सर्वहारा

मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

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विश्व स्तर पर, 1970 के बाद प्रगतिशिलियों, एन जी ओ, और वामपंथियों के साथ मिलकर संशोधनवाद सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों को उत्पादन के स्थान कारखानों और फार्मों से खींचकर, बुर्जुआजी की इच्छानुसार, मंडी में ले गया. मार्क्स की पूंजी पर आधारित यह फिल्म, उनका भंडाफोड़ करती है और संजीदा लोगों को मार्क्सवाद का सही अध्ययन करने के लिए प्रेरित करती है. मूलरूप से फिल्म अंग्रेजी में हैं जिसे हिंदी में डब किया गया है. इसे भारतीय सन्दर्भ में रखने के लिए कुछ तस्वीरों और दृश्य में बदलाव भी किया गया है. http://kapitalism101.wordpress.com/2010/08/20/law-of-value-5-contradiction से विशेष आभार सहित.

मूल्य के नियम_5_विरोधाभास

मूल्य के नियम  में मार्क्स हमेशा विसंगतियों की चर्चा करते हैं. परन्तु ये गोल चकोरों और सैन्य ज्ञान से संबंधित विसंगतियां नहीं होती. ये विसंगतियां पूंजीवादी समाज के सामाजिक संबंधों के अन्दर की विसंगतियां हैं. कुछ लोग इनके लिए शब्द विरोधाभास का प्रयोग करना ज्यादा पसंद करते हैं.

बहुत क्षोभ के साथ हम जानते  हैं कि आधुनिक समाज सामाजिक विसंगतियों से भरा पड़ा है. धन की प्रचुरता के साथ  अत्यधिक गरीबी, अत्याधिक बेरोजगारी के बावजूद  ज्यादा काम, बैंकों द्वारा घरों की कुर्की, नस्ली श्रेष्टता और तनाव, औरतों के खिलाफ हिंसा, श्रम संघर्ष, दूषित वातावरण, पुलिस की बर्बरता, गैंग हिंसा, समूहों की घृणा, जनसँख्या का अत्याधिक उजाड़ा और बहुत से युद्ध.  मार्क्स की दिलचस्पी इन सभी  विसंगतियों में हैं. लेकिन इनमें  से किसी एक  से भी वे अपना विश्लेषण शुरू नहीं करते.

इसके विपरीत वे अपेक्षित साधारण सी लगने वाली चीज – जिन्स से शुरू होते हैं. क्यों ? क्योंकि जिन्स पूंजीवाद के सामाजिक संबंधों की सबसे बुनियादी चीज है. लोगों के परस्पर संबंध जिन्स विनिमय का रूप ले लेते हैं. जिन्स सामाजिक संबंधों की बुनियादी कार्यकर्त्ता है.  इसलिए अगर हम यह जानना चाहते हैं कि कैसे ये सभी सामाजिक विरोधाभास परस्पर संबंधित हैं, हमें जिन्स से शुरुआत करनी होगी.

जैसाकि हमने पहले ही देखा है कि जिन्स में विरोधाभास निहित है. : इसका एक उपयोग मूल्य है और दूसरा मूल्य (जैसाकि हमने देखा है कि मूल्य विनिमय मूल्य के पीछे छुपा होता है इसलिए, पहले हमने कहा था कि विरोधाभास उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य के बीच है, बाद में हमने इसे उपयोग मूल्य और मूल्य में संशोधित कर लिया. ) शुरू में देखने पर यह इतना अधिक विरोधाभासी नहीं लगता. लेकिन जैसे ही हम इसे बारीकी से देखते हैं तो महतवपूर्ण विरोधाभास उभर आते हैं.

ऐसा क्यों होता है कि लोगों को मंडी में अपनी श्रम, धन के बदले बेचना पड़ता है. क्योंकि वे स्वयं अपने जीवन निर्वाह के साधन नहीं जुटा पाते. यही पूंजीवाद का विलक्षण पहलू है. पूर्व में मौजूद उत्पादन की विधियों में लोगों की बहुसंख्या किसी न किसी प्रकार के उत्पादन के साधनों का उपयोग कर सकती थी,  जिनसे वे अपने जीवन निर्वाह के साधन जुटा लेते थे. कई बार लोग आपस में चीजे बदल लेते थे परंतू वे ऐसा अपने ही प्रयोग के लिए अतिरिक्त उत्पादन के द्वारा करते थे. अपने अतिरिक्त उत्पादन की विक्री विशेषरूप से विनिमय के लिए उत्पादन से पूर्णतया भिन्न है.

‘प्रारंभिक एकत्रीकरण नाम की लंबी हिंसात्मक और ऐतिहासिक प्रक्रिया  के द्वारा , उत्पादन के इन साधनों का निजीकरण हो गया और इनपर  पूंजीपति नामक वर्ग के लोगों का कब्ज़ा हो गया. जबकि पहले लोग सीधे अपने उपयोग के लिए श्रम किया करते थे, लेकिन अब उन्हें अपनी रोजी चलने के लिए मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.

सो इस तथ्य से कि हम विनिमय के लिए, न कि सीधे उपयोग के लिए उत्पादन करते हैं, संपत्तिशाली और संपत्तिहीन के बीच सामाजिक विरोधाभास का पता चलता है. खुली मंडी में पहले से ही काम पर जबरदस्ती विद्यमान होती है. और इस जबरदस्ती को लागू करने के लिए किसी न किसी प्रकार की हिंसा की आवश्यकता पड़ती हैं, चाहे यह राज्य , निजी सेना या भाड़े के बटमार द्वारा हो. उत्पादन के साधनों का निजीकरण करने के लिए, हिंसा जरूरी थी और संपत्ति के सभी वैधानिक पह्लूयों को लागू करने के लिए जरूरी बनी हुई है.

अपनी जीविका को मंडी से प्राप्त करने के लिए उन्हें कोई अन्य चीज बेचनी पड़ती है. चूँकि उत्पादन के साधन निजी होते हैं, इसलिए उन्हें अपनी श्रम बेचनी पड़ती है. निसंदेह श्रम वास्तव में बेचीं नहीं जा सकती. इसकी जगह हम अपनी श्रम की क्षमता : श्रम-शक्ति बेचते हैं. हम कार्य समय की निश्चित मात्रा बेचते हैं, चाहे इसे घंटों, हफ़्तों या वर्षों में मापा जाये. यही कारण है कि मूल्य श्रम समय की अभिव्यक्ति है.

हमारी स्वयं की सृजनात्मक क्रियाशील क्षमता, वही वस्तु जो हमें इन्सान बनाती है और समाज से जोडती है, श्रम-शक्ति कहलाती है, श्रम-शक्ति जिन्स बन जाती है जिसे हम किसी को बेचते हैं. श्रम-शक्ति का,  अन्य जिन्स की भांति, उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य होता है और आपने अनुमानित किया, इनमें विरोधाभास है. विनिमय मूल्य हमारे कार्य समय के लिए भुगतान की गयी मजदूरी होती है. इसे जीविका पर खर्च द्वारा निर्धारित किया जाता है. यह भोजन, रिहाईश, कपडे, और परिवहन पर खर्च के बराबर होता है. लेकिन हमारी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य ऐसा है कि यह मूल्य सृजित कर सकता है. यही श्रम-शक्ति के दो विरोधी पहलू हैं, एक तरफ इस पर मजदूरी खर्च होती है तो दूसरी और यह मूल्य पैदा करता है.

हो सकता है आपको 5 डॉलर प्रति घंटा दिए जा रहे हो और आप 20 डॉलर प्रति घंटा की दर से मूल्य सृजित कर रहे हों. अगर ऐसा है तो आपका शोषण हो रहा है. वास्तव में, आपके शोषण की दर चार सौ प्रतिशत है. श्रम-शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास के कारण ही शोषण संभव होता है.

शोषण पूंजीवाद की पहेली – मुनाफे के अस्तित्व – को स्पष्ट करता है. पूंजीपति दिन की शुरुआत कुछ धन से करते हैं जिसे वे उत्पादन में  निवेश कर देते हैं. दिन की समाप्ति पर उनके पास कुछ जिंसों की मात्राएँ होती हैं जिन्हें वे शुरू में  खर्च किये गए धन से अधिक मूल्य पर बेच देते हैं. ऐसा लग सकता है कि इनका मुनाफा क्रय -विक्रय करने से हुआ है. हालाँकि केवल क्रय-विक्रय करने से भी मुनाफा अर्जित किया जा सकता है. लेकिन केवल क्रय-विक्रय करने से मुनाफा पैदा नहीं होता. क्योंकि खरीदना और बेचना जीरो-राशी खेल है. जब हम जिंसों का विनिमय करते हैं तो हम उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं. इस प्रक्रिया द्वारा समाज की कुल राशी के मूल्य में कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसा संभव हो सकता है कि किसी एक को चुना लग जाये. परन्तु मंडी में, किसी एक व्यक्ति का लाभ दूसरे के लिए हानि होता है. लेकिन जिंसों की खरीदफरोख्त से औसत मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती. परन्तु वास्तविक मुनाफा औसत मूल्य में वृद्धि से ही संभव है. किसी समाज के जीडीपी की कुल राशी के मूल्य में वृद्धि मुनाफे  के इस विस्तार से ही होती है.

ऐसा लगता है कि हम पहेली या किसी विरोधाभास में उलझ गए हों. मंडी में समानता और संतुलन का राज्य चलता है. मंडी में विनिमय द्वारा जिंसो के मूल्य का संरक्षण होता है. किसी एक व्यक्ति का लाभ किसी दूसरे व्यक्ति की हानि से इस प्रकार बराबर हो जाता है कि जिन्स विनिमय से अन्तर्जात संतुलन बना रहता है. परन्तु मुनाफा ऐसी अद्भुत घटना है जो जिंसों की खरीदफरोख्त होने से संभावय लगती है. कहीं न कहीं विषमता से मुनाफा पैदा हो सकता है.लेकिन थोड़े से ज्यादा पैदा होना. यह सब किस प्रकार संभव हो सकता है?

इस पहेली को हल करने के लिए मार्क्स हमें मंडी से आगे उत्पादन के  रहस्यमई क्षेत्र में देखने के लिए कहते हैं. उत्पादन में, जहाँ श्रम के शोषण से मूल्य का विस्तार हो जाता है. शोषण मंडी में विनिमय के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करता क्योंकि यह विनिमय में नहीं होता. श्रम-शक्ति को उसके मूल्य पर खरीदा जाता है. उस श्रम शक्ति के उत्पादों को उनके मूल्य पर बेचा जाता है. इन विनिमयों द्वारा कोई मुनाफा नहीं होता. मंडी से मुनाफा बिलकुल नहीं आता, बल्कि श्रम प्रक्रिया से आता है. श्रम के मूल्य से अधिक और ऊपर किया गया श्रम मुनाफे की मात्रा का निर्धारक है. जबकि मंडी समानता और संतुलन की क्षेत्र बनी रहती है, उत्पादन असमानता और शोषण का क्षेत्र है. और यह विरोधाभास श्रम शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास होने से ही संभव है.

अगली किश्त मार्क्स के मूल्य के नियम पर आधारित एनिमेटिड हिंदी डब फिल्म : अंतिम किश्त में समाप्य

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तल्खी से लिखी आपकी टिपण्णी. शुक्रिया

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दिनेश कुमार बिस्सा की एक टिपण्णी बड़ी दिलचस्प रही, हालाँकि उन्होंने बड़े व्यंग्यात्मक अंदाज से मार्क्सवाद पर तीर छोड़े हैं. लेकिन उनकी टिपण्णी उन लोगों की टिप्पणियों से कहीं बेहतर है जो मार्क्सवाद में आस्था रखते हैं, जबकि मार्क्सवाद आस्था का नहीं कर्मों का विज्ञान है. चलिए, दिनेश जी की टिपण्णी से शुरू करते हैं :

“मार्क्सवाद से समाज मैं असमानता मिट कर समानता आ जाती है, भूखे के पेट में रोटी, बेरोजगार के हाथ में काम, नंगे के तन पर कपडा, बच्चों के हाथ में कापी-कलम. गरीबी मिट कर सभी लोग अमीरी के सागर में गोते लगाने लगते हैं, मतलब सब कुछ  अच्छा ही अच्छा. उदाहरण : कम्युनिस्ट देशों रूस, क्यूबा, चीन. भारत के दो महान राज्य, केरल और पश्चिम बंगाल…. इन जगहों में गरीबी और असमानता, शोषण आदि के दर्शन भी नहीं होंगे. दिन में चिराग लेकर ढूंढ लो, तो भी…दिनेश कुमार बिस्सा.

दिनेश भाई, हम यह अंदाजा तो नहीं लगा सकते की आपके घोर मार्क्सवादी विरोध के पीछे आपका अनुभव या फिर आपकी मिडल क्लास की आदर्शवादी-समतावादी संभावनाओं की पूर्ति में मार्क्सवाद के इतिहास ( इतिहास वह नहीं जो है, बल्कि वह जो आपका मन, आपकी सहूलत से गढ़ना चाहता है ) का खरा न उतरना रहा है या फिर कुछ पूर्वाग्रह जो मिडल क्लास की जीवन स्थितियों से उनकी विचार शैली में आ जाते हैं. लेकिन इससे हमें अपना दृष्टिकोण, पाठकों के सामने स्पष्ट करने का मौका मिल गया, जिसका प्रेरणा स्रोत तल्खी से लिखी, आपकी यह टिपण्णी है. शुक्रिया

बीसवीं सदी की क्रांतियों और परिणामस्वरूप समाजवाद को लागू करने की मुश्किलें, समाजवाद के भीतर बुर्जुआ वर्ग का होना, अवसर मिलते ही, उन द्वारा मजदूर वर्ग के अधिनायकवाद के स्थान पर फिर से बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना (वह भी लाल झंडे तले, कम्युनिस्ट भीतरघातियों द्वारा जो शुद्ध से शुद्ध कम्युनिस्ट पार्टी में होते हैं, और हम यह दावा नहीं करते कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा. यह काम हम उन लोगों के लिए छोड़ देते हैं जिन्हें अपने और अपनी पार्टियों के शुद्ध होने पर गर्व है) हमारा फ़िलहाल इतना ही आग्रह है कि पूंजीवाद अपने विकास के उस चरण पर पहुँच चुका है, जहाँ इसकी अप्रासंगिगता स्पष्ट दिखाई देती है.

जहाँ तक मार्क्सवाद के प्रासंगिक होने का अर्थ है, तो यह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है. विश्व के हर कोने में पूंजीवादी संबंधों का वर्चस्व हो चुका है. बेशक सबसे धनाढ्य कार्पोरेशनों के पास विज्ञान और उच्च तकनीक से सुपर मुनाफा कमाना संभव है, लेकिन तीव्र गति के युग में, विज्ञान और तकनीक अन्य मझौले पूंजीपतियों के पास पहुँच कर उनका सुपर मुनाफा बंद कर देती हैं. ( सुपर मुनाफे से आशय है कि उच्च तकनीक द्वारा कम मजदूरों से अधिक उत्पादन करना जिसके परिणामस्वरूप सुपर मुनाफे का स्रोत कमजोर पूंजीपति वर्ग के बेशी मूल्य का साझा पूल होता है)

आपने यूनानी देवता सफिंक्स की मिथ तो सुनी ही होगी. वे एक पहेली द्वारा ऐथंज़ शहर की रक्षा किया करते थे. शहर में आनेवाले अजनबी को पहेली हल करनी होती थी. असफलता का मतलब था, मौत. मार्क्स ने पूंजीवाद की मौत के लिए कोई पहेली तो गढ़ी नहीं है, लेकिन उस पहेली को हल किया है, जिसे जो  भी जान लेता है, उसे पूंजीवाद की मौत स्पष्ट दिखाई देने लगती है. चलिए हम उस पहेली को आपके सामने रखते हैं.

बड़े पूंजीपतियों ने विज्ञान और तकनीक की मदद से सुपर मुनाफा कमाना शुरू कर दिया. लेकिन देर सवेर वह छोटे पूंजीपतियों के पास पहुँच गयी. उन्हें उच्चतर तकनीक की आवश्यकता पड़ी. लेकिन जल्दी ही यह भी दूसरों के पास पहुँच गयी. इस क्रिया का परिणाम यह हुआ कि उत्पादन, बिना मजदूर के होने लगा. (हालाँकि, ऑटोमेटिड से ऑटोमेटिड मशीन के लिए व्यक्ति की आवश्यकता होगी, लेकिन इतना दिखाई दे ही रहा है कि मजदूरों की संख्या कम से कम की जा सकती है और उनके शोषण की दर में इंतिहा बढौतरी की जा सकती है जोकि की जा चुकी है और की जा रही है) अब पूंजीपति बिना मजदूर की मदद से (या उनकी न्यूनतम  संख्या से) उत्पादन कर रहे हैं. समस्या यह है कि,

पूंजीपति मंडी में जिंसों को बेचकर मुनाफा अर्जित करना चाहता है, लेकिन वहां  कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके पास क्रय करने के लिए धन हो, क्योंकि इसके लिए, धन तो मजदूरों के पास होना चाहिए था. लेकिन उन्हें कौन दे क्योंकि वे काम तो करते नहीं. मुट्ठीभर पूंजीपति और उनके पास विशाल उत्पादन ! हाँ वे स्वयं उपभोगता बनकर, एक दूसरे के उत्पादन का थोडा बहुत उपभोग कर सकते हैं, लेकिन यहाँ तो विज्ञान और तकनीक की मदद से चंद मजदूरों ने जो पैदा किया है, उसके लिए कम से कम आठ सौ करोड़ व्यक्तियों की आवश्यकता है और वे (पूंजीपति) हैं आठ करोड़. यही पूंजीवाद का संकट है, जो फूटता रहता है और उनके चाटुकार बुद्धिजीवी पूंजीपतियों को इसके अन्दर नहीं, बाहर अमूर्त चीजों में होने की ओर, इशारों द्वारा उन्हें भरमाते रहते हैं.

2008 से फूटी महामंदी वैसे ही  बरक़रार है और विकसित राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाएं डब्बल डिप्रेशन की और बढ़ रही हैं. भारत का मध्यम वर्ग खुश है कि यहाँ आठ प्रतिशत की विकास दर बनी हुई है (हालाँकि इस विकास से पैदा हुई भूख ने संकटों से घिरे नेपाल और पिछड़े पाकिस्तान को भी पीछे छोड़ दिए है – बकौल स्वतन्त्र एजेंसियों की ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार) लेकिन हमारे एक मिडिल क्लास बुद्धिजीवी इस विकास की दर से इतने आत्ममुग्ध हैं कि उनको विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का यह आकलन गलत लगता है कि यह दर केवल 2015 तक जारी रहने वाली है, उसके बाद धीमी गति से 2022 तक और बस उसके बाद तो घिसटेगा.

दिनेश भाई या उनकी ही तरह के मिडल क्लास के लोगों से हमारा आग्रह है कि मार्क्सवाद उनके लिए नहीं है क्योंकि मिडल क्लास चरित्र के लिहाज से बुर्जुआ विचारधारा की पैरोकार होती है, लेकिन बुर्जुआ वर्ग द्वारा पैदा की गयी होड़, उनकी छोटी सी पूंजी को हड़प कर लेती है, तो छटपटाता हुआ यह वर्ग, अपने कुछ रेडिकल प्रतिनिधियों द्वारा मार्क्सवाद से सहानुभूति की उम्मीद पाल लेता है.

इसके अलावा कुछ लोग अपनी उच्च बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी मार्क्सवाद की और खींचे चले आते हैं. ध्यान रहे, बौद्धिक क्षमता आसमान से पैदा नहीं होती, इसके ऐतिहासिक विकास, अध्ययन-चिंतन के लिए मेहनतकश वर्ग द्वारा मुहैया करवाई गयी अतिरिक्त मूल्य की लूट रही है. उनके ज्ञान और चिंतन का स्रोत भी श्रमिक वर्ग ही रहा है, जिसका कर्ज चुकाने की उनकी लालसा, उन्हें इधर खींच लाती है.

मगर मार्क्सवाद मिडल क्लास का नहीं, सर्वहारा वर्ग के कर्मों का विज्ञान है. इसका इतिहास कठमुल्लाओं का इतिहास नहीं है. अगर मिडल क्लास से आये लोगों ने,संजीदगी से, इसका चिन्तनं-मनन किया है तो वे निराश नहीं हुए हैं, बल्कि एक नए इन्सान के रूप में, उनका पुनर्जन्म ही हुआ है. स्वयं मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ इसके उदाहरण हैं. उन्होंने न केवल मजदूर वर्ग की मुक्ति के इस विज्ञान को अपनाया बल्कि मिडल क्लास के समाजवाद, नैतिकता और मूल्यों की गंदगी से इसकी हिफाजित के लिए संघर्ष किया.

दिनेश की समस्या यह है कि वे एक पैरे में मार्क्सवाद के इतिहास को समेट देना चाहते हैं. उनके इस पैरे की विषय-वस्तु को दो हिस्सों में  बांटा जा सकता है. एक मार्क्सवाद का समतावादी, गरीबी रहित सभी को अमीरी के ठाठ-बाठ मुहैया करवाने वाला ‘पंडोरा का डिब्बा’ और दूसरा इस पंडोरे के डिब्बे से निकला वह इतिहास जो रूस से शुरू होकर भारत के पश्चिम बंगाल और केरल तक का है. अंबानियों और टाटाओं के मुकाबले मिडल क्लास गरीब हो सकती और समाजवाद से सहानुभूति की उम्मीद पाल सकती है. फैशनेबुल तौर पर, मजदूर वर्ग के आंदोलनों के उभार के दौर में, वे धारा में खींचे चले आते हैं. यह ऐसे होते है जैसे आप अपने रिश्तेदार के घर जाएँ और उस घर के सदस्य अपने घर के निर्माण में व्यस्त हों. आपकी उनके घर से कोई दिलचस्पी न थी लेकिन उनके साथ आप भी खिंच लिए और लगे हाथ बंटाने. पर निर्माण कार्य पूरा होते ही, घरवाले घर में बसने लगे लेकिन आप फालतू करार दे दिए गए.

वैज्ञानिक समाजवाद सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद होता है जिसमें मिडल क्लास और उसके बुद्धिजीवियों के एक हिस्से को घुटन होने लगती है. अपने  वर्गीय दृष्टिकोण से पैदा हुए दिग्भ्रमण के कारण, उनका जल्दी ही मोहभंग हो जाता है. वे पुरानी  स्थिति को बहाल करने के लिए छटपटाने लगते हैं और कई बार उनकी कोशिश बुर्जुआजी की पुनर्बहाली के काम आती है, जैसा कि इतिहास में हुआ है.

फिर भी अगर दिनेश भाई जैसे लोग, संजीदगी से मार्क्सवाद को अपनाना चाहते हैं तो उन्हें इस ब्लॉग की और से सुझाव है कि वे मार्क्सवाद पर मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ आदि की रचनाये पढ़ें. इनसे उन्हें पता चलेगा कि कैसे मार्क्सवाद उन लोगों से जो गरीबी को इस तरह से मिटाकर… और सभी के लिए अमीरी की स्थिति की यूटोपिया बातें करते थे…टक्कर लेकर और विरोध में विकसित हुआ है. लाल झंडे का मतलब मार्क्सवाद नहीं होता. इसके इतिहास में वे सभी स्थितियां शामिल हैं जिन्हें संशोधनवाद, सिंडीकेट्वाद ,ट्रेड यूनियनवाद,अर्थवाद, मिडल क्लास का अवसरवाद,कम्युनिस्टों का उदारतावाद ,अतिवामपंथवाद , दुस्साहसवाद , दायें-बाएं भटकाव, सोवियत यूनियन और चीन की क्रांतियों के बाद हुए तीक्ष्ण वर्ग-संघर्ष और परिणामस्वरूप मजदूर वर्ग की लाल झंडे तले बुर्जुआ वर्ग से शिकस्त और समाजवाद (जिसके बारे में मिडल क्लास सोचती है कि यह कोई उनके चौखटे के अनुसार कोई पकी-पकाई स्थायी चीज हो, जिसकी कोई समस्या न हो) और इस समाजवाद से साम्यवाद में संक्रमण और सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद वगैरा, वगैरा. अगर आप को यह सब भारी-भारी लगता है, तो मुआफ कीजियेगा, यह सब आपके लिए नहीं है.

हम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजदूर वर्ग के संघर्षों की बदौलत बदली स्थितियों, विशेषरूप से, सोवियत यूनियन और चीन की क्रांतियों की प्राप्तियों और उनकी हार को स्वीकार करते हैं. सर्वहारा वर्ग द्वारा विकसित किये गए उसके नेताओं और बदले में इन नेताओं द्वारा सर्वहारा वर्ग की सेवा को तस्लीम करते हैं, भले ही, इन नेताओं द्वारा ऐसी गलतियाँ भी हुई हैं  जिनसे बचा जा सकता था. लेकिन उनकी गलतियाँ समाज विज्ञानियों की गलतियाँ थी जिनका होना स्वभाविक होता है लेकिन दोहराना बेवकूफी. जीत-हार की इस अमीर विरासत का मालिक सर्वहारा वर्ग है जो अच्छी तरह जनता है कि उसने इसका कैसे समाहार करना है.

हम साफ़ साफ़ बता देना चाहते हैं कि इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी से पूर्णतया भिन्न है. विश्व के पिछड़े से पिछड़े हिस्से में भी तत्व रूप से सामंतवाद गायब है और वह पूंजीवाद के पैंतरे के अनुसार गतिमान है. भारत के आदिवासी बहुल और पिछड़े अफगानिस्तान जैसे क्षेत्रों का वास्ता जागीरदारों से नहीं देशी-विदेशी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से है. विज्ञान और तकनीक के विकास में पूंजीवादी संबंध बेड़ियाँ बन गए हैं. उच्च वैज्ञानिक तकनीक के विकास ने सर्वहारा वर्ग की उत्पादन क्षमता में इंतहा बढौतरी की, लेकिन बुर्जुआजी ने श्रम सघनता को लागू किया है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, 1970 के दशक के बाद, पूंजीपतियों के पास एकत्रित होने वाली वित्तीय पूंजी की मात्रा में भी इंतहा बढौतरी हुई है, जिसके उत्पादन कार्य में लगने की संभावना निशेष हो चुकी है. लेकिन श्रमिक वर्ग की, इसके बिलकुल उल्ट, आमदनी में गिरावट आई है. पूंजीपतियों की समस्या यह है कि उनको उनकी  महत्त्वाकांक्षानुसार उपभोगता वर्ग नहीं मिल पा रहा. मिलेगा भी कैसे क्योंकि श्रमिक वर्ग द्वारा पैदा किये मूल्य का अधिकतर हिस्सा तो पूंजीपति वर्ग की जेब में सट्टेबाजी और जुआरी-जुगाड़ों में मशगूल है. हम राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों की नहीं, नयी समाजवादी क्रांतियों की पूर्वबेला में जी रहे हैं.

और अंत में मिडल क्लास के नौजवानों से  : आपके आदर्श अमेरिका और यूरोप ने तस्लीम कर लिया है कि नवउदारीकरण उनकी बेवकूफी थी. लेकिन हमारा मानना है कि यह सब नाटक है. नवउदारीकरण का अर्थ था कि पूंजीवादी खुल्ले मुकाबले में श्रमिक-वर्ग की रगों से खून के अंतिम कतरे को निचोड़ लेना. लेकिन पूंजीवाद के आन्तरिक विरोधाभास होते है, जिन्हें उनके बुद्धिजीवी बाहर तलाशते रहते हैं और मुसीबत पड़ने पर राज्य जो उनका सच्चा सेवादार है, से लोगों की बचतों पर डाका डालने के लिए, बैलआउट मांगते हुए बिलकुल नहीं शर्माते. उनकी खुले मुकाबले की श्रेष्टता का भंडाफोड़ हो जाता है.

भारत जैसी ही चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका आदि अर्थव्यवस्थाओं के में जी रहे  मिडल क्लास के गगनविहारियों के पास 2022 तक ऊँची उड़ान भरने का मौका है. हालाँकि उनके अधिकतर हिस्से को सर्वहारा वर्ग में तब्दील होते हुए देखा जा सकेगा. हमारी इस पीड़ा से लुत्फ़ उठाने का कोई मंशा नहीं है लेकिन आपसे प्रार्थना है कि आप चीजों को गति में देखने की आदत डालें. मार्क्सवाद वैसा सुहावना नहीं है, जिसका जिक्र दिनेश जी ने किया है. बल्कि इसके विपरीत कहीं अधिक पीड़ादायक है. लेकिन ये शब्द ‘सुहावना’ और ‘पीड़ादायक’ रिलेटिव हैं. इनके अर्थ बुर्जुआ वर्ग, मिडल क्लास और सर्वहारा के लिए न केवल अलग-अलग होते हैं बल्कि कई अवस्थाओं में विपरीत भी होते हैं.

उनको डर है कि कहीं उनकी मौत का कारण मिलावटी दूध न हो

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बात एक फिकरे में की जाये तो बुद्धिजीवी मिलावटी दूध पीने से मरेंगे नहीं. वैसे बुद्धिजीवी लफ्ज भी कोई ऐसा लफ्ज नहीं है जो, वर्गों में बँटे समाज में, कोई सेक्युलर सी चीज हो.  अगर हमारे प्रथम वाक्य की सच्चाई पर आपको शक हो रहा है, तो सुनो ! बुद्धिजीवी मरता है परजीवियों की सेवा करते हुए या फिर मेहनतकशों की. मिलावटी चीजे खाने से होनेवाली मृत्यु , मृत्यु होती ही नहीं. होता तो बस इतना है कि लूटेर वर्ग की सेवा में हाजिर बुर्जुआ वर्ग का बुद्धिजीवी जो कई साल पहले मर चुका होता है, कब्र में आराम फरमाता है.

एक बुद्धिजीवी वर्ग है जिसने एक नयी चीज ईजाद कर डाली है. वह बुद्धिजीवी जरा परमहंस टाईप का है जो पूंजीपतियों और मजदूरों के बुद्धिजीवियों से ऊपर होने के कारण ‘मुक्त चिन्तनं’ रुपी ‘दंड प्राणायाम’ द्वारा तंदरूस्त रहता है. बहरहाल अगर ऐसा बुद्धिजीवी है तो इस प्रकार के कठिन ‘योगासन्न’ करनेवाले बुद्धिजीवी की प्रतिरोधक क्षमता के मुकाबले बाबा रामदेव के योगासनं की बिसात ही क्या है ! ‘बढती उम्र के साथ सुरक्षित संभोग’ के नुस्खों-टोटकों की मदद से ‘500 वर्षों तक कैसे जीयें’ – इतना कुछ तो कोई भी ‘योगस्वामी  समझा देगा. मगर हमारे ‘परमहंस टाईप’ और ‘मुक्त चिन्तक’ बुद्धिजीवी ‘मुक्त चिन्तनं’ रुपी ‘दंडप्राणायाम’ द्वारा ‘एक्सरसाईज’ करते हैं, जिससे इन 500 वर्षों के जीवन की सार्थकता खोजने पर ‘चिन्तनं’ से जो ‘सागर मंथन’ होता है, उसके  परिणामस्वरूप ‘अमृतपान’ से, वे अमर हो गए हैं. सो मिलावटी दूध पीकर मरने से तो दूर हैं वे.

बात अगर ‘सागर मंथन’ की चली है तो थोडा इस पर भी. ब्रह्मा की दिति और अदिति पत्नियों से पैदा हुए देव और दानव भाईयों ने ‘पौराणिक काल’ में ‘सागर मंथन’ किया था. शेषनाग की रस्सी बनायीं गयी थी जिसके खतरेवाले – यानिकी मुख की ओर के सिरे पर दानव थे. ‘रक्तबीज’ नामक दानव ‘अमृत’ ले उड़ा था और देवतायों ने उसे काटकाटकर मारना शुरू कर दिया. मगर ‘रक्तबीज’ का रक्त जहाँ-जहाँ गिरता गया, और रक्तबीज पैदा होते गये. मौका देखकर, उस वक्त की सियानिसियास्त ने, रक्तपात बंद करवा दिया था.

भारत में मोटापा परजीवी वर्ग के लिए चिंतनीय है तो अमेरिका में बुर्जुआ वर्ग, हमारी धरती के  मुक्त चिंतकों की मेहनत के सदके, इससे मुक्त हो रहा है. मगर वहाँ का सर्वहारा वर्ग अब भी बहुसंख्यक है. वह जंक फ़ूड’ खाने को अभिशप्त है और  मोटापे का शिकार बनता जा रहा है. खैर, हमारा यहाँ का स्थानीय ‘मुक्त चिन्तक’ स्थानीय बुर्जुआ वर्ग की चेतना में इतना इजाफा तो कर ही देगा कि वे थोडा सा और अधिक सियाने हो जाएँ. सियाने होने की देर है, वे सभी भौतिक पदार्थ जैसे ‘ओरगेनिक फ़ूड’ तो पहले से ही, उनकी सेवा में हाजिर होने के लिए, और  हमारे सर्वहारा वर्ग के हाथों से निकलने के लिए छटपटा रहे हैं ?

उत्पादन प्रक्रिया रूपी वर्तमान ‘सागर मंथन’ के उस सिरे पर जहाँ शेषनाग का सिर है, सर्वहारा लगा हुआ है. उत्पादन रूपी अमृत के बड़े हिस्से का रस्सावदान परजीवी पूंजीपति और उनके चाटुकार कर रहें हैं. मगर मुक्त चिंतको की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वे ‘रक्तबीज’ नहीं है. अलबता इस ब्लॉग की ओर से मुक्त चिंतकों को इस फिकरे के साथ शुभकामनाएं  – “तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हो पचास हजार” ?

तथाकथित मुख्य धारा की संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियों के 99 फीसदी से भी अधिक ‘बुद्धिजीवी’ कम्युनिस्ट काडर ने मार्क्स की पूंजी पढ़ी ही नहीं. और जनाब सोचते हैं कि मजदूर और किसान के शोषण का स्थान मंडी है.

हमारे एक  पुराने कामरेड अनाज मंडी या लेबर चौक में किसानों के लिए अधिक भाव और मजदूरों की मजदूरी में बढौतरी (पूंजीवाद की चौहदी के भीतर की लड़ाई) के लिए कवायद में मशगूल रहते हैं. हालाँकि हमारे विश्लेषण का ऐसा कोई अति वामपंथी ‘वर्ज़न’ नहीं है कि इस प्रकार का कोई संघर्ष न हो. हम तो इतना कहना चाहते हैं कि पूंजीवाद द्वारा विकसित आधुनिक मंडी ऐसा स्थान है जहाँ ‘कमोडिटी’ के रूप में उपलब्ध श्रम-शक्ति और किसानों के अनाज का मूल्याँकन सही और वैज्ञानिक तरीके से होता है. जहाँ धोखाधड़ी की गुंजाईश ‘वर्चुयली’ शून्य होती है. सो इन बुद्धिजीवियों का चिंतन कोई घबराहट पैदा नहीं करता, ‘पूंजी’ लिखने के बाद मार्क्स के लिए विश्व के बुद्धिजीवियों को संबोधित करना कोई बड़ी समस्या नहीं थी. सो उन्होंने कह दिया कि अगर आपमें से कोई भी ईमानदारी से मेरे ‘पूंजी’ लिखने के प्रोजेक्ट पर लगा होता, तो वही नतीजे निकलते जो मेरी पुस्तक में निकले हैं. मगर हमारा यह 99 फीसदी तथाकथित मार्क्सवादी काडर अनुभववादी होने के कारण क्लासिकीय मार्क्सवादी पुस्तकों को ‘आस पडौस’ पर रोब झाड़ने के लिए रखता है. सिद्धांत और अनुभव में क्या फर्क होता है, भाड़ में जाये ये सब !

और अंत में, फ्रेडरिक एंगेल्स के ये शब्द : ” हर चीज तर्क के सिंहांसन के संमुख अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करती है या  अस्तित्व त्याग देती है .

एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

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लिंक जोड़ने के लिए देखें —  ‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

मार्क्सवाद और देश दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि पूंजीवाद अपने जन्म से ही लंगड़ा-लूला पैदा हुआ है और उसे मेहनतकश अवाम ने न केवल चुनौतीपूर्ण टक्कर ही दी है, बल्कि बीसवीं सदी में बुर्जुआ वर्ग से सत्ता छीनकर सोवियत यूनियन और चीन में महान समाजवादी तजुर्बे भी किये हैं. हालाँकि अपने इन प्रारंभिक तजुर्बों में मेहनतकश वर्ग ,वक्ती तौर पर, हार गया है और सोवियत यूनियन और यहाँ तक की चीन की वर्तमान संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडे तले पूंजीपति वर्ग ने अपनी सत्ता को स्थापित कर लिया है. डॉ. झुनझुनवाला [ देखें — वामपंथ की सैद्धांतिक भूल ] बंगाल में सत्तासीन रही संशोधनवादी पार्टी की हार का ज़िक्र करते हैं और मार्क्सवाद की थ्योरी को त्रुटिपूर्ण होने का फ़तवा सुना देते हैं, बिना यह जाने कि मार्क्सवाद कोई कठमुल्ला उपदेशात्मक शास्त्र नहीं है, बल्कि वर्गीय समाज के संघर्ष में, ऐसा समाज शास्त्र है जो सर्वहारा पक्षावलम्बी है. मार्क्सवाद ने अपने संघर्ष के दौरान न केवल पूंजीपति वर्ग से टक्कर ली है बल्कि लाल झंडे के तले अराजकतावाद, आतंकवाद, अर्थवाद, ट्रेड-यूनियनवाद आदि संशोधनवाद, जो मार्क्सवाद को इतना पतला और कमजोर कर देना चाहता है ताकि यह पूंजीपति वर्ग की सत्ता को चुनौती न देकर उसकी सेवा में हाज़िर हो और अपने संसदमार्गी कृत्यों से मजदूर वर्ग के आक्रोश पर ठन्डे पानी के छींटे मारकर उनकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करता रहे, केखिलाफ भी संघर्ष किया है.

