जेम्स पेत्रास

संकट. कैसा संकट ? मुनाफे आसमान छू रहे हैं : जेम्स पेत्रास

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Via: The James Petras Website.

जबकि प्रगतिशील और वामपंथी लेखक ‘पूंजीवाद के संकट’ के बारे में लिख रहे हैं, लेकिन अंटलाटिक और प्रशांत महासागर के दोनों ओर, उत्पादक, पेट्रोलियम कम्पनियां, बैंकर और अधिकतर मुख्य कारपोरेशन खुशियाँ मना रहे हैं.

इस वर्ष के पहले क्वार्टर से कारपोरेट मुनाफे बीस प्रतिशत से सौ प्रतिशत से भी अधिक तक ऊपर उठ गए हैं (Financial Times August 10, 2010, p. 7). वास्तव में कारपोरेट मुनाफे 2008 में शुरू होनेवाली महामंदी से पहले की स्थिति से अधिक हैं (Money Morning March 31, 2010). मेहनतकश वर्ग, सार्वजानिक और निजी सेक्टर के कर्मचारियों और छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमों का गहराता संकट, कार्पोरेट मुनाफों की इस उछाल के पीछे का असली कारण है.

मंदी के शुरू होते ही, बड़ी पूंजी ने करोड़ों नौकरियां ख़त्म कर दी (2010 में चार अमेरिकनों में से एक को नौकरी से निकाल दिया गया). ट्रेड यूनियनों के मुखियों से उनके अधिकारों को छीन लिया गया. कारपोरेशनों ने स्थानीय, राज्य और संघीय सरकारों से टैक्सों में छूट, सब्सिडियां और लगभग ब्याज रहित कर्जों सहित भारी छूटें हासिल की हैं.

जैसे ही मंदी अपने निचले स्तर तक पहुंची, शोषण-सघनता लागू करते हुए ( प्रति श्रमिक अधिक उत्पादन ), व्यवसाय ने शेष बची श्रम पर उत्पादन कार्य को दुगना कर दिया और करोडपति ट्रेड यूनियनों के मुखियों से साठगांठ करते हुए, मेहनतकश वर्ग के स्वास्थ्य बीमा और पेंशन फंड के लिए उनके उतरदायित्व को बढाकर अपने खर्चों में कटौती कर ली. इसका परिणाम यह हुआ कि राजस्व में गिरावट आने से मुनाफे बढ़ गये और बैलेंस-शीटों में सुधार हो गया (Financial Times August 10, 2010). विरोधाभासी तरीके से, सीईओ को ‘संकट’ के बहाने और बयानबाजी के चलते,प्रगतिशील लेखकों की, मजदूरों के लिए, बुर्जुआ मुनाफे से मांग को हतोत्साहित करने का मौका मिल गया और बेरोजगारी की  बावड़ी में निरंतर होनेवाली बढौतरी के चलते ‘औद्योगिक एक्शन’ के तौरपर बेरोजगारों के प्रतिस्थापन का अवसर भी हाथ में आ गया.

मुनाफों की इस मौजूदा बढौतरी ने पूंजीवाद के सभी सेक्टरों को फायदा नहीं पहुंचाया है; हवा से गिरे इस मेवे का बड़ा भाग सबसे बड़े कार्पोरेशनों के हिस्से में आया है. इसके विपरीत, कई मध्यम और छोटे उद्यमों को भारी घाटा हुआ है और कईयों का तो दिवाला निकल गया है. परिणाम स्वरूप वे अपने ‘बड़े साथियों’ के आसान शिकार बन गये हैं (Financial Times August 1, 2010). मध्यम पूंजी के संकट ने पूंजी की सघनता और केन्द्रीयकरण की प्रक्रिया को शुरू कर दिया है और सबसे बड़े कार्पोरेशनों के लिए मुनाफे की दर में बढौतरी के लिए योगदान दिया है.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही, जब हमें बताया जाता था कि पूंजीवाद  ‘निष्प्राण’हो गया है और अपने अंतिम विध्वंस की ओर बढ़ रहा है, वामपंथियों और प्रगतिशीलियों द्वारा पूंजीवादी संकटों के विश्लेषण को समझने की असफलता, स्थायी समस्या के रूप में रही है. अपनी यूरोपीय-अमरीकी अंध नस्लीय श्रेष्टता के कारण वे इस तथ्य को नोट करने में असफल रहे हैं कि एशिया की पूंजी कभी भी अंतिम सकंट तक नहीं पहुंची और लातिनी अमरीका के संक्रमण का ‘वर्ज़न’ तो सौम्य रहा है (Financial Times June 9, 2010, p. 9). झूठे भावीवक्ता इसे तस्लीम करने में असफल रहे हैं कि अलग-अलग तरह के  पूंजीवाद की संकटों के प्रति संवेदनशीलता भी कम या अधिक होती है… और कुछ असंगतियों से तीव्र लाभ (एशिया, लातिनी अमरीका, जर्मनी ) होते हैं जबकि  कुछेक देश ( अमरीका, इंग्लैण्ड, दक्षिण और पूर्वी यूरोप) रक्ताल्पता पीड़ित और अस्थिर रूप से, वसूली प्रति संवेदनशील होते हैं.

