनमें शामिल हैं जो प्राय: प्रगतिशील लेखक या संस्कृतिकर्मी हुआ करते हैं। आर्थिक आय की दृष्टि से इनमें से अधिकांश का जीवन सुरक्षित है, इनकी एक सामाजिक हैसियत और इज्ज़त है। यह कथित प्रगतिशील जमात आज़ादी के बाद की आधी सदी, विशेषकर पिछले लगभग तीन दशकों के दौरान, तेज़ी से सुख-सुविधा सम्पन्न हुए मध्य वर्ग की उस ऊपरी परत का अंग बन चुकी है, जिसे इस पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर आर्थिक सुरक्षा के साथ ही सामाजिक हैसियत की बाड़ेबन्दी की सुरक्षा और जनवादी अधिकार भी हासिल हैं। इस सुविधासम्पन्न विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक उपभोक्ता वर्ग में प्रोफेसर, मीडियाकर्मी, वकील आदि के रूप में रोज़ी कमाने वाले जो प्रगतिशील लोग शामिल हैं, वे अपने निजी जीवन में यदि जाति-धर्म को नहीं मानते हैं, स्वयं प्रेम-विवाह करते हैं, अपने बच्चों को इसकी इजाज़त देते हैं और प्रगतिशील आचरण करते हैं, तो भी वे इन मूल्यों को व्यापक आम आबादी के बीच ले जाने के लिए किसी सामाजिक-सांस्कृतिक मुहिम का भागीदार बनने की जहमत या जोखिम नहीं उठाते। साथ ही, इनमें कुछ ऐसे भी हैं जो प्रगतिशीलता की बात तो करते हैं, लेकिन अपनी निजी व पारिवारिक ज़िन्दगी में निहायत पुराणपन्थी हैं। चुनावी वामपन्थी दलों के नेताओं में से अधिकांश ऐसे ही हैं। इनमें से पहली कोटि के प्रगतिशीलों का कुलीनतावादी जनवाद और वामपन्थ हो या दूसरी कोटि के प्रगतिशीलों का दोगला-दुरंगा जनवाद और वामपन्थ मेहनतकश और सामान्य मध्य वर्ग के लोग उन्हें भली-भाँति पहचानते हैं और उनसे घृणा करते हैं। कुलीनतावादी प्रगतिशीलों और छद्म वामपिन्थयों का जीवन मुख्य तौर पर के ऊपरी पन्द्रह-बीस करोड़ आबादी के जीवन का हिस्सा बन चुका है, उस उच्च मध्यवर्गीय आबादी का हिस्सा बन चुका है जो एक लम्बी पीड़ादायी क्रमिक प्रक्रिया में, विकृत और आधे-अधूरे ढंग से, पूँजीवादी जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों के पूरा होने के बाद, आम जनसमुदाय के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात कर चुका है। उसे देश की लगभग पचपन करोड़ सर्वहारा- अर्द्धसर्वहारा आबादी या रोज़ाना बीस रुपये से कम पर जीने वाली चौरासी करोड़ आबादी के जीवन के अँधेरे और यन्त्राणाओं से अब कुछ भी लेना-देना नहीं रह गया है। एक परजीवी जमात के रूप में वह मेहनतकशों से निचोड़े गये अधिशेष का भागीदार बन चुका है। आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से इस परजीवी वर्ग का हिस्सा बन चुके जो बुद्धिजीवी प्रगतिशील, जनवादी और सेक्युलर विचार रखते हैं, उनकी कुलीनतावादी, अनुष्ठानिक, नपुंसक प्रगतिशीलता आम लोगों में घृणा और दूरी के अतिरिक्त भला और कौन-सा भाव पैदा कर सकती है? इस तबके की जो स्त्रियाँ हैं, ऊपरी तौर पर आम लोगों को वे आज़ाद लगती हैं (हालाँकि वस्तुत: ऐसा होता नहीं) और यह आज़ादी उनकी विशेष सुविधा प्रतीत होती है जिसके चलते मेहनतकश और आम मध्य वर्ग की स्त्रियाँ (ऊपर से सम्मान देती हुई भी) उनसे बेगानगी या घृणा तक का भाव महसूस करती हैं तथा उन्हें अपने से एकदम अलग मानती हैं।
