वामपंथी

संकट. कैसा संकट ? मुनाफे आसमान छू रहे हैं : जेम्स पेत्रास

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Via: The James Petras Website.

जबकि प्रगतिशील और वामपंथी लेखक ‘पूंजीवाद के संकट’ के बारे में लिख रहे हैं, लेकिन अंटलाटिक और प्रशांत महासागर के दोनों ओर, उत्पादक, पेट्रोलियम कम्पनियां, बैंकर और अधिकतर मुख्य कारपोरेशन खुशियाँ मना रहे हैं.

इस वर्ष के पहले क्वार्टर से कारपोरेट मुनाफे बीस प्रतिशत से सौ प्रतिशत से भी अधिक तक ऊपर उठ गए हैं (Financial Times August 10, 2010, p. 7). वास्तव में कारपोरेट मुनाफे 2008 में शुरू होनेवाली महामंदी से पहले की स्थिति से अधिक हैं (Money Morning March 31, 2010). मेहनतकश वर्ग, सार्वजानिक और निजी सेक्टर के कर्मचारियों और छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमों का गहराता संकट, कार्पोरेट मुनाफों की इस उछाल के पीछे का असली कारण है.

मंदी के शुरू होते ही, बड़ी पूंजी ने करोड़ों नौकरियां ख़त्म कर दी (2010 में चार अमेरिकनों में से एक को नौकरी से निकाल दिया गया). ट्रेड यूनियनों के मुखियों से उनके अधिकारों को छीन लिया गया. कारपोरेशनों ने स्थानीय, राज्य और संघीय सरकारों से टैक्सों में छूट, सब्सिडियां और लगभग ब्याज रहित कर्जों सहित भारी छूटें हासिल की हैं.

जैसे ही मंदी अपने निचले स्तर तक पहुंची, शोषण-सघनता लागू करते हुए ( प्रति श्रमिक अधिक उत्पादन ), व्यवसाय ने शेष बची श्रम पर उत्पादन कार्य को दुगना कर दिया और करोडपति ट्रेड यूनियनों के मुखियों से साठगांठ करते हुए, मेहनतकश वर्ग के स्वास्थ्य बीमा और पेंशन फंड के लिए उनके उतरदायित्व को बढाकर अपने खर्चों में कटौती कर ली. इसका परिणाम यह हुआ कि राजस्व में गिरावट आने से मुनाफे बढ़ गये और बैलेंस-शीटों में सुधार हो गया (Financial Times August 10, 2010). विरोधाभासी तरीके से, सीईओ को ‘संकट’ के बहाने और बयानबाजी के चलते,प्रगतिशील लेखकों की, मजदूरों के लिए, बुर्जुआ मुनाफे से मांग को हतोत्साहित करने का मौका मिल गया और बेरोजगारी की  बावड़ी में निरंतर होनेवाली बढौतरी के चलते ‘औद्योगिक एक्शन’ के तौरपर बेरोजगारों के प्रतिस्थापन का अवसर भी हाथ में आ गया.

मुनाफों की इस मौजूदा बढौतरी ने पूंजीवाद के सभी सेक्टरों को फायदा नहीं पहुंचाया है; हवा से गिरे इस मेवे का बड़ा भाग सबसे बड़े कार्पोरेशनों के हिस्से में आया है. इसके विपरीत, कई मध्यम और छोटे उद्यमों को भारी घाटा हुआ है और कईयों का तो दिवाला निकल गया है. परिणाम स्वरूप वे अपने ‘बड़े साथियों’ के आसान शिकार बन गये हैं (Financial Times August 1, 2010). मध्यम पूंजी के संकट ने पूंजी की सघनता और केन्द्रीयकरण की प्रक्रिया को शुरू कर दिया है और सबसे बड़े कार्पोरेशनों के लिए मुनाफे की दर में बढौतरी के लिए योगदान दिया है.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही, जब हमें बताया जाता था कि पूंजीवाद  ‘निष्प्राण’हो गया है और अपने अंतिम विध्वंस की ओर बढ़ रहा है, वामपंथियों और प्रगतिशीलियों द्वारा पूंजीवादी संकटों के विश्लेषण को समझने की असफलता, स्थायी समस्या के रूप में रही है. अपनी यूरोपीय-अमरीकी अंध नस्लीय श्रेष्टता के कारण वे इस तथ्य को नोट करने में असफल रहे हैं कि एशिया की पूंजी कभी भी अंतिम सकंट तक नहीं पहुंची और लातिनी अमरीका के संक्रमण का ‘वर्ज़न’ तो सौम्य रहा है (Financial Times June 9, 2010, p. 9). झूठे भावीवक्ता इसे तस्लीम करने में असफल रहे हैं कि अलग-अलग तरह के  पूंजीवाद की संकटों के प्रति संवेदनशीलता भी कम या अधिक होती है… और कुछ असंगतियों से तीव्र लाभ (एशिया, लातिनी अमरीका, जर्मनी ) होते हैं जबकि  कुछेक देश ( अमरीका, इंग्लैण्ड, दक्षिण और पूर्वी यूरोप) रक्ताल्पता पीड़ित और अस्थिर रूप से, वसूली प्रति संवेदनशील होते हैं.

जबकि Exxon-Mobile के मुनाफे की बढौतरी दर सौ प्रतिशत से ऊपर रही और ऑटो कारपोरेशनों ने पिछले वर्षों में सबसे अधिक लाभ अर्जित किया, तो दूसरी ओर, कामगारों की मजदूरी और जीवन स्तर में गिरावट आई और राज्य-सेक्टर के कर्मचारियों को वेतन में कटौती और छंटनी का कड़वा घूँट पीना पड़ा. साफ़ है कि कार्पोरेट मुनाफों की वसूली का आधार श्रम का कर्कश शोषण और सार्वजानिक संसाधनों का निजी कारपोरेशनों को हुआ सबसे बड़ा स्थानान्तरण रहा है. पूंजीवादी राज्य, जिसकी अगुआई डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति ओबामा कर रहा है, ने श्रमिकों को  मजदूरी, स्वास्थ्य और पेंशनों में कटौती को स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के साथ-साथ सीधे बैलआउट पैकजों द्वारा, लगभग ब्याज मुक्त ऋण, टैक्स कटौती से, बड़ी पूंजी को अरबों डॉलर का फायदा पहुंचाया है. रिकवरी के लिए वाईट हाउस की योजना उम्मीद से कहीं बढ़कर रही है – कार्पोरेट मुनाफों की पुन:प्राप्ति हो गयी है, “केवल” कामगारों की भारी तादाद का संकट और अधिक गहरा हो गया है.

पूंजीवाद की मौत की प्रगतिशीलियों द्वारा भविष्यवाणियों की असफलता का कारण उनका वाईट हाउस और कांग्रेस द्वारा सार्वजानिक खजाने की लूट से पूंजी को पुनर्जीवित करने की गुंजाईश का न्यूनानुमान रहा है. उनका न्यूनानुमान इस हद तक था कि वे अंदाजा नहीं लगा पाए कि पूंजी को इतनी अधिक छूट दे दी जाएगी कि वह अपने मुनाफों की वसूली का बोझ कामगारों की पीठ पर लाद सके. इस सन्दर्भ में, प्रगतिशीलियों का “श्रम प्रतिरोध” और “ट्रेड यूनियन लहर” के बारे में  “शब्दाडम्बर” उनकी कमजोर बुद्धि की वह झलक थी जो सामाजिक धन की इस तरह बर्बादी पर किसी प्रकार का प्रतिरोध लगाने में फेल थी क्योंकि किसी प्रकार का कोई श्रम संगठन था ही नहीं. इसके विरुद्ध जो कुछ भी पास हुआ वह अस्थियित था और डेमोक्रेटिक पार्टी के कांग्रेस में वाईट हाउस में, वाल स्ट्रीट के एड्वोकेटों के पक्ष में था.

पूंजीवादी प्रणाली के मौजूदा असमान और विषम प्रभाव से हमें पता चलता है कि पूंजीपति सिर्फ शोषण और दशकों की सामाजिक प्राप्तियों को वापस लेकर ही अपने संकटों पर काबू पा सकते हैं. हालाँकि मौजूदा मुनाफा वसूलने की प्रक्रिया अति अस्थिर है क्योंकि यह वर्तमान अनुसन्धान, निम्न ब्याज दरों, और श्रम खर्च में कटौती के दोहन पर आधारित है (Financial Times August 10, 2010, p 7). यह गत्यात्मक नए निजी पूँजीनिवेश और बढ़ी हुई उत्पादक क्षमता पर आधारित नहीं है. अन्य शब्दों में, ये आसमान से टपकी हुई प्राप्तियां हैं न कि विक्री राजस्व में वृद्धि और उपभोगता मंडी के विस्तार का परिणाम हैं. और यह कैसे हो सकता है – जबकि मजदूरी निरंतर घट रही हो और बेरोजगारी/ अर्धबेरोजगारी और ख़त्म हो चुके रोजगार 20 प्रतिशत से अधिक हों ? साफ है कि राजनीतिक और सामाजिक  बढ़त और विशेषाधिकृत सत्ता पर आधारित यह अल्पकालिक बूम चिरस्थायी नहीं है. सार्वजानिक कर्मचारियों की भीमकाय सेवानिवृति और श्रम की सघनता से शोषण की कुछ सीमायें होती हैं … दवाब बढ़ रहा है और कुछ न कुछ होकर रहेगा. एक बात निश्चित है : पूंजीवादी प्रणाली अपनी आन्तरिक सड़ांध और “विरोधाभासों” से न तो गिरेगी और न ही प्रतिस्थापित होगी.

एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

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लिंक जोड़ने के लिए देखें —  ‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

मार्क्सवाद और देश दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि पूंजीवाद अपने जन्म से ही लंगड़ा-लूला पैदा हुआ है और उसे मेहनतकश अवाम ने न केवल चुनौतीपूर्ण टक्कर ही दी है, बल्कि बीसवीं सदी में बुर्जुआ वर्ग से सत्ता छीनकर सोवियत यूनियन और चीन में महान समाजवादी तजुर्बे भी किये हैं. हालाँकि अपने इन प्रारंभिक तजुर्बों में मेहनतकश वर्ग ,वक्ती तौर पर, हार गया है और सोवियत यूनियन और यहाँ तक की चीन की वर्तमान संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडे तले पूंजीपति वर्ग ने अपनी सत्ता को स्थापित कर लिया है. डॉ. झुनझुनवाला [ देखें — वामपंथ की सैद्धांतिक भूल ] बंगाल में सत्तासीन रही संशोधनवादी पार्टी की हार का ज़िक्र करते हैं और मार्क्सवाद की थ्योरी को त्रुटिपूर्ण होने का फ़तवा सुना देते हैं, बिना यह जाने कि मार्क्सवाद कोई कठमुल्ला उपदेशात्मक शास्त्र नहीं है, बल्कि वर्गीय समाज के संघर्ष में, ऐसा समाज शास्त्र है जो सर्वहारा पक्षावलम्बी है. मार्क्सवाद ने अपने संघर्ष के दौरान न केवल पूंजीपति वर्ग से टक्कर ली है बल्कि लाल झंडे के तले अराजकतावाद, आतंकवाद, अर्थवाद, ट्रेड-यूनियनवाद आदि संशोधनवाद, जो मार्क्सवाद को इतना पतला और कमजोर कर देना चाहता है ताकि यह पूंजीपति वर्ग की सत्ता को चुनौती न देकर उसकी सेवा में हाज़िर हो और अपने संसदमार्गी कृत्यों से मजदूर वर्ग के आक्रोश पर ठन्डे पानी के छींटे मारकर उनकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करता रहे, केखिलाफ भी संघर्ष किया है.

अपने इस आलेख में, डॉ. झुनझुनवाला इस प्रकार के निष्कर्ष निकालते हैं जैसे,  ‘मार्क्सवादी बाजार विरोधी है जबकि बाज़ार सभी को उनकी क्षमतानुसार काम करने के अवसर प्रदान करता है’. बाज़ार का महिमामंडन करते हुए वे लिखते हैं,
“हम देखते हैं कि आर्टिस्ट को पेंटिंग बनाने में ही मजा आता है। पेंटिंग बिक गई, इतनी ही जानकारी उसके लिए पर्याप्त होती है। किसान गेहूं का उत्पादन करके प्रफुल्लित होता है, यद्यपि उसे पता नहीं होता कि रोटी कौन खाएगा। श्रमिक को यदि उसके स्वभाव के अनुकूल काम मिल जाए तो वह सुखी होता है। आर्टिस्ट को हल चलाने में लगा दिया जाए तो वह दुखी होगा और किसान को पेंटिंग करने के लिए ब्रश थमा दी जाए तो वह भी दुखी होगा। विशेष यह कि व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य ढूंढने में बाजार से मदद मिलती है। श्रमिक मन चाहा कार्य पकड़ सकता है। इसलिए मूल रूप से बाजार सुखदायी है।

डॉ. झुनझुनवाला जी, किसान, श्रमिक, और आर्टिस्ट जन्म से पैदा नहीं होते. व्यक्ति का मनपसंद कार्य वह नहीं होता जो वह कर रहा होता है. वर्गीय समाज का विकास इसका मुख्य निर्धारक होता और व्यक्ति की इच्छा गौण. मोटे तौर पर वर्गीय समाज आदिम साम्यवाद से लेकर मालिक-गुलाम, सामंत-किसान और अब पूंजीपति-मजदूर — चार चरणों से होकर गुजरा है . यह सब किसी एक व्यक्ति के चाहने या न चाहने से नहीं हुआ. वर्ग-संघर्ष इसका वस्तुगत चरित्र रहा है.बाजार भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से पैदा हुआ है. चूँकि पूंजीपति वर्ग और  समाज के अस्तित्व के लिए बाज़ार जरूरी है, इसलिए इसका महिमामंडन भी जरूरी है, जोकि आप बाखूबी कर रहे हैं. आपका यह “मूल रूप से बाजार” श्रमिक – जिसके पास अपनी श्रम-शक्ति बेचने के सिवा और कुछ नहीं होता – को नहीं, आपको सुखदायी लगता है।

हमारा यह मानना है कि मार्क्सवाद बाज़ार विरोधी है लेकिन उस प्रकार से नहीं जिस प्रकार डॉ. झुनझुनवाला पेश करते हैं. अपने सारे आलेख में वे ,बड़ी चालाकी के साथ, मार्क्स के मूल्य के श्रम-सिद्धांत का ज़िक्र तक नहीं करते और मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ सिद्ध कर देते हैं. यही वह बाज़ार होता है जहाँ श्रम-शक्ति पण्य (कमोडिटी) के रूप में बिकती है और अपनी विशिष्टता ( श्रम-शक्ति अकेली ऐसी पण्य है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है) के कारण अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है जिसमें से पूंजीपति वर्ग न केवल अपना मुनाफा वसूलता है बल्कि उसकी सेवा में हाज़िर राज्य और उसकी संस्थाओं के खर्च भी निकलते हैं. अपनी विशेष हैसियत के कारण, पूंजीवादी उत्पादन क्रिया से लूटे गये अतिरिक्त मूल्य पर हक़ का पहला दावेदार पूंजीपति वर्ग होता है. यही कारण है कि इस वर्ग की खुशामद द्वारा बुर्जुआ वर्ग का  बुद्धिजीवी (ध्यान रहे बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा संकल्प नहीं है जिसकी अवस्थिति वर्ग-हितों से ऊपर हो ) चंद हड्डियों की अपेक्षा पाले रहता है. ऐसा नहीं है कि एक संशोधनवादी, संसदमार्गी  और मजदूर वर्ग में अर्थवाद द्वारा उसकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करनेवाली माकपा ‘स्टाईल मा‌र्क्सवादियों की पार्टी’ की हार से डॉ. झुनझुनवाला को मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ दिखाई देने लगी हों और वे बड़ी ईमानदारी से मार्क्सवाद पर चिन्तन-मनन करने लगे हों. कारण उनकी पूंजीवादी वर्ग-स्थिति है और वे माकपा जैसी संशोधनवादी पार्टी की हार से व्याकुल इसलिए हैं कि कहीं मजदूरों की, इन संशोधनवादी पार्टियों के प्रति, आस्था न डगमगा जाये और वे, विकल्प के तौर पर, अपनी सच्ची कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण न कर लें.