अपने इस आलेख में, डॉ. झुनझुनवाला इस प्रकार के निष्कर्ष निकालते हैं जैसे,  ‘मार्क्सवादी बाजार विरोधी है जबकि बाज़ार सभी को उनकी क्षमतानुसार काम करने के अवसर प्रदान करता है’. बाज़ार का महिमामंडन करते हुए वे लिखते हैं,
“हम देखते हैं कि आर्टिस्ट को पेंटिंग बनाने में ही मजा आता है। पेंटिंग बिक गई, इतनी ही जानकारी उसके लिए पर्याप्त होती है। किसान गेहूं का उत्पादन करके प्रफुल्लित होता है, यद्यपि उसे पता नहीं होता कि रोटी कौन खाएगा। श्रमिक को यदि उसके स्वभाव के अनुकूल काम मिल जाए तो वह सुखी होता है। आर्टिस्ट को हल चलाने में लगा दिया जाए तो वह दुखी होगा और किसान को पेंटिंग करने के लिए ब्रश थमा दी जाए तो वह भी दुखी होगा। विशेष यह कि व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य ढूंढने में बाजार से मदद मिलती है। श्रमिक मन चाहा कार्य पकड़ सकता है। इसलिए मूल रूप से बाजार सुखदायी है।

डॉ. झुनझुनवाला जी, किसान, श्रमिक, और आर्टिस्ट जन्म से पैदा नहीं होते. व्यक्ति का मनपसंद कार्य वह नहीं होता जो वह कर रहा होता है. वर्गीय समाज का विकास इसका मुख्य निर्धारक होता और व्यक्ति की इच्छा गौण. मोटे तौर पर वर्गीय समाज आदिम साम्यवाद से लेकर मालिक-गुलाम, सामंत-किसान और अब पूंजीपति-मजदूर — चार चरणों से होकर गुजरा है . यह सब किसी एक व्यक्ति के चाहने या न चाहने से नहीं हुआ. वर्ग-संघर्ष इसका वस्तुगत चरित्र रहा है.बाजार भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से पैदा हुआ है. चूँकि पूंजीपति वर्ग और  समाज के अस्तित्व के लिए बाज़ार जरूरी है, इसलिए इसका महिमामंडन भी जरूरी है, जोकि आप बाखूबी कर रहे हैं. आपका यह “मूल रूप से बाजार” श्रमिक – जिसके पास अपनी श्रम-शक्ति बेचने के सिवा और कुछ नहीं होता – को नहीं, आपको सुखदायी लगता है।

हमारा यह मानना है कि मार्क्सवाद बाज़ार विरोधी है लेकिन उस प्रकार से नहीं जिस प्रकार डॉ. झुनझुनवाला पेश करते हैं. अपने सारे आलेख में वे ,बड़ी चालाकी के साथ, मार्क्स के मूल्य के श्रम-सिद्धांत का ज़िक्र तक नहीं करते और मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ सिद्ध कर देते हैं. यही वह बाज़ार होता है जहाँ श्रम-शक्ति पण्य (कमोडिटी) के रूप में बिकती है और अपनी विशिष्टता ( श्रम-शक्ति अकेली ऐसी पण्य है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है) के कारण अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है जिसमें से पूंजीपति वर्ग न केवल अपना मुनाफा वसूलता है बल्कि उसकी सेवा में हाज़िर राज्य और उसकी संस्थाओं के खर्च भी निकलते हैं. अपनी विशेष हैसियत के कारण, पूंजीवादी उत्पादन क्रिया से लूटे गये अतिरिक्त मूल्य पर हक़ का पहला दावेदार पूंजीपति वर्ग होता है. यही कारण है कि इस वर्ग की खुशामद द्वारा बुर्जुआ वर्ग का  बुद्धिजीवी (ध्यान रहे बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा संकल्प नहीं है जिसकी अवस्थिति वर्ग-हितों से ऊपर हो ) चंद हड्डियों की अपेक्षा पाले रहता है. ऐसा नहीं है कि एक संशोधनवादी, संसदमार्गी  और मजदूर वर्ग में अर्थवाद द्वारा उसकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करनेवाली माकपा ‘स्टाईल मा‌र्क्सवादियों की पार्टी’ की हार से डॉ. झुनझुनवाला को मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ दिखाई देने लगी हों और वे बड़ी ईमानदारी से मार्क्सवाद पर चिन्तन-मनन करने लगे हों. कारण उनकी पूंजीवादी वर्ग-स्थिति है और वे माकपा जैसी संशोधनवादी पार्टी की हार से व्याकुल इसलिए हैं कि कहीं मजदूरों की, इन संशोधनवादी पार्टियों के प्रति, आस्था न डगमगा जाये और वे, विकल्प के तौर पर, अपनी सच्ची कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण न कर लें.

मार्क्स ने पूंजीवादी समाज की विशेषताओं में से एक – श्रम के अलगाव का ज़िक्र किया है. अकेला मजदूर वर्ग ही सक्षम है जो पूंजीपति वर्ग से संघर्ष द्वारा – वर्गीय समाज को ख़त्म करने की प्रक्रिया द्वारा – इस मर्ज़ का इलाज करेगा. इसलिए मार्क्सवाद की अवस्थिति वर्तमान और भविष्य में है. लेकिन डॉ. झुनझुनवाला मार्क्स को उस ग्रामीण परिवेश में भेज देते हैं, जहाँ  “गाँव का व्यक्ति किसान के लिए हल बनाता है …वह उसमें अपने प्राण आहूत करता है। उसके सामने ही किसान उसका उपयोग करता है, जिसे देखकर दोनों का मन लहलहाता है।” पता नहीं किस युग में और कैसे किसान जोकि  सामंतो द्वारा शोषित रहा है अपनी उस वक्त की मेहनतकश की स्थिति पर प्रफुल्लित होता रहा है ? ‘अह़ा ग्राम्य जीवन’ का ‘नोस्तालजिया’ मार्क्स का नहीं डॉ. झुनझुनवाला का है जिन्होंने बीते का रुदन करनेवाले कवियों से इसका महिमा मंडन सुन रखा है   वे भूल जाते हैं कि मार्क्स की रचनाओं के तीन स्रोत और तीन अंग उस वक्त के विकसित पूंजीवाद के तीन देशों – दर्शन के लिए जर्मनी, अर्थशास्त्र के लिए इंग्लैण्ड और क्रांतियों व समाजवाद के लिए फ़्रांस – से लिए गए हैं. अब तो सारा विश्व पूंजीवाद के नियमों के अनुसार गतिमान है और कृषि में भी किसान बैलों के पीछे-पीछे हल पकडे नहीं भटकता बल्कि कृषि संबंधी उत्पादन में उसके श्रम की भूमिका गौण हो गयी है और मजदूर वर्ग ही वहाँ उत्पादन क्रिया में मुख्य रूप से सक्रीय है.  कृषि उत्पादन में पूंजीवादी संबंधों की मुकम्मल स्थापना ने छोटे किसानों की तबाही निश्चित कर दी है और वे मजदूर वर्ग की अवस्थिति और दृष्टिकोण अपनाने को बाध्य होते जा रहे हैं. भविष्य में उनका बड़ा हिस्सा मजदूरों द्वारा संपन्न की जानेवाली इक्कीसवीं सदी की नई समाजवादी क्रांतियों के लिए अहम भूमिका अदा करेगा.

डॉ. झुनझुनवाला  लिखते हैं, “एक प्रमुख अखबार ने लिखा है कि वामपंथी विचारधारा तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक देश में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहेगी। यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित है.”

यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित हो सकता है लेकिन एक मार्क्सवादी के लिए नहीं. मार्क्सवाद की विशिष्टता है कि इसने इस वस्तुगत सच्चाई की निशानदेही की है जिसमें, पूंजीवाद ने अपनी विकास प्रक्रिया के दौरान, समाजके एक छोर पर अकूत धन-दौलत और दूसरे सिरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया है. गरीबी,  बीमारी और असमानता जैसी अलामतें इसके जरूरी बाई-प्रोडक्ट हैं. मार्क्सवाद ने एक और कटु सत्य इंगित किया है जो पूंजीपतियों और उनके डॉ झुनझुनवाला जैसे बुद्धिजीविओं को सताता रहता है. पूंजीवाद द्वारा पैदा किये गए कंगाली के इस विशाल समुद्र के सापेक्ष पूंजीपतियों की खुशहाली की चंद मीनारों की औकात अल्पसंख्यक और कमजोर की है जो  कभी भी भरभराकर गिर सकती हैं. मार्क्सवादी विचारधारा की प्रासंगिगता, केवल देश या दुनिया में, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहने तक ही नहीं है बल्कि यह प्रासंगिक रहेगा तब तक, जब तक, वर्गीय समाज का अस्तित्व रहेगा. केवल वर्गविहीन समाज में इसका स्थान म्यूजियम में होगा.

वे अपनी कलम मजदूर वर्ग की तानाशाही पर चलाते हुए मध्यम वर्ग में इस बुर्जुआ लोकतंत्र के भ्रम को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. हो सकता है कि पढेलिखे मध्यम वर्ग के एक हिस्से की, इस बुर्जुआ लोकतंत्र में भारी आस्था हो, लेकिन मजदूर वर्ग इस बात को भली-भांति समझता है कि यह लोकतंत्र बुर्जुआ वर्ग का, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतंत्र है. मजदूर वर्ग के लिए यह तानाशाही ही है. किसी भी वर्गीय समाज में ऐसा लोकतंत्र नहीं हो सकता जो सर्वमान्य हो और न ही सर्वहारा वर्ग, जब वह सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, बुर्जुआ वर्ग और उसके पैरोकारों को लोकतान्त्रिक हक़ देने की छूट दे सकता है, क्योंकि इसका अर्थ होगा – पूंजीवाद की पुनर्स्थापना.

अपने आलेख के अंत में, वे वामपंथ को सैद्धांतिक संजीवनी की घुट्टी पिलाते हुए  और “थ्योरी का  नवीनीकरण” करने की सलाह देते हुए “बाजार का बहिष्कार करने के स्थान पर बाजार पर लगाम लगाने” और ” सरकारी तंत्र के विस्तार के स्थान पर ऐसी पालिसी की मांग” जो  “हल्के सरकारी तंत्र से भारी जनहित हासिल करे” जैसी चलताऊ बातों करके खुश हो लेते हैं, जैसेकि उन्होंने अपने इस आलेख में मार्क्सवाद की ऐसी की तैसी कर दी हो. उनके हलके सरकारी तंत्र और जनतंत्र पर मार्क्सवाद का कहना है कि जब मजदूर वर्ग समाजवाद के संक्रमण काल में बुर्जुआ वर्ग का नामोनिशान मिटा देगा तो उसे किसी भी तरह के -हलके या भारी तंत्र – की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय

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प्रारंभिक कार्य

कार्ल मार्क्स को जिस बौद्धिक वातावरण में काम करना पड़ा, उस पर हेगेल के विचारों का वर्चस्व था. हेगेल के विचारों की प्रतिक्रिया में ‘यंग हेगेलियन’ नामक युवकों का समूह हेगेल के विचारों के रुढ़िवादी आशय को नकारता था. इन चिंतकों में से सबसे प्रसिद्ध लुडविग फायरबाख थे, जिन्होंने हेगेल के विचारवाद को रूपांतरित करने की कोशिश की और इस प्रकार हेगेल के धर्म और राज्य के सिद्धांत की आलोचना प्रस्तुत की. १८४० के दशक की शुरुआत में मार्क्स द्वारा लिखित दार्शनिक साहित्य का बड़ा भाग हेगेल, फायरबाख और अन्य ‘यंग हेगेलियन’ के कार्यों के खिलाफ अपनी स्वयं की स्थिति को रखने का रिकार्ड है.

यहूदियों के सवाल पर

इस रचना में मार्क्स अपने और अपने उदारवादी ‘यंग हेगेलियन’ साथियों – विशेषतया, ब्रुनो बायर के बीच की दूरी को स्पष्ट करते हैं. एक नास्तिक के नजरिये से, बायर ने अभी-अभी यहूदियों की स्वतंत्रता के विरुद्ध लिखा था. उनके अनुसार यहूदियों और ईसाईयों, दोनों का धर्म उनकी मुक्ति में सबसे बड़ा बाधक है. प्रत्युत्तर में मार्क्स , ‘राजनीतिक मुक्ति के सवाल की विलक्षणता’ – आवश्यक रूप से उदार अधिकारों और स्वतंत्रता का अनुदान और मानव मुक्ति के बीच फर्क को दिखाते हुए अपने सर्वाधिक तर्कों में एक का इस्तेमाल करते हैं. मार्क्स बायर को उत्तर देते हुए कहते हैं कि धर्म की सतत व्यापकता के तहत भी राजनीतिक स्वतंत्रता पूर्ण रूप से संभव है जिसका समकालीन उदाहरण संयुक्त राज्य प्रदर्शित करते हैं. लेकिन उदारवाद के अनगिनत आलोचकों द्वारा पुन: स्थापित तर्क की गहराई तक जाते हुए मार्क्स का कहना है कि मानव मुक्ति के लिए राजनीतिक मुक्ति न केवल अप्रयाप्त है बल्कि , यह किसी हद तक, उसकी स्वतंत्रता में रूकावट का ही काम करती है. न्याय के उदारवादी अधिकार और विचार इस विचार पर खड़े हैं कि हम में से प्रत्येक अन्य व्यक्तियों से सुरक्षा चाहता है. इस प्रकार, उदारवादी अधिकार अलगाव के अधिकार हैं, जिन्हें इस प्रकार डिज़ाईन किया जाता है कि वे हमें इस प्रकार वर्णित खतरों से संरक्षण प्रदान करें. इस दृष्टिकोण पर आधारित स्वतंत्रता किसी भी प्रकार की दखलंदाजी से स्वतंत्रता है. यह दृष्टिकोण जिस वस्तु को छोड़ देता है, मार्क्स के लिए वही संभावना बन जाती है – तथ्य की इस रौशनी में कि वास्तविक स्वतंत्रता को, सकारात्मक रूप से, हमारे अन्य व्यक्तियों के साथ संबंधों में ढूंढा जाना है. इस मानव समाज में ढूंढा और खोजा जाना है न कि एकांगी रूप में. इस प्रकार, अधिकारों के राज्य की जिद, हमें उत्साहित करती है कि हम उन्हें इस प्रकार देखें कि मानव मुक्ति में निहित वास्तविक मुक्ति की संभावना धुंधली पड़ जाये. अब हमें साफ़ तौर पर समझ आ जाना चाहिए कि मार्क्स राजनीतिक स्वतन्त्र के विरुद्ध नहीं हैं क्योंकि वे समझ रहे होते हैं कि उदारवाद उसके समय की जर्मनी में मौजूद पूर्वाग्रहों और पक्षपात से भरपूर प्रणालियों में एक बड़े सुधार  का ही काम कर रहा होता है. यद्यपि, इस प्रकार के राजनीतिक रूप से स्वतन्त्र उदारवाद को मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता के रास्ते को पार करना होगा. दुर्भाग्य से, मार्क्स यह नहीं बताते कि मानव स्वतंत्रता क्या है लेकिन यह साफ़ है कि इसका गहरा संबंध अलगाव से मुक्त श्रम के विचार से है, जिसका जिक्र हम आगे करेंगे.

A Contribution to the Critique of Hegel’s Philosophy of Right

Introduction

अपनी इस रचना में मार्क्स धर्म को अफीम कहते हैं और इसी रचना में वे अपने धर्म संबंधी विचारों का सविस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं. इस रचना में वे विचार करते हैं कि किस तरह जर्मनी में क्रांति का सवाल हल हो सकता है और सर्वहारा वर्ग द्वारा सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति के लिए अदा की जानेवाली भूमिका से अवगत करवाते हैं.

धर्म के संबंध में, मार्क्स धर्मशास्त्र के विरुद्ध फायरबाख के उस दावे को स्वीकार करते हैं जिसमें उनका कहना है कि मानव ने अपने ही रूप के अनुसार भगवान के रूप को गढ़ा है. फायरबाख की विलक्षण देन इस तर्क में थी कि परमात्मा की पूजा मानव को अपनी स्वयं की शक्तियों से पूरा लाभ उठाने से वंचित कर देती हैं. फायरबाख की इस देन को ज्यादातर स्वीकार करते हुए मार्क्स फायरबाख की इस कमी की और इशारा करते हैं कि वे इस बात को समझने में असमर्थ हैं कि लोग क्यों धार्मिक अलगाव का शिकार हो जाते हैं और किस प्रकार वे इससे पार जा सकते हैं. मार्क्स की व्याख्या है कि धर्म भौतिक संसार में अलगाव का ही परिणाम है और इसे तब तक ख़त्म नहीं किया जा सकता जब तक इस भौतिक संसार में मौजूद अलगाव को समाप्त नहीं किया जाता. संक्षिप्त में उस भौतिक जीवन का वर्णन स्पष्टता से नहीं किया गया है जो इस अलगाव को पैदा करता है. यद्यपि, ऐसा लगता है कि अलगाव के दो पहलू जिम्मेदार हैं. एक तो श्रम का अलगाव है जिसका जिक्र अभी किया जायेगा. दूसरा, मानव जाति की अपने सामुदायिक तत्व के प्रति अभिव्यक्ति. चाहे हम इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार करें या न करें लेकिन मानव जाति समुदाय के रूप में अस्तित्व में होती है और जो मानव जीवन को संभव बनाता है वह है – हम सभी को अपनी आगोश में समेटा हुआ मजबूत सामाजिक और आर्थिक नेटवर्क जिस पर हमारी परस्पर निर्भरता कायम होती है. इस संबंध में, मार्क्स के विचार इस प्रकार दीखते हैं कि हमें अपनी संस्थाओं में सामुदायिक अस्तित्व को स्वीकृति देनी चाहिए. शुरू से ही, धर्म ने अपनी कुटिलता से इस बात को समझ लिया था और उसने एक मिथ्यावादी सामुदायिकता के विचार को पैदा किया जिसमें सभी लोग भगवान की नज़र में समान होते हैं. सुधार उपरांत विखंडन के बाद, जब धर्म समानता के भ्रम को फैलाने के अयोग्य हो जाता है, राज्य इस आवश्यकता की पूर्ति नागरिकों के समुदाय का भ्रम, जिसमें सभी लोग कानून के सम्मुख समान होते हैं, पैदा करके करता है.  परंतू राज्य और धर्म दोनों से उस वक्त पार जाया जा सकेगा जब सामाजिक और आर्थिक समानता का सच्चा समुदाय अस्तित्व में आ जायेगा.

निसंदेह, हमारे सामने यह प्रश्न है कि किस प्रकार इस तरह के समाज का निर्माण संभव हो सकता है. फायरबाख पर अपने तीसरे सिद्धांत की रौशनी में मार्क्स का अध्ययन दिलचस्प होगा जिसमें वे वैकल्पिक सिद्धांत की आलोचना करते हैं. रॉबर्ट ओवेन और अन्य लोगों का बेडौल भौतिकवाद मानता है कि मानव जाति के भाग्य की निर्धारक उसकी भौतिक परिस्थितियां होती हैं और इसलिए, एक मुक्त समाज के लिए यह जरूरी और प्रयाप्त है कि उन भौतिक परिस्थितियों को सही रूप से बदला जाये. लेकिन सवाल पैदा होता है कि कैसे? ओवेन जैसे प्रबुद्ध परोपकारी द्वारा, जो कि अपने चमत्कार से इन भौतिक परिस्थितियों के निर्धारण को तोड़ देगा जो प्रत्येक को जकड़े हुए है ? मार्क्स का  प्रत्युत्तर है कि सर्वहारा अपने स्वयं के रूपांतरण की क्रिया के दौरान ही इसे तोड़ सकेगा. वास्तव में, अगर सर्वहारा लोग स्वयं के लिए क्रांति नहीं करते हैं (निसंदेह, दार्शनिकों के मार्गदर्शन में ) वे इसे हासिल करने के योग्य नहीं हो सकेंगे.

Economic and Philosophical Manuscripts

इस पुस्तक में कई दिलचस्प विषय हैं जिसमें प्रमुख रूप से निजी संम्पत्ति, कम्युनिज्म, धन और हेगेल की आलोचना शामिल है. यद्यपि, इस रचना में श्रम का अलगाव ही केंद्र में है. यहाँ मार्क्स पूंजीवाद में मजदूर की चार तरह के श्रम के अलगाव से पैदा हुई पीड़ा का जिक्र करते हैं. सबसे पहले उत्पाद से पैदा हुई पीड़ा, जिसे उसी वक्त इसके उत्पादक (मजदूर) से छीन लिया जाता है जब यह उत्पादित हो जाता है. दूसरे, उत्पादन क्रिया (काम) से, जिसे सजा के रूप में अनुभव किया जाता है. तीसरे, मानव जाति के चरित्रानुसार, क्योंकि मनुष्य अंधाधुंध उत्पादन करते हैं न कि अपनी सही मानवीय क्षमताओं के अनुसार. अंत में, अन्य मनुष्यों से, जहाँ विनिमय का संबंध परस्पर आवश्यकता को प्रतिस्थापित कर देता है. इन प्रवर्गों का एक दूसरे में गढ़मढ़ होना हमें आश्चर्यचकित नहीं करता क्योंकि इन रचनाओं में हम मार्क्स  की बेमिसाल खोज-प्रणाली संबंधी आकांक्षा से रूबरू होते हैं. आवश्यक रूप से, वे अर्थशास्त्र में प्रवर्गों के हेगेलियन निगमन को लागू करने का प्रयत्न करते हैं. उनकी कोशिश इस तथ्य को प्रदर्शित करने की होती है कि बुर्जुआ अर्थशास्त्र के सभी प्रवर्ग – मजदूरी, लगान, विनिमय,मुनाफा इत्यादि अंतिम रूप में,अलगाव की अवधारणा के विश्लेषण से ही निकलते हैं. परिणामस्वरूप श्रम के अलगाव का प्रत्येक प्रवर्ग अपने पूर्वक प्रवर्ग से ही निगमन करता है. यदपि  मार्क्स श्रम के अलगाव से पैदा हुए इन प्रवर्गों के निगमन के सिवा और अधिक कुछ नहीं कहते. यह बिलकुल संभव है कि अपने लेखन कार्य की क्रिया के दौरान मार्क्स ने अर्थशास्त्र संबंधी मसलों से निपटने के लिए एक अलग तरीके-प्रणाली की जरूरत को महसूस किया हो. तथापि, हमें श्रम के अलगाव के स्वभाव संबंधी एक बेमिसाल पठन सामग्री प्राप्त होती है. अलगाव से मुक्ति का विचार नकारात्मक से निकालना पड़ता है.  अंत में जेम्स मिल पर पठन सामग्री की सहायता से, जिसमें अलगाव से मुक्त श्रम का, संक्षिप्त में उन शर्तों पर, वर्णन किया गया है कि अपनी शक्तियों के सत्यापन के रूप में उत्पादन से उत्पादक की तुरंत तुष्टि के साथ-साथ उत्पादन अन्य लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है जिससे, दोनों पार्टियों के लिए हमारी परस्पर निर्भरता के रूप में, मानवीय सार का सत्यापन हो जाता है. मानव जाति के सार के दोनों पहलू स्पष्ट हो जाते हैं : हमारी निजी मानव शक्तियां और समुदाय के रूप में एक-दूसरे पर निर्भरता.

इसे समझना महत्वपूर्ण होगा कि मार्क्स के लिए अलगाव कोई मनोगत भावना नहीं है. विमुख व्यक्ति विमुख शक्तियों के हाथों की कठपुतली है – यदपि, ये विमुख शक्तियां भी मानव के कर्मों का ही उत्पाद हैं. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में हम ऐसे फैसले लेते हैं जिनके अनचाहे परिणाम निकलते हैं और जो बाद में चलकर, मिश्रित रूप से, बड़े पैमाने की सामाजिक शक्तियां बन जाती हैं जिनके पूर्ण अधोषित परिणाम होते हैं. मार्क्स की नज़र में, पूंजीवाद की संस्थाएं – जो मानव व्यवहार का ही परिणाम हैं -हमारे भविष्य संबंधी व्यवहार को आकार देने के लिए वापस आ जाती हैं और इस प्रकार निर्धारक का कार्य करती हैं. उदाहरण के लिए, जब तक पूंजीपति की इच्छा व्यवसाय में बने रहने की होती है, उसके लिए जरूरी होता है कि वह कानूनी सीमा तक अपने मजदूरों का शोषण करे. बेशक वह अपराध बोध से भी लबरेज़ हो जाये लेकिन पूंजीपति को निर्दयी शोषक के रूप में जीना पड़ता है. इस प्रकार मजदूर को उपलब्ध कार्य में से सबसे बढ़िया का चुनाव करना होता है, इसके अलावा कोई अन्य तर्कसंगत विकल्प नहीं होता. परंतू इस क्रिया को दुहराते समय हम उसी संरचना को सुदृढ़ करते जाते हैं जो हमारा दमन करती है. इस स्थिति से पार जाने की इच्छा और हमारे भाग्य पर सामूहिक नियन्त्रण प्राप्त कर लेना – अभ्यास में चाहे इसका कुछ भी अर्थ हो, मार्क्स के सामाजिक विश्लेषण में निहित आवश्यक तत्वों में से एक है.

‘Theses on Feuerbach’

मार्क्स की सबसे प्रसिद्ध और विस्मरणीय उक्तियों में से एक, “दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है. “, इसी पुस्तक से ली गयी है.  इस पुस्तक में सम्मलित  ग्यारह सिद्धांतों में से अधिकतर का ऊपर पहले ही वर्णन किया जा चुका है. (उदाहरण के लिए धर्म संबंधी सिद्धांतो ४, ६ और ७ और क्रांति संबंधी सिद्धांत ३ का ) इसलिए हम सिद्धांत १ तक सीमित रहेंगे जो की स्पष्ट रूप से दार्शनिक सिद्धांत है.

अपने पहले सिद्धांत में मार्क्स ‘अब तक के आर्विभूत अस्तित्व’ के भौतिकवाद और विचारवाद के प्रति अपनी आपत्ति दर्ज करवाते हैं. विश्व की भौतिक वास्तविकता को समझने में मदद के लिए भौतिकवाद की सराहना की जाती  है लेकिन उस भौतिक संसार को जिसे मानव अपनी सक्रीय भूमिका द्वारा  निर्मित करते हैं और जिसमें हम विचरण करते हैं, की अवहेलना के लिए आलोचना की जाती है. विचारवाद, जहाँ तक हेगेल ने इसे विकसित किया, मनुष्य की सक्रीय मनोगत दखलंदाजी की निशानदेही करता है. परंतू यह इसे केवल चिंतन और विचार तक सीमित कर देता है : विश्व का निर्माण उन प्रवर्गों द्वारा संपन्न होता है जो हम इस पर लागू करते हैं. मार्क्स दोनों परम्पराओं को संयुक्त करके एक दृष्टिकोण को प्रस्तावित करते हैं जिसमें मानव जाति ही, उस विश्व का जिसमें वह जीती  है, का निर्माण या कम से कम रूपांतरण करती है. परंतू यह रूपांतरण चिंतन में घटित न होकर वास्तविक भौतिक क्रिया द्वारा आकार लेता है. परम अवधारानाओं के दखल से नहीं बल्कि मानव के कस्सी-फाबड़े पर खून-पसीना बहाने से. इतिहास का यह भौतिकवादी वर्जन पार निकल जाता है और वर्तमान की सभी दार्शनिक अवधारानाओं को अस्वीकृत कर देता है. आगे चलकर, यही मार्क्स के इतिहास के सिद्धांत का आधार बनता है. जैसाकि मार्क्स १८४४ में लिखित पांडुलिपि में लिखते हैं, ” उद्योग में हम मानव का प्रकृति से वास्तविक रूप से ऐतिहासिक संबंध देखते हैं. यह चिंतन दर्शन के इतिहास पर मनन के साथ-साथ उनके जर्नलिस्ट के रूप में सामाजिक और आर्थिक यथार्थ के अनुभव से पैदा होता है जो मार्क्स द्वारा भविष्य में किये जानेवाले कार्यों के एजेंडा को निर्धारित कर देता है.

शेष अगली कड़ी में : मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय – दूसरी किश्त

आभार सहित http://plato.stanford.edu/entries/marx/ से हिंदी में अनुवादित

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कार्ल मार्क्स

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कार्ल मार्क्स (1818-1883) मार्क्सवाद और प्रबल राजनीतिक विज्ञान के संस्थापक , जिसके विचारों ने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के इतिहास को नये आयाम दिए.

५ मई १८१८ को पश्चिम जर्मनी के ट्रायर में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ. उसके पिता एक कामयाब वकील थे, जिन्हें प्रशिया के कानूनानुसार अपने व्यवसाय को चलाने के लिए यहूदी से ईसाई धर्म अपनाना पड़ा.

सत्रह वर्ष की आयु में कानून की विद्या हासिल करने के लिए मार्क्स बोन विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए. वहाँ उनकी गिनती तेज-तरार विद्यार्थियों में नहीं होती थी. फिक्रमंद पिता ने उनका स्थानांतरण कठोर अनुशासन के लिए विख्यात बर्लिन के विश्वविद्यालय में करवा दिया. अपने अध्ययन के दौरान नौजवान मार्क्स रेडिकल विचारों और दर्शन की ओर झुकते गये. एक बार तो वे ‘यंग हेगल्स’ नामक विद्यार्थियों के एक समूह से जुड़ गये जो हेगल के विचारों को अस्वीकार कर चुके थे.

१९ जून १८४३ को उनका विवाह प्रशिया के नवाब की सुशिक्षित सपुत्री जेनी वोन वेस्टफालें से संपन्न हुआ. शादी के तुरंत बाद सरकार की सेंसरशिप, जिसका रवैया वामपंथी आन्दोलनकारियों के प्रति दिन-प्रतिदिन कठोर से कठोरतम होता जा रहा था, ने उन्हें देश छोड़कर पेरिस जाने के लिए मजबूर कर दिया.

१८४० का पेरिस उस ज़माने के क्रांतिकारियों की सबसे प्रिय कर्मस्थली थी. यहाँ मार्क्स की मुलाकात बहुत से क्रांतिकारियों से हुई जिनमे फ्रेडरिक एंगेल्स आगे चलकर उनके जीवनभर के वैचारिक मित्र बन गये.

१८४४ में एंगेल्स बहुत ही प्रभावशाली पुस्तक ‘Conditions of the WorkingClass in England ‘ लिख चुके थे. इस पुस्तक ने मार्क्स के सर्वहारा वर्ग द्वारा संपन्न किये जानेवाली क्रांति  के विचार को विकसित करने में  मदद की. इसी पुस्तक से प्रेरणा पाकर मार्क्स ने Economic and Philosophic Manuscripts नामक अपनी पहली  पुस्तक की रचना की. पूंजीवाद के अधीन श्रम के अलगाव से मुक्ति के लिए साम्यवाद की जीत की अवश्यम्भाविता के पक्ष में तर्क के कारण इस पुस्तक का एक नैतिक और दार्शनिक महत्व रहा है.

दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है.

मार्क्स की दिलचस्पी इतिहास के विकास और परिवर्तन में भी थी, जो समाज में नैसर्गिक रूप से चलता रहता है. अपने इस विचार को उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी समझ बताया. मार्क्स का विश्वास दिन-प्रतिदिन इस सच्चाई की ओर दृढ होता गया कि सर्वहारा वर्ग की क्रांति न केवल वांछनीय है बल्कि ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण अवश्यंभावी है.

इसी समय मार्क्स और एंगेल्स ने अपना सबसे प्रसिद्ध पंफलेट ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ लिखा.

“कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. वे खुलेंआम एलान करते हैं कि उनके लक्ष्य पूरी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बलपूर्वक उलटने से ही सिद्ध किये जा सकते हैं. कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग को कांपने दो. सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.

दुनिया के मजदूरों, एक हो ! ”

मार्क्स की ज्यादातर रचनाओं के विपरीत मार्क्स की यह कृति संक्षिप्त और प्रासंगिक होने के साथ-साथ अग्निमय और प्रेरणादायक भाषा के प्रयोग द्वारा क्रांति की इच्छा पैदा करने की क्षमता रखती है.

“अभी तक आर्विभूत समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है.” – कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, प्रथम अध्याय.

क्रांतियों, जिन्होंने १८४८ में समस्त यूरोप को अपनी आगोश में ले लिया था, ने मार्क्स को फ़्रांसिसी और बेल्जियन अधिकारिओं की नज़रों में संदिग्ध बना दिया . उन्हें लंदन में शरण लेनी पड़ी और उनका शेष रचनात्मक जीवन वहीँ बीता.

कम्युनिस्ट लहर की इस तरुणावस्था में मार्क्स इसके साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़ते गये. प्रथम कम्युनिस्ट इंटरनेशनल  में अराजकतावादी बकुनिन के विरुद्ध उन्होंने प्रबल और प्रभावशाली तर्क रखे.

एक और प्रबल घटना १८७१ का पेरिस कम्यून की स्थापना थी जिसे सर्वहारा वर्ग दो महीने के संघर्ष के बाद हार गया. मार्क्स ने इसका पुरजोर मूल्यांकन किया और इसे भविष्य की कम्युनिस्ट क्रांतियों के अग्रदूत की उपाधि प्रदान की.

मार्क्स अपना अधिक से अधिक समय  ब्रिटिश लायब्रेरी में राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए बिताते थे. इसी के परिणामस्वरूप उनकी मास्टरपीस रचना ‘पूँजी’ (दास कैपिटल) का जन्म हुआ. यह पुस्तक पूंजीवादी समाज और अर्थशास्त्र की गतिकी के नियमों का सघन और विस्तृत संकलन हैं.

“पहली दृष्टि में पण्य बहुत मामूली सी और आसानी से समझ में आनेवाली चीज मालूम होता है. किन्तु उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वास्तव में वह एक बहुत अजीब चीज है, जो आधिभौतिक सूक्ष्मताओं और धर्मशास्त्रीय बारीकियों से ओतप्रोत है. जहाँ तक वह उपयोग मूल्य है, वहां तक, चाहे हम उसपर इस दृष्टिकोण से विचार करें कि वह अपने गुणों से मानव आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है” – पूंजी, अध्याय १, प्रथम खंड

अपने निरन्तर विकसित होते हुए मार्क्सवादी दृष्टिकोण अनुसार मार्क्स ने जीवन के हर पहलू पर लिखा.  अक्सर पूंजीपतियों के तलुयाचाट बुद्धिजीवी मार्क्स के “धर्म लोगों के लिए अफीम है” को सन्दर्भ से तोड़कर एक फिकरे के रूप में प्रयोग करते रहे हैं. वर्गीय समाज के अस्तित्व में आने की ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ के अनुसार उत्पादन की प्रक्रिया ने समाज के एक छोर पर मुट्ठीभर अमीर जबकि दूसरे छोरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया. आत्मिक उत्पादन में एक तरफ दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, साहित्य,गीत और संगीत पैदा हुआ तो दूसरी और धर्म. दिखने में धर्म गरीबों को मुफ्त का तोहफा लगता रहा हो लेकिन शोषक वर्ग के सच्चे सेवादार के रूप में इसने गरीब जनता को पैरों के नीचे रौंधने का ही काम किया.

” धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन  परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है.”
— (Contribution to the Critique of Hegel\’s Philosophy of Right)

अपने समय के सर्वाधिक घृणा पाने वाले व्यक्ति कार्ल मार्क्स, जिन पर सबसे अधिक कीचड उछाला गया, के रोशन दिमाग ने १८८३ को हमेशा के लिए काम करना बंद कर दिया. निरंकुश और गणतंत्रीय, दोनों प्रकार की सरकारों ने उन्हें अपने राज्य से खदेड़ा. बुर्जुआजी, चाहे वह अनुदार रही हो चाहे अति जनवादी, मार्क्स के प्रति लान्छनात्मक शब्दों का प्रयोग करने  में आपस में होड़ करती हुई नजर आई. वे इसे इस प्रकार हटा देते थे जैसे यह कोई मकड़ी का जाला हो. पूर्ण लापरवाही के साथ, जब बहुत जरूरी आवश्यकता उन्हें विवश करती, वे तभी जवाब देते. उनकी मृत्यु उनके चहेते करोड़ों क्रांतिकारी मेहनतकश साथियों के लिए एक आघात थी. साईबेरिया से कैलिफोर्निया, यूरोप और अमेरिका के सभी भागों और जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं “मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि  बेशक उनके बहुत से विरोधी रहे हों, लेकिन उनका कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं था.”