उपरोक्त पूरी चर्चा के ज़रिये हम इस सच्चाई की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं कि प्रेम करने की आज़ादी पर रोक सहित किसी भी मध्ययुगीन बर्बरता, धार्मिक कट्टरपन्थी हमले या जातिवादी उत्पीड़न के विरुद्ध कुलीनतावादी प्रगतिशीलों की रस्मी, प्रतीकात्मक कार्रवाइयों का रूढ़िवादी शक्तियों और मूल्यों पर तो कोई असर नहीं ही पड़ता है, उल्टे आम जनता पर भी इनका उल्टा ही प्रभाव पड़ता है। सुविधासम्पन्न, कुलीनतावादी प्रगतिशीलों का जीवन आम लोगों से इतना दूर है कि उनके जीवन-मूल्य (यदि वास्तविक हों तो भी) जनता को आकृष्ट नहीं करते।
एक दूसरी बात जो ग़ौरतलब है, वह यह कि आज के भारतीय समाज में मध्ययुगीन बुराइयों के साथ-साथ आधुनिक बुर्जुआ जीवन की तमाम बुराइयाँ और विकृतियाँ भी मौजूद हैं। आम लोगों को पुरानी बुराइयों के विकल्प के तौर पर समाज में आधुनिक बुर्जुआ जीवन की बुराइयाँ ही नज़र आती हैं। पुरानी बुराइयों के साथ जीने की उन्हें आदत पड़ चुकी है। उनसे उनका परिचय पुराना है। इसलिए नयी बुराइयाँ उन्हें ज्यादा भयावह प्रतीत होती हैं। आधुनिक बुर्जुआ जीवन की सामाजिक-सांस्कृतिक विकृतियों को देखकर वे पुराने जीवन-मूल्यों से चिपके रहने का स्वाभाविक विकल्प चुनते हैं। महानगरों में तरह-तरह के सेक्स रैकेट, प्रेम-विवाहों की विफलता, यौन अपराधों आदि की खबरें पढ़-सुनकर और मीडिया में बढ़ती अश्लीलता आदि देखकर आम नागरिक इन्हें आधुनिक जीवन का प्रतिफल मानते हैं और इनसे सहज प्रतिक्रियास्वरूप उन रूढ़ियों को अपना शरण्य बनाते हैं जिनके साथ जीने के वे शताब्दियों से और पीढ़ियों से आदी रहे हैं। इसका एक वस्तुगत कारण आज की ऐतिहासिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में भी मौजूद है, जब प्रगति की धारा पर विपर्यय और प्रतिगामी पुनरुत्थान की धारा हावी है और चतुर्दक गतिरोध का माहौल है। और मनोगत कारण यह है कि विपर्यय और गतिरोध के इस दौर में ऐतिहासिक परिवर्तन की वाहक मनोगत शक्तियाँ अभी बिखरी हुई और निहायत कमज़ोर हैं। नये सिरे से नयी ज़मीन पर उनके उठ खड़े होने की प्रक्रिया अभी एकदम शुरुआती दौर में है। ऐसी ही शक्तियाँ अपने विचार और व्यवहार के द्वारा जनता के सामने मध्ययुगीन और विकृत बुर्जुआ जीवन मूल्यों का नया, मानवीय और वैज्ञानिक विकल्प प्रस्तुत कर सकती हैं।
फ़िलहाल की गतिरुद्ध स्थिति के बारे में भगत सिंह का उद्धरण एकदम सटीक ढंग से लागू होता है और ऐसी स्थिति में नयी क्रान्तिकारी शक्तियों के दायित्व के बारे में भी यह एकदम सही बात कहता है : “जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, अन्यथा पतन और बरबादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह ज़रूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा की जाये, ताकि इन्सानियत की रूह में हरकत पैदा हो।”

