समाज और संस्कृति

प्रकृति और जीवन प्रशिक्षण का इतिहास

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प्रकृति और जीवन पद्धति

जिस प्रकार लोग पृथ्वी पर फैलते गए उसी प्रकार पृथ्वी के साथ मानव के संबंधों की बहुत परिष्कृत व्यवस्था बनती गयी. विख्यात नवजाति विज्ञानी लेविन और चेबोक्सारोव  के सुझाव अनुसार इन व्यवस्थाओं को जीवन-यापन या जीवन निर्वाह की संस्कृति कहना चाहिए. इसकी परिभाषा उन्होंने इस प्रकार दी है,

“किसी ठोस प्राकृतिक परस्थितियों में बसे जनगण के सामाजिक-आर्थिक विकास के निश्चित स्तर पर उनके जीवन निर्वाह और संस्कृति की जो विशेषताएँ उस जनगण के लिए लाक्षणिक होती हैं, उन विशेषताओं को ऐतिहासिक तौर पर अस्तित्व में आई समग्रता के जीवन-निर्वाह की संस्कृति-प्रारूप कहा जाता है. निश्चित भूगोलिक परस्थितियों से जुड़े जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूपों की धारणा विज्ञान के लिए बहुत लाभप्रद सिद्ध हुई हैं. इसके परिणामस्वरूप जनगण की संस्कृति में समानताओं और विभिन्नताओं के अनेक प्रश्नों के उत्तरों की खोज संभव हुई.हैं.”

लेविन और चेबोक्सारोव इसी बात पर जोर देते हैं. उन्होंने अपने प्रस्तावित रूपों को मात्र जीवन-यापन प्रारूप ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक जीवन-यापन प्रारूप कहा है. ऐसा कहना अकारण नहीं है. बात यह है कि जीवन-यापन संबंधी कार्यकलापों की दिशा और भूगोलिक परिवेश बहुत हद तक जनगण की भौतिक संस्कृति की विशेषता – पद्धतियों और आवासों के प्रारूप, परिवहन साधन, भोजन और गृह-गृहस्ती का सामान, वेशभूषा आदि निर्धारित करते हैं. नवजाति विज्ञानिकों ने विश्व में कई दर्जन जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूपों की गणना की है. इनकी सही सही गिनती बताना कठिन है क्योंकि अलग-अलग विज्ञानी अपने सिद्धांतों के लिए अलग-अलग वर्गीकरण का वैज्ञानिक आधार तैयार करते हैं. इसलिए भिन्न-भिन्न प्रकार के आंकडों की प्रस्तुति होती है. लोग कहाँ-कहाँ नहीं रहते ? उत्तरी ध्रुव प्रदेश में और उष्ण कटिबद्ध में, तिब्बत के पर्वतों में और एशिया , ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के रेगिस्तानों में! संसार के कोने-कोने में लोग बसे हुए हैं. कडाके की ठण्ड और झुलसा देने वाली गर्मी में भी! खतरनाक हिंसक जानवरों के बावजूद वे हर जगह रहने में सफल हुए हैं क्योंकि वे वहां की भूगोलिक परस्थितियों के अनुरूप संस्कृति या दूसरी प्रकृति का निर्माण करने में सफल हुए हैं.

एस्किमो लोगों के जीवन को लें. उनका जीवन कितना कठिन हैं. वहां ऐसा कुछ नहीं है कि वहां बहुत ज्यादा वनस्पति हो या उनके लिए बहुत ज्यादा वृक्षों या खाने-पीने का चुनाव करने की सहूलियत हो. उनका प्राकृतिक क्षेत्र अनेक महीनों की सर्दी और कई महीने लंबी रात – छः महीनों की रात और कहीं-कहीं तो आठ से दस महीनों की भी रात है. चारों तरफ बर्फ ही बर्फ ! निसंदेह कनाडा के प्रसिद्ध  नवजाति विज्ञानी और अनुसंधानकर्त्ता फारली मोइक का यह कहना दरुस्त है कि उत्तरी ध्रुव प्रदेश बर्फ द्वारा जमीं हुई नदियों और हिमकवच से जकड़ी हुई झीलों का ही नहीं बल्कि सजीव नदियों का भी जगत है जहाँ गर्मियों में नीला गगन झांकता है, जहाँ तटों पर फूलों का कालीन बिछता है और जहाँ पर हरी-भरी विशाल चरागाहें भी हैं. उत्तर ध्रुव प्रदेश एक विशाल भूखंड है जहाँ जबरदस्त गर्मी भी होती और भयानक ठण्ड भी. यहाँ लोग शिकारी और मछली पकड़ने वाले बनकर ही अपने अस्तित्व को बनाये रख सकते थे.

उपरोक्त जानकारी हासिल करने से  हमारा आशय क्या है? हमें बताया जाता है कि मूलरूप से हम शाकाहारी हैं. हमें फलां खुराक खाने और फलां खुराक न खाने के सुझाव दिए जाते हैं. हमें बताया जाता है कि फलां खुराक ही हमारे लिए परमात्मा द्वारा निर्धारित की गयी है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. जब तक मनुष्य स्वयं उत्पादन की क्रिया में शामिल नहीं  हुआ तब तक उसे  अपनी खुराक के लिए उस इलाके की परस्थितियों और उपलब्धता पर निर्भर रहना पड़ता था.

उत्तरी ध्रुव के मूल निवासी तरह-तरह के मकान बनाते थे. कुछ जनजातियाँ उत्तरी अमेरिका के तटों पर तहखाने रुपी मकान बनाते थे. जमीन में गढा खोदकर पत्थर की दीवारें खड़ी की जाती थीं जो जमीन से थोडी ऊपर की ओर उभरी होती थीं. इन्हें छत से ढांप दिया जाता था. मकान के अन्दर पहुँचने के लिए गहरी सुरंगों से होते हुए जाया जा सकता था. इन सुरंगों की दीवारें भी पत्थरों की बनी होती थीं जिनके ऊपर भी पत्थरों के छत होती थीं. अलास्का में इस प्रकार के मकानों में पत्थर के स्थान पर लकड़ी के तख्ते इस्तेमाल किये जाते थे. बहुत ही संकरी सुरंग द्वारा इसके अंदर प्रवेश किया जा सकता था. ऐसा दुश्मनों और जंगली जानवरों से बचाव हेतू किया जाता था. लेकिन अगर न पत्थर हो और न ही लकड़ी, तब क्या किया जाये? इस स्थिति में लोग मकान बनाने हेतू बर्फ का प्रयोग करते थे. आज भी ग्रीनलैंड के मैदानों में एस्किमों लोग अपने प्रसिद्ध मकान इग्लू बनाने के लिए बर्फ का प्रयोग करते हैं. एस्किमों राज-मिस्त्रियों की मुहारत हैरानकुन है. बर्फ की सीलियों को काटकर  इस प्रकार रखा जाता है कि एक गोल गुबंद खडा हो जाता है. इन बर्फ की दीवारों को मजबूत करने के लिए इस गुबंद के अन्दर एक दिया जो सील मछली की चर्बी से जल रहा होता है, ले जाया जाता है. इसकी गर्मी से बर्फ की दीवारों की अन्दर की ओर की कुछ बर्फ पिघल जाती है और दीवारों से थोडा-थोडा पानी सरकाना शुरू हो जाता है. इसके बाद ठंडी हवा को अन्दर प्रवेश करने दिया जाता है जिससे यह पानी जम जाता है और सीलियाँ आपस में मजबूती से जुड़ जाती हैं और इनके बीच का खालीपन ख़त्म हो जाता है. इसके पश्चात कुछ ही घंटों और दिनों में इग्लू की दीवारें बहुत मजबूत हो जाती हैं क्योंकि इनपर बर्फ का जमना जारी रहता है. इग्लू में प्रवेश करने का ढंग बहुत अजीब है. यह अकेला ऐसा मकान है जिसमें बर्फ की ही बनी हुई लम्बी सुरंग द्वारा फर्श से (दीवार में दरवाजा नहीं रखा जाता) प्रवेश किया जाता है.

