कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र

मार्क्सवाद की द्वंदात्मक प्रणाली पर अति महत्वपूर्ण दो ऑडियो (पंजाबी)

Posted on Updated on

[audio http://www.archive.org/download/aitihasikbhautikvad/aitihasikpadarthvad.mp3]

9.1 MB 

[audio http://www.archive.org/download/aitihasikbhautikvadsuplymentry/aitihasikpadathvadsuplymantry.mp3]

11.0 MB 

Advertisements

कार्ल मार्क्स

Posted on Updated on

कार्ल मार्क्स (1818-1883) मार्क्सवाद और प्रबल राजनीतिक विज्ञान के संस्थापक , जिसके विचारों ने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के इतिहास को नये आयाम दिए.

५ मई १८१८ को पश्चिम जर्मनी के ट्रायर में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ. उसके पिता एक कामयाब वकील थे, जिन्हें प्रशिया के कानूनानुसार अपने व्यवसाय को चलाने के लिए यहूदी से ईसाई धर्म अपनाना पड़ा.

सत्रह वर्ष की आयु में कानून की विद्या हासिल करने के लिए मार्क्स बोन विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए. वहाँ उनकी गिनती तेज-तरार विद्यार्थियों में नहीं होती थी. फिक्रमंद पिता ने उनका स्थानांतरण कठोर अनुशासन के लिए विख्यात बर्लिन के विश्वविद्यालय में करवा दिया. अपने अध्ययन के दौरान नौजवान मार्क्स रेडिकल विचारों और दर्शन की ओर झुकते गये. एक बार तो वे ‘यंग हेगल्स’ नामक विद्यार्थियों के एक समूह से जुड़ गये जो हेगल के विचारों को अस्वीकार कर चुके थे.

१९ जून १८४३ को उनका विवाह प्रशिया के नवाब की सुशिक्षित सपुत्री जेनी वोन वेस्टफालें से संपन्न हुआ. शादी के तुरंत बाद सरकार की सेंसरशिप, जिसका रवैया वामपंथी आन्दोलनकारियों के प्रति दिन-प्रतिदिन कठोर से कठोरतम होता जा रहा था, ने उन्हें देश छोड़कर पेरिस जाने के लिए मजबूर कर दिया.

१८४० का पेरिस उस ज़माने के क्रांतिकारियों की सबसे प्रिय कर्मस्थली थी. यहाँ मार्क्स की मुलाकात बहुत से क्रांतिकारियों से हुई जिनमे फ्रेडरिक एंगेल्स आगे चलकर उनके जीवनभर के वैचारिक मित्र बन गये.

१८४४ में एंगेल्स बहुत ही प्रभावशाली पुस्तक ‘Conditions of the WorkingClass in England ‘ लिख चुके थे. इस पुस्तक ने मार्क्स के सर्वहारा वर्ग द्वारा संपन्न किये जानेवाली क्रांति  के विचार को विकसित करने में  मदद की. इसी पुस्तक से प्रेरणा पाकर मार्क्स ने Economic and Philosophic Manuscripts नामक अपनी पहली  पुस्तक की रचना की. पूंजीवाद के अधीन श्रम के अलगाव से मुक्ति के लिए साम्यवाद की जीत की अवश्यम्भाविता के पक्ष में तर्क के कारण इस पुस्तक का एक नैतिक और दार्शनिक महत्व रहा है.

दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है.

मार्क्स की दिलचस्पी इतिहास के विकास और परिवर्तन में भी थी, जो समाज में नैसर्गिक रूप से चलता रहता है. अपने इस विचार को उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी समझ बताया. मार्क्स का विश्वास दिन-प्रतिदिन इस सच्चाई की ओर दृढ होता गया कि सर्वहारा वर्ग की क्रांति न केवल वांछनीय है बल्कि ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण अवश्यंभावी है.

इसी समय मार्क्स और एंगेल्स ने अपना सबसे प्रसिद्ध पंफलेट ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ लिखा.

“कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. वे खुलेंआम एलान करते हैं कि उनके लक्ष्य पूरी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बलपूर्वक उलटने से ही सिद्ध किये जा सकते हैं. कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग को कांपने दो. सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.

दुनिया के मजदूरों, एक हो ! ”

मार्क्स की ज्यादातर रचनाओं के विपरीत मार्क्स की यह कृति संक्षिप्त और प्रासंगिक होने के साथ-साथ अग्निमय और प्रेरणादायक भाषा के प्रयोग द्वारा क्रांति की इच्छा पैदा करने की क्षमता रखती है.

“अभी तक आर्विभूत समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है.” – कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, प्रथम अध्याय.

क्रांतियों, जिन्होंने १८४८ में समस्त यूरोप को अपनी आगोश में ले लिया था, ने मार्क्स को फ़्रांसिसी और बेल्जियन अधिकारिओं की नज़रों में संदिग्ध बना दिया . उन्हें लंदन में शरण लेनी पड़ी और उनका शेष रचनात्मक जीवन वहीँ बीता.

कम्युनिस्ट लहर की इस तरुणावस्था में मार्क्स इसके साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़ते गये. प्रथम कम्युनिस्ट इंटरनेशनल  में अराजकतावादी बकुनिन के विरुद्ध उन्होंने प्रबल और प्रभावशाली तर्क रखे.

एक और प्रबल घटना १८७१ का पेरिस कम्यून की स्थापना थी जिसे सर्वहारा वर्ग दो महीने के संघर्ष के बाद हार गया. मार्क्स ने इसका पुरजोर मूल्यांकन किया और इसे भविष्य की कम्युनिस्ट क्रांतियों के अग्रदूत की उपाधि प्रदान की.

मार्क्स अपना अधिक से अधिक समय  ब्रिटिश लायब्रेरी में राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए बिताते थे. इसी के परिणामस्वरूप उनकी मास्टरपीस रचना ‘पूँजी’ (दास कैपिटल) का जन्म हुआ. यह पुस्तक पूंजीवादी समाज और अर्थशास्त्र की गतिकी के नियमों का सघन और विस्तृत संकलन हैं.

“पहली दृष्टि में पण्य बहुत मामूली सी और आसानी से समझ में आनेवाली चीज मालूम होता है. किन्तु उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वास्तव में वह एक बहुत अजीब चीज है, जो आधिभौतिक सूक्ष्मताओं और धर्मशास्त्रीय बारीकियों से ओतप्रोत है. जहाँ तक वह उपयोग मूल्य है, वहां तक, चाहे हम उसपर इस दृष्टिकोण से विचार करें कि वह अपने गुणों से मानव आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है” – पूंजी, अध्याय १, प्रथम खंड

अपने निरन्तर विकसित होते हुए मार्क्सवादी दृष्टिकोण अनुसार मार्क्स ने जीवन के हर पहलू पर लिखा.  अक्सर पूंजीपतियों के तलुयाचाट बुद्धिजीवी मार्क्स के “धर्म लोगों के लिए अफीम है” को सन्दर्भ से तोड़कर एक फिकरे के रूप में प्रयोग करते रहे हैं. वर्गीय समाज के अस्तित्व में आने की ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ के अनुसार उत्पादन की प्रक्रिया ने समाज के एक छोर पर मुट्ठीभर अमीर जबकि दूसरे छोरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया. आत्मिक उत्पादन में एक तरफ दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, साहित्य,गीत और संगीत पैदा हुआ तो दूसरी और धर्म. दिखने में धर्म गरीबों को मुफ्त का तोहफा लगता रहा हो लेकिन शोषक वर्ग के सच्चे सेवादार के रूप में इसने गरीब जनता को पैरों के नीचे रौंधने का ही काम किया.

” धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन  परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है.”
— (Contribution to the Critique of Hegel\’s Philosophy of Right)

अपने समय के सर्वाधिक घृणा पाने वाले व्यक्ति कार्ल मार्क्स, जिन पर सबसे अधिक कीचड उछाला गया, के रोशन दिमाग ने १८८३ को हमेशा के लिए काम करना बंद कर दिया. निरंकुश और गणतंत्रीय, दोनों प्रकार की सरकारों ने उन्हें अपने राज्य से खदेड़ा. बुर्जुआजी, चाहे वह अनुदार रही हो चाहे अति जनवादी, मार्क्स के प्रति लान्छनात्मक शब्दों का प्रयोग करने  में आपस में होड़ करती हुई नजर आई. वे इसे इस प्रकार हटा देते थे जैसे यह कोई मकड़ी का जाला हो. पूर्ण लापरवाही के साथ, जब बहुत जरूरी आवश्यकता उन्हें विवश करती, वे तभी जवाब देते. उनकी मृत्यु उनके चहेते करोड़ों क्रांतिकारी मेहनतकश साथियों के लिए एक आघात थी. साईबेरिया से कैलिफोर्निया, यूरोप और अमेरिका के सभी भागों और जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं “मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि  बेशक उनके बहुत से विरोधी रहे हों, लेकिन उनका कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं था.”

related post : मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय

हम अब भी लालगढ़ में हैं – चत्रधर महतो

Posted on Updated on

हम अब भी लालगढ़ में हैं, ऐसा कहना है लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) के आदिवासी नेताओं का. मंगलवार, 30 जून को आन्दोलनकारी आदिवासी नेता चत्रधर महतो ने इस बात से इंकार किया कि वह लालगढ़ छोड़कर भाग गया है. उसने कहा कि वह अभी भी पश्चिमी बंगाल के इस अशांत इलाके में “मेरे अपने लोगों के साथ” है. ” मैं अभी भी लालगढ़ में रुका हुआ हूँ और मेरे इस क्षेत्र से भागने का सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि मैंने कोई जुर्म नहीं किया”, ‘पुलिस अत्याचार के खिलाफ गठित लोक समिति’ (PCAPA) जिसने सात महीने पहले एक वस्तुत: ” मुक्त क्षेत्र ‘की स्थापना के खिलाफ नेतृत्व किया था, के मुखिया महतो का ऐसा कहना है. महतो और एक अन्य  PCAPA के सदस्य एक प्राइवेट बंगाली टेलिविज़न चैनल पर बातचीत कर रहे थे. महतो ने स्टार आनंद के साथ टेलीफोन पर इंटरव्यू देते हुए कहा,

“लालगढ़ से भागने का सवाल ही नहीं पैदा होता. मैं पूरी तरह से लोगों के साथ हूँ और उनके साथ बना रहूँगा. पुलिस अत्याचार के खिलाफ लालगढ़ में मैंने एक जनवादी लहर शुरू की थी.”

