इन्कलाब

चुनाव, राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी

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हमने लिखा था कि वर्तमान संसदीय प्रणाली द्वारा मजदूर वर्ग कभी सत्ता प्राप्त नहीं कर सकता. लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि मजदूर वर्ग चुनाव प्रक्रिया में बिलकुल भाग नहीं लेता. एक वोटर के रूप में वह इसमें भाग जरूर लेता है लेकिन प्रभुत्वशाली लोगों में से किसी एक को चुनने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं होता.मजदूर वर्ग और पूंजीपति वर्ग के परस्पर विरोध द्वारा एक्यबद्ध और गतिशील वर्तमान वर्गीय समाज जो कि अलग-अलग पड़ावों से गुजरकर वर्तमान पूंजीवादी जनवादी प्रणाली के साथ प्रकट होता है, अपने पूर्व के वर्गीय समाजों की भांति सम्पत्तिहीन – वर्तमान में सर्वहारा वर्ग को – सत्ता में कितनी भागीदारी दे सकता है (या नहीं दे सकता है), की जाँच-पड़ताल हेतू जरूरी है कि हम कुछ अति महत्वपूर्ण तथ्यों और आंकडों पर नजर दौडाएं जो हाल ही में संपन्न हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में सामने आये हैं.  इससे हम यह भी आसानी से समझ सकते है कि किस प्रकार यह चुनाव प्रणाली पूंजी और जनता के बीच चलने वाले विरोध का हल करती है. चुनावों की हकीकत को जानने के लिए और इस पूरी चुनाव प्रक्रिया की सार्थकता संबंधी आम लोगों में जाकर उनके नज़रिए को जानने की कोशिश करें तो इसकी असलियत को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है. हमारी इस रिपोर्ट का आधार पिछले दिनों संपन्न हुई विधान सभा के चुनावों पर अलग-अलग लोगों के विचार और प्रतिक्रियाएं हैं.

1. पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान चाहे वे राजनीतिक दलों के मंच रहे हों या फिर प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के – बहस का स्तर बहुत निम्न दर्जे का रहा है. इनकी बहस में गंभीर किस्म के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सरोकार गायब थे. राजनीतिक दलों में बहुत निम्न स्तर की लांछनबाजी  देखने को मिली. स्वयं बुर्जुआ वर्ग द्वारा स्वीकृत आचार-व्यवहार का पूर्ण अभाव नजर आया. गंभीर सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों की अपेक्षा, जीत-हार संबंधी जोड़-तोड़, धार्मिक और जाति आधारित प्रतिक्रियावादी समीकरणों द्वारा जोड़-घटा के फार्मूलों की खोज और समीक्षा का प्रभुत्व था.

2. अख़बारों और टीवी पर अपने हक़ में प्रचार करवाने हेतू और अपने विरोधी उम्मीदवार के विरुद्ध -समाचार प्रकाशित करवाने हेतू, लाखों और करोडों के सौदे तय हुए. मीडिया की रिपोर्ट अनुसार कई दैनिक अख़बारों ने २५ से ५० लाख तक के सौदे किये.

3. सारी चुनाव प्रक्रिया इतनी महँगी थी कि देश की बहुसंख्यक आबादी अपने आप ही, इस चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित हो गयी है.  चुनाव दफ्तर से जारी सूचना में उम्मीदवारों के रोजाना खर्च का ब्योरा प्रकाशित किया गया है. इनकी रिपोर्ट के अनुसार कुछ उम्मीदवारों का दैनिक खर्च दो सौ रूपये से तीन सौ रूपये तक का था. इन वेचारे गरीब उम्मीदवारों में कुछ ऐसे उम्मीदवारों के नाम भी शामिल थे जिनकी चुनाव मुहीम की तामझाम, लाम-लश्कर और खर्चीली चुनाव रैलियों की आभा मध्यकालीन युग के राजाओं-महाराजाओं को भी मात दे दे!  चुनाव कमीशन को भले ही यह सब नज़र न आया हो लेकिन आम लोग पानी की तरह बहाए जानेवाले इस धन और शक्ति के प्रदर्शन के प्रत्यक्ष गवाह हैं.

4. वाम संसदीय पार्टियाँ जो सैद्धान्तिक तौर पर लोगों प्रति प्रतिबद्धता का दावा करती रहती हैं – इस सारे दृश्य के आन्तरिक सच का पर्दाफाश करते हुए, मजदूर और मेहनतकश लोगों की चेतना को उन्नत करने की बजाय, लगभग दूसरी पार्टियों की तरह इस्तेमाल होने वाले हथकंडों की नक़ल करती हुई नज़र आयीं. प्रतिस्पर्धा के इस युग में जिस प्रकार मण्डी में छोटा उत्पादन, बड़े स्तर पर होने वाले उत्पादन के आगे, नहीं टिक सकता, उसी तरह, संसदीय वामपंथी पार्टियाँ भी लगातार हाशिये पर आ रही हैं.

लोग चुनावों में हिस्सा क्यों लेते हैं – किस तरह लेते हैं ?

सैद्धांतिक तौर पर कहा जाता है कि चुनाव द्वारा लोग अपनी सरकार चुनते हैं जिसने आनेवाले पॉँच वर्षों के लिए देश या संबंधित राज्य का प्रबंधन संचालित करना  होता है. सरकार इस समग्र राजतन्त्र जिसमें पुलिस, फौज और न्यायपालिका भी सम्मलित होती है, का एक अहम् हिस्सा होती है.  सभ्यता के इतिहास में राज्य-प्रबंधन के सञ्चालन के लिए बननेवाली सरकारों के रूप सदैव एक जैसे नहीं रहे. आदिम समाज के कबीलाई गणराज्यों से चलकर पूरे मध्य युग में राजशाहियों के अलग-अलग रूपों से गुजरते हुए सरकारों का आधुनिक रूप – जिसे जनता की जनता  द्वारा और जनता  के लिए सरकार का नाम दिया जाता है – आज के विश्व में, सरकार का प्रमुख रूप (मॉडल ) है. राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान इसी रूप अथवा मॉडल से संबंधित तथ्यों ने जिस तस्वीर को उभार कर हमारे सामने पेश किया है, उनका संक्षिप्त परिचय और सार निम्नलिखित है.,

1. सबसे पहले, चुनावों के दौरान सबसे अधिक क्रियाशील हिस्सा – राजनीतिक पार्टियाँ और उनके कार्यकर्त्ताओं की बात करें. बड़ी राजनीतिक पार्टियों की टिकट के लिए दौड़, जहाँ प्रचार माध्यम के लिए बड़ा मसाला तैयार करती रही, वहीँ आम जनता में इस संबंधी चर्चा ने पूरी चुनाव मुहीम को दिलचस्प बनाये रखा. टिकट हासिल करने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते हैं – बड़ी गिनती में टिकटों के चाहवान अपने-अपने हक़ में मुहीम लामबद्ध करते हैं.  लोगों की भीड़ जुटाकर दवाब बनाया जाता है. लेकिन दिलचस्प पहलू यह होता है कि वे कौन लोग होते हैं जो इनकी भीड़ जुटाते हैं? ये वहीँ लोग होते हैं जिनकी बहुसंख्यक गिनती को राजनीतिक पार्टियाँ अपने सक्रीय और जमीन से जुड़े हुए कार्यकर्ता बताती हैं. इन्हीं स्थानीय लोगों में, आर्थिक तौर पर प्रभावशाली और राजनीतिक पृष्ठभूमि के परिवारों से कुछ बेहद महत्त्वाकांक्षी नौजवान, नेतृत्त्व की भूमिका निभाते दीखाई देते हैं. गरीब किसान, मध्यम वर्ग और दलित मजदूर वर्ग से भी कुछ लोग , बेशक दूसरे दर्जे की भूमिका निभाने के लिए ही सही, इनका हिस्सा बनते रहते हैं. लोगों के काम निकलवाने के नाम पर बने ये स्वयंभू लोकसेवक, प्रशासन और आम लोगों में मध्यस्ता करने के साथ-साथ, ज्यादातर पुलिस के मुखबिर और टाउट का धंधा करते हैं. किसानों और मध्यम वर्ग का वह हिस्सा जो  पूंजीवाद के विकास के फलस्वरूप उजड़कर ऐयाश, पाकेटमार, चोर, उचका आदि बन जाता है, जिसे मार्क्स लम्पट सर्वहारा कहते हैं, भी इसी तरह का लोकसेवक होता है. ज्यादातर इस प्रकार के लोकसेवकों को, किसी राजनीतिक दल के बड़े नेता की सरपरस्ती हासिल होती है. अक्सर ये छोटे नेता भी अपने साथ, अपनी हैसियत अनुसार, चापलूसों का एक घेरा बनाकर रखते हैं. अपनी इसी हैसियत का प्रयोग ये लोग अपनी आर्थिक हालत को सुधारने के लिए करते हैं. इसमें मुख्य तौर पर सरकारी ठेके लेने के अलावा, पुलिस और राजनीतिक नेताओं की सरपरस्ती में, कई तरह के अवैध धंधे भी शामिल होते हैं. यहीं स्थानीय नेता, शहरों और गांवों में, अपने सरपरस्त  नेता का गुणगान करते हुए, उनकी साफ़-सुथरी और स्वच्छ छवि के व्याखान करते, उनकी शक्ति और सामर्थ्य की कहानिया सुनाते हुए, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री और पार्टी के बड़े नेताओं के साथ उनकी नजदीकी का विश्वास दिलाते हुए, आम वोटरों को अपने मनपसंद लीडर के हक़ में फुसलाते हुए, कभी नहीं थकते. पहले ये नेता, अपने सरपरस्त बड़े नेता के लिए टिकट हेतू भीड़ जुटाते हैं फिर उनकी इच्छानुसार वोट डलवाते हैं. गरीब जनता को मिलनेवाली सरकारी सहूलतें, मिसाल के लिए, बुढापा पेंशन, पीले कार्ड बनवाना, गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को सस्ते रेट का अनाज और मकान  बनवाने के लिए ग्रांट वगैरा, जो आधे-अधूरे तरीके से, केवल मुट्ठीभर लोगों के पास ही पहुंचती हैं – इन्हीं सहूलतों का सेहरा, व्यक्तिगत तौर पर अपने सिर लेते हैं. अपने हक़ में वोट भुगताने के लिए ये नेता जी-जान से कोशिश करते हैं.

2. मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में होनेवाले कुत्ताघसीटी वैसे तो प्रतिदिन चौबीसों घंटे चलती रहती है लेकिन चुनावों के समय इसका नज़ारा बहुत ही दिलचस्प हो जाता है. इन वर्गों से संबंधित लोगों के बयान ही नहीं बदलते, दल भी बदल जाते हैं. आश्चर्य और अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है लेकिन है यह सच कि इन्हीं वर्गों से कुछ लोगों द्वारा एक ही दिन में एक से अधिक दलों में अदला-बदली और आना-जाना होता रहता है  और इस प्रकार अपनी शख्सियत की कायापल्टी करते हुए ये लोग अच्छा खासा मनोरंजक समां भी बांधे रखते हैं.

3. किसी भी चुनाव बूथ पर नजर रखने पर आपको लगेगा कि खाते-पीते घराने के लोग दोपहर से पहले ही अपने मत का प्रयोग कर जाते हैं जबकि सर्वहारा जनता दोपहर बाद आती है. बूथ के आस-पास मौजूद लोगों में चर्चा का  विषय होता है कि मजदूर लोग वोट डालने तब आएंगे जब नकद पैसे वसूल कर लेंगे. इस प्रकार की चर्चा से हम यह गलत निष्कर्ष निकाल लेतें हैं कि केवल मजदूर वर्ग अपना वोट बेचता है लेकिन मध्यम वर्ग नहीं. वह भी प्रभावित होता है, बल्कि ज्यादा प्रभावित होता है. या यूं कहिये कि उसकी प्रभावित होने की औकात ज्यादा है और वह अधिक कीमत लेता है. इस वर्ग का एक हिस्सा राजनीती में इस प्रकार सक्रीय होता है कि वह समाज की बहुसंख्यक  आबादी को प्रभावित करता है और उस बहुसंख्यक आबादी के वोटों को भी वेचने की योग्यता रखता है. मध्यम वर्ग का वोट बेचने का तरीका साधारण न होकर जटिल होता है और जरूरी नहीं होता कि वह मजदूर की भांति मौके पर ही सौदा करे. उसके सौदेवाजी के गुर जटिल और दीर्घकालिक होते हैं. इसी वर्ग ने सरकारी पद,लाइसेंस और ठेके हथियाने होते हैं.इसी वर्ग से उजड़कर लम्पट मजदूर के रूप में प्रकट हुए नए वर्ग  के लोग अपने ही नहीं बल्कि मजदूरों के वोट भी बेच जाते हैं. पूंजीपतियों और धनासेठों से मिलनेवाली सफ़ेद और काले धन की थैलियाँ, बुर्जुआ पार्टियों के लोगों द्वारा, प्राय इन्हीं  लोगों को सौंपी जाती हैं, क्योंकि यही वे लोग होते हैं जो पूंजीपतियों की अपेक्षा मजदूर वर्ग में आसानी से घुल-मिल जाते हैं. उन्हें यह सहूलियत होती है की वे पूंजीपतियों द्वारा लुटाई (???) गई इस धनराशी के एक हिस्से को मजदूरों में बाँट सके लेकिन बड़े हिस्से को स्वयं हड़प कर जाएँ.

4. जहाँ तक मजदूर वर्ग के मतदान करने और वोट बेचने का सवाल है तो जिस प्रकार न चाहते हुए भी वह एक उजरती गुलाम  के रूप में पूंजीपतियों के खेतों और कारखानों में सोलह-सोलह घंटे खटने के लिए विवश होता है – उसे अपनी श्रम-शक्ति को बेचना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार वह मजबूरीवश मतदान करने और वोट बेचने के लिए भी बाध्य होता है. पूंजीपति वर्ग और बुर्जुआ मीडिया के लिए चुनाव भले ही एक जश्न रहा हो लेकिन मजदूर वर्ग से बातचीत करने पर इसकी असलियत कुछ और ही बयान करती नज़र आती है.

5. इस क्रियाशील हिस्से की चर्चा के बाद  लोगों के व्यवहार की चर्चा करें तो जो दृष्टान्त नजर आता है वह एकसार नहीं है. अलग-अलग वर्गों में विभाजित होने के कारण लोग, चुनावों के बारे में एक जैसा दृष्टिकोण नहीं रखते. अमीर लोगों, कारखानेदारों, व्यापारियों, उच्च मध्यम वर्ग,पेशेवर लोग (डॉक्टर वकील आदि) और अमीर किसानों के लिए, सरकार और उसके दरबार में दस्तक देनें का यह एक सुनहरी अवसर होता है. तेजी से अमीर होने की लालसा की पूर्ति हेतू राजतन्त्र और खास करके  नौकरशाही और पुलिसतंत्र के साथ मजबूत गठजोड़ करने के लिए, इस तरह के संपर्क आवश्यक होते हैं. इस कार्य हेतू ये वर्ग चंदे मुहैया करवाते हैं. व्यवहारिक तौर पर ये लोग इस चुनाव प्रक्रिया के साथ पूरी तरह जुड़े होते हैं.

6. देश के उत्पादन के साधनों का मालिक बनी भारत की वर्तमान बुर्जुआ जमात के पास बेचने के लिए वह सबकुछ है जो मजदूरवर्ग ने पैदा किया है. इसी के बदौलत उसकी हैसियत एक अच्छे खरीदार की भी बन जाती है. कहने का अर्थ यह है कि वह बिकता नहीं बल्कि खरीददार होता है. एक वर्ग के रूप में वह अच्छी तरह जानता है कि कौन-कौन से राजनीतिक दल, किस हैसियत और रूप में, किस-किस प्रकार की भूमिका, उसके हितों की रक्षा करने हेतू, निभा सकते हैं. मजदूरों को मजदूरी देते समय कठोर और उग्र स्वभाव का यह पूंजीपति वर्ग इन राजनीतिक दलों को चंदा देते समय एकदम उदार और विनम्र दीखता है.

7. ज्यादातर शहरी और ग्रामीण मजदूर और गरीब किसान और छोटे दुकानदार, जिनकी ज़िन्दगी की खुशहाली के सभी दरवाजे बंद हो चुके हैं, निराशा और बेबसी के शिकार हैं. ये लोग दिल से किसी भी पार्टी या नेता पर विश्वास नहीं करते. ऊपर वर्णित राजनीतिक कार्यकर्त्ता जो अमीर होने की लालसा के चलते, हर प्रकार के नैतिक बंधनों से मुक्त हैं, जब गरीब जनता की बेबसी और मजबूरी को अपने हक़ में भुगतान करवाने में सफल हो जाते हैं, तो यह भ्रम पाल लेते हैं कि गरीब वोटरों को खरीद लिया गया है. हर प्रकार के नशे, पैसा, शराब, धार्मिक और जातीय नेताओं के फरमान और डरावे, इनके आम हथियार हैं.

8. बेहद बुरे, सामाजिक-आर्थिक हालात के प्रतिक्रियास्वरूप कुछ लुम्पन तत्त्व पैदा होते रहते हैं. गरीब आबादी के बीच का लुम्पन हिस्सा, बहुत हद तक और जल्दी ही इन लोगों का दुमछल्ला बन जाता है. पर देखने में आया है कि आम मेहनतकश आबादी का विश्वास यह गँवा चुका है. उत्पादन की क्रिया में जैसे उजरती मजदूर अपनी इच्छा के विपरीत, पूंजीपति की शर्तों पर काम करने के लिए मजबूर है – लगभग उसी तरह अपनी बेबसियों के सदके, यह उनके लिए मतदान करता है.

अपनी प्रसिद्ध रचना ‘परिवार, निजी सम्पति और राज्य की उत्पत्ति’ में फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं,

“इतिहास में अब तक जितने राज्य हुए हैं, उन्में से अधिकतर में नागरिकों को उनकी धन-दौलत के अनुसार कम या ज्यादा अधिकार दिए गए हैं, जिससे यह बात सीधे तौर पर साबित हो जाती है कि राज्य सम्पत्तिवान वर्ग की सम्पत्तिहीन वर्ग से रक्षा करने का एक संगठन है. एथेंस और रोम में ऐसा ही था, जहाँ नागरिकों का संपत्ति अनुसार विभाजन किया जाता था. मध्ययुगीन सामंती राज्य में भी यही हालत थी जहाँ राजनीतिक प्रभाव की मात्रा भू-स्वामित्व के पैमाने से निर्धारित होती थी. आधुनिक प्रातिनिधिक राज्यों में जो मताधिकार-अहर्ता पाई जाती है , उसमें भी यह बात साफ़ दिखाई देती है. तिस पर भी स्वामित्व के भेदों की राजनीतिक मान्यता किसी भी प्रकार अनिवार्य नहीं है : इसके विपरीत, वह राज्य के विकास के निम्न स्तर का द्योतक है. राज्य का सबसे ऊँचा रूप, यानि जनवादी जनतंत्र, जो समाज की आधुनिक परिस्थितियों में अनिवार्यत: आवश्यक बनता जा रहा है और जो राज्य का एकमात्र रूप है जिसमें ही सर्वहारा तथा पूंजीपति वर्ग का अंतिम और निर्णायक संघर्ष लड़ा जा सकता है – यह जनवादी जनतंत्र औपचारिक रूप से स्वामित्व के अंतर का कोई ख्याल नहीं करता. उसमें धन-दौलत अप्रत्यक्ष रूप से, पर और भी ज्यादा कारगर ढंग से, अपना असर डालती है. एक तो सीधे-सीधे राज्य के अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के रूप में, जिसका क्लासिकीय उदाहरण अमरीका है. दूसरे, सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज को अपना केंद्र बनाती हुई न केवल यातायात को, बल्कि उत्पादन को भी अपने हाथ में केन्द्रित करती जाती हैं, उतनी ही अधिक आसानी से यह गठबंधन होता जाता है. अमरीका के अलावा नवीनतम फ्रांसीसी जनतंत्र भी उसके ज्वलंत उदाहरण हैं और नेक बुढे स्विटज़रलैंड ने भी इस क्षेत्र में काफी मार्के की कामयाबी हासिल की है. परन्तु सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज के इस बन्धुत्वपूर्ण गठबंधन की स्थापना करने के लिए जनवादी जनतंत्र की आवश्यकता नहीं है. इसका प्रमाण इंग्लैंड के अलावा नवीन जर्मन साम्राज्य भी है, जहाँ कोई नहीं कह सकता कि सार्विक मताधिकार लागू करने से किसका स्थान अधिक ऊँचा हुआ है -बिस्मार्क का या ब्लाइखरोडर का. अंतिम बात यह है कि सम्पत्तिवान वर्ग सार्विक मताधिकार के द्वारा सीधे शासन करता है. जब तक कि उत्पीडित वर्ग – परिणामस्वरूप इस मामले में सर्वहारा वर्ग – इतना परिपक्व नहीं हो जाता कि अपने को स्वतन्त्र  करने के योग्य हो जाये, तब तक उसका अधिकांश भाग वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को ही एकमात्र संभव व्यवस्था समझाता रहेगा और इसलिए वह राजनीतिक रूप से पूंजीपति वर्ग का दुमछल्ला, उसका उग्र वामपक्ष बना रहेगा. लेकिन जैसे-जैसे यह वर्ग परिपक्व होकर स्वयं अपने को मुक्त करने के योग्य बनाता जाता है, वह अपने को खुद अपनी पार्टी के रूप में संगठित करता है, और पूंजीपतियों के नहीं, बल्कि खुद अपने प्रतिनिधि चुनता है. अतएव, सार्विक मताधिकार मजदूर वर्ग की परिपक्वता की कसौटी है. वर्तमान राज्य में वह इससे अधिक कुछ नहीं है और न कभी हो सकता है; परन्तु इतना काफी है. जिस दिन सार्विक मताधिकार का थर्मामीटर यह सूचना देगा कि मजदूरों में उबाल आनेवाला है , उस दिन मजदूर पूंजीपतियों की ही तरह जान जायेंगे कि उन्हें क्या करना है.”

