अस्थिर पूंजी

‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

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इसी महीने की चौदह तारीख के अंक में ‘दैनिक जागरण’ अपने ‘नजरिया’ नामक कालम के नीचे श्रम का मूल्य ‘ और ‘ वामपंथ की सैद्धांतिक भूल( देखने के लिए चटका लगायें ) नामक आलेखों द्वारा मार्क्सवाद पर आक्रमण करता है ताकि  मध्यम वर्ग के पाठक वर्ग का वह हिस्सा जो अपने नजरिया के लिए केवल बुर्जुआ वर्ग के मीडिया और बुद्धिजीवियों पर आश्रित है, भ्रमित हो जाये . डॉ..भरत झुनझुनवाला बुर्जुआ मीडिया के ‘आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों (तथाकथित) में से एक हैं. इसी प्रकार के तथाकथित बड़े नामों को पाल-पोसकर ही पूंजीपति वर्ग सत्ता में रह सकता है. उनके नाम की साख को दाग नहीं लगना चाहिए. इसलिए वह बड़ी चालाकी के साथ  डॉ..भरत झुनझुनवाला को मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ में मीन-मेख निकालने से [ जोकि डॉ..भरत झुनझुनवाला जैसा व्यक्ति क्या निकालेगा ? ] बचा लेता है. इनके स्थान पर वह डा. सरोजनी पाण्डेय की अस्थायी प्रतिनियुक्ति करता है. डा. सरोजनी पाण्डेय के इस आलेख में ऐसा कुछ नहीं है जिसे वैज्ञानिक कहा जाये. वे “भगवान बुद्ध के निर्वाण-सुख”,  “शिव जी का तांडव नृत्य और पार्वती जी के मुख की शोभा” जैसी अमूर्त धारणाओं और पौराणिक  हस्तियों का सहारा लेकर, इसे भावुक बनाने की नाकाम कोशिश करती हैं और समझती हैं कि अब मध्यम वर्ग के लोगों को मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ समझने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी. अपने पाठकों को भावुकता के रंग में रंगने के लिए वे कहने लगती हैं,

“एक मजदूर दिनभर कठिन परिश्रम करके अपनी मजदूरी पाता है। यदि उसकी मेहनत पर गौर करके मालिक उसे दस-बीस रुपये अधिक दे दे, तो उसके चेहरे पर खुशी की जो चमक दिखाई देती है” , उसके  बदले में वे “अपने मालिक के लिए उसके दिल से दुआ” की भी  अपेक्षा करती हैं जोकि “प्रार्थना से कम नहीं” है.

इस प्रकार की भावुक बातों के द्वारा वे मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ के उस सवाल को निगलने की नाकाम कोशिश करती हैं जो उनसे ( डा. सरोजनी पाण्डेय से ) पूछा जा सकता है. वह सवाल है कि “दिनभर कठिन परिश्रम करने वाले  मजदूर की मेहनत पर गौर करके मालिक उसे दस-बीस रुपये अधिक” कहाँ से लाकर देगा ? यही वह बुनियादी सवाल है जिससे बचाव करते हुए, अख़बार ‘जागरण’ अपने आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ बड़े नाम – डॉ..भरत झुनझुनवाला – के स्थान पर  डॉ. कमला पाण्डेय की प्रतिनियुक्ति, एक अलग लेख ‘श्रम का मूल्य’ लिखने के लिए’ करता है. वे विचारी वैज्ञानिक मसले का हल भावुकता के अंध कुएं में गोते लगाते हुए ढूँढती हैं.

खैर, मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ को संक्षिप्त रूप में, एक बार फिर समझने के लिए, इस पेज पर थोडा और रुकें.

मार्क्स का ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’

पूंजी का प्रथम खंड, पण्य उत्पादन के विचार के विश्लेषण से प्रारंभ होता है. पण्य की परिभाषा है, बाह्य उपयोगी वस्तु जिसे मण्डी में विनिमय के लिए प्रस्तुत किया जाता है. इस प्रकार, पण्य उत्पादन के लिए दो जरूरी शर्ते हैं; मण्डी का अस्तित्व जिसमें विनिमय हो सके और सामाजिक श्रम-विभाजन जिससे भिन्न-भिन्न लोग भिन्न भिन्न उत्पादों का उत्पादन करें क्योंकि इसके बिना विनिमय के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं बचता. मार्क्स कहते हैं कि  पण्य में दो बातें होती हैं ; उपयोग मूल्य (value) और विनिमय मूल्य . मार्क्स का मानना है कि उपयोग मूल्य को आसानी से समझा जा सकता है परन्तु उनका दृढतापूर्वक आग्रह है कि विनिमय मूल्य एक पेचीदा मसला है और सापेक्ष विनिमय मूल्य व्याख्या की मांग करते हैं. क्यों किसी पण्य की एक निश्चित मात्रा किसी अन्य पण्य की एक निश्चित मात्रा से बदल ली जाती है ? पण्य के उत्पादन के लिए लगने वाले श्रम की शर्त द्वारा वे इसकी व्याख्या करते हैं. यही नहीं वे कहते है कि जरूरी सामाजिक श्रम वह श्रम होती है जिसे किसी अर्थव्यवस्था में किसी उत्पादक कार्य के लिए, श्रमिक वर्ग में मौजूद उत्पादकता और प्रबलता के औसत स्तर तक निचोड़ा जाता है. इस प्रकार, मूल्य का श्रम सिद्धांत कहता है कि किसी पण्य के मूल्य का निर्धारण उस पर लगी सामाजिक जरूरी श्रम की मात्रा के द्वारा होता है. मूल्य के श्रम सिद्धांत की पैरवी के लिए मार्क्स अपने तर्कों को दो चरणों में पेश करते हैं. पहले चरण में उनका तर्क है कि अगर दो वस्तुओं की तुलना की जाती है तो इनको, किसी समान संकेत के दोनों तरफ रखने के अर्थ में, तीसरी वस्तु की आवश्यकता होगी जो मात्रा या गुण में इन दोनों वस्तुओं के समान हो ताकि ये दोनों वस्तुएं उस वस्तु से समानयन हो जाएँ. चूँकि अब दोनों वस्तुओं को आपस में बदला जा सकता है इसलिए, मार्क्स कहते हैं, अब जरूरी है कि कोई ऐसी तीसरी वस्तु है, जिसमें इन दोनों वस्तुओं का साझा है. यही से दूसरे चरण के लिए प्रोत्साहन मिलता है जो कि उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ की खोज है. यह उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ केवल श्रम ही हो सकती है जिसमें साझा गुण हैं.

मार्क्स कहते हैं कि पूंजीवाद के विशिष्ट गुण हैं जिसमें केवल वस्तुओं का विनिमय ही नहीं होता बल्कि पण्यों की खरीद और उनको अन्य पण्यों जिनमें और अधिक मूल्य होता है, में रूपांतरण द्वारा मुनाफा अर्जित करने के उद्देश्य से, धन के रूप में पूंजी को बढ़ाना होता है. मार्क्स का दावा है कि उनसे पहले के किसी भी सिद्धांतकार ने पर्याप्त रूप से, इस बात की व्याख्या नहीं की है कि कैसे पूंजीवाद समुचित रूप में मुनाफा पैदा करता है. मार्क्स इसका हल पूंजीवाद में श्रमिक के शोषण में देखते हैं. उत्पादन की स्थिति पैदा करने के लिए, पूंजीपति पण्य के रूप में श्रमिक की श्रम-शक्ति – उसके एक निश्चित कार्य दिवस के लिए काम करने की क्षमता – को खरीदता है. इस पण्य – मजदूर की एक निश्चित कार्य दिवस के लिए काम करने की क्षमता – के मूल्य का निर्धारण भी अन्य पण्यों के मूल्य के निर्धारण की भांति; इसके उत्पादन में खर्च हुई सामाजिक जरूरी श्रम द्वारा होता है. इस केस में एक कार्य दिवस की श्रम-शक्ति का मूल्य उन पण्यों के मूल्य के समान है जो उसे (श्रमिक को) एक दिन के लिए जीवित रखने के लिए पर्याप्त हैं. मान लीजिए कि इन पण्यों के उत्पादन पर चार घंटे खर्च होते हैं तो कार्य दिवस के पहले चार घंटे उस मूल्य को पैदा करने में खर्च किये जायेंगे जिसे श्रमिक को मजदूरी के रूप में भुगतान किया जाता है. इसे जरूरी श्रम कहते हैं. इसके अलावा की जानेवाली श्रम को अतिरिक्त श्रम कहते हैं जो पूंजीपति के लिए अतिरिक्त (बेशी) मूल्य पैदा करती है. मार्क्स के अनुसार यही अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत होता है. मार्क्स के विश्लेषण के अनुसार अकेली श्रम-शक्ति ही ऐसी पण्य है जो अपनी औकात से अधिक मूल्य पैदा कर सकती है. इसी कारण इसे, अस्थिर पूंजी (variable capital ) के नाम से जाना जाता है. अन्य पण्य अपने से निर्मित नई पण्य में अपना मूल्य स्थानातरण कर देती हैं लेकिन कोई नया मूल्य पैदा नहीं कर सकती. उन्हें स्थिर पूंजी (constant capital ) कहा जाता है. मुनाफा जरूरी श्रम से प्राप्त मजदूरी से ऊपर की गयी अतिरिक्त श्रम से आता है.

यही है पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत  – श्रमिक से निचोड़ा गया अतिरिक्त-मूल्य . इसी अतिरिक्त मूल्य में से, उस  दिनभर कठिन परिश्रम करने वाले मजदूर की मेहनत पर गौर करते हुए मालिक से”, तरस की गुहार लगाते हुए, डॉ. कमला पाण्डेयदस-बीस रुपये अधिक देनें” को कहती हैं. मसला गंभीर था न कि भावुक, इसीलिए तो “फैज” जैसे विद्वान  कवि की कलम ने ऐसा गीत लिख दिया, जिसकी विषय-वस्तु में ‘ इक खेत नहीं, इक देश नहीं’, बल्कि सारी दुनिया को जीतने  की जिद  है.

http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio2/moba-ila-para-da-unaloda-karane-ke-li-e-krantikari-gita/ikdeshnhin.mp3?attredirects=0 हम मेहनतकश जग वालों से – इस गीत को सुनने के लिए इस प्लेयर के दायीं ओर चटका लगायें.

डॉ. झुनझुनवाला के आलेख का जवाब –देखें — एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास