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अच्छाई से तफ्तीश

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पैर आगे बढाओ : हमने सुना है
कि तुम अच्छे इंसान हो |
तुम्हे ख़रीदा नहीं जा सकता, परन्तु बिजली
जो घर पे गिरती है,
भी नहीं खरीदी जा सकती |
तुम उसपर पक्के हो जो तुमने कहा |
लेकिन क्या कहा था तुमने ?
तुम ईमानदार हो | तुम्हारा मतलब तुम्हारा नजरिया |
कौनसा नजरिया ?
तुम दलेर हो |
किसके खिलाफ ?
तुम दानिशमंद हो |
किसके लिए ?
तुम्हें खुद के फायदे से मतलब नहीं |
तो किसके फायदे से मतलब है ?
तुम अच्छे दोस्त हो |
क्या तुम अच्छे लोगों के भी दोस्त हो ?
तो सुनो : हम जानते हैं |
तुम हमारे दुश्मन हो | इस वजह से
हम तुझे दीवार के साथ खड़ा करेंगे |
लेकिन तुम्हारी खूबियों और गुणों के लिहाज से
हम तुझे बढ़िया  दीवार के साथ खड़ा करेंगे
और बढ़िया  बन्दूक की बढ़िया  गोली से
उड़ा देंगे
और बढ़िया बेलचे के साथ बढ़िया जमीन में
दफ़ना देंगे |

translated from Brotolt Brecht’s “The Interrogation of the Good”

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जब शहीद सोने जाते हैं — महमूद दरवेश

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महमूद दरवेश की यह कविता शहीदों को संबोधित है परन्तु इसके निशाने पर कवि और बुद्धिजीवी हैं. बुर्जुआ मीडिया और पत्रकारों पर “सनसनीखेज वारदात और कत्लोगारत की बेशी-कीमत” से “ज़बान दबाकर” अपने लिए “धोबीघाट के लिए एक दीवार” और “गाने के लिए एक रात” छोड़ने का कटाक्ष उन्हें उस मुकाम पर ले जाने का द्योतक हैं जहाँ अपराधबोध स्वीकृति “अनजान फाँसी की डोर” को और अधिक मजबूत करने के ही काम आ सकती है.

जब शहीद सोने जाते हैं
तो मैं रुदालियों[1] से उन्हें बचाने के लिए जाग जाता हूँ |
मैं उनसे कहता हूँ : मुझे उम्मीद है तुम बादलों और वृक्षों
मरीचिका और पानी के वतन में उठ बैठोगे |
मैं उन्हें सनसनीखेज वारदात और कत्लोगारत की बेशी-कीमत[2]
से बच निकलने पर बधाई देता हूँ |
मैं समय चुरा लेता हूँ
ताकि वे मुझे समय से बचा सकें |
क्या हम सभी शहीद हैं ?
मैं ज़बान दबाकर कहता हूँ :
धोबीघाट के लिए दीवार छोड़ दो गाने के लिए एक रात छोड़ दो |
मैं तुम्हारें नामों को जहाँ तुम चाहो टांग दूंगा
इसलिए थोडा सुस्ता लो, खट्टे अंगूर की बेल पर सो लो
ताकि तुम्हारे सपनों को मैं,
तुम्हारे पहरेदार की कटार और मसीहाओं के खिलाफ ग्रन्थ के
कथानक से बचा सकूं |
आज रात जब सोने जाओ तुम
उनका गीत बन जाओ जिनका कोई गीत नहीं है |
मेरा तुम्हें कहना है :
तुम उस वतन में जाग जाओगे और सरपट दौड़ती घोड़ी पर सवार हो जाओगे |
मैं ज़बान दबाकर कहता हूँ : दोस्त,
तुम कभी नहीं बनोगे हमारी तरह
किसी अनजान फाँसी की डोर !

1 रुदाली : पेशेवर विलापी
2 बेशी कीमत : मजदूर के जीवन-निर्वाह के लिए जरूरी मानदेय के अतिरिक्त मूल्य, जो पूंजीपति वर्ग के मुनाफे और उसकी व्यवस्था पर खर्च का स्रोत होता है.

मालवा का मजदूर आन्दोलन’ मजदूरों के आवास प्रश्न सम्बन्धी समाधान का निम्न बुर्जुआ प्रयत्न

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‘मालवा का मजदूर आन्दोलन’

मजदूरों के आवास प्रश्न सम्बन्धी समाधान का निम्न बुर्जुआ प्रयत्न
सुखविं
दर

“आवास प्रश्न के लिए बड़े पूँजीपतियों  तथा निम्नपूंजीपतियों दोनों के समाधानों का सारतत्व यह है कि मजदूर के पास रहने के लिए अपना घर होना चाहिए.” – फ्रेडरिक एंगेल्स  (“The Housing Question” Marx Engles, Selected Works part-2, page299).  इस लेखन में आगे दिए गए सारे हवाले भी इसी पुस्तक में से हैं,  (हर जगह अनुवाद हमारा)

बीते दिनों सी पी आई (ऍम एल) लिबरेशन की अगुवाई में मानसा और कुछ अन्य ग्रामीण मजदूरों की तरफ से अपने गाँवों की पंचायती ज़मीनों पर कब्जे किये गए और बाद में इस मजदूर संघर्ष को सरकारी दमन का सामना भी करना पड़ा.  इस तरह से लिबरेशन ने गाँव के मजदूरों के आवास प्रश्न का हल करने की कोशिश की, चाहे फ़िलहाल उसे अपने मकसद में सफलता नहीं मिली.

लिबरेशन के मुताबिक “आवास के लिए ज़मीन और गुजारे के लिए रोजगार गारंटी……..पंजाब के समूचे ग्रामीण और शहरी गरीबों तथा मजदूरों का एजेंडा है.”  इस लेख में हम केवल “गरीबों और मजदूरों के आवास के लिए जमीन” के सवाल पर ही चर्चा करेंगे क्योंकि  “गरीबों और मजदूरों के गुजारे के लिए रोजगार की गारंटी ” की मांग का चरित्र आवास प्रश्न से बिलकुल भिन्न है. आवास के लिए ज़मीन और गुजारे के लिए रोजगार की गारंटी पंजाब ही क्यों पूरे देश के मजदूरों का एजेंडा है. देश ही क्यों आज के पूंजीवादी विश्व में सारे देशों के मजदूरों का एजेंडा है. मजदूरों के लिए आवास की कमी का जन्मदाता ही दरअसल पूंजीवादी ढांचा है. असमान आर्थिक विकास पूंजीवादी समाज का एक अनिवार्य अंग है. एक तरफ तो औद्योगीकरण की बदौलत बड़े बड़े आधुनिक महानगर अस्तित्व में आते हैं तो दूसरी तरफ कई इलाके आर्थिक और सांस्कृतिक विकास से लगभग अछूते जहालत और पछडेपन के अँधेरे में धकेल दिए जाते हैं. औद्योगीकरण, शहरीकरण को गति देता है. करोड़ों लोग गाँवों से शहरों में धकेल दिए जाते है. कल के ग्रामीण किसान अब औद्योगिक पूंजीपतियों के लिए बेशी मूल्य पैदा करने के लिए फैक्ट्रियों में हड्डियाँ गलाने के लिए शहरों की गन्दी बस्तिओं में आकर रहने लगते हैं. इस तरह शहरों में आबादी बढ़ने की वजह से शहरों में घटिया से घटिया जगहों के लिए भी किरायेदार मिल जाते हैं. आज मुंबई, दिल्ली जैसे अनेक महानगरों की लगभग आधी आबादी किरायेदारों की ही है. इसमें शहरों में खाली पड़ी जगहों पर ‘नाजायज’ कब्जे करके झुग्गियां बनाकर रहने वाली बहुत बड़ी गरीब आबादी शामिल नहीं है क्योंकि यह आबादी किरायेदारों में शुमार नहीं होती. लुधियाना जैसे औद्योगिक महानगरों में मुर्गीखानों की तर्ज़ पर बने गंदे आंगनों के एक-एक कमरे में चार-चार पांच-पांच मजदूर ठूसे हुए हैं. शहर का कोई भी फ्लाई-ओवर ऐसा नहीं मिलेगा जिसके नीचे झुग्गियों की भरमार न हो. झुग्गियों वाले इलाके यहाँ हरदिन खुमी(Mushroom) की तरह उगते रहते हैं. इसके इलावा यहाँ एक बहुत बड़ी आबादी उन बेघरों की है, जिनके पास रहने के लिए किराए का कमरा भी नहीं है. फुटपाथ, पार्क और रिक्शा ही इनका रैनबसेरा हैं. एक अंदाज़े के मुताबिक़ केवल दिल्ली में ही डेढ़ लाख लोग बेघर हैं(हिन्दोस्तान टाईम्स,9 जनवरी 2010).यही हालात देश के अन्य महानगरों के हैं. यही हालात तीसरी दुनिया के सारे मुल्कों के महानगरों के हैं.और थोड़े फर्क के साथ यही हालात पूंजीवादी ‘स्वर्ग’ यानि विकसित पूंजीवादी देशों के महानगरों के हैं. यह समस्या उतनी ही पुरानी है जितना कि पूँजीवाद.

भारत जैसे कम विकसित पूंजीवादी देशों में जहाँ आज भी ग्रामीण आबादी की बहुतायत है, वहां ग्रामीण इलाकों में ग्रामीण गरीबों और मजदूरों के आवास की समस्या दूसरे रूप में सामने आती है. पंजाब के मालवा के गाँवों में ग्रामीण मजदूर के आवास की समस्या का वर्णन लिबरेशन की अगुवाई में चलने वाला मजदूर मुक्ति मोर्चा कुछ इस तरह से करता है,” ग्रामीण मजदूरों के भारी बहुमत के पास आवास के नाम पर आज भी वही ज़मीन है, जो 1958-60  में हुई मुरब्बेबंदी के समय गाँवों में लाल लकीर के अन्दर उनके बुजुर्गों के पास थी….पिछले 50 सालों में हमारी (ग्रामीण मजदूरों की – लेखक) 3-4 पीढियां जवान होकर कई परिवार बन चुके हैं. खेती के कामों का मशीनीकरण हो जाने की वजह से न तो हमें गुजारे लायक काम मिल रहा है और न ही जिले (मानसा) में कोई फैक्टरी लगाई गयी है…..ज़मीन की कीमतें गाँवों में भी शहरों की तरह आसमान छू रही हैं….जिस वजह से हम अक्सर एक छोटे से कमरे में पूरा-पूरा परिवार पता नहीं कैसे दिन काटने के लिए मजबूर हैं. हममें से बहुतों के पास तो रोटी पकाने के लिए कोई अलग जगह भी नहीं है और न ही नहाने धोने, पशु बाँधने, लकड़ी-इंधन रखने, पशु-विष्ठा सँभालने और शौच जाने के लिए कोई जगह है.” (‘लोक मोर्चा’ नवम्बर 2009,पृष्ठ 25 से हिन्दी में अनुवादित).

लगभग यही हालात देश के अन्य ग्रामीण इलाकों के हैं. यह है पूंजीवादी ढाँचे के अंतर्गत मजदूरों के आवास सम्बन्धी समस्या का विराट रूप. तो फिर इस समस्या का हल क्या है? सी पी आई (ऍम एल) लिबरेशन इसका हल ग्रामीण और शहरी मजदूरों में ज़मीनों का वितरण करके करना चाहती है. अगर बात सिर्फ लिबरेशन की होती तो हम इसका नोटिस नहीं लेते. क्योंकि लोक लुभावन नारे सुधारवादी, संसदमार्गी राजनीती का एक अंग होते हैं. नक्सलबाड़ी आन्दोलन की पैदावार यह पार्टी सातवें दशक के अंत तक वामपंथी दुस्साहसवाद का शिकार रही. आठवें दशक के शुरू में इसने संसदीय राजनीति की तरफ ऐसा मोड़ काटा कि अब यह पार्टी पूरी तरह संसदवाद की पटरी पर चढ़ चुकी है. और जिस पार्टी के साथ हमारे विचारधारा के समेत अन्य अनेक बुनियादी मसलों पर मतभेद हों उस पार्टी के साथ मजदूरों के आवास प्रश्न के बारे में बहस चलाने की कोई तुक नहीं बनती. लेकिनं मजदूरों के आवास के प्रश्न को आवास के लिए ज़मीनों के वितरण से हल करने की पहुँच सिर्फ लिबरेशन की ही नहीं है. मानसा जिला और अन्य जगहों पर लिबरेशन की अगुवाई में मजदूरों की तरफ से पंचायती ज़मीनों के कब्जे के लिए जो संघर्ष चला, उसको लेकर लिबरेशन और लाल परचम वालों में वाद-विवाद भी चला. परचम पक्ष का गिला सिर्फ यही था कि यह संघर्ष विभिन्न इंकलाबी पक्षों की तरफ से सांझे तौर पर क्यों नहीं लड़ा जा सका, जबकि इस संघर्ष की मूल मांग मजदूरों की रिहायश के लिए ज़मीन की मांग पर दोनों पक्षों की सम्पूर्ण सहमती है. इसके अलावा पंजाब के समूचे वामपंथी आन्दोलन, इंकलाबी काडर और इंकलाबी आन्दोलन के हमदर्द वामपंथी बुद्धिजीवियों में इस सवाल पर व्यापक भ्रम पाए जा रहे हैं. इसलिए यह जरूरी हो जाता है की इस सवाल पर मार्क्सवादी पहुँच को स्पष्ट किया जाये.

मजदूरों के आवास का प्रश्न और मार्क्सवाद

मार्क्सवाद अपने जन्म से ही बुर्जुआ, निम्न बुर्जुआ विचारधाराओं से टक्कर लेकर ही विकसित हुआ है. शुरू से ही मार्क्सवाद को आंतरिक और बाहरी हमलों का लगातार सामना करना पड़ा है.मार्क्सवाद ने हर बार इन हमलों का मुंह तोड़ जवाब दिया है. पिछले लगभग 150 साल की लम्बी अवधि के दौरान मजदूर आन्दोलन की राह रूशनाते हुए और विरोधी विचारधाराओं के साथ लगातार लोहा लेते हुए आज मजदूर मुक्ति का यह विज्ञान मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद के रूप में विकसित हो चुका है.

जब बुर्जुआजी मार्क्सवाद से सीधी टक्कर में हार गई तो उसने मजदूर आन्दोलन के अन्दर ही अपने एजेंट ढूँढने शुरू किये. 1896 में फ्रेडरिक एंगेल्स के देहांत के बाद बर्नस्टीन पहले ऐसे एजेंट के रूप में सामने आया. उसने बदले हालातों की दुहाई देते हुए मार्क्सवाद में संशोधन का नारा बुलंद किया. इस संशोधन का मतलब था मार्क्सवाद के बुनियादी तत्व को ख़त्म करके उसे बुर्जुआजी के अनुकूल ढालना. इस तरह से मजदूर आन्दोलन में संशोधनवाद का जन्म हुआ. विकसित पूंजीवादी देश जिनमें से कई अपने सर्वोच्च पड़ाव साम्राज्वाद के पड़ाव में दाखिल हो रहे थे, इस बदले भौतिक हालातों नें भी संशोधनवाद के पनपने में भूमिका निभाई. मजदूर आन्दोलन में संशोधनवाद के जन्म से ही मार्क्सवाद और संशोधनवाद के दरमियान हर मजदूर आन्दोलन के हर व्यवहारिक कदम पर टकराव चला आ रहा है.

जो देश अभी नए-नए पूंजीवादी विकास की राह पर थे, वहां छोटे मालिकों (निम्न-बुर्जुआ) की भरमार थी. इन देशों में (मार्क्स-एंगल्स के समय जर्मनी और फ़्रांस) छोटे मालिकों के नजरिये से पूंजीवाद की आलोचना के रूप में निम्न बुर्जुआ समाजवाद अस्तित्व में आया. मजदूर आन्दोलन की समस्याओं के हल के लिए निम्न बुर्जुआ समाजवाद नीम हकीमी और पश्चगामी नुस्खे पेश करने लगा. रूस में यह रुझान नरोदवाद के रूप में सामने आया. आज दुनिया के अल्प विकसित पूंजीवादी देशों में इस रुझान का अच्छा खासा अस्तित्व है. शुरू से ही मार्क्सवाद को निम्न बुर्जुआ समाजवाद के नीम हकीमी और पश्चगामी प्रोग्रामों के विरुद्ध जबरदस्त संघर्ष करना पड़ा है.

मजदूरों के आवास प्रश्न पर भी निम्न-बुर्जुआ समाजवाद के पैरोकारों प्रूधों और उसके जर्मन चेले मूल्बर्गर का नीम हकीमी और पश्चगामी प्रोग्राम सामने आया. बुर्जुआ समाजवाद और निम्न बुर्जुआ समाजवाद द्वारा आवास प्रश्न पर पेश प्रोग्राम की धज्जियाँ उड़ाने का कार्यभार संसार मजदूर वर्ग के महान अध्यापक फ्रेडरिक एंगल्स के हिस्से आया. इस कार्यभार में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक’आवास प्रश्न सम्बन्धी’(शहीद भगत सिंह यादगारी प्रकाशन लुधियाना की तरफ से पंजाबी में प्रकाशित) में पूरा किया.

यह लेख हम फ्रेडरिक एंगल्स की इसी किताब को आधार बनाकर लिख रहे हैं. इस पुस्तक में मजदूरों के आवास प्रश्न पर निम्न-बुर्जुआ समाजवादी प्रूधों, उसके जर्मन चेले मूलबर्गर और बुर्जुआ समाजवादी श्री ज़ाक्स के विचारों की आलोचना है, और साथ ही फ्रेडरिक एंगल्स यह भी बताते हैं कि मजदूर वर्ग आवास के प्रश्न को कैसे सुलझाएगा. बुर्जुआ समाजवाद और निम्न बुर्जुआ समाजवाद के आवास प्रश्न सम्बन्धी विचारों का सारतत्व यह है कि मजदूरों के पास रहने के लिए अपना घर होना चाहिए या उन्हें घर के मालिक बनाया जाना चाहिए. मौजूदा पूंजीवादी प्रणाली के अंतर्गत मजदूरों को घर के मालिक बनाने का पैंतरा फ्रेडरिक एंगल्स के मुताबिक पश्चगामी, मूर्ख्तापूरण और नामुमकिन है.

फ्रेडरिक एंगल्स लिखते हैं,”पूंजीवादी तथा निम्नपूंजीवादी समाजवाद को जर्मनी में ठीक इस घड़ी तक सशक्त प्रतिनिधित्व प्राप्त है. एक ओर, उनका प्रतिनिधित्व काटेडेर-समाजवादी तथा सब रंगों के लोकोपकारी कर रहे हैं जिनके बीच मजदूरों की अपनी आवास स्थलियों का स्थाई स्वामी बनने की इच्छा अब भी बड़ी भूमिका अदा कर रही है तथा इसलिए जिनके विरुद्ध मेरी पुस्तक अब भी सामयिक है.(उपरोक्त पृष्ठ २९८).” और भारत में भी अभी निम्न बुर्जुआ समाजवाद की प्रभावी प्रतिनिधिता है.यहाँ भी लिबरेशन वालों व औरों की कमी नहीं जो मजदूरों को उनके रिहायशी मकानों के मालिक बनाने की कोशिशों में हैं. लिबरेशन की तरफ से पिछले दिनों मालवा के कुछ इलाकों में लड़ा गया संघर्ष भी इन्हीं प्रयत्नों की एक कड़ी था.इसलिए इनके लिए फ्रेडरिक एंगल्स की “रचना आज भी प्रासंगिक है.”

प्रूदोंवादी मूल्बर्गर मजदूरों के रिहायशी घरों की समस्या की पेशकारी इस तरह करता है,”हम यह दावा करने में संकोच नहीं करते कि हमारी स्तुत्य शताब्दी की पूरी संस्कृति पर इस तथ्य से बड़ा और कोई क्रूर व्यंग्य नहीं हो सकता कि बड़े शहरों में 90 प्रतिशत तथा इससे अधिक आबादी के पास ऐसा आवास नहीं है जिसे वह अपना कह सके. नैतिक तथा पारिवारिक अस्तित्व, घरबार का मूल बिंदु सामाजिक भंवर में डूबता जा रहा है…. इस मामले में हम वहशियों के बहुत नीचे हैं. कन्दरावासी के पास अपनी कन्दरा, आस्ट्रेलियाई के पास अपनी मिट्टी की झोंपड़ी, रेड इंडियन के पास अपना चौका-चूल्हा होता था, लेकिन आधुनिक सर्वहारा त्रिशंकु बना हुआ है.”(उपरोक्त पृष्ठ 310-311). फ्रेडरिक एंगल्स इस पर टिप्पणी करते हैं,”इस विलाप में प्रूदोंपंथ अपने पूरे प्रतिक्रियावादी रूप में मौजूद है.”(उपरोक्त पृष्ठ 311)

हमारे यहाँ भी मजदूरों के बेजमीने और बेघर होने के विलाप सुने जा सकते हैं. ये विलाप न सिर्फ देश के निम्न-बुर्जुआ समाजवाद के सियासी लेखन बल्कि गीतों, कविताओं में भी सुने जा सकते हैं.

निम्न-बुर्जुआ समाजवाद मजदूरों के आवास प्रश्न का हल कैसे करता है? ”मकानों को किराये पर उठाने की व्यवस्था का अंत करना परम आवश्यक बना दिया जाता है तथा उसे इस मांग के रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि हर किरायेदार को अपने आवास का मालिक बना दिया जाये.”(फ्रेडरिक एंगल्स उपरोक्त पृष्ठ 314) प्रूदोंवादी मूल्बर्गर के शब्दों में आवास प्रश्न की समस्या इस प्रकार हल की जाएगी,”किराये पर उठाये जाने वाले मकानों का विमोचन हो जायेगा…..समाज….इस तरह मकानों के स्वतन्त्र, आज़ाद स्वामियों का कुल योग बन जाता है. (उपरोक्त पृष्ठ 314 एंगल्स द्वारा दिया हवाला)

बुर्जुआ और निम्न-बुर्जुआ समाजवादी मजदूरों को मकानों के मालिक क्यों बनाना चाहते हैं और इससे मजदूरों को क्या फायदा होगा? बुर्जुआ समाजवादी श्री ज़ाक्स के शब्दों में पढ़ें,”ज़मीन का स्वामी बनने की इंसान में अन्तर्निहित अभिलाषा  में कुछ विलक्षणता है; यह ऐसी ललक है जिसे आज के कामकाजी जीवन की आपाधापी कम नहीं कर सकी है. यह आर्थिक उपलब्धि के जिसका प्रतिनिधित्व भू-स्वामी करता है, महत्त्व की अचेतन अनुभूति है. इसके साथ व्यक्ति सुरक्षित स्थिति हासिल करता है; कह सकते हैं कि उसके पाँव धरती पर मजबूती से जम जाते हैं, तथा प्रत्येक उद्यम(!) उसमें सबसे स्थाई अधर प्राप्त करता है. परन्तु भू-स्वामित्व के वरदान इन भौतिक लाभों की परिधि से कहीं अधिक व्यापक हैं. ज़मीन के किसी टुकड़े को अपना कहने का जिस किसी को सौभाग्य प्राप्त है, वह आर्थिक स्वतंत्रता की उच्चतम परिकल्पित मंजिल पर पहुँच चुकता है; उसके पास ऐसा भू-क्षेत्र है जिस पर वह प्रभुसत्ताप्राप्त अधिकार के साथ राज कर सकता है; वह स्वयं अपना स्वामी है; उसे कुछ सत्ता उपलब्ध होती है और ज़रुरत पड़ने पर निश्चित समर्थन मिल जाता है; उसका आत्मविश्वास तथा उसके साथ उसकी नैतिक शक्ति बढ़ती है. इसी कारण हमारे समक्ष मौजूद प्रश्न में स्वामित्व का गहन महत्त्व है….मजदूर को, जो आज आर्थिक जीवन के तमाम उतार-चढ़ावों के प्रहार के सामने असहाय है और अपने मालिक पर निरंतर आश्रित रहता है, इस अस्थिर स्थिति से कुछ हद तक बचाया जा सकेगा; बह पूंजीपति बन जायेगा और उसकी स्थावर सम्पदा द्वारा उसके लिए उधार हासिल करने की संभावनाओं के द्वार खोले जाने के परिणामस्वरूप बेरोजगारी तथा कार्य अक्षमता के खतरों से उसकी रक्षा की जाएगी. उसे इस तरह सम्पत्तिहीनों की पांतों से ऊपर उठाकर सम्पत्तिधारी वर्ग के बीच पहुँचाया जा सकेगा.” (उपरोक्त पृष्ठ 329, एंगल्स द्वारा दिया हवाला)

‘लोक मोर्चा’ भी मूल्बर्गर की ही तरह ज़मीन के लिए तड़प की चर्चा करता है,”19 मई को मानसा डी.सी. कार्यालय पर हुए बेमिसाल मजदूर एकत्रीकरण ने यह दर्शाया कि मजदूरों में अपनी ज़मीन के लिए कितनी तड़प है और कैसे वो इसके लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं. (लोक मोर्चा,नवम्बर 2009 पृष्ठ 13,) मजदूरों की संपत्ति-च्युत्तता के विलाप और उनके लिए ज़मीन के लाभकारी होने का वर्णन और भी वामपंथी पत्रिकाओं में देखा जा सकता है.

मजदूरों के आवास प्रश्न के समाधान के रूप में मजदूरों को मकानों के मालिक बनाने में बुर्जुआजी भी दिलचस्पी रखती है,”आवास प्रश्न के प्रूदोंपंथी समाधान-सम्बन्धी अनुभाग में यह सिद्ध किया गया था कि इस प्रश्न में निम्न पूंजीपति वर्ग की कैसे प्रत्यक्ष दिलचस्पी है.परन्तु बड़े पूंजीपति वर्ग की भी उसमें बहुत दिलचस्पी है भले ही वह प्रत्यक्ष न हो……मौजूदा समाज की सारी बुराईयों के आधार को बरक़रार रख्नने और साथ ही स्वयं बुराईयों को मिटाने की इच्छा पूंजीवादी समाज का सारतत्व है. जैसा कि कम्युनिस्ट घोषणापत्र में पहले ही लक्षित किया जा चूका है, पूंजीवादी समाजवादी “पूंजीवादी समाज को बरक़रार रखने के लिए समाज की बुराईयों को दूर करना चाहते है”;वे चाहते हैं कि “पूंजीपति वर्ग हो, लेकिन सर्वहारा न हो” (फ्रेडरिक एंगल्स उपरोक्त पृष्ठ 323-326).

मजदूरों को संपत्ति के साथ बांधना किसके पक्ष में है?

भारत की ज्यादातर कम्युनिस्ट पार्टियां और ग्रुप आज भारत की अवास्तविक समझ पर खड़े हुए हैं. इनके अनुसार भारत एक अर्ध-सामंती अर्ध-बस्तीवादी देश है और यहाँ चीन की तरह की नव जनवादी क्रांति होगी. लेकिन ऐसा भारतीय समाज केवल इनकी कल्पना में ही बसता है. भारत की स्थितियां इनके इस कल्पना लोक से बिलकुल भिन्न हैं. भारतीय समाज आज से लगभग 4 दशक पहले 1960 के दशक के अंत में ही नव जनवादी क्रांति का पड़ाव पार करके समाजवादी क्रान्ति के पड़ाव में दाखिल हो गया था. आज भारत अपनी अलग विशेषताओं वाला पूंजीवादी भारत है. नव जनवादी क्रांति के कार्यक्रम को मानने वाली ज्यादातर पार्टियाँ/ग्रुप इस समय धनी किसानों के मुनाफे बढाने की लड़ाई में मशरूफ हैं. इस तरह ये पूंजीवादी बाज़ार की ‘बुराईयों’ के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. इनका व्यवहार भी इनके सिद्धांत की पुष्टि नहीं करता.

सी.पी.आई.(माओवादी) देश के सबसे पिछड़े इलाकों में सक्रिय है. इस पार्टी का व्यवहार अपने ‘रेड कॉरिडोर’ जो कि देश का सबसे पिछड़ा हिस्सा है, में भी भारतीय समाज के सामंती होने की पुष्टि नहीं करता. भारत के इस सबसे पिछड़े इलाके में भी पार्टी की लड़ाई सामंतों के विरुद्ध नहीं (जो कि वहां है ही नहीं) बल्कि पूँजी और भारतीय राज्यसत्ता के विरुद्ध है.

आज के भारतीय समाज में निम्न पूंजीपतियों मुख्यता किसानों के सर्वहाराकरण की प्रक्रिया बहुत तेज है. किसान किसी सामंती लगान की वजह से नहीं, बल्कि पूँजी के तर्क से सर्वहारा बन रहे हैं. यहाँ की ज्यादातर कम्युनिस्ट पार्टियां/ग्रुप इन छोटे मालिकों को बचाने अर्थात उनको ज़मीन के छोटे से टुकड़े के साथ बांधकर रखने और सर्वहारा बन चुके कल के किसानों को फिर से छोटे मालिक बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं. इनमें से ज्यादातर ग्रुपों का मानना है कि ‘ज़मीन हलवाहक की’ का नारा भारत की कृषि क्रांति का केंद्रीय नारा होगा.

जब समाज सामंती, अर्ध-सामंती पड़ाव में था, तो बुर्जुआ जनवादी या नयी जनवादी क्रांतियों के दौरान भूमिहीन काश्तकार किसानों में ज़मीन के वितरण ने इतिहास में एक शानदार प्रगतिशील भूमिका निभाई थी. परन्तु आज के पूंजीवादी समाज में जहाँ संपत्ति का वितरण नहीं, बल्कि संपत्ति का समाजीकरण इतिहास के एजेंडे पर आ चुका है, वहां सम्पत्तिहीनों के बीच संपत्ति का वितरण एक पश्चगामी नारा बन चुका है. यह आज के भारत के लिए भी उतना ही वास्तविक है जितना कि छोटे मालिकों की प्रचुरता वाले मार्क्स-एंगल्स-लेनिन के समय के समाजों के लिए वास्तविक था. और मजदूर वर्ग के इन महान शिक्षकों नें इस प्रश्न पर काफी कुछ लिखा है. मजदूरों के आवास प्रश्न के बुर्जुआ और निम्न बुर्जुआ हल के बारे में भी यही सच है. फ्रेडरिक एंगल्स लिखते हैं,”पूर्ववर्ती काल के ग्राम्य घरेलू उद्योग, जो सागबाड़ी और खेती से जुड़ा हुआ था, कम से कम उन देशों में, जहाँ उद्योग विकसित हो रहा था, मजदूर वर्ग के लिए सहनीय तथा यत्र-तत्र सुविधाजनक भौतिक स्थिति का आधार और साथ ही उसकी बौद्धिक और राजनीतिक नगण्यता का आधार था. हाथ की बनी वस्तु तथा उसकी लागत मंडी कीमत को निर्धारित किया करती थीं; श्रम उत्पादकता आज की तुलना में सर्वथा न्यून होने के कारण मंडी नियमतः पूर्ती की तुलना में अधिक तेजी के साथ विकसित होती थी. गत शताब्दी के लगभग मध्य तक इंग्लैण्ड में और अंशतः फ्रांस में-विशेष रूप से वस्त्र उद्योग के मामले में-यही होता रहा. परन्तु जर्मनी में, जिसने उस समय तीसवर्षीय युद्ध की तबाही के बाद अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों के अंतर्गत अपना पुनरूद्धार शुरू ही किया था, स्थिति निस्संदेह सर्वथा भिन्न थी. उस समय जर्मनी का एकमात्र घरेलू उद्योग था लिनेन वस्त्र का बुनाई उद्योग,जो विश्व मंडी के लिए उत्पादन कर रहा था, वह करों तथा सामंती सेवाओं के भार से इतना दबा हुआ था कि उसने कृषक बुनकरों को शेष कृषक समुदाय के अत्यंत निम्न जीवन स्तर से कभी ऊपर नहीं उठाया.फिर भी ग्रामीण औद्योगिक मजदूर उस समय कुछ हद तक सुरक्षापूर्ण अस्तित्व का उपभोग कर रहा था.

मशीनों के प्रचलन पर यह सब बदल गया. अब मशीनों से निर्मित वस्तुएं कीमतें निर्धारित कर रही थीं तथा इस कीमत के साथ घरेलू औद्योगिक मजदूर की उजरत घट गयी. परन्तु मजदूर को यह स्वीकार करना पड़ता था, वर्ना उसे किसी और काम की तलाश करनी पड़ती थी. और वह सर्वहारा बने बिना, अर्थात अपना छोटा-सा घर, बाग़ या खेत-वह चाहे अपना हो या लगान पर हो- छोड़े बिना यह नहीं कर सकता था. बिरले ही मामलों में वह इसके लिए तैयार होता. इस तरह हाथ से काम करनेवाले पुराने देहाती बुनकरों की सागबाड़ी तथा खेती ऐसा कारण बन गया जिसके परिणामस्वरूप जर्मनी में यांत्रिक करघे के विरूद्ध हथकरघे का संघर्ष इतने लम्बे समय तक चलता रहा और उसका कोई निर्णायक अंत नहीं हो सका. इस संघर्ष में ख़ास तौर पर इंग्लैण्ड में पहली बार यह चीज़ सामने आई कि जो परिस्थितियां पहले मजदूर की-अपने उत्पादन साधनों का स्वामी होने की- अपेक्षाकृत समृद्धि के आधार का काम देती थीं, वे ही अब उसके लिए अड़चन तथा बदकिस्मती का कारण बन गयीं. उद्योग के क्षेत्र में यांत्रिक करघे नें उसके हथकरघे को पराजित कर दिया, कृषि में छोटे पैमाने की खेती की तुलना में बड़े पैमाने की खेती का पलड़ा भारी हो गया. परन्तु जहां बहुत-से लोगों का सामूहिक श्रम तथा मशीनों और विज्ञान का उपयोग उत्पादन के दोनों क्षेत्रों में सामजिक नियम बन गए, वहां मजदूर को उसके मकान, बाग़, खेत तथा हथकरघे नें निजी उत्पादन की पुरानी पड़ चुकी विधियों और हाथ से किये जानेवाले श्रम के साथ बाँधा रखा. घर और बाग़ का स्वामित्व अब इधर-उधर जाने की पूर्ण स्वतंत्रता से कहीं कम लाभप्रद था. कोई भी कारखाना मजदूर हाथ से काम करनेवाले देहाती बुनकर की जगह लेने को तैयार नहीं था जो धीरे -धीरे परन्तु निश्चित रूप से भूख से मर रहा था.” (उपरोक्त पृष्ठ 299-300)

आगे वह लिखते हैं,”यहीं आधुनिक मजदूर के लिए मकान तथा भूस्वामित्व का “वरदान” अपनी पूरी भव्यता के साथ दिखाई देता है. जर्मन घरेलु उद्योगों में जितनी कम शर्मनाक मजदूरी दी जाती है उतनी और शायद कहीं नहीं दी जाती, शायद आयरिश घरेलु उद्योगों तक में नहीं. मजदूर का परिवार अपने छोटे से बाग़ या खेत से जो कुछ कमाता है, उसे पूंजीपति प्रतियोगिता का लाभ उठाकर मजदूर की श्रम शक्ति की कीमत से काट लेता है. मजदूर को जो भी उजरत दी जाती है उसे स्वीकार करने के लिए वह विवश होता है; एक तो इसलिए कि ऐसा न करने पर उन्हें कुछ भी नहीं मिलेगा और वे अपनी खेती की उपज के सहारे ही जिंदा नहीं रह सकते और दूसरे इसलिए कि यही खेती तथा भूस्वामित्व उन्हें अपने स्थान से बांधे रखते हैं तथा कोई दूसरा रोज़गार तलाश करने के लिए इधर-उधर नहीं देखने देते. यह है वह आधार जो छोटी-छोटी वस्तुओं की एक पूरी श्रृंखला में विश्व मंडी में प्रतियोगिता करने की जर्मन क्षमता को बरकरार रखता है. पूँजी पर पूरा मुनाफा सामान्य मजदूरी से काटा जाता है तथा पूरा अतिरिक्त मूल्य खरीददार को भेंट किया जा सकता है. अधिकाँश निर्यातित  जर्मन वस्तुओं के असाधारण रूप से सस्ते होने का यही रहस्य है.”…..” यहाँ हम स्पष्ट रूप से देखते हैं कि पूर्ववर्ती ऐतिहासिक मंज़िल में जो वस्तु मजदूरों की अपेक्षाकृत समृद्धि का – अर्थात कृषि का उद्योग से सम्बन्ध, मकान, बाग़, खेत तथा निस्संदेह आवास-स्थल के स्वामित्व का- आधार थी, वह आज, बड़े उद्योग के प्रभुत्व के अंतर्गत मजदूर के लिए सबसे विकट बाधक ही नहीं, वरन पूरे मजदूर वर्ग के लिए सबसे बड़ी बदकिस्मती भी बनती जा रही है, पृथक-पृथक ज़िलों में तथा उत्पादन की अलग-अलग शाखाओं में ही नहीं, वरन पूरे देश में भी मजदूरी को सामान्य स्तर से बेमिसाल नीचे रखे जाने का आधार बनती जा रही है. इसलिए यदि बड़े तथा निम्न पूंजीपति, जो मजदूरी से इन असामान्य कटौतियों पर जीवित रहते है तथा उनसे अमीर बनते हैं, घरेलू उद्योग के लिए तथा इस बात के लिए उत्सुक हैं कि मजदूर अपने मकानों के मालिक हो और यदि वे यह मानते हैं कि नए घरेलू उद्योगों की स्थापना समस्त ग्रामीण विपत्तियों को दूर करने का एकमात्र उपचार है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है!” (उपरोक्त पृष्ठ-301-302)

मजदूर वर्ग की मुक्ति संपत्ति के मालिक बनने में नहीं बल्कि संपत्ति से मुक्त होने में है. आधुनिक क्रांतिकारी वर्ग- सर्वहारा वर्ग – के निर्माण के लिए उन नाभि-रज्जू को काटना नितांत आवश्यक था जिससे पुराने ज़माने का मजदूर ज़मीन से जुड़ा हुआ था. हाथ से काम करनेवाला बुनकर, जिसके पास करघे के अलावा अपना छोटा-सा घर, बाग़ और खेत होता था, अपने सारे दुःख-कष्टों तथा सारे राजनीतिक दबाव के बावजूद शांत, संतुष्ट,”धर्मपरायण और प्रतिष्ठा प्राप्त” व्यक्ति था. वह अमीर, पादरी तथा पदाधिकारियों के आगे सिर झुकाया करता था और आंतरिक रूप से पूरी तरह दास था. यह ठीक आधुनिक, बड़े पैमाने का उद्योग ही है जिसने श्रमिक को, जो पहले से ज़मीन से बंधा जुआ था, पूर्णतया संपत्ति-च्युत सर्वहारा बना दिया, उसे तमाम परंपरागत बेड़ियों से मुक्त कर दिया, एक<<Vogelfrei>>(दो अर्थों वाला शब्द-’पक्षी की तरह मुक्त’,’विधि-बहिष्कृत’) सर्वहारा बना दिया; यह ठीक आर्हिक क्रान्ति ही है जिसने एकमात्र ऐसी अवस्थाओं का सृजन किया है जिनके अंतर्गत पूंजीवादी उत्पादन के रूप में मेहनतकश वर्ग का शोषण अपने अंतिम रूप समेत मिटाया जा सकता है. और तब विलाप करते हुए यह प्रूदोंपंथी सामने आते हैं और मजदूरों को घर-बार से बाहर निकाले जाने पर इस तरह सिसकियाँ भरते हैं मानों यह उनकी बौद्धिक मुक्ति की ठीक पहली शर्त नहीं, बल्कि प्रतिगामी पग है. (उपरोक्त पृष्ठ 311)

पूंजीवाद प्रतिदिन आबादी के बड़े हिस्से को सर्वहारा में बदलता है. इस संपत्ति-च्युत सर्वहारा की मुक्ति अब अतीत की और झाँकने में नहीं (जो कि किसी भी हालात में प्राप्त नहीं किया जा सकता और ऐसी इच्छाएं रखना मानवीय इतिहास के पहिये को पीछे की तरफ मोड़ने के तुल्य होगा) बल्कि पूँजीवाद के पार देखने में है.”बड़े पैमाने पर पूंजीवादी उत्पादन के प्रचलन के बाद मजदूरों की स्थिति भौतिक रूप से और बिगड़ी है, इस पर केवल पूंजीपति वर्ग संदेह करता है. परन्तु क्या हमें इसलिए पीछे मुड़कर मिस्त्र देश में मांस की हांडियों, (वह भी इनेगिने), छोटे पैमाने के देहाती उद्योग की ओर, जो केवल दासवत आत्माएं पैदा करता था, अथवा ‘वहशियों” की ओर ललचायी दृष्टि से देखना चाहिए? बात इसके विपरीत है. बड़े पैमाने के आधुनिक उद्योग द्वारा सर्जित, ज़मीन से बाँधनेवाली बेड़ियों समेत विरासत में मिली सारी बेड़ियों से मुक्त और बड़े शहरों में झुण्ड के झुण्ड भरता जा रहा सर्वहारा ही महान सामजिक रूपांन्तरण का कार्य संपन्न कर सकता है जो समस्त वर्ग शोषण तथा समस्त वर्ग शासन का अंत कर देगा, घर-बार वाले पुराने ग्रामीण बुनकर यह कभी न कर पाते; वे इस तरह के विचार को अमल में लाने की इच्छा करना तो दूर रहा, उसे दिमाग में नहीं ला सकते थे. (उपरोक्त पृष्ठ 311-312).

यदि मौजूदा पूंजीवादी प्रणाली में मजदूर घरों के मालिक बन भी जाएँ तो इसका इसका मजदूर वर्ग पर क्या प्रभाव पड़ेगा. फ्रेडरिक एंगल्स के शब्दों में,”श्री ज़ाक्स यह मानते प्रतीत होते हैं कि इन्सान मूलतः किसान है, अन्यथा वह हमारे बड़े शहरों के मजदूरों के दिल में ज़मीन पाने की वह अभिलाषा होने की बात न कहते जिसे और किसी ने उनमें नहीं पाया है. बड़े शहरों के हमारे मजदूरों के लिए स्थानान्तरण की स्वतंत्रता अस्तित्व की प्रथम शर्त है तथा भू-स्वामित्व उनके पांवों पर केवल बेड़ियों का ही काम देगा. उन्हें अपने मकान दें,उन्हें फिर ज़मीन से बाँध दें, बस इस तरह आप कारखानों के मालिकों द्वारा मजदूरी में कटौती कर उन द्वारा प्रतिरोध किये जाने की शक्ति को कुचल डालेंगे. कोई भी मजदूर मौका पड़ने पर शायद अपना मकान बेच सकेगा परन्तु बड़ी हड़ताल या आम औद्योगिक संकट की हालत में हड़ताली मजदूरों के सारे मकानों को बाज़ार में बिक्री के लिए प्रस्तुत करना पड़ेगा और तब इस कारण उनके ग्राहक ही नहीं मिलेंगे और यदि मिलेंगे भी तो उन्हें उनकी लागत कीमत से कहीं कम पर बेचना पड़ेगा. और यदि उन सब के लिए ग्राहक मिल भी जाएँ तो श्री ज़ाक्स का सारा महान आवास सुधार मिट्टी में मिल जायेगा तथा उन्हें फिर नये सिरे से काम शुरू करना पड़ेगा. (उपरोक्त पृष्ठ 330)…..”परन्तु हमारे मजदूर के इस पूंजीवादी रूप का एक और भी पहलू है. आइये, यह मान लें कि किसी औद्योगिक इलाके में यह  प्रथा है कि प्रत्येक मजदूर का अपना छोटा-सा मकान है. ऐसी स्थिति में उस इलाके का मजदूर वर्ग बिना किराये दिये रहता है; आवास व्यय अब उसकी श्रम शक्ति के मूल्य में शामिल नहीं होते. परन्तु श्रम शक्ति की उत्पादन लागत में हर कटौती, यानी मजदूर की जीवनावाश्यक्ताओं की कीमत में प्रत्येक स्थायी कटौती “राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांत के लौह कानूनों के आधार पर” श्रम शक्ति के मूल्य के ह्वास के समतुल्य होती है और इसलिए अन्ततोगत्वा मजदूरी भी उसी अनुपात से घटेगी. इस तरह मजदूरी में औसतन गिरावट किराये की मद में बचाई गयी औसत राशि के बराबर होगी, यानी मजदूर अपने ही मकान के लिए किराया पहले की तरह नकद रूप में मकान-मालिक को नहीं, वरन कारखाना-मालिक को,जिसके लिए वह काम करता है, अदत्त श्रम के रूप में देता है, इस तरह मजदूर की बचत, जिसे वह अपने छोटे-से मकान पर लगाता है, एक अर्थ में पूँजी बन जाएगी परन्तु यह पूँजी उसकी  नहीं, वरन, उस पूंजीपति की होगी जिसके लिए वह काम करता है.(उपरोक्त पृष्ठ 331)…..”प्रसंगतः,जो कुछ ऊपर कहा गया है, वह उन तमाम तथाकथित सामाजिक सुधारों पर लागू होता है, जो बचत करने या मजदूर की आजीविका के साधनों को सस्ता बनाने तक सीमित हैं. या तो ये सुधार सर्वव्याप्त हो जाते हैं और फिर मजदूरी में संबंधित कमी आती है या फिर वे बिलकुल इक्के-दुक्के प्रयोग मात्र रह जाते हैं और फिर इक्के-दुक्के अपवादों के रूप में उनका अस्तित्व ही यह सिद्ध करता है कि व्यापक रूप में उनका कार्यान्वयन उत्पादन की वर्तमान पूंजीवादी पद्धति से मेल नहीं खाता. आइये, यह मान लें कि किसी एक इलाके में उपभोक्ता सहकारिताओं की आम शुरुआत मजदूरों के जीवन निर्वाह साधनों की लागत 20 प्रतिशत घटाने में सफल हो जाती है. इसलिए उस इलाके में अन्ततोगत्वा मजदूरी में 20 प्रतिशत गिरावट आयेगी, कहने का मतलब है, उसी अनुपात से जिस अनुपात से जीवन निर्वाह साधन मजदूर के बजट में शामिल होते हैं. यदि मजदूर, उदाहरण के लिए, अपनी साप्ताहिक मजदूरी का तीन-चौथाई भाग इन जीवन निर्वाह साधनों पर खर्च करता है तो मजदूरी में अंततः गिरावट 3/4*20=15 प्रतिशत के बराबर होगी. संक्षेप में, ज्योंही इस तरह का बचत-सम्बन्धी कोई सुधार सर्वव्याप्त हो जाता है, मजदूर की मजदूरी उसी अनुपात से घट जाती है. हरएक मजदूर के लिए बचत से हासिल होनेवाली 52 टेलरों की स्वतन्त्र आय की व्यवस्था करें, तो उसकी साप्ताहिक मजदूरी अंततःनिश्चित रूप से एक टेलर घट जाएगी. इसलिए वह जितनी बचत करेगा, वह उतनी ही कम मजदूरी प्राप्त करेगा. इसलिए वह अपने हित में नहीं, वरन पूंजीपति के हित में बचत करता है. (उपरोक्तपृष्ठ 331-332)…..”दूसरे शब्दों में श्री ज़ाक्स को आशा है कि मकान के हस्तगत होने से अपनी सर्वहारा स्थिति में परिवर्तन होने के साथ-साथ मजदूर अपना सर्वहारा स्वरूप भी खो बैठेंगे तथा इस तरह वे अपने पूर्वजों की तरह- वे भी मकान-मालिक थे- एक बार फिर आज्ञाकारी चाटुकार बन जायेंगे. प्रूदोपंथियों को इस पर विचार करना चाहिए. (उपरोक्त पृष्ठ 332). मजदूरों को संपत्ति के साथ बांधना सिर्फ शोषक वर्गों के हितों की ही पूर्ति करता है.”सत्ताधारी वर्ग के सबसे चतुर नेताओं की कोशिशों का हमेशा यह लक्ष्य रहा है कि  छोटे -छोटे संपत्ति स्वामियों की संख्या बढती रहे ताकि सर्वहारा के विरुद्ध अपने लिए एक सेना तैयार की जा सके. गत शताब्दी की पूंजीवादी क्रांतियों नें सामंतों तथा चर्च की बड़ी-बड़ी जागीरों को छोटे-छोटे भू-खण्डों में बांटा- ठीक उसी तरह जिस तरह स्पेनी जनतंत्रवादी अपने यहाँ अब भी मौजूद बड़ी जागीरों को बांटना चाहते हैं- और इस तरह उन्होंने छोटे भूस्वामियों का एक वर्ग पैदा कर दिया जो तब से समाज में सबसे प्रतिक्रियावादी तत्व तथा शहरी सर्वहारा के क्रांतिकारी आन्दोलन की राह में स्थाई बाधक बना हुआ है. नेपोलियन तृतीय का इरादा सरकारी ऋण के छोटी-छोटी राशियों के बांड जारी कर शहरों में ठीक ऐसा ही वर्ग तैयार करने का था, और श्री दोल्फुस तथा उनके सहयोगियों ने अपने मजदूरों को छोटे-छोटे घर वार्षिक किश्तों पर बेचकर उनकी सारी क्रांतिकारी भावना का गला घोंटने और साथ ही इस संपत्ति द्वारा मजदूरों को कारखाने से बाँधने का प्रयास किया था. इस तरह प्रूदों की योजना ने मजदूर वर्ग को राहत पंहुचाना तो बहुत दूर रहा, वह सीधे उनंके ही विरुद्ध सिद्ध हुई.” (उपरोक्त पृष्ठ 317).

मजदूरों के आवास प्रश्न की समस्या का समाधान क्या है ?

पूंजीवादी प्रणाली नें मजदूरों के लिए घरों की कमीं पैदा की है, और इसका समाधान भी इस पूंजीवादी प्रणाली को उखाड़ कर और समाजवाद के निर्माण से ही संभव है. मौजूदा पूंजीवादी प्रणाली के अंतर्गत ही आवास प्रश्न की समस्या का हल ढूँढने की कोशिश एक यूटोपिया है, और ऐसी कोशिशें मजदूर आन्दोलन में विपथगमन का कारण बनेंगीं और पूंजीवादी प्रणाली की आयु और लम्बी करेंगीं. फ्रेडरिक एंगल्स लिखते हैं,”आवास की इस कमीं को दूर करने का एक ही साधन है- मेहनतकश वर्ग का सत्तारूढ़ वर्ग द्वारा किये जानेवाले शोषण तथा उत्पीड़न का पूरी तरह ख़ात्मा कर देना.” (उपरोक्तपृष्ठ 305).

मजदूरों के लिए घरों की कमीं को पूरा करने के लिए देहात और शहर के बीच के विरोध को दूर करना भी आवश्यक है. यह भी पूंजीवादी प्रणाली को जड़ से उखाड़ कर समाजवादी व्यवस्था के निर्माण से ही संभव है. ”इसलिए स्वयं अपनी स्वीकारोक्ति के अनुसार आवास प्रश्न का पूंजीवादी समाधान शहर और देहात के बीच विरोध के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया है. और यहाँ हम समस्या के मर्म बिंदु में पहुँच जाते हैं. आवास प्रश्न तभी हल किया जा सकता है जब समाज का इतना पर्याप्त रूप से रूपांतरण हो जाये कि शहर तथा देहात के बीच विरोध मिट जाये जिसे वर्तमान पूंजीवादी समाज नें चरम बिंदु पर पंहुंचा दिया है. इस विरोध को मिटाना तो रहा दूर, पूंजीवादी समाज उल्टे इसे नित्यप्रति उग्र बनाने के लिए विवश होता है. प्रथम समकालीन कल्पनावादी समाजवादी ओवेन तथा फुरिये ने इसे सही ढंग से पहचाना है. उनके आदर्श ढाँचे में शहर तथा देहात के बीच यह विरोध नहीं रह जाता. फलस्वरूप यहाँ ठीक श्री ज़ाक्स के दावे के उलट होता है- आवास प्रश्न का समाधान सामाजिक प्रश्न के साथ ही समाधान नहीं करता, बल्कि सामाजिक प्रश्न के समाधान से ही, यानी उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति के खात्मे से आवास प्रश्न का समाधान संभव हो जाता है.आवास प्रश्न के समाधान की अभिलाषा और साथ ही आधुनिक बड़े शहरों को बरकरार रखने की इच्छा बेतुकी चीज़ है. परन्तु आधुनिक बड़े शहरों को केवल उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति के खात्मे से  ही मिटाया जा सकता है, और एक बार यह काम शुरू हो जाने पर हर मजदूर के लिए छोटे-से घर का स्वामित्व प्रदान करने से सर्वथा भिन्न प्रश्न उठ  खड़े होंगे.” (उपरोक्तपृष्ठ 333). आगे फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं, ”जब तक उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति कायम रहेगी, आवास प्रश्न अथवा मजदूरों की दशा पर असर डालनेवाले किसी भी अन्य सार्वजनिक प्रश्न का समाधान करने की आशा करना मूर्खतापूर्ण है.समाधान तो उत्पादन की पूंजीवादी पद्धति के उन्मूलन में तथा स्वयं मजदूर वर्ग द्वारा जीवन निर्वाह के तमाम साधनों तथा श्रम के तमाम साधनों के हस्तगतकरण में निहित है.” (उपरोक्त पृष्ठ 352-353).

मौजूदा पूंजीवादी पद्धति में घरों की कमीं केवल मजदूरों के लिए ही नहीं है. मजदूरों के इलावा शहरी निम्न-बुर्जुआ भी घरों की कमीं के शिकार हैं. बुर्जुआजी के लिए घरों की कोई कमीं नहीं है. इनके पास न सिर्फ अपने रहने के लिए जरूरत से बड़े घर हैं, बल्कि इनके पास अनेक घर हैं जो कि खाली ही रहते हैं, बस इन घरों की देखभाल के लिए एक-आधा नौकर इन विशाल भवनों के एक कोने में छोटे से कमरे में रहता है. 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में एक करोड़ साठ लाख मकान खाली पड़े थे. लुधियाना जैसे औद्योगिक महानगरों में तैयार घरों की कई कालोनियां देखी जा सकती हैं, जो कि खाली पड़ी हैं. इसके अलावा सभी बड़े शहरों में अनेकों देशी-विदेशी रियल इस्टेट कम्पनियां धड़ा-धड़ मकान बनाए जा रही हैं, जिनके लिए ग्राहक नहीं मिल रहे हैं. आज के समय में घरों की कमीं की समस्या नहीं है, समस्या है इनके सही इस्तेमाल की.

जैसेकि उत्पादन के सभी साधनों का असली मालिक मजदूर वर्ग है, क्योंकि यही इनको इस्तेमाल करता है और इसने ही इनका निर्माण किया है. उत्पादन के इन साधनों को पूंजीपति वर्ग से छीन लेना मजदूर वर्ग की मुक्ति के लिए एक बुनियादी शर्त है. उत्पादन के साधनों की तरह ही, पूंजीपतियों के घरों का भी असली मालिक मजदूर वर्ग ही है. एक, इसलिए कि यह घर उसके श्रम से बने हैं, दूसरा यह मजदूर वर्ग की श्रम शक्ति की लूट के ज़रिये बने हैं. इसलिए उत्पादन के साधनों की ही तरह मजदूर वर्ग पूंजीपतियों के घरों पर भी कब्ज़ा करेगा. एंगेल्स लिखते हैं,”चूँकि भावी समाज के संगठन के लिए कोई काल्पनिक प्रणालियों की रचना हमारा काम नहीं है, इसलिए यहाँ इस प्रश्न का विवेचन करना सर्वथा निरर्थक होगा. परन्तु एक चीज़ निश्चित है – बड़े शहरों में यह सारी “मकानों की कमी” दूर करने के लिए मकान पर्याप्त संख्या में मौजूद हैं बशर्ते उनका विवेकपूर्वक उपयोग किया जाये. यह स्वभावतः तभी हो सकता है जब मौजूदा मकान-मालिकों के मकानों को हस्तगत करके मौजूदा गृहहीन मजदूरों अथवा भीड़भरे घरों में रहनेवाले मजदूरों को उनमें बसा दिया जाये. सर्वहारा ज्यों की राजनीतिक सत्ता हासिल कर लेगा, तब सामाजिक कल्याण के हितों से प्रेरित इस तरह का पग उठाना उतना ही सुगम होगा जितना आधुनिक राज्य द्वारा अन्य प्रकार के सम्पत्तिहरण तथा रिहायशी घरों को अपने अधिकार में किया जाना.” (उपरोक्तपृष्ठ 317-318). इसी सम्बन्ध में वे आगे लिखते हैं, ”परन्तु आरम्भ में प्रत्येक सामाजिक क्रान्ति को स्थिति को उसी रूप में ग्रहण करना होगा जिस रूप में वह उन्हें पाती है और अपने पास मौजूद साधनों की मदद से सबसे विकट बुराइयों से निपटाना पड़ेगा. और हम पहले ही देख चुके हैं कि सम्पत्तिधारी वर्गों के वैभवपूर्ण निवास स्थानों के एक भाग को हस्तगत कर तथा शेष भाग में जबरदस्ती किरायेदार बसाकर आवास की कमी से तत्काल छुटकारा पाया जा सकता है.” (उपरोक्तपृष्ठ 33-334).

निश्चय ही हमारे प्रतिद्वंदी यह सवाल उठाएंगे कि क्रान्ति का रास्ता तो अभी बहुत लम्बा है, और जब तक मजदूर वर्ग पूंजीवादी पद्धति को उखाड़ नहीं फैंकता तब तक क्या मजदूर को ऐसे ही नरक भरे हालातों में रहने दिया जाये. एंगेल्स ऐसे प्रश्नों के प्रति भी सचेतन थे. इसलिए वह लिखते हैं, ”जहां आधुनिक समाजवाद के आधारभूत सिद्धांतों को तथा उत्पादन के सभी साधनों को सार्वजनिक स्वामित्व में रूपांतरित करना न्यायोचित माना जाता है, वहां यह भी घोषित किया जाता है कि इनकी पूर्ति दूर भविष्य में ही संभव है जो व्यवहारतः सर्वथा अगोचर है. इसलिए कहा जाता है कि फ़िलहाल तो सिर्फ सामाजिक पैबंद लगाने का सहारा लेना पड़ेगा और परिस्थितियों के अनुसार “मेहनतकश वर्गों के” तथाकथित “उन्नयन” के लिए सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी प्रयत्नों तक के लिए सुहानुभूति प्रदर्शित की जा सकती है.” (उरोक्तपृष्ठ 298). आगे वह लिखते हैं. ”बड़े पैमाने के उद्योग और शहरों के वर्तमान विकास के साथ यह सुझाव उतना ही असंगत हो गया है जितना कि यह प्रतिक्रियावादी है और हर व्यक्ति द्वारा अपने आवास के व्यक्तिगत स्वामित्व का पुनः आरम्भ किया जाना पीछे की ओर एक कदम होगा.”(उपरोक्त पृष्ठ 371).

साभार प्रतिबद्ध  (प्रतिबद्ध से हिंदी में अनुवादित)

आजाद हिन्‍दुस्‍तान के बारे में कुछ कवियों-शायरों की नज़्मों-कविताओं के अंश

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अगस्‍त 1947 में आज़ादी मिलने के कुछ ही समय बाद मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ ने इस आज़ादी को ‘दाग-दाग उज़ाला’ कहा। उन्‍होंने कहा :

ये दाग़-दाग़ उज़ाला, ये शबगुज़ीदा सहर

वो इन्‍तज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं

ये वो सहर तो नहीं, जिसकी आरजू लेकर

चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं

फ़लक के दश्‍त में तारों की आख़री मंज़ि‍ल

कहीं तो होगा शबे सुस्‍त मौज का साहिल

कहीं तो जा के रुकेगा, सफ़ीन-ए-ग़मे-दिल……….

अली सरदार जाफ़री ने इस आजादी के बारे में लिखा :

कौन आज़ाद हुआ

किसके माथे से ग़ुलामी की सियाही छूटी

मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का

मादरे-हिन्‍द के चेहरे पे उदासी वही

कौन आज़ाद हुआ…

खंजर आज़ाद है सीनों में उतरने के लिए

मौत आज़ाद है लाशों पे गुज़रने के लिए

कौन आज़ाद हुआ…

जब आज़ाद भारत की सरकार ने हकों-अधिकारों की बात करने वालों और जनांदोलनों को कुचलने में अंग्रेजों को भी मात देनी शुरु कर दी, तो शंकर शैलेन्‍द्र ने लिखा :

भगतसिंह इस बार न लेना

काया भारतवासी की

देशभक्ति के लिए आज भी

सज़ा मिलेगी फांसी की

आजादी को सिरे से नकारते हुए इप्‍टा ने आम लोगों की आवाज को अल्‍फाज़ दिए :

तोड़ो बंधन तोड़ो

ये अन्‍याय के बंधन

तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो बंधन तोड़ो…

हम क्‍या जानें भारत भी में भी आया है स्‍वराज

ओ भइया आया है स्‍वराज

आज भी हम भूखे-नंगे हैं आज भी हम मोहताज

ओ भइया आज भी हम मोहताज

रोटी मांगे तो खायें हम लाठी-गोली आज

थैलीशाहों की ठोकर में सारे देश की लाज

ऐ मज़दूर और किसानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों

ऐ छात्रो और जवानो, ऐ दुखियारे इन्‍सानों

झूठी आशा छोड़ो…

तोड़ो बंधन तोड़ा…

ख़लीलुर्रहमान आज़मी ने आज़ादी मिलने के दावे को सिरे से नकार दिया।

अभी वही है निज़ामे कोहना अभी तो जुल्‍मो सितम वही है

अभी मैं किस तरह मुस्‍कराऊं अभी रंजो अलम वही है

नये ग़ुलामो अभी तो हाथों में है वही कास-ए-गदाई

अभी तो ग़ैरों का आसरा है अभी तो रस्‍मो करम वही है

अभी कहां खुल सका है पर्दा अभी कहां तुम हुए हो उरियां

अभी तो रहबर बने हुए हो अभी तुम्‍हारा भरम वही है

अभी तो जम्‍हूरियत के साये में आमरीयत पनप रही है

हवस के हाथों में अब भी कानून का पुराना कलम वही है

मैं कैसे मानूं कि इन खुदाओं की बंदगी का तिलिस्‍म टूटा

अभी वही पीरे-मैकदा है अभी तो शेखो-हरम वही है

अभी वही है उदास राहें वही हैं तरसी हुई निगाहें

सहर के पैगम्‍बरों से कह दो यहां अभी शामे-ग़म वही है

व्‍यंग्‍य कई बार भावनाओं-भावावेशों का अतिरेक तथा सांद्रतम गंभीरता की अभिव्‍यक्ति भी होती है। रघुवीर सहाय ने जन-गण-मन के ‘अधिनायक’ के बारे में कहा :

राष्‍ट्रगीत में भला कौन वह

भारत भाग्‍य विधाता है

फटा सुथन्‍ना पहने जिसका

गुन हरचरना गाता है।

मखमल टमटम बल्‍लम तुरही

पगड़ी छत्र चंवर के साथ

तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर

जय-जय कौन कराता है।

पूरब पच्छिम से आते हैं

नंगे-बूचे नरकंकाल

सिंहासन पर बैठा, उने

तमगे कौन लगाता है।

कौन-कौन है वह जन-गण-मन

अधिनायक वह महाबली

डरा हुआ मन बेमन जिसका

बाजा रोज बजाता है।

विष्‍णु नागर ने तो राष्‍ट्रगीत की वैधता पर ही सवाल खड़ा कर दिया :

जन-गण-मन अधिनायक जय हे

जय हे, जय हे, जय जय हे

जय-जय, जय-जय, जय-जय-जय

जय-जय, जय-जय, जय-जय-जय

हे-हे, हे-हे, हे-हे, हे-हे, हे

हें-हें, हें-हें, हें-हें, हें

हा-हा, ही-ही, हू-हू है

हे-है, हो-हौ, ह-ह, है

हो-हो, हो-हो, हो-हौ है

याहू-याहू, याहू-याहू, याहू है

चाहे कोई मुझे जंगली कहे।

तो क्‍या लाखों शहीदों की शहादतें बेकार गईं। नहीं, शहादतों ने हमें एक मुकाम तक पहुंचाया, और अब ये शहादतें आगामी संघर्ष-पथ पर हमारे लिए प्रेरणा-स्रोत है। शलभ श्रीराम सिंह ने लिखा :

तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर

निगाह डाल, सोच और सोचकर सवाल कर

किधर गये वो वायदे? सुखों के ख्‍वाब क्‍या हुए?

तुझे था जिनका इंतज़ार वो जवाब क्‍या हुए?

तू इनकी झूठी बात पर, न और ऐतबार कर

कि तुझको सांस-सांस का सही हिसाब चाहिए!

घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!

जवाब दर सवाल है कि इंक़लाब चाहिए!

अंत में, शहीदों की ओर से

शहादत थी हमारी इसलिए

कि आज़ादियों का बढ़ता हुआ सफीना

रुके न पल भर को!

पर ये क्‍या?

ये अंधेरा!

ये कारवां रुका क्‍यों है?

बढ़े चलो, अभी तो

काफिला-ए-इंक़लाब को

आगे, बहुत आगे जाना है!

दोस्‍तो, 1947 का ‘दाग़-दाग़ उज़ाला’ अब गहरे अंधेरे में तब्‍दील हो चुका है। हम सभी इस बात को जानते तो हैं, पर पता नहीं महसूस कितना करते हैं। खैर, अब भी अगर कोई आजादी की शुभकामनाएं दे, तो उसके लिए पेश है नागार्जुन की कविता :

किसकी है जनवरी, किसका अगस्‍त है?

कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्‍त है?

सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है

गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है

चोर है, डाकू है, झूठा-मक्‍कार है

कातिल है, छलिया है, लुच्‍चा-लबार है

जैसे भी टिकट मिला

जहां भी टिकट मिला

शासन के घोड़े पर वह भी सवार है

उसी की जनवरी छब्‍बीस

उसीका पन्‍द्रह अगस्‍त है

बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्‍त है…

कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है

कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्‍त है?

खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा

मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्‍त है

सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्‍त है

उसकी है जनवरी, उसी का अगस्‍त है

पटना है, दिल्‍ली है, वहीं सब जुगाड़ है

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है

फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है

फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है

पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो

मास्‍टर की छाती में कै ठो हाड़ है!

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो

मज़दूर की छाती में कै ठो हाड़ है!

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो

घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है!

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो

बच्‍चे की छाती में कै ठो हाड़ है!

देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो

पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है

पटना है, दिल्‍ली है, वहीं सब जुगाड़ है

फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है

फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है

महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है

ग़रीबों की बस्‍ती में उखाड़ है, पछाड़ है

धत् तेरी, धत् तेरी, कुच्‍छों नहीं! कुच्‍छों नहीं

ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है

ताड़ के पत्‍ते हैं, पत्‍तों के पंखे हैं

पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है

कुच्‍छों नहीं, कुच्‍छों नहीं…

ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है

पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है!

किसकी है जनवरी, किसका अगस्‍त है!

कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्‍त है!

सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्‍त है

मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्‍त है

उसी की है जनवरी, उसी का अगस्‍त है…

नताशा- एक महिला बोल्शेविक संगठनकर्ता एक संक्षिप्त जीवनी

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–एल. काताषेवा

रूस की अक्टूबर क्रान्ति के लिए मज़दूरों को संगठित, शिक्षित और प्रशिक्षित करने के लिए हज़ारों बोल्शेविक कार्यकर्ताओं ने बरसों तक बेहद कठिन हालात में, ज़बर्दस्त कुबानियों से भरा जीवन जीते हुए काम किया। उनमें बहुत बड़ी संख्या में महिला बोल्शेविक कार्यकर्ता भी थीं। ऐसी ही एक बोल्शेविक मज़दूर संगठनकर्ता थीं नताशा समोइलोवा जो आखिरी साँस तक मज़दूरों के बीच काम करती रहीं। इस अंक से हम `बिगुल´ के पाठकों के लिए उनकी एक संक्षिप्त जीवनी का धारावाहिक प्रकाशन कर रहे हैं। हमें विश्वास है कि आम मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं को इससे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। – सम्पादक

……..ओदेस्सा छोड़ने के नताशा के फैसले ने उन्हें काफी तकलीफ दी। मज़दूर उनके वहाँ से चले जान का ग़लत अर्थ न निकालें, इसके लिए उन्होंने ओदेस्सा के सामाजिक-जनवादी संगठन के ग़लत रणकौशलों पर स्पष्ट और मुखर बयान दिया। उनका पत्र इस प्रकार था :

मैं  ओदेस्सा कमेटी के सदस्यों (बोल्शेविकों) के समक्ष बयान देती हूँ कि निम्न कारणों से स्थानीय संयुक्त संगठन में बने रहना मुझे सम्भव नहीं जान

पड़ता : पहली बात तो यह कि रणकौशलात्मक सवालों पर बोल्शेविकों और मेंशेविकों के बीच की असहमतियाँ अभी भी इतनी गम्भीर हैं कि इस समय

एकता करना समझौते के रास्ते पर कदम बढ़ाना है और एकमात्र सच्चे क्रान्तिकारी रणकौशलों से किनारा करने के समान है, जिसे बोल्शेविक अभी तक अपनाते आये हैं, और जिसने उन्हें वामपन्थी और सही अर्थों में आरएसडीएलपी (रूसी सामाजिक जनवादी पार्टी) का क्रान्तिकारी धड़ा बनाये रखा है। महत्त्वपूर्ण मसलों पर असहमत होते हुए एकता करना सिर्फ यांत्रिक ही होगा और स्थानीय परिस्थितियों में व्यावहारिक तौर पर इसका नतीजा

बोल्शेविकों पर मेंशेविकों का वर्चस्व होगा, जबकि, मौजूदा हालात में वर्चस्व के लिए सैद्धांतिक  लड़ाई निश्चित रूप से निरर्थक होगी और सिर्फ नये मतभेद,

टकराव और नये विभाजन का कारण बनेगी। यह एकता काम को और भी असंगठित करेगी और चीज़ों को सुधारने में कोई मदद नहीं करेगी। मैं यह भी मानती हूँ कि यहाँ जो एकता हुई है वह पार्टी अनुशासन की सभी धारणाओं का बुनियादी तौर पर उल्लंघन करती है, जिसका बोल्शेविकों ने मेंशेविकों की पार्टी विरोधी और विघटनकारी प्रवृत्तियों के खिलाफ  अपने संघर्ष में हमेशा ही ज़ोरदार बचाव किया है। मैं बाहरी ज़िलों की एक बैठक में बोलने वालों में से उस एक व्यक्ति के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूँ जिसने घोषणा की थी कि `हमें तीसरी कांग्रेस की काग़ज़ी घोषणा पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है´, मुझे लगता है कि स्थानीय संगठन को पूरी पार्टी (यानी बोल्शेविकों) की सहमति के बिना मेंशेविकों के साथ एकता जैसा महत्त्वपूर्ण फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं है, और इस मामले में एकमात्र उचित और विश्वसनीय रास्ता पार्टी के तमाम कार्यकर्ताओं की चौथी कांग्रेस बुलाना है। एकता के रास्ते पर समझ में न आने वाली हड़बड़ी से आगे बढ़ रहे ओदेस्सा के संगठन ने केन्द्रीय

कमेटी या बोल्शेविकों की दूसरी कमेटियों को सूचित करना भी ज़रूरी नहीं समझा। उसने सेण्ट पीटर्सबर्ग और मास्को की कमेटियों के उस उदाहरण की भी सिरे से अवहेलना की जिन्होंने सिर्फ संघीय लाइन पर ही एकता को सम्भव माना था। इस तरह स्थानीय संगठन को स्थापित केन्द्रों और पार्टी की सीमाओं से बाहर रखकर, एकता ने पार्टी सम्बन्धों में और भी अफरातफरी पैदा कर दी है, ख़ासकर तब जबकि हम मानकर चलें कि चौथी कांग्रेस ने पार्टी के दोनों धड़ों के बीच सिर्फ संघीय आधार पर ही एकता का निर्णय किया था। तब ओदेस्सा का संगठन, एकता करने वाले संगठन के तौर पर, किसी भी पार्टी से बाहर होगा। संक्षेप  में मैं कहूँगी कि जिन लोगों के नेतृत्व में मैंने कई महीने काम किया है, अब तक जिन्हें मैं गम्भीर राजनीतिक सिद्धांतों  वाले भरोसेमन्द नेता मानती थी, वे हालात का सामना करने में अक्षम साबित हुए हैं। ऐसे महत्त्वपूर्ण क्षण में जब बाहरी ज़िलों के अपेक्षाकृत कम विश्वसनीय हिस्से एकता का रुझान दर्शा रहे थे, उन ढुलमुल कॉमरेडों को प्रभावित करने

के नज़रिये से बातचीत करने के बजाय वे बहाव के साथ बह गये और अपनी असंगति से उन सिद्धांतों  को नीचा दिखाया, पहले मैं उन्हें, जिनका पैरोकार

मानती थी। वही दिग्गज जो हफ्ते  भर पहले तक एकता की बात भी नहीं सुनना चाहते थे, किसी जादू के ज़ोर से उन्होंने एकता का पक्ष लेना शुरू कर दिया, और यह कहते हुए उसका औचित्य सिद्ध  करने लगे कि जब बाहरी ज़िले एकता चाहते हैं तो संघ का आग्रह करना अटपटा जान पड़ता है। यह सच है कि उनमें से कुछ ने दावा किया कि सिद्धान्तत: वे संघ के पक्ष में हैं, लेकिन बाहरी ज़िलों की बैठकों में उन्होंने एकता के सवाल का कोई विरोध नहीं किया, और हमारे नेताओं ने पार्टी में हुए पिछले विभाजन के बारे में लोकरंजक शब्दावली, जैसेकि उसे `सिर्फ नेताओं ने उकसाया था´, कि वह एकता में बाधा डालने की इच्छा रखने वाले `मुट्ठीभर´ बुद्धिजीवियों का काम था, का जवाब सिर्फ शर्मनाक और आपराधिक चुप्पी से दिया। इस तरह की सैद्धांतिक  अस्थिरता ने स्थानीय नेतृत्व में मेरा सारा विश्वास हिलाकर रख दिया और

उपर्युक्त  कारणों के साथ मिलकर इसने मुझे ओदेस्सा का संगठन छोड़ने पर विवश कर दिया।

लेकिन  प्रचारक नताशा की यह आपत्ति अपना लक्ष्य पूरा न कर सकी। वह डाकपेटी में पत्र डाल ही रही थीं कि उन्हें गिरफ्ऱतार कर लिया गया। उन्हें रोस्तोव जेल में डाल दिया गया और उनका पत्र ज़ारशाही के एजेण्टों के हाथ लग गया (1917 की क्रान्ति ने ओखराना राजनीतिक पुलिस’ के धूल भरे अभिलेखागार से निकालकर इसे सार्वजनिक किया।

जीवनी की पूर्ण सामग्री हेतु निम्न लिंकों पर जाएँ

‘बिगुल’ जनवरी 2009

‘बिगुल’ फरवरी 2009


मज़दूर अख़बार – किस मज़दूर के लिए?

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(क्रांतिकारी राजनितिक प्रचार

की कुछ समस्याएँ)

लेनिन

सभी देशों में मज़दूर आन्दोलन का इतिहास

यह दिखाता है कि मज़दूर वर्ग के उन्नततर संस्तर

ही समाजवाद के विचारों को अपेक्षतया अधिक

तेज़ी के साथ और अधिक आसानी के साथ

अपनाते हैं। इन्हीं के बीच से, मुख्य तौर पर, वे

अग्रवर्ती मज़दूर आते हैं, जिन्हें प्रत्येक मज़दूर

आन्दोलन आगे लाता है, वे मज़दूर जो मेहनतकश

जन-समुदाय का विश्वास जीत सकते हैं, जो खुद

को पूरी तरह सर्वहारा वर्ग की शिक्षा और संगठन

के कार्य के लिए समर्पित करते हैं, जो सचेतन

तौर पर समाजवाद को स्वीकार करते हैं और यहाँ

तक कि, स्वतन्त्र रूप से समाजवादी सिद्धान्तो  को

निरूपित कर लेते हैं। हर सम्भावना- सम्पन्न मज़दूर

आन्दोलन ऐसे मज़दूर नेताओं को सामने लाता रहा

है, अपने प्रूधों और वाइयाँ, वाइटलिंग और बेबेल

पैदा करता रहा है। और हमारा रूसी मज़दूर

आन्दोलन भी इस मामले में यूरोपीय आन्दोलन

से पीछे नहीं रहने वाला है। आज जबकि शिक्षित

समाज ईमानदार, ग़ैरकानूनी साहित्य में दिलचस्पी

खोता जा रहा है, मज़दूरों के बीच ज्ञान के लिए

और समाजवाद के लिए एक उत्कट अभिलाषा

पनप रही है, मज़दूरों के बीच से सच्चे वीर सामने

आ रहे हैं, जो अपनी नारकीय जीवन-स्थितियों

के बावजूद, जेलख़ाने की मशक्कत  जैसे कारख़ाने

के जड़ीभूत कर देने वाले श्रम के बावजूद, ऐसा

चरित्र और इतनी इच्छाशक्ति रखते हैं कि लगातार

अध्ययन, अध्ययन और अध्ययन के काम में जुटे

रहते हैं और खुद को सचेतन सामाजिक-जनवादी

(कम्युनिस्ट) “मजदूर बौद्धिक”  बना लेते हैं।

रूस में ऐसे मजदूर बौद्धिक अभी भी मौजूद

हैं और हमें हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए

कि इनकी कतारें लगातार बढ़ती रहें, इनकी उन्नत

मानसिक ज़रूरत पूरी होती रहे और कि, इनकी

पाँतों से रूसी सामाजिक जनवादी मज़दूर पार्टी

(रूसी कम्युनिस्ट पार्टी का तत्कालीन नाम) के

नेता तैयार हों। जो अख़बार सभी रूसी सामाजिक

जनवादियों (कम्युनिस्टों का मुखपत्र बनना चाहता

है, उसे इन अग्रणी मज़दूरों के स्तर का ही होना

चाहिए, उसे न केवल कृत्रिम ढंग से अपने स्तर

को नीचा नहीं करना चाहिए, बल्कि उल्टे उसे

लगातार ऊँचा उठाना चाहिए, उसे विश्व

सामाजिक-जनवाद (यानी विश्व कम्युनिस्ट

आन्दोलन के सभी रणकौशलात्मक, राजनीतिक

और सैद्धान्तिक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।

केवल तभी मज़दूर बौद्धिकों की माँगें पूरी होंगी,

और वे रूसी मज़दूरों के और परिणामत: रूसी

क्रान्ति के ध्येय को अपने हाथों में ले लेंगे।

संख्या में कम अग्रणी मज़दूरों के संस्तर के

बाद औसत मज़दूरों का व्यापक संस्तर आता है।

ये मज़दूर भी समाजवाद की उत्कट इच्छा रखते

हैं, मज़दूर अध्ययन-मण्डलों में भाग लेते हैं,

समाजवादी अख़बार और किताबें पढ़ते हैं,

आन्दोलनात्मक प्रचार-कार्य में भाग लेते हैं और

उपरोक्त संस्तर से सिर्फ इसी बात में अलग होते

हैं कि ये सामाजिक जनवादी मज़दूर आन्दोलन के

पूरी तरह स्वतन्त्र नेता नहीं बन सकते। जिस

अख़बार को पार्टी का मुखपत्र होना है, उसके कुछ

लेखों को औसत मज़दूर नहीं समझ पायेगा, जटिल

सैद्धान्तिक या व्यावहारिक समस्या को पूरी तरह

समझ पाने में वह सक्षम नहीं होगा। लेकिन इसका

यह मतलब कतई नहीं निकलता कि अख़बार को

अपना स्तर अपने व्यापक आम पाठक समुदाय

के स्तर तक नीचे लाना चाहिए। इसके उलट,

अख़बार को उनका स्तर ऊँचा उठाना चाहिए, और

मज़दूरों के बीच के संस्तर से अग्रणी मज़दूरों को

आगे लाने में मदद करनी चाहिए। स्थानीय

व्यावहारिक कामों में डूबे हुए और मुख्यत: मज़दूर

आन्दोलन की घटनाओं में तथा आन्दोलनात्मक

प्रचार की फौरी समस्याओं में दिलचस्पी लेने वाले

ऐसे मज़दूरों को अपने हर कदम के साथ पूरे रूसी

मज़दूर आन्दोलन का, इसके ऐतिहासिक कार्यभार

का और समाजवाद के अन्तिम लक्ष्य का विचार

जोड़ना चाहिए। अत: उस अख़बार को, जिसके

अधिकांश पाठक औसत मज़दूर ही हैं, हर स्थानीय

और संकीर्ण प्रश्न के साथ समाजवाद और

राजनीतिक संघर्ष को जोड़ना चाहिए।

और अन्त में, औसत मज़दूरों के संस्तर के

बाद वह व्यापक जनसमूह आता है जो सर्वहारा

वर्ग का अपेक्षतया निचला संस्तर होता है। बहुत

मुमकिन है कि एक समाजवादी अख़बार पूरी तरह

या तकरीबन पूरी तरह उनकी समझ से परे हो

(आखिरकार पश्चिमी यूरोप में भी तो सामाजिक

जनवादी मतदाताओं की संख्या सामाजिक जनवादी

अख़बारों के पाठकों की संख्या से कहीं काफी

ज्यादा है, लेकिन इससे यह नतीजा निकालना

बेतुका होगा कि सामाजिक जनवादियों के अख़बार

को, अपने को मज़दूरों के निम्नतम सम्भव स्तर

के अनुरूप ढाल लेना चाहिए। इससे सिर्फ यह

नतीजा निकलता है कि ऐसे संस्तरों पर राजनीतिक

प्रचार और आन्दोलनपरक प्रचार के दूसरे साधनों

से प्रभाव डालना चाहिए – अधिक  लोकप्रिय भाषा

में लिखी गयी पुस्तिकाओं, मौखिक प्रचार तथा

मुख्यत: स्थानीय घटनाओं पर तैयार किये गये परचों

के द्वारा। सामाजिक जनवादियों को यहीं तक सीमित

नहीं रखना चाहिए, बहुत सम्भव है कि मज़दूरों

के निम्नतर संस्तरों की चेतना जगाने के पहले

कदम कानूनी  शैक्षिक गतिविधियौ के रूप में अंजाम

दिये जायें। पार्टी के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है

कि वह इन गतिविधियौ को इस्तेमाल करे इन्हें

उस दिशा में लक्षित करे जहाँ इनकी सबसे अधिक

ज़रूरत है कानूनी कार्यकर्ताओं को उस अनछूई

ज़मीन को जोतने के लिए भेजे, जिस पर बाद में

सामाजिक जनवादी प्रचारक संगठनकर्ता बीज बोने

का काम करने वाले हों। बेशक मज़दूरों के निम्नतर

संस्तरों के बीच प्रचार-कार्य में प्रचारकों को अपनी

निजी विशिष्टताओं, स्थान, पेशा (मज़दूरों के काम

की प्रकृति आदि की विशिष्टताओं का उपयोग

करने की सर्वाधिक व्यापक सम्भावनाएँ मिलनी

चाहिए। बर्नस्टीन के खिलाफ़ अपनी पुस्तक में

काउत्स्की लिखते हैं, रणकौशल और

आन्दोलनात्मक प्रचार-कार्य को आपस में गड्ड-

मड्ड नहीं किया जाना चाहिए। आन्दोलनात्मक

प्रचार का तरीका व्यक्तिगत और स्थानीय

परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए।

आन्दोलनात्मक प्रचार-कार्य में हर प्रचारक को

वे तरीके अपनाने की छूट होनी चाहिए, जो वह

अपने लिए ठीक समझे : कोई प्रचारक अपने

जोशो-खरोश से सबसे अधिक प्रभावित करता है,

तो कोई दूसरा अपने तीखे कटाक्षों से, जबकि तीसरा

ढेरों मिसालें देकर, वग़ैरह-वग़ैरह। प्रचारक के

अनुरूप होने के साथ ही, आन्दोलनात्मक प्रचार

जनता के भी अनुरूप होना चाहिए। प्रचारक को

ऐसे बोलना चाहिए कि सुनने वाले उसकी बातें

समझें; उसे शुरुआत ऐसी किसी चीज़ से करनी

चाहिए, जिससे श्रोतागण बाखूबी वाकिफ़ हों। यह

सब कुछ स्वत:स्पष्ट है और यह सिर्फ किसानों

के बीच आन्दोलनात्मक प्रचार पर ही लागू नहीं

होता। गाड़ी चलाने वालों से उस तरह बात नहीं

होती, जिस तरह जहाज़ियों से और जहाज़ियों से

वैसे बात नहीं होती जैसे छापाख़ाने के मज़दूरों से।

आन्दोलनात्मक प्रचार-कार्य व्यक्तियों के

हिसाब से होना चाहिए, लेकिन हमारा

रणकौशल-हमारी राजनीतिक गतिविधियाँ

एक-सी ही होनी चाहिए (पृ. 2-३)। सामाजिक

जनवादी सिद्धांत के एक अगुवा प्रतिनिधि के इन

शब्दों में पार्टी की आम गतिविधि के एक अंग के

तौर पर आन्दोलनात्मक प्रचार-कार्य का एक

बेहतरीन आकलन निहित है। ये शब्द साफ कर

देते हैं कि उन लोगों के सन्देह कितने निराधार हैं,

जो यह सोचते हैं कि राजनीतिक संघर्ष चलाने

वाली क्रान्तिकारी पार्टी का गठन आन्दोलनात्मक

प्रचार-कार्य में बाधक होगा, उसे पृष्ठभूमि में डाल

देगा और प्रचारकों की स्वतंत्रता  को सीमित कर

देगा। इसके विपरीत, केवल एक संगठित पार्टी ही

व्यापक आन्दोलनात्मक प्रचार का कार्य चला

सकती है, सभी आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों

पर प्रचारकों को आवश्यक मार्गदर्शन (और

सामग्री दे सकती है, आन्दोलनात्मक प्रचार-कार्य

की हर स्थानीय सपफलता का उपयोग पूरे रूस के

मज़दूरों की शिक्षा के लिए कर सकती है, प्रचारकों

को ऐसे स्थानों पर या ऐसे लोगों के बीच भेज

सकती है, जहाँ वे सबसे ज्यादा कामयाब ढंग से

काम कर सकते हों। केवल एक संगठित पार्टी में

ही आन्दोलनात्मक प्रचार की योग्यता रखने वाले

लोग अपने को पूरी तरह इस काम के लिए समर्पित

करने की स्थिति में होंगे, जो आन्दोलनात्मक

प्रचार-कार्य के लिए फायदेमन्द तो होगा ही,

सामाजिक जनवादी कार्य के दूसरे पहलुओं के लिए

भी हितकारी होगा। इससे पता चलता है कि जो

व्यक्ति आर्थिक संघर्ष के पीछे राजनीतिक प्रचार

और राजनीतिक आन्दोलनात्मक प्रचार को भुला

देता है, जो मज़दूर आन्दोलन को एक राजनीतिक

पार्टी के संघर्ष में संगठित करने की आवश्यकता

को भुला देता है, वह और सब बातों के अलावा,

सर्वहारा के निम्नतर संस्तरों को मज़दूर वर्ग के लक्ष्य

की ओर तेज़ी से और सफलतापूर्वक आकर्षित

करने के अवसर से खुद को वंचित कर लेता है।

(1899 के अन्त में लिखित लेनिन के लेख

`रूसी सामाजिक जनवाद में एक प्रतिगामी

प्रवृत्ति´ का एक अंश। संग्रहीत रचनाएँ, अंग्रेज़ी

संस्करण, खण्ड 4, पृ. 280-283

• अनुवाद : आलोक रंजन

‘बिगुल’ फरवरी २००९ से साभार

डेविड हार्वी के साथ कार्ल मार्क्स की पूंजी का पठन-वीडियो डाउनलोड करें

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डेविड हार्वी पिछले 40 सालों से कार्ल मार्क्स की पूंजी पढ़ा रहे हैं और अब पहली बार उनके लेक्चर ऑनलाइन उबलब्ध हुए हैं. इस कोर्स में प्रोफैसर हार्वी के कार्ल मार्क्स की पूंजी के प्रथम खंड पर आधारित 13 वीडियो लेक्चर हैं जिन्हें डाउनलोड किया जा सकता है. खुशी की बात यह है कि files का resume support है.
david-harvey-31
लिंक के लिए यहाँ क्लिक करें

किसानों के लिए लाभकारी मूल्य और मुख्यधारा के कम्युनिस्ट

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(कई दिनों तक इन्टरनेट पर सर्फिंग करने के बाद यह तथ्य तो उजागर हो गया कि मेहनतकश वर्ग की वकालत करने वाले मुख्यधारा के  ये ‘कम्युनिस्ट’ जो अपनी-अपनी इन्टरनेट-साईटों पर रोजाना हजारों की संख्या में पन्ने तो काले करते हैं,लेकिन  आज तक इन्होने (कम्युनिस्ट क्लासिक्स तो दूर)  मार्क्स-एंगेल्ज़ द्वारा रचित ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ तक को क्षेत्रीय भाषाओँ में की तो बात ही छोड़ दें, हिन्दी भाषा में भी प्रकाशित करना गवारा क्यों नहीं समझा. लेकिन, भाषा की बिल्कुल सरल शैली में लिखित सुखविंदर के इस लेख से मार्क्स के अधिशेष/या अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की व्याख्या ने मुख्यधारा के कम्युनिस्टों की नीतिओं और अवसरवादिता का पर्दाफाश कर दिया. इन संशोधनवादी और लेफ्ट-विंग कम्युनिज्म के शिकार कम्युनिस्टों  से किसी भी प्रकार की उम्मीद न करते हुए,अन्य कार्यों के अतिरिक्त, नव सर्वहारा पुनर्जागरण और नव सर्वहारा प्रबोधन के इस काल में सर्वहारा  के सच्चे सेवकों के कन्धों से कन्धा मिलाते हुए मार्क्सवाद को सर्वहारा के बीच ले जाने के  कार्यभार में हम भी अपने आप को  सम्मलित समझते है. इसी सिलसिले को आगे बढाते हुए हम सुखविंदर के लेख को इस ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहे हैं–शहीद भगत सिंह विचार मंच के सदस्यों द्वारा)

पंजाब  का किसान आन्दोलन और कम्युनिस्ट–सुखविंदर

दायित्वबोध के 2005,जुलाई-सितम्बर  से साभार

यूँ तो हरित क्रांति के सभी इलाकों की ही यह खासियत रही है कि वहां धनी किसानों के नेतृत्व में  किसानों का कोई-न-कोई आन्दोलन चलता ही रहता है, लेकिन पंजाब का किसान आन्दोलन पिछले कुछ वर्षों से विशेष तौर से चर्चा का विषय बना हुआ है. यहाँ हमारी दिलचस्पी किसान आन्दोलन में कम  और पंजाब के कम्युनिस्टों की इन आंदोलनों के प्रति पहुँच में ज़्यादा है. मालिक वर्गों की मांगो/मसलों/आंदोलनों के प्रति मजदूर वर्ग के प्रतिनिधियों की पहुँच (एप्रोच) क्या हो? आज एक बार फ़िर हमें इस प्रश्न के रूबरू होना पड़ रहा है.
पंजाब में इन दिनों भी अलग-अलग इलाकों में कहीं ज़्यादा तो कहीं कम, किसान आन्दोलन हरकत में हैं. इस आन्दोलन का नेतृत्व सीपीआई, सीपीआई (एम्), सीपीएम से निकले पासला ग्रुप, और सीपीआई (एमएल) न्यू डेमोक्रेसी से संबधित किसान संगठन कर रहे हैं. इन किसान संगठनों  के आलावा भारतीय किसान यूनियन (एकता) के दोनों ग्रुप भी इस आन्दोलन में शामिल हैं,जिनका समर्थन और मार्गदर्शन पंजाबी में प्रकाशित पत्रिकाएं सुर्ख रेखा, दिशा, दोनों लाल तारा और लाल परचम कर रहे हैं, जो मजदूर वर्ग की वैज्ञानिक विचारधारा मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद विचारधारा  को मानने का दावा करते हैं और भारत में नव-जनवाद, समाजवाद और कम्युनिज्म स्थापित करने की बातें करते हैं.
इन किसान संगठनों के आलावा पंजाब में कुछ और भी किसान संगठन सक्रिय हैं पर उनकी कार्रवाईयां इस लेख के  दायरे से बाहर हैं. उपरोक्त ‘कम्युनिस्ट’ किसान संगठनों द्वारा चलाये गए और चलाये जा रहे आन्दोलन की मुख्य मांगे इस प्रकार हैं :
१. उत्पादों के लाभकारी मूल्य हासिल करना,
२. कृषि लागतों पर सब्सिडी  हासिल करना,
३. कृषि उत्पादों के लिए सुरक्षित मण्डी हासिल करना, और
४. किसानों के कर्जे माफ़ करना.
इसके आलावा और भी मांगे हो सकती हैं लेकिन हमारे लिए उनका ज्यादा महत्व नहीं.
अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व और उपरोक्त पत्रिकाओं-पर्चों के समर्थन और मार्गदर्शन में उक्त मांगो पर चल रहे किसान आन्दोलन का मजदूर वर्ग के विचारधारात्मक नज़रिए से विश्लेषण करना इस लेख का मुख्य मकसद है.
जहाँ तक कृषि मालों गेहूं, धान, दूध आदि की कीमतों में बढोतरी की मांग का सवाल है, तो यह बात दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि यह मांग मजदूर वर्ग के विरोध में जाती है. हर प्रकार के मालिकाने से महरूम, कम मजदूरी पर मुश्किल से गुज़ारा करते मजदूरों को इन वस्तुओं की कीमत में बढोत्तरी की कीमत अपने जिंदा रहने के लिए बेहद जरूरी उपभोग या जिंदगी की ओर  बुनियादी ज़रूरतों में कटौती करके चुकानी पड़ती हैं. क्या कम्युनिस्टों को ऐसी मजदूर विरोधी मांगों पर चलने वाले आन्दोलनों का नेतृत्व, समर्थन या मार्गदर्शन करना चाहिए? और जो यह सब कर रहे हैं क्या वे मजदूर वर्ग के साथ गद्दारी नहीं कर रहे? यह बात इतनी सीधी और सरल है कि इसकी ज्यादा व्याख्या की ज़रूरत नहीं.
कृषि मालों के लाभकारी मूल्यों की लडाई जहाँ मजदूर वर्ग के विरोध  में है, वहीं यह मांग कृषि पूंजीपति या धनी किसानों के हक़ में है, क्योंकि, यही वह वर्ग है, जिसको कृषि मालों की कीमतों में बढोतरी का सबसे ज्यादा फायदा होता है.
किसानी अलग-अलग परतों में बंटी हुई है. कृषि में हुए पूंजीवादी विकास ने इसके अच्छे-खास हिस्से को खेत-मजदूरों में बदल दिया है. मालिक किसानों की बड़ी संख्या गरीब और मध्यम किसानों की है. किसानी का यह हिस्सा खासकर गरीब किसानी आज पूँजी की मार  अधीन आ गई है. गरीब और मध्यम किसान अपनी ज़मीनें बेचकर सम्पत्तिहीन मजदूरों की कतारों में शामिल हो रहे हैं और यह प्रक्रिया दिन-बा-दिन तेज़ होती जा रही है.
माल उत्पादक होने के चलते गरीब किसान भी अन्य  मालिक किसानों (धनी किसानों) के साथ ही अपनी वर्गीय नजदीकी महसूस करता है. उसको यह भ्रम होता है कि अगर उसकी फसल ( चाहे उसके पास बेचने के लिए बहुत अधिक फसल न हो) की ज्यादा कीमत मिले तो वह एक माल उत्पादक के रूप में बचा रह सकता है और किसी समय बड़ा मालिक भी बन सकता है. लाभकारी मूल्यों की लडाई में धनी किसान गरीब किसानों की इस मानसिकता का फायदा उठाते हैं. चूंकि मालिक किसानों का बड़ा हिस्सा गरीब किसानों और मध्यम किसानों का है इसलिए इनके, खासकर गरीब किसानों के समर्थन के बिना धनी किसान न तो अपनी लडाई लड़ सकते हैं और न ही जीत सकते हैं. इसलिए धनी किसान गरीब किसानों का मित्र होने का पाखण्ड करते हैं. धनी किसान कृषि लागतों में बढोतरी होने के कारण कृषि मालों के दामों में बढोतरी किए जाने की वकालत करते हैं. इस प्रकार वे गरीब किसानों को गुमराह करके अपने आन्दोलन में शामिल कर लेते हैं. इस प्रकार अगर कृषि मालों की कीमतें बढ़ जायें तो गरीब किसान के मुकाबले धनी किसानों के मुनाफे कई गुणा  बढ़ जाते हैं. विस्तृत पुनरुत्पादन करने वाला धनी किसानों का यह वर्ग इस बढे हुए मुनाफे को दोबारा कृषि में निवेश करता है. विस्तृत पुनरुत्पादन की एक शर्त यह भी है कि कृषि में लगी पूँजी में बढोतरी के साथ-साथ धनी किसानों के मालिकाने के अधीन ज़मीन में भी बढोतरी हो. इसलिए वह पहले से ही तबाही के कगार पर खड़े किसानों की ज़मीन खरीदकर उन्हें मजदूरों की कतारों में धकेल देते हैं. इसलिए गरीब किसानों के लिए लाभकारी मूल्यों की लडाई एक धोखा, एक छलावा ही साबित होती है.
इस प्रकार देखा जाए तो कृषि उत्पादों के लाभकारी मूल्यों की लडाई जहाँ मजदूर वर्ग के साथ गद्दारी है, वहीं छोटे किसान के साथ धोखा है और इस धोखाधडी भरे धंधे  में शामिल है यहाँ कम्युनिस्टों  का लेबल लगाई हुई पार्टियाँ और ‘कम्युनिस्ट विचारधारा को समर्पित पत्रिकाएं’ लेकिन लाभकारी मूल्यों का अभी और विश्लेषण बाकी है.

धनी किसान और उनकी समर्थक ‘कम्युनिस्ट’ पार्टियाँ और उपर जिक्र में आई पत्रिकाएं कृषि लागत बढ़ने से कृषि मालों की कीमतों में बढोत्तरी  की जो वकालत करती हैं उसकी चीरफाड़ भी जरूरी है. मार्क्सवादी अर्थशास्त्र बताता है कि किसी भी माल की कीमत उसके मूल्य की ही मुद्रा के रूप में अभिव्यक्ति है. मूल्य का सारतत्व किसी माल के उत्पादन में खर्च हुआ श्रम-काल होता है. उत्पादन प्रक्रिया शुरू करने के लिए पूंजीपति अपनी पूँजी को दो मदों पर खर्च करता है. एक मशीनरी, कच्चा माल आदि पर, पूँजी का यह  हिस्सा स्थिर पूँजी कहलाता है; दूसरा श्रम-शक्ति की खरीद पर, पूँजी का यह हिस्सा परिवर्तनशील पूँजी कहलाता है. मशीनरी, कच्चा माल आदि भी चूंकि श्रम के ही उत्पाद होते हैं, इसलिए इसकी कीमत भी उनके उत्पादन के ऊपर खर्च हुए कुल श्रम-काल से ही तय होती है. कच्चे माल पर जब श्रम-शक्ति कार्य करती है, तो कुल मूल्य में बढोत्तरी होती है. लेकिन कच्चा माल नए उत्पादित माल को सिर्फ़ उतने हीं मूल्य का हस्तांतरण कर सकता है, जितना उसमें पहले से ही मौजूद हो. यानी कच्चा माल कोई मूल्य पैदा नहीं करता. सिर्फ़ श्रम-शक्ति ही है जो नया मूल्य सृजित करती है. लेकिन पूँजी का मालिक श्रम-शक्ति के मालिक अर्थात मजदूर को उसके द्वारा सृजित कुल मूल्य का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा ही देता है, बाकी ख़ुद हड़प जाता है. पूँजी का मालिक इस माल को इसमें जोड़े गए मूल्य के ऊपर बेचकर ही मुनाफा कमाता है. मार्क्स इसकी इस प्रकार व्याख्या करते हैं,” मान लीजिए कि श्रम का एक औसत घंटा 6 पेन्स के बराबर मूल्य में जुडा हुआ है, या श्रम के 12 औसत घंटों में 6 शिलिंग का मूल्य जुडा हुआ होता है. यह भी मान लीजिए कि श्रम का मूल्य 3 शिलिंग, या 6 घंटे के श्रम की उपज है. अब यदि किसी माल में लगे हुए कच्चे माल, मशीन आदि में 24 घंटे का औसत श्रम लगा है, तो उसका मूल्य 12 शिलिग़ होगा. इस पर यदि पूंजीपति द्वारा लगाया हुआ मजदूर इन उत्पादन के साधनों में 12 घंटे का श्रम जोड़ देता है, तो ये 12 घंटे 6 शिलिंग के अतिरिक्त मूल्य में फलीभूत होंगे. इस प्रकार उपज  का कुल मूल्य 36 घंटे के फलीभूत श्रम, या 18 शिलिंग के बराबर होगा. लेकिन चूंकि श्रम का मूल्य, या मजदूर की मजदूरी केवल 3 शिलिंग है, पूंजीपति को मजदूर के उस 6 घंटे के अतिरिक्त श्रम के लिए कुछ भी नहीं देना होगा जो माल के मूल्य में शामिल हो गया है. अब यदि पूंजीपति इस माल उसके मूल्य 18 शिलिंग पर बेचता है तो उसे 3 शिलिंग का वह मूल्य भी प्राप्त होता है, जिसके लिए उसने कुछ नहीं दिया. ये 3 शिलिंग अतिरिक्त मूल्य या मुनाफे के रूप में है, जो सीधे पूंजीपति की जेब में जाता है. इस प्रकार माल को उसके मूल्य से अधिक दामों पर न बेचकर, बल्कि उसके सही मूल्य पर बेचकर पूंजीपति 3 शिलिंग का मुनाफा प्राप्त करता है. “ (मार्क्स: मजदूरी, दाम और मुनाफा)

अगर पूंजीपति अपने माल को उसके  मूल्य से अधिक बेचने में कामयाब भी हो जाए, तो इससे समूची अर्थव्यवस्था में मालों के कुल मूल्य में कोई बढोत्तरी नहीं होगी. इस प्रकार हम देखते हैं कि मुनाफा मण्डी में नहीं, बल्कि उत्पादन की प्रक्रिया में पैदा होता है. पूंजीपति मण्डी में  अपने माल के विनिमय से मुनाफा इसलिए प्राप्त करता है क्योंकि उसके माल में पहले से ही मुनाफा निहित होता है. “वाणिज्यिक पूँजी साधारण रूप में परिचलन के क्षेत्र में कार्यशील पूँजी है. परिचलन की प्रक्रिया कुल पुनरुत्पादन की प्रक्रिया का ही एक पड़ाव है. परंतू परिचलन प्रक्रिया में कोई मूल्य पैदा नहीं होता और इसलिए न ही कोई अतिरिक्त मूल्य पैदा होता है. सिर्फ़ मूल्य का एक मात्रा के रूप में हस्तांतरण  होता है…..अगर उत्पादित मालों की बिक्री से अतिरिक्त मूल्य हासिल किया जाता है तो सिर्फ़ इसलिए कि वह पहले से ही उसमें निहित था.” (कार्ल मार्क्स: पूँजी, खंड 3, पृष्ठ 279, अंग्रेजी संस्करण)

इस प्रकार जो लोग मण्डी में मुनाफा ढूंढते हैं, वे होने का परिचय देते हैं. कृषि मालों के लाभकारी मूल्य की मांग व्यर्थ है क्योंकि कृषि मालों में तो पहले से ही मुनाफा निहित होता है

.मण्डी में वस्तुओं की खरीद-फरोख्त व्यापर कहलाती है. पूंजीवादी मण्डी में पूंजीपति अपने माल की ज्यादा से ज्यादा कीमत प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं. मण्डी में माल की उसके मूल्य से ज्यादा दाम पर बिक्री जहाँ एक को लाभ पहुंचाती है, वहीं दूसरे को उतना ही नुकसान झेलना पड़ता है. इस सम्बन्ध में कार्ल मार्क्स, बेंजामिन  फ्रैंकलिन का हवाला देते हैं, “जंग डकैती है, व्यापर आम तौर पर धोखाधडी  है.” (कार्ल मार्क्स: पूँजी, खंड-1, पृष्ठ 161,  अंग्रेज़ी संस्करण)
इस प्रकार मण्डी में कृषि मालों की कीमत बढाने की मांग करने वाले बेंजामिन फ्रैंकलिन के शब्दों में धोखाधडी के वकील हैं. ये धोखाधडी भी वे मजदूर वर्ग के साथ ही कर रहे हैं, जिसके रहनुमा होने का वे दावा कर रहें हैं. क्योंकि मालों के दामों की बढोत्तरी का धनी किसान को जितना लाभ होता है, उसी अनुपात में मजदूरों को उसका नुकसान होता है.

.दरअसल, लाभ या मुनाफा बढ़ाने की लडाई पूंजीपतियों के इस या उस गुट की तो हो सकती लेकिन मजदूर वर्ग की नहीं. कृषि मालों के लाभकारी मूल्य की लडाई समाज में पैदा होने वाले कुल  अतिरिक्त मूल्य में औद्योगिक और व्यापारिक पूँजी की बनिस्पत, कृषि बुर्जुआ वर्ग का हिस्सा बढ़ाने की लडाई है और इसके समर्थन में खड़ी ‘कम्युनिस्ट पार्टियाँ’ और उपरोक्त पत्रिकाएं उसी प्रसंग में कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली जिस सब्सिडी की मांग उठाती हैं उस पर भी विचार करने की जरूरत है. सब्सिडी अर्थात कृषि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली स्थिर पूँजी पर सब्सिडी जिसके संबध में आजकल पंजाब में उपरोक्त किसान संगठनों के नेतृत्व में कृषि क्षेत्र को मुफ्त बिजली दिए जाने के लिए संघर्ष चल रहा है. स्थिर पूँजी क्योंकि कोई नया मूल्य नहीं पैदा करती, सिर्फ़ अपने मूल्य का ही नए उत्पादित मूल्य में हस्तान्तरण करती है, इसलिए स्थिर पूँजी के दाम गिरने से नए उत्पादित  माल का दाम भी गिर जाएगा, जिससे किसान के कुल लाभ में कोई बढोत्तरी नही होगी. निस्संदेह मजदूर वर्ग के प्रतिनिधियों को किसानों के मुनाफे के बढ़ने या गिरने से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए. इस सब की चर्चा तो हम उक्त पार्टियों और पत्रिकाओं  की विचारधारात्मक कंगाली को बेनकाब करने के लिए ही कर रहे हैं.
अगर सब्सिडी की मांग किसी खास इलाके के किसानों के लिए की जाती है, तो सब्सिडी मिलने के उपरांत उस इलाके के किसानों को एक फायदा जरूर होगा कि  उनके उत्पादन की दूसरे इलाके के किसानों के उत्पादन के मुकाबले मण्डी में मुकाबले की योग्यता बढ़ जायेगी. एक इलाके के किसानों का कम लागत पर तैयार माल दूसरे इलाके के किसानों की तबाही का सबब बन सकता है. इससे ज्यादा कृषि सब्सिडी का ओर कोई नतीजा नहीं निकलेगा.
‘कम्युनिस्ट पार्टियों’, पत्रिकायों की रहनुमाई में चल रहे किसान आन्दोलन की अगली महत्वपूर्ण मांग है सुरक्षित मण्डी की. अर्थात किसान जो भी पैदा करे, वह आराम से लाभदायक दामों पर बिक जाए. यह है सुरक्षित पूंजीवादी मण्डी का यूटोपिया. ये लोग मण्डी तो चाहते हैं, लेकिन मुकाबला नहीं. ये लोग पूंजीवाद तो चाहते हैं, लेकिन तबाही नहीं. अगर ये भूल गए हों, तो इन्हें याद दिला दें कि पूंजीवादी मण्डी मूल्य के नियम के मुताबिक चलती है. उत्पादन के साधनों के निजी मालिकाने के अधीन काम करते इस नियम के तहत पूंजीवादी मण्डी हमेशा अराजकता की हालत में रहती है. उत्पादन के स्वत:स्फूर्त नियामक के तौर पर काम करता है. मूल्य के इर्द-गिर्द मालों के दामों में उतार-चढाव,  पूंजीपतियों को कुछ खास वस्तुओं का उत्पादन घटाने या बढ़ाने और उत्पादन के उन क्षेत्रों में अपनी पूँजी लगाने के लिए मजबूर करता है, जहाँ दाम ज्यादा हों. इसका नतीजा अलग-अलग आर्थिक क्षेत्रों में पूँजी और श्रम के स्वत:स्फूर्त पुनर्वितरण में निकलता है. माल उत्पादक अपने मालों की लागत कम करने की कोशिश करता है, लेकिन प्रतिस्पर्धा की परिस्थतियों के अधीन हर कोई इसमें सफल नहीं होता. वे लोग जो अपने मालों को बेचने के उपरांत अपने खर्च पूरे नहीं कर पाते, तबाह हो जाते हैं.इसके विपरीत जो सुधरी हुई तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, इसके कारण श्रम की लागत घटा लेते हैं, वे ओर भी अमीर हो जाते हैं. इस प्रकार माल उत्पादकों के वर्गीय ध्रुवीकरण  का आर्थिक आधार तैयार होता है. इस प्रकार मूल्य के नियम के आधार पर सरल माल उत्पादन के पूंजीवादी उत्पादन में तब्दील हो जाने का आधार अस्तित्व में आता है. यानि वे छोटे उत्पादक जो ख़ुद की श्रम शक्ति से मालों का उत्पादन करतें हैं (सरल माल उत्पादन) तबाह हो जाते हैं और उनकी बची-खुची पूँजी बड़े माल उत्पादकों के हाथों में चली जाती है. इस प्रकार पूंजीवादी उत्पादन (दूसरों की श्रम-शक्ति खरीदकर उत्पादन करवाना) अस्तित्व में आता है

पूंजीवादी मण्डी के नियम इतने बेरहम हैं कि इसके तहत कुछ का फायदा और बहुतों की तबाही अपरिहार्य है. इसका एक ही हल है, पूंजीवादी मण्डी यानि पूंजीवादी व्यवस्था  की तबाही. पूंजीवाद की यह नियति मजदूर वर्ग के हाथों तय है. इसलिए जरूरी है कि इस लडाई में मजदूर वर्ग के दोस्तों, गरीब और मध्यम किसानों, खासकर गरीब किसानों को सुरक्षित मण्डी, लाभकारी मूल्यों आदि के भ्रमोँ  से मुक्त करके उन्हें मजदूर वर्ग के पक्ष में लाया जाए. लेकिन ये कम्युनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएं इस मकसद की विपरीत दिशा में ज़ोर लगा रहीं हैं.
उक्त किसान संगठन और उनके ‘कम्युनिस्ट नेता, समर्थक, मार्गदर्शक पत्रिकायों की चौथी महत्वपूर्ण मांग है किसानों की कर्जा मुक्ति, जिसकी आजकल पंजाब में बहुत चर्चा है. इस प्रश्न पर पंजाब के बुर्जुआ सियासतदान, बुर्जुआ अख़बार, उक्त किस्म की कम्यनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएँ आज एक ही बोली बोल रहें हैं. कृषि मालों के लाभकारी मूल्यों, कर्जा मुक्ति आदि मसलों पर इन अलग-अलग कैम्पों के लोगों के बीच पंजाब में चाहे-अनचाहे एक अपवित्र गठबंधन बना हुआ है.
‘सुर्ख रेखा’ ने जिस तरह किसानी की क़र्ज़ माफ़ी का प्रचार किया है और आज भी कर रही है, उससे तो यूँ प्रतीत होता है जैसे ‘सुर्ख रेखा’  को मालिक किसानों के कर्जा माफ़ी ‘संग्राम’ में से भी नई जनवादी क्रांति निकलती नज़र आती है. यही हाल इस बिरादरी कीं अन्य पत्रिकाओं का भी है. अगर देखा जाए तो ज्यादा कर्जा उसी को मिलता है जिसके पास ज्यादा पूँजी हो यानि कर्जा देने वाले को अपनी पूँजी वापस मिलने का भरोसा हो. दुनिया के बड़े मगरमच्छों एनरोंन  और वर्डकॉम  का उदहारण हमारे सामने है. वर्डकॉम के दिवालिया होने के समय उस पर 30 अरब डालर  का क़र्ज़ था, पंजाब के सभी किसानों के ऊपर कुल कर्जे से कई गुना ज्यादा. ऐसे हे हमारे देश के छोटे-बड़े उद्योगपतियों और मालिक किसानों के अलग-अलग स्तरों के क़र्ज़ देखे जा सकते हैं. पंजाबी ट्रिब्यून में डॉ. अनूप सिंह के एक लेख के अनुसार, “1996-1997 तक 5701 करोड़ रूपये के कुल कर्जे में से 21.57 प्रतिशत यानि 1230 करोड़ रु का कर्जा 5 एकड़ तक की मालिकी वाले किसानो के ऊपर है. 28.57 प्रतिशत यानि 1637 करोड़ रु 5 से 10 एकड़ की की जमीन मालिकी वाले किसानों पर है. बाकि 2820 करोड़ का कर्जा 10 एकड़ से ज्यादा की मालिकी वाले किसानों पर था.” इससे स्पष्ट है कि जिनके  पास ज़मीन ज्यादा है, उन्हीं पर कर्जा भी ज्यादा है. ये कम्यनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएँ किसानी की सभी परतों के कर्जे माफ़ करने की मांग कर रही हैं. वैसे इनको इतना  तो पता ही होगा कि पूंजीपति के  लिए कर्जा भी मुनाफा बढ़ाने का ही एक साधन होता है.

1998 में पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़, के प्रो. एच.एस. शेरगिल की “ग्रामीण पंजाब में उधारी और क़र्ज़” शीर्षक से प्रस्तुत अध्धयन रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के किसानों पर कुल कर्जा 5700 करोड़ रु है, जो कि पंजाब के किसानों की मालिकी के अधीन कुल ज़मीन की कुल कीमत का सिर्फ़ 4 प्रतिशत ही बनता है. अगर कृष में किसानों द्वारा की कुल पूँजी निवेश और किसानों की घरेलू संपत्ति भी जोड़ ली जाए तो किसानों की कुल पूँजी के बनिस्पत कुल कर्जे का प्रतिशत और भी नीचे गिर जाएगा. तथ्यों की रोशनी में पाठक देख सकतें हैं कि इन पार्टियों  और पत्रिकाओं द्वारा किसानी कर्जे के उठाए जा रहे धुएँ की असलियत क्या है.
इस विश्लेषण की रोशनी में देखा जा सकता है कि आज ये कम्यनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएँ किसकी सेवा कर रही हैं. छोटे मालिकाने को बचाए रखने की प्रतिक्रियावादी कोशिशों में डूबे हुए ये लोग मजदूर वर्ग की विचारधारा और उसके वर्गीय रुख को त्याग कर मजदूर वर्ग के दुश्मन शोषक वर्गों के दृष्टिकोण  पर खड़े है.
अंत में इनको लेनिन की यह नसीयत याद दिला देते है,” कोई पूछ सकता कि इसका हल क्या है, किसानों की हालत कैसे सुधारी जा सकती है? छोटे किसान ख़ुद को मजदूर वर्ग के आन्दोलन से जोड़कर और समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष में ज़मीन और साधनों (कारखाने, मशीनें आदि) को सामाजिक संपत्ति के रूप में बदल देने में मजदूरों की मदद करके खुद को पूँजी की जकड़  से मुक्त कर सकते है. छोटे पैमाने की खेती और छोटी  जोतों को बचाने की कोशिश सामाजिक विकास की गति को अनुपयोगी रूप में धीमा करना होगा. इसका मतलब पूंजीवाद के अधीन ही खुशहाली की सम्भावना के भ्रम से किसानों को धोखा देना होगा. इसका मतलब श्रमिक वर्गों में फ़ुट डालना और बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों के लिए एक सुविधाजनक स्थिति  पैदा करना होगा.” (मजदूर, पार्टी और किसान)

(जैकारा, जून २००३ से अनूदित)

नेपाल–बहस के लिए

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कोइराला वंश का पतन

लक्ष्मण पन्त, सदस्य, विदेश ब्यूरो, नेपाल की

कम्युनिस्ट पार्टी  (माओवादी)

प्रधानमंत्री पद पर कॉ. प्रचंड की ऐतिहासिक विजय से नेपाल में एक नए युग का सूत्रपात हुआ है. नेपाली जनता ने नेपाली क्रांति के उस मॉडल का पुन: समर्थन किया है जिसमें खुली और गुप्त गतिविधियों, कलम और बन्दूक, बैलेट और बुलेट एवं जनयुद्ध और जनांदोलन दोनों का मेल किया गया है. चेयरमैन प्रचंड की जीत के साथ ही, हमारी पार्टी अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक सौ साठ वर्षों  के इतिहास में सत्ता तक पहुँचने वाली पहली ऐसे पार्टी बन गई है, जिसके पास सर्वहारा वर्ग की अलग सेना है और जो इन अलग-अलग तरीकों का प्रयोग करते हुए सत्ता में पहुँची है. नेकपा (माओवादी) , 1976 में कॉ. माओ के देहांत के बत्तीस वर्षों बाद सरकार का नेतृत्व  करने वाली पहली कम्युनिस्ट पार्टी है.
समूची दुनिया में एक के बाद एक कम्युनिस्ट सत्ताओं के पतन की प्रष्ठभूमि के बरक्स हमारे देश की माओवादी सरकार इस मायने  में भी भिन्न है कि यह सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग की संयुक्त तानाशाही पर आधारित है. किसी भी मार्क्सवादी प्रस्थापना में इस प्रकर की संयुक्त तानाशाही का ज़िक्र नहीं मिलता. मार्क्सवादी विचार के अनुसार राज्यसत्ता में दो विरोधी वर्गों की संयुक्त  तानाशाही सम्भव नहीं है. हालाँकि, नेपाल के अनुभव ने साबित कर दिया है कि इससे अलग भी कुछ किया जा सकता है. आने वाले दिनों में नेपाल के अनुभव और प्रयोग के दार्शनिक और राजनितिक आधार का संश्लेषण करना होगा. इतिहास ने राज्य की दोहरी तानाशाही को सही ठहराने का दायित्व इक्कीसवीं सदी के माओवादियों के कन्धों  पर डाला है.
चेयरमेन  प्रचंड की जीत का एक और ऐतिहासिक पहलू भी है. उनकी जीत के साथ ही पॉँच दशक  पुरानी  ‘कांग्रेसशाही ‘ और कोइराला वंश का अंत हो गया, जो विस्तारवाद और साम्राज्यवाद का मुख्य सुरक्षाकवच  बना रहा और सामंतवाद एवं साम्राज्यवाद का मूर्त रूप था. इस अर्थ में भी श्रावण की 30वीं  तारीख का ऐतिहासिक महत्व है. कोइराला वंश का ढहना, साम्राज्यवाद का एक खम्बा गिरने का द्योतक है. यह राजशाही के अंत से कम मत्वपूर्ण नहीं है. वस्तुत: नेपाली जनता राजशाही और कोइराला वंश दोनों ही से समान रूप से पीड़ित थी. कोइराला वंश और ‘कांग्रेसशाही’ आधी  सदी तक राजशाही का मुख्य आधार रहे.
राजशाही कें अंत तक नेपाली जनता का प्रधान अंतरविरोध सामंतवाद के साथ था. यह स्पष्ट है कि राजशाही के अंत के बाद, नेपाली जनता का प्रधान अंतरविरोध बदल गया है, और अब यह अंतरविरोध साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के साथ है. दूसरे शब्दों में, गिरिजा प्रसाद कोइराला का अंत, साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के खिलाफ नेपाली जनता के राष्ट्रीय संघर्ष की एक महत्वपूर्ण घटना है.
गणतंत्र की स्थापना के बाद क्रांति का तात्कालिक लक्ष्य बदल गया है और उसी के अनुसार क्रांति के मित्रों एवं शत्रुओं का समीकरण भी बदला है. स्पष्टत: अब मित्र, शत्रुओं में तब्दील हो गए हैं और शत्रु, मित्र बन गए हैं. सामंतवाद और साम्राज्यवाद के दो विराट पहाडों में से एक-सामंतवाद के विशाल पहाड़ को नेपाली जनता ने ध्वस्त कर दिया है. अब नेपाली जनता के समक्ष साम्राज्यवाद और विस्तारवाद की भयावह और विराट चट्टान है. गत चार माह के दौरान नेकपा(माओवादी) को सरकार बनाने से रोकनें की साजिशें इसी का परिणाम थीं.
नेपाली जनता ने सामंतवाद को पराजित करके लोकतंत्र के संघर्ष को काफी हद तक जीत लिया है, लेकिन अभी इसे संस्थागत स्वरूप देने का काम बाकी है. हालाँकि, पूर्ण संप्रभु राष्ट्रवाद के लिए संघर्ष शुरू करना और जीतना अभी बाकी है. फिलहाल यह नहीं बताया जा सकता कि उस संघर्ष की प्रकृति और पद्धति क्या होगी. फ़िर भी, इसमें कोई दो राय नहीं है कि राष्ट्रवाद  के संघर्ष की प्रकृति  राष्ट्रीय ही होगी और यह अधिक जटिल एवं अधिक तीखा होगा. ऐसे में पार्टी की राजनितिक लाइन भी उसी दिशा में निर्देशित होगी.
साम्राज्यवाद-विस्तारवाद और उनके सहयोगियों के समर्थन के बिना लोकतंत्र के लिए संघर्ष में विजय प्राप्त करना सम्भव नहीं था. इसलिए, बारह-सूत्री समझौते को मील का पत्थर कहा गया है. राजशाही के अंत तक, नेपाली कांग्रेस- जिसका साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के साथ क़रीबी सम्बन्ध है–जैसी माओवाद की कट्टर विरोधी ताकतों को नेतृत्व देना कोई  छोटी सफलता नहीं है. इस सफलता ने, संसदीय पार्टियों के साथ गठबंधन करने, बातचीत, गोलमेज सम्मलेन, अंतरिम सरकार को आगे बढाने और सविधान सभा के जरिये जनवादी गणतंत्र की प्राप्ति के लिए, दूसरे राष्ट्रीय सम्मलेन द्वारा निरुपित की गई  और केन्द्रीय कमेटी की चुनवांग मीटिंग द्वारा निर्धारित की गई राजनितिक लाइन के सही होने को साबित किया है.
सविधान सभा के चुनाव के बाद तेजी से परिवर्तित होती परिस्थितियों के कारण क्रांतिकारी कतारों में प्रतिक्रिया के कई स्वर उभरे और एक प्रकार की सनसनी फ़ैल गई.राष्टपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव एवं यूएमएल से गठजोड़ के उपरांत पार्टी में और अधिक उथल-पुथल एवं सनसनी व्याप्त हो गई. सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न, जिसने पार्टी की आम कतारों को झकझोरा, यह था कि हमें सरकार में शामिल होना चाहिए या नहीं?
हमें उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर  अंश में नहीं, बल्कि सम्पूर्णता में और रूप के बजाय सार में तलाशने होंगे. इन सवालों के जवाब पार्टी द्वारा तय की गई रणनीति में निहित है, उसके रणकौशलों (टैक्टिक्स) में नहीं. क्रांति कभी सीधी रेखा में नहीं बढती. क्रांति का विकास कई बार आगे पीछे होते हुए, विजयों-पराजयों, आक्रमणों-सुरक्षा के सिलसिले से गुजरते हुए होता है. संख्या के हिसाब से, राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी की हार को इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए. साथ ही, एक पल के लिए भी यह नहीं भुलाया जा सकता की साम्राज्यवाद थक कर बैठ नहीं गया है. वह हताशा में, क्रांति और माओवादी  पार्टी को नष्ट करने और पीएलऐ  को निशस्त्र  करने की साजिशें रच रहा है. हमने सविधान सभा के चुनावों में साम्राज्यवाद पर करारा प्रहार करते हुए उसे रक्षात्मक रूख अपनाने को मजबूर कर दिया. इसके बाद, वे हमें धोखा  देने में कुछ हद तक सफल भी हुए. उन्होंने आक्रामक रूख अपना लिया था और हम रक्षात्मक स्थिति में आ गए थे. क्रांति का यही नियम है. निरंतर विजय और लगातार पराजय दोनों ही सम्भव नहीं हैं. हालाँकि, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में हमारे प्रत्याशी की हार हुई है क्योंकि इस घटनाक्रम ने वास्तविक राष्ट्रवादी ताकतों में नेपाली कांग्रेस के खिलाफ नफरत के बीज डाल दिए है. हमने अन्तरविरोध को  सतह पर लेने में सहायता की है, मधेश में असली मेहनतकश अवाम का हमारी पार्टी में विश्वास बढाया है और नेपाली कांग्रेस की सत्ता की भूख को भी उजागर किया है. इसी वजह से, संख्या के खेल में पार्टी की हार के बावजूद इसे हम पार्टी की बड़ी विचारधारात्मक  जीत कह रहे है. आगामी दिनों में यह राष्टवाद के संघर्ष में आधार का काम करेगी. कॉ. प्रचंड की जीत ने, एक बार फ़िर, साम्राज्यवादियों को रक्षात्मक रूख अपनाने को मजबूर  करते हुए उनकी रणनीति को निष्फल कर दिया है. इससे हमारी पार्टी आक्रामक स्थिति में आ गई है.
इस बात से इंकार नहीं है कि साम्राज्यवाद और विस्तारवाद नेपाली क्रांति की राह की रुकावटें है. पार्टी ने जनयुद्ध आरंभ होने के पहले ही क्रांति के दो मुख्य शत्रुओं के रूप में साम्राज्यवाद और विस्तारवाद को चिन्हित कर लिया था. पार्टी के इस वैज्ञानिक निरूपण की पुष्टि इस तथ्य से हो जाती है कि अतीत में जनयुद्ध को कुचलने के लिए राजशाही को इन्हीं शक्तियों का समर्थन प्राप्त हुआ था. यदि, १२ सूत्रीय समझौते से लेकर राष्टपति चुनाव तक की अवधि को देखा जाए तो पुन: इसकी पुष्टि हुई है. राजशाही के अंत के बाद, जोकि विदेशी प्रतिक्रिया का मुख्य ज़रिया था, साम्राज्यवादी ताकतों ने राज्यसत्ता के शून्य को भरने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रखा है. चुनाव में गिरिजा के परिवार के अधिकांश सदस्यों  की हार के बावजूद प्रधानमंत्री पद नहीं छोड़ने  की उनकी इच्छा यहीं रेखांकित करती है.
केन्द्रीय प्रश्न यह है कि अब क्रांति का लक्ष्य क्या है और आन्दोलन किसके खिलाफ़ और कैसे शुरू किया जाए. निश्चित तौर पर,राष्ट्रवाद के लिए संघर्ष में संघर्ष का निशाना वे ताकतें होंगी जो साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के बचाव में आगे आएंगी. गिरिजा को उखाड़ फेंकने में प्राप्त हुई सफलता साम्राज्यवाद के खिलाफ़ संघर्ष की महत्वपूर्ण कड़ी है.
हम  पुराने अन्तरविरोध के निषेध और नए अन्तरविरोध के उभार के संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे है. यह प्रक्रिया एक निश्चित अवधि में पूर्ण होगी. इस अवधि एवं इस प्रक्रिया के पुरा होने  तक पेटी-बुर्जुआ उतावलेपन में आन्दोलन या उभार  की या शान्ति की प्रक्रिया से हटने की बात करना आत्मघाती होगा. आने वाले समय में सम्पूर्ण संघर्ष के साथ-साथ राष्ट्रवाद के संघर्ष को आगे बढाने के लिए केवल राष्ट्रिय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक धुर्वीकरण  और गठबंधन की आवश्यकता है. यह चरण देशभक्त, जनवादी और वाम ताकतों के साथ गठबंधन करने का है. यह सरकार में  शामिल होकर या सरकार से बाहर रहकर, दोनों ही तरीकों से समान रूप से किया जा सकता है. ऐसा नहीं है कि पार्टी सरकार में शामिल होगी या शामिल नहीं होगी तो वह ‘ख़त्म’ हो जायेगी. सरकार में शामिल हुआ जाए या नहीं हुआ जाए इसकी बहस शुरू करने से अधिक महत्वपूर्ण और उपयुक्त इस पर चर्चाओं की शुरुआत करना होगा कि भविष्य में हम क्रांति के भू-आयामी मोर्चों की लामबंदी और मोर्च की शुरुआत  कर सकेंगे या नहीं. सरकार में शामिल होने या नहीं होने के प्रश्न से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम क्रांतिकारी ताकतों और प्रतिक्रियावादी ताकतों का तीखा धुर्वीकरण कर पाने में सक्षम होंगे या नहीं.
सरकार में शामिल होने या नहीं होने का प्रश्न सैद्धांतिक प्रश्न नहीं है. यह एक रणकौशलात्मक प्रश्न है. यदि सरकार में शामिल होने से हमें भावी क्रांति को आगे बढाने में सहायता मिलती है, इससे जनतंत्र को हासिल करने का मार्ग प्रशस्त होता है, राष्ट्रवाद  के संघर्ष में जीत सुनिश्चित होती है या इससे क्रांति, नवजनवादी क्रांति की दिशा में एक कदम आगे बढ़ती है, तो सरकार में भागीदारी करना सही है, अन्यथा ऐसा करना गलत होगा. यदि हम क्रांति की नई योजना, नीति और कार्यक्रम बनाने और बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप नई राजनितिक  एवं सैन्य लाइन के निरुप्पन में असफल रहते हैं तो हम सरकार में शामिल नहीं होने पर भी क्रांति को आगे नहीं बढा सकते हैं. यदि हम सरकार में रहते हुए भी वर्ग संघर्ष को धारदार और तेज कर सकते हैं, तो हम क्रांति के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं. अंग्रेजी से अनुवाद : संदीप शर्मा

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नेकपा (माओवादी) के विदेश ब्यूरो के सदस्य लक्ष्मण पन्त के ऊपर प्रकाशित लेख के मूल्यांकन से गंभीर मतभेद रखता हुआ आलोक रंजन का लेख भी हम प्रकाशित कर रहे हैं. पाठकों को याद दिला दें कि ‘बिगुल’ के मई ‘०८ और जून ‘०८  के अंकों में हमने नेपाल के कम्युनिस्ट  आन्दोलन के इतिहास के मूल्यांकन और नेपाली क्रांति की संभावनाओं-समस्यायों पर केंद्रित लेख दो किश्तों में छापा था. नेकपा (माओवादी) के वरिष्ठ नेता कॉ. बाबूराम भट्टराई का साक्षात्कार भी मई ‘०८ के अंक में प्रकाशित हुआ था. इस लेख को उसी की निरंतरता में, तथा उसी परिप्रेक्ष्य में रखकर पढ़ा जाना चाहिए. नेपाली क्रांति का प्रश्न दुनिया भर के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के सरोकार और चिंता से जुडा हुआ है. वहां होने वाले हर घटनाविकास का बारीकी से अध्ययन-विश्लेषण क्रांति की सैद्धांतिक-व्यवहारिक समस्याओं को समझने के लिए जरूरी है. इस दृष्टि से हम समझते हैं कि इन लेखों के प्रकाशन से एक सार्थक बहस की शुरुआत हो सकेगी. हम नेपाल और भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों से तथा वाम बुद्धिजीवियों से इस बहस में भागीदारी का अनुरोध करते हैं.

–संपादक ‘बिगुल’ .

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