मार्क्स ने पूंजीवादी समाज की विशेषताओं में से एक – श्रम के अलगाव का ज़िक्र किया है. अकेला मजदूर वर्ग ही सक्षम है जो पूंजीपति वर्ग से संघर्ष द्वारा – वर्गीय समाज को ख़त्म करने की प्रक्रिया द्वारा – इस मर्ज़ का इलाज करेगा. इसलिए मार्क्सवाद की अवस्थिति वर्तमान और भविष्य में है. लेकिन डॉ. झुनझुनवाला मार्क्स को उस ग्रामीण परिवेश में भेज देते हैं, जहाँ  “गाँव का व्यक्ति किसान के लिए हल बनाता है …वह उसमें अपने प्राण आहूत करता है। उसके सामने ही किसान उसका उपयोग करता है, जिसे देखकर दोनों का मन लहलहाता है।” पता नहीं किस युग में और कैसे किसान जोकि  सामंतो द्वारा शोषित रहा है अपनी उस वक्त की मेहनतकश की स्थिति पर प्रफुल्लित होता रहा है ? ‘अह़ा ग्राम्य जीवन’ का ‘नोस्तालजिया’ मार्क्स का नहीं डॉ. झुनझुनवाला का है जिन्होंने बीते का रुदन करनेवाले कवियों से इसका महिमा मंडन सुन रखा है   वे भूल जाते हैं कि मार्क्स की रचनाओं के तीन स्रोत और तीन अंग उस वक्त के विकसित पूंजीवाद के तीन देशों – दर्शन के लिए जर्मनी, अर्थशास्त्र के लिए इंग्लैण्ड और क्रांतियों व समाजवाद के लिए फ़्रांस – से लिए गए हैं. अब तो सारा विश्व पूंजीवाद के नियमों के अनुसार गतिमान है और कृषि में भी किसान बैलों के पीछे-पीछे हल पकडे नहीं भटकता बल्कि कृषि संबंधी उत्पादन में उसके श्रम की भूमिका गौण हो गयी है और मजदूर वर्ग ही वहाँ उत्पादन क्रिया में मुख्य रूप से सक्रीय है.  कृषि उत्पादन में पूंजीवादी संबंधों की मुकम्मल स्थापना ने छोटे किसानों की तबाही निश्चित कर दी है और वे मजदूर वर्ग की अवस्थिति और दृष्टिकोण अपनाने को बाध्य होते जा रहे हैं. भविष्य में उनका बड़ा हिस्सा मजदूरों द्वारा संपन्न की जानेवाली इक्कीसवीं सदी की नई समाजवादी क्रांतियों के लिए अहम भूमिका अदा करेगा.

डॉ. झुनझुनवाला  लिखते हैं, “एक प्रमुख अखबार ने लिखा है कि वामपंथी विचारधारा तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक देश में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहेगी। यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित है.”

यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित हो सकता है लेकिन एक मार्क्सवादी के लिए नहीं. मार्क्सवाद की विशिष्टता है कि इसने इस वस्तुगत सच्चाई की निशानदेही की है जिसमें, पूंजीवाद ने अपनी विकास प्रक्रिया के दौरान, समाजके एक छोर पर अकूत धन-दौलत और दूसरे सिरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया है. गरीबी,  बीमारी और असमानता जैसी अलामतें इसके जरूरी बाई-प्रोडक्ट हैं. मार्क्सवाद ने एक और कटु सत्य इंगित किया है जो पूंजीपतियों और उनके डॉ झुनझुनवाला जैसे बुद्धिजीविओं को सताता रहता है. पूंजीवाद द्वारा पैदा किये गए कंगाली के इस विशाल समुद्र के सापेक्ष पूंजीपतियों की खुशहाली की चंद मीनारों की औकात अल्पसंख्यक और कमजोर की है जो  कभी भी भरभराकर गिर सकती हैं. मार्क्सवादी विचारधारा की प्रासंगिगता, केवल देश या दुनिया में, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहने तक ही नहीं है बल्कि यह प्रासंगिक रहेगा तब तक, जब तक, वर्गीय समाज का अस्तित्व रहेगा. केवल वर्गविहीन समाज में इसका स्थान म्यूजियम में होगा.

वे अपनी कलम मजदूर वर्ग की तानाशाही पर चलाते हुए मध्यम वर्ग में इस बुर्जुआ लोकतंत्र के भ्रम को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. हो सकता है कि पढेलिखे मध्यम वर्ग के एक हिस्से की, इस बुर्जुआ लोकतंत्र में भारी आस्था हो, लेकिन मजदूर वर्ग इस बात को भली-भांति समझता है कि यह लोकतंत्र बुर्जुआ वर्ग का, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतंत्र है. मजदूर वर्ग के लिए यह तानाशाही ही है. किसी भी वर्गीय समाज में ऐसा लोकतंत्र नहीं हो सकता जो सर्वमान्य हो और न ही सर्वहारा वर्ग, जब वह सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, बुर्जुआ वर्ग और उसके पैरोकारों को लोकतान्त्रिक हक़ देने की छूट दे सकता है, क्योंकि इसका अर्थ होगा – पूंजीवाद की पुनर्स्थापना.

अपने आलेख के अंत में, वे वामपंथ को सैद्धांतिक संजीवनी की घुट्टी पिलाते हुए  और “थ्योरी का  नवीनीकरण” करने की सलाह देते हुए “बाजार का बहिष्कार करने के स्थान पर बाजार पर लगाम लगाने” और ” सरकारी तंत्र के विस्तार के स्थान पर ऐसी पालिसी की मांग” जो  “हल्के सरकारी तंत्र से भारी जनहित हासिल करे” जैसी चलताऊ बातों करके खुश हो लेते हैं, जैसेकि उन्होंने अपने इस आलेख में मार्क्सवाद की ऐसी की तैसी कर दी हो. उनके हलके सरकारी तंत्र और जनतंत्र पर मार्क्सवाद का कहना है कि जब मजदूर वर्ग समाजवाद के संक्रमण काल में बुर्जुआ वर्ग का नामोनिशान मिटा देगा तो उसे किसी भी तरह के -हलके या भारी तंत्र – की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

कार्ल मार्क्स

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कार्ल मार्क्स (1818-1883) मार्क्सवाद और प्रबल राजनीतिक विज्ञान के संस्थापक , जिसके विचारों ने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के इतिहास को नये आयाम दिए.

५ मई १८१८ को पश्चिम जर्मनी के ट्रायर में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ. उसके पिता एक कामयाब वकील थे, जिन्हें प्रशिया के कानूनानुसार अपने व्यवसाय को चलाने के लिए यहूदी से ईसाई धर्म अपनाना पड़ा.

सत्रह वर्ष की आयु में कानून की विद्या हासिल करने के लिए मार्क्स बोन विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए. वहाँ उनकी गिनती तेज-तरार विद्यार्थियों में नहीं होती थी. फिक्रमंद पिता ने उनका स्थानांतरण कठोर अनुशासन के लिए विख्यात बर्लिन के विश्वविद्यालय में करवा दिया. अपने अध्ययन के दौरान नौजवान मार्क्स रेडिकल विचारों और दर्शन की ओर झुकते गये. एक बार तो वे ‘यंग हेगल्स’ नामक विद्यार्थियों के एक समूह से जुड़ गये जो हेगल के विचारों को अस्वीकार कर चुके थे.

१९ जून १८४३ को उनका विवाह प्रशिया के नवाब की सुशिक्षित सपुत्री जेनी वोन वेस्टफालें से संपन्न हुआ. शादी के तुरंत बाद सरकार की सेंसरशिप, जिसका रवैया वामपंथी आन्दोलनकारियों के प्रति दिन-प्रतिदिन कठोर से कठोरतम होता जा रहा था, ने उन्हें देश छोड़कर पेरिस जाने के लिए मजबूर कर दिया.

१८४० का पेरिस उस ज़माने के क्रांतिकारियों की सबसे प्रिय कर्मस्थली थी. यहाँ मार्क्स की मुलाकात बहुत से क्रांतिकारियों से हुई जिनमे फ्रेडरिक एंगेल्स आगे चलकर उनके जीवनभर के वैचारिक मित्र बन गये.

१८४४ में एंगेल्स बहुत ही प्रभावशाली पुस्तक ‘Conditions of the WorkingClass in England ‘ लिख चुके थे. इस पुस्तक ने मार्क्स के सर्वहारा वर्ग द्वारा संपन्न किये जानेवाली क्रांति  के विचार को विकसित करने में  मदद की. इसी पुस्तक से प्रेरणा पाकर मार्क्स ने Economic and Philosophic Manuscripts नामक अपनी पहली  पुस्तक की रचना की. पूंजीवाद के अधीन श्रम के अलगाव से मुक्ति के लिए साम्यवाद की जीत की अवश्यम्भाविता के पक्ष में तर्क के कारण इस पुस्तक का एक नैतिक और दार्शनिक महत्व रहा है.

दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है.

मार्क्स की दिलचस्पी इतिहास के विकास और परिवर्तन में भी थी, जो समाज में नैसर्गिक रूप से चलता रहता है. अपने इस विचार को उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी समझ बताया. मार्क्स का विश्वास दिन-प्रतिदिन इस सच्चाई की ओर दृढ होता गया कि सर्वहारा वर्ग की क्रांति न केवल वांछनीय है बल्कि ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण अवश्यंभावी है.

इसी समय मार्क्स और एंगेल्स ने अपना सबसे प्रसिद्ध पंफलेट ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ लिखा.

“कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. वे खुलेंआम एलान करते हैं कि उनके लक्ष्य पूरी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बलपूर्वक उलटने से ही सिद्ध किये जा सकते हैं. कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग को कांपने दो. सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.

दुनिया के मजदूरों, एक हो ! ”

मार्क्स की ज्यादातर रचनाओं के विपरीत मार्क्स की यह कृति संक्षिप्त और प्रासंगिक होने के साथ-साथ अग्निमय और प्रेरणादायक भाषा के प्रयोग द्वारा क्रांति की इच्छा पैदा करने की क्षमता रखती है.

“अभी तक आर्विभूत समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है.” – कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, प्रथम अध्याय.

क्रांतियों, जिन्होंने १८४८ में समस्त यूरोप को अपनी आगोश में ले लिया था, ने मार्क्स को फ़्रांसिसी और बेल्जियन अधिकारिओं की नज़रों में संदिग्ध बना दिया . उन्हें लंदन में शरण लेनी पड़ी और उनका शेष रचनात्मक जीवन वहीँ बीता.

कम्युनिस्ट लहर की इस तरुणावस्था में मार्क्स इसके साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़ते गये. प्रथम कम्युनिस्ट इंटरनेशनल  में अराजकतावादी बकुनिन के विरुद्ध उन्होंने प्रबल और प्रभावशाली तर्क रखे.

एक और प्रबल घटना १८७१ का पेरिस कम्यून की स्थापना थी जिसे सर्वहारा वर्ग दो महीने के संघर्ष के बाद हार गया. मार्क्स ने इसका पुरजोर मूल्यांकन किया और इसे भविष्य की कम्युनिस्ट क्रांतियों के अग्रदूत की उपाधि प्रदान की.

मार्क्स अपना अधिक से अधिक समय  ब्रिटिश लायब्रेरी में राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए बिताते थे. इसी के परिणामस्वरूप उनकी मास्टरपीस रचना ‘पूँजी’ (दास कैपिटल) का जन्म हुआ. यह पुस्तक पूंजीवादी समाज और अर्थशास्त्र की गतिकी के नियमों का सघन और विस्तृत संकलन हैं.

“पहली दृष्टि में पण्य बहुत मामूली सी और आसानी से समझ में आनेवाली चीज मालूम होता है. किन्तु उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वास्तव में वह एक बहुत अजीब चीज है, जो आधिभौतिक सूक्ष्मताओं और धर्मशास्त्रीय बारीकियों से ओतप्रोत है. जहाँ तक वह उपयोग मूल्य है, वहां तक, चाहे हम उसपर इस दृष्टिकोण से विचार करें कि वह अपने गुणों से मानव आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है” – पूंजी, अध्याय १, प्रथम खंड

अपने निरन्तर विकसित होते हुए मार्क्सवादी दृष्टिकोण अनुसार मार्क्स ने जीवन के हर पहलू पर लिखा.  अक्सर पूंजीपतियों के तलुयाचाट बुद्धिजीवी मार्क्स के “धर्म लोगों के लिए अफीम है” को सन्दर्भ से तोड़कर एक फिकरे के रूप में प्रयोग करते रहे हैं. वर्गीय समाज के अस्तित्व में आने की ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ के अनुसार उत्पादन की प्रक्रिया ने समाज के एक छोर पर मुट्ठीभर अमीर जबकि दूसरे छोरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया. आत्मिक उत्पादन में एक तरफ दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, साहित्य,गीत और संगीत पैदा हुआ तो दूसरी और धर्म. दिखने में धर्म गरीबों को मुफ्त का तोहफा लगता रहा हो लेकिन शोषक वर्ग के सच्चे सेवादार के रूप में इसने गरीब जनता को पैरों के नीचे रौंधने का ही काम किया.

” धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन  परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है.”
— (Contribution to the Critique of Hegel\’s Philosophy of Right)

अपने समय के सर्वाधिक घृणा पाने वाले व्यक्ति कार्ल मार्क्स, जिन पर सबसे अधिक कीचड उछाला गया, के रोशन दिमाग ने १८८३ को हमेशा के लिए काम करना बंद कर दिया. निरंकुश और गणतंत्रीय, दोनों प्रकार की सरकारों ने उन्हें अपने राज्य से खदेड़ा. बुर्जुआजी, चाहे वह अनुदार रही हो चाहे अति जनवादी, मार्क्स के प्रति लान्छनात्मक शब्दों का प्रयोग करने  में आपस में होड़ करती हुई नजर आई. वे इसे इस प्रकार हटा देते थे जैसे यह कोई मकड़ी का जाला हो. पूर्ण लापरवाही के साथ, जब बहुत जरूरी आवश्यकता उन्हें विवश करती, वे तभी जवाब देते. उनकी मृत्यु उनके चहेते करोड़ों क्रांतिकारी मेहनतकश साथियों के लिए एक आघात थी. साईबेरिया से कैलिफोर्निया, यूरोप और अमेरिका के सभी भागों और जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं “मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि  बेशक उनके बहुत से विरोधी रहे हों, लेकिन उनका कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं था.”

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चुनाव, राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी

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हमने लिखा था कि वर्तमान संसदीय प्रणाली द्वारा मजदूर वर्ग कभी सत्ता प्राप्त नहीं कर सकता. लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि मजदूर वर्ग चुनाव प्रक्रिया में बिलकुल भाग नहीं लेता. एक वोटर के रूप में वह इसमें भाग जरूर लेता है लेकिन प्रभुत्वशाली लोगों में से किसी एक को चुनने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं होता.मजदूर वर्ग और पूंजीपति वर्ग के परस्पर विरोध द्वारा एक्यबद्ध और गतिशील वर्तमान वर्गीय समाज जो कि अलग-अलग पड़ावों से गुजरकर वर्तमान पूंजीवादी जनवादी प्रणाली के साथ प्रकट होता है, अपने पूर्व के वर्गीय समाजों की भांति सम्पत्तिहीन – वर्तमान में सर्वहारा वर्ग को – सत्ता में कितनी भागीदारी दे सकता है (या नहीं दे सकता है), की जाँच-पड़ताल हेतू जरूरी है कि हम कुछ अति महत्वपूर्ण तथ्यों और आंकडों पर नजर दौडाएं जो हाल ही में संपन्न हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में सामने आये हैं.  इससे हम यह भी आसानी से समझ सकते है कि किस प्रकार यह चुनाव प्रणाली पूंजी और जनता के बीच चलने वाले विरोध का हल करती है. चुनावों की हकीकत को जानने के लिए और इस पूरी चुनाव प्रक्रिया की सार्थकता संबंधी आम लोगों में जाकर उनके नज़रिए को जानने की कोशिश करें तो इसकी असलियत को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है. हमारी इस रिपोर्ट का आधार पिछले दिनों संपन्न हुई विधान सभा के चुनावों पर अलग-अलग लोगों के विचार और प्रतिक्रियाएं हैं.

1. पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान चाहे वे राजनीतिक दलों के मंच रहे हों या फिर प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के – बहस का स्तर बहुत निम्न दर्जे का रहा है. इनकी बहस में गंभीर किस्म के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सरोकार गायब थे. राजनीतिक दलों में बहुत निम्न स्तर की लांछनबाजी  देखने को मिली. स्वयं बुर्जुआ वर्ग द्वारा स्वीकृत आचार-व्यवहार का पूर्ण अभाव नजर आया. गंभीर सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों की अपेक्षा, जीत-हार संबंधी जोड़-तोड़, धार्मिक और जाति आधारित प्रतिक्रियावादी समीकरणों द्वारा जोड़-घटा के फार्मूलों की खोज और समीक्षा का प्रभुत्व था.

2. अख़बारों और टीवी पर अपने हक़ में प्रचार करवाने हेतू और अपने विरोधी उम्मीदवार के विरुद्ध -समाचार प्रकाशित करवाने हेतू, लाखों और करोडों के सौदे तय हुए. मीडिया की रिपोर्ट अनुसार कई दैनिक अख़बारों ने २५ से ५० लाख तक के सौदे किये.

3. सारी चुनाव प्रक्रिया इतनी महँगी थी कि देश की बहुसंख्यक आबादी अपने आप ही, इस चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित हो गयी है.  चुनाव दफ्तर से जारी सूचना में उम्मीदवारों के रोजाना खर्च का ब्योरा प्रकाशित किया गया है. इनकी रिपोर्ट के अनुसार कुछ उम्मीदवारों का दैनिक खर्च दो सौ रूपये से तीन सौ रूपये तक का था. इन वेचारे गरीब उम्मीदवारों में कुछ ऐसे उम्मीदवारों के नाम भी शामिल थे जिनकी चुनाव मुहीम की तामझाम, लाम-लश्कर और खर्चीली चुनाव रैलियों की आभा मध्यकालीन युग के राजाओं-महाराजाओं को भी मात दे दे!  चुनाव कमीशन को भले ही यह सब नज़र न आया हो लेकिन आम लोग पानी की तरह बहाए जानेवाले इस धन और शक्ति के प्रदर्शन के प्रत्यक्ष गवाह हैं.

4. वाम संसदीय पार्टियाँ जो सैद्धान्तिक तौर पर लोगों प्रति प्रतिबद्धता का दावा करती रहती हैं – इस सारे दृश्य के आन्तरिक सच का पर्दाफाश करते हुए, मजदूर और मेहनतकश लोगों की चेतना को उन्नत करने की बजाय, लगभग दूसरी पार्टियों की तरह इस्तेमाल होने वाले हथकंडों की नक़ल करती हुई नज़र आयीं. प्रतिस्पर्धा के इस युग में जिस प्रकार मण्डी में छोटा उत्पादन, बड़े स्तर पर होने वाले उत्पादन के आगे, नहीं टिक सकता, उसी तरह, संसदीय वामपंथी पार्टियाँ भी लगातार हाशिये पर आ रही हैं.

लोग चुनावों में हिस्सा क्यों लेते हैं – किस तरह लेते हैं ?

सैद्धांतिक तौर पर कहा जाता है कि चुनाव द्वारा लोग अपनी सरकार चुनते हैं जिसने आनेवाले पॉँच वर्षों के लिए देश या संबंधित राज्य का प्रबंधन संचालित करना  होता है. सरकार इस समग्र राजतन्त्र जिसमें पुलिस, फौज और न्यायपालिका भी सम्मलित होती है, का एक अहम् हिस्सा होती है.  सभ्यता के इतिहास में राज्य-प्रबंधन के सञ्चालन के लिए बननेवाली सरकारों के रूप सदैव एक जैसे नहीं रहे. आदिम समाज के कबीलाई गणराज्यों से चलकर पूरे मध्य युग में राजशाहियों के अलग-अलग रूपों से गुजरते हुए सरकारों का आधुनिक रूप – जिसे जनता की जनता  द्वारा और जनता  के लिए सरकार का नाम दिया जाता है – आज के विश्व में, सरकार का प्रमुख रूप (मॉडल ) है. राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान इसी रूप अथवा मॉडल से संबंधित तथ्यों ने जिस तस्वीर को उभार कर हमारे सामने पेश किया है, उनका संक्षिप्त परिचय और सार निम्नलिखित है.,

1. सबसे पहले, चुनावों के दौरान सबसे अधिक क्रियाशील हिस्सा – राजनीतिक पार्टियाँ और उनके कार्यकर्त्ताओं की बात करें. बड़ी राजनीतिक पार्टियों की टिकट के लिए दौड़, जहाँ प्रचार माध्यम के लिए बड़ा मसाला तैयार करती रही, वहीँ आम जनता में इस संबंधी चर्चा ने पूरी चुनाव मुहीम को दिलचस्प बनाये रखा. टिकट हासिल करने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते हैं – बड़ी गिनती में टिकटों के चाहवान अपने-अपने हक़ में मुहीम लामबद्ध करते हैं.  लोगों की भीड़ जुटाकर दवाब बनाया जाता है. लेकिन दिलचस्प पहलू यह होता है कि वे कौन लोग होते हैं जो इनकी भीड़ जुटाते हैं? ये वहीँ लोग होते हैं जिनकी बहुसंख्यक गिनती को राजनीतिक पार्टियाँ अपने सक्रीय और जमीन से जुड़े हुए कार्यकर्ता बताती हैं. इन्हीं स्थानीय लोगों में, आर्थिक तौर पर प्रभावशाली और राजनीतिक पृष्ठभूमि के परिवारों से कुछ बेहद महत्त्वाकांक्षी नौजवान, नेतृत्त्व की भूमिका निभाते दीखाई देते हैं. गरीब किसान, मध्यम वर्ग और दलित मजदूर वर्ग से भी कुछ लोग , बेशक दूसरे दर्जे की भूमिका निभाने के लिए ही सही, इनका हिस्सा बनते रहते हैं. लोगों के काम निकलवाने के नाम पर बने ये स्वयंभू लोकसेवक, प्रशासन और आम लोगों में मध्यस्ता करने के साथ-साथ, ज्यादातर पुलिस के मुखबिर और टाउट का धंधा करते हैं. किसानों और मध्यम वर्ग का वह हिस्सा जो  पूंजीवाद के विकास के फलस्वरूप उजड़कर ऐयाश, पाकेटमार, चोर, उचका आदि बन जाता है, जिसे मार्क्स लम्पट सर्वहारा कहते हैं, भी इसी तरह का लोकसेवक होता है. ज्यादातर इस प्रकार के लोकसेवकों को, किसी राजनीतिक दल के बड़े नेता की सरपरस्ती हासिल होती है. अक्सर ये छोटे नेता भी अपने साथ, अपनी हैसियत अनुसार, चापलूसों का एक घेरा बनाकर रखते हैं. अपनी इसी हैसियत का प्रयोग ये लोग अपनी आर्थिक हालत को सुधारने के लिए करते हैं. इसमें मुख्य तौर पर सरकारी ठेके लेने के अलावा, पुलिस और राजनीतिक नेताओं की सरपरस्ती में, कई तरह के अवैध धंधे भी शामिल होते हैं. यहीं स्थानीय नेता, शहरों और गांवों में, अपने सरपरस्त  नेता का गुणगान करते हुए, उनकी साफ़-सुथरी और स्वच्छ छवि के व्याखान करते, उनकी शक्ति और सामर्थ्य की कहानिया सुनाते हुए, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री और पार्टी के बड़े नेताओं के साथ उनकी नजदीकी का विश्वास दिलाते हुए, आम वोटरों को अपने मनपसंद लीडर के हक़ में फुसलाते हुए, कभी नहीं थकते. पहले ये नेता, अपने सरपरस्त बड़े नेता के लिए टिकट हेतू भीड़ जुटाते हैं फिर उनकी इच्छानुसार वोट डलवाते हैं. गरीब जनता को मिलनेवाली सरकारी सहूलतें, मिसाल के लिए, बुढापा पेंशन, पीले कार्ड बनवाना, गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को सस्ते रेट का अनाज और मकान  बनवाने के लिए ग्रांट वगैरा, जो आधे-अधूरे तरीके से, केवल मुट्ठीभर लोगों के पास ही पहुंचती हैं – इन्हीं सहूलतों का सेहरा, व्यक्तिगत तौर पर अपने सिर लेते हैं. अपने हक़ में वोट भुगताने के लिए ये नेता जी-जान से कोशिश करते हैं.

2. मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में होनेवाले कुत्ताघसीटी वैसे तो प्रतिदिन चौबीसों घंटे चलती रहती है लेकिन चुनावों के समय इसका नज़ारा बहुत ही दिलचस्प हो जाता है. इन वर्गों से संबंधित लोगों के बयान ही नहीं बदलते, दल भी बदल जाते हैं. आश्चर्य और अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है लेकिन है यह सच कि इन्हीं वर्गों से कुछ लोगों द्वारा एक ही दिन में एक से अधिक दलों में अदला-बदली और आना-जाना होता रहता है  और इस प्रकार अपनी शख्सियत की कायापल्टी करते हुए ये लोग अच्छा खासा मनोरंजक समां भी बांधे रखते हैं.

3. किसी भी चुनाव बूथ पर नजर रखने पर आपको लगेगा कि खाते-पीते घराने के लोग दोपहर से पहले ही अपने मत का प्रयोग कर जाते हैं जबकि सर्वहारा जनता दोपहर बाद आती है. बूथ के आस-पास मौजूद लोगों में चर्चा का  विषय होता है कि मजदूर लोग वोट डालने तब आएंगे जब नकद पैसे वसूल कर लेंगे. इस प्रकार की चर्चा से हम यह गलत निष्कर्ष निकाल लेतें हैं कि केवल मजदूर वर्ग अपना वोट बेचता है लेकिन मध्यम वर्ग नहीं. वह भी प्रभावित होता है, बल्कि ज्यादा प्रभावित होता है. या यूं कहिये कि उसकी प्रभावित होने की औकात ज्यादा है और वह अधिक कीमत लेता है. इस वर्ग का एक हिस्सा राजनीती में इस प्रकार सक्रीय होता है कि वह समाज की बहुसंख्यक  आबादी को प्रभावित करता है और उस बहुसंख्यक आबादी के वोटों को भी वेचने की योग्यता रखता है. मध्यम वर्ग का वोट बेचने का तरीका साधारण न होकर जटिल होता है और जरूरी नहीं होता कि वह मजदूर की भांति मौके पर ही सौदा करे. उसके सौदेवाजी के गुर जटिल और दीर्घकालिक होते हैं. इसी वर्ग ने सरकारी पद,लाइसेंस और ठेके हथियाने होते हैं.इसी वर्ग से उजड़कर लम्पट मजदूर के रूप में प्रकट हुए नए वर्ग  के लोग अपने ही नहीं बल्कि मजदूरों के वोट भी बेच जाते हैं. पूंजीपतियों और धनासेठों से मिलनेवाली सफ़ेद और काले धन की थैलियाँ, बुर्जुआ पार्टियों के लोगों द्वारा, प्राय इन्हीं  लोगों को सौंपी जाती हैं, क्योंकि यही वे लोग होते हैं जो पूंजीपतियों की अपेक्षा मजदूर वर्ग में आसानी से घुल-मिल जाते हैं. उन्हें यह सहूलियत होती है की वे पूंजीपतियों द्वारा लुटाई (???) गई इस धनराशी के एक हिस्से को मजदूरों में बाँट सके लेकिन बड़े हिस्से को स्वयं हड़प कर जाएँ.

4. जहाँ तक मजदूर वर्ग के मतदान करने और वोट बेचने का सवाल है तो जिस प्रकार न चाहते हुए भी वह एक उजरती गुलाम  के रूप में पूंजीपतियों के खेतों और कारखानों में सोलह-सोलह घंटे खटने के लिए विवश होता है – उसे अपनी श्रम-शक्ति को बेचना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार वह मजबूरीवश मतदान करने और वोट बेचने के लिए भी बाध्य होता है. पूंजीपति वर्ग और बुर्जुआ मीडिया के लिए चुनाव भले ही एक जश्न रहा हो लेकिन मजदूर वर्ग से बातचीत करने पर इसकी असलियत कुछ और ही बयान करती नज़र आती है.

5. इस क्रियाशील हिस्से की चर्चा के बाद  लोगों के व्यवहार की चर्चा करें तो जो दृष्टान्त नजर आता है वह एकसार नहीं है. अलग-अलग वर्गों में विभाजित होने के कारण लोग, चुनावों के बारे में एक जैसा दृष्टिकोण नहीं रखते. अमीर लोगों, कारखानेदारों, व्यापारियों, उच्च मध्यम वर्ग,पेशेवर लोग (डॉक्टर वकील आदि) और अमीर किसानों के लिए, सरकार और उसके दरबार में दस्तक देनें का यह एक सुनहरी अवसर होता है. तेजी से अमीर होने की लालसा की पूर्ति हेतू राजतन्त्र और खास करके  नौकरशाही और पुलिसतंत्र के साथ मजबूत गठजोड़ करने के लिए, इस तरह के संपर्क आवश्यक होते हैं. इस कार्य हेतू ये वर्ग चंदे मुहैया करवाते हैं. व्यवहारिक तौर पर ये लोग इस चुनाव प्रक्रिया के साथ पूरी तरह जुड़े होते हैं.

6. देश के उत्पादन के साधनों का मालिक बनी भारत की वर्तमान बुर्जुआ जमात के पास बेचने के लिए वह सबकुछ है जो मजदूरवर्ग ने पैदा किया है. इसी के बदौलत उसकी हैसियत एक अच्छे खरीदार की भी बन जाती है. कहने का अर्थ यह है कि वह बिकता नहीं बल्कि खरीददार होता है. एक वर्ग के रूप में वह अच्छी तरह जानता है कि कौन-कौन से राजनीतिक दल, किस हैसियत और रूप में, किस-किस प्रकार की भूमिका, उसके हितों की रक्षा करने हेतू, निभा सकते हैं. मजदूरों को मजदूरी देते समय कठोर और उग्र स्वभाव का यह पूंजीपति वर्ग इन राजनीतिक दलों को चंदा देते समय एकदम उदार और विनम्र दीखता है.

7. ज्यादातर शहरी और ग्रामीण मजदूर और गरीब किसान और छोटे दुकानदार, जिनकी ज़िन्दगी की खुशहाली के सभी दरवाजे बंद हो चुके हैं, निराशा और बेबसी के शिकार हैं. ये लोग दिल से किसी भी पार्टी या नेता पर विश्वास नहीं करते. ऊपर वर्णित राजनीतिक कार्यकर्त्ता जो अमीर होने की लालसा के चलते, हर प्रकार के नैतिक बंधनों से मुक्त हैं, जब गरीब जनता की बेबसी और मजबूरी को अपने हक़ में भुगतान करवाने में सफल हो जाते हैं, तो यह भ्रम पाल लेते हैं कि गरीब वोटरों को खरीद लिया गया है. हर प्रकार के नशे, पैसा, शराब, धार्मिक और जातीय नेताओं के फरमान और डरावे, इनके आम हथियार हैं.

8. बेहद बुरे, सामाजिक-आर्थिक हालात के प्रतिक्रियास्वरूप कुछ लुम्पन तत्त्व पैदा होते रहते हैं. गरीब आबादी के बीच का लुम्पन हिस्सा, बहुत हद तक और जल्दी ही इन लोगों का दुमछल्ला बन जाता है. पर देखने में आया है कि आम मेहनतकश आबादी का विश्वास यह गँवा चुका है. उत्पादन की क्रिया में जैसे उजरती मजदूर अपनी इच्छा के विपरीत, पूंजीपति की शर्तों पर काम करने के लिए मजबूर है – लगभग उसी तरह अपनी बेबसियों के सदके, यह उनके लिए मतदान करता है.

