श्रम का मूल्य

मूल्य का नियम 2 जिंसों की जड़पूजा

Posted on Updated on

इन फिल्मों को डाउनलोड करते समय अपने ब्राउज़र के स्ट्रीम कैच प्लगइन से 480p रेसोलुशन से फिल्म डाउनलोड करें. इससे फिल्म बेहतर क्वालिटी में मिलेगी जिसे कन्वर्ट करके सीडी या डीवीडी में बर्न किया जा सकता है.

संसार में बहुत से लोग हैं जो वास्तव में शक्तिशाली हैं : राष्ट्रपति, सी. ई. ओ. बैंकर , लहरों के नेता…परन्तु एक वस्तु, एक चीज ऐसी है जो इनमें से प्रत्येक से अधिक शक्तिशाली है. वह वस्तु है, दौलत.

दौलत वास्तव में शक्तिशाली है. लोग, समाज और देश इससे हर प्रकार के काम कर सकते हैं. कई लोगों के जीवन को, मकसद के रूप में, दौलत की लालसा जकड़े रखती है और यह आर्थिक बढौतरी की चालक शक्ति होती है. और समस्त समाज में, धन प्रतिष्ठा, हैसियत और सामाजिक शक्ति का प्रतीक है.

धन के बारे में दिलचस्प बात यह है कि यह केवल एक वस्तु है. आजकल तो यह सोने की भांति कोई कीमती चीज भी नहीं है. आजकल तो यह केवल कागज के टुकड़े या कंप्यूटर स्क्रीन पर डिजिट हैं. यही है इसकी शक्ति यद्यपि इसे इच्छा, शस्त्र और शब्दों की जरूरत नहीं है.

क्यों ?

यह अद्भूत परिघटना, जहाँ वस्तुओं की सामाजिक हैसियत होती है और वस्तुएं ऐसे व्यवहार करती हैं जैसे उनकी स्वयं की इच्छा हो, मार्क्स ने इसे ‘जिंसों की जड़पूजा’ शब्द से स्पष्ट करना चाहा.

जब मार्क्स जड़पूजा की बात कर रहे थे, वे चाबुकों, जंजीरों और चमड़े के परिधानों की बात नहीं कर रहे थे. वे उस ढंग के बारे में बात कर रहे थे जिसके द्वारा पूंजीवादी समाज में उत्पादकों के मध्य संबंध वस्तुओं के मध्य संबंधों का रूप ले लेते हैं.

शब्द जड़पूजा मूलरूप से, वस्तुओं को मूर्ति या टोने-टोटके  की भांति जादुई श्रेय देने के कारण धार्मिक कर्मकांडों के वर्णन के लिए प्रयोग किया जाता था. अगर प्राचीन टेस्टामेंट के इज़राईलियों ने फिलिस्तीनियों से युद्ध जीता तो उन्होंने इसका श्रेय अपने साथ चलने वाले ईश्वर और मानव के बीच समझौते की पोत को दिया. अगर वे हार गए तो वे इसपर क्रोधित हो गए. निसंदेह, हकीकत में अपनी स्वयं की कारवाईयों से जीतते या हारते थे. अपनी स्वयं की शक्तियों का श्रेय किसी वस्तु को देना जड़पूजा कहलाता है. धन और जिन्सें, मार्क्स के लिए ऐसी ही थीं. हम सोचते हैं कि उनमें जादुई शक्तियां हैं यद्यपि वास्तव में उनकी शक्तियां हमारे द्वारा, हमारी सृजनात्मक श्रम से आती हैं.

आईए ,थोडा कार्यशाला के अन्दर  देखें. यह कार्य का कोई भी स्थान हो सकता है – किसी पूंजीपति की फैक्टरी, एक किसान कम्यून, एक परिवार का फार्म, कुछ भी. यहाँ श्रमिकों के मध्य संबंध प्रत्यक्ष हैं. मैं एक पूर्जा तैयार करता हूँ और इसे दूसरे व्यक्ति की और बढ़ा देता हूँ. अगर श्रम प्रक्रिया में कोई बदलाव करना होता है तो मैनेजर सभी मजदूरों को इकट्ठा करता है और कहता है, ” अब हम काम को अलग तरह से व्यवस्थित करेंगे. ” चाहे यह जनवादी या वर्गीकृत तरह का संगठन हो, यह संगठन ही होता जो लोगों के बीच में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद होता है.

आओ अब कार्य स्थान से बाहर मंडी में देखें. मंडी में मामला अलग तरह का है. लोगों के मध्य सामाजिक संबंधों  द्वारा प्रत्यक्ष रूप से कार्य का संगठन, श्रम-विभाजन नहीं हो जाता. मंडी में जिन्सें श्रम के उत्पाद के रूप में, अपने मूल्य के साथ अन्य जिंसों से भिड़ती हैं. वस्तुओं के मध्य इन झडपों का असर वापस उत्पादन पर पड़ता है. वहीँ है जो उत्पादकों को उनकी श्रम में बदलाव, ज्यादा या कम उत्पादन, व्यवसाय छोड़ने या इसे बढाने के लिए संकेत भेजती हैं.

कोयला खनिक, बैंकर, कारपेंटर, और रसोइओं का परस्पर सीधा संबंध नहीं होता. इसके विपरीत उनके उत्पाद श्रम, कोयला, ब्रेड , केबिनेट और पास्ता मंडी में मिलते हैं और उनका परस्पर विनिमय हो जाता है. लोगों के बीच भौतिक संबंध जिंसों के बीच सामाजिक संबंध बन जाते हैं. जब हम कोयला, ब्रेड , केबिनेट और पास्ता को देखते हैं, हम उस काम को नहीं देखते जिसने इनकी सृजना की है. हम केवल मूल्य धारण किये हुई जिंसों को एक दूसरे के सम्मुख खड़ी देखते हैं. कोयल के एक ढेर का मूल्य ब्रेड के कई टुकड़ों के बराबर होता है. एक केबिनेट का मूल्य पास्ता की इतनी मात्रा के बराबर.  वस्तु की सामाजिक शक्ति, मूल्य, स्वयं वस्तु का कोई गुण लगता है न कि कामगारों के बीच संबंध का परिणाम.

उपभोग की जानेवाली वस्तुओं के संसार में घूमते हुए हम परमाणुकृत व्यक्ति हैं. जब हम किसी जिन्स को खरीदते हैं, तो हमारा अनुभव केवल खुद के और जिन्स के बीच का होता है. हम इन मिलनियों के पीछे के सामाजिक संबंधों के प्रति अंधे होते हैं. अगर हम चैतन्य रूप से, जिंसों के इस संसार से तालमेल बिठाते सामाजिक संबंधों के नेटवर्क के बारे में जानते हैं, तो भी हमारे पास इन संबंधों को सीधी तरह से अनुभव करने का तरीका नहीं होता …क्योंकि वे प्रत्यक्ष संबंध नहीं है.  इन सामाजिक संबंधों का केवल एकांगी बौद्धिक ज्ञान हमारे पास हो सकता है, न कि प्रत्यक्ष संबंध. प्रत्येक आर्थिक संबंध जिन्स नामक वस्तु की मध्यस्ता से सिरे चढ़ता है.

प्रक्रिया जिसके द्वारा लोगों के मध्य संबंध वस्तुओं के मध्य संबंधों का रूप ले लेते हैं, मार्क्स उसे “निरूपण” कहते हैं. ऐसा क्यों है कि पूंजीवादी समाज में वस्तुओं द्वारा मनुष्य का स्थान ग्रहण करने का आभास होता है. इसे समझने के लिए निरूपण हमारी मदद करता है. निर्जीव वस्तुएं, मूल्य, जो उन्हीं से आया लगता है, से सुसज्जित होकर जीवन धारण कर लेती हैं.

हम कहते है कि पुस्तक २० डॉलर की है और स्वेटर २५ की. परन्तु यह मूल्य स्वयं स्वेटर से नहीं आता. आप स्वेटर फाड़ कर उससे २५ डॉलर नहीं निकाल सकते. ये २५ डॉलर मंडी में स्वेटर और अन्य सभी जिंसों के बीच संबंध की अभिव्यक्ति है. और ये सभी जिन्सें मंडी विनिमय द्वारा संयोजित सामाजिक श्रम प्रक्रिया की महज रूप हैं. यह इसलिए क्योंकि लोग मंडी द्वारा अपनी श्रम का मूल्य हासिल करने के लिए सुनियोजित होते हैं.

यह भ्रम कि मूल्य स्वयं जिन्स से आता है न कि इसके पीछे के सामाजिक संब्न्धों से, यही जड़पूजा है. पूंजीवादी समाज इस प्रकार के भ्रमों से भरा पड़ा है. धन में सोने जैसे गुण होने का आभास है, हालाँकि यह इसलिए है क्योंकि यह ऐसी वस्तु है जिससे अन्य सभी जिंसों के मूल्य की अभिव्यक्ति होती है. ऐसा लगता है कि मुनाफा स्वयं विनिमय से प्रकट हो जाता है, यद्यपि कार्यस्थान पर पूँजी और श्रम के बीच असमान संबंधों द्वारा उत्पादन में,  मुनाफा पैदा होने की व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए मार्क्स ने सख्त मेहनत की. लगान जमीन से पैदा होता हुआ लगता है, यद्यपि मार्क्स अटल थे कि यह श्रम के मूल्य का ही विनियोजन है. हम आधुनिक मुख्यधारा के आर्थिक सिद्धांत में इस प्रकार की अंधभक्ति देखते है जैसेकि मूल्य उपभोगता और जिन्स का व्यक्तिगत अनुभव है और कि पूँजी स्वयं मूल्य पैदा करती है.

यद्यपि, जिन्स जड़पूजा का सिद्धांत केवल भ्रम का सिद्धांत नहीं है. या इस तरह नहीं है कि समस्त विश्व भ्रम हो और वास्तविकता कहीं सतह के नीचे विद्यमान, सदैव आँखों से ओझल हो. भ्रम हकीकत है. जिन्स में वास्तव में मूल्य है. धन में वास्तविक सामाजिक शक्ति है ही. वैयक्तिक लोग वास्तव में बलहीन है और भौतिक संरचनाओं में सामाजिक शक्ति है ही. सतह के नीचे जहाँ उत्पादकों में संबंध प्रत्यक्ष हों, ऐसा कोई उत्पादन का संसार हकीकत नहीं है. उत्पादकों के मध्य संबंध केवल परोक्ष है जो जिंसों के रहस्मयी संसार द्वारा सुनियोजित होते हैं.

मार्क्स के मूल्य का सिद्धांत में जिन्स जड़पूजा का सिद्धांत केन्द्रीय है और यह उन बातों में एक है जो मार्क्स को अपने पूर्वाधिकारियों से कठोरता से भिन्न करती हैं. एडम स्मिथ और रिकार्डो, दोनों का मानना था कि मूल्य को श्रम समय द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकता है. लेकिन मार्क्स का मूल्य (value ) का सिद्धांत, मूल्य (price ) के सिद्धांत से बढ़कर है. यह उस ढंग का सिद्धांत है जिसमें लोगों के मध्य संबंध भौतिक रूपों का स्थान ले लेते हैं जोकि वापस असर डालते हैं और इन सामाजिक संबंधों को शक्ल देते हैं. श्रम जिंसों में निहित मूल्य का स्थान ले लेती है. धन मूल्य इस मूल्य की सार्वभौमिक अभिव्यक्ति बन जाता है. मकसद के रूप में धन की लालसा, सामाजिक वर्चस्व धारण कर लेती है. उत्पादन के साधन पूँजी बन जाते हैं. सामाजिक मूल्यों के प्रतिनिधियों के रूप में, धन, जिन्स और पूँजी समाज के नियंत्रण से मुक्त, स्वतन्त्र शक्तियां बन जाते हैं. इन शक्तियों के नियम का ही मूल्य का नियम है. एकाधिकार या राज्य द्वारा इन शक्तियों पर कुछ अंकुश के यत्न मूल्य के सामाजिक विरोधों में उलझ कर रह जाते हैं.

Advertisements

मूल्य का नियम 1 परिचय

Posted on Updated on

मार्क्स की पूंजी पर आधारित इन अंग्रेजी फिल्मों को इस ब्लॉग द्वारा, हिंदी में डब करके प्रस्तुत करने का कार्य जारी है. फिल्मों की स्क्रिप्ट के कुछ अंशों से हमारे मतभेद हैं. पाठकों से अनुरोध है कि वे इन फिल्मों को आलोचनात्मक तरीके से आत्मसात करें. फिर भी इन फिल्मों का सर्वहारा वर्ग के नए जागरण और प्रबोधन के लिए बहुत महत्त्व है जिसके लिए यह ब्लॉग http://kapitalism101.wordpress.com का  बहुत आभारी है.


आर्थिक संकट वैचारिक संकट का भी समय होता है. यह समय होता है जब लोग अपने विश्व दृष्टिकोण का पुनर्मुल्यांकन करना शुरू कर देते हैं. वे अपनी सबसे मूलभूत पूर्वधारनाओं पर सवालिया निशान लगाने लगते हैं. प्रत्येक आर्थिक संकट से मुख्यधारा के आर्थिक चिंतन में पुनर्विचार और पुनर्गठन पैदा हुआ है. मजे की बात यह है कि यह पुनर्विचार सदैव आर्थिक प्रणाली के लिए रेडिकल चुनौती के सन्दर्भ में रहा है.

सीमांत उपयोगिता सिद्धांत , जो अब भी आधुनिक मुख्यधारा के आर्थिक सिद्धांत के लिए आधार मुहैया करता है, १८०० के अंतिम काल की महामंदी पर कार्ल मार्क्स की ‘पूंजीवाद की आलोचना’ द्वारा चुनौती के प्रत्युतर में पैदा हुआ था. १९३० की महामंदी से,उदारवादी अर्थशास्त्र की असफलता ,सफल बोल्शेविक क्रांति और पश्चिम में मजबूत मेहनतकशों की लहरों से चुनौती के रूप में,  कीन्सवाद पैदा हुआ था. १९७० के संकट से, कीन्सवाद की संकट झेलने की असफलताओं और विशाल लोक वामपंथी लहरें जैसे युद्ध विरोधी, नागरिक अधिकार, स्त्री लहरे और मजबूत श्रम की शक्ति, के विरुद्ध हथियार के रूप में नव उदारीकरण पैदा हुआ.