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अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस पर विशेष

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विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति का प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की दिशा

कात्यायनी

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर
3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में
4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा
5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन
6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन
7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति
8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर
9. और अंत में…

आज एक कठिन समय में हम यहाँ पर नारी मुक्ति आन्दोलन की कुछ बुनियादी समस्याओं पर बातचीत के लिए इकट्ठा हुए हैं । सामायिक तौर पर यह पराजय, विपर्यय, पुनरुत्थान, फासिज़्म की शक्तियों के विश्वव्यापी उभार और क्रांति की शक्तियों के पीछे हटने का दौर है । कुछ समय के लिए, आज एक बार फिर क्रांति की लहर पर प्रतिक्रांति की लहर विश्व स्तर पर हावी है ।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी ऐसे कठिन दौर आते हैं तो अँधेरे की ताकतें मेहनतकश आम जनता के साथ ही औरतों की आधी आबादी पर भी अपनी पूरी ताकत के साथ हमला बोल देती है और न केवल उनकी मुक्ति की लड़ाई को कुचल देना चाहती है बल्कि अतीत के अनगिनत लंबे संघर्षों से अर्जित उनकी आजादी और जनवादी अधिकारों को भी छीन लेने पर उतारू हो जाती हैं । आज भी ऐसा ही हो रहा है । हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो विश्व सर्वहारा क्रांति के एक नये चक्र की शुरुआत का समय है, अक्टूबर क्रांति के नये संस्करण के निर्माण का समय है । साथ ही, यह नारी मुक्ति आन्दोलन के लिए भी एक नई शुरुआत का समय है, क्योंकि इतिहास ने यह अंतिम तौर पर सिद्ध कर दिया है कि एक पूंजीवादी विश्व में नारी मुक्ति का प्रश्न अंतिम तौर पर हल नहीं हो सकता और यह भी कि इस आधी आबादी की मुक्ति की लड़ाई के बिना शोषण-उत्पीडन से मेहनतकश जनता की मुक्ति की लड़ाई भी विजयी नहीं हो सकती ।

आज अपने प्रयासों को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया में, विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति के प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा पर विचार करते हुए हमें सर्वोपरी तौर पर उन विचारधारात्मक-सैद्धांतिक हमलों का जवाब देना होगा जो नारी मुक्ति विषयक तरह-तरह के बुर्जुआ सिद्धांतों के रूप में हमारे ऊपर किये जा रहे हैं । जीवन और संघर्ष के अन्य मोर्चों की ही तरह आज नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी जनवाद के नाम पर मुक्त बाजार का पश्चिमी उपभोक्तावादी दर्शन तरह-तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है और एक बार फिर, नये-नये रूपों में, जोर-शोर से बीमार बुर्जुआ संस्कृति, व्यक्तिवाद, पुरुष-विरोधी नारीवाद, अराजकतावाद, यौन-स्वच्छंदतावाद की तरह-तरह की खिचड़ी परोसी जा रही है । फ़्रांसिसी फुकोयामा के “इतिहास के अंत” और पश्चिम में जन्मे “विचारधारा के अंत” के नारे की तर्ज पर नारी आन्दोलन को भी विचारधारा से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं क्योंकि बकौल इन मुक्त चिंतकों के, “विचारधारा ने नारी की आजादी की लड़ाई को कोई योगदान नहीं दिया ।” ऐसे लोगों के उत्तर में बस बर्तोल्त ब्रेखत का एक बयान उद्धृत किया जा सकता है, जो उन्होंने २६ जुलाई, १९३८ को वाल्टर बेंजामिन से बातचीत के दौरान दिया था, “विचारधारा के विरुद्ध संघर्ष खुद में एक नई विचारधारा बन जाता है ।” वास्तव में इन तमाम मुक्त चिंतनधाराओं का सारतत्व यह है कि व्यवस्था-परिवर्तन की बुनियादी लड़ाई से नारी मुक्ति संघर्ष को अलग करके वर्तमान सामाजिक-आर्थिक दायरे के भीतर सीमित कर दिया जाये । इनका एकमात्र उद्देश्य स्त्रियों को यह समझाना है कि उनकी आजादी के प्रश्न का सामाजिक क्रांति के प्रश्न से कुछ भी लेना-देना नहीं है और यह एक स्वायत्त-स्वतंत्र प्रश्न है । आज न केवल अलग-अलग किस्म की बुर्जुआ सुधारवादी चिंतनधाराएं, बल्कि सत्तर के दशक के यूरोकम्युनिज़्म से लेकर अस्सी के दशक में उभरी भांति-भांति की पश्चिमी नववामपंथी धाराएं तथा गोर्बचोवी लहर और देंगपंथी नकली कम्युनिज़्म  से प्रभावित धाराएं भी या तो स्त्रियों की मुक्ति के आन्दोलन को कुछ सामाजिक-आर्थिक मांगों, पर्यावरण या स्वास्थ्य के मुद्दों तक ही सीमित करके और उसे नारी मुक्ति के बुनियादी मुद्दे, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संघर्ष के दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य से काटकर सुधारवाद और अर्थवाद के दलदल में धंसा देना चाहती हैं या फिर केवल बाल की खाल निकालने जैसी कुछ अकादमिक बहसों और बौद्धिक कवायद तक मह्दूद कर देना चाहती हैं ।

आज नारी मुक्ति संघर्ष को एक क्रांतिकारी दिशा देने और एक नई शुरुआत करने के लिए यह जरूरी है कि इम  अपने आन्दोलन में मौजूद इन सभी विजातीय प्रवृत्तियों और रुझानों को लंबे वाद-विवाद में परास्त करें, उनके प्रभाव को निर्मूल करें और एक सही, ठोस लाइन और कार्यक्रम के इर्द-गिर्द अलग-अलग देशों में मेहनतकश स्त्रियों और मध्यवर्गीय स्त्रियों को गोलबंद एवं संगठित करें तथा साथ ही, उन्हें जनता के सभी वर्गों के क्रांतिकारी संघर्षों के साथ जोड़ें । तीसरी दुनिया के देश आज भी साम्राज्यवाद की कमजोर कड़ी हैं, जहाँ सामाजिक क्रांतियों के विस्फोटक की वस्तुगत परिस्थितियाँ सर्वाधिक परिपक्व हैं । ऐसे देशों में क्रांतिकारी नारी मुक्ति के आन्दोलन के हिरावल दस्तों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा है क्योंकि आधी आबादी की भागीदारी के बिना न तो कोई सर्वहारा क्रांति सफल हो सकती है और न सर्वहारा क्रांति के बिना आधी आबादी की वास्तविक मुक्ति की शुरुआत हो सकती है । ऐसे समय में, नेपाल में नारी मुक्ति आन्दोलन से संबंधित विषय पर संगोष्टी का आयोजन बहुत ख़ुशी की बात है, जहाँ क्रांति की शक्तियां आज तरह-तरह के अवसरवादी-दक्षिणपंथी भटकावों से संघर्ष करते हुए जनता के विभिन्न वर्गों को संगठित कर रही हैं । हम नेपाल में इस संगोष्टी के आयोजक कामरेडों का क्रांतिकारी अभिनंदन करते हैं ।

अपने इस निबन्ध में हमारा मन्तव्य नारी मुक्ति संघर्ष की विश्व-ऐतिहासिक यात्रा का एक संक्षिप्त सिंहावलोकन प्रस्तुत करते हुए उसके सामने आज उपस्थित कार्यभारों और चुनौतियों को रेखांकित करना है । हर नई शुरुआत के समय इतिहास का पुनरवालोकन जरूरी होता है । द्वंदात्मक भौतिकवादी जीवन-दृष्टि हमें यही बताती है कि इतिहास के मुल्यांकन-पुनर्मुल्यांकन का मूल अर्थ केवल भविष्य के लिए नये कार्यभारों का निर्धारण ही होता है ।

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

अब तक वर्ग-अंतरविरोधों से युक्त जितने भी समाजों का इतिहास हमें ज्ञात है, स्त्रियाँ उन सभी में परिवार और समाज – दोनों में पुरुषों के मातहत ही रही हैं । पूरे सामाजिक ढाँचे में सर्वाधिक शोषित-उत्पीड़ित तबकों में ही उनका स्थान रहा है । जब वर्ग समाज का प्रादुर्भाव हो रहा था और निजी स्वामित्व के तत्व और मानसिकता पैदा हो रही थी उसी समय पितृसत्तात्मक व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थी, और स्वाभाविक तौर पर, उसके प्रतिरोध की स्त्री-चेतना भी उत्पन्न हो चुकी थी जिसके साक्ष्य हमें अलग-अलग संस्कृतियों की पुराणकथाओं  और लोकगाथाओं में आज भी देखने को मिल जाते हैं ।
पर इतिहास के पूरे प्राकपूंजीवादी काल में उत्पीड़न के विरुद्ध विद्रोह की नारी चेतना अपने समय के विस्मरण के बाद नारी समुदाय ने अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्षों एवं क्रांतियों में भूदास या दास जैसे वर्गों के सदस्य के रूप में शिरकत तो की लेकिन पुरुषों के मुकाबले अपनी हीनतर सामाजिक-पारिवारिक स्थिति के विरुद्ध या अपनी स्वतंत्र अस्मिता एवं सामाजिक स्थिति के लिए उसने पूंजीवाद के आविर्भाव के पूर्व संघर्ष नहीं किया, क्योंकि तब इसका वस्तुगत आधार ही समाज में मौजूद नहीं था । समाज और परिवार में स्त्रियों की भूमिका, मातृत्व, शिशुपालन आदि स्थितियों के नाते वर्ग समाज में पैदा होनेवाली उनकी मजबूरियां, घरेलू श्रम की गुलामी, समाज में निकृष्टतम  कोटि के उजरती मजदूर की स्थिति, यौन असमानता, यौन शोषण, यौन उत्पीडन – इन सबके कुल योग के रूप में नारी प्रश्न (Women Question ) को विश्व इतिहास के पूंजीवादी युग में ही सुसंगत रूप में देखा गया और नारी मुक्ति की एक नई अवधारणा विकसित हुई, जिसका संबंध पुनर्जागरण काल के मानववाद और प्रबोधन के युग की तर्कपरकता एवं जनवाद की अवधारणा तथा बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों से था ।

सामंतवाद के युग तक स्त्रियों को सम्पत्ति के अधिकार सहित कोई भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं था और उनकी इस सामाजिक-पारिवारिक मातहती की स्थिति को धर्म, कानून और सामाजिक विधानों की स्वीकृति प्राप्त थी । सामन्तवाद के गर्भ में जब पूंजीवाद का भ्रूण विकसित हो रहा था, उसी समय से सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी शुरू होकर बढती चली गई । यही वह भौतिक आधार था, जिसने पहली बार स्त्रियों के भीतर सामाजिक अधिकारों की चेतना को जन्म दिया ।

पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के अंतर्गत सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी और साथ ही उनके अधिकारों के अभाव के जारी रहने की स्थिति के नाते शुरू से ही बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के प्रति परस्पर विरोधी रुख और दृष्टिकोण अलग-अलग रूपों में मौजूद रहे । पुनर्जागरण काल में एक ओर जहाँ प्राचीन ग्रीक और रोमन परिवारों के मॉडल और रोमन कानूनों के नमूनों के अनुकरण ने स्त्रियों की गुलामी को तात्कालिक तौर पर पुख्ता बनाया, वहीं पुनर्जागरण काल के महामानवों द्वारा प्रवर्तित मानववाद के क्रांतिकारी दर्शन ने धर्मकेन्द्रित (Theocentric ) समाज की जगह मानवकेन्द्रित (Anthropocentric ) समाज के मूल्यों का प्रतिपादन करके, सामाजिक व्यवस्था की तमाम दैवी स्वीकृतियों पर प्रश्नचिह्न उठाकर और लौकिकता के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित करके, प्रकारांतर से स्त्रियों की गुलामी की धार्मिक-अलौकिक स्वीकृति और सामंती समाज-व्यवस्था के विधानों की मानवेतर स्वीकृति को भी ध्वस्त करने का काम किया । तात्कालिक तौर पर सोहलवीं शताब्दी में धर्मसुधार काल के दौरान प्यूरिटनिज्म और काल्विनिज्म के प्रभाव में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति भले ही बहुत बदतर दिखाई दे रही हो, पर एक ओर दर्शन के स्तर पर मानववाद की विचारधारा और दूसरी ओर सामाजिक उत्पादन में लगातार बढती स्त्रियों की भागीदारी उनकी मुक्ति की चेतना को लगातार विकसित कर रही थी, जिसकी पहली मुखर अभिव्यक्ति बुर्जुआ क्रांतियों की पूर्वबेला में, प्रबोधन काल के दौरान सामने आई ।

स्त्रियों ने सबसे पहले समानता की मांग बुर्जुआ व्यवस्था के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया के शुरुआती काल में ही उठाई । अमेरिकी क्रांति (१७७५-१७८३) के दौरान मर्सी वारेन और एबिगेल एडम्स के नेतृत्व में स्त्रियों ने मताधिकार और सम्पत्ति के अधिकार सहित सामाजिक समानता की मांग करते हुए जार्ज वाशिंगटन और टॉमस जैफर्सन पर स्त्रियों की आबादी के मसले को संविधान में शामिल करने के लिए दबाव डाला, पर बुर्जुआ वर्ग के एक बड़े हिस्से के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका । प्रबोधन काल के दार्शनिकों के क्रांतिकारी भौतिकवादी दर्शन, वैज्ञानिक तर्कपरकता तथा सामाजिक न्याय और स्वतन्त्रता-समानता-भ्रातृत्व के रूप में जनवाद की अवधारणाओं ने सामाजिक उत्पादन के साथ ही सामंती स्वेच्छाचारिता-विरोधी राजनीतिक संघर्ष में भी सीधे भागीदारी कर रही स्त्रियों की आबादी को गहराई से प्रभावित किया । प्रबोधन काल के क्रांतिकारी दार्शनिकों ने पहली बार यह विचार प्रस्तुत किया कि स्त्रियों की उत्पीड़ित स्थिति मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों का हनन है । फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान फ़्रांसिसी बुर्जुआ विचारधारा का एक अग्रणी प्रवक्ता ए. कोंदोर्से (A .Condorcet ) स्त्रियों की समानता का प्रबल पक्षधर था । उसका मानना था कि स्त्रियों के बारे में समाज में मौजूद गहरे पूर्वाग्रह उनकी असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति की जड़ हैं । अपने समय के अन्य बुर्जुआ विचारकों की तरह कोंदोर्से भी स्त्री-प्रश्न के वर्गीय एवं आर्थिक आधारों को देख न सका । उसका यह विश्वास था कि कानूनी समानता और शिक्षा के जरिए स्त्रियों की मुक्ति संभव है । आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में भी, पश्चिम के कई बुर्जुआ विचारकों ने ऐसे ही विचार प्रस्तुत किये । ब्रिटिश दार्शनिक, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री जेम्स स्टुअर्ट मिल ने भी अपनी पुस्तक “ऑन द सब्जेक्शन ऑफ वुमन” (१८६९) में इन्हीं विचारों का प्रतिपादन किया ।

संगठित नारी आन्दोलन की शुरुआत सर्वप्रथम महान फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान हुई । उस समय स्त्रियाँ भी जन-प्रदर्शनों सहित सभी राजनीतिक कार्रवाइयों में हिस्सा ले रही थीं । समानता के लिए स्त्रियों के संघर्ष के लक्ष्य को समर्पित पहली पत्रिका का प्रकाशन क्रांति के दौरान फ़्रांस में ही शुरू हुआ वहीं क्रांतिकारी नारी क्लबों (Women’s Revolutionary Club) के रूप में स्त्रियों के पहले संगठन अस्तित्व में आये जिन्होंने सभी पक्षधर राजनीतिक संघर्षों में खुलकर भागीदारी करते हुए यह मांग की कि आजादी, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत बिना किसी लिंगभेद के लागू किये जाने चाहिए । ओलिम्प द गाउजेस (Olympe de Gouges, 1748-93) ने “मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा” (Declaration of the Rights of the Man and the Citizen) के मॉडल पर “स्त्रियों और स्त्री नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” तैयार की और उसे १७९१ में राष्ट्रीय असेम्बली के समक्ष प्रस्तुत किया । इस घोषणा पत्र में “स्त्रियों पर पुरुषों के शासन” का विरोध किया गया था और सार्विक मताधिकारों के व्यवहार के लिए स्त्री-पुरुषों के बीच पूर्ण सामाजिक-राजनीतिक समानता की मांग की गई थी । यद्यपि फ़्रांसिसी क्रांति के अधिकांश नेताओं ने स्त्रियों की समानता के विचार को ख़ारिज कर दिया और १७९३ के अंत में सभी नारी क्लबों को बंद कर दिया गया, लेकिन फिर भी इस युगांतरकारी क्रांति ने सामंती संबंधों पर निर्णायक मारक प्रहार करने के साथ ही कई कानूनों के द्वारा और नये सामाजिक मूल्यों के द्वारा औरतों की कानूनी स्थिति में भारी परिवर्तन किया । १७९१ में एक कानून बनाकर स्त्रियों की शिक्षा का प्रावधान किया गया, २० सितंबर १७९२ की आज्ञाप्ति द्वारा उन्हें कई नागरिक अधिकार प्रदान किये गये और अप्रैल १७९४ में कन्वेंशन द्वारा पारित एक कानून ने उनके लिए तलाक लेना आसान बना दिया । लेकिन थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया के काल में नारी मुक्ति संघर्ष की ये उपलब्धियां एक बार फिर, मूलत: छीन गयी । नेपोलियोनिक कोड (१८०४) और अन्य यूरोपीय देशों की ऐसी ही बुर्जुआ नागरिक संहिताओं ने एक बार फिर स्त्रियों के नागरिक अधिकारों को अतिसीमित कर दिया और परिवार, शादी, तलाक, अभिभावकत्व और संपत्ति के अधिकार सहित सभी मामलों में उन्हें कानूनी तौर पर एक बार फिर पूरी तरह पुरुषों के मातहत बना दिया ।

बुर्जुआ क्रांतियों के काल में नारी आन्दोलन का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मेरी वोल्सटोन क्राफ्ट की पुस्तक “स्त्री के अधिकारों का औचित्य-प्रतिपादन” ( A Vindication of the Rights of Women) थी, जो कुल मिलाकर ओलिम्प द गाउजेस के दस्तावेज के प्रतिपादनों को ही उन्नत एवं विस्तृत रूप में प्रस्तुत करती थी । उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के नारीवादी आन्दोलन (Feminist Movement ) की बुनियादी रुपरेखा सर्वप्रथम इसी पुस्तक में दिखाई देती है ।

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर

फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों का सार-संकलन करते हुए कहा जा सकता है कि जब सामन्तवाद के विरुद्ध बुर्जुआ वर्ग के साथ ही पूरी जनता इनमें शिरकत कर रही थी, तब स्वतन्त्रता, समानता और जनवाद के विचारों का प्रतिपादन अधिक क्रांतिकारी रूप में किया जा रहा था, पर बुर्जुआ सत्ता की स्थापना और सुदृढीकरण कें नये शासक वर्ग ने जिस प्रकार मेहनतकशों को, ठीक उसी प्रकार स्त्रियों को भी उसी हद तक आजादी और नागरिक अधिकार दिए, जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली और उत्पादन एवं विनिमय के संबंधों के लिए जरूरी था । इससे थोड़ी भी अधिक आजादी यदि स्त्रियों को मिल सकी, तो उसका एकमात्र कारण नारी समुदाय की नई चेतना और उसके संघर्षों का दबाव एवं भय था । पूंजीवाद ने सामन्ती मध्ययुगीन स्वेच्छाचारिता, घरेलू गुलामी, व्यक्तित्वहीनता, अनागरिकता और विलासिता एवं उपभोग की सामग्री होने की स्थिति से नारी समुदाय को बाहर तो निकला, पर पूरी तरह से नहीं । सत्ता में आने के साथ ही उसने जब चर्च के साथ “पवित्र गठबंधन” कर लिया तो स्त्रियों की गुलामी के सामंती मूल्यों के कुछ तत्वों को उसने फिर से अपना लिया । उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान स्त्रियाँ शिक्षा, नौकरी, सम्पत्ति के अधिकार मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं और उन्हें काफी हद तक अर्जित भी किया, लेकिन उनकी नागरिकता दोयम दर्जे की ही थी और पूंजीवादी उत्पादन तन्त्र में वे निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलामों (Wage Slaves ) में तब्दील कर दी गयी । फिर भी बुर्जुआ क्रांतियाँ ऐतिहासिक तौर पर नारी मुक्ति संघर्ष को एक कदम आगे ले आई, उन्हें सामंती समाज के निरंकुश दमन से एक हद तक छुटकारा दिलाया, सामाजिक उत्पादन में उनकी भागीदारी की स्थितियां पैदा की और उनके भीतर अपने जनवादी अधिकारों, स्वतंत्र अस्मिता और स्वतंत्र पहचान के लिए लड़ने की, सामाजिक-राजनीतिक क्रियाकलापों और संघर्षों में हिस्सा लेने की और एक नई जमीन पर खड़े होकर यौन-असमानता एवं यौन-उत्पीडन का विरोध करने की चेतना पैदा की ।

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यूरोप और अमेरिका के बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के अधिकारों की वास्तविक और वैधिक अनुपस्थिति की जो स्थिति बनी, उसे कई बुर्जुआ लेखकों-विचारकों से सैद्धांतिक समर्थन प्राप्त हुआ । बुर्जुआ साहित्य में बड़े पैमाने पर प्रस्तुत और आज भी पूरी दुनिया में व्यापक स्तर पर मान्यताप्राप्त तथाकथित जीवशास्त्रीय सिद्धांत के प्रारंभिक पैरोकारों में फ़्रांसिसी दार्शनिक ओगुस्त कोंत (A . Konte ) अग्रणी था जिसके अनुसार नारी समुदाय की असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति का मूल कारण “नारी की प्राकृतिक दुर्बलता” में निहित है, स्त्रियाँ स्वाभाविक एवं प्राकृतिक तौर पर पारिवारिक जिम्मेदारियों, प्रजनन, शिशुपालन आदि के लिए ही बनी होती हैं और कभी भी वे सामाजिक तौर पर पुरुषों के समकक्ष नहीं हो सकतीं । स्त्री-पुरुष असमानता का यह जीवशास्त्रीय सिद्धांत उन्नीसवीं शताब्दी के बुर्जुआ समाज का सर्वाधिक प्रभावशाली बुर्जुआ पुरुष-स्वामित्ववादी सिद्धांत था जिसका प्रभाव आज भी बड़े पैमाने पर मौजूद है । ब्रिटेन के विक्टोरियन सामाजिक मूल्यों पर भी इन विचारों का जबर्दस्त प्रभाव मौजूद था । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जर्मनी में प्रचलित पेटी-बुर्जुआ “थियरी ऑफ द थ्री केज” (German–Kirche, Kuche, Kinder-Church, Kitchen, Children) भी सारत: कोंत के विचारों का ही विस्तार था जिसके अनुसार, स्त्रियों की रूचि और सक्रियता का दायरा केवल चर्च, रसोई और बच्चों तक ही सीमित होना चाहिए । आगे चलकर फासिस्टों और नात्सियों ने इसी सिद्धांत के परिष्कृत रूप को इटली एवं जर्मनी में अपनाया और लागू किया । आज भी बुर्जुआ प्रतिक्रियावादी नवनात्सी तत्व और धार्मिक पुनरुत्थानवादी इस तरह के तर्क देते रहते हैं । गोर्बचोवी संशोधनवादियों ने भी स्त्रियों की सामाजिक भूमिका में कटौती करते हुए उनकी प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक बनावट का तर्क दिया और देंगपंथी संशोधनवादी भी आज घुमा-फिराकर ऐसे तर्क देते रहते हैं ।

एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जैसे-जैसे बुर्जुआ वर्ग अपनी सत्ता का सुदृढीकरण करता गया, नारी आन्दोलन के बुर्जुआ चरित्र, फ्रेमवर्क और नेतृत्व की सीमाएं ज्यादा से ज्यादा साफ़ होती चली गई । मताधिकार, सम्पत्ति के अधिकार और यौन आधार पर बरती जाने वाली हर प्रकार की असमानता के विरुद्ध जनवादी अधिकारों के व्यापक दायरे में क्रांतिकारी संघर्ष चलाने और उसे सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष से जोड़ने के बजाय, उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, बुर्जुआ नारी आन्दोलन के नेतृत्व ने फ़्रांसिसी क्रांति काल की परम्परा को छोड़ते हुए अपना उद्देश्य केवल बुर्जुआ समाज के फ्रेमवर्क के भीतर, अपने ही वर्ग के पुरुषों से स्त्रियों की समानता तक सीमित कर दिया और स्त्री-प्रश्न की अवधारणा को संकीर्ण करके संघर्ष को सुधारों के दायरे में कैद कर दिया । उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में उपरोक्त मांग के पूरक के तौर पर सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियों के काम करने के अधिकार की मांग उठाई गई ।

लेकिन नारी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा उस समय भी पूरी तरह से निष्प्राण नहीं हो गयी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के चौथे-पांचवें दशक में फ़्रांस में बड़े पैमाने पर ऐसा क्रांतिकारी यथार्थवादी साहित्य उत्पादित हुआ जिसमें स्त्रियों की पारिवारिक गुलामी और सामाजिक असमानता की आलोचना की गयी थी । इसमें जी. सांद (G. Sand) के उपन्यासों की अग्रणी भूमिका थी । इसी समय अमेरिका और ब्रिटेन में संगठित रूप से नारी मताधिकार आन्दोलन की शुरुआत हुई जहाँ सामाजिक जीवन में स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने लगी थीं । १८३० के दशक में अमेरिका में काले लोगों की मुक्ति के संघर्ष में १०० से भी अधिक दासता-विरोधी “नारी सोसायटी” जैसे संगठन हिस्सा ले रहे थे और ब्रिटेन में चार्टिस्ट आन्दोलन में स्त्रियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं । वास्तव में, पूंजीवादी समाज के विकास के नियम और विज्ञान, तकनोलाजी एवं संस्कृति का विकास, उत्पादन और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ, खुद ही वस्तुगत तौर पर, स्त्रियों की मातहती के सिद्धांतों की आधारहीनता को ज्यादा से ज्यादा उजागर करते जा रहे थे । सर्वप्रथम, उस काल के क्रांतिकारी जनवादी सिद्धान्तकारों, विशेषकर सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिये और राबर्ट ओवेन जैसे सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि काल्पनिक समाजवादी विचारकों ने स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता के बुर्जुआ सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाते हुए नारी उत्पीडन और बुर्जुआ समाज की प्रकृति के बीच के अंतर्संबंधों को उजागर किया था । नारी मुक्ति के बुर्जुआ सिद्धान्तकारों के विपरीत इन दार्शनिकों ने पहलों बार स्त्रियों को समानता का दर्जा देने के समाज के पुनर्गठन की अपनी योजना का एक बुनियादी मुद्दा बनाया । चार्ल्स फूरिये ने पहली बार यह स्पष्ट बताया कि किसी भी समाज में आजादी का एक बुनियादी पैमाना यह है कि उस समाज विशेष में स्त्रियाँ किस हद तक आजाद हैं ।

उन्नीसवीं शताब्दी के रुसी क्रांतिकारी जनवादियों ने इसी विचार-सरणि  को आगे बढ़ते हुए सामाजिक जीवन के साथ ही क्रांतिकारी संघर्ष में भी स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया । नारी मुक्ति के सर्वाधिक प्रखर प्रवक्ता चेर्नीशेव्स्की ने अपने उपन्यास “क्या करें” ( What is to be done )  में एक ऐसा स्त्री-चरित्र प्रस्तुत किया जिसने संकीर्ण पारिवारिक दायरे से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र सामाजिक-आर्थिक स्थिति बनाई थी और जो सामाजिक सक्रियताओं में भी संलग्न थी । चेर्नीशेव्स्की का यह उपन्यास यूटोपिया के तत्वों के बावजूद युगीन परिप्रेक्ष्य में, नारी-मुक्ति के सन्दर्भ में भी क्रांतिकारी महत्व रखता है ।

3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में

यूरोप में १८४८-४९ की क्रांतियों तथा जून १८४८ में पेरिस में हुए प्रथम सर्वहारा विद्रोह सहित विभिन्न देशों में उठ खड़े हुए मजदूर आंदोलनों ने स्त्रियों के राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों के संघर्ष को एक नया संवेग प्रदान किया । १८४८ में फ़्रांस में फिर से नारी क्लबों का गठन हुआ जिन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों को समान अधिकार देने के लिए संघर्षों की नए सिरे से शुरुआत की. इसी वर्ष फ़्रांस में स्त्री कामगारों के पहले स्वतंत्र संगठन की स्थापना हुई । जर्मनी और आस्ट्रिया में भी राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के उद्देश्य से स्त्री यूनियन गठित हुए ।

एक व्यापक आधार पर, एक सुनिश्चित कार्यक्रम के साथ नारीवादी आन्दोलन की शुरुआत का प्रस्थान-बिंदु जुलाई, १८४८ को माना जाता है जब एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन, लुकेसिया कफिन मोट और कुछ अन्य ने सेनेका फाल्स, न्यूयार्क में पहली बार नारी अधिकार कांग्रेस आयोजित करके नारी स्वतन्त्रता का एक घोषणा-पत्र जारी किया जिसमें पूर्ण कानूनी समानता, पूर्ण शैक्षिक एवं व्यावसायिक अवसर, समान मुआवजा और मजदूरी कमाने के अधिकार तथा वित देने के अधिकार की मांग की गयी थी । एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन तथा सूसन बराउनवेल एंथनी के नेतृत्व में यह आन्दोलन तेज गति से फैला और जल्दी ही यूरोप तक जा पहुंचा । ब्रिटेन में १८६० के दशक में चुनावी सुधारों के दौर में नारी मताधिकार आन्दोलन भी बड़े पैमाने पर उठ खड़ा हुआ । १८६७ में पारिलियामेंट में स्त्रियों को मताधिकार देने के जे. एस मिल के प्रस्ताव को रद्द कर दिए जाने के बाद कई नगरों में नारी मताधिकार सोसायिटीयों की स्थापना हो गयी, जिनको मिलाकर बाद में राष्ट्रीय एसोसिएशन बनाया गया । अमेरिका में १८६९ में दो नारी मताधिकार संगठनों का गठन हुआ । १८९० में इनकी एकता के बाद राष्ट्रीय अमेरिकी नारी मताधिकार संघ अस्तित्व में आया । १८८२ में फ़्रांसिसी नारी अधिकार लीग का गठन हुआ ।

मुख्यत: उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के प्रभाव में जनवादी चेतना संचरित होने लगी थी जिससे स्त्री समुदाय भी अछूता नहीं रह गया था । इस दौरान लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की आजादी और बराबरी की मांग को लेकर आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो हालाँकि व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के आभाव में मुख्यत: नारीवादी ( Fiminist ) प्रकृति का था, फिर भी यह लातिनी देशों की स्त्रियों की नयी चेतना का द्योतक था । इसी अवधि में पहले जापान, भारत और इंडोनेशिया में और फिर तुर्की और ईरान में नारी आन्दोलन ने अपना पहला कदम आगे बढ़ाया । १८८८ में अमेरिकी नारीवादियों की पहल पर अंतरराष्ट्रीय नारी परिषद (International Council of Women ) की स्थापना हुई । १९०४ में अंतरराष्ट्रीय नारी मताधिकार संश्रय ( International Women Suffrage Alliance) की स्थापना हुई जिसका नाम १९४६ में बदलकर ‘अंतरराष्ट्रीय नारी संश्रय समान अधिकार-समान दायित्व’ (International Alliance of Women – Equal Rights-Equal Responsibilities ) कर दिया गया ।

इस दौरान एक महत्वपूर्ण विकास यह हुआ कि स्त्रियों की नयी चेतना और संघबद्ध होने की आंकाक्षा को देखते हुए उनकी “स्थिति में सुधार” और “उनके विकास” की आड़ लेकर आध्यात्मिक, धार्मिक सुधारवादी और संकीर्ण राष्ट्रवादी ग्रुपों ने भी भांति-भांति के नारी संगठनों की स्थापना की जिनका मूल उद्देश्य स्त्रियों की मुक्तिकामी आकांक्षा को सुधारों के दायरे में कैद करना, उन्हें मजदूर आंदोलनों, क्रांतिकारी बुर्जुआ जनवादी आंदोलनों और राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के प्रभाव से दूर रखना तथा इस तरह निहित वर्ग स्वार्थों की सेवा करना था ।

4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा


नारी आंदोलनों में सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण के विकास की प्रक्रिया उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में शुरू हई । नारी-प्रश्न के वर्गीय आधारों को उद्घाटित करते हुए मार्क्स और एंगेल्स ने  पहली बार यह स्पष्ट किया कि निजी सम्पत्ति और वर्गीय समाज के संघटन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही स्त्री की दासता की शुरुआत हुई । उन्होंने स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में कामगार स्त्रियाँ निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम होने के साथ-साथ यौन आधार पर शोषण-उत्पीडन का शिकार तो हैं ही, सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ भी सामाजिक श्रम से कटी हुयी या तो नारकीय घरेलू दासता एवं पुरुष स्वामित्व के बोझ से दबी हुई हैं या बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के लिए आरक्षित कुछ विशिष्ट अपमानजनक पेशों में लगी हुयी निहायत निरंकुश स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं । उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में मेहनतकश स्त्रियों की समस्यायों का समाधान असंभव है और स्त्री समुदाय की सच्ची मुक्ति की दिशा में पहला कदम पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था का खात्मा है ।

मार्क्स-एंगेल्स ने यह स्पष्ट किया कि नारी मुक्ति  की दिशा में पहला कदम यह होगा कि स्त्री मजदूरों की वर्ग चेतना को उन्नत किया जाये, सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ाई जाये और उन्हें मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलनों में शामिल किया जाये । पहले इंटरनेशनल ने नारी मजदूरों के श्रम के संरक्षण से संबंधित दो प्रस्ताव पारित किये थे । इन प्रस्तावों ने स्त्रियों के उत्पीडन और उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व एवं मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के बीच अंतर्संबंधों को उद्घाटित  करने के साथ ही नारी अधिकारों के प्रति प्रूधोंवादी दृष्टिकोण के दिवालियेपन को भी उजागर कर दिया । प्रूधों और उसके चेले सामाजिक रूप से उपयोगी श्रम में स्त्रियों की भागीदारी का विरोध करते थे और उनकी सामाजिक समानता की बात करते हुए भी परिवार और बच्चों की देखभाल ही उनकी प्रमुख जिम्मेदारी मानते थे ।  स्त्री कामगारों के श्रम-संरक्षण संबंधी पहले इंटरनेशनल के निर्णय ने सर्वहारा नारी आन्दोलन के विकास का सैद्धांतिक आधार तैयार करने का काम किया । मार्क्स-एंगेल्स ने, और आगे चलकर लेनिन, स्टालिन और माओ ने — अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के इन पाँचों महान शिक्षकों ने कामगार औरतों की उत्पीडित आबादी को सर्वहारा क्रांति की सबसे बड़ी आरक्षित शक्ति ( Greatest Reserve ) के रूप में देखा । सर्वहारा क्रांति और स्त्री प्रश्न के समाधान के द्वंदात्मक अंतर्संबंधों को निरुपित करते हुए लेनिन ने लिखा था, ” स्त्रियों के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल किये बिना सर्वहारा अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं हासिल कर सकता ।”

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में क्रांतिकारी संघर्षों में, विशेषकर १८७१ के युगांतरकारी पेरिस कम्यून में शौर्यपूर्ण भागीदारी के साथ ही स्त्रियों ने राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में स्वतंत्र रूप से भी हिस्सा लिया और अपने संगठन बनाये । फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन में स्त्रियों ने अपनी ट्रेड युनियने संगठित कीं ।  उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में फ़्रांस और ब्रिटेन में स्त्री कामगारों के कई संगठन पहले इंटरनेशनल में भी शामिल हुए । जर्मन कामगार औरतें ‘ इंटरनेशनल प्रोफेशनल एसोसियेशन ऑफ मैन्युफैक्चरी , इंडस्ट्रियल एंड हैंडीक्राफ्ट  वर्कर्स’ में शामिल हो गयीं जिसकी स्थापना १८६९ में क्रिम्मित्स्चू (सैक्सनी) में हुई थी और जो इंटरनेशनल के विचारों से प्रभावित था । स्त्री-प्रश्न पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण को विकसित और व्याख्यायित करने में तथा वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित सर्वहारा नारी आंदोलनों को विकसित करने में बेबेल की सुप्रिसिद्ध कृति ‘नारी और समाजवाद’ (Women and Socialism ) ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में मजदूर स्त्रियों का आन्दोलन जर्मनी में सर्वाधिक तेज गति से विकसित हुआ । १८९१ में जर्मनी की सामाजिक जनवादी पार्टी ने अपने कार्यक्रम (एर्फुर्ट कार्यक्रम ) में नारी मताधिकार की मांग को शामिल किया । पार्टी ने स्त्रियों-पुरुषों की सांगठनिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार किया और ट्रेड यूनियनों में स्त्रियों की भरती के विशेष प्रयास शुरू किये गये । १८९१ में स्त्री कामगारों की एक पत्रिका -Gleichcheit – का प्रकाशन भी शुरू हुआ जो १८९२ से १९१७ तक क्लारा जेटकिन के निर्देशन में प्रकाशित होती रही । सन १९०० से जर्मनी भर में नियमित नारी सम्मेलनों के आयोजन की शुरुआत हुई ।

पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली की अपनी जरूरतों के चलते और सर्वहारा आंदोलनों और विशेष तौर पर नारी आंदोलनों की विविध धाराओं-प्रवृतियों के दबाव के नाते उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यूरोप में स्त्रियों की शिक्षा और श्रम-संरक्षण से संबंधित कई कानून बने और उनकी कानूनी हैसियत में कुछ महत्वपूर्ण सुधार हुए । उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में १८४७ में ही स्त्रियों का श्रम दिवस दस घंटे का कर दिया गया था । मार्क्सवाद के संस्थापकों ने इस कानून को मजदूर वर्ग की एक बड़ी जीत की संज्ञा दी थी । स्त्री मजदूरों के संरक्षण से संबंधित कई अन्य कानून इस दौरान विभिन्न यूरोपीय देशों में बने । स्त्रियाँ  ट्रेड युनियनों में शामिल होने लगीं । १८८९ में ट्रेड यूनियन्स कांग्रेस में उनकी सदस्यता का प्रश्न सारत: हल हो गया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही स्त्री आन्दोलन के दबाव में, पहले सम्पन्न और फिर आम परिवारों की लड़कियों के लिए माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना यूरोप में और फिर एशिया-लातिनी अमेरिका के कुछ देशों में हुई । ब्रिटेन में स्त्रियों को सबसे पहले शिक्षक का पेशा अपनाने का अधिकार मिला । फिर धीरे-धीरे कुछ अन्य क्षेत्रों में भी उन्हें रोजगार के अवसर मिले । १८५८ में ब्रिटेन में स्त्रियों को तलाक का अधिकार प्राप्त हुआ, यद्यपि इस सन्दर्भ में १९३८ तक उनके अधिकार पुरुषों की अपेक्षा कम थे । १८७० से १९०० के बीच ब्रिटिश स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार हासिल किये । १८६९ में कर भुगतान करने वाली स्त्री नागरिकों को म्युनिसिपल चुनावों में भागीदारी का अधिकार मिला और १९१८ में शादीशुदा स्त्रियों तथा ३० वर्ष से अधिक आयु वाली, विश्वविद्यालय डिप्लोमा प्राप्त की हुई स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । १९२८ में २१ वर्ष आयु वाली स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । अमेरिका में स्त्रियों को शिक्षण पेशा अपनाने का अधिकार उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही मिल चुका था । १८५० से १८७० के बीच वहाँ स्त्रियों को तथाकथित “लिबरल” पेशे अपनाने का अधिकार प्राप्त हुआ और १८८० के बाद तथाकथित “पुरुष” पेशों में भी उन्हें स्वीकार किया जाने लगा । १८४८ में वहाँ शादीशुदा औरतों को सम्पत्ति रखने का अधिकार प्राप्त हुआ । १८७४ में वहाँ पहली बार स्त्रियों के श्रम दिवस को सीमित करने का कानून (मैसाचुसेट्स  ) में बना । १९२० में अमेरिकी संविधान में हुए उन्नीसवें संशोधन द्वारा स्त्रियों के मताधिकार पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया गया । फ़्रांस में भी उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार प्राप्त कर लिए थे । १८९२ में उनके श्रम के संरक्षण से संबंधित पहला कानून बना, उनका अधिकतम लम्बा श्रम दिवस ११ घंटे का तय किया गया जिसे १९०४ में घटाकर १० घंटे कर दिया गया । स्त्री मताधिकार संबंधी विधेयक फ़्रांस में पहली बार १८४८ में पेश किया गया था, लेकिन १९४४ में जाकर उन्हें यह अधिकार हासिल हो सका । जर्मनी में औरतों को मत देने का अधिकार १९१९ के वाईमर संविधान द्वारा प्राप्त हुआ था, लेकिन १९३३ में सत्ता में आने के साथ ही नात्सियों ने लम्बे और कठिन संघर्षों द्वारा अर्जित उनके सभी राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों को समाप्त कर दिया ।

इन कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की चर्चा के बाद, संक्षेप में, इतना ही उल्लेख यहाँ पर्याप्त है कि कुछ एक अपवादों को छोडकर, पश्चिमी देशों की स्त्रियों ने बीसवीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते बुर्जुआ सामाजिक ढांचे के भीतर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लिए थे । पर यह कहते हुए कुछ बातों को रेखांकित करना निहायत जरूरी है । पहली बात यह कि कानूनी तौर पर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लेने के बावजूद वास्तव में आज तक उन्हें सामाजिक समानता प्राप्त नहीं है । वे दोयम दर्जे की नागरिक हैं । काम करने वाली औरतें वहाँ असंगठित क्षेत्र में सस्ता श्रम बेचने को बाध्य हैं और निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम हैं । मुख्यत: मध्यम वर्ग और अन्य सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ और सामान्यत: सभी स्त्रियाँ वहाँ घरेलू दासता से पूर्णत: मुक्त नहीं हो सकी हैं । जीवन के हर क्षेत्र में उन्हें आर्थिक शोषण के साथ ही यौन-उत्पीडन का भी शिकार होना पड़ता है । धार्मिक मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही, तरह-तरह की फासिस्ट प्रवृतियों और साथ ही बीमार बुर्जुआ संस्कृति का दबाव भी उन्हें ही सबसे अधिक झेलना पड़ता है । अभी भी गर्भपात और तलाक से लेकर बलात्कार तक — बहुत सारे मामलों में, पश्चिमी देशों में कानून स्त्रियों के प्रति भेदभावपूर्ण बने हुए हैं । दूसरी बात यह है कि पश्चिम की स्त्रियों ने जो भी अधिकार प्राप्त किये हैं, वह उन्हें  बुर्जुआ समाज ने तोहफे के तौर पर नहीं दिए हैं । ये अधिकार सामाजिक क्रांतियों, वर्ग-संघर्षों और नारी समुदाय के शताब्दियों लम्बे संघर्ष द्वारा अर्जित हुए हैं । बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों में व्यापक आम जनता और स्त्रियों की भागीदारी के दौर में स्त्रियों को अपने नागरिक अधिकारों की पहली किश्त हासिल हुई । राज्यसत्ता पर काबिज होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने जब आम जनता पर अपना अधिनायकत्व लागू किया तो स्त्रियों के जनवादी अधिकारों को भी उसने हडपने की हर कोशिश की और केवल उसी हद तक उन्हें नागरिकता के अधिकार दिए जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली की जरूरत थी । पुन: उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब क्रांतियों का नया विस्फोट हुआ और सर्वहारा वर्ग राजनीतिक संघर्ष के मंच पर उतरा तो नारी आन्दोलन को भी महत्वपूर्ण संवेग प्राप्त हुआ और बाद के पचास वर्षों के संघर्षों के दौरान पश्चिम में नारी समुदाय ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित कीं । इस समय मजदूर स्त्रियाँ नारी मध्यवर्गीय स्त्रियों के आगे आ खड़ी हुई थीं । बीसवीं शताब्दी में, अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत संघ में, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोपीय देशों में और १९४९ की नई जनवादी क्रांति के बाद चीन में तथा मेहनतकशों के शासन वाले कुछ अन्य देशों में स्त्री समुदाय ने पहली बार समानता के जो अधिकार अर्जित किये, उनसे भी पश्चिमी देशों की और साथ ही राष्ट्रीय जनवाद की लड़ाई लड़ रहे एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों की मुक्तिकामी स्त्रियों के आंदोलनों को भी नई प्रेरणा और नया संवेग प्राप्त हुआ । तीसरी बात जो गौरतलब है, वह यह कि उन्नीसवीं शताब्दी में, जब तक यूरोप क्रांतियों का केंद्र रहा, तभी तक नारी आन्दोलन वहाँ तेजी से विकसित होता हुआ एक के बाद एक नई जीतें हासिल करता रहा । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू में विश्व पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में संक्रमण के बाद क्रांतियों का केंद्र खिसककर जब रूस और एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों-नवउपनिवेशों में आ गया तो नारी आन्दोलन का मुख्य रंगमंच भी इन्हीं देशों में स्थानांतरित हो गया । यह वस्तुगत ऐतिहासिक तथ्य इसी सत्य को पुष्ट करता है कि नारी आन्दोलन, उसका भविष्य और उसकी जीत-हार की नियति सामाजिक संघर्षों और क्रांतियों के साथ अविभाज्यत: जुडी हुई है । आगे हम सर्वहारा क्रांतियों की धारा और उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों की धारा के साथ जारी नारी मुक्ति आंदोलनों की अत्यंत संक्षिप्त चर्चा करेंगे ।

5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन

मार्क्स-एंगेल्स के बाद लेनिन ने नारी-प्रश्न पर मार्क्सवादी चिंतन को आगे बढाया । लेनिन के काल में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन में कामगार औरतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने की प्रक्रिया उन्नत धरातल पर शुरू हुई. नारी-मुक्ति के प्रश्न पर लेनिन के कई महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अवदान थे । बुर्जुआ नारीवाद की नारी-मुक्ति विषयक वर्गेतर सोच और “यौन मुक्ति” की बुर्जुआ अवधारणाओं के साथ ही उन्होंने मार्क्सवाद से प्रेरित नारी-मुक्ति आन्दोलन की धारा में मौजूद कई अवैज्ञानिक धारणाओं और विजातीय रुझानों का विरोध किया । स्वतन्त्रता का अर्थ असामाजिक स्वच्छंदता और पुरुष के शोषण से मुक्ति का अर्थ “यौन मुक्ति” नहीं होता, यह कम्युनिस्ट नैतिकता और विज्ञान के विरुद्ध है — इसे लेनिन ने एकाधिक बार स्पष्ट किया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में क्लारा जेटकिन, क्रुप्सकाया, अलेक्सांद्रा कोल्लोंताई और अनेंसा आरमाँ आदि कम्युनिस्ट नेत्रियों ने अपनी सक्रियताओं और लेखन के द्वारा भी नारी मुक्ति के मोर्चे पर अहम भूमिका निभाई । इन अग्रणी व्यक्तित्वों के साथ लेनिन के वाद-विवाद और विचार-विमर्श के दौरान नारी मुक्ति के कई पक्षों पर मार्क्सवादी अवस्थिति महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुई ।

बीसवीं शताब्दी के शुरू होते-होते सर्वहारा नारी आन्दोलन के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के लिए पूर्वपीठिका तैयार हो चुकी थी । दूसरे इंटरनेशनल की कांग्रेस में नारी आन्दोलन और नारी समस्या के विविध पहलुओं पर नियमित रूप से बहसें हुआ करती थीं । १८९३ में ज्यूरिख कांग्रेस में यह कहा गया की स्त्रियों के श्रम के कानूनी संरक्ष्ण को पूरा समर्थन देना पूरी दुनिया के मजदूरों का कर्तव्य है । दूसरे इंटरनेशनल की लन्दन कांग्रेस (१८९६) को महिला प्रतिनिधियों के सम्मेलन ने स्त्री-पुरुष– दोनों ही समुदायों के सर्वहारा वर्ग के आम संगठन को स्वीकृति देने के साथ ही इस बात पर जोर दिया कि मेहनतकश वर्गों के नारी आन्दोलन और नारीवाद (Feminism ) के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खिंची जानी चाहिए ।

स्त्री समाजवादियों के पहले और दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (स्टुट्गार्ट, १९०७ और कोपेनहेगेन, १९१० ) मेहनतकश नारी आन्दोलन की विकास-यात्रा के दो महत्वपूर्ण मील पत्थर थे । पहले सम्मेलन ने बिना किसी लिंग-भेद के सार्विक एवं समान मताधिकार का प्रस्ताव पारित किया जिसे दूसरे इंटरनेशनल के स्टुट्गार्ट कांग्रेस ने भी स्वीकार किया । पहले सम्म्मेलन की प्रतिनिधियों ने क्लारा जेटकिन की अध्यक्षता में एक अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना करने और उसके मुखपत्र के प्रकाशन का भी निर्णय लिया । दूसरे सम्म्मेलन में सत्रह देशों की महिला प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । इसी सम्मेलन में प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब दक्षिणपंथी अवसरवादी काउत्स्की और उसके अनुयाइयों के विश्वासघात के कारण अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन में फूट पड़ी ठीक उसी समय मेहनतकश नारी आन्दोलन को भी एक गंभीर धक्का लगा ।  अधिकांश सामाजिक जनवादी स्त्री संगठनों ने भी विश्वयुद्ध में काउत्स्कीपंथियों की ही भांति अंधराष्ट्रवादी अवस्थिति अपनाई । बुर्जुआ नारीवादी संगठन तो पहले से ही यही अवस्थिति अपनाए हुए थे । लेकिन बोलेशेविक प्रस्ताव को ख़ारिज करके एक शांतिवादी प्रस्ताव स्वीकार करने के बावजूद बर्न अंतरराष्ट्रीय स्त्री समाजवादी सम्मेलन (१९१५) ने, जो बोलेशेविकों की पहल पर आयोजित हुई थी, समाजवादी अवस्थिति अपनाने वाली स्त्री समाजवादियों की एकता को बहाल रखने में अहम भूमिका निभाई । युद्ध के दौरान युद्ध में शामिल देशों की स्त्रियों ने भुखमरी और बदहाली के खिलाफ कई प्रदर्शन आयोजित किये । ८ मार्च (२३ फरवरी ) १९१७ को बोलेशेविकों की पेत्रोग्राद कमेटी की अपील पर भुखमरी, युद्ध और जारशाही के विरुद्ध रुसी स्त्रियों के प्रदर्शन ने एक व्यापक जनांदोलन का सूत्रपात किया जिसकी चरम परिणति फरवरी क्रांति के रूप में सामने आई । अक्टूबर समाजवादी क्रांति की तैयारी में रूस की महिला मजदूरों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । क्रांति के बाद सोवियत संघ में नारी आन्दोलन ने हर संभव तरीके से समाजवादी निर्माण के कामों को आगे बढ़ाने में, समाजवाद की रक्षा में और सामाजिक-राजनीतिक जीवन में आम स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने में एक अग्रणी भूमिका निभाई । समाजवादी सोवियत संघ की सर्वहारा राज्यसत्ता ने दुनिया के इतिहास में पहली बार न केवल स्त्री समुदाय को कानूनी तौर पर पुरुषों के साथ पूर्ण समानता के अवसर प्रदान किये बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में व्यवहारत: इसे लागू करने की दिशा में भी हर संभव कदम उठाये । सोवियत संघ स्त्री-मुक्ति के सन्दर्भ में भी पूरी दुनिया के लिए एक नया प्रकाश स्तंभ बन गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अक्टूबर क्रांति के प्रभाव में पूरी दुनिया में नारी आन्दोलन में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई । एक ओर जहाँ आम उत्पीडित नारी समुदाय समाजवाद की विचारधारा की ओर तेजी से आकृष्ट हुआ, वहीँ बुर्जुआ नारी संगठनों ने ज्यादा से ज्यादा खुले तौर पर बुर्जुआ व्यवस्था की हिफाजत का काम शुरू कर दिया । यूरोप की संशोधनवादी सामाजिक जनवादी पार्टियों ने पूंजीवाद की दूसरी सुरक्षापंक्ति का काम करते हुए स्त्रियों के बीच अपनी गतिविधियाँ तेज कर दीं ।

सोवियत संघ के बाहर, सर्वहारा विचारधारा पर आधारित नारी आन्दोलन ने १९२० के दशक में सुनिश्चित शक्ल अख्तियार करना शुरू किया । नारी आन्दोलन को क्रान्तिकारी आन्दोलन का अपरिहार्य बुनियादी अंग मानते हुए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कांग्रेस में मेहनतकश स्त्रियों के बीच कम्युनिस्टों के काम के प्रश्न पर लगातार गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श होता रहा । १९२० में कोमिन्टर्न के निर्देशन में अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना हुई जिसकी सेक्रेटरी क्लारा जेटकिन थीं । महिला कम्युनिस्टों का एक प्रेस भी स्थापित हुआ और एक अंतरराष्ट्रीय महिला पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ । १९२० से १९२६ के बीच महिला कम्युनिस्टों के चार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुए ।

यद्यपि नारी आन्दोलन पर दूसरे इंटरनेशनल के विचारधारात्मक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने महिला कम्युनिस्ट संगठनों के कामों पर विशेष जोर दिया, पर लेनिन और इंटरनेशनल के अन्य अग्रणी नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि स्त्रियों के गैर-पार्टी संगठन और सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों की मांगों को लेकर संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठन भी बनाये जाने चाहिए जिसमें मेहनतकश स्त्रियों के अतिरिक्त जनता के अन्य वर्गों की स्त्रियाँ भी हिस्सा लें । सोवियत संघ के बाहर के देशों में नारी आदोलन में मौजूद संकीर्णतावादी भटकावों और संगठनों की कमजोरी के कारण व्यापक स्त्रियों को उनके जनवादी अधिकारों की मांग और यौन-असमानता के विरोध के आधार पर संगठित करने में तीसरे दशक तक तो कोई विशेष सफलता नहीं प्राप्त हो सकी, लेकिन चौथे दशक में फासिज्म के उभार ने तात्कालिक रूप से, वस्तुगत तौर पर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं कि फासिज्म और साम्राज्यवादी युद्ध-विरोधी संयुक्त मोर्चे में जनता के सभी वर्गों की — विशेषकर कामगार और मध्यम वर्ग की स्त्रियों के संगठित होने की प्रक्रिया शुरू हो गई । जहाँ भी फासिस्ट ताकतें सत्ता में आयीं, प्रगतिशील नारी संगठनों के साथ ही उन्होंने उन बुर्जुआ नारी संगठनों को भी कुचल दिया जो नारी मुक्ति या स्त्रियों के समान अधिकारों की बात करती थीं । इसके साथ ही फासिज्म-विरोधी लोक मोर्चे के एक अंग के रूप में एक जनवादी, फासिज्म-विरोधी नारी आन्दोलन के संघटित होने की प्रक्रिया शुरू हो गयी । अगस्त १९३४ में सोवियत संघ सहित कई देशों के प्रगतिशील नारी संगठनों की पहल पर पेरिस में युद्ध  और फासिज्म-विरोधी महिला विश्व कांग्रेस आयोजित हुआ जिसमें कम्युनिस्ट शांतिवादी, नारीवादी और क्रिश्चियन समाजवादी स्त्री संगठनों एवं ग्रुपों के कुल १०९६ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । कांग्रेस में युद्ध और फासिज्म-विरोधी विश्व महिला कमेटी का गठन किया गया । पुन: मई १९३८ में मार्सिइएज (Marseillis) में युद्ध-विरोधी अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन का आयोजन हुआ ।

यद्यपि विश्वयुद्ध के दौरान जनवादी महिला आन्दोलन के विकास की दिशा में सांगठनिक-परिमाणात्मक शक्ति की दृष्टि से कोई बहुत महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई, लेकिन फासिज्म के रूप में सामने आई बुर्जुआ अधिनायकत्व की नग्नता ने और उसके विश्वव्यापी प्रतिरोध ने इसके लिए आवश्यक पूर्वाधार तैयार कर दिया ।

जिन उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में मुक्तियुद्ध जारी थे, वहां पहले से ही जनवादी नारी आन्दोलन के संगठित होने की प्रक्रिया जारी थी । फासिज्म-विरोधी संघर्ष के अनुभवों, फासिज्म की पराजय, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादी शक्तियों के निर्बल हो जाने और एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर के उठ खड़े होने के व्यापक प्रभाव दुनिया की आधी आबादी की चेतना पर और नारी आन्दोलन पर भी पड़ा । तीसरी दुनिया के देशों में उपनिवेशवाद की पराजय की प्रक्रिया शुरू होने के इस दौर में उन अधिकांश देशों में समाजवाद को सच्चा मित्र मानने वाला जनवादी नारी आन्दोलन शक्तिशाली होता चला गया । चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जारी मुक्ति-संघर्ष में स्त्रियों की भागीदारी और मुक्त क्षेत्रों में उनकी सामाजिक स्थिति पहले से ही दुनिया भर के पिछड़े देशों की स्त्रियों को आकृष्ट कर रही थी । १९४९ में नई जनवादी क्रांति संपन्न होने के बाद मध्ययुगीन पित्रसत्तात्मक स्वेच्छाचारिता से भरे समाज में स्त्रियों को पूर्ण बराबरी का कानूनी दर्ज़ा देकर और फिर समाज में उसे एक वास्तविकता में रूपांतरित करने की शुरुआत करके चीन के सर्वहारा राज्य ने ऐतिहासिक काम किया था उस पर पूरी दुनिया की स्त्रियों और मुक्तिकामी जनता की निगाहें टिकी हुई थीं । द्वितीय विश्व्यद्धोत्तर काल में पश्चिम के देशों की स्त्रियाँ भी अपने जनवादी अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने की जरूरत शिद्दत के साथ महसूस कर रहीं थीं ।

इन्हीं परिस्थितियों में, अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन ने आगे की ओर कुछ महत्वपूर्ण डग भरे । इनमें सर्वाधिक महत्पूर्ण कदम था दिसंबर, १९४५ में महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ( Women’s International Democratic Federation — W.I.D.F.) की स्थापना, जिसमें ३९ देशों के राष्ट्रीय स्त्री-संगठनों ने भाग लिया । महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ने स्त्रियों की आम मांगों को लेकर अलग-अलग देशों में और विश्व स्तर पर सक्रिय विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्त्री संगठनों के साथ साझा कार्रवाइयों की भी कोशिश की, लेकिन उस समय पूरी दुनिया में जारी कम्युनिज्म-विरोधी मुहीम के प्रभाव में बहुत सारे बुर्जुआ, तथाकथित परम्परागत स्त्री संगठनों के नेतृत्व ने इसे स्वीकार नहीं किया ।

१९५६ में रूस में ख्रुश्चेव द्वारा प्रतिक्रांतिकारी तख्तापलट और रूस तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना ने विष-स्तर पर जारी वर्ग-संघर्ष को भारी धक्का पहुँचाने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन को भी भारी नुकसान पहुँचाया । साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष, पूंजीवादी देशों में और तीसरी दुनिया के नवस्वाधीन देशों में जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष और व्यवस्था-विरोधी संघर्ष में स्त्री आन्दोलन की क्रान्तिकारी भागीदारी के विपरीत — संशोधनवादियों ने दुनिया भर में नारी मुक्ति आन्दोलन को सुधारवाद और शांतिवाद के दलदल में ले जाकर धंसा देने की हर चंद कोशिशें कीं और काफी हद तक इसमें सफलता भी प्राप्त की । यही कारण था कि छठे दशक के अंत तक दुनिया भर के नारी आन्दोलन में गतिरोध और शून्य की सी स्थिति उत्पन्न हो गयी थी । यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसमें बुर्जुआ नारीवाद के नये उभार ने सातवें दशक में जन्म लिया ।

6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन

जैसाकि उपर उल्लेख किया जा चुका है, पश्चिम के देशों में बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों की पूर्वपीठिका तैयार होने के साथ ही, यानि प्रबोधन काल (Age of Enlightenment ) के दौर में नारी मुक्ति की चेतना का जन्म हुआ और बुर्जुआ क्रांतियों के दौर में स्त्री समुदाय ने अपने सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी ।

एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों में बुर्जुआ विकास का स्वरूप यूरोप जैसा नहीं रहा । यहाँ बुर्जुआ वर्ग पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रांति की प्रक्रिया से गुजरकर सत्ता में नहीं आया । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों के पूर्ण औपनिवेशीकरण के बाद वहाँ की पुरानी सामाजिक-आर्थिक संरचना को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया । बाद में इन देशों में औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से जिस बुर्जुआ वर्ग का जन्म हुआ, वह एक समझौतापरस्त वर्ग था । वह अमेरिका या फ़्रांसिसी क्रांति के वाहक बुर्जुआ वर्ग की भांति क्रान्तिकारी भौतिकवाद और जनवाद के मूल्यों से लैस नहीं था । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों में इसी बुर्जुआ वर्ग ने अलग-अलग परिस्थितियों में कहीं एक हद तक क्रान्तिकारी संघर्ष करके तो कहीं ‘समझौता-दबाव-समझौता’ की रणनीति अपनाकर और कहीं पूरी तरह साम्राज्यवाद के साथ समझौता करके सत्ता हासिल की । तीसरी दुनिया के इस बुर्जुआ वर्ग की राजनीतिक स्वतन्त्रता भी उनके चरित्र और उनके संघर्ष या समझौते की प्रकृति के ही अनुरूप कम या ज्यादा थी, पर कहीं भी इस नये बुर्जुआ वर्ग ने न तो साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद किया और न ही क्लासिकीय अर्थों में उस रूप में जनवाद को ही बहाल किया, जैसाकि फ़्रांस या अमेरिका के बुर्जुआ वर्ग ने किया था ।

इन सभी देशों में नारी आन्दोलन के उद्भव और विकास की प्रक्रिया और उसका चरित्र भी इन देशों के इतिहास की उपरोक्त विशिष्टता से ही निर्धारितहुआ ।

एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी प्रक्रिया घटित न होने के कारण इन देशों के सामाजिक जीवन एवं मूल्यों में जनवादी मूल्यों-मान्यताओं की व्याप्ति अत्यंत कम थी और नारी समुदाय उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में भी मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था और मूल्यों-मान्यताओं के बंधन में जकड़ा रहा । काफी हद तक यह स्थिति आज भी बनी हुई है । फिर भी उन्नीसवीं शताब्दी में नारी मुक्ति की जो चेतना तीसरी दुनिया के देशों के नारी समुदाय में संचरित हुई, उसकी प्रक्रिया राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के दौर में शुरू हुई ।

अधिकांश लातिन अमेरिका देशों (जैसे मैक्सिको, क्यूबा, ब्राज़ील, हैती, निकारागुआ आदि ) में स्पेनी उपनिवेशवादियों के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हो चुकी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में लातिन अमेरिका देशों में स्त्रियों के संगठनों के बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, हालाँकि यह मध्यवर्गीय शिक्षित मिश्रित आबादी से नीचे मूल इंडियन आबादी तक नहीं पहुँच पाई थी और इन संगठनों की प्रकृति सारत: बुर्जुआ नारीवादी थी । बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में मैक्सिको और ब्राज़ील की अधूरी राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों और क्यूबा, निकारागुआ आदि देशों में उग्र रूप से जारी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों ने पूरे लातिन अमेरिका में नारी मुक्ति आन्दोलन को भी नया संवेग प्रदान किया । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत सारे लातिन अमेरिकी देशों में कम्युनिस्ट संगठनों के बनने की प्रक्रिया भी दूसरे इंटरनेशनल के काल में ही शुरू हो चुकी थी और इस शताब्दी के तीसरे दशक तक अधिकांश देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थापना हो चुकी थी । सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों और क्रांतिकारी मध्यमवर्ग के क्रांतिकारी संघर्षों की लंबी परम्परा ने भी लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति और उनके आन्दोलन पर विशेष प्रभाव डाला । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी नवउपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों का जो नया चक्र लातिनी देशों में शुरू हुआ, उसने आम मध्यवर्गीय और कामगार स्त्रियों को भी और काफी हद तक मूल आबादी की स्त्रियों को भी संघर्ष की मुख्य धारा से जोड़ने के साथ ही स्त्री-मुक्ति की धारा से भी जोड़ने में कामयाबी हासिल की ।

ख्रुश्चेवी लहर से लेकर गोर्बचोवी लहर तक के प्रतिकूल प्रभाव लातिन अमेरिकी जनता के मुक्ति-संघर्षों पर भी पड़े और मुख्यत: संशोधनवादी प्रभाव के चलते आज इन देशों के कई छापामार मुक्ति संघर्षों का (जैसे, अलसल्वाडोर, कोलम्बिया आदि में ) विघटन हो चूका है । कई सारी क्रांतियाँ (जैसे क्यूबा, निकारागुआ आदि ) अपने मध्यवर्गीय नेतृत्व के चरित्र के अनुरूप अपने अधूरे कार्यभारों को पूरा करने के बाद या तो विफिल हो चुकी हैं या विपथगमन कर चुकी हैं । इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव वहाँ के नारी आन्दोलन पर भी पड़ा है । लेकिन आज फिर पेरू में वहाँ की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वहाँ की स्त्रियाँ छापामार सेना और जनकार्रवाइयों में हिस्सा ले रही हैं, आधार इलाकों में लोक कमेटियों में शामिल होकर राजनीतिक कार्यों में, सामाजिक गतिविधियों में तथा सामाजिक उत्पादन में बराबरी की हिस्सेदारी कर रही हैं और साथ ही उन्होंने क्रांतिकारी जनसंगठनों के रूप में अपने संगठन बनाये हैं ।

काले अफ़्रीकी देशों में स्त्रियों ने वर्गीय समाज की गुलामी से औपनिवेशिक काल में ही पहली बार साक्षात्कार किया । दास समाज और सामंती समाज की पितृसत्तात्मक गुलामी के लंबे अतीत और सामन्ती पार्थक्य से वंचित रहने के कारण, पचास और साठ के दशक में राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के विस्फोट के साथ ही स्त्रियों की भारी आबादी उनमें शामिल हुई । नवस्वाधीन अफ़्रीकी देशों की स्त्रियों ने अपने लिए महत्वपूर्ण जनवादी अधिकार अर्जित किये । पर अब इन देशों का विकास गतिरुद्ध हो चुका है और केवल विश्व पूंजीवाद से निर्णायक विच्छेद करके, नई सर्वहारा क्रांतियाँ ही पुन: इन्हें प्रगतिपथ पर आगे बढ़ा सकती हैं । आज अफ़्रीकी देशों में भी पूंजी की सत्ता और यौन-असमानता की शिकार नारी समुदाय के नये आन्दोलन और स्वतंत्र संगठनों के गठन का वस्तुगत आधार तैयार है, पर उनका भविष्य क्रांतियों के नये चक्र की शुरुआत के साथ जुडा हुआ है ।

तुर्की, ईरान और मिस्र में नारी आन्दोलन की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में राष्ट्रीय जनवाद के लिए संघर्ष शुरू होने के साथ ही हो चुकी थी और स्त्रियों ने वहाँ लंबे संघर्ष के दौरान कई जनवादी अधिकार प्राप्त किये, पर फ़िलहाल वहाँ भी नारी मुक्ति-संघर्ष आज ठहराव और गतिरोध का शिकार है । सीरिया और इराक में भी सामाजिक-राजनीतिक जीवन में स्त्रियों ने कुछ महत्वपूर्ण अधिकार अर्जित कर लिए हैं, पर वर्तमान गतिरोध आज वहाँ की भी सच्चाई है । अरब अफ़्रीकी और पश्चिमी एशिया के अन्य अधिकांश मुस्लिम देशों में स्त्रियाँ आज भी अपने सामाजिक अधिकारों से वंचित पूरी तरह मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक गुलामी और सामन्ती पार्थक्य का शिकार बनी हुई हैं । साम्राज्यवादियों के टट्टू प्रतिक्रियावादी शेखों और शाहों के विरुद्ध जब तक इन देशों में जनक्रांतियाँ आगे कदम नहीं बढ़ाएंगी, तब तक नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रक्रिया वहाँ संवेग नहीं ग्रहण कर सकती ।

एशिया के अन्य देशों में चीन और वियतनाम, कोरिया आदि जिन देशों में साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधी संघर्ष का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग ने किया और जहाँ कुछ दशकों के लिए भी सर्वहारा सत्ता कायम रह सकी, उन देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के बावजूद आज भी स्त्रियों की सभी उपलब्धियां खोई नहीं हैं । आज भी अन्य एशियाई देशों की तुलना में स्त्रियों की इन देशों में वास्तव में अधिक सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं, यद्यपि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि चीन, वियतनाम आदि देशों में आज पूंजीवाद की लहर ने न केवल उन्हें निकृष्टतम कोटि का उजरती मजदूर बना दिया है और न केवल उनके अधिकारों में कटौतियां की जा रही हैं, बल्कि अब इन देशों में नारी-विरोधी अपराधों की भी भरमार हो गई है ।

भारत और एशिया के अन्य कई देशों में यद्यपि नारी मुक्ति-आन्दोलन की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही हो चुकी थी, पर राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व के समझौतापरस्त चरित्र के कारण इन देशों में जीवन के अन्य क्षेत्रों की ही भांति नारी अधिकार आन्दोलन के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी जनवादी मूल्यों की लड़ाई क्रांतिकारी और व्यापक पैमाने पर नहीं लड़ी गई । मध्यवर्गीय क्रांतिकारी आन्दोलन और सर्वहारा आन्दोलन की धाराएं अपनी जिन अन्तर्निहित कमजोरियों के कारण राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग के हाथों से नहीं छीन सकीं, उन्हीं कारणों से वे नारी आन्दोलन को भी एक क्रांतिकारी दिशा और संवेग नहीं दे सकीं । लंबे संघर्षों और निरंतरता के बावजूद भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों की स्त्रियों ने जो भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार अर्जित किये, वे बहुत कम थे । यही नहीं, कानूनी और संवैधानिक तौर पर उन्हें समानता के जो अधिकार मिले भी हैं, वे समाजी जीवन में व्याप्त निरंकुश स्वेच्छाचारिता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण मूलत: और मुख्यत: निष्प्रभावी बने हुए हैं ।

राष्ट्रीय आन्दोलन के समझौतापरस्त बुर्जुआ नेतृत्व तथा राष्ट्रीय जनवाद के कार्यभारों के अधूरे और गैरक्रांतिकारी ढंग से पूरा होने के कारण ही भारत, नेपाल आदि पिछड़े देशों में औरतों की गुलामी आज भी अधिक गहरी, व्यापक, निरंकुश और संगठित रूप में कायम है । सीमित हद तक शिक्षा और जनवादी चेतना के प्रसार के बावजूद बहुसंख्यक नारी आबादी आज भी बर्बर निरंकुश दासता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मकता के मूल्यों से जकड़ी हुई है, भयानक अमानवीय पार्थक्य ( Segregation ) की शिकार है और साथ ही पूंजी की सत्ता की उजरती गुलामी के रथ में भी जोत दी गई है । आधी आबादी की अपार क्रांतिकारी सम्भावना सम्पन्न जनशक्ति को निर्बंध क्रांतिकारी चेतना से लैस करना, क्रांतिकारी नारी आन्दोलन को नये सिरे से खड़ा करना और साथ ही सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के हर मोर्चे पर योद्धाओं की कतारों में स्त्रियों को ला खड़ा करना इन सभी देशों में क्रांतियों का एक अत्यंत कठिन लेकिन अनिवार्यत; आवश्यक कार्यभार है ।

तीसरी दुनिया के इन सभी देशों में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के विरुद्ध तथा राष्ट्रीय जनवादी क्रांति के छूटे हुए कार्यभारों को पूरा करने के लिए सर्वहारा क्रांतियों का जो नया चक्र शुरू होगा, अब नारी मुक्ति आन्दोलन का भविष्य भी उसी के साथ द्वंदात्मक रूप से जुडा हुआ है ।

7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति

अक्टूबर क्रान्ति के बाद मानव इतिहास में पहली बार कोई ऐसी राज्यसत्ता अस्तित्व में आयी, जिसने औरतों को हर मायने में सामान अधिकार दिए, समान सुविधाओं के अतिरिक्त हर क्षेत्र में समान काम के अवसर, समान काम के लिए समान वेतन, समान सामजिक राजनीतिक अधिकार, विवाह और तलाक के सम्बन्ध में बराबर अधिकार, अतीत में वेश्यावृत्ति जैसे पेशों के लिए विवश औरतों का सामजिक पुनर्वास आदि अनेकों कदम उठाकर रूस की समाजवादी सरकार नें निस्संदेह एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक काम किया । समाजवादी निर्माण के पूरे दौर में, नारी मुक्ति के क्षेत्र की उपलब्धियां भी अभूतपूर्व थीं । पिछड़े हुए रूसी समाज में क्रान्ति के बाद के चार दशकों में उत्पादन, सामजिक-राजनीतिक कार्रवाईयों , सामरिक मोर्चे और बौद्धिक गतिविधियों के दायरे में जितनी तेजी से औरतों की हिस्सेदारी बढ़ी, वह रफ़्तार जनवादी क्रांतियों के बाद यूरोप-अमेरिका के देशों में पूरी दो शताब्दियों के दौरान कभी नहीं रही थी । चंद-एक दशकों में ही सोवियत समाज से यौन अपराध और यौन रोगों का पूर्ण उच्छेदन हो गया, इस तथ्य को पश्चिम का मीडिया भी स्वीकार करता था । खेतों कारखानों में उत्पादन के मोर्चे पर ही नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चे पर भी लाखों सोवियत वीरांगनाओं नें जिस शौर्य और साहस का परिचय दिया था, उसने काफी हद तक इस सच्चाई को सत्यापित कर दिया कि नारी समुदाय की सीमा सिर्फ यही है कि उसे समाज में पुरुषों के साथ बराबरी की स्थिति, अवसर और परिवेश नहीं प्राप्त है ।

लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजवादी समाज में नारी समुदाय यौन-शोषण-उत्पीड़न से तथा आर्थिक शोषण से पूरी तरह मुक्त हो चुका होता है और पूर्ण समता की स्थिति कायम हो गयी होती है । ऐसा न तो कभी हुआ था और न ही ऐसा हो पाना संभव ही है । इस मुद्दे पर स्पष्टता के लिए जरूरी है कि पहले समाजवाद की अंतर्रचना को ही भली-भाँती समझ लिया जाये ।

समाजवाद एक स्थायी सामाजिक आर्थिक संरचना नहीं है । यह पूँजीवाद और वर्गविहीन समाज के बीच का एक लम्बा संक्रमणकाल है । इस दौर में छोटे पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन लम्बे समय तक बना रहता है, बाजार के नियम काम कार्य रहते हैं, माल-अर्थव्यवस्था भी मौजूद रहती है और इनके आधार पर पूंजीवादी मूल्य-मान्यताएं-संस्कृति रोज-रोज, हर क्षण पैदा होती रहती हैं, पूंजीवादी राज्यतंत्र के नाश के बाद भी पुराने समाज की वैचारिक-सामजिक-सांस्कृतिक अधिरचनाएं लगातार मौजूद रहती हैं और समाजवाद के विरूद्ध, एवं उसे ख़त्म कर देने के लिए लगातार एक भौतिक शक्ति का काम करती रहती हैं । वर्ग संघर्ष जारी रहता है और उत्तरोत्तर तीखा होता जाता है । सर्वहारा का राज्य और सर्वहारा की पार्टी लगातार पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली और मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के विरूद्ध कारगर ढंग से संघर्ष को जारी रखते हुए ही समाजवादी समाज को उस मंजिल तक पंहुचा सकती हैं, जहां वस्तु का बाजार मूल्य पूर्णतः समाप्त हो जाता है और मात्र उपयोग-मूल्य एवं प्रभाव मूल्य का ही अस्तित्व रह जाता है । केवल इसी मंजिल पर पहुंचकर समाज में हर तरह की असमानता समाप्त हो सकती है और नारी समुदाय भी तभी पूर्ण समता और स्वतंत्रता की स्थिति प्राप्त कर सकता है । लेकिन यह मार्ग अनेकों आरोहों-अवरोहों, जय-पराजयों और मोड़ों-घुमावों से भरा हुआ होता है तथा बहुत लम्बा होता है ।

रूस और चीन के समाज ने समाजवादी क्रान्ति और निर्माण के दौर में विकास के अभूतपूर्व लम्बे डग भरे और सामजिक न्याय और समता के अपूर्व कीर्तिमान स्थापित किये, लेकिन वे पूर्ण समता और पूर्ण न्याय से युक्त समाज नहीं थे । संवैधानिक स्तर पर औरत को सभी अधिकार मिल चुके थे, लेकिन सामजिक पारिवारिक स्तर पर यह स्थिति नहीं थी । ऐसा समझना एक वैधिक विभ्रम(Juridical Illusion) होगा । उत्पादन के तंत्र पर पूर्ण सामाजिक स्वामित्व के बगैर यह संभव नहीं था और इसके लिए अधिरचना के धरातल पर सतत क्रांतियों की भी अपरिहार्य आबश्यकता थी ।

समाजवाद की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बावजूद स्तालिनकालीन रूस में ऐसा न हो सका, जो कालान्तार में समाजवाद के ठहराव और अन्ततोगत्वा पराजय का कारण बना । स्तालिन की सर्वाधिक गंभीर गलती उनकी यह दार्शनिक भूल थी कि वे समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के अस्तित्व को और उसकी निरंतरता को वास्तविक रूप में पहचान नहीं सके । यह काम सर्वप्रथम माओ-त्से-तुंग ने किया । सोवियत संघ में समाजवाद की उपलब्धियों और पराजय की शिक्षाओं का तथा चीन में समाजवादी प्रयोगों का सार संकलन करते हुए माओ ने पहली बार समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को स्पष्टतः निरूपित किया और सर्वहारा के अधिनायकत्व के अंतर्गत वर्ग संघर्ष को जारी रखने के सिद्धांत और पद्धति का प्रतिपादन किया । पहले यह उल्लेख किया जा चुका है कि मार्क्सवाद के विकास की परम्परा में उत्पादक शक्तियों के विकास पर अधिक जोर देने की यांत्रिकता शुरू से ही मौजूद थी और मूलाधार एवं अधिरचना के द्वंद्वात्मक संबंधों की समझ काफी हद तक अस्पष्ट थी । सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की सैद्धांतिक पार्श्वभूमि की सर्जना करते हुए माओ त्से तुंग ने पहली बार इनका स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया और मूलाधार के रूपांतरण को जारी रखने के लिए तथा पूंजीवादी पुनर्स्थापना के सभी भौतिक आधारों को नष्ट करने के लिए अधिरचना के निरंतर क्रान्तिकारीकरण या अधिरचना में सतत क्रान्ति की अवधारणा प्रस्तुत की । पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि समाजवादी संक्रमण के दौरान पूंजीवादी उत्पादन के छोटे से छोटे रूप की समाप्ति की लम्बी प्रक्रिया के साथ ही उसकी अनिवार्य पूर्वशर्त एवं समांतर प्रक्रिया के रूप में तथा ज्यादा महत्व देकर कला-साहित्य-संस्कृति, शिक्षा एवं सामाजिक मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के प्रत्येक दायरे में अनवरत क्रान्ति की प्रक्रिया को जारी रखे बगैर समाज की विषमताओं एवं उत्पीड़न के विविध सूक्षम एवं स्थूल रूपों को कदापि समाप्त नहीं किया जा सकता । नारी-पुरूष असमानता, नारी उत्पीड़न पर आधारित पारिवारिक ढांचा एवं वैवाहिक सम्बन्ध, पुरूष-स्वामित्ववादी मानसिकता आदि ऐसी ही सामाजिक संस्थाएं और मूल्य मान्यताएं हैं, जिन्हें समाजवादी समाज के भीतर अनवरत सांस्कृतिक क्रांतियों से गुजरने के बाद ही, क्रमशः निर्मूल किया जा सकेगा । यह सच्चाई केवल समाजवादी समाज के लिए ही लागू नहीं होती है, बल्कि आज भी नारी मुक्ति आन्दोलन के मार्क्सवादी समर्थकों के भीतर मौजूद तमाम यांत्रिक धारणाओं, अर्थवादी भटकावों और भ्रांतियों से मुक्ति के लिए सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की इस दार्शनिक अंतर्वस्तु को जानना समझना जरूरी है ।

मूलाधार और अधिरचना के द्वंदात्मक संबंधों के, सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति द्वारा प्रस्तुत निरूपण, अधिरचना में क्रान्ति की अपरिहार्यता पर उसके जोर और सर्वहारा अधिनायक्तव के अंतर्गत सतत क्रान्ति की उसकी अवधारणा की सम्यक समझदारी के आधार पर ही आज नारी मुक्ति की दिशा से सम्बंधित निम्नलिखित प्रश्नों को भलीभांति समझा जा सकता है ।

1. नारी-उत्पीडन के बुनियादी कारण आर्थिक होंने के बावजूद आर्थिक प्रश्नों के अतिरिक्त सामाजिक- सांस्कृतिक धरातल पर भी स्त्रियों को संगठित होकर संघर्ष करना जरूरी है और पुरूष्सत्तात्मक व्यवस्था की मान्यताओं-संस्थाओं से सघर्ष एक दीर्घकालिक संघर्ष है ।

2. समाजवादी संक्रमण के अंतर्गत भी एक लम्बे समय के संघर्ष के बाद ही स्त्रियों की पूर्ण मुक्ति संभव है और यह कि यह प्रश्न समाजवाद की विजय-पराजय के साथ जुड़ा हुआ है ।

3. नारी मोर्चे पर कामगार स्त्रियों के संगठनों के अतिरिक्त और सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष मोर्चात्मक(Frontal) संगठनों के अतिरिक्त संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठनों की अपरिहार्य आवश्यकता है, जिनमें मध्यमवर्ग सहित जनता के सभी वर्गों की स्त्रियाँ पुरूष उत्पीडन के सर्वतोमुखी विरोध और अपने सामजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के एक कार्यक्रम के आधार पर संगठित हों, ऐसे नारी संगठन सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष नेतृत्व में न होकर सांगठनिक तौर पर, स्वतन्त्र स्वायत्त हों और पार्टी अपनी नीतियों से उन्हें प्रभावित करके, उनके भीतर काम करते हुए उन्हें दिशा देने का प्रयास करे ।

4. स्त्रियों की सहस्त्राब्दियों पुरानी मानसिक गुलामी को नष्ट करने के लिए नारी संगठनों की पहलकदमी, निर्णय लेने की आजादी और सापेक्षिक स्वायत्तता को बढाने के साथ ही, सर्वहारा वर्ग की पार्टी के लिए यह भी जरूरी है की राजनितिक-सांस्कृतिक शिक्षा और आन्दोलन के विशेष प्रयासों से पार्टी-कतारों में स्त्रियों की भरती की प्रक्रिया तेज की जाये और साथ की संघर्ष के हर मोर्चे पर — सभी तरह के जनसंगठनों में स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी बढाई जाये और उनकी पहलकदमी को निरुत्साहित करने की पुरूष-स्वामित्ववादी प्रवृत्तियों के विरूद्ध सतत संघर्ष किया जाये ।

5.पुरूषों की प्रत्यक्ष-परोक्ष चौधराहट(जो हर स्तर पर बुर्जुआ तत्वों को बल प्रदान करती है) से सामाजिक सक्रियता के हर दायरे में औरतों के लिए बच पाना अत्यंत कठिन है और पुराने मूल्यों के पूर्ण उच्छेदन तक यह समस्या समाजवाद की अवधि में भी बनी रहेगी । इससे यह स्पष्ट है कि जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता और स्वतन्त्र पहचान के लिए संघर्ष का प्रश्न दूरगामी और ऐतिहासिक महत्त्व रखता है । इसे एक बुर्जुआ दृष्टिकोण कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । इस प्रश्न को भी नारी आन्दोलन के एजेंडे पर अलग से रेखांकित करके शामिल करना अनिवार्य है ।

पूर्वी यूरोप और भूतपूर्व सोवियत संघ में 1956 में और चीन में 1976 में पूंजीवादी पुनर्स्थापना होने के बाद से लेकर अब तक के काल में, इन देशों में लोभ लालच , प्रतियोगिता, अपराध, भ्रष्टाचार, लूटमार और असमानता की नैतिक स्वीकृति से युक्त एक नग्न उपभोक्ता संस्कृति अस्तित्व में आई है । जाहिरा तौर पर इसका सर्वाधिक शिकार प्रत्यक्ष उत्पादक और स्त्री समुदाय ही हुआ है । इन सभी देशों में इधर नए सिरे से बलात्कार, स्त्री-भ्रूण ह्त्या, पत्नि उत्पीडन आदि नारी विरोधी अपराधों का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर गया जो समाजवाद के कुछ दशकों के भीतर पूरी तरह समाप्त हो चुके थे । अब विगत कुछ वर्षों के भीतर रूस और पूर्वी यूरोप में खुले निजी इजारेदार पूँजीवाद के आने के बाद यह प्रक्रिया और अधिक तेज हो गयी है, इस तथ्य को बुर्जुआ मीडिया भी स्वीकार कर रहा है । वेश्यावृत्ति, कालगर्ल आदि के पेशों और कैबरे नृत्य, अश्लील पत्रिकाओं आदि की बाढ़ आ गयी है, 1956 के पहले के सोवियत संघ और 1976 के पहले के चीन में जिन यौन रोगों के पूर्ण उन्मूलन के तथ्य को पश्चिम भी स्वीकार करता था, अब उनके इलाज के लिए अस्पताल खोले जा रहे है । चीन में लड़कियों की भ्रूण हत्या, अपहरण करके बलात विवाह और दहेज़ सरकार की चिंता के विषय बन चुके है । फिल्मों और साहित्य में नारी छवि की यौन-उत्पीड़क प्रस्तुति, मॉडलिंग जैसे पेशों के जरिये यौन-शोषण, नग्नतावाद, हर तरह के नारी स्वातंत्र्य विरोधी मूल्य और पुरूष स्वामित्व की मानसिकता तेजी से फलफूल रही है । उत्पादन के क्षेत्र में पुरूष व स्त्री के कामों की प्रकृति में भेद करके नारी श्रम को ज्यादा से ज्यादा सस्ता बनाया जा रहा है, उन्हें तथाकथित “हलके”, ‘स्त्रियोचित”, उबाऊ, श्रमसाध्य कामों में लगाया जा रहा है और “गृहिणी” के दायित्व से बाँधा जा रहा है । समाजवाद के अंतर्गत शिक्षा और सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों-पुरूषों की भागीदारी में स्त्रियों का अनुपात लगारार बढ़ा था, जो अब तेजी से घटता जा रहा है । स्मरणीय है कि येल्त्सिन के आने से पूर्व गोर्बाचोव ने ही, जो”मानवीय चेहरे वाले समाज ” की बातें किया करता था, लगभग दो सौ तरह के कामों में स्त्रियों की भागीदारी पर रोक लगा दी थी ताकि वे श्रम से थके पतियों की देखभाल और “समाजवाद के नौनिहालों’ के लालन-पालन पर उचित ध्यान दे सकें ।

और यह सब कुछ सर्वथा स्वाभाविक है । अर्थतंत्र का विकास पूंजीवादी दिशा में हो, राज्यसत्ता पर बुर्जुआ वर्ग काबिज हो और पूरे समाज की अधिरचना का समाजवादी रूपांतरण जारी रहे — यह असंभव है । जैसाकि पहले उल्लेख किया जा चुका है, समाजवाद नारी -समस्या का समाधान नहीं बल्कि समाधान की शुरुआत है । स्त्री की असमानतापूर्ण स्थिति और उसके शोषण के विविध रूप समाजवादी संक्रमण के दौरान भी मौजूद रहेंगे, पर वे क्रमशः क्षरण और विलोपन की दिशा में अग्रसर होंगे । और यह प्रक्रिया स्वतः नहीं होगी, अधिरचना में अनवरत क्रान्ति के जरिए– सतत सांस्कृतिक क्रान्ति के जरिए होगी । पूंजीवादी पुनर्स्थापना की यह तार्किक परिणति है कि औरत फिर से दोयम दर्जे की नागरिक, सबसे निचले दर्जे की उजरती मजदूर और एक उपभोक्ता सामग्री या पण्य वस्तु में तब्दील का दी जाये । रूस, पूर्वी यूरोप और चीन में यही हुआ है ।

हमारी उपरोक्त बातों का यह मतलब कतई नहीं है कि मार्क्सवाद के सूत्रों में नारी मुक्ति के प्रश्न का कोई शाश्वत समाधान या आज की स्थिति का कोई किया-कराया विश्लेषण रखा हुआ है । यह मार्क्सवाद की एक प्रस्तरीकृत रूढ़ समझ ही हो सकती है । अपनी द्वंद्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी दृष्टिकोण पर आधारित ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर मार्क्सवाद ने पहली बार नारी प्रश्न को विश्व-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अवस्थित करके देखा, पूरे सामजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक तंत्र से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल की, वर्गीय उत्पीड़न से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों को स्पष्ट किया और इसे सामजिक क्रान्ति का एक अनिवार्य अंग बताया । महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति तक के प्रयोगों नें इस समझ को ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट किया और नारी मुक्ति के लम्बे संघर्ष की दीर्घकालिक अवधि के लिए सांस्कृतिक क्रान्ति नें आम दिशा (General Line) की एक रूपरेखा प्रस्तुत की । अब शेष काम उन्हें पूरा करना होगा जो इस मोर्चे पर काम कर रहे हैं । अभी तक असमाधानित समस्याओं का हल ढूँढने के साथ ही, आज के युग ने जो सर्वथा नयी समस्यायें पैदा की हैं, उनपर भी वे ही लोग सोचेंगे जो इनके रूबरू खड़े हैं ।

8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर

साठ के दशक में जो नारीवादी आन्दोलन पहले अमेरिका और फिर पूरे पश्चिमी जगत में फूट पड़ा, वह सारतः नारी उत्पीडन के विरूद्ध एक अन्धविद्रोह था । उसकी कई शाखाएं और उपशाखाएँ आगे चलकर फलीं-फूलीं, लेकिन उनके पास न तो नारी-समस्या के सभी पहलुओं की कोई इतिहाससम्मत तर्कपरक व्याख्या थी और न ही दूरगामी सामाजिक संघर्ष के रूप में नारी मुक्ति के सघर्ष को आगे ले जाने का कोई ठोस कार्यक्रम ।

वैसे आधुनिक नारीवाद के सिद्धांत का पहला मील का पत्थर पहली बार 1946 में फ्रांसीसी में और 1953 में अंग्रेजी में प्रकाशित सिमोन द बोउवा (Simone de Beauvoir ) की कृति “द सेकेण्ड सेक्स” था, जिसमें व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण और नारी आन्दोलन की एक स्पष्ट दिशा के अभाव के बावजूद नारी उत्पीड़न के कई सूक्ष्म पहलुओं को रेखांकित किया गया था और यह प्रस्थापना दी गयी थी कि स्त्रियों की मुक्ति में ही पुरूषों की भी मुक्ति है जो स्वयं पुरूष स्वामित्व की मानवद्रोही मानसिकता के दास हैं । साठ के दशक के नारीवादी आन्दोलन की चेतना इस विचार से काफी प्रभावित थी । ऐसी दूसरी प्रसिद्ध कृति सुप्रसिद्ध नारीवादी नेता और 1966 में राष्ट्रीय नारी संगठन (अमेरिका) का गठन करने वाली बेट्टी फ्रीडन(Betty Friedan) की 1963 में प्रकाशित पुस्तक द फेमिनिन मिस्टिक(The Feminine Mystique) थी जिसमें स्त्रियों की घरेलू दासता और पुरूष-स्वामित्व को स्वीकार करने के लिए उनके दिमाग के ‘कंडीशनिंग’ की प्रक्रिया की उग्र लेकिन एकांगी एवं अनैतिहासिक आलोचना की गयी थी ।

साठ का दशक आधुनिक इतिहास के द्वित्तीय विश्वयुद्धोतर काल का एक महत्वपूरण मोड़ बिंदु था । विश्व पूंजीवादी तंत्र के सरदार उस समय गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे । तीस के दशक की मंदी के बाद अमेरिका तक में एक बार फिर बेरोजगारी पैदा हो रही थी और युवा असंतोष तीखा हो रहा था । पूरी दुनिया में जारी मुक्ति-युद्धों की लगातार सफलता साम्राज्यवाद के लिए एक गंभीर संकट को जन्म दे रही थी । वियतनाम में अमेरिका की पराजय निश्चितप्राय प्रतीत होने लगी थी । इसी सामाजिक उथल-पुथल के दौर में अमेरिका में अश्वेत आबादी का आन्दोलन नयी शक्ति के साथ फूट पड़ा था । मैकार्थीवाद और शीतयुद्ध के दौरान संचित जनता का आक्रोश सड़कों पर आ गया था । 1968 में हिन्दचीन में अमेरिकी हस्तक्षेप के विरूद्ध छात्रों-नौजवानों और फिर व्यापक अमेरिकी जनता का आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो नागरिक अधिकारों के आन्दोलन के साथ जुड़कर व्यवस्था के लिए संकट बन गया था । इसी समय फ्रांस में छात्रों का आन्दोलन एक ज्वार की भांति उठ खड़ा हुआ जिसमें बाद में मजदूर भी शामिल हो गए और अन्ततोगत्वा लौह पुरूष कहलाने वाले दगाल को राष्ट्रीय सभा भंग करने व इस्तीफ़ा देने के लिए विवश होना पड़ा । पूरा पश्चिमी जगत एक संकट और उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था । पश्चिमी नारी समुदाय भी इस उथल-पुथल से अछूता नहीं था बल्कि उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहा था । सच तो यह है कि यूरोप-अमेरिका में जनांदोलनों में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर स्त्रियाँ हिस्सा ले रहीं थीं । उत्पादन के अतिरिक्त सामाजिक सक्रियता के दायरे में इस बढती हुई शिरकत ने पश्चिम की नारियों — विशेषकर उनके युवा हिस्से की चेतना का धरातल नयी ऊंचाईयों तक उन्नत किया और दोयम दर्जे की नागरिकता एवं हर तरह के यौन-भेद के विरूद्ध स्त्रियों का प्रबल स्वतः स्फूर्त विद्रोह उठ खड़ा हुआ ।

साठ के दशक का पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन नारी शोषण के विरुद्ध एक बगावती उभार था । इस आन्दोलन में विविध चिन्तनों की मौजूदगी के बावजूद, इसकी कोई सुविचारित वैचारिक पूर्वपीठिका, दिशा और कार्यक्रम नहीं था । द्वित्तीय विश्वयुद्धोत्तर पश्चिमी उपभोक्ता संस्कृति की प्रतिक्रिया में पैदा हुई यह एक बगावत थी । पर विडंबना यह थी कि स्वयं इसकी दार्शनिक अंतर्वस्तु भी बुर्जुआ थी, जिसके चलते जल्दी ही आन्दोलन की मुख्यधारा ने विकृत उच्छ्रंखल बुर्जुआ संस्कृति के नैतिक-सामाजिक मूल्यों को अपना लिया । इस अंध-विद्रोह ने यौन-शोषण और यौन-उत्पीड़न पर खड़ी सामाजिक संस्थाओं की जगह मूल्य-संस्थाओं की कोई समग्र वैकल्पिक व्यवस्था नहीं प्रस्तुत की । विवाह, परिवार, एकल यौन-संबधों आदि को अराजकतावादी ढंग से नकारने की चेष्टा की गयी । पूर लड़ाई को पुरूष सत्ता के विरूद्ध केन्द्रित किया गया और इस सत्ता के ऐतिहासिक-सामाजिक-आर्थिक आधारों को जानने समझने की कोई विशेष चेष्टा नहीं की गयी । जाहिरा तौर पर ऐसा कोई आन्दोलन समाज में लम्बे समय तक टिका नहीं रह सकता और यही हुआ ।

पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन का सामाजिक विद्रोही तत्व धीरे धीरे क्षरित होता गया और आठवें दशक के मध्य तक यह एक बहुत छोटे से हिस्से, बुद्धिजीवी और युवा नारियों तक ही सिमट कर रह गया । यौन-भेद में ही सभी असमानताओं का कारण ढूँढने वाली बुर्जुआ अराजकतावादी स्त्रियाँ और संस्थाएं पूरी सच्चाई को ही सिर के बल खड़ा करती रहीं और अन्ततोगत्वा व्यवस्था को ही लाभ पहुंचाने का काम करती रहीं । पश्चिम के जिन नारीवादी विचारकों ने सातवें-आठवें दशक में कई पुस्तकें लिखीं , उनमे से किसी ने विश्लेषण का कोई समग्र, इतिहाससंगत नमूना प्रस्तुत नहीं किया । लेकिन यह जरूर है कि औरत की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता के प्रश्न को, समाज में उसकी अपनी स्वतन्त्र पहचान के प्रश्न को पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन ने चिन्ता और गाम्भीर्य के साथ उठाया और इतिहास के एजेंडा पर इसे महत्वपूर्ण स्थान दिलाया, भले ही उसने स्वयं इसका काल्पनिक अथवा अराजकतावादी समाधान प्रस्तुत किया हो । यही नहीं, गर्भपात, तलाक आदि मामलों को लेकर नारीवादी संगठनों ने जो मांगे उठाई और आन्दोलन चलाए, वे भी अत्यंन्त महत्वपूर्ण थे । नारीवादी आन्दोलन के दर्शन और इतिहासदृष्टि की अवैज्ञानिकता के बावजूद, इसके द्वारा उठाई गयी अधिकाँश मांगों और समस्यायों को एक सही सैद्धांतिक फ्रेमवर्क में अवस्थित करके एक क्रांतिकारी नारी आन्दोलन के कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है और उसके अनुभवों से काफी कुछ सीखा जा सकता है ।

9. और अंत में…

पश्चिम के पूंजीवादी समाज में, पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (Renaissance-Elightenment-Revolution) की ऐतिहासिक विकास-यात्रा के परिणामस्वरूप वहां के समाज में पुरूष-स्वामित्व और वर्चस्व के रूप सूक्ष्म है. जनतांत्रिक मूल्य सामाजिक जीवन में इस हद तक रचे-बसे हैं कि वहां इनका नग्न रूप कायम नहीं रह सकता । वहां स्त्री के साथ यौन-आधार पर कायम सामाजिक असमानता और भेदभाव मुख्य प्रश्न हैं । यौन-उत्पीड़न के आम रूप अत्यंत सूक्षम हैं । नारी की अस्मिता का प्रश्न पश्चिम में प्रबल है । नारी आन्दोलन का प्रमुख सांस्कृतिक पक्ष वहां उपभोक्ता संस्कृति की विकृतियों के विरुद्ध जनमानस तैयार करने का है ।

तीसरी दुनिया के अधिकाँश पिछड़े हुए देशों में नारी उत्पीड़न के नए पूंजीवादी रूपों के साथ-साथ उसके मध्ययुगीन नग्न स्वेच्छाचारी रूप भी कायम हैं । इनमें से कुछ देशों में आज भी अर्द्धसामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक तंत्र किसी-न-किसी रूप में कायम हैं और जिन देशों में साम्राज्यवाद पर आश्रित बुर्जुआ व्यवस्थाएं कायम हुई हैं, वे जनतांत्रिक मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं-संस्थाओं के मामले में पश्चिमी व्यवस्थाओं से बहुत पीछे हैं । भारत को उदाहरण के तौर पर लें । समाज विकास की मंथर गति तथा जनवादी क्रांतियों और तज्जन्य जनवादी मूल्यों के अभाव के चलते हमारे समाज में मूल्यों-मान्यताओं का प्राक्पूंजीवादी ढांचा अत्यंत धीमी गति से क्षरित होता हुआ आज भी कायम है और भारतीय पूंजीवाद नें इन्हें अपना लिया है । मनु के विधान यहाँ आज भी जिन्दा हैं । शिक्षा के प्रसार के बावजूद सामाजिक क्रियाकलापों से बहुसंख्यक नारी समुदाय, यहाँ तक कि उसका वह हिस्सा भी काफी हद तक कटा हुआ है जो सामाजिक उत्पादन में लगा हुआ है । मजदूर और गरीब किसान औरतें निकृष्टतम कोटि के उजरती गुलाम के रूप में ही सही, पर सामाजिक उत्पादन की कार्रवाई में हिस्सा लेती हैं, पर मध्यमवर्गीय औरतों , यहाँ तक तक कि शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक का बहुलांश चूल्हे- चौखट से पूरी तरह बंधा हुआ है और पति की सेवा, बच्चों का लालन-पालन और घरेलू उपयोग की चीजों के उत्पादन से अधिक कुछ नहीं करता । नौकरी करने वाली मध्यमवर्गीय स्त्रियां भी घरेलू गुलामी से मुक्त नहीं हैं । आज भी औरतों का पुरूषों से और पूरे समाज में जितना अमानवीय पार्थक्य (Segregation) भारत में है, उतना मध्य पूर्व के कुछ देशों को छोड़कर कहीं नहीं है । इस आधी आबादी को आर्थिक शोषण, लूटमार, मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं की दिमागी गुलामी, यौन-उत्पीड़न, पुरूष-स्वामित्व, पार्थक्य (Segregation) और अलगाव (Alienation) से मुक्त करना भारत और ऐसे तमाम देशों की क्रांतियों का दायित्व ही नहीं, बल्कि उनकी लड़ाई का एक ऐसा जरूरी मोर्चा है, जिस पर लड़े बिना ये क्रांतियाँ सफल हो ही नहीं सकतीं ।

भारत जैसे देशों में नारी मुक्ति आन्दोलन को वैचारिक धरातल पर तमाम विजातीय बुर्जुआ विचारों से संघर्ष करते हुए सही वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि, इतिहास-दृष्टि, संस्कृति और दिशा से खुद को समृद्ध बनाना होगा । साथ ही साम्राज्यवाद से आयातित और देशी पूँजीवाद द्वारा पोषित बुर्जुआ नारीवाद के दर्शनं के समूल नाश के लिए समग्र जनमुक्ति एवं नारी-मुक्ति की जातीय, जन-परम्पराओं से खुद को वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर अविच्छिन्न रूप से जोड़ना होगा ।

साम्राज्यवाद के वर्तमान नए दौर में यह बात अब दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि बुर्जुआ व्यवस्था के दायरे के भीतर, सुधारों के दायरे के भीतर नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी अब कुछ हासिल कर पाने की रत्ती भर भी गुंजाईश शेष नहीं है । उलटे, ढांचागत असाध्य संकट के दौर में — आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर में, पूरी दुनिया की पूंजीवादी व्यवस्थाएं अब ज्यादा से ज्यादा निरंकुश होते जाने की दिशा में अग्रसर हैं । ऐसे में अबतक के संघर्षों से अर्जित जनवादी अधिकारों की हिफाजत के लिए भी नारी समुदाय को राज्यसत्ता के विरूद्ध जुझारू लड़ाई लड़नी पड़ेगी । पहली बात तो यह है कि यह लड़ाई स्त्रियां तभी लड़ सकती हैं जब वे मजदूरों-किसानों के क्रांतिकारी संघर्षों में, लोक अधिकार आदोलनों में, क्रांतिकारी सांस्कृतिक आन्दोलनों में, क्रांतिकारी छात्र-युवा आन्दोलनों में पूरी भागीदारी करें । तभी वे आम जनता के पुरूष समुदाय को नयी चेतना देकर अपनी मुक्ति के लिए समर्थन हासिल कर सकेंगी और नारी मुक्ति के संघर्ष को स्त्री बनाम पुरूष का सघर्ष से बचाया जा सकेगा । दूसरी बात यह कि आज कामगार स्त्रियों के संगठन बनाने के अतिरिक्त जनमुक्ति संघर्ष के हिरावलों और अन्य क्रांतिकारी आन्दोलनों के नेतृत्व को मध्यमवर्गीय और जनता के सभी बर्गों की स्त्रियों को नारी उत्पीड़न और जनवादी अधिकारों के प्रश्न पर,व्यापक आधार वाले (वर्गीय संयुक्त मोर्चे की प्रकृति वाले) नारी संगठनों के बैनर तले संगठित करने की भी पहले से बहुत अधिक जरूरत है । साथ ही नारी मुक्ति के मुद्दे को उठाने वाले पहले से ही मौजूद ऐसे संगठनों को भी साथ लेने और उनमें शामिल होकर काम करने की संभावना मौजूद होने पर उनका उपयोग अवश्य ही किया जाना चाहिए । भारत जैसे देशों में स्त्रियों के जनवादी अधिकारों के लिए आंदोलनरत तमाम नारी संगठन महानगरों के शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक ही सिमटे हुए है । इनके साथ आम सहमती के कार्यक्रम पर सहमती के आधार पर काम किया जा सकता है और इनका विस्तार गावों-शहरों की आम स्त्रियों तक भी किया जा सकता है ।

तीसरी बात, यह कि जिस हद तक बुर्जुआ व्यवस्था और विश्वपूंजीवादी तंत्र की जरूरत है, उस हद तक सुधारपरक कार्रवाईयों के लिए आज बड़े पैमाने पर सरकारी आर्थिक मदद और तथाकथित स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिये आने वाली साम्राज्यवादी मदद के जरिये भारत जैसे देशों के कोने-कोने में तथाकथित स्त्री संगठन सुधार और आन्दोलन की कार्रवाईयों में लगे हैं । इनका मूल मकसद स्त्रियों को सुधार के दायरे में कैद करके उनकी तेजी से उन्नत होती चेतना को कुंद करना और उन्हें क्रान्ति की धारा में शामिल होने से रोकना है । स्त्री आन्दोलन के इन खतरनाक घुसपैठियों के विरुद्ध आज बड़े पैमाने पर प्रचार की और उनके प्रभाव को समाप्त करने की जरूरत है ।

इस सभी बातों और इनके सभी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही आज नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा और एक सुसंगत कार्यक्रम का निर्धारण किया जा सकता है ।

BACK TO POST [ १०-११ मार्च १९९२ को काठमांडू नेपाल में ‘अखिल नेपाल महिला संघ’ के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय भाषण के रूप में प्रस्तुत निबन्ध. नेपाली भाषा में पुस्तिकाकार प्रकाशित. ‘दायित्वबोध’, मार्च-जून, १९९३, जुलाई-अगस्त,१९९३ और नवंबर-दिसंबर, १९९३ अंकों में धारावाहिक प्रकाशित ]

डार्विन के जन्मदिन पर विशेष

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जीव विकास का सिद्धांत – डार्विन और वाद-विवाद

डॉ अमृत

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

डार्विन की उपलब्धियां

डार्विन के आलोचक

नव-डार्विनवाद

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

बीते वर्ष 2009 के 12 फरवरी के दिन, मानव  प्रकृति विज्ञानी चार्ल्स डार्विन का दो सौवां जनमदिन था और संयोगवश 150 साल पहले ही नवम्बर 1859 में ही मनुष्य की वैज्ञानिक समझ का एक  मील पत्थर चार्ल्स डार्विन द्वारा लिखित पुस्तक ‘ जीवों की उत्पत्ति’ छपी थी । इन दोनों ही ऐतिहासिक  दिनों की याद को समर्पित 2009 का वर्ष, डार्विन के सिद्धांत को आम लोगों में प्रचारित करने और इस पर हो रहे हमलों का जवाब देने के लिए पूरी दुनिया में मनाया गया । इन कार्यक्रमों की समाप्ति 12 फरवरी 2010 को होगी । इसके अलावा पिछले कुछ सालों में 12 फरवरी का दिन डार्विन दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है ।

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के शहर सर्युस्बरी में हुआ । उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे और दादा इरासमस डार्विन एक प्रकृति दार्शनिक, डॉक्टर और कवि थे । पिता की इच्छा थी कि डार्विन डॉक्टर बनें लेकिन उनकी रूचि प्रकृति विज्ञान में थी । 1828 में पिता ने डार्विन को पादरी बनाने के लिए क्राईस्ट कॉलेज, कैम्ब्रिज में दाखिल करवा दिया  । यहाँ उनका मेल वनस्पति विज्ञान के प्रोफैसर स्टीवन हैन्स्लो से हुआ और वहां काम करने लगे । डार्विन पहले ही लामारक के जीव विकास सम्बन्धी विचारों को पढ़ चुके थे और अब इनकी रूचि और भी बढ़ गयी । इसी दौरान वह प्रकृति का ध्यान से निरीक्षण करने में लग गये और कीड़े मकौड़े तथा पौधे एकत्रित करने में जुट गये । 1831 में उनकी पढाई पूरी हो गयी ।

इंग्लैण्ड में विभिन्न स्थानों पर प्रकृति का निरीक्षण करने के लिए घूमते-घूमते, उनके प्रोफेसर हैन्स्लो ने, उनकी सिफारिश एक सर्वेक्षण करने जा रहे जहाज पर बतौर प्रकृति विज्ञानी कर दी । डार्विन के पिता नें इनकार कर दिया, लेकिन आखिरकार डार्विन ने किसी न किसी तरह उन्हें अपनी यात्रा का खर्च उठाने के लिए मना ही लिया और 27 दिसंबर, 1831 को डार्विन एच. एम. एस. बीगल नामक जहाज पर सफ़र के लिए निकल पड़े । किसे पता था कि यह सफ़र जीव विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति लाने वाला है और पृथ्वी पर मौजूद जीवों और पौधों की उत्पत्ति और विभिन्नता के बारे में  मनुष्य की सदियों पुरानी अवधारणाओं को सदा के लिए बदलने वाला है ।

अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन नें तथ्यों का भण्डार इकट्ठा  कर लिया और अक्तूबर 1836 में इंग्लैंड वापिस आने पर अध्ययन में जुट गये । उनके द्वारा पृथ्वी की सरंचना संबंधी लिखे गये लेखों की वजह से , वह अपनी यात्रा से लौटने से पहले ही काफी प्रसिद्ध हो चुके थे । वापसी पर उनके संबंध उस समय के कई बड़े-बड़े विज्ञानियों से बन गये और वे कई साईंस सोसायटियों के मैम्बर चुने गये । अपने सफरनामे के बारे में किताब लिखते वक्त बहुत ज्यादा मेहनत के दबाव के चलते 1838 में वे बीमार हो गये और डॉक्टरों के कहने पर उन्हें लन्दन वापिस अपने पिता के घर जाना पड़ा । पर यहाँ भी उनकी खोजी रूचि कायम रही । वह अपना ज्यादा समय दुधारू पशुओं को पालने वाले किसानों के साथ बातें करते हुए और उनके द्वारा पशुओं की नसल सुधार के कामों का निरीक्षण करते हुए बिताते थे । हृदयस्पंदन और जठरीय रोग के दर्दों की ये बीमारी इसके बाद डार्विन का उम्र भर पीछा करती रही ।

अपने अध्ययन के आरंभिक वर्षों में ही, डार्विन जीव विकास संबंधी अपनी दो महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं का विकास कर चुके थे । ये दो अवधारणाएं- ‘ प्राकृतिक चयन’ (Natural Selection) और ‘योग्यतम का बचाव’ (Survival of the fittest) थी । डार्विन की अवधारणाओं ने यह पक्के तौर पर सिद्ध कर देना था कि प्रकृति पल-पल बदलती है । यह अपने आरम्भकाल से एकसमान नहीं रही जैसाकि उस समय की धार्मिक शिक्षाओं में बताया जाता था । डार्विन को पता था कि उसकी खोजों का समाज के कठमुल्लों की तरफ से भयंकर विरोध किया जायेगा । कुछ इस डर की वजह से और कुछ अपनी खोजों को प्रमाणिक तौर पर और मजबूत बनाने के लिए प्रकृति में से तथ्य इकट्ठे करने और अध्ययन करने के कारण डार्विन 1859 तक अपनी इस क्रान्तिकारी खोज को प्रकाशित न कर सके ।

1856 के शुरुआती दिनों में चार्ल्स डार्विन के दोस्त चार्ल्स लिल को एक और विज्ञानी अल्फ्रेड वालेस का पत्र मिला जिस में वालेस ने डार्विन की अवधारणाओं के साथ मिलती जुलती बातें कहीं । इसके बाद लिल ने डार्विन को अपनी खोजों को छपवाने के लिए कहा और उसके कहने पर डार्विन ने, जीवों की प्रजातिओं की उत्पत्ति’ (Origin of Species) से सम्बंधित एक खोज पत्र लिखना शुरू किया । जून, 1858 में डार्विन को वालेस का पत्र मिला जिसमें उसने ‘प्राकृतिक चयन’ की धारणा का  जिक्र किया । 1859 में 1 जुलाई के दिन , डार्विन और वालेस ने इकट्ठे ही अपनी खोजों के बारे में खोज पत्र पढने का निर्णय किया, पर अपने बेटे की मृत्यु की वजह से डार्विन इसमें शामिल न हो सके । आखिरकार नवम्बर में डार्विन की पुस्तक’ जीवों की उत्पत्ति’ (Origin of Species) छप कर लोगों में पहुँच गयी ।

जैसाकि उम्मीद ही थी, किताब की काफी प्रशंसा हुई और कुछ ही दिनों में इसके पहले संस्करण की सारी प्रतियाँ बिक गयीं । वैज्ञानिकों में बहुतों ने डार्विन की उपलब्धियों के साथ सहमती प्रकट की, चाहे कुछ वैज्ञानिकों ने डार्विन की अवधारणाओं का सख्त विरोध भी किया । सबसे ज्यादा भयानक विद्रोह धार्मिक कठमुल्लों और कट्टरपंथियों ने किया और डार्विन के भद्दे कार्टून बना कर बांटे गये । जब डार्विन नें यह रहस्योदघाटन किया कि मनुष्य का विकास बंदरों की एक नसल एप (Ape) से हुआ है तो इसका प्रचंड विरोध हुआ । डार्विन का चेहरा बन्दर के धड़ के ऊपर लगा कर उसकी खिल्ली उड़ाई गयी । लेकिन उनकी खोजों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कट्टरपंथी चर्च ने अब उसकी खोजों को अपने धार्मिक लबादे में फिट करना शुरू कर दिया ।

अपने खोज कार्य जारी रखते हुए, डार्विन ने इसके बाद ‘मनुष्य की उत्पत्ति’ (Descent of Man) और अन्य कई किताबें लिखीं । 19 अप्रैल, 1882 के दिन 73 वर्ष की उम्र में इस महान विज्ञानी की मृत्यु हो गयी जो अपने पीछे छोड़ गया मानवता को अपनी बेमिसाल उपलब्धियां ।

डार्विन की उपलब्धियां

एच. एम. एस. बीगल के साथ अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन ने अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्य इकट्ठे किये । गैलापैगोस टापू पर उनका ध्यान घरेलू चिड़ियों जैसे पक्षियों की एक नस्ल पर गया । इन पक्षियों की शक्ल-सूरत आपस में काफी मिलती जुलती थी और ये पक्षी मुख्य धरती पर पाए जाने वाले इसी किस्म के पक्षियों से भी मिलते जुलते थे । पर टापुओं पर रहने वाले पक्षी कीड़े खाकर गुजारा करते थे जबकि दक्षिण अमेरिका की मुख्य धरती वाले पक्षी पौधों के बीज खाते थे । कीड़े खाने वाले पक्षियों की चोंच बीज खाने वाले पक्षियों से लम्बी थीं । अतः डार्विन ने यह परिणाम निकला कि किसी कारणवश यह पक्षी मुख्य धरती से टापुओं पर आ गए । बदलते हालत में जीवन निर्वाह के लिए उन्हें कीड़ों पर निर्भर होना पड़ा । लेकिन आम तौर पर कीड़े वृक्षों के तनों में गहरे छुपे होते थे, अतः समयानुसार टापुओं पर लम्बी चोंच वाले पक्षी अस्तित्व में आ गए ।

इसी तरह उन्होंने दक्षिणी अमेरिका के तट के साथ साथ एक दक्षिण अमेरिकी जानवर ‘सलौथ’  के अवशेषों का अध्ययन किया । इन आलोप हो चुके जानवरों का आकार हाथी जितना था, परन्तु उस समय के अमेरिकी सलौथों का आकार काफी छोटा था, डार्विन ने अपने अध्ययन से यह परिणाम निकला कि छोटे आकार के सलौथ अलोप हो चुके सलौथों से ही विकसित हुए हैं ।

इस तरह डार्विन ने उस समय तक खोजे गए विभिन्न अवशेषों का अध्ययन किया । उनके समय तक अवशेषों पर खोज करने वाले वैज्ञानिकों को धरती कि सतह पर चट्टानों की अलग अलग परतें मिलीं और प्रत्येक परत में अलग अलग किस्म के जानवरों और पौधों के अवशेष मिले । डार्विन ने अपने अध्ययन से यह जाना कि नीचे की परत से ऊपर की तरफ आते हुए, इन परतों में जानवरों और पौधों के विकास का सिलसिला सीधा-सीधा नजर आ रहा था । उस समय तक यह भी पता लग चुका था कि चट्टानों की एक परत जमने में लाखों साल लग जाते हैं । इससे डार्विन का यह निश्चय पक्का हो गया कि धरती पर जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहा है, और यह बदलता रहा है । डार्विन इस नतीजे पर भी पहुँच गए कि जीवन की उत्पत्ति किसी सरल रूप में हुई और इस सरल रूप से विकसित होते हुए जीवों और पौधों की अलग अलग प्रजातियाँ अस्तित्व में आयीं और इस प्रक्रिया में लाखों वर्ष लगे।  आज वैज्ञानिक यह जान चुके हैं कि धरती की उम्र लगभग 4.5 बिलियन वर्ष है । जीवन के प्रथम प्रारूप 3.5 मिलियन वर्ष पहले अस्तित्व में आये । मनुष्य का जनम कोई एक लाख वर्ष पहले ही हुआ है ।

अपने पुश्तैनी घर में रहते समय डार्विन ने देखा कि किसान ज्यादा दूध देने वाले पशुओं का चयन करके और उनका प्रजनन करवाकर ज्यादा दूध देने वाले पशुओं की गिनती बढ़ा लेते हैं । उन्होंने इसको ‘कृत्रिम चयन’ (Artificial Selection) का नाम दिया । लेकिन उन्होंने इससे आगे चलते हुए अपने पास उपलब्ध अन्य तथ्यों के आधार पर यह सिद्धांत दिया कि प्रकृति में भी इस तरह की ‘प्राकृतिक चयन’ की प्रक्रिया घटित होती है ।

इसको एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है । एक ख़ास किस्म का उड़ने वाला कीड़ा पक्षियों द्वारा खाया जाता है । इस कीड़े की दो किस्में हैं – एक सफ़ेद पंखों वाला जो ज़हरीला नहीं है और दूसरा चमकीले रंगों वाला ज़हरीला कीड़ा । धीरे धीरे पक्षी पंखों के रंग से ज़हरीले कीड़े को पहचानने लगते हैं और उसे खाना बंद कर देते हैं । शुरू में चमकीले पंखों वाले कीड़ों की गिनती काफी थी, लेकिन कुछ ही पीढ़ियों बाद चमकीले रंग वाले कीड़ों की बहुतायत हो जाएगी क्योंकि उनके पास प्रजनन करने के और अपने से आगे नए कीड़े पैदा करने के मौके सफ़ेद पंखों वाले कीड़ों से तुलनात्मक रूप में ज्यादा हैं । इस तरह चमकीले पंखों वाले कीड़े प्राकृतिक चयन के ज़रीये बहुतायत में आ जाते हैं ।

इस तरह डार्विन ने देखा कि प्रकृति में जीव जन्तु बहुत ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं लेकिन प्रत्येक जीव प्रजाति की संख्या को नियंत्रण में रखने के लिए किसी तरह का कोई नियम होना जरूरी है । यहीं से उन्होंने अपने दूसरे, जो कि मुख्य रूप में विवाद का कारण बना, ‘योग्यतम के बचाव’ के सिद्धांत को रूप दिया । उनके मुताबिक वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार सबसे योग्य जीव ‘जिंदा रहने के संघर्ष’ में कामयाब हो जाते हैं और प्रजनन कर पाते हैं और बाकी मर जाते हैं । इस तरह जिंदा रहने के लिए लाभकारी गुण चुनिन्दा रूप में अगली पीढ़ियों में चले जाते हैं ।

इन दोनों सिद्धांतों के आधार पर डार्विन नें यह नतीजा निकाला कि लाभकारी लक्षणों और वातावरण के अनुसार ढलने के लिए जीवों में आये बदलाव, जो कि पीढी दर पीढ़ी जीवों में संचारित हो सकते हों, इकट्ठे होते रहते हैं और समय आने पर एक बिलकुल ही नयी प्रजाति के अस्तित्व में आ जाने का कारण बनते हैं ।

डार्विन के सिद्धांतों की अपनी खामियां भी हैं । लेकिन फिर भी डार्विन के सिद्धांत आधुनिक जीव विकास के सिद्धांत की बुनियाद हैं । उनके दिए गए सिद्धांतों के बिना आज भी किसी जीव विकास के सिद्धांत की कल्पना संभव नहीं  । डार्विन की सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण  देन थी, संसार के सदा-सदा स्थिर रहने वाली अवधारणा का सदा सदा के लिए अंत ! यही बात डार्विन के विरोधियों को सबसे ज्यादा चुभती है ।

इन सिद्धांतों के अलावा डार्विन की मानवता को और भी बहुत महत्त्वपूर्ण और क्रांतिकारी देन है । डार्विन के दोस्त, टॉमस हक्सले नें उस समय दिखाया कि शारीरिक रचना के पक्ष से मनुष्य बहुत हद तक ऐप (Ape) के साथ मिलता जुलता है । 1871 में डार्विन नें अपनी पुस्तक ‘मनुष्य का विकास’ प्रकाशित की । इस पुस्तक में उसने मनुष्य की सांस्कृतिक विकास और मनुष्यों में पाए जाने वाली लैंगिक, शारीरिक, और सांस्कृतिक विभिन्नताओं की व्याख्या के लिए ‘लैंगिक चयन’ का सिद्धांत पेश किया । इस पुस्तक में उन्होंने जोर दिया कि सारे मनुष्य एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं और यह विकास अफ्रीका महांद्वीप में हुआ । उस समय अलग-अलग नस्ल के मनुष्यों को अलग अलग प्रजातियाँ मानने और कुछ नस्लों को दूसरी नस्लों से बेहतर मानने और उनके अलग-अलग तौर पर विकसित होने के सिद्धांतों का काफी बोलबाला था, लेकिन डार्विन के द्वारा एक ही पूर्वज से सारे मनुष्यों के विकास के सिद्धांत को पेश करने के बाद बाकी सिद्धांत धीरे धीरे प्रभावहीन हो गए । डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता अब डी.एन. ए. के अध्ययन से भी हो चुकी है ।

डार्विन के आलोचक

जैसे ही डार्विन नें, बाईबल की अवधारणा, कि धरती की उम्र 6000 साल है और संसार की रचना’ परम परमेश्वर प्रभु’ नें 6 दिनों में और सदा सदा के लिए की थी, पर चोट की और इसको अपनी खोजों द्वारा तीतर-बीतर कर दिया; तो धार्मिक कट्टरपंथियों नें उसके खिलाफ जेहाद छेड़ दी । लेकिन अब समय बदल चुका था, अब मध्य युग का सामंती ढांचा नहीं रहा था, अब पूंजीवादी ढांचा अस्तित्व में आ चुका था, और विज्ञान की जरूरत उसके लिए जिंदा रहने की शर्त था, इसलिए थोड़े ही समय में डार्विन के सिद्धांतों को वैज्ञानिकों की तरफ से मान्यता मिल गयी । अब डार्विन के सिद्धांत को पूंजीवादी प्रबंध को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और उसके क्रांतिकारी अंश को को छुपाने की कोशिशें होने लगीं ।

‘अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष’ और ‘ योग्यतम का बचाव’ नामक डार्विन की अवधारणाओं को पूंजीवादी प्रबंध को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और आज भी इसी प्रकार की दलीलें देने वालों की कमीं नहीं है । लेकिन ये सिद्धांतकार ‘अपने अस्तित्व के लिए सर्वहारा के संघर्ष’ से भी उतना ही डरते हैं जितना जोर ये पूँजीवाद को जायज ठहराने के लिए लगाते हैं । ‘ योग्यतम का बचाव’ के सिद्धांत द्वारा पूंजीवादी शोषकों को जायज ठहराने और अल्पमत द्वारा विशाल बहुमत की लूट को ठीक सिद्ध करने की कोशिशें लगातार होती रही हैं । पर यह राग अलापने वाले जन संघर्ष की जगह शान्तिपूर्ण सुधारों और कानूनी कार्रवाई द्वारा गरीबी ख़त्म करने जैसे भद्दे सिद्धांतों को भी साथ-साथ पेश करते रहते हैं । इन दलीलों के बिना भी देखा जाये तो दूसरे जानवरों और मनुष्यों में बहुत अंतर है । मनुष्य वातावरण के साथ खुद भी बदलता है और उसे भी अपने अनुकूल ढाल लेता है, जबकि यह गुण दूसरे जानवरों में बहुत कम विकसित है । इसके अलावा मनुष्य उत्पादन प्रक्रिया में प्रकृति के साथ संघर्ष करता है और जीवन निर्वाह के लिए औजारों का निर्माण करता है । और चूँकि यह सब सामूहिक रूप में ही संभव है, इसलिए ‘योग्यतम का बचाव’ की अवधारणा मनुष्यों पर लागू ही नहीं होती. और तो और, पूंजीवादी प्रणाली में जब भी इन औजारों की (बहुतायत) हो जाती है तो संकट आ जाता है, फिर बहुतायत होने के बावजूद संघर्ष की अवधारणा की तो इसमें कोई गुन्जाईश ही नहीं रह जाती ।

इससे भी बढ़कर, डार्विन की यह अवधारणा मुख्य तौर पर अलग अलग जीवों की प्रजातियों और किसी जीव प्रजाति की जनसँख्या को कंट्रोल में रखने तक ही सीमित रहती है । पहली सूरत में यह अवधारणा मनुष्यों में आपस में लागू नहीं होती, दूसरी सूरत में , जिन यूरोपीय देशों की जनसँख्या वृद्धि दर शून्य हो चुकी है पूंजीवादी दैत्य वहां भी लोगों को संघर्ष करने के लिए मजबूर कर रहा है । जिन देशों में जनसँख्या बढ़ रही है, वहां डार्विन के योग्यतम के बचाव के सिद्धांत के मुताबिक पूंजीपतियों की संख्या बढ़नी चाहिए, लेकिन हो तो इसके विपरीत रहा है, गरीबों (अयोग्यों) की संख्या बढ़ रही है और पूंजीपतियों की या तो स्थिर है या कम हो रही है ।

चर्च और अन्य धार्मिक कट्टरपंथी, जिनमें सिर्फ इसाई ही नहीं, अन्य सभी धर्मों के पादरी-पुजारी भी शामिल हैं, के विरोध और डार्विन के सिद्धांतों को तोड़-फोड़ कर की गयी व्याख्याओं से भी पूँजीवाद का कुछ नहीं संवर सका । इस सबके बावजूद इस पूंजीवादी प्रबंध को डार्विन के सिद्धांतों और पूरे जीव विकास के सिद्धांत से ही खतरा बना हुआ है । एक बार फिर मध्य-युगीन काले दौर के सिरे से खारिज किये जा चुके गैर-वैज्ञानिक ईश्वरवादी सरंचना के सिद्धांत को नए लबादे में सजा कर लोगों पर थोपा जा रहा है और लोगों में भौतिकवादी वैज्ञानिक नज़रिये की पकड़ को कमजोर करने की कोशिशें हो रहीं हैं । इन सब कोशिशों के पीछे हर तरह के धार्मिक कट्टरपंथी और फासीवादी ताने-बाने से लेकर सरकारों, कोर्पोरेट जगत, और लोक कल्याण प्रपंच रचने वाली संस्थाएं शामिल हैं ।

इस नए प्रचारित किये जा रहे सिद्धांत का नाम है ‘सचेतन सृजन'(Intelligent Design) । इनके ज्यादातर तर्क तो डार्विन के समकालीन विरोधी विलियम पैले (William Paley)  से उधार लिए हुए हैं । इस दलील के अनुसार, जैसेकि किसी जटिल जेब घड़ी या किसी आधुनिक मशीन या कंप्यूटर जैसे यन्त्र बनाने के लिए किसी सचेतन शक्ति यानीकि मानव दिमाग की जरूरत होती है, उसी तरह जैसे किसी बहुत ही जटिल मानव अंग जैसेकि आँख, दिमाग, या अन्य जीव जंतुओं को पैदा करने के लिए या सृजन के लिए भी किसी सचेतन शक्ति की जरूरत है, जोकि इनके अनुसार ईश्वर ही हो सकता है  । यह बिलकुल वैसे ही जैसे कोई कहे कि दूध भी पानी की तरह तरल पदार्थ है इसलिए यह पानी की ही तरह धरती में से नल लगाकर निकाला गया होगा या फिर पानी दूध की तरह किसी गाय-भैंस को दुहने से मिलता होगा । खैर इनके तर्क की थोड़ी और छानबीन करते हैं । घड़ी या मशीन बनाने के लिए बहुत सारे मनुष्यों को इकट्ठे होकर या अलग अलग रहकर औजारों का इस्तेमाल करते हुए और भट्टियों में लोहा पिघलाते हुए श्रम करना पड़ता है, और दूसरी तरफ इनके ईश्वर के औजार और भट्टियाँ कहाँ हैं और वह दिखाई क्यों नहीं देते, तो ये भाग निकलेंगे ।

इसी तर्क को थोडा और आगे लेकर जाइये – घडी, मशीन या कंप्यूटर को बनाने वाला सचेतन मानव  दिमाग बहुत जटिल है, तो इतने जटिल मानव दिमाग को बनाने वाली शक्ति तो और भी जटिल होगी । फिर इस और भी जटिल शक्ति को बनाने के लिए और भी ज्यादा जटिल शक्ति – और इस यह जटिलता का पहाड़ा कभी न ख़त्म होने वाला थोथा तर्क बन जाता है ।

एक और तर्क के अनुसार जीवाणु (Bacteria) को गति प्रदान करने वाले हिस्से फ्लैजिला (Flagella), मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली या उसकी आँख जैसे अंग इतने ज्यादा विकसित हैं कि इनके किसी और कम विकसित रूप से विकसित होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता और अपने कम विकसित रूपों में इनकी कोई उपयोगिता संभव भी नहीं होगी; यह तर्क भी थोथा सिद्ध किया जा चुका है. जैसे कि आँख के विकास की विभिन्न अवस्थाओं के विकसित रूप जैविक संसार में पाए जाते हैं. कीट-पतंगे में आँखों का इस्तेमाल होता है और उससे कम विकसित प्राणियों में भी । इसी तरह गाय-भैंसों की आँखों की बनावट काफी हद तक मनुष्य की आँखों से मेल खाती है, लेकिन उनमें रंग पहचानने की योग्यता नहीं होती, और वे चीज़ों को काले और सफ़ेद रंग की अलग शेड्स में ही देख सकती हैं । लेकिन कोई पागल ही यह कहेगा कि उन्हें आखों का कोई लाभ नहीं या फिर उनकी आँखें बेकार हैं । प्रतिरक्षा प्रणाली भी हर तरह के प्राणी में मौजूद है और फ्लैजिला के विभिन्न स्तरों के विकसित रूप जीवाणु (Bacteria) में पाए जाते हैं । लेकिन जैसेकि प्रत्येक विचारवादी का काम होता है, एक तर्क के प्रमाणित हो जाने के बाद कोई दूसरा कुतर्क ढूँढने की बौद्धिक कसरत में लग जाना । और तो और, इनकी विज्ञान की किताब ‘बाइबल’ में धरती की उम्र 6000 साल बताई गयी है और सृष्टि के सृजन में ईश्वर को 6 दिन लगे. आज के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर धरती की उम्र 4.5 बिलियन वर्ष या इससे भी ज्यादा आंकी गयी है और जीवन की उत्पत्ति के आरंभिक प्रमाण भी 3.5 बिलियन साल पुराने हैं.

एक और काम, जो यह ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांतकार करते हैं, वह है- वैज्ञानिक सिद्धांतों में किन्हीं छोटी सी त्रुटियों को ढूंढना और फिर उसकी आधार पर पूरे सिद्धांत के ऊपर विवाद खड़ा करना. और इन त्रुटियों को विज्ञान द्वारा दूर कर लेने पर ऐसी ही कोई और तुच्छ कोशिश । यह है नया विज्ञान – जो अपने आप को प्रमाणित करने में असमर्थ है, लेकिन दूसरी सिद्धांतों की छोटी सी त्रुटियों को भी आधार बनाकर हो हल्ला मचाता है । एक और बहुत ही ‘शानदार’ विचार, जो ऐसे विज्ञानी लोग अक्सर प्रचार करते हैं, वो है- साईंस को ईश्वर भरोसे रहने वाली ‘आस्तिक साईंस’ बनाना जिससे कि ये समझते हैं कि विज्ञान को और वैज्ञानिकों को बहुत फायदा मिलेगा और विज्ञान को सही दिशा मिलेगी ।

इस पूरे ‘विज्ञान'(?) को लोगों में प्रचारित करने और लोगों के दिमागों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता का कूड़-कबाड़ा ठूसने के काम को पूरा करने के लिए अमेरिका और इंग्लैंड में शक्तिशाली राजनैतिक लाबी है, और इसमें कोई हैरानी की बात नहीं इस लाबी का मुख्य हिस्सा राजनैतिक हलकों की दक्षिणपंथी फासीवादी धारा है । जैसाकि होता ही है फासीवाद को वित्तीय सहायता की भी कोई कमी नहीं है ।

यह प्रतिक्रियावादी शक्तियां अमेरिकी सरकार पर लगातार यह दबाव बनाती रही हैं कि धार्मिक विश्वास पर आधारित स्कूलों का खर्च सरकार उठाये, इन स्कूलों में मुख्य तौर पर ईसाई मिशनरी स्कूल हैं । अमीर संस्थाओं ने इस प्रचार मुहीम के लिए लाखों-करोड़ों डॉलर खर्चे । अकेली वाल्टन फैमिली फाऊंडेशन नें 2006 में 28 मिलियन डॉलर इस तरह का दबाव बना रहे संगठनों पर खर्च किये । याद रखा जाना चाहिए कि यह फाऊंडेशन वाल-मार्ट के सहारे चलती है, जो कि ट्रेड-यूनियनों के सबसे खूंखार विरोधियों में से जानी जाती है ।

एक और अमेरिकी संस्था, टेम्पलटन फाऊंडेशन नें वर्ष २००६ में ६० मिलियन डॉलर, उन व्यक्तिओं के प्रोजेक्टों के लिए बांटे, जो ‘विज्ञान’ और अध्यात्मवादी विचारों का मेल मिलाप कराने की कोशिशों में जुटे हुए हैं । इन व्यक्तिओं में अमेरिका और इंग्लैंड के अलावा पूरी दुनिया के अध्यापक, विद्यार्थी, पत्रकार, शोध-कर्त्ता और युनिवर्सिटियों के प्रोफैसर, अकादमीशियन शामिल हैं. यू. एस. क्रॉनिकल ऑफ़ हायर एजुकेशन में छपे एक लेख के अनुसार उपरोक्त संस्था नें २५० मिलियन डॉलर से ज्यादा की धनराशी विज्ञान की इस तरह की ‘सेवा’ के लिए खर्ची । यह संस्था खुले-आम पूँजीवाद तथा मुनाफा आधारित उद्यम की हिमायत करती है ।

इस तरह की एक संस्था वार्डी फाऊंडेशन ब्रिटेन में काम करती है । यह संस्था मुख्य तौर पर वार्डी कार बिजनैस के मुनाफे पर चलती है । इसका मुख्य काम भी ईसाई मूल्यों और मान्यताओं का प्रचार करना और स्कूल खोलना है । इस संस्था के स्कूलों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता को विज्ञान के तौर पर पढ़ाया जाता है ।

भारत में भी ऐसी संस्थाएं मौजूद हैं. इनमें से एक है- कृष्णा कान्सैंस (चेतना). यह संस्था भी अपने अन्य कामों के साथ-साथ ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांत का प्रचार करने के लिए जगह जगह व्याख्यानों का आयोजन करती है और पर्चे बांटती है ।

पूंजीवादी प्रतिक्रियावादी शक्तियों के उपाय सिर्फ नए सिद्धांत घड़ने और उनका प्रचार करने तक ही सीमित नहीं हैं, वह पूंजीवादी सत्ता को अपने ‘विज्ञान’ (?) को लोगों पर थोपने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं । स्कूलों में ‘सचेतन सृजनात्मकता’ के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए अमेरिकी अदालत में केस किया गया । सारे पूंजीपति ऐसे सिद्धांतकारों और ऐसे सिद्धांतों के पक्ष में खड़े हैं । मिसिसिपी, उकलहामा और न्यू मैक्सिको की प्रतिनिधि सभाओं में वर्ष 2009 के दौरान डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत को एक ‘विवादग्रस्त सिद्धांत’ का दर्ज़ा देने या फिर दूसरे सिद्धांतों की शिक्षा देने के बिल दाखिल हो चुके हैं । लुसिआना स्टेट की प्रतिनधि सभा तो एक ऐसा ही बिल पास भी कर चुकी है और गवर्नर बॉबी जिंदल ने हस्ताक्षर भी कर दिये हैं ।

इस तरह की ही लड़ाई टेक्सास में चल रही है, जिसके अनुसार कक्षाओं में अध्यापकों को डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत की आलोचना करनी अनिवार्य हो जायेगी । यह सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं, इंग्लैंड में भी ऐसी ही कोशिशें जारी हैं, और यूरोप के कई और देशों में भी बाइबल की उत्पत्ति की धारणा को स्कूलों के सिलेबस में पढ़ाने के उपाए किये जा रहे हैं । भारत में भी वह दिन दूर नहीं, यहाँ भी ज्योतिष को तो पहले ही विज्ञान का दर्ज़ा मिल चुका है ।

और तो और कानास यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर पाल मिरेकी को डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता करने की वजह से जान से मारने की धमकियाँ दीं गयीं, उसको बुरी तरह पीटा गया जिस वजह से उन्हें अस्पताल दाखिल करवाना पड़ा । उन्हें  उस पद से हटा दिया गया और उनसे अपराधियों की तरह पूछताछ की गयी ।

आम तौर पर विज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्य या किसी संग्रहालय के निर्माण के लिए कोर्पोरेट जगत चंदा मुहैया करवाता है । लेकिन नवम्बर 2005 में जब ‘अमेरिकन मियुसियम ऑफ नैचुरल हिस्ट्री’ को नए सिरे से बनाने और जीव विकास के सिद्धांत को लोगों में प्रचारित करने की बात हुई तो किसी भी कोर्पोरेट घराने नें चंदा देने की ज़हमत नहीं उठायी और इस संग्रहालय द्वारा लगाई गयी प्रदर्शनी ‘डार्विन’ को मीडिया में कोई कवरेज नहीं दी गयी । लेकिन जब 25 मिलियन डॉलर की लागत से ‘ईश्वरवादी उत्पत्ति’ के संग्रहालय को बनाने की बात चली तो कोर्पोरेट जगत नें दिल खोलकर चंदे मुहैया करवाए । इस संग्रहालय में डायनासोरों को मनुष्यों के साथ रहते हुए दिखाया जा रहा है । इस तरह पढ़ाया जाता है कि भयानक बाढ़ आने से पहले मनुष्य और डायनासोर इकट्ठे धरती पर रहते थे । वैज्ञानिक इस बकवास को कब का रद्द कर चुके हैं । डायनासोर लगभग 63 मिलियन वर्ष पहले धरती से अलोप हो चुके हैं और मनुष्य जैसे पहले प्राणी की उत्पत्ति 4 से 10 मिलियन वर्ष से पुरानी नहीं । यह है वह विज्ञान जिसे पूँजीवाद पढ़ा रहा है और फाईनैंस कर रहा है । जबकि पूंजीवादी टहलुये यह डींग मारते नहीं थकते कि पूँजीवाद के बिना विज्ञान का विकास रुक जाएगा ।

नव-डार्विनवाद

एक और  छुपा हुआ हमला हुआ है डार्विन के सिद्धांत पर । यह छुपा हुआ इस अर्थ में है क्योंकि यह स्वयं को डार्विन के मानने और फैलाने के चोगे में छिपाकर रखता है, इसका नाम है नव-डार्विनवाद । इसीका ही विस्तारित रूप है, आधुनिक जीव विकास का सिद्धांत ।

नव-डार्विनवाद शब्द का प्रयोग सबसे पहले वीज़मैन (Weissman ) नाम के विज्ञानी के सिद्धांत के अनुयायियों के लिए किया गया । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में १८९५ में वीज़मैन ने यह सिद्ध किया कि वातावरण के प्रभाव अधीन किसी जीव में होनेवाले बदलाव आगमी पीढ़ी के जीवों में संचारित नहीं हो सकते । इसको वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज्म थियूरी’ कहा जाता है । इस सिद्धांत ने मुख्य तौर पर लैमार्क के जीव विकास के सिद्धांत पर चोट की और जीव विज्ञानियों ने लैमार्क के ‘वातावरण के प्रभाव के अधीन आनेवाले बदलाव का कारण जीव विकास होने के सिद्धांत ‘ को पूरी तरह रद्द कर दिया । अपने सिद्धांत को सही सिद्ध करने के लिए वीज़मैन ने कुछ प्रयोग किये जिनमें चूहों की पूँछें काटने वाला प्रयोग सबसे प्रसिद्ध है ।

वीजमैन के इस प्रयोग में, पीढ़ी दर पीढ़ी चूहों की पूँछें काटी गयी, पर हरवार चूहों की अगली पीढ़ी में पूंछ उग आती थी. इससे उसने यह नतीजा निकाला कि शरीर पर पडनेवाले प्रभाव वंशानुगत तौर पर अगली पीढ़ियों में संचारित नहीं होते. सबसे पहले तो इस प्रयोग में बहुत बड़ी खामियां है – जैसेकि जीव विकास प्राकृतिक स्थिति में होता है और उसे बहुत लंबा समय लगता है । दूसरा उस गुण की, जो प्रकृति में संचरण के लिए जीव के लिए लाभदायिक होता है, प्राकृतिक देन होता है । इस प्रयोग को करने से पहले चूहे के लिए पूंछ की उपयोगिता है या नहीं, के बारे में  कुछ भी निर्धारित नहीं किया गया । इसके अलावा नये अध्ययनों और खोजों से यह स्पष्ट हो गया है कि शारीरिक तौर पर पडनेवाले बाहरी प्रभाव, एक जीव से उसकी, जहाँ तक कि कई पीढ़ियों तक भी संचारित हो सकते हैं और इससे विज्ञान की एक पूरी शाखा ‘ऐपीजैनेटिक्स’ अस्तित्व में आ गयी है.

वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज़्म थियूरी’ और डार्विन की ‘प्राकृतिक चुनाव’ को आधार बनाकर ही आधुनिक जीव विकास अस्तित्व में आया । इस सिद्धांत के अनुसार जीवों में आये अलग-अलग बदलावों में कुछ बदलाव, जो जीव के लिए वातावरण में संचरण और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, प्रकृति द्वारा चुन्न लिए जाते हैं । भाव कि जिस जीव में ये लाभदायिक बदलाव आते हैं, उस जीव को वातावरण में जिंदा रहने का ज्यादा मौका मिलता है और इसलिए उस द्वारा प्रजनन करने के अवसर भी ज्यादा होते हैं और धीरे-धीरे बदलावों वाले जीवों की गिनती मुख्य हो जाती है और समय पाकर और बदलावों के जमा होते जाने के कारण एक नयी प्रजाति अस्तित्व में आ जाती है । यहाँ तक बिलकुल डार्विन के सिद्धांतानुसार है. पर आधुनिक जीव विकास संबंधी सिद्धांतानुसार बदलावों के आने का कारण वातावरण और हालात अनुसार स्वयं को ढलने की जीव की जरूरत नहीं, बल्कि बदलाव जीव के जीनस में संयोगवश होनेवाले  आकस्मिक परिवर्तन हैं । इस प्रकार नव-डार्विनवादी प्राकृतिक परिस्थितियों का जीव पर पड़नेवाले प्रभावों से बिलकुल मुकर जाते हैं ।  यहां से शुरू हुआ यह विचारवादी तर्क बढ़ता हुआ यहाँ तक चला जाता है कि मानव की बनावट और स्वभाव सबकुछ पहले ही निश्चित है और इसे मानव की सामाजिक परिस्थितियों को बदलने से बदला नहीं जा सकता और ऐसा करने के प्रयत्न गैर-वैज्ञानिक और प्रकृति के विरुद्ध हैं और डार्विन विरोधी हैं । नव डार्विनवादी परम्परा में से मुख्य हैं – रिचर्ड डाकिंज़ और स्टीवन पिंकर ।

बीसवीं शताब्दी के पिछले अर्द्ध की महत्त्वपूर्ण खोज पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों की बनावट और अन्य लक्षणों संबंधी सूचना संचारित करनेवाला रसायन डी.एन.ए. है. १९५३ में वाटसन और क्रिक ने डी.एन.ए. की बनावट का मॉडल विकसित कर लिया और इसके बाद जीनज़ की खोज हुई. जीन डी.एन.ए. एक विशेष प्रकार से डिज़ाईन किया गया और यह शरीर के किसी एक हिस्से या लक्ष्ण संबंधी सूचना जमा रखता है, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह सूचना संचारित करता है, जैसे आँखों का रंग, आदमी का कद, चमड़ी का रंग, जीव के बालों का रंग आदि. जीन कोशिका के केन्द्रक (नीयूक्लियस) में पड़े रहते हैं और कोशिका की क्रियायों को रेगूलेट करते हैं । इस खोज के पश्चात कुछ विज्ञानियों ने प्रत्येक मानवी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक या सामाजिक, का आधार जीन के रूप में डी.एन.ए. के टुकड़े को बना दिया । जीव विकास होता है तो जीनों में सांयोगिक बदलावों से होता है, कोई मनुष्य अपराध कर लेता है तो उसके जीन में नुक्स है, अगर कोई उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेता है तो उसके जीन बेहतर हैं, अगर कोई आलिशान घर में रहता है, तो उसके जीन ही इतने काबिल हैं, अगर कोई पूंजीपति अमीर बनता जा रहा है और मजदूर दिन प्रतिदिन गरीब तो अमीर पूंजीपति के जीन गरीब मजदूर के जीनों से बेहतर हैं, अगर किसी को क्रोध अधिक आता है तो उसमें क्रोध वाले जीन अधिक हैं इत्यादि ।

रिचर्ड डाकिंज़ ने मानव की संस्कृति और स्वभाव की व्याख्या करने हेतू एक नया सिद्धांत पेश किया, कि हर व्यक्ति में स्वभाव के अलग-अलग लक्षणों के लिए, जैसे क्रोध, लालच, परोपकार, खीझना, हंसमुख होना आदि के लिए जीनज़ की तरह ही ‘मीमज़’ (Memes) होते हैं । चाहे अभी तक इन ‘मीमज़’ का पता-ठिकाना नहीं चला है । उसके अनुसार ‘मीमज़’ ही मानव का स्वभाव और सभ्यता तय करती हैं और इन्हें बाह्य वातावरण और मानव की परिस्थितियों के बदलने से बदला नहीं जा सकता । लेकिन अगर थोडा बारीकी में जाएँ, तो देखेंगे कि हर समाज और मानव समूह की सभ्यता प्रत्येक पीढ़ी के साथ बदलती रहती है, बल्कि एक मनुष्य के स्वभाव और सभ्यता में उसके जीवन काल में परिवर्तन आते रहते हैं । अगर डाकिंज़ के अनुसार चलें तो हर अपराधी की सन्तान अपराधी होगी, शराबी की शराबी, गुस्सैल की सन्तान गुस्सैल, शर्मीले  की संतान शर्मीली और हंसमुख की सन्तान हंसमुख. और इससे भी बढ़कर मानव सारी उम्र एक जैसा ही बना रहेगा । पर हम देखते हैं ऐसा बिलकुल नहीं होता, प्रतिदिन डाकिन्ज़ साहेब का सिद्धांत मानव जीवन द्वारा गलत साबित किया जाता है । असल में इस प्रकार के सिद्धांत सिर्फ इसलिए निर्मित किये जाते हैं ताकि लोगों को मुर्ख बनाया जा सके । दूसरे महारथी स्टीवन पिंकर का ‘विकासवादी मनोविज्ञान’ का वर्णन भी कुछ इसी प्रकार का ही है । बस पिंकर साहेब ‘मीमज़’ के स्थान पर मॉडियूल (Module) शब्द का प्रयोग करते हैं । इनके अनुसार भी मानव स्वभाव को, इसलिए मानव समाज को बदला नहीं जा सकता । इस सिद्धांत को मनोविज्ञानियों द्वारा पूर्णतया रद्द किया जा चूका है । ज्यादातर मनोविज्ञानी यह मानते हैं कि मानव स्वभाव चाहे कुछ हद तक वंशानुगत होता है पर ज्यादातर यह सामाजिक हालात और मानव के छोटी उम्र में पालन-पोषण, माता-पिता का प्यार, सेहत और शिक्षा पर निर्भर करता है ।

इस सोच के कारण, बहुत समय तक यह समझा जाता रहा कि मानव के विकास दौरान सबसे पहले दिमाग का आकार बड़ा हुआ, उसने अपने हाथ का प्रयोग और सीधा खड़ा होना सीखा, इसी कारण से ही वह भाषा का प्रयोग करने लगा और अपने दिमाग द्वारा सोचने से ही वह समूह बनाकर, फिर मानव समाज के रूप में रहने लगा । पर, असल में, जैसाकि एंगेल्ज़ ने अपने आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ में पेश किया था, सबसे पहले मानव के पूर्वज वृक्षों से उतरकर धरती पर चलने लगे जिस दौरान वे सीधा खड़े रहकर चलना सीखे । इस प्रकार अगले पंजे चलने से मुक्त होकर अन्य कार्यों के लिए प्रयुक्त होने लगे, जिस कारण मानव औजारों का प्रयोग करने लगा, जो बाद में भाषा और सामाजिक उत्पादन का कारण बना । इसके साथ ही हाथों का प्रयोग होने के कारण दिमाग का आकार बड़ा होने लगा, जो हाथों के विकास होने से कहीं बाद में जाकर हुआ । इन सच्चाईयों को आधुनिक जीवाश्म विज्ञान ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है ।

इसके बारे में ज्यादा विस्तार से जॉन पिकार्ड के आलेख “एंगेल्ज़ और मानव विकास’ में पढ़ा जा सकता । जीनज़ में आनेवाली तब्दीलियों के जीव विकास में भूमिका के बारे में ब्रिटिश विज्ञानी जे. बी. एस. हालडेल ने भी अपने आलेखों में विस्तार सहित लिखा है ।

हाल्डेल ने १९२९ में जीवन के पहले रूपों की  उत्पत्ति के रहस्यों से आवरण उठाया । हालडेल के समय में ही, एक सोवियत विज्ञानी, अलेग्जान्द्र उपरेन भी उन्हीं नतीजों पर पहुंचा, इसलिए इस थियूरी को उभयनिष्ठ तौर पर उपरेन-हाल्डेल मॉडल कहा जाता है । इन दोनों विज्ञानियों ने अपने खोज कार्यों में द्वंदात्मक भौतिकवाद को लागू करते हुए इस सिद्धांत की खोज की । १९५३ में मिलर और युरे ने प्रयोगशाला में इस थियूरी को सही सिद्ध कर दिया । अब इस सिद्धांत को थोडा सुधार कर के.आर. एन.ए. मॉडल का रूप दे दिया गया है ।

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

द्वंदात्मक भौतिकवादी नजरिये के जन्मदाता, मार्क्स और एंगेल्ज़, ने डार्विन की खोजों का पुरजोर समर्थन किया । इसके अलावा इसके अधूरेपन और भविष्य में इसके और विस्तारित होने की पेशनगोई भी की । डार्विन की खोजों ने मार्क्स-एंगेल्ज़ के भौतिकवादी नजरिये को प्रकृति में और स्पष्टता से सिद्ध किया । जनवरी १८६१ में मार्क्स ने एंगेल्ज़ को लिखा, “डार्विन की पुस्तक (जीवों की उत्पति – अनु.) बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इसने मुझे वर्ग संघर्ष के लिए प्राकृतिक आधार प्रदान किया है । पर इसमें हमें विकास के अपरिपक्व तरीके को भी सहन करना पड़ता है । अपनी सभी सीमाओं के बावजूद, न सिर्फ उदेश्यवाद (Taleology) (हर वस्तु के पीछे कोई न कोई उदेश्य होता है. अनु.) की प्राकृतिक विज्ञान में विद्यमान धारणा पर निर्णायक चोट है, बल्कि अपने तार्किक मतलब की भी अच्छी तरह व्याख्या करती है ।”

‘डियूरिंग विरुद्ध’ पुस्तक में एंगेल्ज़ ने लिखा, ” जीव विकास का सिद्धांत अभी अपने प्रारंभिक चरणों में है और इसमें कोई शक नहीं कि भविष्य की खोजें हमारी अब तक की जीव विकास संबंधी धारणाओं, डार्विन की खोजों समेत, को बदल देंगी ।”

इसी प्रकार एंगेल्ज़ ने ‘डाईलेक्ट्स ऑफ नेचर’ में भी डार्विन के ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ के सिद्धांत का मूल्यांकन कुछ इस प्रकार किया, ” डार्विन से पहले तक, उसके अबतक के पक्के अनुयायी भी प्रकृति में सामंजस्यपूर्ण सहयोग पर जोर देते हैं, कि कैसे पौधे, जीव, जंतुओं को खाद्य-खुराक और आक्सीज़न प्रदान करते हैं और जीव जंतु पौधों को बदले में खाद, अमोनिया और कार्बोनिक एसिड (कार्बन डाईआक्साईड – अनु.) प्रदान करते हैं । जैसे ही डार्विन का सिद्धांत सामने आया, इन्हें हर जगह संघर्ष ही दिखाई देने लगा । दोनों ही नजरिये अपनी-अपनी सीमाओं के अन्दर ठीक हैं, पर दोनों ही एक समान तरह से एकतरफा और तुअस्बग्रस्त हैं । जैसे प्रकृति में निर्जीव वस्तुओं के संबंध अनुरूपता के टकराव दोनों तरह के होते हैं, वैसे ही सजीव वस्तुओं में भी सचेतन और अचेतन सहयोग के साथ-साथ सचेतन और अचेतन संघर्ष भी होता है । इसलिए, प्रकृति के संबंध में, सिर्फ संघर्ष को ही सबकुछ मान लेना ठीक नहीं । बल्कि ऐतिहासिक जीव विकास और जटिलता की पूरी दौलत को एक छोटे से और एकतरफा वाक्यांश ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ में बाँधने की इच्छा करनी बचकाना ही होगी । इसका कुछ भी मतलब नहीं है ।

‘डार्विन का जीवित रहने के लिए संघर्ष’ का सिद्धांत समाज में प्रचलित अवधारणाओं जैसे सबकी सबके खिलाफ जंग, की हौबिस की थियूरी , मुकाबले की बुर्जुआ अर्थशास्त्र की अवधारणा और माल्थस की जनसंख्या संबंधी अवधारणा का प्रकृति विज्ञान में लागू करने का प्रयत्न हैं । जब ऐसा करके सफलता हासिल कर ली गयी है (बेशक इस मूलभूत आधार, माल्थस की थियूरी पर आज तक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है), यह आसान हो जाता है कि प्रकृति विज्ञान की अवधारणाओं को समाज के इतिहास पर लागू कर दिया जाये और इसे बिलकुल सीधे-सादे तरीके से कहा जाता है कि इस तरह ये प्रस्तुतियां समाज के चिरस्थायी नियमों के तौर पर सिद्ध की जा चुकी हैं । ” (मार्क्स-एंगेल्ज़,  सम्पूर्ण रचनाएँ, जिल्द  25, पेज, 583-584, अंग्रेजी एडिशन 1987, प्रगति प्रकाशन.)

“जीवित रहने के लिए संघर्ष – सबसे बड़ी बात यह है कि इसे पौधों और जनसँख्या की अधिक बढौतरी तक ही सीमित रखा जाये, जोकि पौधों और निम्न जंतुओं के विकास के कुछ चरणों में वास्तव में होता है । परन्तु इन्हें उन परिस्थितियों में, जिसकी जीव-जंतुओं और पौधों को नए वातावरण पर भू-परिस्थितियों वाले नए भूभागों में परवास से बिलकुल अलग रखा जाना चाहिए जिनमें जीवों की प्रजातियाँ बदलती हैं, पुरानी मर जाती हैं और नई विकसित उनका स्थान ग्रहण कर लेती हैं, जनसँख्या में अधिक बढौतरी हुए बिना ही । नए वातावरण में जो जीव स्वयं को ढाल लेते हैं, जीवित रह जाते हैं और लगातार बदलावों से स्वयं को एक नई प्रजाति में विकसित कर लेते हैं पर ज्यादा स्थिर जीव मर जाते हैं और विलुप्त हो जाते हैं, साथ ही मंझोले जीव-रूप भी विलुप्त हो जाते हैं । यह सब कुछ किसी भी माल्थसवाद के बिना संभव है और होता है भी है, और अगर यह लागू भी होता है तो यह उस प्रक्रिया को, ज्यादा से ज्यादा थोडा तेज कर देता है ।”वही पेज, 582-83)

“चलें तर्क करने के लिए ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ नाम के वाक्यांश को मान भी लें । एक जानवर ज्यादा से ज्यादा इकठ्ठा कर सकता है, पर इन्सान तो उत्पादन करता है । वह जीवित रहने के साधन तैयार करता है, ज्यादा विस्तारित शब्दों में, जोकि प्रकृति ने उसके बिना न बनाये होते । यह जानवरों पर लागू होनेवाले नियमों को मानव समाज पर अपरिपक्व तरीके से लागू करना मुश्किल बना देता है । उत्पादन के कारण जल्दी ही ‘जीवित रहने का संघर्ष’ शुरू हो जाता है, पर यह संघर्ष जीवित रहने के साधनों के लिए नहीं, बल्कि मनोरंजन और विकसित होने के साधनों के लिए होता है । यहाँ – क्योंकि विकसित होने के साधन भी सामाजिक तौर पर पैदा होते हैं – जानवरों पर लागू होनेवाले नियम पूरी तरह से  आधारहीन हो जाते हैं । अंत में, पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में, उत्पादन का स्तर इतना ऊँचा हो जाता है कि समाज जीवित रहने, मनोरंजन और विकसित होने के साधनों का अब और पूरी तरह उपयोग नहीं कर सकता क्योंकि उत्पादन करने वालों के बड़े हिस्से को इन साधनों के उपयोग करने से गैर-कुदरती तरीके से और जबरन हटा दिया जाता है । और इसीलिए संतुलन कायम रखने के लिए एक संकट (आर्थिक संकट – अनु.) प्रत्येक दस वर्षों बाद न सिर्फ जीवित रहने के, मनोरंजन और विकसित होने के साधन, बल्कि उत्पादन शक्तियों के एक बड़े हिस्से का भी विनाश कर देता है । इस प्रकार, यह ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ कुछ इस तरह का रूप धारण कर लेता है – बुर्जुआ समाज द्वारा पैदा की गई वस्तुएं और उत्पादक शक्तियों की पूंजीवादी प्रणाली के विनाशकारी, विध्वंशकारी प्रभावों से रक्षा करने के लिए, सामाजिक उत्पादन और वितरण का अधिकार, इस कार्य के लिए अयोग्य हो चुकी पूंजीपति जमात के हाथों से छीन लें और इसको उत्पादन करनेवाले जन-समूहों को सौंप दें -और यह है समाजवादी क्रांति ।

“वर्ग संघर्षों के क्रमिक सिलसिले के तौर पर इतिहास का बोध, इनको ‘जीवित रहने के संघर्ष’ के बहुत कम विभेदन वाले चरणों तक सीमित कर देने से विषय-वस्तु और गंभीरता के पक्ष के लिहाज से कहीं अधिक अमीर है ।” (वही, पेज -584 -85 )

“डार्विन को पता नहीं था कि उसने मानवता, विशेषतया अपने देववासियों पर कितना कड़वा व्यंग्य लिख दिया है, जब उसने यह दिखा दिया कि ‘मुक्त प्रतिस्पर्द्धा’ , जीवित रहने के लिए संघर्ष जिसको अर्थशास्त्री सबसे ऊँची ऐतिहासिक उपलब्धि समझते हैं, जानवरों की दुनिया में एक आम स्थिति है । जैसे उत्पादन की क्रिया ने मानव को अन्य जानवरों से जीव-वैज्ञानिक तौर पर विभेदन प्रदान किया, उसी प्रकार सामाजिक पक्ष से भी ; सिर्फ चैतन्य तौर पर सामाजिक उत्पादन के ढांचे, जिसमें उत्पादन और वितरण योजनाबद्ध तरीके से होगा, मानवता को अन्य जानवरों से श्रेष्ठता प्रदान करेगी । इतिहास विकास इस प्रकार को दिन-प्रतिदिन आवश्यक ही नहीं बना रहा, बल्कि अधिकाधिक संभव भी बना रहा है ।” (वही, पेज -331 )

जैसे एंगेल्ज ने ‘ डियूरिंग विरुद्ध’ में यह कहा था कि जीव विकास के सिद्धांत अभी और विकसित होंगे, उसी प्रकार डार्विन को भी अपने सिद्धांत में विद्यमान खामियों का अहसास था ।

जीवाश्म विज्ञान के अनुसार, कैंबरियन युग (६००-७०० मिलियन वर्ष) से पहले की चट्टानों में जीवों के बहुत कम अंश मिलते हैं और वह भी ‘परोकेरीआईक’ नाम के आरंभिक जीव-रूप ही मिलते हैं । पर इससे बिलकुल बाद की चट्टानों में एकदम ही अलग तरह के बहुभांति जीव-रूप मिलते हैं । इनमें वर्तमान में मौजूद जीवों के लगभग बहुत जीव-रूप मिल जाते हैं. इसको ‘कैंबरियन धमाका’ कहा जाता है । यह ध्यान रखना चाहिए कि यह ‘कैंबरियन धमाका’ कोई रातों-रात हो गयी घटना नहीं थी, बल्कि कई मिलियन वर्षों में होनेवाली घटना थी, पर भू-वैज्ञानिक तौर पर देखा जाये तो पृथ्वी की उम्र के मुकाबले यह घटना एक धमाके की तरह ही तेजी से होनेवाली घटना थी । इसके पश्चात् अनेक प्रजातियाँ अस्तित्व में आ गयीं । डार्विन के समय भी इस तथ्य का ज्ञान था । बाद में यह भी सिद्ध हो गया कि समय-समय पर पृथ्वी पर कुछ इस प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं, चाहे ये परिस्थितियाँ कई मिलियन वर्ष लंबी होती हैं, पर फिर भी भू-वैज्ञानिक तौर पर बहुत छोटी होती हैं, जिस दौरान पृथ्वी पर उस वक्त मौजूद बहुत सारी प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं और उनके स्थान पर नई प्रजातियाँ पैदा हो जाती हैं जो समय के साथ धीरे-धीरे विकास करती हैं, विकास के इस चरण में, जब नई प्रजातियों के अस्तित्व में आ जाने के बाद के समय में ‘प्राकृतिक चुनाव’ अहम भूमिका निभाता है । इस तरह जीवों की प्रजातियों के तेजी से विलुप्त होने की अब तक छः घटनाएँ हो चुकी हैं ।

सबसे बड़ी विलुप्त होनेवाली स्थिति २५० मिलियन वर्ष पहले पेकिअन्योक-मीजोयोक युगों के बीच पैदा हुई जब जल और थल दोनों जगहों के ५० फीसदी जंतुओं और रेंगने वाले ८० फीसदी जंतुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो गयीं । इस प्रकार की अंतिम घटना ६३ मिलियन वर्षों पहले हुई जिसके परिणामस्वरूप अन्य अनेक प्रजातियों समेत डाइनासोर भी विलुप्त हो गये । पर ये घटनाये जीव विकास के राह में रूकावट नहीं बनती हैं, बल्कि जीव विकास को नए और उच्च धरातल पर ले जाती हैं । क्योंकि इन घटनाओं से नई प्रजातियाँ अस्तित्व में आती हैं जो पहले वाली प्रजातियों के मुकाबले अधिक विकसित होती हैं ।

‘कैंबरियन धमाके’ की डार्विन अपनी खोजों के आधार पर व्याख्या करने में असफल थे, पर उस समय डार्विन ने यह कहा कि किसी कारण जीवाश्म संबंधी मानव जानकारी अभी अधूरी है और भविष्य में यह जानकारी मुकम्मल हो जाएगी । पर समय के साथ यह पता चला कि जीवाश्म संबंधी जानकारी बिलकुल सही थी और जीवाश्म में अधूरापन इतना भी अधिक नहीं है कि ‘कैंबरियन धमाके’ को सिर्फ जानकारी का अधूरापन कह कर काम चला लिया जाये । इसी प्रकार कई बार प्रजातियों के बीच के रूप भाव ‘लिंक प्रजाति’ भी नहीं मिलती, उन स्थितियों में डार्विन के सिद्धांतों के अनुसार नई प्रजाति की उत्पति की व्याख्या करनी मुश्किल हो जाती है ।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, अमरीका के भू-विज्ञानी स्टीफन जे गोल्ड और नीलज़ ऐलड्रिज़  ने १९७१ में जीव विकास का नया सिद्धांत पेश किया, जो न सिर्फ डार्विन के सिद्धांत के महत्त्व को बनाये रखता है, बल्कि इस और अधिक अमीर बनाते हुए जीव विकास के सिद्धांत को इस काबिल बना देता है, जिससे ‘कैंबरियन धमाका’ और तेजी से प्रजातियों के विलुप्त होने से पैदा होनेवाली घटनाओं की सटीक व्याख्या होती है । इस सिद्धांत का नाम है – ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ .

गोल्ड और ऐलड्रिज़ ने  अपने निबंधों में यह काफी हद तक सिद्ध कर दिया कि जीव विकास की प्रक्रिया हर समय एक ही रफ़्तार से सीधी रेखा में नहीं चलती बल्कि इस प्रक्रिया में धीमें और लटकते हुए अंतरालों में कुछ पड़ाव ऐसे आते हैं जब जीव विकास की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है । इस तीव्र दौर में धीमें विकास के दौरान जमा हुए मात्रात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तनों में बदल जाते हैं । गोल्ड के अनुसार जीव विकास सदैव प्रगतिशील ही नहीं होता, बल्कि कई बार विपर्ययवादी भी होता है, क्योंकि कई जीव जीवित रहने के लिए दूसरे जीवों के परजीवी बन जाते हैं, जैसे की वृक्षों पर लटकती हुई अमरबेल, अलग-अलग परजीवी कीड़े आदि ।

डार्विन इस प्रकार की संभावना से अनजान नहीं थे । ‘जीव की उत्पति’ के पांचवें एडिशन में डार्विन लिखते हैं, “समय के जिन खण्डों में प्रजातियों में परिवर्तन आते हैं, वे प्रजातियों के लगभग स्थिर रहनेवाले समय खण्डों के मुकाबले छोटे होते हैं ।” चार्ल्स डार्विन, जीवों की उत्पति, १८६९ लन्दन, जॉन मरे, पांचवां एडिशन, पेज -५५१)

इस सिद्धांत के प्रस्तुत करने के समय से ही गोल्ड और ऐलड्रिज़ का बाकी बहुत सारे विज्ञानियों द्वारा निरंतर विरोध होता रहा है क्योंकि छलांगों द्वारा जीव विकास का सिद्धांत पूंजीवाद के बंधक चाकर गुलामों को हजम नहीं होते और वे धीमें और लटकते हुए बदलावों के सिद्धांत को ही एकमात्र सही सिद्धांत सिद्ध करने पर तुले रहते हैं । इस विरोधी शिविर में एक बार रिचर्ड डाकिनज़ और जॉन मेरिनार्ड स्मिथ प्रमुख रहे हैं । अपने मृत्यु के वर्ष, २००२ तक, गोल्ड ने अपने सिद्धांत की डटकर हिमायत की और अन्य तरह के शंकों का निवारण किया. चार्ल्स डार्विन के बाद, स्टीफन जे गोल्ड को जीव विकास के क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा नाम माना जाता है ।

गोल्ड के सिद्धांतों की रोशनी में आज, छलांगों द्वारा जीव विकास के सिद्धांत को अधिकाधिक मान्यता मिल रही है और जीव विकास विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे तरीकों की खोज हो रही है जो इस सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं ।

गोल्ड अपनी पुस्तक ‘पांडाज थंब’ में लिखते हैं, ” सोवियत यूनियन में विज्ञानियों को एक अलग तरह की दार्शनिक शिक्षा मिलती है – एंगेल्स द्वारा, हीगेल से लेकर, और विकसित किये गये द्वंदात्मक नियमों की शिक्षा. द्वंदात्मक नियम स्पष्ट तौर पर धीमे-तेज विकास के हामी हैं. वे मात्रा के गुणों में परिवर्तन की बात करते हैं । यह अजीब लग सकता है, पर ये बताते हैं कि किसी प्रणाली में धीरे-धीरे इकठ्ठे होनेवाले परिवर्तन या तो दबाव के परिणामस्वरूप वह प्रणाली ऐसी स्थिति में पहुँच जाती है, जब एकदम छलांग द्वारा परिवर्तन होता है. पानी को गर्म करो, यह उबल जायेगा, मजदूरों को अधिकाधिक दबायो, क्रांति हो जाएगी । ऐलड्रिज़ और मुझे यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि बहुत पहले रूसी जीवाश्म विज्ञानी भी हमारी ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ मॉडल जैसे जीव विकासी सिद्धांतों की धारणाएं रखते हैं । ”

अपनी पुस्तक ‘डार्विन के बाद अब तक’ में, गोल्ड, एंगेल्स के आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ का वर्णन करते हुए लिखते हैं, ” असल में, उन्नीसवीं शताब्दी में एक बहुत ही शानदार आलेख प्रकाशित हुआ, जिसके लिखनेवाले के बारे में जानकर, बहुत से पाठक हैरान हो जायेंगे – फ्रेडरिक एंगेल्स । (बेशक यह जानकर, कि एंगेल्स भी प्राकृतिक विज्ञान में गहरी दिलचस्पी रखते थे और वे अपने दर्शन ‘द्वंदात्मक भौतिकवाद’  को एक मजबूत आधार पर निर्मित करते हैं । वे अपनी पुस्तक ‘प्रकृति में द्वंदवाद’ को पूरा न कर सके ) उनकी मृत्यु के बाद, १८९६ में एंगेल्स द्वारा लिखित ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ प्रकाशित हुई  पर पश्चिमी विज्ञान पर इसका कोई असर न हुआ ।” क्योंकि उनके  अनुसार पश्चिमी सोच में पक्षपात बहुत गहराई तक पैठ कर चुका था ।

असल में देखा जाये तो डार्विन के सिद्धांतों पर होनेवाले सैद्धांतिक हमले असल में द्वंदात्मक भौतिकवादी दर्शन को नकारने के नाकाम परन्तु योजनाबद्ध प्रयत्न हैं । आज की परिस्थितियों में परजीवी हो चुके पूंजीवाद को सबसे अधिक खतरा मार्क्सवादी भौतिकवादी दर्शन से है क्योंकि यह वह दर्शन है जो समाज को गति में दिखाता है और वर्णन करता है कि प्रत्येक वस्तु गति में है । जैसे जीव विकास एक निरंतर गतिमान क्रिया है, वैसे ही, मानव समाज भी निरंतर गतिमान है । मानव समाज में भी प्राचीन मिट जाता है और नया उसका स्थान ग्रहण कर लेता है । इसी तरह आरंभिक कबीलाई समाजों के स्थान को गुलामदारी प्रबंध ने ग्रहण किया और फिर सामंतवाद और पूंजीवादी प्रबंध । प्रत्येक प्रबंध अपनी उम्र भोगकर इतिहास के रंगमंच से रुखसत हो गया और उसके स्थान को नये प्रबंध ने संभाल लिया । पूंजीवाद के चाकर इस सच्चाई को नकारने के लिए, हर उस सोच, वैज्ञानिक खोज या मानवीय कोशिश को सबसे पहले दबाने की कोशिश करते हैं, अगर ऐसा नहीं होता है, तो उसकी इस तरह से व्याख्या करने की कोशिश करते हैं कि उसके अन्दर का भौतिकवादी तत्त्व ख़त्म हो जाये और वह पूंजीवादी प्रबंध को सदैव से न्यायोचित ऐलान करने लगे ।

उन्नीसवीं शताब्दी में, जब पूंजीवाद के उभार का दौर था, उस वक्त पूंजीवादी चाकरों की कोशिश होती थी कि किसी वैज्ञानिक खोज से होनेवाले फायदा अधिकाधिक उठाया जाये और इस खोज से आम लोगों तक पहुँचने वाली भौतिकवादी चेतना को किसी न किसी तरह से दूर किया जाये । इससे भी अधिक, अगर हो सके तो उन खोजों को पूंजीवादी-चिरस्थायी तौर पर लोगों की नजरों में परिपक्व सिद्धांत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाये । इस प्रकार फासीवाद को जायज ठहराने के लिए पूंजीवादी चाकरों ने विज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया । नस्ल सुधारने को एक विज्ञान का दर्जा दिया गया । इस तथाकथित विज्ञान के आधार पर उन्नीसवीं शताब्दी के पूरार्द्ध में अमरीका में २०,००० लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गयी और नाज़ी जर्मनी में ३.७५,००० लोगों को नपुंसक बना दिया गया । इस काम को सिरे चढाने के लिए बाकायदा कानून बनाये गये । अमरीका के लगभग सभी राज्यों में कानून बनाकर नस्ल सुधारने के विभाग तक बनाये गये ।

विज्ञान के नामपर इस प्रकार के मानवता विरोधी कारनामे बाद में भी जारी रहे । बेशक उपरोक्त किस्म के नस्ल सुधार को विज्ञान द्वारा रद्द किया जा चुका है, पर यह अलग-अलग रूपों में सामने आने लगा जैसेकि साईको सर्जरी । इसके अनुसार सामाजिक समस्याओं का इलाज भी दिमाग का आपरेशन करके किया जा सकता है । इस तरह के ही दो तथाकथित विज्ञानी, वर्तमान मार्क और फ्रैंक इरविन ने यह सुझाव भी पेश कर दिया कि शहरों में होनेवाले दंगे भी दिमागी परेशानी के कारण होते हैं और इसका इलाज झुग्गियों में रहनेवाले लोगों के नेताओं के आपरेशन द्वारा हो सकता है और ऐसा किया भी गया । ऐलन वूड्स और टेड ग्रांट के अनुसार – १९७१ में, अमरीका में ऐसे ही लोगों का इलाज करने के लिए उचित ‘बीमारों’ की सूची मांगी गयी । आपरेशन द्वारा इलाज के लिए भेजे गये आदमियों में अप्रैल, १९७१ के कामगारों की हड़ताल के नेताओं में से एक शामिल था । ये हैं पूंजीवादी चाकरों के कारनामे और वैज्ञानिक खोज !

जीव विज्ञान से बाहर दूसरे विज्ञानों में भी यही स्थिति है । क्वांटम भौतिकी के दार्शनिक नतीजे ‘कोपनहेगन व्याख्या’ इसकी ज्वलंत मिसाल है । जैसे-जैसे पूंजीवाद और अधिक परजीवी होता जा रहा है, उतना ही अधिक यह विज्ञान-विरोधी भी होता जा रहा है । पहले तो यह विज्ञान से निकलने वाले भौतिकवादी परिणामों को बिगाड़ता था, पर अब तो यह विज्ञान के विकास में ही रूकावट बनता जा रहा है ।

पूंजीवाद ने पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाले जीवाश्मों को पण्य (commodity) बना दिया है । जीवाश्मों की पूरी दुनिया में फैली एक मंडी है । पूरी मानवता की धरोहर, ये जीवाश्म कुछ लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति बनते जा रहे हैं । ऐसा एक उदाहरण एक ४७ मिलियन वर्ष पुराने एक कैमूर के जीवाश्म का है । यह अभी-अभी ‘ढूँढा’ गया । यह जीवाश्म दूध पिलाने वाले ऊपरी श्रेणी के और आरंभिक दूध पिलाने वाले प्राणियों के बीच एक महत्त्वपूर्ण लिंक है । पर यह जीवाश्म १९८३ से लेकर २५ वर्षों तक एक जीवाश्म इकठ्ठे करने के शौक़ीन व्यक्ति की व्यक्तिगत सम्पत्ति बना रहा । इस प्रकार और भी जीवाश्मों को, जो व्यक्तिगत सम्पत्ति हैं, किराए पर खोज-कार्यों के लिए दिया जाता है ।

मेडिकल क्षेत्र के बारे में तो जितना कहा जाये उतना ही कम है । दवा कम्पनियां, उस खोज-कार्य जिसमें से मुनाफे की संभावना कम हो या मुनाफे पर चोट करता हो, पर धेला भी नहीं खर्च करतीं । ऐसे कार्यों के लिए अक्सर लोगों को जेब से खर्च उठाना होता है या फिर सरकारों के सामने नाक रगड़नी पड़ती है । बहुत से ऐसे खोज-कार्य बीच में ही बंद हो जाते हैं या फिर बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं ।

स्टेम सैल रीसर्च का भी इसीलिए विरोध हो रहा है । बेशक यह विरोध नैतिक और धर्म के चोगे के नीचे हो रहा है । इसका विरोध करनेवाले भी वही हैं, जो समलैंगिक और गर्भपात संबंधी कानूनों का विरोध करते हैं । और इन फासीवादी समूहों को आशीर्वाद किसका है, यह भी सबको पता है ।

इसी प्रकार १९९० में शुरू हुई, बैटरी से चलनेवाली बिजली की कार की परियोजना भी तेल कंपनियों, ऑटो कंपनियों और अमरीका सरकार की मिलीभगत से ठप होकर रह गयी है और यह कार कभी भी सड़क पर नहीं उतर सकी । इस बैटरी से चलनेवाले व्हीकल ने जहाँ प्रदुषण को कम करना था, वही तेल की खपत भी कम करनी थी, पर यह सब तेल कम्पनियों को किस तरह बर्दाश्त होता, इसलिए मिलमिलाकर पूरी परियोजना को कोल्ड स्टोर में रख दिया गया ।

इस प्रकार साफ़ है कि लोगों में भौतिकवादी चैतन्य के प्रसार को रोकने के लिए और इसे कुंठित करने के प्रयासों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में, जीव विकास के सिद्धांत पर, जोकि उतने ही प्रमाणों से सिद्ध हो चुके हैं जितने प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है पृथ्वी प्लेट जैसी नहीं, बल्कि गेंद जैसी, सूर्य पृथ्वी के नहीं, पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और सूर्य और चन्द्र ग्रहण किसी राहू-केतू के कारण नहीं बल्कि सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा के एक रेखा में आ जाने से लगते हैं, विवाद पैदा कर वैज्ञानिक प्राप्तियों और सिद्धांतों के उन क्रांतिकारी अंशों को कमजोर करने की कोशिशे हो रही हैं जो किसी भी वस्तु के चिरस्थाई होने की अवधारणा के परखचे उड़ा देते हैं । इसके साथ ही विज्ञान और दर्शन को मानवता की भलाई के लिए उपयोग के स्थान पर पूंजीवाद की पूरी अधिसंरचना इन्हें मुनाफे की चौहदी में कैद करने और श्रमिक लोगों की अधिकाधिक रत निचोड़ने के साधन मात्र बनाने के लिए दिनरात पंजों के बल खड़ी रहती है । इसलिए वर्तमान समय में, न्याय और समानता पर आधारित शोषण रहित समाज के सृजन का स्वप्न देखनेवाले लोगों के लिए यह जरूरी है कि भौतिकवादी वैज्ञानिक चैतन्य के हक़ में खड़े होने और डार्विन के सिद्धांतों समेत विज्ञान के हर क्षेत्र में हो रहे विचारवादी हमलों का और वैज्ञानिक तथ्यों को विकृत करके पूंजीवाद की सेवा करनेवालों का मुंह-तोड़ जवाब देने के लिए तैयारी करें ।

पंजाबी पत्रिका, नवें समाजवादी इन्कलाब दा बुलारा ‘प्रतिबद्ध’ के जनवरी, २०१० अंक से आभार सहित |

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चुनाव, राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी

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हमने लिखा था कि वर्तमान संसदीय प्रणाली द्वारा मजदूर वर्ग कभी सत्ता प्राप्त नहीं कर सकता. लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि मजदूर वर्ग चुनाव प्रक्रिया में बिलकुल भाग नहीं लेता. एक वोटर के रूप में वह इसमें भाग जरूर लेता है लेकिन प्रभुत्वशाली लोगों में से किसी एक को चुनने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं होता.मजदूर वर्ग और पूंजीपति वर्ग के परस्पर विरोध द्वारा एक्यबद्ध और गतिशील वर्तमान वर्गीय समाज जो कि अलग-अलग पड़ावों से गुजरकर वर्तमान पूंजीवादी जनवादी प्रणाली के साथ प्रकट होता है, अपने पूर्व के वर्गीय समाजों की भांति सम्पत्तिहीन – वर्तमान में सर्वहारा वर्ग को – सत्ता में कितनी भागीदारी दे सकता है (या नहीं दे सकता है), की जाँच-पड़ताल हेतू जरूरी है कि हम कुछ अति महत्वपूर्ण तथ्यों और आंकडों पर नजर दौडाएं जो हाल ही में संपन्न हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में सामने आये हैं.  इससे हम यह भी आसानी से समझ सकते है कि किस प्रकार यह चुनाव प्रणाली पूंजी और जनता के बीच चलने वाले विरोध का हल करती है. चुनावों की हकीकत को जानने के लिए और इस पूरी चुनाव प्रक्रिया की सार्थकता संबंधी आम लोगों में जाकर उनके नज़रिए को जानने की कोशिश करें तो इसकी असलियत को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है. हमारी इस रिपोर्ट का आधार पिछले दिनों संपन्न हुई विधान सभा के चुनावों पर अलग-अलग लोगों के विचार और प्रतिक्रियाएं हैं.

1. पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान चाहे वे राजनीतिक दलों के मंच रहे हों या फिर प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के – बहस का स्तर बहुत निम्न दर्जे का रहा है. इनकी बहस में गंभीर किस्म के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सरोकार गायब थे. राजनीतिक दलों में बहुत निम्न स्तर की लांछनबाजी  देखने को मिली. स्वयं बुर्जुआ वर्ग द्वारा स्वीकृत आचार-व्यवहार का पूर्ण अभाव नजर आया. गंभीर सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों की अपेक्षा, जीत-हार संबंधी जोड़-तोड़, धार्मिक और जाति आधारित प्रतिक्रियावादी समीकरणों द्वारा जोड़-घटा के फार्मूलों की खोज और समीक्षा का प्रभुत्व था.

2. अख़बारों और टीवी पर अपने हक़ में प्रचार करवाने हेतू और अपने विरोधी उम्मीदवार के विरुद्ध -समाचार प्रकाशित करवाने हेतू, लाखों और करोडों के सौदे तय हुए. मीडिया की रिपोर्ट अनुसार कई दैनिक अख़बारों ने २५ से ५० लाख तक के सौदे किये.

3. सारी चुनाव प्रक्रिया इतनी महँगी थी कि देश की बहुसंख्यक आबादी अपने आप ही, इस चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित हो गयी है.  चुनाव दफ्तर से जारी सूचना में उम्मीदवारों के रोजाना खर्च का ब्योरा प्रकाशित किया गया है. इनकी रिपोर्ट के अनुसार कुछ उम्मीदवारों का दैनिक खर्च दो सौ रूपये से तीन सौ रूपये तक का था. इन वेचारे गरीब उम्मीदवारों में कुछ ऐसे उम्मीदवारों के नाम भी शामिल थे जिनकी चुनाव मुहीम की तामझाम, लाम-लश्कर और खर्चीली चुनाव रैलियों की आभा मध्यकालीन युग के राजाओं-महाराजाओं को भी मात दे दे!  चुनाव कमीशन को भले ही यह सब नज़र न आया हो लेकिन आम लोग पानी की तरह बहाए जानेवाले इस धन और शक्ति के प्रदर्शन के प्रत्यक्ष गवाह हैं.

4. वाम संसदीय पार्टियाँ जो सैद्धान्तिक तौर पर लोगों प्रति प्रतिबद्धता का दावा करती रहती हैं – इस सारे दृश्य के आन्तरिक सच का पर्दाफाश करते हुए, मजदूर और मेहनतकश लोगों की चेतना को उन्नत करने की बजाय, लगभग दूसरी पार्टियों की तरह इस्तेमाल होने वाले हथकंडों की नक़ल करती हुई नज़र आयीं. प्रतिस्पर्धा के इस युग में जिस प्रकार मण्डी में छोटा उत्पादन, बड़े स्तर पर होने वाले उत्पादन के आगे, नहीं टिक सकता, उसी तरह, संसदीय वामपंथी पार्टियाँ भी लगातार हाशिये पर आ रही हैं.

लोग चुनावों में हिस्सा क्यों लेते हैं – किस तरह लेते हैं ?

सैद्धांतिक तौर पर कहा जाता है कि चुनाव द्वारा लोग अपनी सरकार चुनते हैं जिसने आनेवाले पॉँच वर्षों के लिए देश या संबंधित राज्य का प्रबंधन संचालित करना  होता है. सरकार इस समग्र राजतन्त्र जिसमें पुलिस, फौज और न्यायपालिका भी सम्मलित होती है, का एक अहम् हिस्सा होती है.  सभ्यता के इतिहास में राज्य-प्रबंधन के सञ्चालन के लिए बननेवाली सरकारों के रूप सदैव एक जैसे नहीं रहे. आदिम समाज के कबीलाई गणराज्यों से चलकर पूरे मध्य युग में राजशाहियों के अलग-अलग रूपों से गुजरते हुए सरकारों का आधुनिक रूप – जिसे जनता की जनता  द्वारा और जनता  के लिए सरकार का नाम दिया जाता है – आज के विश्व में, सरकार का प्रमुख रूप (मॉडल ) है. राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान इसी रूप अथवा मॉडल से संबंधित तथ्यों ने जिस तस्वीर को उभार कर हमारे सामने पेश किया है, उनका संक्षिप्त परिचय और सार निम्नलिखित है.,

1. सबसे पहले, चुनावों के दौरान सबसे अधिक क्रियाशील हिस्सा – राजनीतिक पार्टियाँ और उनके कार्यकर्त्ताओं की बात करें. बड़ी राजनीतिक पार्टियों की टिकट के लिए दौड़, जहाँ प्रचार माध्यम के लिए बड़ा मसाला तैयार करती रही, वहीँ आम जनता में इस संबंधी चर्चा ने पूरी चुनाव मुहीम को दिलचस्प बनाये रखा. टिकट हासिल करने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते हैं – बड़ी गिनती में टिकटों के चाहवान अपने-अपने हक़ में मुहीम लामबद्ध करते हैं.  लोगों की भीड़ जुटाकर दवाब बनाया जाता है. लेकिन दिलचस्प पहलू यह होता है कि वे कौन लोग होते हैं जो इनकी भीड़ जुटाते हैं? ये वहीँ लोग होते हैं जिनकी बहुसंख्यक गिनती को राजनीतिक पार्टियाँ अपने सक्रीय और जमीन से जुड़े हुए कार्यकर्ता बताती हैं. इन्हीं स्थानीय लोगों में, आर्थिक तौर पर प्रभावशाली और राजनीतिक पृष्ठभूमि के परिवारों से कुछ बेहद महत्त्वाकांक्षी नौजवान, नेतृत्त्व की भूमिका निभाते दीखाई देते हैं. गरीब किसान, मध्यम वर्ग और दलित मजदूर वर्ग से भी कुछ लोग , बेशक दूसरे दर्जे की भूमिका निभाने के लिए ही सही, इनका हिस्सा बनते रहते हैं. लोगों के काम निकलवाने के नाम पर बने ये स्वयंभू लोकसेवक, प्रशासन और आम लोगों में मध्यस्ता करने के साथ-साथ, ज्यादातर पुलिस के मुखबिर और टाउट का धंधा करते हैं. किसानों और मध्यम वर्ग का वह हिस्सा जो  पूंजीवाद के विकास के फलस्वरूप उजड़कर ऐयाश, पाकेटमार, चोर, उचका आदि बन जाता है, जिसे मार्क्स लम्पट सर्वहारा कहते हैं, भी इसी तरह का लोकसेवक होता है. ज्यादातर इस प्रकार के लोकसेवकों को, किसी राजनीतिक दल के बड़े नेता की सरपरस्ती हासिल होती है. अक्सर ये छोटे नेता भी अपने साथ, अपनी हैसियत अनुसार, चापलूसों का एक घेरा बनाकर रखते हैं. अपनी इसी हैसियत का प्रयोग ये लोग अपनी आर्थिक हालत को सुधारने के लिए करते हैं. इसमें मुख्य तौर पर सरकारी ठेके लेने के अलावा, पुलिस और राजनीतिक नेताओं की सरपरस्ती में, कई तरह के अवैध धंधे भी शामिल होते हैं. यहीं स्थानीय नेता, शहरों और गांवों में, अपने सरपरस्त  नेता का गुणगान करते हुए, उनकी साफ़-सुथरी और स्वच्छ छवि के व्याखान करते, उनकी शक्ति और सामर्थ्य की कहानिया सुनाते हुए, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री और पार्टी के बड़े नेताओं के साथ उनकी नजदीकी का विश्वास दिलाते हुए, आम वोटरों को अपने मनपसंद लीडर के हक़ में फुसलाते हुए, कभी नहीं थकते. पहले ये नेता, अपने सरपरस्त बड़े नेता के लिए टिकट हेतू भीड़ जुटाते हैं फिर उनकी इच्छानुसार वोट डलवाते हैं. गरीब जनता को मिलनेवाली सरकारी सहूलतें, मिसाल के लिए, बुढापा पेंशन, पीले कार्ड बनवाना, गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को सस्ते रेट का अनाज और मकान  बनवाने के लिए ग्रांट वगैरा, जो आधे-अधूरे तरीके से, केवल मुट्ठीभर लोगों के पास ही पहुंचती हैं – इन्हीं सहूलतों का सेहरा, व्यक्तिगत तौर पर अपने सिर लेते हैं. अपने हक़ में वोट भुगताने के लिए ये नेता जी-जान से कोशिश करते हैं.

2. मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में होनेवाले कुत्ताघसीटी वैसे तो प्रतिदिन चौबीसों घंटे चलती रहती है लेकिन चुनावों के समय इसका नज़ारा बहुत ही दिलचस्प हो जाता है. इन वर्गों से संबंधित लोगों के बयान ही नहीं बदलते, दल भी बदल जाते हैं. आश्चर्य और अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है लेकिन है यह सच कि इन्हीं वर्गों से कुछ लोगों द्वारा एक ही दिन में एक से अधिक दलों में अदला-बदली और आना-जाना होता रहता है  और इस प्रकार अपनी शख्सियत की कायापल्टी करते हुए ये लोग अच्छा खासा मनोरंजक समां भी बांधे रखते हैं.

3. किसी भी चुनाव बूथ पर नजर रखने पर आपको लगेगा कि खाते-पीते घराने के लोग दोपहर से पहले ही अपने मत का प्रयोग कर जाते हैं जबकि सर्वहारा जनता दोपहर बाद आती है. बूथ के आस-पास मौजूद लोगों में चर्चा का  विषय होता है कि मजदूर लोग वोट डालने तब आएंगे जब नकद पैसे वसूल कर लेंगे. इस प्रकार की चर्चा से हम यह गलत निष्कर्ष निकाल लेतें हैं कि केवल मजदूर वर्ग अपना वोट बेचता है लेकिन मध्यम वर्ग नहीं. वह भी प्रभावित होता है, बल्कि ज्यादा प्रभावित होता है. या यूं कहिये कि उसकी प्रभावित होने की औकात ज्यादा है और वह अधिक कीमत लेता है. इस वर्ग का एक हिस्सा राजनीती में इस प्रकार सक्रीय होता है कि वह समाज की बहुसंख्यक  आबादी को प्रभावित करता है और उस बहुसंख्यक आबादी के वोटों को भी वेचने की योग्यता रखता है. मध्यम वर्ग का वोट बेचने का तरीका साधारण न होकर जटिल होता है और जरूरी नहीं होता कि वह मजदूर की भांति मौके पर ही सौदा करे. उसके सौदेवाजी के गुर जटिल और दीर्घकालिक होते हैं. इसी वर्ग ने सरकारी पद,लाइसेंस और ठेके हथियाने होते हैं.इसी वर्ग से उजड़कर लम्पट मजदूर के रूप में प्रकट हुए नए वर्ग  के लोग अपने ही नहीं बल्कि मजदूरों के वोट भी बेच जाते हैं. पूंजीपतियों और धनासेठों से मिलनेवाली सफ़ेद और काले धन की थैलियाँ, बुर्जुआ पार्टियों के लोगों द्वारा, प्राय इन्हीं  लोगों को सौंपी जाती हैं, क्योंकि यही वे लोग होते हैं जो पूंजीपतियों की अपेक्षा मजदूर वर्ग में आसानी से घुल-मिल जाते हैं. उन्हें यह सहूलियत होती है की वे पूंजीपतियों द्वारा लुटाई (???) गई इस धनराशी के एक हिस्से को मजदूरों में बाँट सके लेकिन बड़े हिस्से को स्वयं हड़प कर जाएँ.

4. जहाँ तक मजदूर वर्ग के मतदान करने और वोट बेचने का सवाल है तो जिस प्रकार न चाहते हुए भी वह एक उजरती गुलाम  के रूप में पूंजीपतियों के खेतों और कारखानों में सोलह-सोलह घंटे खटने के लिए विवश होता है – उसे अपनी श्रम-शक्ति को बेचना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार वह मजबूरीवश मतदान करने और वोट बेचने के लिए भी बाध्य होता है. पूंजीपति वर्ग और बुर्जुआ मीडिया के लिए चुनाव भले ही एक जश्न रहा हो लेकिन मजदूर वर्ग से बातचीत करने पर इसकी असलियत कुछ और ही बयान करती नज़र आती है.

5. इस क्रियाशील हिस्से की चर्चा के बाद  लोगों के व्यवहार की चर्चा करें तो जो दृष्टान्त नजर आता है वह एकसार नहीं है. अलग-अलग वर्गों में विभाजित होने के कारण लोग, चुनावों के बारे में एक जैसा दृष्टिकोण नहीं रखते. अमीर लोगों, कारखानेदारों, व्यापारियों, उच्च मध्यम वर्ग,पेशेवर लोग (डॉक्टर वकील आदि) और अमीर किसानों के लिए, सरकार और उसके दरबार में दस्तक देनें का यह एक सुनहरी अवसर होता है. तेजी से अमीर होने की लालसा की पूर्ति हेतू राजतन्त्र और खास करके  नौकरशाही और पुलिसतंत्र के साथ मजबूत गठजोड़ करने के लिए, इस तरह के संपर्क आवश्यक होते हैं. इस कार्य हेतू ये वर्ग चंदे मुहैया करवाते हैं. व्यवहारिक तौर पर ये लोग इस चुनाव प्रक्रिया के साथ पूरी तरह जुड़े होते हैं.

6. देश के उत्पादन के साधनों का मालिक बनी भारत की वर्तमान बुर्जुआ जमात के पास बेचने के लिए वह सबकुछ है जो मजदूरवर्ग ने पैदा किया है. इसी के बदौलत उसकी हैसियत एक अच्छे खरीदार की भी बन जाती है. कहने का अर्थ यह है कि वह बिकता नहीं बल्कि खरीददार होता है. एक वर्ग के रूप में वह अच्छी तरह जानता है कि कौन-कौन से राजनीतिक दल, किस हैसियत और रूप में, किस-किस प्रकार की भूमिका, उसके हितों की रक्षा करने हेतू, निभा सकते हैं. मजदूरों को मजदूरी देते समय कठोर और उग्र स्वभाव का यह पूंजीपति वर्ग इन राजनीतिक दलों को चंदा देते समय एकदम उदार और विनम्र दीखता है.

7. ज्यादातर शहरी और ग्रामीण मजदूर और गरीब किसान और छोटे दुकानदार, जिनकी ज़िन्दगी की खुशहाली के सभी दरवाजे बंद हो चुके हैं, निराशा और बेबसी के शिकार हैं. ये लोग दिल से किसी भी पार्टी या नेता पर विश्वास नहीं करते. ऊपर वर्णित राजनीतिक कार्यकर्त्ता जो अमीर होने की लालसा के चलते, हर प्रकार के नैतिक बंधनों से मुक्त हैं, जब गरीब जनता की बेबसी और मजबूरी को अपने हक़ में भुगतान करवाने में सफल हो जाते हैं, तो यह भ्रम पाल लेते हैं कि गरीब वोटरों को खरीद लिया गया है. हर प्रकार के नशे, पैसा, शराब, धार्मिक और जातीय नेताओं के फरमान और डरावे, इनके आम हथियार हैं.

8. बेहद बुरे, सामाजिक-आर्थिक हालात के प्रतिक्रियास्वरूप कुछ लुम्पन तत्त्व पैदा होते रहते हैं. गरीब आबादी के बीच का लुम्पन हिस्सा, बहुत हद तक और जल्दी ही इन लोगों का दुमछल्ला बन जाता है. पर देखने में आया है कि आम मेहनतकश आबादी का विश्वास यह गँवा चुका है. उत्पादन की क्रिया में जैसे उजरती मजदूर अपनी इच्छा के विपरीत, पूंजीपति की शर्तों पर काम करने के लिए मजबूर है – लगभग उसी तरह अपनी बेबसियों के सदके, यह उनके लिए मतदान करता है.

अपनी प्रसिद्ध रचना ‘परिवार, निजी सम्पति और राज्य की उत्पत्ति’ में फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं,

“इतिहास में अब तक जितने राज्य हुए हैं, उन्में से अधिकतर में नागरिकों को उनकी धन-दौलत के अनुसार कम या ज्यादा अधिकार दिए गए हैं, जिससे यह बात सीधे तौर पर साबित हो जाती है कि राज्य सम्पत्तिवान वर्ग की सम्पत्तिहीन वर्ग से रक्षा करने का एक संगठन है. एथेंस और रोम में ऐसा ही था, जहाँ नागरिकों का संपत्ति अनुसार विभाजन किया जाता था. मध्ययुगीन सामंती राज्य में भी यही हालत थी जहाँ राजनीतिक प्रभाव की मात्रा भू-स्वामित्व के पैमाने से निर्धारित होती थी. आधुनिक प्रातिनिधिक राज्यों में जो मताधिकार-अहर्ता पाई जाती है , उसमें भी यह बात साफ़ दिखाई देती है. तिस पर भी स्वामित्व के भेदों की राजनीतिक मान्यता किसी भी प्रकार अनिवार्य नहीं है : इसके विपरीत, वह राज्य के विकास के निम्न स्तर का द्योतक है. राज्य का सबसे ऊँचा रूप, यानि जनवादी जनतंत्र, जो समाज की आधुनिक परिस्थितियों में अनिवार्यत: आवश्यक बनता जा रहा है और जो राज्य का एकमात्र रूप है जिसमें ही सर्वहारा तथा पूंजीपति वर्ग का अंतिम और निर्णायक संघर्ष लड़ा जा सकता है – यह जनवादी जनतंत्र औपचारिक रूप से स्वामित्व के अंतर का कोई ख्याल नहीं करता. उसमें धन-दौलत अप्रत्यक्ष रूप से, पर और भी ज्यादा कारगर ढंग से, अपना असर डालती है. एक तो सीधे-सीधे राज्य के अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के रूप में, जिसका क्लासिकीय उदाहरण अमरीका है. दूसरे, सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज को अपना केंद्र बनाती हुई न केवल यातायात को, बल्कि उत्पादन को भी अपने हाथ में केन्द्रित करती जाती हैं, उतनी ही अधिक आसानी से यह गठबंधन होता जाता है. अमरीका के अलावा नवीनतम फ्रांसीसी जनतंत्र भी उसके ज्वलंत उदाहरण हैं और नेक बुढे स्विटज़रलैंड ने भी इस क्षेत्र में काफी मार्के की कामयाबी हासिल की है. परन्तु सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज के इस बन्धुत्वपूर्ण गठबंधन की स्थापना करने के लिए जनवादी जनतंत्र की आवश्यकता नहीं है. इसका प्रमाण इंग्लैंड के अलावा नवीन जर्मन साम्राज्य भी है, जहाँ कोई नहीं कह सकता कि सार्विक मताधिकार लागू करने से किसका स्थान अधिक ऊँचा हुआ है -बिस्मार्क का या ब्लाइखरोडर का. अंतिम बात यह है कि सम्पत्तिवान वर्ग सार्विक मताधिकार के द्वारा सीधे शासन करता है. जब तक कि उत्पीडित वर्ग – परिणामस्वरूप इस मामले में सर्वहारा वर्ग – इतना परिपक्व नहीं हो जाता कि अपने को स्वतन्त्र  करने के योग्य हो जाये, तब तक उसका अधिकांश भाग वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को ही एकमात्र संभव व्यवस्था समझाता रहेगा और इसलिए वह राजनीतिक रूप से पूंजीपति वर्ग का दुमछल्ला, उसका उग्र वामपक्ष बना रहेगा. लेकिन जैसे-जैसे यह वर्ग परिपक्व होकर स्वयं अपने को मुक्त करने के योग्य बनाता जाता है, वह अपने को खुद अपनी पार्टी के रूप में संगठित करता है, और पूंजीपतियों के नहीं, बल्कि खुद अपने प्रतिनिधि चुनता है. अतएव, सार्विक मताधिकार मजदूर वर्ग की परिपक्वता की कसौटी है. वर्तमान राज्य में वह इससे अधिक कुछ नहीं है और न कभी हो सकता है; परन्तु इतना काफी है. जिस दिन सार्विक मताधिकार का थर्मामीटर यह सूचना देगा कि मजदूरों में उबाल आनेवाला है , उस दिन मजदूर पूंजीपतियों की ही तरह जान जायेंगे कि उन्हें क्या करना है.”

वे आगे लिखते हैं,

“इस संविधान को अपनी नींव बनाकर सभ्यता ने ऐसे-ऐसे काम कर दिखाए हैं, जो पुराने गोत्र-समाज की सामर्थ्य के बिल्कुल बाहर थे.  परंतु ये काम उसने किये मनुष्य की सबसे नीच अंतर्वृत्तियों  और आवेगों को उभारते हुए और उसकी तमाम अन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचाकर विकसित करते हुए. सभ्यता के अस्तित्व के पहले दिन से लेकर आज तक नग्न लोभ ही उसकी मूल प्रेरणा रहा है. धन कमाओ, और धन कमाओ और जितना बन सके उतना कमाओ ! समाज का धन नहीं, एक अकेले क्षुद्र व्यक्ति का धन – बस यही सभ्यता का एकमात्र और निर्णायक उद्देश्य रहा है. यदि इसके साथ ही समाज में विज्ञान का अधिकाधिक विकास होता गया और समय-समय पर कला के सम्पूर्णतम  विकास के युग भी बार-बार आते रहे, तो इसका कारण केवल यह था कि धन बटोरने में आज जो भारी सफलताएँ प्राप्त हुई हैं, वे विज्ञान और कला की इन उपलब्धियों के बिना प्राप्त नहीं की जा सकती थीं.”

“सभ्यता का आधार चूँकि एक वर्ग का दूसरे वर्ग का शोषण है, इसलिए उसका सम्पूर्ण विकास सदा अविरत अंतर्विरोध के अविच्छिन्न क्रम में होता रहा है. उत्पादन में हर प्रगति साथ ही साथ उत्पीडित वर्ग की, यानि समाज के बहुसंख्यक भाग की अवस्था में पश्चादगति भी होती है. एक के लिए जो वरदान है, दूसरे के लिए आवश्यक रूप से अभिशाप बन जाता है. जब भी किसी वर्ग को नयी स्वतंत्रता मिलती है, तो वह दूसरे वर्ग के लिए नए उत्पीडन का कारण बन जाती है… जहाँ बर्बर लोगों में अधिकारों और कर्त्तव्यों के बीच भेद की कोई रेखा नहीं खिंची जा सकती थी, वहां सभ्यता एक वर्ग को लगभग सारे अधिकार देकर और दूसरे वर्ग पर लगभग सारे कर्त्तव्यों का बोझ लादकर अधिकारों और कर्त्तव्यों के भेद एवं विरोध को इतना स्पष्ट कर देती हैं कि मूर्ख से मूर्ख आदमी भी उन्हें समझ सकता है.” (देखें : Origins of the Family, Private Property, and the State का Chapter IX: Barbarism and Civilization

वर्तमान बुर्जुआ लोकतान्त्रिक प्रणाली जो अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों की वर्गीय राज्य व्यवस्थाओं का निषेद्ध करते हुए वर्तमान विश्व मंच पर अंतरराष्ट्रीय पूँजी की चाकरी हेतू प्रकट हुई है, अपने अंतरविरोधों के कारण, जन्म से ही लूली-लंगडी है जिसका निषेध अवश्यम्भावी है क्योंकि अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों के विपरीत इसने इस वर्गीय समाज के साथ अपनी कब्र खोदनेवाले उस वर्ग को जन्म दिया है जिसे सर्वहारा या उजरती गुलाम कहते हैं. यहीं वह वर्ग है जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता लेकिन पाने के लिए सारा विश्व है. यह सर्वहारा वर्ग ही बुर्जुआ और समाजवादी क्रांतियों की जीत-हार की अमीर विरासत का असली मालिक है. इक्कीसवीं शताब्दी में घटित होने वाली नई समाजवादी क्रांतियों के कार्यभार को संपन्न करवाने हेतू इसने उन बोलेश्विक चरित्र की सच्ची कम्युनिस्ट पार्टियों और नेताओं को भी जन्म देना हैं क्योंकि समाज को आगे की ओर गति देनेवाली क्रांतियाँ स्वयंस्फूर्त ढंग से संम्पन्न नहीं हो सकती. लेकिन चिंता का पहलू यह भी है कि वर्तमान समय का बुद्धिजीवी वर्ग आज के इस युग के क्षुद्र व्यक्ति ‘पूंजीपति’ द्वारा  सर्वहारा की कमाई की निर्मम लूट और इस लूट की भौंडी प्रदर्शनी पर, चुप्पी साधे है जबकि देश और दुनिया के वस्तुपरक हालात, मजदूर वर्ग द्वारा की जानेवाली क्रांतियों के पक्ष में, लगातार विकसित होते जा रहें हैं. भारत के सबसे अधिक विकसित पूंजीवादी राज्यों में से एक हरियाणा के मजदूर प्रतिदिन बारह घंटे से अधिक श्रम करने पर मजबूर हैं क्योंकि सरकार की ओर से निर्धारित की गयी न्यूनतम मजदूरी – 3510  रूपये प्रति महिना, लागू नहीं हो रही.  कोई भी राजनीतिक दल इसके बारे में गंभीर नहीं है. गुडगाँव जैसे शहर में मजदूर असंतोष को लाठियों और गोलियों से दबाया जा रहा है . एक रिपोर्ट अनुसार राज्य की 56  प्रतिशत औरतें और 83  प्रतिशत बच्चे खून की कमी का शिकार हैं. इस प्रकार की स्थिति पर बुद्धिजीवी वर्ग के चुप्पी के इस कष्टदायक और चिंताजनक पहलू पर ब्रटोल्ट ब्रेष्ट के इन शब्दों के साथ इस आलेख को फ़िलहाल यहीं विराम दिया जाता है,

“किस चीज का इंतजार है और कब तक ?
दुनिया को तुम्हारी जरूरत है |”

गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

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एक तरफ तो उत्तर प्रदेश की सरकार ‘सर्वजन हिताय’ होने का दावा करती है लेकिन दूसरी और इस सरकार के गोरखपुर का प्रशासन मजदूरों की बैचैनी का अर्थ उनके माओवादियों से संबंध होने से निकालता है. आज जब दुनिया महामंदी की चपेट में है और वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए लोगों की बचतों को  झोंका जा रहा और पूंजीवाद चाहता है कि कैसे वह इस विश्व महामंदी से निजात पाए, ठीक उसी वक्त,  स्थानीय पेटी-पूंजीपतियों को छोड़ दें तो इस प्रकार की स्थिति में सरकारों का मजदूरवर्ग से इस तरह के निम्न स्तर के हथकंडों का इस्तेमाल करते हुए उलझना स्वयं पूंजीपति वर्ग को भी नापंसंद होगा. पूंजीवाद की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा उपभोग भी होती है ताकि माल मंडियों में बिक जाये. क्या मजदूर वर्ग की जेब में कुछ डाले बिना मार्केट या देश को मंदी से उभारा जा सकता है?

भारत जैसे देश में तुलनात्मक रूप से उत्पादन क्रिया के दौरान मजदूरों पर होनेवाले खर्च में लगातार गिरावट आ रही है अर्थात देश की कुल पैदावार में मजदूरों के हिस्से केवल ६ प्रतिशत ही आता है जबकि उनकी संख्या ८४ करोड़ है. लेकिन खाने-पीने की बुनियादी चीजों के दामों में बढोत्तरी ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. मजदूरों के लिए जीवन-निर्वाह करना भी मुश्किल होता जा रहा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पूंजीपति एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण अनुसार भारत दुनिया के सबसे सस्ती मजदूरी वाले देशों में से एक है. उनके अनुसार यह स्थिति आगामी अठारह-बीस सालों तक बनी रहेगी. उनके अनुसार यहाँ की इस सस्ती श्रम का लाभ विश्व पूंजी को ही होना है.यहीं नहीं वे भारत को एक बड़ी मंडी के रूप में भी देखते हैं जहाँ माल खपाया जा सकता है. चीन के बाद भारत दूसरा देश है जहाँ विकास दर सबसे ऊँची है. लेकिन मजदूरों की मजदूरी में होनेवाली थोडी-बहुत बढोत्तरी बुनियादी वस्तुओं की कीमत के मुकाबले बढ़ने की अपेक्षा कम हों तो कैसे मजदूर अपना जीवन निर्वाह कर पायेगा? क्या  स्वयं पूंजीवादी के तर्कानुसार भी इस प्रकार का रवैया उचित है?

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गोरखपुर : अपने परिवारों समेत धरने पर बैठे महिला एवं पुरुष मजदूर

पूंजी के अपने तर्क अनुसार किसी भी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए जरूरी होता है कि मजदूरी में बढोत्तरी हो ताकि मजदूर ज्यादा वस्तुएं खरीद सकें. लेकिन गोरखपुर जैसे शहर में जहाँ मजदूर अपनी थोडी सी मजदूरी, रोजगार सुरक्षा और यूनियन बनाने के बुनियादी लडाई ही लड़ रहे हैं, उन्हें माओवादी कहना कहाँ तक उचित है? सबसे चिताजनक पहलू यह है की मजदूरों के बीच की हर तरह की बैचैनी का हल निकालने की बजाय उसे माओवादी-आतंकवादी कार्रवाई कहकर कुचलने की कोशिश की जाती है और उनके लीडरों पर झूठे केस बनाए जाते हैं और मजदूर नेताओं को जेलों में डाला जाता है.

उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करते समय देश की कार्यपालिका और न्यापालिका जैसी संस्थाओं का रवैया ज्यादा से ज्यादा मजदूर विरोधी होता गया है. गुडगाँव जैसे औद्योगिक नगर जहाँ एक मजदूर की मौत पर एक लाख मजदूरों की बड़ी संख्या सड़कों पर आ जाती , वहां पर भी मजदूरों को यूनियन तक बनाने की इजाजित नहीं है. रिको ऑटो कंपनी के संचालक मजदूरों के हड़ताल पर जाने और यूनियन बनाने को गैर-कानूनी कार्य कहते हैं. इसे ऐतिहासिक प्रसंग में देखें तो यह सही भी है क्योंकि मजदूरवर्ग की लहर के विपर्य के इस दौर में मजदूरों ने यूनियन बनाने, धरना देने, हड़ताल करने और गेट मीटिंगे औयोजित करने के अधिकारों को खो दिया है. उन्हें आज अपनों संघर्षों द्वारा जीते इन बुनियादी अधिकारों की रक्षा ही सबसे बड़ा कार्यभार लगता है जबकि वर्गों में विभाजित समाज में ये अधिकार भी उसी तरह गतिशील होते हैं जिस तरह समाज. अपने कालजयी संघर्षों द्वारा जीते गए इन अधिकारों को खो देना उन्हें निराश करता ही रहेगा जब तक वे स्वयं को राजनीतिक चेतना से चाकचौबंद नहीं करेंगे और इस वर्ग विभाजित व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन नहीं कर देंगे. गुडगाँव तो औद्योगिक उपक्रमों की हब है. इसके अलावा भारत के कोने-कोने में छोटे बड़े लाखों औद्योगिक उपक्रमों में देश के मजदूर वर्ग की आबादी का ९३ प्रतिशत भाग काम कर रहा है. मजदूरों की इस बड़ी तादाद को असंगठित मजदूर यानिकि वह मजदूर जो किसी मजदूर ट्रेड यूनियन का भाग नहीं है, कहते हैं. देश के इन छोटे और मझौले उपक्रमों में कार्य करनेवाले मजदूरों की बैचैनी ने हड़ताल और धरने  का रूप भी लेना है. पूंजीपतियों की आपसी गलाकाट होड़ के चलते और मंडी के उतार-चढाव और मंदी का ज्यादा असर छोटी पूंजी पर अधिक पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि  मजदूर वर्ग के हितों की अनदेखी करके इन उपक्रमों की रखवाली की जाये. लेकिन प्रशासन और सरकारी नुमाँईन्दो का इन पेटी-बुर्जुआ पूंजीपतियों और उनके गुंडों से साँठगाँठ   चिंता का विषय है. सरकार के लिए सोचने वाली बात यह भी है कि क्या मजदूरों और उनको नेताओं को माओवादी आतंकवादी कहकर झुट्ठे मुकद्दमों में फँसाना खुद पूंजीपति वर्ग या व्यवस्था के लिए ठीक है?

किसी प्रकार का आंतंकवाद चाहे वह धार्मिक मूलवादी खेमे की ओर से हो या वामपंथी दुस्साहसवाद के रूप में हो, निंदनीय है. सत्ताधारी वर्ग की दमनकारी नीतियाँ भी हर प्रकार का आतंकवाद पैदा करती हैं. सत्ताधारी वर्ग के राजकीय आतंकवाद  के परिणामस्वरूप धार्मिक मूलवादी आतंकवाद, दक्षिणपंथी आतंकवाद, वामपंथी आतंकवाद आदि, की फसल उगने की उपजाऊ भूमि तैयार होती है.हर किस्म का आतंकवाद मजदूर वर्ग की एकता और सांगठनिक क्षमता को कमजोर करता है… लेकिन गोरखपुर के स्थानीय प्रशासन द्वारा मजदूरों को माओवादियों से जोड़ना चिंता का विषय है. अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक  तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी. जी  पहले यह कह चुके हैं कि गोरखपुर में नक्सली नहीं है.

यूनिसेफ  की रिपोर्ट अनुसार पिछले ४० वर्षों के अन्तराल के बाद ग्लोबल वित्तीय संकट और ईंधन, भोजन और चारे की कीमतों में बढोत्तरी के कारण दक्षिण एशिया भूखमरी की उच्चतम शिखर को छू रहा है. इसमें कोई शक नहीं की उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी सेक्टरों और कृषि में भी बढ़िया विकास करते दिखाई गयी है लेकिन विडम्बना देखीए कि भरपूर अनाज पैदा होने के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा की हालत में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है. यह उपहास नहीं तो और क्या है कि उडीसा जैसे राज्य में अब भी लोग भूख से मर रहे हैं जबकि वेयरहाउस और गोदामों में अनाज सड रहा है?

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गोरखपुर : हड़ताल के दौरान सामूहिक रसोई

यहीं नहीं एम्.एस स्वामीनाथन रीसर्च फ़ाऊँडेशन (MSSRF) और विश्व खाद्य कार्यक्रम  (WFP) द्वारा एक रिपोर्ट तैयार करवाई गयी. इसमें कहा गया कि भोजन में प्रयाप्त पौष्टिक तत्त्वों की कमी के कारण  भारत का हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का शिकार है और ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2001 के अनुसार भारत का क्रमांक 94 है.

लेकिन पूंजीपति वर्ग खुश होता है कि विश्वमंदी  का भारत पर असर नहीं हुआ है. संसेक्स में फिर उछाल देखने को मिल रही है. प्रथम फिस्कल छमाही के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में ऑटो सेक्टर की विक्री में बढोत्तरी १४.५१ प्रतिशत रही है. इस प्रकार की बातें पूंजीपति लोगों और उनकी सरकारों को अच्छी लगती हैं. लेकिन ऑटो सेक्टर की हब रहे गुडगाँव जैसे शहर में पूंजीपतियों के किराये के गुंडों के हाथों होनेवाली मजदूर की मौत के बाद एक लाख मजदूरों का प्रदशर्न उन्हें परेशान कर देता है. तेरह-तेरह वर्षों से कार्यरत पंकज कुमार सिंह जैसे मजदूर अपनी मजदूरी से संतुष्ट नहीं हैं. अपनी जायज मांगों को मनमाने के लिए जब वे यूनियन बनाने की पहलकदमी करते हैं तो मैनेजमेंट स्थानीय प्रशासन और अपने निजी गुंडों की मदद से उन्हें दबाने की कोशिश करती है. पूंजीपतियों की मुनाफा कमाने की हवस मजदूरों को इंसान समझती ही नहीं. उन्हें तो चाहिए इन्सान के रूप में एक ऐसा मशीन का पूर्जा जो मशीन के दूसरे पूर्जों से मिलकर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करे. पूंजीपति यह देख ही नहीं पाते कि मशीन और इन्सान में बुनियादी फर्क है. मशीन अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष पैदा नहीं कर सकती. यह केवल मजदूर की श्रम-शक्ति से ही संभव होता है. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपतियों का मुनाफा, मैनेजमेंट के खर्चे और कार्पोरेट टैक्स जिससे सरकारे चलती हैं, आता है.

गुडगाँव की रिको ऑटो कंपनी के मजदूर की हत्या पर भारत की न्यूज एजेंसी पी.टी.आई . अपनी टिपण्णी में यह बात स्वीकार करती है कि गुडगाँव-मानेसर बेल्ट में मजदूर असंतोष कोई नई बात नहीं है. पहले २००० में मारुती उद्योग की मजदूरों की तीन महीने की हड़ताल और फिर २००५ में होंडा मोटर्स एंड स्कूटर के मजदूरों पर पुलिस द्वारा अधाधुंध लाठीचार्च जिसमें १६७ मजदूरों के घायल हुए थे, को नोट करते हुए पला झाड़ लेती है जैसे यह रूटीन की सामान्यतय घटने वाली बातें हों. लेकिन स्थिति का दूसरा पहलू यह भी है कि २००० और फिर २००५ और अब २००९ में मजदूरों का एकसाथ इतनी बड़ी तादाद में खड़े हो जाना, और फिर इन वर्षों के बीच का अन्तराल इतना बड़ा नहीं है कि इतिहास के लिए यह कोई दूर की बात हो. मजदूर वर्ग के असंतोष और वैचैनी के यहीं वे सिग्नल हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग द्वारा ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग की हमदर्द पार्टियों और बुद्धिजीवियों द्वारा नज़रंदाज किया जाता है. मजदूरों के प्रारंभिक सिग्नल भले ही किसी नज़दीक की क्रांति की और संकेत नहीं करते लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग को इन्हीं सिग्नलों को समझना है और इतिहास में अपने स्थान और जिम्मेदारी का भलीभांति निर्वाह करना है.

गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता
गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता

आज मजदूर वर्ग और क्रांतिकारी खेमा अलगाव और विखराव का शिकार है. लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी चुप्पी साधे हुए है. बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का समर्थन और हमदर्दी हमेशा मजदूरवर्ग से रही है. अपनी उच्चतम बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी बुद्धिजीवी लोग अपने स्वयं के वर्ग की सीमाओं को तोड़कर मजदूरों के साथ खड़े होते रहें है. बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा स्वयं को मजदूर वर्ग से अपने आप को अभेद भी पाता रहा है. लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. क्या भारत का बुद्धिजीवी इतना आत्मसंतुष्ट हो सकता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर हाँ  में है तो उसके बुद्धिजीवी होने पर प्रश्नचिह्न लगता है! लेकिन इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होती और न हो सकती है. समाजवादी खेमे के ढह-ढेरी हो जाने  के बाद हम भी मानते हैं कि समाज को आगे की ओर गति देने वाले आंदोलनों या क्रांतियों की प्रासंगिगता पर प्रश्न चिह्न लगा था और पूंजीवाद के अजर-अमर होने के भ्रम को भी खूब हवा मिली थी. अब स्थिति वैसी भी नहीं है. पूंजीवादी एक के बाद एक नए संकटों में फंसता जा रहा है. बुद्धिजीवियों के स्तर के अनुसार पूंजीवाद में भी ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें एक पल के लिए भी संतुष्ट कर पाए. इस प्रकार की स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रह सकती. यह बुद्धिजीवी वर्ग ही होता है जिसने सबसे पहले अपनी चुप्पी तोड़नी होती है क्योंकि अपनी संवेदनशीलता के कारण वहीँ पहला वर्ग होता है जो सबसे पहले टूटता है.

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गोरखपुर : इस पूरे आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया

देश में चुनाव हों लेकिन बुनियादी मुद्दे गायब हों ! एक ऐसा वक्त जब आम जनता अपने जिंदा रहने की लडाई लड़ रही हो और चुनावों में भाग लेनेवाली पार्टियों की ओर से अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जाना ! इसके अलावा राजनीतिक दलों की बहसों का स्तर इतना निम्न स्तर का कि बुद्धिजीवी तो क्या आम आदमी भी इसका नोटिस लेने से नहीं बच पाया. विचारधारात्मक, सैद्धांतिक और राजनीतिक बहस सिरे से ही गायब थी. सामाजिक बहस में भी मुद्दे गायब थे. केवल जोड़तोड़ या तिकड़म द्वारा किस दल की सरकार बनेगी, जैसी चर्चाओं पर अटकलबाजी होती रही. इस प्रकार की स्थिति पर  देश के बुद्धिजीवी वर्ग का मूक दर्शक बने रहना नागरिक समाज के लिए नुकसानदेय है. इतिहास में उसे अपनी भूमिका और स्थान की पहचान करनी ही होगी.

पूंजीपतियों के गुंडों द्वारा गुडगाँव में मजदूर की हत्या और गोरखपुर के मजदूर और मजदूर नेताओं पर झूठे मुकद्दमे निंदनीय हैं. मजदूर वर्ग के हितों पर इस प्रकार का कुठारघात असहनीय है. पूंजीपति इसके लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने पर तुले हुए हैं. हमारे पडौसी देश नेपाल जहाँ पशुओं की हत्या और अत्याचार पर रोक संबंधी बहस चल रही है और हमारे यहाँ मजदूरों पर इस तरह के जुर्म किये जा रहे हैं. नेपाल जैसे पिछडे देश के साथ तुलना करते समय हमारा सीना गर्व से फूल जाता हैं लेकिन अपने ही देश में पशुओं पर नहीं बल्कि इंसानों और मजदूरों पर होनेवाले जुर्म पर हम मूक बने रहते हैं, क्या इस प्रकार की स्थिति शोभनीय है? बुद्धिजीवी वर्ग को सोचना होगा कि सभ्य समाज को इस वक्त अगर कोई खतरा है तो वह पूंजीपतियों के गुंडों की दहशत और प्रशासनिक मिलीभगत से ही है. उसे अपना प्रतिरोध दर्ज करवाना होगा. यही समय की मांग है.

उपरोक्त पोस्ट पर लगी हुई सभी तस्वीरें नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ से धन्यवाद सहित ली गयी हैं.

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