जीवन

तल्खी से लिखी आपकी टिपण्णी. शुक्रिया

Posted on Updated on

दिनेश कुमार बिस्सा की एक टिपण्णी बड़ी दिलचस्प रही, हालाँकि उन्होंने बड़े व्यंग्यात्मक अंदाज से मार्क्सवाद पर तीर छोड़े हैं. लेकिन उनकी टिपण्णी उन लोगों की टिप्पणियों से कहीं बेहतर है जो मार्क्सवाद में आस्था रखते हैं, जबकि मार्क्सवाद आस्था का नहीं कर्मों का विज्ञान है. चलिए, दिनेश जी की टिपण्णी से शुरू करते हैं :

“मार्क्सवाद से समाज मैं असमानता मिट कर समानता आ जाती है, भूखे के पेट में रोटी, बेरोजगार के हाथ में काम, नंगे के तन पर कपडा, बच्चों के हाथ में कापी-कलम. गरीबी मिट कर सभी लोग अमीरी के सागर में गोते लगाने लगते हैं, मतलब सब कुछ  अच्छा ही अच्छा. उदाहरण : कम्युनिस्ट देशों रूस, क्यूबा, चीन. भारत के दो महान राज्य, केरल और पश्चिम बंगाल…. इन जगहों में गरीबी और असमानता, शोषण आदि के दर्शन भी नहीं होंगे. दिन में चिराग लेकर ढूंढ लो, तो भी…दिनेश कुमार बिस्सा.

दिनेश भाई, हम यह अंदाजा तो नहीं लगा सकते की आपके घोर मार्क्सवादी विरोध के पीछे आपका अनुभव या फिर आपकी मिडल क्लास की आदर्शवादी-समतावादी संभावनाओं की पूर्ति में मार्क्सवाद के इतिहास ( इतिहास वह नहीं जो है, बल्कि वह जो आपका मन, आपकी सहूलत से गढ़ना चाहता है ) का खरा न उतरना रहा है या फिर कुछ पूर्वाग्रह जो मिडल क्लास की जीवन स्थितियों से उनकी विचार शैली में आ जाते हैं. लेकिन इससे हमें अपना दृष्टिकोण, पाठकों के सामने स्पष्ट करने का मौका मिल गया, जिसका प्रेरणा स्रोत तल्खी से लिखी, आपकी यह टिपण्णी है. शुक्रिया

बीसवीं सदी की क्रांतियों और परिणामस्वरूप समाजवाद को लागू करने की मुश्किलें, समाजवाद के भीतर बुर्जुआ वर्ग का होना, अवसर मिलते ही, उन द्वारा मजदूर वर्ग के अधिनायकवाद के स्थान पर फिर से बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना (वह भी लाल झंडे तले, कम्युनिस्ट भीतरघातियों द्वारा जो शुद्ध से शुद्ध कम्युनिस्ट पार्टी में होते हैं, और हम यह दावा नहीं करते कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा. यह काम हम उन लोगों के लिए छोड़ देते हैं जिन्हें अपने और अपनी पार्टियों के शुद्ध होने पर गर्व है) हमारा फ़िलहाल इतना ही आग्रह है कि पूंजीवाद अपने विकास के उस चरण पर पहुँच चुका है, जहाँ इसकी अप्रासंगिगता स्पष्ट दिखाई देती है.

जहाँ तक मार्क्सवाद के प्रासंगिक होने का अर्थ है, तो यह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है. विश्व के हर कोने में पूंजीवादी संबंधों का वर्चस्व हो चुका है. बेशक सबसे धनाढ्य कार्पोरेशनों के पास विज्ञान और उच्च तकनीक से सुपर मुनाफा कमाना संभव है, लेकिन तीव्र गति के युग में, विज्ञान और तकनीक अन्य मझौले पूंजीपतियों के पास पहुँच कर उनका सुपर मुनाफा बंद कर देती हैं. ( सुपर मुनाफे से आशय है कि उच्च तकनीक द्वारा कम मजदूरों से अधिक उत्पादन करना जिसके परिणामस्वरूप सुपर मुनाफे का स्रोत कमजोर पूंजीपति वर्ग के बेशी मूल्य का साझा पूल होता है)

आपने यूनानी देवता सफिंक्स की मिथ तो सुनी ही होगी. वे एक पहेली द्वारा ऐथंज़ शहर की रक्षा किया करते थे. शहर में आनेवाले अजनबी को पहेली हल करनी होती थी. असफलता का मतलब था, मौत. मार्क्स ने पूंजीवाद की मौत के लिए कोई पहेली तो गढ़ी नहीं है, लेकिन उस पहेली को हल किया है, जिसे जो  भी जान लेता है, उसे पूंजीवाद की मौत स्पष्ट दिखाई देने लगती है. चलिए हम उस पहेली को आपके सामने रखते हैं.

बड़े पूंजीपतियों ने विज्ञान और तकनीक की मदद से सुपर मुनाफा कमाना शुरू कर दिया. लेकिन देर सवेर वह छोटे पूंजीपतियों के पास पहुँच गयी. उन्हें उच्चतर तकनीक की आवश्यकता पड़ी. लेकिन जल्दी ही यह भी दूसरों के पास पहुँच गयी. इस क्रिया का परिणाम यह हुआ कि उत्पादन, बिना मजदूर के होने लगा. (हालाँकि, ऑटोमेटिड से ऑटोमेटिड मशीन के लिए व्यक्ति की आवश्यकता होगी, लेकिन इतना दिखाई दे ही रहा है कि मजदूरों की संख्या कम से कम की जा सकती है और उनके शोषण की दर में इंतिहा बढौतरी की जा सकती है जोकि की जा चुकी है और की जा रही है) अब पूंजीपति बिना मजदूर की मदद से (या उनकी न्यूनतम  संख्या से) उत्पादन कर रहे हैं. समस्या यह है कि,

पूंजीपति मंडी में जिंसों को बेचकर मुनाफा अर्जित करना चाहता है, लेकिन वहां  कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके पास क्रय करने के लिए धन हो, क्योंकि इसके लिए, धन तो मजदूरों के पास होना चाहिए था. लेकिन उन्हें कौन दे क्योंकि वे काम तो करते नहीं. मुट्ठीभर पूंजीपति और उनके पास विशाल उत्पादन ! हाँ वे स्वयं उपभोगता बनकर, एक दूसरे के उत्पादन का थोडा बहुत उपभोग कर सकते हैं, लेकिन यहाँ तो विज्ञान और तकनीक की मदद से चंद मजदूरों ने जो पैदा किया है, उसके लिए कम से कम आठ सौ करोड़ व्यक्तियों की आवश्यकता है और वे (पूंजीपति) हैं आठ करोड़. यही पूंजीवाद का संकट है, जो फूटता रहता है और उनके चाटुकार बुद्धिजीवी पूंजीपतियों को इसके अन्दर नहीं, बाहर अमूर्त चीजों में होने की ओर, इशारों द्वारा उन्हें भरमाते रहते हैं.

2008 से फूटी महामंदी वैसे ही  बरक़रार है और विकसित राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाएं डब्बल डिप्रेशन की और बढ़ रही हैं. भारत का मध्यम वर्ग खुश है कि यहाँ आठ प्रतिशत की विकास दर बनी हुई है (हालाँकि इस विकास से पैदा हुई भूख ने संकटों से घिरे नेपाल और पिछड़े पाकिस्तान को भी पीछे छोड़ दिए है – बकौल स्वतन्त्र एजेंसियों की ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार) लेकिन हमारे एक मिडिल क्लास बुद्धिजीवी इस विकास की दर से इतने आत्ममुग्ध हैं कि उनको विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का यह आकलन गलत लगता है कि यह दर केवल 2015 तक जारी रहने वाली है, उसके बाद धीमी गति से 2022 तक और बस उसके बाद तो घिसटेगा.

दिनेश भाई या उनकी ही तरह के मिडल क्लास के लोगों से हमारा आग्रह है कि मार्क्सवाद उनके लिए नहीं है क्योंकि मिडल क्लास चरित्र के लिहाज से बुर्जुआ विचारधारा की पैरोकार होती है, लेकिन बुर्जुआ वर्ग द्वारा पैदा की गयी होड़, उनकी छोटी सी पूंजी को हड़प कर लेती है, तो छटपटाता हुआ यह वर्ग, अपने कुछ रेडिकल प्रतिनिधियों द्वारा मार्क्सवाद से सहानुभूति की उम्मीद पाल लेता है.

इसके अलावा कुछ लोग अपनी उच्च बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी मार्क्सवाद की और खींचे चले आते हैं. ध्यान रहे, बौद्धिक क्षमता आसमान से पैदा नहीं होती, इसके ऐतिहासिक विकास, अध्ययन-चिंतन के लिए मेहनतकश वर्ग द्वारा मुहैया करवाई गयी अतिरिक्त मूल्य की लूट रही है. उनके ज्ञान और चिंतन का स्रोत भी श्रमिक वर्ग ही रहा है, जिसका कर्ज चुकाने की उनकी लालसा, उन्हें इधर खींच लाती है.

मगर मार्क्सवाद मिडल क्लास का नहीं, सर्वहारा वर्ग के कर्मों का विज्ञान है. इसका इतिहास कठमुल्लाओं का इतिहास नहीं है. अगर मिडल क्लास से आये लोगों ने,संजीदगी से, इसका चिन्तनं-मनन किया है तो वे निराश नहीं हुए हैं, बल्कि एक नए इन्सान के रूप में, उनका पुनर्जन्म ही हुआ है. स्वयं मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ इसके उदाहरण हैं. उन्होंने न केवल मजदूर वर्ग की मुक्ति के इस विज्ञान को अपनाया बल्कि मिडल क्लास के समाजवाद, नैतिकता और मूल्यों की गंदगी से इसकी हिफाजित के लिए संघर्ष किया.

