संघर्ष

मार्क्स के मूल्य के नियम पर आधारित एनिमेटिड हिंदी डब फिल्म : अंतिम किश्त

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इससे पहले : मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

श्रम -शक्ति के उपयोग और विनिमय मूल्य का विरोधाभास पूंजीपतियों और मजदूरों के सामाजिक विरोधाभास में प्रकट होता है. पूंजीपतियों और मजदूरों के विरोधी हित होते हैं. मजदूरों को अपने जीवन निर्वाह के साधनों  : घर, भोजन, kapda आदि की जरूरत होती है. उन्हें उपयोग मूल्य चाहिए. पूंजीपतियों की दिलचस्पी उपयोग मूल्य में नहीं होती. वे विनिमय मूल्य चाहते हैं. मुनाफा अर्जित कर वे पूंजी के आकार को बढ़ाना चाहते हैं. अपनी-अपनी चाहत को पूरा करने के लिए प्रत्येक वर्ग को दूसरे की जरूरत पड़ती है. जीवित रहने के लिए मजदूरों को मजदूरी के लिए बिकना पड़ता है. पूंजीपतियों को मुनाफा कमाने के लिए मजदूर रखने पड़ते हैं. इस सहअस्तित्व के बावजूद, उनके हित पूर्णतया विरोधी हैं. मजदूरी के अधिक भुगतान का मतलब, पूंजीपति के लिए कम मुनाफा. पूंजीपतियों के अधिक मुनाफे का मतलब मजदूरों के लिए अधिक कंगाली.

साफ़ है कि , पूंजीवादी समाज में, पूंजी और श्रम के बीच, सदैव संघर्ष रहा है. चाहे यह संघर्ष, हमारे दिन-प्रतिदिन के कार्य की मात्रा के लिए राजी होने पर हो, या फिर कार्य की अच्छी स्थिति और ज्यादा वेतन के लिए लंबा संघर्ष. लेकिन कार्य स्थान से बाहर भी , पूंजीवाद का वर्ग वैमनष्य सदैव बना रहता है. मेहनतकश वर्ग द्वारा पैदा किये गए मूल्य के मजदूरी, मुनाफे, लगान, ब्याज, टेक्स में वितरण का परिणाम हमारे द्वारा भोगे जाने वाले जीवन स्तर, हमारे रहने के स्थान, हमें मिलने वाले अवसरों की स्थिति और हमारे जीवन स्तर, में देखा जा सकता है. सामाजिक आवश्यकता के लिए उपयोग मूल्य के स्थान पर किसी एक वर्ग के मुनाफे के लिए निर्मित समाज में हमारे जीवन का स्तर पूंजी की जरूरतों के विलोमानुपाती होता है. पिछले ३० वर्षों में, नव उदारीकरण द्वारा पूंजी के स्वतन्त्र प्रवाह के लिए सभी  बंधन तोड़ने के परिणामस्वरूप उपरी पूंजीपति वर्ग के पास धन की अपार मात्रा इकट्ठी हो गयी है, जबकि शेष विश्व के लोगों के जीवन में निरंतर गिरावट आई है.

समाज के पास इतना भोजन, घर और तकनीक है कि विश्व की समस्त आबादी थोड़ी सी मेहनत से जीवन की सभी आधारभूत सुख-सुविधाएँ हासिल कर सकती है. और जीवन भर किसी और के लिए कार्य करने की अपेक्षा, यह शायद अधिक संतोषजनक     होगा. परन्तु हमारा समाज ऐसा नहीं है, क्योंकि हमारी श्रम का उद्देश्य समाज के लिए उपयोग मूल्य के स्थान पर पूंजी के लिए मुनाफा पैदा करना है. तकनीक और उत्पादकता में होनेवाली निरंतर क्रांतियों का उद्देश्य कार्य को आसान करना या हमारे जीवन स्तर को ऊँचा उठाना नहीं होता बल्कि और अधिक नियंत्रित श्रम द्वारा और अधिक मुनाफा बटोरना होता है. इस तरह, कार्य स्थान पर श्रम से अधिक मूल्य पैदा करवाने के लिए मशीनों, असेंबली लाईन और कंप्यूटर द्वारा निर्मित अनुशासन का वर्चस्व कायम हो जाता है.

कामगार से कार्य संबंधी ज्ञान छीन लिया जाता है और उसे मशीन में डाल दिया जाता है. कामगार श्रम-प्रक्रिया से नियंत्रण खोने के बाद, मशीन का एक छोटा सा पुर्जा बनकर रह जाता है जिसे आसानी से बदला जा सकता है. एक और विरोधाभास, संकल्पना और कार्यान्वयन के मध्य उभरता है : श्रम-प्रक्रिया का हमारा ज्ञान हमसे छीनकर, मशीन जो हमें नियंत्रित करती है, में डाल दिया जाता है, जो हमारे काम को एक जॉब – ऐसी रूटीन कवायद जिसमें मजदूरी के साधन के अलावा हमारे लिए कोई अर्थ नहीं होता, में न्यून कर देती है. मानव बनाम मशीन के मोहजाल के पीछे यही विरोधाभासी लोकप्रिय संस्कृति है. परन्तु मशीन ने अपने पीछे, हम और हमारी सृजनात्मक क्षमताओं के बीच सामाजिक संबंध को हमसे छीनकर, अलग करके, हमारे कार्य पर काबू पा लिया है.

मशीन के रूप में, निरंतर एकत्रित होती पूंजी के बाद, एक और विरोधाभास आता है, पूंजी के  मृत श्रम, मशीन और कच्चे माल और पूंजी के जीवित श्रम में निवेश. हालाँकि मशीनरी की वृद्धि द्वारा पूंजीपति मजदूरों का ज्यादा शोषण कर सकते हैं, लेकिन मशीन मूल्य पैदा नहीं कर सकती. मशीन और कच्चे माल में ज्यादा से ज्यादा और श्रम में कम से कम पुन:निवेश से समाज के द्रव्यमान के मूल्य में भरमार हो जाती है. यहीं से मार्क्स के संकट के सिद्धांत की शुरुआत होती है. जैसे-जैसे उत्पादन में विस्तार के लिए पुन:निवेश बढ़ता जाता है, यह जीवित श्रम की अपेक्षा मृत श्रम में अधिक होता जाता है. यहीं से भीमकाय संकट की शुरुआत होती है, जिसने पूंजी का उसके सभी रूपों के साथ, अवमूल्यन और विनाश करना होता है.

मार्क्स के पूंजीवादी समाज के विश्लेषण की व्युत्पति , ‘जिन्स के विश्लेषण’ का यही  प्रस्थान बिंदु है. एक जिन्स उत्पादक समाज के सांगठनिक सिद्धांत, मूल्य के इस मूल विचार से, वे जिन्स के उपयोग मूल्य और मूल्य के बीच विरोधाभास को स्थापित करते हैं और कई जिल्दों में इस विरोधाभास से पैदा होनेवाले  वर्गों , समाज , मशीनों और मानव और कार्य की संकल्पना और कार्यान्वयन में विरोधाभासों को प्रकट कर देते हैं. उपयोग और विनिमय में सीधी सी लगने वाली विसंगति वर्ग संघर्ष और संकट का कारक बन जाती है.

इसका यह मतलब नहीं है कि समाज की प्रत्येक समस्या को सीधा मूल्य के नियम से समझा जा सकता है. फिर भी,  सामाजिक धन और शक्ति के उत्पन्न होने और वितरण होने के ढंग को समझे बिना, किस प्रकार हम,असमानता पर बहस को वास्तव में समझ सकते हैं.

मंडी की दमनकारी प्रकृति, जिन्स विनिमय से उत्पन्न गंभीर असमानता और हर कीमत पर पूंजी के एकत्रीकरण की विवशता को समझे बिना, किस प्रकार हम हिंसा को समझ सकते हैं. पूंजीवादी समाज के उत्पादन संबंधों के संगठन के ढंग पर बहस के बिना परिवेशी संकट के समाधान पर बहस कैसे संभव हो सकती है ? वामपंथियों की समस्या यह नहीं कि वहां इतने लोग नहीं हैं कि वे इन मसलों की परवाह करें. समस्या यह है कि ऐसे लोग अधिक् नहीं हैं जिनके पास हमारे समाज के मूल ढांचे की शर्तों के अनुसार इन मसलों पर सोचने की इच्छाशक्ति और सैद्धांतिक औजार हों. इसी कारण आज  मूल्य के नियम को समझना महत्वपूर्ण है. अगर हम समाज के विरोधाभासों पर काबू पाना चाहते हैं, तो हमें समझना होगा कि किस तरह ये विरोधाभास संबंधित हैं और ऐसा करने के लिए हमें जिन्स के विश्लेषण से शुरुआत करनी होगी.

मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

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विश्व स्तर पर, 1970 के बाद प्रगतिशिलियों, एन जी ओ, और वामपंथियों के साथ मिलकर संशोधनवाद सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों को उत्पादन के स्थान कारखानों और फार्मों से खींचकर, बुर्जुआजी की इच्छानुसार, मंडी में ले गया. मार्क्स की पूंजी पर आधारित यह फिल्म, उनका भंडाफोड़ करती है और संजीदा लोगों को मार्क्सवाद का सही अध्ययन करने के लिए प्रेरित करती है. मूलरूप से फिल्म अंग्रेजी में हैं जिसे हिंदी में डब किया गया है. इसे भारतीय सन्दर्भ में रखने के लिए कुछ तस्वीरों और दृश्य में बदलाव भी किया गया है. http://kapitalism101.wordpress.com/2010/08/20/law-of-value-5-contradiction से विशेष आभार सहित.