एलन ग्रीनस्पेन :
“याद रखें कि वैचारिकी एक ऐसा प्रत्ययात्मक चौखटा है जिससे लोग हकीकत का सामना करते हैं. प्रत्येक के पास एक है…जीवित रहने के लिए आपको एक वैचारिकी चाहिए. सवाल यह है कि क्या यह सही है या नहीं. और जो मैं आपसे कह रहा हूँ, मुझे एक त्रुटी दिखी है – मैं नहीं जानता कि यह कितनी सही और स्थायी है, परन्तु इस हकीकत ने मुझे बहुत परेशान किया है.”

नव उदारवादी संस्थापना की ओर से अपनी असफलता पर इस तरह की स्वीकृतियों से मौजूदा समय की मुख्यधारा की आर्थिक वैचारिकी पर प्रश्नचिह्न लगता है. लेकिन स्पष्ट नहीं है कि हम इस वैचारिक संकट में इस आर्थिक प्रणाली को योग्य टक्कर देने के सन्दर्भ में प्रवेश कर रहे हैं. सोवियत तरह की केंद्र न्योजित प्रणालियों की असफलता ने पूंजीवाद के विकल्पों पर विचार की लोकप्रिय चेतना को धो डाला है. इस समय कार्ल मार्क्स के विचारों का यह देखने के लिए कि वे पूंजीवाद की आलोचना में क्या सही-सही कहने की कोशिश कर रहे थे, पुनर्मुल्यांकन करना उपयोगी होगा – इसलिए नहीं कि हम लेनिन, स्टालिन, माओ और अन्य जो मार्क्स के विचारों पर दावा करते हैं, के राजनीतिक अनुभवों को दोहराने की इच्छा रखते हैं , पर क्योंकि मार्क्स पूंजीवाद की पूर्ण और प्रणालीबद्ध आलोचना प्रस्तुत करते हैं जोकि आर्थिक चिंतन के इतिहास में पूर्णतया अलग, पूर्णतया अद्वितीय है. इस तरह के रेडिकल विचार हमारी मौजूदा स्थिति और सामाजिक रूपांतरण की संभावनाओं की नयी समझ की खोज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. जीवित रहने के लिए वह समाज खतरनाक है जो विशेषतय संकट के लंबे अन्तराल में प्रवेश करने पर भी आत्मालोचना की क्षमता नहीं रखता.

मार्क्स और सभी प्रसिद्ध बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों में निर्णायक भिन्नता है. सभी बुर्जुआ अर्थशास्त्री संकट को पूंजीवाद के प्राकृतिक संतुलन को खिन करनेवाली कोई बाह्य वस्तु मानते हैं. पूंजीवाद की प्रवृति असमानता, शोषण और संकट यानिकी जब स्पष्ट हो जाता है कि उनके सिद्धांत और असलियत में असंगतता है तो बुर्जुआ अर्थशास्त्री असलियत को उनके मॉडल के विपरीत होने पर दोषी ठहराते हैं. राज्य के दखल, मजदूर लहरें, मानवीय लोभ आदि के रूप में हमलावर बाह्य शक्तियों द्वारा असलियत को विषाक्त किया जाता है. आज हम इसी प्रकार के दक्षिणपंथी लोकप्रिय उत्थान की प्रतिक्रियावादी समझ को देख रहे हैं जोकि विदेशियों, वाम बुद्धिजीवियों, समलिंगियों, गैर ईसाई और काले राष्ट्र अध्यक्षों की आक्रामक घुसपैठ पर समाज की समस्यायों का दोष मढ़ते हैं.

मार्क्स विपरीत पद्वति अपनाते हैं. वे सामाजिक विरोधों को व्यवस्था के भीतर देखते हैं. ये सामाजिक विरोध व्यवस्था में इतने बुनियादी हैं कि ये अपने गुरुत्वीय क्षेत्र में समाज के सभी अंगों को खींच लेते हैं.

बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों ने सदैव मंडी को स्वतंत्रता और समानता का क्षेत्र माना है. तथ्य यह है कि मंडी वाले समाज में इतनी असमानता, संकट और अधूरी स्वतंत्रता है कि इसे सिद्धांत में नहीं बल्कि हकीकत में देखा जा सकता है. आम लोगों की सोच के विपरीत मार्क्स इन सामाजिक बुराईयों के विश्लेषण से शुरुआत करते हुए मंडी के संबंधों की आलोचना की ओर नहीं बढ़ते. मार्क्स इजारेदारी, गरीबी, शोषण और राज्य की हिंसा पर बोलते हुए आगे नहीं बढ़ते. वे उसी मंडी के स्वतन्त्र क्षेत्र से शुरू होते हैं जो  उनके बुर्जुआ आलोचकों को बहुत प्रिय है, और दिखाते हैं कि किस तरह ये सभी सामाजिक विरोध इस मूल उत्पादन संबंध से प्रकट हो जाते हैं. पूंजीवादी उत्पादन का मंडी विनिमय के लिए उत्पादन होने के तथ्य के कारण मार्क्स के लिए यहीं से शुरुआत होती है. आधारभूत उत्पादन का यह रूप कानून जैसे गुण अख्तियार कर लेता है जिसे वे ‘मूल्य का नियम’ से पुकारते हैं.

मंडी में दिलचस्प लगने वाली कौनसी वस्तु मार्क्स को मिली ? यह कोई आपकी इच्छानुसार वस्तुएं खरीदने या बेचने की स्वतंत्रता नहीं थी. तथ्य यह है, कि मंडी समाज के सामाजिक जीवन में भाग लेने के लिए, प्रत्येक को चीजें खरीदनी या बेचनी पड़ती हैं. जीवित रहने के लिए, समाज में भाग लेने के लिए, प्रत्येक को चीजें खरीदने और अपनी श्रम के उत्पाद बेचने के लिए, मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.  यह विलक्षण रूप से,  प्रारंभिक समाजों से जहाँ मेहनतकश अपने श्रम से स्वयं को पालते थे, यानिकी वे अपने उपयोग के लिए श्रम द्वारा वस्तुएं उत्पादित करते थे, से अलग तरह का सामाजिक संगठन है. पूंजीवादी समाज में उत्पादित होनेवाली चीजें स्वयं के लिए नहीं होती. लोग उनका उत्पादन विनिमय के लिए करते हैं. इस लिए सामाजिक श्रम प्रक्रिया, परोक्ष रूप से, विनिमय के द्वारा तालमेल बिठाती है.

मंडी द्वारा परोक्ष रूप से तालमेल बिठाने वाले, निजी उत्पादकों के समाज में लोगों के मध्य सामाजिक संबंध, जिंसों के संबंध, चीजों के मध्य संबंधों का रूप ले लेते हैं. लोगों के बीच संबंध जिन्स मूल्यों में प्रकट होनेवाले मूल्य संबंध बन जाते हैं. आर्थिक रूप से, लोग एक दूसरे से धन और मूल्य द्वारा संबंधित हो जाते हैं. जिन्स संबंधों का यह संसार, व्यक्तियों के नियंत्रण से बाहर  स्वतन्त्र रूप ले लेता है जो प्रतिप्रभाव पैदा करता है और उनके रिश्तों को नियंत्रित करता है. एडम स्मिथ ने इसे ‘मंडी का ओझल हाथ’ कहा.  मार्क्स इसे ‘मूल्य का नियम’ कहते हैं.

मूल्य का नियम क्या है ? ये अव्यक्तिगत, समाज पर अपना असर डालनेवाली अर्थ की अंध शक्तियां हैं. वह समाज अद्वितीय है जहाँ श्रम का प्रमुख रूप मंडी में, विनिमय के लिए उत्पादित होता है. लोगों के बीच के संबंध जिंसों के बीच मूल्य संबंध बन जाते हैं. और ये मूल्य संबंध अव्यक्तिगत शक्तियां बन जाते हैं जिनके समाज के लिए अनचाहे परिणाम होते हैं. उदाहरण के लिए, हमें मिलती है पूँजी.

अपने श्रम के लिए, लोगों ने सदैव, औजारों और अन्य संसाधनों का उपयोग किया है. इन्हें उत्पादन के साधन कहते हैं. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में, ये उत्पादन के साधन पूंजी बन जाते हैं. औजार, मशीन, कच्चा माल और यहाँ तक कि कामगार मूल्य के साथ जिन्स बन जाते हैं. इससे मंडी में उत्पादन के साधनों को खरीदना और इन उत्पादन के साधनों के उत्पादों को मुनाफे के लिए बेचना संभव हो जाता है. दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति उत्पादन में धन निवेश कर सकता है ताकि और अधिक धन कमा सके . मूल्य, उसके खुद में उद्देश्य की तलाश, समाज की प्रधान शक्ति बन जाती है. यही है जो पूंजी है, सामाजिक क़ीमत से उपराम, मूल्य का अपने ही लिए विस्तार. पूंजी एक वर्ग का रूप ले लेती है जो उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है और अन्य लोगों को मुनाफे के लिए उत्पादन करना पड़ता है.

स्वाभाविक रूप से पूंजी की विषमता से आर्थिक और  भूमंडलीय अन्तरिक्ष में, दौलत और कंगाली के ध्रुव खड़े हो जाते हैं. पूंजी स्व-निषेधित भी होती है. हालाँकि यह कामगार पर काबू पानेवाली, एक अव्यक्तिगत शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन मुनाफा पैदा करने के लिए इसे कामगार की आवश्यकता पड़ती है. इसकी जड़ में है सामाजिक विरोध. इस सामाजिक विरोध से, निरंतर अस्थिरता और सामयिक संकट  फूटते रहते है.

बहुत से अन्य और ये सभी रेडिकल अर्थ मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ के भाग हैं.

यह वीडियो सीरिज मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ पर विभिन्न विषयों को शामिल करेगी : उपयोग मूल्य, विनिमय मूल्य और मूल्य में अंतर, पूर्ति, मांग और मूल्य का मूल्य से संबंध, अमूर्त श्रम, शोषण, संकट, सामाजिक आवश्यक श्रम समय और यहाँ तक कि विश्व को बदलने के लिए ‘मूल्य का नियम’ की समझ . उम्मीद की जाती है कि आज रेडिकल लहरों को सही तरह से समझने के महत्व के लिए इनका योगदान होगा क्योंकि उन्हें ऐसे विचार चाहियें  जिनसे वे अपनी मांगे और रणकौशल को स्पष्टता से बयान कर सकें.

मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

Posted on Updated on

विश्व स्तर पर, 1970 के बाद प्रगतिशिलियों, एन जी ओ, और वामपंथियों के साथ मिलकर संशोधनवाद सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों को उत्पादन के स्थान कारखानों और फार्मों से खींचकर, बुर्जुआजी की इच्छानुसार, मंडी में ले गया. मार्क्स की पूंजी पर आधारित यह फिल्म, उनका भंडाफोड़ करती है और संजीदा लोगों को मार्क्सवाद का सही अध्ययन करने के लिए प्रेरित करती है. मूलरूप से फिल्म अंग्रेजी में हैं जिसे हिंदी में डब किया गया है. इसे भारतीय सन्दर्भ में रखने के लिए कुछ तस्वीरों और दृश्य में बदलाव भी किया गया है. http://kapitalism101.wordpress.com/2010/08/20/law-of-value-5-contradiction से विशेष आभार सहित.

मूल्य के नियम_5_विरोधाभास

मूल्य के नियम  में मार्क्स हमेशा विसंगतियों की चर्चा करते हैं. परन्तु ये गोल चकोरों और सैन्य ज्ञान से संबंधित विसंगतियां नहीं होती. ये विसंगतियां पूंजीवादी समाज के सामाजिक संबंधों के अन्दर की विसंगतियां हैं. कुछ लोग इनके लिए शब्द विरोधाभास का प्रयोग करना ज्यादा पसंद करते हैं.

बहुत क्षोभ के साथ हम जानते  हैं कि आधुनिक समाज सामाजिक विसंगतियों से भरा पड़ा है. धन की प्रचुरता के साथ  अत्यधिक गरीबी, अत्याधिक बेरोजगारी के बावजूद  ज्यादा काम, बैंकों द्वारा घरों की कुर्की, नस्ली श्रेष्टता और तनाव, औरतों के खिलाफ हिंसा, श्रम संघर्ष, दूषित वातावरण, पुलिस की बर्बरता, गैंग हिंसा, समूहों की घृणा, जनसँख्या का अत्याधिक उजाड़ा और बहुत से युद्ध.  मार्क्स की दिलचस्पी इन सभी  विसंगतियों में हैं. लेकिन इनमें  से किसी एक  से भी वे अपना विश्लेषण शुरू नहीं करते.

इसके विपरीत वे अपेक्षित साधारण सी लगने वाली चीज – जिन्स से शुरू होते हैं. क्यों ? क्योंकि जिन्स पूंजीवाद के सामाजिक संबंधों की सबसे बुनियादी चीज है. लोगों के परस्पर संबंध जिन्स विनिमय का रूप ले लेते हैं. जिन्स सामाजिक संबंधों की बुनियादी कार्यकर्त्ता है.  इसलिए अगर हम यह जानना चाहते हैं कि कैसे ये सभी सामाजिक विरोधाभास परस्पर संबंधित हैं, हमें जिन्स से शुरुआत करनी होगी.

जैसाकि हमने पहले ही देखा है कि जिन्स में विरोधाभास निहित है. : इसका एक उपयोग मूल्य है और दूसरा मूल्य (जैसाकि हमने देखा है कि मूल्य विनिमय मूल्य के पीछे छुपा होता है इसलिए, पहले हमने कहा था कि विरोधाभास उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य के बीच है, बाद में हमने इसे उपयोग मूल्य और मूल्य में संशोधित कर लिया. ) शुरू में देखने पर यह इतना अधिक विरोधाभासी नहीं लगता. लेकिन जैसे ही हम इसे बारीकी से देखते हैं तो महतवपूर्ण विरोधाभास उभर आते हैं.

ऐसा क्यों होता है कि लोगों को मंडी में अपनी श्रम, धन के बदले बेचना पड़ता है. क्योंकि वे स्वयं अपने जीवन निर्वाह के साधन नहीं जुटा पाते. यही पूंजीवाद का विलक्षण पहलू है. पूर्व में मौजूद उत्पादन की विधियों में लोगों की बहुसंख्या किसी न किसी प्रकार के उत्पादन के साधनों का उपयोग कर सकती थी,  जिनसे वे अपने जीवन निर्वाह के साधन जुटा लेते थे. कई बार लोग आपस में चीजे बदल लेते थे परंतू वे ऐसा अपने ही प्रयोग के लिए अतिरिक्त उत्पादन के द्वारा करते थे. अपने अतिरिक्त उत्पादन की विक्री विशेषरूप से विनिमय के लिए उत्पादन से पूर्णतया भिन्न है.