दिनेश की समस्या यह है कि वे एक पैरे में मार्क्सवाद के इतिहास को समेट देना चाहते हैं. उनके इस पैरे की विषय-वस्तु को दो हिस्सों में  बांटा जा सकता है. एक मार्क्सवाद का समतावादी, गरीबी रहित सभी को अमीरी के ठाठ-बाठ मुहैया करवाने वाला ‘पंडोरा का डिब्बा’ और दूसरा इस पंडोरे के डिब्बे से निकला वह इतिहास जो रूस से शुरू होकर भारत के पश्चिम बंगाल और केरल तक का है. अंबानियों और टाटाओं के मुकाबले मिडल क्लास गरीब हो सकती और समाजवाद से सहानुभूति की उम्मीद पाल सकती है. फैशनेबुल तौर पर, मजदूर वर्ग के आंदोलनों के उभार के दौर में, वे धारा में खींचे चले आते हैं. यह ऐसे होते है जैसे आप अपने रिश्तेदार के घर जाएँ और उस घर के सदस्य अपने घर के निर्माण में व्यस्त हों. आपकी उनके घर से कोई दिलचस्पी न थी लेकिन उनके साथ आप भी खिंच लिए और लगे हाथ बंटाने. पर निर्माण कार्य पूरा होते ही, घरवाले घर में बसने लगे लेकिन आप फालतू करार दे दिए गए.

वैज्ञानिक समाजवाद सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद होता है जिसमें मिडल क्लास और उसके बुद्धिजीवियों के एक हिस्से को घुटन होने लगती है. अपने  वर्गीय दृष्टिकोण से पैदा हुए दिग्भ्रमण के कारण, उनका जल्दी ही मोहभंग हो जाता है. वे पुरानी  स्थिति को बहाल करने के लिए छटपटाने लगते हैं और कई बार उनकी कोशिश बुर्जुआजी की पुनर्बहाली के काम आती है, जैसा कि इतिहास में हुआ है.

फिर भी अगर दिनेश भाई जैसे लोग, संजीदगी से मार्क्सवाद को अपनाना चाहते हैं तो उन्हें इस ब्लॉग की और से सुझाव है कि वे मार्क्सवाद पर मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ आदि की रचनाये पढ़ें. इनसे उन्हें पता चलेगा कि कैसे मार्क्सवाद उन लोगों से जो गरीबी को इस तरह से मिटाकर… और सभी के लिए अमीरी की स्थिति की यूटोपिया बातें करते थे…टक्कर लेकर और विरोध में विकसित हुआ है. लाल झंडे का मतलब मार्क्सवाद नहीं होता. इसके इतिहास में वे सभी स्थितियां शामिल हैं जिन्हें संशोधनवाद, सिंडीकेट्वाद ,ट्रेड यूनियनवाद,अर्थवाद, मिडल क्लास का अवसरवाद,कम्युनिस्टों का उदारतावाद ,अतिवामपंथवाद , दुस्साहसवाद , दायें-बाएं भटकाव, सोवियत यूनियन और चीन की क्रांतियों के बाद हुए तीक्ष्ण वर्ग-संघर्ष और परिणामस्वरूप मजदूर वर्ग की लाल झंडे तले बुर्जुआ वर्ग से शिकस्त और समाजवाद (जिसके बारे में मिडल क्लास सोचती है कि यह कोई उनके चौखटे के अनुसार कोई पकी-पकाई स्थायी चीज हो, जिसकी कोई समस्या न हो) और इस समाजवाद से साम्यवाद में संक्रमण और सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद वगैरा, वगैरा. अगर आप को यह सब भारी-भारी लगता है, तो मुआफ कीजियेगा, यह सब आपके लिए नहीं है.

हम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजदूर वर्ग के संघर्षों की बदौलत बदली स्थितियों, विशेषरूप से, सोवियत यूनियन और चीन की क्रांतियों की प्राप्तियों और उनकी हार को स्वीकार करते हैं. सर्वहारा वर्ग द्वारा विकसित किये गए उसके नेताओं और बदले में इन नेताओं द्वारा सर्वहारा वर्ग की सेवा को तस्लीम करते हैं, भले ही, इन नेताओं द्वारा ऐसी गलतियाँ भी हुई हैं  जिनसे बचा जा सकता था. लेकिन उनकी गलतियाँ समाज विज्ञानियों की गलतियाँ थी जिनका होना स्वभाविक होता है लेकिन दोहराना बेवकूफी. जीत-हार की इस अमीर विरासत का मालिक सर्वहारा वर्ग है जो अच्छी तरह जनता है कि उसने इसका कैसे समाहार करना है.

हम साफ़ साफ़ बता देना चाहते हैं कि इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी से पूर्णतया भिन्न है. विश्व के पिछड़े से पिछड़े हिस्से में भी तत्व रूप से सामंतवाद गायब है और वह पूंजीवाद के पैंतरे के अनुसार गतिमान है. भारत के आदिवासी बहुल और पिछड़े अफगानिस्तान जैसे क्षेत्रों का वास्ता जागीरदारों से नहीं देशी-विदेशी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से है. विज्ञान और तकनीक के विकास में पूंजीवादी संबंध बेड़ियाँ बन गए हैं. उच्च वैज्ञानिक तकनीक के विकास ने सर्वहारा वर्ग की उत्पादन क्षमता में इंतहा बढौतरी की, लेकिन बुर्जुआजी ने श्रम सघनता को लागू किया है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, 1970 के दशक के बाद, पूंजीपतियों के पास एकत्रित होने वाली वित्तीय पूंजी की मात्रा में भी इंतहा बढौतरी हुई है, जिसके उत्पादन कार्य में लगने की संभावना निशेष हो चुकी है. लेकिन श्रमिक वर्ग की, इसके बिलकुल उल्ट, आमदनी में गिरावट आई है. पूंजीपतियों की समस्या यह है कि उनको उनकी  महत्त्वाकांक्षानुसार उपभोगता वर्ग नहीं मिल पा रहा. मिलेगा भी कैसे क्योंकि श्रमिक वर्ग द्वारा पैदा किये मूल्य का अधिकतर हिस्सा तो पूंजीपति वर्ग की जेब में सट्टेबाजी और जुआरी-जुगाड़ों में मशगूल है. हम राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों की नहीं, नयी समाजवादी क्रांतियों की पूर्वबेला में जी रहे हैं.

और अंत में मिडल क्लास के नौजवानों से  : आपके आदर्श अमेरिका और यूरोप ने तस्लीम कर लिया है कि नवउदारीकरण उनकी बेवकूफी थी. लेकिन हमारा मानना है कि यह सब नाटक है. नवउदारीकरण का अर्थ था कि पूंजीवादी खुल्ले मुकाबले में श्रमिक-वर्ग की रगों से खून के अंतिम कतरे को निचोड़ लेना. लेकिन पूंजीवाद के आन्तरिक विरोधाभास होते है, जिन्हें उनके बुद्धिजीवी बाहर तलाशते रहते हैं और मुसीबत पड़ने पर राज्य जो उनका सच्चा सेवादार है, से लोगों की बचतों पर डाका डालने के लिए, बैलआउट मांगते हुए बिलकुल नहीं शर्माते. उनकी खुले मुकाबले की श्रेष्टता का भंडाफोड़ हो जाता है.

भारत जैसी ही चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका आदि अर्थव्यवस्थाओं के में जी रहे  मिडल क्लास के गगनविहारियों के पास 2022 तक ऊँची उड़ान भरने का मौका है. हालाँकि उनके अधिकतर हिस्से को सर्वहारा वर्ग में तब्दील होते हुए देखा जा सकेगा. हमारी इस पीड़ा से लुत्फ़ उठाने का कोई मंशा नहीं है लेकिन आपसे प्रार्थना है कि आप चीजों को गति में देखने की आदत डालें. मार्क्सवाद वैसा सुहावना नहीं है, जिसका जिक्र दिनेश जी ने किया है. बल्कि इसके विपरीत कहीं अधिक पीड़ादायक है. लेकिन ये शब्द ‘सुहावना’ और ‘पीड़ादायक’ रिलेटिव हैं. इनके अर्थ बुर्जुआ वर्ग, मिडल क्लास और सर्वहारा के लिए न केवल अलग-अलग होते हैं बल्कि कई अवस्थाओं में विपरीत भी होते हैं.

प्रकृति और जीवन प्रशिक्षण का इतिहास

Posted on Updated on

कड़ी जोड़ने के लिए देखें : .

प्रकृति और जीवन पद्धति

जिस प्रकार लोग पृथ्वी पर फैलते गए उसी प्रकार पृथ्वी के साथ मानव के संबंधों की बहुत परिष्कृत व्यवस्था बनती गयी. विख्यात नवजाति विज्ञानी लेविन और चेबोक्सारोव  के सुझाव अनुसार इन व्यवस्थाओं को जीवन-यापन या जीवन निर्वाह की संस्कृति कहना चाहिए. इसकी परिभाषा उन्होंने इस प्रकार दी है,

“किसी ठोस प्राकृतिक परस्थितियों में बसे जनगण के सामाजिक-आर्थिक विकास के निश्चित स्तर पर उनके जीवन निर्वाह और संस्कृति की जो विशेषताएँ उस जनगण के लिए लाक्षणिक होती हैं, उन विशेषताओं को ऐतिहासिक तौर पर अस्तित्व में आई समग्रता के जीवन-निर्वाह की संस्कृति-प्रारूप कहा जाता है. निश्चित भूगोलिक परस्थितियों से जुड़े जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूपों की धारणा विज्ञान के लिए बहुत लाभप्रद सिद्ध हुई हैं. इसके परिणामस्वरूप जनगण की संस्कृति में समानताओं और विभिन्नताओं के अनेक प्रश्नों के उत्तरों की खोज संभव हुई.हैं.”

लेविन और चेबोक्सारोव इसी बात पर जोर देते हैं. उन्होंने अपने प्रस्तावित रूपों को मात्र जीवन-यापन प्रारूप ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक जीवन-यापन प्रारूप कहा है. ऐसा कहना अकारण नहीं है. बात यह है कि जीवन-यापन संबंधी कार्यकलापों की दिशा और भूगोलिक परिवेश बहुत हद तक जनगण की भौतिक संस्कृति की विशेषता – पद्धतियों और आवासों के प्रारूप, परिवहन साधन, भोजन और गृह-गृहस्ती का सामान, वेशभूषा आदि निर्धारित करते हैं. नवजाति विज्ञानिकों ने विश्व में कई दर्जन जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूपों की गणना की है. इनकी सही सही गिनती बताना कठिन है क्योंकि अलग-अलग विज्ञानी अपने सिद्धांतों के लिए अलग-अलग वर्गीकरण का वैज्ञानिक आधार तैयार करते हैं. इसलिए भिन्न-भिन्न प्रकार के आंकडों की प्रस्तुति होती है. लोग कहाँ-कहाँ नहीं रहते ? उत्तरी ध्रुव प्रदेश में और उष्ण कटिबद्ध में, तिब्बत के पर्वतों में और एशिया , ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के रेगिस्तानों में! संसार के कोने-कोने में लोग बसे हुए हैं. कडाके की ठण्ड और झुलसा देने वाली गर्मी में भी! खतरनाक हिंसक जानवरों के बावजूद वे हर जगह रहने में सफल हुए हैं क्योंकि वे वहां की भूगोलिक परस्थितियों के अनुरूप संस्कृति या दूसरी प्रकृति का निर्माण करने में सफल हुए हैं.

एस्किमो लोगों के जीवन को लें. उनका जीवन कितना कठिन हैं. वहां ऐसा कुछ नहीं है कि वहां बहुत ज्यादा वनस्पति हो या उनके लिए बहुत ज्यादा वृक्षों या खाने-पीने का चुनाव करने की सहूलियत हो. उनका प्राकृतिक क्षेत्र अनेक महीनों की सर्दी और कई महीने लंबी रात – छः महीनों की रात और कहीं-कहीं तो आठ से दस महीनों की भी रात है. चारों तरफ बर्फ ही बर्फ ! निसंदेह कनाडा के प्रसिद्ध  नवजाति विज्ञानी और अनुसंधानकर्त्ता फारली मोइक का यह कहना दरुस्त है कि उत्तरी ध्रुव प्रदेश बर्फ द्वारा जमीं हुई नदियों और हिमकवच से जकड़ी हुई झीलों का ही नहीं बल्कि सजीव नदियों का भी जगत है जहाँ गर्मियों में नीला गगन झांकता है, जहाँ तटों पर फूलों का कालीन बिछता है और जहाँ पर हरी-भरी विशाल चरागाहें भी हैं. उत्तर ध्रुव प्रदेश एक विशाल भूखंड है जहाँ जबरदस्त गर्मी भी होती और भयानक ठण्ड भी. यहाँ लोग शिकारी और मछली पकड़ने वाले बनकर ही अपने अस्तित्व को बनाये रख सकते थे.

उपरोक्त जानकारी हासिल करने से  हमारा आशय क्या है? हमें बताया जाता है कि मूलरूप से हम शाकाहारी हैं. हमें फलां खुराक खाने और फलां खुराक न खाने के सुझाव दिए जाते हैं. हमें बताया जाता है कि फलां खुराक ही हमारे लिए परमात्मा द्वारा निर्धारित की गयी है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. जब तक मनुष्य स्वयं उत्पादन की क्रिया में शामिल नहीं  हुआ तब तक उसे  अपनी खुराक के लिए उस इलाके की परस्थितियों और उपलब्धता पर निर्भर रहना पड़ता था.

उत्तरी ध्रुव के मूल निवासी तरह-तरह के मकान बनाते थे. कुछ जनजातियाँ उत्तरी अमेरिका के तटों पर तहखाने रुपी मकान बनाते थे. जमीन में गढा खोदकर पत्थर की दीवारें खड़ी की जाती थीं जो जमीन से थोडी ऊपर की ओर उभरी होती थीं. इन्हें छत से ढांप दिया जाता था. मकान के अन्दर पहुँचने के लिए गहरी सुरंगों से होते हुए जाया जा सकता था. इन सुरंगों की दीवारें भी पत्थरों की बनी होती थीं जिनके ऊपर भी पत्थरों के छत होती थीं. अलास्का में इस प्रकार के मकानों में पत्थर के स्थान पर लकड़ी के तख्ते इस्तेमाल किये जाते थे. बहुत ही संकरी सुरंग द्वारा इसके अंदर प्रवेश किया जा सकता था. ऐसा दुश्मनों और जंगली जानवरों से बचाव हेतू किया जाता था. लेकिन अगर न पत्थर हो और न ही लकड़ी, तब क्या किया जाये? इस स्थिति में लोग मकान बनाने हेतू बर्फ का प्रयोग करते थे. आज भी ग्रीनलैंड के मैदानों में एस्किमों लोग अपने प्रसिद्ध मकान इग्लू बनाने के लिए बर्फ का प्रयोग करते हैं. एस्किमों राज-मिस्त्रियों की मुहारत हैरानकुन है. बर्फ की सीलियों को काटकर  इस प्रकार रखा जाता है कि एक गोल गुबंद खडा हो जाता है. इन बर्फ की दीवारों को मजबूत करने के लिए इस गुबंद के अन्दर एक दिया जो सील मछली की चर्बी से जल रहा होता है, ले जाया जाता है. इसकी गर्मी से बर्फ की दीवारों की अन्दर की ओर की कुछ बर्फ पिघल जाती है और दीवारों से थोडा-थोडा पानी सरकाना शुरू हो जाता है. इसके बाद ठंडी हवा को अन्दर प्रवेश करने दिया जाता है जिससे यह पानी जम जाता है और सीलियाँ आपस में मजबूती से जुड़ जाती हैं और इनके बीच का खालीपन ख़त्म हो जाता है. इसके पश्चात कुछ ही घंटों और दिनों में इग्लू की दीवारें बहुत मजबूत हो जाती हैं क्योंकि इनपर बर्फ का जमना जारी रहता है. इग्लू में प्रवेश करने का ढंग बहुत अजीब है. यह अकेला ऐसा मकान है जिसमें बर्फ की ही बनी हुई लम्बी सुरंग द्वारा फर्श से (दीवार में दरवाजा नहीं रखा जाता) प्रवेश किया जाता है.

संसार के दूसरे मकानों के मुकाबले इग्लू को आरामदायक कतई नहीं कहा जा सकता. इसकी ऊंचाई लगभग दो मीटर और व्यास तीन-चार मीटर होता है. इस थोडी सी जगह में भी दो परिवार रहते हैं. अगर चाहें तो इग्लू को बड़ा भी बनाया जा सकता है. अपनी सभाए आयोजित करने के लिए एस्किमों लोग बारह-बारह मीटर व्यास के इग्लू भी बनाते हैं. वहां मकान सामग्री बर्फ है जिसकी कोई कमीं नहीं है. लेकिन समस्या यह है कि मकान को गरमाने के लिए सील की चर्बी के दीये और मानवी शरीर से निकलने वाली गर्मी की आवश्यकता होती है. इसलिए स्वाभाविक है कि मकान जितना छोटा होगा उतना गर्म भी आसानी से होगा. इसमें गर्मी में भी रहा जा सकता है. यह सर्दी से ही नहीं गर्मी से भी बचाव करता है. वैसे तो उत्तरी ध्रुव प्रदेश में गर्मी की ऋतु बहुत छोटी होती है और गर्मीं की इस ऋतू में भी वहां कोई विशेष गर्मीं नहीं होती. गर्मियों में इग्लू में प्रवेश करने के लिए फर्श के साथ दीवार में सुराख़ किया जाता है. बर्फ की दीवारें रोशनी को अन्दर जाने देती हैं. इसमें खिड़कियाँ भी रखी जा सकती हैं. दीवारों में सुराख़ किया जाता है और बर्फ की पतली और पारदर्शक पर्त लगा दी जाती है. आमतौर पर ऐसा किया भी जाता है. ऐसा लगता है कि यूरोप के मकानों की बनवाट के बारे में जानकारी होने के पश्चात एस्किमों लोगों ने इस प्रकार की खिड़कियाँ लगाने के प्रयोग करने शुरू कर दिए थे. पहले ऐसा नहीं था.

सदियों पहले इग्लू किस प्रकार के रहे होंगे, यह कोई भी नहीं बता सकता. इन मकानों की आयु ज्यादा लंबी नहीं होती. इसलिए इन मकानों की खोज पुरातत्वविदों को निराश ही करती है. हाँ, हम इतना जरूर जानते हैं कि इग्लू में बसने वाले लोगों की सभ्यता के तत्त्व मौजूद हैं. यहाँ खिड़कियों में समुद्री जीवों की पारदर्शक अंतड़ियों का प्रयोग किया जाता था. घर के अन्दर चारों तरफ समूर वाले जानवरों की खालें टंगी होती थीं. परंतु यहाँ भी ग्रीनलैंड की भांति सारा फर्नीचर बर्फ का ही होता था जो चमड़े और समूर से ढंका होता था. सारा फर्नीचर बर्फ के बेंचों के रूप में होता था जिनपर लोग बैठते, खाना खाते और आराम करते थे. वैसे औजारों और हथियारों के लिए इग्लू की काख में बर्फ की छोटी-छोटी कोठियां भी बनाई जाती थीं.  जमीन में गढा खोदकर उसमें खाने-पीने की वस्तुएं भी रखी जाती थीं. बेरन जलडमरू के मध्य तटों पर रहनेवाले एलउत लोग व्हेल मछली की पसलियों को जमीन में गाड़कर और उनपर सुखी घास बिछाकर घर बनाते थे. बाद में व्हेल मछलियों की हड्डियों के स्थान पर समुद्र में आनेवाले वृक्षों के तनों का प्रयोग होने लगा. ये मकान ग्रीनलैंड के इग्लू मकानों से कहीं अधिक बड़े होते थे. इन मकानों का क्षेत्रफल सौ वर्ग मीटर से भी अधिक हो सकता था. पर बड़े मकानों में लोग और भी अधिक तंगी का शिकार होते थे. इस प्रकार के मकानों में लगभग पचास परिवार अपने-अपने रहने का हिस्सा टाट द्वारा बाँट लेते थे.

उपरोक्त सभी कौमें उस जीवन-यापन सांस्कृतिक प्रारूप का उदाहरण हैं जिसमे प्राकृतिक संपत्ति को मात्र हस्तगत किया जाता है. यहाँ कोई उत्पादन नहीं किया जाता. यह भी उस उपकरण की प्रतिनिधि है जिसको समुद्री जीवों के उत्तर ध्रुवीय शिकारी कहा जाता है. एस्किमों, तिप्ता, एलउत आदि का शिकार बहुत विभिन्नता लिए हुए नहीं है. व्हेल, सील, वालरस, सफ़ेद रींछ आदि का ही शिकार किया जाता है. इनका शिकार आसानी से किया जा सकता है क्योंकि एक या दो प्रकार के जीवों के शिकार के लिए बहुत अधिक मुहारत की आवश्यकता नहीं पड़ती. पत्थर, हड्डी, व्हेल के बालों और समुद्र में बहकर आनेवाली लकड़ी से कई तरह के औजार – लड़ाई के और गृह-गृहस्ती में काम आनेवाले  – बनाये जाते थे. लकड़ी के ढांचे और खालों को तानकर बनायीं गयी इनकी नावें हलकी फुलकी होती थीं. व्हेल के शिकार के लिए एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश जाने के लिए बनी इन नोकाओं में एक सौ से भी अधिक व्यक्ति बैठ सकते थे.

उत्तर ध्रुवीय निवासी लोगों के वस्त्र गर्म और आरामदायक होते थे. अन्तरिक्ष में जानेवाले लोगों के वस्त्र इन्हीं लोगों के वस्त्रों की नक़ल अनुसार बने हुए हैं. यूरोपीय लोगों का कोट पैंट भी किसी हद तक इन लोगों के वस्त्रों के आधार पर बनाया गया है. उत्तर ध्रुवीय प्रदेश और शीतोष्ण और उष्ण कटिबद्ध प्रदेश , जहाँ-जहाँ पर लोगों ने ख़ास किस्म का शिकार अपना लिया – फंदे, जाल, धनुष और बर्छिया बना ली और बंजारे  शिकारी और कंदमूल इकठ्ठा करनेवालों के स्थान पर लम्बे समय के लिए रहने के लिए बस्तियों का निर्माण कर लिया गया – वे वहां के स्थाई निवासी बन गए और उन्होंने औजारों और आहार के भण्डारण के तरीकों को खोज निकला. दूसरे शब्दों में, जहाँ हस्तगतकरण पर आधारित जीवन पद्धति ने उत्तम रूप धारण कर लिया वहां बहुविधि-भौतिक-आत्मिक संस्कृति का निर्माण हुआ और जटिल संरचनाएं प्रकट हो गयीं.

हस्तगतकरण से उत्पादन की ओर – अगली किश्त में

दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाए बिना सांस्कृतिक मोर्चे पर सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन के कार्यभारों को पूरा कर पाना सम्भव नहीं होगा। दलित-मुक्ति के प्रश्न की उपेक्षा करके सर्वहारा क्रान्ति या जन-मुक्ति की परियोजना के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। सहशताब्दियों से सर्वाधिक व्यवस्थित और सर्वाधिक बर्बर शोषण-दमन के शिकार दलित देश की कुल आबादी में लगभग तीस प्रतिशत हैं और उनमें से 90 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की कतारों में शामिल हैं। यह आबादी यदि सम्पूर्ण जनता की मुक्ति और स्वतंत्रता-समानता की वास्तविक स्थापना की परियोजना के रूप में सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति को स्वीकार नहीं करेगी तो उसकी विजय असम्भव है। दूसरी ओर, समाजवादी क्रान्ति परियोजना से जुड़े बिना दलित-मुक्ति का प्रश्न भी असमाधानित ही बना रहेगा (क्योंकि पूँजीवादी दायरे के भीतर सुधार की सम्भावनाएँ अब समाप्तप्राय हैं) तथा समाजवादी क्रान्ति को लगातार चलाए बिना समाज को उस मुकाम तक पहुँचाया ही नहीं जा सकता जब जाति और धर्म के आधार पर किसी भी तरह का अन्तर बचा ही नहीं रह जाएगा।

इस प्रश्न की द्वन्द्वात्मक समझ की कमी के अभाव में अतीत में कम्युनिस्ट आन्दोलन और वाम जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन में वर्ग-अपचयनवाद (class-reductionism) का विचलन गम्भीर रूप में मौजूद था। आज इसी विचलन का दूसरा छोर वर्ग-विसर्जनवाद (class-liquidationism) या वर्ग-निषेधवाद के रूप में मौजूद है जब इस हद तक के फतवे दिए जा रहे हैं कि वर्ग-विश्लेषण की क्लासिकी मार्क्सवादी पद्धति से भारतीय जाति-व्यवस्था का विश्लेषण ही सम्भव नहीं है। दलित मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के “दलितवादी” चिन्तन के प्रति निहायत अनालोचनात्मक, आत्मसमर्पणकारी, समन्वयवादी रवैया अपनाया जा रहा है। यह एक घातक विसर्जनवादी, सुधारवादी प्रवृत्ति है जिसका आज खूब बोलबाला है। आज हिन्दी में जो दलित-लेखन हो रहा है, वह पक्षधर साहित्य है, प्रतिरोध का साहित्य है, रैडिकल आलोचनात्मक यथार्थवादी साहित्य है। लेकिन यह सच है कि यह सम्पूर्ण दलित आबादी के बजाय, मुख्यत: उस मध्यवर्गीय दलित का प्रातिनिधिक स्वर है, जिसका आर्थिक प्रश्न तो एक हद तक हल हो चुका है और अब सामाजिक अपमान व भेदभाव ही जिसके लिए केन्द्रीय प्रश्न है। इसीलिए समकालीन दलित लेखन का तेवर चाहे जितना तीखा हो, वह ठोस विकल्प के रूप में इसी व्यवस्था के भीतर कुछ सुधारों की माँग करता है, दलित-प्रश्न की समूल समाप्ति की कोई परियोजना नहीं प्रस्तुत करता तथा क्रान्ति के नाम से बिदकता है। यह अनायास नहीं कि जिन आन्दोलनों-संघर्षों में दलित आबादी की बहुतायत होती है या जो आन्दोलन गाँवों में दलित उत्पीड़न के ही किसी मुद्दे पर होते हैं उनसे यह दलित `भद्रलोक´ कोसों दूर रहता है। दलित साहित्य चूँकि अम्बेडकरवाद को ही अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त मानता है, अत: दलित अस्मिता की पहचान और उनके प्रतिरोध-आन्दोलन को संगठित करने में डा. अम्बेडकर की ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार करते हुए भी यह ज़रूरी है कि उनके विचारों की विस्तृत, तर्क और तथ्यपूर्ण विवेचना की जाए। प्रश्न यह है कि अम्बेडकर की दार्शनिक विश्वदृष्टि क्या थी? उनके मूलभूत राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचार क्या थे? दलित हितों के अर्जन और हिफाजित के अन्तरिम प्रावधानों और प्रतिरोध आन्दोलन के प्रोग्राम के साथ ही क्या डा. अम्बेडकर के पास दलित-प्रश्न के सम्पूर्ण और अन्तिम समाधान की कोई दूरगामी सांगोपांग परियोजना थी? ब्राह्मणवाद और जाति प्रश्न का `एक्सपोज़र´, विश्लेषण और भर्त्सना ज़रूरी है, लेकिन लगातार, लम्बे समय तक यहीं रुके रहना और इसे ही दलित आन्दोलन का पूरा प्रोग्राम बना देना कहाँ तक उचित है?

हम समझते हैं कि सामाजिक बदलाव एक वैज्ञानिक प्रश्न है और विज्ञान के प्रश्न निस्संकोच, बेलागलपेट बहस की माँग करते हैं। दलित-प्रश्न को लेकर मार्क्सवाद पर अधूरेपन का लेबल मात्र लगाने के बजाय इस पर मुद्देवार, विस्तृत बहस होनी चाहिए, अम्बेडकर के विचारों और दलित आन्दोलन के इतिहास पर भी बहस होनी चाहिए तथा दलित प्रश्न के वर्ग-विश्लेषण के साथ-साथ समकालीन दलित साहित्य को भी विश्लेषण के एजेण्डे पर लाया जाना चाहिए। तर्क-विचारहीन दलित-हित समर्थन का शोरगुल आज दलित प्रश्न पर सही कार्यदिशा अपनाने में गम्भीर विघ्न पैदा कर रहा है।

स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

समाजशास्त्रीय विमर्श की ही भाँति कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी आज बुर्जुआ नारीवाद के विविध नये-नये रूपों और किस्मों का खूब बोलबाला है। नववामपन्थी “मुक्त चिन्तक” स्त्री-प्रश्न पर क्लासिकी मार्क्सवाद के “अधूरेपन” और “यांत्रिकता” को स्वीकारते हुए बुर्जुआ नारीवादियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हैं।

