संघर्ष

अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस पर विशेष

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विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति का प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की दिशा

कात्यायनी

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर
3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में
4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा
5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन
6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन
7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति
8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर
9. और अंत में…

आज एक कठिन समय में हम यहाँ पर नारी मुक्ति आन्दोलन की कुछ बुनियादी समस्याओं पर बातचीत के लिए इकट्ठा हुए हैं । सामायिक तौर पर यह पराजय, विपर्यय, पुनरुत्थान, फासिज़्म की शक्तियों के विश्वव्यापी उभार और क्रांति की शक्तियों के पीछे हटने का दौर है । कुछ समय के लिए, आज एक बार फिर क्रांति की लहर पर प्रतिक्रांति की लहर विश्व स्तर पर हावी है ।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी ऐसे कठिन दौर आते हैं तो अँधेरे की ताकतें मेहनतकश आम जनता के साथ ही औरतों की आधी आबादी पर भी अपनी पूरी ताकत के साथ हमला बोल देती है और न केवल उनकी मुक्ति की लड़ाई को कुचल देना चाहती है बल्कि अतीत के अनगिनत लंबे संघर्षों से अर्जित उनकी आजादी और जनवादी अधिकारों को भी छीन लेने पर उतारू हो जाती हैं । आज भी ऐसा ही हो रहा है । हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो विश्व सर्वहारा क्रांति के एक नये चक्र की शुरुआत का समय है, अक्टूबर क्रांति के नये संस्करण के निर्माण का समय है । साथ ही, यह नारी मुक्ति आन्दोलन के लिए भी एक नई शुरुआत का समय है, क्योंकि इतिहास ने यह अंतिम तौर पर सिद्ध कर दिया है कि एक पूंजीवादी विश्व में नारी मुक्ति का प्रश्न अंतिम तौर पर हल नहीं हो सकता और यह भी कि इस आधी आबादी की मुक्ति की लड़ाई के बिना शोषण-उत्पीडन से मेहनतकश जनता की मुक्ति की लड़ाई भी विजयी नहीं हो सकती ।

आज अपने प्रयासों को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया में, विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति के प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा पर विचार करते हुए हमें सर्वोपरी तौर पर उन विचारधारात्मक-सैद्धांतिक हमलों का जवाब देना होगा जो नारी मुक्ति विषयक तरह-तरह के बुर्जुआ सिद्धांतों के रूप में हमारे ऊपर किये जा रहे हैं । जीवन और संघर्ष के अन्य मोर्चों की ही तरह आज नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी जनवाद के नाम पर मुक्त बाजार का पश्चिमी उपभोक्तावादी दर्शन तरह-तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है और एक बार फिर, नये-नये रूपों में, जोर-शोर से बीमार बुर्जुआ संस्कृति, व्यक्तिवाद, पुरुष-विरोधी नारीवाद, अराजकतावाद, यौन-स्वच्छंदतावाद की तरह-तरह की खिचड़ी परोसी जा रही है । फ़्रांसिसी फुकोयामा के “इतिहास के अंत” और पश्चिम में जन्मे “विचारधारा के अंत” के नारे की तर्ज पर नारी आन्दोलन को भी विचारधारा से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं क्योंकि बकौल इन मुक्त चिंतकों के, “विचारधारा ने नारी की आजादी की लड़ाई को कोई योगदान नहीं दिया ।” ऐसे लोगों के उत्तर में बस बर्तोल्त ब्रेखत का एक बयान उद्धृत किया जा सकता है, जो उन्होंने २६ जुलाई, १९३८ को वाल्टर बेंजामिन से बातचीत के दौरान दिया था, “विचारधारा के विरुद्ध संघर्ष खुद में एक नई विचारधारा बन जाता है ।” वास्तव में इन तमाम मुक्त चिंतनधाराओं का सारतत्व यह है कि व्यवस्था-परिवर्तन की बुनियादी लड़ाई से नारी मुक्ति संघर्ष को अलग करके वर्तमान सामाजिक-आर्थिक दायरे के भीतर सीमित कर दिया जाये । इनका एकमात्र उद्देश्य स्त्रियों को यह समझाना है कि उनकी आजादी के प्रश्न का सामाजिक क्रांति के प्रश्न से कुछ भी लेना-देना नहीं है और यह एक स्वायत्त-स्वतंत्र प्रश्न है । आज न केवल अलग-अलग किस्म की बुर्जुआ सुधारवादी चिंतनधाराएं, बल्कि सत्तर के दशक के यूरोकम्युनिज़्म से लेकर अस्सी के दशक में उभरी भांति-भांति की पश्चिमी नववामपंथी धाराएं तथा गोर्बचोवी लहर और देंगपंथी नकली कम्युनिज़्म  से प्रभावित धाराएं भी या तो स्त्रियों की मुक्ति के आन्दोलन को कुछ सामाजिक-आर्थिक मांगों, पर्यावरण या स्वास्थ्य के मुद्दों तक ही सीमित करके और उसे नारी मुक्ति के बुनियादी मुद्दे, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संघर्ष के दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य से काटकर सुधारवाद और अर्थवाद के दलदल में धंसा देना चाहती हैं या फिर केवल बाल की खाल निकालने जैसी कुछ अकादमिक बहसों और बौद्धिक कवायद तक मह्दूद कर देना चाहती हैं ।

आज नारी मुक्ति संघर्ष को एक क्रांतिकारी दिशा देने और एक नई शुरुआत करने के लिए यह जरूरी है कि इम  अपने आन्दोलन में मौजूद इन सभी विजातीय प्रवृत्तियों और रुझानों को लंबे वाद-विवाद में परास्त करें, उनके प्रभाव को निर्मूल करें और एक सही, ठोस लाइन और कार्यक्रम के इर्द-गिर्द अलग-अलग देशों में मेहनतकश स्त्रियों और मध्यवर्गीय स्त्रियों को गोलबंद एवं संगठित करें तथा साथ ही, उन्हें जनता के सभी वर्गों के क्रांतिकारी संघर्षों के साथ जोड़ें । तीसरी दुनिया के देश आज भी साम्राज्यवाद की कमजोर कड़ी हैं, जहाँ सामाजिक क्रांतियों के विस्फोटक की वस्तुगत परिस्थितियाँ सर्वाधिक परिपक्व हैं । ऐसे देशों में क्रांतिकारी नारी मुक्ति के आन्दोलन के हिरावल दस्तों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा है क्योंकि आधी आबादी की भागीदारी के बिना न तो कोई सर्वहारा क्रांति सफल हो सकती है और न सर्वहारा क्रांति के बिना आधी आबादी की वास्तविक मुक्ति की शुरुआत हो सकती है । ऐसे समय में, नेपाल में नारी मुक्ति आन्दोलन से संबंधित विषय पर संगोष्टी का आयोजन बहुत ख़ुशी की बात है, जहाँ क्रांति की शक्तियां आज तरह-तरह के अवसरवादी-दक्षिणपंथी भटकावों से संघर्ष करते हुए जनता के विभिन्न वर्गों को संगठित कर रही हैं । हम नेपाल में इस संगोष्टी के आयोजक कामरेडों का क्रांतिकारी अभिनंदन करते हैं ।

अपने इस निबन्ध में हमारा मन्तव्य नारी मुक्ति संघर्ष की विश्व-ऐतिहासिक यात्रा का एक संक्षिप्त सिंहावलोकन प्रस्तुत करते हुए उसके सामने आज उपस्थित कार्यभारों और चुनौतियों को रेखांकित करना है । हर नई शुरुआत के समय इतिहास का पुनरवालोकन जरूरी होता है । द्वंदात्मक भौतिकवादी जीवन-दृष्टि हमें यही बताती है कि इतिहास के मुल्यांकन-पुनर्मुल्यांकन का मूल अर्थ केवल भविष्य के लिए नये कार्यभारों का निर्धारण ही होता है ।

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

अब तक वर्ग-अंतरविरोधों से युक्त जितने भी समाजों का इतिहास हमें ज्ञात है, स्त्रियाँ उन सभी में परिवार और समाज – दोनों में पुरुषों के मातहत ही रही हैं । पूरे सामाजिक ढाँचे में सर्वाधिक शोषित-उत्पीड़ित तबकों में ही उनका स्थान रहा है । जब वर्ग समाज का प्रादुर्भाव हो रहा था और निजी स्वामित्व के तत्व और मानसिकता पैदा हो रही थी उसी समय पितृसत्तात्मक व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थी, और स्वाभाविक तौर पर, उसके प्रतिरोध की स्त्री-चेतना भी उत्पन्न हो चुकी थी जिसके साक्ष्य हमें अलग-अलग संस्कृतियों की पुराणकथाओं  और लोकगाथाओं में आज भी देखने को मिल जाते हैं ।
पर इतिहास के पूरे प्राकपूंजीवादी काल में उत्पीड़न के विरुद्ध विद्रोह की नारी चेतना अपने समय के विस्मरण के बाद नारी समुदाय ने अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्षों एवं क्रांतियों में भूदास या दास जैसे वर्गों के सदस्य के रूप में शिरकत तो की लेकिन पुरुषों के मुकाबले अपनी हीनतर सामाजिक-पारिवारिक स्थिति के विरुद्ध या अपनी स्वतंत्र अस्मिता एवं सामाजिक स्थिति के लिए उसने पूंजीवाद के आविर्भाव के पूर्व संघर्ष नहीं किया, क्योंकि तब इसका वस्तुगत आधार ही समाज में मौजूद नहीं था । समाज और परिवार में स्त्रियों की भूमिका, मातृत्व, शिशुपालन आदि स्थितियों के नाते वर्ग समाज में पैदा होनेवाली उनकी मजबूरियां, घरेलू श्रम की गुलामी, समाज में निकृष्टतम  कोटि के उजरती मजदूर की स्थिति, यौन असमानता, यौन शोषण, यौन उत्पीडन – इन सबके कुल योग के रूप में नारी प्रश्न (Women Question ) को विश्व इतिहास के पूंजीवादी युग में ही सुसंगत रूप में देखा गया और नारी मुक्ति की एक नई अवधारणा विकसित हुई, जिसका संबंध पुनर्जागरण काल के मानववाद और प्रबोधन के युग की तर्कपरकता एवं जनवाद की अवधारणा तथा बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों से था ।

सामंतवाद के युग तक स्त्रियों को सम्पत्ति के अधिकार सहित कोई भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं था और उनकी इस सामाजिक-पारिवारिक मातहती की स्थिति को धर्म, कानून और सामाजिक विधानों की स्वीकृति प्राप्त थी । सामन्तवाद के गर्भ में जब पूंजीवाद का भ्रूण विकसित हो रहा था, उसी समय से सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी शुरू होकर बढती चली गई । यही वह भौतिक आधार था, जिसने पहली बार स्त्रियों के भीतर सामाजिक अधिकारों की चेतना को जन्म दिया ।

पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के अंतर्गत सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी और साथ ही उनके अधिकारों के अभाव के जारी रहने की स्थिति के नाते शुरू से ही बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के प्रति परस्पर विरोधी रुख और दृष्टिकोण अलग-अलग रूपों में मौजूद रहे । पुनर्जागरण काल में एक ओर जहाँ प्राचीन ग्रीक और रोमन परिवारों के मॉडल और रोमन कानूनों के नमूनों के अनुकरण ने स्त्रियों की गुलामी को तात्कालिक तौर पर पुख्ता बनाया, वहीं पुनर्जागरण काल के महामानवों द्वारा प्रवर्तित मानववाद के क्रांतिकारी दर्शन ने धर्मकेन्द्रित (Theocentric ) समाज की जगह मानवकेन्द्रित (Anthropocentric ) समाज के मूल्यों का प्रतिपादन करके, सामाजिक व्यवस्था की तमाम दैवी स्वीकृतियों पर प्रश्नचिह्न उठाकर और लौकिकता के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित करके, प्रकारांतर से स्त्रियों की गुलामी की धार्मिक-अलौकिक स्वीकृति और सामंती समाज-व्यवस्था के विधानों की मानवेतर स्वीकृति को भी ध्वस्त करने का काम किया । तात्कालिक तौर पर सोहलवीं शताब्दी में धर्मसुधार काल के दौरान प्यूरिटनिज्म और काल्विनिज्म के प्रभाव में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति भले ही बहुत बदतर दिखाई दे रही हो, पर एक ओर दर्शन के स्तर पर मानववाद की विचारधारा और दूसरी ओर सामाजिक उत्पादन में लगातार बढती स्त्रियों की भागीदारी उनकी मुक्ति की चेतना को लगातार विकसित कर रही थी, जिसकी पहली मुखर अभिव्यक्ति बुर्जुआ क्रांतियों की पूर्वबेला में, प्रबोधन काल के दौरान सामने आई ।