मूल्य के नियम_5_विरोधाभास

मूल्य के नियम  में मार्क्स हमेशा विसंगतियों की चर्चा करते हैं. परन्तु ये गोल चकोरों और सैन्य ज्ञान से संबंधित विसंगतियां नहीं होती. ये विसंगतियां पूंजीवादी समाज के सामाजिक संबंधों के अन्दर की विसंगतियां हैं. कुछ लोग इनके लिए शब्द विरोधाभास का प्रयोग करना ज्यादा पसंद करते हैं.

बहुत क्षोभ के साथ हम जानते  हैं कि आधुनिक समाज सामाजिक विसंगतियों से भरा पड़ा है. धन की प्रचुरता के साथ  अत्यधिक गरीबी, अत्याधिक बेरोजगारी के बावजूद  ज्यादा काम, बैंकों द्वारा घरों की कुर्की, नस्ली श्रेष्टता और तनाव, औरतों के खिलाफ हिंसा, श्रम संघर्ष, दूषित वातावरण, पुलिस की बर्बरता, गैंग हिंसा, समूहों की घृणा, जनसँख्या का अत्याधिक उजाड़ा और बहुत से युद्ध.  मार्क्स की दिलचस्पी इन सभी  विसंगतियों में हैं. लेकिन इनमें  से किसी एक  से भी वे अपना विश्लेषण शुरू नहीं करते.

इसके विपरीत वे अपेक्षित साधारण सी लगने वाली चीज – जिन्स से शुरू होते हैं. क्यों ? क्योंकि जिन्स पूंजीवाद के सामाजिक संबंधों की सबसे बुनियादी चीज है. लोगों के परस्पर संबंध जिन्स विनिमय का रूप ले लेते हैं. जिन्स सामाजिक संबंधों की बुनियादी कार्यकर्त्ता है.  इसलिए अगर हम यह जानना चाहते हैं कि कैसे ये सभी सामाजिक विरोधाभास परस्पर संबंधित हैं, हमें जिन्स से शुरुआत करनी होगी.

जैसाकि हमने पहले ही देखा है कि जिन्स में विरोधाभास निहित है. : इसका एक उपयोग मूल्य है और दूसरा मूल्य (जैसाकि हमने देखा है कि मूल्य विनिमय मूल्य के पीछे छुपा होता है इसलिए, पहले हमने कहा था कि विरोधाभास उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य के बीच है, बाद में हमने इसे उपयोग मूल्य और मूल्य में संशोधित कर लिया. ) शुरू में देखने पर यह इतना अधिक विरोधाभासी नहीं लगता. लेकिन जैसे ही हम इसे बारीकी से देखते हैं तो महतवपूर्ण विरोधाभास उभर आते हैं.

ऐसा क्यों होता है कि लोगों को मंडी में अपनी श्रम, धन के बदले बेचना पड़ता है. क्योंकि वे स्वयं अपने जीवन निर्वाह के साधन नहीं जुटा पाते. यही पूंजीवाद का विलक्षण पहलू है. पूर्व में मौजूद उत्पादन की विधियों में लोगों की बहुसंख्या किसी न किसी प्रकार के उत्पादन के साधनों का उपयोग कर सकती थी,  जिनसे वे अपने जीवन निर्वाह के साधन जुटा लेते थे. कई बार लोग आपस में चीजे बदल लेते थे परंतू वे ऐसा अपने ही प्रयोग के लिए अतिरिक्त उत्पादन के द्वारा करते थे. अपने अतिरिक्त उत्पादन की विक्री विशेषरूप से विनिमय के लिए उत्पादन से पूर्णतया भिन्न है.

‘प्रारंभिक एकत्रीकरण नाम की लंबी हिंसात्मक और ऐतिहासिक प्रक्रिया  के द्वारा , उत्पादन के इन साधनों का निजीकरण हो गया और इनपर  पूंजीपति नामक वर्ग के लोगों का कब्ज़ा हो गया. जबकि पहले लोग सीधे अपने उपयोग के लिए श्रम किया करते थे, लेकिन अब उन्हें अपनी रोजी चलने के लिए मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.

सो इस तथ्य से कि हम विनिमय के लिए, न कि सीधे उपयोग के लिए उत्पादन करते हैं, संपत्तिशाली और संपत्तिहीन के बीच सामाजिक विरोधाभास का पता चलता है. खुली मंडी में पहले से ही काम पर जबरदस्ती विद्यमान होती है. और इस जबरदस्ती को लागू करने के लिए किसी न किसी प्रकार की हिंसा की आवश्यकता पड़ती हैं, चाहे यह राज्य , निजी सेना या भाड़े के बटमार द्वारा हो. उत्पादन के साधनों का निजीकरण करने के लिए, हिंसा जरूरी थी और संपत्ति के सभी वैधानिक पह्लूयों को लागू करने के लिए जरूरी बनी हुई है.

अपनी जीविका को मंडी से प्राप्त करने के लिए उन्हें कोई अन्य चीज बेचनी पड़ती है. चूँकि उत्पादन के साधन निजी होते हैं, इसलिए उन्हें अपनी श्रम बेचनी पड़ती है. निसंदेह श्रम वास्तव में बेचीं नहीं जा सकती. इसकी जगह हम अपनी श्रम की क्षमता : श्रम-शक्ति बेचते हैं. हम कार्य समय की निश्चित मात्रा बेचते हैं, चाहे इसे घंटों, हफ़्तों या वर्षों में मापा जाये. यही कारण है कि मूल्य श्रम समय की अभिव्यक्ति है.

हमारी स्वयं की सृजनात्मक क्रियाशील क्षमता, वही वस्तु जो हमें इन्सान बनाती है और समाज से जोडती है, श्रम-शक्ति कहलाती है, श्रम-शक्ति जिन्स बन जाती है जिसे हम किसी को बेचते हैं. श्रम-शक्ति का,  अन्य जिन्स की भांति, उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य होता है और आपने अनुमानित किया, इनमें विरोधाभास है. विनिमय मूल्य हमारे कार्य समय के लिए भुगतान की गयी मजदूरी होती है. इसे जीविका पर खर्च द्वारा निर्धारित किया जाता है. यह भोजन, रिहाईश, कपडे, और परिवहन पर खर्च के बराबर होता है. लेकिन हमारी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य ऐसा है कि यह मूल्य सृजित कर सकता है. यही श्रम-शक्ति के दो विरोधी पहलू हैं, एक तरफ इस पर मजदूरी खर्च होती है तो दूसरी और यह मूल्य पैदा करता है.

हो सकता है आपको 5 डॉलर प्रति घंटा दिए जा रहे हो और आप 20 डॉलर प्रति घंटा की दर से मूल्य सृजित कर रहे हों. अगर ऐसा है तो आपका शोषण हो रहा है. वास्तव में, आपके शोषण की दर चार सौ प्रतिशत है. श्रम-शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास के कारण ही शोषण संभव होता है.

शोषण पूंजीवाद की पहेली – मुनाफे के अस्तित्व – को स्पष्ट करता है. पूंजीपति दिन की शुरुआत कुछ धन से करते हैं जिसे वे उत्पादन में  निवेश कर देते हैं. दिन की समाप्ति पर उनके पास कुछ जिंसों की मात्राएँ होती हैं जिन्हें वे शुरू में  खर्च किये गए धन से अधिक मूल्य पर बेच देते हैं. ऐसा लग सकता है कि इनका मुनाफा क्रय -विक्रय करने से हुआ है. हालाँकि केवल क्रय-विक्रय करने से भी मुनाफा अर्जित किया जा सकता है. लेकिन केवल क्रय-विक्रय करने से मुनाफा पैदा नहीं होता. क्योंकि खरीदना और बेचना जीरो-राशी खेल है. जब हम जिंसों का विनिमय करते हैं तो हम उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं. इस प्रक्रिया द्वारा समाज की कुल राशी के मूल्य में कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसा संभव हो सकता है कि किसी एक को चुना लग जाये. परन्तु मंडी में, किसी एक व्यक्ति का लाभ दूसरे के लिए हानि होता है. लेकिन जिंसों की खरीदफरोख्त से औसत मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती. परन्तु वास्तविक मुनाफा औसत मूल्य में वृद्धि से ही संभव है. किसी समाज के जीडीपी की कुल राशी के मूल्य में वृद्धि मुनाफे  के इस विस्तार से ही होती है.

ऐसा लगता है कि हम पहेली या किसी विरोधाभास में उलझ गए हों. मंडी में समानता और संतुलन का राज्य चलता है. मंडी में विनिमय द्वारा जिंसो के मूल्य का संरक्षण होता है. किसी एक व्यक्ति का लाभ किसी दूसरे व्यक्ति की हानि से इस प्रकार बराबर हो जाता है कि जिन्स विनिमय से अन्तर्जात संतुलन बना रहता है. परन्तु मुनाफा ऐसी अद्भुत घटना है जो जिंसों की खरीदफरोख्त होने से संभावय लगती है. कहीं न कहीं विषमता से मुनाफा पैदा हो सकता है.लेकिन थोड़े से ज्यादा पैदा होना. यह सब किस प्रकार संभव हो सकता है?

