पूंजी

मूल्य का नियम 1 परिचय

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मार्क्स की पूंजी पर आधारित इन अंग्रेजी फिल्मों को इस ब्लॉग द्वारा, हिंदी में डब करके प्रस्तुत करने का कार्य जारी है. फिल्मों की स्क्रिप्ट के कुछ अंशों से हमारे मतभेद हैं. पाठकों से अनुरोध है कि वे इन फिल्मों को आलोचनात्मक तरीके से आत्मसात करें. फिर भी इन फिल्मों का सर्वहारा वर्ग के नए जागरण और प्रबोधन के लिए बहुत महत्त्व है जिसके लिए यह ब्लॉग http://kapitalism101.wordpress.com का  बहुत आभारी है.


आर्थिक संकट वैचारिक संकट का भी समय होता है. यह समय होता है जब लोग अपने विश्व दृष्टिकोण का पुनर्मुल्यांकन करना शुरू कर देते हैं. वे अपनी सबसे मूलभूत पूर्वधारनाओं पर सवालिया निशान लगाने लगते हैं. प्रत्येक आर्थिक संकट से मुख्यधारा के आर्थिक चिंतन में पुनर्विचार और पुनर्गठन पैदा हुआ है. मजे की बात यह है कि यह पुनर्विचार सदैव आर्थिक प्रणाली के लिए रेडिकल चुनौती के सन्दर्भ में रहा है.

सीमांत उपयोगिता सिद्धांत , जो अब भी आधुनिक मुख्यधारा के आर्थिक सिद्धांत के लिए आधार मुहैया करता है, १८०० के अंतिम काल की महामंदी पर कार्ल मार्क्स की ‘पूंजीवाद की आलोचना’ द्वारा चुनौती के प्रत्युतर में पैदा हुआ था. १९३० की महामंदी से,उदारवादी अर्थशास्त्र की असफलता ,सफल बोल्शेविक क्रांति और पश्चिम में मजबूत मेहनतकशों की लहरों से चुनौती के रूप में,  कीन्सवाद पैदा हुआ था. १९७० के संकट से, कीन्सवाद की संकट झेलने की असफलताओं और विशाल लोक वामपंथी लहरें जैसे युद्ध विरोधी, नागरिक अधिकार, स्त्री लहरे और मजबूत श्रम की शक्ति, के विरुद्ध हथियार के रूप में नव उदारीकरण पैदा हुआ.

एलन ग्रीनस्पेन :
“याद रखें कि वैचारिकी एक ऐसा प्रत्ययात्मक चौखटा है जिससे लोग हकीकत का सामना करते हैं. प्रत्येक के पास एक है…जीवित रहने के लिए आपको एक वैचारिकी चाहिए. सवाल यह है कि क्या यह सही है या नहीं. और जो मैं आपसे कह रहा हूँ, मुझे एक त्रुटी दिखी है – मैं नहीं जानता कि यह कितनी सही और स्थायी है, परन्तु इस हकीकत ने मुझे बहुत परेशान किया है.”

नव उदारवादी संस्थापना की ओर से अपनी असफलता पर इस तरह की स्वीकृतियों से मौजूदा समय की मुख्यधारा की आर्थिक वैचारिकी पर प्रश्नचिह्न लगता है. लेकिन स्पष्ट नहीं है कि हम इस वैचारिक संकट में इस आर्थिक प्रणाली को योग्य टक्कर देने के सन्दर्भ में प्रवेश कर रहे हैं. सोवियत तरह की केंद्र न्योजित प्रणालियों की असफलता ने पूंजीवाद के विकल्पों पर विचार की लोकप्रिय चेतना को धो डाला है. इस समय कार्ल मार्क्स के विचारों का यह देखने के लिए कि वे पूंजीवाद की आलोचना में क्या सही-सही कहने की कोशिश कर रहे थे, पुनर्मुल्यांकन करना उपयोगी होगा – इसलिए नहीं कि हम लेनिन, स्टालिन, माओ और अन्य जो मार्क्स के विचारों पर दावा करते हैं, के राजनीतिक अनुभवों को दोहराने की इच्छा रखते हैं , पर क्योंकि मार्क्स पूंजीवाद की पूर्ण और प्रणालीबद्ध आलोचना प्रस्तुत करते हैं जोकि आर्थिक चिंतन के इतिहास में पूर्णतया अलग, पूर्णतया अद्वितीय है. इस तरह के रेडिकल विचार हमारी मौजूदा स्थिति और सामाजिक रूपांतरण की संभावनाओं की नयी समझ की खोज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. जीवित रहने के लिए वह समाज खतरनाक है जो विशेषतय संकट के लंबे अन्तराल में प्रवेश करने पर भी आत्मालोचना की क्षमता नहीं रखता.

मार्क्स और सभी प्रसिद्ध बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों में निर्णायक भिन्नता है. सभी बुर्जुआ अर्थशास्त्री संकट को पूंजीवाद के प्राकृतिक संतुलन को खिन करनेवाली कोई बाह्य वस्तु मानते हैं. पूंजीवाद की प्रवृति असमानता, शोषण और संकट यानिकी जब स्पष्ट हो जाता है कि उनके सिद्धांत और असलियत में असंगतता है तो बुर्जुआ अर्थशास्त्री असलियत को उनके मॉडल के विपरीत होने पर दोषी ठहराते हैं. राज्य के दखल, मजदूर लहरें, मानवीय लोभ आदि के रूप में हमलावर बाह्य शक्तियों द्वारा असलियत को विषाक्त किया जाता है. आज हम इसी प्रकार के दक्षिणपंथी लोकप्रिय उत्थान की प्रतिक्रियावादी समझ को देख रहे हैं जोकि विदेशियों, वाम बुद्धिजीवियों, समलिंगियों, गैर ईसाई और काले राष्ट्र अध्यक्षों की आक्रामक घुसपैठ पर समाज की समस्यायों का दोष मढ़ते हैं.

मार्क्स विपरीत पद्वति अपनाते हैं. वे सामाजिक विरोधों को व्यवस्था के भीतर देखते हैं. ये सामाजिक विरोध व्यवस्था में इतने बुनियादी हैं कि ये अपने गुरुत्वीय क्षेत्र में समाज के सभी अंगों को खींच लेते हैं.

बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों ने सदैव मंडी को स्वतंत्रता और समानता का क्षेत्र माना है. तथ्य यह है कि मंडी वाले समाज में इतनी असमानता, संकट और अधूरी स्वतंत्रता है कि इसे सिद्धांत में नहीं बल्कि हकीकत में देखा जा सकता है. आम लोगों की सोच के विपरीत मार्क्स इन सामाजिक बुराईयों के विश्लेषण से शुरुआत करते हुए मंडी के संबंधों की आलोचना की ओर नहीं बढ़ते. मार्क्स इजारेदारी, गरीबी, शोषण और राज्य की हिंसा पर बोलते हुए आगे नहीं बढ़ते. वे उसी मंडी के स्वतन्त्र क्षेत्र से शुरू होते हैं जो  उनके बुर्जुआ आलोचकों को बहुत प्रिय है, और दिखाते हैं कि किस तरह ये सभी सामाजिक विरोध इस मूल उत्पादन संबंध से प्रकट हो जाते हैं. पूंजीवादी उत्पादन का मंडी विनिमय के लिए उत्पादन होने के तथ्य के कारण मार्क्स के लिए यहीं से शुरुआत होती है. आधारभूत उत्पादन का यह रूप कानून जैसे गुण अख्तियार कर लेता है जिसे वे ‘मूल्य का नियम’ से पुकारते हैं.

मंडी में दिलचस्प लगने वाली कौनसी वस्तु मार्क्स को मिली ? यह कोई आपकी इच्छानुसार वस्तुएं खरीदने या बेचने की स्वतंत्रता नहीं थी. तथ्य यह है, कि मंडी समाज के सामाजिक जीवन में भाग लेने के लिए, प्रत्येक को चीजें खरीदनी या बेचनी पड़ती हैं. जीवित रहने के लिए, समाज में भाग लेने के लिए, प्रत्येक को चीजें खरीदने और अपनी श्रम के उत्पाद बेचने के लिए, मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.  यह विलक्षण रूप से,  प्रारंभिक समाजों से जहाँ मेहनतकश अपने श्रम से स्वयं को पालते थे, यानिकी वे अपने उपयोग के लिए श्रम द्वारा वस्तुएं उत्पादित करते थे, से अलग तरह का सामाजिक संगठन है. पूंजीवादी समाज में उत्पादित होनेवाली चीजें स्वयं के लिए नहीं होती. लोग उनका उत्पादन विनिमय के लिए करते हैं. इस लिए सामाजिक श्रम प्रक्रिया, परोक्ष रूप से, विनिमय के द्वारा तालमेल बिठाती है.

मंडी द्वारा परोक्ष रूप से तालमेल बिठाने वाले, निजी उत्पादकों के समाज में लोगों के मध्य सामाजिक संबंध, जिंसों के संबंध, चीजों के मध्य संबंधों का रूप ले लेते हैं. लोगों के बीच संबंध जिन्स मूल्यों में प्रकट होनेवाले मूल्य संबंध बन जाते हैं. आर्थिक रूप से, लोग एक दूसरे से धन और मूल्य द्वारा संबंधित हो जाते हैं. जिन्स संबंधों का यह संसार, व्यक्तियों के नियंत्रण से बाहर  स्वतन्त्र रूप ले लेता है जो प्रतिप्रभाव पैदा करता है और उनके रिश्तों को नियंत्रित करता है. एडम स्मिथ ने इसे ‘मंडी का ओझल हाथ’ कहा.  मार्क्स इसे ‘मूल्य का नियम’ कहते हैं.

मूल्य का नियम क्या है ? ये अव्यक्तिगत, समाज पर अपना असर डालनेवाली अर्थ की अंध शक्तियां हैं. वह समाज अद्वितीय है जहाँ श्रम का प्रमुख रूप मंडी में, विनिमय के लिए उत्पादित होता है. लोगों के बीच के संबंध जिंसों के बीच मूल्य संबंध बन जाते हैं. और ये मूल्य संबंध अव्यक्तिगत शक्तियां बन जाते हैं जिनके समाज के लिए अनचाहे परिणाम होते हैं. उदाहरण के लिए, हमें मिलती है पूँजी.

अपने श्रम के लिए, लोगों ने सदैव, औजारों और अन्य संसाधनों का उपयोग किया है. इन्हें उत्पादन के साधन कहते हैं. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में, ये उत्पादन के साधन पूंजी बन जाते हैं. औजार, मशीन, कच्चा माल और यहाँ तक कि कामगार मूल्य के साथ जिन्स बन जाते हैं. इससे मंडी में उत्पादन के साधनों को खरीदना और इन उत्पादन के साधनों के उत्पादों को मुनाफे के लिए बेचना संभव हो जाता है. दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति उत्पादन में धन निवेश कर सकता है ताकि और अधिक धन कमा सके . मूल्य, उसके खुद में उद्देश्य की तलाश, समाज की प्रधान शक्ति बन जाती है. यही है जो पूंजी है, सामाजिक क़ीमत से उपराम, मूल्य का अपने ही लिए विस्तार. पूंजी एक वर्ग का रूप ले लेती है जो उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है और अन्य लोगों को मुनाफे के लिए उत्पादन करना पड़ता है.

स्वाभाविक रूप से पूंजी की विषमता से आर्थिक और  भूमंडलीय अन्तरिक्ष में, दौलत और कंगाली के ध्रुव खड़े हो जाते हैं. पूंजी स्व-निषेधित भी होती है. हालाँकि यह कामगार पर काबू पानेवाली, एक अव्यक्तिगत शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन मुनाफा पैदा करने के लिए इसे कामगार की आवश्यकता पड़ती है. इसकी जड़ में है सामाजिक विरोध. इस सामाजिक विरोध से, निरंतर अस्थिरता और सामयिक संकट  फूटते रहते है.

बहुत से अन्य और ये सभी रेडिकल अर्थ मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ के भाग हैं.

यह वीडियो सीरिज मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ पर विभिन्न विषयों को शामिल करेगी : उपयोग मूल्य, विनिमय मूल्य और मूल्य में अंतर, पूर्ति, मांग और मूल्य का मूल्य से संबंध, अमूर्त श्रम, शोषण, संकट, सामाजिक आवश्यक श्रम समय और यहाँ तक कि विश्व को बदलने के लिए ‘मूल्य का नियम’ की समझ . उम्मीद की जाती है कि आज रेडिकल लहरों को सही तरह से समझने के महत्व के लिए इनका योगदान होगा क्योंकि उन्हें ऐसे विचार चाहियें  जिनसे वे अपनी मांगे और रणकौशल को स्पष्टता से बयान कर सकें.

मार्क्स के मूल्य के नियम पर आधारित एनिमेटिड हिंदी डब फिल्म : अंतिम किश्त

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इससे पहले : मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

श्रम -शक्ति के उपयोग और विनिमय मूल्य का विरोधाभास पूंजीपतियों और मजदूरों के सामाजिक विरोधाभास में प्रकट होता है. पूंजीपतियों और मजदूरों के विरोधी हित होते हैं. मजदूरों को अपने जीवन निर्वाह के साधनों  : घर, भोजन, kapda आदि की जरूरत होती है. उन्हें उपयोग मूल्य चाहिए. पूंजीपतियों की दिलचस्पी उपयोग मूल्य में नहीं होती. वे विनिमय मूल्य चाहते हैं. मुनाफा अर्जित कर वे पूंजी के आकार को बढ़ाना चाहते हैं. अपनी-अपनी चाहत को पूरा करने के लिए प्रत्येक वर्ग को दूसरे की जरूरत पड़ती है. जीवित रहने के लिए मजदूरों को मजदूरी के लिए बिकना पड़ता है. पूंजीपतियों को मुनाफा कमाने के लिए मजदूर रखने पड़ते हैं. इस सहअस्तित्व के बावजूद, उनके हित पूर्णतया विरोधी हैं. मजदूरी के अधिक भुगतान का मतलब, पूंजीपति के लिए कम मुनाफा. पूंजीपतियों के अधिक मुनाफे का मतलब मजदूरों के लिए अधिक कंगाली.

साफ़ है कि , पूंजीवादी समाज में, पूंजी और श्रम के बीच, सदैव संघर्ष रहा है. चाहे यह संघर्ष, हमारे दिन-प्रतिदिन के कार्य की मात्रा के लिए राजी होने पर हो, या फिर कार्य की अच्छी स्थिति और ज्यादा वेतन के लिए लंबा संघर्ष. लेकिन कार्य स्थान से बाहर भी , पूंजीवाद का वर्ग वैमनष्य सदैव बना रहता है. मेहनतकश वर्ग द्वारा पैदा किये गए मूल्य के मजदूरी, मुनाफे, लगान, ब्याज, टेक्स में वितरण का परिणाम हमारे द्वारा भोगे जाने वाले जीवन स्तर, हमारे रहने के स्थान, हमें मिलने वाले अवसरों की स्थिति और हमारे जीवन स्तर, में देखा जा सकता है. सामाजिक आवश्यकता के लिए उपयोग मूल्य के स्थान पर किसी एक वर्ग के मुनाफे के लिए निर्मित समाज में हमारे जीवन का स्तर पूंजी की जरूरतों के विलोमानुपाती होता है. पिछले ३० वर्षों में, नव उदारीकरण द्वारा पूंजी के स्वतन्त्र प्रवाह के लिए सभी  बंधन तोड़ने के परिणामस्वरूप उपरी पूंजीपति वर्ग के पास धन की अपार मात्रा इकट्ठी हो गयी है, जबकि शेष विश्व के लोगों के जीवन में निरंतर गिरावट आई है.

समाज के पास इतना भोजन, घर और तकनीक है कि विश्व की समस्त आबादी थोड़ी सी मेहनत से जीवन की सभी आधारभूत सुख-सुविधाएँ हासिल कर सकती है. और जीवन भर किसी और के लिए कार्य करने की अपेक्षा, यह शायद अधिक संतोषजनक     होगा. परन्तु हमारा समाज ऐसा नहीं है, क्योंकि हमारी श्रम का उद्देश्य समाज के लिए उपयोग मूल्य के स्थान पर पूंजी के लिए मुनाफा पैदा करना है. तकनीक और उत्पादकता में होनेवाली निरंतर क्रांतियों का उद्देश्य कार्य को आसान करना या हमारे जीवन स्तर को ऊँचा उठाना नहीं होता बल्कि और अधिक नियंत्रित श्रम द्वारा और अधिक मुनाफा बटोरना होता है. इस तरह, कार्य स्थान पर श्रम से अधिक मूल्य पैदा करवाने के लिए मशीनों, असेंबली लाईन और कंप्यूटर द्वारा निर्मित अनुशासन का वर्चस्व कायम हो जाता है.

कामगार से कार्य संबंधी ज्ञान छीन लिया जाता है और उसे मशीन में डाल दिया जाता है. कामगार श्रम-प्रक्रिया से नियंत्रण खोने के बाद, मशीन का एक छोटा सा पुर्जा बनकर रह जाता है जिसे आसानी से बदला जा सकता है. एक और विरोधाभास, संकल्पना और कार्यान्वयन के मध्य उभरता है : श्रम-प्रक्रिया का हमारा ज्ञान हमसे छीनकर, मशीन जो हमें नियंत्रित करती है, में डाल दिया जाता है, जो हमारे काम को एक जॉब – ऐसी रूटीन कवायद जिसमें मजदूरी के साधन के अलावा हमारे लिए कोई अर्थ नहीं होता, में न्यून कर देती है. मानव बनाम मशीन के मोहजाल के पीछे यही विरोधाभासी लोकप्रिय संस्कृति है. परन्तु मशीन ने अपने पीछे, हम और हमारी सृजनात्मक क्षमताओं के बीच सामाजिक संबंध को हमसे छीनकर, अलग करके, हमारे कार्य पर काबू पा लिया है.

मशीन के रूप में, निरंतर एकत्रित होती पूंजी के बाद, एक और विरोधाभास आता है, पूंजी के  मृत श्रम, मशीन और कच्चे माल और पूंजी के जीवित श्रम में निवेश. हालाँकि मशीनरी की वृद्धि द्वारा पूंजीपति मजदूरों का ज्यादा शोषण कर सकते हैं, लेकिन मशीन मूल्य पैदा नहीं कर सकती. मशीन और कच्चे माल में ज्यादा से ज्यादा और श्रम में कम से कम पुन:निवेश से समाज के द्रव्यमान के मूल्य में भरमार हो जाती है. यहीं से मार्क्स के संकट के सिद्धांत की शुरुआत होती है. जैसे-जैसे उत्पादन में विस्तार के लिए पुन:निवेश बढ़ता जाता है, यह जीवित श्रम की अपेक्षा मृत श्रम में अधिक होता जाता है. यहीं से भीमकाय संकट की शुरुआत होती है, जिसने पूंजी का उसके सभी रूपों के साथ, अवमूल्यन और विनाश करना होता है.

मार्क्स के पूंजीवादी समाज के विश्लेषण की व्युत्पति , ‘जिन्स के विश्लेषण’ का यही  प्रस्थान बिंदु है. एक जिन्स उत्पादक समाज के सांगठनिक सिद्धांत, मूल्य के इस मूल विचार से, वे जिन्स के उपयोग मूल्य और मूल्य के बीच विरोधाभास को स्थापित करते हैं और कई जिल्दों में इस विरोधाभास से पैदा होनेवाले  वर्गों , समाज , मशीनों और मानव और कार्य की संकल्पना और कार्यान्वयन में विरोधाभासों को प्रकट कर देते हैं. उपयोग और विनिमय में सीधी सी लगने वाली विसंगति वर्ग संघर्ष और संकट का कारक बन जाती है.

इसका यह मतलब नहीं है कि समाज की प्रत्येक समस्या को सीधा मूल्य के नियम से समझा जा सकता है. फिर भी,  सामाजिक धन और शक्ति के उत्पन्न होने और वितरण होने के ढंग को समझे बिना, किस प्रकार हम,असमानता पर बहस को वास्तव में समझ सकते हैं.

मंडी की दमनकारी प्रकृति, जिन्स विनिमय से उत्पन्न गंभीर असमानता और हर कीमत पर पूंजी के एकत्रीकरण की विवशता को समझे बिना, किस प्रकार हम हिंसा को समझ सकते हैं. पूंजीवादी समाज के उत्पादन संबंधों के संगठन के ढंग पर बहस के बिना परिवेशी संकट के समाधान पर बहस कैसे संभव हो सकती है ? वामपंथियों की समस्या यह नहीं कि वहां इतने लोग नहीं हैं कि वे इन मसलों की परवाह करें. समस्या यह है कि ऐसे लोग अधिक् नहीं हैं जिनके पास हमारे समाज के मूल ढांचे की शर्तों के अनुसार इन मसलों पर सोचने की इच्छाशक्ति और सैद्धांतिक औजार हों. इसी कारण आज  मूल्य के नियम को समझना महत्वपूर्ण है. अगर हम समाज के विरोधाभासों पर काबू पाना चाहते हैं, तो हमें समझना होगा कि किस तरह ये विरोधाभास संबंधित हैं और ऐसा करने के लिए हमें जिन्स के विश्लेषण से शुरुआत करनी होगी.