वे आगे लिखते हैं,

“इस संविधान को अपनी नींव बनाकर सभ्यता ने ऐसे-ऐसे काम कर दिखाए हैं, जो पुराने गोत्र-समाज की सामर्थ्य के बिल्कुल बाहर थे.  परंतु ये काम उसने किये मनुष्य की सबसे नीच अंतर्वृत्तियों  और आवेगों को उभारते हुए और उसकी तमाम अन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचाकर विकसित करते हुए. सभ्यता के अस्तित्व के पहले दिन से लेकर आज तक नग्न लोभ ही उसकी मूल प्रेरणा रहा है. धन कमाओ, और धन कमाओ और जितना बन सके उतना कमाओ ! समाज का धन नहीं, एक अकेले क्षुद्र व्यक्ति का धन – बस यही सभ्यता का एकमात्र और निर्णायक उद्देश्य रहा है. यदि इसके साथ ही समाज में विज्ञान का अधिकाधिक विकास होता गया और समय-समय पर कला के सम्पूर्णतम  विकास के युग भी बार-बार आते रहे, तो इसका कारण केवल यह था कि धन बटोरने में आज जो भारी सफलताएँ प्राप्त हुई हैं, वे विज्ञान और कला की इन उपलब्धियों के बिना प्राप्त नहीं की जा सकती थीं.”

“सभ्यता का आधार चूँकि एक वर्ग का दूसरे वर्ग का शोषण है, इसलिए उसका सम्पूर्ण विकास सदा अविरत अंतर्विरोध के अविच्छिन्न क्रम में होता रहा है. उत्पादन में हर प्रगति साथ ही साथ उत्पीडित वर्ग की, यानि समाज के बहुसंख्यक भाग की अवस्था में पश्चादगति भी होती है. एक के लिए जो वरदान है, दूसरे के लिए आवश्यक रूप से अभिशाप बन जाता है. जब भी किसी वर्ग को नयी स्वतंत्रता मिलती है, तो वह दूसरे वर्ग के लिए नए उत्पीडन का कारण बन जाती है… जहाँ बर्बर लोगों में अधिकारों और कर्त्तव्यों के बीच भेद की कोई रेखा नहीं खिंची जा सकती थी, वहां सभ्यता एक वर्ग को लगभग सारे अधिकार देकर और दूसरे वर्ग पर लगभग सारे कर्त्तव्यों का बोझ लादकर अधिकारों और कर्त्तव्यों के भेद एवं विरोध को इतना स्पष्ट कर देती हैं कि मूर्ख से मूर्ख आदमी भी उन्हें समझ सकता है.” (देखें : Origins of the Family, Private Property, and the State का Chapter IX: Barbarism and Civilization

वर्तमान बुर्जुआ लोकतान्त्रिक प्रणाली जो अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों की वर्गीय राज्य व्यवस्थाओं का निषेद्ध करते हुए वर्तमान विश्व मंच पर अंतरराष्ट्रीय पूँजी की चाकरी हेतू प्रकट हुई है, अपने अंतरविरोधों के कारण, जन्म से ही लूली-लंगडी है जिसका निषेध अवश्यम्भावी है क्योंकि अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों के विपरीत इसने इस वर्गीय समाज के साथ अपनी कब्र खोदनेवाले उस वर्ग को जन्म दिया है जिसे सर्वहारा या उजरती गुलाम कहते हैं. यहीं वह वर्ग है जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता लेकिन पाने के लिए सारा विश्व है. यह सर्वहारा वर्ग ही बुर्जुआ और समाजवादी क्रांतियों की जीत-हार की अमीर विरासत का असली मालिक है. इक्कीसवीं शताब्दी में घटित होने वाली नई समाजवादी क्रांतियों के कार्यभार को संपन्न करवाने हेतू इसने उन बोलेश्विक चरित्र की सच्ची कम्युनिस्ट पार्टियों और नेताओं को भी जन्म देना हैं क्योंकि समाज को आगे की ओर गति देनेवाली क्रांतियाँ स्वयंस्फूर्त ढंग से संम्पन्न नहीं हो सकती. लेकिन चिंता का पहलू यह भी है कि वर्तमान समय का बुद्धिजीवी वर्ग आज के इस युग के क्षुद्र व्यक्ति ‘पूंजीपति’ द्वारा  सर्वहारा की कमाई की निर्मम लूट और इस लूट की भौंडी प्रदर्शनी पर, चुप्पी साधे है जबकि देश और दुनिया के वस्तुपरक हालात, मजदूर वर्ग द्वारा की जानेवाली क्रांतियों के पक्ष में, लगातार विकसित होते जा रहें हैं. भारत के सबसे अधिक विकसित पूंजीवादी राज्यों में से एक हरियाणा के मजदूर प्रतिदिन बारह घंटे से अधिक श्रम करने पर मजबूर हैं क्योंकि सरकार की ओर से निर्धारित की गयी न्यूनतम मजदूरी – 3510  रूपये प्रति महिना, लागू नहीं हो रही.  कोई भी राजनीतिक दल इसके बारे में गंभीर नहीं है. गुडगाँव जैसे शहर में मजदूर असंतोष को लाठियों और गोलियों से दबाया जा रहा है . एक रिपोर्ट अनुसार राज्य की 56  प्रतिशत औरतें और 83  प्रतिशत बच्चे खून की कमी का शिकार हैं. इस प्रकार की स्थिति पर बुद्धिजीवी वर्ग के चुप्पी के इस कष्टदायक और चिंताजनक पहलू पर ब्रटोल्ट ब्रेष्ट के इन शब्दों के साथ इस आलेख को फ़िलहाल यहीं विराम दिया जाता है,

“किस चीज का इंतजार है और कब तक ?
दुनिया को तुम्हारी जरूरत है |”

गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

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एक तरफ तो उत्तर प्रदेश की सरकार ‘सर्वजन हिताय’ होने का दावा करती है लेकिन दूसरी और इस सरकार के गोरखपुर का प्रशासन मजदूरों की बैचैनी का अर्थ उनके माओवादियों से संबंध होने से निकालता है. आज जब दुनिया महामंदी की चपेट में है और वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए लोगों की बचतों को  झोंका जा रहा और पूंजीवाद चाहता है कि कैसे वह इस विश्व महामंदी से निजात पाए, ठीक उसी वक्त,  स्थानीय पेटी-पूंजीपतियों को छोड़ दें तो इस प्रकार की स्थिति में सरकारों का मजदूरवर्ग से इस तरह के निम्न स्तर के हथकंडों का इस्तेमाल करते हुए उलझना स्वयं पूंजीपति वर्ग को भी नापंसंद होगा. पूंजीवाद की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा उपभोग भी होती है ताकि माल मंडियों में बिक जाये. क्या मजदूर वर्ग की जेब में कुछ डाले बिना मार्केट या देश को मंदी से उभारा जा सकता है?

भारत जैसे देश में तुलनात्मक रूप से उत्पादन क्रिया के दौरान मजदूरों पर होनेवाले खर्च में लगातार गिरावट आ रही है अर्थात देश की कुल पैदावार में मजदूरों के हिस्से केवल ६ प्रतिशत ही आता है जबकि उनकी संख्या ८४ करोड़ है. लेकिन खाने-पीने की बुनियादी चीजों के दामों में बढोत्तरी ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. मजदूरों के लिए जीवन-निर्वाह करना भी मुश्किल होता जा रहा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पूंजीपति एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण अनुसार भारत दुनिया के सबसे सस्ती मजदूरी वाले देशों में से एक है. उनके अनुसार यह स्थिति आगामी अठारह-बीस सालों तक बनी रहेगी. उनके अनुसार यहाँ की इस सस्ती श्रम का लाभ विश्व पूंजी को ही होना है.यहीं नहीं वे भारत को एक बड़ी मंडी के रूप में भी देखते हैं जहाँ माल खपाया जा सकता है. चीन के बाद भारत दूसरा देश है जहाँ विकास दर सबसे ऊँची है. लेकिन मजदूरों की मजदूरी में होनेवाली थोडी-बहुत बढोत्तरी बुनियादी वस्तुओं की कीमत के मुकाबले बढ़ने की अपेक्षा कम हों तो कैसे मजदूर अपना जीवन निर्वाह कर पायेगा? क्या  स्वयं पूंजीवादी के तर्कानुसार भी इस प्रकार का रवैया उचित है?

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गोरखपुर : अपने परिवारों समेत धरने पर बैठे महिला एवं पुरुष मजदूर

पूंजी के अपने तर्क अनुसार किसी भी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए जरूरी होता है कि मजदूरी में बढोत्तरी हो ताकि मजदूर ज्यादा वस्तुएं खरीद सकें. लेकिन गोरखपुर जैसे शहर में जहाँ मजदूर अपनी थोडी सी मजदूरी, रोजगार सुरक्षा और यूनियन बनाने के बुनियादी लडाई ही लड़ रहे हैं, उन्हें माओवादी कहना कहाँ तक उचित है? सबसे चिताजनक पहलू यह है की मजदूरों के बीच की हर तरह की बैचैनी का हल निकालने की बजाय उसे माओवादी-आतंकवादी कार्रवाई कहकर कुचलने की कोशिश की जाती है और उनके लीडरों पर झूठे केस बनाए जाते हैं और मजदूर नेताओं को जेलों में डाला जाता है.

उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करते समय देश की कार्यपालिका और न्यापालिका जैसी संस्थाओं का रवैया ज्यादा से ज्यादा मजदूर विरोधी होता गया है. गुडगाँव जैसे औद्योगिक नगर जहाँ एक मजदूर की मौत पर एक लाख मजदूरों की बड़ी संख्या सड़कों पर आ जाती , वहां पर भी मजदूरों को यूनियन तक बनाने की इजाजित नहीं है. रिको ऑटो कंपनी के संचालक मजदूरों के हड़ताल पर जाने और यूनियन बनाने को गैर-कानूनी कार्य कहते हैं. इसे ऐतिहासिक प्रसंग में देखें तो यह सही भी है क्योंकि मजदूरवर्ग की लहर के विपर्य के इस दौर में मजदूरों ने यूनियन बनाने, धरना देने, हड़ताल करने और गेट मीटिंगे औयोजित करने के अधिकारों को खो दिया है. उन्हें आज अपनों संघर्षों द्वारा जीते इन बुनियादी अधिकारों की रक्षा ही सबसे बड़ा कार्यभार लगता है जबकि वर्गों में विभाजित समाज में ये अधिकार भी उसी तरह गतिशील होते हैं जिस तरह समाज. अपने कालजयी संघर्षों द्वारा जीते गए इन अधिकारों को खो देना उन्हें निराश करता ही रहेगा जब तक वे स्वयं को राजनीतिक चेतना से चाकचौबंद नहीं करेंगे और इस वर्ग विभाजित व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन नहीं कर देंगे. गुडगाँव तो औद्योगिक उपक्रमों की हब है. इसके अलावा भारत के कोने-कोने में छोटे बड़े लाखों औद्योगिक उपक्रमों में देश के मजदूर वर्ग की आबादी का ९३ प्रतिशत भाग काम कर रहा है. मजदूरों की इस बड़ी तादाद को असंगठित मजदूर यानिकि वह मजदूर जो किसी मजदूर ट्रेड यूनियन का भाग नहीं है, कहते हैं. देश के इन छोटे और मझौले उपक्रमों में कार्य करनेवाले मजदूरों की बैचैनी ने हड़ताल और धरने  का रूप भी लेना है. पूंजीपतियों की आपसी गलाकाट होड़ के चलते और मंडी के उतार-चढाव और मंदी का ज्यादा असर छोटी पूंजी पर अधिक पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि  मजदूर वर्ग के हितों की अनदेखी करके इन उपक्रमों की रखवाली की जाये. लेकिन प्रशासन और सरकारी नुमाँईन्दो का इन पेटी-बुर्जुआ पूंजीपतियों और उनके गुंडों से साँठगाँठ   चिंता का विषय है. सरकार के लिए सोचने वाली बात यह भी है कि क्या मजदूरों और उनको नेताओं को माओवादी आतंकवादी कहकर झुट्ठे मुकद्दमों में फँसाना खुद पूंजीपति वर्ग या व्यवस्था के लिए ठीक है?

किसी प्रकार का आंतंकवाद चाहे वह धार्मिक मूलवादी खेमे की ओर से हो या वामपंथी दुस्साहसवाद के रूप में हो, निंदनीय है. सत्ताधारी वर्ग की दमनकारी नीतियाँ भी हर प्रकार का आतंकवाद पैदा करती हैं. सत्ताधारी वर्ग के राजकीय आतंकवाद  के परिणामस्वरूप धार्मिक मूलवादी आतंकवाद, दक्षिणपंथी आतंकवाद, वामपंथी आतंकवाद आदि, की फसल उगने की उपजाऊ भूमि तैयार होती है.हर किस्म का आतंकवाद मजदूर वर्ग की एकता और सांगठनिक क्षमता को कमजोर करता है… लेकिन गोरखपुर के स्थानीय प्रशासन द्वारा मजदूरों को माओवादियों से जोड़ना चिंता का विषय है. अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक  तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी. जी  पहले यह कह चुके हैं कि गोरखपुर में नक्सली नहीं है.

यूनिसेफ  की रिपोर्ट अनुसार पिछले ४० वर्षों के अन्तराल के बाद ग्लोबल वित्तीय संकट और ईंधन, भोजन और चारे की कीमतों में बढोत्तरी के कारण दक्षिण एशिया भूखमरी की उच्चतम शिखर को छू रहा है. इसमें कोई शक नहीं की उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी सेक्टरों और कृषि में भी बढ़िया विकास करते दिखाई गयी है लेकिन विडम्बना देखीए कि भरपूर अनाज पैदा होने के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा की हालत में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है. यह उपहास नहीं तो और क्या है कि उडीसा जैसे राज्य में अब भी लोग भूख से मर रहे हैं जबकि वेयरहाउस और गोदामों में अनाज सड रहा है?

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गोरखपुर : हड़ताल के दौरान सामूहिक रसोई

यहीं नहीं एम्.एस स्वामीनाथन रीसर्च फ़ाऊँडेशन (MSSRF) और विश्व खाद्य कार्यक्रम  (WFP) द्वारा एक रिपोर्ट तैयार करवाई गयी. इसमें कहा गया कि भोजन में प्रयाप्त पौष्टिक तत्त्वों की कमी के कारण  भारत का हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का शिकार है और ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2001 के अनुसार भारत का क्रमांक 94 है.

लेकिन पूंजीपति वर्ग खुश होता है कि विश्वमंदी  का भारत पर असर नहीं हुआ है. संसेक्स में फिर उछाल देखने को मिल रही है. प्रथम फिस्कल छमाही के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में ऑटो सेक्टर की विक्री में बढोत्तरी १४.५१ प्रतिशत रही है. इस प्रकार की बातें पूंजीपति लोगों और उनकी सरकारों को अच्छी लगती हैं. लेकिन ऑटो सेक्टर की हब रहे गुडगाँव जैसे शहर में पूंजीपतियों के किराये के गुंडों के हाथों होनेवाली मजदूर की मौत के बाद एक लाख मजदूरों का प्रदशर्न उन्हें परेशान कर देता है. तेरह-तेरह वर्षों से कार्यरत पंकज कुमार सिंह जैसे मजदूर अपनी मजदूरी से संतुष्ट नहीं हैं. अपनी जायज मांगों को मनमाने के लिए जब वे यूनियन बनाने की पहलकदमी करते हैं तो मैनेजमेंट स्थानीय प्रशासन और अपने निजी गुंडों की मदद से उन्हें दबाने की कोशिश करती है. पूंजीपतियों की मुनाफा कमाने की हवस मजदूरों को इंसान समझती ही नहीं. उन्हें तो चाहिए इन्सान के रूप में एक ऐसा मशीन का पूर्जा जो मशीन के दूसरे पूर्जों से मिलकर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करे. पूंजीपति यह देख ही नहीं पाते कि मशीन और इन्सान में बुनियादी फर्क है. मशीन अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष पैदा नहीं कर सकती. यह केवल मजदूर की श्रम-शक्ति से ही संभव होता है. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपतियों का मुनाफा, मैनेजमेंट के खर्चे और कार्पोरेट टैक्स जिससे सरकारे चलती हैं, आता है.

गुडगाँव की रिको ऑटो कंपनी के मजदूर की हत्या पर भारत की न्यूज एजेंसी पी.टी.आई . अपनी टिपण्णी में यह बात स्वीकार करती है कि गुडगाँव-मानेसर बेल्ट में मजदूर असंतोष कोई नई बात नहीं है. पहले २००० में मारुती उद्योग की मजदूरों की तीन महीने की हड़ताल और फिर २००५ में होंडा मोटर्स एंड स्कूटर के मजदूरों पर पुलिस द्वारा अधाधुंध लाठीचार्च जिसमें १६७ मजदूरों के घायल हुए थे, को नोट करते हुए पला झाड़ लेती है जैसे यह रूटीन की सामान्यतय घटने वाली बातें हों. लेकिन स्थिति का दूसरा पहलू यह भी है कि २००० और फिर २००५ और अब २००९ में मजदूरों का एकसाथ इतनी बड़ी तादाद में खड़े हो जाना, और फिर इन वर्षों के बीच का अन्तराल इतना बड़ा नहीं है कि इतिहास के लिए यह कोई दूर की बात हो. मजदूर वर्ग के असंतोष और वैचैनी के यहीं वे सिग्नल हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग द्वारा ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग की हमदर्द पार्टियों और बुद्धिजीवियों द्वारा नज़रंदाज किया जाता है. मजदूरों के प्रारंभिक सिग्नल भले ही किसी नज़दीक की क्रांति की और संकेत नहीं करते लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग को इन्हीं सिग्नलों को समझना है और इतिहास में अपने स्थान और जिम्मेदारी का भलीभांति निर्वाह करना है.

गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता
गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता

आज मजदूर वर्ग और क्रांतिकारी खेमा अलगाव और विखराव का शिकार है. लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी चुप्पी साधे हुए है. बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का समर्थन और हमदर्दी हमेशा मजदूरवर्ग से रही है. अपनी उच्चतम बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी बुद्धिजीवी लोग अपने स्वयं के वर्ग की सीमाओं को तोड़कर मजदूरों के साथ खड़े होते रहें है. बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा स्वयं को मजदूर वर्ग से अपने आप को अभेद भी पाता रहा है. लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. क्या भारत का बुद्धिजीवी इतना आत्मसंतुष्ट हो सकता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर हाँ  में है तो उसके बुद्धिजीवी होने पर प्रश्नचिह्न लगता है! लेकिन इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होती और न हो सकती है. समाजवादी खेमे के ढह-ढेरी हो जाने  के बाद हम भी मानते हैं कि समाज को आगे की ओर गति देने वाले आंदोलनों या क्रांतियों की प्रासंगिगता पर प्रश्न चिह्न लगा था और पूंजीवाद के अजर-अमर होने के भ्रम को भी खूब हवा मिली थी. अब स्थिति वैसी भी नहीं है. पूंजीवादी एक के बाद एक नए संकटों में फंसता जा रहा है. बुद्धिजीवियों के स्तर के अनुसार पूंजीवाद में भी ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें एक पल के लिए भी संतुष्ट कर पाए. इस प्रकार की स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रह सकती. यह बुद्धिजीवी वर्ग ही होता है जिसने सबसे पहले अपनी चुप्पी तोड़नी होती है क्योंकि अपनी संवेदनशीलता के कारण वहीँ पहला वर्ग होता है जो सबसे पहले टूटता है.

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गोरखपुर : इस पूरे आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया

देश में चुनाव हों लेकिन बुनियादी मुद्दे गायब हों ! एक ऐसा वक्त जब आम जनता अपने जिंदा रहने की लडाई लड़ रही हो और चुनावों में भाग लेनेवाली पार्टियों की ओर से अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जाना ! इसके अलावा राजनीतिक दलों की बहसों का स्तर इतना निम्न स्तर का कि बुद्धिजीवी तो क्या आम आदमी भी इसका नोटिस लेने से नहीं बच पाया. विचारधारात्मक, सैद्धांतिक और राजनीतिक बहस सिरे से ही गायब थी. सामाजिक बहस में भी मुद्दे गायब थे. केवल जोड़तोड़ या तिकड़म द्वारा किस दल की सरकार बनेगी, जैसी चर्चाओं पर अटकलबाजी होती रही. इस प्रकार की स्थिति पर  देश के बुद्धिजीवी वर्ग का मूक दर्शक बने रहना नागरिक समाज के लिए नुकसानदेय है. इतिहास में उसे अपनी भूमिका और स्थान की पहचान करनी ही होगी.

पूंजीपतियों के गुंडों द्वारा गुडगाँव में मजदूर की हत्या और गोरखपुर के मजदूर और मजदूर नेताओं पर झूठे मुकद्दमे निंदनीय हैं. मजदूर वर्ग के हितों पर इस प्रकार का कुठारघात असहनीय है. पूंजीपति इसके लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने पर तुले हुए हैं. हमारे पडौसी देश नेपाल जहाँ पशुओं की हत्या और अत्याचार पर रोक संबंधी बहस चल रही है और हमारे यहाँ मजदूरों पर इस तरह के जुर्म किये जा रहे हैं. नेपाल जैसे पिछडे देश के साथ तुलना करते समय हमारा सीना गर्व से फूल जाता हैं लेकिन अपने ही देश में पशुओं पर नहीं बल्कि इंसानों और मजदूरों पर होनेवाले जुर्म पर हम मूक बने रहते हैं, क्या इस प्रकार की स्थिति शोभनीय है? बुद्धिजीवी वर्ग को सोचना होगा कि सभ्य समाज को इस वक्त अगर कोई खतरा है तो वह पूंजीपतियों के गुंडों की दहशत और प्रशासनिक मिलीभगत से ही है. उसे अपना प्रतिरोध दर्ज करवाना होगा. यही समय की मांग है.

उपरोक्त पोस्ट पर लगी हुई सभी तस्वीरें नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ से धन्यवाद सहित ली गयी हैं.