…इस आलेख का शेष भाग देखें : प्रेम, परम्‍परा और विद्रोह pdf file

नए इंकलाब की मशाल जलाओ ! क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का परचम ऊँचा उठाओ !!

Posted on Updated on

उठो ! जागो !! आगे बढो !!!

आज़ादी मुनाफाखोरों लुटेरों के लिए ! जनतंत्र चोरों-मुफ्तखोरों के लिए !!

एक ही विक्लप — एक ही रास्ता

नए इंकलाब की मशाल जलाओ ! क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का परचम ऊँचा उठाओ !!

इक्कीसवीं सदी तक आते-आते आज़ादी और जनतंत्र के सारे छल-छद्म उजागर हो चुके हैं. पूंजीवादी राज, समाज और संस्कृति के कुरूपतम वीभत्सतम रूप आज हमारे सामने हैं. १५ अगस्त 1947 की जिस आज़ादी को मशहूर शायर फैज़ ने ‘दाग़-दाग़ उजाला’ कहा था, वह आधी सदी बीतते-बीतते भादों की अमावस की कलि रात में तब्दील हो चुकी है. देश जल रहा है.जालिम नीरो की जारज औलादें बांसुरी बजा रही हैं.

इतिहास के इस अभूतपूर्व कठिन दौर में शहीदेआज़म भगत सिंह के शब्दों को दोहराते हुए हम इंसानियत की रूह में हरकत पैदा करने के लिए एक बार फिर क्रांति की स्पिरिट को ताज़ा करने का आह्वान करते है. हम देशी-विदेशी पूंजीपतियों के जालिमाना लूटतंत्र को तबाहो-बर्बाद करके हिंद महासागर में फेंक देने के लिए और उत्पादन, राज-काज और समाज के पूरे तंत्र पर आगे बढ़कर कब्ज़ा करने लेने के लिए मेहनतकश अवाम को आवाज़ देते है और क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा बुलंद करते हैं.

हम मानते हैं की नए सिरे से सब कुछ शुरू करना होगा. मेहनतकश जनता के राज्य और समतामूलक समाज के निर्माण की परियोजनायों को पुनर्जीवित करना होगा. पूरी दुनिया के पैमाने पर, पिछली सदी के आखिरी चौथी हिस्से के दौरान मेहनतकशों के इन्कलाबों का कारवां रुक-सा गया है, और भटका और बिखराव भी है. पूंजीवादी लूट और हुकूमत के तौर-तरीकों में भी अहम् बदलाब आये हैं. उन्हें समझना होगा और नई क्रांतियों की राह निकालनी होगी. यह कठिन हैं. पर असम्भव नहीं. हर नया काम कठिन लगता है. हर नई शुरुआत मज़बूत संकल्पों की मांग करती है. इतिहास के हजारों वर्षों के सफ़र का यह सबक है और पूंजीवादी लूटतंत्र के असाध्य और लाईलाज बिमारियों को देखते हुए यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि पराजय झेलने के बाद क्रांतियाँ फिर से परवान चढेँगी. यह सदी नई, फैसलाकुन क्रांतियों की सदी है.

यह हमारा दृढ विश्वास है और इस विश्वास के पर्याप्त कारण हैं की भारत की मेहनतकश जनता भी इस नए विश्व-एतिहासिक महासमर में पीछे नहीं रहेगी, बल्कि अगली कतारों में रहेगी. 85 फीसदी लोगों के दुखों और बरबादियों के सागर में 15 फीसदी लोगों के समृद्धि के टापू और उन पर खड़ी विलासता की मीनारें हमेशां के लिए कायम नहीं रह सकती. यह तूफ़ान के पहले का सन्नाटा है. इसलिए हुक्मरान बेचैन हैं. तरह-तरह के नए काले कानून बनाकर, पुलिस-फौज को चाक-चौबंद करके वे निश्चिंत हो जाना चाहते हैं, पर हो नहीं पाते. उन्हें लगने लगा है कि आम जनता को बाँटने-बरगलाने के लिए उछाले जाने वाले मुद्दे और छोडे जाने वाले शिगूफे भी बहुत दिनों तक काम नहीं आएंगे. पूंजीवादी जनतंत्र की कलई चारों ओर से उतर रही है. नया रंग-रोगन टिकता नहीं. इसलिए भारत की पूंजीवादी राज्यसत्ता फासिस्ट निरंकुशशाही की ओर खिसकती जा रही है.

इसलिए, क्रांतिकारी लोकस्वराज्य अभियान के ज़रिए हम इतिहास को गढ़ने वाले और अपने बलिष्ट हाथों से समय के प्रवाह को मोड़ देने वाले मेहनतकश अवाम के पराक्रम को ललकार रहे हैं और नई,कठिन और निर्णायक लड़ाई की तैयारी में शामिल होने के लिए उन तमाम लोगों को निमंत्रण दे रहे हैं, जिनकी आत्माएं युवा हैं, जो सच्चे अर्थों में जिन्दा हैं.

