संसदीय

चुनाव, राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी

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हमने लिखा था कि वर्तमान संसदीय प्रणाली द्वारा मजदूर वर्ग कभी सत्ता प्राप्त नहीं कर सकता. लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि मजदूर वर्ग चुनाव प्रक्रिया में बिलकुल भाग नहीं लेता. एक वोटर के रूप में वह इसमें भाग जरूर लेता है लेकिन प्रभुत्वशाली लोगों में से किसी एक को चुनने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं होता.मजदूर वर्ग और पूंजीपति वर्ग के परस्पर विरोध द्वारा एक्यबद्ध और गतिशील वर्तमान वर्गीय समाज जो कि अलग-अलग पड़ावों से गुजरकर वर्तमान पूंजीवादी जनवादी प्रणाली के साथ प्रकट होता है, अपने पूर्व के वर्गीय समाजों की भांति सम्पत्तिहीन – वर्तमान में सर्वहारा वर्ग को – सत्ता में कितनी भागीदारी दे सकता है (या नहीं दे सकता है), की जाँच-पड़ताल हेतू जरूरी है कि हम कुछ अति महत्वपूर्ण तथ्यों और आंकडों पर नजर दौडाएं जो हाल ही में संपन्न हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में सामने आये हैं.  इससे हम यह भी आसानी से समझ सकते है कि किस प्रकार यह चुनाव प्रणाली पूंजी और जनता के बीच चलने वाले विरोध का हल करती है. चुनावों की हकीकत को जानने के लिए और इस पूरी चुनाव प्रक्रिया की सार्थकता संबंधी आम लोगों में जाकर उनके नज़रिए को जानने की कोशिश करें तो इसकी असलियत को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है. हमारी इस रिपोर्ट का आधार पिछले दिनों संपन्न हुई विधान सभा के चुनावों पर अलग-अलग लोगों के विचार और प्रतिक्रियाएं हैं.

1. पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान चाहे वे राजनीतिक दलों के मंच रहे हों या फिर प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के – बहस का स्तर बहुत निम्न दर्जे का रहा है. इनकी बहस में गंभीर किस्म के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सरोकार गायब थे. राजनीतिक दलों में बहुत निम्न स्तर की लांछनबाजी  देखने को मिली. स्वयं बुर्जुआ वर्ग द्वारा स्वीकृत आचार-व्यवहार का पूर्ण अभाव नजर आया. गंभीर सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों की अपेक्षा, जीत-हार संबंधी जोड़-तोड़, धार्मिक और जाति आधारित प्रतिक्रियावादी समीकरणों द्वारा जोड़-घटा के फार्मूलों की खोज और समीक्षा का प्रभुत्व था.

2. अख़बारों और टीवी पर अपने हक़ में प्रचार करवाने हेतू और अपने विरोधी उम्मीदवार के विरुद्ध -समाचार प्रकाशित करवाने हेतू, लाखों और करोडों के सौदे तय हुए. मीडिया की रिपोर्ट अनुसार कई दैनिक अख़बारों ने २५ से ५० लाख तक के सौदे किये.

3. सारी चुनाव प्रक्रिया इतनी महँगी थी कि देश की बहुसंख्यक आबादी अपने आप ही, इस चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित हो गयी है.  चुनाव दफ्तर से जारी सूचना में उम्मीदवारों के रोजाना खर्च का ब्योरा प्रकाशित किया गया है. इनकी रिपोर्ट के अनुसार कुछ उम्मीदवारों का दैनिक खर्च दो सौ रूपये से तीन सौ रूपये तक का था. इन वेचारे गरीब उम्मीदवारों में कुछ ऐसे उम्मीदवारों के नाम भी शामिल थे जिनकी चुनाव मुहीम की तामझाम, लाम-लश्कर और खर्चीली चुनाव रैलियों की आभा मध्यकालीन युग के राजाओं-महाराजाओं को भी मात दे दे!  चुनाव कमीशन को भले ही यह सब नज़र न आया हो लेकिन आम लोग पानी की तरह बहाए जानेवाले इस धन और शक्ति के प्रदर्शन के प्रत्यक्ष गवाह हैं.

4. वाम संसदीय पार्टियाँ जो सैद्धान्तिक तौर पर लोगों प्रति प्रतिबद्धता का दावा करती रहती हैं – इस सारे दृश्य के आन्तरिक सच का पर्दाफाश करते हुए, मजदूर और मेहनतकश लोगों की चेतना को उन्नत करने की बजाय, लगभग दूसरी पार्टियों की तरह इस्तेमाल होने वाले हथकंडों की नक़ल करती हुई नज़र आयीं. प्रतिस्पर्धा के इस युग में जिस प्रकार मण्डी में छोटा उत्पादन, बड़े स्तर पर होने वाले उत्पादन के आगे, नहीं टिक सकता, उसी तरह, संसदीय वामपंथी पार्टियाँ भी लगातार हाशिये पर आ रही हैं.

लोग चुनावों में हिस्सा क्यों लेते हैं – किस तरह लेते हैं ?

सैद्धांतिक तौर पर कहा जाता है कि चुनाव द्वारा लोग अपनी सरकार चुनते हैं जिसने आनेवाले पॉँच वर्षों के लिए देश या संबंधित राज्य का प्रबंधन संचालित करना  होता है. सरकार इस समग्र राजतन्त्र जिसमें पुलिस, फौज और न्यायपालिका भी सम्मलित होती है, का एक अहम् हिस्सा होती है.  सभ्यता के इतिहास में राज्य-प्रबंधन के सञ्चालन के लिए बननेवाली सरकारों के रूप सदैव एक जैसे नहीं रहे. आदिम समाज के कबीलाई गणराज्यों से चलकर पूरे मध्य युग में राजशाहियों के अलग-अलग रूपों से गुजरते हुए सरकारों का आधुनिक रूप – जिसे जनता की जनता  द्वारा और जनता  के लिए सरकार का नाम दिया जाता है – आज के विश्व में, सरकार का प्रमुख रूप (मॉडल ) है. राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान इसी रूप अथवा मॉडल से संबंधित तथ्यों ने जिस तस्वीर को उभार कर हमारे सामने पेश किया है, उनका संक्षिप्त परिचय और सार निम्नलिखित है.,

1. सबसे पहले, चुनावों के दौरान सबसे अधिक क्रियाशील हिस्सा – राजनीतिक पार्टियाँ और उनके कार्यकर्त्ताओं की बात करें. बड़ी राजनीतिक पार्टियों की टिकट के लिए दौड़, जहाँ प्रचार माध्यम के लिए बड़ा मसाला तैयार करती रही, वहीँ आम जनता में इस संबंधी चर्चा ने पूरी चुनाव मुहीम को दिलचस्प बनाये रखा. टिकट हासिल करने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते हैं – बड़ी गिनती में टिकटों के चाहवान अपने-अपने हक़ में मुहीम लामबद्ध करते हैं.  लोगों की भीड़ जुटाकर दवाब बनाया जाता है. लेकिन दिलचस्प पहलू यह होता है कि वे कौन लोग होते हैं जो इनकी भीड़ जुटाते हैं? ये वहीँ लोग होते हैं जिनकी बहुसंख्यक गिनती को राजनीतिक पार्टियाँ अपने सक्रीय और जमीन से जुड़े हुए कार्यकर्ता बताती हैं. इन्हीं स्थानीय लोगों में, आर्थिक तौर पर प्रभावशाली और राजनीतिक पृष्ठभूमि के परिवारों से कुछ बेहद महत्त्वाकांक्षी नौजवान, नेतृत्त्व की भूमिका निभाते दीखाई देते हैं. गरीब किसान, मध्यम वर्ग और दलित मजदूर वर्ग से भी कुछ लोग , बेशक दूसरे दर्जे की भूमिका निभाने के लिए ही सही, इनका हिस्सा बनते रहते हैं. लोगों के काम निकलवाने के नाम पर बने ये स्वयंभू लोकसेवक, प्रशासन और आम लोगों में मध्यस्ता करने के साथ-साथ, ज्यादातर पुलिस के मुखबिर और टाउट का धंधा करते हैं. किसानों और मध्यम वर्ग का वह हिस्सा जो  पूंजीवाद के विकास के फलस्वरूप उजड़कर ऐयाश, पाकेटमार, चोर, उचका आदि बन जाता है, जिसे मार्क्स लम्पट सर्वहारा कहते हैं, भी इसी तरह का लोकसेवक होता है. ज्यादातर इस प्रकार के लोकसेवकों को, किसी राजनीतिक दल के बड़े नेता की सरपरस्ती हासिल होती है. अक्सर ये छोटे नेता भी अपने साथ, अपनी हैसियत अनुसार, चापलूसों का एक घेरा बनाकर रखते हैं. अपनी इसी हैसियत का प्रयोग ये लोग अपनी आर्थिक हालत को सुधारने के लिए करते हैं. इसमें मुख्य तौर पर सरकारी ठेके लेने के अलावा, पुलिस और राजनीतिक नेताओं की सरपरस्ती में, कई तरह के अवैध धंधे भी शामिल होते हैं. यहीं स्थानीय नेता, शहरों और गांवों में, अपने सरपरस्त  नेता का गुणगान करते हुए, उनकी साफ़-सुथरी और स्वच्छ छवि के व्याखान करते, उनकी शक्ति और सामर्थ्य की कहानिया सुनाते हुए, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री और पार्टी के बड़े नेताओं के साथ उनकी नजदीकी का विश्वास दिलाते हुए, आम वोटरों को अपने मनपसंद लीडर के हक़ में फुसलाते हुए, कभी नहीं थकते. पहले ये नेता, अपने सरपरस्त बड़े नेता के लिए टिकट हेतू भीड़ जुटाते हैं फिर उनकी इच्छानुसार वोट डलवाते हैं. गरीब जनता को मिलनेवाली सरकारी सहूलतें, मिसाल के लिए, बुढापा पेंशन, पीले कार्ड बनवाना, गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को सस्ते रेट का अनाज और मकान  बनवाने के लिए ग्रांट वगैरा, जो आधे-अधूरे तरीके से, केवल मुट्ठीभर लोगों के पास ही पहुंचती हैं – इन्हीं सहूलतों का सेहरा, व्यक्तिगत तौर पर अपने सिर लेते हैं. अपने हक़ में वोट भुगताने के लिए ये नेता जी-जान से कोशिश करते हैं.

2. मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में होनेवाले कुत्ताघसीटी वैसे तो प्रतिदिन चौबीसों घंटे चलती रहती है लेकिन चुनावों के समय इसका नज़ारा बहुत ही दिलचस्प हो जाता है. इन वर्गों से संबंधित लोगों के बयान ही नहीं बदलते, दल भी बदल जाते हैं. आश्चर्य और अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है लेकिन है यह सच कि इन्हीं वर्गों से कुछ लोगों द्वारा एक ही दिन में एक से अधिक दलों में अदला-बदली और आना-जाना होता रहता है  और इस प्रकार अपनी शख्सियत की कायापल्टी करते हुए ये लोग अच्छा खासा मनोरंजक समां भी बांधे रखते हैं.

3. किसी भी चुनाव बूथ पर नजर रखने पर आपको लगेगा कि खाते-पीते घराने के लोग दोपहर से पहले ही अपने मत का प्रयोग कर जाते हैं जबकि सर्वहारा जनता दोपहर बाद आती है. बूथ के आस-पास मौजूद लोगों में चर्चा का  विषय होता है कि मजदूर लोग वोट डालने तब आएंगे जब नकद पैसे वसूल कर लेंगे. इस प्रकार की चर्चा से हम यह गलत निष्कर्ष निकाल लेतें हैं कि केवल मजदूर वर्ग अपना वोट बेचता है लेकिन मध्यम वर्ग नहीं. वह भी प्रभावित होता है, बल्कि ज्यादा प्रभावित होता है. या यूं कहिये कि उसकी प्रभावित होने की औकात ज्यादा है और वह अधिक कीमत लेता है. इस वर्ग का एक हिस्सा राजनीती में इस प्रकार सक्रीय होता है कि वह समाज की बहुसंख्यक  आबादी को प्रभावित करता है और उस बहुसंख्यक आबादी के वोटों को भी वेचने की योग्यता रखता है. मध्यम वर्ग का वोट बेचने का तरीका साधारण न होकर जटिल होता है और जरूरी नहीं होता कि वह मजदूर की भांति मौके पर ही सौदा करे. उसके सौदेवाजी के गुर जटिल और दीर्घकालिक होते हैं. इसी वर्ग ने सरकारी पद,लाइसेंस और ठेके हथियाने होते हैं.इसी वर्ग से उजड़कर लम्पट मजदूर के रूप में प्रकट हुए नए वर्ग  के लोग अपने ही नहीं बल्कि मजदूरों के वोट भी बेच जाते हैं. पूंजीपतियों और धनासेठों से मिलनेवाली सफ़ेद और काले धन की थैलियाँ, बुर्जुआ पार्टियों के लोगों द्वारा, प्राय इन्हीं  लोगों को सौंपी जाती हैं, क्योंकि यही वे लोग होते हैं जो पूंजीपतियों की अपेक्षा मजदूर वर्ग में आसानी से घुल-मिल जाते हैं. उन्हें यह सहूलियत होती है की वे पूंजीपतियों द्वारा लुटाई (???) गई इस धनराशी के एक हिस्से को मजदूरों में बाँट सके लेकिन बड़े हिस्से को स्वयं हड़प कर जाएँ.

4. जहाँ तक मजदूर वर्ग के मतदान करने और वोट बेचने का सवाल है तो जिस प्रकार न चाहते हुए भी वह एक उजरती गुलाम  के रूप में पूंजीपतियों के खेतों और कारखानों में सोलह-सोलह घंटे खटने के लिए विवश होता है – उसे अपनी श्रम-शक्ति को बेचना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार वह मजबूरीवश मतदान करने और वोट बेचने के लिए भी बाध्य होता है. पूंजीपति वर्ग और बुर्जुआ मीडिया के लिए चुनाव भले ही एक जश्न रहा हो लेकिन मजदूर वर्ग से बातचीत करने पर इसकी असलियत कुछ और ही बयान करती नज़र आती है.

