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पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

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हार्वे की ओर इस कशिश के पीछे कुछ और भी कारण हैं. सावधानीपूर्वक तराशी हुई उनकी दाढ़ी और भले चचा जैसे रूप-रंग में, वे, काफी हद तक, एक भद्र क्रांतिकारी जैसे दीखते हैं. वे बेमिसाल वाक्पटुता के मालिक हैं. मार्क्सवाद की मौजूदा प्रासंगिगता पर उनकी पुस्तकें और व्याख्यान – अढाई लाख से अधिक जिज्ञासू विद्यार्थियों द्वारा उनके इंटरनेट पर उपलब्ध पूंजी पर व्याख्यानों को डाउनलोड किया जाना – एक तरह का साहित्यिक उत्साह और मार्क्स को उनकी श्रेष्टता के साथ  आह्वान करने के विश्वास का भाव. वे उस वक्त विशेषरूप से अकाट्य होते हैं जब वे पूंजीवाद का, अनंत प्रवाह के रूप में, वर्णन करते हैं, कि कैसे यह निरंतर अपनी रुकावटों को पार कर जाता है, जैसे ही इसे मुनाफा कमाने के नये अवसर मिल जाते हैं.इसे एक उपमा ही कहेंगे कि वे सत्रहवीं सदी के अपने हमनाम ‘विलियम हार्वे’ को प्रसंतापूर्वक इस बात का श्रेय देते हैं कि कैसे वे  शरीर में खून को प्रणालीबद्ध रूप से दौड़ता हुआ दिखाया करते थे. यहाँ उसी उपमा को काम करते हुए देखा जा सकता है.

“एक तरफ अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं और क्रेडिट के फेरीवाले जौंक की भांति विश्वभर के लोगों का ‘ढांचागत समन्वय’ कार्यक्रमों और हर तरह की तिकडमों ( जैसे क्रेडिट कार्ड की फीस का एकदम दोगुना हो जाना ) द्वारा जितना खून चूस सकते हैं,चूसते रहते हैं – कोई फर्क नहीं पड़ता के वे कितने गरीब हो चुके हैं. दूसरी और केन्द्रीय बैंक अपनी अर्थव्यवस्थाओं में बाढ़ ले आते हैं और ग्लोबल बॉडी पोलीटिक में इस उम्मीद के साथ कि इस तरह के आकस्मिक आधानों से वह रोग ठीक हो जायेगा जिसे रेडिकल रोगनिदान और हस्तक्षेप की जरूरत है,  अत्यधिक तरलता का विस्तार कर देते हैं.

सभी मार्क्सवादियों की भांति, डेविड हार्वे भी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच मौज-मस्ती करते हैं. जैसेकि उन्होंने अपने व्याख्यान के बाद मेरे साथ अपने इन्टरवियू में बताया, ” मैं द्वन्द विज्ञानी हूँ. समाज में मौजूद विसंगतियों की खुदाई करने में मेरा विश्वास है. और मैं उनको प्रगतिशील बदलाव की गति के मार्ग के लिए प्रयोग करता हूँ. यह चिंतन और व्याख्या करने का तरीका है, जिसे प्रयोग में लाना बड़ा ही आसान है, अगर आप इसका प्रयोग इस तरह से करें कि लोग इसके साथ स्वयं को अभेद पायें बजाय इसके कि आपको कहना पड़े कि इसे समझने के लिए आपको हेगेल के तीनों और मार्क्स  के चारों खण्डों का अध्ययन करना पड़ेगा. बढ़िया नाटक, हेलमेट ( शेकस्पियर का एक नाटक ) की संरचना द्वंदात्मक है. अगर ऐसा न होता तो यह बहुत उबाऊ होता. और यही कारण है कि मुझे इतिहास और ऐतिहासिक बदलाव बहुत आकर्षित करते हैं.

अपनी [RSA ] के साथ बातचीत और अपनी उम्दा पठनीय पुस्तक में हार्वे, थेचरवाद के वर्षों के दौरान, नवउदारीवादी क्रांति से पैदा हुई विसंगतियों पर ,लुत्फ़ उठाते हैं. इससे पहले पूंजीवाद की समस्याओं को पूंजी के संबंध में श्रम की शक्ति को रखकर परिभाषित किया जाता था. नए यूनियन विरोधी विधान और ग्लोबल आउटसोर्सिंग के विकास, जिससे पूंजीपति अविकसित देशों की भोली-भाली जनता के श्रम को निचोड़ सकें, द्वारा संगठित श्रम को पीछे हटने के लिए मजबूर करके ही मुनाफे संभव हो सकते थे. परन्तु इसके तुरंत बाद एक नयी समस्या खड़ी हो गयी. अब, चूँकि वास्तविक उजरत बहुत घट गयी थी, पूंजीवाद द्वारा उत्पादित वस्तुओं को मजदूर वर्ग द्वारा खरीदना किस प्रकार संभव हो सकता था ? इसका हल आसान क्रेडिट में ढूंढा जाने वाला था.

क्रेडिट का अधिकतर हिस्सा, आवास बाज़ार में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक नयी समस्या थी. इस कर्ज का अधिकतर भाग आवास बाज़ार को ईधन मुहैया करवाने के रूप में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक और विरोधाभास था. एक तरफ बैंकों ने बिल्डरों को क्रेडिट की लंबी-लंबी स्कीमें थमा दी ताकि वे और अधिक घरों का निर्माण कर सकें. और उसी वक्त, उन्हीं बैंकों ने, उन लोगों को कर्ज दे दिया जो इस नयी खड़ी की गयी संपत्ति को खरीदना चाहते थे. यह पोंजी स्कीम – एक निवेश संबंधी घोटाला जिसमें शुरू के निवेशकों को मिलनेवाला तथाकथित लाभ नए जुडनेवाले निवेशकों के फंडों से सीधा प्राप्त हो जाता है – का सटीक उदाहरण था. अन्य सभी पोंज़ी स्कीमों की भांति, पूरी ईमारत उस वक्त भरभराकर गिर गयी जब निवेशकों ने नकदी वसूलने का फैसला किया.

लेकिन हम इतने अधिक लोगों की उस क्षेत्र में, जो उदाहरणतय, मैन्युफेक्चरिंग जैसे क्षेत्र में निवेश के मुकाबले संदिग्ध हो, में निवेश की इच्छा की किस प्रकार व्याख्या करेंगे ? और यही है वह जहाँ, हम हार्वे के विश्लेषण की गरी की झलक पाते हैं. वे तर्क देते हैं की बीतें दिनों वित्तीय संकटों में हुए प्रवर्धनों को उत्साहित करने के लिए जो चीज थी, वह थी, पूंजीवाद की तीन प्रतिशत की मिश्रित दर से वृद्धि की प्रतिबद्धता. बीते समय में, सीमित विश्व में जिसमें इतनी अधिक अविकसित मंडियां हों , अमेरिका और ब्रिटेन के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना संभव था. लेकिन अब जबकि चीन और भारत भी उसी दर या उससे भी अधिक दर से विकसित हो रहे हैं, पूंजीवादी उद्यमों के लिए अपने बेशी-मुनाफों का निवेश करने का क्षेत्र सिकुड़ रहा है. वर्तमान समय में, £1.5 ट्रिलियन नए निवेश की खोज में पड़े हैं. २० वर्षों के समय में, वे £ 3 ट्रिलियन हो जायेंगे. इसलिए उसका अनुसन्धान हुआ, जिसे हार्वे ‘फ़र्ज़ी मंडियां’ : व्युत्पादन (derivatives ) की मंडियां, भविष्य में व्युत्पादन के व्युत्पादन और कार्बन  ट्रेडिंग कहना पसंद करते हैं. शुरू में, ये इनमें निवेश करनेवालों को, उद्योग में निवेश की तुलना में अधिक प्रतिलाभ देने का वायदा करते है लेकिन वे, जैसाकि हमने अपने दम पर देखा है, अंतिम रूप में, भ्रम साबित होते हैं .

जैसे-जैसे [RSA ] के श्रोताओं की ध्यान-मुद्रा साफ़ होती जाती है, इस दलील से प्रभावित न होना मुश्किल लगता है और विशेषरूप से तब, जब इसे, पिछले बारह महीनों के दौरान अन्य अर्थशास्त्रियों की टूटी-फूटी टिप्पणियों के कोंट्रासट में रखते हैं. परन्तु मैं अपनी उस वक्त की बेचैनी को दबा नहीं सका जब हार्वे  मौजूदा स्थिति पर रेडिकल हल पेश करने की और बढ़ रहे थे, जहाँ ऐसा लगता था कि यह ताज़ा पूंजीवादी संकट इसके कफ़न के लिए अंतिम कील साबित होगा. मैं इसलिए चौकस था कि इस तरह की भविष्यवाणियाँ पहले भी कई बार हुई थीं. पूंजीवाद, हमें बहुत से सिद्धान्तकारों द्वारा बताया गया था , 1973 के तेल संकट,या IMF के 1976 के संकट , या 1987 के काले सोमवार के साथ या 1992 के काले बुधवार के साथ, अपने चरम बिंदु पर पहुँच गया था. परन्तु भविष्यवाणियाँ फेल साबित हुईं. बार-बार पूंजीवाद, जीवित रहने में, सफल रहा. इसलिए क्या मौजूदा स्थिति में कुछ ऐसा है जो वास्तव में अलग हो ?

ऐसी कोई बात नहीं है जिसने मुझे परेशान किया हो. हार्वे इतनी तैयारी में हैं कि वे पूंजीवाद द्वारा संकटों पर काबू पाने और कुशलतापूर्वक मुनाफा कमाने के नए रास्तों की खोज को तस्लीम नहीं कर पाते. बीते समय में, इसने अपने इस मकसद को हासिल करने के लिए कई अतार्किक तरीके खोजे थे. और इसने ऐसा ही किया, जैसे हार्वे अपनी पुस्तक ‘पूंजीवाद की पहेली’  [ The Enigma of Capital ] में इसके द्वारा युद्ध के रास्ते से, परिसम्पत्तियों के अवमूल्यन से, उत्पादक क्षमता के अपकर्ष से, अपसर्जन और अन्य सृजनात्मकता की तबाही द्वारा, अपनी समस्याओं का हल करता रहा है. इन सभी समाधानों से चौंकानेवाले परिणाम निकले हैं. मानव जीवन अस्त-व्यस्त और जहाँ तक कि तबाह हो जाता है, सारा कैरियर और जीवनभर की उपलब्धियां खतरे में पड़ जाती हैं, गहरे पैठ कर चुके विश्वास को चुनौती मिलती है, रूह घायल हो जाती है और मानव के गौरव का परित्याग कर दिया जाता है. सृजनात्मक तबाही शानदार, सुन्दर, बुरे और अच्छे – सभी पर भारी पड़ती है. संकट, हम निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं, ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’ है.