‘प्रारंभिक एकत्रीकरण नाम की लंबी हिंसात्मक और ऐतिहासिक प्रक्रिया  के द्वारा , उत्पादन के इन साधनों का निजीकरण हो गया और इनपर  पूंजीपति नामक वर्ग के लोगों का कब्ज़ा हो गया. जबकि पहले लोग सीधे अपने उपयोग के लिए श्रम किया करते थे, लेकिन अब उन्हें अपनी रोजी चलने के लिए मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.

सो इस तथ्य से कि हम विनिमय के लिए, न कि सीधे उपयोग के लिए उत्पादन करते हैं, संपत्तिशाली और संपत्तिहीन के बीच सामाजिक विरोधाभास का पता चलता है. खुली मंडी में पहले से ही काम पर जबरदस्ती विद्यमान होती है. और इस जबरदस्ती को लागू करने के लिए किसी न किसी प्रकार की हिंसा की आवश्यकता पड़ती हैं, चाहे यह राज्य , निजी सेना या भाड़े के बटमार द्वारा हो. उत्पादन के साधनों का निजीकरण करने के लिए, हिंसा जरूरी थी और संपत्ति के सभी वैधानिक पह्लूयों को लागू करने के लिए जरूरी बनी हुई है.

अपनी जीविका को मंडी से प्राप्त करने के लिए उन्हें कोई अन्य चीज बेचनी पड़ती है. चूँकि उत्पादन के साधन निजी होते हैं, इसलिए उन्हें अपनी श्रम बेचनी पड़ती है. निसंदेह श्रम वास्तव में बेचीं नहीं जा सकती. इसकी जगह हम अपनी श्रम की क्षमता : श्रम-शक्ति बेचते हैं. हम कार्य समय की निश्चित मात्रा बेचते हैं, चाहे इसे घंटों, हफ़्तों या वर्षों में मापा जाये. यही कारण है कि मूल्य श्रम समय की अभिव्यक्ति है.

हमारी स्वयं की सृजनात्मक क्रियाशील क्षमता, वही वस्तु जो हमें इन्सान बनाती है और समाज से जोडती है, श्रम-शक्ति कहलाती है, श्रम-शक्ति जिन्स बन जाती है जिसे हम किसी को बेचते हैं. श्रम-शक्ति का,  अन्य जिन्स की भांति, उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य होता है और आपने अनुमानित किया, इनमें विरोधाभास है. विनिमय मूल्य हमारे कार्य समय के लिए भुगतान की गयी मजदूरी होती है. इसे जीविका पर खर्च द्वारा निर्धारित किया जाता है. यह भोजन, रिहाईश, कपडे, और परिवहन पर खर्च के बराबर होता है. लेकिन हमारी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य ऐसा है कि यह मूल्य सृजित कर सकता है. यही श्रम-शक्ति के दो विरोधी पहलू हैं, एक तरफ इस पर मजदूरी खर्च होती है तो दूसरी और यह मूल्य पैदा करता है.

हो सकता है आपको 5 डॉलर प्रति घंटा दिए जा रहे हो और आप 20 डॉलर प्रति घंटा की दर से मूल्य सृजित कर रहे हों. अगर ऐसा है तो आपका शोषण हो रहा है. वास्तव में, आपके शोषण की दर चार सौ प्रतिशत है. श्रम-शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास के कारण ही शोषण संभव होता है.

शोषण पूंजीवाद की पहेली – मुनाफे के अस्तित्व – को स्पष्ट करता है. पूंजीपति दिन की शुरुआत कुछ धन से करते हैं जिसे वे उत्पादन में  निवेश कर देते हैं. दिन की समाप्ति पर उनके पास कुछ जिंसों की मात्राएँ होती हैं जिन्हें वे शुरू में  खर्च किये गए धन से अधिक मूल्य पर बेच देते हैं. ऐसा लग सकता है कि इनका मुनाफा क्रय -विक्रय करने से हुआ है. हालाँकि केवल क्रय-विक्रय करने से भी मुनाफा अर्जित किया जा सकता है. लेकिन केवल क्रय-विक्रय करने से मुनाफा पैदा नहीं होता. क्योंकि खरीदना और बेचना जीरो-राशी खेल है. जब हम जिंसों का विनिमय करते हैं तो हम उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं. इस प्रक्रिया द्वारा समाज की कुल राशी के मूल्य में कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसा संभव हो सकता है कि किसी एक को चुना लग जाये. परन्तु मंडी में, किसी एक व्यक्ति का लाभ दूसरे के लिए हानि होता है. लेकिन जिंसों की खरीदफरोख्त से औसत मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती. परन्तु वास्तविक मुनाफा औसत मूल्य में वृद्धि से ही संभव है. किसी समाज के जीडीपी की कुल राशी के मूल्य में वृद्धि मुनाफे  के इस विस्तार से ही होती है.

ऐसा लगता है कि हम पहेली या किसी विरोधाभास में उलझ गए हों. मंडी में समानता और संतुलन का राज्य चलता है. मंडी में विनिमय द्वारा जिंसो के मूल्य का संरक्षण होता है. किसी एक व्यक्ति का लाभ किसी दूसरे व्यक्ति की हानि से इस प्रकार बराबर हो जाता है कि जिन्स विनिमय से अन्तर्जात संतुलन बना रहता है. परन्तु मुनाफा ऐसी अद्भुत घटना है जो जिंसों की खरीदफरोख्त होने से संभावय लगती है. कहीं न कहीं विषमता से मुनाफा पैदा हो सकता है.लेकिन थोड़े से ज्यादा पैदा होना. यह सब किस प्रकार संभव हो सकता है?

इस पहेली को हल करने के लिए मार्क्स हमें मंडी से आगे उत्पादन के  रहस्यमई क्षेत्र में देखने के लिए कहते हैं. उत्पादन में, जहाँ श्रम के शोषण से मूल्य का विस्तार हो जाता है. शोषण मंडी में विनिमय के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करता क्योंकि यह विनिमय में नहीं होता. श्रम-शक्ति को उसके मूल्य पर खरीदा जाता है. उस श्रम शक्ति के उत्पादों को उनके मूल्य पर बेचा जाता है. इन विनिमयों द्वारा कोई मुनाफा नहीं होता. मंडी से मुनाफा बिलकुल नहीं आता, बल्कि श्रम प्रक्रिया से आता है. श्रम के मूल्य से अधिक और ऊपर किया गया श्रम मुनाफे की मात्रा का निर्धारक है. जबकि मंडी समानता और संतुलन की क्षेत्र बनी रहती है, उत्पादन असमानता और शोषण का क्षेत्र है. और यह विरोधाभास श्रम शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास होने से ही संभव है.

अगली किश्त मार्क्स के मूल्य के नियम पर आधारित एनिमेटिड हिंदी डब फिल्म : अंतिम किश्त में समाप्य

‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

Posted on Updated on

इसी महीने की चौदह तारीख के अंक में ‘दैनिक जागरण’ अपने ‘नजरिया’ नामक कालम के नीचे श्रम का मूल्य ‘ और ‘ वामपंथ की सैद्धांतिक भूल( देखने के लिए चटका लगायें ) नामक आलेखों द्वारा मार्क्सवाद पर आक्रमण करता है ताकि  मध्यम वर्ग के पाठक वर्ग का वह हिस्सा जो अपने नजरिया के लिए केवल बुर्जुआ वर्ग के मीडिया और बुद्धिजीवियों पर आश्रित है, भ्रमित हो जाये . डॉ..भरत झुनझुनवाला बुर्जुआ मीडिया के ‘आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों (तथाकथित) में से एक हैं. इसी प्रकार के तथाकथित बड़े नामों को पाल-पोसकर ही पूंजीपति वर्ग सत्ता में रह सकता है. उनके नाम की साख को दाग नहीं लगना चाहिए. इसलिए वह बड़ी चालाकी के साथ  डॉ..भरत झुनझुनवाला को मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ में मीन-मेख निकालने से [ जोकि डॉ..भरत झुनझुनवाला जैसा व्यक्ति क्या निकालेगा ? ] बचा लेता है. इनके स्थान पर वह डा. सरोजनी पाण्डेय की अस्थायी प्रतिनियुक्ति करता है. डा. सरोजनी पाण्डेय के इस आलेख में ऐसा कुछ नहीं है जिसे वैज्ञानिक कहा जाये. वे “भगवान बुद्ध के निर्वाण-सुख”,  “शिव जी का तांडव नृत्य और पार्वती जी के मुख की शोभा” जैसी अमूर्त धारणाओं और पौराणिक  हस्तियों का सहारा लेकर, इसे भावुक बनाने की नाकाम कोशिश करती हैं और समझती हैं कि अब मध्यम वर्ग के लोगों को मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ समझने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी. अपने पाठकों को भावुकता के रंग में रंगने के लिए वे कहने लगती हैं,

“एक मजदूर दिनभर कठिन परिश्रम करके अपनी मजदूरी पाता है। यदि उसकी मेहनत पर गौर करके मालिक उसे दस-बीस रुपये अधिक दे दे, तो उसके चेहरे पर खुशी की जो चमक दिखाई देती है” , उसके  बदले में वे “अपने मालिक के लिए उसके दिल से दुआ” की भी  अपेक्षा करती हैं जोकि “प्रार्थना से कम नहीं” है.

इस प्रकार की भावुक बातों के द्वारा वे मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ के उस सवाल को निगलने की नाकाम कोशिश करती हैं जो उनसे ( डा. सरोजनी पाण्डेय से ) पूछा जा सकता है. वह सवाल है कि “दिनभर कठिन परिश्रम करने वाले  मजदूर की मेहनत पर गौर करके मालिक उसे दस-बीस रुपये अधिक” कहाँ से लाकर देगा ? यही वह बुनियादी सवाल है जिससे बचाव करते हुए, अख़बार ‘जागरण’ अपने आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ बड़े नाम – डॉ..भरत झुनझुनवाला – के स्थान पर  डॉ. कमला पाण्डेय की प्रतिनियुक्ति, एक अलग लेख ‘श्रम का मूल्य’ लिखने के लिए’ करता है. वे विचारी वैज्ञानिक मसले का हल भावुकता के अंध कुएं में गोते लगाते हुए ढूँढती हैं.

खैर, मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ को संक्षिप्त रूप में, एक बार फिर समझने के लिए, इस पेज पर थोडा और रुकें.

मार्क्स का ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’

पूंजी का प्रथम खंड, पण्य उत्पादन के विचार के विश्लेषण से प्रारंभ होता है. पण्य की परिभाषा है, बाह्य उपयोगी वस्तु जिसे मण्डी में विनिमय के लिए प्रस्तुत किया जाता है. इस प्रकार, पण्य उत्पादन के लिए दो जरूरी शर्ते हैं; मण्डी का अस्तित्व जिसमें विनिमय हो सके और सामाजिक श्रम-विभाजन जिससे भिन्न-भिन्न लोग भिन्न भिन्न उत्पादों का उत्पादन करें क्योंकि इसके बिना विनिमय के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं बचता. मार्क्स कहते हैं कि  पण्य में दो बातें होती हैं ; उपयोग मूल्य (value) और विनिमय मूल्य . मार्क्स का मानना है कि उपयोग मूल्य को आसानी से समझा जा सकता है परन्तु उनका दृढतापूर्वक आग्रह है कि विनिमय मूल्य एक पेचीदा मसला है और सापेक्ष विनिमय मूल्य व्याख्या की मांग करते हैं. क्यों किसी पण्य की एक निश्चित मात्रा किसी अन्य पण्य की एक निश्चित मात्रा से बदल ली जाती है ? पण्य के उत्पादन के लिए लगने वाले श्रम की शर्त द्वारा वे इसकी व्याख्या करते हैं. यही नहीं वे कहते है कि जरूरी सामाजिक श्रम वह श्रम होती है जिसे किसी अर्थव्यवस्था में किसी उत्पादक कार्य के लिए, श्रमिक वर्ग में मौजूद उत्पादकता और प्रबलता के औसत स्तर तक निचोड़ा जाता है. इस प्रकार, मूल्य का श्रम सिद्धांत कहता है कि किसी पण्य के मूल्य का निर्धारण उस पर लगी सामाजिक जरूरी श्रम की मात्रा के द्वारा होता है. मूल्य के श्रम सिद्धांत की पैरवी के लिए मार्क्स अपने तर्कों को दो चरणों में पेश करते हैं. पहले चरण में उनका तर्क है कि अगर दो वस्तुओं की तुलना की जाती है तो इनको, किसी समान संकेत के दोनों तरफ रखने के अर्थ में, तीसरी वस्तु की आवश्यकता होगी जो मात्रा या गुण में इन दोनों वस्तुओं के समान हो ताकि ये दोनों वस्तुएं उस वस्तु से समानयन हो जाएँ. चूँकि अब दोनों वस्तुओं को आपस में बदला जा सकता है इसलिए, मार्क्स कहते हैं, अब जरूरी है कि कोई ऐसी तीसरी वस्तु है, जिसमें इन दोनों वस्तुओं का साझा है. यही से दूसरे चरण के लिए प्रोत्साहन मिलता है जो कि उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ की खोज है. यह उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ केवल श्रम ही हो सकती है जिसमें साझा गुण हैं.

