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मूल्य का नियम 1 परिचय

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मार्क्स की पूंजी पर आधारित इन अंग्रेजी फिल्मों को इस ब्लॉग द्वारा, हिंदी में डब करके प्रस्तुत करने का कार्य जारी है. फिल्मों की स्क्रिप्ट के कुछ अंशों से हमारे मतभेद हैं. पाठकों से अनुरोध है कि वे इन फिल्मों को आलोचनात्मक तरीके से आत्मसात करें. फिर भी इन फिल्मों का सर्वहारा वर्ग के नए जागरण और प्रबोधन के लिए बहुत महत्त्व है जिसके लिए यह ब्लॉग http://kapitalism101.wordpress.com का  बहुत आभारी है.


आर्थिक संकट वैचारिक संकट का भी समय होता है. यह समय होता है जब लोग अपने विश्व दृष्टिकोण का पुनर्मुल्यांकन करना शुरू कर देते हैं. वे अपनी सबसे मूलभूत पूर्वधारनाओं पर सवालिया निशान लगाने लगते हैं. प्रत्येक आर्थिक संकट से मुख्यधारा के आर्थिक चिंतन में पुनर्विचार और पुनर्गठन पैदा हुआ है. मजे की बात यह है कि यह पुनर्विचार सदैव आर्थिक प्रणाली के लिए रेडिकल चुनौती के सन्दर्भ में रहा है.

सीमांत उपयोगिता सिद्धांत , जो अब भी आधुनिक मुख्यधारा के आर्थिक सिद्धांत के लिए आधार मुहैया करता है, १८०० के अंतिम काल की महामंदी पर कार्ल मार्क्स की ‘पूंजीवाद की आलोचना’ द्वारा चुनौती के प्रत्युतर में पैदा हुआ था. १९३० की महामंदी से,उदारवादी अर्थशास्त्र की असफलता ,सफल बोल्शेविक क्रांति और पश्चिम में मजबूत मेहनतकशों की लहरों से चुनौती के रूप में,  कीन्सवाद पैदा हुआ था. १९७० के संकट से, कीन्सवाद की संकट झेलने की असफलताओं और विशाल लोक वामपंथी लहरें जैसे युद्ध विरोधी, नागरिक अधिकार, स्त्री लहरे और मजबूत श्रम की शक्ति, के विरुद्ध हथियार के रूप में नव उदारीकरण पैदा हुआ.

एलन ग्रीनस्पेन :
“याद रखें कि वैचारिकी एक ऐसा प्रत्ययात्मक चौखटा है जिससे लोग हकीकत का सामना करते हैं. प्रत्येक के पास एक है…जीवित रहने के लिए आपको एक वैचारिकी चाहिए. सवाल यह है कि क्या यह सही है या नहीं. और जो मैं आपसे कह रहा हूँ, मुझे एक त्रुटी दिखी है – मैं नहीं जानता कि यह कितनी सही और स्थायी है, परन्तु इस हकीकत ने मुझे बहुत परेशान किया है.”

नव उदारवादी संस्थापना की ओर से अपनी असफलता पर इस तरह की स्वीकृतियों से मौजूदा समय की मुख्यधारा की आर्थिक वैचारिकी पर प्रश्नचिह्न लगता है. लेकिन स्पष्ट नहीं है कि हम इस वैचारिक संकट में इस आर्थिक प्रणाली को योग्य टक्कर देने के सन्दर्भ में प्रवेश कर रहे हैं. सोवियत तरह की केंद्र न्योजित प्रणालियों की असफलता ने पूंजीवाद के विकल्पों पर विचार की लोकप्रिय चेतना को धो डाला है. इस समय कार्ल मार्क्स के विचारों का यह देखने के लिए कि वे पूंजीवाद की आलोचना में क्या सही-सही कहने की कोशिश कर रहे थे, पुनर्मुल्यांकन करना उपयोगी होगा – इसलिए नहीं कि हम लेनिन, स्टालिन, माओ और अन्य जो मार्क्स के विचारों पर दावा करते हैं, के राजनीतिक अनुभवों को दोहराने की इच्छा रखते हैं , पर क्योंकि मार्क्स पूंजीवाद की पूर्ण और प्रणालीबद्ध आलोचना प्रस्तुत करते हैं जोकि आर्थिक चिंतन के इतिहास में पूर्णतया अलग, पूर्णतया अद्वितीय है. इस तरह के रेडिकल विचार हमारी मौजूदा स्थिति और सामाजिक रूपांतरण की संभावनाओं की नयी समझ की खोज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. जीवित रहने के लिए वह समाज खतरनाक है जो विशेषतय संकट के लंबे अन्तराल में प्रवेश करने पर भी आत्मालोचना की क्षमता नहीं रखता.

मार्क्स और सभी प्रसिद्ध बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों में निर्णायक भिन्नता है. सभी बुर्जुआ अर्थशास्त्री संकट को पूंजीवाद के प्राकृतिक संतुलन को खिन करनेवाली कोई बाह्य वस्तु मानते हैं. पूंजीवाद की प्रवृति असमानता, शोषण और संकट यानिकी जब स्पष्ट हो जाता है कि उनके सिद्धांत और असलियत में असंगतता है तो बुर्जुआ अर्थशास्त्री असलियत को उनके मॉडल के विपरीत होने पर दोषी ठहराते हैं. राज्य के दखल, मजदूर लहरें, मानवीय लोभ आदि के रूप में हमलावर बाह्य शक्तियों द्वारा असलियत को विषाक्त किया जाता है. आज हम इसी प्रकार के दक्षिणपंथी लोकप्रिय उत्थान की प्रतिक्रियावादी समझ को देख रहे हैं जोकि विदेशियों, वाम बुद्धिजीवियों, समलिंगियों, गैर ईसाई और काले राष्ट्र अध्यक्षों की आक्रामक घुसपैठ पर समाज की समस्यायों का दोष मढ़ते हैं.

मार्क्स विपरीत पद्वति अपनाते हैं. वे सामाजिक विरोधों को व्यवस्था के भीतर देखते हैं. ये सामाजिक विरोध व्यवस्था में इतने बुनियादी हैं कि ये अपने गुरुत्वीय क्षेत्र में समाज के सभी अंगों को खींच लेते हैं.

बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों ने सदैव मंडी को स्वतंत्रता और समानता का क्षेत्र माना है. तथ्य यह है कि मंडी वाले समाज में इतनी असमानता, संकट और अधूरी स्वतंत्रता है कि इसे सिद्धांत में नहीं बल्कि हकीकत में देखा जा सकता है. आम लोगों की सोच के विपरीत मार्क्स इन सामाजिक बुराईयों के विश्लेषण से शुरुआत करते हुए मंडी के संबंधों की आलोचना की ओर नहीं बढ़ते. मार्क्स इजारेदारी, गरीबी, शोषण और राज्य की हिंसा पर बोलते हुए आगे नहीं बढ़ते. वे उसी मंडी के स्वतन्त्र क्षेत्र से शुरू होते हैं जो  उनके बुर्जुआ आलोचकों को बहुत प्रिय है, और दिखाते हैं कि किस तरह ये सभी सामाजिक विरोध इस मूल उत्पादन संबंध से प्रकट हो जाते हैं. पूंजीवादी उत्पादन का मंडी विनिमय के लिए उत्पादन होने के तथ्य के कारण मार्क्स के लिए यहीं से शुरुआत होती है. आधारभूत उत्पादन का यह रूप कानून जैसे गुण अख्तियार कर लेता है जिसे वे ‘मूल्य का नियम’ से पुकारते हैं.

मंडी में दिलचस्प लगने वाली कौनसी वस्तु मार्क्स को मिली ? यह कोई आपकी इच्छानुसार वस्तुएं खरीदने या बेचने की स्वतंत्रता नहीं थी. तथ्य यह है, कि मंडी समाज के सामाजिक जीवन में भाग लेने के लिए, प्रत्येक को चीजें खरीदनी या बेचनी पड़ती हैं. जीवित रहने के लिए, समाज में भाग लेने के लिए, प्रत्येक को चीजें खरीदने और अपनी श्रम के उत्पाद बेचने के लिए, मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.  यह विलक्षण रूप से,  प्रारंभिक समाजों से जहाँ मेहनतकश अपने श्रम से स्वयं को पालते थे, यानिकी वे अपने उपयोग के लिए श्रम द्वारा वस्तुएं उत्पादित करते थे, से अलग तरह का सामाजिक संगठन है. पूंजीवादी समाज में उत्पादित होनेवाली चीजें स्वयं के लिए नहीं होती. लोग उनका उत्पादन विनिमय के लिए करते हैं. इस लिए सामाजिक श्रम प्रक्रिया, परोक्ष रूप से, विनिमय के द्वारा तालमेल बिठाती है.

मंडी द्वारा परोक्ष रूप से तालमेल बिठाने वाले, निजी उत्पादकों के समाज में लोगों के मध्य सामाजिक संबंध, जिंसों के संबंध, चीजों के मध्य संबंधों का रूप ले लेते हैं. लोगों के बीच संबंध जिन्स मूल्यों में प्रकट होनेवाले मूल्य संबंध बन जाते हैं. आर्थिक रूप से, लोग एक दूसरे से धन और मूल्य द्वारा संबंधित हो जाते हैं. जिन्स संबंधों का यह संसार, व्यक्तियों के नियंत्रण से बाहर  स्वतन्त्र रूप ले लेता है जो प्रतिप्रभाव पैदा करता है और उनके रिश्तों को नियंत्रित करता है. एडम स्मिथ ने इसे ‘मंडी का ओझल हाथ’ कहा.  मार्क्स इसे ‘मूल्य का नियम’ कहते हैं.

मूल्य का नियम क्या है ? ये अव्यक्तिगत, समाज पर अपना असर डालनेवाली अर्थ की अंध शक्तियां हैं. वह समाज अद्वितीय है जहाँ श्रम का प्रमुख रूप मंडी में, विनिमय के लिए उत्पादित होता है. लोगों के बीच के संबंध जिंसों के बीच मूल्य संबंध बन जाते हैं. और ये मूल्य संबंध अव्यक्तिगत शक्तियां बन जाते हैं जिनके समाज के लिए अनचाहे परिणाम होते हैं. उदाहरण के लिए, हमें मिलती है पूँजी.

अपने श्रम के लिए, लोगों ने सदैव, औजारों और अन्य संसाधनों का उपयोग किया है. इन्हें उत्पादन के साधन कहते हैं. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में, ये उत्पादन के साधन पूंजी बन जाते हैं. औजार, मशीन, कच्चा माल और यहाँ तक कि कामगार मूल्य के साथ जिन्स बन जाते हैं. इससे मंडी में उत्पादन के साधनों को खरीदना और इन उत्पादन के साधनों के उत्पादों को मुनाफे के लिए बेचना संभव हो जाता है. दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति उत्पादन में धन निवेश कर सकता है ताकि और अधिक धन कमा सके . मूल्य, उसके खुद में उद्देश्य की तलाश, समाज की प्रधान शक्ति बन जाती है. यही है जो पूंजी है, सामाजिक क़ीमत से उपराम, मूल्य का अपने ही लिए विस्तार. पूंजी एक वर्ग का रूप ले लेती है जो उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है और अन्य लोगों को मुनाफे के लिए उत्पादन करना पड़ता है.

स्वाभाविक रूप से पूंजी की विषमता से आर्थिक और  भूमंडलीय अन्तरिक्ष में, दौलत और कंगाली के ध्रुव खड़े हो जाते हैं. पूंजी स्व-निषेधित भी होती है. हालाँकि यह कामगार पर काबू पानेवाली, एक अव्यक्तिगत शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन मुनाफा पैदा करने के लिए इसे कामगार की आवश्यकता पड़ती है. इसकी जड़ में है सामाजिक विरोध. इस सामाजिक विरोध से, निरंतर अस्थिरता और सामयिक संकट  फूटते रहते है.

बहुत से अन्य और ये सभी रेडिकल अर्थ मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ के भाग हैं.

यह वीडियो सीरिज मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ पर विभिन्न विषयों को शामिल करेगी : उपयोग मूल्य, विनिमय मूल्य और मूल्य में अंतर, पूर्ति, मांग और मूल्य का मूल्य से संबंध, अमूर्त श्रम, शोषण, संकट, सामाजिक आवश्यक श्रम समय और यहाँ तक कि विश्व को बदलने के लिए ‘मूल्य का नियम’ की समझ . उम्मीद की जाती है कि आज रेडिकल लहरों को सही तरह से समझने के महत्व के लिए इनका योगदान होगा क्योंकि उन्हें ऐसे विचार चाहियें  जिनसे वे अपनी मांगे और रणकौशल को स्पष्टता से बयान कर सकें.

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तल्खी से लिखी आपकी टिपण्णी. शुक्रिया

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दिनेश कुमार बिस्सा की एक टिपण्णी बड़ी दिलचस्प रही, हालाँकि उन्होंने बड़े व्यंग्यात्मक अंदाज से मार्क्सवाद पर तीर छोड़े हैं. लेकिन उनकी टिपण्णी उन लोगों की टिप्पणियों से कहीं बेहतर है जो मार्क्सवाद में आस्था रखते हैं, जबकि मार्क्सवाद आस्था का नहीं कर्मों का विज्ञान है. चलिए, दिनेश जी की टिपण्णी से शुरू करते हैं :

“मार्क्सवाद से समाज मैं असमानता मिट कर समानता आ जाती है, भूखे के पेट में रोटी, बेरोजगार के हाथ में काम, नंगे के तन पर कपडा, बच्चों के हाथ में कापी-कलम. गरीबी मिट कर सभी लोग अमीरी के सागर में गोते लगाने लगते हैं, मतलब सब कुछ  अच्छा ही अच्छा. उदाहरण : कम्युनिस्ट देशों रूस, क्यूबा, चीन. भारत के दो महान राज्य, केरल और पश्चिम बंगाल…. इन जगहों में गरीबी और असमानता, शोषण आदि के दर्शन भी नहीं होंगे. दिन में चिराग लेकर ढूंढ लो, तो भी…दिनेश कुमार बिस्सा.

दिनेश भाई, हम यह अंदाजा तो नहीं लगा सकते की आपके घोर मार्क्सवादी विरोध के पीछे आपका अनुभव या फिर आपकी मिडल क्लास की आदर्शवादी-समतावादी संभावनाओं की पूर्ति में मार्क्सवाद के इतिहास ( इतिहास वह नहीं जो है, बल्कि वह जो आपका मन, आपकी सहूलत से गढ़ना चाहता है ) का खरा न उतरना रहा है या फिर कुछ पूर्वाग्रह जो मिडल क्लास की जीवन स्थितियों से उनकी विचार शैली में आ जाते हैं. लेकिन इससे हमें अपना दृष्टिकोण, पाठकों के सामने स्पष्ट करने का मौका मिल गया, जिसका प्रेरणा स्रोत तल्खी से लिखी, आपकी यह टिपण्णी है. शुक्रिया

बीसवीं सदी की क्रांतियों और परिणामस्वरूप समाजवाद को लागू करने की मुश्किलें, समाजवाद के भीतर बुर्जुआ वर्ग का होना, अवसर मिलते ही, उन द्वारा मजदूर वर्ग के अधिनायकवाद के स्थान पर फिर से बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना (वह भी लाल झंडे तले, कम्युनिस्ट भीतरघातियों द्वारा जो शुद्ध से शुद्ध कम्युनिस्ट पार्टी में होते हैं, और हम यह दावा नहीं करते कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा. यह काम हम उन लोगों के लिए छोड़ देते हैं जिन्हें अपने और अपनी पार्टियों के शुद्ध होने पर गर्व है) हमारा फ़िलहाल इतना ही आग्रह है कि पूंजीवाद अपने विकास के उस चरण पर पहुँच चुका है, जहाँ इसकी अप्रासंगिगता स्पष्ट दिखाई देती है.

जहाँ तक मार्क्सवाद के प्रासंगिक होने का अर्थ है, तो यह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है. विश्व के हर कोने में पूंजीवादी संबंधों का वर्चस्व हो चुका है. बेशक सबसे धनाढ्य कार्पोरेशनों के पास विज्ञान और उच्च तकनीक से सुपर मुनाफा कमाना संभव है, लेकिन तीव्र गति के युग में, विज्ञान और तकनीक अन्य मझौले पूंजीपतियों के पास पहुँच कर उनका सुपर मुनाफा बंद कर देती हैं. ( सुपर मुनाफे से आशय है कि उच्च तकनीक द्वारा कम मजदूरों से अधिक उत्पादन करना जिसके परिणामस्वरूप सुपर मुनाफे का स्रोत कमजोर पूंजीपति वर्ग के बेशी मूल्य का साझा पूल होता है)

आपने यूनानी देवता सफिंक्स की मिथ तो सुनी ही होगी. वे एक पहेली द्वारा ऐथंज़ शहर की रक्षा किया करते थे. शहर में आनेवाले अजनबी को पहेली हल करनी होती थी. असफलता का मतलब था, मौत. मार्क्स ने पूंजीवाद की मौत के लिए कोई पहेली तो गढ़ी नहीं है, लेकिन उस पहेली को हल किया है, जिसे जो  भी जान लेता है, उसे पूंजीवाद की मौत स्पष्ट दिखाई देने लगती है. चलिए हम उस पहेली को आपके सामने रखते हैं.

बड़े पूंजीपतियों ने विज्ञान और तकनीक की मदद से सुपर मुनाफा कमाना शुरू कर दिया. लेकिन देर सवेर वह छोटे पूंजीपतियों के पास पहुँच गयी. उन्हें उच्चतर तकनीक की आवश्यकता पड़ी. लेकिन जल्दी ही यह भी दूसरों के पास पहुँच गयी. इस क्रिया का परिणाम यह हुआ कि उत्पादन, बिना मजदूर के होने लगा. (हालाँकि, ऑटोमेटिड से ऑटोमेटिड मशीन के लिए व्यक्ति की आवश्यकता होगी, लेकिन इतना दिखाई दे ही रहा है कि मजदूरों की संख्या कम से कम की जा सकती है और उनके शोषण की दर में इंतिहा बढौतरी की जा सकती है जोकि की जा चुकी है और की जा रही है) अब पूंजीपति बिना मजदूर की मदद से (या उनकी न्यूनतम  संख्या से) उत्पादन कर रहे हैं. समस्या यह है कि,

पूंजीपति मंडी में जिंसों को बेचकर मुनाफा अर्जित करना चाहता है, लेकिन वहां  कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके पास क्रय करने के लिए धन हो, क्योंकि इसके लिए, धन तो मजदूरों के पास होना चाहिए था. लेकिन उन्हें कौन दे क्योंकि वे काम तो करते नहीं. मुट्ठीभर पूंजीपति और उनके पास विशाल उत्पादन ! हाँ वे स्वयं उपभोगता बनकर, एक दूसरे के उत्पादन का थोडा बहुत उपभोग कर सकते हैं, लेकिन यहाँ तो विज्ञान और तकनीक की मदद से चंद मजदूरों ने जो पैदा किया है, उसके लिए कम से कम आठ सौ करोड़ व्यक्तियों की आवश्यकता है और वे (पूंजीपति) हैं आठ करोड़. यही पूंजीवाद का संकट है, जो फूटता रहता है और उनके चाटुकार बुद्धिजीवी पूंजीपतियों को इसके अन्दर नहीं, बाहर अमूर्त चीजों में होने की ओर, इशारों द्वारा उन्हें भरमाते रहते हैं.

2008 से फूटी महामंदी वैसे ही  बरक़रार है और विकसित राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाएं डब्बल डिप्रेशन की और बढ़ रही हैं. भारत का मध्यम वर्ग खुश है कि यहाँ आठ प्रतिशत की विकास दर बनी हुई है (हालाँकि इस विकास से पैदा हुई भूख ने संकटों से घिरे नेपाल और पिछड़े पाकिस्तान को भी पीछे छोड़ दिए है – बकौल स्वतन्त्र एजेंसियों की ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार) लेकिन हमारे एक मिडिल क्लास बुद्धिजीवी इस विकास की दर से इतने आत्ममुग्ध हैं कि उनको विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का यह आकलन गलत लगता है कि यह दर केवल 2015 तक जारी रहने वाली है, उसके बाद धीमी गति से 2022 तक और बस उसके बाद तो घिसटेगा.

दिनेश भाई या उनकी ही तरह के मिडल क्लास के लोगों से हमारा आग्रह है कि मार्क्सवाद उनके लिए नहीं है क्योंकि मिडल क्लास चरित्र के लिहाज से बुर्जुआ विचारधारा की पैरोकार होती है, लेकिन बुर्जुआ वर्ग द्वारा पैदा की गयी होड़, उनकी छोटी सी पूंजी को हड़प कर लेती है, तो छटपटाता हुआ यह वर्ग, अपने कुछ रेडिकल प्रतिनिधियों द्वारा मार्क्सवाद से सहानुभूति की उम्मीद पाल लेता है.

इसके अलावा कुछ लोग अपनी उच्च बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी मार्क्सवाद की और खींचे चले आते हैं. ध्यान रहे, बौद्धिक क्षमता आसमान से पैदा नहीं होती, इसके ऐतिहासिक विकास, अध्ययन-चिंतन के लिए मेहनतकश वर्ग द्वारा मुहैया करवाई गयी अतिरिक्त मूल्य की लूट रही है. उनके ज्ञान और चिंतन का स्रोत भी श्रमिक वर्ग ही रहा है, जिसका कर्ज चुकाने की उनकी लालसा, उन्हें इधर खींच लाती है.

मगर मार्क्सवाद मिडल क्लास का नहीं, सर्वहारा वर्ग के कर्मों का विज्ञान है. इसका इतिहास कठमुल्लाओं का इतिहास नहीं है. अगर मिडल क्लास से आये लोगों ने,संजीदगी से, इसका चिन्तनं-मनन किया है तो वे निराश नहीं हुए हैं, बल्कि एक नए इन्सान के रूप में, उनका पुनर्जन्म ही हुआ है. स्वयं मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ इसके उदाहरण हैं. उन्होंने न केवल मजदूर वर्ग की मुक्ति के इस विज्ञान को अपनाया बल्कि मिडल क्लास के समाजवाद, नैतिकता और मूल्यों की गंदगी से इसकी हिफाजित के लिए संघर्ष किया.

दिनेश की समस्या यह है कि वे एक पैरे में मार्क्सवाद के इतिहास को समेट देना चाहते हैं. उनके इस पैरे की विषय-वस्तु को दो हिस्सों में  बांटा जा सकता है. एक मार्क्सवाद का समतावादी, गरीबी रहित सभी को अमीरी के ठाठ-बाठ मुहैया करवाने वाला ‘पंडोरा का डिब्बा’ और दूसरा इस पंडोरे के डिब्बे से निकला वह इतिहास जो रूस से शुरू होकर भारत के पश्चिम बंगाल और केरल तक का है. अंबानियों और टाटाओं के मुकाबले मिडल क्लास गरीब हो सकती और समाजवाद से सहानुभूति की उम्मीद पाल सकती है. फैशनेबुल तौर पर, मजदूर वर्ग के आंदोलनों के उभार के दौर में, वे धारा में खींचे चले आते हैं. यह ऐसे होते है जैसे आप अपने रिश्तेदार के घर जाएँ और उस घर के सदस्य अपने घर के निर्माण में व्यस्त हों. आपकी उनके घर से कोई दिलचस्पी न थी लेकिन उनके साथ आप भी खिंच लिए और लगे हाथ बंटाने. पर निर्माण कार्य पूरा होते ही, घरवाले घर में बसने लगे लेकिन आप फालतू करार दे दिए गए.

वैज्ञानिक समाजवाद सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद होता है जिसमें मिडल क्लास और उसके बुद्धिजीवियों के एक हिस्से को घुटन होने लगती है. अपने  वर्गीय दृष्टिकोण से पैदा हुए दिग्भ्रमण के कारण, उनका जल्दी ही मोहभंग हो जाता है. वे पुरानी  स्थिति को बहाल करने के लिए छटपटाने लगते हैं और कई बार उनकी कोशिश बुर्जुआजी की पुनर्बहाली के काम आती है, जैसा कि इतिहास में हुआ है.

फिर भी अगर दिनेश भाई जैसे लोग, संजीदगी से मार्क्सवाद को अपनाना चाहते हैं तो उन्हें इस ब्लॉग की और से सुझाव है कि वे मार्क्सवाद पर मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ आदि की रचनाये पढ़ें. इनसे उन्हें पता चलेगा कि कैसे मार्क्सवाद उन लोगों से जो गरीबी को इस तरह से मिटाकर… और सभी के लिए अमीरी की स्थिति की यूटोपिया बातें करते थे…टक्कर लेकर और विरोध में विकसित हुआ है. लाल झंडे का मतलब मार्क्सवाद नहीं होता. इसके इतिहास में वे सभी स्थितियां शामिल हैं जिन्हें संशोधनवाद, सिंडीकेट्वाद ,ट्रेड यूनियनवाद,अर्थवाद, मिडल क्लास का अवसरवाद,कम्युनिस्टों का उदारतावाद ,अतिवामपंथवाद , दुस्साहसवाद , दायें-बाएं भटकाव, सोवियत यूनियन और चीन की क्रांतियों के बाद हुए तीक्ष्ण वर्ग-संघर्ष और परिणामस्वरूप मजदूर वर्ग की लाल झंडे तले बुर्जुआ वर्ग से शिकस्त और समाजवाद (जिसके बारे में मिडल क्लास सोचती है कि यह कोई उनके चौखटे के अनुसार कोई पकी-पकाई स्थायी चीज हो, जिसकी कोई समस्या न हो) और इस समाजवाद से साम्यवाद में संक्रमण और सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद वगैरा, वगैरा. अगर आप को यह सब भारी-भारी लगता है, तो मुआफ कीजियेगा, यह सब आपके लिए नहीं है.

हम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजदूर वर्ग के संघर्षों की बदौलत बदली स्थितियों, विशेषरूप से, सोवियत यूनियन और चीन की क्रांतियों की प्राप्तियों और उनकी हार को स्वीकार करते हैं. सर्वहारा वर्ग द्वारा विकसित किये गए उसके नेताओं और बदले में इन नेताओं द्वारा सर्वहारा वर्ग की सेवा को तस्लीम करते हैं, भले ही, इन नेताओं द्वारा ऐसी गलतियाँ भी हुई हैं  जिनसे बचा जा सकता था. लेकिन उनकी गलतियाँ समाज विज्ञानियों की गलतियाँ थी जिनका होना स्वभाविक होता है लेकिन दोहराना बेवकूफी. जीत-हार की इस अमीर विरासत का मालिक सर्वहारा वर्ग है जो अच्छी तरह जनता है कि उसने इसका कैसे समाहार करना है.

हम साफ़ साफ़ बता देना चाहते हैं कि इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी से पूर्णतया भिन्न है. विश्व के पिछड़े से पिछड़े हिस्से में भी तत्व रूप से सामंतवाद गायब है और वह पूंजीवाद के पैंतरे के अनुसार गतिमान है. भारत के आदिवासी बहुल और पिछड़े अफगानिस्तान जैसे क्षेत्रों का वास्ता जागीरदारों से नहीं देशी-विदेशी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से है. विज्ञान और तकनीक के विकास में पूंजीवादी संबंध बेड़ियाँ बन गए हैं. उच्च वैज्ञानिक तकनीक के विकास ने सर्वहारा वर्ग की उत्पादन क्षमता में इंतहा बढौतरी की, लेकिन बुर्जुआजी ने श्रम सघनता को लागू किया है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, 1970 के दशक के बाद, पूंजीपतियों के पास एकत्रित होने वाली वित्तीय पूंजी की मात्रा में भी इंतहा बढौतरी हुई है, जिसके उत्पादन कार्य में लगने की संभावना निशेष हो चुकी है. लेकिन श्रमिक वर्ग की, इसके बिलकुल उल्ट, आमदनी में गिरावट आई है. पूंजीपतियों की समस्या यह है कि उनको उनकी  महत्त्वाकांक्षानुसार उपभोगता वर्ग नहीं मिल पा रहा. मिलेगा भी कैसे क्योंकि श्रमिक वर्ग द्वारा पैदा किये मूल्य का अधिकतर हिस्सा तो पूंजीपति वर्ग की जेब में सट्टेबाजी और जुआरी-जुगाड़ों में मशगूल है. हम राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों की नहीं, नयी समाजवादी क्रांतियों की पूर्वबेला में जी रहे हैं.

और अंत में मिडल क्लास के नौजवानों से  : आपके आदर्श अमेरिका और यूरोप ने तस्लीम कर लिया है कि नवउदारीकरण उनकी बेवकूफी थी. लेकिन हमारा मानना है कि यह सब नाटक है. नवउदारीकरण का अर्थ था कि पूंजीवादी खुल्ले मुकाबले में श्रमिक-वर्ग की रगों से खून के अंतिम कतरे को निचोड़ लेना. लेकिन पूंजीवाद के आन्तरिक विरोधाभास होते है, जिन्हें उनके बुद्धिजीवी बाहर तलाशते रहते हैं और मुसीबत पड़ने पर राज्य जो उनका सच्चा सेवादार है, से लोगों की बचतों पर डाका डालने के लिए, बैलआउट मांगते हुए बिलकुल नहीं शर्माते. उनकी खुले मुकाबले की श्रेष्टता का भंडाफोड़ हो जाता है.

भारत जैसी ही चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका आदि अर्थव्यवस्थाओं के में जी रहे  मिडल क्लास के गगनविहारियों के पास 2022 तक ऊँची उड़ान भरने का मौका है. हालाँकि उनके अधिकतर हिस्से को सर्वहारा वर्ग में तब्दील होते हुए देखा जा सकेगा. हमारी इस पीड़ा से लुत्फ़ उठाने का कोई मंशा नहीं है लेकिन आपसे प्रार्थना है कि आप चीजों को गति में देखने की आदत डालें. मार्क्सवाद वैसा सुहावना नहीं है, जिसका जिक्र दिनेश जी ने किया है. बल्कि इसके विपरीत कहीं अधिक पीड़ादायक है. लेकिन ये शब्द ‘सुहावना’ और ‘पीड़ादायक’ रिलेटिव हैं. इनके अर्थ बुर्जुआ वर्ग, मिडल क्लास और सर्वहारा के लिए न केवल अलग-अलग होते हैं बल्कि कई अवस्थाओं में विपरीत भी होते हैं.

भारत के गाँव-गाँव तक पैठ कर चुकी बुर्जुआजी

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चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – तीसरी किश्त

इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

जमीनों के आसमान छूते भावः हैं लेकिन उनके लिए कोई फर्क नहीं पड़ता जिन्होंने मजदूरों से अधिशेष लूटा है. वे इसे हर कीमत पर खरीद लेना चाहते हैं. यहाँ तक भी देखने में आया है की वे रास्तों और गलियों को भी अपने खेतों और घरों में मिला लेते हैं जिसके लिए उन्हें कोई दाम नहीं देने पड़ते. अगर कोई विरोध करता है तो गाँव की निम्न बुर्जुआजी भी फ़िलहाल बड़े लोगों के साथ ही खड़ी होती है. इनका नजरिया न केवल पलायनवादी होता जा रहा है बल्कि वे गाँव के धनाढय लोगों के पक्ष में जिरह करते पाए जाते हैं. गली और रास्ता बंद होने की अगर कोई आपत्ति भी दर्ज करवाता है तो अपने बड़े बिरादरों की हिमायत में ये लोग उस व्यक्ति के घर इस तरह का ताँता लगा देते हैं जैसे कोई मईयत पर आता हो. उनके तर्क होते हैं कि भाई, तुम ही क्यों विरोध करते हो. वे कहते हैं कि फलां व्यक्ति भी गली पर कब्जा जमाये बैठा है और फलां भी. यह दरखास्त तुने खिलाफ क्यों दर्ज करवाई है ?

मेरे जैसे लोग उनसे जिरह तो करते है कि भाई सांझी मल्कियत रास्ते और गलियों का बचाना ज़रूरी है. उनसे यह भी कहा जाता है कि गाँव में कब्जों द्वारा से गली और रास्ता हथियाने वाले ये लोग कभी भी कामरेडों के मित्र नहीं रहे. कामरेड उन्हीं परिवारों से आये जो दबे-कुचले लोग थे, अगर किसी एक भी अमीर परिवार से आया है तो बता दो. उन लोगों से कहा जाता है  कि पहले तो यह कब्जों का काम ये भद्र्पुरुष करते थे लेकिन अब यह काम आपने भी ले लिया है ! जहाँ तक जमीन का सवाल है तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान दो मुल्क बन गए और अंग्रेज भी चले गए, ज़मीनें जो जागीरदारों के पास थी उसमें से अधिकतर का बंटवारा भी हो गया लेकिन कभी गलियों और रास्तों के भी बँटवारे हुए हैं?  एक धार्मिक व्यक्ति ने गुरबाणी का सहारा लेकर इन जमीन के भूखे लोगों का पक्ष लिया “जित हाथ जोर हरि देखिये सोई, नानक उसते नीच न कोई”. मतलब यह कि एक भी व्यक्ति तैयार नहीं है इस तरह की बात मानने को. तो यह स्थिति है नयी-नयी निम्न-बुर्जुआ में शामिल हुए इस वर्ग की !

तो यह फर्क है हमारी पंचायत और सोवियतों में. सोवियत कानून बनाती भीं हैं और इसे स्वयं लागू भी करती हैं. यह कोई उपरोक्त व्यक्तियों की तरह निठ्ठले लोगों का अड्डा नहीं है. गप्पबाजी का अड्डा नहीं है. यहाँ तो गप्पबाजी करो, पैसे लो, मज्जे लो, कानून बनाओ, अपने आप अफसरशाही उसे अपने ही ढंग-तरीके से लागू करती रहेगी. इधर जब भी कभी मजदूरों के हाथ में सत्ता आती है वे सोवियतें बनाते हैं, कम्यून बनाते हैं. और अब चीन और रूस में जब उल्ट हुआ है तो इन्होने फिर ‘डूमा’, पार्लियमेंट को लाकर खडा कर दिया. तो संस्थाएं भी उसी प्रकृति की होती हैं जिस प्रकृति या वर्ग की सत्ता होती है. आज मान लीजिये अगर राजाओं की सत्ता आ जाये तो (जो कि संभव नहीं है) तो राजा लोग अपनी एक परिषद् बनायेगे जिसमें वोट का अधिकार केवल सामंतों को ही होगा. इन्हीं लोगों द्वारा आम राय निर्धारित की जायेगी. राजा भी राय देगा लेकिन आम लोगों की कोई राय नहीं होगी. अब इस व्यवस्था में केवल पूंजीपतियों की राय की ही कद्र होती है.

दूसरी बात कि अब वोटों को देखो. काफी मजदूर आबादी जो इधर से उधर स्थान बदलती रहती है उसकी वोट बनी हुई ही नहीं है. और जो वोट डाली गयी है उसमें से वर्तमान में सत्ता में आयी कांग्रेस पार्टी को कुल वोट का केवल 12  प्रतिशत ही मिला है. यानी कि वर्तमान सरकार केवल 12  प्रतिशत लोगों की ही नुमाइंदगी करती है बाकी जो 88  प्रतिशत वोट है वह इसके विरोध में है. अगर हम इस आंकडों की बाजीगरी में भी जाएँ तो भी बात कितनी विडम्बनापूर्ण है. इसी भारत को ही दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं ! तो इस स्थिति, इस भ्रम से बाहर निकलने का हम अपने साथियों से आह्वान करते हैं.

(बीच में एक साथी प्रश्न पूछते हैं कि कई देशों में कानून और नीतियाँ बनाने के लिए ‘पब्लिक ओपिनियन’ होता है)

‘पब्लिक ओपिनियन’ भी तो यही है. हमारे संसदमार्गी कामरेडों ने कभी मांग उठाई थी कि अठारह साल के नौजवान को वोट का अधिकार हो. कि नौजवान बहुत ऊर्जावान होता है. कि नौजवान प्रोग्रेसिव होता है.जैसे कि नौजवान यूंही ऊर्जावान और प्रोग्रेसिव हो जाता है ! जैसे कि उसका कोई वर्ग न हो ! जैसे कि वह वर्ग से ऊपर कोई पवित्र शै हो !

(एक और साथी बीच में बोलने लगते हैं कि ‘पब्लिक ओपिनियन’ आप टीवी पर नहीं देखते हो ? उसमें यह तो बताया जाता है कि इतने फीसदी ने पक्ष या विपक्ष में एस.एम.एस भेजा लेकिन यह नहीं बताया जाता कि कुल कितने एस.एम.एस आये.एक और साथी कहते हैं कि कई देशों में जनमत के द्वारा लोग अपने चुनें गए प्रतिनिधियों को वापस बुला सकते हैं.)

यह बात ठीक है कि वे वापस बुला सकते हैं. लेकिन अगर हम वापस बुला भी लेते हैं तो फिर वोट डाली जाएँगी और वोटें तो वैसे ही डाली जाएँगी जैसे पहले डाली गयी थी. मतलब यह है कि इस क्रिया मैं आम लोग कहाँ ठहर पाएंगे. उनका तो कोई अधिकार है ही नहीं. आम लोगों का प्रतिनिधित्व तो फिर भी नगण्य होगा. अब सोवियतों का प्रतिनिधित्व कैसा रहा है. सोवियत क्या थीं? सोवियतें थीं – मजदूरों की सोवियतें, किसानों की सोवियतें, अध्यापकों की सोवियतें, फौजियों की सोवियतें बगैरा-बगैरा. सोवियते थी काम के आधार पर. हमारे क्या हैं जातिगत ? कि इतने फीसदी औरतें ! अब औरतें हमारी पार्लियमेंट में जाते ही औरतें रहती ही नहीं, वे कुलीन औरत में परवर्तित हो जाती है. आत्मा सिंह को ले लो वह इस पार्लियमेंट का एक कुलीन व्यक्ति बन गया है. उसमें ऐसा कुछ नहीं है जो उसके दलित जाति का प्रतिनिधित्व करे. बूटा सिंह को ले लो. उसका लड़का घपले करता पकडा गया और वह झूठ पर झूठ बोले जा रहा है. हमारे यहाँ ये लोग इस प्रकार के बँटवारे करते हैं. कभी भी काम-धंधे के आधार पर बटवारा नहीं होता. कि इतने फीसदी मजदूर आएंगे, इतने फीसदी किसान, इतने फीसदी पूंजीपति. लेकिन सोवियतों में इस तरह का बंटवारा था. अपने यहाँ प्रतिक्रियावादी बाँट करेंगे. जिससे लोग भाई-भाई के दुश्मन हो जाते हैं. वे कह रहें है कि देखिये हरियाणा में इतने फीसदी पंजाबी हैं. तो यह है प्रतिक्रियावादी बंटवारा. यह प्रतिक्रियावादी बंटवारा है क्या ? धर्मों के नाम पर, जाति के नाम पर, गोत्रों के नाम पर – यह पीछे-खींचू बाँट है, प्रतिक्रियावादी बाँट है. जो असली बाँट है वे वर्गों के आधार पर है कि काम के आधार पर बाँट हो. यही समाजवादी बाँट है और वैज्ञानिक बाँट है. कि मजदूर की गिनती आबादी का सतत्तर फीसदी है इसे सतत्तर  फीसदी की ‘रिजर्वेशन’ मिले. अब ये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लोग भी कह रहे हैं कि पंजाबियों का इतने प्रतिशत प्रतिनिधित्व हो. ये भी इतने पीछे-खींचू हो गए हैं.

(एक और साथी प्रश्न करते हैं कि क्या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी यह बात कहती है.)

बिलकुल आज से आठ-दस वर्ष पूर्व इन्होनें अपने प्रोग्रेम में यह तरमीम की है. पहले इनके प्रोग्रेम में था कि यह पार्टी मजदूरों और किसानों की पार्टी है और यह अपना सैद्धांतिक आधार मार्क्सवाद-लेनिनवाद से लेती है. माओवाद से नहीं. अब माओवाद आज के युग का मार्क्सवाद है वैसे ही जैसे लेनिनवाद साम्राज्यवाद के युग का मार्क्सवाद है. मार्क्सवाद आजाद मुकाबले के पूंजीवाद के युग का सिद्धांत है और जैसे ही पूंजीवाद साम्राज्यवाद में बदला तो उस समय का मार्क्सवाद है लेनिनवाद. माओवाद समाजवाद आने के बाद ,उसे साम्यवाद में ले जाने के लिए किन-किन  दांव-पेंचों की ज़रुरत है, किस प्रकार की रणनीति हो, उस समय का मार्क्सवाद है. वे माओवाद को मानते ही नहीं बल्कि वे कहते हैं कि वे मार्क्सवाद, लेनिनवाद, बुद्धवाद, नानकवाद, कबीरवाद आदि उनके प्रेरणास्रोत हैं. मतलब कि ये अपनी विचारधारा को पीछे ले गए हैं. हम समझते हैं कि लेनिन तक भी हम पीछे हैं. अगर आप माओ तक भी नहीं आते तो बहुत पिछड़ जाते हो. पर ये तो मध्ययुग के उस मानवतावाद तक निघार की रसातल में चले गए हैं.

अगली किश्त में समाप्य

इसके बाद : चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – क्या करें

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प्रो.एल.पी.जी. बुद्धिजीवी बनाम वामपंथी बुद्धिजीवी

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पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक में और उसके बाद भारत में एक ऐसा वर्ग पनपा है जिसे प्रो.एल.पी.जी. वर्ग के नाम से जाना जाता है. अंग्रेजी में इसका विस्तार है Pro. Liberalization, Privatization और Globalisation. इसके प्रबुद्ध नागरिकों में प्रोफेसर, इंजिनियर, डॉक्टर, विज्ञानी, जज,वकील , सिविल सर्वेन्ट्स वगैरा-वगैरा शामिल हैं. देश-दुनिया की समस्यायों पर यह वर्ग भी अपने फ़िक्र का इजहार करता रहता है जैसे बिजली ठप होने से आम आदमी परेशान, ट्रेफिक से आम आदमी परेशान, प्रदुषण से आम आदमी परेशान, पेट्रोल के दाम बढ़ने से आम आदमी परेशान, पुलिस की ज्यादतियों से आम आदमी परेशान, कानून-व्यवस्था से आम आदमी परेशान वगैरा-वगैरा. लेकिन यहाँ आम आदमी से अभिप्राय इस प्रो.एल.पी.जी. वर्ग से सम्बंधित लोगों से ही होता है. इनकी पसंदीदा नीतियों के कारण देश की 84 करोड़ आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, उनका इन आम आदमियों के फ़िक्र की  लिस्ट में कहीं कोई जिक्र नहीं होता. साफ और सीधे शब्दों में कहे तो इनकी नज़र में यह 84 करोड़ की आबादी ‘आम आदमी’ नहीं है.

अभी-अभी संपन्न हुए देश की महापंचायत के चुनावों से पहले इस वर्ग के प्रबुद्ध लोग प्रिंट मीडिया, रेडियो और टेलिविज़न पर अपने इस ‘आम आदमी’ के इस महापंचायत के चुनावों प्रति उपेक्षा से फिक्रमंद पाए गए. उनका मानना था कि देश की मिडल क्लास का अधिकांश वोट डालने नहीं जाता है. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ आबादी बड़े जोश-खरोश के साथ इन चुनावों में भाग लेती है. या यूँ कहें कि यह इलेक्शन इस 84 करोड़ आबादी की महत्वाकांक्षा की अभिव्यक्ति तो करता है लेकिन मिडल क्लास के लिए इसका कोई अर्थ नहीं है. तो इसके प्रबुद्ध नागरिकों का फिक्रमंद होना लाजिमी था. देश को योग द्वारा स्वस्थ करने का बीडा उठाने वाले बाबा रामदेव भी इनके फ़िक्र में शामिल हो गए. उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि इस लोकतंत्र की रक्षा के लिए वोट डालना हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी या मूलभूत कर्तव्य बना देना चाहिए. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ की वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है या इन चुनावों में भाग लेती है.

अब हम मान कर चलते हैं कि 84 करोड़  वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है लेकिन मिडल या अपर मिडल क्लास का बोट डालने प्रति रवैया नकारात्मक है. इसकी पड़ताल होनी चाहिए. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बुर्जुआजी इस देश के हर कोने में अपनी पैठ जमा चुकी है. कहीं ऐसा तो नहीं कि देश के हर कस्बे, हर गाँव में प्रभावशाली हो चुकी इस बुर्जुआजी के लोगों के असर के अधीन इस  84 करोड़ आबादी के लोग अपना वोट डालने के लिए बाध्य हों? क्योंकि कस्बों में ही नहीं बल्कि गांवों में भी देश के मजदूर वर्ग को अपनी श्रम शक्ति बेचने के लिए प्रभावशाली लोगों के सामने गिडगिडाना पड़ता है. भारत एक ऐसा देश है जहाँ श्रम-शक्ति सस्ती और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और मजदूरों को इसे बेचने के लिए आपस में होड़ करनी पड़ती है. इसका नतीजा यह होता है कि मजदूर को श्रम-शक्ति के खरीददार से मधुर सम्बन्ध बनाने पड़ते हैं. श्रम-शक्ति का खरीददार इस बुर्जुआ राज्य का एक प्रतिनिधि भी होता है. इस बात की पूरी सम्भावना है कि वह श्रम-शक्ति के मालिक यानि मजदूर को न केवल वोट डालने के लिए बाध्य करे बल्कि अपनी इच्छा के उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने के लिए बाध्य करे.

जहाँ तक मिडल या अपर मिडल क्लास के वोट न डालने का प्रश्न है तो इसके राज की कुंजी भी उपरोक्त तथ्य में छुपी हुई है. देश की पूंजीवादी प्रणाली द्वारा मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष का एक भाग इनके यहाँ सुनिश्चित रूप से पहुँचता रहता है. यह क्लास उतनी बाध्य नहीं हो सकती जितना कि मजदूर वर्ग.

अगर आपको उपरोक्त आकलन मनोगत लगता हो तो ज़रूरी है कि आप एक प्रश्नावली बनाएँ और अपने आस-पास के सौ-पचास मजदूर लोगों से प्रश्न करें. पूरी उम्मीद है कि नतीजा वही निकलेगा जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है. उपरोक्त आकलन उन बुद्धिजीवियों के लिए चुनौती के रूप पेश किया गया है जो 84 करोड़ की आबादी के इलेक्शन में भाग लेने पर गदगद है.

अब हम उस बुद्धिजीवी को लेते हैं जो इस Liberalization, Privatization और Globalisation को संशय की दृष्टि से देखता है. इसे वामपंथी बुद्धिजीवी कह सकते हैं. हालाँकि इस विपर्यय के दौर में उसकी स्थिति अल्पसंख्यक की ही है लेकिन फ़िक्र इस तथ्य से नहीं कि वह अल्पसंख्यक है फ़िक्र उसकी अकर्मण्यता से है. इन्हें अपनी अकर्मण्यता से छुटकारा पाना होगा. इन्हें तो लाज़मी एक प्रश्नावली बनानी चाहिए और इस बुर्जुआ लोकतंत्र की सार्थकता की पड़ताल करनी चाहिए. बुद्धिजीवियों के इस वर्ग के लिए माओ त्से तुङ के इन विचारों की आज भी पूरी सार्थकता है,

“चूँकि बुद्धिजीवियों का काम मजदूर-किसान जनसमुदाय की सेवा करना है, इसलिए, सर्वप्रथम और सर्वोपरि तौर पर, उन्हें उनको (यानी मजदूर-किसानों को – अनु.) जानना होगा तथा उनके जीवन, काम और विचारों से परिचित होना होगा. हम जनता के बीच जाने के लिए , कारखानों में और गांवों में जाने के लिए, बुद्धिजीवियों को प्रोत्साहित करते हैं. यदि आप अपने पूरे जीवन में एक मजदूर या किसान से कभी नहीं मिलते, तो यह बहुत बुरी बात है. हमारे सरकारी कर्मियों, लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों और वैज्ञानिक शोधकर्मियों को मजदूरों और किसानों के निकट जाने के लिए हर अवसर का लाभ उठाना चाहिए. कुछ लोग महज नज़र दौड़ने के लिए कारखानों और गांवों में जा सकते हैं; “इसे घोडे की पीठ पर बैठे-बैठे फूलों को देखना” कहा जा सकता है और इसका कोई फायदा नहीं हो सकता. दूसरे लोग वहां कुछ महीने रुक सकते हैं, जाँच-पड़ताल कर सकते हैं और दोस्त बना सकते हैं; इसे “फूलों को देखने के लिए (घोडे से -अनु.) नीचे उतरना” कहा जा सकता है. कुछ और दूसरे लोग वहाँ रुक सकते हैं और पर्याप्त समय तक, जैसे कि दो या तीन वर्षों तक या उससे भी अधिक समय तक वहां रह सकते हैं; इसे “बस जाना” कहा जा सकता है. कुछ बुद्धिजीवी मजदूरों और किसानों के बीच रहते हैं , जैसे कि, कारखानों में औद्योगिक तकनीशियन तथा देहातों में कृषि-तकनीशियन और ग्रामीण स्कूल शिक्षक. उन्हें अपना काम अच्छी तरह से करना चाहिए और मजदूरों और किसानों के साथ घुलमिल जाना चाहिए. हमें ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिसमें, “मजदूरों और किसानों का करीबी बन जाना” दरअसल एक आदत में ढल जाये, दूसरे शब्दों में, हमारे पास ऐसा करने वाले बुद्धिजीवियों की एक भारी संख्या होनी चाहिए. सभी तो नहीं लेकिन निश्चय ही, कुछ ऐसे हैं जो एक या दूसरे कारण से (मजदूरों-किसानों के बीच-अनु.) जा पाने में असमर्थ हैं, लेकिन हमें आशा है कि अधिक से अधिक जितने लोगों का जा पाना संभव होगा, वे जायेंगे. वे सभी एक ही समय नहीं जा सकते, लेकिन वे अलग-अलग समयों में टोलियों में जा सकते हैं. पुराने दिनों में जब हम लोग येनान में थे, बुद्धिजीवियों को सक्षम बनाया गया था कि वे मजदूरों और किसानों से सीधे संपर्क बना सकें. येनान में बहुतेरे ऐसे थे जिनकी सोच बहुत उलझी हुई थी और वे तमाम किस्म की अनोखी दलीलों के साथ सामने आते थे. हमारा एक फोरम था, जो उन्हें जनता के बीच जाने के लिए राय-परामर्श देता था. बाद में बहुतेरे गए, और नतीजा बहुत अच्छा रहा. एक बुद्धिजीवी का किताबी ज्ञान जब तक व्यवहार के साथ एकीकृत नहीं हो जाता, तब तक वह पूरा नहीं होता, बल्कि वह बहुत अधिक अधूरा भी हो सकता है. मुख्यत: पुस्तकों को पढने के ज़रिए ही बुद्धिजीवी हमारे पूर्वजों के अनुभवों को अर्जित करते हैं. निश्चय ही, पुस्तकें पढना ज़रूरी है; लेकिन यह अपने आप समस्याएं हल नहीं कर सकता. वास्तविक परिस्थिति का अध्ययन, व्यावहारिक अनुभव और ठोस सामग्री का परीक्षण, तथा मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना ज़रूरी है. मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना आसान काम नहीं है. अभी भी जब लोग कारखानों और गांवों में जा रहे हैं, कुछ मामलों में नतीजे अच्छे हैं लेकिन कुछ में नहीं हैं. यहाँ जो चीज निहित है वह है रुख या अवस्थिति का सवाल, यानी, व्यक्ति-विशेष के विश्व-दृष्टिकोण का सवाल. हम “सैंकडों विचार-सरणियों को परस्पर संघर्ष करने देने” की हिमायत करते हैं और जानने-सीखने की हर शाखा में बहुतेरी सरणियाँ और प्रवृत्तियां हो सकती हैं; लेकिन विश्व दृष्टिकोण के मामले में आज बुनियादी तौर पर सिर्फ दो सरणियाँ हैं, सर्वहारा और बुर्जुआ. इसमें से एक हो सकता है या दूसरा, या तो सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण या फिर बुर्जुआ विश्व-दृष्टिकोण. कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण किसी भी अन्य वर्ग का नहीं बल्कि सिर्फ सर्वहारा का विश्व-दृष्टिकोण है. हमारे आज के बुद्धिजीवियों में से अधिकांश पुराने समाज से और गैर-कामगार लोगों के परिवारों से आते हैं. जो मजदूरों या किसानों के परिवारों से आते हैं, वे भी अभी बुर्जुआ बुद्धिजीवी ही हैं क्योंकि मुक्ति से पहले जो शिक्षा उन्होंने हासिल की थी वह बुर्जुआ शिक्षा थी और उनका विश्व-दृष्टिकोण मूलत: बुर्जुआ था. यदि वे पुराने विश्व-दृष्टिकोण, अवस्थिति और भावनाओं में मजदूरों और किसानों से अलग बने रहेंगे, और वे गोल छेदों में चौकोर खूंटियों के समान होंगे, और मजदूर और किसान उनके सामने अपना दिल नहीं खोलेंगे. यदि बुद्धिजीवी खुद को मजदूरों और किसानों के साथ एकीकृत कर लें और उनके बीच दोस्ती बना लें तो जो मार्क्सवाद उन्होंने किताबों में पढ़ रखा है, वह सही मायने में अपना हो सकता है. मार्क्सवाद पर वास्तविक पकड बनाने के लिए, सिर्फ किताबों से ही नहीं, बल्कि मुख्यत: वर्ग-संघर्ष के ज़रिए, व्यावहारिक कार्य और मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए सीखना होगा. कुछ मार्क्सवादी किताबें पढने के साथ ही जब हमारे बुद्धिजीवी मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए और अपने खुद के व्यावहारिक कार्य के ज़रिए कुछ समझदारी हासिल कर लेंगे तो हम सभी एक ही भाषा, न केवल देशभक्ति की सामान्य भाषा और समाजवादी व्यवस्था की सामान्य भाषा बोलने लगेंगे बल्कि शायद कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण की सामान्य भाषा भी बोलने लगेंगे. यदि ऐसा हो जाता है तो हम सभी निश्चय ही बेहतर काम करेंगे.” (दर्शन विषयक सम्बन्धी पॉँच निबंध, पृ.114-16,  बिगुल पुस्तिका  श्रृंखला से)

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर विचारधारात्मक संघर्ष

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

वर्ग-संघर्ष की वैज्ञानिक चेतना को विकसित करने के लिए हमें कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर भी वर्ग-संघर्ष को तीखा करने का काम करना होगा। हमें श्रम की दुनिया में क्रान्ति की वस्तुगत आवश्यकता को एक बार फिर आम जनगण की उद्दाम, दुर्निवार आकांक्षा में रूपान्तरित कर देना है। साहित्य का, समग्र संस्कृति कर्म का कर्तव्य है कि वह लोगों को निराशा और विभ्रमों से छुटकारा दिलाकर तमाम मानवद्रोही शक्तियों और मानवद्रोही व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह में उठ खड़ा होने के लिए तैयार करे। जीवन के अन्य सभी मोर्चों की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हमें आज “नये संघर्षोंको गौरवमण्डित करने के लिए”, “सम्मुख उपस्थित कार्यभार को कल्पना में वृहद आकार देने के लिए”, “एक बार फिर क्रान्ति की आत्मा को जागृत करने के लिए” अतीत के संघर्षों की महानता-महत्ता और वैचारिक परम्परा का पुनरान्वेषण करना है। इस दृष्टि से सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आज की पहली प्राथमिकता वैचारिक कार्य और वैचारिक तैयारियों की है।

किसी भी मोर्चे पर नई तैयारियाँ हर-हमेशा विचारधारात्मक धरातल से ही शुरू होती हैं। भविष्य का विजेता वर्ग अपने विरोधी को सबसे पहले विचारधारात्मक मोर्चे पर ही शिकस्त देता है। सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आज पहली ज़रूरत वैचारिक सफ़ाई और तैयारी की, वैचारिक आक्रमणों के प्रतिकार की और वैचारिक प्रत्याक्रमण की है। ध्यान रखना होगा कि यह बुनियादी काम है, पर एकमात्र नहीं। और यह भी याद रखना होगा कि इसे “अध्ययन-कक्ष के योद्धा” और निठल्ले विमर्शक नहीं, बल्कि जनता के बीच सक्रिय सांस्कृतिक सेनानी ही अंजाम दे सकेंगे। विपर्यय, पुनरुत्थान और संक्रमण के समय में इतिहास का पुनरीक्षण, वर्तमान का विश्लेषण और भविष्य की दिशा तय करने का काम केन्द्रीय बन जाता है, अत: विचार-पक्ष पर केन्द्रीय ज़ोर स्वाभाविक हो जाता है।

अतीत में ऐसा कई बार हुआ है कि ऐतिहासिक संक्रमण कालों में संस्कृति का क्षेत्र विचारधारात्मक संघर्ष का अहम मोर्चा, और कभी-कभी तो मुख्य रंगमंच बन जाता रहा है। यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन-काल के इतिहास की बस हम याद दिलाना चाहेंगे।

लेकिन जब हम कहते हैं कि आज संस्कृति का क्षेत्र विचारधारात्मक संघर्ष का केन्द्रीय रणांगन बना हुआ है तो यह इतिहास-निगमित सूत्र के दुहराने के रूप में नहीं बल्कि इस समय मौजूद स्थिति के वस्तुगत मूल्यांकन के रूप में कहते हैं। हम देखें, राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में तो स्थिति यह है कि वर्तमान परिस्थितियाँ बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों के मुँह से मार्क्सवादी प्रस्थापनाएँ उगलवा रही हैं। सीधे विचारधारा के क्षेत्र में, मार्क्सवादी दर्शन या समाजवादी प्रयोगों की शिक्षाओं को तोड़ने-मरोड़ने का काम तो हो रहा है, पर वास्तव में बुर्जुआ वर्ग कोई नया हमला बोल ही नहीं सका है। जिन मुद्दों पर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारिम्भक दो दशकों तक मार्क्सवाद बुर्जुआ विचारधारा को परास्त कर चुका है, उन्हें ही भाड़े के कलमघसीट कुछ यूँ उठा रहे हैं मानो यह एकदम नई बात हो, मार्क्सवाद पर कोई नया सवाल हो। समाजवाद की फ़िलहाली पराजय को लेकर जो भी बातें की जा रही हैं, उनके उत्तर लेनिन के अन्तिम दौर के चिन्तन से लेकर माओ के सांस्कृतिक क्रान्ति-कालीन चिन्तन तक में मौजूद हैं।

देखा जाए तो अधिक षड्यंत्रकारी और प्रभावी ढंग से, अमूर्त बौद्धिक निरूपणों-सूत्रीकरणों का वाग्जाल रचते हुए, विगत दो दशकों के दौरान जो “सांस्कृतिक विमर्श” हुए हैं और जो नये सामाजिक, सांस्कृतिक और सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त गढ़े गए हैं, उन्होंने द्वन्द्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी जीवन-दृष्टि पर सर्वाधिक प्रभावी चोटें की हैं। इन नये विमर्शों-सिद्धान्तों में हम उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर-मार्क्सवाद, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद, प्राच्यवाद, `सबआल्टर्न´ इतिहास-लेखन आदि-आदि-सभी को शामिल कर रहे हैं। इनके तर्क भी दरअसल नये नहीं हैं। इनमें हीगेल का विदू्रप है और नीत्शे से लेकर स्पेंग्लर तक की अनुगूँजें हैं, पर “सांस्कृतिक विमर्शों” में इन्हें प्रभावी ढंग से नया और समकालीन बनाकर पेश किया जा रहा है। संशोधनवादियों और अकादमिक वामपन्थियों का एक हिस्सा पक्ष-परिवर्तन करके इस जमात में शामिल हो गया है, दूसरा हिस्सा इनसे काफ़ी-कुछ उधार लेकर समन्वयवाद की राह चल रहा है और तीसरा हिस्सा इनका आधा-अधूरा, मरियल और अमूर्त अकादमिक विमर्श की ही भाषा में जवाब दे रहा है। सही ईमानदार, वामपन्थी लेखक-संस्कृतिकर्मी प्राय: दिग्भ्रमित हैं और ख़ास तौर पर जनपक्षधर युवा बुद्धिजीवियों पर इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे सांस्कृतिक मोर्चे की वैचारिक तैयारी और नई कतारों की तैयारी का काम भी प्रभावित हो रहा है।

संस्कृति के मोर्चे पर एक और दृष्टि से नये पुनर्जागरण और नये प्रबोधन के वैचारिक कार्यों को देखना-समझना ज़रूरी है। पुनरुत्थान के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में, वित्तीय पूँजी की “अन्तिम विजय” के इस दौर में, फ़ासीवादी प्रवृत्तियों का नया उभार एक विश्वव्यापी परिघटना है और हमारे देश में भी इनका श्मशान-नृत्य जारी है। वैचारिक धरातल पर, अतीत की ही तरह, इतिहास और संस्कृति के विकृतिकरण पर इनका मुख्य ज़ोर है। इसलिए भी, एक ओर जहाँ इनसे निर्णायक संघर्ष के लिए मेहनतकश जनता की लामबन्दी का काम तेज़ करना होगा, वही संस्कृति के क्षेत्र में इनके मुकाबले के लिए जमकर वैचारिक कार्य करना होगा और व्यापक प्रचार-कार्य भी।

सच पूछें तो आज समूचे बुर्जुआ वर्ग का दर्शन ही तर्कणा और जनवाद के मूल्यों से इतना रिक्त हो चुका है कि फ़ासीवादी विचार-दर्शन से उसकी विभाजक रेखा धूमिल हो गई है। यह अनायास नहीं है कि तमाम किस्म की “उत्तर” विचार-सरणियाँ आज बुर्जुआ पुनर्जागरण और उसकी मानववाद और इहलोकवाद की परम्परा को तथा बुर्जुआ प्रबोधनकाल और उसकी तर्कणा और जनवाद की विरासत को ही सिरे से खारिज करने का काम कर रही हैं। उस महान क्रान्तिकारी विरासत का वास्तविक वारिस तो सर्वहारा वर्ग ही है। उन्नीसवीं शताब्दी में सत्तारूढ़ होते ही बुर्जुआ वर्ग ने स्वतंत्रता-समानता-भ्रातृत्व के लाल झण्डे को धूल में फेंक दिया था तो सर्वहारा वर्ग ने उसे आगे बढ़कर उठा लिया था। आज जीवन में मानववाद और तर्कणा के प्राधिकार को स्थापित करने की लम्बी लड़ाई एक बार फिर एक उग्र चरण में है। यह सर्वहारा मानववाद और द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी तर्कणा के झण्डे को ऊँचा उठाने का समय है। यह आज के नये पुनर्जागरण और नये प्रबोधन का केन्द्रीय काम है और संस्कृति का मोर्चा ऐसे समय में बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

निचोड़ के तौर पर संस्कृति के मोर्चे के वैचारिक कार्यों को ठोस रूप में कुछ यूँ निरूपित किया जा सकता है :

(1) सबसे पहली बात तो यह कि सर्वहारा-संस्कृति के सर्जकों-शिल्पियों को मार्क्सवादी दर्शन और राजनीतिक अर्थशास्त्र का एक हद तक अध्ययन अवश्य करना होगा, तभी वे बुर्जुआ विभ्रमों से मुक्त हो सकते हैं, बुर्जुआ सांस्कृतिक विचारों का प्रतिकार कर सकते हैं और सामाजिक जीवन की प्रतीतियों की सतह भेदकर सारभूत यथार्थ को पकड़ सकते हैं।

(2) हमें साहित्य-कला-संस्कृति की मार्क्सवादी वैचारिकी के अध्ययन-मनन का काम करना होगा। पहले किया भी हो तो नये सिरे से करना होगा, विस्मृतियों की कालिख पोंछनी होगी। अतीत के सैद्धान्तिक बहसों-विमर्शों और प्रयोगों का नये सिरे से अध्ययन करना होगा और महत्त्वपूर्ण चीज़ों को पुनर्प्रस्तुत करना होगा।

(3) हमें तमाम “उत्तर” विचार-सरणियों की, अन्य नये-नये बुर्जुआ और “नववामपन्थी” संस्कृति-सिद्धान्तों की वैज्ञानिक आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

(4) हमें आज के बुर्जुआ मीडिया-विशेषज्ञों और बुर्जुआ संस्कृति उद्योग के सिद्धान्तकारों के नये-नये सिद्धान्तों की सांगोपांग चीर-फाड़ करनी होगी।

(5) हमें आज के सामाजिक यथार्थ और नई सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटनाओं-प्रवृत्तियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करना होगा और इस प्रक्रिया में मार्क्सवादी कला-दर्शन और सौन्दर्य-शास्त्र को समृद्ध और समकालीन बनाने की सतत्-प्रक्रिया को नया संवेग देना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

नए सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन— महत्तव्पूर्ण सामजिक-आर्थिक सरंचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में सृजन और आन्दोलन के सभी कार्यों को आज एकदम नये सिरे से संगठित करने की ज़रूरत है। हम सर्वहारा क्रान्ति की पक्षधर अवस्थिति से यह बात कह रहे हैं।

समय और समाज जब जनता के प्रचण्ड वेगवाही सांस्कृतिक आन्दोलन की माँग कर रहे हैं, तब कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में अराजकता, विभ्रम, भटकाव, अवसरवाद और ठहराव का बोलबाला है। ताकत कम नहीं है, पर कोशिशें बिखरी हुई हैं। जहाँ ईमानदारी और मेहनत से लगी हुई टीमें हैं, वहाँ वैचारिक समझ कमज़ोर है और अनुभववाद तथा `लकीर की फकीरी´ का बोलबाला है। निस्संकोच कहा जा सकता है कि प्रगतिशील वाम सांस्कृतिक धारा पर आज प्रच्छन्न बुर्जुआ और निम्न-बुर्जुआ धाराएँ हावी हैं। एक ओर नामधारी वाम के पुराने मठाधीशों-महामण्डलेश्वरों की गद्दियाँ और अखाड़े हैं तो दूसरी ओर विश्व के नये यथार्थ के अवगाहन और अतीत की “जड़ीभूत” विचारधारात्मक चिन्तन-पद्धतियों के पुनरीक्षण का दावा करने वाले अकर्मक “नव-मार्क्सवाद” के नौबढ़ प्रणेताओं के अड्डे हैं। क्रान्तिकारी वाम शिविर से जुड़े कई एक सांस्कृतिक संगठन और टोलियाँ हैं, पर उनका विचार-पक्ष कमज़ोर है। वे कला-साहित्य-संस्कृति की द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी समझ से, अपनी समृद्ध वैचारिक विरासत से और अतीत के सर्जनात्मक प्रयोगों से अपरिचित हैं। वे भरपूर जोश से क्रान्तिकारी आन्दोलन और प्रचार की कार्रवाइयों में लगे हैं, लेकिन वैचारिक समझ के अभाव में उनके सांस्कृतिक कार्य दिशाहीन और निष्प्रभावी होकर रह जा रहे हैं।

हमें इस भंवर से बाहर निकलना होगा। क्योंकि हमारे देश और समूची दुनिया के सामने आज यह प्रश्न पहले हमेशा की अपेक्षा अधिक ज्वलन्त और भयावह रूप में खड़ा है – या तो समाजवाद, या फिर बर्बरता! कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी यही प्रश्न केन्द्रीय है।

अकर्मण्य वैचारिक समझ घोड़े की लीद से बेहतर नहीं होती। वास्तविक आशावाद नियतत्ववादी नहीं होता। यदि हम आशावादी हैं तो हमें अपनी आशाओं को फलीभूत करने के लिए जी-जान से जूझना होगा। अकर्मक ज्ञान और अन्धा आशावाद – इन दोनों से बचना होगा।

नये सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन – महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संरचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

आज की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की इस निबन्ध में सविस्तार चर्चा सम्भव नहीं है और इसकी ज़रूरत भी नहीं है। लेकिन अलग से यह करना ही होगा क्योंकि सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुनिश्चित समझ के बिना संस्कृतिकर्मी भी अपने समय के जीवन के मर्म को नहीं पकड़ सकते। इसके बग़ैर वे सतह की परिघटनाओं को ही सारभूत यथार्थ मानकर प्रस्तुत करेंगे। इसके बिना वे भविष्य की ओर जारी यात्रा की गतिकी को नहीं समझ सकते और अपने कार्यभार नहीं निर्धारित कर सकते। आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, हमारे देश के आम लोगों का जीवन सर्वग्रासी संकट के जिस विषैले-दमघोंटू अन्धकार में घुट रहा है, उसकी हम यहाँ सूत्रवत चर्चा करेंगे। इतनी चर्चा पृष्ठभूमि के तौर पर ज़रूरी है।

हम आज भी साम्राज्यवाद के युग में जी रहे हैं जिसकी बुनियादी अभिलाक्षणिकताओं को और उन्नीसवीं शताब्दी के `स्वतंत्र प्रतियोगिता के युग´ से जिसकी भिन्नताओं को लेनिन ने उद्घाटित किया था। लेकिन आज, सतह की परिघटनाओं-प्रवृत्तियों के पर्यवेक्षण के आधार पर भी यह महसूस किया जा सकता है कि स्थितियों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं। विश्व-पूँजीवाद के असमाधेय संकटों की, साम्राज्यवाद की अभूतपूर्व आक्रामकता की, नई तकनोलॉजी के प्रयोग की, तीसरी दुनिया के देशों में निर्बन्ध पूँजी-निवेश और लूट की, इन देशों के बुर्जुआ शासक वर्ग के आत्म समर्पण की, मज़दूरों से अतिलाभ निचोड़ने की नई-नई तरकीबों और उनके छिनते अधिकारों की, सट्टेबाज़ी और अनुत्पादक प्रवृत्तियों की, सूचना-संचार के तंत्र की नई प्रभाविता की, फ़ासीवादी शक्तियों के नये उभार की और पहले से भिन्न तमाम लक्षणों-प्रवृत्तियों की चर्चा तो आम तौर पर होती है। इन तमाम बदलावों के पीछे सिर्फ़ यही कारण नहीं है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम संस्करण आज पराजित और विफल हो चुके हैं और सोवियत संघ के नेतृत्व में नामधारी समाजवादी (वस्तुत: राजकीय पूँजीवादी) ढाँचे वाले देशों का शिविर विघटित हो चुका है। इससे भी बुनियादी कारण (और ये दोनों अन्तर्सम्बन्धित हैं) यह है कि साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की कार्यप्रणाली और लगातार पैदा होने वाले अपने संकटों को निपटाने के उसेक तौर-तरीकों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं, और इनके चलते, विश्व पूँजीवाद के समूचे परिदृश्य में कुछ महत्त्वपूर्ण नई चीज़ें पैदा हुई हैं। इन बुनियादी कारणों को समझने की ज़रूरत है। इन बदलावों की पृष्ठभूमि के बनने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हो चुकी थी, गत शताब्दी के आठवें दशक से इनके लक्षण सतह पर उभरने लगे थे और अन्तिम दशक के दौरान एक नया बदला हुआ परिदृश्य एकदम सामने आ चुका था।

पहली बात, वित्तीय पूँजी की जो वरीयता और निर्णायक भूमिका उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में स्थापित हुई थी, वह गत शताब्दी के आठवें दशक तक चरम वर्चस्व में रूपान्तरित हो चुकी थी। दुनिया भर में निवेशित कुल पूँजी का तीन-चौथाई से भी अधिक आज सट्टा बाज़ार, मीडिया, मनोरंजन उद्योग और अन्य अनुत्पादक कार्रवाइयों में लगा हुआ है। वित्तीय पूँजी ने वास्तविक उत्पादन से स्वतंत्र होकर सम्पूर्ण विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व कायम कर लिया है और कीन्स की आशंका को हूबहू साकार करते हुए, उद्योग सट्टेबाज़ी के भंवर में सतह पर तैरने वाला बुलबुला बनकर रह गया है। आज जो पूँजी का विश्वव्यापी प्रसार दीख रहा है, वह सट्टेबाज़ी, मुद्रा-बाज़ारों में ऋण-सर्जन में सतत् वृद्धि और मुद्रा-पूँजी के अन्तरराष्ट्रीय आवागमन के रूप में है। साम्राज्यवाद के दौर में पूँजी के जिस परजीवी, परभक्षी, अनुत्पादक और जुआड़ी चरित्र की चर्चा लेनिन ने की थी, वह उस समय से कई गुना अधिक हो चुकी है।

आज विश्व-स्तर पर बुर्जुआ जनवाद के बचे-खुचे मूल्यों के भी निश्शेष होने, तरह-तरह की मूलतत्त्ववादी-नवफ़ासीवादी राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के सिर उठाने, तर्कणा और मानववाद के विरुद्ध नानाविध सांस्कृतिक उपक्रमों-उद्यमों के जन्म लेने तथा साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में माल-अन्धभक्ति, निरंकुशता, अतर्कपरकता, कलावाद-रूपवाद और मानवद्रोही प्रवृत्तियों के नये-नये रूपों के उभरने की ज़मीन यही है।

विश्व-स्तर पर पूँजी का विकास शेयर बाज़ारों और जुआघरों का `बाई-प्रोडक्ट´ बन जाने के चलते संकट के विस्फोट और महाध्वंस का भय हमेशा साम्राज्यवादियों-पूँजीपतियों के सिर पर सवार रहता है। बीच-बीच की अल्पकालिक राहतों के बावजूद, दीर्घकालिक मन्दी का दौर विगत तीन दशकों से लगातार मौजूद है। कभी तेज़ कभी मद्धम होता व्यापार युद्ध, बड़े-बड़े घरानों में से कुछ के तबाह होने का या किसी और द्वारा निगल लिये जाने का तथा नई-नई इजारेदारियों के गठन का सिलसिला लगातार जारी है। उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों, पूर्वी यूरोप के देशों और भूतपूर्व सोवियत संघ के घटक देशों के बाज़ार को साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी के लिए पूरी तरह खोल दिया है और चीन में “बाज़ार समाजवाद” की पिपिहरी बजाने वाले नये शासकों ने भी उसके स्वागत के लिए लाल गलीचे बिछा दिए हैं, पर पश्चिमी पूँजी का अजीर्ण रोग लगातार मौजूद है।

भूतपूर्व समाजवादी देशों में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना और राजकीय पूँजीवाद के सोवियत “समाजवादी” ढाँचे के विघटन के बाद पश्चिमी ढंग के पूँजीवादी ढाँचे की स्थापना मुख्यत: उन देशों के आन्तरिक वर्ग-संघर्ष का परिणाम थी, लेकिन इसमें साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की तथा साम्राज्यवादी घुसपैठ, घेरेबन्दी और षड्यंत्र की भी एक अहम भूमिका थी। इसी प्रकार, उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के तहत, एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों के बाज़ारों में साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी खुला चरागाह बना देने, सार्वजनिक क्षेत्र के विघटन का बुर्जुआ राज्य की बची-खुची “कल्याणकारी” भूमिका के निरस्तीकरण और “श्रम-सुधारों” के पीछे साम्राज्यवादी देशों के दबाव के साथ ही इन देशों के सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग की अपनी आवश्यकता और विवशता भी है। इन देशों में सत्तासीन होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोधों का लाभ उठाते हुए और जनता को निचोड़कर राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा कर एक सीमा तक पूँजीवाद का विकास किया। अब यह सिलसिला संतृप्ति-बिन्दु तक जा पहुँचा था। नई तकनोलॉजी, पूँजी और बाज़ार की अपनी ज़रूरतों के चलते साम्राज्यवादियों के गिरोह के दिशा-निर्देशों पर चलना अब इनके सामने एकमात्र विकल्प था। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर का यही सारतत्त्व है। इस नये दौर में पूँजी का वैश्विक प्रवाह एकदम निर्बन्ध हो गया है। साम्राज्यवादी शोषण इस नये दौर में प्रत्यक्ष राजनीतिक शासन या नियंत्रण के माध्यम से काम नहीं कर रहा है। राजनीतिक-सामरिक बल-प्रयोग और दबाव का अनिवार्य पहलू मौजूद है, लेकिन साम्राज्यवादी शोषण की प्रक्रिया मुख्यत: उस विशाल अन्तर के ज़रिए काम करती है जो विकसित देशों और पिछड़े देशों की उत्पादक शक्तियों के बीच बना हुआ है।

भारत और तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों के पूँजीपति वर्ग के किसी भी हिस्से का अब राष्ट्रीय चरित्र नहीं रह गया है। साम्राज्यवाद से विनियोजित अधिशेष में अपने हिस्से को लेकर देशी पूँजीपति वर्ग के अन्तरविरोध मौजूद हैं और वे समय-समय पर उग्र भी हो जाते हैं। देश के भीतर इजारेदार और ग़ैर इजारेदार पूँजी के बीच, बड़ी और छोटी पूँजी के बीच भी अन्तरविरोध हैं, पर वे ग़ैरदुश्मनाना अन्तरविरोध हैं। पूँजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा अब साम्राज्यवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए जनता के अन्य वर्गों के साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है।

राष्ट्रीय प्रश्न की ही तरह भूमि-प्रश्न भी अब सामाजिक क्रान्ति के एजेण्डे पर अपने पूर्ववर्ती रूप में उपस्थित नहीं रह गया है। प्रतिक्रियावादी “प्रशियाई” मार्ग से प्राक्पूँजीवादी भूमि-सुधारों के रूपान्तरण का काम पूँजीवादी व्यवस्था में सम्भव हदों तक, मुख्यत: पूरा हो चुका है। पुराने सामन्ती भूस्वामियों का एक बड़ा हिस्सा पूँजीवादी भूस्वामी बन चुका है। पहले के बड़े काश्तकार आज के बड़े मालिक किसान-कुलक बन चुके हैं। किसान आबादी का तेज़ विभेदीकरण गत तीन दशकों की एक महत्त्वपूर्ण परिघटना है। निम्न-मध्यम और छोटे किसान उजड़कर सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की पाँतों में शामिल हो रहे हैं। उच्च-मध्यम किसान धनी किसानों की कतारों में शामिल हो रहे हैं। पिछले दशक के दौरान यह प्रक्रिया और अधिक तेज़ हो गई है। गाँवों में भी श्रम और पूँजी का अन्तरविरोध ही प्रधान हो गया है। जहाँ अभी पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था की संक्रमणशील स्थिति है, वहाँ भी यही स्थिति है। वहाँ से भारी संख्या में उजड़कर किसान आबादी शहरों और विकसित पूँजीवादी खेती वाले इलाकों की ओर पलायन कर रही है। सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के आज सिर्फ़ अवशेष ही मौजूद हैं। गाँवों में वित्तीय पूँजी की पैठ मज़बूत हुई है, वे राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी में आ गए हैं, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था की जड़ता टूट गई है और कृषि और सहायक क्षेत्रों में भी माल-उत्पादन प्रभावी प्रवृत्ति बन गई है।

इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारतीय मध्यवर्ग का भी विगत कुछ दशकों के दौरान तेज़ विस्तार और विभेदीकरण हुआ है। मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों (प्रोफेसरों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों, नौकरशाहों, विशेषज्ञों आदि का) का एक बड़ा हिस्सा आज पूरी तरह से व्यवस्था के पक्ष में खड़ा हो चुका है। आम नौकरीपेशा, तबाहहाल मध्यवर्गीय कतारों से यह एकदम अलग खड़ा है। मध्यवर्ग के निचले संस्तरों की करीबी मेहनतकश वर्गों से बन रही है, हालाँकि उनकी निराशा, पिछड़े मूल्यों, जातिगत संस्कारों आदि का लाभ उठाकर धार्मिक कट्टरपन्थी ताकतें उनके एक हिस्से को अपने प्रभाव में लेने में फ़िलहाल कामयाब हैं। उच्च मध्यवर्ग आज उदारीकरण-निजीकरण के प्रवक्ता-समर्थक और धुर प्रतिक्रियावादी संस्कृति के संवाहक के रूप में व्यवस्था से नाभिनालबद्ध है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि हमारा पिछड़ा हुआ पूँजीवादी समाज आज राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के बजाय एक ऐसी नई समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में है जिसकी अन्तर्वस्तु साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी है। राष्ट्रीय जनवाद के अधूरे पड़े काम भी आज इसी के कार्यभारों में समाहित हो गए हैं। इस काम में सर्वहारा वर्ग का साथ मुख्यत: गाँव और शहर की भारी ग़रीब आबादी देगी और मध्यवर्ग और मध्यम किसानों के नीचे के संस्तर देंगे। बीच के संस्तर ढुलमुल सहयोगी होंगे। पूंजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा, खुशहाल मालिक किसान और उच्च मध्यवर्ग अब किसी भी सूरत में मेहनतकशों के रणनीतिक संश्रयकारी नहीं बनेंगे।

लेनिन के समय और आज के समय के बीच का एक महत्त्वपूर्ण फर्क यह है कि राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियाँ आज विश्व सर्वहारा क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण संघटक तत्त्व नहीं रह गई हैं। एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के अर्द्धऔद्योगीकृत पिछड़े देश ही आज भी साम्राज्यवाद की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं, पर इनमें से अधिकांश देशों में सामाजिक क्रान्तियों का एजेण्डा बदल चुका है। अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण, विश्व-सर्वहारा क्रान्ति के दूसरे चक्र में, वस्तुगत परिस्थितियों की दृष्टि से, इन्हीं देशों में सम्भावित हैं, पर इन क्रान्तियों की अन्तर्वस्तु अब साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी होगी। ये देशी-विदेशी पूँजी के संश्रय के विरुद्ध केन्द्रित नई समाजवादी क्रान्तियाँ होंगी, जो न केवल चीनी क्रान्ति से, बल्कि कई मायनों में सोवियत समाजवादी क्रान्ति से भी भिन्न होंगी।

सामाजिक शक्तियों के इस नये ध्रुवीकरण के अनुसार ही सांस्कृतिक मोर्चे के कार्यभारों की बुनियादी रूपरेखा तय होगी। कहा जा सकता है कि आज हमारी लड़ाई राष्ट्रीय जनवादी संस्कृति की नहीं बल्कि सर्वहारा जनवादी संस्कृति की, या कहें कि सर्वहारा संस्कृति की है। अब लोगों को यह बताने का अनुकूल समय है कि सिर्फ़ सर्वहारा जनवाद ही वास्तविक जनवाद होता है, कि आज सिर्फ़ दो ही मुख्य सांस्कृतिक पक्ष हैं – पूँजी की संस्कृति का पक्ष और श्रम की संस्कृति का पक्ष, और लोगों को इन्हीं दो के बीच अपना पक्ष चुनना होगा। कला-साहित्य के दायरे में व्यक्तिवाद और अलगाव की संस्कृति पर निर्णायक प्रहार के लिए आज निजी स्वामित्व की नैतिकता पर ही प्रश्न खड़े करने होंगे, लोभ-लाभ, बाज़ार और माल के रहस्यवाद की संस्कृति के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करना होगा, सम्पत्ति सम्बन्धों की तफसीलों को प्रस्तुत करना होगा और बुर्जुआ अधिकारों तथा अन्तरवैयक्तिक असमानताओं की सामाजिक-ऐतिहासिक बुनियादों को उद्घाटित करना होगा। इन्हीं बुनियादी कार्यभारों के इर्दगिर्द हमें राजनीतिक सत्ता, साम्राज्यवादी लूट और षड्यंत्र आदि के भण्डाफोड़ के प्रचारात्मक और आन्दोलनात्मक, रुटीनी और फ़ौरी, सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्य भी संगठित करने होंगे। सामाजिक जीवन में जो सामन्ती सांस्कृतिक मूल्य मौजूद हैं, वे सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग और साम्राज्यवादियों के लिए एकदम उपयुक्त हैं, अत: उन्होंने उन सभी को अपनाकर अपने सांस्कृतिक तंत्र का अंग बना लिया है। तर्कणा और भौतिकवाद की जगह अन्धविश्वास, रहस्यवाद आदि ही आज बुर्जुआ वर्ग की ज़रूरत हैं। जाति-समस्या, दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न को भी आज इसी नज़रिए से देखना होगा। इन मुद्दों पर जनवादी सुधार की पैबन्दगीरी का समय बीत चुका है। ऐसा करना महज़ बुर्जुआ गुलामगीरी होगी। सामाजिक मुक्ति के ये बुनियादी प्रश्न समाजवादी परियोजना के अनिवार्य बुनियादी मुद्दे हैं।

साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की संस्कृति में भी आज कोई अन्तरविरोध नहीं है। दोनों में सहयोग और एकता है, और काफ़ी हद तक तो एकरूपता भी है। राष्ट्रवादी संस्कृति की ज़मीन से साम्राज्यवादी संस्कृति का विरोध आज इतिहास की बात बन चुका है। सामाजिक-आर्थिक संरचना और सामाजिक-राजनीतिक क्रान्ति के स्वरूप के आधार पर, जनपक्षधर संस्कृति कर्म की सर्वाधिक सामान्य रूपरेखा की इस चर्चा के बाद, हम पूँजी के भूमण्डलीकरण के इस नये दौर की कुछ और नई प्रवृत्तियों की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

हम समझते हैं कि साम्राज्यवाद की आज की अति उग्र आक्रामकता के पीछे उसकी शक्ति नहीं, बल्कि उसका असमाधेय ढाँचागत संकट है। समाजवाद की तात्कालिक विफलता, तीसरी दुनिया के शासक वर्गों की घुटनाटेकू मुद्राओं और विश्व-क्रान्ति की धारा की वर्तमान संकटग्रस्तता के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था में उछाल या त्वरण के कोई विश्वसनीय संकेत नहीं हैं। साझा हितों के लिए, एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका में अमेरिकी सामरिक हस्तक्षेपों और कुचक्रों के पीछे सभी साम्राज्यवादी देश एकजुट दीखते हैं, लेकिन यह दौर-विशेष की विशिष्टता है। साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोध एक बार फिर गहरा रहे हैं और आने वाले दिनों में नये व्यापार-युद्धों और शक्ति-समीकरणों के संकेत अभी से मिलने लगे हैं।

अत: कहा जा सकता है कि ऊपरी तौर पर एकतरफ़ा ढंग से पूरी दुनिया की जनता पर हावी दीखता साम्राज्यवाद अन्दर से खोखला हो रहा है। यह आज भी कागजी बाघ ही है, बल्कि पहले से भी अधिक कागजी है। आज यह अपनी जड़ता की शक्ति से जीवित है और इसलिए जीवित है कि सर्वहारा क्रान्तियों और समाजवादी प्रयोगों का सिलसिला, पहले चक्र की विफलता के बाद, अभी फिर से गतिमान नहीं हो सका है।

इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय और पुनरुत्थान का यह समय अभूतपूर्व संकट का समय है। बुर्जुआ क्रान्तियों के प्रवाह को भी पराजय और पुन:स्थापन के दौरों से गुज़रना पड़ा था पर उनका संकट इतना विकट और लम्बा नहीं था। लेकिन जो क्रान्ति दूरगामी तौर पर, सहशताब्दियों लम्बे, वर्ग-समाज के समूचे इतिहास के विरुद्ध निर्देशित है, जो इतिहास की सर्वाधिक युगान्तरकारी और पहली `सचेतन क्रान्ति´ है, उसकी अवधि लम्बी होना, कठिनाइयाँ विकट होना, पराजय प्रचण्ड होना और रास्ता जटिल और आरोह-अवरोहपूर्ण होना, ऐतिहासिक दृष्टि से स्वाभाविक प्रतीत होता है।

विगत लगभग दो शताब्दियों के विश्व-इतिहास का समाहार करते हुए कहा जा सकता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच विश्व-ऐतिहासिक महासमर के पहले चक्र की शुरुआत हुई। पेरिस कम्यून (1871), अक्टूबर क्रान्ति (1917) और चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति (1966-76) इस यात्रा के तीन महानतम कीर्ति स्तम्भ – तीन मील के पत्थर थे। रूस में स्तालिन की मृत्यु के बाद संशोधनवादी पार्टी और राज्य पर काबिज हो गए और वहाँ समाजवाद का मुखौटा कायम रखते हुए नये नौकरशाह बुर्जुआ वर्ग ने राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा किया। एक ओर सामाजिक साम्राज्यवादी सोवियत संघ ने विश्व के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों के साथ विश्वासघात किया तथा उन्हें विघटित करने और अपना पिछलग्गू बनाने की कोशिश की। दूसरी ओर पश्चिमी साम्राज्यवादी शिविर के सामने एक चुनौती प्रस्तुत करके और साम्राज्यवादी शिविर के अन्तरविरोधों को उग्र बनाकर उसने वस्तुगत तौर पर विश्व-पूँजीवाद के संकट को बढ़ाने का काम भी किया। साथ ही, सोवियत संघ की मौजूदगी और दो अतिमहाशक्तियों के शिविरों के बीच की उग्र प्रतिस्पर्धा का लाभ पिछड़े देशों के शासक वर्गों ने भी उठाया। पश्चिमी खेमे की थोपी गई शर्तों का आंशिक विरोध सोवियत “सहायता” के सहारे करने में वे सफल रहे। सोवियत संघ में और पूर्वी यूरोप के देशों में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद भी चीन में सर्वहारा सत्ता की मौजूदगी और समाजवादी प्रयोगों के सिलसिले से पूरी दुनिया में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों और सर्वहारा क्रान्तियों की धारा को प्रेरणा और संवेग मिलता रहा। सोवियत संघ और अपने देश के प्रयोगों के विश्लेषण के आधार पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और माओ त्से-तुङ ने समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को उद्घाटित करने और पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने के उपाय विकसित करने और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के रूप में उन्हें अमल में लाने का युगान्तरकारी काम किया। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद वहाँ भी पूँजीवादी पुनर्स्थापना हो गई। इसका मुख्य कारण यह था कि 1949 से लेकर सांस्कृतिक क्रान्ति शुरू होने तक, वहाँ भी बुर्जुआ वर्ग ने समाज में अपने आधार के विस्तार के साथ ही पार्टी और राज्य के भीतर भी अपने समान्तर सदर मुकाम कायम कर लिए थे। दूसरे, अनुकूल विश्व-परिस्थितियों से भी उन्हें शक्ति मिली। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो सर्वहारा क्रान्ति के पहले संस्करणों की पराजय अप्रत्याशित नहीं लगती। मार्क्स-एंगेल्स और लेनिन ने पहले भी इस बात की चर्चा की थी कि समाजवादी संक्रमण की दीर्घावधि में वर्ग-संघर्ष लगातार जारी रहेगा, पूँजीवादी पुनर्स्थापना के ख़तरे लम्बे समय तक मौजूद रहेंगे। लेनिन ने पूँजीवादी पुनर्स्थापना के विभिन्न स्रोतों का उल्लेख किया था। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान माओ ने एकाधिक बार कहा था कि पूंजीवादी तत्त्वों के सत्तासीन होने की सम्भावनाएँ लम्बे समय तक मौजूद रहेंगी और समाजवाद की निर्णायक विजय के लिए कई सांस्कृतिक क्रान्तियों की आवश्यकता होगी। इस दृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र का, पराजय के रूप में समापन मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि को सत्यापित ही करता है। क्रान्तियों के विगत प्रयोगों की विफलता विचारधारा की पराजय नहीं है। पूँजीवाद इतिहास का अन्त नहीं है। यह स्वयं अपने भीतर से समाजवाद की आवश्यकता पैदा करता है। और उसकी वाहक शक्तियों को भी। विश्व पूँजीवाद की वर्तमान स्थिति स्वयं इसका प्रमाण है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच वर्ग-महासमर का पहला विश्व-ऐतिहासिक चक्र 1976 में चीन में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद समाप्त हो गया और अब दूसरे विश्व-ऐतिहासिक चक्र की शुरुआत हो चुकी है। इन दो चक्रों के बीच के संक्रमण-काल में एक महत्त्वपूर्ण घटना यह घटी है कि समाजवाद के नाम पर कायम, सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के राजकीय पूँजीवादी ढाँचे विघटित हो गए हैं। चीन के “बाज़ार समाजवाद” का पूँजीवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा हुआ है और यह तय है कि देर-सबेर इसे भी विघटित हो जाना है। समाजवाद के बारे में भ्रम पैदा करने वाले स्रोत समाप्त हो गए हैं। इधर भूण्डलीकरण के दौर में ऐसी स्थिति पैदा हुई है कि संशोधनवाद, सामाजिक जनवाद, अर्थवाद, ट्रेड यूनियनवाद आदि की सीमाएँ भी मेहनतकश जनता को स्पष्टत: दीखने लगी हैं और उसे यह बताने के लिए अनुकूल स्थितियाँ तैयार हुई हैं कि वास्तविक प्रश्न राज्यसत्ता का है, राजनीतिक संघर्ष का है। संशोधनवादी-सुधारवादी प्रवृत्तियों का आधार मध्यवर्ग और कुलीन मज़दूरों में मौजूद है, पर उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की चपेट में इनका भी एक हिस्सा अब आने लगा है और उसकी चेतना का भी `रैडिकलाइज़ेशन´ हो रहा है। परम्परागत चुनावी वामपन्थी और ट्रेड-यूनियन सुधारवाद की, व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति के रूप में प्रभाविता कम होने के साथ ही साम्राज्यवाद और पूँजीवादी व्यवस्था ने इधर नये सिरे से एन.जी.ओ.-सुधारवाद के रूप में एक नई सुरक्षा-पंक्ति खड़ी करने की कोशिश की है। एन.जीओ. व्यवस्था-विरोध का छद्म खड़ा करते हुए एक नये `सेफ्टी वॉल्व´ का और `ट्रोजन हॉर्स´ का काम कर रहे हैं, जनहित के कार्यों से बुर्जुआ राज्यसत्ता को पूरी तरह पीछे हटने का मौका दे रहे हैं, और साथ ही, सस्ता श्रम निचोड़ने का ज़रिया भी बने हुए हैं। इनका विश्वव्यापी नेटवर्क फण्ड-बैंक-डब्ल्यू.टी.ओ. की तिकड़ी का ही अनिवार्य पूरक तंत्र है। यह आश्चर्यजनक नहीं कि पुराने गांधीवादियों-समाजवादियों से लेकर नकली वामपिन्थयों और भगोड़ों की सभी किस्में आज एन.जी.ओ. के साथ मधुयामिनी मना रही हैं।

सर्वहारा क्रान्ति के दो विश्व ऐतिहासिक चक्रों के बीच की विशिष्टता यह रही है कि उसने समाजवाद को बदनाम करने वाले नकली लाल झण्डे को चींथकर धूल में फेंक दिया है, सुधारवाद और “कल्याणकारी राज्य” के कीन्सियाई नुस्खों की असलियत साफ़ कर दी है और विश्व पूँजीवाद की घोर मानवद्रोही बर्बरता को एकदम उजागर कर दिया है। एक बार फिर, उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप की तरह, पूरी दुनिया में श्रम और पूँजी की ताकतें एकदम आमने-सामने खड़ी हैं। साम्राज्यवादी भेड़िये और तीसरी दुनिया के देशों में सत्तारूढ़ उनके छुटभैये मेहनतकशों से अतिलाभ निचोड़ते हुए उनके एक बड़े हिस्से को लगातार सड़कों पर धकेल रहे हैं और तबाह कर रहे हैं। दूसरी ओर विश्व स्तर पर युद्ध और विनाश का जो कहर वे बरपा कर रहे हैं, वह कुल मिलाकर विश्वयुद्धों की तबाही से कम नहीं है। दूसरी ओर, दुनिया के पिछड़े देशों से लेकर समृद्ध देशों तक में एक बार फिर विद्रोह का लावा खौल रहा है। जगह-जगह जन-उभारों और आन्दोलनों के ज्वार भी उठने लगे हैं। इस पूरी स्थिति का समस्यापरक पक्ष यह है कि सर्वहारा क्रान्ति की मनोगत शक्तियाँ अभी कमज़ोर और बिखरी हुई हैं। विगत पराजयों का सार-संकलन अभी पूरा नहीं हुआ है। साथ ही, नई सर्वहारा क्रान्तियों की प्रकृति और रास्ते को समझने के लिए, परिस्थितियों में आए नये बदलावों को समझने का काम भी अभी बहुत कम हुआ है। लेकिन, ठहराव के दौर के संकटों और चुनौतियों के बजाय आज हम एक नई शुरुआत के दौर के संकटों और चुनौतियों के रूबरू खड़े हैं। इसी नये दौर के कार्यभारों को हम एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और नये सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभारों के रूप में देख-समझ रहे हैं।

एकदम ठोस शब्दों में कहें कि सर्वहारा क्रान्ति के नए संस्करण की सर्जना के लिए हमें सबसे पहला काम यह करना है कि अतीत की सर्वहारा क्रान्तियों और संघर्षों के इतिहास को विस्मृति के अँधेरे से बाहर लाना है, तमाम मिथ्या-प्रचारों और विभ्रमों की धूल-राख उड़ाकर उसे जनता के सामने प्रस्तुत करना है। हमें सर्वहारा क्रान्ति की विचारधारा के बारे में फैलाई जा रही भ्रान्तियों और झूठे प्रचारों का प्रतिकार करते हुए उसे मेहनतकश जनता के वर्ग-सचेत संस्तरों तक और उनके पक्ष में खड़े परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों तक लेकर जाना है। यह सर्वहारा पुनर्जागरण का पक्ष है। एक नये सर्वहारा प्रबोधन के केन्द्रीय कार्यभार क्या हैं? हमें सर्वहारा वर्ग की विचारधारा को आज के विश्व-ऐतिहासिक सन्दर्भों में जानना-समझना है। मार्क्सवाद एक गत्यात्मक विज्ञान है। अतीत की क्रान्तियों का अध्ययन हम भविष्य की क्रान्तियों के लिए कर रहे हैं। महानतम क्रान्तियों का भी अनुकरण नई क्रान्तियों को जन्म नहीं दे सकता। अतीत के प्रयोगों से सीखते हुए स्थितियों में आए परिवर्तनों को सदा-सर्वदा ध्यान में रखना होता है। और फिर नये चक्र की सर्वहारा क्रान्तियों का रंगंमच तो पूर्व की अपेक्षा कई महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ लिये हुए है। इतिहास के अध्ययन, वर्तमान जीवन के अध्ययन और सामाजिक प्रयोगों के त्रिकोणात्मक संघातों के बीच ही नई क्रान्तियों के मार्गदर्शक सूत्र और रणनीति का विकास होगा। यह समय घनघोर वैचारिक बहस-मुबाहसे का होगा। साथ ही, यह जनता के बीच शिक्षा और प्रचार का तथा प्रारिम्भक स्तर के सामाजिक प्रयोग का समय होगा। यही नये सर्वहारा प्रबोधन का केन्द्रीय कार्यभार है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये दोनों कार्यभार अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ गुंथे-बुने हैं और इन्हें साथ-साथ अंजाम दिया जाएगा। यह भी स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि यह पूरी प्रक्रिया सर्वहारा क्रान्ति की हरावल शक्ति को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया की सहवर्ती होगी, पूर्ववर्ती या अनुवर्ती नहीं।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’

शिशिर-बसंत 2002 से साभार

दर्शन के प्रश्नों पर

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वार्ता विशेष

माओ त्से-तुङ

18 अगस्त, 1964


यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अपने कुछ वरिष्ठ कामरेडों के साथ माओ त्से-तुङ की एक अनौपचारिक वातचीत का पाठ है जिसमें उन्होंने चीन में समाजवादी निर्माण की समस्याओं और समाजवादी समाज में जारी वर्ग संघर्ष से जोड़ते हुए कुछ दार्शनिक प्रश्नों पर, ख़ासकर द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के बारे में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विचार व्यक्त किये हैं। बातचीत का ढंग अनौपचारिक है और वार्ता में अनेक विषयों को छुआ गया है लेकिन यहाँ की गयी बातें बेहद गम्भीर और विचारोत्तेजक हैं। -सं

जब वर्ग संघर्ष हो तभी दर्शन भी सम्भव हो सकता है। व्यवहार से अलग ज्ञानमीमांसा की चर्चा करना समय की बर्बादी है। दर्शन का अध्ययन करने वाले कामरेडों को देहात में जाना चाहिए। उन्हें इन सर्दियों में या अगले वसन्त में वहाँ जाकर वर्ग संघर्ष में हिस्सा लेना चाहिए। जिनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है उन्हें भी जाना चाहिए। वहाँ जाने से लोग मर नहीं जायेंगे। बस इतना होगा कि उन्हें सर्दी लग जायेगी, और अगर वे कुछ अतिरिक्त कपड़े पहन लेंगे तो कोई दिक्कत नहीं होगी।

फ़िलहाल विश्वविद्यालयों में वे जिस तरह से इसका अध्ययन करते हैं किताब से किताब तक, एक अवधारणा से दूसरी अवधारणा तक जाते हुए, वह किसी काम का नहीं है। दर्शन किताबों से कैसे आ सकता है? मार्क्सवाद के तीन बुनियादी संघटक हैं वैज्ञानिक समाजवाद, दर्शन और राजनीतिक अर्थशास्त्र।[1] इसका आधार है समाज विज्ञान, वर्ग संघर्ष। सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच संघर्ष है। मार्क्स और दूसरे लोगों ने इसे देखा था। यूटोपियाई समाजवादी हमेशा बुर्जुआ वर्ग को उदार होने के लिए राज़ी करने की कोशिश करते है। यह नहीं चलेगा, सर्वहारा के वर्ग संघर्ष पर भरोसा करना ज़रूरी है। उस समय, कई हड़तालें हो चुकी थीं। इंग्लैण्ड की संसदीय जाँच ने पाया कि बारह घण्टे काम का दिन पूँजीपतियों के हित के लिए आठ घण्टे काम के दिन के मुकाबले कम अनुकूल है। इसी दृष्टिकोण से आरम्भ करके मार्क्सवाद सामने आया। बुनियाद तो वर्ग संघर्ष है। दर्शनशास्त्र का अध्ययन इसके बाद ही हो सकता है। किसका दर्शन? बुर्जुआ वर्ग का दर्शन, या सर्वहारा वर्ग का दर्शन? सर्वहारा वर्ग का दर्शन मार्क्सवादी दर्शन है। सर्वहारा वर्ग का अर्थशास्त्र भी है, जिसने क्लासिकीय अर्थशास्त्र को बदल डाला है। जो लोग दर्शनशास्त्र से जुड़े हैं, वे मानते हैं कि दर्शन का स्थान पहले है। उत्पीड़क उत्पीड़ितों का उत्पीड़न करते हैं, जबकि उत्पीड़ितों को दर्शन की तलाश शुरू करने से पहले उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ने और उससे निकलने का रास्ता तलाश करना पड़ता है। जब लोगों ने इसे अपना प्रस्थान बिन्दु बनाया तभी मार्क्सवाद- लेनिनवाद सामने आया और तभी उन्हें दर्शन का पता चला। हम सब इससे होकर गुज़रे हैं। दूसरे लोग मुझे मारना चाहते थे( च्याङ काई-शेक मुझे मारना चाहता था। इस तरह हम वर्ग संघर्ष में शामिल हुए, हमने दार्शनिक ढंग से सोचना शुरू किया।

विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को इन सर्दियों में (देहात में – अनु.) जाना शुरू कर देना चाहिए -मैं समाज विज्ञानों की बात कर रहा हूँ। प्राकृतिक विज्ञान के विद्यार्थियों को अभी नहीं भेजना चाहिए, हालाँकि हम एक-दो बार उन्हें भेज सकते हैं। समाज विज्ञानों – इतिहास, राजनीतिक अर्थशास्त्र, साहित्य, कानून – का अध्ययन करने वाले सभी लोगों को, हरेक को जाना चाहिए। प्रोफेसरों, असिस्टेण्ट प्रोफेसरों, प्रशासनिक कर्मचारियों और विद्यार्थियों सभी को, पाँच महीने की सीमित अवधि के लिए जाना चाहिए। अगर वे पाँच महीने के लिए कारखानों में जायेंगे, तो वे कुछ बोधात्मक ज्ञान हासिल करेंगे। घोड़े, गायें, भेड़ें, मुर्गियाँ कुत्ते, सुअर, धान, ज्वार, सेम, गेहूँ, बाजरे की किस्में, इन सब चीज़ों को वे देख सकेंगे। यदि वे सर्दियों में जायेंगे, तो फसल नहीं देख पायेंगे, पर कम से कम वे जमीन और लोगों को देख सकेंगे। वर्ग संघर्ष का अनुभव हासिल करना – मैं इसे ही विश्वविद्यालय कहता हूँ। लोग बहस करते हैं कि कौन- सा विश्वविद्यालय बेहतर हं, पीकिङ विश्वविद्यालय या `जन विश्वविद्यालय´।[2] जहाँ तक मेरी बात है, मैं तो खुले मैदानों के विश्वविद्यालय का स्नातक हूँ, मैंने वहीं थोड़ा-बहुत सीखा है। अतीत में मैंने कनफ़्यूशियस का अध्ययन किया और चार पुस्तकों तथा पाँच शास्त्रों पर छह वर्ष ख़र्च किये।[3] मैंने उन्हें रट लिया, पर मैंने उन्हें समझा नहीं। उस समय, मुझे कनफ़्यूशियस में गहरा विश्वास था, और मैंने लेख भी लिखे (उसके विचारों को स्पष्ट करते हुए) बाद में मैं सात वर्ष तक एक बुर्जुआ स्कूल में गया। सात धन छह बराबर तेरह वर्ष होते हैं। मैंने आम तौर पर पढ़ाई जानेवाली सारी बुर्जुआ चीज़ों का अध्ययन किया – प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञानों को। थोड़ा शिक्षाशास्त्र भी सिखाते थे। इसमें पाँच वर्ष नार्मल स्कूल में दो वर्ष मिडिल स्कूल में और साथ ही पुस्तकालय में बिताया गया मेरा समय शामिल है।[4] उस समय मैं काण्ट के द्वैतवाद, खासकर उसके प्रत्ययवाद में विश्वास करता था। मूलत: मैं एक सामन्तवादी और बुर्जुआ लोकतन्त्र का समर्थक था। समाज ने मुझे क्रान्ति में भाग लेने की ओर धकेला। मैंने प्राथमिक स्कूल के शिक्षक और एक चार-वर्षीय स्कूल के प्रिंसिपल के रूप में कुछ वर्ष बिताये। मैंने एक छह-वर्षीय स्कूल में इतिहास और चीनी भाषा भी पढ़ाई। मैंने थोड़े समय तक एक मिडिल स्कूल में भी पढ़ाया, पर मैं कुछ भी समझता नहीं था। जब मैं कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुआ, तो मैं जानता था कि हमें क्रान्ति करनी है, पर किसके खिलाफ? और हम ऐसा करेंगे कैसे? बेशक हमें साम्राज्यवाद ओर पुराने समाज के खिलाफ क्रान्ति करनी थी। मुझे ठीक से यही नहीं पता था कि साम्राज्यवाद किस किस्म की चीज़ है, और इस बात की तो और भी कम समझ थी कि हम इसके खिलाफ क्रान्ति कैसे करेंगे। मैं तेरह वर्षों में जो कुछ भी सीखा था, उसमें से कुछ भी क्रान्ति करने के लिए किसी काम का नहीं था। मैंने एकमात्र औज़ार – भाषा – का इस्तेमाल किया। लेख लिखना एक औज़ार है। जहाँ तक मेरे अध्ययनों का सवाल है, मैंने उसका बिल्कुल भी प्रयोग नहीं किया। कनफ़्यूशियस कहता था : सदाशयता मानवजाति का अभिलाक्षणिक गुण है। सदाशयी व्यक्ति दूसरों से प्रेम करता है।[5] वह किससे प्रेम करता था? सभी मनुष्यों से? ऐसा कतई नहीं था। क्या वह शोषकों से प्रेम करता था? बिल्कुल ऐसा भी नहीं था। वह शोषकों के सिर्फ़ एक हिस्से से प्रेम करता था। वरना, कनफ़्यूशियस कोई ऊँचा अधिकारी क्यों न बन सका? लोग उसे नहीं चाहते थे। वह उन्हें प्रेम करता था और चाहता था कि वे एकजुट हो जायें। लेकिन जब भुखमरी की, और (इस उक्ति) `श्रेष्ठ व्यक्ति ग़रीबी को झेल सकता है´ की बात आयी, तो वह मरते-मरते बचा। कुआङ के लोग उसे मार डालना चाहते थे।[6] ऐसे लोग भी थे जो चिन की पश्चिम की यात्रा पर साथ न जाने के लिए उसकी आलोचना करते थे। वास्तव में, `गीति-काव्यों की पुस्तक´ (बुक ऑफ ओड्स) में शामिल कविता `सातवें माह में अग्नि तारा भूमध्य रेखा को पार करता है´ में शेन्सी की घटनाओं का उल्लेख है। `पीला पक्षी´ कविता में उस घटना की चर्चा है जब चिन के युवराज मू के तीन उच्च अधिकारियों को मारकर उसी के साथ दफना दिया गया था।[7] सू-मा चिरोन [8]की `गीति-काव्यों की पुस्तक´ के बारे में बहुत अच्छी राय थी। वह कहता था कि इसकी 300 कविताएँ प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों ने जागृत अवस्था में लिखी थीं। `गीति-काव्यों की पुस्तक´ की कविताओं का एक बड़ा हिस्सा राज्यों की शैली में लिखा गया है, वे आम लोगों के लोकगीत है, ऋषि-मुनि और कोई नहीं बल्कि आम लोग ही हैं। `जागृत अवस्था में लिखी थीं´ का मतलब यह है कि जब किसी व्यक्ति का हृदय क्रोध से भर उठता था तब वह कविता लिखता था!

तुम न बोते हो न काटते हो;

फिर तुम्हारे तीन सौ कोठार धान से कैसे भरे रहते है?

तुम शिकार में कभी दौड़ते नहीं हों;

फिर तुम्हारे अहाते में तीतर लटकते कैसे दिखते हैं?

ओ श्रेष्ठ मनुष्य!

वह अपनी अकर्मण्यता की रोटी

नहीं खाता![9]

`काम के न काज के, दुश्मन अनाज के´ कहावत यहीं से पैदा हुई। यह कविता देवताओं को दोषी ठहराती है और शासकों का विरोध करती है। कनफ़्यूशियस थोड़ा जनवादी भी था। उसने (`गीति-काव्यों की पुस्तक´ में) स्त्री-पुरुष के प्रेम के बारे में कविताओं को भी शामिल किया है। अपनी टिप्पणियों में, चू सि ने उन्हें गुप्त प्रेम सम्बन्धों के रूप में वर्णित किया है।[10] वास्तव में, कुछ ऐसे हैं और कुछ नहीं हैं, जो ऐसे नहीं हैं। उनमें राजकुमार और प्रजा के सम्बन्धों के बारे में लिखने के लिए पुरुष और स्त्री के बिम्बों का प्रयोग किया गया है। पाँच राजवंशों और दस काउन्टियों के काल में शू (आज का शेच्वान) में `चिन की पत्नी सर्दियों का रोना रोती है´ शीर्षक ऐवेई चुआङ की एक कविता थी।[11] उसने अपनी युवावस्था में इसे लिखा था और यह अपने राजकुमार के लिए उसकी विरह वेदना के बारे में है।

देहात में जाने के मामले पर लौटते है। लोगों को इन सर्दियों और वसन्त से शुरू करके, समूहों में और बारी-बारी से, वर्ग संघर्ष में भाग लेने के लिए जाना चाहिए। सिर्फ़ इसी ढंग से वे कुछ सीख सकते है, क्रान्ति के बारे में सीख सकते है। आप बुद्धिजीवी लोग सारा दिन अपने सरकारी दफ्तरों में बैठते हैं, अच्छा खाते हैं, अच्छा पहनते हैं, पैदल तक नहीं चलते हैं। इसीलिए आप बीमार पड़ते हैं। कपड़े, भोजन, मकान और व्यायाम की कमी बीमारी पैदा करने वाले चार बड़े कारण हैं। अगर अच्छी जीवन स्थितियों का भोग करने की हालत में तब्दीली लाकर, आप कुछ बुरी स्थितियों में जाते हैं, अगर आप वर्ग संघर्ष में हिस्सा लेने के लिए जाते हैं, अगर आप `चार सफाई अभियानों´ और `पाँच विरोध अभियानों´[12] के बीच जाते हैं और कठोर बनने के एक दौर से गुजरते हैं, तो आप बुद्धिजीवी लोग एक नये रूप में नजर आयेंगे।

अगर आप वर्ग संघर्ष में नहीं लगे हैं, तो आप भला किस दर्शन को लेकर चल रहे हैं?

क्यों न वहाँ जाकर इसे आज़मायें? अगर आपकी बीमारी ज्यादा गम्भीर हो जाये तो आप वापस आ जाइयेगा – आपको मरने की हालत में पहुँच जाने को निर्धारक रेखा बनाना चाहिए। जब आप इतने बीमार हो जाये कि मरने वाले हों तो आपको वापस आ जाना चाहिए। जैसे ही आप वहाँ जायेंगे, आपमें कुछ जोश आ जायेगा। (काङ शेङ बीच में बोलते हैं : `दर्शन और समाज विज्ञान विभागों के शोध संस्थानों और विज्ञान अकादमी को भी जाना चाहिए। फ़िलहाल, वे प्राचीन वस्तुओं के अध्ययन हेतु संस्थानों में तब्दील हो जाने, धूप-लोहबान के चढ़ावों से पोषण पाने वाले परीलोक में तब्दील हो जाने के कगार पर हैं। दर्शनशास्त्र संस्थान का कोई भी व्यक्ति कुआङ-मिङ जि-पाओ नहीं पढ़ता।´) मैं सिर्फ़ कुआङ-मिङ जि-पाओ और वेन-हुई पाओ[13] ही पढ़ता हूँ, मैं पीपुल्स डेली नहीं पढ़ता, क्योंकि पीपुल्स डेली में सैद्धान्तिक लेख नहीं छपते( जब हम कोई प्रस्ताव पारित करते हैं, तब वे उसे प्रकाशित करते हैं। लिबरेशन आर्मी डेली जीवन्त है, यह पठनीय है। (कामरेड काङ शेङ: `साहित्य संस्थान चाउ कुचेङ[14] पर कोई ध्यान नहीं देता, और अर्थशास्त्र संस्थान सुन येह-फाङ[15] और लिबरमैनिज्म की ओर उसके झुकाव, पूँजीवाद की ओर उसके झुकाव पर ध्यान नहीं देता।´)

उन्हें पूँजीवाद की ओर जाने दीजिये। समाज बहुत जटिल है। अगर हर कोई सिर्फ़ समाजवाद की ओर जाये, और पूँजीवाद की ओर न जाये, तो क्या यह ज्यादा ही सरल नहीं होगा? तब क्या हमारे यहाँ विरोधों की एकता ख़त्म नहीं हो जायेगी, और सिर्फ़ एकांगिकता ही नहीं रह जायेगी? उन्हें ऐसा करने दीजिये। उन्हें हम पर पागलपनभरे हमले करने दीजिये, सड़कों पर प्रदर्शन करने दीजिये, हथियार उठाकर बगावत करने दीजिये – मैं इन सब चीज़ों का समर्थन करता हूँ। समाज बहुत जटिल है, एक भी ऐसा कम्यून, एक भी सिएन, केन्द्रीय कमेटी का एक भी ऐसा विभाग नहीं है, जहाँ हम एक को दो में नहीं बाँट सकते। जरा देखिये क्या ग्रामीण कार्य विभाग को भंग नहीं कर दिया गया है?[16] यह पूरी तरह व्यक्तिगत गृहणियों के आधार पर लेखा-जोखा करने और `चार महान स्वतन्त्रताओं – धन उधार देने, व्यापार करने, श्रम भाड़े पर लेने और जमीन की खरीद-फरोख्त करने की स्वतन्त्रता – का प्रचार करने में जुटा हुआ था। अतीत में, उन्होंने (इस आशय की) एक घोषणा जारी की थी। तेङ त्जू-हुई का मुझसे विवाद हुआ था। केन्द्रीय कमेटी की एक बैठक में उन्होंने चार महान स्वतन्त्रताओं को लागू करने का विचार प्रस्तुत किया था[17]

नव जनवाद को सुदृढ़ करना, और इसे निरन्तर सुदृढ़ करते जाना, पूँजीवाद पर अमल करना है।[18] नव जनवाद सर्वहारा के नेतृत्व में एक बुर्जुआ-जनवादी क्रान्ति है। यह सिर्फ़ भूस्वामियों और दलाल पूँजीपतियों को छूती है, राष्ट्रीय पूँजीपति वर्ग को तो यह हाथ भी नहीं लगाती। जमीन का बँटवारा करना और उसे किसानों को दे देना सामन्ती भूस्वामियों की सम्पत्ति को किसानों की व्यक्तिगत सम्पत्ति में तब्दील करना है, और यह बुर्जुआ क्रान्ति के दायरे में ही आता है। जमीन का बँटवारा कोई बड़ी बात नहीं है – मैकआर्थर ने जापान में ऐसा किया। नेपोलियन ने भी जमीन का बँटवारा किया था। भूमि सुधारों से पूँजीवाद का खात्मा नहीं हो सकता। न ही इससे समाजवाद आ सकता है।

अभी हम जिस अवस्था में हैं उसमें एक तिहाई सत्ता दुश्मन या दुश्मन के हमदर्दों के हाथों में है। हम लोग पन्द्रह वर्षों से लगे हुए हैं औ अब दो-तिहाई शासन-सूत्र हमारे नियन्त्रण में हैं। आज की स्थिति में, आप एक (पार्टी) ब्रांच सेक्रेटरी को सिगरेट के चन्द पैकेटों से ख़रीद सकते हैं, अपनी बेटी का उससे ब्याह कर देने पर तो खैर कहना ही क्या। कुछ ऐसे इलाके हैं जहाँ भूमि सुधार शान्तिपूर्ण ढंग से पूरा किया गया, और भूमि सुधार टोलियाँ बहत कमजोर थीं( अब आप देख सकते हैं कि वहाँ ढेरों समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं।

मुझे दर्शन के बारे में सामग्रियाँ मिल गयी हैं। (यहाँ अन्तरविरोधों की समस्या पर सामग्रियों का ज़िक्र है – स्टेनोग्राफ़र की टिप्पणी।) मैंने रूपरेखा पर एक नजर डाली है। (यहाँ `दो को एक में मिलाओ´ की आलोचना करते हुए एक लेख की रूपरेखा का जिक्र है – स्टेनोग्राफर की टिप्पणी।)[19] मैं शेष को नहीं पढ़ पाया हूँ। मैंने विश्लेषण और संश्लेषण के बारे में सामग्रियों को भी देखा है। विपरीत तत्वों की एकता के नियम, बुर्जुआ वर्ग इसके बारे में क्या कहता है, मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्तालिन इसके बारे में क्या कहते हैं, संशोधनवादी इसके बारे में क्या कहते हैं, उन पर इस तरह की सामग्री इकट्ठा करना अच्छी बात है। जहाँ तक बुर्जुआ वर्ग की बात है, याङ सिएन-चेन इसकी बात करता है, और पहले हीगेल इसकी बात करते थे। ऐसे लोग पुराने जमाने में होते थे। अब तो वे और भी बुरे हैं। बोग्दोनोव और लुनाचार्स्की भी थे, जो देववाद (Deism) की बात करते थे। मैंने बोग्दानोव का अर्थशास्त्र पढ़ा है कि आदिम संचय वाले हिस्से को उन्होंने ठीक माना था। (काङ शेङ : `बोग्दानोव के आर्थिक सिद्धान्त शायद आधुनिक संशोधनवाद के आर्थिक सिद्धान्तों से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध थे। काउत्स्की के आर्थिक सिद्धान्त ख्रुश्चेव के आर्थिक सिद्धान्तों से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध थे, और युगोस्लाविया भी सोवियत संघ से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध हैं आखिरकार, जिलास ने स्तालिन के बारे में कुछ अच्छी बातें कहीं थी, उसने कहा था कि चीनी समस्याओं पर स्तालिन ने आत्मालोचना की थी।´)

स्तालिन ने महसूस किया था कि चीनी समस्याओं के सम्बन्ध में उनसे गलतियाँ हुई, और वे कोई छोटी गलतियाँ नहीं थीं। हम करोड़ों लोगों की आबादी वाला विशाल देश हैं, और उन्होंने हमारी क्रान्ति का, और सत्ता पर हमारे कब्जा करने का विरोध किया। हमने पूरे देश में सत्ता पर कब्जा करने के लिए बरसों तक तैयारी की, समूचा जापान-विरोधी युद्ध एक तैयारी थी। अगर आप उस दौर के केन्द्रीय कमेटी के दस्तावेजों को देखें, `नव जनवाद के बारे में´ सहित, तो यह बात एकदम साफ हो जायेगी। कहने का मतलब कि आप बुर्जुआ वर्ग का अधिनायकत्व कायम नहीं कर सकते, आप सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में नव जनवाद ही कायम कर सकते हैं, आप सर्वहारा के नेतृत्व में लोक जनवादी अधिनाकत्व ही कायम कर सकते है। हमारे देश में, अस्सी वर्ष तक, बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में की गयी सभी जनवादी क्रान्तियाँ असफल रहीं। हमारे नेतृत्व में जनवादी क्रान्ति निश्चित ही विजयी होगी। एकमात्र रास्ता यही है, और कोई रास्ता नहीं है। यह पहला कदम है। दूसरा कदम समाजवाद के निर्माण का होगा। इस तरह, `नव जनवाद के बारे में´ एक सम्पूर्ण कार्यक्रम है। इसमें राजनीतिक, अर्थशास्त्र और संस्कृति की भी चर्चा की गयी है। सिर्फ़ सैन्य मामलों की इसमें चर्चा नहीं की गयी। (काङ शेङ : `नव जनवाद के बारे में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मैंने स्पेनी कामरेडों से पूछा, और उन्होंने कहा कि उनके लिए समस्या नव जनवाद की स्थापना नहीं, बल्कि बुर्जुआ जनवाद की स्थापना करना था। उन्होंने अपने देश में तीन बिन्दुओँ सेना, देहात , राजनीतिक सत्ता – पर ध्यान नहीं दिया। वे पूरी तरह सोवियत विदेश नीति के मातहत हो गये, और कुछ भी हासिल नहीं कर पाये।´)

ये चेन तू-सिङ की नीतियाँ हैं! (कामरेड काङ शेङ : `वे कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ने सेना संगठित की और, फिर उसे दूसरों को सौंप दिया।´)

ये बेकार की बात है। ( कामरेड काङ शेङ : `वे राजनीतिक सत्ता भी नहीं चाहते थे, न ही उन्होंने किसानों को गोलबन्द किया। उस समय पर, सोवियत संघ ने कहा कि यदि वे सर्वहारा का नेतृत्व थोपेंगे, तो इंग्लैण्ड और फ्रांस इसका विरोध करेंगे, और यह सोवियत संघ के हित में नहीं होगा।´)

क्यूबा के बारे में क्या खयाल है? क्यूबा में उन्होंने राजनीतिक सत्ता और सेना गठित करने पर ही ध्यान दिया, और किसानों को भी गोलबन्द किया, जैसा (हमने) अतीत में किया था( इसीलिए वे कामयाब हुए।

(कामरेड काङ शेङ `साथ ही, जब वे (स्पेनी) लड़े, तो उन्होंने सामान्य ढंग से युद्ध किया, बुर्जुआ वर्ग के तरीके से, वे आखिर तक मैड्रिड की रक्षा करते रहे।[20] हर चीज़ में, उन्होंने खुद को सोवियत विदेश नीति के मातहत कर लिया था।´)

तीसरे इण्टरनेशनल को भंग किये जाने के पहले भी, हमने तीसरे इण्टरनेशनल के आदेशों को नहीं माना। तसुन्यी सम्मेलन में हमने आदेश नहीं माने, और उसके बाद दस वर्ष के अरसे तक, शुद्धीकरण अभियान से सातवीं कांग्रेस तक, जब अन्तत: हमने एक प्रस्ताव पारित किया (`हमारी पार्टी के इतिहास के कुछ प्रश्नों के बारे में प्रस्ताव´)[21] और वामवाद (की ग़लतियों) को ठीक कर लिया, हमने उनके आदेशों का बिल्कुल पालन नहीं किया। वे कठमुल्लावादी चीन की विशेषताओं का अध्ययन करने में पूरी तरह असफल रहे( जब वे देहात में गये, उसके दस वर्ष बाद भी, वे देहात में भूमि सम्पत्ति और वर्ग सम्बन्धों को समझने में पूरी तरह असफल रहे। आप महज़ देहात में जाने से देहात को नहीं समझ सकते, आपको देहात के सभी वर्गों और तबकों के बीच के सम्बन्धों का अध्ययन करना चाहिए। मैंने इन समस्याओं पर दस वर्ष से अधिक ख़र्च किये तब जाकर आखिरकार वे मेरे सामने स्पष्ट हुई। आपको हर किस्म के लोगों से सम्पर्क करना पड़ेगा, चायखानों से लेकर जुआघरों तक, और उनकी जाँच-पड़ताल करनी होगी। 1925 में, मैं किसान आन्दोलन प्रशिक्षण संस्थान[22] में सक्रिय था, और ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वेक्षण करता था। अपने पैतृक गाँव में, मैं ग़रीब किसानों की जाँच पड़ताल करने के लिए उनसे मिलता था। उनकी हालत दयनीय थी, उनके पास खाने को कुछ नहीं था। एक किसान था जिसके साथ मैंने गोटियों का खेल खेला (स्वर्ग, धरती, इन्सान, मेलजोल, मेई चिएन, चाङ साङ और बेंच के साथ खेला जाने वाला) और उसके बाद उसे अपने साथ खाना खाने के लिए आमन्त्रित किया। खाने के पहले, बाद में और खाना खाते हुए, मैंने उससे बातें की और मेरी समझ में आया कि देहात में वर्ग संघर्ष इतना तीखा क्यों है। वह मुझसे बात करने को इसलिए तैयार था क्योंकि : सबसे पहले तो मैंने उससे इन्सान के तौर पर बरताव किया( और तीसरे, वह थोड़े पैसे बनाने में सफल रहा था। मैं जानबूझकर हार रहा था( मैं एक या दो डालर हार गया, और नतीजतन वह काफी सन्तुष्ट था। एक दोस्त है जो अब भी दो बार मुझसे मिलने आया! मुक्ति के बाद। एक बार, उन दिनों में, वह काफी बुरी हालत में था, और वह एक डालर उधार लेने के लिए मुझे ढूँढ़ते हुए आया। मैंने उसे तीन डालर दिये, ऐसी मदद के तौर पर जिसे लौटाना नहीं था। उन दिनों में, ऐसी न लौटाने वाली मदद मिलना मुश्किल होता था। मेरे पिता का सोचना था कि अगर कोई आदमी अपना ख्याल नहीं रखता, उसे लोक-परलोक दोनों जगह सजा मिलेगी। मेरी माँ उनका विरोध करती थीं। जब मेरे पिता की मृत्यु हुई, तो बहुत थोडे़-से लोग शवयात्रा में शामिल हुए। जब मेरी माँ की मृत्यु हुई तो बहुत से लोग उनकी शवयात्रा में गये। एक बार को लाओ हुई ने हमारे घर को लूट लिया। मैंने कहा कि उन्होंने ठीक ही किया, क्योंकि लोगों के पास कुछ भी नहीं है। मेरी माँ भी इस बात को स्वीकार नहीं कर सकी।

एक बार चाङशा में चावल के लिए दंगे भड़क उठे जिनमें प्रान्तीय गवर्नर की पिटाई हो गयी। सियाङ-सियाङ से कुछ फेरी वाले अपनी सेम बेचकर घर लौट रहे थे। मैंने उन्हें रोककर हालात के बारे में पूछा। देहात में लाल और हरे गिरोह भी सभाएँ करते थे और बडे़ परिवारों को तबाह कर देते थे। इसकी ख़बरें शंघाई के अख़बारों में छपती थीं, और गड़बड़ियाँ तभी दबायी जा सकीं जब चाङशा से सैनिक भेजे गये। उनमें अनुशासन नहीं था, वे मध्यम किसानों का चावल छीन लेते थे, और इसलिए वे अलग-थलग पड़ गये। उनका एक नेता इधर-उधर भागता रहा, और आखिर पहाड़ियों में जाकर छिपा, लेकिन उसे वहाँ पकड़ लिया गया और मार दिया गया। बाद में, देहात के गणमान्य लोगों ने बैठक की, और कुछ और ग़रीब किसानों को मार डाला। उस समय तक कोई कम्युनिस्ट पार्टी नहीं थी। ये स्वत:स्फूर्त वर्ग संघर्ष थे।

समाज ने हमें धकेलकर राजनीतिक मंच पर ला खड़ा किया। पहले मार्क्सवाद से कोई वास्ता रखने के बारे में कौन सोचता था? मैंने तो इसका नाम भी नहीं सुना था। मैंने जिन लोगों के बारे में सुना, और पढ़ा था वे थे कनफ़्यूशियस, नेपोलियन, वाशिंगटन, पीटर महान, मेईजी पुनर्स्थापना, तीन विख्यात इतालवी (देशभक्त) – यूँ कहें कि सब पूँजीवाद के (नायक) थे। मैंने फ्रैंकलिन की एक आत्मकथा भी पढ़ी थी। वह एक ग़रीब परिवार से आये थे( बाद में वह लेखक बने, और बिजली के बारे में प्रयोग भी किये। (चेन पो-ता : `सबसे पहले फ्रैंकलिन ने ही यह प्रस्थापना दी थी कि मनुष्य औज़ार बनाने वाला प्राणी है।´) उन्होंने मनुष्य के औज़ार बनाने वाला प्राणी होने की बात कही। पहले वे कहते थे कि मनुष्य सोचने वाला प्राणी है, `हृदय सोच सकता है।´[23] वे कहते थे कि मनुष्य समस्त सृष्टि की आत्मा है। किसने सभा बुलाकर उसे चुना (इस पदवी के लिए)? उसने स्वयं को यह गौरव प्रदान किया। यह प्रस्थापना सामन्ती युग में मौजूद थी। बाद में, मार्क्स ने यह विचार रखा कि मनुष्य औज़ार-निर्माता है, और मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सच तो यह है कि (क्रमिक विकास दस लाख वर्ष से गुजरने के बाद ही मनुष्य का बड़ा मस्तिष्क और एक जोड़ी हाथ विकसित हुए। भविष्य में, जानवर विकसित होते रहेंगे। मैं नहीं मानता कि सिर्फ़ मनुष्य के ही दो हाथ हो सकते हैं। क्या घोड़ों, गायों, भेड़ों का क्रमिक विकास नहीं हो सकता है? क्या सिर्फ़ बन्दरों का क्रमिक विकास हो सकता है? और इससे भी बढ़कर क्या यह हो सकता है कि बन्दरों की सिर्फ़ एक प्रजाति क्रमिक विकास करे, तथा अन्य सभी क्रमिक विकास करने में असमर्थ हैं? क्या दस लाख वर्ष बाद, एक करोड़ वर्ष बाद, घोड़े, गायें और भेड़ें वैसे ही रहेंगी जैसी वे आज हैं? मैं सोचता हूँ कि उनमें बदलाव होता रहेगा। घोड़े, गायें, भेड़ें, कीड़े सब बदल जायेंगे। प्राणियों का विकास वनस्पतियों से हुआ है, वे समुद्री शैवालों से विकसित हुए हैं। चाङ ताई-येन यह सब जानता था। जिस किताब में वह काङ यु-वेइ से क्रान्ति के बारे में बहस करता है, उसमें उसने इन सिद्धान्तों को स्पष्ट किया है।[24] मूल रूप में पृथ्वी मृत थी, न कोई वनस्पतियाँ थीं, न पानी, न हवा। मुझे पता नहीं कितने करोड़ वर्ष बाद जाकर पानी बना( हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तुरन्त किसी पुराने तरीके से पानी में तब्दील नहीं हो गयी।

पानी का भी अपना इतिहास है। इससे भी पहले, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन भी मौजूद नहीं थे। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के पैदा होने के बाद ही यह सम्भावना बनी कि इन दो तत्वों के मिलने से पानी बनेगा।

हमे प्राकृतिक विज्ञानों के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए, इस विषय की अनदेखी करने से काम नहीं चलेगा। हमें कुछ किताबें ज़रूर पढ़नी चाहिए। हमारे वर्तमान संघर्षों की ज़रूरतों के कारण पढ़ने और निरुद्देश्य पढ़ने के बीच बहुत अन्तर है। फू यिङ [25] कहता है कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के लाखों बार साथ आने के बाद कहीं पानी बनता है( यह दो चीज़ों के मिलकर एक बन जाने का सीधा मामला नहीं है। वह इस बारे में ठीक ही कहता है। मैं उससे मिलना और बात करना चाहता हूँ। (लू पिङ [26] से) आप लोगों को फू यिङ की हरेक बात का विरोध नहीं करना चाहिए।

टिप्पणियाँ

1 यानी, 1) मार्क्सवादी दर्शन, अर्थात द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद, जो प्रकृति, मानव समाज और मनुष्य के विचारों में मौजूद अन्तरविरोधों के विकास के सामान्य सिद्धान्त से सम्बिन्धत ही( 2) मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र जो समाज की अर्थव्यवस्था के विकास को नियन्त्रित करने वाले नियमों की व्याख्या करता है और इस बात का पर्दाफ़ाश करता है कि पूँजीपति वर्ग किस तरह मेहनतकश वर्ग का शोषण करता है (अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त)( और 3) वैज्ञानिक समाजवाद जो यह दिखाता है कि पूँजीवादी समाज का विकास समाज की एक उच्चतर मंजिल में होना ही है और सर्वहारा पूँजीवादी व्यवस्था की कब्र खोदता है। (ब्योरे के लिए देखें लेनिन की मार्क्सवाद के तीन स्रोत और तीन संघटक अंग।)

2 पीकिङ विश्वविद्यालय को, जो 1919 के 4 मई आन्दोलन की शुरुआत करने वाले पुराने पीकिङ विश्वविद्यालय और अमेरिकी आर्थिक सहायता से चलने वाले येनचिङ विश्वविद्यालय को मिलाकर बना है, 1949 के बाद से चीन में सामान्य बौद्धिक श्रेष्ठता के लिए सबसे उँचा दर्ज़ा हासिल है। पीकिङ में ही स्थित जन विश्वविद्यालय ख़ास तौर पर मज़दूर-किसान पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए अधिक सुगम पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने के लिए स्थापित किया गया था।

3 कनफ़्यूशियस की क्लासिकी कृतियों में `चार पुस्तकें´ आरम्भिक विद्यार्थियों द्वारा पढ़ी जाने वाली मुख्य सामग्री थी, पाँच क्लासिकी कृतियाँ इसका कुछ बड़ा रूप था।

4 माओ त्से-तुङ ने अपने विविध शैक्षिक अनुभवों में, 1912-13 की सर्दियों में हुनान प्रान्तीय पुस्तकालय में पढ़ाई करते हुए गुज़ारे गये छह माह के समय को सबसे मूल्यवान अनुभवों में से एक माना है।

5 पहला वाक्य `माध्य का सिद्धान्त´ से है, दूसरा है `मेन्शियस´, ग्रन्थ चार से।

6 यह उद्धरण कनफ़्यूशियस की कृति `एनालेक्ट्स´ से लिया गया है। `एनालेक्ट्स´ में उस घटना का उल्लेख है जिसमें कुआङ के लोगों ने कनफ़्यूशियस को बन्दी बना लिया था और उसे मार डालना चाहते थे।

7 माओ का तर्क यह लगता है कि चाहे कनफ़्यूशियस वहाँ गया हो या नहीं, चिन (आज के शेन्सी में स्थित पहली सहस्त्राब्दी ईसापूर्व का एक राज्य, जिसके शासक ने बाद में पूरे चीन को जीत लिया और 221 ई.पू. में चिन वंश की नींव डाली), वह चिन के विरुद्ध नहीं था क्योंकि उसने उस क्षेत्र की दो कविताओं को `बुक ऑफ़ ओड्स´ में शामिल किया है, जिनमें से दो को माओ ने उद्धृत किया है।

8 सू-मा चिएन (145-90 ई.पू.) चीन का पहला महान इतिहासकार था, जिसने चीन के आरिम्भक दिनों से लेकर अपने समय तक चीन का इतिहास बताने वाले शिह-चि (ऐतिहासिक अभिलेख) को संकलित किया था।

9 उपरोक्त कविता और दो पूर्वोलिखित कविताओं के शीर्षक `गीतिकाव्यों की पुस्तक´ के लेग्ग्स के संस्करण से लिये गये हैं।

10 चीनी आलोचकों ने पारम्परिक तौर पर प्रेम कविताओं की व्याख्या अधिकारी और उसके राजा के सम्बन्धों के रूपक के रूप में की है( चू सि (नीचे टिप्पणी 42 देखें) का मानना था कि उन्हें अभिधा में लिया जाना चाहिए। माओ सहजबुद्धि की दृष्टि से यह विचार प्रस्तुत करते हैं कि कभी उनका शाब्दिक अर्थ लिया लाना चाहिए और कभी नहीं।

11 वेई चुआङ (858-910) उत्तरवर्ती ताङ तथा आरिम्भक पाँच राजवंशों (907 से शुरू) काल का एक प्रमुख कवि था। माओ का तर्क है कि `गीतिकाव्यों की पुस्तक´ तथा समस्त क्लासिकी काव्य पर व्याख्या के एक ही सिद्धान्त लागू किये जाने चाहिए।

12 “Four Clean Ups“ और “Five antis” के लिए देखें संकलित रचनाएँ, खण्ड पाँच।

13 `चीन जनवादी लीग´ का पत्र कुआंग- मिङ जिह-पाओ अप्रैल 1957 में, जब `फूल खिलना और विचारों का टकराव´ ज़ोर-शोर से जारी था, पार्टी की आलोचना करने में सबसे आगे था। शंघाई से प्रकाशित वेन-हुई पाओ एक गैर-पार्टी पत्र था जिसकी माओ ने 1957 में बुर्जुआ प्रवृत्तियों के लिए आलोचना की थी। नवम्बर 1965 में, उसने सांस्कृतिक क्रान्ति की शुरुआत करने के माध्यम का काम किया।

14 चाउ कू-चेङ चीनी और विश्व इतिहास पर अनेक कृतियों के लेखक थे। 1950 के बाद से, वह शंघाई में फुतान विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। 1962 में, उन्होंने इतिहास और कला पर एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें उन्होंने `ज़ाइटजीस्ट´ पर विचार व्यक्त किये थे जिन्हें य सिएन-चेन के दार्शनिक सिद्धान्तों की सौन्दर्यशास्त्र के दायरे में अभिव्यक्ति माना गया (देखें नीचे, टिप्पणी 19)।

15 सुन येह-फाङ इस समय विज्ञान अकादेमी के अर्थशास्त्र संस्थान के निदेशक थे( 1966 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। जैसा कि काङ शेङ की टिप्पणी से पता चलता है, उन्होंने समाजवादी अर्थव्यवस्था में मुनाफे के उद्देश्य की भूमिका के बारे में कुछ सोवियत और पूर्वी यूरोपीय अर्थशास्त्रियों के विचारों को अपना लिया था जिनके साथ उसका पेशेवर सम्पर्क था।

16 1955 की गर्मियों में, 31 जुलाई के माओ के भाषण द्वारा कृषि उत्पादकों के कोआपरेटिवों के गठन को नया संवेग प्रदान करने के ठीक पहले, पार्टी के ग्रामीण कार्य विभाग ने (ल्यू शाओ-चि के उकसाने पर) अनेक कोआपरेटिवों को यह कहकर भंग कर दिया कि इन्हें जल्दबाज़ी में और समय से पहले गठित किया गया था।

17 तेङ त्ज़ू-हुई (1895-1972) 1952 से ग्रामीण कार्य विभाग का प्रमुख रहा था, हालांकि 1955 में कोआपरेटिवों को `भंग करने´ या `बुरी कोआपरेटिवों की छंटाई करने´ की ज़िम्मेदारी में उसकी हिस्सेदारी के कारण 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध से उसका प्रभाव कम हो गया था। लेकिन ऐसा लगता है कि इसके बावजूद 1960 के दशक के आरम्भ में माओ के विचारों के विरोध में अपने विचार ज़ोर-शोर से व्यक्त करने लायक हैसियत उसकी बनी हुई थी। यह वही वक्त था जबकि माओ द्वारा यहाँ बतायी गयी नीतियाँ पार्टी के भीतर विवाद का विषय थीं। (अधिक ब्योरे के लिए देखें `संकलित रचनाएँ´ के खण्ड पाँच का पृ. 224-225, अंग्रेज़ी संस्करण।)

18 एक दक्षिणपन्थी अवसरवादी दृष्टिकोण जिसकी वकालत ल्यू शाओ-ची और दूसरे करते थे। इस सम्बन्ध में देखें, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के पोलित बयूरो की बैठक में माओ त्से-तुङ का भाषण “आम दिशा से विपथगमन करने वाले दक्षिणपन्थी विचलनवादी विचारों का विरोध करो,” संकलित रचनाएँ, खण्ड पाँच।

19 `दो मिलकर एक हो जाते हैं´ का विचार सबसे पहले 1960 के दशक में याङ सिएन-चेन (1899-) ने पेश किया था, जो 1955 से, उच्चतर पार्टी स्कूल का अध्यक्ष रहा था। जुलाई 1964 से इस सूत्रीकरण पर प्रेस में इस आधार पर तीखा हमला बोला गया कि यह संघर्ष और अन्तरविरोध के महत्व को कम कर देता है और माओ के इस दृष्टिकोण के विपरीत है कि `एक दो में बँट जाता है,´ यानी संघर्ष, खासकर वर्ग संघर्ष निरन्तर बार-बार उभरता रहता है, तब भी जबकि विशिष्ट अन्तरविरोध हल हो गये हों। स्टेनोग्राफ़र के नोट में उल्लिखित `एक लेख की रूपरेखा´ सम्भवत: याङ पर होने वाले किसी हमले का सारांश था जिसे पूर्वस्वीकृति के लिए अध्यक्ष को दिया गया था।

20 अक्टूबर 1936 में शुरू हुई मैड्रिड की रक्षा दो वर्ष पाँच महीने तक चलती रही। 1936 में, फ़ासिस्ट जर्मनी और इटली ने स्पेनी फ़ासिस्ट युद्ध सरदार फ्रांको का इस्तेमाल करके स्पेन के विरुद्ध हमलावर युद्ध छेड़ दिया। पॉपुलर फ्रण्ट सरकार के नेतृत्व में, स्पेन के लोगों ने बहादुराना ढंग से हमले के खिलाफ जनवाद की हिफ़ाजत की। स्पेन की राजधानी मैड्रिड की लड़ाई पूरे युद्ध में सबसे तीखी लड़ाई थी। मार्च 1939 में मैड्रिड दुश्मन के हाथों में चला गया कयोंकि ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य साम्राज्यवादी देशों ने “अ-हस्तक्षेप´´ की अपनी पाखण्डी नीति के द्वारा हमलावरों की मदद की और पॉपुलर फ्रण्ट के भीतर मतभेद उभर आये। इस आलोचना का मुद्दा ज़ाहिरा तौर पर यह नहीं है कि स्पेन के रिपब्लिकन आखिरी सांस तक लड़ते रहे, बल्कि यह है कि वे इस बात को समझ नहीं सके कि कुछ मज़बूत क्षेत्रीय बिन्दु अपने आप में निर्णायक नहीं हो सकते।

21 कृपया देखें “हमारी पार्टी के इतिहास में कुछ प्रश्नों के बारे में प्रस्ताव,´´ 20 अप्रैल 1945 को स्वीकृत। संकलित रचनाएँ, खण्ड 3

22 माओ ने इस संस्थान में अपना काम 1925 में शुरू किया था, लेकिन 1926 में ही उन्होंने प्रिंसिपल के तौर पर काम किया और अपना मुख्य योगदान किया।

23 यह उद्धरण मेन्शियस, ग्रन्थ 4, भाग ए, अध्याय 15 से है।

24 सम्भवत: यहाँ 1903 में प्रकाशित चाङ पिंग-लिन के प्रसिद्ध लेख `काङ यु-वेई के क्रान्ति के नाम पत्र का खण्डन´ का उल्लेख है। इस लेख में चाङ ने न केवल क्रान्ति बनाम क्रमिक सुधार के मुद्दे पर बल्कि चीनी और माँचू लोगों के बीच नस्ली भिन्नता के महत्त्व को लेकर भी काङ पर तीखा हमला किया जिसे काङ कम करके पेश करते थे। चाङ का तर्क था कि मांचू लोग एक परायी और पतनशील नस्ल के हैं जोकि चीन पर शासन करने के लिए कत्तई अनुपयुक्त हैं। इसी सन्दर्भ में उन्होंने क्रमिक विकास की चर्चा की, और यह बताया कि मौजूदा नस्ली अन्तर इतिहासजन्य हैं।

25 फू यिंग कोई चीनी वैज्ञानिक लगते हैं जोकि 1964 में जीवित थे क्योंकि माओ उनसे मिलने की बात करते हैं।

26 लू पिंग (1910-) उस समय पीकिङ विश्वविद्यालय के अध्यक्ष थे( जून 1966 में उन्हें पद से हटा दिया गया और उनके विरुद्ध संघर्ष चलाया गया।

दर्शन के प्रश्नों पर-2

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-4

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एजेण्डा पर कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की एकता का

सवाल : एक सर्वभारतीय पार्टी के गठन की ओर

नक्सलबाड़ी में सशस्त्र किसान विद्रोह के विस्फोट के तुरन्त बाद पूरे देश में माकपा की पार्टी कतारों में और पार्टी के बाहर के कम्युनिस्ट तत्त्वों के बीच संशोधनवाद के विरुद्ध विद्रोह की लहर दौड़ पड़ी। बंगाल से बाहर, उत्तर प्रदेश, बिहार, आन्ध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, असम, उड़ीसा और त्रिपुरा में पार्टी-कतारों के विद्रोह से अराजकता और विभाजन की स्थिति उत्पन्न होने लगी। भारी संख्या में नये युवा तत्त्व भी इस क्रान्तिकारी लहर की ओर आकृष्ट हुए। पार्टी के भीतर और बाहर, स्वयंस्फूर्त ढंग से क्रान्तिकारी ग्रुप बनने लगे। यदि केवल प. बंगाल का उदाहरण लें तो वहाँ `निशान´, `पदातिक´, `भित्ति´, `सूर्यसेन´, `छात्र फ़ौज´ आदि कई ग्रुप सक्रिय हो गये थे, जिन्होंने संशोधनवाद विरोधी सैद्धान्तिक संघर्ष और क्रान्तिकारी प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1966 से ही सक्रिय `चिन्ता ग्रुप´ और पार्टी के भीतर गठित `अन्तर्पार्टी संशोधनवाद विरोधी कमेटी´ की पहले ही चर्चा की जा चुकी है।

अलग-अलग राज्यों में माकपा के भीतर संशोधनवाद विरोधी संघर्ष को नेतृत्व देने वालों में आन्ध्र प्रदेश के डी.वी. राव और नागी रेड्डी तो राष्ट्रीय स्तर के नेता थे और केन्द्रीय कमेटी के सदस्य भी रह चुके थे। इनके अतिरिक्त बिहार में सत्यनारायण सिंह, उत्तर प्रदेश में शिवकुमार मिश्र, जम्मू-कश्मीर में आर.पी. सर्राफ़ सहित कई राज्य स्तरीय नेतृत्व के लोग भी थे। बंगाल में सुशीतल राय चौधरी और सरोज दत्त राज्य स्तरीय नेता थे, परिमल दास गुप्त और असित सेन प्रसिद्ध ट्रेडयूनियन नेता और सिद्धान्तवेत्ता थे। उपरोक्त राज्यों में तारों का बड़ा हिस्सा विद्रोहियों के साथ था।

14 जून 1967 को कलकत्ता के राममोहन लाइब्रेरी हॉल में नक्सलबाड़ी में किसानों की हत्या और दमन के विरोध में तथा संग्रामी किसानों के समर्थन में कुछ ऐसी मज़दूर यूनियनों के आह्वान पर एक जनसभा हुई, जिनका नेतृत्व माकपा की संशोधनवादी, अर्थवादी नीतियों से असन्तुष्ट था। इसमें एक प्रस्ताव पारित करके `नक्सलबाड़ी और कृषक संग्राम सहायक कमेटी´ की स्थापना की गयी जिसका सचिव प्रसिद्ध ट्रेड यूनियन नेता और माकपा की कलकत्ता ज़िला कमेटी के सदस्य परिमल दासगुप्त को बनाया गया। देश भर के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तत्त्वों से सम्पर्क स्थापित करने का काम सबसे पहले इसी कमेटी के बैनर तले शुरू किया गया।

प. बंगाल राज्य कमेटी के मुखपत्र `देशहितैषी´ का दफ़्तर उस समय क्रान्तिकारी तत्त्वों के नियन्त्रण में आ गया था। उसके सम्पादक मण्डल में सुशीतल रायचौधरी और सरोज दत्त शामिल थे और बहुमत भी उन्हीं के साथ था। 28 जून 1967 को माकपा नेतृत्व ने बलपूर्वक उन सबको निकाल बाहर करके दफ़्तर पर कब्ज़ा किया। इसके एक सप्ताह बाद बांगला साप्ताहिक `देशव्रती´ का प्रकाशन शुरू हुआ जो मार्क्सवादी-लेनिनवादियों का पहला मुखपत्र था। इस समय तक माकपा नेतृत्व देशव्यापी छँटनी मुहिम शुरू कर चुका था। पूरे देश में नक्सलबाड़ी के पक्ष में मुखर एक हज़ार से भी अधिक नेताओं-कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाल बाहर किया गया। अकेले बंगाल में ही निष्कासित लोगों की संख्या चार सौ से अधिक थी। बंगाल के निष्कासित लोगों में चारु मजूमदार, कानू सान्याल, सौरेन बसु, सरोज दत, सुशीतल रायचौधरी, परिमल दासगुप्त, असित सेन, सुनीति कुमार घोष आदि प्रमुख थे। बिहार से सत्यनारायण सिंह, गुरुबख्श सिंह, उत्तर प्रदेश से शिवकुमार मिश्र, महेन्द्र सिंह, श्रीनारायण चतुर्वेदी, आर.एन. उपाध्याय, पंजाब से दया सिंह, जगजीत सिंह सोहल, बलवन्त सिंह आदि कई नेता निष्कासित लोगों में शामिल थे। इसके बाद तो निष्कासन का यह सिलसिला 1969 तक कई किश्तों में लगातार चलता रहा। नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के पक्ष में पीकिंग रेडियो के प्रसारणों ने भी कार्यकर्ताओं को पक्ष चुनने के लिए प्रेरित करने में एक अहम भूमिका निभायी। पाँच जुलाई, 1967 को `पीपुल्स डेली´ (चीनी पार्टी का मुखपत्र) में `भारत में वसन्त का वज्रनाद´ शीर्षक लेख छपा, जिसमें नक्सलबाड़ी का समर्थन करते हुए माकपा के नवसंशोधनवादियों को भी ग़द्दार और भारतीय शासक वर्ग का चाकर घोषित किया गया था। इसके बाद `पीपुल्स डेली´ में कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के पक्ष में कई टिप्पणियाँ छपीं। इनका एक दूरगामी नकारात्मक प्रभाव यह था कि आगे चलकर चारु मजूमदार ने इसका लाभ अपनी लाइन की अन्तरराष्ट्रीय मान्यता के रूप में प्रचार करके उठाया। एक दूसरा नकारात्मक प्रभाव यह था कि चीनी पार्टी की धारणा के हिसाब से, भारतीय कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों ने कार्यक्रम के प्रश्न पर सोच-विचार को एजेण्डे से ही हटा दिया और यह मानकर चलने लगे कि भारत में भी चीन की तरह नवजनवादी क्रान्ति और दीर्घकालिक लोकयुद्ध का रास्ता ही लागू होगा। लेकिन तात्कालिक तौर पर चीन की पार्टी की अवस्थिति ने भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तेज़ करके क्रान्तिकारी पक्ष की मदद की।

11 नवम्बर 1967 को `नक्सलबाड़ी और कृषक संग्राम सहायक कमेटी´ की ओर से अक्टूबर क्रान्ति दिवस मनाने और मार्क्सवादी-लेनिनवादी के प्रचार के लिए कलकत्ता के शहीद मीनार मैदान में एक जनसभा बुलायी गयी जिसमें चारु मजूमदार ने खुले मंच से अपना अन्तिम भाषण दिया। इस सभा में पारित प्रस्ताव में सोवियत संशोधनवाद की भत्र्सना करते हुए चीन की पार्टी का समर्थन किया गया और माकपा को भी एक संशोधनवादी पार्टी बताते हुए उसकी निन्दा की गयी। इसके तुरन्त बाद, पूर्व योजना के अनुसार, सात राज्यों के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी प्रतिनिधियों की एक बैठक हुई जिसमें महत्त्वपूर्ण राजनीतिक-सांगठनिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श के बाद `भा.क.पा. (मा.) के क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी´ (ऑल इण्डिया कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ़ दि रिवोल्यूशनरीज़ ऑफ़ दि सी.पी.आई. (एम.)) का गठन किया गया और उसकी ओर से एक घोषणा जारी की गयी। इस तालमेल कमेटी ने अपने चार मुख्य कार्यभार निर्धारित किये : (1) मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में सभी स्तरों पर जुझारू और क्रान्तिकारी संघर्षों का ख़ासकर नक्सलबाड़ी की तरह किसान-संघर्षों का विकास करना और उनके बीच तालमेल कायम करना, (2) मज़दूर वर्ग और अन्य मेहनतकशों के जुझारू संघर्षों का विकास करना, अर्थवाद से लड़ना और इन संघर्षों को कृषि क्रान्ति की दिशा में मोड़ना, (3) संशोधनवाद और नवसंशोधनवाद के विरुद्ध समझौताहीन सैद्धान्तिक संघर्ष चलाना और माओ त्से-तुङ विचारधारा को, जो वर्तमान युग का मार्क्सवाद- लेनिनवाद है, लोकप्रिय बनाना और इसके आधार पर पार्टी के भीतर के और बाहर के सारे क्रान्तिकारी तत्त्वों को ऐक्यबद्ध करना, और (4) माओ त्से-तुङ विचारधारा की रोशनी में भारतीय परिस्थिति के सुनिश्चित विश्लेषण के आधार पर क्रान्तिकारी कार्यक्रम और रणकौशल तैयार करने की ज़िम्मेदारी लेना।

देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों से सम्पर्क स्थापित करने का काम पहले से ही मुख्यत: सुशीतल रायचौधरी कर रहे थे। उन्हें ही तालमेल कमेटी का सचिव चुना गया और उनके सम्पादन में अंग्रेज़ी मासिक मुखपत्र `लिबरेशन´ निकालने का निर्णय लिया गया। इसका पहला अंक नवम्बर, 1967 में प्रकाशित हुआ।

आन्ध्र प्रदेश में माकपा के शीर्ष नेताओं में से दो – टी. नागी रेड्डी और डी.वी. राव भी माकपा नेतृत्व के संशोधनवाद के विरुद्ध शुरू से ही संघर्षरत थे। उन्होंने नक्सलबाड़ी का पक्ष लिया था। लेकिन उनका विचार था कि माकपा के भीतर जब तक सम्भव हो, रहते हुए संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष चलाया जाना चाहिए ताकि कतारों के बड़े हिस्से को क्रान्तिकारी पक्ष के साथ खड़ा किया जा सके। इस मसले पर चारु मजूमदार के साथ उनका मतभेद था। अप्रैल, 1968 में माकपा का बर्दवान प्लेनम हुआ जो मुख्यत: विचारधारात्मक प्रश्न पर केन्द्रित था। प्लेनम में पारित होने वाले दस्तावेज़ `विचारधारात्मक विचार-विमर्श के लिए´ का मसौदा पहले वितरित हो चुका था और उस पर डी.वी.-नागी ने तीखे मतभेद दर्ज कराये थे। यही दस्तावेज़ प्लेनम में पारित हुआ। इसके अनुसार, सोवियत पार्टी जहाँ दक्षिणपन्थी भटकाव का शिकार थी वहीं चीन की पार्टी “वामपन्थी

” संकीर्णतावादी भटकाव का शिकार थी। इसमें चीनी पार्टी पर माकपा के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप का आरोप भी लगाया था। माकपा के मध्यमार्ग का संशोधनवादी चरित्र अब एकदम नंगा हो चुका था। जम्मू-कश्मीर और आन्ध्र प्रदेश की राज्य कमेटियों ने दस्तावेज़ के मसौदे का विरोध किया। विरोध का एक मुद्दा यह भी था कि दस्तावेज़ में भारत सहित सभी पिछड़े देशों में लोकयुद्ध को संघर्ष के सार्वभौमिक रूप के तौर पर स्वीकार नहीं किया गया है और मुख्य लाइन के तौर पर भूमि क्रान्ति को ख़ारिज कर दिया गया है।

बर्दमान प्लेनम के तुरन्त बाद तालमेल कमेटी ने 14 मई ´68 को हुई अपनी दूसरी बैठक में अपने नाम से `भा.क.पा. (मा.) के अन्दर के´ वाक्यांश को हटाकर अपना नया नाम रखा `कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी´ (ए.आई.सी.सी.सी.आर.) और इसका नेतृत्व चारु मजूमदार को सौंपा गया। दूसरी बैठक के बाद तालमेल कमेटी ने अपनी `दूसरी घोषणा´ जारी की जिसमें कहा गया था कि नवसंशोधनवादी भी डांगेपन्थियों की तरह प्रतिक्रान्तिकारी शिविर में शामिल हो चुके हैं, वे कृषि क्रांति की पीठ में सक्रिय रूप से छुरा भोंक रहे हैं और जो लोग अभी भी माकपा के भीतर अन्तर्पार्टी संघर्ष की सम्भावना देखते हैं वे संशोधनवाद के विरुद्ध लड़नेवालों में भ्रम का बीज बो रहे हैं तथा उनको संगठित और शक्तिशाली होने से रोक रहे हैं। इस अन्तिम वाक्यांश में वस्तुत: डी.वी.-नागी ग्रुप की परोक्ष आलोचना की गयी थी। तालमेल कमेटी की इस दूसरी बैठक में पंजाब के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी भी शामिल हुए थे। बर्दवान प्लेनम के तुरन्त बाद, डी.वी.-नागी के नेतृत्व में माकपा की आन्ध्र कमेटी का बहुसंख्यक हिस्सा विद्रोह करके पार्टी से अलग हो गया। जम्मू-कश्मीर के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी भी पार्टी से बाहर आ गये थे। डीवी.- नागी द्वारा पार्टी के भीतर चलाये गये संघर्ष का नतीजा था कि आन्ध्र में बहुसंख्यक कार्यकर्ता पार्टी से बाहर आ गये थे। डी.वी. राव-नागी रेड्डी-चन्द्रपुल्ला रेड्डी आदि ने `आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी´ (ए.पी.आरसी. सी.) का गठन किया जो ए.आई.सी.सी.सी.आर. से जुड़कर उसकी आन्ध्र राज्य कमेटी के रूप में काम करने लगी। आन्ध्र ग्रुप और चारु मजूमदार के नेतृत्व के बीच शुरू ही से कुछ अहम मतभेद मौजूद थे। चारु मजूमदार के नेतृत्व वाले हिस्से का मानना था कि नागी रेड्डी ग्रुप चीनी पार्टी की लाइन को पूरी तरह से स्वीकार नहीं करता है। इसका एक आधार यह था कि नागी रेड्डी ग्रुप सोवियत संघ को सामाजिक-साम्राज्यवादी न कहकर सिर्फ़ संशोधनवादी कहता था। यह प्रश्न बुनियादी विचारधारात्मक न होकर वस्तुगत आकलन का था, जिसे चीनी पार्टी के कठमुल्लावादी अनुकरण के चलते बुनियादी बना दिया गया। दूसरा अहम मतभेद यह था कि अखिल भारतीय तालमेल कमेटी चुनाव बहिष्कार को एक रणनीतिक प्रश्न मानती थी और उसे क्रान्ति की प्रक्रिया की शुरुआत से अन्त तक लागू करने की बात करती थी जबकि आन्ध्र ग्रुप इसे रणकौशल का प्रश्न मानता था और इस मामले में परिस्थिति-अनुसार निर्णय की बात करता था। इस प्रश्न पर उनकी अवस्थिति क्लासिकीय लेनिनवादी सूत्रीकरण के अनुरूप थी। तालमेल कमेटी नक्सलबाड़ी को माओ विचारधारा का भारत में पहला प्रयोग मानती थी, जबकि आन्ध्र ग्रुप का कहना था कि माओ विचारधारा का पहला प्रयोग तेलंगाना में हुआ था और नक्सलबाड़ी उसी की अगली कड़ी है। तालमेल कमेटी जनसंघर्ष के खुले रूपों, आर्थिक मुद्दों पर संघर्ष और जनसंगठनों की उपेक्षा कर रही थी, जिससे आन्ध्र ग्रुप सहमत नहीं था। तालमेल कमेटी का ज़ोर प्रारिम्भक मंज़िल से ही छापामार संघर्ष संगठित करने पर था, जबकि आन्ध्र ग्रुप का कहना था कि जनान्दोलन की प्रक्रिया में संघर्ष के उच्चतर रूप के तौर पर सशस्त्र संघर्ष शुरू होगा, स्वयंसेवक दस्ते, स्थानीय दस्ते और नियमित छापामार दस्ते अस्तित्व में आयेंगे और आधार-क्षेत्रों का निर्माण होगा। कुछ सशस्त्र दस्तों की कार्रवाई के बजाय उनका ज़ोर क्रान्तिकारी जनप्रदर्शनों, क्रान्तिकारी जनान्दोलनों, क्रान्तिकारी ग्राम सोवियतों की स्थापना और सशस्त्र जनसंघर्षों पर था। इस प्रश्न पर भी संघर्ष मूलत: “वाम” दुस्साहसवाद और जनदिशा के प्रश्न पर था। इन मूल मुद्दों के अतिरिक्त, दोनों पक्षों के बीच जनवादी कार्यक्रम (तालमेल कमेटी `लोक जनवादी क्रान्ति´ शब्दावली का प्रयोग करती थी जबकि आन्ध्र ग्रुप `नव जनवादी क्रान्ति´ शब्दावली का) की कुछ तफ़सीलों, व्याख्याओं और ज़ोर को लेकर था जो हालाँकि गौण था लेकिन यहाँ भी अप्रोच की भिन्नता महत्त्वपूर्ण थी। तालमेल कमेटी चीनी पार्टी के कार्यक्रम का अन्धानुकरण करती थी जबकि आन्ध्र ग्रुप उसकी आम दिशा और फ्रेमवर्क को मानते हुए भी, एक हद तक, भारतीय परिस्थिति की सच्चाइयों को उसमें समाहित करने की कोशिश करता था। तालमेल कमेटी का आन्ध्र ग्रुप पर एक आरोप यह भी था कि वह श्रीकाकुलम सशस्त्र संघर्ष को ज़ोर-शोर से नहीं, बल्कि महज़ रस्मी समर्थन दे रहा है। इस प्रश्न पर आगे चर्चा की जायेगी।

इन मतभेदों के बावजूद, पहली बैठक के बाद आन्ध्र प्रदेश की तालमेल कमेटी अखिल भारतीय तालमेल कमेटी से जुड़ गयी। यह तय किया गया कि प्रयोग करते हुए मतभेद के मसलों पर बहस की प्रक्रिया जारी रहेगी क्योंकि तालमेल कमेटी का उद्देश्य ही यही है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। 7 फ़रवरी, 1969 को निहायत एकतरफ़ा और मनमाने तरीके से आन्ध्र प्रदेश कमेटी को अखिल भारतीय तालमेल कमेटी से निकाल दिया गया और बातचीत करने के उनके बार-बार के अनुरोध पर कान तक नहीं दिया गया।

तालमेल कमेटी का गठन ही इस उद्देश्य से किया गया था कि माओ विचारधारा पर आम तौर पर सहमत देश भर के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आपस में बहस-मुबाहिसा करके और अपने प्रयोगों के अनुभवों का आदान-प्रदान करते हुए भारतीय क्रान्ति की रणनीति, आम रणकौशल और रास्ते के सवाल पर एक राय बनायें तथा भारतीय परिस्थितियों के अध्ययन के आधार पर कार्यक्रम तैयार करें। पर तालमेल कमेटी शुरुआत करते ही लक्ष्य विमुख हो गयी। नक्सलबाड़ी संघर्ष के नेतृत्व के “वामपन्थी” लाइन के आगे घुटने टेकने के बाद चारु मजूमदार ने इस लाइन को ज़ोर-शोर से पूरे देश के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच बढ़ावा दिया। आम क्रान्तिकारी कतारों में यह धारणा थी कि नक्सलबाड़ी के निर्माता और नेता चारु मजूमदार ही थे और उनकी लाइन को चीनी पार्टी का पूरा समर्थन हासिल है। बंगाल का एक गुट, जिसमें विशेष तौर पर सरोज दत्त, सौरेन बसु, सुनीति कुमार घोष शामिल थे, चारु को भारतीय क्रान्ति का महान नेता सिद्ध करने में जुट गया था। सत्यनारायण सिंह, कानू सान्याल आदि भी बढ़-चढ़कर उनकी प्रशंसा में जुटे थे। `तराई किसान संघर्ष की रिपोर्ट´ में हालाँकि चारु की लाइन के आगे कानू सान्याल आदि की जनदिशा की लाइन का आत्मसमर्पण मुख्य पहलू था, लेकिन उसमें व्यापक जनसंघर्ष के विकास का एक ब्योरा भी था। पर उस रिपोर्ट को तालमेल कमेटी ने देश भर के क्रान्तिकारियों के बीच न तो कभी चर्चा का विषय बनाया, न खुद ही कभी उस पर चर्चा की। इस पूरी स्थिति का लाभ उठाकर चारु मजूमदार तालमेल कमेटी को एक पार्टी की तरह चलाने लगे और स्वयं उसके स्वयंभू एकछत्र नेता जैसा व्यवहार करने लगे। तालमेल कमेटी विभिन्न कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी ग्रुपों के बीच तालमेल करने के बजाय पार्टी की केन्द्रीय कमेटी जैसा आचरण करने लगी। विभिन्न ग्रुपों को अपने मुखपत्र बन्द करने का निर्देश जारी किया जाने लगा। मतभेदों और उठाये जाने वाले सवालों पर स्वस्थ बहस के बजाय, अलग विचार प्रकट करने वाले लोगों व ग्रुपों के खिलाफ़ कुत्सा-प्रचार करके और उन पर तोहमतें लगाकर निकाल बाहर किया जाने लगा। तालमेल कमेटी ने भारतीय परिस्थितियों का अध्ययन-विश्लेषण करके भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम और रणकौशल तय करने के बुनियादी कार्यभार को तो पूरी तरह से तिलांजलि दे दी। यह घोषित कर दिया गया कि भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम, रणकौशल और रास्ता हूबहू चीनी क्रान्ति जैसा होगा। लेकिन नक्सलबाड़ी टाइप किसान संघर्ष और चीनी रास्ते की दुहाई देते हुए चारु मजूमदार व्यवहार में घनघोर आतंकवादी लाइन लागू करने की बात कर रहे थे। मज़दूर वर्ग के नेतृत्व की बात करते हुए भी ट्रेड यूनियन कार्यों व मज़दूर वर्ग के बीच हर प्रकार की जनकार्रवाई को अर्थवाद-सुधारवाद कहकर ख़ारिज किया जा रहा था। पार्टी को “देहात-आधारित पार्टी” होना था। और वहाँ भी, किसी प्रकार की जनकार्रवाई, आर्थिक संघर्ष और खुले राजनीतिक प्रचार से बचते हुए सीधे सशस्त्र दस्तों का निर्माण करके भूस्वामियों के खिलाफ़ `ऐक्शन´ करना था (जल्दी ही चारु ने इसे स्पष्ट करते हुए `ख़ात्मे की लाइन´ यानी वर्ग शत्रुओं की हत्या की लाइन दी जो व्यक्तिगत आतंकवाद का नग्न रूप था)।

आन्ध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम ज़िले के गिरिजन नक्सलबाड़ी की घटना के करीब आठ वर्ष पहले से भूस्वामियों के शोषण-उत्पीड़न और पुलिस उत्पीड़न के विरुद्ध आन्दोलन चला रहे थे। वह इलाका डी.वी. राव.-नागी रेड्डी धड़े के प्रभाव क्षेत्र में नहीं था। कम्युनिस्ट पार्टी के संशोधनवादियों ने इस संघर्ष को आगे विकसित करने की कभी कोई कोशिश नहीं की। नक्सलबाड़ी की ख्याति के बाद श्रीकाकुलम के नेताओं ने तालमेल कमेटी से सम्पर्क स्थापित किया और चारु मजूमदार को अपना नेतृत्व करने के लिए आमन्त्रित किया। जनवरी ´69 में चारु मजूमदार श्रीकाकुलम गये और वहाँ सशस्त्र संग्राम को “वामपन्थी” आतंकवादी लाइन पर आगे बढ़ाने का दिशा-निर्देश दिया। श्रीकाकुलम में जनवरी ´69 से भूस्वामियों के घरों-गोदामों पर छापामार दस्तों के हमलों और सफ़ाये की लाइन की शुरुआत हुई। चूँकि गिरिजनों का आन्दोलन लम्बे समय से जारी था इसलिए शुरुआती सशस्त्र कार्रवाइयों को व्यापक जनसमर्थन भी हासिल हुआ। बाथापुरम्, पद्मपुर, बूड़ीबांका, आकूपल्ली और गरुड़भद्र में छापामार हमलों और भूस्वामियों-सूदख़ोरों की हत्या की घटनाओं को काफ़ी ख्याति मिली। चारु मजूमदार गुट ने इसे लोकयुद्ध का संकेत बताया। चतरहाट-इस्लामपुर की विफलता के बाद, श्रीकाकुलम में पहली बार चारु मजूमदार की आतंकवादी लाइन व्यापक स्तर पर लागू हुई। पुलिस ने घनघोर दमन की कार्रवाई शुरू की। मई 1966 में, संघर्ष के एक मुख्य नेता पंचाद्रि कृष्णमूर्ति, उनकी पत्नी निर्मला और पाँच अन्य छापामार पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। तमाम दमन के बावजूद श्रीकाकुलम संघर्ष 1970 तक जारी रहा। मई 1970 में भा.क.पा. (मा-ले) के स्थापना-सम्मेलन के कुछ महीने बाद ही गिरिजनों के लोकप्रिय नेता वेंकटापु सत्यनारायण और आदिमाटला कैलाशम् सहित कई और नेताओं की हत्या हो गयी तथा नागभूषण पटनायक और अप्पाला सूरी गिरफ़्तार हो गये। लगभग नेतृत्वविहीन हो चुका आन्दोलन फिर जल्दी ही बिखर गया। इस तरह एक व्यापक आधार वाले, लम्बे समय से जारी जनसंघर्ष को “आतंकवादी” रास्ते पर विमुख करके पराजय के गर्त में धकेल दिया गया।

जनवरी ´69 में श्रीकाकुलम संघर्ष का नेतृत्व हाथ में आ जाने के बाद, चारु मजूमदार को यह उचित अवसर प्रतीत हुआ कि क्रान्तिकारी जनदिशा की पुरज़ोर वकालत करने वाले डी.वी.-नागी ग्रुप से छुटकारा पा लिया जाये और फिर फ़रवरी ´69 में निहायत नौकरशाहाना तरीके से उन्हें तालमेल कमेटी से निकाल बाहर किया गया। डीवी.- नागी के नेतृत्व में आन्ध्र प्रदेश में माकपा से पार्टी का बहुसंख्यक हिस्सा बाहर आया था। कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी राजनीति का इतना व्यापक जनाधार और कार्यकर्ताओं का आधार देश के किसी राज्य में नहीं था। आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी को निष्कासित करने में चारु को मिली सफलता कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए एक भारी धक्का थी जिसने पार्टी गठन की प्रक्रिया को शुरू होते ही गम्भीर नुकसान पहुँचाया।

तालमेल कमेटी में बहस-मुबाहिसे के जनवादी माहौल का गला घोंट दिये जाने और नौकरशाहाना और संकीर्ण गुटपरस्त कार्यशैली के हावी होने के बाद, बंगाल के और पूरे देश के कई छोटे-छोटे ग्रुप तो उसमें शामिल ही नहीं हुए। कई ग्रुप जो शुरू में इससे सम्बद्ध हुए थे, बाद में अलग हो गये। `चिन्ता´/`दक्षिण देश´ ग्रुप का उल्लेख पहले आ चुका है। नक्सलबाड़ी विद्रोह के पाँच महीने बाद इस ग्रुप ने 24 परगना ज़िले के सोनारपुर में किसान संघर्ष संगठित किया था जिसे जबरदस्त पुलिस दमन का शिकार होना पड़ा था। इसमें ग्रुप के एक संस्थापक नेता चन्द्रशेखर दास की हत्या भी कर दी गयी थी। सोनारपुर के अतिरिक्त 1968-69 के दौरान इस ग्रुप ने हावड़ा, हुगली, मेदिनीपुर, बीरभूम, मालदा और बर्धमान ज़िले के कुछ क्षेत्रों में भी किसानों में काम संगठित किया तथा दक्षिणी कलकता, आसनसोल और दुर्गापुर में औद्योगिक मज़दूरों के बीच ट्रेड यूनियन मोर्चे पर काम किया। दक्षिण देश ग्रुप के लोगों का 1966 के अन्त में ही चारु मजूमदार और दार्जिलिंग के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों से सम्पर्क हो चुका था। नक्सलबाड़ी के तुरन्त बाद चारु मजूमदार से फिर उनकी बातचीत हुई। तालमेल कमेटी बनने के बाद चारु मजूमदार से कई अहम मतभेदों के बावजूद दक्षिण देश ग्रुप उससे सम्बद्ध हुआ, लेकिन नौकरशाहाना तौर-तरीके के चलते और मतभेदों के सुलझने की प्रक्रिया नहीं चलते देख, जल्दी ही उसे अलग हो जाना पड़ा। दक्षिण देश ग्रुप की राजनीतिक सोच कई मायनों में दकियानूसी और यान्त्रिक थी, लेकिन उन्होंने राजनीति और सांगठनिक कार्यशैली-विषयक कुछ बुनियादी महत्त्व के प्रश्न उठाये। जनसंगठन और पार्टी संगठन के अन्तरसम्बन्ध और छापामार संघर्ष के विकास, चुनाव के इस्तेमाल, वर्गों के रणनीतिक संश्रय के अमली रूप आदि कई प्रश्नों पर वे स्वयं अतिवामपन्थी भटकावों के शिकार थे, लेकिन बिना किसी राजनीतिक कार्य के गुप्त दस्तों के गठन और `ऐक्शन´ को छापामार-युद्ध बताने और सफ़ाये की लाइन को वे “वामपन्थी” दुस्साहसवाद मानते थे तथा साथ ही, चारु की लाइन को स्वयंस्फूर्ततावाद और अराजकतावाद का भी शिकार मानते थे। चीन की पार्टी के प्रति उनका रवैया अनुकरणवादी था और विभिन्न सांगठनिक प्रश्नों पर वे शुद्धतावादी रोमानी नज़रिये के शिकार थे, लेकिन इस प्रश्न को उन्होंने गम्भीरता के साथ रेखांकित किया कि तालमेल कमेटी को भारतीय परिस्थितियों के अध्ययन-विश्लेषण के आधार पर भारतीय क्रान्ति के कार्यक्रम एवं रणकौशल के निर्धारण के अपने लक्ष्य को पूरा करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए जबकि वह उसकी उपेक्षा कर रही है। उनका भी यह मानना था कि नक्सलबाड़ी नहीं बल्कि तेलंगाना भारत में माओ विचारधारा का पहला प्रयोग था और नक्सलबाड़ी उसका जारी रूप है। इन प्रश्नों पर तालमेल कमेटी में जनवादी ढंग से बहस चलाने के बजाय चारु गुट ने उपेक्षा करने, कुत्सा प्रचार करने और लेबल चस्पाँ करने (`देशव्रती´ में लिखकर भी) का काम किया। यही नहीं, तालमेल कमेटी का पार्टी की तरह इस्तेमाल करते हुए और स्वयं पार्टी नेतृत्व जैसा व्यवहार करते हुए चारु गुट ने `दक्षिण देश´ का प्रकाशन-वितरण बन्द करने के लिए भी कहना शुरू कर दिया। इस स्थिति में `दक्षिण देश´ ग्रुप ने तालमेल कमेटी से अपने को अलग कर लिया। लेकिन साथ ही यह निर्णय भी लिया कि ग़लत नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वे एकता कायम करने की कोशिशें जारी रखेंगे। आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी के निष्कासन और दक्षिण देश ग्रुप के अलग होने के बाद, तालमेल कमेटी के कामों की समीक्षा किये बग़ैर और बुनियादी लक्ष्यों को पूरा किये बग़ैर 22 अप्रैल, 1969 को जब अचानक भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना की घोषणा की गयी और एक वर्ष के भीतर पार्टी कांग्रेस का निर्णय लिया गया तो यह दक्षिण देश ग्रुप के लिए आश्चर्य की बात थी। अपने विचारों और मतभेदों को लेकर उसने भा.क.पा. (मा-ले) नेतृत्व को एक पत्र भेजा, जिसका उसने कोई उत्तर नहीं दिया। तब दक्षिण देश ग्रुप ने अलग राह पकड़ी और 20 अक्टूबर 1969 को `माओवादी कम्युनिस्ट केन्द्र´ नाम से एक अलग केन्द्र की स्थापना की।

क्रान्तिकारियों की पश्चिम बंगाल तालमेल कमेटी (डब्ल्यू.बी.सी.सी.आर.) ने भी अखिल भारतीय तालमेल कमेटी के समक्ष राजनीति, संगठन और कार्यप्रणाली-विषयक कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल उठाये और “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन के साथ अपने मतभेद रखे। उसके प्रश्नों और मतभेदों की भी पूरी तरह से अनदेखी की गयी और यह संगठन भी तालमेल कमेटी में शामिल नहीं हुआ।

मतभेद के बुनियादी और अहम मसले उठाने वाले अगले दो व्यक्ति थे परिमल दासगुप्त और असित सेन। परिमल दासगुप्त तालमेल कमेटी के काम के एक-डेढ़ वर्ष बाद ही आनन-फानन में पार्टी-गठन के निर्णय से सहमत नहीं थे। वे लम्बे सैद्धान्तिक संघर्ष और व्यावहारिक कामों के बाद संशोधनवाद और अवसरवाद से मुक्त क्रान्तिकारी पार्टी की स्थापना के पक्षधर थे। यह सही है कि कोई भी क्रान्तिकारी पार्टी भटकावों से अन्तिम मुक्ति की गारण्टी नहीं दे सकती और यह भटकाव पार्टी में सिर उठाते ही रहते हैं जिनके विरुद्ध पार्टी में सतत दो लाइनों का संघर्ष चलाना पड़ता है। लेकिन इस आदर्शवादी विचलन के बावजूद परिमल दासगुप्त की अवस्थिति इस मायने में सही थी कि कार्यक्रम-निर्धारण के लिए भारतीय परिस्थितियों के अध्ययन-विश्लेषण सहित अपने किसी भी लक्ष्य को तालमेल कमेटी ने वास्तव में अर्जित नहीं किया था और कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच वास्तविक राजनीतिक एकता कायम करने के लिए वे बहस और अनुभवों के आदान-प्रदान की ज़िम्मेदारी लगभग पूरी तरह से छोड़ दी गयी थी। इस मतभेद के बाद परिमल दासगुप्त और उनके समर्थकों ने अखिल भारतीय तालमेल कमेटी से अलग होकर एक समान्तर तालमेल कमेटी बनायी (जो कालान्तर में निष्क्रिय हो गयी) जिसने एक दस्तावेज़ निकालकर चारु मजूमदार के साथ अपने मतभेदों का उल्लेख किया। उक्त दस्तावेज़ में कहा गया था कि चारु मजूमदार माओ के रास्ते से भटककर चे ग्वेवारा के निम्न-बुर्जुआ क्रान्तिवादी रास्ते का अनुसरण कर रहे हैं। माओ विचारधारा राजनीति के आधार पर जनगण को संगठित करने की बात करती है जबकि चे ग्वेवारा का रास्ता उसे मुठभेड़ों के ज़रिये संगठित करने का था। दस्तावेज़ के अनुसार, गुप्त दस्तों के ज़रिये छापामार युद्ध को क्रान्तिकारी आन्दोलन का एकमात्र रास्ता बताना, अर्थवाद से बचने के नाम पर ट्रेड यूनियन आन्दोलन का विरोध, देहाती क्षेत्रों में आधार क्षेत्र के निर्माण के नाम पर शहरी मज़दूरों और मध्य वर्ग के आन्दोलनों के प्रति घृणा-भाव, छोटे-छोटे ग्रुपों द्वारा संघर्षों के ज़रिये ही भूमि क्रान्ति को आगे बढ़ाने का प्रयास और वर्ग संगठन और जन संघर्षों के बिना ही क्रान्तिकारी संघर्ष की कोशिशें – चारु की लाइन के ये सभी संघटक अवयव चे ग्वेवारा से उधार लिये गये हैं, यह माओ विचारधारा का विकृतिकरण है और इन रुझानों को ठीक किये बिना बनायी जाने वाली पार्टी कालान्तर में एक आतंकवादी पार्टी बनकर रह जायेगी।

1 मई, 1969 को कलकता के शहीद मीनार मैदान की जिस जनसभा में कानू सान्याल ने भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना की घोषणा की थी उसकी अध्यक्षता असित सेन ने ही की थी, लेकिन कुछ सप्ताह बाद ही नेतृत्व के साथ पहले से ही चले आ रहे अपने गम्भीर मतभेदों के हल नहीं होने के कारण उन्हें अलग हो जाना पड़ा। चारु मजूमदार की लाइन के साथ असित सेन के मतभेद शुरुआती दौर से ही मौजूद थे। चारु मजूमदार का मानना था कि ज़मीन की लड़ाई किसानों को क्रान्तिकारी रास्ते से भटकाकर अर्थवाद और संशोधनवाद के दलदल में धँसा देती है, अत: उन्हें सिर्फ़ राज्यसत्ता पर अधिकार के लिए लड़ना चाहिए। उनका कहना था कि नक्सलबाड़ी में किसान ज़मीन के लिए नहीं बल्कि राज्यसत्ता पर अधिकार के लिए लड़ रहे थे। असित सेन का मानना था कि कोई भी वर्ग पहले अपनी वर्गीय माँग पर ही संगठित होता है, ज़मीन के लिए संघर्ष जनवादी क्रान्ति के लिए किसानों की तैयारी के लिए ज़रूरी पहला कदम होता है। चारु मजूमदार की लाइन के विपरीत असित सेन ट्रेड यूनियनों को मज़दूरों के लिए क्रान्ति का प्राथमिक स्कूल मानते थे और मज़दूर वर्ग के आन्दोलनों और ट्रेड यूनियनों को आवश्यक मानते थे। वे “देहात-आधारित” पार्टी की अवधारणा का विरोध करते थे और पार्टी के मज़दूरवर्गीय हिरावल चरित्र पर बल देते थे। चारु मजूमदार गुट का तर्क था कि भा.क.पा. (मा-ले) विशुद्ध सर्वहारा पार्टी है क्योंकि उसके अधिकांश नेता सशस्त्र संघर्ष के क्षेत्र से आये हैं। असित सेन का तर्क था कि मात्र कुछ कॉमरेडों के सशस्त्र संघर्ष के क्षेत्र से जुड़े होने से पार्टी का निम्न-पूँजीवादी वर्ग-चरित्र बदल नहीं जाता। मुख्य प्रश्न विचारधारा का है और मज़दूर वर्ग से पार्टी कतारों में भरती का है। साथ ही, व्यापक वर्ग संघर्ष की उपेक्षा करके मात्र क्रान्तिकारी राजनीति देने पर भी क्रान्तिकारी सेना का हिरावल नहीं तैयार हो सकता। असित सेन का कहना था कि आर्थिक माँगों की लड़ाई को संशोधनवाद कहकर मज़दूर आन्दोलन से दूर हट जाना मज़दूर वर्ग को संशोधनवाद और हर तरह के प्रतिक्रियावादी विचारधारा के हवाले कर दिये जाने के समान है। व्यक्ति-हत्या या ख़ात्मे की लाइन को उन्होंने नरोदवाद और चे ग्वेवारा के निम्न-पूँजीवादी रोमानी सिद्धान्त का सम्मिश्रण बताया। असित सेन का कहना था कि वर्ग शत्रुओं की हत्या और जायदाद-ज़ब्ती कभी भी वर्ग संघर्ष का मुख्य रूप नहीं हो सकते। साथ ही, जिस प्रकार जनता के स्वत:स्फूर्त सशस्त्र संघर्ष और क्रान्तिकारी राजनीति के नेतृत्व में चलने वाले सशस्त्र संघर्ष में मौलिक अन्तर होता है, उसी प्रकार निम्न-पूँजीवादी क्रान्तिकारी दुस्साहसियों द्वारा प्रारम्भ किये गये सशस्त्र संघर्ष और मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ विचारधारा से लैस मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी के नेतृत्व में चलने वाले वर्ग-संघर्ष में भी मौलिक अन्तर होता है। हरेक बात छापामार संघर्ष के ज़रिये सोच-समझ ली जायेगी, चारु मजूमदार की इस धारणा का खण्डन करते हुए असित सेन ने अपने दस्तावेज़ में लिखा कि यदि सशस्त्र संग्राम करने से अपने आप सही क्रान्तिकारी पार्टी बन जानी होती तो भारत में क्रान्ति कभी की हो गयी होती। उन्होंने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि चारु की लाइन क्रान्तिकारी पार्टी के मुख्य तत्त्व – मज़दूर वर्ग को सशस्त्र संघर्ष से एकदम अलग कर देती है!

यह सही है कि परिमल दासगुप्त और असित सेनगुप्त द्वारा प्रस्तुत चारु मजूमदार की “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन की आलोचना विचारधारात्मक रूप से उतनी सुसंगत और सांगोपांग नहीं थी, जैसी कि डी.वीराव- नागी रेड्डी ग्रुप या आगे चलकर पंजाब क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी (हरभजन सिंह सोही ग्रुप) द्वारा प्रस्तुत आलोचना थी। फिर भी उन्होंने “वामपन्थी” दुस्साहवाद की प्रकृति, वर्ग-चरित्र और मुख्य अभिव्यक्तियों की बुनियादी तौर पर सही शिनाख्त की थी। समस्या यह थी कि एक गहरी विचारधारात्मक समझ और सांगोपांग दृष्टि न होने के कारण उन्होंने सवाल का़फ़ी देर से उठाये और अलग-अलग समयों पर उठाये। जब आन्ध्र कमेटी से मतभेद चला और उन्हें नौकरशाहाना ढंग से निकाल बाहर किया गया, उस समय उन्होंने सही अवस्थिति नहीं ली थी। यही नहीं, स्वयं अलग होने के बाद भी उन्होंने जनदिशा की बुनियादी एकता के बावजूद उनसे (यानी आन्ध्र कमेटी से) तालमेल बनाने की कोशिश नहीं की। अपनी स्वयं की विचारधारात्मक कमज़ोरी और विचलनों के चलते “वामपन्थी” आतंकवादी लाइन का विरोध करने वाले ग्रुप और व्यक्ति आपस के गौण मतभेदों को अतिरिक्त अहमियत देते रहे और इस कारण से भी अतिवामपन्थ और जनदिशा के बीच ध्रुवीकरण की प्रक्रिया प्रभावित हुई। यह भी एक तथ्य है कि संशोधनवादी भटकाव और कतिपय विचारधारात्मक उलझाव परिमल दासगुप्त और असित सेन के चिन्तन में भी मौजूद थे (जैसे परिमल दासगुप्त सोवियत पार्टी को संशोधनवादी तो मानते थे, लेकिन साथ ही उन्होंने “पश्चिमी साम्राज्यवादी दख़लन्दाज़ी के विरोध” के तर्क के आधार पर चेकोस्लोवाकिया पर सोवियत संघ के आक्रमण को उचित ठहराया था), लेकिन वे सुसंगत संशोधनवादी न होकर `जेनुइन´ मार्क्सवादी-लेनिनवादी ही थे। उनके जीवन के उत्तरवर्ती दौर ने इस बात को सही सिद्ध किया। दोनों जीवनपर्यन्त कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धारा से ही जुड़े रहे और 1996 में अपनी मृत्यु से पूर्व असित सेन भा.क.पा. (मा-ले) (जनशक्ति) ग्रुप के साथ जुड़े हुए थे। मूल और मुख्य बात यह है कि यदि ए.आई.सी.सी.सी.आर. सही जनवादी ढंग से तालमेल और राजनीतिक बहस की भूमिका निभाती तो ऐसे योग्य और ईमानदार लोग बहस-मुबाहिसे के दौरान अपने भटकावों से मुक्त होकर क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन में शानदार भूमिका निभा सकते थे, लेकिन तालमेल कमेटी पर आतंकवादी लाइन के नौकरशाहाना वर्चस्व ने ऐसा होने नहीं दिया। ऐतिहासिक आकलन की दृष्टि से आज मुख्य बात यह है कि कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन को विघटन और तबाही की दिशा में धकेलने में जिस लाइन ने कुंजीभूत भूमिका निभायी, कतिपय कमियों के बावजूद परिमल दासगुप्त और असित सेन जैसे लोगों ने भी उस लाइन की मूल प्रकृति की निशानदेही की और उसकी आलोचना प्रस्तुत की।

ए.आई.सी.सी.सी.आर. के काल में चारु मजूमदार की “वामपन्थी” लाइन की सुसंगत, तार्किक और सांगोपांग समालोचना प्रस्तुत करने वाले और दृढ़ विरोध करने वालों में आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी (डी.वीराव- नागी रेड्डी ग्रुप) के बाद दूसरे स्थान पर पंजाब के एक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धड़े का नाम आता है जिसका नेतृत्व हरभजन सिंह सोही कर रहे थे। 1970 के बाद, भा.क.पा. (मा-ले) काल में एक अलग ग्रुप के तौर पर काम करते हुए कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के इस हिस्से ने जनदिशा को ठोस रूप में सफलतापूर्वक लागू करते हुए पंजाब में “वामपन्थी” आतंकवादी धारा को व्यवहार में भी फ़ैसलाकुन शिकस्त दी। मा.क.पा. की पंजाब इकाई में मतभेद और विवादों की शुरुआत नक्सलबाड़ी विद्रोह के तत्काल बाद हो गयी थी और जल्दी ही माओवादी रुझान वाले कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाल दिया गया। इन क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों ने राज्य स्तर पर एक तालमेल कमेटी गठित की जिसके सचिव दया सिंह थे। दया सिंह सुलझे हुए कम्युनिस्ट थे और “वामपन्थी” लाइन के बारे में उनके भी कुछ `रिजर्वेशंस´ थे। लेकिन कमोबेश 1968 के अन्त से तालमेल कमेटी में हावी “वामपन्थी” लहर का पंजाब में भी भारी प्रभाव था और उदारतावादी प्रवृत्ति के चलते दया सिंह बहुमत के हिसाब से चलने के हामी थे। आतंकवादी लाइन पर पंजाब में सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत 1969 में हुई। कुछ `ऐक्शंस´ के बाद ही पुलिस दमन, गिरफ़्तारियों और फर्जी मुठभेड़ों का धुआँधार सिलसिला शुरू हो गया। मार्च 1970 के अन्त में भा.क.पा. (मा-ले) (तब तक पार्टी की घोषणा हो चुकी थी) की पंजाब राज्य कमेटी के सचिव दया सिंह, रोपड़ ज़िला कमेटी के सचिव बलवन्त सिंह, वयोवृद्ध ग़दरी बाबा और पटियाला के नेता हरिसिंह मृगेन्द्र की पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी। पंजाब में मा-ले आन्दोलन से जुड़ने वाले ग़दर पार्टी के पुराने लोगों में बाबा निरंजन कालसा और बाबा भुजा सिंह भी थे। इनकी भी बाद में पुलिस ने गिरफ़्तारी के बाद फर्जी मुठभेड़ दिखाकर नृशंस हत्या कर दी। “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन पंजाब में पार्टी कांग्रेस के बाद भी कुछ दिनों तक जारी रही। करीब नब्बे के आसपास वर्ग शत्रुओं का सफ़ाया किया गया जिनमें अधिकांश सूदख़ोर थे। पंजाब में देश के अन्य कुछ पिछड़े हिस्सों की तरह ज़मीन और सामन्ती उत्पीड़न का सवाल 1967-70 के दौरान भी नहीं था, लेकिन सूदख़ोरों के खिलाफ़ न केवल ग़रीब बल्कि मँझोले किसानों में भी गहरी नफ़रत थी। पंजाबी समाज में राज्य के विरुद्ध जुझारू वीरतापूर्ण संघर्षों-कुर्बानियों की एक लम्बी परम्परा रही है। कम्युनिस्ट कतारों में विचारधारात्मक समझ के अभाव में इस परम्परा ने “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के लिए खाद-पानी का काम किया। अकेले इस एक राज्य में 1974 तक फर्जी मुठभेड़ों में सौ से कुछ अधिक क्रान्तिकारी मौत के घाट उतारे जा चुके थे और दर्ज़नों क्रान्तिकारी जेलों में लम्बी सज़ाएँ भुगत रहे थे।

पंजाब में राज्य स्तरीय तालमेल कमेटी के गठन के बाद से ही भटिण्डा-फिरोज़पुर कमेटी के लोग सफ़ाये की लाइन, आर्थिक संघर्षों, जन संघर्षों और जन संगठन के निषेध की लाइन और लोक युद्ध के उद्गम और विकास की आतंकवादी समझ का दृढ़तापूर्वक विरोध कर रहे थे। क्रान्तिकारी संघर्षों के असमान विकास और मज़दूर वर्ग के नेतृत्व के प्रश्न पर भी उनकी चारु की लाइन से भिन्न राय थी और जनदिशा के अमल के प्रश्न पर वे अडिग थे। जब भा.क.पा. (मा-ले) के गठन और कांग्रेस की घोषणा हुई तो उन्होंने इस पर भी अपनी अलग राय रखी। कठिन अलगाव झेलकर और “ग़द्दार”, “संशोधनवादी”, “जनता के दुश्मन” आदि “उपाधियाँ” पाकर भी वे अपनी अवस्थिति पर दृढ़ रहे और क्रान्तिकारी आतंकवाद की शक्तिशाली लहर का सामना करते रहे। इसके बावजूद वे औपचारिक तौर पर पहले तालमेल कमेटी, और पार्टी-गठन की घोषणा के बाद भा.क.पा. (मा-ले) का हिस्सा बने रहे। फ़रवरी 1970 में, पार्टी कांग्रेस के ठीक पहले भटिण्डा-फिरोज़पुर कमेटी भा.क.पा. (मा-ले) से अलग हो गयी और `पंजाब कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कमेटी´ (पी.सी.आर.सी.) के नाम से इसने अपना पुनर्गठन किया। आगे चलकर उसने पंजाब में जनदिशा को सफलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से लागू किया और चारुपन्थी धारा को एकदम अलग-थलग और निश्शक्त बना डाला। इसकी चर्चा आलेख में आगे यथास्थान आयेगी।

ए.आई.सी.सी.सी.आर. के पूरे काल में, तालमेल कमेटी द्वारा निर्धारित सभी कार्यभारों को तिलांजलि देते हुए तालमेल कमेटी के स्वरूप को नकारकर उसे एक केन्द्रीकृत पार्टी की तरह इस्तेमाल करते हुए और स्वयं एकछत्र नेता सदृश नौकरशाहाना व्यवहार करते हुए तथा चीन की पार्टी के लेखों एवं प्रसारणों द्वारा मिलने वाली मान्यता एवं नक्सलबाड़ी के घोषित नेता होने की साख का लाभ उठाते हुए चारु मजूमदार ने एक-एक करके अपनी लाइन के विरोधी ग्रुपों और व्यक्तियों को ठिकाने लगाया और तालमेल कमेटी पर अपनी लाइन का वर्चस्व स्थापित होते ही पार्टी-गठन के लिए आगे बढ़ गये। इस प्रक्रिया में उन्हें इस बात से भी मदद मिली कि उनकी लाइन के कई विरोधी स्वयं या तो “वामपन्थी” या दक्षिणपन्थी विचलन के शिकार थे, उनकी (यानी चारु की लाइन के विरोधियों की) लाइन सुसंगत नहीं थी, विरोध के स्वर एकसाथ नहीं बल्कि अलग-अलग उठते रहे तथा जनदिशा के पक्षधर ग्रुपों और लोगों के बीच भी आपस में कई मसलों पर अहम या गौण मतभेद थे। जैसे-जैसे तालमेल कमेटी से विरोध-पक्ष का सफ़ाया होता गया, चारु की लाइन का “वामपन्थी” अवसरवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नग्न और विकृत रूप में सामने आता चला गया। पहले वे गोलमोल भाषा में जनसंघर्षों की या भूमि क्रान्ति के कार्यक्रम की या मज़दूर वर्ग के संघर्षों की बात करते थे, लेकिन अब उन्होंने हर प्रकार की जनकार्रवाई, खुले काम, आर्थिक संघर्ष और राजनीतिक प्रचार-कार्य को सिरे से ख़ारिज करते हुए यह कहना शुरू किया कि “ख़ात्मे की लड़ाई ही वर्ग संघर्ष का उच्चतर रूप और छापामार संघर्ष का आरम्भ दोनों ही है”, इसी के द्वारा भारी किसान जनसमुदाय जागृत होगा, इसी के द्वारा मुक्तांचल-निर्माण और क्रान्तिकारी सेना-निर्माण की समस्या हल होगी और इसी से प्रेरित प्रचण्ड स्वयंस्फूर्त जन-अभ्युत्थान राज्यसत्ता पर वज्रघात करेगा। पार्टी कांग्रेस से तीन माह पहले छापामार कार्रवाई के बारे में लिखे गये अपने एक लेख में उन्होंने लिखा कि छापामार दस्ते बिल्कुल गुप्त और स्वतन्त्र होंगे, उन पर पार्टी कमेटी का भी नियन्त्रण नहीं होगा, उनको बनाने का तरीका एक-एक व्यक्ति को पकड़कर, उसके कान में फुसफुसाकर किया जायेगा, इसकी भनक पार्टी की राजनीतिक इकाइयों को भी नहीं होगी और इसके लिए निम्न-बुर्जुआ बुद्धिजीवियों को पहल करनी होगी। यही नहीं, लोकयुद्ध की दीर्घकालिक प्रवृत्ति को ठुकराते हुए उन्होंने ख़ात्मे की लाइन से प्रेरित प्रचण्ड देशव्यापी विद्रोह की भी कल्पना की और कांग्रेस के पहले के काल में ही, पार्टी-गठन की घोषणा के बाद, 1969 में सत्तर के दशक को मुक्ति के दशक में बदल देने का नारा दिया।

वस्तुत: यह रणदिवे काल के “वामपन्थी” भटकाव का ही एक अत्याधिक विकृत और भोंड़ा संस्करण था जिसका मार्क्सवाद-लेनिनवाद से और जनवादी क्रान्ति विषयक माओ के विचारों से कुछ भी लेना-देना नहीं था।

सिद्धान्त-निरूपण के साथ ही क्रान्तिकारी आतंकवाद का व्यवहार भी देश के विभिन्न हिस्सों में ज़ोर-शोर से जारी था। देश के विभिन्न हिस्सों में चारु की लाइन से प्रेरित कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी छिटपुट, बिखरे हुए रूप में, दस्ते बनाकर `ऐक्शन´ और ख़ात्मे की लाइन लागू करते थे और कुछेक कार्रवाइयों के बाद ही सबकुछ बिखर जाता था। श्रीकाकुलम के बाद “वाम” दुस्साहसवाद का दूसरा बड़ा प्रयोग बंगाल के मिदनापुर ज़िले के दो थानों डेबरा और गोपीवल्लभपुर में हुआ। उस समय तक तालमेल कमेटी पार्टी-गठन की घोषणा कर चुकी थी। सितम्बर ´69 से यहाँ कार्रवाइयों की शुरुआत नवगठित पार्टी की प. बंगाल-बिहार-उड़ीसा सीमा आंचलिक कमेटी ने की थी जिसके सचिव असीम चटर्जी और मुख्य संगठनकर्ता सन्तोष राणा, मिहिर राणा, गुणधर मुर्मू आदि थे। उल्लेखनीय है कि शुरुआत यहाँ भी व्यापक जन पहलकदमी और जनान्दोलन के रूप में हुई। अत्याचारी ज़मींदारों के खेत काटने के अभियान में 40,000 किसानों ने हिस्सा लिया। गाँवों में किसान कमेटियों ने अपनी सत्ता कायम करके लोक अदालतें लगाकर ज़मींदारों, सूदख़ोरों को दण्डित किया। ज़मींदारों और धनी किसानों के खेतों में काम करने वाले मज़दूरों की मज़दूरी पाँच गुनी कर दी गयी। लेकिन इस शुरुआत के बाद दस्तों की आतंकवादी कार्रवाइयों ने जनान्दोलन को तबाह कर दिया। अप्रैल 1970 तक साठ वर्ग शत्रुओं की हत्या की जा चुकी थी। इस मुहिम को डेबरा और गोपीवल्लभपुर थानों से बाहर खड़गपुर लोकल, सांक्राइल, केशापुर और चाकुलिया में फैलाया गया। लेकिन बढ़ते दमन और गतिरोध के साथ ही नेतृत्व में मतभेद भी पैदा होने लगे और लाइन पर सवाल भी उठने लगे। 1970 के मध्य तक यह आन्दोलन बिखर चुका था।

बिहार के मुजफ़रपुर ज़िले के मुसहरी अंचल के लगभग बारह गाँवों में भी भूमि आन्दोलन की शुरुआत 1969 में जनान्दोलन के रूप में हुई जिसमें लगभग दस हज़ार किसानों ने हिस्सा लिया। शुरुआती दौर के बाद वहाँ भी सफ़ाये की लाइन लागू हुई और फ़रवरी ´70 तक दस वर्ग-शत्रुओं की हत्या कर दी गयी। यहाँ भी डेढ़ वर्ष के भीतर आन्दोलन गतिरोध का शिकार होकर बिखर गया।

उत्तर प्रदेश में लखीमपुर ज़िले के तराई अंचल के पालिया में जनवरी-फ़रवरी 1968 में किसानों का आन्दोलन जन-पहलकदमी और जन-भागीदारी के साथ शुरू हुआ। ग़रीब किसानों और मज़दूरों ने पीलीभीत तराई फार्म और पतियान, घोला, इब्राहीमपुर के फार्मों पर (यह एक दीगर प्रश्न है कि मुद्दा यहाँ ज़मीन का होना चाहिए था या नहीं, क्योंकि ये फार्म पूँजीवादी भूस्वामियों के फार्म थे जो मज़दूरों से काम लेकर मुनाफ़े की खेती करते थे) फार्म मालिकों के गुण्डा गिरोहों से मोर्चा लेकर ज़मीन पर कब्ज़ा किया। फिर “वामपन्थी” लाइन के हावी होने का दौर आया और दमन ने भी ज़ोर पकड़ा। एक वर्ष के भीतर यह आन्दोलन भी बिखर गया।

बावजूद इन विफलताओं के, मुक्ति संघर्ष के निरन्तर अग्रवर्ती विकास के चारु के दावे जारी थे। कारण यह था कि एक जगह “वामपन्थी” लाइन की विफलता सामने आती थी, तब तक दूसरे किसी क्षेत्र में ज़ोर-शोर से इसका अमल शुरू हो चुका होता था। फिर भी 1970 के अन्त तक पूरे देश में मा-ले आन्दोलन की “वाम” आतंकवादी मुहिम पिट चुकी थी और चतुर्दिक व्याप्त गतिरोध एक ओर कतारों में निराशा पैदा कर रहा था, दूसरी ओर नेतृत्व में मतभेद और फूट की ज़मीन तैयार कर रहा था। इसकी चर्चा लेख के अगले हिस्से में पार्टी कांग्रेस के बाद के काल के घटना-प्रवाह के विवरण और समाहार के दौरान की जायेगी। यहाँ पार्टी-कांग्रेस तक का घटनाक्रम संक्षेप में बताकर हमें इस हिस्से का समापन करना होगा। ए.आई.सी.सी.सी.आर. से आन्ध्र प्रदेश कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कमेटी के निष्कासन (7 फ़रवरी ´69) के बाद चारु को लगने लगा था कि “वामपन्थी” लाइन के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हटायी जा चुकी है। अपने पहले के विचार को एकाएक बदलते हुए उन्होंने अचानक यह विचार रखना शुरू किया कि अब सर्वभारतीय पार्टी गठन का उपयुक्त समय आ गया है। तालमेल कमेटी के कामों की कोई भी समीक्षा नहीं हुई। कुछ लोगों ने विरोध किया, फिर सहमत हो गये। परिमल दासगुप्त को निकाले जाने के बाद इस निर्णय का एकमात्र शेष विरोधी भी रास्ते से हट गया। 22 अप्रैल 1969 को तालमेल कमेटी ने अपने को भंग कर भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना की और 1 मई 1969 को कलकता के शहीद मीनार मैदान में आयोजित जनसभा में कानू सान्याल ने इसकी घोषणा की। 27 अप्रैल के अधिवेशन में पार्टी की आरजी (कांग्रेस तक के लिए) नेतृत्वकारी कमेटी के रूप में केन्द्रीय सांगठनिक कमेटी का गठन किया गया जिसके कुल ग्यारह सदस्य थे : चारु मजूमदार, सुशीतल रायचौधरी, सरोज दत्त, कानू सान्याल, सौरेन बसु, शिवकुमार मिश्र, सत्यनारायण सिंह, आर.पी. सर्राफ़, पंचाद्रि कृष्णमूर्ति, चौधरी तेजेश्वर राव और एल. अप्पू। चारु मजूमदार को कमेटी का सचिव चुना गया। एक वर्ष के भीतर पार्टी कांग्रेस बुलाने का निर्णय लिया गया। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने पार्टी-स्थापना का स्वागत किया और उसे मान्यता प्रदान की। पीकिंङ रेडियो से 22 अप्रैल ´69 के प्रस्ताव का, 1 मई की जनसभा में कानू सान्याल के भाषण का और जनसभा में पारित प्रस्तावों का प्रसारण हुआ। इससे कतारों में नवगठित पार्टी की मान्यता बढ़ी और नये उत्साह का संचार हुआ। 1969 के अन्त में एक पार्टी प्रतिनिधिमण्डल ने चीन की गुप्त यात्रा भी की।

अप्रैल 1970 में पार्टी कांग्रेस की तैयारी के लिए केन्द्रीय सांगठनिक कमेटी ने तीन दिनों की बैठक की। बैठक में सत्यनारायण सिंह, शिवकुमार मिश्र और सौरेन बसु को पार्टी कार्यक्रम का मसविदा तैयार करने की तथा सुशीतल रायचौधरी, आर.पी. सर्राफ़ और सरोज दत्त को राजनीतिक प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी।

भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना कांग्रेस (जिसे कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास की निरन्तरता की दृष्टि से आठवीं कांग्रेस कहा गया) 15-16 मई 1970 को कलकता में हुई जिसमें प. बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, आन्ध्र, त्रिपुरा, तमिलनाडु, केरल, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसके पूर्व राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे पर उत्तर प्रदेश राज्य सम्मेलन में काफ़ी बहस हुई थी जिसमें छापामार संघर्ष के ही संघर्ष के एकमात्र रूप होने, सफ़ाये की लाइन और चीन की पार्टी के प्रति निष्ठा को क्रान्तिकारियों की एकरूपता की एकमात्र शर्त बनाने का विरोध किया गया था। कांग्रेस में आर.एन. उपाध्याय ने इस बहस की रिपोर्ट रखी। स्पष्ट था कि उ.प्र. में चारु की लाइन के विरोध का पक्ष प्रधान था। लेकिन राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे के पक्ष में सत्यनारायण सिंह के वक्तव्य के बाद उसे पारित कर दिया गया। पार्टी-कार्यक्रम चीन की लोक जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम पर आधारित था। इसमें भारतीय समाज को एक अर्द्धसामन्ती, अर्द्ध-औपनिवेशिक समाज बताते हुए और आज़ादी को नकली आज़ादी बताते हुए अमेरिकी साम्राज्यवाद, सोवियत सामाजिक साम्राज्यवाद, सामन्तवाद और दलाल-नौकरशाह पूँजी को भारतीय जनता के चार मुख्य शत्रु बताया गया था। भारत को अमेरिकी और सोवियत साम्राज्यवाद का (एकसाथ) नवउपनिवेश बताया गया था लेकिन तत्कालीन दौर का मुख्य अन्तरविरोध व्यापक भारतीय जनता और सामन्तवाद के रूप में बताया गया था। यह कार्यक्रम चीन की पार्टी के विश्व परिस्थितियों के आम आकलन को निगमनात्मक तरीके से भारत पर लागू करते हुए तैयार किया गया था और विसंगतियों से भरा हुआ था। इसके पीछे ठोस परिस्थितियों के स्वतन्त्र अध्ययन-विश्लेषण की कोई भूमिका नहीं थी। आगे लेख में नवजनवादी कार्यक्रम की तमाम विसंगतियों-अन्तरविरोधों की चर्चा उस स्थान पर की जायेगी जहाँ मार्क्सवादी-लेनिनवादी शिविर में इस पर सवाल उठने का प्रसंग आयेगा, इसलिए यहाँ हम उसके विस्तार में नहीं जा रहे हैं। राजनीतिक प्रस्ताव भी इसी कार्यक्रम के अनुरूप था। साथ ही, उसमें रणकौशल और रास्ते से जुड़े विविध प्रश्नों पर रखी गयी अवस्थिति में “वाम” अवसरवादी लाइन की पूरी छाया मौजूद थी। रही-सही कोर-कसर चारु मजूमदार ने अपने वक्तव्य से पूरी कर दी जिसमें उन्होंने साफ़-साफ़ शब्दों में पुरज़ोर तरीके से आतंकवादी लाइन की हाँक लगायी थी।

यहाँ यह चर्चा भी ज़रूरी है कि कांग्रेस में सौरेन बसु ने (सरोज दत्त भी उनके साथ थे) चारु मजूमदार के व्यक्तिगत प्राधिकार को औपचारिक तौर पर स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। असीम चटर्जी ने प्रस्ताव के पक्ष में यहाँ तक कह डाला कि केन्द्रीय कमेटी और चारु मजूमदार के बीच विरोध होने पर मैं चारु मजूमदार का साथ दूँगा। कानू सान्याल ने बस इतना कहा कि तराई रिपोर्ट में चारु मजूमदार की भूमिका का और ज्यादा उल्लेख करना ज़रूरी था। सत्यनारायण सिंह ने इसका मुखर विरोध किया। शिवकुमार मिश्र और आर.पी. सर्राफ़ ने भी दबी जुबान से विरोध प्रकट किया। सुशीतल रायचौधरी ने माओ के उद्धरणों की पुस्तक से पार्टी कमेटी को शक्तिशाली बनाने सम्बन्धी सारे उद्धरण पढ़ सुनाये और इस प्रस्ताव को माओ की शिक्षाओं के विपरीत बताया। आम सहमति नहीं बनने के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका लेकिन बाद के दौर में केन्द्रीय कमेटी में मौजूद चारु समर्थक कॉकस ने वस्तुत: चारु के प्राधिकार वाली स्थिति को ही लागू किया, जिसके आगे केन्द्रीय कमेटी का कोई मतलब ही नहीं रह गया था। यह सर्वथा स्वाभाविक था क्योंकि “वामपन्थी” दुस्साहसवादी विचारधारात्मक-राजनीतिक लाइन केवल और केवल नौकरशाहाना और फरमानशाहाना केन्द्रीयता की सांगठनिक लाइन के माध्यम से ही प्रभावी हो सकती है।

कांग्रेस ने एक बीस-सदस्यीय केन्द्रीय कमेटी का चुनाव किया जिसके सदस्य थे : चारु मजूमदार, सुशीतल रायचौधरी, सरोज दत्त, कानू सान्याल, सौरेन बसु, सुनीति कुमार घोष, असीम चटर्जी (प. बंगाल), सत्यनारायण सिंह, गुरुबख्श सिंह (बिहार), शिवकुमार मिश्र, महेन्द्र सिंह (उत्तर प्रदेश), वेंकटाप्पु सत्यनारायण, आदिमाटला कैलाशम्, नागभूषण पटनायक, अप्पाला सूरी (आन्ध्र प्रदेश), एल. अप्पू, कोदण्डरामन (तमिलनाडु), आम्बाडि (केरल), आर.पी. सर्राप़+ (जम्मू-कश्मीर), और जगजीत सिंह सोहल (पंजाब)। कमेटी के सचिव चारु मजूमदार चुने गये।

आठवीं कांग्रेस में स्वीकृत कार्यक्रम, राजनीतिक प्रस्ताव, राजनीतिक-सांगठनिक रिपोर्ट और चारु मजूमदार के वक्तव्य को यदि एकसाथ रखकर देखा जाये तो यह बात एकदम साफ़ हो जाती है कि कांग्रेस द्वारा स्वीकृत लाइन की विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ विचारधारा के विपरीत थी। हम यहाँ कार्यक्रम में प्रस्तुत भारतीय समाज के विश्लेषण और चरित्र-निर्धारण का फ़िलहाल उल्लेख नहीं कर रहे हैं। मूल बात विचारधारा की है। यदि कोई क्रान्तिकारी पार्टी जनदिशा और जनवादी केन्द्रीयता की सांगठनिक लाइन को सुसंगत ढंग से लागू करती है तो अनुभवों के समाहार और अन्तर्पार्टी बहस-मुबाहिसे के द्वारा वह क्रान्ति के कार्यक्रम विषयक ग़लती को ठीक भी कर सकती है। लेकिन यदि पार्टी का विचाराधारात्मक आधार ही ग़लत हो तो सही कार्यक्रम भी महज़ काग़ज़ का टुकड़ा बनकर रह जायेगा। भा.क.पा. (मा-ले) का गठन मार्क्सवाद-लेनिनवाद के आधार पर नहीं बल्कि “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के आधार पर हुआ था। आठवीं कांग्रेस ने एक सर्वभारतीय पार्टी-गठन के कार्यभार को कतई पूरा नहीं किया। मूलत: और मुख्यत: क्रान्तिकारी जनदिशा को लागू करने वाले जो मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठन थे (और जो संगठन “वामपन्थी” या दक्षिणपन्थी भटकाव के अपेक्षाकृत कम शिकार थे), वे भा.क.पा. (मा-ले) के बाहर ही रह गये थे। इसलिए, 1970 में गठित भा.क.पा. (मा-ले) के बारे में ज्यादा से ज्यादा इतना ही कहा जा सकता है कि वह गम्भीर “वामपन्थी” अवसरवादी भटकाव से ग्रस्त एक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन था, एक सर्वभारतीय क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी कतई नहीं था।

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-2

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-3

(अगले अंक में जारी)

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-3

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तैयार होती ज़मीन,

वह ऐतिहासिक विस्फोट

और उसके बाद

नवम्बर, 1964 में जब कलकत्ता के त्यागराज हॉल में पार्टी कांग्रेस हो रही थी, उस समय बाहर कुछ लोगों के एक छोटे से ग्रुप ने पर्चे बाँटकर नयी पार्टी के नेतृत्व पर भी मध्यमार्गी और संशोधनवादी भटकाव का शिकार होने का आरोप लगाया। पार्टी कांग्रेस से ज्यादातर प्रतिनिधि निराश और संशयग्रस्त होकर लौटे। 1965 के जनवरी महीने में नवगठित माकपा के महासचिव पी. सुन्दरैया गिरफ़्तार हुए और फिर सरकारी अनुमति से इलाज के लिए सोवियत संघ गये। वहाँ से लौटने के बाद सोवियत नेतृत्व के कई सकारात्मक पहलू गिनाते हुए उन्होंने लिखा कि सोवियत पार्टी की बातों में भी दम है। इधर, महान बहस के दस्तावेज़ निचले स्तर के संगठनकर्ताओं-कार्यकर्ताओं तक भी पहुँचने लगे थे और उन्नत चेतना वाले कार्यकर्ताओं का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा यह समझने लगा था कि संशोधनवाद और मार्क्सवाद के बीच मध्यमार्ग अपनाने की कोई गुंजाइश ही नहीं है और ऐसा करने का एकमात्र मतलब होगा संशोधनवाद के पाले में खड़ा होना। यह समय था जब दक्षिण वियतनाम, फिलीप्पींस और मलाया से लेकर अफ़्रीकी देशों और लातिन अमेरिकी देशों में जारी राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों और नवउपनिवेशवाद-विरोधी सशस्त्र संघर्षों में राष्ट्रीय बुर्जुआ नेतृत्व माओ के दीर्घकालिक लोकयुद्ध की सामरिक रणनीति को लागू कर रहा था और इनमें से अधिकांश संघर्ष विजय की दहलीज़ पर खड़े थे। अफ़्रीकी मुक्ति संघर्ष के अमिल्कर कबराल, क्वामे एन्क्रूमा, जूलियस न्येरेरे जैसे नेता माओ की सामरिक रणनीति के अवदान को घोषित तौर पर स्वीकार कर रहे थे। राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों के साथ मोलतोल करके मदद करने तथा उन्हें शासकों के साथ बातचीत की टेबुल पर बैठकर मोलतोल करने और सुलह-सफाई के ज़रिये सत्ता हासिल करने का सुझाव देने वाले ख्रुश्चेवी संशोधनवादी ज्यादा से ज्यादा बेनकाब होते जा रहे थे। क्यूबाई मिसाइल संकट के समय अमेरिकी धौंस के सामने ख्रुश्चेव के घुटने टेकने के बाद सोवियत शासन के चरित्र के बारे में दुनिया भर की कम्युनिस्ट कतारों के भीतर पहले ही सवाल पैदा हो चुका था। साम्राज्यवादियों के साथ लगातार सुलह-सफाई की उसकी नीति भी उसे शंकाओं के घेरे में खड़ा कर रही थी। 1965 के अन्त में इण्डोनेशिया में कम्युनिस्टों का अभूतपूर्व बर्बर दमन हुआ और इस घटना ने भी भारत के कम्युनिस्ट कतारों के सामने स्पष्ट कर दिया कि यदि कोई पार्टी विशाल जनाधार और कैडर-शक्ति के बावजूद गुप्तता, कैडर-भरती, कार्य संस्कृति के अनुशासन और सामरिक तैयारी के मामले में ढिलाई बरतेगी तो बुर्जुआ राज्यसत्ता बर्बर सैन्यबल से उसे कुचलकर खून के दलदल में धँसा देगी। इस घटना ने भारतीय कम्युनिस्ट कतारों को भी सोवियत और चीनी रास्तों के विचारधारात्मक फ़र्क को समझने में काफ़ी मदद की और वे इसी रोशनी में माकपा के नये नेतृत्व के बारे में भी सोचने लगे। `महान बहस´ के तत्काल बाद चीन में 1964 से `महान समाजवादी शिक्षा आन्दोलन´ की शुरुआत हो चुकी थी। यह आन्दोलन वस्तुत: समाजवादी निर्माण के प्रश्न पर चीनी पार्टी के भीतर संशोधनवाद और क्रान्तिकारी लाइन के बीच के संघर्ष का ही एक रूप था और इस दौरान महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की पूर्वपीठिका तैयार होने लगी थी। इस आन्दोलन से सम्बन्धित चीनी पार्टी के दस्तावेज़ भी माकपा से जुड़े बुद्धिजीवियों और चेतनशील कार्यकर्ताओं तक पहुँच रहे थे और चीज़ों को समझने में सहायक बन रहे थे। सातवीं कांग्रेस में जनान्दोलन की लम्बी-चौड़ी बातों के उलट, कांग्रेस के ठीक बाद कहीं भी भूमि संघर्ष संगठित करने या मज़दूरों की राजनीतिक-आर्थिक माँगों को लेकर जुझारू आन्दोलन संगठित करने की नेतृत्व की ओर से कोई पहल नहीं दीख रही थी। नियमित अनुष्ठान से अलग क्रान्तिकारी राजनीतिक प्रचार एवं शिक्षा की कोई कार्रवाई भी नहीं संगठित की जा रही थी, जो किसी नवगठित पार्टी के लिए आवश्यक कार्यभार होता है। पार्टी-नेतृत्व का मुख्य या लगभग पूरा ज़ोर कांग्रेस-विरोधी व्यापक संयुक्त मोर्चा बनाकर आगामी चुनावों में कांग्रेस का विकल्प प्रस्तुत करने की तैयारी पर था। हालाँकि अपने चुनावी चरित्र पर पर्दा डालने के लिए वह लगातार “जनान्दोलनों को मज़बूत बनाने वाली संक्रमणकालीन सरकारों की स्थापना” (वह “संक्रमणकाल” आज तक जारी है!) की ही बात कह रही थी। 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय भी पार्टी ने बुर्जुआ अन्धराष्ट्रवाद-विरोधी और युद्ध-विरोधी क्रान्तिकारी प्रचार का कोई भी कार्यक्रम हाथ में लेने का साहस नहीं किया। राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय पटल की ये सारी घटनाएँ और विश्व-इतिहास के उस दौर में चतुर्दिक आगे बढ़ते मुक्ति संघर्षों के ज्वार माकपा की कतारों की चेतना का क्रान्तिकारीकरण करने में, उन्हें संशोधनवाद और क्रान्तिकारी मार्क्सवाद के बीच अन्तर करना सिखाने में तथा माकपा नेतृत्व के असली चरित्र को पहचानने में मदद पहुँचा रहे थे। पार्टी नेतृत्व का व्यवहार स्वयं उसके चरित्र को उजागर करता जा रहा था।

नवगठित पार्टी-नेतृत्व के चरित्र पर प्रश्न उठाने वाले कुछ लोगों ने सातवीं कांग्रेस के तत्काल बाद, पार्टी के भीतर गुप्त तरीके से (उनका आकलन था कि नौकरशाह पार्टी नेतृत्व पार्टी के भीतर उन्हें बुनियादी सैद्धान्तिक मुद्दों पर कतई बहस नहीं चलाने देगा और ऐसा करते ही उन्हें उग्रवादी और दुस्साहसवादी बताकर किनारे लगा दिया जायेगा। उनका यह सोचना एकदम ठीक था, तमाम मसलों पर माकपा नेतृत्व के बाद के व्यवहार ने यही सिद्ध किया) सैद्धान्तिकी संघर्ष चलाने के लिए कन्हाई चटर्जी, अमूल्य सेन और चन्द्रशेखर दास की पहल पर, उन्हीं की अगुवाई में एक गुप्त क्रान्तिकारी केन्द्र का गठन किया। इस केन्द्र की ओर से मार्च, 1965 में `चिन्ता´ नामक बुलेटिन का पहला अंक निकला और पार्टी कतारों के बीच (विशेषकर बिहार और बंगाल में) इसे गुप्त रूप से बाँटा गया। ठीक इसी समय, चारू मजूमदार ने भी अपने प्रसिद्ध आठ दस्तावेज़ों की श्रंखला का लेखन प्रारम्भ किया। 28 फ़रवरी, 1965 को इस श्रंखला का पहला दस्तावेज़ `वर्तमान स्थिति में हमारे कर्त्तव्य’ उन्होंने पूरा किया। माकपा के नवसंशोधनवाद के विरुद्ध बिगुल फूँकने वाली ये दो निर्णायक पहलकदमियाँ अलग-अलग, लेकिन एकदम एक ही समय में ली गयीं। इनके अतिरिक्त, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब के कई लोग सातवीं कांग्रेस के बाद से ही पार्टी नेतृत्व को संशोधनवादी रास्ते का राही मानने लगे थे और इस मसले पर सोच-विचार रहे थे कि पार्टी के भीतर संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष चलाने का रास्ता क्या हो सकता है? कुछ लोग (विशेषकर पार्टी बुद्धिजीवी) ऐसे भी थे, जिन्होंने पार्टी को संशोधनवादी मानकर उसकी सदस्यता छोड़ दी थी या सदस्यता के बावजूद निष्क्रिय हो गये थे।

मार्च, 1965 से लेकर 1966 के मध्य तक `चिन्ता´ बुलेटिन के कुल छह अंक निकले। इसके बाद इस क्रान्तिकारी केन्द्र के सूत्रधारों को उग्रवादी और दुस्साहसवादी करार देकर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। निष्कासन के बाद, संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष और भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल से जुड़े विविध प्रश्नों पर बहस को व्यापक आधार पर चलाने के लिए 1966 के मध्य से कन्हाई चटर्जी-अमूल्य सेन के नेतृत्व वाले इस ग्रुप ने `दक्षिण देश´ नाम से एक खुली पत्रिका का नियमित प्रकाशन शुरू किया। चारु मजूमदार अगस्त, 1966 तक अपनी `आठ दस्तावेज़ श्रंखला´ के छ: दस्तावेज़ लिख चुके थे। सातवाँ और आठवाँ दस्तावेज़ उन्होंने क्रमश: 1967 के फ़रवरी और अप्रैल महीने में लिखा, जब नक्सलबाड़ी में किसानों के बड़े-बड़े जुलूस निकलने लगे थे और मई में शुरू होने वाले किसान-विद्रोह की ज़मीन तैयार हो चुकी थी। इन दस्तावेज़ों और `चिन्ता´ के अंकों की विषयवस्तु की चर्चा से पहले नक्सलबाड़ी के बारे में यह जानना ज़रूरी है कि इस विद्रोह की वस्तुगत परिस्थितियाँ किस प्रकार वहाँ मौजूद थीं और नक्सलबाड़ी में किसान संघर्षों और कम्युनिस्ट आन्दोलन की किस प्रकार पहले से ही एक परम्परा रही थी।

दार्जीलिंग ज़िले के सिलीगुड़ी सबडिवीज़न स्थित नक्सलबाड़ी क्षेत्र का ग्रामीण इलाका तराई अंचल है। वहीं से पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है। खेती के अलावा इस इलाके में चाय बाग़ान भी हैं, जो गाँवों से एकदम लगे हुए हैं। इस क्षेत्र के किसानों और बाग़ान मज़दूरों के बीच कम्युनिस्ट पार्टी ने व्यवस्थित ढंग से काम की शुरुआत 1951 में की। दार्जीलिंग ज़िला ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत एक `नॉन-रेग्यूलेटेड एरिया´ था। 1947 के बाद भी वहाँ के माहौल पर इसकी छाप थी। इलाके में चाय बाग़ान मालिक प्लाण्टर-भूस्वामियों और जोतदारों (भूस्वामियों) की निरंकुश सत्ता कायम थी। बाग़ान मज़दूरों की कोई यूनियन नहीं थी और बाग़ान मालिकों का आतंक इतना था कि वे इस दिशा में सोच तक नहीं सकते थे। किसी भी राजनीतिक पार्टी का कार्यकर्ता जोतदारों की मर्ज़ी और इजाज़त के बग़ैर किसानों की झोंपड़ियों तक पहुँच भी नहीं सकता था। इन कठिन परिस्थितियों में पार्टी ने इस क्षेत्र में काम शुरू किया। चारु मजूमदार उस सिलीगुड़ी लोकल कमेटी के नेता थे, जिसके अन्तर्गत नक्सलबाड़ी क्षेत्र आता था।

चारु मजूमदार 1930 के दशक में पाबना (अब बांगलादेश) के एडवर्ड कॉलेज में पढ़ते समय कम्युनिस्ट छात्र-छात्राओं के सम्पर्क में आये और कम्युनिस्ट बने। इण्टरमीडियट की फाइनल की परीक्षा छोड़कर वे जलपाईगुड़ी ज़िले के देवीगंज थाने (अब बांगलादेश) के पचागढ़ में किसानों के बीच काम करने लगे। कम्युनिज्म की प्रारिम्भक शिक्षा उन्हें माधवदत्त से मिली और फिर वे जलपाईगुड़ी के कम्युनिस्ट नेता शचिन दासगुप्त और वीरेन दत्त के सम्पर्क में आये। किसानों के अधियार आन्दोलन में भागीदारी के बाद उन्होंने लालमनिहार जं. (दिनाजपुर ज़िला) से लेकर जलपाईगुड़ी तक के रेल मज़दूरों और दुआर के चाय बाग़ान के मज़दूरों के बीच संगठनकर्त्ता के रूप में काम किया। उत्तर बंगाल के करीब 70 लाख किसानों के प्रसिद्ध तेभागा आन्दोलन (1946-47) में भी वे सक्रिय रहे। उल्लेखनीय है कि तेभागा आन्दोलन का प्रत्यक्ष नेतृत्व जब बर्बर दमन का प्रतिरोध करने के लिए किसानों की सशस्त्र प्रतिरक्षा संगठित करने के बारे में सोच रहा था, उसी समय मुस्लिम लीग सरकार के कोरे आश्वासनों के बाद प्रादेशिक नेतृत्व ने आन्दोलन वापस ले लिया। तब प्रादेशिक नेतृत्व की तीखी आलोचना करने वालों में चारु मजूमदार भी थे। 1947 में देश के विभाजन के बाद चारु मजूमदार का मुख्य कार्यक्षेत्र जब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांगलादेश) में चला गया तो वे जलपाईगुड़ी ज़िले के उस हिस्से में चाय बाग़ान मज़दूरों, रेल मज़दूरों और आदिवासी किसानों के बीच काम करने लगे, जो भारत में आया था। रणदिवे काल की अतिवामपन्थी लाइन और पार्टी के ग़ैरव़कानूनी करार दिये जाने के दौर में चारु जेल में थे। वहीं उन्हें तेलंगाना संघर्ष के दौरान पार्टी में जारी बहस और आन्ध्र दस्तावेज़ के बारे में पता चला। जेल में उन्हें माओ और चीनी पार्टी की लाइन के पक्षधर के रूप में जाना जाता था। तेलंगाना संघर्ष वापस लिये जाने के बाद, मार्च 1952 में चारु जेल से रिहा हुए। अब उनका नया कार्यक्षेत्र दार्जीलिंग ज़िले का सिलीगुड़ी सब-डिवीज़न बना जहाँ की लोकल कमेटी का नेतृत्व चारु मजूमदार ने सम्हाला। 1951 में पार्टी ने नक्सलबाड़ी क्षेत्र के गाँवों के किसानों और चाय बाग़ान मज़दूरों के बीच कामों की शुरुआत की। इसी समय कानू सान्याल ने भी यहाँ पूर्णकालिक संगठनकर्त्ता के रूप में काम करना शुरू किया और जंगल सन्थाल, दम लाल मल्लिक, खोदनलाल मल्लिक आदि स्थानीय कार्यकर्ताओं की एक टीम तैयार हुई।

1951 से लेकर 1954 तक का दौर नक्सलबाड़ी में किसानों और बाग़ान मज़दूरों के संगठित होने का प्रारम्भिक दौर था, लेकिन इलाके में जोतदारों के अत्याचार का इतना अधिक बोलबाला था कि उनके साथ खूनी झड़पों के बिना शुरुआती काम भी असम्भव था। पार्टी संगठनकर्ताओं ने जोतदारों की अवैध वसूलियों और अत्याचारों के विरुद्ध किसानों को संगठित करते हुए निकटवर्ती चाय बाग़ान मज़दूरों को भी उनके पक्ष में संगठित किया। इस तरह, स्थानीय स्तर पर, व्यवहार में मज़दूरों और किसानों का संयुक्त मोर्चा तैयार हुआ और 1955 से 1957 के बीच नक्सलबाड़ी के किसानों-मज़दूरों ने एक साथ मिलकर लगातार संघर्ष चलाये। जोतदारों और बाग़ान मालिकों के निरंकुश अत्याचार के चलते इस इलाके के किसानों और मज़दूरों को शुरू से ही अपने आत्मरक्षार्थ परम्परागत हथियारों की मदद लेनी पड़ी। यह एक महत्त्वपूर्ण कारण था कि नक्सलबाड़ी के किसानों में उस समय से ही कानूनी और शान्तिपूर्ण तरीके के बारे में कोई भ्रम नहीं था। 1955 का चाय बाग़ान मज़दूरों का बोनस आन्दोलन हालाँकि एक आर्थिक संघर्ष था, लेकिन हज़ारों मज़दूरों-किसानों ने इसमें भी अपनी जुझारू एकजुटता और लड़ाकूपन का प्रदर्शन किया और न केवल बाग़ान मालिकों के भाड़े के गुण्डों को बल्कि पुलिस को भी पीछे हटने पर मज़बूर कर दिया। एक मौके पर दस हज़ार हथियारबन्द बाग़ान मज़दूरों और किसानों ने पुलिस बल को निश्शस्त्र होने के लिए मज़बूर कर दिया था। नक्सलबाड़ी में वर्ग-संघर्ष के विकास की दृष्टि से 1955-56 का यह दूसरा दौर विशेष महत्त्व रखता है। 1958-62 के काल को नक्सलबाड़ी में किसानों-मज़दूरों के संघर्ष के विकास का तीसरा दौर कहा जा सकता है। इस दौरान पश्चिम बंगाल किसान सभा ने `बेनामी´ ज़मीन पर किसानों द्वारा फिर से कब्ज़ा का नारा दिया। लेकिन सिलीगुड़ी की सबडिवीज़नल किसान समिति के नक्सलबाड़ी में हुए सम्मेलन ने इस आह्वान को वास्तविक भूमि-सुधार की उद्देश्य-पूर्ति के लिए अधूरा मानते हुए जोतदारों की ज़मीन की कुल उपज ज़ब्त करने का आह्वान किया। सम्मेलन ने किसानों का आह्वान किया कि वे सारी फसल काटकर अपनी जगहों पर रखें, मालिकाना का सबूत पेश करने पर ही किसान समितियाँ जोतदारों को उनका हिस्सा दें और पुलिस एवं जोतदारों से फसल को बचाने के लिए किसान हथियारबन्द हो जायें। इस आन्दोलन के दौरान, सिर्फ़ 1958-59 के वर्ष में दो हज़ार किसान गिरफ़्तार हुए और उन पर सात सौ आपराधिक मुकदमे पुलिस ने दर्ज किये। जोतदारों और पुलिस से किसानों की सशस्त्र झड़पें हुई और जोतदारों के हथियार छीनने की कई घटनाएँ घटीं। किसान 80 फीसदी फसल अपने कब्ज़े में लेने और उसका बड़ा हिस्सा पुलिस द्वारा छीने जाने से बचाने में सफल रहे।

पूरे आन्दोलन के दौरान एक भी नेतृत्वकारी संगठनकर्ता को पुलिस गिरफ़्तार नहीं कर पायी। चारु मजूमदार इस आन्दोलन से सीधे नहीं जुड़े थे। उसके संगठनकर्ता कानू सान्याल, जंगल सन्थाल, कदम मल्लिक आदि थे। चारु मजूमदार की एक नकारात्मक भूमिका यह ज़रूर रही थी कि राज्य किसान सभा के नेताओं के निर्देश पर, संघर्ष के नेताओं और भागीदार किसान कार्यकर्ताओं से सलाह-मशविरा किये बिना ही, उन्होंने संघर्ष वापस लेने की घोषणा कर दी थी। इसके बावजूद, नक्सलबाड़ी के किसान कमोबेश 1962 तक इस संघर्ष की उपलब्धियों की हिफ़ाज़त में सफल रहे।

1962-64 के दौर को नक्सलबाड़ी में किसानों के संघर्ष और उनके बीच पार्टी कार्य के विकास का चौथा दौर माना जा सकता है। 1962 के भारत-चीन सीमा-युद्ध के समय और उसके बाद के वर्षों में घनघोर अन्धराष्ट्रवाद और कम्युनिज्म-विरोध के माहौल में भी नक्सलबाड़ी क्षेत्र के कम्युनिस्ट कार्यकर्ता दृढ़तापूर्वक इस अवस्थिति पर खड़े रहे कि हमलावर चीन नहीं है और यह युद्ध साम्राज्यवादियों की शह और अपनी विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षा से भारतीय शासक वर्ग ने छेड़ा है। किसानों-मज़दूरों में कम्युनिस्टों की साख इतनी मज़बूत थी कि वे दृढ़तापूर्वक उनके साथ खड़े थे। उस समय सही अवस्थिति लेने वाले कम्युनिस्टों की गिरफ़्तारी की जो मुहिम चली थी, उसके तहत अकेले नक्सलबाड़ी में सौ किसान-मज़दूर गिरफ़्तार हुए थे। इन कठिन वर्षों में भी जोतदारों और टी-प्लाण्टरों के हमलों और सत्ता के दमन का मुकाबला करते हुए इस क्षेत्र के किसान-मज़दूर अपनी सांगठनिक ताकत को बनाये रखने में सफ़ल रहे थे। 1964 में दार्जीलिंग ज़िले के मज़दूर, किसान और मध्यवर्गीय कार्यकर्ताओं ने संशोधनवाद के विरुद्ध जमकर संघर्ष किया और डांगेपंथियों  को पूरी तरह से अलगाव में डाल दिया। सिलीगुड़ी सबडिवीज़न के कार्यकर्ता दृढ़तापूर्वक ख्रुश्चेवी संशोधनवाद का विरोध कर रहे थे और चीनी पार्टी के पक्ष का समर्थन कर रहे थे।

नक्सलबाड़ी में जोतदारों-बाग़ान मालिकों के बर्बर दमन की जो विशेष परिस्थितियाँ थीं और वहाँ के किसानों-मज़दूरों के बीच कम्युनिस्ट कतारों के काम और कम्युनिस्ट नेतृत्व में उनके जुझारू संघर्षों का जो डेढ़ दशक लम्बा इतिहास था, उसने नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह और उस पर क्रान्तिकारी कम्युनिज्म के विचारधारात्मक-राजनीतिक वर्चस्व-स्थापना का आधार तैयार किया था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जुझारू संघर्षों का यह सिलसिला ही स्वत: विकसित होकर 1967 में नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के रूप में सामने आया। ऐसा मानना स्वयंस्फूर्ततावादी भटकाव होगा। नक्सलबाड़ी सशस्त्र किसान विद्रोह महज़ एक विद्रोह नहीं था। वह एक क्रान्तिकारी किसान-उभार था, जिसका नेतृत्व क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों के हाथों में था। नक्सलबाड़ी ने संशोधनवाद को सहज वर्ग-प्रवृत्ति से ख़ारिज नहीं किया था, बल्कि उसके पीछे एक सचेतन विचारधारात्मक नेतृत्व की भूमिका थी, चाहे उस नेतृत्व की अपनी सैद्धान्तिक कमज़ोरियाँ-विसंगतियाँ जो भी रही हों। चारु मजूमदार की सकारात्मक और नकारात्मक भूमिका का सवाल इसी मुद्दे की विवेचना से जुड़ा हुआ है।

1964 में माकपा के गठन के बाद, पार्टी कांग्रेस के ठीक पहले पूरे पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारी हुई। अक्टूबर 1964 से लेकर 1965 के पूर्वार्द्ध तक सिलीगुड़ी सबडिवीज़न के लगभग सभी पार्टी कार्यकर्ता गिरफ़्तार किये जा चुके थे। चारु मजूमदार तबतक दिल की बीमारी से ग्रस्त हो चुके थे और बीमारी के कारण ही उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया गया था। बाद में, 1965 के अन्त में उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया। 1964 से जून, 1966 के बीच जेल में रहने के दौरान दार्जीलिंग ज़िले के पार्टी कार्यकर्ताओं ने माकपा नेतृत्व के संशोधनवाद को जानने-समझने का काम किया, उसके विरुद्ध दृढ़तापूर्वक स्टैण्ड लिया और इस नतीजे पर पहुँचे कि चीनी मार्ग ही भारतीय मुक्ति-संघर्ष का भी मार्ग होगा। जेल में बन्दी इन कार्यकर्ताओं ने संशोधनवाद के विरुद्ध अपनी राजनीतिक तैयारी भले की हो, लेकिन माकपा नेतृत्व के विरुद्ध उन्होंने कोई दस्तावेज़ लिखने और उसे कतारों के अन्य हिस्सों तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की। यदि वे जेल से बाहर होते तो ऐसा करते या नहीं करते, यह अटकल की बात है और इतिहास की वस्तुगत सच्चाइयों की जाँच-पड़ताल करते हुए इस अटकल का कोई महत्त्व नहीं है। चारु मजूमदार का यह योगदान असन्धिग्ध है कि उन्होंने आठ दस्तावेज़ लिखकर माकपा के नवसंशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद में एक बुनियादी भूमिका निभायी। हाँ, इस बहुप्रचलित धारणा को ज़रूर संशोधित करने की ज़रूरत है कि ऐसा करने वाले वह अकेले व्यक्ति थे। ठीक उसी समय `चिन्ता ग्रुप´ (आगे चलकर `दक्षिण देश´ ग्रुप) ने भी अपनी बुलेटिन के ज़रिये कलकत्ता में यह काम शुरू कर दिया था और यह बुलेटिन चारु की दस्तावेज़-श्रन्खला की तुलना में पश्चिम बंगाल की कतारों की अपेक्षाकृत बड़ी संख्या तक पहुँच रहा था। आगे चलकर नक्सलबाड़ी किसान-संघर्ष की चमक और उसके निर्माता के रूप में चारु मजूमदार और उनके आठ दस्तावेज़ों की ख्याति के चलते `चिन्ता´ ग्रुप के प्रयास अपने महत्त्व के समुचित मूल्यांकन से काफ़ी हद तक वंचित रह गये। जहाँ तक नक्सलबाड़ी किसान-संघर्ष के निर्माता के रूप में चारु की और उनके आठ दस्तावेजों की भूमिका का प्रश्न है, उसका सही मूल्यांकन उस समय के ठोस तथ्यों की पड़ताल के बाद ही किया जा सकता है। अत: उनकी हम यहाँ संक्षेप में चर्चा करेंगे।

फ़रवरी, से सितम्बर 1965 के बीच चारु मजूमदार ने तत्कालीन राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए और उन परिस्थितियों में कम्युनिस्टों के कार्यभारों का विश्लेषण करते हुए पाँच लेख लिखे : `वर्तमान स्थिति में हमारे कर्त्तव्य´, `संशोधनवाद के खिलाफ़ संघर्ष कर जनता की जनवादी क्रान्ति को सफ़ल बनायें´, `भारत के स्वत:स्फूर्त क्रान्तिकारी सैलाब का स्रोत क्या है´, `आधुनिक संशोधनवाद के खिलाफ़ संघर्ष चलाते जायें´ और `1965 किस सम्भावना का निर्देश दे रहा है।´ इसके बाद वे गिरफ़्तार कर लिये गये। जेल में बीमारी गम्भीर हो जाने के कारण उन्हें कलकत्ता के एक अस्पताल में भर्ती किया गया और वहीं से वे 7 मई 1966 को रिहा कर दिये गये। अगस्त, 1966 में उन्होंने अपना छठवाँ लेख लिखा। प्रसिद्ध `आठ दस्तावेज़ श्रँखला´ के इन छ: लेखों में चारु मजूमदार ने जो स्थापनाएँ दी थीं, संक्षेप में उनका उल्लेख यहाँ ज़रूरी है।

इन दस्तावेज़ों के अनुसार, किसान सभा और ट्रेड यूनियन के ज़रिये आंशिक माँगों पर आन्दोलन चलाते रहने के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलकर राजनीतिक सत्ता के लिए संघर्ष करना होगा। राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा का अर्थ सरकार पर कब्ज़ा करना नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष द्वारा इलाकावार सत्ता-दख़ल करना है। चीन का रास्ता ही भारत की मुक्ति का रास्ता है और सशस्त्र संघर्ष हमारा फ़ौरी कार्यभार है। इसके लिए क्रान्तिकारी कार्यकर्ता तैयार करने होंगे और गुप्त ढाँचा खड़ा करना होगा, फिर गुप्त सशस्त्र दस्ते बनाने होंगे, जोतदारों पर हमले करने होंगे, उनके घरों में आग लगानी होगी, फसल कब्ज़ा करनी होगी और हथियार एकत्र करने होंगे। राजनीतिक प्रचार एवं उद्वेलन की कार्रवाई की पूरी उपेक्षा करते हुए इन लेखों में यह स्थापना दी गयी थी कि `ऐक्शन´ (जोतदारों पर `काम्बैट ग्रुपों´ के सशस्त्र व्यक्तिगत हमलों) के प्रभाव से ही जन-गोलबन्दी की शुरुआत हो जायेगी। यद्यपि इन दस्तावेजों में जन संगठनों और जनान्दोलनों को उसी तरह से सुधारवादी-संशोधनवादी काम नहीं करार दिया गया था, जैसाकि चारु मजूमदार ने कमोबेश 1969 से कहना शुरू कर दिया था, लेकिन सशस्त्र जनसंघर्षों के विकास में जनआन्दोलनों की कोई भूमिका बताने की बजाय सीधे गुप्त सशस्त्र दस्तों के निर्माण और ऐक्शन से ही कार्रवाई की बात की गयी थी, यानी पार्टी के कार्यभारों में जनआन्दोलन संगठित करने की कार्रवाई और राजनीतिक प्रचार की कार्रवाई की सीधे-सीधे उपेक्षा की गयी थी और सीधे छापामार संघर्ष से शुरुआत की बात की गयी थी। दस्तावेज़ों में आर्थिक संघर्षों को ही अर्थवादी करार देते हुए उनकी आलोचना की गयी थी और कहा गया था कि मज़दूरों के आन्दोलनों को समर्थन देते हुए भी पार्टी ट्रेडयूनियन व कानूनी संघर्षों में अपना समय जाया नहीं करेगी। छठे दस्तावेज़ में माकपा को स्पष्ट शब्दों में एक संशोधनवादी पार्टी बताते हुए कतारों से उसके ढाँचे को तोड़कर नेतृत्व के विरुद्ध विद्रोह का आह्वान किया गया था और यह कहा गया था कि माकपा-नेतृत्व जनान्दोलनों को महज़ सरकार बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है और उसके कांग्रेस विरोधी संयुक्त मोर्चे के नारे का एकमात्र अर्थ है बुर्जुआ वर्ग का दुमछल्ला बनना। इसी दस्तावेज़ में यह भी स्पष्ट कहा गया था कि सोवियत पार्टी के संशोधनवाद की मुखालफ़त किये बिना क्रान्तिकारी संघर्ष आगे नहीं बढ़ सकता और आज की दुनिया में माओ ने लेनिन का स्थान ग्रहण कर लिया है, अत: उनका विरोध करने वाले वास्तव में संशोधनवाद के विरोधी नहीं हैं। दरअसल, इसकी पृष्ठभूमि में माकपा की केन्द्रीय कमेटी की हाल ही में हुई वह बैठक थी जिसमें एक प्रस्ताव पारित करके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा भारत सरकार की आलोचना को ग़लत ठहराया गया था और यह भी कहा गया था कि सोवियत नेतृत्व की आलोचना करना अभी उचित नहीं है क्योंकि इससे लोगों के मन में समाजवाद के प्रति भरोसा घट जायेगा। इसके अतिरिक्त इन दस्तावेज़ों में, भारतीय व्यवस्था के संकट, गहराते दमन और बढ़ते जनाक्रोश की चर्चा के साथ ही चीन और पाकिस्तान के खिलाफ़ भारतीय शासक वर्ग द्वारा अन्धराष्ट्रवादी लहर उभाड़ने की कड़ी निन्दा की गयी थी तथा सोवियत संघ के सहयोग से बने सार्वजनिक क्षेत्र को भारतीय एकाधिकारी पूँजीपति वर्ग के हित में खड़ा किया गया उपक्रम बताया गया था।

30 अगस्त ´66 को जारी चारु का छठा दस्तावेज़ `भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का माओवादी केन्द्र´ की ओर से जारी किया गया था। वस्तुत: इस नाम का केवल प्रतीकात्मक महत्त्व था क्योंकि ऐसा कोई केन्द्र उस समय तक अस्तित्व में नहीं आया था और इस दस्तावेज़ का लेखन अकेले चारु ने ही किया था। चारु मजूमदार के पहले लेख से ही दार्जीलिंग की कम्युनिस्ट कतारों के बीच (जो जेल से बाहर थे), बहस की शुरुआत हो चुकी थी। चारु के जेल जाने तक उनके पाँच दस्तावेज़ सीमित लोगों तक ही पहुँच सके थे। मई में जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने चुने हुए पाँच छ: युवा कार्यकर्ताओं को पाँच दस्तावेज़ों में निरूपित लाइन के प्रचार के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भेजा। बुर्जुआ प्रेस में भी इन दस्तावेज़ों की ख़बरें प्रकाशित हुई और इस तथ्य से अन्य इलाके के माकपा कार्यकर्ता और जेल में बन्दी लोग भी परिचित हुए।

अगस्त 1966 तक प्रकाशित छ: दस्तावेज़ों की अन्तर्वस्तु पर यदि ग़ौर करें तो अन्तरराष्ट्रीय संशोधनवाद और माकपा के नवसंशोधनवाद से रैडिकल विच्छेद की इनमें दो टूक शब्दों में चर्चा की गयी थी और माओ विचारधारा को क्रान्तिकारी विचारधारा के रूप में स्थापित किया गया था। यह इनका मुख्य सकारात्मक पहलू था। लेकिन साथ ही, ये दस्तावेज़ भारतीय परिस्थितियों का अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम निर्धारित करने के कार्यभार की जगह उसे तयशुदा मानकर चलते थे और यह विचार रखते थे कि भारतीय क्रान्ति का रास्ता पूरी तरह से चीनी क्रान्ति का रास्ता होगा। पर चीनी क्रान्ति में सशस्त्र छापामार युद्ध का रास्ता क्रान्तिकारी जनदिशा के आधार पर विकसित हुआ था, जबकि चारु मजूमदार जनकार्रवाइयों की उपेक्षा करते हुए शुरू से ही गुप्त सशस्त्र दस्तों के निर्माण और उनके `ऐक्शन´ पर ज़ोर दे रहे थे और इन्हीं के द्वारा जन-गोलबन्दी पर बल दे रहे थे। उनके अनुसार, चूँकि इन कार्रवाइयों को व्यापक जन समुदाय का समर्थन प्राप्त होगा, अत: इन्हें आतंकवाद नहीं कहा जा सकता। यही लाइन आगे चलकर नग्न “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन के रूप में सामने आयी, लेकिन वस्तुत: इस भटकाव के तत्त्व इन छह दस्तावेज़ों में ही स्पष्ट रूप में मौजूद थे।

जेल से दार्जीलिंग के पार्टी कार्यकर्ताओं की रिहाई के बाद, सिलीगुड़ी लोकल कमेटी के नेतृत्वकारी संगठनकर्ताओं के साथ चारु मजूमदार की बातचीत हुई। उनमें इस बात पर आम सहमति बनी कि माकपा के संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष करना होगा, भारत की मुक्ति का रास्ता चीन का रास्ता होगा, भूमि क्रान्ति को सशस्त्र संघर्ष के ज़रिये ही पूरा किया जा सकता है तथा, भूमि क्रान्ति की राजनीति का किसानों-मज़दूरों के बीच प्रचार करना होगा, उन्हें संगठित करना होगा और गुप्त पार्टी संगठन का निर्माण करना होगा। लेकिन कानू सान्याल सहित लोकल कमेटी के पार्टी संगठनकर्ताओं का विचार था कि मज़दूरों और किसानों के जन संगठन और जनान्दोलन अपरिहार्य हैं, राजनीतिक काम सशस्त्र कार्रवाई की तैयारी की अनिवार्य पूर्वशर्त है, `पॉलिटिक्स इन कमाण्ड´ के बिना `ऐक्शन´ का कोई मतलब नहीं है, जन संघर्षों के द्वारा ही संघर्ष के उच्चतर रूप विकसित किये जा सकते हैं और शहरी क्षेत्रों में भी जनसंगठन बनाने होंगे। चारु मजूमदार इस विचार से सहमत नहीं थे। ऐसी स्थिति में यह समझौता हुआ कि सिलीगुड़ी लोकल कमेटी के संगठनकर्ता नक्सलबाड़ी में अपनी लाइन लागू करेंगे और चारु मजूमदार की लाइन को उनके पक्षधर नये कार्यकर्ता नक्सलबाड़ी से सटे पश्चिमी दिनाजपुर ज़िले के चतरहाट-इस्लामपुर इलाके में लागू करेंगे।

चतरहाट-इस्लामपुर में चारु मजूमदार के छ: दस्तावेज़ों के आधार पर काम की शुरुआत हुई। गुप्त दस्तों ने कुछ जोतदारों के घरों को जलाया और कुछ फसल भी रात में काट ली गयी। जनसंगठन बनाने या जनान्दोलन की कोई कोशिश नहीं की गयी। जल्दी ही `कॉम्बैट ग्रुप´ लुम्पन तत्त्वों के जमावड़े बनने लगे। 1967 में, जब नक्सलबाड़ी उभार शिखर पर था, उस समय चतरहाट-इस्लामपुर में जोतदारों ने गुप्त `कॉम्बैट ग्रुपों´ के ज्ञात सदस्यों के घरों पर संगठित होकर हमला किया। पूरी किसान आबादी ने उनका समर्थन किया। ग्रुपों के कार्यकर्ता किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये और ये गुप्त दस्ते जल्दी ही बिखर गये। इस तरह चारु की लाइन का पहला प्रयोग बुरी तरह विफल रहा।

नक्सलबाड़ी में जनदिशा लागू की गयी। ज़िला कमेटी में बहुमत को पक्ष में करने के लिए क्रान्तिकारी पार्टी कार्यकर्ताओं ने माकपा के भीतर विचारधारात्मक संघर्ष चलाने का निर्णय लिया। ज़िला कमेटी के 26 सदस्यों में से 20 ने सिलीगुड़ी लोकल कमेटी की राजनीतिक लाइन को स्वीकार किया और फिर ज़िला कमेटी के भीतर एक गुप्त कमेटी का गठन किया गया। व्यापक प्रचार के बाद, दार्जीलिंग ज़िले के पहाड़ी और मैदानी इलाके के ज्यादातर बाग़ान मज़दूर गुप्त ज़िला कमेटी की राजनीतिक लाइन का समर्थन करने लगे थे। संशोधनवादी यूनियन नेताओं से असन्तुष्ट बाग़ान मज़दूर आर्थिक माँगों को लेकर जुझारू संघर्ष के लिए कमर कसने लगे। 1966 के उत्तरार्द्ध का पूरा समय ऐसा था जब दार्जीलिंग ज़िले में नक्सलबाड़ी किसान उभार की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी। सितम्बर 1966 में चाय उद्योग में हुई नौ दिनों की आम हड़ताल इस दौर की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। जलपाईगुड़ी ज़िले में हड़ताल जब टूटने की ओर अग्रसर थी, उस समय भी दार्जीलिंग में मज़दूर डटे हुए थे। लाल झण्डा यूनियन के मज़दूरों के साथ ही अन्य यूनियनों के मज़दूर और बाग़ानों के असंगठित मज़दूर भी हड़ताल में शामिल हो गये थे। इससे भयभीत संशोधनवादी नेता पूरी कोशिश कर रहे थे कि कोई `सेटलमेण्ट´ हो जाये। दार्जीलिंग में 25,000 से अधिक मज़दूरों ने दमन करने आयी पुलिस का जमकर मुकाबला किया जिसमें पुलिस की गोली से एक मज़दूर शहीद हुआ। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान, खेती-बाड़ी के व्यस्त समय के कामों के बावजूद, नक्सलबाड़ी के किसान दृढ़तापूर्वक हड़ताली मज़दूरों का साथ देते रहे। पुलिस के साथ कई बार उनकी झड़प भी हुई। बिना किसी बुनियादी माँग के पूरा हुए, हड़ताल वापस लेने की वजह से संशोधनवादी मज़दूरों में एकदम अलग-थलग पड़ गये। गुप्त ज़िला कमेटी और लोकल कमेटी के कार्यकर्ताओं ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाया। प्लाण्टेशन यूनियनों की शाखा सम्मेलनों ने भूमि क्रान्ति के कार्यक्रम के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। पर्वतीय क्षेत्र के चाय बाग़ान मज़दूरों के वार्षिक सम्मेलन ने संशोधनवादी नेताओं की कठोर निन्दा करते हुए उन्हें ट्रेड यूनियनों से निकाल बाहर किया। नक्सलबाड़ी के प्लाण्टेशन मज़दूरों के वार्षिक सम्मेलन ने भूमि-संघर्ष शुरू करने के लिए किसानों का आह्वान करते हुए प्रस्ताव पारित किया। इस तरह, चारु मजूमदार की “वाम” संकीर्णतावादी लाइन का विरोध करते हुए नक्सलबाड़ी में और समग्रता में दार्जीलिंग ज़िले में, कानू सान्याल और अन्य पार्टी संगठनकर्ताओं ने जो लाइन लागू की, उसके परिणामस्वरूप इलाके में मज़दूरों और किसानों का जुझारू और मज़बूत संश्रय अस्तित्व में आया, पुरानी ट्रेड यूनियनों और जनसंगठनों पर क्रान्तिकारी लाइन का वर्चस्व स्थापित हुआ और नयी यूनियनों व अन्य जनसंगठनों का निर्माण हुआ। मज़दूर-किसान संश्रय की मज़बूती को इस बात से समझा जा सकता है कि नक्सलबाड़ी उभार के दौरान चाय बाग़ानों के मज़दूरों ने उसके समर्थन में तीन बार आम हड़तालें की थीं।

`आठ दस्तावेज़ श्रँखला´ के सातवें और आठवें दस्तावेज़ – `संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष कर सशस्त्र पार्टीजन संघर्ष गठित करें´ और `संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष करके ही किसान संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा´ – चारु मजूमदार ने दार्जीलिंग ज़िले में, और विशेषकर सिलीगुड़ी के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में मज़दूरों-किसानों के जनान्दोलनों की उपरोक्त घटनाओं के बाद लिखे। सातवाँ दस्तावेज़ फ़रवरी 1967 के आम चुनाव के ठीक पहले और आठवाँ दस्तावेज़ अप्रैल, 1967 में लिखा गया। दार्जीलिंग में विरोधी लाइन के सफल व्यवहार ने चारु मजूमदार को विवश किया कि वे अपने इन दस्तावेज़ों में खुली जनकार्रवाइयों, आर्थिक संघर्षों और राजनीतिक प्रचार की कार्रवाई का महत्त्व स्वीकार करें, लेकिन ये दस्तावेज़ भी अतिवामपन्थी भटकाव से मुक्त नहीं थे। इन दस्तावेज़ों में जनता को संगठित करने के प्रारम्भिक चरण से ही हथियार संग्रह और गुप्त सशस्त्र दस्ते संगठित करने की बात की गयी थी, जनकार्रवाइयों की और जनसंगठन बनाने की कोई स्पष्ट योजना नहीं रखी गयी थी, उन्हें प्रकारान्तर से सशस्त्र कार्रवाइयों की पूरक मात्र का दर्जा दे दिया गया था, क्रान्तिकारी शहरी मध्यवर्ग और मज़दूर वर्ग के समक्ष उनके वर्गीय माँगों पर संघर्ष या साझा संघर्ष का कोई कार्यक्रम नहीं रखा गया था, उनका एकमात्र कार्यभार भूमि संघर्ष का समर्थन करना और उसमें भागीदारी करना बताया गया था, तथा भूमि क्रान्ति के ठोस कार्यक्रम और नारे तय करने की आवश्यकता की जगह बस सशस्त्र दस्तों के द्वारा भूस्वामियों की फसल और ज़मीन पर कब्ज़े की बात की गयी थी। इन दस्तावेज़ों का सकारात्मक पक्ष यह था कि इनमें एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन पर ठोस रूप में ज़ोर दिया गया था तथा माकपा नेतृत्व की वर्ग सहयोगवादी राजनीति और हर प्रकार के संशोधनवाद के विरुद्ध समझौताहीन संघर्ष करते हुए किसान संघर्ष को आगे बढ़ाने की बात की गयी थी। आने वाले समय ने यह सिद्ध किया कि चारु ने जनदिशा पर सफल अमल और उससे निर्मित माहौल के दबाव में बस थोड़े समय के लिए अपने कदम पीछे खींच लिये थे, अन्यथा अपनी लाइन पर वे सर्वथा सुसंगत और दृढ़ थे। नक्सलबाड़ी में जनदिशा का नेतृत्व करने वाले लोगों की विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण जैसे ही आन्दोलन में गतिरोध पैदा हुआ, वैसे ही चारु ने विकल्प के तौर पर अपनी लाइन आगे बढ़ा दी, हर प्रकार के खुले, कानूनी और आर्थिक संघर्ष के रूपों, जनान्दोलनों और जनसंगठनों को संशोधनवाद बताते हुए गुप्त सशस्त्र दस्ते बनाकर वर्ग-शत्रुओं के सफाये को ही छापामार-युद्ध घोषित कर दिया और अत्यन्त भोंड़े विकृत रूप में आतंकवादी लाइन पेश की। लेकिन यह अभी आगे की बात है।

1966 में दार्जीलिंग ज़िले में, विशेषकर नक्सलबाड़ी क्षेत्र में संशोधनवाद के विरुद्ध जो संघर्ष चल रहा था और मज़दूरों-किसानों के जो जुझारू संघर्ष लगातार विकसित हो रहे थे, सिलीगुड़ी लोकल कमेटी का नेता और दार्जीलिंग ज़िला कमेटी का सदस्य होने के नाते इन सबमें नेतृत्वकारी भूमिका चारु मजूमदार की ही मानी जा रही थी। संशोधनवादी, दार्जीलिंग के बाहर की कम्युनिस्ट कतारें और बुर्जुआ दायरे के लोग भी यही समझ रहे थे। चारु मजूमदार और नक्सलबाड़ी के स्थानीय संगठनकर्ताओं के बीच के मतभेद की जानकारी दार्जीलिंग ज़िला कमेटी के भीतर काम कर रही `गुप्त कमेटी´ तक ही सीमित थी। अक्टूबर, 1966 में माकपा राज्य कमेटी और केन्द्रीय कमेटी के कुछ नेतागण चारु मजूमदार को समझाने सिलीगुड़ी आये, पर उन्होंने उनकी बात मानने से इन्कार कर दिया। इसके पहले जुलाई, 1966 में भी बंगाल राज्य कमेटी के सचिव प्रमोद दास गुप्त उन्हें समझाने-बुझाने के लिए सिलीगुड़ी आये थे और विफल लौट गये थे।

नवम्बर, 1966 में दार्जीलिंग ज़िले में एक किसान सम्मेलन हुआ जिसमें यह तय हुआ कि बटाईदार किसान फसल का कोई भी हिस्सा जोतदारों को नहीं देंगे। फ़रवरी, 1967 में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें जंगल सन्थाल और सौरेन बसु को क्रमश: फाँसीदेवा और सिलीगुड़ी से पार्टी का टिकट मिला। इस चुनाव के मसले पर भी दार्जीलिंग के पार्टी कार्यकर्ताओं और कुछ नये कार्यकर्ताओं में मतभेद था। दार्जीलिंग के कार्यकर्ताओं का निर्णय था कि इस चुनाव का इस्तेमाल क्रान्तिकारी राजनीति के प्रचार के लिए किया जाये और ऐसा ही किया गया। इसका पर्याप्त लाभ मिला। चुनाव के ठीक बाद, बटाईदारों ने जोतदारों के विरुद्ध फसल-ज़ब्ती का आन्दोलन शुरू कर दिया। किसानों के कई इलाका सम्मेलन हुए जिनमें जोतदारों के कब्ज़े की ज़मीन ज़ब्त करने का आन्दोलन शुरू करने के लिए प्रस्ताव पारित किये गये। 7 मई 1967 को सिलीगुड़ी सबडिवीजनल किसान सम्मेलन हुआ जिसमें यह निर्णय लिया गया कि किसान जोतदारों की ज़मीन पर कब्ज़ा और किसान समितियों के माध्यम से उनके पुनर्वितरण का काम शुरू कर दें, जोतदारों के प्रतिरोध का मुकाबला करने के लिए हथियारबन्द हो जायें और गाँवों में किसान समितियाँ प्रशासन का काम अपने हाथों में ले लें। इस समय तक पश्चिम बंगाल में ग़ैरकांग्रेसी दलों की संयुक्त मोर्चे की सरकार सत्तारूढ़ हो चुकी थी जिसमें माकपा सबसे बड़ी पार्टनर थी और उसका चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा होता जा रहा था। 8 मई से नक्सलबाड़ी, खेरीबाड़ी, फाँसीदेवा और सिलीगुड़ी थानों के कई गाँवों से किसान-विद्रोह की शुरुआत हो गयी।

नक्सलबाड़ी किसान-उभार के विस्तार में जाने से पहले यह ज़रूरी है कि प. बंगाल में और देश के अन्य हिस्सों में माकपा के नवसंशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष और विद्रोह की जो प्रक्रिया 1964 से लगातार आगे बढ़ रही थी, उसकी चर्चा के छूटे हुए सिरे को पकड़कर आगे बढ़ायें। ऊपर हमने कन्हाई चटर्जी-अमूल्य सेन के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट ग्रुप की और उसके द्वारा प्रकाशित `चिन्ता´ बुलेटिन के छ: अंकों की चर्चा की है। `चिन्ता´ ने अपने अंकों में प्रकाशित लेखों में भूमि क्रान्ति के प्रश्न को और इसे पूरा करने के लिए सशस्त्र संघर्ष की अपरिहार्यता को, क्रान्ति के दीर्घकालिक लोकयुद्ध के मार्ग के प्रश्न को, भारतीय राष्ट्र के नवऔपनिवेशिक चरित्र के प्रश्न को और संशोधनवाद के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष के प्रश्न को व्यवस्थित ढंग से उठाया। कतारों के बीच वितरित होने वाला यह गुप्त प्रकाशन काफ़ी लोकप्रिय हो रहा था और बंगाल में संशोधनवादियों के लिए खासा सिरदर्द पैदा कर रहा था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि माकपा के केन्द्रीय मुखपत्र `पीपुल्स डेमोक्रेसी´ और `स्वाधीनता´ में तथा राज्य कमेटी के मुखपत्र `देशहितैषी´ में `चिन्ता´ के लेखों के विरुद्ध कई लेख प्रकाशित हुए। 1966 के मध्य में `चिन्ता´ से जुड़े या उससे मिलते-जुलते विचार रखने वाले पश्चिम बंगाल के कई क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को “उग्रवादी” करार देकर संगठन से बाहर कर दिया गया। तब बहस को और व्यापक स्तर पर आम कतारों तक पहुँचाने के लिए कन्हाई चटर्जी-अमूल्य सेन के ग्रुप ने `दक्षिण देश´ नामक खुली पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। 1966 से लेकर अक्टूबर 1969 में `माओवादी कम्युनिस्ट केन्द्र´ के गठन तक `दक्षिण देश´ पत्रिका ने साम्राज्यवाद, नवउपनिवेशवाद, सोवियत सामाजिक साम्राज्यवाद, भारतीय राष्ट्र के चरित्र, भारतीय क्रान्ति की रणनीति और रणकौशल सम्बन्धी समस्याओं, क्रान्तिकारी प्रचार कार्य की जनदिशा, छापामार संघर्ष, संशोधनवाद, अर्थवाद, संसदवाद, स्वत:स्फूर्ततावाद आदि विषयों पर कई महत्त्वपूर्ण लेख छापे। इन लेखों ने माकपा के संशोधनवाद के विरुद्ध कतारों की शिक्षा में विशेष मदद की। साथ ही, इसी पत्रिका के ज़रिये दक्षिण देश ग्रुप ने आगे चलकर ए.आई.सी.सी.सी.आर. पर हावी चारु मजूमदार गुट की लाइन की परोक्ष आलोचना रखते हुए मतभेद के प्रश्नों पर अपनी अवस्थिति भी रखी। इस कालखण्ड की चर्चा लेख में आगे आयेगी। पत्रिका ने इस ग्रुप के आरम्भिक राजनीतिक सुदृढ़ीकरण में काफी सहायता की और इसकी अवस्थिति से सहमत कार्यकर्ताओं को लेकर एक प्रारिम्भक सांगठनिक ढाँचा भी खड़ा हो गया, जिन्हें लेकर मज़दूरों, छात्रों, बुद्धिजीवियों के बीच कामों की शुरुआत हुई। 1966 के अन्त से इस ग्रुप ने 24 परगना ज़िले के सोनारपुर इलाके में किसानों के बीच काम की शुरुआत की जहाँ 1967 के अक्टूबर में, नक्सलबाड़ी विद्रोह के पाँच महीने बाद किसानों का सशस्त्र संघर्ष भड़क उठा जिसे मोर्चा सरकार के बर्बर पुलिस दमन का सामना करना पड़ा।

1966 में ही बंगाल में स्वत:स्फूर्त ढंग से खाद्य आन्दोलन की शुरुआत हुई, जो विशेष रूप से कलकत्ता और निकटवर्ती क्षेत्रों में अधिक तेज़ था। उस समय माकपा के, बंगाल के केन्द्रीय और राज्य स्तरीय नेताओं की पूरी पुरानी पीढ़ी जेल में थी और पार्टी गतिविधियों के संचालन के लिए लगभग सभी युवा और नये चेहरों को लेकर एक नया राज्य स्तरीय नेतृत्व संगठित किया गया था। इस नये नेतृत्व ने खाद्य आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए सभी वाम पार्टियों का एक संयुक्त मोर्चा बनाया। लेकिन इस मोर्चे के नेता स्वयंस्फूर्त आन्दोलन को नेतृत्व देने की बजाय जनता के पीछे-पीछे रेंग रहे थे। जबर्दस्त पुलिस दमन से आन्दोलन तो बिखर गया, लेकिन माकपा के नये राज्यस्तरीय नेतृत्व की युवा पीढ़ी ने इसके समाहार के आधार पर, अन्य वाम दलों को छोड़कर, स्वयं अपने बूते पर इस आन्दोलन को पुनस्संगठित करने और आगे ले जाने की एक योजना बनायी। यह तय किया गया कि आन्दोलन को विस्तारित करके गाँवों तक ले जाया जाये, भूस्वामियों की फसल बलपूर्वक ज़ब्त करने का नारा दिया जाये और प्रभावी प्रतिरोध की तैयारी के लिए ज़रूरी संगठन खड़े किये जायें। इसी समय पुरानी पीढ़ी के नेतागण जेल से छूटकर बाहर आये। शहीद मैदान मीनार में जनता का गर्मजोशी भरा अभिनन्दन स्वीकार करते हुए इन नेताओं ने खाद्य आन्दोलन में जनता की जुझारू भागीदारी की प्रशंसा की और आन्दोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प प्रकट किया। लेकिन मंच से नीचे उतरते ही उन्होंने आगामी फ़रवरी, 1967 में होने वाले चौथे आम चुनाव में संयुक्त मोर्चा बनाकर भागीदारी करने के लिए भाकपा नेताओं के साथ बन्द कमरों में मीटिंगें शुरू दीं। यह कतारों में व्याप्त भावना के एकदम विपरीत था, जो भाकपा को दुश्मन से कम कुछ भी नहीं समझती थीं। खाद्य आन्दोलन के जुझारू तेवर को भूख हड़ताल का नरम रास्ता अपनाकर कुन्द बनाने के भाकपा के प्रयासों का अनुभव अभी ताज़ा ही था। नतीजतन, कतारों ने पुराने नेतृत्व की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी। जो नया युवा नेतृत्व था, उसने देखा कि जेल से लौटने के बाद पुरानी पीढ़ी के नेता `देशहितैषी´ और `नन्दन´ के सम्पादकमण्डल के कामों में कदम-कदम पर हस्तक्षेप कर रहे हैं और रोक लगा रहे हैं जो रैडिकल क्रान्तिकारी लाइन पर प्रचार-कार्य को जारी रखना चाहता था। खाद्य आन्दोलन में भाकपा की भूमिका को उजागर करने के लिए मार्क्सवाद-लेनिनवाद संस्थान की ओर से प्रकाशित पुस्तिका `भूख हड़ताल का दर्शन´ के वितरण को रोक देने का निर्देश जारी किया गया। जेल जाने से पहले मार्क्सवाद-लेनिनवाद संस्थान की शुरुआत का जिस नेतृत्व ने स्वागत किया था और समर्थन दिया था, उसी ने बाहर आने के बाद इसके कामों को तरह-तरह से रोकना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि बुनियादी मार्क्सवाद की विभिन्न स्तरों पर चलने वाली कक्षाएँ भी रोक दी गयीं और कहा गया कि कक्षाओं में केवल पार्टी कार्यक्रम के सूत्रों के औचित्य की ही व्याख्या की जानी चाहिए। खाद्य आन्दोलन को जुझारू ढंग से आगे बढ़ाने की सारी योजनाओं को स्थगित कर दिया गया। यहाँ तक कि जनता की क्रान्तिकारी पहलकदमी को खोलने वाले स्थानीय आंशिक संघर्षों को भी तरह-तरह की तिकड़मों से और नौकरशाहाना तौर-तरीकों से रोका जाने लगा। इन सभी कार्रवाइयों के चलते, माकपा के गठन के समय से ही जारी अन्तर्पार्टी संघर्ष और अधिक गहरा हो गया। भाकपा के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिशें चुनाव के पहले तो परवान नहीं चढ़ सकीं लेकिन चुनाव के बाद भाकपा, कांग्रेस से अलग होकर बनी बांगला कांग्रेस और सभी ग़ैर कांग्रेसी विपक्षी दलों को साथ लेकर माकपा ने संयुक्त मोर्चे की सरकार बनायी जिसमें गृह और पुलिस विभाग के मन्त्री ज्योति बसु बने। माकपा नेतृत्व का एकमात्र तर्क यह था कि मोर्चे की सरकार में पार्टी के शामिल होने से रैडिकल भूमि-सुधारों के लिए संघर्ष सहित वर्ग संघर्ष को गति मिलेगी और पुलिस दमन से जनता का बचाव होगा। लेकिन कतारों के सामने पार्टी नेतृत्व का संशोधनवादी-संसदवादी-अर्थवादी और नौकरशाह-चरित्रा ज्यादा से ज्यादा नंगा होता जा रहा था। नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के फूट पड़ने की घटना और राज्य सरकार द्वारा उसके बर्बर पुलिस दमन ने माकपा नेतृत्व को कतारों के सामने पूरी तरह से नंगा कर दिया था। 1967-68 के दौरान कलकत्ता और कुछ ज़िलों में तो ऐसी स्थिति थी कि यदि नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद गठित `कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी´ (ए.आई.सी.सी.सी.आर.) में चारु की वामपन्थी आतंकवादी लाइन हावी नहीं होती और यदि जनसंगठनों और जनकार्रवाइयों का पूर्ण परित्याग नहीं किया जाता तो मज़दूरों, किसानों, छात्रों, बुद्धिजीवियों के मोर्चे पर कार्यरत कतारों का बहुलांश क्रान्तिकारी धारा के साथ आ खड़ा होता और माकपा के लिए कम से कम प. बंगाल में, अस्तित्व का संकट पैदा हो जाता।

ज्ञातव्य है कि कलकत्ता में 1965 से ही माकपा के भीतर सुशीतल राय चौधरी, सरोज दत्त, परिमल दास गुप्त, असित सेन, प्रमोद सेनगुप्त आदि ने `अन्तर्पार्टी संशोधनवाद विरोधी कमेटी´ बना रखी थी। इस कमेटी से चारु मजूमदार ने 1966 के मध्य में सम्पर्क स्थापित कर लिया था। `पार्टी के भीतर पार्टी बनाने´ का नारा उन दिनों खूब प्रचलित हुआ था और माकपा के भीतर इसी तरह के संशोधनवाद-विरोधी ग्रुप बंगाल के विभिन्न अंचलों के अतिरिक्त आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में भी अस्तित्व में आ चुके थे। 1966 के अन्त में दार्जीलिंग ज़िले के क्रान्तिकारी धड़े के साथ `दक्षिण देश ग्रुप´ का भी सम्पर्क स्थापित हो चुका था और 1967 के प्रारम्भ में चारु मजूमदार के साथ उनकी लम्बी बातचीत हुई। दक्षिण देश ग्रुप चुनाव में जंगल सन्थाल और सौरेन बसु को प्रत्याशी बनाये जाने के निर्णय से सहमत नहीं था, बावजूद इसके संशोधनवाद-विरोधी संघर्ष को व्यापक बनाने, किसानों के बीच यथाशक्ति काम को मज़बूत बनाने और परस्पर घनिष्ठ सम्पर्क रखने पर दोनों पक्षों में सहमति बनी थी।

8 मई 1967 की सुबह, नक्सलबाड़ी और निकटवर्ती तीन थानों के कुछ गाँवों से एक साथ किसान विद्रोह की शुरुआत हुई। बड़ी संख्या में तीर-धनुष से लैस किसान लाल झण्डा उड़ाते हुए जोतदारों के कब्ज़े की ज़मीनों और फसलों पर कब्ज़ा करने लगे। उनकी बन्दूकें भी ज़ब्त की जाने लगीं। इसी दौरान नक्सलबाड़ी थाने के एक गाँव में घटने वाली एक छोटी-सी घटना ने संघर्ष को नया मोड़ दे दिया। बिगुल नामक एक भूमिहीन किसान को दीवानी अदालत से कुछ ज़मीन पर अधिकार मिला था जिसे स्थानीय जोतदार ईश्वर टिर्की ने मार-पीटकर बेदखल करने की कोशिश की। इस पर स्थानीय किसानों ने एकजुट होकर ईश्वर टिर्की के लठैतों को मार भगाया। ख़बर मिलते ही, हमेशा की तरह 23 मई ´67 को किसानों को सबक सिखाने और जोतदार की मदद करने जब पुलिस पहुँची तो तीर-धनुष से लैस तीन हज़ार किसानों ने उसे घेर लिया। इस झड़प में कई लोग घायल हुए जिनमें पुलिस टुकड़ी के भी तीन आदमी थे। इनमें से इंस्पेक्टर सुनाम वांगदी की दो दिनों बाद अस्पताल में मौत हो गयी। विद्रोही किसानों को कुचलने के लिए उसी दिन, यानी 25 मई को पुलिस की एक बड़ी सशस्त्र टुकड़ी फिर गाँव में पहुँची। उस समय वहाँ किसान विद्रोह के पक्ष में स्त्रियों का एक जुलूस निकल रहा था, जिस पर पुलिस ने अन्धाधुन्ध फायरिंग की। इसमें सात स्त्रियों और दो बच्चों सहित दस लोग शहीद हो गये। इस घटना ने बारूद की ढेरी में पलीता लगाने का काम किया। देखते ही देखते पूरे नक्सलबाड़ी में विद्रोह की आग धधकने लगी। ज़मीन और फसल पर कब्ज़े की मुहिम तेज़ हो गयी। हज़ारों की तादाद में किसान जगह-जगह एकत्र होते थे, जोतदारों की ज़मीन पर झण्डे गाड़ते थे और ज़ालिम जोतदारों के घरों पर भी धावा बोलते थे। नक्सलबाड़ी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। 25 मई हत्याकाण्ड के विरोध में चाय बाग़ान मज़दूरों ने हड़ताल कर दी। सिलीगुड़ी में रेल और बिजली मज़दूरों का एक बड़ा जुलूस निकला। शिक्षक, छात्र और आम मध्यवर्ग के लोग भी सड़क पर उतरे। सत्तारूढ़ माकपाई संशोधनवादियों में बदहवासी का आलम था। राज्य के तत्कालीन भूमि और भू-राजस्व मन्त्री हरे कृष्ण कोनार एक और मन्त्री, भाकपा के विश्वनाथ मुखर्जी को साथ लेकर भागे-भागे सिलीगुड़ी पहुँचे। कोनार अभी हाल ही में वियतनाम से वर्ग संघर्ष के अनुभवों से “लैस” होकर लौटे थे! भूमि-प्रश्न के पुराने विशेषज्ञ थे। नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह की गम्भीर स्थिति से निपटने के लिए उनसे अधिक उपयुक्त व्यक्ति भला और कौन हो सकता था! कोनार सिलीगुड़ी पहुँचकर न तो दार्जीलिंग ज़िला कमेटी के लोगों से और न ही सिलीगुड़ी के किसान संगठनकर्ताओं से मिले। इसकी जगह सुखना फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में शीर्ष पुलिस अधिकारियों के साथ गुप्त बैठक करके वे लौट गये। उधर माकपा के राज्यस्तरीय नेताओं ने सिलीगुड़ी के कई दौरे किये और भूमिगत किसान नेताओं के आत्मसमर्पण की कोशिशें करते रहे। उनका तर्क वही पुराना था कि चूँकि वे अब मन्त्रीमण्डल में हैं, इसलिए आन्दोलन वापस ले लिये जाने पर किसानों की शिकायतें दूर कर दी जायेंगी। लेकिन कार्यकर्ताओं को संशोधनवादी नेतृत्व पर अब रत्ती भर भी भरोसा नहीं रह गया था। ग़ौरतलब है कि माकपा नेताओं ने किसानों की हत्या पर कोई भी शोक नहीं जतलाया। इसके उलट, प्रमोद दासगुप्त ने बयान दिया कि इंस्पेक्टर सुनाम वांगदी की हत्या की प्रतिक्रिया में पुलिस ने उक्त कार्रवाई की थी।

आन्दोलन वापस लिये जाने की सरकारी कोशिशों की विफलता के बाद एक पखवारे का समय भी न बीता था कि राज्य पुलिस और केन्द्र सरकार के अर्द्धसैनिक बलों ने नक्सलबाड़ी में प्रचण्ड दमन चक्र की शुरुआत कर दी। दो हज़ार से भी कुछ अधिक लोग गिरफ़्तार कर लिये गये। फिर भी कानू सान्याल और जंगल सन्थाल सहित कुछ नेतृत्वकारी संगठनकर्ता भूमिगत रहकर संघर्ष को जारी रखने की कोशिश करते रहे। जंगल सन्थाल कुछ महीनों बाद गिरफ़्तार हुए। कानू सान्याल डेढ़ वर्ष बाद गिरफ़्तार किये जा सके। पूरे इलाके में आतंक-राज कायम किये जाने के बावजूद, इस किसान उभार को कुचलने में सरकार को तीन महीने से भी कुछ अधिक समय लग गया।

इस जन-विद्रोह ने नक्सलबाड़ी के किसानों की क्रान्तिकारी पहलकदमी और सर्जनात्मकता को निर्बन्ध कर दिया। `नक्सलबाड़ी कृषक समिति´ द्वारा निर्धारित फ़ौरी कार्यक्रम को लागू करते हुए किसानों ने जोतदारों के कब्ज़े की ज़मीन को अपने कब्ज़े में लेकर किसान समितियों के माध्यम से उसका पुनर्वितरण शुरू कर दिया। भू-स्वामित्व सम्बन्धी पुराने सरकारी काग़ज़ात और क़र्ज़ सम्बन्धी काग़ज़ात को सार्वजनिक सभाओं में जला दिया गया। जोतदारों और सूदखोरों के कर्जों को रद्द कर दिया गया और क़र्ज़ के एवज में गिरवी पड़ी ज़मीनें व अन्य सामान किसानों को वापस कर दिये गये। जोतदारों द्वारा जमा किया गया अनाज और किसानों से ज़ब्त किये गये हल-बैल और अन्य सामान ज़ब्त करके उन्हें किसानों में बाँट दिया गया। ज़ालिम जोतदारों, उनकी मदद करने वाले गुण्डों और सूदखोरों पर किसान समितियों ने खुली अदालतें लगाकर सज़ाएँ सुनायीं और उन्हें तामील किया। कुछ मामलों में मृत्युदण्ड भी दिये गये। बुर्जुआ कोर्ट-कानून-प्रशासन की मान्यता को ख़ारिज करते हुए किसान समितियों ने घोषित किया कि केन्द्रीय और इलाकाई क्रान्तिकारी कमेटियों के निर्णय ही कानून होंगे। गाँवों के आम प्रशासन – चौकीदारी, आपसी विवाद के निपटारे, स्कूलों की व्यवस्था आदि कामों को भी किसान समितियों ने अपने हाथों में लेने की घोषणा कर दी। जोतदारों के प्रतिरोध का किसानों ने हथियारबन्द होकर मुकाबला किया और इन कामों की शुरुआत की। लेकिन यह प्रक्रिया बहुत दिनों तक जारी नहीं रह सकी और बहुत आगे तक नहीं जा सकी। राज्य और केन्द्र के पुलिस बलों ने जब दमन की सुसंगठित मुहिम चलाई और नेतृत्व के ज्यादातर लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया तो संघर्ष धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगा और बिखरने लगा। फिर भी सरकार को स्थिति पर पूरी तरह से नियन्त्रण स्थापित करने में सितम्बर माह तक का समय लग गया।

इस दौरान नक्सलबाड़ी पूरे देश में चर्चा का केन्द्रीय विषय बना रहा। देश के अख़बारों में नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह और उसके नेतृत्व की कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी राजनीति की ख़बरें प्रमुखता के साथ छपती रहीं। कैबिनेट सब-कमेटी ने नक्सलबाड़ी का दौरा किया। बुर्जुआ अर्थशास्त्री, राजनीतिक सिद्धान्तकार, पत्रकार, मार्क्सवादी व बुर्जुआ अकादमीशियन और सरकारी कम्युनिस्ट – सबकी कमोबेश एक ही राय थी कि यदि नक्सलबाड़ी जैसे विस्फोटों से और उनके सम्भावित “भयावह” नतीजों से बचना है तो बुर्जुआ भूमि-सुधारों की गति थोड़ी और तेज़ करनी होगी, भूमि हदबन्दी कानून को कम से कम कुछ हद तक प्रभावी बनाना होगा, किसानों के मालिकाने के सवाल के बुर्जुआ हल की दिशा में कुछ प्रभावी कदम उठाने होंगे और भूमिहीनों में ज़मीन वितरण के कुछ बुर्जुआ सुधारवादी कार्यक्रम सरकारी-ग़ैरसरकारी स्तर पर हाथ में लेने होंगे। यह वह समय था जब भारतीय पूँजीपति वर्ग राष्ट्रीय बाज़ार के दायरे और पहुँच-पकड़ के विस्तार के लिए गाँवों में प्राक्पूँजीवादी सम्बन्धों को बदलने की प्रक्रिया में ऊपर से, और क्रमिक परिवर्तन के “प्रशियाई मार्ग” पर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा था। देश के कुछ हिस्सों में उभरे कुलकों-फार्मरों की प्रेशर-लॉबियाँ कांग्रेस पर इसके लिए दबाव भी बना रही थीं। इधर साम्राज्यवादी भी सीधे “सहायता” और अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों के ज़रिये भारत सहित तीसरी दुनिया के अधिकांश महत्त्वपूर्ण देशों में गाँवों में पूँजीवादी विकास करके कृषि में पूँजी निवेश का स्कोप बढ़ाना चाह रहे थे और इसलिए “हरित क्रान्ति” मार्का कृषि-नीतियों पर अमल के लिए वे भारत, इण्डोनेशिया, मलयेशिया, फिलिप्पींस, श्रीलंका आदि देशों के बुर्जुआ वर्ग को पूरी मदद देने के लिए तत्पर थे। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में साम्राज्यवादियों और भारतीय पूँजीपति वर्ग के अपने वर्ग-हितों के तकाज़े से, पहले से ही जारी भूमि सम्बन्धों के क्रमिक पूँजीवादी रूपातरण की प्रक्रिया एक नये दौर में प्रवेश कर रही थी। नक्सलबाड़ी किसान-उभार ने इस प्रक्रिया को और तेज़ करने और सुव्यवस्थित ढंग से बुर्जुआ भूमि-सुधार को लागू करने के लिए भारतीय शासक वर्ग पर दबाव बनाया जिसके चलते भारतीय समाज के पूँजीवादी रूपान्तरण की प्रक्रिया तेज़ हो गयी, देश के जिन हिस्सों में अभी भी भूमि सम्बन्धों की प्रकृति मुख्यत: प्राक्पूँजीवादी थी, या जहाँ अभी भी प्राक्पूँजीवादी अवशेष बहुत अधिक थे, या फिर जहाँ एक संक्रमणशील पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था मौजूद थी, उन सभी हिस्सों में पूँजीवादी संक्रमण की गति तेज़ हो गयी। सत्तर के दशक में ही देश के अधिकांश हिस्से में गाँवों में पूँजीवादी वर्गीय संरचना और पूँजीवादी ध्रुवीकरण की स्थिति एकदम स्पष्ट हो चुकी थी। नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के तत्काल बाद, जयप्रकाश नारायण ने विनोबा के सर्वोदय, भूदान, ग्रामदान में कूदकर उसमें जान डालने की पूरी कोशिश की। यह अनायास नहीं कि मुशहरी (बिहार) में और देश के अन्य “नक्सल प्रभावित” इलाकों और भूमि-संघर्ष के सम्भावना सम्पन्न क्षेत्रों में ही जयप्रकाश नारायण ने डेरा डालकर ताकत लगाने का काम किया था और वर्ग संघर्ष की आग पर ठण्डे पानी के छींटे डालने का काम किया था। बंगाल में बरगादारों के पंजीकरण के द्वारा ज़मीन के मालिकाने को आंशिक ढंग से और बुर्जुआ रास्ते से हल करके माकपा के नेतृत्व वाली वाम सरकार ने गाँवों में पूँजीवादी विकास की राह बनाने का वही काम किया जो प्रशा के बिस्मार्क ने और ज़ार के मन्त्री स्तालिपिन ने किया था। इससे भूमि संघर्षों का तनाव विघटित हो गया और गाँवों में वर्ग-सम्बन्धों में बदलाव के साथ ही बंगाल के गाँवों में नये पैदा हुए निरंकुश कुलकों में माकपा का नया सामाजिक आधार तैयार हुआ। कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि नक्सलबाड़ी किसान-उभार का एक महत्त्वपूर्ण अनुवर्ती प्रभाव और उपजात (बाई प्रोडक्ट) यह था कि बुर्जुआ भूमि सुधार की गति तेज़ करने के लिए भारतीय शासक वर्ग पर एक दबाव निर्मित हुआ और भारतीय समाज के पूँजीवादीकरण की प्रक्रिया मुकम्मल होने की समयाविध सिकुड़कर थोड़ी और छोटी हो गयी। बहरहाल, नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह का यह लक्ष्य नहीं बल्कि वस्तुगत प्रभाव था। लेकिन इस प्रभाव ने भी वस्तुगत तौर पर समाज-विकास की गति पर प्रगतिशील प्रभाव ही छोड़ा। पूँजीवादी वर्ग-सम्बन्धों के स्पष्ट और तीव्र होने के साथ ही यह समझना और तय कर पाना अधिक आसान हो गया कि भारतीय क्रान्ति की प्रकृति अब राष्ट्रीय जनवादी न होकर समाजवादी ही होगी।

पर जैसाकि ऊपर कहा गया है, उपरोक्त प्रक्रिया नक्सलबाड़ी का उपजात, अनुवर्ती प्रभाव था। यह एक ऐतिहासिक जनविद्रोह का शासक वर्ग की नीतियों पर पड़ने वाला प्रभाव था। देश के एक सुदूर छोटे-से अंचल के जनउभार ने शासक वर्ग को सोचने के लिए विवश ही इसलिए किया कि इसमें निहित क्रान्तिकारी सम्भावनाएँ स्पष्ट थीं। नक्सलबाड़ी किसान-उभार के दमन और बिखराव के बावजूद, पूरे देश के कम्युनिस्ट आन्दोलन पर उसका जो प्रभाव पड़ा, उसने इस बात को और अधिक स्पष्ट कर दिया। नक्सलबाड़ी कोई स्वयंस्फूर्त किसान-विद्रोह नहीं था। उसके पीछे ऐसे उदीयमान कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तत्त्व सक्रिय थे जो संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद करके नयी क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन के लिए संकल्पबद्ध हो चुके थे। इन कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तत्त्वों को ख्रुश्चेवी संशोधनवाद के विरुद्ध चीन की पार्टी द्वारा चलायी गयी `महान बहस´ से विचारधारात्मक दिशा मिली थी और 1966 से चीन में पार्टी और राज्य के पूँजीवादी पथगामियों के विरुद्ध शुरू हुई `महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति´ ने उन्हें यह राह सुझायी थी कि पार्टी के नेतृत्व पर हावी संशोधनवादियों के विरुद्ध विद्रोह करके नये क्रान्तिकारी केन्द्र की स्थापना ही एकमात्र उचित और सही रास्ता है। अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में जारी विचारधारात्मक बहस में पक्ष न लेने वाले मध्यमार्गियों का संशोधनवादी चरित्र माकपा के गठन और उसके बाद नेतृत्व द्वारा उठाये गये कदमों से काफी हद तक साफ़ हो चुका था। नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के प्रति उनके रुख़ ने उन्हें एकदम नंगा कर दिया। यही कारण था कि नक्सलबाड़ी के तुरन्त बाद, पूरे देश में माकपा के भीतर कतारों में विद्रोह की लहर फैल गयी। पराजय के बावजूद, नक्सलबाड़ी ने ऐतिहासिक मूल्यांकन की दृष्टि से महान उपलब्धि हासिल की। देश के एक गुमनाम से ग्रामीण अंचल ने इतिहास को इस तरह प्रभावित किया कि वह क्रान्तिकारी कम्युनिज्म की धारा का एक प्रतीक और एक प्रस्थान-बिन्दु बन गया। लगभग अठारह वर्षों तक संसदवाद के पंककुण्ड में दबे रहने के बाद तेलंगाना की स्पिरिट और परम्परा फिर से नक्सलबाड़ी में उभर आयी और पूरे देश में फैल गयी। आगे चलकर, विचारधारात्मक कमज़ोरी और उससे पैदा हुए विविध नकारात्मक पक्षों के चलते नक्सलबाड़ी से उत्पन्न हुई राजनीति भारतीय क्रान्ति की नेतृत्वकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन तथा क्रान्ति के अग्रवर्ती विकास के रूप में भले ही आगे न बढ़ सकी हो, नक्सलबाड़ी से पैदा हुई क्रान्तिकारी वाम की धारा आगे चलकर भले ही फूट और विघटन का शिकार हो गयी हो, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उस समय हावी संसदीय जड़वामनवाद पर नक्सलबाड़ी ने जो निर्णायक प्रभावी चोट की, उसका भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास में हरदम महत्त्व बना रहेगा। नक्सलबाड़ी के कुछ और पहलुओं को समेटते हुए सांगोपांग समाहार से पहले यह ज़रूरी है कि नक्सलबाड़ी किसान-उभार के तुरन्त बाद वाम राजनीति के दायरे के घटना-प्रवाह पर चर्चा कर ली जाये।

जैसाकि चारु मजूमदार ने 11 नवम्बर 1967 को शहीद मीनार मैदान में हुई जनसभा में अपने भाषण में स्वयं स्वीकार किया था, नक्सलबाड़ी के नेता वे नहीं बल्कि कानू सान्याल, जंगल सन्थाल, कदम मल्लिक और खोकन मजूमदार आदि स्थानीय संगठनकर्ता थे। ऊपर यह चर्चा की जा चुकी है कि अपने आठ दस्तावेज़ों की श्रँखला में चारु मजूमदार ने भूमि-क्रान्ति की शुरुआत जनदिशा के बजाय “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के आधार पर करने का जो प्रस्ताव रखा था, उसे ठुकराकर नक्सलबाड़ी का निर्माण हुआ था। नक्सलबाड़ी किसान-उभार वास्तव में क्रान्तिकारी जनदिशा का सत्यापन और “वाम” दुस्साहसवाद का मूर्त नकार था। लेकिन यह कहना ग़लत होगा कि इसमें चारु और उनके आठ दस्तावेज़ों की कोई भूमिका ही नहीं थी, क्योंकि `आठ दस्तावेज़´ के दो पहलू थे। उसका अहम पहलू यह था कि उसने संशोधनवाद और संसदीय जड़वामनवाद पर निर्णायक चोट करते हुए एक सर्वभारतीय क्रान्तिकारी पार्टी के पुनर्निर्माण और पुनर्गठन का स्पष्ट प्रस्ताव एजेण्डे पर उपस्थित किया। उसका नकारात्मक पक्ष यह था कि उसने भारतीय आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक संरचना का अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल के निर्धारण के बजाय, न केवल चीनी क्रान्ति के कार्यक्रम व मार्ग के अन्धानुकरण का नारा दिया बल्कि सभी प्रकार की जनकार्रवाइयों, जनसंगठनों के महत्त्व को रद्द करते हुए और आर्थिक संघर्षों के साथ ही राजनीतिक शिक्षा एवं प्रचार के महत्त्व को भी नकारते हुए छापामार किसान संघर्ष को सशस्त्र गुप्त दस्तों के `ऐक्शन´ का समानार्थक बनाकर प्रस्तुत किया। नक्सलबाड़ी के नेतृत्व ने इस दूसरे पहलू को ख़ारिज किया, लेकिन पहला पहलू उसका विचारधारात्मक-राजनीतिक आधार बना। कानू सान्याल आदि संगठनकर्ता भी जेल में रहने के दौरान माकपा नेतृत्व के संशोधनवाद के विरुद्ध राजनीतिक तौर पर स्वयं को तैयार कर चुके थे, लेकिन उसके विरुद्ध दस्तावेज़ों की श्रँखला लिखने, उसे कतारों तक ले जाने की कोशिश करने और कानू आदि के जेल से बाहर आने के बाद `आठ दस्तावेज़´ के रूप में माकपा नेतृत्व के विरुद्ध विद्रोह की कार्रवाई का सैद्धान्तिक आधार मुहैया करने का काम तो चारु मजूमदार ने ही किया। यानी एक ओर यदि यह कहना ग़लत है कि नक्सलबाड़ी किसान उभार के नेता और निर्माता चारु थे, वहीं यह तो स्वीकारना ही होगा कि उसका विचारधारात्मक आधार तैयार करने में चारु की बुनियादी रूप से एक अहम भूमिका थी। कहा जा सकता है कि माकपा-राजनीति से निर्णायक विच्छेद करने में चारु की भूमिका निर्णायक थी। चारु नहीं होते तो मुमकिन था कि नक्सलबाड़ी संघर्ष साठ के दशक में उस इलाके में कम्युनिस्ट नेतृत्व में चले बहुतेरे रैडिकल आर्थिक और जनवादी (या संकुचित सीमा वाले राजनीतिक) माँगों पर चलने वाले जन संघर्षों की ही अगली कड़ी बनकर रह जाता। चारु की संशोधनवाद-विरोधी संघर्ष की निर्णायकता के पीछे कहीं एक “वाम” दुस्साहसवादी का निम्न-बुर्जुआ अधैर्य हो सकता है (क्योंकि उनकी “वाम’ दुस्साहसवादी लाइन आद्यन्त सुसंगत थी), लेकिन उस समय तो उस निर्णायकता का सकारात्मक पहलू ही प्रभावी था। कहा जा सकता है कि नक्सलबाड़ी के बाद के दौर में क्रान्तिकारी वाम राजनीति के गतिरोध, पराभव और विघटन के लिए चारु की “वामपन्थी” आतंकवादी लाइन ही ज़िम्मेदार बनी, लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि चारु नहीं होते तो नक्सलबाड़ी किसान-उभार शायद क्रान्तिकारी वाम राजनीति का एक प्रस्थान बिन्दु और प्रतीक-चिन्ह नहीं बन पाता। प्रसिद्ध उक्ति है कि संशोधनवाद करने के पाप का दण्ड मज़दूर आन्दोलन “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के रूप में भुगतता है। भारत में भी 18 वर्षों के संशोधनवादी दौर के बाद पेण्डुलम का सिरा दूसरे सिरे तक जाने का अन्देशा था और इतिहास की इस द्वन्द्वात्मक विडम्बना का व्यंग्य शायद यह होना था कि संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद की प्रक्रिया में एक ऐसे व्यक्ति को इतिहास के एक नायक का दर्जा हासिल करना था, जिसकी विचारधारात्मक-राजनीतिक क्षमता नेतृत्वकारी स्तर तक की कदापि नहीं थी और जो अधैर्यशील, आदर्शवादी, भावुक निम्न-बुर्जुआ क्रान्तिकारिता से ग्रस्त था। चारु के समस्त उपलब्ध राजनीतिक लेखन के आधार पर यह कहना ग़लत नहीं होगा।

नक्सलबाड़ी की घटना के क्रान्तिकारी प्रतीक-चिन्ह बनने में जहाँ एक सकारात्मक पक्ष है, वहीं एक नकारात्मक पक्ष भी है। नक्सलबाड़ी किसान-उभार के बाद, पूरे देश की कम्युनिस्ट कतारों में संशोधनवाद के विरुद्ध विद्रोह की एक लहर फैल गयी। पूरे देश में माकपा की क्रान्तिकारी कतारें विद्रोह करने लगीं। अनुभवसंगत धरातल पर माकपा के संशोधनवाद के विरुद्ध जो शंका, अविश्वास और बेचैनी की भावना थी, उसे नक्सलबाड़ी ने विद्रोह की दिशा देकर तरल परिस्थिति को अवक्षेपित कर दिया। देश के विभिन्न राज्यों में क्रान्तिकारी पक्ष के जो नेतृत्वकारी संगठनकर्ता थे, वे तो `महान बहस´, चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति और माकपाई मध्यमार्ग की विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु से कमोबेश वाकिफ थे, लेकिन आम कतारों के लिए संशोधनवाद और क्रान्तिकारी मार्ग के बीच फैसला करने का एकमात्र सीधा-सादा पैमाना बस यह बन गया कि कोई व्यक्ति नक्सलबाड़ी के पक्ष में है या विपक्ष में। इससे कतारों का ध्रुवीकरण तो तेज़ गति से हुआ, लेकिन ऐसे किसी भी विचारधारात्मक संघर्ष की सुदीर्घ प्रक्रिया में कतारों की जो विचारधारात्मक-राजनीतिक शिक्षा होती है और सांगठनिक सुदृढ़ीकरण से पूर्व विचारधारात्मक- राजनीतिक सुदृढ़ीकरण की जो आवश्यक प्रक्रिया होती है, वह नहीं हुई। अपनी विचारधारात्मक-राजनीतिक कमज़ोरी के चलते क्रान्तिकारी नेतृत्व ने इस पर कोई बल भी नहीं दिया। यह भी एक कारण था कि आगे चलकर कतारें आसानी से “वामपन्थी” दुस्साहसवाद की लहर में बह गयीं और अपनी पारी में, “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन ने कतारों की विचारधारात्मक-राजनीतिक सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया के आगे बढ़ने की रही-सही सम्भावना का गला भी घोंट दिया। कल्पना करें, यदि 1967 में नक्सलबाड़ी की घटना नहीं घटित हुई होती। तब क्या भारत में मार्क्सवादी-लेनिनवादी धारा पैदा ही नहीं होती? ऐसा नहीं था। आठ दस्तावेज़ों का लेखन, `चिन्ता´ ग्रुप का संशोधनवाद-विरोधी संघर्ष और माकपा के भीतर संशोधनवादी नेतृत्व के विरुद्ध कतारों के असन्तोष और संशोधनवाद- विरोधी धड़ेबन्दियों की विविध रूपों में नक्सलबाड़ी विद्रोह से पहले के दौर में मौजूदगी इस बात का संकेत देती हैं कि उस स्थिति में संशोधनवाद के विरुद्ध लम्बा विचारधारात्मक संघर्ष चलता जो अपनी तार्किक परिणति तक पहुँचकर किसी वैकल्पिक क्रान्तिकारी नेतृत्वकारी केन्द्र को जन्म देता। ग़ौरतलब है कि एशिया, अफ़्रीका और लातिन अमेरिका के बहुतेरे देशों में (और यूरोप-अमेरिका में भी) साठ के दशक में `महान बहस´ और चीन की महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति से विचारधारात्मक मार्गदर्शन प्राप्त करके क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कतारों ने ख्रुश्चेवी संशोधनवादी नेतृत्व से विद्रोह करके मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टियों एवं संगठनों का गठन किया था। भारत में भी ऐसा ही होता, इसी की सम्भावना अधिक थी और उस स्थिति में लम्बे विचारधारात्मक संघर्ष के दौरान कतारों की राजनीतिक शिक्षा और सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया बेहतर ढंग से चलती। यानी नक्सलबाड़ी ने संशोधनवाद से विच्छेद और ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तीव्र और संक्षिप्त बना दिया, लेकिन इस तीव्रता और संक्षिप्तता ने दो लाइनों के सघन-सुदीर्घ संघर्ष की प्रक्रिया के दौरान होने वाले कतारों के विचारधारात्मक-राजनीतिक सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव छोड़ा। आज वस्तुगत तौर पर, भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन का जो इतिहास हमारे सामने है, उसमें नक्सलबाड़ी एक मील के पत्थर का स्थान रखता है, लेकिन उसी से जुड़ा हुआ जो अन्तर्निहित दूसरा पहलू है, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। उसकी अनदेखी करके नक्सलबाड़ी की गौरवशाली क्रान्तिकारी परम्परा का पुनरुज्जीवन और विस्तार तो कतई सम्भव नहीं है, भावविन्हल परम्परा-पूजा का अनुष्ठान भले ही सम्पन्न कर लिया जाये।

नक्सलबाड़ी के ऐतिहासिक मूल्यांकन से ही जुड़ा एक और पहलू है, जिस पर यहाँ चर्चा ज़रूरी है क्योंकि चार दशक बाद पश्चदृष्टि से देखने पर चीज़ें आज अधिक साफ़ दीखती हैं। नक्सलबाड़ी उत्तर-औपनिवेशिक काल के एक ऐसे दौर में हुआ, जब पूरा भारत असमान रूप से एक संक्रमण से गुज़रते हुए एक लम्बी संक्रमण-अवधि के कमोबेश मध्यबिन्दु पर खड़ा था। सत्तारूढ़ भारतीय पूँजीपति वर्ग विगत दो दशक से बुर्जुआ सत्ता का सुदृढ़ीकरण करते हुए अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर तथा आयात-प्रतिस्थापन की नीतियों को लागू करते हुए अपने औद्योगिक-वित्तीय आधार का विस्तार कर रहा था और साथ ही वह गाँवों को पूँजीवादी राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी में समेट लेने के लिए भूमि सम्बन्धों को भी, ऊपर से, बुर्जुआ क्रमिक भूमि सुधार की नीतियों को लागू करते हुए, बदलने के लिए चेष्टाशील था। यह प्रक्रिया पूरे देश में असमान रूप से जारी थी। जैसे, जम्मू-कश्मीर में सापेक्षत: सर्वाधिक रैडिकल भूमि-सुधार सबसे पहले हुए। साठ के दशक के मध्य तक स्थिति यह थी कि पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में पूँजीवादी खेती की प्रवृत्ति ज़ोर पकड़ चुकी थी और कुलक वर्ग शक्तिशाली बन चुका था। देश के कई क्षेत्रों में सामन्ती भूस्वामियों की मौजूदगी के साथ ही उन्हीं के बीच से कुछ पूँजीवादी भूस्वामी भी पैदा हो चुके थे और बड़े काश्तकारों के बीच से कुछ कुलक भी पैदा हो चुके थे। कुछ क्षेत्रों में सामन्ती अवशेष ज्यादा थे, कुछ में कम थे, कुछ पिछड़ी हुई किसानी अर्थव्यवस्था की संक्रमणशील अवस्था में थे और कहीं अर्द्धसामन्ती भूमि सम्बन्धों का पहलू ही अभी प्रधान था। बंगाल, बिहार, उड़ीसा जैसे राज्यों में उस समय, या तो अर्द्धसामन्ती भूमि-सम्बन्धों की प्रधानता थी या मज़बूत सामन्ती अवशेष मौजूद थे। बंगाल में जब तक बरगादारों के पंजीकरण के द्वारा मालिकाने का सवाल आंशिक तौर पर हल नहीं हुआ था। जब तक भूमि-सम्बन्धों का अर्द्धसामन्ती स्वरूप मुख्यत: कायम था। नक्सलबाड़ी किसान-उभार ऐसे ही समय में हुआ। पूरे देश के क्रान्तिकारी कतारों को नक्सलबाड़ी टाइप भूमि-संघर्ष विकसित करने का नारा दिया गया। इस नारे की पहली विसंगति तो यही थी कि यह नक्सलबाड़ी की संशोधनवाद- विरोधी विचारधारात्मक विरासत की जगह नक्सलबाड़ी के रास्ते को ही पूरे भारत के लिए सामान्य बनाकर प्रस्तुत कर रहा था और विचारधारा और कार्यक्रम के प्रश्न को परस्पर गड्डमड्ड कर रहा था। उस पर से अतिरिक्त बात यह कि जब यह नारा दिया जा रहा था, उस समय नक्सलबाड़ी का लेबुल लगाकर वस्तुत: “वामपन्थी” आतंकवाद की लाइन बेची जा रही थी। लेकिन हम कहना यह चाहते हैं कि यदि पूरे देश में नक्सलबाड़ी की क्रान्तिकारी जनदिशा वास्तव में लागू भी की जाती तो सफ़ल नहीं होती। देश के जिन हिस्सों में पूँजीवादी भूमि-सम्बन्ध विकसित हो चुके थे और जहाँ संक्रमणशील अवस्था थी, वहाँ न तो चार वर्गों के रणनीतिक संश्रय के आधार पर भूमि-क्रान्ति को लागू कर पाना सम्भव था, न ही छापामार संघर्ष का विकास और आधार-क्षेत्र का निर्माण सम्भव था। पूरे देश की स्थिति उस समय भी ऐसी नहीं रह गयी थी कि देहातों में मुक्त क्षेत्र का निर्माण करके गाँवों से शहरों को घेरते हुए दीर्घकालिक लोकयुद्ध की सामरिक रणनीति को अमल में लाया जा सके। अर्द्धसामन्ती-अर्द्धऔपनिवेशिक चीन से भिन्न उत्तर- औपनिवेशिक दौर के भारत में एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता थी जिसके सामाजिक अवलम्ब व्यापक थे, अधिक विकसित राज्यसत्ता, सैन्यतन्त्र, और संचार-यातायात व्यवस्था थी। यहाँ न तो चीन जैसी स्थिति थी, न ही वियतनाम, कम्बोडिया और सैन्य तानाशाही वाले लातिन अमेरिकी देशों जैसी स्थिति थी। एक समस्या यह भी थी कि चीन की पार्टी के 1963 के विश्व सर्वहारा क्रान्ति की आम दिशा-विषयक दस्तावेज़ में या लिन प्याओ के 1965 के लेख `लोकयुद्ध की विजय अमर रहे´ में तीसरी दुनिया के देशों में लोक जनवादी क्रान्ति का जो आम सूत्रीकरण दिया था, वह एशिया, अफ़्रीका, लातिन अमेरिका के अधिकांश उपनिवेशों और नवउपनिवेशों के लिए तो ठीक था, (और आम तौर पर उस समय सही था) पर उसके फ्रेमवर्क या स्कीम में भारत, मिश्र, इण्डोनेशिया, मलाया, आदि ऐसे नवस्वाधीन देश पूरी तरह से फ़िट नहीं होते थे जहाँ पूँजीवादी संक्रमण की प्रक्रिया जारी थी। चीन की पार्टी द्वारा भारतीय बड़े पूँजीपति वर्ग को दलाल और भारत को नवउपनिवेश मानने का सूत्रीकरण भी सच्चाई से मेल नहीं खाता था। समस्या यह थी कि उत्तर औपनिवेशिक समाजों के परिवर्तनशील यथार्थ की गतिकी को पकड़ने की बजाय उसे औपनिवेशिक दौर की निरन्तरता मानकर चलने की प्रवृत्ति अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में हावी रही थी और चीन की पार्टी के भारत-विषयक सूत्रीकरण भी इस दोष से मुक्त नहीं थे। समस्या यह भी थी कि बिस्मार्ककालीन प्रशा, जारकालीन रूस या कमाल अतातुर्ककालीन तुर्की की स्थितियों से अलग एक उत्तरऔपनिवेशिक समाज में सत्तारूढ़ बुर्जुआ वर्ग (जो साम्राज्यवाद का कनिष्ठ साझीदार था लेकिन राज्यसत्ता का स्वामी था और सीमित बुर्जुआ जनवाद को अमल में ला रहा था), पहली बार बुर्जुआ भूमि-सुधार की वैसी ही नीतियाँ लागू कर रहा था, इसलिए इसे पुराने फ्रेमवर्क को तोड़कर ही समझा जा सकता था, जो नहीं हुआ। बहरहाल, मूल प्रसंग पर लौटते हुए, हम कहना यह चाहते हैं कि यदि नक्सलबाड़ी टाइप संघर्ष का मॉडल पूरे देश में वास्तव में लागू करने की कोशिश भी होती, यदि जनदिशा लागू भी होती, तो भी, 1967-70 में पूरे देश में ऐसी परिस्थितियाँ नहीं थीं कि कोई सफलता मिल पाती। ज्यादा से ज्यादा, देश के अर्द्धसामन्ती भूमि-सम्बन्धों वाले इलाकों में, मज़बूत सामन्ती अवशेषों वाले इलाकों में ही ऐसा हो पाता और उसकी तार्किक परिणति महज़ इसी रूप में सामने आती कि बुर्जुआ वर्ग उन क्षेत्रों में बुर्जुआ भूमि सुधारों की गति तेज़ कर देता। यह अनायास नहीं है कि आगे चलकर जिन मा-ले संगठनों ने क्रान्तिकारी जनदिशा के आधार पर लोक जनवादी कार्यक्रम को लागू करने की कोशिश की भी, वे सफल नहीं हो सके और लम्बे गतिरोध की परिणति के तौर पर आज वे संगठन मालिक किसानों के लाभकारी मूल्य और लागत मूल्य की कमी की वर्गीय माँगों को लेकर लड़ने वाले मार्क्सवादी नरोदवादी बन चुके हैं। तात्पर्य यह कि 1967-70 में भी नक्सलबाड़ी पूरे देश के लिए एक सार्विक परिघटना नहीं हो सकता था। यूँ कहें कि, यदि क्रान्तिकारी जनदिशा लागू भी होती तो नक्सलबाड़ी के रास्ते की राष्ट्रव्यापी सफलता 1967 में सन्दिग्ध थी और इसलिए नक्सलबाड़ी भी बहुत दिनों तक टिका नहीं रह पाता। नक्सलबाड़ी के बाद गठित कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी यदि अध्ययन और प्रयोग के आधार पर भारतीय क्रान्ति के कार्यक्रम के निर्धारण के अपने काम को पूरा करने में कोताही नहीं बरतती तो क्रान्तिकारी जनसंघर्ष निरन्तरता की प्रक्रिया में ही अपनी कार्यक्रममूलक दिशा बदल लेते। लेकिन उस स्थिति में भी, नक्सलबाड़ी किसान-उभार का ऐतिहासिक विचारधारात्मक महत्त्व संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद के मोड़-बिन्दु के रूप में अक्षुण्ण बना रहता।

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, नक्सलबाड़ी सशस्त्र किसान विद्रोह चारु मजूमदार की “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन पर सही क्रान्तिकारी लाइन की विजय पर आधारित था। लेकिन सत्ता के दमन के बाद, संघर्ष जब गतिरोध का शिकार हुआ तो जनदिशा को लागू करने वाले कानू सान्याल आदि नेतृत्व के लोगों ने विचारधारात्मक अपरिपक्वता के चलते स्वयं को विकल्पहीन और किंकर्त्तव्यविमूढ़ अवस्था में पाया। इस स्थिति में चारु मजूमदार ने अपनी आतंकवादी लाइन को फिर आगे बढ़ाया और नक्सलबाड़ी के नेतृत्व ने उसके आगे पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर दिया। आर्थिक संघर्षों के महत्त्व को पूरी तरह नकारने वाले चारु मजूमदार का कहना था कि नक्सलबाड़ी में किसान ज़मीन या किसी आर्थिक माँग के लिए नहीं लड़कर राज्यसत्ता के लिए लड़े थे। सितम्बर 1968 में कानू सान्याल ने नक्सलबाड़ी का सार-संकलन करते हुए `तराई क्षेत्र के किसान आन्दोलन पर रिपोर्ट´ नामक जो दस्तावेज़ लिखा, उसमें उन्होंने चारु की इसी स्थापना को दुहराया। पुन: 1974 में अपनी अवस्थिति बदलकर उन्होंने “वामपन्थी” दुस्साहसवाद की आलोचना करते हुए `मोर अबाउट नक्सलबाड़ी´ शीर्षक जो लेख लिखा उसमें यह लिखा कि भूमि क्रान्ति में ज़मीन और राज्यसत्ता के प्रश्न अन्तर्ग्रन्थित होते हैं और नक्सलबाड़ी में भी ऐसा ही था। यह न तो सैद्धान्तिक तौर पर सही है, न ही व्यावहारिक तौर पर ऐसा हुआ था। भूमि क्रान्ति के दौर में किसान ज़मीन के मालिकाने की माँग के लिए अपना संघर्ष शुरू करते हैं। पार्टी इस बात का लगातार प्रचार करती है कि इस प्रश्न को राज्यसत्ता के साथ संघर्ष करके ही हल किया जा सकता है। किसान पार्टी नेतृत्व में जब ज़मीन और फसल पर कब्ज़े की मुहिम चलाते हैं तो उन्हें ज़मींदारों और राज्यसत्ता के दमनतन्त्र का सामना करना पड़ता है, जिसका मुकाबला करने के लिए वे हथियारबन्द होते हैं( स्वयंसेवक दस्ते जनमिलिशिया और छापामार दस्ते बनाते हैं और संघर्ष क्रमश: इलाकावार सत्ता दख़ल की मंज़िल तक विकसित होता है। इस प्रक्रिया में ज़मीन का सवाल आगे बढ़कर राज्यसत्ता का सवाल बन जाता है। नक्सलबाड़ी में भी यही प्रक्रिया जारी थी, जिसे कानू सान्याल ने न तो 1967 में समझा और न ही 1974 में समझा। 1974 में “वामपन्थी” आतंकवाद की आलोचना करते हुए दक्षिणपन्थी अवसरवादी भटकाव के दूसरे छोर पर जा खड़े हुए थे, जिसकी चर्चा इस लेख में आगे की जायेगी। तराई किसान रिपोर्ट में उन्होंने किसान सम्मेलन द्वारा निर्धारित “दस महान कार्यों” को पूरा करने में नेतृत्व देने में निम्न-पूँजीवादी भटकावग्रस्त नेतृत्व की विफलता, नेतृत्व का जनता में भरोसा न होने, एक शक्तिशाली जनाधार के अभाव, एक मज़बूत पार्टी ढाँचे के अभाव, राजनीतिक सत्ता की स्थापना और क्रान्तिकारी भूमि-सुधार के बारे में रूपवादी पहुँच और पुरानी संशोधनवादी सोच के असर तथा सामरिक मामलों की ग़ैरजानकारी को नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह की विफलता के लिए ज़िम्मेदार बताया था। वास्तव में यह एक सतही, रूपवादी और सार-संग्रहवादी समाहार था। सच्चाई यह है कि नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह शुरू होने से पहले नेतृत्व ने दूर की सोचकर कोई व्यवस्थित तैयारी की ही नहीं थी। किसानों की सशस्त्र प्रतिरक्षा आगे किस प्रकार छापामार दस्तों के निर्माण की अवस्था तक विकसित होगी और दमन की स्थिति में अपनी सशस्त्र शक्तियों को अन्य क्षेत्रों में किस प्रकार बिखराया जायेगा, इसकी कोई योजना नहीं थी। निकटवर्ती जंगलों और पर्वतीय क्षेत्रों में पृष्ठभागीय आधार बनाने की कोई योजना नहीं थी। उल्लेखनीय है कि स्थिति को सँभालने के लिए, काफ़ी बाद में, 1968 में मिरिक के पहाड़ी इलाके में एक पृष्ठभागीय क्षेत्र विकसित करने की कोशिश की गयी जो सफल नहीं हुई। इससे भी अहम बात यह थी कि स्थितियाँ तब तक सँभालने लायक रह ही नहीं गयीं थी। और इससे भी अहम बात यह थी कि एक सुसंगठित कम्युनिस्ट पार्टी के अभाव में दीर्घकालिक लोकयुद्ध की परिस्थिति होने पर भी उसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। ऐसी स्थिति में यदि एक योग्य नेतृत्व होता तो कुछ समय तक संघर्ष को स्थगित या विलम्बित करने के लिए रणकौशलात्मक स्तर पर शत्रु से कुछ समझौते की राह भी चुन सकता था, पर बिना जनता के बीच गहन राजनीतिक प्रचार और तैयारी के, यदि यह किया जाता तो निरुत्साह और बिखराव पैदा होना लाज़िमी होता। नक्सलबाड़ी में भी यही स्थिति थी।

इन्हीं परिस्थितियों में नक्सलबाड़ी के नेतृत्व ने चारु की लाइन के आगे पूरी तरह से घुटने टेक दिये। तराई रिपोर्ट में कानू सान्याल ने नक्सलबाड़ी के पूर्व चारु की लाइन और जनदिशा के बीच के संघर्ष और चतरहाट-इस्लामपुर प्रसंग की कोई चर्चा नहीं की है और विशेष तौर पर नक्सलबाड़ी संघर्ष में चारु के योग्य नेतृत्व की भूमिका को रेखांकित किया है। इन तथ्यों का उल्लेख उन्होंने पहली बार 1974 में किया। विचारधारात्मक कमज़ोरी से जन्मी इस अवसरवादी आत्मसमर्पणकारी प्रवृत्ति ने “वामपन्थी” आतंकवाद के हावी होने में निश्चय ही काफ़ी मदद पहुँचायी। बहरहाल, नक्सलबाड़ी का ऐतिहासिक महत्त्व उस घटना की स्थानीयता में निहित नहीं था। मुख्य बात यह थी कि उसने संशोधनवाद से निर्णायक संघर्ष और रैडिकल विच्छेद तथा एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन की अनिवार्य आवश्यकता के सन्देश को पूरे देश की कम्युनिस्ट कतारों तक पहुँचा दिया था। कम्युनिस्ट कतारों में एक नये उत्साह और ऊर्जस्विता का संचार हो चुका था। संशोधनवादी बदहवास थे। बुर्जुआ वर्ग इस नयी लहर को गम्भीर चुनौती के रूप में देख रहा था।.…जारी

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-2

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निकट अतीत की पृष्ठभूमि : नक्सलबाड़ी-पूर्व दो दशकों के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन

नक्सलबाड़ी में क्रान्तिकारी किसान-उभार के ऐतिहासिक महत्त्व के वस्तुगत आकलन के लिए यह जानना ज़रूरी है कि भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में ये हालात क्यों और किस प्रकार तैयार हुए कि पश्चिम बंगाल के एक सुदूर तराई अंचल में स्थानीय कम्युनिस्ट संगठनकर्ताओं के नेतृत्व में किसानों का हथियारबन्द जन-विद्रोह शुरू हुआ (जो बमुश्किल तमाम सिर्फ़ ढाई माह तक ही चला) और उसके पक्ष-विपक्ष में पूरे देश का कम्युनिस्ट आन्दोलन बँट गया तथा वह घटना संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद का मानक, प्रस्थान-बिन्दु, रूपक और प्रतीक-चिन्ह बन गयी। नक्सलबाड़ी तेलंगाना के छूटे हुए सिरे को पकड़कर आगे विस्तार दे सकता था, पर ऐसा नहीं हो सका। कई रूपों में नक्सलबाड़ी के बाद, मा.ले. आन्दोलन की मुख्य धारा ने रणदिवे-कालीन “वामपन्थी” संकीर्णतावाद को ही और अधिक विकृत भोंडे़ रूप में दुहराया। मज़दूर आन्दोलन संशोधनवादी पाप की कीमत अतिवामपन्थी भटकाव के दण्ड के रूप में चुकाता है। लेनिन की इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए 17 वर्षो लम्बे संशोधनवादी दौर की प्रतिक्रिया नक्सलबाड़ी किसान उभार के दो वर्षो बाद “वामपन्थी” आतंकवाद के रूप में सामने आयी। लेकिन इन बातों को अहसास के गहरे धरातल पर जाकर समझने के लिए तेलंगाना किसान संघर्ष और उसके उत्तरवर्ती सत्रह वर्षो के पार्टी इतिहास की अति संक्षिप्त चर्चा यहाँ ज़रूरी है। नक्सलबाड़ी के ऐतिहासिक महत्त्व और उसकी ऐतिहासिक विफलता – इन दोनों को ही समझने के लिए यह चर्चा ज़रूरी है।

नक्सलबाड़ी स्वातन्त्रयोत्तर भारत के इतिहास के एक ऐसे दौर में हुआ जब नेहरू की पूँजीवादी नीतियों के समाजवादी मुखौटे की असलियत उजागर हो चुकी थी। महँगाई और बेरोज़गारी से त्रस्त आम लोग सड़कों पर उतर रहे थे। छात्र-युवा आन्दोलन, मज़दूर आन्दोलन और महँगाई-विरोधी जनान्दोलनों का अविराम क्रम जारी था। पूँजीवादी संसदीय राजनीति के दायरे के भीतर इस व्यापक मोहभंग और जनाक्रोश की अभिव्यक्ति 1967 के आम चुनावों के बाद, पहली बार देश के नौ राज्यों में ग़ैरकांग्रेसी सरकारों के गठन के रूप में सामने आयी। लेकिन अहम बात यह थी कि 1947 के बाद के वर्षो में और तेभागा-तेलंगाना-पुनप्रा-वायलार और नौसेना-विद्रोह के दिनों के बाद, पहली बार देशव्यापी स्तर पर जनसमुदाय में व्यवस्था-विरोधी भावनाएँ और क्रान्तिकारी परिवर्तन की आकांक्षाएँ उमड़-घुमड़ रही थीं जिन्हें दिशा और नेतृत्व देने वाली कोई क्रान्तिकारी शक्ति राजनीतिक रंगमंच पर मौजूद नहीं थी। स्मरणीय है कि यही वह समय था जब वियतनामी क्रान्ति अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध विजयोन्मुख थी और पूरी दुनिया में, यहाँ तक कि पश्चिमी देशों में भी छात्र-युवा, बुद्धिजीवी और मेहनतकश सड़कों पर उतरकर उसका समर्थन कर रहे थे। अफ़्रीकी देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष एक के बाद एक जीतें हासिल कर रहे थे और लातिन अमेरिका में भी सैनिक जुण्टाओं के विरुद्ध प्रतिरोध संघर्ष उफान पर थे। फ्रांस में छात्र आन्दोलन और अमेरिका में अश्वेतों, स्त्रियों और युवाओं के आन्दोलनों तथा युद्ध-विरोधी आन्दोलन का अविराम सिलसिला जारी था। सोवियत संशोधनवाद के विरुद्ध चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलायी गयी `महान बहस´ के बाद, 1966 से चीन में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का तूफ़ान शुरू हो चुका था, जो न केवल पूरी दुनिया के मेहनतकशों और कम्युनिस्ट कतारों को संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष करने और क्रान्ति का मार्ग चुनने के लिए प्रेरित कर रहा था, बल्कि बड़े पैमाने पर युवाओं और बुद्धिजीवियों को भी माओ के विचारों और चीनी सांस्कृतिक क्रान्ति के युगान्तरकारी प्रयोग की ओर आकृष्ट कर रहा था। यह अन्तरराष्ट्रीय माहौल भारत की उन्नत चेतना वाली कम्युनिस्ट कतारों को और रैडिकल छात्रों-युवाओं-बुद्धिजीवियों को भी गहराई से प्रभावित और प्रेरित कर रहा था। इधर देश के भीतर, संशोधनवादी नेतृत्व से कम्युनिस्ट कतारों का मोहभंग निराशा से आगे बढ़कर आक्रोश और विद्रोह की भावना में परिणत होता जा रहा था। 1964 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद नेतृत्व के एक हिस्से को संशोधनवादी घोषित करते हुए दूसरे हिस्से ने जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का गठन किया था तो रैडिकल कतारों का बहुलांश उसमें इस उम्मीद से शामिल हुआ था कि नयी पार्टी तेलंगाना की विरासत को आगे बढ़ाते हुए क्रान्तिकारी संघर्षो में उतरेगी, लेकिन जल्दी ही यह स्पष्ट होने लगा कि अपने तमाम भ्रामक रैडिकल तेवर के बावजूद माकपा के नेतृत्व भी अर्थवादी-संसदवादी सीमाओं का अतिक्रमण करने के लिए तैयार नहीं है। चीन की पार्टी द्वारा खुर्श्चेवी संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष (`महान बहस´) के दस्तावेज़ भारत के कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों को जब मिले (टूट के कगार पर खड़ी भाकपा के डांगेपन्थी धड़े ने ही नहीं बल्कि बासवपुनैया-सुन्दरैया-नम्बूदरीपाद-रणदिवे धड़े ने भी इस पॉलिमिक्स को कतारों तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की, और उन्हें तब तक अँधेरे में रखा जब तक कि ये दस्तावेज़ अलग स्रोतों से कतारों तक नहीं पहुँच गये) और फिर इस बहस से भारत की कम्युनिस्ट कतारों के अग्रिम तत्त्व परिचित हुए, तो यहाँ भी संशोधनवाद के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के लिए एक नयी दिशा मिली। 1966 में चीन में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के शुरू होते ही वहाँ पार्टी के भीतर के बुर्जुआ हेडक्वार्टर को ध्वस्त करने के माओ के आह्वान ने भारतीय कम्युनिस्ट कतारों को भी नेतृत्व पर काबिज़ संशोधनवादियों के विरुद्ध खुली बग़ावत की प्रेरणा दी।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर दो लाइनों का संघर्ष किसी न किसी रूप में तेलंगाना किसान संघर्ष के समय से ही जारी था। इसमें नेतृत्व का एक पक्ष संशोधनवादी विचलन का शिकार था और दूसरा पक्ष जो कतारों की क्रान्तिकारी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता था, वह भी विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण विसंगति, अनिर्णय और अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट नेतृत्व और बड़ी पार्टियों पर मार्गदर्शन के लिए निर्भरता की प्रवृत्ति का शिकार था। इसके परिणामास्वरूप, यह दूसरा पक्ष भी 1950 का दशक शुरू होते-होते संशोधनवादी पंककुण्ड में जा गिरा और दोनों पक्षों के बीच मतभेद का मुद्दा सिर्फ़ यह रह गया कि राष्ट्रीय जनवाद के नारे के तहत नेहरू सरकार के प्रति सहयोग का रास्ता अपनाया जाये या लोक जनवाद के नारे के तहत मुख्यत: संसदीय विपक्ष की भूमिका निभाते हुए कुछ रैडिकल जनान्दोलन भी चलाये जायें।

तेलंगाना किसान संघर्ष कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चला पहला ऐसा सशस्त्र संघर्ष था जिसके परिणामस्वरूप 16000 वर्ग मील का क्षेत्र – जिसमें तीन हज़ार गाँव शामिल थे – मुक्त किया गया था और लगभग डेढ़ वर्षो तक इस क्षेत्र की सारी शासन-व्यवस्था किसानों की गाँव कमेटियों के हाथों में थी। कुल 4,000 किसान और पार्टी के छापामार इसमें शहीद हुए और दस हज़ार कम्युनिस्ट कार्यकर्ता तीन से चार वर्षो तक जेलों में बन्द रहे। इस दौरान कुल 30 लाख एकड़ ज़मीन किसानों में बाँटी गयी, बेदखली और बेगार प्रथा बन्द कर दी गयी और न्यूनतम मज़दूरी लागू कर दी गयी।

फ़रवरी-मार्च 1948 में जब भाकपा की दूसरी कांग्रेस में दक्षिणपन्थी पी.सी. जोशी को हटाकर बी.टी. रणदिवे को पार्टी महासचिव बनाया गया, उस समय तेलंगाना किसान संघर्ष सशस्त्र छापामार संघर्ष की मंज़िल तक पहुँच चुका था। ग़ौरतलब है तेलंगाना के प्रतिनिधियों के ज़ोर देने के बाद ही दूसरी कांग्रेस की थीसिस में तेलंगाना संघर्ष के महत्त्व का उल्लेख करते हुए उसे समर्थन दिया गया और पूरे देश में ऐसे संघर्ष संगठित करने तथा मज़दूर वर्ग से भी उनके समर्थन में आन्दोलन करने का आह्वान किया गया। लेकिन इस आह्वान के पीछे “वामपन्थी” अवसरवादी रणदिवे की यह सोच थी कि इससे पूरे देश में सशस्त्र आम विद्रोह की स्थिति पैदा हो जायेगी। रणदिवे ने युगोस्लाविया की टीटोपन्थी संशोधनवादी पार्टी के एक सिद्धान्तकार एडवर्ड कार्डेल्ज़ के विचार के आधार पर यह थीसिस पेश की कि जनवादी और समाजवादी क्रान्तियाँ एक साथ होनी चाहिए, और कम्युनिस्टों को न केवल बड़े बुर्जुआ को बल्कि सभी बुर्जुआओं को अपने हमले का निशाना बनाते हुए देशव्यापी आम हड़ताल और सशस्त्र विद्रोह का मार्ग अपनाना चाहिए। इस “वामपन्थी” दुस्साहसवाद ने भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन को जो क्षति पहुँचायी, वह इतिहास का एक तथ्य है। साथ ही, इस लाइन ने तेलंगाना संघर्ष के अग्रवर्ती विकास को भी रोकने का काम किया। मई, 1948 में आन्ध्र की पार्टी इकाई ने रणदिवे थीसिस का विरोध करते हुए अपनी यह लाइन रखी कि भारतीय क्रान्ति का चरित्र रूसी क्रान्ति से भिन्न है और यह चीन में जारी नवजनवादी क्रान्ति से काफ़ी हद तक समानता रखती है, यहाँ चार वर्गों का संयुक्त मोर्चा बनाना होगा और दीर्घकालिक लोकयुद्ध का मार्ग अपनाना होगा। आन्ध्र थीसिस में माओ त्से-तुँग के नवजनवाद के सिद्धान्त को प्रासंगिक बताते हुए भारत में सर्वहारा क्रान्ति को दो अवस्थाओं में सम्पन्न करने की योजना प्रस्तुत की गयी। रणदिवे ने इस थीसिस का विरोध करते हुए माओ के विचारों का भी विरोध किया और उन्हें टीटो और अल-ब्राउडर की श्रेणी का संशोधनवादी तक कह डाला। दो वर्षो तक पार्टी पर रणदिवे-लाइन के वर्चस्व ने तेलंगाना संघर्ष को भारी क्षति पहुँचाई। देश के विभिन्न हिस्सों में किसान संघर्षो को तेलंगाना की राह पर आगे बढ़ाने और मज़दूर वर्ग के संघर्षो को उनके साथ जोड़ने के बजाय “वामपन्थी” दुस्साहसवाद ने पार्टी को जन समुदाय से अलग-थलग कर दिया और कतारों की पहलकदमी को पंगु बना दिया गया। 1949 में चीनी क्रान्ति के बाद, 1950 में कोमिन्फॉर्म ने माओ के नवजनवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया। सोवियत पार्टी के एक सिद्धान्तकार जुकोव ने उपनिवेशों और अर्द्धउपनिवेशों में चार वर्गों के संश्रय को अनिवार्य बताया और दूसरे सिद्धान्तकार बालाबुशेविच ने तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करते हुए उसे कृषि क्रान्ति का अग्रदूत और भारतीय जनता की लोक जनवादी सत्ता स्थापित करने का प्रथम प्रयास बताया। अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व से नयी दिशा मिलते ही भारत में भी रणदिवे की “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन रातोंरात अलग-थलग पड़ गयी। मई-जून 1950 में राजेश्वर राव पार्टी के महासचिव बने और पार्टी ने आन्ध्र-थीसिस को आधिकारिक लाइन के तौर पर स्वीकार किया। लेकिन इस समय तक, पहले ही काफ़ी देर हो चुकी थी। देशव्यापी स्तर पर संघर्ष के विस्तार की सम्भावनाओं का, ग़लत लाइन काफ़ी हद तक गला घोंट चुकी थी और नयी बुर्जुआ सत्ता को अपने सुदृढ़ीकरण के लिए तीन वर्षो का कीमती समय मिल चुका था। चूँकि “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन की पराजय पूरी पार्टी में चले दो लाइनों के अन्दरूनी संघर्ष की परिणति नहीं थी बल्कि कोमिन्फॉर्म और सोवियत पार्टी की अवस्थिति के हिसाब से चलने की प्रवृत्ति का नतीजा थी, इसलिए पार्टी कतारें सही-गलत के बारे में विभ्रमग्रस्त थीं। विभ्रम का यह सिलसिला पहले से ही चल रहा था और 1947 से तो लगातार जारी था। राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय घटनाओं के प्रति ग़लत अवस्थिति अपनाने और फिर उन्हें आनन-फानन में उलट देने तथा पार्टी नेतृत्व में लगातार दो छोरों की विरोधी लाइनों की मौजूदगी के चलते कतारें निराश हो रही थीं। इसी समय भारतीय सेना ने हैदराबाद में प्रवेश किया। निजाम के आत्मसमर्पण के बाद, भारतीय सेना ने कम्युनिस्ट छापामार दस्तों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। छोटे-छोटे छापामार दस्तों में बँटी जनता की सशस्त्र सेना का सामना अब उन्नत हथियारों से लैस 50-60 हज़ार संख्या वाली सेना से था। फिर भी बहुत कठिनाइयों और अभूतपूर्व दमन के बाद ही भारतीय सेना छापामार दस्तों को पीछे धकेल सकी। मलाया सरकार की ब्रिग्स योजना की ही तरह ऐसे गाँव बसाये गये जहाँ के निवासियों को सेना के नियन्त्रण में रहना था। जंगलों की दो हज़ार आदिवासी बस्तियों को नेस्तनाबूद कर दिया गया और लोगों को यातना शिविरों में रखा गया। छापामार गाँवों को छोड़कर निकटवर्ती जंगलों में चले गये और वहाँ भी सेना का दबाव बढ़ने पर दूरवर्ती जंगली क्षेत्रों में बिखर गये।

उल्लेखनीय है कि पार्टी के बम्बई मुख्यालय में हावी एस.ए. डांगे, घाटे और अजय घोष आदि का दक्षिणपन्थी धड़ा शुरू से ही आन्ध्र लाइन का विरोध कर रहा था। तेलंगाना में सेना-प्रवेश के बाद वहाँ भी रवि नारायण रेड़्डी के नेतृत्व में कुछ लोग संघर्ष को वापस लेने के लिए दबाव बनाने लगे, हालाँकि आन्ध्र कमेटी का बड़ा हिस्सा फिर भी संग्राम को जारी रखना चाहता था। उसका मानना था कि फ़ौरी तौर पर नुकसान के बावजूद, संघर्ष को जारी रखना और देश के अन्य अनुकूल परिस्थितियों वाले भूभागों में उसका फैलाव मुमकिन है। इस समय दक्षिणपन्थी धड़े का हाथ मज़बूत करने मेँ ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी और उसके एक नेता रजनी पामदत्त ने विशेष भूमिका निभाई। दत्त का मानना था कि शीतयुद्ध की नयी विश्वपरिस्थितियों में भारत के कम्युनिस्टों को सशस्त्र संघर्ष के रास्ते को छोड़कर विश्व शान्ति आन्दोलन को मज़बूत बनाने का काम करना चाहिए और साम्राज्यवादी शिविर से भारत सरकार के दूर रहने और समाजवादी खेमे से नज़दीकी रिश्ता बनाने तथा कोरियाई जनयुद्ध का समर्थन करने के लिए नेहरू सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। इसी विचार का विकसित रूप आगे चलकर भाकपा के दक्षिणपन्थी धड़े के राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा की सोच और “प्रगतिशील” बुर्जुआ नेहरू सरकार के प्रति सहयोग- समर्थन की नीति के रूप में सामने आया। पार्टी के संशोधनवादियों ने आधिभौतिक निगमनात्मक पद्धति से अन्तरराष्ट्रीय अन्तरविरोधों के ही अनुसार राष्ट्रीय अन्तरविरोधों को भी देखने तथा दोनों में विरोध होने पर अन्तरराष्ट्रीय अन्तरविरोधों के हिसाब से अपना कार्यभार तय करने का काम एक बार फिर किया। यह ग़लती द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी की गयी थी और उसके पहले भी की जाती रही थी। ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक समिति ने भारतीय पार्टी को लिखे गये एक पत्र में अपने उपरोक्त सुझावों के साथ ही कानूनी कामों में लगने तथा डेढ़ वर्षो बाद होने वाले आगामी आम चुनाव पर ज़ोर दिया और साथ ही नेतृत्व को बदलने की भी राय दी क्योंकि राजेश्वर राव के नेतृत्व वाली केन्द्रीय कमेटी जनवादी तरीके से नहीं चुनी गयी थी। इन परिस्थितियों ने पार्टी में दक्षिणपन्थी नेतृत्व के हाथ मज़बूत करने का काम किया। 1 जुलाई, 1950 को राजेश्वर राव की जगह अजय घोष पार्टी के महासचिव बनाये गये। पार्टी में मौजूद मतभेद, संकट और विभ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए, एक बार फिर अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व पर भरोसा किया गया और चार सदस्यों का एक प्रतिनिधिमण्डल 1951 के प्रारम्भ में सोवियत पार्टी के नेतृत्व से बातचीत करने के लिए मास्को गया। इसमें दो – राजेश्वर राव और बासवपुनैया तेलंगाना संघर्ष के नेता थे, जबकि अन्य दो – अजय घोष और डांगे उसका विरोध कर रहे थे। सोवियत पार्टी की ओर से स्तालिन, मालेंकोव, मालरोव और सुस्लोव ने बातचीत की। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, इस बातचीत के बाद भारतीय प्रतिनिधिमण्डल भारत लौटा तो पहली बार भारत में जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम का एक मसौदा तैयार किया गया और एक नीति-विषयक वक्तव्य जारी किया गया। नीति-विषयक वक्तव्य रणकौशलात्मक लाइन के वृहद दस्तावेज़ का ही एक अंश था जिसे कानूनी तौर पर प्रकाशित किया गया। उपरोक्त दोनों दस्तावेज़ों में हालाँकि सशस्त्र संघर्ष का जिक्र नहीं था लेकिन रणकौशल-विषयक दस्तावेज़ में “अपरिपक्व विद्रोह और जोखिम भरी कार्रवाइयों से सावधान रहते हुए” किसानों के छापामार युद्ध के साथ ही मज़दूरों की वर्गीय हड़तालों और संघर्ष के अन्य रूपों के इस्तेमाल की बात कही गयी थी। उसमें इस धारणा को भी ग़लत ठहराया गया था कि देश के किसी हिस्से में सशस्त्र विद्रोह तभी शुरू किया जा सकता है, जब पूरे देश में विद्रोह की स्थिति तैयार हो। दस्तावेज़ के अनुसार, किसी एक बड़े भूभाग में किसान संघर्ष के ज़मीन-ज़ब्ती के स्तर पर पहुँचने के बाद, व्यापक जनान्दोलन और छापामार युद्ध यदि ठीक तरह से संगठित हों तो देश भर के किसानों को उद्वेलित करके संघर्ष को उच्च धरातल पर पहुँचा देना सम्भव है। किसान-संघर्ष के बारे में सोवियत पार्टी के आम सुझाव सही थे, पर तेलंगाना संघर्ष के बारे में ठोस निर्णय भारतीय पार्टी के नेतृत्व को लेना था, जिस पर दक्षिणपन्थी अवसरवादी हावी हो चुके थे। केन्द्रीय कमेटी ने आन्ध्र की कमेटी को संघर्ष केवल तब तक जारी रखने को कहा जब तक पार्टी सरकार से उसे स्थगित करने की शर्तो पर बातचीत पूरी न कर ले। इन शर्तो में किसानों के कब्ज़े की ज़मीन ज़मींदारों को वापस न करना, कैदियों की रिहाई, मुकदमे वापस लेना और पार्टी से प्रतिबन्ध हटाना प्रमुख थीं। लेकिन केन्द्रीय कमेटी के इस निर्णय के विपरीत अजय घोष के नेतृत्व वाले दक्षिणपन्थी धड़े और आन्ध्र के रवि नारायण रेड्डी गुट ने बिना शर्त संघर्ष वापसी के लिए दबाव बनाना शुरू किया। पार्टी की इस स्थिति का लाभ उठाकर नेहरू सरकार ने किसी भी शर्त को मानने और बातचीत करने से इन्कार कर दिया। मई, 1951 तक केन्द्रीय कमेटी में आन्ध्र के सदस्य भी मान चुके थे कि अब आंशिक छापामार संघर्ष भी जारी रख पाना सम्भव नहीं है। अक्टूबर, 1951 में पार्टी ने बिना किसी शर्त, निहायत घुटनाटेकू ढंग से संघर्ष वापस लेने की घोषणा कर दी। जंगल के छापामार नेताओं को इसकी ख़बर बाद में लगी। पार्टी अब पूरी तरह से संसदीय राह पर चल पड़ी। दक्षिणपन्थी धड़े के सामने उसके विरोधियों ने आत्मसमर्पण कर दिया और कतारों में भारी पस्ती का माहौल फैल गया।

आज पश्चदृष्टि से देखने पर कहा जा सकता है कि तेलंगाना संघर्ष की तत्कालीन पराजय कई कारणों से उस समय लगभग तय हो चुकी थी। इसका सर्वोपरि कारण यह था कि पार्टी बोल्शेविक ढंग से एकीकृत नहीं थी और उसमें ऊपर से नीचे तक “वाम” और दक्षिण के धड़े मौजूद थे, इसलिए वह भारतीय क्रान्ति को नेतृत्व देने में अक्षम थी। 1946 से 1951 के बीच पहले पी.सी. जोशी काल के दक्षिणपन्थी भटकाव ने, फिर रणदिवे काल के “वामपन्थी” भटकाव ने और फिर अजय घोष काल के दक्षिणपन्थी भटकाव ने पूरे देश स्तर पर और तेलंगाना के स्तर पर पार्टी के कार्यो को काफ़ी नुकसान पहुँचाया था। यह एक ऐसा संक्रमण-काल था, जब नयी सत्ता के सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थीं लेकिन नौसेना-विद्रोह, तेभागा-तेलंगाना-पुनप्रा वायलार के किसान संघर्षों और देशव्यापी मज़दूर आन्दोलनों को एक कड़ी में पिरोकर जनक्रान्ति की धारा को आगे बढ़ाने में पार्टी-नेतृत्व नाकाम रहा। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती तो कांग्रेस की समझौतापरस्ती का पहलू और नंगा होकर सामने आता और पार्टी के नेतृत्व में यदि जनवादी क्रान्ति जल्दी पूरी नहीं भी होती तो या तो दीर्घकालिक लोकयुद्ध मज़बूत आधार पर, आगे की मंज़िलों में प्रविष्ट हो गया होता या जनसंघर्षों के दबाव में नेहरू सरकार भूमि क्रान्ति के कार्यभारों को हालाँकि प्रशियाई मार्ग से ही सही और ऊपर से ही सही लेकिन तेज़ी के साथ पूरा करने को विवश हो जाती और तेज़ पूँजीवादी विकास के साथ भारत जल्दी ही समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में प्रविष्ट हो जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1951 तक, पार्टी-नेतृत्व में मतभेद के चलते तेलंगाना संघर्ष को इतना नुकसान पहुँच चुका था कि कम से कम, फौरी तौर पर उसकी पराजय सुनिश्चित हो चुकी थी। फिर भी, उस समय यदि नेतृत्व पर दक्षिणपन्थी धड़ा काबिज़ नहीं होता और पूरी तरह से आत्मसमर्पण करने के बजाय, फौरी तौर पर पीछे हटने और अपनी सैन्य शक्ति को दुर्गम जंगल क्षेत्रों में बिखरा देने के बाद, नये सिरे से उस क्षेत्र में तथा देश के अन्य ऐसे भूभागों में किसान-संघर्ष संगठित किये जाते, तो स्थिति को सँभालकर फिर से आगे बढ़ने का अवसर मिल जाता। इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राजेश्वर राव के नेतृत्व में जिस धड़े ने तेलंगाना में सही लाइन ली थी, वह भी विचारधारात्मक रूप से कमज़ोर था। इसके चलते, कुछ समय तक केन्द्रीय कमेटी में प्रभावी होने के दौर में भी वह अपनी लाइन का देशव्यापी स्तर पर सुदृढ़ीकरण नहीं कर सका, विरोधी लाइन के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के बजाय उसने समझौता करने का रुख़ अपनाया और अन्तत: घुटने टेक दिये। इस बुनियादी तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि 1951 तक भारत की पार्टी के पास न तो जनवादी क्रान्ति का कोई सुसंगत कार्यक्रम था, न ही कोई भूमि-क्रान्ति का कार्यक्रम (एग्रेरियन प्रोग्राम)। 1951 में सोवियत पार्टी की राय से, जब कार्यक्रम और रणकौशलात्मक लाइन के दस्तावेज़ तैयार हुए तब तक नेतृत्व पर दक्षिणपन्थी काबिज़ हो चुके थे, पार्टी संशोधनवाद की राह पर आगे बढ़ चुकी थी और तेलंगाना संघर्ष की पराजय तय हो चुकी थी। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि चीनी क्रान्ति जैसे दीर्घकालिक लोकयुद्ध के मार्ग का पक्षधर धड़ा, अपनी सही अवस्थिति के बावजूद, यदि स्थितियाँ उसके अनुकूल होतीं, तब भी संघर्ष को किस हद तक आगे ले जा पाता, यह संदिग्ध है, क्योंकि विचारधारात्मक रूप से यह धड़ा भी काफ़ी अपरिपक्व था और भारतीय परिस्थितियाँ हूबहू चीन जैसी नहीं थीं। क्रान्ति पूर्व अर्द्धऔपनिवेशिक चीन एक प्राक्औपनिवेशिक मंज़िल में था, जबकि 1947 के बाद का भारत विउपनिवेशीकरण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो पाने के बावजूद एक उत्तर औपनिवेशिक समाज था, जिसकी एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता थी, जो एक ऐसे औद्योगिक पूँजीपति वर्ग के हाथों में थी, जो चीन जैसा दलाल पूँजीपति वर्ग नहीं था। अपनी इस प्रकृति के चलते आगे चलकर राष्ट्रीय बाज़ार के निर्माण के लिए, प्रशियाई मार्ग से सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण का मार्ग अपनाना और साम्राज्यवादियों का कनिष्ठ साझीदार होते हुए भी अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर अपने आर्थिक विकल्पों का विस्तार करना इसके लिए अपरिहार्य था। भारतीय पूँजीपति वर्ग के इस चरित्र की ओर सबसे पहले इतिहासकार डी.डी. कोसम्बी ने इंगित किया था। इस मायने में 1951 का कार्यक्रम वर्ग-सम्बन्धों की दृष्टि से तत्कालीन समय में क्रान्ति की मंज़िल और मार्ग का तो ठीक निर्धारण कर रहा था लेकिन भारतीय पूँजीपति वर्ग और राज्यसत्ता के चरित्र के मूल्यांकन में सटीकता और स्पष्टता की कमी के चलते वह भारतीय समाज के विकास की दिशा के बारे में कुछ नहीं कहता था। वह इस बात को स्पष्ट नहीं करता था कि सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति यदि सम्पन्न नहीं होती, तो भारतीय पूँजीपति वर्ग ग़ैरक्रान्तिकारी रास्ते से, ऊपर से क्रमश: भूमि सम्बन्धों को बदलने का काम करता ही, क्योंकि यह उसके वर्गहित का तकाज़ा था। वह इस बात को भी स्पष्ट नहीं करता था कि एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता और सापेक्षत: अधिक पूँजीवादी विकास के कारण, 1947-51 के दौरान राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की मंज़िल होते हुए भी, दीर्घकालिक लोकयुद्ध के चीनी रास्ते को हूबहू यहाँ लागू कर पाना सम्भव नहीं था। उस समय चीनी पार्टी ने भी आगाह किया था कि हर उपनिवेश-अर्द्धउपनिवेश- नवउपनिवेश में छापामार किसान संघर्ष के चीनी अनुभव को आँख मूँदकर दुहराया नहीं जा सकता। इन जटिल, तरल संक्रमणकालीन स्थितियों में, यदि सब कुछ तेलंगाना में सही लाइन लागू करने वाले धड़े के अनुकूल होता, तो भी यह कह पाना मुश्किल है कि अपनी विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण, वह संघर्ष को कहाँ तक आगे ले जा पाता और चीनी क्रान्ति के मार्ग के अन्धानुकरण की प्रवृत्ति से बच पाता भी या नहीं। भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के उत्तरवर्ती दौर का इतिहास तो यही बताता है कि ऐसा बहुत मुश्किल होता।

बहरहाल, इतिहास में जो घटित हुआ, वह यह कि पार्टी 1951 में ही शान्तिपूर्ण संविधानवाद का रास्ता अपना चुकी थी और मुख्यत: और मूलत: मेंशेविक और काउत्स्कीपन्थी यूरोपीय पार्टियों के साँचे में ढल चुकी थी। 1951 से लेकर 1962-63 तक इसमें दो लाइनों का संघर्ष वस्तुत: संसदवाद-अर्थवाद की नरम धारा और रैडिकल धारा के बीच संघर्ष के रूप में ही मौजूद रहा। कतारों का बड़ा हिस्सा क्रान्तिकारी आकांक्षाओं और चरित्र वाला था। (हालाँकि सुधारवादी तत्त्वों की नयी भरती लगातार जारी थी), लेकिन अपनी विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण वह नेतृत्व के रैडिकल संशोधनवादी धड़े को ही क्रान्तिकारी मानता था। जो नरमपन्थी उदारवादी धड़ा था, उसका नेतृत्व डांगे, मोहित सेन, भवानी सेन, भूपेश गुप्त, दामोदरन, जी. अधिकारी आदि के हाथों में था और मध्यमार्गी अजय घोष भी मूलत: उन्हीं के साथ थे। दूसरे धड़े का नेतृत्व सुन्दरैया, गोपालन, बासवपुनैया, प्रमोद दासगुप्ता आदि के हाथों में था। पहले धड़े की राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की थीसिस यह थी कि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस में मौजूद धड़ा प्रगतिशील राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग का प्रतिनिधि है और नेहरू सरकार विउपनिवेशीकरण और भूमि-सुधारों के राष्ट्रीय जनवादी कार्यभारों को अंजाम दे रही है, इसलिए भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को उसके प्रति मुख्यत: सहयोग का रुख़ अपनाना चाहिए। साथ ही, यह सरकार समाजवादी शिविर के प्रति भी दोस्ताना रुख़ रखती है। इसे मज़बूत बनाने के लिए और साथ ही विश्व शान्ति आन्दोलन को मज़बूत बनाकर शीतयुद्ध का प्रतिकार करने के लिए नेहरू सरकार के प्रति सहयोगी रुख़ अपनाना ज़रूरी है। दूसरी ओर रैडिकल संशोधनवादी धड़े का यह मानना था कि भारत में राज्यसत्ता का बड़ा साझीदार बड़ा पूँजीपति वर्ग है जो साम्राज्यवाद के साथ समझौते कर रहा है और राष्ट्रीय जनवादी कार्यभारों को कतई पूरा नहीं करना चाहता। इसके विरुद्ध चार वर्गो के रणनीतिक संश्रय के आधार पर लोक जनवादी क्रान्ति के लिए संघर्ष करना होगा, जिसका केन्द्रीय तत्त्व भूमि क्रान्ति होगा। ऊपरी तौर पर देखने पर यह कार्यक्रम क्रान्तिकारी लगता था, लेकिन वास्तविकता यह थी कि क्रान्तिकारी किसान संघर्ष को पुनस्संगठित करके तेलंगाना किसान-संघर्ष की परम्परा को आगे बढ़ाने की कोई ठोस कार्य-योजना इसके वाहक धड़े ने कभी प्रस्तुत नहीं की। जगह-जगह भूमिहीनों के बीच ग़ैरमजरुआ, पंचायती व सीलिंग से निकली ज़मीन बाँटने, सरकार पर भूमि-सुधारों की गति तेज़ करने के लिए दबाव बनाने, न्यूनतम मज़दूरी जैसी माँगों पर संघर्ष करने, संसद में नेहरू की नीतियों के खिलाफ़ रैडिकल भाषण देने और औद्योगिक मज़दूरों की बोनस, वेतनवृद्धि व अन्य सुविधाओं को लेकर आन्दोलन संगठित करने के अतिरिक्त लोक जनवादी क्रान्ति का कार्यक्रम देने वाले धड़े ने और कुछ भी नहीं किया। यहाँ यह उल्लेख भी कर दिया जाना चाहिए कि 1955-56 के दौरान अजय घोष, नम्बूदरिपाद, डांगे, जगन्नाथ सरकार, बालकृष्ण मेनन आदि कुछ लोग इस तरीके की बात कर रहे थे कि भारतीय सत्तारूढ़ बुर्जुआ भी बिस्मार्ककालीन प्रशा की तरह, ऊपर से, भूस्वामित्व ढाँचे का क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण कर रहा है, लेकिन फिर वे इस मसले पर कायराना और अवसरवादी ढंग से चुप्पी साध गये। यूँ तो एक संशोधनवादी पार्टी के लिए कार्यक्रम के सही-ग़लत होने का कोई मतलब नहीं होता, लेकिन यह ज़रूर है कि भूमि सम्बन्धों के रूपान्तरण से जुड़े पक्षों पर उस समय यदि बहस चली होती तो नक्सलबाड़ी के बाद, कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच भी यह मुद्दा बहस के एजेण्डे पर आसानी से आ जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।, कहा जा सकता है कि पहला धड़ा जहाँ एकदम सामाजिक जनवादी आचरण करते हुए पार्टी को बुर्जुआ वर्ग की गोद में बैठा देना चाहता था, वहीं दूसरा धड़ा रैडिकल अर्थवादी-ट्रेडयूनियनवादी-संसदवादी विरोध की कार्रवाइयाँ चलाते हुए एक ज़िम्मेदार संसदीय विपक्ष, व्यवस्था के भीतर सक्रिय एक `प्रेशर ब्लॉक´ और व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा-पंक्ति की भूमिका निभाना चाहता था। लेकिन इस धड़े के संशोधनवादी चरित्र को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि संसदीय और आर्थिक संघर्षों के अतिरिक्त इसने 1951 से 1964 तक किसानों के क्रान्तिकारी भूमि संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए तथा मज़दूर वर्ग के बीच क्रान्तिकारी राजनीतिक प्रचार एवं राजनीतिक संघर्ष संगठित करने के लिए कुछ भी नहीं किया। पूरी पार्टी के कानूनी बना दिये जाने और चवन्नियाँ सदस्यता सहित सभी मेंशेविक ढंग-ढर्रों को अपना लेने पर इस धड़े ने कभी कोई सवाल नहीं उठाया। 1958 में हुई पार्टी की पाँचवीं (विशेष) कांग्रेस (अमृतसर) में जब सोवियत पार्टी की बीसवीं कांग्रेस में स्वीकृत खुर्श्चेवी संशोधनवादी नीतियों को अपनाया गया और पार्टी संविधान की प्रस्तावना से `क्रान्तिकारी हिंसा´ शब्दावली को हटा दिया गया तो एक भी प्रतिनिधि ने इसका विरोध नहीं किया। नक्सलबाड़ी किसान-उभार से जन्मी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धारा के भी नेतृत्व की विचारधारात्मक कमज़ोरी को समझने के लिए यहीं पर यह उल्लेख भी ज़रूरी है कि इस कांग्रेस में भावी मा-ले नेतृत्व के कई लोग भी प्रतिनिधि के रूप में मौजूद थे। उनमें डी.वी. राव (केन्द्रीय कमेटी के सदस्य भी थे) और नागी रेड्डी तो राष्ट्रीय स्तर के नेता माने जाते थे जबकि कई अन्य राज्य स्तर के नेता थे। छठी कांग्रेस (विजयवाड़ा, 1961) में दो परस्पर-विरोधी कार्यक्रम के मसौदों पर अवश्य गम्भीर मतभेद सामने आया, लेकिन सोवियत प्रतिनिधिमण्डल के खुर्श्चेवपन्थियों के बीच-बचाव से फूट को टाल दिया गया। उल्लेखनीय है कि 1956-61 के दौरान खुर्श्चेवी संशोधनवाद का विरोध परोक्ष रूप से करते हुए चीन की पार्टी स्तालिन और सर्वहारा क्रान्ति के मार्क्सवादी-लेनिनवादी उसूलों के पक्ष में सकारात्मक तौर पर अपने मुखपत्रों में लिख रही थी, लेकिन संशोधनवाद पर खुला हमला बोलने की जगह वह पार्टी-स्तर पर बातचीत के ज़रिये मतभेदों को हल करने की कोशिश कर रही थी। उसे उम्मीद थी कि पूरी सोवियत पार्टी शायद खुर्श्चेव के साथ न हो और बातचीत करके सोवियत पार्टी को सही रास्ते पर लाया जा सकता है तथा विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन को फूट से बचाया जा सकता है। इसी प्रक्रिया में 1957 और 1960 के अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट सम्मेलनों द्वारा पारित दस्तावेज़ों में चीन की पार्टी ने अपनी अवस्थिति दर्ज कराने के बावजूद समझौते भी किये। इन विचारधारात्मक समझौतों के चलते इन दस्तावेज़ों में कई संशोधनवादी प्रस्थापनाएँ शामिल हो गयी थीं, जिनका पूरा लाभ पूरी दुनिया की पार्टियों के संशोधनवादियों ने उठाया। चीन की पार्टी की उम्मीदों का इतिहास के अनुभव समर्थन नहीं करते थे और उसका आचरण सुधारवाद और संशोधनवाद के विरुद्ध तत्क्षण संघर्ष छेड़ देने के मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के आचरण से मेल नहीं खाता था। संशोधनवाद के विरुद्ध खुले संघर्ष में चीन की पार्टी द्वारा किये गये अनावश्यक विलम्ब से पूरी दुनिया के कम्युनिस्ट आन्दोलन में संशोधनवादियों को लाभ मिला। कतारों को दिग्भ्रमित करने और अपना सुदृढ़ीकरण करने में उन्होंने इस अन्तराल का भरपूर लाभ उठाया। भारत के कम्युनिस्ट नेतृत्व को तो दुनिया की किसी बड़ी पार्टी या मान्य अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व से दिशा पाये बिना सोचने की आदत ही नहीं थी। ऐसे में, पाँचवीं और छठी कांग्रेस में खुर्श्चेवी संशोधनवाद पर सवाल उठाने का भला सवाल ही कहाँ उठता है? कतारों की क्रान्तिकारी स्पिरिट भी 1951 के बाद से लगातार क्षरित हो रही थी। अब स्तालिन की आलोचना और संसदीय मार्ग की स्वीकृति ने उनमें और अधिक पस्ती और निराशा पैदा करने का काम किया।

1962 में भारत के चीन युद्ध के समय डांगेपन्थी धड़े ने अपनी वर्ग-सहयोगी लाइन की तार्किक परिणति के तौर पर अन्धराष्ट्रवादी अवस्थिति अपनायी और चीन को हमलावर मानते हुए नेहरू सरकार की सीमानीति को पुरज़ोर समर्थन दिया। उस समय चीन पश्चिमी शक्तियों की घेरेबन्दी और कुत्साप्रचार के घटाटोप का शिकार था, फिर भी पश्चिमी मीडिया और पश्चिमी बुद्धिजीवियों का बहुलांश भारत-चीन सीमा विवाद में अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों की शह और अपनी क्षेत्रीय विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षा के चलते उकसावे और हमले की कार्रवाई के लिए भारत को ही ज़िम्मेदार मानता था। कई पुस्तकों में इन तथ्यों की सविस्तार चर्चा मिलती है जिसमें अमेरिकी पत्रकार नेविल मैक्सवेल की पुस्तक सर्वाधिक प्रसिद्ध है। भारत में भी पुराने क्रान्तिकारी पं. सुन्दरलाल सहित कई लोग नेहरू की विस्तारवादी नीतियों और हमले की कार्रवाई के कटु आलोचक थे और तथ्यों को सामने लाने वाली कई पुस्तकें व लेख यहाँ भी लिखे गये लेकिन अन्धराष्ट्रवादी प्रचार की लहर में वे व्यापक जनता तक नहीं पहुँच सके। भारत की कम्युनिस्ट कतारें सीमा-विवाद सम्बन्धी इस सारी सामग्री से परिचित नहीं थीं, लेकिन अपने सहज वर्ग-बोध से समाजवादी चीन को विस्तारवादी और हमलावर मानने को वे तैयार नहीं थी और भारतीय बुर्जुआ सत्ता के प्रतिक्रियावादी तथा विस्तारवादी चरित्र को भी वे भली-भाँति समझती थीं। भारी अन्धराष्ट्रवादी लहर का मुकाबला करते हुए भारत की कम्युनिस्ट कतारों के बड़े हिस्से ने नेहरू सरकार की हमलावर विस्तारवादी सीमा-नीति का विरोध किया। पार्टी-नेतृत्व के भीतर डांगेपन्थियों का विरोधी जो दूसरा धड़ा था (जो कि अल्पमत में था), उसने डांगेपन्थियों के बहुमत द्वारा ली गयी लाइन को मार्क्सवाद-विरोधी और बुर्जुआ राष्ट्रवाद के अवसरवादी सिद्धान्त पर आधारित घोषित किया। लेकिन आने वाले समय की घटनाओं ने सिद्ध किया कि ऐसा सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावाद के प्रति प्रतिबद्धता के चलते नहीं, बल्कि क्रान्तिकारी कतारों को अपने पक्ष में करने के लिए किया गया था। चीनी “हमले” के मिथक के पीछे की सच्चाइयों को साहसपूर्वक उजागर करने और अन्धराष्ट्रवाद-विरोधी प्रचार का कोई कार्यक्रम हाथ में लेने के बजाय, इस दूसरे धड़े की ओर से राममूर्ति ने पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में एक वैकल्पिक प्रस्ताव पेश किया जिसमें सिर्फ़ इतना ही कहा गया था कि चीन और भारत दो महान पड़ोसी देश हैं, उन्हें आपसी युद्ध में नहीं उलझना चाहिए क्योंकि इससे दोनों देशों को तबाही-बर्बादी का सामना करना पड़ेगा। लेकिन इस कायराना जोड़तोड़ के बावजूद वे बच नहीं सके। भारत सरकार ने उनमें से अधिकांश को, डांगे द्वारा दी गयी सूची के आधार पर, गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया।

1963 के उत्तरार्द्ध से, `क्रान्ति या शान्तिपूर्ण संक्रमण?´ के बुनियादी विचारधारात्मक प्रश्न पर, भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन में शायद पहली बार अभूतपूर्व आयामों वाली एक ऐसी बहस की शुरुआत हुई जिसने समूची पार्टी कतारों को अपनी ज़द में ले लिया। 1957 से 1962 के बीच सोवियत पार्टी और चीनी पार्टी का जो भी साहित्य भारत की कम्युनिस्ट कतारों के एक हिस्से तक पहुँच पा रहा था, उससे यह बात तो स्पष्ट हो ही चुकी थी कि चीन की पार्टी न केवल तोग्लियाती और टीटो के संशोधनवाद का विरोध करती है, बल्कि वह खुर्श्चेव के तीन “शान्तिपूर्णों” के सिद्धान्त और उसके द्वारा प्रस्तुत स्तालिन की आलोचना को भी स्वीकार नहीं करती है। लेकिन पूरे देश की व्यापक कतारों तक सोवियत लेखन की ही पहुँच थी। चीनी पार्टी का साहित्य ज्यादातर कुछ महानगरों के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों और प्रबुद्ध कतारों तक ही पहुँच पाता था। पार्टी नेतृत्व अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के बीच जारी मतभेदों से परिचित था, लेकिन उसके दूसरे धड़े ने भी कभी चीनी पार्टी की अवस्थिति को कतारों तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की। जून, 1963 में चीनी पार्टी ने पहली बार बहस को खुला करते हुए खुर्श्चेवी लाइन के विरुद्ध विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन की वैकल्पिक आम दिशा का दस्तावेज़ प्रस्तुत किया। इसके बाद सितम्बर 1963 से लेकर जुलाई 1964 के बीच क्रमश: नौ निबन्धों के ज़रिये चीनी पार्टी ने ख्रुश्चेवी नकली कम्युनिज्म को पूरी तरह बेनकाब करते हुए सोवियत पार्टी को पूँजीवादी रास्ते का राही घोषित किया। यही बहस अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास में `महान बहस´ नाम से प्रसिद्ध हुई। उस समय आधिकारिक पार्टी-लाइन का विरोध करने वाले धड़े का बड़ा हिस्सा जेल में था। जो लोग बाहर थे, उन्होंने `महान बहस´ के दस्तावेज़ों को पार्टी-कतारों तक पहुँचाने के लिए कुछ भी नहीं किया। ये दस्तावेज़ मुख्यत: बुद्धिजीवियों के बीच से पार्टी कतारों तक पहुँचे और फिर वहां से तेज़ी से फैले। अब पहलकदमी पूरी तरह से कतारों के हाथ में थी। जुझारू कतारों के बड़े हिस्से ने चीनी अवस्थिति का समर्थन किया। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि चीनी “हमले” के दुष्प्रचार और अन्धराष्ट्रवादी लहर का निशाना दरअसल चीनी पार्टी की क्रान्तिकारी लाइन है, इसलिए कतारों ने अन्धराष्ट्रवाद के विरुद्ध साहसिक प्रचार-कार्य पूरी तरह से अपनी स्वतन्त्र पहल पर करना शुरू किया। यह मुहिम बंगाल में सर्वाधिक सशक्त थी। कलकत्ता के शहीद मैदान में एक भारी रैली हुई और फिर सड़कों पर जुलूस निकाला गया। जिसका प्रमुख नारा था : `चीन का हौवा खड़ा करने वाले साम्राज्यवाद के एजेण्ट हैं।´ पूरी स्थिति को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि पार्टी का बांगला मुखपत्र `स्वाधीनता´ नेतृत्व के 16 आधिकारिक पार्टी-लाइन विरोधी गुट के नियन्त्रण में होने के बावजूद इस पूरे मसले पर चुप्पी साधे हुए था। दूसरी ओर, पार्टी कतारों की पहल पर शुरू हुआ नया साप्ताहिक `देशहितैषी´ और नया मासिक `नन्दन´ इस पूरे प्रश्न पर जुझारू मुखरता के साथ स्टैण्ड लेकर लिख रहे थे और संशोधनवाद पर चोट कर रहे थे।

आधिकारिक पार्टी-लाइन विरोधी पक्ष के नेतागण जब जेलों से बाहर आये तो स्थितियाँ उन्हें अपनी समझ और नियन्त्रण की सीमा से परे प्रतीत हुई। जेल जाने से पहले वे चीनी लाइन के साथ जोड़कर देखे जाते थे, हालाँकि वे स्वयं ऐसा नहीं कहते थे। जेल में उनके भीतर भी मतभेद पैदा हो गये थे। कुछ उदारपन्थियों का कहना था कि सोवियत और चीनी पार्टी – दोनों की अवस्थितियाँ ग़लत हैं जबकि उनके विरोधियों का कहना था कि चीनी अवस्थिति मुख्यत: सही है। आधिकारिक लाइन विरोधी नेतृत्व का एक छोटा-सा हिस्सा जो बंगाल में गिरफ़्तारी से बच गया था और भूमिगत होकर पार्टी की राज्य कमेटी के रूप में काम कर रहा था, उसने `पृथ्वीराज´ छद्मनाम से एक दस्तावेज़ निकाला था जिसमें यह स्पष्ट कहा गया था कि अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में मतभेद मार्क्सवाद के बुनियादी उसूलों पर हैं। लेकिन यह कहने के बावजूद, `पृथ्वीराज´ इकाई के एक सदस्य समर मुखर्जी ने स्पष्ट कर दिया था कि वे फूट के लिए अपनी ओर से कोई पहल नहीं करेंगे। जेल से बाहर आये नेताओं की भी यही सोच थी, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि कतारों में यह भावना प्रचण्ड रूप में मौजूद है कि पार्टी नेतृत्व पर हावी डांगेपन्थियों के बहुमत के साथ सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में विचारधारात्मक मुद्दे से कतारों का ध्यान हटाने के लिए आधिकारिक पार्टी-लाइन विरोधी धड़े ने राष्ट्रीय अभिलेखागार से डांगे का वह पत्र निकलवाकर ख़ूब ज़ोर-शोर से कतारों में बाँटना शुरू कर दिया, जो उसने ब्रिटिश सत्ता को जेल से माफ़ीनामे के तौर पर भेजा था। लेकिन यह जुगत काम न आयी। विचारधारात्मक संघर्ष और तीखा हो गया और इन नेताओं के सामने इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प शेष नहीं बचा कि वे एक नयी पार्टी के गठन की दिशा में आगे कदम बढ़ायें। इस उद्देश्य से तेनाली (आन्ध्र प्रदेश) में एक कन्वेंशन बुलाया गया। लेकिन नेताओं के इस धड़े की नीयत और चरित्र को इस बात से समझा जा सकता है कि इस कन्वेंशन के ऐन पहले ज्योति बसु समझौते का एक प्रस्ताव लेकर भूपेश गुप्त और राजेश्वर राव से मिलने उड़कर दिल्ली पहुँचे। उनकी शर्त थी कि यदि अगली पार्टी कांग्रेस 1962 की सदस्यता के आधार पर हो और यदि डांगे को पार्टी-चेयरमैन पद से हटा दिया जाये, तो नयी पार्टी बनाने का विचार छोड़ा जा सकता है। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि ऐसे नेतृत्व के लिए, फूट का मुद्दा विचारधारात्मक-राजनीतिक नहीं था, बल्कि संसदीय राजनीति के दायरे में ही अधिक नरम या अधिक गरम नीतियों-रणनीतियों को लेकर था। `पृथ्वीराज दस्तावेज़´ में सोवियत व चीनी पार्टी के बीच के मतभेदों को विचारधारात्मक बताते हुए चीनी अवस्थिति का स्पष्ट समर्थन किया गया था जबकि राष्ट्रीय परिषद में हावी डांगेपन्थियों ने यह प्रस्ताव पारित करवाया था कि चीन आक्रमणकारी है। इन दोनों लाइनों के एक ही पार्टी में सहअस्तित्व की बात सोचने वाले लोग परले दरजे के अवसरवादी ही हो सकते थे।

ऐसे अवसरवादी नेतृत्व के प्रति रैडिकल कतारें शुरू से ही सशंकित थीं, फिर भी उन्हें यही लगा कि डांगेपिन्थयों से अलग होने के बाद इस नये नेतृत्व के ढुलमुलपन पर दबाव बनाकर नयी पार्टी को रास्ते पर लाया जा सकता है। कतारों को तब और आश्चर्य हुआ था जब, जिस नेतृत्व से एक क्रान्तिकारी लाइन लागू करने की अपेक्षा थी, वह दमनकारी राज्य मशीनरी की भरपूर सक्रियता के समय खुले तौर पर एक कांग्रेस के लिए एकत्र हुआ और फिर वही हुआ जो होना था। आधिकारिक-लाइन विरोधी सभी अग्रणी नेताओं को शान्तिपूर्वक उठाकर जेल में डाल दिया गया। जब अन्धराष्ट्रवादी लहर के खिलाफ़ रैडिकल कतारें सड़कों पर थीं, उस समय नेतृत्व के इस धड़े को जेल शायद अधिक महफ़ूज़ जगह लगी। कतारों के इस नये नेतृत्व के प्रति शंकाओं को तब और अधिक बल मिला जब नयी पार्टी (माकपा) के गठन के लिए प्रस्तावित कांग्रेस के लिए इसने मसौदा पार्टी कार्यक्रम वितरित किया। हालाँकि लोक जनवादी क्रान्ति की बात करते हुए इसमें मजदूर वर्ग के नेतृत्व, मज़दूर-किसान संश्रय पर आधारित संयुक्त मोर्चे और भूमि-क्रान्ति के धुरी होने की बात की गयी थी, लेकिन इसमें संशोधनवाद और सुधारवाद के कई तत्त्व थे और भविष्य में क्रान्तिकारी लाइन को पूरी तरह से छोड़ देने की तमाम गुंजाइशें इसमें अन्तर्निहित थीं, जिन्हें रैडिकल कतारों के एक बड़े हिस्से ने भाँप लिया। नतीजतन, कांग्रेस की तैयारी के लिए आयोजित पार्टी कन्वेंशन के सभी स्तरों पर तीखी बहसें उठ खड़ी हुई। यहाँ तक कि पार्टी कांग्रेस तक में कार्यक्रम का एक वैकल्पिक मसौदा पेश किया गया, लेकिन पुराने नौकरशाहाना ढंग से, जोड़तोड़ के बहुमत के सहारे हर रैडिकल आलोचना को दबा दिया गया। पार्टी कार्यक्रम के मसौदे के सिर्फ़ कुछ शब्दों में छोटे-मोटे बदलाव किये गये।

इतना कुछ होने के बावजूद, रैडिकल कतारें यह समझने में विफल रहीं कि जो नयी पार्टी गठित की जा रही है, वह भी नेतृत्व और नीतियों की दृष्टि से एक संशोधनवादी पार्टी है। उन्हें अपेक्षा थी कि इस पार्टी के भीतर दो लाइनों का संघर्ष चलाकर और मध्यमार्गियों को ठिकाने लगाकर इसे क्रान्तिकारी रास्ते पर उन्मुख किया जा सकता है। इस विभ्रम के लिए पार्टी की विचारधारात्मक कमज़ोरी का लम्बा इतिहास, राजनीतिक शिक्षा के अभाव की लम्बी परम्परा और निपट संशोधनवाद का चौदह वर्षों लम्बा दौर ज़िम्मेदार थे। नवगठित पार्टी ने सर्वहारा क्रान्ति के मूलभूत विचारधारात्मक प्रश्न पर जो अवस्थिति अपनायी उसकी सारवस्तु स्पष्टत: संशोधनवादी थी। खुर्श्चेवी संशोधनवाद की आलोचना करने के बावजूद माकपा-नेतृत्व का मानना था कि चीनी पार्टी अतिवामपन्थी संकीर्णतावादी भटकाव की शिकार है। सोवियत संघ के बारे में उनका कहना था कि वहाँ की पार्टी संशोधनवादी भटकाव की शिकार है किन्तु राज्य और समाज का चरित्र अभी भी समाजवादी है। यह अवस्थिति अपने आप में हास्यास्पद रूप से विसंगतिपूर्ण थी। लेनिन की परिभाषा के अनुसार, संशोधनवादी पार्टी का मतलब है समाजवादी मुखौटे वाली बुर्जुआ पार्टी। ऐसी कोई पार्टी यदि राज्य पर काबिज़ हो तो राज्य का चरित्र सर्वहारा अधिनायकत्व का नहीं, बल्कि बुर्जुआ अधिनायकत्व का ही होगा और उस राज्य के होते समाजवादी समाज का विघटन केवल समय की बात होगी। 1955 से 1964 तक सोवियत संघ का समाजवादी तानाबाना पूरी तरह विघटित हो चुका था और उसका स्थान राजकीय इजारेदार पूँजीवाद ले चुका था। 1968 में चेकोस्लोवाकिया पर हमले के बाद, सोवियत संघ का साम्राज्यवादी चरित्र भी नंगा हो गया। बाद के दशक के दौरान, राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों को मदद देने के नाम पर उनमें फूट डालने, उन्हें सशस्त्र संघर्ष का रास्ता छोड़ समझौते की नसीहत देने, नवस्वाधीन देशों का सहायता के नाम पर शोषण करने और पूर्वी यूरोपीय देशों की जनता का शोषण करने की सोवियत नीति ने सोवियत संघ के सामाजिक साम्राज्यवादी चरित्र को दिन के उजाले की तरह साफ़ कर दिया। लेकिन माकपा नेतृत्व सोवियत संघ को तब तक समाजवादी मानता रहा जब तक राजकीय पूँजीवाद का स्थान पश्चिमी ढंग के निजी पूँजीवाद ने नहीं ले लिया और सोवियत संघ का विघटन नहीं हो गया। माकपा की थीसिस के अनुसार, पैंतीस वर्षों तक एक संशोधनवादी पार्टी के शासन में राज्य और समाज का चरित्र समाजवादी बना रहा। मार्क्सवाद के साथ इससे बड़ा मज़ाक भला और क्या हो सकता है! और बात केवल इतनी ही नहीं थी। धीरे-धीरे माकपा ने सोवियत पार्टी को संशोधनवादी कहना भी बन्द कर दिया।

पूँजीवादी पुनर्स्थापना के कारणों और समाजवादी संक्रमण की अवधि में जारी वर्ग संघर्ष की प्रकृति के बारे में माओ त्से-तुङ के विश्लेषण और सैद्धान्तिक निष्पत्तियों पर माकपा ने कभी विस्तार से कुछ नहीं लिखा, लेकिन महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के प्रयोग को वह शुरू से अस्वीकार करती रही और ल्यू शाओ-ची व देङ सियाओ-पिङ के उत्पादक शक्तियों के विकास के संशोधनवादी सिद्धान्त को मार्क्सवादी मानती रही। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि वह आज के चीन के “बाज़ार समाजवाद” नामधारी नग्न पूँजीवाद को समाजवाद मानती है और सांस्कृतिक क्रान्ति को देङपंथियों के सुर में सुर मिलाते हुए एक “अतिवामपन्थी भूल” और “महाविपदा” घोषित करती है। वैसे, आम तौर पर मध्यमार्ग अपनाने वाली हर संशोधनवादी पार्टी की तरह माकपा अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के हर अहम विचारधारात्मक मसले पर प्राय: चुप्पी का ही रवैया अख्तियार करती रही है और विवश होने पर ही अपनी संशोधनवादी अवस्थिति को रखती रही है। `महान बहस´ में चीन की अवस्थिति को कथनी में सही मानते हुए भी उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों-नवउपनिवेशों में क्रान्ति सहित विश्व सर्वहारा क्रान्ति की आम दिशा के बारे में चीनी पार्टी द्वारा 1963 में प्रस्तुत अवस्थिति की जगह उसने खुर्श्चेवी संशोधनवादी आम दिशा को ही सारत: स्वीकार किया। माओ की मृत्यु के बाद, चीन में प्रतिक्रियावादी तख्तापलट करके सत्तासीन हुए पूँजीवादी पथगामियों ने सोवियत पार्टी को जब बिरादराना पार्टी कहना शुरू कर दिया, तो माकपा ने इसका कोई विरोध नहीं किया और उनके इस कुटिल पैंतरापलट को चुपचाप स्वीकार कर लिया। माकपा का यह संशोधनवादी चरित्र समय बीतने के साथ ही ज्यादा से ज्यादा नंगा होता गया, लेकिन विचारधारात्मक अवस्थिति और पार्टी की प्रकृति की दृष्टि से देखें तो अपने जन्मकाल से ही यह एक संशोधनवादी पार्टी थी।

यानी संकीर्ण अनुभववादी पर्यवेक्षण के बजाय, यदि पार्टी संगठन के लेनिनवादी उसूलों के नज़रिये से देखा जाये तो माकपा का संशोधनवादी चरित्र 1964 में ही एकदम साफ़ था। 1951 से ही जारी पार्टी के एकदम खुले, कानूनी, संसदीय चरित्र और कार्यप्रणाली को माकपा ने यथावत जारी रखा। पार्टी-सदस्यता की प्रकृति इसमें मेंशेविकों से भी गयी-गुज़री थी। अमृतसर कांग्रेस में पार्टी संविधान में किया गया बदलाव भी 1964 की सातवीं कांग्रेस में यथावत कायम रखा गया। लोक जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम के अनुसार, क्रान्ति का मार्ग दीर्घकालिक लोकयुद्ध का ही हो सकता था, लेकिन इसका कोई उल्लेख करने की जगह पार्टी कार्यक्रम में कपटपूर्ण भाषा में “संसदीय और ग़ैरसंसदीय” रास्ते का उल्लेख किया गया। कोई भी क्रान्तिकारी पार्टी बुर्जुआ संसदीय चुनावों का परिस्थिति अनुसार रणकौशल के तौर पर ही इस्तेमाल करती है। संसदीय रास्ते को ग़ैर संसदीय मार्ग के समकक्ष रखना अपने आप में संशोधनवाद है। यूँ बाद में मा-ले आन्दोलन की “वामपन्थी” दुस्साहसवादी धारा के चुनाव-बहिष्कार के नारे का विरोध करते हुए माकपा लेनिन के हवाले से यही कहती थी कि एक रणकौशल के तौर पर चुनाव का इस्तेमाल किया जा सकता है और वह यही कर रही है। लेकिन विगत तीन दशकों से बुर्जुआ व्यवस्था के अन्तर्गत एक राज्य में शासन करते हुए वह बुर्जुआ नीतियों को भरपूर वफ़ादारी के साथ लागू करती रही है और जनसंघर्षों की तैयारी के लिए चुनाव व संसदीय मंच का इस्तेमाल करने की जगह लगातार हर जनान्दोलन को कुचलने के लिए राज्यतन्त्र का बर्बर निरंकुश ढंग से इस्तेमाल करती रही है। अपना यह चरित्र वह नक्सलबाड़ी किसान उभार का बर्बर दमन करके साठ के दशक के अन्तिम वर्षों में ही नंगा कर चुकी थी।

जहाँ तक कार्यक्रम का प्रश्न है, माकपा ने अपने लोक-जनवादी कार्यक्रम के अन्तर्गत भारतीय बड़े पूँजीपति वर्ग का चरित्र दलाल न मानकर दोहरी प्रकृति का माना था और कुल मिलाकर इसकी स्थिति साम्राज्यवाद के कनिष्ठ साझीदार की मानी थी, जो वास्तविकता के अधिक निकट था। लेकिन सत्तारूढ़ पूँजीपति वर्ग के इस चरित्र का अन्तर्निहित तर्क यही हो सकता था कि वह अपने औद्योगिक-वित्तीय हितों के अनुरूप, ऊपर से, एक क्रमिक प्रक्रिया में, प्रशा के जुंकर-टाइप रूपान्तरण से मिलते-जुलते रास्ते से अर्द्धसामन्ती भूमि-सम्बन्धों को बदलने की कोशिश करे, सामन्ती भूस्वामियों को पूँजीवादी भूस्वामी बनने का अवसर दे (और जो ऐसा न करें, उन्हें उजड़ने के लिए स्वतन्त्र छोड़ दे), धनी काश्तकारों को मुनाफ़ाखोर कुलक बना दे, अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर तथा आयात-प्रतिस्थापन की नीति अपनाकर अपने आर्थिक हितों की हिफ़ाज़त एवं विस्तार करे तथा सुदूरवर्ती गाँवों तक को एक राष्ट्रीय बाज़ार के अन्तर्गत लाने की कोशिश करे। वास्तव में हुआ भी यही (और यह प्रक्रिया 1964 में गति पकड़ चुकी थी)। माकपा से जुड़े अर्थशास्त्री देश में पूँजीवादी विकास की सच्चाई को अंशों में स्वीकारते भी रहे हैं, हालाँकि इस तर्क को उसकी स्वाभाविक निष्पत्ति तक पहुँचाने से कन्नी काटते रहे हैं। माकपा भारतीय पूँजीपति वर्ग के चरित्र-निरूपण से निगमित तर्क को उसके नतीजे तक पहुँचाने की जगह, आज तक यही मानती है कि भारत विगत आधी सदी से लोक जनवादी क्रान्ति की मंज़िल में ही खड़ा है। वैसे किसी संशोधनवादी पार्टी के लिए क्रान्ति के कार्यक्रम का कोई खास मतलब नहीं होता। भारत में समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल मानने वाली कई छोटी-छोटी संशोधनवादी पार्टियाँ भी हैं, जो गाँवों और शहरों के सर्वहाराओं को लेकर लगातार अर्थवादी-ट्रेडयूनियनवादी कवायद करती रहती हैं और संसद-विधानसभाओं के चुनाव लड़ती रहती हैं, या फिर मात्र सिद्धान्त-चर्वण करती रहती हैं। लेकिन माकपा सापेक्षत: एक बड़े सामाजिक आधार वाली पार्टी है, जिसे गाँवों में बड़े मँझोले मालिक किसानों को और शहरों में छोटे बुर्जुआओं और उच्च मध्यवर्ग को हर हाल में अपने साथ रखना है, वरना उसके वोट बैंक को भारी नुकसान पहुँचेगा (संगठित मज़दूरों के आर्थिक हितों को लेकर, मरियल ही सही, लेकिन कानूनी और अर्थवादी लड़ाइयाँ लड़कर तथा संसद में वेतन संशोधन, पी.एफ., पेंशन, सेवाशर्तों आदि पर सत्ता का विरोध करने का पाखण्ड करके वह उनमें अपना वोट बैंक बनाये रखती है, पर मात्र इसी आधार पर उसकी चुनावी गोट लाल नहीं हो सकती)। इसलिए गाँवों के बड़े मालिक किसानों, शहरों के छोटे बुर्जुआओं और उच्च मध्य वर्ग के प्रति वर्ग-सहयोगवादी रवैया अपनाने में लोक जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम में निहित चार वर्गो के रणनीतिक संश्रय की सोच माकपा को एक सैद्धान्तिक आड़ देने का काम करती है। इसीलिए माकपा आज भी लोक जनवादी कार्यक्रम की बात करती है।

बहरहाल, यह तो आगे की बात हुई। हमें 1964 के काल में वापस लौटना होगा। माकपा का जो संशोधनवादी चरित्र आज उसके घनघोर जनविरोधी सामाजिक-जनवादी चरित्र के रूप में एकदम नंगा हो चुका है, वह अपने जन्मकाल से वैसा ही था। लेकिन चूँकि माकपा नेतृत्व उस समय डांगेपन्थी संशोधनवादियों पर हमले कर रहा था और चूँकि वह दबी-जुबान से ही सही लेकिन खुर्श्चेवी संशोधनवाद का विरोध करता प्रतीत हो रहा था इसलिए आनुभविक ढंग से चीज़ों को देखने के आदी, निम्न सैद्धान्तिक समझ और चेतना वाली कतारों के बड़े हिस्से ने उन्हें क्रान्तिकारी समझा। फिर भी यह एक निर्विवाद सच्चाई है कि कतारों का एक बड़ा हिस्सा उन्हें संशय की दृष्टि से देख रहा था और मध्यमार्गी ढुलमुलपन का शिकार मान रहा था। जो अधिक चेतनशील कार्यकर्ता थे, वे 1964 की कांग्रेस के बाद मायूस थे, पर उन्हें कोई विकल्प नहीं दीख रहा था। एक बड़ा हिस्सा ऐसा था जो नेतृत्व को संशोधनवादी मानते हुए भी, पार्टी के साथ फ़िलहाली तौर पर ही था और इंतजार की मानसिकता में था। बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं का एक अच्छा-खासा हिस्सा ऐसा भी था, जो इस नये नेतृत्व से कोई उम्मीद नहीं रखने के कारण निष्क्रिय हो गया था। कुल मिलाकर कहें, तो एक सर्वभारतीय पार्टी के गठन से जिस उत्साह, उम्मीद और जोश का माहौल होना चाहिए था, वह कहीं भी नहीं था।.…जारी

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