बढती लूट, निचुड़ती जनता : तबाही के सागर में ऐयाशी के टापू

इस देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी किसानों, मजदूरों और आम मध्यम वर्ग के लोगों ने, लेकिन छल-कपट से और क्रांतिकारी नेतृत्व की कमजोरियों-गलतियों का लाभ उठाकर देशी पूंजीपति वर्ग के नुमाइंदे उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे ढांचे पर काबिज हो गए.

समाजवाद का नारा लगाते हुए उन्होंने जनता को निचोड़कर पब्लिक सेक्टर में उद्योगों का विशाल ढांचा खड़ा किया, जिनमें मजदूरों को चूसकर अफसरशाही नेताशाही को ऐशो-आराम के सरंजाम मुहैया कराये गए और पूंजी का अम्बार इक्कठा किया गया. साथ ही विदेशी पूंजी को भी लूट की सारी सुविधाएँ मुहैया करी गयी. देशी पूंजीपति लुटेरों के जूनियर पार्टनर के रूप में वे भूतपूर्व सामंती भूस्वामी भी कतार में शामिल हो गए, जो अपने तौर-तरीके बदलकर अब पूंजीवादी भूस्वामी बन चुके थे. इसके साथ ही व्यापारियों, ठेकेदारों, उच्च मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों, अफसरों, नेताओं, दलालों और काले धन वालों की लम्बी-चौडी जमातें भी खूब फलती-फूलती रहीं. सारी संपदा पैदा करने वाली जनता को पूंजीवादी विकास का सिर्फ जूठन ही नसीब हुआ.

“समाजवाद” का गुब्बारा जब फूस हो गया ओर देशी पूंजीवादी ढांचे का चौतरफा संकट लाइलाज हो गया तो अपने लूटतंत्र को चलाने के लिए शासक वर्गों ने ओर उनकी सभी पार्टियों ने, यहाँ तक कि नकली वामपंथियों ने भी, आम सहमती से , बारह वर्षों पहले उदारीकरण ओर निजीकरण का रास्ता पकडा ओर जनता के खून पसीने से खड़े राजकीय उद्योगों को सीधे-सीधे देशी-विदेशी पूंजीपतियों को सौंपना शुरू कर दिया. अर्थतंत्र को साम्राज्यवादियों के लिए पूरी तरह खोल दिया गया. साथ ही, विदेशी कर्जों के सूद के रूप में सालाना देश से बाहर जाने वाले धन में भी कई गुने का इजाफा हो गया.

उदारीकरण के पिछले 17 वर्षों ने “समाजवाद” के मुखौटे को नोचकर पूंजीवादी जनतंत्र के खुनी चहरे को एकदम नंगा कर दिया है. आधी सदी के तथाकथित विकास का कुल बैलेंस शीट यह है कि ऊपर के 22 पूंजीपति घरानों की परिसंपत्तियों में 1951 से 2000 के बीच 500 गुने से अधिक की बढोत्तरी हुई. इन घरानों की परिभाषा में बहुराष्ट्रीय निगम शामिल नहीं है, जिनके शुद्ध मुनाफे में सैंकडों गुना की वृद्धि हुई है. दूसरी ओर, देश में गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों की ओर बेरोजगारों की संख्या में लगातार बढोत्तरी की रफ्तार उदारीकरण के 17 वर्षों ने ओर अधिक तेज़ कर दी है. एशिया विकास बैंक के मुताबिक इस समय हमारे देश की 55 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे रह रही है. छुपी हुई ओर अर्द्ध बेरोजगारी को छोड़ दे, तो भी अर्थशास्त्रियों के अनुसार, बेरोजगारी की कुल संख्या आज 20 से 25 करोड़ के बीच जा पहुंची है.

देश में आज कुल 20 करोड़ मजदूर असंगठित हैं. पुराने श्रम कानूनों को किश्तों में निष्प्रभावी बनाते हुए सरकार देशी-विदेशी पूंजीपतियों के आधुनिक उद्योगों को भी यह छूट दे रही है कि वे ज्यादा से ज्यादा काम दिहाडी ओर ठेका मजदूरों से लें ओर उन्हें चंद टुकडों के लिए बारह-बारह, चौदह-चौदह घंटे काम करने के लिए मजबूर करें. खेत-मजदूरों की स्थिति तो इससे भी बदतर है.

