अतिरिक्त मूल्य

तल्खी से लिखी आपकी टिपण्णी. शुक्रिया

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दिनेश कुमार बिस्सा की एक टिपण्णी बड़ी दिलचस्प रही, हालाँकि उन्होंने बड़े व्यंग्यात्मक अंदाज से मार्क्सवाद पर तीर छोड़े हैं. लेकिन उनकी टिपण्णी उन लोगों की टिप्पणियों से कहीं बेहतर है जो मार्क्सवाद में आस्था रखते हैं, जबकि मार्क्सवाद आस्था का नहीं कर्मों का विज्ञान है. चलिए, दिनेश जी की टिपण्णी से शुरू करते हैं :

“मार्क्सवाद से समाज मैं असमानता मिट कर समानता आ जाती है, भूखे के पेट में रोटी, बेरोजगार के हाथ में काम, नंगे के तन पर कपडा, बच्चों के हाथ में कापी-कलम. गरीबी मिट कर सभी लोग अमीरी के सागर में गोते लगाने लगते हैं, मतलब सब कुछ  अच्छा ही अच्छा. उदाहरण : कम्युनिस्ट देशों रूस, क्यूबा, चीन. भारत के दो महान राज्य, केरल और पश्चिम बंगाल…. इन जगहों में गरीबी और असमानता, शोषण आदि के दर्शन भी नहीं होंगे. दिन में चिराग लेकर ढूंढ लो, तो भी…दिनेश कुमार बिस्सा.

दिनेश भाई, हम यह अंदाजा तो नहीं लगा सकते की आपके घोर मार्क्सवादी विरोध के पीछे आपका अनुभव या फिर आपकी मिडल क्लास की आदर्शवादी-समतावादी संभावनाओं की पूर्ति में मार्क्सवाद के इतिहास ( इतिहास वह नहीं जो है, बल्कि वह जो आपका मन, आपकी सहूलत से गढ़ना चाहता है ) का खरा न उतरना रहा है या फिर कुछ पूर्वाग्रह जो मिडल क्लास की जीवन स्थितियों से उनकी विचार शैली में आ जाते हैं. लेकिन इससे हमें अपना दृष्टिकोण, पाठकों के सामने स्पष्ट करने का मौका मिल गया, जिसका प्रेरणा स्रोत तल्खी से लिखी, आपकी यह टिपण्णी है. शुक्रिया

बीसवीं सदी की क्रांतियों और परिणामस्वरूप समाजवाद को लागू करने की मुश्किलें, समाजवाद के भीतर बुर्जुआ वर्ग का होना, अवसर मिलते ही, उन द्वारा मजदूर वर्ग के अधिनायकवाद के स्थान पर फिर से बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना (वह भी लाल झंडे तले, कम्युनिस्ट भीतरघातियों द्वारा जो शुद्ध से शुद्ध कम्युनिस्ट पार्टी में होते हैं, और हम यह दावा नहीं करते कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा. यह काम हम उन लोगों के लिए छोड़ देते हैं जिन्हें अपने और अपनी पार्टियों के शुद्ध होने पर गर्व है) हमारा फ़िलहाल इतना ही आग्रह है कि पूंजीवाद अपने विकास के उस चरण पर पहुँच चुका है, जहाँ इसकी अप्रासंगिगता स्पष्ट दिखाई देती है.

जहाँ तक मार्क्सवाद के प्रासंगिक होने का अर्थ है, तो यह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है. विश्व के हर कोने में पूंजीवादी संबंधों का वर्चस्व हो चुका है. बेशक सबसे धनाढ्य कार्पोरेशनों के पास विज्ञान और उच्च तकनीक से सुपर मुनाफा कमाना संभव है, लेकिन तीव्र गति के युग में, विज्ञान और तकनीक अन्य मझौले पूंजीपतियों के पास पहुँच कर उनका सुपर मुनाफा बंद कर देती हैं. ( सुपर मुनाफे से आशय है कि उच्च तकनीक द्वारा कम मजदूरों से अधिक उत्पादन करना जिसके परिणामस्वरूप सुपर मुनाफे का स्रोत कमजोर पूंजीपति वर्ग के बेशी मूल्य का साझा पूल होता है)