5. इस क्रियाशील हिस्से की चर्चा के बाद  लोगों के व्यवहार की चर्चा करें तो जो दृष्टान्त नजर आता है वह एकसार नहीं है. अलग-अलग वर्गों में विभाजित होने के कारण लोग, चुनावों के बारे में एक जैसा दृष्टिकोण नहीं रखते. अमीर लोगों, कारखानेदारों, व्यापारियों, उच्च मध्यम वर्ग,पेशेवर लोग (डॉक्टर वकील आदि) और अमीर किसानों के लिए, सरकार और उसके दरबार में दस्तक देनें का यह एक सुनहरी अवसर होता है. तेजी से अमीर होने की लालसा की पूर्ति हेतू राजतन्त्र और खास करके  नौकरशाही और पुलिसतंत्र के साथ मजबूत गठजोड़ करने के लिए, इस तरह के संपर्क आवश्यक होते हैं. इस कार्य हेतू ये वर्ग चंदे मुहैया करवाते हैं. व्यवहारिक तौर पर ये लोग इस चुनाव प्रक्रिया के साथ पूरी तरह जुड़े होते हैं.

6. देश के उत्पादन के साधनों का मालिक बनी भारत की वर्तमान बुर्जुआ जमात के पास बेचने के लिए वह सबकुछ है जो मजदूरवर्ग ने पैदा किया है. इसी के बदौलत उसकी हैसियत एक अच्छे खरीदार की भी बन जाती है. कहने का अर्थ यह है कि वह बिकता नहीं बल्कि खरीददार होता है. एक वर्ग के रूप में वह अच्छी तरह जानता है कि कौन-कौन से राजनीतिक दल, किस हैसियत और रूप में, किस-किस प्रकार की भूमिका, उसके हितों की रक्षा करने हेतू, निभा सकते हैं. मजदूरों को मजदूरी देते समय कठोर और उग्र स्वभाव का यह पूंजीपति वर्ग इन राजनीतिक दलों को चंदा देते समय एकदम उदार और विनम्र दीखता है.

7. ज्यादातर शहरी और ग्रामीण मजदूर और गरीब किसान और छोटे दुकानदार, जिनकी ज़िन्दगी की खुशहाली के सभी दरवाजे बंद हो चुके हैं, निराशा और बेबसी के शिकार हैं. ये लोग दिल से किसी भी पार्टी या नेता पर विश्वास नहीं करते. ऊपर वर्णित राजनीतिक कार्यकर्त्ता जो अमीर होने की लालसा के चलते, हर प्रकार के नैतिक बंधनों से मुक्त हैं, जब गरीब जनता की बेबसी और मजबूरी को अपने हक़ में भुगतान करवाने में सफल हो जाते हैं, तो यह भ्रम पाल लेते हैं कि गरीब वोटरों को खरीद लिया गया है. हर प्रकार के नशे, पैसा, शराब, धार्मिक और जातीय नेताओं के फरमान और डरावे, इनके आम हथियार हैं.

8. बेहद बुरे, सामाजिक-आर्थिक हालात के प्रतिक्रियास्वरूप कुछ लुम्पन तत्त्व पैदा होते रहते हैं. गरीब आबादी के बीच का लुम्पन हिस्सा, बहुत हद तक और जल्दी ही इन लोगों का दुमछल्ला बन जाता है. पर देखने में आया है कि आम मेहनतकश आबादी का विश्वास यह गँवा चुका है. उत्पादन की क्रिया में जैसे उजरती मजदूर अपनी इच्छा के विपरीत, पूंजीपति की शर्तों पर काम करने के लिए मजबूर है – लगभग उसी तरह अपनी बेबसियों के सदके, यह उनके लिए मतदान करता है.

अपनी प्रसिद्ध रचना ‘परिवार, निजी सम्पति और राज्य की उत्पत्ति’ में फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं,

“इतिहास में अब तक जितने राज्य हुए हैं, उन्में से अधिकतर में नागरिकों को उनकी धन-दौलत के अनुसार कम या ज्यादा अधिकार दिए गए हैं, जिससे यह बात सीधे तौर पर साबित हो जाती है कि राज्य सम्पत्तिवान वर्ग की सम्पत्तिहीन वर्ग से रक्षा करने का एक संगठन है. एथेंस और रोम में ऐसा ही था, जहाँ नागरिकों का संपत्ति अनुसार विभाजन किया जाता था. मध्ययुगीन सामंती राज्य में भी यही हालत थी जहाँ राजनीतिक प्रभाव की मात्रा भू-स्वामित्व के पैमाने से निर्धारित होती थी. आधुनिक प्रातिनिधिक राज्यों में जो मताधिकार-अहर्ता पाई जाती है , उसमें भी यह बात साफ़ दिखाई देती है. तिस पर भी स्वामित्व के भेदों की राजनीतिक मान्यता किसी भी प्रकार अनिवार्य नहीं है : इसके विपरीत, वह राज्य के विकास के निम्न स्तर का द्योतक है. राज्य का सबसे ऊँचा रूप, यानि जनवादी जनतंत्र, जो समाज की आधुनिक परिस्थितियों में अनिवार्यत: आवश्यक बनता जा रहा है और जो राज्य का एकमात्र रूप है जिसमें ही सर्वहारा तथा पूंजीपति वर्ग का अंतिम और निर्णायक संघर्ष लड़ा जा सकता है – यह जनवादी जनतंत्र औपचारिक रूप से स्वामित्व के अंतर का कोई ख्याल नहीं करता. उसमें धन-दौलत अप्रत्यक्ष रूप से, पर और भी ज्यादा कारगर ढंग से, अपना असर डालती है. एक तो सीधे-सीधे राज्य के अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के रूप में, जिसका क्लासिकीय उदाहरण अमरीका है. दूसरे, सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज को अपना केंद्र बनाती हुई न केवल यातायात को, बल्कि उत्पादन को भी अपने हाथ में केन्द्रित करती जाती हैं, उतनी ही अधिक आसानी से यह गठबंधन होता जाता है. अमरीका के अलावा नवीनतम फ्रांसीसी जनतंत्र भी उसके ज्वलंत उदाहरण हैं और नेक बुढे स्विटज़रलैंड ने भी इस क्षेत्र में काफी मार्के की कामयाबी हासिल की है. परन्तु सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज के इस बन्धुत्वपूर्ण गठबंधन की स्थापना करने के लिए जनवादी जनतंत्र की आवश्यकता नहीं है. इसका प्रमाण इंग्लैंड के अलावा नवीन जर्मन साम्राज्य भी है, जहाँ कोई नहीं कह सकता कि सार्विक मताधिकार लागू करने से किसका स्थान अधिक ऊँचा हुआ है -बिस्मार्क का या ब्लाइखरोडर का. अंतिम बात यह है कि सम्पत्तिवान वर्ग सार्विक मताधिकार के द्वारा सीधे शासन करता है. जब तक कि उत्पीडित वर्ग – परिणामस्वरूप इस मामले में सर्वहारा वर्ग – इतना परिपक्व नहीं हो जाता कि अपने को स्वतन्त्र  करने के योग्य हो जाये, तब तक उसका अधिकांश भाग वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को ही एकमात्र संभव व्यवस्था समझाता रहेगा और इसलिए वह राजनीतिक रूप से पूंजीपति वर्ग का दुमछल्ला, उसका उग्र वामपक्ष बना रहेगा. लेकिन जैसे-जैसे यह वर्ग परिपक्व होकर स्वयं अपने को मुक्त करने के योग्य बनाता जाता है, वह अपने को खुद अपनी पार्टी के रूप में संगठित करता है, और पूंजीपतियों के नहीं, बल्कि खुद अपने प्रतिनिधि चुनता है. अतएव, सार्विक मताधिकार मजदूर वर्ग की परिपक्वता की कसौटी है. वर्तमान राज्य में वह इससे अधिक कुछ नहीं है और न कभी हो सकता है; परन्तु इतना काफी है. जिस दिन सार्विक मताधिकार का थर्मामीटर यह सूचना देगा कि मजदूरों में उबाल आनेवाला है , उस दिन मजदूर पूंजीपतियों की ही तरह जान जायेंगे कि उन्हें क्या करना है.”

वे आगे लिखते हैं,

“इस संविधान को अपनी नींव बनाकर सभ्यता ने ऐसे-ऐसे काम कर दिखाए हैं, जो पुराने गोत्र-समाज की सामर्थ्य के बिल्कुल बाहर थे.  परंतु ये काम उसने किये मनुष्य की सबसे नीच अंतर्वृत्तियों  और आवेगों को उभारते हुए और उसकी तमाम अन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचाकर विकसित करते हुए. सभ्यता के अस्तित्व के पहले दिन से लेकर आज तक नग्न लोभ ही उसकी मूल प्रेरणा रहा है. धन कमाओ, और धन कमाओ और जितना बन सके उतना कमाओ ! समाज का धन नहीं, एक अकेले क्षुद्र व्यक्ति का धन – बस यही सभ्यता का एकमात्र और निर्णायक उद्देश्य रहा है. यदि इसके साथ ही समाज में विज्ञान का अधिकाधिक विकास होता गया और समय-समय पर कला के सम्पूर्णतम  विकास के युग भी बार-बार आते रहे, तो इसका कारण केवल यह था कि धन बटोरने में आज जो भारी सफलताएँ प्राप्त हुई हैं, वे विज्ञान और कला की इन उपलब्धियों के बिना प्राप्त नहीं की जा सकती थीं.”

“सभ्यता का आधार चूँकि एक वर्ग का दूसरे वर्ग का शोषण है, इसलिए उसका सम्पूर्ण विकास सदा अविरत अंतर्विरोध के अविच्छिन्न क्रम में होता रहा है. उत्पादन में हर प्रगति साथ ही साथ उत्पीडित वर्ग की, यानि समाज के बहुसंख्यक भाग की अवस्था में पश्चादगति भी होती है. एक के लिए जो वरदान है, दूसरे के लिए आवश्यक रूप से अभिशाप बन जाता है. जब भी किसी वर्ग को नयी स्वतंत्रता मिलती है, तो वह दूसरे वर्ग के लिए नए उत्पीडन का कारण बन जाती है… जहाँ बर्बर लोगों में अधिकारों और कर्त्तव्यों के बीच भेद की कोई रेखा नहीं खिंची जा सकती थी, वहां सभ्यता एक वर्ग को लगभग सारे अधिकार देकर और दूसरे वर्ग पर लगभग सारे कर्त्तव्यों का बोझ लादकर अधिकारों और कर्त्तव्यों के भेद एवं विरोध को इतना स्पष्ट कर देती हैं कि मूर्ख से मूर्ख आदमी भी उन्हें समझ सकता है.” (देखें : Origins of the Family, Private Property, and the State का Chapter IX: Barbarism and Civilization

वर्तमान बुर्जुआ लोकतान्त्रिक प्रणाली जो अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों की वर्गीय राज्य व्यवस्थाओं का निषेद्ध करते हुए वर्तमान विश्व मंच पर अंतरराष्ट्रीय पूँजी की चाकरी हेतू प्रकट हुई है, अपने अंतरविरोधों के कारण, जन्म से ही लूली-लंगडी है जिसका निषेध अवश्यम्भावी है क्योंकि अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों के विपरीत इसने इस वर्गीय समाज के साथ अपनी कब्र खोदनेवाले उस वर्ग को जन्म दिया है जिसे सर्वहारा या उजरती गुलाम कहते हैं. यहीं वह वर्ग है जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता लेकिन पाने के लिए सारा विश्व है. यह सर्वहारा वर्ग ही बुर्जुआ और समाजवादी क्रांतियों की जीत-हार की अमीर विरासत का असली मालिक है. इक्कीसवीं शताब्दी में घटित होने वाली नई समाजवादी क्रांतियों के कार्यभार को संपन्न करवाने हेतू इसने उन बोलेश्विक चरित्र की सच्ची कम्युनिस्ट पार्टियों और नेताओं को भी जन्म देना हैं क्योंकि समाज को आगे की ओर गति देनेवाली क्रांतियाँ स्वयंस्फूर्त ढंग से संम्पन्न नहीं हो सकती. लेकिन चिंता का पहलू यह भी है कि वर्तमान समय का बुद्धिजीवी वर्ग आज के इस युग के क्षुद्र व्यक्ति ‘पूंजीपति’ द्वारा  सर्वहारा की कमाई की निर्मम लूट और इस लूट की भौंडी प्रदर्शनी पर, चुप्पी साधे है जबकि देश और दुनिया के वस्तुपरक हालात, मजदूर वर्ग द्वारा की जानेवाली क्रांतियों के पक्ष में, लगातार विकसित होते जा रहें हैं. भारत के सबसे अधिक विकसित पूंजीवादी राज्यों में से एक हरियाणा के मजदूर प्रतिदिन बारह घंटे से अधिक श्रम करने पर मजबूर हैं क्योंकि सरकार की ओर से निर्धारित की गयी न्यूनतम मजदूरी – 3510  रूपये प्रति महिना, लागू नहीं हो रही.  कोई भी राजनीतिक दल इसके बारे में गंभीर नहीं है. गुडगाँव जैसे शहर में मजदूर असंतोष को लाठियों और गोलियों से दबाया जा रहा है . एक रिपोर्ट अनुसार राज्य की 56  प्रतिशत औरतें और 83  प्रतिशत बच्चे खून की कमी का शिकार हैं. इस प्रकार की स्थिति पर बुद्धिजीवी वर्ग के चुप्पी के इस कष्टदायक और चिंताजनक पहलू पर ब्रटोल्ट ब्रेष्ट के इन शब्दों के साथ इस आलेख को फ़िलहाल यहीं विराम दिया जाता है,

“किस चीज का इंतजार है और कब तक ?
दुनिया को तुम्हारी जरूरत है |”

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चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प – दूसरी किश्त

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इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

