कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र

कार्ल मार्क्स

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कार्ल मार्क्स (1818-1883) मार्क्सवाद और प्रबल राजनीतिक विज्ञान के संस्थापक , जिसके विचारों ने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के इतिहास को नये आयाम दिए.

५ मई १८१८ को पश्चिम जर्मनी के ट्रायर में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ. उसके पिता एक कामयाब वकील थे, जिन्हें प्रशिया के कानूनानुसार अपने व्यवसाय को चलाने के लिए यहूदी से ईसाई धर्म अपनाना पड़ा.

सत्रह वर्ष की आयु में कानून की विद्या हासिल करने के लिए मार्क्स बोन विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए. वहाँ उनकी गिनती तेज-तरार विद्यार्थियों में नहीं होती थी. फिक्रमंद पिता ने उनका स्थानांतरण कठोर अनुशासन के लिए विख्यात बर्लिन के विश्वविद्यालय में करवा दिया. अपने अध्ययन के दौरान नौजवान मार्क्स रेडिकल विचारों और दर्शन की ओर झुकते गये. एक बार तो वे ‘यंग हेगल्स’ नामक विद्यार्थियों के एक समूह से जुड़ गये जो हेगल के विचारों को अस्वीकार कर चुके थे.

१९ जून १८४३ को उनका विवाह प्रशिया के नवाब की सुशिक्षित सपुत्री जेनी वोन वेस्टफालें से संपन्न हुआ. शादी के तुरंत बाद सरकार की सेंसरशिप, जिसका रवैया वामपंथी आन्दोलनकारियों के प्रति दिन-प्रतिदिन कठोर से कठोरतम होता जा रहा था, ने उन्हें देश छोड़कर पेरिस जाने के लिए मजबूर कर दिया.

१८४० का पेरिस उस ज़माने के क्रांतिकारियों की सबसे प्रिय कर्मस्थली थी. यहाँ मार्क्स की मुलाकात बहुत से क्रांतिकारियों से हुई जिनमे फ्रेडरिक एंगेल्स आगे चलकर उनके जीवनभर के वैचारिक मित्र बन गये.

१८४४ में एंगेल्स बहुत ही प्रभावशाली पुस्तक ‘Conditions of the WorkingClass in England ‘ लिख चुके थे. इस पुस्तक ने मार्क्स के सर्वहारा वर्ग द्वारा संपन्न किये जानेवाली क्रांति  के विचार को विकसित करने में  मदद की. इसी पुस्तक से प्रेरणा पाकर मार्क्स ने Economic and Philosophic Manuscripts नामक अपनी पहली  पुस्तक की रचना की. पूंजीवाद के अधीन श्रम के अलगाव से मुक्ति के लिए साम्यवाद की जीत की अवश्यम्भाविता के पक्ष में तर्क के कारण इस पुस्तक का एक नैतिक और दार्शनिक महत्व रहा है.

दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है.

मार्क्स की दिलचस्पी इतिहास के विकास और परिवर्तन में भी थी, जो समाज में नैसर्गिक रूप से चलता रहता है. अपने इस विचार को उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी समझ बताया. मार्क्स का विश्वास दिन-प्रतिदिन इस सच्चाई की ओर दृढ होता गया कि सर्वहारा वर्ग की क्रांति न केवल वांछनीय है बल्कि ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण अवश्यंभावी है.

इसी समय मार्क्स और एंगेल्स ने अपना सबसे प्रसिद्ध पंफलेट ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ लिखा.

“कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. वे खुलेंआम एलान करते हैं कि उनके लक्ष्य पूरी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बलपूर्वक उलटने से ही सिद्ध किये जा सकते हैं. कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग को कांपने दो. सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.

दुनिया के मजदूरों, एक हो ! ”

मार्क्स की ज्यादातर रचनाओं के विपरीत मार्क्स की यह कृति संक्षिप्त और प्रासंगिक होने के साथ-साथ अग्निमय और प्रेरणादायक भाषा के प्रयोग द्वारा क्रांति की इच्छा पैदा करने की क्षमता रखती है.

“अभी तक आर्विभूत समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है.” – कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, प्रथम अध्याय.

क्रांतियों, जिन्होंने १८४८ में समस्त यूरोप को अपनी आगोश में ले लिया था, ने मार्क्स को फ़्रांसिसी और बेल्जियन अधिकारिओं की नज़रों में संदिग्ध बना दिया . उन्हें लंदन में शरण लेनी पड़ी और उनका शेष रचनात्मक जीवन वहीँ बीता.

कम्युनिस्ट लहर की इस तरुणावस्था में मार्क्स इसके साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़ते गये. प्रथम कम्युनिस्ट इंटरनेशनल  में अराजकतावादी बकुनिन के विरुद्ध उन्होंने प्रबल और प्रभावशाली तर्क रखे.

एक और प्रबल घटना १८७१ का पेरिस कम्यून की स्थापना थी जिसे सर्वहारा वर्ग दो महीने के संघर्ष के बाद हार गया. मार्क्स ने इसका पुरजोर मूल्यांकन किया और इसे भविष्य की कम्युनिस्ट क्रांतियों के अग्रदूत की उपाधि प्रदान की.

मार्क्स अपना अधिक से अधिक समय  ब्रिटिश लायब्रेरी में राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए बिताते थे. इसी के परिणामस्वरूप उनकी मास्टरपीस रचना ‘पूँजी’ (दास कैपिटल) का जन्म हुआ. यह पुस्तक पूंजीवादी समाज और अर्थशास्त्र की गतिकी के नियमों का सघन और विस्तृत संकलन हैं.

“पहली दृष्टि में पण्य बहुत मामूली सी और आसानी से समझ में आनेवाली चीज मालूम होता है. किन्तु उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वास्तव में वह एक बहुत अजीब चीज है, जो आधिभौतिक सूक्ष्मताओं और धर्मशास्त्रीय बारीकियों से ओतप्रोत है. जहाँ तक वह उपयोग मूल्य है, वहां तक, चाहे हम उसपर इस दृष्टिकोण से विचार करें कि वह अपने गुणों से मानव आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है” – पूंजी, अध्याय १, प्रथम खंड

अपने निरन्तर विकसित होते हुए मार्क्सवादी दृष्टिकोण अनुसार मार्क्स ने जीवन के हर पहलू पर लिखा.  अक्सर पूंजीपतियों के तलुयाचाट बुद्धिजीवी मार्क्स के “धर्म लोगों के लिए अफीम है” को सन्दर्भ से तोड़कर एक फिकरे के रूप में प्रयोग करते रहे हैं. वर्गीय समाज के अस्तित्व में आने की ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ के अनुसार उत्पादन की प्रक्रिया ने समाज के एक छोर पर मुट्ठीभर अमीर जबकि दूसरे छोरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया. आत्मिक उत्पादन में एक तरफ दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, साहित्य,गीत और संगीत पैदा हुआ तो दूसरी और धर्म. दिखने में धर्म गरीबों को मुफ्त का तोहफा लगता रहा हो लेकिन शोषक वर्ग के सच्चे सेवादार के रूप में इसने गरीब जनता को पैरों के नीचे रौंधने का ही काम किया.

” धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन  परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है.”
— (Contribution to the Critique of Hegel\’s Philosophy of Right)

अपने समय के सर्वाधिक घृणा पाने वाले व्यक्ति कार्ल मार्क्स, जिन पर सबसे अधिक कीचड उछाला गया, के रोशन दिमाग ने १८८३ को हमेशा के लिए काम करना बंद कर दिया. निरंकुश और गणतंत्रीय, दोनों प्रकार की सरकारों ने उन्हें अपने राज्य से खदेड़ा. बुर्जुआजी, चाहे वह अनुदार रही हो चाहे अति जनवादी, मार्क्स के प्रति लान्छनात्मक शब्दों का प्रयोग करने  में आपस में होड़ करती हुई नजर आई. वे इसे इस प्रकार हटा देते थे जैसे यह कोई मकड़ी का जाला हो. पूर्ण लापरवाही के साथ, जब बहुत जरूरी आवश्यकता उन्हें विवश करती, वे तभी जवाब देते. उनकी मृत्यु उनके चहेते करोड़ों क्रांतिकारी मेहनतकश साथियों के लिए एक आघात थी. साईबेरिया से कैलिफोर्निया, यूरोप और अमेरिका के सभी भागों और जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं “मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि  बेशक उनके बहुत से विरोधी रहे हों, लेकिन उनका कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं था.”

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हम अब भी लालगढ़ में हैं – चत्रधर महतो

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हम अब भी लालगढ़ में हैं, ऐसा कहना है लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) के आदिवासी नेताओं का. मंगलवार, 30 जून को आन्दोलनकारी आदिवासी नेता चत्रधर महतो ने इस बात से इंकार किया कि वह लालगढ़ छोड़कर भाग गया है. उसने कहा कि वह अभी भी पश्चिमी बंगाल के इस अशांत इलाके में “मेरे अपने लोगों के साथ” है. ” मैं अभी भी लालगढ़ में रुका हुआ हूँ और मेरे इस क्षेत्र से भागने का सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि मैंने कोई जुर्म नहीं किया”, ‘पुलिस अत्याचार के खिलाफ गठित लोक समिति’ (PCAPA) जिसने सात महीने पहले एक वस्तुत: ” मुक्त क्षेत्र ‘की स्थापना के खिलाफ नेतृत्व किया था, के मुखिया महतो का ऐसा कहना है. महतो और एक अन्य  PCAPA के सदस्य एक प्राइवेट बंगाली टेलिविज़न चैनल पर बातचीत कर रहे थे. महतो ने स्टार आनंद के साथ टेलीफोन पर इंटरव्यू देते हुए कहा,

“लालगढ़ से भागने का सवाल ही नहीं पैदा होता. मैं पूरी तरह से लोगों के साथ हूँ और उनके साथ बना रहूँगा. पुलिस अत्याचार के खिलाफ लालगढ़ में मैंने एक जनवादी लहर शुरू की थी.”

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार झूठ  द्वारा उसका सम्बन्ध  माओवादी गुरिल्लाओं के साथ जोड़कर उसकी छवि को दूषित करने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा “वे मुझे माओवादी सिद्ध करना चाहते हैं जोकि मैं नहीं हूँ.”

पहले सुरक्षा बलों और राज्य सरकार का कहना था कि PCAPA के  महतो, सिद्धू सोरेन और कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी और बिकाश जैसे कुछ अग्रणी नेता अशांत क्षेत्र से उस वक्त से भगौड़े हैं जब 18 जून को केंद्रीय अर्धसैनिक और राज्य पुलिस के द्वारा राज्य की राजधानी कोलकत्ता से 200 किलोमीटर दूर  संयुक्त सुरक्षा आपरेशन शुरू हुआ. पुलिस का कहना था कि महतो भाग खडा हुआ था और उसने बांकुड़ा  जिले में पनाह ले ली थी और सोरेन ने पश्चिमी मिदनापुर के शलबोनी में जबकि दो बड़े माओवादी पड़ोस के झारखण्ड की ओर कूच कर गए. सोरेन ने टेलिविज़न चैनल से यह भी कहा कि

“मैं अब कांटापहाड़ी  क्षेत्र में हूँ. मैं क्यों भागूं जब मैंने कुछ गलत नहीं किया है? हमने तो केवल पुलिस संत्रास के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई है जो कि हमारा जनवादी अधिकार है”. “हमारा आंदोलन बंद नहीं किया जा सकता जब तक कि वे (बल) अनावश्यक रूप से हमारी महिलाओं और बच्चों को तंग करना बंद नहीं करते. अब हम अपने भविष्य की कार्रवाई की योजना पर काम कर रहे हैं.”, ऐसा उनका कहना है.

लालगढ़ तब से उबल रहा है जब पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव भटाचार्य और दो अन्य केंद्र सरकार के मंत्री  श्री राम विलास पासवान और श्री जितिन प्रसाद के पथरक्षक दल के रूट पर बारूदी सुरंग फटी थी. इस ब्लास्ट के बाद पुलिस पर  अत्याचारों का आरोप लगाते हुए स्थानीय क्रुद्ध आदिवासियों ने, जिन्हें माओवादियों का समर्थन हासिल था, आन्दोलन शुरू किया और पश्चिमी मिदनापुर जिले से इस क्षेत्र को काटते हुए और सिविल प्रशासन को खदेड़कर वस्तुतः प्रशासन अपने हाथ में ले लिया. राज्य के तीन पश्चिमी जिलों मिदनापुर, बांकुडा और पुरुलिया के इक्कीस पुलिस स्टेशनों के क्षेत्र में माओवादी सक्रिय हैं. Fraternally, PratyushGet Yourself a cool, short @in.com Email ID now!

pratyush1917@in.com द्वारा marxist-leninist-list@lists.econ.utah.edu पर प्रेषित ईमेल से साभार

इस चिट्ठे की ओर से

विकास तो होना ही चाहिए, विकास उनके लिए सर्वोपरि है चाहे इसके लिए कोई अपनी ज़र-ज़मीन से उखड जाता है. यह बात नहीं है कि आदिवासियों की भलाई के लिए उन्हें माओवादियों से मुक्त करवाया जा रहा  है बल्कि अपने मुनाफे की हवस के लिए इन्हें विकास तो करना ही है – हम भी मानते हैं कि विकास ज़रूरी है लेकिन पूंजीवाद के विकास का रूप अब किसी भी प्रकार से रोल मॉडल नहीं रह गया है. मुनाफे की हवस से हर चीज जो प्राकृतिक है , उसे बलात नष्ट किया जाता है.वनों की अंधाधुंध कटाई, अधिक से अधिक कृषि उपज लेने के लिए  कृषि योग्य भूमि पर बढ़ता हुआ कृत्रिम खाद, कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों का बोझ , बेशी मूल्य की जमाखोरी से बेशी उत्पादन और प्रदुषण – पूंजीवादी के अराजक उत्पादन और वितरण ढांचे ने इस पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है. लेकिन पूंजीवाद की यह अराजकता सभ्यता की दौड़ में पिछडे आदिवासियों पर किसी बर्बर हमले से कम नहीं होती. फिर भी पूंजीवाद एक तीर से दो शिकार करता है – एक उनके प्राकृतिक संसाधनों की लूट और दूसरा उन्हें एक ऐसी सभ्यता में खींचता है जहाँ उनकी किस्मत में  सबसे सस्ती श्रम-शक्ति की पूर्ति करना लिखा होता ताकि यह  मांग से अधिक बनी रहे और  मजदूरी की दर निम्न से निम्न रहे. पूंजीवाद के अपने तरीके और तर्क से आदिवासी आबादी को इस तरह सभ्यता में खींचने की परिणति इन आदिवासियों के लिए  उज़रती गुलाम, बच्चों के भिखारी और औरतों के  वेश्यावृति में रुपानान्तरण में होती है.

“बुर्जुआ वर्ग ने, जहाँ पर भी उसका पलडा भारी हुआ, वहां सभी सामंती, पितृसत्तात्मक और काव्यात्मक संबंधों का अंत कर दिया.  उसने मनुष्य को अपने “स्वाभाविक बड़ों” के साथ बांध रखने वाले नाना प्रकार के सामंती संबंधों को निर्ममता से तोड़ डाला; और नग्न स्वार्थ के, “नकद पैसे-कौडी” के हृदयशुन्य व्यवहार के सिवा मनुष्यों के बीच और कोई दूसरा सम्बन्ध बाकी नहीं रहने दिया. धार्मिक श्रद्धा के स्वगोपम आनंदातिरेक को, वीरोचित उत्साह और कूपमंडूकतापूर्ण भावुकता को उसने आना-पाई के स्वार्थी हिसाब-किताब के बर्फीले पानी में डुबो दिया है. मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को उसने विनिमय मूल्य बना दिया है, और पहले के अनगिनत अनपहरणीय अधिकारपत्र द्वारा प्रदत्त स्वातंत्रों की जगह अब उसने एक ऐसे अंत:करणशून्य स्वातंत्र्य की स्थापना की है जिसे मुक्त व्यापार कहते हैं. संक्षेप में, धार्मिक और राजनीतिक भ्रमजाल के पीछे छिपे शोषण के स्थान पर उसने नग्न, निर्लज्ज, प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की स्थापना की है…”

“…सभी स्थिर और ज़डीभूत सम्बन्ध, जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वाग्रहों तथा मतों की एक पूरी श्रृंखला जुडी हुई होती है, मिटा दिये जाते हैं, और सभी नए बनने वाले सम्बन्ध ज़डीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं. जो कुछ भी ठोस होता है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है, और आखिरकार मनुष्य संजीदा नज़र से जीवन के वास्तविक हालत को, मानव-मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है.”

मार्क्स और एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ से लिया गया उपरोक्त उद्धरण चरितार्थ हो रहा है लेकिन विडम्बना देखीए कि यह सब उनके नेतृत्व में  हो रहा है जो खुद को मार्क्सवादी कहलाते हैं.

कम्युनिस्ट और मजदूर वर्ग की पार्टियाँ

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घोषणापत्र का यह वाक्य कि “कम्युनिस्ट मजदूर वर्ग की पार्टियों के बदले में अपनी कोई अलग पार्टी नहीं गठित करते हैं”,  इस वक्त गलतफहमी प्रगट कर सकता है, बल्कि कुछ लोग तो इसका यही गलत अर्थ निकालते हैं कि मार्क्स और एंगेल्स सिद्धांतत: अलग कम्युनिस्ट पार्टियों के गठन के विरोधी थे. इस वाक्य की व्याख्या उन ऐतिहासिक परिस्थितियों के प्रकाश में की जानी चाहिए जिन्होंने कम्युनिस्ट लीग को जन्म दिया था. जहाँ तक राष्ट्रीय स्तर पर गठित मेहनतकशों की एक पार्टी का प्रश्न है, उस समय केवल एक ही पार्टी का अस्तित्व था और वह थी — इंग्लैंड  की चार्टिस्ट पार्टी. फ्रांस में लेद्रू-रोलां और पुलोकन के नेतृत्व में सामाजिक जनवादियों के समूह के अलावा कुछ छुटपुट ग्रुप ही सक्रीय थे जो पुराने बार्बेस (1809-1870) और बलान्कीवादी संगठनों से जुड़े हुए थे.  कुछ भौतिकवादी कम्युनिस्टों और “मजदूरवर्गीय समतावादियों” की मंडलियाँ भी थीं. सामाजिक जनवादियों की निम्न-बुर्जुआ पार्टी के विपरीत, ये समूह और मंडलियाँ लगभग पूरी तौर पर सर्वहारा से बनी थीं. तो भी 1848 के पहले तक वे समूहों और मंडली के स्तर से आगे नहीं बढ़ पाए थे और उन्हें किसी भी अर्थ में राष्ट्रव्यापी संगठन नहीं कहा जा सकता था. स्विट्ज़रलैंड, बेल्जियम और जर्मनी में स्थिति इससे बेहतर नहीं थी.

लेकिन कम्युनिस्ट लीग शुरू से ही, अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में गठित की गयी थी और राष्ट्रीय प्रवर्गों के साथ अपने संबंधों को इस प्रकार व्यवस्थित करने के लिए विवश थी कि इन प्रवर्गों और अन्य राष्ट्रीय पार्टियों, यदि कोई हों, के बीच अनावश्यक आच्छादन से बचा जा सके. इंग्लैंड में, इन सावधानियों का ध्यान रखने की विशेष आवश्यकता थी जहाँ चार्टिस्ट आन्दोलन मुख्य रूप से मेहनतकश वर्ग का राजनीतिक संगठन बन गया था. अंग्रेज कम्युनिस्टों ने, जिनमें जॉर्ज जूलियन हार्नी है, ने नयी पार्टी की स्थापना नहीं की थी. उन्होंने केवल चार्टिस्ट आन्दोलन और कम्युनिज्म का संयोजन करने, हिरावल दस्ते की भूमिका निभाने और संपत्ति के प्रश्न को अपने विमर्श में प्रमुखता देने की कोशिश की.

कम्युनिस्टों द्वारा किए जाने वाले कार्यभारों को घोषणापत्र में सूत्रित किया गया है. कम्युनिस्ट पार्टी और मजदूर वर्ग के बीच संबंधों का इसमें निरूपण आज भी समीचीन है. रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रम का इस निरूपण से पूर्ण सामंजस्य है जैसाकि निम्न उद्धरण से देखा जा सकता है —

“अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट पार्टी जोकि सभी बुर्जुआ पार्टियों के खिलाफ खड़ी होती है, सर्वहारा का स्वतन्त्र राजनीतिक संगठन है जोकि उसे अपना महान ऐतिहासिक मिशन पूरा करने के योग्य बनाता है. वर्ग संघर्ष के सभी रूपों में यह मजदूरों को नेतृत्व प्रदान करती है. शोषितों और शोषकों के हितों के बीच अशांत न हो सकने वाले टकराव के रहस्य को यह शोषितों के सामने खोलकर रख देती है, और सर्वहारा के समक्ष अवश्यम्भावी क्रांति की आवश्यक शर्तों और ऐतिहासिक महत्त्व को स्पष्ट कर देती है.” (ए.बी.सी. ऑफ़ कम्युनिज्म, बुखारिन और प्रिओब्रेजिन्स्की द्वारा रचित, पृ.375)

पूंजीवादी संचय मेहनतकश वर्ग के दरिद्रीकरण और अध:पतन की ओर — सम्पत्तिहर्त्ताओं के सम्पत्तिहरण की ओर ले जाता है

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31.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

उस स्थिति में भी जब मजदूर अपनी श्रमशक्ति को सर्वाधिक लाभप्रद शर्तों पर बेचने में सफल हो जाता है, जब वह अधिकतम मजदूरी प्राप्त करता है तब भी वह औद्योगिक चक्रों से उत्पन्न अव्यवस्था से प्रभावित रहता है और संकटों का शिकार बनता रहता है. उसे अस्तित्व की असुरक्षा, मजदूरी में उतार-चढाव, बेरोजगारी का निरंतर संकट यह सब मिलकर सर्वहारा की स्थिति को दास या भूदास की स्थिति से भिन्न बना देते हैं.

“सर्वहारा के पास अपने दो हाथों के अलावा और कुछ नहीं होता. वह कल की कमाई को आज ही खर्च करता है. हर आपदा को वह झेलता है. इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह कल प्रयाप्त धन अर्जित कर ही लेगा. व्यापार संकट या सेवायोजक की सनक उसे भोजन से वंचित कर सकती है. इस प्रकार मजदूर ऐसी दुखदाई और अमानवीय स्थिति में जीता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. दास की कम से कम जीविका तो सुरक्षित रहती है अन्यथा वह अपने मालिक के किसी काम का नहीं रह जाता है. भूदास को कम से कम भूमि का एक टुकडा तो दिया जाता है जिस पर वह अपने गुजारे के लिए अन्न पैदा करता है. इस प्रकार दास और भूदास को न्यूनतम जीवनस्तर की गारंटी तो मिल जाती है. सर्वहारा को केवल अपनेआप पर भरोसा करना पड़ता है. तो भी वह कभी भी ऐसी स्थिति में नहीं होता कि अपनी जीविका चलते रहने के प्रति आश्वस्त हो जाये. दुखद संयोगों का खतरा उस पर हरदम मंडराया करता है. इसलिए वह अपनी स्थिति चाहे कितनी ही क्यों न सुधार ले, यह दुखद संयोगों के समुद्र में एक बूँद जैसी बनी रहती है.” (एंगेल्स द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 116)

विशाल पैमाने के उद्योग का विकास मजदूर की असुरक्षित स्थिति को बदतर बना देता है. पूंजी के संचय की प्रक्रिया की तेज़ गति से श्रम की औद्योगिक आरक्षित सेना बन जाती है जो मजदूर की सक्रीय सेना पर लगातार दबाब बनाये रखती है और कारखानों में रोजगारशुदा मजदूरों  को अपनी मजदूरी में उल्लेखनीय वृद्धि करवाने का मौका नहीं देती है. आधुनिक उद्योग के जीवन-चक्र में उत्पादन में सामान्य वृद्धि के बाद सहसा बहुत अधिक वृद्धि होती है जिसके बाद संकट, मंदी और ठहराव की अवधि आती है. इसका विशिष्ट परिणाम यह होता है कि बेशी आबादी में वृद्धि हो जाती है और औद्योगिक आरक्षित सेना के आकार में परिवर्तन होने लगता है. आरक्षित सेना जितनी बडी होती है उतना ही मेहनतकशों के कंगालों की कतार में शामिल हो जाने का खतरा बढ़ता जाता है. यह प्रक्रिया उस बिन्दू तक पहुँच सकती है कि समाज इन्हें मुह्ताजखाने में खिलाने और आय देने या इन्हें दूसरे किस्म की राहत देने के लिए बाध्य हो जाये.