परन्तु निसंदेह, उनकी जिज्ञासा यह दिखाने की है, कि वर्तमान संकट पिछले सभी संकटों, जिनपर काबू पा लिया गया था, की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है और उनकी जिज्ञासा यह सुझाव देने की होती है कि प्रत्येक समझदार व्यक्ति के पास ‘पूंजीवाद विरोधी अभियान’ में शामिल होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है, लेकिन फिर भी, वे भविष्यवेत्ता बनने से बहुत दूर हैं.

क्या पूंजीवाद वर्तमान सदमे से बच निकलेगा ? हाँ, बेशक. लेकिन हार्वे विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि इसकी भारी कीमत चुकानी होगी. लोगों की अधिकतर आबादी को अपनी मेहनत के फल को उन्हें देना होगा, जो सत्ता में हैं, अपने बहुत से अधिकारों और अपने साधनों की सख्त मुशक्त से हासिल की गयी कीमत ( आवास से लेकर पेंशन फंड, हर वस्तु) का त्याग करना होगा और प्रचुर मात्रा में, परिवेशी अपकर्ष का दर्द झेलना होगा. केवल इतना ही नहीं कि अपने जीवन स्तर में कटौती बल्कि इसका अर्थ होगा बहुत से गरीब लोग, जो पहले ही जीवित रहने का संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए भूखमरी. थोड़े से राजनीतिक दमन से कहीं अधिक, आनेवाली अशांति का गला घोंटने के लिए, पुलिस हिंसा और मिलट्री राज्य नियंत्रण की आवश्यकता पड़ेगी. जिस वक्त,  हार्वे यह सब कह रहे थे, ठीक उसी वक्त, एथेन की गल्लियों में लड़ाई बढ़नी शुरू हो गयी थी.

यद्यपि, इस सब का मतलब निराश होने से नहीं है. संकंट विरोधाभास और संभावनाओं के वे क्षण होते हैं, जिनसे विकल्प के तरीके, समाजवादी और पूंजीवाद विरोधी, सभी जन्म लेते हैं.

अगली अंतिम किश्त में समाप्य

पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

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इससे पहले, लिंक जोड़ने के लिए देखें : वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पोंजी स्कीम जैसी है ?

विश्व आर्थिक मंदी ने एक बार फिर सारी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को मार्क्स की ओर मुड़ने के लिए मजबूर कर दिया है.  ‘द्वंदात्मक भौतिकवादी’ भूगोलवेत्ता ‘डेविड  हार्वे’ जो चालीस वर्षों से मार्क्स की पूंजी पढ़ा रहें हैं और जिन्हें पहली बार गंभीरता से लिया जा रहा है, से ‘लॉरी टेलर’ की मुलाकात पर आधारित यह आलेख ‘http://newhumanist.org.uk’ से लिया गया है.

डेविड हार्वे तुरंत अपनी तरंग में आ जाते हैं. “पूंजीवाद” वे रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स ,  लन्दन के हाल में अपने श्रोताओं से कहते हैं, “कभी भी अपने संकटों का समाधान नहीं करता. यह उन्हें केवल एक स्थान से दूसरी स्थान पर ले जाता है. ब्राज़ील से रूस, से अर्जन्टीना, से अमेरिका, से ब्रिटेन, से यूनान”.

जैसे ही वे इन बार-बार आनेवाले संकटों,  और विशेषरूप से, 1970 के बाद से उनकी बारंबारता में नाटकीय बढौतरी के कारकों का विश्लेषण करना शुरू करते हैं, मैं अपनी नज़र, श्रोताओं पर डालता हूँ. मैं अपनी चैयरमेन की सीट से देख सकता हूँ कि व्याख्यान सभागार खचाखच भरा हुआ है. कोई भी कुर्सी खाली नहीं है और लगभग दर्जन एक श्रोता गलियारे में खड़े हुए हैं. रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स [RSA]   के लंच-समय के व्याख्यानों में, अक्सर, अच्छी हाजिरी होती है लेकिन क्या कमरे में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति ने इस बात को तस्लीम कर लिया था कि जो कुछ वे आज इस वक्ता से सुनने जा रहे हैं, वह आज के पूंजीवाद का विश्लेषण है जो मार्क्स से शुरू होकर मार्क्स पर ख़त्म होता है, ऐसा विश्लेषण जोकि कई प्रकार से वैसा ही है, जैसा मैंने ७० और ८० के दशक में सैंकड़ों नीरस सभाओं में कट्टर समाजवादियों से सुना था.

कोई कारण नहीं था कि मैं फिक्रमंद होता. इस पर भी कि हार्वे ने तुरंत मार्क्स के प्रति अपना कर्ज तस्लीम किया और बार-बार वे मार्क्स को उद्घृत करते रहे. फिर भी, तीस मिनट के व्याख्यान में, किसी भी क्षण,  उनके अमीर श्रोताओं में बेचैनी  का कोई चिह्न नहीं था और समापन पर, प्रश्नौतर काल में, केवल एक श्रोता का सुझाव था कि मार्क्स को छोड़कर कुछ भी, हमारे मौजूदा आर्थिक संकट को समझने के लिए, सबसे बढ़िया हो सकता है.

निसंदेह, उस आर्थिक सिद्धांत को, जिसे सोवियत यूनियन के ढह-ढेरी हो जाने पर, भले ही अतार्किक रूप से ही सही, इतिहास में जगह दे दी गयी थी, स्वीकार करने की चाहत के पीछे एक बढ़िया कारण था. बिलकुल सीधी सी बात है कि विश्वभर के अर्थशास्त्रियों की,  इतिहास में अभी-अभी  घटित हुई घटनाओं पर एक भी संतोषजनक व्याख्या देने की पूर्ण असक्षमता. इसी तथ्य को श्रोताओं के सामने सही और साफ-साफ तरीके से प्रस्तुत करने में, हार्वे पूरी तरह से माहिर हैं.

अपनी ताज़ा पुस्तक, ‘पूंजी की पहेली और पूंजीवाद के संकट’ की प्रस्तावना में, वे यह कहानी सुनाते हैं, ” जब प्रतापी महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने नवंबर 2008 में, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के अर्थशास्त्रियों से यह पूछा कि क्यों नहीं वे मौजूदा आर्थिक संकट की आमद को देख पाए ( एक ऐसा सवाल जोकि निसंदेह प्रत्येक व्यक्ति की जबान पर था, लेकिन जिसे कोई सामन्ती शासक ही, इस तरह, हलके अंदाज में पूछ सकता था और उत्तर की अपेक्षा पाल सकता था ) तो अर्थशास्त्रियों के पास, देने के लिए, कोई जवाब तैयार नहीं था. छह महीने के मुख्य नीति निर्धारकों के साथ मिलकर किये गए अध्ययन, जुगाली और गहन विचार-विमर्श  के बाद, ब्रिटिश अकादमी के गलियारे में एकत्रित हुए सभी अर्थशास्त्रियों ने, एक साझे पत्र में, प्रतापी महारानी के सामने स्वीकार किया कि वे ,किसी हद तक, उस दृष्टि को खो चुके हैं जिसे वे ‘प्रणालीबद्ध जोखिम’ के नाम से जाना करते थे.

हार्वे, इस एपिसोड की स्विफटियन विडंबना का रस्सावदान करते हुए कहते हैं, “शिक्षित अर्थशास्त्रियों की अपनी असफलता पर बहानेबाजी करने की नाकाम कोशिश का यह दृश्य है, उस वक्त, जब वे बुरी तरह से डरे हुए सचेत हैं कि उनमें से किसी ने भी कपडे नहीं पहने हुए हैं. परन्तु यह सब उनको (हार्वे को) मार्क्स को जगाने का पूर्ण तरीका मुहैया करवाता है. किंकर्तव्यविमूढ़, वे अर्थशास्त्री, उन छः महीनों के लंबे अन्तराल के बाद, अंत में, यह पहचान गए थे कि उनकी असफलता का वास्तविक रहस्य क्या था.  जर्नलिस्टों और टिपण्णीकर्त्ताओं द्वारा पेश किये गये अधपक्के सिद्धांतों को भूल जाईये.  ताज़ा संकट, हार्वे अपने [RSA] के भावविभोर श्रोताओं से कहते हैं, किसी मानवीय कमजोरी या अप्रयाप्त वित्तीय बन्दोबस्त या किन्सियाई दृष्टि को त्यागने से या अंग्रेजों या अमेरिकियों या यूनानियों की विलक्षण सांस्कृतिक असफलताओं के कारण सिर के बल खड़ा नहीं हुआ है. यह पूंजीवाद की प्रणालीबद्ध असफलता है.  और इस प्रकार की असफलता पर विश्वसनीय लगने वाली केवल एक ही व्याख्या है, जिसे बूढ़े भले मार्क्स में खोजा जा सकता है.

[RSA] द्वारा तैयार की गयी इस कार्टून फिल्म की पार्श्व-ध्वनी, स्वयं हार्वे के उपरोक्त व्याख्यान का ही ऑडियो है.

शेष अगली किश्त [पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’] में

मैं कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की इतनी सरल प्रस्तुति सुन रही थी…

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जैक लंडन का उपन्यास – देखें : \’आयरन हील\’

और अतिरिक्त मूल्य का नियम

सपने का गणित

अर्नेस्ट के उद्घाटन से लोग मानो भौंचक रह गए. इस बीच उसने फिर शुरू किया :
‘आप में से दर्जनों ने कहा कि समाजवाद असंभव है. आपने असम्भाविता पर जोर दिया है. मैं अनिवार्यता को चिन्हित कर रहा हूँ. न केवल यह अनिवार्य है कि आप छोटे पूंजीपति विलुप्त हो जायेंगे – बड़े पूंजीपति और ट्रस्ट भी नहीं बचेंगे. याद रखो विकास की धारा पीछे नहीं लोटती. वह आगे ही बढ़ती जाती है, प्रतियोगिता से संयोजन की ओर, छोटे संयोजन से बड़े संयोजन की ओर, फिर विराट संयोजन की ओर और फिर समाजवाद की ओर जो सबसे विराट संयोजन है.

‘आप कह रहे हैं कि मैं सपना देख रहा हूँ. ठीक है मैं अपने सपने का गणित प्रस्तुत कर रहा हूँ और यहीं मैं पहले से आपको चुनौती दे रहा हूँ कि आप मेरे गणित को गलत साबित करें. मैं पूंजीवादी व्यवस्था के ध्वंस  की अनिवार्यता प्रमाणित करूंगा और  मैं इसे गणितीय ढंग से प्रमाणित करूंगा.  मैं शुरू कर रहा हूँ. थोडा धैर्य रखें, अगर शुरू में यह अप्रासंगिक लगे.