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार झूठ  द्वारा उसका सम्बन्ध  माओवादी गुरिल्लाओं के साथ जोड़कर उसकी छवि को दूषित करने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा “वे मुझे माओवादी सिद्ध करना चाहते हैं जोकि मैं नहीं हूँ.”

पहले सुरक्षा बलों और राज्य सरकार का कहना था कि PCAPA के  महतो, सिद्धू सोरेन और कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी और बिकाश जैसे कुछ अग्रणी नेता अशांत क्षेत्र से उस वक्त से भगौड़े हैं जब 18 जून को केंद्रीय अर्धसैनिक और राज्य पुलिस के द्वारा राज्य की राजधानी कोलकत्ता से 200 किलोमीटर दूर  संयुक्त सुरक्षा आपरेशन शुरू हुआ. पुलिस का कहना था कि महतो भाग खडा हुआ था और उसने बांकुड़ा  जिले में पनाह ले ली थी और सोरेन ने पश्चिमी मिदनापुर के शलबोनी में जबकि दो बड़े माओवादी पड़ोस के झारखण्ड की ओर कूच कर गए. सोरेन ने टेलिविज़न चैनल से यह भी कहा कि

“मैं अब कांटापहाड़ी  क्षेत्र में हूँ. मैं क्यों भागूं जब मैंने कुछ गलत नहीं किया है? हमने तो केवल पुलिस संत्रास के विरुद्ध अपनी आवाज उठाई है जो कि हमारा जनवादी अधिकार है”. “हमारा आंदोलन बंद नहीं किया जा सकता जब तक कि वे (बल) अनावश्यक रूप से हमारी महिलाओं और बच्चों को तंग करना बंद नहीं करते. अब हम अपने भविष्य की कार्रवाई की योजना पर काम कर रहे हैं.”, ऐसा उनका कहना है.

लालगढ़ तब से उबल रहा है जब पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री श्री बुद्धदेव भटाचार्य और दो अन्य केंद्र सरकार के मंत्री  श्री राम विलास पासवान और श्री जितिन प्रसाद के पथरक्षक दल के रूट पर बारूदी सुरंग फटी थी. इस ब्लास्ट के बाद पुलिस पर  अत्याचारों का आरोप लगाते हुए स्थानीय क्रुद्ध आदिवासियों ने, जिन्हें माओवादियों का समर्थन हासिल था, आन्दोलन शुरू किया और पश्चिमी मिदनापुर जिले से इस क्षेत्र को काटते हुए और सिविल प्रशासन को खदेड़कर वस्तुतः प्रशासन अपने हाथ में ले लिया. राज्य के तीन पश्चिमी जिलों मिदनापुर, बांकुडा और पुरुलिया के इक्कीस पुलिस स्टेशनों के क्षेत्र में माओवादी सक्रिय हैं. Fraternally, PratyushGet Yourself a cool, short @in.com Email ID now!

pratyush1917@in.com द्वारा marxist-leninist-list@lists.econ.utah.edu पर प्रेषित ईमेल से साभार

इस चिट्ठे की ओर से

विकास तो होना ही चाहिए, विकास उनके लिए सर्वोपरि है चाहे इसके लिए कोई अपनी ज़र-ज़मीन से उखड जाता है. यह बात नहीं है कि आदिवासियों की भलाई के लिए उन्हें माओवादियों से मुक्त करवाया जा रहा  है बल्कि अपने मुनाफे की हवस के लिए इन्हें विकास तो करना ही है – हम भी मानते हैं कि विकास ज़रूरी है लेकिन पूंजीवाद के विकास का रूप अब किसी भी प्रकार से रोल मॉडल नहीं रह गया है. मुनाफे की हवस से हर चीज जो प्राकृतिक है , उसे बलात नष्ट किया जाता है.वनों की अंधाधुंध कटाई, अधिक से अधिक कृषि उपज लेने के लिए  कृषि योग्य भूमि पर बढ़ता हुआ कृत्रिम खाद, कीटनाशकों और खरपतवार नाशकों का बोझ , बेशी मूल्य की जमाखोरी से बेशी उत्पादन और प्रदुषण – पूंजीवादी के अराजक उत्पादन और वितरण ढांचे ने इस पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है. लेकिन पूंजीवाद की यह अराजकता सभ्यता की दौड़ में पिछडे आदिवासियों पर किसी बर्बर हमले से कम नहीं होती. फिर भी पूंजीवाद एक तीर से दो शिकार करता है – एक उनके प्राकृतिक संसाधनों की लूट और दूसरा उन्हें एक ऐसी सभ्यता में खींचता है जहाँ उनकी किस्मत में  सबसे सस्ती श्रम-शक्ति की पूर्ति करना लिखा होता ताकि यह  मांग से अधिक बनी रहे और  मजदूरी की दर निम्न से निम्न रहे. पूंजीवाद के अपने तरीके और तर्क से आदिवासी आबादी को इस तरह सभ्यता में खींचने की परिणति इन आदिवासियों के लिए  उज़रती गुलाम, बच्चों के भिखारी और औरतों के  वेश्यावृति में रुपानान्तरण में होती है.

“बुर्जुआ वर्ग ने, जहाँ पर भी उसका पलडा भारी हुआ, वहां सभी सामंती, पितृसत्तात्मक और काव्यात्मक संबंधों का अंत कर दिया.  उसने मनुष्य को अपने “स्वाभाविक बड़ों” के साथ बांध रखने वाले नाना प्रकार के सामंती संबंधों को निर्ममता से तोड़ डाला; और नग्न स्वार्थ के, “नकद पैसे-कौडी” के हृदयशुन्य व्यवहार के सिवा मनुष्यों के बीच और कोई दूसरा सम्बन्ध बाकी नहीं रहने दिया. धार्मिक श्रद्धा के स्वगोपम आनंदातिरेक को, वीरोचित उत्साह और कूपमंडूकतापूर्ण भावुकता को उसने आना-पाई के स्वार्थी हिसाब-किताब के बर्फीले पानी में डुबो दिया है. मनुष्य के वैयक्तिक मूल्य को उसने विनिमय मूल्य बना दिया है, और पहले के अनगिनत अनपहरणीय अधिकारपत्र द्वारा प्रदत्त स्वातंत्रों की जगह अब उसने एक ऐसे अंत:करणशून्य स्वातंत्र्य की स्थापना की है जिसे मुक्त व्यापार कहते हैं. संक्षेप में, धार्मिक और राजनीतिक भ्रमजाल के पीछे छिपे शोषण के स्थान पर उसने नग्न, निर्लज्ज, प्रत्यक्ष और पाशविक शोषण की स्थापना की है…”

“…सभी स्थिर और ज़डीभूत सम्बन्ध, जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वाग्रहों तथा मतों की एक पूरी श्रृंखला जुडी हुई होती है, मिटा दिये जाते हैं, और सभी नए बनने वाले सम्बन्ध ज़डीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं. जो कुछ भी ठोस होता है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है वह भ्रष्ट हो जाता है, और आखिरकार मनुष्य संजीदा नज़र से जीवन के वास्तविक हालत को, मानव-मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है.”

मार्क्स और एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ से लिया गया उपरोक्त उद्धरण चरितार्थ हो रहा है लेकिन विडम्बना देखीए कि यह सब उनके नेतृत्व में  हो रहा है जो खुद को मार्क्सवादी कहलाते हैं.

कम्युनिस्ट और मजदूर वर्ग की पार्टियाँ

Posted on Updated on

घोषणापत्र का यह वाक्य कि “कम्युनिस्ट मजदूर वर्ग की पार्टियों के बदले में अपनी कोई अलग पार्टी नहीं गठित करते हैं”,  इस वक्त गलतफहमी प्रगट कर सकता है, बल्कि कुछ लोग तो इसका यही गलत अर्थ निकालते हैं कि मार्क्स और एंगेल्स सिद्धांतत: अलग कम्युनिस्ट पार्टियों के गठन के विरोधी थे. इस वाक्य की व्याख्या उन ऐतिहासिक परिस्थितियों के प्रकाश में की जानी चाहिए जिन्होंने कम्युनिस्ट लीग को जन्म दिया था. जहाँ तक राष्ट्रीय स्तर पर गठित मेहनतकशों की एक पार्टी का प्रश्न है, उस समय केवल एक ही पार्टी का अस्तित्व था और वह थी — इंग्लैंड  की चार्टिस्ट पार्टी. फ्रांस में लेद्रू-रोलां और पुलोकन के नेतृत्व में सामाजिक जनवादियों के समूह के अलावा कुछ छुटपुट ग्रुप ही सक्रीय थे जो पुराने बार्बेस (1809-1870) और बलान्कीवादी संगठनों से जुड़े हुए थे.  कुछ भौतिकवादी कम्युनिस्टों और “मजदूरवर्गीय समतावादियों” की मंडलियाँ भी थीं. सामाजिक जनवादियों की निम्न-बुर्जुआ पार्टी के विपरीत, ये समूह और मंडलियाँ लगभग पूरी तौर पर सर्वहारा से बनी थीं. तो भी 1848 के पहले तक वे समूहों और मंडली के स्तर से आगे नहीं बढ़ पाए थे और उन्हें किसी भी अर्थ में राष्ट्रव्यापी संगठन नहीं कहा जा सकता था. स्विट्ज़रलैंड, बेल्जियम और जर्मनी में स्थिति इससे बेहतर नहीं थी.