पूंजी की मार से अपनी जगह-ज़मीन से उजड़कर उजरती मजदूरों की कतारों में शामिल होने वाले मध्यम ओर गरीब किसानों की संख्या में विगत बारह वर्षों में करोडों की बढोत्तरी हो गयी है. इन्हीं सत्रह वर्षों के दौरान लाखों छोटे व मझोले दर्जे के उद्योगों की बंदी से और छंटनी से करीब 4 करोड़ मजदूर बेकार हो चुके हैं. विगत आधी सदी के दौरान, बड़े बांधों और बिजली परियोजनायों के निर्माण स्थलों से करोडों लोगों को उजाडा जा चुका है.

देश में कार, मोटरसाइकिल, ए.सी., फ्रिज, टी.वी., वाशिंग मशीन आदि के नए-नए ब्रांडों के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है, पर अनाज के उत्पादन में वृद्धि की रफ्तार तेजी से घटती जा रही है और आम गरीब आदमी के खाने-पीने और इस्तेमाल की अन्य चीजों और दवा-इलाज़ की कीमतों में रिकार्ड तोड़ वृद्धि हो रही है. प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के खर्चों में दस-दस गुने की वृद्धि हो रही है ओर बेटे-बेटी की इंजिनियर-डाक्टर बनाने का सपना तो अब आम मध्य वर्ग का आदमी तक नहीं देख सकता.

1991 से लेकर आज तक सभी सरकारों के प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री ओर भाड़े के अर्थशास्त्री यह कहते आ रहे हैं कि उदारीकरण-निजीकरण ही एकमात्र विक्लप है. वे एक मायने में सही कहते हैं. पूंजीवादी व्यवस्था के सामने आज यही एकमात्र एकमात्र विकल्प है ओर इसके जो विनाशकारी नतीजे सामने हैं, वे स्पष्ट कर देते हैं कि भविष्य क्या होगा ! पूंजीवादी हकूमत को जो करना था, उसने वह किया है. अब इस देश की मेहनतकश जनता को वह करना होगा जो उसे करना चाहिए.

कितना छली संविधान ओर कितना महंगा “जनतंत्र”

आर्थिक ढांचे पर सरसरी नज़र डालने के बाद, आइए राजनितिक ढांचे का भी संक्षेप में जायजा लें.

भारतीय संविधान का निर्माण जिस संविधान सभा ने किया था, उसका चुनाव पूरी जनता ने नहीं बल्कि महज़ 15 फीसदी कुलीन नागरिकों ने किया था. यह संविधान वास्तव में 1935 के ‘गवर्नमेंट आफ़ इंडिया एक्ट’ का ही संशोधित रूप था. यह भारत को ‘संप्रभु जनतांत्रिक गणराज्य’ घोषित करते हुए भी जनता को अति सीमित जनवादी अधिकार देता है और इन्हें भी हड़प लेने के प्रावधान इसके भीतर ही मौजूद हैं. इससे भी बड़ी बात यह है कि ब्रिटिशकालीन न्यायव्यवस्था और पुलिस तंत्र को लगभग ज्यों का त्यों कायम रखने के चलते आम जनता के अति सीमित सवैधानिक अधिकारों का भी कुछ खास मतलब नहीं रह जाता है.

इस सविधान के तहत, अरबों-खरबों के खर्च से जो चुनाव होते है, वे दरअसल जन-प्रतिनिधियों के चुनाव होते ही नहीं. चुनाव सिर्फ इस बात का होता है की अगले पॉँच वर्ष तक सरकार के रूप में “शासक वर्गों की मैनेजिंग कमिटी” का काम किस पार्टी या गठबंधन के लोग संभालेंगे ! अरबों-खरबों के खर्च से होने वाले ये चुनाव अब पॉँच साल के भीतर दो-दो, तीन-तीन बार हो रहे हैं और अपनी व्यवस्था के इस संकट का बोझ भी शासक वर्ग जनता से ही वसूल रहा है.

चुनाव के बाद अब जरा सरकार चलाने के खर्चों पर भी नजर डालें. औसत भारतीय आदमी की दैनिक आय लगभग 29 रुपये 50 पैसे है जबकि देश के राष्ट्र्पति पर रोजाना लगभग 4 लाख 14 हज़ार खर्च होते हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय पर लगभर 2 लाख 38 हज़ार रूपये कह्र्च होते हैं. केन्द्रीय मंत्रिमंडल का दैनिक खर्च लगभग 15 लाख रूपये है. संसद की एक घंटे की कार्रवाई पर लगभग 16 लाख रूपये खर्च होते हैं. इसमें सभी विधानसभाओं के खर्चों, राज्यों के मंत्रिमंडलों के खर्चों, एम.पी.-एम.एल.ए. के वेतन-भत्तों और विधानसभा चुनावों के खर्चों को जोड़ देने पर यह बात सहज ही समझी जा सकती है कि यह “जनतंत्र” कितना खर्चीला और कितना परजीवी है.