“इसका परिणाम यह होता है कि जिस अनुपात में पूंजी का संचय होता जाता है, उसी अनुपात में मजदूर की हालत अनिवार्य रूप से बिगड़ती जाती है — उसको चाहे ज्यादा मजदूरी मिलती हो या कम. अंत में वह नियम जो सापेक्ष बेशी आबादी या औद्योगिक आरक्षित सेना का (पूंजी) संचय के विस्तार और तेजी के साथ संतुलन कायम करता है, मजदूर को पूंजी के साथ इतनी मजबूती के साथ जकड़ देता है जितनी मजबूती के साथ हिपेसियस की बनाई जंजीर प्रोमेथियस को चट्टान के साथ नहीं जकड़ सकी थी. इस नियम के फलस्वरूप पूंजी संचय के साथ-साथ दरिद्रता बढती जाती है. इसलिए यदि एक छोर पर धन, का संचय होता है, तो इसके साथ-साथ दूसरे छोर पर — यानी उस वर्ग में जो खुद अपने श्रम के उत्पाद को पूंजी के रूप में तैयार करता है — गरीबी, यातनादायक श्रम, दासता, अज्ञान, पाशविकता और मानसिक पतन का संचय होता जाता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 714)

घोषणापत्र के प्रथम भाग के अंतिम अनुच्छेद में पूंजीवादी समाज के पतन की अनिवार्यता को रेखांकित किया गया है. दो दशकों के अतिरिक्त अनुभव और गहनतर विश्लेषण के बाद पूंजी के पहले खंड में इसकी पुनरावृत्ति और विस्तार से प्रतिपादन किया गया है. इसके अंतिम से पहले वाले अध्याय में हम पढ़ते हैं :

“रूपांतरण की यह प्रक्रिया जैसे ही पुराने समाज को ऊपर से नीचे तक काफी छिन्न-भिन्न कर देती है, मेहनतकश जैसे ही सर्वहारा बन जाता है और उसके श्रम के साधन पूंजी में रूपांतरित हो जाते हैं, पूंजीवादी प्रणाली खुद जैसे ही अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है, वैसे ही श्रम का और अधिक समाजीकरण करने और साथ ही निजी मालिकों का और अधिक स्वत्वहरण करने का प्रश्न एक नया रूप धारण कर लेता है. अब जिसका सम्पत्तिहरण करना आवश्यक हो जाता है, वह खुद अपने लिए काम करने वाला मेहनतकश नहीं होता है, बल्कि वह होता है बहुत से मेहनतकशों का शोषण करने वाला पूंजीपति. यह सम्पत्तिहरण पूंजीवादी उत्पादन के अंतर्भूत नियमों के अमल में आने के फलस्वरूप पूंजी के केन्द्रीकरण  द्वारा संपन्न होता है. एक पूंजीपति बहुत से पूंजीपतियों को मिटा देता है. इस केन्द्रीकरण के साथ-साथ, अधिकाधिक बढ़ते पैमाने पर श्रम-प्रक्रिया का सहकारी स्वरूप विकसित होता जाता है. इसके साथ प्राविधिक विकास के लिए सचेतन ढंग से विज्ञान का अधिकाधिक उपयोग बढ़ता जाता है. भूमि को उत्तरोत्तर अधिक सुनियोजित ढंग से जोता-बोया जाता है. श्रम के औजार ऐसे औजारों में बदलते जाते हैं जिनका केवल सामूहिक ढंग से उपयोग किया जा सकता है. उत्पादन के साधनों का संयुक्त, समाजीकृत श्रम के साधनों के रूप में उपयोग करके उत्पादन के साधनों का मितव्ययिता के साथ इस्तेमाल किया जाता है. सभी कोमें संसारव्यापी मंडी के जाल में सिमट आती हैं. इन सभी के कारण पूंजीवादी शासन का स्वरूप अधिकाधिक अंतरराष्ट्रीय होता जाता है. रुपान्तरण की इस प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाली समस्त सुविधाओं पर जो लोग जबरदस्ती अपना अधिकार कायम कर लेते हैं, पूंजी के उन बड़े-बड़े स्वामियों की संख्या यदि एक ओर बराबर घटती जाती है  तो दूसरी ओर, गरीबी, अत्याचार, गुलामी, पतन और शोषण में लगातार वृद्धि होती जाती है. लेकिन इसके साथ-साथ मजदूर वर्ग का विद्रोह भी अधिकाधिक तीव्र होता जाता है. यह वर्ग संख्या में लगातार बढ़ता जाता है और स्वयं पूंजीवादी उत्पादन की प्रक्रिया का तंत्र ही उसे अधिकाधिक अनुशासनबद्ध एकजुट और संगठित करता जाता है. पूंजीवादी एकाधिकार उत्पादन की उस प्रणाली के लिए बंधन बन जाता है जो इस एकाधिकार के साथ-साथ जन्मी है और फली-फूली है. उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण और श्रम का समाजीकरण एक ऐसे बिन्दू पर पहुँच जाते हैं जहाँ वे अपने पूंजीवादी खोल के भीतर नहीं रह सकते हैं.  खोल फट जाते हैं. पूंजीवादी निजी संपत्ति की मौत की घंटी बज उठती है. सम्पत्तिहरण करने वालों का सम्पत्तिहरण हो जाता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड.1, 845-846)

सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र का विकास और क्रांति

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30.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

“वर्ग विरोध पर आधारित समाज में शोषित वर्ग अनिवार्यत: विद्यमान रहता है. इसलिए शोषित वर्ग की मुक्ति से नए समाज का निर्माण होता है. शोषित वर्ग की मुक्ति के लिए आवश्यक है कि विद्यमान उत्पादक शक्तियों  और प्रभावी सामाजिक सम्बन्ध परस्पर अनुकूल न हों. उत्पादन के औजारों में क्रांतिकारी वर्ग स्वयं सर्वाधिक ताकतवर उत्पादक शक्ति बन जाता है. क्रांतिकारी तत्त्वों के एक वर्ग के रूप में संघठन के लिए आवश्यक है कि पुराने समाज में समस्त उत्पादक शक्तियों का हर सम्भव विकास वास्तव में पूरा हो गया हो. तब क्या हम इस विचार को लें उडे कि पूर्व समाज के ध्वंस से दूसरे वर्ग का प्रभुत्व स्थापित हो जायेगा? कि इस नए प्रभुत्व की परिणति एक नयी राजनीतिक सत्ता की स्थापना में होगी? बिलकुल नहीं. मेहनतकश वर्ग की मुक्ति की यह अनिवार्य शर्त है कि समस्त वर्गों का खत्म हो जाये. पूर्व इतिहास में इसका सटीक उदाहरण मिलता है. राज्य से समस्त वर्गों, समस्त श्रेणियों के उन्मूलन से ही तीसरे वर्ग यानी बुर्जुआ वर्ग की मुक्ति का सवाल हल हुआ.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ.137)

सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र के प्रश्न पर आगे की टिपण्णी (42) में और अधिक विचार किया जायेगा. यहाँ पर पाठकों को मात्र यह याद दिलाने की ज़रुरत है कि घोषणापत्र के रचयिताओं ने ‘राष्ट्रीय’ शब्द का प्रयोग शासकीय और राज्यक्षेत्र के अर्थ में किया था. जब वे वर्ग संघर्ष के “मुख्यतया राष्ट्रीय” होने की चर्चा करते हैं तब उनका आशय यह होता है कि यह संघर्ष फ्रांस, इंग्लैंड, बेल्जियम आदि राष्ट्र-राज्यों की सीमा के अन्दर होता है. बुर्जुआ वर्ग को पराजित करने के लिए आवश्यक है कि सर्वहारा इस संघर्ष में अन्य देशों के सर्वहारा को मित्र के रूप में लामबंद करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध छेड़ दे. लेकिन ऐसा करने के पहले उसे अपने देश के बुर्जुआ से निपटना पड़ता है. दूसरा इंटरनेशनल इसलिए असफल हो गया क्योंकि इसके नेताओं ने ‘पितृभूमि की रक्षा’ के नारे को अपना लिया था जिसके तहत शुरुआत तो विदेशी बुर्जुआ को नष्ट करने से होनी थी लेकिन इसमें न केवल सीमा पार के सर्वहारा बंधुओं बल्कि अपने सह-राष्ट्रीय सर्वहारा बंधुओं को अपनी  तरफ करना ज़रूरी था. भीषणतम गृहयुद्धों में, क्रांति की अवधि में, राष्ट्रों के बीच अत्यधिक धर्मांध संघर्षों में, यहाँ तक कि इतिहास की पूरी अवधि में, इतना अधिक खून नहीं बहा है, इतनी अधिक जानें नहीं गयी हैं जितना कि हाल के विश्वयुद्ध में खून बहा है और जानें गयी हैं. ठीक उन्हीं लोगों ने इस विश्वयुद्ध का समर्थन किया था जिन्होंने अपने देश में बुर्जुआ सत्ता को बलात उखाड़ फेंकने से इस भय से इंकार कर दिया था कि इससे रक्तपात हो सकता है.

“विकास के दौरान मेहनतकश वर्ग पुराने बुर्जुआ समाज के स्थान पर एक ऐसा समाज स्थापित करेगा जिसमें वर्गों और वर्ग विरोध का लोप हो जायेगा. चूँकि राजनीतिक सत्ता बुर्जुआ समाज में विद्यमान विरोधों की आधिकारिक अभिव्यक्ति होती है, मात्र इसलिए सामान्य अर्थों में कोई राजनीतिक सत्ता नहीं होगी. उस वक्त तक सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच शत्रुता तो भिन्न वर्गों के संघर्ष के रूप में लेकिन बनी रहती है. जब यह संघर्ष अपने चर्म पर पहुँचता है तो क्रांति में तब्दील हो जाता है. क्या हमें यह जानकर आर्श्चय होना चाहिए कि वर्ग शत्रुता पर आधारित समाज का अंत सशस्त्र भिडंत से होगा और आमने-सामने की लडाई से इसका विघटन होगा? यह दावा नहीं किया जा सकता कि सामाजिक आन्दोलन राजनीतिक आन्दोलन का निषेध करता है. अभी तक कोई ऐसा राजनीतिक आन्दोलन नहीं हुआ जो सामाजिक आन्दोलन न रहा हो, जो सामाजिक आन्दोलन के साथ न चलता हो. केवल ऐसी सामाजिक अवस्था में, जिसमें वर्गों और वर्ग शत्रुता का अस्तित्व ही नहीं होगा, समाजिक विकास क्रांति का रूप धारण करना बंद कर देगा. लेकिन तब तक, हर बार जब समाज में व्यापक कायापलट होने वाली होती है, तब सामाजिक विज्ञान का निष्कर्ष जॉर्ज सान्द (1804-1876) के शब्दों में यह होगा — युद्ध या मौत : खूनी संघर्ष या विनाश, यही है वह विकल्प जिससे बचा नहीं जा सकता.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ.137-138)

सर्वहारा और कानून का सम्मान

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29.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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निजी संपत्ति समस्त पूंजीवादी समाज की आधारशीला है. न्याय और समानता के नाम पर बुर्जुआ ने इसे सामंतवाद की बेडियों से, एकाधिकार से और विशेषाधिकार से मुक्ति दिलाई. यह निर्दोष और सहज दिखनेवाली निजी सम्पति पूंजीवादी विकास के नियमों के कारण पूंजीवादी निजी संपत्ति में धीरे-धीरे तब्दील होने लगी अर्थात संपत्ति ने ऐसा रूप धारण किया जिसका अस्तित्व निजी संपत्ति से वंचित व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि पर निर्भर था. निजी संपत्ति की पवित्रता और अनुल्लंघनियता पर बुर्जुआ जितना अधिक संभ्रम फैलाता है, उसी व्यग्रता से वह इसे छोटे व्यापारी, कारीगर और किसान से छीनता जाता है. इस प्रकार वह उन्हें निजी संपत्ति से वंचित जन-साधारण अर्थात सर्वहारा में परिवर्तित  कर देता है. निजी संपत्ति के ध्वंस की मांग प्रस्तुत करके सर्वहारा मात्र उस वस्तु का ध्वंस चाहते हैं जो उनके लिए नष्ट हो चुकी है — वह चीज जिसका अभाव उनकी मौलिक अभिलाक्षणिकता है. सर्वहारा पुरानी व्यवस्था के विघटन से, मध्य वर्गों विशेषकर इनके निम्न संस्तर के क्षय से उद्भूत व्यक्तियों का समूह है. सर्वहारा की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में अपनी नयी अवधारणा का प्रतिपादन करते हुए मार्क्स लिखते हैं,

“हीगेल के न्याय-दर्शन की आलोचना करते हुए यदि सर्वहारा पूर्ववर्ती सामाजिक व्यवस्था के विघटन की घोषणा  करता है, तो वह मात्र अपने अस्तित्व के रहस्य को प्रकट कर रहा है क्योंकि वास्तव में उस व्यवस्था के विघटन से उसका जन्म हुआ है. सर्वहारा निजी संपत्ति के निषेध की मांग करता है तो वह महज़ एक ऐसी चीज को समाज के सिद्धांत का दर्जा दे रहा है जिसे समाज ने पहले से ही अपना सिद्धांत बना रखा है, जोकि सर्वहारा के रूप में, उसके सहयोग के बिना ही, समाज का एक नकारात्मक परिणाम बन गया है.”

पूंजीवादी व्यवस्था ने निजी सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए कानून बनाये हैं. पूंजीवादी विकास के दौरान ये तथ्य और अधिक स्पष्ट हो गया है कि ये कानून संपत्ति की सुरक्षा कर पाने में अक्षम साबित होते हैं चाहे उनका बहुत सावधानी से विस्तृत प्रतिपादन ही क्यों न किया गया हो. जहाँ तक मेहनतकशों का सम्बन्ध है, इन कानूनों को इसलिए बनाया जाता है ताकि उनकी निजी संपत्ति पर हमला करने से रोका जा सके. केवल कड़े संघर्ष और कई लोगों की कुर्बानियों के बाद सर्वहारा को अपनी एकमात्र संपत्ति अर्थात श्रमशक्ति के लिए कुछ कानूनी सुरक्षा हासिल हुई है. मेहनतकशों के निरंतर संघर्ष के बाद ही ऐसे कानून बनाये गए जो उनकी श्रमशक्ति को पूंजीपतियों के निर्मम शोषण से बचाते थे. इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की स्थिति को चित्रित करने वाली अपनी पुस्तक में एंगेल्स ने इन बुर्जुआ कानूनों पर मेहनतकशों के रुख, इन कानूनों के प्रति उनमें सम्मान के अभाव आदि का उत्कृष्ट चित्र प्रस्तुत किया है.

“कानून बुर्जुआ द्वारा गढा जाता है, उसकी सहमति से पारित किया जाता है और बुर्जुआ के लाभ और उसकी सुरक्षा के लिए तत्पर रहता है इसलिए बुर्जुआ की नज़र में कानून एक पवित्र चीज है. बुर्जुआ अच्छी तरह जानता है कि कोई कानून विशेष उसके किसी सदस्य के लिए हानिकारक हो सकता है लेकिन आमतौर पर कानून-संहिता बुर्जुआ के समग्र हितों की रक्षा करती है. केवल यही बात नहीं है. कानून की पवित्रता, प्रतिष्ठित संस्थाओं की अनुल्लंघनीयता जो समाज के एक हिस्से के सक्रिय संकल्प से स्थापित की जाती है और समाज के दूसरे हिस्से द्वारा निश्चेस्ट रूप से स्वीकार की जाती है –समाज में बुर्जुआ की अवस्थिति इन अमूर्त रूपों के सर्वाधिक ठोस आधार पर निर्भर करती है. अंग्रेज बुर्जुआ के लिए कानून एक पवित्र चीज है क्योंकि वह उसका प्रतिबिम्ब और उसके समान है ठीक उसी तरह जिस तरह ईश्वर उसका प्रतिबिम्ब और उसके समान है. यही वजह है कि पुलिस का डंडा (जो वास्तव में उसका अपना डंडा है) उसके मन को बहुत सकून देता है. लेकिन मजदूर को इसमें कोई पवित्रता नज़र नहीं आती है. कठोर अनुभव ने उसे सिखा दिया है कि कानून डोरियों से बना जाल है जिसे बुर्जुआ उसके लिए बुनता है. इसलिए परिस्थितियां उसे बाध्य न कर दें, मजदूर कानून की सहायता कभी नहीं मांगता है…”(एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, क्वेल्व का अनुवाद पृ. 227)

“क्या संपत्तिहीन के लिए चोरी से परहेज़ करने का प्रयाप्त आधार मौजूद रहता है? निसंदेह ‘संपत्ति की पवित्रता’ मुहावरा बहुत सुन्दर लगता है और बुर्जुआ के कानों को बहुत मधुर लगता है. लेकिन सम्पत्तिहीन के लिए संपत्ति को पवित्र समझना बहुत मुश्किल है. इस दुनिया ने मुद्रा को भगवन बना दिया है. बुर्जुआ सर्वहारा को धन से वंचित रखता है और इस प्रकार उसे मोटे तौर पर नास्तिक बना देता है. तब क्या हमें इस बात से हैरानी होनी चाहिए कि सर्वहारा अपनी नास्तिकता स्वीकार करता है और कि इस दुनिया के भगवान की शक्ति और पवित्रता पर उसकी श्रद्धा समाप्त हो गयी है? जब सर्वहारा वर्ग की गरीबी इस हद तक बढ़ जाती है कि जीवन की मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति का पूर्ण अभाव हो जाये, जब भूखमरी और कंगालीकरण तेजी से फैलने लगे तब मौजूद सामाजिक व्यवस्था के कानून की अवहेलना की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 115)

बड़े पैमाने के उद्योग की विकास प्रक्रिया और इसके फलस्वरूप शहरों में आबादी के बड़े हिस्से में जमावडे के कारण मजदूरों की समग्र मानसिकता बदल जाती है. जब मजदूर सामूहिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संगठित होता है तब उसे अपनी वर्ग स्थिति की जानकारी होती है. उसे यह मालूम हो जाता है कि एक-दूसरे से अलग रहने पर  वह कमज़ोर हो जाता है लेकिन एक साथ हो  जाने से वह ताक़तवर हो जाता है. उसे बुर्जुआ से अपने विभेद का तीव्र अहसास होने लगता है. तब वह अपने बारे में सोचने लगता है, उसका अपना दृष्टिकोण विकसित होने लगता है, उसकी स्थिति के अनुकूल विचार और दृष्टिकोण पनपने लगते हैं. तब उसे अपनी गुलामों जैसी स्थिति का भान होता है और धीरे-धीरे राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं की समझ विकसित होने लगती है. पुराने पितृसत्तात्मक सम्बन्ध बड़ी चतुराई से मेहनतकश की गुलामी पर पर्दा डाल देते थे और बौद्धिक दृष्टिकोण से मेहनतकश अपने हितों से अनभिज्ञ और सामान्य ज्ञान से वंचित निर्जीव वस्तु-सा था. जब मालिक और कारिंदे के बीच का एकमात्र सम्बन्ध सिर्फ इस सम्बन्ध से लाभ निचोड़ने में मालिक का व्यक्तिगत हित ही है, जब सारी हमदर्दी ख़त्म हो गयी और उसका कोई निशान शेष न बचा — तभी मेहनतकश को अपनी स्थिति और अपने हितों की चेतना हुई और उसका बौद्धिक पुनर्जन्म हुआ. तभी उसने संवेदना, विचार और उद्यम के क्षेत्र में मालिक का अनुसरण करना बंद कर दिया.

बुर्जुआ वर्ग और उसके बीच रहने वाले मजदूरों के बीच समानता के सापेक्ष बुर्जुआ और विश्व के पिछडे राष्ट्रों के बीच साम्य अधिक है. मजदूर अलग बोली बोलता है. मजदूर और बुर्जुआ के विचार और कल्पनाएँ परस्पर विरोधी होती हैं. उनकी आदतें, नैतिक सिद्धांत, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टिकोण एकदम भिन्न होते हैं. बुर्जुआ और सर्वहारा पृथक राष्ट्र होते हैं. वे एक दूसरे से इतना अलग होते हैं कि उन्हें दो प्रजातियाँ कहा जा सकता है. डिज़रायली का उपन्यास ‘सिबिल, ऑर द टू नेशन्ज़‘ की रचना 1845 में की गयी थी. उसी समय यानि कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के तीन साल से भी कम समय पहले अँग्रेज़ मजदूर वर्ग की स्थिति पर एंगेल्स की पुस्तक की रचना की गयी थी. डिज़रायली ने पुरानी पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग किया था और अपने पाठकों को बताया था कि “अमीर” और ‘गरीब” ही दो राष्ट्र होते हैं. लेकिन अब हम बाखूबी समझ सकते हैं कि बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच चौडी होती जा रही खाई, मानसिक और शारीरिक दोनों किस्म की, ने नौजवान अनुदार राजनीतिक को बहुत प्रभावित किया था.

बुर्जुआ समाज के अंतरविरोध और सर्वहारा द्वारा इनका उपयोग

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27.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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बुर्जुआ वर्ग की कतारों के बीच विरोध, पूंजीपति वर्ग के विभिन्न धडों के बीच अनबन, भूस्वामियों और औद्योगिक सम्पत्तिधारकों के बीच संघर्ष, एक ओर वित्तीय हितों के प्रतिनिधियों और दूसरी ओर मैन्युफैक्चरिंग हितों के प्रतिनिधियों के बीच तीखी होड़ – इन सभी संघर्षों के बीच पूंजीवादी समाज के गठन में ही मौजूद है.

“अपने ऐतिहासिक विकास के दौरान बुर्जुआ अनिवार्यत: अपने सुषुप्त अंतरविरोधों को बढाता जाता है…जैसे-जैसे बुर्जुआ व्यवस्था विकसित होती जाती है इसके ढांचे के अर्न्तगत नए सर्वहारा, आधुनिक युग की अभिलाक्षणिकताओं से युक्त सर्वहारा का विकास होता जाता है. बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच युद्ध छिड़ जाता है जो पहले अस्थाई आंशिक और अल्पकालिक संघर्षों और ध्वंसात्मक कार्रवाइयों के रूप में प्रकट होता है तथा जब इसकी समझ बन जाती है, इस पर ध्यान देना आवश्यक हो जाता है, इसका मूल्यांकन कर लिया जाता है, इसे स्वीकार कर लिया जाता है. अन्य वर्गों के खिलाफ खड़े, एक विशिष्ट वर्ग के रूप में गठित समकालीन बुर्जुआ वर्ग के सभी सदस्यों के हित समान होते हैं परन्तु इन सदस्यों के बीच-बीच के सम्बन्ध परस्पर विरोधी हितों पर आधारित होते हैं. यह विरोध बुर्जुआ व्यवस्था की आर्थिक संरचना में निहित होता है.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ, 971)

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम अर्धांश के दौरान ब्रिटिश बुर्जुआ समाज का इतिहास इस दावे का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है.

नेपोलियन (1769-1821) की अंतिम पराजय के ठीक बाद, 1815 में ब्रिटिश भूस्वामियों ने विदेशों से अनाज के आयात पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक विधेयक पेश किया और गेहूं के आयात को करमुक्त करने के लिए 80 शिलिंग का दाम निर्धारित किया. इस अधिनियम का उद्देश्य ब्रिटिश बाज़ार में प्रति क्वार्टर गेहूं की कीमत लगभग 80 शिलिंग बनाए रखना था. अनाज बाज़ार के महाद्वीपीय प्रतिस्पर्द्धा से मुक्त हो जाने से ब्रिटिश भूस्वामियों के लिए असाधारण रूप से ऊँची आय सुनिश्चित हो गयी. लेकिन  मध्य वर्गों ने इस नए कानून का कड़ा विरोध किया. यह जनमत निकाय छोटे कारखाना मालिकों, कारीगरों, सामान्तया निम्न-बुर्जुआ और औधोगिक बुर्जुआ के कई प्रतिनिधियों से बना था जो अपना लाभ बढाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. आरंभ में इस आन्दोलन ने शांतिपूर्ण विरोध का रूप धारण किया था लेकिन पूरी तरह से बेअसर साबित हुआ. प्रत्येक याचिका को सीधे अस्वीकार कर दिया गया.

यहाँ तक की सन 1832 के चुनाव सुधार से भी कुछ हासिल नहीं हुआ. अपनी आय की सुरक्षा के लिए भूस्वामी कुलीनों के सभी धडे एकजुट हो गए. अब औद्योगिक बुर्जुआ ने इस विवाद को राजनीती के क्षेत्र में ले जाने और ‘जनता’ को लामबंद करने का निर्णय किया. इसलिए 1839 में मैनचेस्टर में एंटी-कॉर्न लीग गठित की गयी जिसके प्रमुख मार्गदर्शक कॉबडेन (1804-1865) और ब्राईट (1811-1839) थे. संघर्ष ने अधिक उग्र रूप धारण कर लिया. दोनों पक्षों ने “निम्न श्रेणियों” से समर्थन देने की अपील की. प्रत्येक शिविर में दूसरे के खिलाफ आरोप लगाए जा रहे थे. औद्योगिक बुर्जुआ ने कृषि मजदूरों की भयंकर दुर्दशा की ओर ध्यान आकर्षित किया तो भूस्वामी कुलीन वर्ग ने औधोगिक उत्पादन में लगे मजदूरों की हिमायत की और कारखाना कानून के पक्ष में आन्दोलन करके अपना बदला लिया.

“एक ओर तो बुर्जुआ आन्दोलनकर्ताओं का हित यह प्रमाणित करने में था कि अनाज कानून से उन लोगों को कम लाभ पहुँचा है जो सचमुच अनाज पैदा करते हैं. दूसरी ओर, भूस्वामी कुलीन वर्ग फैक्टरी-व्यवस्था की जो तीव्र निंदा कर रहा था और ये सर्वथा भ्रष्ट, हृदयहीन और कुलीन आवारा लोग कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के साथ जो दिखावटी सहानुभूति प्रकट कर रहे थे तथा फैक्टरी-कानून बनवाने के लिए जिस “कुटनीतिक उत्साह” का प्रदर्शन कर रहे थे, उसे देख-देखकर बुर्जुआ वर्ग क्रोध से आग-बबूला हो रहा था. अंग्रेजी की एक पुराणी कहावत है कि “जब चोरों में खटपट हो जाती है, तब भले की बन आती है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड,1,पृ. 747)

आखिरकार 29 जून 1846 को पील (1788-1850) के प्रसिद्ध अधिनियम ने अनाज कानूनों को रद्द करके इस विवाद का अंत कर दिया. एंटी कॉर्न लीग को प्रत्येक मुद्दे पर जीत हासिल हुई. उस आन्दोलन को मजदूरों का समर्थन प्राप्त था. “अंग्रेज़ मजदूरों ने स्वतन्त्र व्यापारियों को जता दिया था कि वे स्वतन्त्र व्यापार के भ्रमों और भ्रांतियों से बुद्धू बनने वाले नहीं है. इसके बावजूद  यदि मजदूर भूस्वामी कुलीन वर्ग के खिलाफ स्वतन्त्र व्यापारियों के पक्ष में लामबंद हो गए थे तो इसलिए वे सामंतवाद के अवशेषों को ख़त्म करना चाहते थे ताकि उनके खिलाफ केवल एक शत्रु बचे. मजदूरों का अनुमान गलत साबित नहीं हुआ. विनिर्माण के हितपोषकों से बदला लेने के लिए, दस घंटे कार्यदिवस सम्बन्धी विवाद में भूसंपत्ति के समर्थक मजदूरों के पक्ष में लामबंद हो गए. इस सुधार के लिए मजदूर बीस सालों से व्यर्थ ही मांग कर रहे थे जबकि अनाज कानूनों के रद्द होने के तुंरत बाद बने नियमों में उनकी मांग मान ली गयी.” (ब्रसेल्स डेमोक्रेटिक एसोसिएशन के समक्ष 9 जनवरी 1848 को स्वतन्त्र व्यापार पर दिए गए मार्क्स के भाषण से. (देखें मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ, 186)

दस घंटे कार्यदिवस का विधेयक जिन परिस्थितियों में पेश किया गया था उनका जिक्र मार्क्स इस प्रकार करते हैं : “इन वर्षों में अनाज कानून रद्द कर दिए गए थे, कपास और अन्य कच्चे मालों पर आयात शुल्क समाप्त कर दिया गया था, स्वतन्त्र व्यापार के सिद्धांत को तमाम कानूनों का पथ-प्रदर्शक घोषित कर दिया गया था. संक्षेप में कहा जाये, तो मानों स्वर्ण-युग का आरंभ हो गया था. दूसरी ओर, इन्हीं वर्षों में चार्टिस्ट आन्दोलन और दस घंटे कार्यदिवस विधेयक के पक्ष में आन्दोलन अपनी चर्म सीमा पर पहुँच गया था. इन अदोलनों को अनुदार दल के लोगों का समर्थन प्राप्त था जोकि कारखाना मालिकों से बदला लेने के लिए बेकरार थे. (कॉबडेन और ब्राइट के नेतृत्व में) स्वतन्त्र व्यापार की क़समें खाने वाले समर्थकों के जोरदार विरोध के बावजूद यह विधेयक जिसके लिए कई वर्षों से संघर्ष चल रहा था, संसद में पास हो गया. (मार्क्स, कैपिटल, खंड,1,पृ. 289-90)

एंटी-कॉर्न लीग ने ब्रिटिश मजदूरों के लिए पाठशाला का काम भी किया जहाँ पर उन्होंने आन्दोलनात्मक तौर-तरीकों की शिक्षा ग्रहण की. लीग के नियंत्रण में बहुत बड़ी धनराशी उपलब्ध थी जिसे उसने समाचारपत्रों, पुस्तकों, पर्चों, पोस्टरों और घोषणापत्रों के प्रकाशन में खुले हाथ से खर्च किया. 1843 तक लीग पर्चों की 10,000,000 प्रतियाँ प्रकाशित कर चुकी थी.  लीग की कार्यकारी समिति उसकी सर्वोच्च सत्ता थी जिसके सदस्य इसकी विभिन्न शाखाओं की गतिविधियों को संचालित करते थे. लीग की कार्रवाइयों में पुरुष मजदूरों के संगठन और स्त्री-मजदूरों के संगठन साथ-साथ शिरकत करते थे. अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए लीग के प्रवक्ता बल-प्रयोग की अपील करने से नहीं घबराते थे और भूस्वामी कुलीन वर्ग की दुष्टता का बखान बहुत खुले शब्दों में करते थे जो उत्पादक वर्ग को भूखा मार डालना चाहता था.