गोरखपुर के मजदूर संघर्ष से संबंधित पोस्टें :

आग्नेय अक्टूबर

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अक्टूबर क्रांति की ९२वीँ वर्षगांठ पर

बोल्शेविकों ने विद्रोह की ज़ोरदार तैयारियाँ शुरू कीं। लेनिन ने कहा कि दोनों राजधानियों – मास्को और पेत्रोग्राद – में मज़दूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियतों में बहुमत हासिल करने के बाद, बोल्शेविक अपने हाथ में राज्यसत्ता ले सकते हैं, और उन्हें लेना चाहिए। तय किये हुए रास्ते पर नज़र डालते हुए, लेनिन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि `जनता का बहुमत हमारे साथ है।´ अपने लेखों और केन्द्रीय समिति और बोल्शेविक संगठनों के नाम अपने ख़तों में, लेनिन ने विद्रोह की एक विस्तृत योजना बनायी और बतलाया कि फौजी दस्ते, जल-सेना और रेड गार्ड दस्तों को किस तरह इस्तेमाल करना चाहिए, विद्रोह की सफलता निश्चित करने के लिए पेत्रोग्राद के किन मुख्य स्थानों पर कब्ज़ा करना चाहिए, इत्यादि।

7 अक्टूबर को, लेनिन गुप्त रूप से फिनलैण्ड से पेत्रोग्राद आये। 10 अक्टूबर 1917 को, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ऐतिहासिक बैठक हुई जिसमें अगले कुछ दिनों में सशस्त्र विद्रोह आरम्भ करने का फैसला किया गया। पार्टी की केन्द्रीय समिति के ऐतिहासिक प्रस्ताव में, जिसे लेनिन ने लिखा था, कहा गया था :

“केन्द्रीय समिति यह समझती है कि रूसी क्रान्ति की अन्तरराष्ट्रीय परिस्थिति (जर्मन जल-सेना में विद्रोह, जो समूचे यूरोप में विश्व समाजवादी क्रान्ति का चरम प्रदर्शन है, रूस की क्रान्ति का गला घोंटने के उद्देश्य से साम्राज्यवादियों के बीच शान्ति की धमकी), साथ ही सैनिक परिस्थिति (रूसी पूँजीपतियों और केरेन्स्की एण्ड कम्पनी का यह निश्चित फैसला कि पेत्रोग्राद जर्मनों को सौंप दिया जाये) और सोवियतों में सर्वहारा पार्टी का बहुमत हासिल करना, – यह सब और इसके साथ यह कि किसान-विद्रोह हो रहे हैं और आम जनता का विश्वास तेज़ी से पार्टी पर जम रहा है (मास्को के चुनाव), और अन्त में एक दूसरे कार्निलोव काण्ड के लिए जो खुली तैयारी हो रही है (पेत्रोग्राद से फौजें हटाना, मास्को और मिंस्क में हमारी जनता की कार्रवाई वग़ैरह) पर विचार करें और फैसला करें।” (लेनिन, संकलित रचनाएँ, अंग्रेज़ी संस्करण, खण्ड 2, पृष्ठ 135)

केन्द्रीय समिति के दो सदस्य, कामेनेव और ज़िनोवियेव, इस ऐतिहासिक प्रस्ताव के खिलाफ बोले और उन्होंने उसके विरुद्ध वोट दिया। मेंशेविकों की तरह, वे पूँजीवादी संसदीय जनतन्त्र का सपना देखते थे और मज़दूर वर्ग पर यह कहकर कीचड़ उछालते थे कि समाजवादी क्रान्ति करने के लिए वह काफी मज़बूत नहीं है, कि वह सत्ता हाथ में लेने के लिए काफी परिपक्व नहीं है।

हालाँकि इस बैठक में त्रात्स्की ने सीधे इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट नहीं दिया, फिर भी उसने एक संशोधन रखा जिससे विद्रोह की सम्भावना नहीं के बराबर हो जाती और विद्रोह निष्फल हो जाता। उसने प्रस्ताव रखा कि सोवियतों की दूसरी कांग्रेस शुरू होने से पहले विद्रोह शुरू न किया जाये। इस प्रस्ताव का मतलब था – विद्रोह में विलम्ब करना, उसकी तारीख़ ज़ाहिर कर देना और अस्थायी सरकार को आगाह कर देना।

बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति ने विद्रोह का संगठन करने के लिए अपने प्रतिनिधियों को दोन्येत्स प्रदेश, यूराल, हैलसिंगफोर्स, क्रोन्स्तात, दक्षिण-पश्चिमी मोर्चा और दूसरी जगहों पर भेजा। पार्टी ने ख़ासतौर से सूबों में विद्रोह का संचालन करने के लिए कामरेड बोरोशिलोव, मोलोतोव, जरजन्स्की, ओजानिकित्से, किरोव, कगानोविच, कुइवीशेव, फ्रुन्जे, यारोस्लाव्स्की और दूसरे साथियों को मुकर्रर किया। कामरेड ज्दानोव ने यूराल में शंद्रिस्क की फौज में काम जारी रखा। केन्द्रीय समिति के प्रतिनिधियों ने सूबों के बोल्शेविक संगठनों के प्रमुख सदस्यों को विद्रोह की योजना बतायी और पेत्रोग्राद के विद्रोह का समर्थन करने के लिए उन्हें तैयार रहने के लिए बटोरा।

पार्टी की केन्द्रीय समिति के निर्देश से, पेत्रोग्राद-सोवियत की एक क्रान्तिकारी फौजी कमेटी बनायी गयी। यह संस्था विद्रोह का कानूनी तौर पर चलने वाला हेडक्वार्टर बन गयी। उधर क्रान्ति-विरोधी भी जल्दी-जल्दी अपनी शक्ति बटोर रहे थे। फौज के अफसरों ने एक क्रान्ति-विरोधी संगठन बनाया, जिसका नाम अफसरों की सभा था। हर जगह क्रान्ति विरोधियों ने लड़ाकू दस्ते बनाने के लिए हेडक्वार्टर कायम किये। अक्टूबर के अन्त तक, क्रान्ति विरोधियों की कमान में 43 लड़ाकू दस्ते बन गये। सेण्ट जॉर्ज के क्रॉस को मानने वालों के ख़ास दस्ते बनाये गये।

केरेन्स्की की सरकार ने शासन केन्द्र पेत्रोग्राद से मास्को ले जाने के सवाल पर विचार किया। इससे स्पष्ट हो गया कि शहर में विद्रोह रोकने के लिए वह पेत्रोग्राद को जर्मनों के हाथ सौंपने की तैयारी कर रही है। पेत्रोग्राद के मज़दूरों और सैनिकों के विरोध ने अस्थायी सरकार को पेत्रोग्राद में ही रहने पर मजबूर किया।

16 अक्टूबर को, पार्टी की केन्द्रीय समिति की एक विस्तृत बैठक हुई। इस बैठक में विद्रोह का संचालन करने के लिए एक पार्टी केन्द्र चुना गया, जिसके अगुआ कामरेड स्तालिन थे। यह पार्टी केन्द्र पेत्रोग्राद-सोवियत की क्रान्तिकारी फौजी कमेटी का प्रमुख नेतृत्व था और समूचे विद्रोह का अमली संचालन उसके हाथ में था।

केन्द्रीय समिति की बैठक में, समर्पणवादियों – ज़िनोवियेव और कामेनेव ने विद्रोह का फिर विरोध किया। यहाँ मुँह की खाकर, उन्होंने विद्रोह के खिलाफ, पार्टी के खिलाफ खुल्लमखुल्ला अख़बारों में लिखा। 18 अक्टूबर को, मेंशेविक अख़बार नोवाया जीज्न (नव जीवन) ने कामेनेव और ज़िनोवियेव का बयान छापा, जिसमें कहा गया था कि बोल्शेविक विद्रोह की तैयारी कर रहे हैं और वे (कामेनेव और ज़िनोवियेव) समझते हैं कि यह दुस्साहसपूर्ण जुआ खेलना है। इस तरह, कामेनेव और ज़िनोवियेव ने दुश्मन को केन्द्रीय समिति का विद्रोह सम्बन्धी फैसला बता दिया( उन्होंने यह प्रकट कर दिया कि कुछ ही दिनों में विद्रोह शुरू करने की योजना बनायी गयी है। यह ग़द्दारी थी। इस सिलसिले में, लेनिन ने लिखा था : “कामेनेव और ज़िनोवियेव ने सशस्त्र विद्रोह के बारे में अपनी पार्टी की केन्द्रीय समिति का फैसला दग़ाबाज़ी से रोद्जियांको और केरेन्स्की को बतला दिया है।” लेनिन ने केन्द्रीय समिति के सामने ज़िनोवियेव और कामेनेव को पार्टी से निकालने का सवाल रखा।

ग़द्दारों से चेतावनी पाकर, क्रान्ति के दुश्मन तुरन्त ही, इस बात के उपाय करने लगे कि विद्रोह को रोक दें और क्रान्ति के संचालक दल – बोल्शेविक पार्टी – का नाश कर दें। अस्थायी सरकार ने एक गुप्त बैठक बुलायी, जिसमें बोल्शेविकों का मुकाबला करने के लिए क्या उपाय किये जायें, इसका फैसला हुआ। 19 अक्टूबर को, अस्थायी सरकार ने युद्ध के मोर्चे से जल्दी-जल्दी फौजें पेत्रोग्राद बुलायीं। सड़कों पर भारी पहरा लगा दिया गया। क्रान्ति विरोधी ख़ासतौर से मास्को में भारी फौज इकट्ठा करने में कामयाब हुए। अस्थायी सरकार ने एक योजना बनायी कि सोवियतों की दूसरी कांग्रेस शुरू होने से पहले बोल्शेविक केन्द्रीय समिति के हेडक्वार्टर स्मोल्नी पर हमला किया जाये और उस पर कब्ज़ा कर लिया जाये और बोल्शेविक संचालन-केन्द्र का नाश कर दिया जाये। इसी उद्देश्य से, हुकूमत ने पेत्रोग्राद में वह फौज बुलायी जिसकी वफ़ादारी पर उसे भरोसा था।

लेकिन, अस्थायी सरकार की ज़िन्दगी के दिन और घण्टे भी गिनती के रह गये थे। समाजवादी क्रान्ति की विजय-यात्रा को अब कोई भी नहीं रोक सकता था। 21 अक्टूबर को, बोल्शेविकों ने सभी क्रान्तिकारी फौजी दस्तों के पास क्रान्तिकारी फौजी समिति के कमिसार भेजे। विद्रोह होने से पहले के बचे हुए दिनों में फौजी दस्तों, मिलों और कारख़ानों में कार्रवाई की ज़ोरदार तैयारी की गयी। युद्धपोत अव्रोरा और जारियास्वोबोदी के लिए भी निश्चित निर्देश भेजे गये।

पेत्रोग्राद सोवियत की एक बैठक में, त्रात्स्की ने डींग हाँकने की जीम में दुश्मन को वह तारीख़ बतला दी जब बोल्शेविक सशस्त्र विद्रोह शुरू करने वाले थे। केरेन्स्की सरकार विद्रोह को असफल न कर दे, इसलिए पार्टी की केन्द्रीय समिति ने फैसला किया कि निश्चित किये हुए समय से पहले ही विद्रोह शुरू कर दिया जाये और आखिरी मंज़िल तक ले जाया जाये। उसने विद्रोह की तारीख़ सोवियतों की दूसरी कांग्रेस के शुरू होने से पहले के दिन रखी। 24 अक्टूबर (6 नवम्बर) को सुबह तड़के, केरेन्स्की ने हमला शुरू कर दिया। उसने बोल्शेविक पार्टी के केन्द्रीय पत्र रबोचीपूत (मज़दूर पथ) को बन्द करने का हुक्म दिया और सम्पादकीय दफ़्तर और बोल्शेविकों के छापेख़ाने पर हथियारबन्द गाड़ियाँ भेजीं। लेकिन 10 बजे सबेरे तक, कामरेड स्तालिन के निर्देश पर, रेड गार्डों के दस्तों और क्रान्तिकारी सैनिकों ने हथियारबन्द गाड़ियों को पीछे ठेल दिया और छापेख़ाने और रबोचीपूत के सम्पादकीय दफ़्तरों पर और ज्यादा पहरा बिठा दिया। लगभग 11 बजे सबेरे रबोचीपूत प्रकाशित हुआ, जिसमें अस्थायी सरकार का तख्ता उलट देने के लिए आह्वान था। उसी समय, विद्रोह के पार्टी केन्द्र के निर्देश से क्रान्तिकारी सैनिकों और रेड गार्डों के दस्ते स्मोल्नी की तरफ दौड़ाये गये। विद्रोह शुरू हो गया।

24 अक्टूबर की रात को, लेनिन स्मोल्नी आ पहुँचे और उन्होंने खुद विद्रोह के संचालन का भार सँभाला। उस रातभर फौज के क्रान्तिकारी दस्ते और रेड गार्डों के जत्थे बराबर स्मोल्नी आते रहे। बोल्शेविकों ने शीतप्रासाद घेरने के लिए, जहाँ अस्थायी सरकार ने अपना अड्डा बनाया था, उन्हें राजधानी के केन्द्र की तरफ भेजा। 25 अक्टूबर (7 नवम्बर) को, रेड गार्डों के दस्तों और क्रान्तिकारी सैनिकों ने रेलवे स्टेशनों, डाकख़ानों, तारघरों, मन्त्री-गृहों और राज्य बैंक पर कब्ज़ा कर लिया।

प्रेद पार्लियामेण्ट भंग कर दी गयी।

बोल्शेविक केन्द्रीय समिति और पेत्रोग्राद सोवियत का हेडक्वार्टर, स्मोल्नी क्रान्ति का हेडक्वार्टर बन गया, जहाँ से लड़ाई के बारे में सभी हुक्म भेजे जाते थे। पेत्रोग्राद के मज़दूरों ने उन दिनों दिखला दिया कि बोल्शेविक पार्टी की देखरेख में उन्होंने कैसी महान शिक्षा पायी है। फौज के क्रान्तिकारी दस्तों ने, जिन्हें बोल्शेविकों के काम ने विद्रोह के लिए तैयार किया था, नपे-तुले ढंग से लड़ाई की आज्ञाओं का पालन किया और वे रेड गार्डों के दस्तों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़े। जल सेना फौज से पीछे न रही। क्रोन्स्तात बोल्शेविक पार्टी का गढ़ था और बहुत दिन पहले ही अस्थायी सरकार का प्रभुत्व मानने से इन्कार कर चुका था। युद्धपोत अव्रोरा ने अपनी तोपें शीतप्रासाद की तरफ मोड़ दीं और, 25 अक्टूबर को, उनकी घन गरजन ने एक नया युग आरम्भ किया, महान समाजवादी क्रान्ति का युग आरम्भ किया।

25 अक्टूबर (7 नवम्बर) को, बोल्शेविकों ने (रूस के नागरिकों के नाम) एक घोषणापत्र निकाला। इसमें कहा गया था कि पूँजीवादी अस्थायी सरकार हटा दी गयी है और राज्यसत्ता सोवियतों के हाथ में आ गयी है।

अस्थायी सरकार ने कैडेटों और लड़ाकू जत्थों की छत्रछाया में शीतप्रासाद में शरण ली थी। 25 अक्टूबर की रात को क्रान्तिकारी मज़दूरों, सैनिकों और जहाज़ियों ने शीतप्रासाद पर हल्ला बोलकर कब्ज़ा कर लिया और अस्थायी सरकार को गिरफ़्तार कर लिया। पेत्रोग्राद में सशस्त्र विद्रोह की विजय हुई।

सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस 25 अक्टूबर (7 नवम्बर) 1917 की शाम को 10 बजकर 45 मिनट पर स्मोल्नी में शुरू हुई, जबकि पेत्रोग्राद का विद्रोह विजय गौरव से दमक रहा था और राजधानी में सत्ता सचमुच पेत्रोग्राद सोवियत के हाथ में आ गयी थी। कांग्रेस में बोल्शेविकों को भारी बहुमत मिला। मेंशेविकों, बुन्दवादियों और दक्षिणपन्थी समाजवादी क्रान्तिकारियों ने देखा कि अब उनके दिन बीत चुके हैं, इसलिए वे कांग्रेस से बाहर चले गये और उन्होंने ऐलान किया कि वे कांग्रेस के काम में हिस्सा लेने से इन्कार करते हैं। सोवियतों की कांग्रेस में उनका एक बयान पढ़ा गया, जिसमें उन्होंने अक्टूबर क्रान्ति को एक `फौजी षड्यन्त्र´ बताया था। कांग्रेस ने मेंशेविकों और समाजवादी क्रान्तिकारियों की निन्दा की और उनके चले जाने पर अफसोस करना तो दूर, उसका स्वागत किया। कांग्रेस ने ऐलान किया कि ग़द्दारों के चले जाने से अब वह मज़दूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सच्ची क्रान्तिकारी कांग्रेस हो गयी है।

कांग्रेस ने ऐलान किया कि सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में आ गयी है। सोवियतों की दूसरी कांग्रेस के घोषणापत्रा में कहा गया :

“मज़दूरों, सैनिकों और किसानों के भारी बहुमत का समर्थन पाकर और पेत्रोग्राद में होने वाले मज़दूरों और सैनिकों के सफल विद्रोह का समर्थन पाकर, कांग्रेस अपने हाथ में सत्ता लेती है।”

26 अक्टूबर (8 नवम्बर) 1917 की रात को, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस ने शान्ति सम्बन्धी आज्ञप्ति स्वीकार की। कांग्रेस ने युद्ध करने वाले देशों का आह्वान किया कि कम से कम तीन महीने के लिए सुलह कर लें, जिससे शान्ति की बातचीत की जा सके। कांग्रेस ने एक तरफ तो युद्ध करने वाले देशों की जनता और वहाँ की सरकारों से अपनी बात कही, दूसरी तरफ उसने ‘संसार के तीन प्रमुख राज्यों यानी ब्रिटेन, फ्रांसिस और जर्मनी के वर्ग-चेतन मज़दूरों से’ अपील की। उसने इन मज़दूरों से कहा कि वे ‘शान्ति के उद्देश्य को सफलता की मंज़िल तक ले जाने में और साथ ही सभी तरह की गुलामी और शोषण से मेहनतकश और शोषित जनता की मुक्ति के उद्देश्य को सफलता की मंज़िल तक ले जाने में’ मदद करें। उसी रात को, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस ने भूमि सम्बन्धी आज्ञप्ति स्वीकार की जिसमें कहा गया था : “भूमि पर ज़मींदारों की मिल्कियत बिना मुआवज़े के तुरन्त ख़त्म की जाती है।” खेती के इस कानून का आधार किसानों का एक निर्देश पत्र (नकाज, मैण्डेट) था, जो अलग-अलग जगहों के किसानों के 242 मैण्डेटों को मिलाकर बनाया गया था। इसके अनुसार, ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत हमेशा के लिए ख़त्म कर दी गयी और उसके बदले सार्वजनिक या राज्य की मिल्कियत कायम हुई। ज़मींदारों, ज़ार के परिवार और मठों की ज़मीन बिना पैसा दिये हुए सभी मेहनतकशों को इस्तेमाल के लिए देने का हुक्म हुआ।

इस आज्ञापत्र से, किसानों ने अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति से 15 करोड़ देस्यातिन (40 करोड़ एकड़ से ऊपर) ज़मीन पायी जो पहले ज़मींदारों, पूँजीपतियों, ज़ार के परिवार, मठों और गिरजाघरों के पास थी।

इसके अलावा, किसानों को उस लगान से मुक्त कर दिया गया जो वे ज़मींदारों को देते थे और जो सालाना 50 करोड़ स्वर्ण रूबल होता था।

खनिज पदार्थों के तमाम साधन (तेल, कोयला, धातुएँ, वग़ैरह), जंगल और जलाशय जनता की सम्पत्ति हो गये।

अन्त में, सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस ने पहली सोवियत सरकार बनायी – जनकमिसारों की समिति बनायी जिसमें सभी बोल्शेविक थे। जनकमिसारों की पहली समिति के पहले सभापति लेनिन चुने गये।

इससे सोवियतों की दूसरी ऐतिहासिक कांग्रेस का काम ख़त्म हुआ।

कांग्रेस के प्रतिनिधि इधर-उधर बिखर गये, जिससे कि पेत्रोग्राद में सोवियतों की जीत की ख़बर फैला दें और सोवियतों की सत्ता सारे देश में फैलाने का काम निश्चित करें। हर जगह सोवियतों के हाथ तुरन्त ही सत्ता नहीं आ गयी। जब पेत्रोग्राद में सोवियत सरकार बन चुकी थी, तब मास्को में कई दिन तक डटकर और घनघोर लड़ाई होती रही। सत्ता मास्को-सोवियत के हाथ में न जाये, इसके लिए क्रान्ति-विरोधी मेंशेविक और समाजवादी क्रान्तिकारी पार्टियों ने ग़द्दारों और कैडेटों से मिलकर मज़दूरों और सैनिकों के खिलाफ हथियारबन्द लड़ाई शुरू कर दी। बागि़यों को हराने और मास्को में सोवियतों की सत्ता कायम करने में कई दिन लग गये।

खुद पेत्रोग्राद में और उसके कई ज़िलों में क्रान्ति की जीत के शुरू के दिनों में ही सोवियत सत्ता को ख़त्म करने की क्रान्ति विरोधी कोशिशें की गयीं। 10 नवम्बर 1917 को, केरेन्स्की ने, जो विद्रोह के समय पेत्रोग्राद से उत्तरी मोर्चे को भाग गया था, कई कज्ज़ाक दस्ते इकट्ठा किये और जनरल क्रासनोव की कमान में उन्हें पेत्रोग्राद के खिलाफ भेजा। 11 नवम्बर 1917 को, एक क्रान्ति-विरोधी संगठन ने पेत्रोग्राद में कैडेटों से बग़ावत करायी। इस संगठन के नेता समाजवादी क्रान्तिकारी थे, और उसका नाम रखा था – “पितृभूमि और क्रान्ति के उद्धार की कमेटी”। लेकिन, बिना ज्यादा कठिनाई के बग़ावत दबा दी गयी। एक ही दिन में, 11 नवम्बर की शाम तक, जहाज़ियों और रेड गार्डों के दस्तों ने कैडेट-विद्रोह दबा दिया और 13 नवम्बर को जनरल क्रासनोव पुलकोवो पहाड़ियों के पास हरा दिया गया। लेनिन ने व्यक्तिगत रूप से सोवियत-विरोधी बग़ावत दबाने का संचालन किया, जैसे उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अक्टूबर विद्रोह का संचालन किया था। उनकी अटूट दृढ़ता और विजय में उनके शान्त विश्वास ने जनता को प्रेरित और संगठित किया। दुश्मन कुचल दिया गया। क्रासनोव गिरफ़्तार कर लिया गया और उसने `वचन दिया´ कि सोवियत सत्ता के खिलाफ लड़ाई बन्द कर देगा। और, `वचन देने पर´ वह छोड़ दिया गया। लेकिन जैसाकि आगे मालूम हुआ, जनरल ने अपना वचन तोड़ दिया। जहाँ तक केरेन्स्की का सम्बन्ध था, वह औरत का भेष बनाकर `किसी अज्ञात दिशा में ग़ायब´ हो गया।