अपनी प्रसिद्ध रचना ‘परिवार, निजी सम्पति और राज्य की उत्पत्ति’ में फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं,

“इतिहास में अब तक जितने राज्य हुए हैं, उन्में से अधिकतर में नागरिकों को उनकी धन-दौलत के अनुसार कम या ज्यादा अधिकार दिए गए हैं, जिससे यह बात सीधे तौर पर साबित हो जाती है कि राज्य सम्पत्तिवान वर्ग की सम्पत्तिहीन वर्ग से रक्षा करने का एक संगठन है. एथेंस और रोम में ऐसा ही था, जहाँ नागरिकों का संपत्ति अनुसार विभाजन किया जाता था. मध्ययुगीन सामंती राज्य में भी यही हालत थी जहाँ राजनीतिक प्रभाव की मात्रा भू-स्वामित्व के पैमाने से निर्धारित होती थी. आधुनिक प्रातिनिधिक राज्यों में जो मताधिकार-अहर्ता पाई जाती है , उसमें भी यह बात साफ़ दिखाई देती है. तिस पर भी स्वामित्व के भेदों की राजनीतिक मान्यता किसी भी प्रकार अनिवार्य नहीं है : इसके विपरीत, वह राज्य के विकास के निम्न स्तर का द्योतक है. राज्य का सबसे ऊँचा रूप, यानि जनवादी जनतंत्र, जो समाज की आधुनिक परिस्थितियों में अनिवार्यत: आवश्यक बनता जा रहा है और जो राज्य का एकमात्र रूप है जिसमें ही सर्वहारा तथा पूंजीपति वर्ग का अंतिम और निर्णायक संघर्ष लड़ा जा सकता है – यह जनवादी जनतंत्र औपचारिक रूप से स्वामित्व के अंतर का कोई ख्याल नहीं करता. उसमें धन-दौलत अप्रत्यक्ष रूप से, पर और भी ज्यादा कारगर ढंग से, अपना असर डालती है. एक तो सीधे-सीधे राज्य के अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के रूप में, जिसका क्लासिकीय उदाहरण अमरीका है. दूसरे, सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज को अपना केंद्र बनाती हुई न केवल यातायात को, बल्कि उत्पादन को भी अपने हाथ में केन्द्रित करती जाती हैं, उतनी ही अधिक आसानी से यह गठबंधन होता जाता है. अमरीका के अलावा नवीनतम फ्रांसीसी जनतंत्र भी उसके ज्वलंत उदाहरण हैं और नेक बुढे स्विटज़रलैंड ने भी इस क्षेत्र में काफी मार्के की कामयाबी हासिल की है. परन्तु सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज के इस बन्धुत्वपूर्ण गठबंधन की स्थापना करने के लिए जनवादी जनतंत्र की आवश्यकता नहीं है. इसका प्रमाण इंग्लैंड के अलावा नवीन जर्मन साम्राज्य भी है, जहाँ कोई नहीं कह सकता कि सार्विक मताधिकार लागू करने से किसका स्थान अधिक ऊँचा हुआ है -बिस्मार्क का या ब्लाइखरोडर का. अंतिम बात यह है कि सम्पत्तिवान वर्ग सार्विक मताधिकार के द्वारा सीधे शासन करता है. जब तक कि उत्पीडित वर्ग – परिणामस्वरूप इस मामले में सर्वहारा वर्ग – इतना परिपक्व नहीं हो जाता कि अपने को स्वतन्त्र  करने के योग्य हो जाये, तब तक उसका अधिकांश भाग वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को ही एकमात्र संभव व्यवस्था समझाता रहेगा और इसलिए वह राजनीतिक रूप से पूंजीपति वर्ग का दुमछल्ला, उसका उग्र वामपक्ष बना रहेगा. लेकिन जैसे-जैसे यह वर्ग परिपक्व होकर स्वयं अपने को मुक्त करने के योग्य बनाता जाता है, वह अपने को खुद अपनी पार्टी के रूप में संगठित करता है, और पूंजीपतियों के नहीं, बल्कि खुद अपने प्रतिनिधि चुनता है. अतएव, सार्विक मताधिकार मजदूर वर्ग की परिपक्वता की कसौटी है. वर्तमान राज्य में वह इससे अधिक कुछ नहीं है और न कभी हो सकता है; परन्तु इतना काफी है. जिस दिन सार्विक मताधिकार का थर्मामीटर यह सूचना देगा कि मजदूरों में उबाल आनेवाला है , उस दिन मजदूर पूंजीपतियों की ही तरह जान जायेंगे कि उन्हें क्या करना है.”

वे आगे लिखते हैं,

“इस संविधान को अपनी नींव बनाकर सभ्यता ने ऐसे-ऐसे काम कर दिखाए हैं, जो पुराने गोत्र-समाज की सामर्थ्य के बिल्कुल बाहर थे.  परंतु ये काम उसने किये मनुष्य की सबसे नीच अंतर्वृत्तियों  और आवेगों को उभारते हुए और उसकी तमाम अन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचाकर विकसित करते हुए. सभ्यता के अस्तित्व के पहले दिन से लेकर आज तक नग्न लोभ ही उसकी मूल प्रेरणा रहा है. धन कमाओ, और धन कमाओ और जितना बन सके उतना कमाओ ! समाज का धन नहीं, एक अकेले क्षुद्र व्यक्ति का धन – बस यही सभ्यता का एकमात्र और निर्णायक उद्देश्य रहा है. यदि इसके साथ ही समाज में विज्ञान का अधिकाधिक विकास होता गया और समय-समय पर कला के सम्पूर्णतम  विकास के युग भी बार-बार आते रहे, तो इसका कारण केवल यह था कि धन बटोरने में आज जो भारी सफलताएँ प्राप्त हुई हैं, वे विज्ञान और कला की इन उपलब्धियों के बिना प्राप्त नहीं की जा सकती थीं.”

“सभ्यता का आधार चूँकि एक वर्ग का दूसरे वर्ग का शोषण है, इसलिए उसका सम्पूर्ण विकास सदा अविरत अंतर्विरोध के अविच्छिन्न क्रम में होता रहा है. उत्पादन में हर प्रगति साथ ही साथ उत्पीडित वर्ग की, यानि समाज के बहुसंख्यक भाग की अवस्था में पश्चादगति भी होती है. एक के लिए जो वरदान है, दूसरे के लिए आवश्यक रूप से अभिशाप बन जाता है. जब भी किसी वर्ग को नयी स्वतंत्रता मिलती है, तो वह दूसरे वर्ग के लिए नए उत्पीडन का कारण बन जाती है… जहाँ बर्बर लोगों में अधिकारों और कर्त्तव्यों के बीच भेद की कोई रेखा नहीं खिंची जा सकती थी, वहां सभ्यता एक वर्ग को लगभग सारे अधिकार देकर और दूसरे वर्ग पर लगभग सारे कर्त्तव्यों का बोझ लादकर अधिकारों और कर्त्तव्यों के भेद एवं विरोध को इतना स्पष्ट कर देती हैं कि मूर्ख से मूर्ख आदमी भी उन्हें समझ सकता है.” (देखें : Origins of the Family, Private Property, and the State का Chapter IX: Barbarism and Civilization

वर्तमान बुर्जुआ लोकतान्त्रिक प्रणाली जो अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों की वर्गीय राज्य व्यवस्थाओं का निषेद्ध करते हुए वर्तमान विश्व मंच पर अंतरराष्ट्रीय पूँजी की चाकरी हेतू प्रकट हुई है, अपने अंतरविरोधों के कारण, जन्म से ही लूली-लंगडी है जिसका निषेध अवश्यम्भावी है क्योंकि अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों के विपरीत इसने इस वर्गीय समाज के साथ अपनी कब्र खोदनेवाले उस वर्ग को जन्म दिया है जिसे सर्वहारा या उजरती गुलाम कहते हैं. यहीं वह वर्ग है जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता लेकिन पाने के लिए सारा विश्व है. यह सर्वहारा वर्ग ही बुर्जुआ और समाजवादी क्रांतियों की जीत-हार की अमीर विरासत का असली मालिक है. इक्कीसवीं शताब्दी में घटित होने वाली नई समाजवादी क्रांतियों के कार्यभार को संपन्न करवाने हेतू इसने उन बोलेश्विक चरित्र की सच्ची कम्युनिस्ट पार्टियों और नेताओं को भी जन्म देना हैं क्योंकि समाज को आगे की ओर गति देनेवाली क्रांतियाँ स्वयंस्फूर्त ढंग से संम्पन्न नहीं हो सकती. लेकिन चिंता का पहलू यह भी है कि वर्तमान समय का बुद्धिजीवी वर्ग आज के इस युग के क्षुद्र व्यक्ति ‘पूंजीपति’ द्वारा  सर्वहारा की कमाई की निर्मम लूट और इस लूट की भौंडी प्रदर्शनी पर, चुप्पी साधे है जबकि देश और दुनिया के वस्तुपरक हालात, मजदूर वर्ग द्वारा की जानेवाली क्रांतियों के पक्ष में, लगातार विकसित होते जा रहें हैं. भारत के सबसे अधिक विकसित पूंजीवादी राज्यों में से एक हरियाणा के मजदूर प्रतिदिन बारह घंटे से अधिक श्रम करने पर मजबूर हैं क्योंकि सरकार की ओर से निर्धारित की गयी न्यूनतम मजदूरी – 3510  रूपये प्रति महिना, लागू नहीं हो रही.  कोई भी राजनीतिक दल इसके बारे में गंभीर नहीं है. गुडगाँव जैसे शहर में मजदूर असंतोष को लाठियों और गोलियों से दबाया जा रहा है . एक रिपोर्ट अनुसार राज्य की 56  प्रतिशत औरतें और 83  प्रतिशत बच्चे खून की कमी का शिकार हैं. इस प्रकार की स्थिति पर बुद्धिजीवी वर्ग के चुप्पी के इस कष्टदायक और चिंताजनक पहलू पर ब्रटोल्ट ब्रेष्ट के इन शब्दों के साथ इस आलेख को फ़िलहाल यहीं विराम दिया जाता है,

“किस चीज का इंतजार है और कब तक ?
दुनिया को तुम्हारी जरूरत है |”

चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प – दूसरी किश्त

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इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

अब हम बदल के बारे में कुछ ऐतिहासिक बातें करते हैं. चुनावों के बारे में कहा जाता है कि ये तो बहुत ज़रूरी हैं और चुनाव कभी लोकसभा के तो कभी विधानसभा या पंचायतो और मयुन्सिपलिटी के चुनाव. ऊपर से लेकर नीचे तक चुनावों का जाल बुना गया है. लेकिन हम देखते हैं कि इन पर अरबों-खरबों का खर्च होता है.पिछले दिनों, आपने देखा होगा कि बुर्जुआ पत्रकार किस प्रकार पांच सितारा होटलों में ठहरे होते हैं , और ये लोग इन नेताओं और सरकारों के खिलाफ लिखते हैं ! जाने-माने पत्रकार खुशवंत सिंह पूछते हैं कि इन पत्रकारों और अख़बारों में से कोई एक भी ऐसा है जो अपनी जेब से खर्च करता हो ! ये पत्रकार, उनसे आप वहां मिल ही नहीं सकते . इसके विपरीत जब हम इसके बदल की बात करते हैं तो  हम मजदूरों के प्रारंभिक, बेशक  अल्पकालीन ही सही लेकिन महत्त्वपूर्ण अनुभवों को देखते हैं.१८७१ के पेरिस कम्यून में हम देखते हैं कि उन्होंने सारी बुर्जुआ मशीनरी को हटा दिया और सारे काम-काज को स्वयं संभाल लिया. उस अस्थाई ढांचे जिसने कुछ दिन ही शासन किया, वहां एक मजदूर वर्ग का प्रतिनिधि  शासन करने के अलावा फैक्टरी में भी काम करता था और उसकी तनख्वाह एक औसत मजदूर से ज्यादा नहीं थी. इसी प्रकार सोवियतें जो सोवियत यूनियन में बनीं. सोवियतें हमारी संसद की तरह थी लेकिन तत्त्व रूप से बिलकुल भिन्न. हमारी संसद अपने आप में कोई शासक शक्ति नहीं है बल्कि राज्य की शक्ति के कुल जोड़ का एक हिस्सा है. इसके विपरीत सोवियतें कानून ही नहीं बनाती थीं बल्कि उन्हें लागू भी करती थीं. हमारी संसद की तरह नहीं कि कानून को लागू करने के लिए भारी-भरकम अफसरशाही रखी जाये. और अफसरशाही उसे लागू करने में बीस-बीस साल या इससे भी अधिक समय लगाए और लोग इंसाफ का इंतजार करते-करते मर जाएँ. बुर्जुआ राज्य के दिखाने के दांत कोई और होते हैं और खाने वाले कोई और. संसद बुर्जुआ के दिखाने के दांत हैं जबकि अफसरशाही इसके खाने के. चीन में कम्युनों की मिसाल लें. महान सांस्कृतिक क्रांति जो माओ की अगुआई में शुरू हुई थी, उसके अनुभवों को देखें. हालाँकि दुनिया भर के वाईट-कालर बुद्धिजीवी वर्ग और चीन के बुद्धिजीवियों का भी कहना था की माओ ‘पागल’ हो गए हैं. उन्होंने कहा था कि अब प्रोफेसर और बुद्धिजीवी पढ़ने-पढाने के अलावा खेतों और फैक्ट्रियों में काम भी करेंगे और मजदूर और किसान स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढायेंगे. कई वस्तुगत कारणों के अलावा यह भी एक कारण था कि बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के समय मजदूर और किसान के साथ था, अपनी मंजिल आते ही इस जनवादी क्रांति की बस से नीचे कूद  गया !

अब हमारी इस नयी संसद के गठन पर इन्होने नौकरियों के लिए कुछ फार्म भरवाने शुरू किये हैं लेकिन ये आने वाले पॉँच सालों में इन फार्मों को छेड़ेंगे नहीं. अगर कर्मचारियों की भरती की भी जायेगी तो मुट्ठीभर लोगों की. तो यह है हमारी संसदीय प्रणाली. अगर हम इस संसदीय प्रणाली में इस बुर्जुआ राज्य की शक्ति के कुल जोड़ के एक अंग ‘संसद’ में बहुमत प्राप्त भी कर लेते हैं, जैसा की संशोधनवादी और संसदमार्गी कम्युनिस्टों का मानना है – हालाँकि इस प्रकार की स्थिति में इसकी कोई गुंजाईश भी नहीं दीखती, तो भी मजदूर वर्ग अपने ऐज़ंडा कि पैदावार या उत्पादन के साधनों के  समाजीकरण के साथ-साथ इन्हें सांझी मलकीयत में बदला जाये, तो किस प्रकार केवल कानून बनाकर इसे लागू किया जा सकता है जबकि सत्ता का एक बहुत बड़ा हिस्सा जैसे सरकारी अफसरशाही, पुलिस, फौज और स्वयं पूंजीपति वर्ग अपने निजी दल-बल और हथियारों के साथ इसके विरोध में मर-मिटने को तैयार-बर तैयार बैठा है ? हमारी चुनाव प्रणाली एक पूरे धंधे में बदल चुकी है. एक मजदूर कभी करोड़पति नहीं बन सकता (कौन बनेगा करोड़पति और स्लमडोग मिल्लियानेरी के भ्रम को अपने दिमाग से निकाल दें)

दूसरी बात जिसका कि ऐतिहासिक महत्त्व है वह है पूंजीवादी चुनाव और पूंजीवादी दल. पूंजीवादी दलों और पूंजीवादी चुनाव प्रणाली पूंजीवाद के जन्म के साथ-साथ पैदा हुए, ये हमेशा से इसी तरह विद्यमान नहीं रहे हैं. पूंजीवादी चुनावों का महत्त्व पूंजीवादी प्रणाली के अन्दर और इसे इसी प्रकार बरक़रार रखने में ही है. इसमें पूंजीपति या उनके उम्मीदवार ही चुनें जाते हैं या फिर वे जो इसी प्रणाली के अन्दर के रेस के घोडे होते हैं. अब तो उन्होंने इसे भी बर्दाश्त करना बंद कर दिया है. मिसाल के लिए हमारे प्रधान मंत्री और गृहमंत्री जो पहले वित्तमंत्री रहे हैं या तो चुनाव लड़ते ही नहीं या फिर हार जाते हैं लेकिन अमेरिकन पूंजीवादी साम्राज्य के, जिनकी कि भारतीय बुर्जुआजी जूनियर पार्टनर है, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थायों के इशारों पर सीधे नियुक्ति कर दी जाती है. इसके इलावा जातिवाद, धर्म, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, संप्रदाय आदि के प्रतिक्रियावादी समीकरणों में इन चुनावों को देखा जाता है. इस प्रकार इसे इतना पीछे-खींचू देखा जाता है,जैसे मिसाल के लिए अगर ‘हजका’ वालों ने राय सिख को खडा कर दिया तो लोकदल वालों ने देखा कि उनका ऐसा उम्मीदवार हो जो सिख न हो, भुमनशाह के डेरे को भी मानता हो और सच्चे सौदे का भी उपासक हो, कम्बोज हो लेकिन सिख नहीं मोना हो, उसे ढूंढकर खडा कर दिया है. इस तरह का सर्च-वर्क किया जाता है. वे लोग जो महीनों से टिकट पाने के लिए मुशक्कत कर रहे थे, हाथ मलते रह गए हैं ! उन्होंने एक कम्बोज को जो सिख नहीं है और जिसकी कि आढ़त की दुकान है और जो कृषि-पूंजीपति है उसे टिकट थमा दी है क्योंकि वह पूँजी के लिहाज से अन्य पार्टियों के उम्मीदवारों से किसी भी प्रकार से छोटा नहीं है. तो यह है वह स्थिति जिसके की हम सभी चश्मदीद गवाह हैं.

दूसरी और अपने उम्मीदवार जो चुंने जाते हैं. इस प्रकार की तो कोई बात नहीं है कि वर्तमान में हमारी ये बुर्जुआ पंचायते जो केवल बुर्जुआ वर्ग के हितों की रक्षा के लिए गठित की जाती हैं, हमारे सपने का हिस्सा हों. जिस प्रकार हम देखतें हैं की भगत सिंह का सपना सोवियतों की तर्ज़ पर पंचायतो के निर्माण का सपना था. अब सोवियतें क्या थीं ? जब हम कहते हैं की सारी सत्ता सोवियतों को? सोवियतों और पार्लियमैन्ट में क्या फर्क है? पंचायतो के निर्माण का सपना तो महात्मा गाँधी का भी था. लेकिन वह इसे वर्तमान और भविष्य के लिए नहीं देखता था बल्कि भारत के तथाकथित गौरवशाली अतीत की अन्धगली में छलांग लगा देता था. समाजवाद में सोवियत होगी इसके उल्ट की पार्लियमैन्ट हो. पार्लियमैन्ट क्या है ? यह कानून बनाती है जिसे इसे लागू करने का हक़ नहीं होता. इसे लागू करती है नौकरशाही जो जैसा कि हमने जिक्र किया, इसे लागू करने में बीस-बीस वर्ष लगा देती है. यह नौकरशाही ही इसके असली और खाने के दाँत होते हैं. अब मान लीजिये कि हमारी न्यायव्यवस्था में कोई व्यक्ति किसी मुकद्दमें में जीत भी जाता है तो नौकरशाही उसकी मदद तब ही करती है जब वह अपने विरोधी पक्ष से पूँजी के मामले में अधिक शक्तिशाली होता है.

बाकी हिस्सा अगली किश्त भारत के गाँव-गाँव तक पैठ कर चुकी बुर्जुआजी

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चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प

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इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

आम तौर पर क्या होता है कि लोग हमें यहाँ सी पी आई या सी पी एम से भिन्न नहीं समझते. इसमें कोई शक नहीं है कि हम उनसे अलग है लेकिन यह बात उपरी स्तर पर हल हो गयी और एक दूसरे से तोड़-विछोड़ा करने से पहले ताने-मेहने और वाद-विवाद का अभाव रहा है और लोग अक्सर इस तरह की बातें करते हैं कि कामरेडों, इस बार तो बड़ी बढ़िया बात है कि तुम्हारा आदमी भी चुनाव लड़ रहा है या फिर पूछते है कि अब किसे वोट दी जाये. इससे एक बड़ी पेचीदा स्थिति पैदा हो जाती है. इस पर हमें बड़े सीधे-साधे ढंग से अपनी स्थिति प्रकट करनी होती है. उन्हें बताया जाता है कि हमारे यहाँ भारत में दो तरह के कम्युनिस्ट हैं – एक वे जो चुनावों में भाग लेते हैं, इन्हें इलेक्शनबाज या संसदमार्गी कम्युनिस्ट कहा जाता है, दूसरे वे जो चुनावों में भाग नहीं लेते हैं. इनमें से एक वे हैं जो दुस्साहसवादी  या नकसलवादी कम्युनिस्ट है जो केवल हथियारों के बल पर इन्कलाब करना चाहते हैं. पहले वाले कम्युनिस्टों के भी आगे कई प्रवर्ग है जैसे सी.पी.आई., सी.पी.एम., सी.पी.एम. लिबरेशन आदि. और जो चुनाव नहीं लड़ते हैं उनमें भी कई तरह के हैं जैसे कुछ क्रांतिकारी ग्रुप हैं और इसके अलावा नकसली और माओवादी भी चुनावों में भाग नहीं लेते हैं..

उपरोक्त चर्चा का आशय क्या है ? इसे समझने के लिए आईए हम भारतीय बुर्जुआजी और इसके  लोकतंत्र (यानि बुर्जुआ लोकतंत्र, जिसके ऐतिहासिक विकास के थोड़े से वस्तुगत अध्ययन से हम इसे बुर्जुआ वर्ग की सर्वहारा वर्ग पर तानाशाही से बढ़कर कुछ नहीं समझते) के विकास और इतिहास को देखें. भारतीय बुर्जुआजी अंगरेजों के समय में पैदा हुई थी. यह पश्चिम या यूरोप के पूंजीपति वर्ग की तरह किसी स्वतन्त्र मुकाबले में संघर्ष से पैदा नहीं हुई है. अग्रेजी साम्राज्य के दौरान कभी छिप-छिप कर तो कभी थोडा सा मुखर होकर यह धीरे-धीरे अपना अस्तित्त्व ग्रहण करती गयी. कभी भी इसने खुलकर या संघर्षमयी तरीके से अपनी जरूरतों या मांगों को नहीं रखा. इसके विपरीत यह समयानुसार अपनी मांगे रखकर और फिर समझौता फिर मांगे और फिर समझौता की प्रक्रिया द्वारा पैदा हुई है. चाहे पहला विश्वयुद्ध हो या फिर दूसरा. जब भी इसने देखा कि अब अंग्रेजी साम्राज्यवाद उलझा हुआ है या किसी और कारण से – ये अपनी मांगे प्रस्तुत कर देती रही है. जैसे १९४२  में जब इसने देखा कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद दूसरे विश्वयुद्ध में उलझा हुआ है तो विश्व साम्राज्यवाद के अंतरविरोधों  का फायदा उठाते हुए ठीक कांग्रेस की अगुआई में इसने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’  शुरू कर दिया. इसने कभी भी उस समय के मेहनतकश वर्ग किसान या मजदूर वर्ग की मांगो को अपने आंदोलनों या मांगों का हिस्सा नहीं बनाया. १९४७ से पहले भी और बाद में भी इसका यही रुझान रहा है,  कभी चीन से समझौता तो कभी अमेरिका से या फिर रूस से.

अभी कुछ दिन पहले ही हरियाणा  के वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंदर हुड्डा के पिता श्री रणवीर हुड्डा का निधन हुआ है. वे हमारी उस सविधान सभा के सदस्य थे जो अंग्रेजी शासन के दौरान गठित हुई थी. उस ज़माने में इस संविधान सभा के सदस्य होने के लिए जो शर्तें निर्धारित थी उनमें केवल भारत की १५ प्रतिशत आबादी ही कवर होती थी. जैसे कि भूमि का मामला या आबियाना कर का भुगतान कौन लोग करते हैं. अन्य ८५ प्रतिशत आबादी को इसमें शामिल होने का कोई अधिकार नहीं था. इन पंद्रह फीसदी लोगों में  से चुनें हुए लोग ही उस संविधान सभा के सदस्य हुए.  जैसा कि होता रहा है,  भारतीय जब विदेश में निर्मित किसी चीज को देखते रहे हैं और फिर उसकी नक़ल करके उस पर ‘भारत में निर्मित’ का ठप्पा लगाते रहे हैं. ठीक वैसे ही इस संविधान सभा द्वारा निर्मित सविधान को ही १९४७ के बाद झाड़-पोंछकर संविधान का दर्जा दे दिया गया. संविधान के निर्माण से पहले संविधान सभा के लिए जिसमें आम लोग शामिल हों, के चुनाव के लिए किसी भी प्रकार की संविधान सभा का चुनाव नहीं हुआ. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कानून के अनुसार मुट्ठीभर वे लोग जो कुलीन थे और जो पैसे-टक्के वाले थे, वे ही भारत के वर्तमान संविधान के निर्माता रहे हैं (अगर इन्हें निर्माता  कहा जाये तो भी). संक्षेप में यही है हमारे संविधान का इतिहास जिसके बारे में बड़ी-बड़ी डींगे हांकी जाती है कि इसमें अम्बेडकर था , हुडा था या कोई और, और यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, उन लोग के बुत लगाये जाते हैं और उन्हें महानता की उपाधियाँ दी जाती है. ऐसी कोई बात नहीं है कि उनके बुत लगायें जाएँ और उन्हें ये उपाधियाँ दी जाएँ.

अब हम भारत की चुनाव प्रणाली की ओर आते हैं. हम देखते हैं कि यह प्रणाली कितनी खर्चीली है और आम लोगों की आकाँक्षाओं पर किसी भी प्रकार से खरी नहीं उतरती है. लेनिन के ‘राज्य और इन्कलाब’ के शब्दों के अनुसार इसमें होता सिर्फ इतना ही है कि हर पांच वर्षों के बाद देखना होता है कि लुटेरे वर्ग का कौनसा धड़ा अब लोगों के कपडे उतारेगा. आओ थोडा सा देखें कि इनके वेतन, भत्तों और अन्य सहूलतों की फेहरिस्त कितनी खर्चीली है. हम देखते हैं कि एक विधायक का चुनाव खर्च करोड़ रुपये या उससे बढ़कर है. चर्चा होती है कि फलां व्यक्ति फलां पार्टी से टिकट लेने के लिए इतने करोड़ देने को तैयार है. चुनाव उम्मीदवारों में से किसी एक का चुनाव करने के लिए हमें चुनाव से किसी गिरोह, भू माफिया या भ्रष्ट व्यक्ति से एक को चुनना होता है. ताज़ा चुनी गयी लोकसभा में ३०० सांसद यानि ५६ फीसदी घोषित करोड़पति हैं. वो ज़माने चले गए जब कामरेड भी कहा करते थे कि एक वोट और एक नोट. अब हम देखते हैं कि हमारी ये जो संसदमार्गी कम्युनिस्ट पार्टियाँ हैं इन्हें कोई बड़े पूंजीपति तो नहीं लेकिन निम्न पूंजीपति वर्ग या प्रोफेसर, वकील या कुलीन मजदूर वर्ग ने इन्हें थोडा-बहुत फंड या पैसा देना शुरू कर दिया है. लेकिन हम देखते हैं कि बुद्धदेव भटाचार्य ने भी उन नीतियों को पश्चिम बंगाल में लागू कर दिया है जो बुर्जुआ की मन-पसंद रही हैं, तो फंड और पैसा देने वाला ये वर्ग भी निराशा का शिकार है. इतिहास में हम देखते हैं कि पहली बार जब केरल में  नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में वामपंथियों की सरकार बनी तो उस वक्त नेहरू प्रधान मंत्री थे और इंदिरा कांग्रेस की प्रधान. उन्होंने इस सरकार को तुंरत तोड़ दिया. लेकिन धीरे-धीरे भारत की बुर्जुआजी को और इसका प्रतिनिधित्व करने वाले दलों ने इस बात को समझा और आत्मसात किया कि ऐसी कोई बात नहीं है कि इन नामधारी कम्युनिस्टों से डरा जाये, तो उन्होंने इनको बर्दाशत करना शुरू कर दिया और इन्हें इनका वाजिब हक़ और सम्मान (?) देना शुरू कर दिया.

अब हम देखते हैं कि जिस देश की ८४ करोड़ आबादी जो २० रुपये दैनिक से गुज़ारा चलाती है, इस चुनावी नौटंकी में सिवाय अपना तमाशा बना लेने से, उन्हें कुछ हासिल नहीं होता है और न ही हो सकता है, वे अपने को बड़ी हास्यपद स्थिति में पाती है. ये आंकड़े कुछ वर्ष पुराने हैं. इन्हीं के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमंडल का रोजाना खर्च पंद्रह लाख रूपये है, प्रधानमंत्री दफ्तर पर प्रतिदिन दो लाख अड़तीस हज़ार रुपये खर्च होते हैं. राष्ट्रपति पर प्रतिदिन चार लाख चौदह हज़ार. संसद की एक घंटे की कार्रवाई पर सोलह लाख रुपये और इस प्रकार राज्य सभा की एक घंटे की कार्रवाई और राज्य विधान सभा की कार्रवाई  पर बारह-पंद्रह लाख रुपये प्रति घंटा खर्च होते हैं. इनके सदस्यों के वेतन कम दीखते हों लेकिन अन्य सहूलतें और  अन्य आमदनी का कोई हिसाब नहीं है. संसद की अलग-अलग कमेटियों में भाग लेने के लिए ४०० रुपये प्रतिदिन, सदन की मीटिंग बेशक न चलती हो तो भी ८००० रुपये प्रति मास लोगों से संपर्क के लिए चुनाव भता, दफ्तर में आने के लिए २५० ० रुपये , एक या दो सहायक रखने के लिए ६००० रुपये, प्रत्येक सदस्य को स्कूटर , ए.सी. या कार आदि सहूलतें,  फोन बिना कराये के , एक लाख मुफ्त फोन काल्स , फर्स्ट क्लास रेलवे और हवाई यात्रा की टिकटों पर भारी छूट. प्रत्येक सांसद अपने परिवार समेत ३२ हवाई यात्रायें मुफ्त कर सकता है , ..अन्य कमाई  को छोड़ दें. अन्य संस्थाओं के आफिसरों और अमले के खर्च पर लेनिन के ‘राज्य ओर इन्कलाब’ पुस्तक के शब्द कि इन प्रोफेसरों और आफिसरों के इतने बड़े वेतन, यह परोक्ष रूप से रिश्वत नहीं तो और क्या है? इस भारी-भरकम  रकम को खर्च करके यह मशीनरी लोगों पर राज्य करती है. मंत्री परिषद की सुरक्षा पर ५० करोड़ और अन्य प्रमुख हस्तियों की सुरक्षा पर एक अरब 61 करोड़ खर्च.

इसी ऑडियो के सार का बाकी हिस्सा अगली किश्त में जिसमें बुर्जुआजी के ऐतिहासिक विकास और बदल के बारे में चर्चा करेंगे.

चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प – दूसरी किश्त

प्रो.एल.पी.जी. बुद्धिजीवी बनाम वामपंथी बुद्धिजीवी

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पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक में और उसके बाद भारत में एक ऐसा वर्ग पनपा है जिसे प्रो.एल.पी.जी. वर्ग के नाम से जाना जाता है. अंग्रेजी में इसका विस्तार है Pro. Liberalization, Privatization और Globalisation. इसके प्रबुद्ध नागरिकों में प्रोफेसर, इंजिनियर, डॉक्टर, विज्ञानी, जज,वकील , सिविल सर्वेन्ट्स वगैरा-वगैरा शामिल हैं. देश-दुनिया की समस्यायों पर यह वर्ग भी अपने फ़िक्र का इजहार करता रहता है जैसे बिजली ठप होने से आम आदमी परेशान, ट्रेफिक से आम आदमी परेशान, प्रदुषण से आम आदमी परेशान, पेट्रोल के दाम बढ़ने से आम आदमी परेशान, पुलिस की ज्यादतियों से आम आदमी परेशान, कानून-व्यवस्था से आम आदमी परेशान वगैरा-वगैरा. लेकिन यहाँ आम आदमी से अभिप्राय इस प्रो.एल.पी.जी. वर्ग से सम्बंधित लोगों से ही होता है. इनकी पसंदीदा नीतियों के कारण देश की 84 करोड़ आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, उनका इन आम आदमियों के फ़िक्र की  लिस्ट में कहीं कोई जिक्र नहीं होता. साफ और सीधे शब्दों में कहे तो इनकी नज़र में यह 84 करोड़ की आबादी ‘आम आदमी’ नहीं है.

अभी-अभी संपन्न हुए देश की महापंचायत के चुनावों से पहले इस वर्ग के प्रबुद्ध लोग प्रिंट मीडिया, रेडियो और टेलिविज़न पर अपने इस ‘आम आदमी’ के इस महापंचायत के चुनावों प्रति उपेक्षा से फिक्रमंद पाए गए. उनका मानना था कि देश की मिडल क्लास का अधिकांश वोट डालने नहीं जाता है. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ आबादी बड़े जोश-खरोश के साथ इन चुनावों में भाग लेती है. या यूँ कहें कि यह इलेक्शन इस 84 करोड़ आबादी की महत्वाकांक्षा की अभिव्यक्ति तो करता है लेकिन मिडल क्लास के लिए इसका कोई अर्थ नहीं है. तो इसके प्रबुद्ध नागरिकों का फिक्रमंद होना लाजिमी था. देश को योग द्वारा स्वस्थ करने का बीडा उठाने वाले बाबा रामदेव भी इनके फ़िक्र में शामिल हो गए. उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि इस लोकतंत्र की रक्षा के लिए वोट डालना हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी या मूलभूत कर्तव्य बना देना चाहिए. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ की वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है या इन चुनावों में भाग लेती है.

अब हम मान कर चलते हैं कि 84 करोड़  वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है लेकिन मिडल या अपर मिडल क्लास का बोट डालने प्रति रवैया नकारात्मक है. इसकी पड़ताल होनी चाहिए. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बुर्जुआजी इस देश के हर कोने में अपनी पैठ जमा चुकी है. कहीं ऐसा तो नहीं कि देश के हर कस्बे, हर गाँव में प्रभावशाली हो चुकी इस बुर्जुआजी के लोगों के असर के अधीन इस  84 करोड़ आबादी के लोग अपना वोट डालने के लिए बाध्य हों? क्योंकि कस्बों में ही नहीं बल्कि गांवों में भी देश के मजदूर वर्ग को अपनी श्रम शक्ति बेचने के लिए प्रभावशाली लोगों के सामने गिडगिडाना पड़ता है. भारत एक ऐसा देश है जहाँ श्रम-शक्ति सस्ती और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और मजदूरों को इसे बेचने के लिए आपस में होड़ करनी पड़ती है. इसका नतीजा यह होता है कि मजदूर को श्रम-शक्ति के खरीददार से मधुर सम्बन्ध बनाने पड़ते हैं. श्रम-शक्ति का खरीददार इस बुर्जुआ राज्य का एक प्रतिनिधि भी होता है. इस बात की पूरी सम्भावना है कि वह श्रम-शक्ति के मालिक यानि मजदूर को न केवल वोट डालने के लिए बाध्य करे बल्कि अपनी इच्छा के उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने के लिए बाध्य करे.

जहाँ तक मिडल या अपर मिडल क्लास के वोट न डालने का प्रश्न है तो इसके राज की कुंजी भी उपरोक्त तथ्य में छुपी हुई है. देश की पूंजीवादी प्रणाली द्वारा मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष का एक भाग इनके यहाँ सुनिश्चित रूप से पहुँचता रहता है. यह क्लास उतनी बाध्य नहीं हो सकती जितना कि मजदूर वर्ग.

अगर आपको उपरोक्त आकलन मनोगत लगता हो तो ज़रूरी है कि आप एक प्रश्नावली बनाएँ और अपने आस-पास के सौ-पचास मजदूर लोगों से प्रश्न करें. पूरी उम्मीद है कि नतीजा वही निकलेगा जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है. उपरोक्त आकलन उन बुद्धिजीवियों के लिए चुनौती के रूप पेश किया गया है जो 84 करोड़ की आबादी के इलेक्शन में भाग लेने पर गदगद है.

अब हम उस बुद्धिजीवी को लेते हैं जो इस Liberalization, Privatization और Globalisation को संशय की दृष्टि से देखता है. इसे वामपंथी बुद्धिजीवी कह सकते हैं. हालाँकि इस विपर्यय के दौर में उसकी स्थिति अल्पसंख्यक की ही है लेकिन फ़िक्र इस तथ्य से नहीं कि वह अल्पसंख्यक है फ़िक्र उसकी अकर्मण्यता से है. इन्हें अपनी अकर्मण्यता से छुटकारा पाना होगा. इन्हें तो लाज़मी एक प्रश्नावली बनानी चाहिए और इस बुर्जुआ लोकतंत्र की सार्थकता की पड़ताल करनी चाहिए. बुद्धिजीवियों के इस वर्ग के लिए माओ त्से तुङ के इन विचारों की आज भी पूरी सार्थकता है,

“चूँकि बुद्धिजीवियों का काम मजदूर-किसान जनसमुदाय की सेवा करना है, इसलिए, सर्वप्रथम और सर्वोपरि तौर पर, उन्हें उनको (यानी मजदूर-किसानों को – अनु.) जानना होगा तथा उनके जीवन, काम और विचारों से परिचित होना होगा. हम जनता के बीच जाने के लिए , कारखानों में और गांवों में जाने के लिए, बुद्धिजीवियों को प्रोत्साहित करते हैं. यदि आप अपने पूरे जीवन में एक मजदूर या किसान से कभी नहीं मिलते, तो यह बहुत बुरी बात है. हमारे सरकारी कर्मियों, लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों और वैज्ञानिक शोधकर्मियों को मजदूरों और किसानों के निकट जाने के लिए हर अवसर का लाभ उठाना चाहिए. कुछ लोग महज नज़र दौड़ने के लिए कारखानों और गांवों में जा सकते हैं; “इसे घोडे की पीठ पर बैठे-बैठे फूलों को देखना” कहा जा सकता है और इसका कोई फायदा नहीं हो सकता. दूसरे लोग वहां कुछ महीने रुक सकते हैं, जाँच-पड़ताल कर सकते हैं और दोस्त बना सकते हैं; इसे “फूलों को देखने के लिए (घोडे से -अनु.) नीचे उतरना” कहा जा सकता है. कुछ और दूसरे लोग वहाँ रुक सकते हैं और पर्याप्त समय तक, जैसे कि दो या तीन वर्षों तक या उससे भी अधिक समय तक वहां रह सकते हैं; इसे “बस जाना” कहा जा सकता है. कुछ बुद्धिजीवी मजदूरों और किसानों के बीच रहते हैं , जैसे कि, कारखानों में औद्योगिक तकनीशियन तथा देहातों में कृषि-तकनीशियन और ग्रामीण स्कूल शिक्षक. उन्हें अपना काम अच्छी तरह से करना चाहिए और मजदूरों और किसानों के साथ घुलमिल जाना चाहिए. हमें ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिसमें, “मजदूरों और किसानों का करीबी बन जाना” दरअसल एक आदत में ढल जाये, दूसरे शब्दों में, हमारे पास ऐसा करने वाले बुद्धिजीवियों की एक भारी संख्या होनी चाहिए. सभी तो नहीं लेकिन निश्चय ही, कुछ ऐसे हैं जो एक या दूसरे कारण से (मजदूरों-किसानों के बीच-अनु.) जा पाने में असमर्थ हैं, लेकिन हमें आशा है कि अधिक से अधिक जितने लोगों का जा पाना संभव होगा, वे जायेंगे. वे सभी एक ही समय नहीं जा सकते, लेकिन वे अलग-अलग समयों में टोलियों में जा सकते हैं. पुराने दिनों में जब हम लोग येनान में थे, बुद्धिजीवियों को सक्षम बनाया गया था कि वे मजदूरों और किसानों से सीधे संपर्क बना सकें. येनान में बहुतेरे ऐसे थे जिनकी सोच बहुत उलझी हुई थी और वे तमाम किस्म की अनोखी दलीलों के साथ सामने आते थे. हमारा एक फोरम था, जो उन्हें जनता के बीच जाने के लिए राय-परामर्श देता था. बाद में बहुतेरे गए, और नतीजा बहुत अच्छा रहा. एक बुद्धिजीवी का किताबी ज्ञान जब तक व्यवहार के साथ एकीकृत नहीं हो जाता, तब तक वह पूरा नहीं होता, बल्कि वह बहुत अधिक अधूरा भी हो सकता है. मुख्यत: पुस्तकों को पढने के ज़रिए ही बुद्धिजीवी हमारे पूर्वजों के अनुभवों को अर्जित करते हैं. निश्चय ही, पुस्तकें पढना ज़रूरी है; लेकिन यह अपने आप समस्याएं हल नहीं कर सकता. वास्तविक परिस्थिति का अध्ययन, व्यावहारिक अनुभव और ठोस सामग्री का परीक्षण, तथा मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना ज़रूरी है. मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना आसान काम नहीं है. अभी भी जब लोग कारखानों और गांवों में जा रहे हैं, कुछ मामलों में नतीजे अच्छे हैं लेकिन कुछ में नहीं हैं. यहाँ जो चीज निहित है वह है रुख या अवस्थिति का सवाल, यानी, व्यक्ति-विशेष के विश्व-दृष्टिकोण का सवाल. हम “सैंकडों विचार-सरणियों को परस्पर संघर्ष करने देने” की हिमायत करते हैं और जानने-सीखने की हर शाखा में बहुतेरी सरणियाँ और प्रवृत्तियां हो सकती हैं; लेकिन विश्व दृष्टिकोण के मामले में आज बुनियादी तौर पर सिर्फ दो सरणियाँ हैं, सर्वहारा और बुर्जुआ. इसमें से एक हो सकता है या दूसरा, या तो सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण या फिर बुर्जुआ विश्व-दृष्टिकोण. कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण किसी भी अन्य वर्ग का नहीं बल्कि सिर्फ सर्वहारा का विश्व-दृष्टिकोण है. हमारे आज के बुद्धिजीवियों में से अधिकांश पुराने समाज से और गैर-कामगार लोगों के परिवारों से आते हैं. जो मजदूरों या किसानों के परिवारों से आते हैं, वे भी अभी बुर्जुआ बुद्धिजीवी ही हैं क्योंकि मुक्ति से पहले जो शिक्षा उन्होंने हासिल की थी वह बुर्जुआ शिक्षा थी और उनका विश्व-दृष्टिकोण मूलत: बुर्जुआ था. यदि वे पुराने विश्व-दृष्टिकोण, अवस्थिति और भावनाओं में मजदूरों और किसानों से अलग बने रहेंगे, और वे गोल छेदों में चौकोर खूंटियों के समान होंगे, और मजदूर और किसान उनके सामने अपना दिल नहीं खोलेंगे. यदि बुद्धिजीवी खुद को मजदूरों और किसानों के साथ एकीकृत कर लें और उनके बीच दोस्ती बना लें तो जो मार्क्सवाद उन्होंने किताबों में पढ़ रखा है, वह सही मायने में अपना हो सकता है. मार्क्सवाद पर वास्तविक पकड बनाने के लिए, सिर्फ किताबों से ही नहीं, बल्कि मुख्यत: वर्ग-संघर्ष के ज़रिए, व्यावहारिक कार्य और मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए सीखना होगा. कुछ मार्क्सवादी किताबें पढने के साथ ही जब हमारे बुद्धिजीवी मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए और अपने खुद के व्यावहारिक कार्य के ज़रिए कुछ समझदारी हासिल कर लेंगे तो हम सभी एक ही भाषा, न केवल देशभक्ति की सामान्य भाषा और समाजवादी व्यवस्था की सामान्य भाषा बोलने लगेंगे बल्कि शायद कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण की सामान्य भाषा भी बोलने लगेंगे. यदि ऐसा हो जाता है तो हम सभी निश्चय ही बेहतर काम करेंगे.” (दर्शन विषयक सम्बन्धी पॉँच निबंध, पृ.114-16,  बिगुल पुस्तिका  श्रृंखला से)

धार्मिक कट्टरपन्थ फ़ासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर सही क्रान्तिकारी रणनीति अपनाओ!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर समकालीन धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी उभार की वैचारिक-ऐतिहासिक समझ में गम्भीर दृष्टि-दोष दीखते हैं और इनका प्रतिरोध भी प्राय: रस्मी, प्रतीकात्मक और कुलीनतावादी सीमान्तों में कैद दीखता है।

नाटकों, कविताओं और कहानियों में प्राय: हिन्दुत्ववादी कट्टरपंथियों का विरोध `सर्वधर्म समभाव´ की ज़मीन से या बुर्जुआ मानवतावाद या बुर्जुआ जनवाद की ज़मीन से करने की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। यह सर्वहारा संस्कृतिकर्मी का सिरदर्द नहीं है कि संघ परिवार ने संविधान और न्यायतंत्र को ख़तरे में डाल दिया है। इसकी चिन्ता संविधान और न्यायतंत्र के पहरुए करें। हम यदि इसका हवाला भी देंगे तो पूरी व्यवस्था के चरित्र और फ़ासीवाद के चरित्र को समझाने और `एक्सपोज़र´ के नज़रिए से देंगे। लोगों की निजी धार्मिक आस्थाओं के अनुपालन के जनवादी अधिकार के प्रति अपनी पूर्ण प्रतिबद्धता ज़ाहिर करते हुए भी, हमें “उदार हिन्दू” या “रैडिकल हिन्दू” का रुख अपनाने के बजाय धर्म के जन्म और इतिहास की भौतिकवादी समझ का प्रचार करना होगा, धर्म के प्रति सही सर्वहारा नज़रिए को स्पष्ट करना होगा, धर्म और साम्प्रदायिकता के बीच के फर्क को स्पष्ट करते हुए एक आधुनिक परिघटना के रूप में साम्प्रदायिकता की समझ बनानी होगी तथा संकटग्रस्त पूँजीवाद की विचारधारा और राजनीति के रूप में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार का विश्लेषण प्रस्तुत करना होगा। हमें यह स्पष्ट करना होगा कि भारत में धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी उभार यहाँ की पूँजीवादी व्यवस्था के सर्वग्रासी संकट की राजनीतिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति होने के साथ ही, पुनरुत्थान और विपर्यय के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में, धार्मिक कट्टरपन्थ के विश्वव्यापी उभार का भी एक हिस्सा है। इसका सम्बन्ध मूलगामी तौर पर, विश्व पूँजीवाद के ढाँचागत संकट से है, आर्थिक कट्टरपन्थ की वापसी के दौर से है तथा बुर्जुआ जनवाद के निर्णायक विश्व-ऐतिहासिक पराभव के दौर से है।

यह सर्वहारा की अवस्थिति नहीं हो सकती कि वह निर्गुण भक्ति आन्दोलन के सहारे, गांधीवादी मानवतावाद के सहारे या नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के सहारे या संविधान पर ख़तरे की दुहाई देते हुए साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का विरोध करे। कबीर और निर्गुण भक्ति आन्दोलन की सन्त परम्परा जनता की महान सांस्कृतिक परम्परा है, पर यह आन्दोलन मध्ययुगीन सामन्ती निरंकुश स्वेच्छाचारिता, ब्राह्मणवादी जातिगत उत्पीड़न और कर्मकाण्डों के विरुद्ध किसानों-दस्तकारों के “नये धार्मिक” तर्कों पर ही आधारित था। आज का धार्मिक कट्टरपन्थ मध्ययुगीन प्रतिक्रियावादी अधिरचना के बहुतेरे तत्त्वों को अपनाए हुए है, लेकिन यह एक आधुनिक परिघटना है, इसकी जड़ें वित्तीय पूँजी के वैश्विक तंत्र और भारतीय पूँजीवादी राज, समाज, उत्पादन और संस्कृति की रुग्णता में हैं। गांधी की आत्मा का आवाहन भी साम्प्रदायिकता के प्रेत से निपटने में काम नहीं आ सकता, क्योंकि गांधी के मानवतावाद में धार्मिक पुराणपन्थ और धार्मिक `यूटोपिया´ का जो स्थान था, उसके चलते धर्म के धार्मिक कट्टरपन्थी इस्तेमाल के विरुद्ध वह आज जनता के वैचारिक सांस्कृतिक अस्त्र की भूमिका निभाने में कतई अक्षम हो चुका है। एक मरियल किस्म के भौतिकवाद की ज़मीन पर खड़ी नेहरू की धर्मनिरपेक्षता को भी आज पुनर्जीवित कर पाना ठीक उसी प्रकार सम्भव नहीं है जिस प्रकार नेहरूवादी “समाजवाद” के दिनों को वापस लौटा लाना।

यह इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुसंगत समझ का अभाव ही है कि भगवान सिंह जैसे रचनाकार साम्प्रदायिकता को सुनिश्चित सामाजिकार्थिक भौतिक आधार से उद्भूत सांस्कृतिक-राजनीतिक परिघटना के रूप में नहीं बल्कि एक मनोवैज्ञानिक समस्या या रुग्णता के रूप में देखते हैं (`उन्माद´ उपन्यास)।

जहाँ तक धार्मिक कट्टरपन्थ के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यावहारिक-आन्दोलनात्मक कार्रवाइयों का सम्बन्ध है, इनका स्वरूप अत्यन्त संकुचित, अनुष्ठानिक और कुलीनतावादी है तथा इनकी अन्तर्वस्तु मुख्यत: सामाजिक जनवादी है। वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों की अधिकांश कार्रवाइयाँ शहरी मध्यवर्ग तक सीमित हैं। संघ परिवारी फ़ासिस्टों की आक्रामक कार्रवाइयों के विरुद्ध दिल्ली-बम्बई के अभिजात सांस्कृतिक अड्डों पर रस्मी विरोध-प्रदर्शन, साम्प्रदायिक दंगा ग्रस्त क्षेत्रों में टीमें भेजना और रिपोर्टें (वह भी प्राय: अंग्रेज़ी में) जारी करना, उन्नत चेतना वाले शिक्षित मध्यवर्ग तक सीमिति साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ-कहानी-निबन्ध आदि लिखना, कुछ गोष्ठी-सेमिनार व अन्य आयोजन तथा कभी-कभार कुछ नुक्कड़ नाटक जैसे कार्यक्रम – विगत लगभग डेढ़ दशक के फ़ासीवादी उभार के ग्राफ के समान्तर हमारी सांस्कृतिक जन-कार्रवाइयों की यही स्थिति है। दरअसल, राजनीतिक दायरे में संसदमार्गी वामपन्थ संसदीय-संवैधानिक सीमान्तों के भीतर, मुख्यत: संसदीय जनवाद की हिफ़ाज़त के नारे के साथ, मतदान की राजनीति को धुरी बनाकर, फ़ासीवाद का जैसा विरोध कर रहा है, काफी कुछ वैसा ही सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हो रहा है।

फ़ासीवाद की वैचारिक समझ के लिए गम्भीर विमर्श और जनता के जनवादी अधिकारों पर फ़ासिस्ट डकैती का फौरी विरोध ज़रूरी है, लेकिन सवाल यह है कि फासिज्म के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष करने वाले मज़दूर वर्ग और बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी को जागृत, शिक्षित और गोलबन्द करने के लिए हम क्या कर रहे हैं? धार्मिक कट्टरपन्थ के हर पहलू पर सीधी-सादी भाषा में पर्चे, पुस्तिकाएँ लिखकर उनका व्यापक वितरण, औद्योगिक क्षेत्रों में और गाँव के ग़रीबों के बीच गीतों-नाटकों आदि के ज़रिए व्यापक शिक्षा और प्रचार के काम क्यों नहीं संगठित हो पा रहे हैं? क्या इसके लिए वामपन्थी लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के भीतर व्याप्त मध्यवर्गीय कुलीनता-कायरता और सुविधाभोगी स्वार्थपरता ज़िम्मेदार नहीं है?

हमें याद रखना होगा कि मज़दूरों और अन्य मेहनतकश वर्गों के बीच धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी राजनीति के असली “चाल-चेहरे-चरित्र” को नंगा करना हमारा सर्वोपरि दायित्व है। सच्चे वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों को याद रखना होगा कि फ़ासीवाद के रस्मी सामाजिक जनवादी संशोधनवादी विरोधों ने प्रकारान्तर से उसकी मदद ही की है। सामाजिक-जनवादी विभ्रमों से छुटकारा पाए बग़ैर मध्यवर्ग का रैडिकल जनवादी हिस्सा भी धार्मिक कट्टरपन्थ के विरुद्ध आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार नहीं हो सकेगा और सर्वहारा वर्ग के साथ क्रान्तिकारी संयुक्त मोर्चा में शामिल नहीं हो सकेगा। तकरीबन 75 वर्षों पहले कही गई भगतसिंह की ये बातें आज भी प्रासंगिक हैं और सांस्कृतिक मोर्चे के सेनानियों को भी इन पर अवश्य ही ग़ौर करना चाहिए, “लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब मेहनतकशों और किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए। और इनके हत्थे चढ़ कुछ नहीं करना चाहिए। संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता और देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा। इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जाएँगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी…” (साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज´)

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कला-साहित्य-संस्कृति में “लोकवाद” और “स्वदेशीवाद” का विरोध करो!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

प्रतिक्रिया के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में विश्व-पूँजी की संयुक्त शक्ति ने जनता के जीवन पर जो सर्वतोमुखी हमला बोला है, राजनीति की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी उसका प्रतिरोध भविष्य के बजाय अतीत की ज़मीन पर खड़े होकर करने की एक पराजयवादी-पुनरुत्थानवादी और लोकरंजकतावादी प्रवृत्ति मौजूद है। इस प्रवृत्ति के प्रभाव-उच्छेदन के बिना, एक वैज्ञानिक इतिहास-दृष्टि के आधार पर, जनता के सांस्कृतिक आन्दोलन का पुनर्निर्माण नहीं किया जा सकता। विस्तार से बचते हुए, हम अपनी बात यहाँ कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहेंगे।

पहले “लोकवाद” के कुछ उदाहरण लें। आज भारत जैसे देशों में जो रुग्ण-निरंकुश किस्म का पूँजीवादीकरण हो रहा है, वह पूँजीवादी रूपान्तरण के क्लासिकी ऐतिहासिक उदाहरणों से सर्वथा भिन्न है। यहाँ कुछ भी सकारात्मक नहीं है। सामन्ती पार्थक्य की जगह पूँजीवादी अलगाव, सामन्ती निरंकुश स्वेच्छाचारी तंत्र की जगह पूँजीवादी सर्वसत्तावाद। एक पुरातन आपदा की जगह एक नूतन विपदा जिसने पुरातन के कई सांस्कृतिक मूल्यों को ज्यों का त्यों अपना लिया है। हमारे कला-साहित्य में अकसर उन चीज़ों के लिए शोकगीत या रुदन के स्वर सुनाई पड़ते हैं, जिन्हें इतिहास की अनिवार्य गति से नष्ट होना ही था। जैसे कविगण कभी-कभी तो उत्पादन और दैनिन्दन इस्तेमाल की उन पुरानी चीज़ों को भी बहुत आह भरते हुए याद करते हैं जो अन्य चीज़ों द्वारा विस्थापित कर दी गई और जिन्हें स्वाभाविक गति से, अतीत की वस्तु बन ही जाना था क्योंकि यही इतिहास का शाश्वत नियम है। लोटा, दातुन और कठही हल के लिए रोने की ज़रूरत नहीं। कठही हल की जगह ट्रैक्टर को आना ही था। मशीनों को हर हाल में मानवविरोधी चित्रित करना भी एक ग़ैर सर्वहारा, बुर्जुआ पर्यावरणवादी नज़रिया है। मशीनें मानवीय कौशल और चिन्तन की महान उपज हैं, दोष मशीनों का नहीं बल्कि उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व की व्यवस्था का है जिनके चलते मशीनें मुनाफे की अन्धी हवस का उपकरण बनकर मनुष्य और प्रकृति को निचोड़कर तबाह कर डालती हैं।

इसी तरह की अतीतगामी दृष्टि वाले रचनाकार अकसर पूँजीवादी अलगाव के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करते हुए प्राकृतिक अर्थव्यवस्था वाले प्राक्-पूँजीवादी समाजों की उस रागात्मकता और उन काव्यात्मक सम्बन्धों को महिमामण्डित करने लगते हैं जिन्हें पूँजी की सत्ता ने आने-पाई के ठण्डे पानी में डुबो दिया। प्राक्पूँजीवादी, ग्रामीण समाजों की रागात्मकता का काल्पनिक आदर्शीकरण करने वाले प्राय: उसकी पृष्ठभूमि में मौजूद सामन्ती निरंकुशता तथा स्त्रियों और दलितों के बर्बर दमन की अनजाने ही अनदेखी करने की कोशिश करते हैं और श्रम की संस्कृति के वर्चस्व वाले नये, भावी समाज को नहीं बल्कि अनिवार्यत: नष्ट होने वाले अतीत को अपना प्रेरणा-स्रोत बनाने लगते हैं। इसे किसानी “समाजवादी” यूटोपिया का एक रूप भी कहा जा सकता है।

“लोकवाद” का एक और कूपमण्डूकतापूर्ण संस्करण यह भी है कि कई प्रगतिशील कवि-लेखक गण नागर जीवन की हृदयहीनता, नग्न बुर्जुआ लूट-खसोट, आपाधापी और अलगाव की आलोचना करते हुए आहें भरते हुए गाँवों को याद करते हैं, और वर्ग-निरपेक्ष रूप में शहर की हृदयहीनता और गाँवों के “सामूहिक जीवन” की तुलना करते प्रतीत होते हैं। यह `अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है´ का नया संस्करण है। यह सही है कि पूँजीवादी समाज में गाँव और शहर का अन्तर लगातार बढ़ता जाता है और शहर की समृद्धि गाँवों को लूटकर ही फलती-फूलती है। पर इस तथ्य को वर्ग-निरपेक्ष रूप में नहीं देखा जा सकता। शहरों में भी बहुंसख्यक आबादी निचोड़े जाने वाले सर्वहारा और अर्द्धसर्वहारा की और परेशानहाल निम्न-मध्यवर्ग की ही है। एक छोटी सी आबादी है जो गाँवों को लूटती है और शहर के उजरती गुलामों को भी। जो शहर की भारी मज़दूर और निम्न-मध्यवर्गीय नौकरीपेशा आबादी है वह गाँवों से ही पूँजी की मार से दर-बदर होकर शहर आई है और यह दुरवस्था फिर भी इतिहास की दृष्टि से प्रगतिशील कदम है। जो आबादी गँवई सुस्ती और कूपमण्डूकता के दलदल से बाहर पूँजीवादी जीवन की बर्बर हृदयहीन अफरातफरी के बीचोबीच धकेल दी गई है, वही पूँजी की सत्ता के लिए कब्र खोदने का काम करेगी। ग्रामीण जीवन की शान्ति के लिए बिसूरने वाले सफेदपोश प्रगतिशील प्राय: ग्रामीण कुलीनों (प्राय: सवर्णों) की ही अगली पीढ़ियाँ हैं। यदि वे ग़रीब किसान, खेत मज़दूर या दलित के बेटे होते या स्त्री होते तो उजरती गुलामी का शहरी नर्क भोगते हुए ग्रामीण निरंकुशता, सुस्ती और कूपमण्डूकता के अँधेरे में वापस नहीं जाना चाहते। जाएँगे तो वे भी नहीं जो गाँवों को खूब याद करते हैं। दरअसल यह अपराध-बोध की कुछ वैसी ही रिसती हुई गाँठ है, जैसी गाँठ के चलते, अनिवासी धनिक भारतीय पाश्चात्य समृद्धि की पत्तल चाटते हुए भारत और भारतीय संस्कृति को खूब याद करते हैं और इस नाम पर यहाँ की सबसे प्रतिक्रियावादी शक्तियों और सबसे प्रतिक्रियावादी मूल्यों के पक्ष में जा खड़े होते हैं। प्रगतिशीलता का ठप्पा बरकरार रखने और “नागर-बोध ग्रस्त” होने के आरोप से बचने के लिए बहुतेरे रचनाकार दशकों पुरानी स्मृतियों और चन्द एक दिनों के दौरों और अख़बारी तथ्यों के आधार पर आज के ग्रामीण जीवन के यथार्थ का कलात्मक पुनर्सृजन करने की कोशिश करते हैं जो वास्तविकता से कोसों दूर होता है। ऐसा वे इसलिए भी करते हैं कि स्मृतियों के सहारे गाँव पर लिखना आसान है, पर उन्हीं के शहरों में उजरती गुलामी का जो रौरव नर्क एक समान्तर दुनिया के रूप में मौजूद है, वहाँ के जीवन के रूबरू होने लायक मज़बूती उनके दिल-गुर्दे में कतई नहीं है।

“लोकवाद” के अन्य कई रूप हैं। जैसे कि संगीत की दुनिया को लें। क्रान्तिकारी संगीत की दुनिया में लोक संगीत से काफी कुछ हूबहू उधार ले लेने – लोकगीतों की पैरोडी करने तक की प्रवृत्ति मौजूद है। लोक गीत-संगीत की परम्परा हमारी अपनी परम्परा है और उससे काफी-कुछ लेना होगा, लेकिन हूबहू नहीं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक के साथ छाँट-बीनकर। लोकसंगीत क्रान्तिकारी गण संगीत का समानार्थक नहीं हो सकता। लोकसंगीत का आधार आदिम जनजातीय जीवन की सामूहिकता, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के किसानी जीवन और दस्तकारी में मौजूद रहा है और कालान्तर में उसका स्थान इतिहास का संग्रहालय ही होगा। उसके कुछ संघटक तत्त्व नये सर्वहारा संगीत में, निरन्तरता के पहलू के रूप में मौजूद रहेंगे। लोकसंगीत सदियों के सांस्कृतिक संस्कारों-आदतों के चलते जनता में लोकप्रिय होता है, लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं कि नई क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु के लिए उसके रूप उपयुक्त होंगे।

नुक्कड़ नाटकों और रंगमंच पर भी लोकरंजकतावाद अनेक रूपों में मौजूद है। प्राय: देखने में यही आता है कि प्रगतिशील नाटककार और नाट्य-निर्देशक भी तर्कबुद्धि, विश्वदृष्टिकोण और आलोचनात्मक विवेक पर बल देने वाले `एपिक थिएटर´ या द्वन्द्वात्मक थिएटर की जगह भावना, अनुभूति और तदनुभूति पर बल देने वाले परम्परागत `ड्रामेटिक थिएटर´ की शैली और तकनीक को ही अपनाते हैं। नुक्कड़ नाटकों में कुछ हद तक पहली धारा की शैली को अपनाया गया है, लेकिन फिर भी दर्शकों को भावनात्मक आवेश से आप्लावित कर देने वाली शैली भी काफी चलन में है, जहाँ विचार पक्ष काफी कमज़ोर पड़ जाता है, जैसाकि प्राय: गुरुशरण सिंह के नाटकों में दिखाई पड़ता है।

“लोकवाद” का ही एक रूप “स्वदेशीवाद” भी है। राजनीति की तरह कला-साहित्य में भी आज यह प्रवृत्ति काफी मज़बूत है। आज आम जनता के जीवन और संस्कृति पर विश्व-पूँजी के चौतरफा हमले का प्रतिकार वामपन्थी धारा का भी एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रवाद की उस ज़मीन पर खड़ा होकर करने की कोशिश कर रहा है, जिस पर खड़े होकर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई लड़ी गई थी। यह अजीब-सी बात है कि कुछ पुराने गाधीवादी, सर्वोदयी, मध्यमार्गी सुधारवादी और एन.जी.ओ. वाले ही नहीं बल्कि क्रान्तिकारी वामपन्थी भी भूमण्डलीकरण के विरुद्ध “स्वदेशी” का झण्डा उठाए हुए हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और उनके सहयोगियों के विरुद्ध गांधीवाद द्वारा सुझाए गए स्वदेशी और स्वराज्य के राष्ट्रवादी नारों को आज का रणनीतिक नारा बनाना नये दौर की लड़ाई को पुराने दौर की लड़ाई के हथियारों से लड़ने की बचकानी कोशिश है। आज जनता की वास्तविक मुक्ति की लड़ाई “स्वदेशी” या किसी अन्य पूँजीवादी राष्ट्रवादी नारे के झण्डे तले लड़ी ही नहीं जा सकती। अपने बीच के तमाम अन्तरविरोधों के बावजूद, आज देश की बड़ी पूंजी और छोटी पूँजी – दोनों की नियति, हित और अस्तित्व साम्राज्यवाद के साथ जुड़ चुके हैं। अपने आपसी अन्तरविरोधों के बावजूद, देश के सभी छोटे-बड़े पूँजीपति साम्राज्यवादी पूँजी के निर्बाध प्रवाह के लिए राष्ट्रीय अर्थतंत्र को पूरी तरह खोल देने के पक्षधर हैं। उनके किसी भी हिस्से का चरित्र राष्ट्रीय या जनपक्षधर नहीं रह गया है। आज का मूल प्रश्न यह नहीं है कि विदेशी शासन और विदेशी पूँजी के वर्चस्व को नष्ट करके देशी उद्योग-धंधों को फलने-फूलने का अवसर दिया जाए। आज का मूल प्रश्न यह है कि पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली, सामाजिक ढाँचा और संस्कृति अब पूरी तरह मानवद्रोही हो चुकी है। इतिहास इन्हें नष्ट करके ही आगे डग भर सकता है। कह सकते हैं कि जो सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक मिशन था, वह अब फौरी कार्यभार बन चुका है। आज का नया नारा यही हो सकता है – उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले सामाजिक वर्गों के पूर्ण नियंत्रण के लिए संघर्ष! ज़ाहिरा तौर पर, सांस्कृतिक वर्चस्व का संघर्ष भी इसी संघर्ष का अनिवार्य और आधारभूत सहवर्ती होगा। साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी जनमुक्ति क्रान्तियाँ आज इतिहास के एजेण्डे पर हैं। राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के दौर के शौर्यपूर्ण संघर्षों-कुर्बानियों से हम प्रेरणा ले सकते हैं और संघर्ष के रूपों से काफी कुछ सीख सकते हैं, पर उस दौर के रणनीतिक नारे आज के नारे नहीं हो सकते।

