कला

मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

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विश्व स्तर पर, 1970 के बाद प्रगतिशिलियों, एन जी ओ, और वामपंथियों के साथ मिलकर संशोधनवाद सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों को उत्पादन के स्थान कारखानों और फार्मों से खींचकर, बुर्जुआजी की इच्छानुसार, मंडी में ले गया. मार्क्स की पूंजी पर आधारित यह फिल्म, उनका भंडाफोड़ करती है और संजीदा लोगों को मार्क्सवाद का सही अध्ययन करने के लिए प्रेरित करती है. मूलरूप से फिल्म अंग्रेजी में हैं जिसे हिंदी में डब किया गया है. इसे भारतीय सन्दर्भ में रखने के लिए कुछ तस्वीरों और दृश्य में बदलाव भी किया गया है. http://kapitalism101.wordpress.com/2010/08/20/law-of-value-5-contradiction से विशेष आभार सहित.

मूल्य के नियम_5_विरोधाभास

मूल्य के नियम  में मार्क्स हमेशा विसंगतियों की चर्चा करते हैं. परन्तु ये गोल चकोरों और सैन्य ज्ञान से संबंधित विसंगतियां नहीं होती. ये विसंगतियां पूंजीवादी समाज के सामाजिक संबंधों के अन्दर की विसंगतियां हैं. कुछ लोग इनके लिए शब्द विरोधाभास का प्रयोग करना ज्यादा पसंद करते हैं.

बहुत क्षोभ के साथ हम जानते  हैं कि आधुनिक समाज सामाजिक विसंगतियों से भरा पड़ा है. धन की प्रचुरता के साथ  अत्यधिक गरीबी, अत्याधिक बेरोजगारी के बावजूद  ज्यादा काम, बैंकों द्वारा घरों की कुर्की, नस्ली श्रेष्टता और तनाव, औरतों के खिलाफ हिंसा, श्रम संघर्ष, दूषित वातावरण, पुलिस की बर्बरता, गैंग हिंसा, समूहों की घृणा, जनसँख्या का अत्याधिक उजाड़ा और बहुत से युद्ध.  मार्क्स की दिलचस्पी इन सभी  विसंगतियों में हैं. लेकिन इनमें  से किसी एक  से भी वे अपना विश्लेषण शुरू नहीं करते.

इसके विपरीत वे अपेक्षित साधारण सी लगने वाली चीज – जिन्स से शुरू होते हैं. क्यों ? क्योंकि जिन्स पूंजीवाद के सामाजिक संबंधों की सबसे बुनियादी चीज है. लोगों के परस्पर संबंध जिन्स विनिमय का रूप ले लेते हैं. जिन्स सामाजिक संबंधों की बुनियादी कार्यकर्त्ता है.  इसलिए अगर हम यह जानना चाहते हैं कि कैसे ये सभी सामाजिक विरोधाभास परस्पर संबंधित हैं, हमें जिन्स से शुरुआत करनी होगी.

जैसाकि हमने पहले ही देखा है कि जिन्स में विरोधाभास निहित है. : इसका एक उपयोग मूल्य है और दूसरा मूल्य (जैसाकि हमने देखा है कि मूल्य विनिमय मूल्य के पीछे छुपा होता है इसलिए, पहले हमने कहा था कि विरोधाभास उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य के बीच है, बाद में हमने इसे उपयोग मूल्य और मूल्य में संशोधित कर लिया. ) शुरू में देखने पर यह इतना अधिक विरोधाभासी नहीं लगता. लेकिन जैसे ही हम इसे बारीकी से देखते हैं तो महतवपूर्ण विरोधाभास उभर आते हैं.

ऐसा क्यों होता है कि लोगों को मंडी में अपनी श्रम, धन के बदले बेचना पड़ता है. क्योंकि वे स्वयं अपने जीवन निर्वाह के साधन नहीं जुटा पाते. यही पूंजीवाद का विलक्षण पहलू है. पूर्व में मौजूद उत्पादन की विधियों में लोगों की बहुसंख्या किसी न किसी प्रकार के उत्पादन के साधनों का उपयोग कर सकती थी,  जिनसे वे अपने जीवन निर्वाह के साधन जुटा लेते थे. कई बार लोग आपस में चीजे बदल लेते थे परंतू वे ऐसा अपने ही प्रयोग के लिए अतिरिक्त उत्पादन के द्वारा करते थे. अपने अतिरिक्त उत्पादन की विक्री विशेषरूप से विनिमय के लिए उत्पादन से पूर्णतया भिन्न है.

‘प्रारंभिक एकत्रीकरण नाम की लंबी हिंसात्मक और ऐतिहासिक प्रक्रिया  के द्वारा , उत्पादन के इन साधनों का निजीकरण हो गया और इनपर  पूंजीपति नामक वर्ग के लोगों का कब्ज़ा हो गया. जबकि पहले लोग सीधे अपने उपयोग के लिए श्रम किया करते थे, लेकिन अब उन्हें अपनी रोजी चलने के लिए मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.

सो इस तथ्य से कि हम विनिमय के लिए, न कि सीधे उपयोग के लिए उत्पादन करते हैं, संपत्तिशाली और संपत्तिहीन के बीच सामाजिक विरोधाभास का पता चलता है. खुली मंडी में पहले से ही काम पर जबरदस्ती विद्यमान होती है. और इस जबरदस्ती को लागू करने के लिए किसी न किसी प्रकार की हिंसा की आवश्यकता पड़ती हैं, चाहे यह राज्य , निजी सेना या भाड़े के बटमार द्वारा हो. उत्पादन के साधनों का निजीकरण करने के लिए, हिंसा जरूरी थी और संपत्ति के सभी वैधानिक पह्लूयों को लागू करने के लिए जरूरी बनी हुई है.

अपनी जीविका को मंडी से प्राप्त करने के लिए उन्हें कोई अन्य चीज बेचनी पड़ती है. चूँकि उत्पादन के साधन निजी होते हैं, इसलिए उन्हें अपनी श्रम बेचनी पड़ती है. निसंदेह श्रम वास्तव में बेचीं नहीं जा सकती. इसकी जगह हम अपनी श्रम की क्षमता : श्रम-शक्ति बेचते हैं. हम कार्य समय की निश्चित मात्रा बेचते हैं, चाहे इसे घंटों, हफ़्तों या वर्षों में मापा जाये. यही कारण है कि मूल्य श्रम समय की अभिव्यक्ति है.

हमारी स्वयं की सृजनात्मक क्रियाशील क्षमता, वही वस्तु जो हमें इन्सान बनाती है और समाज से जोडती है, श्रम-शक्ति कहलाती है, श्रम-शक्ति जिन्स बन जाती है जिसे हम किसी को बेचते हैं. श्रम-शक्ति का,  अन्य जिन्स की भांति, उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य होता है और आपने अनुमानित किया, इनमें विरोधाभास है. विनिमय मूल्य हमारे कार्य समय के लिए भुगतान की गयी मजदूरी होती है. इसे जीविका पर खर्च द्वारा निर्धारित किया जाता है. यह भोजन, रिहाईश, कपडे, और परिवहन पर खर्च के बराबर होता है. लेकिन हमारी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य ऐसा है कि यह मूल्य सृजित कर सकता है. यही श्रम-शक्ति के दो विरोधी पहलू हैं, एक तरफ इस पर मजदूरी खर्च होती है तो दूसरी और यह मूल्य पैदा करता है.

हो सकता है आपको 5 डॉलर प्रति घंटा दिए जा रहे हो और आप 20 डॉलर प्रति घंटा की दर से मूल्य सृजित कर रहे हों. अगर ऐसा है तो आपका शोषण हो रहा है. वास्तव में, आपके शोषण की दर चार सौ प्रतिशत है. श्रम-शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास के कारण ही शोषण संभव होता है.

शोषण पूंजीवाद की पहेली – मुनाफे के अस्तित्व – को स्पष्ट करता है. पूंजीपति दिन की शुरुआत कुछ धन से करते हैं जिसे वे उत्पादन में  निवेश कर देते हैं. दिन की समाप्ति पर उनके पास कुछ जिंसों की मात्राएँ होती हैं जिन्हें वे शुरू में  खर्च किये गए धन से अधिक मूल्य पर बेच देते हैं. ऐसा लग सकता है कि इनका मुनाफा क्रय -विक्रय करने से हुआ है. हालाँकि केवल क्रय-विक्रय करने से भी मुनाफा अर्जित किया जा सकता है. लेकिन केवल क्रय-विक्रय करने से मुनाफा पैदा नहीं होता. क्योंकि खरीदना और बेचना जीरो-राशी खेल है. जब हम जिंसों का विनिमय करते हैं तो हम उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं. इस प्रक्रिया द्वारा समाज की कुल राशी के मूल्य में कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसा संभव हो सकता है कि किसी एक को चुना लग जाये. परन्तु मंडी में, किसी एक व्यक्ति का लाभ दूसरे के लिए हानि होता है. लेकिन जिंसों की खरीदफरोख्त से औसत मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती. परन्तु वास्तविक मुनाफा औसत मूल्य में वृद्धि से ही संभव है. किसी समाज के जीडीपी की कुल राशी के मूल्य में वृद्धि मुनाफे  के इस विस्तार से ही होती है.

ऐसा लगता है कि हम पहेली या किसी विरोधाभास में उलझ गए हों. मंडी में समानता और संतुलन का राज्य चलता है. मंडी में विनिमय द्वारा जिंसो के मूल्य का संरक्षण होता है. किसी एक व्यक्ति का लाभ किसी दूसरे व्यक्ति की हानि से इस प्रकार बराबर हो जाता है कि जिन्स विनिमय से अन्तर्जात संतुलन बना रहता है. परन्तु मुनाफा ऐसी अद्भुत घटना है जो जिंसों की खरीदफरोख्त होने से संभावय लगती है. कहीं न कहीं विषमता से मुनाफा पैदा हो सकता है.लेकिन थोड़े से ज्यादा पैदा होना. यह सब किस प्रकार संभव हो सकता है?

इस पहेली को हल करने के लिए मार्क्स हमें मंडी से आगे उत्पादन के  रहस्यमई क्षेत्र में देखने के लिए कहते हैं. उत्पादन में, जहाँ श्रम के शोषण से मूल्य का विस्तार हो जाता है. शोषण मंडी में विनिमय के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करता क्योंकि यह विनिमय में नहीं होता. श्रम-शक्ति को उसके मूल्य पर खरीदा जाता है. उस श्रम शक्ति के उत्पादों को उनके मूल्य पर बेचा जाता है. इन विनिमयों द्वारा कोई मुनाफा नहीं होता. मंडी से मुनाफा बिलकुल नहीं आता, बल्कि श्रम प्रक्रिया से आता है. श्रम के मूल्य से अधिक और ऊपर किया गया श्रम मुनाफे की मात्रा का निर्धारक है. जबकि मंडी समानता और संतुलन की क्षेत्र बनी रहती है, उत्पादन असमानता और शोषण का क्षेत्र है. और यह विरोधाभास श्रम शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास होने से ही संभव है.