इस पहेली को हल करने के लिए मार्क्स हमें मंडी से आगे उत्पादन के  रहस्यमई क्षेत्र में देखने के लिए कहते हैं. उत्पादन में, जहाँ श्रम के शोषण से मूल्य का विस्तार हो जाता है. शोषण मंडी में विनिमय के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करता क्योंकि यह विनिमय में नहीं होता. श्रम-शक्ति को उसके मूल्य पर खरीदा जाता है. उस श्रम शक्ति के उत्पादों को उनके मूल्य पर बेचा जाता है. इन विनिमयों द्वारा कोई मुनाफा नहीं होता. मंडी से मुनाफा बिलकुल नहीं आता, बल्कि श्रम प्रक्रिया से आता है. श्रम के मूल्य से अधिक और ऊपर किया गया श्रम मुनाफे की मात्रा का निर्धारक है. जबकि मंडी समानता और संतुलन की क्षेत्र बनी रहती है, उत्पादन असमानता और शोषण का क्षेत्र है. और यह विरोधाभास श्रम शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास होने से ही संभव है.

अगली किश्त मार्क्स के मूल्य के नियम पर आधारित एनिमेटिड हिंदी डब फिल्म : अंतिम किश्त में समाप्य

उनको डर है कि कहीं उनकी मौत का कारण मिलावटी दूध न हो

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बात एक फिकरे में की जाये तो बुद्धिजीवी मिलावटी दूध पीने से मरेंगे नहीं. वैसे बुद्धिजीवी लफ्ज भी कोई ऐसा लफ्ज नहीं है जो, वर्गों में बँटे समाज में, कोई सेक्युलर सी चीज हो.  अगर हमारे प्रथम वाक्य की सच्चाई पर आपको शक हो रहा है, तो सुनो ! बुद्धिजीवी मरता है परजीवियों की सेवा करते हुए या फिर मेहनतकशों की. मिलावटी चीजे खाने से होनेवाली मृत्यु , मृत्यु होती ही नहीं. होता तो बस इतना है कि लूटेर वर्ग की सेवा में हाजिर बुर्जुआ वर्ग का बुद्धिजीवी जो कई साल पहले मर चुका होता है, कब्र में आराम फरमाता है.

एक बुद्धिजीवी वर्ग है जिसने एक नयी चीज ईजाद कर डाली है. वह बुद्धिजीवी जरा परमहंस टाईप का है जो पूंजीपतियों और मजदूरों के बुद्धिजीवियों से ऊपर होने के कारण ‘मुक्त चिन्तनं’ रुपी ‘दंड प्राणायाम’ द्वारा तंदरूस्त रहता है. बहरहाल अगर ऐसा बुद्धिजीवी है तो इस प्रकार के कठिन ‘योगासन्न’ करनेवाले बुद्धिजीवी की प्रतिरोधक क्षमता के मुकाबले बाबा रामदेव के योगासनं की बिसात ही क्या है ! ‘बढती उम्र के साथ सुरक्षित संभोग’ के नुस्खों-टोटकों की मदद से ‘500 वर्षों तक कैसे जीयें’ – इतना कुछ तो कोई भी ‘योगस्वामी  समझा देगा. मगर हमारे ‘परमहंस टाईप’ और ‘मुक्त चिन्तक’ बुद्धिजीवी ‘मुक्त चिन्तनं’ रुपी ‘दंडप्राणायाम’ द्वारा ‘एक्सरसाईज’ करते हैं, जिससे इन 500 वर्षों के जीवन की सार्थकता खोजने पर ‘चिन्तनं’ से जो ‘सागर मंथन’ होता है, उसके  परिणामस्वरूप ‘अमृतपान’ से, वे अमर हो गए हैं. सो मिलावटी दूध पीकर मरने से तो दूर हैं वे.

बात अगर ‘सागर मंथन’ की चली है तो थोडा इस पर भी. ब्रह्मा की दिति और अदिति पत्नियों से पैदा हुए देव और दानव भाईयों ने ‘पौराणिक काल’ में ‘सागर मंथन’ किया था. शेषनाग की रस्सी बनायीं गयी थी जिसके खतरेवाले – यानिकी मुख की ओर के सिरे पर दानव थे. ‘रक्तबीज’ नामक दानव ‘अमृत’ ले उड़ा था और देवतायों ने उसे काटकाटकर मारना शुरू कर दिया. मगर ‘रक्तबीज’ का रक्त जहाँ-जहाँ गिरता गया, और रक्तबीज पैदा होते गये. मौका देखकर, उस वक्त की सियानिसियास्त ने, रक्तपात बंद करवा दिया था.

भारत में मोटापा परजीवी वर्ग के लिए चिंतनीय है तो अमेरिका में बुर्जुआ वर्ग, हमारी धरती के  मुक्त चिंतकों की मेहनत के सदके, इससे मुक्त हो रहा है. मगर वहाँ का सर्वहारा वर्ग अब भी बहुसंख्यक है. वह जंक फ़ूड’ खाने को अभिशप्त है और  मोटापे का शिकार बनता जा रहा है. खैर, हमारा यहाँ का स्थानीय ‘मुक्त चिन्तक’ स्थानीय बुर्जुआ वर्ग की चेतना में इतना इजाफा तो कर ही देगा कि वे थोडा सा और अधिक सियाने हो जाएँ. सियाने होने की देर है, वे सभी भौतिक पदार्थ जैसे ‘ओरगेनिक फ़ूड’ तो पहले से ही, उनकी सेवा में हाजिर होने के लिए, और  हमारे सर्वहारा वर्ग के हाथों से निकलने के लिए छटपटा रहे हैं ?

उत्पादन प्रक्रिया रूपी वर्तमान ‘सागर मंथन’ के उस सिरे पर जहाँ शेषनाग का सिर है, सर्वहारा लगा हुआ है. उत्पादन रूपी अमृत के बड़े हिस्से का रस्सावदान परजीवी पूंजीपति और उनके चाटुकार कर रहें हैं. मगर मुक्त चिंतको की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वे ‘रक्तबीज’ नहीं है. अलबता इस ब्लॉग की ओर से मुक्त चिंतकों को इस फिकरे के साथ शुभकामनाएं  – “तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हो पचास हजार” ?

तथाकथित मुख्य धारा की संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियों के 99 फीसदी से भी अधिक ‘बुद्धिजीवी’ कम्युनिस्ट काडर ने मार्क्स की पूंजी पढ़ी ही नहीं. और जनाब सोचते हैं कि मजदूर और किसान के शोषण का स्थान मंडी है.

हमारे एक  पुराने कामरेड अनाज मंडी या लेबर चौक में किसानों के लिए अधिक भाव और मजदूरों की मजदूरी में बढौतरी (पूंजीवाद की चौहदी के भीतर की लड़ाई) के लिए कवायद में मशगूल रहते हैं. हालाँकि हमारे विश्लेषण का ऐसा कोई अति वामपंथी ‘वर्ज़न’ नहीं है कि इस प्रकार का कोई संघर्ष न हो. हम तो इतना कहना चाहते हैं कि पूंजीवाद द्वारा विकसित आधुनिक मंडी ऐसा स्थान है जहाँ ‘कमोडिटी’ के रूप में उपलब्ध श्रम-शक्ति और किसानों के अनाज का मूल्याँकन सही और वैज्ञानिक तरीके से होता है. जहाँ धोखाधड़ी की गुंजाईश ‘वर्चुयली’ शून्य होती है. सो इन बुद्धिजीवियों का चिंतन कोई घबराहट पैदा नहीं करता, ‘पूंजी’ लिखने के बाद मार्क्स के लिए विश्व के बुद्धिजीवियों को संबोधित करना कोई बड़ी समस्या नहीं थी. सो उन्होंने कह दिया कि अगर आपमें से कोई भी ईमानदारी से मेरे ‘पूंजी’ लिखने के प्रोजेक्ट पर लगा होता, तो वही नतीजे निकलते जो मेरी पुस्तक में निकले हैं. मगर हमारा यह 99 फीसदी तथाकथित मार्क्सवादी काडर अनुभववादी होने के कारण क्लासिकीय मार्क्सवादी पुस्तकों को ‘आस पडौस’ पर रोब झाड़ने के लिए रखता है. सिद्धांत और अनुभव में क्या फर्क होता है, भाड़ में जाये ये सब !

और अंत में, फ्रेडरिक एंगेल्स के ये शब्द : ” हर चीज तर्क के सिंहांसन के संमुख अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करती है या  अस्तित्व त्याग देती है .

पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

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हार्वे की ओर इस कशिश के पीछे कुछ और भी कारण हैं. सावधानीपूर्वक तराशी हुई उनकी दाढ़ी और भले चचा जैसे रूप-रंग में, वे, काफी हद तक, एक भद्र क्रांतिकारी जैसे दीखते हैं. वे बेमिसाल वाक्पटुता के मालिक हैं. मार्क्सवाद की मौजूदा प्रासंगिगता पर उनकी पुस्तकें और व्याख्यान – अढाई लाख से अधिक जिज्ञासू विद्यार्थियों द्वारा उनके इंटरनेट पर उपलब्ध पूंजी पर व्याख्यानों को डाउनलोड किया जाना – एक तरह का साहित्यिक उत्साह और मार्क्स को उनकी श्रेष्टता के साथ  आह्वान करने के विश्वास का भाव. वे उस वक्त विशेषरूप से अकाट्य होते हैं जब वे पूंजीवाद का, अनंत प्रवाह के रूप में, वर्णन करते हैं, कि कैसे यह निरंतर अपनी रुकावटों को पार कर जाता है, जैसे ही इसे मुनाफा कमाने के नये अवसर मिल जाते हैं.इसे एक उपमा ही कहेंगे कि वे सत्रहवीं सदी के अपने हमनाम ‘विलियम हार्वे’ को प्रसंतापूर्वक इस बात का श्रेय देते हैं कि कैसे वे  शरीर में खून को प्रणालीबद्ध रूप से दौड़ता हुआ दिखाया करते थे. यहाँ उसी उपमा को काम करते हुए देखा जा सकता है.

“एक तरफ अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं और क्रेडिट के फेरीवाले जौंक की भांति विश्वभर के लोगों का ‘ढांचागत समन्वय’ कार्यक्रमों और हर तरह की तिकडमों ( जैसे क्रेडिट कार्ड की फीस का एकदम दोगुना हो जाना ) द्वारा जितना खून चूस सकते हैं,चूसते रहते हैं – कोई फर्क नहीं पड़ता के वे कितने गरीब हो चुके हैं. दूसरी और केन्द्रीय बैंक अपनी अर्थव्यवस्थाओं में बाढ़ ले आते हैं और ग्लोबल बॉडी पोलीटिक में इस उम्मीद के साथ कि इस तरह के आकस्मिक आधानों से वह रोग ठीक हो जायेगा जिसे रेडिकल रोगनिदान और हस्तक्षेप की जरूरत है,  अत्यधिक तरलता का विस्तार कर देते हैं.

सभी मार्क्सवादियों की भांति, डेविड हार्वे भी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच मौज-मस्ती करते हैं. जैसेकि उन्होंने अपने व्याख्यान के बाद मेरे साथ अपने इन्टरवियू में बताया, ” मैं द्वन्द विज्ञानी हूँ. समाज में मौजूद विसंगतियों की खुदाई करने में मेरा विश्वास है. और मैं उनको प्रगतिशील बदलाव की गति के मार्ग के लिए प्रयोग करता हूँ. यह चिंतन और व्याख्या करने का तरीका है, जिसे प्रयोग में लाना बड़ा ही आसान है, अगर आप इसका प्रयोग इस तरह से करें कि लोग इसके साथ स्वयं को अभेद पायें बजाय इसके कि आपको कहना पड़े कि इसे समझने के लिए आपको हेगेल के तीनों और मार्क्स  के चारों खण्डों का अध्ययन करना पड़ेगा. बढ़िया नाटक, हेलमेट ( शेकस्पियर का एक नाटक ) की संरचना द्वंदात्मक है. अगर ऐसा न होता तो यह बहुत उबाऊ होता. और यही कारण है कि मुझे इतिहास और ऐतिहासिक बदलाव बहुत आकर्षित करते हैं.

अपनी [RSA ] के साथ बातचीत और अपनी उम्दा पठनीय पुस्तक में हार्वे, थेचरवाद के वर्षों के दौरान, नवउदारीवादी क्रांति से पैदा हुई विसंगतियों पर ,लुत्फ़ उठाते हैं. इससे पहले पूंजीवाद की समस्याओं को पूंजी के संबंध में श्रम की शक्ति को रखकर परिभाषित किया जाता था. नए यूनियन विरोधी विधान और ग्लोबल आउटसोर्सिंग के विकास, जिससे पूंजीपति अविकसित देशों की भोली-भाली जनता के श्रम को निचोड़ सकें, द्वारा संगठित श्रम को पीछे हटने के लिए मजबूर करके ही मुनाफे संभव हो सकते थे. परन्तु इसके तुरंत बाद एक नयी समस्या खड़ी हो गयी. अब, चूँकि वास्तविक उजरत बहुत घट गयी थी, पूंजीवाद द्वारा उत्पादित वस्तुओं को मजदूर वर्ग द्वारा खरीदना किस प्रकार संभव हो सकता था ? इसका हल आसान क्रेडिट में ढूंढा जाने वाला था.

क्रेडिट का अधिकतर हिस्सा, आवास बाज़ार में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक नयी समस्या थी. इस कर्ज का अधिकतर भाग आवास बाज़ार को ईधन मुहैया करवाने के रूप में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक और विरोधाभास था. एक तरफ बैंकों ने बिल्डरों को क्रेडिट की लंबी-लंबी स्कीमें थमा दी ताकि वे और अधिक घरों का निर्माण कर सकें. और उसी वक्त, उन्हीं बैंकों ने, उन लोगों को कर्ज दे दिया जो इस नयी खड़ी की गयी संपत्ति को खरीदना चाहते थे. यह पोंजी स्कीम – एक निवेश संबंधी घोटाला जिसमें शुरू के निवेशकों को मिलनेवाला तथाकथित लाभ नए जुडनेवाले निवेशकों के फंडों से सीधा प्राप्त हो जाता है – का सटीक उदाहरण था. अन्य सभी पोंज़ी स्कीमों की भांति, पूरी ईमारत उस वक्त भरभराकर गिर गयी जब निवेशकों ने नकदी वसूलने का फैसला किया.

लेकिन हम इतने अधिक लोगों की उस क्षेत्र में, जो उदाहरणतय, मैन्युफेक्चरिंग जैसे क्षेत्र में निवेश के मुकाबले संदिग्ध हो, में निवेश की इच्छा की किस प्रकार व्याख्या करेंगे ? और यही है वह जहाँ, हम हार्वे के विश्लेषण की गरी की झलक पाते हैं. वे तर्क देते हैं की बीतें दिनों वित्तीय संकटों में हुए प्रवर्धनों को उत्साहित करने के लिए जो चीज थी, वह थी, पूंजीवाद की तीन प्रतिशत की मिश्रित दर से वृद्धि की प्रतिबद्धता. बीते समय में, सीमित विश्व में जिसमें इतनी अधिक अविकसित मंडियां हों , अमेरिका और ब्रिटेन के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना संभव था. लेकिन अब जबकि चीन और भारत भी उसी दर या उससे भी अधिक दर से विकसित हो रहे हैं, पूंजीवादी उद्यमों के लिए अपने बेशी-मुनाफों का निवेश करने का क्षेत्र सिकुड़ रहा है. वर्तमान समय में, £1.5 ट्रिलियन नए निवेश की खोज में पड़े हैं. २० वर्षों के समय में, वे £ 3 ट्रिलियन हो जायेंगे. इसलिए उसका अनुसन्धान हुआ, जिसे हार्वे ‘फ़र्ज़ी मंडियां’ : व्युत्पादन (derivatives ) की मंडियां, भविष्य में व्युत्पादन के व्युत्पादन और कार्बन  ट्रेडिंग कहना पसंद करते हैं. शुरू में, ये इनमें निवेश करनेवालों को, उद्योग में निवेश की तुलना में अधिक प्रतिलाभ देने का वायदा करते है लेकिन वे, जैसाकि हमने अपने दम पर देखा है, अंतिम रूप में, भ्रम साबित होते हैं .

जैसे-जैसे [RSA ] के श्रोताओं की ध्यान-मुद्रा साफ़ होती जाती है, इस दलील से प्रभावित न होना मुश्किल लगता है और विशेषरूप से तब, जब इसे, पिछले बारह महीनों के दौरान अन्य अर्थशास्त्रियों की टूटी-फूटी टिप्पणियों के कोंट्रासट में रखते हैं. परन्तु मैं अपनी उस वक्त की बेचैनी को दबा नहीं सका जब हार्वे  मौजूदा स्थिति पर रेडिकल हल पेश करने की और बढ़ रहे थे, जहाँ ऐसा लगता था कि यह ताज़ा पूंजीवादी संकट इसके कफ़न के लिए अंतिम कील साबित होगा. मैं इसलिए चौकस था कि इस तरह की भविष्यवाणियाँ पहले भी कई बार हुई थीं. पूंजीवाद, हमें बहुत से सिद्धान्तकारों द्वारा बताया गया था , 1973 के तेल संकट,या IMF के 1976 के संकट , या 1987 के काले सोमवार के साथ या 1992 के काले बुधवार के साथ, अपने चरम बिंदु पर पहुँच गया था. परन्तु भविष्यवाणियाँ फेल साबित हुईं. बार-बार पूंजीवाद, जीवित रहने में, सफल रहा. इसलिए क्या मौजूदा स्थिति में कुछ ऐसा है जो वास्तव में अलग हो ?

ऐसी कोई बात नहीं है जिसने मुझे परेशान किया हो. हार्वे इतनी तैयारी में हैं कि वे पूंजीवाद द्वारा संकटों पर काबू पाने और कुशलतापूर्वक मुनाफा कमाने के नए रास्तों की खोज को तस्लीम नहीं कर पाते. बीते समय में, इसने अपने इस मकसद को हासिल करने के लिए कई अतार्किक तरीके खोजे थे. और इसने ऐसा ही किया, जैसे हार्वे अपनी पुस्तक ‘पूंजीवाद की पहेली’  [ The Enigma of Capital ] में इसके द्वारा युद्ध के रास्ते से, परिसम्पत्तियों के अवमूल्यन से, उत्पादक क्षमता के अपकर्ष से, अपसर्जन और अन्य सृजनात्मकता की तबाही द्वारा, अपनी समस्याओं का हल करता रहा है. इन सभी समाधानों से चौंकानेवाले परिणाम निकले हैं. मानव जीवन अस्त-व्यस्त और जहाँ तक कि तबाह हो जाता है, सारा कैरियर और जीवनभर की उपलब्धियां खतरे में पड़ जाती हैं, गहरे पैठ कर चुके विश्वास को चुनौती मिलती है, रूह घायल हो जाती है और मानव के गौरव का परित्याग कर दिया जाता है. सृजनात्मक तबाही शानदार, सुन्दर, बुरे और अच्छे – सभी पर भारी पड़ती है. संकट, हम निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं, ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’ है.