एक और जहाँ बुर्जुआ क्रांति में उन कुलीनवर्गीय सिद्धान्तकारों की अच्छी-खासी तादाद थी जो बुर्जुआ विचारधारा को स्वीकार करते थे और उसका समर्थन करते थे दूसरी और ऐसे बुर्जुआ सिद्धान्तकार बिरले ही मिलेंगे जो सामाजिक विकास की दिशा को समझते हों और सर्वहारा दृष्टिकोण को अपनाने के लिए तत्पर हों. इसकी मुख्य वजह यह है कि बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच खाई उससे कहीं ज्यादा गहरी थी जो कुलीन वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच मौजूद थी. रूसी क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में (जनवादी पार्टियों का गठन करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग) के ऐसे सिद्धान्तकारों ने संघर्षरत सर्वहारा की कतारों में शामिल होने की इच्छा कदाचित ही प्रकट की थी.

चार्टिस्ट आन्दोलन – मेहनतकश वर्ग का राजनीतिक संगठन

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26.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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हड़तालों की घोषणा, ट्रेड यूनियनों का गठन, यूनियनों का पहले क्षेत्रीय संगठनों और बाद में राष्ट्रीय संगठनों में समेकन और उसके बाद कई यूनियनों से अस्थाई संघ बनाने की कोशिश करने का काम मेहनतकशों के राजनीतिक संघर्ष के साथ-साथ  चलता रहा और इसने 1836-37 के संकट के बाद गंभीर हलचल का रूप धारण कर लिया था. 1839 में नेशनल चार्टिस्ट एसोसिएशन की स्थापना उन मांगों के समर्थन में आन्दोलन करने के लिए की गयी थीं जो एक साल बाद पीपुल्स चार्टर में प्रस्तुत किये गए थे. इस निकाय का खास मकसद कारीगरों और मेहनतकश वर्गों  की तकलीफों को कम करना था और इसे मजदूरों की पहली राजनीतिक पार्टी कहा जा सकता है. एंगेल्स इस तथ्य का स्पष्ट विवरण पेश करते हैं कि अलग-अलग यूनियनों का आंशिक संघर्ष और इनका राष्ट्रीय स्तर पर वर्ग संघर्ष में मिल जाना कैसे सारे मेहनतकश वर्ग के राजनीतिक संघर्ष में रूपांतरित हो जाता है.

“मेहनतकश कानून का समादर नहीं करता है. वह केवल तभी इसके विधानों का पालन करता है जब उनके बदलने की कोई गुंजाईश नहीं होती है. इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि वह कानून बदलने की कोशिश करे और बुर्जुआ विधानों के स्थान पर सर्वहारा विधानों को लागू करने का प्रयत्न करे. यही वजह थी कि अंग्रेज मजदूरों को सुधारों की योजना तैयार करने की प्रेरणा मिली जिसे पीपुल्स चार्टर में प्रस्तुत किया गया था. वह एक विशुद्ध राजनीतिक दस्तावेज़ था जिसका उद्देश्य अन्य बातों के अलावा, हाउस ऑफ़ कामन्स का जनवादी पुनर्गठन था. चार्टिस्ट आन्दोलन बुर्जुआ वर्ग के खिलाफ मेहनतकश वर्ग के विरोध की सघन अभिव्यक्ति थी. ट्रेड यूनियनों और हड़तालों में व्यक्तिगत मजदूर या मजदूरों का समूह व्यक्तिगत बुर्जुआ के खिलाफ संघर्ष छेड़ देता था जिससे इसका स्थानीय और एकाकी रूप जाहिर होता था. यदि कभी-कभी यह संघर्ष व्यापक रूप धारण कर लेता था तो इसकी शायद ही कभी यह वजह होती थी कि मजदूर खुद सचेतन रूप से ऐसा चाहते थे. जहाँ तक आन्दोलन के सुविचारित विस्तार का प्रश्न है, यह चार्टिस्ट आन्दोलन की देन है. क्योंकि चार्टिस्ट आन्दोलन में सारा मेहनतकश वर्ग बुर्जुआ के खिलाफ हो गया था. उसका पहला हमला बुर्जुआ की राजनीतिक सत्ता पर हुआ और उसने इस सत्ता को सुरक्षा प्रदान करने वाली कानूनी दीवारों में दरार पैदा करने की कोशिश की.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड पृ. 227-28)

सन 1838 में हाउस ऑफ़ कामन्स के छह सदस्यों और लन्दन वर्किन्गमेंस एसोसिएशन के प्रतिनिधियों के लन्दन में हुए अधिवेशन में पीपुल्स चार्ट का प्रारूप तैयार किया था. इनकी मुख्य मांगे थीं :
(१) इक्कीस वर्ष से अधिक आयु के पुरषों के लिए सार्विक मताधिकार,
(२) सालाना संसद,
(३) संसद सदस्यों के लिए संपत्ति की अहर्ता का खात्मा,
(४) गुप्त मतदान से चुनाव,
(५)अधिक न्यायोजित प्रतिनिधित्व के लिए समान निर्वाचक मंडल,
(६) सदस्यों को पारिश्रमिक.

एंटी-प्रूधों में मार्क्स उस प्रक्रिया का विवरण देते हैं जिसके अर्न्तगत मेहनतकश लोग धीरे-धीरे अपने हित के लिए एक वर्ग में संगठित हो जाते हैं और जिसके अर्न्तगत मेहनतकश वर्ग चेतना का विकास करता है. उन्हीं के शब्दों में;

“पूंजीवाद युग के प्रारंभ में आबादी का बड़ा हिस्सा आर्थिक कारणों से उज़रती मजदूरों में तब्दील हो गया. पूंजी की सत्ता ने उन स्थितियों को पैदा किया जिन्होनें मेहनतकशों को समग्र रूप में प्रभावित किया जिससे उनके हित समान हो गए. इस प्रकार एक वर्ग के रूप में वे पहले ही समेकित हो चुके थे जो पूंजीपतियों के खिलाफ खडा था हालाँकि एक अलग वर्ग के रूप में अपनी हैसियत की पहचान उन्हें नहीं हो पाई थी. संघर्ष के दौरान ही मेहनतकशों का समूह समेकित होता है ताकि वह अपने आप को एक सुस्पष्ट वर्ग के रूप में पहचान सके. जिन हितों की रक्षा के लिए वे संघर्ष करते हैं वे उनके वर्ग हित बन जाते हैं लेकिन एक वर्ग का दूसरे वर्ग के खिलाफ संघर्ष, राजनीतिक संघर्ष ही होता है.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ फिलासफी, पृ. 136)

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चतुथार्श में सर्वहारा ने एक वर्ग, समाज के एक सुस्पष्ट हिस्से, उत्पादन प्रक्रिया में एक विशिष्ट भूमिका निबाहने वाले लोगों के समूह के रूप में निश्चित शक्ल अख्तियार की. इस समय सर्वहारा वैज्ञानिक पड़ताल की विषयवस्तु  बन जाता है. इसका अस्तित्व इतना सुस्पष्ट बन जाता है कि बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्र का मुख्य कार्यभार उन नियमों की व्याख्या करना है जिनके अर्न्तगत पूंजीवादी व्यवस्था में समाज के तीन वर्गों – भूस्वामी कुलीन वर्ग, बुर्जुआ वर्ग और मजदूर वर्ग के बीच मालों का वितरण होता है. तो भी एक विशिष्ट वर्ग जिनके अपने विशिष्ट वर्ग हित हों, अपने विशिष्ट कार्यभार हों, संक्षेप में स्वयं के महत्त्व के अनुरूप पृथक वर्ग की चेतना से लैस होने में मेहनतकश लोगों को बहुत साल लगे.

ट्रेड यूनियन आन्दोलन का उद्भव और विकास

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25.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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मजदूरों के ट्रेड यूनियन आन्दोलन के विकास की दिशा की सैद्धांतिक व्याख्या करने का प्रयास एंगेल्स ने किया था. उनके विचार अपने समकालीन अर्थशास्त्रियों और समाजवादियों से भिन्न थे और उन्होंने 1845 में ही यह सिद्ध कर दिया था की ट्रेड यूनियनें मज़दूरों और उद्योगपतियों के बीच संघर्ष की अनिवार्य परिणति हैं और मज़दूर वर्ग के सभी संगठनों का आधार ट्रेड यूनियन होगा. अपने आरंभिक दौर में, हड़ताल अवधि में जन्मी मज़दूरों की एकजुटता अल्पजीवी होती थी. चूंकि सभी किस्म के संगठन कानून द्वारा प्रतिबंधित थे, चूंकि मज़दूर वर्ग की समस्त संस्थाएं और संघ कानून का उल्लंघन माने जाते थे (जिसे महान फ्रांसीसी क्रांति की घटनाओं के बाद विशेष रूप से सख्त बना  दिया गया था जब 1799-1800 में विशेष विधेयक लागू कर दिया गया), इसलिए मज़दूरों ने गुप्त सोसायटियां बनाना आरंभ कर दिया जिनकी संख्या और सक्रियता बढ़ती चली गयी. मज़दूरों ने प्रचंड संघर्ष किया जिसमें रैडिकल बुर्जुआ ने मज़दूरों की मदद की. इस संघर्ष ने 1816, 1817 एवं 1819 के दौरान अर्द्ध-क्रांतिकारी रूप धारण कर लिया था. इस संघर्ष ने प्रतिक्रियावादी सिडमाउथ मंत्रिमंडल को बदनाम छह कानून पारित करने के लिए मजबूर कर दिया था. आखिरकार इस संघर्ष के बाद 1824 में एक अधिनियम पारित किया गया जिसने उन सभी कानूनों को मंसूख कर दिया जो किसी भी किस्म के संगठन को प्रतिबंधित करते थे. यद्यपि संगठन बनाने का अधिकार प्रदान करने वाले इस कानून को आंशिक रूप से अगले ही साल रद्द कर दिया गया था तथापि मज़दूर अनिरस्त विशेषाधिकारों का धीरे-धीरे उपयोग करने लगे.
“उद्योग की प्रत्येक शाखा में ट्रेड यूनियनें बन गयीं. बुर्जुआ के अत्याचार और अन्याय से मज़दूरों को बचाने का काम ये खुलकर करने लगीं. उनके उद्देश्य थे;

1. सामूहिक समझौते से मज़दूरी निर्धारित कराना,
2. यूनियन के सभी सदस्यों की ओर से सेवायोजकों से समझौता करना,
3. उद्यमी के लाभांश अनुसार मज़दूरी नियंत्रित करना,
4. यथासंभव मज़दूरी में वृद्धि करना और
5. कारखानों की प्रत्येक शाखा में मज़दूरी का समान स्तर कायम रखना.

इसलिए ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि प्राय: पूंजीपतियों से एक मानक मज़दूरी तय करने के प्रश्न पर वार्ता किया करते थे जो समस्त सेवायोजकों के लिए बाध्यकारी होती थी. यदि कोई सेवायोजक मानक दर से मज़दूरी अदा करने से मना कर देता था तो उसे होश में लाने के लिए हड़ताल की घोषणा कर दी जाती थी. इसके अलावा ये प्रशिक्षुओं की संख्या के सीमा निर्धारण द्वारा श्रम की मांग को बनाए रखने की कोशिश करते थे ताकि मज़दूरी के स्तर को कायम रखा जा सके. वे कारखाना मालिकों को नयी मशीनों को उपयोग में लाने की कोशिश करने से रोकने का प्रयास करते थे जिनके कारण मज़दूरी कम होती थी. इतना ही नहीं, ट्रेड यूनियनें काम से निकाल दिये गए सदस्यों को धन के रूप में, मदद भी दिया करती थीं. (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 215)

एंगेल्स इस तथ्य से भलीभांति परिचित थे कि ब्रिटिश मज़दूरों ने अपने जीवन काल में ही राष्ट्रीय स्तर की यूनियनें बनाना शुरू कर दिया था. “जब कभी सम्भव हुआ और स्थिति अनुकूल हुई, स्थानीय शिल्प संघों ने संयुक्त होकर महासंघ बनाया. निर्धारित अवधि में इन निकायों के अधिवेशन सम्पन्न किये जाते थे जिनके प्रतिनिधि इन यूनियनों द्वारा मनोनीत होते थे. इन यूनियनों ने न केवल शिल्प विशेष के सारे मज़दूरों को एक बड़े संघ में एकजुट करने का प्रयास किया बल्कि समय-समय पर (उदाहरण के लिए 1830 में) उन्होंने इंग्लैंड के सभी मज़दूरों को एक बड़ी ट्रेड यूनियन में ऐक्यबद्ध करने का प्रयास किया जिसके अन्तर्गत प्रत्येक शिल्प के मजदूर स्वतन्त्र रूप से संगठित होते थे.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 215-16)
इसी प्रकार एंगेल्स ट्रेड यूनियनों के संघर्ष के तरीकों का विवरण प्रस्तुत  करते हैं. सबसे पहले हड़ताल होती है, फिर भेदी मज़दूरों, हड़ताल तोड़ने वाले मज़दूरों का मुकाबला किया जाता है और गैर-युनियनवादियों को इस मार्ग पर चलाने के लिए दबाब डाला जाता है.

एंगेल्स यह स्वीकार करते थे कि मेहनतकश वर्ग के संगठन का एक आवश्यक घटक ट्रेड यूनियन है लेकिन वे पूंजीवादी समाज में इसके महत्त्व की सीमा को भी पूरे तौर पर समझते थे. “इन संघों का इतिहास विरल विजयों से अलंकृत पराजयों की लम्बी श्रृंखला की कहानी है. यह बताने की ज़रुरत नहीं है कि ट्रेड यूनियनवाद अपनी सारी ताकत लगाकर भी इस स्थिति में नहीं आ पाता कि उस आर्थिक नियम को बदल दे जिसके अर्न्तगत, उज़रतें श्रम बाज़ार में मांग और आपूर्ति से तय होती हैं.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 216-17)
यद्यपि हड़ताल करना निरर्थक प्रतीत होता है फिर भी यह बात एकदम साफ़ है कि यदि मेहनतकश उज़रत में कटौती का विरोध नहीं करें तो ऐसे विरोध के अभाव में सेवायोजकों के लालच की कोई सीमा नहीं होगी. “युनियने और उनके नाम से की गयी हड़ताल का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि इससे प्रथमत: मजदूरों के बीच प्रतिस्पर्द्धा का उन्मूलन होता है. यह उस पूर्वधारणा  पर आधारित है कि खुद मजदूरों के बीच प्रतिद्वंदिता, उनमें एकजुटता का आभाव, मजदूरों के एक समूह के हितों का दुसरे मज़दूरों के हितों से शत्रुतापूर्ण संबंधों पर बुर्जुआ का शासन स्थापित होता है.”(एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 218-19)

एंगेल्स हड़ताल की भर्त्सना करने वाले समाजवादियों और अर्थशास्त्रियों को याद दिलाते हैं कि इन कार्रवाईयों का शैक्षिक महत्त्व होता है. “हो सकता है कि हड़तालें झड़पों से ज्यादा कुछ न हों; कभी-कभी वे महत्त्वपूर्ण टकराव हो सकती हैं. वे निर्णायक भिदंतें नहीं होती हैं लेकिन इससे पूरी तौर से स्पष्ट हो जाता है कि सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच antim संघर्ष आसन्न है. मज़दूरों  के लिए हड़तालें सैनिक प्रशिक्षण विद्यालय का काम करती हैं. इस विद्यालय में सर्वहारा उस महान संघर्ष के लिए प्रशिक्षण पाटा है जोकि अपरिहार्य है. हड़ताल इस बात का ऐलान है कि मज़दूरों की प्रथक प्रशाखाएं समग्रता में मज़दूर आन्दोलन में निष्ठां रखती हैं…. युद्धकला की पाठशाला के रूप में, हड़तालों का कोई सनी नहीं है.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 224)
प्रूधों (1809-1865) हड़तालों की भर्त्सना करते थे और उनका तर्क था कि वे “अवैधानिक” होती हैं. लेकिन मार्क्स ने एंगेल्स के निष्कर्षों को महत्त्व देते हुए तथा उन्हें और अधिक स्पष्ट करते हुए बताया कि एक वर्ग के रूप में सर्वहारा के विकास एवं ट्रेड यूनियन के विकास में निकट का सम्बन्ध है.

“जब कभी और जहाँ कहीं मजदूर अपनी ताकत को इकठ्ठा करने की कोशिश करते हैं तो इस एकता का सबसे पहला रूप एक गठबंधन होता है. बड़े पैमाने का उद्योग एक-दुसरे से अंजन लोगों के समूह को एक स्थान पर इकठ्ठा कर देता है. प्रतिस्पर्द्धा उन्हें एक-दुसरे से अलग करती हैं. उजरतोँ के स्तर को कायम रखना उनका साझा हित होता है जो उनके स्वामी के हितों के प्रतिकूल होता है. उज़रत में कटौती के किसी प्रयास का मुकाबला करने के लिए वे एक हो जाते हैं और एक ‘गठबंधन’ बना लेते हैं. इस गठबंधन के दो उद्देश्य होते हैं – पहला मजदूरों के बीच प्रतिस्पर्द्धा कम करना और दूसरा पूंजीपति से संघर्ष में मज़दूरों की सारी शक्ति को केन्द्रित कर देना. ऐसा मालूम हो सकता है कि पहला उद्देश्य उज़रतों के स्तर को कायम रखने के प्रयास से अधिक कुछ नहीं है. तो भी सूक्ष्मतर  निरीक्षण से यह बात समझ में आ जाती है कि जिस हद तक मज़दूरों की विभिन्न श्रेणियां समूह बनाने की ओर प्रवृत होती हैं. पूंजीपतियों की पूर्ण एकता के मद्देनज़र, मजदूरों की इन एकीकृत समूहों को कायम रखना, इसका गठन करने वाले मजदूरों के नज़रिए से उज़रत का स्तर बनाये रखने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण बन जाता है. इस बात की सत्यता ने अंग्रेज़ अर्थशास्त्रियों को बहुत आश्चर्यचकित कर दिया है जब वे यह देखते हैं कि मजदूर उन यूनियनों को धन उपलब्ध करने के लिए अपनी मजदूरी का बडा हिस्सा दे देते हैं जिनका गठन, इन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, मजदूरों की उज़रत की सुरक्षा के लिए किया जाता है. इस संघर्ष के दौरान, वास्तविक गृहयुद्ध में आगामी संघर्ष के सभी तत्त्वों का एका स्थापित हो जाता है. इसके साथ गठबंधन ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं कि उनका चरित्र राजनीतिक हो जाता है.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ. 136)

बुर्जुआ शतरंज में मोहरों के रूप में सर्वहारा

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24.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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दूसरे और तीसरे दशक में (1820-1840) अंग्रेज़ और फ्रांसीसी बुर्जुआ मजदूरों के नेता की भूमिका निभाने लगे थे और बुर्जुआ शतरंज में सर्वहारा को मोहरों की तरह इस्तेमाल कर रहे थे| इसी समय के बारे में मार्क्स  लिखते हैं:” एक और तो बड़े पैमाने का उद्योग खुद अपनी बाल्यावस्था पार  कर रहा था जिसका परिमाण यह है कि 1825 के संकट के साथ पहली बार उसके आधुनिक जीवन के आवधिक चक्र की शुरुआत होती है| दूसरी ओर पूँजी और श्रम का वर्ग संघर्ष पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया था| राजनीतिक दृष्टि से उस झगड़े द्बारा जो एक तरफ पवित्र गुट( होली अलायंस) के इर्दगिर्द एकत्रित सरकारों तथा सामंती अभिजात वर्ग और दूसरी तरफ बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में साधारण जनता के बीच चल रहा था; आर्थिक दृष्टि से उस झगड़े द्वारा जो औद्योगिक पूँजी तथा अभिजातवर्गीय भूसंपत्ति के बीच चल रहा था| यह दूसरा झगडा फ्रांस में छोटी और बड़ी भूसंपत्ति के झगड़े से छिप गया था लेकिन इंग्लॅण्ड में अनाज कानूनों के सवाल पर खुल्लम-खुल्ला लड़ाई के रूप में सामने आ गया था|( मार्क्स, कैपिटल के दूसरे जर्मन संस्करण का प्राक्कथन)|

इंग्लॅण्ड में स्वतन्त्र व्यापार के सिद्धांत को लागू करने, अनाज कानून को रद्द करने, अपराध और दीवानी संहिता में सुधार करने तथा मताधिकार का क्षेत्र विस्तृत करने के लिए बुर्जुआ द्वारा छेड़े गए संघर्ष में मजदूरों ने उसकी मदद की थी|

रिकार्डो(1772-1823) जैसे अर्थशास्त्रियों, बेन्थम(1748-1832) जैसे विधि विशेषज्ञों और जोसफ ह्यूम(1777-1855) जैसे राजनीतिज्ञों  का भी मजदूरों पर बहुत अधिक प्रभाव था| 1830 के बाद जब बुर्जुआ वर्ग के उग्र भाग ने उस समझौते को बहुत ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लिया जोकि औद्योगिक पूंजीपतियों को राजनीतिक सत्ता प्रदान करता था तो मजदूर वर्ग के अग्रिम दस्ते और बुर्जुआ के बीच गंभीर मतभेद पैदा हो गए|

पुनर्स्थापना काल में, 1815 से 1830 तक फ्रांसीसी उदार बुर्जुआ का विकास ठीक इसी दिशा में हुआ| इसमें सामंती कुलीनतंत्र और ब्रूब्रोंवादियों की राजतंत्रीय शक्ति के विरूद्ध जनसाधारण के संघर्ष का नेतृत्व किया| उसने शोषितों के मार्गदर्शक, दार्शनिक और मित्र की भूमिका निभायी| लेकिन इसके साथ ही उसने बड़ी चतुराई से औद्योगिक पूंजीपतियों के हितों एंवं भूसम्पत्तिधारक अभिजात वर्ग के हितों के बीच शत्रुता तथा अपने वर्ग हितों एवं मजदूरों के वर्ग हितों के बीच शत्रुता को नज़र से दूर रखा| लेकिन जुलाई क्रांति तथा 1831 और 1834 में सक्रिय  ल्योनवासियों के विद्रोह के युग में मजदूरों की आँखें खुल गयीं जिसने उन्हें अपने हित के लिए राजनीतिक दृष्टिकोण सूत्रित करने और उस भूमिका को निभाने के लिए प्रेरित किया जिसे अब तक बुर्जुआ पार्टी की उग्र शाखा द्वारा निभाया जा रहा था|