लेकिन कम्युनिस्ट लीग शुरू से ही, अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में गठित की गयी थी और राष्ट्रीय प्रवर्गों के साथ अपने संबंधों को इस प्रकार व्यवस्थित करने के लिए विवश थी कि इन प्रवर्गों और अन्य राष्ट्रीय पार्टियों, यदि कोई हों, के बीच अनावश्यक आच्छादन से बचा जा सके. इंग्लैंड में, इन सावधानियों का ध्यान रखने की विशेष आवश्यकता थी जहाँ चार्टिस्ट आन्दोलन मुख्य रूप से मेहनतकश वर्ग का राजनीतिक संगठन बन गया था. अंग्रेज कम्युनिस्टों ने, जिनमें जॉर्ज जूलियन हार्नी है, ने नयी पार्टी की स्थापना नहीं की थी. उन्होंने केवल चार्टिस्ट आन्दोलन और कम्युनिज्म का संयोजन करने, हिरावल दस्ते की भूमिका निभाने और संपत्ति के प्रश्न को अपने विमर्श में प्रमुखता देने की कोशिश की.

कम्युनिस्टों द्वारा किए जाने वाले कार्यभारों को घोषणापत्र में सूत्रित किया गया है. कम्युनिस्ट पार्टी और मजदूर वर्ग के बीच संबंधों का इसमें निरूपण आज भी समीचीन है. रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यक्रम का इस निरूपण से पूर्ण सामंजस्य है जैसाकि निम्न उद्धरण से देखा जा सकता है —

“अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट पार्टी जोकि सभी बुर्जुआ पार्टियों के खिलाफ खड़ी होती है, सर्वहारा का स्वतन्त्र राजनीतिक संगठन है जोकि उसे अपना महान ऐतिहासिक मिशन पूरा करने के योग्य बनाता है. वर्ग संघर्ष के सभी रूपों में यह मजदूरों को नेतृत्व प्रदान करती है. शोषितों और शोषकों के हितों के बीच अशांत न हो सकने वाले टकराव के रहस्य को यह शोषितों के सामने खोलकर रख देती है, और सर्वहारा के समक्ष अवश्यम्भावी क्रांति की आवश्यक शर्तों और ऐतिहासिक महत्त्व को स्पष्ट कर देती है.” (ए.बी.सी. ऑफ़ कम्युनिज्म, बुखारिन और प्रिओब्रेजिन्स्की द्वारा रचित, पृ.375)

पूंजीवादी संचय मेहनतकश वर्ग के दरिद्रीकरण और अध:पतन की ओर — सम्पत्तिहर्त्ताओं के सम्पत्तिहरण की ओर ले जाता है

Posted on Updated on

31.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

उस स्थिति में भी जब मजदूर अपनी श्रमशक्ति को सर्वाधिक लाभप्रद शर्तों पर बेचने में सफल हो जाता है, जब वह अधिकतम मजदूरी प्राप्त करता है तब भी वह औद्योगिक चक्रों से उत्पन्न अव्यवस्था से प्रभावित रहता है और संकटों का शिकार बनता रहता है. उसे अस्तित्व की असुरक्षा, मजदूरी में उतार-चढाव, बेरोजगारी का निरंतर संकट यह सब मिलकर सर्वहारा की स्थिति को दास या भूदास की स्थिति से भिन्न बना देते हैं.

“सर्वहारा के पास अपने दो हाथों के अलावा और कुछ नहीं होता. वह कल की कमाई को आज ही खर्च करता है. हर आपदा को वह झेलता है. इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वह कल प्रयाप्त धन अर्जित कर ही लेगा. व्यापार संकट या सेवायोजक की सनक उसे भोजन से वंचित कर सकती है. इस प्रकार मजदूर ऐसी दुखदाई और अमानवीय स्थिति में जीता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. दास की कम से कम जीविका तो सुरक्षित रहती है अन्यथा वह अपने मालिक के किसी काम का नहीं रह जाता है. भूदास को कम से कम भूमि का एक टुकडा तो दिया जाता है जिस पर वह अपने गुजारे के लिए अन्न पैदा करता है. इस प्रकार दास और भूदास को न्यूनतम जीवनस्तर की गारंटी तो मिल जाती है. सर्वहारा को केवल अपनेआप पर भरोसा करना पड़ता है. तो भी वह कभी भी ऐसी स्थिति में नहीं होता कि अपनी जीविका चलते रहने के प्रति आश्वस्त हो जाये. दुखद संयोगों का खतरा उस पर हरदम मंडराया करता है. इसलिए वह अपनी स्थिति चाहे कितनी ही क्यों न सुधार ले, यह दुखद संयोगों के समुद्र में एक बूँद जैसी बनी रहती है.” (एंगेल्स द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 116)

विशाल पैमाने के उद्योग का विकास मजदूर की असुरक्षित स्थिति को बदतर बना देता है. पूंजी के संचय की प्रक्रिया की तेज़ गति से श्रम की औद्योगिक आरक्षित सेना बन जाती है जो मजदूर की सक्रीय सेना पर लगातार दबाब बनाये रखती है और कारखानों में रोजगारशुदा मजदूरों  को अपनी मजदूरी में उल्लेखनीय वृद्धि करवाने का मौका नहीं देती है. आधुनिक उद्योग के जीवन-चक्र में उत्पादन में सामान्य वृद्धि के बाद सहसा बहुत अधिक वृद्धि होती है जिसके बाद संकट, मंदी और ठहराव की अवधि आती है. इसका विशिष्ट परिणाम यह होता है कि बेशी आबादी में वृद्धि हो जाती है और औद्योगिक आरक्षित सेना के आकार में परिवर्तन होने लगता है. आरक्षित सेना जितनी बडी होती है उतना ही मेहनतकशों के कंगालों की कतार में शामिल हो जाने का खतरा बढ़ता जाता है. यह प्रक्रिया उस बिन्दू तक पहुँच सकती है कि समाज इन्हें मुह्ताजखाने में खिलाने और आय देने या इन्हें दूसरे किस्म की राहत देने के लिए बाध्य हो जाये.

“इसका परिणाम यह होता है कि जिस अनुपात में पूंजी का संचय होता जाता है, उसी अनुपात में मजदूर की हालत अनिवार्य रूप से बिगड़ती जाती है — उसको चाहे ज्यादा मजदूरी मिलती हो या कम. अंत में वह नियम जो सापेक्ष बेशी आबादी या औद्योगिक आरक्षित सेना का (पूंजी) संचय के विस्तार और तेजी के साथ संतुलन कायम करता है, मजदूर को पूंजी के साथ इतनी मजबूती के साथ जकड़ देता है जितनी मजबूती के साथ हिपेसियस की बनाई जंजीर प्रोमेथियस को चट्टान के साथ नहीं जकड़ सकी थी. इस नियम के फलस्वरूप पूंजी संचय के साथ-साथ दरिद्रता बढती जाती है. इसलिए यदि एक छोर पर धन, का संचय होता है, तो इसके साथ-साथ दूसरे छोर पर — यानी उस वर्ग में जो खुद अपने श्रम के उत्पाद को पूंजी के रूप में तैयार करता है — गरीबी, यातनादायक श्रम, दासता, अज्ञान, पाशविकता और मानसिक पतन का संचय होता जाता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 714)

घोषणापत्र के प्रथम भाग के अंतिम अनुच्छेद में पूंजीवादी समाज के पतन की अनिवार्यता को रेखांकित किया गया है. दो दशकों के अतिरिक्त अनुभव और गहनतर विश्लेषण के बाद पूंजी के पहले खंड में इसकी पुनरावृत्ति और विस्तार से प्रतिपादन किया गया है. इसके अंतिम से पहले वाले अध्याय में हम पढ़ते हैं :