अगली किश्त मार्क्स के मूल्य के नियम पर आधारित एनिमेटिड हिंदी डब फिल्म : अंतिम किश्त में समाप्य

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कार्ल मार्क्स

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कार्ल मार्क्स (1818-1883) मार्क्सवाद और प्रबल राजनीतिक विज्ञान के संस्थापक , जिसके विचारों ने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के इतिहास को नये आयाम दिए.

५ मई १८१८ को पश्चिम जर्मनी के ट्रायर में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ. उसके पिता एक कामयाब वकील थे, जिन्हें प्रशिया के कानूनानुसार अपने व्यवसाय को चलाने के लिए यहूदी से ईसाई धर्म अपनाना पड़ा.

सत्रह वर्ष की आयु में कानून की विद्या हासिल करने के लिए मार्क्स बोन विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए. वहाँ उनकी गिनती तेज-तरार विद्यार्थियों में नहीं होती थी. फिक्रमंद पिता ने उनका स्थानांतरण कठोर अनुशासन के लिए विख्यात बर्लिन के विश्वविद्यालय में करवा दिया. अपने अध्ययन के दौरान नौजवान मार्क्स रेडिकल विचारों और दर्शन की ओर झुकते गये. एक बार तो वे ‘यंग हेगल्स’ नामक विद्यार्थियों के एक समूह से जुड़ गये जो हेगल के विचारों को अस्वीकार कर चुके थे.

१९ जून १८४३ को उनका विवाह प्रशिया के नवाब की सुशिक्षित सपुत्री जेनी वोन वेस्टफालें से संपन्न हुआ. शादी के तुरंत बाद सरकार की सेंसरशिप, जिसका रवैया वामपंथी आन्दोलनकारियों के प्रति दिन-प्रतिदिन कठोर से कठोरतम होता जा रहा था, ने उन्हें देश छोड़कर पेरिस जाने के लिए मजबूर कर दिया.

१८४० का पेरिस उस ज़माने के क्रांतिकारियों की सबसे प्रिय कर्मस्थली थी. यहाँ मार्क्स की मुलाकात बहुत से क्रांतिकारियों से हुई जिनमे फ्रेडरिक एंगेल्स आगे चलकर उनके जीवनभर के वैचारिक मित्र बन गये.

१८४४ में एंगेल्स बहुत ही प्रभावशाली पुस्तक ‘Conditions of the WorkingClass in England ‘ लिख चुके थे. इस पुस्तक ने मार्क्स के सर्वहारा वर्ग द्वारा संपन्न किये जानेवाली क्रांति  के विचार को विकसित करने में  मदद की. इसी पुस्तक से प्रेरणा पाकर मार्क्स ने Economic and Philosophic Manuscripts नामक अपनी पहली  पुस्तक की रचना की. पूंजीवाद के अधीन श्रम के अलगाव से मुक्ति के लिए साम्यवाद की जीत की अवश्यम्भाविता के पक्ष में तर्क के कारण इस पुस्तक का एक नैतिक और दार्शनिक महत्व रहा है.

दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है.

मार्क्स की दिलचस्पी इतिहास के विकास और परिवर्तन में भी थी, जो समाज में नैसर्गिक रूप से चलता रहता है. अपने इस विचार को उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी समझ बताया. मार्क्स का विश्वास दिन-प्रतिदिन इस सच्चाई की ओर दृढ होता गया कि सर्वहारा वर्ग की क्रांति न केवल वांछनीय है बल्कि ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण अवश्यंभावी है.

इसी समय मार्क्स और एंगेल्स ने अपना सबसे प्रसिद्ध पंफलेट ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ लिखा.

“कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. वे खुलेंआम एलान करते हैं कि उनके लक्ष्य पूरी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बलपूर्वक उलटने से ही सिद्ध किये जा सकते हैं. कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग को कांपने दो. सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.

दुनिया के मजदूरों, एक हो ! ”

मार्क्स की ज्यादातर रचनाओं के विपरीत मार्क्स की यह कृति संक्षिप्त और प्रासंगिक होने के साथ-साथ अग्निमय और प्रेरणादायक भाषा के प्रयोग द्वारा क्रांति की इच्छा पैदा करने की क्षमता रखती है.

“अभी तक आर्विभूत समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है.” – कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, प्रथम अध्याय.

क्रांतियों, जिन्होंने १८४८ में समस्त यूरोप को अपनी आगोश में ले लिया था, ने मार्क्स को फ़्रांसिसी और बेल्जियन अधिकारिओं की नज़रों में संदिग्ध बना दिया . उन्हें लंदन में शरण लेनी पड़ी और उनका शेष रचनात्मक जीवन वहीँ बीता.

कम्युनिस्ट लहर की इस तरुणावस्था में मार्क्स इसके साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़ते गये. प्रथम कम्युनिस्ट इंटरनेशनल  में अराजकतावादी बकुनिन के विरुद्ध उन्होंने प्रबल और प्रभावशाली तर्क रखे.

एक और प्रबल घटना १८७१ का पेरिस कम्यून की स्थापना थी जिसे सर्वहारा वर्ग दो महीने के संघर्ष के बाद हार गया. मार्क्स ने इसका पुरजोर मूल्यांकन किया और इसे भविष्य की कम्युनिस्ट क्रांतियों के अग्रदूत की उपाधि प्रदान की.

मार्क्स अपना अधिक से अधिक समय  ब्रिटिश लायब्रेरी में राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए बिताते थे. इसी के परिणामस्वरूप उनकी मास्टरपीस रचना ‘पूँजी’ (दास कैपिटल) का जन्म हुआ. यह पुस्तक पूंजीवादी समाज और अर्थशास्त्र की गतिकी के नियमों का सघन और विस्तृत संकलन हैं.

“पहली दृष्टि में पण्य बहुत मामूली सी और आसानी से समझ में आनेवाली चीज मालूम होता है. किन्तु उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वास्तव में वह एक बहुत अजीब चीज है, जो आधिभौतिक सूक्ष्मताओं और धर्मशास्त्रीय बारीकियों से ओतप्रोत है. जहाँ तक वह उपयोग मूल्य है, वहां तक, चाहे हम उसपर इस दृष्टिकोण से विचार करें कि वह अपने गुणों से मानव आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है” – पूंजी, अध्याय १, प्रथम खंड

अपने निरन्तर विकसित होते हुए मार्क्सवादी दृष्टिकोण अनुसार मार्क्स ने जीवन के हर पहलू पर लिखा.  अक्सर पूंजीपतियों के तलुयाचाट बुद्धिजीवी मार्क्स के “धर्म लोगों के लिए अफीम है” को सन्दर्भ से तोड़कर एक फिकरे के रूप में प्रयोग करते रहे हैं. वर्गीय समाज के अस्तित्व में आने की ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ के अनुसार उत्पादन की प्रक्रिया ने समाज के एक छोर पर मुट्ठीभर अमीर जबकि दूसरे छोरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया. आत्मिक उत्पादन में एक तरफ दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, साहित्य,गीत और संगीत पैदा हुआ तो दूसरी और धर्म. दिखने में धर्म गरीबों को मुफ्त का तोहफा लगता रहा हो लेकिन शोषक वर्ग के सच्चे सेवादार के रूप में इसने गरीब जनता को पैरों के नीचे रौंधने का ही काम किया.

” धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन  परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है.”
— (Contribution to the Critique of Hegel\’s Philosophy of Right)

अपने समय के सर्वाधिक घृणा पाने वाले व्यक्ति कार्ल मार्क्स, जिन पर सबसे अधिक कीचड उछाला गया, के रोशन दिमाग ने १८८३ को हमेशा के लिए काम करना बंद कर दिया. निरंकुश और गणतंत्रीय, दोनों प्रकार की सरकारों ने उन्हें अपने राज्य से खदेड़ा. बुर्जुआजी, चाहे वह अनुदार रही हो चाहे अति जनवादी, मार्क्स के प्रति लान्छनात्मक शब्दों का प्रयोग करने  में आपस में होड़ करती हुई नजर आई. वे इसे इस प्रकार हटा देते थे जैसे यह कोई मकड़ी का जाला हो. पूर्ण लापरवाही के साथ, जब बहुत जरूरी आवश्यकता उन्हें विवश करती, वे तभी जवाब देते. उनकी मृत्यु उनके चहेते करोड़ों क्रांतिकारी मेहनतकश साथियों के लिए एक आघात थी. साईबेरिया से कैलिफोर्निया, यूरोप और अमेरिका के सभी भागों और जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं “मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि  बेशक उनके बहुत से विरोधी रहे हों, लेकिन उनका कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं था.”

related post : मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय

सांस्कृतिक मोर्चे पर अन्तरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण का प्रश्न

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कहने की आवश्यकता नहीं कि जीवन के हर क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का नज़रिया व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भों में हर-हमेशा अन्तरराष्ट्रीयतावादी होता है। लेकिन आज पूँजी के भूमण्डलीकरण के नये दौर में, एक ओर जहाँ बुर्जुआ राष्ट्रवाद क्षरित-स्खलित होकर, अपनी ऐतिहासिक सकारात्मकता खोकर फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद का लगभग समानार्थी-सा बन गया है, वहीं सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावादी चेतना का ज्यादा मज़बूत और व्यापक भौतिक आधार भी तैयार हुआ है।

सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावाद के दो सन्दर्भों की चर्चा प्रकारान्तर से ऊपर के दो उपशीर्षकों के अन्तर्गत आ चुकी है। पहली बात, राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियों का दौर बीतने के बाद राष्ट्रवाद के रणनीतिक नारों का झण्डा सर्वहारा वर्ग और मुक्तिकामी जनों के विरुद्ध अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। अन्तरविरोध आज सीधे-सीधे श्रम और पूँजी के दो शिविरों के बीच है। संस्कृति के मोर्चे पर आज यह एक अति महत्त्वपूर्ण काम है कि हम फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद सहित प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ राष्ट्रवाद की संस्कृति का व्यापक भण्डाफोड़ और विरोध करें और श्रम की संस्कृति का, अन्तरराष्ट्रीयतावादी श्रमिक एकजुटता के विचार का विकल्प सामने रखें। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति दो चीज़ें हैं। राष्ट्रवाद एक बुर्जुआ परिघटना के रूप में जब अपनी ऐतिहासिक प्रासंगिकता खो देगा, तब भी देशभक्ति की भावना व संस्कृति बनी रहेगी। वह बुर्जुआ देशभक्ति की संस्कृति न होकर सर्वहारा देशभक्ति की संस्कृति होगी। सर्वहारा वर्ग ही अपने देश की जनता, संस्कृति और प्रकृति को वास्तविक प्यार करता है और अपने देश में समाजवाद की विजय के बाद वह समाजवादी मातृभूति की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार रहेगा।

दूसरी बात, जब हम अपनी सांस्कृतिक-वैचारिक परम्परा की बात करते हैं तो इसका एक पक्ष है हमारे देश की मुक्तिकामी जनता के इतिहास की विरासत और दूसरा पक्ष है, पूरी दुनिया के सर्वहारा संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों से जुड़ी सांस्कृतिक विरासत और पूरी दुनिया की मुक्तिकामी जनता की सांस्कृतिक विरासत। यही संस्कृति के क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का सही-सन्तुलित अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिया है।

जब हम सांस्कृतिक क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग के अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिए की बात करते हैं तो उसका मतलब सिर्फ यही नहीं होता कि पूरी दुनिया के सर्वहारा वर्ग के कला-साहित्य की समृद्ध सम्पदा को हम अपनी विरासत के रूप में स्वीकार करते हैं, इसका मतलब यह भी होता है कि यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन काल के मानवतावादी, जुझारू भौतिकवादी, जनवादी साहित्य तथा उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप और रूस के महान यथार्थवादी और क्रान्तिकारी जनवादी साहित्य की पूरी परम्परा का हम अपने को उत्तराधिकारी मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि समूचे विश्व के समग्र क्लासिकीय साहित्य-सम्पदा को हम अपनी विरासत मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि किसी भी देश के सर्वहारा का क्रान्तिकारी सांस्कृतिक आन्दोलन विश्व मज़दूर आन्दोलन के अतिरिक्त, सभी देशों के राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों, प्रतिरोध संघर्षों और जन-आन्दोलनों के दौर के कला-साहित्य की विरासत को अपनाता है, उनका द्वन्द्वात्मक विश्लेषण करता है तथा उनके ज़रूरी अवयवों को आत्मसात कर लेता है। यह महज़ एक सैद्धान्तिक `अप्रोच´ का सवाल नहीं, ठोस व्यावहारिक कार्रवाई का मुद्दा है। एक उदाहरण लें। अफ्रीकी जनता के प्रतिरोध-संगीत, अमेरिकी अश्वेतों के प्रतिरोध संगीत, मेक्सिको व लातिन अमेरिकी देशों की अधूरी क्रान्तियों और किसान संघर्षों के दौरान सृजित क्रान्तिकारी संगीत – इन सभी में पूंजी की सत्ता, वर्चस्व और उत्पीड़न के प्रतिरोध के तत्त्व हैं, समानता के स्वप्न हैं, संघर्ष की आग है। भारतीय सर्वहारा का संगीत आन्दोलन अपने देश के जन संघर्षों के गीत-संगीत और लोक संगीत के अतिरिक्त उपरोक्त अन्तरराष्ट्रीय विरासत को भी अपनाएगा और इस सतत्-सुदीर्घ प्रक्रिया में सर्वहारा संगीत की सार्वभौमिक सम्प्रेषणीयता, उसकी एक सच्ची “अन्तरराष्ट्रीय भाषा” विकसित होगी। यही बात सर्वहारा के समाजवादी यथार्थवादी थिएटर और सिनेमा के लिए, तथा साहित्य के लिए भी लागू होती है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ , शिशिर-बसंत 2002 से साभार

न तो इतिहासग्रस्त, न ही इतिहास विमुख!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

पूर्वोक्त चर्चा से इतिहास के प्रति हमारा दृष्टिकोण भी स्पष्ट हो जाना चाहिए, लेकिन हम, कुछ ठोस उदाहरणों सहित, अलग से इस विषय को रेखांकित करना ज़रूरी समझते हैं। इतिहास के प्रति एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो हर-हमेशा ज़रूरी होता है, लेकिन ख़ास तौर पर नई शुरुआतों या इतिहास के किसी नये दौर की भौतिक-आत्मिक स्थितियों को जानने-समझने के दौर में, द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी इतिहास-दृष्टि से सूक्ष्म विचलन भी हमें कालान्तर में लक्ष्य से कोसों दूर लेकर चला जाता है। निरन्तरता और नूतनता के द्वन्द्व से इतिहास आगे डग भरता है। इसमें भी कभी निरन्तरता का पक्ष प्रमुख होता है तो कभी नूतनता का। निर्णय की जटिलता तब अधिक होती है जब नूतनता का पक्ष प्रमुख होता है।

अतीत के शरणागत या इतिहासग्रस्त होने से कम हानिकारक इतिहास-विमुख होना नहीं होता। जैसा कि अबू तालिब ने फर्माया है, `यदि तुम इतिहास पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर तोप से गोल बरसाएगा।´

इसी दृष्टि से, आज परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्वों को पहचानते हुए, परम्परा के ज़रूरी अवदानों की पहचान करते हुए साहित्य-कला-संस्कृति के इतिहास के पुनर्मुल्यांकन की ज़रूरत है। प्रश्न चाहे इतिहास के हों या साहित्येतिहास के, ग़लत सैद्धान्तिक फ्रेम, अधूरे तथ्य-संग्रह और अटकलबाज़ी के द्वारा अपने अतीत और नायकों का अनावश्यक महिमा-मण्डन सर्वहारा क्रान्ति और साहित्य-कला-संस्कृति के वर्तमान और भविष्य को भयंकर क्षति पहुँचाएगा, और यहाँ तक कि ऐसे तर्कों और निष्पत्तियों का पुनरुत्थानवादी शक्तियाँ भी लाभ उठाएँगी। परम्परा के प्रति सही रुख का यह सवाल हिन्दी साहित्येतिहास के पुनर्मुल्यांकन से जुड़ा हुआ एक ज़रूरी और अतिप्रासंगिक प्रश्न बना हुआ है।

इसके अतिरिक्त, इतिहास के प्रति सही दृष्टिकोण के सवाल को हमें और व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। यह और भी ज़रूरी इसलिए है कि आज प्राच्यवाद, उत्तर आधुनिकतावाद, उत्तर-मार्क्सवाद, `सब आल्टर्न´ इतिहास-दृष्टि और क्वाण्टम भौतिकी के कोपेनहेगन स्कूल के अनिश्चितता सिद्धान्त के सामाजिक अनुप्रयोग आदि के प्रहार का मूल लक्ष्य ही है – इतिहास-विकास के नियमों की द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी अवधारणा। इन लोकवादी, बुर्जुआ समाजशास्त्रीय और “नववामपन्थी” इतिहास-दृष्टियों के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष का मुख्य रणक्षेत्र संस्कृति का प्रदेश ही बन रहा है।

साथ ही, यह आज के सर्वहारा नवजागरण का मूलभूत कार्यभार है कि सर्वहारा विचारधारा, क्रान्तियों के इतिहास और सर्वहारा कला-साहित्य की महान उपलब्धियों को विस्मृति के अन्धकार से बाहर लाया जाए और इनके बारे में फैलाए जा रहे तमाम विभ्रमों की धूल-राख को झाड़कर वास्तविकता को सामने प्रस्तुत किया जाए। बीसवीं शताब्दी में पूरी दुनिया में सर्वहारा कला-साहित्य के क्षेत्र में जो काम और प्रयोग हुए, उनकी पुनर्प्रस्तुति बेहद ज़रूरी है। आज बेशक उन्हें मॉडल मानकर उनका अनुकरण करने से हमारा अभीष्ट नहीं प्राप्त होगा, पर उनसे परिचित हुए बिना भी आगे कदम बढ़ाना हद दर्जे का बचकानापन ही होगा। हमारे देश में प्रगतिशील सांस्कृतिक आन्दोलन का जो इतिहास रहा है, उसका भी इसी दृष्टि से अध्ययन ज़रूरी है।

इतिहास की वास्तविकताएँ भी निश्चल-निरपेक्ष नहीं होतीं। इतिहास के हर मोड़ पर, हर नये चरण की पूर्वबेला में हम मानव सभ्यता के अतीत और जातीय-देशीय स्मृतियों की पुनर्यात्रा करते हैं, और हर बार, सम्मुख उपस्थित कार्यभारों की दृष्टि से इतिहास की “नये सिरे से खोज करते हैं” और उसके उन पक्षों पर ध्यान देते हैं, जो विगत इतिहास-यात्राओं में अनालोकित-उपेक्षित रह गए थे। जीवन के विकास की नई मंज़िलें और सम्भावित दिशाएँ हमारे सामने अतीत के नये-नये आयामों-पक्षों को देखने की नई सूक्ष्मदर्शता और व्यापकता देती चलती हैं और फिर अपनी पारी में, अतीत का हर नया पर्यवेक्षण विकास की दिशाओं की समझदारी को ज्यादा ठोस, ज्यादा उन्नत बनाता चलता है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

धार्मिक कट्टरपन्थ फ़ासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर सही क्रान्तिकारी रणनीति अपनाओ!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर समकालीन धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी उभार की वैचारिक-ऐतिहासिक समझ में गम्भीर दृष्टि-दोष दीखते हैं और इनका प्रतिरोध भी प्राय: रस्मी, प्रतीकात्मक और कुलीनतावादी सीमान्तों में कैद दीखता है।

नाटकों, कविताओं और कहानियों में प्राय: हिन्दुत्ववादी कट्टरपंथियों का विरोध `सर्वधर्म समभाव´ की ज़मीन से या बुर्जुआ मानवतावाद या बुर्जुआ जनवाद की ज़मीन से करने की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। यह सर्वहारा संस्कृतिकर्मी का सिरदर्द नहीं है कि संघ परिवार ने संविधान और न्यायतंत्र को ख़तरे में डाल दिया है। इसकी चिन्ता संविधान और न्यायतंत्र के पहरुए करें। हम यदि इसका हवाला भी देंगे तो पूरी व्यवस्था के चरित्र और फ़ासीवाद के चरित्र को समझाने और `एक्सपोज़र´ के नज़रिए से देंगे। लोगों की निजी धार्मिक आस्थाओं के अनुपालन के जनवादी अधिकार के प्रति अपनी पूर्ण प्रतिबद्धता ज़ाहिर करते हुए भी, हमें “उदार हिन्दू” या “रैडिकल हिन्दू” का रुख अपनाने के बजाय धर्म के जन्म और इतिहास की भौतिकवादी समझ का प्रचार करना होगा, धर्म के प्रति सही सर्वहारा नज़रिए को स्पष्ट करना होगा, धर्म और साम्प्रदायिकता के बीच के फर्क को स्पष्ट करते हुए एक आधुनिक परिघटना के रूप में साम्प्रदायिकता की समझ बनानी होगी तथा संकटग्रस्त पूँजीवाद की विचारधारा और राजनीति के रूप में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार का विश्लेषण प्रस्तुत करना होगा। हमें यह स्पष्ट करना होगा कि भारत में धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी उभार यहाँ की पूँजीवादी व्यवस्था के सर्वग्रासी संकट की राजनीतिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति होने के साथ ही, पुनरुत्थान और विपर्यय के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में, धार्मिक कट्टरपन्थ के विश्वव्यापी उभार का भी एक हिस्सा है। इसका सम्बन्ध मूलगामी तौर पर, विश्व पूँजीवाद के ढाँचागत संकट से है, आर्थिक कट्टरपन्थ की वापसी के दौर से है तथा बुर्जुआ जनवाद के निर्णायक विश्व-ऐतिहासिक पराभव के दौर से है।

यह सर्वहारा की अवस्थिति नहीं हो सकती कि वह निर्गुण भक्ति आन्दोलन के सहारे, गांधीवादी मानवतावाद के सहारे या नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के सहारे या संविधान पर ख़तरे की दुहाई देते हुए साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का विरोध करे। कबीर और निर्गुण भक्ति आन्दोलन की सन्त परम्परा जनता की महान सांस्कृतिक परम्परा है, पर यह आन्दोलन मध्ययुगीन सामन्ती निरंकुश स्वेच्छाचारिता, ब्राह्मणवादी जातिगत उत्पीड़न और कर्मकाण्डों के विरुद्ध किसानों-दस्तकारों के “नये धार्मिक” तर्कों पर ही आधारित था। आज का धार्मिक कट्टरपन्थ मध्ययुगीन प्रतिक्रियावादी अधिरचना के बहुतेरे तत्त्वों को अपनाए हुए है, लेकिन यह एक आधुनिक परिघटना है, इसकी जड़ें वित्तीय पूँजी के वैश्विक तंत्र और भारतीय पूँजीवादी राज, समाज, उत्पादन और संस्कृति की रुग्णता में हैं। गांधी की आत्मा का आवाहन भी साम्प्रदायिकता के प्रेत से निपटने में काम नहीं आ सकता, क्योंकि गांधी के मानवतावाद में धार्मिक पुराणपन्थ और धार्मिक `यूटोपिया´ का जो स्थान था, उसके चलते धर्म के धार्मिक कट्टरपन्थी इस्तेमाल के विरुद्ध वह आज जनता के वैचारिक सांस्कृतिक अस्त्र की भूमिका निभाने में कतई अक्षम हो चुका है। एक मरियल किस्म के भौतिकवाद की ज़मीन पर खड़ी नेहरू की धर्मनिरपेक्षता को भी आज पुनर्जीवित कर पाना ठीक उसी प्रकार सम्भव नहीं है जिस प्रकार नेहरूवादी “समाजवाद” के दिनों को वापस लौटा लाना।

यह इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुसंगत समझ का अभाव ही है कि भगवान सिंह जैसे रचनाकार साम्प्रदायिकता को सुनिश्चित सामाजिकार्थिक भौतिक आधार से उद्भूत सांस्कृतिक-राजनीतिक परिघटना के रूप में नहीं बल्कि एक मनोवैज्ञानिक समस्या या रुग्णता के रूप में देखते हैं (`उन्माद´ उपन्यास)।

जहाँ तक धार्मिक कट्टरपन्थ के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यावहारिक-आन्दोलनात्मक कार्रवाइयों का सम्बन्ध है, इनका स्वरूप अत्यन्त संकुचित, अनुष्ठानिक और कुलीनतावादी है तथा इनकी अन्तर्वस्तु मुख्यत: सामाजिक जनवादी है। वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों की अधिकांश कार्रवाइयाँ शहरी मध्यवर्ग तक सीमित हैं। संघ परिवारी फ़ासिस्टों की आक्रामक कार्रवाइयों के विरुद्ध दिल्ली-बम्बई के अभिजात सांस्कृतिक अड्डों पर रस्मी विरोध-प्रदर्शन, साम्प्रदायिक दंगा ग्रस्त क्षेत्रों में टीमें भेजना और रिपोर्टें (वह भी प्राय: अंग्रेज़ी में) जारी करना, उन्नत चेतना वाले शिक्षित मध्यवर्ग तक सीमिति साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ-कहानी-निबन्ध आदि लिखना, कुछ गोष्ठी-सेमिनार व अन्य आयोजन तथा कभी-कभार कुछ नुक्कड़ नाटक जैसे कार्यक्रम – विगत लगभग डेढ़ दशक के फ़ासीवादी उभार के ग्राफ के समान्तर हमारी सांस्कृतिक जन-कार्रवाइयों की यही स्थिति है। दरअसल, राजनीतिक दायरे में संसदमार्गी वामपन्थ संसदीय-संवैधानिक सीमान्तों के भीतर, मुख्यत: संसदीय जनवाद की हिफ़ाज़त के नारे के साथ, मतदान की राजनीति को धुरी बनाकर, फ़ासीवाद का जैसा विरोध कर रहा है, काफी कुछ वैसा ही सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हो रहा है।

फ़ासीवाद की वैचारिक समझ के लिए गम्भीर विमर्श और जनता के जनवादी अधिकारों पर फ़ासिस्ट डकैती का फौरी विरोध ज़रूरी है, लेकिन सवाल यह है कि फासिज्म के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष करने वाले मज़दूर वर्ग और बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी को जागृत, शिक्षित और गोलबन्द करने के लिए हम क्या कर रहे हैं? धार्मिक कट्टरपन्थ के हर पहलू पर सीधी-सादी भाषा में पर्चे, पुस्तिकाएँ लिखकर उनका व्यापक वितरण, औद्योगिक क्षेत्रों में और गाँव के ग़रीबों के बीच गीतों-नाटकों आदि के ज़रिए व्यापक शिक्षा और प्रचार के काम क्यों नहीं संगठित हो पा रहे हैं? क्या इसके लिए वामपन्थी लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के भीतर व्याप्त मध्यवर्गीय कुलीनता-कायरता और सुविधाभोगी स्वार्थपरता ज़िम्मेदार नहीं है?

हमें याद रखना होगा कि मज़दूरों और अन्य मेहनतकश वर्गों के बीच धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी राजनीति के असली “चाल-चेहरे-चरित्र” को नंगा करना हमारा सर्वोपरि दायित्व है। सच्चे वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों को याद रखना होगा कि फ़ासीवाद के रस्मी सामाजिक जनवादी संशोधनवादी विरोधों ने प्रकारान्तर से उसकी मदद ही की है। सामाजिक-जनवादी विभ्रमों से छुटकारा पाए बग़ैर मध्यवर्ग का रैडिकल जनवादी हिस्सा भी धार्मिक कट्टरपन्थ के विरुद्ध आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार नहीं हो सकेगा और सर्वहारा वर्ग के साथ क्रान्तिकारी संयुक्त मोर्चा में शामिल नहीं हो सकेगा। तकरीबन 75 वर्षों पहले कही गई भगतसिंह की ये बातें आज भी प्रासंगिक हैं और सांस्कृतिक मोर्चे के सेनानियों को भी इन पर अवश्य ही ग़ौर करना चाहिए, “लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब मेहनतकशों और किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए। और इनके हत्थे चढ़ कुछ नहीं करना चाहिए। संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता और देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा। इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जाएँगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी…” (साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज´)

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कला-साहित्य-संस्कृति में “लोकवाद” और “स्वदेशीवाद” का विरोध करो!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

प्रतिक्रिया के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में विश्व-पूँजी की संयुक्त शक्ति ने जनता के जीवन पर जो सर्वतोमुखी हमला बोला है, राजनीति की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी उसका प्रतिरोध भविष्य के बजाय अतीत की ज़मीन पर खड़े होकर करने की एक पराजयवादी-पुनरुत्थानवादी और लोकरंजकतावादी प्रवृत्ति मौजूद है। इस प्रवृत्ति के प्रभाव-उच्छेदन के बिना, एक वैज्ञानिक इतिहास-दृष्टि के आधार पर, जनता के सांस्कृतिक आन्दोलन का पुनर्निर्माण नहीं किया जा सकता। विस्तार से बचते हुए, हम अपनी बात यहाँ कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहेंगे।

पहले “लोकवाद” के कुछ उदाहरण लें। आज भारत जैसे देशों में जो रुग्ण-निरंकुश किस्म का पूँजीवादीकरण हो रहा है, वह पूँजीवादी रूपान्तरण के क्लासिकी ऐतिहासिक उदाहरणों से सर्वथा भिन्न है। यहाँ कुछ भी सकारात्मक नहीं है। सामन्ती पार्थक्य की जगह पूँजीवादी अलगाव, सामन्ती निरंकुश स्वेच्छाचारी तंत्र की जगह पूँजीवादी सर्वसत्तावाद। एक पुरातन आपदा की जगह एक नूतन विपदा जिसने पुरातन के कई सांस्कृतिक मूल्यों को ज्यों का त्यों अपना लिया है। हमारे कला-साहित्य में अकसर उन चीज़ों के लिए शोकगीत या रुदन के स्वर सुनाई पड़ते हैं, जिन्हें इतिहास की अनिवार्य गति से नष्ट होना ही था। जैसे कविगण कभी-कभी तो उत्पादन और दैनिन्दन इस्तेमाल की उन पुरानी चीज़ों को भी बहुत आह भरते हुए याद करते हैं जो अन्य चीज़ों द्वारा विस्थापित कर दी गई और जिन्हें स्वाभाविक गति से, अतीत की वस्तु बन ही जाना था क्योंकि यही इतिहास का शाश्वत नियम है। लोटा, दातुन और कठही हल के लिए रोने की ज़रूरत नहीं। कठही हल की जगह ट्रैक्टर को आना ही था। मशीनों को हर हाल में मानवविरोधी चित्रित करना भी एक ग़ैर सर्वहारा, बुर्जुआ पर्यावरणवादी नज़रिया है। मशीनें मानवीय कौशल और चिन्तन की महान उपज हैं, दोष मशीनों का नहीं बल्कि उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व की व्यवस्था का है जिनके चलते मशीनें मुनाफे की अन्धी हवस का उपकरण बनकर मनुष्य और प्रकृति को निचोड़कर तबाह कर डालती हैं।