पूंजीवाद के खिलाफ मेहनतकश वर्ग के प्रतिरोध के विभिन्न रूप

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23.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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पूंजीवादी समाज मेहनतकशों को जड़ बस्तुओं की सीमा तक नीचे गिरा देता है. मज़दूर मानवीय गरिमा के बोध को तभी तक बरक़रार रख सकता है जब तक वह अपनी इस स्थिति के विरुद्ध विरोध प्रकट करता रहता है, और बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध विद्रोह करता रहता है और बुर्जुआ सामाजिक व्यवस्था से घृणा करता रहता है. इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की दशा में एंगेल्स बताते हैं कि “आधुनिक अर्थों में उद्योगों का विकास अपनी प्रारंभिक मन्ज़िल से जब आगे बढा उसके तुंरत बाद बुर्जुआ के खिलाफ मजदूरों का विद्रोह शुरू हो गया था. इस विद्रोह का सबसे पुराना, सबसे अधिक भोंडा और सबसे कम प्रभावी रूप अपराधिक गति विधियों में अभिव्यक्त हुआ. मज़दूर गरीबी और अभाव में जीता है और दूसरों को बेहतर स्थितियों में ज़िन्दगी बसर करते हुए देखता है. उसे यह समझ में नहीं आता था कि वह क्यों कष्ट झेलता है जबकि वह धनी निकम्मे लोगों की अपेक्षा समाज के लिए ज्यादा काम करता हैं. संपत्ति के प्रति उसकी पारंपरिक श्रद्धा पर ज़रुरत हावी हो गयी – और वह चोरी करने लगा. जैसे-जैसे उद्योगों का विकास हुआ उसी अनुपात में अपराध में भी वृद्धि होने लगी. गिरफ्तारी के वार्षिक आंकडे, कपास की गांठों की खपत के वार्षिक आंकडों के समरूप पाए गए. मजदूरों को जल्दी ही यह समझ आ गया कि अपराध करने में कोई फायदा नहीं है. अपराधी एक व्यक्ति के रूप में अलग-अलग, समाज की प्रचलित व्यवस्था के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराता है तो समाज की समग्र शक्ति सक्रीय हो जाती है और अपनी जबरदस्त ताकत से उसे कुचल डालती है. चोरी करना विरोध दर्ज करने का सर्वाधिक अपरिष्कृत रूप है और इसी वजह से यह मज़दूर वर्ग के अभिमत की सामान्य अभिव्यक्ति कभी नहीं बन पाई, हालाँकि मज़दूर अपने अंतर्मन में इस कृत्य को क्षम्य मानते रहे हैं.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 213-4) ठीक यही बात विरोध के उस दूसरे रूप पर भी लागू होती जोकि पूंजीवादी विकास के शुरुआती दौर में प्रकट हुआ था अर्थात कारखाना मालिकों, ओवरसियरों की हत्या करना.
कारखानों में बलवा सामूहिक विरोध करने का पहला रूप है जिसमें संपत्ति नष्ट की जाती थी विशेषतया मशीनें तोड़ दी जाती थीं. मशीनों के खिलाफ मजदूरों का संघर्ष नयी मशीनरी के आविष्कार के आरंभ से शुरू हो गया था. लेकिन सामूहिक कार्रवाइयाँ  उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में शुरू हुई. मजदूरों ने नाटिन्घम, यार्कशायर और लंकाशायर में मशीनों को नष्ट करने का सुनियोजित अभियान आरंभ किया जिन्हें ‘लुड़्डाइट्स’ कहा जाता था. 1811 के अंत में बलवाइयों ने नाटिन्घम और पड़ोसी जिलों में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी. लेस और स्टॉकिन्ग  बनाने के चौखटों को नष्ट करने से उन्होंने अपनी शुरुआत की. इन मंडलियों का सरदार एक मिथकीय काल्पनिक चरित्र जनरल लुड़्ड के नाम से जाना जाता था जिसके नाम पर कारखाना मालिकों के खिलाफ हिंसात्मक कार्रवाइयाँ की जाती थीं, औद्योगिक संपत्ति नष्ट की जाती थी और मशीनों के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए जाते थे. पुलिस ‘लुड़्डाइट्स’ का सामना कर पाने में असमर्थ थी और विद्रोह को दबाने के लिए सेना की मदद लेनी पडी. एक विधेयक प्रस्तुत किया गया जिसके तहत किसी मज़दूर को मृत्यु दंड दिया जा सकता था यदि उस पर मशीन तोड़ने का आरोप  सिद्ध हो जाता. इस अत्यधिक दमनात्मक विधेयक के विरोध की एक उल्लेखनीय उपलब्धि लोर्ड बायरन (1788-1824) का हॉउस ऑफ़ लॉर्ड्स में दिया गया भाषण है. इस भाषण में उन्होंने नाटिंघम के मजदूरों की तकलीफों का सजीव चित्र पेश किया था. लुड्डाइट आन्दोलन का सजीव और कल्पनापूर्ण चित्रण अर्न्स्ट टालर के नाटक द मशीन रेकर्स में किया गया है. यह आन्दोलन 1812 में पुनर्जीवित हो उठा और जनवरी 1813 में तीन व्यक्तियों को फाँसी दे दी गयी. कार्टराइट के कारखाने पर हमले के सप्ताह के दौरान चौदह व्यक्तियों को प्राणदंड दिया गया. उत्तेज़ना फैलाने वाले एजेंटों की मदद से सरकार ने पूरी तौर से इस संगठन को नष्ट कर दिया. उद्योग की समृद्धि में नयी जान आ जाने और अंशत: कॉर्बेट (1762-1835) के आन्दोलन के परिणामस्वरूप, जिसने मजदूरों को मशीनों को तोड़ने की मुर्खता का अहसास करा दिया था (जो उनकी बढती जा रही समझदारी का बोध कराता है), लुड्डाइट आन्दोलन का अंत हो गया. फिर भी विरोध के इस स्वरूप ने अपनेआप को बदलती परस्थितियों के अनुकूल ढालना जारी रखा और जब कभी नयी मशीनें उपयोग में लायी गयीं इसका सहारा लिया गया. इस प्रकार अठारह सौ तीस के दशक में इंग्लैंड के सम्पूर्ण ग्रामीण क्षेत्र में ‘लाल मुर्गा’ बांग देता रहा. अर्थात जैक स्विंग के नेतृत्व में कृषि मजदूरों ने पुआल के ढेरों और खलिहानों में आग लगायी. “जनरल लुड्ड” की भांति “जैक स्विंग” भी एक काल्पनिक चरित्र था.
जर्मनी में अठारह सौ चालीस के दशक में सिलेसियाई बुनकरों ने आन्दोलन के ठीक इसी रूप को अपनाया. इसका ज़िक्र मार्क्स के मित्र विल्हेल्म वुल्फ ने अपनी रचनाओं में किया है और गरहार्ट हाफमैन ने अपने प्रसिद्द नाटक द वीवर्स में इसका उपयोग कथावस्तु में किया. उन्नीसवीं शताब्दी के आठवें और नौवें दशक में रूस में मशीनों को तोड़ने वाला बलवा हुआ. “काफी समय बीत जाने और काफी अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद मजदूर मशीन और पूंजी द्वारा मशीन के उपयोग में भेद कर पाए और उन्होंने अपने प्रहार का निशाना उत्पादन के भौतिक औजारों को नहीं बल्कि उस विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था को बनाना सीखा जो इन औजारों का उपयोग करती है.” (मार्क्स, कैपिटल, भाग 1, 458)


मजदूर पूंजीपति को उधार देता है

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21.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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“ऐसे प्रत्येक देश में, जिसमें पूंजीवादी ढंग का उत्पादन पाया जाता है, यह रिवाज होता है कि जब तक श्रम-शक्ति का करार में निश्चित समय तक, जैसे, मिसाल के लिए, एक सप्ताह तक प्रयोग नहीं कर लिया जाता, तब तक उसके दाम नहीं दिए जाते. इसलिए, हर जगह मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य पूंजीपति को पेशगी दे देता है, मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति के क्रेता को दाम पाने के पहले ही उसके उपयोग की इजाज़त दे देता है; हर कहीं मज़दूर पूंजीपति को उधार देता है. यह उधार महज़ कोई हवाई चीज नहीं होता, इसका सबूत सिर्फ यह है कि पूंजीपति का दिवाला निकलने पर मजदूरी के पैसे अक्सर डूब जाते हैं बल्कि यह भी कि उसके इससे कहीं अधिक स्थायी अनेक दूसरे नतीजे भी होते हैं.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 162)
मार्क्स यहाँ पर एक टिप्पणी देते हैं जिसमें वह आंकडे देते हुए यह सिद्ध करते हैं कि उन मज़दूरों से जिन्हें एक सप्ताह बाद मजदूरी मिलती है, दूकानदार ज़्यादा दाम वसूल करता है क्योंकि उन्हें अपनी ज़रुरत की चीजें उधार पर लेनी पड़ती हैं.
उस मज़दूर की स्थिति और ज़्यादा ख़राब होती है जो अपनी मजदूरी एक पखवाड़े या एक महीने के बाद पाता है. वह चीजों की और ज़्यादा कीमत चुकाने के लिए बाध्य हो जाता है और वास्तव में उस दूकानदार का गुलाम बन जाता है जो उसे चीजें उधार देता है. मज़दूर जो माल खरीदता है वे यदि वास्तव में मिलावटी नहीं होते तो निम्न गुणवत्ता के होते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान खाद्य सामग्री की मिलावट ने विकराल रूप धारण कर लिया था. इसी प्रकार आवास के मामले में मज़दूर भवन स्वामी की दया पर निर्भर रहता है. आवास जितना घटिया होता उतना अधिक उसकी मरम्मत पर खर्च आता है और असंदिग्ध रूप से सर्वाधिक मंहगे वे आवास होते हैं जिसमें आबादी का निर्धनतम वर्ग निवास करता है. “आवासों के सट्टेबाज गरीबी की इन खानों से इतना अधिक मुनाफा कमाते हैं कि पोटोसी की चांदी की खानों के मालिकों के मुहं में भी पानी आ जाये.”(मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 727)

22. निम्न और मध्यम बुर्जुआ सर्वहारा की कतारों में शामिल होते हैं

“समाज के उच्चतर संस्तरों से आये लोगों से भी मज़दूर वर्ग की संख्या में वृद्धि होती है. ढेरों छोटे उद्यमी और अनर्जित आय के छोटे हिस्सेदार सर्वहारा की कतारों में शामिल होते जाते हैं और अपने श्रम को श्रम बाज़ार में बिक्री के लिए मज़दूरों के साथ-साथ पेश कर देते हैं. काम की याचना में ऊपर उठे हाथों का जंगल लगातार ज़्यादा घना होता जाता है जबकि ये हाथ लगातार पतले होते जाते हैं. यह बात एकदम साफ़ है कि जब सफलता की पहली शर्त बड़े पैमाने का उत्पादन हो तो छोटा उत्पादक स्पर्द्धा में टिक नहीं सकता. दूसरे शब्दों में कोई भी इंसान एक ही वक्त में छोटे उत्पादक के साथ-साथ बड़ा उत्पादक नहीं बना रह सकता. इस तथ्य के विस्तृत निरूपण की आवश्यकता नहीं है कि पूंजी पर ब्याज उसी अनुपात में घटता जाता है जिस अनुपात में पूंजी में वृद्धि होती जाती है अर्थात पूंजी की मात्रा और उसके क्षेत्र के विस्तार में वृद्धि होती जाती है. अनर्जित आय के छोटे हिस्सेदारों के लिए अपनी पूंजी के ब्याज से जीवनयापन कर पाना मुश्किल होता जाता है. इसलिए वह औद्योगिक प्रक्रिया में सक्रीय भागीदार बनने के लिए विवश कर दिया जाता है अर्थात यह छोटे कारखाना मालिकों की खाली जगह को भरता जाता है जो खुद भी सर्वहारा वर्ग में भरती के लिए विवश होते जाते हैं.” (मार्क्स, Lohnarbeit and Kapital, पृ. 39)

स्त्रियों और बच्चों का श्रम

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20. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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“जिस हद तक मशीनें शारीरिक शक्ति के अधिक उपयोग को अनावश्यक बना देती हैं, उस हद तक मशीनें सापेक्षत: कम शक्ति रखने वाले मज़दूरों के श्रम के उपयोग का साधन बन जाती है जिनका शरीरिक विकास अपूर्ण होता पर जिनके अंग अधिक लोचदार होते हैं. इसलिए मशीनों का इस्तेमाल करने वाले पूंजीपतियों को सबसे पहले स्त्रियों और बच्चों के श्रम की तलाश होती थी. श्रम और श्रमजीवियों का स्थान लेने वाला यह शक्तिशाली यंत्र शीघ्र ही मज़दूर के परिवार के प्रत्येक सदस्य को, बिना किसी आयु-भेद या लिंग-भेद के, पूंजी के प्रत्यक्ष दासों में भरती करके उज़रती मज़दूरों की संख्या में वृद्धि करने का साधन बन गया. पूंजीपति के लिए अनिवार्य श्रम ने न केवल बच्चों के खेलकूद की जगह ले ली बल्कि घरेलू क्षेत्र में परिवार की आवश्यकताओं के लिए किये जाने वाले सीमित और स्वतन्त्र श्रम की जगह भी ले ली.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 418-9)
पहले एक व्यस्क मज़दूर अपने श्रम से अपने परिवार का भरण-पोषण कर लेता था परन्तु पूंजीवाद में सारा परिवार कारखाने में घसीट लिया जाता है और काम करने के लिए बाध्य कर दिया जाता है. ऐसा भी हो सकता है कि किसी उद्योग में विकसित मज़दूर के लिए कोई काम न हो और वह दूसरे उद्योग में काम ढूँढने के लिए विवश हो जाये अथवा अपने भरण-पोषण के लिए अपने बच्चों पर निर्भर हो जाये. इंग्लैंड के वस्त्र उद्योग में 1861 में प्रति हज़ार नियोजित व्यक्तियों में से स्त्री मज़दूरों की संख्या सूती वस्त्र ट्रेड में 567 (1901 में यह संख्या 628 थी), ऊनी वस्त्र ट्रेड में 461 (1901 में यह संख्या 582 थी) और रेशम ट्रेड में 642 (1901 में यह संख्या 702 थी) थी. चीनी मिटटी के बर्तन, रसायन, वस्त्र, खाद्य जैसी उद्योग की दस विभिन्न शाखाओं में नियोजित पुरुष और स्त्रियों का अनुपात 1841 में 1,030,600 पुरुषों पर 463,000 स्त्रियों का और 1891 में 1,576,100 पुरुषों पर 1,447,500 स्त्रियों का था. जहाँ तक जर्मनी का सम्बन्ध है, वहां के वस्त्र उद्योग में नियोजित प्रति 100 पुरुषों पर नियोजित स्त्रियों की संख्या 1882 में 38, 1895 में 45, 1907 में 50 थी. परिधान उत्पादन के क्षेत्र में नियोजित प्रति 100 पुरुषों पर नियोजित स्त्रियों की संख्या 1882 में 40, 1895 में 45 और 1907 में 51 थी.

कारखाने का निरंकुशतंत्र

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19. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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श्रम के साधन की अपरिवर्ती गति के तहत मज़दूरों की यांत्रिक अधीनता और काम करने वाले समुदाय की विचित्र बुनावट (जो भिन्न-भिन्न वर्ग के स्त्री और पुरुष से मिलकर बनती है) के कारण बैरक जैसा अनुशासन पैदा हो जाता है. यह अनुशासन फैक्टरी में पूर्ण व्यवस्था का रूप ले लेता है और उसमें दूसरों के काम की देखरेख करने का उपर्युक्त श्रम पूरी तरह से विकसित हो जाता है. इससे मज़दूर काम करने वालों और काम की देखरेख करने वालों, औद्योगिक सेना के साधारण सिपाहियों और हवलदारों में बंट जाता है… फैक्टरी नियमावली (जिसमें पूंजी निजी कानून बनाने वाले व्यक्ति की तरह और अपनी इच्छा के अनुसार मज़दूरों पर कायम अपने निरंकुश शासन को कानून का रूप देती है. परन्तु इस निरंकुशता के साथ उतरदायित्व का वह विभाजन जुड़ा हुआ नहीं होता है, और न ही उसके साथ प्रतिनिधिमूलक प्रणालियाँ जुडी होती हैं जो अन्य मामलों में बुर्जुआ वर्ग को बहुत पसंद होती हैं) श्रम-प्रक्रिया के उस सामाजिक नियमन का पूंजीवादी प्रहसन मात्र होता है जो विशाल पैमाने की सहकारिता के लिए और श्रम के औज़ारों के – विशेषकर मशीनों के – सामूहिक उपयोग के लिए आवश्यक होता है. मार-मारकर गुलामों से काम लेने वाले सरदार के कोड़ों का स्थान फोरमैन के जुमानों का रजिस्टर ले लेता है. सभी प्रकार के दंड स्वाभाविक रूप से जुर्मानों और उज़रत में कटौती का रूप धारण कर लेते हैं, और फैक्टरी लाइकरगसों की विधायी प्रतिभा ऐसी व्यवस्था करती है कि उनके बनाये कानूनों के कठोर अनुपालन की अपेक्षा उनके उल्लंघन से सेवायोजक को अधिक लाभ होता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 453-4)
मार्क्स इस सम्बन्ध में एंगेल्स को उद्धृत करते हैं जिन्होंने इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की जीवन स्थितियों के बारे में लिखी पुस्तक में, बीस साल पहले, कारखानों में कायम निरंकुशता का सजीव चित्रण किया था : “बुर्जुआ वर्ग ने सर्वहारा को जिस गुलामी की जंजीर से जकड़ दिया है, उस पर जितना अधिक प्रकाश फैक्टरी-व्यवस्था में पड़ता है, उतना और कहीं नहीं पड़ता. इस व्यवस्था में हर प्रकार की स्वाधीनता – कानूनी तौर पर और वास्तव में दोनों तरह – ख़त्म हो जाती है. मज़दूर को सुबह साढे पॉँच बजे फैक्टरी में हाज़िर होना पड़ता है. यदि उसे दो चार मिनट की देर हो जाती है तो उस पर जुर्माना किया जाता है. यदि वह दस मिनट देर से पहुँचता है तो उसे नाश्ते के समय तक घुसने नहीं दिया जाता और उसकी एक चौथाई मज़दूरी काट ली जाती है. उसे मालिक के हुक्म पर खाना, पीना और सोना पड़ता है…फैक्टरी की निरंकुश सीटी उसे बिस्तर से उठा देती है, नाश्ता और खाना बीच में छुड़ा देती है. और कारखानें में उस पर क्या गुजरती है ? यहाँ पर कारखाने का मालिक निरंकुश विधि-निर्माता होता है. वह जैसे चाहता है, वैसे नियम बनाता है, नियमावली में अपनी इच्छानुसार परिवर्तन करता रहता है और नयी बातें जोड़ता रहता है, और अगर वह बिलकुल बेहूदा बातें उसमें शामिल कर लेता है, तब भी अदालतें मज़दूर से यही कहती हैं, कि : ‘तुमने ये करार अपनी मर्ज़ी से किया है, अब तो तुम्हें उसका पालन करना ही होगा…नौ वर्ष की आयु से मृत्यु तक इन मज़दूरों को हर घड़ी यह मानसिक और शारीरिक यातना सहन करनी पड़ती है.” (कैपिटल, खंड 1, पृ. 453)
क्रांति के पहले रूस में कारखानों में कायम निरंकुशता का घृणित रूप, रूसी कारखाना मालिकों द्वारा जुर्मानों की व्यवस्था में किये गये परिमार्जन के स्तर को लेनिन के पैम्फ्लेट (‘दण्डों के कानून की व्याख्या’ – Explanation of the Law on Fines Imposed on Factory Workers) में अच्छे तरीके से चित्रित किया गया है.

श्रम और श्रमशक्ति

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18. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

यहाँ पर मार्क्स और एंगेल्स उस पारिभाषिक शब्दावली का उपयोग करते हैं जिसे उन्होंने बाद के वर्षों में त्याग दिया था. माल के रूप में श्रम का उस श्रम से विभेदीकरण किया गया है जिसकी मात्रा किसी माल के मूल्य को निर्धारित करती है. मज़दूर के काम करने की क्षमता, किसी उत्पाद को बनाने की उसकी क्षमता को इंगित करने के लिए माल के रूप में “श्रम” शब्द का प्रयोग करने की बजाय मार्क्स ने बाद में “श्रमशक्ति” शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया. उत्पादन के साधन से वंचित होने के कारण मज़दूर उत्पादन के काम में अपनी क्षमता को लगाने की स्थिति में तब तक नहीं होता है जब तक वह स्वयं माल बाज़ार में प्रवेश नहीं करता और माल के रूप में अपनी श्रमशक्ति को नहीं बेचता. माल के रूप में श्रम का मूल्य या श्रमशक्ति के मूल्य का निर्धारण करने के सम्बन्ध में मार्क्स और एंगेल्स ने तदनुसार अपने विचार में संशोधन किया. Umrisse zu einer kritik der Nationalokonomie नामक अपनी पुस्तक और इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की जीवन स्थितियों के बारे में अपनी पुस्तक में एंगेल्स इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि श्रम का मूल्य ठीक उन्हीं नियमों द्वारा निर्धारित होता है जिन नियमों के अनुसार किसी अन्य माल का मूल्य निर्धारित होता है अर्थात अपने उत्पादन की लागत पर ! जहाँ तक मजदूर का प्रश्न है यह उसे श्रम करने योग्य बनाये रखने के लिए आवश्यक भरण-पोषण के साधन की लागत होती है. इसलिए जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक न्यूनतम धनराशी ही “श्रम” अर्थात श्रमशक्ति का मूल्य, मजदूर की उज़रत होती है. मार्क्स उनके निष्कर्षों से सहमत थे. दर्शन की दरिद्रता और फिर उज़रती श्रम और पूँजी में वह मजदूर के श्रम की उज़रत की परिभाषा निम्न प्रकार से देते हैं “साधारण श्रम यानि (श्रमशक्ति की) उत्पादन लागत उस व्यय के बराबर होती है जो मजदूर और उसके प्रजनन के जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक होता है. मजदूर और उसके प्रजनन के जीवन निर्वाह के  लिए उजरत का भुगतान किया जाता है. इस प्रकार निर्धारित मज़दूरी को न्यूनतम मज़दूरी के नाम से जाना जाता है. न्यूनतम मज़दूरी का सम्बन्ध सामान्य मानव जाति से है न की अलग-अलग मज़दूर से है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार माल का मूल्य साधारणतया उनकी उत्पादन लागत से निर्धारित होता है. ऐसे मज़दूर कुछ ही नहीं होते बल्कि उनकी संख्या लाखों में होती है जिन्हें इतनी भी मज़दूरी नहीं मिलती कि अपना जीवन निर्वाह कर सकें और अपनी जाति का प्रजनन कर सकें. अपने खुद के उतार-चढाव के ढांचे के अन्दर रहते हुए मज़दूर वर्ग की उज़रत इस न्यूनतम मज़दूरी के अनुकूल बन जाती है.” “मार्क्स, Lohnarbeit and Kapital, पृ. 24)
लासाल ने इस सूत्र को स्वीकार कर लिया था और इसे वह “मज़दूरी का कठोर नियम” कहते थे जोकि एक मुहावरा था जिसका प्रचार मूल्य के अलावा अन्य कोई महत्त्व नहीं था.
पूँजी में मार्क्स समझाते हैं कि श्रमशक्ति का मूल्य, अन्य दुसरे मालों की तरह इसके उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल से निर्धारित होता है और श्रमशक्ति के उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल उस श्रमकाल के बराबर होता है जो जीवन निर्वाह के साधनों के उत्पादन के लिए आवश्यक होता है जिनसे मज़दूर भोजन, वस्त्र, आवास आदि की आवश्यकता की पूर्ति करता है. लेकिन इन मूलभूत आवश्यकताओं का विस्तार, इन आवश्यकताओं की पूर्ति का स्तर तथा इनकी पूर्ति की क्षमता इतिहास द्वारा निर्धारित तत्त्वों का परिणाम होती है. यह बहुत हद तक सम्बंधित देश के सांस्कृतिक विकास पर निर्भर करता है और अन्य कारकों के अलावा उन स्थितियों पर निर्भर करता है जिनके अर्न्तगत स्वतन्त्र मजदूरों के वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ, उन आदतों पर जो इस वर्ग की बनीं, और उस जीवन स्तर पर जो इस वर्ग ने अपने लिए हासिल किया. इस प्रकार, अन्य मालों के विपरीत, श्रमशक्ति का मूल्य आंशिक रूप से ऐतिहासिक और नैतिक घटकों से निर्धारित होता है. जीवन निर्वाह की भौतिक आवश्यकताओं की मात्र लागत पर श्रमशक्ति के न्यूनतम मूल्य का आकलन किया जाता है. यदि श्रमशक्ति का मूल्य (मज़दूरी) न्यूनतम तक गिर जाता है, तब यह श्रमशक्ति के मूल्य के नीचे भी गिर जाता है. इस स्थिति में श्रमशक्ति का संपोषण प्रयाप्त स्तर तक नहीं होता है. मार्क्स यस भी सिद्ध करते हैं कि पूंजीवादी समाज में मज़दूर को अपने भरण-पोषण के लिए उत्पादन करने का अधिकार इसी प्रतिबन्ध के साथ मिलता है कि इसके अलावा वह बिना उज़रत के कुछ समय काम करे जो पूंजीपति के लिए बेशी (surplus) मूल्य उत्पन्न करता है. मार्क्स उन स्थितियों का भी खुलासा करते हैं जो पूंजीपति को इस अवैतनिक श्रम की मात्रा को बढाने में मदद करते हैं. कार्य दिवस लम्बा बनाकर, श्रम सघनता बढाकर, श्रम उत्पादकता में वृद्धि करके (आजकल विशेष आर्थिक ज़ोनों, SEZ की स्थापना इसी उद्देश्य से की जा रही है) इसे हासिल किया जाता है. इसके फलस्वरूप पूंजीपति श्रमशक्ति की कीमत, उजरत को कम से कम करते जाते हैं और यह श्रमशक्ति के मूल्य के नीचे तक पहुँच जाती है. (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 158-165 में दिये गये विस्तृत विवेचन को देखें जिसका सारांश पूर्वोक्त कथन है.)