अब हम बदल के बारे में कुछ ऐतिहासिक बातें करते हैं. चुनावों के बारे में कहा जाता है कि ये तो बहुत ज़रूरी हैं और चुनाव कभी लोकसभा के तो कभी विधानसभा या पंचायतो और मयुन्सिपलिटी के चुनाव. ऊपर से लेकर नीचे तक चुनावों का जाल बुना गया है. लेकिन हम देखते हैं कि इन पर अरबों-खरबों का खर्च होता है.पिछले दिनों, आपने देखा होगा कि बुर्जुआ पत्रकार किस प्रकार पांच सितारा होटलों में ठहरे होते हैं , और ये लोग इन नेताओं और सरकारों के खिलाफ लिखते हैं ! जाने-माने पत्रकार खुशवंत सिंह पूछते हैं कि इन पत्रकारों और अख़बारों में से कोई एक भी ऐसा है जो अपनी जेब से खर्च करता हो ! ये पत्रकार, उनसे आप वहां मिल ही नहीं सकते . इसके विपरीत जब हम इसके बदल की बात करते हैं तो  हम मजदूरों के प्रारंभिक, बेशक  अल्पकालीन ही सही लेकिन महत्त्वपूर्ण अनुभवों को देखते हैं.१८७१ के पेरिस कम्यून में हम देखते हैं कि उन्होंने सारी बुर्जुआ मशीनरी को हटा दिया और सारे काम-काज को स्वयं संभाल लिया. उस अस्थाई ढांचे जिसने कुछ दिन ही शासन किया, वहां एक मजदूर वर्ग का प्रतिनिधि  शासन करने के अलावा फैक्टरी में भी काम करता था और उसकी तनख्वाह एक औसत मजदूर से ज्यादा नहीं थी. इसी प्रकार सोवियतें जो सोवियत यूनियन में बनीं. सोवियतें हमारी संसद की तरह थी लेकिन तत्त्व रूप से बिलकुल भिन्न. हमारी संसद अपने आप में कोई शासक शक्ति नहीं है बल्कि राज्य की शक्ति के कुल जोड़ का एक हिस्सा है. इसके विपरीत सोवियतें कानून ही नहीं बनाती थीं बल्कि उन्हें लागू भी करती थीं. हमारी संसद की तरह नहीं कि कानून को लागू करने के लिए भारी-भरकम अफसरशाही रखी जाये. और अफसरशाही उसे लागू करने में बीस-बीस साल या इससे भी अधिक समय लगाए और लोग इंसाफ का इंतजार करते-करते मर जाएँ. बुर्जुआ राज्य के दिखाने के दांत कोई और होते हैं और खाने वाले कोई और. संसद बुर्जुआ के दिखाने के दांत हैं जबकि अफसरशाही इसके खाने के. चीन में कम्युनों की मिसाल लें. महान सांस्कृतिक क्रांति जो माओ की अगुआई में शुरू हुई थी, उसके अनुभवों को देखें. हालाँकि दुनिया भर के वाईट-कालर बुद्धिजीवी वर्ग और चीन के बुद्धिजीवियों का भी कहना था की माओ ‘पागल’ हो गए हैं. उन्होंने कहा था कि अब प्रोफेसर और बुद्धिजीवी पढ़ने-पढाने के अलावा खेतों और फैक्ट्रियों में काम भी करेंगे और मजदूर और किसान स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढायेंगे. कई वस्तुगत कारणों के अलावा यह भी एक कारण था कि बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के समय मजदूर और किसान के साथ था, अपनी मंजिल आते ही इस जनवादी क्रांति की बस से नीचे कूद  गया !

अब हमारी इस नयी संसद के गठन पर इन्होने नौकरियों के लिए कुछ फार्म भरवाने शुरू किये हैं लेकिन ये आने वाले पॉँच सालों में इन फार्मों को छेड़ेंगे नहीं. अगर कर्मचारियों की भरती की भी जायेगी तो मुट्ठीभर लोगों की. तो यह है हमारी संसदीय प्रणाली. अगर हम इस संसदीय प्रणाली में इस बुर्जुआ राज्य की शक्ति के कुल जोड़ के एक अंग ‘संसद’ में बहुमत प्राप्त भी कर लेते हैं, जैसा की संशोधनवादी और संसदमार्गी कम्युनिस्टों का मानना है – हालाँकि इस प्रकार की स्थिति में इसकी कोई गुंजाईश भी नहीं दीखती, तो भी मजदूर वर्ग अपने ऐज़ंडा कि पैदावार या उत्पादन के साधनों के  समाजीकरण के साथ-साथ इन्हें सांझी मलकीयत में बदला जाये, तो किस प्रकार केवल कानून बनाकर इसे लागू किया जा सकता है जबकि सत्ता का एक बहुत बड़ा हिस्सा जैसे सरकारी अफसरशाही, पुलिस, फौज और स्वयं पूंजीपति वर्ग अपने निजी दल-बल और हथियारों के साथ इसके विरोध में मर-मिटने को तैयार-बर तैयार बैठा है ? हमारी चुनाव प्रणाली एक पूरे धंधे में बदल चुकी है. एक मजदूर कभी करोड़पति नहीं बन सकता (कौन बनेगा करोड़पति और स्लमडोग मिल्लियानेरी के भ्रम को अपने दिमाग से निकाल दें)

दूसरी बात जिसका कि ऐतिहासिक महत्त्व है वह है पूंजीवादी चुनाव और पूंजीवादी दल. पूंजीवादी दलों और पूंजीवादी चुनाव प्रणाली पूंजीवाद के जन्म के साथ-साथ पैदा हुए, ये हमेशा से इसी तरह विद्यमान नहीं रहे हैं. पूंजीवादी चुनावों का महत्त्व पूंजीवादी प्रणाली के अन्दर और इसे इसी प्रकार बरक़रार रखने में ही है. इसमें पूंजीपति या उनके उम्मीदवार ही चुनें जाते हैं या फिर वे जो इसी प्रणाली के अन्दर के रेस के घोडे होते हैं. अब तो उन्होंने इसे भी बर्दाश्त करना बंद कर दिया है. मिसाल के लिए हमारे प्रधान मंत्री और गृहमंत्री जो पहले वित्तमंत्री रहे हैं या तो चुनाव लड़ते ही नहीं या फिर हार जाते हैं लेकिन अमेरिकन पूंजीवादी साम्राज्य के, जिनकी कि भारतीय बुर्जुआजी जूनियर पार्टनर है, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थायों के इशारों पर सीधे नियुक्ति कर दी जाती है. इसके इलावा जातिवाद, धर्म, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, संप्रदाय आदि के प्रतिक्रियावादी समीकरणों में इन चुनावों को देखा जाता है. इस प्रकार इसे इतना पीछे-खींचू देखा जाता है,जैसे मिसाल के लिए अगर ‘हजका’ वालों ने राय सिख को खडा कर दिया तो लोकदल वालों ने देखा कि उनका ऐसा उम्मीदवार हो जो सिख न हो, भुमनशाह के डेरे को भी मानता हो और सच्चे सौदे का भी उपासक हो, कम्बोज हो लेकिन सिख नहीं मोना हो, उसे ढूंढकर खडा कर दिया है. इस तरह का सर्च-वर्क किया जाता है. वे लोग जो महीनों से टिकट पाने के लिए मुशक्कत कर रहे थे, हाथ मलते रह गए हैं ! उन्होंने एक कम्बोज को जो सिख नहीं है और जिसकी कि आढ़त की दुकान है और जो कृषि-पूंजीपति है उसे टिकट थमा दी है क्योंकि वह पूँजी के लिहाज से अन्य पार्टियों के उम्मीदवारों से किसी भी प्रकार से छोटा नहीं है. तो यह है वह स्थिति जिसके की हम सभी चश्मदीद गवाह हैं.

दूसरी और अपने उम्मीदवार जो चुंने जाते हैं. इस प्रकार की तो कोई बात नहीं है कि वर्तमान में हमारी ये बुर्जुआ पंचायते जो केवल बुर्जुआ वर्ग के हितों की रक्षा के लिए गठित की जाती हैं, हमारे सपने का हिस्सा हों. जिस प्रकार हम देखतें हैं की भगत सिंह का सपना सोवियतों की तर्ज़ पर पंचायतो के निर्माण का सपना था. अब सोवियतें क्या थीं ? जब हम कहते हैं की सारी सत्ता सोवियतों को? सोवियतों और पार्लियमैन्ट में क्या फर्क है? पंचायतो के निर्माण का सपना तो महात्मा गाँधी का भी था. लेकिन वह इसे वर्तमान और भविष्य के लिए नहीं देखता था बल्कि भारत के तथाकथित गौरवशाली अतीत की अन्धगली में छलांग लगा देता था. समाजवाद में सोवियत होगी इसके उल्ट की पार्लियमैन्ट हो. पार्लियमैन्ट क्या है ? यह कानून बनाती है जिसे इसे लागू करने का हक़ नहीं होता. इसे लागू करती है नौकरशाही जो जैसा कि हमने जिक्र किया, इसे लागू करने में बीस-बीस वर्ष लगा देती है. यह नौकरशाही ही इसके असली और खाने के दाँत होते हैं. अब मान लीजिये कि हमारी न्यायव्यवस्था में कोई व्यक्ति किसी मुकद्दमें में जीत भी जाता है तो नौकरशाही उसकी मदद तब ही करती है जब वह अपने विरोधी पक्ष से पूँजी के मामले में अधिक शक्तिशाली होता है.

बाकी हिस्सा अगली किश्त भारत के गाँव-गाँव तक पैठ कर चुकी बुर्जुआजी

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चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प

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http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio2/Home/chunav2009kashmir.mp3?attredirects=0

इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

आम तौर पर क्या होता है कि लोग हमें यहाँ सी पी आई या सी पी एम से भिन्न नहीं समझते. इसमें कोई शक नहीं है कि हम उनसे अलग है लेकिन यह बात उपरी स्तर पर हल हो गयी और एक दूसरे से तोड़-विछोड़ा करने से पहले ताने-मेहने और वाद-विवाद का अभाव रहा है और लोग अक्सर इस तरह की बातें करते हैं कि कामरेडों, इस बार तो बड़ी बढ़िया बात है कि तुम्हारा आदमी भी चुनाव लड़ रहा है या फिर पूछते है कि अब किसे वोट दी जाये. इससे एक बड़ी पेचीदा स्थिति पैदा हो जाती है. इस पर हमें बड़े सीधे-साधे ढंग से अपनी स्थिति प्रकट करनी होती है. उन्हें बताया जाता है कि हमारे यहाँ भारत में दो तरह के कम्युनिस्ट हैं – एक वे जो चुनावों में भाग लेते हैं, इन्हें इलेक्शनबाज या संसदमार्गी कम्युनिस्ट कहा जाता है, दूसरे वे जो चुनावों में भाग नहीं लेते हैं. इनमें से एक वे हैं जो दुस्साहसवादी  या नकसलवादी कम्युनिस्ट है जो केवल हथियारों के बल पर इन्कलाब करना चाहते हैं. पहले वाले कम्युनिस्टों के भी आगे कई प्रवर्ग है जैसे सी.पी.आई., सी.पी.एम., सी.पी.एम. लिबरेशन आदि. और जो चुनाव नहीं लड़ते हैं उनमें भी कई तरह के हैं जैसे कुछ क्रांतिकारी ग्रुप हैं और इसके अलावा नकसली और माओवादी भी चुनावों में भाग नहीं लेते हैं..

उपरोक्त चर्चा का आशय क्या है ? इसे समझने के लिए आईए हम भारतीय बुर्जुआजी और इसके  लोकतंत्र (यानि बुर्जुआ लोकतंत्र, जिसके ऐतिहासिक विकास के थोड़े से वस्तुगत अध्ययन से हम इसे बुर्जुआ वर्ग की सर्वहारा वर्ग पर तानाशाही से बढ़कर कुछ नहीं समझते) के विकास और इतिहास को देखें. भारतीय बुर्जुआजी अंगरेजों के समय में पैदा हुई थी. यह पश्चिम या यूरोप के पूंजीपति वर्ग की तरह किसी स्वतन्त्र मुकाबले में संघर्ष से पैदा नहीं हुई है. अग्रेजी साम्राज्य के दौरान कभी छिप-छिप कर तो कभी थोडा सा मुखर होकर यह धीरे-धीरे अपना अस्तित्त्व ग्रहण करती गयी. कभी भी इसने खुलकर या संघर्षमयी तरीके से अपनी जरूरतों या मांगों को नहीं रखा. इसके विपरीत यह समयानुसार अपनी मांगे रखकर और फिर समझौता फिर मांगे और फिर समझौता की प्रक्रिया द्वारा पैदा हुई है. चाहे पहला विश्वयुद्ध हो या फिर दूसरा. जब भी इसने देखा कि अब अंग्रेजी साम्राज्यवाद उलझा हुआ है या किसी और कारण से – ये अपनी मांगे प्रस्तुत कर देती रही है. जैसे १९४२  में जब इसने देखा कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद दूसरे विश्वयुद्ध में उलझा हुआ है तो विश्व साम्राज्यवाद के अंतरविरोधों  का फायदा उठाते हुए ठीक कांग्रेस की अगुआई में इसने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’  शुरू कर दिया. इसने कभी भी उस समय के मेहनतकश वर्ग किसान या मजदूर वर्ग की मांगो को अपने आंदोलनों या मांगों का हिस्सा नहीं बनाया. १९४७ से पहले भी और बाद में भी इसका यही रुझान रहा है,  कभी चीन से समझौता तो कभी अमेरिका से या फिर रूस से.

अभी कुछ दिन पहले ही हरियाणा  के वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंदर हुड्डा के पिता श्री रणवीर हुड्डा का निधन हुआ है. वे हमारी उस सविधान सभा के सदस्य थे जो अंग्रेजी शासन के दौरान गठित हुई थी. उस ज़माने में इस संविधान सभा के सदस्य होने के लिए जो शर्तें निर्धारित थी उनमें केवल भारत की १५ प्रतिशत आबादी ही कवर होती थी. जैसे कि भूमि का मामला या आबियाना कर का भुगतान कौन लोग करते हैं. अन्य ८५ प्रतिशत आबादी को इसमें शामिल होने का कोई अधिकार नहीं था. इन पंद्रह फीसदी लोगों में  से चुनें हुए लोग ही उस संविधान सभा के सदस्य हुए.  जैसा कि होता रहा है,  भारतीय जब विदेश में निर्मित किसी चीज को देखते रहे हैं और फिर उसकी नक़ल करके उस पर ‘भारत में निर्मित’ का ठप्पा लगाते रहे हैं. ठीक वैसे ही इस संविधान सभा द्वारा निर्मित सविधान को ही १९४७ के बाद झाड़-पोंछकर संविधान का दर्जा दे दिया गया. संविधान के निर्माण से पहले संविधान सभा के लिए जिसमें आम लोग शामिल हों, के चुनाव के लिए किसी भी प्रकार की संविधान सभा का चुनाव नहीं हुआ. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कानून के अनुसार मुट्ठीभर वे लोग जो कुलीन थे और जो पैसे-टक्के वाले थे, वे ही भारत के वर्तमान संविधान के निर्माता रहे हैं (अगर इन्हें निर्माता  कहा जाये तो भी). संक्षेप में यही है हमारे संविधान का इतिहास जिसके बारे में बड़ी-बड़ी डींगे हांकी जाती है कि इसमें अम्बेडकर था , हुडा था या कोई और, और यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, उन लोग के बुत लगाये जाते हैं और उन्हें महानता की उपाधियाँ दी जाती है. ऐसी कोई बात नहीं है कि उनके बुत लगायें जाएँ और उन्हें ये उपाधियाँ दी जाएँ.

