मजदूरों का जीवन

मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

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विश्व स्तर पर, 1970 के बाद प्रगतिशिलियों, एन जी ओ, और वामपंथियों के साथ मिलकर संशोधनवाद सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों को उत्पादन के स्थान कारखानों और फार्मों से खींचकर, बुर्जुआजी की इच्छानुसार, मंडी में ले गया. मार्क्स की पूंजी पर आधारित यह फिल्म, उनका भंडाफोड़ करती है और संजीदा लोगों को मार्क्सवाद का सही अध्ययन करने के लिए प्रेरित करती है. मूलरूप से फिल्म अंग्रेजी में हैं जिसे हिंदी में डब किया गया है. इसे भारतीय सन्दर्भ में रखने के लिए कुछ तस्वीरों और दृश्य में बदलाव भी किया गया है. http://kapitalism101.wordpress.com/2010/08/20/law-of-value-5-contradiction से विशेष आभार सहित.

मूल्य के नियम_5_विरोधाभास

मूल्य के नियम  में मार्क्स हमेशा विसंगतियों की चर्चा करते हैं. परन्तु ये गोल चकोरों और सैन्य ज्ञान से संबंधित विसंगतियां नहीं होती. ये विसंगतियां पूंजीवादी समाज के सामाजिक संबंधों के अन्दर की विसंगतियां हैं. कुछ लोग इनके लिए शब्द विरोधाभास का प्रयोग करना ज्यादा पसंद करते हैं.

बहुत क्षोभ के साथ हम जानते  हैं कि आधुनिक समाज सामाजिक विसंगतियों से भरा पड़ा है. धन की प्रचुरता के साथ  अत्यधिक गरीबी, अत्याधिक बेरोजगारी के बावजूद  ज्यादा काम, बैंकों द्वारा घरों की कुर्की, नस्ली श्रेष्टता और तनाव, औरतों के खिलाफ हिंसा, श्रम संघर्ष, दूषित वातावरण, पुलिस की बर्बरता, गैंग हिंसा, समूहों की घृणा, जनसँख्या का अत्याधिक उजाड़ा और बहुत से युद्ध.  मार्क्स की दिलचस्पी इन सभी  विसंगतियों में हैं. लेकिन इनमें  से किसी एक  से भी वे अपना विश्लेषण शुरू नहीं करते.

इसके विपरीत वे अपेक्षित साधारण सी लगने वाली चीज – जिन्स से शुरू होते हैं. क्यों ? क्योंकि जिन्स पूंजीवाद के सामाजिक संबंधों की सबसे बुनियादी चीज है. लोगों के परस्पर संबंध जिन्स विनिमय का रूप ले लेते हैं. जिन्स सामाजिक संबंधों की बुनियादी कार्यकर्त्ता है.  इसलिए अगर हम यह जानना चाहते हैं कि कैसे ये सभी सामाजिक विरोधाभास परस्पर संबंधित हैं, हमें जिन्स से शुरुआत करनी होगी.

जैसाकि हमने पहले ही देखा है कि जिन्स में विरोधाभास निहित है. : इसका एक उपयोग मूल्य है और दूसरा मूल्य (जैसाकि हमने देखा है कि मूल्य विनिमय मूल्य के पीछे छुपा होता है इसलिए, पहले हमने कहा था कि विरोधाभास उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य के बीच है, बाद में हमने इसे उपयोग मूल्य और मूल्य में संशोधित कर लिया. ) शुरू में देखने पर यह इतना अधिक विरोधाभासी नहीं लगता. लेकिन जैसे ही हम इसे बारीकी से देखते हैं तो महतवपूर्ण विरोधाभास उभर आते हैं.

ऐसा क्यों होता है कि लोगों को मंडी में अपनी श्रम, धन के बदले बेचना पड़ता है. क्योंकि वे स्वयं अपने जीवन निर्वाह के साधन नहीं जुटा पाते. यही पूंजीवाद का विलक्षण पहलू है. पूर्व में मौजूद उत्पादन की विधियों में लोगों की बहुसंख्या किसी न किसी प्रकार के उत्पादन के साधनों का उपयोग कर सकती थी,  जिनसे वे अपने जीवन निर्वाह के साधन जुटा लेते थे. कई बार लोग आपस में चीजे बदल लेते थे परंतू वे ऐसा अपने ही प्रयोग के लिए अतिरिक्त उत्पादन के द्वारा करते थे. अपने अतिरिक्त उत्पादन की विक्री विशेषरूप से विनिमय के लिए उत्पादन से पूर्णतया भिन्न है.

‘प्रारंभिक एकत्रीकरण नाम की लंबी हिंसात्मक और ऐतिहासिक प्रक्रिया  के द्वारा , उत्पादन के इन साधनों का निजीकरण हो गया और इनपर  पूंजीपति नामक वर्ग के लोगों का कब्ज़ा हो गया. जबकि पहले लोग सीधे अपने उपयोग के लिए श्रम किया करते थे, लेकिन अब उन्हें अपनी रोजी चलने के लिए मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.

सो इस तथ्य से कि हम विनिमय के लिए, न कि सीधे उपयोग के लिए उत्पादन करते हैं, संपत्तिशाली और संपत्तिहीन के बीच सामाजिक विरोधाभास का पता चलता है. खुली मंडी में पहले से ही काम पर जबरदस्ती विद्यमान होती है. और इस जबरदस्ती को लागू करने के लिए किसी न किसी प्रकार की हिंसा की आवश्यकता पड़ती हैं, चाहे यह राज्य , निजी सेना या भाड़े के बटमार द्वारा हो. उत्पादन के साधनों का निजीकरण करने के लिए, हिंसा जरूरी थी और संपत्ति के सभी वैधानिक पह्लूयों को लागू करने के लिए जरूरी बनी हुई है.

अपनी जीविका को मंडी से प्राप्त करने के लिए उन्हें कोई अन्य चीज बेचनी पड़ती है. चूँकि उत्पादन के साधन निजी होते हैं, इसलिए उन्हें अपनी श्रम बेचनी पड़ती है. निसंदेह श्रम वास्तव में बेचीं नहीं जा सकती. इसकी जगह हम अपनी श्रम की क्षमता : श्रम-शक्ति बेचते हैं. हम कार्य समय की निश्चित मात्रा बेचते हैं, चाहे इसे घंटों, हफ़्तों या वर्षों में मापा जाये. यही कारण है कि मूल्य श्रम समय की अभिव्यक्ति है.

हमारी स्वयं की सृजनात्मक क्रियाशील क्षमता, वही वस्तु जो हमें इन्सान बनाती है और समाज से जोडती है, श्रम-शक्ति कहलाती है, श्रम-शक्ति जिन्स बन जाती है जिसे हम किसी को बेचते हैं. श्रम-शक्ति का,  अन्य जिन्स की भांति, उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य होता है और आपने अनुमानित किया, इनमें विरोधाभास है. विनिमय मूल्य हमारे कार्य समय के लिए भुगतान की गयी मजदूरी होती है. इसे जीविका पर खर्च द्वारा निर्धारित किया जाता है. यह भोजन, रिहाईश, कपडे, और परिवहन पर खर्च के बराबर होता है. लेकिन हमारी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य ऐसा है कि यह मूल्य सृजित कर सकता है. यही श्रम-शक्ति के दो विरोधी पहलू हैं, एक तरफ इस पर मजदूरी खर्च होती है तो दूसरी और यह मूल्य पैदा करता है.

हो सकता है आपको 5 डॉलर प्रति घंटा दिए जा रहे हो और आप 20 डॉलर प्रति घंटा की दर से मूल्य सृजित कर रहे हों. अगर ऐसा है तो आपका शोषण हो रहा है. वास्तव में, आपके शोषण की दर चार सौ प्रतिशत है. श्रम-शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास के कारण ही शोषण संभव होता है.

शोषण पूंजीवाद की पहेली – मुनाफे के अस्तित्व – को स्पष्ट करता है. पूंजीपति दिन की शुरुआत कुछ धन से करते हैं जिसे वे उत्पादन में  निवेश कर देते हैं. दिन की समाप्ति पर उनके पास कुछ जिंसों की मात्राएँ होती हैं जिन्हें वे शुरू में  खर्च किये गए धन से अधिक मूल्य पर बेच देते हैं. ऐसा लग सकता है कि इनका मुनाफा क्रय -विक्रय करने से हुआ है. हालाँकि केवल क्रय-विक्रय करने से भी मुनाफा अर्जित किया जा सकता है. लेकिन केवल क्रय-विक्रय करने से मुनाफा पैदा नहीं होता. क्योंकि खरीदना और बेचना जीरो-राशी खेल है. जब हम जिंसों का विनिमय करते हैं तो हम उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं. इस प्रक्रिया द्वारा समाज की कुल राशी के मूल्य में कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसा संभव हो सकता है कि किसी एक को चुना लग जाये. परन्तु मंडी में, किसी एक व्यक्ति का लाभ दूसरे के लिए हानि होता है. लेकिन जिंसों की खरीदफरोख्त से औसत मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती. परन्तु वास्तविक मुनाफा औसत मूल्य में वृद्धि से ही संभव है. किसी समाज के जीडीपी की कुल राशी के मूल्य में वृद्धि मुनाफे  के इस विस्तार से ही होती है.

ऐसा लगता है कि हम पहेली या किसी विरोधाभास में उलझ गए हों. मंडी में समानता और संतुलन का राज्य चलता है. मंडी में विनिमय द्वारा जिंसो के मूल्य का संरक्षण होता है. किसी एक व्यक्ति का लाभ किसी दूसरे व्यक्ति की हानि से इस प्रकार बराबर हो जाता है कि जिन्स विनिमय से अन्तर्जात संतुलन बना रहता है. परन्तु मुनाफा ऐसी अद्भुत घटना है जो जिंसों की खरीदफरोख्त होने से संभावय लगती है. कहीं न कहीं विषमता से मुनाफा पैदा हो सकता है.लेकिन थोड़े से ज्यादा पैदा होना. यह सब किस प्रकार संभव हो सकता है?

इस पहेली को हल करने के लिए मार्क्स हमें मंडी से आगे उत्पादन के  रहस्यमई क्षेत्र में देखने के लिए कहते हैं. उत्पादन में, जहाँ श्रम के शोषण से मूल्य का विस्तार हो जाता है. शोषण मंडी में विनिमय के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करता क्योंकि यह विनिमय में नहीं होता. श्रम-शक्ति को उसके मूल्य पर खरीदा जाता है. उस श्रम शक्ति के उत्पादों को उनके मूल्य पर बेचा जाता है. इन विनिमयों द्वारा कोई मुनाफा नहीं होता. मंडी से मुनाफा बिलकुल नहीं आता, बल्कि श्रम प्रक्रिया से आता है. श्रम के मूल्य से अधिक और ऊपर किया गया श्रम मुनाफे की मात्रा का निर्धारक है. जबकि मंडी समानता और संतुलन की क्षेत्र बनी रहती है, उत्पादन असमानता और शोषण का क्षेत्र है. और यह विरोधाभास श्रम शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास होने से ही संभव है.

अगली किश्त मार्क्स के मूल्य के नियम पर आधारित एनिमेटिड हिंदी डब फिल्म : अंतिम किश्त में समाप्य

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संकट. कैसा संकट ? मुनाफे आसमान छू रहे हैं : जेम्स पेत्रास

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Via: The James Petras Website.

जबकि प्रगतिशील और वामपंथी लेखक ‘पूंजीवाद के संकट’ के बारे में लिख रहे हैं, लेकिन अंटलाटिक और प्रशांत महासागर के दोनों ओर, उत्पादक, पेट्रोलियम कम्पनियां, बैंकर और अधिकतर मुख्य कारपोरेशन खुशियाँ मना रहे हैं.

इस वर्ष के पहले क्वार्टर से कारपोरेट मुनाफे बीस प्रतिशत से सौ प्रतिशत से भी अधिक तक ऊपर उठ गए हैं (Financial Times August 10, 2010, p. 7). वास्तव में कारपोरेट मुनाफे 2008 में शुरू होनेवाली महामंदी से पहले की स्थिति से अधिक हैं (Money Morning March 31, 2010). मेहनतकश वर्ग, सार्वजानिक और निजी सेक्टर के कर्मचारियों और छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमों का गहराता संकट, कार्पोरेट मुनाफों की इस उछाल के पीछे का असली कारण है.

मंदी के शुरू होते ही, बड़ी पूंजी ने करोड़ों नौकरियां ख़त्म कर दी (2010 में चार अमेरिकनों में से एक को नौकरी से निकाल दिया गया). ट्रेड यूनियनों के मुखियों से उनके अधिकारों को छीन लिया गया. कारपोरेशनों ने स्थानीय, राज्य और संघीय सरकारों से टैक्सों में छूट, सब्सिडियां और लगभग ब्याज रहित कर्जों सहित भारी छूटें हासिल की हैं.

जैसे ही मंदी अपने निचले स्तर तक पहुंची, शोषण-सघनता लागू करते हुए ( प्रति श्रमिक अधिक उत्पादन ), व्यवसाय ने शेष बची श्रम पर उत्पादन कार्य को दुगना कर दिया और करोडपति ट्रेड यूनियनों के मुखियों से साठगांठ करते हुए, मेहनतकश वर्ग के स्वास्थ्य बीमा और पेंशन फंड के लिए उनके उतरदायित्व को बढाकर अपने खर्चों में कटौती कर ली. इसका परिणाम यह हुआ कि राजस्व में गिरावट आने से मुनाफे बढ़ गये और बैलेंस-शीटों में सुधार हो गया (Financial Times August 10, 2010). विरोधाभासी तरीके से, सीईओ को ‘संकट’ के बहाने और बयानबाजी के चलते,प्रगतिशील लेखकों की, मजदूरों के लिए, बुर्जुआ मुनाफे से मांग को हतोत्साहित करने का मौका मिल गया और बेरोजगारी की  बावड़ी में निरंतर होनेवाली बढौतरी के चलते ‘औद्योगिक एक्शन’ के तौरपर बेरोजगारों के प्रतिस्थापन का अवसर भी हाथ में आ गया.

मुनाफों की इस मौजूदा बढौतरी ने पूंजीवाद के सभी सेक्टरों को फायदा नहीं पहुंचाया है; हवा से गिरे इस मेवे का बड़ा भाग सबसे बड़े कार्पोरेशनों के हिस्से में आया है. इसके विपरीत, कई मध्यम और छोटे उद्यमों को भारी घाटा हुआ है और कईयों का तो दिवाला निकल गया है. परिणाम स्वरूप वे अपने ‘बड़े साथियों’ के आसान शिकार बन गये हैं (Financial Times August 1, 2010). मध्यम पूंजी के संकट ने पूंजी की सघनता और केन्द्रीयकरण की प्रक्रिया को शुरू कर दिया है और सबसे बड़े कार्पोरेशनों के लिए मुनाफे की दर में बढौतरी के लिए योगदान दिया है.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही, जब हमें बताया जाता था कि पूंजीवाद  ‘निष्प्राण’हो गया है और अपने अंतिम विध्वंस की ओर बढ़ रहा है, वामपंथियों और प्रगतिशीलियों द्वारा पूंजीवादी संकटों के विश्लेषण को समझने की असफलता, स्थायी समस्या के रूप में रही है. अपनी यूरोपीय-अमरीकी अंध नस्लीय श्रेष्टता के कारण वे इस तथ्य को नोट करने में असफल रहे हैं कि एशिया की पूंजी कभी भी अंतिम सकंट तक नहीं पहुंची और लातिनी अमरीका के संक्रमण का ‘वर्ज़न’ तो सौम्य रहा है (Financial Times June 9, 2010, p. 9). झूठे भावीवक्ता इसे तस्लीम करने में असफल रहे हैं कि अलग-अलग तरह के  पूंजीवाद की संकटों के प्रति संवेदनशीलता भी कम या अधिक होती है… और कुछ असंगतियों से तीव्र लाभ (एशिया, लातिनी अमरीका, जर्मनी ) होते हैं जबकि  कुछेक देश ( अमरीका, इंग्लैण्ड, दक्षिण और पूर्वी यूरोप) रक्ताल्पता पीड़ित और अस्थिर रूप से, वसूली प्रति संवेदनशील होते हैं.

जबकि Exxon-Mobile के मुनाफे की बढौतरी दर सौ प्रतिशत से ऊपर रही और ऑटो कारपोरेशनों ने पिछले वर्षों में सबसे अधिक लाभ अर्जित किया, तो दूसरी ओर, कामगारों की मजदूरी और जीवन स्तर में गिरावट आई और राज्य-सेक्टर के कर्मचारियों को वेतन में कटौती और छंटनी का कड़वा घूँट पीना पड़ा. साफ़ है कि कार्पोरेट मुनाफों की वसूली का आधार श्रम का कर्कश शोषण और सार्वजानिक संसाधनों का निजी कारपोरेशनों को हुआ सबसे बड़ा स्थानान्तरण रहा है. पूंजीवादी राज्य, जिसकी अगुआई डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति ओबामा कर रहा है, ने श्रमिकों को  मजदूरी, स्वास्थ्य और पेंशनों में कटौती को स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के साथ-साथ सीधे बैलआउट पैकजों द्वारा, लगभग ब्याज मुक्त ऋण, टैक्स कटौती से, बड़ी पूंजी को अरबों डॉलर का फायदा पहुंचाया है. रिकवरी के लिए वाईट हाउस की योजना उम्मीद से कहीं बढ़कर रही है – कार्पोरेट मुनाफों की पुन:प्राप्ति हो गयी है, “केवल” कामगारों की भारी तादाद का संकट और अधिक गहरा हो गया है.

पूंजीवाद की मौत की प्रगतिशीलियों द्वारा भविष्यवाणियों की असफलता का कारण उनका वाईट हाउस और कांग्रेस द्वारा सार्वजानिक खजाने की लूट से पूंजी को पुनर्जीवित करने की गुंजाईश का न्यूनानुमान रहा है. उनका न्यूनानुमान इस हद तक था कि वे अंदाजा नहीं लगा पाए कि पूंजी को इतनी अधिक छूट दे दी जाएगी कि वह अपने मुनाफों की वसूली का बोझ कामगारों की पीठ पर लाद सके. इस सन्दर्भ में, प्रगतिशीलियों का “श्रम प्रतिरोध” और “ट्रेड यूनियन लहर” के बारे में  “शब्दाडम्बर” उनकी कमजोर बुद्धि की वह झलक थी जो सामाजिक धन की इस तरह बर्बादी पर किसी प्रकार का प्रतिरोध लगाने में फेल थी क्योंकि किसी प्रकार का कोई श्रम संगठन था ही नहीं. इसके विरुद्ध जो कुछ भी पास हुआ वह अस्थियित था और डेमोक्रेटिक पार्टी के कांग्रेस में वाईट हाउस में, वाल स्ट्रीट के एड्वोकेटों के पक्ष में था.

पूंजीवादी प्रणाली के मौजूदा असमान और विषम प्रभाव से हमें पता चलता है कि पूंजीपति सिर्फ शोषण और दशकों की सामाजिक प्राप्तियों को वापस लेकर ही अपने संकटों पर काबू पा सकते हैं. हालाँकि मौजूदा मुनाफा वसूलने की प्रक्रिया अति अस्थिर है क्योंकि यह वर्तमान अनुसन्धान, निम्न ब्याज दरों, और श्रम खर्च में कटौती के दोहन पर आधारित है (Financial Times August 10, 2010, p 7). यह गत्यात्मक नए निजी पूँजीनिवेश और बढ़ी हुई उत्पादक क्षमता पर आधारित नहीं है. अन्य शब्दों में, ये आसमान से टपकी हुई प्राप्तियां हैं न कि विक्री राजस्व में वृद्धि और उपभोगता मंडी के विस्तार का परिणाम हैं. और यह कैसे हो सकता है – जबकि मजदूरी निरंतर घट रही हो और बेरोजगारी/ अर्धबेरोजगारी और ख़त्म हो चुके रोजगार 20 प्रतिशत से अधिक हों ? साफ है कि राजनीतिक और सामाजिक  बढ़त और विशेषाधिकृत सत्ता पर आधारित यह अल्पकालिक बूम चिरस्थायी नहीं है. सार्वजानिक कर्मचारियों की भीमकाय सेवानिवृति और श्रम की सघनता से शोषण की कुछ सीमायें होती हैं … दवाब बढ़ रहा है और कुछ न कुछ होकर रहेगा. एक बात निश्चित है : पूंजीवादी प्रणाली अपनी आन्तरिक सड़ांध और “विरोधाभासों” से न तो गिरेगी और न ही प्रतिस्थापित होगी.

गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

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एक तरफ तो उत्तर प्रदेश की सरकार ‘सर्वजन हिताय’ होने का दावा करती है लेकिन दूसरी और इस सरकार के गोरखपुर का प्रशासन मजदूरों की बैचैनी का अर्थ उनके माओवादियों से संबंध होने से निकालता है. आज जब दुनिया महामंदी की चपेट में है और वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए लोगों की बचतों को  झोंका जा रहा और पूंजीवाद चाहता है कि कैसे वह इस विश्व महामंदी से निजात पाए, ठीक उसी वक्त,  स्थानीय पेटी-पूंजीपतियों को छोड़ दें तो इस प्रकार की स्थिति में सरकारों का मजदूरवर्ग से इस तरह के निम्न स्तर के हथकंडों का इस्तेमाल करते हुए उलझना स्वयं पूंजीपति वर्ग को भी नापंसंद होगा. पूंजीवाद की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा उपभोग भी होती है ताकि माल मंडियों में बिक जाये. क्या मजदूर वर्ग की जेब में कुछ डाले बिना मार्केट या देश को मंदी से उभारा जा सकता है?

भारत जैसे देश में तुलनात्मक रूप से उत्पादन क्रिया के दौरान मजदूरों पर होनेवाले खर्च में लगातार गिरावट आ रही है अर्थात देश की कुल पैदावार में मजदूरों के हिस्से केवल ६ प्रतिशत ही आता है जबकि उनकी संख्या ८४ करोड़ है. लेकिन खाने-पीने की बुनियादी चीजों के दामों में बढोत्तरी ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. मजदूरों के लिए जीवन-निर्वाह करना भी मुश्किल होता जा रहा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पूंजीपति एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण अनुसार भारत दुनिया के सबसे सस्ती मजदूरी वाले देशों में से एक है. उनके अनुसार यह स्थिति आगामी अठारह-बीस सालों तक बनी रहेगी. उनके अनुसार यहाँ की इस सस्ती श्रम का लाभ विश्व पूंजी को ही होना है.यहीं नहीं वे भारत को एक बड़ी मंडी के रूप में भी देखते हैं जहाँ माल खपाया जा सकता है. चीन के बाद भारत दूसरा देश है जहाँ विकास दर सबसे ऊँची है. लेकिन मजदूरों की मजदूरी में होनेवाली थोडी-बहुत बढोत्तरी बुनियादी वस्तुओं की कीमत के मुकाबले बढ़ने की अपेक्षा कम हों तो कैसे मजदूर अपना जीवन निर्वाह कर पायेगा? क्या  स्वयं पूंजीवादी के तर्कानुसार भी इस प्रकार का रवैया उचित है?

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गोरखपुर : अपने परिवारों समेत धरने पर बैठे महिला एवं पुरुष मजदूर

पूंजी के अपने तर्क अनुसार किसी भी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए जरूरी होता है कि मजदूरी में बढोत्तरी हो ताकि मजदूर ज्यादा वस्तुएं खरीद सकें. लेकिन गोरखपुर जैसे शहर में जहाँ मजदूर अपनी थोडी सी मजदूरी, रोजगार सुरक्षा और यूनियन बनाने के बुनियादी लडाई ही लड़ रहे हैं, उन्हें माओवादी कहना कहाँ तक उचित है? सबसे चिताजनक पहलू यह है की मजदूरों के बीच की हर तरह की बैचैनी का हल निकालने की बजाय उसे माओवादी-आतंकवादी कार्रवाई कहकर कुचलने की कोशिश की जाती है और उनके लीडरों पर झूठे केस बनाए जाते हैं और मजदूर नेताओं को जेलों में डाला जाता है.

उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करते समय देश की कार्यपालिका और न्यापालिका जैसी संस्थाओं का रवैया ज्यादा से ज्यादा मजदूर विरोधी होता गया है. गुडगाँव जैसे औद्योगिक नगर जहाँ एक मजदूर की मौत पर एक लाख मजदूरों की बड़ी संख्या सड़कों पर आ जाती , वहां पर भी मजदूरों को यूनियन तक बनाने की इजाजित नहीं है. रिको ऑटो कंपनी के संचालक मजदूरों के हड़ताल पर जाने और यूनियन बनाने को गैर-कानूनी कार्य कहते हैं. इसे ऐतिहासिक प्रसंग में देखें तो यह सही भी है क्योंकि मजदूरवर्ग की लहर के विपर्य के इस दौर में मजदूरों ने यूनियन बनाने, धरना देने, हड़ताल करने और गेट मीटिंगे औयोजित करने के अधिकारों को खो दिया है. उन्हें आज अपनों संघर्षों द्वारा जीते इन बुनियादी अधिकारों की रक्षा ही सबसे बड़ा कार्यभार लगता है जबकि वर्गों में विभाजित समाज में ये अधिकार भी उसी तरह गतिशील होते हैं जिस तरह समाज. अपने कालजयी संघर्षों द्वारा जीते गए इन अधिकारों को खो देना उन्हें निराश करता ही रहेगा जब तक वे स्वयं को राजनीतिक चेतना से चाकचौबंद नहीं करेंगे और इस वर्ग विभाजित व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन नहीं कर देंगे. गुडगाँव तो औद्योगिक उपक्रमों की हब है. इसके अलावा भारत के कोने-कोने में छोटे बड़े लाखों औद्योगिक उपक्रमों में देश के मजदूर वर्ग की आबादी का ९३ प्रतिशत भाग काम कर रहा है. मजदूरों की इस बड़ी तादाद को असंगठित मजदूर यानिकि वह मजदूर जो किसी मजदूर ट्रेड यूनियन का भाग नहीं है, कहते हैं. देश के इन छोटे और मझौले उपक्रमों में कार्य करनेवाले मजदूरों की बैचैनी ने हड़ताल और धरने  का रूप भी लेना है. पूंजीपतियों की आपसी गलाकाट होड़ के चलते और मंडी के उतार-चढाव और मंदी का ज्यादा असर छोटी पूंजी पर अधिक पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि  मजदूर वर्ग के हितों की अनदेखी करके इन उपक्रमों की रखवाली की जाये. लेकिन प्रशासन और सरकारी नुमाँईन्दो का इन पेटी-बुर्जुआ पूंजीपतियों और उनके गुंडों से साँठगाँठ   चिंता का विषय है. सरकार के लिए सोचने वाली बात यह भी है कि क्या मजदूरों और उनको नेताओं को माओवादी आतंकवादी कहकर झुट्ठे मुकद्दमों में फँसाना खुद पूंजीपति वर्ग या व्यवस्था के लिए ठीक है?

किसी प्रकार का आंतंकवाद चाहे वह धार्मिक मूलवादी खेमे की ओर से हो या वामपंथी दुस्साहसवाद के रूप में हो, निंदनीय है. सत्ताधारी वर्ग की दमनकारी नीतियाँ भी हर प्रकार का आतंकवाद पैदा करती हैं. सत्ताधारी वर्ग के राजकीय आतंकवाद  के परिणामस्वरूप धार्मिक मूलवादी आतंकवाद, दक्षिणपंथी आतंकवाद, वामपंथी आतंकवाद आदि, की फसल उगने की उपजाऊ भूमि तैयार होती है.हर किस्म का आतंकवाद मजदूर वर्ग की एकता और सांगठनिक क्षमता को कमजोर करता है… लेकिन गोरखपुर के स्थानीय प्रशासन द्वारा मजदूरों को माओवादियों से जोड़ना चिंता का विषय है. अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक  तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी. जी  पहले यह कह चुके हैं कि गोरखपुर में नक्सली नहीं है.

यूनिसेफ  की रिपोर्ट अनुसार पिछले ४० वर्षों के अन्तराल के बाद ग्लोबल वित्तीय संकट और ईंधन, भोजन और चारे की कीमतों में बढोत्तरी के कारण दक्षिण एशिया भूखमरी की उच्चतम शिखर को छू रहा है. इसमें कोई शक नहीं की उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी सेक्टरों और कृषि में भी बढ़िया विकास करते दिखाई गयी है लेकिन विडम्बना देखीए कि भरपूर अनाज पैदा होने के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा की हालत में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है. यह उपहास नहीं तो और क्या है कि उडीसा जैसे राज्य में अब भी लोग भूख से मर रहे हैं जबकि वेयरहाउस और गोदामों में अनाज सड रहा है?

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गोरखपुर : हड़ताल के दौरान सामूहिक रसोई

यहीं नहीं एम्.एस स्वामीनाथन रीसर्च फ़ाऊँडेशन (MSSRF) और विश्व खाद्य कार्यक्रम  (WFP) द्वारा एक रिपोर्ट तैयार करवाई गयी. इसमें कहा गया कि भोजन में प्रयाप्त पौष्टिक तत्त्वों की कमी के कारण  भारत का हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का शिकार है और ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2001 के अनुसार भारत का क्रमांक 94 है.

लेकिन पूंजीपति वर्ग खुश होता है कि विश्वमंदी  का भारत पर असर नहीं हुआ है. संसेक्स में फिर उछाल देखने को मिल रही है. प्रथम फिस्कल छमाही के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में ऑटो सेक्टर की विक्री में बढोत्तरी १४.५१ प्रतिशत रही है. इस प्रकार की बातें पूंजीपति लोगों और उनकी सरकारों को अच्छी लगती हैं. लेकिन ऑटो सेक्टर की हब रहे गुडगाँव जैसे शहर में पूंजीपतियों के किराये के गुंडों के हाथों होनेवाली मजदूर की मौत के बाद एक लाख मजदूरों का प्रदशर्न उन्हें परेशान कर देता है. तेरह-तेरह वर्षों से कार्यरत पंकज कुमार सिंह जैसे मजदूर अपनी मजदूरी से संतुष्ट नहीं हैं. अपनी जायज मांगों को मनमाने के लिए जब वे यूनियन बनाने की पहलकदमी करते हैं तो मैनेजमेंट स्थानीय प्रशासन और अपने निजी गुंडों की मदद से उन्हें दबाने की कोशिश करती है. पूंजीपतियों की मुनाफा कमाने की हवस मजदूरों को इंसान समझती ही नहीं. उन्हें तो चाहिए इन्सान के रूप में एक ऐसा मशीन का पूर्जा जो मशीन के दूसरे पूर्जों से मिलकर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करे. पूंजीपति यह देख ही नहीं पाते कि मशीन और इन्सान में बुनियादी फर्क है. मशीन अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष पैदा नहीं कर सकती. यह केवल मजदूर की श्रम-शक्ति से ही संभव होता है. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपतियों का मुनाफा, मैनेजमेंट के खर्चे और कार्पोरेट टैक्स जिससे सरकारे चलती हैं, आता है.

गुडगाँव की रिको ऑटो कंपनी के मजदूर की हत्या पर भारत की न्यूज एजेंसी पी.टी.आई . अपनी टिपण्णी में यह बात स्वीकार करती है कि गुडगाँव-मानेसर बेल्ट में मजदूर असंतोष कोई नई बात नहीं है. पहले २००० में मारुती उद्योग की मजदूरों की तीन महीने की हड़ताल और फिर २००५ में होंडा मोटर्स एंड स्कूटर के मजदूरों पर पुलिस द्वारा अधाधुंध लाठीचार्च जिसमें १६७ मजदूरों के घायल हुए थे, को नोट करते हुए पला झाड़ लेती है जैसे यह रूटीन की सामान्यतय घटने वाली बातें हों. लेकिन स्थिति का दूसरा पहलू यह भी है कि २००० और फिर २००५ और अब २००९ में मजदूरों का एकसाथ इतनी बड़ी तादाद में खड़े हो जाना, और फिर इन वर्षों के बीच का अन्तराल इतना बड़ा नहीं है कि इतिहास के लिए यह कोई दूर की बात हो. मजदूर वर्ग के असंतोष और वैचैनी के यहीं वे सिग्नल हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग द्वारा ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग की हमदर्द पार्टियों और बुद्धिजीवियों द्वारा नज़रंदाज किया जाता है. मजदूरों के प्रारंभिक सिग्नल भले ही किसी नज़दीक की क्रांति की और संकेत नहीं करते लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग को इन्हीं सिग्नलों को समझना है और इतिहास में अपने स्थान और जिम्मेदारी का भलीभांति निर्वाह करना है.

गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता
गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता

आज मजदूर वर्ग और क्रांतिकारी खेमा अलगाव और विखराव का शिकार है. लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी चुप्पी साधे हुए है. बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का समर्थन और हमदर्दी हमेशा मजदूरवर्ग से रही है. अपनी उच्चतम बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी बुद्धिजीवी लोग अपने स्वयं के वर्ग की सीमाओं को तोड़कर मजदूरों के साथ खड़े होते रहें है. बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा स्वयं को मजदूर वर्ग से अपने आप को अभेद भी पाता रहा है. लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. क्या भारत का बुद्धिजीवी इतना आत्मसंतुष्ट हो सकता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर हाँ  में है तो उसके बुद्धिजीवी होने पर प्रश्नचिह्न लगता है! लेकिन इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होती और न हो सकती है. समाजवादी खेमे के ढह-ढेरी हो जाने  के बाद हम भी मानते हैं कि समाज को आगे की ओर गति देने वाले आंदोलनों या क्रांतियों की प्रासंगिगता पर प्रश्न चिह्न लगा था और पूंजीवाद के अजर-अमर होने के भ्रम को भी खूब हवा मिली थी. अब स्थिति वैसी भी नहीं है. पूंजीवादी एक के बाद एक नए संकटों में फंसता जा रहा है. बुद्धिजीवियों के स्तर के अनुसार पूंजीवाद में भी ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें एक पल के लिए भी संतुष्ट कर पाए. इस प्रकार की स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रह सकती. यह बुद्धिजीवी वर्ग ही होता है जिसने सबसे पहले अपनी चुप्पी तोड़नी होती है क्योंकि अपनी संवेदनशीलता के कारण वहीँ पहला वर्ग होता है जो सबसे पहले टूटता है.

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गोरखपुर : इस पूरे आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया

देश में चुनाव हों लेकिन बुनियादी मुद्दे गायब हों ! एक ऐसा वक्त जब आम जनता अपने जिंदा रहने की लडाई लड़ रही हो और चुनावों में भाग लेनेवाली पार्टियों की ओर से अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जाना ! इसके अलावा राजनीतिक दलों की बहसों का स्तर इतना निम्न स्तर का कि बुद्धिजीवी तो क्या आम आदमी भी इसका नोटिस लेने से नहीं बच पाया. विचारधारात्मक, सैद्धांतिक और राजनीतिक बहस सिरे से ही गायब थी. सामाजिक बहस में भी मुद्दे गायब थे. केवल जोड़तोड़ या तिकड़म द्वारा किस दल की सरकार बनेगी, जैसी चर्चाओं पर अटकलबाजी होती रही. इस प्रकार की स्थिति पर  देश के बुद्धिजीवी वर्ग का मूक दर्शक बने रहना नागरिक समाज के लिए नुकसानदेय है. इतिहास में उसे अपनी भूमिका और स्थान की पहचान करनी ही होगी.

पूंजीपतियों के गुंडों द्वारा गुडगाँव में मजदूर की हत्या और गोरखपुर के मजदूर और मजदूर नेताओं पर झूठे मुकद्दमे निंदनीय हैं. मजदूर वर्ग के हितों पर इस प्रकार का कुठारघात असहनीय है. पूंजीपति इसके लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने पर तुले हुए हैं. हमारे पडौसी देश नेपाल जहाँ पशुओं की हत्या और अत्याचार पर रोक संबंधी बहस चल रही है और हमारे यहाँ मजदूरों पर इस तरह के जुर्म किये जा रहे हैं. नेपाल जैसे पिछडे देश के साथ तुलना करते समय हमारा सीना गर्व से फूल जाता हैं लेकिन अपने ही देश में पशुओं पर नहीं बल्कि इंसानों और मजदूरों पर होनेवाले जुर्म पर हम मूक बने रहते हैं, क्या इस प्रकार की स्थिति शोभनीय है? बुद्धिजीवी वर्ग को सोचना होगा कि सभ्य समाज को इस वक्त अगर कोई खतरा है तो वह पूंजीपतियों के गुंडों की दहशत और प्रशासनिक मिलीभगत से ही है. उसे अपना प्रतिरोध दर्ज करवाना होगा. यही समय की मांग है.

उपरोक्त पोस्ट पर लगी हुई सभी तस्वीरें नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ से धन्यवाद सहित ली गयी हैं.

गोरखपुर के मजदूर संघर्ष से संबंधित पोस्टें :

प्रो.एल.पी.जी. बुद्धिजीवी बनाम वामपंथी बुद्धिजीवी

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पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक में और उसके बाद भारत में एक ऐसा वर्ग पनपा है जिसे प्रो.एल.पी.जी. वर्ग के नाम से जाना जाता है. अंग्रेजी में इसका विस्तार है Pro. Liberalization, Privatization और Globalisation. इसके प्रबुद्ध नागरिकों में प्रोफेसर, इंजिनियर, डॉक्टर, विज्ञानी, जज,वकील , सिविल सर्वेन्ट्स वगैरा-वगैरा शामिल हैं. देश-दुनिया की समस्यायों पर यह वर्ग भी अपने फ़िक्र का इजहार करता रहता है जैसे बिजली ठप होने से आम आदमी परेशान, ट्रेफिक से आम आदमी परेशान, प्रदुषण से आम आदमी परेशान, पेट्रोल के दाम बढ़ने से आम आदमी परेशान, पुलिस की ज्यादतियों से आम आदमी परेशान, कानून-व्यवस्था से आम आदमी परेशान वगैरा-वगैरा. लेकिन यहाँ आम आदमी से अभिप्राय इस प्रो.एल.पी.जी. वर्ग से सम्बंधित लोगों से ही होता है. इनकी पसंदीदा नीतियों के कारण देश की 84 करोड़ आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, उनका इन आम आदमियों के फ़िक्र की  लिस्ट में कहीं कोई जिक्र नहीं होता. साफ और सीधे शब्दों में कहे तो इनकी नज़र में यह 84 करोड़ की आबादी ‘आम आदमी’ नहीं है.

अभी-अभी संपन्न हुए देश की महापंचायत के चुनावों से पहले इस वर्ग के प्रबुद्ध लोग प्रिंट मीडिया, रेडियो और टेलिविज़न पर अपने इस ‘आम आदमी’ के इस महापंचायत के चुनावों प्रति उपेक्षा से फिक्रमंद पाए गए. उनका मानना था कि देश की मिडल क्लास का अधिकांश वोट डालने नहीं जाता है. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ आबादी बड़े जोश-खरोश के साथ इन चुनावों में भाग लेती है. या यूँ कहें कि यह इलेक्शन इस 84 करोड़ आबादी की महत्वाकांक्षा की अभिव्यक्ति तो करता है लेकिन मिडल क्लास के लिए इसका कोई अर्थ नहीं है. तो इसके प्रबुद्ध नागरिकों का फिक्रमंद होना लाजिमी था. देश को योग द्वारा स्वस्थ करने का बीडा उठाने वाले बाबा रामदेव भी इनके फ़िक्र में शामिल हो गए. उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि इस लोकतंत्र की रक्षा के लिए वोट डालना हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी या मूलभूत कर्तव्य बना देना चाहिए. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ की वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है या इन चुनावों में भाग लेती है.

अब हम मान कर चलते हैं कि 84 करोड़  वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है लेकिन मिडल या अपर मिडल क्लास का बोट डालने प्रति रवैया नकारात्मक है. इसकी पड़ताल होनी चाहिए. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बुर्जुआजी इस देश के हर कोने में अपनी पैठ जमा चुकी है. कहीं ऐसा तो नहीं कि देश के हर कस्बे, हर गाँव में प्रभावशाली हो चुकी इस बुर्जुआजी के लोगों के असर के अधीन इस  84 करोड़ आबादी के लोग अपना वोट डालने के लिए बाध्य हों? क्योंकि कस्बों में ही नहीं बल्कि गांवों में भी देश के मजदूर वर्ग को अपनी श्रम शक्ति बेचने के लिए प्रभावशाली लोगों के सामने गिडगिडाना पड़ता है. भारत एक ऐसा देश है जहाँ श्रम-शक्ति सस्ती और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और मजदूरों को इसे बेचने के लिए आपस में होड़ करनी पड़ती है. इसका नतीजा यह होता है कि मजदूर को श्रम-शक्ति के खरीददार से मधुर सम्बन्ध बनाने पड़ते हैं. श्रम-शक्ति का खरीददार इस बुर्जुआ राज्य का एक प्रतिनिधि भी होता है. इस बात की पूरी सम्भावना है कि वह श्रम-शक्ति के मालिक यानि मजदूर को न केवल वोट डालने के लिए बाध्य करे बल्कि अपनी इच्छा के उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने के लिए बाध्य करे.

जहाँ तक मिडल या अपर मिडल क्लास के वोट न डालने का प्रश्न है तो इसके राज की कुंजी भी उपरोक्त तथ्य में छुपी हुई है. देश की पूंजीवादी प्रणाली द्वारा मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष का एक भाग इनके यहाँ सुनिश्चित रूप से पहुँचता रहता है. यह क्लास उतनी बाध्य नहीं हो सकती जितना कि मजदूर वर्ग.

अगर आपको उपरोक्त आकलन मनोगत लगता हो तो ज़रूरी है कि आप एक प्रश्नावली बनाएँ और अपने आस-पास के सौ-पचास मजदूर लोगों से प्रश्न करें. पूरी उम्मीद है कि नतीजा वही निकलेगा जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है. उपरोक्त आकलन उन बुद्धिजीवियों के लिए चुनौती के रूप पेश किया गया है जो 84 करोड़ की आबादी के इलेक्शन में भाग लेने पर गदगद है.

अब हम उस बुद्धिजीवी को लेते हैं जो इस Liberalization, Privatization और Globalisation को संशय की दृष्टि से देखता है. इसे वामपंथी बुद्धिजीवी कह सकते हैं. हालाँकि इस विपर्यय के दौर में उसकी स्थिति अल्पसंख्यक की ही है लेकिन फ़िक्र इस तथ्य से नहीं कि वह अल्पसंख्यक है फ़िक्र उसकी अकर्मण्यता से है. इन्हें अपनी अकर्मण्यता से छुटकारा पाना होगा. इन्हें तो लाज़मी एक प्रश्नावली बनानी चाहिए और इस बुर्जुआ लोकतंत्र की सार्थकता की पड़ताल करनी चाहिए. बुद्धिजीवियों के इस वर्ग के लिए माओ त्से तुङ के इन विचारों की आज भी पूरी सार्थकता है,

“चूँकि बुद्धिजीवियों का काम मजदूर-किसान जनसमुदाय की सेवा करना है, इसलिए, सर्वप्रथम और सर्वोपरि तौर पर, उन्हें उनको (यानी मजदूर-किसानों को – अनु.) जानना होगा तथा उनके जीवन, काम और विचारों से परिचित होना होगा. हम जनता के बीच जाने के लिए , कारखानों में और गांवों में जाने के लिए, बुद्धिजीवियों को प्रोत्साहित करते हैं. यदि आप अपने पूरे जीवन में एक मजदूर या किसान से कभी नहीं मिलते, तो यह बहुत बुरी बात है. हमारे सरकारी कर्मियों, लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों और वैज्ञानिक शोधकर्मियों को मजदूरों और किसानों के निकट जाने के लिए हर अवसर का लाभ उठाना चाहिए. कुछ लोग महज नज़र दौड़ने के लिए कारखानों और गांवों में जा सकते हैं; “इसे घोडे की पीठ पर बैठे-बैठे फूलों को देखना” कहा जा सकता है और इसका कोई फायदा नहीं हो सकता. दूसरे लोग वहां कुछ महीने रुक सकते हैं, जाँच-पड़ताल कर सकते हैं और दोस्त बना सकते हैं; इसे “फूलों को देखने के लिए (घोडे से -अनु.) नीचे उतरना” कहा जा सकता है. कुछ और दूसरे लोग वहाँ रुक सकते हैं और पर्याप्त समय तक, जैसे कि दो या तीन वर्षों तक या उससे भी अधिक समय तक वहां रह सकते हैं; इसे “बस जाना” कहा जा सकता है. कुछ बुद्धिजीवी मजदूरों और किसानों के बीच रहते हैं , जैसे कि, कारखानों में औद्योगिक तकनीशियन तथा देहातों में कृषि-तकनीशियन और ग्रामीण स्कूल शिक्षक. उन्हें अपना काम अच्छी तरह से करना चाहिए और मजदूरों और किसानों के साथ घुलमिल जाना चाहिए. हमें ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिसमें, “मजदूरों और किसानों का करीबी बन जाना” दरअसल एक आदत में ढल जाये, दूसरे शब्दों में, हमारे पास ऐसा करने वाले बुद्धिजीवियों की एक भारी संख्या होनी चाहिए. सभी तो नहीं लेकिन निश्चय ही, कुछ ऐसे हैं जो एक या दूसरे कारण से (मजदूरों-किसानों के बीच-अनु.) जा पाने में असमर्थ हैं, लेकिन हमें आशा है कि अधिक से अधिक जितने लोगों का जा पाना संभव होगा, वे जायेंगे. वे सभी एक ही समय नहीं जा सकते, लेकिन वे अलग-अलग समयों में टोलियों में जा सकते हैं. पुराने दिनों में जब हम लोग येनान में थे, बुद्धिजीवियों को सक्षम बनाया गया था कि वे मजदूरों और किसानों से सीधे संपर्क बना सकें. येनान में बहुतेरे ऐसे थे जिनकी सोच बहुत उलझी हुई थी और वे तमाम किस्म की अनोखी दलीलों के साथ सामने आते थे. हमारा एक फोरम था, जो उन्हें जनता के बीच जाने के लिए राय-परामर्श देता था. बाद में बहुतेरे गए, और नतीजा बहुत अच्छा रहा. एक बुद्धिजीवी का किताबी ज्ञान जब तक व्यवहार के साथ एकीकृत नहीं हो जाता, तब तक वह पूरा नहीं होता, बल्कि वह बहुत अधिक अधूरा भी हो सकता है. मुख्यत: पुस्तकों को पढने के ज़रिए ही बुद्धिजीवी हमारे पूर्वजों के अनुभवों को अर्जित करते हैं. निश्चय ही, पुस्तकें पढना ज़रूरी है; लेकिन यह अपने आप समस्याएं हल नहीं कर सकता. वास्तविक परिस्थिति का अध्ययन, व्यावहारिक अनुभव और ठोस सामग्री का परीक्षण, तथा मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना ज़रूरी है. मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना आसान काम नहीं है. अभी भी जब लोग कारखानों और गांवों में जा रहे हैं, कुछ मामलों में नतीजे अच्छे हैं लेकिन कुछ में नहीं हैं. यहाँ जो चीज निहित है वह है रुख या अवस्थिति का सवाल, यानी, व्यक्ति-विशेष के विश्व-दृष्टिकोण का सवाल. हम “सैंकडों विचार-सरणियों को परस्पर संघर्ष करने देने” की हिमायत करते हैं और जानने-सीखने की हर शाखा में बहुतेरी सरणियाँ और प्रवृत्तियां हो सकती हैं; लेकिन विश्व दृष्टिकोण के मामले में आज बुनियादी तौर पर सिर्फ दो सरणियाँ हैं, सर्वहारा और बुर्जुआ. इसमें से एक हो सकता है या दूसरा, या तो सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण या फिर बुर्जुआ विश्व-दृष्टिकोण. कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण किसी भी अन्य वर्ग का नहीं बल्कि सिर्फ सर्वहारा का विश्व-दृष्टिकोण है. हमारे आज के बुद्धिजीवियों में से अधिकांश पुराने समाज से और गैर-कामगार लोगों के परिवारों से आते हैं. जो मजदूरों या किसानों के परिवारों से आते हैं, वे भी अभी बुर्जुआ बुद्धिजीवी ही हैं क्योंकि मुक्ति से पहले जो शिक्षा उन्होंने हासिल की थी वह बुर्जुआ शिक्षा थी और उनका विश्व-दृष्टिकोण मूलत: बुर्जुआ था. यदि वे पुराने विश्व-दृष्टिकोण, अवस्थिति और भावनाओं में मजदूरों और किसानों से अलग बने रहेंगे, और वे गोल छेदों में चौकोर खूंटियों के समान होंगे, और मजदूर और किसान उनके सामने अपना दिल नहीं खोलेंगे. यदि बुद्धिजीवी खुद को मजदूरों और किसानों के साथ एकीकृत कर लें और उनके बीच दोस्ती बना लें तो जो मार्क्सवाद उन्होंने किताबों में पढ़ रखा है, वह सही मायने में अपना हो सकता है. मार्क्सवाद पर वास्तविक पकड बनाने के लिए, सिर्फ किताबों से ही नहीं, बल्कि मुख्यत: वर्ग-संघर्ष के ज़रिए, व्यावहारिक कार्य और मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए सीखना होगा. कुछ मार्क्सवादी किताबें पढने के साथ ही जब हमारे बुद्धिजीवी मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए और अपने खुद के व्यावहारिक कार्य के ज़रिए कुछ समझदारी हासिल कर लेंगे तो हम सभी एक ही भाषा, न केवल देशभक्ति की सामान्य भाषा और समाजवादी व्यवस्था की सामान्य भाषा बोलने लगेंगे बल्कि शायद कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण की सामान्य भाषा भी बोलने लगेंगे. यदि ऐसा हो जाता है तो हम सभी निश्चय ही बेहतर काम करेंगे.” (दर्शन विषयक सम्बन्धी पॉँच निबंध, पृ.114-16,  बिगुल पुस्तिका  श्रृंखला से)

सर्वहारा और कानून का सम्मान

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29.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

निजी संपत्ति समस्त पूंजीवादी समाज की आधारशीला है. न्याय और समानता के नाम पर बुर्जुआ ने इसे सामंतवाद की बेडियों से, एकाधिकार से और विशेषाधिकार से मुक्ति दिलाई. यह निर्दोष और सहज दिखनेवाली निजी सम्पति पूंजीवादी विकास के नियमों के कारण पूंजीवादी निजी संपत्ति में धीरे-धीरे तब्दील होने लगी अर्थात संपत्ति ने ऐसा रूप धारण किया जिसका अस्तित्व निजी संपत्ति से वंचित व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि पर निर्भर था. निजी संपत्ति की पवित्रता और अनुल्लंघनियता पर बुर्जुआ जितना अधिक संभ्रम फैलाता है, उसी व्यग्रता से वह इसे छोटे व्यापारी, कारीगर और किसान से छीनता जाता है. इस प्रकार वह उन्हें निजी संपत्ति से वंचित जन-साधारण अर्थात सर्वहारा में परिवर्तित  कर देता है. निजी संपत्ति के ध्वंस की मांग प्रस्तुत करके सर्वहारा मात्र उस वस्तु का ध्वंस चाहते हैं जो उनके लिए नष्ट हो चुकी है — वह चीज जिसका अभाव उनकी मौलिक अभिलाक्षणिकता है. सर्वहारा पुरानी व्यवस्था के विघटन से, मध्य वर्गों विशेषकर इनके निम्न संस्तर के क्षय से उद्भूत व्यक्तियों का समूह है. सर्वहारा की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में अपनी नयी अवधारणा का प्रतिपादन करते हुए मार्क्स लिखते हैं,

“हीगेल के न्याय-दर्शन की आलोचना करते हुए यदि सर्वहारा पूर्ववर्ती सामाजिक व्यवस्था के विघटन की घोषणा  करता है, तो वह मात्र अपने अस्तित्व के रहस्य को प्रकट कर रहा है क्योंकि वास्तव में उस व्यवस्था के विघटन से उसका जन्म हुआ है. सर्वहारा निजी संपत्ति के निषेध की मांग करता है तो वह महज़ एक ऐसी चीज को समाज के सिद्धांत का दर्जा दे रहा है जिसे समाज ने पहले से ही अपना सिद्धांत बना रखा है, जोकि सर्वहारा के रूप में, उसके सहयोग के बिना ही, समाज का एक नकारात्मक परिणाम बन गया है.”

पूंजीवादी व्यवस्था ने निजी सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए कानून बनाये हैं. पूंजीवादी विकास के दौरान ये तथ्य और अधिक स्पष्ट हो गया है कि ये कानून संपत्ति की सुरक्षा कर पाने में अक्षम साबित होते हैं चाहे उनका बहुत सावधानी से विस्तृत प्रतिपादन ही क्यों न किया गया हो. जहाँ तक मेहनतकशों का सम्बन्ध है, इन कानूनों को इसलिए बनाया जाता है ताकि उनकी निजी संपत्ति पर हमला करने से रोका जा सके. केवल कड़े संघर्ष और कई लोगों की कुर्बानियों के बाद सर्वहारा को अपनी एकमात्र संपत्ति अर्थात श्रमशक्ति के लिए कुछ कानूनी सुरक्षा हासिल हुई है. मेहनतकशों के निरंतर संघर्ष के बाद ही ऐसे कानून बनाये गए जो उनकी श्रमशक्ति को पूंजीपतियों के निर्मम शोषण से बचाते थे. इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की स्थिति को चित्रित करने वाली अपनी पुस्तक में एंगेल्स ने इन बुर्जुआ कानूनों पर मेहनतकशों के रुख, इन कानूनों के प्रति उनमें सम्मान के अभाव आदि का उत्कृष्ट चित्र प्रस्तुत किया है.

“कानून बुर्जुआ द्वारा गढा जाता है, उसकी सहमति से पारित किया जाता है और बुर्जुआ के लाभ और उसकी सुरक्षा के लिए तत्पर रहता है इसलिए बुर्जुआ की नज़र में कानून एक पवित्र चीज है. बुर्जुआ अच्छी तरह जानता है कि कोई कानून विशेष उसके किसी सदस्य के लिए हानिकारक हो सकता है लेकिन आमतौर पर कानून-संहिता बुर्जुआ के समग्र हितों की रक्षा करती है. केवल यही बात नहीं है. कानून की पवित्रता, प्रतिष्ठित संस्थाओं की अनुल्लंघनीयता जो समाज के एक हिस्से के सक्रिय संकल्प से स्थापित की जाती है और समाज के दूसरे हिस्से द्वारा निश्चेस्ट रूप से स्वीकार की जाती है –समाज में बुर्जुआ की अवस्थिति इन अमूर्त रूपों के सर्वाधिक ठोस आधार पर निर्भर करती है. अंग्रेज बुर्जुआ के लिए कानून एक पवित्र चीज है क्योंकि वह उसका प्रतिबिम्ब और उसके समान है ठीक उसी तरह जिस तरह ईश्वर उसका प्रतिबिम्ब और उसके समान है. यही वजह है कि पुलिस का डंडा (जो वास्तव में उसका अपना डंडा है) उसके मन को बहुत सकून देता है. लेकिन मजदूर को इसमें कोई पवित्रता नज़र नहीं आती है. कठोर अनुभव ने उसे सिखा दिया है कि कानून डोरियों से बना जाल है जिसे बुर्जुआ उसके लिए बुनता है. इसलिए परिस्थितियां उसे बाध्य न कर दें, मजदूर कानून की सहायता कभी नहीं मांगता है…”(एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, क्वेल्व का अनुवाद पृ. 227)

“क्या संपत्तिहीन के लिए चोरी से परहेज़ करने का प्रयाप्त आधार मौजूद रहता है? निसंदेह ‘संपत्ति की पवित्रता’ मुहावरा बहुत सुन्दर लगता है और बुर्जुआ के कानों को बहुत मधुर लगता है. लेकिन सम्पत्तिहीन के लिए संपत्ति को पवित्र समझना बहुत मुश्किल है. इस दुनिया ने मुद्रा को भगवन बना दिया है. बुर्जुआ सर्वहारा को धन से वंचित रखता है और इस प्रकार उसे मोटे तौर पर नास्तिक बना देता है. तब क्या हमें इस बात से हैरानी होनी चाहिए कि सर्वहारा अपनी नास्तिकता स्वीकार करता है और कि इस दुनिया के भगवान की शक्ति और पवित्रता पर उसकी श्रद्धा समाप्त हो गयी है? जब सर्वहारा वर्ग की गरीबी इस हद तक बढ़ जाती है कि जीवन की मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति का पूर्ण अभाव हो जाये, जब भूखमरी और कंगालीकरण तेजी से फैलने लगे तब मौजूद सामाजिक व्यवस्था के कानून की अवहेलना की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 115)

बड़े पैमाने के उद्योग की विकास प्रक्रिया और इसके फलस्वरूप शहरों में आबादी के बड़े हिस्से में जमावडे के कारण मजदूरों की समग्र मानसिकता बदल जाती है. जब मजदूर सामूहिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संगठित होता है तब उसे अपनी वर्ग स्थिति की जानकारी होती है. उसे यह मालूम हो जाता है कि एक-दूसरे से अलग रहने पर  वह कमज़ोर हो जाता है लेकिन एक साथ हो  जाने से वह ताक़तवर हो जाता है. उसे बुर्जुआ से अपने विभेद का तीव्र अहसास होने लगता है. तब वह अपने बारे में सोचने लगता है, उसका अपना दृष्टिकोण विकसित होने लगता है, उसकी स्थिति के अनुकूल विचार और दृष्टिकोण पनपने लगते हैं. तब उसे अपनी गुलामों जैसी स्थिति का भान होता है और धीरे-धीरे राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं की समझ विकसित होने लगती है. पुराने पितृसत्तात्मक सम्बन्ध बड़ी चतुराई से मेहनतकश की गुलामी पर पर्दा डाल देते थे और बौद्धिक दृष्टिकोण से मेहनतकश अपने हितों से अनभिज्ञ और सामान्य ज्ञान से वंचित निर्जीव वस्तु-सा था. जब मालिक और कारिंदे के बीच का एकमात्र सम्बन्ध सिर्फ इस सम्बन्ध से लाभ निचोड़ने में मालिक का व्यक्तिगत हित ही है, जब सारी हमदर्दी ख़त्म हो गयी और उसका कोई निशान शेष न बचा — तभी मेहनतकश को अपनी स्थिति और अपने हितों की चेतना हुई और उसका बौद्धिक पुनर्जन्म हुआ. तभी उसने संवेदना, विचार और उद्यम के क्षेत्र में मालिक का अनुसरण करना बंद कर दिया.

बुर्जुआ वर्ग और उसके बीच रहने वाले मजदूरों के बीच समानता के सापेक्ष बुर्जुआ और विश्व के पिछडे राष्ट्रों के बीच साम्य अधिक है. मजदूर अलग बोली बोलता है. मजदूर और बुर्जुआ के विचार और कल्पनाएँ परस्पर विरोधी होती हैं. उनकी आदतें, नैतिक सिद्धांत, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टिकोण एकदम भिन्न होते हैं. बुर्जुआ और सर्वहारा पृथक राष्ट्र होते हैं. वे एक दूसरे से इतना अलग होते हैं कि उन्हें दो प्रजातियाँ कहा जा सकता है. डिज़रायली का उपन्यास ‘सिबिल, ऑर द टू नेशन्ज़‘ की रचना 1845 में की गयी थी. उसी समय यानि कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के तीन साल से भी कम समय पहले अँग्रेज़ मजदूर वर्ग की स्थिति पर एंगेल्स की पुस्तक की रचना की गयी थी. डिज़रायली ने पुरानी पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग किया था और अपने पाठकों को बताया था कि “अमीर” और ‘गरीब” ही दो राष्ट्र होते हैं. लेकिन अब हम बाखूबी समझ सकते हैं कि बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच चौडी होती जा रही खाई, मानसिक और शारीरिक दोनों किस्म की, ने नौजवान अनुदार राजनीतिक को बहुत प्रभावित किया था.

बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ

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– अमेरिका स्थित एक अध्ययन समूह सिटीग्रुप ने कहा है कि निर्यात आधारित जैसे कि जवाहरात, आभूषण, आटो इण्डस्ट्री और टेक्सटाइल सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले उद्योग है जिनमें 2008 के आखि़र में 5,00,000 नौकरियाँ ख़त्म हो गयीं। यह आँकड़ा केवल उस संगठित क्षेत्र का है जो देश की काम करने वाली जनसंख्या का सिर्फ 10 प्रतिशत है।

– अमेरिका में दिसम्बर 1974 के बाद सबसे ज़्यादा नौकरियाँ जाने के आँकड़े को छूते हुए 2008 की शुरुआत से अब तक 30 लाख नौकरियाँ ख़त्म हो गयी हैं। यह गिरावट द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है।

– अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने वैश्विक बेरोज़गारी के 2 से 5 करोड़ होने का पूर्वानुमान लगाया है।

– विश्व बैंक का पूर्वानुमान है कि मन्दी के चलते 2008 के मुकाबले 2009 में औद्योगिक उत्पादन 15 प्रतिशत तक कम हो सकता है। यह भी बताया गया कि 116 विकासशील देशों में से 94 देशों में आर्थिक विकास में कमी आयी है। इनमें से 43 देशों में ग़रीबी का स्तर ऊँचा है।

– पिछले साल नवम्बर में सरकार और विपक्ष द्वारा आलोचना करने के बाद हमारे देश के उद्योग संगठन एसौचेम ने कुछ उद्योग क्षेत्रों की नौकरियों में 25-30 प्रतिशत कमी आने की अपनी रिपोर्ट को वापस ले लिया था।

– राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे संस्थान के अनुसार भारत में शहरी ग़रीबी 25 प्रतिशत से ज़्यादा है। शहरों में 8 करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीबी में जीते हैं। यह संख्या मिड्ड की जनसंख्या के बराबर है। शहरी ग़रीबी अरक्षित समूहों जैसे महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों की विशेष ज़रूरतों के अलावा रहने, साफ पानी, साफ-सफाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और रोज़गार की समस्याएँ पैदा करती है।

– 2001 की जनगणना के मुताबिक बड़े शहरों की शहरी आबादी का 22.6 प्रतिशत हिस्सा यानी लगभग सवा चार करोड़ लोग झुग्गियों में रहते हैं। यह मोटे तौर पर स्पेन या कोलम्बिया के आकार के बराबर है।

– झुग्गियों में रहने वाले सबसे ज़्यादा लोग, लगभग एक करोड़ 12 लाख, महाराष्ट्र में हैं। झुग्गियों की आबादी बढ़ी है लेकिन झुग्गियों की संख्या कम हुई है यानी सघन हुई हैं।

– संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने जी-20 देशों की बैठक में कहा कि मन्दी का असर ग़रीब देशों में कहीं ज़्यादा पड़ता है सिर्फ नौकरी जाने या आमदनी कम होने के तौर पर ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा सूचकों – जीवन सम्भाव्यता, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या और पढ़ाई पूरी करने वाले बच्चों की संख्या में यह दिखायी देता है। आर्थिक मन्दी की सबसे ज़्यादा मार झेलने वाले लोगों में ग़रीब देशों की महिलाएँ, बच्चे और ग़रीब होते हैं। हाल में मन्दी के दौरान के आँकड़े बताते हैं कि स्कूली पढ़ाई छुड़वाने वाले बच्चों में लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या बहुत ज़्यादा थी।

– मन्दी के नतीजे में चीज़ें महँगी होती हैं, ग़रीबी बढ़ती है और ग़रीबी बढ़ना अपने आप मृत्यु दर बढ़ने में बदल जाता है। जैसेकि सकल घरेलू उत्पाद में 3 प्रतिशत की कमी को प्रति 1000 शिशुओं के जन्म पर 47 से 120 और ज़्यादा मृत्यु दर से जोड़ा जा सकता है। विकासशील देशों में उस देश के अमीर बच्चों की तुलना में ग़रीब बच्चों के मरने की सम्भावना चार गुना बढ़ गयी है और लड़कों की तुलना में लड़कियों की शिशु मृत्युदर पाँच गुना बढ़ गयी है।

– यह संकट ग़रीब देशों में कई लोगों के लिए जीवन और मौत का सवाल है और आर्थिक विकास, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या और मृत्यु दर के पुराने स्तर पर पहुँचने में कई साल लग सकते हैं। अनुमान के मुताबिक 2010 में आर्थिक स्थिति बहाल होने तक मानव विकास को पहुँची चोट गम्भीर होगी और सामाजिक बहाली में कई साल लगेंगे। पुराने संकट का इतिहास बताता है कि इसके दुष्प्रभाव 2020 तक पड़ते रहेंगे।
‘बिगुल’ मई 2009 से साभार

मुरादनगर के पावरलूम मजदूरों ने शोषण के खिलाफ आवाज उठाई

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मोदीनगर देश के किसी भी दूसरे कस्बे की तरह खामोश और ठहरा हुआ नज़र आता है. यह गाजियाबाद से २२ किलोमीटर दूर मेरठ रूट पर स्थित है. अभी हाल के दिनों में यहाँ के माहौल में हलचल देखी गई. करीब ८ हज़ार मजदूरों ने यहाँ अपनी मांगों को लेकर एक बड़ी सभा की. पिछ्ले २० साल से पशु की तरह पावरलूम उद्योग में अपना हाड़मांस गलातेगलाते थक चुके मजदूरों ने लम्बी चुप्पी तोडी और मालिकों के बर्बर शोषण के विरुद्ध आम सभा में खुले में आवाज उठाई.

मोदीनगर में पावरलूम की ४०० से ज्यादा फ़ैक्ट्रियां हैं. फैक्ट्रियों की इमारतें मुर्गियों के लंबेलंबे दडबों की तरह हैं. हवा और धूप के लिए शायद ही रोशनदान छोडे गए हैं. फैक्ट्री ईमारत की ऊंचाई कम होने की वजय से काम की जगह पर घुटन बढ़ जाती है. लूम चलते वक्त धागों से उड़ने वाले मशीन रेशे बिना रोकटोक के मजदूरों के फेफडों में समा जाते हैं. नतीज़तन टीवी की बीमारी आम बात है. खुली हुई बिजली की मोटरों और यहाँ वहां बिखरते नंगे तारों की चपेट में मजदूर अकसर ही आ जाते हैं. चूंकि क़स्बा बहुत खुलाखुला है इसलिए मालिकों को यह हमेशा सुविधा रहती है कि दुर्घटना में मारे गए मजदूर की लाश को खेतों में या सड़क किनारे कहीं भी फिंकवा दे. वैसे लूम के मालिक काफी रहमदिलहैं. वो पहले तो मजदूरों को फैकट्री में सोने की इजाजत दे देते हैं लेकिन फ़िर उन्हीं पर चोरी का इल्जाम लगाकर हवालात की हवा और पुलिस की लात भी खिलवाते हैं. इस तिकड़म का इस्तेमाल वे आन्दोलन को तोड़ने और बदनाम करने के लिए करते हैं.

मजदूरों ने बताया कि पिछले २० सालों से उनकी मजदूरी नहीं बढ़ी है. आज २.५ रूपए से ३ रूपए प्रति चादर की दर पर भुगतान किया जा रहा है. जब मजदूरी बढ़ाने की बात मालिकों के सामने रखी गई तो उन्होंने प्रति मजदूर मशीन की संख्या दो से बढाकर चार कर दी. इस तरह मजदूरी की पुरानी दर कायम रखते हुए मालिकों ने शोषण को दुगना कर दिया.

यहाँ काम के घंटों की कोई सीमा नहीं है. कई मजदूर तो फैक्टरियों में ही रहते हैं और उन्हें कभी भी काम पर बुला लिया जाता है. अभी तक इतवार की छुट्टी भी नहीं होती थी. आन्दोलन के बाद मालिकों ने इतवार की छुट्टी मंज़ूर की. ईएसआई, पीएफ, हाजरी रजिस्टर, जॉब कार्ड, बोनस आदि किसी भी कानून को लागू नहीं किया गया है.

मजदूरों में बढ़ते असंतोष और संगठन को भांप कर प्रशासन ने वार्ता सुलहसमझौते का नाटक खेलना शुरू कर दिया है. मालिकों और उच्चाधिकारियों की उपस्थिति में हुई बैठकों में अभी तक मजदूरों को कुछ मामूली रियायतें ही हासिल हुई हैं. अपने अनुभवों से वे समझने लगे हैं कि एकजुट संघर्ष के बिना कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता.

—‘बिगुलसंवाददाता अक्टूबर २००८