स्त्रियों ने सबसे पहले समानता की मांग बुर्जुआ व्यवस्था के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया के शुरुआती काल में ही उठाई । अमेरिकी क्रांति (१७७५-१७८३) के दौरान मर्सी वारेन और एबिगेल एडम्स के नेतृत्व में स्त्रियों ने मताधिकार और सम्पत्ति के अधिकार सहित सामाजिक समानता की मांग करते हुए जार्ज वाशिंगटन और टॉमस जैफर्सन पर स्त्रियों की आबादी के मसले को संविधान में शामिल करने के लिए दबाव डाला, पर बुर्जुआ वर्ग के एक बड़े हिस्से के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका । प्रबोधन काल के दार्शनिकों के क्रांतिकारी भौतिकवादी दर्शन, वैज्ञानिक तर्कपरकता तथा सामाजिक न्याय और स्वतन्त्रता-समानता-भ्रातृत्व के रूप में जनवाद की अवधारणाओं ने सामाजिक उत्पादन के साथ ही सामंती स्वेच्छाचारिता-विरोधी राजनीतिक संघर्ष में भी सीधे भागीदारी कर रही स्त्रियों की आबादी को गहराई से प्रभावित किया । प्रबोधन काल के क्रांतिकारी दार्शनिकों ने पहली बार यह विचार प्रस्तुत किया कि स्त्रियों की उत्पीड़ित स्थिति मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों का हनन है । फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान फ़्रांसिसी बुर्जुआ विचारधारा का एक अग्रणी प्रवक्ता ए. कोंदोर्से (A .Condorcet ) स्त्रियों की समानता का प्रबल पक्षधर था । उसका मानना था कि स्त्रियों के बारे में समाज में मौजूद गहरे पूर्वाग्रह उनकी असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति की जड़ हैं । अपने समय के अन्य बुर्जुआ विचारकों की तरह कोंदोर्से भी स्त्री-प्रश्न के वर्गीय एवं आर्थिक आधारों को देख न सका । उसका यह विश्वास था कि कानूनी समानता और शिक्षा के जरिए स्त्रियों की मुक्ति संभव है । आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में भी, पश्चिम के कई बुर्जुआ विचारकों ने ऐसे ही विचार प्रस्तुत किये । ब्रिटिश दार्शनिक, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री जेम्स स्टुअर्ट मिल ने भी अपनी पुस्तक “ऑन द सब्जेक्शन ऑफ वुमन” (१८६९) में इन्हीं विचारों का प्रतिपादन किया ।

संगठित नारी आन्दोलन की शुरुआत सर्वप्रथम महान फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान हुई । उस समय स्त्रियाँ भी जन-प्रदर्शनों सहित सभी राजनीतिक कार्रवाइयों में हिस्सा ले रही थीं । समानता के लिए स्त्रियों के संघर्ष के लक्ष्य को समर्पित पहली पत्रिका का प्रकाशन क्रांति के दौरान फ़्रांस में ही शुरू हुआ वहीं क्रांतिकारी नारी क्लबों (Women’s Revolutionary Club) के रूप में स्त्रियों के पहले संगठन अस्तित्व में आये जिन्होंने सभी पक्षधर राजनीतिक संघर्षों में खुलकर भागीदारी करते हुए यह मांग की कि आजादी, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत बिना किसी लिंगभेद के लागू किये जाने चाहिए । ओलिम्प द गाउजेस (Olympe de Gouges, 1748-93) ने “मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा” (Declaration of the Rights of the Man and the Citizen) के मॉडल पर “स्त्रियों और स्त्री नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” तैयार की और उसे १७९१ में राष्ट्रीय असेम्बली के समक्ष प्रस्तुत किया । इस घोषणा पत्र में “स्त्रियों पर पुरुषों के शासन” का विरोध किया गया था और सार्विक मताधिकारों के व्यवहार के लिए स्त्री-पुरुषों के बीच पूर्ण सामाजिक-राजनीतिक समानता की मांग की गई थी । यद्यपि फ़्रांसिसी क्रांति के अधिकांश नेताओं ने स्त्रियों की समानता के विचार को ख़ारिज कर दिया और १७९३ के अंत में सभी नारी क्लबों को बंद कर दिया गया, लेकिन फिर भी इस युगांतरकारी क्रांति ने सामंती संबंधों पर निर्णायक मारक प्रहार करने के साथ ही कई कानूनों के द्वारा और नये सामाजिक मूल्यों के द्वारा औरतों की कानूनी स्थिति में भारी परिवर्तन किया । १७९१ में एक कानून बनाकर स्त्रियों की शिक्षा का प्रावधान किया गया, २० सितंबर १७९२ की आज्ञाप्ति द्वारा उन्हें कई नागरिक अधिकार प्रदान किये गये और अप्रैल १७९४ में कन्वेंशन द्वारा पारित एक कानून ने उनके लिए तलाक लेना आसान बना दिया । लेकिन थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया के काल में नारी मुक्ति संघर्ष की ये उपलब्धियां एक बार फिर, मूलत: छीन गयी । नेपोलियोनिक कोड (१८०४) और अन्य यूरोपीय देशों की ऐसी ही बुर्जुआ नागरिक संहिताओं ने एक बार फिर स्त्रियों के नागरिक अधिकारों को अतिसीमित कर दिया और परिवार, शादी, तलाक, अभिभावकत्व और संपत्ति के अधिकार सहित सभी मामलों में उन्हें कानूनी तौर पर एक बार फिर पूरी तरह पुरुषों के मातहत बना दिया ।

बुर्जुआ क्रांतियों के काल में नारी आन्दोलन का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मेरी वोल्सटोन क्राफ्ट की पुस्तक “स्त्री के अधिकारों का औचित्य-प्रतिपादन” ( A Vindication of the Rights of Women) थी, जो कुल मिलाकर ओलिम्प द गाउजेस के दस्तावेज के प्रतिपादनों को ही उन्नत एवं विस्तृत रूप में प्रस्तुत करती थी । उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के नारीवादी आन्दोलन (Feminist Movement ) की बुनियादी रुपरेखा सर्वप्रथम इसी पुस्तक में दिखाई देती है ।

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर

फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों का सार-संकलन करते हुए कहा जा सकता है कि जब सामन्तवाद के विरुद्ध बुर्जुआ वर्ग के साथ ही पूरी जनता इनमें शिरकत कर रही थी, तब स्वतन्त्रता, समानता और जनवाद के विचारों का प्रतिपादन अधिक क्रांतिकारी रूप में किया जा रहा था, पर बुर्जुआ सत्ता की स्थापना और सुदृढीकरण कें नये शासक वर्ग ने जिस प्रकार मेहनतकशों को, ठीक उसी प्रकार स्त्रियों को भी उसी हद तक आजादी और नागरिक अधिकार दिए, जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली और उत्पादन एवं विनिमय के संबंधों के लिए जरूरी था । इससे थोड़ी भी अधिक आजादी यदि स्त्रियों को मिल सकी, तो उसका एकमात्र कारण नारी समुदाय की नई चेतना और उसके संघर्षों का दबाव एवं भय था । पूंजीवाद ने सामन्ती मध्ययुगीन स्वेच्छाचारिता, घरेलू गुलामी, व्यक्तित्वहीनता, अनागरिकता और विलासिता एवं उपभोग की सामग्री होने की स्थिति से नारी समुदाय को बाहर तो निकला, पर पूरी तरह से नहीं । सत्ता में आने के साथ ही उसने जब चर्च के साथ “पवित्र गठबंधन” कर लिया तो स्त्रियों की गुलामी के सामंती मूल्यों के कुछ तत्वों को उसने फिर से अपना लिया । उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान स्त्रियाँ शिक्षा, नौकरी, सम्पत्ति के अधिकार मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं और उन्हें काफी हद तक अर्जित भी किया, लेकिन उनकी नागरिकता दोयम दर्जे की ही थी और पूंजीवादी उत्पादन तन्त्र में वे निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलामों (Wage Slaves ) में तब्दील कर दी गयी । फिर भी बुर्जुआ क्रांतियाँ ऐतिहासिक तौर पर नारी मुक्ति संघर्ष को एक कदम आगे ले आई, उन्हें सामंती समाज के निरंकुश दमन से एक हद तक छुटकारा दिलाया, सामाजिक उत्पादन में उनकी भागीदारी की स्थितियां पैदा की और उनके भीतर अपने जनवादी अधिकारों, स्वतंत्र अस्मिता और स्वतंत्र पहचान के लिए लड़ने की, सामाजिक-राजनीतिक क्रियाकलापों और संघर्षों में हिस्सा लेने की और एक नई जमीन पर खड़े होकर यौन-असमानता एवं यौन-उत्पीडन का विरोध करने की चेतना पैदा की ।

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यूरोप और अमेरिका के बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के अधिकारों की वास्तविक और वैधिक अनुपस्थिति की जो स्थिति बनी, उसे कई बुर्जुआ लेखकों-विचारकों से सैद्धांतिक समर्थन प्राप्त हुआ । बुर्जुआ साहित्य में बड़े पैमाने पर प्रस्तुत और आज भी पूरी दुनिया में व्यापक स्तर पर मान्यताप्राप्त तथाकथित जीवशास्त्रीय सिद्धांत के प्रारंभिक पैरोकारों में फ़्रांसिसी दार्शनिक ओगुस्त कोंत (A . Konte ) अग्रणी था जिसके अनुसार नारी समुदाय की असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति का मूल कारण “नारी की प्राकृतिक दुर्बलता” में निहित है, स्त्रियाँ स्वाभाविक एवं प्राकृतिक तौर पर पारिवारिक जिम्मेदारियों, प्रजनन, शिशुपालन आदि के लिए ही बनी होती हैं और कभी भी वे सामाजिक तौर पर पुरुषों के समकक्ष नहीं हो सकतीं । स्त्री-पुरुष असमानता का यह जीवशास्त्रीय सिद्धांत उन्नीसवीं शताब्दी के बुर्जुआ समाज का सर्वाधिक प्रभावशाली बुर्जुआ पुरुष-स्वामित्ववादी सिद्धांत था जिसका प्रभाव आज भी बड़े पैमाने पर मौजूद है । ब्रिटेन के विक्टोरियन सामाजिक मूल्यों पर भी इन विचारों का जबर्दस्त प्रभाव मौजूद था । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जर्मनी में प्रचलित पेटी-बुर्जुआ “थियरी ऑफ द थ्री केज” (German–Kirche, Kuche, Kinder-Church, Kitchen, Children) भी सारत: कोंत के विचारों का ही विस्तार था जिसके अनुसार, स्त्रियों की रूचि और सक्रियता का दायरा केवल चर्च, रसोई और बच्चों तक ही सीमित होना चाहिए । आगे चलकर फासिस्टों और नात्सियों ने इसी सिद्धांत के परिष्कृत रूप को इटली एवं जर्मनी में अपनाया और लागू किया । आज भी बुर्जुआ प्रतिक्रियावादी नवनात्सी तत्व और धार्मिक पुनरुत्थानवादी इस तरह के तर्क देते रहते हैं । गोर्बचोवी संशोधनवादियों ने भी स्त्रियों की सामाजिक भूमिका में कटौती करते हुए उनकी प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक बनावट का तर्क दिया और देंगपंथी संशोधनवादी भी आज घुमा-फिराकर ऐसे तर्क देते रहते हैं ।

एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जैसे-जैसे बुर्जुआ वर्ग अपनी सत्ता का सुदृढीकरण करता गया, नारी आन्दोलन के बुर्जुआ चरित्र, फ्रेमवर्क और नेतृत्व की सीमाएं ज्यादा से ज्यादा साफ़ होती चली गई । मताधिकार, सम्पत्ति के अधिकार और यौन आधार पर बरती जाने वाली हर प्रकार की असमानता के विरुद्ध जनवादी अधिकारों के व्यापक दायरे में क्रांतिकारी संघर्ष चलाने और उसे सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष से जोड़ने के बजाय, उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, बुर्जुआ नारी आन्दोलन के नेतृत्व ने फ़्रांसिसी क्रांति काल की परम्परा को छोड़ते हुए अपना उद्देश्य केवल बुर्जुआ समाज के फ्रेमवर्क के भीतर, अपने ही वर्ग के पुरुषों से स्त्रियों की समानता तक सीमित कर दिया और स्त्री-प्रश्न की अवधारणा को संकीर्ण करके संघर्ष को सुधारों के दायरे में कैद कर दिया । उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में उपरोक्त मांग के पूरक के तौर पर सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियों के काम करने के अधिकार की मांग उठाई गई ।

लेकिन नारी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा उस समय भी पूरी तरह से निष्प्राण नहीं हो गयी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के चौथे-पांचवें दशक में फ़्रांस में बड़े पैमाने पर ऐसा क्रांतिकारी यथार्थवादी साहित्य उत्पादित हुआ जिसमें स्त्रियों की पारिवारिक गुलामी और सामाजिक असमानता की आलोचना की गयी थी । इसमें जी. सांद (G. Sand) के उपन्यासों की अग्रणी भूमिका थी । इसी समय अमेरिका और ब्रिटेन में संगठित रूप से नारी मताधिकार आन्दोलन की शुरुआत हुई जहाँ सामाजिक जीवन में स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने लगी थीं । १८३० के दशक में अमेरिका में काले लोगों की मुक्ति के संघर्ष में १०० से भी अधिक दासता-विरोधी “नारी सोसायटी” जैसे संगठन हिस्सा ले रहे थे और ब्रिटेन में चार्टिस्ट आन्दोलन में स्त्रियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं । वास्तव में, पूंजीवादी समाज के विकास के नियम और विज्ञान, तकनोलाजी एवं संस्कृति का विकास, उत्पादन और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ, खुद ही वस्तुगत तौर पर, स्त्रियों की मातहती के सिद्धांतों की आधारहीनता को ज्यादा से ज्यादा उजागर करते जा रहे थे । सर्वप्रथम, उस काल के क्रांतिकारी जनवादी सिद्धान्तकारों, विशेषकर सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिये और राबर्ट ओवेन जैसे सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि काल्पनिक समाजवादी विचारकों ने स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता के बुर्जुआ सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाते हुए नारी उत्पीडन और बुर्जुआ समाज की प्रकृति के बीच के अंतर्संबंधों को उजागर किया था । नारी मुक्ति के बुर्जुआ सिद्धान्तकारों के विपरीत इन दार्शनिकों ने पहलों बार स्त्रियों को समानता का दर्जा देने के समाज के पुनर्गठन की अपनी योजना का एक बुनियादी मुद्दा बनाया । चार्ल्स फूरिये ने पहली बार यह स्पष्ट बताया कि किसी भी समाज में आजादी का एक बुनियादी पैमाना यह है कि उस समाज विशेष में स्त्रियाँ किस हद तक आजाद हैं ।

उन्नीसवीं शताब्दी के रुसी क्रांतिकारी जनवादियों ने इसी विचार-सरणि  को आगे बढ़ते हुए सामाजिक जीवन के साथ ही क्रांतिकारी संघर्ष में भी स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया । नारी मुक्ति के सर्वाधिक प्रखर प्रवक्ता चेर्नीशेव्स्की ने अपने उपन्यास “क्या करें” ( What is to be done )  में एक ऐसा स्त्री-चरित्र प्रस्तुत किया जिसने संकीर्ण पारिवारिक दायरे से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र सामाजिक-आर्थिक स्थिति बनाई थी और जो सामाजिक सक्रियताओं में भी संलग्न थी । चेर्नीशेव्स्की का यह उपन्यास यूटोपिया के तत्वों के बावजूद युगीन परिप्रेक्ष्य में, नारी-मुक्ति के सन्दर्भ में भी क्रांतिकारी महत्व रखता है ।

3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में

यूरोप में १८४८-४९ की क्रांतियों तथा जून १८४८ में पेरिस में हुए प्रथम सर्वहारा विद्रोह सहित विभिन्न देशों में उठ खड़े हुए मजदूर आंदोलनों ने स्त्रियों के राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों के संघर्ष को एक नया संवेग प्रदान किया । १८४८ में फ़्रांस में फिर से नारी क्लबों का गठन हुआ जिन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों को समान अधिकार देने के लिए संघर्षों की नए सिरे से शुरुआत की. इसी वर्ष फ़्रांस में स्त्री कामगारों के पहले स्वतंत्र संगठन की स्थापना हुई । जर्मनी और आस्ट्रिया में भी राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के उद्देश्य से स्त्री यूनियन गठित हुए ।

एक व्यापक आधार पर, एक सुनिश्चित कार्यक्रम के साथ नारीवादी आन्दोलन की शुरुआत का प्रस्थान-बिंदु जुलाई, १८४८ को माना जाता है जब एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन, लुकेसिया कफिन मोट और कुछ अन्य ने सेनेका फाल्स, न्यूयार्क में पहली बार नारी अधिकार कांग्रेस आयोजित करके नारी स्वतन्त्रता का एक घोषणा-पत्र जारी किया जिसमें पूर्ण कानूनी समानता, पूर्ण शैक्षिक एवं व्यावसायिक अवसर, समान मुआवजा और मजदूरी कमाने के अधिकार तथा वित देने के अधिकार की मांग की गयी थी । एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन तथा सूसन बराउनवेल एंथनी के नेतृत्व में यह आन्दोलन तेज गति से फैला और जल्दी ही यूरोप तक जा पहुंचा । ब्रिटेन में १८६० के दशक में चुनावी सुधारों के दौर में नारी मताधिकार आन्दोलन भी बड़े पैमाने पर उठ खड़ा हुआ । १८६७ में पारिलियामेंट में स्त्रियों को मताधिकार देने के जे. एस मिल के प्रस्ताव को रद्द कर दिए जाने के बाद कई नगरों में नारी मताधिकार सोसायिटीयों की स्थापना हो गयी, जिनको मिलाकर बाद में राष्ट्रीय एसोसिएशन बनाया गया । अमेरिका में १८६९ में दो नारी मताधिकार संगठनों का गठन हुआ । १८९० में इनकी एकता के बाद राष्ट्रीय अमेरिकी नारी मताधिकार संघ अस्तित्व में आया । १८८२ में फ़्रांसिसी नारी अधिकार लीग का गठन हुआ ।

मुख्यत: उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के प्रभाव में जनवादी चेतना संचरित होने लगी थी जिससे स्त्री समुदाय भी अछूता नहीं रह गया था । इस दौरान लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की आजादी और बराबरी की मांग को लेकर आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो हालाँकि व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के आभाव में मुख्यत: नारीवादी ( Fiminist ) प्रकृति का था, फिर भी यह लातिनी देशों की स्त्रियों की नयी चेतना का द्योतक था । इसी अवधि में पहले जापान, भारत और इंडोनेशिया में और फिर तुर्की और ईरान में नारी आन्दोलन ने अपना पहला कदम आगे बढ़ाया । १८८८ में अमेरिकी नारीवादियों की पहल पर अंतरराष्ट्रीय नारी परिषद (International Council of Women ) की स्थापना हुई । १९०४ में अंतरराष्ट्रीय नारी मताधिकार संश्रय ( International Women Suffrage Alliance) की स्थापना हुई जिसका नाम १९४६ में बदलकर ‘अंतरराष्ट्रीय नारी संश्रय समान अधिकार-समान दायित्व’ (International Alliance of Women – Equal Rights-Equal Responsibilities ) कर दिया गया ।

इस दौरान एक महत्वपूर्ण विकास यह हुआ कि स्त्रियों की नयी चेतना और संघबद्ध होने की आंकाक्षा को देखते हुए उनकी “स्थिति में सुधार” और “उनके विकास” की आड़ लेकर आध्यात्मिक, धार्मिक सुधारवादी और संकीर्ण राष्ट्रवादी ग्रुपों ने भी भांति-भांति के नारी संगठनों की स्थापना की जिनका मूल उद्देश्य स्त्रियों की मुक्तिकामी आकांक्षा को सुधारों के दायरे में कैद करना, उन्हें मजदूर आंदोलनों, क्रांतिकारी बुर्जुआ जनवादी आंदोलनों और राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के प्रभाव से दूर रखना तथा इस तरह निहित वर्ग स्वार्थों की सेवा करना था ।

4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा


नारी आंदोलनों में सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण के विकास की प्रक्रिया उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में शुरू हई । नारी-प्रश्न के वर्गीय आधारों को उद्घाटित करते हुए मार्क्स और एंगेल्स ने  पहली बार यह स्पष्ट किया कि निजी सम्पत्ति और वर्गीय समाज के संघटन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही स्त्री की दासता की शुरुआत हुई । उन्होंने स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में कामगार स्त्रियाँ निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम होने के साथ-साथ यौन आधार पर शोषण-उत्पीडन का शिकार तो हैं ही, सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ भी सामाजिक श्रम से कटी हुयी या तो नारकीय घरेलू दासता एवं पुरुष स्वामित्व के बोझ से दबी हुई हैं या बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के लिए आरक्षित कुछ विशिष्ट अपमानजनक पेशों में लगी हुयी निहायत निरंकुश स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं । उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में मेहनतकश स्त्रियों की समस्यायों का समाधान असंभव है और स्त्री समुदाय की सच्ची मुक्ति की दिशा में पहला कदम पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था का खात्मा है ।

मार्क्स-एंगेल्स ने यह स्पष्ट किया कि नारी मुक्ति  की दिशा में पहला कदम यह होगा कि स्त्री मजदूरों की वर्ग चेतना को उन्नत किया जाये, सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ाई जाये और उन्हें मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलनों में शामिल किया जाये । पहले इंटरनेशनल ने नारी मजदूरों के श्रम के संरक्षण से संबंधित दो प्रस्ताव पारित किये थे । इन प्रस्तावों ने स्त्रियों के उत्पीडन और उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व एवं मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के बीच अंतर्संबंधों को उद्घाटित  करने के साथ ही नारी अधिकारों के प्रति प्रूधोंवादी दृष्टिकोण के दिवालियेपन को भी उजागर कर दिया । प्रूधों और उसके चेले सामाजिक रूप से उपयोगी श्रम में स्त्रियों की भागीदारी का विरोध करते थे और उनकी सामाजिक समानता की बात करते हुए भी परिवार और बच्चों की देखभाल ही उनकी प्रमुख जिम्मेदारी मानते थे ।  स्त्री कामगारों के श्रम-संरक्षण संबंधी पहले इंटरनेशनल के निर्णय ने सर्वहारा नारी आन्दोलन के विकास का सैद्धांतिक आधार तैयार करने का काम किया । मार्क्स-एंगेल्स ने, और आगे चलकर लेनिन, स्टालिन और माओ ने — अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के इन पाँचों महान शिक्षकों ने कामगार औरतों की उत्पीडित आबादी को सर्वहारा क्रांति की सबसे बड़ी आरक्षित शक्ति ( Greatest Reserve ) के रूप में देखा । सर्वहारा क्रांति और स्त्री प्रश्न के समाधान के द्वंदात्मक अंतर्संबंधों को निरुपित करते हुए लेनिन ने लिखा था, ” स्त्रियों के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल किये बिना सर्वहारा अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं हासिल कर सकता ।”

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में क्रांतिकारी संघर्षों में, विशेषकर १८७१ के युगांतरकारी पेरिस कम्यून में शौर्यपूर्ण भागीदारी के साथ ही स्त्रियों ने राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में स्वतंत्र रूप से भी हिस्सा लिया और अपने संगठन बनाये । फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन में स्त्रियों ने अपनी ट्रेड युनियने संगठित कीं ।  उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में फ़्रांस और ब्रिटेन में स्त्री कामगारों के कई संगठन पहले इंटरनेशनल में भी शामिल हुए । जर्मन कामगार औरतें ‘ इंटरनेशनल प्रोफेशनल एसोसियेशन ऑफ मैन्युफैक्चरी , इंडस्ट्रियल एंड हैंडीक्राफ्ट  वर्कर्स’ में शामिल हो गयीं जिसकी स्थापना १८६९ में क्रिम्मित्स्चू (सैक्सनी) में हुई थी और जो इंटरनेशनल के विचारों से प्रभावित था । स्त्री-प्रश्न पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण को विकसित और व्याख्यायित करने में तथा वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित सर्वहारा नारी आंदोलनों को विकसित करने में बेबेल की सुप्रिसिद्ध कृति ‘नारी और समाजवाद’ (Women and Socialism ) ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में मजदूर स्त्रियों का आन्दोलन जर्मनी में सर्वाधिक तेज गति से विकसित हुआ । १८९१ में जर्मनी की सामाजिक जनवादी पार्टी ने अपने कार्यक्रम (एर्फुर्ट कार्यक्रम ) में नारी मताधिकार की मांग को शामिल किया । पार्टी ने स्त्रियों-पुरुषों की सांगठनिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार किया और ट्रेड यूनियनों में स्त्रियों की भरती के विशेष प्रयास शुरू किये गये । १८९१ में स्त्री कामगारों की एक पत्रिका -Gleichcheit – का प्रकाशन भी शुरू हुआ जो १८९२ से १९१७ तक क्लारा जेटकिन के निर्देशन में प्रकाशित होती रही । सन १९०० से जर्मनी भर में नियमित नारी सम्मेलनों के आयोजन की शुरुआत हुई ।

पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली की अपनी जरूरतों के चलते और सर्वहारा आंदोलनों और विशेष तौर पर नारी आंदोलनों की विविध धाराओं-प्रवृतियों के दबाव के नाते उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यूरोप में स्त्रियों की शिक्षा और श्रम-संरक्षण से संबंधित कई कानून बने और उनकी कानूनी हैसियत में कुछ महत्वपूर्ण सुधार हुए । उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में १८४७ में ही स्त्रियों का श्रम दिवस दस घंटे का कर दिया गया था । मार्क्सवाद के संस्थापकों ने इस कानून को मजदूर वर्ग की एक बड़ी जीत की संज्ञा दी थी । स्त्री मजदूरों के संरक्षण से संबंधित कई अन्य कानून इस दौरान विभिन्न यूरोपीय देशों में बने । स्त्रियाँ  ट्रेड युनियनों में शामिल होने लगीं । १८८९ में ट्रेड यूनियन्स कांग्रेस में उनकी सदस्यता का प्रश्न सारत: हल हो गया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही स्त्री आन्दोलन के दबाव में, पहले सम्पन्न और फिर आम परिवारों की लड़कियों के लिए माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना यूरोप में और फिर एशिया-लातिनी अमेरिका के कुछ देशों में हुई । ब्रिटेन में स्त्रियों को सबसे पहले शिक्षक का पेशा अपनाने का अधिकार मिला । फिर धीरे-धीरे कुछ अन्य क्षेत्रों में भी उन्हें रोजगार के अवसर मिले । १८५८ में ब्रिटेन में स्त्रियों को तलाक का अधिकार प्राप्त हुआ, यद्यपि इस सन्दर्भ में १९३८ तक उनके अधिकार पुरुषों की अपेक्षा कम थे । १८७० से १९०० के बीच ब्रिटिश स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार हासिल किये । १८६९ में कर भुगतान करने वाली स्त्री नागरिकों को म्युनिसिपल चुनावों में भागीदारी का अधिकार मिला और १९१८ में शादीशुदा स्त्रियों तथा ३० वर्ष से अधिक आयु वाली, विश्वविद्यालय डिप्लोमा प्राप्त की हुई स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । १९२८ में २१ वर्ष आयु वाली स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । अमेरिका में स्त्रियों को शिक्षण पेशा अपनाने का अधिकार उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही मिल चुका था । १८५० से १८७० के बीच वहाँ स्त्रियों को तथाकथित “लिबरल” पेशे अपनाने का अधिकार प्राप्त हुआ और १८८० के बाद तथाकथित “पुरुष” पेशों में भी उन्हें स्वीकार किया जाने लगा । १८४८ में वहाँ शादीशुदा औरतों को सम्पत्ति रखने का अधिकार प्राप्त हुआ । १८७४ में वहाँ पहली बार स्त्रियों के श्रम दिवस को सीमित करने का कानून (मैसाचुसेट्स  ) में बना । १९२० में अमेरिकी संविधान में हुए उन्नीसवें संशोधन द्वारा स्त्रियों के मताधिकार पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया गया । फ़्रांस में भी उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार प्राप्त कर लिए थे । १८९२ में उनके श्रम के संरक्षण से संबंधित पहला कानून बना, उनका अधिकतम लम्बा श्रम दिवस ११ घंटे का तय किया गया जिसे १९०४ में घटाकर १० घंटे कर दिया गया । स्त्री मताधिकार संबंधी विधेयक फ़्रांस में पहली बार १८४८ में पेश किया गया था, लेकिन १९४४ में जाकर उन्हें यह अधिकार हासिल हो सका । जर्मनी में औरतों को मत देने का अधिकार १९१९ के वाईमर संविधान द्वारा प्राप्त हुआ था, लेकिन १९३३ में सत्ता में आने के साथ ही नात्सियों ने लम्बे और कठिन संघर्षों द्वारा अर्जित उनके सभी राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों को समाप्त कर दिया ।

इन कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की चर्चा के बाद, संक्षेप में, इतना ही उल्लेख यहाँ पर्याप्त है कि कुछ एक अपवादों को छोडकर, पश्चिमी देशों की स्त्रियों ने बीसवीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते बुर्जुआ सामाजिक ढांचे के भीतर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लिए थे । पर यह कहते हुए कुछ बातों को रेखांकित करना निहायत जरूरी है । पहली बात यह कि कानूनी तौर पर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लेने के बावजूद वास्तव में आज तक उन्हें सामाजिक समानता प्राप्त नहीं है । वे दोयम दर्जे की नागरिक हैं । काम करने वाली औरतें वहाँ असंगठित क्षेत्र में सस्ता श्रम बेचने को बाध्य हैं और निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम हैं । मुख्यत: मध्यम वर्ग और अन्य सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ और सामान्यत: सभी स्त्रियाँ वहाँ घरेलू दासता से पूर्णत: मुक्त नहीं हो सकी हैं । जीवन के हर क्षेत्र में उन्हें आर्थिक शोषण के साथ ही यौन-उत्पीडन का भी शिकार होना पड़ता है । धार्मिक मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही, तरह-तरह की फासिस्ट प्रवृतियों और साथ ही बीमार बुर्जुआ संस्कृति का दबाव भी उन्हें ही सबसे अधिक झेलना पड़ता है । अभी भी गर्भपात और तलाक से लेकर बलात्कार तक — बहुत सारे मामलों में, पश्चिमी देशों में कानून स्त्रियों के प्रति भेदभावपूर्ण बने हुए हैं । दूसरी बात यह है कि पश्चिम की स्त्रियों ने जो भी अधिकार प्राप्त किये हैं, वह उन्हें  बुर्जुआ समाज ने तोहफे के तौर पर नहीं दिए हैं । ये अधिकार सामाजिक क्रांतियों, वर्ग-संघर्षों और नारी समुदाय के शताब्दियों लम्बे संघर्ष द्वारा अर्जित हुए हैं । बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों में व्यापक आम जनता और स्त्रियों की भागीदारी के दौर में स्त्रियों को अपने नागरिक अधिकारों की पहली किश्त हासिल हुई । राज्यसत्ता पर काबिज होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने जब आम जनता पर अपना अधिनायकत्व लागू किया तो स्त्रियों के जनवादी अधिकारों को भी उसने हडपने की हर कोशिश की और केवल उसी हद तक उन्हें नागरिकता के अधिकार दिए जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली की जरूरत थी । पुन: उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब क्रांतियों का नया विस्फोट हुआ और सर्वहारा वर्ग राजनीतिक संघर्ष के मंच पर उतरा तो नारी आन्दोलन को भी महत्वपूर्ण संवेग प्राप्त हुआ और बाद के पचास वर्षों के संघर्षों के दौरान पश्चिम में नारी समुदाय ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित कीं । इस समय मजदूर स्त्रियाँ नारी मध्यवर्गीय स्त्रियों के आगे आ खड़ी हुई थीं । बीसवीं शताब्दी में, अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत संघ में, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोपीय देशों में और १९४९ की नई जनवादी क्रांति के बाद चीन में तथा मेहनतकशों के शासन वाले कुछ अन्य देशों में स्त्री समुदाय ने पहली बार समानता के जो अधिकार अर्जित किये, उनसे भी पश्चिमी देशों की और साथ ही राष्ट्रीय जनवाद की लड़ाई लड़ रहे एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों की मुक्तिकामी स्त्रियों के आंदोलनों को भी नई प्रेरणा और नया संवेग प्राप्त हुआ । तीसरी बात जो गौरतलब है, वह यह कि उन्नीसवीं शताब्दी में, जब तक यूरोप क्रांतियों का केंद्र रहा, तभी तक नारी आन्दोलन वहाँ तेजी से विकसित होता हुआ एक के बाद एक नई जीतें हासिल करता रहा । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू में विश्व पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में संक्रमण के बाद क्रांतियों का केंद्र खिसककर जब रूस और एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों-नवउपनिवेशों में आ गया तो नारी आन्दोलन का मुख्य रंगमंच भी इन्हीं देशों में स्थानांतरित हो गया । यह वस्तुगत ऐतिहासिक तथ्य इसी सत्य को पुष्ट करता है कि नारी आन्दोलन, उसका भविष्य और उसकी जीत-हार की नियति सामाजिक संघर्षों और क्रांतियों के साथ अविभाज्यत: जुडी हुई है । आगे हम सर्वहारा क्रांतियों की धारा और उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों की धारा के साथ जारी नारी मुक्ति आंदोलनों की अत्यंत संक्षिप्त चर्चा करेंगे ।

5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन

मार्क्स-एंगेल्स के बाद लेनिन ने नारी-प्रश्न पर मार्क्सवादी चिंतन को आगे बढाया । लेनिन के काल में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन में कामगार औरतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने की प्रक्रिया उन्नत धरातल पर शुरू हुई. नारी-मुक्ति के प्रश्न पर लेनिन के कई महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अवदान थे । बुर्जुआ नारीवाद की नारी-मुक्ति विषयक वर्गेतर सोच और “यौन मुक्ति” की बुर्जुआ अवधारणाओं के साथ ही उन्होंने मार्क्सवाद से प्रेरित नारी-मुक्ति आन्दोलन की धारा में मौजूद कई अवैज्ञानिक धारणाओं और विजातीय रुझानों का विरोध किया । स्वतन्त्रता का अर्थ असामाजिक स्वच्छंदता और पुरुष के शोषण से मुक्ति का अर्थ “यौन मुक्ति” नहीं होता, यह कम्युनिस्ट नैतिकता और विज्ञान के विरुद्ध है — इसे लेनिन ने एकाधिक बार स्पष्ट किया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में क्लारा जेटकिन, क्रुप्सकाया, अलेक्सांद्रा कोल्लोंताई और अनेंसा आरमाँ आदि कम्युनिस्ट नेत्रियों ने अपनी सक्रियताओं और लेखन के द्वारा भी नारी मुक्ति के मोर्चे पर अहम भूमिका निभाई । इन अग्रणी व्यक्तित्वों के साथ लेनिन के वाद-विवाद और विचार-विमर्श के दौरान नारी मुक्ति के कई पक्षों पर मार्क्सवादी अवस्थिति महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुई ।

बीसवीं शताब्दी के शुरू होते-होते सर्वहारा नारी आन्दोलन के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के लिए पूर्वपीठिका तैयार हो चुकी थी । दूसरे इंटरनेशनल की कांग्रेस में नारी आन्दोलन और नारी समस्या के विविध पहलुओं पर नियमित रूप से बहसें हुआ करती थीं । १८९३ में ज्यूरिख कांग्रेस में यह कहा गया की स्त्रियों के श्रम के कानूनी संरक्ष्ण को पूरा समर्थन देना पूरी दुनिया के मजदूरों का कर्तव्य है । दूसरे इंटरनेशनल की लन्दन कांग्रेस (१८९६) को महिला प्रतिनिधियों के सम्मेलन ने स्त्री-पुरुष– दोनों ही समुदायों के सर्वहारा वर्ग के आम संगठन को स्वीकृति देने के साथ ही इस बात पर जोर दिया कि मेहनतकश वर्गों के नारी आन्दोलन और नारीवाद (Feminism ) के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खिंची जानी चाहिए ।

स्त्री समाजवादियों के पहले और दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (स्टुट्गार्ट, १९०७ और कोपेनहेगेन, १९१० ) मेहनतकश नारी आन्दोलन की विकास-यात्रा के दो महत्वपूर्ण मील पत्थर थे । पहले सम्मेलन ने बिना किसी लिंग-भेद के सार्विक एवं समान मताधिकार का प्रस्ताव पारित किया जिसे दूसरे इंटरनेशनल के स्टुट्गार्ट कांग्रेस ने भी स्वीकार किया । पहले सम्म्मेलन की प्रतिनिधियों ने क्लारा जेटकिन की अध्यक्षता में एक अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना करने और उसके मुखपत्र के प्रकाशन का भी निर्णय लिया । दूसरे सम्म्मेलन में सत्रह देशों की महिला प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । इसी सम्मेलन में प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब दक्षिणपंथी अवसरवादी काउत्स्की और उसके अनुयाइयों के विश्वासघात के कारण अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन में फूट पड़ी ठीक उसी समय मेहनतकश नारी आन्दोलन को भी एक गंभीर धक्का लगा ।  अधिकांश सामाजिक जनवादी स्त्री संगठनों ने भी विश्वयुद्ध में काउत्स्कीपंथियों की ही भांति अंधराष्ट्रवादी अवस्थिति अपनाई । बुर्जुआ नारीवादी संगठन तो पहले से ही यही अवस्थिति अपनाए हुए थे । लेकिन बोलेशेविक प्रस्ताव को ख़ारिज करके एक शांतिवादी प्रस्ताव स्वीकार करने के बावजूद बर्न अंतरराष्ट्रीय स्त्री समाजवादी सम्मेलन (१९१५) ने, जो बोलेशेविकों की पहल पर आयोजित हुई थी, समाजवादी अवस्थिति अपनाने वाली स्त्री समाजवादियों की एकता को बहाल रखने में अहम भूमिका निभाई । युद्ध के दौरान युद्ध में शामिल देशों की स्त्रियों ने भुखमरी और बदहाली के खिलाफ कई प्रदर्शन आयोजित किये । ८ मार्च (२३ फरवरी ) १९१७ को बोलेशेविकों की पेत्रोग्राद कमेटी की अपील पर भुखमरी, युद्ध और जारशाही के विरुद्ध रुसी स्त्रियों के प्रदर्शन ने एक व्यापक जनांदोलन का सूत्रपात किया जिसकी चरम परिणति फरवरी क्रांति के रूप में सामने आई । अक्टूबर समाजवादी क्रांति की तैयारी में रूस की महिला मजदूरों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । क्रांति के बाद सोवियत संघ में नारी आन्दोलन ने हर संभव तरीके से समाजवादी निर्माण के कामों को आगे बढ़ाने में, समाजवाद की रक्षा में और सामाजिक-राजनीतिक जीवन में आम स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने में एक अग्रणी भूमिका निभाई । समाजवादी सोवियत संघ की सर्वहारा राज्यसत्ता ने दुनिया के इतिहास में पहली बार न केवल स्त्री समुदाय को कानूनी तौर पर पुरुषों के साथ पूर्ण समानता के अवसर प्रदान किये बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में व्यवहारत: इसे लागू करने की दिशा में भी हर संभव कदम उठाये । सोवियत संघ स्त्री-मुक्ति के सन्दर्भ में भी पूरी दुनिया के लिए एक नया प्रकाश स्तंभ बन गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अक्टूबर क्रांति के प्रभाव में पूरी दुनिया में नारी आन्दोलन में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई । एक ओर जहाँ आम उत्पीडित नारी समुदाय समाजवाद की विचारधारा की ओर तेजी से आकृष्ट हुआ, वहीँ बुर्जुआ नारी संगठनों ने ज्यादा से ज्यादा खुले तौर पर बुर्जुआ व्यवस्था की हिफाजत का काम शुरू कर दिया । यूरोप की संशोधनवादी सामाजिक जनवादी पार्टियों ने पूंजीवाद की दूसरी सुरक्षापंक्ति का काम करते हुए स्त्रियों के बीच अपनी गतिविधियाँ तेज कर दीं ।

सोवियत संघ के बाहर, सर्वहारा विचारधारा पर आधारित नारी आन्दोलन ने १९२० के दशक में सुनिश्चित शक्ल अख्तियार करना शुरू किया । नारी आन्दोलन को क्रान्तिकारी आन्दोलन का अपरिहार्य बुनियादी अंग मानते हुए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कांग्रेस में मेहनतकश स्त्रियों के बीच कम्युनिस्टों के काम के प्रश्न पर लगातार गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श होता रहा । १९२० में कोमिन्टर्न के निर्देशन में अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना हुई जिसकी सेक्रेटरी क्लारा जेटकिन थीं । महिला कम्युनिस्टों का एक प्रेस भी स्थापित हुआ और एक अंतरराष्ट्रीय महिला पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ । १९२० से १९२६ के बीच महिला कम्युनिस्टों के चार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुए ।