‘पहले हम किसी एक औद्योगिक प्रक्रिया की खोजबीन करें और जब भी आप मेरी किसी बात से असहमत हों, फ़ौरन हस्तक्षेप कर दें. एक जूते की फैक्टरी को लें. वहां लैदर जूता बनाया जाता है. मान लीजिए सौ डालर का चमडा खरीदा गया. फैक्टरी में उसके जूते बनें. दो सौ डालर के. हुआ क्या ? चमड़े के दाम सौ डालर में सौ डालर और जुड गया. कैसे ? आईए देखें.

पूंजी और श्रम ने जो सौ डालर जोड़े. पूंजी ने फैक्टरी, मशीने जुटाई, सारे खर्चे किए. श्रम ने श्रम जुटाया. दोनों के संयुक्त प्रयास से सौ डालर मूल्य जुडा. आप अब तक सहमत हैं? ‘

सब ने स्वीकार में गर्दन हिलाई.

‘पूंजी और श्रम इस सौ डालर का विभाजन करते हैं. इस विभाजन के आंकडे थोड़े महीन होंगे. तो आईए मोटा-मोटा हिसाब करें. पूंजी और श्रम पचास-पचास डालर बाँट लेते हैं. इस विभाजन में हुए विवाद में नहीं पड़ेंगे. यह भी याद रखें कि यह प्रक्रिया सभी उद्योगों में होती है. ठीक है न ? ‘

फिर सब ने स्वीकृति में गर्दन हिलाई.

‘अब मान लीजिए मजदूर जूते खरीदना चाहें तो पचास डालर के जूते खरीद सकते हैं. स्पष्ट है.’

‘अब हम किसी एक प्रक्रिया की जगह अमेरिका की सभी प्रक्रियाओं की कुल प्रक्रिया को लें जिसमें चमडा, कच्चा माल, परिवहन सब कुछ हो. मान लें अमेरिका में साल भर में चार अरब के धन का उत्पादन होता है. तो उस दौरान मजदूर ने दो अरब की मजदूरी पाई. चार अरब का उत्पादन जिसमें से मजदूरों को मिला — दो अरब — इसमें तो कोई बहस नहीं होनी चाहिए वैसे पूंजीपतियों की ढेरों चालों की वजह से मजदूरों को आधा भी कभी नहीं मिल पाता. पर चलिए मान लेते हैं कि आधा यानि दो अरब मिला मजदूरों को. तर्क तो यही कहेगा कि मजदूर दो अरब का उपयोग कर सकते हैं. लेकिन दो अरब का हिसाब बाकी है जो मजदूर नहीं पा सकता और इसलिए नहीं खर्च कर सकता.’

‘मजदूर. अपने दो अरब भी नहीं खर्च करता — क्योंकि तब वह बचत खाते में जमा क्या करेगा ? कोबाल्ट बोला.’

‘मजदूर का बचत खाता एक प्रकार का रिजर्व फंड होता है जो जितनी जल्दी बनता है उतनी जल्दी ख़त्म हो जाता है. यह बचत वृद्धा अवस्था, बीमारी, दुर्घटना और अंत्येष्टि के लिए की जाती है. बचत रोटी के उस टुकड़े की तरह होती है जिसे अगले दिन खाने के लिए बचा कर रखा जाता है. मजदूर वह सारा ही खर्च कर देता है जो मजदूरी में पाता है.’

‘दो अरब पूंजीपति के पास चले जाते हैं. खर्चों के बाद सारे का क्या वह, उपभोग कर लेता है ? क्या अपने सारे दो अरब का उपभोग करता है. अर्नेस्ट ने रूककर कई लोगों से दो टूक पूछा. सब ने सिर हिला दिया.

‘मैं नहीं जानता.’ एक ने साफ़-साफ़ कह दिया.

‘आप निश्चित ही जानते हैं. क्षण भर के लिए जरा सोचिए. अगर पूंजीपति सब का उपभोग कर ले तो पूंजी बढेगी कैसे ? अगर आप देश के इतिहास पर नज़र डालें तो आप देखेंगे कि पूंजी लगातार बढ़ती गयी है. इसलिए पूंजीपति सारे का उपभोग नहीं करता. आप को याद है जब इंग्लैंड के पास हमारी रेल के अधिकांश बांड थे. फिर हम उन्हें खरीदते गए. इसका क्या मतलब हुआ ? उन्हें उस पूंजी से ख़रीदा गया जिसका उपभोग नहीं हुआ था. इस बात का क्या मतलब है कि यूनाइटेड स्टेट्स के पास मैक्सिको, इटली और रूस के करोडों बांड हैं ? मतलब है कि वे लाखों करोडों वह पूंजी है जिसका पूंजीपतियों ने उपभोग नहीं किया. इसके अलावा पूंजीवाद के प्रारंभ से ही पूंजीपति ने कभी अपना सारा हिस्सा खर्च नहीं किया है.’

अब हम मुख्य मुद्दे पर आयें. अमेरिका में एक साल चार अरब के धन का उत्पादन होता है. मजदूर उसमें से दो अरब पाता है और खर्च कर देता है. पूंजीपति शेष दो अरब खर्च नहीं करता. भारी हिस्सा बचा रह जाता है. इस बचे अंश का क्या होता है ? इससे क्या हो सकता है ? मजदूर इसमें से कुछ खर्च नहीं कर सकता. क्योंकि उसने तो अपनी सारी मजदूरी खर्च कर दी है. पूंजीपति जितना खर्च कर सकता है, करता है; फिर भी बचा रह जाता है. तो इसका क्या हो ? क्या होता है?

‘एकदम ठीक! इसी शेष के लिए हमें विदेशी बाज़ार की ज़रुरत होती है. उसे विदेशों में बेचा जाता है. वही किया जा सकता है. उसे खर्चने का ओर उपाय नहीं है. और यही उपर्युक्त अतिरिक्त धन जो विदेशों में बेचा जाता है हमारी लिए सकारात्मक व्यापार संतुलन कहलाता है. क्या हम यहाँ तक सहमत हैं ?’

‘इस व्यवसाय के क, ख, ग से ही मैं आपको चकित करूंगा. यहीं. अमेरिका एक पूंजीवादी देश है जिसमें अपने संसाधनों का विकास किया है. अपनी पूंजीवादी औद्योगिक व्यवस्था से उसके पास काफी धन बच जाता है जिसका वह उपभोग नहीं कर पाता. उसे विदेशों में खर्च करना ज़रूरी है. यही बात दूसरे पूंजीवादी देशों के बारे में भी सच है. अगर उनके संसाधन विकसित हैं तो यह न भूलें कि आपस में खूब  व्यापार करते हैं फिर भी अतिरिक्त काफी बच जाता है. इन देशों में मजदूर सारी मजदूरी खर्च कर देता है और इस बचे हुए अतिरिक्त को खरीदने में असमर्थ है. इन देशों में पूंजीपति जितना भी उपयोग कर सकते हैं करते हैं फिर भी बहुत कुछ बच जाता है. इस अतिरिक्त धन को वे एक दूसरे को नहीं दे सकते. फिर उसका वे क्या करें?’

‘उन्हें अविकसित संसाधनों वाले देशों में बेच दें.’ कोबाल्ट बोला.

‘एकदम यह ठीक है. मेरा तर्क इतना स्पष्ट और सीधा है कि आप स्वयं मेरा काम आसान कर रहे हैं. अब अगला कदम ! मान लिया यूनाइटेड स्टेट्स अपने अतिरिक्त धन को एक अविकसित देश जैसे ब्राजील में लगाता है. याद रखें यह अतिरिक्त उस व्यापार से अलग है जिसका इस्तेमाल हो चूका है. तो उसके बदले में ब्राजील से क्या मिलता है?’

‘सोना’ कोबाल्ट बोला.

‘लेकिन दुनिया में सोना तो  सीमित है !’ अर्नेस्ट ने एतराज किया.

‘आप पहुँच गए. ब्राजील से अमेरिका अपने अतिरिक्त धन के बदले में लेता है सिक्युरिटी और बांड. इसका मतलब है अमेरिका ब्राजील रेल, फैक्ट्रियों, खदानों का मालिक बन सकता है. और तब इसका क्या मतलब हुआ ?’

कोबाल्ट सोचने लगा पर नहीं सोच पाया तथा नकारात्मक में सिर हिला दिया.

‘मैं बताता हूँ. इसका मतलब हुआ ब्राजील के संसाधन विकसित किए जा रहे हैं. जब ब्राजील पूंजीवादी व्यवस्था में अपने संसाधन विकसित कर लेगा तो उसके पास भी अतिरिक्त धन बचने लगेगा. क्या वह इसे अमेरिका में लगा सकता है ? नहीं क्योंकि उसके पास तो अपना ही अतिरिक्त धन है. तो क्या अमेरिका अपना अतिरिक्त धन पहले की ही तरह ब्राजील में लगा सकता है ? नहीं ; क्योंकि अब तो स्वयं ब्राजील के पास अतिरिक्त धन है.

‘ तब क्या होता है ? इन दोनों को तीसरा अविकसित देश ढूँढना पड़ेगा जहाँ से वे अपना सरप्लस उलीच सकें. इस क्रम से उनके पास भी अतिरिक्त धन बचने लगेगा. महानुभाव गौर करें धरती इतनी बड़ी तो है नहीं. देशों की संख्या सीमित है. तब क्या होगा जब छोटे से छोटे देश में भी कुछ अतिरिक्त बचने लगेगा?’

उसने रूककर श्रोताओं पर एक नज़र डाली. उनके चेहरों पर हवाईयां उड़ रही थीं. थोडा उसे मज़ा आया. जितने बिम्ब खींचे थे अर्नेस्ट ने उनमें से कई उन्हें डरा रहे थे.

मिस्टर काल्विन  हमने ए बी सी  से शुरू किया था. मैंने अब सारे अक्षर सामने रख दिए हैं. यही तो इसका सौन्दर्य है. क्या होगा जब देश के पास अतिरिक्त बचा रह जायेगा ओर आपकी पूंजीवादी व्यवस्था का क्या होगा ?’

अर्नेस्ट ने फिर शुरू किया :

‘ मैं अपनी बात संक्षेप में दोहरा दूं. हमने एक विशेष औद्योगिक प्रक्रिया से बात शुरू की थी. एक जूता फैक्ट्री से हमने पाया कि जो हाल वहां है वही सारे औद्योगिक जगत में हैं. हमने पाया कि मजदूर को उत्पादन का एक हिस्सा मिलता है जिसे वह पूरी तरह खर्च कर देता है और पूंजीपति पूरा खर्च नहीं कर पाता. बचे हुए अतिरिक्त धन के लिए विदेशी बाज़ार अनिवार्य है. इस निवेश से वह देश भी अतिरिक्त पैदा करने में सक्षम हो जायेगा. जब एक दिन सभी इस स्थिति में पहुँच जायेंगे तो अंतत: इस अतिरिक्त का क्या होगा?

किसी ने जवाब नहीं दिया.

‘काल्विन महोदय !’

‘मुझे समझ नहीं आ रहा.’ उसने स्वीकारा.

‘मैंने तो यह सपने में भी नहीं सोचा था पर यह तो एकदम स्पष्ट लग रहा है.’ ऐसमुनसेन ने कहा.

मैं कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की इतनी सरल प्रस्तुति सुन रही थी और मैं स्तब्ध और चकित बैठी थी…

इतिहास बोध प्रकाशन
बी-239, चन्द्रशेखर आजाद नगर
इलाहाबाद – 211004
दूरभाष : 0532/2546769 से प्रकाशित ‘आयरन हील’ – जैक लंडन
से साभार

मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दावली – कुछ विरासत से और कुछ …

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कुछ  मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दों  को परिभाषित करने की एक कोशिश लेकिन बहुत से मतभेद हो सकते हैं. आओ,  सब मिलकर मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दों को परिभाषित करें.

वैज्ञानिक समाजवाद : ‘यूटोपिया’ और आदर्श समाजवाद के विपरीत मार्क्स एंगेल्ज़ द्वारा परिभाषित समाजवाद- पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच की स्टेज. एक संक्रमण काल. पूंजीवाद  से इस लिए अलग कि सत्ता पर कब्जा सर्वहारा वर्ग का, इसलिए सर्वहारा का जनतंत्र या सर्वहारा का बुर्जुआ पर अधिनायकवाद वैसे ही जैसे बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकवाद के चलते  पूंजीवादी बुर्जुआ जनतंत्र. साम्यवाद से दोनों भिन्न क्योंकि दोनों में वर्गों का सतत संघर्ष जारी. इतिहास की कुटील और टेडी-मेढी चाल के चलते ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ का ऐतिहासिक रूप से एक बार हारना – एक कड़वी सच्चाई. कुछ विद्वानों और विशेषकर बुर्जुआ चाटुकार बुद्धिजीवियों द्वारा साम्यवाद को बदनाम करने के लिए इस “वैज्ञानिक समाजवाद ” को ही साम्यवाद का नाम देना.

चीन में भी,नकली समाजवाद का चरित्र आज पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। चीन में समाजवाद की सारी उपलब्धियाँ समाप्त हो चुकी है। कम्यूनों का विघटन हो चुका है। खेती और उद्योग में समाजवाद के राजकीय पूँजीवाद में रूपान्तरण के बाद अब निजीकरण और उदारीकरण की मुहिम बेलगाम जारी है। अब यह केवल समय की बात है कि समाजवाद का चोंगा और नकली लाल झण्डा वहाँ कब धूल में फेंक दिया जायेगा। माकपा और भाकपा अपने असली चरित्र को ढँकने के लिए आज चीन के इसी “बाज़ार समाजवाद” के गुण गाती हैं।

संशोधनवाद : संशोधनवाद उस सिद्धांत का प्रतिनिधि जो मार्क्सवादी सिद्धांतों को तोड़-मरोड़ कर विकृत करता है ताकि यह (मार्क्सवाद) बुर्जुआ वर्ग के हितों के लिए नुकसान रहित बन जाये. प्राय: यह मार्क्सवाद को सुधारवाद बना देता है. संशोधनवाद का सम्बन्ध स्तालिन की मृत्यु के बाद ख्रुश्चेव और माओ त्से तुङ के बाद देङपंथी टोली से भी लिया जाता है जिनके नेतृत्व में बुर्जुआ वर्ग सर्वहारा वर्ग पर पुन: अधिनायकवाद स्थापित कर सका.

वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद : लेनिन की एक उक्ति है कि किसी भी दल में संशोधनवाद के कर्मों की सजा  कतारें वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद में चुकाती हैं. भारत में अगर नकसलबाडी जैसा वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद उभरा तो निश्चित रूप से इसके दूसरे सिरे (ध्रुव) पर संशोधनवाद था. वामपंथी कम्युनिस्टों में अधिकतर मिडल क्लास के लोग आते हैं – पूँजी के सताए ये लोग क्रांति के एजेंडा पर तो तुंरत पहुँच जाते हैं लेकिन अवाम को चेतन करने की लंबी और मुश्किल रणनीति या प्रोग्राम बनाने से घबराते हैं.

विरोधों की एकता : ब्रहामंड में विद्यमान पदार्थ, व्यापार (phinomenon), व्यक्ति, समाज, अवधारणा आदि को समझने के लिए दो मुख्य विरोधी ध्रुवों की निशानदेही. किसी भी व्यापार के अस्तित्व या गतिशीलता (dynamism) की ज़रूरी शर्त. अन्य गौण विसंगतियां या ध्रुवों द्वारा किसी एक के साथ अभेद होना.

उदाहरण के लिए पूंजीवाद विवाह संस्था जिसमें विवाह एक अवधारणा है जिसका एक सिरा दो व्यक्तियों के मिलन का तो दूसरा दो बराबर की पूंजियों के मिलन का है. देखना यह है कि इन दोनों सिरों से गतिमान विवाहिक सम्बन्धों की विसंगति (contradiction) किसके पक्ष में हल होती है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा सिरा प्रधान है और कौनसा गौण. चूंकि पूंजीवाद में दो पूंजियों के मिलन का सिरा प्रधान होता है इसलिए इसे दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो पूंजियों का मिलन ही कहा जाता है जबकि गौण सिरे पर दो व्यक्ति भी मिलते हैं- प्यार करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं – ये बच्चे पूंजी के सच्चे वारिस होते हैं. अगर ऐसा नहीं होता है तो .. तो.. बच्चों को बागी करार दिया जाता है.

गोर्की ने कहा था कि इस संसार को परिभाषित करना बड़ा ही आसान है क्योंकि लोग दो कामों में लगे हुए हैं :

१. धन के ढेर लगाना और

२. अपने हिस्से के श्रम को दूसरों से करवाना.

यही पागलपन इस दुनिया की सच्चाई है पर इसे ही आदर्श माना जाता है.

जुन्कर या प्रशियाई : प्रशिया -जर्मनी के अधीन एक राज्य, यूरोप के अन्य देशों के विपरीत, बिस्मार्क की अगुआई में यहाँ, पूंजीवाद ने सामंती व्यवस्था को  क्रांतिकारी ढंग से तबाह न करके, बुर्जुआ जनतंत्र के विकास का एक लम्बा और पीडादायक तरीका अपनाया. भारत की आज़ादी की क्रांतिकारियों की अगुआई में जारी लहर कांग्रेस की अगुआई में जारी लहर से हार गयी. भगत सिंह का यह शक कि कांग्रेस अंग्रेजों से समझौता कर लेगी, का सच होना भी एक कड़वी सच्चाई है, आज़ादी के बाद क्रांतिकारी दलों की दयनीय स्थिति और भारत के बुर्जुआ राज्य का विकास जुन्कर या प्रशियाई विकास से मिलता जुलता,  या सामंती समाज की कोशिकायों को तबाह न करते हुए उन्हीं कोशिकायों में बुर्जुआ समाज की कोशिकायों की  घुसपैठ – यही कारण है कि भारत इस इक्कीसवीं सदी में भी एक विकसित बुर्जुआ राज्य होते हुए भी सामंती बुराईयों-कद्रों-कीमतों को, व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं बल्कि संस्थागत तौर पर भी संभाले हुए है. देखे : 1857, आरंभिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता

आधार : सभ्य समाज में उत्पादक शक्तियों के विकास की स्टेज, उत्पादन के साधनों पर किस वर्ग का कब्ज़ा, मनुष्यों के आपसी उत्पादन सम्बन्ध या आर्थिक सम्बन्ध. “राजनितिक अर्थशास्त्र जिंसों के आपसी संबंधों का अध्ययन न होकर मनुष्यों के आपसी संबंधों का विज्ञान है”- एंगेल्स

अधिरचना : आधार तय करता है कि अधिरचना कैसी हो. न्यायपालिका, विधानपालिका, कार्यपालिका, धर्म, नैतिकता, दर्शन और स्वयं राज्य रुपी संस्था अधिरचना के ही अंग है.

विचारवादियों के विपरीत मार्क्सवादियों के अनुसार इनका विकास ऐतिहासिक है जबकि विचारवादियों के अनुसार अधिरचना के ये अंग सदैव विद्यमान रहें हैं. वर्ग-संघर्ष के इतिहास अनुसार जब आधार के दोनों विरोधी ध्रुवों से गतिमान इस आधार की विसंगति किसी एक के पक्ष में हल होना छोड़ देती है तो उसी वक्त अधिरचना में तनाव आ जाता जिसे आधार और अधिरचना का द्वंद इन्कलाब द्वारा सुलझा लेता है. अगर ऐसा नहीं होता तो भी धीरे-धीरे, पीडादायक तरीके से विसंगतियाँ हल तो हो ही जाती हैं. इस पीडा से बचने के लिए क्रांतिकारी चेतना की शक्ति का प्रयोग करते हैं ताकि इन्कलाब हो. चेतना की भूमिका उसी प्रकार जैसे किसी संवेदनशील पदार्थ पर बाहर से इलेक्ट्रोन की बमबारी करके पदार्थ की प्रकृति को बदला जा सकता है या फिर जैसे एक बीज जो खोल में सुरक्षित है, उसे भिगोकर, बीजकर उसके विरोधों की एकता को भंग किया जा सकता है, बीज का निषेध ही पौधा है, पौधे का निषेध, फूल….फल…और फिर बीज, लेकिन बीज वही बीज नहीं जो पहले था, यह ज्यादा विकसित है.