मार्क्स कहते हैं कि पूंजीवाद के विशिष्ट गुण हैं जिसमें केवल वस्तुओं का विनिमय ही नहीं होता बल्कि पण्यों की खरीद और उनको अन्य पण्यों जिनमें और अधिक मूल्य होता है, में रूपांतरण द्वारा मुनाफा अर्जित करने के उद्देश्य से, धन के रूप में पूंजी को बढ़ाना होता है. मार्क्स का दावा है कि उनसे पहले के किसी भी सिद्धांतकार ने पर्याप्त रूप से, इस बात की व्याख्या नहीं की है कि कैसे पूंजीवाद समुचित रूप में मुनाफा पैदा करता है. मार्क्स इसका हल पूंजीवाद में श्रमिक के शोषण में देखते हैं. उत्पादन की स्थिति पैदा करने के लिए, पूंजीपति पण्य के रूप में श्रमिक की श्रम-शक्ति – उसके एक निश्चित कार्य दिवस के लिए काम करने की क्षमता – को खरीदता है. इस पण्य – मजदूर की एक निश्चित कार्य दिवस के लिए काम करने की क्षमता – के मूल्य का निर्धारण भी अन्य पण्यों के मूल्य के निर्धारण की भांति; इसके उत्पादन में खर्च हुई सामाजिक जरूरी श्रम द्वारा होता है. इस केस में एक कार्य दिवस की श्रम-शक्ति का मूल्य उन पण्यों के मूल्य के समान है जो उसे (श्रमिक को) एक दिन के लिए जीवित रखने के लिए पर्याप्त हैं. मान लीजिए कि इन पण्यों के उत्पादन पर चार घंटे खर्च होते हैं तो कार्य दिवस के पहले चार घंटे उस मूल्य को पैदा करने में खर्च किये जायेंगे जिसे श्रमिक को मजदूरी के रूप में भुगतान किया जाता है. इसे जरूरी श्रम कहते हैं. इसके अलावा की जानेवाली श्रम को अतिरिक्त श्रम कहते हैं जो पूंजीपति के लिए अतिरिक्त (बेशी) मूल्य पैदा करती है. मार्क्स के अनुसार यही अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत होता है. मार्क्स के विश्लेषण के अनुसार अकेली श्रम-शक्ति ही ऐसी पण्य है जो अपनी औकात से अधिक मूल्य पैदा कर सकती है. इसी कारण इसे, अस्थिर पूंजी (variable capital ) के नाम से जाना जाता है. अन्य पण्य अपने से निर्मित नई पण्य में अपना मूल्य स्थानातरण कर देती हैं लेकिन कोई नया मूल्य पैदा नहीं कर सकती. उन्हें स्थिर पूंजी (constant capital ) कहा जाता है. मुनाफा जरूरी श्रम से प्राप्त मजदूरी से ऊपर की गयी अतिरिक्त श्रम से आता है.

यही है पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत  – श्रमिक से निचोड़ा गया अतिरिक्त-मूल्य . इसी अतिरिक्त मूल्य में से, उस  दिनभर कठिन परिश्रम करने वाले मजदूर की मेहनत पर गौर करते हुए मालिक से”, तरस की गुहार लगाते हुए, डॉ. कमला पाण्डेयदस-बीस रुपये अधिक देनें” को कहती हैं. मसला गंभीर था न कि भावुक, इसीलिए तो “फैज” जैसे विद्वान  कवि की कलम ने ऐसा गीत लिख दिया, जिसकी विषय-वस्तु में ‘ इक खेत नहीं, इक देश नहीं’, बल्कि सारी दुनिया को जीतने  की जिद  है.

http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio2/moba-ila-para-da-unaloda-karane-ke-li-e-krantikari-gita/ikdeshnhin.mp3?attredirects=0 हम मेहनतकश जग वालों से – इस गीत को सुनने के लिए इस प्लेयर के दायीं ओर चटका लगायें.

डॉ. झुनझुनवाला के आलेख का जवाब –देखें — एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

लक्ष्मी-पूजन करें लेकिन

Posted on Updated on

जब भी हम बाजार से कोई वस्तु खरीदते हैं तो हम उसके भौतिक गुणों की ओर ही देखते हैं. हो सकता है हम उसके गुणों, सुन्दरता आदि की तारीफ भी करें. लेकिन इन वस्तुओं को राजनीतिक अर्थशास्त्र में पण्य या जिंस कहा जाता है. अगर आप भी इनकी पूजा करने की योजना बना रहे हैं तो यह सब करने से पहले अपनी आँखों से उस परदे को हटाने की कोशिश कीजियेगा जिसे “पण्यों की जड़ पूजा’ कहा जाता है.

जिंस रूप का रहस्यमई रूप इस तथ्य के कारण है कि जिंस, जोकि श्रम का उत्पाद होती है अपने उत्पादन की क्रिया में निहित मनुष्य के सामाजिक संबंधों का प्रतिबिम्बन करती है.

उदाहरण के लिए, जिंस के मूल्य का परिमाण मनुष्य के जिस्म की श्रम-शक्ति के खर्च का मापन है. इसके अलावा विभिन्न उत्पादकों के बीच के सामाजिक संबंध उन द्वारा उत्पादित की गयी जिंसों के संबंधों को भी प्रकट करते हैं.

इस प्रकार, जिंस रूप और जिंसों के बीच मूल्य-संबंधों का इस बात से कोई लेनादेना नहीं होता कि उनके भौतिक गुण क्या हैं और वे किन पदार्थों से निर्मित हुए हैं. इसके विपरीत अहमियत इस बात की है कि उनके उत्पादन और विनिमय में सामाजिक संबंधों का रूप कैसा है.

‘पण्यों की जड़ पूजा’ पण्यों को उत्पादित करने वाली श्रम के सामाजिक चरित्र से पैदा होती है. भौतिक वस्तुएं केवल इसलिए पण्य या जिंस बन जाती हैं क्योंकि श्रम उन्हें अलग-अलग स्थान पर और व्यक्तिगत तौर पर उत्पादित करती है. यह विनिमय होने से ही संभव होता है कि श्रम के उत्पाद मूल्यों की एकरूपता या समरूपता प्राप्त करते हैं जो उनके  उपयोगी गुण और भौतिक गुणों से भिन्न होता है. इस प्रकार, मानव द्वारा निर्मित भौतिक वस्तुओं को कृत्रिम रूप से उनका स्वयं का ‘जीवन’  दे दिया जाता है अर्थात ऐसा लगता है कि मूल्य तो वस्तु के भौतिक गुणों में ही छुपा हुआ है न कि उस श्रम शक्ति की इकाईयों में जो इनके उत्पादन के समय खर्च हुई थीं.

पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूर अपनी मजदूरी के अलावा जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करता है उसे अधिशेष मूल्य भी कहते हैं. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपति का मुनाफा और अन्य वर्गों की आमदनी आती है. मजदूर को उतनी ही मजदूरी मिलती है जितनी उसके जिन्दा रहने और अपनी नसल के पुनरुत्थान के लिए आवश्यक हो. न कम न ज्यादा. अगर कम मिलेगी तो मजदूर का जीवन और पुनरुत्थान नहीं हो पायेगा. ज्यादा होने पर मजदूर मजदूरी नहीं करेगा. इसी तर्क पर पूंजीवाद कार्यशील होता है. लेकिन मजदूर द्वारा पैदा की गयी अतिरिक्त कीमत की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में जो कुत्ता घसीटी होती है, उसकी कामना करना ही लक्ष्मी-पूजन है.

अगर अब भी आप ‘लक्ष्मी पूजन’ या ‘पण्यों की जड़ पूजा’ करेंगे तो हमें आपसे कुछ नहीं कहना है !

सन्दर्भ साभार :   THE FETISHISM OF COMMODITIES AND THE SECRET THEREOF

मैं कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की इतनी सरल प्रस्तुति सुन रही थी…

Posted on Updated on

जैक लंडन का उपन्यास – देखें : \’आयरन हील\’

और अतिरिक्त मूल्य का नियम

सपने का गणित

अर्नेस्ट के उद्घाटन से लोग मानो भौंचक रह गए. इस बीच उसने फिर शुरू किया :
‘आप में से दर्जनों ने कहा कि समाजवाद असंभव है. आपने असम्भाविता पर जोर दिया है. मैं अनिवार्यता को चिन्हित कर रहा हूँ. न केवल यह अनिवार्य है कि आप छोटे पूंजीपति विलुप्त हो जायेंगे – बड़े पूंजीपति और ट्रस्ट भी नहीं बचेंगे. याद रखो विकास की धारा पीछे नहीं लोटती. वह आगे ही बढ़ती जाती है, प्रतियोगिता से संयोजन की ओर, छोटे संयोजन से बड़े संयोजन की ओर, फिर विराट संयोजन की ओर और फिर समाजवाद की ओर जो सबसे विराट संयोजन है.

‘आप कह रहे हैं कि मैं सपना देख रहा हूँ. ठीक है मैं अपने सपने का गणित प्रस्तुत कर रहा हूँ और यहीं मैं पहले से आपको चुनौती दे रहा हूँ कि आप मेरे गणित को गलत साबित करें. मैं पूंजीवादी व्यवस्था के ध्वंस  की अनिवार्यता प्रमाणित करूंगा और  मैं इसे गणितीय ढंग से प्रमाणित करूंगा.  मैं शुरू कर रहा हूँ. थोडा धैर्य रखें, अगर शुरू में यह अप्रासंगिक लगे.

‘पहले हम किसी एक औद्योगिक प्रक्रिया की खोजबीन करें और जब भी आप मेरी किसी बात से असहमत हों, फ़ौरन हस्तक्षेप कर दें. एक जूते की फैक्टरी को लें. वहां लैदर जूता बनाया जाता है. मान लीजिए सौ डालर का चमडा खरीदा गया. फैक्टरी में उसके जूते बनें. दो सौ डालर के. हुआ क्या ? चमड़े के दाम सौ डालर में सौ डालर और जुड गया. कैसे ? आईए देखें.

पूंजी और श्रम ने जो सौ डालर जोड़े. पूंजी ने फैक्टरी, मशीने जुटाई, सारे खर्चे किए. श्रम ने श्रम जुटाया. दोनों के संयुक्त प्रयास से सौ डालर मूल्य जुडा. आप अब तक सहमत हैं? ‘

सब ने स्वीकार में गर्दन हिलाई.

‘पूंजी और श्रम इस सौ डालर का विभाजन करते हैं. इस विभाजन के आंकडे थोड़े महीन होंगे. तो आईए मोटा-मोटा हिसाब करें. पूंजी और श्रम पचास-पचास डालर बाँट लेते हैं. इस विभाजन में हुए विवाद में नहीं पड़ेंगे. यह भी याद रखें कि यह प्रक्रिया सभी उद्योगों में होती है. ठीक है न ? ‘

फिर सब ने स्वीकृति में गर्दन हिलाई.

‘अब मान लीजिए मजदूर जूते खरीदना चाहें तो पचास डालर के जूते खरीद सकते हैं. स्पष्ट है.’

‘अब हम किसी एक प्रक्रिया की जगह अमेरिका की सभी प्रक्रियाओं की कुल प्रक्रिया को लें जिसमें चमडा, कच्चा माल, परिवहन सब कुछ हो. मान लें अमेरिका में साल भर में चार अरब के धन का उत्पादन होता है. तो उस दौरान मजदूर ने दो अरब की मजदूरी पाई. चार अरब का उत्पादन जिसमें से मजदूरों को मिला — दो अरब — इसमें तो कोई बहस नहीं होनी चाहिए वैसे पूंजीपतियों की ढेरों चालों की वजह से मजदूरों को आधा भी कभी नहीं मिल पाता. पर चलिए मान लेते हैं कि आधा यानि दो अरब मिला मजदूरों को. तर्क तो यही कहेगा कि मजदूर दो अरब का उपयोग कर सकते हैं. लेकिन दो अरब का हिसाब बाकी है जो मजदूर नहीं पा सकता और इसलिए नहीं खर्च कर सकता.’

‘मजदूर. अपने दो अरब भी नहीं खर्च करता — क्योंकि तब वह बचत खाते में जमा क्या करेगा ? कोबाल्ट बोला.’

‘मजदूर का बचत खाता एक प्रकार का रिजर्व फंड होता है जो जितनी जल्दी बनता है उतनी जल्दी ख़त्म हो जाता है. यह बचत वृद्धा अवस्था, बीमारी, दुर्घटना और अंत्येष्टि के लिए की जाती है. बचत रोटी के उस टुकड़े की तरह होती है जिसे अगले दिन खाने के लिए बचा कर रखा जाता है. मजदूर वह सारा ही खर्च कर देता है जो मजदूरी में पाता है.’

‘दो अरब पूंजीपति के पास चले जाते हैं. खर्चों के बाद सारे का क्या वह, उपभोग कर लेता है ? क्या अपने सारे दो अरब का उपभोग करता है. अर्नेस्ट ने रूककर कई लोगों से दो टूक पूछा. सब ने सिर हिला दिया.

‘मैं नहीं जानता.’ एक ने साफ़-साफ़ कह दिया.

‘आप निश्चित ही जानते हैं. क्षण भर के लिए जरा सोचिए. अगर पूंजीपति सब का उपभोग कर ले तो पूंजी बढेगी कैसे ? अगर आप देश के इतिहास पर नज़र डालें तो आप देखेंगे कि पूंजी लगातार बढ़ती गयी है. इसलिए पूंजीपति सारे का उपभोग नहीं करता. आप को याद है जब इंग्लैंड के पास हमारी रेल के अधिकांश बांड थे. फिर हम उन्हें खरीदते गए. इसका क्या मतलब हुआ ? उन्हें उस पूंजी से ख़रीदा गया जिसका उपभोग नहीं हुआ था. इस बात का क्या मतलब है कि यूनाइटेड स्टेट्स के पास मैक्सिको, इटली और रूस के करोडों बांड हैं ? मतलब है कि वे लाखों करोडों वह पूंजी है जिसका पूंजीपतियों ने उपभोग नहीं किया. इसके अलावा पूंजीवाद के प्रारंभ से ही पूंजीपति ने कभी अपना सारा हिस्सा खर्च नहीं किया है.’

अब हम मुख्य मुद्दे पर आयें. अमेरिका में एक साल चार अरब के धन का उत्पादन होता है. मजदूर उसमें से दो अरब पाता है और खर्च कर देता है. पूंजीपति शेष दो अरब खर्च नहीं करता. भारी हिस्सा बचा रह जाता है. इस बचे अंश का क्या होता है ? इससे क्या हो सकता है ? मजदूर इसमें से कुछ खर्च नहीं कर सकता. क्योंकि उसने तो अपनी सारी मजदूरी खर्च कर दी है. पूंजीपति जितना खर्च कर सकता है, करता है; फिर भी बचा रह जाता है. तो इसका क्या हो ? क्या होता है?

‘एकदम ठीक! इसी शेष के लिए हमें विदेशी बाज़ार की ज़रुरत होती है. उसे विदेशों में बेचा जाता है. वही किया जा सकता है. उसे खर्चने का ओर उपाय नहीं है. और यही उपर्युक्त अतिरिक्त धन जो विदेशों में बेचा जाता है हमारी लिए सकारात्मक व्यापार संतुलन कहलाता है. क्या हम यहाँ तक सहमत हैं ?’