जबकि Exxon-Mobile के मुनाफे की बढौतरी दर सौ प्रतिशत से ऊपर रही और ऑटो कारपोरेशनों ने पिछले वर्षों में सबसे अधिक लाभ अर्जित किया, तो दूसरी ओर, कामगारों की मजदूरी और जीवन स्तर में गिरावट आई और राज्य-सेक्टर के कर्मचारियों को वेतन में कटौती और छंटनी का कड़वा घूँट पीना पड़ा. साफ़ है कि कार्पोरेट मुनाफों की वसूली का आधार श्रम का कर्कश शोषण और सार्वजानिक संसाधनों का निजी कारपोरेशनों को हुआ सबसे बड़ा स्थानान्तरण रहा है. पूंजीवादी राज्य, जिसकी अगुआई डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति ओबामा कर रहा है, ने श्रमिकों को  मजदूरी, स्वास्थ्य और पेंशनों में कटौती को स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के साथ-साथ सीधे बैलआउट पैकजों द्वारा, लगभग ब्याज मुक्त ऋण, टैक्स कटौती से, बड़ी पूंजी को अरबों डॉलर का फायदा पहुंचाया है. रिकवरी के लिए वाईट हाउस की योजना उम्मीद से कहीं बढ़कर रही है – कार्पोरेट मुनाफों की पुन:प्राप्ति हो गयी है, “केवल” कामगारों की भारी तादाद का संकट और अधिक गहरा हो गया है.

पूंजीवाद की मौत की प्रगतिशीलियों द्वारा भविष्यवाणियों की असफलता का कारण उनका वाईट हाउस और कांग्रेस द्वारा सार्वजानिक खजाने की लूट से पूंजी को पुनर्जीवित करने की गुंजाईश का न्यूनानुमान रहा है. उनका न्यूनानुमान इस हद तक था कि वे अंदाजा नहीं लगा पाए कि पूंजी को इतनी अधिक छूट दे दी जाएगी कि वह अपने मुनाफों की वसूली का बोझ कामगारों की पीठ पर लाद सके. इस सन्दर्भ में, प्रगतिशीलियों का “श्रम प्रतिरोध” और “ट्रेड यूनियन लहर” के बारे में  “शब्दाडम्बर” उनकी कमजोर बुद्धि की वह झलक थी जो सामाजिक धन की इस तरह बर्बादी पर किसी प्रकार का प्रतिरोध लगाने में फेल थी क्योंकि किसी प्रकार का कोई श्रम संगठन था ही नहीं. इसके विरुद्ध जो कुछ भी पास हुआ वह अस्थियित था और डेमोक्रेटिक पार्टी के कांग्रेस में वाईट हाउस में, वाल स्ट्रीट के एड्वोकेटों के पक्ष में था.

पूंजीवादी प्रणाली के मौजूदा असमान और विषम प्रभाव से हमें पता चलता है कि पूंजीपति सिर्फ शोषण और दशकों की सामाजिक प्राप्तियों को वापस लेकर ही अपने संकटों पर काबू पा सकते हैं. हालाँकि मौजूदा मुनाफा वसूलने की प्रक्रिया अति अस्थिर है क्योंकि यह वर्तमान अनुसन्धान, निम्न ब्याज दरों, और श्रम खर्च में कटौती के दोहन पर आधारित है (Financial Times August 10, 2010, p 7). यह गत्यात्मक नए निजी पूँजीनिवेश और बढ़ी हुई उत्पादक क्षमता पर आधारित नहीं है. अन्य शब्दों में, ये आसमान से टपकी हुई प्राप्तियां हैं न कि विक्री राजस्व में वृद्धि और उपभोगता मंडी के विस्तार का परिणाम हैं. और यह कैसे हो सकता है – जबकि मजदूरी निरंतर घट रही हो और बेरोजगारी/ अर्धबेरोजगारी और ख़त्म हो चुके रोजगार 20 प्रतिशत से अधिक हों ? साफ है कि राजनीतिक और सामाजिक  बढ़त और विशेषाधिकृत सत्ता पर आधारित यह अल्पकालिक बूम चिरस्थायी नहीं है. सार्वजानिक कर्मचारियों की भीमकाय सेवानिवृति और श्रम की सघनता से शोषण की कुछ सीमायें होती हैं … दवाब बढ़ रहा है और कुछ न कुछ होकर रहेगा. एक बात निश्चित है : पूंजीवादी प्रणाली अपनी आन्तरिक सड़ांध और “विरोधाभासों” से न तो गिरेगी और न ही प्रतिस्थापित होगी.