आधार और अधिरचना पर मार्क्स द्वारा लिखित ‘पूंजी’ पृ. 100, नोट- 32, देखें ;

“अर्थशास्त्रियों का तर्क-वितर्क अजीब ढंग का होता है. उनके लिए केवल दो प्रकार की ही संस्थाएं हैं : बनावटी संस्थाएं और प्राकृतिक संस्थाएं. सामंती संस्थाएं बनावटी संस्थाएं हैं, बुर्जुआ सस्थाएं प्राकृतिक संस्थाएं हैं. इस बात में वे धर्मशास्त्रियों से मिलते हैं. वे लोग भी दो प्रकार के धर्म मानते हैं. उनके अपने धर्म छोड़कर उनकी दृष्टि में बाकी हर धर्म मनुष्यों की मनगढ़ंत है, जब के अपने धर्म के बारे में वे समझते  हैं की वह ईश्वर से उद्भूत हुआ है.-(Karl Marx, Misere de la Philosophie, Response a la philosophie de la misere par M. Proudhon, 1847, p. 113) मि. बस्तिया के हाल पर सचमुच हंसी आती है. उनका ख्याल है की प्राचीन काल में यूनानी और रोमन लोग केवल  लूट-मार के सहारे ही जीवन बसर करते थे. लेकिन जब लोग सदियों तक लूट-मार करते हैं , तो कोई ऐसी चीज हमेशा होनी चाहिए , जिसे वे लूट सकें; लूटमार की चीजों का लगातार पुनरुत्पादन होते रहना चाहिए. परिणाम स्वरूप इससे ऐसा लगेगा कि यूनानियों और रोमनों के यहाँ भी उत्पादन की क्रिया थी. चुनांचे उनके यहाँ कोई अर्थव्यवस्था भी रही होगी, और जिस प्रकार बुर्जुआ अर्थव्यवस्था हमारी आधुनिक दुनिया का भौतिक आधार है, उसी प्रकार वह अर्थव्यवस्था यूनानियों और रोमनों की दुनिया का भौतिक आधार रही होगी. या शायद बस्तिया के कथन का अर्थ यह है कि दास प्रथा पर आधारित उत्पादन विधि लूटमार की प्रणाली पर आधारित होती है ? यदि यह बात है, तो बस्तिया खतरनाक ज़मीन पर पांव रख रहे हैं. यदि अरस्तू जैसा महान विचारक दासों के श्रम को समझने में गलती कर गया, तो बस्तिया जैसा बौना अर्थशास्त्री मजदूरी लेकर काम करने वाले मजदूरों के श्रम को कैसे सही तौर पर समझ सकता है ? मैं इस अवसर से लाभ उठाकर अमेरिका में प्रकाशित एक जर्मन पत्र के उस एतराज का संक्षेप में जवाब देना चाहता हूँ, जो उसने मेरी रचना, Zur Kritik der Politschen Oekonomie, 1859 पर किया है. मेरा मत है कि प्रत्येक विशिष्ट उत्पादन-प्रणाली  और उसके अनुरूप सामाजिक सम्बन्ध, या संक्षेप में कहें, तो समाज का आर्थिक ढांचा ही वह वास्तविक आधार होता है, जिस पर कानूनी और राजनीतिक उपरी ढांचा खडा किया जा सकता है और जिसके अनुरूप चिंतन के भी कुछ निश्चित सामाजिक रूप होते हैं; मेरा मत है कि उत्पादन की प्रणाली आमतौर पर सामाजिक, राजनितिक एवं बौद्धिक जीवन के स्वरूप को निर्धारित करती है. इस पत्र की राय में, मेरा यह मत हमारे अपने ज़माने के लिए तो बहुत सही है, क्योंकि उसमें भौतिक स्वार्थों का बोलबाला है, लेकिन वह मध्य युग के लिए सही नहीं है, जिसमें कैथोलिक धर्म का बोलबाला था, और वह एन्थेंस और रोम के लिए भी सही नहीं है, जहाँ राजनीति का ही डंका बजता था. अब सबसे पहले तो किसी का यह सोचना सचमुच बड़ा अजीब लगता है कि मध्य युग और प्राचीन संसार के बारे में ये पिटी-पिटाई बातें किसी दूसरे को मालूम नहीं है. बहरहाल इतनी बात तो स्पष्ट है कि मध्य युग के लोग केवल कैथोलिक धर्म के सहारे या प्राचीन संसार के लोग केवल राजनीति के सहारे जिंदा नहीं रह सकते थे. इसके विपरीत, उनके जीविका कमाने के ढंग से ही यह बात साफ़ हो जाती है कि क्यों एक काल में राजनीति और दूसरे काल में कैथोलिक धर्म की मुख्य भूमिका थी. जहाँ तक बाकी बातों का सम्बन्ध है, तो, उदाहरण के लिए, रोमन गणतंत्र के इतिहास की मामूली जानकारी भी यह जानने के लिए काफी है कि रोमन गणतंत्र का गुप्त इतिहास वास्तव में उसकी भूसंपत्ति का इतिहास है. दूसरी और, डॉन क्विकज़ोट बहुत पहले अपनी इस गलत समझ का खामियाजा अदा कर चूका है कि मध्य युग के सूरमा-सरदारों जैसा आचरण समाज के सभी आर्थिक रूपों से मेल खा सकता है.

ट्रेड यूनियन आन्दोलन का उद्भव और विकास

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25.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

मजदूरों के ट्रेड यूनियन आन्दोलन के विकास की दिशा की सैद्धांतिक व्याख्या करने का प्रयास एंगेल्स ने किया था. उनके विचार अपने समकालीन अर्थशास्त्रियों और समाजवादियों से भिन्न थे और उन्होंने 1845 में ही यह सिद्ध कर दिया था की ट्रेड यूनियनें मज़दूरों और उद्योगपतियों के बीच संघर्ष की अनिवार्य परिणति हैं और मज़दूर वर्ग के सभी संगठनों का आधार ट्रेड यूनियन होगा. अपने आरंभिक दौर में, हड़ताल अवधि में जन्मी मज़दूरों की एकजुटता अल्पजीवी होती थी. चूंकि सभी किस्म के संगठन कानून द्वारा प्रतिबंधित थे, चूंकि मज़दूर वर्ग की समस्त संस्थाएं और संघ कानून का उल्लंघन माने जाते थे (जिसे महान फ्रांसीसी क्रांति की घटनाओं के बाद विशेष रूप से सख्त बना  दिया गया था जब 1799-1800 में विशेष विधेयक लागू कर दिया गया), इसलिए मज़दूरों ने गुप्त सोसायटियां बनाना आरंभ कर दिया जिनकी संख्या और सक्रियता बढ़ती चली गयी. मज़दूरों ने प्रचंड संघर्ष किया जिसमें रैडिकल बुर्जुआ ने मज़दूरों की मदद की. इस संघर्ष ने 1816, 1817 एवं 1819 के दौरान अर्द्ध-क्रांतिकारी रूप धारण कर लिया था. इस संघर्ष ने प्रतिक्रियावादी सिडमाउथ मंत्रिमंडल को बदनाम छह कानून पारित करने के लिए मजबूर कर दिया था. आखिरकार इस संघर्ष के बाद 1824 में एक अधिनियम पारित किया गया जिसने उन सभी कानूनों को मंसूख कर दिया जो किसी भी किस्म के संगठन को प्रतिबंधित करते थे. यद्यपि संगठन बनाने का अधिकार प्रदान करने वाले इस कानून को आंशिक रूप से अगले ही साल रद्द कर दिया गया था तथापि मज़दूर अनिरस्त विशेषाधिकारों का धीरे-धीरे उपयोग करने लगे.
“उद्योग की प्रत्येक शाखा में ट्रेड यूनियनें बन गयीं. बुर्जुआ के अत्याचार और अन्याय से मज़दूरों को बचाने का काम ये खुलकर करने लगीं. उनके उद्देश्य थे;

1. सामूहिक समझौते से मज़दूरी निर्धारित कराना,
2. यूनियन के सभी सदस्यों की ओर से सेवायोजकों से समझौता करना,
3. उद्यमी के लाभांश अनुसार मज़दूरी नियंत्रित करना,
4. यथासंभव मज़दूरी में वृद्धि करना और
5. कारखानों की प्रत्येक शाखा में मज़दूरी का समान स्तर कायम रखना.

इसलिए ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि प्राय: पूंजीपतियों से एक मानक मज़दूरी तय करने के प्रश्न पर वार्ता किया करते थे जो समस्त सेवायोजकों के लिए बाध्यकारी होती थी. यदि कोई सेवायोजक मानक दर से मज़दूरी अदा करने से मना कर देता था तो उसे होश में लाने के लिए हड़ताल की घोषणा कर दी जाती थी. इसके अलावा ये प्रशिक्षुओं की संख्या के सीमा निर्धारण द्वारा श्रम की मांग को बनाए रखने की कोशिश करते थे ताकि मज़दूरी के स्तर को कायम रखा जा सके. वे कारखाना मालिकों को नयी मशीनों को उपयोग में लाने की कोशिश करने से रोकने का प्रयास करते थे जिनके कारण मज़दूरी कम होती थी. इतना ही नहीं, ट्रेड यूनियनें काम से निकाल दिये गए सदस्यों को धन के रूप में, मदद भी दिया करती थीं. (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 215)

एंगेल्स इस तथ्य से भलीभांति परिचित थे कि ब्रिटिश मज़दूरों ने अपने जीवन काल में ही राष्ट्रीय स्तर की यूनियनें बनाना शुरू कर दिया था. “जब कभी सम्भव हुआ और स्थिति अनुकूल हुई, स्थानीय शिल्प संघों ने संयुक्त होकर महासंघ बनाया. निर्धारित अवधि में इन निकायों के अधिवेशन सम्पन्न किये जाते थे जिनके प्रतिनिधि इन यूनियनों द्वारा मनोनीत होते थे. इन यूनियनों ने न केवल शिल्प विशेष के सारे मज़दूरों को एक बड़े संघ में एकजुट करने का प्रयास किया बल्कि समय-समय पर (उदाहरण के लिए 1830 में) उन्होंने इंग्लैंड के सभी मज़दूरों को एक बड़ी ट्रेड यूनियन में ऐक्यबद्ध करने का प्रयास किया जिसके अन्तर्गत प्रत्येक शिल्प के मजदूर स्वतन्त्र रूप से संगठित होते थे.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 215-16)
इसी प्रकार एंगेल्स ट्रेड यूनियनों के संघर्ष के तरीकों का विवरण प्रस्तुत  करते हैं. सबसे पहले हड़ताल होती है, फिर भेदी मज़दूरों, हड़ताल तोड़ने वाले मज़दूरों का मुकाबला किया जाता है और गैर-युनियनवादियों को इस मार्ग पर चलाने के लिए दबाब डाला जाता है.

एंगेल्स यह स्वीकार करते थे कि मेहनतकश वर्ग के संगठन का एक आवश्यक घटक ट्रेड यूनियन है लेकिन वे पूंजीवादी समाज में इसके महत्त्व की सीमा को भी पूरे तौर पर समझते थे. “इन संघों का इतिहास विरल विजयों से अलंकृत पराजयों की लम्बी श्रृंखला की कहानी है. यह बताने की ज़रुरत नहीं है कि ट्रेड यूनियनवाद अपनी सारी ताकत लगाकर भी इस स्थिति में नहीं आ पाता कि उस आर्थिक नियम को बदल दे जिसके अर्न्तगत, उज़रतें श्रम बाज़ार में मांग और आपूर्ति से तय होती हैं.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 216-17)
यद्यपि हड़ताल करना निरर्थक प्रतीत होता है फिर भी यह बात एकदम साफ़ है कि यदि मेहनतकश उज़रत में कटौती का विरोध नहीं करें तो ऐसे विरोध के अभाव में सेवायोजकों के लालच की कोई सीमा नहीं होगी. “युनियने और उनके नाम से की गयी हड़ताल का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि इससे प्रथमत: मजदूरों के बीच प्रतिस्पर्द्धा का उन्मूलन होता है. यह उस पूर्वधारणा  पर आधारित है कि खुद मजदूरों के बीच प्रतिद्वंदिता, उनमें एकजुटता का आभाव, मजदूरों के एक समूह के हितों का दुसरे मज़दूरों के हितों से शत्रुतापूर्ण संबंधों पर बुर्जुआ का शासन स्थापित होता है.”(एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 218-19)

एंगेल्स हड़ताल की भर्त्सना करने वाले समाजवादियों और अर्थशास्त्रियों को याद दिलाते हैं कि इन कार्रवाईयों का शैक्षिक महत्त्व होता है. “हो सकता है कि हड़तालें झड़पों से ज्यादा कुछ न हों; कभी-कभी वे महत्त्वपूर्ण टकराव हो सकती हैं. वे निर्णायक भिदंतें नहीं होती हैं लेकिन इससे पूरी तौर से स्पष्ट हो जाता है कि सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच antim संघर्ष आसन्न है. मज़दूरों  के लिए हड़तालें सैनिक प्रशिक्षण विद्यालय का काम करती हैं. इस विद्यालय में सर्वहारा उस महान संघर्ष के लिए प्रशिक्षण पाटा है जोकि अपरिहार्य है. हड़ताल इस बात का ऐलान है कि मज़दूरों की प्रथक प्रशाखाएं समग्रता में मज़दूर आन्दोलन में निष्ठां रखती हैं…. युद्धकला की पाठशाला के रूप में, हड़तालों का कोई सनी नहीं है.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 224)
प्रूधों (1809-1865) हड़तालों की भर्त्सना करते थे और उनका तर्क था कि वे “अवैधानिक” होती हैं. लेकिन मार्क्स ने एंगेल्स के निष्कर्षों को महत्त्व देते हुए तथा उन्हें और अधिक स्पष्ट करते हुए बताया कि एक वर्ग के रूप में सर्वहारा के विकास एवं ट्रेड यूनियन के विकास में निकट का सम्बन्ध है.

“जब कभी और जहाँ कहीं मजदूर अपनी ताकत को इकठ्ठा करने की कोशिश करते हैं तो इस एकता का सबसे पहला रूप एक गठबंधन होता है. बड़े पैमाने का उद्योग एक-दुसरे से अंजन लोगों के समूह को एक स्थान पर इकठ्ठा कर देता है. प्रतिस्पर्द्धा उन्हें एक-दुसरे से अलग करती हैं. उजरतोँ के स्तर को कायम रखना उनका साझा हित होता है जो उनके स्वामी के हितों के प्रतिकूल होता है. उज़रत में कटौती के किसी प्रयास का मुकाबला करने के लिए वे एक हो जाते हैं और एक ‘गठबंधन’ बना लेते हैं. इस गठबंधन के दो उद्देश्य होते हैं – पहला मजदूरों के बीच प्रतिस्पर्द्धा कम करना और दूसरा पूंजीपति से संघर्ष में मज़दूरों की सारी शक्ति को केन्द्रित कर देना. ऐसा मालूम हो सकता है कि पहला उद्देश्य उज़रतों के स्तर को कायम रखने के प्रयास से अधिक कुछ नहीं है. तो भी सूक्ष्मतर  निरीक्षण से यह बात समझ में आ जाती है कि जिस हद तक मज़दूरों की विभिन्न श्रेणियां समूह बनाने की ओर प्रवृत होती हैं. पूंजीपतियों की पूर्ण एकता के मद्देनज़र, मजदूरों की इन एकीकृत समूहों को कायम रखना, इसका गठन करने वाले मजदूरों के नज़रिए से उज़रत का स्तर बनाये रखने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण बन जाता है. इस बात की सत्यता ने अंग्रेज़ अर्थशास्त्रियों को बहुत आश्चर्यचकित कर दिया है जब वे यह देखते हैं कि मजदूर उन यूनियनों को धन उपलब्ध करने के लिए अपनी मजदूरी का बडा हिस्सा दे देते हैं जिनका गठन, इन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, मजदूरों की उज़रत की सुरक्षा के लिए किया जाता है. इस संघर्ष के दौरान, वास्तविक गृहयुद्ध में आगामी संघर्ष के सभी तत्त्वों का एका स्थापित हो जाता है. इसके साथ गठबंधन ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं कि उनका चरित्र राजनीतिक हो जाता है.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ. 136)

बुर्जुआ शतरंज में मोहरों के रूप में सर्वहारा

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24.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

दूसरे और तीसरे दशक में (1820-1840) अंग्रेज़ और फ्रांसीसी बुर्जुआ मजदूरों के नेता की भूमिका निभाने लगे थे और बुर्जुआ शतरंज में सर्वहारा को मोहरों की तरह इस्तेमाल कर रहे थे| इसी समय के बारे में मार्क्स  लिखते हैं:” एक और तो बड़े पैमाने का उद्योग खुद अपनी बाल्यावस्था पार  कर रहा था जिसका परिमाण यह है कि 1825 के संकट के साथ पहली बार उसके आधुनिक जीवन के आवधिक चक्र की शुरुआत होती है| दूसरी ओर पूँजी और श्रम का वर्ग संघर्ष पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया था| राजनीतिक दृष्टि से उस झगड़े द्बारा जो एक तरफ पवित्र गुट( होली अलायंस) के इर्दगिर्द एकत्रित सरकारों तथा सामंती अभिजात वर्ग और दूसरी तरफ बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में साधारण जनता के बीच चल रहा था; आर्थिक दृष्टि से उस झगड़े द्वारा जो औद्योगिक पूँजी तथा अभिजातवर्गीय भूसंपत्ति के बीच चल रहा था| यह दूसरा झगडा फ्रांस में छोटी और बड़ी भूसंपत्ति के झगड़े से छिप गया था लेकिन इंग्लॅण्ड में अनाज कानूनों के सवाल पर खुल्लम-खुल्ला लड़ाई के रूप में सामने आ गया था|( मार्क्स, कैपिटल के दूसरे जर्मन संस्करण का प्राक्कथन)|

इंग्लॅण्ड में स्वतन्त्र व्यापार के सिद्धांत को लागू करने, अनाज कानून को रद्द करने, अपराध और दीवानी संहिता में सुधार करने तथा मताधिकार का क्षेत्र विस्तृत करने के लिए बुर्जुआ द्वारा छेड़े गए संघर्ष में मजदूरों ने उसकी मदद की थी|

रिकार्डो(1772-1823) जैसे अर्थशास्त्रियों, बेन्थम(1748-1832) जैसे विधि विशेषज्ञों और जोसफ ह्यूम(1777-1855) जैसे राजनीतिज्ञों  का भी मजदूरों पर बहुत अधिक प्रभाव था| 1830 के बाद जब बुर्जुआ वर्ग के उग्र भाग ने उस समझौते को बहुत ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लिया जोकि औद्योगिक पूंजीपतियों को राजनीतिक सत्ता प्रदान करता था तो मजदूर वर्ग के अग्रिम दस्ते और बुर्जुआ के बीच गंभीर मतभेद पैदा हो गए|

पुनर्स्थापना काल में, 1815 से 1830 तक फ्रांसीसी उदार बुर्जुआ का विकास ठीक इसी दिशा में हुआ| इसमें सामंती कुलीनतंत्र और ब्रूब्रोंवादियों की राजतंत्रीय शक्ति के विरूद्ध जनसाधारण के संघर्ष का नेतृत्व किया| उसने शोषितों के मार्गदर्शक, दार्शनिक और मित्र की भूमिका निभायी| लेकिन इसके साथ ही उसने बड़ी चतुराई से औद्योगिक पूंजीपतियों के हितों एंवं भूसम्पत्तिधारक अभिजात वर्ग के हितों के बीच शत्रुता तथा अपने वर्ग हितों एवं मजदूरों के वर्ग हितों के बीच शत्रुता को नज़र से दूर रखा| लेकिन जुलाई क्रांति तथा 1831 और 1834 में सक्रिय  ल्योनवासियों के विद्रोह के युग में मजदूरों की आँखें खुल गयीं जिसने उन्हें अपने हित के लिए राजनीतिक दृष्टिकोण सूत्रित करने और उस भूमिका को निभाने के लिए प्रेरित किया जिसे अब तक बुर्जुआ पार्टी की उग्र शाखा द्वारा निभाया जा रहा था|

पूंजीवाद के खिलाफ मेहनतकश वर्ग के प्रतिरोध के विभिन्न रूप

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23.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

पूंजीवादी समाज मेहनतकशों को जड़ बस्तुओं की सीमा तक नीचे गिरा देता है. मज़दूर मानवीय गरिमा के बोध को तभी तक बरक़रार रख सकता है जब तक वह अपनी इस स्थिति के विरुद्ध विरोध प्रकट करता रहता है, और बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध विद्रोह करता रहता है और बुर्जुआ सामाजिक व्यवस्था से घृणा करता रहता है. इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की दशा में एंगेल्स बताते हैं कि “आधुनिक अर्थों में उद्योगों का विकास अपनी प्रारंभिक मन्ज़िल से जब आगे बढा उसके तुंरत बाद बुर्जुआ के खिलाफ मजदूरों का विद्रोह शुरू हो गया था. इस विद्रोह का सबसे पुराना, सबसे अधिक भोंडा और सबसे कम प्रभावी रूप अपराधिक गति विधियों में अभिव्यक्त हुआ. मज़दूर गरीबी और अभाव में जीता है और दूसरों को बेहतर स्थितियों में ज़िन्दगी बसर करते हुए देखता है. उसे यह समझ में नहीं आता था कि वह क्यों कष्ट झेलता है जबकि वह धनी निकम्मे लोगों की अपेक्षा समाज के लिए ज्यादा काम करता हैं. संपत्ति के प्रति उसकी पारंपरिक श्रद्धा पर ज़रुरत हावी हो गयी – और वह चोरी करने लगा. जैसे-जैसे उद्योगों का विकास हुआ उसी अनुपात में अपराध में भी वृद्धि होने लगी. गिरफ्तारी के वार्षिक आंकडे, कपास की गांठों की खपत के वार्षिक आंकडों के समरूप पाए गए. मजदूरों को जल्दी ही यह समझ आ गया कि अपराध करने में कोई फायदा नहीं है. अपराधी एक व्यक्ति के रूप में अलग-अलग, समाज की प्रचलित व्यवस्था के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराता है तो समाज की समग्र शक्ति सक्रीय हो जाती है और अपनी जबरदस्त ताकत से उसे कुचल डालती है. चोरी करना विरोध दर्ज करने का सर्वाधिक अपरिष्कृत रूप है और इसी वजह से यह मज़दूर वर्ग के अभिमत की सामान्य अभिव्यक्ति कभी नहीं बन पाई, हालाँकि मज़दूर अपने अंतर्मन में इस कृत्य को क्षम्य मानते रहे हैं.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 213-4) ठीक यही बात विरोध के उस दूसरे रूप पर भी लागू होती जोकि पूंजीवादी विकास के शुरुआती दौर में प्रकट हुआ था अर्थात कारखाना मालिकों, ओवरसियरों की हत्या करना.
कारखानों में बलवा सामूहिक विरोध करने का पहला रूप है जिसमें संपत्ति नष्ट की जाती थी विशेषतया मशीनें तोड़ दी जाती थीं. मशीनों के खिलाफ मजदूरों का संघर्ष नयी मशीनरी के आविष्कार के आरंभ से शुरू हो गया था. लेकिन सामूहिक कार्रवाइयाँ  उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में शुरू हुई. मजदूरों ने नाटिन्घम, यार्कशायर और लंकाशायर में मशीनों को नष्ट करने का सुनियोजित अभियान आरंभ किया जिन्हें ‘लुड़्डाइट्स’ कहा जाता था. 1811 के अंत में बलवाइयों ने नाटिन्घम और पड़ोसी जिलों में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी. लेस और स्टॉकिन्ग  बनाने के चौखटों को नष्ट करने से उन्होंने अपनी शुरुआत की. इन मंडलियों का सरदार एक मिथकीय काल्पनिक चरित्र जनरल लुड़्ड के नाम से जाना जाता था जिसके नाम पर कारखाना मालिकों के खिलाफ हिंसात्मक कार्रवाइयाँ की जाती थीं, औद्योगिक संपत्ति नष्ट की जाती थी और मशीनों के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए जाते थे. पुलिस ‘लुड़्डाइट्स’ का सामना कर पाने में असमर्थ थी और विद्रोह को दबाने के लिए सेना की मदद लेनी पडी. एक विधेयक प्रस्तुत किया गया जिसके तहत किसी मज़दूर को मृत्यु दंड दिया जा सकता था यदि उस पर मशीन तोड़ने का आरोप  सिद्ध हो जाता. इस अत्यधिक दमनात्मक विधेयक के विरोध की एक उल्लेखनीय उपलब्धि लोर्ड बायरन (1788-1824) का हॉउस ऑफ़ लॉर्ड्स में दिया गया भाषण है. इस भाषण में उन्होंने नाटिंघम के मजदूरों की तकलीफों का सजीव चित्र पेश किया था. लुड्डाइट आन्दोलन का सजीव और कल्पनापूर्ण चित्रण अर्न्स्ट टालर के नाटक द मशीन रेकर्स में किया गया है. यह आन्दोलन 1812 में पुनर्जीवित हो उठा और जनवरी 1813 में तीन व्यक्तियों को फाँसी दे दी गयी. कार्टराइट के कारखाने पर हमले के सप्ताह के दौरान चौदह व्यक्तियों को प्राणदंड दिया गया. उत्तेज़ना फैलाने वाले एजेंटों की मदद से सरकार ने पूरी तौर से इस संगठन को नष्ट कर दिया. उद्योग की समृद्धि में नयी जान आ जाने और अंशत: कॉर्बेट (1762-1835) के आन्दोलन के परिणामस्वरूप, जिसने मजदूरों को मशीनों को तोड़ने की मुर्खता का अहसास करा दिया था (जो उनकी बढती जा रही समझदारी का बोध कराता है), लुड्डाइट आन्दोलन का अंत हो गया. फिर भी विरोध के इस स्वरूप ने अपनेआप को बदलती परस्थितियों के अनुकूल ढालना जारी रखा और जब कभी नयी मशीनें उपयोग में लायी गयीं इसका सहारा लिया गया. इस प्रकार अठारह सौ तीस के दशक में इंग्लैंड के सम्पूर्ण ग्रामीण क्षेत्र में ‘लाल मुर्गा’ बांग देता रहा. अर्थात जैक स्विंग के नेतृत्व में कृषि मजदूरों ने पुआल के ढेरों और खलिहानों में आग लगायी. “जनरल लुड्ड” की भांति “जैक स्विंग” भी एक काल्पनिक चरित्र था.
जर्मनी में अठारह सौ चालीस के दशक में सिलेसियाई बुनकरों ने आन्दोलन के ठीक इसी रूप को अपनाया. इसका ज़िक्र मार्क्स के मित्र विल्हेल्म वुल्फ ने अपनी रचनाओं में किया है और गरहार्ट हाफमैन ने अपने प्रसिद्द नाटक द वीवर्स में इसका उपयोग कथावस्तु में किया. उन्नीसवीं शताब्दी के आठवें और नौवें दशक में रूस में मशीनों को तोड़ने वाला बलवा हुआ. “काफी समय बीत जाने और काफी अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद मजदूर मशीन और पूंजी द्वारा मशीन के उपयोग में भेद कर पाए और उन्होंने अपने प्रहार का निशाना उत्पादन के भौतिक औजारों को नहीं बल्कि उस विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था को बनाना सीखा जो इन औजारों का उपयोग करती है.” (मार्क्स, कैपिटल, भाग 1, 458)


मजदूर पूंजीपति को उधार देता है

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21.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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“ऐसे प्रत्येक देश में, जिसमें पूंजीवादी ढंग का उत्पादन पाया जाता है, यह रिवाज होता है कि जब तक श्रम-शक्ति का करार में निश्चित समय तक, जैसे, मिसाल के लिए, एक सप्ताह तक प्रयोग नहीं कर लिया जाता, तब तक उसके दाम नहीं दिए जाते. इसलिए, हर जगह मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य पूंजीपति को पेशगी दे देता है, मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति के क्रेता को दाम पाने के पहले ही उसके उपयोग की इजाज़त दे देता है; हर कहीं मज़दूर पूंजीपति को उधार देता है. यह उधार महज़ कोई हवाई चीज नहीं होता, इसका सबूत सिर्फ यह है कि पूंजीपति का दिवाला निकलने पर मजदूरी के पैसे अक्सर डूब जाते हैं बल्कि यह भी कि उसके इससे कहीं अधिक स्थायी अनेक दूसरे नतीजे भी होते हैं.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 162)
मार्क्स यहाँ पर एक टिप्पणी देते हैं जिसमें वह आंकडे देते हुए यह सिद्ध करते हैं कि उन मज़दूरों से जिन्हें एक सप्ताह बाद मजदूरी मिलती है, दूकानदार ज़्यादा दाम वसूल करता है क्योंकि उन्हें अपनी ज़रुरत की चीजें उधार पर लेनी पड़ती हैं.
उस मज़दूर की स्थिति और ज़्यादा ख़राब होती है जो अपनी मजदूरी एक पखवाड़े या एक महीने के बाद पाता है. वह चीजों की और ज़्यादा कीमत चुकाने के लिए बाध्य हो जाता है और वास्तव में उस दूकानदार का गुलाम बन जाता है जो उसे चीजें उधार देता है. मज़दूर जो माल खरीदता है वे यदि वास्तव में मिलावटी नहीं होते तो निम्न गुणवत्ता के होते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान खाद्य सामग्री की मिलावट ने विकराल रूप धारण कर लिया था. इसी प्रकार आवास के मामले में मज़दूर भवन स्वामी की दया पर निर्भर रहता है. आवास जितना घटिया होता उतना अधिक उसकी मरम्मत पर खर्च आता है और असंदिग्ध रूप से सर्वाधिक मंहगे वे आवास होते हैं जिसमें आबादी का निर्धनतम वर्ग निवास करता है. “आवासों के सट्टेबाज गरीबी की इन खानों से इतना अधिक मुनाफा कमाते हैं कि पोटोसी की चांदी की खानों के मालिकों के मुहं में भी पानी आ जाये.”(मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 727)

22. निम्न और मध्यम बुर्जुआ सर्वहारा की कतारों में शामिल होते हैं

“समाज के उच्चतर संस्तरों से आये लोगों से भी मज़दूर वर्ग की संख्या में वृद्धि होती है. ढेरों छोटे उद्यमी और अनर्जित आय के छोटे हिस्सेदार सर्वहारा की कतारों में शामिल होते जाते हैं और अपने श्रम को श्रम बाज़ार में बिक्री के लिए मज़दूरों के साथ-साथ पेश कर देते हैं. काम की याचना में ऊपर उठे हाथों का जंगल लगातार ज़्यादा घना होता जाता है जबकि ये हाथ लगातार पतले होते जाते हैं. यह बात एकदम साफ़ है कि जब सफलता की पहली शर्त बड़े पैमाने का उत्पादन हो तो छोटा उत्पादक स्पर्द्धा में टिक नहीं सकता. दूसरे शब्दों में कोई भी इंसान एक ही वक्त में छोटे उत्पादक के साथ-साथ बड़ा उत्पादक नहीं बना रह सकता. इस तथ्य के विस्तृत निरूपण की आवश्यकता नहीं है कि पूंजी पर ब्याज उसी अनुपात में घटता जाता है जिस अनुपात में पूंजी में वृद्धि होती जाती है अर्थात पूंजी की मात्रा और उसके क्षेत्र के विस्तार में वृद्धि होती जाती है. अनर्जित आय के छोटे हिस्सेदारों के लिए अपनी पूंजी के ब्याज से जीवनयापन कर पाना मुश्किल होता जाता है. इसलिए वह औद्योगिक प्रक्रिया में सक्रीय भागीदार बनने के लिए विवश कर दिया जाता है अर्थात यह छोटे कारखाना मालिकों की खाली जगह को भरता जाता है जो खुद भी सर्वहारा वर्ग में भरती के लिए विवश होते जाते हैं.” (मार्क्स, Lohnarbeit and Kapital, पृ. 39)