यद्यपि नारी आन्दोलन पर दूसरे इंटरनेशनल के विचारधारात्मक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने महिला कम्युनिस्ट संगठनों के कामों पर विशेष जोर दिया, पर लेनिन और इंटरनेशनल के अन्य अग्रणी नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि स्त्रियों के गैर-पार्टी संगठन और सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों की मांगों को लेकर संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठन भी बनाये जाने चाहिए जिसमें मेहनतकश स्त्रियों के अतिरिक्त जनता के अन्य वर्गों की स्त्रियाँ भी हिस्सा लें । सोवियत संघ के बाहर के देशों में नारी आदोलन में मौजूद संकीर्णतावादी भटकावों और संगठनों की कमजोरी के कारण व्यापक स्त्रियों को उनके जनवादी अधिकारों की मांग और यौन-असमानता के विरोध के आधार पर संगठित करने में तीसरे दशक तक तो कोई विशेष सफलता नहीं प्राप्त हो सकी, लेकिन चौथे दशक में फासिज्म के उभार ने तात्कालिक रूप से, वस्तुगत तौर पर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं कि फासिज्म और साम्राज्यवादी युद्ध-विरोधी संयुक्त मोर्चे में जनता के सभी वर्गों की — विशेषकर कामगार और मध्यम वर्ग की स्त्रियों के संगठित होने की प्रक्रिया शुरू हो गई । जहाँ भी फासिस्ट ताकतें सत्ता में आयीं, प्रगतिशील नारी संगठनों के साथ ही उन्होंने उन बुर्जुआ नारी संगठनों को भी कुचल दिया जो नारी मुक्ति या स्त्रियों के समान अधिकारों की बात करती थीं । इसके साथ ही फासिज्म-विरोधी लोक मोर्चे के एक अंग के रूप में एक जनवादी, फासिज्म-विरोधी नारी आन्दोलन के संघटित होने की प्रक्रिया शुरू हो गयी । अगस्त १९३४ में सोवियत संघ सहित कई देशों के प्रगतिशील नारी संगठनों की पहल पर पेरिस में युद्ध  और फासिज्म-विरोधी महिला विश्व कांग्रेस आयोजित हुआ जिसमें कम्युनिस्ट शांतिवादी, नारीवादी और क्रिश्चियन समाजवादी स्त्री संगठनों एवं ग्रुपों के कुल १०९६ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । कांग्रेस में युद्ध और फासिज्म-विरोधी विश्व महिला कमेटी का गठन किया गया । पुन: मई १९३८ में मार्सिइएज (Marseillis) में युद्ध-विरोधी अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन का आयोजन हुआ ।

यद्यपि विश्वयुद्ध के दौरान जनवादी महिला आन्दोलन के विकास की दिशा में सांगठनिक-परिमाणात्मक शक्ति की दृष्टि से कोई बहुत महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई, लेकिन फासिज्म के रूप में सामने आई बुर्जुआ अधिनायकत्व की नग्नता ने और उसके विश्वव्यापी प्रतिरोध ने इसके लिए आवश्यक पूर्वाधार तैयार कर दिया ।

जिन उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में मुक्तियुद्ध जारी थे, वहां पहले से ही जनवादी नारी आन्दोलन के संगठित होने की प्रक्रिया जारी थी । फासिज्म-विरोधी संघर्ष के अनुभवों, फासिज्म की पराजय, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादी शक्तियों के निर्बल हो जाने और एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर के उठ खड़े होने के व्यापक प्रभाव दुनिया की आधी आबादी की चेतना पर और नारी आन्दोलन पर भी पड़ा । तीसरी दुनिया के देशों में उपनिवेशवाद की पराजय की प्रक्रिया शुरू होने के इस दौर में उन अधिकांश देशों में समाजवाद को सच्चा मित्र मानने वाला जनवादी नारी आन्दोलन शक्तिशाली होता चला गया । चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जारी मुक्ति-संघर्ष में स्त्रियों की भागीदारी और मुक्त क्षेत्रों में उनकी सामाजिक स्थिति पहले से ही दुनिया भर के पिछड़े देशों की स्त्रियों को आकृष्ट कर रही थी । १९४९ में नई जनवादी क्रांति संपन्न होने के बाद मध्ययुगीन पित्रसत्तात्मक स्वेच्छाचारिता से भरे समाज में स्त्रियों को पूर्ण बराबरी का कानूनी दर्ज़ा देकर और फिर समाज में उसे एक वास्तविकता में रूपांतरित करने की शुरुआत करके चीन के सर्वहारा राज्य ने ऐतिहासिक काम किया था उस पर पूरी दुनिया की स्त्रियों और मुक्तिकामी जनता की निगाहें टिकी हुई थीं । द्वितीय विश्व्यद्धोत्तर काल में पश्चिम के देशों की स्त्रियाँ भी अपने जनवादी अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने की जरूरत शिद्दत के साथ महसूस कर रहीं थीं ।

इन्हीं परिस्थितियों में, अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन ने आगे की ओर कुछ महत्वपूर्ण डग भरे । इनमें सर्वाधिक महत्पूर्ण कदम था दिसंबर, १९४५ में महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ( Women’s International Democratic Federation — W.I.D.F.) की स्थापना, जिसमें ३९ देशों के राष्ट्रीय स्त्री-संगठनों ने भाग लिया । महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ने स्त्रियों की आम मांगों को लेकर अलग-अलग देशों में और विश्व स्तर पर सक्रिय विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्त्री संगठनों के साथ साझा कार्रवाइयों की भी कोशिश की, लेकिन उस समय पूरी दुनिया में जारी कम्युनिज्म-विरोधी मुहीम के प्रभाव में बहुत सारे बुर्जुआ, तथाकथित परम्परागत स्त्री संगठनों के नेतृत्व ने इसे स्वीकार नहीं किया ।

१९५६ में रूस में ख्रुश्चेव द्वारा प्रतिक्रांतिकारी तख्तापलट और रूस तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना ने विष-स्तर पर जारी वर्ग-संघर्ष को भारी धक्का पहुँचाने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन को भी भारी नुकसान पहुँचाया । साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष, पूंजीवादी देशों में और तीसरी दुनिया के नवस्वाधीन देशों में जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष और व्यवस्था-विरोधी संघर्ष में स्त्री आन्दोलन की क्रान्तिकारी भागीदारी के विपरीत — संशोधनवादियों ने दुनिया भर में नारी मुक्ति आन्दोलन को सुधारवाद और शांतिवाद के दलदल में ले जाकर धंसा देने की हर चंद कोशिशें कीं और काफी हद तक इसमें सफलता भी प्राप्त की । यही कारण था कि छठे दशक के अंत तक दुनिया भर के नारी आन्दोलन में गतिरोध और शून्य की सी स्थिति उत्पन्न हो गयी थी । यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसमें बुर्जुआ नारीवाद के नये उभार ने सातवें दशक में जन्म लिया ।

6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन

जैसाकि उपर उल्लेख किया जा चुका है, पश्चिम के देशों में बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों की पूर्वपीठिका तैयार होने के साथ ही, यानि प्रबोधन काल (Age of Enlightenment ) के दौर में नारी मुक्ति की चेतना का जन्म हुआ और बुर्जुआ क्रांतियों के दौर में स्त्री समुदाय ने अपने सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी ।

एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों में बुर्जुआ विकास का स्वरूप यूरोप जैसा नहीं रहा । यहाँ बुर्जुआ वर्ग पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रांति की प्रक्रिया से गुजरकर सत्ता में नहीं आया । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों के पूर्ण औपनिवेशीकरण के बाद वहाँ की पुरानी सामाजिक-आर्थिक संरचना को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया । बाद में इन देशों में औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से जिस बुर्जुआ वर्ग का जन्म हुआ, वह एक समझौतापरस्त वर्ग था । वह अमेरिका या फ़्रांसिसी क्रांति के वाहक बुर्जुआ वर्ग की भांति क्रान्तिकारी भौतिकवाद और जनवाद के मूल्यों से लैस नहीं था । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों में इसी बुर्जुआ वर्ग ने अलग-अलग परिस्थितियों में कहीं एक हद तक क्रान्तिकारी संघर्ष करके तो कहीं ‘समझौता-दबाव-समझौता’ की रणनीति अपनाकर और कहीं पूरी तरह साम्राज्यवाद के साथ समझौता करके सत्ता हासिल की । तीसरी दुनिया के इस बुर्जुआ वर्ग की राजनीतिक स्वतन्त्रता भी उनके चरित्र और उनके संघर्ष या समझौते की प्रकृति के ही अनुरूप कम या ज्यादा थी, पर कहीं भी इस नये बुर्जुआ वर्ग ने न तो साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद किया और न ही क्लासिकीय अर्थों में उस रूप में जनवाद को ही बहाल किया, जैसाकि फ़्रांस या अमेरिका के बुर्जुआ वर्ग ने किया था ।

इन सभी देशों में नारी आन्दोलन के उद्भव और विकास की प्रक्रिया और उसका चरित्र भी इन देशों के इतिहास की उपरोक्त विशिष्टता से ही निर्धारितहुआ ।

एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी प्रक्रिया घटित न होने के कारण इन देशों के सामाजिक जीवन एवं मूल्यों में जनवादी मूल्यों-मान्यताओं की व्याप्ति अत्यंत कम थी और नारी समुदाय उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में भी मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था और मूल्यों-मान्यताओं के बंधन में जकड़ा रहा । काफी हद तक यह स्थिति आज भी बनी हुई है । फिर भी उन्नीसवीं शताब्दी में नारी मुक्ति की जो चेतना तीसरी दुनिया के देशों के नारी समुदाय में संचरित हुई, उसकी प्रक्रिया राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के दौर में शुरू हुई ।

अधिकांश लातिन अमेरिका देशों (जैसे मैक्सिको, क्यूबा, ब्राज़ील, हैती, निकारागुआ आदि ) में स्पेनी उपनिवेशवादियों के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हो चुकी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में लातिन अमेरिका देशों में स्त्रियों के संगठनों के बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, हालाँकि यह मध्यवर्गीय शिक्षित मिश्रित आबादी से नीचे मूल इंडियन आबादी तक नहीं पहुँच पाई थी और इन संगठनों की प्रकृति सारत: बुर्जुआ नारीवादी थी । बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में मैक्सिको और ब्राज़ील की अधूरी राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों और क्यूबा, निकारागुआ आदि देशों में उग्र रूप से जारी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों ने पूरे लातिन अमेरिका में नारी मुक्ति आन्दोलन को भी नया संवेग प्रदान किया । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत सारे लातिन अमेरिकी देशों में कम्युनिस्ट संगठनों के बनने की प्रक्रिया भी दूसरे इंटरनेशनल के काल में ही शुरू हो चुकी थी और इस शताब्दी के तीसरे दशक तक अधिकांश देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थापना हो चुकी थी । सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों और क्रांतिकारी मध्यमवर्ग के क्रांतिकारी संघर्षों की लंबी परम्परा ने भी लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति और उनके आन्दोलन पर विशेष प्रभाव डाला । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी नवउपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों का जो नया चक्र लातिनी देशों में शुरू हुआ, उसने आम मध्यवर्गीय और कामगार स्त्रियों को भी और काफी हद तक मूल आबादी की स्त्रियों को भी संघर्ष की मुख्य धारा से जोड़ने के साथ ही स्त्री-मुक्ति की धारा से भी जोड़ने में कामयाबी हासिल की ।

ख्रुश्चेवी लहर से लेकर गोर्बचोवी लहर तक के प्रतिकूल प्रभाव लातिन अमेरिकी जनता के मुक्ति-संघर्षों पर भी पड़े और मुख्यत: संशोधनवादी प्रभाव के चलते आज इन देशों के कई छापामार मुक्ति संघर्षों का (जैसे, अलसल्वाडोर, कोलम्बिया आदि में ) विघटन हो चूका है । कई सारी क्रांतियाँ (जैसे क्यूबा, निकारागुआ आदि ) अपने मध्यवर्गीय नेतृत्व के चरित्र के अनुरूप अपने अधूरे कार्यभारों को पूरा करने के बाद या तो विफिल हो चुकी हैं या विपथगमन कर चुकी हैं । इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव वहाँ के नारी आन्दोलन पर भी पड़ा है । लेकिन आज फिर पेरू में वहाँ की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वहाँ की स्त्रियाँ छापामार सेना और जनकार्रवाइयों में हिस्सा ले रही हैं, आधार इलाकों में लोक कमेटियों में शामिल होकर राजनीतिक कार्यों में, सामाजिक गतिविधियों में तथा सामाजिक उत्पादन में बराबरी की हिस्सेदारी कर रही हैं और साथ ही उन्होंने क्रांतिकारी जनसंगठनों के रूप में अपने संगठन बनाये हैं ।

काले अफ़्रीकी देशों में स्त्रियों ने वर्गीय समाज की गुलामी से औपनिवेशिक काल में ही पहली बार साक्षात्कार किया । दास समाज और सामंती समाज की पितृसत्तात्मक गुलामी के लंबे अतीत और सामन्ती पार्थक्य से वंचित रहने के कारण, पचास और साठ के दशक में राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के विस्फोट के साथ ही स्त्रियों की भारी आबादी उनमें शामिल हुई । नवस्वाधीन अफ़्रीकी देशों की स्त्रियों ने अपने लिए महत्वपूर्ण जनवादी अधिकार अर्जित किये । पर अब इन देशों का विकास गतिरुद्ध हो चुका है और केवल विश्व पूंजीवाद से निर्णायक विच्छेद करके, नई सर्वहारा क्रांतियाँ ही पुन: इन्हें प्रगतिपथ पर आगे बढ़ा सकती हैं । आज अफ़्रीकी देशों में भी पूंजी की सत्ता और यौन-असमानता की शिकार नारी समुदाय के नये आन्दोलन और स्वतंत्र संगठनों के गठन का वस्तुगत आधार तैयार है, पर उनका भविष्य क्रांतियों के नये चक्र की शुरुआत के साथ जुडा हुआ है ।