फौज के जनरल हेडक्वार्टर पर, मोगीलेव में प्रधान सेनापति जनरल दुखोनिन ने भी बग़ावत करने की कोशिश की। जब सोवियत सरकार ने उसे हुक्म दिया कि जर्मन कमान से सुलह करने के लिए तुरन्त बातचीत चलाओ, तो उसने इन्कार कर दिया। इस पर, सोवियत सरकार के हुक्म से उसे हटा दिया गया। क्रान्ति विरोधी जनरल हेडक्वार्टर भंग कर दिया गया और खुद दुखोनिन को उसके खिलाफ विद्रोह करने वाले सैनिकों ने मार डाला। पार्टी के भीतर कुछ नामी-गिरामी अवसरवादियों – कामेनेव, ज़िनोवियेव, राइकोव, श्लीयापनीकोव, वग़ैरह – ने भी सोवियत सत्ता के खिलाफ धावा बोला। उन्होंने माँग की कि एक `संयुक्त समाजवादी सरकार´ बनायी जाये, जिसमें मेंशेविक और समाजवादी क्रान्तिकारी भी शामिल किये जायें जिन्हें अक्टूबर क्रान्ति ने अभी-अभी परास्त किया था। 15 नवम्बर 1917 को, बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें इन क्रान्ति-विरोधी पार्टियों के साथ समझौता करना नामंजूर कर दिया गया और कामेनेव तथा ज़िनोवियेव को क्रान्ति का हड़ताल-तोड़क कहा गया।

17 नवम्बर को, पार्टी की नीति से असहमत होते हुए कामेनेव, ज़िनोवियेव, राइकोव और मिल्यूतिन ने ऐलान किया कि वे केन्द्रीय समिति से इस्तीफा देते हैं। उसी दिन, 17 नवम्बर को, नोगिन ने अपनी तरफ से और जनकमिसार समिति के सदस्यों – राइकोव, वी. मिल्यूतिन, तियोदोरोविच, ए. श्लीयापनीकोव, डी. रियाज़ानोव, यूरेनेव और लारिन – की तरफ से ऐलान किया कि वे पार्टी की केन्द्रीय समिति की नीति से असहमत हैं और जनकमिसार समिति से इस्तीफा देते हैं। इन मुट्ठीभर ग़द्दारों के भाग खड़े होने से, अक्टूबर क्रान्ति के दुश्मनों के यहाँ खुशियाँ मनायी जाने लगीं। पूँजीपति और उनके पिट्ठू खुशी से फूलकर कहने लगे कि बोल्शेविज्म ख़त्म हो गया और बोल्शेविक पार्टी जल्द ही समाप्त होने वाली है। लेकिन इन मुट्ठीभर ग़द्दारों की वजह से, पार्टी एक क्षण के लिए भी विचलित न हुई। पार्टी की केन्द्रीय समिति ने घृणा के साथ उन्हें क्रान्ति से भाग खड़े होने वाला और पूँजीपतियों का साझीदार कहकर उनकी निन्दा की और अपने आगे के काम में लग गयी।

जहाँ तक `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों का सवाल था, वे किसान जनता पर अपना असर बनाये रखना चाहते थे। किसानों की हमदर्दी निश्चित रूप से बोल्शेविकों के साथ थी। इसलिए, `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों ने फैसला किया कि बोल्शेविकों से झगड़ा न करें और फिलहाल उनके साथ संयुक्त मोर्चा बनाये रहें। नवम्बर 1917 में, किसान सोवियतों की कांग्रेस हुई। उसने अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति से हासिल हुए सभी लाभ स्वीकार किये और सोवियत सरकार के आज्ञा-पत्रों का समर्थन किया। `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों के साथ एक समझौता हुआ और उनमें से कई को जनकमिसार समिति में जगहें दी गयीं (कोलेगायेव, स्प्रिदोनोवा, प्रोश्यान और स्टाइनबर्ग)। लेकिन, यह समझौता ब्रेस्ट-लिटोव्स्क की संधि होने और ग़रीब किसानों की कमेटियाँ बनने तक ही कायम रहा। उसके बाद किसानों में गहरी दरार पड़ी। `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारी अधिकाधिक कुलक हित ज़ाहिर करने लगे। उन्होंने बोल्शेविकों के खिलाफ बग़ावत की और सोवियत सत्ता ने उन्हें परास्त कर दिया।

अक्टूबर 1917 से फरवरी 1918 तक, देश के विशाल प्रदेशों में सोवियत क्रान्ति इतनी तेज़ी से फैली कि लेनिन ने उसे सोवियत सत्ता की `विजय-यात्रा´ कहा।

महान अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति विजयी हुई।

रूस में समाजवादी क्रान्ति की इस अपेक्षाकृत आसान विजय के कई कारण थे। नीचे लिखे हुए मुख्य कारण ध्यान देने योग्य हैं :

(1) अक्टूबर क्रान्ति का दुश्मन अपेक्षाकृत ऐसा कमज़ोर, ऐसा असंगठित और राजनीतिक रूप से ऐसा अनुभवहीन था जैसेकि रूसी पूँजीपति। रूसी पूँजीपति आर्थिक रूप से अब भी कमज़ोर थे और पूरी तरह सरकारी ठेकों पर निर्भर थे। उनमें राजनीतिक आत्मनिर्भरता और पहलकदमी इतनी न थी कि परिस्थिति से निकलने का रास्ता ढूँढ़ सकें। मसलन, बड़े पैमाने पर राजनीतिक गुटबन्दी और राजनीतिक दगाबाज़ी में उन्हें फ्रांसीसी पूँजीपतियों का-सा तजुर्बा न था, न अंग्रेज़ पूँजीपतियों की तरह, उन्होंने विशद रूप से सोचे हुए चतुर समझौते करने की शिक्षा पायी थी। हाल ही में, उन्होंने ज़ार से समझौता करने की कोशिश की थी। फरवरी क्रान्ति ने ज़ार का तख्ता उलट दिया था और सत्ता खुद पूँजीपतियों के हाथ में आ गयी थी लेकिन बुनियादी तौर से घृणित ज़ार की नीति पर ही चलने के सिवा उन्हें और कुछ न सूझ पड़ा। ज़ार की तरह, उन्होंने `विजय तक युद्ध करने´ का समर्थन किया, हालाँकि युद्ध चलाना देश की शक्ति से परे था और जनता तथा फौज दोनों युद्ध से बुरी तरह चूर हो चुके थे। ज़ार की तरह, कुल मिलाकर वे भी रियासती ज़मीन बनाये रखने के पक्ष में थे, हालाँकि ज़मीन की कमी और ज़मींदारों के जुवे के बोझ से किसान मर रहे थे। जहाँ तक उनकी मज़दूर नीति का सम्बन्ध था, वे मज़दूर वर्ग से नफरत करने में ज़ार के भी कान काट चुके थे। उन्होंने कारख़ानेदारों के जुवे को बनाये रखने और मज़बूत करने की ही कोशिश नहीं की, बल्कि उन्होंने बड़े पैमाने पर तालाबन्दी करके उसे असहनीय बना दिया।

कोई ताज्जुब नहीं कि जनता ने ज़ार की नीति और पूँजीपतियों की नीति में कोई बुनियादी भेद नहीं देखा, और जो घृणा उसके दिल में ज़ार के लिए थी वही पूँजीपतियों की अस्थायी सरकार के लिए हो गयी।

जब तक समाजवादी क्रान्तिकारी और मेंशेविक पार्टियों का थोड़ा बहुत असर जनता पर था, तब तक पूँजीपति उन्हें पर्दे की तरह इस्तेमाल कर सकते थे और अपनी सत्ता बनाये रख सकते थे। लेकिन, जब मेंशेविकों और समाजवादी क्रान्तिकारियों ने ज़ाहिर कर दिया कि वे साम्राज्यवादी पूँजीपतियों के दलाल हैं और इस तरह जनता में उन्होंने अपना असर खो दिया, तब पूँजीपतियों और उनकी अस्थायी सरकार का कोई मददगार न रहा।

(2) अक्टूबर क्रान्ति का नेतृत्व रूस के मज़दूर वर्ग जैसे क्रान्तिकारी वर्ग ने किया। यह ऐसा वर्ग था जो संघर्ष की आँच में तप चुका था, जो थोड़ी ही अवधि में दो क्रान्तियों से गुज़र चुका था और जो तीसरी क्रान्ति के शुरू होने से पहले शान्ति, ज़मीन, स्वाधीनता और समाजवाद के लिए संघर्ष में जनता का नायक माना जा चुका था। अगर क्रान्ति का नेता रूस के मज़दूर वर्ग जैसा न होता, ऐसा नेता जिसने जनता का विश्वास पा लिया था, तो मज़दूरों और किसानों की मैत्री न होती और इस तरह की मैत्री के बिना अक्टूबर क्रान्ति की विजय असम्भव होती।

(3) रूस के मज़दूर वर्ग को क्रान्ति में ग़रीब किसानों जैसा समर्थ साथी मिला, जो किसान जनता का भारी बहुसंख्यक भाग था। जहाँ तक आम मेहनतकश किसानों का सवाल था, क्रान्ति के आठ महीनों का तजुर्बा बेकार नहीं गया। इस तजुर्बे की तुलना `साधारण´ विकास के बीसियों सालों के तजुर्बे से निस्सन्देह की जा सकती है। इन दिनों, उन्हें मौका मिला कि वे अमल में रूस की तमाम पार्टियों को परख लें और अपनी दिलजमई कर लें कि न तो कान्स्टीट्यूशनल डेमोक्रेट और न समाजवादी क्रान्तिकारी या मेंशेविक ही ज़मींदारों से कोई गम्भीर झगड़ा मोल लेंगे, या किसानों के हित के लिए अपना बलिदान करेंगे, कि रूस में एक ही पार्टी है – बोल्शेविक पार्टी – जिसका ज़मींदारों से कोई सम्बन्ध नहीं है और जो उन्हें किसानों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए कुचलने को तैयार है। सर्वहारा और ग़रीब किसानों की मैत्री का यह दृढ़ आधार था। मज़दूर वर्ग और ग़रीब किसानों की इस मैत्री के कायम होने से, मध्यम किसानों की गति निश्चित हो गयी। ये मध्यम किसान बहुत दिन तक ढुलमुल रहे थे और अक्टूबर विद्रोह के शुरू होने से पहले ही पूरी तरह क्रान्ति की तरफ आये थे और उन्होंने ग़रीब किसानों से नाता जोड़ा था।

कहना न होगा कि इस मैत्री के बिना अक्टूबर क्रान्ति विजयी न होती।

(4) मज़दूर वर्ग का नेतृत्व राजनीतिक संघर्षों में तपी और परखी हुई बोल्शेविक पार्टी जैसी पार्टी ने किया था। बोल्शेविक पार्टी इतनी साहसी पार्टी थी कि निर्णायक हमले में जनता का नेतृत्व कर सके। वह इतनी सावधान पार्टी थी कि मंज़िल की तरफ जाने के रास्ते में ढँकी-मुँदी खाई-खन्दकों से बचकर निकल सके। ऐसी ही पार्टी विभिन्न क्रान्तिकारी आन्दोलनों को चतुराई से एक ही सामान्य क्रान्तिकारी धारा में मिला सकती थी। शान्ति के लिए आम जनवादी आन्दोलन, जातीय स्वाधीनता और जातीय समानता के लिए पीड़ित जातियों का आन्दोलन और पूँजीपतियों का तख्ता उलटने के लिए और सर्वहारा अधिनायकत्व कायम करने के लिए सर्वहारा वर्ग का समाजवादी आन्दोलन – इन सबको ऐसी ही पार्टी एक सामान्य क्रान्तिकारी धारा में मिला सकती थी।

इसमें सन्देह नहीं कि इन विभिन्न क्रान्तिकारी धाराओं के एक ही सामान्य शक्तिशाली क्रान्तिकारी धारा में मिलने ने रूस में पूँजीवाद की तकदीर का फैसला कर दिया।

(5) अक्टूबर क्रान्ति ऐसे समय आरम्भ हुई जबकि साम्राज्यवादी युद्ध अभी ज़ोरों पर था, जबकि प्रमुख पूँजीवादी राज्य दो विरोधी खेमों में बँटे हुए थे और जब परस्पर युद्ध में फँसे रहने और एक-दूसरे की जड़ें काटने में लगे रहने से, वे `रूसी मामलों´ में सफलता से दख़ल न दे सकते थे और सक्रिय रूप से अक्टूबर क्रान्ति का विरोध न कर सकते थे। निस्सन्देह, अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति की जीत में इस बात से बहुत मदद मिली।

(`बिगुल´, फरवरी 1998 और मार्च-अप्रैल ´98 में धारावाहिक प्रकाशित)

बुझी नहीं है अक्टूबर क्रांति की मशाल – पीडीऍफ़

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अक्टूबर क्रान्ति की मशाल बुझी नहीं है! बुझ नहीं सकती!

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अक्टूबर क्रांति की ९२वीँ वर्षगांठ पर

अब से ठीक 79 वर्ष पहले, 1917 में (पुराने कैलेण्डर के अनुसार अक्टूबर में और नये कैलेण्डर के अनुसार नवम्बर में) मेहनतकश अवाम ने, क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग की अगुवाई में, रूस में पहली बार पूँजीपतियों और सभी सम्पत्तिवान लुटेरों की राज्यसत्ता को बलपूर्वक उखाड़ फेंका था और पहली बार महान लेनिन और उनकी बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सर्वहारा राज्यसत्ता की – सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की स्थापना की थी।

मानव समाज के वर्गों में बँटने के बाद के हज़ारों वर्षों के इतिहास में यह पहली ऐसी क्रान्ति थी जिसमें राज्यसत्ता एक शोषक वर्ग से दूसरे, नये शोषक वर्ग के हाथ में नहीं बल्कि मेहनतकश शोषित-उत्पीड़ित जनता के हाथों में गयी थी। इतिहास की पहली सचेतन संगठित क्रान्ति जिसने पहली बार उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व का नाश कर दिया और समता के साथ तरक्की की रफ्त़ार का नया रिकार्ड कायम किया |

दबे-कुचले लोगों ने पूरे मानव इतिहास में बग़ावतें तो अनगिनत बार की थीं लेकिन पेरिस कम्यून (1871 में पेरिस के मज़दूरों द्वारा सम्पन्न क्रान्ति और पहली सर्वहारा सत्ता की स्थापना, जिसे 72 दिनों बाद फ्रांसीसी पूँजीपतियों ने पूरे यूरोप के प्रतिक्रियावादियों की मदद से कुचल दिया) की शुरुआती कोशिश के बाद, अक्टूबर क्रान्ति मेहनतकश वर्गों की पहली योजनाबद्ध, सचेतन तौर पर संगठित क्रान्ति थी जिसके पीछे एक दर्शन था, एक विचारधारा थी, एक कार्यक्रम था, एक युद्धनीति थी और एक ऐसे रास्ते की रूपरेखा भी थी जिससे होकर आगे बढ़ते हुए एक नये समाज की रचना करनी थी।

निजी सम्पत्ति और वर्ग-शोषण के अस्तित्व में आने के लगभग चार हज़ार वर्षों बाद पहली बार मेहनतकशों की सोवियत सत्ता ने अब तक असम्भव और महज़ किताबी माने जाने वाली बात को सम्भव बनाकर वास्तविकता की ज़मीन पर उतार दिया। लेनिन और फिर स्तालिन के नेतृत्व वाली सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में स्थापित सर्वहारा सत्ता – सर्वहारा अधिनायकत्व ने अब तक सम्पत्ति का अपहरण करने वालों की ही सम्पत्ति का अपहरण कर लिया और फिर ज्ञात इतिहास में पहली बार उत्पादन के साधनों – यानी कल-कारख़ानों, खेतों, संचार-यातायात के साधनों आदि पर निजी स्वामित्व का ख़ात्मा कर दिया गया। इस सोच को ग़लत ही नहीं बल्कि उल्टा साबित कर दिया गया कि खेतों और कारख़ानों पर निजी मालिकाने के बिना समाज का कामकाज चल ही नहीं सकता। कामकाज चला ही नहीं बल्कि दौड़ा, और अद्भुत, चमत्कारी रफ़्तार से दौड़ा! उत्पादन और भौतिक प्रगति के सभी पुराने रिकॉर्ड टूट गये और मानदण्ड छोटे पड़ गये!

आज दुनियाभर का पूँजीवादी प्रेस समाजवाद पर चाहे जितना कीचड़ उछाल ले, तमाम झूठ-फरेब के बावजूद इस सच्चाई को उसे आज से पचास वर्षों पहले ही स्वीकारने के लिए मजबूर होना पड़ा था कि 1917 के बाद सोवियत संघ में वैज्ञानिक-मशीनी तरक्की और आम मेहनतकशों की चेतना, हुनर, शिक्षा, संस्कृति वग़ैरह की तरक्की की रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि जो चीज़ें हासिल करने में पश्चिमी यूरोप के देशों को करीब दो सौ वर्षों का समय लगा वह उसने सिर्फ 20-25 वर्षों में हासिल कर लिया। फ्रांसीसी क्रान्ति और इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति के बाद पश्चिमी दुनिया में जो भी तरक्की पूँजीवादी रास्ते से हासिल हुई थी, उसके साथ ही धनी-ग़रीब के बीच की खाई भी तेज़ रफ़्तार से बढ़ती चली गयी थी और पूँजीपतियों के जनवाद की यह असलियत सामने आती चली गयी थी कि वह धनिकों के बीच की स्वतन्त्रता , समानता, भ्रातृत्व है जबकि ग़रीबों-मेहनतकशों के ऊपर तानाशाही है। यह स्वाभाविक था, क्योंकि पश्चिम में सारी तरक्की जनता की खुशहाली और न्याय के लिए नहीं बल्कि नयी-नयी मशीनों द्वारा मेहनतकशों को निचोड़कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए पूँजीपतियों में लगी होड़ का नतीजा थी। दूसरी ओर सोवियत संघ में निजी मालिकाने के बलपूर्वक ख़ात्मे के बाद मुनाफाख़ोरी और लूट के मूल एवं मुख्य आधार को ख़त्म करके मेहनतकश जनता की राज्यसत्ता ने आम लोगों को पहली बार अपनी तरक्की के लिए उत्पादन का अवसर दिया तथा साथ ही सांस्कृतिक-शैक्षिक तरक्की और ज़िन्दगी की हर तरह की बेहतरी के लिए भी खुद अपनी पहल पर काम करने का मौका दिया। इसी का नतीजा था कि समाजवादी विकास ने जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने और पूरे सोवियत संघ को उन्नत औद्योगिक देशों की कतार में ला खड़ा करने के साथ ही समाज में ज्यादा से ज्यादा समानता स्थापित की और हज़ारों वर्षों से कायम विशेषाधिकारों, भौतिक-सांस्कृतिक अन्तरों और उनकी ज़मीन के मौजूद रहने के बावजूद पूँजीपतियों, भूस्वामियों, नौकरशाहों, सट्टेबाज़ों, व्यापारियों आदि सभी तरह के परोपजीवी वर्गों के प्रत्यक्ष शोषण को दो दशकों के भीतर ही समाप्त कर दिया। समाजवाद के रास्ते ने उद्योगों और खेतीबाड़ी की अभूतपूर्व तरक्की के साथ ही नि:शुल्क एवं समान शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि सुविधाओं को सर्वसुलभ बना दिया तथा बेरोज़गारी का पूरी तरह ख़ात्मा कर दिया। ग़ौरतलब बात यह है कि उद्योगों पर समूची जनता का मालिकाना स्थापित करके (यानी मेहनतकशों की राज्यसत्ता के अन्तर्गत राष्ट्रीकरण करके) और खेती का सामूहिकीकरण करके (यानी खेतों में काम करने वाले सभी किसानों के सामूहिक मालिकाने वाले बड़े फार्म स्थापित करके) सोवियत संघ ने ऊपर गिनायी गयीं उपलब्धियां उस समय हासिल कीं जब पूरी पूँजीवादी दुनिया महामन्दी (1930-40 के बीच) के भँवरों में पछाड़ खा रही थी।

स्तालिन के भूत से आज भी क्यों डरते हैं पूंजीपति और क्यों उन्हें आज भी गाली देते हैं उनके भाड़े के टट्टू ?

समाजवाद के महान निर्माता स्तालिन के बारे में आज पूँजीवादी अख़बारों के दो कौड़ी के भाड़े के टट्टू भी तरह-तरह के झूठ गढ़ रहे हैं। हम उन्हें सिर्फ याद दिलाना चाहते हैं कि कभी पूँजीवादी दुनिया के एच.जी. वेल्स, रोम्याँ रोलाँ, बर्नार्ड शॉ, बर्ट्रेड रसेल, चार्ली चैपलिन आदि और भारत के लाला लाजपत राय, गणेश शंकर विद्यार्थी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, नेहरू, प्रेमचन्द आदि जैसे महापुरुषों ने भी स्तालिन और सोवियत संघ की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि साम्राज्यवादी कुत्तों की गलाकाटू होड़ ने जब दूसरे महायुद्ध को और फासिस्ट-नात्सी भस्मासुरों को जन्म दिया तो हिटलर की सिर्फ 54 डिवीज़नों ने लगभग पूरे यूरोप को रौंदकर विश्वविजय का ख़तरा पैदा कर दिया था। उस समय उसकी 200 डिवीज़नों का मुकाबला करते हुए सोवियत जनता और लाल सेना ने हिटलर की पूरी सत्ता को ही तबाह कर डाला था। इसमें दो करोड़ सोवियत जनता ने अपनी बेमिसाल कुर्बानी स्तालिन की बहुप्रचारित ‘तानाशाही’ के डर से नहीं बल्कि समाजवाद और विश्व मानवता की हिफाज़त के लिए दी थी। उस समय तो रूज़वेल्ट, चर्चिल और दगॉल भी स्तालिन की बड़ाई कर रहे थे और पीछे-पीछे चल रहे थे तथा पश्चिमी अख़बार उन्हें ‘चाचा स्तालिन’ (`अंकल जो´) कह रहे थे, पर विश्वयुद्ध समाप्त होते ही स्तालिन को फिर तानाशाह कहा जाने लगा और सोवियत संघ नामक ‘शैतानी राज्य’ को तबाह कर दिये जाने का आह्वान किया जाने लगा। यह है पूँजीवाद का दोगलापन, जो स्वयंसिद्ध है।

पर दुनिया के पूँजीवादी इतिहासकार आज भी इस तथ्य से इन्कार नहीं कर पाते कि अक्टूबर क्रान्ति के तोपों के धमाकों ने दुनियाभर के मेहनतकशों को पूँजी की सत्ता के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा देने के साथ ही एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका की जनता के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों को भी ज़बरदस्त उछाल देने का काम किया। सोवियत संघ लगातार औपनिवेशिक गुलामी के विरुद्ध लड़ने वाले क्रान्तिकारियों को और आम जनता को प्रेरणा देता रहा और यथासम्भव मदद भी। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में भी सर्वहारा सत्ताएँ स्थापित हुई और चीन में माओ और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई नयी जनवादी क्रान्ति ने अक्टूबर क्रान्ति के बाद एक और, नया मील का पत्थर कायम किया। शक्तिशाली समाजवादी खेमे की मौजूदगी ने एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिकी देशों की जनता पर कायम औपनिवेशिक और नवऔपनिवेशिक शिकंजे को ढीला करने में भी अहम भूमिका निभायी।

पर इतिहास कभी भी सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ता। यह आती-जाती लहरों के रूप में, ज्वार और भाटे के रूप में आगे बढ़ता है, सर्पिल रास्तों से होकर, अनेकों मोड़ों और घुमावों से होकर आगे बढ़ता है।

समाजवाद की फिलहाली हार के बुनियादी कारण क्या हैं ?