“रूपांतरण की यह प्रक्रिया जैसे ही पुराने समाज को ऊपर से नीचे तक काफी छिन्न-भिन्न कर देती है, मेहनतकश जैसे ही सर्वहारा बन जाता है और उसके श्रम के साधन पूंजी में रूपांतरित हो जाते हैं, पूंजीवादी प्रणाली खुद जैसे ही अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है, वैसे ही श्रम का और अधिक समाजीकरण करने और साथ ही निजी मालिकों का और अधिक स्वत्वहरण करने का प्रश्न एक नया रूप धारण कर लेता है. अब जिसका सम्पत्तिहरण करना आवश्यक हो जाता है, वह खुद अपने लिए काम करने वाला मेहनतकश नहीं होता है, बल्कि वह होता है बहुत से मेहनतकशों का शोषण करने वाला पूंजीपति. यह सम्पत्तिहरण पूंजीवादी उत्पादन के अंतर्भूत नियमों के अमल में आने के फलस्वरूप पूंजी के केन्द्रीकरण  द्वारा संपन्न होता है. एक पूंजीपति बहुत से पूंजीपतियों को मिटा देता है. इस केन्द्रीकरण के साथ-साथ, अधिकाधिक बढ़ते पैमाने पर श्रम-प्रक्रिया का सहकारी स्वरूप विकसित होता जाता है. इसके साथ प्राविधिक विकास के लिए सचेतन ढंग से विज्ञान का अधिकाधिक उपयोग बढ़ता जाता है. भूमि को उत्तरोत्तर अधिक सुनियोजित ढंग से जोता-बोया जाता है. श्रम के औजार ऐसे औजारों में बदलते जाते हैं जिनका केवल सामूहिक ढंग से उपयोग किया जा सकता है. उत्पादन के साधनों का संयुक्त, समाजीकृत श्रम के साधनों के रूप में उपयोग करके उत्पादन के साधनों का मितव्ययिता के साथ इस्तेमाल किया जाता है. सभी कोमें संसारव्यापी मंडी के जाल में सिमट आती हैं. इन सभी के कारण पूंजीवादी शासन का स्वरूप अधिकाधिक अंतरराष्ट्रीय होता जाता है. रुपान्तरण की इस प्रक्रिया से उत्पन्न होने वाली समस्त सुविधाओं पर जो लोग जबरदस्ती अपना अधिकार कायम कर लेते हैं, पूंजी के उन बड़े-बड़े स्वामियों की संख्या यदि एक ओर बराबर घटती जाती है  तो दूसरी ओर, गरीबी, अत्याचार, गुलामी, पतन और शोषण में लगातार वृद्धि होती जाती है. लेकिन इसके साथ-साथ मजदूर वर्ग का विद्रोह भी अधिकाधिक तीव्र होता जाता है. यह वर्ग संख्या में लगातार बढ़ता जाता है और स्वयं पूंजीवादी उत्पादन की प्रक्रिया का तंत्र ही उसे अधिकाधिक अनुशासनबद्ध एकजुट और संगठित करता जाता है. पूंजीवादी एकाधिकार उत्पादन की उस प्रणाली के लिए बंधन बन जाता है जो इस एकाधिकार के साथ-साथ जन्मी है और फली-फूली है. उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण और श्रम का समाजीकरण एक ऐसे बिन्दू पर पहुँच जाते हैं जहाँ वे अपने पूंजीवादी खोल के भीतर नहीं रह सकते हैं.  खोल फट जाते हैं. पूंजीवादी निजी संपत्ति की मौत की घंटी बज उठती है. सम्पत्तिहरण करने वालों का सम्पत्तिहरण हो जाता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड.1, 845-846)

सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र का विकास और क्रांति

Posted on Updated on

30.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

“वर्ग विरोध पर आधारित समाज में शोषित वर्ग अनिवार्यत: विद्यमान रहता है. इसलिए शोषित वर्ग की मुक्ति से नए समाज का निर्माण होता है. शोषित वर्ग की मुक्ति के लिए आवश्यक है कि विद्यमान उत्पादक शक्तियों  और प्रभावी सामाजिक सम्बन्ध परस्पर अनुकूल न हों. उत्पादन के औजारों में क्रांतिकारी वर्ग स्वयं सर्वाधिक ताकतवर उत्पादक शक्ति बन जाता है. क्रांतिकारी तत्त्वों के एक वर्ग के रूप में संघठन के लिए आवश्यक है कि पुराने समाज में समस्त उत्पादक शक्तियों का हर सम्भव विकास वास्तव में पूरा हो गया हो. तब क्या हम इस विचार को लें उडे कि पूर्व समाज के ध्वंस से दूसरे वर्ग का प्रभुत्व स्थापित हो जायेगा? कि इस नए प्रभुत्व की परिणति एक नयी राजनीतिक सत्ता की स्थापना में होगी? बिलकुल नहीं. मेहनतकश वर्ग की मुक्ति की यह अनिवार्य शर्त है कि समस्त वर्गों का खत्म हो जाये. पूर्व इतिहास में इसका सटीक उदाहरण मिलता है. राज्य से समस्त वर्गों, समस्त श्रेणियों के उन्मूलन से ही तीसरे वर्ग यानी बुर्जुआ वर्ग की मुक्ति का सवाल हल हुआ.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ.137)

सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र के प्रश्न पर आगे की टिपण्णी (42) में और अधिक विचार किया जायेगा. यहाँ पर पाठकों को मात्र यह याद दिलाने की ज़रुरत है कि घोषणापत्र के रचयिताओं ने ‘राष्ट्रीय’ शब्द का प्रयोग शासकीय और राज्यक्षेत्र के अर्थ में किया था. जब वे वर्ग संघर्ष के “मुख्यतया राष्ट्रीय” होने की चर्चा करते हैं तब उनका आशय यह होता है कि यह संघर्ष फ्रांस, इंग्लैंड, बेल्जियम आदि राष्ट्र-राज्यों की सीमा के अन्दर होता है. बुर्जुआ वर्ग को पराजित करने के लिए आवश्यक है कि सर्वहारा इस संघर्ष में अन्य देशों के सर्वहारा को मित्र के रूप में लामबंद करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध छेड़ दे. लेकिन ऐसा करने के पहले उसे अपने देश के बुर्जुआ से निपटना पड़ता है. दूसरा इंटरनेशनल इसलिए असफल हो गया क्योंकि इसके नेताओं ने ‘पितृभूमि की रक्षा’ के नारे को अपना लिया था जिसके तहत शुरुआत तो विदेशी बुर्जुआ को नष्ट करने से होनी थी लेकिन इसमें न केवल सीमा पार के सर्वहारा बंधुओं बल्कि अपने सह-राष्ट्रीय सर्वहारा बंधुओं को अपनी  तरफ करना ज़रूरी था. भीषणतम गृहयुद्धों में, क्रांति की अवधि में, राष्ट्रों के बीच अत्यधिक धर्मांध संघर्षों में, यहाँ तक कि इतिहास की पूरी अवधि में, इतना अधिक खून नहीं बहा है, इतनी अधिक जानें नहीं गयी हैं जितना कि हाल के विश्वयुद्ध में खून बहा है और जानें गयी हैं. ठीक उन्हीं लोगों ने इस विश्वयुद्ध का समर्थन किया था जिन्होंने अपने देश में बुर्जुआ सत्ता को बलात उखाड़ फेंकने से इस भय से इंकार कर दिया था कि इससे रक्तपात हो सकता है.

“विकास के दौरान मेहनतकश वर्ग पुराने बुर्जुआ समाज के स्थान पर एक ऐसा समाज स्थापित करेगा जिसमें वर्गों और वर्ग विरोध का लोप हो जायेगा. चूँकि राजनीतिक सत्ता बुर्जुआ समाज में विद्यमान विरोधों की आधिकारिक अभिव्यक्ति होती है, मात्र इसलिए सामान्य अर्थों में कोई राजनीतिक सत्ता नहीं होगी. उस वक्त तक सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच शत्रुता तो भिन्न वर्गों के संघर्ष के रूप में लेकिन बनी रहती है. जब यह संघर्ष अपने चर्म पर पहुँचता है तो क्रांति में तब्दील हो जाता है. क्या हमें यह जानकर आर्श्चय होना चाहिए कि वर्ग शत्रुता पर आधारित समाज का अंत सशस्त्र भिडंत से होगा और आमने-सामने की लडाई से इसका विघटन होगा? यह दावा नहीं किया जा सकता कि सामाजिक आन्दोलन राजनीतिक आन्दोलन का निषेध करता है. अभी तक कोई ऐसा राजनीतिक आन्दोलन नहीं हुआ जो सामाजिक आन्दोलन न रहा हो, जो सामाजिक आन्दोलन के साथ न चलता हो. केवल ऐसी सामाजिक अवस्था में, जिसमें वर्गों और वर्ग शत्रुता का अस्तित्व ही नहीं होगा, समाजिक विकास क्रांति का रूप धारण करना बंद कर देगा. लेकिन तब तक, हर बार जब समाज में व्यापक कायापलट होने वाली होती है, तब सामाजिक विज्ञान का निष्कर्ष जॉर्ज सान्द (1804-1876) के शब्दों में यह होगा — युद्ध या मौत : खूनी संघर्ष या विनाश, यही है वह विकल्प जिससे बचा नहीं जा सकता.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ.137-138)

सर्वहारा और कानून का सम्मान

Posted on Updated on

29.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

निजी संपत्ति समस्त पूंजीवादी समाज की आधारशीला है. न्याय और समानता के नाम पर बुर्जुआ ने इसे सामंतवाद की बेडियों से, एकाधिकार से और विशेषाधिकार से मुक्ति दिलाई. यह निर्दोष और सहज दिखनेवाली निजी सम्पति पूंजीवादी विकास के नियमों के कारण पूंजीवादी निजी संपत्ति में धीरे-धीरे तब्दील होने लगी अर्थात संपत्ति ने ऐसा रूप धारण किया जिसका अस्तित्व निजी संपत्ति से वंचित व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि पर निर्भर था. निजी संपत्ति की पवित्रता और अनुल्लंघनियता पर बुर्जुआ जितना अधिक संभ्रम फैलाता है, उसी व्यग्रता से वह इसे छोटे व्यापारी, कारीगर और किसान से छीनता जाता है. इस प्रकार वह उन्हें निजी संपत्ति से वंचित जन-साधारण अर्थात सर्वहारा में परिवर्तित  कर देता है. निजी संपत्ति के ध्वंस की मांग प्रस्तुत करके सर्वहारा मात्र उस वस्तु का ध्वंस चाहते हैं जो उनके लिए नष्ट हो चुकी है — वह चीज जिसका अभाव उनकी मौलिक अभिलाक्षणिकता है. सर्वहारा पुरानी व्यवस्था के विघटन से, मध्य वर्गों विशेषकर इनके निम्न संस्तर के क्षय से उद्भूत व्यक्तियों का समूह है. सर्वहारा की ऐतिहासिक भूमिका के बारे में अपनी नयी अवधारणा का प्रतिपादन करते हुए मार्क्स लिखते हैं,