इसी तरह की अतीतगामी दृष्टि वाले रचनाकार अकसर पूँजीवादी अलगाव के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करते हुए प्राकृतिक अर्थव्यवस्था वाले प्राक्-पूँजीवादी समाजों की उस रागात्मकता और उन काव्यात्मक सम्बन्धों को महिमामण्डित करने लगते हैं जिन्हें पूँजी की सत्ता ने आने-पाई के ठण्डे पानी में डुबो दिया। प्राक्पूँजीवादी, ग्रामीण समाजों की रागात्मकता का काल्पनिक आदर्शीकरण करने वाले प्राय: उसकी पृष्ठभूमि में मौजूद सामन्ती निरंकुशता तथा स्त्रियों और दलितों के बर्बर दमन की अनजाने ही अनदेखी करने की कोशिश करते हैं और श्रम की संस्कृति के वर्चस्व वाले नये, भावी समाज को नहीं बल्कि अनिवार्यत: नष्ट होने वाले अतीत को अपना प्रेरणा-स्रोत बनाने लगते हैं। इसे किसानी “समाजवादी” यूटोपिया का एक रूप भी कहा जा सकता है।

“लोकवाद” का एक और कूपमण्डूकतापूर्ण संस्करण यह भी है कि कई प्रगतिशील कवि-लेखक गण नागर जीवन की हृदयहीनता, नग्न बुर्जुआ लूट-खसोट, आपाधापी और अलगाव की आलोचना करते हुए आहें भरते हुए गाँवों को याद करते हैं, और वर्ग-निरपेक्ष रूप में शहर की हृदयहीनता और गाँवों के “सामूहिक जीवन” की तुलना करते प्रतीत होते हैं। यह `अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है´ का नया संस्करण है। यह सही है कि पूँजीवादी समाज में गाँव और शहर का अन्तर लगातार बढ़ता जाता है और शहर की समृद्धि गाँवों को लूटकर ही फलती-फूलती है। पर इस तथ्य को वर्ग-निरपेक्ष रूप में नहीं देखा जा सकता। शहरों में भी बहुंसख्यक आबादी निचोड़े जाने वाले सर्वहारा और अर्द्धसर्वहारा की और परेशानहाल निम्न-मध्यवर्ग की ही है। एक छोटी सी आबादी है जो गाँवों को लूटती है और शहर के उजरती गुलामों को भी। जो शहर की भारी मज़दूर और निम्न-मध्यवर्गीय नौकरीपेशा आबादी है वह गाँवों से ही पूँजी की मार से दर-बदर होकर शहर आई है और यह दुरवस्था फिर भी इतिहास की दृष्टि से प्रगतिशील कदम है। जो आबादी गँवई सुस्ती और कूपमण्डूकता के दलदल से बाहर पूँजीवादी जीवन की बर्बर हृदयहीन अफरातफरी के बीचोबीच धकेल दी गई है, वही पूँजी की सत्ता के लिए कब्र खोदने का काम करेगी। ग्रामीण जीवन की शान्ति के लिए बिसूरने वाले सफेदपोश प्रगतिशील प्राय: ग्रामीण कुलीनों (प्राय: सवर्णों) की ही अगली पीढ़ियाँ हैं। यदि वे ग़रीब किसान, खेत मज़दूर या दलित के बेटे होते या स्त्री होते तो उजरती गुलामी का शहरी नर्क भोगते हुए ग्रामीण निरंकुशता, सुस्ती और कूपमण्डूकता के अँधेरे में वापस नहीं जाना चाहते। जाएँगे तो वे भी नहीं जो गाँवों को खूब याद करते हैं। दरअसल यह अपराध-बोध की कुछ वैसी ही रिसती हुई गाँठ है, जैसी गाँठ के चलते, अनिवासी धनिक भारतीय पाश्चात्य समृद्धि की पत्तल चाटते हुए भारत और भारतीय संस्कृति को खूब याद करते हैं और इस नाम पर यहाँ की सबसे प्रतिक्रियावादी शक्तियों और सबसे प्रतिक्रियावादी मूल्यों के पक्ष में जा खड़े होते हैं। प्रगतिशीलता का ठप्पा बरकरार रखने और “नागर-बोध ग्रस्त” होने के आरोप से बचने के लिए बहुतेरे रचनाकार दशकों पुरानी स्मृतियों और चन्द एक दिनों के दौरों और अख़बारी तथ्यों के आधार पर आज के ग्रामीण जीवन के यथार्थ का कलात्मक पुनर्सृजन करने की कोशिश करते हैं जो वास्तविकता से कोसों दूर होता है। ऐसा वे इसलिए भी करते हैं कि स्मृतियों के सहारे गाँव पर लिखना आसान है, पर उन्हीं के शहरों में उजरती गुलामी का जो रौरव नर्क एक समान्तर दुनिया के रूप में मौजूद है, वहाँ के जीवन के रूबरू होने लायक मज़बूती उनके दिल-गुर्दे में कतई नहीं है।

“लोकवाद” के अन्य कई रूप हैं। जैसे कि संगीत की दुनिया को लें। क्रान्तिकारी संगीत की दुनिया में लोक संगीत से काफी कुछ हूबहू उधार ले लेने – लोकगीतों की पैरोडी करने तक की प्रवृत्ति मौजूद है। लोक गीत-संगीत की परम्परा हमारी अपनी परम्परा है और उससे काफी-कुछ लेना होगा, लेकिन हूबहू नहीं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक के साथ छाँट-बीनकर। लोकसंगीत क्रान्तिकारी गण संगीत का समानार्थक नहीं हो सकता। लोकसंगीत का आधार आदिम जनजातीय जीवन की सामूहिकता, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के किसानी जीवन और दस्तकारी में मौजूद रहा है और कालान्तर में उसका स्थान इतिहास का संग्रहालय ही होगा। उसके कुछ संघटक तत्त्व नये सर्वहारा संगीत में, निरन्तरता के पहलू के रूप में मौजूद रहेंगे। लोकसंगीत सदियों के सांस्कृतिक संस्कारों-आदतों के चलते जनता में लोकप्रिय होता है, लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं कि नई क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु के लिए उसके रूप उपयुक्त होंगे।

नुक्कड़ नाटकों और रंगमंच पर भी लोकरंजकतावाद अनेक रूपों में मौजूद है। प्राय: देखने में यही आता है कि प्रगतिशील नाटककार और नाट्य-निर्देशक भी तर्कबुद्धि, विश्वदृष्टिकोण और आलोचनात्मक विवेक पर बल देने वाले `एपिक थिएटर´ या द्वन्द्वात्मक थिएटर की जगह भावना, अनुभूति और तदनुभूति पर बल देने वाले परम्परागत `ड्रामेटिक थिएटर´ की शैली और तकनीक को ही अपनाते हैं। नुक्कड़ नाटकों में कुछ हद तक पहली धारा की शैली को अपनाया गया है, लेकिन फिर भी दर्शकों को भावनात्मक आवेश से आप्लावित कर देने वाली शैली भी काफी चलन में है, जहाँ विचार पक्ष काफी कमज़ोर पड़ जाता है, जैसाकि प्राय: गुरुशरण सिंह के नाटकों में दिखाई पड़ता है।

“लोकवाद” का ही एक रूप “स्वदेशीवाद” भी है। राजनीति की तरह कला-साहित्य में भी आज यह प्रवृत्ति काफी मज़बूत है। आज आम जनता के जीवन और संस्कृति पर विश्व-पूँजी के चौतरफा हमले का प्रतिकार वामपन्थी धारा का भी एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रवाद की उस ज़मीन पर खड़ा होकर करने की कोशिश कर रहा है, जिस पर खड़े होकर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई लड़ी गई थी। यह अजीब-सी बात है कि कुछ पुराने गाधीवादी, सर्वोदयी, मध्यमार्गी सुधारवादी और एन.जी.ओ. वाले ही नहीं बल्कि क्रान्तिकारी वामपन्थी भी भूमण्डलीकरण के विरुद्ध “स्वदेशी” का झण्डा उठाए हुए हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और उनके सहयोगियों के विरुद्ध गांधीवाद द्वारा सुझाए गए स्वदेशी और स्वराज्य के राष्ट्रवादी नारों को आज का रणनीतिक नारा बनाना नये दौर की लड़ाई को पुराने दौर की लड़ाई के हथियारों से लड़ने की बचकानी कोशिश है। आज जनता की वास्तविक मुक्ति की लड़ाई “स्वदेशी” या किसी अन्य पूँजीवादी राष्ट्रवादी नारे के झण्डे तले लड़ी ही नहीं जा सकती। अपने बीच के तमाम अन्तरविरोधों के बावजूद, आज देश की बड़ी पूंजी और छोटी पूँजी – दोनों की नियति, हित और अस्तित्व साम्राज्यवाद के साथ जुड़ चुके हैं। अपने आपसी अन्तरविरोधों के बावजूद, देश के सभी छोटे-बड़े पूँजीपति साम्राज्यवादी पूँजी के निर्बाध प्रवाह के लिए राष्ट्रीय अर्थतंत्र को पूरी तरह खोल देने के पक्षधर हैं। उनके किसी भी हिस्से का चरित्र राष्ट्रीय या जनपक्षधर नहीं रह गया है। आज का मूल प्रश्न यह नहीं है कि विदेशी शासन और विदेशी पूँजी के वर्चस्व को नष्ट करके देशी उद्योग-धंधों को फलने-फूलने का अवसर दिया जाए। आज का मूल प्रश्न यह है कि पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली, सामाजिक ढाँचा और संस्कृति अब पूरी तरह मानवद्रोही हो चुकी है। इतिहास इन्हें नष्ट करके ही आगे डग भर सकता है। कह सकते हैं कि जो सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक मिशन था, वह अब फौरी कार्यभार बन चुका है। आज का नया नारा यही हो सकता है – उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले सामाजिक वर्गों के पूर्ण नियंत्रण के लिए संघर्ष! ज़ाहिरा तौर पर, सांस्कृतिक वर्चस्व का संघर्ष भी इसी संघर्ष का अनिवार्य और आधारभूत सहवर्ती होगा। साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी जनमुक्ति क्रान्तियाँ आज इतिहास के एजेण्डे पर हैं। राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के दौर के शौर्यपूर्ण संघर्षों-कुर्बानियों से हम प्रेरणा ले सकते हैं और संघर्ष के रूपों से काफी कुछ सीख सकते हैं, पर उस दौर के रणनीतिक नारे आज के नारे नहीं हो सकते।