वर्ष 1999-2000 के केन्द्रीय बज़ट में विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा पर एक अरब 61 करोड़ रूपये और केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सुरक्षा पर 50 करोड़ 52 लाख रूपये की व्यवस्था की गयी थी. सभी राज्यों के मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर होने वाला खर्च भी इसमें शामिल करने पर इस मद की विशालता का आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है.

यह खर्च तो सिर्फ तथाकथित जनप्रतिनिधियों का है. विराट नौकरशाही तंत्र, पुलिस विभाग, अर्द्धसैनिक बलों और फौजी मशीनरी पर सालाना खरबों रूपए का जो अनुत्पादक खर्च होता है, उसका बोझ भी अपना पेट काटकर जनता ही उठाती है.

जो पूंजीवादी लुटेरों के बफादार कुत्ते हैं, वे भौकने, काटखाने और चौकीदारी करने की पूरी कीमत वसूल करते हैं. और पूंजीपति यह कीमत खुद नहीं देते, बल्कि जनतंत्र ने नाम पर उसी जनता से वसूल करते हैं, जिसकी हड्डियों से वे अपना मुनाफा निचोड़ते हैं.

संसदीय “जनतंत्र” की नंगई एकदम सामने आ जाने ने बाद विभिन्न राज्यों की कांग्रेसी, भाजपाई और नकली वामपंथी सरकारों ने पंचायती राज ने नाम पर सत्ता के विकेंद्रीकरण का नया शोशा उछाला है और पंचायतों को अधिक अधिकारसंपन्न बनाने का दावा किया है. यह वास्तव में गावों के स्तर पर धनी किसानों और पूंजीवादी भूस्वामियों को अधिक अधिकारसंपन्न बनाकर लूट और सत्ता में भागीदारी के लिए उन्हें अधिक अवसर देने का ही उपक्रम है. ऐसा करके, वास्तव में पूंजीवादी व्यवस्था के स्थानीय खंभों को मजबूत बनाया जा रहा है और ऐसा, शीर्ष पर, या पूरे ढांचे में, कोई बदलाव लाये बिना ही किया जा रहा है. आर्थिक शक्ति से वंचित आम लोग पंचायतों में निहित सीमित अधिकारों का भी तब तक इस्तेमाल नहीं कर सकते जब तक कि आर्थिक-सामाजिक ढांचे में बुनियादी बदलाव नहीं किया जाये, या फिर व्यापक जनता की संघर्षशील एकजुटता का बलशाही दबाब नहीं बनाया जाये.

हम क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा क्यों बुलंद करते हैं?

देश के इतिहास के ऐसे मोड़ पर, जब समय के गर्भ में महत्त्वपूर्ण बदलाव के बीज पल रहे हैं, हम पूंजीवादी संसदीय जनतंत्र की खर्चीली धोखाधडी और तथाकथित पंचायती राज के कपटपूर्ण शगूफे को सिरे से खारिज करने के लिए उन सबका आह्वान करते हैं, जो इस व्यवस्था में छले जा रहे हैं, ठगे जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं और आवाज़ उठाने पर कुचले जा रहे हैं. इस व्यवस्था में जिनका कोई भविष्य नहीं है, वे ही नई व्यवस्था बनाने के लिए आगे आएंगे. उन्हें आगे आना ही होगा !

देश के विभिन्न क्रांतिकारी जनसंगठनों द्वारा चलाया जा रहा क्रांतिकारी लोक स्वराज्य अभियान यही सन्देश देश के जन-जन तक ले जाने के काम में जुटा है कि साम्राज्यवाद और पूंजीवाद का एक-एक दिन हमारे लिए भारी है. इसका नाश हमारे अस्तित्व की शर्त है !