संसार के दूसरे मकानों के मुकाबले इग्लू को आरामदायक कतई नहीं कहा जा सकता. इसकी ऊंचाई लगभग दो मीटर और व्यास तीन-चार मीटर होता है. इस थोडी सी जगह में भी दो परिवार रहते हैं. अगर चाहें तो इग्लू को बड़ा भी बनाया जा सकता है. अपनी सभाए आयोजित करने के लिए एस्किमों लोग बारह-बारह मीटर व्यास के इग्लू भी बनाते हैं. वहां मकान सामग्री बर्फ है जिसकी कोई कमीं नहीं है. लेकिन समस्या यह है कि मकान को गरमाने के लिए सील की चर्बी के दीये और मानवी शरीर से निकलने वाली गर्मी की आवश्यकता होती है. इसलिए स्वाभाविक है कि मकान जितना छोटा होगा उतना गर्म भी आसानी से होगा. इसमें गर्मी में भी रहा जा सकता है. यह सर्दी से ही नहीं गर्मी से भी बचाव करता है. वैसे तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश में गर्मी की ऋतु बहुत छोटी होती है और गर्मीं की इस ऋतू में भी वहां कोई विशेष गर्मीं नहीं होती. गर्मियों में इग्लू में प्रवेश करने के लिए फर्श के साथ दीवार में सुराख़ किया जाता है. बर्फ की दीवारें रोशनी को अन्दर जाने देती हैं. इसमें खिड़कियाँ भी रखी जा सकती हैं. दीवारों में सुराख़ किया जाता है और बर्फ की पतली और पारदर्शक पर्त लगा दी जाती है. आमतौर पर ऐसा किया भी जाता है. ऐसा लगता है कि यूरोप के मकानों की बनवाट के बारे में जानकारी होने के पश्चात एस्किमों लोगों ने इस प्रकार की खिड़कियाँ लगाने के प्रयोग करने शुरू कर दिए थे. पहले ऐसा नहीं था.

सदियों पहले इग्लू किस प्रकार के रहे होंगे, यह कोई भी नहीं बता सकता. इन मकानों की आयु ज्यादा लंबी नहीं होती. इसलिए इन मकानों की खोज पुरातत्वविदों को निराश ही करती है. हाँ, हम इतना जरूर जानते हैं कि इग्लू में बसने वाले लोगों की सभ्यता के तत्त्व मौजूद हैं. यहाँ खिड़कियों में समुद्री जीवों की पारदर्शक अंतड़ियों का प्रयोग किया जाता था. घर के अन्दर चारों तरफ समूर वाले जानवरों की खालें टंगी होती थीं. परंतु यहाँ भी ग्रीनलैंड की भांति सारा फर्नीचर बर्फ का ही होता था जो चमड़े और समूर से ढंका होता था. सारा फर्नीचर बर्फ के बेंचों के रूप में होता था जिनपर लोग बैठते, खाना खाते और आराम करते थे. वैसे औजारों और हथियारों के लिए इग्लू की काख में बर्फ की छोटी-छोटी कोठियां भी बनाई जाती थीं.  जमीन में गढा खोदकर उसमें खाने-पीने की वस्तुएं भी रखी जाती थीं. बेरन जलडमरू के मध्य तटों पर रहनेवाले एलउत लोग व्हेल मछली की पसलियों को जमीन में गाड़कर और उनपर सुखी घास बिछाकर घर बनाते थे. बाद में व्हेल मछलियों की हड्डियों के स्थान पर समुद्र में आनेवाले वृक्षों के तनों का प्रयोग होने लगा. ये मकान ग्रीनलैंड के इग्लू मकानों से कहीं अधिक बड़े होते थे. इन मकानों का क्षेत्रफल सौ वर्ग मीटर से भी अधिक हो सकता था. पर बड़े मकानों में लोग और भी अधिक तंगी का शिकार होते थे. इस प्रकार के मकानों में लगभग पचास परिवार अपने-अपने रहने का हिस्सा टाट द्वारा बाँट लेते थे.

उपरोक्त सभी कौमें उस जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूप का उदाहरण हैं जिसमे प्राकृतिक संपत्ति को मात्र हस्तगत किया जाता है. यहाँ कोई उत्पादन नहीं किया जाता. यह भी उस उपकरण की प्रतिनिधि है जिसको समुद्री जीवों के उत्तर ध्रुवीय शिकारी कहा जाता है. एस्किमों, तिप्ता, एलउत आदि का शिकार बहुत विभिन्नता लिए हुए नहीं है. व्हेल, सील, वालरस, सफ़ेद रींछ आदि का ही शिकार किया जाता है. इनका शिकार आसानी से किया जा सकता है क्योंकि एक या दो प्रकार के जीवों के शिकार के लिए बहुत अधिक मुहारत की आवश्यकता नहीं पड़ती. पत्थर, हड्डी, व्हेल के बालों और समुद्र में बहकर आनेवाली लकड़ी से कई तरह के औजार – लड़ाई के और गृह-गृहस्ती में काम आनेवाले  – बनाये जाते थे. लकड़ी के ढांचे और खालों को तानकर बनायीं गयी इनकी नावें हलकी फुलकी होती थीं. व्हेल के शिकार के लिए एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश जाने के लिए बनी इन नोकाओं में एक सौ से भी अधिक व्यक्ति बैठ सकते थे.

उत्तर ध्रुवीय निवासी लोगों के वस्त्र गर्म और आरामदायक होते थे. अन्तरिक्ष में जानेवाले लोगों के वस्त्र इन्हीं लोगों के वस्त्रों की नक़ल अनुसार बने हुए हैं. यूरोपीय लोगों का कोट पैंट भी किसी हद तक इन लोगों के वस्त्रों के आधार पर बनाया गया है. उत्तर ध्रुवीय प्रदेश और शीतोष्ण और उष्ण कटिबद्ध प्रदेश , जहाँ-जहाँ पर लोगों ने ख़ास किस्म का शिकार अपना लिया – फंदे, जाल, धनुष और बर्छिया बना ली और बंजारे  शिकारी और कंदमूल इकठ्ठा करनेवालों के स्थान पर लम्बे समय के लिए रहने के लिए बस्तियों का निर्माण कर लिया गया – वे वहां के स्थाई निवासी बन गए और उन्होंने औजारों और आहार के भण्डारण के तरीकों को खोज निकला. दूसरे शब्दों में, जहाँ हस्तगतकरण पर आधारित जीवन पद्धति ने उत्तम रूप धारण कर लिया वहां बहुविधि-भौतिक-आत्मिक संस्कृति का निर्माण हुआ और जटिल संरचनाएं प्रकट हो गयीं.

हस्तगतकरण से उत्पादन की ओर – अगली किश्त में

भोजन की खोज द्वारा दूसरी प्रकृति का निर्माण

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पिछली बार हमने मानव की जैविक जरूरतों जैसे भोजन, आराम करना आदि के बारे में चर्चा की थी. अब हम इनपर एक-एक करके विस्तार से चर्चा करेंगे. सबसे पहले भोजन की खोज द्वारा दूसरी प्रकृति के निर्माण की चर्चा. कई धार्मिक लोग कहते हैं कि जिसे चोंच मिली है उसे चुगा भी मिलेगा, परमात्मा पत्थरों में भी कीडों को देता है, उबलते पानी में भी जीव मिलेगा. जबकि सभ्यता और सस्कृति का इतिहास इससे उल्ट खून-पसीने से लबरेज है. हमारे बड़े-बूढेरे कंदमूल इकठ्ठा करते थे और शिकार किया करते थे. हाथ में लाठियाँ लिए वे वनों, मैदानों, तपते रेगिस्तानों में घूमते रहते थे. उन्हें खाए जा सकने वाले फलों, सब्जियों और कन्दमूलों की हजारों किस्मों के गुण और लक्षणों का पता था. अब हम उनके नाम और पहचान से अनभिज्ञ हैं. शिकारी अपने शिकार की आदतों के जानकर थे.

२० सदी के एक प्रसिद्द नरविज्ञानी लुई स्विकी अफ्रीकनों की परंपरागत शिकार विधियों का निरक्षण करते हुए इस नतीजे पर पहुंची कि खरगोश को पकड़ना कोई मुश्किल कार्य नहीं है. हमारे यहाँ भी अगर हम खरगोश पकड़ने वालों से बात करें तो  हमें पता चल जाता है कि दिन के समय खरगोश जिस रास्ते से होकर गुजरता है, उसी रास्ते से ही वापस आता है. ख़रगोश और अन्य जंगली जानवरों को जिन्दा रहने के लिए भोजन बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है. उन्हें अपनी उर्जा को बचाकर रखना होता है. निश्चित मार्गो पर चलकर ही वे ऐसा कर सकते हैं. शिकारियों को बस उनके रास्ते में बैठना या जाल अथवा शिकंजा लगाना होता है. लुई स्विकी लिखती हैं कि खरगोश शिकारी को देखते ही दौड़ना शुरू कर देता है. खरगोश की यह खासियत है कि मुड़ते समय वह अपने कानों को पीछे पीठ के साथ सटा लेता है. शिकारी समझ जाते हैं कि यह अब बाएं या दायें मुडेगा. मान लीजिये शिकारी दायीं और भाग रहा है और उसका अनुमान सही रहता है तो शिकार सीधा उसकी झोली में आ गिरेगा. अगर वह बायीं और भी मुडेगा तो वह पास की किसी झाडी में छुपेगा. खरगोश यह जानता है कि उसकी चमडी का रंग उसे छुपाने में मदद करेगा. लेकिन मानव की आँखे तो सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज को देखने के योग्य है. मानव बेशक तेज नहीं दौड़ सकता लेकिन बुद्धिमान होने के कारण उसे जानवरों की आदतों के बारे में पता है. मनुष्य के शरीर का गठन इस प्रकार का है कि शिकार के दौरान वह बाखूबी अपने ज्ञान का उपयोग कर सकता है.

शिकार के समय प्राचीन मानव ही नहीं बल्कि आज के मनुष्य भी बड़ी सहनशीलता का सबूत देते हैं. जैसे पानी में कांटा डालकर लम्बे समय तक मछली के फंसने का इंतजार करना. इसी प्रकार शिकार करते समय वे अपने कुत्तों के पीछे मीलों दूर तक निकल जाते हैं. मैक्सिको के तारामोरा इंडियन हिरणों का तब तक पीछा करते हैं जबतक वे थककर निढाल नहीं हो जाते. वे दो-दो, तीन-तीन दिनतक जानवरों का पीछा करते रहते हैं. रास्ते के हर छोटे टुकड़े पर हिरण मानव को आसानी से पीछे छोड़ देता है. पर मानव उसके पैरों के चिह्नों की खोज जारी रखता है. खोज बताती है कि यह मानव नहीं बल्कि हिरण ही होता है जो मानव से पहले थकता है. अगर शिकारी पशुओं के रास्ते जानता है या उसे विश्वास है कि पशु अपने प्राणों की रक्षा करते हुए वक्र रेखा में दौड़ता जायेगा तो शिकारी अपनी उर्जा और ताकत बचाते हुए सीधा उसके पास , अनुमानित स्थान पर पहुँच जाता है.

शिकारी और कंदमूल के संग्रहकर्त्ता उद्यमी और जिज्ञासू लोग थे. पशु-पक्षी और वनस्पतियों के बारे, अपने चौगिरदे और संसारव्यापी  घटनाओं के बारे, हर नई जानकारी उनके ज्ञान और अनुभव को बढाती रही. इस काल के दौरान मानव प्रकृति से उसकी देन लेता रहा और साथ-साथ प्रकृति की नई-नई देनों को लेने की तरकीब सीखता गया. शिकारी और संग्रहकर्त्ता उन हालातों में जीने के अनुकूल सिद्ध हुए. वे पृथ्वी के बड़े भूभाग पर बस गए. ऐसा उस समय से बहुत पहले हुआ जब उनके पूर्वजों ने धरती में पहले बीजों की बुआई की और अपने मित्र और सेवकों की खोज की. पर्वतों के उस पार क्या है? अनजान झील,  बड़ी नदी के उस पार क्या है?  ये सदैव उनकी जिज्ञासा का केंद्र रही हैं. प्राचीन काल से रहस्य मानव को भयभीत ही नहीं करता रहा बल्कि आकर्षित भी करता रहा है. और मानव की ज्ञान की प्यास आज भी शांत नहीं हुई है.

अज्ञात और अनजान खतरों से टक्कर लेने वाले लोग हर युग में पैदा हुए हैं. परंतु इन मतवाले लोगों की खोजों को बढाचढा कर नहीं देखना चाहिए. लोगों को नगरों, पर्वतों, सागरों नदियों से पार लेजाने वाली शक्ति यात्रा का चाव नहीं बल्कि उनकी मजबूरी, उनकी जरूरत थी. यूरोप के निवासी बर्फ नदियों के दक्षिणी किनारे पर रहने वाले पशुओं का शिकार करने के लिए वैसे-वैसे ही पीछे चलते रहे जैसे-जैसे नदिया पीछे उत्तर की ओर खिसकती गयी और जानवर पीछे हटते गए. वे अब उन वनों में नहीं रह सकते थे जहाँ पशु-पक्षियों की संख्या कम हो गयी थी. उदाहरण के लिए सूखे के कारण शिकार की संख्या में कमी हो गयी. अपने इलाके में आहार की पूर्ति कम हो गयी. लोगों का एक दल अलग होकर अपने लिए एक नया आवास ढूँढने के लिए निकल पड़ा. या ऐसा हुआ कि बस्ती में कहीं ओर से कुछ नए लोग आ गए. उन्हें भूख ने अपने इलाके से खदेड़ दिया था. उन्होंने यहाँ इस नए इलाके को अपने लिए ठीक समझा. उनकी संख्या और ताकत यहाँ के मूल निवासियों से अधिक थी. इस स्थिति में  मूल निवासियों के लिए मारे जाने या उस इलाके को  छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं था.

अमेरिकन इतिहासकार बी. हार्पर ने ऑचएलैउत और मैक्सिकन और उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले एक्सिमों लोगों की जीवन पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन किया है. तुले सभ्यता के एक्सिमों लोगों ने चार सौ वर्षों के दौरान अलास्का से ग्रीनलैंड तक पांच हजार किलोमीटर की दूरी तय की. प्रति वर्ष साढे बारह किलोमीटर. इसके विपरीत द्वीपों पर बसने वाले लोगों की प्रवास की गति कम थी. इस अंतर के पीछे क्या कारण है? एलैउत  लोग उपजाऊ भूमिपर बसे हुए होने के कारण लम्बे समय तक उसी स्थान पर बसे रहते थे जबकि उस स्थान पर जहाँ ज्यादा भ्रमण प्रकट होता है उस बारे में बी. हार्पर लिखते हैं कि यह निरक्षण नई बस्तियों के बसाए जाने से भी संबंधित हो सकता है. अमेरिकी इंडियनों के बूढेरों ने महाद्वीपों पर भू-स्थल के रास्ते प्रवेश किया. यह एक जीव-जंतु रहित मरूस्थलीय इलाका था. वे इसे जल्दी से जल्दी पार कर देना चाहते थे जबकि इसके विपरीत एलैउत लोगों को रास्ते में समृद्ध समुद्रीय परिवेश मिला. इससे नई दुनिया की ओर प्रस्थान करने की उनकी रफ्तार में कमी आई.

कभी तेज तो कभी धीमे, कभी पैदल तो कभी तैरकर या नावों की मदद से, अपने सफ़र को जारी रखते हुए, मनुष्य दक्षिणी ध्रुव के अलावा संसार के हर भू.भाग पर पहुँच गया. आदिम युग के कंदमूल इकठ्ठा करने वाले और शिकारी लोगों को कई बार लंबे समय तक भूखा रहना पड़ता था. धीरे-धीरे अपने अनुभव के द्वारा मानव ने सीखा कि जो कुछ भी सामने आता है, उसे खाना ठीक नहीं है. बल्कि कुछ विशेष पक्षियों और मछलियों का शिकार ही ठीक है. आज से कई दस हजार वर्षों पहले एशिया और यूरोप के मैदान और कटेशिया और उत्तरी अफ्रीका के निवासियों की उदर-पूर्ति शिकार द्वारा ही होती थी. क्रीमिया के पत्थर युग से पूर्व की अनेक हड्डियों के नमूने प्राप्त हुए हैं. इनकी गिनती से पता चला कि ६८.५ प्रतिशत हड्डियाँ जंगली गधों, घोडों और जैबरे आदि की थीं. सौंची नगर के नज़दीक हुई खुदाई और खोज से पता चलता है कि कई दस हजार वर्षों पूर्व जहाँ बसने वाले लोग विशेषतय बैल का मांस खाते थे जबकि मध्य एशिया के लोगों का  प्रमुख आहार भैंसे का मांस था.

एक लाख वर्ष पूर्व विशेषीकरण और  हथियारों के विकास ने लोगों की शिकार करने की दक्षता के लिए बेहतर उपाय निकालने में मदद की. शिकार करने के कुछ दुखदायी नतीजे भी निकले. प्राचीन गुफाओं के अध्ययन से पता चलता है कि वहां पर रहने वाले जीवों की कई प्रजातियाँ बिलकुल विलुप्त हो गयी क्योंकि अपने पेट की आग भूझाने के लिए मानव इन्हें पूरी तरह से चट कर गए. पुरातत्त्वविदों के अनुसार ५० व्यक्तियों के एक समूह को ६०० ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति के हिसाब से एक वर्ष के लिए ११ टन मांस की जरूरत पड़ती थी. मैन्मथन के शिकार के साथ १०० वर्गकिलोमीटर के क्षेत्र में लगभग डेढ टन मांस ही मिलता था. इसका अर्थ यह हुआ कि बच्चो समेत एक ५० व्यक्तियों के समूह को सात-आठ सौ वर्ग किलोमीटर तक के शेत्र में शिकार करना पड़ता था. इस उदाहरण से स्पष्ट है कि साढे पांच हजार वर्गकिलोमीटर के विशाल भू-भाग पर केवल तीस-पैंतीस हजार लोग ही गुजर-बसर कर सकते थे.

प्रकृति और जीवन प्रशिक्षण का इतिहास –

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संस्कृति की विभिन्नता और मानव का विकास – अंतिम किश्त

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प्रत्येक व्यक्ति अपने जनगण के प्रतिनिधि के तौर पर उस जनगण की  लाक्षणिक सांस्कृतिक विशेषताओं का वाहक होता है. जैसे एक व्यक्ति जब किसी अन्य स्थान पर जाता है तो उसने अगर पगडी बांधी हुई है तो वह अपने जनगण का प्रतिनिधित्व ही कर रहा होता है. इस प्रकार की विशेषताएँ जैव या आनुवंशिक या शारीरिक रूप से प्राप्त नहीं होती बल्कि  इन्हे हम अपने माता-पिता या बड़े-बुढेरों से ग्रहण करते हैं. कोई व्यक्ति किस जाति का है यह बात उसके जन या वंश द्वारा और इससे भी बढ़कर उसके पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा द्वारा निर्धारित होती है जिसके दौरान वह व्यक्ति उस नवजाति  जिसमें वह पैदा हुआ है, उस नवजाति के लक्षण जड़ीभूत करता है. अलग-अलग  देशों में लोगों के रीति-रिवाजों , आदतों और आचार-विहार की विलक्षणता असीम प्रतीत होती है और मानव संस्कृति की  भिन्नता की वह अभिव्यक्ति है जो पहली नज़र में ही स्पष्ट नज़र आती है. समस्त विश्व के लिए ऐतिहासिक विकास की एकसमान नियमों की सीमाओं के अन्दर लोगों ने जीवन-पद्धति के सैंकडों-हजारों रूपान्तरों का निर्माण किया है. संसार को प्रवर्तित करते हुए लोग स्वयं खुद को इस संसार के और इन परिवर्तनों को भी अनुकूल ढालते हैं. वे भविष्य की अपनी-अपनी राह तलाशते हैं और राह का निर्माण भी करते हैं. संसार की प्रत्येक जाति, प्रत्येक राष्ट्र एक विशेष जीवन-पद्धति का सुन्दर प्रयोग है, उस जीवन-पद्धति का जो आदतों और प्रथाओं से, नियमों और नैतिकता से, कला और उस सबसे जिसे संस्कृति कहते हैं, से निर्मित होती है. जीवन-पद्धति की नवजाति विशेषता हर जाति के ठोस, ऐतिहासिक व्योरों का प्रमाण है.प्रत्येक जाति की विलक्षणता अपने भूगोलिक प्रवेश और दूसरे जनगण के साथ उत्पादन के माध्यमों के द्वारा अनन्त क्रिया की विशेषता की प्रतिछाया है. उदाहरण के लिए हमारे पहरावे में बाहर से आनेवाले शासक वर्गों का असर रहा है और अब पश्चिम के परिधानों का असर पड़ रहा है. इस प्रभाव के आदान-प्रदान के दौरान इसमें सामंजस्य ही नहीं होता है बल्कि इसमें टकराव भी होता है.

दिक और काल में, पांचों महाद्वीपों में, अनेक शताब्दियों के दौरान मानव जाति का सांस्कृतिक विकास होता आया है. आओ हम अब बारीकी से परखे कि संस्कृति किन-किन कार्यभारों को निभाती आई है. अपनी सारी विविधता के साथ संस्कृति को उन सभी सफल और असफल उत्तरों का कुलयोग माना जा सकता है जो लोगों के सामाजिक अस्तित्व के क्षेत्र में, और अस्तित्व द्वारा पैदा हुई उनकी सामाजिक चेतना के क्षेत्र में, मानव और मानव दलों की जरूरतों के लिए निर्मित होते हैं. संस्कृति के भिन्न-भिन्न प्रकार इन जरूरतों की पूर्ति करते हैं. हमारी वे कौन-कौन सी जरूरते हैं जिनकी पूर्ति संस्कृति द्वारा होती है? सबसे पहली जरूरत है उदर-पूर्ति, पेट भरना, सोना, तंदरूस्त रहना अपने वंश को जारी रखना. ये सभी जरूरतें तो पशुओं की भी हैं परंतु जीवन के लिए जरूरी इन जरूरतों की मानव जब पूर्ति करता है तो उसमें कई विशेषताएं शामिल होती हैं. ये जरूरतें दूसरी प्रकृति अर्थात संस्कृति के द्वारा पूर्ण होती हैं. जैव-जरूरतों की पूर्ति के उपायों में मनुष्य ने गहरे परिवर्तन किये हैं. इनके सिलसलों में कार्ल मार्क्स की एक टिपण्णी बड़ी ध्यान आकर्षित करने योग्य है. वे कहते हैं कि भूख तो भूख है बेशक वह  मांस को पकाकर छूरी-काँटों की मदद से खाकर मिटाई जाती है – यह भूख उस भूख से बिलकुल भिन्न है जिसके लगने पर हाथों, नाखूनों और दांतों द्वारा कच्ची बोटियों को निगला जाता है. दूसरी प्रकृति द्वारा रक्षात्मक कामों की पूर्ति के लिए जीवन-जरूरतों की तुष्टि में ऐसा रुपान्तरण स्पष्ट रूप में प्रकट होता है. यह दूसरी प्रकृति मनुष्य की वर्षा से रक्षा छत द्वारा करती है, उसके शरीर पर चोगा-कुरता आदि पहनाती है और सिर पर पगडी या टोपी. इस सबको आधारभूत जीवन-निर्वाह की संस्कृति कहा जाता है.

संस्कृति का कहीं अधिक महत्वपूर्ण काम कुछ और भी है, वह है इस संसार का कायाकल्प जो मानव की उन जरूरतों का उत्तर प्रस्तुत करता है जो किसी अन्य जीव की नहीं हैं. यह उत्तर सबसे पहले भौतिक संपत्ति और उत्पादन साधनों और औजारों के उत्पादन में प्रकट होते हैं. लोगों का परस्पर मेलजोल जरूरी होता है. इसके अनुरूप ही संस्कृति उनको मेलजोल के ऐसे साधन प्रदान करती है जो केवल मनुष्य को ही प्राप्त हैं. किसी भी समाज का अस्तित्व केवल तभी बना रह सकता है जब उसके सदस्य आचार-विहार और रहन-सहन के निश्चित नियमों का पालन करें. कोई ऐसा समुदाय नहीं है जिसमे उसके जीवन को नियमित करने के मानक न हों. कोई भी ऐसा विकसित समाज नहीं है जिसके पास उसके समाज और उसके आर्थिक आधार और उत्पादन के संचालन की प्रणाली न हो. लोगों के परस्पर संबंधों का नियमन भी संस्कृति करती है. मानव वंश जारी है. मानव जाति के लंबे इतिहास में प्रेम का जो रुपान्तरण हुआ है, यह शायद संस्कृति के विकास की सबसे अधिक ज्वलंत अभिव्यक्ति है. वंश जारी रखने की सहज वृति तो सभी जीवों में है लेकिन मनुष्य में यह एक उदात भावना बन गयी है जिसने आत्मिक भावना से भरपूर मनुष्य में श्रेष्ट, सच्चे मानवी गुणों को उभारा है. मानव वंश का पुनरुत्पादन लोगों की नई पीढियों को शिक्षित करने की जरूरत के साथ गहरे रूप से जुडा हुआ है. यह शिक्षा-दीक्षा और चरित्र-निर्माण किसी भी समाज का सबसे महत्वपूर्ण कार्यभार होता है क्योंकि इसकी बदौलत ही समाज संस्कृति के लगातार विकास के कार्य को जारी रख सकता है. आराम भी मनुष्य की एक बड़ी जरूरत है. अपने मूल में यह जैव जरूरत है लेकिन काफी हद तक इसकी पूर्ति संस्कृति के साधनों से ही होती है. एक और शुद्ध मानवी जरूरत है, जिसे मानव ने लाखों वर्ष पूर्व ग्रहण किया है, वह है संसार का ज्ञान प्राप्त करने और उसकी व्याख्या करने की मनुष्य की भूख. यह कहा जा सकता है कि ज्ञान और विज्ञान और कला की उत्पति का सेहरा इस बात को है कि मानव ने मानव जाति की खोज की, मानवता को जाना, इतिहास में अपने स्थान को समझा. संस्कृति की घटनाये बहुआयामी हैं, मनुष्य के सामने अपने अलग-अलग पहलू उभार सकती है. होमर की प्रस्तुतियां कभी नृत्य की धार्मिक रचनाएँ थीं लेकिन प्राचीन साहित्य का रस लेते हुए हम इसके बारे में नहीं सोचते. विज्ञान आज एक विराट शक्ति है लेकिन किसी ज़माने में यह मनुष्य की व्यवहारिक समस्या को हल नहीं करता था बल्कि यह केवल जादू द्वारा उनका मनोरंजन मात्र करता था.

आनेवाले आलेखों में हम देखेंगे  कि किस प्रकार मानव ने इस संसार को अपने रहने लायक बनाया और संस्कृति के आर्थिक पहलू का विकास किया और किस प्रकार इसने  सबसे पहले जीव की नर्सैगिक जरूरत – उदर पूर्ति की संस्कृति को विकसित किया.

संस्कृति की विभिन्नता और मानव का विकास – दूसरी किश्त

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भोजन पकाने की विधियों में भी नवजाति संस्कृति की विशेषता प्रकट होती है. पहले पंजाब में तंदूर की रोटी ही प्रधान रही है .कई इलाकों में इसे हाथों द्वारा थपथपाकर फैलाया जाता था तो कई इसे किसी और तरह से बनाते थे. लेकिन अब रोटी के बनाने में एक ही तरह का तरीका प्रधान होता जा रहा है. रोटी किस अनाज की बनाई जानी है, इसमें भी विभिन्नता थी. पंजाब में और अमेरिका और लैटिन अमेरिका के देशों में मक्के की रोटी रही है, कई जगह चने की तो कहीं बाजरे की. गेहूं की रोटी तो बस कल ही की घटना है. पहले तो गेहूं की रोटी को पकाया जाता था और सब्जी बनायीं जाती थी लेकिन सिर्फ घर में आये मेहमान के लिए.

यूरोपियन लोग एक-दूसरे से मिलते समय हाथ मिलाते हैं पर जापानी और चीनी और बहुत सारे भारतीय लोग हाथ मिलाना पसंद नहीं करते. हमारे यहाँ आमतौर पर बड़ों के पैर-छूहने की परम्परा रही है. बहुतेरे जापानी और यूरोपियन लोग इस तरह से सोचते थे कि अंजान लोगों से किस प्रकार हाथ मिलाया जा सकता है. पंजाबी औरतें आपस में गले मिलती हैं लेकिन अब यह कम होता जा रहा है. वियनावासी कहता है कि मैं हाथ का चुम्बन लेता हूँ लेकिन हाथ चूमता नहीं जबकि वारसावासी किसी औरत से मिलते समय सचमुच हाथ का चुम्बन लेते हैं. अंग्रेज अपना पत्र ‘डियर’ से शुरू करता है बेशक वह इसे क्रोध में आकर ही लिखे, बेशक उसने पत्र के प्राप्तकर्त्ता पर कोई अभियोग ही लगाना हो ! इसाई गिरजे में प्रवेश करते समय अपना सिर नंगा कर लेते हैं जबकि यहूदी, मुस्लमान और सिक्ख इसे ढक लेते हैं. यूरोपियन लोगों का शोक का रंग काला हैं जबकि चीन और भारत का सफ़ेद. जब चीनी लोग पहलीबार किसी यूरोपवासी या अमेरिकन व्यक्ति को किसी औरत की बाँहों में बाहें डालकर या चूमते हुए देखते हैं तो उन्हें बहुत शर्म महसूस होती है. यूरोप के लोग बच्चों को समझाते हैं कि अगर किसी के घर जाएँ तो जूठन नहीं छोड़नी है लेकिन चीनी अंत में परोसी गयी चीज को छोड़ देते हैं. अगर ऐसा नहीं होता है तो मेजवान उसे भूखा समझेगा.

प्रत्येक राष्ट्र को अपनी संस्कृति साधारण, सहज और एक उसी की ही सही लगती है. लेकिन दूसरे जनगण का व्यवहार अटपटा और चकित करने वाला लगता है. भारतीय हैरान होते हैं कि यूरोपियन औरतें अपने पति को नाम लेकर बुलाती हैं. बुल्गारिया के लोग ‘हाँ’ कहने के लिए अपने सिर को दायें-बाएं घुमाते हैं और ‘नहीं’ के लिए आगे-पीछे. घाना की संपती जाति में दामाद अपनी सास से बात नहीं कर सकता. हमारे यहाँ राजस्थान में भी ऐसा है और सास अपने दामाद से भी पर्दा करती है. एक बार एक स्विस यात्री न्यू चिली में शिकार के बाद पपुया कबीले के मुखिए के साथ भोजन कर रहा था. वह हड्डी पर बचे हुए थोड़े से मांस को मुखिया के लिए छोड़ देता था. इस बचे हुए गोश्त को पूरा खाने के बाद ही वह मुखिया हड्डी फेंकता था. उसके दोस्त ने पूछा कि इसका मतलब क्या है? तो उसने बताया कि अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो मुखिया नाराज होगा. यहीं मित्रता की निशानी है. हमारे लिए यह ऐसा होगा जैसे किसी कुत्ते के साथ व्यवहार किया गया हो.पंजाब में भी मित्रता के लिए एक ऐसा ही मुहावरा है कि उन दोनों की रोटी दांतों तले पिसती है, दोनों की एक ही बुरकी है.

बातचीत करते समय बीच की दूरी कितनी हो, इसपर भी  अलग-अलग राष्ट्रों में अलग-अलग धारणाएं हैं हैं. उत्तरी अमेरिकावासी को यह पसंद नहीं है कि कोई उसके बिलकुल साथ सटकर बातचीत करे. उसके लिए बीच की दूरी कम से कम ७५ सेंटीमीटर होना आवश्यक है जबकि लेटिन अमेरिकावासी के लिए यह दूरी बहुत ज्यादा है.

सुन्दरता की अवधारणायें भी भिन्न-भिन्न हैं. कौन सुन्दर है, कौनसा रंग सुन्दर है, लम्बा होना सुन्दर है या फिर ठिगना, इस बारे में भी जनगणों में बहुत अधिक विभिन्नता पाई जाती है. उदाहरण के लिए प्राचीन समरात लोगों को  सिर का प्राकृतिक रूप पसंद नहीं था. वे इसे सुन्दरता के लिहाज से अपनी कल्पना के अनुसार बदलते थे. इनके रहने के स्थानों की खुदाई के दौरान पुरातत्त्वविदों को बड़े हैरान करने वाले खोपड़ियों के आकार बरामद हुए हैं. अपने सिर के आकार में तबदीली करने वाले केवल समरात लोग ही नहीं थे बल्कि पेरू के इंक लोग जिनकी सभ्यता स्पेनियों ने नष्ट कर दी, भी ऐसा करते रहे हैं. वे सिर को दो हिस्सों में बाँट लेते थे. बच्चों के सिर की हड्डियाँ नर्म होती हैं. वे इस पर एक पट्टी बाँध लेते थे. इससे बीच में एक दरार पड़ जाती थी. सुन्दरता की धारणाएं कुछ सामाजिक कारकों से भी जुडी होती हैं. जैसे कि बहुत से जनगणों में लम्बे नाखून इस बात का प्रतीक हैं कि उन्हें धारण करनेवाला व्यक्ति बहुत बड़ा है और वह शारीरिक श्रम से मुक्त है.  पूर्व के कुछ देशों में नाखूनों को खतरनाक आकार तक बढ़ने दिया जाता है और इसे कुलीन वंश के होने का चिह्न समझा जाता है. कभी-कभी लोग नाखूनों पर चाँदी के खोल चढा लेते हैं. कहीं-कहीं लम्बे नाखूनों का मतलब धार्मिक व्यक्ति होने से भी है.