तुर्की, ईरान और मिस्र में नारी आन्दोलन की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में राष्ट्रीय जनवाद के लिए संघर्ष शुरू होने के साथ ही हो चुकी थी और स्त्रियों ने वहाँ लंबे संघर्ष के दौरान कई जनवादी अधिकार प्राप्त किये, पर फ़िलहाल वहाँ भी नारी मुक्ति-संघर्ष आज ठहराव और गतिरोध का शिकार है । सीरिया और इराक में भी सामाजिक-राजनीतिक जीवन में स्त्रियों ने कुछ महत्वपूर्ण अधिकार अर्जित कर लिए हैं, पर वर्तमान गतिरोध आज वहाँ की भी सच्चाई है । अरब अफ़्रीकी और पश्चिमी एशिया के अन्य अधिकांश मुस्लिम देशों में स्त्रियाँ आज भी अपने सामाजिक अधिकारों से वंचित पूरी तरह मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक गुलामी और सामन्ती पार्थक्य का शिकार बनी हुई हैं । साम्राज्यवादियों के टट्टू प्रतिक्रियावादी शेखों और शाहों के विरुद्ध जब तक इन देशों में जनक्रांतियाँ आगे कदम नहीं बढ़ाएंगी, तब तक नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रक्रिया वहाँ संवेग नहीं ग्रहण कर सकती ।

एशिया के अन्य देशों में चीन और वियतनाम, कोरिया आदि जिन देशों में साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधी संघर्ष का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग ने किया और जहाँ कुछ दशकों के लिए भी सर्वहारा सत्ता कायम रह सकी, उन देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के बावजूद आज भी स्त्रियों की सभी उपलब्धियां खोई नहीं हैं । आज भी अन्य एशियाई देशों की तुलना में स्त्रियों की इन देशों में वास्तव में अधिक सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं, यद्यपि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि चीन, वियतनाम आदि देशों में आज पूंजीवाद की लहर ने न केवल उन्हें निकृष्टतम कोटि का उजरती मजदूर बना दिया है और न केवल उनके अधिकारों में कटौतियां की जा रही हैं, बल्कि अब इन देशों में नारी-विरोधी अपराधों की भी भरमार हो गई है ।

भारत और एशिया के अन्य कई देशों में यद्यपि नारी मुक्ति-आन्दोलन की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही हो चुकी थी, पर राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व के समझौतापरस्त चरित्र के कारण इन देशों में जीवन के अन्य क्षेत्रों की ही भांति नारी अधिकार आन्दोलन के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी जनवादी मूल्यों की लड़ाई क्रांतिकारी और व्यापक पैमाने पर नहीं लड़ी गई । मध्यवर्गीय क्रांतिकारी आन्दोलन और सर्वहारा आन्दोलन की धाराएं अपनी जिन अन्तर्निहित कमजोरियों के कारण राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग के हाथों से नहीं छीन सकीं, उन्हीं कारणों से वे नारी आन्दोलन को भी एक क्रांतिकारी दिशा और संवेग नहीं दे सकीं । लंबे संघर्षों और निरंतरता के बावजूद भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों की स्त्रियों ने जो भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार अर्जित किये, वे बहुत कम थे । यही नहीं, कानूनी और संवैधानिक तौर पर उन्हें समानता के जो अधिकार मिले भी हैं, वे समाजी जीवन में व्याप्त निरंकुश स्वेच्छाचारिता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण मूलत: और मुख्यत: निष्प्रभावी बने हुए हैं ।

राष्ट्रीय आन्दोलन के समझौतापरस्त बुर्जुआ नेतृत्व तथा राष्ट्रीय जनवाद के कार्यभारों के अधूरे और गैरक्रांतिकारी ढंग से पूरा होने के कारण ही भारत, नेपाल आदि पिछड़े देशों में औरतों की गुलामी आज भी अधिक गहरी, व्यापक, निरंकुश और संगठित रूप में कायम है । सीमित हद तक शिक्षा और जनवादी चेतना के प्रसार के बावजूद बहुसंख्यक नारी आबादी आज भी बर्बर निरंकुश दासता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मकता के मूल्यों से जकड़ी हुई है, भयानक अमानवीय पार्थक्य ( Segregation ) की शिकार है और साथ ही पूंजी की सत्ता की उजरती गुलामी के रथ में भी जोत दी गई है । आधी आबादी की अपार क्रांतिकारी सम्भावना सम्पन्न जनशक्ति को निर्बंध क्रांतिकारी चेतना से लैस करना, क्रांतिकारी नारी आन्दोलन को नये सिरे से खड़ा करना और साथ ही सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के हर मोर्चे पर योद्धाओं की कतारों में स्त्रियों को ला खड़ा करना इन सभी देशों में क्रांतियों का एक अत्यंत कठिन लेकिन अनिवार्यत; आवश्यक कार्यभार है ।

तीसरी दुनिया के इन सभी देशों में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के विरुद्ध तथा राष्ट्रीय जनवादी क्रांति के छूटे हुए कार्यभारों को पूरा करने के लिए सर्वहारा क्रांतियों का जो नया चक्र शुरू होगा, अब नारी मुक्ति आन्दोलन का भविष्य भी उसी के साथ द्वंदात्मक रूप से जुडा हुआ है ।

7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति

अक्टूबर क्रान्ति के बाद मानव इतिहास में पहली बार कोई ऐसी राज्यसत्ता अस्तित्व में आयी, जिसने औरतों को हर मायने में सामान अधिकार दिए, समान सुविधाओं के अतिरिक्त हर क्षेत्र में समान काम के अवसर, समान काम के लिए समान वेतन, समान सामजिक राजनीतिक अधिकार, विवाह और तलाक के सम्बन्ध में बराबर अधिकार, अतीत में वेश्यावृत्ति जैसे पेशों के लिए विवश औरतों का सामजिक पुनर्वास आदि अनेकों कदम उठाकर रूस की समाजवादी सरकार नें निस्संदेह एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक काम किया । समाजवादी निर्माण के पूरे दौर में, नारी मुक्ति के क्षेत्र की उपलब्धियां भी अभूतपूर्व थीं । पिछड़े हुए रूसी समाज में क्रान्ति के बाद के चार दशकों में उत्पादन, सामजिक-राजनीतिक कार्रवाईयों , सामरिक मोर्चे और बौद्धिक गतिविधियों के दायरे में जितनी तेजी से औरतों की हिस्सेदारी बढ़ी, वह रफ़्तार जनवादी क्रांतियों के बाद यूरोप-अमेरिका के देशों में पूरी दो शताब्दियों के दौरान कभी नहीं रही थी । चंद-एक दशकों में ही सोवियत समाज से यौन अपराध और यौन रोगों का पूर्ण उच्छेदन हो गया, इस तथ्य को पश्चिम का मीडिया भी स्वीकार करता था । खेतों कारखानों में उत्पादन के मोर्चे पर ही नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चे पर भी लाखों सोवियत वीरांगनाओं नें जिस शौर्य और साहस का परिचय दिया था, उसने काफी हद तक इस सच्चाई को सत्यापित कर दिया कि नारी समुदाय की सीमा सिर्फ यही है कि उसे समाज में पुरुषों के साथ बराबरी की स्थिति, अवसर और परिवेश नहीं प्राप्त है ।

लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजवादी समाज में नारी समुदाय यौन-शोषण-उत्पीड़न से तथा आर्थिक शोषण से पूरी तरह मुक्त हो चुका होता है और पूर्ण समता की स्थिति कायम हो गयी होती है । ऐसा न तो कभी हुआ था और न ही ऐसा हो पाना संभव ही है । इस मुद्दे पर स्पष्टता के लिए जरूरी है कि पहले समाजवाद की अंतर्रचना को ही भली-भाँती समझ लिया जाये ।

समाजवाद एक स्थायी सामाजिक आर्थिक संरचना नहीं है । यह पूँजीवाद और वर्गविहीन समाज के बीच का एक लम्बा संक्रमणकाल है । इस दौर में छोटे पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन लम्बे समय तक बना रहता है, बाजार के नियम काम कार्य रहते हैं, माल-अर्थव्यवस्था भी मौजूद रहती है और इनके आधार पर पूंजीवादी मूल्य-मान्यताएं-संस्कृति रोज-रोज, हर क्षण पैदा होती रहती हैं, पूंजीवादी राज्यतंत्र के नाश के बाद भी पुराने समाज की वैचारिक-सामजिक-सांस्कृतिक अधिरचनाएं लगातार मौजूद रहती हैं और समाजवाद के विरूद्ध, एवं उसे ख़त्म कर देने के लिए लगातार एक भौतिक शक्ति का काम करती रहती हैं । वर्ग संघर्ष जारी रहता है और उत्तरोत्तर तीखा होता जाता है । सर्वहारा का राज्य और सर्वहारा की पार्टी लगातार पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली और मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के विरूद्ध कारगर ढंग से संघर्ष को जारी रखते हुए ही समाजवादी समाज को उस मंजिल तक पंहुचा सकती हैं, जहां वस्तु का बाजार मूल्य पूर्णतः समाप्त हो जाता है और मात्र उपयोग-मूल्य एवं प्रभाव मूल्य का ही अस्तित्व रह जाता है । केवल इसी मंजिल पर पहुंचकर समाज में हर तरह की असमानता समाप्त हो सकती है और नारी समुदाय भी तभी पूर्ण समता और स्वतंत्रता की स्थिति प्राप्त कर सकता है । लेकिन यह मार्ग अनेकों आरोहों-अवरोहों, जय-पराजयों और मोड़ों-घुमावों से भरा हुआ होता है तथा बहुत लम्बा होता है ।

रूस और चीन के समाज ने समाजवादी क्रान्ति और निर्माण के दौर में विकास के अभूतपूर्व लम्बे डग भरे और सामजिक न्याय और समता के अपूर्व कीर्तिमान स्थापित किये, लेकिन वे पूर्ण समता और पूर्ण न्याय से युक्त समाज नहीं थे । संवैधानिक स्तर पर औरत को सभी अधिकार मिल चुके थे, लेकिन सामजिक पारिवारिक स्तर पर यह स्थिति नहीं थी । ऐसा समझना एक वैधिक विभ्रम(Juridical Illusion) होगा । उत्पादन के तंत्र पर पूर्ण सामाजिक स्वामित्व के बगैर यह संभव नहीं था और इसके लिए अधिरचना के धरातल पर सतत क्रांतियों की भी अपरिहार्य आबश्यकता थी ।

समाजवाद की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बावजूद स्तालिनकालीन रूस में ऐसा न हो सका, जो कालान्तार में समाजवाद के ठहराव और अन्ततोगत्वा पराजय का कारण बना । स्तालिन की सर्वाधिक गंभीर गलती उनकी यह दार्शनिक भूल थी कि वे समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के अस्तित्व को और उसकी निरंतरता को वास्तविक रूप में पहचान नहीं सके । यह काम सर्वप्रथम माओ-त्से-तुंग ने किया । सोवियत संघ में समाजवाद की उपलब्धियों और पराजय की शिक्षाओं का तथा चीन में समाजवादी प्रयोगों का सार संकलन करते हुए माओ ने पहली बार समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को स्पष्टतः निरूपित किया और सर्वहारा के अधिनायकत्व के अंतर्गत वर्ग संघर्ष को जारी रखने के सिद्धांत और पद्धति का प्रतिपादन किया । पहले यह उल्लेख किया जा चुका है कि मार्क्सवाद के विकास की परम्परा में उत्पादक शक्तियों के विकास पर अधिक जोर देने की यांत्रिकता शुरू से ही मौजूद थी और मूलाधार एवं अधिरचना के द्वंद्वात्मक संबंधों की समझ काफी हद तक अस्पष्ट थी । सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की सैद्धांतिक पार्श्वभूमि की सर्जना करते हुए माओ त्से तुंग ने पहली बार इनका स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया और मूलाधार के रूपांतरण को जारी रखने के लिए तथा पूंजीवादी पुनर्स्थापना के सभी भौतिक आधारों को नष्ट करने के लिए अधिरचना के निरंतर क्रान्तिकारीकरण या अधिरचना में सतत क्रान्ति की अवधारणा प्रस्तुत की । पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि समाजवादी संक्रमण के दौरान पूंजीवादी उत्पादन के छोटे से छोटे रूप की समाप्ति की लम्बी प्रक्रिया के साथ ही उसकी अनिवार्य पूर्वशर्त एवं समांतर प्रक्रिया के रूप में तथा ज्यादा महत्व देकर कला-साहित्य-संस्कृति, शिक्षा एवं सामाजिक मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के प्रत्येक दायरे में अनवरत क्रान्ति की प्रक्रिया को जारी रखे बगैर समाज की विषमताओं एवं उत्पीड़न के विविध सूक्षम एवं स्थूल रूपों को कदापि समाप्त नहीं किया जा सकता । नारी-पुरूष असमानता, नारी उत्पीड़न पर आधारित पारिवारिक ढांचा एवं वैवाहिक सम्बन्ध, पुरूष-स्वामित्ववादी मानसिकता आदि ऐसी ही सामाजिक संस्थाएं और मूल्य मान्यताएं हैं, जिन्हें समाजवादी समाज के भीतर अनवरत सांस्कृतिक क्रांतियों से गुजरने के बाद ही, क्रमशः निर्मूल किया जा सकेगा । यह सच्चाई केवल समाजवादी समाज के लिए ही लागू नहीं होती है, बल्कि आज भी नारी मुक्ति आन्दोलन के मार्क्सवादी समर्थकों के भीतर मौजूद तमाम यांत्रिक धारणाओं, अर्थवादी भटकावों और भ्रांतियों से मुक्ति के लिए सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की इस दार्शनिक अंतर्वस्तु को जानना समझना जरूरी है ।

मूलाधार और अधिरचना के द्वंदात्मक संबंधों के, सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति द्वारा प्रस्तुत निरूपण, अधिरचना में क्रान्ति की अपरिहार्यता पर उसके जोर और सर्वहारा अधिनायक्तव के अंतर्गत सतत क्रान्ति की उसकी अवधारणा की सम्यक समझदारी के आधार पर ही आज नारी मुक्ति की दिशा से सम्बंधित निम्नलिखित प्रश्नों को भलीभांति समझा जा सकता है ।

1. नारी-उत्पीडन के बुनियादी कारण आर्थिक होंने के बावजूद आर्थिक प्रश्नों के अतिरिक्त सामाजिक- सांस्कृतिक धरातल पर भी स्त्रियों को संगठित होकर संघर्ष करना जरूरी है और पुरूष्सत्तात्मक व्यवस्था की मान्यताओं-संस्थाओं से सघर्ष एक दीर्घकालिक संघर्ष है ।

2. समाजवादी संक्रमण के अंतर्गत भी एक लम्बे समय के संघर्ष के बाद ही स्त्रियों की पूर्ण मुक्ति संभव है और यह कि यह प्रश्न समाजवाद की विजय-पराजय के साथ जुड़ा हुआ है ।

3. नारी मोर्चे पर कामगार स्त्रियों के संगठनों के अतिरिक्त और सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष मोर्चात्मक(Frontal) संगठनों के अतिरिक्त संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठनों की अपरिहार्य आवश्यकता है, जिनमें मध्यमवर्ग सहित जनता के सभी वर्गों की स्त्रियाँ पुरूष उत्पीडन के सर्वतोमुखी विरोध और अपने सामजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के एक कार्यक्रम के आधार पर संगठित हों, ऐसे नारी संगठन सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष नेतृत्व में न होकर सांगठनिक तौर पर, स्वतन्त्र स्वायत्त हों और पार्टी अपनी नीतियों से उन्हें प्रभावित करके, उनके भीतर काम करते हुए उन्हें दिशा देने का प्रयास करे ।

4. स्त्रियों की सहस्त्राब्दियों पुरानी मानसिक गुलामी को नष्ट करने के लिए नारी संगठनों की पहलकदमी, निर्णय लेने की आजादी और सापेक्षिक स्वायत्तता को बढाने के साथ ही, सर्वहारा वर्ग की पार्टी के लिए यह भी जरूरी है की राजनितिक-सांस्कृतिक शिक्षा और आन्दोलन के विशेष प्रयासों से पार्टी-कतारों में स्त्रियों की भरती की प्रक्रिया तेज की जाये और साथ की संघर्ष के हर मोर्चे पर — सभी तरह के जनसंगठनों में स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी बढाई जाये और उनकी पहलकदमी को निरुत्साहित करने की पुरूष-स्वामित्ववादी प्रवृत्तियों के विरूद्ध सतत संघर्ष किया जाये ।

5.पुरूषों की प्रत्यक्ष-परोक्ष चौधराहट(जो हर स्तर पर बुर्जुआ तत्वों को बल प्रदान करती है) से सामाजिक सक्रियता के हर दायरे में औरतों के लिए बच पाना अत्यंत कठिन है और पुराने मूल्यों के पूर्ण उच्छेदन तक यह समस्या समाजवाद की अवधि में भी बनी रहेगी । इससे यह स्पष्ट है कि जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता और स्वतन्त्र पहचान के लिए संघर्ष का प्रश्न दूरगामी और ऐतिहासिक महत्त्व रखता है । इसे एक बुर्जुआ दृष्टिकोण कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । इस प्रश्न को भी नारी आन्दोलन के एजेंडे पर अलग से रेखांकित करके शामिल करना अनिवार्य है ।

पूर्वी यूरोप और भूतपूर्व सोवियत संघ में 1956 में और चीन में 1976 में पूंजीवादी पुनर्स्थापना होने के बाद से लेकर अब तक के काल में, इन देशों में लोभ लालच , प्रतियोगिता, अपराध, भ्रष्टाचार, लूटमार और असमानता की नैतिक स्वीकृति से युक्त एक नग्न उपभोक्ता संस्कृति अस्तित्व में आई है । जाहिरा तौर पर इसका सर्वाधिक शिकार प्रत्यक्ष उत्पादक और स्त्री समुदाय ही हुआ है । इन सभी देशों में इधर नए सिरे से बलात्कार, स्त्री-भ्रूण ह्त्या, पत्नि उत्पीडन आदि नारी विरोधी अपराधों का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर गया जो समाजवाद के कुछ दशकों के भीतर पूरी तरह समाप्त हो चुके थे । अब विगत कुछ वर्षों के भीतर रूस और पूर्वी यूरोप में खुले निजी इजारेदार पूँजीवाद के आने के बाद यह प्रक्रिया और अधिक तेज हो गयी है, इस तथ्य को बुर्जुआ मीडिया भी स्वीकार कर रहा है । वेश्यावृत्ति, कालगर्ल आदि के पेशों और कैबरे नृत्य, अश्लील पत्रिकाओं आदि की बाढ़ आ गयी है, 1956 के पहले के सोवियत संघ और 1976 के पहले के चीन में जिन यौन रोगों के पूर्ण उन्मूलन के तथ्य को पश्चिम भी स्वीकार करता था, अब उनके इलाज के लिए अस्पताल खोले जा रहे है । चीन में लड़कियों की भ्रूण हत्या, अपहरण करके बलात विवाह और दहेज़ सरकार की चिंता के विषय बन चुके है । फिल्मों और साहित्य में नारी छवि की यौन-उत्पीड़क प्रस्तुति, मॉडलिंग जैसे पेशों के जरिये यौन-शोषण, नग्नतावाद, हर तरह के नारी स्वातंत्र्य विरोधी मूल्य और पुरूष स्वामित्व की मानसिकता तेजी से फलफूल रही है । उत्पादन के क्षेत्र में पुरूष व स्त्री के कामों की प्रकृति में भेद करके नारी श्रम को ज्यादा से ज्यादा सस्ता बनाया जा रहा है, उन्हें तथाकथित “हलके”, ‘स्त्रियोचित”, उबाऊ, श्रमसाध्य कामों में लगाया जा रहा है और “गृहिणी” के दायित्व से बाँधा जा रहा है । समाजवाद के अंतर्गत शिक्षा और सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों-पुरूषों की भागीदारी में स्त्रियों का अनुपात लगारार बढ़ा था, जो अब तेजी से घटता जा रहा है । स्मरणीय है कि येल्त्सिन के आने से पूर्व गोर्बाचोव ने ही, जो”मानवीय चेहरे वाले समाज ” की बातें किया करता था, लगभग दो सौ तरह के कामों में स्त्रियों की भागीदारी पर रोक लगा दी थी ताकि वे श्रम से थके पतियों की देखभाल और “समाजवाद के नौनिहालों’ के लालन-पालन पर उचित ध्यान दे सकें ।

और यह सब कुछ सर्वथा स्वाभाविक है । अर्थतंत्र का विकास पूंजीवादी दिशा में हो, राज्यसत्ता पर बुर्जुआ वर्ग काबिज हो और पूरे समाज की अधिरचना का समाजवादी रूपांतरण जारी रहे — यह असंभव है । जैसाकि पहले उल्लेख किया जा चुका है, समाजवाद नारी -समस्या का समाधान नहीं बल्कि समाधान की शुरुआत है । स्त्री की असमानतापूर्ण स्थिति और उसके शोषण के विविध रूप समाजवादी संक्रमण के दौरान भी मौजूद रहेंगे, पर वे क्रमशः क्षरण और विलोपन की दिशा में अग्रसर होंगे । और यह प्रक्रिया स्वतः नहीं होगी, अधिरचना में अनवरत क्रान्ति के जरिए– सतत सांस्कृतिक क्रान्ति के जरिए होगी । पूंजीवादी पुनर्स्थापना की यह तार्किक परिणति है कि औरत फिर से दोयम दर्जे की नागरिक, सबसे निचले दर्जे की उजरती मजदूर और एक उपभोक्ता सामग्री या पण्य वस्तु में तब्दील का दी जाये । रूस, पूर्वी यूरोप और चीन में यही हुआ है ।

हमारी उपरोक्त बातों का यह मतलब कतई नहीं है कि मार्क्सवाद के सूत्रों में नारी मुक्ति के प्रश्न का कोई शाश्वत समाधान या आज की स्थिति का कोई किया-कराया विश्लेषण रखा हुआ है । यह मार्क्सवाद की एक प्रस्तरीकृत रूढ़ समझ ही हो सकती है । अपनी द्वंद्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी दृष्टिकोण पर आधारित ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर मार्क्सवाद ने पहली बार नारी प्रश्न को विश्व-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अवस्थित करके देखा, पूरे सामजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक तंत्र से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल की, वर्गीय उत्पीड़न से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों को स्पष्ट किया और इसे सामजिक क्रान्ति का एक अनिवार्य अंग बताया । महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति तक के प्रयोगों नें इस समझ को ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट किया और नारी मुक्ति के लम्बे संघर्ष की दीर्घकालिक अवधि के लिए सांस्कृतिक क्रान्ति नें आम दिशा (General Line) की एक रूपरेखा प्रस्तुत की । अब शेष काम उन्हें पूरा करना होगा जो इस मोर्चे पर काम कर रहे हैं । अभी तक असमाधानित समस्याओं का हल ढूँढने के साथ ही, आज के युग ने जो सर्वथा नयी समस्यायें पैदा की हैं, उनपर भी वे ही लोग सोचेंगे जो इनके रूबरू खड़े हैं ।

8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर

साठ के दशक में जो नारीवादी आन्दोलन पहले अमेरिका और फिर पूरे पश्चिमी जगत में फूट पड़ा, वह सारतः नारी उत्पीडन के विरूद्ध एक अन्धविद्रोह था । उसकी कई शाखाएं और उपशाखाएँ आगे चलकर फलीं-फूलीं, लेकिन उनके पास न तो नारी-समस्या के सभी पहलुओं की कोई इतिहाससम्मत तर्कपरक व्याख्या थी और न ही दूरगामी सामाजिक संघर्ष के रूप में नारी मुक्ति के सघर्ष को आगे ले जाने का कोई ठोस कार्यक्रम ।

वैसे आधुनिक नारीवाद के सिद्धांत का पहला मील का पत्थर पहली बार 1946 में फ्रांसीसी में और 1953 में अंग्रेजी में प्रकाशित सिमोन द बोउवा (Simone de Beauvoir ) की कृति “द सेकेण्ड सेक्स” था, जिसमें व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण और नारी आन्दोलन की एक स्पष्ट दिशा के अभाव के बावजूद नारी उत्पीड़न के कई सूक्ष्म पहलुओं को रेखांकित किया गया था और यह प्रस्थापना दी गयी थी कि स्त्रियों की मुक्ति में ही पुरूषों की भी मुक्ति है जो स्वयं पुरूष स्वामित्व की मानवद्रोही मानसिकता के दास हैं । साठ के दशक के नारीवादी आन्दोलन की चेतना इस विचार से काफी प्रभावित थी । ऐसी दूसरी प्रसिद्ध कृति सुप्रसिद्ध नारीवादी नेता और 1966 में राष्ट्रीय नारी संगठन (अमेरिका) का गठन करने वाली बेट्टी फ्रीडन(Betty Friedan) की 1963 में प्रकाशित पुस्तक द फेमिनिन मिस्टिक(The Feminine Mystique) थी जिसमें स्त्रियों की घरेलू दासता और पुरूष-स्वामित्व को स्वीकार करने के लिए उनके दिमाग के ‘कंडीशनिंग’ की प्रक्रिया की उग्र लेकिन एकांगी एवं अनैतिहासिक आलोचना की गयी थी ।