इनके विरुद्ध हम क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा क्यों बुलंद करते हैं? क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का मतलब है उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले सामाजिक वर्गों का नियंत्रण, फैसले की पूरी ताकत उन्हीं के हाथों में. इसका सारतत्व है – ‘सारी सत्ता मेहनतकशों को!’, इसका तात्पर्य है – विश्व पूंजीवादी तंत्र से नाभिनालबद्ध देशी पूंजीवादी व्यवस्था को चकनाचूर करके पूरे समाज के आर्थिक आधार और ऊपरी ढांचे का न्याय और समानता के आधार पर पुनर्गठन !

कुछ पूंजीवादी सुधारवादी और कुछ दिग्भ्रमित लोग आज विदेशी लूट और राष्ट्र की नई “गुलामी” के खिलाफ “स्वदेशी” का नारा दे रहे हैं. फासिस्ट संघ परिवार तक ने इसके लिए एक मंच बना रखा है. यह नारा भटकाने वाला है. विदेशी आज देशी लुटेरों से गाँठ जोड़कर ही जनता को लूट रहे हैं. देशी पूंजीपति लूट की बंदरबांट में अपने हिस्से के लिए साम्राज्यवादियों से खींचतान करते हैं और “स्वदेशी” की गुहार लगाते हैं, पर तकनोलाजी और पूंजी के लिए और विश्व बाज़ार में टिके रहने की खातिर वे उनसे गांठ जोड़ने के लिए मजबूर हैं. सवाल देश की गुलामी का नहीं है. मेहनतकश तो हर हाल में पूंजी का उजरती गुलाम है, चाहे वह देशी पूंजी हो या विदेशी. भूमंडलीकरण के दौर में गरीब देशों में पूंजीवादी लूट साम्राज्यवाद से गांठ जोड़कर ही जारी रह सकती है.

सवाल आज विदेशी गुलामी बनाम स्वदेशी का नहीं है, बल्कि सवाल पूरी पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली और पूंजीवादी सामाजिक-राजनितिक- सांस्कृतिक प्रणाली को ही नष्ट करने का है जो अनैतिहासिक और मानवद्रोही हो चुकी है.

इक्कसवीं सदी में इतिहास के एजेंडे पर यही केन्द्रीय मुद्दा है. क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा उस पूंजीवादी सत्ता को उखाड़ फैंकने के लिए संघर्ष का नारा है, जिसने देशी पूंजीपतियों की लूट के साथ ही साम्राज्यवादी देशों और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के लिए देश के दरवाजे खोल दिये हैं.

क्रांतिकारी लोक स्वराज्य अभियान पूंजीवादी जनतंत्र के सभी स्वांगों और छल-छद्मों का भंडाफोड़ करते हुए वर्तमान संसदीय प्रणाली को सिरे से खारिज करने का और सरकारी पंचायती राज की असलियत को समझने का आह्वान करता है.

क्रांतिकारी लोक स्वराज्य अभियान व्यापक परिवर्तन के हर मोर्चे पर सन्नद्ध होने के साथ-साथ गाँव-गाँव में, शहर के मुहल्लों और मजदूर बस्तियों में जनता की वैकल्पिक सत्ता के क्रांतिकारी केन्द्रों के रूप में लोक स्वराज्य पंचायतों के गठन का आह्वान करता है.

हम जानते है, हमारा रास्ता लम्बा है. पर यही एकमात्र विकल्प है. यही इतिहास का रास्ता है. इसलिए हमारा यह संग्रामी संकल्प है कि ” लोक स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम हर कीमत पर उसे लेकर रहेंगे.”

नौजवान भारत सभा की ओर से जारी

यदि आप भी इस मुहीम में शामिल होना चाहते हैं तो इन पतों में से किसी पर भी संपर्क कीजिए :

1. बी- 100, मुकुंद विहार, करावल नगर, दिल्ली-110094, फोन-011-65976788, 099993-79381

2. डॉ. परमिंदर, गाँव- पख्खोवाल, जिला-लुधियाना. फोन 98886-96323

3. शहीद भगत सिंह लाईब्रेरी, गली नंबर-5, लक्ष्मण नगर, ग्यासपुरा, लुधियाना. फोन. 98771-43788

4. नवकाशदीप, गली नंबर-6/ बाईं ओर, डोगर बस्ती, फरीदकोट. फोन-94663-47046

5. गुलशन कुमार, शहीद भगत सिंह लाईब्रेरी, मकान नंबर-112, सैक्टर 22 सी, संगतपुरा मोहला, मण्डी गोबिंदगढ़. फोन-98728-65599

6. अमनदीप, भाईरुपा, बठिंडा. फोन- 97793-68203