‘इस व्यवसाय के क, ख, ग से ही मैं आपको चकित करूंगा. यहीं. अमेरिका एक पूंजीवादी देश है जिसमें अपने संसाधनों का विकास किया है. अपनी पूंजीवादी औद्योगिक व्यवस्था से उसके पास काफी धन बच जाता है जिसका वह उपभोग नहीं कर पाता. उसे विदेशों में खर्च करना ज़रूरी है. यही बात दूसरे पूंजीवादी देशों के बारे में भी सच है. अगर उनके संसाधन विकसित हैं तो यह न भूलें कि आपस में खूब  व्यापार करते हैं फिर भी अतिरिक्त काफी बच जाता है. इन देशों में मजदूर सारी मजदूरी खर्च कर देता है और इस बचे हुए अतिरिक्त को खरीदने में असमर्थ है. इन देशों में पूंजीपति जितना भी उपयोग कर सकते हैं करते हैं फिर भी बहुत कुछ बच जाता है. इस अतिरिक्त धन को वे एक दूसरे को नहीं दे सकते. फिर उसका वे क्या करें?’

‘उन्हें अविकसित संसाधनों वाले देशों में बेच दें.’ कोबाल्ट बोला.

‘एकदम यह ठीक है. मेरा तर्क इतना स्पष्ट और सीधा है कि आप स्वयं मेरा काम आसान कर रहे हैं. अब अगला कदम ! मान लिया यूनाइटेड स्टेट्स अपने अतिरिक्त धन को एक अविकसित देश जैसे ब्राजील में लगाता है. याद रखें यह अतिरिक्त उस व्यापार से अलग है जिसका इस्तेमाल हो चूका है. तो उसके बदले में ब्राजील से क्या मिलता है?’

‘सोना’ कोबाल्ट बोला.

‘लेकिन दुनिया में सोना तो  सीमित है !’ अर्नेस्ट ने एतराज किया.

‘आप पहुँच गए. ब्राजील से अमेरिका अपने अतिरिक्त धन के बदले में लेता है सिक्युरिटी और बांड. इसका मतलब है अमेरिका ब्राजील रेल, फैक्ट्रियों, खदानों का मालिक बन सकता है. और तब इसका क्या मतलब हुआ ?’

कोबाल्ट सोचने लगा पर नहीं सोच पाया तथा नकारात्मक में सिर हिला दिया.

‘मैं बताता हूँ. इसका मतलब हुआ ब्राजील के संसाधन विकसित किए जा रहे हैं. जब ब्राजील पूंजीवादी व्यवस्था में अपने संसाधन विकसित कर लेगा तो उसके पास भी अतिरिक्त धन बचने लगेगा. क्या वह इसे अमेरिका में लगा सकता है ? नहीं क्योंकि उसके पास तो अपना ही अतिरिक्त धन है. तो क्या अमेरिका अपना अतिरिक्त धन पहले की ही तरह ब्राजील में लगा सकता है ? नहीं ; क्योंकि अब तो स्वयं ब्राजील के पास अतिरिक्त धन है.

‘ तब क्या होता है ? इन दोनों को तीसरा अविकसित देश ढूँढना पड़ेगा जहाँ से वे अपना सरप्लस उलीच सकें. इस क्रम से उनके पास भी अतिरिक्त धन बचने लगेगा. महानुभाव गौर करें धरती इतनी बड़ी तो है नहीं. देशों की संख्या सीमित है. तब क्या होगा जब छोटे से छोटे देश में भी कुछ अतिरिक्त बचने लगेगा?’

उसने रूककर श्रोताओं पर एक नज़र डाली. उनके चेहरों पर हवाईयां उड़ रही थीं. थोडा उसे मज़ा आया. जितने बिम्ब खींचे थे अर्नेस्ट ने उनमें से कई उन्हें डरा रहे थे.

मिस्टर काल्विन  हमने ए बी सी  से शुरू किया था. मैंने अब सारे अक्षर सामने रख दिए हैं. यही तो इसका सौन्दर्य है. क्या होगा जब देश के पास अतिरिक्त बचा रह जायेगा ओर आपकी पूंजीवादी व्यवस्था का क्या होगा ?’

अर्नेस्ट ने फिर शुरू किया :

‘ मैं अपनी बात संक्षेप में दोहरा दूं. हमने एक विशेष औद्योगिक प्रक्रिया से बात शुरू की थी. एक जूता फैक्ट्री से हमने पाया कि जो हाल वहां है वही सारे औद्योगिक जगत में हैं. हमने पाया कि मजदूर को उत्पादन का एक हिस्सा मिलता है जिसे वह पूरी तरह खर्च कर देता है और पूंजीपति पूरा खर्च नहीं कर पाता. बचे हुए अतिरिक्त धन के लिए विदेशी बाज़ार अनिवार्य है. इस निवेश से वह देश भी अतिरिक्त पैदा करने में सक्षम हो जायेगा. जब एक दिन सभी इस स्थिति में पहुँच जायेंगे तो अंतत: इस अतिरिक्त का क्या होगा?

किसी ने जवाब नहीं दिया.

‘काल्विन महोदय !’

‘मुझे समझ नहीं आ रहा.’ उसने स्वीकारा.

‘मैंने तो यह सपने में भी नहीं सोचा था पर यह तो एकदम स्पष्ट लग रहा है.’ ऐसमुनसेन ने कहा.

मैं कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की इतनी सरल प्रस्तुति सुन रही थी और मैं स्तब्ध और चकित बैठी थी…

इतिहास बोध प्रकाशन
बी-239, चन्द्रशेखर आजाद नगर
इलाहाबाद – 211004
दूरभाष : 0532/2546769 से प्रकाशित ‘आयरन हील’ – जैक लंडन
से साभार

श्रम और पूंजी की टक्कर – एक ऐसा ‘वैषम्य’ जिसका निपटारा बल प्रयोग द्वारा ही होता है

Posted on Updated on

श्री दिनेशराय द्विवेदी जी द्वारा लिखित आलेख ‘उद्यम भी श्रम ही है‘ और श्री ज्ञानदत्त जी पाण्डेय द्वारा लिखित आलेख  ‘उद्यम और श्रम’ की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में यह ज़रूरी हो गया कि पाठको को पूंजी और श्रम के उस बुनियादी ‘वैषम्य’ जो इन दोनों के बीच है – इस ‘वैषम्य’ का निपटारा किसी तीसरे हम जैसे पाठक या जज की दखलान्दाजी से सर्वदा मुक्त है, इस बिंदु को समझना होगा और अपने मनोगत विचारों से मुक्ति पानी होगी.

श्रम-शक्ति अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती  है  लेकिन अन्य जिंसो से इसलिए अलग है कि इसे मनुष्य के शरीर से अलग नहीं किया जा सकता और दूसरी जिंसों के विपरीत यह अकेली ऐसी जिन्स है जो  बेशी मूल्य या अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष (surplus value) पैदा करती है.

लेकिन दूसरी जिंसों की तरह ही इसका भी बाज़ार में विनिमय होता है. दूसरी जिंसों की तरह इसका मूल्य भी इसके पुनरुत्थान पर खर्च – श्रम शक्ति के बराबर होता है. लेकिन एक बार पूंजीपति द्वारा इसे खरीदने पर उसे यह अधिकार मिल जाता है कि वह इसका ‘काम के दिन’ में मूल्य पैदा करने के लिए उपयोग कर सके .

‘काम के दिन’ के दौरान मजदूर द्वारा किया गया वह श्रम जो उसके जिन्दा  रहने और उसकी श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन के लिए ज़रूरी होता है, ज़रूरी श्रम कहलाता है जबकि इसके अतिरिक्त समय के लिए किया गया श्रम – यही, केवल यही वह श्रम होता है जो अतिरिक्त मूल्य, या बेशी मूल्य, या अधिशेष (surplus value) जिसे लूटने वाला पूंजीपति वर्ग अपनी बहियों में “शुभ लाभ” के नाम से दर्ज करता है, अतिरिक्त श्रम कहलाता है.

लेकिन प्रश्न उठता है कि ‘काम के दिन’ की लम्बाई की क्या परिभाषा या ‘परिमाण’ हो ? पूंजीपति इसे ज्यादा से ज्यादा लम्बा करना चाहेगा जबकि श्रमिक इसे छोटा !

मार्क्स की ‘पूंजी’ के प्रथम खंड के ‘काम के दिन’ नामक अध्याय से यह उद्धरण जिसमें एक मजदूर पूंजीपति को संबोधित  है, काबिले-गौर है ;

मैंने जो पण्य (जिंस)   तुम्हारे हाथ बेचा है, वह दूसरे पण्यों की भीड़ से इस बात में भिन्न है कि उसका उपयोग मूल्य का सृजन करता है, और वह मूल्य उसके अपने मूल्य से अधिक होता है. इसलिए तो तुमने उसे खरीदा है. तुम्हारी दृष्टि में जो पूँजी का स्वयंस्फूर्त विस्तार है, वह मेरी दृष्टि में श्रम शक्ति का अतिरिक्त उपभोग है. मंडी में तुम और मैं केवल एक ही नियम मानते है, और वह है पण्यों का विनिमय का नियम. और पण्यों के उपभोग पर बेचने वाले का, जो पण्य को हस्तांतरित कर चुका है, अधिकार नहीं होता; पण्य के उपभोग पर उसे खरीदने वाले का अधिकार होता है, जिसने पण्य को हासिल कर लिया है. इसलिए मेरी दैनिक श्रमशक्ति के उपभोग पर तुम्हारा अधिकार है. लेकिन उसका जो दाम तुम हर रोज देते हो, वह इसके लिए काफी होना चाहिए कि मैं अपनी श्रमशक्ति का रोजाना पुनरुत्पादन कर सकूँ और उसे फिर से बेच सकूँ. बढती हुई आयु, इत्यादी के कारण शक्ति का जो स्वाभाविक ह्रास होता है, उसको छोड़कर मेरे लिए यह संभव होना चाहिए कि मैं हर नयी सुबह को पहले जैसे सामान्य बल, स्वास्थ्य तथा ताज़गी के साथ काम कर सकूँ. तुम मुझे हर घडी “मितव्ययिता” और “परिवर्जन” का उपदेश सुनाते रहते हो. अच्छी बात है ! अब मैं भी विवेक और “मितव्ययिता” से काम लूँगा और अपनी एकमात्र संपत्ति – यानि अपनी श्रम-शक्ति – के किसी भी प्रकार के मूर्खतापूर्ण अपव्यय का परिवर्जन करूंगा. मैं हर रोज अब केवल उतनी ही श्रमशक्ति का उपयोग करूंगा, केवल उतनी ही श्रमशक्ति से काम करूंगा, केवल उतनी ही श्रमशक्ति को क्रियाशील बनाउंगा, जितनी उसकी सामान्य अवधि तथा स्वस्थ विकास के अनुरूप होगी. काम के दिन का मनमाना विस्तार करके, मुमकिन है,  तुम एक ही दिन में इतनी श्रमशक्ति इस्तेमाल कर डालो, जिसे मैं तीन दिन में भी पुन: प्राप्त न कर सकूँ. श्रम के रूप में तुम्हारा जितना लाभ होगा, श्रम के सारतत्त्व के रूप में उतना ही मेरा नुकसान हो जायेगा. मेरी श्रमशक्ति का उपयोग करना एक बात है, और उसे लूटकर चौपट कर देना बिलकुल दूसरी बात है. यदि एक औसत मजदूर (उचित मात्रा में काम करते हुए) औसतन तीस वर्ष तक जिंदा रह सकता है, तो मेरी श्रमशक्ति का वह मूल्य, जो तुम मुझे रोज देते हो, उसके कुल मूल्य का 1/365*30 या 1/10,950 वां भाग होता है. किन्तु यदि तुम मेरी श्रमशक्ति को तीस के बजाए दस वर्षों में ही खर्च  कर डालते हो तो तुम रोजाना मुझको मेरी श्रमशक्ति के कुल मूल्य के 1/3,650 के बजाए उसका 1/10,950 , यानि उसके दैनिक मूल्य का केवल 1/3 ही देते हो. इस तरह तुम मेरे पण्य के मूल्य का 2/3 भाग प्रतिदिन लूट लेते हो. तुम मुझे दाम दोगे एक दिन की श्रमशक्ति के, लेकिन इस्तेमाल करोगे तीन दिन की श्रमशक्ति. यह हम लोगों के करार और विनिमय के नियम के खिलाफ है. इसलिए मैं मांग करता हूँ कि काम का दिन सामान्य लम्बाई का हो, (मजूदूर के लिए सामान्य लम्बाई का अर्थ उतना ही है जितना उसकी श्रम शक्ति के पुनरुत्थान के लिए ज़रूरी है -अधिशेष के लिए एक पल भी अतिरिक्त नहीं ) और इस मांग को मनमाने के लिए मैं तुम्हारे हृदय को द्रवित नहीं करना चाहता, क्योंकि रूपए-पैसे के मामले में भावनाओं का कोई स्थान नहीं होता. मुमकिन है कि तुम एक आदर्श नागरिक हो, संभव है कि तुम पशु-निर्दयता- निवारण समिति के सदस्य भी हो और ऊपर से तुम्हारा साधुपन सारी दुनिया में विख्यात हो. लेकिन मेरे सामने खड़े हुए तुम जिस चीज का प्रतिनिधित्व करते है, उसकी छाती में हृदय का प्रभाव है.  वहां जो कुछ धड़कता सा लगता है, वह मेरे ही दिल की आवाज है. मैं सामान्य दीर्घता के काम के दिन की इसलिए मांग करता हूँ कि दूसरे हर विक्रेता की तरह मैं भी अपने पण्य का पूरा-पूरा मूल्य चाहता हूँ.

इस तरह हम देखते हैं कि कुछ बहुत ही लोचदार सीमाओं के अलावा पण्यों के विनिमय का स्वरूप खुद काम के दिन पर, या बेशी श्रम पर, कोई प्रतिबन्ध नहीं लगता. पूंजीपति जब काम के दिन को ज्यादा से ज्यादा खींचना चाहता है, और मुमकिन है, तो एक दिन के दो दिन बनाने की कोशिश करता है, तब वह खरीददार के रूप में अपने अधिकार का उपयोग करता है. दूसरी तरफ, उसके हाथ बेचा जाने वाला पण्य इस अजीब तरह का है कि उसका खरीददार एक सीमा से अधिक उपयोग नहीं कर सकता, और जब मजदूर काम के दिन को घटाकर एक निश्चित एवं सामान्य अवधि का दिन कर देना चाहता है, तब वह भी बेचने वाले के रूप में अपने अधिकार का ही प्रयोग करता है. इसलिए यहाँ असल में अधिकारों का विरोध सामने आता है, एक अधिकार दूसरे अधिकार से टकराता है, और दोनों अधिकार ऐसे हैं, जिन पर विनिमय की मुहर लगी हुई है. जब सामान अधिकारों की टक्कर होती है, तब बल प्रयोग द्वारा ही निर्णय होता है. यही कारण है कि पूंजीवादी उत्पादन के इतिहास में काम का दिन कितना लम्बा हो, इस प्रश्न का निर्णय एक संघर्ष के द्वारा होता है, जो संघर्ष सामूहिक पूँजी अर्थात पूंजीपतियों के वर्ग और सामूहिक श्रम अर्थात मजदूर वर्ग के बीच चलता है.

मजदूरों के आर्थिक हितों की रक्षा के नाम पर तिरंगा, भगवा और लाल – सभी अपनी-अपनी राजनितिक रोटियां सेकते रहें हैं. इसे ही ‘अर्थवाद’ कहा जाता है जो मार्क्सवाद का ‘संशोधनवाद‘ है. सर्वहारा वर्ग की असली लडाई राजनीतिक होने के कारण ‘राजनीतिक सत्ता का प्रश्न‘ ही उसके लिए मुख्य प्रश्न है जिसे, एक ट्रेड यूनियन के नेताओं द्वारा दूसरी ट्रेड यूनियन के नेताओं पर लाँछ्नात्मक आरोप-प्रति आरोप लगाते हुए,  अर्थवाद के ठंडे मानी में डुबो दिया जाता है.

उपरोक्त चर्चा के सन्दर्भ में कुछ लोग सर्वहारा वर्ग के पक्ष में खड़े होंगे तो कुछ पूंजीपति वर्ग के. दोनों स्वागतयोग्य हैं क्योंकि दोनों ढोंगी नहीं हैं लेकिन कोई ऐसा भी है जो निरपेक्ष होने का ढोंग करता है. इस प्रकार के ‘ गैर- राजनितिक बुद्धिजीवी’ के लिए हमने एक टिपण्णी के प्रत्युत्तर में लिखा था;

कुछ लोग अपनी जीविका के लिए, अपनी श्रम शक्ति बेचते हैं, चाहे वह शारीरिक श्रम हो या मानसिक. दूसरे लोग, पूँजी के मालिक होने की हैसियत से श्रम शक्ति खरीदते हैं और इसी प्रक्रिया द्बारा अपनी पूँजी में वृद्धि करते हैं. इसी आधार पर, मोटे तौर पर समाज में दो तरह के लोग हैं, एक पूँजी के मालिक और, दूसरे श्रम शक्ति बेचकर जिन्दा रहने वाले मजदूर वर्ग के लोग. अपनी वर्गीय स्थिति की बदौलत मजदूर वर्ग, अपनी श्रम शक्ति बेचने की मजबूरी के कारण पूंजीपतियों की बेरहम लूट का शिकार होते हैं.

समाज के अन्य तबके व वर्ग, समाज के इन दो मुख्य वर्गों के बीच इन वर्गों के सहयोगी या विरोधी की भूमिका अदा करते हैं. मानवीय इतिहास की एक विशेष मंजिल पर मानवीय श्रम का शारीरिक और मानसिक श्रम में विभाजन हो गया. शारीरिक श्रम या मानसिक श्रम विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों की पैदावार है न कि किसी व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह की जन्मजात विशेषता. समाज के विकास की विकसित मंजिल में यह विभाजन भी आलोप हो जाएगा.

एक गैर राजनितिक बुद्धीजीवी, इस सच्चाई से अनजान ख़ुद ही अपने आप को महान और किस्मत का धनी होने के भ्रम में, अपने ही सीमित खोल में बनाये काल्पनिक संसार में संतुष्ट है. जब कभी, वह अपने इस काल्पनिक संसार के भ्रम से मुक्त होकर, खोल के बाहर झांकेगा, तो आवश्य ही इस संसार की क्रूर हकीकतें उसे निष्पक्ष नहीं रहने देंगीं. अगर वह ईमानदार है तो वह सच्चाई, न्याय और गौरव के पक्ष में खड़ा होगा. परन्तु सच्चाई को समझकर भी, यदि वह निष्पक्ष और गैर राजनितिक होने का नाटक करता है तो वह दम्भी है, सच का सामना करने से घबराता है. भविष्य का आजाद मनुष्य, मानवीय इतिहास के इस बेरहम और मुश्किल दौर में, उस द्बारा दिखाई गई कायरता पर अवश्य सवाल उठाएगा.

related posts

जब औजार क्रांति की माँग करते हैं

कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

Posted on Updated on

कड़ी जोड़ने के लिए देखे :

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

“हमने लिखा
“आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं…..साथ ही हमने जोड़ा था कि “वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.”
किसी प्रकार की गलतफहमी न हो हम साफ़ कर देना चाहते हैं कि;

आज के किसान का चरित्र वह नहीं है जो तब था और वह मजदूर के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति का वाहक था जो नहीं हुई. इसके विपरीत राष्ट्रीय जनतंत्र के कार्यभार ने बुर्जुआ राज्य और बुर्जुआ सरकारों के नेतृत्व में प्रशियाई जुन्कर तरीके से धीमे परन्तु पीडादायक तरीके से संपन्न होना था और वह हुआ भी. इस दौरान किसान उस मेहनतकश के क्रांतिकारी चरित्र को खो बैठा जो कि मजदूर वर्ग की सहायक रिजर्व सेना का होता है. पूँजी का सताया यह  वर्ग यदि क्रांतिकारी दीखता है तो केवल इसलिए क्योंकि मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से अपना दृष्टिकोण त्यागकर यह अपना भविष्य सुरक्षित कर लेना चाहता है. हम इसका स्वागत करते हैं परंतु मजदूरों के हितों को ताक में रखकर इनके बोनुस, लाभकारी मूल्यों की हिफाजत की वकालत हम नहीं करते. हाँ, बुर्जुआ राज्य द्वारा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पूँजी की चाकरी बजाते हुए पुलिस और फौज द्वारा इनके हासिल जनतांत्रिक अधिकारों के हनन की हम भर्त्सना करते हैं बेशक किसी लाल झंडे के नेतृत्व में कामरेडों ने वह कर दिखाया हो जिसे करने में बुर्जुआ दल भी शरमातें हैं.

आज के किसान का चरित्र – हमारी पहुँच – कुछ और स्पष्टता : देखें

हमने बार-बार लिखा है कि सीपीआई, सीपीआई (एम) सीपीआई (एम एल ) संशोधनवादी पार्टियाँ हैं और इनका चरित्र बुर्जुआ पार्टियों से कहीं ज्यादा, कहीं अधिक कुटील है लेकिन इनकी कतारों की बहुसंख्यक  गिनती  और इनके समर्थक बुद्धिजीवियों की बहुसंख्या, अब भी ईमानदार है हालाँकि ,किसी भी वस्तु, घटनावृत  अथवा व्यापार की गतिकी की दशा-दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि वस्तु, घटनावृत  अथवा व्यापार के बुनियादी  मुख्य विरोधी ध्रुवों में प्रधानता किसकी है. इस घटनावृत को ठीक इसी प्रकार समझा जा सकता है जैसे किसी समाज में मेहनतकश अवाम तो बहुसंख्यक हो लेकिन उस समाज की विरोधों की एकता से पैदा होने वाली गतिकी उसके पक्ष के विपरीत अल्पसंख्यक परजीवी वर्गों के पक्ष में हल होती हो.

लेकिन निम्नलिखित रिपोर्ट में वर्णित तथ्य भी गौर करने लायक हैं ;

1990  के दशक में, सी.पी.एम. की चंडीगढ़ में संपन्न हुई पंद्रहवीं कांग्रेस में एक चौकाने वाला तथ्य प्रकाश में आया. पार्टी के आधे से ज्यादा सदस्य गैर-मेहनतकश वर्ग और गैर-किसान वर्ग से आये थे या यूं कहें कि  – मिडल क्लास से. इससे सी.पी.एम. की मेहनतकश वर्गों को जन-आंदोलनों में  न खींच सकने की क्षमता और उसके रेडिकल शिक्षित युवा की और आकर्षण का  पता चलता है. उस समय से जारी इस नुक्स और बेपरवाही के चलते हालत यह हो गयी है कि विद्यार्थियों, युवायों और महिलायों के मोर्चे ही लगभग सभी  पोलित ब्यूरो और संसद  के टॉप नेताओं  की आपूर्ति करते हैं.  नव युवाओं में शायद ही कोई सदस्य हो जो ट्रेड यूनियन, किसान और जन-आन्दोलन से उठकर आया हो. हरकिशन सिंह सुरजीत और ज्योति बसु किसान और श्रमिक वर्ग आंदोलनों से उभरे थे जबकि प्रकाश करात और बुद्धदेव भट्टाचार्य विश्वविद्यालयों  के कुलीन वर्ग से आये हैं. पार्टी में इस मालदार शिक्षित वर्ग की प्रधानता ने पार्टी को ,जिसे कहा जा सकता है कि, “तर्कसंगत सिद्धांतों की राजनीति” में बदल दिया…देखें : A Logical Defeat

कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी कम्युनिस्टों के इस प्रकार अलग-अलग खेमों में बँटे होने से चिंतित हो जाते हैं. हालाँकि कुछ विशेष परस्थितियों में ‘टैक्टिस’ के लिहाज़ से यहाँ तक कि जनतांत्रिक बुर्जुआ दलों तक के साथ सांझे मोर्चे के लिए समझौता करने से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन समझौता आखिर समझौता ही होता है जो कभी भी किसी पक्ष को, एक पल के लिए भी, पीडामुक्त  नहीं करता और उसे दशकों तक निभाना (यहाँ इशारा भारतीय वाम मोर्चा से है) हद दर्जे की निम्न अवसरवादिता नहीं तो और क्या है?

जहाँ तक सैद्धांतिक एकता का प्रश्न है तो मजदूरों के लिए लेनिन के कहे गए इन शब्दों का आज भी उतना ही महत्त्व है,

“मज़दूरों को एकता की ज़रूरत अवश्य है और इस बात को समझना महत्त्वपूर्ण है कि उन्हें छोड़कर और कोई भी उन्हें यह एकता ‘प्रदान’ नहीं कर सकता, कोई भी एकता प्राप्त करने में उनकी सहायता नहीं कर सकता। एकता स्थापित करने का ‘वचन’ नहीं दिया जा सकता – यह झूठा दम्भ होगा, आत्मप्रवंचना होगी (एकता बुद्धिजीवी ग्रुपों के बीच ‘समझौतों’ द्वारा ‘पैदा’ नहीं की जा सकती। ऐसा सोचना गहन रूप से दुखद, भोलापन भरा और अज्ञानता भरा भ्रम है।” “एकता को लड़कर जीतना होगा, और उसे स्वयं मज़दूर ही, वर्गचेतन मज़दूर ही अपने दृढ़, अथक परिश्रम द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। इससे ज्यादा आसान दूसरी चीज़ नहीं हो सकती है कि ‘एकता’ शब्द को गज-गज भर लम्बे अक्षरों में लिखा जाये, उसका वचन दिया जाये और अपने को ‘एकता’ का पक्षधर घोषित किया जाये।”

शब्द कम्युनिस्ट से अभिप्राय सत्तासीन दल के शेयर होल्डर रहे संशोधनवादी वामपंथी धडे और दुस्साहसवादियों से लिया जाता हैं. हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि छिटपुट ही सही परंतु कुछ क्रांतिकारी ग्रुप उपरोक्त दो धाराओं से बिलकुल हटके हैं लेकिन इसका मतलब हरगिज़ नहीं कि  कोई नया मार्क्सवाद ईजाद कर लिया गया है बल्कि आज विपर्य के इस दौर में मार्क्सवाद की हिफाजित तथाकथित मार्क्सवादियों से करने की सख्त ज़रुरत है और इन संशोधनवादी मार्क्सवादियों को नंगा करना क्रांतिकारी ग्रुपों का एक कार्यभार है जबकि दुस्साहसवाद इतना कुटील नहीं, उसे हराया जा सकता है. जहाँ तक सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी के होने न होने का सवाल है, इसके लिए देखें : कहाँ से फूटेंगी उम्मीद की किरणें

हमारे कर्मों का मार्गदर्शक होते हुए मार्क्सवाद निरंतर विकासमान सिद्धांत है जिसे समय-समय पर कर्म-सिद्धांत-कर्म के सूत्र द्वारा एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन माओ आदि मार्क्सवादियों ने विकसित किया है. वैज्ञानिक समाजवाद के प्रथम प्रयोग हार जाने के बाद, नई समाजवादी क्रान्तियों (समाजवादी क्रांतियाँ – क्योंकि 21वीं शताब्दी 20वीं शताब्दी से इसलिए भिन्न है कि दुनिया के लगभग प्रत्येक हिस्से में पूंजीवाद विकसित हो चूका है)  का अगला चक्र शुरू ही होने वाला है.

मार्क्सवाद को असफल नहीं माना जा सकता अलबता मजदूर वर्ग का इस संक्रमण दौर में बुर्जुआओं से हार जाने का अर्थ केवल यही है कि समाजवादी क्रांतियों का प्रथम चक्र पूरा हो गया है और सर्वहारा वर्ग अगले चक्र की तैयारी की  इस प्रचंड झंझावाती समय की पूर्वबेला से पहले सोया हुआ दीखता है लेकिन यह मान लेना कि मजदूरवर्ग नए समाजवादी क्रांतियों के तजुर्बे नहीं करेगा क्योंकि समाजवाद तो फेल हो चुका है , क्रांतिकारियों के लिए भाग्यवादी और पलायनवादी – हाथ पर हाथ रखकर बैठना होगा जबकि इसके विपरीत मजदूर वर्ग बड़ी शिद्दत के साथ समाजवादी क्रांतियों की इस प्रक्रिया को अंजाम देगा – बेशक हजारों-हज़ार क्रांतियाँ फेल हो जाएँ क्योंकि बुर्जुआ वर्ग अपने-आप तो उसे यह मौका देगा नहीं कि आओ मैं तुम्हें सिखाता हूँ कि राज्य का संचालन कैसे किया जाता है ! ऐसे में सर्वहारा के पास हारी हुई क्रांतियों के निष्कर्ष और निष्पत्तियों का समाहार करते हुए और मार्क्सवाद की कसौटी पर इसे आत्मसात करते हुए नए समाजवादी तजुर्बे करने और सीखने के सिवा और कोई चारा नहीं है. इसी प्रक्रिया द्वारा ही मार्क्सवाद एक कट्ठ्मुल्लापन (dogma) होने के विपरीत अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास द्वारा अपने विकास की उच्चतर मंजिल को छूएगा और यह क्रांतियों के पिछले रोल मॉडल रहे फ्रेमवर्कों को तहस नहस कर डालेगा.

सुरेश चिपलूनकर [ Suresh Chiplunkar ] के इन शब्दों “बहरहाल, अकेले प्याज़ के मुद्दे पर जब भाजपा सरकार गिर सकती है तो सभी वस्तुओं के गत 5 साल में तीन गुना महंगे होने पर भी सरकार का न गिरना “आश्चर्यजनक” क्यों नहीं है, यह मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं” का हम स्वागत करते हैं. हमने लिखा था

“वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा.”

पूंजीवादी में महंगाई कोई नया घटनावृत नहीं है. दशकों बीत गए जब मुंबईया फिल्मों में ‘बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी’, लोगों ने सुना और महंगाई की इस परिघटना को पूंजीवाद के एक ज़रूरी लक्षण के रूप में स्वीकार किया. दरअसल, पेट्टी-बुर्जुआ बुर्जुआओँ  का सताया होने के कारण महंगाई -महंगाई चिल्लाने लगता है जबकि वस्तुओं और मजदूरी की दर सरकार द्वारा तय न होकर क्लासिकीय पूंजीवादी व्यवस्था में (इस क्लासिकीय पूंजीवाद के चेहरे को लोक-हितेषी दिखाने हेतू, 1930 की पहली विश्व महामंदी से डरे पूंजीवाद को बचाने के लिए कीन्स समाजवाद से उधार लेकर नुस्खे-टोटके प्रगट हुए थे जिसे बुर्जुआ राज्यों ने नवउदारवादी दौर में फैंक दिया. विडम्बना यह है कि पूंजीवाद कीन्स के नुस्खों-टोटकों की ओर वापस भी नहीं लौट सकता) मार्केट द्वारा मांग और पूर्ति के नियमानुसार निर्धारित होती हैं जिसे पूंजीवाद में निहित कई फैक्टर प्रभावित करते हैं क्योंकि मांग और पूर्ति अपने-आप वस्तुओं और मज़दूरी की दर तय नहीं कर सकती. पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों को भारत जैसे देश में, बेहद सस्ती दरों पर श्रम शक्ति का उपलब्ध होने का कारण, यहाँ की बढ़ी हुई जनसंख्या  में दीखता है जबकि इसका राज प्रधानमंत्री के उस वक्तव्य में निहित है कि यहाँ की 70 प्रतिशत आबादी 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती है. श्रम-शक्ति के पुनरुत्थान के लिए इतना कम खर्च बहुत ही कम देशों में होता है. बहरहाल, कहना इतना ही है कि पूंजीवाद में, श्रम-शक्ति भी अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती है और उसके पुनरुत्थान का खर्च या श्रम-शक्ति का मूल्य उसके पुनरुत्थान पर लगे सामाजिक ज़रूरी श्रम-समय (Socially necessary labor time) के बराबर होता है.

महंगाई से हम न केवल चिंतित हैं बल्कि इसकी सबसे ज्यादा मार सर्वहारा वर्ग पर ही पड़ने के कारण  पीड़ित भी हैं  लेकिन पेट्टी-बुर्जुआ के वर्ग दृष्टिकोण के अनुसार बिलकुल नहीं. चरित्र में भारत जैसी ही पूंजीवादी दृष्टिकोण अनुसार  तेजी से विकास की और अग्रसर विश्व की ब्राजील, अर्जेंटीना, मेक्सिको, चीले, द. अफ्रीका, नाईजिरिया, मिस्त्र, ईरान, तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिप्पीन्स, भारत आदि लगभग दर्ज़न एक अर्थव्यवस्थाओं को, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, दुनिया के सबसे सस्ते मुल्को में शुमार करते हैं क्योंकि पूंजी द्वारा यहाँ  उपलब्ध श्रम-शक्ति का अँध-शोषण, बेहद सस्ती दरों पर किया जाता है. सस्ती श्रम-शक्ति होने के कारण सस्ती जिन्से उपलब्ध करवाना केवल इन्हीं मुल्कों के बस की ही बात है. ये देश दुनिया के विकसित पूंजीवादी देशों के मुकाबले में सस्ती उपभोक्तावादी जिंसों का धडाधड उत्पादन कर रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी पूँजी के इस खेल में देशी पूंजीपति मिलकर सर्वहारा वर्ग का कचूमर निकाले हुए हैं जिसे हम विकास के नाम पर अनदेखा नहीं कर सकते. इस लिहाज से हमारा यह कहना कि भारत मुकाबलतन महंगा देश न होकर एक सस्ता देश है कहाँ गलत है ? क्या इसकी पुष्टि वे नहीं करते जिनके पास डॉलर हैं ? उपरी वर्गों की तो छोडिये मध्यम वर्ग के जीवन स्तर की 1970 की दशा और उसकी वर्तमान उपभोक्तावादी स्थिति की तुलना कीजिए. अब जरा सर्वहारा वर्ग जिसके बारे में प्रधानमंत्री जी बीस रूपए से कम गुजारा करने वाला वर्ग बताते हैं उसके 1970 के जीवन स्तर और आज के जीवन स्तर की तुलना कीजिए. क्या उसने उन चरागाहों को नहीं खो दिया जहाँ वह अपनी भेड़ बकरियां चराकर गुज़र-बसर कर लिया करता था? क्या उसके नीचे से उसकी झोंपडी की ज़मीन नहीं खिसक गयी है?

लेकिन हम सत्तर या उसके पीछे की दलदल में वापस लौटने का भी इरादा नहीं रखते हैं. कुछ महानुभावों की यादों में “अहा ग्राम्य जीवन’ का नोस्टालिजिया हो सकता है वे हमसे उसी नोस्टालिजिया में जीने की स्वतंत्रता की मांग कर सकते हैं जिसका हमें कोई शिकवा नहीं है लेकिन हम भी उनसे, लेनिन की भाषा की मदद लेकर, कहना चाहते हैं कि ऐ महानुभावों ! आप उस दलदल में लौट जाना चाहते हैं, आपको वहाँ लौटने की पूरी स्वतंत्रता और हक़ है लेकिन हम भी स्वतन्त्र हैं कि आप को उस दलदल में छोड़कर आगे बढे, हमें पूरा हक़ है कि, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, इस पूंजीवाद के  दानवी चेहरे से लोक-हितेषी मेक-अप का पर्दाफाश करें क्योंकि पूंजीवाद मेहनतकश अवाम की जीवनचर्या को पहले से कहीं ज्यादा बदतर, पहले से कहीं ज्यादा दुष्कर बनाए जा रहा है. विकास के नाम पर जिसमे पेट्टी-बुर्जुआ अपने दिलो-दिमाग को पूंजीपति टोली के साथ मिलाकर रखता है और विकास-विकास की चिल्ल-पौ मचाता रहता है लेकिन जब पूँजी अपने तर्क द्वारा उसे हजम कर जाती है तो वह चिल्लाने लग जाता है पर  फिर भी वह अपने पेट्टी-बुर्जुआ दृष्टिकोण का त्याग नहीं करता – मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण को नहीं अपनाता, का उपहास उडाने की हमें भी पूरी स्वतंत्रता है. हम सर्वहारा वर्ग से आह्वान करते हैं कि पूंजी के इस दुश्चक्र को तोड़कर ही, वह केवल और केवल समाजवादी क्रांति द्वारा समाज और इतिहास को आगे गति दे सकता है क्योंकि पूंजी अपने ही तर्क द्वारा अप्रासंगिक हो चुकी है , यदि वह प्रासंगिक है तो केवल उसके हरकत में न होने से है.

विज्ञान की प्रत्येक शाखा की अपनी एक अलग शब्दावली होती है. फिजिक्स, कैमिस्ट्री या जीवविज्ञान का अध्ययन करते समय नए विद्यार्थियों को उनके कुछ शब्द सीखने पड़ते हैं. इसी प्रकार राजनीती और समाजशास्त्र के सिद्धांतों के अध्ययन के वक्त सम्बंधित शब्दावली की गैर-मौजूदगी में ये विषय बेहद “बोझिल” और कठिन लगते हैं. सुरेश चिपलूनकर कहते हैं;

“मैं तो एक मूढ़ व्यक्ति हूँ”, न तो मैं बड़ी-बड़ी ना समझ में आने वाली पुस्तकें पढ़ता हूँ, न ही वैसा लिख पाता हूँ… 🙂 । मैंने तो अपनी असफ़लता को भी खुल्लमखुल्ला स्वीकार किया है” और वे मांग करते हैं कि “मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं…।”

विज्ञान की भाषा विज्ञान के युग में वैज्ञानिक न होगी तो कैसी होगी. क्या हम रोजमर्रा की खाने-पीने और अघाने वाली भाषा द्वारा इसका अध्ययन-मनन कर सकते हैं ? यह मेहनत से जी चुराना नहीं तो और क्या है?  यह सब पलायनवाद नहीं तो और क्या है ?

रहा सवाल, मजदूर वर्ग द्वारा इस भारी-भरकम शब्दाबली को सीखने-समझने का तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्स की ‘पूंजी’ छपते ही, जर्मन की मजदूर जमात में लोकप्रिय हो गयी थी. हाँ, प्रोफेसरों को इसे समझने-पढने में जो दिक्कत आती है उसके बारे में हम कुछ कह नहीं सकते. मौजूदा समय  विपर्य का दौर है – मजदूर वर्ग की लहर का  दौर नहीं. बुद्धिजीवी वर्ग के लिए इस तरह के दौर का इतिहास में बड़ा महत्त्व रहा है क्योंकि इस शांति भरे दौर (?) में वह चिन्तन-मनन करने के लिए काफी समय निकाल सकता है. जहाँ तक लहर के दौर का सवाल है तो उस वक्त सर्वहारा वर्ग यह नहीं देखता कि मार्क्स, लेनिन, माओ आदि ने क्या कहा. वह देखता है तो अपने हित ! उस वक्त समस्या होती है तो बुद्धिजीवी वर्ग के लिए. सैद्धांतिक अस्त्र से रहित उसके प्रतिक्रियावादियों के हाथों खेल जाने की पूरी-पूरी संभावना होती है जबकि इसके विपरीत अगर वह सिद्धांत से चाक-चौबंद होता है तो क्रांति और समाज को आगे की ओर गति देने वाली उस वाहक शक्ति को वह, सही दिशा प्रदान कर सकता है और एक नए युग का सूत्रपात करने में अपनी भूमिका निभा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे एक प्रसूति-विशेषज्ञ की भूमिका जनन-पीड़ाओं  को कम करने की होती है.

दूसरा सवाल कि सिद्धांत को  अमल द्वारा कैसे परखा जाये तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्सवाद कोई एकेडमिक चीज तो है नहीं ! इसे परखने की लैब तो यह समाज ही है. इसके लिए बस इतना ही, कि आमलेट खाने के लिए अंडा तो फोड़ना ही होगा.

अंत में एक बार फिर, हम बुद्धिजीवी वर्ग का आह्वान करते हैं कि वह आगे बढे और इस संजीदा बहस को संजीदगी के साथ ही आगे बढाए.

नोट : श्रम-शक्ति अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती तो है लेकिन अन्य जिंसो से इसलिए अलग है कि इसे मनुष्य के शरीर से अलग नहीं किया जा सकता और दूसरी जिंसों के विपरीत यह अकेली ऐसी जिन्स है जो  बेशी मूल्य या अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष (surplus value) पैदा करती है.

सुने : दुनिया के हर सवाल केhttp://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/duniakeharsavaalke.mp3?attredirects=0

possibly related posts

कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है

कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

Posted on Updated on

इस पोस्ट से सम्बंधित प्राप्त टिप्पणियों के पश्चात् यह ज़रूरी हो गया है कि इस विषय पर वाद-विवाद जारी रखा जाये. चूंकि वर्तमान समाज वर्गों में विभाजित है इसलिए समाज में विचारों और दृष्टिकोण की विभिन्नता होना स्वाभाविक और  लाजिम है; कि  विचारों की विभिन्नता और उनके बीच जारी संघर्ष विचारों के विकास की ज़रूरी शर्त है. कला नैतिकता, धर्म, राजनीति, दर्शन आदि ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में मौजूद विचार चेतना के ही रूप हैं. हालाँकि सामाजिक चेतना का कोई भी रूप वस्तुगत यथार्थ से स्वतन्त्र नहीं होता बल्कि मानवी दिमाग अन्दर वस्तुगत यथार्थ का ही प्रतिबिम्बन होता है. सर्वहारा वर्ग के नव पुनर्जागरण और सर्वहारा वर्ग के नवप्रबोधन का यह आधुनिक  दौर समाज, राजनीति और संस्कृति आदि विषयों पर बुद्धिजीवी वर्ग से पहले के मुकाबले में कहीं अधिक संजीदगी की मांग करता है. अफ़सोस तब होता है जब विद्वान् कहलवाने वाले कुछ सज्जन बिना जाँच-परख किए और निम्न दर्जे के फतवे जारी करते हुए अपनी घोर अज्ञानता और असहनशीलता का प्रगटावा करते हुए दिखाई देते हैं.

लोकसभा चुनावों में जीत-हार के विश्लेषण की अपेक्षा पूंजीवादी जनतंत्र के नाम खेले जाने वाले इस खेल में, आम आदमी के साथ होने वाले छल को समझना ज़्यादा ज़रूरी है. आर्थिक असमानता की इस प्रणाली में राजनितिक अधिकारों की असमानता का जो हश्र होता है, वह किसी व्याख्या की मांग नहीं करता. बेहद खर्चीले इन चुनावों में बड़ी-बड़ी पूंजीवादी पार्टियाँ स्टार खिलाडी की हैसियत से सबसे ज्यादा पैसा बहाती हैं. क्षेत्रीय पूंजीपतियों की पार्टियाँ और निम्न बुर्जुआ विचारधारा की छोटी पार्टियाँ भी अपनी क्षमता से अधिक जोर-आजमाईश करती हैं. वामपंथी पार्टियाँ जो देश के कुछ भागों में असरदायक हैं, ने कभी भी मजदूरों और किसानों के संघर्षों को आर्थिक संघर्षों के दायरे से बाहर नहीं आने दिया. राजनीती के क्षेत्र में भी इनकी कार्रवाही सामाजिक-जनवाद यानिकि छोटे-मोटे आर्थिक सुधारों की लडाई तक सिमिट कर रह गयी है. ‘राज्य’ के चरित्र का ठोस विश्लेषण करके, देश में जारी वर्ग संघर्ष में, अलग-अलग वर्गों की पार्टियों का ठोस विश्लेषण करके, समाजवादी क्रांति का कोई प्रोग्राम ड्राफ्ट करना तो इनके एजेंडा पर रह ही नहीं  गया है . पूंजीपति वर्गों द्वारा प्रायोजित किए जाने  वाले  जनतंत्र के इस खेल में, ये भी अपनी किस्मत-आजमाईश के लिए प्रयत्नशील रहते हैं.

वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के इस दौर में आम लोगों की कंगाली और बदहाली में कई गुना बढोत्तरी हो चुकी है.

देश के कई हिस्सों, विशेषतय:  पश्चिमी बंगाल में किसानों में वामपंथ का काफी प्रभाव रहा है. कृषि में पूंजीवादी विकास ने किसानी क्षेत्र में जो आक्रोश पैदा किया है, कभी वामपंथ उस आक्रोश  का प्रतिनिधित्व करता रहा है जबकि अब  इस किसान वर्ग का प्रतिनिधित्व अन्य निम्न-बुर्जुआ हाथों में जाता हुआ साफ दीखाई दे रहा है.

इन चुनावों में 10 हज़ार करोड़ रूपए से अधिक की राशिः के ‘इन्वेस्ट’ (?) होने की रिपोर्टें हैं. पूंजीवादी ढांचे के अर्न्तगत बड़ा उत्पादक निरंतर छोटे उत्पादक को हड़प करता रहता है लेकिन अपनी विशेष आवश्यकताओं के मद्देनज़र बड़े उत्पादक को, किसी हद तक, छोटे उत्पादक की निरंतर आवश्यकता बनी रहती है. इसलिए नष्ट होने के साथ-साथ छोटा उत्पादक नए-नए रूपों में, जन्म भी लेता रहता है. जहाँ तक प्रतिस्पर्द्धा का सम्बन्ध है, छोटा उत्पादक बड़े उत्पादक के मुकाबले टिक नहीं पाता बल्कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बड़े उत्पादक के रहमोकर्म पर आश्रित और श्रापित होता है. राजनीती में यही अमल सीधे-सरल रूप से तो नहीं पर बड़े ही जटिल ढंग से प्रतिबिंबित होता है. लेकिन पूंजीवाद का बुनियादी स्वभाव यहाँ पर भी कायम रहता है. बड़े पूंजीपतियों की पार्टियों के समक्ष छोटे पूंजीपतियों की पार्टियों का जमें रहना, इतना आसान नहीं होता. पूंजीवादी चुनावों में छोटी पूंजीवादी पार्टियों का वही हाल होता है जो पूंजीवादी उत्पादन के क्षेत्र में छोटे उत्पादकों का होता है. इन चुनावों में करोड़पति प्रतिनिधियों की संख्या पहले से कहीं अधिक है और शेष बचे हुए सांसद करोड़पतियों के बफादार सेवादारों की हैसियत से, ससंद में पहुंचे हैं.

जहाँ तक विश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों का सम्बन्ध है, लगभग सभी संसदमार्गी पार्टियों के बीच आम सहमति बन गयी है – यहाँ तक कि वामपंथी पार्टियाँ भी, सैद्धांतिक विरोध के बावजूद, अमल में इन्हें लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. बंगाल की मिसाल तो सामने है ही, केंद्र में भी वामपंथी पार्टियों की हिमायत से चलने वाली पिछली श्री मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा भी यह अमल निर्बाध रूप से जारी रहा. हाँ, अपने-अपने वोट-बैंक के हिसाब-किताब के साथ-साथ, इन सभी पार्टियों के दरमियान, इन नीतियों को लागू करने सम्बन्धी तौर-तरीकों बारे मतभेद रहे हैं.

संसदीय चुनाव, बहुसंख्यक आबादी की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. इस सारे अमल में, आम आदमी की हालत का अंदाजा पाठक स्वयं लगा सकते हैं!  जहाँ तक आम आदमी के स्वयं समझने का सवाल है, वह पहले से कहीं अधिक बेहतर ढंग से समझे हुए है.

जब आम आदमी की बात हो रही हो तो तब हमारे कुछ विद्वान् बुद्धिजीवी सज्जन मेहनतकश वर्ग के बारे में बड़ी ही अजीब किस्म की धारणा पाले बैठे हैं. वे आम लोगों को अनपढ, गंवार या पता नहीं और किन-किन खिताबों से नवाजते हैं. आओ ज़रा हकीकत पर नज़र डालें.

पढाई या ज्ञान का बुनियादी मकसद, जिन्दा रहने या मानव के विकास के लिए, ज़रूरी वस्तुओं के उत्पादन के ढंग-तरीकों की खोज करना था. आरंभिक काल से, इसी मकसद के लिए, श्रम  को अमल में लाने हेतू, सामूहिक सरगर्मी को अपनाते हुए ही भाषा का जन्म हुआ. श्रम के अमल में आने के कारण, मानव पशु जगत से अलग हुआ और चिंतनशील प्राणी के रूप में, इस ब्रह्माण्ड के रंगमंच पर प्रगट हुआ. मानव चिंतन की पहली आवश्यकता या मानवी चिंतन की उत्पति, जिन्दा रहने के लिए उत्पादन की आवश्यकता से ही पैदा हुई.

आज भी मजदूर जो जटिल मशीनरी की बारीकियों को समझ सकता है, खेत मजदूर या किसान (केवल मेहनतकश) अति आधुनिक बीज तैयार कर सकता है, उसे अनपढ, गंवार कहना, अपनी अज्ञानता की नुमाईश करना नहीं तो और क्या है ?

जिस तरह यूरोप में, प्राचीन सामंतशाही को ख़त्म करने के लिए एक दौर गतिमान हुआ जिसके परिणामस्वरूप पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक दौर भी गतिमान हुआ और जिसका नतीजा बुर्जुआ इन्कलाब हुए और आधुनिक बुर्जुआ जनतंत्रों की स्थापना हुई थी इसी प्रकार भारत में [ देखें : 1857, आरंभिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता PDF File ]भी अपने ढंग की बौद्धिक सरगरमियां चलती रही हैं जिनकी तुलना (हर तुलना लंगडी होती है) कुछ भारतीय विद्वानों ने यूरोप के पुनर्जागरण और प्रबोधन से की है. यहाँ नोट करने वाली बात यह है कि बस्तीवादी घटनावृत ने हमारे देश में उस वक्त जारी इस घटनावृत को, बीच राह में ही कत्ल कर दिया या यूं कहें की उसकी भ्रूण हत्या हो गयी जिसकि परिणति, भारत के यूरोप से अलग किस्म के बौद्धिक अमल से गुजरने में हुई. विशेष ऐतिहासिक परस्थितियों के परिणामस्वरूप, हमारे यहाँ के बुद्धिजीवी, बड़े संभल-संभलकर चलने वाले, अपनी सुख-सुविधाओं के छिनने से डरते हुए, एक विशेष किस्म की सुविधाभोगी मानसिकता से ग्रस्त रहे हैं.

हम ईमानदार और जिंदा-ज़मीर के बुद्धिजीवियों से अपील करते हैं कि इतिहास की इस सच्चाई को समझने और पचाने की कोशिश करें. मजदूर वर्ग और मेहनतकश वर्गों को , राजनितिक तौर पर शिक्षित करने के लिए, आपकी सेवाओ की ज़रुरत है. आज हमारे देश में और विश्व स्तर पर भी, सर्वहारा नवपुनर्जागरण और प्रबोधन के अमल में बुद्धिजीविओं को अपना फ़र्ज़ पहचानना होगा.

सुने : भागो मत दुनिया को बदलोhttp://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/bhagomat.duniyakobadlo.mp3?attredirects=0

…शेष अगली किश्त

कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

में समाप्य

possibly related posts

कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है

कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34) की हिफाजित में

Posted on Updated on

“कोट, कपड़ा, आदि उपयोग-मूल्य, अर्थात पण्यों के ढांचे, दो तत्त्वों के योग होते हैं – पदार्थ और श्रम के. उन पर जो उपयोगी श्रम खर्च किया गया है, यदि आप उसे अलग कर दें, तो एक ऐसा भौतिक आधार-तत्त्व हमेशा बचा रहेगा, जो बिना मनुष्य की सहायता के प्रकृति से मिलता है. मनुष्य केवल प्रकृति की तरह काम कर सकता है, अर्थात वह भी केवल पदार्थ का रूप बदलकर ही काम कर सकता है. यही नहीं रूप बदलने के इस काम में उसे प्रकृति की शक्तियों से बराबर मदद मिलती है. इस प्रकार हम देखते हैं कि अकेला श्रम भौतिक संपत्ति का, अथवा श्रम के पैदा किये हुए, उपयोग-मूल्यों का एकमात्र स्रोत नहीं है जैसा कि विलियम पैटी ने कहा है, श्रम उसका बाप है और पृथ्वी उसकी माँ है. (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

“विश्व की सभी परिघटनाएं , चाहे वे मनुष्य के हाथ का फल हों अथवा प्रकृति के सार्विक नियमों का परिणाम, वास्तव में सृजन नहीं बल्कि पदार्थ के रूपों में परिवर्तन है. मानव बुद्धि जब कभी उत्पादन के विचार का विश्लेषण करती है, तो उसे केवल दो ही तत्त्व दिखाई पड़ते हैं – एक जोड़ना, दूसरा तोड़ना; यही बात मूल्य ” (उपयोग-मूल्य, हालाँकि फिजियोक्रेटों के साथ वाद-विवाद के इस अंश में वेर्री के मन में भी यह बात पूरी तरह साफ़ नहीं है कि वह किस प्रकार के मूल्य की चर्चा कर रहा है) “अथवा धन के उत्पादन के संबंध में भी लोगू होती है, जब मनुष्य द्वारा पृथ्वी, वायू, और जल को अनाज में रूपांतरित कर दिया जाता है, या एक कीड़े के चेपदार स्त्राव को रेशम में, या धातु  के अलग-अलग टुकडों को एक घड़ी में बदल दिया जाता है.” _Pietro Verri, Meditazioni sulla Economia Politica (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

श्रम और पण्य-मूल्य दोनों का चरित्र दुहरा है लेकिन हम यहाँ पण्य-मूल्य के दुहरे चरित्र के सामान्य विश्लेषण तक सीमित  रहेंगे. पण्य-मूल्य के दोहरे चरित्र में पहली विशेषता उसके उपयोग मूल्य से है जैसे पानी, धुप, वायू, आदि. ये सभी धन का एक रूप हैं लेकिन ये पण्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि इसमें मानवी श्रम नहीं लगा है और इन्हें हासिल करने के लिए भुगतान के किसी भी रूप की आवश्यकता नहीं पड़ती.

पण्य की दूसरी विशेषता उसमें लगे मानवीय श्रम से सम्बंधित है जिस कारण उसका विनिमय मूल्य होता है.

अरस्तू का हवाला देते हुए मार्क्स लिखते हैं.”अरस्तू कहते हैं कि विनिमय समानता के बिना नहीं हो सकता, और समानता उस वक्त तक नहीं हो सकती, जब तक की दोनों वस्तुएं एक ही मापदंड से न मापी जा सकती हों.” “लेकिन यहाँ आकर वे (अरस्तू) ठहर जाते हैं और मूल्य के रूप का आगे विश्लेषण करना बंद कर देते हैं.

मार्क्स आगे लिखते हैं ,” अरस्तू की प्रतिभा का चमत्कार इसी बात में प्रकट होता है कि उन्होंने पण्यों के मूल्यों के अभिव्यक्ति में समानता का सम्बन्ध देखा. वह जिस समाज (गुलाम और मालिक-गुलाम) में रहते थे, केवल उसकी विशेष परिस्थितियों ने ही उन्हें यह पता नहीं लगाने दिया कि इस समानता की तह में ‘सचमुच” क्या था.(मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. 79)

“महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” सूत जी [इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34)] द्वारा पांडे जी के  इस कथन की स्वीकृति के  साथ हम भी सहमत हैं लेकिन यह भी जोड़ देना चाहते हैं कि यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” गति में होने के कारण हमेशा बना नहीं रह सकता क्योंकि पांडे जी के परदादा जो  कुरता पहना करते थे वह बामुश्किल दस या पंद्रह लोगों की श्रम का फल था और अंत में जिसके पास इसे बेचने का अधिकार (अगर था तो ) वह  दस या पंद्रह पर एक  का ही था. लेकिन आज इन्होने जिस 100 रूपए की शर्ट को पहना हुआ है उस पर लगी हुई श्रम, अगर हम कहें कि, विश्व के सौ करोड़ लोगों की श्रम है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

पूँजीवाद की सबसे बड़ी विसंगतियों में एक श्रम का इतने उच्च धरातल पर समाजीकरण परंतु इसके विपरीत श्रम के उत्पादों पर मुट्ठीभर लोगों का मालिकाना हक़ जिनकी संख्या निरंतर घटती जा रही  है …. यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है जबकि यह विसंगति और अधिक गहराती जा रही है …देखना है कि इसका क्लाईमैक्स कहाँ होता है

उपरोक्त वस्तुगत और साक्षात उदाहरण उन बुद्दिजीवियों के मुहं पर तमाचा है जो मार्क्सवाद को आयातित और अप्रासंगिक बताते हैं. बल्कि यह साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा शोषित  भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए पहले से अधिक, कहीं अधिक प्रासंगिक है.  इस बात को लेनिन ने नोट कर लिया था और मार्क्स के  शब्द “कम्युनिस्म का हौवा यूरोप पर मंडरा रहा है”  को दरुस्त करते हुए, बदले हुए हालात में उन्होंने कहा कि,” विश्व पूँजी के साम्राज्यवाद में प्रवेश करने के कारण क्रांतियों का धुरा अब यूरोप न होकर पूर्व है.”

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी आपके इतना भर लिख देने से कि  “महालक्ष्मी श्रम से उत्पन्न नहीं होतीं, वे श्रम के लिये मानव को प्रेरित करती हैं। महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” काम नहीं चलेगा. बात को तर्क-वितर्क से आगे बढाएं.

और आपका फ़िक्र कि “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.

….मार्क्स के इन शब्दों “To leave an error unrefuted is to encourage intellectual immorality. ...के साथ हम अपने आलेख को विराम देते हैं और पांडे जी से आशा करतें हैं कि वे बहस को आगे बढाएँगे.

Possibly Related Posts:

ज्ञानदत्त जी ऐसा कुतर्क तो गृहमंत्रालय भी नहीं करेगा