मैन्युफैक्चर और बड़े पैमाने के उत्पादन (मशीनोफैक्चर) की कालावधियों में श्रम विभाजन

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17. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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दस्तकार किसी वस्तु के एक के बाद एक दूसरे हिस्से को बनाते जाते हैं जो अंत में विक्रय के लिए तैयार माल बन जाता है. शिल्प संघ के विकास की उच्चतम अवस्था में भी उत्पादन के क्षेत्र में उपविभाजन की संख्या बहुत कम थी. लेकिन विनिर्माण की शुरुआत के साथ, श्रम का विशुद्ध यांत्रिक विभाजन हुआ जिसके अर्न्तगत माल तैयार करने की उत्पादन प्रक्रिया में मजदूर काम के एक छोटे हिस्से को पूरा करता है. तो भी इस अवधि में भी उद्योग की कुछ शाखाओं में उत्पादन की विस्तृत प्रक्रियाओं में श्रम विभाजन हुआ और दूसरी शाखाएँ बची रह गयी. इसके अलावा विनिर्माण के अर्न्तगत मजदूर अपने हाथ से सारा उत्पादन करता था जो उसकी दक्षता और योग्यता पर निर्भर करता था.
“दस्तकारी और मैन्युफैक्चर में मजदूर औजारों का इस्तेमाल करता है, कारखाना में मजदूर मशीन की सेवा करता है. पहली स्थिति में मजदूर श्रम के साधनों के संचालन पर नियंत्रण रखता है तो दूसरी स्थिति में मजदूर की गतिविधियाँ मशीन के अधीन होती हैं. विनिर्माण में मजदूर सक्रीय तंत्र का एक हिस्सा होते हैं. कारखानों में मजदूरों से स्वतन्त्र एक जड़ तंत्र होता है और मजदूर इसमें जीवित उपांगो की तरह शरीक होते हैं. अंतहीन चाकरी और कठिन परिश्रम की नीरस नित्य-क्रिया, जिसमें एक ही यांत्रिक प्रक्रिया को लगातार दुहराना पड़ता है, सिसिफस की यंत्रणा के समान होता है अर्थात चट्टान जैसा कड़ी मेहनत का बोझ थके हुए कर्मी पर गिरता रहता है. मशीनों पर काम करने से स्नायुतंत्र पर अवसादक असर पड़ता है. इसी के साथ यह मांसपेशियों की विविध गतिविधियों में व्यवधान उत्पन्न कर देता है और स्वतन्त्र शारीरिक और बौधिक गतिविधियों को रोक देता है. यहाँ तक की काम के बोझ को हल्का कर देना यंत्रणा का साधन बन जाता है क्योंकि मशीन मजदूर को काम से मुक्त नहीं करती है बल्कि काम में उसकी दिलचस्पी को ख़त्म कर देती है. ” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 451) मशीन पर काम करने वाले मज़दूर की तुलना सिसिफस से करने वाला उद्धरण मार्क्स ने एंगेल्स की पुस्तक द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, 1845, पृ. 217, से और एंगेल्स ने जेम्स फिलिप के, एम.डी. की पुस्तक मैनचेस्टर के वस्त्र उत्पादन में नियोजित मज़दूर वर्ग की नैतिक एवं भौतिक जीवन स्थितियां से लिया है. (रिजवे, लन्दन 1832, पृ.8)
मशीन से उत्पादन करने के लिए यह आवश्यक होता है कि कच्चे माल, अर्द्ध-निर्मित सामान और औजारों की आपूर्ति में वृद्धि हो और इससे उद्योग की ज़्यादा शाखाएँ खोलने के लिए प्रेरणा मिलती है. उत्पादन प्रणाली की असंख्य नयी किस्मों और उप-किस्मों द्वारा इस कच्ची सामग्री और अर्द्ध-निर्मित सामान को तैयार किया जाता है जिससे ‘ट्रेडों’ की संख्या में भारी वृद्धि हो जाती है. जर्मन आंकडों के अनुसार 1882 में ट्रेडों और पेशों की संख्या 6000 आंकी गयी थी. 1895 में यह संख्या लगभग 10,000 हो गयी थी.
इस प्रकार पूंजीवाद के अर्न्तगत बड़े पैमाने के उत्पादन ने न केवल स्थायी विशेषता वाले पुराने श्रम विभाजन को समाप्त कर दिया बल्कि विशिष्ट प्रक्रियाओं की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि कर दी. इससे विशेष काम करने वाले मज़दूर की स्थिति पहले से ज़्यादा खराब हो जाती है यदि इस बात को ध्यान में रखा जाये कि यह घटनाओं में निहित संकटों पर पूर्णतया आश्रित होता है जिससे उसके भौतिक जीवन के आधार की सुरक्षा और दृढ़ता जोखिम में पड़ जाती है.

सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक विकास

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16. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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वर्तमान समय में ‘सर्वहारा’ (‘प्रोंवितारिया’) का तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसके जीवकोपार्जन का एकमात्र साधन अपनी श्रमशक्ति का विक्रय है. लैटिन भाषा के शब्द ‘प्रोलितारियास’ का मूल अर्थ यह नहीं था. प्राचीन रोम के ज़माने में ‘प्रोलितारियास’ शब्द का प्रयोग उस व्यक्ति के लिए किया जाता था जिसकी एकमात्र सम्पत्ति उसके वंशज, उसकी संताने (प्रोलेस) होती थीं. आरंभ में सर्वहारा जोकि रोम की आबादी का निर्धनतम वर्ग था, को सैनिक सेवा और करों की अदायगी से मुक्त कर दिया गया था. बाद में सर्वहारा को सेना में भर्ती किया जाने लगा जिसका संभरण राज्य करता था. गृहयुद्धों के दौर में जब रोम का किसान समुदाय बरबाद हो गया तथा (रोमन) साम्राज्य के अधीन हो गया, तो सर्वहारा सेना का केन्द्रक बन गया था. शांति के समय सैनिकों के इस समूह का भरण-पोषण राज्य करता था तथा उन्हें अनाज की नियमित रसद दी जाती थी. इस प्रकार नाम के अलावा इन रोमन सर्वहारा और आज के भूमिहीन आवासहीन यूरोपीय सर्वहारा के बीच अन्य कोई साम्य नहीं है. हमें इस बात की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जैसाकि मार्क्स बताते हैं,”कि प्राचीन रोम में वर्ग संघर्ष स्वतन्त्र धनिकों और स्वतन्त्र निर्धनों यानि कि विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यकों के दायरे में जारी रहा था. दास वर्ग जोकि आबादी का बड़ा उत्पादक हिस्सा था, उस निष्क्रिय मंच का काम कर रहा था जिस पर यह संघर्ष चल रहा था. लोग सिसमोंदी की उल्लेखनीय उक्ति को भूल गए हैं कि ‘रोम का सर्वहारा राज्य के खर्च पर जीता था जबकि आधुनिक समाज सर्वहारा के दम पर जीता है”. (कार्ल मार्क्स, द एटीन्थ ब्रूमेर ऑफ लुई बोनापार्ट, पृ. 18-19) The Eighteenth Brumaire of Louis Bonaparte- by Karl Marx
उज़रती मजदूरों के वर्ग को व्यक्त करने के अर्थों में ‘सर्वहारा शब्द का व्यापक उपयोग उन्नीसवीं शताब्दी के पहले अर्धांश के पूर्व आरंभ नहीं हुआ था. एंगेल्स ने इंग्लैंड में मेहनतकश वर्ग की जीवनस्थितियों के सम्बन्ध में अपनी पुस्तक में पहली बार इंग्लैंड के सर्वहारा के अठारह सौ चालीस के दशक तक का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है. इस पुस्तक के मूल जर्मन संस्करण की प्रस्तावना में एंगेल्स बताते हैं कि उन्होंने “मेहनतकश, श्रमजीवी, सम्पत्ति-अधिकार रहित वर्ग और सर्वहारा” शब्द का प्रयोग एक ही परिघटना को व्यक्त करने के लिए किया है. अन्य स्थान पर वह लिखते हैं, “सर्वहारा समाज का वह वर्ग है जो अपने जीवन-निर्वाह के लिए, पूंजी से हासिल किए गए मुनाफे पर नहीं बल्कि पूरे तौर पर अपने श्रम (श्रमशक्ति) की बिक्री पर निर्भर करता है. उसका सुख-दुःख ज़िन्दगी और मौत, सम्पूर्ण अस्तित्व श्रम (श्रमशक्ति) की मांग पर, कारोबार के अच्छे और बुरे वक्त के बीच झूलते रहने पर, उन उतार-चढावों पर जो अनियंत्रित प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम होते हैं, पर निर्भर करता है. संक्षेप में, सर्वहारा अथवा सर्वहारा वर्ग उन्नीसवीं सदी का मेहनतकश वर्ग है.” इंग्लैंड में उज़रती मजदूरों या श्रमजीवियों का वर्ग चौदहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में अस्तित्व में आ गया था. एक सौ पचास वर्षों के दौरान आबादी के निम्नतर संस्तर इसमें शामिल थे. धीरे-धीरे करके यह (वर्ग) कारीगरों, शिल्पकारों और किसानों से अलग हुआ तथा सामंती बंधनों से मुक्त हो सका.
जहाँ तक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है, अपने प्रादुर्भाव के आरंभिक दिनों से ही, सर्वहारा का अन्य शिल्पों या कृषि कर्म में लगे रहने वाले मेहनतकशों से विभेदीकरण बहुत कम हुआ था. लेकिन जैसे-जैसे पूंजीवाद विकसित होता गया, सर्वहारा ने अपनी खुद की अभिलाक्षणिकताएँ धारण कर लीं. सर्वहारा, स्वतन्त्र किसान और शिल्पकार के बीच भिन्नता इस तथ्य में निहित है कि सर्वहारा मजदूर श्रम के साधनों से वंचित होता है, कि उसे अपने लिए नहीं (किसान और शिल्पकार की भांति) बल्कि पूंजी के मालिक अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए श्रम करना पड़ता है. वह स्वयं को, अपनी श्रमशक्ति को इस तरह बेचता है मानो वह कोई माल हो और इसके बदले वह उज़रत पाता है.
जब तक पूंजीवाद अपनी शैशवावस्था में था, जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में सामंती अधिकारी और नगरों में व्यापारिक निगम वित्तीय पूंजी और व्यापारिक पूंजी के औद्योगिक पूंजी में रूपांतरण को बाधित करते रहे, जब तक विनिर्माण उद्योग केवल उन नगरीय बस्तियों में पनपते रहे जो शिल्प-संघों के नियंत्रण में नहीं थे- दमनात्मक कानूनों के बावजूद उजरती मजदूर, सर्वहारा पूंजी संचय के परिणामस्वरूप अपने श्रम की बढती मांग का पूरा लाभ उठाते रहे. गिरजाघर से जुड़ी परिसंपत्तियों की लूटमार, राज्य की संपत्तियों के वितरण और सामूहिक भूमि की व्यापक बाड़ेबंदी जिसने लाखों किसानों को आजीविका से वंचित कर दिया तथा राजमार्गों, गलियों में व्यर्थ ही काम की तलाश में भटकने पर मजबूर कर दिया, के बाद मजदूरों की हालत अकस्मात बहुत बिगड़ गयी. विनिर्माण की वृद्धि ने, स्वतन्त्र उद्यमोँ को खड़ा करने के लिए अत्यंत आवश्यक पूंजी संचय ने उज़रती मज़दूर की स्वयं मालिक बन जाने की आशाओं पर पानी फेर दिया था – क्योंकि स्वतन्त्र शिल्पों का स्थान भी पूंजीवादी उद्यम लेते जा रहे थे. यह सही है कि विनिर्माण उद्योग केवल धीरे-धीरे (सत्रहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश  से लेकर अठाहरवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश तक के सौ सालों या इससे कुछ ज्यादा अवधि के दौरान ही) नगरीय उत्पादन तथा ग्रामीण उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित कर सका था. लेकिन कारीगरों और घरेलू नौकरों के आते जाने से सर्वहारा की कतारों में लगातार वृद्धि हो रही थी. इन सभी नए घटकों के बावजूद वर्ग के रूप में सर्वहारा का विभेदीकरण ज्यादा तेजी से हो रहा था. नगरीय शिल्पकार और ग्रामीण घरेलू नौकर पूरी तौर पर तभी गायब हुए जब मशीन से विशाल पैमाने का उत्पादन शुरू हुआ. वे कई खंडों में सर्वहारा की कतारों में फेंके गए और इस प्रकार ख़त्म हो गयी उनकी “आदिम अवस्था” में वापस लौटने की सम्भावना. बडे पैमाने पर मशीन से उत्पादन की शुरुआत ने ऐसे व्यक्तियों के वर्ग को जन्म दिया जो बाज़ार में अपनी चमड़ी बेचने खुद जाते हैं और रोज़गार की तलाश में अपने शरीर को प्रतिस्पर्द्धा की भंवर में झोंक देते हैं.
एंगेल्स बताते हैं,”आधुनिक बुर्जुआ समाज का प्रधान लक्षण सभी की सभी के खिलाफ जंग है जिसकी सर्वाधिक पूर्ण अभिव्यक्ति ‘प्रतिस्पर्द्धा” शब्द से होती है. यह युद्ध जिंदगी के लिए, अस्तित्व के लिए, प्रत्येक चीज़ के लिए किया जाता है और ज़रुरत पड़ जाये तो मृत्यु तक चलता रहता है. यह युद्ध समाज के विभिन्न वर्गों के बीच ही नहीं बल्कि इन वर्गों के अलग-अलग सदस्यों के बीच भी छिड़ा रहता है. हरेक इन्सान दूसरे इन्सान के रास्ते का रोड़ा होता. इसलिए हरेक इन्सान दूसरे इन्सान को अपने रास्ते से हटा देने और उसकी जगह लेने की कोशिश करता है. मजदूर एक-दूसरे से ठीक उसी तरह प्रतिस्पर्द्धा करते हैं जिस तरह एक बुर्जुआ दूसरे बुर्जुआ से प्रतिस्पर्द्धा करता है. शक्तिचालित करघे का बुनकर, हथकरघा बुनकर, रोजगारशुदा या ज़्यादा उज़रत पाने वाले  साथी से प्रतिस्पर्द्धा करता है और उसका स्थान लेना चाहता है. जहाँ तक मजदूरों का सवाल है, यह प्रतिस्पर्द्धा विद्यमान स्थितियों का निकृष्टतम पक्ष है क्योंकि यही सर्वाधिक असरदार हथियार है जो बुर्जुआ वर्ग सर्वहारा के खिलाफ इस्तेमाल करता है. (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 75-76)

संकटों के सिद्धांत और इतिहास के बारे में कुछ बातें

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‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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अंग्रेज़ मेहनतकश वर्ग जीवनस्थितियों का चित्रण करने वाली अपनी पुस्तक में एंगेल्स संकटों के बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं. वह सिद्ध करते हैं कि पूंजीवादी उत्पादन और प्रतिस्पर्द्धा की प्रवृति ही उन्हें (संकटों) उत्पन्न करती है.”आधुनिक उत्पादन और उत्पाद वितरण की अराजक स्थितियां, उत्पादन की वे स्थितियां जोकि आवश्यकता की तुष्टि के लिए न होकर लाभ से नियंत्रित होती है, वह स्थितियां जिसमें धनी बन जाने की कोशिश में प्रत्येक व्यक्ति खुद की स्वंतंत्र लीक पर काम करता है, ये स्थितियां बार-बार मंदी पैदा करने से नहीं चुकती हैं. औद्योगिक विकास के युग के आरंभ में मंदी उद्योग की एक या दूसरी शाखा या एक बाज़ार तक सीमित रहती थी. लेकिन प्रतिस्पर्द्धियों की कार्रवाईयों के चलते उद्योग की एक शाखा में रोज़गार से वंचित मजदूर उद्योग की दूसरी शाखा में रोज़गार पाने के लिए धावा बोल देते हैं जिसमें काम सीखना तुलनात्मक रूप से आसान होता है. इस प्रकार वे उत्पाद जिन्हें एक बाज़ार में खरीददार नहीं मिलते आगे बढ़कर दूसरे बाज़ार में पहुँच जाते हैं, आदि, आदि. ये छोटे-छोटे संकट इकठ्ठा होकर कालांतर में बड़े पैमाने के संकटों में तब्दील हो जाते हैं. इन संकटों का दस्तूर यह होता है कि विकास और व्यापक समृद्धि की अल्पकालीन अवधि के बाद हर पाँच वर्ष में वे प्रकट हो जाते हैं.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 82)

अन्यंत्र एंगेल्स पॉँच वर्षीय या छः वर्षीय चक्रों की चर्चा करते हैं और ‘कम्युनिज्म के सिद्धांत’  [The Principles of Communism-Frederick Engels 1847] में सात वर्षीय अवधि का उल्लेख करते है. “इस शताब्दी की पूरी अवधि के दौरान, उद्योगों का जीवन समृद्धि के दौरों और संकटों के दौरों के बीच झूलता रहा. इस तरह के संकट पॉँच साल से सात साल के नियमित अंतरालों में पैदा होते रहे. अपने साथ मजदूरों के लिए असहनीय दुर्दशा, व्यापक क्रांतिकारी उफान और मौजूदा व्यवस्था के लिए सबसे बड़े संकट लाता गया.”

सन 1848 के बहुत सालों बाद जब मार्क्स पूंजी लिख रहे थे, तब उन्होंने ध्यान दिया कि तेजी और मंदी के बीच उतार-चढाव के ये चक्र पॉँच या सात वर्षों की नहीं बल्कि दस या पंद्रह सालों की अवधि को समेट लेते हैं.

पहला संकट सन 1825-1826 में आया जिसने राष्ट्रव्यापी असर पैदा किया. उसके आरंभ में सट्टेबाजी की कार्रवाईयों में प्रस्फोट हुआ था. अगला व्यापक संकट 1836-37 में आया. इसके पहले ब्रिटेन के उद्योग और निर्यात में बहुत वृद्धि हुई थी. निर्यात में यह वृद्धि विशेष थी जिसे उत्तरी अमेरिका में बाज़ार मिल गया था. 1847 में तीसरे संकट के संकेत मिलने लगे थे. 1845 और 1846 के “रेलवे में पूंजी लगाने के उन्माद” जिसमें रेलवे निर्माण में विह्वल उतावली में पूंजी उड़ेली जा रही थी, के बाद तेजी से मंदी आयी.

जिस गति से रेलवे का निर्माण किया जा रहा था, उससे बड़ी भारी संख्या में लोगों को काम मिला. लेकिन बाद में लगभग पचास हज़ार लोग बेरोजगार हो गए. इस संकट की चरम अवस्था में जिसने ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और वास्तव में समूचे यूरोपीय महाद्वीप को (रूस को छोड़कर) लपेट में लिया था और जिसने 1848 की क्रांतिकारी उथल-पुथल का मार्ग प्रशस्त कर दिया था, कम्युनिस्ट लीग के अनुरोध पर मार्क्स ने घोषणापत्र की रचना की.

डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

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14. पूंजीवाद और प्रकृति पर मनुष्य की विजय

सन 1848 तक प्रकृति पर मनुष्य की विजय का काम बहुत धीमी गति से चल रहा था. फिर भी वाट के आविष्कार की व्यापक स्वीकृति के बाद वायु शक्ति और जलशक्ति के बेहतर इस्तेमाल के साथ-साथ वाष्पशक्ति के उपयोग का विकास तेजी से हो रहा था. 1820 से ओस्टेड (1777-1851), सीबेक (1770-1831) और फैराडे (1791-1867) जैसे वैज्ञानिकों ने विद्युत परिघटना के क्षेत्र में एक के बाद दुसरे आविष्कार किये. लेकिन विद्युत तार और विद्युत धातुशोधन के अपवाद को छोड़कर विनिर्माण उद्योग में इन आविष्कारों का लाभ नहीं उठाया जा सका. हालाँकि उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी तृतीयाँश में उद्योग की एक शाखा के रूप में विद्युत तकनीक अस्तित्व में आ चुकी थी.

कृषि में रसायन विज्ञान का उपयोग, जिसे कभी-कभी कृषि रसायन कहा जाता है, का श्रेय मुख्य रूप से जस्टस वान लीबिंग (1806-1873) नामक जर्मन को जाता है. हालाँकि इस सिलसिले में हम्फ्री डेवी (1772-1829) नामक अँगरेज़ का उल्लेख किया जा सकता है जिसकी कृषि रसायन के प्रारंभिक ज्ञान पर पुस्तक 1813 में प्रकाशित हुई थी. इस विषय पर लीबिंग की प्रथम कृति (Die Chemie in ihrer Ammending aur Agriculther und Phisiology) शीर्षक की पुस्तक जिसका लयों फ्लेफेयर (1818-1898) ने तुरंत अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया था) 1840 में प्रकाशित हुई. मार्क्स बताते हैं, “लीबिंग का एक अमर अवदान यह है कि उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान के दृष्टिकोण से आधुनिक खेती के नकारात्मक और विनाशकारी पहलू का विवेचन किया है (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1,548, टिपण्णी). इसके ठीक पहले मूल पाठ में लिखा है : “पूंजीवादी उत्पादन आबादी को लगातार बड़े केन्द्रों में एकत्रित करके शहरी आबादी के महत्त्व को बढाकर एक ओर समाज की गतिशीलता में वृद्धि कर देता है तो दूसरी ओर मनुष्य और धरती के बीच पदार्थों की अदला-बदली को अर्थात भोजन और वस्त्र के रूप में मनुष्य धरती से जिन तत्त्वों को लेकर उपयोग कर लेता है, उनकी धरती को वापसी, जो धरती को उपजाऊ बनाये रखने के लिए सदा सहज आवश्यक होता है, को अस्त-व्यस्त कर डालता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1,546-47)

लीबिंग पहले व्यक्ति थे जिन्होनें सिद्ध किया कि ज़मीन की उर्वरा शक्ति चुक जाने का कारण यह है कि इन्सान और उसके द्वारा जोती गयी ज़मीन के बीच विनिमय संबंधों में अस्त-व्यस्तता आ गयी है क्योंकि अपनी वृद्धि के दौरान फसलें ज़मीन से कुछ पदार्थों को चूस लेती हैं जिन्हें ज़मीन को वापस लौटा देने में इन्सान असमर्थ रहता है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और इसमें शहर के गाँव से अलगाव की एक अभिलाक्षणिकता धरती को कई उर्वरक पदार्थों से वंचित कर देना और प्राकृतिक खाद के रूप में इन पदार्थों को धरती को वापस न लौटा पाना है. प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के अर्न्तगत ज़मीन की उपज का लगभग पूरे हिस्से का उपभोग उस इलाके में हो जाता है जहाँ पैदावार होती है, उपभोक्ताओं, इन्सान और जानवर दोनों, द्वारा प्राकृतिक खाद ज़मीन की उर्वरा शक्ति को प्रतिपूर्ति के लिए पर्याप्त हुआ करती थी. लेकिन विशाल से विशालतर शहरों के विकास के कारण कृषि उत्पादों का उपयोग कृषि क्षेत्रों से दूर होने लगा और प्राकृतिक उर्वरक पदार्थ बर्बाद होने लगा. प्राकृतिक खाद के अभाव के कारण कृत्रिम उर्वरकों की खोज ज़रूरी हो गयी ताकि ज़मीन को उन खनिजों की वापसी की जा सके जिन्हें फसलों ने अपने पोषण के लिए इस्तेमाल कर डाला था. लीबिंग का मत था कि खनिज अवयवों की आपूर्ति सीमित होती है क्योंकि जमीन उनकी असीमित मात्रा मुहैया कराने में असमर्थ होती है. इसलिए किसान की मुख्य ज़िम्मेदारी और खादों का कार्य जमीन को उन खनिजों की प्रतिपूर्ति होना चाहिए जिन्हें प्रत्येक फसल, जिसकी उनके विश्लेषण से पता चलता है, अपनी वृद्धि के लिए जमीन से ले लेती है. इसलिए एक ऐसी कृत्रिम खाद तैयार की गयी जिसमें आवश्यक खनिज पदार्थ जैसे फास्फोरिक अम्ल, पोटेशियम और नाइट्रोजन विद्यमान थे. अठारह सौ चालीस की दशाब्दी और उसके बाद से, कृत्रिम खाद का उपयोग ज्यादा लोकप्रिय होने लगा. अब उत्पादित नाइट्रोजन युक्त खाद, सुपरफास्फेट जैसे उर्वरक और मूल धातु-कचरा, धुली हुई हड्डियाँ और मिश्रित खाद का इस्तेमाल किया जाता है. मूल धातु कचरा स्टील निर्माण का अपशिष्ट उत्पाद है और इसके उर्वरकीय गुणों की खोज 1878 के पहले नहीं हो पाई थी.

औद्योगिक उत्पादन में रसायनशास्त्र का उपयोग अठारवीं शताब्दी के अंत में आरंभ हुआ. सन 1787 के लगभग निकोलस लाब्लांक (1742-1806) ने समुद्री नमक से सोडा कार्बोनेट बनाने की महत्वपूर्ण समस्या पर ध्यान केन्द्रित किया. इन प्रयोगों में उसके अवदान ने कृत्रिम क्षार उत्पादन के विशाल उद्योग का आधार निर्मित किया जिसके उत्पाद विरंजन कार्यों (विशेषतया कुछ किस्म के कागजों के लिए), आतिशबाजी, दियासलाई, साबुन, वस्त्रों, रंगों आदि में प्रयोग किए जाते है. प्रदीपक के रूप में कोल गैस के पहले व्यावहारिक उपयोग का श्रेय विलियम मरडक (1754-1839) को दिया जाता है जिन्होंने सन 1792 से 1802 के बीच इस दिशा में सम्भावना प्रर्दशित करने वाले प्रयोग किए. इन प्रयोगों ने अगला पड़ाव तब पार किया जब एक जर्मन ने, जो 1804 में इंग्लैंड आया था, लिसियम थियेटर ख़रीदा और अपनी विधि का वहां प्रदर्शन किया. इसका परिणाम यह हुआ कि पॉल माल में नयी प्रकाश व्यवस्था की स्थापना के साथ ही लन्दन में गैस आधारित सार्वजानिक प्रकाश व्यवस्था आरंभ हो गयी. कोयले के आसवन से मुख्य ठोस अवशेष कोक प्राप्त होता है और द्रव अवशेष टार और अमोनियामय लिकर प्राप्त होता है. उप-उत्पात के रूप में हमें बेंजीन, एनिलीन डाई, विभिन्न कीटनाशक, नैप्थलीन, सैक्रीन आदि प्राप्त होते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में शेवारिल (1786-1889) की वसा और तेलों पर परीक्षणों और लाब्लांक की साधारण नमक से कास्टिक सोडा बनाने की खोजों ने साबुन और मोमबत्ती बनाने की विधियों और मात्राओं में आमूल परिवर्तन कर दिया. लेकिन घोषणापत्र के पहले प्रकाशन के कई वर्षों बाद अठारह सौ पचास के दशक में ही उद्योग में रासायनिक शोध के उपयोग का युग आरम्भ हो सका. सन 1848 से कुछ वर्षों बाद वस्त्र उत्पादन में औद्योगिक क्रांति जो अभी तक मुख्य रूप से कताई और बुनाई से सम्बंधित प्रक्रियाओं तक सीमित थी, रंगाई और परिष्करण के क्षेत्र में सुधार के साथ अपनी अंतिम मंजिल तक पहुँच गयी. 1856 में डब्ल्यू.एच. पार्किन ने पहला एनिलिन डाई अर्थात माव नाम का पहला रंगीन पदार्थ बनाया. कोलतार के आसवन से अन्य चमकदार रंगीन पदार्थों की खोजों का ताँता लग गया. आज इतने किस्म के रंगीन पदार्थ मौजूद हैं कि रंगसाज को उलझन में डाल देते हैं. उनसे हर किस्म के रंग बनाए जा सकते हैं जिनके गुण सर्वाधिक विविधपूर्ण होते हैं. उनमें से कुछ रंग अल्पकालिक लेकिन ज्यादातर रंग स्थायी और विभिन्न प्रभावों को सहन करने वाले होते हैं.

धरती के सुदूरवर्ती हिस्सों पर खेती करने का काम (घोषणापत्र के पाठ में मार्क्स और एंगेल्स इस प्रक्रिया का सन्दर्भ देते हैं) 1848 तक प्रारंभिक मंजिल पार कर चूका था. 1815 में संयुक्त राज्य का कपास का उत्पादन 73,000 गांठ था जो बढ़कर 1840 में 1,348,000 गांठों तक पहुँच गया था. 1840 में गेहूं का उत्पादन 84,800,000 बुशेल था लेकिन 1901-1905 के पाँच वर्षों में वार्षिक औसत 662,000,000 बुशेल प्रतिवर्ष हो गया था. जहाँ तक समस्त किस्मों के अनाजों के सम्पूर्ण उत्पादन का प्रश्न है, यह 1848 में 377.000,000 बुशेल था जबकि 1901-1905 के वर्षों के बीच औसत वार्षिक उत्पादन 2,100,000,000 बुशेल था. 1850 के बाद कनाडा, दक्ष्णि अमेरिका, आस्ट्रेलिया, साइबेरिया, अफ्रीका आदि व्यापार के लिए खुले.

अठारवीं शताब्दी के अंतिम तृतीयाँश तक नौपरिवहन के लिए नदियों का प्रयोग पुराने तरीके से ही किया जा रहा था. अठारवीं शताब्दी के मध्य में इंग्लैंड में नहरों के निर्माण का काम आरंभ हो गया था और फ्रांस में भी नहरों का जाल बिछ गया था. नहर निर्माण के आरंभिक वर्षों में बनाई गयी ज्यादातर नहरे बजरा और नौका नहरों के नाम से जानी जाती थीं तथा सीमित गहराई और चौडाई के कारण छोटे आकार के जलयान के लिए उपयुक्त थीं. नहरों के विकास का कारण बढ़ते व्यापार की तत्काल ज़रुरत को पूरा करना था. जैसे-जैसे नहर निर्माण की तकनीक में सुधार होता गया, जलमार्गों की गहराई और चौडाई इतनी बढाई गयी कि इसमें समुद्री जहाज भी चलने लगे. ज्यादातर जहाजी नहरें इसलिए निर्मित की गयीं ताकि बीच में पड़ने वाले जलडमरू मध्य को काटकर दो सागरों के बीच यात्रा समय को कम किया जा सके. (उदाहरण के लिए केलिडोनियन नहर और श्वेज़ नहर) या कि महत्त्वपूर्ण आंतरिक स्थानों को समुद्री बंदरगाहों में परिवर्तित किया जा सके (मैनचेस्टर जहाजी नहर और फ्लैंडर्स में जीब्रुगे-ब्रुग्स नहर). एक छल्ले से दुसरे छल्ले तक कटाई करके नदियों की टेढ़े-मेढे घुमावदार धारा से बचाया गया और बांध और जलाशय द्वारा नदी की तलहटी का ढाल नौपरिवहन योग्य बनाया गया. जलमार्गों और नदियों के मुहानों को प्राय: वाष्पशक्ति से चालित ड्रेजिंग मशीनों द्वारा साफ़ किया जाता है. बड़े पैमाने के रेलवे निर्माण के आरंभ होने के बाद ही नहरों का विकास समाप्त हुआ.

‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां-13

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पूँजी का संचय

पूंजीपतियों के व्यक्तिगत नियंत्रण में पूंजी का संचय दो तरीकों से होता है. सबसे पहले श्रम से लाभ निचोड़कर इसका स्वतः संचय हो जाता है. (पूँजी का संकेंद्रण) तथा दूसरी ओर पूंजीपतियों की व्यक्तिगत पूंजी का संयुक्त स्टॉक कम्पनियों, व्यापार-संघ, व्यवसाय संघ और उत्पादन संघ के नियंत्रण में पूंजी के समूहन द्वारा पूंजी संचय हो जाता है. (पूंजी का केन्द्रीकरण).

यूनाइटेड किंगडम में कुल कर योग्य आय 1856 में 3,07,068,898 पौण्ड, 1865 में 385,530,020 पाउंड, 1882 में 601,450,977 पाउंड और 1912 में 1,111,456,413 पाउंड थी. इन आंकडों में कर मुक्त आय जोड़ देने पर कुल योग 2,000,000,000 पाउंड हो जाता है. इसका आधा हिस्सा आबादी के आठवें हिस्से को प्राप्त होता है. 1884 में इंग्लैंड में संयुक्त स्टॉक कम्पनियों की कुल संख्या 8,192 थी. 1912 में यह बढ़कर 29,730 और 1916 में 66,094 हो गयी. इसी के अनुरूप, इन स्टॉक कम्पनियों की पूंजी 1884 में 480,000,000 पाउंड से बढ़कर 1900 में 1,164,000,000 पाउंड और 1916 में 2,720,000,000 पाउंड हो गयी.

वर्ष 1906 से 1913 तक फ्रांस की राष्ट्रीय सम्पत्ति की कीमत 225,000,000,000 फ्रैंक आंकी गयी थी जो 11,664,000 व्यक्तियों के पास थी इनमें से 98,243 जिनमें से प्रत्येक के पास 250,000 फ्रैंक से अधिक की संपत्ति थी और उनकी संपत्ति की सकल धनराशी 106,000,000 अर्थात समस्त राष्ट्रीय संपत्ति का लगभग आधा हिस्सा. अगर इनमें से सर्वाधिक धनी व्यक्तियों को अलग कर दें जिनकी संख्या लगभग 18,586 और संपत्ति का मूल्य 60,500,000 फ्रैंक था तो 9,500,000 से कम संपत्ति धारक बच जाते हैं जिनमें से प्रत्येक के पास 10,000 से अधिक मूल्य की संपत्ति थी जिनकी कुल संपत्ति का मूल्य 66,000,000,000 था.

प्रशिया में 900 मार्क से कम आय वाले 8,570,418 व्यक्ति थे. इन सबकी आय का योग उच्चतर श्रेणी के 1,46,000 व्यक्तियों की कुल आय से कम था. 1,00,000 मार्क से अधिक आय वाले व्यक्तियों की संख्या 1913 में 4,747, 1914 में 5,215 और 1917 में 13,327 थी.

संयुक्त राज्य की राष्ट्रीय संपत्ति में 7,100,000,000 डॉलर 1870 में 30,000,000,000 डॉलर और 1900 में 88,500,000,000 डॉलर थी. 1912 में यह बढ़कर 187,000,000,000 डॉलर और कुछ अर्थशास्त्रियों के आकलन के अनुसार 1920 में 500,000,000,000 तक पहुँच गयी थी. 1917 में 50,000 डॉलर या इससे अधिक वार्षिक आय वाले 19.103 व्यक्ति थे जिनमें 141 व्यक्तियों की आय 10,000,000 डॉलर से अधिक थी. विनिर्माण उद्योग में पूंजी निवेश की धनराशी 1899 में 8,500,000,000 और 1914 में 22,700,000,000 डॉलर थी. रेलवे निर्माण में पूंजी निवेश की धनराशी 1899 में 11,000,000 डॉलर थी और 1914 में 20,200,000,000 डॉलर थी.

बड़े व्यापार संघों द्वारा नियंत्रित नेशनल सिटी बैंक की पूंजी  1879 में 16,700,000 डॉलर थी. यह पूंजी बढ़कर 1899 में 128,000,000 डॉलर हो गयी  थी और आज बढ़कर यह 1,000,000,000 डॉलर हो गयी है.

इस वक्त जबकि संयुक्त राज्य संसार के सम्पूर्ण क्षेत्र के 7 प्रतिशत पर काबिज़ है जबकि इसकी आबादी विश्व की आबादी का 6 प्रतिशत से भी कम है, यह पूंजीवादी गणतंत्र विश्व के सोना उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के गेहूं उत्पादन का 25 प्रतिशत, विश्व के स्टील और लौह उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के सीसा उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के जिंक उत्पादन का 50 प्रतिशत, विश्व के चाँदी उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के कोयला उत्पादन का 60 प्रतिशत, विश्व के खनिज उत्पादन का 60 प्रतिशत, विश्व के अनाज उत्पादन का 75 प्रतिशत और विश्व के कार उत्पादन का 85 प्रतिशत पैदा करता है. यह समस्त चंद एक ट्रस्टों न्यासों के नियंत्रण में है जिनके शीर्ष पर रॉकफेलर  मोर्गेन, फोर्ड, मैकार्मिक और आरमर जैसे बीस अरबपति है.

‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां-12

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शहर और गाँव के बीच दरार

जर्मनी में पहले विशाल पैमाने के श्रम विभाजन, शहर से गाँव के अलगाव को स्थापित होने में तीन शताब्दियों का वक्त लगा. केवल इस पहलू के लिहाज़ से जिस तरह शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सम्बन्धों में परिवर्तन हो गया था, ठीक उसी प्रकार सारे समाज में परिवर्तन हो गया था. आइए हम श्रम विभाजन के इस एक ही पहलू पर गौर करते हैं और प्राचीन दास-स्वामी वाले गणतंत्रों और ईसाई सामंतवाद के विरोध पर ध्यान देते हैं या फिर उपाधिकारी भूपतियों के पुराने इंग्लैंड और कपास स्वामियों के आधुनिक इंग्लैंड के विरोध पर ध्यान देते हैं. चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी में जब औपनिवेशिक अधिकार क्षेत्र स्थापित नहीं हुए थे, जब यूरोपियनों के लिए अमेरिका अस्तित्व ही नहीं था और एशिया के व्यापर कुस्तुनतुनिया के रास्ते से होता था, जब भूमध्य सागर व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र था-उन दिनों (समाज में) श्रम विभाजन सत्रहवीं शताब्दी के श्रम विभाजन से बिलकुल भिन्न था जब स्पेन, पुर्तगाल, हॉलैंड, इंग्लैंड और फ्रांस धरती के हर कोने पर औपनिवेशिक अधिकार-क्षेत्र स्थापित कर रहे थे (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ फिलासफ़ी, पृ. 101). पूंजी में मार्क्स इस विषय का फिर उल्लेख करते हैं और जोड़ते हैं : “प्रत्येक श्रम विभाजन का आधार जो अच्छी तरह विकसित हो चुका है और जो मालों के विनिमय के कारण अस्तित्व में आया है, शहर और देहात का अलगाव होता है. यह कहा जा सकता है कि समाज के पूरे आर्थिक इतिहास का सारांश शहर और देहात के बीच इस अलगाव में निहित है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1 371-2)

विशाल पैमाने के उद्योग ने कृषि के पुराने जमाने के तौर-तरीकों पर निर्णायक प्रहार किया. इसने किसान के ग्रामीण जीवन की निर्जीव कर देने वाली स्थितियों का उन्मूलन कर दिया. “कृषि के क्षेत्र में आधुनिक उद्योग का सर्वाधिक क्रांतिकारी प्रभाव यह है कि यह पुराने समाज के आधार स्तम्भ – किसान – को नष्ट कर देता है और उसके स्थान पर उज़रत लेकर काम करने वाले मजदूर को स्थापित कर देता है. इस प्रकार सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता और वर्ग विरोध गांवों में भी शहर के स्तर तक पहुँच गए हैं…उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति ने कृषि और मैन्युफैक्चर के बीच एकता के पुराने बंधन को, जिसने उनमें तब एकता कायम कर रखी थी जब दोनों अपनी शैशव अवस्था में थे, एकदम तोड़कर फैंक दिया है.”(मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 546 )

नीचे दिए गए आंकडों से यह नतीजा निकलता है कि उन्नीसवीं शताब्दी की आरम्भिक दशाब्दियों में गाँव की आबादी के बहिर्गमन से शहरी आबादी में बहुत तेज वृद्धि हुई. 1800 में लन्दन की आबादी 9,59,000 थी जो बढ़कर 1850 में 2,363,000 हो गयी. 1800 से 1850 के बीच पेरिस की आबादी 547,000 से बढ़कर 1,053,000 हो गयी. इसी अवधि में न्यूयार्क की आबादी 64,000 से बढ़कर 612,000 हो गयी. मैनचेस्टर, बर्मिंघम, शैफील्ड और ब्रेडफोर्ड जैसे नए औद्योगिक केन्द्रों में आबादी में वृद्धि और ज्यादा तेज़ थी. लेकिन इस शताब्दी के दूसरे अर्धांश के दौरान शहरी आबादी में वृद्धि के सामने यह कुछ भी नहीं थी.

1850

1900

वियना

444,000

1,675,000

सैंट पीटर्सबर्ग

485,000

1,333,000

बर्लिन

419,000

1,889,000

म्यूनिख

110,000

500,000

एसेन

9,000

119,000

लीपज़िग

63,000

456,000

शिकागो

30,000

1,699,000

न्यूयार्क शहर

612,000

3,437,000

1851 में ही इंग्लैंड और वेल्स की शहरी आबादी 8,991,000 तक पहुच गयी थी जोकि पूरे देश की आबादी का 50 प्रतिशत थी. 1901 तक यह आबादी बढ़कर 28,169,000 या सम्पूर्ण आबादी का 88 प्रतिशत हो गयी थी. इंग्लैंड और वेल्स की आबादी में वृद्धि की रफ्तार को नीचे दिए गए आंकडों से देखा जा सकता है :

—————————————–

वर्ष                  आबादी

1690                          5,000,000

1801                          9,000,000

1851                        17,900,000

1901                        32,500,000

————————————————

इंग्लैंड और वेल्स में जनसंख्या घनत्व 1800 में लगभग 146 प्रति वर्ग मील, 1840 में 265 प्रति वर्ग मील और 1901 में 540 प्रति वर्ग मील था.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-11. पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत संचार के साधनों और परिवहन का विकास

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11. पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत संचार के साधनों और परिवहन का विकास

“उद्योग और कृषि की उत्पादन प्रणालियों में क्रांति ने उत्पादन की सामाजिक प्रक्रिया की सामान्य परिस्थितियों में – अर्थात संचार और परिवहन के साधनों में – भी एक क्रांति को आवश्यक बना दिया. फूरिये के शब्दों में जिस समाज की एक धुरी सहायक घरेलू उद्योगों सहित छोटे पैमाने की खेती और दूसरी धुरी शहरी दस्तकारी थी उस समाज में संचार और परिवहन के जो साधन थे वे मैन्युफैक्चर के काल की उत्पादन आवश्यकताओं के लिए जिसमें सामाजिक श्रम का विस्तृत विभाजन, उत्पादन के औजारों और मजदूरों का संकेन्द्रण हो गया था और जिसके लिए उपनिवेशों में मंडियां तैयार थीं, इतने अधिक अपर्याप्त थे कि संचार और परिवहन के क्षेत्र में मूल परिवर्तन होना ही था और वास्तव में यह हुआ भी. इसी प्रकार मैन्युफैक्चर के काल से आधुनिक उद्योग को संचार और परिवहन के जो साधन मिले, वे इस नए ढंग के उद्योग के लिए जिसमें तूफानी गति से उत्पादन होता है, जिसका विस्तार बहुत व्यापक होता है, जो पूँजी और श्रम को उत्पादन के एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में लगातार स्थानांतरित करता रहता हो और जिसके पूरे विश्व की मंडियों में नवोत्पादित सम्बन्ध स्थापित हो चुके हों, शीघ्र ही असहनीय बाधा बन गए. इसलिए पालों वाले जलपोतों की बनवाट में मूलभूत परिवर्तनों के अलावा नदियों में चलने वाले स्टीमरों, रेलों, सागरगामी वाष्प जलपोतों और तार की एक पूरी प्रणाली से संचार और परिवहन के साधन विशाल पैमाने के उद्योग की उत्पादन पद्धतियों के धीरे-धीरे अनुकूल बनते चले गये.” (मार्क्स, कैपिटल, 1, अंग्रेजी, 406-407)

अठारहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में जलयानों को इंग्लैंड से भारत जाने और वापस आने की समुद्री यात्रा में अठारह से बीस महीने का वक्त लगता था. इन जलयानों का औसत भार 3०० से 500 टन हुआ करता था. अठाहरवीं शताब्दी के अंत में इस जहाज़रानी बेड़े की कुल भार-क्षमता 1,725,000 टन से अधिक नहीं थी. पहले चप्पुओं से और फिर पेंच या पेंचों से आगे बढ़ने वाले वाष्प-जलपोतों के आविष्कार के साथ समुद्री परिवहन के भार और गति दोनों में ज़बरदस्त वृद्धि हुई. आजकल मालवाहक जहाज़ों का औसत भार दस से बारह हज़ार टन होता है और यात्री जहाज़ जिनकी औसत भार-क्षमता चालीस से पचास हज़ार टन होती है, बीस नॉट प्रति घंटा या उससे ज़्यादा रफ्तार से चलते हैं. नार्वे के सांख्यिकीविदों के अनुसार 1821 में सारे समुद्री बेड़े की भारवहन क्षमता 5,250,000 टन थी जिसमें वाष्प चालित जहाज़ 0.02 प्रतिशत से अधिक नहीं थे. 1914 में यह भार क्षमता 31,500,000 टन हो गयी जिसमें मुख्यता वाष्प जलपोत थे. जहाँ तक रेल मार्गों का सम्बन्ध  है, 1840 में पूरे विश्व में इसकी लम्बाई 4800 मील, 1850 में 21,600 मील, 1870 में 136,000 मील और 1913 में इसकी लम्बाई 690,000 मील थी. मालगाडी की औसत चाल 20 से 25 मील प्रति घंटा और यात्री गाड़ी की औसत चाल 35 मील प्रति घंटा थी. 1812 में बर्लिन से वियना तक की यात्रा में पांच दिन का समय लगता था 1912 में यह समय घट कर बारह घंटा हो गया. 1812 में बर्लिन से पेरिस तक की यात्रा नौ दिन की थी और 1912 में केवल सत्रह घंटों की ज़रुरत रह गयी थी. 1812 में हैम्बर्ग से न्यूयार्क की यात्रा में लगने वाले अड़तालीस दिनों की बजाय 1912 में सात दिनों से ज़्यादा की ज़रुरत नहीं रह गयी थी. 1840 के बाद से, रोलेंड हिल (1795-1879) द्वारा प्रस्तुत किये गये सुधारों के बाद, डाक सेवा विशाल पैमाने के उद्योग की मांगों के अनुरूप गठित कर ली गयी थी. उन्नीसवीं सदी के अंत तक डाक सेवा लगभग पूरी पृथ्वी पर चालू हो गयी थी जिससे उत्तर में स्पिटबर्गेन से लेकर दक्षिण में टियरा डे फ्यूगो पर पुटा एरिनाज़ तक पत्रों आदि का नियमित वितरण होने लगा. पोस्टल यूनियन की स्थापना ने सम्पूर्ण पृथ्वी को ‘एक डाक क्षेत्र’ में बदल दिया है.

पहला संकेत यंत्र जो क्लॉद शेप (1753-1850) द्वारा आविष्कृत प्रकाशीय तार यंत्र था, को 1792 में लेजिस्लेटिव असेम्बली ने स्वीकार कर लिया था और राजतन्त्रवादी गठबंधन के विरुद्ध संघर्ष में क्रांति की सेना के लिए यह यंत्र बहुत उपयोगी साबित हुआ. आजकल सर्वाधिक सुपरिचित संकेत यंत्र वह है जो रेलवे सिग्नल की ब्लाक प्रणाली में प्रयोग किया जाता है. विद्युत तारयंत्र के आविष्कार हो जाने के पहले तक, लम्बी दूरी तक तीव्र गति से सन्देश भेजने के लिए संकेत यंत्रों से प्रसारण का उपयोग किया जाता था. 1830 के दशक के दौरान एक विद्युत तार यंत्र बनाया गया और अमेरिकावासी मोर्स (1791-1872) ने अभिलेखन पद्धति का अविष्कार किया जो आज तक उसके नाम से जाना जाता है. 1844 से ही विश्व बाज़ार की आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए और इसके विकास की गतिविधियों से कदम मिलाकर चलने के लिए इलेक्ट्रो-टेलीग्राफ का उपयोग सारे संसार में किया जा रहा है. टेलीग्रामों के ज़रिए ही वाणिज्य जगत के दामों में तेजी से होने वाले उतार-चढाव की जानकारी दी जा सकती थी. 1865 में जब पहला समुद्री तार बिछाया गया तब से सारे संसार में तार-यंत्रों की सहायता से संपर्क स्थापित हो गया. टेलीग्राफ प्रणाली की सहायता से राजधानी और उपनिवेशों के बीच, केंद्र में स्थित व्यापारिक उद्यम और उसकी दूरस्थ शाखाओं के बीच निकटम सम्बन्ध कायम कर दिया गया है.उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक पचास लाख मील लम्बी टेलीग्राफ संचार-प्रणाली निर्मित कर दी गयी थी. अठारह सौ सत्तर के दशक में टेलीफोन का प्रयोग आरंभ किया गया था और तब से इसका इतना अधिक विकास हो गया है कि एक देश के किसी शहर या गाँव में बैठे किसी मित्र से ही नहीं, बल्कि देश की सीमाओं के बाहर बैठे मित्र से भी बातचीत की जा सकती है. यह गणना की गयी है कि टेलीफोन और टेलीग्राफ के तार लगभग चालीस लाख मील में फैले हुए हैं और इनकी लम्बाई से पूरी पृथ्वी को 1600 बार लपेटा जा सकता है. बेतार टेलीग्राफ और टेलीफोन के आविष्कार ने संचार के साधनों के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत कर दी है.

अंग्रेज़ व्यापारियों ने अपने सामानों, विशेषतया सूती सामानों की कीमत घटाकर ईस्ट इंडीज़ के उद्योग को बरबाद का दिया. समृद्धि के लिए वे केवल आर्थिक स्त्रोतों से संतुष्ट नहीं हुए बल्कि उन्होंने बिना किसी नैतिक हिचक के राजनितिक तौर-तरीकों का भी सहारा लिया. इस प्रकार उन्होंने बल प्रयोग से चीनियों को अफीम का आयात करने के लिए विवश कर दिया. इस मामले में अंग्रेजी नौसेना की जगह पर संयुक्त राज्य की नौसेना ने काम किया. 1854 के पैरी समझौता, 1875 का हैरिस समझौता और 1858 की येदो संधि द्वारा जापानियों को अपने कुछ बंदरगाह पश्चिमी व्यापार के लिए खोलने के लिए मजबूर कर दिया गया.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-10. विश्व बाज़ार का मात्रात्मक और गुणात्मक विकास

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10. विश्व बाज़ार का मात्रात्मक और गुणात्मक विकास

“मशीनों के आविष्कार के पहले प्रत्येक देश की औद्योगिक गतिविधि मुख्यतया देशज भूमि में पैदा होने वाले कच्चे सामान के उत्पादन को लगातार विकसित करते जाने में निहित थी. इस प्रकार ग्रेट ब्रिटेन देशी भेड़ों के ऊन से कपड़ा बनाता था, जर्मनी पटसन को लिनेन में परिवर्तित करता था, फ्रांस रेशम और पटसन पैदा करता था और इनसे तैयार माल बना लेता था, ईस्ट इंडीज़ और लेवांत कपास उगाते थे और इससे सूती सामान बनाते थे,आदि-आदि. वाष्प-चालित मशीन के उपयोग से श्रम विभाजन में इतना अधिक विस्तार हो गया कि विशाल पैमाने के उद्योग देशज भूमि से उखड़ते गए और विश्व बाज़ार, अंतरराष्ट्रीय विनिमय और अंतरराष्ट्रीय श्रम पर पूर्णतया निर्भर हो गए.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ 110)

यदि यूरोपीय उद्योग को कपास,जूट, पेट्रोलियम और रबर उपलब्ध न होता तो इसकी नियति इसे विनाश की ओर ले जाती. इटली का इन्जीनियरिंग और ऑटोमोबाइल उद्योग कोयला और धातु के निर्यात पर पूर्णतया निर्भर है. मध्ययुगीन व्यापर के सर्वाधिक समृद्धिशाली काल में एक साल में सेंट गोथार्ड दर्रे से गुजरने वाले सारे सामान को अब आसानी से कुछ अदद साधारण मालगाडियों में भरा जा सकता था. अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विकास का स्तर निम्न आंकडों से स्पष्ट हो जाता है. 1800 में मालों के अंतरराष्ट्रीय कारोबार की कीमत 6,050,000,000,मार्क आंकी गयी थी, ( 1 मार्क = 8 औंस चांदी); पर था; 1840 में इसकी कीमत 11,500,000,000 तक पहुच गयी और और 1850 में इसका आकलन 16,650,000,000 किया गया था. बीसवीं सदी के आरंभ में अंतरराष्ट्रीय कारोबार 1850 की तुलना में पांच गुना बढ़ गया था और 88,500,000,000 मार्क तक पहुँच गया था जो 1912 तक छलांग लगाकर 169,000,000,000 मार्क तक पहुँच गया था. विश्व बाज़ार में पहुँचने वाले सामानों कि विविधता में दस गुना वृद्धि हो गयी थी. अठारवीं शताब्दी के अंत तक कुछ ‘कुलीन’ सामान उच्च वर्गों द्वारा वांछित माल बाज़ार में आये जिनकी मात्रा बढती गयी. बाल्टिक सागर और यूरोप के उत्तर-पश्चिमी सागर तट के बीच अनाज और इमारती लकड़ी का समुद्री व्यापार तेजी से होता था. 1790 में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े केंद्र, लन्दन में जलपोतों में भरकर 580,000 टन माल बन्दरगाह पर आया था. एक सौ साल बाद यह आंकडा बढ़कर 7,709,000 टन हो गया. सूती वस्त्र उद्योग के विकास से उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में कच्चे कपास उगाने की मांग में बढोत्तरी ज़्यादा से ज़्यादा होती चली गयी. 1790 में 2,000,000 पाउंड वजन की फसल हुई. 1820 में यह आंकडा बढ़कर 180,000,000 पाउंड हो गया था. इससे इंग्लैंड में कच्चे कपास के आयात में भारी वृद्धि हुई. 1751 में आयात की मात्रा 5,000,000 पाउंड थी, 1920 तक यह बढ़कर 142,000,000 पाउंड पहुँच गयी.

उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान विश्व बाज़ार में आने वाले माल की संरचना में समग्र परिवर्तन हो गया. उत्तरी अमेरिका से गेहूं, कपास, पेट्रोलियम और ताम्बा, दक्षिणी अमेरिका से कॉफी, ग्वानों, चिली का शोरा, गोश्त; एशिया से गेहूं, जूट, कपास, चावल और चाय; आस्ट्रेलिया से गेहूं, गोश्त और ऊन- यह सब विविध सामान हजारों वाष्प-चालित जहाजों में समुद्री रास्ते से आते हैं और विश्व बाज़ार को मालों से पाट देते हैं.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-8. पूंजीवाद का क्रांतिकारी चरित्र व 9. पुरे विश्व में पूंजीवाद का विस्तार

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8. पूंजीवाद का क्रांतिकारी चरित्र

“जब तक हस्तशिल्प और मैन्युफैक्चर सामाजिक उत्पादन के सामान्य आधार बने रहते हैं तब तक उत्पादक का उत्पादन की केवल एक विशिष्ट शाखा के अधीन रहना और उसके धंधे की विविधता का छिन्न-भिन्न हो जाना आगे के विकास का आवश्यक कदम होता है. इस मूलाधार के सहारे उत्पादन की प्रत्येक विशेष शाखा अनुभव के फलस्वरूप समुचित तकनीकी रूप प्राप्त कर लेती है, उसका क्रमश: परिष्करण करती जाती है और ज्यों ही यह रूप एक निश्चित मात्रा में परिपक्वता हासिल कर लेता है वैसे ही उसका उस रूप में ठोस ढंग से ढलना तीव्रता से हो जाता  है. वाणिज्य के द्वारा प्राप्त नए कच्चे माल के अलावा श्रम के औजारों में होने वाला क्रमिक परिवर्तन ही इसमें थोडा-बहुत फर्क डालता है. एक बार अनुभव से सिद्ध सर्वाधिक उपयोगी रूप जब प्राप्त हो जाता है तब श्रम के औजार का वह रूप मानों पत्थर में ढल जाता है, जो इस ढंग से प्रगट होता है जिससे कि अनेक औजार कई हज़ार वर्षों से एक पीढी से दूसरी पीढी को एक ही रूप में मिलते गए हैं… आधुनिक उद्योग किसी भी उत्पादन प्रक्रिया के वर्तमान रूप को उसका अंतिम रूप नहीं समझता और न ही व्यवहार में उसे ऐसा मानता है. इसलिए इसका तकनीकी आधार क्रांतिकारी है जबकि इसके पहले वाली उत्पादन की तमाम प्रणालियाँ बुनियादी तौर पर रुढिवादी   थीं. मशीनों, रासायनिक प्रक्रियायों तथा अन्य तरीकों की सहायता से आधुनिक उद्योग उत्पादन के तकनीकी आधार के साथ-साथ मजदूरों के काम और श्रम-प्रक्रिया के सामाजिक संयोजन में लगातार परिवर्तन कर रहा है. साथ ही यह उसी निरंतरता से इस समाज में पाए जाने वाले श्रम विभाजनों में परिवर्तन कर देता है तथा पूंजी की मात्रा तथा मजदूरों के समूहों को उत्पादन की एक शाखा से दूसरी शाखा में लगातार स्थानांतरित करता रहता है.” (मार्क्स, कैपिटल खंड 1, 524-526) पूंजीवाद के ऐतिहासिक भूमिका के प्रश्न के उत्तर के लिए देखें, प्लेखानोव (1856-1918) Georgi Plekhanov – Our Differences (हमारे मतभेद, रचनावली, रूसी संस्करण, खंड 1, पृ. 230-237)

9. पूरे विश्व में पूंजीवाद का विस्तार

सोलहवीं शताब्दी के दौरान पूरी दुनिया में बाज़ार के विस्तार ने पूंजीवाद के विकास को संवेग प्रदान किया. लेकिन अठारवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के बाद ही बुर्जुआ वर्ग धरती के सारे क्षेत्र पर फैलने में सफल हो सका. पृथ्वी के दूरस्थ स्थानों में प्रवेश करने के लिए बुर्जुआ वर्ग ने धर्म-प्रचारकों और वैज्ञानिकों का इस्तेमाल किया. 1770 से 1848 के बीच अंग्रेजों ने आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और सारे हिंदुस्तान पर अधिकार कर लिया था. फ्रांस, जिसे नेपोलियन के युद्धों में अपने अधिकांश औपनिवेशिक क्षेत्रों को अंग्रेजों के हवाले करना पड़ता, ने उत्तरी अफ्रीका के बड़े क्षेत्रों को कब्जे में करके अपने नुकसान की भरपाई कर ली थी.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-7. विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

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7. विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

“विनिमय का अपना अलग इतिहास है और यह विकास के विभिन्न मंजिलों से होकर गुजरा है. एक वक्त था, उदाहरण के लिए मध्ययुग में, जब केवल फ़ाजिल चीजों यानि केवल उन चीजों का जो जनता की ज़रूरतों से अधिक उत्पादित होती थीं, का विनिमय किया जाता था. दूसरा वक्त आया जब न केवल उत्पादन का अधिशेष बल्कि उद्योग का सम्पूर्ण उत्पाद वाणिज्य के क्षेत्र में पहुँचने लगा. यह वह वक्त था जब उत्पादन पूर्णतया विनिमय पर निर्भर हो गया था. अंत में वह दिन भी आ गया जब उन चीजों का जिन्हें पहले अहस्तान्तरणीय समझा जाता था, विनिमय और मोल-टोल होने लगा. वास्तव में वे चीजें बेचीं भी जाने लगी. वे चीजें भी जो अभी तक सौंपी जाती थीं, विनिमय नहीं की जाती थीं, दी जाती थीं, बेची नहीं जाती थीं – सतीत्व, प्रेम, अभिमत, विज्ञानं, अंतरात्मा आदि – वाणिज्य के हवाले कर दी गयीं. यह बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार और सार्विक धन -लोलुपता का वक्त है या राजनितिक अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो यह एक ऐसा वक्त है जबकि हर चीज़ चाहे भौतिक हो या आत्मिक, बिक्री योग्य माल बन गयी है, उचित मूल्य-निर्धारण हेतु बाज़ार में ले जायी जा रही है.” ((मार्क्स, द पॉवर्टी ऑफ फिलासफी, बीपीएच, कलकत्ता, पृ. 26)

“जब किसी माल में विनिमय-मूल्य को संभाले रखने और जमा करने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है, तब मुद्रा के प्रति लालच का जन्म होता है. मालों का परिचलन बढ़ने के साथ मुद्रा की, अर्थात उस सर्वथा सामाजिक रूप की जिसका हर वक्त इस्तेमाल किया जा सकता है, शक्ति बढती जाती है. १५०३ में जैमाका से लिखे पत्र में कोलंबस बताते हैं : “सोना एक आश्चर्यजनक वस्तु है. जिसके पास पास है वह जो भी चाहे हासिल कर सकता है. सोना आत्माओं के स्वर्ग तक जाने का रास्ता बना सकता है.” मुद्रा चूंकि यह खुलासा नहीं करती है कि कौनसी चीज़ उसमें रूपांतरित हुई है, इसलिए हर चीज़ चाहे वह माल हो या न हो, सोने से बदली जा सकती है. हर चीज़ बिकाऊ बन जाती है और हर चीज़ खरीदी जा सकती है. परिचलन वह विशाल सामाजिक दहनपात्र बन जाता है जिसमें हर चीज़ डाली जाती है और जिसमें से हर चीज़ मुद्रा का रूप धारण करके निकल आती है. यहाँ तक कि संतों की हड्डियाँ तक इस कीमियागिरी के सामने नहीं ठहर पाती हैं. इसमें से ज्यादा नाजुक चीजें, वे पवित्र चीजें जो मनुष्यों के व्यापारिक लेन-देन से बाहर हैं, तो इस कीमियागिरी के सामने और भी कम ठहर पाती हैं. जिस प्रकार मालों के बीच मात्रात्मक भिन्नता का लोप मुद्रा में हो जाता है उसी प्रकार मुद्रा बेरहमी से सबकुछ सपाट कर देने वाला, अपनी ओर से हर तरह के भेदभाव समाप्त कर देती है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, अंग्रेजी संस्करण, 112-13) capital

औद्योगिक क्रांति की पूर्वसंध्या पर ब्रिटेन में विद्यमान काव्यात्मक और पितृसत्तात्मक संबंधो को एंगेल्स ने अपनी कृति इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की दशा (द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, लंदन, 1892) में भली-भांति चित्रित किया है. १८४५ में लिखते समय इस पुस्तक में वह उन बुनकरों का चित्र प्रस्तुत करते हैं जो अभी भी भूमि के छोटे टुकड़े पर मालिकाना हक़ रखे हुए थे : “मेहनतकशों के इस वर्ग का नैतिक और बौद्धिक जीवन किस तरह का था , इसका अनुमान लगाने के लिए कल्पना की उड़ान की आवश्यकता नहीं है. वे शहर से कटे रहते थे जहाँ वे कभी नहीं जाते थे (क्योंकि घुमंतू एजेंट उनसे धागा और कपड़ा खरीद लेते थे और बुनकरों को इसके बदले में मजदूरी दे दिया करते थे). यहाँ तक कि साड़ी जिंदगी शहर के पास गुजारने के बावजूद, अपने बुढापे में वे कहा करते थे कि उन्होंने वहां अभी तक कदम नहीं रखा. यह स्थिति तब तक चलती रही जब तक कि मशीन के प्रवेश ने उन्हें आजीविका के साधन से वंचित नहीं कर दिया और उन्हें रोजगार की खोज में शहर जाने को मजबूर नहीं कर दिया. बुनाई के काम से मिली छुट्टी के दौरान वे अपनी छोटी जोत में खेती करते थे जिसकी वजय से उनका बौद्धिक और नैतिक स्तर अपने इलाके के भूधर किसान से मिलता-जुलता था जिससे वे स्वेच्छा से मेल-जोल बढाते और सर्वाधिक आत्मीयता के सम्बन्ध बनाए रखते थे. अपने इलाके के प्रमुख भूस्वामी ज़मींदार को वे सहज ही अपना श्रेष्ठ समझते थे. वे अपने छोटे-मोटे झगड़ों के निपटारे के लिए उससे सलाह लेने जाते और इस पूज्य सम्बन्ध को बनाये रखने के लिए उसे यथोचित सम्मान भी देते थे. वे ‘सम्मानीय लोग’ माने जाते थे जो अच्छे पति और पिता हुआ करते थे. वे सदाचारी जीवन बिताया करते थे क्योंकि उन्हें अनैतिक बना देने वाला कोई प्रलोभन मौजूद नहीं था यदि यह तथ्य ध्यान में रखा जाये कि उन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में शराबखाने और चकले नहीं हुआ करते थे. और चूंकि मेरा मेज़बान जिसके भटियारखाने में वे कभी-कभार अपना गला तर करने जाते थे, उन्हीं की तरह “भला” आदमी, या शायद असामी किसान होता जिसे अपनी अच्छी बियर अपनी अच्छी श्रेणी पर गर्व हुआ करता और जो छुट्टी के दिन या त्यौहार पर अपनी दूकान बंद कर देने की सावधानी बरतता. बच्चे घर पर रखे जाते थे, उन्हें आज्ञापालन की शिक्षा दी जाती थी और उनका लालन-पालन परमेश्वर पर श्रद्धा बनाये रखने वाले माहौल में किया जाता. जब तक नौजवान अविवाहित रहते, यह पितृसत्तात्मक सम्बन्ध उन्हें दृढ़ता से बांधे रखता था. विवाह होने तक बच्चे ग्रामीण सादगी और अपने बाल सखाओं के निकट साहचर्य में रहकर बड़े होते थे. यद्यपि विवाह के पहले स्त्री-पुरुष के बीच अन्तरंग संबंध कायम होना लगभग सामान्य था तो भी इन जोड़ों के बीच यह बात बिलकुल साफ़ हुआ करती थी कि यह वैवाहिक समारोह का पूर्वाभ्यास मात्र है जिसे कालांतर में संपन्न कर दिया जाता था. संक्षेप में,उन दिनों अंग्रेज़ कारीगरों और शिल्पकारों की सक्रीय जिंदगी और सेवा-निवृति का वक्त एकांत में, बौद्धिक गतिविधि और प्रचंड व्याकुलता का उनकी जीवन-शैली में कोई स्थान लिए बिना, बीत जाता था जो आज भी (1845) जर्मनी के कुछ हिस्सों में पाया जाता है. शायद ही कभी उन्हें पढना आता और बिरले ही वे लिखना जानते. वे नियमित रूप से गिरजाघर जाते थे, कभी भी राजनीती पर बात नहीं करते थे, कभी भी कोई सामूहिक षड़यंत्र नहीं रचते थे, गंभीर चिंतन के लिए वक्त नहीं निकालते थे, शारीरिक रंगरेलियों और क्रीडाओं को बहुत पसंद करते थे, बाइबिल के प्रवचन को पारम्परिक श्रद्धा के साथ सुनते थे और अपने से श्रेष्ठों को पूरी नम्रता के साथ नीचे झुककर और श्रद्धापूर्वक सम्मान देते थे. लेकिन बौद्धिक दृष्टिकोण से वे मृत थे, जिंदगी से उनका सरोकार अपने संकीर्ण हितों, अपने करघे और अपने छोटे बगीचे तक सीमित थे और उनकी सीमित दुनिया के पार समग्र मानवता को आलोड़ित करने वाले प्रचंड आन्दोलन की कोई समझ नहीं थी. वे अपने शांत और निष्क्रिय जीवन के आदी हो गये थे. यदि औद्योगिक क्रांति नहीं हुई होती, तो उन्हें उस जिंदगी से निजात नहीं मिलती जो रूमानी किस्म की मोहकता के बावजूद मानवीय अस्तित्व के लायक नहीं थी. सच्चाई यह है कि वे इन्सान नहीं थे बल्कि मात्र मशीन बन गये थे जो उन कुलीनों के एक छोटे से समूह की सेवा कर रही थी जोकि अभी तक इतिहास का आधार रहे थे. (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ 2-4) The Condition of the Working Class in England — Frederick Engels

पूंजीवादी समाज का प्रधान घटक, नकद भुगतान, बुर्जुआ की मनोवृत्ति का प्रमुख प्रेरक तत्त्व है. इसलिए इस नारे “मुद्रा को बटुवे में रख लो” का जन्म हुआ. एंगेल्स निम्न पंक्तियों में इसका सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं : “जब तक उसके मजदूर अपने जीते जी उसके लिए प्रचुर धन अर्जित करते रहते है, अंग्रेज़ बुर्जुआ को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे भूख से मर रहे हैं या नहीं. हर चीज़ की कीमत मुद्रा में आंकी जाती है और हर वह चीज़ जो मुद्रा न अर्जित कर पाती हो उसे उपहासास्पद, अव्यवहारिक और विचारधारात्मक मूर्खता समझा जाता है…उसके लिए मजदूर इन्सान न होकर मात्र एक ‘कारीगर’ होता है और मजदूर के सामने भी बुर्जुआ उनकी चर्चा इसी तरह करता है. जैसाकि कार्लाईल कहते हैं कि बुर्जुआ यह मानता है कि “नकद भुगतान एक इन्सान और दूसरे इन्सान के बीच का एक मात्र सम्बन्ध है.” यहाँ तक कि वह बंधन जो पति को पत्नी के साथ बाँधता है, सो में से निन्यानबे मामलों में नकद मुद्रा के रूप में व्यक्त किया जा सकता है. दासत्व की दयनीय स्थिति जो मुद्रा ने बुर्जुआ पर थोपी है, उसने अंग्रेजी भाषा पर भी अपनी छाप छोड़ दी है. यदि आप यह बताना चाहते हैं कि किसी व्यक्ति के पास 10,000 पाउंड हैं तो उसे इस तरह कहा जाता है कि ‘अमुक व्यक्ति की कीमत 10,000 पाउंड है.’ जिसके पास धन होता है वह ‘सम्मानीय समझा जाता है और तदनुसार उसे महत्त्व दिया जाता है : उसकी गणना बेहतर किस्म के लोगों’ में की जाती है और वह ज्यादा असर डालता है. वह जो कुछ भी करता है उसके साथियों के लिए मानक बन जाता है. यह अवांछित मनोवृत्ति सारी भाषा में समां गयी है. सभी सम्बन्धों को व्यापारिक शब्दावली से उधार लिए गए शब्दों में व्यक्त किया जाता है और इसका समाहार आर्थिक श्रेणियों में किया जाता है. आपूर्ति और मांग का सूत्र अंग्रेजों के समग्र जीवन दृष्टिकोण को व्यक्त करता है. इसलिए मानवीय गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र में स्वतन्त्र प्रतिस्पर्द्धा का होना आवश्यक है, इसलिए शासन, चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में अवरोधहीनता और अहस्तक्षेप की नीति का पालन आवश्यक है. जल्दी ही अहस्तक्षेप की नीति धर्म के क्षेत्र में प्रवेश कर जायेगी क्योंकि जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा है राजकीय चर्च का चुनौतीरहित प्राधिकार ज़्यादा तेज़ी से ध्वस्त होता जा रहा है.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ 277)

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-6. बुर्जुआ वर्ग का राजनितिक विकास

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6. बुर्जुआ वर्ग का राजनितिक विकास

यहाँ पर लेखकों का मंतव्य सर्वप्रथम और प्रमुख रूप से फ्रांसीसी बुर्जुआ के राजनितिक विकास पर विचार करना है. अन्यंत्र मार्क्स लिखते हैं : “बुर्जुआ वर्ग के इतिहास को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है. पहले चरण के दौरान सामंती व्यवस्था और निरंकुश राजतन्त्र के अधीन बुर्जुआ वर्ग के रूप में विभेदीकृत होता है. दूसरा चरण तब आता है जब यह वर्ग के रूप में पहले से ही संगठित हो जाता है, सामंती सामाजिक व्यवस्था और राजतन्त्र को उखाड़ फेंकता है और पुरानी व्यवस्था के स्थान पर बुर्जुआ व्यवस्था स्थापित कर लेता है. पहले चरण को दूसरे चरण की अपेक्षा ज्यादा वक्त लगा और अपनी कार्यसिद्धि के लिए अधिक उर्जा व्यय करनी पड़ी”. (मार्क्स, द पॉवर्टी ऑफ फिलासफी, बीपीएच, कलकत्ता, पृ.136-37)  [The Poverty of Philosophy Answer to the Philosophy of Poverty by M. Proudhon]

बाहरवीं और तेरहवीं शताब्दी में, फ्रांसीसी कम्यून सामंती जागीरदारों के खिलाफ संघर्ष में उलझे हुए थे और सामंतों की बीच झगडों का उसने फायदा उठाया. (जिसकी एंगेल्स घोषणापत्र के बाद के संस्करणों की टिपण्णी में बताते हैं कि “कम्यून” नाम इटली और फ्रांस के शहरी समुदायों ने तब अपनाया था जब उन्होंने सामंती स्वामियों से स्व-शासन का अधिकार क्रय कर लिया था.) चौदहवीं शताब्दी के प्रारन्भिक वर्षों में उन्होंने स्टेट्स जनरल के प्रतिनिधित्व की मांग की. इस सभा को पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करना था. 1356 से 1358 तक पेरिस के व्यापारियों के अध्यक्ष एतियन मार्सेल (मृत्यु 1358) के नेतृत्व में, पेरिस के बुर्जुआ ने स्टेट्स जनरल को वास्तविक प्रातिनिधिक संस्था में बदलने की कोशिश की जिसकी बैठक, राजा के बुलावे की प्रतीक्षा किये बिना निर्धारित अवधि पर की जा सके. निरंकुश सम्राट ने विभिन्न श्रेणियों (पुरोहित वर्ग,कुलीन वर्ग आदि  के बीच मतभेदों का फायदा उठाकर बुर्जुआ पक्ष से समझौता कर लिया. बुर्जुआ वर्ग “थर्ड एस्टेट” (राज्य का तीसरा स्तम्भ), कर-योग्य श्रेणी, केंद्रीकृत राजतान्त्रिक राज्य का एक मान्यता-प्राप्त अंग बन गया जिसने राजकीय तंत्र का उपयोग व्यापारिक और औद्योगिक विकास के हित में करने के लिए अपनी सारी शक्ति केन्द्रित कर दी. इस आन्दोलन के शीर्ष पर वे बुर्जुआ धन्नासेठ थे जिन्होंने उन दरबारी कुलीनों के साथ मिलकर जो समर्थन के लिए इस उभरती ताकत की ओर उन्मुख हो गए थे, राजतंत्रीय शक्ति का उपयोग अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति के एक साधन के रूप में करने की कोशिश की. इस नीति की असफलता ने, क्योंकि यह मेहनतकश जनता के निर्मम शोषण और निम्न-बुर्जुआ हितों की पूर्ण उपेक्षा पर आधारित थे, महान फ्रांसीसी क्रांति का रास्ता साफ़ कर दिया जो अठारहवीं शताब्दी के अंत में भड़क उठी थी. नेपोलियन के मध्यवर्ती शासन (1815 में समाप्त हो गया था) और बूर्बो वंश की पुनप्रतिष्ठा के बाद 1830 में क्रांति हुई और “जुलाई राजतन्त्र” की स्थापना हुई जोकि बुर्जुआ मताधिकार पर आधारित संसदीय सरकार का क्लासिकीय रूप था.

नीदरलैंड में, नागरिकों, ने सामंती संस्थाओं के खिलाफ अविराम संघर्ष किया.यह संघर्ष कभी-कभी वास्तविक गृह-युद्ध (उदाहरण के लिए 1324 का वाइप्रे और ब्रूगे के नेतृत्व में फ्लेमिश नगरों का विद्रोह जो कई वर्षों तक चला)  का रूप धारण कर लेता था. सोलहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश के दौरान नीदरलैंड के बुर्जुआ ने मध्यवर्ती और निम्न कुलीनों के सहयोग से हैप्सबर्ग वंश के शासन के खिलाफ राष्ट्रीय विद्रोह का नेतृत्व किया और लम्बे और तीखे संघर्ष के बाद लोलैंड ने विदेशी शासन से स्वतंत्रता प्राप्त कर ली. नीदरलैंड पहला बुर्जुआ राज्य बना और सत्रहवीं शताब्दी के बाद से ही अन्य सभी बुर्जुआ राज्यों के लिए मॉडल बन गया जोकि कालांतर में पश्चिमी यूरोप में स्थापित हुए.

इटली के स्वतन्त्र नगर गणराज्य, भूस्वामी कुलीनों के शासन के जुवे को उतार फेंकने के बाद, धीरे-धीरे व्यापारिक और औद्योगिक अल्पतन्त्र का रूप धारण करने लगे. लेकिन उत्तरी इटली की व्यापारिक प्रधानता (जहाँ पर व्यापारिक पूंजीवाद का विकास यूरोप के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा पहले हो गया था) के ह्नास के साथ-साथ नगरों में पूंजीवाद के विकास में गतिरोध आ गया. इस प्रकार इन व्यापारिक नगरों ने अपना पहले वाला महत्त्व खो दिया और उन्नीसवीं शताब्दी में ही इतालवी बुर्जुआ के सुदृढीकरण की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू हो पाई.

ग्रेट ब्रिटेन में नगरीय समुदाय ने संसदीय प्रतिनिधित्व बहुत अरसा पहले हासिल कर लिया था लेकिन औद्योगिक पूंजीवाद का विकास आरंभ होने के बाद ही ब्रिटिश बुर्जुआ का सलाहकार और याचक की भूमिका से संतुष्ट होना ख़त्म हो गया और राजनितिक सत्ता के लिए उसका संघर्ष उग्रतर होता चला गया. संसदीय युद्ध जो 1641 से 1649 तक चला, चार्ल्स प्रथम को फांसी और ओलिवर क्रोमवेल के नेतृत्व में राष्ट्रकुल की स्थापना के बाद ख़त्म हुआ. स्टुअर्ट वंश की पुनप्रतिष्ठा की अल्पावधि के बाद क्रांति 1688 में नए रूप में भड़क उठी और इस मर्तबा संसदीय राजतन्त्र स्थापित करने में सफल हो गयी. अब बुर्जुआ को भूस्वामी अभिजातों के रूप में सुयोग्य मित्र मिल गया था जिसका बुर्जुआकरण तेजी से हो रहा था. आर्थिक क्षेत्र में सत्ता बुर्जुआ के अधिक प्रभावशाली संस्तर के अधीन हो गयी जैसाकि फ्रांस में भी इसके बाद घटित हुआ. 1832 में चुनाव सुधारों और 1846 में अनाज कानून के बाद उन्नीसवीं शताब्दी काफी आगे बढ़ गयी थी तब जाकर विश्व बाज़ार के शोषण के लिए एकजुट समग्र बुर्जुआ वर्ग के लिए ब्रिटिश राज्य ज्वाइण्ट-स्टॉक कंपनी में तबदील हो गयी.

जिन देशों में राजनितिक एकता स्थापित नहीं हो पाई थी उनमें राजनितिक केन्द्रीकरण का सटीक अध्ययन जर्मनी और इटली जैसे देशों के उन्नीसवीं सदी के इतिहास में किया जा सकता है. जहाँ तक फ्रांस का सवाल है इस प्रक्रिया ने विशेषतया तीव्र और विशिष्ट रूप धारण कर लिया था. यहाँ पर बुर्जुआ राजनितिक केन्द्रीकरण 1789 और 1815 के वर्षों के दौरान हो गया था हालाँकि 1830, 1845-50 और 1870-75 के दौरान इसे परिपूर्ण किया गया.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-5. औद्योगिक क्रांति और मशीन से उत्पादन का विकास

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5. औद्योगिक क्रांति और मशीन से उत्पादन का विकास

अठारहवीं शताब्दी के अंत में नयी मशीनों के आविष्कार से औद्योगिक क्रांति शुरू हुई थी जिसके परिणामस्वरूप पूंजीवादी मैन्युफैक्चर का स्थान बड़े पैमाने के उत्पादन ने लिया था. इसमें इंग्लैंड ने नेतृत्व प्रदान किया था और मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि यह क्रांति उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम अर्धांश के पहले समाप्त नहीं हुई थी. इसकी शुरुआत कुछ अदद खोजों और आविष्कारों, प्रमुख रूप से पशु-प्रजनन, कृषि, खनन, वस्त्र-उत्पादन के क्षेत्रों में, के साथ हुई थी. इसे शुरुआती संवेग मिला उन यंत्रों के विस्तार से जिन्हें वर्किंग मशीन के नाम से जाना जाता था. इन वर्किंग मशीनों ने कारीगरों के औजारों और मैन्युफैक्चर करने वाले श्रम को विस्थापित कर दिया. 1733 में जान के (1733 से 1764 तक फला-फूला) ने अपनी फ्लाई-शटल का पेटेंट प्राप्त किया जिससे शटल को आगे पीछे ले जाने के लिए केवल एक व्यक्ति की जरूरत रह गयी थी. यांत्रिक कताई के विकास में प्रथम चरण पूरा करने का काम लेवी पाल (मृत्यु 1759) के आविष्कार से संपन्न हुआ जिन्हें 1738 में इसका पेटेंट प्राप्त हुआ और जिसकी सहायता जान वायट (1700-1766) ने की थी. “बिना अँगुलियों के कताई करने” में समर्थ मशीन के रूप में इसकी चर्चा की गयी है (कैपिटल, खंड 1,392). 1766 में जेम्स हरग्रीव्ज़ (1778 में मृत्यु) जो एक बुनकर और बढ़ई था, ने सूती कपडा के मैन्युफैक्चर में इस्तेमाल की जाने वाली स्पिनिंग- जेनी का आविष्कार किया. 1767 में रिचर्ड आर्कराईट (1732-1792) ने प्रसिद्व कताई ढांचे का आविष्कार किया जिसका मुख्य महत्त्व ताना का प्रावधान किया जाना था जिसका हरग्रीव्ज़ के आविष्कार में अभाव था. सैम्युअल क्राम्पटन (1733-1827) जोकि एक परिश्रमी  किसान और बुनकर था, ने कताई चट्टी के  आविष्कार में पॉँच साल लगाए और इस मशीन ने सबसे बारीक धागा बनाने में हरग्रीव्ज़ और आर्कराईट की मशीन को पीछे छोड़ दिया. पहले पावरलूम का आविष्कार एडम कार्टराईट (1743-1823) द्वारा 1785 में ही कर लिया गया था लेकिन इसके कुछ सालों बाद ही सूती कपडा मिल के मालिक जान होरक्स (1768-1804) द्वारा ही यह आविष्कार लोक-सुलभ बन सका. उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक तक वस्त्र-उद्योग में, पावरलूम ने पुराने किस्म के हैंडलूम का स्थान ले लिया था.

