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मैन्युफैक्चर और बड़े पैमाने के उत्पादन (मशीनोफैक्चर) की कालावधियों में श्रम विभाजन

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17. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

दस्तकार किसी वस्तु के एक के बाद एक दूसरे हिस्से को बनाते जाते हैं जो अंत में विक्रय के लिए तैयार माल बन जाता है. शिल्प संघ के विकास की उच्चतम अवस्था में भी उत्पादन के क्षेत्र में उपविभाजन की संख्या बहुत कम थी. लेकिन विनिर्माण की शुरुआत के साथ, श्रम का विशुद्ध यांत्रिक विभाजन हुआ जिसके अर्न्तगत माल तैयार करने की उत्पादन प्रक्रिया में मजदूर काम के एक छोटे हिस्से को पूरा करता है. तो भी इस अवधि में भी उद्योग की कुछ शाखाओं में उत्पादन की विस्तृत प्रक्रियाओं में श्रम विभाजन हुआ और दूसरी शाखाएँ बची रह गयी. इसके अलावा विनिर्माण के अर्न्तगत मजदूर अपने हाथ से सारा उत्पादन करता था जो उसकी दक्षता और योग्यता पर निर्भर करता था.
“दस्तकारी और मैन्युफैक्चर में मजदूर औजारों का इस्तेमाल करता है, कारखाना में मजदूर मशीन की सेवा करता है. पहली स्थिति में मजदूर श्रम के साधनों के संचालन पर नियंत्रण रखता है तो दूसरी स्थिति में मजदूर की गतिविधियाँ मशीन के अधीन होती हैं. विनिर्माण में मजदूर सक्रीय तंत्र का एक हिस्सा होते हैं. कारखानों में मजदूरों से स्वतन्त्र एक जड़ तंत्र होता है और मजदूर इसमें जीवित उपांगो की तरह शरीक होते हैं. अंतहीन चाकरी और कठिन परिश्रम की नीरस नित्य-क्रिया, जिसमें एक ही यांत्रिक प्रक्रिया को लगातार दुहराना पड़ता है, सिसिफस की यंत्रणा के समान होता है अर्थात चट्टान जैसा कड़ी मेहनत का बोझ थके हुए कर्मी पर गिरता रहता है. मशीनों पर काम करने से स्नायुतंत्र पर अवसादक असर पड़ता है. इसी के साथ यह मांसपेशियों की विविध गतिविधियों में व्यवधान उत्पन्न कर देता है और स्वतन्त्र शारीरिक और बौधिक गतिविधियों को रोक देता है. यहाँ तक की काम के बोझ को हल्का कर देना यंत्रणा का साधन बन जाता है क्योंकि मशीन मजदूर को काम से मुक्त नहीं करती है बल्कि काम में उसकी दिलचस्पी को ख़त्म कर देती है. ” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 451) मशीन पर काम करने वाले मज़दूर की तुलना सिसिफस से करने वाला उद्धरण मार्क्स ने एंगेल्स की पुस्तक द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, 1845, पृ. 217, से और एंगेल्स ने जेम्स फिलिप के, एम.डी. की पुस्तक मैनचेस्टर के वस्त्र उत्पादन में नियोजित मज़दूर वर्ग की नैतिक एवं भौतिक जीवन स्थितियां से लिया है. (रिजवे, लन्दन 1832, पृ.8)
मशीन से उत्पादन करने के लिए यह आवश्यक होता है कि कच्चे माल, अर्द्ध-निर्मित सामान और औजारों की आपूर्ति में वृद्धि हो और इससे उद्योग की ज़्यादा शाखाएँ खोलने के लिए प्रेरणा मिलती है. उत्पादन प्रणाली की असंख्य नयी किस्मों और उप-किस्मों द्वारा इस कच्ची सामग्री और अर्द्ध-निर्मित सामान को तैयार किया जाता है जिससे ‘ट्रेडों’ की संख्या में भारी वृद्धि हो जाती है. जर्मन आंकडों के अनुसार 1882 में ट्रेडों और पेशों की संख्या 6000 आंकी गयी थी. 1895 में यह संख्या लगभग 10,000 हो गयी थी.
इस प्रकार पूंजीवाद के अर्न्तगत बड़े पैमाने के उत्पादन ने न केवल स्थायी विशेषता वाले पुराने श्रम विभाजन को समाप्त कर दिया बल्कि विशिष्ट प्रक्रियाओं की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि कर दी. इससे विशेष काम करने वाले मज़दूर की स्थिति पहले से ज़्यादा खराब हो जाती है यदि इस बात को ध्यान में रखा जाये कि यह घटनाओं में निहित संकटों पर पूर्णतया आश्रित होता है जिससे उसके भौतिक जीवन के आधार की सुरक्षा और दृढ़ता जोखिम में पड़ जाती है.

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सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक विकास

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16. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

वर्तमान समय में ‘सर्वहारा’ (‘प्रोंवितारिया’) का तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसके जीवकोपार्जन का एकमात्र साधन अपनी श्रमशक्ति का विक्रय है. लैटिन भाषा के शब्द ‘प्रोलितारियास’ का मूल अर्थ यह नहीं था. प्राचीन रोम के ज़माने में ‘प्रोलितारियास’ शब्द का प्रयोग उस व्यक्ति के लिए किया जाता था जिसकी एकमात्र सम्पत्ति उसके वंशज, उसकी संताने (प्रोलेस) होती थीं. आरंभ में सर्वहारा जोकि रोम की आबादी का निर्धनतम वर्ग था, को सैनिक सेवा और करों की अदायगी से मुक्त कर दिया गया था. बाद में सर्वहारा को सेना में भर्ती किया जाने लगा जिसका संभरण राज्य करता था. गृहयुद्धों के दौर में जब रोम का किसान समुदाय बरबाद हो गया तथा (रोमन) साम्राज्य के अधीन हो गया, तो सर्वहारा सेना का केन्द्रक बन गया था. शांति के समय सैनिकों के इस समूह का भरण-पोषण राज्य करता था तथा उन्हें अनाज की नियमित रसद दी जाती थी. इस प्रकार नाम के अलावा इन रोमन सर्वहारा और आज के भूमिहीन आवासहीन यूरोपीय सर्वहारा के बीच अन्य कोई साम्य नहीं है. हमें इस बात की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जैसाकि मार्क्स बताते हैं,”कि प्राचीन रोम में वर्ग संघर्ष स्वतन्त्र धनिकों और स्वतन्त्र निर्धनों यानि कि विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यकों के दायरे में जारी रहा था. दास वर्ग जोकि आबादी का बड़ा उत्पादक हिस्सा था, उस निष्क्रिय मंच का काम कर रहा था जिस पर यह संघर्ष चल रहा था. लोग सिसमोंदी की उल्लेखनीय उक्ति को भूल गए हैं कि ‘रोम का सर्वहारा राज्य के खर्च पर जीता था जबकि आधुनिक समाज सर्वहारा के दम पर जीता है”. (कार्ल मार्क्स, द एटीन्थ ब्रूमेर ऑफ लुई बोनापार्ट, पृ. 18-19) The Eighteenth Brumaire of Louis Bonaparte- by Karl Marx
उज़रती मजदूरों के वर्ग को व्यक्त करने के अर्थों में ‘सर्वहारा शब्द का व्यापक उपयोग उन्नीसवीं शताब्दी के पहले अर्धांश के पूर्व आरंभ नहीं हुआ था. एंगेल्स ने इंग्लैंड में मेहनतकश वर्ग की जीवनस्थितियों के सम्बन्ध में अपनी पुस्तक में पहली बार इंग्लैंड के सर्वहारा के अठारह सौ चालीस के दशक तक का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है. इस पुस्तक के मूल जर्मन संस्करण की प्रस्तावना में एंगेल्स बताते हैं कि उन्होंने “मेहनतकश, श्रमजीवी, सम्पत्ति-अधिकार रहित वर्ग और सर्वहारा” शब्द का प्रयोग एक ही परिघटना को व्यक्त करने के लिए किया है. अन्य स्थान पर वह लिखते हैं, “सर्वहारा समाज का वह वर्ग है जो अपने जीवन-निर्वाह के लिए, पूंजी से हासिल किए गए मुनाफे पर नहीं बल्कि पूरे तौर पर अपने श्रम (श्रमशक्ति) की बिक्री पर निर्भर करता है. उसका सुख-दुःख ज़िन्दगी और मौत, सम्पूर्ण अस्तित्व श्रम (श्रमशक्ति) की मांग पर, कारोबार के अच्छे और बुरे वक्त के बीच झूलते रहने पर, उन उतार-चढावों पर जो अनियंत्रित प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम होते हैं, पर निर्भर करता है. संक्षेप में, सर्वहारा अथवा सर्वहारा वर्ग उन्नीसवीं सदी का मेहनतकश वर्ग है.” इंग्लैंड में उज़रती मजदूरों या श्रमजीवियों का वर्ग चौदहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में अस्तित्व में आ गया था. एक सौ पचास वर्षों के दौरान आबादी के निम्नतर संस्तर इसमें शामिल थे. धीरे-धीरे करके यह (वर्ग) कारीगरों, शिल्पकारों और किसानों से अलग हुआ तथा सामंती बंधनों से मुक्त हो सका.
जहाँ तक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है, अपने प्रादुर्भाव के आरंभिक दिनों से ही, सर्वहारा का अन्य शिल्पों या कृषि कर्म में लगे रहने वाले मेहनतकशों से विभेदीकरण बहुत कम हुआ था. लेकिन जैसे-जैसे पूंजीवाद विकसित होता गया, सर्वहारा ने अपनी खुद की अभिलाक्षणिकताएँ धारण कर लीं. सर्वहारा, स्वतन्त्र किसान और शिल्पकार के बीच भिन्नता इस तथ्य में निहित है कि सर्वहारा मजदूर श्रम के साधनों से वंचित होता है, कि उसे अपने लिए नहीं (किसान और शिल्पकार की भांति) बल्कि पूंजी के मालिक अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए श्रम करना पड़ता है. वह स्वयं को, अपनी श्रमशक्ति को इस तरह बेचता है मानो वह कोई माल हो और इसके बदले वह उज़रत पाता है.
जब तक पूंजीवाद अपनी शैशवावस्था में था, जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में सामंती अधिकारी और नगरों में व्यापारिक निगम वित्तीय पूंजी और व्यापारिक पूंजी के औद्योगिक पूंजी में रूपांतरण को बाधित करते रहे, जब तक विनिर्माण उद्योग केवल उन नगरीय बस्तियों में पनपते रहे जो शिल्प-संघों के नियंत्रण में नहीं थे- दमनात्मक कानूनों के बावजूद उजरती मजदूर, सर्वहारा पूंजी संचय के परिणामस्वरूप अपने श्रम की बढती मांग का पूरा लाभ उठाते रहे. गिरजाघर से जुड़ी परिसंपत्तियों की लूटमार, राज्य की संपत्तियों के वितरण और सामूहिक भूमि की व्यापक बाड़ेबंदी जिसने लाखों किसानों को आजीविका से वंचित कर दिया तथा राजमार्गों, गलियों में व्यर्थ ही काम की तलाश में भटकने पर मजबूर कर दिया, के बाद मजदूरों की हालत अकस्मात बहुत बिगड़ गयी. विनिर्माण की वृद्धि ने, स्वतन्त्र उद्यमोँ को खड़ा करने के लिए अत्यंत आवश्यक पूंजी संचय ने उज़रती मज़दूर की स्वयं मालिक बन जाने की आशाओं पर पानी फेर दिया था – क्योंकि स्वतन्त्र शिल्पों का स्थान भी पूंजीवादी उद्यम लेते जा रहे थे. यह सही है कि विनिर्माण उद्योग केवल धीरे-धीरे (सत्रहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश  से लेकर अठाहरवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश तक के सौ सालों या इससे कुछ ज्यादा अवधि के दौरान ही) नगरीय उत्पादन तथा ग्रामीण उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित कर सका था. लेकिन कारीगरों और घरेलू नौकरों के आते जाने से सर्वहारा की कतारों में लगातार वृद्धि हो रही थी. इन सभी नए घटकों के बावजूद वर्ग के रूप में सर्वहारा का विभेदीकरण ज्यादा तेजी से हो रहा था. नगरीय शिल्पकार और ग्रामीण घरेलू नौकर पूरी तौर पर तभी गायब हुए जब मशीन से विशाल पैमाने का उत्पादन शुरू हुआ. वे कई खंडों में सर्वहारा की कतारों में फेंके गए और इस प्रकार ख़त्म हो गयी उनकी “आदिम अवस्था” में वापस लौटने की सम्भावना. बडे पैमाने पर मशीन से उत्पादन की शुरुआत ने ऐसे व्यक्तियों के वर्ग को जन्म दिया जो बाज़ार में अपनी चमड़ी बेचने खुद जाते हैं और रोज़गार की तलाश में अपने शरीर को प्रतिस्पर्द्धा की भंवर में झोंक देते हैं.
एंगेल्स बताते हैं,”आधुनिक बुर्जुआ समाज का प्रधान लक्षण सभी की सभी के खिलाफ जंग है जिसकी सर्वाधिक पूर्ण अभिव्यक्ति ‘प्रतिस्पर्द्धा” शब्द से होती है. यह युद्ध जिंदगी के लिए, अस्तित्व के लिए, प्रत्येक चीज़ के लिए किया जाता है और ज़रुरत पड़ जाये तो मृत्यु तक चलता रहता है. यह युद्ध समाज के विभिन्न वर्गों के बीच ही नहीं बल्कि इन वर्गों के अलग-अलग सदस्यों के बीच भी छिड़ा रहता है. हरेक इन्सान दूसरे इन्सान के रास्ते का रोड़ा होता. इसलिए हरेक इन्सान दूसरे इन्सान को अपने रास्ते से हटा देने और उसकी जगह लेने की कोशिश करता है. मजदूर एक-दूसरे से ठीक उसी तरह प्रतिस्पर्द्धा करते हैं जिस तरह एक बुर्जुआ दूसरे बुर्जुआ से प्रतिस्पर्द्धा करता है. शक्तिचालित करघे का बुनकर, हथकरघा बुनकर, रोजगारशुदा या ज़्यादा उज़रत पाने वाले  साथी से प्रतिस्पर्द्धा करता है और उसका स्थान लेना चाहता है. जहाँ तक मजदूरों का सवाल है, यह प्रतिस्पर्द्धा विद्यमान स्थितियों का निकृष्टतम पक्ष है क्योंकि यही सर्वाधिक असरदार हथियार है जो बुर्जुआ वर्ग सर्वहारा के खिलाफ इस्तेमाल करता है. (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 75-76)

संकटों के सिद्धांत और इतिहास के बारे में कुछ बातें

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‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

अंग्रेज़ मेहनतकश वर्ग जीवनस्थितियों का चित्रण करने वाली अपनी पुस्तक में एंगेल्स संकटों के बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं. वह सिद्ध करते हैं कि पूंजीवादी उत्पादन और प्रतिस्पर्द्धा की प्रवृति ही उन्हें (संकटों) उत्पन्न करती है.”आधुनिक उत्पादन और उत्पाद वितरण की अराजक स्थितियां, उत्पादन की वे स्थितियां जोकि आवश्यकता की तुष्टि के लिए न होकर लाभ से नियंत्रित होती है, वह स्थितियां जिसमें धनी बन जाने की कोशिश में प्रत्येक व्यक्ति खुद की स्वंतंत्र लीक पर काम करता है, ये स्थितियां बार-बार मंदी पैदा करने से नहीं चुकती हैं. औद्योगिक विकास के युग के आरंभ में मंदी उद्योग की एक या दूसरी शाखा या एक बाज़ार तक सीमित रहती थी. लेकिन प्रतिस्पर्द्धियों की कार्रवाईयों के चलते उद्योग की एक शाखा में रोज़गार से वंचित मजदूर उद्योग की दूसरी शाखा में रोज़गार पाने के लिए धावा बोल देते हैं जिसमें काम सीखना तुलनात्मक रूप से आसान होता है. इस प्रकार वे उत्पाद जिन्हें एक बाज़ार में खरीददार नहीं मिलते आगे बढ़कर दूसरे बाज़ार में पहुँच जाते हैं, आदि, आदि. ये छोटे-छोटे संकट इकठ्ठा होकर कालांतर में बड़े पैमाने के संकटों में तब्दील हो जाते हैं. इन संकटों का दस्तूर यह होता है कि विकास और व्यापक समृद्धि की अल्पकालीन अवधि के बाद हर पाँच वर्ष में वे प्रकट हो जाते हैं.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 82)

अन्यंत्र एंगेल्स पॉँच वर्षीय या छः वर्षीय चक्रों की चर्चा करते हैं और ‘कम्युनिज्म के सिद्धांत’  [The Principles of Communism-Frederick Engels 1847] में सात वर्षीय अवधि का उल्लेख करते है. “इस शताब्दी की पूरी अवधि के दौरान, उद्योगों का जीवन समृद्धि के दौरों और संकटों के दौरों के बीच झूलता रहा. इस तरह के संकट पॉँच साल से सात साल के नियमित अंतरालों में पैदा होते रहे. अपने साथ मजदूरों के लिए असहनीय दुर्दशा, व्यापक क्रांतिकारी उफान और मौजूदा व्यवस्था के लिए सबसे बड़े संकट लाता गया.”

सन 1848 के बहुत सालों बाद जब मार्क्स पूंजी लिख रहे थे, तब उन्होंने ध्यान दिया कि तेजी और मंदी के बीच उतार-चढाव के ये चक्र पॉँच या सात वर्षों की नहीं बल्कि दस या पंद्रह सालों की अवधि को समेट लेते हैं.

पहला संकट सन 1825-1826 में आया जिसने राष्ट्रव्यापी असर पैदा किया. उसके आरंभ में सट्टेबाजी की कार्रवाईयों में प्रस्फोट हुआ था. अगला व्यापक संकट 1836-37 में आया. इसके पहले ब्रिटेन के उद्योग और निर्यात में बहुत वृद्धि हुई थी. निर्यात में यह वृद्धि विशेष थी जिसे उत्तरी अमेरिका में बाज़ार मिल गया था. 1847 में तीसरे संकट के संकेत मिलने लगे थे. 1845 और 1846 के “रेलवे में पूंजी लगाने के उन्माद” जिसमें रेलवे निर्माण में विह्वल उतावली में पूंजी उड़ेली जा रही थी, के बाद तेजी से मंदी आयी.

जिस गति से रेलवे का निर्माण किया जा रहा था, उससे बड़ी भारी संख्या में लोगों को काम मिला. लेकिन बाद में लगभग पचास हज़ार लोग बेरोजगार हो गए. इस संकट की चरम अवस्था में जिसने ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और वास्तव में समूचे यूरोपीय महाद्वीप को (रूस को छोड़कर) लपेट में लिया था और जिसने 1848 की क्रांतिकारी उथल-पुथल का मार्ग प्रशस्त कर दिया था, कम्युनिस्ट लीग के अनुरोध पर मार्क्स ने घोषणापत्र की रचना की.

डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

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14. पूंजीवाद और प्रकृति पर मनुष्य की विजय

सन 1848 तक प्रकृति पर मनुष्य की विजय का काम बहुत धीमी गति से चल रहा था. फिर भी वाट के आविष्कार की व्यापक स्वीकृति के बाद वायु शक्ति और जलशक्ति के बेहतर इस्तेमाल के साथ-साथ वाष्पशक्ति के उपयोग का विकास तेजी से हो रहा था. 1820 से ओस्टेड (1777-1851), सीबेक (1770-1831) और फैराडे (1791-1867) जैसे वैज्ञानिकों ने विद्युत परिघटना के क्षेत्र में एक के बाद दुसरे आविष्कार किये. लेकिन विद्युत तार और विद्युत धातुशोधन के अपवाद को छोड़कर विनिर्माण उद्योग में इन आविष्कारों का लाभ नहीं उठाया जा सका. हालाँकि उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी तृतीयाँश में उद्योग की एक शाखा के रूप में विद्युत तकनीक अस्तित्व में आ चुकी थी.

कृषि में रसायन विज्ञान का उपयोग, जिसे कभी-कभी कृषि रसायन कहा जाता है, का श्रेय मुख्य रूप से जस्टस वान लीबिंग (1806-1873) नामक जर्मन को जाता है. हालाँकि इस सिलसिले में हम्फ्री डेवी (1772-1829) नामक अँगरेज़ का उल्लेख किया जा सकता है जिसकी कृषि रसायन के प्रारंभिक ज्ञान पर पुस्तक 1813 में प्रकाशित हुई थी. इस विषय पर लीबिंग की प्रथम कृति (Die Chemie in ihrer Ammending aur Agriculther und Phisiology) शीर्षक की पुस्तक जिसका लयों फ्लेफेयर (1818-1898) ने तुरंत अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया था) 1840 में प्रकाशित हुई. मार्क्स बताते हैं, “लीबिंग का एक अमर अवदान यह है कि उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान के दृष्टिकोण से आधुनिक खेती के नकारात्मक और विनाशकारी पहलू का विवेचन किया है (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1,548, टिपण्णी). इसके ठीक पहले मूल पाठ में लिखा है : “पूंजीवादी उत्पादन आबादी को लगातार बड़े केन्द्रों में एकत्रित करके शहरी आबादी के महत्त्व को बढाकर एक ओर समाज की गतिशीलता में वृद्धि कर देता है तो दूसरी ओर मनुष्य और धरती के बीच पदार्थों की अदला-बदली को अर्थात भोजन और वस्त्र के रूप में मनुष्य धरती से जिन तत्त्वों को लेकर उपयोग कर लेता है, उनकी धरती को वापसी, जो धरती को उपजाऊ बनाये रखने के लिए सदा सहज आवश्यक होता है, को अस्त-व्यस्त कर डालता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1,546-47)

लीबिंग पहले व्यक्ति थे जिन्होनें सिद्ध किया कि ज़मीन की उर्वरा शक्ति चुक जाने का कारण यह है कि इन्सान और उसके द्वारा जोती गयी ज़मीन के बीच विनिमय संबंधों में अस्त-व्यस्तता आ गयी है क्योंकि अपनी वृद्धि के दौरान फसलें ज़मीन से कुछ पदार्थों को चूस लेती हैं जिन्हें ज़मीन को वापस लौटा देने में इन्सान असमर्थ रहता है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और इसमें शहर के गाँव से अलगाव की एक अभिलाक्षणिकता धरती को कई उर्वरक पदार्थों से वंचित कर देना और प्राकृतिक खाद के रूप में इन पदार्थों को धरती को वापस न लौटा पाना है. प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के अर्न्तगत ज़मीन की उपज का लगभग पूरे हिस्से का उपभोग उस इलाके में हो जाता है जहाँ पैदावार होती है, उपभोक्ताओं, इन्सान और जानवर दोनों, द्वारा प्राकृतिक खाद ज़मीन की उर्वरा शक्ति को प्रतिपूर्ति के लिए पर्याप्त हुआ करती थी. लेकिन विशाल से विशालतर शहरों के विकास के कारण कृषि उत्पादों का उपयोग कृषि क्षेत्रों से दूर होने लगा और प्राकृतिक उर्वरक पदार्थ बर्बाद होने लगा. प्राकृतिक खाद के अभाव के कारण कृत्रिम उर्वरकों की खोज ज़रूरी हो गयी ताकि ज़मीन को उन खनिजों की वापसी की जा सके जिन्हें फसलों ने अपने पोषण के लिए इस्तेमाल कर डाला था. लीबिंग का मत था कि खनिज अवयवों की आपूर्ति सीमित होती है क्योंकि जमीन उनकी असीमित मात्रा मुहैया कराने में असमर्थ होती है. इसलिए किसान की मुख्य ज़िम्मेदारी और खादों का कार्य जमीन को उन खनिजों की प्रतिपूर्ति होना चाहिए जिन्हें प्रत्येक फसल, जिसकी उनके विश्लेषण से पता चलता है, अपनी वृद्धि के लिए जमीन से ले लेती है. इसलिए एक ऐसी कृत्रिम खाद तैयार की गयी जिसमें आवश्यक खनिज पदार्थ जैसे फास्फोरिक अम्ल, पोटेशियम और नाइट्रोजन विद्यमान थे. अठारह सौ चालीस की दशाब्दी और उसके बाद से, कृत्रिम खाद का उपयोग ज्यादा लोकप्रिय होने लगा. अब उत्पादित नाइट्रोजन युक्त खाद, सुपरफास्फेट जैसे उर्वरक और मूल धातु-कचरा, धुली हुई हड्डियाँ और मिश्रित खाद का इस्तेमाल किया जाता है. मूल धातु कचरा स्टील निर्माण का अपशिष्ट उत्पाद है और इसके उर्वरकीय गुणों की खोज 1878 के पहले नहीं हो पाई थी.

औद्योगिक उत्पादन में रसायनशास्त्र का उपयोग अठारवीं शताब्दी के अंत में आरंभ हुआ. सन 1787 के लगभग निकोलस लाब्लांक (1742-1806) ने समुद्री नमक से सोडा कार्बोनेट बनाने की महत्वपूर्ण समस्या पर ध्यान केन्द्रित किया. इन प्रयोगों में उसके अवदान ने कृत्रिम क्षार उत्पादन के विशाल उद्योग का आधार निर्मित किया जिसके उत्पाद विरंजन कार्यों (विशेषतया कुछ किस्म के कागजों के लिए), आतिशबाजी, दियासलाई, साबुन, वस्त्रों, रंगों आदि में प्रयोग किए जाते है. प्रदीपक के रूप में कोल गैस के पहले व्यावहारिक उपयोग का श्रेय विलियम मरडक (1754-1839) को दिया जाता है जिन्होंने सन 1792 से 1802 के बीच इस दिशा में सम्भावना प्रर्दशित करने वाले प्रयोग किए. इन प्रयोगों ने अगला पड़ाव तब पार किया जब एक जर्मन ने, जो 1804 में इंग्लैंड आया था, लिसियम थियेटर ख़रीदा और अपनी विधि का वहां प्रदर्शन किया. इसका परिणाम यह हुआ कि पॉल माल में नयी प्रकाश व्यवस्था की स्थापना के साथ ही लन्दन में गैस आधारित सार्वजानिक प्रकाश व्यवस्था आरंभ हो गयी. कोयले के आसवन से मुख्य ठोस अवशेष कोक प्राप्त होता है और द्रव अवशेष टार और अमोनियामय लिकर प्राप्त होता है. उप-उत्पात के रूप में हमें बेंजीन, एनिलीन डाई, विभिन्न कीटनाशक, नैप्थलीन, सैक्रीन आदि प्राप्त होते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में शेवारिल (1786-1889) की वसा और तेलों पर परीक्षणों और लाब्लांक की साधारण नमक से कास्टिक सोडा बनाने की खोजों ने साबुन और मोमबत्ती बनाने की विधियों और मात्राओं में आमूल परिवर्तन कर दिया. लेकिन घोषणापत्र के पहले प्रकाशन के कई वर्षों बाद अठारह सौ पचास के दशक में ही उद्योग में रासायनिक शोध के उपयोग का युग आरम्भ हो सका. सन 1848 से कुछ वर्षों बाद वस्त्र उत्पादन में औद्योगिक क्रांति जो अभी तक मुख्य रूप से कताई और बुनाई से सम्बंधित प्रक्रियाओं तक सीमित थी, रंगाई और परिष्करण के क्षेत्र में सुधार के साथ अपनी अंतिम मंजिल तक पहुँच गयी. 1856 में डब्ल्यू.एच. पार्किन ने पहला एनिलिन डाई अर्थात माव नाम का पहला रंगीन पदार्थ बनाया. कोलतार के आसवन से अन्य चमकदार रंगीन पदार्थों की खोजों का ताँता लग गया. आज इतने किस्म के रंगीन पदार्थ मौजूद हैं कि रंगसाज को उलझन में डाल देते हैं. उनसे हर किस्म के रंग बनाए जा सकते हैं जिनके गुण सर्वाधिक विविधपूर्ण होते हैं. उनमें से कुछ रंग अल्पकालिक लेकिन ज्यादातर रंग स्थायी और विभिन्न प्रभावों को सहन करने वाले होते हैं.

धरती के सुदूरवर्ती हिस्सों पर खेती करने का काम (घोषणापत्र के पाठ में मार्क्स और एंगेल्स इस प्रक्रिया का सन्दर्भ देते हैं) 1848 तक प्रारंभिक मंजिल पार कर चूका था. 1815 में संयुक्त राज्य का कपास का उत्पादन 73,000 गांठ था जो बढ़कर 1840 में 1,348,000 गांठों तक पहुँच गया था. 1840 में गेहूं का उत्पादन 84,800,000 बुशेल था लेकिन 1901-1905 के पाँच वर्षों में वार्षिक औसत 662,000,000 बुशेल प्रतिवर्ष हो गया था. जहाँ तक समस्त किस्मों के अनाजों के सम्पूर्ण उत्पादन का प्रश्न है, यह 1848 में 377.000,000 बुशेल था जबकि 1901-1905 के वर्षों के बीच औसत वार्षिक उत्पादन 2,100,000,000 बुशेल था. 1850 के बाद कनाडा, दक्ष्णि अमेरिका, आस्ट्रेलिया, साइबेरिया, अफ्रीका आदि व्यापार के लिए खुले.

अठारवीं शताब्दी के अंतिम तृतीयाँश तक नौपरिवहन के लिए नदियों का प्रयोग पुराने तरीके से ही किया जा रहा था. अठारवीं शताब्दी के मध्य में इंग्लैंड में नहरों के निर्माण का काम आरंभ हो गया था और फ्रांस में भी नहरों का जाल बिछ गया था. नहर निर्माण के आरंभिक वर्षों में बनाई गयी ज्यादातर नहरे बजरा और नौका नहरों के नाम से जानी जाती थीं तथा सीमित गहराई और चौडाई के कारण छोटे आकार के जलयान के लिए उपयुक्त थीं. नहरों के विकास का कारण बढ़ते व्यापार की तत्काल ज़रुरत को पूरा करना था. जैसे-जैसे नहर निर्माण की तकनीक में सुधार होता गया, जलमार्गों की गहराई और चौडाई इतनी बढाई गयी कि इसमें समुद्री जहाज भी चलने लगे. ज्यादातर जहाजी नहरें इसलिए निर्मित की गयीं ताकि बीच में पड़ने वाले जलडमरू मध्य को काटकर दो सागरों के बीच यात्रा समय को कम किया जा सके. (उदाहरण के लिए केलिडोनियन नहर और श्वेज़ नहर) या कि महत्त्वपूर्ण आंतरिक स्थानों को समुद्री बंदरगाहों में परिवर्तित किया जा सके (मैनचेस्टर जहाजी नहर और फ्लैंडर्स में जीब्रुगे-ब्रुग्स नहर). एक छल्ले से दुसरे छल्ले तक कटाई करके नदियों की टेढ़े-मेढे घुमावदार धारा से बचाया गया और बांध और जलाशय द्वारा नदी की तलहटी का ढाल नौपरिवहन योग्य बनाया गया. जलमार्गों और नदियों के मुहानों को प्राय: वाष्पशक्ति से चालित ड्रेजिंग मशीनों द्वारा साफ़ किया जाता है. बड़े पैमाने के रेलवे निर्माण के आरंभ होने के बाद ही नहरों का विकास समाप्त हुआ.

‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां-13

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पूँजी का संचय

पूंजीपतियों के व्यक्तिगत नियंत्रण में पूंजी का संचय दो तरीकों से होता है. सबसे पहले श्रम से लाभ निचोड़कर इसका स्वतः संचय हो जाता है. (पूँजी का संकेंद्रण) तथा दूसरी ओर पूंजीपतियों की व्यक्तिगत पूंजी का संयुक्त स्टॉक कम्पनियों, व्यापार-संघ, व्यवसाय संघ और उत्पादन संघ के नियंत्रण में पूंजी के समूहन द्वारा पूंजी संचय हो जाता है. (पूंजी का केन्द्रीकरण).

यूनाइटेड किंगडम में कुल कर योग्य आय 1856 में 3,07,068,898 पौण्ड, 1865 में 385,530,020 पाउंड, 1882 में 601,450,977 पाउंड और 1912 में 1,111,456,413 पाउंड थी. इन आंकडों में कर मुक्त आय जोड़ देने पर कुल योग 2,000,000,000 पाउंड हो जाता है. इसका आधा हिस्सा आबादी के आठवें हिस्से को प्राप्त होता है. 1884 में इंग्लैंड में संयुक्त स्टॉक कम्पनियों की कुल संख्या 8,192 थी. 1912 में यह बढ़कर 29,730 और 1916 में 66,094 हो गयी. इसी के अनुरूप, इन स्टॉक कम्पनियों की पूंजी 1884 में 480,000,000 पाउंड से बढ़कर 1900 में 1,164,000,000 पाउंड और 1916 में 2,720,000,000 पाउंड हो गयी.

वर्ष 1906 से 1913 तक फ्रांस की राष्ट्रीय सम्पत्ति की कीमत 225,000,000,000 फ्रैंक आंकी गयी थी जो 11,664,000 व्यक्तियों के पास थी इनमें से 98,243 जिनमें से प्रत्येक के पास 250,000 फ्रैंक से अधिक की संपत्ति थी और उनकी संपत्ति की सकल धनराशी 106,000,000 अर्थात समस्त राष्ट्रीय संपत्ति का लगभग आधा हिस्सा. अगर इनमें से सर्वाधिक धनी व्यक्तियों को अलग कर दें जिनकी संख्या लगभग 18,586 और संपत्ति का मूल्य 60,500,000 फ्रैंक था तो 9,500,000 से कम संपत्ति धारक बच जाते हैं जिनमें से प्रत्येक के पास 10,000 से अधिक मूल्य की संपत्ति थी जिनकी कुल संपत्ति का मूल्य 66,000,000,000 था.

प्रशिया में 900 मार्क से कम आय वाले 8,570,418 व्यक्ति थे. इन सबकी आय का योग उच्चतर श्रेणी के 1,46,000 व्यक्तियों की कुल आय से कम था. 1,00,000 मार्क से अधिक आय वाले व्यक्तियों की संख्या 1913 में 4,747, 1914 में 5,215 और 1917 में 13,327 थी.

संयुक्त राज्य की राष्ट्रीय संपत्ति में 7,100,000,000 डॉलर 1870 में 30,000,000,000 डॉलर और 1900 में 88,500,000,000 डॉलर थी. 1912 में यह बढ़कर 187,000,000,000 डॉलर और कुछ अर्थशास्त्रियों के आकलन के अनुसार 1920 में 500,000,000,000 तक पहुँच गयी थी. 1917 में 50,000 डॉलर या इससे अधिक वार्षिक आय वाले 19.103 व्यक्ति थे जिनमें 141 व्यक्तियों की आय 10,000,000 डॉलर से अधिक थी. विनिर्माण उद्योग में पूंजी निवेश की धनराशी 1899 में 8,500,000,000 और 1914 में 22,700,000,000 डॉलर थी. रेलवे निर्माण में पूंजी निवेश की धनराशी 1899 में 11,000,000 डॉलर थी और 1914 में 20,200,000,000 डॉलर थी.

बड़े व्यापार संघों द्वारा नियंत्रित नेशनल सिटी बैंक की पूंजी  1879 में 16,700,000 डॉलर थी. यह पूंजी बढ़कर 1899 में 128,000,000 डॉलर हो गयी  थी और आज बढ़कर यह 1,000,000,000 डॉलर हो गयी है.

इस वक्त जबकि संयुक्त राज्य संसार के सम्पूर्ण क्षेत्र के 7 प्रतिशत पर काबिज़ है जबकि इसकी आबादी विश्व की आबादी का 6 प्रतिशत से भी कम है, यह पूंजीवादी गणतंत्र विश्व के सोना उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के गेहूं उत्पादन का 25 प्रतिशत, विश्व के स्टील और लौह उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के सीसा उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के जिंक उत्पादन का 50 प्रतिशत, विश्व के चाँदी उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के कोयला उत्पादन का 60 प्रतिशत, विश्व के खनिज उत्पादन का 60 प्रतिशत, विश्व के अनाज उत्पादन का 75 प्रतिशत और विश्व के कार उत्पादन का 85 प्रतिशत पैदा करता है. यह समस्त चंद एक ट्रस्टों न्यासों के नियंत्रण में है जिनके शीर्ष पर रॉकफेलर  मोर्गेन, फोर्ड, मैकार्मिक और आरमर जैसे बीस अरबपति है.

‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां-12

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शहर और गाँव के बीच दरार

जर्मनी में पहले विशाल पैमाने के श्रम विभाजन, शहर से गाँव के अलगाव को स्थापित होने में तीन शताब्दियों का वक्त लगा. केवल इस पहलू के लिहाज़ से जिस तरह शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सम्बन्धों में परिवर्तन हो गया था, ठीक उसी प्रकार सारे समाज में परिवर्तन हो गया था. आइए हम श्रम विभाजन के इस एक ही पहलू पर गौर करते हैं और प्राचीन दास-स्वामी वाले गणतंत्रों और ईसाई सामंतवाद के विरोध पर ध्यान देते हैं या फिर उपाधिकारी भूपतियों के पुराने इंग्लैंड और कपास स्वामियों के आधुनिक इंग्लैंड के विरोध पर ध्यान देते हैं. चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी में जब औपनिवेशिक अधिकार क्षेत्र स्थापित नहीं हुए थे, जब यूरोपियनों के लिए अमेरिका अस्तित्व ही नहीं था और एशिया के व्यापर कुस्तुनतुनिया के रास्ते से होता था, जब भूमध्य सागर व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र था-उन दिनों (समाज में) श्रम विभाजन सत्रहवीं शताब्दी के श्रम विभाजन से बिलकुल भिन्न था जब स्पेन, पुर्तगाल, हॉलैंड, इंग्लैंड और फ्रांस धरती के हर कोने पर औपनिवेशिक अधिकार-क्षेत्र स्थापित कर रहे थे (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ फिलासफ़ी, पृ. 101). पूंजी में मार्क्स इस विषय का फिर उल्लेख करते हैं और जोड़ते हैं : “प्रत्येक श्रम विभाजन का आधार जो अच्छी तरह विकसित हो चुका है और जो मालों के विनिमय के कारण अस्तित्व में आया है, शहर और देहात का अलगाव होता है. यह कहा जा सकता है कि समाज के पूरे आर्थिक इतिहास का सारांश शहर और देहात के बीच इस अलगाव में निहित है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1 371-2)

विशाल पैमाने के उद्योग ने कृषि के पुराने जमाने के तौर-तरीकों पर निर्णायक प्रहार किया. इसने किसान के ग्रामीण जीवन की निर्जीव कर देने वाली स्थितियों का उन्मूलन कर दिया. “कृषि के क्षेत्र में आधुनिक उद्योग का सर्वाधिक क्रांतिकारी प्रभाव यह है कि यह पुराने समाज के आधार स्तम्भ – किसान – को नष्ट कर देता है और उसके स्थान पर उज़रत लेकर काम करने वाले मजदूर को स्थापित कर देता है. इस प्रकार सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता और वर्ग विरोध गांवों में भी शहर के स्तर तक पहुँच गए हैं…उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति ने कृषि और मैन्युफैक्चर के बीच एकता के पुराने बंधन को, जिसने उनमें तब एकता कायम कर रखी थी जब दोनों अपनी शैशव अवस्था में थे, एकदम तोड़कर फैंक दिया है.”(मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 546 )

नीचे दिए गए आंकडों से यह नतीजा निकलता है कि उन्नीसवीं शताब्दी की आरम्भिक दशाब्दियों में गाँव की आबादी के बहिर्गमन से शहरी आबादी में बहुत तेज वृद्धि हुई. 1800 में लन्दन की आबादी 9,59,000 थी जो बढ़कर 1850 में 2,363,000 हो गयी. 1800 से 1850 के बीच पेरिस की आबादी 547,000 से बढ़कर 1,053,000 हो गयी. इसी अवधि में न्यूयार्क की आबादी 64,000 से बढ़कर 612,000 हो गयी. मैनचेस्टर, बर्मिंघम, शैफील्ड और ब्रेडफोर्ड जैसे नए औद्योगिक केन्द्रों में आबादी में वृद्धि और ज्यादा तेज़ थी. लेकिन इस शताब्दी के दूसरे अर्धांश के दौरान शहरी आबादी में वृद्धि के सामने यह कुछ भी नहीं थी.

1850

1900

वियना

444,000

1,675,000

सैंट पीटर्सबर्ग

485,000

1,333,000

बर्लिन

419,000

1,889,000

म्यूनिख

110,000

500,000

एसेन

9,000

119,000

लीपज़िग

63,000

456,000

शिकागो

30,000

1,699,000

न्यूयार्क शहर

612,000

3,437,000

1851 में ही इंग्लैंड और वेल्स की शहरी आबादी 8,991,000 तक पहुच गयी थी जोकि पूरे देश की आबादी का 50 प्रतिशत थी. 1901 तक यह आबादी बढ़कर 28,169,000 या सम्पूर्ण आबादी का 88 प्रतिशत हो गयी थी. इंग्लैंड और वेल्स की आबादी में वृद्धि की रफ्तार को नीचे दिए गए आंकडों से देखा जा सकता है :

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वर्ष                  आबादी

1690                          5,000,000

1801                          9,000,000

1851                        17,900,000

1901                        32,500,000

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इंग्लैंड और वेल्स में जनसंख्या घनत्व 1800 में लगभग 146 प्रति वर्ग मील, 1840 में 265 प्रति वर्ग मील और 1901 में 540 प्रति वर्ग मील था.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-11. पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत संचार के साधनों और परिवहन का विकास

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11. पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत संचार के साधनों और परिवहन का विकास

“उद्योग और कृषि की उत्पादन प्रणालियों में क्रांति ने उत्पादन की सामाजिक प्रक्रिया की सामान्य परिस्थितियों में – अर्थात संचार और परिवहन के साधनों में – भी एक क्रांति को आवश्यक बना दिया. फूरिये के शब्दों में जिस समाज की एक धुरी सहायक घरेलू उद्योगों सहित छोटे पैमाने की खेती और दूसरी धुरी शहरी दस्तकारी थी उस समाज में संचार और परिवहन के जो साधन थे वे मैन्युफैक्चर के काल की उत्पादन आवश्यकताओं के लिए जिसमें सामाजिक श्रम का विस्तृत विभाजन, उत्पादन के औजारों और मजदूरों का संकेन्द्रण हो गया था और जिसके लिए उपनिवेशों में मंडियां तैयार थीं, इतने अधिक अपर्याप्त थे कि संचार और परिवहन के क्षेत्र में मूल परिवर्तन होना ही था और वास्तव में यह हुआ भी. इसी प्रकार मैन्युफैक्चर के काल से आधुनिक उद्योग को संचार और परिवहन के जो साधन मिले, वे इस नए ढंग के उद्योग के लिए जिसमें तूफानी गति से उत्पादन होता है, जिसका विस्तार बहुत व्यापक होता है, जो पूँजी और श्रम को उत्पादन के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में लगातार स्थानांतरित करता रहता हो और जिसके पूरे विश्व की मंडियों में नवोत्पादित सम्बन्ध स्थापित हो चुके हों, शीघ्र ही असहनीय बाधा बन गए. इसलिए पालों वाले जलपोतों की बनवाट में मूलभूत परिवर्तनों के अलावा नदियों में चलने वाले स्टीमरों, रेलों, सागरगामी वाष्प जलपोतों और तार की एक पूरी प्रणाली से संचार और परिवहन के साधन विशाल पैमाने के उद्योग की उत्पादन पद्धतियों के धीरे-धीरे अनुकूल बनते चले गये.” (मार्क्स, कैपिटल, 1, अंग्रेजी, 406-407)

अठारहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में जलयानों को इंग्लैंड से भारत जाने और वापस आने की समुद्री यात्रा में अठारह से बीस महीने का वक्त लगता था. इन जलयानों का औसत भार 3०० से 500 टन हुआ करता था. अठाहरवीं शताब्दी के अंत में इस जहाज़रानी बेड़े की कुल भार-क्षमता 1,725,000 टन से अधिक नहीं थी. पहले चप्पुओं से और फिर पेंच या पेंचों से आगे बढ़ने वाले वाष्प-जलपोतों के आविष्कार के साथ समुद्री परिवहन के भार और गति दोनों में ज़बरदस्त वृद्धि हुई. आजकल मालवाहक जहाज़ों का औसत भार दस से बारह हज़ार टन होता है और यात्री जहाज़ जिनकी औसत भार-क्षमता चालीस से पचास हज़ार टन होती है, बीस नॉट प्रति घंटा या उससे ज़्यादा रफ्तार से चलते हैं. नार्वे के सांख्यिकीविदों के अनुसार 1821 में सारे समुद्री बेड़े की भारवहन क्षमता 5,250,000 टन थी जिसमें वाष्प चालित जहाज़ 0.02 प्रतिशत से अधिक नहीं थे. 1914 में यह भार क्षमता 31,500,000 टन हो गयी जिसमें मुख्यता वाष्प जलपोत थे. जहाँ तक रेल मार्गों का सम्बन्ध  है, 1840 में पूरे विश्व में इसकी लम्बाई 4800 मील, 1850 में 21,600 मील, 1870 में 136,000 मील और 1913 में इसकी लम्बाई 690,000 मील थी. मालगाडी की औसत चाल 20 से 25 मील प्रति घंटा और यात्री गाड़ी की औसत चाल 35 मील प्रति घंटा थी. 1812 में बर्लिन से वियना तक की यात्रा में पांच दिन का समय लगता था 1912 में यह समय घट कर बारह घंटा हो गया. 1812 में बर्लिन से पेरिस तक की यात्रा नौ दिन की थी और 1912 में केवल सत्रह घंटों की ज़रुरत रह गयी थी. 1812 में हैम्बर्ग से न्यूयार्क की यात्रा में लगने वाले अड़तालीस दिनों की बजाय 1912 में सात दिनों से ज़्यादा की ज़रुरत नहीं रह गयी थी. 1840 के बाद से, रोलेंड हिल (1795-1879) द्वारा प्रस्तुत किये गये सुधारों के बाद, डाक सेवा विशाल पैमाने के उद्योग की मांगों के अनुरूप गठित कर ली गयी थी. उन्नीसवीं सदी के अंत तक डाक सेवा लगभग पूरी पृथ्वी पर चालू हो गयी थी जिससे उत्तर में स्पिटबर्गेन से लेकर दक्षिण में टियरा डे फ्यूगो पर पुटा एरिनाज़ तक पत्रों आदि का नियमित वितरण होने लगा. पोस्टल यूनियन की स्थापना ने सम्पूर्ण पृथ्वी को ‘एक डाक क्षेत्र’ में बदल दिया है.

पहला संकेत यंत्र जो क्लॉद शेप (1753-1850) द्वारा आविष्कृत प्रकाशीय तार यंत्र था, को 1792 में लेजिस्लेटिव असेम्बली ने स्वीकार कर लिया था और राजतन्त्रवादी गठबंधन के विरुद्ध संघर्ष में क्रांति की सेना के लिए यह यंत्र बहुत उपयोगी साबित हुआ. आजकल सर्वाधिक सुपरिचित संकेत यंत्र वह है जो रेलवे सिग्नल की ब्लाक प्रणाली में प्रयोग किया जाता है. विद्युत तारयंत्र के आविष्कार हो जाने के पहले तक, लम्बी दूरी तक तीव्र गति से सन्देश भेजने के लिए संकेत यंत्रों से प्रसारण का उपयोग किया जाता था. 1830 के दशक के दौरान एक विद्युत तार यंत्र बनाया गया और अमेरिकावासी मोर्स (1791-1872) ने अभिलेखन पद्धति का अविष्कार किया जो आज तक उसके नाम से जाना जाता है. 1844 से ही विश्व बाज़ार की आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए और इसके विकास की गतिविधियों से कदम मिलाकर चलने के लिए इलेक्ट्रो-टेलीग्राफ का उपयोग सारे संसार में किया जा रहा है. टेलीग्रामों के ज़रिए ही वाणिज्य जगत के दामों में तेजी से होने वाले उतार-चढाव की जानकारी दी जा सकती थी. 1865 में जब पहला समुद्री तार बिछाया गया तब से सारे संसार में तार-यंत्रों की सहायता से संपर्क स्थापित हो गया. टेलीग्राफ प्रणाली की सहायता से राजधानी और उपनिवेशों के बीच, केंद्र में स्थित व्यापारिक उद्यम और उसकी दूरस्थ शाखाओं के बीच निकटम सम्बन्ध कायम कर दिया गया है.उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक पचास लाख मील लम्बी टेलीग्राफ संचार-प्रणाली निर्मित कर दी गयी थी. अठारह सौ सत्तर के दशक में टेलीफोन का प्रयोग आरंभ किया गया था और तब से इसका इतना अधिक विकास हो गया है कि एक देश के किसी शहर या गाँव में बैठे किसी मित्र से ही नहीं, बल्कि देश की सीमाओं के बाहर बैठे मित्र से भी बातचीत की जा सकती है. यह गणना की गयी है कि टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार लगभग चालीस लाख मील में फैले हुए हैं और इनकी लम्बाई से पूरी पृथ्वी को 1600 बार लपेटा जा सकता है. बेतार टेलीग्राफ और टेलीफोन के आविष्कार ने संचार के साधनों के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत कर दी है.

अंग्रेज़ व्यापारियों ने अपने सामानों, विशेषतया सूती सामानों की कीमत घटाकर ईस्ट इंडीज़ के उद्योग को बरबाद का दिया. समृद्धि के लिए वे केवल आर्थिक स्त्रोतों से संतुष्ट नहीं हुए बल्कि उन्होंने बिना किसी नैतिक हिचक के राजनितिक तौर-तरीकों का भी सहारा लिया. इस प्रकार उन्होंने बल प्रयोग से चीनियों को अफीम का आयात करने के लिए विवश कर दिया. इस मामले में अंग्रेजी नौसेना की जगह पर संयुक्त राज्य की नौसेना ने काम किया. 1854 के पैरी समझौता, 1875 का हैरिस समझौता और 1858 की येदो संधि द्वारा जापानियों को अपने कुछ बंदरगाह पश्चिमी व्यापार के लिए खोलने के लिए मजबूर कर दिया गया.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-10. विश्व बाज़ार का मात्रात्मक और गुणात्मक विकास

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10. विश्व बाज़ार का मात्रात्मक और गुणात्मक विकास

“मशीनों के आविष्कार के पहले प्रत्येक देश की औद्योगिक गतिविधि मुख्यतया देशज भूमि में पैदा होने वाले कच्चे सामान के उत्पादन को लगातार विकसित करते जाने में निहित थी. इस प्रकार ग्रेट ब्रिटेन देशी भेड़ों के ऊन से कपड़ा बनाता था, जर्मनी पटसन को लिनेन में परिवर्तित करता था, फ्रांस रेशम और पटसन पैदा करता था और इनसे तैयार माल बना लेता था, ईस्ट इंडीज़ और लेवांत कपास उगाते थे और इससे सूती सामान बनाते थे,आदि-आदि. वाष्प-चालित मशीन के उपयोग से श्रम विभाजन में इतना अधिक विस्तार हो गया कि विशाल पैमाने के उद्योग देशज भूमि से उखड़ते गए और विश्व बाज़ार, अंतरराष्ट्रीय विनिमय और अंतरराष्ट्रीय श्रम पर पूर्णतया निर्भर हो गए.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ 110)

यदि यूरोपीय उद्योग को कपास,जूट, पेट्रोलियम और रबर उपलब्ध न होता तो इसकी नियति इसे विनाश की ओर ले जाती. इटली का इन्जीनियरिंग और ऑटोमोबाइल उद्योग कोयला और धातु के निर्यात पर पूर्णतया निर्भर है. मध्ययुगीन व्यापर के सर्वाधिक समृद्धिशाली काल में एक साल में सेंट गोथार्ड दर्रे से गुजरने वाले सारे सामान को अब आसानी से कुछ अदद साधारण मालगाडियों में भरा जा सकता था. अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विकास का स्तर निम्न आंकडों से स्पष्ट हो जाता है. 1800 में मालों के अंतरराष्ट्रीय कारोबार की कीमत 6,050,000,000,मार्क आंकी गयी थी, ( 1 मार्क = 8 औंस चांदी); पर था; 1840 में इसकी कीमत 11,500,000,000 तक पहुच गयी और और 1850 में इसका आकलन 16,650,000,000 किया गया था. बीसवीं सदी के आरंभ में अंतरराष्ट्रीय कारोबार 1850 की तुलना में पांच गुना बढ़ गया था और 88,500,000,000 मार्क तक पहुँच गया था जो 1912 तक छलांग लगाकर 169,000,000,000 मार्क तक पहुँच गया था. विश्व बाज़ार में पहुँचने वाले सामानों कि विविधता में दस गुना वृद्धि हो गयी थी. अठारवीं शताब्दी के अंत तक कुछ ‘कुलीन’ सामान उच्च वर्गों द्वारा वांछित माल बाज़ार में आये जिनकी मात्रा बढती गयी. बाल्टिक सागर और यूरोप के उत्तर-पश्चिमी सागर तट के बीच अनाज और इमारती लकड़ी का समुद्री व्यापार तेजी से होता था. 1790 में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े केंद्र, लन्दन में जलपोतों में भरकर 580,000 टन माल बन्दरगाह पर आया था. एक सौ साल बाद यह आंकडा बढ़कर 7,709,000 टन हो गया. सूती वस्त्र उद्योग के विकास से उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में कच्चे कपास उगाने की मांग में बढोत्तरी ज़्यादा से ज़्यादा होती चली गयी. 1790 में 2,000,000 पाउंड वजन की फसल हुई. 1820 में यह आंकडा बढ़कर 180,000,000 पाउंड हो गया था. इससे इंग्लैंड में कच्चे कपास के आयात में भारी वृद्धि हुई. 1751 में आयात की मात्रा 5,000,000 पाउंड थी, 1920 तक यह बढ़कर 142,000,000 पाउंड पहुँच गयी.

उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान विश्व बाज़ार में आने वाले माल की संरचना में समग्र परिवर्तन हो गया. उत्तरी अमेरिका से गेहूं, कपास, पेट्रोलियम और ताम्बा, दक्षिणी अमेरिका से कॉफी, ग्वानों, चिली का शोरा, गोश्त; एशिया से गेहूं, जूट, कपास, चावल और चाय; आस्ट्रेलिया से गेहूं, गोश्त और ऊन- यह सब विविध सामान हजारों वाष्प-चालित जहाजों में समुद्री रास्ते से आते हैं और विश्व बाज़ार को मालों से पाट देते हैं.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-8. पूंजीवाद का क्रांतिकारी चरित्र व 9. पुरे विश्व में पूंजीवाद का विस्तार

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8. पूंजीवाद का क्रांतिकारी चरित्र

“जब तक हस्तशिल्प और मैन्युफैक्चर सामाजिक उत्पादन के सामान्य आधार बने रहते हैं तब तक उत्पादक का उत्पादन की केवल एक विशिष्ट शाखा के अधीन रहना और उसके धंधे की विविधता का छिन्न-भिन्न हो जाना आगे के विकास का आवश्यक कदम होता है. इस मूलाधार के सहारे उत्पादन की प्रत्येक विशेष शाखा अनुभव के फलस्वरूप समुचित तकनीकी रूप प्राप्त कर लेती है, उसका क्रमश: परिष्करण करती जाती है और ज्यों ही यह रूप एक निश्चित मात्रा में परिपक्वता हासिल कर लेता है वैसे ही उसका उस रूप में ठोस ढंग से ढलना तीव्रता से हो जाता  है. वाणिज्य के द्वारा प्राप्त नए कच्चे माल के अलावा श्रम के औजारों में होने वाला क्रमिक परिवर्तन ही इसमें थोडा-बहुत फर्क डालता है. एक बार अनुभव से सिद्ध सर्वाधिक उपयोगी रूप जब प्राप्त हो जाता है तब श्रम के औजार का वह रूप मानों पत्थर में ढल जाता है, जो इस ढंग से प्रगट होता है जिससे कि अनेक औजार कई हज़ार वर्षों से एक पीढी से दूसरी पीढी को एक ही रूप में मिलते गए हैं… आधुनिक उद्योग किसी भी उत्पादन प्रक्रिया के वर्तमान रूप को उसका अंतिम रूप नहीं समझता और न ही व्यवहार में उसे ऐसा मानता है. इसलिए इसका तकनीकी आधार क्रांतिकारी है जबकि इसके पहले वाली उत्पादन की तमाम प्रणालियाँ बुनियादी तौर पर रुढिवादी   थीं. मशीनों, रासायनिक प्रक्रियायों तथा अन्य तरीकों की सहायता से आधुनिक उद्योग उत्पादन के तकनीकी आधार के साथ-साथ मजदूरों के काम और श्रम-प्रक्रिया के सामाजिक संयोजन में लगातार परिवर्तन कर रहा है. साथ ही यह उसी निरंतरता से इस समाज में पाए जाने वाले श्रम विभाजनों में परिवर्तन कर देता है तथा पूंजी की मात्रा तथा मजदूरों के समूहों को उत्पादन की एक शाखा से दूसरी शाखा में लगातार स्थानांतरित करता रहता है.” (मार्क्स, कैपिटल खंड 1, 524-526) पूंजीवाद के ऐतिहासिक भूमिका के प्रश्न के उत्तर के लिए देखें, प्लेखानोव (1856-1918) Georgi Plekhanov – Our Differences (हमारे मतभेद, रचनावली, रूसी संस्करण, खंड 1, पृ. 230-237)

9. पूरे विश्व में पूंजीवाद का विस्तार

सोलहवीं शताब्दी के दौरान पूरी दुनिया में बाज़ार के विस्तार ने पूंजीवाद के विकास को संवेग प्रदान किया. लेकिन अठारवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के बाद ही बुर्जुआ वर्ग धरती के सारे क्षेत्र पर फैलने में सफल हो सका. पृथ्वी के दूरस्थ स्थानों में प्रवेश करने के लिए बुर्जुआ वर्ग ने धर्म-प्रचारकों और वैज्ञानिकों का इस्तेमाल किया. 1770 से 1848 के बीच अंग्रेजों ने आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और सारे हिंदुस्तान पर अधिकार कर लिया था. फ्रांस, जिसे नेपोलियन के युद्धों में अपने अधिकांश औपनिवेशिक क्षेत्रों को अंग्रेजों के हवाले करना पड़ता, ने उत्तरी अफ्रीका के बड़े क्षेत्रों को कब्जे में करके अपने नुकसान की भरपाई कर ली थी.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-7. विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

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7. विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

“विनिमय का अपना अलग इतिहास है और यह विकास के विभिन्न मंजिलों से होकर गुजरा है. एक वक्त था, उदाहरण के लिए मध्ययुग में, जब केवल फ़ाजिल चीजों यानि केवल उन चीजों का जो जनता की ज़रूरतों से अधिक उत्पादित होती थीं, का विनिमय किया जाता था. दूसरा वक्त आया जब न केवल उत्पादन का अधिशेष बल्कि उद्योग का सम्पूर्ण उत्पाद वाणिज्य के क्षेत्र में पहुँचने लगा. यह वह वक्त था जब उत्पादन पूर्णतया विनिमय पर निर्भर हो गया था. अंत में वह दिन भी आ गया जब उन चीजों का जिन्हें पहले अहस्तान्तरणीय समझा जाता था, विनिमय और मोल-टोल होने लगा. वास्तव में वे चीजें बेचीं भी जाने लगी. वे चीजें भी जो अभी तक सौंपी जाती थीं, विनिमय नहीं की जाती थीं, दी जाती थीं, बेची नहीं जाती थीं – सतीत्व, प्रेम, अभिमत, विज्ञानं, अंतरात्मा आदि – वाणिज्य के हवाले कर दी गयीं. यह बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार और सार्विक धन -लोलुपता का वक्त है या राजनितिक अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो यह एक ऐसा वक्त है जबकि हर चीज़ चाहे भौतिक हो या आत्मिक, बिक्री योग्य माल बन गयी है, उचित मूल्य-निर्धारण हेतु बाज़ार में ले जायी जा रही है.” ((मार्क्स, द पॉवर्टी ऑफ फिलासफी, बीपीएच, कलकत्ता, पृ. 26)

“जब किसी माल में विनिमय-मूल्य को संभाले रखने और जमा करने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है, तब मुद्रा के प्रति लालच का जन्म होता है. मालों का परिचलन बढ़ने के साथ मुद्रा की, अर्थात उस सर्वथा सामाजिक रूप की जिसका हर वक्त इस्तेमाल किया जा सकता है, शक्ति बढती जाती है. १५०३ में जैमाका से लिखे पत्र में कोलंबस बताते हैं : “सोना एक आश्चर्यजनक वस्तु है. जिसके पास पास है वह जो भी चाहे हासिल कर सकता है. सोना आत्माओं के स्वर्ग तक जाने का रास्ता बना सकता है.” मुद्रा चूंकि यह खुलासा नहीं करती है कि कौनसी चीज़ उसमें रूपांतरित हुई है, इसलिए हर चीज़ चाहे वह माल हो या न हो, सोने से बदली जा सकती है. हर चीज़ बिकाऊ बन जाती है और हर चीज़ खरीदी जा सकती है. परिचलन वह विशाल सामाजिक दहनपात्र बन जाता है जिसमें हर चीज़ डाली जाती है और जिसमें से हर चीज़ मुद्रा का रूप धारण करके निकल आती है. यहाँ तक कि संतों की हड्डियाँ तक इस कीमियागिरी के सामने नहीं ठहर पाती हैं. इसमें से ज्यादा नाजुक चीजें, वे पवित्र चीजें जो मनुष्यों के व्यापारिक लेन-देन से बाहर हैं, तो इस कीमियागिरी के सामने और भी कम ठहर पाती हैं. जिस प्रकार मालों के बीच मात्रात्मक भिन्नता का लोप मुद्रा में हो जाता है उसी प्रकार मुद्रा बेरहमी से सबकुछ सपाट कर देने वाला, अपनी ओर से हर तरह के भेदभाव समाप्त कर देती है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, अंग्रेजी संस्करण, 112-13) capital

औद्योगिक क्रांति की पूर्वसंध्या पर ब्रिटेन में विद्यमान काव्यात्मक और पितृसत्तात्मक संबंधो को एंगेल्स ने अपनी कृति इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की दशा (द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, लंदन, 1892) में भली-भांति चित्रित किया है. १८४५ में लिखते समय इस पुस्तक में वह उन बुनकरों का चित्र प्रस्तुत करते हैं जो अभी भी भूमि के छोटे टुकड़े पर मालिकाना हक़ रखे हुए थे : “मेहनतकशों के इस वर्ग का नैतिक और बौद्धिक जीवन किस तरह का था , इसका अनुमान लगाने के लिए कल्पना की उड़ान की आवश्यकता नहीं है. वे शहर से कटे रहते थे जहाँ वे कभी नहीं जाते थे (क्योंकि घुमंतू एजेंट उनसे धागा और कपड़ा खरीद लेते थे और बुनकरों को इसके बदले में मजदूरी दे दिया करते थे). यहाँ तक कि साड़ी जिंदगी शहर के पास गुजारने के बावजूद, अपने बुढापे में वे कहा करते थे कि उन्होंने वहां अभी तक कदम नहीं रखा. यह स्थिति तब तक चलती रही जब तक कि मशीन के प्रवेश ने उन्हें आजीविका के साधन से वंचित नहीं कर दिया और उन्हें रोजगार की खोज में शहर जाने को मजबूर नहीं कर दिया. बुनाई के काम से मिली छुट्टी के दौरान वे अपनी छोटी जोत में खेती करते थे जिसकी वजय से उनका बौद्धिक और नैतिक स्तर अपने इलाके के भूधर किसान से मिलता-जुलता था जिससे वे स्वेच्छा से मेल-जोल बढाते और सर्वाधिक आत्मीयता के सम्बन्ध बनाए रखते थे. अपने इलाके के प्रमुख भूस्वामी ज़मींदार को वे सहज ही अपना श्रेष्ठ समझते थे. वे अपने छोटे-मोटे झगड़ों के निपटारे के लिए उससे सलाह लेने जाते और इस पूज्य सम्बन्ध को बनाये रखने के लिए उसे यथोचित सम्मान भी देते थे. वे ‘सम्मानीय लोग’ माने जाते थे जो अच्छे पति और पिता हुआ करते थे. वे सदाचारी जीवन बिताया करते थे क्योंकि उन्हें अनैतिक बना देने वाला कोई प्रलोभन मौजूद नहीं था यदि यह तथ्य ध्यान में रखा जाये कि उन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में शराबखाने और चकले नहीं हुआ करते थे. और चूंकि मेरा मेज़बान जिसके भटियारखाने में वे कभी-कभार अपना गला तर करने जाते थे, उन्हीं की तरह “भला” आदमी, या शायद असामी किसान होता जिसे अपनी अच्छी बियर अपनी अच्छी श्रेणी पर गर्व हुआ करता और जो छुट्टी के दिन या त्यौहार पर अपनी दूकान बंद कर देने की सावधानी बरतता. बच्चे घर पर रखे जाते थे, उन्हें आज्ञापालन की शिक्षा दी जाती थी और उनका लालन-पालन परमेश्वर पर श्रद्धा बनाये रखने वाले माहौल में किया जाता. जब तक नौजवान अविवाहित रहते, यह पितृसत्तात्मक सम्बन्ध उन्हें दृढ़ता से बांधे रखता था. विवाह होने तक बच्चे ग्रामीण सादगी और अपने बाल सखाओं के निकट साहचर्य में रहकर बड़े होते थे. यद्यपि विवाह के पहले स्त्री-पुरुष के बीच अन्तरंग संबंध कायम होना लगभग सामान्य था तो भी इन जोड़ों के बीच यह बात बिलकुल साफ़ हुआ करती थी कि यह वैवाहिक समारोह का पूर्वाभ्यास मात्र है जिसे कालांतर में संपन्न कर दिया जाता था. संक्षेप में,उन दिनों अंग्रेज़ कारीगरों और शिल्पकारों की सक्रीय जिंदगी और सेवा-निवृति का वक्त एकांत में, बौद्धिक गतिविधि और प्रचंड व्याकुलता का उनकी जीवन-शैली में कोई स्थान लिए बिना, बीत जाता था जो आज भी (1845) जर्मनी के कुछ हिस्सों में पाया जाता है. शायद ही कभी उन्हें पढना आता और बिरले ही वे लिखना जानते. वे नियमित रूप से गिरजाघर जाते थे, कभी भी राजनीती पर बात नहीं करते थे, कभी भी कोई सामूहिक षड़यंत्र नहीं रचते थे, गंभीर चिंतन के लिए वक्त नहीं निकालते थे, शारीरिक रंगरेलियों और क्रीडाओं को बहुत पसंद करते थे, बाइबिल के प्रवचन को पारम्परिक श्रद्धा के साथ सुनते थे और अपने से श्रेष्ठों को पूरी नम्रता के साथ नीचे झुककर और श्रद्धापूर्वक सम्मान देते थे. लेकिन बौद्धिक दृष्टिकोण से वे मृत थे, जिंदगी से उनका सरोकार अपने संकीर्ण हितों, अपने करघे और अपने छोटे बगीचे तक सीमित थे और उनकी सीमित दुनिया के पार समग्र मानवता को आलोड़ित करने वाले प्रचंड आन्दोलन की कोई समझ नहीं थी. वे अपने शांत और निष्क्रिय जीवन के आदी हो गये थे. यदि औद्योगिक क्रांति नहीं हुई होती, तो उन्हें उस जिंदगी से निजात नहीं मिलती जो रूमानी किस्म की मोहकता के बावजूद मानवीय अस्तित्व के लायक नहीं थी. सच्चाई यह है कि वे इन्सान नहीं थे बल्कि मात्र मशीन बन गये थे जो उन कुलीनों के एक छोटे से समूह की सेवा कर रही थी जोकि अभी तक इतिहास का आधार रहे थे. (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ 2-4) The Condition of the Working Class in England — Frederick Engels

पूंजीवादी समाज का प्रधान घटक, नकद भुगतान, बुर्जुआ की मनोवृत्ति का प्रमुख प्रेरक तत्त्व है. इसलिए इस नारे “मुद्रा को बटुवे में रख लो” का जन्म हुआ. एंगेल्स निम्न पंक्तियों में इसका सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं : “जब तक उसके मजदूर अपने जीते जी उसके लिए प्रचुर धन अर्जित करते रहते है, अंग्रेज़ बुर्जुआ को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे भूख से मर रहे हैं या नहीं. हर चीज़ की कीमत मुद्रा में आंकी जाती है और हर वह चीज़ जो मुद्रा न अर्जित कर पाती हो उसे उपहासास्पद, अव्यवहारिक और विचारधारात्मक मूर्खता समझा जाता है…उसके लिए मजदूर इन्सान न होकर मात्र एक ‘कारीगर’ होता है और मजदूर के सामने भी बुर्जुआ उनकी चर्चा इसी तरह करता है. जैसाकि कार्लाईल कहते हैं कि बुर्जुआ यह मानता है कि “नकद भुगतान एक इन्सान और दूसरे इन्सान के बीच का एक मात्र सम्बन्ध है.” यहाँ तक कि वह बंधन जो पति को पत्नी के साथ बाँधता है, सो में से निन्यानबे मामलों में नकद मुद्रा के रूप में व्यक्त किया जा सकता है. दासत्व की दयनीय स्थिति जो मुद्रा ने बुर्जुआ पर थोपी है, उसने अंग्रेजी भाषा पर भी अपनी छाप छोड़ दी है. यदि आप यह बताना चाहते हैं कि किसी व्यक्ति के पास 10,000 पाउंड हैं तो उसे इस तरह कहा जाता है कि ‘अमुक व्यक्ति की कीमत 10,000 पाउंड है.’ जिसके पास धन होता है वह ‘सम्मानीय समझा जाता है और तदनुसार उसे महत्त्व दिया जाता है : उसकी गणना बेहतर किस्म के लोगों’ में की जाती है और वह ज्यादा असर डालता है. वह जो कुछ भी करता है उसके साथियों के लिए मानक बन जाता है. यह अवांछित मनोवृत्ति सारी भाषा में समां गयी है. सभी सम्बन्धों को व्यापारिक शब्दावली से उधार लिए गए शब्दों में व्यक्त किया जाता है और इसका समाहार आर्थिक श्रेणियों में किया जाता है. आपूर्ति और मांग का सूत्र अंग्रेजों के समग्र जीवन दृष्टिकोण को व्यक्त करता है. इसलिए मानवीय गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र में स्वतन्त्र प्रतिस्पर्द्धा का होना आवश्यक है, इसलिए शासन, चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में अवरोधहीनता और अहस्तक्षेप की नीति का पालन आवश्यक है. जल्दी ही अहस्तक्षेप की नीति धर्म के क्षेत्र में प्रवेश कर जायेगी क्योंकि जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा है राजकीय चर्च का चुनौतीरहित प्राधिकार ज़्यादा तेज़ी से ध्वस्त होता जा रहा है.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ 277)