कुछ लोग नत्थ पहनते हैं तो कुछ लोग इसपर बड़े हैरान होते हैं जबकि उनकी स्वयं की औरतें कानों में गहने पहनती हैं. मलाया और मौरी कबीले के लोग अपने बच्चों की नाक को चपटा रखना पसंद करते थे जबकि इसके एकदम विपरीत १६वीं शताब्दी के फ्रांस में बाज जैसी नाक का होना बहुत सुन्दर माना जाता था और वहां की औरतें अपने बच्चों की नाक को खींचती रहती थीं ताकि वह पतली और लंबी हो जाये. कहीं-कहीं लम्बी गर्दन होना सुन्दरता की निशानी माना जाता है. जार्जिया के लोग बच्चों को इस प्रकार सुलाते थे कि उसका सिर पीछे की ओर लटक जाये. इस तरह से वे उसकी गर्दन को लम्बा करते थे. पूर्वी अफ्रीका के लोग औरतों की गर्दनों को लंबा करने के लिए छल्ले डालते जाते हैं. इस प्रकार मानव शरीर को बनावटी आकार देने की बहुत सारी विधियां रही हैं. इसी प्रकार मानव अंगों पर गोदने का रिवाज भी रहा है. कई इलाकों में सीधे आकार की टांगे सुन्दर मानी जाती हैं. घूमंतरू और पशुपालक कबीले के लोगों में वक्राकार टांगे अच्छी और सुन्दर मानी जाती है. इससे चलना और दौड़ना आसान होता है. मरू-भूमि के लोगों की टाँगे सीधी होती हैं जबकि जहाँ बैलों से हल चलाया जाता है, वहां लोगों की टांगे खम्म धारण कर लेती हैं. इसलिए काल्मिक लोग बच्चों के पालने में एक कूपी रख देते थे ताकि टाँगें थोडी सी टेढी हो जाएँ.  प्राचीन युनानवासी सीधी टांगों को ही सुन्दर मानते थे. न्यूजीलैंड के मौरी कबीले के आदिवासी बच्चे के घुटने पर थोड़े-थोड़े समय के बाद चोट मारते रहते थे ताकि उसकी टांगे सीधी रहें. ओशियाना के कुछ कबीलों में दांत तोड़ देने का रिवाज रहा है. वहां टूटे हुए दंत का मुंह सुन्दर माना जाता रहा है. प्राचीन मैक्सिको की माया सभ्यता के लोगों के बारे में एक रुसी लेखक लिखते हैं कि माता अपनी बच्ची को सुन्दर बनाने के लिए माथे और सिर के पीछे एक-एक फटी बांध देती थी ताकि उसका माथा सीधा, चौडा और सपाट हो जाये. इसी प्रकार उसके सामने के बालों की लटों से एक गोली बांध दी जाती थी. इसे लगातार देखने पर उस लड़की की नज़र तिरछी हो जाती थी. इसे सुन्दर समझा जाता था जबकि हमारे यहाँ इसे सुन्दर नहीं नुक्स समझा जाता है. पश्चिमी और दक्षिण एशिया के लोग बड़ी आँखों को सुन्दर मानते हैं.

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संस्कृति की विभिन्नता और मानव का विकास

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यह आलेख उपरोक्त पंजाबी ऑडियो का हिंदी रूपांतरण है

संस्कृति है क्या ? संस्कृति दूसरी प्रकृति है. एक वह प्रकृति है जिसका प्रसार हम अपने चारों तरफ पाते हैं. यह प्रकृति मनुष्य से स्वतन्त्र तौर पर निर्मित और विकसित हुई और इसके निर्माण और विकास का इतिहास भी मानव से पहले का है. दूसरी प्रकृति वह है जिसे मानव ने निर्मित किया है और मानव इस दूसरी प्रकृति के निर्माण के दौरान स्वयं इस प्रकृति की रचना भी बना है. अर्थात मानव और दूसरी प्रकृति के अंतरविरोध द्वारा गतिशील संस्कृति और मानव के बीच द्वंदात्मक रिश्ता है.

संस्कृति की विभिन्नता

सही-सही कहा जाये तो नवजाति संस्कृति के लोग एक-दूसरे से इसलिए भिन्न हैं क्योंकि भिन्न-भिन्न जनगण एक समान ज़रूरतों की पूर्ति हेतू की जाने वाली आवश्यक क्रियायें आमतौर पर अलग-अलग तरीकों से करते हैं. उदाहरण के लिए बैठने की क्रिया को लीजिये. हम भारतीय नीचे भूमि पर ही बैठ जाते हैं जबकि यूरोपियन लोग ऐसा नहीं करते. रूसी लोग या यूरोपियन लोग खाना खाते समय मेज-कुर्सी का प्रयोग करते हैं, लेकिन हम जो हलवाहक कौमें रही हैं, नीचे धरती पर बैठकर ही खाना खा लेते रहे हैं या फिर पीढे बगैर का प्रयोग करते रहे हैं. और खाते समय केवल हाथों का प्रयोग करते हुए खाना खाते रहे हैं जबकि कश्मीरी लोगों को हाथों द्वारा रोटी तोड़कर खाना नहीं आता. हमारे लिए यह यूं लगता है जैसे कि यही, हमारे वाला तरीका ही, सही है. प्रत्येक संस्कृति के लोग ऐसा ही अनुभव करते हैं. वे ऐसा अनुभव करते हैं कि उनका स्वयं का ढंग सही और प्राकृतिक है जबकि दूसरों का नहीं. जैसे पंजाब के माझा इलाके की स्त्रियाँ रोटी के जिस तरफ चुपड़ लगाती हैं वहीँ दोआब की स्त्रियाँ इसके विपरीत ओर चुपड़ लगाएंगी. अगर ये दोनों एक जगह इकट्ठी हो जाएँ तो एक दूसरी से संबोधित करते हुए कहेगी कि वे लोग रोटी के गलत ओर चुपड़ लगाती हैं जबकि दूसरी स्त्री कहेगी चुपड़ लगाने का उनका तरीका गलत  हैं. इस प्रकार अगर बैलों को लें तो हम देखते हैं कि गाडीवानों और हलवाहकों के बैलों को हांकने के लिए भी अलग-अलग दिशाएं लेनी पड़ती हैं. जापानी लोगो उकडूं बठकर खाना खाते हैं जबकि काफी लोग कालीन बिछाकर. यूरोप के लोग एक लंबे अभ्यास के बिना चौकड़ी लगाकर बैठ ही नहीं सकते. और न वे उकडूं बैठ सकते हैं. यूरोपियन औरतों के लिए घुटनों के बल लंबे समय तक बैठना बहुत कष्टदायक है लेकिन जापानी औरतों के लिए यह बिलकुल सहज क्रिया है. जापान में कुर्सी पर बैठने का रिवाज बड़ी मुश्किल से प्रचलित हुआ. अफ्रीका के जूलू कबीले के लोगों के आराम करने का तरीका बहुत अजीब किस्म का है. वे एक टांग पर खड़े होकर, बगुले की तरह, आराम करते हैं. वे एक टांग पर खड़े हो जाते हैं और दूसरे पैर की ऐडी को घुटनों की डिस्क पर सटाकर आराम करते हैं. वैसे ही जैसा घोड़ा अपने एक तरफ के दोनों पैरों पर झुककर आराम कर लेता है. मलाया के लोग सोते समय अपने सिर के नीचे चौंकी रख लेते हैं. दक्षिण अफ्रीका के आदिवासी लोग वृक्षों की लटकती हुई टहनियों के बीच झूले से बनाकर, वहीँ आराम कर लेते हैं.

इस प्रकार विभिन्नताएं अनगिनत हैं. अगर इस प्रकार की विभिन्नताएं कौमों या समूहों से संबंधित हों, तो उन्हें कौमी-क्षेत्रीय या नवजाति-क्षेत्रीय  विभिन्नताएं कहा जाता है. खाना, सोना या आराम करते समय अपनी मांस-पेशियों को तनावमुक्त करना होता है. यह क्रियायें मूल रूप से जैविक क्रियायें हैं. जैविक क्रियायों के आधार पर अपनी संस्कृति का निर्माण करते समय, मानव ने एक ही समान क्रिया की पूर्ति हेतू भिन्न-भिन्न प्रकार के ढंगों को विकसित किया है. इस प्रकार मानव की इन जैविक क्रियायों की पूर्ति ने ही सामाजिक-सांस्कृतिक रूप धारण कर लिया. ठीक-ठीक कहा जाये तो एक नहीं अनेकों रूप धारण कर लिए हैं. नवजाति की विशेषता इस तथ्य में भी प्रकट होती है कि लोग किस प्रकर काम करते हैं, किस प्रकार के औजारों का प्रयोग करते हैं, किस प्रकार के वे मकान बनाते हैं, उनका पहरावा कैसा है इत्यादि.

प्राचीन काल में लुहार कुल्हाडी और कस्सी जैसे औजारों को अलग-अलग रूप में बनाते रहे हैं.औजारों के निर्माण में भी किसी स्थान की विशेष ज़रूरतों के हिसाब से अलग-अलग रूपों में विभिन्नता पाई जाती है.अतीत में रूसी लोग लकडी के मकान बनाते रहे हैं. जब भी उन्हें, किसी कारण वश, अपने इलाके को छोड़ना पड़ता और किसी अन्य क्षेत्र में, जहाँ लकडी प्रयाप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होती थी, जाना पड़ता, वे वहां तहखानों में रह लेते लेकिन सोचते यही थे कि जब भी वे मकान बनायेंगे, बनायेंगे लकड़ी के ही. लेकिन लंबा समय उसी स्थान पर गुजारने के बाद ही वे लोग वहां की स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल मकान-निर्माण हेतू करने लगे. उक्रेनी किसान, आमतौर पर, बैलगाडी का प्रयोग करते हैं, रूसी किसान घोडागाडी का. इसी प्रकार पंजाब के किसानों की बैलगाडी हरियाणा के किसानों की बैलगाडी से अलग तरह की होती है. आगे पंजाबियों में भी, दोअब, माझा और मालवा के किसानों की बैलगाडियों के रूप में भी विभिन्नता पाई जाती है. माझा और दोअब के किसान बैलगाडी के जुल्ले को केवल एक रबड़ के टायर से ढीला-ढाला बांध लेते थे. इससे होता यह था कि एक बैल आगे और दूसरा  बहुत पीछे रह जाता था लेकिन मालवा के किसान जुल्ले को रस्सियों द्वारा मजबूती और कलात्मक तरीके से बांधते रहे हैं. हरियाणा के किसानों की लकड़ी की गाड़ी पर लोहे का फाल चढा होता था.

एक ज़माने की, उज्बेक लोगों की कशीदाकारी की हुई टोपी देखें तो उनके उज्बेकी होने का पता चल जाता था. रूसियों की टोपी रूसी, यूरोपियन देशों की अलग-अलग तरह की टोपियाँ होती हैं. हमारे यहाँ राजस्थान के  हर जिले की अपनी अलग-अलग पगड़ी है. पगड़ी देखकर ही पता चल जाता है कि यह व्यक्ति किस जिले का रहनेवाला है. इसी प्रकार पंजाब में जट्टों की पगड़ी बनियों की पगड़ी से भिन्न प्रकार की होती है. बनिए, आमतौर पर, पीछे से, पगड़ी को उठाकर, सिर के निचले भाग को नंगा रखते हुए और एक तरह किनारा छोड़कर पगड़ी बांधते रहे हैं जबकि जाट पगड़ी की शुरुआत जूड़े (बालों की गांठ) से किया करते थे. पटियाला वालों की पगड़ी पटियाला-शाही नाम से मशहूर रही है. इस प्रकार औरतों के पहरावे के बारे में भी कहा जा सकता है. पंजाब के माझा और दोअब की औरते जब घर से ओढ़ना लेकर निकलती थी, उसे ‘दुहरा’ कहा जाता था. मालवा की औरतों द्वारा अपनी चुन्नरी को कानों के ऊपर से ओढ़ने के कारण पहचाना जा सकता था. लेकिन अब पहरावे में एकरूपता आती जा रही है. पुरषों में पैंट, शर्ट और कोट जबकि औरते ब्लाउज़  और स्कर्ट. भारतीय औरतों में साडी-ब्लाउज़ के अलावा  सलवार-कमीज़ का प्रचलन बढ़ता जा रहा है. अब कौमी पहरावे तो केवल त्योहारों के समय ही नज़र आते हैं.

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हम अब भी लालगढ़ में हैं – चत्रधर महतो

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हम अब भी लालगढ़ में हैं, ऐसा कहना है लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) के आदिवासी नेताओं का. मंगलवार, 30 जून को आन्दोलनकारी आदिवासी नेता चत्रधर महतो ने इस बात से इंकार किया कि वह लालगढ़ छोड़कर भाग गया है. उसने कहा कि वह अभी भी पश्चिमी बंगाल के इस अशांत इलाके में “मेरे अपने लोगों के साथ” है. ” मैं अभी भी लालगढ़ में रुका हुआ हूँ और मेरे इस क्षेत्र से भागने का सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि मैंने कोई जुर्म नहीं किया”, ‘पुलिस अत्याचार के खिलाफ गठित लोक समिति’ (PCAPA) जिसने सात महीने पहले एक वस्तुत: ” मुक्त क्षेत्र ‘की स्थापना के खिलाफ नेतृत्व किया था, के मुखिया महतो का ऐसा कहना है. महतो और एक अन्य  PCAPA के सदस्य एक प्राइवेट बंगाली टेलिविज़न चैनल पर बातचीत कर रहे थे. महतो ने स्टार आनंद के साथ टेलीफोन पर इंटरव्यू देते हुए कहा,

“लालगढ़ से भागने का सवाल ही नहीं पैदा होता. मैं पूरी तरह से लोगों के साथ हूँ और उनके साथ बना रहूँगा. पुलिस अत्याचार के खिलाफ लालगढ़ में मैंने एक जनवादी लहर शुरू की थी.”

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार झूठ  द्वारा उसका सम्बन्ध  माओवादी गुरिल्लाओं के साथ जोड़कर उसकी छवि को दूषित करने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा “वे मुझे माओवादी सिद्ध करना चाहते हैं जोकि मैं नहीं हूँ.”

पहले सुरक्षा बलों और राज्य सरकार का कहना था कि PCAPA के  महतो, सिद्धू सोरेन और कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी और बिकाश जैसे कुछ अग्रणी नेता अशांत क्षेत्र से उस वक्त से भगौड़े हैं जब 18 जून को केंद्रीय अर्धसैनिक और राज्य पुलिस के द्वारा राज्य की राजधानी कोलकत्ता से 200 किलोमीटर दूर  संयुक्त सुरक्षा आपरेशन शुरू हुआ. पुलिस का कहना था कि महतो भाग खडा हुआ था और उसने बांकुड़ा  जिले में पनाह ले ली थी और सोरेन ने पश्चिमी मिदनापुर के शलबोनी में जबकि दो बड़े माओवादी पड़ोस के झारखण्ड की ओर कूच कर गए. सोरेन ने टेलिविज़न चैनल से यह भी कहा कि

“मैं अब कांटापहाड़ी  क्षेत्र में हूँ. मैं क्यों भागूं जब मैंने कुछ गलत नहीं किया है? हमने तो केवल पुलिस संत्रास के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई है जो कि हमारा जनवादी अधिकार है”. “हमारा आंदोलन बंद नहीं किया जा सकता जब तक कि वे (बल) अनावश्यक रूप से हमारी महिलाओं और बच्चों को तंग करना बंद नहीं करते. अब हम अपने भविष्य की कार्रवाई की योजना पर काम कर रहे हैं.”, ऐसा उनका कहना है.

लालगढ़ तब से उबल रहा है जब पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव भटाचार्य और दो अन्य केंद्र सरकार के मंत्री  श्री राम विलास पासवान और श्री जितिन प्रसाद के पथरक्षक दल के रूट पर बारूदी सुरंग फटी थी. इस ब्लास्ट के बाद पुलिस पर  अत्याचारों का आरोप लगाते हुए स्थानीय क्रुद्ध आदिवासियों ने, जिन्हें माओवादियों का समर्थन हासिल था, आन्दोलन शुरू किया और पश्चिमी मिदनापुर जिले से इस क्षेत्र को काटते हुए और सिविल प्रशासन को खदेड़कर वस्तुतः प्रशासन अपने हाथ में ले लिया. राज्य के तीन पश्चिमी जिलों मिदनापुर, बांकुडा और पुरुलिया के इक्कीस पुलिस स्टेशनों के क्षेत्र में माओवादी सक्रिय हैं. Fraternally, PratyushGet Yourself a cool, short @in.com Email ID now!

pratyush1917@in.com द्वारा marxist-leninist-list@lists.econ.utah.edu पर प्रेषित ईमेल से साभार

इस चिट्ठे की ओर से

विकास तो होना ही चाहिए, विकास उनके लिए सर्वोपरि है चाहे इसके लिए कोई अपनी ज़र-ज़मीन से उखड जाता है. यह बात नहीं है कि आदिवासियों की भलाई के लिए उन्हें माओवादियों से मुक्त करवाया जा रहा  है बल्कि अपने मुनाफे की हवस के लिए इन्हें विकास तो करना ही है – हम भी मानते हैं कि विकास ज़रूरी है लेकिन पूंजीवाद के विकास का रूप अब किसी भी प्रकार से रोल मॉडल नहीं रह गया है. मुनाफे की हवस से हर चीज जो प्राकृतिक है , उसे बलात नष्ट किया जाता है.वनों की अंधाधुंध कटाई, अधिक से अधिक कृषि उपज लेने के लिए  कृषि योग्य भूमि पर बढ़ता हुआ कृत्रिम खाद, कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों का बोझ , बेशी मूल्य की जमाखोरी से बेशी उत्पादन और प्रदुषण – पूंजीवादी के अराजक उत्पादन और वितरण ढांचे ने इस पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है. लेकिन पूंजीवाद की यह अराजकता सभ्यता की दौड़ में पिछडे आदिवासियों पर किसी बर्बर हमले से कम नहीं होती. फिर भी पूंजीवाद एक तीर से दो शिकार करता है – एक उनके प्राकृतिक संसाधनों की लूट और दूसरा उन्हें एक ऐसी सभ्यता में खींचता है जहाँ उनकी किस्मत में  सबसे सस्ती श्रम-शक्ति की पूर्ति करना लिखा होता ताकि यह  मांग से अधिक बनी रहे और  मजदूरी की दर निम्न से निम्न रहे. पूंजीवाद के अपने तरीके और तर्क से आदिवासी आबादी को इस तरह सभ्यता में खींचने की परिणति इन आदिवासियों के लिए  उज़रती गुलाम, बच्चों के भिखारी और औरतों के  वेश्यावृति में रुपानान्तरण में होती है.