अठारवीं शताब्दी के दौरान खनन-उद्योग के विकास (1700 में कोयला उत्पादन 214,800 टन से बढ़कर  1770 में 7,205,400 टन हो गया था) ने पानी निकालने वाली मशीन के सार्विक उपयोग को आवश्यक बना दिया. वाष्प-शक्ति का पहला व्यवहारिक उपयोग खानों से पानी बाहर निकालने के काम में  ही किया गया. वाट के इंजन ने वाष्प-चालित पम्पों के उपयोग को व्यापक बनाने का ही काम किया जिसकी शुरुआत न्युकोमेन (1663-1729)  द्वारा की गयी थी. वाट का नया पम्प दुहरा काम करने वाला इंजन था जिसका और सुधार उस पेटेंट के ज़रिए किया गया जो उसने 1784 में प्राप्त किया. अब उस चालक बल. जिसका अभी तक लगभग पूरे तौर पर केवल खनन उद्योग में उपयोग किया जा रहा था, का लाभदायक ढंग से उपयोग कताई मीलों और पावरलूम को चलाने में किया जाने लगा और इस प्रकार उर्जा के स्रोत के रूप में वाष्प ने जल का स्थान ले लिया. उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश में वस्त्र-उद्योग में वाष्प शक्ति का उपयोग लगभग सार्विक हो गया था. इसके बाद वाष्प-चालित परिवहन की बारी आई. 1807 में रॉबर्ट फुल्टन स्टीफेंसन  (1765-1815) ने वाष्प-चालित नौपरिवहन की खोज को परिपूर्ण किया और जार्ज स्टीफेंसन (1781-1848) ने रेल इंजन बनाया जिसका सफल परिक्षण 1814 में हुआ. पांच साल बाद प्रयोग के लिए उसने रेल की पटरी बिछ्बायी. 1819 में पहले वाष्प-पोत ने अमेरिका से यूरोप की यात्रा की और इसी समुद्री यात्रा में 26 दिन का वक्त लगा. वर्ष 1825 में इंग्लैंड में पहला रेलमार्ग जनसाधारण के लिए खोल दिया गया. 1830 में ब्रिटिश रेलमार्ग लगभग 57 मील लम्बाई में बिछ गया था, 1840 में 843 मील और 1850 में यह दूरी 6630 मील तक पहुँच गयी थी.

कृषि के क्षेत्र में, पुरानी तीन-खेत व्यवस्था का स्थान फसलों के चक्रानुसरण ने ले लिया. रॉबर्ट बेकवेल (1725-1795) ने पशुधन प्रजनन के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों से इसे कारखाना उद्योग की एक शाखा जैसा बना दिया और बाज़ार की विभिन्न ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के जानवरों का उत्पादन करने में उसने आश्चर्यजनक कुशलता का परिचय दिया. लम्बे बालों वाली लीसेस्टर भेड़ और लम्बे सींगों वाले डिश्ले मवेशी, जोकि बहुत प्रसिद्द थे, के प्रजनन में उसे विशेषज्ञता हासिल थी. पुराने ग्रामीण सम्बन्ध अब ज्यादातर पूंजीवादी उत्पादन की दशाओँ के अनुकूल होते जा रहे थे. भूस्वामी कुलीन वर्ग और भूमिहीन किसान के साथ-साथ बड़ी जोत वाले किसान का उदय हुआ जोकि सार रूप में औद्योगिक पूंजीपति था जो भूमि पर उज़रती मजदूर के श्रम का शोषण करता था और इस प्रकार अपने लिए लाभ और भूस्वामी के लिए लगान निकालता था. उन्नीसवीं शताब्दी में कृषि में पूंजीवादी प्रवृत्ति बहुत सुस्पष्ट हो गयी थी.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-4. मैन्युफैक्चर

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[‘कम्यूनिस्ट घोषणापत्र’ पर राजनीतिशास्त्र के कई विद्वानों ने व्याख्याएँ और टिप्पणियां लिखी हैं. इनमें अब तक सर्वाधिक गंभीर, वैज्ञानिक और सटीक व्याख्याएँ-टिप्पणियां क्रांति के बाद मास्को में स्थापित मार्क्स-एंगेल्स इन्स्टीट्यूट के निदेशक डेविड रियाज़ानोव की ही मानी जाती रही हैं. 1923 में प्रकाशित कम्यूनिस्ट घोषणापत्र की ये व्याख्याएँ-टिप्पणियां तत्काल पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गयीं और अधिकांश कम्यूनिस्ट पार्टियों ने इन्हें पाठ्यपुस्तक-सा बना लिया था. रियाज़ानोव की घोषणापत्र पत्र पर विस्तृत, व्याख्याओं को यहाँ श्रंखलाबद्ध रूप से प्रकाशित किया जा रहा है जो कि कम्युनिज्म के गंभीर अध्येताओं के साथ ही युवा कार्यकर्त्ताओं और इस युग की परिवर्तनकारी विचारधारा को समझने में रूचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए आज भी बहुमूल्य और बेहद उपयोगी सिद्ध होंगी–संपादक ]

4. मैन्युफैक्चर

यहाँ पर हम औद्योगिक विकास के चरण के रूप में मैन्युफैक्चर की चर्चा कर रहे हैं. ऐतिहासिक दृष्टि से स्वतन्त्र कारीगर के खिलाफ प्रतितुलन के रूप में मैन्युफैक्चर का विकास हुआ था. जब व्यापारिक पूंजीपति स्वतन्त्र कारीगरों को अपने जाल में फंसा लेता है तब वह व्यापारी-उद्धमी के रूप में स्वंतंत्र कारीगरों को बड़ी संख्या में एक छत के नीचे इकठ्ठा कर देता है जो किसी नियत कार्य (उदाहरण के लिए दर्जी का काम) के एक या दूसरे हिस्से को पूरा करने के लिए काम करते हैं या फिर किसी माल के विभिन्न हिस्सों को बनाते है, फिर इन हिस्सों को जोड़कर कोई एकल उत्पाद (जैसेकि बैलगाडी) बनाया जाता है. इस तरह के मैन्युफैक्चर का लाभ, इसकी शुरुआत के आरम्भिक दिनों में, इस बात में निहित है कि उत्पादन का बहुत विस्तार हो जाता है और अनावश्यक व्यय कम हो जाता है. इस आधार पर एक व्यवस्था निर्मित होती है जिसमें ज्यादातर विशेषीकृत श्रम की आवश्यकता होती है जब तक कि मैन्युफैक्चर एक एकीकृत प्रक्रिया में रूपांतरित न हो जाये जिसके अंतर्गत पृथक अनुभाग की निगरानी उन मज़दूरों द्वारा की जाती है जो स्वयं किसी वस्तु का एक गौण हिस्सा बनाते हैं जबकि उनके पूर्वगामी पूरी वस्तु को बनाया करते थे. इस प्रकार इस प्रक्रिया में वे एक औजार बन जाते हैं. इंग्लैंड में, हॉलैंड में और बाद में फ्रांस में पूंजीवादी उत्पादन का मैन्युफैक्चरिंग काल सोलहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में आरम्भ हुआ और अठारहवीं शताब्दी की आरम्भिक दशाब्दियों में अपने चरम पर पहुंचा. [यहाँ पर यह ध्यान रखना जरूरी है घोषणा पत्र के रचयिताओं ने ऊपर व्याख्यायित सीमित अर्थों में “मैन्युफैक्चरिंग” शब्द का प्रयोग किया है न कि वृहद् अर्थों में जो “मशीन के उत्पादन” को भी समेट लेता है जिसका उल्लेख अगली टिपण्णी में किया गया है.]

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-3. मध्ययुगीन अर्थव्यवस्था का ह्नास, भूगोलिक खोजों का युग और विश्व-बाज़ार की शुरुआत

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3. मध्ययुगीन अर्थव्यवस्था का ह्नास, भूगोलिक खोजों का युग और विश्व-बाज़ार की शुरुआत

पंद्रहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश के पहले से ही छोटे पैमाने के उत्पादन पर आधारित मध्ययुगीन समाज अपकर्ष की सक्रिय प्रक्रिया से गुज़र रहा था. देश और विदेश में विनिमय के साधनों की त्वरित वृद्धि के परिणामस्वरूप वित्तीय अर्थव्यवस्था के उदय ने वित्तीय और व्यापारिक पूँजी के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं. ग्रामीण क्षेत्रों में सामंती शुल्क का भुगतान जिन्स  के रूप में किया जा रहा था; स्वतन्त्र किसान और भूदासों की छोटे पैमाने के कृषि उत्पादन की स्थिति एक साथ ख़राब हो रही थी; सामन्ती जमींदार फार्मर बनते जा रहे थे और मुद्रा के रूप में धन इकठ्ठा करने के लिए प्रत्येक साधन का इस्तेमाल कर रहे थे. सामन्ती जागीरदारों ने विशाल कर्मचारी समुदाय और दरबारी लोगों को निकाल दिया. इन बेसहारा लोगों और उन बेदखल किसानों, जिन्हें उस भूमि से वंचित कर दिया गया था जिसे वे और उनके पूर्वज अनगिनत पीढियों से जोतते आ रहे थे, ने “हट्टे-कट्टे बदमाशों और आवारा लोगों” की कतारों में वृद्धि कर दी जो राजमार्ग पर गतिरोध उत्पन्न कर देते थे और शहरों में भीड़-भाड़ कर देते थे. स्वतन्त्र शिल्प-संघ जिनमें उस्तादों और कारीगरों के बीच अनबन से दरार पड़ गयी थी, व्यापारिक पूँजी के अधीन हो गए.

धातुकर्मीय उत्पादन, वस्त्र उत्पादन, नौपरिवहन, युद्ध-सामग्री उत्पादन, घड़ी-निर्माण, खगोलीय यंत्रों के क्षेत्रों में हुए अनेक तकनीकी सुधारों; छापाखानों का आविष्कार; वैज्ञानिक अनुसन्धान की प्रगति, विशेषतया खगोलीय विश्व में नयी खोजों – इन सबने उत्पादक शक्तियों के विकास को जोरदार संवेग प्रदान किया और उद्धमी मानसिकता के व्यक्तियों को पहल करने के लिए प्रोत्साहित किया. भूमध्य सागर के पश्चिमी हिस्से या अटलांटिक महासागर के तटवर्ती क्षेत्रों (जेनोआ या लिस्बन) जैसे बंदरगाहों में व्यवसाय का संचालन करने वाले व्यापारियों और मैन्युफैक्चर करने वालों, तथा एशियाई व्यापार पर एकाधिकार रखने वाले और पूर्वी भूमध्य सागर के स्वामी वेनिसवासियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा ने पुर्तगालियों, जेनेवावासियों और स्पेनी व्यापारिक दु:साहसियों को इंडीज़ के लिए नए मार्ग की तलाश के लिए उकसाया. पुर्तगाल के राजा जोआओ और गांट के जान की पुत्री अंग्रेज़ राजकुमारी फिलिप्पा के चौथे पुत्र महान नौसंचालक राजकुमार हेनरी (1394-1460) ने पंद्रहवीं शताब्दी के आरम्भिक अर्द्धांश में ही भौगोलिक खोजों में किये गए योगदान के लिए ख्याति प्राप्त कर ली थी. उसने अफ्रीका के तट पर स्थित उन स्थानों के लिए जहाज भेजे जो अब तक अनजान थे और 1418 तथा 1420 में उसके कप्तानों ने पोटों सान्टो और मडीरा की दुबारा खोज की. अजोर्स की खोज के लिए समुद्री अभियान भेजने का श्रेय भी उसको जाता है जिसका पुर्तगालवासियों द्वारा उपनिवेशीकरण तेजी से आगे बढा. 1460 तक राजकुमार हेनरी के पोत भूमध्यरेखा के निकटतर स्थानों, केप वर्डे से करीब एक सौ लीग से आगे तक पहुँच गए थे. इसके बाद 1486 में बार्थोलेम्यू (1455-1500) ने केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाया. इसके पहले कि  पुर्तगाली इंडीज़ के नए मार्ग की खोज के लिए अगला अभियान भेज सकें, जेनेवावासी नाविक क्रिस्टोफ़र कोलम्बस (1446-1506) ने अपने अभियान में पश्चिम की ओर रूख़ किया और 1492 में वेस्ट इंडीज़ के टापुओं की खोज की. जान कैबर (1450-1557)  1497 में अमेरिका के उत्तरी तट पर उतरा. लेकिन इसके एक साल बाद ही वास्को डि गामा (1451-1512) ने डियाज़ द्वारा शुरू किये गए काम को पूरा किया और भारत के समुद्री मार्ग का पता लगाया. दो वर्ष बाद “फ्लोरेंसवासी नाविक अमेरिगो वेस्पूची (1451-1512) ब्राजील के तट तक पहुँच गया और उसी के नाम पर अमेरिकी महाद्वीप का नामकरण हुआ. 1500 में पुर्तगाली सेनापति पेड्रों अल्वारेज़ कैब्रल (मृत्यु 1526) जिसे उसके राजा ने डिगामा के मार्ग का अनुसरण करने के लिए नियुक्त किया था, को प्रतिकूल हवाओं ने अपने मार्ग से इतना दूर हटने के लिए बाध्य कर दिया कि वह उस साल गुड फ़्राइडे के दिन ब्राजील के तट पर जा पहुँचा. अंत में 1520 में फर्डीनण्ड मैगलन (1470-1521), पृथ्वी का चक्कर लगाने वाला पहला नाविक, उस जलडमरूमध्य से होकर प्रशांत महासागर में पहुँच गया जो अभी भी उसके नाम से जाना जाता है.

इन समुद्री यात्राओं और खोजों के कारण विश्व बाज़ार का इतना अधिक विस्तार हो गया कि इसने सौलहवीं शताब्दी के बढ़ते उत्पादन को खपा लिया. इसी शताब्दी में समकालीन बुर्जुआ युग का जन्म हुआ.

मेक्सिको में कार्टेज़ (1485-1547), पेरू में पिजारो (1476-1541) जैसे शुरुआती अत्याचारी विजेताओं द्वारा नए खोजे गए देशों की निर्मम लूट और आदिवासियों के उन्मूलन का स्थान सोलहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश में ही, दास श्रम की सहायता से अछूती भूमि के सुव्यवस्थित शोषण ने ले लिया. कुछ शताब्दियों में ही अफ्रीका उन श्वेतों का आखेट-क्षेत्र बन गया जो अमेरिकी बाज़ार के लिए नीग्रो दासों की तलाश में रहते थे. 1508 से 1860 के बीच “परोपकारी” पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी और सर्वोपरि रूप से ब्रिटिश दास व्यापारियों के शिकार लगभग डेढ़ करोड़ नीग्रो अटलांटिक महासागर के पार जहाजों में भरकर लाये गए थे और उतनी ही संख्या में इस समुद्री यात्रा में मर गए थे. “लिवरपूल दास व्यापार का प्रशस्ति गान करते हैं. उदाहरण के लिए 1795 में लिखी डॉ. आइकिन की पूर्व उद्धृत रचना को देखा जा सकता है जिसमें लिखा है कि दासों का व्यापार ‘निर्भय साहसिकता की उस भावना से मेल खाता है जो लिवरपूल के व्यापार का विशेष गुण हैं और जिसकी सहायता से लिवरपूल इतनी तेजी से अपनी वर्तमान समृद्धि प्राप्त कर सका है; उससे जहाज़ों और नाविकों को बड़े पैमाने पर काम मिला है और देश के मैन्युफ़ैक्चरों के बने सामान की मांग बढ़ी है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1 पृ 885) उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब इंग्लैंड के सूती वस्त्र उद्योग ने अमेरिका के दक्षिण प्रान्तों में कच्चे कपास के उत्पादन को अतिरिक्त संवेग प्रदान किया, तब अटलांटिक महासागर के पार दास-प्रथा राष्ट्रीय संस्था बन चुकी थी और दासों का प्रजनन एक वाणिज्यिक उद्धम बन चुका था.

बोलीविया में 1545 के बाद से और मेक्सिको में 1548 से सोने और चाँदी की खानों की खोज और दोहन ने यूरोपवासियों के हाथों में सोने और चाँदी के विशाल सुरक्षित भंडार बनाने में योगदान किया. 1501 से 1544 तक चाँदी के उत्पादन की कीमत 460 मिलियन मार्क के आसपास थी. (‘मार्क’ पौण्ड औंस भार प्रकृति वाले अंग्रेजी पौण्ड का आधा होता है) 1546 से 1600 तक उत्पादन 2880 मार्क तक बढ़ गया था. उन चाँदी के सिक्के के मूल्य, जो परिचलन में थे, में भी समानुपातिक वृद्धि हो गयी थी.

ब्रिटेनवासियों द्वारा उत्तरी अमेरिका का योजनाबद्ध उपनिवेशीकरण 1620 में आरंभ हो चुका था. फ्रांसीसियों ने इसका अनुसरण किया. आरंभ में ईस्टइंडीज़ के शासन संचालन का काम पुर्तगालियों के हाथों में था. लेकिन 1600 में डच और ब्रिटिश ने लगभग एक साथ एक विशेष अभियान आरंभ किया जिससे धीरे-धीरे, अपने यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों (पहले पुर्तगालियों और बाद में फ्रांसीसियों) से संघर्ष करते हुए उन्होंने ईस्ट इंडीज़ पर अधिकार कर लिया. चीन से व्यापारिक सम्बन्ध कायम करने वाले यूरोपीय लोग , पुर्तगाली थे जिन्होंने 1557 में मकाओ पर अधिकार कर लिया. 1684 के बाद ही अंग्रेज़ चीन के तट पर स्थापित हो सके.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-2. हेक्स्टहाउज़ेन, मॉरेर और मॉर्गन

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2. हेक्स्टहाउज़ेन, मॉरेर और मॉर्गन

कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र के बाद के संस्करणों में एंगेल्स (1820 -1895) ने “समस्त मानव-समाज के इतिहास” वाक्यांश के बाद निम्न टिपण्णी जोड़ दी थी : ‘अर्थात समस्त लिपिबद्ध इतिहास” 1847 में समाज का आदिम इतिहास अर्थात लिखित इतिहास से पहले का सामाजिक संगठन बिलकुल अज्ञात था.उसके बाद हेक्स्टहाउज़ेन ने रूस में भूमि के सामुदायिक स्वामित्व का पता लगाया,  मॉरेन ने सिद्ध किया कि यही सामुदायिक स्वामित्व समस्त ट्यूटन नस्लों के इतिहास का सामाजिक आधार था और धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता गया कि भारत से लेकर आयरलैंड तक समाज का आदि रूप ग्राम समुदाय था जिसमें भूमि का स्वामित्व समुदाय के पास होता था. गोत्र के असली स्वरूप और कबीले के साथ उसके सम्बन्ध की मॉर्गेन की महत्ती खोज द्वारा विस्तार से इस आदिम कम्युनिस्ट समाज का आन्तरिक संगठन. अपने ठेठ रूप में, अनावृत हुआ. इस आदिम समाज के विघटन के साथ समाज का अलग-अलग वर्गों में विभाजन आरंभ हुआ तो कालांतर में विरोधी वर्ग बन गए.”

ऑगस्ट फ़ान हेक्स्टहाउज़ेन (1792-1866) प्रशिया के एक सामंत थे. 1843 में निकोलस प्रथम के अनुरोध पर भूमि कानूनों, कृषि की समस्याओं और किसानों के जीवन के बारे में पड़ताल करने और रिपोर्ट देने के लिए वह रूस गये. (रूसी ग्रामीण जीवन का अध्ययन) नाम की रचना में उनके श्रम का परिणाम संग्रहित है. जिसका पहला खंड 1847 में, और तीसरा खंड 1852 में, कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र के प्रकाशन के लगभग पॉँच वर्ष बाद प्रकाशित हुआ. तीसरा खंड मुख्यतया रूसी कृषि पंचायती संस्थाओं के बारे में है. रूस में यात्रा के दौरान हेक्स्टहाउज़ेन के साथ अलेक्सांद्र हर्ज़न थे जिनकी क्रांतिकारी राजनितिक रचनाओं ने बाद में उन्हें इतनी प्रसिद्धि दी. अपने मित्र से प्रभावित होने के कारण हेक्स्टहाउज़ेन ने रूसी कृषि पंचायती संस्थाओं के महत्त्व पर बल दिया जिन्हें वह सर्वहारा विकास की अवधि से गुज़रने की “महामारी’ से रूस को बचाने का एक साधन मानते थे.

जार्ज लुडविग फान मॉरेर (1790-1872) महान जर्मन इतिहासकार, कानूनविद, राजनेता और जर्मनी की प्राचीन संस्थाओं पर कई रचनाओं के लेखक थे. कई खंडो वाली इन रचनाओं का प्रकाशन अठारह सौ पचास और साठ के दशक में हुआ था और इनमें जर्मनी की ग्रामीण और नगरीय पंचायती संस्थाओं पर सर्वांगीण  रूप से विचार किया था. पुराने दृष्टिकोण के खिलाफ (जिसके अवशेष कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र में भी पाए जाते हैं) मॉरेर ने सिद्ध किया कि मध्ययुग के आरंभ में नगर क्षेत्रों का विकास मध्ययुगीन दास-प्रथा से उदभूत न होकर स्वतन्त्र ग्रामीण समुदाय (मध्युगीन मार्क) से हुआ था.

अमेरिकावासी लुईस हेनरी मॉर्गन (1818-1881) (Ancient Society Or Researches in the Lines of Human Progress from Savagery through Barbarism to Civilization By Lewis H. Morgan, LL. D) नृवंशविज्ञानी  और आदिम सामाजिक संगठनों के अध्येता थे. वह इराक्यू इंडियनों के बीच रहे, उन्हीं के जैसा जीवन जिया था और उनके आचरण तथा रीती-रिवाज का अध्ययन किया. उनका मत था कि एतिहासिक विकास में बुनियादी महत्त्व के कारक तकनीक के क्षेत्र में खोजों, आविष्कारों, जीवन की भौतिक परिस्थितियों के विकास में निहित हैं. मानव परिवार के विकास, विशेषतया सगोत्रता एवं विवाह सम्बन्धी रीती-रिवाज़ सम्बंधित  उनके विचारों की ओर एंगेल्स आकृष्ट हुए और 1884 में पहली बार प्रकाशित अपनी पुस्तक परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति (The Origin of the Family, Private Property and the State) में इनका विवेचन किया. इस पुस्तक में एंगेल्स ने इतिहास के आरंभ से समाज के विकास की दिशा का पता लगाने और वर्ग समाज में इसके क्रमिक परिवर्तन को समझाने की कोशिश की है.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-1. 1847 में कम्युनिस्टों को सताया जाना

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1. 1847 में कम्युनिस्टों को सताया जाना

वर्ष 1846 में पोप के पद पर चुनाव के समय पायस नौवां स्वयं को उदारतावादी कहता था. परन्तु समाजवाद के प्रति उसका रुख जार निकोलस प्रथम (1796-1855) से कम शत्रुतापूर्ण नहीं था, और उसने 1848 की क्रांति से पहले ही यूरोपीय पुलिसमैन की भूमिका अदा की. ऑस्ट्रियाई साम्राज्य का चांसलर और यूरोपीय प्रतिक्रियावाद का मान्य नेता मेटरनिख 1773-1859) और उस समय का असाधारण इतिहासकार गीज़ो (1787-1874), जो 1840 से फ्रांस की विदेश नीति का संचालन कर रहा था और बाद में इस मंत्रालय का प्रधान बना, के खास तौर पर करीबी संबंध थे. गीज़ो बडे वित्तीय और औद्योगिक बुर्जुआ वर्ग का बौद्धिक नेता था. वह सर्वहारा वर्ग का कट्टर दुश्मन था. प्रशियाई सरकार की मांग पर गीज़ो ने मार्क्स (1818-1883) को पेरिस से निकाल दिया. जर्मन पुलिस ने न केवल जर्मनी में कम्युनिस्टों को चैन से नहीं रहने दिया बल्कि विदेश में फ्रांस बेल्जियम और यहाँ तक की स्विट्ज़रलैंड में भी इसी तरह परेशान किया. इसके लिए उन्होंने उपलब्ध पूरी ताकत का इस्तेमाल किया और कम्युनिस्ट प्रचार में बाधा उत्पन्न करने के लिए सब तरह के हथकंडे अपनाती रही एवं इसे भूमिगत हो जाने के लिए विवश कर दिया. फ्रांसीसी उग्र – परिवर्तनवादी मारास्ट (1802 – 1852), कार्नेट (1801 -1888) और मारी (1795 -1870) ने न केवल समाजवादियों और कम्युनिस्टों के खिलाफ बल्कि लेद्रू – रोलां (1807 -1874) और फ्लोकन (1800 -1866) के नेतृत्व वाले तत्कालीन सामाजिक जनवादियों के खिलाफ भी वैचारिक हमला किया.