इतिहास में यह ग़लती पहले भी होती रही है कि मुक्तिकामी जनता के हरावल, नये संघर्षों को गौरवमण्डित करने के लिए, नई प्रेरणा लेने के लिए अतीत की क्रान्तियों का पुन:स्मरण करने के बजाय उन्हीं की भोंडी नकल करने लग जाते रहे हैं। चाहते थे वे अतीत की क्रान्तियों से क्रान्तिकारी स्पिरिट लेना और हुआ यह कि वे अतीत के शरणागत हो गए, अतीत के नारों से नई लड़ाई लड़ने की कोशिश करने लगे और क्रान्ति की आत्मा के पुनर्जागरण के बजाय उसकी प्रेतात्मा मँडराने लगी। यह स्वाभाविक है कि अतीत के महान संघर्षों से अभिभूत होकर, हम अनजाने ही उनकी नकल करने लग जाते हैं। महान क्रान्तियाँ भावी क्रान्तियों के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करने के बजाय सर्जनात्मक अन्वेषण को जकड़ने वाली बेड़ियों का काम करने लगती हैं और नये का अन्वेषण करने के बजाय हम अतीत से समस्याओं का समाधान माँगने लगते हैं। कार्ल मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी की उदीयमान सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम बसन्त-प्लावन के दौर में कहा था, “उन्नीसवीं शताब्दी की सामाजिक क्रान्ति अतीत से नहीं वरन् भविष्य से ही अपनी प्रेरणा प्राप्त कर सकती है।” सर्वहारा क्रान्ति के नये विश्व ऐतिहासिक चक्र की समारम्भ-बेला में यह महान युक्ति एक बार फिर, नये अर्थ-सन्दर्भो के साथ, प्रासंगिक हो उठी है। जब श्रम और पूँजी की शक्तियाँ आमने-सामने खड़ी हों तो क्रान्तिकारी कला-साहित्य का काम श्रम की संस्कृति को सर्जना का मार्गदर्शक बनाना और श्रम की दुनिया में क्रान्ति की अन्तश्चेतना का पुनर्सृजन करना है। अतीत के शरणागत होने, जिसे इतिहास की नैर्सैगिक गति से नष्ट होना है उसके लिए शोकगीत गाने तथा अतीत से नारे, आदर्श, प्रतिमान और प्रादर्श उधार लेने की प्रवृत्ति से मुक्त होना होगा। जनता के पास संस्कृति के नाम पर जो कुछ भी मौजूद है, उन सबको प्रगतिशील मानने का नज़रिया एक अवैज्ञानिक नज़रिया है। यही “लोकवाद” है जिससे हमें छुटकारा पाना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाए बिना सांस्कृतिक मोर्चे पर सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन के कार्यभारों को पूरा कर पाना सम्भव नहीं होगा। दलित-मुक्ति के प्रश्न की उपेक्षा करके सर्वहारा क्रान्ति या जन-मुक्ति की परियोजना के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। सहशताब्दियों से सर्वाधिक व्यवस्थित और सर्वाधिक बर्बर शोषण-दमन के शिकार दलित देश की कुल आबादी में लगभग तीस प्रतिशत हैं और उनमें से 90 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की कतारों में शामिल हैं। यह आबादी यदि सम्पूर्ण जनता की मुक्ति और स्वतंत्रता-समानता की वास्तविक स्थापना की परियोजना के रूप में सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति को स्वीकार नहीं करेगी तो उसकी विजय असम्भव है। दूसरी ओर, समाजवादी क्रान्ति परियोजना से जुड़े बिना दलित-मुक्ति का प्रश्न भी असमाधानित ही बना रहेगा (क्योंकि पूँजीवादी दायरे के भीतर सुधार की सम्भावनाएँ अब समाप्तप्राय हैं) तथा समाजवादी क्रान्ति को लगातार चलाए बिना समाज को उस मुकाम तक पहुँचाया ही नहीं जा सकता जब जाति और धर्म के आधार पर किसी भी तरह का अन्तर बचा ही नहीं रह जाएगा।

इस प्रश्न की द्वन्द्वात्मक समझ की कमी के अभाव में अतीत में कम्युनिस्ट आन्दोलन और वाम जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन में वर्ग-अपचयनवाद (class-reductionism) का विचलन गम्भीर रूप में मौजूद था। आज इसी विचलन का दूसरा छोर वर्ग-विसर्जनवाद (class-liquidationism) या वर्ग-निषेधवाद के रूप में मौजूद है जब इस हद तक के फतवे दिए जा रहे हैं कि वर्ग-विश्लेषण की क्लासिकी मार्क्सवादी पद्धति से भारतीय जाति-व्यवस्था का विश्लेषण ही सम्भव नहीं है। दलित मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के “दलितवादी” चिन्तन के प्रति निहायत अनालोचनात्मक, आत्मसमर्पणकारी, समन्वयवादी रवैया अपनाया जा रहा है। यह एक घातक विसर्जनवादी, सुधारवादी प्रवृत्ति है जिसका आज खूब बोलबाला है। आज हिन्दी में जो दलित-लेखन हो रहा है, वह पक्षधर साहित्य है, प्रतिरोध का साहित्य है, रैडिकल आलोचनात्मक यथार्थवादी साहित्य है। लेकिन यह सच है कि यह सम्पूर्ण दलित आबादी के बजाय, मुख्यत: उस मध्यवर्गीय दलित का प्रातिनिधिक स्वर है, जिसका आर्थिक प्रश्न तो एक हद तक हल हो चुका है और अब सामाजिक अपमान व भेदभाव ही जिसके लिए केन्द्रीय प्रश्न है। इसीलिए समकालीन दलित लेखन का तेवर चाहे जितना तीखा हो, वह ठोस विकल्प के रूप में इसी व्यवस्था के भीतर कुछ सुधारों की माँग करता है, दलित-प्रश्न की समूल समाप्ति की कोई परियोजना नहीं प्रस्तुत करता तथा क्रान्ति के नाम से बिदकता है। यह अनायास नहीं कि जिन आन्दोलनों-संघर्षों में दलित आबादी की बहुतायत होती है या जो आन्दोलन गाँवों में दलित उत्पीड़न के ही किसी मुद्दे पर होते हैं उनसे यह दलित `भद्रलोक´ कोसों दूर रहता है। दलित साहित्य चूँकि अम्बेडकरवाद को ही अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त मानता है, अत: दलित अस्मिता की पहचान और उनके प्रतिरोध-आन्दोलन को संगठित करने में डा. अम्बेडकर की ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार करते हुए भी यह ज़रूरी है कि उनके विचारों की विस्तृत, तर्क और तथ्यपूर्ण विवेचना की जाए। प्रश्न यह है कि अम्बेडकर की दार्शनिक विश्वदृष्टि क्या थी? उनके मूलभूत राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचार क्या थे? दलित हितों के अर्जन और हिफाजित के अन्तरिम प्रावधानों और प्रतिरोध आन्दोलन के प्रोग्राम के साथ ही क्या डा. अम्बेडकर के पास दलित-प्रश्न के सम्पूर्ण और अन्तिम समाधान की कोई दूरगामी सांगोपांग परियोजना थी? ब्राह्मणवाद और जाति प्रश्न का `एक्सपोज़र´, विश्लेषण और भर्त्सना ज़रूरी है, लेकिन लगातार, लम्बे समय तक यहीं रुके रहना और इसे ही दलित आन्दोलन का पूरा प्रोग्राम बना देना कहाँ तक उचित है?

हम समझते हैं कि सामाजिक बदलाव एक वैज्ञानिक प्रश्न है और विज्ञान के प्रश्न निस्संकोच, बेलागलपेट बहस की माँग करते हैं। दलित-प्रश्न को लेकर मार्क्सवाद पर अधूरेपन का लेबल मात्र लगाने के बजाय इस पर मुद्देवार, विस्तृत बहस होनी चाहिए, अम्बेडकर के विचारों और दलित आन्दोलन के इतिहास पर भी बहस होनी चाहिए तथा दलित प्रश्न के वर्ग-विश्लेषण के साथ-साथ समकालीन दलित साहित्य को भी विश्लेषण के एजेण्डे पर लाया जाना चाहिए। तर्क-विचारहीन दलित-हित समर्थन का शोरगुल आज दलित प्रश्न पर सही कार्यदिशा अपनाने में गम्भीर विघ्न पैदा कर रहा है।

स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

समाजशास्त्रीय विमर्श की ही भाँति कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी आज बुर्जुआ नारीवाद के विविध नये-नये रूपों और किस्मों का खूब बोलबाला है। नववामपन्थी “मुक्त चिन्तक” स्त्री-प्रश्न पर क्लासिकी मार्क्सवाद के “अधूरेपन” और “यांत्रिकता” को स्वीकारते हुए बुर्जुआ नारीवादियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हैं।

एक गहरे वैचारिक कुचक्र के तहत सर्वहारा क्रान्ति और पार्टी-सिद्धान्त को पुरुष स्वामित्ववाद और स्त्री-उत्पीड़न के तत्त्वों से युक्त बताया जा रहा है और स्त्री-आन्दोलन की स्वायत्तता की वकालत करते हुए आधी आबादी को जन-मुक्ति-संघर्ष की ऐतिहासिक परियोजना से काटकर अलग करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। बुर्जुआ नारीवाद की सभी किस्में उन उच्च-मध्यवर्गीय स्त्रियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनका `स्वर्ग´ इसी व्यवस्था में सुरक्षित है। वे पुरुष-वर्चस्ववाद का विरोध तो करना चाहती हैं, लेकिन इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना में जमी उसकी जड़ों को नहीं देख पातीं क्योंकि इस व्यवस्था के वर्ग-उत्पीड़क चरित्र से उन्हें कोई शिकायत नहीं। एन.जी.ओ. प्रायोजित नारीवादियों का एक हिस्सा स्त्रियों, दलितों, विस्थापितों के उत्पीड़न और पर्यावरण के प्रश्न पर अलग-अलग जनसंघर्षों की हिमायत करता है लेकिन इन सबको एक ही मुक्ति-परियोजना के अभिन्न अंगों के रूप में नहीं देखता और विचारधारा और राजनीति के प्राधिकार को स्वीकार नहीं करता। यह अराजकतावाद और संघाधिपत्यवाद (syndicalism) का ही एक नया रूप है। भारत में तीव्र पूँजीवादीकरण से हुए मध्यवर्ग के विस्तार और बुर्जुआ संस्कृति के आच्छादनकारी प्रभाव ने बुर्जुआ नारीवाद के सामाजिक आधार को व्यापक बनाया है। सर्वहारा क्रान्तियों की विफलता से पैदा हुए परिवेश और बुर्जुआ वैचारिक-सांस्कृतिक प्रचार के प्रभाव में, निम्न-मध्यवर्गीय शिक्षित युवा स्त्रियों का एक बहुत बड़ा रैडिकल हिस्सा भी व्यापक मेहनतकश आबादी और आम मेहनतकश स्त्रियों के संघर्षों से जुड़ने के बजाय फिलहाल बुर्जुआ नारीवादी लहर के साथ बह रहा है। साहित्य-कला-संस्कृति की दुनिया में जारी स्त्री-विमर्श में पुरुष-वर्चस्ववाद के प्रश्न को एक समाज-निरपेक्ष, स्वायत्त प्रश्न के रूप में ही प्रस्तुत किया जा रहा है। स्त्री-मुक्ति के किसी व्यावहारिक सुदीर्घ कार्यक्रम के बिना सिर्फ़ गर्मागर्म लफ्फजी का अविराम सिलसिला जारी है। रचनात्मक लेखन का भी परिदृश्य हूबहू ऐसा ही है।