आपने यूनानी देवता सफिंक्स की मिथ तो सुनी ही होगी. वे एक पहेली द्वारा ऐथंज़ शहर की रक्षा किया करते थे. शहर में आनेवाले अजनबी को पहेली हल करनी होती थी. असफलता का मतलब था, मौत. मार्क्स ने पूंजीवाद की मौत के लिए कोई पहेली तो गढ़ी नहीं है, लेकिन उस पहेली को हल किया है, जिसे जो  भी जान लेता है, उसे पूंजीवाद की मौत स्पष्ट दिखाई देने लगती है. चलिए हम उस पहेली को आपके सामने रखते हैं.

बड़े पूंजीपतियों ने विज्ञान और तकनीक की मदद से सुपर मुनाफा कमाना शुरू कर दिया. लेकिन देर सवेर वह छोटे पूंजीपतियों के पास पहुँच गयी. उन्हें उच्चतर तकनीक की आवश्यकता पड़ी. लेकिन जल्दी ही यह भी दूसरों के पास पहुँच गयी. इस क्रिया का परिणाम यह हुआ कि उत्पादन, बिना मजदूर के होने लगा. (हालाँकि, ऑटोमेटिड से ऑटोमेटिड मशीन के लिए व्यक्ति की आवश्यकता होगी, लेकिन इतना दिखाई दे ही रहा है कि मजदूरों की संख्या कम से कम की जा सकती है और उनके शोषण की दर में इंतिहा बढौतरी की जा सकती है जोकि की जा चुकी है और की जा रही है) अब पूंजीपति बिना मजदूर की मदद से (या उनकी न्यूनतम  संख्या से) उत्पादन कर रहे हैं. समस्या यह है कि,

पूंजीपति मंडी में जिंसों को बेचकर मुनाफा अर्जित करना चाहता है, लेकिन वहां  कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके पास क्रय करने के लिए धन हो, क्योंकि इसके लिए, धन तो मजदूरों के पास होना चाहिए था. लेकिन उन्हें कौन दे क्योंकि वे काम तो करते नहीं. मुट्ठीभर पूंजीपति और उनके पास विशाल उत्पादन ! हाँ वे स्वयं उपभोगता बनकर, एक दूसरे के उत्पादन का थोडा बहुत उपभोग कर सकते हैं, लेकिन यहाँ तो विज्ञान और तकनीक की मदद से चंद मजदूरों ने जो पैदा किया है, उसके लिए कम से कम आठ सौ करोड़ व्यक्तियों की आवश्यकता है और वे (पूंजीपति) हैं आठ करोड़. यही पूंजीवाद का संकट है, जो फूटता रहता है और उनके चाटुकार बुद्धिजीवी पूंजीपतियों को इसके अन्दर नहीं, बाहर अमूर्त चीजों में होने की ओर, इशारों द्वारा उन्हें भरमाते रहते हैं.

2008 से फूटी महामंदी वैसे ही  बरक़रार है और विकसित राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाएं डब्बल डिप्रेशन की और बढ़ रही हैं. भारत का मध्यम वर्ग खुश है कि यहाँ आठ प्रतिशत की विकास दर बनी हुई है (हालाँकि इस विकास से पैदा हुई भूख ने संकटों से घिरे नेपाल और पिछड़े पाकिस्तान को भी पीछे छोड़ दिए है – बकौल स्वतन्त्र एजेंसियों की ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार) लेकिन हमारे एक मिडिल क्लास बुद्धिजीवी इस विकास की दर से इतने आत्ममुग्ध हैं कि उनको विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का यह आकलन गलत लगता है कि यह दर केवल 2015 तक जारी रहने वाली है, उसके बाद धीमी गति से 2022 तक और बस उसके बाद तो घिसटेगा.