साठ का दशक आधुनिक इतिहास के द्वित्तीय विश्वयुद्धोतर काल का एक महत्वपूरण मोड़ बिंदु था । विश्व पूंजीवादी तंत्र के सरदार उस समय गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे । तीस के दशक की मंदी के बाद अमेरिका तक में एक बार फिर बेरोजगारी पैदा हो रही थी और युवा असंतोष तीखा हो रहा था । पूरी दुनिया में जारी मुक्ति-युद्धों की लगातार सफलता साम्राज्यवाद के लिए एक गंभीर संकट को जन्म दे रही थी । वियतनाम में अमेरिका की पराजय निश्चितप्राय प्रतीत होने लगी थी । इसी सामाजिक उथल-पुथल के दौर में अमेरिका में अश्वेत आबादी का आन्दोलन नयी शक्ति के साथ फूट पड़ा था । मैकार्थीवाद और शीतयुद्ध के दौरान संचित जनता का आक्रोश सड़कों पर आ गया था । 1968 में हिन्दचीन में अमेरिकी हस्तक्षेप के विरूद्ध छात्रों-नौजवानों और फिर व्यापक अमेरिकी जनता का आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो नागरिक अधिकारों के आन्दोलन के साथ जुड़कर व्यवस्था के लिए संकट बन गया था । इसी समय फ्रांस में छात्रों का आन्दोलन एक ज्वार की भांति उठ खड़ा हुआ जिसमें बाद में मजदूर भी शामिल हो गए और अन्ततोगत्वा लौह पुरूष कहलाने वाले दगाल को राष्ट्रीय सभा भंग करने व इस्तीफ़ा देने के लिए विवश होना पड़ा । पूरा पश्चिमी जगत एक संकट और उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था । पश्चिमी नारी समुदाय भी इस उथल-पुथल से अछूता नहीं था बल्कि उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहा था । सच तो यह है कि यूरोप-अमेरिका में जनांदोलनों में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर स्त्रियाँ हिस्सा ले रहीं थीं । उत्पादन के अतिरिक्त सामाजिक सक्रियता के दायरे में इस बढती हुई शिरकत ने पश्चिम की नारियों — विशेषकर उनके युवा हिस्से की चेतना का धरातल नयी ऊंचाईयों तक उन्नत किया और दोयम दर्जे की नागरिकता एवं हर तरह के यौन-भेद के विरूद्ध स्त्रियों का प्रबल स्वतः स्फूर्त विद्रोह उठ खड़ा हुआ ।

साठ के दशक का पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन नारी शोषण के विरुद्ध एक बगावती उभार था । इस आन्दोलन में विविध चिन्तनों की मौजूदगी के बावजूद, इसकी कोई सुविचारित वैचारिक पूर्वपीठिका, दिशा और कार्यक्रम नहीं था । द्वित्तीय विश्वयुद्धोत्तर पश्चिमी उपभोक्ता संस्कृति की प्रतिक्रिया में पैदा हुई यह एक बगावत थी । पर विडंबना यह थी कि स्वयं इसकी दार्शनिक अंतर्वस्तु भी बुर्जुआ थी, जिसके चलते जल्दी ही आन्दोलन की मुख्यधारा ने विकृत उच्छ्रंखल बुर्जुआ संस्कृति के नैतिक-सामाजिक मूल्यों को अपना लिया । इस अंध-विद्रोह ने यौन-शोषण और यौन-उत्पीड़न पर खड़ी सामाजिक संस्थाओं की जगह मूल्य-संस्थाओं की कोई समग्र वैकल्पिक व्यवस्था नहीं प्रस्तुत की । विवाह, परिवार, एकल यौन-संबधों आदि को अराजकतावादी ढंग से नकारने की चेष्टा की गयी । पूर लड़ाई को पुरूष सत्ता के विरूद्ध केन्द्रित किया गया और इस सत्ता के ऐतिहासिक-सामाजिक-आर्थिक आधारों को जानने समझने की कोई विशेष चेष्टा नहीं की गयी । जाहिरा तौर पर ऐसा कोई आन्दोलन समाज में लम्बे समय तक टिका नहीं रह सकता और यही हुआ ।

पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन का सामाजिक विद्रोही तत्व धीरे धीरे क्षरित होता गया और आठवें दशक के मध्य तक यह एक बहुत छोटे से हिस्से, बुद्धिजीवी और युवा नारियों तक ही सिमट कर रह गया । यौन-भेद में ही सभी असमानताओं का कारण ढूँढने वाली बुर्जुआ अराजकतावादी स्त्रियाँ और संस्थाएं पूरी सच्चाई को ही सिर के बल खड़ा करती रहीं और अन्ततोगत्वा व्यवस्था को ही लाभ पहुंचाने का काम करती रहीं । पश्चिम के जिन नारीवादी विचारकों ने सातवें-आठवें दशक में कई पुस्तकें लिखीं , उनमे से किसी ने विश्लेषण का कोई समग्र, इतिहाससंगत नमूना प्रस्तुत नहीं किया । लेकिन यह जरूर है कि औरत की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता के प्रश्न को, समाज में उसकी अपनी स्वतन्त्र पहचान के प्रश्न को पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन ने चिन्ता और गाम्भीर्य के साथ उठाया और इतिहास के एजेंडा पर इसे महत्वपूर्ण स्थान दिलाया, भले ही उसने स्वयं इसका काल्पनिक अथवा अराजकतावादी समाधान प्रस्तुत किया हो । यही नहीं, गर्भपात, तलाक आदि मामलों को लेकर नारीवादी संगठनों ने जो मांगे उठाई और आन्दोलन चलाए, वे भी अत्यंन्त महत्वपूर्ण थे । नारीवादी आन्दोलन के दर्शन और इतिहासदृष्टि की अवैज्ञानिकता के बावजूद, इसके द्वारा उठाई गयी अधिकाँश मांगों और समस्यायों को एक सही सैद्धांतिक फ्रेमवर्क में अवस्थित करके एक क्रांतिकारी नारी आन्दोलन के कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है और उसके अनुभवों से काफी कुछ सीखा जा सकता है ।

9. और अंत में…

पश्चिम के पूंजीवादी समाज में, पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (Renaissance-Elightenment-Revolution) की ऐतिहासिक विकास-यात्रा के परिणामस्वरूप वहां के समाज में पुरूष-स्वामित्व और वर्चस्व के रूप सूक्ष्म है. जनतांत्रिक मूल्य सामाजिक जीवन में इस हद तक रचे-बसे हैं कि वहां इनका नग्न रूप कायम नहीं रह सकता । वहां स्त्री के साथ यौन-आधार पर कायम सामाजिक असमानता और भेदभाव मुख्य प्रश्न हैं । यौन-उत्पीड़न के आम रूप अत्यंत सूक्षम हैं । नारी की अस्मिता का प्रश्न पश्चिम में प्रबल है । नारी आन्दोलन का प्रमुख सांस्कृतिक पक्ष वहां उपभोक्ता संस्कृति की विकृतियों के विरुद्ध जनमानस तैयार करने का है ।

तीसरी दुनिया के अधिकाँश पिछड़े हुए देशों में नारी उत्पीड़न के नए पूंजीवादी रूपों के साथ-साथ उसके मध्ययुगीन नग्न स्वेच्छाचारी रूप भी कायम हैं । इनमें से कुछ देशों में आज भी अर्द्धसामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक तंत्र किसी-न-किसी रूप में कायम हैं और जिन देशों में साम्राज्यवाद पर आश्रित बुर्जुआ व्यवस्थाएं कायम हुई हैं, वे जनतांत्रिक मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं-संस्थाओं के मामले में पश्चिमी व्यवस्थाओं से बहुत पीछे हैं । भारत को उदाहरण के तौर पर लें । समाज विकास की मंथर गति तथा जनवादी क्रांतियों और तज्जन्य जनवादी मूल्यों के अभाव के चलते हमारे समाज में मूल्यों-मान्यताओं का प्राक्पूंजीवादी ढांचा अत्यंत धीमी गति से क्षरित होता हुआ आज भी कायम है और भारतीय पूंजीवाद नें इन्हें अपना लिया है । मनु के विधान यहाँ आज भी जिन्दा हैं । शिक्षा के प्रसार के बावजूद सामाजिक क्रियाकलापों से बहुसंख्यक नारी समुदाय, यहाँ तक कि उसका वह हिस्सा भी काफी हद तक कटा हुआ है जो सामाजिक उत्पादन में लगा हुआ है । मजदूर और गरीब किसान औरतें निकृष्टतम कोटि के उजरती गुलाम के रूप में ही सही, पर सामाजिक उत्पादन की कार्रवाई में हिस्सा लेती हैं, पर मध्यमवर्गीय औरतों , यहाँ तक तक कि शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक का बहुलांश चूल्हे- चौखट से पूरी तरह बंधा हुआ है और पति की सेवा, बच्चों का लालन-पालन और घरेलू उपयोग की चीजों के उत्पादन से अधिक कुछ नहीं करता । नौकरी करने वाली मध्यमवर्गीय स्त्रियां भी घरेलू गुलामी से मुक्त नहीं हैं । आज भी औरतों का पुरूषों से और पूरे समाज में जितना अमानवीय पार्थक्य (Segregation) भारत में है, उतना मध्य पूर्व के कुछ देशों को छोड़कर कहीं नहीं है । इस आधी आबादी को आर्थिक शोषण, लूटमार, मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं की दिमागी गुलामी, यौन-उत्पीड़न, पुरूष-स्वामित्व, पार्थक्य (Segregation) और अलगाव (Alienation) से मुक्त करना भारत और ऐसे तमाम देशों की क्रांतियों का दायित्व ही नहीं, बल्कि उनकी लड़ाई का एक ऐसा जरूरी मोर्चा है, जिस पर लड़े बिना ये क्रांतियाँ सफल हो ही नहीं सकतीं ।

भारत जैसे देशों में नारी मुक्ति आन्दोलन को वैचारिक धरातल पर तमाम विजातीय बुर्जुआ विचारों से संघर्ष करते हुए सही वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि, इतिहास-दृष्टि, संस्कृति और दिशा से खुद को समृद्ध बनाना होगा । साथ ही साम्राज्यवाद से आयातित और देशी पूँजीवाद द्वारा पोषित बुर्जुआ नारीवाद के दर्शनं के समूल नाश के लिए समग्र जनमुक्ति एवं नारी-मुक्ति की जातीय, जन-परम्पराओं से खुद को वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर अविच्छिन्न रूप से जोड़ना होगा ।

साम्राज्यवाद के वर्तमान नए दौर में यह बात अब दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि बुर्जुआ व्यवस्था के दायरे के भीतर, सुधारों के दायरे के भीतर नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी अब कुछ हासिल कर पाने की रत्ती भर भी गुंजाईश शेष नहीं है । उलटे, ढांचागत असाध्य संकट के दौर में — आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर में, पूरी दुनिया की पूंजीवादी व्यवस्थाएं अब ज्यादा से ज्यादा निरंकुश होते जाने की दिशा में अग्रसर हैं । ऐसे में अबतक के संघर्षों से अर्जित जनवादी अधिकारों की हिफाजत के लिए भी नारी समुदाय को राज्यसत्ता के विरूद्ध जुझारू लड़ाई लड़नी पड़ेगी । पहली बात तो यह है कि यह लड़ाई स्त्रियां तभी लड़ सकती हैं जब वे मजदूरों-किसानों के क्रांतिकारी संघर्षों में, लोक अधिकार आदोलनों में, क्रांतिकारी सांस्कृतिक आन्दोलनों में, क्रांतिकारी छात्र-युवा आन्दोलनों में पूरी भागीदारी करें । तभी वे आम जनता के पुरूष समुदाय को नयी चेतना देकर अपनी मुक्ति के लिए समर्थन हासिल कर सकेंगी और नारी मुक्ति के संघर्ष को स्त्री बनाम पुरूष का सघर्ष से बचाया जा सकेगा । दूसरी बात यह कि आज कामगार स्त्रियों के संगठन बनाने के अतिरिक्त जनमुक्ति संघर्ष के हिरावलों और अन्य क्रांतिकारी आन्दोलनों के नेतृत्व को मध्यमवर्गीय और जनता के सभी बर्गों की स्त्रियों को नारी उत्पीड़न और जनवादी अधिकारों के प्रश्न पर,व्यापक आधार वाले (वर्गीय संयुक्त मोर्चे की प्रकृति वाले) नारी संगठनों के बैनर तले संगठित करने की भी पहले से बहुत अधिक जरूरत है । साथ ही नारी मुक्ति के मुद्दे को उठाने वाले पहले से ही मौजूद ऐसे संगठनों को भी साथ लेने और उनमें शामिल होकर काम करने की संभावना मौजूद होने पर उनका उपयोग अवश्य ही किया जाना चाहिए । भारत जैसे देशों में स्त्रियों के जनवादी अधिकारों के लिए आंदोलनरत तमाम नारी संगठन महानगरों के शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक ही सिमटे हुए है । इनके साथ आम सहमती के कार्यक्रम पर सहमती के आधार पर काम किया जा सकता है और इनका विस्तार गावों-शहरों की आम स्त्रियों तक भी किया जा सकता है ।

तीसरी बात, यह कि जिस हद तक बुर्जुआ व्यवस्था और विश्वपूंजीवादी तंत्र की जरूरत है, उस हद तक सुधारपरक कार्रवाईयों के लिए आज बड़े पैमाने पर सरकारी आर्थिक मदद और तथाकथित स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिये आने वाली साम्राज्यवादी मदद के जरिये भारत जैसे देशों के कोने-कोने में तथाकथित स्त्री संगठन सुधार और आन्दोलन की कार्रवाईयों में लगे हैं । इनका मूल मकसद स्त्रियों को सुधार के दायरे में कैद करके उनकी तेजी से उन्नत होती चेतना को कुंद करना और उन्हें क्रान्ति की धारा में शामिल होने से रोकना है । स्त्री आन्दोलन के इन खतरनाक घुसपैठियों के विरुद्ध आज बड़े पैमाने पर प्रचार की और उनके प्रभाव को समाप्त करने की जरूरत है ।

इस सभी बातों और इनके सभी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही आज नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा और एक सुसंगत कार्यक्रम का निर्धारण किया जा सकता है ।

BACK TO POST [ १०-११ मार्च १९९२ को काठमांडू नेपाल में ‘अखिल नेपाल महिला संघ’ के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय भाषण के रूप में प्रस्तुत निबन्ध. नेपाली भाषा में पुस्तिकाकार प्रकाशित. ‘दायित्वबोध’, मार्च-जून, १९९३, जुलाई-अगस्त,१९९३ और नवंबर-दिसंबर, १९९३ अंकों में धारावाहिक प्रकाशित ]

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