इस बेहद ज़रूरी और बुनियादी सवाल पर पुरज़ोर हस्तक्षेप की ज़रूरत है। नारीवादी विचारों और नारीवादी रचनाओं की सुव्यवस्थित आलोचना और मीमांसा प्रस्तुत की जानी चाहिए। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मार्क्सवाद स्त्री-प्रश्न को हल करने का कोई मॉडल या बना-बनाया फार्मूला नहीं प्रस्तुत करता बल्कि स्त्री की पराधीनता के इतिहास और आधारभूत कारणों की पड़ताल करता है तथा वर्गों के उन्मूलन की सुदीर्घ ऐतिहासिक परियोजना के एक अंग के तौर पर स्त्री-उत्पीड़न की समाप्ति की भी तर्कसम्मत सोच उसी प्रकार प्रस्तुत करता है जिस प्रकार मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण-उत्पीड़न के हर रूप के उन्मूलन की भविष्यवाणी करता है। आम स्त्रियों के बीच यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा क्रान्ति की तैयारी के प्रारम्भ-बिन्दु से ही स्त्री-प्रश्न उसके एजेण्डे पर अनिवार्यत: उपस्थित रहेगा, लेकिन स्त्री-पुरुष असमानता के भौतिक-ऐतिहासिक आधारों के नष्ट होने के बाद भी यौन-भेद और पुरुष-वर्चस्व की सहशताब्दियों पुरानी संस्कृति समाज में एक लम्बे समय तक मौजूद रहेगी और सतत् सांस्कृतिक क्रान्तियों की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही उसका निर्मूलन सम्भव हो सकेगा। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि स्त्री-मुक्ति की तमाम बुर्जुआ नारीवादी अवधारणाएँ इस प्रश्न के सम्पूर्ण हल की कोई दिशा नहीं बतलातीं, क्योंकि वे खुशहाल मध्यवर्गीय स्त्रियों से नीचे की स्त्रियों को सम्बोधित नहीं होतीं। साथ ही, मार्क्सवाद के नाम पर, स्त्री-प्रश्न पर प्रस्तुत की जाने वाली वर्ग-अपचयनवादी अवस्थिति की भी प्रखर आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

भारत में यह नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक अनिवार्यत: आधारभूत कार्यभार है कि व्यापक जनसमुदाय के बीच अन्धविश्वास, धार्मिक कुरीतियों, मध्ययुगीन निरंकुशता, नई बुर्जुआ निरंकुशता और धार्मिक मूलतत्त्ववादी फासीवादी विचारों से निरन्तर सिंचित-पोषित स्त्री-उत्पीड़न और पुरुष-वर्चस्व के तमाम रूपों के विरुद्ध एक रैडिकल सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार आन्दोलन की उद्वेलनकारी लहर पैदा की जाए। इसके बाद ही सामाजिक-राजनीतिक सरगर्मियों में आधी आबादी की पहलकदमी और भागीदारी बढ़ाने के प्रयास सार्थक और प्रभावी हो सकते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा के राजनीतिक और सांस्कृतिक हरावल अपने निजी आचरण-व्यवहार से यह सिद्ध करें कि वे दोहरे-दुरंगे लोग नहीं, बल्कि स्त्री-मुक्ति के सच्चे-सक्रिय पक्षधर हैं। समाज और व्यावहारिक स्थितियों की दुहाई देकर, निजी और पारिवारिक जीवन में पुरुष-वर्चस्ववादी आचरण करने वाले (जैसे घरेलू गुलामी को प्रश्रय देने वाले, दहेज व जाति-धर्म आधारित विवाहों को स्वीकार करने वाले, स्त्री-विरोधी सामाजिक आचारों को व्यावहारिकता की दुहाई देकर स्वीकारने वाले, अपने परिवार में प्रेम-विवाह जैसी चीज़ों का प्रत्यक्ष-परोक्ष विरोध करने वाले, आदि-आदि) पाखण्डी-कायर-धूर्त मध्यवर्गीय प्रगतिशीलों और संशोधनवादी कम्युनिस्टों ने स्त्री-समुदाय को सर्वहारा क्रान्ति के प्रवाह से काटकर अलग करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। अत: इस प्रश्न पर सांस्कृतिक आन्दोलन की शुरुआत हमें अपने निजी जीवन और आचरण से करनी होगी।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यक्तिवाद, अराजकतावाद, उदारतावाद का विरोध करो!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

आज ऐसे ही कथित वामपन्थी लेखकों-संस्कृतिक कर्मियों का बोलबाला है जो “मुक्त लोग” हैं। राजनीति पर खुली-दो टूक चर्चा से वे बिदकते-कतराते हैं। किसी भी तरह का अनुशासन उन्हें अपनी “सर्जनात्मकता” के हाथों की हथकड़ी प्रतीत होती है। वे अकेले अपने दम-बूते जनता और इतिहास की “सेवा” करते हैं। वास्तव में यह मध्यवर्गीय अराजकतावाद है, व्यक्तिवाद और फिलिस्टाइनवाद है। सामूहिक शक्ति और सर्जना का अनुशासित योग भौतिक उत्पादन के लिए ज़रूरी है और आत्मिक उत्पादन के लिए भी। इस बात का विरोध करने वाले समष्टिगत सर्जना के भविष्य और उत्पादक श्रमजीवी के प्रतिनिधि लेखक नहीं हो सकते। हम बेझिझक, बल देकर यह कहना चाहते हैं कि यह स्थापना आज भी पूरी तरह सही है कि सर्वहारा वर्ग का कला-साहित्य समूचे सर्वहारा क्रान्तिकारी कार्य का एक अंग है। जैसाकि लेनिन ने कहा था, यह समूची क्रान्तिकारी मशीनरी के दाँते और पेंच के समान है। “कला और साहित्य राजनीति के मातहत होते हैं, लेकिन वे खुद भी राजनीति पर अपना महान प्रभाव डालते हैं। क्रान्तिकारी कला और साहित्य समूचे क्रान्तिकारी कार्य का एक अंग हैं, ये दोनों इस कार्य के दाँते और पेंच हैं, तथा ये कुछ अन्य अपेक्षाकृत अधिक महत्त्वपूर्ण पुर्जों की तुलना में कम महत्त्वपूर्ण और कम आवश्यक भले हीं हों, मगर समूची मशीनरी के अनिवार्य दाँते और पेंच हैं तथा समूचे क्रान्तिकारी कार्य के अनिवार्य अंग हैं।” – (माओ त्से-तुङ  : येनान कला-साहित्य गोष्ठी में भाषण)

हम इसे अपरिहार्य समझते हैं, इसलिए अधिकांश प्रगतिशील सुजान-सर्जकों के लिए उबाऊ-बिदकाऊ बात होते हुए भी इस “पुरानी स्थापना” को दुहराना चाहते हैं कि संस्कृति के मोर्चे को राजनीतिक धरातल के वर्ग-संघर्ष से जोड़ना होगा और सांस्कृतिक सृजन और प्रचार के काम को पूरे क्रान्तिकारी उपक्रम का अनिवार्य अंग बनाना होगा। कहा जा सकता है कि सांस्कृतिक मोर्चे पर भी उदारतावाद के विरुद्ध संघर्ष आज बेहद ज़रूरी है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ शिशिर-बसंत 2002 से साभार

वामपन्थी” कलावाद-रूपवाद और मध्यवर्गीय लम्पटता का विरोध करो!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

यह बिन्दु भी उपरोक्त बिन्दु से जुटा हुआ है। सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र की पराजय और क्रान्तिकारी वामपन्थी आन्दोलन की विघटन-विफलता के परिणाम जिन रूपों में सामने आए हैं, उनमें से एक यह भी है कि वामपन्थी और जनवादी का लेबल लगाकर घूमने वाले ऐसे “छैलों” की कविता-कहानी-नाटक की दुनिया में भरमार है जो अपने जीवन में तो हर तरह का अवसरवादी कुकर्म करते ही हैं, रचना के धरातल पर भी उनके मूल आग्रह कलावादी होते हैं। ख़ास तौर पर कविता के क्षेत्र में तो रूपवादी “वामपन्थ” का ज़ोर इतना अधिक है कि पुरोगामी और प्रतिगामी की विभाजक रेखा ही वहाँ धूमिल कर दी गई है। इसी तरह कहानी के क्षेत्र में यथार्थवाद के नाम पर प्रकृतवादी आग्रहों के बोलबाले का एक रूप मध्यवर्गीय लम्पटता का घटाटोप भी है। भारतीय जन-जीवन और संस्कृति की तबाही के सबसे नंगे, बर्बर और तेज़ रफ़्तार दौर में फूहड़-कामुक, यौनलोलुप और रुग्ण विवरण “यथार्थ-चित्राण” के नाम पर कहानियों से लेकर आत्मकथाओं के “भोगे हुए यथार्थ” और संस्मरणों के “बनारसी ठाठ” के रूप में खूब प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

इन घटिया प्रवृत्तियों के वास्तविक स्रोत को, इनके वर्ग-चरित्र को सविश्लेषण उजागर करना होगा, सर्वहारा संस्कृति के इन रेशमी रूमालधारियों को, इन भंड़ैतों, छैलों और रागरंग-प्रेमियों को बेनकाब करना होगा और इनके विरुद्ध समझौताविहीन संघर्ष चलाना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर विचारधारात्मक संघर्ष