दिनेश भाई या उनकी ही तरह के मिडल क्लास के लोगों से हमारा आग्रह है कि मार्क्सवाद उनके लिए नहीं है क्योंकि मिडल क्लास चरित्र के लिहाज से बुर्जुआ विचारधारा की पैरोकार होती है, लेकिन बुर्जुआ वर्ग द्वारा पैदा की गयी होड़, उनकी छोटी सी पूंजी को हड़प कर लेती है, तो छटपटाता हुआ यह वर्ग, अपने कुछ रेडिकल प्रतिनिधियों द्वारा मार्क्सवाद से सहानुभूति की उम्मीद पाल लेता है.

इसके अलावा कुछ लोग अपनी उच्च बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी मार्क्सवाद की और खींचे चले आते हैं. ध्यान रहे, बौद्धिक क्षमता आसमान से पैदा नहीं होती, इसके ऐतिहासिक विकास, अध्ययन-चिंतन के लिए मेहनतकश वर्ग द्वारा मुहैया करवाई गयी अतिरिक्त मूल्य की लूट रही है. उनके ज्ञान और चिंतन का स्रोत भी श्रमिक वर्ग ही रहा है, जिसका कर्ज चुकाने की उनकी लालसा, उन्हें इधर खींच लाती है.

मगर मार्क्सवाद मिडल क्लास का नहीं, सर्वहारा वर्ग के कर्मों का विज्ञान है. इसका इतिहास कठमुल्लाओं का इतिहास नहीं है. अगर मिडल क्लास से आये लोगों ने,संजीदगी से, इसका चिन्तनं-मनन किया है तो वे निराश नहीं हुए हैं, बल्कि एक नए इन्सान के रूप में, उनका पुनर्जन्म ही हुआ है. स्वयं मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ इसके उदाहरण हैं. उन्होंने न केवल मजदूर वर्ग की मुक्ति के इस विज्ञान को अपनाया बल्कि मिडल क्लास के समाजवाद, नैतिकता और मूल्यों की गंदगी से इसकी हिफाजित के लिए संघर्ष किया.

दिनेश की समस्या यह है कि वे एक पैरे में मार्क्सवाद के इतिहास को समेट देना चाहते हैं. उनके इस पैरे की विषय-वस्तु को दो हिस्सों में  बांटा जा सकता है. एक मार्क्सवाद का समतावादी, गरीबी रहित सभी को अमीरी के ठाठ-बाठ मुहैया करवाने वाला ‘पंडोरा का डिब्बा’ और दूसरा इस पंडोरे के डिब्बे से निकला वह इतिहास जो रूस से शुरू होकर भारत के पश्चिम बंगाल और केरल तक का है. अंबानियों और टाटाओं के मुकाबले मिडल क्लास गरीब हो सकती और समाजवाद से सहानुभूति की उम्मीद पाल सकती है. फैशनेबुल तौर पर, मजदूर वर्ग के आंदोलनों के उभार के दौर में, वे धारा में खींचे चले आते हैं. यह ऐसे होते है जैसे आप अपने रिश्तेदार के घर जाएँ और उस घर के सदस्य अपने घर के निर्माण में व्यस्त हों. आपकी उनके घर से कोई दिलचस्पी न थी लेकिन उनके साथ आप भी खिंच लिए और लगे हाथ बंटाने. पर निर्माण कार्य पूरा होते ही, घरवाले घर में बसने लगे लेकिन आप फालतू करार दे दिए गए.

वैज्ञानिक समाजवाद सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद होता है जिसमें मिडल क्लास और उसके बुद्धिजीवियों के एक हिस्से को घुटन होने लगती है. अपने  वर्गीय दृष्टिकोण से पैदा हुए दिग्भ्रमण के कारण, उनका जल्दी ही मोहभंग हो जाता है. वे पुरानी  स्थिति को बहाल करने के लिए छटपटाने लगते हैं और कई बार उनकी कोशिश बुर्जुआजी की पुनर्बहाली के काम आती है, जैसा कि इतिहास में हुआ है.

फिर भी अगर दिनेश भाई जैसे लोग, संजीदगी से मार्क्सवाद को अपनाना चाहते हैं तो उन्हें इस ब्लॉग की और से सुझाव है कि वे मार्क्सवाद पर मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ आदि की रचनाये पढ़ें. इनसे उन्हें पता चलेगा कि कैसे मार्क्सवाद उन लोगों से जो गरीबी को इस तरह से मिटाकर… और सभी के लिए अमीरी की स्थिति की यूटोपिया बातें करते थे…टक्कर लेकर और विरोध में विकसित हुआ है. लाल झंडे का मतलब मार्क्सवाद नहीं होता. इसके इतिहास में वे सभी स्थितियां शामिल हैं जिन्हें संशोधनवाद, सिंडीकेट्वाद ,ट्रेड यूनियनवाद,अर्थवाद, मिडल क्लास का अवसरवाद,कम्युनिस्टों का उदारतावाद ,अतिवामपंथवाद , दुस्साहसवाद , दायें-बाएं भटकाव, सोवियत यूनियन और चीन की क्रांतियों के बाद हुए तीक्ष्ण वर्ग-संघर्ष और परिणामस्वरूप मजदूर वर्ग की लाल झंडे तले बुर्जुआ वर्ग से शिकस्त और समाजवाद (जिसके बारे में मिडल क्लास सोचती है कि यह कोई उनके चौखटे के अनुसार कोई पकी-पकाई स्थायी चीज हो, जिसकी कोई समस्या न हो) और इस समाजवाद से साम्यवाद में संक्रमण और सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद वगैरा, वगैरा. अगर आप को यह सब भारी-भारी लगता है, तो मुआफ कीजियेगा, यह सब आपके लिए नहीं है.

हम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजदूर वर्ग के संघर्षों की बदौलत बदली स्थितियों, विशेषरूप से, सोवियत यूनियन और चीन की क्रांतियों की प्राप्तियों और उनकी हार को स्वीकार करते हैं. सर्वहारा वर्ग द्वारा विकसित किये गए उसके नेताओं और बदले में इन नेताओं द्वारा सर्वहारा वर्ग की सेवा को तस्लीम करते हैं, भले ही, इन नेताओं द्वारा ऐसी गलतियाँ भी हुई हैं  जिनसे बचा जा सकता था. लेकिन उनकी गलतियाँ समाज विज्ञानियों की गलतियाँ थी जिनका होना स्वभाविक होता है लेकिन दोहराना बेवकूफी. जीत-हार की इस अमीर विरासत का मालिक सर्वहारा वर्ग है जो अच्छी तरह जनता है कि उसने इसका कैसे समाहार करना है.

हम साफ़ साफ़ बता देना चाहते हैं कि इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी से पूर्णतया भिन्न है. विश्व के पिछड़े से पिछड़े हिस्से में भी तत्व रूप से सामंतवाद गायब है और वह पूंजीवाद के पैंतरे के अनुसार गतिमान है. भारत के आदिवासी बहुल और पिछड़े अफगानिस्तान जैसे क्षेत्रों का वास्ता जागीरदारों से नहीं देशी-विदेशी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से है. विज्ञान और तकनीक के विकास में पूंजीवादी संबंध बेड़ियाँ बन गए हैं. उच्च वैज्ञानिक तकनीक के विकास ने सर्वहारा वर्ग की उत्पादन क्षमता में इंतहा बढौतरी की, लेकिन बुर्जुआजी ने श्रम सघनता को लागू किया है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, 1970 के दशक के बाद, पूंजीपतियों के पास एकत्रित होने वाली वित्तीय पूंजी की मात्रा में भी इंतहा बढौतरी हुई है, जिसके उत्पादन कार्य में लगने की संभावना निशेष हो चुकी है. लेकिन श्रमिक वर्ग की, इसके बिलकुल उल्ट, आमदनी में गिरावट आई है. पूंजीपतियों की समस्या यह है कि उनको उनकी  महत्त्वाकांक्षानुसार उपभोगता वर्ग नहीं मिल पा रहा. मिलेगा भी कैसे क्योंकि श्रमिक वर्ग द्वारा पैदा किये मूल्य का अधिकतर हिस्सा तो पूंजीपति वर्ग की जेब में सट्टेबाजी और जुआरी-जुगाड़ों में मशगूल है. हम राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों की नहीं, नयी समाजवादी क्रांतियों की पूर्वबेला में जी रहे हैं.

और अंत में मिडल क्लास के नौजवानों से  : आपके आदर्श अमेरिका और यूरोप ने तस्लीम कर लिया है कि नवउदारीकरण उनकी बेवकूफी थी. लेकिन हमारा मानना है कि यह सब नाटक है. नवउदारीकरण का अर्थ था कि पूंजीवादी खुल्ले मुकाबले में श्रमिक-वर्ग की रगों से खून के अंतिम कतरे को निचोड़ लेना. लेकिन पूंजीवाद के आन्तरिक विरोधाभास होते है, जिन्हें उनके बुद्धिजीवी बाहर तलाशते रहते हैं और मुसीबत पड़ने पर राज्य जो उनका सच्चा सेवादार है, से लोगों की बचतों पर डाका डालने के लिए, बैलआउट मांगते हुए बिलकुल नहीं शर्माते. उनकी खुले मुकाबले की श्रेष्टता का भंडाफोड़ हो जाता है.

भारत जैसी ही चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका आदि अर्थव्यवस्थाओं के में जी रहे  मिडल क्लास के गगनविहारियों के पास 2022 तक ऊँची उड़ान भरने का मौका है. हालाँकि उनके अधिकतर हिस्से को सर्वहारा वर्ग में तब्दील होते हुए देखा जा सकेगा. हमारी इस पीड़ा से लुत्फ़ उठाने का कोई मंशा नहीं है लेकिन आपसे प्रार्थना है कि आप चीजों को गति में देखने की आदत डालें. मार्क्सवाद वैसा सुहावना नहीं है, जिसका जिक्र दिनेश जी ने किया है. बल्कि इसके विपरीत कहीं अधिक पीड़ादायक है. लेकिन ये शब्द ‘सुहावना’ और ‘पीड़ादायक’ रिलेटिव हैं. इनके अर्थ बुर्जुआ वर्ग, मिडल क्लास और सर्वहारा के लिए न केवल अलग-अलग होते हैं बल्कि कई अवस्थाओं में विपरीत भी होते हैं.

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एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

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लिंक जोड़ने के लिए देखें —  ‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

मार्क्सवाद और देश दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि पूंजीवाद अपने जन्म से ही लंगड़ा-लूला पैदा हुआ है और उसे मेहनतकश अवाम ने न केवल चुनौतीपूर्ण टक्कर ही दी है, बल्कि बीसवीं सदी में बुर्जुआ वर्ग से सत्ता छीनकर सोवियत यूनियन और चीन में महान समाजवादी तजुर्बे भी किये हैं. हालाँकि अपने इन प्रारंभिक तजुर्बों में मेहनतकश वर्ग ,वक्ती तौर पर, हार गया है और सोवियत यूनियन और यहाँ तक की चीन की वर्तमान संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडे तले पूंजीपति वर्ग ने अपनी सत्ता को स्थापित कर लिया है. डॉ. झुनझुनवाला [ देखें — वामपंथ की सैद्धांतिक भूल ] बंगाल में सत्तासीन रही संशोधनवादी पार्टी की हार का ज़िक्र करते हैं और मार्क्सवाद की थ्योरी को त्रुटिपूर्ण होने का फ़तवा सुना देते हैं, बिना यह जाने कि मार्क्सवाद कोई कठमुल्ला उपदेशात्मक शास्त्र नहीं है, बल्कि वर्गीय समाज के संघर्ष में, ऐसा समाज शास्त्र है जो सर्वहारा पक्षावलम्बी है. मार्क्सवाद ने अपने संघर्ष के दौरान न केवल पूंजीपति वर्ग से टक्कर ली है बल्कि लाल झंडे के तले अराजकतावाद, आतंकवाद, अर्थवाद, ट्रेड-यूनियनवाद आदि संशोधनवाद, जो मार्क्सवाद को इतना पतला और कमजोर कर देना चाहता है ताकि यह पूंजीपति वर्ग की सत्ता को चुनौती न देकर उसकी सेवा में हाज़िर हो और अपने संसदमार्गी कृत्यों से मजदूर वर्ग के आक्रोश पर ठन्डे पानी के छींटे मारकर उनकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करता रहे, केखिलाफ भी संघर्ष किया है.

अपने इस आलेख में, डॉ. झुनझुनवाला इस प्रकार के निष्कर्ष निकालते हैं जैसे,  ‘मार्क्सवादी बाजार विरोधी है जबकि बाज़ार सभी को उनकी क्षमतानुसार काम करने के अवसर प्रदान करता है’. बाज़ार का महिमामंडन करते हुए वे लिखते हैं,
“हम देखते हैं कि आर्टिस्ट को पेंटिंग बनाने में ही मजा आता है। पेंटिंग बिक गई, इतनी ही जानकारी उसके लिए पर्याप्त होती है। किसान गेहूं का उत्पादन करके प्रफुल्लित होता है, यद्यपि उसे पता नहीं होता कि रोटी कौन खाएगा। श्रमिक को यदि उसके स्वभाव के अनुकूल काम मिल जाए तो वह सुखी होता है। आर्टिस्ट को हल चलाने में लगा दिया जाए तो वह दुखी होगा और किसान को पेंटिंग करने के लिए ब्रश थमा दी जाए तो वह भी दुखी होगा। विशेष यह कि व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य ढूंढने में बाजार से मदद मिलती है। श्रमिक मन चाहा कार्य पकड़ सकता है। इसलिए मूल रूप से बाजार सुखदायी है।

डॉ. झुनझुनवाला जी, किसान, श्रमिक, और आर्टिस्ट जन्म से पैदा नहीं होते. व्यक्ति का मनपसंद कार्य वह नहीं होता जो वह कर रहा होता है. वर्गीय समाज का विकास इसका मुख्य निर्धारक होता और व्यक्ति की इच्छा गौण. मोटे तौर पर वर्गीय समाज आदिम साम्यवाद से लेकर मालिक-गुलाम, सामंत-किसान और अब पूंजीपति-मजदूर — चार चरणों से होकर गुजरा है . यह सब किसी एक व्यक्ति के चाहने या न चाहने से नहीं हुआ. वर्ग-संघर्ष इसका वस्तुगत चरित्र रहा है.बाजार भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से पैदा हुआ है. चूँकि पूंजीपति वर्ग और  समाज के अस्तित्व के लिए बाज़ार जरूरी है, इसलिए इसका महिमामंडन भी जरूरी है, जोकि आप बाखूबी कर रहे हैं. आपका यह “मूल रूप से बाजार” श्रमिक – जिसके पास अपनी श्रम-शक्ति बेचने के सिवा और कुछ नहीं होता – को नहीं, आपको सुखदायी लगता है।

हमारा यह मानना है कि मार्क्सवाद बाज़ार विरोधी है लेकिन उस प्रकार से नहीं जिस प्रकार डॉ. झुनझुनवाला पेश करते हैं. अपने सारे आलेख में वे ,बड़ी चालाकी के साथ, मार्क्स के मूल्य के श्रम-सिद्धांत का ज़िक्र तक नहीं करते और मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ सिद्ध कर देते हैं. यही वह बाज़ार होता है जहाँ श्रम-शक्ति पण्य (कमोडिटी) के रूप में बिकती है और अपनी विशिष्टता ( श्रम-शक्ति अकेली ऐसी पण्य है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है) के कारण अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है जिसमें से पूंजीपति वर्ग न केवल अपना मुनाफा वसूलता है बल्कि उसकी सेवा में हाज़िर राज्य और उसकी संस्थाओं के खर्च भी निकलते हैं. अपनी विशेष हैसियत के कारण, पूंजीवादी उत्पादन क्रिया से लूटे गये अतिरिक्त मूल्य पर हक़ का पहला दावेदार पूंजीपति वर्ग होता है. यही कारण है कि इस वर्ग की खुशामद द्वारा बुर्जुआ वर्ग का  बुद्धिजीवी (ध्यान रहे बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा संकल्प नहीं है जिसकी अवस्थिति वर्ग-हितों से ऊपर हो ) चंद हड्डियों की अपेक्षा पाले रहता है. ऐसा नहीं है कि एक संशोधनवादी, संसदमार्गी  और मजदूर वर्ग में अर्थवाद द्वारा उसकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करनेवाली माकपा ‘स्टाईल मा‌र्क्सवादियों की पार्टी’ की हार से डॉ. झुनझुनवाला को मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ दिखाई देने लगी हों और वे बड़ी ईमानदारी से मार्क्सवाद पर चिन्तन-मनन करने लगे हों. कारण उनकी पूंजीवादी वर्ग-स्थिति है और वे माकपा जैसी संशोधनवादी पार्टी की हार से व्याकुल इसलिए हैं कि कहीं मजदूरों की, इन संशोधनवादी पार्टियों के प्रति, आस्था न डगमगा जाये और वे, विकल्प के तौर पर, अपनी सच्ची कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण न कर लें.

मार्क्स ने पूंजीवादी समाज की विशेषताओं में से एक – श्रम के अलगाव का ज़िक्र किया है. अकेला मजदूर वर्ग ही सक्षम है जो पूंजीपति वर्ग से संघर्ष द्वारा – वर्गीय समाज को ख़त्म करने की प्रक्रिया द्वारा – इस मर्ज़ का इलाज करेगा. इसलिए मार्क्सवाद की अवस्थिति वर्तमान और भविष्य में है. लेकिन डॉ. झुनझुनवाला मार्क्स को उस ग्रामीण परिवेश में भेज देते हैं, जहाँ  “गाँव का व्यक्ति किसान के लिए हल बनाता है …वह उसमें अपने प्राण आहूत करता है। उसके सामने ही किसान उसका उपयोग करता है, जिसे देखकर दोनों का मन लहलहाता है।” पता नहीं किस युग में और कैसे किसान जोकि  सामंतो द्वारा शोषित रहा है अपनी उस वक्त की मेहनतकश की स्थिति पर प्रफुल्लित होता रहा है ? ‘अह़ा ग्राम्य जीवन’ का ‘नोस्तालजिया’ मार्क्स का नहीं डॉ. झुनझुनवाला का है जिन्होंने बीते का रुदन करनेवाले कवियों से इसका महिमा मंडन सुन रखा है   वे भूल जाते हैं कि मार्क्स की रचनाओं के तीन स्रोत और तीन अंग उस वक्त के विकसित पूंजीवाद के तीन देशों – दर्शन के लिए जर्मनी, अर्थशास्त्र के लिए इंग्लैण्ड और क्रांतियों व समाजवाद के लिए फ़्रांस – से लिए गए हैं. अब तो सारा विश्व पूंजीवाद के नियमों के अनुसार गतिमान है और कृषि में भी किसान बैलों के पीछे-पीछे हल पकडे नहीं भटकता बल्कि कृषि संबंधी उत्पादन में उसके श्रम की भूमिका गौण हो गयी है और मजदूर वर्ग ही वहाँ उत्पादन क्रिया में मुख्य रूप से सक्रीय है.  कृषि उत्पादन में पूंजीवादी संबंधों की मुकम्मल स्थापना ने छोटे किसानों की तबाही निश्चित कर दी है और वे मजदूर वर्ग की अवस्थिति और दृष्टिकोण अपनाने को बाध्य होते जा रहे हैं. भविष्य में उनका बड़ा हिस्सा मजदूरों द्वारा संपन्न की जानेवाली इक्कीसवीं सदी की नई समाजवादी क्रांतियों के लिए अहम भूमिका अदा करेगा.

डॉ. झुनझुनवाला  लिखते हैं, “एक प्रमुख अखबार ने लिखा है कि वामपंथी विचारधारा तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक देश में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहेगी। यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित है.”

यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित हो सकता है लेकिन एक मार्क्सवादी के लिए नहीं. मार्क्सवाद की विशिष्टता है कि इसने इस वस्तुगत सच्चाई की निशानदेही की है जिसमें, पूंजीवाद ने अपनी विकास प्रक्रिया के दौरान, समाजके एक छोर पर अकूत धन-दौलत और दूसरे सिरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया है. गरीबी,  बीमारी और असमानता जैसी अलामतें इसके जरूरी बाई-प्रोडक्ट हैं. मार्क्सवाद ने एक और कटु सत्य इंगित किया है जो पूंजीपतियों और उनके डॉ झुनझुनवाला जैसे बुद्धिजीविओं को सताता रहता है. पूंजीवाद द्वारा पैदा किये गए कंगाली के इस विशाल समुद्र के सापेक्ष पूंजीपतियों की खुशहाली की चंद मीनारों की औकात अल्पसंख्यक और कमजोर की है जो  कभी भी भरभराकर गिर सकती हैं. मार्क्सवादी विचारधारा की प्रासंगिगता, केवल देश या दुनिया में, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहने तक ही नहीं है बल्कि यह प्रासंगिक रहेगा तब तक, जब तक, वर्गीय समाज का अस्तित्व रहेगा. केवल वर्गविहीन समाज में इसका स्थान म्यूजियम में होगा.

वे अपनी कलम मजदूर वर्ग की तानाशाही पर चलाते हुए मध्यम वर्ग में इस बुर्जुआ लोकतंत्र के भ्रम को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. हो सकता है कि पढेलिखे मध्यम वर्ग के एक हिस्से की, इस बुर्जुआ लोकतंत्र में भारी आस्था हो, लेकिन मजदूर वर्ग इस बात को भली-भांति समझता है कि यह लोकतंत्र बुर्जुआ वर्ग का, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतंत्र है. मजदूर वर्ग के लिए यह तानाशाही ही है. किसी भी वर्गीय समाज में ऐसा लोकतंत्र नहीं हो सकता जो सर्वमान्य हो और न ही सर्वहारा वर्ग, जब वह सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, बुर्जुआ वर्ग और उसके पैरोकारों को लोकतान्त्रिक हक़ देने की छूट दे सकता है, क्योंकि इसका अर्थ होगा – पूंजीवाद की पुनर्स्थापना.

अपने आलेख के अंत में, वे वामपंथ को सैद्धांतिक संजीवनी की घुट्टी पिलाते हुए  और “थ्योरी का  नवीनीकरण” करने की सलाह देते हुए “बाजार का बहिष्कार करने के स्थान पर बाजार पर लगाम लगाने” और ” सरकारी तंत्र के विस्तार के स्थान पर ऐसी पालिसी की मांग” जो  “हल्के सरकारी तंत्र से भारी जनहित हासिल करे” जैसी चलताऊ बातों करके खुश हो लेते हैं, जैसेकि उन्होंने अपने इस आलेख में मार्क्सवाद की ऐसी की तैसी कर दी हो. उनके हलके सरकारी तंत्र और जनतंत्र पर मार्क्सवाद का कहना है कि जब मजदूर वर्ग समाजवाद के संक्रमण काल में बुर्जुआ वर्ग का नामोनिशान मिटा देगा तो उसे किसी भी तरह के -हलके या भारी तंत्र – की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.