कारखाने का निरंकुशतंत्र

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19. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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श्रम के साधन की अपरिवर्ती गति के तहत मज़दूरों की यांत्रिक अधीनता और काम करने वाले समुदाय की विचित्र बुनावट (जो भिन्न-भिन्न वर्ग के स्त्री और पुरुष से मिलकर बनती है) के कारण बैरक जैसा अनुशासन पैदा हो जाता है. यह अनुशासन फैक्टरी में पूर्ण व्यवस्था का रूप ले लेता है और उसमें दूसरों के काम की देखरेख करने का उपर्युक्त श्रम पूरी तरह से विकसित हो जाता है. इससे मज़दूर काम करने वालों और काम की देखरेख करने वालों, औद्योगिक सेना के साधारण सिपाहियों और हवलदारों में बंट जाता है… फैक्टरी नियमावली (जिसमें पूंजी निजी कानून बनाने वाले व्यक्ति की तरह और अपनी इच्छा के अनुसार मज़दूरों पर कायम अपने निरंकुश शासन को कानून का रूप देती है. परन्तु इस निरंकुशता के साथ उतरदायित्व का वह विभाजन जुड़ा हुआ नहीं होता है, और न ही उसके साथ प्रतिनिधिमूलक प्रणालियाँ जुडी होती हैं जो अन्य मामलों में बुर्जुआ वर्ग को बहुत पसंद होती हैं) श्रम-प्रक्रिया के उस सामाजिक नियमन का पूंजीवादी प्रहसन मात्र होता है जो विशाल पैमाने की सहकारिता के लिए और श्रम के औज़ारों के – विशेषकर मशीनों के – सामूहिक उपयोग के लिए आवश्यक होता है. मार-मारकर गुलामों से काम लेने वाले सरदार के कोड़ों का स्थान फोरमैन के जुमानों का रजिस्टर ले लेता है. सभी प्रकार के दंड स्वाभाविक रूप से जुर्मानों और उज़रत में कटौती का रूप धारण कर लेते हैं, और फैक्टरी लाइकरगसों की विधायी प्रतिभा ऐसी व्यवस्था करती है कि उनके बनाये कानूनों के कठोर अनुपालन की अपेक्षा उनके उल्लंघन से सेवायोजक को अधिक लाभ होता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 453-4)
मार्क्स इस सम्बन्ध में एंगेल्स को उद्धृत करते हैं जिन्होंने इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की जीवन स्थितियों के बारे में लिखी पुस्तक में, बीस साल पहले, कारखानों में कायम निरंकुशता का सजीव चित्रण किया था : “बुर्जुआ वर्ग ने सर्वहारा को जिस गुलामी की जंजीर से जकड़ दिया है, उस पर जितना अधिक प्रकाश फैक्टरी-व्यवस्था में पड़ता है, उतना और कहीं नहीं पड़ता. इस व्यवस्था में हर प्रकार की स्वाधीनता – कानूनी तौर पर और वास्तव में दोनों तरह – ख़त्म हो जाती है. मज़दूर को सुबह साढे पॉँच बजे फैक्टरी में हाज़िर होना पड़ता है. यदि उसे दो चार मिनट की देर हो जाती है तो उस पर जुर्माना किया जाता है. यदि वह दस मिनट देर से पहुँचता है तो उसे नाश्ते के समय तक घुसने नहीं दिया जाता और उसकी एक चौथाई मज़दूरी काट ली जाती है. उसे मालिक के हुक्म पर खाना, पीना और सोना पड़ता है…फैक्टरी की निरंकुश सीटी उसे बिस्तर से उठा देती है, नाश्ता और खाना बीच में छुड़ा देती है. और कारखानें में उस पर क्या गुजरती है ? यहाँ पर कारखाने का मालिक निरंकुश विधि-निर्माता होता है. वह जैसे चाहता है, वैसे नियम बनाता है, नियमावली में अपनी इच्छानुसार परिवर्तन करता रहता है और नयी बातें जोड़ता रहता है, और अगर वह बिलकुल बेहूदा बातें उसमें शामिल कर लेता है, तब भी अदालतें मज़दूर से यही कहती हैं, कि : ‘तुमने ये करार अपनी मर्ज़ी से किया है, अब तो तुम्हें उसका पालन करना ही होगा…नौ वर्ष की आयु से मृत्यु तक इन मज़दूरों को हर घड़ी यह मानसिक और शारीरिक यातना सहन करनी पड़ती है.” (कैपिटल, खंड 1, पृ. 453)
क्रांति के पहले रूस में कारखानों में कायम निरंकुशता का घृणित रूप, रूसी कारखाना मालिकों द्वारा जुर्मानों की व्यवस्था में किये गये परिमार्जन के स्तर को लेनिन के पैम्फ्लेट (‘दण्डों के कानून की व्याख्या’ – Explanation of the Law on Fines Imposed on Factory Workers) में अच्छे तरीके से चित्रित किया गया है.

श्रम और श्रमशक्ति

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18. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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यहाँ पर मार्क्स और एंगेल्स उस पारिभाषिक शब्दावली का उपयोग करते हैं जिसे उन्होंने बाद के वर्षों में त्याग दिया था. माल के रूप में श्रम का उस श्रम से विभेदीकरण किया गया है जिसकी मात्रा किसी माल के मूल्य को निर्धारित करती है. मज़दूर के काम करने की क्षमता, किसी उत्पाद को बनाने की उसकी क्षमता को इंगित करने के लिए माल के रूप में “श्रम” शब्द का प्रयोग करने की बजाय मार्क्स ने बाद में “श्रमशक्ति” शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया. उत्पादन के साधन से वंचित होने के कारण मज़दूर उत्पादन के काम में अपनी क्षमता को लगाने की स्थिति में तब तक नहीं होता है जब तक वह स्वयं माल बाज़ार में प्रवेश नहीं करता और माल के रूप में अपनी श्रमशक्ति को नहीं बेचता. माल के रूप में श्रम का मूल्य या श्रमशक्ति के मूल्य का निर्धारण करने के सम्बन्ध में मार्क्स और एंगेल्स ने तदनुसार अपने विचार में संशोधन किया. Umrisse zu einer kritik der Nationalokonomie नामक अपनी पुस्तक और इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की जीवन स्थितियों के बारे में अपनी पुस्तक में एंगेल्स इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि श्रम का मूल्य ठीक उन्हीं नियमों द्वारा निर्धारित होता है जिन नियमों के अनुसार किसी अन्य माल का मूल्य निर्धारित होता है अर्थात अपने उत्पादन की लागत पर ! जहाँ तक मजदूर का प्रश्न है यह उसे श्रम करने योग्य बनाये रखने के लिए आवश्यक भरण-पोषण के साधन की लागत होती है. इसलिए जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक न्यूनतम धनराशी ही “श्रम” अर्थात श्रमशक्ति का मूल्य, मजदूर की उज़रत होती है. मार्क्स उनके निष्कर्षों से सहमत थे. दर्शन की दरिद्रता और फिर उज़रती श्रम और पूँजी में वह मजदूर के श्रम की उज़रत की परिभाषा निम्न प्रकार से देते हैं “साधारण श्रम यानि (श्रमशक्ति की) उत्पादन लागत उस व्यय के बराबर होती है जो मजदूर और उसके प्रजनन के जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक होता है. मजदूर और उसके प्रजनन के जीवन निर्वाह के  लिए उजरत का भुगतान किया जाता है. इस प्रकार निर्धारित मज़दूरी को न्यूनतम मज़दूरी के नाम से जाना जाता है. न्यूनतम मज़दूरी का सम्बन्ध सामान्य मानव जाति से है न की अलग-अलग मज़दूर से है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार माल का मूल्य साधारणतया उनकी उत्पादन लागत से निर्धारित होता है. ऐसे मज़दूर कुछ ही नहीं होते बल्कि उनकी संख्या लाखों में होती है जिन्हें इतनी भी मज़दूरी नहीं मिलती कि अपना जीवन निर्वाह कर सकें और अपनी जाति का प्रजनन कर सकें. अपने खुद के उतार-चढाव के ढांचे के अन्दर रहते हुए मज़दूर वर्ग की उज़रत इस न्यूनतम मज़दूरी के अनुकूल बन जाती है.” “मार्क्स, Lohnarbeit and Kapital, पृ. 24)
लासाल ने इस सूत्र को स्वीकार कर लिया था और इसे वह “मज़दूरी का कठोर नियम” कहते थे जोकि एक मुहावरा था जिसका प्रचार मूल्य के अलावा अन्य कोई महत्त्व नहीं था.
पूँजी में मार्क्स समझाते हैं कि श्रमशक्ति का मूल्य, अन्य दुसरे मालों की तरह इसके उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल से निर्धारित होता है और श्रमशक्ति के उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल उस श्रमकाल के बराबर होता है जो जीवन निर्वाह के साधनों के उत्पादन के लिए आवश्यक होता है जिनसे मज़दूर भोजन, वस्त्र, आवास आदि की आवश्यकता की पूर्ति करता है. लेकिन इन मूलभूत आवश्यकताओं का विस्तार, इन आवश्यकताओं की पूर्ति का स्तर तथा इनकी पूर्ति की क्षमता इतिहास द्वारा निर्धारित तत्त्वों का परिणाम होती है. यह बहुत हद तक सम्बंधित देश के सांस्कृतिक विकास पर निर्भर करता है और अन्य कारकों के अलावा उन स्थितियों पर निर्भर करता है जिनके अर्न्तगत स्वतन्त्र मजदूरों के वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ, उन आदतों पर जो इस वर्ग की बनीं, और उस जीवन स्तर पर जो इस वर्ग ने अपने लिए हासिल किया. इस प्रकार, अन्य मालों के विपरीत, श्रमशक्ति का मूल्य आंशिक रूप से ऐतिहासिक और नैतिक घटकों से निर्धारित होता है. जीवन निर्वाह की भौतिक आवश्यकताओं की मात्र लागत पर श्रमशक्ति के न्यूनतम मूल्य का आकलन किया जाता है. यदि श्रमशक्ति का मूल्य (मज़दूरी) न्यूनतम तक गिर जाता है, तब यह श्रमशक्ति के मूल्य के नीचे भी गिर जाता है. इस स्थिति में श्रमशक्ति का संपोषण प्रयाप्त स्तर तक नहीं होता है. मार्क्स यस भी सिद्ध करते हैं कि पूंजीवादी समाज में मज़दूर को अपने भरण-पोषण के लिए उत्पादन करने का अधिकार इसी प्रतिबन्ध के साथ मिलता है कि इसके अलावा वह बिना उज़रत के कुछ समय काम करे जो पूंजीपति के लिए बेशी (surplus) मूल्य उत्पन्न करता है. मार्क्स उन स्थितियों का भी खुलासा करते हैं जो पूंजीपति को इस अवैतनिक श्रम की मात्रा को बढाने में मदद करते हैं. कार्य दिवस लम्बा बनाकर, श्रम सघनता बढाकर, श्रम उत्पादकता में वृद्धि करके (आजकल विशेष आर्थिक ज़ोनों, SEZ की स्थापना इसी उद्देश्य से की जा रही है) इसे हासिल किया जाता है. इसके फलस्वरूप पूंजीपति श्रमशक्ति की कीमत, उजरत को कम से कम करते जाते हैं और यह श्रमशक्ति के मूल्य के नीचे तक पहुँच जाती है. (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 158-165 में दिये गये विस्तृत विवेचन को देखें जिसका सारांश पूर्वोक्त कथन है.)