“हीगेल के न्याय-दर्शन की आलोचना करते हुए यदि सर्वहारा पूर्ववर्ती सामाजिक व्यवस्था के विघटन की घोषणा  करता है, तो वह मात्र अपने अस्तित्व के रहस्य को प्रकट कर रहा है क्योंकि वास्तव में उस व्यवस्था के विघटन से उसका जन्म हुआ है. सर्वहारा निजी संपत्ति के निषेध की मांग करता है तो वह महज़ एक ऐसी चीज को समाज के सिद्धांत का दर्जा दे रहा है जिसे समाज ने पहले से ही अपना सिद्धांत बना रखा है, जोकि सर्वहारा के रूप में, उसके सहयोग के बिना ही, समाज का एक नकारात्मक परिणाम बन गया है.”

पूंजीवादी व्यवस्था ने निजी सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए कानून बनाये हैं. पूंजीवादी विकास के दौरान ये तथ्य और अधिक स्पष्ट हो गया है कि ये कानून संपत्ति की सुरक्षा कर पाने में अक्षम साबित होते हैं चाहे उनका बहुत सावधानी से विस्तृत प्रतिपादन ही क्यों न किया गया हो. जहाँ तक मेहनतकशों का सम्बन्ध है, इन कानूनों को इसलिए बनाया जाता है ताकि उनकी निजी संपत्ति पर हमला करने से रोका जा सके. केवल कड़े संघर्ष और कई लोगों की कुर्बानियों के बाद सर्वहारा को अपनी एकमात्र संपत्ति अर्थात श्रमशक्ति के लिए कुछ कानूनी सुरक्षा हासिल हुई है. मेहनतकशों के निरंतर संघर्ष के बाद ही ऐसे कानून बनाये गए जो उनकी श्रमशक्ति को पूंजीपतियों के निर्मम शोषण से बचाते थे. इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की स्थिति को चित्रित करने वाली अपनी पुस्तक में एंगेल्स ने इन बुर्जुआ कानूनों पर मेहनतकशों के रुख, इन कानूनों के प्रति उनमें सम्मान के अभाव आदि का उत्कृष्ट चित्र प्रस्तुत किया है.

“कानून बुर्जुआ द्वारा गढा जाता है, उसकी सहमति से पारित किया जाता है और बुर्जुआ के लाभ और उसकी सुरक्षा के लिए तत्पर रहता है इसलिए बुर्जुआ की नज़र में कानून एक पवित्र चीज है. बुर्जुआ अच्छी तरह जानता है कि कोई कानून विशेष उसके किसी सदस्य के लिए हानिकारक हो सकता है लेकिन आमतौर पर कानून-संहिता बुर्जुआ के समग्र हितों की रक्षा करती है. केवल यही बात नहीं है. कानून की पवित्रता, प्रतिष्ठित संस्थाओं की अनुल्लंघनीयता जो समाज के एक हिस्से के सक्रिय संकल्प से स्थापित की जाती है और समाज के दूसरे हिस्से द्वारा निश्चेस्ट रूप से स्वीकार की जाती है –समाज में बुर्जुआ की अवस्थिति इन अमूर्त रूपों के सर्वाधिक ठोस आधार पर निर्भर करती है. अंग्रेज बुर्जुआ के लिए कानून एक पवित्र चीज है क्योंकि वह उसका प्रतिबिम्ब और उसके समान है ठीक उसी तरह जिस तरह ईश्वर उसका प्रतिबिम्ब और उसके समान है. यही वजह है कि पुलिस का डंडा (जो वास्तव में उसका अपना डंडा है) उसके मन को बहुत सकून देता है. लेकिन मजदूर को इसमें कोई पवित्रता नज़र नहीं आती है. कठोर अनुभव ने उसे सिखा दिया है कि कानून डोरियों से बना जाल है जिसे बुर्जुआ उसके लिए बुनता है. इसलिए परिस्थितियां उसे बाध्य न कर दें, मजदूर कानून की सहायता कभी नहीं मांगता है…”(एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, क्वेल्व का अनुवाद पृ. 227)

“क्या संपत्तिहीन के लिए चोरी से परहेज़ करने का प्रयाप्त आधार मौजूद रहता है? निसंदेह ‘संपत्ति की पवित्रता’ मुहावरा बहुत सुन्दर लगता है और बुर्जुआ के कानों को बहुत मधुर लगता है. लेकिन सम्पत्तिहीन के लिए संपत्ति को पवित्र समझना बहुत मुश्किल है. इस दुनिया ने मुद्रा को भगवन बना दिया है. बुर्जुआ सर्वहारा को धन से वंचित रखता है और इस प्रकार उसे मोटे तौर पर नास्तिक बना देता है. तब क्या हमें इस बात से हैरानी होनी चाहिए कि सर्वहारा अपनी नास्तिकता स्वीकार करता है और कि इस दुनिया के भगवान की शक्ति और पवित्रता पर उसकी श्रद्धा समाप्त हो गयी है? जब सर्वहारा वर्ग की गरीबी इस हद तक बढ़ जाती है कि जीवन की मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति का पूर्ण अभाव हो जाये, जब भूखमरी और कंगालीकरण तेजी से फैलने लगे तब मौजूद सामाजिक व्यवस्था के कानून की अवहेलना की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 115)

बड़े पैमाने के उद्योग की विकास प्रक्रिया और इसके फलस्वरूप शहरों में आबादी के बड़े हिस्से में जमावडे के कारण मजदूरों की समग्र मानसिकता बदल जाती है. जब मजदूर सामूहिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संगठित होता है तब उसे अपनी वर्ग स्थिति की जानकारी होती है. उसे यह मालूम हो जाता है कि एक-दूसरे से अलग रहने पर  वह कमज़ोर हो जाता है लेकिन एक साथ हो  जाने से वह ताक़तवर हो जाता है. उसे बुर्जुआ से अपने विभेद का तीव्र अहसास होने लगता है. तब वह अपने बारे में सोचने लगता है, उसका अपना दृष्टिकोण विकसित होने लगता है, उसकी स्थिति के अनुकूल विचार और दृष्टिकोण पनपने लगते हैं. तब उसे अपनी गुलामों जैसी स्थिति का भान होता है और धीरे-धीरे राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं की समझ विकसित होने लगती है. पुराने पितृसत्तात्मक सम्बन्ध बड़ी चतुराई से मेहनतकश की गुलामी पर पर्दा डाल देते थे और बौद्धिक दृष्टिकोण से मेहनतकश अपने हितों से अनभिज्ञ और सामान्य ज्ञान से वंचित निर्जीव वस्तु-सा था. जब मालिक और कारिंदे के बीच का एकमात्र सम्बन्ध सिर्फ इस सम्बन्ध से लाभ निचोड़ने में मालिक का व्यक्तिगत हित ही है, जब सारी हमदर्दी ख़त्म हो गयी और उसका कोई निशान शेष न बचा — तभी मेहनतकश को अपनी स्थिति और अपने हितों की चेतना हुई और उसका बौद्धिक पुनर्जन्म हुआ. तभी उसने संवेदना, विचार और उद्यम के क्षेत्र में मालिक का अनुसरण करना बंद कर दिया.

बुर्जुआ वर्ग और उसके बीच रहने वाले मजदूरों के बीच समानता के सापेक्ष बुर्जुआ और विश्व के पिछडे राष्ट्रों के बीच साम्य अधिक है. मजदूर अलग बोली बोलता है. मजदूर और बुर्जुआ के विचार और कल्पनाएँ परस्पर विरोधी होती हैं. उनकी आदतें, नैतिक सिद्धांत, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टिकोण एकदम भिन्न होते हैं. बुर्जुआ और सर्वहारा पृथक राष्ट्र होते हैं. वे एक दूसरे से इतना अलग होते हैं कि उन्हें दो प्रजातियाँ कहा जा सकता है. डिज़रायली का उपन्यास ‘सिबिल, ऑर द टू नेशन्ज़‘ की रचना 1845 में की गयी थी. उसी समय यानि कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन के तीन साल से भी कम समय पहले अँग्रेज़ मजदूर वर्ग की स्थिति पर एंगेल्स की पुस्तक की रचना की गयी थी. डिज़रायली ने पुरानी पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग किया था और अपने पाठकों को बताया था कि “अमीर” और ‘गरीब” ही दो राष्ट्र होते हैं. लेकिन अब हम बाखूबी समझ सकते हैं कि बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच चौडी होती जा रही खाई, मानसिक और शारीरिक दोनों किस्म की, ने नौजवान अनुदार राजनीतिक को बहुत प्रभावित किया था.

बुर्जुआ समाज के अंतरविरोध और सर्वहारा द्वारा इनका उपयोग

Posted on Updated on

27.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

बुर्जुआ वर्ग की कतारों के बीच विरोध, पूंजीपति वर्ग के विभिन्न धडों के बीच अनबन, भूस्वामियों और औद्योगिक सम्पत्तिधारकों के बीच संघर्ष, एक ओर वित्तीय हितों के प्रतिनिधियों और दूसरी ओर मैन्युफैक्चरिंग हितों के प्रतिनिधियों के बीच तीखी होड़ – इन सभी संघर्षों के बीच पूंजीवादी समाज के गठन में ही मौजूद है.

“अपने ऐतिहासिक विकास के दौरान बुर्जुआ अनिवार्यत: अपने सुषुप्त अंतरविरोधों को बढाता जाता है…जैसे-जैसे बुर्जुआ व्यवस्था विकसित होती जाती है इसके ढांचे के अर्न्तगत नए सर्वहारा, आधुनिक युग की अभिलाक्षणिकताओं से युक्त सर्वहारा का विकास होता जाता है. बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच युद्ध छिड़ जाता है जो पहले अस्थाई आंशिक और अल्पकालिक संघर्षों और ध्वंसात्मक कार्रवाइयों के रूप में प्रकट होता है तथा जब इसकी समझ बन जाती है, इस पर ध्यान देना आवश्यक हो जाता है, इसका मूल्यांकन कर लिया जाता है, इसे स्वीकार कर लिया जाता है. अन्य वर्गों के खिलाफ खड़े, एक विशिष्ट वर्ग के रूप में गठित समकालीन बुर्जुआ वर्ग के सभी सदस्यों के हित समान होते हैं परन्तु इन सदस्यों के बीच-बीच के सम्बन्ध परस्पर विरोधी हितों पर आधारित होते हैं. यह विरोध बुर्जुआ व्यवस्था की आर्थिक संरचना में निहित होता है.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ, 971)

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम अर्धांश के दौरान ब्रिटिश बुर्जुआ समाज का इतिहास इस दावे का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है.

नेपोलियन (1769-1821) की अंतिम पराजय के ठीक बाद, 1815 में ब्रिटिश भूस्वामियों ने विदेशों से अनाज के आयात पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक विधेयक पेश किया और गेहूं के आयात को करमुक्त करने के लिए 80 शिलिंग का दाम निर्धारित किया. इस अधिनियम का उद्देश्य ब्रिटिश बाज़ार में प्रति क्वार्टर गेहूं की कीमत लगभग 80 शिलिंग बनाए रखना था. अनाज बाज़ार के महाद्वीपीय प्रतिस्पर्द्धा से मुक्त हो जाने से ब्रिटिश भूस्वामियों के लिए असाधारण रूप से ऊँची आय सुनिश्चित हो गयी. लेकिन  मध्य वर्गों ने इस नए कानून का कड़ा विरोध किया. यह जनमत निकाय छोटे कारखाना मालिकों, कारीगरों, सामान्तया निम्न-बुर्जुआ और औधोगिक बुर्जुआ के कई प्रतिनिधियों से बना था जो अपना लाभ बढाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. आरंभ में इस आन्दोलन ने शांतिपूर्ण विरोध का रूप धारण किया था लेकिन पूरी तरह से बेअसर साबित हुआ. प्रत्येक याचिका को सीधे अस्वीकार कर दिया गया.

यहाँ तक की सन 1832 के चुनाव सुधार से भी कुछ हासिल नहीं हुआ. अपनी आय की सुरक्षा के लिए भूस्वामी कुलीनों के सभी धडे एकजुट हो गए. अब औद्योगिक बुर्जुआ ने इस विवाद को राजनीती के क्षेत्र में ले जाने और ‘जनता’ को लामबंद करने का निर्णय किया. इसलिए 1839 में मैनचेस्टर में एंटी-कॉर्न लीग गठित की गयी जिसके प्रमुख मार्गदर्शक कॉबडेन (1804-1865) और ब्राईट (1811-1839) थे. संघर्ष ने अधिक उग्र रूप धारण कर लिया. दोनों पक्षों ने “निम्न श्रेणियों” से समर्थन देने की अपील की. प्रत्येक शिविर में दूसरे के खिलाफ आरोप लगाए जा रहे थे. औद्योगिक बुर्जुआ ने कृषि मजदूरों की भयंकर दुर्दशा की ओर ध्यान आकर्षित किया तो भूस्वामी कुलीन वर्ग ने औधोगिक उत्पादन में लगे मजदूरों की हिमायत की और कारखाना कानून के पक्ष में आन्दोलन करके अपना बदला लिया.

“एक ओर तो बुर्जुआ आन्दोलनकर्ताओं का हित यह प्रमाणित करने में था कि अनाज कानून से उन लोगों को कम लाभ पहुँचा है जो सचमुच अनाज पैदा करते हैं. दूसरी ओर, भूस्वामी कुलीन वर्ग फैक्टरी-व्यवस्था की जो तीव्र निंदा कर रहा था और ये सर्वथा भ्रष्ट, हृदयहीन और कुलीन आवारा लोग कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के साथ जो दिखावटी सहानुभूति प्रकट कर रहे थे तथा फैक्टरी-कानून बनवाने के लिए जिस “कुटनीतिक उत्साह” का प्रदर्शन कर रहे थे, उसे देख-देखकर बुर्जुआ वर्ग क्रोध से आग-बबूला हो रहा था. अंग्रेजी की एक पुराणी कहावत है कि “जब चोरों में खटपट हो जाती है, तब भले की बन आती है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड,1,पृ. 747)

आखिरकार 29 जून 1846 को पील (1788-1850) के प्रसिद्ध अधिनियम ने अनाज कानूनों को रद्द करके इस विवाद का अंत कर दिया. एंटी कॉर्न लीग को प्रत्येक मुद्दे पर जीत हासिल हुई. उस आन्दोलन को मजदूरों का समर्थन प्राप्त था. “अंग्रेज़ मजदूरों ने स्वतन्त्र व्यापारियों को जता दिया था कि वे स्वतन्त्र व्यापार के भ्रमों और भ्रांतियों से बुद्धू बनने वाले नहीं है. इसके बावजूद  यदि मजदूर भूस्वामी कुलीन वर्ग के खिलाफ स्वतन्त्र व्यापारियों के पक्ष में लामबंद हो गए थे तो इसलिए वे सामंतवाद के अवशेषों को ख़त्म करना चाहते थे ताकि उनके खिलाफ केवल एक शत्रु बचे. मजदूरों का अनुमान गलत साबित नहीं हुआ. विनिर्माण के हितपोषकों से बदला लेने के लिए, दस घंटे कार्यदिवस सम्बन्धी विवाद में भूसंपत्ति के समर्थक मजदूरों के पक्ष में लामबंद हो गए. इस सुधार के लिए मजदूर बीस सालों से व्यर्थ ही मांग कर रहे थे जबकि अनाज कानूनों के रद्द होने के तुंरत बाद बने नियमों में उनकी मांग मान ली गयी.” (ब्रसेल्स डेमोक्रेटिक एसोसिएशन के समक्ष 9 जनवरी 1848 को स्वतन्त्र व्यापार पर दिए गए मार्क्स के भाषण से. (देखें मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ, 186)

दस घंटे कार्यदिवस का विधेयक जिन परिस्थितियों में पेश किया गया था उनका जिक्र मार्क्स इस प्रकार करते हैं : “इन वर्षों में अनाज कानून रद्द कर दिए गए थे, कपास और अन्य कच्चे मालों पर आयात शुल्क समाप्त कर दिया गया था, स्वतन्त्र व्यापार के सिद्धांत को तमाम कानूनों का पथ-प्रदर्शक घोषित कर दिया गया था. संक्षेप में कहा जाये, तो मानों स्वर्ण-युग का आरंभ हो गया था. दूसरी ओर, इन्हीं वर्षों में चार्टिस्ट आन्दोलन और दस घंटे कार्यदिवस विधेयक के पक्ष में आन्दोलन अपनी चर्म सीमा पर पहुँच गया था. इन अदोलनों को अनुदार दल के लोगों का समर्थन प्राप्त था जोकि कारखाना मालिकों से बदला लेने के लिए बेकरार थे. (कॉबडेन और ब्राइट के नेतृत्व में) स्वतन्त्र व्यापार की क़समें खाने वाले समर्थकों के जोरदार विरोध के बावजूद यह विधेयक जिसके लिए कई वर्षों से संघर्ष चल रहा था, संसद में पास हो गया. (मार्क्स, कैपिटल, खंड,1,पृ. 289-90)

एंटी-कॉर्न लीग ने ब्रिटिश मजदूरों के लिए पाठशाला का काम भी किया जहाँ पर उन्होंने आन्दोलनात्मक तौर-तरीकों की शिक्षा ग्रहण की. लीग के नियंत्रण में बहुत बड़ी धनराशी उपलब्ध थी जिसे उसने समाचारपत्रों, पुस्तकों, पर्चों, पोस्टरों और घोषणापत्रों के प्रकाशन में खुले हाथ से खर्च किया. 1843 तक लीग पर्चों की 10,000,000 प्रतियाँ प्रकाशित कर चुकी थी.  लीग की कार्यकारी समिति उसकी सर्वोच्च सत्ता थी जिसके सदस्य इसकी विभिन्न शाखाओं की गतिविधियों को संचालित करते थे. लीग की कार्रवाइयों में पुरुष मजदूरों के संगठन और स्त्री-मजदूरों के संगठन साथ-साथ शिरकत करते थे. अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए लीग के प्रवक्ता बल-प्रयोग की अपील करने से नहीं घबराते थे और भूस्वामी कुलीन वर्ग की दुष्टता का बखान बहुत खुले शब्दों में करते थे जो उत्पादक वर्ग को भूखा मार डालना चाहता था.

एक और जहाँ बुर्जुआ क्रांति में उन कुलीनवर्गीय सिद्धान्तकारों की अच्छी-खासी तादाद थी जो बुर्जुआ विचारधारा को स्वीकार करते थे और उसका समर्थन करते थे दूसरी और ऐसे बुर्जुआ सिद्धान्तकार बिरले ही मिलेंगे जो सामाजिक विकास की दिशा को समझते हों और सर्वहारा दृष्टिकोण को अपनाने के लिए तत्पर हों. इसकी मुख्य वजह यह है कि बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच खाई उससे कहीं ज्यादा गहरी थी जो कुलीन वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच मौजूद थी. रूसी क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में (जनवादी पार्टियों का गठन करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग) के ऐसे सिद्धान्तकारों ने संघर्षरत सर्वहारा की कतारों में शामिल होने की इच्छा कदाचित ही प्रकट की थी.

चार्टिस्ट आन्दोलन – मेहनतकश वर्ग का राजनीतिक संगठन

Posted on Updated on

26.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

हड़तालों की घोषणा, ट्रेड यूनियनों का गठन, यूनियनों का पहले क्षेत्रीय संगठनों और बाद में राष्ट्रीय संगठनों में समेकन और उसके बाद कई यूनियनों से अस्थाई संघ बनाने की कोशिश करने का काम मेहनतकशों के राजनीतिक संघर्ष के साथ-साथ  चलता रहा और इसने 1836-37 के संकट के बाद गंभीर हलचल का रूप धारण कर लिया था. 1839 में नेशनल चार्टिस्ट एसोसिएशन की स्थापना उन मांगों के समर्थन में आन्दोलन करने के लिए की गयी थीं जो एक साल बाद पीपुल्स चार्टर में प्रस्तुत किये गए थे. इस निकाय का खास मकसद कारीगरों और मेहनतकश वर्गों  की तकलीफों को कम करना था और इसे मजदूरों की पहली राजनीतिक पार्टी कहा जा सकता है. एंगेल्स इस तथ्य का स्पष्ट विवरण पेश करते हैं कि अलग-अलग यूनियनों का आंशिक संघर्ष और इनका राष्ट्रीय स्तर पर वर्ग संघर्ष में मिल जाना कैसे सारे मेहनतकश वर्ग के राजनीतिक संघर्ष में रूपांतरित हो जाता है.

“मेहनतकश कानून का समादर नहीं करता है. वह केवल तभी इसके विधानों का पालन करता है जब उनके बदलने की कोई गुंजाईश नहीं होती है. इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि वह कानून बदलने की कोशिश करे और बुर्जुआ विधानों के स्थान पर सर्वहारा विधानों को लागू करने का प्रयत्न करे. यही वजह थी कि अंग्रेज मजदूरों को सुधारों की योजना तैयार करने की प्रेरणा मिली जिसे पीपुल्स चार्टर में प्रस्तुत किया गया था. वह एक विशुद्ध राजनीतिक दस्तावेज़ था जिसका उद्देश्य अन्य बातों के अलावा, हाउस ऑफ़ कामन्स का जनवादी पुनर्गठन था. चार्टिस्ट आन्दोलन बुर्जुआ वर्ग के खिलाफ मेहनतकश वर्ग के विरोध की सघन अभिव्यक्ति थी. ट्रेड यूनियनों और हड़तालों में व्यक्तिगत मजदूर या मजदूरों का समूह व्यक्तिगत बुर्जुआ के खिलाफ संघर्ष छेड़ देता था जिससे इसका स्थानीय और एकाकी रूप जाहिर होता था. यदि कभी-कभी यह संघर्ष व्यापक रूप धारण कर लेता था तो इसकी शायद ही कभी यह वजह होती थी कि मजदूर खुद सचेतन रूप से ऐसा चाहते थे. जहाँ तक आन्दोलन के सुविचारित विस्तार का प्रश्न है, यह चार्टिस्ट आन्दोलन की देन है. क्योंकि चार्टिस्ट आन्दोलन में सारा मेहनतकश वर्ग बुर्जुआ के खिलाफ हो गया था. उसका पहला हमला बुर्जुआ की राजनीतिक सत्ता पर हुआ और उसने इस सत्ता को सुरक्षा प्रदान करने वाली कानूनी दीवारों में दरार पैदा करने की कोशिश की.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड पृ. 227-28)

सन 1838 में हाउस ऑफ़ कामन्स के छह सदस्यों और लन्दन वर्किन्गमेंस एसोसिएशन के प्रतिनिधियों के लन्दन में हुए अधिवेशन में पीपुल्स चार्ट का प्रारूप तैयार किया था. इनकी मुख्य मांगे थीं :
(१) इक्कीस वर्ष से अधिक आयु के पुरषों के लिए सार्विक मताधिकार,
(२) सालाना संसद,
(३) संसद सदस्यों के लिए संपत्ति की अहर्ता का खात्मा,
(४) गुप्त मतदान से चुनाव,
(५)अधिक न्यायोजित प्रतिनिधित्व के लिए समान निर्वाचक मंडल,
(६) सदस्यों को पारिश्रमिक.

एंटी-प्रूधों में मार्क्स उस प्रक्रिया का विवरण देते हैं जिसके अर्न्तगत मेहनतकश लोग धीरे-धीरे अपने हित के लिए एक वर्ग में संगठित हो जाते हैं और जिसके अर्न्तगत मेहनतकश वर्ग चेतना का विकास करता है. उन्हीं के शब्दों में;

“पूंजीवाद युग के प्रारंभ में आबादी का बड़ा हिस्सा आर्थिक कारणों से उज़रती मजदूरों में तब्दील हो गया. पूंजी की सत्ता ने उन स्थितियों को पैदा किया जिन्होनें मेहनतकशों को समग्र रूप में प्रभावित किया जिससे उनके हित समान हो गए. इस प्रकार एक वर्ग के रूप में वे पहले ही समेकित हो चुके थे जो पूंजीपतियों के खिलाफ खडा था हालाँकि एक अलग वर्ग के रूप में अपनी हैसियत की पहचान उन्हें नहीं हो पाई थी. संघर्ष के दौरान ही मेहनतकशों का समूह समेकित होता है ताकि वह अपने आप को एक सुस्पष्ट वर्ग के रूप में पहचान सके. जिन हितों की रक्षा के लिए वे संघर्ष करते हैं वे उनके वर्ग हित बन जाते हैं लेकिन एक वर्ग का दूसरे वर्ग के खिलाफ संघर्ष, राजनीतिक संघर्ष ही होता है.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ फिलासफी, पृ. 136)

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चतुथार्श में सर्वहारा ने एक वर्ग, समाज के एक सुस्पष्ट हिस्से, उत्पादन प्रक्रिया में एक विशिष्ट भूमिका निबाहने वाले लोगों के समूह के रूप में निश्चित शक्ल अख्तियार की. इस समय सर्वहारा वैज्ञानिक पड़ताल की विषयवस्तु  बन जाता है. इसका अस्तित्व इतना सुस्पष्ट बन जाता है कि बुर्जुआ राजनीतिक अर्थशास्त्र का मुख्य कार्यभार उन नियमों की व्याख्या करना है जिनके अर्न्तगत पूंजीवादी व्यवस्था में समाज के तीन वर्गों – भूस्वामी कुलीन वर्ग, बुर्जुआ वर्ग और मजदूर वर्ग के बीच मालों का वितरण होता है. तो भी एक विशिष्ट वर्ग जिनके अपने विशिष्ट वर्ग हित हों, अपने विशिष्ट कार्यभार हों, संक्षेप में स्वयं के महत्त्व के अनुरूप पृथक वर्ग की चेतना से लैस होने में मेहनतकश लोगों को बहुत साल लगे.

ट्रेड यूनियन आन्दोलन का उद्भव और विकास

Posted on Updated on

25.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

मजदूरों के ट्रेड यूनियन आन्दोलन के विकास की दिशा की सैद्धांतिक व्याख्या करने का प्रयास एंगेल्स ने किया था. उनके विचार अपने समकालीन अर्थशास्त्रियों और समाजवादियों से भिन्न थे और उन्होंने 1845 में ही यह सिद्ध कर दिया था की ट्रेड यूनियनें मज़दूरों और उद्योगपतियों के बीच संघर्ष की अनिवार्य परिणति हैं और मज़दूर वर्ग के सभी संगठनों का आधार ट्रेड यूनियन होगा. अपने आरंभिक दौर में, हड़ताल अवधि में जन्मी मज़दूरों की एकजुटता अल्पजीवी होती थी. चूंकि सभी किस्म के संगठन कानून द्वारा प्रतिबंधित थे, चूंकि मज़दूर वर्ग की समस्त संस्थाएं और संघ कानून का उल्लंघन माने जाते थे (जिसे महान फ्रांसीसी क्रांति की घटनाओं के बाद विशेष रूप से सख्त बना  दिया गया था जब 1799-1800 में विशेष विधेयक लागू कर दिया गया), इसलिए मज़दूरों ने गुप्त सोसायटियां बनाना आरंभ कर दिया जिनकी संख्या और सक्रियता बढ़ती चली गयी. मज़दूरों ने प्रचंड संघर्ष किया जिसमें रैडिकल बुर्जुआ ने मज़दूरों की मदद की. इस संघर्ष ने 1816, 1817 एवं 1819 के दौरान अर्द्ध-क्रांतिकारी रूप धारण कर लिया था. इस संघर्ष ने प्रतिक्रियावादी सिडमाउथ मंत्रिमंडल को बदनाम छह कानून पारित करने के लिए मजबूर कर दिया था. आखिरकार इस संघर्ष के बाद 1824 में एक अधिनियम पारित किया गया जिसने उन सभी कानूनों को मंसूख कर दिया जो किसी भी किस्म के संगठन को प्रतिबंधित करते थे. यद्यपि संगठन बनाने का अधिकार प्रदान करने वाले इस कानून को आंशिक रूप से अगले ही साल रद्द कर दिया गया था तथापि मज़दूर अनिरस्त विशेषाधिकारों का धीरे-धीरे उपयोग करने लगे.
“उद्योग की प्रत्येक शाखा में ट्रेड यूनियनें बन गयीं. बुर्जुआ के अत्याचार और अन्याय से मज़दूरों को बचाने का काम ये खुलकर करने लगीं. उनके उद्देश्य थे;

1. सामूहिक समझौते से मज़दूरी निर्धारित कराना,
2. यूनियन के सभी सदस्यों की ओर से सेवायोजकों से समझौता करना,
3. उद्यमी के लाभांश अनुसार मज़दूरी नियंत्रित करना,
4. यथासंभव मज़दूरी में वृद्धि करना और
5. कारखानों की प्रत्येक शाखा में मज़दूरी का समान स्तर कायम रखना.

इसलिए ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि प्राय: पूंजीपतियों से एक मानक मज़दूरी तय करने के प्रश्न पर वार्ता किया करते थे जो समस्त सेवायोजकों के लिए बाध्यकारी होती थी. यदि कोई सेवायोजक मानक दर से मज़दूरी अदा करने से मना कर देता था तो उसे होश में लाने के लिए हड़ताल की घोषणा कर दी जाती थी. इसके अलावा ये प्रशिक्षुओं की संख्या के सीमा निर्धारण द्वारा श्रम की मांग को बनाए रखने की कोशिश करते थे ताकि मज़दूरी के स्तर को कायम रखा जा सके. वे कारखाना मालिकों को नयी मशीनों को उपयोग में लाने की कोशिश करने से रोकने का प्रयास करते थे जिनके कारण मज़दूरी कम होती थी. इतना ही नहीं, ट्रेड यूनियनें काम से निकाल दिये गए सदस्यों को धन के रूप में, मदद भी दिया करती थीं. (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 215)

एंगेल्स इस तथ्य से भलीभांति परिचित थे कि ब्रिटिश मज़दूरों ने अपने जीवन काल में ही राष्ट्रीय स्तर की यूनियनें बनाना शुरू कर दिया था. “जब कभी सम्भव हुआ और स्थिति अनुकूल हुई, स्थानीय शिल्प संघों ने संयुक्त होकर महासंघ बनाया. निर्धारित अवधि में इन निकायों के अधिवेशन सम्पन्न किये जाते थे जिनके प्रतिनिधि इन यूनियनों द्वारा मनोनीत होते थे. इन यूनियनों ने न केवल शिल्प विशेष के सारे मज़दूरों को एक बड़े संघ में एकजुट करने का प्रयास किया बल्कि समय-समय पर (उदाहरण के लिए 1830 में) उन्होंने इंग्लैंड के सभी मज़दूरों को एक बड़ी ट्रेड यूनियन में ऐक्यबद्ध करने का प्रयास किया जिसके अन्तर्गत प्रत्येक शिल्प के मजदूर स्वतन्त्र रूप से संगठित होते थे.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 215-16)
इसी प्रकार एंगेल्स ट्रेड यूनियनों के संघर्ष के तरीकों का विवरण प्रस्तुत  करते हैं. सबसे पहले हड़ताल होती है, फिर भेदी मज़दूरों, हड़ताल तोड़ने वाले मज़दूरों का मुकाबला किया जाता है और गैर-युनियनवादियों को इस मार्ग पर चलाने के लिए दबाब डाला जाता है.

एंगेल्स यह स्वीकार करते थे कि मेहनतकश वर्ग के संगठन का एक आवश्यक घटक ट्रेड यूनियन है लेकिन वे पूंजीवादी समाज में इसके महत्त्व की सीमा को भी पूरे तौर पर समझते थे. “इन संघों का इतिहास विरल विजयों से अलंकृत पराजयों की लम्बी श्रृंखला की कहानी है. यह बताने की ज़रुरत नहीं है कि ट्रेड यूनियनवाद अपनी सारी ताकत लगाकर भी इस स्थिति में नहीं आ पाता कि उस आर्थिक नियम को बदल दे जिसके अर्न्तगत, उज़रतें श्रम बाज़ार में मांग और आपूर्ति से तय होती हैं.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 216-17)
यद्यपि हड़ताल करना निरर्थक प्रतीत होता है फिर भी यह बात एकदम साफ़ है कि यदि मेहनतकश उज़रत में कटौती का विरोध नहीं करें तो ऐसे विरोध के अभाव में सेवायोजकों के लालच की कोई सीमा नहीं होगी. “युनियने और उनके नाम से की गयी हड़ताल का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि इससे प्रथमत: मजदूरों के बीच प्रतिस्पर्द्धा का उन्मूलन होता है. यह उस पूर्वधारणा  पर आधारित है कि खुद मजदूरों के बीच प्रतिद्वंदिता, उनमें एकजुटता का आभाव, मजदूरों के एक समूह के हितों का दुसरे मज़दूरों के हितों से शत्रुतापूर्ण संबंधों पर बुर्जुआ का शासन स्थापित होता है.”(एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 218-19)

एंगेल्स हड़ताल की भर्त्सना करने वाले समाजवादियों और अर्थशास्त्रियों को याद दिलाते हैं कि इन कार्रवाईयों का शैक्षिक महत्त्व होता है. “हो सकता है कि हड़तालें झड़पों से ज्यादा कुछ न हों; कभी-कभी वे महत्त्वपूर्ण टकराव हो सकती हैं. वे निर्णायक भिदंतें नहीं होती हैं लेकिन इससे पूरी तौर से स्पष्ट हो जाता है कि सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच antim संघर्ष आसन्न है. मज़दूरों  के लिए हड़तालें सैनिक प्रशिक्षण विद्यालय का काम करती हैं. इस विद्यालय में सर्वहारा उस महान संघर्ष के लिए प्रशिक्षण पाटा है जोकि अपरिहार्य है. हड़ताल इस बात का ऐलान है कि मज़दूरों की प्रथक प्रशाखाएं समग्रता में मज़दूर आन्दोलन में निष्ठां रखती हैं…. युद्धकला की पाठशाला के रूप में, हड़तालों का कोई सनी नहीं है.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 224)
प्रूधों (1809-1865) हड़तालों की भर्त्सना करते थे और उनका तर्क था कि वे “अवैधानिक” होती हैं. लेकिन मार्क्स ने एंगेल्स के निष्कर्षों को महत्त्व देते हुए तथा उन्हें और अधिक स्पष्ट करते हुए बताया कि एक वर्ग के रूप में सर्वहारा के विकास एवं ट्रेड यूनियन के विकास में निकट का सम्बन्ध है.

“जब कभी और जहाँ कहीं मजदूर अपनी ताकत को इकठ्ठा करने की कोशिश करते हैं तो इस एकता का सबसे पहला रूप एक गठबंधन होता है. बड़े पैमाने का उद्योग एक-दुसरे से अंजन लोगों के समूह को एक स्थान पर इकठ्ठा कर देता है. प्रतिस्पर्द्धा उन्हें एक-दुसरे से अलग करती हैं. उजरतोँ के स्तर को कायम रखना उनका साझा हित होता है जो उनके स्वामी के हितों के प्रतिकूल होता है. उज़रत में कटौती के किसी प्रयास का मुकाबला करने के लिए वे एक हो जाते हैं और एक ‘गठबंधन’ बना लेते हैं. इस गठबंधन के दो उद्देश्य होते हैं – पहला मजदूरों के बीच प्रतिस्पर्द्धा कम करना और दूसरा पूंजीपति से संघर्ष में मज़दूरों की सारी शक्ति को केन्द्रित कर देना. ऐसा मालूम हो सकता है कि पहला उद्देश्य उज़रतों के स्तर को कायम रखने के प्रयास से अधिक कुछ नहीं है. तो भी सूक्ष्मतर  निरीक्षण से यह बात समझ में आ जाती है कि जिस हद तक मज़दूरों की विभिन्न श्रेणियां समूह बनाने की ओर प्रवृत होती हैं. पूंजीपतियों की पूर्ण एकता के मद्देनज़र, मजदूरों की इन एकीकृत समूहों को कायम रखना, इसका गठन करने वाले मजदूरों के नज़रिए से उज़रत का स्तर बनाये रखने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण बन जाता है. इस बात की सत्यता ने अंग्रेज़ अर्थशास्त्रियों को बहुत आश्चर्यचकित कर दिया है जब वे यह देखते हैं कि मजदूर उन यूनियनों को धन उपलब्ध करने के लिए अपनी मजदूरी का बडा हिस्सा दे देते हैं जिनका गठन, इन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, मजदूरों की उज़रत की सुरक्षा के लिए किया जाता है. इस संघर्ष के दौरान, वास्तविक गृहयुद्ध में आगामी संघर्ष के सभी तत्त्वों का एका स्थापित हो जाता है. इसके साथ गठबंधन ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं कि उनका चरित्र राजनीतिक हो जाता है.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ. 136)