एक गहरे वैचारिक कुचक्र के तहत सर्वहारा क्रान्ति और पार्टी-सिद्धान्त को पुरुष स्वामित्ववाद और स्त्री-उत्पीड़न के तत्त्वों से युक्त बताया जा रहा है और स्त्री-आन्दोलन की स्वायत्तता की वकालत करते हुए आधी आबादी को जन-मुक्ति-संघर्ष की ऐतिहासिक परियोजना से काटकर अलग करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। बुर्जुआ नारीवाद की सभी किस्में उन उच्च-मध्यवर्गीय स्त्रियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनका `स्वर्ग´ इसी व्यवस्था में सुरक्षित है। वे पुरुष-वर्चस्ववाद का विरोध तो करना चाहती हैं, लेकिन इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना में जमी उसकी जड़ों को नहीं देख पातीं क्योंकि इस व्यवस्था के वर्ग-उत्पीड़क चरित्र से उन्हें कोई शिकायत नहीं। एन.जी.ओ. प्रायोजित नारीवादियों का एक हिस्सा स्त्रियों, दलितों, विस्थापितों के उत्पीड़न और पर्यावरण के प्रश्न पर अलग-अलग जनसंघर्षों की हिमायत करता है लेकिन इन सबको एक ही मुक्ति-परियोजना के अभिन्न अंगों के रूप में नहीं देखता और विचारधारा और राजनीति के प्राधिकार को स्वीकार नहीं करता। यह अराजकतावाद और संघाधिपत्यवाद (syndicalism) का ही एक नया रूप है। भारत में तीव्र पूँजीवादीकरण से हुए मध्यवर्ग के विस्तार और बुर्जुआ संस्कृति के आच्छादनकारी प्रभाव ने बुर्जुआ नारीवाद के सामाजिक आधार को व्यापक बनाया है। सर्वहारा क्रान्तियों की विफलता से पैदा हुए परिवेश और बुर्जुआ वैचारिक-सांस्कृतिक प्रचार के प्रभाव में, निम्न-मध्यवर्गीय शिक्षित युवा स्त्रियों का एक बहुत बड़ा रैडिकल हिस्सा भी व्यापक मेहनतकश आबादी और आम मेहनतकश स्त्रियों के संघर्षों से जुड़ने के बजाय फिलहाल बुर्जुआ नारीवादी लहर के साथ बह रहा है। साहित्य-कला-संस्कृति की दुनिया में जारी स्त्री-विमर्श में पुरुष-वर्चस्ववाद के प्रश्न को एक समाज-निरपेक्ष, स्वायत्त प्रश्न के रूप में ही प्रस्तुत किया जा रहा है। स्त्री-मुक्ति के किसी व्यावहारिक सुदीर्घ कार्यक्रम के बिना सिर्फ़ गर्मागर्म लफ्फजी का अविराम सिलसिला जारी है। रचनात्मक लेखन का भी परिदृश्य हूबहू ऐसा ही है।

इस बेहद ज़रूरी और बुनियादी सवाल पर पुरज़ोर हस्तक्षेप की ज़रूरत है। नारीवादी विचारों और नारीवादी रचनाओं की सुव्यवस्थित आलोचना और मीमांसा प्रस्तुत की जानी चाहिए। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मार्क्सवाद स्त्री-प्रश्न को हल करने का कोई मॉडल या बना-बनाया फार्मूला नहीं प्रस्तुत करता बल्कि स्त्री की पराधीनता के इतिहास और आधारभूत कारणों की पड़ताल करता है तथा वर्गों के उन्मूलन की सुदीर्घ ऐतिहासिक परियोजना के एक अंग के तौर पर स्त्री-उत्पीड़न की समाप्ति की भी तर्कसम्मत सोच उसी प्रकार प्रस्तुत करता है जिस प्रकार मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण-उत्पीड़न के हर रूप के उन्मूलन की भविष्यवाणी करता है। आम स्त्रियों के बीच यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा क्रान्ति की तैयारी के प्रारम्भ-बिन्दु से ही स्त्री-प्रश्न उसके एजेण्डे पर अनिवार्यत: उपस्थित रहेगा, लेकिन स्त्री-पुरुष असमानता के भौतिक-ऐतिहासिक आधारों के नष्ट होने के बाद भी यौन-भेद और पुरुष-वर्चस्व की सहशताब्दियों पुरानी संस्कृति समाज में एक लम्बे समय तक मौजूद रहेगी और सतत् सांस्कृतिक क्रान्तियों की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही उसका निर्मूलन सम्भव हो सकेगा। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि स्त्री-मुक्ति की तमाम बुर्जुआ नारीवादी अवधारणाएँ इस प्रश्न के सम्पूर्ण हल की कोई दिशा नहीं बतलातीं, क्योंकि वे खुशहाल मध्यवर्गीय स्त्रियों से नीचे की स्त्रियों को सम्बोधित नहीं होतीं। साथ ही, मार्क्सवाद के नाम पर, स्त्री-प्रश्न पर प्रस्तुत की जाने वाली वर्ग-अपचयनवादी अवस्थिति की भी प्रखर आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

भारत में यह नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक अनिवार्यत: आधारभूत कार्यभार है कि व्यापक जनसमुदाय के बीच अन्धविश्वास, धार्मिक कुरीतियों, मध्ययुगीन निरंकुशता, नई बुर्जुआ निरंकुशता और धार्मिक मूलतत्त्ववादी फासीवादी विचारों से निरन्तर सिंचित-पोषित स्त्री-उत्पीड़न और पुरुष-वर्चस्व के तमाम रूपों के विरुद्ध एक रैडिकल सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार आन्दोलन की उद्वेलनकारी लहर पैदा की जाए। इसके बाद ही सामाजिक-राजनीतिक सरगर्मियों में आधी आबादी की पहलकदमी और भागीदारी बढ़ाने के प्रयास सार्थक और प्रभावी हो सकते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा के राजनीतिक और सांस्कृतिक हरावल अपने निजी आचरण-व्यवहार से यह सिद्ध करें कि वे दोहरे-दुरंगे लोग नहीं, बल्कि स्त्री-मुक्ति के सच्चे-सक्रिय पक्षधर हैं। समाज और व्यावहारिक स्थितियों की दुहाई देकर, निजी और पारिवारिक जीवन में पुरुष-वर्चस्ववादी आचरण करने वाले (जैसे घरेलू गुलामी को प्रश्रय देने वाले, दहेज व जाति-धर्म आधारित विवाहों को स्वीकार करने वाले, स्त्री-विरोधी सामाजिक आचारों को व्यावहारिकता की दुहाई देकर स्वीकारने वाले, अपने परिवार में प्रेम-विवाह जैसी चीज़ों का प्रत्यक्ष-परोक्ष विरोध करने वाले, आदि-आदि) पाखण्डी-कायर-धूर्त मध्यवर्गीय प्रगतिशीलों और संशोधनवादी कम्युनिस्टों ने स्त्री-समुदाय को सर्वहारा क्रान्ति के प्रवाह से काटकर अलग करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। अत: इस प्रश्न पर सांस्कृतिक आन्दोलन की शुरुआत हमें अपने निजी जीवन और आचरण से करनी होगी।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34) की हिफाजित में

Posted on Updated on

“कोट, कपड़ा, आदि उपयोग-मूल्य, अर्थात पण्यों के ढांचे, दो तत्त्वों के योग होते हैं – पदार्थ और श्रम के. उन पर जो उपयोगी श्रम खर्च किया गया है, यदि आप उसे अलग कर दें, तो एक ऐसा भौतिक आधार-तत्त्व हमेशा बचा रहेगा, जो बिना मनुष्य की सहायता के प्रकृति से मिलता है. मनुष्य केवल प्रकृति की तरह काम कर सकता है, अर्थात वह भी केवल पदार्थ का रूप बदलकर ही काम कर सकता है. यही नहीं रूप बदलने के इस काम में उसे प्रकृति की शक्तियों से बराबर मदद मिलती है. इस प्रकार हम देखते हैं कि अकेला श्रम भौतिक संपत्ति का, अथवा श्रम के पैदा किये हुए, उपयोग-मूल्यों का एकमात्र स्रोत नहीं है जैसा कि विलियम पैटी ने कहा है, श्रम उसका बाप है और पृथ्वी उसकी माँ है. (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

“विश्व की सभी परिघटनाएं , चाहे वे मनुष्य के हाथ का फल हों अथवा प्रकृति के सार्विक नियमों का परिणाम, वास्तव में सृजन नहीं बल्कि पदार्थ के रूपों में परिवर्तन है. मानव बुद्धि जब कभी उत्पादन के विचार का विश्लेषण करती है, तो उसे केवल दो ही तत्त्व दिखाई पड़ते हैं – एक जोड़ना, दूसरा तोड़ना; यही बात मूल्य ” (उपयोग-मूल्य, हालाँकि फिजियोक्रेटों के साथ वाद-विवाद के इस अंश में वेर्री के मन में भी यह बात पूरी तरह साफ़ नहीं है कि वह किस प्रकार के मूल्य की चर्चा कर रहा है) “अथवा धन के उत्पादन के संबंध में भी लोगू होती है, जब मनुष्य द्वारा पृथ्वी, वायू, और जल को अनाज में रूपांतरित कर दिया जाता है, या एक कीड़े के चेपदार स्त्राव को रेशम में, या धातु  के अलग-अलग टुकडों को एक घड़ी में बदल दिया जाता है.” _Pietro Verri, Meditazioni sulla Economia Politica (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

श्रम और पण्य-मूल्य दोनों का चरित्र दुहरा है लेकिन हम यहाँ पण्य-मूल्य के दुहरे चरित्र के सामान्य विश्लेषण तक सीमित  रहेंगे. पण्य-मूल्य के दोहरे चरित्र में पहली विशेषता उसके उपयोग मूल्य से है जैसे पानी, धुप, वायू, आदि. ये सभी धन का एक रूप हैं लेकिन ये पण्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि इसमें मानवी श्रम नहीं लगा है और इन्हें हासिल करने के लिए भुगतान के किसी भी रूप की आवश्यकता नहीं पड़ती.

पण्य की दूसरी विशेषता उसमें लगे मानवीय श्रम से सम्बंधित है जिस कारण उसका विनिमय मूल्य होता है.

अरस्तू का हवाला देते हुए मार्क्स लिखते हैं.”अरस्तू कहते हैं कि विनिमय समानता के बिना नहीं हो सकता, और समानता उस वक्त तक नहीं हो सकती, जब तक की दोनों वस्तुएं एक ही मापदंड से न मापी जा सकती हों.” “लेकिन यहाँ आकर वे (अरस्तू) ठहर जाते हैं और मूल्य के रूप का आगे विश्लेषण करना बंद कर देते हैं.

मार्क्स आगे लिखते हैं ,” अरस्तू की प्रतिभा का चमत्कार इसी बात में प्रकट होता है कि उन्होंने पण्यों के मूल्यों के अभिव्यक्ति में समानता का सम्बन्ध देखा. वह जिस समाज (गुलाम और मालिक-गुलाम) में रहते थे, केवल उसकी विशेष परिस्थितियों ने ही उन्हें यह पता नहीं लगाने दिया कि इस समानता की तह में ‘सचमुच” क्या था.(मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. 79)

“महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” सूत जी [इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34)] द्वारा पांडे जी के  इस कथन की स्वीकृति के  साथ हम भी सहमत हैं लेकिन यह भी जोड़ देना चाहते हैं कि यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” गति में होने के कारण हमेशा बना नहीं रह सकता क्योंकि पांडे जी के परदादा जो  कुरता पहना करते थे वह बामुश्किल दस या पंद्रह लोगों की श्रम का फल था और अंत में जिसके पास इसे बेचने का अधिकार (अगर था तो ) वह  दस या पंद्रह पर एक  का ही था. लेकिन आज इन्होने जिस 100 रूपए की शर्ट को पहना हुआ है उस पर लगी हुई श्रम, अगर हम कहें कि, विश्व के सौ करोड़ लोगों की श्रम है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

पूँजीवाद की सबसे बड़ी विसंगतियों में एक श्रम का इतने उच्च धरातल पर समाजीकरण परंतु इसके विपरीत श्रम के उत्पादों पर मुट्ठीभर लोगों का मालिकाना हक़ जिनकी संख्या निरंतर घटती जा रही  है …. यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है जबकि यह विसंगति और अधिक गहराती जा रही है …देखना है कि इसका क्लाईमैक्स कहाँ होता है

उपरोक्त वस्तुगत और साक्षात उदाहरण उन बुद्दिजीवियों के मुहं पर तमाचा है जो मार्क्सवाद को आयातित और अप्रासंगिक बताते हैं. बल्कि यह साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा शोषित  भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए पहले से अधिक, कहीं अधिक प्रासंगिक है.  इस बात को लेनिन ने नोट कर लिया था और मार्क्स के  शब्द “कम्युनिस्म का हौवा यूरोप पर मंडरा रहा है”  को दरुस्त करते हुए, बदले हुए हालात में उन्होंने कहा कि,” विश्व पूँजी के साम्राज्यवाद में प्रवेश करने के कारण क्रांतियों का धुरा अब यूरोप न होकर पूर्व है.”

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी आपके इतना भर लिख देने से कि  “महालक्ष्मी श्रम से उत्पन्न नहीं होतीं, वे श्रम के लिये मानव को प्रेरित करती हैं। महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” काम नहीं चलेगा. बात को तर्क-वितर्क से आगे बढाएं.

और आपका फ़िक्र कि “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.

….मार्क्स के इन शब्दों “To leave an error unrefuted is to encourage intellectual immorality. ...के साथ हम अपने आलेख को विराम देते हैं और पांडे जी से आशा करतें हैं कि वे बहस को आगे बढाएँगे.

Possibly Related Posts:

ज्ञानदत्त जी ऐसा कुतर्क तो गृहमंत्रालय भी नहीं करेगा

मई दिवस

Posted on

यह किस्सा नहीं किताबों का यह खेल नहीं दस्तूरों का,
एक मई इतिहास बना है दुनिया के मज़दूरों का।

एक मई 1886 इतिहास का सुनहरा काल हुआ,
निर्दोष ग़रीबों के खून से जब शहर शिकागो लाल हुआ,
जब गूँजा नारा अधिकारों का जब फटे कान सरकारों के
मौत से लड़ते जोश के आगे अमरीका बेहाल हुआ।

सारी दुनिया दहल गयी जब तूफान उठा मज़दूरों का,
एक मई इतिहास बना है दुनिया के मज़दूरों का।

देश पर शासन करने वाले जालिम शासक नीरो हैं,
इन्साफपरस्ती की दुनिया में एक से सौ त जीरो हैं,
इन्साफ की सच्ची झलक मिली थी पेरिस के कम्यूनों से,
पार्सन, स्पाइस, एंजेल फ़िशर मज़दूरों के सच्चे हीरो हैं।

फाँसी चढ़कर मौत से लड़कर इतिहास लिखा मज़दूरों का,
एक मई इतिहास बना है दुनिया के मज़दूरों का।

सूर्य उदय से सूर्य अस्त तक काम सभी को करना था,
आठ साल के बच्चों को भी पेट की ख़ातिर मरना था,
बूढ़े-बच्चे, नर और नारी सबकी यही हकीकत थी,
शीश झुकाकर जीने से अच्छा मौत से लड़कर मरना था।

आठ घण्टे का कार्य दिवस हो नारा बना मज़दूरों का,
एक मई इतिहास बना है दुनिया के मज़दूरों का।

माँ के सीने से चिपका बालक अपना फ़र्ज़ निभाया था,
चन्द माह की छोटी उम्र में अमर शहादत पाया था,
खून से भीगे लाल को माँ ने झण्डे में लिपटाया था,
कुर्बानी की याद का झण्डा दुगना जोश बढ़ाया था।

मासूम शहीद के खून में रँगकर झण्डा मज़दूरों का लाल हुआ,
एक मई इतिहास बना है दुनिया के मज़दूरों का।

– टी. एम. अंसारी
शक्ति नगर, लुधियाना

मेट्रो प्रशासन ने भिजवाया
कर्मचारियों को जेल
पर अगले ही दिन मिल गयी उनको बेल
मिली बेल कर्मचारी आन्दोलन ने
पकड़ा ज़ोर
अब तो मच गया हर तरफ हल्ला,
मेट्रो प्रशासन चोर
करे मज़दूरों का शोषण

मज़दूरों के शोषण से करे

अफसरों का पोषण

– दिल्ली मेट्रो का एक मज़दूर

“हमारी मौत दीवार पर लिखी ऐसी इबारत बन जायेगी जो नफरत, बैर,
ढोंग-पाखण्ड, अदालत के हाथों होने वाली हत्या, अत्याचार और इन्सान के
हाथों इन्सान की गुलामी के अन्त की भविष्यवाणी करेगी। दुनियाभर के दबे-कुचले
लोग अपनी कानूनी बेड़ियों में कसमसा रहे हैं। विराट मज़दूर वर्ग जाग रहा है।
गहरी नींद से जागी हुई जनता अपनी जंजीरों को इस तरह तोड़ फेंकेगी जैसे
तूफान में नरकुल टूट जाते हैं।”

– अल्बर्ट पार्सन्स (शिकागो के शहीद मज़दूर नेता)

‘बिगुल’ मई, 2009

कार्ल मार्क्‍स के जन्मदिन (5 मई) के अवसर पर

Posted on

कार्ल मार्क्‍स

फ्रेडरिक एंगेल्स

marx engels

विज्ञान के इतिहास में मार्क्‍स ने जिन महत्त्वपूर्ण बातों का पता लगाकर अपना नाम अमर किया है, उनमें से हम यहाँ दो का ही उल्लेख कर सकते हैं।

पहली तो विश्व इतिहास की सम्पूर्ण धारणा में ही वह क्रान्ति है, जो उन्होंने सम्पन्न की। इतिहास का पहले का पूरा दृष्टिकोण इस धारणा पर आधारित था कि सभी तरह के ऐतिहासिक परिवर्तनों का मूल कारण मनुष्यों के परिवर्तनशील विचारों में ही मिलेगा और सभी तरह के ऐतिहासिक परिवर्तनों में सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन ही हैं तथा सम्पूर्ण इतिहास में उन्हीं की प्रधानता है। लेकिन लोगों ने यह प्रश्न न किया था कि मनुष्य के दिमाग़ में ये विचार आते कहाँ से हैं और राजनीतिक परिवर्तनों की प्रेरक शक्तियाँ क्या हैं। केवल फ्रांसीसी और कुछ-कुछ अंग्रेज़ इतिहासकारों की नवीनतर शाखा में यह विश्वास बरबस प्रविष्ट हुआ था कि कम से कम मध्ययुग से, सामाजिक और राजनीतिक प्रभुत्व के लिए उदीयमान पूँजीपति वर्ग का सामन्ती अभिजात वर्ग के साथ संघर्ष यूरोप के इतिहास की प्रेरक शक्ति रहा है। मार्क्‍स ने सिद्ध कर दिया कि अब तक का सारा इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास है, अब तक के सभी विविधरूपी और जटिल राजनीतिक संघर्षों की जड़ में केवल सामाजिक वर्गों के राजनीतिक और सामाजिक शासन की समस्या, पुराने वर्गों द्वारा अपना प्रभुत्व बनाये रखने तथा नये पनपते हुए वर्गों द्वारा इस प्रभुत्व को हस्तगत करने की समस्या ही रही है। लेकिन इन वर्गों के जन्म लेने और कायम रहने के कारण क्या हैं? इनका कारण वे शुद्ध भौतिक, गोचर परिस्थितियाँ हैं, जिनके अन्तर्गत समाज किसी भी युग में अपने जीवन-यापन के साधनों का उत्पादन और विनिमय करता है। मध्ययुग के सामन्ती शासन का आधार छोटे-छोटे कृषक समुदायों की स्वावलम्बी अर्थव्यवस्था था, जो अपनी ज़रूरत की प्रायः सभी चीज़ों का स्वयं उत्पादन कर लेते थे। इनमें विनिमय का प्रायः पूर्ण अभाव था, शस्त्रधारी सामन्त बाहर के आक्रमणों से इनकी रक्षा करते थे, उन्हें जातीय या कम से कम राजनीतिक एकता प्रदान करते थे। नगरों के अभ्युदय के साथ अलग-अलग दस्तकारियों और परस्पर व्यापार का विकास हुआ जो पहले आन्तरिक क्षेत्र में सीमित था और आगे चलकर अन्तरराष्ट्रीय हो गया। इस सबके साथ नगर के पूँजीपति वर्ग का विकास हुआ और मध्यवर्ग में ही उसने सामन्तों से लड़-भिड़कर सामन्ती व्यवस्था के अन्दर एक विशेषाधिकार प्राप्त श्रेणी के रूप में अपने लिए स्थान बना लिया। परन्तु 15वीं शताब्दी के मध्य के बाद से, यूरोप के बाहर की दुनिया का पता लगने पर, इस पूँजीपति वर्ग को अपने व्यापार के लिए कहीं अधिक विस्तृत क्षेत्र मिल गया। इससे उसे अपने उद्योग-धन्धों के लिए नयी स्फूर्ति मिली। प्रमुख शाखाओं में दस्तकारी का स्थान मैनुफेक्चर ने ले लिया जो अब फैक्टरियों के पैमाने पर स्थापित था। फ़िर इसकी जगह बड़े पैमाने के उद्योग ने ले ली जो पिछली सदी के आविष्कारों, ख़ासकर भाप से चलनेवाले इंजन के आविष्कार से सम्भव हो गया था। बड़े पैमाने के उद्योग का व्यापार पर यह प्रभाव पड़ा कि पिछड़े हुए देशों में पुराना हाथ का काम ठप हो गया और उन्नत देशों में उसने संचार के आधुनिक नये साधन – भाप से चलने वाले जहाज़, रेल, वैद्युतिक तार – उत्पन्न किये। इस प्रकार पूँजीपति वर्ग सामाजिक सम्पत्ति और सामाजिक शक्ति दोनों को अधिकाधिक अपने हाथों में केन्द्रित करने लगा, यद्यपि काफी अरसे तक राजनीतिक सत्ता से वह वंचित रहा जो सामन्तों और उनके द्वारा समर्थित राजतन्त्र के हाथ में थी। लेकिन विकास की एक मंज़िल ऐसी आयी – फ़्राँस में महान क्रान्ति के बाद – जब उसने राजनीतिक सत्ता को भी हथिया लिया, और तब वे वह सर्वहारा वर्ग और छोटे किसानों के ऊपर शासन करनेवाला वर्ग बन गया। इस दृष्टिकोण से, समाज की विशेष आर्थिक स्थिति का सम्यक ज्ञान होने से सतही ऐतिहासिक घटनाओं की बड़ी सरलता से व्याख्या की जा सकती है, यद्यपि यह सही है कि हमारे पेशेवर इतिहासकारों में इस ज्ञान का सर्वथा अभाव है। इसी प्रकार हर ऐतिहासिक युग की धारणाओं और उसके विचारों की व्याख्या बड़ी सरलता से, उस युग की आर्थिक जीवनावस्थाओं और सामाजिक तथा राजनीतिक सम्बन्धों के आधार पर (ये सम्बन्ध भी आर्थिक परिस्थितियों द्वारा ही निर्धारित होते हैं) की जा सकती है। इतिहास को पहली बार अपना वास्तविक आधार मिला। यह आधार एक बहुत ही स्पष्ट सत्य है जिसकी ओर पहले लोगों का ध्यान बिल्कुल नहीं गया था, यानी यह सत्य कि मनुष्यों को सबसे पहले खाना-पीना, ओढ़ना- पहनना और सिर के ऊपर साया चाहिए, इसलिए पहले उन्हें लाज़िमी तोर पर काम करना होता है, जिसके बाद ही वे प्रभुत्व के लिए एक-दूसरे से झगड़ सकते हैं, और राजनीति, धर्म, दर्शन, आदि को अपना समय दे सकते हैं। आखि़रकार इस स्पष्ट सत्य को अपना ऐतिहासिक अधिकार प्राप्त हुआ।

समाजवादी दृष्टिकोण के लिए इतिहास की यह नयी धारणा सर्वोच्च महत्त्व की थी। इससे पता लगा कि पहले के सम्पूर्ण इतिहास की गति वर्ग- विरोधों और वर्ग-संघर्षों के बीच में रही है, कि शासक और शासित, शोषक और शोषित वर्गों का अस्तित्व बराबर रहा है और यह कि मानव-जाति के अधिकांश भाग के पल्ले सदा से कड़ी मशक्कत पड़ी है, आनन्दोपभोग बहुत कम। ऐसा क्यों हुआ? इसीलिए कि मानव-जाति के विकास की सभी पिछली मंज़िलों में उत्पादन का विकास इतना कम हुआ था कि ऐतिहासिक विकास इस अन्तरविरोधी रूप में ही हो सकता था, ऐतिहासिक प्रगति कुल मिलाकर एक विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक समुदाय के क्रियाकलाप का ही विषय बना दी गयी थी, और बहुसंख्यकों के भाग्य में अपने श्रम द्वारा जीवन-निर्वाह के अपने स्वल्प साधन और इसके अतिरिक्त विशेषाधिकार सम्पन्न समुदाय के लिए अधिकाधिक प्रचुर साधन उत्पादित करना रह गया था। परन्तु इतिहास की यही जाँच-पड़ताल, जो हमें इस प्रकार पहले के वर्ग शासन की स्वाभाविक एवं बुद्धिसम्मत व्याख्या प्रदान करती है (अन्यथा हम मानव-स्वभाव की दुष्टता द्वारा ही उसकी व्याख्या कर सकते थे), साथ ही साथ हमें यह बोध कराती है कि वर्तमान युग में उत्पादक शक्तियों के अति प्रचण्ड विकास के कारण मानव-जाति को शासक और शासित, शोषक और शोषित में बाँट रखने का अन्तिम बहाना भी, कम से कम सबसे उन्नत देशों में, मिट चुका है; कि शासक बड़े पूँजीपति अपनी ऐतिहासिक भूमिका समाप्त कर चुके हैं, और जैसा कि व्यापारिक संकटों, और ख़ासकर पिछली भयानक गिरावट और सभी देशों में फैली मन्दी से सिद्ध हो चुका है, वे समाज का नेतृत्व करने के योग्य अब नहीं रह गये हैं, बल्कि उत्पादन के विकास में बाधक बन गये हैं; कि ऐतिहासिक नेतृत्व सर्वहारा वर्ग के हाथ में चला गया है, ऐसे वर्ग के हाथ में चला गया है जो समाज में अपनी समग्र स्थिति के कारण सम्पूर्ण वर्ग शासन, सम्पूर्ण दासता एवं सम्पूर्ण शोषण का अन्त करके ही अपने को मुक्त कर सकता है; और यह कि सामाजिक उत्पादक शक्तियाँ, जो इतनी विकसित हो गयी हैं कि पूँजीपति वर्ग के काबू से बाहर हैं, बस इस प्रतीक्षा में हैं कि एकजुट सर्वहारा उन्हें अपने हाथों में ले ले जिससे कि ऐसी अवस्था कायम की जा सके जिसमें समाज का प्रत्येक सदस्य न केवल सामाजिक सम्पदा के उत्पादन में, बल्कि वितरण और प्रबन्ध में भी हाथ बँटा सकेगा, और जो अवस्था सम्पूर्ण उत्पादन के नियोजित संचालन द्वारा सामाजिक उत्पादक शक्तियों और उनकी उपज को इतना बढ़ा देगी कि प्रत्येक व्यक्ति की सभी उचित आवश्यकताओं की उत्तरोत्तर बढ़ती मात्रा में पूर्ति सुनिश्चित हो जायेगी।