“बुर्जुआ वर्ग ने, जहाँ पर भी उसका पलडा भारी हुआ, वहां सभी सामंती, पितृसत्तात्मक और काव्यात्मक संबंधों का अंत कर दिया.  उसने मनुष्य को अपने “स्वाभाविक बड़ों” के साथ बांध रखने वाले नाना प्रकार के सामंती संबंधों को निर्ममता से तोड़ डाला; और नग्न स्वार्थ के, “नकद पैसे-कौडी” के हृदयशुन्य व्यवहार के सिवा मनुष्यों के बीच और कोई दूसरा सम्बन्ध बाकी नहीं रहने दिया. धार्मिक श्रद्धा के स्वगोपम आनंदातिरेक को, वीरोचित उत्साह और कूपमंडूकतापूर्ण भावुकता को उसने आना-पाई के स्वार्थी हिसाब-किताब के बर्फीले पानी में डुबो दिया है. मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को उसने विनिमय मूल्य बना दिया है, और पहले के अनगिनत अनपहरणीय अधिकारपत्र द्वारा प्रदत्त स्वातंत्रों की जगह अब उसने एक ऐसे अंत:करणशून्य स्वातंत्र्य की स्थापना की है जिसे मुक्त व्यापार कहते हैं. संक्षेप में, धार्मिक और राजनीतिक भ्रमजाल के पीछे छिपे शोषण के स्थान पर उसने नग्न, निर्लज्ज, प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की स्थापना की है…”

“…सभी स्थिर और ज़डीभूत सम्बन्ध, जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वाग्रहों तथा मतों की एक पूरी श्रृंखला जुडी हुई होती है, मिटा दिये जाते हैं, और सभी नए बनने वाले सम्बन्ध ज़डीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं. जो कुछ भी ठोस होता है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है, और आखिरकार मनुष्य संजीदा नज़र से जीवन के वास्तविक हालत को, मानव-मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है.”

मार्क्स और एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ से लिया गया उपरोक्त उद्धरण चरितार्थ हो रहा है लेकिन विडम्बना देखीए कि यह सब उनके नेतृत्व में  हो रहा है जो खुद को मार्क्सवादी कहलाते हैं.

सांस्कृतिक मोर्चे पर अन्तरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण का प्रश्न

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कहने की आवश्यकता नहीं कि जीवन के हर क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का नज़रिया व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भों में हर-हमेशा अन्तरराष्ट्रीयतावादी होता है। लेकिन आज पूँजी के भूमण्डलीकरण के नये दौर में, एक ओर जहाँ बुर्जुआ राष्ट्रवाद क्षरित-स्खलित होकर, अपनी ऐतिहासिक सकारात्मकता खोकर फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद का लगभग समानार्थी-सा बन गया है, वहीं सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावादी चेतना का ज्यादा मज़बूत और व्यापक भौतिक आधार भी तैयार हुआ है।

सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावाद के दो सन्दर्भों की चर्चा प्रकारान्तर से ऊपर के दो उपशीर्षकों के अन्तर्गत आ चुकी है। पहली बात, राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियों का दौर बीतने के बाद राष्ट्रवाद के रणनीतिक नारों का झण्डा सर्वहारा वर्ग और मुक्तिकामी जनों के विरुद्ध अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। अन्तरविरोध आज सीधे-सीधे श्रम और पूँजी के दो शिविरों के बीच है। संस्कृति के मोर्चे पर आज यह एक अति महत्त्वपूर्ण काम है कि हम फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद सहित प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ राष्ट्रवाद की संस्कृति का व्यापक भण्डाफोड़ और विरोध करें और श्रम की संस्कृति का, अन्तरराष्ट्रीयतावादी श्रमिक एकजुटता के विचार का विकल्प सामने रखें। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति दो चीज़ें हैं। राष्ट्रवाद एक बुर्जुआ परिघटना के रूप में जब अपनी ऐतिहासिक प्रासंगिकता खो देगा, तब भी देशभक्ति की भावना व संस्कृति बनी रहेगी। वह बुर्जुआ देशभक्ति की संस्कृति न होकर सर्वहारा देशभक्ति की संस्कृति होगी। सर्वहारा वर्ग ही अपने देश की जनता, संस्कृति और प्रकृति को वास्तविक प्यार करता है और अपने देश में समाजवाद की विजय के बाद वह समाजवादी मातृभूति की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार रहेगा।

दूसरी बात, जब हम अपनी सांस्कृतिक-वैचारिक परम्परा की बात करते हैं तो इसका एक पक्ष है हमारे देश की मुक्तिकामी जनता के इतिहास की विरासत और दूसरा पक्ष है, पूरी दुनिया के सर्वहारा संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों से जुड़ी सांस्कृतिक विरासत और पूरी दुनिया की मुक्तिकामी जनता की सांस्कृतिक विरासत। यही संस्कृति के क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का सही-सन्तुलित अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिया है।

जब हम सांस्कृतिक क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग के अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिए की बात करते हैं तो उसका मतलब सिर्फ यही नहीं होता कि पूरी दुनिया के सर्वहारा वर्ग के कला-साहित्य की समृद्ध सम्पदा को हम अपनी विरासत के रूप में स्वीकार करते हैं, इसका मतलब यह भी होता है कि यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन काल के मानवतावादी, जुझारू भौतिकवादी, जनवादी साहित्य तथा उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप और रूस के महान यथार्थवादी और क्रान्तिकारी जनवादी साहित्य की पूरी परम्परा का हम अपने को उत्तराधिकारी मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि समूचे विश्व के समग्र क्लासिकीय साहित्य-सम्पदा को हम अपनी विरासत मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि किसी भी देश के सर्वहारा का क्रान्तिकारी सांस्कृतिक आन्दोलन विश्व मज़दूर आन्दोलन के अतिरिक्त, सभी देशों के राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों, प्रतिरोध संघर्षों और जन-आन्दोलनों के दौर के कला-साहित्य की विरासत को अपनाता है, उनका द्वन्द्वात्मक विश्लेषण करता है तथा उनके ज़रूरी अवयवों को आत्मसात कर लेता है। यह महज़ एक सैद्धान्तिक `अप्रोच´ का सवाल नहीं, ठोस व्यावहारिक कार्रवाई का मुद्दा है। एक उदाहरण लें। अफ्रीकी जनता के प्रतिरोध-संगीत, अमेरिकी अश्वेतों के प्रतिरोध संगीत, मेक्सिको व लातिन अमेरिकी देशों की अधूरी क्रान्तियों और किसान संघर्षों के दौरान सृजित क्रान्तिकारी संगीत – इन सभी में पूंजी की सत्ता, वर्चस्व और उत्पीड़न के प्रतिरोध के तत्त्व हैं, समानता के स्वप्न हैं, संघर्ष की आग है। भारतीय सर्वहारा का संगीत आन्दोलन अपने देश के जन संघर्षों के गीत-संगीत और लोक संगीत के अतिरिक्त उपरोक्त अन्तरराष्ट्रीय विरासत को भी अपनाएगा और इस सतत्-सुदीर्घ प्रक्रिया में सर्वहारा संगीत की सार्वभौमिक सम्प्रेषणीयता, उसकी एक सच्ची “अन्तरराष्ट्रीय भाषा” विकसित होगी। यही बात सर्वहारा के समाजवादी यथार्थवादी थिएटर और सिनेमा के लिए, तथा साहित्य के लिए भी लागू होती है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ , शिशिर-बसंत 2002 से साभार