यह जानना बेहद जरू़री है!

समाजवादी समाज पूरी तरह वर्गविहीन, शोषणविहीन समाज नहीं होता, बल्कि इसकी शुरुआती अवस्था होता है। वह पूँजीवाद और कम्युनिज्म के बीच का ‘वर्ग समाज और वर्गविहीन समाज’ के बीच का काल होता है( कम्युनिज्म की सिर्फ प्रथम अवस्था होता है। मेहनतकश वर्ग इस दौरान बलपूर्वक सम्पत्तिवान, परजीवी वर्गों पर शासन कायम करके उत्पादन के साधनों पर से उनका स्वामित्व छीन लेता है( पर ये पुराने शोषक-शासक अपनी उसी लुटेरी मानसिकता और अपने ‘खोये हुए स्वर्ग’ को फिर से पाने की चाहत के साथ समाज में मौजूद होते हैं। इसके साथ ही छोटे पैमाने पर (गाँव के मँझोले व छोटे किसानों, छोटे उद्यमियों-कारोबारियों आदि के बीच) पूँजीवादी किस्म का उत्पादन समाजवाद के शुरुआती समयों में लम्बी अवधि तक मौजूद रहता है, निजी स्वामित्व छोटे पैमाने पर मौजूद रहता है और आम जनता के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के भीतर धनी बनने की और मुनाफा कमाने की पुरानी बीमारी भी मौजूद रहती है। यह छोटे पैमाने का पूँजीवादी उत्पादन नये-नये पूँजीवादी तत्त्वों और मानसिकता को समाजवाद के भीतर नये सिरे से पैदा भी करता रहता है। इसके अलावा समाजवादी समाज में भी शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम करने वालों के बीच, कारख़ानों में काम करने वाले और खेतों में काम करने वालों के बीच तथा गाँव में रहने वालों और शहर में रहने वालों के बीच का अन्तर भी मौजूद रहता है। इसके अतिरिक्त, समाजवाद के बहुत आगे की मंज़िलों में ही यह सम्भव हो सकता है कि लोग क्षमता मुताबिक काम करते हैं और ज़रूरत मुताबिक पाते हैं। शुरू में तो लम्बे समय तक यही हो सकता है कि लोग जितना श्रम करें उसी के हिसाब से उन्हें मजदूरी मिले। अब चूँकि लोगों की श्रम करने की प्राकृतिक क्षमता एक नहीं होती, इस कारण से भी समाजवाद के शुरुआती लम्बे समय में असमानता पैदा होने का एक आधार मौजूद रहता है। कुल मतलब यह कि उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज का मालिकाना कायम करना शोषण और असमानता के ख़ात्मे का सबसे ज़रूरी पहला कदम है, पर यही सब कुछ नहीं। इसके बाद भी समाज में असमानता और पूँजीवाद के उतने किस्म के उत्पादन केन्द्र और पालन-पोषण केन्द्र मौजूद रहते हैं, जो ऊपर गिनाये गये हैं। इन्हीं कारणों से समाजवादी समाज के भीतर भी नये किस्म के पूँजीवादी तत्त्व मज़बूत होते जाते हैं और समय रहते इन खरपतवारों को नष्ट करके ज़मीन की अच्छी तरह निराई-गुड़ाई और कीटनाशकों का छिड़काव न किया जाये तो यह समाजवाद की पूरी फसल तबाह कर डालते हैं। ये नये पूँजीवादी तत्त्व कम्युनिस्ट पार्टी और सर्वहारा राज्यसत्ता पर काबिज़ हो जाते हैं और पूँजीवाद की पुनर्स्थापना हो जाती है।

1953 में स्तालिन की मृत्यु के बाद सोवियत संघ में यही हुआ। ख्रुश्चेव के नेतृत्व में वहाँ एक नये किस्म का पूँजीवाद बहाल हो गया -‘समाजवादी’ मुखौटे और नकली लाल झण्डे वाला, सरकारी या राजकीय पूँजीवाद – बहुत कुछ हमारे देश के `पब्लिक सेक्टर´ जैसा! 1990 में यह मुखौटा भी गिर गया और महान अक्टूबर क्रान्ति के देश में एक बार फिर खुला पूँजीवाद बहाल हो गया।

सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति ने दिखलायी नयी राह!

दरअसल स्तालिन भी समाजवाद के भीतर मौजूद और नये सिरे से पनपने वाले बुर्जुआ तत्त्वों को पहचान नहीं सके, उनके द्वारा समाजवाद की हार के ख़तरे को देख नहीं सके और उनके विरुद्ध सतत क्रान्ति चलाते हुए कम्युनिज्म की दिशा में आगे बढ़ने की राह नहीं निकाल सके। इस दिशा में लेनिन ने सोचना ज़रूर शुरू किया था, पर वक्त ने उन्हें मौका नहीं दिया और 1924 में उनका निधन हो गया। स्तालिन की ग़लतियों ओर चीन के समाजवादी प्रयोगों से सबक लेकर माओ त्से-तुङ ने इस महान काम को अंजाम दिया और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का वह प्रयोग किया जो विश्व सर्वहारा क्रान्ति के डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में पेरिस कम्यून और अक्टूबर क्रान्ति के बाद कायम तीसरा कीर्ति स्तम्भ है। हालाँकि चीन में भी माओ की मृत्यु के बाद पूँजीवादी तत्त्व सत्ता पर काबिज़ हो गये और पूँजीवाद की पुनर्स्थापना हो गयी, पर इससे सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का महत्त्व कम नहीं होता क्योंकि पहली बार इस महान क्रान्ति ने पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने, पूँजीवादी तत्त्वों को लगातार कमज़ोर करते जाने और वर्गविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ते जाने की ठोस, स्पष्ट राह बतलायी थी।

मेहनतकश अवाम अगर इतिहास से शिक्षा लेकर क्रान्ति के विज्ञान की समझ नहीं हासिल करेगा तो पूँजीपाति वर्ग और उसके भोंपुओं के भ्रामक प्रचारों से मुक्त नहीं हो पायेगा और यह मानता रहेगा कि समाजवाद की हार हो गयी है, वह असफल सिद्ध हो गयी। पूँजीवादी समाज की विपत्तियों से तंग, परेशान-बदहाल होकर वह समय-समय पर विद्रोह भी करता रहेगा, लेकिन समाजवाद की अन्तिम जीत में विश्वास और क्रान्ति के विज्ञान की समझ के अभाव में वह कभी भी पूँजीवाद का नाश नहीं कर सकेगा क्योंकि पूँजीवाद का एकमात्र विकल्प समाजवाद ही है।

अमर नहीं है पूँजीवाद! इसे मरना ही है!

हमें इस बात को अच्छी तरह से समझना होगा कि अतीत में भी क्रान्तियों के शुरुआती संस्करण असफल होते रहे हैं। सात-आठ सौ वर्षों तक कई दास विद्रोह कुचल दिये गये, तब कहीं जाकर दास प्रथा के युग का पूरी दुनिया से ख़ात्मा हो सका था। सामन्तवर्ग से संघर्ष करते हुए निर्णायक विजय हासिल करने में और पूँजीवादी सामाजिक ढाँचे का निर्माण करने में पूँजीपति वर्ग को तकरीबन चार सौ वर्षों का समय लग गया। फिर इसमें निराश या भग्नहृदय होने की भला क्या बात हो सकती है कि समाजवादी क्रान्ति फिलहाल कुछ समय के लिए सदियों से जड़ जमाये पूँजीवाद से हार गयी है और सर्वहारा वर्ग को फ़ौरी तौर पर पीछे हट जाना पड़ा है! और फिर हमें यह भी तो याद रखना होगा कि समाजवादी क्रान्ति मानव इतिहास की सर्वाधिक व्यापक, गहरी और बुनियादी क्रान्ति है, क्योंकि पहले की सभी क्रान्तियों ने एक पुरानी पड़ चुकी शोषण की व्यवस्था की जगह एक नये प्रकार की शोषण की व्यवस्था की स्थापना की जबकि समाजवादी क्रान्ति का लक्ष्य सभी वर्ग व्यवस्थाओं का, हर तरह के शोषण का और हर तरह की असमानता का नाश करना है। राज्यसत्ता पर सर्वहारा वर्ग के काबिज़ होने के बाद लम्बे समय के संघर्ष में ही यह सम्भव हो सकता है और इस लम्बे संक्रमण काल के दौरान एक से अधिक बार सर्वहारा वर्ग को हार का सामना भी करना पड़ सकता है।

हमें यह बात ठीक से समझ लेनी होगी कि प्रकृति और समाज की कोई भी चीज़, कोई भी ऐतिहासिक युग और कोई भी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था अमर नहीं होती। पूँजीवाद भी अजर-अमर नहीं है। दास प्रथा और सामन्त प्रथा की तरह पूँजी की उजरती गुलामी की प्रथा भी आज मानव समाज के पैरों की बेड़ी बन चुकी है जो उसको आगे नहीं बढ़ने दे रही है। अत:, निश्चित ही, मानवता इन बेड़ियों को तोड़ फेंकेगी। समूचे विश्व पूँजीवाद और इसके शीर्ष पर आसीन साम्राज्यवादी देशों तक की अर्थव्यवस्था आज एक लम्बी मन्दी और ठहराव के ऐसे ढाँचागत संकट से ग्रस्त है जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था। हालात बताते हैं कि इसकी मृत्यु अब सुदूर भविष्य की बात नहीं है। तब तक यह केवल घिसट-घिसटकर साँसें गिन सकता है जब तक कि मेहनतकश अवाम फिर से संगठित होकर इसके नाश की लड़ाई न छेड़ दे। हालाँकि पूरी दुनिया में अभी क्रान्ति की लहर पर प्रतिक्रान्ति की लहर हावी है, पर दुनिया के अलग-अलग कोनों से एक नये उभार के पूर्वसंकेत मिलने शुरू हो चुके हैं। रूस, भूतपूर्व सोवियत संघ के दूसरे घटक देशों में, और पूर्वी यूरोप के देशों में मेहनतकश जनता ने नकली समाजवाद का गन्दा चेहरा तो पहले ही देख लिया था, अब वह पश्चिमी दुनिया के ‘स्वर्ग’ की असलियत भी जान चुकी है। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था के साथ मिलते ही इन देशों की कमज़ोर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था गम्भीर संकट के भँवर में जा फँसी है तथा बेरोज़गारी, महँगाई, अभाव और भ्रष्टाचार की मार झेलती और मुट्ठीभर लोगों के धनी होने की कीमत अपनी कंगाली से चुकाती जनता एक बार फिर सड़कों पर उतर चुकी है। उसके एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के हाथ में आज लेनिन और स्तालिन के पोस्टर और लाल परचम हैं और लबों पर सच्चे समाजवाद की बहाली के नारे हैं। वहाँ कई क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट संगठन नयी अक्टूबर क्रान्ति की रणनीति पर बहसें चला रहे हैं और पश्चिम के पूँजीवादी अख़बार भी इन देशों में ‘बोल्शेविक पुनरुत्थान’ की ख़बरें छाप रहे हैं। माओ के देश की जनता भी सोई नहीं है। वहाँ देङ सियाओ-पिङ के ‘बाज़ार समाजवाद’ नामधारी पूँजीवाद के खिलाफ किसानों ओर युवाओं की बग़ावतें हो रही हैं और बदनाम करने की तमाम कोशिशों के बावजूद जनता महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दिनों को याद कर रही है!

ज़ाहिर है कि सन्नाटा टूटने लगा है।

मिट्टी में दबे अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के बीज अंकुरित होने लगे हैं।

लातिन अमेरिकी देशों में किसानों-मज़दूरों के आन्दोलन और छापामार संघर्षों का नया सिलसिला शुरू हो चुका है। और अब एशिया भी जग रहा है। इण्डोनेशिया के ताज़ा जन-उभार से हुई शुरुआत की आहटें भारतीय उपमहाद्वीप तक में सुनायी पड़ रही हैं। भारत की जनता भी सोई नहीं रह सकती। नयी आर्थिक नीतियों के अमल ने साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की लूट और लगातार बढ़ती महँगाई-बेरोज़गारी-असमानता और भ्रष्टाचार को जिन आखिरी हदों तक पहुँचा दिया है, वहाँ पहुँचना एक जागते ज्वालामुखी के दहाने पर पहुँचने के समान है।

ज़ाहिरा तौर पर, भारतीय मेहनतकश अवाम को भी अपना ऐतिहासिक मिशन पूरा करने के लिए आगे कदम बढ़ाना होगा। यह पूरी दुनिया की तरह भारत में भी एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और नये सर्वहारा ज्ञानोदय का दौर है। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के इस नये दौर में भारतीय सर्वहारा वर्ग और मेहनतकश जनता को साम्राज्यवाद और उसके जूनियर पार्टनर बने भारतीय पूँजीपति वर्ग की राज्यसत्ता को उखाड़कर पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली को ही नष्ट कर देना है तथा राज्यसत्ता उत्पादन और समाज के पूरे तन्त्र पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेना है। यही क्रान्तिकारी लोक स्वराज्य के नारे का मतलब है। यही है भारत की नयी समाजवादी क्रान्ति जो आज की नयी परिस्थितियों के अनुरूप अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति का एक नया संस्करण है। भारत के मेहनतकशों को अक्टूबर क्रान्ति के दिखाये मार्ग पर आगे बढ़ना होगा, नये सिरे से अपनी नयी, नये ढंग की इंकलाबी पार्टी बनानी होगी और अपने देश की ज़मीन पर मौलिक ढंग से अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण की आधारशिला स्थापित करनी होगी।

इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि हम दुनिया की पहली समाजवादी क्रान्ति के प्रयोग के सारतत्त्व को, उसके निचोड़ को, उसकी सबसे बुनियादी शिक्षाओं को गाँठ बाँध लें। वे क्या हैं ?

अक्टबूर क्रान्ति की सबसे बुनियादी शिक्षाएँ

1. सर्वहारा क्रान्ति की सबसे पहली ज़रूरत है सर्वहारा वर्ग की, पूरे देश के स्तर पर संगठित एक क्रान्तिकारी पार्टी। यह क्रान्तिकारी पार्टी लेनिन के मार्गदर्शन में निर्मित बोल्शेविक पार्टी की तरह संघर्षों की आग में तपकर इस्पात बनी हो, पूँजीवाद की सशस्त्र सेना-पुलिस से लैस राज्यसत्ता से लोहा लेने में सक्षम हो (न कि महज़ चुनावबाज़ी और ट्रेडयूनियनबाज़ी का धन्धा करती हो), औद्योगिक सर्वहारा और ग्रामीण सर्वहारा में ही नहीं बल्कि बहुसंख्यक ग़रीब व परेशानहाल मँझोले किसानों में भी इसकी गहरी पैठ हो और यह अपने देश की परिस्थितियों की समझ के आधार पर क्रान्ति का कार्यक्रम और रास्ता तय करने में सक्षम हो, तभी यह अक्टूबर क्रान्ति का नया संस्करण तैयार कर सकती है।

2. जब हम अक्टूबर क्रान्ति के पहले के रूस में करीब बीस वर्षों तक जारी, ऐसी पार्टी के निर्माण और गठन की प्रक्रिया पर निगाह डालते हैं तो यह सच्चाई दिन की रोशनी की तरह साफ हो जाती है कि कठिन विचारधारात्मक संघर्ष, अटल विचारधारात्मक दृढ़ता और गहरी विचारधारात्मक समझ के बिना कोई सच्ची सर्वहारा पार्टी क्रान्ति करना तो दूर, गठित ही नहीं हो सकती और यदि गठित हो भी गयी तो जल्दी ही बिखर जायेगी। लेनिन और उनके साथी बोल्शेविकों ने एकदम अलग-थलग पड़ जाने का ख़तरा मोल लेते हुए भी विचारधारा के प्रश्न पर कोई समझौता नहीं किया और मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी विचारधारा में किसी भी तरह की मिलावट की मेंशेविकों और कार्ल काउत्स्की के चेलों की साज़िशों को एकदम से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने पार्टी को कभी भी चवन्निया मेम्बरी वाली महज़ चुनावबाज़, यूनियनबाज़, धन्धेबाज़ संगठन नहीं बनने दिया। दाँवपेंच के रूप में लेनिन की पार्टी ने पूँजीवादी चुनावों और संसद का भी इस्तेमाल किया और ट्रेडयूनियनों में काम करते हुए आर्थिक संघर्ष भी लगातार चलाये तथा जनता को जगाने के लिए विभिन्न प्रकार की राजनीतिक सुधारपरक कार्रवाइयाँ भी कीं, पर पार्टी ने इस बात को कभी नहीं भुलाया कि बिना बल-प्रयोग और हिंसा के, महज़ चुनावों के ज़रिये शोषक वर्गों से सत्ता छीनी नहीं जा सकती। वे पूँजीवादी राज्यसत्ता की सैन्य शक्ति और दमनतन्त्र को उखाड़ फेंकने के लिए क्रान्तिकारी तैयारी लगातार करते रहे और एक बार फिर अक्टूबर क्रान्ति ने इस बात को सही साबित किया कि शोषक वर्ग कभी भी समझाने-बुझाने या अल्पमत-बहुमत से सत्ता नहीं सौंप सकते। अक्टूबर क्रान्ति की इस शिक्षा को याद रखने का मतलब यह है कि भारत का सर्वहारा वर्ग भी भा.क.पा., मा.क.पा., भा.क.पा. मा-ले (लिबरेशन ग्रुप) और ऐसे तमाम सुधारवादी, अर्थवादी, पूँजीवादी संसदवादी कम्युनिस्ट संगठनों के भ्रमजाल से बाहर आकर कम्युनिज्म के सही क्रान्तिकारी चरित्र को पहचाने। ये सभी मदारी मेंशेविकों और काउत्स्कीपंथियों के उन सिद्धान्तों को ही नये लेबल लगाकर पेश करते हें जिनके खिलाफ लगातार लड़कर बोल्शेविक पार्टी ने विचारधारात्मक दृढ़ता हासिल की और तभी जाकर अक्टूबर क्रान्ति विजयी हो सकी।

3. साथ ही, अक्टूबर क्रान्ति और उसके नेता लेनिन की यह भी शिक्षा है कि क्रान्ति मुट्ठीभर समझदार और बहादुर क्रान्तिकारी नहीं, बल्कि व्यापक मेहनतकश जनता करती है। बहादुर और समझदार क्रान्तिकारी उस मेहनतकश जनता के हरावल दस्ता होते हैं जो जनता के रोज़मर्रा की छोटी-छोटी लड़ाइयों में हिस्सा लेते हुए, ट्रेडयूनियनों (बुर्जुआ और प्रतिक्रियावादी ट्रेडयूनियनों में भी) भागीदारी करके आर्थिक माँगों पर और साथ ही राजनीतिक माँगों पर भी लड़ते हुए, सम्भव होने पर रणकौशल के तौर पर पूँजीवादी चुनाव और संसद में भी भागीदारी करते हुए जनता की राजनीतिक चेतना का ज्यादा से ज्यादा क्रान्तिकारीकरण करते हैं और उसे शासक वर्गों के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार करते हैं। अर्थवाद और संसदवाद के विरोध के नाम पर इन सभी रूपों-रणकौशलों को छोड़कर किसी भी रूप में महज़ हथियारबन्द कार्रवाइयों पर ज़ोर देना वामपन्थी दुस्साहसवाद, या ‘अतिवामपन्थ’ का मध्यमवर्गीय भटकाव है जिसका फायदा अन्ततोगत्वा भाकपा-माकपा ब्राण्ड नकली कम्युनिस्टों और पूँजीवादी सत्ता को ही मिलता है।

4. अक्टूबर क्रान्ति का निचोड़ निकालते हुए लेनिन ने सैकड़ों बार विचारधारात्मक दृढ़ता को स्पष्ट किया था और कहा था कि वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को कभी न भूलो। इनको भूलने का मतलब ही है पूँजीवादी जनवाद और शान्तिपूर्ण संक्रमण के भ्रमजालों में जा फँसना और क्रान्ति के मार्ग को भूल जाना। हालात में चाहे जो भी बदलाव आ जाये, यदि पूँजीवाद पूँजीवाद है तो इसका अर्थ है कि राज्यसत्ता पूँजीपति वर्ग के हाथों में है, जिसे सिर्फ बलपूर्वक ही उखाड़ा जा सकता है और शोषक वर्गों को तब तक बलपूर्वक दबाये रखना पड़ेगा जब तक कि वर्ग के रूप में उनका अस्तित्व कायम रहेगा। आगे चलकर अक्टूबर क्रान्ति की इस शिक्षा को माओ ने महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान पुष्ट करने के साथ ही आगे विकसित किया और बताया कि सर्वहारा वर्ग राज्यसत्ता पर काबिज़ होने के बाद एक लम्बे समय तक यदि अपने अधिनायकत्व के अन्तर्गत सभी पूँजीवादी तत्त्वों के विरुद्ध सतत क्रान्ति नहीं चलायेगा और पूँजीवादी मूल्यों-विचारों-संस्थाओं के विरुद्ध सतत सांस्कृतिक क्रान्ति नहीं चलायेगा तो पूँजीवाद की पुनर्स्थापना अवश्यम्भावी होगी। अक्टूबर क्रान्ति की मशाल से पूँजीवादी जंगल राज में दावानल भड़काने के लिए इन शिक्षाओं को दिल में भलीभाँति बैठा लेना होगा, हर तरह के कठमुल्लेपन से मुक्त होकर आज की दुनिया और अपने देश की पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली, सामाजिक संरचना और राज्यतन्त्र की सही समझ कायम करनी होगी और लगातार क्रान्तिकारी कार्रवाइयों में धीरज तथा मुस्तैदी के साथ सन्नद्ध होकर एक ऐसी क्रान्तिकारी पार्टी का पुनर्गठन करना होगा जो अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के निर्माण में सक्षम हो।

(`बिगुल´, नवम्बर-दिसम्बर 1996 में प्रकाशित

बुझी नहीं है अक्टूबर क्रांति की मशाल – पीडीऍफ़

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भगत सिंह, कम्युनिस्ट और गाँधी होने का मतलब

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पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों द्वारा जानबूझकर परंतु कुछ पढ़े-लिखे लोगों द्वारा अनजाने में भावुकतावश यह प्रचारित किया जाता है कि गाँधी और भगत सिंह, दोनों आज़ादी के दीवाने थे. उनका मकसद इस देश को अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति दिलाने तक सीमित था. लेकिन बात एकदम इसके उल्ट है. दोनों में कोई भी भावुक नहीं था. इसमें कोई शक नहीं है कि कांग्रेस की अगुआई में जारी स्वतंत्रता आन्दोलन अन्य आंदोलनों पर वर्चस्व बनाये हुए था. कांग्रेस में गाँधी का तानाशाही प्रभाव भी सर्वविदित है. ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की गहराती अंतरराष्ट्रीय स्थिति से लाभ उठाकर गाँधी और कांग्रेस का मकसद महज  उभरती भारतीय बुर्जुआजी की सेवा करना था. भगत सिंह कांग्रेस की इस स्थिति से भली-भांति परिचित हो गए थे. यही कारण था कि वे केवल २३ वर्ष की अल्पायु भोगने के बावजूद कांग्रेस और गाँधी की विचारधारा के विरोध में  अपने विचारों को इस कद्र विकसित कर पाए. इसी टकराव और द्वंद में भगतसिंह के विचारों की परिपक्वता निहित है. इतना ही नहीं देश में जारी कमजोर समाजवादी विचारधारा के और उनके मतभेद भी सिद्ध होते हैं. १९२० में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन मास्को में हो चुका था. क्या भगतसिंह अपने समय की मुख्यधारा की समाजवादी राजनीती से जुड़ पाए ? अगर ऐसा था तो क्यों उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से खुद को दूर रखा ? क्या कारण था कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपने समय के इन ओजस्वी क्रांतिकारियों को प्रभावित करने में असफल रही? क्या कारण था कि उस समय के बहादुर युवकों ने आंतकवादी और आत्मघाती रास्ते को चुना? अगर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लोग परिपक्व थे तो वे इन युवकों को क्यों नहीं संभाल पाए? क्यों वे इस पार्टी द्वारा जारी अपीलों को ठुकराते रहे ?

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म मास्को से  उधार और आयातित समाजवाद से था. भारत की वस्तुगत स्थिति के आकलन और फिर क्रांति संबंधी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने के कार्यभार को इन्होने लंबे समय तक  हाथ में ही नहीं लिया. जहाँ तक की दूसरे विश्व-युद्घ के शुरू होने पर भी यह पार्टी इस योग्य नहीं थी कि स्तालिन की हिटलर और फासिज्म के विरुद्ध  अंग्रेजों की मदद के आदेश को तत्त्व-रूप से  समझ सके और स्वतन्त्र रूप से इस स्थिति का भारतीय मेहनतकश अवाम के लिए फायदा उठा सके.  बड़े लीडरों को छोड़ दें तो आज भी इन पार्टियों के आम काडर का मार्क्सवाद में हाथ तंग ही है. किसी भी प्रकार का वैचारिक संघर्ष इन्हें आतंकित ही करता रहा है. बल्कि इन्होने अवसरवादी ढंग से मार्क्सवाद को संशोधित करने के रास्ते पर पलायन करना उचित समझा. यह ज़रूरी था कि इस संशोधनवाद के दूसरे सिरे पर दुस्साहसवाद [देखें : नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक] होता !

भगतसिंह अंग्रेजी साम्राज्यवाद और स्थानीय बुर्जुआजी द्वारा भारतीय मजदूर और किसान के शोषण से भली-भांति परिचित हो गए थे. नवयुवकों के नाम पत्र जारी करते हुए और क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा तैयार करते हुए उन्होंने लिखा :

“अगर आप मजदूरों और किसानों को आन्दोलन में सक्रीय रूप से खींचने की योजना बनाने जा रहे हो, तो मैं आपसे कहना चाहूँगा कि उन्हें भावुक शब्दाडंबर से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता. वे आपसे पूछेंगे कि तुम्हारी इस क्रांति जिसमें तुम उन्हें कुर्बानी का आह्वान करने जा रहे हो, उन्हें इससे क्या हासिल होगा. लोगों को इससे क्या फर्क पड़ता है कि लोर्ड रीडिंग के स्थान पर सर पुरषोतम दास ठाकुर सरकार का प्रतिनिधि हो? किसानो से इससे क्या फर्क पड़ेगा कि लोर्ड इरविंग के स्थान पर सर तेज बहादुर सपरू आ जाएँ ? राष्ट्रीय भावनायों की अपील उपहास है. आप इसका प्रयोग अपने काम के लिए नहीं कर सकते.”

जब स्तालिन अपने शिष्यों को गाँधी का अनुसरण करने की सिफारिशें कर रहे थे, भगत सिंह गाँधी के झूठे प्रवचनों का पर्दाफाश कर रहे थे :

भगतसिंह गाँधी (तस्वीर) के झूठ्ठे  प्रवचनों का अख़बारों और पर्चों में पर्दाफाश किया करते थे
भगतसिंह गाँधी (तस्वीर) के झूठे प्रवचनों का अख़बारों और पर्चों में पर्दाफाश किया करते थे

“वह (गाँधी) शुरू से ही जानता था कि उसकी लहर का अंत किसी समझौते में हो जायेगा. इस प्रकार की प्रतिबद्धता से हम नफरत करते हैं.”

उन्होंने आगे कांग्रेस के बारे में अपने शंके जाहिर करते हुए लिखा  :

“कांग्रेस का उद्देश्य क्या है? कि वर्तमान लहर किसी समझौते में बदल जाये या पूरी तरह से असफल रहे. मैंने इसे इसलिए कहा है कि वास्तविक क्रांतिकारी शक्तियों को लहर में शामिल होने का आह्वान नहीं किया गया है. इस लहर का संचालन मध्यम वर्ग के दूकानदारों और कुछ पूंजीपतियों के आधार पर किया जा रहा है. ये दोनों वर्ग, और विशेषकर पूंजीपति अपनी जायदाद को दांव पर लगाने का खतरा नहीं सहेड़ सकते. क्रांति की वास्तविक सेनाएं – किसान और मजदूर गांवों और फेक्टरियों में है. लेकिन अपने बुर्जुआ नेता उन्हें शामिल करने का साहस नहीं कर सकते. ये सोये हुए शेर, अगर जाग गए तो वे हमारे लीडरों के मिशन के पूरा होने के बाद भी नहीं रुकेंगे.”

भगत सिंह के इन शब्दों की पुष्टि उस वक्त हो गयी जब बंबई के बुनकरों की कार्रवाई के बाद गाँधी ने  क्रांतिकारी शक्तियों पर अपनी चिंता जाहिर की :

राजनितिक उद्देश्यों के लिए सर्वहारा का प्रयोग खतरनाक हो सकता है.”

हमारे सविधान की प्रस्तावना में जिस समाजवाद का जिक्र किया है, इसके निर्माण के लिए सर्वदलीए कांफ्रेंस बुलाई गयी, जिसमें नेहरू समिति बनाई गयी. जवाहर नेहरू के बारे में वे लिखते हैं :

“समझ नहीं आता कि पंडित जवाहर लाल आदि जोकि समाजवादी विचारों के समर्थक हैं, क्यों इस समिति में शामिल होकर अपना आदर्श बदल सके? क्या वह इन्क़लाब नहीं चाहते? वैसे ही इन्क़लाब – इन्क़लाब चिल्लाते रहते हैं? क्या उन्हे आशा है कि यह सरकार स्वयं ही, जो माँगें प्रस्तुत क़ी गयी हैं उन्हे स्वीकार कर लेगी? (ऐसा सोचना ) जान – बूझकर आँखें मूंदना है..

कांग्रेस, नेहरू और गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत पर वे आगे लिखते हैं :

“नेहरू साहब केवल सरकार को भयभीत करने के लिए ही पूर्ण स्वतंत्रता का शोर मचाते रहते हैं और चाहते अधीन राज ही हैं? असल में यह आशा कि अभी कुछ मिलेगा, अभी कुछ मिलेगा, बहुत बर्बाद करती है | दास , बरकेन हैड क़ी चापलूसी में कितना गिर गया था, यह उसके फ़रीदपुर के संबोधन से ही पता चल सकता है| आज सभी नेता उस राह पर चल पड़े है|
स्वतंत्रता कभी दान में प्राप्त नहीं होगी| लेने से मिलेगी| शक्ति से हासिल क़ी जाती है| जब ताक़त थी तब लॉर्ड रीडिंग गोल मेज कांफ्रेंस के लिए महात्मा गाँधी के पीछे – पीछे फिरता था और अब जब आंदोलन दब गया, तो दास और नेहरू बार बार ज़ोर लगा रहे हैं और किसी ने गोलमेज तो दूर  , ” स्टूल कान्फ्रेंस ” भी न मानी| इसलिए अपना और देश का  समय बर्बाद करने से अच्छा है कि मैदान में आकर देश को स्वतन्त्रता – संघर्ष के लिए तैयार करना चाहिए|  नहीं तो मुँह धोकर सभी तैयार रहें कि आ रहा है –स्वराज्य का पार्सल!”

गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत को वे मजदूरों और किसानों के जुझारू वर्गीय चरित्र को कुंठित करने का फंदा मानते थे ताकि भारतीय पूंजीपतियों के संपत्ति रखने के अधिकार की रक्षा हो सके :

“यह गाँधी के अहिंसा और समझौतावादी सिद्धांत से ही हुआ है कि राष्ट्रीय आन्दोलन की इस लहर में दरार पैदा हो गयी है.”

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन के घोषणा पत्र में वे गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत की निरर्थकता को सिद्ध करते हैं क्योंकि वे समझते थे कि मौजूदा राज्य सत्ता का अस्तित्व ही हिंसा के सहारे टिका हुआ है. वे लिखते हैं;

“आज यह फैशन-सा हो गया है कि अहिंसा के बारे में अंधाधुंध और निरर्थक बात की जाये. महात्मा गाँधी महान हैं और हम उनके सम्मान पर कोई भी आंच नहीं ला देना चाहते लेकिन हम दृढ़ता से कहते हैं कि हम उनके देश को स्वतन्त्र कराने के ढंग को पूर्णतया नामंजूर  करते हैं. यदि देश में चलाये जा रहे उनके असहयोग आन्दोलन द्वारा लोक-जाग्रति में उनकी भागीदारी के लिए उन्हें सलाम न करें तो यह हमारे लिए नाशुक्रापन होगा. परंतु हमारे लिए महात्मा असंभावनाओं का दार्शनिक है. अहिंसा भले ही एक नेक आदर्श है लेकिन यह अतीत की चीज है. जिस स्थिति में आज हम हैं, सिर्फ अहिंसा से  आजादी कभी भी प्राप्त नहीं की जा सकती. दुनिया सिरे तक हथियारों से लैस है और (ऐसी) दुनिया पर हम हावी हैं ! अमन की सारी बातें ईमानदार हो सकती हैं लेकिन हम जो गुलाम कौम हैं, हमें ऐसी झूठे सिद्धांतों से नहीं भटकना चाहिए. हम पूछते हैं कि जब दुनिया का वातावरण हिंसा और गरीब की लूट से भरा पड़ा है, तब देश को अहिंसा के रास्ते पर चलाने की क्या तुक है? हम अपने पूरे जोर के साथ कहते हैं कि कौम के नौजवान कच्ची नींद के इन सपनों के बहकावे में नहीं आ सकते.”

कांग्रेस का उद्देश्य भगतसिंह और उनके साथियों से जैसे-तैसे पिंड छुडाना था. कांग्रेस पार्टी का इतिहास लिखने वाले मन्मथनाथ गुप्त अपनी  पुस्तक ‘क्रांति-युग के संस्मरण’ में लिखते हैं :

“जिस समय भगत सिंह तथा उसके साथी फांसीघर में बंद थे उस समय उनकी सज़ा के संबंध में गाँधीजी और वाइसराय के बीच औपचारिक बातें हुई, क्योंकि उन्हें जो फाँसी दी जाने वाली थी उससे देश में बड़ी हलचल मच रही थी| स्वयं कॉंग्रेस वाले भी इस बात के लिए बहुत उत्सुक थे कि इस समय जो सद्‍भाव चारों ओर दिखाई पड़ रहा है, उसका लाभ उठा कर उनकी फाँसी की सज़ा बदलवा दी जाय | किंतु वायसराय ने इस संबंध मे स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहा| हमेशा एक मर्यादा रखकर उन्होंने इस सबंध में बातें की| उन्होंने गाँधी जी से केवल यही कहा कि मैं पंजाब सरकार को इस संबंध में लिखूंगा| इसके अतिरिक्त और कोई वादा उन्होंने नहीं किया| यह ठीक है कि स्वयं उन्हीं को सज़ा रद्द करने का अधिकार था किंतु यह अधिकार राजनैतिक कारणों के लिए उपयोग में लाने योग्य नहीं था| दूसरीओर राजनैतिक कारण ही पंजाब सरकार को इस बात के मानने में बाधक हो रहे थे.”

” कांग्रेस का इतिहास”–पट्टाभिसीतारमैया के हवाले से वे आगे लिखते हैं;

“दरअसल वे बाधक थे भी| चाहे जो हो लार्ड इर्विन इस बारे में कुछ करने में असमर्थ थे| अलबत्ता कराची कॉंग्रेस अधिवेशन हो लेने तक फाँसी रुकवा देने का उन्होंने जिम्मा लिया| मार्च के अंतिम साप्ताह में कराची में कॉंग्रेस अधिवेशन होने वाला था किंतु स्वयं गाँधीजी ने ही निश्चित रूप से वाइसराय से कहा –यदि इन नौजवानो को फाँसी पर लटकाना ही तो कॉंग्रेस अधिवेशन के बाद ऐसा किया जाय, उसके बजाय पहले ही ऐसा करना ठीक होगा| इससे देश को साफ-साफ यह पता चल जाएगा कि वस्तुत: उसकी स्थिति क्या है और लोगों के दिलों में झूठी आशाएं न बँधेगी| कांग्रेस में गाँधी-इर्विन समझौता अपने गुणों के कारण ही पास या रद्द होगा, यह जानते बूझते हुए कि तीन नवजवानों को फाँसी दे दी गयी है| ”

जेल में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और मार्क्सवादी साहित्य के अध्ययन  द्वारा वे वर्ग-संघर्ष की पहचान को और अधिक स्पष्ट रूप से पहचानने में सफल हुए. फाँसी लगने से तीन दिन पूर्व, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव द्वारा फाँसी के बजाय गोली से उड़ाए जाने की मांग करते हुए पंजाब के गवर्नर को लिखे गए पत्र से इसकी पुष्टि होती है :

“यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक कि शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना अधिकार जमाये रखेंगे| चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति , अंग्रेज शासक या सर्वथा भारतीय  ही हों| यदि कुछ भारतीय पूंजीपतियों  द्वारा  ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी इस स्थिति में कोई अन्तर  नहीं पड़ता|”

भगत सिंह व्यक्तिगत हिंसा में विश्वास नहीं रखते थे लेकिन वर्गीय हिंसा को वे अच्छी तरह से पहचानते थे. क्रांतिकारी वर्गों द्वारा प्रतिक्रयावादी वर्गों के खिलाफ हिंसा को वे जायज मानते थे. बेशक भगतसिंह आज की ज़रूरतों के अनुसार सिद्धान्तिक अगुआई नहीं दे सकते लेकिन क्रांतिकारियों के लिए भगत सिंह जैसी स्पिरिट का होना आवश्यक है. भगत सिंह ने अपना अंतिम समय जेल में बिताया. यही वह समय था जब वे मार्क्सवाद को थोडा ही सही लेकिन समझ और आत्मसात कर पाए. जेल से स्मगल किये गए साहित्य का आज भी महत्त्व है. यहीं पर वे व्यक्तिगत हिंसा और वर्गीय हिंसा में फर्क सीखने में कामयाब हुए. पंजाबी के क्रांतिकारी कवि ‘पाश’ के अनुसार  क्रांतिकारियों को यहीं से अपना सफ़र शुरू करना चाहिए;

”भगत सिंह ने पहली बार
पंजाब को
जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से
बुद्धिवाद की ओर मोड़ा था
जिस दिन फांसी दी गयी
उसकी कोठरी में लेनिन की किताब मिली
जिसका एक पन्ना मोड़ा गया था
पंजाब की जवानी को
उसके आखिरी दिन से
इस मुड़े पन्ने से बढ़ना है आगे, चलना है आगे”

सन्दर्भ साभार :  शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज : पीडीऍफ़

आज शहीदे-आजम का 102वां जन्मदिन है

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अमर शहीदों का पैगाम, जारी रखना है संग्राम !

भगत सिंह की बात सुनों,

नई क्रांति की राह चलो !

मेहनतकश बहनों और भाईयो,bhagat singh

28 सितंबर को महान शहीदे-आजम का 102वाँ जन्मदिन है. शहीदे-आजम के जन्मदिन पर जरूरत है कि हम महज रस्मी श्रद्धान्जलियों से हटकर अपने महबूब शहीद की याद को सच्चे दिल से ताजा करें. यह ज़रुरत सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे विदेशी गुलामी से देश को आजाद करवाने के लिए भरी जवानी में अपनी जान तक की बाजी लगा गए. भयंकर शोषण उत्पीडन का शिकार मेहनतकश जनता के लिए शहीद भगतसिंह को याद करना आज इससे भी गहरे अर्थ रखता है.

शहीद भगतसिंह के विचारों को दबाने की जितनी साजिशें अंग्रेजों ने की थी, वे आजाद भारत के लुटेरे हुक्मरानों की साजिशों के सामने कुछ भी नहीं है. बेहद घिनोनी साजिशों के तहत शहीदे-आजम भगतसिंह के विचारों को दबाने की कोशिश की गयी. १९४७ के बाद देश की राज्यसत्ता पर काबिज हुए काले अंग्रेजों ने शहीद भगतसिंह की आजादी की लडाई के बारे में इस झूठ का हमेशा प्रचार किया कि वे तो सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे. उनके मुताबिक शहीद भगतसिंह के बुतों पर फूल मालाएं पहनना ही उन्हें श्रद्धांजलि देने का तरीका है. लेकिन यह कड़वी सच्चाई किसी से छुपी नहीं है कि हम आज भी एक बेहद अँधेरे समय में रह रहे हैं. साधारण जनता के लिए इस देश में आज़ादी नाम की कोई चीज नहीं है. शहीद भगतसिंह के सपनों के समाज का निर्माण होना अभी बाकी है.

शहीद भगतसिंह और उनके साथियों ने एक ऐसे समाज के निर्माण का सपना देखा था जहाँ इन्सान के हाथों इन्सान की लूट न हो, जहाँ अमीरी-गरीबी की असामानताएं न हों, जहाँ धर्मों-जातियों-क्षेत्रों के नाम पर झगडे न हों, जहाँ स्त्री-पुरषों में असमानता न हो. वे एक ऐसे समाज के लिए संघर्ष करते रहे जहाँ मेहनतकश जनता रहने-खाने-पहनने सहित शिक्षा-स्वास्थ्य, मनोरंजन, आदि सहूलतें हासिल कर सके. वे हर मेहनतकश व्यक्ति के लिए इन्सान की ज़िन्दगी, मान-सम्मान की ज़िन्दगी चाहते थे.  लेकिन शहीदे-आजम भगत सिंह के प्यारे मेहनतकश लोग आज भी इस आजाद देश में गुलामों की ज़िन्दगी जीनेपर मजबूर कर दिए गए हैं. देश की साधारण जनता की बेहद दर्दनाक परस्थितियाँ शहीद भगतसिंह के सपनों के तार-तार होने की कहानी बयान कर रही हैं.

देश में १८ करोड़ लोग फुटपाथों पर सोते हैं, १८ करोड़ लोग झुगी-झोपडियों में रहते हैं. हर रोज ९ हज़ार बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर रहे हैं. ३५ करोड़ लोगों को भूखे सोना पड़ता है. देश के लगभग ८० करोड़ से भी अधिक औद्योगिक और खेतियर मजदूर और गरीब किसान दिन-रात की कड़ी मेहनत के बावजूद भी भूख और कंगाली से जूझ रहे हैं. करोडों नौजवानों के पास कोई रोजगार नहीं है. आर्थिक तंगियों-परेशानियों से घिरे लोग आत्महत्या कर रहे हैं. कमरतोड़ महँगाई गरीबों के मुहं से रोटी का आखिरी बचा निवाला भी छीनने जा रही है. फल, दूध, दही तो गरीबों की पहुँच से पहले ही बाहर थे – अब आलू, दाल भी खरीद पाना गरीबों के लिए असंभव सा होता जा रहा है.

हमारे इस आजाद भारत में हर सेकंड में एक स्त्री बलात्कार का शिकार होती है. हर वर्ष ५० हज़ार से अधिक बच्चे गायब होते हैं जिनमें से अधिकतर लड़कियां होती हैं. इनमें से अधिकतर लड़कियों को देह व्यापार के धंधे में जबरन धकेल दिया जाता है. इन बच्चों को भीख मांगने पर मजबूर कर दिया जाता है या फिर उनके शरीर के अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं.

यह शहीद भगतसिंह के सपनों की आज़ादी नहीं है. यह आज़ादी पूंजीपतियों की आज़ादी है.देश की ऊपर की आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का ८५ प्रतिशत है, वहीँ गरीबी का शिकार देश की निचली ६० प्रतिशत के पास सिर्फ २ प्रतिशत ही है. आज़ादी के ६ दशकों के दौरान २२ पूंजीपति घरानों की संपत्ति में ५०० गुना से भी अधिक बढोत्तरी हुई है. साम्राज्यवादी लूटेरों को भारतीय मेहनतकश जनता को लूटने के लिए बेहिसाब छूटें दी जा रही है. संसद-विधानसभाएँ चोर-गुंडे-बदमाशों-परजीवियों के अड्डे हैं जहाँ पूंजीपतियों द्वारा मेहनतकशों के हो रहे लूट-शोषण को बनाए रखने की स्कीमें बनाई जाती हैं, हक़-अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली जनता के दमन के लिए काले कानून तैयार किये जाते हैं.

यह है वह काली आज़ादी जिसकी जय जयकार करते देश के लूटरे हुकमरान कभी नहीं थकते.

क्रांतिकारी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि अंग्रेजों से राज्यसत्ता भारतियों के हाथ आ जाने से ही देश की विशाल जनता की हालत में कोई बदलाव नहीं आने वाला. शहीद भगतसिंह ने कहा था :

हम यह कहना चाहते हैं कि एक जंग लड़ी जा रही है जो तब तक जारी रहेगी जब तक इन्सान के हाथों इन्सान की लूट जारी रहेगी, जब तक कुछ शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता की आमदनी से साधनों पर कब्जा जमाये रखेंगे. यह लूटेरे अंग्रेज हों या भारतीय इससे स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता.

यह थे शहीद-भगतसिंह के जंगे-आजादी के सच्चे मायने जिन्हें दबाये रखने की कोशिशे भारतीय लूटेरे हुकमरानों द्वारा आज तक जारी है. हुकमरानों ने इतिहास की किताबों में शहीद भगतसिंह की आजादी की लड़ाई को हमेशा तोड़-मरोड़कर पेश किया. यही कारण है कि आज पढ़े-लिखे लोग भी भगतसिंह की जंगे-आज़ादी के इन मायनों से अनजान हैं – लेकिन लूटेरे हुकमरान कितनी भी साजिशें क्यों न रचते हों, शहीद भगतसिंह के विचार आज भी जिंदा है. जैसा कि शहीदे-आजम ने कहा था : हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली, ये मुशते खाक है फानी, रहे, रहे, न रहे. समाज के आमूलचूल बदलाव की तड़फ रखने वाले आज भी शहीदे-आजम की क्रांतिकारी सोच से प्रेरणा और मार्गदर्शन ले रहे हैं – शहीदे-आजम आज भी लूट,शोषण, जुल्म, दमन, अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले जिंदादिल इंसानों के दिलों की धड़कन हैं. वे आज भी जलती मशाल की तरह इन्कलाब की राह रोशन कर रहे हैं. लूटेरों के दिलों में आज भी भगतसिंह के विचार खौफ पैदा कर रहे हैं. उनके विचारों को दबाकर रखने की कोशिश के रूप में शहीद भगतसिंह को एक बार नहीं बल्कि अनेकों-अनेक बार फाँसी लगाने की कोशिशें होती आई हैं लेकिन शोषितों-उत्पीडितों के दिलों में वे आज भी लूट,शोषण, जुल्म, दमन, अन्याय, गुलामी से मुक्ति की आशा बनकर अमर हैं. वे आज भी हर मेहनतकश को इन्सान के हाथों इन्सान की लूट रहित नए समाज के निर्माण के महान पथ के राही बनने के लिए ललकार रहे हैं.

आज के अँधेरे समय में शहीद भगतसिंह के विचारों पर अमल करना ही उन्हें एकमात्र सच्ची श्रद्धाजंली हो सकती है. आओ , शहीद भगतसिंह के जन्मदिन पर उनके सपनों के समाज के निर्माण का प्रण लें.

हम सभी सच्चे लोगों को शहीद भगत सिंह के

सपनो के समाज के निर्माण के लिए चल रही जदोजहद में

हमारे हमसफ़र बनने का आह्वान करते हैं !

कारखाना मजदूर यूनियन लुधियाना

संपर्क : शहीद भगत सिंह पुस्तकालय, गली न. ५, लक्ष्मण नगर, ग्यासपुरा, लुधियाना

फ़ोन : 98771-43788 , 98886 -55663

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चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – क्या करें

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इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

पहली बार क्या हुआ ? हुआ यह कि जब तेलंगाना का हथियारबंद संघर्ष हुआ तो, जब तक लडाई वहीँ तेलगाना तक सीमित थी तो ये काफी अच्छी तरह से संघर्ष को संचालित कर रहे थे लेकिन जैसे ही भारत की फौज ने इन पर चढाई की तो इन्हें पीछे भागना पड़ा. जो बुद्धिजीवी थे वे कमजोर साबित  हुए. उन्होंने कहा कि इस तरह की टक्कर का कोई फायदा नहीं है. तब उस तरह के हालात से डरते हुए उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि हथियारबंद संघर्ष का तरीका ठीक नहीं है. अब कोई और तरह के तरीके जैसे संसदवाद आदि आजमाए जाएँ. मतलब कि डर के कारण और हथियारबंद संघर्ष के ताव को न सहते हुए मार्क्सवाद को संशोधित करने के रास्ते चल पड़े. दुनिया भर में कम्युनिस्टों के संशोधनवाद के रास्ते पर चलने से भी पहले, यहाँ तक कि  ख्रुश्चेव से भी पहले भारत की कम्युनिस्ट पार्टी  (वर्तमान में सी.पी.आई.) ने संशोधनवादी रास्ता अपनाया.मार्शल टीटो से भी पहले के ये संशोधनवादी हैं. मार्शल टीटो भी संशोधनवादी हो गए थे. उन्होंने कहा था कि मजदूर वोटों द्वारा सत्ता हासिल कर लेंगे और समाजवाद की स्थापना हो जायेगी. और जब अमृतसर में इनकी कांफ्रेंस हुई, (उस वक्त सी.पी.आई. और सी.पी.एम. इकट्ठी थीं.) उस कांफ्रेंस में इन्होने इस संशोधन का प्रस्ताव रखा और पास किया जिसमें था कि अब वे केवल हथियारबंद इन्कलाब ही नहीं बल्कि कई और तरीकों की आजमाईश करेंगे. उसके बाद इन्होने जो अभ्यास किया है उसमें हथियारों का अभ्यास बिलकुल छोड़ दिया. इसके बाद इन पार्टियों के काडर में से अगर कोई ईमानदार सदस्य इनके लीडरों से पूछता था कि क्लासिकीय मार्क्सवाद तो हथियारों की प्रेक्टिस को नज़रंदाज़ नहीं करता है, तो ये जवाब देते थे कि आप मॉस मोबिलाईजेशन करें हम ऊपर की लीडरशिप से पूछकर बताएँगे. इन्होने क्रांतिकारियों की पार्टी से इसे एक मॉस पार्टी में बदलना शुरू कर दिया. जिसे कहते है कि दुअन्नी-चवन्नी की पार्टी जिसमें कोई भी शामिल हो सकता है. इसके पश्चात सी.पी.आई. और सी.पी.एम. आदि पार्टियों की यही कवायद रही है कि क्रांतिकारी पार्टी कि बजाय एक घोर जनवादी पार्टी , जनवादी भी नहीं, इससे भी आगे – जनवादी भी आगे की और देखते हैं एक बुर्जुआ जनवादी पार्टी बनाई जाये.

अब इनकी सोच क्या है? इनकी सोच है कि भारत एक धर्मों का देश है, धर्मों के और धर्मवालों के साथ मात्थापच्ची न करो, खुद नास्तिक रहो लेकिन धर्मों और धर्म वालों के साथ यूं मिल जाओ जैसे खिचड़ी में घी. कहने का अर्थ है कि किस प्रकार ये लोग विपरीत में बदले हैं. यह कोई सबब से नहीं हुआ कि  ये वामपंथी पार्टियाँ प्रतिक्रियावादी पार्टियों में बदल गयी हैं. इसके लिए ये मार्क्सवाद को संशोधित करके पहले ही रास्ता साफ़ कर चुके थे. ये लोग वैज्ञानिक विचारों से कुछ भी ग्रहण नहीं कर रहे हैं.इस प्रकार ये लोग कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे. संसद में कभी बहुमत में आकर भी नहीं, मतलब की इस पूंजीवादी ढांचे का निर्माण उन्होंने इस प्रकार किया है कि कभी भी मजदूर वर्ग इससे अपने एजेंडा को लागू करने में कामयाब नहीं हो सकता. एक उदाहरण देता हूँ. एक बार चौधरी देवी लाल चीन में गए. उन्हें वहां ट्रेक्टर  बहुत पसंद आये. देवी लाल कानून की अपेक्षा पंचायती ज्यादा थे. अब देखिये अगर पंचायत में आप को अधिकार है कि आपको पॉँच सौ रुपये तक के फैसले करवाने का हक़ है लेकिन आप ने फैसला कर दिया पॉँच हज़ार का तो बड़ी मुश्किल होगी. उन्होंने अफसरों से कहा कि वे इन ट्रेक्टरों को खरीदेंगे. लेकिन अफसरों ने जब देखा कि इस ‘डील’ से उन्हें तो कुछ भी नहीं मिलने वाला है, तो उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि इस देश से तो हम इस तरह की चीज नहीं खरीद सकते हैं. हमारे इस देश के साथ इस तरह के इकरार नहीं हैं. अगर अफसरशाही को इसमें अपने हित दिखाई देते तो वे उसी वक्त बता देते कि फलां-फलां धारा के तहत इन्हें खरीदा जा सकता है. हमारे कानून में बहुत सी एक दूसरे को काटती हुई धाराएँ है. एक से नहीं तो दूसरी से, इधर से नहीं तो कान उधर से पकडा जा सकता है.उस वक्त वैसे भी अफसरशाही किसानों को हिकारत की दृष्टि से देखती थी. इसलिए उसने कह दिया कि इस देश के साथ हमारा कुछ भी साँझा नहीं है. यह ‘डील’ नहीं हो सकती. हमारे कहने का भाव है कि संसद और कोई सोवियत जैसी चीज जिसे मजदूर वर्ग चाहता है उसके और इसके बीच का अंतर बहुत अधिक है.

फिर सवाल पैदा होता है कि मौजूदा हालात के तहत इंकलाबी शक्तियों को क्या करना चाहिए. इंकलाबी शक्तियों को समझना होगा कि जब तक हालात स्पष्ट इंकलाबी नहीं हो जाते तब तक चुनावों के बहिष्कार का मतलब अराजकतावाद होगा. मान लीजिये अगर हम बायकाट का नारा दे देते हैं तो चुनावों का बायकाट तो होगा नहीं, लेकिन हमारा बायकाट ज़रूर हो जायेगा.  जब तक मजदूरों के संगठन और आधार नहीं बन जाते, मजदूरों की लहरों के दौर की शुरुआत नहीं होती तब तक ऐसा सोचना भी गलत है. दूसरी और एक दो आदमी जीतवाकर, उन्हें सूअरबाड़े  में भेजकर और इस व्यवस्था का भंडा-फोड़ जैसी कार्रवाई करके भी मजूदरों और इंकलाबियों को कुछ हासिल नहीं होगा. अब स्थिति वह भी नहीं रही जिसके लिए पहले के दौर के इंकलाबी संसद का प्रचार के प्लेटफार्म के रूप में इस्तेमाल करने की सिफारिश किया करते थे. देश में मज़बूत एक इंकलाबी पार्टी जिसका की लोगों के बीच एक मज़बूत आधार हो, अपने थोड़े से इंकलाबी संसद में भेजकर प्रचार द्वारा लाभ उठा सकती है. लेकिन आज ऐसी स्थिति भी नहीं है. रूस में एक मज़बूत बोलेश्विक पार्टी थी. इसके थोड़े से व्यक्ति ही वहां की ‘दूमा’ के सदस्य थे लेकिन जब किसी मजदूर सदस्य ने बोलना होता था, तो सारे मजदूर अपने-अपने काम छोड़कर रेडियो-सेटों के चारों और इकट्ठे हो जाते थे. और उस वक्त इस तरह के जुर्म यानि कि रेडियो सुनने के अपराध में भी साईबीरिया की जेलों की सजा भुगतनी पड़ती थी. लेकिन मजदूरों के जोश और स्पिरिट में किसी प्रकार की कोई कमजोरी दिखाई नहीं देती थी. आज वैसी स्थिति नहीं है. असेम्बली लाइन को बिखरा दिया गया है. उत्पादन को एक देश के अन्दर के अलग-अलग कारखानों में ही नहीं बल्कि अलग-अलग देशों में और इसे फिर किसी अन्य देश में असेम्बल करने का दौर है. मजदूरों के प्रतिनिधि कारखानों में घुस ही नहीं पाते. अगर चले जाएँ तो उन्हें भी अपने साथ मिला लिया जाता है या ठिकाने लगा दिया जाता है. और इस प्रकार की हल्काबंदी की जाती है कि मजदूर बहुल आबादी को किसी एक सीट में बहुमत जैसी स्थिति में इकठ्ठा ही नहीं होने दिया जाता. सर्वे करवाए जाते हैं, अगर कहीं खतरा दिखाई देता है तो उस सीट का फिर परिसिमिन हो जाता है. उसे रिजर्व कर दिया जाता है या रिजर्वेशन भंग कर दी जाती है. हमारी यह पक्की धारणा है कि इन चुनावों में हमें एक अलग तरह से भाग लेना चाहिए. चुनावों में अपना उम्मीदवार खडा करना अपनी शक्ति जाया करने के सिवा कुछ नहीं है. बल्कि हमें चाहिए कि जब चुनावों के दौरान माहौल पूरी तरह से गर्म हो तो उस वक्त अपनी राजनीतिक सरगर्मियों को और अधिक तीव्र करें. लोगों से मिलकर उनतक अपनी बात पहुंचानी चाहिए. सभी बुर्जुआ और चुनावबाजी वामपंथी पार्टियों का भंडा-फोड़ करना चाहिए. लोगों को बताना चाहिए कि इन चुनावों से कुछ भी फर्क नहीं पड़ने वाला. फर्क तभी पड़ेगा जब सभी मेहनतकश अवाम खड़े होकर सारी ताकत अपने हाथ में लेंगे. लोगों को  बताया जाये कि किन-किन पार्टियों को किन-किन पूंजीपति और व्यावसायिक घरानों से कितना चंदा मिलता है. फिलहाल क्रांतिकारियों को इस तरह के या इससे मिलते-जुलते काम करने चाहिएं.

भारत के गाँव-गाँव तक पैठ कर चुकी बुर्जुआजी

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चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – तीसरी किश्त

इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

जमीनों के आसमान छूते भावः हैं लेकिन उनके लिए कोई फर्क नहीं पड़ता जिन्होंने मजदूरों से अधिशेष लूटा है. वे इसे हर कीमत पर खरीद लेना चाहते हैं. यहाँ तक भी देखने में आया है की वे रास्तों और गलियों को भी अपने खेतों और घरों में मिला लेते हैं जिसके लिए उन्हें कोई दाम नहीं देने पड़ते. अगर कोई विरोध करता है तो गाँव की निम्न बुर्जुआजी भी फ़िलहाल बड़े लोगों के साथ ही खड़ी होती है. इनका नजरिया न केवल पलायनवादी होता जा रहा है बल्कि वे गाँव के धनाढय लोगों के पक्ष में जिरह करते पाए जाते हैं. गली और रास्ता बंद होने की अगर कोई आपत्ति भी दर्ज करवाता है तो अपने बड़े बिरादरों की हिमायत में ये लोग उस व्यक्ति के घर इस तरह का ताँता लगा देते हैं जैसे कोई मईयत पर आता हो. उनके तर्क होते हैं कि भाई, तुम ही क्यों विरोध करते हो. वे कहते हैं कि फलां व्यक्ति भी गली पर कब्जा जमाये बैठा है और फलां भी. यह दरखास्त तुने खिलाफ क्यों दर्ज करवाई है ?

मेरे जैसे लोग उनसे जिरह तो करते है कि भाई सांझी मल्कियत रास्ते और गलियों का बचाना ज़रूरी है. उनसे यह भी कहा जाता है कि गाँव में कब्जों द्वारा से गली और रास्ता हथियाने वाले ये लोग कभी भी कामरेडों के मित्र नहीं रहे. कामरेड उन्हीं परिवारों से आये जो दबे-कुचले लोग थे, अगर किसी एक भी अमीर परिवार से आया है तो बता दो. उन लोगों से कहा जाता है  कि पहले तो यह कब्जों का काम ये भद्र्पुरुष करते थे लेकिन अब यह काम आपने भी ले लिया है ! जहाँ तक जमीन का सवाल है तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान दो मुल्क बन गए और अंग्रेज भी चले गए, ज़मीनें जो जागीरदारों के पास थी उसमें से अधिकतर का बंटवारा भी हो गया लेकिन कभी गलियों और रास्तों के भी बँटवारे हुए हैं?  एक धार्मिक व्यक्ति ने गुरबाणी का सहारा लेकर इन जमीन के भूखे लोगों का पक्ष लिया “जित हाथ जोर हरि देखिये सोई, नानक उसते नीच न कोई”. मतलब यह कि एक भी व्यक्ति तैयार नहीं है इस तरह की बात मानने को. तो यह स्थिति है नयी-नयी निम्न-बुर्जुआ में शामिल हुए इस वर्ग की !

तो यह फर्क है हमारी पंचायत और सोवियतों में. सोवियत कानून बनाती भीं हैं और इसे स्वयं लागू भी करती हैं. यह कोई उपरोक्त व्यक्तियों की तरह निठ्ठले लोगों का अड्डा नहीं है. गप्पबाजी का अड्डा नहीं है. यहाँ तो गप्पबाजी करो, पैसे लो, मज्जे लो, कानून बनाओ, अपने आप अफसरशाही उसे अपने ही ढंग-तरीके से लागू करती रहेगी. इधर जब भी कभी मजदूरों के हाथ में सत्ता आती है वे सोवियतें बनाते हैं, कम्यून बनाते हैं. और अब चीन और रूस में जब उल्ट हुआ है तो इन्होने फिर ‘डूमा’, पार्लियमेंट को लाकर खडा कर दिया. तो संस्थाएं भी उसी प्रकृति की होती हैं जिस प्रकृति या वर्ग की सत्ता होती है. आज मान लीजिये अगर राजाओं की सत्ता आ जाये तो (जो कि संभव नहीं है) तो राजा लोग अपनी एक परिषद् बनायेगे जिसमें वोट का अधिकार केवल सामंतों को ही होगा. इन्हीं लोगों द्वारा आम राय निर्धारित की जायेगी. राजा भी राय देगा लेकिन आम लोगों की कोई राय नहीं होगी. अब इस व्यवस्था में केवल पूंजीपतियों की राय की ही कद्र होती है.

दूसरी बात कि अब वोटों को देखो. काफी मजदूर आबादी जो इधर से उधर स्थान बदलती रहती है उसकी वोट बनी हुई ही नहीं है. और जो वोट डाली गयी है उसमें से वर्तमान में सत्ता में आयी कांग्रेस पार्टी को कुल वोट का केवल 12  प्रतिशत ही मिला है. यानी कि वर्तमान सरकार केवल 12  प्रतिशत लोगों की ही नुमाइंदगी करती है बाकी जो 88  प्रतिशत वोट है वह इसके विरोध में है. अगर हम इस आंकडों की बाजीगरी में भी जाएँ तो भी बात कितनी विडम्बनापूर्ण है. इसी भारत को ही दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं ! तो इस स्थिति, इस भ्रम से बाहर निकलने का हम अपने साथियों से आह्वान करते हैं.

(बीच में एक साथी प्रश्न पूछते हैं कि कई देशों में कानून और नीतियाँ बनाने के लिए ‘पब्लिक ओपिनियन’ होता है)

‘पब्लिक ओपिनियन’ भी तो यही है. हमारे संसदमार्गी कामरेडों ने कभी मांग उठाई थी कि अठारह साल के नौजवान को वोट का अधिकार हो. कि नौजवान बहुत ऊर्जावान होता है. कि नौजवान प्रोग्रेसिव होता है.जैसे कि नौजवान यूंही ऊर्जावान और प्रोग्रेसिव हो जाता है ! जैसे कि उसका कोई वर्ग न हो ! जैसे कि वह वर्ग से ऊपर कोई पवित्र शै हो !

(एक और साथी बीच में बोलने लगते हैं कि ‘पब्लिक ओपिनियन’ आप टीवी पर नहीं देखते हो ? उसमें यह तो बताया जाता है कि इतने फीसदी ने पक्ष या विपक्ष में एस.एम.एस भेजा लेकिन यह नहीं बताया जाता कि कुल कितने एस.एम.एस आये.एक और साथी कहते हैं कि कई देशों में जनमत के द्वारा लोग अपने चुनें गए प्रतिनिधियों को वापस बुला सकते हैं.)

यह बात ठीक है कि वे वापस बुला सकते हैं. लेकिन अगर हम वापस बुला भी लेते हैं तो फिर वोट डाली जाएँगी और वोटें तो वैसे ही डाली जाएँगी जैसे पहले डाली गयी थी. मतलब यह है कि इस क्रिया मैं आम लोग कहाँ ठहर पाएंगे. उनका तो कोई अधिकार है ही नहीं. आम लोगों का प्रतिनिधित्व तो फिर भी नगण्य होगा. अब सोवियतों का प्रतिनिधित्व कैसा रहा है. सोवियत क्या थीं? सोवियतें थीं – मजदूरों की सोवियतें, किसानों की सोवियतें, अध्यापकों की सोवियतें, फौजियों की सोवियतें बगैरा-बगैरा. सोवियते थी काम के आधार पर. हमारे क्या हैं जातिगत ? कि इतने फीसदी औरतें ! अब औरतें हमारी पार्लियमेंट में जाते ही औरतें रहती ही नहीं, वे कुलीन औरत में परवर्तित हो जाती है. आत्मा सिंह को ले लो वह इस पार्लियमेंट का एक कुलीन व्यक्ति बन गया है. उसमें ऐसा कुछ नहीं है जो उसके दलित जाति का प्रतिनिधित्व करे. बूटा सिंह को ले लो. उसका लड़का घपले करता पकडा गया और वह झूठ पर झूठ बोले जा रहा है. हमारे यहाँ ये लोग इस प्रकार के बँटवारे करते हैं. कभी भी काम-धंधे के आधार पर बटवारा नहीं होता. कि इतने फीसदी मजदूर आएंगे, इतने फीसदी किसान, इतने फीसदी पूंजीपति. लेकिन सोवियतों में इस तरह का बंटवारा था. अपने यहाँ प्रतिक्रियावादी बाँट करेंगे. जिससे लोग भाई-भाई के दुश्मन हो जाते हैं. वे कह रहें है कि देखिये हरियाणा में इतने फीसदी पंजाबी हैं. तो यह है प्रतिक्रियावादी बंटवारा. यह प्रतिक्रियावादी बंटवारा है क्या ? धर्मों के नाम पर, जाति के नाम पर, गोत्रों के नाम पर – यह पीछे-खींचू बाँट है, प्रतिक्रियावादी बाँट है. जो असली बाँट है वे वर्गों के आधार पर है कि काम के आधार पर बाँट हो. यही समाजवादी बाँट है और वैज्ञानिक बाँट है. कि मजदूर की गिनती आबादी का सतत्तर फीसदी है इसे सतत्तर  फीसदी की ‘रिजर्वेशन’ मिले. अब ये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लोग भी कह रहे हैं कि पंजाबियों का इतने प्रतिशत प्रतिनिधित्व हो. ये भी इतने पीछे-खींचू हो गए हैं.

(एक और साथी प्रश्न करते हैं कि क्या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी यह बात कहती है.)

बिलकुल आज से आठ-दस वर्ष पूर्व इन्होनें अपने प्रोग्रेम में यह तरमीम की है. पहले इनके प्रोग्रेम में था कि यह पार्टी मजदूरों और किसानों की पार्टी है और यह अपना सैद्धांतिक आधार मार्क्सवाद-लेनिनवाद से लेती है. माओवाद से नहीं. अब माओवाद आज के युग का मार्क्सवाद है वैसे ही जैसे लेनिनवाद साम्राज्यवाद के युग का मार्क्सवाद है. मार्क्सवाद आजाद मुकाबले के पूंजीवाद के युग का सिद्धांत है और जैसे ही पूंजीवाद साम्राज्यवाद में बदला तो उस समय का मार्क्सवाद है लेनिनवाद. माओवाद समाजवाद आने के बाद ,उसे साम्यवाद में ले जाने के लिए किन-किन  दांव-पेंचों की ज़रुरत है, किस प्रकार की रणनीति हो, उस समय का मार्क्सवाद है. वे माओवाद को मानते ही नहीं बल्कि वे कहते हैं कि वे मार्क्सवाद, लेनिनवाद, बुद्धवाद, नानकवाद, कबीरवाद आदि उनके प्रेरणास्रोत हैं. मतलब कि ये अपनी विचारधारा को पीछे ले गए हैं. हम समझते हैं कि लेनिन तक भी हम पीछे हैं. अगर आप माओ तक भी नहीं आते तो बहुत पिछड़ जाते हो. पर ये तो मध्ययुग के उस मानवतावाद तक निघार की रसातल में चले गए हैं.

अगली किश्त में समाप्य

इसके बाद : चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – क्या करें

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इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

अब हम बदल के बारे में कुछ ऐतिहासिक बातें करते हैं. चुनावों के बारे में कहा जाता है कि ये तो बहुत ज़रूरी हैं और चुनाव कभी लोकसभा के तो कभी विधानसभा या पंचायतो और मयुन्सिपलिटी के चुनाव. ऊपर से लेकर नीचे तक चुनावों का जाल बुना गया है. लेकिन हम देखते हैं कि इन पर अरबों-खरबों का खर्च होता है.पिछले दिनों, आपने देखा होगा कि बुर्जुआ पत्रकार किस प्रकार पांच सितारा होटलों में ठहरे होते हैं , और ये लोग इन नेताओं और सरकारों के खिलाफ लिखते हैं ! जाने-माने पत्रकार खुशवंत सिंह पूछते हैं कि इन पत्रकारों और अख़बारों में से कोई एक भी ऐसा है जो अपनी जेब से खर्च करता हो ! ये पत्रकार, उनसे आप वहां मिल ही नहीं सकते . इसके विपरीत जब हम इसके बदल की बात करते हैं तो  हम मजदूरों के प्रारंभिक, बेशक  अल्पकालीन ही सही लेकिन महत्त्वपूर्ण अनुभवों को देखते हैं.१८७१ के पेरिस कम्यून में हम देखते हैं कि उन्होंने सारी बुर्जुआ मशीनरी को हटा दिया और सारे काम-काज को स्वयं संभाल लिया. उस अस्थाई ढांचे जिसने कुछ दिन ही शासन किया, वहां एक मजदूर वर्ग का प्रतिनिधि  शासन करने के अलावा फैक्टरी में भी काम करता था और उसकी तनख्वाह एक औसत मजदूर से ज्यादा नहीं थी. इसी प्रकार सोवियतें जो सोवियत यूनियन में बनीं. सोवियतें हमारी संसद की तरह थी लेकिन तत्त्व रूप से बिलकुल भिन्न. हमारी संसद अपने आप में कोई शासक शक्ति नहीं है बल्कि राज्य की शक्ति के कुल जोड़ का एक हिस्सा है. इसके विपरीत सोवियतें कानून ही नहीं बनाती थीं बल्कि उन्हें लागू भी करती थीं. हमारी संसद की तरह नहीं कि कानून को लागू करने के लिए भारी-भरकम अफसरशाही रखी जाये. और अफसरशाही उसे लागू करने में बीस-बीस साल या इससे भी अधिक समय लगाए और लोग इंसाफ का इंतजार करते-करते मर जाएँ. बुर्जुआ राज्य के दिखाने के दांत कोई और होते हैं और खाने वाले कोई और. संसद बुर्जुआ के दिखाने के दांत हैं जबकि अफसरशाही इसके खाने के. चीन में कम्युनों की मिसाल लें. महान सांस्कृतिक क्रांति जो माओ की अगुआई में शुरू हुई थी, उसके अनुभवों को देखें. हालाँकि दुनिया भर के वाईट-कालर बुद्धिजीवी वर्ग और चीन के बुद्धिजीवियों का भी कहना था की माओ ‘पागल’ हो गए हैं. उन्होंने कहा था कि अब प्रोफेसर और बुद्धिजीवी पढ़ने-पढाने के अलावा खेतों और फैक्ट्रियों में काम भी करेंगे और मजदूर और किसान स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढायेंगे. कई वस्तुगत कारणों के अलावा यह भी एक कारण था कि बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के समय मजदूर और किसान के साथ था, अपनी मंजिल आते ही इस जनवादी क्रांति की बस से नीचे कूद  गया !

अब हमारी इस नयी संसद के गठन पर इन्होने नौकरियों के लिए कुछ फार्म भरवाने शुरू किये हैं लेकिन ये आने वाले पॉँच सालों में इन फार्मों को छेड़ेंगे नहीं. अगर कर्मचारियों की भरती की भी जायेगी तो मुट्ठीभर लोगों की. तो यह है हमारी संसदीय प्रणाली. अगर हम इस संसदीय प्रणाली में इस बुर्जुआ राज्य की शक्ति के कुल जोड़ के एक अंग ‘संसद’ में बहुमत प्राप्त भी कर लेते हैं, जैसा की संशोधनवादी और संसदमार्गी कम्युनिस्टों का मानना है – हालाँकि इस प्रकार की स्थिति में इसकी कोई गुंजाईश भी नहीं दीखती, तो भी मजदूर वर्ग अपने ऐज़ंडा कि पैदावार या उत्पादन के साधनों के  समाजीकरण के साथ-साथ इन्हें सांझी मलकीयत में बदला जाये, तो किस प्रकार केवल कानून बनाकर इसे लागू किया जा सकता है जबकि सत्ता का एक बहुत बड़ा हिस्सा जैसे सरकारी अफसरशाही, पुलिस, फौज और स्वयं पूंजीपति वर्ग अपने निजी दल-बल और हथियारों के साथ इसके विरोध में मर-मिटने को तैयार-बर तैयार बैठा है ? हमारी चुनाव प्रणाली एक पूरे धंधे में बदल चुकी है. एक मजदूर कभी करोड़पति नहीं बन सकता (कौन बनेगा करोड़पति और स्लमडोग मिल्लियानेरी के भ्रम को अपने दिमाग से निकाल दें)

दूसरी बात जिसका कि ऐतिहासिक महत्त्व है वह है पूंजीवादी चुनाव और पूंजीवादी दल. पूंजीवादी दलों और पूंजीवादी चुनाव प्रणाली पूंजीवाद के जन्म के साथ-साथ पैदा हुए, ये हमेशा से इसी तरह विद्यमान नहीं रहे हैं. पूंजीवादी चुनावों का महत्त्व पूंजीवादी प्रणाली के अन्दर और इसे इसी प्रकार बरक़रार रखने में ही है. इसमें पूंजीपति या उनके उम्मीदवार ही चुनें जाते हैं या फिर वे जो इसी प्रणाली के अन्दर के रेस के घोडे होते हैं. अब तो उन्होंने इसे भी बर्दाश्त करना बंद कर दिया है. मिसाल के लिए हमारे प्रधान मंत्री और गृहमंत्री जो पहले वित्तमंत्री रहे हैं या तो चुनाव लड़ते ही नहीं या फिर हार जाते हैं लेकिन अमेरिकन पूंजीवादी साम्राज्य के, जिनकी कि भारतीय बुर्जुआजी जूनियर पार्टनर है, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थायों के इशारों पर सीधे नियुक्ति कर दी जाती है. इसके इलावा जातिवाद, धर्म, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, संप्रदाय आदि के प्रतिक्रियावादी समीकरणों में इन चुनावों को देखा जाता है. इस प्रकार इसे इतना पीछे-खींचू देखा जाता है,जैसे मिसाल के लिए अगर ‘हजका’ वालों ने राय सिख को खडा कर दिया तो लोकदल वालों ने देखा कि उनका ऐसा उम्मीदवार हो जो सिख न हो, भुमनशाह के डेरे को भी मानता हो और सच्चे सौदे का भी उपासक हो, कम्बोज हो लेकिन सिख नहीं मोना हो, उसे ढूंढकर खडा कर दिया है. इस तरह का सर्च-वर्क किया जाता है. वे लोग जो महीनों से टिकट पाने के लिए मुशक्कत कर रहे थे, हाथ मलते रह गए हैं ! उन्होंने एक कम्बोज को जो सिख नहीं है और जिसकी कि आढ़त की दुकान है और जो कृषि-पूंजीपति है उसे टिकट थमा दी है क्योंकि वह पूँजी के लिहाज से अन्य पार्टियों के उम्मीदवारों से किसी भी प्रकार से छोटा नहीं है. तो यह है वह स्थिति जिसके की हम सभी चश्मदीद गवाह हैं.

दूसरी और अपने उम्मीदवार जो चुंने जाते हैं. इस प्रकार की तो कोई बात नहीं है कि वर्तमान में हमारी ये बुर्जुआ पंचायते जो केवल बुर्जुआ वर्ग के हितों की रक्षा के लिए गठित की जाती हैं, हमारे सपने का हिस्सा हों. जिस प्रकार हम देखतें हैं की भगत सिंह का सपना सोवियतों की तर्ज़ पर पंचायतो के निर्माण का सपना था. अब सोवियतें क्या थीं ? जब हम कहते हैं की सारी सत्ता सोवियतों को? सोवियतों और पार्लियमैन्ट में क्या फर्क है? पंचायतो के निर्माण का सपना तो महात्मा गाँधी का भी था. लेकिन वह इसे वर्तमान और भविष्य के लिए नहीं देखता था बल्कि भारत के तथाकथित गौरवशाली अतीत की अन्धगली में छलांग लगा देता था. समाजवाद में सोवियत होगी इसके उल्ट की पार्लियमैन्ट हो. पार्लियमैन्ट क्या है ? यह कानून बनाती है जिसे इसे लागू करने का हक़ नहीं होता. इसे लागू करती है नौकरशाही जो जैसा कि हमने जिक्र किया, इसे लागू करने में बीस-बीस वर्ष लगा देती है. यह नौकरशाही ही इसके असली और खाने के दाँत होते हैं. अब मान लीजिये कि हमारी न्यायव्यवस्था में कोई व्यक्ति किसी मुकद्दमें में जीत भी जाता है तो नौकरशाही उसकी मदद तब ही करती है जब वह अपने विरोधी पक्ष से पूँजी के मामले में अधिक शक्तिशाली होता है.

बाकी हिस्सा अगली किश्त भारत के गाँव-गाँव तक पैठ कर चुकी बुर्जुआजी

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इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

आम तौर पर क्या होता है कि लोग हमें यहाँ सी पी आई या सी पी एम से भिन्न नहीं समझते. इसमें कोई शक नहीं है कि हम उनसे अलग है लेकिन यह बात उपरी स्तर पर हल हो गयी और एक दूसरे से तोड़-विछोड़ा करने से पहले ताने-मेहने और वाद-विवाद का अभाव रहा है और लोग अक्सर इस तरह की बातें करते हैं कि कामरेडों, इस बार तो बड़ी बढ़िया बात है कि तुम्हारा आदमी भी चुनाव लड़ रहा है या फिर पूछते है कि अब किसे वोट दी जाये. इससे एक बड़ी पेचीदा स्थिति पैदा हो जाती है. इस पर हमें बड़े सीधे-साधे ढंग से अपनी स्थिति प्रकट करनी होती है. उन्हें बताया जाता है कि हमारे यहाँ भारत में दो तरह के कम्युनिस्ट हैं – एक वे जो चुनावों में भाग लेते हैं, इन्हें इलेक्शनबाज या संसदमार्गी कम्युनिस्ट कहा जाता है, दूसरे वे जो चुनावों में भाग नहीं लेते हैं. इनमें से एक वे हैं जो दुस्साहसवादी  या नकसलवादी कम्युनिस्ट है जो केवल हथियारों के बल पर इन्कलाब करना चाहते हैं. पहले वाले कम्युनिस्टों के भी आगे कई प्रवर्ग है जैसे सी.पी.आई., सी.पी.एम., सी.पी.एम. लिबरेशन आदि. और जो चुनाव नहीं लड़ते हैं उनमें भी कई तरह के हैं जैसे कुछ क्रांतिकारी ग्रुप हैं और इसके अलावा नकसली और माओवादी भी चुनावों में भाग नहीं लेते हैं..

उपरोक्त चर्चा का आशय क्या है ? इसे समझने के लिए आईए हम भारतीय बुर्जुआजी और इसके  लोकतंत्र (यानि बुर्जुआ लोकतंत्र, जिसके ऐतिहासिक विकास के थोड़े से वस्तुगत अध्ययन से हम इसे बुर्जुआ वर्ग की सर्वहारा वर्ग पर तानाशाही से बढ़कर कुछ नहीं समझते) के विकास और इतिहास को देखें. भारतीय बुर्जुआजी अंगरेजों के समय में पैदा हुई थी. यह पश्चिम या यूरोप के पूंजीपति वर्ग की तरह किसी स्वतन्त्र मुकाबले में संघर्ष से पैदा नहीं हुई है. अग्रेजी साम्राज्य के दौरान कभी छिप-छिप कर तो कभी थोडा सा मुखर होकर यह धीरे-धीरे अपना अस्तित्त्व ग्रहण करती गयी. कभी भी इसने खुलकर या संघर्षमयी तरीके से अपनी जरूरतों या मांगों को नहीं रखा. इसके विपरीत यह समयानुसार अपनी मांगे रखकर और फिर समझौता फिर मांगे और फिर समझौता की प्रक्रिया द्वारा पैदा हुई है. चाहे पहला विश्वयुद्ध हो या फिर दूसरा. जब भी इसने देखा कि अब अंग्रेजी साम्राज्यवाद उलझा हुआ है या किसी और कारण से – ये अपनी मांगे प्रस्तुत कर देती रही है. जैसे १९४२  में जब इसने देखा कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद दूसरे विश्वयुद्ध में उलझा हुआ है तो विश्व साम्राज्यवाद के अंतरविरोधों  का फायदा उठाते हुए ठीक कांग्रेस की अगुआई में इसने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’  शुरू कर दिया. इसने कभी भी उस समय के मेहनतकश वर्ग किसान या मजदूर वर्ग की मांगो को अपने आंदोलनों या मांगों का हिस्सा नहीं बनाया. १९४७ से पहले भी और बाद में भी इसका यही रुझान रहा है,  कभी चीन से समझौता तो कभी अमेरिका से या फिर रूस से.

अभी कुछ दिन पहले ही हरियाणा  के वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंदर हुड्डा के पिता श्री रणवीर हुड्डा का निधन हुआ है. वे हमारी उस सविधान सभा के सदस्य थे जो अंग्रेजी शासन के दौरान गठित हुई थी. उस ज़माने में इस संविधान सभा के सदस्य होने के लिए जो शर्तें निर्धारित थी उनमें केवल भारत की १५ प्रतिशत आबादी ही कवर होती थी. जैसे कि भूमि का मामला या आबियाना कर का भुगतान कौन लोग करते हैं. अन्य ८५ प्रतिशत आबादी को इसमें शामिल होने का कोई अधिकार नहीं था. इन पंद्रह फीसदी लोगों में  से चुनें हुए लोग ही उस संविधान सभा के सदस्य हुए.  जैसा कि होता रहा है,  भारतीय जब विदेश में निर्मित किसी चीज को देखते रहे हैं और फिर उसकी नक़ल करके उस पर ‘भारत में निर्मित’ का ठप्पा लगाते रहे हैं. ठीक वैसे ही इस संविधान सभा द्वारा निर्मित सविधान को ही १९४७ के बाद झाड़-पोंछकर संविधान का दर्जा दे दिया गया. संविधान के निर्माण से पहले संविधान सभा के लिए जिसमें आम लोग शामिल हों, के चुनाव के लिए किसी भी प्रकार की संविधान सभा का चुनाव नहीं हुआ. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कानून के अनुसार मुट्ठीभर वे लोग जो कुलीन थे और जो पैसे-टक्के वाले थे, वे ही भारत के वर्तमान संविधान के निर्माता रहे हैं (अगर इन्हें निर्माता  कहा जाये तो भी). संक्षेप में यही है हमारे संविधान का इतिहास जिसके बारे में बड़ी-बड़ी डींगे हांकी जाती है कि इसमें अम्बेडकर था , हुडा था या कोई और, और यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, उन लोग के बुत लगाये जाते हैं और उन्हें महानता की उपाधियाँ दी जाती है. ऐसी कोई बात नहीं है कि उनके बुत लगायें जाएँ और उन्हें ये उपाधियाँ दी जाएँ.

अब हम भारत की चुनाव प्रणाली की ओर आते हैं. हम देखते हैं कि यह प्रणाली कितनी खर्चीली है और आम लोगों की आकाँक्षाओं पर किसी भी प्रकार से खरी नहीं उतरती है. लेनिन के ‘राज्य और इन्कलाब’ के शब्दों के अनुसार इसमें होता सिर्फ इतना ही है कि हर पांच वर्षों के बाद देखना होता है कि लुटेरे वर्ग का कौनसा धड़ा अब लोगों के कपडे उतारेगा. आओ थोडा सा देखें कि इनके वेतन, भत्तों और अन्य सहूलतों की फेहरिस्त कितनी खर्चीली है. हम देखते हैं कि एक विधायक का चुनाव खर्च करोड़ रुपये या उससे बढ़कर है. चर्चा होती है कि फलां व्यक्ति फलां पार्टी से टिकट लेने के लिए इतने करोड़ देने को तैयार है. चुनाव उम्मीदवारों में से किसी एक का चुनाव करने के लिए हमें चुनाव से किसी गिरोह, भू माफिया या भ्रष्ट व्यक्ति से एक को चुनना होता है. ताज़ा चुनी गयी लोकसभा में ३०० सांसद यानि ५६ फीसदी घोषित करोड़पति हैं. वो ज़माने चले गए जब कामरेड भी कहा करते थे कि एक वोट और एक नोट. अब हम देखते हैं कि हमारी ये जो संसदमार्गी कम्युनिस्ट पार्टियाँ हैं इन्हें कोई बड़े पूंजीपति तो नहीं लेकिन निम्न पूंजीपति वर्ग या प्रोफेसर, वकील या कुलीन मजदूर वर्ग ने इन्हें थोडा-बहुत फंड या पैसा देना शुरू कर दिया है. लेकिन हम देखते हैं कि बुद्धदेव भटाचार्य ने भी उन नीतियों को पश्चिम बंगाल में लागू कर दिया है जो बुर्जुआ की मन-पसंद रही हैं, तो फंड और पैसा देने वाला ये वर्ग भी निराशा का शिकार है. इतिहास में हम देखते हैं कि पहली बार जब केरल में  नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में वामपंथियों की सरकार बनी तो उस वक्त नेहरू प्रधान मंत्री थे और इंदिरा कांग्रेस की प्रधान. उन्होंने इस सरकार को तुंरत तोड़ दिया. लेकिन धीरे-धीरे भारत की बुर्जुआजी को और इसका प्रतिनिधित्व करने वाले दलों ने इस बात को समझा और आत्मसात किया कि ऐसी कोई बात नहीं है कि इन नामधारी कम्युनिस्टों से डरा जाये, तो उन्होंने इनको बर्दाशत करना शुरू कर दिया और इन्हें इनका वाजिब हक़ और सम्मान (?) देना शुरू कर दिया.

अब हम देखते हैं कि जिस देश की ८४ करोड़ आबादी जो २० रुपये दैनिक से गुज़ारा चलाती है, इस चुनावी नौटंकी में सिवाय अपना तमाशा बना लेने से, उन्हें कुछ हासिल नहीं होता है और न ही हो सकता है, वे अपने को बड़ी हास्यपद स्थिति में पाती है. ये आंकड़े कुछ वर्ष पुराने हैं. इन्हीं के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमंडल का रोजाना खर्च पंद्रह लाख रूपये है, प्रधानमंत्री दफ्तर पर प्रतिदिन दो लाख अड़तीस हज़ार रुपये खर्च होते हैं. राष्ट्रपति पर प्रतिदिन चार लाख चौदह हज़ार. संसद की एक घंटे की कार्रवाई पर सोलह लाख रुपये और इस प्रकार राज्य सभा की एक घंटे की कार्रवाई और राज्य विधान सभा की कार्रवाई  पर बारह-पंद्रह लाख रुपये प्रति घंटा खर्च होते हैं. इनके सदस्यों के वेतन कम दीखते हों लेकिन अन्य सहूलतें और  अन्य आमदनी का कोई हिसाब नहीं है. संसद की अलग-अलग कमेटियों में भाग लेने के लिए ४०० रुपये प्रतिदिन, सदन की मीटिंग बेशक न चलती हो तो भी ८००० रुपये प्रति मास लोगों से संपर्क के लिए चुनाव भता, दफ्तर में आने के लिए २५० ० रुपये , एक या दो सहायक रखने के लिए ६००० रुपये, प्रत्येक सदस्य को स्कूटर , ए.सी. या कार आदि सहूलतें,  फोन बिना कराये के , एक लाख मुफ्त फोन काल्स , फर्स्ट क्लास रेलवे और हवाई यात्रा की टिकटों पर भारी छूट. प्रत्येक सांसद अपने परिवार समेत ३२ हवाई यात्रायें मुफ्त कर सकता है , ..अन्य कमाई  को छोड़ दें. अन्य संस्थाओं के आफिसरों और अमले के खर्च पर लेनिन के ‘राज्य ओर इन्कलाब’ पुस्तक के शब्द कि इन प्रोफेसरों और आफिसरों के इतने बड़े वेतन, यह परोक्ष रूप से रिश्वत नहीं तो और क्या है? इस भारी-भरकम  रकम को खर्च करके यह मशीनरी लोगों पर राज्य करती है. मंत्री परिषद की सुरक्षा पर ५० करोड़ और अन्य प्रमुख हस्तियों की सुरक्षा पर एक अरब 61 करोड़ खर्च.

इसी ऑडियो के सार का बाकी हिस्सा अगली किश्त में जिसमें बुर्जुआजी के ऐतिहासिक विकास और बदल के बारे में चर्चा करेंगे.

चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प – दूसरी किश्त