मार्क्‍स ने जिस दूसरी महत्त्वपूर्ण बात का पता लगाया है, वह पूँजी और श्रम के सम्बन्ध का निश्चित स्पष्टीकरण है। दूसरे शब्दों में, उन्होंने यह दिखाया कि वर्तमान समाज में और उत्पादन की मौजूदा पूँजीवादी प्रणाली के अन्तर्गत किस तरह पूँजीपति मज़दूर का शोषण करता है। जब से राजनीतिक अर्थशास्त्र ने यह प्रस्थापना प्रस्तुत की कि समस्त सम्पदा और समस्त मूल्य का मूल स्रोत श्रम ही है, तभी से यह प्रश्न भी अनिवार्य रूप से सामने आया कि इस बात से हम इस तथ्य का मेल कैसे बैठायें कि उजरती मज़दूर अपने श्रम से जिस मूल्य को उत्पन्न करता है, वह पूरा का पूरा उसे नहीं मिलता, वरन उसका एक अंश उसे पूँजीपति को दे देना पड़ता है? पूँजीवादी और समाजवादी, दोनों ही तरह के अर्थशास्त्रियों ने इस प्रश्न का ऐसा उत्तर देने का प्रयत्न किया, जो वैज्ञानिक दृष्टि से संगत हो, परन्तु वे विफल रहे। अन्त में मार्क्‍स ने ही उसका सही उत्तर दिया। वह उत्तर इस प्रकार है: उत्पादन की वर्तमान पूँजीवादी प्रणाली में समाज के दो वर्ग हैं – एक ओर पूँजीपतियों का वर्ग है, जिसके हाथ में उत्पादन और जीवन-निर्वाह के साधन हैं, दूसरी ओर सर्वहारा वर्ग है, जिसके पास इन साधनों से वंचित रहने के कारण बेचने के लिए केवल एक माल – अपनी श्रम-शक्ति – ही है और इसलिए जो जीवन-निर्वाह के साधन प्राप्त करने के लिए अपनी इस श्रम-शक्ति को बेचने के लिए मजबूर है। परन्तु किसी माल का मूल्य उसके उत्पादन में, और इसीलिए उसके पुनरुत्पादन में भी, लगी सामाजिक दृष्टि से आवश्यक श्रम की मात्रा से निर्धारित होता है। अतः एक औसत मनुष्य की एक दिन, एक महीना या एक वर्ष की श्रम-शक्ति का मूल्य इस श्रम-शक्ति को एक दिन, एक महीना या एक वर्ष तक कायम रखने के लिए आवश्यक जीवन-निर्वाह के साधनों में लगे श्रम की मात्रा से निर्धारित होता है। मान लीजिये कि किसी मज़दूर को एक दिन के जीवन-निर्वाह के साधनों के उत्पादन के लिए छः घण्टे का श्रम चाहिए, या उसी बात को यों कहें कि उनमें लगा श्रम छः घण्टे के श्रम की मात्रा के बराबर है, तो श्रम-शक्ति का एक दिन का मूल्य ऐसी रकम में व्यक्त होगा जिसमें भी छः घण्टे का श्रम लगा हो। अब यह भी मान लीजिये कि इस मज़दूर को काम पर लगानेवाला पूँजीपति उसे बदले में यह रकम देता है, और इसलिए उसकी श्रम-शक्ति का पूरा मूल्य उसे अदा करता है। अब अगर मज़दूर दिन में छः घण्टे पूँजीपति के लिए काम करता है तो वह पूँजीपति की पूरी लागत को चुकता कर देता है – छः घण्टे के श्रम के बदले छः घण्टे का श्रम देता है। पर ऐसी हालत में पूँजीपति के लिए कुछ नहीं रहता, और इसलिए वह तो इसे बिल्कुल दूसरे ही ढंग से देखता है। वह कहता है: मैंने इस मज़दूर की श्रम-शक्ति छः घण्टे के लिए नहीं बल्कि पूरे दिन के लिए ख़रीदी है, और इसलिए वह मज़दूर से 8, 10, 12, 14 या इससे भी अधिक घण्टों की उपज अशोधित श्रम की, ऐसी श्रम की जिसका भुगतान नहीं किया गया होता, उपज होती है, और यह सीधे पूँजीपति की जेब में पहुँच जाती है। इस तरह पूँजीपति की नौकरी करनेवाला मज़दूर केवल उस श्रम-शक्ति का मूल्य ही नहीं पुनरुत्पादित करता जिसके लिए उसे मज़दूरी मिलती है, बल्कि इसके अलावा वह अतिरिक्त मूल्य भी पैदा करता है जिसे पहले पूँजीपति हस्तगत करता है और जो बाद में निश्चित आर्थिक नियमों के अनुसार समूचे पूँजीपति वर्ग के बीच वितरित होता है। यह अतिरिक्त मूल्य वह मूल कोष होता है जिससे लगान, मुनाफा, पूँजी का संचय बनता है – संक्षेप में वह सारी दौलत बनती है जिसका ग़ैर-मेहनतकश वर्ग उपभोग अथवा संचय करते हैं। इससे यह सिद्ध हो गया कि आज के पूँजीपतियों द्वारा धन संचय उसी प्रकार दूसरों के अशोधित श्रम का हस्तगतकरण है जिस प्रकार दास-स्वामियों या भू-दास श्रम का शोषण करनेवाले सामन्ती प्रभुओं का धन-संचय था, और शोषण के इन सभी रूपों में अन्तर केवल अशोधित श्रम के हस्तगतकरण के तरीके और ढंग का ही है। पर इस बात ने सम्पत्तिधारी वर्गों के ढोंग से भरे शब्दजाल का अन्तिम औचित्य भी समाप्त कर दिया, जिसका आशय यह होता था कि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में कानून और न्याय, अधिकारों और कर्तव्यों की समानता तथा हितों के सामंजस्य का बोलबाला है, और यह प्रकट कर दिया कि वर्तमान पूँजीवादी समाज, अपने पूर्ववर्ती समाजों की ही भाँति और उनसे किसी भी तरह कम नहीं, जनता की विशाल की बहुसंख्या के निरन्तर घटते ही जाते अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा शोषण की एक भीमकाय संस्था मात्र है।

एंगेल्स द्वारा जून, 1877 के मध्य में लिखित लेख का अंश। ‘Volks-Kalender’ नामक वार्षिकी में, जो ब्रुंसविक में 1878 में निकली थी, प्रकाशित।

तनख्वाह का सच

Posted on Updated on

आपस की बात
मजदूर भाइयो, मैं अभी कुछ दिनों से ही फैक्ट्री में काम करने लगा हूँ, किंतु इतने में ही मैंने जो चीज जान ली है वह है तनख्वाह देने की पीछे का सच. हमें तनख्वाह क्यों और कितनी दी जाए इसके पीछे मालिक का अपना मतलब होता है. लुटेरा मालिक एक मजदूर को उतना ही देता हैं जितना मज़दूर को जिंदा रहने की लिए न्यूनतम जरूरत होती है. मालिक को खूब अच्छी तरह पता है कि मज़दूर को किसी तरह रोटी, कपडा और दवा चाहिए, साथ में एक किराए का कमरा, क्योंकि अधिकतर मज़दूर अपने गावों से दूर शहरों में काम करने आयें हैं,. इन सभी चीजों की लिए इतनी महंगाई में २०००-२५०० रुपये देना ठीक होगा. मालिक को पता है अगर मैं २००० रुपये भी नहीं दूँगा तो मज़दूर भूखा या नंगा तो काम करने आएगा नहीं. मज़दूर फैक्ट्री आये तभी मालिकों की लिए १२-१४ घंटों तक काम करके रोज मालिकों की लिए करोड़ों रुपये मुनाफ़ा बनाएगा. अगर मज़दूर को जिंदा रहने लायक मजदूरी भी नहीं दी गयी तो एक दिन मज़दूर वर्ग ही मिट जाएगा और इन चोर पूंजीपतियों -मालिकों का मुनाफा बंद हो जाएगा. जिस (मुनाफे) को ये लुटेरे कभी भी किसी भी हालत में बंद नहीं होने देंगे. और इसी मुनाफे को जारी रखने की लिए वह कम तनख्वाह देकर मज़दूरों को जिंदा रखता है ताकि उसका मुनाफा बनता रहे. कल्पना करें कि आटा ५ रुपये किलो, चावल ५ रुपये किलो, सरसों तेल २० रुपये किलो, सभी सब्बजियाँ ४ रुपये किलो हो जायें तो तुरंत मालिक सभी की तनख्वाह १००० रुपये कर देगा और पुराने मज़दूरों को किसी न किसी बहाने निकाल कर नये मजदूरों की भर्ती ले लेगा. क्योंकि इन सारी चीजों के सस्ते होने पर मालिक भी हिसाब लगायेगा कि अब १००० रुपये में मज़दूर जिंदा रह सकता है तो २००० रुपये क्यों दिया जाए.
एक बात और कम्पनी में देखने को मिली कि कम्पनी में जो पुराने मज़दूर हैं जो थोड़ा काम जानते हैं उनको कुछ ज्यादा पैसा (३०००-३५००) देकर मालिक कुछ-कुछ अपना बफादार बना लेता है. और मालिक साजिशाना ढंग से मज़दूरों की बीच भी दो वर्ग पैदा कर देता है और इससे होता यह है कि नये मज़दूर जब किसी तरह का विरोध करते हैं तो पुराने मज़दूर जल्दी उनका साथ नहीं देते. पुराने मज़दूर कहते हैं हमें क्या है हमें तो ३००० रुपये मिल ही रहा है. वह सोचता है मुझे इन मजदूरों से ज्यादा पैसा तो मिल ही रहा है और कुछ दिन काम करके कारीगर बन जाऊंगा तो और तनख्वाह बढ़ जायेगी. और मैं अच्छी जिंदगी जीने लगूंगा. वह यह भूल जाता है कि वह जिस मालिक के लिए काम कर रहा है , वह मालिक उसी की मेहनत से हर महीने बिना कुछ किए लाखों रुपया मुनाफा कमाता है और अपनी संपत्ति में कई गुणा की बढोत्तरी करता रहता है. और वह मज़दूर कारीगर सीखने को ही अपना लक्ष्य बनाकर सालों गुजार देता हैं. वह मज़दूर अपनी तुलना अपने से नीचे वाले मज़दूर से करता है जबकि उसे चाहिए कि वह अपनी तुलना उस नये मज़दूर से न करके उस मालिक से करके देखे कि उसका मालिक कितना ज्यादा मुनाफा बटोर रहा है. सभी मजदूरों को समझना चाहिए कि ये लुटेरा जो लाखों-करोडों कमाता है वह हमारी खून-पसीने से बनाया गया मुनाफा होता है अगर हम मज़दूर वर्ग न हो तो ये लुटेरे भूखों मरेंगे. इसलिए मजदूरों को अपनी ताकत समझनी होगी और मजदूरों को संगठित होकर इन मालिकों की खिलाफ लडाई में हिस्सा लेना होगा. नए मजदूरों के साथ पुराने मज़दूरों को भी समझना होगा कि उसे जो थोड़ा ज्यादा तनख्वाह मिल रही है उससे कुछ नहीं होने वाला. उसका सारा मुनाफा तो मालिक हड़प जाता है और फ़िर इन पैसों से अगले साल ६-८ मशीने बढा ली जाती हैं और इसीके साथ मालिक का मुनाफा और फ़िर कुछ नये मजदूरों का शोषण बढ़ता जाता है.
‘बिगुल’ दिसम्बर २००८ से साभार