इतिहास में यह ग़लती पहले भी होती रही है कि मुक्तिकामी जनता के हरावल, नये संघर्षों को गौरवमण्डित करने के लिए, नई प्रेरणा लेने के लिए अतीत की क्रान्तियों का पुन:स्मरण करने के बजाय उन्हीं की भोंडी नकल करने लग जाते रहे हैं। चाहते थे वे अतीत की क्रान्तियों से क्रान्तिकारी स्पिरिट लेना और हुआ यह कि वे अतीत के शरणागत हो गए, अतीत के नारों से नई लड़ाई लड़ने की कोशिश करने लगे और क्रान्ति की आत्मा के पुनर्जागरण के बजाय उसकी प्रेतात्मा मँडराने लगी। यह स्वाभाविक है कि अतीत के महान संघर्षों से अभिभूत होकर, हम अनजाने ही उनकी नकल करने लग जाते हैं। महान क्रान्तियाँ भावी क्रान्तियों के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करने के बजाय सर्जनात्मक अन्वेषण को जकड़ने वाली बेड़ियों का काम करने लगती हैं और नये का अन्वेषण करने के बजाय हम अतीत से समस्याओं का समाधान माँगने लगते हैं। कार्ल मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी की उदीयमान सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम बसन्त-प्लावन के दौर में कहा था, “उन्नीसवीं शताब्दी की सामाजिक क्रान्ति अतीत से नहीं वरन् भविष्य से ही अपनी प्रेरणा प्राप्त कर सकती है।” सर्वहारा क्रान्ति के नये विश्व ऐतिहासिक चक्र की समारम्भ-बेला में यह महान युक्ति एक बार फिर, नये अर्थ-सन्दर्भो के साथ, प्रासंगिक हो उठी है। जब श्रम और पूँजी की शक्तियाँ आमने-सामने खड़ी हों तो क्रान्तिकारी कला-साहित्य का काम श्रम की संस्कृति को सर्जना का मार्गदर्शक बनाना और श्रम की दुनिया में क्रान्ति की अन्तश्चेतना का पुनर्सृजन करना है। अतीत के शरणागत होने, जिसे इतिहास की नैर्सैगिक गति से नष्ट होना है उसके लिए शोकगीत गाने तथा अतीत से नारे, आदर्श, प्रतिमान और प्रादर्श उधार लेने की प्रवृत्ति से मुक्त होना होगा। जनता के पास संस्कृति के नाम पर जो कुछ भी मौजूद है, उन सबको प्रगतिशील मानने का नज़रिया एक अवैज्ञानिक नज़रिया है। यही “लोकवाद” है जिससे हमें छुटकारा पाना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाए बिना सांस्कृतिक मोर्चे पर सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन के कार्यभारों को पूरा कर पाना सम्भव नहीं होगा। दलित-मुक्ति के प्रश्न की उपेक्षा करके सर्वहारा क्रान्ति या जन-मुक्ति की परियोजना के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। सहशताब्दियों से सर्वाधिक व्यवस्थित और सर्वाधिक बर्बर शोषण-दमन के शिकार दलित देश की कुल आबादी में लगभग तीस प्रतिशत हैं और उनमें से 90 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की कतारों में शामिल हैं। यह आबादी यदि सम्पूर्ण जनता की मुक्ति और स्वतंत्रता-समानता की वास्तविक स्थापना की परियोजना के रूप में सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति को स्वीकार नहीं करेगी तो उसकी विजय असम्भव है। दूसरी ओर, समाजवादी क्रान्ति परियोजना से जुड़े बिना दलित-मुक्ति का प्रश्न भी असमाधानित ही बना रहेगा (क्योंकि पूँजीवादी दायरे के भीतर सुधार की सम्भावनाएँ अब समाप्तप्राय हैं) तथा समाजवादी क्रान्ति को लगातार चलाए बिना समाज को उस मुकाम तक पहुँचाया ही नहीं जा सकता जब जाति और धर्म के आधार पर किसी भी तरह का अन्तर बचा ही नहीं रह जाएगा।

इस प्रश्न की द्वन्द्वात्मक समझ की कमी के अभाव में अतीत में कम्युनिस्ट आन्दोलन और वाम जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन में वर्ग-अपचयनवाद (class-reductionism) का विचलन गम्भीर रूप में मौजूद था। आज इसी विचलन का दूसरा छोर वर्ग-विसर्जनवाद (class-liquidationism) या वर्ग-निषेधवाद के रूप में मौजूद है जब इस हद तक के फतवे दिए जा रहे हैं कि वर्ग-विश्लेषण की क्लासिकी मार्क्सवादी पद्धति से भारतीय जाति-व्यवस्था का विश्लेषण ही सम्भव नहीं है। दलित मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के “दलितवादी” चिन्तन के प्रति निहायत अनालोचनात्मक, आत्मसमर्पणकारी, समन्वयवादी रवैया अपनाया जा रहा है। यह एक घातक विसर्जनवादी, सुधारवादी प्रवृत्ति है जिसका आज खूब बोलबाला है। आज हिन्दी में जो दलित-लेखन हो रहा है, वह पक्षधर साहित्य है, प्रतिरोध का साहित्य है, रैडिकल आलोचनात्मक यथार्थवादी साहित्य है। लेकिन यह सच है कि यह सम्पूर्ण दलित आबादी के बजाय, मुख्यत: उस मध्यवर्गीय दलित का प्रातिनिधिक स्वर है, जिसका आर्थिक प्रश्न तो एक हद तक हल हो चुका है और अब सामाजिक अपमान व भेदभाव ही जिसके लिए केन्द्रीय प्रश्न है। इसीलिए समकालीन दलित लेखन का तेवर चाहे जितना तीखा हो, वह ठोस विकल्प के रूप में इसी व्यवस्था के भीतर कुछ सुधारों की माँग करता है, दलित-प्रश्न की समूल समाप्ति की कोई परियोजना नहीं प्रस्तुत करता तथा क्रान्ति के नाम से बिदकता है। यह अनायास नहीं कि जिन आन्दोलनों-संघर्षों में दलित आबादी की बहुतायत होती है या जो आन्दोलन गाँवों में दलित उत्पीड़न के ही किसी मुद्दे पर होते हैं उनसे यह दलित `भद्रलोक´ कोसों दूर रहता है। दलित साहित्य चूँकि अम्बेडकरवाद को ही अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त मानता है, अत: दलित अस्मिता की पहचान और उनके प्रतिरोध-आन्दोलन को संगठित करने में डा. अम्बेडकर की ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार करते हुए भी यह ज़रूरी है कि उनके विचारों की विस्तृत, तर्क और तथ्यपूर्ण विवेचना की जाए। प्रश्न यह है कि अम्बेडकर की दार्शनिक विश्वदृष्टि क्या थी? उनके मूलभूत राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचार क्या थे? दलित हितों के अर्जन और हिफाजित के अन्तरिम प्रावधानों और प्रतिरोध आन्दोलन के प्रोग्राम के साथ ही क्या डा. अम्बेडकर के पास दलित-प्रश्न के सम्पूर्ण और अन्तिम समाधान की कोई दूरगामी सांगोपांग परियोजना थी? ब्राह्मणवाद और जाति प्रश्न का `एक्सपोज़र´, विश्लेषण और भर्त्सना ज़रूरी है, लेकिन लगातार, लम्बे समय तक यहीं रुके रहना और इसे ही दलित आन्दोलन का पूरा प्रोग्राम बना देना कहाँ तक उचित है?

हम समझते हैं कि सामाजिक बदलाव एक वैज्ञानिक प्रश्न है और विज्ञान के प्रश्न निस्संकोच, बेलागलपेट बहस की माँग करते हैं। दलित-प्रश्न को लेकर मार्क्सवाद पर अधूरेपन का लेबल मात्र लगाने के बजाय इस पर मुद्देवार, विस्तृत बहस होनी चाहिए, अम्बेडकर के विचारों और दलित आन्दोलन के इतिहास पर भी बहस होनी चाहिए तथा दलित प्रश्न के वर्ग-विश्लेषण के साथ-साथ समकालीन दलित साहित्य को भी विश्लेषण के एजेण्डे पर लाया जाना चाहिए। तर्क-विचारहीन दलित-हित समर्थन का शोरगुल आज दलित प्रश्न पर सही कार्यदिशा अपनाने में गम्भीर विघ्न पैदा कर रहा है।

स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

समाजशास्त्रीय विमर्श की ही भाँति कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी आज बुर्जुआ नारीवाद के विविध नये-नये रूपों और किस्मों का खूब बोलबाला है। नववामपन्थी “मुक्त चिन्तक” स्त्री-प्रश्न पर क्लासिकी मार्क्सवाद के “अधूरेपन” और “यांत्रिकता” को स्वीकारते हुए बुर्जुआ नारीवादियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हैं।

एक गहरे वैचारिक कुचक्र के तहत सर्वहारा क्रान्ति और पार्टी-सिद्धान्त को पुरुष स्वामित्ववाद और स्त्री-उत्पीड़न के तत्त्वों से युक्त बताया जा रहा है और स्त्री-आन्दोलन की स्वायत्तता की वकालत करते हुए आधी आबादी को जन-मुक्ति-संघर्ष की ऐतिहासिक परियोजना से काटकर अलग करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। बुर्जुआ नारीवाद की सभी किस्में उन उच्च-मध्यवर्गीय स्त्रियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनका `स्वर्ग´ इसी व्यवस्था में सुरक्षित है। वे पुरुष-वर्चस्ववाद का विरोध तो करना चाहती हैं, लेकिन इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना में जमी उसकी जड़ों को नहीं देख पातीं क्योंकि इस व्यवस्था के वर्ग-उत्पीड़क चरित्र से उन्हें कोई शिकायत नहीं। एन.जी.ओ. प्रायोजित नारीवादियों का एक हिस्सा स्त्रियों, दलितों, विस्थापितों के उत्पीड़न और पर्यावरण के प्रश्न पर अलग-अलग जनसंघर्षों की हिमायत करता है लेकिन इन सबको एक ही मुक्ति-परियोजना के अभिन्न अंगों के रूप में नहीं देखता और विचारधारा और राजनीति के प्राधिकार को स्वीकार नहीं करता। यह अराजकतावाद और संघाधिपत्यवाद (syndicalism) का ही एक नया रूप है। भारत में तीव्र पूँजीवादीकरण से हुए मध्यवर्ग के विस्तार और बुर्जुआ संस्कृति के आच्छादनकारी प्रभाव ने बुर्जुआ नारीवाद के सामाजिक आधार को व्यापक बनाया है। सर्वहारा क्रान्तियों की विफलता से पैदा हुए परिवेश और बुर्जुआ वैचारिक-सांस्कृतिक प्रचार के प्रभाव में, निम्न-मध्यवर्गीय शिक्षित युवा स्त्रियों का एक बहुत बड़ा रैडिकल हिस्सा भी व्यापक मेहनतकश आबादी और आम मेहनतकश स्त्रियों के संघर्षों से जुड़ने के बजाय फिलहाल बुर्जुआ नारीवादी लहर के साथ बह रहा है। साहित्य-कला-संस्कृति की दुनिया में जारी स्त्री-विमर्श में पुरुष-वर्चस्ववाद के प्रश्न को एक समाज-निरपेक्ष, स्वायत्त प्रश्न के रूप में ही प्रस्तुत किया जा रहा है। स्त्री-मुक्ति के किसी व्यावहारिक सुदीर्घ कार्यक्रम के बिना सिर्फ़ गर्मागर्म लफ्फजी का अविराम सिलसिला जारी है। रचनात्मक लेखन का भी परिदृश्य हूबहू ऐसा ही है।

इस बेहद ज़रूरी और बुनियादी सवाल पर पुरज़ोर हस्तक्षेप की ज़रूरत है। नारीवादी विचारों और नारीवादी रचनाओं की सुव्यवस्थित आलोचना और मीमांसा प्रस्तुत की जानी चाहिए। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मार्क्सवाद स्त्री-प्रश्न को हल करने का कोई मॉडल या बना-बनाया फार्मूला नहीं प्रस्तुत करता बल्कि स्त्री की पराधीनता के इतिहास और आधारभूत कारणों की पड़ताल करता है तथा वर्गों के उन्मूलन की सुदीर्घ ऐतिहासिक परियोजना के एक अंग के तौर पर स्त्री-उत्पीड़न की समाप्ति की भी तर्कसम्मत सोच उसी प्रकार प्रस्तुत करता है जिस प्रकार मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण-उत्पीड़न के हर रूप के उन्मूलन की भविष्यवाणी करता है। आम स्त्रियों के बीच यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा क्रान्ति की तैयारी के प्रारम्भ-बिन्दु से ही स्त्री-प्रश्न उसके एजेण्डे पर अनिवार्यत: उपस्थित रहेगा, लेकिन स्त्री-पुरुष असमानता के भौतिक-ऐतिहासिक आधारों के नष्ट होने के बाद भी यौन-भेद और पुरुष-वर्चस्व की सहशताब्दियों पुरानी संस्कृति समाज में एक लम्बे समय तक मौजूद रहेगी और सतत् सांस्कृतिक क्रान्तियों की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही उसका निर्मूलन सम्भव हो सकेगा। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि स्त्री-मुक्ति की तमाम बुर्जुआ नारीवादी अवधारणाएँ इस प्रश्न के सम्पूर्ण हल की कोई दिशा नहीं बतलातीं, क्योंकि वे खुशहाल मध्यवर्गीय स्त्रियों से नीचे की स्त्रियों को सम्बोधित नहीं होतीं। साथ ही, मार्क्सवाद के नाम पर, स्त्री-प्रश्न पर प्रस्तुत की जाने वाली वर्ग-अपचयनवादी अवस्थिति की भी प्रखर आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

भारत में यह नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक अनिवार्यत: आधारभूत कार्यभार है कि व्यापक जनसमुदाय के बीच अन्धविश्वास, धार्मिक कुरीतियों, मध्ययुगीन निरंकुशता, नई बुर्जुआ निरंकुशता और धार्मिक मूलतत्त्ववादी फासीवादी विचारों से निरन्तर सिंचित-पोषित स्त्री-उत्पीड़न और पुरुष-वर्चस्व के तमाम रूपों के विरुद्ध एक रैडिकल सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार आन्दोलन की उद्वेलनकारी लहर पैदा की जाए। इसके बाद ही सामाजिक-राजनीतिक सरगर्मियों में आधी आबादी की पहलकदमी और भागीदारी बढ़ाने के प्रयास सार्थक और प्रभावी हो सकते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा के राजनीतिक और सांस्कृतिक हरावल अपने निजी आचरण-व्यवहार से यह सिद्ध करें कि वे दोहरे-दुरंगे लोग नहीं, बल्कि स्त्री-मुक्ति के सच्चे-सक्रिय पक्षधर हैं। समाज और व्यावहारिक स्थितियों की दुहाई देकर, निजी और पारिवारिक जीवन में पुरुष-वर्चस्ववादी आचरण करने वाले (जैसे घरेलू गुलामी को प्रश्रय देने वाले, दहेज व जाति-धर्म आधारित विवाहों को स्वीकार करने वाले, स्त्री-विरोधी सामाजिक आचारों को व्यावहारिकता की दुहाई देकर स्वीकारने वाले, अपने परिवार में प्रेम-विवाह जैसी चीज़ों का प्रत्यक्ष-परोक्ष विरोध करने वाले, आदि-आदि) पाखण्डी-कायर-धूर्त मध्यवर्गीय प्रगतिशीलों और संशोधनवादी कम्युनिस्टों ने स्त्री-समुदाय को सर्वहारा क्रान्ति के प्रवाह से काटकर अलग करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। अत: इस प्रश्न पर सांस्कृतिक आन्दोलन की शुरुआत हमें अपने निजी जीवन और आचरण से करनी होगी।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार