बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

चुनाव, राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी

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हमने लिखा था कि वर्तमान संसदीय प्रणाली द्वारा मजदूर वर्ग कभी सत्ता प्राप्त नहीं कर सकता. लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि मजदूर वर्ग चुनाव प्रक्रिया में बिलकुल भाग नहीं लेता. एक वोटर के रूप में वह इसमें भाग जरूर लेता है लेकिन प्रभुत्वशाली लोगों में से किसी एक को चुनने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं होता.मजदूर वर्ग और पूंजीपति वर्ग के परस्पर विरोध द्वारा एक्यबद्ध और गतिशील वर्तमान वर्गीय समाज जो कि अलग-अलग पड़ावों से गुजरकर वर्तमान पूंजीवादी जनवादी प्रणाली के साथ प्रकट होता है, अपने पूर्व के वर्गीय समाजों की भांति सम्पत्तिहीन – वर्तमान में सर्वहारा वर्ग को – सत्ता में कितनी भागीदारी दे सकता है (या नहीं दे सकता है), की जाँच-पड़ताल हेतू जरूरी है कि हम कुछ अति महत्वपूर्ण तथ्यों और आंकडों पर नजर दौडाएं जो हाल ही में संपन्न हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में सामने आये हैं.  इससे हम यह भी आसानी से समझ सकते है कि किस प्रकार यह चुनाव प्रणाली पूंजी और जनता के बीच चलने वाले विरोध का हल करती है. चुनावों की हकीकत को जानने के लिए और इस पूरी चुनाव प्रक्रिया की सार्थकता संबंधी आम लोगों में जाकर उनके नज़रिए को जानने की कोशिश करें तो इसकी असलियत को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है. हमारी इस रिपोर्ट का आधार पिछले दिनों संपन्न हुई विधान सभा के चुनावों पर अलग-अलग लोगों के विचार और प्रतिक्रियाएं हैं.

1. पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान चाहे वे राजनीतिक दलों के मंच रहे हों या फिर प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के – बहस का स्तर बहुत निम्न दर्जे का रहा है. इनकी बहस में गंभीर किस्म के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सरोकार गायब थे. राजनीतिक दलों में बहुत निम्न स्तर की लांछनबाजी  देखने को मिली. स्वयं बुर्जुआ वर्ग द्वारा स्वीकृत आचार-व्यवहार का पूर्ण अभाव नजर आया. गंभीर सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों की अपेक्षा, जीत-हार संबंधी जोड़-तोड़, धार्मिक और जाति आधारित प्रतिक्रियावादी समीकरणों द्वारा जोड़-घटा के फार्मूलों की खोज और समीक्षा का प्रभुत्व था.

2. अख़बारों और टीवी पर अपने हक़ में प्रचार करवाने हेतू और अपने विरोधी उम्मीदवार के विरुद्ध -समाचार प्रकाशित करवाने हेतू, लाखों और करोडों के सौदे तय हुए. मीडिया की रिपोर्ट अनुसार कई दैनिक अख़बारों ने २५ से ५० लाख तक के सौदे किये.

3. सारी चुनाव प्रक्रिया इतनी महँगी थी कि देश की बहुसंख्यक आबादी अपने आप ही, इस चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित हो गयी है.  चुनाव दफ्तर से जारी सूचना में उम्मीदवारों के रोजाना खर्च का ब्योरा प्रकाशित किया गया है. इनकी रिपोर्ट के अनुसार कुछ उम्मीदवारों का दैनिक खर्च दो सौ रूपये से तीन सौ रूपये तक का था. इन वेचारे गरीब उम्मीदवारों में कुछ ऐसे उम्मीदवारों के नाम भी शामिल थे जिनकी चुनाव मुहीम की तामझाम, लाम-लश्कर और खर्चीली चुनाव रैलियों की आभा मध्यकालीन युग के राजाओं-महाराजाओं को भी मात दे दे!  चुनाव कमीशन को भले ही यह सब नज़र न आया हो लेकिन आम लोग पानी की तरह बहाए जानेवाले इस धन और शक्ति के प्रदर्शन के प्रत्यक्ष गवाह हैं.

4. वाम संसदीय पार्टियाँ जो सैद्धान्तिक तौर पर लोगों प्रति प्रतिबद्धता का दावा करती रहती हैं – इस सारे दृश्य के आन्तरिक सच का पर्दाफाश करते हुए, मजदूर और मेहनतकश लोगों की चेतना को उन्नत करने की बजाय, लगभग दूसरी पार्टियों की तरह इस्तेमाल होने वाले हथकंडों की नक़ल करती हुई नज़र आयीं. प्रतिस्पर्धा के इस युग में जिस प्रकार मण्डी में छोटा उत्पादन, बड़े स्तर पर होने वाले उत्पादन के आगे, नहीं टिक सकता, उसी तरह, संसदीय वामपंथी पार्टियाँ भी लगातार हाशिये पर आ रही हैं.

लोग चुनावों में हिस्सा क्यों लेते हैं – किस तरह लेते हैं ?

सैद्धांतिक तौर पर कहा जाता है कि चुनाव द्वारा लोग अपनी सरकार चुनते हैं जिसने आनेवाले पॉँच वर्षों के लिए देश या संबंधित राज्य का प्रबंधन संचालित करना  होता है. सरकार इस समग्र राजतन्त्र जिसमें पुलिस, फौज और न्यायपालिका भी सम्मलित होती है, का एक अहम् हिस्सा होती है.  सभ्यता के इतिहास में राज्य-प्रबंधन के सञ्चालन के लिए बननेवाली सरकारों के रूप सदैव एक जैसे नहीं रहे. आदिम समाज के कबीलाई गणराज्यों से चलकर पूरे मध्य युग में राजशाहियों के अलग-अलग रूपों से गुजरते हुए सरकारों का आधुनिक रूप – जिसे जनता की जनता  द्वारा और जनता  के लिए सरकार का नाम दिया जाता है – आज के विश्व में, सरकार का प्रमुख रूप (मॉडल ) है. राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान इसी रूप अथवा मॉडल से संबंधित तथ्यों ने जिस तस्वीर को उभार कर हमारे सामने पेश किया है, उनका संक्षिप्त परिचय और सार निम्नलिखित है.,

1. सबसे पहले, चुनावों के दौरान सबसे अधिक क्रियाशील हिस्सा – राजनीतिक पार्टियाँ और उनके कार्यकर्त्ताओं की बात करें. बड़ी राजनीतिक पार्टियों की टिकट के लिए दौड़, जहाँ प्रचार माध्यम के लिए बड़ा मसाला तैयार करती रही, वहीँ आम जनता में इस संबंधी चर्चा ने पूरी चुनाव मुहीम को दिलचस्प बनाये रखा. टिकट हासिल करने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते हैं – बड़ी गिनती में टिकटों के चाहवान अपने-अपने हक़ में मुहीम लामबद्ध करते हैं.  लोगों की भीड़ जुटाकर दवाब बनाया जाता है. लेकिन दिलचस्प पहलू यह होता है कि वे कौन लोग होते हैं जो इनकी भीड़ जुटाते हैं? ये वहीँ लोग होते हैं जिनकी बहुसंख्यक गिनती को राजनीतिक पार्टियाँ अपने सक्रीय और जमीन से जुड़े हुए कार्यकर्ता बताती हैं. इन्हीं स्थानीय लोगों में, आर्थिक तौर पर प्रभावशाली और राजनीतिक पृष्ठभूमि के परिवारों से कुछ बेहद महत्त्वाकांक्षी नौजवान, नेतृत्त्व की भूमिका निभाते दीखाई देते हैं. गरीब किसान, मध्यम वर्ग और दलित मजदूर वर्ग से भी कुछ लोग , बेशक दूसरे दर्जे की भूमिका निभाने के लिए ही सही, इनका हिस्सा बनते रहते हैं. लोगों के काम निकलवाने के नाम पर बने ये स्वयंभू लोकसेवक, प्रशासन और आम लोगों में मध्यस्ता करने के साथ-साथ, ज्यादातर पुलिस के मुखबिर और टाउट का धंधा करते हैं. किसानों और मध्यम वर्ग का वह हिस्सा जो  पूंजीवाद के विकास के फलस्वरूप उजड़कर ऐयाश, पाकेटमार, चोर, उचका आदि बन जाता है, जिसे मार्क्स लम्पट सर्वहारा कहते हैं, भी इसी तरह का लोकसेवक होता है. ज्यादातर इस प्रकार के लोकसेवकों को, किसी राजनीतिक दल के बड़े नेता की सरपरस्ती हासिल होती है. अक्सर ये छोटे नेता भी अपने साथ, अपनी हैसियत अनुसार, चापलूसों का एक घेरा बनाकर रखते हैं. अपनी इसी हैसियत का प्रयोग ये लोग अपनी आर्थिक हालत को सुधारने के लिए करते हैं. इसमें मुख्य तौर पर सरकारी ठेके लेने के अलावा, पुलिस और राजनीतिक नेताओं की सरपरस्ती में, कई तरह के अवैध धंधे भी शामिल होते हैं. यहीं स्थानीय नेता, शहरों और गांवों में, अपने सरपरस्त  नेता का गुणगान करते हुए, उनकी साफ़-सुथरी और स्वच्छ छवि के व्याखान करते, उनकी शक्ति और सामर्थ्य की कहानिया सुनाते हुए, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री और पार्टी के बड़े नेताओं के साथ उनकी नजदीकी का विश्वास दिलाते हुए, आम वोटरों को अपने मनपसंद लीडर के हक़ में फुसलाते हुए, कभी नहीं थकते. पहले ये नेता, अपने सरपरस्त बड़े नेता के लिए टिकट हेतू भीड़ जुटाते हैं फिर उनकी इच्छानुसार वोट डलवाते हैं. गरीब जनता को मिलनेवाली सरकारी सहूलतें, मिसाल के लिए, बुढापा पेंशन, पीले कार्ड बनवाना, गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को सस्ते रेट का अनाज और मकान  बनवाने के लिए ग्रांट वगैरा, जो आधे-अधूरे तरीके से, केवल मुट्ठीभर लोगों के पास ही पहुंचती हैं – इन्हीं सहूलतों का सेहरा, व्यक्तिगत तौर पर अपने सिर लेते हैं. अपने हक़ में वोट भुगताने के लिए ये नेता जी-जान से कोशिश करते हैं.

2. मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में होनेवाले कुत्ताघसीटी वैसे तो प्रतिदिन चौबीसों घंटे चलती रहती है लेकिन चुनावों के समय इसका नज़ारा बहुत ही दिलचस्प हो जाता है. इन वर्गों से संबंधित लोगों के बयान ही नहीं बदलते, दल भी बदल जाते हैं. आश्चर्य और अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है लेकिन है यह सच कि इन्हीं वर्गों से कुछ लोगों द्वारा एक ही दिन में एक से अधिक दलों में अदला-बदली और आना-जाना होता रहता है  और इस प्रकार अपनी शख्सियत की कायापल्टी करते हुए ये लोग अच्छा खासा मनोरंजक समां भी बांधे रखते हैं.

3. किसी भी चुनाव बूथ पर नजर रखने पर आपको लगेगा कि खाते-पीते घराने के लोग दोपहर से पहले ही अपने मत का प्रयोग कर जाते हैं जबकि सर्वहारा जनता दोपहर बाद आती है. बूथ के आस-पास मौजूद लोगों में चर्चा का  विषय होता है कि मजदूर लोग वोट डालने तब आएंगे जब नकद पैसे वसूल कर लेंगे. इस प्रकार की चर्चा से हम यह गलत निष्कर्ष निकाल लेतें हैं कि केवल मजदूर वर्ग अपना वोट बेचता है लेकिन मध्यम वर्ग नहीं. वह भी प्रभावित होता है, बल्कि ज्यादा प्रभावित होता है. या यूं कहिये कि उसकी प्रभावित होने की औकात ज्यादा है और वह अधिक कीमत लेता है. इस वर्ग का एक हिस्सा राजनीती में इस प्रकार सक्रीय होता है कि वह समाज की बहुसंख्यक  आबादी को प्रभावित करता है और उस बहुसंख्यक आबादी के वोटों को भी वेचने की योग्यता रखता है. मध्यम वर्ग का वोट बेचने का तरीका साधारण न होकर जटिल होता है और जरूरी नहीं होता कि वह मजदूर की भांति मौके पर ही सौदा करे. उसके सौदेवाजी के गुर जटिल और दीर्घकालिक होते हैं. इसी वर्ग ने सरकारी पद,लाइसेंस और ठेके हथियाने होते हैं.इसी वर्ग से उजड़कर लम्पट मजदूर के रूप में प्रकट हुए नए वर्ग  के लोग अपने ही नहीं बल्कि मजदूरों के वोट भी बेच जाते हैं. पूंजीपतियों और धनासेठों से मिलनेवाली सफ़ेद और काले धन की थैलियाँ, बुर्जुआ पार्टियों के लोगों द्वारा, प्राय इन्हीं  लोगों को सौंपी जाती हैं, क्योंकि यही वे लोग होते हैं जो पूंजीपतियों की अपेक्षा मजदूर वर्ग में आसानी से घुल-मिल जाते हैं. उन्हें यह सहूलियत होती है की वे पूंजीपतियों द्वारा लुटाई (???) गई इस धनराशी के एक हिस्से को मजदूरों में बाँट सके लेकिन बड़े हिस्से को स्वयं हड़प कर जाएँ.

4. जहाँ तक मजदूर वर्ग के मतदान करने और वोट बेचने का सवाल है तो जिस प्रकार न चाहते हुए भी वह एक उजरती गुलाम  के रूप में पूंजीपतियों के खेतों और कारखानों में सोलह-सोलह घंटे खटने के लिए विवश होता है – उसे अपनी श्रम-शक्ति को बेचना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार वह मजबूरीवश मतदान करने और वोट बेचने के लिए भी बाध्य होता है. पूंजीपति वर्ग और बुर्जुआ मीडिया के लिए चुनाव भले ही एक जश्न रहा हो लेकिन मजदूर वर्ग से बातचीत करने पर इसकी असलियत कुछ और ही बयान करती नज़र आती है.

5. इस क्रियाशील हिस्से की चर्चा के बाद  लोगों के व्यवहार की चर्चा करें तो जो दृष्टान्त नजर आता है वह एकसार नहीं है. अलग-अलग वर्गों में विभाजित होने के कारण लोग, चुनावों के बारे में एक जैसा दृष्टिकोण नहीं रखते. अमीर लोगों, कारखानेदारों, व्यापारियों, उच्च मध्यम वर्ग,पेशेवर लोग (डॉक्टर वकील आदि) और अमीर किसानों के लिए, सरकार और उसके दरबार में दस्तक देनें का यह एक सुनहरी अवसर होता है. तेजी से अमीर होने की लालसा की पूर्ति हेतू राजतन्त्र और खास करके  नौकरशाही और पुलिसतंत्र के साथ मजबूत गठजोड़ करने के लिए, इस तरह के संपर्क आवश्यक होते हैं. इस कार्य हेतू ये वर्ग चंदे मुहैया करवाते हैं. व्यवहारिक तौर पर ये लोग इस चुनाव प्रक्रिया के साथ पूरी तरह जुड़े होते हैं.

6. देश के उत्पादन के साधनों का मालिक बनी भारत की वर्तमान बुर्जुआ जमात के पास बेचने के लिए वह सबकुछ है जो मजदूरवर्ग ने पैदा किया है. इसी के बदौलत उसकी हैसियत एक अच्छे खरीदार की भी बन जाती है. कहने का अर्थ यह है कि वह बिकता नहीं बल्कि खरीददार होता है. एक वर्ग के रूप में वह अच्छी तरह जानता है कि कौन-कौन से राजनीतिक दल, किस हैसियत और रूप में, किस-किस प्रकार की भूमिका, उसके हितों की रक्षा करने हेतू, निभा सकते हैं. मजदूरों को मजदूरी देते समय कठोर और उग्र स्वभाव का यह पूंजीपति वर्ग इन राजनीतिक दलों को चंदा देते समय एकदम उदार और विनम्र दीखता है.

7. ज्यादातर शहरी और ग्रामीण मजदूर और गरीब किसान और छोटे दुकानदार, जिनकी ज़िन्दगी की खुशहाली के सभी दरवाजे बंद हो चुके हैं, निराशा और बेबसी के शिकार हैं. ये लोग दिल से किसी भी पार्टी या नेता पर विश्वास नहीं करते. ऊपर वर्णित राजनीतिक कार्यकर्त्ता जो अमीर होने की लालसा के चलते, हर प्रकार के नैतिक बंधनों से मुक्त हैं, जब गरीब जनता की बेबसी और मजबूरी को अपने हक़ में भुगतान करवाने में सफल हो जाते हैं, तो यह भ्रम पाल लेते हैं कि गरीब वोटरों को खरीद लिया गया है. हर प्रकार के नशे, पैसा, शराब, धार्मिक और जातीय नेताओं के फरमान और डरावे, इनके आम हथियार हैं.

8. बेहद बुरे, सामाजिक-आर्थिक हालात के प्रतिक्रियास्वरूप कुछ लुम्पन तत्त्व पैदा होते रहते हैं. गरीब आबादी के बीच का लुम्पन हिस्सा, बहुत हद तक और जल्दी ही इन लोगों का दुमछल्ला बन जाता है. पर देखने में आया है कि आम मेहनतकश आबादी का विश्वास यह गँवा चुका है. उत्पादन की क्रिया में जैसे उजरती मजदूर अपनी इच्छा के विपरीत, पूंजीपति की शर्तों पर काम करने के लिए मजबूर है – लगभग उसी तरह अपनी बेबसियों के सदके, यह उनके लिए मतदान करता है.

अपनी प्रसिद्ध रचना ‘परिवार, निजी सम्पति और राज्य की उत्पत्ति’ में फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं,

“इतिहास में अब तक जितने राज्य हुए हैं, उन्में से अधिकतर में नागरिकों को उनकी धन-दौलत के अनुसार कम या ज्यादा अधिकार दिए गए हैं, जिससे यह बात सीधे तौर पर साबित हो जाती है कि राज्य सम्पत्तिवान वर्ग की सम्पत्तिहीन वर्ग से रक्षा करने का एक संगठन है. एथेंस और रोम में ऐसा ही था, जहाँ नागरिकों का संपत्ति अनुसार विभाजन किया जाता था. मध्ययुगीन सामंती राज्य में भी यही हालत थी जहाँ राजनीतिक प्रभाव की मात्रा भू-स्वामित्व के पैमाने से निर्धारित होती थी. आधुनिक प्रातिनिधिक राज्यों में जो मताधिकार-अहर्ता पाई जाती है , उसमें भी यह बात साफ़ दिखाई देती है. तिस पर भी स्वामित्व के भेदों की राजनीतिक मान्यता किसी भी प्रकार अनिवार्य नहीं है : इसके विपरीत, वह राज्य के विकास के निम्न स्तर का द्योतक है. राज्य का सबसे ऊँचा रूप, यानि जनवादी जनतंत्र, जो समाज की आधुनिक परिस्थितियों में अनिवार्यत: आवश्यक बनता जा रहा है और जो राज्य का एकमात्र रूप है जिसमें ही सर्वहारा तथा पूंजीपति वर्ग का अंतिम और निर्णायक संघर्ष लड़ा जा सकता है – यह जनवादी जनतंत्र औपचारिक रूप से स्वामित्व के अंतर का कोई ख्याल नहीं करता. उसमें धन-दौलत अप्रत्यक्ष रूप से, पर और भी ज्यादा कारगर ढंग से, अपना असर डालती है. एक तो सीधे-सीधे राज्य के अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के रूप में, जिसका क्लासिकीय उदाहरण अमरीका है. दूसरे, सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज को अपना केंद्र बनाती हुई न केवल यातायात को, बल्कि उत्पादन को भी अपने हाथ में केन्द्रित करती जाती हैं, उतनी ही अधिक आसानी से यह गठबंधन होता जाता है. अमरीका के अलावा नवीनतम फ्रांसीसी जनतंत्र भी उसके ज्वलंत उदाहरण हैं और नेक बुढे स्विटज़रलैंड ने भी इस क्षेत्र में काफी मार्के की कामयाबी हासिल की है. परन्तु सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज के इस बन्धुत्वपूर्ण गठबंधन की स्थापना करने के लिए जनवादी जनतंत्र की आवश्यकता नहीं है. इसका प्रमाण इंग्लैंड के अलावा नवीन जर्मन साम्राज्य भी है, जहाँ कोई नहीं कह सकता कि सार्विक मताधिकार लागू करने से किसका स्थान अधिक ऊँचा हुआ है -बिस्मार्क का या ब्लाइखरोडर का. अंतिम बात यह है कि सम्पत्तिवान वर्ग सार्विक मताधिकार के द्वारा सीधे शासन करता है. जब तक कि उत्पीडित वर्ग – परिणामस्वरूप इस मामले में सर्वहारा वर्ग – इतना परिपक्व नहीं हो जाता कि अपने को स्वतन्त्र  करने के योग्य हो जाये, तब तक उसका अधिकांश भाग वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को ही एकमात्र संभव व्यवस्था समझाता रहेगा और इसलिए वह राजनीतिक रूप से पूंजीपति वर्ग का दुमछल्ला, उसका उग्र वामपक्ष बना रहेगा. लेकिन जैसे-जैसे यह वर्ग परिपक्व होकर स्वयं अपने को मुक्त करने के योग्य बनाता जाता है, वह अपने को खुद अपनी पार्टी के रूप में संगठित करता है, और पूंजीपतियों के नहीं, बल्कि खुद अपने प्रतिनिधि चुनता है. अतएव, सार्विक मताधिकार मजदूर वर्ग की परिपक्वता की कसौटी है. वर्तमान राज्य में वह इससे अधिक कुछ नहीं है और न कभी हो सकता है; परन्तु इतना काफी है. जिस दिन सार्विक मताधिकार का थर्मामीटर यह सूचना देगा कि मजदूरों में उबाल आनेवाला है , उस दिन मजदूर पूंजीपतियों की ही तरह जान जायेंगे कि उन्हें क्या करना है.”

वे आगे लिखते हैं,

“इस संविधान को अपनी नींव बनाकर सभ्यता ने ऐसे-ऐसे काम कर दिखाए हैं, जो पुराने गोत्र-समाज की सामर्थ्य के बिल्कुल बाहर थे.  परंतु ये काम उसने किये मनुष्य की सबसे नीच अंतर्वृत्तियों  और आवेगों को उभारते हुए और उसकी तमाम अन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचाकर विकसित करते हुए. सभ्यता के अस्तित्व के पहले दिन से लेकर आज तक नग्न लोभ ही उसकी मूल प्रेरणा रहा है. धन कमाओ, और धन कमाओ और जितना बन सके उतना कमाओ ! समाज का धन नहीं, एक अकेले क्षुद्र व्यक्ति का धन – बस यही सभ्यता का एकमात्र और निर्णायक उद्देश्य रहा है. यदि इसके साथ ही समाज में विज्ञान का अधिकाधिक विकास होता गया और समय-समय पर कला के सम्पूर्णतम  विकास के युग भी बार-बार आते रहे, तो इसका कारण केवल यह था कि धन बटोरने में आज जो भारी सफलताएँ प्राप्त हुई हैं, वे विज्ञान और कला की इन उपलब्धियों के बिना प्राप्त नहीं की जा सकती थीं.”

“सभ्यता का आधार चूँकि एक वर्ग का दूसरे वर्ग का शोषण है, इसलिए उसका सम्पूर्ण विकास सदा अविरत अंतर्विरोध के अविच्छिन्न क्रम में होता रहा है. उत्पादन में हर प्रगति साथ ही साथ उत्पीडित वर्ग की, यानि समाज के बहुसंख्यक भाग की अवस्था में पश्चादगति भी होती है. एक के लिए जो वरदान है, दूसरे के लिए आवश्यक रूप से अभिशाप बन जाता है. जब भी किसी वर्ग को नयी स्वतंत्रता मिलती है, तो वह दूसरे वर्ग के लिए नए उत्पीडन का कारण बन जाती है… जहाँ बर्बर लोगों में अधिकारों और कर्त्तव्यों के बीच भेद की कोई रेखा नहीं खिंची जा सकती थी, वहां सभ्यता एक वर्ग को लगभग सारे अधिकार देकर और दूसरे वर्ग पर लगभग सारे कर्त्तव्यों का बोझ लादकर अधिकारों और कर्त्तव्यों के भेद एवं विरोध को इतना स्पष्ट कर देती हैं कि मूर्ख से मूर्ख आदमी भी उन्हें समझ सकता है.” (देखें : Origins of the Family, Private Property, and the State का Chapter IX: Barbarism and Civilization

वर्तमान बुर्जुआ लोकतान्त्रिक प्रणाली जो अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों की वर्गीय राज्य व्यवस्थाओं का निषेद्ध करते हुए वर्तमान विश्व मंच पर अंतरराष्ट्रीय पूँजी की चाकरी हेतू प्रकट हुई है, अपने अंतरविरोधों के कारण, जन्म से ही लूली-लंगडी है जिसका निषेध अवश्यम्भावी है क्योंकि अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों के विपरीत इसने इस वर्गीय समाज के साथ अपनी कब्र खोदनेवाले उस वर्ग को जन्म दिया है जिसे सर्वहारा या उजरती गुलाम कहते हैं. यहीं वह वर्ग है जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता लेकिन पाने के लिए सारा विश्व है. यह सर्वहारा वर्ग ही बुर्जुआ और समाजवादी क्रांतियों की जीत-हार की अमीर विरासत का असली मालिक है. इक्कीसवीं शताब्दी में घटित होने वाली नई समाजवादी क्रांतियों के कार्यभार को संपन्न करवाने हेतू इसने उन बोलेश्विक चरित्र की सच्ची कम्युनिस्ट पार्टियों और नेताओं को भी जन्म देना हैं क्योंकि समाज को आगे की ओर गति देनेवाली क्रांतियाँ स्वयंस्फूर्त ढंग से संम्पन्न नहीं हो सकती. लेकिन चिंता का पहलू यह भी है कि वर्तमान समय का बुद्धिजीवी वर्ग आज के इस युग के क्षुद्र व्यक्ति ‘पूंजीपति’ द्वारा  सर्वहारा की कमाई की निर्मम लूट और इस लूट की भौंडी प्रदर्शनी पर, चुप्पी साधे है जबकि देश और दुनिया के वस्तुपरक हालात, मजदूर वर्ग द्वारा की जानेवाली क्रांतियों के पक्ष में, लगातार विकसित होते जा रहें हैं. भारत के सबसे अधिक विकसित पूंजीवादी राज्यों में से एक हरियाणा के मजदूर प्रतिदिन बारह घंटे से अधिक श्रम करने पर मजबूर हैं क्योंकि सरकार की ओर से निर्धारित की गयी न्यूनतम मजदूरी – 3510  रूपये प्रति महिना, लागू नहीं हो रही.  कोई भी राजनीतिक दल इसके बारे में गंभीर नहीं है. गुडगाँव जैसे शहर में मजदूर असंतोष को लाठियों और गोलियों से दबाया जा रहा है . एक रिपोर्ट अनुसार राज्य की 56  प्रतिशत औरतें और 83  प्रतिशत बच्चे खून की कमी का शिकार हैं. इस प्रकार की स्थिति पर बुद्धिजीवी वर्ग के चुप्पी के इस कष्टदायक और चिंताजनक पहलू पर ब्रटोल्ट ब्रेष्ट के इन शब्दों के साथ इस आलेख को फ़िलहाल यहीं विराम दिया जाता है,

“किस चीज का इंतजार है और कब तक ?
दुनिया को तुम्हारी जरूरत है |”

गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

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एक तरफ तो उत्तर प्रदेश की सरकार ‘सर्वजन हिताय’ होने का दावा करती है लेकिन दूसरी और इस सरकार के गोरखपुर का प्रशासन मजदूरों की बैचैनी का अर्थ उनके माओवादियों से संबंध होने से निकालता है. आज जब दुनिया महामंदी की चपेट में है और वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए लोगों की बचतों को  झोंका जा रहा और पूंजीवाद चाहता है कि कैसे वह इस विश्व महामंदी से निजात पाए, ठीक उसी वक्त,  स्थानीय पेटी-पूंजीपतियों को छोड़ दें तो इस प्रकार की स्थिति में सरकारों का मजदूरवर्ग से इस तरह के निम्न स्तर के हथकंडों का इस्तेमाल करते हुए उलझना स्वयं पूंजीपति वर्ग को भी नापंसंद होगा. पूंजीवाद की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा उपभोग भी होती है ताकि माल मंडियों में बिक जाये. क्या मजदूर वर्ग की जेब में कुछ डाले बिना मार्केट या देश को मंदी से उभारा जा सकता है?

भारत जैसे देश में तुलनात्मक रूप से उत्पादन क्रिया के दौरान मजदूरों पर होनेवाले खर्च में लगातार गिरावट आ रही है अर्थात देश की कुल पैदावार में मजदूरों के हिस्से केवल ६ प्रतिशत ही आता है जबकि उनकी संख्या ८४ करोड़ है. लेकिन खाने-पीने की बुनियादी चीजों के दामों में बढोत्तरी ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. मजदूरों के लिए जीवन-निर्वाह करना भी मुश्किल होता जा रहा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पूंजीपति एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण अनुसार भारत दुनिया के सबसे सस्ती मजदूरी वाले देशों में से एक है. उनके अनुसार यह स्थिति आगामी अठारह-बीस सालों तक बनी रहेगी. उनके अनुसार यहाँ की इस सस्ती श्रम का लाभ विश्व पूंजी को ही होना है.यहीं नहीं वे भारत को एक बड़ी मंडी के रूप में भी देखते हैं जहाँ माल खपाया जा सकता है. चीन के बाद भारत दूसरा देश है जहाँ विकास दर सबसे ऊँची है. लेकिन मजदूरों की मजदूरी में होनेवाली थोडी-बहुत बढोत्तरी बुनियादी वस्तुओं की कीमत के मुकाबले बढ़ने की अपेक्षा कम हों तो कैसे मजदूर अपना जीवन निर्वाह कर पायेगा? क्या  स्वयं पूंजीवादी के तर्कानुसार भी इस प्रकार का रवैया उचित है?

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गोरखपुर : अपने परिवारों समेत धरने पर बैठे महिला एवं पुरुष मजदूर

पूंजी के अपने तर्क अनुसार किसी भी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए जरूरी होता है कि मजदूरी में बढोत्तरी हो ताकि मजदूर ज्यादा वस्तुएं खरीद सकें. लेकिन गोरखपुर जैसे शहर में जहाँ मजदूर अपनी थोडी सी मजदूरी, रोजगार सुरक्षा और यूनियन बनाने के बुनियादी लडाई ही लड़ रहे हैं, उन्हें माओवादी कहना कहाँ तक उचित है? सबसे चिताजनक पहलू यह है की मजदूरों के बीच की हर तरह की बैचैनी का हल निकालने की बजाय उसे माओवादी-आतंकवादी कार्रवाई कहकर कुचलने की कोशिश की जाती है और उनके लीडरों पर झूठे केस बनाए जाते हैं और मजदूर नेताओं को जेलों में डाला जाता है.

उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करते समय देश की कार्यपालिका और न्यापालिका जैसी संस्थाओं का रवैया ज्यादा से ज्यादा मजदूर विरोधी होता गया है. गुडगाँव जैसे औद्योगिक नगर जहाँ एक मजदूर की मौत पर एक लाख मजदूरों की बड़ी संख्या सड़कों पर आ जाती , वहां पर भी मजदूरों को यूनियन तक बनाने की इजाजित नहीं है. रिको ऑटो कंपनी के संचालक मजदूरों के हड़ताल पर जाने और यूनियन बनाने को गैर-कानूनी कार्य कहते हैं. इसे ऐतिहासिक प्रसंग में देखें तो यह सही भी है क्योंकि मजदूरवर्ग की लहर के विपर्य के इस दौर में मजदूरों ने यूनियन बनाने, धरना देने, हड़ताल करने और गेट मीटिंगे औयोजित करने के अधिकारों को खो दिया है. उन्हें आज अपनों संघर्षों द्वारा जीते इन बुनियादी अधिकारों की रक्षा ही सबसे बड़ा कार्यभार लगता है जबकि वर्गों में विभाजित समाज में ये अधिकार भी उसी तरह गतिशील होते हैं जिस तरह समाज. अपने कालजयी संघर्षों द्वारा जीते गए इन अधिकारों को खो देना उन्हें निराश करता ही रहेगा जब तक वे स्वयं को राजनीतिक चेतना से चाकचौबंद नहीं करेंगे और इस वर्ग विभाजित व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन नहीं कर देंगे. गुडगाँव तो औद्योगिक उपक्रमों की हब है. इसके अलावा भारत के कोने-कोने में छोटे बड़े लाखों औद्योगिक उपक्रमों में देश के मजदूर वर्ग की आबादी का ९३ प्रतिशत भाग काम कर रहा है. मजदूरों की इस बड़ी तादाद को असंगठित मजदूर यानिकि वह मजदूर जो किसी मजदूर ट्रेड यूनियन का भाग नहीं है, कहते हैं. देश के इन छोटे और मझौले उपक्रमों में कार्य करनेवाले मजदूरों की बैचैनी ने हड़ताल और धरने  का रूप भी लेना है. पूंजीपतियों की आपसी गलाकाट होड़ के चलते और मंडी के उतार-चढाव और मंदी का ज्यादा असर छोटी पूंजी पर अधिक पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि  मजदूर वर्ग के हितों की अनदेखी करके इन उपक्रमों की रखवाली की जाये. लेकिन प्रशासन और सरकारी नुमाँईन्दो का इन पेटी-बुर्जुआ पूंजीपतियों और उनके गुंडों से साँठगाँठ   चिंता का विषय है. सरकार के लिए सोचने वाली बात यह भी है कि क्या मजदूरों और उनको नेताओं को माओवादी आतंकवादी कहकर झुट्ठे मुकद्दमों में फँसाना खुद पूंजीपति वर्ग या व्यवस्था के लिए ठीक है?

किसी प्रकार का आंतंकवाद चाहे वह धार्मिक मूलवादी खेमे की ओर से हो या वामपंथी दुस्साहसवाद के रूप में हो, निंदनीय है. सत्ताधारी वर्ग की दमनकारी नीतियाँ भी हर प्रकार का आतंकवाद पैदा करती हैं. सत्ताधारी वर्ग के राजकीय आतंकवाद  के परिणामस्वरूप धार्मिक मूलवादी आतंकवाद, दक्षिणपंथी आतंकवाद, वामपंथी आतंकवाद आदि, की फसल उगने की उपजाऊ भूमि तैयार होती है.हर किस्म का आतंकवाद मजदूर वर्ग की एकता और सांगठनिक क्षमता को कमजोर करता है… लेकिन गोरखपुर के स्थानीय प्रशासन द्वारा मजदूरों को माओवादियों से जोड़ना चिंता का विषय है. अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक  तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी. जी  पहले यह कह चुके हैं कि गोरखपुर में नक्सली नहीं है.

यूनिसेफ  की रिपोर्ट अनुसार पिछले ४० वर्षों के अन्तराल के बाद ग्लोबल वित्तीय संकट और ईंधन, भोजन और चारे की कीमतों में बढोत्तरी के कारण दक्षिण एशिया भूखमरी की उच्चतम शिखर को छू रहा है. इसमें कोई शक नहीं की उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी सेक्टरों और कृषि में भी बढ़िया विकास करते दिखाई गयी है लेकिन विडम्बना देखीए कि भरपूर अनाज पैदा होने के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा की हालत में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है. यह उपहास नहीं तो और क्या है कि उडीसा जैसे राज्य में अब भी लोग भूख से मर रहे हैं जबकि वेयरहाउस और गोदामों में अनाज सड रहा है?

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गोरखपुर : हड़ताल के दौरान सामूहिक रसोई

यहीं नहीं एम्.एस स्वामीनाथन रीसर्च फ़ाऊँडेशन (MSSRF) और विश्व खाद्य कार्यक्रम  (WFP) द्वारा एक रिपोर्ट तैयार करवाई गयी. इसमें कहा गया कि भोजन में प्रयाप्त पौष्टिक तत्त्वों की कमी के कारण  भारत का हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का शिकार है और ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2001 के अनुसार भारत का क्रमांक 94 है.

लेकिन पूंजीपति वर्ग खुश होता है कि विश्वमंदी  का भारत पर असर नहीं हुआ है. संसेक्स में फिर उछाल देखने को मिल रही है. प्रथम फिस्कल छमाही के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में ऑटो सेक्टर की विक्री में बढोत्तरी १४.५१ प्रतिशत रही है. इस प्रकार की बातें पूंजीपति लोगों और उनकी सरकारों को अच्छी लगती हैं. लेकिन ऑटो सेक्टर की हब रहे गुडगाँव जैसे शहर में पूंजीपतियों के किराये के गुंडों के हाथों होनेवाली मजदूर की मौत के बाद एक लाख मजदूरों का प्रदशर्न उन्हें परेशान कर देता है. तेरह-तेरह वर्षों से कार्यरत पंकज कुमार सिंह जैसे मजदूर अपनी मजदूरी से संतुष्ट नहीं हैं. अपनी जायज मांगों को मनमाने के लिए जब वे यूनियन बनाने की पहलकदमी करते हैं तो मैनेजमेंट स्थानीय प्रशासन और अपने निजी गुंडों की मदद से उन्हें दबाने की कोशिश करती है. पूंजीपतियों की मुनाफा कमाने की हवस मजदूरों को इंसान समझती ही नहीं. उन्हें तो चाहिए इन्सान के रूप में एक ऐसा मशीन का पूर्जा जो मशीन के दूसरे पूर्जों से मिलकर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करे. पूंजीपति यह देख ही नहीं पाते कि मशीन और इन्सान में बुनियादी फर्क है. मशीन अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष पैदा नहीं कर सकती. यह केवल मजदूर की श्रम-शक्ति से ही संभव होता है. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपतियों का मुनाफा, मैनेजमेंट के खर्चे और कार्पोरेट टैक्स जिससे सरकारे चलती हैं, आता है.

गुडगाँव की रिको ऑटो कंपनी के मजदूर की हत्या पर भारत की न्यूज एजेंसी पी.टी.आई . अपनी टिपण्णी में यह बात स्वीकार करती है कि गुडगाँव-मानेसर बेल्ट में मजदूर असंतोष कोई नई बात नहीं है. पहले २००० में मारुती उद्योग की मजदूरों की तीन महीने की हड़ताल और फिर २००५ में होंडा मोटर्स एंड स्कूटर के मजदूरों पर पुलिस द्वारा अधाधुंध लाठीचार्च जिसमें १६७ मजदूरों के घायल हुए थे, को नोट करते हुए पला झाड़ लेती है जैसे यह रूटीन की सामान्यतय घटने वाली बातें हों. लेकिन स्थिति का दूसरा पहलू यह भी है कि २००० और फिर २००५ और अब २००९ में मजदूरों का एकसाथ इतनी बड़ी तादाद में खड़े हो जाना, और फिर इन वर्षों के बीच का अन्तराल इतना बड़ा नहीं है कि इतिहास के लिए यह कोई दूर की बात हो. मजदूर वर्ग के असंतोष और वैचैनी के यहीं वे सिग्नल हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग द्वारा ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग की हमदर्द पार्टियों और बुद्धिजीवियों द्वारा नज़रंदाज किया जाता है. मजदूरों के प्रारंभिक सिग्नल भले ही किसी नज़दीक की क्रांति की और संकेत नहीं करते लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग को इन्हीं सिग्नलों को समझना है और इतिहास में अपने स्थान और जिम्मेदारी का भलीभांति निर्वाह करना है.

गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता
गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता

आज मजदूर वर्ग और क्रांतिकारी खेमा अलगाव और विखराव का शिकार है. लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी चुप्पी साधे हुए है. बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का समर्थन और हमदर्दी हमेशा मजदूरवर्ग से रही है. अपनी उच्चतम बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी बुद्धिजीवी लोग अपने स्वयं के वर्ग की सीमाओं को तोड़कर मजदूरों के साथ खड़े होते रहें है. बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा स्वयं को मजदूर वर्ग से अपने आप को अभेद भी पाता रहा है. लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. क्या भारत का बुद्धिजीवी इतना आत्मसंतुष्ट हो सकता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर हाँ  में है तो उसके बुद्धिजीवी होने पर प्रश्नचिह्न लगता है! लेकिन इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होती और न हो सकती है. समाजवादी खेमे के ढह-ढेरी हो जाने  के बाद हम भी मानते हैं कि समाज को आगे की ओर गति देने वाले आंदोलनों या क्रांतियों की प्रासंगिगता पर प्रश्न चिह्न लगा था और पूंजीवाद के अजर-अमर होने के भ्रम को भी खूब हवा मिली थी. अब स्थिति वैसी भी नहीं है. पूंजीवादी एक के बाद एक नए संकटों में फंसता जा रहा है. बुद्धिजीवियों के स्तर के अनुसार पूंजीवाद में भी ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें एक पल के लिए भी संतुष्ट कर पाए. इस प्रकार की स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रह सकती. यह बुद्धिजीवी वर्ग ही होता है जिसने सबसे पहले अपनी चुप्पी तोड़नी होती है क्योंकि अपनी संवेदनशीलता के कारण वहीँ पहला वर्ग होता है जो सबसे पहले टूटता है.

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गोरखपुर : इस पूरे आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया

देश में चुनाव हों लेकिन बुनियादी मुद्दे गायब हों ! एक ऐसा वक्त जब आम जनता अपने जिंदा रहने की लडाई लड़ रही हो और चुनावों में भाग लेनेवाली पार्टियों की ओर से अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जाना ! इसके अलावा राजनीतिक दलों की बहसों का स्तर इतना निम्न स्तर का कि बुद्धिजीवी तो क्या आम आदमी भी इसका नोटिस लेने से नहीं बच पाया. विचारधारात्मक, सैद्धांतिक और राजनीतिक बहस सिरे से ही गायब थी. सामाजिक बहस में भी मुद्दे गायब थे. केवल जोड़तोड़ या तिकड़म द्वारा किस दल की सरकार बनेगी, जैसी चर्चाओं पर अटकलबाजी होती रही. इस प्रकार की स्थिति पर  देश के बुद्धिजीवी वर्ग का मूक दर्शक बने रहना नागरिक समाज के लिए नुकसानदेय है. इतिहास में उसे अपनी भूमिका और स्थान की पहचान करनी ही होगी.

पूंजीपतियों के गुंडों द्वारा गुडगाँव में मजदूर की हत्या और गोरखपुर के मजदूर और मजदूर नेताओं पर झूठे मुकद्दमे निंदनीय हैं. मजदूर वर्ग के हितों पर इस प्रकार का कुठारघात असहनीय है. पूंजीपति इसके लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने पर तुले हुए हैं. हमारे पडौसी देश नेपाल जहाँ पशुओं की हत्या और अत्याचार पर रोक संबंधी बहस चल रही है और हमारे यहाँ मजदूरों पर इस तरह के जुर्म किये जा रहे हैं. नेपाल जैसे पिछडे देश के साथ तुलना करते समय हमारा सीना गर्व से फूल जाता हैं लेकिन अपने ही देश में पशुओं पर नहीं बल्कि इंसानों और मजदूरों पर होनेवाले जुर्म पर हम मूक बने रहते हैं, क्या इस प्रकार की स्थिति शोभनीय है? बुद्धिजीवी वर्ग को सोचना होगा कि सभ्य समाज को इस वक्त अगर कोई खतरा है तो वह पूंजीपतियों के गुंडों की दहशत और प्रशासनिक मिलीभगत से ही है. उसे अपना प्रतिरोध दर्ज करवाना होगा. यही समय की मांग है.

उपरोक्त पोस्ट पर लगी हुई सभी तस्वीरें नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ से धन्यवाद सहित ली गयी हैं.

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