अब हम भारत की चुनाव प्रणाली की ओर आते हैं. हम देखते हैं कि यह प्रणाली कितनी खर्चीली है और आम लोगों की आकाँक्षाओं पर किसी भी प्रकार से खरी नहीं उतरती है. लेनिन के ‘राज्य और इन्कलाब’ के शब्दों के अनुसार इसमें होता सिर्फ इतना ही है कि हर पांच वर्षों के बाद देखना होता है कि लुटेरे वर्ग का कौनसा धड़ा अब लोगों के कपडे उतारेगा. आओ थोडा सा देखें कि इनके वेतन, भत्तों और अन्य सहूलतों की फेहरिस्त कितनी खर्चीली है. हम देखते हैं कि एक विधायक का चुनाव खर्च करोड़ रुपये या उससे बढ़कर है. चर्चा होती है कि फलां व्यक्ति फलां पार्टी से टिकट लेने के लिए इतने करोड़ देने को तैयार है. चुनाव उम्मीदवारों में से किसी एक का चुनाव करने के लिए हमें चुनाव से किसी गिरोह, भू माफिया या भ्रष्ट व्यक्ति से एक को चुनना होता है. ताज़ा चुनी गयी लोकसभा में ३०० सांसद यानि ५६ फीसदी घोषित करोड़पति हैं. वो ज़माने चले गए जब कामरेड भी कहा करते थे कि एक वोट और एक नोट. अब हम देखते हैं कि हमारी ये जो संसदमार्गी कम्युनिस्ट पार्टियाँ हैं इन्हें कोई बड़े पूंजीपति तो नहीं लेकिन निम्न पूंजीपति वर्ग या प्रोफेसर, वकील या कुलीन मजदूर वर्ग ने इन्हें थोडा-बहुत फंड या पैसा देना शुरू कर दिया है. लेकिन हम देखते हैं कि बुद्धदेव भटाचार्य ने भी उन नीतियों को पश्चिम बंगाल में लागू कर दिया है जो बुर्जुआ की मन-पसंद रही हैं, तो फंड और पैसा देने वाला ये वर्ग भी निराशा का शिकार है. इतिहास में हम देखते हैं कि पहली बार जब केरल में  नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में वामपंथियों की सरकार बनी तो उस वक्त नेहरू प्रधान मंत्री थे और इंदिरा कांग्रेस की प्रधान. उन्होंने इस सरकार को तुंरत तोड़ दिया. लेकिन धीरे-धीरे भारत की बुर्जुआजी को और इसका प्रतिनिधित्व करने वाले दलों ने इस बात को समझा और आत्मसात किया कि ऐसी कोई बात नहीं है कि इन नामधारी कम्युनिस्टों से डरा जाये, तो उन्होंने इनको बर्दाशत करना शुरू कर दिया और इन्हें इनका वाजिब हक़ और सम्मान (?) देना शुरू कर दिया.

अब हम देखते हैं कि जिस देश की ८४ करोड़ आबादी जो २० रुपये दैनिक से गुज़ारा चलाती है, इस चुनावी नौटंकी में सिवाय अपना तमाशा बना लेने से, उन्हें कुछ हासिल नहीं होता है और न ही हो सकता है, वे अपने को बड़ी हास्यपद स्थिति में पाती है. ये आंकड़े कुछ वर्ष पुराने हैं. इन्हीं के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमंडल का रोजाना खर्च पंद्रह लाख रूपये है, प्रधानमंत्री दफ्तर पर प्रतिदिन दो लाख अड़तीस हज़ार रुपये खर्च होते हैं. राष्ट्रपति पर प्रतिदिन चार लाख चौदह हज़ार. संसद की एक घंटे की कार्रवाई पर सोलह लाख रुपये और इस प्रकार राज्य सभा की एक घंटे की कार्रवाई और राज्य विधान सभा की कार्रवाई  पर बारह-पंद्रह लाख रुपये प्रति घंटा खर्च होते हैं. इनके सदस्यों के वेतन कम दीखते हों लेकिन अन्य सहूलतें और  अन्य आमदनी का कोई हिसाब नहीं है. संसद की अलग-अलग कमेटियों में भाग लेने के लिए ४०० रुपये प्रतिदिन, सदन की मीटिंग बेशक न चलती हो तो भी ८००० रुपये प्रति मास लोगों से संपर्क के लिए चुनाव भता, दफ्तर में आने के लिए २५० ० रुपये , एक या दो सहायक रखने के लिए ६००० रुपये, प्रत्येक सदस्य को स्कूटर , ए.सी. या कार आदि सहूलतें,  फोन बिना कराये के , एक लाख मुफ्त फोन काल्स , फर्स्ट क्लास रेलवे और हवाई यात्रा की टिकटों पर भारी छूट. प्रत्येक सांसद अपने परिवार समेत ३२ हवाई यात्रायें मुफ्त कर सकता है , ..अन्य कमाई  को छोड़ दें. अन्य संस्थाओं के आफिसरों और अमले के खर्च पर लेनिन के ‘राज्य ओर इन्कलाब’ पुस्तक के शब्द कि इन प्रोफेसरों और आफिसरों के इतने बड़े वेतन, यह परोक्ष रूप से रिश्वत नहीं तो और क्या है? इस भारी-भरकम  रकम को खर्च करके यह मशीनरी लोगों पर राज्य करती है. मंत्री परिषद की सुरक्षा पर ५० करोड़ और अन्य प्रमुख हस्तियों की सुरक्षा पर एक अरब 61 करोड़ खर्च.

इसी ऑडियो के सार का बाकी हिस्सा अगली किश्त में जिसमें बुर्जुआजी के ऐतिहासिक विकास और बदल के बारे में चर्चा करेंगे.

चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प – दूसरी किश्त

कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

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कड़ी जोड़ने के लिए देखे :

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

“हमने लिखा
“आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं…..साथ ही हमने जोड़ा था कि “वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.”
किसी प्रकार की गलतफहमी न हो हम साफ़ कर देना चाहते हैं कि;

आज के किसान का चरित्र वह नहीं है जो तब था और वह मजदूर के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति का वाहक था जो नहीं हुई. इसके विपरीत राष्ट्रीय जनतंत्र के कार्यभार ने बुर्जुआ राज्य और बुर्जुआ सरकारों के नेतृत्व में प्रशियाई जुन्कर तरीके से धीमे परन्तु पीडादायक तरीके से संपन्न होना था और वह हुआ भी. इस दौरान किसान उस मेहनतकश के क्रांतिकारी चरित्र को खो बैठा जो कि मजदूर वर्ग की सहायक रिजर्व सेना का होता है. पूँजी का सताया यह  वर्ग यदि क्रांतिकारी दीखता है तो केवल इसलिए क्योंकि मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से अपना दृष्टिकोण त्यागकर यह अपना भविष्य सुरक्षित कर लेना चाहता है. हम इसका स्वागत करते हैं परंतु मजदूरों के हितों को ताक में रखकर इनके बोनुस, लाभकारी मूल्यों की हिफाजत की वकालत हम नहीं करते. हाँ, बुर्जुआ राज्य द्वारा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पूँजी की चाकरी बजाते हुए पुलिस और फौज द्वारा इनके हासिल जनतांत्रिक अधिकारों के हनन की हम भर्त्सना करते हैं बेशक किसी लाल झंडे के नेतृत्व में कामरेडों ने वह कर दिखाया हो जिसे करने में बुर्जुआ दल भी शरमातें हैं.

आज के किसान का चरित्र – हमारी पहुँच – कुछ और स्पष्टता : देखें

हमने बार-बार लिखा है कि सीपीआई, सीपीआई (एम) सीपीआई (एम एल ) संशोधनवादी पार्टियाँ हैं और इनका चरित्र बुर्जुआ पार्टियों से कहीं ज्यादा, कहीं अधिक कुटील है लेकिन इनकी कतारों की बहुसंख्यक  गिनती  और इनके समर्थक बुद्धिजीवियों की बहुसंख्या, अब भी ईमानदार है हालाँकि ,किसी भी वस्तु, घटनावृत  अथवा व्यापार की गतिकी की दशा-दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि वस्तु, घटनावृत  अथवा व्यापार के बुनियादी  मुख्य विरोधी ध्रुवों में प्रधानता किसकी है. इस घटनावृत को ठीक इसी प्रकार समझा जा सकता है जैसे किसी समाज में मेहनतकश अवाम तो बहुसंख्यक हो लेकिन उस समाज की विरोधों की एकता से पैदा होने वाली गतिकी उसके पक्ष के विपरीत अल्पसंख्यक परजीवी वर्गों के पक्ष में हल होती हो.

लेकिन निम्नलिखित रिपोर्ट में वर्णित तथ्य भी गौर करने लायक हैं ;

1990  के दशक में, सी.पी.एम. की चंडीगढ़ में संपन्न हुई पंद्रहवीं कांग्रेस में एक चौकाने वाला तथ्य प्रकाश में आया. पार्टी के आधे से ज्यादा सदस्य गैर-मेहनतकश वर्ग और गैर-किसान वर्ग से आये थे या यूं कहें कि  – मिडल क्लास से. इससे सी.पी.एम. की मेहनतकश वर्गों को जन-आंदोलनों में  न खींच सकने की क्षमता और उसके रेडिकल शिक्षित युवा की और आकर्षण का  पता चलता है. उस समय से जारी इस नुक्स और बेपरवाही के चलते हालत यह हो गयी है कि विद्यार्थियों, युवायों और महिलायों के मोर्चे ही लगभग सभी  पोलित ब्यूरो और संसद  के टॉप नेताओं  की आपूर्ति करते हैं.  नव युवाओं में शायद ही कोई सदस्य हो जो ट्रेड यूनियन, किसान और जन-आन्दोलन से उठकर आया हो. हरकिशन सिंह सुरजीत और ज्योति बसु किसान और श्रमिक वर्ग आंदोलनों से उभरे थे जबकि प्रकाश करात और बुद्धदेव भट्टाचार्य विश्वविद्यालयों  के कुलीन वर्ग से आये हैं. पार्टी में इस मालदार शिक्षित वर्ग की प्रधानता ने पार्टी को ,जिसे कहा जा सकता है कि, “तर्कसंगत सिद्धांतों की राजनीति” में बदल दिया…देखें : A Logical Defeat

कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी कम्युनिस्टों के इस प्रकार अलग-अलग खेमों में बँटे होने से चिंतित हो जाते हैं. हालाँकि कुछ विशेष परस्थितियों में ‘टैक्टिस’ के लिहाज़ से यहाँ तक कि जनतांत्रिक बुर्जुआ दलों तक के साथ सांझे मोर्चे के लिए समझौता करने से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन समझौता आखिर समझौता ही होता है जो कभी भी किसी पक्ष को, एक पल के लिए भी, पीडामुक्त  नहीं करता और उसे दशकों तक निभाना (यहाँ इशारा भारतीय वाम मोर्चा से है) हद दर्जे की निम्न अवसरवादिता नहीं तो और क्या है?

जहाँ तक सैद्धांतिक एकता का प्रश्न है तो मजदूरों के लिए लेनिन के कहे गए इन शब्दों का आज भी उतना ही महत्त्व है,

“मज़दूरों को एकता की ज़रूरत अवश्य है और इस बात को समझना महत्त्वपूर्ण है कि उन्हें छोड़कर और कोई भी उन्हें यह एकता ‘प्रदान’ नहीं कर सकता, कोई भी एकता प्राप्त करने में उनकी सहायता नहीं कर सकता। एकता स्थापित करने का ‘वचन’ नहीं दिया जा सकता – यह झूठा दम्भ होगा, आत्मप्रवंचना होगी (एकता बुद्धिजीवी ग्रुपों के बीच ‘समझौतों’ द्वारा ‘पैदा’ नहीं की जा सकती। ऐसा सोचना गहन रूप से दुखद, भोलापन भरा और अज्ञानता भरा भ्रम है।” “एकता को लड़कर जीतना होगा, और उसे स्वयं मज़दूर ही, वर्गचेतन मज़दूर ही अपने दृढ़, अथक परिश्रम द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। इससे ज्यादा आसान दूसरी चीज़ नहीं हो सकती है कि ‘एकता’ शब्द को गज-गज भर लम्बे अक्षरों में लिखा जाये, उसका वचन दिया जाये और अपने को ‘एकता’ का पक्षधर घोषित किया जाये।”

शब्द कम्युनिस्ट से अभिप्राय सत्तासीन दल के शेयर होल्डर रहे संशोधनवादी वामपंथी धडे और दुस्साहसवादियों से लिया जाता हैं. हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि छिटपुट ही सही परंतु कुछ क्रांतिकारी ग्रुप उपरोक्त दो धाराओं से बिलकुल हटके हैं लेकिन इसका मतलब हरगिज़ नहीं कि  कोई नया मार्क्सवाद ईजाद कर लिया गया है बल्कि आज विपर्य के इस दौर में मार्क्सवाद की हिफाजित तथाकथित मार्क्सवादियों से करने की सख्त ज़रुरत है और इन संशोधनवादी मार्क्सवादियों को नंगा करना क्रांतिकारी ग्रुपों का एक कार्यभार है जबकि दुस्साहसवाद इतना कुटील नहीं, उसे हराया जा सकता है. जहाँ तक सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी के होने न होने का सवाल है, इसके लिए देखें : कहाँ से फूटेंगी उम्मीद की किरणें

हमारे कर्मों का मार्गदर्शक होते हुए मार्क्सवाद निरंतर विकासमान सिद्धांत है जिसे समय-समय पर कर्म-सिद्धांत-कर्म के सूत्र द्वारा एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन माओ आदि मार्क्सवादियों ने विकसित किया है. वैज्ञानिक समाजवाद के प्रथम प्रयोग हार जाने के बाद, नई समाजवादी क्रान्तियों (समाजवादी क्रांतियाँ – क्योंकि 21वीं शताब्दी 20वीं शताब्दी से इसलिए भिन्न है कि दुनिया के लगभग प्रत्येक हिस्से में पूंजीवाद विकसित हो चूका है)  का अगला चक्र शुरू ही होने वाला है.

मार्क्सवाद को असफल नहीं माना जा सकता अलबता मजदूर वर्ग का इस संक्रमण दौर में बुर्जुआओं से हार जाने का अर्थ केवल यही है कि समाजवादी क्रांतियों का प्रथम चक्र पूरा हो गया है और सर्वहारा वर्ग अगले चक्र की तैयारी की  इस प्रचंड झंझावाती समय की पूर्वबेला से पहले सोया हुआ दीखता है लेकिन यह मान लेना कि मजदूरवर्ग नए समाजवादी क्रांतियों के तजुर्बे नहीं करेगा क्योंकि समाजवाद तो फेल हो चुका है , क्रांतिकारियों के लिए भाग्यवादी और पलायनवादी – हाथ पर हाथ रखकर बैठना होगा जबकि इसके विपरीत मजदूर वर्ग बड़ी शिद्दत के साथ समाजवादी क्रांतियों की इस प्रक्रिया को अंजाम देगा – बेशक हजारों-हज़ार क्रांतियाँ फेल हो जाएँ क्योंकि बुर्जुआ वर्ग अपने-आप तो उसे यह मौका देगा नहीं कि आओ मैं तुम्हें सिखाता हूँ कि राज्य का संचालन कैसे किया जाता है ! ऐसे में सर्वहारा के पास हारी हुई क्रांतियों के निष्कर्ष और निष्पत्तियों का समाहार करते हुए और मार्क्सवाद की कसौटी पर इसे आत्मसात करते हुए नए समाजवादी तजुर्बे करने और सीखने के सिवा और कोई चारा नहीं है. इसी प्रक्रिया द्वारा ही मार्क्सवाद एक कट्ठ्मुल्लापन (dogma) होने के विपरीत अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास द्वारा अपने विकास की उच्चतर मंजिल को छूएगा और यह क्रांतियों के पिछले रोल मॉडल रहे फ्रेमवर्कों को तहस नहस कर डालेगा.

सुरेश चिपलूनकर [ Suresh Chiplunkar ] के इन शब्दों “बहरहाल, अकेले प्याज़ के मुद्दे पर जब भाजपा सरकार गिर सकती है तो सभी वस्तुओं के गत 5 साल में तीन गुना महंगे होने पर भी सरकार का न गिरना “आश्चर्यजनक” क्यों नहीं है, यह मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं” का हम स्वागत करते हैं. हमने लिखा था

“वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा.”

पूंजीवादी में महंगाई कोई नया घटनावृत नहीं है. दशकों बीत गए जब मुंबईया फिल्मों में ‘बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी’, लोगों ने सुना और महंगाई की इस परिघटना को पूंजीवाद के एक ज़रूरी लक्षण के रूप में स्वीकार किया. दरअसल, पेट्टी-बुर्जुआ बुर्जुआओँ  का सताया होने के कारण महंगाई -महंगाई चिल्लाने लगता है जबकि वस्तुओं और मजदूरी की दर सरकार द्वारा तय न होकर क्लासिकीय पूंजीवादी व्यवस्था में (इस क्लासिकीय पूंजीवाद के चेहरे को लोक-हितेषी दिखाने हेतू, 1930 की पहली विश्व महामंदी से डरे पूंजीवाद को बचाने के लिए कीन्स समाजवाद से उधार लेकर नुस्खे-टोटके प्रगट हुए थे जिसे बुर्जुआ राज्यों ने नवउदारवादी दौर में फैंक दिया. विडम्बना यह है कि पूंजीवाद कीन्स के नुस्खों-टोटकों की ओर वापस भी नहीं लौट सकता) मार्केट द्वारा मांग और पूर्ति के नियमानुसार निर्धारित होती हैं जिसे पूंजीवाद में निहित कई फैक्टर प्रभावित करते हैं क्योंकि मांग और पूर्ति अपने-आप वस्तुओं और मज़दूरी की दर तय नहीं कर सकती. पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों को भारत जैसे देश में, बेहद सस्ती दरों पर श्रम शक्ति का उपलब्ध होने का कारण, यहाँ की बढ़ी हुई जनसंख्या  में दीखता है जबकि इसका राज प्रधानमंत्री के उस वक्तव्य में निहित है कि यहाँ की 70 प्रतिशत आबादी 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती है. श्रम-शक्ति के पुनरुत्थान के लिए इतना कम खर्च बहुत ही कम देशों में होता है. बहरहाल, कहना इतना ही है कि पूंजीवाद में, श्रम-शक्ति भी अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती है और उसके पुनरुत्थान का खर्च या श्रम-शक्ति का मूल्य उसके पुनरुत्थान पर लगे सामाजिक ज़रूरी श्रम-समय (Socially necessary labor time) के बराबर होता है.

महंगाई से हम न केवल चिंतित हैं बल्कि इसकी सबसे ज्यादा मार सर्वहारा वर्ग पर ही पड़ने के कारण  पीड़ित भी हैं  लेकिन पेट्टी-बुर्जुआ के वर्ग दृष्टिकोण के अनुसार बिलकुल नहीं. चरित्र में भारत जैसी ही पूंजीवादी दृष्टिकोण अनुसार  तेजी से विकास की और अग्रसर विश्व की ब्राजील, अर्जेंटीना, मेक्सिको, चीले, द. अफ्रीका, नाईजिरिया, मिस्त्र, ईरान, तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिप्पीन्स, भारत आदि लगभग दर्ज़न एक अर्थव्यवस्थाओं को, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, दुनिया के सबसे सस्ते मुल्को में शुमार करते हैं क्योंकि पूंजी द्वारा यहाँ  उपलब्ध श्रम-शक्ति का अँध-शोषण, बेहद सस्ती दरों पर किया जाता है. सस्ती श्रम-शक्ति होने के कारण सस्ती जिन्से उपलब्ध करवाना केवल इन्हीं मुल्कों के बस की ही बात है. ये देश दुनिया के विकसित पूंजीवादी देशों के मुकाबले में सस्ती उपभोक्तावादी जिंसों का धडाधड उत्पादन कर रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी पूँजी के इस खेल में देशी पूंजीपति मिलकर सर्वहारा वर्ग का कचूमर निकाले हुए हैं जिसे हम विकास के नाम पर अनदेखा नहीं कर सकते. इस लिहाज से हमारा यह कहना कि भारत मुकाबलतन महंगा देश न होकर एक सस्ता देश है कहाँ गलत है ? क्या इसकी पुष्टि वे नहीं करते जिनके पास डॉलर हैं ? उपरी वर्गों की तो छोडिये मध्यम वर्ग के जीवन स्तर की 1970 की दशा और उसकी वर्तमान उपभोक्तावादी स्थिति की तुलना कीजिए. अब जरा सर्वहारा वर्ग जिसके बारे में प्रधानमंत्री जी बीस रूपए से कम गुजारा करने वाला वर्ग बताते हैं उसके 1970 के जीवन स्तर और आज के जीवन स्तर की तुलना कीजिए. क्या उसने उन चरागाहों को नहीं खो दिया जहाँ वह अपनी भेड़ बकरियां चराकर गुज़र-बसर कर लिया करता था? क्या उसके नीचे से उसकी झोंपडी की ज़मीन नहीं खिसक गयी है?

लेकिन हम सत्तर या उसके पीछे की दलदल में वापस लौटने का भी इरादा नहीं रखते हैं. कुछ महानुभावों की यादों में “अहा ग्राम्य जीवन’ का नोस्टालिजिया हो सकता है वे हमसे उसी नोस्टालिजिया में जीने की स्वतंत्रता की मांग कर सकते हैं जिसका हमें कोई शिकवा नहीं है लेकिन हम भी उनसे, लेनिन की भाषा की मदद लेकर, कहना चाहते हैं कि ऐ महानुभावों ! आप उस दलदल में लौट जाना चाहते हैं, आपको वहाँ लौटने की पूरी स्वतंत्रता और हक़ है लेकिन हम भी स्वतन्त्र हैं कि आप को उस दलदल में छोड़कर आगे बढे, हमें पूरा हक़ है कि, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, इस पूंजीवाद के  दानवी चेहरे से लोक-हितेषी मेक-अप का पर्दाफाश करें क्योंकि पूंजीवाद मेहनतकश अवाम की जीवनचर्या को पहले से कहीं ज्यादा बदतर, पहले से कहीं ज्यादा दुष्कर बनाए जा रहा है. विकास के नाम पर जिसमे पेट्टी-बुर्जुआ अपने दिलो-दिमाग को पूंजीपति टोली के साथ मिलाकर रखता है और विकास-विकास की चिल्ल-पौ मचाता रहता है लेकिन जब पूँजी अपने तर्क द्वारा उसे हजम कर जाती है तो वह चिल्लाने लग जाता है पर  फिर भी वह अपने पेट्टी-बुर्जुआ दृष्टिकोण का त्याग नहीं करता – मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण को नहीं अपनाता, का उपहास उडाने की हमें भी पूरी स्वतंत्रता है. हम सर्वहारा वर्ग से आह्वान करते हैं कि पूंजी के इस दुश्चक्र को तोड़कर ही, वह केवल और केवल समाजवादी क्रांति द्वारा समाज और इतिहास को आगे गति दे सकता है क्योंकि पूंजी अपने ही तर्क द्वारा अप्रासंगिक हो चुकी है , यदि वह प्रासंगिक है तो केवल उसके हरकत में न होने से है.

विज्ञान की प्रत्येक शाखा की अपनी एक अलग शब्दावली होती है. फिजिक्स, कैमिस्ट्री या जीवविज्ञान का अध्ययन करते समय नए विद्यार्थियों को उनके कुछ शब्द सीखने पड़ते हैं. इसी प्रकार राजनीती और समाजशास्त्र के सिद्धांतों के अध्ययन के वक्त सम्बंधित शब्दावली की गैर-मौजूदगी में ये विषय बेहद “बोझिल” और कठिन लगते हैं. सुरेश चिपलूनकर कहते हैं;

“मैं तो एक मूढ़ व्यक्ति हूँ”, न तो मैं बड़ी-बड़ी ना समझ में आने वाली पुस्तकें पढ़ता हूँ, न ही वैसा लिख पाता हूँ… 🙂 । मैंने तो अपनी असफ़लता को भी खुल्लमखुल्ला स्वीकार किया है” और वे मांग करते हैं कि “मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं…।”

विज्ञान की भाषा विज्ञान के युग में वैज्ञानिक न होगी तो कैसी होगी. क्या हम रोजमर्रा की खाने-पीने और अघाने वाली भाषा द्वारा इसका अध्ययन-मनन कर सकते हैं ? यह मेहनत से जी चुराना नहीं तो और क्या है?  यह सब पलायनवाद नहीं तो और क्या है ?

रहा सवाल, मजदूर वर्ग द्वारा इस भारी-भरकम शब्दाबली को सीखने-समझने का तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्स की ‘पूंजी’ छपते ही, जर्मन की मजदूर जमात में लोकप्रिय हो गयी थी. हाँ, प्रोफेसरों को इसे समझने-पढने में जो दिक्कत आती है उसके बारे में हम कुछ कह नहीं सकते. मौजूदा समय  विपर्य का दौर है – मजदूर वर्ग की लहर का  दौर नहीं. बुद्धिजीवी वर्ग के लिए इस तरह के दौर का इतिहास में बड़ा महत्त्व रहा है क्योंकि इस शांति भरे दौर (?) में वह चिन्तन-मनन करने के लिए काफी समय निकाल सकता है. जहाँ तक लहर के दौर का सवाल है तो उस वक्त सर्वहारा वर्ग यह नहीं देखता कि मार्क्स, लेनिन, माओ आदि ने क्या कहा. वह देखता है तो अपने हित ! उस वक्त समस्या होती है तो बुद्धिजीवी वर्ग के लिए. सैद्धांतिक अस्त्र से रहित उसके प्रतिक्रियावादियों के हाथों खेल जाने की पूरी-पूरी संभावना होती है जबकि इसके विपरीत अगर वह सिद्धांत से चाक-चौबंद होता है तो क्रांति और समाज को आगे की ओर गति देने वाली उस वाहक शक्ति को वह, सही दिशा प्रदान कर सकता है और एक नए युग का सूत्रपात करने में अपनी भूमिका निभा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे एक प्रसूति-विशेषज्ञ की भूमिका जनन-पीड़ाओं  को कम करने की होती है.

दूसरा सवाल कि सिद्धांत को  अमल द्वारा कैसे परखा जाये तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्सवाद कोई एकेडमिक चीज तो है नहीं ! इसे परखने की लैब तो यह समाज ही है. इसके लिए बस इतना ही, कि आमलेट खाने के लिए अंडा तो फोड़ना ही होगा.

अंत में एक बार फिर, हम बुद्धिजीवी वर्ग का आह्वान करते हैं कि वह आगे बढे और इस संजीदा बहस को संजीदगी के साथ ही आगे बढाए.

नोट : श्रम-शक्ति अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती तो है लेकिन अन्य जिंसो से इसलिए अलग है कि इसे मनुष्य के शरीर से अलग नहीं किया जा सकता और दूसरी जिंसों के विपरीत यह अकेली ऐसी जिन्स है जो  बेशी मूल्य या अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष (surplus value) पैदा करती है.

सुने : दुनिया के हर सवाल केhttp://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/duniakeharsavaalke.mp3?attredirects=0

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कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है

कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

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इस पोस्ट से सम्बंधित प्राप्त टिप्पणियों के पश्चात् यह ज़रूरी हो गया है कि इस विषय पर वाद-विवाद जारी रखा जाये. चूंकि वर्तमान समाज वर्गों में विभाजित है इसलिए समाज में विचारों और दृष्टिकोण की विभिन्नता होना स्वाभाविक और  लाजिम है; कि  विचारों की विभिन्नता और उनके बीच जारी संघर्ष विचारों के विकास की ज़रूरी शर्त है. कला नैतिकता, धर्म, राजनीति, दर्शन आदि ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में मौजूद विचार चेतना के ही रूप हैं. हालाँकि सामाजिक चेतना का कोई भी रूप वस्तुगत यथार्थ से स्वतन्त्र नहीं होता बल्कि मानवी दिमाग अन्दर वस्तुगत यथार्थ का ही प्रतिबिम्बन होता है. सर्वहारा वर्ग के नव पुनर्जागरण और सर्वहारा वर्ग के नवप्रबोधन का यह आधुनिक  दौर समाज, राजनीति और संस्कृति आदि विषयों पर बुद्धिजीवी वर्ग से पहले के मुकाबले में कहीं अधिक संजीदगी की मांग करता है. अफ़सोस तब होता है जब विद्वान् कहलवाने वाले कुछ सज्जन बिना जाँच-परख किए और निम्न दर्जे के फतवे जारी करते हुए अपनी घोर अज्ञानता और असहनशीलता का प्रगटावा करते हुए दिखाई देते हैं.

लोकसभा चुनावों में जीत-हार के विश्लेषण की अपेक्षा पूंजीवादी जनतंत्र के नाम खेले जाने वाले इस खेल में, आम आदमी के साथ होने वाले छल को समझना ज़्यादा ज़रूरी है. आर्थिक असमानता की इस प्रणाली में राजनितिक अधिकारों की असमानता का जो हश्र होता है, वह किसी व्याख्या की मांग नहीं करता. बेहद खर्चीले इन चुनावों में बड़ी-बड़ी पूंजीवादी पार्टियाँ स्टार खिलाडी की हैसियत से सबसे ज्यादा पैसा बहाती हैं. क्षेत्रीय पूंजीपतियों की पार्टियाँ और निम्न बुर्जुआ विचारधारा की छोटी पार्टियाँ भी अपनी क्षमता से अधिक जोर-आजमाईश करती हैं. वामपंथी पार्टियाँ जो देश के कुछ भागों में असरदायक हैं, ने कभी भी मजदूरों और किसानों के संघर्षों को आर्थिक संघर्षों के दायरे से बाहर नहीं आने दिया. राजनीती के क्षेत्र में भी इनकी कार्रवाही सामाजिक-जनवाद यानिकि छोटे-मोटे आर्थिक सुधारों की लडाई तक सिमिट कर रह गयी है. ‘राज्य’ के चरित्र का ठोस विश्लेषण करके, देश में जारी वर्ग संघर्ष में, अलग-अलग वर्गों की पार्टियों का ठोस विश्लेषण करके, समाजवादी क्रांति का कोई प्रोग्राम ड्राफ्ट करना तो इनके एजेंडा पर रह ही नहीं  गया है . पूंजीपति वर्गों द्वारा प्रायोजित किए जाने  वाले  जनतंत्र के इस खेल में, ये भी अपनी किस्मत-आजमाईश के लिए प्रयत्नशील रहते हैं.

वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के इस दौर में आम लोगों की कंगाली और बदहाली में कई गुना बढोत्तरी हो चुकी है.

देश के कई हिस्सों, विशेषतय:  पश्चिमी बंगाल में किसानों में वामपंथ का काफी प्रभाव रहा है. कृषि में पूंजीवादी विकास ने किसानी क्षेत्र में जो आक्रोश पैदा किया है, कभी वामपंथ उस आक्रोश  का प्रतिनिधित्व करता रहा है जबकि अब  इस किसान वर्ग का प्रतिनिधित्व अन्य निम्न-बुर्जुआ हाथों में जाता हुआ साफ दीखाई दे रहा है.

इन चुनावों में 10 हज़ार करोड़ रूपए से अधिक की राशिः के ‘इन्वेस्ट’ (?) होने की रिपोर्टें हैं. पूंजीवादी ढांचे के अर्न्तगत बड़ा उत्पादक निरंतर छोटे उत्पादक को हड़प करता रहता है लेकिन अपनी विशेष आवश्यकताओं के मद्देनज़र बड़े उत्पादक को, किसी हद तक, छोटे उत्पादक की निरंतर आवश्यकता बनी रहती है. इसलिए नष्ट होने के साथ-साथ छोटा उत्पादक नए-नए रूपों में, जन्म भी लेता रहता है. जहाँ तक प्रतिस्पर्द्धा का सम्बन्ध है, छोटा उत्पादक बड़े उत्पादक के मुकाबले टिक नहीं पाता बल्कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बड़े उत्पादक के रहमोकर्म पर आश्रित और श्रापित होता है. राजनीती में यही अमल सीधे-सरल रूप से तो नहीं पर बड़े ही जटिल ढंग से प्रतिबिंबित होता है. लेकिन पूंजीवाद का बुनियादी स्वभाव यहाँ पर भी कायम रहता है. बड़े पूंजीपतियों की पार्टियों के समक्ष छोटे पूंजीपतियों की पार्टियों का जमें रहना, इतना आसान नहीं होता. पूंजीवादी चुनावों में छोटी पूंजीवादी पार्टियों का वही हाल होता है जो पूंजीवादी उत्पादन के क्षेत्र में छोटे उत्पादकों का होता है. इन चुनावों में करोड़पति प्रतिनिधियों की संख्या पहले से कहीं अधिक है और शेष बचे हुए सांसद करोड़पतियों के बफादार सेवादारों की हैसियत से, ससंद में पहुंचे हैं.

जहाँ तक विश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों का सम्बन्ध है, लगभग सभी संसदमार्गी पार्टियों के बीच आम सहमति बन गयी है – यहाँ तक कि वामपंथी पार्टियाँ भी, सैद्धांतिक विरोध के बावजूद, अमल में इन्हें लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. बंगाल की मिसाल तो सामने है ही, केंद्र में भी वामपंथी पार्टियों की हिमायत से चलने वाली पिछली श्री मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा भी यह अमल निर्बाध रूप से जारी रहा. हाँ, अपने-अपने वोट-बैंक के हिसाब-किताब के साथ-साथ, इन सभी पार्टियों के दरमियान, इन नीतियों को लागू करने सम्बन्धी तौर-तरीकों बारे मतभेद रहे हैं.

संसदीय चुनाव, बहुसंख्यक आबादी की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. इस सारे अमल में, आम आदमी की हालत का अंदाजा पाठक स्वयं लगा सकते हैं!  जहाँ तक आम आदमी के स्वयं समझने का सवाल है, वह पहले से कहीं अधिक बेहतर ढंग से समझे हुए है.

जब आम आदमी की बात हो रही हो तो तब हमारे कुछ विद्वान् बुद्धिजीवी सज्जन मेहनतकश वर्ग के बारे में बड़ी ही अजीब किस्म की धारणा पाले बैठे हैं. वे आम लोगों को अनपढ, गंवार या पता नहीं और किन-किन खिताबों से नवाजते हैं. आओ ज़रा हकीकत पर नज़र डालें.

पढाई या ज्ञान का बुनियादी मकसद, जिन्दा रहने या मानव के विकास के लिए, ज़रूरी वस्तुओं के उत्पादन के ढंग-तरीकों की खोज करना था. आरंभिक काल से, इसी मकसद के लिए, श्रम  को अमल में लाने हेतू, सामूहिक सरगर्मी को अपनाते हुए ही भाषा का जन्म हुआ. श्रम के अमल में आने के कारण, मानव पशु जगत से अलग हुआ और चिंतनशील प्राणी के रूप में, इस ब्रह्माण्ड के रंगमंच पर प्रगट हुआ. मानव चिंतन की पहली आवश्यकता या मानवी चिंतन की उत्पति, जिन्दा रहने के लिए उत्पादन की आवश्यकता से ही पैदा हुई.

आज भी मजदूर जो जटिल मशीनरी की बारीकियों को समझ सकता है, खेत मजदूर या किसान (केवल मेहनतकश) अति आधुनिक बीज तैयार कर सकता है, उसे अनपढ, गंवार कहना, अपनी अज्ञानता की नुमाईश करना नहीं तो और क्या है ?

जिस तरह यूरोप में, प्राचीन सामंतशाही को ख़त्म करने के लिए एक दौर गतिमान हुआ जिसके परिणामस्वरूप पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक दौर भी गतिमान हुआ और जिसका नतीजा बुर्जुआ इन्कलाब हुए और आधुनिक बुर्जुआ जनतंत्रों की स्थापना हुई थी इसी प्रकार भारत में [ देखें : 1857, आरंभिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता PDF File ]भी अपने ढंग की बौद्धिक सरगरमियां चलती रही हैं जिनकी तुलना (हर तुलना लंगडी होती है) कुछ भारतीय विद्वानों ने यूरोप के पुनर्जागरण और प्रबोधन से की है. यहाँ नोट करने वाली बात यह है कि बस्तीवादी घटनावृत ने हमारे देश में उस वक्त जारी इस घटनावृत को, बीच राह में ही कत्ल कर दिया या यूं कहें की उसकी भ्रूण हत्या हो गयी जिसकि परिणति, भारत के यूरोप से अलग किस्म के बौद्धिक अमल से गुजरने में हुई. विशेष ऐतिहासिक परस्थितियों के परिणामस्वरूप, हमारे यहाँ के बुद्धिजीवी, बड़े संभल-संभलकर चलने वाले, अपनी सुख-सुविधाओं के छिनने से डरते हुए, एक विशेष किस्म की सुविधाभोगी मानसिकता से ग्रस्त रहे हैं.

हम ईमानदार और जिंदा-ज़मीर के बुद्धिजीवियों से अपील करते हैं कि इतिहास की इस सच्चाई को समझने और पचाने की कोशिश करें. मजदूर वर्ग और मेहनतकश वर्गों को , राजनितिक तौर पर शिक्षित करने के लिए, आपकी सेवाओ की ज़रुरत है. आज हमारे देश में और विश्व स्तर पर भी, सर्वहारा नवपुनर्जागरण और प्रबोधन के अमल में बुद्धिजीविओं को अपना फ़र्ज़ पहचानना होगा.

सुने : भागो मत दुनिया को बदलोhttp://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/bhagomat.duniyakobadlo.mp3?attredirects=0

…शेष अगली किश्त

कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

में समाप्य

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नई समाजवादी क्रान्ति का उद्घोषक ‘बिगुल’ के मई-2009 अंक की विषय – सामग्री

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bigul naya ank bigमज़दूर वर्ग के लिए सबसे बुरी बातों में से एक शायद यह है कि मई दिवस को आज एक अनुष्ठान बना दिया गया है। यह मई दिवस के महान शहीदों का अपमान है। मई दिवस मज़दूरों के मक्कार, फरेबी, नकली नेताओं के लिए महज़ झण्डा फहराने, जुलूस निकालने, भाषण देने की एक रस्म हो सकता है, लेकिन वास्तव में यह उन शहीदों की कुर्बानियों की याददिहानी का एक मौका है, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी देकर पूरी दुनिया के मज़दूरों को यह सन्देश दिया था कि उन्हें अलग-अलग पेशों और कारख़ानों में बँटे-बिखरे रहकर महज़ अपनी पगार बढ़ाने के लिए लड़ने की बजाय एक वर्ग के रूप में एकजुट होकर अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा। काम के घण्टे कम करने की माँग उस समय की सर्वोपरि राजनीतिक माँग थी…

मई दिवस अनुष्ठान नहीं, संकल्पों को फौलादी बनाने का दिन है!

मज़दूरों का त्योहार मई दिवस आठ घण्टे काम के दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आन्दोलन से पैदा हुआ। उसके पहले मज़दूर चौदह से लेकर सोलह- सोलह घण्टे तक खटते थे। सारी दुनिया में अलग-अलग इस माँग को लेकर आन्दोलन होते रहे थे। अपने देश में भी 1862 में ही मज़दूरों ने इस माँग को लेकर कामबन्दी की थी। लेकिन पहली बार बड़े पैमाmay day 2ने पर 1886 में अमेरिका के विभिन्न मज़दूर संगठनों ने मिलकर आठ घण्टे काम के दिन की माँग पर एक विशाल आन्दोलन खड़ा करने का फैसला किया।

एक मई 1886 को पूरे अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 फैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे। शिकागो महानगर के आसपास सारा रेल यातायात ठप्प हो गया और शिकागो के ज़्यादातर कारख़ाने और वर्कशाप बन्द हो गये। शहर के मुख्य मार्ग मिशिगन एवेन्यू पर अल्बर्ट पार्सन्स के नेतृत्व में मज़दूरों ने एक शानदार जुलूस निकला….

मई 1886 का वह रक्तरंजित दिन

मशहूर भारतीय फ़िल्मकार सत्यजित रे ने अपनी एक फ़िल्म अमेरिका में प्रदर्शित की तो पहले शो में ही बहुत से अमेरिकी फ़िल्म बीच में ही छोड़कर आ गये क्योंकि सत्यजीत रे ने फ़िल्म के एक सीन में भारतीय लोगों को हाथों से खाना खाते हुए दिखाया था जिसे देखकर उन्हें वितृष्णा होने लगी थी। लेकिन अगर उन्हें इंसान के हाथों से सीवरेज की सफाई होती दिखला दी जाती तो शायद वे बेहोश हो जाते। सिर्फ अमेरिकी ही क्यों, इस नर्क के दर्शन से तो बहुत से भारतीय भी बेहोश हो जायेंगे। लोग अपने घरों में साफ-सुथरा टायलट इस्तेमाल करते हैं लेकिन वे शायद ही कभी सोचते हों कि उनके इस टायलट को साफ रखने के लिए इस दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो अपनी जान दे देते हैं। सिर्फ इसलिए कि दूसरे लोग एक साफ-सुथरी, ‘‘हाइजेनिक’’ ज़िन्दगी जी सकें….

चेन्नई के सफाई कामगारों की हालत

माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है…..

चीनी विशेषता वाले ”समाजवाद” में मज़दूरों के स्वास्थ्य की दुर्गति

हर साल करोड़ों स्‍त्री-पुरुष गाँवों में फसल का काम ख़त्म होते ही रोज़गार की तलाश में देश के महानगरों की ओर चल पड़ते हैं। निर्माणस्थलों, ईंटभट्ठों और पत्थर की खदानों में कमरतोड़ काम करने हुए ये रेल की पटरियों के नीचे या सड़कों के किनारे, या गन्दे नालों के किनारे बोरी या पालिथीन की झुग्गियों में रहते हैं, और अक्सर आधा पेट खाकर ही गुज़ारा कर लेते हैं

प्रवासी मज़दूर: चिकित्सा सेवाओं के शरणार्थी

dehati mazdoor

मधुबन, मऊ। प्रशासन की उपेक्षा और संवेदनहीनता से तंग आकर मधुबन तहसील के अन्तर्गत फतेहपुर मण्डाव ब्लाक के कई गाँवों के नरेगा मज़दूर अपनी  माँगों और मर्यादपुर ग्राम सभा की 5 माँगों को लेकर 22 अप्रैल से क्रमिक अनशन पर बैठे थे। इन गाँवों में मर्यादपुर, डुमरी, लखनौर, भिडवरा, जवाहिरपुर, गोबबाडी, रामपुर, अलीपुर-शेखपुर, ताजपुर, बेमडाड, गुरम्हा, छतहरा, लघुआई, लऊआसात शामिल थे। अनशन पर जाने से पूर्व उन्होंने ज़िला और तहसील स्तर पर हर जगह बार-बार पत्र लिखकर, ज्ञापन देकर अपनी आवाज़ पहुँचाने की कोशिश की, लेकिन मज़दूरों की आवाज़ कहीं नहीं सुनी गयी।

देहाती मज़दूर यूनियन द्वारा 8 दिन की क्रमिक भूख हड़ताल

5करीब डेढ़ महीने तक चली देशव्यापी चुनावी नौटंकी अब आख़िरी दौर में है। ‘बिगुल’ का यह अंक जब तक अधिकांश पाठकों के हाथों में पहुँचेगा तब तक चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे और दिल्ली की गद्दी तक पहुँचने के लिए पार्टियों के बीच जोड़-तोड़, सांसदों की खरीद-फरोख्त और हर तरह के सिद्धान्तों को ताक पर रखकर निकृष्टतम कोटि की सौदेबाज़ी शुरू हो चुकी होगी। पूँजीवादी राजनीति की पतनशीलता के जो दृश्य हम चुनावों के दौरान देख चुके हैं, उन्हें भी पीछे छोड़ते हुए तीन-तिकड़म, पाखण्ड, झूठ-फरेब का घिनौना नज़ारा पेश किया जा रहा होगा। जिस तरह इस चुनाव के दौरान न तो कोई मुद्दा था, न नीति – उसी तरह सरकार बनाने के सवाल पर भी किसी भी पार्टी का न तो कोई उसूल है, न नैतिकता! सिर्फ और सिर्फ सत्ता हासिल करने की कुत्ता घसीटी जारी है।

चुनावी नौटंकी का पटाक्षेप: अब सत्ता की कुत्ताघसीटी शुरू

नौजवान भारत सभा, बिगुल मज़दूर दस्ता और अखिल भारत नेपाली एकता मंच ने मिलकर अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस मनाया और भारत एवं नेपाल की मेहनतकश जनता के भाईचारे को और मज़बूत बनाने का संकल्प लिया।

मई दिवस के दिन सुबह ही गोरखपुर की सड़कें “दुनिया के मज़दूरों एक हो”, “मई दिवस ज़िन्दाबाद”, “साम्राज्यवाद-पूँजीवाद maydayका नाश हो”, “भारत और नेपाली जनता की एकजुटता ज़िन्दाबाद”, “इंकलाब ज़िन्दाबाद” जैसे नारों से गूँज उठीं। नगर निगम परिसर में स्थित लक्ष्मीबाई पार्क से शुरू हुआ मई दिवस का जुलूस बैंक रोड, सिनेमा रोड, गोलघर, इन्दिरा तिराहे से होता हुआ बिस्मिल तिराहे पर पहुँचकर सभा में तब्दील हो गया। जुलूस में शामिल लोग हाथों में आकर्षक तख्तियाँ लेकर चल रहे थे जिन पर ‘मेहनतकश जब जागेगा, तब नया सवेरा आयेगा’, ‘मई दिवस का है पैगाम, जागो मेहनतकश अवाम’ जैसे नारे लिखे थे….

मई दिवस पर याद किया मज़दूरों की शहादत को

कारपोरेट जगत में हमेशा ही मजदूरों का मनमाना शोषण होता रहा है लेकिन अब सरकारी उपक्रम भी बेहयाई से श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। वैसे तो मेट्रो रेल कारपोरेशन में श्रम कानूनों के खुले उल्लंघन की ख़बरें कर्मचारियों के आन्दोलन की बदौलत सामने आने लगी हैं लेकिन बेंगलोर मेट्रो तो इसमें भी दो कदम आगे निकल गयी है। वहाँ बच्चों से मज़दूरी करायी जा रही है ताकि कम पैसे पर उन्हें अधिक से अधिक निचोड़ा जा सके। केन्द्र और राज्य सरकार के निवेश और जापान बैंक के सहयोग से मिलने वाले 9,000 करोड़ के बजट के बाद भी बंगलोर मेट्रो के निर्माण के लिए बच्चों का खून और पसीना बहाया जा रहा है।..

बच्चों के खून-पसीने से बन रही है बेंगलोर मेट्रोदिल्ली मेट्रो की ट्रेनें

metro

दिल्ली मेट्रो की ट्रेनें, मॉल और दफ्तर जितने आलीशान हैं उसके कर्मचारियों की स्थिति उतनी ही बुरी है और मेट्रो प्रशासन का रवैया उतना ही तानाशाहीभरा। लेकिन दिल्ली मेट्रो रेल प्रशासन द्वारा कर्मचारियों के दमन-उत्पीड़न की हर कार्रवाई के साथ ही मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन और ज़ोर पकड़ रहा है। सफाईकर्मियों से शुरू हुए इस आन्दोलन में अब मेट्रो फीडर सेवा के ड्राइवर-कण्डक्टर भी शामिल हो गये हैं। मेट्रो प्रशासन के तानाशाही रवैये और डीएमआरसी-ठेका कम्पनी गँठजोड़ ने अपनी हरकतों से ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों की एकजुटता को और मज़बूत कर दिया है।

मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन

मित्रवत साथियो,
क्या आप जानते हैं कि शोषण करने वाला शोषण सहने वाले से ज्यादा गुनहगार होता है। और सभी जानते हैं, शोषण सहने वाला अधिक परिश्रमी होता है और शोषण करने वाला ऐयाशबाज़ होता है और हवेली में आरामदेह जीवन बिताता है।
लेकिन ऐसा क्यों?

ऐसा सवाल एक नहीं है बल्कि बहुत अधिक संख्या में हैं। लेकिन इन सवालों का जवाब एक ही है और वह है `अज्ञानता´। जो दिमाग़ और आँख होते हुए भी उन पर पट्टी बँधी हुई है। जो आज के हालात में `जानवर और मनुष्य एक समान जीने को मज़बूर है´, ऐसा क्यों? आप खुद समझिये और विचार कीजिये। आपके घर बैल होगा, अगर नहीं भी होगा तो सुने तो ज़रूर होंगे, बेचारा कितना मासूम परिश्रमी होता है। पूरे साल का अनाज पैदा करने में सहायता करता है। क्या उसका अधिकार नहीं है कि सोने के लिए पलंग मिले, उसका मालिक हमाम साबुन से नहाये तो उसे भी नहाने का हक हो, उसे भी अच्छे कपड़े मिलें, उसे भी खाने को अच्छा भोजन मिले, आपकी सम्पति में भी आधा हक हो…

आपस की बात

……..इसके अलावा और भी…

माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है

कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

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जिस देश का प्रधानमंत्री स्वयं स्वीकार करे की देश की 7० प्रतिशत जनता 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती हैं वहां सुरेश चिपलूनकर [ कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है ] का यह कहना कि जनता को अपनी गरीबी या महंगाई जैसे मुद्दों से कोई वास्ता नहीं हैं, बात ज़रा गले से उतरी नहीं.

वैसे उन्होंने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि वे भारतीय जनता पार्टी की हार से दुखी हैं, ऐसे में जनता जनार्दन को दोषी करार दे देना ! कहीं उन्हें यह भ्रम तो नहीं कि वे सर्वज्ञाता हैं और जनता बेवकूफ.

वैसे आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं. उस ज़माने में किसान, मजदूर और देहाती का चरित्र मेहनतकश का था और मेहनतकश परजीवी वर्गों को हमेशा बेवकूफ दीखते हैं चाहे वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.

समाज शास्त्र कभी जनता को दोषी नहीं ठहराता अलबता वह सोई हुई हो सकती है, सोना कोई बुरी बात नहीं, किसी को उसे उठाना नहीं आता और वह मनोगत तरीके से दोष जनता पर मढ़ दे ? अगर हम समझतें हैं कि जनता हमारी मनोगत इच्छाओं का ख्याल करे, तो हमारी ओर लाखों नहीं करोडों उँगलियाँ उठ जाएँगी लेकिन अपनी इस मनोगत बीमारी की वजह से हो सकता है हमें एक भी दिखाई न दे.

वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा. और आतंकवाद पर वे चिंतित हैं मगर एकांगी तरीके से, समग्रता से नहीं, उन्हेँ हम दीपायन बोस के आतंकवाद के बारे में विभ्रम और यर्थाथ के अध्ययन की सलाह देंगे और इस पर एक विस्तृत टिपण्णी की अपेक्षा भी करेंगे.

अफलातून जी वास्तव में अफलातून हैं, उसी यूनानी परम्परा के जिसने जेल से भागने से इंकार कर दिया था कि इससे राज्य का पवित्र कानून टूटता है, उसी राज्य का जिसमें गुलाम और मालिक दो वर्ग थे और जहर का प्याला अपने लबों से लगा लिया मगर राज्य के तर्क पर आंच नहीं आने दी. ये बात करेंगे मगर शब्दों के हेरफेर के साथ. अब इन्होनें एक नया शब्द जोड़ बिठा दिया  “संघर्षशील प्रतिपक्ष” ? इसे अगर परिभाषित कर लें तो हम भी कुछ आगे बढ़ें.

वैसे सुरेश जी की एक बात से “लेकिन एकमात्र खुशी इस चुनाव रिजल्ट की यही है कि इन तीनों से पीछा छूटा” हम भी सहमत हैं लेकिन इसके साथ हम ये भी जोड़ देना चाहते हैं कि वामपंथी, समाजवादी, कम्युनिस्ट, जनशक्ति, बहुज़न जैसे शब्दों का प्रयोग करने से आप और हम (अवसरवादी) वे नहीं हो जाते जो इन शब्दों के अर्थ हैं लेकिन आप जैसे विचारवादी या आदर्शवादी लोग जो विचार को प्रथम और पदार्थ को गौण मानते हैं मानेंगे थोड़े ही. कोई लाख सर पटक ले तब भी आप नहीं मानेगे कि मनुष्य को उसके भौतिक हालात ही किसी विचार का कायल बनाते हैं. हाँ अपवाद हो सकतें हैं लेकिन हम वर्ग की बात कर रहें हैं. यहाँ अटल जी, मनमोहन सिंह और बहुतेरे वामपंथी, (एक का ज़िक्र हमने भी किसी अख़बार में पढ़ा कि वे राजस्थान से विधायक हैं परंतु पीले कार्डधारी हैं, खजाने से तनख्वाह नहीं लेते और राशन की दुकान पर उन्हें लाईन में खड़े देखा जा सकता है ), साफ़ और स्वच्छ छवि के हैं.

आप मिलना चाहेंगे उनसे ? मगर क्या फायदा. असल सवाल तो उन दलों का है – उनके चरित्र का है और साथ ही क्या बुर्जुआओं को साफ़ और स्वच्छ छवि के सेवक नहीं चाहिएँ?

एक कन्फ्यूजन हो सकता है कि कहीं हमने कांग्रेस को उस 70 प्रतिशत का सच्चा प्रतिनिधि तो घोषित नहीं कर दिया. बिल्कुल नहीं. बस विकल्पहीनता.

कुछ भविष्यवाणी हो सकती है. 20 प्रतिशत लोगों का लोकतंत्र जिसे हम बुर्जुआ अधिनायकवाद कहते हैं (इसलिए नहीं कि ऐसा हम कहते हैं यह तो हर कोई बगैर सिद्धांत के अपने अनुभव से ही समझता है) और अधिक मज़बूत हुआ है और आने वाले समय में श्रम और पूँजी की झड़पें त्वरित होंगी. इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए.

मार्क्सवाद से तो तथाकथित मार्क्सवादी भी मुनकर हो गएँ हैं आप की तो बात छोड़िए. लेकिन लेनिन द्वारा गद्दार कायुत्सकी के लिए कहे गए शब्द कि बुर्जुआ लोकतंत्र जहाँ पूँजी का राज होता है वहां मजदूर वर्ग संसदीय ढंग से सत्ता हासिल कर लेगा यह कोई लुच्चा और शोहदा ही कह सकता है. और लेनिन के यह शब्द उनकी मृत्यु के बाद चिल्ली और इंडोनेशिया में (केवल इंडोनेशिया में जहाँ कम्युनिस्ट संसदीय ढंग से मज़बूत हो रहे थे, 10 लाख लोगों को यह कहकर कत्ल कर दिया गया कि वे कम्युनिस्ट हैं) सही साबित हुए.

हाँ आप गलती न करें कि हम कोई भारतीय माओवाद या नकसलवाद का नया संस्करण हैं इसके लिए आप हमारा नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1 देखें.

और अब दो टूक बात. बुर्जुआ दलों का तो ऐसा होता ही है लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट दलों का स्वरूप भी संघाधिपत्यवादी रहा है. आप दो लाईनों के बीच लम्बा और सतत संघर्ष चलाए बगैर किसी बोलेश्विक चरित्र की पार्टी के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकते. यह गैर वैज्ञानिक है, गैर मार्क्सवादी है, विचारवादी और आदर्शवादी तरीका है जिसकी परणिति संशोधनवाद और दुस्साहसवाद ही होती है.

शहीद भगत सिंह विचार मंच उन बुद्धिजीवियों से यह स्पष्ट कर देना चाहता है कि भारत की वे पार्टियाँ जिन्हें कम्युनिस्ट पार्टियाँ कहा जाता (और यहाँ तक की विश्व की 99 प्रतिशत कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी) अपने उल्ट में बदल चुकीं हैं. हमें इसका अफ़सोस नहीं करना चाहिए क्योंकि सिद्धांत कहता है कि चीजें देर-सवेर अपने विपरीत में बदल जाती हैं. आज बीते युग की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियों को इकठ्ठा करके भानुमती का कुनबा जोड़ने से कुछ हासिल नहीं होने वाला. आज पार्टी गठन की अपेक्षा पार्टी निर्माण प्रमुख है.

हम उन बुद्धिजीवियों से जो श्रम को धन (यहाँ श्रीमान अफलातून द्वारा प्रस्तुत सुनील जी के उस लेख [ तलाश एक नए मार्क्सवाद की (२) : ले. सुनील ] का जिक्र भी करना ज़रूरी समझेंगे जिसमें उन्होंने बिना पूँजी और मार्क्स पढ़े किसी नए सिद्धांत को लिखने की सलाह दे डाली थी, उसमें उन्होंने मार्क्स  पर आरोप लगाया था कि वे श्रम की बिनाह पर धन के स्रोत में प्रकृति की भूमिका से मुनकर हैं जबकि पूंजी के प्रथम खंड के प्रथम अध्याय में मार्क्स ने उन अर्थशास्त्रियों को गलत ठहराया था जो श्रम को ही एकमात्र धन का स्रोत मानते थे) और ज्ञान का स्रोत मानते हैं, इस लम्बी और पीडादायक प्रक्रिया का हिस्सा बनने का आह्वान करते हैं ताकि वे अपने सर पर ज्ञान के इस क़र्ज़ का कुछ भुगतान करके सर्वहारा की अदालत में अपने कर्मों द्वारा कुछ तो सच्चे हों.
आमीन !

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पाँच क्रान्तिकारी जनसंगठनों का साझा चुनावी भण्डाफोड़ अभियान

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चुनावी राजनीति के मायाजाल से बाहर आओ!


नये मज़दूर इन्कलाब की अलख जगाओ!!

देशभर में लोकसभा चुनाव के लिए जारी धमाचौकड़ी के बीच बिगुल मज़दूर दस्ता, देहाती मज़दूर यूनियन, दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा, और स्‍त्री मुक्ति लीग ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश sajha abhiyanऔर पंजाब के अलग-अलग इलाकों  में चुनावी भण्डाफोड़ अभियान चलाकर लोगों को यह बताया कि वर्तमान संसदीय ढाँचे के भीतर देश की समस्याओं का हल तलाशना एक मृगमरीचिका है। ऊपर से नीचे तक सड़ चुकी इस आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को ध्वस्त कर बराबरी और न्याय पर टिका नया हिन्दुस्तान बनाने के लिए आम अवाम को संगठित करके एक नया इन्कलाब लाना होगा।

दिल्ली, लखनऊ, गोरखपुर, लुधियाना, चण्डीगढ़ आदि शहरों में इन संगठनों के कार्यकर्ताओं ने चुनावी राजनीति का भण्डाफोड़ करते हुए बड़े पैमाने पर पर्चे बाँटे, नुक्कड़ सभाएँ कीं, घर-घर सम्पर्क किया, ट्रेनों-बसों में और बस-रेलवे स्टेशनों पर प्रचार अभियान चलाये और दीवारों पर पोस्टर लगाये। दिल्ली, लखनऊ और गोरखपुर में चुनावी राजनीति की असलियत उजागर करने वाली एक आकर्षक पोस्टर प्रदर्शनी भी जगह-जगह लगायी गयी जिसने बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान खींचा। दिल्ली में रोहिणी इलाके में जागरूक नागरिक मंच ने अपनी दीवाल पत्रिका ‘पहल’ के ज़रिये भी चुनावी राजनीति के भ्रमजाल पर करारी चोट की।

राजधानी दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय, करावलनगर, शहीद भगतसिंह कालोनी, प्रकाश विहार, अंकुर एन्क्लेव, शिव विहार, कमल विहार, मुस्तफाबाद, नरेला, राजा विहार, सूरज पार्क, बादली आदि इलाकों  में चलाये गये भण्डाफोड़ अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं ने कहा कि चुनाव में बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं। इस बार मीडिया में धुआँधार प्रचार अभियान चलाकर लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कोई इसे परिवर्तन की अग्नि बता रहा है तो कोई कह रहा है कि महज़ एक वोट से हम देश की तकदीर बदल सकते हैं। लेकिन असलियत यह है कि हमसे कहा जा रहा है कि हम चुनें लम्पटों, लुटेरों, भ्रष्टाचारियों, व्यभिचारियों के इस या उस गिरोह को, थैलीशाहों के इस या उस टुकड़खोर को, जहरीले साँपों, भेड़ियों और लकड़बग्घों की इस या उस नस्ल को। किसी भी पार्टी के लिए आम जनता की तबाही-बर्बादी कोई मुद्दा नहीं है। बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी, छँटनी, पूँजीपतियों की लूट-खसोट, पुलिसिया अत्याचार, भ्रष्टाचार किसी पार्टी के लिए कोई मुद्दा नहीं है। ग़रीबों के लिए स्वास्थ्य, सबके लिए बराबर और सस्ती शिक्षा, रोज़गार, बिजली, पानी, घर जैसी माँगें इस चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। हमेशा की तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नफरत भरी राजनीति ज़ोर-शोर से जारी है। चुनाव जीतने के लिए जनता का समर्थन नहीं बल्कि जातीय समीकरणों के जोड़-तोड़ भिड़ाये जा रहे हैं।

नुक्कड़ सभाओं में वक्ताओं ने कहा कि असलियत तो पहले भी यही थी मगर इस पर भ्रम के परदे पड़े हुए थे। लेकिन ख़ास तौर पर पिछले 25-30 वर्षों में यह सच्चाई ज़्यादा से ज़्यादा नंगे रूप में उजागर होती गयी है कि यह जनतन्त्र नहीं बल्कि बेहद निरंकुश किस्म का धनतन्त्र है। हमें बस यह चुनने की आज़ादी है कि अगले पाँच वर्षों तक कौन हमारा ख़ून निचोड़े, किसके हाथों से हम दरबदर किये जायें!

लखनऊ में जीपीओ पार्क, हाई कोर्ट, मुंशी पुलिया, पालीटेक्निक चौराहा, चौक, अमीनाबाद आदि इलाकों में भण्डाफोड़ पोस्टर प्रदर्शनी लगायी गयी और पर्चे बाँटे गये। प्रदर्शनी स्थल पर जुटी भीड़ को सम्बोधित करते हुए कार्यकर्ताओं ने कहा कि 1952 में चुनावी ख़र्च महज़ डेढ़ करोड़ रुपये का था जो अब बढ़ते-बढ़ते 13,000 करोड़ तक पहुँच चुका है – और यह तो महज़ घोषित ख़र्च है। पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा किया जाने वाला असली ख़र्च तो इससे कई-कई गुना ज़्यादा है। चुनाव ख़त्म होते ही यह सारा ख़र्च आम ग़रीब जनता से ही वसूला जायेगा।

गोरखपुर में दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा के कार्यकर्ताओं ने बिछिया, रामलीला बाज़ार, सब्ज़ी मण्डी, शाहपुर, धरमपुर, लेबर चौक, इन्दिरा तिराहा आदि पर नुक्कड़ सभाएँ कीं, पोस्टर प्रदर्शनी लगायी और बड़े पैमाने पर पर्चे बाँटे। सभाओं में कहा गया कि भगवाधारी भाजपा हो या तिरंगा उड़ाने वाली कांग्रेस, हरे-नीले-पीले झण्डे वाली तमाम क्षेत्रीय पार्टियाँ हों या लाल झण्डे को बेचकर संसद में सीट ख़रीदने वाले नकली वामपन्थी – लुटेरी आर्थिक नीतियों के सवाल पर सबमें एकता है। यह बात दिनोदिन साफ होती जा रही है कि सरकार चाहे इसकी हो या उसकी – वह शासक वर्गों की मैनेजिंग कमेटी ही होती है। यह जनतन्त्र पूँजीपतियों का अधिनायकतन्त्र ही है। लोगों को अपने तथाकथित “प्रतिनिधियों” का चुनाव बस इसीलिए करना है ताकि वे संसद के सुअरबाड़े में बैठकर जनता को दबाने के नये-नये कानून बनायें, निरर्थक बहसें और जूतम-पैजार करें और देशी-विदेशी धनपतियों की सेवा करते हुए अपने पड़पोतों और पड़पड़पोतों तक के लिए कमाकर धर दें।

पंजाब में लुधियाना, चण्डीगढ़ सहित अनेक स्थानों पर चलाये गये भण्डाफोड़ अभियान में कार्यकर्ताओं ने अपने भाषणों और पर्चों में कहा कि इस बार सभी चुनावी धन्धेबाजोँ का मुख्य मुद्दा है कि प्रधानमन्त्री कौन बने। लेकिन किसी की नीतियों में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। कांग्रेस की अगुवाई वाला यू.पी.ए. गठबन्धन हो, भाजपा की अगुवाई वाला एन.डी.ए. गठबन्धन हो, तीसरा मोर्चा हो या अन्य कोई भी चौथा-पाँचवाँ गठबन्धन या मोर्चा, सभी की नीतियाँ देसी-विदेशी पूँजी के पक्ष में और मेहनतकश जनता के विपक्ष में चलायी जा रही निजीकरण- उदारीकरण की नीतियों से ज़रा भी इधर-उधर नहीं जाती हैं। आज सैकड़ों करोड़पति गुण्डे-अपराधी लोकसभा के चुनाव लड़ रहे हैं। जिस देश की 77 प्रतिशत जनता रोज़ाना महज़ 20 रुपये पर गुज़ारा करती हो वहाँ की जनता को कहा जा रहा है कि वे अपने भाग्य का फैसला करने के लिए करोड़पतियों को चुनें। चुनाव लड़ रहे नेताओं में से 15 प्रतिशत ऐसे हैं जो इस देश के बुर्जुआ कानून के अनुसार भी अपराधी हैं। कहने को तो साधरण ग़रीब आदमी भी चुनाव में हिस्सा ले सकता है, लेकिन हम जानते ही हैं कि चुनाव धन और गुण्डागर्दी के सहारे ही जीते जाते हैं।

उन्होंने कहा कि आज जनता विकल्पहीनता की स्थिति में है और क्रान्ति की शक्तियाँ कमजोर हैं। पर रास्ता एक ही है। इलेक्शन नहीं, इन्कलाब का रास्ता! मेहनतकशों को चुनावी मदारियों से कोई भी आस छोड़कर अपने क्रान्तिकारी संगठन बनाने के लिए आगे आना होगा। इस देश की सूरत बदलने वाले सच्चे क्रान्तिकारी विकल्प का निर्माण चुनावी नौटंकी से नहीं बल्कि जनता के क्रान्तिकारी संघर्षों से ही होगा। जब जनता ख़ुद संगठित हो जायेगी तब वह वास्तव में चुनाव कर सकेगी – वह चुनाव होगा यथास्थिति और क्रान्ति के बीच, लोकतन्त्र के स्वांग और वास्तविक लोकसत्ता के बीच! हमें इसकी तैयारी आज से ही शुरू कर देनी चाहिए।

सभी जगह अभियान टोलियों ने मेहनतकशों, इंसाफपसन्द नागरिकों और नौजवानों का आह्नान किया कि वे नयी सदी की नयी क्रान्ति की कतारों को संगठित करने के लिए आगे आयें। शहीदेआज़म भगतसिंह के सन्देश को सुनें और क्रान्ति का पैग़ाम हर दिल तक ले जाने में जुट जायें। चुनावी मदारियों के मायाजाल से बाहर आयें और जनता की सच्ची लोकसत्ता कायम करने के लिए लम्बी लड़ाई की राह पर डट जायें।

– बिगुल संवाददाता

भारतीय लोकतंत्र की पंचवर्षीय महानौटंकी का मंच सज रहा है!

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चुनाव? लुटेरों के गिरोह जुटने लगे हैं!

जोड़-तोड़, झूठ-फरेब, धार्मिक उन्माद, नफरत, रक्तपात, भ्रष्टाचार से भरपूर

भारतीय लोकतंत्र की पंचवर्षीय महानौटंकी का मंच सज रहा है!

मालिक लोग आते हैं, जाते हैं

कभी नीला कुर्ता पहनकर,

कभी सफ़ेद, कभी हरा

तो कभी लाल कुर्ता पहनकर |

महान हैं मालिक लोग

पहले पॉँच साल पर आते थे

पर अब तो और भी

जल्दी-जल्दी आते हैं

हमारे द्वार पर याचक बनकर |

मालिक लोग चले जाते हैं

तुम वहीँ के वहीँ रह जाते हो

आश्वासनों की अफीम चाटते

किस्मत का रोना रोते;

धरम-करम के भरम में जीते |

आगे बढो !

मालिकों के रंग-बिरंगे कुर्ते को नोचकर

उन्हें नंगा करो |

तभी तुम उनकी असलियत जान सकोगे |

तभी तुम्हें इस मायाजाल से मुक्ति मिलेगी |

तभी तुम्हें दिखाई देगा

अपनी मुक्ति का रास्ता |

भेडियों, कुत्तों, लकड़बग्घों

और सूअरों के बीच से आखिर

हम किसको चुनें ?

ये सब पूंजीवादी नरभक्षी

राक्षसों के टुकडखोर पालतू हैं !

यह चुनाव एक धोखा है !

विकल्प क्या है? –संसदीय

राजनीती के भ्रम से निकलो!

क्रांति के मार्ग पर आगे बढो!

असली चुनाव

इस या उस

पूंजीवादी चुनावी पार्टी

के बीच नहीं

बल्कि

इंकलाबी राजनीति

और पूंजीवादी राजनीति

के बीच हैं |

चुन लो

चुनावी मृगमरीचिका में

जीना है

या

इन्कलाब की तैयारी की

कठिन राह पर चलना है?

मेहनतकश साथियों! नौजवान दोस्तों!

सोचो!

62 सालों तक

चुनावी

मदारियों से

उम्मीदें पालने की बजाय

यदि हमने इन्कलाब की राह चुनी होती

तो भगत सिंह के सपनों का भारत

आज एक हकीकत होता !