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

वर्ग-संघर्ष की वैज्ञानिक चेतना को विकसित करने के लिए हमें कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर भी वर्ग-संघर्ष को तीखा करने का काम करना होगा। हमें श्रम की दुनिया में क्रान्ति की वस्तुगत आवश्यकता को एक बार फिर आम जनगण की उद्दाम, दुर्निवार आकांक्षा में रूपान्तरित कर देना है। साहित्य का, समग्र संस्कृति कर्म का कर्तव्य है कि वह लोगों को निराशा और विभ्रमों से छुटकारा दिलाकर तमाम मानवद्रोही शक्तियों और मानवद्रोही व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह में उठ खड़ा होने के लिए तैयार करे। जीवन के अन्य सभी मोर्चों की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हमें आज “नये संघर्षोंको गौरवमण्डित करने के लिए”, “सम्मुख उपस्थित कार्यभार को कल्पना में वृहद आकार देने के लिए”, “एक बार फिर क्रान्ति की आत्मा को जागृत करने के लिए” अतीत के संघर्षों की महानता-महत्ता और वैचारिक परम्परा का पुनरान्वेषण करना है। इस दृष्टि से सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आज की पहली प्राथमिकता वैचारिक कार्य और वैचारिक तैयारियों की है।

किसी भी मोर्चे पर नई तैयारियाँ हर-हमेशा विचारधारात्मक धरातल से ही शुरू होती हैं। भविष्य का विजेता वर्ग अपने विरोधी को सबसे पहले विचारधारात्मक मोर्चे पर ही शिकस्त देता है। सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आज पहली ज़रूरत वैचारिक सफ़ाई और तैयारी की, वैचारिक आक्रमणों के प्रतिकार की और वैचारिक प्रत्याक्रमण की है। ध्यान रखना होगा कि यह बुनियादी काम है, पर एकमात्र नहीं। और यह भी याद रखना होगा कि इसे “अध्ययन-कक्ष के योद्धा” और निठल्ले विमर्शक नहीं, बल्कि जनता के बीच सक्रिय सांस्कृतिक सेनानी ही अंजाम दे सकेंगे। विपर्यय, पुनरुत्थान और संक्रमण के समय में इतिहास का पुनरीक्षण, वर्तमान का विश्लेषण और भविष्य की दिशा तय करने का काम केन्द्रीय बन जाता है, अत: विचार-पक्ष पर केन्द्रीय ज़ोर स्वाभाविक हो जाता है।

अतीत में ऐसा कई बार हुआ है कि ऐतिहासिक संक्रमण कालों में संस्कृति का क्षेत्र विचारधारात्मक संघर्ष का अहम मोर्चा, और कभी-कभी तो मुख्य रंगमंच बन जाता रहा है। यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन-काल के इतिहास की बस हम याद दिलाना चाहेंगे।

लेकिन जब हम कहते हैं कि आज संस्कृति का क्षेत्र विचारधारात्मक संघर्ष का केन्द्रीय रणांगन बना हुआ है तो यह इतिहास-निगमित सूत्र के दुहराने के रूप में नहीं बल्कि इस समय मौजूद स्थिति के वस्तुगत मूल्यांकन के रूप में कहते हैं। हम देखें, राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में तो स्थिति यह है कि वर्तमान परिस्थितियाँ बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों के मुँह से मार्क्सवादी प्रस्थापनाएँ उगलवा रही हैं। सीधे विचारधारा के क्षेत्र में, मार्क्सवादी दर्शन या समाजवादी प्रयोगों की शिक्षाओं को तोड़ने-मरोड़ने का काम तो हो रहा है, पर वास्तव में बुर्जुआ वर्ग कोई नया हमला बोल ही नहीं सका है। जिन मुद्दों पर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारिम्भक दो दशकों तक मार्क्सवाद बुर्जुआ विचारधारा को परास्त कर चुका है, उन्हें ही भाड़े के कलमघसीट कुछ यूँ उठा रहे हैं मानो यह एकदम नई बात हो, मार्क्सवाद पर कोई नया सवाल हो। समाजवाद की फ़िलहाली पराजय को लेकर जो भी बातें की जा रही हैं, उनके उत्तर लेनिन के अन्तिम दौर के चिन्तन से लेकर माओ के सांस्कृतिक क्रान्ति-कालीन चिन्तन तक में मौजूद हैं।

देखा जाए तो अधिक षड्यंत्रकारी और प्रभावी ढंग से, अमूर्त बौद्धिक निरूपणों-सूत्रीकरणों का वाग्जाल रचते हुए, विगत दो दशकों के दौरान जो “सांस्कृतिक विमर्श” हुए हैं और जो नये सामाजिक, सांस्कृतिक और सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त गढ़े गए हैं, उन्होंने द्वन्द्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी जीवन-दृष्टि पर सर्वाधिक प्रभावी चोटें की हैं। इन नये विमर्शों-सिद्धान्तों में हम उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर-मार्क्सवाद, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद, प्राच्यवाद, `सबआल्टर्न´ इतिहास-लेखन आदि-आदि-सभी को शामिल कर रहे हैं। इनके तर्क भी दरअसल नये नहीं हैं। इनमें हीगेल का विदू्रप है और नीत्शे से लेकर स्पेंग्लर तक की अनुगूँजें हैं, पर “सांस्कृतिक विमर्शों” में इन्हें प्रभावी ढंग से नया और समकालीन बनाकर पेश किया जा रहा है। संशोधनवादियों और अकादमिक वामपन्थियों का एक हिस्सा पक्ष-परिवर्तन करके इस जमात में शामिल हो गया है, दूसरा हिस्सा इनसे काफ़ी-कुछ उधार लेकर समन्वयवाद की राह चल रहा है और तीसरा हिस्सा इनका आधा-अधूरा, मरियल और अमूर्त अकादमिक विमर्श की ही भाषा में जवाब दे रहा है। सही ईमानदार, वामपन्थी लेखक-संस्कृतिकर्मी प्राय: दिग्भ्रमित हैं और ख़ास तौर पर जनपक्षधर युवा बुद्धिजीवियों पर इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे सांस्कृतिक मोर्चे की वैचारिक तैयारी और नई कतारों की तैयारी का काम भी प्रभावित हो रहा है।

संस्कृति के मोर्चे पर एक और दृष्टि से नये पुनर्जागरण और नये प्रबोधन के वैचारिक कार्यों को देखना-समझना ज़रूरी है। पुनरुत्थान के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में, वित्तीय पूँजी की “अन्तिम विजय” के इस दौर में, फ़ासीवादी प्रवृत्तियों का नया उभार एक विश्वव्यापी परिघटना है और हमारे देश में भी इनका श्मशान-नृत्य जारी है। वैचारिक धरातल पर, अतीत की ही तरह, इतिहास और संस्कृति के विकृतिकरण पर इनका मुख्य ज़ोर है। इसलिए भी, एक ओर जहाँ इनसे निर्णायक संघर्ष के लिए मेहनतकश जनता की लामबन्दी का काम तेज़ करना होगा, वही संस्कृति के क्षेत्र में इनके मुकाबले के लिए जमकर वैचारिक कार्य करना होगा और व्यापक प्रचार-कार्य भी।

सच पूछें तो आज समूचे बुर्जुआ वर्ग का दर्शन ही तर्कणा और जनवाद के मूल्यों से इतना रिक्त हो चुका है कि फ़ासीवादी विचार-दर्शन से उसकी विभाजक रेखा धूमिल हो गई है। यह अनायास नहीं है कि तमाम किस्म की “उत्तर” विचार-सरणियाँ आज बुर्जुआ पुनर्जागरण और उसकी मानववाद और इहलोकवाद की परम्परा को तथा बुर्जुआ प्रबोधनकाल और उसकी तर्कणा और जनवाद की विरासत को ही सिरे से खारिज करने का काम कर रही हैं। उस महान क्रान्तिकारी विरासत का वास्तविक वारिस तो सर्वहारा वर्ग ही है। उन्नीसवीं शताब्दी में सत्तारूढ़ होते ही बुर्जुआ वर्ग ने स्वतंत्रता-समानता-भ्रातृत्व के लाल झण्डे को धूल में फेंक दिया था तो सर्वहारा वर्ग ने उसे आगे बढ़कर उठा लिया था। आज जीवन में मानववाद और तर्कणा के प्राधिकार को स्थापित करने की लम्बी लड़ाई एक बार फिर एक उग्र चरण में है। यह सर्वहारा मानववाद और द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी तर्कणा के झण्डे को ऊँचा उठाने का समय है। यह आज के नये पुनर्जागरण और नये प्रबोधन का केन्द्रीय काम है और संस्कृति का मोर्चा ऐसे समय में बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

निचोड़ के तौर पर संस्कृति के मोर्चे के वैचारिक कार्यों को ठोस रूप में कुछ यूँ निरूपित किया जा सकता है :

(1) सबसे पहली बात तो यह कि सर्वहारा-संस्कृति के सर्जकों-शिल्पियों को मार्क्सवादी दर्शन और राजनीतिक अर्थशास्त्र का एक हद तक अध्ययन अवश्य करना होगा, तभी वे बुर्जुआ विभ्रमों से मुक्त हो सकते हैं, बुर्जुआ सांस्कृतिक विचारों का प्रतिकार कर सकते हैं और सामाजिक जीवन की प्रतीतियों की सतह भेदकर सारभूत यथार्थ को पकड़ सकते हैं।

(2) हमें साहित्य-कला-संस्कृति की मार्क्सवादी वैचारिकी के अध्ययन-मनन का काम करना होगा। पहले किया भी हो तो नये सिरे से करना होगा, विस्मृतियों की कालिख पोंछनी होगी। अतीत के सैद्धान्तिक बहसों-विमर्शों और प्रयोगों का नये सिरे से अध्ययन करना होगा और महत्त्वपूर्ण चीज़ों को पुनर्प्रस्तुत करना होगा।

(3) हमें तमाम “उत्तर” विचार-सरणियों की, अन्य नये-नये बुर्जुआ और “नववामपन्थी” संस्कृति-सिद्धान्तों की वैज्ञानिक आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

(4) हमें आज के बुर्जुआ मीडिया-विशेषज्ञों और बुर्जुआ संस्कृति उद्योग के सिद्धान्तकारों के नये-नये सिद्धान्तों की सांगोपांग चीर-फाड़ करनी होगी।

(5) हमें आज के सामाजिक यथार्थ और नई सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटनाओं-प्रवृत्तियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करना होगा और इस प्रक्रिया में मार्क्सवादी कला-दर्शन और सौन्दर्य-शास्त्र को समृद्ध और समकालीन बनाने की सतत्-प्रक्रिया को नया संवेग देना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार