साम्राज्यवाद

पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

Posted on Updated on

हार्वे की ओर इस कशिश के पीछे कुछ और भी कारण हैं. सावधानीपूर्वक तराशी हुई उनकी दाढ़ी और भले चचा जैसे रूप-रंग में, वे, काफी हद तक, एक भद्र क्रांतिकारी जैसे दीखते हैं. वे बेमिसाल वाक्पटुता के मालिक हैं. मार्क्सवाद की मौजूदा प्रासंगिगता पर उनकी पुस्तकें और व्याख्यान – अढाई लाख से अधिक जिज्ञासू विद्यार्थियों द्वारा उनके इंटरनेट पर उपलब्ध पूंजी पर व्याख्यानों को डाउनलोड किया जाना – एक तरह का साहित्यिक उत्साह और मार्क्स को उनकी श्रेष्टता के साथ  आह्वान करने के विश्वास का भाव. वे उस वक्त विशेषरूप से अकाट्य होते हैं जब वे पूंजीवाद का, अनंत प्रवाह के रूप में, वर्णन करते हैं, कि कैसे यह निरंतर अपनी रुकावटों को पार कर जाता है, जैसे ही इसे मुनाफा कमाने के नये अवसर मिल जाते हैं.इसे एक उपमा ही कहेंगे कि वे सत्रहवीं सदी के अपने हमनाम ‘विलियम हार्वे’ को प्रसंतापूर्वक इस बात का श्रेय देते हैं कि कैसे वे  शरीर में खून को प्रणालीबद्ध रूप से दौड़ता हुआ दिखाया करते थे. यहाँ उसी उपमा को काम करते हुए देखा जा सकता है.

“एक तरफ अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं और क्रेडिट के फेरीवाले जौंक की भांति विश्वभर के लोगों का ‘ढांचागत समन्वय’ कार्यक्रमों और हर तरह की तिकडमों ( जैसे क्रेडिट कार्ड की फीस का एकदम दोगुना हो जाना ) द्वारा जितना खून चूस सकते हैं,चूसते रहते हैं – कोई फर्क नहीं पड़ता के वे कितने गरीब हो चुके हैं. दूसरी और केन्द्रीय बैंक अपनी अर्थव्यवस्थाओं में बाढ़ ले आते हैं और ग्लोबल बॉडी पोलीटिक में इस उम्मीद के साथ कि इस तरह के आकस्मिक आधानों से वह रोग ठीक हो जायेगा जिसे रेडिकल रोगनिदान और हस्तक्षेप की जरूरत है,  अत्यधिक तरलता का विस्तार कर देते हैं.

सभी मार्क्सवादियों की भांति, डेविड हार्वे भी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच मौज-मस्ती करते हैं. जैसेकि उन्होंने अपने व्याख्यान के बाद मेरे साथ अपने इन्टरवियू में बताया, ” मैं द्वन्द विज्ञानी हूँ. समाज में मौजूद विसंगतियों की खुदाई करने में मेरा विश्वास है. और मैं उनको प्रगतिशील बदलाव की गति के मार्ग के लिए प्रयोग करता हूँ. यह चिंतन और व्याख्या करने का तरीका है, जिसे प्रयोग में लाना बड़ा ही आसान है, अगर आप इसका प्रयोग इस तरह से करें कि लोग इसके साथ स्वयं को अभेद पायें बजाय इसके कि आपको कहना पड़े कि इसे समझने के लिए आपको हेगेल के तीनों और मार्क्स  के चारों खण्डों का अध्ययन करना पड़ेगा. बढ़िया नाटक, हेलमेट ( शेकस्पियर का एक नाटक ) की संरचना द्वंदात्मक है. अगर ऐसा न होता तो यह बहुत उबाऊ होता. और यही कारण है कि मुझे इतिहास और ऐतिहासिक बदलाव बहुत आकर्षित करते हैं.

अपनी [RSA ] के साथ बातचीत और अपनी उम्दा पठनीय पुस्तक में हार्वे, थेचरवाद के वर्षों के दौरान, नवउदारीवादी क्रांति से पैदा हुई विसंगतियों पर ,लुत्फ़ उठाते हैं. इससे पहले पूंजीवाद की समस्याओं को पूंजी के संबंध में श्रम की शक्ति को रखकर परिभाषित किया जाता था. नए यूनियन विरोधी विधान और ग्लोबल आउटसोर्सिंग के विकास, जिससे पूंजीपति अविकसित देशों की भोली-भाली जनता के श्रम को निचोड़ सकें, द्वारा संगठित श्रम को पीछे हटने के लिए मजबूर करके ही मुनाफे संभव हो सकते थे. परन्तु इसके तुरंत बाद एक नयी समस्या खड़ी हो गयी. अब, चूँकि वास्तविक उजरत बहुत घट गयी थी, पूंजीवाद द्वारा उत्पादित वस्तुओं को मजदूर वर्ग द्वारा खरीदना किस प्रकार संभव हो सकता था ? इसका हल आसान क्रेडिट में ढूंढा जाने वाला था.

क्रेडिट का अधिकतर हिस्सा, आवास बाज़ार में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक नयी समस्या थी. इस कर्ज का अधिकतर भाग आवास बाज़ार को ईधन मुहैया करवाने के रूप में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक और विरोधाभास था. एक तरफ बैंकों ने बिल्डरों को क्रेडिट की लंबी-लंबी स्कीमें थमा दी ताकि वे और अधिक घरों का निर्माण कर सकें. और उसी वक्त, उन्हीं बैंकों ने, उन लोगों को कर्ज दे दिया जो इस नयी खड़ी की गयी संपत्ति को खरीदना चाहते थे. यह पोंजी स्कीम – एक निवेश संबंधी घोटाला जिसमें शुरू के निवेशकों को मिलनेवाला तथाकथित लाभ नए जुडनेवाले निवेशकों के फंडों से सीधा प्राप्त हो जाता है – का सटीक उदाहरण था. अन्य सभी पोंज़ी स्कीमों की भांति, पूरी ईमारत उस वक्त भरभराकर गिर गयी जब निवेशकों ने नकदी वसूलने का फैसला किया.

लेकिन हम इतने अधिक लोगों की उस क्षेत्र में, जो उदाहरणतय, मैन्युफेक्चरिंग जैसे क्षेत्र में निवेश के मुकाबले संदिग्ध हो, में निवेश की इच्छा की किस प्रकार व्याख्या करेंगे ? और यही है वह जहाँ, हम हार्वे के विश्लेषण की गरी की झलक पाते हैं. वे तर्क देते हैं की बीतें दिनों वित्तीय संकटों में हुए प्रवर्धनों को उत्साहित करने के लिए जो चीज थी, वह थी, पूंजीवाद की तीन प्रतिशत की मिश्रित दर से वृद्धि की प्रतिबद्धता. बीते समय में, सीमित विश्व में जिसमें इतनी अधिक अविकसित मंडियां हों , अमेरिका और ब्रिटेन के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना संभव था. लेकिन अब जबकि चीन और भारत भी उसी दर या उससे भी अधिक दर से विकसित हो रहे हैं, पूंजीवादी उद्यमों के लिए अपने बेशी-मुनाफों का निवेश करने का क्षेत्र सिकुड़ रहा है. वर्तमान समय में, £1.5 ट्रिलियन नए निवेश की खोज में पड़े हैं. २० वर्षों के समय में, वे £ 3 ट्रिलियन हो जायेंगे. इसलिए उसका अनुसन्धान हुआ, जिसे हार्वे ‘फ़र्ज़ी मंडियां’ : व्युत्पादन (derivatives ) की मंडियां, भविष्य में व्युत्पादन के व्युत्पादन और कार्बन  ट्रेडिंग कहना पसंद करते हैं. शुरू में, ये इनमें निवेश करनेवालों को, उद्योग में निवेश की तुलना में अधिक प्रतिलाभ देने का वायदा करते है लेकिन वे, जैसाकि हमने अपने दम पर देखा है, अंतिम रूप में, भ्रम साबित होते हैं .

जैसे-जैसे [RSA ] के श्रोताओं की ध्यान-मुद्रा साफ़ होती जाती है, इस दलील से प्रभावित न होना मुश्किल लगता है और विशेषरूप से तब, जब इसे, पिछले बारह महीनों के दौरान अन्य अर्थशास्त्रियों की टूटी-फूटी टिप्पणियों के कोंट्रासट में रखते हैं. परन्तु मैं अपनी उस वक्त की बेचैनी को दबा नहीं सका जब हार्वे  मौजूदा स्थिति पर रेडिकल हल पेश करने की और बढ़ रहे थे, जहाँ ऐसा लगता था कि यह ताज़ा पूंजीवादी संकट इसके कफ़न के लिए अंतिम कील साबित होगा. मैं इसलिए चौकस था कि इस तरह की भविष्यवाणियाँ पहले भी कई बार हुई थीं. पूंजीवाद, हमें बहुत से सिद्धान्तकारों द्वारा बताया गया था , 1973 के तेल संकट,या IMF के 1976 के संकट , या 1987 के काले सोमवार के साथ या 1992 के काले बुधवार के साथ, अपने चरम बिंदु पर पहुँच गया था. परन्तु भविष्यवाणियाँ फेल साबित हुईं. बार-बार पूंजीवाद, जीवित रहने में, सफल रहा. इसलिए क्या मौजूदा स्थिति में कुछ ऐसा है जो वास्तव में अलग हो ?

ऐसी कोई बात नहीं है जिसने मुझे परेशान किया हो. हार्वे इतनी तैयारी में हैं कि वे पूंजीवाद द्वारा संकटों पर काबू पाने और कुशलतापूर्वक मुनाफा कमाने के नए रास्तों की खोज को तस्लीम नहीं कर पाते. बीते समय में, इसने अपने इस मकसद को हासिल करने के लिए कई अतार्किक तरीके खोजे थे. और इसने ऐसा ही किया, जैसे हार्वे अपनी पुस्तक ‘पूंजीवाद की पहेली’  [ The Enigma of Capital ] में इसके द्वारा युद्ध के रास्ते से, परिसम्पत्तियों के अवमूल्यन से, उत्पादक क्षमता के अपकर्ष से, अपसर्जन और अन्य सृजनात्मकता की तबाही द्वारा, अपनी समस्याओं का हल करता रहा है. इन सभी समाधानों से चौंकानेवाले परिणाम निकले हैं. मानव जीवन अस्त-व्यस्त और जहाँ तक कि तबाह हो जाता है, सारा कैरियर और जीवनभर की उपलब्धियां खतरे में पड़ जाती हैं, गहरे पैठ कर चुके विश्वास को चुनौती मिलती है, रूह घायल हो जाती है और मानव के गौरव का परित्याग कर दिया जाता है. सृजनात्मक तबाही शानदार, सुन्दर, बुरे और अच्छे – सभी पर भारी पड़ती है. संकट, हम निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं, ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’ है.

परन्तु निसंदेह, उनकी जिज्ञासा यह दिखाने की है, कि वर्तमान संकट पिछले सभी संकटों, जिनपर काबू पा लिया गया था, की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है और उनकी जिज्ञासा यह सुझाव देने की होती है कि प्रत्येक समझदार व्यक्ति के पास ‘पूंजीवाद विरोधी अभियान’ में शामिल होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है, लेकिन फिर भी, वे भविष्यवेत्ता बनने से बहुत दूर हैं.

क्या पूंजीवाद वर्तमान सदमे से बच निकलेगा ? हाँ, बेशक. लेकिन हार्वे विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि इसकी भारी कीमत चुकानी होगी. लोगों की अधिकतर आबादी को अपनी मेहनत के फल को उन्हें देना होगा, जो सत्ता में हैं, अपने बहुत से अधिकारों और अपने साधनों की सख्त मुशक्त से हासिल की गयी कीमत ( आवास से लेकर पेंशन फंड, हर वस्तु) का त्याग करना होगा और प्रचुर मात्रा में, परिवेशी अपकर्ष का दर्द झेलना होगा. केवल इतना ही नहीं कि अपने जीवन स्तर में कटौती बल्कि इसका अर्थ होगा बहुत से गरीब लोग, जो पहले ही जीवित रहने का संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए भूखमरी. थोड़े से राजनीतिक दमन से कहीं अधिक, आनेवाली अशांति का गला घोंटने के लिए, पुलिस हिंसा और मिलट्री राज्य नियंत्रण की आवश्यकता पड़ेगी. जिस वक्त,  हार्वे यह सब कह रहे थे, ठीक उसी वक्त, एथेन की गल्लियों में लड़ाई बढ़नी शुरू हो गयी थी.

यद्यपि, इस सब का मतलब निराश होने से नहीं है. संकंट विरोधाभास और संभावनाओं के वे क्षण होते हैं, जिनसे विकल्प के तरीके, समाजवादी और पूंजीवाद विरोधी, सभी जन्म लेते हैं.

अगली अंतिम किश्त में समाप्य

पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

Posted on Updated on

इससे पहले, लिंक जोड़ने के लिए देखें : वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पोंजी स्कीम जैसी है ?

विश्व आर्थिक मंदी ने एक बार फिर सारी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को मार्क्स की ओर मुड़ने के लिए मजबूर कर दिया है.  ‘द्वंदात्मक भौतिकवादी’ भूगोलवेत्ता ‘डेविड  हार्वे’ जो चालीस वर्षों से मार्क्स की पूंजी पढ़ा रहें हैं और जिन्हें पहली बार गंभीरता से लिया जा रहा है, से ‘लॉरी टेलर’ की मुलाकात पर आधारित यह आलेख ‘http://newhumanist.org.uk’ से लिया गया है.

डेविड हार्वे तुरंत अपनी तरंग में आ जाते हैं. “पूंजीवाद” वे रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स ,  लन्दन के हाल में अपने श्रोताओं से कहते हैं, “कभी भी अपने संकटों का समाधान नहीं करता. यह उन्हें केवल एक स्थान से दूसरी स्थान पर ले जाता है. ब्राज़ील से रूस, से अर्जन्टीना, से अमेरिका, से ब्रिटेन, से यूनान”.

जैसे ही वे इन बार-बार आनेवाले संकटों,  और विशेषरूप से, 1970 के बाद से उनकी बारंबारता में नाटकीय बढौतरी के कारकों का विश्लेषण करना शुरू करते हैं, मैं अपनी नज़र, श्रोताओं पर डालता हूँ. मैं अपनी चैयरमेन की सीट से देख सकता हूँ कि व्याख्यान सभागार खचाखच भरा हुआ है. कोई भी कुर्सी खाली नहीं है और लगभग दर्जन एक श्रोता गलियारे में खड़े हुए हैं. रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स [RSA]   के लंच-समय के व्याख्यानों में, अक्सर, अच्छी हाजिरी होती है लेकिन क्या कमरे में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति ने इस बात को तस्लीम कर लिया था कि जो कुछ वे आज इस वक्ता से सुनने जा रहे हैं, वह आज के पूंजीवाद का विश्लेषण है जो मार्क्स से शुरू होकर मार्क्स पर ख़त्म होता है, ऐसा विश्लेषण जोकि कई प्रकार से वैसा ही है, जैसा मैंने ७० और ८० के दशक में सैंकड़ों नीरस सभाओं में कट्टर समाजवादियों से सुना था.

कोई कारण नहीं था कि मैं फिक्रमंद होता. इस पर भी कि हार्वे ने तुरंत मार्क्स के प्रति अपना कर्ज तस्लीम किया और बार-बार वे मार्क्स को उद्घृत करते रहे. फिर भी, तीस मिनट के व्याख्यान में, किसी भी क्षण,  उनके अमीर श्रोताओं में बेचैनी  का कोई चिह्न नहीं था और समापन पर, प्रश्नौतर काल में, केवल एक श्रोता का सुझाव था कि मार्क्स को छोड़कर कुछ भी, हमारे मौजूदा आर्थिक संकट को समझने के लिए, सबसे बढ़िया हो सकता है.

निसंदेह, उस आर्थिक सिद्धांत को, जिसे सोवियत यूनियन के ढह-ढेरी हो जाने पर, भले ही अतार्किक रूप से ही सही, इतिहास में जगह दे दी गयी थी, स्वीकार करने की चाहत के पीछे एक बढ़िया कारण था. बिलकुल सीधी सी बात है कि विश्वभर के अर्थशास्त्रियों की,  इतिहास में अभी-अभी  घटित हुई घटनाओं पर एक भी संतोषजनक व्याख्या देने की पूर्ण असक्षमता. इसी तथ्य को श्रोताओं के सामने सही और साफ-साफ तरीके से प्रस्तुत करने में, हार्वे पूरी तरह से माहिर हैं.

अपनी ताज़ा पुस्तक, ‘पूंजी की पहेली और पूंजीवाद के संकट’ की प्रस्तावना में, वे यह कहानी सुनाते हैं, ” जब प्रतापी महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने नवंबर 2008 में, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के अर्थशास्त्रियों से यह पूछा कि क्यों नहीं वे मौजूदा आर्थिक संकट की आमद को देख पाए ( एक ऐसा सवाल जोकि निसंदेह प्रत्येक व्यक्ति की जबान पर था, लेकिन जिसे कोई सामन्ती शासक ही, इस तरह, हलके अंदाज में पूछ सकता था और उत्तर की अपेक्षा पाल सकता था ) तो अर्थशास्त्रियों के पास, देने के लिए, कोई जवाब तैयार नहीं था. छह महीने के मुख्य नीति निर्धारकों के साथ मिलकर किये गए अध्ययन, जुगाली और गहन विचार-विमर्श  के बाद, ब्रिटिश अकादमी के गलियारे में एकत्रित हुए सभी अर्थशास्त्रियों ने, एक साझे पत्र में, प्रतापी महारानी के सामने स्वीकार किया कि वे ,किसी हद तक, उस दृष्टि को खो चुके हैं जिसे वे ‘प्रणालीबद्ध जोखिम’ के नाम से जाना करते थे.

हार्वे, इस एपिसोड की स्विफटियन विडंबना का रस्सावदान करते हुए कहते हैं, “शिक्षित अर्थशास्त्रियों की अपनी असफलता पर बहानेबाजी करने की नाकाम कोशिश का यह दृश्य है, उस वक्त, जब वे बुरी तरह से डरे हुए सचेत हैं कि उनमें से किसी ने भी कपडे नहीं पहने हुए हैं. परन्तु यह सब उनको (हार्वे को) मार्क्स को जगाने का पूर्ण तरीका मुहैया करवाता है. किंकर्तव्यविमूढ़, वे अर्थशास्त्री, उन छः महीनों के लंबे अन्तराल के बाद, अंत में, यह पहचान गए थे कि उनकी असफलता का वास्तविक रहस्य क्या था.  जर्नलिस्टों और टिपण्णीकर्त्ताओं द्वारा पेश किये गये अधपक्के सिद्धांतों को भूल जाईये.  ताज़ा संकट, हार्वे अपने [RSA] के भावविभोर श्रोताओं से कहते हैं, किसी मानवीय कमजोरी या अप्रयाप्त वित्तीय बन्दोबस्त या किन्सियाई दृष्टि को त्यागने से या अंग्रेजों या अमेरिकियों या यूनानियों की विलक्षण सांस्कृतिक असफलताओं के कारण सिर के बल खड़ा नहीं हुआ है. यह पूंजीवाद की प्रणालीबद्ध असफलता है.  और इस प्रकार की असफलता पर विश्वसनीय लगने वाली केवल एक ही व्याख्या है, जिसे बूढ़े भले मार्क्स में खोजा जा सकता है.

[RSA] द्वारा तैयार की गयी इस कार्टून फिल्म की पार्श्व-ध्वनी, स्वयं हार्वे के उपरोक्त व्याख्यान का ही ऑडियो है.

शेष अगली किश्त [पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’] में

अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस पर विशेष

Posted on Updated on

विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति का प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की दिशा

कात्यायनी

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर
3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में
4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा
5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन
6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन
7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति
8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर
9. और अंत में…

आज एक कठिन समय में हम यहाँ पर नारी मुक्ति आन्दोलन की कुछ बुनियादी समस्याओं पर बातचीत के लिए इकट्ठा हुए हैं । सामायिक तौर पर यह पराजय, विपर्यय, पुनरुत्थान, फासिज़्म की शक्तियों के विश्वव्यापी उभार और क्रांति की शक्तियों के पीछे हटने का दौर है । कुछ समय के लिए, आज एक बार फिर क्रांति की लहर पर प्रतिक्रांति की लहर विश्व स्तर पर हावी है ।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी ऐसे कठिन दौर आते हैं तो अँधेरे की ताकतें मेहनतकश आम जनता के साथ ही औरतों की आधी आबादी पर भी अपनी पूरी ताकत के साथ हमला बोल देती है और न केवल उनकी मुक्ति की लड़ाई को कुचल देना चाहती है बल्कि अतीत के अनगिनत लंबे संघर्षों से अर्जित उनकी आजादी और जनवादी अधिकारों को भी छीन लेने पर उतारू हो जाती हैं । आज भी ऐसा ही हो रहा है । हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो विश्व सर्वहारा क्रांति के एक नये चक्र की शुरुआत का समय है, अक्टूबर क्रांति के नये संस्करण के निर्माण का समय है । साथ ही, यह नारी मुक्ति आन्दोलन के लिए भी एक नई शुरुआत का समय है, क्योंकि इतिहास ने यह अंतिम तौर पर सिद्ध कर दिया है कि एक पूंजीवादी विश्व में नारी मुक्ति का प्रश्न अंतिम तौर पर हल नहीं हो सकता और यह भी कि इस आधी आबादी की मुक्ति की लड़ाई के बिना शोषण-उत्पीडन से मेहनतकश जनता की मुक्ति की लड़ाई भी विजयी नहीं हो सकती ।

आज अपने प्रयासों को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया में, विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति के प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा पर विचार करते हुए हमें सर्वोपरी तौर पर उन विचारधारात्मक-सैद्धांतिक हमलों का जवाब देना होगा जो नारी मुक्ति विषयक तरह-तरह के बुर्जुआ सिद्धांतों के रूप में हमारे ऊपर किये जा रहे हैं । जीवन और संघर्ष के अन्य मोर्चों की ही तरह आज नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी जनवाद के नाम पर मुक्त बाजार का पश्चिमी उपभोक्तावादी दर्शन तरह-तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है और एक बार फिर, नये-नये रूपों में, जोर-शोर से बीमार बुर्जुआ संस्कृति, व्यक्तिवाद, पुरुष-विरोधी नारीवाद, अराजकतावाद, यौन-स्वच्छंदतावाद की तरह-तरह की खिचड़ी परोसी जा रही है । फ़्रांसिसी फुकोयामा के “इतिहास के अंत” और पश्चिम में जन्मे “विचारधारा के अंत” के नारे की तर्ज पर नारी आन्दोलन को भी विचारधारा से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं क्योंकि बकौल इन मुक्त चिंतकों के, “विचारधारा ने नारी की आजादी की लड़ाई को कोई योगदान नहीं दिया ।” ऐसे लोगों के उत्तर में बस बर्तोल्त ब्रेखत का एक बयान उद्धृत किया जा सकता है, जो उन्होंने २६ जुलाई, १९३८ को वाल्टर बेंजामिन से बातचीत के दौरान दिया था, “विचारधारा के विरुद्ध संघर्ष खुद में एक नई विचारधारा बन जाता है ।” वास्तव में इन तमाम मुक्त चिंतनधाराओं का सारतत्व यह है कि व्यवस्था-परिवर्तन की बुनियादी लड़ाई से नारी मुक्ति संघर्ष को अलग करके वर्तमान सामाजिक-आर्थिक दायरे के भीतर सीमित कर दिया जाये । इनका एकमात्र उद्देश्य स्त्रियों को यह समझाना है कि उनकी आजादी के प्रश्न का सामाजिक क्रांति के प्रश्न से कुछ भी लेना-देना नहीं है और यह एक स्वायत्त-स्वतंत्र प्रश्न है । आज न केवल अलग-अलग किस्म की बुर्जुआ सुधारवादी चिंतनधाराएं, बल्कि सत्तर के दशक के यूरोकम्युनिज़्म से लेकर अस्सी के दशक में उभरी भांति-भांति की पश्चिमी नववामपंथी धाराएं तथा गोर्बचोवी लहर और देंगपंथी नकली कम्युनिज़्म  से प्रभावित धाराएं भी या तो स्त्रियों की मुक्ति के आन्दोलन को कुछ सामाजिक-आर्थिक मांगों, पर्यावरण या स्वास्थ्य के मुद्दों तक ही सीमित करके और उसे नारी मुक्ति के बुनियादी मुद्दे, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संघर्ष के दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य से काटकर सुधारवाद और अर्थवाद के दलदल में धंसा देना चाहती हैं या फिर केवल बाल की खाल निकालने जैसी कुछ अकादमिक बहसों और बौद्धिक कवायद तक मह्दूद कर देना चाहती हैं ।

आज नारी मुक्ति संघर्ष को एक क्रांतिकारी दिशा देने और एक नई शुरुआत करने के लिए यह जरूरी है कि इम  अपने आन्दोलन में मौजूद इन सभी विजातीय प्रवृत्तियों और रुझानों को लंबे वाद-विवाद में परास्त करें, उनके प्रभाव को निर्मूल करें और एक सही, ठोस लाइन और कार्यक्रम के इर्द-गिर्द अलग-अलग देशों में मेहनतकश स्त्रियों और मध्यवर्गीय स्त्रियों को गोलबंद एवं संगठित करें तथा साथ ही, उन्हें जनता के सभी वर्गों के क्रांतिकारी संघर्षों के साथ जोड़ें । तीसरी दुनिया के देश आज भी साम्राज्यवाद की कमजोर कड़ी हैं, जहाँ सामाजिक क्रांतियों के विस्फोटक की वस्तुगत परिस्थितियाँ सर्वाधिक परिपक्व हैं । ऐसे देशों में क्रांतिकारी नारी मुक्ति के आन्दोलन के हिरावल दस्तों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा है क्योंकि आधी आबादी की भागीदारी के बिना न तो कोई सर्वहारा क्रांति सफल हो सकती है और न सर्वहारा क्रांति के बिना आधी आबादी की वास्तविक मुक्ति की शुरुआत हो सकती है । ऐसे समय में, नेपाल में नारी मुक्ति आन्दोलन से संबंधित विषय पर संगोष्टी का आयोजन बहुत ख़ुशी की बात है, जहाँ क्रांति की शक्तियां आज तरह-तरह के अवसरवादी-दक्षिणपंथी भटकावों से संघर्ष करते हुए जनता के विभिन्न वर्गों को संगठित कर रही हैं । हम नेपाल में इस संगोष्टी के आयोजक कामरेडों का क्रांतिकारी अभिनंदन करते हैं ।

अपने इस निबन्ध में हमारा मन्तव्य नारी मुक्ति संघर्ष की विश्व-ऐतिहासिक यात्रा का एक संक्षिप्त सिंहावलोकन प्रस्तुत करते हुए उसके सामने आज उपस्थित कार्यभारों और चुनौतियों को रेखांकित करना है । हर नई शुरुआत के समय इतिहास का पुनरवालोकन जरूरी होता है । द्वंदात्मक भौतिकवादी जीवन-दृष्टि हमें यही बताती है कि इतिहास के मुल्यांकन-पुनर्मुल्यांकन का मूल अर्थ केवल भविष्य के लिए नये कार्यभारों का निर्धारण ही होता है ।

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

अब तक वर्ग-अंतरविरोधों से युक्त जितने भी समाजों का इतिहास हमें ज्ञात है, स्त्रियाँ उन सभी में परिवार और समाज – दोनों में पुरुषों के मातहत ही रही हैं । पूरे सामाजिक ढाँचे में सर्वाधिक शोषित-उत्पीड़ित तबकों में ही उनका स्थान रहा है । जब वर्ग समाज का प्रादुर्भाव हो रहा था और निजी स्वामित्व के तत्व और मानसिकता पैदा हो रही थी उसी समय पितृसत्तात्मक व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थी, और स्वाभाविक तौर पर, उसके प्रतिरोध की स्त्री-चेतना भी उत्पन्न हो चुकी थी जिसके साक्ष्य हमें अलग-अलग संस्कृतियों की पुराणकथाओं  और लोकगाथाओं में आज भी देखने को मिल जाते हैं ।
पर इतिहास के पूरे प्राकपूंजीवादी काल में उत्पीड़न के विरुद्ध विद्रोह की नारी चेतना अपने समय के विस्मरण के बाद नारी समुदाय ने अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्षों एवं क्रांतियों में भूदास या दास जैसे वर्गों के सदस्य के रूप में शिरकत तो की लेकिन पुरुषों के मुकाबले अपनी हीनतर सामाजिक-पारिवारिक स्थिति के विरुद्ध या अपनी स्वतंत्र अस्मिता एवं सामाजिक स्थिति के लिए उसने पूंजीवाद के आविर्भाव के पूर्व संघर्ष नहीं किया, क्योंकि तब इसका वस्तुगत आधार ही समाज में मौजूद नहीं था । समाज और परिवार में स्त्रियों की भूमिका, मातृत्व, शिशुपालन आदि स्थितियों के नाते वर्ग समाज में पैदा होनेवाली उनकी मजबूरियां, घरेलू श्रम की गुलामी, समाज में निकृष्टतम  कोटि के उजरती मजदूर की स्थिति, यौन असमानता, यौन शोषण, यौन उत्पीडन – इन सबके कुल योग के रूप में नारी प्रश्न (Women Question ) को विश्व इतिहास के पूंजीवादी युग में ही सुसंगत रूप में देखा गया और नारी मुक्ति की एक नई अवधारणा विकसित हुई, जिसका संबंध पुनर्जागरण काल के मानववाद और प्रबोधन के युग की तर्कपरकता एवं जनवाद की अवधारणा तथा बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों से था ।

सामंतवाद के युग तक स्त्रियों को सम्पत्ति के अधिकार सहित कोई भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं था और उनकी इस सामाजिक-पारिवारिक मातहती की स्थिति को धर्म, कानून और सामाजिक विधानों की स्वीकृति प्राप्त थी । सामन्तवाद के गर्भ में जब पूंजीवाद का भ्रूण विकसित हो रहा था, उसी समय से सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी शुरू होकर बढती चली गई । यही वह भौतिक आधार था, जिसने पहली बार स्त्रियों के भीतर सामाजिक अधिकारों की चेतना को जन्म दिया ।

पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के अंतर्गत सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी और साथ ही उनके अधिकारों के अभाव के जारी रहने की स्थिति के नाते शुरू से ही बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के प्रति परस्पर विरोधी रुख और दृष्टिकोण अलग-अलग रूपों में मौजूद रहे । पुनर्जागरण काल में एक ओर जहाँ प्राचीन ग्रीक और रोमन परिवारों के मॉडल और रोमन कानूनों के नमूनों के अनुकरण ने स्त्रियों की गुलामी को तात्कालिक तौर पर पुख्ता बनाया, वहीं पुनर्जागरण काल के महामानवों द्वारा प्रवर्तित मानववाद के क्रांतिकारी दर्शन ने धर्मकेन्द्रित (Theocentric ) समाज की जगह मानवकेन्द्रित (Anthropocentric ) समाज के मूल्यों का प्रतिपादन करके, सामाजिक व्यवस्था की तमाम दैवी स्वीकृतियों पर प्रश्नचिह्न उठाकर और लौकिकता के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित करके, प्रकारांतर से स्त्रियों की गुलामी की धार्मिक-अलौकिक स्वीकृति और सामंती समाज-व्यवस्था के विधानों की मानवेतर स्वीकृति को भी ध्वस्त करने का काम किया । तात्कालिक तौर पर सोहलवीं शताब्दी में धर्मसुधार काल के दौरान प्यूरिटनिज्म और काल्विनिज्म के प्रभाव में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति भले ही बहुत बदतर दिखाई दे रही हो, पर एक ओर दर्शन के स्तर पर मानववाद की विचारधारा और दूसरी ओर सामाजिक उत्पादन में लगातार बढती स्त्रियों की भागीदारी उनकी मुक्ति की चेतना को लगातार विकसित कर रही थी, जिसकी पहली मुखर अभिव्यक्ति बुर्जुआ क्रांतियों की पूर्वबेला में, प्रबोधन काल के दौरान सामने आई ।

स्त्रियों ने सबसे पहले समानता की मांग बुर्जुआ व्यवस्था के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया के शुरुआती काल में ही उठाई । अमेरिकी क्रांति (१७७५-१७८३) के दौरान मर्सी वारेन और एबिगेल एडम्स के नेतृत्व में स्त्रियों ने मताधिकार और सम्पत्ति के अधिकार सहित सामाजिक समानता की मांग करते हुए जार्ज वाशिंगटन और टॉमस जैफर्सन पर स्त्रियों की आबादी के मसले को संविधान में शामिल करने के लिए दबाव डाला, पर बुर्जुआ वर्ग के एक बड़े हिस्से के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका । प्रबोधन काल के दार्शनिकों के क्रांतिकारी भौतिकवादी दर्शन, वैज्ञानिक तर्कपरकता तथा सामाजिक न्याय और स्वतन्त्रता-समानता-भ्रातृत्व के रूप में जनवाद की अवधारणाओं ने सामाजिक उत्पादन के साथ ही सामंती स्वेच्छाचारिता-विरोधी राजनीतिक संघर्ष में भी सीधे भागीदारी कर रही स्त्रियों की आबादी को गहराई से प्रभावित किया । प्रबोधन काल के क्रांतिकारी दार्शनिकों ने पहली बार यह विचार प्रस्तुत किया कि स्त्रियों की उत्पीड़ित स्थिति मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों का हनन है । फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान फ़्रांसिसी बुर्जुआ विचारधारा का एक अग्रणी प्रवक्ता ए. कोंदोर्से (A .Condorcet ) स्त्रियों की समानता का प्रबल पक्षधर था । उसका मानना था कि स्त्रियों के बारे में समाज में मौजूद गहरे पूर्वाग्रह उनकी असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति की जड़ हैं । अपने समय के अन्य बुर्जुआ विचारकों की तरह कोंदोर्से भी स्त्री-प्रश्न के वर्गीय एवं आर्थिक आधारों को देख न सका । उसका यह विश्वास था कि कानूनी समानता और शिक्षा के जरिए स्त्रियों की मुक्ति संभव है । आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में भी, पश्चिम के कई बुर्जुआ विचारकों ने ऐसे ही विचार प्रस्तुत किये । ब्रिटिश दार्शनिक, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री जेम्स स्टुअर्ट मिल ने भी अपनी पुस्तक “ऑन द सब्जेक्शन ऑफ वुमन” (१८६९) में इन्हीं विचारों का प्रतिपादन किया ।

संगठित नारी आन्दोलन की शुरुआत सर्वप्रथम महान फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान हुई । उस समय स्त्रियाँ भी जन-प्रदर्शनों सहित सभी राजनीतिक कार्रवाइयों में हिस्सा ले रही थीं । समानता के लिए स्त्रियों के संघर्ष के लक्ष्य को समर्पित पहली पत्रिका का प्रकाशन क्रांति के दौरान फ़्रांस में ही शुरू हुआ वहीं क्रांतिकारी नारी क्लबों (Women’s Revolutionary Club) के रूप में स्त्रियों के पहले संगठन अस्तित्व में आये जिन्होंने सभी पक्षधर राजनीतिक संघर्षों में खुलकर भागीदारी करते हुए यह मांग की कि आजादी, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत बिना किसी लिंगभेद के लागू किये जाने चाहिए । ओलिम्प द गाउजेस (Olympe de Gouges, 1748-93) ने “मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा” (Declaration of the Rights of the Man and the Citizen) के मॉडल पर “स्त्रियों और स्त्री नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” तैयार की और उसे १७९१ में राष्ट्रीय असेम्बली के समक्ष प्रस्तुत किया । इस घोषणा पत्र में “स्त्रियों पर पुरुषों के शासन” का विरोध किया गया था और सार्विक मताधिकारों के व्यवहार के लिए स्त्री-पुरुषों के बीच पूर्ण सामाजिक-राजनीतिक समानता की मांग की गई थी । यद्यपि फ़्रांसिसी क्रांति के अधिकांश नेताओं ने स्त्रियों की समानता के विचार को ख़ारिज कर दिया और १७९३ के अंत में सभी नारी क्लबों को बंद कर दिया गया, लेकिन फिर भी इस युगांतरकारी क्रांति ने सामंती संबंधों पर निर्णायक मारक प्रहार करने के साथ ही कई कानूनों के द्वारा और नये सामाजिक मूल्यों के द्वारा औरतों की कानूनी स्थिति में भारी परिवर्तन किया । १७९१ में एक कानून बनाकर स्त्रियों की शिक्षा का प्रावधान किया गया, २० सितंबर १७९२ की आज्ञाप्ति द्वारा उन्हें कई नागरिक अधिकार प्रदान किये गये और अप्रैल १७९४ में कन्वेंशन द्वारा पारित एक कानून ने उनके लिए तलाक लेना आसान बना दिया । लेकिन थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया के काल में नारी मुक्ति संघर्ष की ये उपलब्धियां एक बार फिर, मूलत: छीन गयी । नेपोलियोनिक कोड (१८०४) और अन्य यूरोपीय देशों की ऐसी ही बुर्जुआ नागरिक संहिताओं ने एक बार फिर स्त्रियों के नागरिक अधिकारों को अतिसीमित कर दिया और परिवार, शादी, तलाक, अभिभावकत्व और संपत्ति के अधिकार सहित सभी मामलों में उन्हें कानूनी तौर पर एक बार फिर पूरी तरह पुरुषों के मातहत बना दिया ।

बुर्जुआ क्रांतियों के काल में नारी आन्दोलन का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मेरी वोल्सटोन क्राफ्ट की पुस्तक “स्त्री के अधिकारों का औचित्य-प्रतिपादन” ( A Vindication of the Rights of Women) थी, जो कुल मिलाकर ओलिम्प द गाउजेस के दस्तावेज के प्रतिपादनों को ही उन्नत एवं विस्तृत रूप में प्रस्तुत करती थी । उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के नारीवादी आन्दोलन (Feminist Movement ) की बुनियादी रुपरेखा सर्वप्रथम इसी पुस्तक में दिखाई देती है ।

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर

फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों का सार-संकलन करते हुए कहा जा सकता है कि जब सामन्तवाद के विरुद्ध बुर्जुआ वर्ग के साथ ही पूरी जनता इनमें शिरकत कर रही थी, तब स्वतन्त्रता, समानता और जनवाद के विचारों का प्रतिपादन अधिक क्रांतिकारी रूप में किया जा रहा था, पर बुर्जुआ सत्ता की स्थापना और सुदृढीकरण कें नये शासक वर्ग ने जिस प्रकार मेहनतकशों को, ठीक उसी प्रकार स्त्रियों को भी उसी हद तक आजादी और नागरिक अधिकार दिए, जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली और उत्पादन एवं विनिमय के संबंधों के लिए जरूरी था । इससे थोड़ी भी अधिक आजादी यदि स्त्रियों को मिल सकी, तो उसका एकमात्र कारण नारी समुदाय की नई चेतना और उसके संघर्षों का दबाव एवं भय था । पूंजीवाद ने सामन्ती मध्ययुगीन स्वेच्छाचारिता, घरेलू गुलामी, व्यक्तित्वहीनता, अनागरिकता और विलासिता एवं उपभोग की सामग्री होने की स्थिति से नारी समुदाय को बाहर तो निकला, पर पूरी तरह से नहीं । सत्ता में आने के साथ ही उसने जब चर्च के साथ “पवित्र गठबंधन” कर लिया तो स्त्रियों की गुलामी के सामंती मूल्यों के कुछ तत्वों को उसने फिर से अपना लिया । उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान स्त्रियाँ शिक्षा, नौकरी, सम्पत्ति के अधिकार मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं और उन्हें काफी हद तक अर्जित भी किया, लेकिन उनकी नागरिकता दोयम दर्जे की ही थी और पूंजीवादी उत्पादन तन्त्र में वे निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलामों (Wage Slaves ) में तब्दील कर दी गयी । फिर भी बुर्जुआ क्रांतियाँ ऐतिहासिक तौर पर नारी मुक्ति संघर्ष को एक कदम आगे ले आई, उन्हें सामंती समाज के निरंकुश दमन से एक हद तक छुटकारा दिलाया, सामाजिक उत्पादन में उनकी भागीदारी की स्थितियां पैदा की और उनके भीतर अपने जनवादी अधिकारों, स्वतंत्र अस्मिता और स्वतंत्र पहचान के लिए लड़ने की, सामाजिक-राजनीतिक क्रियाकलापों और संघर्षों में हिस्सा लेने की और एक नई जमीन पर खड़े होकर यौन-असमानता एवं यौन-उत्पीडन का विरोध करने की चेतना पैदा की ।

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यूरोप और अमेरिका के बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के अधिकारों की वास्तविक और वैधिक अनुपस्थिति की जो स्थिति बनी, उसे कई बुर्जुआ लेखकों-विचारकों से सैद्धांतिक समर्थन प्राप्त हुआ । बुर्जुआ साहित्य में बड़े पैमाने पर प्रस्तुत और आज भी पूरी दुनिया में व्यापक स्तर पर मान्यताप्राप्त तथाकथित जीवशास्त्रीय सिद्धांत के प्रारंभिक पैरोकारों में फ़्रांसिसी दार्शनिक ओगुस्त कोंत (A . Konte ) अग्रणी था जिसके अनुसार नारी समुदाय की असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति का मूल कारण “नारी की प्राकृतिक दुर्बलता” में निहित है, स्त्रियाँ स्वाभाविक एवं प्राकृतिक तौर पर पारिवारिक जिम्मेदारियों, प्रजनन, शिशुपालन आदि के लिए ही बनी होती हैं और कभी भी वे सामाजिक तौर पर पुरुषों के समकक्ष नहीं हो सकतीं । स्त्री-पुरुष असमानता का यह जीवशास्त्रीय सिद्धांत उन्नीसवीं शताब्दी के बुर्जुआ समाज का सर्वाधिक प्रभावशाली बुर्जुआ पुरुष-स्वामित्ववादी सिद्धांत था जिसका प्रभाव आज भी बड़े पैमाने पर मौजूद है । ब्रिटेन के विक्टोरियन सामाजिक मूल्यों पर भी इन विचारों का जबर्दस्त प्रभाव मौजूद था । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जर्मनी में प्रचलित पेटी-बुर्जुआ “थियरी ऑफ द थ्री केज” (German–Kirche, Kuche, Kinder-Church, Kitchen, Children) भी सारत: कोंत के विचारों का ही विस्तार था जिसके अनुसार, स्त्रियों की रूचि और सक्रियता का दायरा केवल चर्च, रसोई और बच्चों तक ही सीमित होना चाहिए । आगे चलकर फासिस्टों और नात्सियों ने इसी सिद्धांत के परिष्कृत रूप को इटली एवं जर्मनी में अपनाया और लागू किया । आज भी बुर्जुआ प्रतिक्रियावादी नवनात्सी तत्व और धार्मिक पुनरुत्थानवादी इस तरह के तर्क देते रहते हैं । गोर्बचोवी संशोधनवादियों ने भी स्त्रियों की सामाजिक भूमिका में कटौती करते हुए उनकी प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक बनावट का तर्क दिया और देंगपंथी संशोधनवादी भी आज घुमा-फिराकर ऐसे तर्क देते रहते हैं ।

एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जैसे-जैसे बुर्जुआ वर्ग अपनी सत्ता का सुदृढीकरण करता गया, नारी आन्दोलन के बुर्जुआ चरित्र, फ्रेमवर्क और नेतृत्व की सीमाएं ज्यादा से ज्यादा साफ़ होती चली गई । मताधिकार, सम्पत्ति के अधिकार और यौन आधार पर बरती जाने वाली हर प्रकार की असमानता के विरुद्ध जनवादी अधिकारों के व्यापक दायरे में क्रांतिकारी संघर्ष चलाने और उसे सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष से जोड़ने के बजाय, उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, बुर्जुआ नारी आन्दोलन के नेतृत्व ने फ़्रांसिसी क्रांति काल की परम्परा को छोड़ते हुए अपना उद्देश्य केवल बुर्जुआ समाज के फ्रेमवर्क के भीतर, अपने ही वर्ग के पुरुषों से स्त्रियों की समानता तक सीमित कर दिया और स्त्री-प्रश्न की अवधारणा को संकीर्ण करके संघर्ष को सुधारों के दायरे में कैद कर दिया । उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में उपरोक्त मांग के पूरक के तौर पर सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियों के काम करने के अधिकार की मांग उठाई गई ।

लेकिन नारी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा उस समय भी पूरी तरह से निष्प्राण नहीं हो गयी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के चौथे-पांचवें दशक में फ़्रांस में बड़े पैमाने पर ऐसा क्रांतिकारी यथार्थवादी साहित्य उत्पादित हुआ जिसमें स्त्रियों की पारिवारिक गुलामी और सामाजिक असमानता की आलोचना की गयी थी । इसमें जी. सांद (G. Sand) के उपन्यासों की अग्रणी भूमिका थी । इसी समय अमेरिका और ब्रिटेन में संगठित रूप से नारी मताधिकार आन्दोलन की शुरुआत हुई जहाँ सामाजिक जीवन में स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने लगी थीं । १८३० के दशक में अमेरिका में काले लोगों की मुक्ति के संघर्ष में १०० से भी अधिक दासता-विरोधी “नारी सोसायटी” जैसे संगठन हिस्सा ले रहे थे और ब्रिटेन में चार्टिस्ट आन्दोलन में स्त्रियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं । वास्तव में, पूंजीवादी समाज के विकास के नियम और विज्ञान, तकनोलाजी एवं संस्कृति का विकास, उत्पादन और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ, खुद ही वस्तुगत तौर पर, स्त्रियों की मातहती के सिद्धांतों की आधारहीनता को ज्यादा से ज्यादा उजागर करते जा रहे थे । सर्वप्रथम, उस काल के क्रांतिकारी जनवादी सिद्धान्तकारों, विशेषकर सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिये और राबर्ट ओवेन जैसे सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि काल्पनिक समाजवादी विचारकों ने स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता के बुर्जुआ सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाते हुए नारी उत्पीडन और बुर्जुआ समाज की प्रकृति के बीच के अंतर्संबंधों को उजागर किया था । नारी मुक्ति के बुर्जुआ सिद्धान्तकारों के विपरीत इन दार्शनिकों ने पहलों बार स्त्रियों को समानता का दर्जा देने के समाज के पुनर्गठन की अपनी योजना का एक बुनियादी मुद्दा बनाया । चार्ल्स फूरिये ने पहली बार यह स्पष्ट बताया कि किसी भी समाज में आजादी का एक बुनियादी पैमाना यह है कि उस समाज विशेष में स्त्रियाँ किस हद तक आजाद हैं ।

उन्नीसवीं शताब्दी के रुसी क्रांतिकारी जनवादियों ने इसी विचार-सरणि  को आगे बढ़ते हुए सामाजिक जीवन के साथ ही क्रांतिकारी संघर्ष में भी स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया । नारी मुक्ति के सर्वाधिक प्रखर प्रवक्ता चेर्नीशेव्स्की ने अपने उपन्यास “क्या करें” ( What is to be done )  में एक ऐसा स्त्री-चरित्र प्रस्तुत किया जिसने संकीर्ण पारिवारिक दायरे से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र सामाजिक-आर्थिक स्थिति बनाई थी और जो सामाजिक सक्रियताओं में भी संलग्न थी । चेर्नीशेव्स्की का यह उपन्यास यूटोपिया के तत्वों के बावजूद युगीन परिप्रेक्ष्य में, नारी-मुक्ति के सन्दर्भ में भी क्रांतिकारी महत्व रखता है ।

3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में

यूरोप में १८४८-४९ की क्रांतियों तथा जून १८४८ में पेरिस में हुए प्रथम सर्वहारा विद्रोह सहित विभिन्न देशों में उठ खड़े हुए मजदूर आंदोलनों ने स्त्रियों के राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों के संघर्ष को एक नया संवेग प्रदान किया । १८४८ में फ़्रांस में फिर से नारी क्लबों का गठन हुआ जिन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों को समान अधिकार देने के लिए संघर्षों की नए सिरे से शुरुआत की. इसी वर्ष फ़्रांस में स्त्री कामगारों के पहले स्वतंत्र संगठन की स्थापना हुई । जर्मनी और आस्ट्रिया में भी राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के उद्देश्य से स्त्री यूनियन गठित हुए ।

एक व्यापक आधार पर, एक सुनिश्चित कार्यक्रम के साथ नारीवादी आन्दोलन की शुरुआत का प्रस्थान-बिंदु जुलाई, १८४८ को माना जाता है जब एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन, लुकेसिया कफिन मोट और कुछ अन्य ने सेनेका फाल्स, न्यूयार्क में पहली बार नारी अधिकार कांग्रेस आयोजित करके नारी स्वतन्त्रता का एक घोषणा-पत्र जारी किया जिसमें पूर्ण कानूनी समानता, पूर्ण शैक्षिक एवं व्यावसायिक अवसर, समान मुआवजा और मजदूरी कमाने के अधिकार तथा वित देने के अधिकार की मांग की गयी थी । एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन तथा सूसन बराउनवेल एंथनी के नेतृत्व में यह आन्दोलन तेज गति से फैला और जल्दी ही यूरोप तक जा पहुंचा । ब्रिटेन में १८६० के दशक में चुनावी सुधारों के दौर में नारी मताधिकार आन्दोलन भी बड़े पैमाने पर उठ खड़ा हुआ । १८६७ में पारिलियामेंट में स्त्रियों को मताधिकार देने के जे. एस मिल के प्रस्ताव को रद्द कर दिए जाने के बाद कई नगरों में नारी मताधिकार सोसायिटीयों की स्थापना हो गयी, जिनको मिलाकर बाद में राष्ट्रीय एसोसिएशन बनाया गया । अमेरिका में १८६९ में दो नारी मताधिकार संगठनों का गठन हुआ । १८९० में इनकी एकता के बाद राष्ट्रीय अमेरिकी नारी मताधिकार संघ अस्तित्व में आया । १८८२ में फ़्रांसिसी नारी अधिकार लीग का गठन हुआ ।

मुख्यत: उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के प्रभाव में जनवादी चेतना संचरित होने लगी थी जिससे स्त्री समुदाय भी अछूता नहीं रह गया था । इस दौरान लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की आजादी और बराबरी की मांग को लेकर आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो हालाँकि व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के आभाव में मुख्यत: नारीवादी ( Fiminist ) प्रकृति का था, फिर भी यह लातिनी देशों की स्त्रियों की नयी चेतना का द्योतक था । इसी अवधि में पहले जापान, भारत और इंडोनेशिया में और फिर तुर्की और ईरान में नारी आन्दोलन ने अपना पहला कदम आगे बढ़ाया । १८८८ में अमेरिकी नारीवादियों की पहल पर अंतरराष्ट्रीय नारी परिषद (International Council of Women ) की स्थापना हुई । १९०४ में अंतरराष्ट्रीय नारी मताधिकार संश्रय ( International Women Suffrage Alliance) की स्थापना हुई जिसका नाम १९४६ में बदलकर ‘अंतरराष्ट्रीय नारी संश्रय समान अधिकार-समान दायित्व’ (International Alliance of Women – Equal Rights-Equal Responsibilities ) कर दिया गया ।

इस दौरान एक महत्वपूर्ण विकास यह हुआ कि स्त्रियों की नयी चेतना और संघबद्ध होने की आंकाक्षा को देखते हुए उनकी “स्थिति में सुधार” और “उनके विकास” की आड़ लेकर आध्यात्मिक, धार्मिक सुधारवादी और संकीर्ण राष्ट्रवादी ग्रुपों ने भी भांति-भांति के नारी संगठनों की स्थापना की जिनका मूल उद्देश्य स्त्रियों की मुक्तिकामी आकांक्षा को सुधारों के दायरे में कैद करना, उन्हें मजदूर आंदोलनों, क्रांतिकारी बुर्जुआ जनवादी आंदोलनों और राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के प्रभाव से दूर रखना तथा इस तरह निहित वर्ग स्वार्थों की सेवा करना था ।

4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा


नारी आंदोलनों में सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण के विकास की प्रक्रिया उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में शुरू हई । नारी-प्रश्न के वर्गीय आधारों को उद्घाटित करते हुए मार्क्स और एंगेल्स ने  पहली बार यह स्पष्ट किया कि निजी सम्पत्ति और वर्गीय समाज के संघटन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही स्त्री की दासता की शुरुआत हुई । उन्होंने स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में कामगार स्त्रियाँ निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम होने के साथ-साथ यौन आधार पर शोषण-उत्पीडन का शिकार तो हैं ही, सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ भी सामाजिक श्रम से कटी हुयी या तो नारकीय घरेलू दासता एवं पुरुष स्वामित्व के बोझ से दबी हुई हैं या बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के लिए आरक्षित कुछ विशिष्ट अपमानजनक पेशों में लगी हुयी निहायत निरंकुश स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं । उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में मेहनतकश स्त्रियों की समस्यायों का समाधान असंभव है और स्त्री समुदाय की सच्ची मुक्ति की दिशा में पहला कदम पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था का खात्मा है ।

मार्क्स-एंगेल्स ने यह स्पष्ट किया कि नारी मुक्ति  की दिशा में पहला कदम यह होगा कि स्त्री मजदूरों की वर्ग चेतना को उन्नत किया जाये, सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ाई जाये और उन्हें मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलनों में शामिल किया जाये । पहले इंटरनेशनल ने नारी मजदूरों के श्रम के संरक्षण से संबंधित दो प्रस्ताव पारित किये थे । इन प्रस्तावों ने स्त्रियों के उत्पीडन और उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व एवं मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के बीच अंतर्संबंधों को उद्घाटित  करने के साथ ही नारी अधिकारों के प्रति प्रूधोंवादी दृष्टिकोण के दिवालियेपन को भी उजागर कर दिया । प्रूधों और उसके चेले सामाजिक रूप से उपयोगी श्रम में स्त्रियों की भागीदारी का विरोध करते थे और उनकी सामाजिक समानता की बात करते हुए भी परिवार और बच्चों की देखभाल ही उनकी प्रमुख जिम्मेदारी मानते थे ।  स्त्री कामगारों के श्रम-संरक्षण संबंधी पहले इंटरनेशनल के निर्णय ने सर्वहारा नारी आन्दोलन के विकास का सैद्धांतिक आधार तैयार करने का काम किया । मार्क्स-एंगेल्स ने, और आगे चलकर लेनिन, स्टालिन और माओ ने — अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के इन पाँचों महान शिक्षकों ने कामगार औरतों की उत्पीडित आबादी को सर्वहारा क्रांति की सबसे बड़ी आरक्षित शक्ति ( Greatest Reserve ) के रूप में देखा । सर्वहारा क्रांति और स्त्री प्रश्न के समाधान के द्वंदात्मक अंतर्संबंधों को निरुपित करते हुए लेनिन ने लिखा था, ” स्त्रियों के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल किये बिना सर्वहारा अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं हासिल कर सकता ।”

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में क्रांतिकारी संघर्षों में, विशेषकर १८७१ के युगांतरकारी पेरिस कम्यून में शौर्यपूर्ण भागीदारी के साथ ही स्त्रियों ने राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में स्वतंत्र रूप से भी हिस्सा लिया और अपने संगठन बनाये । फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन में स्त्रियों ने अपनी ट्रेड युनियने संगठित कीं ।  उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में फ़्रांस और ब्रिटेन में स्त्री कामगारों के कई संगठन पहले इंटरनेशनल में भी शामिल हुए । जर्मन कामगार औरतें ‘ इंटरनेशनल प्रोफेशनल एसोसियेशन ऑफ मैन्युफैक्चरी , इंडस्ट्रियल एंड हैंडीक्राफ्ट  वर्कर्स’ में शामिल हो गयीं जिसकी स्थापना १८६९ में क्रिम्मित्स्चू (सैक्सनी) में हुई थी और जो इंटरनेशनल के विचारों से प्रभावित था । स्त्री-प्रश्न पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण को विकसित और व्याख्यायित करने में तथा वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित सर्वहारा नारी आंदोलनों को विकसित करने में बेबेल की सुप्रिसिद्ध कृति ‘नारी और समाजवाद’ (Women and Socialism ) ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में मजदूर स्त्रियों का आन्दोलन जर्मनी में सर्वाधिक तेज गति से विकसित हुआ । १८९१ में जर्मनी की सामाजिक जनवादी पार्टी ने अपने कार्यक्रम (एर्फुर्ट कार्यक्रम ) में नारी मताधिकार की मांग को शामिल किया । पार्टी ने स्त्रियों-पुरुषों की सांगठनिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार किया और ट्रेड यूनियनों में स्त्रियों की भरती के विशेष प्रयास शुरू किये गये । १८९१ में स्त्री कामगारों की एक पत्रिका -Gleichcheit – का प्रकाशन भी शुरू हुआ जो १८९२ से १९१७ तक क्लारा जेटकिन के निर्देशन में प्रकाशित होती रही । सन १९०० से जर्मनी भर में नियमित नारी सम्मेलनों के आयोजन की शुरुआत हुई ।

पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली की अपनी जरूरतों के चलते और सर्वहारा आंदोलनों और विशेष तौर पर नारी आंदोलनों की विविध धाराओं-प्रवृतियों के दबाव के नाते उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यूरोप में स्त्रियों की शिक्षा और श्रम-संरक्षण से संबंधित कई कानून बने और उनकी कानूनी हैसियत में कुछ महत्वपूर्ण सुधार हुए । उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में १८४७ में ही स्त्रियों का श्रम दिवस दस घंटे का कर दिया गया था । मार्क्सवाद के संस्थापकों ने इस कानून को मजदूर वर्ग की एक बड़ी जीत की संज्ञा दी थी । स्त्री मजदूरों के संरक्षण से संबंधित कई अन्य कानून इस दौरान विभिन्न यूरोपीय देशों में बने । स्त्रियाँ  ट्रेड युनियनों में शामिल होने लगीं । १८८९ में ट्रेड यूनियन्स कांग्रेस में उनकी सदस्यता का प्रश्न सारत: हल हो गया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही स्त्री आन्दोलन के दबाव में, पहले सम्पन्न और फिर आम परिवारों की लड़कियों के लिए माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना यूरोप में और फिर एशिया-लातिनी अमेरिका के कुछ देशों में हुई । ब्रिटेन में स्त्रियों को सबसे पहले शिक्षक का पेशा अपनाने का अधिकार मिला । फिर धीरे-धीरे कुछ अन्य क्षेत्रों में भी उन्हें रोजगार के अवसर मिले । १८५८ में ब्रिटेन में स्त्रियों को तलाक का अधिकार प्राप्त हुआ, यद्यपि इस सन्दर्भ में १९३८ तक उनके अधिकार पुरुषों की अपेक्षा कम थे । १८७० से १९०० के बीच ब्रिटिश स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार हासिल किये । १८६९ में कर भुगतान करने वाली स्त्री नागरिकों को म्युनिसिपल चुनावों में भागीदारी का अधिकार मिला और १९१८ में शादीशुदा स्त्रियों तथा ३० वर्ष से अधिक आयु वाली, विश्वविद्यालय डिप्लोमा प्राप्त की हुई स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । १९२८ में २१ वर्ष आयु वाली स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । अमेरिका में स्त्रियों को शिक्षण पेशा अपनाने का अधिकार उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही मिल चुका था । १८५० से १८७० के बीच वहाँ स्त्रियों को तथाकथित “लिबरल” पेशे अपनाने का अधिकार प्राप्त हुआ और १८८० के बाद तथाकथित “पुरुष” पेशों में भी उन्हें स्वीकार किया जाने लगा । १८४८ में वहाँ शादीशुदा औरतों को सम्पत्ति रखने का अधिकार प्राप्त हुआ । १८७४ में वहाँ पहली बार स्त्रियों के श्रम दिवस को सीमित करने का कानून (मैसाचुसेट्स  ) में बना । १९२० में अमेरिकी संविधान में हुए उन्नीसवें संशोधन द्वारा स्त्रियों के मताधिकार पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया गया । फ़्रांस में भी उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार प्राप्त कर लिए थे । १८९२ में उनके श्रम के संरक्षण से संबंधित पहला कानून बना, उनका अधिकतम लम्बा श्रम दिवस ११ घंटे का तय किया गया जिसे १९०४ में घटाकर १० घंटे कर दिया गया । स्त्री मताधिकार संबंधी विधेयक फ़्रांस में पहली बार १८४८ में पेश किया गया था, लेकिन १९४४ में जाकर उन्हें यह अधिकार हासिल हो सका । जर्मनी में औरतों को मत देने का अधिकार १९१९ के वाईमर संविधान द्वारा प्राप्त हुआ था, लेकिन १९३३ में सत्ता में आने के साथ ही नात्सियों ने लम्बे और कठिन संघर्षों द्वारा अर्जित उनके सभी राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों को समाप्त कर दिया ।

इन कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की चर्चा के बाद, संक्षेप में, इतना ही उल्लेख यहाँ पर्याप्त है कि कुछ एक अपवादों को छोडकर, पश्चिमी देशों की स्त्रियों ने बीसवीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते बुर्जुआ सामाजिक ढांचे के भीतर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लिए थे । पर यह कहते हुए कुछ बातों को रेखांकित करना निहायत जरूरी है । पहली बात यह कि कानूनी तौर पर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लेने के बावजूद वास्तव में आज तक उन्हें सामाजिक समानता प्राप्त नहीं है । वे दोयम दर्जे की नागरिक हैं । काम करने वाली औरतें वहाँ असंगठित क्षेत्र में सस्ता श्रम बेचने को बाध्य हैं और निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम हैं । मुख्यत: मध्यम वर्ग और अन्य सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ और सामान्यत: सभी स्त्रियाँ वहाँ घरेलू दासता से पूर्णत: मुक्त नहीं हो सकी हैं । जीवन के हर क्षेत्र में उन्हें आर्थिक शोषण के साथ ही यौन-उत्पीडन का भी शिकार होना पड़ता है । धार्मिक मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही, तरह-तरह की फासिस्ट प्रवृतियों और साथ ही बीमार बुर्जुआ संस्कृति का दबाव भी उन्हें ही सबसे अधिक झेलना पड़ता है । अभी भी गर्भपात और तलाक से लेकर बलात्कार तक — बहुत सारे मामलों में, पश्चिमी देशों में कानून स्त्रियों के प्रति भेदभावपूर्ण बने हुए हैं । दूसरी बात यह है कि पश्चिम की स्त्रियों ने जो भी अधिकार प्राप्त किये हैं, वह उन्हें  बुर्जुआ समाज ने तोहफे के तौर पर नहीं दिए हैं । ये अधिकार सामाजिक क्रांतियों, वर्ग-संघर्षों और नारी समुदाय के शताब्दियों लम्बे संघर्ष द्वारा अर्जित हुए हैं । बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों में व्यापक आम जनता और स्त्रियों की भागीदारी के दौर में स्त्रियों को अपने नागरिक अधिकारों की पहली किश्त हासिल हुई । राज्यसत्ता पर काबिज होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने जब आम जनता पर अपना अधिनायकत्व लागू किया तो स्त्रियों के जनवादी अधिकारों को भी उसने हडपने की हर कोशिश की और केवल उसी हद तक उन्हें नागरिकता के अधिकार दिए जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली की जरूरत थी । पुन: उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब क्रांतियों का नया विस्फोट हुआ और सर्वहारा वर्ग राजनीतिक संघर्ष के मंच पर उतरा तो नारी आन्दोलन को भी महत्वपूर्ण संवेग प्राप्त हुआ और बाद के पचास वर्षों के संघर्षों के दौरान पश्चिम में नारी समुदाय ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित कीं । इस समय मजदूर स्त्रियाँ नारी मध्यवर्गीय स्त्रियों के आगे आ खड़ी हुई थीं । बीसवीं शताब्दी में, अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत संघ में, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोपीय देशों में और १९४९ की नई जनवादी क्रांति के बाद चीन में तथा मेहनतकशों के शासन वाले कुछ अन्य देशों में स्त्री समुदाय ने पहली बार समानता के जो अधिकार अर्जित किये, उनसे भी पश्चिमी देशों की और साथ ही राष्ट्रीय जनवाद की लड़ाई लड़ रहे एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों की मुक्तिकामी स्त्रियों के आंदोलनों को भी नई प्रेरणा और नया संवेग प्राप्त हुआ । तीसरी बात जो गौरतलब है, वह यह कि उन्नीसवीं शताब्दी में, जब तक यूरोप क्रांतियों का केंद्र रहा, तभी तक नारी आन्दोलन वहाँ तेजी से विकसित होता हुआ एक के बाद एक नई जीतें हासिल करता रहा । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू में विश्व पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में संक्रमण के बाद क्रांतियों का केंद्र खिसककर जब रूस और एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों-नवउपनिवेशों में आ गया तो नारी आन्दोलन का मुख्य रंगमंच भी इन्हीं देशों में स्थानांतरित हो गया । यह वस्तुगत ऐतिहासिक तथ्य इसी सत्य को पुष्ट करता है कि नारी आन्दोलन, उसका भविष्य और उसकी जीत-हार की नियति सामाजिक संघर्षों और क्रांतियों के साथ अविभाज्यत: जुडी हुई है । आगे हम सर्वहारा क्रांतियों की धारा और उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों की धारा के साथ जारी नारी मुक्ति आंदोलनों की अत्यंत संक्षिप्त चर्चा करेंगे ।

5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन

मार्क्स-एंगेल्स के बाद लेनिन ने नारी-प्रश्न पर मार्क्सवादी चिंतन को आगे बढाया । लेनिन के काल में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन में कामगार औरतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने की प्रक्रिया उन्नत धरातल पर शुरू हुई. नारी-मुक्ति के प्रश्न पर लेनिन के कई महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अवदान थे । बुर्जुआ नारीवाद की नारी-मुक्ति विषयक वर्गेतर सोच और “यौन मुक्ति” की बुर्जुआ अवधारणाओं के साथ ही उन्होंने मार्क्सवाद से प्रेरित नारी-मुक्ति आन्दोलन की धारा में मौजूद कई अवैज्ञानिक धारणाओं और विजातीय रुझानों का विरोध किया । स्वतन्त्रता का अर्थ असामाजिक स्वच्छंदता और पुरुष के शोषण से मुक्ति का अर्थ “यौन मुक्ति” नहीं होता, यह कम्युनिस्ट नैतिकता और विज्ञान के विरुद्ध है — इसे लेनिन ने एकाधिक बार स्पष्ट किया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में क्लारा जेटकिन, क्रुप्सकाया, अलेक्सांद्रा कोल्लोंताई और अनेंसा आरमाँ आदि कम्युनिस्ट नेत्रियों ने अपनी सक्रियताओं और लेखन के द्वारा भी नारी मुक्ति के मोर्चे पर अहम भूमिका निभाई । इन अग्रणी व्यक्तित्वों के साथ लेनिन के वाद-विवाद और विचार-विमर्श के दौरान नारी मुक्ति के कई पक्षों पर मार्क्सवादी अवस्थिति महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुई ।

बीसवीं शताब्दी के शुरू होते-होते सर्वहारा नारी आन्दोलन के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के लिए पूर्वपीठिका तैयार हो चुकी थी । दूसरे इंटरनेशनल की कांग्रेस में नारी आन्दोलन और नारी समस्या के विविध पहलुओं पर नियमित रूप से बहसें हुआ करती थीं । १८९३ में ज्यूरिख कांग्रेस में यह कहा गया की स्त्रियों के श्रम के कानूनी संरक्ष्ण को पूरा समर्थन देना पूरी दुनिया के मजदूरों का कर्तव्य है । दूसरे इंटरनेशनल की लन्दन कांग्रेस (१८९६) को महिला प्रतिनिधियों के सम्मेलन ने स्त्री-पुरुष– दोनों ही समुदायों के सर्वहारा वर्ग के आम संगठन को स्वीकृति देने के साथ ही इस बात पर जोर दिया कि मेहनतकश वर्गों के नारी आन्दोलन और नारीवाद (Feminism ) के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खिंची जानी चाहिए ।

स्त्री समाजवादियों के पहले और दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (स्टुट्गार्ट, १९०७ और कोपेनहेगेन, १९१० ) मेहनतकश नारी आन्दोलन की विकास-यात्रा के दो महत्वपूर्ण मील पत्थर थे । पहले सम्मेलन ने बिना किसी लिंग-भेद के सार्विक एवं समान मताधिकार का प्रस्ताव पारित किया जिसे दूसरे इंटरनेशनल के स्टुट्गार्ट कांग्रेस ने भी स्वीकार किया । पहले सम्म्मेलन की प्रतिनिधियों ने क्लारा जेटकिन की अध्यक्षता में एक अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना करने और उसके मुखपत्र के प्रकाशन का भी निर्णय लिया । दूसरे सम्म्मेलन में सत्रह देशों की महिला प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । इसी सम्मेलन में प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब दक्षिणपंथी अवसरवादी काउत्स्की और उसके अनुयाइयों के विश्वासघात के कारण अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन में फूट पड़ी ठीक उसी समय मेहनतकश नारी आन्दोलन को भी एक गंभीर धक्का लगा ।  अधिकांश सामाजिक जनवादी स्त्री संगठनों ने भी विश्वयुद्ध में काउत्स्कीपंथियों की ही भांति अंधराष्ट्रवादी अवस्थिति अपनाई । बुर्जुआ नारीवादी संगठन तो पहले से ही यही अवस्थिति अपनाए हुए थे । लेकिन बोलेशेविक प्रस्ताव को ख़ारिज करके एक शांतिवादी प्रस्ताव स्वीकार करने के बावजूद बर्न अंतरराष्ट्रीय स्त्री समाजवादी सम्मेलन (१९१५) ने, जो बोलेशेविकों की पहल पर आयोजित हुई थी, समाजवादी अवस्थिति अपनाने वाली स्त्री समाजवादियों की एकता को बहाल रखने में अहम भूमिका निभाई । युद्ध के दौरान युद्ध में शामिल देशों की स्त्रियों ने भुखमरी और बदहाली के खिलाफ कई प्रदर्शन आयोजित किये । ८ मार्च (२३ फरवरी ) १९१७ को बोलेशेविकों की पेत्रोग्राद कमेटी की अपील पर भुखमरी, युद्ध और जारशाही के विरुद्ध रुसी स्त्रियों के प्रदर्शन ने एक व्यापक जनांदोलन का सूत्रपात किया जिसकी चरम परिणति फरवरी क्रांति के रूप में सामने आई । अक्टूबर समाजवादी क्रांति की तैयारी में रूस की महिला मजदूरों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । क्रांति के बाद सोवियत संघ में नारी आन्दोलन ने हर संभव तरीके से समाजवादी निर्माण के कामों को आगे बढ़ाने में, समाजवाद की रक्षा में और सामाजिक-राजनीतिक जीवन में आम स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने में एक अग्रणी भूमिका निभाई । समाजवादी सोवियत संघ की सर्वहारा राज्यसत्ता ने दुनिया के इतिहास में पहली बार न केवल स्त्री समुदाय को कानूनी तौर पर पुरुषों के साथ पूर्ण समानता के अवसर प्रदान किये बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में व्यवहारत: इसे लागू करने की दिशा में भी हर संभव कदम उठाये । सोवियत संघ स्त्री-मुक्ति के सन्दर्भ में भी पूरी दुनिया के लिए एक नया प्रकाश स्तंभ बन गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अक्टूबर क्रांति के प्रभाव में पूरी दुनिया में नारी आन्दोलन में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई । एक ओर जहाँ आम उत्पीडित नारी समुदाय समाजवाद की विचारधारा की ओर तेजी से आकृष्ट हुआ, वहीँ बुर्जुआ नारी संगठनों ने ज्यादा से ज्यादा खुले तौर पर बुर्जुआ व्यवस्था की हिफाजत का काम शुरू कर दिया । यूरोप की संशोधनवादी सामाजिक जनवादी पार्टियों ने पूंजीवाद की दूसरी सुरक्षापंक्ति का काम करते हुए स्त्रियों के बीच अपनी गतिविधियाँ तेज कर दीं ।

सोवियत संघ के बाहर, सर्वहारा विचारधारा पर आधारित नारी आन्दोलन ने १९२० के दशक में सुनिश्चित शक्ल अख्तियार करना शुरू किया । नारी आन्दोलन को क्रान्तिकारी आन्दोलन का अपरिहार्य बुनियादी अंग मानते हुए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कांग्रेस में मेहनतकश स्त्रियों के बीच कम्युनिस्टों के काम के प्रश्न पर लगातार गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श होता रहा । १९२० में कोमिन्टर्न के निर्देशन में अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना हुई जिसकी सेक्रेटरी क्लारा जेटकिन थीं । महिला कम्युनिस्टों का एक प्रेस भी स्थापित हुआ और एक अंतरराष्ट्रीय महिला पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ । १९२० से १९२६ के बीच महिला कम्युनिस्टों के चार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुए ।

यद्यपि नारी आन्दोलन पर दूसरे इंटरनेशनल के विचारधारात्मक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने महिला कम्युनिस्ट संगठनों के कामों पर विशेष जोर दिया, पर लेनिन और इंटरनेशनल के अन्य अग्रणी नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि स्त्रियों के गैर-पार्टी संगठन और सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों की मांगों को लेकर संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठन भी बनाये जाने चाहिए जिसमें मेहनतकश स्त्रियों के अतिरिक्त जनता के अन्य वर्गों की स्त्रियाँ भी हिस्सा लें । सोवियत संघ के बाहर के देशों में नारी आदोलन में मौजूद संकीर्णतावादी भटकावों और संगठनों की कमजोरी के कारण व्यापक स्त्रियों को उनके जनवादी अधिकारों की मांग और यौन-असमानता के विरोध के आधार पर संगठित करने में तीसरे दशक तक तो कोई विशेष सफलता नहीं प्राप्त हो सकी, लेकिन चौथे दशक में फासिज्म के उभार ने तात्कालिक रूप से, वस्तुगत तौर पर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं कि फासिज्म और साम्राज्यवादी युद्ध-विरोधी संयुक्त मोर्चे में जनता के सभी वर्गों की — विशेषकर कामगार और मध्यम वर्ग की स्त्रियों के संगठित होने की प्रक्रिया शुरू हो गई । जहाँ भी फासिस्ट ताकतें सत्ता में आयीं, प्रगतिशील नारी संगठनों के साथ ही उन्होंने उन बुर्जुआ नारी संगठनों को भी कुचल दिया जो नारी मुक्ति या स्त्रियों के समान अधिकारों की बात करती थीं । इसके साथ ही फासिज्म-विरोधी लोक मोर्चे के एक अंग के रूप में एक जनवादी, फासिज्म-विरोधी नारी आन्दोलन के संघटित होने की प्रक्रिया शुरू हो गयी । अगस्त १९३४ में सोवियत संघ सहित कई देशों के प्रगतिशील नारी संगठनों की पहल पर पेरिस में युद्ध  और फासिज्म-विरोधी महिला विश्व कांग्रेस आयोजित हुआ जिसमें कम्युनिस्ट शांतिवादी, नारीवादी और क्रिश्चियन समाजवादी स्त्री संगठनों एवं ग्रुपों के कुल १०९६ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । कांग्रेस में युद्ध और फासिज्म-विरोधी विश्व महिला कमेटी का गठन किया गया । पुन: मई १९३८ में मार्सिइएज (Marseillis) में युद्ध-विरोधी अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन का आयोजन हुआ ।

यद्यपि विश्वयुद्ध के दौरान जनवादी महिला आन्दोलन के विकास की दिशा में सांगठनिक-परिमाणात्मक शक्ति की दृष्टि से कोई बहुत महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई, लेकिन फासिज्म के रूप में सामने आई बुर्जुआ अधिनायकत्व की नग्नता ने और उसके विश्वव्यापी प्रतिरोध ने इसके लिए आवश्यक पूर्वाधार तैयार कर दिया ।

जिन उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में मुक्तियुद्ध जारी थे, वहां पहले से ही जनवादी नारी आन्दोलन के संगठित होने की प्रक्रिया जारी थी । फासिज्म-विरोधी संघर्ष के अनुभवों, फासिज्म की पराजय, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादी शक्तियों के निर्बल हो जाने और एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर के उठ खड़े होने के व्यापक प्रभाव दुनिया की आधी आबादी की चेतना पर और नारी आन्दोलन पर भी पड़ा । तीसरी दुनिया के देशों में उपनिवेशवाद की पराजय की प्रक्रिया शुरू होने के इस दौर में उन अधिकांश देशों में समाजवाद को सच्चा मित्र मानने वाला जनवादी नारी आन्दोलन शक्तिशाली होता चला गया । चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जारी मुक्ति-संघर्ष में स्त्रियों की भागीदारी और मुक्त क्षेत्रों में उनकी सामाजिक स्थिति पहले से ही दुनिया भर के पिछड़े देशों की स्त्रियों को आकृष्ट कर रही थी । १९४९ में नई जनवादी क्रांति संपन्न होने के बाद मध्ययुगीन पित्रसत्तात्मक स्वेच्छाचारिता से भरे समाज में स्त्रियों को पूर्ण बराबरी का कानूनी दर्ज़ा देकर और फिर समाज में उसे एक वास्तविकता में रूपांतरित करने की शुरुआत करके चीन के सर्वहारा राज्य ने ऐतिहासिक काम किया था उस पर पूरी दुनिया की स्त्रियों और मुक्तिकामी जनता की निगाहें टिकी हुई थीं । द्वितीय विश्व्यद्धोत्तर काल में पश्चिम के देशों की स्त्रियाँ भी अपने जनवादी अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने की जरूरत शिद्दत के साथ महसूस कर रहीं थीं ।

इन्हीं परिस्थितियों में, अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन ने आगे की ओर कुछ महत्वपूर्ण डग भरे । इनमें सर्वाधिक महत्पूर्ण कदम था दिसंबर, १९४५ में महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ( Women’s International Democratic Federation — W.I.D.F.) की स्थापना, जिसमें ३९ देशों के राष्ट्रीय स्त्री-संगठनों ने भाग लिया । महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ने स्त्रियों की आम मांगों को लेकर अलग-अलग देशों में और विश्व स्तर पर सक्रिय विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्त्री संगठनों के साथ साझा कार्रवाइयों की भी कोशिश की, लेकिन उस समय पूरी दुनिया में जारी कम्युनिज्म-विरोधी मुहीम के प्रभाव में बहुत सारे बुर्जुआ, तथाकथित परम्परागत स्त्री संगठनों के नेतृत्व ने इसे स्वीकार नहीं किया ।

१९५६ में रूस में ख्रुश्चेव द्वारा प्रतिक्रांतिकारी तख्तापलट और रूस तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना ने विष-स्तर पर जारी वर्ग-संघर्ष को भारी धक्का पहुँचाने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन को भी भारी नुकसान पहुँचाया । साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष, पूंजीवादी देशों में और तीसरी दुनिया के नवस्वाधीन देशों में जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष और व्यवस्था-विरोधी संघर्ष में स्त्री आन्दोलन की क्रान्तिकारी भागीदारी के विपरीत — संशोधनवादियों ने दुनिया भर में नारी मुक्ति आन्दोलन को सुधारवाद और शांतिवाद के दलदल में ले जाकर धंसा देने की हर चंद कोशिशें कीं और काफी हद तक इसमें सफलता भी प्राप्त की । यही कारण था कि छठे दशक के अंत तक दुनिया भर के नारी आन्दोलन में गतिरोध और शून्य की सी स्थिति उत्पन्न हो गयी थी । यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसमें बुर्जुआ नारीवाद के नये उभार ने सातवें दशक में जन्म लिया ।

6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन

जैसाकि उपर उल्लेख किया जा चुका है, पश्चिम के देशों में बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों की पूर्वपीठिका तैयार होने के साथ ही, यानि प्रबोधन काल (Age of Enlightenment ) के दौर में नारी मुक्ति की चेतना का जन्म हुआ और बुर्जुआ क्रांतियों के दौर में स्त्री समुदाय ने अपने सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी ।

एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों में बुर्जुआ विकास का स्वरूप यूरोप जैसा नहीं रहा । यहाँ बुर्जुआ वर्ग पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रांति की प्रक्रिया से गुजरकर सत्ता में नहीं आया । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों के पूर्ण औपनिवेशीकरण के बाद वहाँ की पुरानी सामाजिक-आर्थिक संरचना को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया । बाद में इन देशों में औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से जिस बुर्जुआ वर्ग का जन्म हुआ, वह एक समझौतापरस्त वर्ग था । वह अमेरिका या फ़्रांसिसी क्रांति के वाहक बुर्जुआ वर्ग की भांति क्रान्तिकारी भौतिकवाद और जनवाद के मूल्यों से लैस नहीं था । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों में इसी बुर्जुआ वर्ग ने अलग-अलग परिस्थितियों में कहीं एक हद तक क्रान्तिकारी संघर्ष करके तो कहीं ‘समझौता-दबाव-समझौता’ की रणनीति अपनाकर और कहीं पूरी तरह साम्राज्यवाद के साथ समझौता करके सत्ता हासिल की । तीसरी दुनिया के इस बुर्जुआ वर्ग की राजनीतिक स्वतन्त्रता भी उनके चरित्र और उनके संघर्ष या समझौते की प्रकृति के ही अनुरूप कम या ज्यादा थी, पर कहीं भी इस नये बुर्जुआ वर्ग ने न तो साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद किया और न ही क्लासिकीय अर्थों में उस रूप में जनवाद को ही बहाल किया, जैसाकि फ़्रांस या अमेरिका के बुर्जुआ वर्ग ने किया था ।

इन सभी देशों में नारी आन्दोलन के उद्भव और विकास की प्रक्रिया और उसका चरित्र भी इन देशों के इतिहास की उपरोक्त विशिष्टता से ही निर्धारितहुआ ।

एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी प्रक्रिया घटित न होने के कारण इन देशों के सामाजिक जीवन एवं मूल्यों में जनवादी मूल्यों-मान्यताओं की व्याप्ति अत्यंत कम थी और नारी समुदाय उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में भी मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था और मूल्यों-मान्यताओं के बंधन में जकड़ा रहा । काफी हद तक यह स्थिति आज भी बनी हुई है । फिर भी उन्नीसवीं शताब्दी में नारी मुक्ति की जो चेतना तीसरी दुनिया के देशों के नारी समुदाय में संचरित हुई, उसकी प्रक्रिया राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के दौर में शुरू हुई ।

अधिकांश लातिन अमेरिका देशों (जैसे मैक्सिको, क्यूबा, ब्राज़ील, हैती, निकारागुआ आदि ) में स्पेनी उपनिवेशवादियों के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हो चुकी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में लातिन अमेरिका देशों में स्त्रियों के संगठनों के बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, हालाँकि यह मध्यवर्गीय शिक्षित मिश्रित आबादी से नीचे मूल इंडियन आबादी तक नहीं पहुँच पाई थी और इन संगठनों की प्रकृति सारत: बुर्जुआ नारीवादी थी । बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में मैक्सिको और ब्राज़ील की अधूरी राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों और क्यूबा, निकारागुआ आदि देशों में उग्र रूप से जारी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों ने पूरे लातिन अमेरिका में नारी मुक्ति आन्दोलन को भी नया संवेग प्रदान किया । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत सारे लातिन अमेरिकी देशों में कम्युनिस्ट संगठनों के बनने की प्रक्रिया भी दूसरे इंटरनेशनल के काल में ही शुरू हो चुकी थी और इस शताब्दी के तीसरे दशक तक अधिकांश देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थापना हो चुकी थी । सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों और क्रांतिकारी मध्यमवर्ग के क्रांतिकारी संघर्षों की लंबी परम्परा ने भी लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति और उनके आन्दोलन पर विशेष प्रभाव डाला । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी नवउपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों का जो नया चक्र लातिनी देशों में शुरू हुआ, उसने आम मध्यवर्गीय और कामगार स्त्रियों को भी और काफी हद तक मूल आबादी की स्त्रियों को भी संघर्ष की मुख्य धारा से जोड़ने के साथ ही स्त्री-मुक्ति की धारा से भी जोड़ने में कामयाबी हासिल की ।

ख्रुश्चेवी लहर से लेकर गोर्बचोवी लहर तक के प्रतिकूल प्रभाव लातिन अमेरिकी जनता के मुक्ति-संघर्षों पर भी पड़े और मुख्यत: संशोधनवादी प्रभाव के चलते आज इन देशों के कई छापामार मुक्ति संघर्षों का (जैसे, अलसल्वाडोर, कोलम्बिया आदि में ) विघटन हो चूका है । कई सारी क्रांतियाँ (जैसे क्यूबा, निकारागुआ आदि ) अपने मध्यवर्गीय नेतृत्व के चरित्र के अनुरूप अपने अधूरे कार्यभारों को पूरा करने के बाद या तो विफिल हो चुकी हैं या विपथगमन कर चुकी हैं । इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव वहाँ के नारी आन्दोलन पर भी पड़ा है । लेकिन आज फिर पेरू में वहाँ की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वहाँ की स्त्रियाँ छापामार सेना और जनकार्रवाइयों में हिस्सा ले रही हैं, आधार इलाकों में लोक कमेटियों में शामिल होकर राजनीतिक कार्यों में, सामाजिक गतिविधियों में तथा सामाजिक उत्पादन में बराबरी की हिस्सेदारी कर रही हैं और साथ ही उन्होंने क्रांतिकारी जनसंगठनों के रूप में अपने संगठन बनाये हैं ।

काले अफ़्रीकी देशों में स्त्रियों ने वर्गीय समाज की गुलामी से औपनिवेशिक काल में ही पहली बार साक्षात्कार किया । दास समाज और सामंती समाज की पितृसत्तात्मक गुलामी के लंबे अतीत और सामन्ती पार्थक्य से वंचित रहने के कारण, पचास और साठ के दशक में राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के विस्फोट के साथ ही स्त्रियों की भारी आबादी उनमें शामिल हुई । नवस्वाधीन अफ़्रीकी देशों की स्त्रियों ने अपने लिए महत्वपूर्ण जनवादी अधिकार अर्जित किये । पर अब इन देशों का विकास गतिरुद्ध हो चुका है और केवल विश्व पूंजीवाद से निर्णायक विच्छेद करके, नई सर्वहारा क्रांतियाँ ही पुन: इन्हें प्रगतिपथ पर आगे बढ़ा सकती हैं । आज अफ़्रीकी देशों में भी पूंजी की सत्ता और यौन-असमानता की शिकार नारी समुदाय के नये आन्दोलन और स्वतंत्र संगठनों के गठन का वस्तुगत आधार तैयार है, पर उनका भविष्य क्रांतियों के नये चक्र की शुरुआत के साथ जुडा हुआ है ।

तुर्की, ईरान और मिस्र में नारी आन्दोलन की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में राष्ट्रीय जनवाद के लिए संघर्ष शुरू होने के साथ ही हो चुकी थी और स्त्रियों ने वहाँ लंबे संघर्ष के दौरान कई जनवादी अधिकार प्राप्त किये, पर फ़िलहाल वहाँ भी नारी मुक्ति-संघर्ष आज ठहराव और गतिरोध का शिकार है । सीरिया और इराक में भी सामाजिक-राजनीतिक जीवन में स्त्रियों ने कुछ महत्वपूर्ण अधिकार अर्जित कर लिए हैं, पर वर्तमान गतिरोध आज वहाँ की भी सच्चाई है । अरब अफ़्रीकी और पश्चिमी एशिया के अन्य अधिकांश मुस्लिम देशों में स्त्रियाँ आज भी अपने सामाजिक अधिकारों से वंचित पूरी तरह मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक गुलामी और सामन्ती पार्थक्य का शिकार बनी हुई हैं । साम्राज्यवादियों के टट्टू प्रतिक्रियावादी शेखों और शाहों के विरुद्ध जब तक इन देशों में जनक्रांतियाँ आगे कदम नहीं बढ़ाएंगी, तब तक नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रक्रिया वहाँ संवेग नहीं ग्रहण कर सकती ।

एशिया के अन्य देशों में चीन और वियतनाम, कोरिया आदि जिन देशों में साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधी संघर्ष का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग ने किया और जहाँ कुछ दशकों के लिए भी सर्वहारा सत्ता कायम रह सकी, उन देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के बावजूद आज भी स्त्रियों की सभी उपलब्धियां खोई नहीं हैं । आज भी अन्य एशियाई देशों की तुलना में स्त्रियों की इन देशों में वास्तव में अधिक सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं, यद्यपि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि चीन, वियतनाम आदि देशों में आज पूंजीवाद की लहर ने न केवल उन्हें निकृष्टतम कोटि का उजरती मजदूर बना दिया है और न केवल उनके अधिकारों में कटौतियां की जा रही हैं, बल्कि अब इन देशों में नारी-विरोधी अपराधों की भी भरमार हो गई है ।

भारत और एशिया के अन्य कई देशों में यद्यपि नारी मुक्ति-आन्दोलन की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही हो चुकी थी, पर राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व के समझौतापरस्त चरित्र के कारण इन देशों में जीवन के अन्य क्षेत्रों की ही भांति नारी अधिकार आन्दोलन के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी जनवादी मूल्यों की लड़ाई क्रांतिकारी और व्यापक पैमाने पर नहीं लड़ी गई । मध्यवर्गीय क्रांतिकारी आन्दोलन और सर्वहारा आन्दोलन की धाराएं अपनी जिन अन्तर्निहित कमजोरियों के कारण राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग के हाथों से नहीं छीन सकीं, उन्हीं कारणों से वे नारी आन्दोलन को भी एक क्रांतिकारी दिशा और संवेग नहीं दे सकीं । लंबे संघर्षों और निरंतरता के बावजूद भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों की स्त्रियों ने जो भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार अर्जित किये, वे बहुत कम थे । यही नहीं, कानूनी और संवैधानिक तौर पर उन्हें समानता के जो अधिकार मिले भी हैं, वे समाजी जीवन में व्याप्त निरंकुश स्वेच्छाचारिता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण मूलत: और मुख्यत: निष्प्रभावी बने हुए हैं ।

राष्ट्रीय आन्दोलन के समझौतापरस्त बुर्जुआ नेतृत्व तथा राष्ट्रीय जनवाद के कार्यभारों के अधूरे और गैरक्रांतिकारी ढंग से पूरा होने के कारण ही भारत, नेपाल आदि पिछड़े देशों में औरतों की गुलामी आज भी अधिक गहरी, व्यापक, निरंकुश और संगठित रूप में कायम है । सीमित हद तक शिक्षा और जनवादी चेतना के प्रसार के बावजूद बहुसंख्यक नारी आबादी आज भी बर्बर निरंकुश दासता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मकता के मूल्यों से जकड़ी हुई है, भयानक अमानवीय पार्थक्य ( Segregation ) की शिकार है और साथ ही पूंजी की सत्ता की उजरती गुलामी के रथ में भी जोत दी गई है । आधी आबादी की अपार क्रांतिकारी सम्भावना सम्पन्न जनशक्ति को निर्बंध क्रांतिकारी चेतना से लैस करना, क्रांतिकारी नारी आन्दोलन को नये सिरे से खड़ा करना और साथ ही सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के हर मोर्चे पर योद्धाओं की कतारों में स्त्रियों को ला खड़ा करना इन सभी देशों में क्रांतियों का एक अत्यंत कठिन लेकिन अनिवार्यत; आवश्यक कार्यभार है ।

तीसरी दुनिया के इन सभी देशों में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के विरुद्ध तथा राष्ट्रीय जनवादी क्रांति के छूटे हुए कार्यभारों को पूरा करने के लिए सर्वहारा क्रांतियों का जो नया चक्र शुरू होगा, अब नारी मुक्ति आन्दोलन का भविष्य भी उसी के साथ द्वंदात्मक रूप से जुडा हुआ है ।

7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति

अक्टूबर क्रान्ति के बाद मानव इतिहास में पहली बार कोई ऐसी राज्यसत्ता अस्तित्व में आयी, जिसने औरतों को हर मायने में सामान अधिकार दिए, समान सुविधाओं के अतिरिक्त हर क्षेत्र में समान काम के अवसर, समान काम के लिए समान वेतन, समान सामजिक राजनीतिक अधिकार, विवाह और तलाक के सम्बन्ध में बराबर अधिकार, अतीत में वेश्यावृत्ति जैसे पेशों के लिए विवश औरतों का सामजिक पुनर्वास आदि अनेकों कदम उठाकर रूस की समाजवादी सरकार नें निस्संदेह एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक काम किया । समाजवादी निर्माण के पूरे दौर में, नारी मुक्ति के क्षेत्र की उपलब्धियां भी अभूतपूर्व थीं । पिछड़े हुए रूसी समाज में क्रान्ति के बाद के चार दशकों में उत्पादन, सामजिक-राजनीतिक कार्रवाईयों , सामरिक मोर्चे और बौद्धिक गतिविधियों के दायरे में जितनी तेजी से औरतों की हिस्सेदारी बढ़ी, वह रफ़्तार जनवादी क्रांतियों के बाद यूरोप-अमेरिका के देशों में पूरी दो शताब्दियों के दौरान कभी नहीं रही थी । चंद-एक दशकों में ही सोवियत समाज से यौन अपराध और यौन रोगों का पूर्ण उच्छेदन हो गया, इस तथ्य को पश्चिम का मीडिया भी स्वीकार करता था । खेतों कारखानों में उत्पादन के मोर्चे पर ही नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चे पर भी लाखों सोवियत वीरांगनाओं नें जिस शौर्य और साहस का परिचय दिया था, उसने काफी हद तक इस सच्चाई को सत्यापित कर दिया कि नारी समुदाय की सीमा सिर्फ यही है कि उसे समाज में पुरुषों के साथ बराबरी की स्थिति, अवसर और परिवेश नहीं प्राप्त है ।

लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजवादी समाज में नारी समुदाय यौन-शोषण-उत्पीड़न से तथा आर्थिक शोषण से पूरी तरह मुक्त हो चुका होता है और पूर्ण समता की स्थिति कायम हो गयी होती है । ऐसा न तो कभी हुआ था और न ही ऐसा हो पाना संभव ही है । इस मुद्दे पर स्पष्टता के लिए जरूरी है कि पहले समाजवाद की अंतर्रचना को ही भली-भाँती समझ लिया जाये ।

समाजवाद एक स्थायी सामाजिक आर्थिक संरचना नहीं है । यह पूँजीवाद और वर्गविहीन समाज के बीच का एक लम्बा संक्रमणकाल है । इस दौर में छोटे पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन लम्बे समय तक बना रहता है, बाजार के नियम काम कार्य रहते हैं, माल-अर्थव्यवस्था भी मौजूद रहती है और इनके आधार पर पूंजीवादी मूल्य-मान्यताएं-संस्कृति रोज-रोज, हर क्षण पैदा होती रहती हैं, पूंजीवादी राज्यतंत्र के नाश के बाद भी पुराने समाज की वैचारिक-सामजिक-सांस्कृतिक अधिरचनाएं लगातार मौजूद रहती हैं और समाजवाद के विरूद्ध, एवं उसे ख़त्म कर देने के लिए लगातार एक भौतिक शक्ति का काम करती रहती हैं । वर्ग संघर्ष जारी रहता है और उत्तरोत्तर तीखा होता जाता है । सर्वहारा का राज्य और सर्वहारा की पार्टी लगातार पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली और मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के विरूद्ध कारगर ढंग से संघर्ष को जारी रखते हुए ही समाजवादी समाज को उस मंजिल तक पंहुचा सकती हैं, जहां वस्तु का बाजार मूल्य पूर्णतः समाप्त हो जाता है और मात्र उपयोग-मूल्य एवं प्रभाव मूल्य का ही अस्तित्व रह जाता है । केवल इसी मंजिल पर पहुंचकर समाज में हर तरह की असमानता समाप्त हो सकती है और नारी समुदाय भी तभी पूर्ण समता और स्वतंत्रता की स्थिति प्राप्त कर सकता है । लेकिन यह मार्ग अनेकों आरोहों-अवरोहों, जय-पराजयों और मोड़ों-घुमावों से भरा हुआ होता है तथा बहुत लम्बा होता है ।

रूस और चीन के समाज ने समाजवादी क्रान्ति और निर्माण के दौर में विकास के अभूतपूर्व लम्बे डग भरे और सामजिक न्याय और समता के अपूर्व कीर्तिमान स्थापित किये, लेकिन वे पूर्ण समता और पूर्ण न्याय से युक्त समाज नहीं थे । संवैधानिक स्तर पर औरत को सभी अधिकार मिल चुके थे, लेकिन सामजिक पारिवारिक स्तर पर यह स्थिति नहीं थी । ऐसा समझना एक वैधिक विभ्रम(Juridical Illusion) होगा । उत्पादन के तंत्र पर पूर्ण सामाजिक स्वामित्व के बगैर यह संभव नहीं था और इसके लिए अधिरचना के धरातल पर सतत क्रांतियों की भी अपरिहार्य आबश्यकता थी ।

समाजवाद की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बावजूद स्तालिनकालीन रूस में ऐसा न हो सका, जो कालान्तार में समाजवाद के ठहराव और अन्ततोगत्वा पराजय का कारण बना । स्तालिन की सर्वाधिक गंभीर गलती उनकी यह दार्शनिक भूल थी कि वे समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के अस्तित्व को और उसकी निरंतरता को वास्तविक रूप में पहचान नहीं सके । यह काम सर्वप्रथम माओ-त्से-तुंग ने किया । सोवियत संघ में समाजवाद की उपलब्धियों और पराजय की शिक्षाओं का तथा चीन में समाजवादी प्रयोगों का सार संकलन करते हुए माओ ने पहली बार समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को स्पष्टतः निरूपित किया और सर्वहारा के अधिनायकत्व के अंतर्गत वर्ग संघर्ष को जारी रखने के सिद्धांत और पद्धति का प्रतिपादन किया । पहले यह उल्लेख किया जा चुका है कि मार्क्सवाद के विकास की परम्परा में उत्पादक शक्तियों के विकास पर अधिक जोर देने की यांत्रिकता शुरू से ही मौजूद थी और मूलाधार एवं अधिरचना के द्वंद्वात्मक संबंधों की समझ काफी हद तक अस्पष्ट थी । सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की सैद्धांतिक पार्श्वभूमि की सर्जना करते हुए माओ त्से तुंग ने पहली बार इनका स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया और मूलाधार के रूपांतरण को जारी रखने के लिए तथा पूंजीवादी पुनर्स्थापना के सभी भौतिक आधारों को नष्ट करने के लिए अधिरचना के निरंतर क्रान्तिकारीकरण या अधिरचना में सतत क्रान्ति की अवधारणा प्रस्तुत की । पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि समाजवादी संक्रमण के दौरान पूंजीवादी उत्पादन के छोटे से छोटे रूप की समाप्ति की लम्बी प्रक्रिया के साथ ही उसकी अनिवार्य पूर्वशर्त एवं समांतर प्रक्रिया के रूप में तथा ज्यादा महत्व देकर कला-साहित्य-संस्कृति, शिक्षा एवं सामाजिक मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के प्रत्येक दायरे में अनवरत क्रान्ति की प्रक्रिया को जारी रखे बगैर समाज की विषमताओं एवं उत्पीड़न के विविध सूक्षम एवं स्थूल रूपों को कदापि समाप्त नहीं किया जा सकता । नारी-पुरूष असमानता, नारी उत्पीड़न पर आधारित पारिवारिक ढांचा एवं वैवाहिक सम्बन्ध, पुरूष-स्वामित्ववादी मानसिकता आदि ऐसी ही सामाजिक संस्थाएं और मूल्य मान्यताएं हैं, जिन्हें समाजवादी समाज के भीतर अनवरत सांस्कृतिक क्रांतियों से गुजरने के बाद ही, क्रमशः निर्मूल किया जा सकेगा । यह सच्चाई केवल समाजवादी समाज के लिए ही लागू नहीं होती है, बल्कि आज भी नारी मुक्ति आन्दोलन के मार्क्सवादी समर्थकों के भीतर मौजूद तमाम यांत्रिक धारणाओं, अर्थवादी भटकावों और भ्रांतियों से मुक्ति के लिए सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की इस दार्शनिक अंतर्वस्तु को जानना समझना जरूरी है ।

मूलाधार और अधिरचना के द्वंदात्मक संबंधों के, सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति द्वारा प्रस्तुत निरूपण, अधिरचना में क्रान्ति की अपरिहार्यता पर उसके जोर और सर्वहारा अधिनायक्तव के अंतर्गत सतत क्रान्ति की उसकी अवधारणा की सम्यक समझदारी के आधार पर ही आज नारी मुक्ति की दिशा से सम्बंधित निम्नलिखित प्रश्नों को भलीभांति समझा जा सकता है ।

1. नारी-उत्पीडन के बुनियादी कारण आर्थिक होंने के बावजूद आर्थिक प्रश्नों के अतिरिक्त सामाजिक- सांस्कृतिक धरातल पर भी स्त्रियों को संगठित होकर संघर्ष करना जरूरी है और पुरूष्सत्तात्मक व्यवस्था की मान्यताओं-संस्थाओं से सघर्ष एक दीर्घकालिक संघर्ष है ।

2. समाजवादी संक्रमण के अंतर्गत भी एक लम्बे समय के संघर्ष के बाद ही स्त्रियों की पूर्ण मुक्ति संभव है और यह कि यह प्रश्न समाजवाद की विजय-पराजय के साथ जुड़ा हुआ है ।

3. नारी मोर्चे पर कामगार स्त्रियों के संगठनों के अतिरिक्त और सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष मोर्चात्मक(Frontal) संगठनों के अतिरिक्त संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठनों की अपरिहार्य आवश्यकता है, जिनमें मध्यमवर्ग सहित जनता के सभी वर्गों की स्त्रियाँ पुरूष उत्पीडन के सर्वतोमुखी विरोध और अपने सामजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के एक कार्यक्रम के आधार पर संगठित हों, ऐसे नारी संगठन सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष नेतृत्व में न होकर सांगठनिक तौर पर, स्वतन्त्र स्वायत्त हों और पार्टी अपनी नीतियों से उन्हें प्रभावित करके, उनके भीतर काम करते हुए उन्हें दिशा देने का प्रयास करे ।

4. स्त्रियों की सहस्त्राब्दियों पुरानी मानसिक गुलामी को नष्ट करने के लिए नारी संगठनों की पहलकदमी, निर्णय लेने की आजादी और सापेक्षिक स्वायत्तता को बढाने के साथ ही, सर्वहारा वर्ग की पार्टी के लिए यह भी जरूरी है की राजनितिक-सांस्कृतिक शिक्षा और आन्दोलन के विशेष प्रयासों से पार्टी-कतारों में स्त्रियों की भरती की प्रक्रिया तेज की जाये और साथ की संघर्ष के हर मोर्चे पर — सभी तरह के जनसंगठनों में स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी बढाई जाये और उनकी पहलकदमी को निरुत्साहित करने की पुरूष-स्वामित्ववादी प्रवृत्तियों के विरूद्ध सतत संघर्ष किया जाये ।

5.पुरूषों की प्रत्यक्ष-परोक्ष चौधराहट(जो हर स्तर पर बुर्जुआ तत्वों को बल प्रदान करती है) से सामाजिक सक्रियता के हर दायरे में औरतों के लिए बच पाना अत्यंत कठिन है और पुराने मूल्यों के पूर्ण उच्छेदन तक यह समस्या समाजवाद की अवधि में भी बनी रहेगी । इससे यह स्पष्ट है कि जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता और स्वतन्त्र पहचान के लिए संघर्ष का प्रश्न दूरगामी और ऐतिहासिक महत्त्व रखता है । इसे एक बुर्जुआ दृष्टिकोण कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । इस प्रश्न को भी नारी आन्दोलन के एजेंडे पर अलग से रेखांकित करके शामिल करना अनिवार्य है ।

पूर्वी यूरोप और भूतपूर्व सोवियत संघ में 1956 में और चीन में 1976 में पूंजीवादी पुनर्स्थापना होने के बाद से लेकर अब तक के काल में, इन देशों में लोभ लालच , प्रतियोगिता, अपराध, भ्रष्टाचार, लूटमार और असमानता की नैतिक स्वीकृति से युक्त एक नग्न उपभोक्ता संस्कृति अस्तित्व में आई है । जाहिरा तौर पर इसका सर्वाधिक शिकार प्रत्यक्ष उत्पादक और स्त्री समुदाय ही हुआ है । इन सभी देशों में इधर नए सिरे से बलात्कार, स्त्री-भ्रूण ह्त्या, पत्नि उत्पीडन आदि नारी विरोधी अपराधों का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर गया जो समाजवाद के कुछ दशकों के भीतर पूरी तरह समाप्त हो चुके थे । अब विगत कुछ वर्षों के भीतर रूस और पूर्वी यूरोप में खुले निजी इजारेदार पूँजीवाद के आने के बाद यह प्रक्रिया और अधिक तेज हो गयी है, इस तथ्य को बुर्जुआ मीडिया भी स्वीकार कर रहा है । वेश्यावृत्ति, कालगर्ल आदि के पेशों और कैबरे नृत्य, अश्लील पत्रिकाओं आदि की बाढ़ आ गयी है, 1956 के पहले के सोवियत संघ और 1976 के पहले के चीन में जिन यौन रोगों के पूर्ण उन्मूलन के तथ्य को पश्चिम भी स्वीकार करता था, अब उनके इलाज के लिए अस्पताल खोले जा रहे है । चीन में लड़कियों की भ्रूण हत्या, अपहरण करके बलात विवाह और दहेज़ सरकार की चिंता के विषय बन चुके है । फिल्मों और साहित्य में नारी छवि की यौन-उत्पीड़क प्रस्तुति, मॉडलिंग जैसे पेशों के जरिये यौन-शोषण, नग्नतावाद, हर तरह के नारी स्वातंत्र्य विरोधी मूल्य और पुरूष स्वामित्व की मानसिकता तेजी से फलफूल रही है । उत्पादन के क्षेत्र में पुरूष व स्त्री के कामों की प्रकृति में भेद करके नारी श्रम को ज्यादा से ज्यादा सस्ता बनाया जा रहा है, उन्हें तथाकथित “हलके”, ‘स्त्रियोचित”, उबाऊ, श्रमसाध्य कामों में लगाया जा रहा है और “गृहिणी” के दायित्व से बाँधा जा रहा है । समाजवाद के अंतर्गत शिक्षा और सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों-पुरूषों की भागीदारी में स्त्रियों का अनुपात लगारार बढ़ा था, जो अब तेजी से घटता जा रहा है । स्मरणीय है कि येल्त्सिन के आने से पूर्व गोर्बाचोव ने ही, जो”मानवीय चेहरे वाले समाज ” की बातें किया करता था, लगभग दो सौ तरह के कामों में स्त्रियों की भागीदारी पर रोक लगा दी थी ताकि वे श्रम से थके पतियों की देखभाल और “समाजवाद के नौनिहालों’ के लालन-पालन पर उचित ध्यान दे सकें ।

और यह सब कुछ सर्वथा स्वाभाविक है । अर्थतंत्र का विकास पूंजीवादी दिशा में हो, राज्यसत्ता पर बुर्जुआ वर्ग काबिज हो और पूरे समाज की अधिरचना का समाजवादी रूपांतरण जारी रहे — यह असंभव है । जैसाकि पहले उल्लेख किया जा चुका है, समाजवाद नारी -समस्या का समाधान नहीं बल्कि समाधान की शुरुआत है । स्त्री की असमानतापूर्ण स्थिति और उसके शोषण के विविध रूप समाजवादी संक्रमण के दौरान भी मौजूद रहेंगे, पर वे क्रमशः क्षरण और विलोपन की दिशा में अग्रसर होंगे । और यह प्रक्रिया स्वतः नहीं होगी, अधिरचना में अनवरत क्रान्ति के जरिए– सतत सांस्कृतिक क्रान्ति के जरिए होगी । पूंजीवादी पुनर्स्थापना की यह तार्किक परिणति है कि औरत फिर से दोयम दर्जे की नागरिक, सबसे निचले दर्जे की उजरती मजदूर और एक उपभोक्ता सामग्री या पण्य वस्तु में तब्दील का दी जाये । रूस, पूर्वी यूरोप और चीन में यही हुआ है ।

हमारी उपरोक्त बातों का यह मतलब कतई नहीं है कि मार्क्सवाद के सूत्रों में नारी मुक्ति के प्रश्न का कोई शाश्वत समाधान या आज की स्थिति का कोई किया-कराया विश्लेषण रखा हुआ है । यह मार्क्सवाद की एक प्रस्तरीकृत रूढ़ समझ ही हो सकती है । अपनी द्वंद्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी दृष्टिकोण पर आधारित ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर मार्क्सवाद ने पहली बार नारी प्रश्न को विश्व-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अवस्थित करके देखा, पूरे सामजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक तंत्र से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल की, वर्गीय उत्पीड़न से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों को स्पष्ट किया और इसे सामजिक क्रान्ति का एक अनिवार्य अंग बताया । महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति तक के प्रयोगों नें इस समझ को ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट किया और नारी मुक्ति के लम्बे संघर्ष की दीर्घकालिक अवधि के लिए सांस्कृतिक क्रान्ति नें आम दिशा (General Line) की एक रूपरेखा प्रस्तुत की । अब शेष काम उन्हें पूरा करना होगा जो इस मोर्चे पर काम कर रहे हैं । अभी तक असमाधानित समस्याओं का हल ढूँढने के साथ ही, आज के युग ने जो सर्वथा नयी समस्यायें पैदा की हैं, उनपर भी वे ही लोग सोचेंगे जो इनके रूबरू खड़े हैं ।

8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर

साठ के दशक में जो नारीवादी आन्दोलन पहले अमेरिका और फिर पूरे पश्चिमी जगत में फूट पड़ा, वह सारतः नारी उत्पीडन के विरूद्ध एक अन्धविद्रोह था । उसकी कई शाखाएं और उपशाखाएँ आगे चलकर फलीं-फूलीं, लेकिन उनके पास न तो नारी-समस्या के सभी पहलुओं की कोई इतिहाससम्मत तर्कपरक व्याख्या थी और न ही दूरगामी सामाजिक संघर्ष के रूप में नारी मुक्ति के सघर्ष को आगे ले जाने का कोई ठोस कार्यक्रम ।

वैसे आधुनिक नारीवाद के सिद्धांत का पहला मील का पत्थर पहली बार 1946 में फ्रांसीसी में और 1953 में अंग्रेजी में प्रकाशित सिमोन द बोउवा (Simone de Beauvoir ) की कृति “द सेकेण्ड सेक्स” था, जिसमें व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण और नारी आन्दोलन की एक स्पष्ट दिशा के अभाव के बावजूद नारी उत्पीड़न के कई सूक्ष्म पहलुओं को रेखांकित किया गया था और यह प्रस्थापना दी गयी थी कि स्त्रियों की मुक्ति में ही पुरूषों की भी मुक्ति है जो स्वयं पुरूष स्वामित्व की मानवद्रोही मानसिकता के दास हैं । साठ के दशक के नारीवादी आन्दोलन की चेतना इस विचार से काफी प्रभावित थी । ऐसी दूसरी प्रसिद्ध कृति सुप्रसिद्ध नारीवादी नेता और 1966 में राष्ट्रीय नारी संगठन (अमेरिका) का गठन करने वाली बेट्टी फ्रीडन(Betty Friedan) की 1963 में प्रकाशित पुस्तक द फेमिनिन मिस्टिक(The Feminine Mystique) थी जिसमें स्त्रियों की घरेलू दासता और पुरूष-स्वामित्व को स्वीकार करने के लिए उनके दिमाग के ‘कंडीशनिंग’ की प्रक्रिया की उग्र लेकिन एकांगी एवं अनैतिहासिक आलोचना की गयी थी ।

साठ का दशक आधुनिक इतिहास के द्वित्तीय विश्वयुद्धोतर काल का एक महत्वपूरण मोड़ बिंदु था । विश्व पूंजीवादी तंत्र के सरदार उस समय गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे । तीस के दशक की मंदी के बाद अमेरिका तक में एक बार फिर बेरोजगारी पैदा हो रही थी और युवा असंतोष तीखा हो रहा था । पूरी दुनिया में जारी मुक्ति-युद्धों की लगातार सफलता साम्राज्यवाद के लिए एक गंभीर संकट को जन्म दे रही थी । वियतनाम में अमेरिका की पराजय निश्चितप्राय प्रतीत होने लगी थी । इसी सामाजिक उथल-पुथल के दौर में अमेरिका में अश्वेत आबादी का आन्दोलन नयी शक्ति के साथ फूट पड़ा था । मैकार्थीवाद और शीतयुद्ध के दौरान संचित जनता का आक्रोश सड़कों पर आ गया था । 1968 में हिन्दचीन में अमेरिकी हस्तक्षेप के विरूद्ध छात्रों-नौजवानों और फिर व्यापक अमेरिकी जनता का आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो नागरिक अधिकारों के आन्दोलन के साथ जुड़कर व्यवस्था के लिए संकट बन गया था । इसी समय फ्रांस में छात्रों का आन्दोलन एक ज्वार की भांति उठ खड़ा हुआ जिसमें बाद में मजदूर भी शामिल हो गए और अन्ततोगत्वा लौह पुरूष कहलाने वाले दगाल को राष्ट्रीय सभा भंग करने व इस्तीफ़ा देने के लिए विवश होना पड़ा । पूरा पश्चिमी जगत एक संकट और उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था । पश्चिमी नारी समुदाय भी इस उथल-पुथल से अछूता नहीं था बल्कि उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहा था । सच तो यह है कि यूरोप-अमेरिका में जनांदोलनों में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर स्त्रियाँ हिस्सा ले रहीं थीं । उत्पादन के अतिरिक्त सामाजिक सक्रियता के दायरे में इस बढती हुई शिरकत ने पश्चिम की नारियों — विशेषकर उनके युवा हिस्से की चेतना का धरातल नयी ऊंचाईयों तक उन्नत किया और दोयम दर्जे की नागरिकता एवं हर तरह के यौन-भेद के विरूद्ध स्त्रियों का प्रबल स्वतः स्फूर्त विद्रोह उठ खड़ा हुआ ।

साठ के दशक का पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन नारी शोषण के विरुद्ध एक बगावती उभार था । इस आन्दोलन में विविध चिन्तनों की मौजूदगी के बावजूद, इसकी कोई सुविचारित वैचारिक पूर्वपीठिका, दिशा और कार्यक्रम नहीं था । द्वित्तीय विश्वयुद्धोत्तर पश्चिमी उपभोक्ता संस्कृति की प्रतिक्रिया में पैदा हुई यह एक बगावत थी । पर विडंबना यह थी कि स्वयं इसकी दार्शनिक अंतर्वस्तु भी बुर्जुआ थी, जिसके चलते जल्दी ही आन्दोलन की मुख्यधारा ने विकृत उच्छ्रंखल बुर्जुआ संस्कृति के नैतिक-सामाजिक मूल्यों को अपना लिया । इस अंध-विद्रोह ने यौन-शोषण और यौन-उत्पीड़न पर खड़ी सामाजिक संस्थाओं की जगह मूल्य-संस्थाओं की कोई समग्र वैकल्पिक व्यवस्था नहीं प्रस्तुत की । विवाह, परिवार, एकल यौन-संबधों आदि को अराजकतावादी ढंग से नकारने की चेष्टा की गयी । पूर लड़ाई को पुरूष सत्ता के विरूद्ध केन्द्रित किया गया और इस सत्ता के ऐतिहासिक-सामाजिक-आर्थिक आधारों को जानने समझने की कोई विशेष चेष्टा नहीं की गयी । जाहिरा तौर पर ऐसा कोई आन्दोलन समाज में लम्बे समय तक टिका नहीं रह सकता और यही हुआ ।

पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन का सामाजिक विद्रोही तत्व धीरे धीरे क्षरित होता गया और आठवें दशक के मध्य तक यह एक बहुत छोटे से हिस्से, बुद्धिजीवी और युवा नारियों तक ही सिमट कर रह गया । यौन-भेद में ही सभी असमानताओं का कारण ढूँढने वाली बुर्जुआ अराजकतावादी स्त्रियाँ और संस्थाएं पूरी सच्चाई को ही सिर के बल खड़ा करती रहीं और अन्ततोगत्वा व्यवस्था को ही लाभ पहुंचाने का काम करती रहीं । पश्चिम के जिन नारीवादी विचारकों ने सातवें-आठवें दशक में कई पुस्तकें लिखीं , उनमे से किसी ने विश्लेषण का कोई समग्र, इतिहाससंगत नमूना प्रस्तुत नहीं किया । लेकिन यह जरूर है कि औरत की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता के प्रश्न को, समाज में उसकी अपनी स्वतन्त्र पहचान के प्रश्न को पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन ने चिन्ता और गाम्भीर्य के साथ उठाया और इतिहास के एजेंडा पर इसे महत्वपूर्ण स्थान दिलाया, भले ही उसने स्वयं इसका काल्पनिक अथवा अराजकतावादी समाधान प्रस्तुत किया हो । यही नहीं, गर्भपात, तलाक आदि मामलों को लेकर नारीवादी संगठनों ने जो मांगे उठाई और आन्दोलन चलाए, वे भी अत्यंन्त महत्वपूर्ण थे । नारीवादी आन्दोलन के दर्शन और इतिहासदृष्टि की अवैज्ञानिकता के बावजूद, इसके द्वारा उठाई गयी अधिकाँश मांगों और समस्यायों को एक सही सैद्धांतिक फ्रेमवर्क में अवस्थित करके एक क्रांतिकारी नारी आन्दोलन के कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है और उसके अनुभवों से काफी कुछ सीखा जा सकता है ।

9. और अंत में…

पश्चिम के पूंजीवादी समाज में, पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (Renaissance-Elightenment-Revolution) की ऐतिहासिक विकास-यात्रा के परिणामस्वरूप वहां के समाज में पुरूष-स्वामित्व और वर्चस्व के रूप सूक्ष्म है. जनतांत्रिक मूल्य सामाजिक जीवन में इस हद तक रचे-बसे हैं कि वहां इनका नग्न रूप कायम नहीं रह सकता । वहां स्त्री के साथ यौन-आधार पर कायम सामाजिक असमानता और भेदभाव मुख्य प्रश्न हैं । यौन-उत्पीड़न के आम रूप अत्यंत सूक्षम हैं । नारी की अस्मिता का प्रश्न पश्चिम में प्रबल है । नारी आन्दोलन का प्रमुख सांस्कृतिक पक्ष वहां उपभोक्ता संस्कृति की विकृतियों के विरुद्ध जनमानस तैयार करने का है ।

तीसरी दुनिया के अधिकाँश पिछड़े हुए देशों में नारी उत्पीड़न के नए पूंजीवादी रूपों के साथ-साथ उसके मध्ययुगीन नग्न स्वेच्छाचारी रूप भी कायम हैं । इनमें से कुछ देशों में आज भी अर्द्धसामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक तंत्र किसी-न-किसी रूप में कायम हैं और जिन देशों में साम्राज्यवाद पर आश्रित बुर्जुआ व्यवस्थाएं कायम हुई हैं, वे जनतांत्रिक मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं-संस्थाओं के मामले में पश्चिमी व्यवस्थाओं से बहुत पीछे हैं । भारत को उदाहरण के तौर पर लें । समाज विकास की मंथर गति तथा जनवादी क्रांतियों और तज्जन्य जनवादी मूल्यों के अभाव के चलते हमारे समाज में मूल्यों-मान्यताओं का प्राक्पूंजीवादी ढांचा अत्यंत धीमी गति से क्षरित होता हुआ आज भी कायम है और भारतीय पूंजीवाद नें इन्हें अपना लिया है । मनु के विधान यहाँ आज भी जिन्दा हैं । शिक्षा के प्रसार के बावजूद सामाजिक क्रियाकलापों से बहुसंख्यक नारी समुदाय, यहाँ तक कि उसका वह हिस्सा भी काफी हद तक कटा हुआ है जो सामाजिक उत्पादन में लगा हुआ है । मजदूर और गरीब किसान औरतें निकृष्टतम कोटि के उजरती गुलाम के रूप में ही सही, पर सामाजिक उत्पादन की कार्रवाई में हिस्सा लेती हैं, पर मध्यमवर्गीय औरतों , यहाँ तक तक कि शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक का बहुलांश चूल्हे- चौखट से पूरी तरह बंधा हुआ है और पति की सेवा, बच्चों का लालन-पालन और घरेलू उपयोग की चीजों के उत्पादन से अधिक कुछ नहीं करता । नौकरी करने वाली मध्यमवर्गीय स्त्रियां भी घरेलू गुलामी से मुक्त नहीं हैं । आज भी औरतों का पुरूषों से और पूरे समाज में जितना अमानवीय पार्थक्य (Segregation) भारत में है, उतना मध्य पूर्व के कुछ देशों को छोड़कर कहीं नहीं है । इस आधी आबादी को आर्थिक शोषण, लूटमार, मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं की दिमागी गुलामी, यौन-उत्पीड़न, पुरूष-स्वामित्व, पार्थक्य (Segregation) और अलगाव (Alienation) से मुक्त करना भारत और ऐसे तमाम देशों की क्रांतियों का दायित्व ही नहीं, बल्कि उनकी लड़ाई का एक ऐसा जरूरी मोर्चा है, जिस पर लड़े बिना ये क्रांतियाँ सफल हो ही नहीं सकतीं ।

भारत जैसे देशों में नारी मुक्ति आन्दोलन को वैचारिक धरातल पर तमाम विजातीय बुर्जुआ विचारों से संघर्ष करते हुए सही वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि, इतिहास-दृष्टि, संस्कृति और दिशा से खुद को समृद्ध बनाना होगा । साथ ही साम्राज्यवाद से आयातित और देशी पूँजीवाद द्वारा पोषित बुर्जुआ नारीवाद के दर्शनं के समूल नाश के लिए समग्र जनमुक्ति एवं नारी-मुक्ति की जातीय, जन-परम्पराओं से खुद को वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर अविच्छिन्न रूप से जोड़ना होगा ।

साम्राज्यवाद के वर्तमान नए दौर में यह बात अब दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि बुर्जुआ व्यवस्था के दायरे के भीतर, सुधारों के दायरे के भीतर नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी अब कुछ हासिल कर पाने की रत्ती भर भी गुंजाईश शेष नहीं है । उलटे, ढांचागत असाध्य संकट के दौर में — आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर में, पूरी दुनिया की पूंजीवादी व्यवस्थाएं अब ज्यादा से ज्यादा निरंकुश होते जाने की दिशा में अग्रसर हैं । ऐसे में अबतक के संघर्षों से अर्जित जनवादी अधिकारों की हिफाजत के लिए भी नारी समुदाय को राज्यसत्ता के विरूद्ध जुझारू लड़ाई लड़नी पड़ेगी । पहली बात तो यह है कि यह लड़ाई स्त्रियां तभी लड़ सकती हैं जब वे मजदूरों-किसानों के क्रांतिकारी संघर्षों में, लोक अधिकार आदोलनों में, क्रांतिकारी सांस्कृतिक आन्दोलनों में, क्रांतिकारी छात्र-युवा आन्दोलनों में पूरी भागीदारी करें । तभी वे आम जनता के पुरूष समुदाय को नयी चेतना देकर अपनी मुक्ति के लिए समर्थन हासिल कर सकेंगी और नारी मुक्ति के संघर्ष को स्त्री बनाम पुरूष का सघर्ष से बचाया जा सकेगा । दूसरी बात यह कि आज कामगार स्त्रियों के संगठन बनाने के अतिरिक्त जनमुक्ति संघर्ष के हिरावलों और अन्य क्रांतिकारी आन्दोलनों के नेतृत्व को मध्यमवर्गीय और जनता के सभी बर्गों की स्त्रियों को नारी उत्पीड़न और जनवादी अधिकारों के प्रश्न पर,व्यापक आधार वाले (वर्गीय संयुक्त मोर्चे की प्रकृति वाले) नारी संगठनों के बैनर तले संगठित करने की भी पहले से बहुत अधिक जरूरत है । साथ ही नारी मुक्ति के मुद्दे को उठाने वाले पहले से ही मौजूद ऐसे संगठनों को भी साथ लेने और उनमें शामिल होकर काम करने की संभावना मौजूद होने पर उनका उपयोग अवश्य ही किया जाना चाहिए । भारत जैसे देशों में स्त्रियों के जनवादी अधिकारों के लिए आंदोलनरत तमाम नारी संगठन महानगरों के शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक ही सिमटे हुए है । इनके साथ आम सहमती के कार्यक्रम पर सहमती के आधार पर काम किया जा सकता है और इनका विस्तार गावों-शहरों की आम स्त्रियों तक भी किया जा सकता है ।

तीसरी बात, यह कि जिस हद तक बुर्जुआ व्यवस्था और विश्वपूंजीवादी तंत्र की जरूरत है, उस हद तक सुधारपरक कार्रवाईयों के लिए आज बड़े पैमाने पर सरकारी आर्थिक मदद और तथाकथित स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिये आने वाली साम्राज्यवादी मदद के जरिये भारत जैसे देशों के कोने-कोने में तथाकथित स्त्री संगठन सुधार और आन्दोलन की कार्रवाईयों में लगे हैं । इनका मूल मकसद स्त्रियों को सुधार के दायरे में कैद करके उनकी तेजी से उन्नत होती चेतना को कुंद करना और उन्हें क्रान्ति की धारा में शामिल होने से रोकना है । स्त्री आन्दोलन के इन खतरनाक घुसपैठियों के विरुद्ध आज बड़े पैमाने पर प्रचार की और उनके प्रभाव को समाप्त करने की जरूरत है ।

इस सभी बातों और इनके सभी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही आज नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा और एक सुसंगत कार्यक्रम का निर्धारण किया जा सकता है ।

BACK TO POST [ १०-११ मार्च १९९२ को काठमांडू नेपाल में ‘अखिल नेपाल महिला संघ’ के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय भाषण के रूप में प्रस्तुत निबन्ध. नेपाली भाषा में पुस्तिकाकार प्रकाशित. ‘दायित्वबोध’, मार्च-जून, १९९३, जुलाई-अगस्त,१९९३ और नवंबर-दिसंबर, १९९३ अंकों में धारावाहिक प्रकाशित ]

हैती, भूकंप,तथाकथित ज्योतिष शास्त्र, पूंजीवाद और समाजवाद का परस्पर गहरा संबंध है, भाई !

Posted on Updated on

पूंजीवादी रूस के शहर नेफ्तेगोर्स्क में 27 मई 1995 के रेक्टर पैमाने 7.6 के भूकम्प ने इसकी कुल आबादी 3500 में से 2000 लोगों की जान ली. इस त्रासदी पर माइक देविड़ो ने अपनी ‘ मास्को डायरी  : रूसी आपदाएं, प्राकृतिक और अप्राकृतिक’ में समाजवादी सोवियत यूनियन के शहर ताशकंद के अप्रैल  26, 1966 के रेक्टर पैमाने 7.5 के भूकंप पर समाजवादी राज्य और उसकी जनता के बारे में लिखा है कि किस प्रकार राज्य और जनता का सैलाब इस शहर के लोगों की मदद के लिए उमड़ पड़ा. अविभाजित सोवियत यूनियन में पूंजीवाद की पुन:स्थापना हो चुकी थी लेकिन समाजवादी भावना का , पूर्ण रूप से, अंत नहीं हुआ था. अपनी यादों को ताज़ा करते हुए वे लिखते हैं,

“भूकम्प जिसने सखालिन द्वीप के शहर नेफ्तेगोर्स्क को गर्क कर दिया है, इससे भी बड़ी त्रासदी का प्रतीक है – उल्ट रूसी इन्कलाब, जिसने रूस और भूतपूर्व सोवियत यूनियन को समतल कर दिया है. प्राकृतिक आपदाएं सामाजिक व्यवस्थाओं की सीमाओं में फर्क करना नहीं जानती. लेकिन सोवियत यूनियन 26 अप्रैल 1966 के भूकम्प जिसने ताशकंद को तबाह कर दिया, पर किस प्रकार कार्यशील होता है और किस प्रकार पूंजीवादी रूस नेफ्तेगोर्स्क के भूकम्प और संभावित दुर्घटनाओं से निपटता है, में अंतर इतना साफ़ है कि वह अपनी कहानी स्वयं बयान करता  है.

मैं 1969 में ताशकंद में था. मैंने उज्बेकिस्तान की राजधानी ( 10 लाख की जनसंख्या का शहर) के जिंदा बचे लोगों से, उनके दहशत के न केवल किस्से ही सुने हैं बल्कि मैंने देखा है – ताशकंद को, सभी 15 गणराज्यों द्वारा, पुनर्निर्मित रूप में और पहले से भी अधिक सुन्दर रूप में ! वह भी केवल तीन वर्षों में ! 35 प्रतिशत शहर तबाह हो गया था. 95,000 लोग बेघर हुए, 45 प्रतिशत संयंत्रों को भारी नुकसान पहुंचा. 180 स्कूल, 600 दुकाने ढह-ढेरी हो गईं. भूकम्प के कुछ घंटों बाद ही CPSU   के महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव और प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन ताशकंद आ गए. USSR की सेना द्वारा तुरंत हरकत करने की उसकी प्रकृति ने  ‘महान राष्ट्रीय युद्ध” के दौरान सभी लोगों के हरकत में आने की यादों को ताज़ा कर दिया. प्रत्येक गणराज्य से लोग ताशकंद के लिए उमड़ पड़े. मास्को, लेनिनग्राद, रूस गणराज्य के सभी भागों से, उक्रेन से, अजेबेर्जान से, जोर्जिया, कजाखिस्तान, बेलारूस और बाल्टिक गणराज्यों से निर्माणकर्मी, ताशकंद के लिए रवाना हो गये. इन गणराज्यों ने वहाँ राहत सामग्री, औजार, और अपनी मशीने उतारना शुरू कर दिया. अपनी छुट्टियों का त्याग करते हुए सैनिक और विद्यार्थी उनसे जा जुड़े. ताशकंद के लोगों ने उनका अपने मुक्तिदाताओं के रूप में स्वागत किया. निर्माणकर्मी मेक-शिफ्ट बैरकों में दो से तीन वर्षों तक रहे.

सितंबर तक स्कूल पुन: खुल गये और 20,000 अपार्टमेंटों का निर्माण कर लिया गया – जो पिछले वर्षभर में निर्मित हुए कुल अपार्टमेंटों की संख्या का दोगुना था. लेकिन प्रतीकात्मक रूप से, जो चीज मैंने पाई, वह थी, “ताशकंद के पुन:निर्माण के समय समग्र सोवियत भावना” – प्रत्येक गणराज्य की विशेष भवन निर्माण शैली और कला, इस नए बसे शहर का अंग बन गयी.

और नेफ्तेगोर्स्क ? खो गया है वह महान परिवार जो अपने ही जैसे परिवार के दुःख भरे हालात से विचलित हो गया था ! खो गयी है वह बहन-भाईचारे की भावना जो एक को दूसरे से बाँधे हुए थी ! वर्तमान “स्वतंत्र” गणराज्यों से सांत्वना और टोकन सहायता आई है, पर यह आई है अजनबियों से ! पूंजीवादी रूस ने नेफ्तेगोर्स्क के सभी भूकंपलिख स्टेशनों का “मितव्ययीकरण” कर दिया है.  विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वे चालू हालत में होते, तो तबाही की समय पर चेतावनी मिल सकती थी.

राष्ट्रपति येल्स्तिन इस शहर में अभी तक नहीं आये हैं. भूकंप के कुछ दिनों बाद, प्रधानमंत्री  चेर्नोगिर्दिन ने अपनी छुट्टियाँ समाप्त कीं, लेकिन मास्को जाने के लिए. इतना ही काफी नहीं है कि प्राकृतिक आपदाओं  से निपटने के लिए दृष्टिकोण में इतना बड़ा अंतर है, बल्कि सच्चाई यह है कि अब आपदाएं पूंजीवादी रूस और ‘स्वतंत्र’ गणराज्यों के लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन गयी हैं. भाई-भाई के बीच खून-खराबा, चैचैनया का नागरिक युद्ध, 20 लाख रूसी शरणार्थी जो युद्ध से भाग आये हैं, और उनके साथ केन्द्रीय एशिया और बाल्टिक के “स्वतंत्र” गणराज्यों द्वारा भेदभाव, नागोमों काराबाख में आर्मीनिया युद्ध के शरणार्थी; माल्डोवा – प्रेदानेस्त्रोवा, ओसेतिया इंगुश गणराज्य, अब्कासिया; जोर्जिया – भूतपूर्व सोवियत यूनियन का  कोई भी ऐसा अंग नहीं है , जो सामाजिक तबाही और मानव-त्रासदी से अछूता हो. और इसके साथ ही हमें शामिल करना चाहिए मास्को के नरसंहार को. 1988 के आर्मीनिया के भूकंप से तबाह शहर अब तक  भी पुन: निर्मित नहीं हो सके हैं . ये समाजवाद के अवरोहण से, अपराधी पूंजीवाद के पोषण के लिए, वसूली करने की क्रूरता के साक्षी हैं. आर्मीनिया के येल्स्तिनों ने भाई को भाई से लड़कर मरने के लिए करोड़ों खर्च कर दिए हैं और भूकंप से प्रभावित 2 लाख से अधिक लोग अस्थायी घुरनों में रहने को विवश हैं. ग्रोस्नी और नेफ्तेगोर्स्क, स्तालिनग्राद और ताशकंद में यही फर्क है.

यह फर्क पूंजीवादी रूस और भूतपूर्व सोवियत यूनियन के लोगों का साये की तरह पीछा करता है. पायनियर कैम्प या तो बंद कर दिए गए हैं या फिर उनका व्यवसायीकरण हो गया है. काले सागर के अनापा में छुट्टियाँ बिताने का प्रति माता या पिता और एक बच्चे का 21 दिनों का खर्च 4,500,000 से 5,000,000 रूबल तक है. सोवियत ज़माने में यह खर्च 200 रूबल था जिसका 70 प्रतिशत ट्रेड युनियाने देती थीं. नेफ्तेगोर्स्क के भूकंप ने कड़वाहट में ही बढौतरी की है. तबाही का लगातार भरता हुआ यह वह जाम है जिसे रूस और भूतपूर्व गणराज्यों के लोग पी रहे हैं.”

लेखक के उपरोक्त संस्मरण को प्रकाशित करके हम साबित करना चाहते हैं कि समाजवाद और पूंजीवाद , भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाएं और तथाकथित ज्योतिष अंकविज्ञान आपस में जुड़े हुए हैं, क्योंकि समाजवाद प्राकृतिक आपदाओं से निपटते हुए मानव की जरूरतों और  गौरव की रक्षा करता है. जबकि तथाकथिक ज्योतिष अंकविज्ञान का मकसद पूंजीवाद की तरह ही, मानव द्वारा मानव की मजबूरी और अज्ञानता से लाभ कमाना होता है. पाठकों को भूलना नहीं चाहिए कि जब तक समाजवाद, हमारी पृथ्वी के एक बड़े हिस्से पर, विद्यमान था, तो इसके डर के चलते, पूंजीवाद वह सभी  सहूलियतें  देता रहा जो समाजवाद का अभिन्न अंग होती हैं. और अब उसे इन सहूलियतों जैसे आवास, शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के “मितव्ययीकरण” और निजीकरण को उदारवादी नीतियों के रूप में प्रचारित करके और लागू करके, मुनाफे की हवस की पूर्ति होने पर, मज़ा आता है. उदारीकरण से इनका अर्थ पूंजीपतियों के लिए “उदार” और मेहनतकश जनता के प्रति “क्रूर” होना होता है.

दूर जाने की जरूरत नहीं है. हमारे देश में कुछ वर्ष पूर्व आई  सुनामी और गुजरात के भूकम्प-पीड़ितों  के लिए आई अंतरराष्ट्रीय मदद को पीड़ित लोगों तक पहुँचाने के लिए सक्रिय नौकरशाही द्वारा आपस में बंदरबांट के, हम चश्मदीद गवाह हैं. ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि, पूंजीवादी समाज द्वारा निर्मित मानव और उसके दूसरों के कपड़े तक उतार लेने के संस्कार, उससे उसके इन्सान होने के मायने ही छीन लेते हैं.

एक लंबे समय तक हमारी पृथ्वी के एक बड़े हिस्से पर समाजवाद रहा है. ऐसा नहीं है कि समाजवाद ने भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना न किया हो. पाठकों को इनका अध्ययन करना चाहिए. लेकिन मुख्य मुद्दा पूंजीवादी समाज और समाजवादी समाज के उदेश्य में फर्क का है. एक के केंद्र में व्यक्तिगत मुनाफे की हवस है तो दूसरे के केंद्र में पूरा मानव समाज और उसकी भलाई. मानव के साथ व्यवहार करते समय पूंजीवाद को फ़िक्र होता है कि किस प्रकार उसका शोषण किया जाये. इस उद्देश्य की पूर्ति हेतू वह मनुष्यों को अलग-अलग  स्थानों पर, चालाकी या धूर्तता से, ‘ठिकाने लगाने’  – जहाँ उनका अधिक से अधिक शोषण हो, की फ़िराक में लगा रहता. जबकि समाजवाद में , जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं, मनुष्य नहीं बल्कि वस्तुओं का प्रबन्धन स्थान ले लेता है. इस समाज को इंसानों को ‘ठिकाने लगाने’ का कतई फ़िक्र नहीं होता – इसे फ़िक्र होता है कि किस प्रकार मानव की जरूरतों को केंद्र में रखकर उत्पादन किया जाये और वस्तुओं को जरूरतमंदों तक पहुँचाया जाये. किसी भी रूप में मुनाफा, समाजवादी समाज का उद्देश्य नहीं होता.

वैज्ञानिक विकास और तकनीक के तेज विकास की इस इक्कीसवीं शताब्दी में “हैती के भूकंप” से पैदा हुई प्राकृतिक त्रासदी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

मानव आदिम युग से आधुनिक युग तक, जीवन के संघर्ष में, प्रकृति के साथ अपने द्वंदात्मक रिश्तों की बदौलत, संघर्ष करता हुआ, विकास की मौजूदा मंजिल तक पहुंचा है. विज्ञान और तकनीक के मौजूदा स्तर ने ऐसा भौतिक आधार तैयार कर दिया है, जिसके द्वारा भूख, कंगाली और आवास की समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है. भूचाल और सुनामी जैसे कहर से घटित होनेवाली तबाही पर, बेशक पूरी तरह से नहीं, पर काफी हद तक निपटा जा सकता है. प्राकृतिक विपदाओं की पूर्व-सूचना हासिल करनेवाले अन्वेषण कार्यों को तरजीह देनी चाहिए. भवन-निर्माण और आवासीय घरों के निर्माण की ऐसी तकनीक विकसित करने पर जोर देना चाहिए, जिनसे प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए, कम से कम नुकसान हो.

कौनसी समस्या है जो इस तरह के कार्यों को अंजाम देने में रूकावट बनती है ? दूसरे विश्व-युद्ध के समय ब्रिटिश सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार रहे, प्रसिद्ध विज्ञानी जॉन डेस्मोंड बरनाल ने लिखा है, ” प्रचुरता और अवकाश के एक युग की समूची  संभावनाएं हमारे पास हैं, लेकिन हमारा यथार्थ एक विभाजित विश्व का है, जिसमें इतनी भूखमरी, मूर्खता और क्रूरता है जितनी आज तक कभी नहीं रही.” – विज्ञान की सामाजिक भूमिका, पेज 7. हैती के भूकंप  में लाखों लोगों की मौत, भारी गिनती में बेघर और जख्मी लोगों के दुखों और मुसीबतों ने, सभ्य समाज को हिला कर रख दिया है.

एक ब्लॉगर सज्जन का प्रश्न है कि हैती, भूकंप, ज्योतिषशास्त्र , समाजवाद और पूंजीवाद का आपस में क्या संबंध है ? शायद हमारे यह विद्वान सज्जन, जानबूझ कर, अपनी किसी मजबूरी के चलते, इतने महत्त्वपूर्ण प्रश्न को, मज़ाकिय ढंग से उछाल रहे हैं. आज साधारण लोग भी समझते हैं कि मानव-विश्व के निरंतर विकास के चलते, प्राकृतिक-विश्व से दो-चार होने की मानव-सामर्थ्य में निरंतर बढौतरी हुई है. आदिम युग में मौजूद प्रकृति की ओर से प्रस्तुत लाखों चुनौतियों पर वर्चस्व हासिल कर, समाज के विकास को गति प्रदान की. बड़ी-बड़ी नदियों पर बाँध बनाकर, भयंकर तबाहियों पर काबू पाया जा चुका है. तकनीक के विकास से, पैदावार के क्षेत्र में, असीम बढौतरी हुई है. हर युग में, पैदावार का स्तर और उसके वितरण का तरीका ही, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संरचना को तय करता है. मानव-समाज, आदिम कबीलाई सामाजिक संरचना से लेकर, गुलामदारी, सामंती और पूंजीवादी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं से भी आगे समाजवाद के प्रारंभिक प्रयोग भी कर चुका है.

प्राकृतिक-विश्व और मानव-विश्व के संबंध सदैव एकसार नहीं रहे हैं. इन संबंधों के विकास ने मानव को, प्रकृति की विध्वंसकारी शक्तियों पर वर्चस्व हासिल करने के योग्य बनाया है. प्रकृति का हिस्सा होते हुए भी, प्रकृति और मानव के संघर्ष में, मानव ने प्रकृति को अपने हित में बदलते हुए, लगातार स्वयं को भी बदला है.

पूर्व पूंजीवादी समाजों में, मानव और प्रकृति के संघर्ष में, प्रकृति से हुई छेड़छाड़, समूचे प्राकृतिक-विश्व को, कोई उल्लेखनीय हानि नहीं पहुंचाती थी. मानव द्वारा प्रकृति के खजानों के उपयोग दौरान होनेवाले नुकसान, प्रकृति द्वारा स्वयं पुन: भरपाई के सामर्थ्य के दायरे का, उल्लंघन नहीं करते थे.

हमारा इस तर्क से कोई मतभेद नहीं है कि भूकम्प और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएं, पृथ्वी की उत्पति के समय से ही, यानी लाखों-करोड़ों वर्षों से ही, घटित होती आ रही हैं. प्राकृतिक परिघटनाओं के अपने नियम हैं, जिनकी बदौलत पृथ्वी के अंदर और बाहर के वातावरण में घटित होनेवाली हलचल, कई बार भयानक तबाही का सबब बनती है. इस बात से भी सभी सहमत हैं कि जंगलों की तबाही, मशीनरी के अंधाधुंध उपयोग, जंग-युद्धों में उपयोग होनेवाले बारूद और रासायनिक हथियार और परमाणु तजुर्बों से पैदा होनेवाले प्रदुषण से प्रकृति का संतुलन लडखडा रहा है. प्रकृति अपने जख्मों की बहाली के लिए, सचेत मानव प्रयास की मोहताज हो गयी है.

मतभेद इस सच की पेशकारी को लेकर है. बड़ी चालाकी से, तमाम मानव जाति को, इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर, मुजरिम अपने गुनाहों पर पर्दा डाल देता है. कौन है वह मुजरिम, जो इक्कीसवीं शताब्दी के रोशन दिमाग इन्सान को भी, चकमा देने में कामयाब हो जाता है ? इस सवाल के जवाब से पहले, हमारे लिए, अपने वर्तमान और भूतकाल  के संबंधों के बारे में, थोड़ी सी चर्चा जरूरी है.

आज मानव के पास ज्ञान का एक बड़ा खजाना मौजूद है. इसके अलावा, समस्त मानव जाति को खुशहाल और बढ़िया जिंदगी मुहैया करवा सकने के सभी साधन मौजूद हैं. विज्ञान और तकनीक के विकास ने, वह भौतिक आधार तैयार कर दिया है, जिसपर, ऐसा समाज निर्मित होना संभव है, जहाँ भूखमरी और बिमारियों समेत, हर किस्म के अभाव पर वर्चस्व हासिल किया जा सकता है.

अपने आरंभिक दौर में, मानव प्रकृति की शक्तियों के अधीन था.  आदिम समाज मजबूरी का साम्यवाद था. उत्पादक शक्तियों के विकास के एक विशेष पड़ाव पर, मानव समाज वर्गों में – मालिक और गुलामों में विभाजित हो गया. यह सब कैसे हुआ? समाज विकास के किन नियमों ने, उन ऐतिहासिक परिवर्तनों को दिशा और गति दी, यह एक अलग विषय है. मानव-संस्कृतियों के इतिहास में, अलग-अलग भौतिक भूभागों में, वहां के वातावरण और ऐतिहासिक परस्थितियों की विभिन्नताओं के चलते, अपनी-अपनी विशेषताएँ मौजूद थीं, जिनके कारण वे अपनी अलग पहचान रखते हैं. परंतु ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि अपनी सभी विभिन्नताओं के बावजूद, प्रत्येक भूभाग के इतिहास में, कुछ चीजें साझी हैं. मिसाल के लिए, सभी की सभी सभ्यताएं, अपने-अपने विशेष लक्षणों के बावजूद, आदिम समाजवादी समाज, गुलामों-मालिकों के समाज और सामंतवादी सामाजिक-राजनीतिक आर्थिक प्रबंधों के दौर में से गुजरी हैं.

आज का युग, पूंजीवाद का युग है. इंग्लैण्ड के औद्योगिक इन्कलाब और फ़्रांसिसी इन्कलाब से शुरू हुई, आर्थिक और राजनीतिक तब्दीलियों ने, लगभग समस्त दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. पूंजीवाद के आगमन ने, मध्यकालीन जड़ता को तोड़कर, मानव-सभ्यता को बेहद तेजी से, पहले के मुकाबले विकास के बेहद ऊँचे स्तर पर, पहुंचा दिया. मजदूर वर्ग और मेहनतकश लोगों के आधार पर टिका पूंजीवाद, अपने विकास के साथ-साथ, आम लोगों के लिए भारी मुसीबतें साथ ही लेकर आया. अपने चरित्र के चलते ही, पूंजीवादी विकास समस्त संसार में एकसमान नहीं हुआ. असमान विकास इसके तौर-तरीकों में ही निहित है. पूंजीवादी विकास की आन्तरिक विरोधता के कारण, यह निरंतर मंदी के चक्रों की सजा भुगतता आ रहा है. पूंजीवाद का इतिहास, बस्तीवाद, नवबस्तीवाद के दौरों से गुजरता हुआ, आज नव-आर्थिक साम्राज्यवादी दौर से गुजर रहा है. बीसवीं सदी के आरंभ में ही, पूंजीवाद के साम्राज्यवादी पूंजीवाद की मंजिल में पहुँचने के साथ, इसके चरित्र में अधिकतर परजीविपन आ गया है. साम्राज्यवादी पूंजी ने, जहाँ दुनिया भर के कमजोर राष्ट्रों को, अपने कच्चे माल की मंडियां बनाकर लूटा, वहीं अपने-अपने देश के मजदूरों की लूट की दर को भी लगातार बढ़ाना जारी रखा. परिणामस्वरूप यूरोप के देशों और अमेरिका के मजदूर वर्ग ने, पूंजीवाद की बर्बर लूट के विरुद्ध, शानदार संघर्ष किये. दूसरी तरफ, साम्राज्यवादी पूंजी की लूट के शिकार, तीसरी दुनिया के देशों में, लड़े जानेवाले महान राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों ने, दुनिया में बस्तीवाद का निपटारा कर दिया. पूंजीवाद के इतिहास पर नज़र दौड़ाने पर, जो विशेष लक्षण उभरता है, वह है – विकास की विषमता. विश्व स्तर पर पूंजीवाद विरुद्ध, मजदूर वर्ग की विकसित राजनीतिक चेतना, विचारधारा के रूप में, प्रकट हुई. रूस, चीन, क्यूबा, पूर्वी यूरोप और एशिया के कई देशों में समाजवादी इन्कलाब करके, मजदूर वर्ग ने साम्यवादी समाज के निर्माण के पहले तजुर्बे किये.

बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक विश्व रंगमंच पर, पूंजीवादी राजनीतिक आर्थिक संरचनाओं में भी, भारी फर्क नज़र आते हैं. एक तरफ साम्राज्यवादी पूंजीवाद, अपनी क्रूरता और लूट के सर्वोच्च स्वरूप फासीवाद समेत, अपने देश के मजदूरों और मेहनतकशों और तीसरी दुनिया के देशों की कच्चे माल की सीधी लूट के रूप में मौजूद था. दूसरी ओर तीसरी दुनिया के गुलाम देश, राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के द्वारा, बस्तीवादी गुलामी और अपनी पुरानी सामंती व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे. तीसरी दुनिया के  देशों का आर्थिक-सामाजिक स्तर भी एकसमान नहीं था. अफ्रीका, लातिनी अमरीका, मध्य पूर्व और एशिया के और कई देश, अपने-अपने राजनीतिक-आर्थिक धरातल के अनुसार, अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे. इन नवस्वतन्त्र देशों में क्यूबा, उत्तरी कोरिया, इंडो चीन और चीन जैसे देशों ने, समाजवादी क्रांतियों का रास्ता चुना. तब तक, 1917 का रूसी इन्कलाब, दुनियाभर के मजदूरों के लिए, विचारधारा के क्षेत्र में, उच्च प्रेरणा स्रोत बन चुका था. दुनिया के बड़े हिस्से में, मजदूर और मेहनतकश लोग, हर किस्म की लूट-खसूट ख़त्म करके, कम्युनिस्ट समाज के निर्माण की ओर अग्रसर होने के पहले प्रयोग कर रहे थे. परिणाम स्वरूप, इतिहास ने पहली वार, मजदूर वर्ग की बेमिसाल शक्ति के दर्शन किए.

पूंजीवाद और समाजवाद के संघर्ष के इन पहले प्रयोगों में, मजदूर वर्ग वक्ती तौर पर हार गया है. इन देशों में पूंजीपति वर्ग ने विश्व पूंजीवाद की मदद से, समाजवादी देशों में, पूंजीवाद की पुन:स्थापना कर ली है.

नए आजाद हुए अधिकतर देशों में भी, पूंजीवादी आर्थिक रिश्ते स्थापित हो चुके हैं. आज मोटे तौर पर हमारे देशों में, पूर्व पूंजीवादी आर्थिक-रूपों का निपटारा हो चुका है. राजनीतिक ढांचे के रूप में जहाँ कहीं, पिछड़े सामंती रूप नज़र आ रहे हैं, वहाँ भी आर्थिक-सामाजिक क्षेत्र में, पूंजीवादी रिश्ते अपनी पकड़ बना चुके हैं.

सारांश के तौर पर, अपनी सभी क्षेत्रीय विशेषताओं और विभिन्नताओं के बावजूद, सारा विश्व पूंजीवाद के तर्क अनुसार गतिमान है.

इस व्याख्या की रौशनी में, हम अपने पहले प्रश्न की ओर आते हैं. मानव-विश्व के इतिहास का प्राकृतिक-विश्व पर गहरा असर पड़ता है. आज जलवायु प्रदुषण, ओजोन परत में सुराख़, कार्बन उत्सर्जन, गलेशियारों का पिघलना, वनों की बर्बादी, भूकम्प और सुनामी आदि की चर्चा के समय, विज्ञानी और विद्वान सज्जन, समस्त मानव जाति की गलतियों की ओर  ऊँगली उठाते हैं. इसी मुकाम पर सामाजिक व्यवस्थाओं और प्राकृतिक परिघटनाओं में घटित होनेवाली हलचलों का परस्पर संबंध, महत्त्व ग्रहण करता है. मानव-इतिहास में, पूंजीवादी प्रबंध ही एक ऐसा प्रबंध है, जहाँ पूंजीपति वर्ग की मुनाफे की हवस बेलगाम हो जाती.  इसी मुनाफे की हवस ने, जंगल तबाह कर दिए हैं, पृथ्वी के धरातल तले पानी बेहद घटा दिया है. जंग-युद्धों के लिए और आधुनिक तकनीक के विकास के लिए, विज्ञान का दुरूपयोग किया है. जाने या अनजाने, सारी मानव जाति को, इस तबाही के लिए जिम्मेदार ठहराना, असल मुजरिम को छुपाने या पनाह देने के तुल्य है. यह तरीका पीड़ित मानव-जाति के विरुद्ध, पूंजीपति वर्गों की सेवा करता है.

आज हर क्षेत्र में जो आर्थिक सरगर्मी नजर आ रही है, उसका मुख्य प्रेरणा स्रोत ‘मुनाफा’ है. माल मंडी के लिए उत्पादित होता है, मानव-आवश्यकता के लिए नहीं. परिणाम स्वरूप महंगाई, अन्न का संकट और बेरोजगारी जैसी समस्यायों का हल नज़र नहीं आ रहा.

बेहिसाब उत्पादक क्षमता वाले, भारत जैसे देश की आधी से ज्यादा आबादी, रात को भूखा सोती है.

अति आधुनिक सुविधायों से सुसज्जित हस्पतालों का जाल बिछ जाने के बावजूद, ये सहूलियतें 90 फीसदी जनता की पहुँच से बाहर हैं.

मानव गौरव, पैसे की कमीनी दौड़ तले, कुचला जा रहा है. सभी आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सरगर्मियों का केंद्र मानव न होकर ‘मुनाफा’ हो गया है. यह स्थिति मुठ्ठीभर धन-पशुओं का तुष्टिकरण तो कर सकती है लेकिन करोड़ों मेहनतकश लोगों की जीवन-स्थितियों को बेहतर नहीं बना सकती. मजदूर और मेहनतकश लोगों की मुक्ति और अच्छा भविष्य, इस पूंजीवादी प्रबंध के खात्मे और समाजवादी प्रबंध के निर्माण के संघर्ष से जुड़ा हुआ है. केवल निजी संपत्ति के खात्मेवाले समाजवादी प्रबंध के निर्माण द्वारा ही, सभी लोगों को, अपनी योग्यताओं के सर्वांगीण विकास के लिए, अवसर उपलब्ध हो सकते हैं, जिसके केंद्र में, मुनाफे की हवस में पागल हुए, धन-पशु नहीं, बल्कि आम लोग होंगे. बीसवीं शताब्दी के समाजवादी क्रांतियों के प्रथम चक्र के प्रयोगों ने साबित कर दिया है कि किसी भी अन्य प्रबंध की भांति, पूंजीवादी प्रबंध भी  स्थायी नहीं है. इन इन्कलाबों ने, मजदूर वर्ग की असीम शक्ति और सामर्थ्य को भी इतिहास के रंगमंच पर प्रकट कर दिया है. वक्ती तौर पर, समाजवाद की हार और पूंजीवाद की पुन:स्थापना से, पूंजीवादी शिविर में जो जश्न का माहौल बना हुआ था, उसका भी आर्थिक महामंदी ने निपटारा कर दिया है.

इक्कीसवीं शताब्दी, विश्वभर में, नये समाजवादी इन्कलाबों के अगले चक्र की सदी होगी. जहाँ प्रत्येक मनुष्य के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ, समस्त मानव जाति, प्राकृतिक आपदाओं का मुकाबला करने के लिए, समर्थ होगी.

विशेष आभार : http://www.hartford-hwp.com/archives/63/055.html

हैती के लोगों के भूंकप में मारेजाने का दोषी विश्व-पूंजीवाद नहीं तो और कौन है

Posted on Updated on

पहले हैती के बारे में :

* 90 लाख की आबादी वाला कैरिबियन राष्ट्र हैती, कभी फ़्रांस का उपनिवेश रहा है. यह काले लोगों का विश्व का सबसे प्राचीन गणतंत्र है जिसे, आजाद हुए इन लोगों ने, बगावत द्वारा 1804 में स्थापित किया.

* यह अमेरिका का सबसे गरीब देश है जिसकी प्रति व्यक्ति आय $560 है. UNDP मानव विकास तालिका में शामिल 177 देशों में इसका स्थान 146 वाँ है.

* आधी से अधिक आबादी 1 डालर प्रतिदिन से कम पर और 78 प्रतिशत आबादी 2 डालर प्रतिदिन से कम पर गुजारा करती है. शिशु मृत्यु दर बहुत अधिक है – 1000 पर 60 बच्चे. 15 और 49 के बीच HIV की मौजूदगी 2.2 प्रतिशत है.

* हैती का मूलभूत ढांचा पूर्णतया जर्जर हो चुका है. वनों की अंधाधुंध कटाई ने केवल  2 प्रतिशत भू-भाग पर ही वन छोड़े हैं.

* चावल की घरेलू और विदेशी बिक्री में 50 प्रतिशत की गिरावट आई और पूंजीवाद की मंदी ने वहां के किसान को तबाह कर दिया. इन उजड़े हुए किसानों के कारण Port-au-Prince की आबादी केवल 20 वर्षों में दुगनी – 40 लाख हो गयी.

* हैती की केन्द्रीय सरकार द्वारा दक्षिण के साथ भेदभाव के कारण अलगाववादी शक्तियां भी सिर उठा रही हैं.

हैती के लोगों की गरीबी और वर्तमान दशा के कारणों का पर्दाफाश करना होगा. क्या कारण है की पोर्ट-औ-प्रिंस गरीब और ग्रामीण लोगों से भरा हुआ है ?  क्यों उनकी संख्या एकदम 40 लाख तक जा पहुंची है ?

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आगे घुटने टेकने से पहले, चावल हैती का प्रमुख निर्यात रहा है. साम्राज्यवादियों, विशेषतया अमेरिका के हितों की पूर्ति हेतू 1980 में मुक्त बाज़ार और उदारवादी नीतियों के चलते, हैती की सीमा को खोल दिया गया, जिससे व्यापार रुकावटों के समाप्त हो जाने से चावल, जिसे अमेरिका में सब्सिडी मिलती थी, हैती के लिए निर्यात होने लगा और वहां का चावल उद्योग नष्ट हो गया. ( यहाँ यह बता देना जरूरी है कि विकसित और विकासशील और गरीब देशों के बीच अन्तरविरोध से विकासशील और गरीब देशों की बुर्जुआ सरकारों और उनके एन. जी. ओ. का मकसद इस अन्तरविरोध का फायदा अपने बुर्जुआ वर्ग को दिलाना होता है. इसलिए वे अंतरराष्ट्रीय मंचों और सम्मेलनों में विकासशील और गरीब देशों की दयनीय स्थिति का वास्ता देकर विकसित और साम्राज्यवादी देशों से जोड़तोड़ और सौदेबाजी करने में और स्वयं के देशों की जनता को बरगलाने में कामयाब हो जाते हैं. हकीकत में ये देश अपने देश की मेहनतकश जनता को लूटते और शोषण करते समय कोई रियायत नहीं देते.)

और इन नीतियों का फायदा किसे हुआ ? अमेरिका की भोजन सामग्री निर्माता कम्पनियों ने हैती के बाज़ारों में निर्यात करके करोड़ों कमाए. विदेशी कारपोरेशनों, जो हैती के नगरों में अपनी दुकाने खोलने में सफल रहे, ने गांवों से शहरों की ओर पलायन करने वाली सस्ती श्रम का जीभरकर शोषण किया. और हैती के लोगों के हिस्से में आई गरीबी, जिल्लत और तबाही.

हैती में आये भूकंप से मरनेवाले और प्रवाभित होनेवाले लोगों की संख्या लाखों में होने का अनुमान है. दुःख का विषय है कि इसे इस प्रकार पेश किया जाता है जैसेकि ये ऐसी प्राकृतिक आपदाएं हैं जिन पर मानव  काबू पाने में अक्षम है. या फिर ज्योतिष और तथाकथित अंकवैज्ञानिक माहिर इसे अपनी सच हो चुकी भविष्यवाणी के रूप में भुनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते. कहने को वे कहेंगे कि काश उनकी यह भविष्यवाणी गलत साबित होती तो मासूम लोग इस असामयिक मौत की आगोश में जाने से बच जाते. इसमें भी इनका फायदा होता है क्योंकि इसे अपराधबोध स्वीकृति के रूप में भुनाने का एक और मौका होता है.

ऐसे क्षणों में, इस कयामत के कारणों की पड़ताल राजनीतिक और सामाजिक सन्दर्भ में रखकर करना महत्त्वपूर्ण है. इस सन्दर्भ के बिना हैती के लोगों की मुश्किलों और उनके मसलों के हल नहीं ढूंढे जा सकते.उन्हें समझा नहीं जा सकता.  हिलेरी क्लिंटन का कहना ” यह कयामत ऐसे है जैसे कोई बाइबिल का फरमान हो जो हैती और हैती के लोगों का साये की तरह पीछा कर रहा है.”  इस प्रकार की बनावटी परन्तु आलोचनात्मक दीखने वाली टिप्पणी जो हैती के लोगों की पीडाओं के लिए भगवान को दोष दे – इससे अमेरिका और फ़्रांसिसी साम्राज्यवादी अपने चेहरे  छुपा नहीं सकते.

हैती के लोगों की मौत और तबाही केवल इस १२ जनवरी को आनेवाले भूकम्प के कारण ही नहीं है. दो शताब्दियों तक पहले फ़्रांसिसी और बाद में अमेरिका, हैती के लोगों की धन-संपदा को लुटते रहे – बलात्कार करते रहे, ठगते रहे और जनवादी तरीके से चुने हुए उनके नेताओं का अपहरण करते रहे. थोडा समय पहले ही अमेरिका ने वहां अपनी ‘अधिग्रहण बल’ की टुकड़ियों को तैनात किया है जिन्होंने हैती के लोगों को असुरक्षित इमारतों में, एक दूसरे के ऊपर-नीचे रहने, खुले स्थानों पर खाना पकाने, अपने पास बचे रेत-कंकड़ मिले आटे से अपने बच्चों का पेट भरने के लिए मजबूर कर दिया है. ‘अधिग्रहण बल’ का उद्देश्य कुछ और नहीं बल्कि उन्हें संगठित होने से रोकना है ताकि वर्तमान स्थिति यूं ही चलती रहे. इनके चलते ही इस गोलार्द्ध का यह देश सबसे गरीब रहा है. बेरोजगारी, उचित आवास की कमी, पराधीनता और अधिकारविहीन जनता के दुखों का कारण भी अमेरिका के अधिग्रहण से हुआ है.

विश्व-पूंजीवाद की सरकारें और उनकी मानव हितैषी एजेंसियां अपने दानवीर होने के मुखौटे पहनकर सहायता के लिए पहुँच गयी हैं जिन्हें बुर्जुआ मीडिया द्वारा ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे इनके दिलों में इन पीड़ित लोगों के प्रति सच्ची हमदर्दी हो. लेकिन वहां कार्यरत कुछ सामाजिक संस्थाओं ने इन लोगों से सहायता न लेने की और इन साम्राज्यवादी देशों की नीतियों का पर्दाफाश करने की हिम्मत दिखाई है. वे सलाम की हक़दार हैं.

यह सही है कि हमारे ग्रह की प्लेटें भूकम्प पैदा करती है लेकिन तबाही के लिए जिम्मेदार मौजूदा विश्व पूंजीवादी व्यवस्था ही है. संसाधनों का वितरण और योजनायें उनके असर को कम करने और बाद में उनके असर से निपटने के लिए निर्णायक भूमिका अदा करती हैं. हैती और उसका पडौसी देश क्यूबा – ये दोनों देश भयंकर तूफानों के साझे गवाह हैं.परन्तु 2008 में आनेवाले क्रमबद्ध तूफानों से जहाँ हैती में मरनेवाले लोगों की संख्या 800 थी वहां क्यूबा में केवल 10 लोग ही अपनी जान गंवा सके. यह इसलिए हुआ कि क्यूबा का समाज विदेशियों और पूंजीपतियों के मुनाफे और हितों के लिए संगठित नहीं हैं बल्कि उसके केंद्र में वहां की जनता के हित हैं.पश्चिम  गोलार्द्द का सबसे गरीब देश हैती जोकि औपनिवेशिक प्रणाली की सबसे क्रूर विरासत है, जिसके लोगों के जीवन को उत्तर औपनिवेशिक लूट ने और अधिक कष्टदायी बना दिया है. ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि विश्व साम्राज्यवादी पूंजीवाद, जो लोगों के दुखों का असली कारण है, का पर्दाफाश किया जाये. अमेरिकन साम्राज्यवाद, जिसकी नीतियों ने वहां के चावल उद्योग को नष्ट कर दिया है और लोगों को गन्दी बस्तियों में धकेल दिया है – अगर हैती के लोगों के भूंकप में मारेजाने का दोषी विश्व-पूंजीवाद नहीं तो और कौन है ?

अमेरिका में क्रांति नजदीक है : रेमंड लोट्टा – अर्थशास्त्री

Posted on Updated on

नोट : गिरिजेश राव के एतराज को स्वीकार करते हुए इस वीडियो से संबंधित सामग्री से परिचय करवाने की कोशिश के रूप में, निम्नलिखित सामग्री को हिंदी में छापा जा रहा है.

इस संक्षिप्त से इंटरवियू  में रेमंड लोट्टा का कहना है कि हमारे अधिकत्तर दुखों का कारण है – विश्व पूंजीवाद, जिसका नेतृत्व अमेरिका करता है. जलवायु संकट और मौजूदा वित्तीय संकट जिससे विश्व पूंजीवाद बाहर नहीं निकल रहा है – इसका कारण बाहर नहीं, पूंजीवाद के अंदर, उसकी कार्यप्रणाली की विशेषताओं में ही छुपा हुआ है. इसे उल्ट कर ही हम पूंजीवाद द्वारा निर्मित आपदाओं से मुक्ति पा सकते हैं.

हमारे बुद्दिजीवियों के एक बड़े हिस्से द्वारा २० शताब्दी के कम्युनिस्ट तजुर्बों को एकतरफा ख़ारिज करने का शक्तिशाली रुझान पाया जाता है. यह एक अराजकतावादी दृष्टिकोण है. सही दृष्टिकोण, इन तजुर्बों को इनकी प्राप्तियों और कमियों समेत स्वीकार करने में है जबकि बुद्धिजीवियों के एक बड़े हिस्से द्वारा इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया जाता है. उनके अनुसार समाजवाद के  उन तजुर्बों ने समाजवाद को एक असफल सामाजिक व्यवस्था घोषित कर दिया है. वे इसे तजुर्बे के तौर पर नहीं लेना चाहते. वे समाजवाद से इस प्रकार की अपेक्षा पाले रहते हैं जैसे यह एक पूर्ण प्रणाली हो. वे इसमें किसी भी प्रकार का नुक्स नहीं देखना चाहते जबकि इसका मतलब होगा – गतिहीन और वर्ग-संघर्ष से मुक्त स्थिति. वे यह मानने को तैयार नहीं होते कि पूंजीवाद और समाजवाद में फर्क केवल इतना ही होता है कि सत्ता पूंजीपतियों के हाथ में न होकर मेहनतकशों के हाथ में होती है. वे इल्ज़ाम लगाते हैं कि वहां तानाशाही थी जबकि पूंजीवाद लोकतंत्र को वे एक आदर्श और सबसे बढिया मॉडल होने का श्रेय देते हैं. लेकिन इसकी हकीकत उस वक्त खुल जाती है जब चुनावों में आम आदमी ठगा जाता है और सत्ता सदैव पूंजीपति वर्ग के के पास ही रहती है. रेमंड लोट्टा का कहना  है कि पूंजीवाद भी तानाशाही होता है. एक ऐसी तानाशाही जिसमें पूंजीपतियों की अल्पसंख्यक आबादी मेहनतकशों पर शासन करती है क्योंकि वह उत्पादन के साधनों की मालिक होती है. अपनी इसी सामाजिक हैसियत से वह मेहनतकशों को उजरती गुलाम बना डालती है. जब मेहनतकश आबादी सत्ता हासिल कर लेती है उसे समाजवाद कहते हैं. लेकिन इसका मतलब यह हरगिज नहीं होता कि सामन्तो और पूंजीपतियों के अल्पसंख्यक वर्ग का खात्मा हो गया. वे समाजवाद में मौजूद रहते हैं. उनसे संघर्ष चलता रहता है.

रेमंड लोट्टा का कहना है कि संघर्ष का नतीजा मेहनतकशों की हार में भी हो सकता. चीन में समाजवाद के तजुर्बे के दौरान इसे माओ ने नोट कर लिया था. माओ का कहना था कि क्रांति के बाद क्रांति सतत रूप से जारी रहनी चाहिए, वर्ना देर-स्वर जीती हुई क्रांति हार जाएगी.

सोवियत यूनियन और चीन के तजुर्बे यही कहते हैं. वहां मजदूर वर्ग अपने दुश्मन वर्ग से हार चुका है. दूसरे शब्दों में, क्रांतियाँ असफल नहीं हुई लेकिन वे हारी जा चुकी हैं. वर्ग-संघर्ष समाजवाद का एक बुनियादी लक्ष्ण होता है. समाजवाद अपनी उच्चत्तर मंजिल साम्यवाद में क्यों प्रवेश नहीं कर पाया ?, इस प्रश्न का उत्तर समाजवाद जोकि पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच का संक्रमण काल होता है, में चलनेवाले वर्ग-संघर्ष में ही है जिसके पहले तजुर्बों में मेहनतकश आबादी बुर्जुआ तत्त्वों से मात खा चुकी है. लेकिन मेहनतकशों को यह नसीहत देना कि समाजवाद एक असफल प्रणाली है – इसका मतलब है कि वे समाजवाद पर नए तजुर्बे न करें. क्या इसके बिना उस समाज की स्थापना संभव है जिसे राज्य-विहीन और वर्गविहीन  समाज कहा जाता  है ? हारी हुई क्रांतियों से जरूरी सबक ग्रहण करते हुए, मेहनतकश वर्ग ने नये समाजवादी तजुर्बे हासिल करने है. इसके अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है. उसे अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास से सीखना होता है. इसके विपरीत सिद्धांत-अभ्यास-सिद्धांत एक विचारवादी नजरिया है जिसे मेहनतकश वर्ग ख़ारिज करता है.

“क्या अमेरिका के लोग समाजवाद अपनायेगे ?” इस  प्रश्न के उत्तर में रेमंड लोट्टा का कहना है, ” कठोर शब्दों में कहा जाये तो अभी नहीं”. लेकिन वे क्रांतिकारी लोगों द्वारा क्रांति के लिए की जानेवाली कोशिशों को सघन और व्यापक करने का आह्वान करते हैं.

जलवायु संकट के लिए जिम्मेदार स्वयं पूंजीपति और उनकी व्यवस्था है न कि आम लोग

Posted on Updated on

धरती पर जलवायु संकट मनुष्य के इतिहास का एक अटल परिणाम है. यह सामाजिक और आर्थिक रिश्तों पर निर्भर करता है. पूंजीवादी प्रचार, जलवायु संबंधी समस्या को सामाजिक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य  से अलग करके रखता है. यह इसे राजनीति से ऊपर समझता है. समाज और वर्ग से ऊपर की कोई शै के रूप में इसे पेश करने का इसका उद्देश्य यह होता है कि पूंजीपति वर्ग और पूंजीपति प्रबंध को, इन संकटों को पैदा करने के लिए जिम्मेदार न ठहराया जा सके.

पिछले दिनों ‘कोपनहेगन पृथ्वी सम्मेलन’  जलवायु को प्रदुषण-मुक्त करने के लिए, दुनिया भर के शीर्ष नेताओं का, हमारे समय का, सबसे बड़ा जमावड़ा था. कार्बन उत्सर्जन के सवाल को जोर-शोर से उठाया गया. एक-दूसरे पर दोषारोपण हुआ. दुनिया की तबाही का आतंक उत्पन्न करते हुए, स्वयं के मुनाफों के कारोबार को, मंदी के इस दौर में, कैसे बचाकर रखा जा सकता है, विश्व पूंजीवादी प्रबंध में स्वयं की भूमिका को ज्यादा से ज्यादा किस प्रकार प्रभावशाली बनाया जा सकता है, इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतू, प्रकृति-हितैषी और मानवता के हितैषी होने के अपने मुखौटे पहनकर, सारी दुनिया की बड़ी-बड़ी प्रतिभायों ने, तरह-तरहके घुट्टी-पिलाउ हल पेश किये.

सबसे बढकर, सवाल इस प्रकार पेश किया जा रहा है कि आम लोगों में भय पैदा हो. संसार की तबाही और कई देशों के समुद्र में डूब जाने की भविष्यवाणियां पेश की जा रही हैं. धरती पर बढ़ते हुए तापमान की समस्या के ठोस हल खोजने की अपेक्षा, लोगों को डराने के लिए, इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है जबकि जलवायु के सवाल को सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से अलग करके नहीं समझा जा सकता.

आज की समस्यायों का मुख्य दोषी खुद पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक प्रबंध है. पूंजीवाद के आगमन से पहले की व्यवस्थाओं में मानव प्रकृति के साथ संघर्ष में – उसे बदलते हुए, आप जो कुछ प्राप्त करता था, उसका पैमाना बड़ा सीमित होता था. मानव के प्रकृति के साथ संघर्ष में, प्राकृतिक वातावरण को कोई उल्लेखनीय नुकसान नहीं पहुंचता था. प्रकृति मानव की उपजीविका का सदैव बड़ा स्रोत रही है. आज भी मानव और प्रकृति के संघर्ष में, विरोध और विकास संबंधी नियमानुसार, समस्याओं के हल होते रहते हैं. हमारी धरती और ब्रह्मंड की तबाही की बातें करनेवाले, गैर-वैज्ञानिक और एकतरफा ढंग से सोचते हैं. लेकिन आज का बड़ा सवाल है – पूंजीपतियों की मुनाफे की हवस ने जो हालात हमारी धरती पर पैदा कर दिए हैं उससे आम लोगों की जिंदगी और कठिन होती जा रही. आज पूंजीपतियों ने आम मेहनतकशों और श्रम-जीविओं के शोषण के साथ-साथ, प्रकृति का भी निर्लज्जता की हद तक शोषण किया है. ( इसने प्रकृति के सौन्दर्य को नष्ट करने का गुनाह किया है. नदियों, नालों और समुद्र के पानी को प्रदूषित किया है. परिवहन के साधनों को योजनाबद्ध ढंग से व्यवस्थित करने की बजाय, अपने मुनाफे की अंधी हवस में, प्राईवेट परिवहन के उद्योग (मिसाल के लिए, कार उद्योग ) को प्रोत्साहित करके, हवाओं में प्रदुषण को बेहद मात्रा में बढ़ा दिया है. पूरी की पूरी उत्पादन प्रणाली में – आम आदमी की सेहत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. परमाणु कचरा समुद्र में फैंका जा रहा है. हथियारों का बड़ी मात्रा में उत्पादन करके, मानवता की तबाही के साथ-साथ, प्रकृति की तबाही भी की जा रही है. पहले मुनाफे की हवस के चलते वातावरण खराब किया जाता है, फिर वातावरण को ठीक रखने के नाम पर – अमीर आबादी के चौगिरदे को साफ-सुथरा रखने के नाम पर, मेहनतकश आबादी के बड़े हिस्सों को शहर के बाहर के क्षेत्रों में स्लम्ज़  में धकेल दिया है जो धरती पर नरक के साक्षात नमूने हैं.

पूंजीवाद के अपने जन्म से, मुनाफे की इस बेरहम जंग ने भयानक तबाही मचाई है. मानव द्वारा मानव का शोषण और मानव द्वारा प्रकृति का शोषण , पूंजीवादी प्रबंध में अपने शिखर पर पहुंचा है. इंग्लैण्ड में पूंजीवाद के विकास और बाड़ाबंदियों के निर्धारण के समय किसानों का उजाड़ा, अमेरिका में जंगलों और आदिवासी (रेड इन्डियन) आबादी की तबाही, ( और वर्तमान में, भारत में नक्सलवादियों की समस्या तो एक बहाना है, असल में निशाना तो वह इलाका है जहाँ आदिवासी बसे हुए हैं जिनकी बदकिस्मती यह है कि ये जंगल खनिज और वनसम्पदा से भरपूर  हैं और पूंजीपति और साम्राज्यवादी इस लूट से अपनी नजर हटा पाने में अक्षम हैं ) विश्व के अन्य हिस्सों में जंगलों की बर्बादी के साथ, मुनाफा तो कुछ मुठ्ठीभर पूंजीपतियों ने कमाया, पर मुसीबतें आई आम लोगों के हिस्से में ! मुनाफे की हवस के सामने प्रकृति तो क्या, मानव जिंदगी की सीधी तबाही  भी पूंजीपति वर्ग को विचलित नहीं कर पाती ! अमेरिका में पूंजीवाद के फैलाव के समय,उनके कारनामों का जिक्र करते हुए मार्क्स लिखते हैं,

प्रोटेस्टेंट मत के उन गंभीर साधकों – न्यू इंग्लैण्ड के प्यूरिटनों  – ने १७०३ में अपनी असेंबली के कुछ अध्यादेशों के द्वारा अमरीकी आदिवासियों को मारकर उनकी खोपड़ी की त्वचा लाने या उन्हें जिंदा पकड़ लाने के लिए प्रति आदिवासी ४० पाउंड  पुरस्कार की घोषणा की थी. १७२० में प्रति त्वचा १०० पाउंड पुरस्कार का ऐलान किया गया था. १७४४ में, जब मैस्साचुसेटस-बे  ने एक खास कबीले को विद्रोही घोषित किया, तो निम्नलिखित पुरस्कारों की घोषणा की गयी : १२ वर्ष या उससे अधिक आयु के पुरषों को मार डालने के लिए प्रति त्वचा १०० पाउंड (नई मुद्रा में), पुरषों को पकड़ लाने के लिए प्रति व्यक्ति १०५ पाउंड, स्त्रियों और बच्चों को पकड़ लाने के लिए प्रति व्यक्ति ५५ पाउंड. कुछ दशक और बीत जाने के बाद औपनिवेशिक व्यवस्था ने न्यू इंग्लैण्ड के उपनिवेशों की नींव डालनेवाले इन piligrim fathers [पवित्र हृदय यात्रियों] के वंशजों से बदला लिया, जो इस बीच विद्रोही बन बैठे थे. अंग्रेजों के उकसाने पर और अंग्रेजों के पैसे के एवज में अमरीकी आदिवासी अपने गंडासों से इन लोगों के सिर काटने लगे. ब्रिटिश संसद ने घोषणा की कि विद्रोही अमरीकियों के पीछे कुत्ते छोडकर और आदिवासियों से उनके सिर कटवाकर वह केवल ” भगवान और प्रकृति के दिए हुए साधनों” का ही उपयोग कर रही है.– कार्ल मार्क्स ‘पूंजी’ प्रथम खंड, सफा ७६२, प्रगति प्रकाशन मास्को.

सामर्थ्यशाली “राष्ट्रीयताएं  हर उस बदनामी बारे सनक की हद तक शेखियां बघारा करती  जो उनके लिए पूंजी के एकत्रीकरण का साधन बनती , अगर वह पूंजी एकत्रित करने का ढंग होती” – मार्क्स, कैपिटल जिल्द १, सफा ७१०.

उपरोक्त विवरण से हम साबित करना चाहते हैं – पूंजीपति वर्ग, प्रदुषण संबंधी, सभी लोगों को, व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार ठहराकर, अपने गुनाहों को छिपाने का यत्न करते हैं.

पहले प्रदुषण फैलायो, फिर प्रदुषण हटाने की मुहीम के नेता के रूप में, ऐसी स्कीमें और हल पेश करो कि और मुनाफे कमाए जा सकें – अपने गुनाहों पर पर्दा डाला जा सके. सब कुछ इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि असल गुनाहगार, मुक्तिदाता दिखाई दे.

बात को इस प्रकार पेश किया जा रहा है जैसे कि यह कोई विकसित, विकासशील और गरीब देशों के बीच का झगड़ा हो. इन सभी देशों के पूंजीपति प्रतिनिधि, खुद के अपने मेहनतकशों और श्रम-जीवियों के शोषण से ध्यान हटाने के लिए, स्वयं को, उनके मसीहाओं के रूप में पेश कर रहे हैं.

आज जलवायु या प्रदुषण की समस्या को, विश्व पूंजीवादी प्रबंध के विरुद्ध लड़ाई से अलग करके, हल नहीं किया जा सकता. पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक प्रबंध में मुनाफे का स्रोत श्रमिक से निचोड़ा गया अधिशेष होता है. जब पूंजीपति फैक्ट्री या फार्म में उत्पादन की प्रक्रिया शुरू करवाता है केवल तभी अधिशेष मूल्य पैदा हो सकता है. लेकिन विश्व के तमाम हिस्सों में फैला पूंजीपति वर्ग मंडी और प्रतिस्पर्द्धा जैसे मुख्य कारणों के चलते कुल उत्पादन प्रक्रिया को योजनाबद्ध नहीं कर सकता, भले ही, एक फैक्टरी या फार्म में उत्पादन की प्रक्रिया को अंजाम देते समय पूंजीपति छोटी से छोटी मद को अपनी योजना में शामिल करता है. लेकिन जब बात किसी देश या विश्व के कुल उत्पादन की प्रक्रिया को योजनाबद्ध करने की आती है, तो पूंजीपति ही नहीं बल्कि उनके बुद्धिजीवी भी घबरा जाते हैं क्योंकि इसका अर्थ होता है एक ऐसी प्रणाली की स्थापना जिसमें इस मुठ्ठीभर परजीवी वर्ग के एशो-आराम को खतरा होता है. ये दोहरे मापदंड राजनीतिक तो हो सकते हैं लेकिन वैज्ञानिक नहीं. विज्ञान के नियम किसी वर्ग के हितों की रक्षा की जिद्द पूरी करने हेतू नहीं बदलते.गैर-योजनाबद्ध और अराजक उत्पादन प्रणाली में पर्यावरण और जलवायु संबंधी मुश्किलों पर काबू पाना ना मुम्मकिन है जबकि पूंजीपति और उनके बुद्धिजीवी इसे पूंजीवाद की चौहद्धी के भीतर ही हल करना चाहते हैं.

हम फिर बुद्धिजीवियों से अपील करते हैं कि वे वीरता से सच का साथ दें.  अगर समस्या की गंभीरता को देखते हुए सवाल ठीक ढंग से पेश किया जायेगा तभी उसका सही जवाब मिल सकता है, लेकिन पूंजीपति और उनके बुद्धिजीवी कभी नहीं चाहेंगे कि इसे ठीक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाये. उनके उद्देश्य समस्याओं को सनसनी तरीके से पेश करना और ऐसे अप्रासंगिक सवाल खड़े करना होता है ताकि लोग भी अप्रासंगिक हल ढूंढने की अंध कवायद करते हुए विचारों की भूल-भुलैया में सिर पटकते रहें.विचारधारा के क्षेत्र में फैले प्रदुषण के विरुद्ध लड़े बिना वातावरण संबंधी समस्या समेत, मानवता के सामने दरपेश समस्यायों का हल संभव नहीं.

related posts

यह किसका कोपेनहेगन है

गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

Posted on Updated on

एक तरफ तो उत्तर प्रदेश की सरकार ‘सर्वजन हिताय’ होने का दावा करती है लेकिन दूसरी और इस सरकार के गोरखपुर का प्रशासन मजदूरों की बैचैनी का अर्थ उनके माओवादियों से संबंध होने से निकालता है. आज जब दुनिया महामंदी की चपेट में है और वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए लोगों की बचतों को  झोंका जा रहा और पूंजीवाद चाहता है कि कैसे वह इस विश्व महामंदी से निजात पाए, ठीक उसी वक्त,  स्थानीय पेटी-पूंजीपतियों को छोड़ दें तो इस प्रकार की स्थिति में सरकारों का मजदूरवर्ग से इस तरह के निम्न स्तर के हथकंडों का इस्तेमाल करते हुए उलझना स्वयं पूंजीपति वर्ग को भी नापंसंद होगा. पूंजीवाद की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा उपभोग भी होती है ताकि माल मंडियों में बिक जाये. क्या मजदूर वर्ग की जेब में कुछ डाले बिना मार्केट या देश को मंदी से उभारा जा सकता है?

भारत जैसे देश में तुलनात्मक रूप से उत्पादन क्रिया के दौरान मजदूरों पर होनेवाले खर्च में लगातार गिरावट आ रही है अर्थात देश की कुल पैदावार में मजदूरों के हिस्से केवल ६ प्रतिशत ही आता है जबकि उनकी संख्या ८४ करोड़ है. लेकिन खाने-पीने की बुनियादी चीजों के दामों में बढोत्तरी ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. मजदूरों के लिए जीवन-निर्वाह करना भी मुश्किल होता जा रहा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पूंजीपति एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण अनुसार भारत दुनिया के सबसे सस्ती मजदूरी वाले देशों में से एक है. उनके अनुसार यह स्थिति आगामी अठारह-बीस सालों तक बनी रहेगी. उनके अनुसार यहाँ की इस सस्ती श्रम का लाभ विश्व पूंजी को ही होना है.यहीं नहीं वे भारत को एक बड़ी मंडी के रूप में भी देखते हैं जहाँ माल खपाया जा सकता है. चीन के बाद भारत दूसरा देश है जहाँ विकास दर सबसे ऊँची है. लेकिन मजदूरों की मजदूरी में होनेवाली थोडी-बहुत बढोत्तरी बुनियादी वस्तुओं की कीमत के मुकाबले बढ़ने की अपेक्षा कम हों तो कैसे मजदूर अपना जीवन निर्वाह कर पायेगा? क्या  स्वयं पूंजीवादी के तर्कानुसार भी इस प्रकार का रवैया उचित है?

8
गोरखपुर : अपने परिवारों समेत धरने पर बैठे महिला एवं पुरुष मजदूर

पूंजी के अपने तर्क अनुसार किसी भी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए जरूरी होता है कि मजदूरी में बढोत्तरी हो ताकि मजदूर ज्यादा वस्तुएं खरीद सकें. लेकिन गोरखपुर जैसे शहर में जहाँ मजदूर अपनी थोडी सी मजदूरी, रोजगार सुरक्षा और यूनियन बनाने के बुनियादी लडाई ही लड़ रहे हैं, उन्हें माओवादी कहना कहाँ तक उचित है? सबसे चिताजनक पहलू यह है की मजदूरों के बीच की हर तरह की बैचैनी का हल निकालने की बजाय उसे माओवादी-आतंकवादी कार्रवाई कहकर कुचलने की कोशिश की जाती है और उनके लीडरों पर झूठे केस बनाए जाते हैं और मजदूर नेताओं को जेलों में डाला जाता है.

उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करते समय देश की कार्यपालिका और न्यापालिका जैसी संस्थाओं का रवैया ज्यादा से ज्यादा मजदूर विरोधी होता गया है. गुडगाँव जैसे औद्योगिक नगर जहाँ एक मजदूर की मौत पर एक लाख मजदूरों की बड़ी संख्या सड़कों पर आ जाती , वहां पर भी मजदूरों को यूनियन तक बनाने की इजाजित नहीं है. रिको ऑटो कंपनी के संचालक मजदूरों के हड़ताल पर जाने और यूनियन बनाने को गैर-कानूनी कार्य कहते हैं. इसे ऐतिहासिक प्रसंग में देखें तो यह सही भी है क्योंकि मजदूरवर्ग की लहर के विपर्य के इस दौर में मजदूरों ने यूनियन बनाने, धरना देने, हड़ताल करने और गेट मीटिंगे औयोजित करने के अधिकारों को खो दिया है. उन्हें आज अपनों संघर्षों द्वारा जीते इन बुनियादी अधिकारों की रक्षा ही सबसे बड़ा कार्यभार लगता है जबकि वर्गों में विभाजित समाज में ये अधिकार भी उसी तरह गतिशील होते हैं जिस तरह समाज. अपने कालजयी संघर्षों द्वारा जीते गए इन अधिकारों को खो देना उन्हें निराश करता ही रहेगा जब तक वे स्वयं को राजनीतिक चेतना से चाकचौबंद नहीं करेंगे और इस वर्ग विभाजित व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन नहीं कर देंगे. गुडगाँव तो औद्योगिक उपक्रमों की हब है. इसके अलावा भारत के कोने-कोने में छोटे बड़े लाखों औद्योगिक उपक्रमों में देश के मजदूर वर्ग की आबादी का ९३ प्रतिशत भाग काम कर रहा है. मजदूरों की इस बड़ी तादाद को असंगठित मजदूर यानिकि वह मजदूर जो किसी मजदूर ट्रेड यूनियन का भाग नहीं है, कहते हैं. देश के इन छोटे और मझौले उपक्रमों में कार्य करनेवाले मजदूरों की बैचैनी ने हड़ताल और धरने  का रूप भी लेना है. पूंजीपतियों की आपसी गलाकाट होड़ के चलते और मंडी के उतार-चढाव और मंदी का ज्यादा असर छोटी पूंजी पर अधिक पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि  मजदूर वर्ग के हितों की अनदेखी करके इन उपक्रमों की रखवाली की जाये. लेकिन प्रशासन और सरकारी नुमाँईन्दो का इन पेटी-बुर्जुआ पूंजीपतियों और उनके गुंडों से साँठगाँठ   चिंता का विषय है. सरकार के लिए सोचने वाली बात यह भी है कि क्या मजदूरों और उनको नेताओं को माओवादी आतंकवादी कहकर झुट्ठे मुकद्दमों में फँसाना खुद पूंजीपति वर्ग या व्यवस्था के लिए ठीक है?

किसी प्रकार का आंतंकवाद चाहे वह धार्मिक मूलवादी खेमे की ओर से हो या वामपंथी दुस्साहसवाद के रूप में हो, निंदनीय है. सत्ताधारी वर्ग की दमनकारी नीतियाँ भी हर प्रकार का आतंकवाद पैदा करती हैं. सत्ताधारी वर्ग के राजकीय आतंकवाद  के परिणामस्वरूप धार्मिक मूलवादी आतंकवाद, दक्षिणपंथी आतंकवाद, वामपंथी आतंकवाद आदि, की फसल उगने की उपजाऊ भूमि तैयार होती है.हर किस्म का आतंकवाद मजदूर वर्ग की एकता और सांगठनिक क्षमता को कमजोर करता है… लेकिन गोरखपुर के स्थानीय प्रशासन द्वारा मजदूरों को माओवादियों से जोड़ना चिंता का विषय है. अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक  तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी. जी  पहले यह कह चुके हैं कि गोरखपुर में नक्सली नहीं है.

यूनिसेफ  की रिपोर्ट अनुसार पिछले ४० वर्षों के अन्तराल के बाद ग्लोबल वित्तीय संकट और ईंधन, भोजन और चारे की कीमतों में बढोत्तरी के कारण दक्षिण एशिया भूखमरी की उच्चतम शिखर को छू रहा है. इसमें कोई शक नहीं की उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी सेक्टरों और कृषि में भी बढ़िया विकास करते दिखाई गयी है लेकिन विडम्बना देखीए कि भरपूर अनाज पैदा होने के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा की हालत में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है. यह उपहास नहीं तो और क्या है कि उडीसा जैसे राज्य में अब भी लोग भूख से मर रहे हैं जबकि वेयरहाउस और गोदामों में अनाज सड रहा है?

3
गोरखपुर : हड़ताल के दौरान सामूहिक रसोई

यहीं नहीं एम्.एस स्वामीनाथन रीसर्च फ़ाऊँडेशन (MSSRF) और विश्व खाद्य कार्यक्रम  (WFP) द्वारा एक रिपोर्ट तैयार करवाई गयी. इसमें कहा गया कि भोजन में प्रयाप्त पौष्टिक तत्त्वों की कमी के कारण  भारत का हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का शिकार है और ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2001 के अनुसार भारत का क्रमांक 94 है.

लेकिन पूंजीपति वर्ग खुश होता है कि विश्वमंदी  का भारत पर असर नहीं हुआ है. संसेक्स में फिर उछाल देखने को मिल रही है. प्रथम फिस्कल छमाही के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में ऑटो सेक्टर की विक्री में बढोत्तरी १४.५१ प्रतिशत रही है. इस प्रकार की बातें पूंजीपति लोगों और उनकी सरकारों को अच्छी लगती हैं. लेकिन ऑटो सेक्टर की हब रहे गुडगाँव जैसे शहर में पूंजीपतियों के किराये के गुंडों के हाथों होनेवाली मजदूर की मौत के बाद एक लाख मजदूरों का प्रदशर्न उन्हें परेशान कर देता है. तेरह-तेरह वर्षों से कार्यरत पंकज कुमार सिंह जैसे मजदूर अपनी मजदूरी से संतुष्ट नहीं हैं. अपनी जायज मांगों को मनमाने के लिए जब वे यूनियन बनाने की पहलकदमी करते हैं तो मैनेजमेंट स्थानीय प्रशासन और अपने निजी गुंडों की मदद से उन्हें दबाने की कोशिश करती है. पूंजीपतियों की मुनाफा कमाने की हवस मजदूरों को इंसान समझती ही नहीं. उन्हें तो चाहिए इन्सान के रूप में एक ऐसा मशीन का पूर्जा जो मशीन के दूसरे पूर्जों से मिलकर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करे. पूंजीपति यह देख ही नहीं पाते कि मशीन और इन्सान में बुनियादी फर्क है. मशीन अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष पैदा नहीं कर सकती. यह केवल मजदूर की श्रम-शक्ति से ही संभव होता है. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपतियों का मुनाफा, मैनेजमेंट के खर्चे और कार्पोरेट टैक्स जिससे सरकारे चलती हैं, आता है.

गुडगाँव की रिको ऑटो कंपनी के मजदूर की हत्या पर भारत की न्यूज एजेंसी पी.टी.आई . अपनी टिपण्णी में यह बात स्वीकार करती है कि गुडगाँव-मानेसर बेल्ट में मजदूर असंतोष कोई नई बात नहीं है. पहले २००० में मारुती उद्योग की मजदूरों की तीन महीने की हड़ताल और फिर २००५ में होंडा मोटर्स एंड स्कूटर के मजदूरों पर पुलिस द्वारा अधाधुंध लाठीचार्च जिसमें १६७ मजदूरों के घायल हुए थे, को नोट करते हुए पला झाड़ लेती है जैसे यह रूटीन की सामान्यतय घटने वाली बातें हों. लेकिन स्थिति का दूसरा पहलू यह भी है कि २००० और फिर २००५ और अब २००९ में मजदूरों का एकसाथ इतनी बड़ी तादाद में खड़े हो जाना, और फिर इन वर्षों के बीच का अन्तराल इतना बड़ा नहीं है कि इतिहास के लिए यह कोई दूर की बात हो. मजदूर वर्ग के असंतोष और वैचैनी के यहीं वे सिग्नल हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग द्वारा ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग की हमदर्द पार्टियों और बुद्धिजीवियों द्वारा नज़रंदाज किया जाता है. मजदूरों के प्रारंभिक सिग्नल भले ही किसी नज़दीक की क्रांति की और संकेत नहीं करते लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग को इन्हीं सिग्नलों को समझना है और इतिहास में अपने स्थान और जिम्मेदारी का भलीभांति निर्वाह करना है.

गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता
गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता

आज मजदूर वर्ग और क्रांतिकारी खेमा अलगाव और विखराव का शिकार है. लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी चुप्पी साधे हुए है. बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का समर्थन और हमदर्दी हमेशा मजदूरवर्ग से रही है. अपनी उच्चतम बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी बुद्धिजीवी लोग अपने स्वयं के वर्ग की सीमाओं को तोड़कर मजदूरों के साथ खड़े होते रहें है. बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा स्वयं को मजदूर वर्ग से अपने आप को अभेद भी पाता रहा है. लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. क्या भारत का बुद्धिजीवी इतना आत्मसंतुष्ट हो सकता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर हाँ  में है तो उसके बुद्धिजीवी होने पर प्रश्नचिह्न लगता है! लेकिन इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होती और न हो सकती है. समाजवादी खेमे के ढह-ढेरी हो जाने  के बाद हम भी मानते हैं कि समाज को आगे की ओर गति देने वाले आंदोलनों या क्रांतियों की प्रासंगिगता पर प्रश्न चिह्न लगा था और पूंजीवाद के अजर-अमर होने के भ्रम को भी खूब हवा मिली थी. अब स्थिति वैसी भी नहीं है. पूंजीवादी एक के बाद एक नए संकटों में फंसता जा रहा है. बुद्धिजीवियों के स्तर के अनुसार पूंजीवाद में भी ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें एक पल के लिए भी संतुष्ट कर पाए. इस प्रकार की स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रह सकती. यह बुद्धिजीवी वर्ग ही होता है जिसने सबसे पहले अपनी चुप्पी तोड़नी होती है क्योंकि अपनी संवेदनशीलता के कारण वहीँ पहला वर्ग होता है जो सबसे पहले टूटता है.

4
गोरखपुर : इस पूरे आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया

देश में चुनाव हों लेकिन बुनियादी मुद्दे गायब हों ! एक ऐसा वक्त जब आम जनता अपने जिंदा रहने की लडाई लड़ रही हो और चुनावों में भाग लेनेवाली पार्टियों की ओर से अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जाना ! इसके अलावा राजनीतिक दलों की बहसों का स्तर इतना निम्न स्तर का कि बुद्धिजीवी तो क्या आम आदमी भी इसका नोटिस लेने से नहीं बच पाया. विचारधारात्मक, सैद्धांतिक और राजनीतिक बहस सिरे से ही गायब थी. सामाजिक बहस में भी मुद्दे गायब थे. केवल जोड़तोड़ या तिकड़म द्वारा किस दल की सरकार बनेगी, जैसी चर्चाओं पर अटकलबाजी होती रही. इस प्रकार की स्थिति पर  देश के बुद्धिजीवी वर्ग का मूक दर्शक बने रहना नागरिक समाज के लिए नुकसानदेय है. इतिहास में उसे अपनी भूमिका और स्थान की पहचान करनी ही होगी.

पूंजीपतियों के गुंडों द्वारा गुडगाँव में मजदूर की हत्या और गोरखपुर के मजदूर और मजदूर नेताओं पर झूठे मुकद्दमे निंदनीय हैं. मजदूर वर्ग के हितों पर इस प्रकार का कुठारघात असहनीय है. पूंजीपति इसके लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने पर तुले हुए हैं. हमारे पडौसी देश नेपाल जहाँ पशुओं की हत्या और अत्याचार पर रोक संबंधी बहस चल रही है और हमारे यहाँ मजदूरों पर इस तरह के जुर्म किये जा रहे हैं. नेपाल जैसे पिछडे देश के साथ तुलना करते समय हमारा सीना गर्व से फूल जाता हैं लेकिन अपने ही देश में पशुओं पर नहीं बल्कि इंसानों और मजदूरों पर होनेवाले जुर्म पर हम मूक बने रहते हैं, क्या इस प्रकार की स्थिति शोभनीय है? बुद्धिजीवी वर्ग को सोचना होगा कि सभ्य समाज को इस वक्त अगर कोई खतरा है तो वह पूंजीपतियों के गुंडों की दहशत और प्रशासनिक मिलीभगत से ही है. उसे अपना प्रतिरोध दर्ज करवाना होगा. यही समय की मांग है.

उपरोक्त पोस्ट पर लगी हुई सभी तस्वीरें नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ से धन्यवाद सहित ली गयी हैं.

गोरखपुर के मजदूर संघर्ष से संबंधित पोस्टें :

होन्डुरस की घटनाओं ने खोली बुर्जुआ लोकतंत्र की पोल

Posted on Updated on

एक करोड़पति जमींदार राष्ट्रपति जिसका जुर्म था कि उसने अपने देश को अमेरिकन पक्षीय खेमें से निकाल लिया और  लैटिन अमेरिका के बाएं मुहाज के खेमे से हाथ मिलाया और लोक-पक्षीय सुधारों की शुरुआत करना करना शुरू की, के जबरन तख्तापलट के विरुद्ध लोगों के प्रतिरोध के फूटने के क्रांति में परिवर्तन होने की संभावना की और संकेत किये जा रहे हैं.

honduras resists

३० सितंबर को अर्जन्टीना के दैनिक ‘कलारिन’ में वर्तमान राष्टपति रोबर्टो माईकलेटी जिसने चुने हुए राष्ट्रपति मैन्युल जेलाया को मिलट्री एक्शन द्वारा जबरन हटा दिया का बयान प्रकाशित हुआ ,” हमने जेलाया को हटा दिया क्योंकि वह लेफ्टिस्ट था… इससे हम परेशान थे.

लेकिन जबरन हटाये गए राष्ट्रपति मैन्युल जेलाया जिनका  बन्दूक की नोक पर अपहरण  किया गया और रिका के तट पर निर्वासित कर दिया गया, के सौ दिन बाद भी नए राष्ट्रपति रोबर्टो माईकलेटी की परेशानियों में कमी नहीं आई है. जेलाया वापस देश आ गए हैं और वहां ब्राजील के दूतावास में शरण लिए हुए हैं. इस घटना से सक्रीय हुए लोगों के होठों पर अपने राष्ट्रपति की पुनर्बहाली के अलावा और भी मांगे हैं.

निरंतर सख्त दमन के बावजूद लोगों का शांतिपूर्वक विरोध, हड़तालें और रास्ता रोको आन्दोलन जारी हैं. Honduras Resists की २ अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार ४००० लोगों को बंदी बनाया जा चूका है और १७ मारे गए हैं जबकि गैर सरकारी आंकडा इससे कहीं बड़ा है. इसी ब्लॉग पर लिखने वाली मारिया रीटा मैटामोरोस कहती हैं कि उन्हें प्रतिरोध के कारण प्राकृतिक संसाधन और पर्यावरण के सचिवालय से अपने पद से हटा दिया गया. वे कहती हैं,

“मुझे इसलिए अपने पद से हटा दिया गया कि चारों तरफ प्रतिरोध करनेवाले लोगों का दमन जारी है. लोग अपना देश बचाने की भावना से ओतप्रोत हैं. हमें लगता है कि हम न्याय के लिए लड़ रहे हैं. राष्ट्रपति जेलाया वे व्यक्ति थे जो गरीब लोगों के पक्ष में खड़े थे. उनका एकमात्र जुर्म गरीबों की मदद रहा है. वे लोकप्रिय थे. वे गरीब लोगों के साथ बैठ जाया करते थे. उनको ये बातें नागवार लगी. जेलाया ने अन्य राष्ट्रपतियों के उल्ट देश के पूंजीपतियों के इशारों पर चलने से इंकार कर दिया. और उन्होंने उसे उसकी औकात दिखा दी.

जिस लोकतंत्र की बड़ाई का व्याख्यान करते बुर्जुआ बुद्धिजीवी कभी नहीं थकते यही है उसकी असलियत. चिली, इंडोनेशिया  और नेपाल के बाद अब होन्डुरस ने भी इस तथ्य को उजागर कर दिया है कि जब भी किसी बुर्जुआ राज्य की मेहनतकश इस लोकतंत्र द्वारा अपने एजेंडा को लागू करने की कोशिश करती है, उसे सत्ता से बाहर कर दिया जाता है. नेपाल में माओवादी जब भी कोई लोकपक्षीय कार्रवाई करना चाहते थे, अन्य दलों के लोग एकसाथ खड़े होकर उनका विरोध कर देते थे.

मारिया रीटा मैटामोरोस कहती हैं,” वे हमारा दमन कर रहे हैं. यह लोकतंत्र नहीं है. लोकतंत्र का मतलब होता है शांति, संवाद और एक-दूसरे की बात सुनना. मेरा मानना है कि यहाँ कोई लोकतंत्र नहीं है. यहाँ केवल दमन है. और जो ‘राष्ट्रपति’ यहाँ बैठा है वह हथियारों के बल विराजमान हुआ है. लोग उसे नहीं चाहते. उस जैसा व्यक्ति शासन नहीं कर सकता क्योंकि वह सहनशील नहीं है.”

प्रतिरोध का हिस्सा होने के कारण २१ दिनों तक हिरासत में रही प्रोफ़ेसर अगुस्तिना फ्लोरेस लोपेज़ ने बताया कि ,” मेरी रिहाई की शर्तों में एक यह है कि मैं स्वयं को इस प्रतिरोध से दूर रखूँ और ज़लाया की बहाली के आन्दोलन से दूर रहूँ.  परंतु सलाखें मुझे चुप नहीं करा सकती  और जेल ने मेरे विश्वास को नहीं तोडा है. मैं समझती हूँ कि काम करने के कई तरीके हो सकते हैं. मेरे कार्यस्थल पर  और मेरे घर के पास भी आन्दोलन शुरू किया जाना है और गृहणियों के साथ मिलकर संविधान सभा की जीत तक संघर्ष करना है जिससे लोगों की उम्मीदें जुडी हुई हैं.”

इस तख्तापलट के विरूद्व नेशनल प्रतिरोध फ्रंट FNRG  के अध्यक्ष गिल्बर्टो रिओस ने,  ग्रीन विकली पत्रिका’ को बताया कि यह प्रतिरोध संगठित और मज़बूत है और होन्डुरस की मुक्ति के लिए सबकुछ करने को तैयार है. रिओस आगे कहते हैं ” स्पष्ट है कि यह प्रतिरोध मेहनतकश वर्ग चरित्र धारण किये हुए है. देश के  उपरी तबके की बहुसंख्या तख्तापलट के पक्ष में हैं लेकिन वे कुल जनसँख्या के मुकाबले में अल्पसंख्यक हैं. निचले तबके के लोग बहुसंख्या में हैं. उनकी तादाद ६५ प्रतिशत है. वे गरीबी में जी रहे हैं. वे इस तख्तापलट के प्रतिरोध के साथ अभेद हो गए है”

प्रतिरोध की मुख्य मांगों में पूर्व राष्ट्रपति जेलाया की बहाली और संविधान सभा का गठन है ताकि नए लोकतान्त्रिक संविधान को दोबारा लिखा जा सके.

honduras

FNRG ने मजदूरों, किसानों और अन्य लोकप्रिय जमातों का कामयाबी के साथ नेतृत्व किया है. इसने परिवर्तनकारी शक्तिशाली बल का रूप ले लिया है. इसके एक लाख से भी अधिक कार्यकर्त्ता सक्रीय रूप से काम कर रहे हैं.

इस तीव्र वर्ग संघर्ष ने तेगुसिगल्पा के पास-पडौस और सारे देश की गरीब बस्तियों को जगा दिया है. जमीन से जुड़े हुए हजारों कार्यकर्त्ता लोगों की रहनुमाई कर रहें हैं.

तेगुसिगल्पा के केंद्र में प्रदर्शन करने और पास-पडौस में इसे जनाक्रोश के साथ मिलाने के रणकौशल से विश्वास हो गया है   कि लोगों ने इस प्रतिरोध का सन्देश पूरी तरह ग्रहण कर लिया  है. इसने दूर की बस्तियों में प्रदशर्न करने के रास्ते खोल दिए हैं और वहां के लोगों ने शहर के दमन से मुक्त “स्वतन्त्र ज़ोन” की घोषणा करनी शुरू कर दी है. यहाँ रात को युद्ध जैसी स्थिति हो जाती है. प्रतिरोध को दबाने के लिए पुलिस दमन की नीति अपनाई जाती है जिसके परिणामस्वरूप नेतृत्व के लिए स्थानीय लोगों की और अधिक संख्या  आगे बढ जाती है.

रिओस नोट करते हैं कि जब पुलिस प्रतिरोध का दमन करने के लिए लोगों के घरों में घुस जाती है तो वे लोग जो अबतक इस लहर के प्रति तटस्थ थे, लहर का भाग बन जाते हैं.

रिओस कहते हैं कि मध्यम श्रेणी और छोटे और मझोले व्यवसायिक लोग जो तानाशाही सरकार के कारण तबाह होने शुरू हो गए है , धीरे-धीरे इस आन्दोलन में आने शुरू हो गए हैं.

लोगों के प्रतिरोध ने इस तख्तापलट सत्ता और इसके समर्थकों लिए एक बड़ा संकट खडा कर दिया है. देश की अर्थव्यवस्था को करोडों डालरों का घाटा हररोज सहना पड़ रहा है.

बदहवास सत्ता, जिसके बढ़ती हुई आन्तरिक कलह के चिह्न भी दिखने लगे हैं, ने २९ नवंबर के निर्धारित आम चुनावों तक सत्ता से चिपके रहने की इच्छा जाहिर की है जबकि बाएं मुहाज की लैटिन अमेरिका की सरकारों ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से इस सत्ता द्वारा निर्धारित चुनावों के विरोध की अपील की है.

वर्तमान सत्ता और जेलाया के बीच संवाद की कई कोशिशे हो चुकी हैं लेकिन उन्होंने FNRG की तरह अपने पद पर बहाली की शर्त पर ही संवाद होने का यकीन दिलाया है. जेलाया ने बातचीत के लिए FNRG से पॉँच सदस्य टीम का गठन किया है.

बातचीत के लिए अमेरिकन राज्यों के संगठन  की ओर से गठित शिष्टमंडल का उद्देश्य ‘सेन संधि’ के लिए सम्रर्थन जुटाना है जिसमें जेलाया की बहाली शामिल है लेकिन यह एक शक्ति के बँटवारे का समझौता है जिसमें तख्तापलट करने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की गयी है.

अमेरका जो इस तख्तापलट को हवा देता रहा है,इस संधि द्वारा समय लेना चाहता है ताकि इस दौरान  लोगों के इस वर्ग संघर्ष को अलग-थलग किया जा सके.

आज शहीदे-आजम का 102वां जन्मदिन है

Posted on Updated on

अमर शहीदों का पैगाम, जारी रखना है संग्राम !

भगत सिंह की बात सुनों,

नई क्रांति की राह चलो !

मेहनतकश बहनों और भाईयो,bhagat singh

28 सितंबर को महान शहीदे-आजम का 102वाँ जन्मदिन है. शहीदे-आजम के जन्मदिन पर जरूरत है कि हम महज रस्मी श्रद्धान्जलियों से हटकर अपने महबूब शहीद की याद को सच्चे दिल से ताजा करें. यह ज़रुरत सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे विदेशी गुलामी से देश को आजाद करवाने के लिए भरी जवानी में अपनी जान तक की बाजी लगा गए. भयंकर शोषण उत्पीडन का शिकार मेहनतकश जनता के लिए शहीद भगतसिंह को याद करना आज इससे भी गहरे अर्थ रखता है.

शहीद भगतसिंह के विचारों को दबाने की जितनी साजिशें अंग्रेजों ने की थी, वे आजाद भारत के लुटेरे हुक्मरानों की साजिशों के सामने कुछ भी नहीं है. बेहद घिनोनी साजिशों के तहत शहीदे-आजम भगतसिंह के विचारों को दबाने की कोशिश की गयी. १९४७ के बाद देश की राज्यसत्ता पर काबिज हुए काले अंग्रेजों ने शहीद भगतसिंह की आजादी की लडाई के बारे में इस झूठ का हमेशा प्रचार किया कि वे तो सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे. उनके मुताबिक शहीद भगतसिंह के बुतों पर फूल मालाएं पहनना ही उन्हें श्रद्धांजलि देने का तरीका है. लेकिन यह कड़वी सच्चाई किसी से छुपी नहीं है कि हम आज भी एक बेहद अँधेरे समय में रह रहे हैं. साधारण जनता के लिए इस देश में आज़ादी नाम की कोई चीज नहीं है. शहीद भगतसिंह के सपनों के समाज का निर्माण होना अभी बाकी है.

शहीद भगतसिंह और उनके साथियों ने एक ऐसे समाज के निर्माण का सपना देखा था जहाँ इन्सान के हाथों इन्सान की लूट न हो, जहाँ अमीरी-गरीबी की असामानताएं न हों, जहाँ धर्मों-जातियों-क्षेत्रों के नाम पर झगडे न हों, जहाँ स्त्री-पुरषों में असमानता न हो. वे एक ऐसे समाज के लिए संघर्ष करते रहे जहाँ मेहनतकश जनता रहने-खाने-पहनने सहित शिक्षा-स्वास्थ्य, मनोरंजन, आदि सहूलतें हासिल कर सके. वे हर मेहनतकश व्यक्ति के लिए इन्सान की ज़िन्दगी, मान-सम्मान की ज़िन्दगी चाहते थे.  लेकिन शहीदे-आजम भगत सिंह के प्यारे मेहनतकश लोग आज भी इस आजाद देश में गुलामों की ज़िन्दगी जीनेपर मजबूर कर दिए गए हैं. देश की साधारण जनता की बेहद दर्दनाक परस्थितियाँ शहीद भगतसिंह के सपनों के तार-तार होने की कहानी बयान कर रही हैं.

देश में १८ करोड़ लोग फुटपाथों पर सोते हैं, १८ करोड़ लोग झुगी-झोपडियों में रहते हैं. हर रोज ९ हज़ार बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर रहे हैं. ३५ करोड़ लोगों को भूखे सोना पड़ता है. देश के लगभग ८० करोड़ से भी अधिक औद्योगिक और खेतियर मजदूर और गरीब किसान दिन-रात की कड़ी मेहनत के बावजूद भी भूख और कंगाली से जूझ रहे हैं. करोडों नौजवानों के पास कोई रोजगार नहीं है. आर्थिक तंगियों-परेशानियों से घिरे लोग आत्महत्या कर रहे हैं. कमरतोड़ महँगाई गरीबों के मुहं से रोटी का आखिरी बचा निवाला भी छीनने जा रही है. फल, दूध, दही तो गरीबों की पहुँच से पहले ही बाहर थे – अब आलू, दाल भी खरीद पाना गरीबों के लिए असंभव सा होता जा रहा है.

हमारे इस आजाद भारत में हर सेकंड में एक स्त्री बलात्कार का शिकार होती है. हर वर्ष ५० हज़ार से अधिक बच्चे गायब होते हैं जिनमें से अधिकतर लड़कियां होती हैं. इनमें से अधिकतर लड़कियों को देह व्यापार के धंधे में जबरन धकेल दिया जाता है. इन बच्चों को भीख मांगने पर मजबूर कर दिया जाता है या फिर उनके शरीर के अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं.

यह शहीद भगतसिंह के सपनों की आज़ादी नहीं है. यह आज़ादी पूंजीपतियों की आज़ादी है.देश की ऊपर की आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का ८५ प्रतिशत है, वहीँ गरीबी का शिकार देश की निचली ६० प्रतिशत के पास सिर्फ २ प्रतिशत ही है. आज़ादी के ६ दशकों के दौरान २२ पूंजीपति घरानों की संपत्ति में ५०० गुना से भी अधिक बढोत्तरी हुई है. साम्राज्यवादी लूटेरों को भारतीय मेहनतकश जनता को लूटने के लिए बेहिसाब छूटें दी जा रही है. संसद-विधानसभाएँ चोर-गुंडे-बदमाशों-परजीवियों के अड्डे हैं जहाँ पूंजीपतियों द्वारा मेहनतकशों के हो रहे लूट-शोषण को बनाए रखने की स्कीमें बनाई जाती हैं, हक़-अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली जनता के दमन के लिए काले कानून तैयार किये जाते हैं.

यह है वह काली आज़ादी जिसकी जय जयकार करते देश के लूटरे हुकमरान कभी नहीं थकते.

क्रांतिकारी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि अंग्रेजों से राज्यसत्ता भारतियों के हाथ आ जाने से ही देश की विशाल जनता की हालत में कोई बदलाव नहीं आने वाला. शहीद भगतसिंह ने कहा था :

हम यह कहना चाहते हैं कि एक जंग लड़ी जा रही है जो तब तक जारी रहेगी जब तक इन्सान के हाथों इन्सान की लूट जारी रहेगी, जब तक कुछ शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता की आमदनी से साधनों पर कब्जा जमाये रखेंगे. यह लूटेरे अंग्रेज हों या भारतीय इससे स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता.

यह थे शहीद-भगतसिंह के जंगे-आजादी के सच्चे मायने जिन्हें दबाये रखने की कोशिशे भारतीय लूटेरे हुकमरानों द्वारा आज तक जारी है. हुकमरानों ने इतिहास की किताबों में शहीद भगतसिंह की आजादी की लड़ाई को हमेशा तोड़-मरोड़कर पेश किया. यही कारण है कि आज पढ़े-लिखे लोग भी भगतसिंह की जंगे-आज़ादी के इन मायनों से अनजान हैं – लेकिन लूटेरे हुकमरान कितनी भी साजिशें क्यों न रचते हों, शहीद भगतसिंह के विचार आज भी जिंदा है. जैसा कि शहीदे-आजम ने कहा था : हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली, ये मुशते खाक है फानी, रहे, रहे, न रहे. समाज के आमूलचूल बदलाव की तड़फ रखने वाले आज भी शहीदे-आजम की क्रांतिकारी सोच से प्रेरणा और मार्गदर्शन ले रहे हैं – शहीदे-आजम आज भी लूट,शोषण, जुल्म, दमन, अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले जिंदादिल इंसानों के दिलों की धड़कन हैं. वे आज भी जलती मशाल की तरह इन्कलाब की राह रोशन कर रहे हैं. लूटेरों के दिलों में आज भी भगतसिंह के विचार खौफ पैदा कर रहे हैं. उनके विचारों को दबाकर रखने की कोशिश के रूप में शहीद भगतसिंह को एक बार नहीं बल्कि अनेकों-अनेक बार फाँसी लगाने की कोशिशें होती आई हैं लेकिन शोषितों-उत्पीडितों के दिलों में वे आज भी लूट,शोषण, जुल्म, दमन, अन्याय, गुलामी से मुक्ति की आशा बनकर अमर हैं. वे आज भी हर मेहनतकश को इन्सान के हाथों इन्सान की लूट रहित नए समाज के निर्माण के महान पथ के राही बनने के लिए ललकार रहे हैं.

आज के अँधेरे समय में शहीद भगतसिंह के विचारों पर अमल करना ही उन्हें एकमात्र सच्ची श्रद्धाजंली हो सकती है. आओ , शहीद भगतसिंह के जन्मदिन पर उनके सपनों के समाज के निर्माण का प्रण लें.

हम सभी सच्चे लोगों को शहीद भगत सिंह के

सपनो के समाज के निर्माण के लिए चल रही जदोजहद में

हमारे हमसफ़र बनने का आह्वान करते हैं !

कारखाना मजदूर यूनियन लुधियाना

संपर्क : शहीद भगत सिंह पुस्तकालय, गली न. ५, लक्ष्मण नगर, ग्यासपुरा, लुधियाना

फ़ोन : 98771-43788 , 98886 -55663

related posts :

भगतसिंह के जन्मदिवस (28 सितम्बर) के अवसर पर — क्या है क्रान्ति

मैं नास्तिक क्यों हूं – भगत सिंह

शहीद भगत सिंह तथा समकालीन कम्युनिस्ट आंदोलन

शहीद भगत सिंह

शहीद भगत सिंह के जीवन और संघर्ष आज भी हमारे नौजवानों को प्रेरित करते हैं!

शहीद भगत सिंह को रोल माडल मानते हैं युवा

भगत सिंह : सौ बरस के बूढ़े के रुप में याद किये जाने के विरुद्ध

क्या हम भगत सिंह को जानते हैं?

related activities :

स्‍मृति संकल्‍प यात्रा : भगतसिंह और उनके साथियों की शहादत की 75वीं वर्षगांठ से जन्मशताब्दी के तीन ऐतिहासिक वर्षों के दौरान साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के विरुद्ध नये जनमुक्ति संघर्ष की तैयारी के आह्वान के साथ क्रान्तिकारी छात्रों-युवाओं का देशव्यापी अभियान

चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प

Posted on Updated on

http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio2/Home/chunav2009kashmir.mp3?attredirects=0

इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

आम तौर पर क्या होता है कि लोग हमें यहाँ सी पी आई या सी पी एम से भिन्न नहीं समझते. इसमें कोई शक नहीं है कि हम उनसे अलग है लेकिन यह बात उपरी स्तर पर हल हो गयी और एक दूसरे से तोड़-विछोड़ा करने से पहले ताने-मेहने और वाद-विवाद का अभाव रहा है और लोग अक्सर इस तरह की बातें करते हैं कि कामरेडों, इस बार तो बड़ी बढ़िया बात है कि तुम्हारा आदमी भी चुनाव लड़ रहा है या फिर पूछते है कि अब किसे वोट दी जाये. इससे एक बड़ी पेचीदा स्थिति पैदा हो जाती है. इस पर हमें बड़े सीधे-साधे ढंग से अपनी स्थिति प्रकट करनी होती है. उन्हें बताया जाता है कि हमारे यहाँ भारत में दो तरह के कम्युनिस्ट हैं – एक वे जो चुनावों में भाग लेते हैं, इन्हें इलेक्शनबाज या संसदमार्गी कम्युनिस्ट कहा जाता है, दूसरे वे जो चुनावों में भाग नहीं लेते हैं. इनमें से एक वे हैं जो दुस्साहसवादी  या नकसलवादी कम्युनिस्ट है जो केवल हथियारों के बल पर इन्कलाब करना चाहते हैं. पहले वाले कम्युनिस्टों के भी आगे कई प्रवर्ग है जैसे सी.पी.आई., सी.पी.एम., सी.पी.एम. लिबरेशन आदि. और जो चुनाव नहीं लड़ते हैं उनमें भी कई तरह के हैं जैसे कुछ क्रांतिकारी ग्रुप हैं और इसके अलावा नकसली और माओवादी भी चुनावों में भाग नहीं लेते हैं..

उपरोक्त चर्चा का आशय क्या है ? इसे समझने के लिए आईए हम भारतीय बुर्जुआजी और इसके  लोकतंत्र (यानि बुर्जुआ लोकतंत्र, जिसके ऐतिहासिक विकास के थोड़े से वस्तुगत अध्ययन से हम इसे बुर्जुआ वर्ग की सर्वहारा वर्ग पर तानाशाही से बढ़कर कुछ नहीं समझते) के विकास और इतिहास को देखें. भारतीय बुर्जुआजी अंगरेजों के समय में पैदा हुई थी. यह पश्चिम या यूरोप के पूंजीपति वर्ग की तरह किसी स्वतन्त्र मुकाबले में संघर्ष से पैदा नहीं हुई है. अग्रेजी साम्राज्य के दौरान कभी छिप-छिप कर तो कभी थोडा सा मुखर होकर यह धीरे-धीरे अपना अस्तित्त्व ग्रहण करती गयी. कभी भी इसने खुलकर या संघर्षमयी तरीके से अपनी जरूरतों या मांगों को नहीं रखा. इसके विपरीत यह समयानुसार अपनी मांगे रखकर और फिर समझौता फिर मांगे और फिर समझौता की प्रक्रिया द्वारा पैदा हुई है. चाहे पहला विश्वयुद्ध हो या फिर दूसरा. जब भी इसने देखा कि अब अंग्रेजी साम्राज्यवाद उलझा हुआ है या किसी और कारण से – ये अपनी मांगे प्रस्तुत कर देती रही है. जैसे १९४२  में जब इसने देखा कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद दूसरे विश्वयुद्ध में उलझा हुआ है तो विश्व साम्राज्यवाद के अंतरविरोधों  का फायदा उठाते हुए ठीक कांग्रेस की अगुआई में इसने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’  शुरू कर दिया. इसने कभी भी उस समय के मेहनतकश वर्ग किसान या मजदूर वर्ग की मांगो को अपने आंदोलनों या मांगों का हिस्सा नहीं बनाया. १९४७ से पहले भी और बाद में भी इसका यही रुझान रहा है,  कभी चीन से समझौता तो कभी अमेरिका से या फिर रूस से.

अभी कुछ दिन पहले ही हरियाणा  के वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंदर हुड्डा के पिता श्री रणवीर हुड्डा का निधन हुआ है. वे हमारी उस सविधान सभा के सदस्य थे जो अंग्रेजी शासन के दौरान गठित हुई थी. उस ज़माने में इस संविधान सभा के सदस्य होने के लिए जो शर्तें निर्धारित थी उनमें केवल भारत की १५ प्रतिशत आबादी ही कवर होती थी. जैसे कि भूमि का मामला या आबियाना कर का भुगतान कौन लोग करते हैं. अन्य ८५ प्रतिशत आबादी को इसमें शामिल होने का कोई अधिकार नहीं था. इन पंद्रह फीसदी लोगों में  से चुनें हुए लोग ही उस संविधान सभा के सदस्य हुए.  जैसा कि होता रहा है,  भारतीय जब विदेश में निर्मित किसी चीज को देखते रहे हैं और फिर उसकी नक़ल करके उस पर ‘भारत में निर्मित’ का ठप्पा लगाते रहे हैं. ठीक वैसे ही इस संविधान सभा द्वारा निर्मित सविधान को ही १९४७ के बाद झाड़-पोंछकर संविधान का दर्जा दे दिया गया. संविधान के निर्माण से पहले संविधान सभा के लिए जिसमें आम लोग शामिल हों, के चुनाव के लिए किसी भी प्रकार की संविधान सभा का चुनाव नहीं हुआ. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कानून के अनुसार मुट्ठीभर वे लोग जो कुलीन थे और जो पैसे-टक्के वाले थे, वे ही भारत के वर्तमान संविधान के निर्माता रहे हैं (अगर इन्हें निर्माता  कहा जाये तो भी). संक्षेप में यही है हमारे संविधान का इतिहास जिसके बारे में बड़ी-बड़ी डींगे हांकी जाती है कि इसमें अम्बेडकर था , हुडा था या कोई और, और यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, उन लोग के बुत लगाये जाते हैं और उन्हें महानता की उपाधियाँ दी जाती है. ऐसी कोई बात नहीं है कि उनके बुत लगायें जाएँ और उन्हें ये उपाधियाँ दी जाएँ.

अब हम भारत की चुनाव प्रणाली की ओर आते हैं. हम देखते हैं कि यह प्रणाली कितनी खर्चीली है और आम लोगों की आकाँक्षाओं पर किसी भी प्रकार से खरी नहीं उतरती है. लेनिन के ‘राज्य और इन्कलाब’ के शब्दों के अनुसार इसमें होता सिर्फ इतना ही है कि हर पांच वर्षों के बाद देखना होता है कि लुटेरे वर्ग का कौनसा धड़ा अब लोगों के कपडे उतारेगा. आओ थोडा सा देखें कि इनके वेतन, भत्तों और अन्य सहूलतों की फेहरिस्त कितनी खर्चीली है. हम देखते हैं कि एक विधायक का चुनाव खर्च करोड़ रुपये या उससे बढ़कर है. चर्चा होती है कि फलां व्यक्ति फलां पार्टी से टिकट लेने के लिए इतने करोड़ देने को तैयार है. चुनाव उम्मीदवारों में से किसी एक का चुनाव करने के लिए हमें चुनाव से किसी गिरोह, भू माफिया या भ्रष्ट व्यक्ति से एक को चुनना होता है. ताज़ा चुनी गयी लोकसभा में ३०० सांसद यानि ५६ फीसदी घोषित करोड़पति हैं. वो ज़माने चले गए जब कामरेड भी कहा करते थे कि एक वोट और एक नोट. अब हम देखते हैं कि हमारी ये जो संसदमार्गी कम्युनिस्ट पार्टियाँ हैं इन्हें कोई बड़े पूंजीपति तो नहीं लेकिन निम्न पूंजीपति वर्ग या प्रोफेसर, वकील या कुलीन मजदूर वर्ग ने इन्हें थोडा-बहुत फंड या पैसा देना शुरू कर दिया है. लेकिन हम देखते हैं कि बुद्धदेव भटाचार्य ने भी उन नीतियों को पश्चिम बंगाल में लागू कर दिया है जो बुर्जुआ की मन-पसंद रही हैं, तो फंड और पैसा देने वाला ये वर्ग भी निराशा का शिकार है. इतिहास में हम देखते हैं कि पहली बार जब केरल में  नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में वामपंथियों की सरकार बनी तो उस वक्त नेहरू प्रधान मंत्री थे और इंदिरा कांग्रेस की प्रधान. उन्होंने इस सरकार को तुंरत तोड़ दिया. लेकिन धीरे-धीरे भारत की बुर्जुआजी को और इसका प्रतिनिधित्व करने वाले दलों ने इस बात को समझा और आत्मसात किया कि ऐसी कोई बात नहीं है कि इन नामधारी कम्युनिस्टों से डरा जाये, तो उन्होंने इनको बर्दाशत करना शुरू कर दिया और इन्हें इनका वाजिब हक़ और सम्मान (?) देना शुरू कर दिया.

अब हम देखते हैं कि जिस देश की ८४ करोड़ आबादी जो २० रुपये दैनिक से गुज़ारा चलाती है, इस चुनावी नौटंकी में सिवाय अपना तमाशा बना लेने से, उन्हें कुछ हासिल नहीं होता है और न ही हो सकता है, वे अपने को बड़ी हास्यपद स्थिति में पाती है. ये आंकड़े कुछ वर्ष पुराने हैं. इन्हीं के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमंडल का रोजाना खर्च पंद्रह लाख रूपये है, प्रधानमंत्री दफ्तर पर प्रतिदिन दो लाख अड़तीस हज़ार रुपये खर्च होते हैं. राष्ट्रपति पर प्रतिदिन चार लाख चौदह हज़ार. संसद की एक घंटे की कार्रवाई पर सोलह लाख रुपये और इस प्रकार राज्य सभा की एक घंटे की कार्रवाई और राज्य विधान सभा की कार्रवाई  पर बारह-पंद्रह लाख रुपये प्रति घंटा खर्च होते हैं. इनके सदस्यों के वेतन कम दीखते हों लेकिन अन्य सहूलतें और  अन्य आमदनी का कोई हिसाब नहीं है. संसद की अलग-अलग कमेटियों में भाग लेने के लिए ४०० रुपये प्रतिदिन, सदन की मीटिंग बेशक न चलती हो तो भी ८००० रुपये प्रति मास लोगों से संपर्क के लिए चुनाव भता, दफ्तर में आने के लिए २५० ० रुपये , एक या दो सहायक रखने के लिए ६००० रुपये, प्रत्येक सदस्य को स्कूटर , ए.सी. या कार आदि सहूलतें,  फोन बिना कराये के , एक लाख मुफ्त फोन काल्स , फर्स्ट क्लास रेलवे और हवाई यात्रा की टिकटों पर भारी छूट. प्रत्येक सांसद अपने परिवार समेत ३२ हवाई यात्रायें मुफ्त कर सकता है , ..अन्य कमाई  को छोड़ दें. अन्य संस्थाओं के आफिसरों और अमले के खर्च पर लेनिन के ‘राज्य ओर इन्कलाब’ पुस्तक के शब्द कि इन प्रोफेसरों और आफिसरों के इतने बड़े वेतन, यह परोक्ष रूप से रिश्वत नहीं तो और क्या है? इस भारी-भरकम  रकम को खर्च करके यह मशीनरी लोगों पर राज्य करती है. मंत्री परिषद की सुरक्षा पर ५० करोड़ और अन्य प्रमुख हस्तियों की सुरक्षा पर एक अरब 61 करोड़ खर्च.

इसी ऑडियो के सार का बाकी हिस्सा अगली किश्त में जिसमें बुर्जुआजी के ऐतिहासिक विकास और बदल के बारे में चर्चा करेंगे.

चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प – दूसरी किश्त

प्रथम अरविन्द स्मृति संगोष्ठी कार्यक्रम

Posted on Updated on

(24 जुलाई, 2009)

विषय

भूमण्डलीकरण के दौर में

श्रम कानून और मज़दूर वर्ग के

प्रतिरोध  के नये रूप

भूमण्डलीकरण पर विमर्श अभी भी अकादमिक जगत में प्रचलित फैशन बना हुआ है। लेकिन साथ ही यह उन लोगों के लिए भी अध्ययन-मनन और विचार-विमर्श का एक केन्द्रीय विषय है, जो व्यापक मेहनतकश जनसमुदाय की मुक्ति से जुड़े प्रश्नों पर जेनुइन सरोकार के साथ सोचते हैं या जो मज़दूर आन्दोलन को नयी ज़मीन पर फिर से खड़ा करने के अनथक प्रयासों में जुटे हुए हैं।

विगत शताब्दी के लगभग अन्तिम दो दशकों के दौरान वित्तीय पूँजी के वैश्विक नियंत्रण एवं वर्चस्व के नये रूपों एवं संरचनाओं के सामने आने के साथ ही पूँजी की कार्यप्रणाली में जो व्यापक और सूक्ष्म बदलाव आये तथा अतिलाभ निचोड़ने की जो नयी प्रविधियां विकसित हुई, कुल मिलाकर इनको ही भूमण्डलीकरण परिघटना का केन्द्रीय संघटक अवयव माना जाता है। यही वह समय था जब विपर्यय और प्रतिक्रिया की लहर विश्वव्यापी बन चुकी थी। बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रान्तियों की पराजय के बाद, पूँजीवाद के पक्षधर सिद्धांतकार और प्रचारक धर्मशास्त्रियों की तरह पूँजीवाद के अमरत्व की घोषणा कर रहे थे। कहने की ज़रूरत नहीं कि विश्वव्यापी मन्दी के वर्तमान दौर ने पूँजीवाद के असाध्य ढाँचागत संकट की गम्भीरता दर्शाकर इस मिथक को ध्वस्त कर दिया है। लेकिन पूँजी का भूमण्डलीय तन्त्र अपने आन्तरिक संकटों से स्वयं ही टूट-बिखरकर किसी नये ढाँचे के लिए जगह नहीं बना देगा। यह अपनी जड़ता की शक्ति के सहारे तबतक चलता रहेगा और अपना आंशिक पुनर्गठन करता रहेगा, जबतक कि श्रम की शक्तियाँ सुनियोजित प्रयासों से इसे तोड़कर नये ढाँचे का निर्माण नहीं करेंगी।

विचारणीय प्रश्न यह है कि छिटपुट मुठभेड़ों, असंगठित- स्वयंस्फूर्त प्रतिरोधों और आत्मरक्षात्मक उपक्रमों के अतिरिक्त मज़दूर वर्ग आज कहीं भी पूँजी के संगठित हमलों एवं दबाव का प्रभावी ढंग से उत्तर नहीं दे पा रहा है। अपने ऐतिहासिक मिशन और दूरगामी राजनीतिक संघर्ष को आगे बढ़ा पाना तो दूर, मज़दूर वर्ग अपने तात्कालिक एवं आंशिक हितों की लड़ाई को, आर्थिक माँगों एवं सीमित जनवादी अधिकारों की लड़ाई को भी प्रभावी ढंग से संगठित नहीं कर पा रहा है। यह एक जलता हुआ सवाल है, जिसके रूबरू हम-आप खड़े हैं!

अक्सर ऐसा होता है कि अतीत के शानदार और सफल संघर्षों से सम्मोहित होकर हम उनका अनुकरण करने लगते हैं। इसके पीछे एक कारण परिवर्तन के लिए हमारी व्यग्रता का होना भी होता है, जबकि ज़रूरत इस बात की होती है कि नये बदलावों का अध्ययन किया जाये और नयी राहों का संधान किया जाये। उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के मज़दूर आन्दोलनों के अनुभवों का अध्ययन-समाहार ज़रूरी है, पर उन्हीं की प्रतिछवि में आज के मज़दूर आन्दोलन को नहीं देखा जा सकता। हमें निरन्तरता और परिवर्तन के द्वन्द्व को सही ढंग से समझना होगा।

इक्कीसवीं सदी में पूँजी की कार्य-प्रणाली वही नहीं है जो बीसवीं शताब्दी में थी और उसमें कई बुनियादी ढाँचागत बदलाव भी आये हैं। इस स्थिति में, ज़ाहिर है कि श्रम के पक्ष को भी प्रतिरोध के तौर-तरीकों और रणनीति में कुछ बुनियादी बदलाव लाने होंगे। स्वचालन और अन्य नयी तकनीकों के सहारे पूँजी ने अतिलाभ निचोड़ने के नये तौर-तरीके विकसित कर लिये हैं। ज्यादातर मामलों में, बड़े-बड़े कारखानों में मज़दूरों की भारी आबादी के संकेन्द्रण का स्थान कई छोटे-छोटे कारखानों में मज़दूरों की छोटी-छोटी आबादियों के बिखराव ने ले लिया है। किसी एक माल के दस हिस्से न सिर्फ एक देश के दस हिस्सों में बल्कि दुनिया के दस देशों में बिखरे संयंत्रों में बनते हैं और फिर ग्यारहवीं जगह आपस में जुड़ते हैं। इसे इन दिनों प्राय: `ग्लोबल असेम्बली लाइन´ या `विखण्डित असेम्बली लाइन´ कहा जाता है। प्राय: इन सभी कारख़ानों में अधिकांश मज़दूर ठेका, दिहाड़ी, कैजुअल होते हैं या पीसरेट पर काम करते हैं। कुशल मज़दूरों की एक बहुत छोटी आबादी ही नियमित की श्रेणी में आती है। कम मज़दूरी देकर स्त्रियों और बच्चों से काम लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इन्हीं नयी चीज़ों को आज श्रम के अनौपचारिकीकरण, परिधिकरण, ठेकाकरण, स्त्रीकरण आदि नामों से जाना जाता है। तात्पर्य यह कि कई तरीकों से मज़दूरों की संगठित शक्ति और चेतना को विखण्डित करने के साथ ही कई स्तरों पर मज़दूरों को आपस में ही बाँट दिया गया है और एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है। संगठित बड़ी ट्रेड यूनियनें ज्यादातर बेहतर वेतन और जीवनस्थितियों वाले नियमित मज़दूरों और कुलीन मज़दूरों की अत्यन्त छोटी-सी आबादी के आर्थिक हितों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं।

भूमण्डलीकरण के दौर ने राष्ट्र-राज्य की भूमिका का भी पुनर्निर्धारण किया है। पूँजी की आवाजाही के लिए राष्ट्र-राज्यों की सीमाएँ ज्यादा से ज्यादा खुल गयी हैं जबकि श्रम की आवाजाही की बंदिशें और शर्तें बढ़ गयी हैं। निजीकरण की अंधाधुंध मुहिम में शिक्षा, स्वास्थ्य आदि – सबकुछ को उत्पाद का दर्जा देकर बाज़ार के हवाले कर दिया गया है, लेकिन श्रम को नियंत्रित करने के मामले में सरकार, नौकरशाही और न्यायपालिका ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने लगी हैं। यूँ तो बुर्जुआ श्रम कानून पहले भी मज़दूरों के आर्थिक हितों और राजनीतिक अधिकारों की सीमित हिफाजित ही कर पाते थे, पर आज श्रम कानूनों और श्रम न्यायालयों का जैसे कोई मतलब ही नहीं रह गया है। लम्बे संघर्षों के बाद रोज़गार-सुरक्षा, काम के घण्टे, न्यूनतम मज़दूरी, ओवरटाइम, आवास आदि से जुड़े जो अधिकार मज़दूर वर्ग ने हासिल किये थे – वे उसके हाथ से छिन चुके हैं और इन मुद्दों पर आन्दोलन संगठित करने की परिस्थितियाँ एकदम वैसी ही नहीं हैं, जैसी आज से सौ या पचास साल पहले थीं।

मज़दूर आन्दोलन से जुड़े इन सभी प्रश्नों और समस्याओं को एक साथ रखने का मतलब यह कतई नहीं है कि हमारा दृष्टिकोण निराशावादी है। बल्कि हम वैज्ञानिक और यथार्थवादी अप्रोच एवं पद्धति अपनाकर सामने उपस्थित समस्याओं का सिद्धांत एवं व्यवहार के धरातल पर हल निकालना चाहते हैं और वर्तमान गतिरोध् को तोड़ने की कोशिशों को गति देना चाहते हैं। यहाँ हमने आज के दौर में मज़दूर आन्दोलन के समक्ष उपस्थित समस्याओं-चुनौतियों के बारे में संक्षिप्त चर्चा की है। प्रस्तावित संगोष्ठी में सिर्फ इन समस्याओं पर ही नहीं, बल्कि मज़दूर आन्दोलन के नये रूपों और नयी रणनीतियों पर भी सहभागियों के साथ मिलबैठकर बात करेंगे |

यह संगोष्ठी हम अपने प्रिय दिवंगत साथी अरविन्द सिंह की स्मृति में आयोजित कर रहे हैं। 24 जुलाई, 2009 साथी अरविन्द की पहली पुण्यतिथि है। गत वर्ष इसी दिन, उनका असामयिक निध्न हो गया था। तब उनकी आयु मात्र 44 वर्ष थी। वाम प्रगतिशील धारा के अधिकांश बुद्धिजीवी, क्रान्तिकारी वामधारा के राजनीतिक कार्यकर्ता और मज़दूर संगठनकर्ता साथी अरविन्द से परिचित हैं। वे मज़दूर अख़बार `बिगुल´ और वाम बौद्धिक पत्रिका `दायित्वबोध´ से जुड़े थे। छात्र-युवा आन्दोलन में लगभग डेढ़ दशक की सक्रियता के बाद वे मज़दूरों को संगठित करने के काम में लगभग एक दशक से लगे हुए थे। दिल्ली और नोएडा से लेकर पूर्वी उत्तरप्रदेश तक कई मज़दूर संघर्षों में वे अग्रणी भूमिका निभा चुके थे। अपने अन्तिम समय में भी वे गोरखपुर में सफाईकर्मियों के आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। उनका छोटा किन्तु सघन जीवन राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। `भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम कानून और मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध के नये रूप´ जैसे ज्वलन्त और जीवन्त विषय पर संगोष्ठी का आयोजन ऐसे साथी को याद करने का शायद सबसे सही-सटीक तरीका होगा। हम सभी मज़दूर कार्यकर्ताओं, मज़दूर आन्दोलन से जुड़ाव एवं हमदर्दी रखने वाले बुद्धिजीवियों और नागरिकों को इस संगोष्ठी में भाग लेने के लिए गर्मजोशी एवं हार्दिक आग्रह के साथ आमंत्रित करते हैं। हमें विश्वास है कि आन्दोलन की मौजूदा चुनौतियों पर हम जीवन्त और उपयोगी चर्चा करेंगे।

सधन्यवाद ,

साभिवादन,

कात्यायनी

अध्यक्ष

राहुल फाउण्डेशन

कार्यक्रम

प्रथम सत्र

पूर्वाह्न 11 बजे से 2 बजे तक

भोजनावकाश

अपरांत 2 से 2.30 बजे तक

द्वितीय सत्र

अपरांत 2.30 से सायं 7.30 बजे तक

प्रथम अरविन्द स्मृति संगोष्टी

(24 जुलाई 2009)

comrade-arvind

विषय

भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम कानून और मज़दूर

वर्ग के प्रतिरोध के नये रूप

स्थान:

गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान सभागार

दीनदयाल उपाध्याय मार्ग

(निकट आई.टी.ओ.)

नई दिल्ली

संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों से मज़दूर संगठनकर्ताओं, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं, श्रम कानूनों के विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों के भाग लेने की पुष्टि हो चुकी है। आपसे हमारा पुरज़ोर अनुरोध् है कि जल्द से जल्द अपनी भागीदारी की पुष्टि करें और अपने आने की सूचना दें।

गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान सभागार

नई दिल्ली

सुबह 11 बजे से शाम 7.30 बजे तक

आप सादर आमंत्रित हैं!

सम्पर्क:

कात्यायनी (0522-2786782)

सत्यम (099104 62009 / 011-2783 4130)

आयोजक:

राहुल फाउण्डेशन


जब औजार क्रांति की माँग करते हैं

Posted on Updated on

श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के आलेख  उद्यम और श्रम की इन टिप्पणियों को  देखें ;

अभिषेक ओझा said… “लाल झण्डा माने अकार्यकुशलता पर प्रीमियम’: लाख टके की बात ! ”

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said… “जहाँ उद्यम उद्यमी और उद्योग का अर्थ श्रम का शोषण, शोषकपूँजीपति और पूँजी का विस्तारवाद, संस्कृत का श्लोक बुर्जुआओ की दलाल ब्राह्मणवादी मानसिकता समझा जाए तो व्याप्त औद्योगिक दुर्द्शा पर व्यक्त आपकी चिन्ता पर मरणासन्न मार्क्सवाद की ऎसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही है।
तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि कारवाँ लुटा क्यूँ कि तर्ज पर यह जवाबदेही बनती है कि भारत में २लाख से ज्यादा औद्योगिक इकाइयाँ बंद क्यों हैं? एशिया का मैनचेस्टर के नाम से जाना जानें वाला और जो १९४७ के पहले २ लाख तथा १९७० में लगभग १० लाख कामगारों को रोजगार देता था, वह कानपुर आज तबाह क्यों है? टैफ्को, लालइमली, एल्गिन, म्योर, अथर्टन, कानपुर टेक्सटाइल, रेल वैगन फैक्ट्री, जे०के०रेयन, जे०के०काटन, जे०के०जूट, स्वदेशी काटन,मिश्रा होजरी, ब्रशवेयर कारपोरेशन, मोतीलाल पदमपत शुगर मिल्स, गैंजेस फ्लोर मिल्स, न्यूकानपुर फ्लोर मिल्स, गणेश फ्लोर एण्ड वेजिटेबिल आयल मिल, श्रीराम महादेव फ्लोर मिल, एच ए एल, इण्डियन फर्टिलाइजर तथा अन्य सैकड़ों छोटे-बड़े कारखाने बन्द क्यों और किसकी वजह से हैं। सिर्फ और सिर्फ लाल झण्ड़े के कारण।”

काजल कुमार Kajal Kumar said… “आज लाल झंडे का मतलब केवल अधिकार रह गया है, न कि उत्तरदायित्व. ”

dhiru singh {धीरू सिंह} said… “मजदूर यूनियन तो स्पीड ब्रेकर है तरक्की उन्हें खलती है और हड़ताल उनकी आमदनी का जरिए है”

Amit said… “यूनियन श्रमिकों को संगठित करने और कुटिल उद्योगपतियों के द्वारा श्रमिकों का शोषण रोकने के लिए बनाई गई थीं लेकिन वहाँ भी वैसी ही कुटिल राजनीति होने लगी जैसी लोकतंत्रों में होती है। श्रमिक अपना विवेक बेच के यूनियन लीडरों के पीछे भेड़ों की भांति चलने लगे और लीडर स्वयं बादशाह बन गए।”

Mired Mirage said… “The conclusion I have reached is that neither the union, nor the owners care a damn for you.They all have vested interests. Labour or whatever, you are just pawns in this great game of chess….”

उपरोक्त कुछ टिप्पणियों से जो निष्कर्ष निकलते हैं :

१. मजदूर यूनियनों की अर्थवादी रोटियां सकने कि राजनीति और
२.  श्रमिकों, ट्रेड यूनियनों और उद्योगपतियों में से किसी एक पक्ष की जिद्द के कारण हड़ताल, तालाबंदी या किसी औद्योगिक इकाई द्वारा पूर्ण रूप से उत्पादन बंद.

पहला निष्कर्ष भी एक विस्तृत वाद-विवाद की मांग करता है लेकिन हम यहाँ केवल दूसरे निष्कर्ष जिसमें किसी औद्योगिक  संयंत्र में काम बंद होने के पीछे “श्रमिकों, ट्रेड यूनियनों और उद्योगपतियों में से किसी एक पक्ष की जिद्द” को दोषी ठहराया जाता है तक सीमित रहेंगे.

अनुभववादी या मनोगत तरीके से सोचने पर स्थिति के वस्तुगत निष्कर्ष सतही और अवैज्ञानिक होते हैं क्योंकि किसी एक संयंत्र में तालाबंदी आदि के पीछे हम केवल स्थानीय कारणों तक सीमित रह जाते हैं जबकि आज की इस उत्पादन की प्रक्रिया को स्थानीय, एकांगी और आंशिक रूप से न समझकर  इसे विश्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विसंगतियों की समग्रता में देखना होगा. आज के नवउदारवादी युग में कोई भी ऐसा उत्पादन नहीं है जो साम्राज्यवादी पूंजी से निरपेक्ष हो.

थोडा सा सैद्धांतिक कारणों को समझने की कोशिश करते हैं,

पूंजी के दो भाग होते हैं. स्थिर (constant) पूंजी और परिवर्ती (variable) पूंजी. कच्चा माल, सहायक सामग्री और श्रम के औजार स्थिर पूंजी में शामिल होते हैं. उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान इनके मूल्य का कुछ भाग नए उत्पाद में रूपांतरित हो जाता है लेकिन इससे मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती.

दूसरी ओर, उत्पादन की प्रक्रिया में पूंजी के उस भाग के मूल्य में अवश्य परिवर्तन हो जाता है, जिसका प्रतिनिधित्व श्रम शक्ति करता है. वह खुद अपने मूल्य के समतुल्य का पुनरुत्पादन भी करता है और साथ ही उससे अधिक बेशी मूल्य भी पैदा कर देता है. इसे परिवर्ती पूंजी कहते हैं.

प्रतिस्पर्द्धा के चलते पूंजीपति के लिए ज़रूरी होता है कि वह स्थिर पूंजी वाले भाग पर नई से नई तकनीक का प्रयोग करते हुए और  परिवर्ती पूंजी पर मजदूरों की संख्या में कटौती करके श्रम सघनता बढाकर अधिक से अधिक उत्पादन करे. इससे अतिरिक्त मूल्य की दर बढ़ जाती या यूं कहें कि मजदूरों के शोषण की दर में बढोत्तरी होती है.  इस मामले में बड़ा पूंजीपति छोटे के मुकाबले में अधिक लाभ में रहता है. इस होड़ में  प्राय: छोटा पूंजीपति दम तोड़ देता है और उसकी औद्योगिक इकाई बंद हो जाती है. इसका एक परिणाम बेरोजगारी में वृद्धि होता है जो बड़े पूंजीपति द्वारा मजदूरों की संख्या में कटौती और बंद होने वाली औद्योगिक इकाई के कारण होती है.

इसके अलावा औद्योगिक इकाईयों के बंद होने के पीछे जो  दूसरा सैद्धांतिक तर्क सक्रीय है, उसे भी समझने की कोशिश करते हैं;

‘आयरन हील’ में  मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य की सरल व्याख्या करते हुए अर्नेस्ट निम्न निष्कर्ष निकालता है और प्रश्न करता है;

‘ मैं अपनी बात संक्षेप में दोहरा दूं. हमने एक विशेष औद्योगिक प्रक्रिया से बात शुरू की थी. एक जूता फैक्ट्री से हमने पाया कि जो हाल वहां है वही सारे औद्योगिक जगत में हैं. हमने पाया कि मजदूर को उत्पादन का एक हिस्सा मिलता है जिसे वह पूरी तरह खर्च कर देता है और पूंजीपति पूरा खर्च नहीं कर पाता. बचे हुए अतिरिक्त धन के लिए विदेशी बाज़ार अनिवार्य है. इस निवेश से वह देश भी अतिरिक्त पैदा करने में सक्षम हो जायेगा. जब एक दिन सभी इस स्थिति में पहुँच जायेंगे तो अंतत: इस अतिरिक्त का क्या होगा?

इसी अतिरिक्त ने वित्तीय साम्राज्यवादी पूंजी का रूप धारण करना शुरू किया लेकिन बीसवीं शताब्दी के शुरू में जब यह नावल प्रकाशित हुआ था उस वक्त वित्तीय पूंजी जो गैर उत्पादन कार्यों में लगती है , विश्व अर्थव्यवस्था की कुल पूंजी में उत्पादन की पूंजी के मुकाबले सतह पर तैरते एक बुलबुले समान थी. लेकिन आज स्थिति एकदम उल्ट है. आज वित्तीय पूंजी के मुकाबले उत्पादन कार्यों में लगी पूंजी एक बुलबुले समान है. जब इस अतिरिक्त के लिए उत्पादन कार्यों में लगने की कोई जगह नहीं है तो “किसी स्थानीय कुटीर उद्योग या मध्यम उद्योग की पूंजी” का मुकाबले में खड़े होना किस तरह से एक आसन कार्य हो सकता है ?

किसी स्थानीय कुटीर उद्योग या मध्यम उद्योग द्वारा जब उत्पादन शुरू होता है तो श्रम और पूंजी की टक्कर इस प्रक्रिया की एक आन्तरिक ज़रूरी शर्त होती है न कि बाहर से पैदा किया गया कोई छूत का रोग. खैर, उत्पादन शुरू हो जाता है, वस्तुओं के मूल्य का निर्धारण मार्केट ने तय करना होता है जिसे अन्य औद्योगिक इकाईयों की वस्तुओं के मूल्य से टक्कर लेनी होती है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इस “कुटीर उद्योग या मध्यम उद्योग” का खड़े रहना असंभव नहीं तो इतना आसान और जोखिम रहित नहीं होता. निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि किसी भी संयंत्र में उत्पादन कार्य के ठप होने के पीछे ” श्रमिकों, ट्रेड यूनियनों और उद्योगपतियों में से किसी एक पक्ष की जिद्द” की अपेक्षा स्वयं पूंजी की आन्तरिक विसंगति कहीं ज्यादा जिम्मेदार होती है.

बीसवीं शताब्दी के शुरू में इसी अतिरिक्त ने, जिसके लिए उत्पादन के कार्यों के लिए कोई जगह बाकी नहीं बची रह गयी थी –  इसी अतिरिक्त ने वित्तीय पूंजी का रूप धारण करना शुरू किया जिसका चरित्र गैर-उत्पादन कार्यों में लगना होता है. वित्तीय पूंजी साम्राज्यवाद का एक ज़रूरी लक्ष्ण है. इसी अतिरिक्त मूल्य में लगातार बढोत्तरी का परिणाम था कि साम्राज्यवादी पूंजी विश्व का पुन: बटवारा करे जिसका परिणाम बीसवीं शताब्दी के दो विश्व-युद्ध  थे. अपने अतिरिक्त को खपाने का एक बढ़िया तरीका होता है कि मानवता को युद्ध में झोंक दिया जाये. इससे न केवल बेरोजगारी कम होती है बल्कि विरोधी देशों को जीतकर, वहां अपनी डमी सरकार की स्थापना द्वारा अपने हितों कि पूर्ति जारी रखी जा सकती है.

आज भले ही समाजवाद हार चुका हो लेकिन पूंजी का चरित्र किसी भी प्रकार से विकासोंमुखी नहीं है. पूंजी स्वयं परजीवी होती है जो मजदूर द्वारा पैदा किये गए अतिरिक्त से अपना विस्तार करती है. लेकिन आज तो पूंजी का एक भाग जो वित्तीय है जो उत्पादन की किसी भी प्रक्रिया में नहीं है, जो अपने विस्तार के लिए उस पूंजी से हिस्सा छीनता है जो स्वयं मजदूर से निचोडे गए अतिरिक्त पर निर्भर होती है – पूंजी का यह चरित्र किसी तरह से भी मानव हितैषी नहीं है. बीसवीं शताब्दी की यह भी एक विडम्बना ही थी कि एक तरफ समाजवाद हार गया और दूसरी तरफ पूंजीवाद की समस्याओं में लगातार बढोत्तरी हो रही थी.

उत्पादन की शक्तियों का बेहद विस्तार हो चुका है लेकिन उत्पादन सम्बन्ध वही पुराने हैं. इस आलेख के शुरू में दी गयी टिप्पणियों में वर्णित फ़िक्र और सुझाव ठीक वैसे ही हैं जैसे पैर के बढ़ने पर जूता बदलने की बजाय पैर को काटना. उत्पादन की शक्तियां जब विकसित हो जाती हैं तो वे पुराने आर्थिक संबंधों को तोड़ डालती हैं. मानव जाति का अब तक का विकास इसी बात की पुष्टि करता है. उत्पादन की शक्तियों के विकास पर माओ के इस कथन –“औजार मनुष्यों द्वारा निर्मित किए जाते हैं | जब औजार क्रांति की माँग करते हैं , वे मनुष्यों के अंदर से बोलते हैं” का महत्त्व कम नहीं हुआ है. भले ही समाजवाद अपने पहले प्रयोग में हार चुका हो लेकिन मानव जाति ने अगर आगे बढ़ना है तो यही एक रास्ता है.

कला-साहित्य-संस्कृति में “लोकवाद” और “स्वदेशीवाद” का विरोध करो!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

प्रतिक्रिया के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में विश्व-पूँजी की संयुक्त शक्ति ने जनता के जीवन पर जो सर्वतोमुखी हमला बोला है, राजनीति की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी उसका प्रतिरोध भविष्य के बजाय अतीत की ज़मीन पर खड़े होकर करने की एक पराजयवादी-पुनरुत्थानवादी और लोकरंजकतावादी प्रवृत्ति मौजूद है। इस प्रवृत्ति के प्रभाव-उच्छेदन के बिना, एक वैज्ञानिक इतिहास-दृष्टि के आधार पर, जनता के सांस्कृतिक आन्दोलन का पुनर्निर्माण नहीं किया जा सकता। विस्तार से बचते हुए, हम अपनी बात यहाँ कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहेंगे।

पहले “लोकवाद” के कुछ उदाहरण लें। आज भारत जैसे देशों में जो रुग्ण-निरंकुश किस्म का पूँजीवादीकरण हो रहा है, वह पूँजीवादी रूपान्तरण के क्लासिकी ऐतिहासिक उदाहरणों से सर्वथा भिन्न है। यहाँ कुछ भी सकारात्मक नहीं है। सामन्ती पार्थक्य की जगह पूँजीवादी अलगाव, सामन्ती निरंकुश स्वेच्छाचारी तंत्र की जगह पूँजीवादी सर्वसत्तावाद। एक पुरातन आपदा की जगह एक नूतन विपदा जिसने पुरातन के कई सांस्कृतिक मूल्यों को ज्यों का त्यों अपना लिया है। हमारे कला-साहित्य में अकसर उन चीज़ों के लिए शोकगीत या रुदन के स्वर सुनाई पड़ते हैं, जिन्हें इतिहास की अनिवार्य गति से नष्ट होना ही था। जैसे कविगण कभी-कभी तो उत्पादन और दैनिन्दन इस्तेमाल की उन पुरानी चीज़ों को भी बहुत आह भरते हुए याद करते हैं जो अन्य चीज़ों द्वारा विस्थापित कर दी गई और जिन्हें स्वाभाविक गति से, अतीत की वस्तु बन ही जाना था क्योंकि यही इतिहास का शाश्वत नियम है। लोटा, दातुन और कठही हल के लिए रोने की ज़रूरत नहीं। कठही हल की जगह ट्रैक्टर को आना ही था। मशीनों को हर हाल में मानवविरोधी चित्रित करना भी एक ग़ैर सर्वहारा, बुर्जुआ पर्यावरणवादी नज़रिया है। मशीनें मानवीय कौशल और चिन्तन की महान उपज हैं, दोष मशीनों का नहीं बल्कि उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व की व्यवस्था का है जिनके चलते मशीनें मुनाफे की अन्धी हवस का उपकरण बनकर मनुष्य और प्रकृति को निचोड़कर तबाह कर डालती हैं।

इसी तरह की अतीतगामी दृष्टि वाले रचनाकार अकसर पूँजीवादी अलगाव के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करते हुए प्राकृतिक अर्थव्यवस्था वाले प्राक्-पूँजीवादी समाजों की उस रागात्मकता और उन काव्यात्मक सम्बन्धों को महिमामण्डित करने लगते हैं जिन्हें पूँजी की सत्ता ने आने-पाई के ठण्डे पानी में डुबो दिया। प्राक्पूँजीवादी, ग्रामीण समाजों की रागात्मकता का काल्पनिक आदर्शीकरण करने वाले प्राय: उसकी पृष्ठभूमि में मौजूद सामन्ती निरंकुशता तथा स्त्रियों और दलितों के बर्बर दमन की अनजाने ही अनदेखी करने की कोशिश करते हैं और श्रम की संस्कृति के वर्चस्व वाले नये, भावी समाज को नहीं बल्कि अनिवार्यत: नष्ट होने वाले अतीत को अपना प्रेरणा-स्रोत बनाने लगते हैं। इसे किसानी “समाजवादी” यूटोपिया का एक रूप भी कहा जा सकता है।

“लोकवाद” का एक और कूपमण्डूकतापूर्ण संस्करण यह भी है कि कई प्रगतिशील कवि-लेखक गण नागर जीवन की हृदयहीनता, नग्न बुर्जुआ लूट-खसोट, आपाधापी और अलगाव की आलोचना करते हुए आहें भरते हुए गाँवों को याद करते हैं, और वर्ग-निरपेक्ष रूप में शहर की हृदयहीनता और गाँवों के “सामूहिक जीवन” की तुलना करते प्रतीत होते हैं। यह `अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है´ का नया संस्करण है। यह सही है कि पूँजीवादी समाज में गाँव और शहर का अन्तर लगातार बढ़ता जाता है और शहर की समृद्धि गाँवों को लूटकर ही फलती-फूलती है। पर इस तथ्य को वर्ग-निरपेक्ष रूप में नहीं देखा जा सकता। शहरों में भी बहुंसख्यक आबादी निचोड़े जाने वाले सर्वहारा और अर्द्धसर्वहारा की और परेशानहाल निम्न-मध्यवर्ग की ही है। एक छोटी सी आबादी है जो गाँवों को लूटती है और शहर के उजरती गुलामों को भी। जो शहर की भारी मज़दूर और निम्न-मध्यवर्गीय नौकरीपेशा आबादी है वह गाँवों से ही पूँजी की मार से दर-बदर होकर शहर आई है और यह दुरवस्था फिर भी इतिहास की दृष्टि से प्रगतिशील कदम है। जो आबादी गँवई सुस्ती और कूपमण्डूकता के दलदल से बाहर पूँजीवादी जीवन की बर्बर हृदयहीन अफरातफरी के बीचोबीच धकेल दी गई है, वही पूँजी की सत्ता के लिए कब्र खोदने का काम करेगी। ग्रामीण जीवन की शान्ति के लिए बिसूरने वाले सफेदपोश प्रगतिशील प्राय: ग्रामीण कुलीनों (प्राय: सवर्णों) की ही अगली पीढ़ियाँ हैं। यदि वे ग़रीब किसान, खेत मज़दूर या दलित के बेटे होते या स्त्री होते तो उजरती गुलामी का शहरी नर्क भोगते हुए ग्रामीण निरंकुशता, सुस्ती और कूपमण्डूकता के अँधेरे में वापस नहीं जाना चाहते। जाएँगे तो वे भी नहीं जो गाँवों को खूब याद करते हैं। दरअसल यह अपराध-बोध की कुछ वैसी ही रिसती हुई गाँठ है, जैसी गाँठ के चलते, अनिवासी धनिक भारतीय पाश्चात्य समृद्धि की पत्तल चाटते हुए भारत और भारतीय संस्कृति को खूब याद करते हैं और इस नाम पर यहाँ की सबसे प्रतिक्रियावादी शक्तियों और सबसे प्रतिक्रियावादी मूल्यों के पक्ष में जा खड़े होते हैं। प्रगतिशीलता का ठप्पा बरकरार रखने और “नागर-बोध ग्रस्त” होने के आरोप से बचने के लिए बहुतेरे रचनाकार दशकों पुरानी स्मृतियों और चन्द एक दिनों के दौरों और अख़बारी तथ्यों के आधार पर आज के ग्रामीण जीवन के यथार्थ का कलात्मक पुनर्सृजन करने की कोशिश करते हैं जो वास्तविकता से कोसों दूर होता है। ऐसा वे इसलिए भी करते हैं कि स्मृतियों के सहारे गाँव पर लिखना आसान है, पर उन्हीं के शहरों में उजरती गुलामी का जो रौरव नर्क एक समान्तर दुनिया के रूप में मौजूद है, वहाँ के जीवन के रूबरू होने लायक मज़बूती उनके दिल-गुर्दे में कतई नहीं है।

“लोकवाद” के अन्य कई रूप हैं। जैसे कि संगीत की दुनिया को लें। क्रान्तिकारी संगीत की दुनिया में लोक संगीत से काफी कुछ हूबहू उधार ले लेने – लोकगीतों की पैरोडी करने तक की प्रवृत्ति मौजूद है। लोक गीत-संगीत की परम्परा हमारी अपनी परम्परा है और उससे काफी-कुछ लेना होगा, लेकिन हूबहू नहीं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक के साथ छाँट-बीनकर। लोकसंगीत क्रान्तिकारी गण संगीत का समानार्थक नहीं हो सकता। लोकसंगीत का आधार आदिम जनजातीय जीवन की सामूहिकता, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के किसानी जीवन और दस्तकारी में मौजूद रहा है और कालान्तर में उसका स्थान इतिहास का संग्रहालय ही होगा। उसके कुछ संघटक तत्त्व नये सर्वहारा संगीत में, निरन्तरता के पहलू के रूप में मौजूद रहेंगे। लोकसंगीत सदियों के सांस्कृतिक संस्कारों-आदतों के चलते जनता में लोकप्रिय होता है, लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं कि नई क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु के लिए उसके रूप उपयुक्त होंगे।

नुक्कड़ नाटकों और रंगमंच पर भी लोकरंजकतावाद अनेक रूपों में मौजूद है। प्राय: देखने में यही आता है कि प्रगतिशील नाटककार और नाट्य-निर्देशक भी तर्कबुद्धि, विश्वदृष्टिकोण और आलोचनात्मक विवेक पर बल देने वाले `एपिक थिएटर´ या द्वन्द्वात्मक थिएटर की जगह भावना, अनुभूति और तदनुभूति पर बल देने वाले परम्परागत `ड्रामेटिक थिएटर´ की शैली और तकनीक को ही अपनाते हैं। नुक्कड़ नाटकों में कुछ हद तक पहली धारा की शैली को अपनाया गया है, लेकिन फिर भी दर्शकों को भावनात्मक आवेश से आप्लावित कर देने वाली शैली भी काफी चलन में है, जहाँ विचार पक्ष काफी कमज़ोर पड़ जाता है, जैसाकि प्राय: गुरुशरण सिंह के नाटकों में दिखाई पड़ता है।

“लोकवाद” का ही एक रूप “स्वदेशीवाद” भी है। राजनीति की तरह कला-साहित्य में भी आज यह प्रवृत्ति काफी मज़बूत है। आज आम जनता के जीवन और संस्कृति पर विश्व-पूँजी के चौतरफा हमले का प्रतिकार वामपन्थी धारा का भी एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रवाद की उस ज़मीन पर खड़ा होकर करने की कोशिश कर रहा है, जिस पर खड़े होकर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई लड़ी गई थी। यह अजीब-सी बात है कि कुछ पुराने गाधीवादी, सर्वोदयी, मध्यमार्गी सुधारवादी और एन.जी.ओ. वाले ही नहीं बल्कि क्रान्तिकारी वामपन्थी भी भूमण्डलीकरण के विरुद्ध “स्वदेशी” का झण्डा उठाए हुए हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और उनके सहयोगियों के विरुद्ध गांधीवाद द्वारा सुझाए गए स्वदेशी और स्वराज्य के राष्ट्रवादी नारों को आज का रणनीतिक नारा बनाना नये दौर की लड़ाई को पुराने दौर की लड़ाई के हथियारों से लड़ने की बचकानी कोशिश है। आज जनता की वास्तविक मुक्ति की लड़ाई “स्वदेशी” या किसी अन्य पूँजीवादी राष्ट्रवादी नारे के झण्डे तले लड़ी ही नहीं जा सकती। अपने बीच के तमाम अन्तरविरोधों के बावजूद, आज देश की बड़ी पूंजी और छोटी पूँजी – दोनों की नियति, हित और अस्तित्व साम्राज्यवाद के साथ जुड़ चुके हैं। अपने आपसी अन्तरविरोधों के बावजूद, देश के सभी छोटे-बड़े पूँजीपति साम्राज्यवादी पूँजी के निर्बाध प्रवाह के लिए राष्ट्रीय अर्थतंत्र को पूरी तरह खोल देने के पक्षधर हैं। उनके किसी भी हिस्से का चरित्र राष्ट्रीय या जनपक्षधर नहीं रह गया है। आज का मूल प्रश्न यह नहीं है कि विदेशी शासन और विदेशी पूँजी के वर्चस्व को नष्ट करके देशी उद्योग-धंधों को फलने-फूलने का अवसर दिया जाए। आज का मूल प्रश्न यह है कि पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली, सामाजिक ढाँचा और संस्कृति अब पूरी तरह मानवद्रोही हो चुकी है। इतिहास इन्हें नष्ट करके ही आगे डग भर सकता है। कह सकते हैं कि जो सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक मिशन था, वह अब फौरी कार्यभार बन चुका है। आज का नया नारा यही हो सकता है – उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले सामाजिक वर्गों के पूर्ण नियंत्रण के लिए संघर्ष! ज़ाहिरा तौर पर, सांस्कृतिक वर्चस्व का संघर्ष भी इसी संघर्ष का अनिवार्य और आधारभूत सहवर्ती होगा। साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी जनमुक्ति क्रान्तियाँ आज इतिहास के एजेण्डे पर हैं। राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के दौर के शौर्यपूर्ण संघर्षों-कुर्बानियों से हम प्रेरणा ले सकते हैं और संघर्ष के रूपों से काफी कुछ सीख सकते हैं, पर उस दौर के रणनीतिक नारे आज के नारे नहीं हो सकते।

इतिहास में यह ग़लती पहले भी होती रही है कि मुक्तिकामी जनता के हरावल, नये संघर्षों को गौरवमण्डित करने के लिए, नई प्रेरणा लेने के लिए अतीत की क्रान्तियों का पुन:स्मरण करने के बजाय उन्हीं की भोंडी नकल करने लग जाते रहे हैं। चाहते थे वे अतीत की क्रान्तियों से क्रान्तिकारी स्पिरिट लेना और हुआ यह कि वे अतीत के शरणागत हो गए, अतीत के नारों से नई लड़ाई लड़ने की कोशिश करने लगे और क्रान्ति की आत्मा के पुनर्जागरण के बजाय उसकी प्रेतात्मा मँडराने लगी। यह स्वाभाविक है कि अतीत के महान संघर्षों से अभिभूत होकर, हम अनजाने ही उनकी नकल करने लग जाते हैं। महान क्रान्तियाँ भावी क्रान्तियों के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करने के बजाय सर्जनात्मक अन्वेषण को जकड़ने वाली बेड़ियों का काम करने लगती हैं और नये का अन्वेषण करने के बजाय हम अतीत से समस्याओं का समाधान माँगने लगते हैं। कार्ल मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी की उदीयमान सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम बसन्त-प्लावन के दौर में कहा था, “उन्नीसवीं शताब्दी की सामाजिक क्रान्ति अतीत से नहीं वरन् भविष्य से ही अपनी प्रेरणा प्राप्त कर सकती है।” सर्वहारा क्रान्ति के नये विश्व ऐतिहासिक चक्र की समारम्भ-बेला में यह महान युक्ति एक बार फिर, नये अर्थ-सन्दर्भो के साथ, प्रासंगिक हो उठी है। जब श्रम और पूँजी की शक्तियाँ आमने-सामने खड़ी हों तो क्रान्तिकारी कला-साहित्य का काम श्रम की संस्कृति को सर्जना का मार्गदर्शक बनाना और श्रम की दुनिया में क्रान्ति की अन्तश्चेतना का पुनर्सृजन करना है। अतीत के शरणागत होने, जिसे इतिहास की नैर्सैगिक गति से नष्ट होना है उसके लिए शोकगीत गाने तथा अतीत से नारे, आदर्श, प्रतिमान और प्रादर्श उधार लेने की प्रवृत्ति से मुक्त होना होगा। जनता के पास संस्कृति के नाम पर जो कुछ भी मौजूद है, उन सबको प्रगतिशील मानने का नज़रिया एक अवैज्ञानिक नज़रिया है। यही “लोकवाद” है जिससे हमें छुटकारा पाना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर विचारधारात्मक संघर्ष

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

वर्ग-संघर्ष की वैज्ञानिक चेतना को विकसित करने के लिए हमें कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर भी वर्ग-संघर्ष को तीखा करने का काम करना होगा। हमें श्रम की दुनिया में क्रान्ति की वस्तुगत आवश्यकता को एक बार फिर आम जनगण की उद्दाम, दुर्निवार आकांक्षा में रूपान्तरित कर देना है। साहित्य का, समग्र संस्कृति कर्म का कर्तव्य है कि वह लोगों को निराशा और विभ्रमों से छुटकारा दिलाकर तमाम मानवद्रोही शक्तियों और मानवद्रोही व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह में उठ खड़ा होने के लिए तैयार करे। जीवन के अन्य सभी मोर्चों की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हमें आज “नये संघर्षोंको गौरवमण्डित करने के लिए”, “सम्मुख उपस्थित कार्यभार को कल्पना में वृहद आकार देने के लिए”, “एक बार फिर क्रान्ति की आत्मा को जागृत करने के लिए” अतीत के संघर्षों की महानता-महत्ता और वैचारिक परम्परा का पुनरान्वेषण करना है। इस दृष्टि से सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आज की पहली प्राथमिकता वैचारिक कार्य और वैचारिक तैयारियों की है।

किसी भी मोर्चे पर नई तैयारियाँ हर-हमेशा विचारधारात्मक धरातल से ही शुरू होती हैं। भविष्य का विजेता वर्ग अपने विरोधी को सबसे पहले विचारधारात्मक मोर्चे पर ही शिकस्त देता है। सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आज पहली ज़रूरत वैचारिक सफ़ाई और तैयारी की, वैचारिक आक्रमणों के प्रतिकार की और वैचारिक प्रत्याक्रमण की है। ध्यान रखना होगा कि यह बुनियादी काम है, पर एकमात्र नहीं। और यह भी याद रखना होगा कि इसे “अध्ययन-कक्ष के योद्धा” और निठल्ले विमर्शक नहीं, बल्कि जनता के बीच सक्रिय सांस्कृतिक सेनानी ही अंजाम दे सकेंगे। विपर्यय, पुनरुत्थान और संक्रमण के समय में इतिहास का पुनरीक्षण, वर्तमान का विश्लेषण और भविष्य की दिशा तय करने का काम केन्द्रीय बन जाता है, अत: विचार-पक्ष पर केन्द्रीय ज़ोर स्वाभाविक हो जाता है।

अतीत में ऐसा कई बार हुआ है कि ऐतिहासिक संक्रमण कालों में संस्कृति का क्षेत्र विचारधारात्मक संघर्ष का अहम मोर्चा, और कभी-कभी तो मुख्य रंगमंच बन जाता रहा है। यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन-काल के इतिहास की बस हम याद दिलाना चाहेंगे।

लेकिन जब हम कहते हैं कि आज संस्कृति का क्षेत्र विचारधारात्मक संघर्ष का केन्द्रीय रणांगन बना हुआ है तो यह इतिहास-निगमित सूत्र के दुहराने के रूप में नहीं बल्कि इस समय मौजूद स्थिति के वस्तुगत मूल्यांकन के रूप में कहते हैं। हम देखें, राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में तो स्थिति यह है कि वर्तमान परिस्थितियाँ बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों के मुँह से मार्क्सवादी प्रस्थापनाएँ उगलवा रही हैं। सीधे विचारधारा के क्षेत्र में, मार्क्सवादी दर्शन या समाजवादी प्रयोगों की शिक्षाओं को तोड़ने-मरोड़ने का काम तो हो रहा है, पर वास्तव में बुर्जुआ वर्ग कोई नया हमला बोल ही नहीं सका है। जिन मुद्दों पर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारिम्भक दो दशकों तक मार्क्सवाद बुर्जुआ विचारधारा को परास्त कर चुका है, उन्हें ही भाड़े के कलमघसीट कुछ यूँ उठा रहे हैं मानो यह एकदम नई बात हो, मार्क्सवाद पर कोई नया सवाल हो। समाजवाद की फ़िलहाली पराजय को लेकर जो भी बातें की जा रही हैं, उनके उत्तर लेनिन के अन्तिम दौर के चिन्तन से लेकर माओ के सांस्कृतिक क्रान्ति-कालीन चिन्तन तक में मौजूद हैं।

देखा जाए तो अधिक षड्यंत्रकारी और प्रभावी ढंग से, अमूर्त बौद्धिक निरूपणों-सूत्रीकरणों का वाग्जाल रचते हुए, विगत दो दशकों के दौरान जो “सांस्कृतिक विमर्श” हुए हैं और जो नये सामाजिक, सांस्कृतिक और सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त गढ़े गए हैं, उन्होंने द्वन्द्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी जीवन-दृष्टि पर सर्वाधिक प्रभावी चोटें की हैं। इन नये विमर्शों-सिद्धान्तों में हम उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर-मार्क्सवाद, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद, प्राच्यवाद, `सबआल्टर्न´ इतिहास-लेखन आदि-आदि-सभी को शामिल कर रहे हैं। इनके तर्क भी दरअसल नये नहीं हैं। इनमें हीगेल का विदू्रप है और नीत्शे से लेकर स्पेंग्लर तक की अनुगूँजें हैं, पर “सांस्कृतिक विमर्शों” में इन्हें प्रभावी ढंग से नया और समकालीन बनाकर पेश किया जा रहा है। संशोधनवादियों और अकादमिक वामपन्थियों का एक हिस्सा पक्ष-परिवर्तन करके इस जमात में शामिल हो गया है, दूसरा हिस्सा इनसे काफ़ी-कुछ उधार लेकर समन्वयवाद की राह चल रहा है और तीसरा हिस्सा इनका आधा-अधूरा, मरियल और अमूर्त अकादमिक विमर्श की ही भाषा में जवाब दे रहा है। सही ईमानदार, वामपन्थी लेखक-संस्कृतिकर्मी प्राय: दिग्भ्रमित हैं और ख़ास तौर पर जनपक्षधर युवा बुद्धिजीवियों पर इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे सांस्कृतिक मोर्चे की वैचारिक तैयारी और नई कतारों की तैयारी का काम भी प्रभावित हो रहा है।

संस्कृति के मोर्चे पर एक और दृष्टि से नये पुनर्जागरण और नये प्रबोधन के वैचारिक कार्यों को देखना-समझना ज़रूरी है। पुनरुत्थान के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में, वित्तीय पूँजी की “अन्तिम विजय” के इस दौर में, फ़ासीवादी प्रवृत्तियों का नया उभार एक विश्वव्यापी परिघटना है और हमारे देश में भी इनका श्मशान-नृत्य जारी है। वैचारिक धरातल पर, अतीत की ही तरह, इतिहास और संस्कृति के विकृतिकरण पर इनका मुख्य ज़ोर है। इसलिए भी, एक ओर जहाँ इनसे निर्णायक संघर्ष के लिए मेहनतकश जनता की लामबन्दी का काम तेज़ करना होगा, वही संस्कृति के क्षेत्र में इनके मुकाबले के लिए जमकर वैचारिक कार्य करना होगा और व्यापक प्रचार-कार्य भी।

सच पूछें तो आज समूचे बुर्जुआ वर्ग का दर्शन ही तर्कणा और जनवाद के मूल्यों से इतना रिक्त हो चुका है कि फ़ासीवादी विचार-दर्शन से उसकी विभाजक रेखा धूमिल हो गई है। यह अनायास नहीं है कि तमाम किस्म की “उत्तर” विचार-सरणियाँ आज बुर्जुआ पुनर्जागरण और उसकी मानववाद और इहलोकवाद की परम्परा को तथा बुर्जुआ प्रबोधनकाल और उसकी तर्कणा और जनवाद की विरासत को ही सिरे से खारिज करने का काम कर रही हैं। उस महान क्रान्तिकारी विरासत का वास्तविक वारिस तो सर्वहारा वर्ग ही है। उन्नीसवीं शताब्दी में सत्तारूढ़ होते ही बुर्जुआ वर्ग ने स्वतंत्रता-समानता-भ्रातृत्व के लाल झण्डे को धूल में फेंक दिया था तो सर्वहारा वर्ग ने उसे आगे बढ़कर उठा लिया था। आज जीवन में मानववाद और तर्कणा के प्राधिकार को स्थापित करने की लम्बी लड़ाई एक बार फिर एक उग्र चरण में है। यह सर्वहारा मानववाद और द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी तर्कणा के झण्डे को ऊँचा उठाने का समय है। यह आज के नये पुनर्जागरण और नये प्रबोधन का केन्द्रीय काम है और संस्कृति का मोर्चा ऐसे समय में बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

निचोड़ के तौर पर संस्कृति के मोर्चे के वैचारिक कार्यों को ठोस रूप में कुछ यूँ निरूपित किया जा सकता है :

(1) सबसे पहली बात तो यह कि सर्वहारा-संस्कृति के सर्जकों-शिल्पियों को मार्क्सवादी दर्शन और राजनीतिक अर्थशास्त्र का एक हद तक अध्ययन अवश्य करना होगा, तभी वे बुर्जुआ विभ्रमों से मुक्त हो सकते हैं, बुर्जुआ सांस्कृतिक विचारों का प्रतिकार कर सकते हैं और सामाजिक जीवन की प्रतीतियों की सतह भेदकर सारभूत यथार्थ को पकड़ सकते हैं।

(2) हमें साहित्य-कला-संस्कृति की मार्क्सवादी वैचारिकी के अध्ययन-मनन का काम करना होगा। पहले किया भी हो तो नये सिरे से करना होगा, विस्मृतियों की कालिख पोंछनी होगी। अतीत के सैद्धान्तिक बहसों-विमर्शों और प्रयोगों का नये सिरे से अध्ययन करना होगा और महत्त्वपूर्ण चीज़ों को पुनर्प्रस्तुत करना होगा।

(3) हमें तमाम “उत्तर” विचार-सरणियों की, अन्य नये-नये बुर्जुआ और “नववामपन्थी” संस्कृति-सिद्धान्तों की वैज्ञानिक आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

(4) हमें आज के बुर्जुआ मीडिया-विशेषज्ञों और बुर्जुआ संस्कृति उद्योग के सिद्धान्तकारों के नये-नये सिद्धान्तों की सांगोपांग चीर-फाड़ करनी होगी।

(5) हमें आज के सामाजिक यथार्थ और नई सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटनाओं-प्रवृत्तियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करना होगा और इस प्रक्रिया में मार्क्सवादी कला-दर्शन और सौन्दर्य-शास्त्र को समृद्ध और समकालीन बनाने की सतत्-प्रक्रिया को नया संवेग देना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

नए सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन— महत्तव्पूर्ण सामजिक-आर्थिक सरंचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में सृजन और आन्दोलन के सभी कार्यों को आज एकदम नये सिरे से संगठित करने की ज़रूरत है। हम सर्वहारा क्रान्ति की पक्षधर अवस्थिति से यह बात कह रहे हैं।

समय और समाज जब जनता के प्रचण्ड वेगवाही सांस्कृतिक आन्दोलन की माँग कर रहे हैं, तब कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में अराजकता, विभ्रम, भटकाव, अवसरवाद और ठहराव का बोलबाला है। ताकत कम नहीं है, पर कोशिशें बिखरी हुई हैं। जहाँ ईमानदारी और मेहनत से लगी हुई टीमें हैं, वहाँ वैचारिक समझ कमज़ोर है और अनुभववाद तथा `लकीर की फकीरी´ का बोलबाला है। निस्संकोच कहा जा सकता है कि प्रगतिशील वाम सांस्कृतिक धारा पर आज प्रच्छन्न बुर्जुआ और निम्न-बुर्जुआ धाराएँ हावी हैं। एक ओर नामधारी वाम के पुराने मठाधीशों-महामण्डलेश्वरों की गद्दियाँ और अखाड़े हैं तो दूसरी ओर विश्व के नये यथार्थ के अवगाहन और अतीत की “जड़ीभूत” विचारधारात्मक चिन्तन-पद्धतियों के पुनरीक्षण का दावा करने वाले अकर्मक “नव-मार्क्सवाद” के नौबढ़ प्रणेताओं के अड्डे हैं। क्रान्तिकारी वाम शिविर से जुड़े कई एक सांस्कृतिक संगठन और टोलियाँ हैं, पर उनका विचार-पक्ष कमज़ोर है। वे कला-साहित्य-संस्कृति की द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी समझ से, अपनी समृद्ध वैचारिक विरासत से और अतीत के सर्जनात्मक प्रयोगों से अपरिचित हैं। वे भरपूर जोश से क्रान्तिकारी आन्दोलन और प्रचार की कार्रवाइयों में लगे हैं, लेकिन वैचारिक समझ के अभाव में उनके सांस्कृतिक कार्य दिशाहीन और निष्प्रभावी होकर रह जा रहे हैं।

हमें इस भंवर से बाहर निकलना होगा। क्योंकि हमारे देश और समूची दुनिया के सामने आज यह प्रश्न पहले हमेशा की अपेक्षा अधिक ज्वलन्त और भयावह रूप में खड़ा है – या तो समाजवाद, या फिर बर्बरता! कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी यही प्रश्न केन्द्रीय है।

अकर्मण्य वैचारिक समझ घोड़े की लीद से बेहतर नहीं होती। वास्तविक आशावाद नियतत्ववादी नहीं होता। यदि हम आशावादी हैं तो हमें अपनी आशाओं को फलीभूत करने के लिए जी-जान से जूझना होगा। अकर्मक ज्ञान और अन्धा आशावाद – इन दोनों से बचना होगा।

नये सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन – महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संरचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

आज की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की इस निबन्ध में सविस्तार चर्चा सम्भव नहीं है और इसकी ज़रूरत भी नहीं है। लेकिन अलग से यह करना ही होगा क्योंकि सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुनिश्चित समझ के बिना संस्कृतिकर्मी भी अपने समय के जीवन के मर्म को नहीं पकड़ सकते। इसके बग़ैर वे सतह की परिघटनाओं को ही सारभूत यथार्थ मानकर प्रस्तुत करेंगे। इसके बिना वे भविष्य की ओर जारी यात्रा की गतिकी को नहीं समझ सकते और अपने कार्यभार नहीं निर्धारित कर सकते। आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, हमारे देश के आम लोगों का जीवन सर्वग्रासी संकट के जिस विषैले-दमघोंटू अन्धकार में घुट रहा है, उसकी हम यहाँ सूत्रवत चर्चा करेंगे। इतनी चर्चा पृष्ठभूमि के तौर पर ज़रूरी है।

हम आज भी साम्राज्यवाद के युग में जी रहे हैं जिसकी बुनियादी अभिलाक्षणिकताओं को और उन्नीसवीं शताब्दी के `स्वतंत्र प्रतियोगिता के युग´ से जिसकी भिन्नताओं को लेनिन ने उद्घाटित किया था। लेकिन आज, सतह की परिघटनाओं-प्रवृत्तियों के पर्यवेक्षण के आधार पर भी यह महसूस किया जा सकता है कि स्थितियों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं। विश्व-पूँजीवाद के असमाधेय संकटों की, साम्राज्यवाद की अभूतपूर्व आक्रामकता की, नई तकनोलॉजी के प्रयोग की, तीसरी दुनिया के देशों में निर्बन्ध पूँजी-निवेश और लूट की, इन देशों के बुर्जुआ शासक वर्ग के आत्म समर्पण की, मज़दूरों से अतिलाभ निचोड़ने की नई-नई तरकीबों और उनके छिनते अधिकारों की, सट्टेबाज़ी और अनुत्पादक प्रवृत्तियों की, सूचना-संचार के तंत्र की नई प्रभाविता की, फ़ासीवादी शक्तियों के नये उभार की और पहले से भिन्न तमाम लक्षणों-प्रवृत्तियों की चर्चा तो आम तौर पर होती है। इन तमाम बदलावों के पीछे सिर्फ़ यही कारण नहीं है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम संस्करण आज पराजित और विफल हो चुके हैं और सोवियत संघ के नेतृत्व में नामधारी समाजवादी (वस्तुत: राजकीय पूँजीवादी) ढाँचे वाले देशों का शिविर विघटित हो चुका है। इससे भी बुनियादी कारण (और ये दोनों अन्तर्सम्बन्धित हैं) यह है कि साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की कार्यप्रणाली और लगातार पैदा होने वाले अपने संकटों को निपटाने के उसेक तौर-तरीकों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं, और इनके चलते, विश्व पूँजीवाद के समूचे परिदृश्य में कुछ महत्त्वपूर्ण नई चीज़ें पैदा हुई हैं। इन बुनियादी कारणों को समझने की ज़रूरत है। इन बदलावों की पृष्ठभूमि के बनने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हो चुकी थी, गत शताब्दी के आठवें दशक से इनके लक्षण सतह पर उभरने लगे थे और अन्तिम दशक के दौरान एक नया बदला हुआ परिदृश्य एकदम सामने आ चुका था।

पहली बात, वित्तीय पूँजी की जो वरीयता और निर्णायक भूमिका उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में स्थापित हुई थी, वह गत शताब्दी के आठवें दशक तक चरम वर्चस्व में रूपान्तरित हो चुकी थी। दुनिया भर में निवेशित कुल पूँजी का तीन-चौथाई से भी अधिक आज सट्टा बाज़ार, मीडिया, मनोरंजन उद्योग और अन्य अनुत्पादक कार्रवाइयों में लगा हुआ है। वित्तीय पूँजी ने वास्तविक उत्पादन से स्वतंत्र होकर सम्पूर्ण विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व कायम कर लिया है और कीन्स की आशंका को हूबहू साकार करते हुए, उद्योग सट्टेबाज़ी के भंवर में सतह पर तैरने वाला बुलबुला बनकर रह गया है। आज जो पूँजी का विश्वव्यापी प्रसार दीख रहा है, वह सट्टेबाज़ी, मुद्रा-बाज़ारों में ऋण-सर्जन में सतत् वृद्धि और मुद्रा-पूँजी के अन्तरराष्ट्रीय आवागमन के रूप में है। साम्राज्यवाद के दौर में पूँजी के जिस परजीवी, परभक्षी, अनुत्पादक और जुआड़ी चरित्र की चर्चा लेनिन ने की थी, वह उस समय से कई गुना अधिक हो चुकी है।

आज विश्व-स्तर पर बुर्जुआ जनवाद के बचे-खुचे मूल्यों के भी निश्शेष होने, तरह-तरह की मूलतत्त्ववादी-नवफ़ासीवादी राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के सिर उठाने, तर्कणा और मानववाद के विरुद्ध नानाविध सांस्कृतिक उपक्रमों-उद्यमों के जन्म लेने तथा साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में माल-अन्धभक्ति, निरंकुशता, अतर्कपरकता, कलावाद-रूपवाद और मानवद्रोही प्रवृत्तियों के नये-नये रूपों के उभरने की ज़मीन यही है।

विश्व-स्तर पर पूँजी का विकास शेयर बाज़ारों और जुआघरों का `बाई-प्रोडक्ट´ बन जाने के चलते संकट के विस्फोट और महाध्वंस का भय हमेशा साम्राज्यवादियों-पूँजीपतियों के सिर पर सवार रहता है। बीच-बीच की अल्पकालिक राहतों के बावजूद, दीर्घकालिक मन्दी का दौर विगत तीन दशकों से लगातार मौजूद है। कभी तेज़ कभी मद्धम होता व्यापार युद्ध, बड़े-बड़े घरानों में से कुछ के तबाह होने का या किसी और द्वारा निगल लिये जाने का तथा नई-नई इजारेदारियों के गठन का सिलसिला लगातार जारी है। उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों, पूर्वी यूरोप के देशों और भूतपूर्व सोवियत संघ के घटक देशों के बाज़ार को साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी के लिए पूरी तरह खोल दिया है और चीन में “बाज़ार समाजवाद” की पिपिहरी बजाने वाले नये शासकों ने भी उसके स्वागत के लिए लाल गलीचे बिछा दिए हैं, पर पश्चिमी पूँजी का अजीर्ण रोग लगातार मौजूद है।

भूतपूर्व समाजवादी देशों में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना और राजकीय पूँजीवाद के सोवियत “समाजवादी” ढाँचे के विघटन के बाद पश्चिमी ढंग के पूँजीवादी ढाँचे की स्थापना मुख्यत: उन देशों के आन्तरिक वर्ग-संघर्ष का परिणाम थी, लेकिन इसमें साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की तथा साम्राज्यवादी घुसपैठ, घेरेबन्दी और षड्यंत्र की भी एक अहम भूमिका थी। इसी प्रकार, उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के तहत, एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों के बाज़ारों में साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी खुला चरागाह बना देने, सार्वजनिक क्षेत्र के विघटन का बुर्जुआ राज्य की बची-खुची “कल्याणकारी” भूमिका के निरस्तीकरण और “श्रम-सुधारों” के पीछे साम्राज्यवादी देशों के दबाव के साथ ही इन देशों के सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग की अपनी आवश्यकता और विवशता भी है। इन देशों में सत्तासीन होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोधों का लाभ उठाते हुए और जनता को निचोड़कर राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा कर एक सीमा तक पूँजीवाद का विकास किया। अब यह सिलसिला संतृप्ति-बिन्दु तक जा पहुँचा था। नई तकनोलॉजी, पूँजी और बाज़ार की अपनी ज़रूरतों के चलते साम्राज्यवादियों के गिरोह के दिशा-निर्देशों पर चलना अब इनके सामने एकमात्र विकल्प था। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर का यही सारतत्त्व है। इस नये दौर में पूँजी का वैश्विक प्रवाह एकदम निर्बन्ध हो गया है। साम्राज्यवादी शोषण इस नये दौर में प्रत्यक्ष राजनीतिक शासन या नियंत्रण के माध्यम से काम नहीं कर रहा है। राजनीतिक-सामरिक बल-प्रयोग और दबाव का अनिवार्य पहलू मौजूद है, लेकिन साम्राज्यवादी शोषण की प्रक्रिया मुख्यत: उस विशाल अन्तर के ज़रिए काम करती है जो विकसित देशों और पिछड़े देशों की उत्पादक शक्तियों के बीच बना हुआ है।

भारत और तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों के पूँजीपति वर्ग के किसी भी हिस्से का अब राष्ट्रीय चरित्र नहीं रह गया है। साम्राज्यवाद से विनियोजित अधिशेष में अपने हिस्से को लेकर देशी पूँजीपति वर्ग के अन्तरविरोध मौजूद हैं और वे समय-समय पर उग्र भी हो जाते हैं। देश के भीतर इजारेदार और ग़ैर इजारेदार पूँजी के बीच, बड़ी और छोटी पूँजी के बीच भी अन्तरविरोध हैं, पर वे ग़ैरदुश्मनाना अन्तरविरोध हैं। पूँजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा अब साम्राज्यवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए जनता के अन्य वर्गों के साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है।

राष्ट्रीय प्रश्न की ही तरह भूमि-प्रश्न भी अब सामाजिक क्रान्ति के एजेण्डे पर अपने पूर्ववर्ती रूप में उपस्थित नहीं रह गया है। प्रतिक्रियावादी “प्रशियाई” मार्ग से प्राक्पूँजीवादी भूमि-सुधारों के रूपान्तरण का काम पूँजीवादी व्यवस्था में सम्भव हदों तक, मुख्यत: पूरा हो चुका है। पुराने सामन्ती भूस्वामियों का एक बड़ा हिस्सा पूँजीवादी भूस्वामी बन चुका है। पहले के बड़े काश्तकार आज के बड़े मालिक किसान-कुलक बन चुके हैं। किसान आबादी का तेज़ विभेदीकरण गत तीन दशकों की एक महत्त्वपूर्ण परिघटना है। निम्न-मध्यम और छोटे किसान उजड़कर सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की पाँतों में शामिल हो रहे हैं। उच्च-मध्यम किसान धनी किसानों की कतारों में शामिल हो रहे हैं। पिछले दशक के दौरान यह प्रक्रिया और अधिक तेज़ हो गई है। गाँवों में भी श्रम और पूँजी का अन्तरविरोध ही प्रधान हो गया है। जहाँ अभी पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था की संक्रमणशील स्थिति है, वहाँ भी यही स्थिति है। वहाँ से भारी संख्या में उजड़कर किसान आबादी शहरों और विकसित पूँजीवादी खेती वाले इलाकों की ओर पलायन कर रही है। सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के आज सिर्फ़ अवशेष ही मौजूद हैं। गाँवों में वित्तीय पूँजी की पैठ मज़बूत हुई है, वे राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी में आ गए हैं, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था की जड़ता टूट गई है और कृषि और सहायक क्षेत्रों में भी माल-उत्पादन प्रभावी प्रवृत्ति बन गई है।

इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारतीय मध्यवर्ग का भी विगत कुछ दशकों के दौरान तेज़ विस्तार और विभेदीकरण हुआ है। मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों (प्रोफेसरों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों, नौकरशाहों, विशेषज्ञों आदि का) का एक बड़ा हिस्सा आज पूरी तरह से व्यवस्था के पक्ष में खड़ा हो चुका है। आम नौकरीपेशा, तबाहहाल मध्यवर्गीय कतारों से यह एकदम अलग खड़ा है। मध्यवर्ग के निचले संस्तरों की करीबी मेहनतकश वर्गों से बन रही है, हालाँकि उनकी निराशा, पिछड़े मूल्यों, जातिगत संस्कारों आदि का लाभ उठाकर धार्मिक कट्टरपन्थी ताकतें उनके एक हिस्से को अपने प्रभाव में लेने में फ़िलहाल कामयाब हैं। उच्च मध्यवर्ग आज उदारीकरण-निजीकरण के प्रवक्ता-समर्थक और धुर प्रतिक्रियावादी संस्कृति के संवाहक के रूप में व्यवस्था से नाभिनालबद्ध है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि हमारा पिछड़ा हुआ पूँजीवादी समाज आज राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के बजाय एक ऐसी नई समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में है जिसकी अन्तर्वस्तु साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी है। राष्ट्रीय जनवाद के अधूरे पड़े काम भी आज इसी के कार्यभारों में समाहित हो गए हैं। इस काम में सर्वहारा वर्ग का साथ मुख्यत: गाँव और शहर की भारी ग़रीब आबादी देगी और मध्यवर्ग और मध्यम किसानों के नीचे के संस्तर देंगे। बीच के संस्तर ढुलमुल सहयोगी होंगे। पूंजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा, खुशहाल मालिक किसान और उच्च मध्यवर्ग अब किसी भी सूरत में मेहनतकशों के रणनीतिक संश्रयकारी नहीं बनेंगे।

लेनिन के समय और आज के समय के बीच का एक महत्त्वपूर्ण फर्क यह है कि राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियाँ आज विश्व सर्वहारा क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण संघटक तत्त्व नहीं रह गई हैं। एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के अर्द्धऔद्योगीकृत पिछड़े देश ही आज भी साम्राज्यवाद की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं, पर इनमें से अधिकांश देशों में सामाजिक क्रान्तियों का एजेण्डा बदल चुका है। अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण, विश्व-सर्वहारा क्रान्ति के दूसरे चक्र में, वस्तुगत परिस्थितियों की दृष्टि से, इन्हीं देशों में सम्भावित हैं, पर इन क्रान्तियों की अन्तर्वस्तु अब साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी होगी। ये देशी-विदेशी पूँजी के संश्रय के विरुद्ध केन्द्रित नई समाजवादी क्रान्तियाँ होंगी, जो न केवल चीनी क्रान्ति से, बल्कि कई मायनों में सोवियत समाजवादी क्रान्ति से भी भिन्न होंगी।

सामाजिक शक्तियों के इस नये ध्रुवीकरण के अनुसार ही सांस्कृतिक मोर्चे के कार्यभारों की बुनियादी रूपरेखा तय होगी। कहा जा सकता है कि आज हमारी लड़ाई राष्ट्रीय जनवादी संस्कृति की नहीं बल्कि सर्वहारा जनवादी संस्कृति की, या कहें कि सर्वहारा संस्कृति की है। अब लोगों को यह बताने का अनुकूल समय है कि सिर्फ़ सर्वहारा जनवाद ही वास्तविक जनवाद होता है, कि आज सिर्फ़ दो ही मुख्य सांस्कृतिक पक्ष हैं – पूँजी की संस्कृति का पक्ष और श्रम की संस्कृति का पक्ष, और लोगों को इन्हीं दो के बीच अपना पक्ष चुनना होगा। कला-साहित्य के दायरे में व्यक्तिवाद और अलगाव की संस्कृति पर निर्णायक प्रहार के लिए आज निजी स्वामित्व की नैतिकता पर ही प्रश्न खड़े करने होंगे, लोभ-लाभ, बाज़ार और माल के रहस्यवाद की संस्कृति के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करना होगा, सम्पत्ति सम्बन्धों की तफसीलों को प्रस्तुत करना होगा और बुर्जुआ अधिकारों तथा अन्तरवैयक्तिक असमानताओं की सामाजिक-ऐतिहासिक बुनियादों को उद्घाटित करना होगा। इन्हीं बुनियादी कार्यभारों के इर्दगिर्द हमें राजनीतिक सत्ता, साम्राज्यवादी लूट और षड्यंत्र आदि के भण्डाफोड़ के प्रचारात्मक और आन्दोलनात्मक, रुटीनी और फ़ौरी, सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्य भी संगठित करने होंगे। सामाजिक जीवन में जो सामन्ती सांस्कृतिक मूल्य मौजूद हैं, वे सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग और साम्राज्यवादियों के लिए एकदम उपयुक्त हैं, अत: उन्होंने उन सभी को अपनाकर अपने सांस्कृतिक तंत्र का अंग बना लिया है। तर्कणा और भौतिकवाद की जगह अन्धविश्वास, रहस्यवाद आदि ही आज बुर्जुआ वर्ग की ज़रूरत हैं। जाति-समस्या, दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न को भी आज इसी नज़रिए से देखना होगा। इन मुद्दों पर जनवादी सुधार की पैबन्दगीरी का समय बीत चुका है। ऐसा करना महज़ बुर्जुआ गुलामगीरी होगी। सामाजिक मुक्ति के ये बुनियादी प्रश्न समाजवादी परियोजना के अनिवार्य बुनियादी मुद्दे हैं।

साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की संस्कृति में भी आज कोई अन्तरविरोध नहीं है। दोनों में सहयोग और एकता है, और काफ़ी हद तक तो एकरूपता भी है। राष्ट्रवादी संस्कृति की ज़मीन से साम्राज्यवादी संस्कृति का विरोध आज इतिहास की बात बन चुका है। सामाजिक-आर्थिक संरचना और सामाजिक-राजनीतिक क्रान्ति के स्वरूप के आधार पर, जनपक्षधर संस्कृति कर्म की सर्वाधिक सामान्य रूपरेखा की इस चर्चा के बाद, हम पूँजी के भूमण्डलीकरण के इस नये दौर की कुछ और नई प्रवृत्तियों की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

हम समझते हैं कि साम्राज्यवाद की आज की अति उग्र आक्रामकता के पीछे उसकी शक्ति नहीं, बल्कि उसका असमाधेय ढाँचागत संकट है। समाजवाद की तात्कालिक विफलता, तीसरी दुनिया के शासक वर्गों की घुटनाटेकू मुद्राओं और विश्व-क्रान्ति की धारा की वर्तमान संकटग्रस्तता के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था में उछाल या त्वरण के कोई विश्वसनीय संकेत नहीं हैं। साझा हितों के लिए, एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका में अमेरिकी सामरिक हस्तक्षेपों और कुचक्रों के पीछे सभी साम्राज्यवादी देश एकजुट दीखते हैं, लेकिन यह दौर-विशेष की विशिष्टता है। साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोध एक बार फिर गहरा रहे हैं और आने वाले दिनों में नये व्यापार-युद्धों और शक्ति-समीकरणों के संकेत अभी से मिलने लगे हैं।

अत: कहा जा सकता है कि ऊपरी तौर पर एकतरफ़ा ढंग से पूरी दुनिया की जनता पर हावी दीखता साम्राज्यवाद अन्दर से खोखला हो रहा है। यह आज भी कागजी बाघ ही है, बल्कि पहले से भी अधिक कागजी है। आज यह अपनी जड़ता की शक्ति से जीवित है और इसलिए जीवित है कि सर्वहारा क्रान्तियों और समाजवादी प्रयोगों का सिलसिला, पहले चक्र की विफलता के बाद, अभी फिर से गतिमान नहीं हो सका है।

इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय और पुनरुत्थान का यह समय अभूतपूर्व संकट का समय है। बुर्जुआ क्रान्तियों के प्रवाह को भी पराजय और पुन:स्थापन के दौरों से गुज़रना पड़ा था पर उनका संकट इतना विकट और लम्बा नहीं था। लेकिन जो क्रान्ति दूरगामी तौर पर, सहशताब्दियों लम्बे, वर्ग-समाज के समूचे इतिहास के विरुद्ध निर्देशित है, जो इतिहास की सर्वाधिक युगान्तरकारी और पहली `सचेतन क्रान्ति´ है, उसकी अवधि लम्बी होना, कठिनाइयाँ विकट होना, पराजय प्रचण्ड होना और रास्ता जटिल और आरोह-अवरोहपूर्ण होना, ऐतिहासिक दृष्टि से स्वाभाविक प्रतीत होता है।

विगत लगभग दो शताब्दियों के विश्व-इतिहास का समाहार करते हुए कहा जा सकता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच विश्व-ऐतिहासिक महासमर के पहले चक्र की शुरुआत हुई। पेरिस कम्यून (1871), अक्टूबर क्रान्ति (1917) और चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति (1966-76) इस यात्रा के तीन महानतम कीर्ति स्तम्भ – तीन मील के पत्थर थे। रूस में स्तालिन की मृत्यु के बाद संशोधनवादी पार्टी और राज्य पर काबिज हो गए और वहाँ समाजवाद का मुखौटा कायम रखते हुए नये नौकरशाह बुर्जुआ वर्ग ने राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा किया। एक ओर सामाजिक साम्राज्यवादी सोवियत संघ ने विश्व के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों के साथ विश्वासघात किया तथा उन्हें विघटित करने और अपना पिछलग्गू बनाने की कोशिश की। दूसरी ओर पश्चिमी साम्राज्यवादी शिविर के सामने एक चुनौती प्रस्तुत करके और साम्राज्यवादी शिविर के अन्तरविरोधों को उग्र बनाकर उसने वस्तुगत तौर पर विश्व-पूँजीवाद के संकट को बढ़ाने का काम भी किया। साथ ही, सोवियत संघ की मौजूदगी और दो अतिमहाशक्तियों के शिविरों के बीच की उग्र प्रतिस्पर्धा का लाभ पिछड़े देशों के शासक वर्गों ने भी उठाया। पश्चिमी खेमे की थोपी गई शर्तों का आंशिक विरोध सोवियत “सहायता” के सहारे करने में वे सफल रहे। सोवियत संघ में और पूर्वी यूरोप के देशों में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद भी चीन में सर्वहारा सत्ता की मौजूदगी और समाजवादी प्रयोगों के सिलसिले से पूरी दुनिया में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों और सर्वहारा क्रान्तियों की धारा को प्रेरणा और संवेग मिलता रहा। सोवियत संघ और अपने देश के प्रयोगों के विश्लेषण के आधार पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और माओ त्से-तुङ ने समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को उद्घाटित करने और पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने के उपाय विकसित करने और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के रूप में उन्हें अमल में लाने का युगान्तरकारी काम किया। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद वहाँ भी पूँजीवादी पुनर्स्थापना हो गई। इसका मुख्य कारण यह था कि 1949 से लेकर सांस्कृतिक क्रान्ति शुरू होने तक, वहाँ भी बुर्जुआ वर्ग ने समाज में अपने आधार के विस्तार के साथ ही पार्टी और राज्य के भीतर भी अपने समान्तर सदर मुकाम कायम कर लिए थे। दूसरे, अनुकूल विश्व-परिस्थितियों से भी उन्हें शक्ति मिली। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो सर्वहारा क्रान्ति के पहले संस्करणों की पराजय अप्रत्याशित नहीं लगती। मार्क्स-एंगेल्स और लेनिन ने पहले भी इस बात की चर्चा की थी कि समाजवादी संक्रमण की दीर्घावधि में वर्ग-संघर्ष लगातार जारी रहेगा, पूँजीवादी पुनर्स्थापना के ख़तरे लम्बे समय तक मौजूद रहेंगे। लेनिन ने पूँजीवादी पुनर्स्थापना के विभिन्न स्रोतों का उल्लेख किया था। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान माओ ने एकाधिक बार कहा था कि पूंजीवादी तत्त्वों के सत्तासीन होने की सम्भावनाएँ लम्बे समय तक मौजूद रहेंगी और समाजवाद की निर्णायक विजय के लिए कई सांस्कृतिक क्रान्तियों की आवश्यकता होगी। इस दृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र का, पराजय के रूप में समापन मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि को सत्यापित ही करता है। क्रान्तियों के विगत प्रयोगों की विफलता विचारधारा की पराजय नहीं है। पूँजीवाद इतिहास का अन्त नहीं है। यह स्वयं अपने भीतर से समाजवाद की आवश्यकता पैदा करता है। और उसकी वाहक शक्तियों को भी। विश्व पूँजीवाद की वर्तमान स्थिति स्वयं इसका प्रमाण है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच वर्ग-महासमर का पहला विश्व-ऐतिहासिक चक्र 1976 में चीन में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद समाप्त हो गया और अब दूसरे विश्व-ऐतिहासिक चक्र की शुरुआत हो चुकी है। इन दो चक्रों के बीच के संक्रमण-काल में एक महत्त्वपूर्ण घटना यह घटी है कि समाजवाद के नाम पर कायम, सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के राजकीय पूँजीवादी ढाँचे विघटित हो गए हैं। चीन के “बाज़ार समाजवाद” का पूँजीवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा हुआ है और यह तय है कि देर-सबेर इसे भी विघटित हो जाना है। समाजवाद के बारे में भ्रम पैदा करने वाले स्रोत समाप्त हो गए हैं। इधर भूण्डलीकरण के दौर में ऐसी स्थिति पैदा हुई है कि संशोधनवाद, सामाजिक जनवाद, अर्थवाद, ट्रेड यूनियनवाद आदि की सीमाएँ भी मेहनतकश जनता को स्पष्टत: दीखने लगी हैं और उसे यह बताने के लिए अनुकूल स्थितियाँ तैयार हुई हैं कि वास्तविक प्रश्न राज्यसत्ता का है, राजनीतिक संघर्ष का है। संशोधनवादी-सुधारवादी प्रवृत्तियों का आधार मध्यवर्ग और कुलीन मज़दूरों में मौजूद है, पर उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की चपेट में इनका भी एक हिस्सा अब आने लगा है और उसकी चेतना का भी `रैडिकलाइज़ेशन´ हो रहा है। परम्परागत चुनावी वामपन्थी और ट्रेड-यूनियन सुधारवाद की, व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति के रूप में प्रभाविता कम होने के साथ ही साम्राज्यवाद और पूँजीवादी व्यवस्था ने इधर नये सिरे से एन.जी.ओ.-सुधारवाद के रूप में एक नई सुरक्षा-पंक्ति खड़ी करने की कोशिश की है। एन.जीओ. व्यवस्था-विरोध का छद्म खड़ा करते हुए एक नये `सेफ्टी वॉल्व´ का और `ट्रोजन हॉर्स´ का काम कर रहे हैं, जनहित के कार्यों से बुर्जुआ राज्यसत्ता को पूरी तरह पीछे हटने का मौका दे रहे हैं, और साथ ही, सस्ता श्रम निचोड़ने का ज़रिया भी बने हुए हैं। इनका विश्वव्यापी नेटवर्क फण्ड-बैंक-डब्ल्यू.टी.ओ. की तिकड़ी का ही अनिवार्य पूरक तंत्र है। यह आश्चर्यजनक नहीं कि पुराने गांधीवादियों-समाजवादियों से लेकर नकली वामपिन्थयों और भगोड़ों की सभी किस्में आज एन.जी.ओ. के साथ मधुयामिनी मना रही हैं।

सर्वहारा क्रान्ति के दो विश्व ऐतिहासिक चक्रों के बीच की विशिष्टता यह रही है कि उसने समाजवाद को बदनाम करने वाले नकली लाल झण्डे को चींथकर धूल में फेंक दिया है, सुधारवाद और “कल्याणकारी राज्य” के कीन्सियाई नुस्खों की असलियत साफ़ कर दी है और विश्व पूँजीवाद की घोर मानवद्रोही बर्बरता को एकदम उजागर कर दिया है। एक बार फिर, उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप की तरह, पूरी दुनिया में श्रम और पूँजी की ताकतें एकदम आमने-सामने खड़ी हैं। साम्राज्यवादी भेड़िये और तीसरी दुनिया के देशों में सत्तारूढ़ उनके छुटभैये मेहनतकशों से अतिलाभ निचोड़ते हुए उनके एक बड़े हिस्से को लगातार सड़कों पर धकेल रहे हैं और तबाह कर रहे हैं। दूसरी ओर विश्व स्तर पर युद्ध और विनाश का जो कहर वे बरपा कर रहे हैं, वह कुल मिलाकर विश्वयुद्धों की तबाही से कम नहीं है। दूसरी ओर, दुनिया के पिछड़े देशों से लेकर समृद्ध देशों तक में एक बार फिर विद्रोह का लावा खौल रहा है। जगह-जगह जन-उभारों और आन्दोलनों के ज्वार भी उठने लगे हैं। इस पूरी स्थिति का समस्यापरक पक्ष यह है कि सर्वहारा क्रान्ति की मनोगत शक्तियाँ अभी कमज़ोर और बिखरी हुई हैं। विगत पराजयों का सार-संकलन अभी पूरा नहीं हुआ है। साथ ही, नई सर्वहारा क्रान्तियों की प्रकृति और रास्ते को समझने के लिए, परिस्थितियों में आए नये बदलावों को समझने का काम भी अभी बहुत कम हुआ है। लेकिन, ठहराव के दौर के संकटों और चुनौतियों के बजाय आज हम एक नई शुरुआत के दौर के संकटों और चुनौतियों के रूबरू खड़े हैं। इसी नये दौर के कार्यभारों को हम एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और नये सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभारों के रूप में देख-समझ रहे हैं।

एकदम ठोस शब्दों में कहें कि सर्वहारा क्रान्ति के नए संस्करण की सर्जना के लिए हमें सबसे पहला काम यह करना है कि अतीत की सर्वहारा क्रान्तियों और संघर्षों के इतिहास को विस्मृति के अँधेरे से बाहर लाना है, तमाम मिथ्या-प्रचारों और विभ्रमों की धूल-राख उड़ाकर उसे जनता के सामने प्रस्तुत करना है। हमें सर्वहारा क्रान्ति की विचारधारा के बारे में फैलाई जा रही भ्रान्तियों और झूठे प्रचारों का प्रतिकार करते हुए उसे मेहनतकश जनता के वर्ग-सचेत संस्तरों तक और उनके पक्ष में खड़े परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों तक लेकर जाना है। यह सर्वहारा पुनर्जागरण का पक्ष है। एक नये सर्वहारा प्रबोधन के केन्द्रीय कार्यभार क्या हैं? हमें सर्वहारा वर्ग की विचारधारा को आज के विश्व-ऐतिहासिक सन्दर्भों में जानना-समझना है। मार्क्सवाद एक गत्यात्मक विज्ञान है। अतीत की क्रान्तियों का अध्ययन हम भविष्य की क्रान्तियों के लिए कर रहे हैं। महानतम क्रान्तियों का भी अनुकरण नई क्रान्तियों को जन्म नहीं दे सकता। अतीत के प्रयोगों से सीखते हुए स्थितियों में आए परिवर्तनों को सदा-सर्वदा ध्यान में रखना होता है। और फिर नये चक्र की सर्वहारा क्रान्तियों का रंगंमच तो पूर्व की अपेक्षा कई महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ लिये हुए है। इतिहास के अध्ययन, वर्तमान जीवन के अध्ययन और सामाजिक प्रयोगों के त्रिकोणात्मक संघातों के बीच ही नई क्रान्तियों के मार्गदर्शक सूत्र और रणनीति का विकास होगा। यह समय घनघोर वैचारिक बहस-मुबाहसे का होगा। साथ ही, यह जनता के बीच शिक्षा और प्रचार का तथा प्रारिम्भक स्तर के सामाजिक प्रयोग का समय होगा। यही नये सर्वहारा प्रबोधन का केन्द्रीय कार्यभार है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये दोनों कार्यभार अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ गुंथे-बुने हैं और इन्हें साथ-साथ अंजाम दिया जाएगा। यह भी स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि यह पूरी प्रक्रिया सर्वहारा क्रान्ति की हरावल शक्ति को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया की सहवर्ती होगी, पूर्ववर्ती या अनुवर्ती नहीं।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’

शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

Posted on Updated on

कड़ी जोड़ने के लिए देखे :

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

“हमने लिखा
“आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं…..साथ ही हमने जोड़ा था कि “वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.”
किसी प्रकार की गलतफहमी न हो हम साफ़ कर देना चाहते हैं कि;

आज के किसान का चरित्र वह नहीं है जो तब था और वह मजदूर के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति का वाहक था जो नहीं हुई. इसके विपरीत राष्ट्रीय जनतंत्र के कार्यभार ने बुर्जुआ राज्य और बुर्जुआ सरकारों के नेतृत्व में प्रशियाई जुन्कर तरीके से धीमे परन्तु पीडादायक तरीके से संपन्न होना था और वह हुआ भी. इस दौरान किसान उस मेहनतकश के क्रांतिकारी चरित्र को खो बैठा जो कि मजदूर वर्ग की सहायक रिजर्व सेना का होता है. पूँजी का सताया यह  वर्ग यदि क्रांतिकारी दीखता है तो केवल इसलिए क्योंकि मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से अपना दृष्टिकोण त्यागकर यह अपना भविष्य सुरक्षित कर लेना चाहता है. हम इसका स्वागत करते हैं परंतु मजदूरों के हितों को ताक में रखकर इनके बोनुस, लाभकारी मूल्यों की हिफाजत की वकालत हम नहीं करते. हाँ, बुर्जुआ राज्य द्वारा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पूँजी की चाकरी बजाते हुए पुलिस और फौज द्वारा इनके हासिल जनतांत्रिक अधिकारों के हनन की हम भर्त्सना करते हैं बेशक किसी लाल झंडे के नेतृत्व में कामरेडों ने वह कर दिखाया हो जिसे करने में बुर्जुआ दल भी शरमातें हैं.

आज के किसान का चरित्र – हमारी पहुँच – कुछ और स्पष्टता : देखें

हमने बार-बार लिखा है कि सीपीआई, सीपीआई (एम) सीपीआई (एम एल ) संशोधनवादी पार्टियाँ हैं और इनका चरित्र बुर्जुआ पार्टियों से कहीं ज्यादा, कहीं अधिक कुटील है लेकिन इनकी कतारों की बहुसंख्यक  गिनती  और इनके समर्थक बुद्धिजीवियों की बहुसंख्या, अब भी ईमानदार है हालाँकि ,किसी भी वस्तु, घटनावृत  अथवा व्यापार की गतिकी की दशा-दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि वस्तु, घटनावृत  अथवा व्यापार के बुनियादी  मुख्य विरोधी ध्रुवों में प्रधानता किसकी है. इस घटनावृत को ठीक इसी प्रकार समझा जा सकता है जैसे किसी समाज में मेहनतकश अवाम तो बहुसंख्यक हो लेकिन उस समाज की विरोधों की एकता से पैदा होने वाली गतिकी उसके पक्ष के विपरीत अल्पसंख्यक परजीवी वर्गों के पक्ष में हल होती हो.

लेकिन निम्नलिखित रिपोर्ट में वर्णित तथ्य भी गौर करने लायक हैं ;

1990  के दशक में, सी.पी.एम. की चंडीगढ़ में संपन्न हुई पंद्रहवीं कांग्रेस में एक चौकाने वाला तथ्य प्रकाश में आया. पार्टी के आधे से ज्यादा सदस्य गैर-मेहनतकश वर्ग और गैर-किसान वर्ग से आये थे या यूं कहें कि  – मिडल क्लास से. इससे सी.पी.एम. की मेहनतकश वर्गों को जन-आंदोलनों में  न खींच सकने की क्षमता और उसके रेडिकल शिक्षित युवा की और आकर्षण का  पता चलता है. उस समय से जारी इस नुक्स और बेपरवाही के चलते हालत यह हो गयी है कि विद्यार्थियों, युवायों और महिलायों के मोर्चे ही लगभग सभी  पोलित ब्यूरो और संसद  के टॉप नेताओं  की आपूर्ति करते हैं.  नव युवाओं में शायद ही कोई सदस्य हो जो ट्रेड यूनियन, किसान और जन-आन्दोलन से उठकर आया हो. हरकिशन सिंह सुरजीत और ज्योति बसु किसान और श्रमिक वर्ग आंदोलनों से उभरे थे जबकि प्रकाश करात और बुद्धदेव भट्टाचार्य विश्वविद्यालयों  के कुलीन वर्ग से आये हैं. पार्टी में इस मालदार शिक्षित वर्ग की प्रधानता ने पार्टी को ,जिसे कहा जा सकता है कि, “तर्कसंगत सिद्धांतों की राजनीति” में बदल दिया…देखें : A Logical Defeat

कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी कम्युनिस्टों के इस प्रकार अलग-अलग खेमों में बँटे होने से चिंतित हो जाते हैं. हालाँकि कुछ विशेष परस्थितियों में ‘टैक्टिस’ के लिहाज़ से यहाँ तक कि जनतांत्रिक बुर्जुआ दलों तक के साथ सांझे मोर्चे के लिए समझौता करने से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन समझौता आखिर समझौता ही होता है जो कभी भी किसी पक्ष को, एक पल के लिए भी, पीडामुक्त  नहीं करता और उसे दशकों तक निभाना (यहाँ इशारा भारतीय वाम मोर्चा से है) हद दर्जे की निम्न अवसरवादिता नहीं तो और क्या है?

जहाँ तक सैद्धांतिक एकता का प्रश्न है तो मजदूरों के लिए लेनिन के कहे गए इन शब्दों का आज भी उतना ही महत्त्व है,

“मज़दूरों को एकता की ज़रूरत अवश्य है और इस बात को समझना महत्त्वपूर्ण है कि उन्हें छोड़कर और कोई भी उन्हें यह एकता ‘प्रदान’ नहीं कर सकता, कोई भी एकता प्राप्त करने में उनकी सहायता नहीं कर सकता। एकता स्थापित करने का ‘वचन’ नहीं दिया जा सकता – यह झूठा दम्भ होगा, आत्मप्रवंचना होगी (एकता बुद्धिजीवी ग्रुपों के बीच ‘समझौतों’ द्वारा ‘पैदा’ नहीं की जा सकती। ऐसा सोचना गहन रूप से दुखद, भोलापन भरा और अज्ञानता भरा भ्रम है।” “एकता को लड़कर जीतना होगा, और उसे स्वयं मज़दूर ही, वर्गचेतन मज़दूर ही अपने दृढ़, अथक परिश्रम द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। इससे ज्यादा आसान दूसरी चीज़ नहीं हो सकती है कि ‘एकता’ शब्द को गज-गज भर लम्बे अक्षरों में लिखा जाये, उसका वचन दिया जाये और अपने को ‘एकता’ का पक्षधर घोषित किया जाये।”

शब्द कम्युनिस्ट से अभिप्राय सत्तासीन दल के शेयर होल्डर रहे संशोधनवादी वामपंथी धडे और दुस्साहसवादियों से लिया जाता हैं. हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि छिटपुट ही सही परंतु कुछ क्रांतिकारी ग्रुप उपरोक्त दो धाराओं से बिलकुल हटके हैं लेकिन इसका मतलब हरगिज़ नहीं कि  कोई नया मार्क्सवाद ईजाद कर लिया गया है बल्कि आज विपर्य के इस दौर में मार्क्सवाद की हिफाजित तथाकथित मार्क्सवादियों से करने की सख्त ज़रुरत है और इन संशोधनवादी मार्क्सवादियों को नंगा करना क्रांतिकारी ग्रुपों का एक कार्यभार है जबकि दुस्साहसवाद इतना कुटील नहीं, उसे हराया जा सकता है. जहाँ तक सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी के होने न होने का सवाल है, इसके लिए देखें : कहाँ से फूटेंगी उम्मीद की किरणें

हमारे कर्मों का मार्गदर्शक होते हुए मार्क्सवाद निरंतर विकासमान सिद्धांत है जिसे समय-समय पर कर्म-सिद्धांत-कर्म के सूत्र द्वारा एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन माओ आदि मार्क्सवादियों ने विकसित किया है. वैज्ञानिक समाजवाद के प्रथम प्रयोग हार जाने के बाद, नई समाजवादी क्रान्तियों (समाजवादी क्रांतियाँ – क्योंकि 21वीं शताब्दी 20वीं शताब्दी से इसलिए भिन्न है कि दुनिया के लगभग प्रत्येक हिस्से में पूंजीवाद विकसित हो चूका है)  का अगला चक्र शुरू ही होने वाला है.

मार्क्सवाद को असफल नहीं माना जा सकता अलबता मजदूर वर्ग का इस संक्रमण दौर में बुर्जुआओं से हार जाने का अर्थ केवल यही है कि समाजवादी क्रांतियों का प्रथम चक्र पूरा हो गया है और सर्वहारा वर्ग अगले चक्र की तैयारी की  इस प्रचंड झंझावाती समय की पूर्वबेला से पहले सोया हुआ दीखता है लेकिन यह मान लेना कि मजदूरवर्ग नए समाजवादी क्रांतियों के तजुर्बे नहीं करेगा क्योंकि समाजवाद तो फेल हो चुका है , क्रांतिकारियों के लिए भाग्यवादी और पलायनवादी – हाथ पर हाथ रखकर बैठना होगा जबकि इसके विपरीत मजदूर वर्ग बड़ी शिद्दत के साथ समाजवादी क्रांतियों की इस प्रक्रिया को अंजाम देगा – बेशक हजारों-हज़ार क्रांतियाँ फेल हो जाएँ क्योंकि बुर्जुआ वर्ग अपने-आप तो उसे यह मौका देगा नहीं कि आओ मैं तुम्हें सिखाता हूँ कि राज्य का संचालन कैसे किया जाता है ! ऐसे में सर्वहारा के पास हारी हुई क्रांतियों के निष्कर्ष और निष्पत्तियों का समाहार करते हुए और मार्क्सवाद की कसौटी पर इसे आत्मसात करते हुए नए समाजवादी तजुर्बे करने और सीखने के सिवा और कोई चारा नहीं है. इसी प्रक्रिया द्वारा ही मार्क्सवाद एक कट्ठ्मुल्लापन (dogma) होने के विपरीत अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास द्वारा अपने विकास की उच्चतर मंजिल को छूएगा और यह क्रांतियों के पिछले रोल मॉडल रहे फ्रेमवर्कों को तहस नहस कर डालेगा.

सुरेश चिपलूनकर [ Suresh Chiplunkar ] के इन शब्दों “बहरहाल, अकेले प्याज़ के मुद्दे पर जब भाजपा सरकार गिर सकती है तो सभी वस्तुओं के गत 5 साल में तीन गुना महंगे होने पर भी सरकार का न गिरना “आश्चर्यजनक” क्यों नहीं है, यह मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं” का हम स्वागत करते हैं. हमने लिखा था

“वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा.”

पूंजीवादी में महंगाई कोई नया घटनावृत नहीं है. दशकों बीत गए जब मुंबईया फिल्मों में ‘बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी’, लोगों ने सुना और महंगाई की इस परिघटना को पूंजीवाद के एक ज़रूरी लक्षण के रूप में स्वीकार किया. दरअसल, पेट्टी-बुर्जुआ बुर्जुआओँ  का सताया होने के कारण महंगाई -महंगाई चिल्लाने लगता है जबकि वस्तुओं और मजदूरी की दर सरकार द्वारा तय न होकर क्लासिकीय पूंजीवादी व्यवस्था में (इस क्लासिकीय पूंजीवाद के चेहरे को लोक-हितेषी दिखाने हेतू, 1930 की पहली विश्व महामंदी से डरे पूंजीवाद को बचाने के लिए कीन्स समाजवाद से उधार लेकर नुस्खे-टोटके प्रगट हुए थे जिसे बुर्जुआ राज्यों ने नवउदारवादी दौर में फैंक दिया. विडम्बना यह है कि पूंजीवाद कीन्स के नुस्खों-टोटकों की ओर वापस भी नहीं लौट सकता) मार्केट द्वारा मांग और पूर्ति के नियमानुसार निर्धारित होती हैं जिसे पूंजीवाद में निहित कई फैक्टर प्रभावित करते हैं क्योंकि मांग और पूर्ति अपने-आप वस्तुओं और मज़दूरी की दर तय नहीं कर सकती. पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों को भारत जैसे देश में, बेहद सस्ती दरों पर श्रम शक्ति का उपलब्ध होने का कारण, यहाँ की बढ़ी हुई जनसंख्या  में दीखता है जबकि इसका राज प्रधानमंत्री के उस वक्तव्य में निहित है कि यहाँ की 70 प्रतिशत आबादी 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती है. श्रम-शक्ति के पुनरुत्थान के लिए इतना कम खर्च बहुत ही कम देशों में होता है. बहरहाल, कहना इतना ही है कि पूंजीवाद में, श्रम-शक्ति भी अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती है और उसके पुनरुत्थान का खर्च या श्रम-शक्ति का मूल्य उसके पुनरुत्थान पर लगे सामाजिक ज़रूरी श्रम-समय (Socially necessary labor time) के बराबर होता है.

महंगाई से हम न केवल चिंतित हैं बल्कि इसकी सबसे ज्यादा मार सर्वहारा वर्ग पर ही पड़ने के कारण  पीड़ित भी हैं  लेकिन पेट्टी-बुर्जुआ के वर्ग दृष्टिकोण के अनुसार बिलकुल नहीं. चरित्र में भारत जैसी ही पूंजीवादी दृष्टिकोण अनुसार  तेजी से विकास की और अग्रसर विश्व की ब्राजील, अर्जेंटीना, मेक्सिको, चीले, द. अफ्रीका, नाईजिरिया, मिस्त्र, ईरान, तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिप्पीन्स, भारत आदि लगभग दर्ज़न एक अर्थव्यवस्थाओं को, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, दुनिया के सबसे सस्ते मुल्को में शुमार करते हैं क्योंकि पूंजी द्वारा यहाँ  उपलब्ध श्रम-शक्ति का अँध-शोषण, बेहद सस्ती दरों पर किया जाता है. सस्ती श्रम-शक्ति होने के कारण सस्ती जिन्से उपलब्ध करवाना केवल इन्हीं मुल्कों के बस की ही बात है. ये देश दुनिया के विकसित पूंजीवादी देशों के मुकाबले में सस्ती उपभोक्तावादी जिंसों का धडाधड उत्पादन कर रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी पूँजी के इस खेल में देशी पूंजीपति मिलकर सर्वहारा वर्ग का कचूमर निकाले हुए हैं जिसे हम विकास के नाम पर अनदेखा नहीं कर सकते. इस लिहाज से हमारा यह कहना कि भारत मुकाबलतन महंगा देश न होकर एक सस्ता देश है कहाँ गलत है ? क्या इसकी पुष्टि वे नहीं करते जिनके पास डॉलर हैं ? उपरी वर्गों की तो छोडिये मध्यम वर्ग के जीवन स्तर की 1970 की दशा और उसकी वर्तमान उपभोक्तावादी स्थिति की तुलना कीजिए. अब जरा सर्वहारा वर्ग जिसके बारे में प्रधानमंत्री जी बीस रूपए से कम गुजारा करने वाला वर्ग बताते हैं उसके 1970 के जीवन स्तर और आज के जीवन स्तर की तुलना कीजिए. क्या उसने उन चरागाहों को नहीं खो दिया जहाँ वह अपनी भेड़ बकरियां चराकर गुज़र-बसर कर लिया करता था? क्या उसके नीचे से उसकी झोंपडी की ज़मीन नहीं खिसक गयी है?

लेकिन हम सत्तर या उसके पीछे की दलदल में वापस लौटने का भी इरादा नहीं रखते हैं. कुछ महानुभावों की यादों में “अहा ग्राम्य जीवन’ का नोस्टालिजिया हो सकता है वे हमसे उसी नोस्टालिजिया में जीने की स्वतंत्रता की मांग कर सकते हैं जिसका हमें कोई शिकवा नहीं है लेकिन हम भी उनसे, लेनिन की भाषा की मदद लेकर, कहना चाहते हैं कि ऐ महानुभावों ! आप उस दलदल में लौट जाना चाहते हैं, आपको वहाँ लौटने की पूरी स्वतंत्रता और हक़ है लेकिन हम भी स्वतन्त्र हैं कि आप को उस दलदल में छोड़कर आगे बढे, हमें पूरा हक़ है कि, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, इस पूंजीवाद के  दानवी चेहरे से लोक-हितेषी मेक-अप का पर्दाफाश करें क्योंकि पूंजीवाद मेहनतकश अवाम की जीवनचर्या को पहले से कहीं ज्यादा बदतर, पहले से कहीं ज्यादा दुष्कर बनाए जा रहा है. विकास के नाम पर जिसमे पेट्टी-बुर्जुआ अपने दिलो-दिमाग को पूंजीपति टोली के साथ मिलाकर रखता है और विकास-विकास की चिल्ल-पौ मचाता रहता है लेकिन जब पूँजी अपने तर्क द्वारा उसे हजम कर जाती है तो वह चिल्लाने लग जाता है पर  फिर भी वह अपने पेट्टी-बुर्जुआ दृष्टिकोण का त्याग नहीं करता – मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण को नहीं अपनाता, का उपहास उडाने की हमें भी पूरी स्वतंत्रता है. हम सर्वहारा वर्ग से आह्वान करते हैं कि पूंजी के इस दुश्चक्र को तोड़कर ही, वह केवल और केवल समाजवादी क्रांति द्वारा समाज और इतिहास को आगे गति दे सकता है क्योंकि पूंजी अपने ही तर्क द्वारा अप्रासंगिक हो चुकी है , यदि वह प्रासंगिक है तो केवल उसके हरकत में न होने से है.

विज्ञान की प्रत्येक शाखा की अपनी एक अलग शब्दावली होती है. फिजिक्स, कैमिस्ट्री या जीवविज्ञान का अध्ययन करते समय नए विद्यार्थियों को उनके कुछ शब्द सीखने पड़ते हैं. इसी प्रकार राजनीती और समाजशास्त्र के सिद्धांतों के अध्ययन के वक्त सम्बंधित शब्दावली की गैर-मौजूदगी में ये विषय बेहद “बोझिल” और कठिन लगते हैं. सुरेश चिपलूनकर कहते हैं;

“मैं तो एक मूढ़ व्यक्ति हूँ”, न तो मैं बड़ी-बड़ी ना समझ में आने वाली पुस्तकें पढ़ता हूँ, न ही वैसा लिख पाता हूँ… 🙂 । मैंने तो अपनी असफ़लता को भी खुल्लमखुल्ला स्वीकार किया है” और वे मांग करते हैं कि “मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं…।”

विज्ञान की भाषा विज्ञान के युग में वैज्ञानिक न होगी तो कैसी होगी. क्या हम रोजमर्रा की खाने-पीने और अघाने वाली भाषा द्वारा इसका अध्ययन-मनन कर सकते हैं ? यह मेहनत से जी चुराना नहीं तो और क्या है?  यह सब पलायनवाद नहीं तो और क्या है ?

रहा सवाल, मजदूर वर्ग द्वारा इस भारी-भरकम शब्दाबली को सीखने-समझने का तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्स की ‘पूंजी’ छपते ही, जर्मन की मजदूर जमात में लोकप्रिय हो गयी थी. हाँ, प्रोफेसरों को इसे समझने-पढने में जो दिक्कत आती है उसके बारे में हम कुछ कह नहीं सकते. मौजूदा समय  विपर्य का दौर है – मजदूर वर्ग की लहर का  दौर नहीं. बुद्धिजीवी वर्ग के लिए इस तरह के दौर का इतिहास में बड़ा महत्त्व रहा है क्योंकि इस शांति भरे दौर (?) में वह चिन्तन-मनन करने के लिए काफी समय निकाल सकता है. जहाँ तक लहर के दौर का सवाल है तो उस वक्त सर्वहारा वर्ग यह नहीं देखता कि मार्क्स, लेनिन, माओ आदि ने क्या कहा. वह देखता है तो अपने हित ! उस वक्त समस्या होती है तो बुद्धिजीवी वर्ग के लिए. सैद्धांतिक अस्त्र से रहित उसके प्रतिक्रियावादियों के हाथों खेल जाने की पूरी-पूरी संभावना होती है जबकि इसके विपरीत अगर वह सिद्धांत से चाक-चौबंद होता है तो क्रांति और समाज को आगे की ओर गति देने वाली उस वाहक शक्ति को वह, सही दिशा प्रदान कर सकता है और एक नए युग का सूत्रपात करने में अपनी भूमिका निभा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे एक प्रसूति-विशेषज्ञ की भूमिका जनन-पीड़ाओं  को कम करने की होती है.

दूसरा सवाल कि सिद्धांत को  अमल द्वारा कैसे परखा जाये तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्सवाद कोई एकेडमिक चीज तो है नहीं ! इसे परखने की लैब तो यह समाज ही है. इसके लिए बस इतना ही, कि आमलेट खाने के लिए अंडा तो फोड़ना ही होगा.

अंत में एक बार फिर, हम बुद्धिजीवी वर्ग का आह्वान करते हैं कि वह आगे बढे और इस संजीदा बहस को संजीदगी के साथ ही आगे बढाए.

नोट : श्रम-शक्ति अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती तो है लेकिन अन्य जिंसो से इसलिए अलग है कि इसे मनुष्य के शरीर से अलग नहीं किया जा सकता और दूसरी जिंसों के विपरीत यह अकेली ऐसी जिन्स है जो  बेशी मूल्य या अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष (surplus value) पैदा करती है.

सुने : दुनिया के हर सवाल केhttp://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/duniakeharsavaalke.mp3?attredirects=0

possibly related posts

कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है

कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34) की हिफाजित में

Posted on Updated on

“कोट, कपड़ा, आदि उपयोग-मूल्य, अर्थात पण्यों के ढांचे, दो तत्त्वों के योग होते हैं – पदार्थ और श्रम के. उन पर जो उपयोगी श्रम खर्च किया गया है, यदि आप उसे अलग कर दें, तो एक ऐसा भौतिक आधार-तत्त्व हमेशा बचा रहेगा, जो बिना मनुष्य की सहायता के प्रकृति से मिलता है. मनुष्य केवल प्रकृति की तरह काम कर सकता है, अर्थात वह भी केवल पदार्थ का रूप बदलकर ही काम कर सकता है. यही नहीं रूप बदलने के इस काम में उसे प्रकृति की शक्तियों से बराबर मदद मिलती है. इस प्रकार हम देखते हैं कि अकेला श्रम भौतिक संपत्ति का, अथवा श्रम के पैदा किये हुए, उपयोग-मूल्यों का एकमात्र स्रोत नहीं है जैसा कि विलियम पैटी ने कहा है, श्रम उसका बाप है और पृथ्वी उसकी माँ है. (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

“विश्व की सभी परिघटनाएं , चाहे वे मनुष्य के हाथ का फल हों अथवा प्रकृति के सार्विक नियमों का परिणाम, वास्तव में सृजन नहीं बल्कि पदार्थ के रूपों में परिवर्तन है. मानव बुद्धि जब कभी उत्पादन के विचार का विश्लेषण करती है, तो उसे केवल दो ही तत्त्व दिखाई पड़ते हैं – एक जोड़ना, दूसरा तोड़ना; यही बात मूल्य ” (उपयोग-मूल्य, हालाँकि फिजियोक्रेटों के साथ वाद-विवाद के इस अंश में वेर्री के मन में भी यह बात पूरी तरह साफ़ नहीं है कि वह किस प्रकार के मूल्य की चर्चा कर रहा है) “अथवा धन के उत्पादन के संबंध में भी लोगू होती है, जब मनुष्य द्वारा पृथ्वी, वायू, और जल को अनाज में रूपांतरित कर दिया जाता है, या एक कीड़े के चेपदार स्त्राव को रेशम में, या धातु  के अलग-अलग टुकडों को एक घड़ी में बदल दिया जाता है.” _Pietro Verri, Meditazioni sulla Economia Politica (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

श्रम और पण्य-मूल्य दोनों का चरित्र दुहरा है लेकिन हम यहाँ पण्य-मूल्य के दुहरे चरित्र के सामान्य विश्लेषण तक सीमित  रहेंगे. पण्य-मूल्य के दोहरे चरित्र में पहली विशेषता उसके उपयोग मूल्य से है जैसे पानी, धुप, वायू, आदि. ये सभी धन का एक रूप हैं लेकिन ये पण्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि इसमें मानवी श्रम नहीं लगा है और इन्हें हासिल करने के लिए भुगतान के किसी भी रूप की आवश्यकता नहीं पड़ती.

पण्य की दूसरी विशेषता उसमें लगे मानवीय श्रम से सम्बंधित है जिस कारण उसका विनिमय मूल्य होता है.

अरस्तू का हवाला देते हुए मार्क्स लिखते हैं.”अरस्तू कहते हैं कि विनिमय समानता के बिना नहीं हो सकता, और समानता उस वक्त तक नहीं हो सकती, जब तक की दोनों वस्तुएं एक ही मापदंड से न मापी जा सकती हों.” “लेकिन यहाँ आकर वे (अरस्तू) ठहर जाते हैं और मूल्य के रूप का आगे विश्लेषण करना बंद कर देते हैं.

मार्क्स आगे लिखते हैं ,” अरस्तू की प्रतिभा का चमत्कार इसी बात में प्रकट होता है कि उन्होंने पण्यों के मूल्यों के अभिव्यक्ति में समानता का सम्बन्ध देखा. वह जिस समाज (गुलाम और मालिक-गुलाम) में रहते थे, केवल उसकी विशेष परिस्थितियों ने ही उन्हें यह पता नहीं लगाने दिया कि इस समानता की तह में ‘सचमुच” क्या था.(मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. 79)

“महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” सूत जी [इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34)] द्वारा पांडे जी के  इस कथन की स्वीकृति के  साथ हम भी सहमत हैं लेकिन यह भी जोड़ देना चाहते हैं कि यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” गति में होने के कारण हमेशा बना नहीं रह सकता क्योंकि पांडे जी के परदादा जो  कुरता पहना करते थे वह बामुश्किल दस या पंद्रह लोगों की श्रम का फल था और अंत में जिसके पास इसे बेचने का अधिकार (अगर था तो ) वह  दस या पंद्रह पर एक  का ही था. लेकिन आज इन्होने जिस 100 रूपए की शर्ट को पहना हुआ है उस पर लगी हुई श्रम, अगर हम कहें कि, विश्व के सौ करोड़ लोगों की श्रम है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

पूँजीवाद की सबसे बड़ी विसंगतियों में एक श्रम का इतने उच्च धरातल पर समाजीकरण परंतु इसके विपरीत श्रम के उत्पादों पर मुट्ठीभर लोगों का मालिकाना हक़ जिनकी संख्या निरंतर घटती जा रही  है …. यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है जबकि यह विसंगति और अधिक गहराती जा रही है …देखना है कि इसका क्लाईमैक्स कहाँ होता है

उपरोक्त वस्तुगत और साक्षात उदाहरण उन बुद्दिजीवियों के मुहं पर तमाचा है जो मार्क्सवाद को आयातित और अप्रासंगिक बताते हैं. बल्कि यह साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा शोषित  भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए पहले से अधिक, कहीं अधिक प्रासंगिक है.  इस बात को लेनिन ने नोट कर लिया था और मार्क्स के  शब्द “कम्युनिस्म का हौवा यूरोप पर मंडरा रहा है”  को दरुस्त करते हुए, बदले हुए हालात में उन्होंने कहा कि,” विश्व पूँजी के साम्राज्यवाद में प्रवेश करने के कारण क्रांतियों का धुरा अब यूरोप न होकर पूर्व है.”

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी आपके इतना भर लिख देने से कि  “महालक्ष्मी श्रम से उत्पन्न नहीं होतीं, वे श्रम के लिये मानव को प्रेरित करती हैं। महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” काम नहीं चलेगा. बात को तर्क-वितर्क से आगे बढाएं.

और आपका फ़िक्र कि “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.

….मार्क्स के इन शब्दों “To leave an error unrefuted is to encourage intellectual immorality. ...के साथ हम अपने आलेख को विराम देते हैं और पांडे जी से आशा करतें हैं कि वे बहस को आगे बढाएँगे.

Possibly Related Posts:

ज्ञानदत्त जी ऐसा कुतर्क तो गृहमंत्रालय भी नहीं करेगा

बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ

Posted on Updated on

– अमेरिका स्थित एक अध्ययन समूह सिटीग्रुप ने कहा है कि निर्यात आधारित जैसे कि जवाहरात, आभूषण, आटो इण्डस्ट्री और टेक्सटाइल सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले उद्योग है जिनमें 2008 के आखि़र में 5,00,000 नौकरियाँ ख़त्म हो गयीं। यह आँकड़ा केवल उस संगठित क्षेत्र का है जो देश की काम करने वाली जनसंख्या का सिर्फ 10 प्रतिशत है।

– अमेरिका में दिसम्बर 1974 के बाद सबसे ज़्यादा नौकरियाँ जाने के आँकड़े को छूते हुए 2008 की शुरुआत से अब तक 30 लाख नौकरियाँ ख़त्म हो गयी हैं। यह गिरावट द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है।

– अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने वैश्विक बेरोज़गारी के 2 से 5 करोड़ होने का पूर्वानुमान लगाया है।

– विश्व बैंक का पूर्वानुमान है कि मन्दी के चलते 2008 के मुकाबले 2009 में औद्योगिक उत्पादन 15 प्रतिशत तक कम हो सकता है। यह भी बताया गया कि 116 विकासशील देशों में से 94 देशों में आर्थिक विकास में कमी आयी है। इनमें से 43 देशों में ग़रीबी का स्तर ऊँचा है।

– पिछले साल नवम्बर में सरकार और विपक्ष द्वारा आलोचना करने के बाद हमारे देश के उद्योग संगठन एसौचेम ने कुछ उद्योग क्षेत्रों की नौकरियों में 25-30 प्रतिशत कमी आने की अपनी रिपोर्ट को वापस ले लिया था।

– राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे संस्थान के अनुसार भारत में शहरी ग़रीबी 25 प्रतिशत से ज़्यादा है। शहरों में 8 करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीबी में जीते हैं। यह संख्या मिड्ड की जनसंख्या के बराबर है। शहरी ग़रीबी अरक्षित समूहों जैसे महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों की विशेष ज़रूरतों के अलावा रहने, साफ पानी, साफ-सफाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और रोज़गार की समस्याएँ पैदा करती है।

– 2001 की जनगणना के मुताबिक बड़े शहरों की शहरी आबादी का 22.6 प्रतिशत हिस्सा यानी लगभग सवा चार करोड़ लोग झुग्गियों में रहते हैं। यह मोटे तौर पर स्पेन या कोलम्बिया के आकार के बराबर है।

– झुग्गियों में रहने वाले सबसे ज़्यादा लोग, लगभग एक करोड़ 12 लाख, महाराष्ट्र में हैं। झुग्गियों की आबादी बढ़ी है लेकिन झुग्गियों की संख्या कम हुई है यानी सघन हुई हैं।

– संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने जी-20 देशों की बैठक में कहा कि मन्दी का असर ग़रीब देशों में कहीं ज़्यादा पड़ता है सिर्फ नौकरी जाने या आमदनी कम होने के तौर पर ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा सूचकों – जीवन सम्भाव्यता, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या और पढ़ाई पूरी करने वाले बच्चों की संख्या में यह दिखायी देता है। आर्थिक मन्दी की सबसे ज़्यादा मार झेलने वाले लोगों में ग़रीब देशों की महिलाएँ, बच्चे और ग़रीब होते हैं। हाल में मन्दी के दौरान के आँकड़े बताते हैं कि स्कूली पढ़ाई छुड़वाने वाले बच्चों में लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या बहुत ज़्यादा थी।

– मन्दी के नतीजे में चीज़ें महँगी होती हैं, ग़रीबी बढ़ती है और ग़रीबी बढ़ना अपने आप मृत्यु दर बढ़ने में बदल जाता है। जैसेकि सकल घरेलू उत्पाद में 3 प्रतिशत की कमी को प्रति 1000 शिशुओं के जन्म पर 47 से 120 और ज़्यादा मृत्यु दर से जोड़ा जा सकता है। विकासशील देशों में उस देश के अमीर बच्चों की तुलना में ग़रीब बच्चों के मरने की सम्भावना चार गुना बढ़ गयी है और लड़कों की तुलना में लड़कियों की शिशु मृत्युदर पाँच गुना बढ़ गयी है।

– यह संकट ग़रीब देशों में कई लोगों के लिए जीवन और मौत का सवाल है और आर्थिक विकास, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या और मृत्यु दर के पुराने स्तर पर पहुँचने में कई साल लग सकते हैं। अनुमान के मुताबिक 2010 में आर्थिक स्थिति बहाल होने तक मानव विकास को पहुँची चोट गम्भीर होगी और सामाजिक बहाली में कई साल लगेंगे। पुराने संकट का इतिहास बताता है कि इसके दुष्प्रभाव 2020 तक पड़ते रहेंगे।
‘बिगुल’ मई 2009 से साभार

पाँच क्रान्तिकारी जनसंगठनों का साझा चुनावी भण्डाफोड़ अभियान

Posted on Updated on

चुनावी राजनीति के मायाजाल से बाहर आओ!


नये मज़दूर इन्कलाब की अलख जगाओ!!

देशभर में लोकसभा चुनाव के लिए जारी धमाचौकड़ी के बीच बिगुल मज़दूर दस्ता, देहाती मज़दूर यूनियन, दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा, और स्‍त्री मुक्ति लीग ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश sajha abhiyanऔर पंजाब के अलग-अलग इलाकों  में चुनावी भण्डाफोड़ अभियान चलाकर लोगों को यह बताया कि वर्तमान संसदीय ढाँचे के भीतर देश की समस्याओं का हल तलाशना एक मृगमरीचिका है। ऊपर से नीचे तक सड़ चुकी इस आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को ध्वस्त कर बराबरी और न्याय पर टिका नया हिन्दुस्तान बनाने के लिए आम अवाम को संगठित करके एक नया इन्कलाब लाना होगा।

दिल्ली, लखनऊ, गोरखपुर, लुधियाना, चण्डीगढ़ आदि शहरों में इन संगठनों के कार्यकर्ताओं ने चुनावी राजनीति का भण्डाफोड़ करते हुए बड़े पैमाने पर पर्चे बाँटे, नुक्कड़ सभाएँ कीं, घर-घर सम्पर्क किया, ट्रेनों-बसों में और बस-रेलवे स्टेशनों पर प्रचार अभियान चलाये और दीवारों पर पोस्टर लगाये। दिल्ली, लखनऊ और गोरखपुर में चुनावी राजनीति की असलियत उजागर करने वाली एक आकर्षक पोस्टर प्रदर्शनी भी जगह-जगह लगायी गयी जिसने बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान खींचा। दिल्ली में रोहिणी इलाके में जागरूक नागरिक मंच ने अपनी दीवाल पत्रिका ‘पहल’ के ज़रिये भी चुनावी राजनीति के भ्रमजाल पर करारी चोट की।

राजधानी दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय, करावलनगर, शहीद भगतसिंह कालोनी, प्रकाश विहार, अंकुर एन्क्लेव, शिव विहार, कमल विहार, मुस्तफाबाद, नरेला, राजा विहार, सूरज पार्क, बादली आदि इलाकों  में चलाये गये भण्डाफोड़ अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं ने कहा कि चुनाव में बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं। इस बार मीडिया में धुआँधार प्रचार अभियान चलाकर लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कोई इसे परिवर्तन की अग्नि बता रहा है तो कोई कह रहा है कि महज़ एक वोट से हम देश की तकदीर बदल सकते हैं। लेकिन असलियत यह है कि हमसे कहा जा रहा है कि हम चुनें लम्पटों, लुटेरों, भ्रष्टाचारियों, व्यभिचारियों के इस या उस गिरोह को, थैलीशाहों के इस या उस टुकड़खोर को, जहरीले साँपों, भेड़ियों और लकड़बग्घों की इस या उस नस्ल को। किसी भी पार्टी के लिए आम जनता की तबाही-बर्बादी कोई मुद्दा नहीं है। बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी, छँटनी, पूँजीपतियों की लूट-खसोट, पुलिसिया अत्याचार, भ्रष्टाचार किसी पार्टी के लिए कोई मुद्दा नहीं है। ग़रीबों के लिए स्वास्थ्य, सबके लिए बराबर और सस्ती शिक्षा, रोज़गार, बिजली, पानी, घर जैसी माँगें इस चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। हमेशा की तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नफरत भरी राजनीति ज़ोर-शोर से जारी है। चुनाव जीतने के लिए जनता का समर्थन नहीं बल्कि जातीय समीकरणों के जोड़-तोड़ भिड़ाये जा रहे हैं।

नुक्कड़ सभाओं में वक्ताओं ने कहा कि असलियत तो पहले भी यही थी मगर इस पर भ्रम के परदे पड़े हुए थे। लेकिन ख़ास तौर पर पिछले 25-30 वर्षों में यह सच्चाई ज़्यादा से ज़्यादा नंगे रूप में उजागर होती गयी है कि यह जनतन्त्र नहीं बल्कि बेहद निरंकुश किस्म का धनतन्त्र है। हमें बस यह चुनने की आज़ादी है कि अगले पाँच वर्षों तक कौन हमारा ख़ून निचोड़े, किसके हाथों से हम दरबदर किये जायें!

लखनऊ में जीपीओ पार्क, हाई कोर्ट, मुंशी पुलिया, पालीटेक्निक चौराहा, चौक, अमीनाबाद आदि इलाकों में भण्डाफोड़ पोस्टर प्रदर्शनी लगायी गयी और पर्चे बाँटे गये। प्रदर्शनी स्थल पर जुटी भीड़ को सम्बोधित करते हुए कार्यकर्ताओं ने कहा कि 1952 में चुनावी ख़र्च महज़ डेढ़ करोड़ रुपये का था जो अब बढ़ते-बढ़ते 13,000 करोड़ तक पहुँच चुका है – और यह तो महज़ घोषित ख़र्च है। पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा किया जाने वाला असली ख़र्च तो इससे कई-कई गुना ज़्यादा है। चुनाव ख़त्म होते ही यह सारा ख़र्च आम ग़रीब जनता से ही वसूला जायेगा।

गोरखपुर में दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा के कार्यकर्ताओं ने बिछिया, रामलीला बाज़ार, सब्ज़ी मण्डी, शाहपुर, धरमपुर, लेबर चौक, इन्दिरा तिराहा आदि पर नुक्कड़ सभाएँ कीं, पोस्टर प्रदर्शनी लगायी और बड़े पैमाने पर पर्चे बाँटे। सभाओं में कहा गया कि भगवाधारी भाजपा हो या तिरंगा उड़ाने वाली कांग्रेस, हरे-नीले-पीले झण्डे वाली तमाम क्षेत्रीय पार्टियाँ हों या लाल झण्डे को बेचकर संसद में सीट ख़रीदने वाले नकली वामपन्थी – लुटेरी आर्थिक नीतियों के सवाल पर सबमें एकता है। यह बात दिनोदिन साफ होती जा रही है कि सरकार चाहे इसकी हो या उसकी – वह शासक वर्गों की मैनेजिंग कमेटी ही होती है। यह जनतन्त्र पूँजीपतियों का अधिनायकतन्त्र ही है। लोगों को अपने तथाकथित “प्रतिनिधियों” का चुनाव बस इसीलिए करना है ताकि वे संसद के सुअरबाड़े में बैठकर जनता को दबाने के नये-नये कानून बनायें, निरर्थक बहसें और जूतम-पैजार करें और देशी-विदेशी धनपतियों की सेवा करते हुए अपने पड़पोतों और पड़पड़पोतों तक के लिए कमाकर धर दें।

पंजाब में लुधियाना, चण्डीगढ़ सहित अनेक स्थानों पर चलाये गये भण्डाफोड़ अभियान में कार्यकर्ताओं ने अपने भाषणों और पर्चों में कहा कि इस बार सभी चुनावी धन्धेबाजोँ का मुख्य मुद्दा है कि प्रधानमन्त्री कौन बने। लेकिन किसी की नीतियों में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। कांग्रेस की अगुवाई वाला यू.पी.ए. गठबन्धन हो, भाजपा की अगुवाई वाला एन.डी.ए. गठबन्धन हो, तीसरा मोर्चा हो या अन्य कोई भी चौथा-पाँचवाँ गठबन्धन या मोर्चा, सभी की नीतियाँ देसी-विदेशी पूँजी के पक्ष में और मेहनतकश जनता के विपक्ष में चलायी जा रही निजीकरण- उदारीकरण की नीतियों से ज़रा भी इधर-उधर नहीं जाती हैं। आज सैकड़ों करोड़पति गुण्डे-अपराधी लोकसभा के चुनाव लड़ रहे हैं। जिस देश की 77 प्रतिशत जनता रोज़ाना महज़ 20 रुपये पर गुज़ारा करती हो वहाँ की जनता को कहा जा रहा है कि वे अपने भाग्य का फैसला करने के लिए करोड़पतियों को चुनें। चुनाव लड़ रहे नेताओं में से 15 प्रतिशत ऐसे हैं जो इस देश के बुर्जुआ कानून के अनुसार भी अपराधी हैं। कहने को तो साधरण ग़रीब आदमी भी चुनाव में हिस्सा ले सकता है, लेकिन हम जानते ही हैं कि चुनाव धन और गुण्डागर्दी के सहारे ही जीते जाते हैं।

उन्होंने कहा कि आज जनता विकल्पहीनता की स्थिति में है और क्रान्ति की शक्तियाँ कमजोर हैं। पर रास्ता एक ही है। इलेक्शन नहीं, इन्कलाब का रास्ता! मेहनतकशों को चुनावी मदारियों से कोई भी आस छोड़कर अपने क्रान्तिकारी संगठन बनाने के लिए आगे आना होगा। इस देश की सूरत बदलने वाले सच्चे क्रान्तिकारी विकल्प का निर्माण चुनावी नौटंकी से नहीं बल्कि जनता के क्रान्तिकारी संघर्षों से ही होगा। जब जनता ख़ुद संगठित हो जायेगी तब वह वास्तव में चुनाव कर सकेगी – वह चुनाव होगा यथास्थिति और क्रान्ति के बीच, लोकतन्त्र के स्वांग और वास्तविक लोकसत्ता के बीच! हमें इसकी तैयारी आज से ही शुरू कर देनी चाहिए।

सभी जगह अभियान टोलियों ने मेहनतकशों, इंसाफपसन्द नागरिकों और नौजवानों का आह्नान किया कि वे नयी सदी की नयी क्रान्ति की कतारों को संगठित करने के लिए आगे आयें। शहीदेआज़म भगतसिंह के सन्देश को सुनें और क्रान्ति का पैग़ाम हर दिल तक ले जाने में जुट जायें। चुनावी मदारियों के मायाजाल से बाहर आयें और जनता की सच्ची लोकसत्ता कायम करने के लिए लम्बी लड़ाई की राह पर डट जायें।

– बिगुल संवाददाता

प्रेम, परम्परा और विद्रोह

Posted on Updated on

कात्यायनी

बाबू बजरंगी आज एक राष्ट्रीय परिघटना बन चुका है। अहमदाबाद के इस शख्स का दावा है कि अब तक वह सैकड़ों हिन्दू कन्याओं को “मुक्त” करा चुका है। “मुक्ति” का यह काम बाबू बजरंगी मुस्लिम युवकों के साथ हिन्दू युवतियों के प्रेमविवाह को बलपूर्वक तुड़वाकर किया करता है। ज़ाहिर है कि अन्तरधार्मिक विवाहों, या यूँ कहें कि दो वयस्कों द्वारा परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध कायम करने के स्वतन्त्र निर्णय को संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बावजूद बाबू बजरंगी का “मुक्ति अभियान” यदि अब तक निर्बाध चलता रहा है तो इसके पीछे गुजरात की भाजपा सरकार द्वारा प्राप्त परोक्ष सत्ता-संरक्षण का भी एक महत्त्वपूर्ण हाथ है।

लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा, जो साम्प्रदायिक कट्टरपन्थी नहीं है, वह भी अपने रूढ़िवादी मानस के कारण, अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक प्रेम-विवाहों का ही विरोधी है और बाबू बजरंगी जैसों की हरकतों के निर्बाध जारी रहने में समाज के इस हिस्से की भी एक परोक्ष भूमिका होती है। समाज के पढ़े-लिखे, प्रबुद्ध माने जाने वाले लोगों का बहुलांश आज भी ऐसा ही है जो युवाओं के बीच प्रेम-सम्बन्ध को ही ग़लत मानता है और उसे अनाचार एवं अनैतिकता की कोटि में रखकर देखता है। बहुत कम ही ऐसे अभिभावक हैं जो अपने बेटों या बेटियों के प्रेम-सम्बन्ध को सहर्ष स्वीकार करते हों और अपनी ज़िन्दगी के बारे में निर्णय लेने के उनके अधिकार को दिल से मान्यता देते हों। यदि वे स्वीकार करते भी हैं तो ज्यादातर मामलों में विवशता और अनिच्छा के साथ ही। और जब बात किसी अन्य धर्म के या अपने से निम्न मानी जाने वाली किसी जाति (विशेषकर दलित) के युवक या युवती के साथ, अपने बेटे या बेटी के प्रेम की हो तो अधिकांश उदारमना माने जाने वाले नागरिक भी जो रुख अपनाते हैं, उससे यह साफ हो जाता है कि हमारे देश का उदार और सेक्युलर दिलो-दिमाग़ भी वास्तव में कितना उदार और सेक्युलर होता है! यही कारण है कि जब धर्म या जाति से बाहर प्रेम करने के कारण किसी बेटी को अपने ही घर में काटकर या जलाकर मार दिया जाता है या किसी दलित या मुस्लिम युवक को सरेआम फाँसी पर लटकाकर मार दिया जाता है या उसकी बोटी-बोटी काट दी जाती है या उसके परिवार को गाँव-शहर छोड़ने तक पर मज़बूर कर दिया जाता है तो ऐसे मसलों को लेकर केवल महानगरों का सेक्युलर और प्रगतिशील बुद्धिजीवी समुदाय ही (ग़ौरतलब है कि ऐसे बुद्धिजीवी महानगरीय बुद्धिजीवियों के बीच भी अल्पसंख्यक ही हैं) कुछ चीख़-पुकार मचाता है, शासन-प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की जाती है, कुछ प्रतीकात्मक धरने-प्रदर्शन होते हैं, कुछ जाँच टीमें घटनास्थल का दौरा करती हैं, अखबारों में लेख-टिप्पणियाँ छपती हैं (और लगे हाथों फ्रीलांसर नामधारियों की कुछ कमाई भी हो जाती है), टी.वी. चैनलों को `मुकाबला´, `टक्कर´ या ऐसे ही नाम वाले किसी कार्यक्रम के लिए मसाला मिल जाता है और कुछ प्रचार-पिपासु, धनपिपासु सेक्युलर बुद्धिजीवियों को भी अपनी गोट लाल करने का मौका मिल जाता है। जल्दी ही मामला ठण्डा पड़ जाता है और फिर ऐसे ही किसी नये मामले का इन्तज़ार होता है जो लम्बा कतई नहीं होता।
मुद्दा केवल किसी एक बाबू बजरंगी का नहीं है। देश के बहुतेरे छोटे-बड़े शहरों और ग्रामीण अंचलों में ऐसे गिरोह मौजूद हैं जो धर्म और संस्कृति के नाम पर ऐसे कारनामों को अंजाम दिया करते हैं और बात केवल धार्मिक कट्टरपन्थी फासीवादी राजनीति से प्रेरित गिरोहों की ही नहीं है। ऐसे पिताओं और परिवारों के बारे में भी आये दिन खबरें छपती रहती हैं जो जाति-धर्म के बाहर प्रेम या विवाह करने के चलते अपनी ही सन्तानों की जान के दुश्मन बन जाते हैं। देश के कुछ हिस्सों में, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाति-बिरादरी की पंचायतों की मध्ययुगीन सत्ता इतनी मज़बूत है कि जाति-धर्म के बाहर शादी करना तो दूर, सगोत्रीय विवाह की वर्जना तक को तोड़ने के चलते पंचायतों द्वारा सरेआम मौत की सज़ा दे दी जाती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ्ऱफरनगर, सहारनपुर, मेरठ आदि ज़िलों से लेकर हरियाणा तक से हर वर्ष ऐसी कई घटनाओं की खबरें आती रहती हैं और उससे कई गुना घटनाएँ ऐसी होती हैं जो खबर बन पाने से पहले ही दबा दी जाती हैं। इन सभी मामलों में पुलिस और प्रशासन का रवैया भी पूरी तरह पंचायतों के साथ हुआ करता है। अपने जातिगत और धार्मिक पूर्वाग्रहों के चलते पुलिस और प्रशासन के कर्मचारियों की सहानुभूति भी पंचायतों के रूढ़िवादी बड़े-बुजुर्गों के साथ ही हुआ करती है। यहाँ तक कि न्यायपालिका भी इन पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होती। आये दिन दिल्ली-मुम्बई से लेकर देश के छोटे-छोटे शहरों तक में पार्कों-सिनेमाघरों-कैम्पसों आदि सार्वजनिक स्थानों पर  घुसकर बजरंगियों-शिवसैनिकों और पुलिस द्वारा प्रेमी जोड़ों की पिटाई को भी इसी आम सामाजिक प्रवृत्ति से जोड़कर देखा जाना चाहिए क्योंकि आम लोग ऐसी घटनाओं का मुखर प्रतिवाद नहीं करते।
कहा जा सकता है कि प्रेम करने की आज़ादी सहित किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत आज़ादी, निजता और निर्णय की स्वतन्त्रता के विरुद्ध एक बर्बर किस्म की निरंकुशता पूरी भारतीय सामाजिक संरचना के ताने-बाने में सर्वव्याप्त प्रतीत होती है। सोचने की बात यह है कि उत्पादन की आधुनिक प्रक्रिया अपनाने, आधुनिकतम उपभोक्ता सामग्रियों का इस्तेमाल करने और भौतिक जीवन में आधुनिक तौर-तरीके अपनाने के बावजूद हमारे समाज में निजता, व्यक्तिगत आज़ादी, तर्कणा आदि आधुनिक जीवन-मूल्यों का सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व आज तक क्यों नहीं स्थापित हो सका? भारत में सतत विकासमान पूँजीवाद मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं के साथ इतना कुशल-सफल तालमेल क्यों और किस प्रकार बनाये हुए है? इस बात को सुसंगत ढंग से केवल ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है।
यह सही है कि आज का पश्चिमी समाज समृद्धि के शिखर पर आसीन होने के बावजूद, आर्थिक स्तर पर असाध्य ढाँचागत संकट, राजनीतिक स्तर पर पूँजीवादी जनवाद के क्षरण एवं विघटन तथा सांस्कृतिक-सामाजिक स्तर पर विघटन, अलगाव, नैतिक अध:पतन और अराजकता का शिकार है। पारिवारिक ढाँचे का ताना-बाना वहाँ बिखर रहा है। अपराधों, मानसिक रोगों और आत्मिक वंचना का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है। पूरी दुनिया को लूटकर समृद्धि का द्वीप बसाने वाले पश्चिमी महाप्रभुओं से इतिहास उनकी करनी का वाजिब हिसाब वसूल रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि पश्चिम में नागरिकों के आपसी रिश्तों और परिवार सहित सभी सामाजिक संस्थाओं में जनवाद के मूल्य इस तरह रचे-बसे हुए हैं कि कैथोलिक, प्रोटेस्टेण्ट, यहूदी, मुसलमान, श्वेत, अश्वेत – किसी भी धर्म या नस्ल के व्यक्ति यदि आपस में प्यार या शादी करें तो सामाजिक बहिष्कार या पंचायती दण्ड जैसी किसी बात की तो कल्पना तक नहीं की जा सकती। हो सकता है कि परिवार की पुरानी पीढ़ी कहीं-कहीं इस बात का विरोध करे, पर यह विरोध प्राय: उसूली मतभेद के दायरे तक ही सीमित रहता है। जहाँ तक समाज का सम्बन्ध है, लोग इसे किन्हीं दो व्यक्तियों का निजी मामला ही मानते हैं। यह सही है कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका आदि देशों में अश्वेतों और अन्य आप्रवासियों का पार्थक्य, दोयम दर्जे की आर्थिक स्थिति और उनके प्रति विद्वेष भाव लगातार मौजूद रहता है और पिछले कुछ दशकों के दौरान कुछ नवनात्सीवादी गिरोह इन्हें हिंसा और गुण्डागर्दी का भी शिकार बनाते रहे हैं। धनी-ग़रीब के अन्तर और वर्ग-अन्तरविरोध भी वहाँ तीखे रूप में मौजूद हैं। लेकिन सामाजिक ताने-बाने में वहाँ निजता और व्यक्तिगत आज़ादी के जनवादी मूल्य इस तरह रचे-बसे हैं कि धर्म या नस्ल के बाहर प्रेम या विवाह को मन ही मन ग़लत मानने वाले लोग भी इसका संगठित और मुखर विरोध नहीं करते। पश्चिम में `मैचमेकर्स´ द्वारा परिवारों के बीच बातचीत करके शादियाँ कराने की परम्परा उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ही दम तोड़ने लगी थी। प्रेम और विवाह के मामलों में वहाँ के समाज में मुख्य और स्थापित प्रवृत्ति युवाओं को पूरी आज़ादी देने की है। इसका मुख्य कारण है कि मानववाद, इहलौकिकता, वैयक्तिकता और जनवाद के मूल्यों को सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों और क्रान्तियों के कई शताब्दियों लम्बे सिलसिले ने यूरोपीय समाज के पोर-पोर में इस कदर रचा-बसा दिया था कि साम्राज्यवाद की एक पूरी सदी बीत जाने के बावजूद, पश्चिमी पूँजीवादी राज्यसत्ताओं के बढ़ते निरंकुश चरित्र और पूँजीवादी जनवाद के पतन-विघटन की प्रक्रिया के समापन बिन्दु के निकट पहुँचने के बावजूद, तमाम सामाजिक विषमताओं, आर्थिक लूट, सामाजिक- सांस्कृतिक-नैतिक अध:पतन तथा पण्यपूजा (कमोडिटी फेटिशिज्म) और अलगाव (एलियनेशन) के घटाटोप के बावजूद, वहाँ नागरिकों के आपसी रिश्तों और मूल्यों-मान्यताओं में व्यक्तियों की निजता और व्यक्तिगत आज़ादी को पूरा सम्मान देने की प्रवृत्ति आज भी इस तरह स्थापित है कि उसे वापस पीछे नहीं धकेला जा सकता। पंचायती न्याय की मध्ययुगीन कबीलाई बर्बरता के बारे में, अन्तरधार्मिक-अन्तरजातीय विवाह करने पर सामाजिक बहिष्कार, अपना गाँव-शहर छोड़ने के लिए विवश होने या हत्या से कीमत चुकाने के बारे में या प्रेमी जोड़ों की पार्कों में सामूहिक पिटाई जैसी घटना के बारे में वहाँ का एक आम नागरिक सोच तक नहीं सकता।
यूरोपीय पूँजीवादी समाज पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (रेनेसाँ-एनलाइटेनमेण्ट- रिवोल्यूशन) की शताब्दियों लम्बी प्रक्रिया से गुज़रकर अस्तित्व में आया था। इस प्रक्रिया में अधिकांश मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं का वर्चस्व वहाँ लगभग समाप्त हो गया था। यद्यपि सत्तासीन होने के बाद यूरोपीय पूँजीपति वर्ग ने चर्च से “पवित्र गठबन्धन” करके तर्कणा और जनवाद के झण्डे को धूल में फेंक दिया और पुनर्जागरण-प्रबोधन के समस्त मानववादी-जनवादी आदर्शोँ को तिलांजलि दे दी, लेकिन ये मूल्य सामाजिक-सांस्कृतिक अधिरचना के ताने-बाने  में इस कदर रच-बस चुके थे कि सामाजिक जनमानस में इनकी अन्तर्व्याप्ति को समूल नष्ट करके मध्ययुग की ओर वापस नहीं लौटा जा सकता था। पूँजीवाद के ऐतिहासिक विश्वासघात और असली चरित्र को उजागर करने में उन्नीसवीं शताब्दी के आलोचनात्मक यथार्थवादी कला-साहित्य ने भी एक विशेष भूमिका निभायी। यह तुलनात्मक अध्ययन अलग से पर्याप्त गहराई और विस्तार की माँग करता है, जो यहाँ सम्भव नहीं है।
भारतीय इतिहास की गति और दिशा इस सन्दर्भ में यूरोप से सर्वथा भिन्न रही है। यहाँ मध्ययुगीन सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संरचना का ताना-बाना जब अन्दर से टूटने-बिखरने की दिशा में अग्रसर था और इसके भीतर से प्रगतिशील पूँजीवादी तत्त्वों के उद्भव और विकास की प्रक्रिया गति पकड़ रही थी, उसी समय देश के उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गयी। उपनिवेशीकरण की व्यवस्थित प्रक्रिया ने एक शताब्दी के भीतर भारतीय समाज की स्वाभाविक आन्तरिक गति की हत्या कर दी और यहाँ की संक्रमणशील देशज सामाजिक- आर्थिक संरचना को नष्ट करके ऊपर से एक औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना आरोपित कर दी। निश्चय ही भारतीय मध्ययुगीन सामाजिक-आर्थिक संरचना की अपनी विशिष्टताएँ थीं, यह यूरोपीय सामन्तवाद से काफी भिन्न था और यहाँ पूँजीवादी विकास की बहुतेरी बाधाएँ-समस्याएँ भी थीं। लेकिन ये बाधाएँ पूँजीवादी विकास को रोक नहीं सकती थीं। प्राक्-ब्रिटिश भारत में पूँजीवादी विकास के उपादान मौजूद थे। यदि भारत उपनिवेश नहीं बनता तो उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ ही पूँजी भारतीय समाज के पोर-पोर में घुस जाती और फिर वह समय भी आता जब एक सर्वसमावेशी सामाजिक झंझावात के साथ यहाँ भी इतिहास को तेज़ गति देने वाला पूँजीवाद अपनी भौतिक-आत्मिक समग्रता के साथ अस्तित्व में आता। मध्ययुगीन समाज के परमाणु के नाभिक पर सतत प्रहार उसे विखण्डित कर देते और ऊर्जा का अजस्त्र स्रोत फूट पड़ता। मुख्यत: किसानों-दस्तकारों की शक्ति से संगठित मध्यकालीन भारत के भक्ति आन्दोलन और किसान-संघर्षों ने इस दिशा में एक पूर्वसंकेत दे भी दिया था। तमाम पारिस्थितिक भिन्नताओं के बावजूद भारतीय भक्ति आन्दोलन और यूरोपीय धर्म-सुधार आन्दोलन में तात्त्विक समानता के बहुतेरे अवयव मौजूद दीखते हैं। भारतीय इतिहास हूबहू पुनर्जागरण-प्रबोधन-बुर्जुआ क्रान्ति के यूरोपीय मार्ग का अनुकरण करता हुआ आगे बढ़ता, यह मानना मूर्खता होगी। रूस और जापान जैसे देशों ने भी पूँजीवादी विकास का अपना सापेक्षत: भिन्न मार्ग चुना था और यूरोप में भी जर्मनी और पूर्वी यूरोपीय देशों का रास्ता ब्रिटेन, फ़्रान्स, अमेरिका आदि देशों से काफी भिन्नता लिये हुए था। लेकिन इतना तय है कि यदि भारत का उपनिवेशीकरण नहीं होता तो अपनी स्वाभाविक गति और प्रक्रिया से यहाँ जो पूँजीवाद विकसित होता, वह आज के भारतीय पूँजीवाद जैसा रुग्ण-बौना-विकलांग नहीं होता। उसमें इतनी शक्ति होती कि वह मध्ययुगीन आर्थिक मूलाधार के साथ ही अधिरचना को भी चकनाचूर कर देता। यहाँ भी यूरोपीय पुनर्जागरण-प्रबोधन की भाँति कुछ आमूलगामी सामाजिक-सांस्कृतिक- वैचारिक तूफान उठ खड़े होते जो मानववाद, जनवाद और तर्कणा के मूल्यों को समाज के रन्ध्र-रन्ध्र में पैठा देते। ऐसी स्थिति में भारतीय मानस भी प्राचीन भारत की भौतिकवादी चिन्तन-परम्परा का पुन:स्मरण करता और दर्शन-कला-साहित्य से लेकर जीवन-मूल्यों तक के धरातल पर जुझारू भौतिकवादी चिन्तन की एक सशक्त आधुनिक परम्परा अस्तित्व में आती। लेकिन उपनिवेशीकरण ने इन सभी सम्भावनाओं को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। अंग्रेज़ों ने न केवल पूरे देश को समुद्री डाकुओं से भी अधिक बर्बर तरीके से लूटा-खसोटा, बल्कि उनकी नीतियों ने यहाँ कृषि से दस्तकारी और दस्तकारी से उद्योग तक की स्वाभाविक यात्रा की सारी सम्भावनाओं की भ्रूण हत्या कर दी। भूमि के औपनिवेशिक बन्दोबस्त ने भारत में एक नये किस्म की अर्द्धसामन्ती भूमि-व्यवस्था को जन्म दिया। विश्व-प्रसिद्ध भारतीय दस्तकारी तबाह हो गयी और भारत की आर्थिक- सामाजिक संरचना अपनी स्वतन्त्र गति और स्वतन्त्र सम्भावनाओं के साथ अकाल मृत्यु का शिकार हो गयी। इसकी दिशा और नियति पूरी तरह से ब्रिटिश वित्तीय पूँजी के हितों के अधीन हो गयी।
जिसे भारतीय इतिहासकार प्राय: भारतीय पुनर्जागरणय् की संज्ञा से विभूषित करते हैं, उसमें यूरोपीय पुनर्जागरण जैसा क्रान्तिकारी कुछ भी नहीं था। वह कोई महान या प्रगतिशील जनक्रान्ति कतई नहीं थी। वह औपनिवेशिक सामाजिक- आर्थिक संरचना के भीतर पले-बढ़े एक छोटे से पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की आवाज़ थी जो स्वामिभक्त ब्रिटिश प्रजा के रूप में कुछ अधिकारों की याचना कर रहा था। भारतीय समाज में सुधारों की इसकी माँग और इसके सुधार आन्दोलनों का प्रभाव शहरी मध्य वर्ग तक सीमित था और किसानों-दस्तकारों तथा आम मेहनतकश जनता उससे सर्वथा अछूती थी। आज़ादी की आधी सदी बाद भी भारतीय बौद्धिक जगत की निर्वीर्यता, जनविमुखता और कायरता इसी बात का प्रमाण है कि भारतीय इतिहास में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी कोई चीज़ कभी घटित ही नहीं हुई। हमारी सामाजिक संरचना में जनवाद और तर्कणा के मूल्यों के अभाव और आधुनिक पूँजीवादी जीवन-प्रणाली के साथ मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं का विचित्र सहअस्तित्व भी दरअसल इसी तथ्य को प्रमाणित करता है।
औपनिवेशिक काल में भारत में जिस पूँजीवाद का विकास हुआ, वह किसी क्रान्तिकारी परिवर्तन का नहीं, बल्कि ब्रिटिश वित्तीय पूँजी के हितसाधन के लिए उठाये गये कदमों की गौण गति का परिणाम था जो उपनिवेशवादियों की इच्छा से स्वतन्त्र था। इस मरियल, रीढ़विहीन पूँजीवाद की स्वाभाविक गति को भी उपनिवेशवाद ने कदम-कदम पर नियन्त्रित और बाधित करने का काम किया। लेकिन इतिहास की गति शासक वर्गों की इच्छानुकूल नहीं होती और उनके द्वारा उठाया गया हर कदम स्वयंस्फूर्त ढंग से एक प्रतिरोधी गति एवं प्रभाव को गौण पहलू के रूप में जन्म देता है और फिर कालान्तर में यह गौण पहलू मुख्य पहलू भी बन जाया करता है। औपनिवेशिक काल में भारत में पूँजीवाद का विकास इसी रूप में हुआ और फिर उपनिवेशवाद के संकट, अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पद्धा और विश्वयुद्धों का लाभ उठाकर भारतीय पूँजीपति वर्ग ने अपनी शक्ति बढ़ाने का काम किया। अपनी बढ़ती शक्ति के अनुपात में ही इसकी आवाज़ भी मुखर होती गयी और फिर एक दिन इसने राजनीतिक आज़ादी भी हासिल कर ली, लेकिन यह राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति जैसा कुछ भी नहीं था। भारतीय पूँजीवाद ने साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद करने के बजाय उसके कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका निभायी और भूमि क्रान्ति के जनवादी कार्यभार को भी एक झटके के साथ पूरा करने के बजाय क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण का दुस्सह यन्त्रणादायी प्रतिगामी पथ अपनाया। ज़ाहिर है कि ऐसी स्थिति में सामाजिक-सांस्कृतिक- वैचारिक अधिरचना में भी, औपनिवेशिक काल और उत्तर-औपनिवेशिक काल में कभी क्रान्तिकारी परिवर्तन की कोई प्रक्रिया घटित ही नहीं हुई। यूरोपीय पूँजीवाद कम से कम पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया में जनता के साथ जुड़ा हुआ और प्रगतिशील मूल्यों का वाहक था। भारत में ऐसी कोई प्रक्रिया घटित ही नहीं हुई। भारतीय पूँजीपति वर्ग ने शुरू से ही प्राक्-पूँजीवादी मूल्यों- मान्यताओं के साथ समझौते का रुख़ अपनाया और साम्राज्यवाद की सदी में क्रमिक विकास की प्रक्रिया में जिन बुर्जुआ मूल्यों को इसने क्रमश: अपनाया, वे तर्कणा, मानववाद, जनवाद और जुझारू भौतिकवाद के मूल्य नहीं थे, बल्कि सड़े-गले प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ मूल्य ही थे।

भारतीय पूँजीवाद कृषि से दस्तकारी और दस्तकारी से उद्योग की स्वाभाविक प्रक्रिया से नहीं जन्मा था। यह बर्गरों की सन्तान नहीं था। यह आरोपित औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना की सन्तान था और इसका विकास उपनिवेशवाद के अनिवार्य आन्तरिक अन्तरविरोध का परिणाम था। क्रान्तिकारी संघर्ष के बजाय इसने `समझौता-दबाव-समझौता´ की रणनीति अपनाकर राजनीतिक स्वतन्त्रता तक की यात्रा तय की। इसका चरित्र शुरू से ही दुहरा था। राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्यधारा का नेतृत्व करते हुए इसने जिन वायदों-नारों पर जनसमुदाय को साथ लिया, उनसे बार-बार मुकरता रहा और विश्वासघात करता रहा। ज़ाहिर है कि औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से पैदा हुआ और साम्राज्यवादी विश्व-परिवेश में पला-बढ़ा पूँजीवाद ऐसा ही हो सकता था। भारतीय समाज के औपनिवेशिक अतीत की इस त्रासदी को समझना ही राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के दौरान और आज के भारत में विभिन्न वर्गों की भूमिका को, उनके संघर्षों की कमज़ोरियों को, मूलाधार और अधिरचना के विविध पक्षों को, भावी परिवर्तन की दिशा और समस्याओं को तथा आज के आधुनिक पूँजीवादी समाज में पण्य-पूजा और अलगाव आदि पूँजीवादी विकृतियों के साथ-साथ मध्ययुगीन बर्बर परम्पराओं-रूढ़ियों-मान्यताओं के विचित्र सहमेल को समझने की एक कुंजीभूत कड़ी है। औपनिवेशिक अतीत के जन्मचिह्न  केवल भारतीय पूँजीपति वर्ग ही नहीं बल्कि अन्य वर्गों के शरीर पर भी अंकित हैं। पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया के हाशिये पर खड़ा रूस बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक मध्ययुगीन बर्बरता के आगोश में जकड़ा हुआ था, लेकिन चूँकि औपनिवेशिक गुलामी ने उसकी स्वतन्त्र आन्तरिक गति का गला नहीं घोंटा था, इसलिए उस देश में हर्ज़ेन, बेलिंस्की, चेर्निशेव्स्की, दोब्रोल्यूबोव जैसे क्रान्तिकारी जनवादी विचारकों और पुश्किन, गोगोल, लर्मन्तोव, तुर्गनेव, तोल्स्तोय, दोस्तोयेव्स्की, कोरोलेंको, चेख़व आदि यथार्थवादी लेखकों ने अपने कृतित्व से तथा उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यवर्गीय क्रान्तिकारियों ने अपने शौर्य से न केवल एक भावी युगान्तरकारी क्रान्ति की ज़मीन तैयार की, बल्कि क्रान्तिकारी जनवादी विचारों से पूरे सामाजिक मानस को सींचने का काम किया। चीन भी निहायत पिछड़ा और साम्राज्यवादी लूट-खसोट से तबाह देश था, लेकिन भारत की तरह उसका पूर्ण उपनिवेशीकरण नहीं हो सका। इसीलिए न केवल उस देश ने सुन यात-सेन, लू शुन और माओ जैसे जननायक पैदा किये, बल्कि वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी ने अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व पर अन्धी निर्भरता और अनुकरण के बजाय अपनी क्रान्ति का मार्ग स्वयं ढूँढ़ा। चीनी क्रान्ति ने आधी सदी के भीतर ही उत्पादन-सम्बन्धों के साथ-साथ चीनी जनमानस में गहराई तक पैठे मध्ययुगीन बर्बर मूल्यों, रहस्यवाद और धार्मिक रूढ़ियों को काफी हद तक उखाड़ फेंका था। इस तुलना के द्वारा (ध्यान रखते हुए कि हर तुलना लँगड़ी होती है) हम कहना यह चाहते हैं कि उपनिवेशीकरण की त्रासदी ने न केवल भारतीय पूँजीपति वर्ग को, बल्कि बुद्धिजीवियों और सर्वहारा वर्ग सहित हमारे समाज के सभी वर्गों को प्रभावित किया तथा उनके वैचारिक-सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों को कमज़ोर बनाने का काम किया। निश्चय ही, राष्ट्रीय आन्दोलन और वर्ग-संघर्ष की ऊष्मा ने भारत में भी राधामोहन गोकुल और राहुल सांकृत्यायन जैसे उग्र परम्पराभंजक चिन्तक, भगत सिंह जैसे युवा विचारक क्रान्तिकारी और प्रेमचन्द जैसे महान जनवादी यथार्थवादी लेखक को जन्म दिया, लेकिन क्षितिज पर अनवरत प्रज्वलित इन मशालों की संख्या बहुत कम है, क्योंकि औपनिवेशिक भारत में किसी युगान्तरकारी वैचारिक- सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन की ज़मीन ही बहुत कमज़ोर थी। कोई आश्चर्य नहीं कि तिलक जैसे उग्र राष्ट्रवादी तथा युगान्तर-अनुशीलन के मध्यवर्गीय क्रान्तिकारी राष्ट्रीय मुक्ति का नया वैचारिक आधार तर्कणा एवं भौतिकवादी विश्वदृष्टि आधारित मानववाद-जनवाद के आधार पर तैयार करने के बजाय खोये हुए गौरवशालीय अतीत की पुनर्स्थापना और धार्मिक विश्वासों का सहारा लेते थे। गाँधी भारतीय परिस्थितियों में, बुर्जुआ मानववाद की प्रतिमूर्त कहे जा सकते हैं, लेकिन जनमानस को साथ लेने के लिए उन्होंने रूढ़ियों, धार्मिक अन्धविश्वासों और पुरातनपन्थी रीतियों का भरपूर सहारा लिया। इससे (महात्माय् बनकर) जनता को साथ लेने में तो वे सफल रहे लेकिन साथ ही, रूढ़ियों-परम्पराओं को पुन:संस्कारित करके नया जीवन देने में भी उनकी भूमिका अहम हो गयी। राष्ट्रीय आन्दोलन की विभिन्न धाराओं के अधिकांश मुख्य नायकों के विचारों की तुलना यदि वाल्तेयर, दिदेरो, रूसो या टॉमस पेन, जेफर्सन, वाशिंगटन या हर्ज़ेन, चेर्निशेव्स्की आदि के उग्र रूढ़िभंजक विचारों से करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रीय आन्दोलनकालीन अधिकांश भारतीय राष्ट्रीय जनवादी विचारकों ने काफी हद तक (भविष्य की कविता) के बजाय (अतीत की कविता) को अपना आदर्श और प्रेरक-स्रोत बनाया और फलत: अपने दौर में एक प्रगतिशील भूमिका निभाने के बावजूद, दूरगामी तौर पर, वस्तुगत रूप में पुनरुत्थानवादी और रूढ़िवादी यथास्थितिवाद की ज़मीन को ही मज़बूत करने का काम किया।
आज़ादी मिलने के बाद के छह दशकों के दौरान हमारे देश में सामन्ती भूमि- सम्बन्धों के टूटने और पूँजीवादी विकास की जो क्रमिक, मन्थर प्रक्रिया रही है, वह आर्थिक धरातल पर तो घोर यन्त्रणादायी और जनविरोधी रही ही है, मूल्यों- मान्यताओं-संस्थाओं के धरातल पर भी यह प्रक्रिया कुछ भी ऊर्जस्वी और सकारात्मक दे पाने की क्षमता से सर्वथा रिक्त रही है। भारतीय पूँजीपति वर्ग किसी भी सामाजिक आन्दोलन में जनसमुदाय की पहलकदमी और सृजनशीलता के निर्बन्ध होने से हमेशा ही आतंकित रहा है। इसीलिए हमारे देश में पूँजीवादी विकास का रास्ता “नीचे से” नहीं बल्कि “ऊपर से” अपनाया गया, यानी जन-पहलकदमी और सामाजिक आन्दोलनों के बजाय बुर्जुआ राज्यसत्ता की नीतियों पर अमल के द्वारा यहाँ पूँजीवाद का क्रमिक विकास हुआ, जिसकी सबसे तेज़ गति चार दशक बाद 1990 के दशक में देखने को मिली, जब पूरी दुनिया साम्राज्यवादी भूमण्डलीकरण की चपेट में आ चुकी थी।
ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक तौर पर समझा जा सकता है कि बुर्जुआ जनवाद के स्वस्थ-सकारात्मक मूल्य क्यों हमारे समाज के ताने-बाने में पैठ ही नहीं पाये। किसी नागरिक को जो सीमित जनवादी और नागरिक अधिकार तथा व्यक्तिगत आज़ादी संविधान की किताब और कानून की धाराएँ प्रदान करती भी हैं, उन्हें न केवल पुलिस और प्रशासन का तन्त्र उस तक पहुँचने नहीं देता, बल्कि मध्ययुगीन रूढ़ियों-परम्पराओं का सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व भी उन्हें निष्प्रभावी बनाने में एक अहम भूमिका निभाता है। रूढ़ियों का यह सामाजिक- सांस्कृतिक वर्चस्व ही वह प्रमुख उपादान है, जिसके ज़रिये प्रभुत्वशाली वर्ग और उसकी राज्यसत्ता आम जनता से अपने शासन के पक्ष में “स्वयंस्पफूर्त”-सी प्रतीत होने वाली सहमति प्राप्त करती है।

कहा जा सकता है कि भारतीय बुर्जुआ समाज क्लासिकी अर्थों. में, पूरी तरह से एक नागरिक समाज नहीं बन पाया है, क्योंकि न केवल प्राक्-बुर्जुआ समाज की विविध सामुदायिक अस्मिताएँ, बल्कि मूल्य-मान्यताएँ-संस्थाएँ भी आज प्रभावी और वर्चस्वकारी रूप में मौजूद हैं। लेकिन ये मूल्य-मान्यताएँ-संस्थाएँ किसी सामन्ती अभिजन समाज की नहीं, बल्कि भारतीय बुर्जुआ वर्ग या कहें कि भारतीय बुर्जुआ समाज के नये, आधुनिक अभिजन समाज की सेवा करती हैं। जो भारतीय बुर्जुआ वर्ग नये बुर्जुआ मूल्यों के सृजन में जन्मना असमर्थ था उसने एक क्रमिक प्रक्रिया में अर्द्धसामन्ती आर्थिक सम्बन्धों को तो नष्ट किया लेकिन सामन्ती मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं को संकुचित संशोधन-परिष्कार के साथ अपना लिया और बुर्जुआ राज और समाज की सेवा में, या कहें कि पूँजीवाद की सेवा में सन्नद्ध कर लिया। यह कृषि और औद्योगिक उत्पादन में तो बुर्जुआ तर्कपरकता की शिक्षा देता है, लेकिन कला-साहित्य-संस्कृति और सामाजिक जीवन में अवैज्ञानिक मध्ययुगीन मूल्यों को अक्षत बने रहने देता है और न केवल बने रहने देता है, बल्कि उन्हें खाद-पानी देने का काम भी करता है।
कुछ उदाहरण लें। दहेज़ एक पुरानी सामन्ती संस्था है। लेकिन आज शहरों के आधुनिक मध्य वर्ग और व्यापारियों में इसका चलन सबसे ज्यादा है। दहेज़ के लिए स्त्रियाँ जला दी जाती हैं और फिर दहेज़ बटोरने के लिए एक और शादी का रास्ता साफ हो जाता है। यानी दहेज़, व्यापार या उद्यम के लिए पूँजी जुटाने का एक माध्यम बन गया है, न कि सामन्ती शान का प्रतीक रह गया है। यही कारण है कि पहले दहेज़ का खूब प्रदर्शन होता था, पर आज यह छिपाकर, पर्दे की ओट में ले लिया जाता है। सभी बुर्जुआ चुनावी पार्टियाँ अपनी नीतियाँ बुर्जुआ शासक वर्गों के हितसाधन के लिए तैयार करती हैं और आम लोग भी जानते होते हैं कि उनमें से कोई भी उनकी ज़िन्दगी में कोई महत्त्वपूर्ण बदलाव नहीं ला सकती, लेकिन भारत में वोट बैंक की राजनीति किसी भी लोकलुभावन आर्थिक वायदे या राजनीतिक नारे से अधिक जातिगत समीकरणों पर आधारित होती है। जातियों और उनकी पंचायतों के मुखियाओं के माध्यम से आम जनता की जातिगत एकता के संस्कारों का लाभ उठाकर, उनके वोट आसानी से हासिल कर लिये जाते हैं। भारत के चुनाव विशेषज्ञों की सारी विशेषज्ञता इस बात में निहित होती है कि वे जातिगत सामाजिक समीकरणों को किस हद तक समझते हैं। टेलीविज़न आधुनिकतम प्रौद्योगिकी-आधारित एक ऐसा माध्यम है जो जनमानस और सांस्कृतिक मूल्यों को बदलने में शायद सबसे प्रभावी भूमिका निभा सकता है। लेकिन टेलीविजन पर धार्मिक प्रचार के चैनलों की संख्या एक दर्जन के आसपास है, जबकि विज्ञान-तकनोलॉजी-वैज्ञानिक जीवनदृष्टि पर केन्द्रित एक भी चैनल नहीं है। न्यूज़ चैनलों से लेकर मनोरंजन के चैनलों तक सर्वाधिक सामग्री जादू-टोना, भूत-प्रेत, अन्धविश्वास, परम्परा-पूजा और रूढ़ियों के प्रचार से जुड़ी होती है।
इन सभी उदाहरणों के माध्यम से हम कहना यह चाहते हैं कि भारतीय समाज एक ऐसा, विशिष्ट प्रकृति का पूँजीवादी समाज है जिसमें उत्पादन और विनिमय की प्रणाली के स्तर पर पूँजी का, बाज़ार का वर्चस्व स्थापित हो चुका है, पर इस विशिष्ट प्रकृति के पूँजीवाद ने अधिकांश प्राक्-पूँजीवादी मूल्यों- मान्यताओं-संस्थाओं को तोड़ने की बजाय अपना लिया है तथा विविध रूपों में पूँजी और पूँजीवादी व्यवस्था की सेवा में सन्नद्ध कर दिया है। हमारे समाज में तमाम मध्ययुगीन स्वेच्छाचारी मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही अलगाव, पण्य पूजा, व्यक्तिवाद और बुर्जुआ निरंकुशता जैसे पतनशील बुर्जुआ मूल्यों का एक विचित्र सहमेल मौजूद है। पुरानी बुराइयों के साथ नयी बुराइयों का यह सहअस्तित्व बुर्जुआ समाज के हर प्रकार के अन्याय को सामाजिक स्वीकृति प्रदान करने का काम करता है। यह एक ऐसा बुर्जुआ समाज है जिसमें प्राक्-नागरिक समाज के मूल्यों-मान्यताओं का सहारा लेकर शोषक वर्ग शासित वर्ग में यह भ्रम पैदा करता है कि व्यवस्था उनकी सहमति (कन्सेण्ट) से चल रही है। इस रूप में शासक वर्ग शासित वर्गों पर अपना वर्चस्व, यानी सहयोजन के साथ प्रभुत्व, स्थापित करता है, जैसाकि प्रत्येक नागरिक समाज में होता है। इस वर्चस्व के ज़रिये बुर्जुआ राज्य की रक्षा होती है और अपनी पारी में, राज्य अपनी संस्थाओं के ज़रिये इस वर्चस्व को बनाये रखने में भूमिका निभाता है। यानी भारत का बुर्जुआ समाज एक ऐसा नागरिक समाज है, जिसमें शासक वर्ग के वर्चस्व को बनाये रखने में प्राक्-नागरिक समाज की अस्मिताओं-मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं की अहम भूमिका होती है। इन अर्थों में यहाँ की स्थिति यूरोपीय नागरिक समाजों से काफी हद तक भिन्न है।

लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर आज प्राक्-नागरिक समाज के मूल्यों-मान्यताओं के विरुद्ध संघर्ष करके एक यूरोपीय ढंग के नागरिक समाज (यानी बुर्जुआ समाज) के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित किया जा सकता है। इतिहास के इस दौर में यह सम्भव नहीं है। हम पीछे मुड़कर बुर्जुआ पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया नये सिरे से शुरू नहीं कर सकते। इतिहास की विशिष्ट गति से आविर्भूत जो भी भारतीय बुर्जुआ समाज हमारे सामने मौजूद है, उसे नष्ट करके ही इसकी सभी बुराइयों से छुटकारा पाया जा सकता है जिनमें मध्ययुगीन मूल्य-मान्यताएँ भी शामिल हैं। नये सिरे से एक आदर्श बुर्जुआ समाज नहीं बनाया जा सकता। वर्तमान बुर्जुआ समाज का विकल्प एक ऐसा समाज ही हो सकता है, जिसमें उत्पादन मुनाफे के लिए नहीं बल्कि सामाजिक आवश्यकताओं को केन्द्र में रखकर होता हो, जिसमें उत्पादन, राजकाज और समाज पर बहुसंख्यक उत्पादक जनसमुदाय का नियन्त्रण कायम हो। ऐसे समाज में न केवल श्रम-विभाजन, अलगाव और पण्य पूजा की संस्कृति नहीं होगी, बल्कि तर्कणा, जनवाद और व्यक्तिगत आज़ादी का निषेध करने वाली सभी मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं का अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा। ज़ाहिर है कि यह सबकुछ एक झटके से नहीं हो जायेगा। राजनीतिक व्यवस्था- परिवर्तन और आर्थिक सम्बन्धों के परिवर्तन के साथ-साथ और उसके बाद भी सतत समाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही ऐसा सम्भव हो सकेगा।
हरेक राजनीतिक आन्दोलन की पूर्ववर्ती, सहवर्ती और अनुवर्ती सामाजिक- सांस्कृतिक आन्दोलन की स्वयंस्फूर्त धाराएँ अनिवार्यत: उपस्थित होती हैं। लेकिन इन सहवर्ती-अनुवर्ती धाराओं की स्वयंस्फूर्त गति एवं परिणति पर नियतत्त्ववादी ढंग से ज़ोर नहीं दिया जाना चाहिए। यानी, यह मानकर नहीं चला जाना चाहिए कि राजनीतिक व्यवस्था-परिवर्तन और आर्थिक सम्बन्धों के बदलने के साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक अधिरचनात्मक तन्त्र भी स्वत: बदल जायेगा। आर्थिक मूलाधार से आविर्भूत-निर्धारित होने के बावजूद अधिरचना की अपनी सापेक्षत:  स्वतन्त्र गति होती है और उसे बदलने के लिए अधिरचना के धरातल पर भी सचेतन प्रयास की, अधिरचना में क्रान्ति की, आवश्यकता होती है। राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों को जन्म और गति देती है और साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया को मज़बूत, गतिमान और गहरा बनाते हैं। भारत में औपनिवेशिक दौर, राष्ट्रीय आन्दोलन और उसके बाद पूँजीवादी समाज-विकास का जो विशिष्ट इतिहास रहा, आज के समाज में मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं की मौजूदगी उसी का एक प्रतिपफल है। जो काम राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के दौर में हो सकता था, वह नहीं हुआ। सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ता किंचित सुगबुगाहट और ऊपरी बदलावों के बावजूद बनी रही। अब एक प्रबल वेगवाही सामाजिक झंझावात ही इस जड़ता को तोड़कर भारतीय समाज की शिराओं में एक नयी ऊर्जस्विता और संवेग का संचार कर सकता है। यह तूफान पूँजीवादी सामाजिक-आर्थिक संरचना और राजनीतिक व्यवस्था के साथ ही उन सभी नये-पुराने मूल्यों और संस्थाओं को भी अपना निशाना बनायेगा जो इस व्यवस्था से सहारा पाते हैं और इसे सहारा देते हैं।

प्रेम की आज़ादी के प्रश्न को भी इसी ऐतिहासिक-सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य में देखा-समझा जा सकता है। व्यक्तिगत और खण्डित संघर्ष इस प्रश्न को एजेण्डा पर उपस्थित तो कर सकते हैं, लेकिन हल नहीं कर सकते। सामाजिक ताने-बाने में जनवाद और व्यक्तिगत आज़ादी के अभाव और मध्ययुगीन कबीलाई, निरंकुश स्वेच्छाचारिता के प्रभुत्व को तोड़े बिना, परम्पराओं और रूढ़ियों की जकड़बन्दी को छिन्न-भिन्न किये बिना, प्रेम की आज़ादी हासिल नहीं की जा सकती। इसलिए यह सवाल एक आमूलगामी सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति का सवाल है। हमें भूलना नहीं होगा कि प्रेम और जीवनसाथी चुनने की आज़ादी का प्रश्न जाति-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न से तथा धार्मिक आधार पर कायम सामाजिक पार्थक्य की समस्या से बुनियादी रूप से जुड़ा हुआ है। इन प्रश्नों पर एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन ही समस्या के अन्तिम हल की दिशा में जाने वाला एकमात्र रास्ता है। और साथ ही, इसके बिना, राजनीतिक व्यवस्था-परिवर्तन की किसी लड़ाई को भी अंजाम तक नहीं पहुँचाया जा सकता। जो समाज अपनी युवा पीढ़ी को अपनी ज़िन्दगी के बारे में बुनियादी फैसले लेने तक की इजाज़त नहीं देता, जहाँ परिवार में पुरानी पीढ़ी और पुरुषों का निरंकुश स्वेच्छाचारी अधिनायकत्व आज भी प्रभावी है, जिस समाज के मानस पर रूढ़ियों-परम्पराओं की ऑक्टोपसी जकड़ कायम है, वह समाज बुर्जुआ समाज के सभी अन्याय-अनाचार को और बुर्जुआ राज्य के वर्चस्व को स्वीकारने के लिए अभिशप्त है। इसीलिए, कोई आश्चर्य नहीं कि संविधान और कानून की किताबों में व्यक्तिगत आज़ादी और जनवाद की दुहाई देने वाली बुर्जुआ राज्यसत्ता अपने तमाम प्रचार-माध्यमों के ज़रिये धार्मिक-जातिगत रूढ़ियों-मान्यताओं, अन्धविश्वासों और मध्ययुगीन मूल्यों को बढ़ावा देने का काम करती है, क्योंकि इन्हीं के माध्यम से वह जनसमुदाय से अपने शासन के लिए एक किस्म की “स्वयंस्फ़ूर्त” सहमति हासिल करती है और यह भ्रम पैदा करती है कि उनका प्रभुत्व जनता की सहमति से कायम है। जो समाज भविष्य के नागरिकों को रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह करने की इजाज़त नहीं देता, वह अपनी गुलामी की बेड़ियों को खुद ही मज़बूत बनाने का काम करता है। इन्हीं रूढ़ियों-परम्पराओं के ऐतिहासिक कूड़े-कचरे के ढेर से वे फ़ासिस्‍ट गिरोह खाद-पानी पाते हैं जो मूलत: एक असाध्य संकटग्रस्त बुर्जुआ समाज की उपज होते हैं। “अतीत के गौरव” की वापसी का नारा देती हुई ये फ़ासिस्‍ट शक्तियाँ वस्तुत: पूँजी के निरंकुश सर्वसत्तावादी शासन की वकालत करती हैं और धार्मिक-जातिगत- नस्ली-लैंगिक रूढ़ियों को मज़बूत बनाकर व्यवस्था की बुनियाद को मज़बूत करने में एक अहम भूमिका निभाती हैं। बाबू बजरंगी और प्रेमी जोड़ों पर हमले करने वाले गुण्डागिरोह इन्हीं शक्तियों के प्रतिनिधि उदाहरण हैं।

प्रेम की आज़ादी का सवाल रूढ़ियों से विद्रोह का प्रश्न है। यह जाति-प्रथा के विरुद्ध भी विद्रोह है। सच्चे अर्थों में प्रेम की आज़ादी का प्रश्न स्त्री की आज़ादी के प्रश्न से भी जुड़ा है, क्योंकि प्रेम आज़ाद और समान लोगों के बीच ही वास्तव में सम्भव है। प्रेम के प्रश्न को हम सामाजिक-आर्थिक मुक्ति के बुनियादी प्रश्न से अलग काटकर नहीं देख सकते। सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति के एजेण्डा से हम इस प्रश्न को अलग नहीं कर सकते। इस प्रश्न को लेकर हमारे समाज में संघर्ष के दो रूप बनते हैं। एक,फौरी तथा दूसरा दूरगामी। फौरी तौर पर, जब भी कहीं कोई बाबू बजरंगी या धार्मिक कट्टरपंथियों का कोई गिरोह या कोई जाति-पंचायत प्रेमी जोड़ों को ज़बरन अलग करती है या कोई सज़ा सुनाती है, तो यह व्यक्तिगत आज़ादी या जनवादी अधिकार का एक मसला बनता है। इस मसले को लेकर क्रान्तिकारी छात्र-युवा संगठनों, सांस्कृतिक संगठनों, नागरिक अधिकार संगठनों आदि को आगे आना चाहिए और रस्मी कवायदों से आगे बढ़कर प्रतिरोध की संगठित आवाज़ उठानी चाहिए, संविधान और कानून रस्मी तौर पर हमें जो अधिकार देते हैं उनका भी सहारा लेना चाहिए और व्यापक आम जनता के बीच अपनी बात ले जाकर समर्थन हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। यह प्रक्रिया युवा समुदाय और समाज के प्रबुद्ध तत्त्वों की चेतना को `रैडिकल´ बनाने का भी काम करेगी। लेकिन मात्र इसी उपक्रम को समस्या का अन्तिम समाधान मान लेना एक सुधारवादी दृष्टिकोण होगा। यह केवल फौरी कार्यभार ही हो सकता है। इसके साथ एक दूरगामी कार्यभार भी है और वही फौरी कार्यभार को भी एक क्रान्तिकारी परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।
प्रेम की आज़ादी का प्रश्न बुनियादी तौर पर समाज के मौजूदा आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक ढाँचे के क्रान्तिकारी परिवर्तन से जुड़ा हुआ है और इस रूप में यह बुर्जुआ समाज-विरोधी नयी मुक्ति-परियोजना का एक अंग है। जातिगत-धार्मिक रूढ़ियों से मुक्ति और स्त्रियों की आज़ादी के प्रश्न से भी यह अविभाज्यत: जुड़ा हुआ है। इस रूप में इस समस्या का हल एक दीर्घकालिक संघर्ष के परिप्रेक्ष्य के बिना सम्भव नहीं। व्यवस्था-परिवर्तन के क्रान्तिकारी संघर्ष की कड़ियों के रूप में संगठित युवाओं के आन्दोलन, सांस्कृतिक आन्दोलन, स्त्री-आन्दोलन और नागरिक अधिकार आन्दोलन की एक लम्बी और जुझारू प्रक्रिया ही इस समस्या के निर्णायक समाधान की दिशा में भारतीय समाज को आगे ले जा सकती है। यही नहीं, व्यवस्था-परिवर्तन के बाद भी समाज की हरावल शक्तियों को सामाजिक- सांस्कृतिक अधिरचना में सतत क्रान्ति की दीर्घकालिक प्रक्रिया चलानी होगी, तभी सच्चे अर्थों में समानता और आज़ादी की सामाजिक व्यवस्था कायम होने के साथ ही रूढ़ियों की दिमाग़ी गुलामी से और मानवद्रोही पुरातनपन्थी मूल्यों के सांस्कृतिक वर्चस्व से छुटकारा मिल सकेगा और सच्चे अर्थों में आदर्श मानवीय प्रेम को ज़िन्दगी की सच्चाई बनाया जा सकेगा, जो कम से कम आज, सुदूर भविष्य की कोई चीज़ प्रतीत होती है।
अब इस प्रश्न के एक और पहलू पर भी विचार कर लिया जाना चाहिए। चाहे अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक विवाह करने वाले किसी युवा जोड़े पर जाति- बिरादरी के पंचों द्वारा बर्बर अत्याचार का सवाल हो, चाहे एम.एफ. हुसैन के चित्रों के विरुद्ध हिन्दुत्ववादी फासिस्टों की मुहिम हो, या चाहे नागरिक अधिकार, जनवादी अधिकार और व्यक्तिगत आज़ादी से जुड़ा कोई भी मसला हो, इन सवालों पर पढ़े-लिखे मध्य वर्ग का या आम छात्रों-युवाओं का भी बड़ा हिस्सा संगठित होकर सड़कों पर नहीं उतरता। ऊपर हमने इसके सामाजिक-ऐतिहासिक कारणों की आम चर्चा की है। लेकिन उस आम कारण के एक विशिष्ट विस्तार पर भी चर्चा ज़रूरी है, जो आज के भारतीय समाज में प्रगतिशील एवं जनवादी माने जाने वाले बुद्धिजीवियों की स्थिति और आम जनता के विभिन्न वर्गो के साथ उनके रिश्तों से जुड़ी हुई है।
जब भी अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक प्रेम या विवाह करने वाले किसी जोड़े पर अत्याचार की या नागरिक अधिकार के हनन की कोई घटना सामने आती है तो दिल्ली या किसी राज्य की राजधानी या किसी अन्य महानगर की सड़कों पर कुछ थोड़े से मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी उसके प्रतीकात्मक विरोध के लिए आगे आते हैं। (दिल्ली में) मण्डी हाउस से होकर जन्तर-मन्तर तक, कहीं भी कुछ लोग धरने पर बैठ जाते हैं, किसी एक शाम को मोमबत्ती जुलूस या मौन जुलूस निकाल दिया जाता है, एक जाँच दल घटना-स्थल का दौरा करने के बाद वापस आकर प्रेस के लिए और बुद्धिजीवियों के बीच सीमित वितरण के लिए एक रिपोर्ट जारी कर देता है और कुछ जनहित याचिकाएँ दाखिल कर दी जाती हैं। इन सभी कार्रवाइयों का दायरा अत्यन्त सीमित और अनुष्ठानिक होता है। इनका कर्ता-धर्ता जो बुद्धिजीवी समुदाय होता है, वह केवल तात्कालिक और संकुचित दायरे की इन गतिविधियों से अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री करके अपने प्रगतिशील और जनवादी होने का “प्रमाण” प्रस्तुत कर देता है। व्यापक आम आबादी तक अपनी बात पहुँचाने का, प्रचार और उद्वेलन की विविधरूपा कार्रवाइयों द्वारा उसे जागृत और संगठित करने का तथा ऐसे तमाम मुद्दों को लेकर सामाजिक- सांस्कृतिक आन्दोलन संगठित करने का कोई दूरगामी-दीर्घकालिक कार्यक्रम उनके एजेण्डे पर वस्तुत: होता ही नहीं। उनकी अपेक्षा केवल सत्ता से होती है कि वह संवैधानिक प्रावधानों-कानूनों का सहारा लेकर प्रतिक्रियावादी सामाजिक-राजनीतिक ताकतों के हमलों से आम लोगों के जनवादी अधिकारों और व्यक्तिगत आज़ादी की हिफाज़त सुनिश्चित करे। लोकतन्त्र के मुखौटे को बनाये रखने के लिए सरकार और प्रशासन तन्त्र भी कुछ रस्मी कार्रवाई करते हैं, कभी-कभार कुछ जाँच, कुछ गिरफ़्तारियाँ होती हैं और कुछ कानूनी कार्रवाइयाँ भी शुरू होती हैं और फ़िर समय बीतने के साथ ही सब कुछ ठण्डा पड़ जाता है।
दरअसल सत्ता और सभी पूँजीवादी चुनावी दलों के सामाजिक अवलम्ब ज़मीनी स्तर पर वही प्रतिगामी और रूढ़िवादी तत्त्व होते हैं, जो सामाजिक स्तर पर जाति-उत्पीड़न, स्त्री-उत्पीड़न और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अलगाव एवं उत्पीड़न के सूत्रधार होते हैं। इसलिए हमारे देश की बुर्जुआ सत्ता यदि चाहे भी तो उनके विरुद्ध कोई कारगर कदम नहीं उठा सकती। यदि उसे सीमित हद तक कोई प्रभावी कदम उठाने के लिए मज़बूर भी करना हो तो व्यापक जन-भागीदारी वाले किसी सामाजिक आन्दोलन के द्वारा ही यह सम्भव हो सकता है। इससे भी अहम बात यह है कि ऐसा कोई सामाजिक आन्दोलन सत्ता के कदमों और कानूनों का मोहताज नहीं होगा, वह स्वयं नये सामाजिक मूल्यों को जन्म देगा, जनमानस में उन्हें स्थापित करेगा और रूढ़िवादी शक्तियों एवं संस्थाओं के वर्चस्व को तोड़ने की आमूलगामी प्रक्रिया को आगे बढ़ायेगा। इस काम को वह बुद्धिजीवी समाज कतई अंजाम नहीं दे सकता जो प्रगतिशील, वैज्ञानिक और जनवादी मूल्यों का आग्रही तो है, लेकिन समाज में उन मूल्यों को स्थापित करने के लिए न तो कोई तकलीफ झेलने के लिए तैयार है और न ही कोई जोखिम उठाने के लिए तैयार है।

जो बुद्धिजीवी आज वामपन्थी, प्रगतिशील, सेक्युलर और जनवादी होने का दम भरते हैं तथा तमाम रस्मी एवं प्रतीकात्मक कार्रवाइयों में लगे रहते हैं, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर निगाह डालने से बात साफ हो जायेगी। प्राय: ये महानगरों में रहने वाले विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के प्राध्यापक, मीडियाकर्मी, वकील, फ्रीलांसर पत्रकार व लेखक तथा एन.जी.ओ. व सिविल सोसाइटी संगठनों के कर्ता-धर्ता हैं। कुछ थोड़े से डॉक्टर, इंजीनियर जैसे स्वतन्त्र प्रोफेशनल्स और नौकरशाह भी इनमें शामिल हैं जो प्राय: प्रगतिशील लेखक या संस्कृतिकर्मी हुआ करते हैं। आर्थिक आय की दृष्टि से इनमें से अधिकांश का जीवन सुरक्षित है, इनकी एक सामाजिक हैसियत और इज्ज़त है। यह कथित प्रगतिशील जमात आज़ादी के बाद की आधी सदी, विशेषकर पिछले लगभग तीन दशकों के दौरान, तेज़ी से सुख-सुविधा सम्पन्न हुए मध्य वर्ग की उस ऊपरी परत का अंग बन चुकी है, जिसे इस पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर आर्थिक सुरक्षा के साथ ही सामाजिक हैसियत की बाड़ेबन्दी की सुरक्षा और जनवादी अधिकार भी हासिल हैं। इस सुविधासम्पन्न विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक उपभोक्ता वर्ग में प्रोफेसर, मीडियाकर्मी, वकील आदि के रूप में रोज़ी कमाने वाले जो प्रगतिशील लोग शामिल हैं, वे अपने निजी जीवन में यदि जाति-धर्म को नहीं मानते हैं, स्वयं प्रेम-विवाह करते हैं, अपने बच्चों को इसकी इजाज़त देते हैं और प्रगतिशील आचरण करते हैं, तो भी वे इन मूल्यों को व्यापक आम आबादी के बीच ले जाने के लिए किसी सामाजिक-सांस्कृतिक मुहिम का भागीदार बनने की जहमत या जोखिम नहीं उठाते। साथ ही, इनमें कुछ ऐसे भी हैं जो प्रगतिशीलता की बात तो करते हैं, लेकिन अपनी निजी व पारिवारिक ज़िन्दगी में निहायत पुराणपन्थी हैं। चुनावी वामपन्थी दलों के नेताओं में से अधिकांश ऐसे ही हैं। इनमें से पहली कोटि के प्रगतिशीलों का कुलीनतावादी जनवाद और वामपन्थ हो या दूसरी कोटि के प्रगतिशीलों का दोगला-दुरंगा जनवाद और वामपन्थ मेहनतकश और सामान्य मध्य वर्ग के लोग उन्हें भली-भाँति पहचानते हैं और उनसे घृणा करते हैं। कुलीनतावादी प्रगतिशीलों और छद्म वामपिन्थयों का जीवन मुख्य तौर पर के ऊपरी पन्द्रह-बीस करोड़ आबादी के जीवन का हिस्सा बन चुका है, उस उच्च मध्यवर्गीय आबादी का हिस्सा बन चुका है जो एक लम्बी पीड़ादायी क्रमिक प्रक्रिया में, विकृत और आधे-अधूरे ढंग से, पूँजीवादी जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों के पूरा होने के बाद, आम जनसमुदाय के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात कर चुका है। उसे देश की लगभग पचपन करोड़ सर्वहारा- अर्द्धसर्वहारा आबादी या रोज़ाना बीस रुपये से कम पर जीने वाली चौरासी करोड़ आबादी के जीवन के अँधेरे और यन्त्राणाओं से अब कुछ भी लेना-देना नहीं रह गया है। एक परजीवी जमात के रूप में वह मेहनतकशों से निचोड़े गये अधिशेष का भागीदार बन चुका है। आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से इस परजीवी वर्ग का हिस्सा बन चुके जो बुद्धिजीवी प्रगतिशील, जनवादी और सेक्युलर विचार रखते हैं, उनकी कुलीनतावादी, अनुष्ठानिक, नपुंसक प्रगतिशीलता आम लोगों में घृणा और दूरी के अतिरिक्त भला और कौन-सा भाव पैदा कर सकती है? इस तबके की जो स्त्रियाँ हैं, ऊपरी तौर पर आम लोगों को वे आज़ाद लगती हैं (हालाँकि वस्तुत: ऐसा होता नहीं) और यह आज़ादी उनकी विशेष सुविधा प्रतीत होती है जिसके चलते मेहनतकश और आम मध्य वर्ग की स्त्रियाँ (ऊपर से सम्मान देती हुई भी) उनसे बेगानगी या घृणा तक का भाव महसूस करती हैं तथा उन्हें अपने से एकदम अलग मानती हैं।
उपरोक्त पूरी चर्चा के ज़रिये हम इस सच्चाई की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं कि प्रेम करने की आज़ादी पर रोक सहित किसी भी मध्ययुगीन बर्बरता, धार्मिक कट्टरपन्थी हमले या जातिवादी उत्पीड़न के विरुद्ध कुलीनतावादी प्रगतिशीलों की रस्मी, प्रतीकात्मक कार्रवाइयों का रूढ़िवादी शक्तियों और मूल्यों पर तो कोई असर नहीं ही पड़ता है, उल्टे आम जनता पर भी इनका उल्टा ही प्रभाव पड़ता है। सुविधासम्पन्न, कुलीनतावादी प्रगतिशीलों का जीवन आम लोगों से इतना दूर है कि उनके जीवन-मूल्य (यदि वास्तविक हों तो भी) जनता को आकृष्ट नहीं करते।
एक दूसरी बात जो ग़ौरतलब है, वह यह कि आज के भारतीय समाज में मध्ययुगीन बुराइयों के साथ-साथ आधुनिक बुर्जुआ जीवन की तमाम बुराइयाँ और विकृतियाँ भी मौजूद हैं। आम लोगों को पुरानी बुराइयों के विकल्प के तौर पर समाज में आधुनिक बुर्जुआ जीवन की बुराइयाँ ही नज़र आती हैं। पुरानी बुराइयों के साथ जीने की उन्हें आदत पड़ चुकी है। उनसे उनका परिचय पुराना है। इसलिए नयी बुराइयाँ उन्हें ज्यादा भयावह प्रतीत होती हैं। आधुनिक बुर्जुआ जीवन की सामाजिक-सांस्कृतिक विकृतियों को देखकर वे पुराने जीवन-मूल्यों से चिपके रहने का स्वाभाविक विकल्प चुनते हैं। महानगरों में तरह-तरह के सेक्स रैकेट, प्रेम-विवाहों की विफलता, यौन अपराधों आदि की खबरें पढ़-सुनकर और मीडिया में बढ़ती अश्लीलता आदि देखकर आम नागरिक इन्हें आधुनिक जीवन का प्रतिफल मानते हैं और इनसे सहज प्रतिक्रियास्वरूप उन रूढ़ियों को अपना शरण्य बनाते हैं जिनके साथ जीने के वे शताब्दियों से और पीढ़ियों से आदी रहे हैं। इसका एक वस्तुगत कारण आज की ऐतिहासिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में भी मौजूद है, जब प्रगति की धारा पर विपर्यय और प्रतिगामी पुनरुत्थान की धारा हावी है और चतुर्दक गतिरोध का माहौल है। और मनोगत कारण यह है कि विपर्यय और गतिरोध के इस दौर में ऐतिहासिक परिवर्तन की वाहक मनोगत शक्तियाँ अभी बिखरी हुई और निहायत कमज़ोर हैं। नये सिरे से नयी ज़मीन पर उनके उठ खड़े होने की प्रक्रिया अभी एकदम शुरुआती दौर में है। ऐसी ही शक्तियाँ अपने विचार और व्यवहार के द्वारा जनता के सामने मध्ययुगीन और विकृत बुर्जुआ जीवन मूल्यों का नया, मानवीय और वैज्ञानिक विकल्प प्रस्तुत कर सकती हैं।
फ़िलहाल की गतिरुद्ध स्थिति के बारे में भगत सिंह का उद्धरण एकदम सटीक ढंग से लागू होता है और ऐसी स्थिति में नयी क्रान्तिकारी शक्तियों के दायित्व के बारे में भी यह एकदम सही बात कहता है : “जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, अन्यथा पतन और बरबादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह ज़रूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा की जाये, ताकि इन्सानियत की रूह में हरकत पैदा हो।”

…इस आलेख का शेष भाग देखें : प्रेम, परम्‍परा और विद्रोह pdf file

सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक विकास

Posted on

16. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

वर्तमान समय में ‘सर्वहारा’ (‘प्रोंवितारिया’) का तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसके जीवकोपार्जन का एकमात्र साधन अपनी श्रमशक्ति का विक्रय है. लैटिन भाषा के शब्द ‘प्रोलितारियास’ का मूल अर्थ यह नहीं था. प्राचीन रोम के ज़माने में ‘प्रोलितारियास’ शब्द का प्रयोग उस व्यक्ति के लिए किया जाता था जिसकी एकमात्र सम्पत्ति उसके वंशज, उसकी संताने (प्रोलेस) होती थीं. आरंभ में सर्वहारा जोकि रोम की आबादी का निर्धनतम वर्ग था, को सैनिक सेवा और करों की अदायगी से मुक्त कर दिया गया था. बाद में सर्वहारा को सेना में भर्ती किया जाने लगा जिसका संभरण राज्य करता था. गृहयुद्धों के दौर में जब रोम का किसान समुदाय बरबाद हो गया तथा (रोमन) साम्राज्य के अधीन हो गया, तो सर्वहारा सेना का केन्द्रक बन गया था. शांति के समय सैनिकों के इस समूह का भरण-पोषण राज्य करता था तथा उन्हें अनाज की नियमित रसद दी जाती थी. इस प्रकार नाम के अलावा इन रोमन सर्वहारा और आज के भूमिहीन आवासहीन यूरोपीय सर्वहारा के बीच अन्य कोई साम्य नहीं है. हमें इस बात की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जैसाकि मार्क्स बताते हैं,”कि प्राचीन रोम में वर्ग संघर्ष स्वतन्त्र धनिकों और स्वतन्त्र निर्धनों यानि कि विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यकों के दायरे में जारी रहा था. दास वर्ग जोकि आबादी का बड़ा उत्पादक हिस्सा था, उस निष्क्रिय मंच का काम कर रहा था जिस पर यह संघर्ष चल रहा था. लोग सिसमोंदी की उल्लेखनीय उक्ति को भूल गए हैं कि ‘रोम का सर्वहारा राज्य के खर्च पर जीता था जबकि आधुनिक समाज सर्वहारा के दम पर जीता है”. (कार्ल मार्क्स, द एटीन्थ ब्रूमेर ऑफ लुई बोनापार्ट, पृ. 18-19) The Eighteenth Brumaire of Louis Bonaparte- by Karl Marx
उज़रती मजदूरों के वर्ग को व्यक्त करने के अर्थों में ‘सर्वहारा शब्द का व्यापक उपयोग उन्नीसवीं शताब्दी के पहले अर्धांश के पूर्व आरंभ नहीं हुआ था. एंगेल्स ने इंग्लैंड में मेहनतकश वर्ग की जीवनस्थितियों के सम्बन्ध में अपनी पुस्तक में पहली बार इंग्लैंड के सर्वहारा के अठारह सौ चालीस के दशक तक का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है. इस पुस्तक के मूल जर्मन संस्करण की प्रस्तावना में एंगेल्स बताते हैं कि उन्होंने “मेहनतकश, श्रमजीवी, सम्पत्ति-अधिकार रहित वर्ग और सर्वहारा” शब्द का प्रयोग एक ही परिघटना को व्यक्त करने के लिए किया है. अन्य स्थान पर वह लिखते हैं, “सर्वहारा समाज का वह वर्ग है जो अपने जीवन-निर्वाह के लिए, पूंजी से हासिल किए गए मुनाफे पर नहीं बल्कि पूरे तौर पर अपने श्रम (श्रमशक्ति) की बिक्री पर निर्भर करता है. उसका सुख-दुःख ज़िन्दगी और मौत, सम्पूर्ण अस्तित्व श्रम (श्रमशक्ति) की मांग पर, कारोबार के अच्छे और बुरे वक्त के बीच झूलते रहने पर, उन उतार-चढावों पर जो अनियंत्रित प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम होते हैं, पर निर्भर करता है. संक्षेप में, सर्वहारा अथवा सर्वहारा वर्ग उन्नीसवीं सदी का मेहनतकश वर्ग है.” इंग्लैंड में उज़रती मजदूरों या श्रमजीवियों का वर्ग चौदहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में अस्तित्व में आ गया था. एक सौ पचास वर्षों के दौरान आबादी के निम्नतर संस्तर इसमें शामिल थे. धीरे-धीरे करके यह (वर्ग) कारीगरों, शिल्पकारों और किसानों से अलग हुआ तथा सामंती बंधनों से मुक्त हो सका.
जहाँ तक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है, अपने प्रादुर्भाव के आरंभिक दिनों से ही, सर्वहारा का अन्य शिल्पों या कृषि कर्म में लगे रहने वाले मेहनतकशों से विभेदीकरण बहुत कम हुआ था. लेकिन जैसे-जैसे पूंजीवाद विकसित होता गया, सर्वहारा ने अपनी खुद की अभिलाक्षणिकताएँ धारण कर लीं. सर्वहारा, स्वतन्त्र किसान और शिल्पकार के बीच भिन्नता इस तथ्य में निहित है कि सर्वहारा मजदूर श्रम के साधनों से वंचित होता है, कि उसे अपने लिए नहीं (किसान और शिल्पकार की भांति) बल्कि पूंजी के मालिक अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए श्रम करना पड़ता है. वह स्वयं को, अपनी श्रमशक्ति को इस तरह बेचता है मानो वह कोई माल हो और इसके बदले वह उज़रत पाता है.
जब तक पूंजीवाद अपनी शैशवावस्था में था, जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में सामंती अधिकारी और नगरों में व्यापारिक निगम वित्तीय पूंजी और व्यापारिक पूंजी के औद्योगिक पूंजी में रूपांतरण को बाधित करते रहे, जब तक विनिर्माण उद्योग केवल उन नगरीय बस्तियों में पनपते रहे जो शिल्प-संघों के नियंत्रण में नहीं थे- दमनात्मक कानूनों के बावजूद उजरती मजदूर, सर्वहारा पूंजी संचय के परिणामस्वरूप अपने श्रम की बढती मांग का पूरा लाभ उठाते रहे. गिरजाघर से जुड़ी परिसंपत्तियों की लूटमार, राज्य की संपत्तियों के वितरण और सामूहिक भूमि की व्यापक बाड़ेबंदी जिसने लाखों किसानों को आजीविका से वंचित कर दिया तथा राजमार्गों, गलियों में व्यर्थ ही काम की तलाश में भटकने पर मजबूर कर दिया, के बाद मजदूरों की हालत अकस्मात बहुत बिगड़ गयी. विनिर्माण की वृद्धि ने, स्वतन्त्र उद्यमोँ को खड़ा करने के लिए अत्यंत आवश्यक पूंजी संचय ने उज़रती मज़दूर की स्वयं मालिक बन जाने की आशाओं पर पानी फेर दिया था – क्योंकि स्वतन्त्र शिल्पों का स्थान भी पूंजीवादी उद्यम लेते जा रहे थे. यह सही है कि विनिर्माण उद्योग केवल धीरे-धीरे (सत्रहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश  से लेकर अठाहरवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश तक के सौ सालों या इससे कुछ ज्यादा अवधि के दौरान ही) नगरीय उत्पादन तथा ग्रामीण उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित कर सका था. लेकिन कारीगरों और घरेलू नौकरों के आते जाने से सर्वहारा की कतारों में लगातार वृद्धि हो रही थी. इन सभी नए घटकों के बावजूद वर्ग के रूप में सर्वहारा का विभेदीकरण ज्यादा तेजी से हो रहा था. नगरीय शिल्पकार और ग्रामीण घरेलू नौकर पूरी तौर पर तभी गायब हुए जब मशीन से विशाल पैमाने का उत्पादन शुरू हुआ. वे कई खंडों में सर्वहारा की कतारों में फेंके गए और इस प्रकार ख़त्म हो गयी उनकी “आदिम अवस्था” में वापस लौटने की सम्भावना. बडे पैमाने पर मशीन से उत्पादन की शुरुआत ने ऐसे व्यक्तियों के वर्ग को जन्म दिया जो बाज़ार में अपनी चमड़ी बेचने खुद जाते हैं और रोज़गार की तलाश में अपने शरीर को प्रतिस्पर्द्धा की भंवर में झोंक देते हैं.
एंगेल्स बताते हैं,”आधुनिक बुर्जुआ समाज का प्रधान लक्षण सभी की सभी के खिलाफ जंग है जिसकी सर्वाधिक पूर्ण अभिव्यक्ति ‘प्रतिस्पर्द्धा” शब्द से होती है. यह युद्ध जिंदगी के लिए, अस्तित्व के लिए, प्रत्येक चीज़ के लिए किया जाता है और ज़रुरत पड़ जाये तो मृत्यु तक चलता रहता है. यह युद्ध समाज के विभिन्न वर्गों के बीच ही नहीं बल्कि इन वर्गों के अलग-अलग सदस्यों के बीच भी छिड़ा रहता है. हरेक इन्सान दूसरे इन्सान के रास्ते का रोड़ा होता. इसलिए हरेक इन्सान दूसरे इन्सान को अपने रास्ते से हटा देने और उसकी जगह लेने की कोशिश करता है. मजदूर एक-दूसरे से ठीक उसी तरह प्रतिस्पर्द्धा करते हैं जिस तरह एक बुर्जुआ दूसरे बुर्जुआ से प्रतिस्पर्द्धा करता है. शक्तिचालित करघे का बुनकर, हथकरघा बुनकर, रोजगारशुदा या ज़्यादा उज़रत पाने वाले  साथी से प्रतिस्पर्द्धा करता है और उसका स्थान लेना चाहता है. जहाँ तक मजदूरों का सवाल है, यह प्रतिस्पर्द्धा विद्यमान स्थितियों का निकृष्टतम पक्ष है क्योंकि यही सर्वाधिक असरदार हथियार है जो बुर्जुआ वर्ग सर्वहारा के खिलाफ इस्तेमाल करता है. (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 75-76)

संकटों के सिद्धांत और इतिहास के बारे में कुछ बातें

Posted on

‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

अंग्रेज़ मेहनतकश वर्ग जीवनस्थितियों का चित्रण करने वाली अपनी पुस्तक में एंगेल्स संकटों के बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं. वह सिद्ध करते हैं कि पूंजीवादी उत्पादन और प्रतिस्पर्द्धा की प्रवृति ही उन्हें (संकटों) उत्पन्न करती है.”आधुनिक उत्पादन और उत्पाद वितरण की अराजक स्थितियां, उत्पादन की वे स्थितियां जोकि आवश्यकता की तुष्टि के लिए न होकर लाभ से नियंत्रित होती है, वह स्थितियां जिसमें धनी बन जाने की कोशिश में प्रत्येक व्यक्ति खुद की स्वंतंत्र लीक पर काम करता है, ये स्थितियां बार-बार मंदी पैदा करने से नहीं चुकती हैं. औद्योगिक विकास के युग के आरंभ में मंदी उद्योग की एक या दूसरी शाखा या एक बाज़ार तक सीमित रहती थी. लेकिन प्रतिस्पर्द्धियों की कार्रवाईयों के चलते उद्योग की एक शाखा में रोज़गार से वंचित मजदूर उद्योग की दूसरी शाखा में रोज़गार पाने के लिए धावा बोल देते हैं जिसमें काम सीखना तुलनात्मक रूप से आसान होता है. इस प्रकार वे उत्पाद जिन्हें एक बाज़ार में खरीददार नहीं मिलते आगे बढ़कर दूसरे बाज़ार में पहुँच जाते हैं, आदि, आदि. ये छोटे-छोटे संकट इकठ्ठा होकर कालांतर में बड़े पैमाने के संकटों में तब्दील हो जाते हैं. इन संकटों का दस्तूर यह होता है कि विकास और व्यापक समृद्धि की अल्पकालीन अवधि के बाद हर पाँच वर्ष में वे प्रकट हो जाते हैं.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 82)

अन्यंत्र एंगेल्स पॉँच वर्षीय या छः वर्षीय चक्रों की चर्चा करते हैं और ‘कम्युनिज्म के सिद्धांत’  [The Principles of Communism-Frederick Engels 1847] में सात वर्षीय अवधि का उल्लेख करते है. “इस शताब्दी की पूरी अवधि के दौरान, उद्योगों का जीवन समृद्धि के दौरों और संकटों के दौरों के बीच झूलता रहा. इस तरह के संकट पॉँच साल से सात साल के नियमित अंतरालों में पैदा होते रहे. अपने साथ मजदूरों के लिए असहनीय दुर्दशा, व्यापक क्रांतिकारी उफान और मौजूदा व्यवस्था के लिए सबसे बड़े संकट लाता गया.”

सन 1848 के बहुत सालों बाद जब मार्क्स पूंजी लिख रहे थे, तब उन्होंने ध्यान दिया कि तेजी और मंदी के बीच उतार-चढाव के ये चक्र पॉँच या सात वर्षों की नहीं बल्कि दस या पंद्रह सालों की अवधि को समेट लेते हैं.

पहला संकट सन 1825-1826 में आया जिसने राष्ट्रव्यापी असर पैदा किया. उसके आरंभ में सट्टेबाजी की कार्रवाईयों में प्रस्फोट हुआ था. अगला व्यापक संकट 1836-37 में आया. इसके पहले ब्रिटेन के उद्योग और निर्यात में बहुत वृद्धि हुई थी. निर्यात में यह वृद्धि विशेष थी जिसे उत्तरी अमेरिका में बाज़ार मिल गया था. 1847 में तीसरे संकट के संकेत मिलने लगे थे. 1845 और 1846 के “रेलवे में पूंजी लगाने के उन्माद” जिसमें रेलवे निर्माण में विह्वल उतावली में पूंजी उड़ेली जा रही थी, के बाद तेजी से मंदी आयी.

जिस गति से रेलवे का निर्माण किया जा रहा था, उससे बड़ी भारी संख्या में लोगों को काम मिला. लेकिन बाद में लगभग पचास हज़ार लोग बेरोजगार हो गए. इस संकट की चरम अवस्था में जिसने ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और वास्तव में समूचे यूरोपीय महाद्वीप को (रूस को छोड़कर) लपेट में लिया था और जिसने 1848 की क्रांतिकारी उथल-पुथल का मार्ग प्रशस्त कर दिया था, कम्युनिस्ट लीग के अनुरोध पर मार्क्स ने घोषणापत्र की रचना की.

डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

Posted on

14. पूंजीवाद और प्रकृति पर मनुष्य की विजय

सन 1848 तक प्रकृति पर मनुष्य की विजय का काम बहुत धीमी गति से चल रहा था. फिर भी वाट के आविष्कार की व्यापक स्वीकृति के बाद वायु शक्ति और जलशक्ति के बेहतर इस्तेमाल के साथ-साथ वाष्पशक्ति के उपयोग का विकास तेजी से हो रहा था. 1820 से ओस्टेड (1777-1851), सीबेक (1770-1831) और फैराडे (1791-1867) जैसे वैज्ञानिकों ने विद्युत परिघटना के क्षेत्र में एक के बाद दुसरे आविष्कार किये. लेकिन विद्युत तार और विद्युत धातुशोधन के अपवाद को छोड़कर विनिर्माण उद्योग में इन आविष्कारों का लाभ नहीं उठाया जा सका. हालाँकि उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी तृतीयाँश में उद्योग की एक शाखा के रूप में विद्युत तकनीक अस्तित्व में आ चुकी थी.

कृषि में रसायन विज्ञान का उपयोग, जिसे कभी-कभी कृषि रसायन कहा जाता है, का श्रेय मुख्य रूप से जस्टस वान लीबिंग (1806-1873) नामक जर्मन को जाता है. हालाँकि इस सिलसिले में हम्फ्री डेवी (1772-1829) नामक अँगरेज़ का उल्लेख किया जा सकता है जिसकी कृषि रसायन के प्रारंभिक ज्ञान पर पुस्तक 1813 में प्रकाशित हुई थी. इस विषय पर लीबिंग की प्रथम कृति (Die Chemie in ihrer Ammending aur Agriculther und Phisiology) शीर्षक की पुस्तक जिसका लयों फ्लेफेयर (1818-1898) ने तुरंत अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया था) 1840 में प्रकाशित हुई. मार्क्स बताते हैं, “लीबिंग का एक अमर अवदान यह है कि उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान के दृष्टिकोण से आधुनिक खेती के नकारात्मक और विनाशकारी पहलू का विवेचन किया है (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1,548, टिपण्णी). इसके ठीक पहले मूल पाठ में लिखा है : “पूंजीवादी उत्पादन आबादी को लगातार बड़े केन्द्रों में एकत्रित करके शहरी आबादी के महत्त्व को बढाकर एक ओर समाज की गतिशीलता में वृद्धि कर देता है तो दूसरी ओर मनुष्य और धरती के बीच पदार्थों की अदला-बदली को अर्थात भोजन और वस्त्र के रूप में मनुष्य धरती से जिन तत्त्वों को लेकर उपयोग कर लेता है, उनकी धरती को वापसी, जो धरती को उपजाऊ बनाये रखने के लिए सदा सहज आवश्यक होता है, को अस्त-व्यस्त कर डालता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1,546-47)

लीबिंग पहले व्यक्ति थे जिन्होनें सिद्ध किया कि ज़मीन की उर्वरा शक्ति चुक जाने का कारण यह है कि इन्सान और उसके द्वारा जोती गयी ज़मीन के बीच विनिमय संबंधों में अस्त-व्यस्तता आ गयी है क्योंकि अपनी वृद्धि के दौरान फसलें ज़मीन से कुछ पदार्थों को चूस लेती हैं जिन्हें ज़मीन को वापस लौटा देने में इन्सान असमर्थ रहता है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और इसमें शहर के गाँव से अलगाव की एक अभिलाक्षणिकता धरती को कई उर्वरक पदार्थों से वंचित कर देना और प्राकृतिक खाद के रूप में इन पदार्थों को धरती को वापस न लौटा पाना है. प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के अर्न्तगत ज़मीन की उपज का लगभग पूरे हिस्से का उपभोग उस इलाके में हो जाता है जहाँ पैदावार होती है, उपभोक्ताओं, इन्सान और जानवर दोनों, द्वारा प्राकृतिक खाद ज़मीन की उर्वरा शक्ति को प्रतिपूर्ति के लिए पर्याप्त हुआ करती थी. लेकिन विशाल से विशालतर शहरों के विकास के कारण कृषि उत्पादों का उपयोग कृषि क्षेत्रों से दूर होने लगा और प्राकृतिक उर्वरक पदार्थ बर्बाद होने लगा. प्राकृतिक खाद के अभाव के कारण कृत्रिम उर्वरकों की खोज ज़रूरी हो गयी ताकि ज़मीन को उन खनिजों की वापसी की जा सके जिन्हें फसलों ने अपने पोषण के लिए इस्तेमाल कर डाला था. लीबिंग का मत था कि खनिज अवयवों की आपूर्ति सीमित होती है क्योंकि जमीन उनकी असीमित मात्रा मुहैया कराने में असमर्थ होती है. इसलिए किसान की मुख्य ज़िम्मेदारी और खादों का कार्य जमीन को उन खनिजों की प्रतिपूर्ति होना चाहिए जिन्हें प्रत्येक फसल, जिसकी उनके विश्लेषण से पता चलता है, अपनी वृद्धि के लिए जमीन से ले लेती है. इसलिए एक ऐसी कृत्रिम खाद तैयार की गयी जिसमें आवश्यक खनिज पदार्थ जैसे फास्फोरिक अम्ल, पोटेशियम और नाइट्रोजन विद्यमान थे. अठारह सौ चालीस की दशाब्दी और उसके बाद से, कृत्रिम खाद का उपयोग ज्यादा लोकप्रिय होने लगा. अब उत्पादित नाइट्रोजन युक्त खाद, सुपरफास्फेट जैसे उर्वरक और मूल धातु-कचरा, धुली हुई हड्डियाँ और मिश्रित खाद का इस्तेमाल किया जाता है. मूल धातु कचरा स्टील निर्माण का अपशिष्ट उत्पाद है और इसके उर्वरकीय गुणों की खोज 1878 के पहले नहीं हो पाई थी.

औद्योगिक उत्पादन में रसायनशास्त्र का उपयोग अठारवीं शताब्दी के अंत में आरंभ हुआ. सन 1787 के लगभग निकोलस लाब्लांक (1742-1806) ने समुद्री नमक से सोडा कार्बोनेट बनाने की महत्वपूर्ण समस्या पर ध्यान केन्द्रित किया. इन प्रयोगों में उसके अवदान ने कृत्रिम क्षार उत्पादन के विशाल उद्योग का आधार निर्मित किया जिसके उत्पाद विरंजन कार्यों (विशेषतया कुछ किस्म के कागजों के लिए), आतिशबाजी, दियासलाई, साबुन, वस्त्रों, रंगों आदि में प्रयोग किए जाते है. प्रदीपक के रूप में कोल गैस के पहले व्यावहारिक उपयोग का श्रेय विलियम मरडक (1754-1839) को दिया जाता है जिन्होंने सन 1792 से 1802 के बीच इस दिशा में सम्भावना प्रर्दशित करने वाले प्रयोग किए. इन प्रयोगों ने अगला पड़ाव तब पार किया जब एक जर्मन ने, जो 1804 में इंग्लैंड आया था, लिसियम थियेटर ख़रीदा और अपनी विधि का वहां प्रदर्शन किया. इसका परिणाम यह हुआ कि पॉल माल में नयी प्रकाश व्यवस्था की स्थापना के साथ ही लन्दन में गैस आधारित सार्वजानिक प्रकाश व्यवस्था आरंभ हो गयी. कोयले के आसवन से मुख्य ठोस अवशेष कोक प्राप्त होता है और द्रव अवशेष टार और अमोनियामय लिकर प्राप्त होता है. उप-उत्पात के रूप में हमें बेंजीन, एनिलीन डाई, विभिन्न कीटनाशक, नैप्थलीन, सैक्रीन आदि प्राप्त होते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में शेवारिल (1786-1889) की वसा और तेलों पर परीक्षणों और लाब्लांक की साधारण नमक से कास्टिक सोडा बनाने की खोजों ने साबुन और मोमबत्ती बनाने की विधियों और मात्राओं में आमूल परिवर्तन कर दिया. लेकिन घोषणापत्र के पहले प्रकाशन के कई वर्षों बाद अठारह सौ पचास के दशक में ही उद्योग में रासायनिक शोध के उपयोग का युग आरम्भ हो सका. सन 1848 से कुछ वर्षों बाद वस्त्र उत्पादन में औद्योगिक क्रांति जो अभी तक मुख्य रूप से कताई और बुनाई से सम्बंधित प्रक्रियाओं तक सीमित थी, रंगाई और परिष्करण के क्षेत्र में सुधार के साथ अपनी अंतिम मंजिल तक पहुँच गयी. 1856 में डब्ल्यू.एच. पार्किन ने पहला एनिलिन डाई अर्थात माव नाम का पहला रंगीन पदार्थ बनाया. कोलतार के आसवन से अन्य चमकदार रंगीन पदार्थों की खोजों का ताँता लग गया. आज इतने किस्म के रंगीन पदार्थ मौजूद हैं कि रंगसाज को उलझन में डाल देते हैं. उनसे हर किस्म के रंग बनाए जा सकते हैं जिनके गुण सर्वाधिक विविधपूर्ण होते हैं. उनमें से कुछ रंग अल्पकालिक लेकिन ज्यादातर रंग स्थायी और विभिन्न प्रभावों को सहन करने वाले होते हैं.

धरती के सुदूरवर्ती हिस्सों पर खेती करने का काम (घोषणापत्र के पाठ में मार्क्स और एंगेल्स इस प्रक्रिया का सन्दर्भ देते हैं) 1848 तक प्रारंभिक मंजिल पार कर चूका था. 1815 में संयुक्त राज्य का कपास का उत्पादन 73,000 गांठ था जो बढ़कर 1840 में 1,348,000 गांठों तक पहुँच गया था. 1840 में गेहूं का उत्पादन 84,800,000 बुशेल था लेकिन 1901-1905 के पाँच वर्षों में वार्षिक औसत 662,000,000 बुशेल प्रतिवर्ष हो गया था. जहाँ तक समस्त किस्मों के अनाजों के सम्पूर्ण उत्पादन का प्रश्न है, यह 1848 में 377.000,000 बुशेल था जबकि 1901-1905 के वर्षों के बीच औसत वार्षिक उत्पादन 2,100,000,000 बुशेल था. 1850 के बाद कनाडा, दक्ष्णि अमेरिका, आस्ट्रेलिया, साइबेरिया, अफ्रीका आदि व्यापार के लिए खुले.

अठारवीं शताब्दी के अंतिम तृतीयाँश तक नौपरिवहन के लिए नदियों का प्रयोग पुराने तरीके से ही किया जा रहा था. अठारवीं शताब्दी के मध्य में इंग्लैंड में नहरों के निर्माण का काम आरंभ हो गया था और फ्रांस में भी नहरों का जाल बिछ गया था. नहर निर्माण के आरंभिक वर्षों में बनाई गयी ज्यादातर नहरे बजरा और नौका नहरों के नाम से जानी जाती थीं तथा सीमित गहराई और चौडाई के कारण छोटे आकार के जलयान के लिए उपयुक्त थीं. नहरों के विकास का कारण बढ़ते व्यापार की तत्काल ज़रुरत को पूरा करना था. जैसे-जैसे नहर निर्माण की तकनीक में सुधार होता गया, जलमार्गों की गहराई और चौडाई इतनी बढाई गयी कि इसमें समुद्री जहाज भी चलने लगे. ज्यादातर जहाजी नहरें इसलिए निर्मित की गयीं ताकि बीच में पड़ने वाले जलडमरू मध्य को काटकर दो सागरों के बीच यात्रा समय को कम किया जा सके. (उदाहरण के लिए केलिडोनियन नहर और श्वेज़ नहर) या कि महत्त्वपूर्ण आंतरिक स्थानों को समुद्री बंदरगाहों में परिवर्तित किया जा सके (मैनचेस्टर जहाजी नहर और फ्लैंडर्स में जीब्रुगे-ब्रुग्स नहर). एक छल्ले से दुसरे छल्ले तक कटाई करके नदियों की टेढ़े-मेढे घुमावदार धारा से बचाया गया और बांध और जलाशय द्वारा नदी की तलहटी का ढाल नौपरिवहन योग्य बनाया गया. जलमार्गों और नदियों के मुहानों को प्राय: वाष्पशक्ति से चालित ड्रेजिंग मशीनों द्वारा साफ़ किया जाता है. बड़े पैमाने के रेलवे निर्माण के आरंभ होने के बाद ही नहरों का विकास समाप्त हुआ.

दर्शन के प्रश्नों पर-2

Posted on Updated on

दर्शन के प्रश्नों पर-1

अब तक, विश्लेषण और संश्लेषण को स्पष्ट ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है। विश्लेषण अधिक स्पष्ट है लेकिन संश्लेषण के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा गया है। मैंने आई सू-चि[27] से बात की। उसका कहना है कि आजकल सिर्फ़ अवधारणात्मक संश्लेषण और विश्लेषण की बात की जाती है, और वस्तुगत प्रयोगात्मक संश्लेषण तथा विश्लेषण की बात नहीं की जाती। हम कम्युनिस्ट पार्टी और क्वोमिन्ताङ, सर्वहारा और बुर्जुआ, भूस्वामियों और किसानों, चीनी जनता और साम्राज्यवादियों का विश्लेषण और संश्लेषण कैसे करेंगे? उदाहरण के लिए, कम्युनिस्ट पार्टी और क्वोमिन्ताङ के मामले में हम ऐसा कैसे करेंगे। विश्लेषण तो बस यह प्रश्न है कि हम कितने मज़बूत हैं, हमारे पास कितना इलाका है, हमारे कितने सदस्य हैं, कितने सैनिक हैं, हमारी कमजोरियाँ क्या हैं? हमारे हाथ में कोई बड़ा शहर नहीं है, हमारी सेना की संख्या सिर्फ़ 1,200,000 है, हमारे पास कोई विदेशी सहायता नहीं है, जबकि क्वोमिन्ताङ को भारी विदेशी सहायता मिलती है। अगर आप येनान की तुलना शंघाई से करें, तो येनान की आबादी सिर्फ़ 7,000 है, इसमें (पार्टी और सरकार के) संगठनों के लोगों तथा सैनिकों (येनान में तैनात) को जोड़ दें, तो कुल योग 20,000 होता है। वहाँ सिर्फ़ दस्तकारी और खेती होती है। किसी बड़े शहर से इसकी तुलना कैसे की जा सकती है? हमारा मज़बूत पक्ष है कि हमारे साथ जनता का समर्थन है जबकि क्वोमिन्ताङ जनता से कटी हुई है। आपके पास ज्यादा इलाका है, लेकिन आपके सैनिक दबाव डालकर भरती किये गये हैं, और अफसरों तथा सिपाहियों के बीच टकराव है। स्वाभाविक है, उनकी सेना के एक खासे बड़े हिस्से के पास लड़ने की काफी क्षमता है, और ऐसा कतई नहीं है कि वे एक ही प्रहार से ढेर हो जायेंगे। उनका कमज़ोर पक्ष इस बात में है, उसकी कुंजी यह है कि वे आम जनता से कटे हुए हैं। हम आम जनता के साथ एकजुट हैं; वे आम जनता से कटे हैं।

वे अपने प्रचार में कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी सम्पत्ति को और पत्नियों को सर्वोपभोग्य बना देगी और वे इन बातों को प्राथमिक स्कूलों तक के स्तर पर प्रचारित करते हैं। उन्होंने एक गीत बनाया था: `जब चू तेह और माओ त्से-तुङ आयेंगे, मारते-काटते और तबाही मचाते हुए, तो तुम क्या करोगे?´ उन्होंने प्राइमरी स्कूल के विद्यार्थियों को यह गीत सिखा दिया, और जैसे ही विद्यार्थियों ने इसे गाया, सारे बच्चों ने घर जाकर अपने माता-पिता भाई-बहनों से इसके बारे में पूछा, और इस तरह हमारे लिए इस प्रचार का उलटा ही असर हुआ। एक छोटे बच्चे ने (गीत) सुनकर अपने पिता से पूछा। उसके पिता ने जवाब दिया : `तुम्हें पूछना नहीं चाहिए( जब तुम बड़े हो जाओगे तो खुद देखकर समझ जाओगे।´ वह मध्यमार्गी था। फिर बच्चे ने अपने चाचा से भी पूछा। चाचा ने उसे डाँट लगायी, और जवाब दिया : `ये सब मारने-काटने का क्या मामला है? अगर मुझसे फिर पूछा तो मार खाओगे।´ उसका चाचा पहले कम्युनिस्ट युवा लीग का सदस्य था। सभी अख़बार और रेडियो स्टेशन हम पर हमला करते थे। ढेर सारे अख़बार थे, हर शहर में कई दर्जन, हर धड़े का अपना अखबार था, और वे सब के सब, निरपवाद रूप से, कम्युनिस्ट विरोधी थे। क्या सारे सामान्य लोगों ने उनकी बात सुनी? कतई नहीं! हमें चीन के मामलों का कुछ अनुभव हुआ है, चीन एक `गौरैया´ है।[28] विदेशों में भी, अमीर-ग़रीब, प्रतिक्रान्ति और क्रान्ति, मार्क्सवाद-लेनिनवाद और संशोधनवाद के सिवा कुछ नहीं है। आपको यह बिल्कुल नहीं मानना चाहिए कि हर कोई कम्युनिस्ट-विरोधी प्रचार को मान लेगा और कम्युनिज्म का विरोध करने में शामिल हो जायेगा। क्या हम उस समय अखबार नहीं पढ़ते थे? फिर भी हम उनसे प्रभावित नहीं थे।

मैंने `लाल महल का सपना´ पाँच बार पढ़ी है, और इससे प्रभावित नहीं हुआ हूँ। मैं इसे इतिहास के तौर पढ़ता हूँ। पहले मैंने इसे कहानी के तौर पर पढ़ा, और फिर इतिहास के तौर पर। जब लोग `लाल महल का सपना´ पढ़ते हैं, तो वे चौथे अध्याय को ध्यान से नहीं पढ़ते , लेकिन दरअसल इसी अध्याय में इस किताब का सार है। इसमें लेङ लू-सिङ है जो जुङ-कुओ का वर्णन करता है, और गीत तथा टिप्पणियाँ रचता है। चौथे अध्याय `लौकी वाला भिक्षु लौकी का मामला तय करता है´ में `अफसरों के लिए ताबीज´ की चर्चा की गयी है। यह चार बड़े खानदानों का परिचय कराता है :

नानकिङ चिया के लिए

कहो हिप हिप हुर्रा!

वे जार भर-भरकर

तौलते हैं अपना सोना।

आह-पाङ महल

छूता है आसमान,

लेकिन इसमें समा नहीं पाता

नानकिङ शिह खानदान।

समन्दर के राजा को

जब कम पड़ते हैं। सोने के पलंग

तो पहुँचता है वह नानकिङ वाङ।

नानकिङ सुएह हैं इतने अमीर

कि उनके पैसे गिनने में

लग जायेगा सारा दिन….[29]

`लाल महल का सपना´ में चारों बड़े खानदानों का वर्णन किया गया हैं यह एक भीषण वर्ग संघर्ष के बारे में है, जिससे दर्जनों लोगों का भविष्य जुड़ा है, हालाँकि इनमें से बीस-तीस लोग ही शासक वर्ग में हैं। (गणना की गयी है कि (इस श्रेणी में) तैंतीस लोग हैं।) अन्य सभी, तीन सौ से ज्यादा लोग, दास हैं, जैसे युएह याङ, सू-चि, दूसरी बहन यु, तीसरी बहन यु, आदि। इतिहास पढ़ते समय, यदि आप वर्ग संघर्ष को अपना प्रस्थान-बिन्दु न बनायें, तो आप भ्रम में पड़ जायेंगे। वर्ग विश्लेषण से ही चीज़ों का स्पष्ट विश्लेषण किया जा सकता है। `लाल महल का सपना´ और आज तक, इस किताब पर हुए शोध से मुद्दे स्पष्ट नहीं हो सके हैं( इससे हम समझ सकते हैं कि समस्या कितनी कठिन है। यु पिङ-पो और वाङ कुन-लुन दोनों इसके विशेषज्ञ हैं।[30] हो चि फाङ [31][32] नामक एक सज्जन भी प्रकट हुए हैं। ये सब तो `लाल महल का सपना´ पर हाल में हुए शोध से सम्बन्धित हैं, पुराने अध्ययनों को तो मैं गिनाउँगा ही नहीं। `लाल महल का सपना´ के बारे में त्साई युवान-पेई का दृष्टिकोण गलत था( हू-शिह का दृष्टिकोण कुछ अधिक सही था।[33]

संश्लेषण क्या है? कि किस तरह दो विपरीत तत्व, क्वोमिन्ताङ और कम्युनिस्ट पार्टी मुख्य भूमि (चीन – अनु.) पर संश्लेषित हो गये। संश्लेषण इस तरह घटित हुआ: उनकी सेनाएँ आयीं, और हम उन्हें हज़म कर गये, हम एक-एक कौर करके उन्हें खा गये। यह याङ सिएन-चेन द्वारा बताये गये ढंग से दो को एक में मिलाने का मामला नहीं था, यह शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में मौजूद दो विपरीत तत्वों का संश्लेषण नहीं था। वे शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में नहीं रहना चाहते, वे आपको हजम कर जाना चाहते हैं वरना, वे येनान पर हमला क्यों करते? उनकी सेना तीनों सीमाओं पर तीन सिएन को छोड़कर उत्तरी शेन्सी मे हर जगह घुस चुकी थी। आपके पास अपनी आज़ादी है, और हमारे पास अपनी आज़ादी हैं आप 250,000 हैं, और हम 25,000 लोग।[34] चन्द ब्रिगेड, 20,000 आदमियों से कुछ ज्यादा। विश्लेषण कर लेने के बाद, अब हम संश्लेषण कैसे करें? अगर आप कहीं जाना चाहते हैं, तो सीधे आगे जाइये( हम फिर भी एक-एक कौर करके आपकी सेना को निगल जायेंगे। अगर हम जीतने के लिए लड़ सकते थे, तो हम लड़ते थे, अगर नहीं जीत सकते थे, तो हम पीछे हट जाते थे। मार्च 1947 से मार्च 1948 तक, (दुश्मन की) एक पूरी सेना हवा में ग़ायब हो गयी, क्योंकि हमने उनके दसियों दजार सैनिकों को ख़त्म कर दिया। जब हमने ई-चुझान का घेरा डाला, और ल्यू कान शहर को मुक्त कराने आया, तो मुख्य कमाण्डर ल्यू कान मारा गया, उसके तीन डिवीज़नल कमाण्डरों में से दो मारे गये और तीसरा बन्दी बना लिया गया, और पूरी सेना का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। यह संश्लेषण था। उनकी तमाम बन्दूकें और तोपखाना हमारे पक्ष में संश्लेषित हो गया और सैनिक भी संश्लेषित हो गये। जो हमारे साथ रहना चाहते थे वे रह सकते थे और जो नहीं रहना चाहते थे उन्हें हमने जाने का ख़र्चा दे दिया। जब हमने ल्यू-कान को ख़त्म कर दिया तो ई-चुआन में तैनात ब्रिगेड ने बिना लड़े हथियार डाला दिये। तीन बड़े अभियानों – ल्याओ-शेव, हुआई-हाई और पीकिङ- त्येनित्सन – में संश्लेषण का हमारा तरीका क्या था? फू त्सो-ह 400,000 आदमियों की अपनी सेना सहित, बिना लड़े, हमारे पक्ष में संश्लेषित हो गया और उन्होंने अपनी सारी रायफलें सौंप दीं।[35] एक चीज़ का दूसरे को खा जाना, बड़ी मछली का छोटी मछली को खा जाना, यह संश्लेषण है। इसे इस तरह से किताबों में कभी प्रस्तुत नहीं किया गया है। मैंने भी कभी अपनी किताबों में इसे इस ढंग से नहीं प्रस्तुत किया है। याङ सिएन-चिन मानते हैं कि दो मिलकर एक हो जाते हैं और संश्लेषण दो विपरीत तत्वों के बीच का अटूट बन्धन हैं। इस दुनिया में कौन से बन्धन अटूट हैं? चीज़ें एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती है, लेकिन अन्तत: उन्हें टूटना होता है। कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे अलग नहीं किया जा सकता। हमारे संघर्ष के करीब बीस वर्षों में, हममें से भी बहुत से लोगों को दुश्मन हजम कर गया। जब 300,000 आदमियों की लाल सेना शेन-कान-निङ क्षेत्र में पहुँची, तो सिर्फ़ 20,000 लोग बचे थे। बाकी में से, कुछ हजम कर लिये गये थे, कुछ बिखर गये थे, कुछ मारे गये या घायल हुए थे।

हमें विपरीत तत्वों की एकता पर चर्चा करने के लिए अपने जीवन को प्रस्थान बिन्दु बनाना चाहिए। (कामरेड काङ शेङ : `सिर्फ़ अवधारणाओं की बात करने से काम नहीं चलेगा।´)

जब विश्लेषण चल रहा होता है, तो संश्लेषण भी होता है, और जब संश्लेषण हो रहा होता है, तो विश्लेषण भी होता है। जब लोग जानवरों और पौधों को खाते हैं, तो वे भी विश्लेषण से शुरू करते हैं। हम बालू क्यों नहीं खाते? अगर चावल में बालू हो तो वह खाने लायक नहीं होता। हम घोड़े, गाय या भेड़ की तरह घास क्यों नहीं खाते, सिर्फ़ बन्दगोभी जैसी चीज़ें क्यों खाते हैं? हमें हर चीज़ का विश्लेषण करना चाहिए। शेन वुङ ने सौ जड़ी-बूटियों को चखा,[36] और दवाओं के लिए उनके इस्तेमाल की शुरुआत की। दसियों हज़ार साल बाद, विश्लेषण ने स्पष्ट रूप से यह उजागर किया कि क्या खाया जा सकता है और क्या नहीं। टिड्डे, साँप और कछुए खाये जा सकते हैं। केकड़े, कुत्ते और जलीय जन्तु खाये जा सकते हैं। कुछ विदेशी उन्हें नहीं खाते। उत्तरी शेन्सी में लोग जलीय जन्तुओं को नहीं खाते, वे मछलियाँ नहीं खाते। वे वहाँ बिल्ली भी नहीं खाते। एक बार पीली नदी की भारी बाढ़ से हज़ारों किलों मछलियाँ किनारों पर जमा हो गयी( और उन्होंने उन सबकी खाद बना डाली। मैं एक देशी दार्शनिक हूँ, आप लोग विदेशी दार्शनिक हैं। (कामरेड काङ शेङ `क्या अध्यक्ष तीन श्रेणियों के प्रश्न पर कुछ कह सकते हैं?´) एंगेल्स ने तीन श्रेणियों की चर्चा की है, लेकिन जहाँ तक मेरी बात है मैं उनमें से दो श्रेणियों में विश्वास नहीं करता। (विपरीत तत्वों की एकता सबसे बुनियादी नियम है, गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण विपरीत तत्वों गुण और मात्रा की एकता है, और निषेध का निषेध होता ही नहीं है) उसी स्तर पर, गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण, निषेध का निषेध, और विपरीत तत्वों की एकता के नियम को साथ-साथ रहना एकतत्ववाद नहीं, बल्कि `त्रितत्वाद´ है। सबसे बुनियादी चीज़ है विपरीत तत्वों की एकता। गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण विपरीत तत्वों गुण और मात्रा की एकता है। निषेध का निषेध जैसी कोई चीज़ नहीं है। अभिपुष्टि, निषेध, अभिपुष्टि, निषेध… चीज़ों की विकास प्रक्रिया में, घटनाओं की श्रंखला में हर कहीं अभिपुष्टि और निषेध दोनों होते हैं। दास स्वामियों के समाज ने आदिम समाज का निषेध किया, लेकिन सामन्ती समाज के सन्दर्भ में, यह एक सकारात्मक बात थी। सामन्ती समाज दास समाज के सम्बन्ध में निषेध था, लेकिन पूँजीवादी समाज के सन्दर्भ में यह सकारात्मक था। पूँजीवादी समाज सामन्ती समाज के सम्बन्ध में निषेध था, लेकिन समाजवादी समाज के सन्दर्भ में यह फिर सकारात्मक है। संश्लेषण की पद्धति क्या होती है! क्या यह सम्भव है कि दास समाज के साथ-साथ आदिम समाज का भी अस्तित्व बना रहे? वे साथ-साथ मौजूद होते हैं, लेकिन यह समग्र का एक छोटा-सा हिस्सा है। समग्र तस्वीर यह है कि आदिम समाज समाप्त हो जायेगा। इससे भी बाढ़कर यह है कि समाज का विकास कई मंजिलों से गुजरकर होता है। आदिम समाज भी अनेक मंजिलों में बँटा हुआ है। उस समय तक, मृत पतियों के साथ औरतों को दफन कर देने की प्रथा नहीं थी, लेकिन तब पुरुष स्त्रियों के अधीन थे और फिर चीज़ें अपने विपरीत की ओर बढ़ीं और स्त्रियाँ पुरुषों के अधीन हो गयीं। इतिहास की यह मंजिल अब तक स्पष्ट नहीं हो पायी है, हालाँकि करीब दस लाख वर्ष से ज्यादा समय से यह चला आ रहा है। वर्ग समाज अभी 5000 वर्ष पुराना नहीं हुआ है, आदिम युग के अन्त में लुङ शान और याङ शाओ [37] जैसी संस्कृतियों में रँगे हुए बर्तन होते थे। एक शब्द में, एक दूसरे को हड़प कर जाता है, एक दूसरे को उखाड़ फेंकता है, वर्ग ख़त्म कर दिया जाता है, दूसरा वर्ग उठता है, एक समाज का खात्मा हो जाता है, दूसरा समाज उठ खड़ा होता है। स्वाभाविक रूप से, विकास की प्रक्रिया में हर चीज़ बिल्कुल शुद्ध नहीं होती। जब यह सामन्ती समाज तक पहुँचती है, तो दास प्रणाली की कुछ चीज़ें अब भी बची रहती हैं, हालाँकि सामाजिक ढाँचे का अधिकांश भाग सामन्ती प्रणाली की अभिलाक्षणिकताओं के अनुसार होता है। अब भी कुछ भू-दास और कुछ बँधुआ मजदूर होते हैं, जैसे दस्तकार कारीगर। पूँजीवाद समाज भी बिल्कुल शुद्ध नहीं होता, और ज्यादा उन्नत पूँजीवादी समाजों में भी एक पिछड़ा भाग भी होता है। उदाहरण के लिए, दक्षिणी संयुक्त राज्य अमेरिका में दास प्रणाली थी। लिंकन ने दास प्रणाली ख़त्म कर दी, लेकिन वहाँ अब भी काले गुलाम हैं, उनका संघर्ष बहुत तीखा है। दो करोड़ से ज्यादा लोग इसमें शामिल हैं और ये काफी बड़ी संख्या है। एक चीज़ दूसरी को नष्ट कर देती है, चीज़ें पैदा होती हैं, विकसित होती हैं, और नष्ट हो जाती हैं, हर कहीं ऐसा ही है। अगर चीज़ें दूसरी चीज़ों द्वारा नष्ट नहीं करती, तो वे खुद ही नष्ट हो जाती हैं। लोग क्यों मरते हैं? क्या कुलीन लोग भी मरते हैं? यह एक प्राकृतिक नियम है। जंगल मनुष्यों से ज्यादा जीवित रहते हैं, लेकिन वे भी कुछ हज़ार वर्ष तक रहते हैं। यदि मृत्यु जैसी चीज़ न होती, तो यह स्थिति असहनीय होती। अगर हम आज कनफ़्यूशियस को जीवित देख सकते, तो धरती इतने सारे लोगों को सँभालने लायक नहीं रहती। मैं चुआङ-ल्यू[38] के रवैये का समर्थन करता हूँ। जब उसकी पत्नी मर गयी तो वह थाली बजाकर गाना गाने लगा। जब लोग मरें, तो द्वन्द्ववाद की विजय का जश्न मनाने के लिए पुराने के ध्वंस का जश्न मनाने के लिए पार्टियाँ होनी चाहिए। समाजवाद भी समाप्त हो जायेगा। इसका समाप्त न होना ठीक नहीं, क्योंकि जब तक यह समाप्त नहीं होगा तब तक कम्युनिज्म नहीं आयेगा। कम्युनिज्म हज़ारों हज़ार साल तक रहेगा। मैं नहीं मानता कि कम्युनिज्म के तहत कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होंगे, कि यह गुणात्मक बदलावों द्वारा मंज़िलों में बँटा नहीं होगा। मैं इसे नहीं मानता! मात्रा गुण में बदलती है, और गुण मात्रा में बदल जाता है। मैं यह नहीं मानता कि यह दसियों लाख वर्ष तक बिना बदले गुणात्मक रूप से बिल्कुल एक समान बना रह सकता है! द्वन्द्ववाद की रोशनी में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। फिर यह सिद्धान्त है, `हरेक से उसकी क्षमतानुसार, हरेक को उसकी आवश्यकतानुसार।´ क्या आप मानते हैं कि वे दस लाख वर्ष तक इसी अर्थशास्त्र पर चलते रहेंगे? क्या आपने इसके बारे में सोचा है? अगर ऐसा होता, तो हमें अर्थशास्त्रियों की ज़रूरत नहीं होती, या फिर हम बस एक पाठ्यपुस्तक से काम चला सकते, और द्वन्द्ववाद ख़त्म हो जाता। विपरीत ध्रुवों की ओर निरन्तर गति द्वन्द्ववाद का प्राण है। अन्तत: मनुष्य जाति का भी अन्त होगा। जब धर्मशास्त्री कयामत के दिन की बात करते हैं, तो वे निराशावादी होते हैं। हम कहते हैं कि मनुष्य जाति का अन्त कुछ ऐसी चीज़ होगी जो मनुष्य जाति से भी उन्नत किसी चीज़ को जन्म देगी। मनुष्य जाति अभी अपनी शैशवावस्था में है। एंगेल्स ने आवश्यकता के राज्य से स्वतन्त्रता के राज्य में प्रवेश करने की बात की थी, और कहा था कि स्वतन्त्रता का अर्थ है आवश्यकता की समझ। यह वाक्य अधूरा है। यह आधी बात कहता है और शेष को अनकहा छोड़ देता है। क्या इसे महज समझने से आप स्वतन्त्र हो जायेंगे? स्वतन्त्रता का अर्थ है आवश्यकता की समझ और आवश्यकता का रूपान्तरण – आपको कुछ काम भी तो करना होता है। अगर आप बिना कोई काम किये सिर्फ़ खायेंगे, अगर आप महज समझेंगे, तो क्या यह काफ़ी होगा? जब आप कोई नियम ढूँढ़ते हैं, तो आपको इसे लागू करना आना चाहिए, आपको दुनिया का नये सिरे से निर्माण करना होगा, आपको जमीन खोदनी और इमारतें खड़ी करनी होंगी, आपको खदानें खोदनी होंगी, उद्योग लगाने होंगे। भविष्य में और भी ज्यादा लोग होंगे, और अनाज काफी नहीं होगा, तो लोगों को खनिजों से भोजन प्राप्त करना होगा। इस तरह, केवल रूपान्तरण द्वारा ही स्वतन्त्रता हासिल की जा सकती है। क्या भविष्य में इतनी स्वतन्त्रता सम्भव होगी? लेनिन ने कहा था कि भविष्य में, आसमान में इधर-उधर भागते हवाई जहाज इतने ज्यादा होंगे जैसे कि पतंगें। हर जगह वे टकरा जायेंगे, तो हम इसके बारे में क्या करेंगे? हम उन्हें कैसे चलायेंगे? और अगर हम ऐसा कर लेंगे, तो क्या चीज़ें इतनी स्वतन्त्र रहेंगी? पीकिङ में इस समय 10,000 बसें हैं, टोक्यो में 100,000 (वाहन) हैं (या यह 800,000 है?) इसलिए वहाँ वाहन दुर्घटनाएँ ज्यादा होती हैं। हमारे यहाँ कम कारें हैं और हम ड्राइवरों और लोगों को शिक्षित भी करते हैं, इसलिए दुर्घटनाएँ कम होती हैं। अब से 10,000 साल बाद पीकिङ में क्या होगा? क्या तब भी 10,000 बसें ही रहेंगी? वे कुछ नया अविष्कार कर सकते हैं, जिससे वे परिवहन के इन साधनों को त्याग सकते हैं, ताकि मनुष्य उड़ सके, किसी सरल-से यान्त्रिक उपकरण का प्रयोग करके किसी भी जगह उड़कर जा सके, और जहाँ जी चाहे उतर सके। आवश्यकता को सिर्फ़ समझने से कुछ नहीं होगा, हमें चीज़ों को बदलना भी होगा। मैं नहीं मानता कि कम्युनिज्म मंजिलों में विभाजित नहीं होगा, और कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होंगे। लेनिन ने कहा था कि सारी चीज़ें विभाजित की जा सकती हैं। उन्होंने परमाणु का उदाहरण दिया और कहा कि न सिर्फ़ परमाणु को विभाजित किया जा सकता है बल्कि इलेक्ट्रान को भी विभाजित किया जा सकता है। पहले, यह माना जाता था कि इसे विभाजित नहीं किया जा सकता, परमाणु के नाभिक के विखण्डन से जुड़ी विज्ञान की शाखा की उम्र अभी ज्यादा नहीं है, बस बीस या तीस वर्ष हुए हैं। हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने परमाणु के नाभिक को उसके संघटकों जैसे प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, एण्टी-न्यूट्रान, मेज़ान और एण्टी- मेज़ॉन में बाँटा है। ये तो भारी वाले संघटक हैं इसके अलावा हल्के वाले भी हैं। इनमें से ज्यादातर खोजें द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान या उसके बाद हुई हैं। यह तथ्य कुछ समय पहले खोजा जा चुका था कि इलेक्ट्रान को परमाणु के नाभिक से अलग किया जा सकता है। बिजली के तार में ताँबे या अल्युमिनियम से अलग किये गये इलेक्ट्रानों का प्रयोग किया जाता है। पृथ्वी के 300 ली के वातावरण में, भी असम्बद्ध इलेक्ट्रानों की परतों का पता लगाया गया है। वहाँ भी इलेक्ट्रान और परमाणु का नाभिक अलग-अलग हैं। अब तक इलेक्ट्रानों को तोड़ा नहीं जा सका है लेकिन एक दिन वे अवश्य ही इसे भी तोड़ सकेंगे। चुआ³-त्जू ने कहा है, `एक फुट की लम्बाई, जिसे रोज़ आधा किया जाता है, कभी भी घटकर शून्य नहीं होगी।´ (चुआङ-त्जू, अध्याय 33 का उद्धरण) यह सच है। अगर आपको विश्वास नहीं है, तो ज़रा सोचिये। अगर इसे घटा कर शून्य किया जा सकता, तो विज्ञान ही नहीं होता। तमाम तरह की चीज़ें निरन्तर और असीम ढंग से विकसित होती रहती हैं, और वे अनन्त हैं। समय और स्थान अनन्त हैं। जहाँ तक स्थान का सवाल है, वृहत और सूक्ष्य दोनों दृष्टिकोण से देखने पर, यह अनन्त है, इसे अन्तहीन ढंग से विभाजित किया जा सकता है। इसलिए, दस लाख वर्ष बाद भी वैज्ञानिकों के लिए करने को काम होगा। मैं `बुलेटिन ऑफ नेचुरल साइंसेज़´ में मूलभूत कणों पर सकाटा के लेख की बहुत सराहना करता हूँ।[39] मैंने पहले इस तरह का कोई लेख नहीं देखा। यह द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। वह लेनिन को उद्धृत करते हैं। दर्शनशास्त्र की कमजोरी है कि इसने व्यावहारिक दर्शन नहीं, सिर्फ़ किताबी दर्शन पैदा किया है। हमें हमेशा नई-नई चीज़ें सामने लानी चाहिए। वरना हमारा यहाँ क्या काम है? हमें वंशज किसलिए चाहिए? नयी चीज़ें यथार्थ में मिलती हैं, हमें यथार्थ को समझना चाहिए। अन्तिम विश्लेषण में, जेन चि-यू[40] मार्क्सवादी हैं या नहीं? मैं बौद्ध धर्म पर उनके उन लेखों की काफी सराहना करता हूँ। (उनके पीछे) कुछ शोध किया गया दिखता है, वह ताङ युङ-तुङ[41] के शिष्य हैं। वह सिर्फ़ ताङ वंश के बौद्ध धर्म की चर्चा करते हैं, और बाद के समय के बौद्ध धर्म पर सीधे कुछ नहीं कहते। सुङ और मिङ अधिभूतवाद ताङ वंश के चान स्कूल से विकसित हुए, और यह मनोगत प्रत्ययवाद से वस्तुगत प्रत्ययवाद की ओर एक आन्दोलन था।[42] बौद्ध धर्म और ताओ पन्थ दोनों ही हैं, और दोनों के बीच फर्क न करना ग़लत है। उन पर ध्यान देना उचित कैसे हो सकता है? हान यू की बातों का कोई मतलब नहीं है। उसका नारा था( `उनके विचारों से सीखो, उनकी अभिव्यक्ति के ढंग से नहीं।´ उसके विचार पूरी तरह दूसरों से नकल किये हुए थे, उसने बस निबन्धों का रूप और संरचना बदल दी। उसकी बातें बेमतलब थीं, और जो कुछ उसने कहा वह मूलत: प्राचीन पुस्तकों से लिया गया था। `शिक्षकों पर विमर्श´ जैसे लेखनों में कुछ नयापन है। ल्यू-हाउ अलग था, वह बौद्ध और ताओ भौतिकवाद की एक-एक बात जानता था।[43] लेकिन उसकी `स्वर्ग उत्तर देता है´ बहुत छोटी है। उसकी `स्वर्ग उत्तर देता है´ चू युआन की `स्वर्ग पूछता है´ से पैदा हुई है।[44] हज़ारों साल में सिर्फ़ इस एक आदमी ने `स्वर्ग उत्तर देता है´ जैसी कोई चीज़ लिखी है। `स्वर्ग उत्तर देता है´ और `स्वर्ग पूछता है´ किसके बारे में हैं? `स्वर्ग पूछता है´ में स्पष्ट ढंग से व्याख्या करने के लिए टिप्पणियाँ न हों, तो इसे पढ़कर आप कुछ नहीं समझ पायेंगे, आपको एक सामान्य झलक मिलेगी। `स्वर्ग पूछता है´ वाकई अद्भुत है, हज़ारों वर्ष पहले इसने ब्रह्माण्ड, प्रकृति और मनुष्य पर सवाल उठाये थे। (दो को एक में मिलाने के प्रश्न पर चर्चा के सम्बन्ध में) हुङ चि को कुछ अच्छी चीज़ें पुनर्मुद्रित करने और एक रिपोर्ट लिखने के लिए कहें।

टिप्पणियाँ

27आई सू-ची (1910-66) अपनी मृत्यु के समय उच्चतर पार्टी स्कूल के उपाध्यक्ष थे। वह पार्टी के अग्रणी दार्शनिक प्रवक्ताओं में से एक थे, जिन्होंने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर कृतियों का रूसी से अनुवाद किया था, और मार्क्सवाद को जनसाधारण तक ले जाने के लिए अनेक पुस्तकें तथा लेख लिखे थे। 1 नवम्बर 1964 को उन्होंने पीपुल्स डेली में `बुर्जुआ´ दार्शनिक याङ सिएन-चेन पर हमला करते हुए एक लेख प्रकाशित कराया।

28 `गौरैया की चीरफाड़´ की उपमा ज्ञान अर्जित करने और अनुभवों का समाहार करने का एक अनुप्रयुक्त सिद्धान्त और कार्य पद्धति है। किसी परिघटना की अनेक पुनरावृत्तियों के सामान्यीकरण का प्रयास करने के बजाय, यह कार्य पद्धति किसी प्रोटोटाइप के सांगोपांग अध्ययन और जांच-पड़ताल के ज़रिये उसका गहन विश्लेषण करने और इस विश्लेषण के ज़रिये अनुभवों का सार-संकलन करने की हिमायत करती है। यह नारा इस आम कहावत से निकला है कि `गौरैया छोटी भले ही होती है लेकिन उसमें सभी ज़रूरी अंग होते हैं।´ यहाँ माओ कहते हैं कि व्यापक अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भों में पूरा चीन आज की दुनिया में क्रान्ति की समस्याओं का एक लघु रूप है।

29 पुस्तक (दि स्टोरी ऑफ दि स्टोन) के अध्याय 2 में जुङ कुओ के ड्यूक की हवेली में लेङ त्जू-सिंग के उपदेश। `अधिकारियों के लिए ताबीज´ इलाके के अमीर और असरदार परिवारों की एक सूची थी जिसे बॉटल-गूर्ड के भूतपूर्व शिष्य को साथ रखना पड़ता था ताकि उन्हें नाराज़ करके अपना भविष्य चौपट करने से बच सके। (दि स्टोरी ऑफ दि स्टोन)

30 इस मुद्दे पर कॉमरेड माओ द्वारा की गयी आलोचनाओं के लिए देखें लाल भवन का सपना के बारे में पत्र´´ (संकलित रचनाएँ, खण्ड 5) वाङ कुन-लेन 1950 के दशक में पीकिङ के उप महापौर थे

31 हो चि-फाङ (1911-) एक कवि तथा साहित्य जगत के प्रभावी व्यक्ति थे। 1954 में यू यिंग-पो के विरुद्ध चली मुहिम में उन्होंने एक सीमा तक उसका यह कहकर बचाव किया कि लाल भवन का सपना की यू की व्याख्या ग़लत है लेकिन वे राजनीतिक रूप से वफादार हैं। महान अग्रवर्ती छलाँग के वक्त स्वयं उनकी आलोचना की गयी।

32 इस विषय पर वू शिह-चाङ की कृति अंग्रेज़ी में अनूदित है : ऑन `लाल भवन का सपना´ (क्लैरण्डन प्रेस, 1961)

33 यहाँ माओ के विचार लू शुन से मेल खाते हैं।

34 माओ द्वारा यहाँ दिये गये आँकड़े 1946 में गृह युद्ध नये सिरे से छिड़ जाने जाने से अधिक जापान विरोधी युद्ध के आरिम्भक दिनों के हैं जब जन मुक्ति सेना की ताकत कम से कम पाँच लाख तक की हो गयी थी।

35 जनवरी 1949 में, पेइपिंग (जिस नाम से तब उसे जाना जाता था) में राष्ट्रवादी गैरीसन के कमाण्डर जनरल फू त्सो-इ ने व्यर्थ की बरबादी से बचने के लिए बिना लड़े ही आतमसमर्पण कर दिया। बाद में पीकिङ सरकार में वह जल संरक्षण मन्त्री बने।

36 कहा जाता है कि प्रसिद्ध सम्राट शेन नुङ ने तीसरी शताब्दी ई.पू. में कृषि कला सिखायी थी, और ख़ास तौर पर वनस्पतियों के औषधीय गुणों का पता लगाया था।

37 लुङ शान और यान शाओ संस्कृतियाँ, जो क्रमश: उत्तर-पूर्वी और उत्तर- पश्चिमी चीन में स्थित हैं, उत्तरपाषाण काल की दो उल्लेखनीय संस्कृतियाँ थीं। जैसा कि माओ कहते हैं, वे अपनी मृदभाँड कला के लिए विशेष रूप से जानी जाती हैं।

38 चुआङ-त्जू नामक पुस्तक, जिसका एक अंश ही दूसरी शताब्दी ई.पू. के उत्तरार्द्ध में रहने वाले इसी नाम के व्यक्ति ने लिखा था, न केवल ताओ धर्म के शास्त्रीय ग्रन्थों में से एक है (लाओ-त्जू और बुक ऑफ चेंजेंस के साथ) बल्कि चीन के इतिहास की महानतम साहित्यिक कृतियों में से भी एक है।

39 नगोया विश्वविद्यालय के एक जापानी भौतिकीविद सकाटा शियूची का मानना था कि `मूलभूत कण एक एकल, भौतिक, विभेदीकृत और असीम श्रेणी होते हैं जिनसे प्राकृतिक व्यवस्था बनी होती है।´ इन विचारों को प्रस्तुत करने वाला उनका एक लेख जून 1965 में रेड फ्लैग में छपा था।

40 सम्भवत: माओ जेन चि-यू द्वारा 1963 में प्रकाशित और 1973 में पुनर्मुद्रित लेखों के एक संग्रह की बात कर रहे हैं : `हान एवं ताङ राजवंशों में बौद्ध विचारधारा पर संकलित निबन्ध,´ (पीकिङ )। इन अध्ययनों में वह द्वन्द्ववाद के विषय में लेनिन को काफ़ी विस्तार से उद्धृत करते हैं।

41 ताङ युङ-तुङ (1892-1964) जिन्हें जेन चि-यु अपना शिक्षक मानते हैं, बौद्ध धर्म के अग्रणी इतिहासकार थे, जिन्होंने हान, वेई, चिन और उत्तरी एवं दक्षिणी राजवंशों में चीनी बौद्ध धर्म के बारे में तथा भारतीय दर्शन के इतिहास आदि पर लिखा था। 1948 से लेकर 1954 में बीमार पड़ने तक वह पीकिङ विश्वविद्यालय में मानविकी के डीन थे।

42 चान बौद्ध धर्म (जो उसके जापानी नाम ज़ेन से अधिक प्रसिद्ध है) के प्रभाव में, सुङ और मिङ वंशों के चीनी दार्शनिकों ने कनफ़्यूशियसवाद और बौद्ध धर्म का संश्लेषण किया जिसमें केन्द्रीय भूमिका ली अवधारणा (सिद्धान्त या तर्क) की होती है, जिसे नव-कनफ़्यूशियसवाद के नाम से जाना जाता है।

43 हान यू और ल्यू त्सुङ-युआन। हान-यू ने प्राचीन शैली की अधिकता से बचते हुए प्राचीन क्लासिकी अवधि की सादगी को पुनर्सृजित करने की कोशिश की। `उनके विचारों से सीखने´ का माओ द्वारा उद्धृत नारा अभिव्यक्ति के पुराने पड़ गये तरीकों से बचते हुए प्राचीन कनफ़्यूशियस- वादी सन्तों से प्रेरणा लेने के इस लक्ष्य का हवाला देता है। उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाया लेकिन फिर भी उससे कुछ विचार लिये। ल्यू त्सु³-युआन, जिन्हें माओ यहाँ उनके साहित्यिक नाम ल्यू त्जू-हाउ के नाम से पुकारते हैं, हान यू के करीबी दोस्त थे।

44 ल्यू त्सुङ-युआन का निबन्ध `स्वर्ग उत्तर देता है´ में चू युआन द्वारा अपनी कविता `स्वर्ग पूछता है´ में ब्रह्माण्ड के बारे में उठाये गये कुछ प्रश्नों के उत्तर दिये गये हैं।

अनुवाद : सत्यम

‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां-13

Posted on

पूँजी का संचय

पूंजीपतियों के व्यक्तिगत नियंत्रण में पूंजी का संचय दो तरीकों से होता है. सबसे पहले श्रम से लाभ निचोड़कर इसका स्वतः संचय हो जाता है. (पूँजी का संकेंद्रण) तथा दूसरी ओर पूंजीपतियों की व्यक्तिगत पूंजी का संयुक्त स्टॉक कम्पनियों, व्यापार-संघ, व्यवसाय संघ और उत्पादन संघ के नियंत्रण में पूंजी के समूहन द्वारा पूंजी संचय हो जाता है. (पूंजी का केन्द्रीकरण).

यूनाइटेड किंगडम में कुल कर योग्य आय 1856 में 3,07,068,898 पौण्ड, 1865 में 385,530,020 पाउंड, 1882 में 601,450,977 पाउंड और 1912 में 1,111,456,413 पाउंड थी. इन आंकडों में कर मुक्त आय जोड़ देने पर कुल योग 2,000,000,000 पाउंड हो जाता है. इसका आधा हिस्सा आबादी के आठवें हिस्से को प्राप्त होता है. 1884 में इंग्लैंड में संयुक्त स्टॉक कम्पनियों की कुल संख्या 8,192 थी. 1912 में यह बढ़कर 29,730 और 1916 में 66,094 हो गयी. इसी के अनुरूप, इन स्टॉक कम्पनियों की पूंजी 1884 में 480,000,000 पाउंड से बढ़कर 1900 में 1,164,000,000 पाउंड और 1916 में 2,720,000,000 पाउंड हो गयी.

वर्ष 1906 से 1913 तक फ्रांस की राष्ट्रीय सम्पत्ति की कीमत 225,000,000,000 फ्रैंक आंकी गयी थी जो 11,664,000 व्यक्तियों के पास थी इनमें से 98,243 जिनमें से प्रत्येक के पास 250,000 फ्रैंक से अधिक की संपत्ति थी और उनकी संपत्ति की सकल धनराशी 106,000,000 अर्थात समस्त राष्ट्रीय संपत्ति का लगभग आधा हिस्सा. अगर इनमें से सर्वाधिक धनी व्यक्तियों को अलग कर दें जिनकी संख्या लगभग 18,586 और संपत्ति का मूल्य 60,500,000 फ्रैंक था तो 9,500,000 से कम संपत्ति धारक बच जाते हैं जिनमें से प्रत्येक के पास 10,000 से अधिक मूल्य की संपत्ति थी जिनकी कुल संपत्ति का मूल्य 66,000,000,000 था.

प्रशिया में 900 मार्क से कम आय वाले 8,570,418 व्यक्ति थे. इन सबकी आय का योग उच्चतर श्रेणी के 1,46,000 व्यक्तियों की कुल आय से कम था. 1,00,000 मार्क से अधिक आय वाले व्यक्तियों की संख्या 1913 में 4,747, 1914 में 5,215 और 1917 में 13,327 थी.

संयुक्त राज्य की राष्ट्रीय संपत्ति में 7,100,000,000 डॉलर 1870 में 30,000,000,000 डॉलर और 1900 में 88,500,000,000 डॉलर थी. 1912 में यह बढ़कर 187,000,000,000 डॉलर और कुछ अर्थशास्त्रियों के आकलन के अनुसार 1920 में 500,000,000,000 तक पहुँच गयी थी. 1917 में 50,000 डॉलर या इससे अधिक वार्षिक आय वाले 19.103 व्यक्ति थे जिनमें 141 व्यक्तियों की आय 10,000,000 डॉलर से अधिक थी. विनिर्माण उद्योग में पूंजी निवेश की धनराशी 1899 में 8,500,000,000 और 1914 में 22,700,000,000 डॉलर थी. रेलवे निर्माण में पूंजी निवेश की धनराशी 1899 में 11,000,000 डॉलर थी और 1914 में 20,200,000,000 डॉलर थी.

बड़े व्यापार संघों द्वारा नियंत्रित नेशनल सिटी बैंक की पूंजी  1879 में 16,700,000 डॉलर थी. यह पूंजी बढ़कर 1899 में 128,000,000 डॉलर हो गयी  थी और आज बढ़कर यह 1,000,000,000 डॉलर हो गयी है.

इस वक्त जबकि संयुक्त राज्य संसार के सम्पूर्ण क्षेत्र के 7 प्रतिशत पर काबिज़ है जबकि इसकी आबादी विश्व की आबादी का 6 प्रतिशत से भी कम है, यह पूंजीवादी गणतंत्र विश्व के सोना उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के गेहूं उत्पादन का 25 प्रतिशत, विश्व के स्टील और लौह उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के सीसा उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के जिंक उत्पादन का 50 प्रतिशत, विश्व के चाँदी उत्पादन का 40 प्रतिशत, विश्व के कोयला उत्पादन का 60 प्रतिशत, विश्व के खनिज उत्पादन का 60 प्रतिशत, विश्व के अनाज उत्पादन का 75 प्रतिशत और विश्व के कार उत्पादन का 85 प्रतिशत पैदा करता है. यह समस्त चंद एक ट्रस्टों न्यासों के नियंत्रण में है जिनके शीर्ष पर रॉकफेलर  मोर्गेन, फोर्ड, मैकार्मिक और आरमर जैसे बीस अरबपति है.