परन्तु निसंदेह, उनकी जिज्ञासा यह दिखाने की है, कि वर्तमान संकट पिछले सभी संकटों, जिनपर काबू पा लिया गया था, की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है और उनकी जिज्ञासा यह सुझाव देने की होती है कि प्रत्येक समझदार व्यक्ति के पास ‘पूंजीवाद विरोधी अभियान’ में शामिल होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है, लेकिन फिर भी, वे भविष्यवेत्ता बनने से बहुत दूर हैं.

क्या पूंजीवाद वर्तमान सदमे से बच निकलेगा ? हाँ, बेशक. लेकिन हार्वे विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि इसकी भारी कीमत चुकानी होगी. लोगों की अधिकतर आबादी को अपनी मेहनत के फल को उन्हें देना होगा, जो सत्ता में हैं, अपने बहुत से अधिकारों और अपने साधनों की सख्त मुशक्त से हासिल की गयी कीमत ( आवास से लेकर पेंशन फंड, हर वस्तु) का त्याग करना होगा और प्रचुर मात्रा में, परिवेशी अपकर्ष का दर्द झेलना होगा. केवल इतना ही नहीं कि अपने जीवन स्तर में कटौती बल्कि इसका अर्थ होगा बहुत से गरीब लोग, जो पहले ही जीवित रहने का संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए भूखमरी. थोड़े से राजनीतिक दमन से कहीं अधिक, आनेवाली अशांति का गला घोंटने के लिए, पुलिस हिंसा और मिलट्री राज्य नियंत्रण की आवश्यकता पड़ेगी. जिस वक्त,  हार्वे यह सब कह रहे थे, ठीक उसी वक्त, एथेन की गल्लियों में लड़ाई बढ़नी शुरू हो गयी थी.

यद्यपि, इस सब का मतलब निराश होने से नहीं है. संकंट विरोधाभास और संभावनाओं के वे क्षण होते हैं, जिनसे विकल्प के तरीके, समाजवादी और पूंजीवाद विरोधी, सभी जन्म लेते हैं.

अगली अंतिम किश्त में समाप्य

एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

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लिंक जोड़ने के लिए देखें —  ‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

मार्क्सवाद और देश दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि पूंजीवाद अपने जन्म से ही लंगड़ा-लूला पैदा हुआ है और उसे मेहनतकश अवाम ने न केवल चुनौतीपूर्ण टक्कर ही दी है, बल्कि बीसवीं सदी में बुर्जुआ वर्ग से सत्ता छीनकर सोवियत यूनियन और चीन में महान समाजवादी तजुर्बे भी किये हैं. हालाँकि अपने इन प्रारंभिक तजुर्बों में मेहनतकश वर्ग ,वक्ती तौर पर, हार गया है और सोवियत यूनियन और यहाँ तक की चीन की वर्तमान संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडे तले पूंजीपति वर्ग ने अपनी सत्ता को स्थापित कर लिया है. डॉ. झुनझुनवाला [ देखें — वामपंथ की सैद्धांतिक भूल ] बंगाल में सत्तासीन रही संशोधनवादी पार्टी की हार का ज़िक्र करते हैं और मार्क्सवाद की थ्योरी को त्रुटिपूर्ण होने का फ़तवा सुना देते हैं, बिना यह जाने कि मार्क्सवाद कोई कठमुल्ला उपदेशात्मक शास्त्र नहीं है, बल्कि वर्गीय समाज के संघर्ष में, ऐसा समाज शास्त्र है जो सर्वहारा पक्षावलम्बी है. मार्क्सवाद ने अपने संघर्ष के दौरान न केवल पूंजीपति वर्ग से टक्कर ली है बल्कि लाल झंडे के तले अराजकतावाद, आतंकवाद, अर्थवाद, ट्रेड-यूनियनवाद आदि संशोधनवाद, जो मार्क्सवाद को इतना पतला और कमजोर कर देना चाहता है ताकि यह पूंजीपति वर्ग की सत्ता को चुनौती न देकर उसकी सेवा में हाज़िर हो और अपने संसदमार्गी कृत्यों से मजदूर वर्ग के आक्रोश पर ठन्डे पानी के छींटे मारकर उनकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करता रहे, केखिलाफ भी संघर्ष किया है.

अपने इस आलेख में, डॉ. झुनझुनवाला इस प्रकार के निष्कर्ष निकालते हैं जैसे,  ‘मार्क्सवादी बाजार विरोधी है जबकि बाज़ार सभी को उनकी क्षमतानुसार काम करने के अवसर प्रदान करता है’. बाज़ार का महिमामंडन करते हुए वे लिखते हैं,
“हम देखते हैं कि आर्टिस्ट को पेंटिंग बनाने में ही मजा आता है। पेंटिंग बिक गई, इतनी ही जानकारी उसके लिए पर्याप्त होती है। किसान गेहूं का उत्पादन करके प्रफुल्लित होता है, यद्यपि उसे पता नहीं होता कि रोटी कौन खाएगा। श्रमिक को यदि उसके स्वभाव के अनुकूल काम मिल जाए तो वह सुखी होता है। आर्टिस्ट को हल चलाने में लगा दिया जाए तो वह दुखी होगा और किसान को पेंटिंग करने के लिए ब्रश थमा दी जाए तो वह भी दुखी होगा। विशेष यह कि व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य ढूंढने में बाजार से मदद मिलती है। श्रमिक मन चाहा कार्य पकड़ सकता है। इसलिए मूल रूप से बाजार सुखदायी है।

डॉ. झुनझुनवाला जी, किसान, श्रमिक, और आर्टिस्ट जन्म से पैदा नहीं होते. व्यक्ति का मनपसंद कार्य वह नहीं होता जो वह कर रहा होता है. वर्गीय समाज का विकास इसका मुख्य निर्धारक होता और व्यक्ति की इच्छा गौण. मोटे तौर पर वर्गीय समाज आदिम साम्यवाद से लेकर मालिक-गुलाम, सामंत-किसान और अब पूंजीपति-मजदूर — चार चरणों से होकर गुजरा है . यह सब किसी एक व्यक्ति के चाहने या न चाहने से नहीं हुआ. वर्ग-संघर्ष इसका वस्तुगत चरित्र रहा है.बाजार भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से पैदा हुआ है. चूँकि पूंजीपति वर्ग और  समाज के अस्तित्व के लिए बाज़ार जरूरी है, इसलिए इसका महिमामंडन भी जरूरी है, जोकि आप बाखूबी कर रहे हैं. आपका यह “मूल रूप से बाजार” श्रमिक – जिसके पास अपनी श्रम-शक्ति बेचने के सिवा और कुछ नहीं होता – को नहीं, आपको सुखदायी लगता है।

हमारा यह मानना है कि मार्क्सवाद बाज़ार विरोधी है लेकिन उस प्रकार से नहीं जिस प्रकार डॉ. झुनझुनवाला पेश करते हैं. अपने सारे आलेख में वे ,बड़ी चालाकी के साथ, मार्क्स के मूल्य के श्रम-सिद्धांत का ज़िक्र तक नहीं करते और मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ सिद्ध कर देते हैं. यही वह बाज़ार होता है जहाँ श्रम-शक्ति पण्य (कमोडिटी) के रूप में बिकती है और अपनी विशिष्टता ( श्रम-शक्ति अकेली ऐसी पण्य है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है) के कारण अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है जिसमें से पूंजीपति वर्ग न केवल अपना मुनाफा वसूलता है बल्कि उसकी सेवा में हाज़िर राज्य और उसकी संस्थाओं के खर्च भी निकलते हैं. अपनी विशेष हैसियत के कारण, पूंजीवादी उत्पादन क्रिया से लूटे गये अतिरिक्त मूल्य पर हक़ का पहला दावेदार पूंजीपति वर्ग होता है. यही कारण है कि इस वर्ग की खुशामद द्वारा बुर्जुआ वर्ग का  बुद्धिजीवी (ध्यान रहे बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा संकल्प नहीं है जिसकी अवस्थिति वर्ग-हितों से ऊपर हो ) चंद हड्डियों की अपेक्षा पाले रहता है. ऐसा नहीं है कि एक संशोधनवादी, संसदमार्गी  और मजदूर वर्ग में अर्थवाद द्वारा उसकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करनेवाली माकपा ‘स्टाईल मा‌र्क्सवादियों की पार्टी’ की हार से डॉ. झुनझुनवाला को मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ दिखाई देने लगी हों और वे बड़ी ईमानदारी से मार्क्सवाद पर चिन्तन-मनन करने लगे हों. कारण उनकी पूंजीवादी वर्ग-स्थिति है और वे माकपा जैसी संशोधनवादी पार्टी की हार से व्याकुल इसलिए हैं कि कहीं मजदूरों की, इन संशोधनवादी पार्टियों के प्रति, आस्था न डगमगा जाये और वे, विकल्प के तौर पर, अपनी सच्ची कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण न कर लें.

मार्क्स ने पूंजीवादी समाज की विशेषताओं में से एक – श्रम के अलगाव का ज़िक्र किया है. अकेला मजदूर वर्ग ही सक्षम है जो पूंजीपति वर्ग से संघर्ष द्वारा – वर्गीय समाज को ख़त्म करने की प्रक्रिया द्वारा – इस मर्ज़ का इलाज करेगा. इसलिए मार्क्सवाद की अवस्थिति वर्तमान और भविष्य में है. लेकिन डॉ. झुनझुनवाला मार्क्स को उस ग्रामीण परिवेश में भेज देते हैं, जहाँ  “गाँव का व्यक्ति किसान के लिए हल बनाता है …वह उसमें अपने प्राण आहूत करता है। उसके सामने ही किसान उसका उपयोग करता है, जिसे देखकर दोनों का मन लहलहाता है।” पता नहीं किस युग में और कैसे किसान जोकि  सामंतो द्वारा शोषित रहा है अपनी उस वक्त की मेहनतकश की स्थिति पर प्रफुल्लित होता रहा है ? ‘अह़ा ग्राम्य जीवन’ का ‘नोस्तालजिया’ मार्क्स का नहीं डॉ. झुनझुनवाला का है जिन्होंने बीते का रुदन करनेवाले कवियों से इसका महिमा मंडन सुन रखा है   वे भूल जाते हैं कि मार्क्स की रचनाओं के तीन स्रोत और तीन अंग उस वक्त के विकसित पूंजीवाद के तीन देशों – दर्शन के लिए जर्मनी, अर्थशास्त्र के लिए इंग्लैण्ड और क्रांतियों व समाजवाद के लिए फ़्रांस – से लिए गए हैं. अब तो सारा विश्व पूंजीवाद के नियमों के अनुसार गतिमान है और कृषि में भी किसान बैलों के पीछे-पीछे हल पकडे नहीं भटकता बल्कि कृषि संबंधी उत्पादन में उसके श्रम की भूमिका गौण हो गयी है और मजदूर वर्ग ही वहाँ उत्पादन क्रिया में मुख्य रूप से सक्रीय है.  कृषि उत्पादन में पूंजीवादी संबंधों की मुकम्मल स्थापना ने छोटे किसानों की तबाही निश्चित कर दी है और वे मजदूर वर्ग की अवस्थिति और दृष्टिकोण अपनाने को बाध्य होते जा रहे हैं. भविष्य में उनका बड़ा हिस्सा मजदूरों द्वारा संपन्न की जानेवाली इक्कीसवीं सदी की नई समाजवादी क्रांतियों के लिए अहम भूमिका अदा करेगा.

डॉ. झुनझुनवाला  लिखते हैं, “एक प्रमुख अखबार ने लिखा है कि वामपंथी विचारधारा तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक देश में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहेगी। यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित है.”

यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित हो सकता है लेकिन एक मार्क्सवादी के लिए नहीं. मार्क्सवाद की विशिष्टता है कि इसने इस वस्तुगत सच्चाई की निशानदेही की है जिसमें, पूंजीवाद ने अपनी विकास प्रक्रिया के दौरान, समाजके एक छोर पर अकूत धन-दौलत और दूसरे सिरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया है. गरीबी,  बीमारी और असमानता जैसी अलामतें इसके जरूरी बाई-प्रोडक्ट हैं. मार्क्सवाद ने एक और कटु सत्य इंगित किया है जो पूंजीपतियों और उनके डॉ झुनझुनवाला जैसे बुद्धिजीविओं को सताता रहता है. पूंजीवाद द्वारा पैदा किये गए कंगाली के इस विशाल समुद्र के सापेक्ष पूंजीपतियों की खुशहाली की चंद मीनारों की औकात अल्पसंख्यक और कमजोर की है जो  कभी भी भरभराकर गिर सकती हैं. मार्क्सवादी विचारधारा की प्रासंगिगता, केवल देश या दुनिया में, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहने तक ही नहीं है बल्कि यह प्रासंगिक रहेगा तब तक, जब तक, वर्गीय समाज का अस्तित्व रहेगा. केवल वर्गविहीन समाज में इसका स्थान म्यूजियम में होगा.

वे अपनी कलम मजदूर वर्ग की तानाशाही पर चलाते हुए मध्यम वर्ग में इस बुर्जुआ लोकतंत्र के भ्रम को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. हो सकता है कि पढेलिखे मध्यम वर्ग के एक हिस्से की, इस बुर्जुआ लोकतंत्र में भारी आस्था हो, लेकिन मजदूर वर्ग इस बात को भली-भांति समझता है कि यह लोकतंत्र बुर्जुआ वर्ग का, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतंत्र है. मजदूर वर्ग के लिए यह तानाशाही ही है. किसी भी वर्गीय समाज में ऐसा लोकतंत्र नहीं हो सकता जो सर्वमान्य हो और न ही सर्वहारा वर्ग, जब वह सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, बुर्जुआ वर्ग और उसके पैरोकारों को लोकतान्त्रिक हक़ देने की छूट दे सकता है, क्योंकि इसका अर्थ होगा – पूंजीवाद की पुनर्स्थापना.

अपने आलेख के अंत में, वे वामपंथ को सैद्धांतिक संजीवनी की घुट्टी पिलाते हुए  और “थ्योरी का  नवीनीकरण” करने की सलाह देते हुए “बाजार का बहिष्कार करने के स्थान पर बाजार पर लगाम लगाने” और ” सरकारी तंत्र के विस्तार के स्थान पर ऐसी पालिसी की मांग” जो  “हल्के सरकारी तंत्र से भारी जनहित हासिल करे” जैसी चलताऊ बातों करके खुश हो लेते हैं, जैसेकि उन्होंने अपने इस आलेख में मार्क्सवाद की ऐसी की तैसी कर दी हो. उनके हलके सरकारी तंत्र और जनतंत्र पर मार्क्सवाद का कहना है कि जब मजदूर वर्ग समाजवाद के संक्रमण काल में बुर्जुआ वर्ग का नामोनिशान मिटा देगा तो उसे किसी भी तरह के -हलके या भारी तंत्र – की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस पर विशेष

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विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति का प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की दिशा

कात्यायनी

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर
3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में
4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा
5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन
6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन
7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति
8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर
9. और अंत में…

आज एक कठिन समय में हम यहाँ पर नारी मुक्ति आन्दोलन की कुछ बुनियादी समस्याओं पर बातचीत के लिए इकट्ठा हुए हैं । सामायिक तौर पर यह पराजय, विपर्यय, पुनरुत्थान, फासिज़्म की शक्तियों के विश्वव्यापी उभार और क्रांति की शक्तियों के पीछे हटने का दौर है । कुछ समय के लिए, आज एक बार फिर क्रांति की लहर पर प्रतिक्रांति की लहर विश्व स्तर पर हावी है ।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी ऐसे कठिन दौर आते हैं तो अँधेरे की ताकतें मेहनतकश आम जनता के साथ ही औरतों की आधी आबादी पर भी अपनी पूरी ताकत के साथ हमला बोल देती है और न केवल उनकी मुक्ति की लड़ाई को कुचल देना चाहती है बल्कि अतीत के अनगिनत लंबे संघर्षों से अर्जित उनकी आजादी और जनवादी अधिकारों को भी छीन लेने पर उतारू हो जाती हैं । आज भी ऐसा ही हो रहा है । हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो विश्व सर्वहारा क्रांति के एक नये चक्र की शुरुआत का समय है, अक्टूबर क्रांति के नये संस्करण के निर्माण का समय है । साथ ही, यह नारी मुक्ति आन्दोलन के लिए भी एक नई शुरुआत का समय है, क्योंकि इतिहास ने यह अंतिम तौर पर सिद्ध कर दिया है कि एक पूंजीवादी विश्व में नारी मुक्ति का प्रश्न अंतिम तौर पर हल नहीं हो सकता और यह भी कि इस आधी आबादी की मुक्ति की लड़ाई के बिना शोषण-उत्पीडन से मेहनतकश जनता की मुक्ति की लड़ाई भी विजयी नहीं हो सकती ।

आज अपने प्रयासों को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया में, विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति के प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा पर विचार करते हुए हमें सर्वोपरी तौर पर उन विचारधारात्मक-सैद्धांतिक हमलों का जवाब देना होगा जो नारी मुक्ति विषयक तरह-तरह के बुर्जुआ सिद्धांतों के रूप में हमारे ऊपर किये जा रहे हैं । जीवन और संघर्ष के अन्य मोर्चों की ही तरह आज नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी जनवाद के नाम पर मुक्त बाजार का पश्चिमी उपभोक्तावादी दर्शन तरह-तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है और एक बार फिर, नये-नये रूपों में, जोर-शोर से बीमार बुर्जुआ संस्कृति, व्यक्तिवाद, पुरुष-विरोधी नारीवाद, अराजकतावाद, यौन-स्वच्छंदतावाद की तरह-तरह की खिचड़ी परोसी जा रही है । फ़्रांसिसी फुकोयामा के “इतिहास के अंत” और पश्चिम में जन्मे “विचारधारा के अंत” के नारे की तर्ज पर नारी आन्दोलन को भी विचारधारा से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं क्योंकि बकौल इन मुक्त चिंतकों के, “विचारधारा ने नारी की आजादी की लड़ाई को कोई योगदान नहीं दिया ।” ऐसे लोगों के उत्तर में बस बर्तोल्त ब्रेखत का एक बयान उद्धृत किया जा सकता है, जो उन्होंने २६ जुलाई, १९३८ को वाल्टर बेंजामिन से बातचीत के दौरान दिया था, “विचारधारा के विरुद्ध संघर्ष खुद में एक नई विचारधारा बन जाता है ।” वास्तव में इन तमाम मुक्त चिंतनधाराओं का सारतत्व यह है कि व्यवस्था-परिवर्तन की बुनियादी लड़ाई से नारी मुक्ति संघर्ष को अलग करके वर्तमान सामाजिक-आर्थिक दायरे के भीतर सीमित कर दिया जाये । इनका एकमात्र उद्देश्य स्त्रियों को यह समझाना है कि उनकी आजादी के प्रश्न का सामाजिक क्रांति के प्रश्न से कुछ भी लेना-देना नहीं है और यह एक स्वायत्त-स्वतंत्र प्रश्न है । आज न केवल अलग-अलग किस्म की बुर्जुआ सुधारवादी चिंतनधाराएं, बल्कि सत्तर के दशक के यूरोकम्युनिज़्म से लेकर अस्सी के दशक में उभरी भांति-भांति की पश्चिमी नववामपंथी धाराएं तथा गोर्बचोवी लहर और देंगपंथी नकली कम्युनिज़्म  से प्रभावित धाराएं भी या तो स्त्रियों की मुक्ति के आन्दोलन को कुछ सामाजिक-आर्थिक मांगों, पर्यावरण या स्वास्थ्य के मुद्दों तक ही सीमित करके और उसे नारी मुक्ति के बुनियादी मुद्दे, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संघर्ष के दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य से काटकर सुधारवाद और अर्थवाद के दलदल में धंसा देना चाहती हैं या फिर केवल बाल की खाल निकालने जैसी कुछ अकादमिक बहसों और बौद्धिक कवायद तक मह्दूद कर देना चाहती हैं ।

आज नारी मुक्ति संघर्ष को एक क्रांतिकारी दिशा देने और एक नई शुरुआत करने के लिए यह जरूरी है कि इम  अपने आन्दोलन में मौजूद इन सभी विजातीय प्रवृत्तियों और रुझानों को लंबे वाद-विवाद में परास्त करें, उनके प्रभाव को निर्मूल करें और एक सही, ठोस लाइन और कार्यक्रम के इर्द-गिर्द अलग-अलग देशों में मेहनतकश स्त्रियों और मध्यवर्गीय स्त्रियों को गोलबंद एवं संगठित करें तथा साथ ही, उन्हें जनता के सभी वर्गों के क्रांतिकारी संघर्षों के साथ जोड़ें । तीसरी दुनिया के देश आज भी साम्राज्यवाद की कमजोर कड़ी हैं, जहाँ सामाजिक क्रांतियों के विस्फोटक की वस्तुगत परिस्थितियाँ सर्वाधिक परिपक्व हैं । ऐसे देशों में क्रांतिकारी नारी मुक्ति के आन्दोलन के हिरावल दस्तों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा है क्योंकि आधी आबादी की भागीदारी के बिना न तो कोई सर्वहारा क्रांति सफल हो सकती है और न सर्वहारा क्रांति के बिना आधी आबादी की वास्तविक मुक्ति की शुरुआत हो सकती है । ऐसे समय में, नेपाल में नारी मुक्ति आन्दोलन से संबंधित विषय पर संगोष्टी का आयोजन बहुत ख़ुशी की बात है, जहाँ क्रांति की शक्तियां आज तरह-तरह के अवसरवादी-दक्षिणपंथी भटकावों से संघर्ष करते हुए जनता के विभिन्न वर्गों को संगठित कर रही हैं । हम नेपाल में इस संगोष्टी के आयोजक कामरेडों का क्रांतिकारी अभिनंदन करते हैं ।

अपने इस निबन्ध में हमारा मन्तव्य नारी मुक्ति संघर्ष की विश्व-ऐतिहासिक यात्रा का एक संक्षिप्त सिंहावलोकन प्रस्तुत करते हुए उसके सामने आज उपस्थित कार्यभारों और चुनौतियों को रेखांकित करना है । हर नई शुरुआत के समय इतिहास का पुनरवालोकन जरूरी होता है । द्वंदात्मक भौतिकवादी जीवन-दृष्टि हमें यही बताती है कि इतिहास के मुल्यांकन-पुनर्मुल्यांकन का मूल अर्थ केवल भविष्य के लिए नये कार्यभारों का निर्धारण ही होता है ।

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

अब तक वर्ग-अंतरविरोधों से युक्त जितने भी समाजों का इतिहास हमें ज्ञात है, स्त्रियाँ उन सभी में परिवार और समाज – दोनों में पुरुषों के मातहत ही रही हैं । पूरे सामाजिक ढाँचे में सर्वाधिक शोषित-उत्पीड़ित तबकों में ही उनका स्थान रहा है । जब वर्ग समाज का प्रादुर्भाव हो रहा था और निजी स्वामित्व के तत्व और मानसिकता पैदा हो रही थी उसी समय पितृसत्तात्मक व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थी, और स्वाभाविक तौर पर, उसके प्रतिरोध की स्त्री-चेतना भी उत्पन्न हो चुकी थी जिसके साक्ष्य हमें अलग-अलग संस्कृतियों की पुराणकथाओं  और लोकगाथाओं में आज भी देखने को मिल जाते हैं ।
पर इतिहास के पूरे प्राकपूंजीवादी काल में उत्पीड़न के विरुद्ध विद्रोह की नारी चेतना अपने समय के विस्मरण के बाद नारी समुदाय ने अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्षों एवं क्रांतियों में भूदास या दास जैसे वर्गों के सदस्य के रूप में शिरकत तो की लेकिन पुरुषों के मुकाबले अपनी हीनतर सामाजिक-पारिवारिक स्थिति के विरुद्ध या अपनी स्वतंत्र अस्मिता एवं सामाजिक स्थिति के लिए उसने पूंजीवाद के आविर्भाव के पूर्व संघर्ष नहीं किया, क्योंकि तब इसका वस्तुगत आधार ही समाज में मौजूद नहीं था । समाज और परिवार में स्त्रियों की भूमिका, मातृत्व, शिशुपालन आदि स्थितियों के नाते वर्ग समाज में पैदा होनेवाली उनकी मजबूरियां, घरेलू श्रम की गुलामी, समाज में निकृष्टतम  कोटि के उजरती मजदूर की स्थिति, यौन असमानता, यौन शोषण, यौन उत्पीडन – इन सबके कुल योग के रूप में नारी प्रश्न (Women Question ) को विश्व इतिहास के पूंजीवादी युग में ही सुसंगत रूप में देखा गया और नारी मुक्ति की एक नई अवधारणा विकसित हुई, जिसका संबंध पुनर्जागरण काल के मानववाद और प्रबोधन के युग की तर्कपरकता एवं जनवाद की अवधारणा तथा बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों से था ।

सामंतवाद के युग तक स्त्रियों को सम्पत्ति के अधिकार सहित कोई भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं था और उनकी इस सामाजिक-पारिवारिक मातहती की स्थिति को धर्म, कानून और सामाजिक विधानों की स्वीकृति प्राप्त थी । सामन्तवाद के गर्भ में जब पूंजीवाद का भ्रूण विकसित हो रहा था, उसी समय से सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी शुरू होकर बढती चली गई । यही वह भौतिक आधार था, जिसने पहली बार स्त्रियों के भीतर सामाजिक अधिकारों की चेतना को जन्म दिया ।

पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के अंतर्गत सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी और साथ ही उनके अधिकारों के अभाव के जारी रहने की स्थिति के नाते शुरू से ही बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के प्रति परस्पर विरोधी रुख और दृष्टिकोण अलग-अलग रूपों में मौजूद रहे । पुनर्जागरण काल में एक ओर जहाँ प्राचीन ग्रीक और रोमन परिवारों के मॉडल और रोमन कानूनों के नमूनों के अनुकरण ने स्त्रियों की गुलामी को तात्कालिक तौर पर पुख्ता बनाया, वहीं पुनर्जागरण काल के महामानवों द्वारा प्रवर्तित मानववाद के क्रांतिकारी दर्शन ने धर्मकेन्द्रित (Theocentric ) समाज की जगह मानवकेन्द्रित (Anthropocentric ) समाज के मूल्यों का प्रतिपादन करके, सामाजिक व्यवस्था की तमाम दैवी स्वीकृतियों पर प्रश्नचिह्न उठाकर और लौकिकता के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित करके, प्रकारांतर से स्त्रियों की गुलामी की धार्मिक-अलौकिक स्वीकृति और सामंती समाज-व्यवस्था के विधानों की मानवेतर स्वीकृति को भी ध्वस्त करने का काम किया । तात्कालिक तौर पर सोहलवीं शताब्दी में धर्मसुधार काल के दौरान प्यूरिटनिज्म और काल्विनिज्म के प्रभाव में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति भले ही बहुत बदतर दिखाई दे रही हो, पर एक ओर दर्शन के स्तर पर मानववाद की विचारधारा और दूसरी ओर सामाजिक उत्पादन में लगातार बढती स्त्रियों की भागीदारी उनकी मुक्ति की चेतना को लगातार विकसित कर रही थी, जिसकी पहली मुखर अभिव्यक्ति बुर्जुआ क्रांतियों की पूर्वबेला में, प्रबोधन काल के दौरान सामने आई ।

स्त्रियों ने सबसे पहले समानता की मांग बुर्जुआ व्यवस्था के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया के शुरुआती काल में ही उठाई । अमेरिकी क्रांति (१७७५-१७८३) के दौरान मर्सी वारेन और एबिगेल एडम्स के नेतृत्व में स्त्रियों ने मताधिकार और सम्पत्ति के अधिकार सहित सामाजिक समानता की मांग करते हुए जार्ज वाशिंगटन और टॉमस जैफर्सन पर स्त्रियों की आबादी के मसले को संविधान में शामिल करने के लिए दबाव डाला, पर बुर्जुआ वर्ग के एक बड़े हिस्से के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका । प्रबोधन काल के दार्शनिकों के क्रांतिकारी भौतिकवादी दर्शन, वैज्ञानिक तर्कपरकता तथा सामाजिक न्याय और स्वतन्त्रता-समानता-भ्रातृत्व के रूप में जनवाद की अवधारणाओं ने सामाजिक उत्पादन के साथ ही सामंती स्वेच्छाचारिता-विरोधी राजनीतिक संघर्ष में भी सीधे भागीदारी कर रही स्त्रियों की आबादी को गहराई से प्रभावित किया । प्रबोधन काल के क्रांतिकारी दार्शनिकों ने पहली बार यह विचार प्रस्तुत किया कि स्त्रियों की उत्पीड़ित स्थिति मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों का हनन है । फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान फ़्रांसिसी बुर्जुआ विचारधारा का एक अग्रणी प्रवक्ता ए. कोंदोर्से (A .Condorcet ) स्त्रियों की समानता का प्रबल पक्षधर था । उसका मानना था कि स्त्रियों के बारे में समाज में मौजूद गहरे पूर्वाग्रह उनकी असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति की जड़ हैं । अपने समय के अन्य बुर्जुआ विचारकों की तरह कोंदोर्से भी स्त्री-प्रश्न के वर्गीय एवं आर्थिक आधारों को देख न सका । उसका यह विश्वास था कि कानूनी समानता और शिक्षा के जरिए स्त्रियों की मुक्ति संभव है । आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में भी, पश्चिम के कई बुर्जुआ विचारकों ने ऐसे ही विचार प्रस्तुत किये । ब्रिटिश दार्शनिक, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री जेम्स स्टुअर्ट मिल ने भी अपनी पुस्तक “ऑन द सब्जेक्शन ऑफ वुमन” (१८६९) में इन्हीं विचारों का प्रतिपादन किया ।

संगठित नारी आन्दोलन की शुरुआत सर्वप्रथम महान फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान हुई । उस समय स्त्रियाँ भी जन-प्रदर्शनों सहित सभी राजनीतिक कार्रवाइयों में हिस्सा ले रही थीं । समानता के लिए स्त्रियों के संघर्ष के लक्ष्य को समर्पित पहली पत्रिका का प्रकाशन क्रांति के दौरान फ़्रांस में ही शुरू हुआ वहीं क्रांतिकारी नारी क्लबों (Women’s Revolutionary Club) के रूप में स्त्रियों के पहले संगठन अस्तित्व में आये जिन्होंने सभी पक्षधर राजनीतिक संघर्षों में खुलकर भागीदारी करते हुए यह मांग की कि आजादी, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत बिना किसी लिंगभेद के लागू किये जाने चाहिए । ओलिम्प द गाउजेस (Olympe de Gouges, 1748-93) ने “मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा” (Declaration of the Rights of the Man and the Citizen) के मॉडल पर “स्त्रियों और स्त्री नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” तैयार की और उसे १७९१ में राष्ट्रीय असेम्बली के समक्ष प्रस्तुत किया । इस घोषणा पत्र में “स्त्रियों पर पुरुषों के शासन” का विरोध किया गया था और सार्विक मताधिकारों के व्यवहार के लिए स्त्री-पुरुषों के बीच पूर्ण सामाजिक-राजनीतिक समानता की मांग की गई थी । यद्यपि फ़्रांसिसी क्रांति के अधिकांश नेताओं ने स्त्रियों की समानता के विचार को ख़ारिज कर दिया और १७९३ के अंत में सभी नारी क्लबों को बंद कर दिया गया, लेकिन फिर भी इस युगांतरकारी क्रांति ने सामंती संबंधों पर निर्णायक मारक प्रहार करने के साथ ही कई कानूनों के द्वारा और नये सामाजिक मूल्यों के द्वारा औरतों की कानूनी स्थिति में भारी परिवर्तन किया । १७९१ में एक कानून बनाकर स्त्रियों की शिक्षा का प्रावधान किया गया, २० सितंबर १७९२ की आज्ञाप्ति द्वारा उन्हें कई नागरिक अधिकार प्रदान किये गये और अप्रैल १७९४ में कन्वेंशन द्वारा पारित एक कानून ने उनके लिए तलाक लेना आसान बना दिया । लेकिन थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया के काल में नारी मुक्ति संघर्ष की ये उपलब्धियां एक बार फिर, मूलत: छीन गयी । नेपोलियोनिक कोड (१८०४) और अन्य यूरोपीय देशों की ऐसी ही बुर्जुआ नागरिक संहिताओं ने एक बार फिर स्त्रियों के नागरिक अधिकारों को अतिसीमित कर दिया और परिवार, शादी, तलाक, अभिभावकत्व और संपत्ति के अधिकार सहित सभी मामलों में उन्हें कानूनी तौर पर एक बार फिर पूरी तरह पुरुषों के मातहत बना दिया ।

बुर्जुआ क्रांतियों के काल में नारी आन्दोलन का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मेरी वोल्सटोन क्राफ्ट की पुस्तक “स्त्री के अधिकारों का औचित्य-प्रतिपादन” ( A Vindication of the Rights of Women) थी, जो कुल मिलाकर ओलिम्प द गाउजेस के दस्तावेज के प्रतिपादनों को ही उन्नत एवं विस्तृत रूप में प्रस्तुत करती थी । उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के नारीवादी आन्दोलन (Feminist Movement ) की बुनियादी रुपरेखा सर्वप्रथम इसी पुस्तक में दिखाई देती है ।

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर

फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों का सार-संकलन करते हुए कहा जा सकता है कि जब सामन्तवाद के विरुद्ध बुर्जुआ वर्ग के साथ ही पूरी जनता इनमें शिरकत कर रही थी, तब स्वतन्त्रता, समानता और जनवाद के विचारों का प्रतिपादन अधिक क्रांतिकारी रूप में किया जा रहा था, पर बुर्जुआ सत्ता की स्थापना और सुदृढीकरण कें नये शासक वर्ग ने जिस प्रकार मेहनतकशों को, ठीक उसी प्रकार स्त्रियों को भी उसी हद तक आजादी और नागरिक अधिकार दिए, जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली और उत्पादन एवं विनिमय के संबंधों के लिए जरूरी था । इससे थोड़ी भी अधिक आजादी यदि स्त्रियों को मिल सकी, तो उसका एकमात्र कारण नारी समुदाय की नई चेतना और उसके संघर्षों का दबाव एवं भय था । पूंजीवाद ने सामन्ती मध्ययुगीन स्वेच्छाचारिता, घरेलू गुलामी, व्यक्तित्वहीनता, अनागरिकता और विलासिता एवं उपभोग की सामग्री होने की स्थिति से नारी समुदाय को बाहर तो निकला, पर पूरी तरह से नहीं । सत्ता में आने के साथ ही उसने जब चर्च के साथ “पवित्र गठबंधन” कर लिया तो स्त्रियों की गुलामी के सामंती मूल्यों के कुछ तत्वों को उसने फिर से अपना लिया । उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान स्त्रियाँ शिक्षा, नौकरी, सम्पत्ति के अधिकार मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं और उन्हें काफी हद तक अर्जित भी किया, लेकिन उनकी नागरिकता दोयम दर्जे की ही थी और पूंजीवादी उत्पादन तन्त्र में वे निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलामों (Wage Slaves ) में तब्दील कर दी गयी । फिर भी बुर्जुआ क्रांतियाँ ऐतिहासिक तौर पर नारी मुक्ति संघर्ष को एक कदम आगे ले आई, उन्हें सामंती समाज के निरंकुश दमन से एक हद तक छुटकारा दिलाया, सामाजिक उत्पादन में उनकी भागीदारी की स्थितियां पैदा की और उनके भीतर अपने जनवादी अधिकारों, स्वतंत्र अस्मिता और स्वतंत्र पहचान के लिए लड़ने की, सामाजिक-राजनीतिक क्रियाकलापों और संघर्षों में हिस्सा लेने की और एक नई जमीन पर खड़े होकर यौन-असमानता एवं यौन-उत्पीडन का विरोध करने की चेतना पैदा की ।

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यूरोप और अमेरिका के बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के अधिकारों की वास्तविक और वैधिक अनुपस्थिति की जो स्थिति बनी, उसे कई बुर्जुआ लेखकों-विचारकों से सैद्धांतिक समर्थन प्राप्त हुआ । बुर्जुआ साहित्य में बड़े पैमाने पर प्रस्तुत और आज भी पूरी दुनिया में व्यापक स्तर पर मान्यताप्राप्त तथाकथित जीवशास्त्रीय सिद्धांत के प्रारंभिक पैरोकारों में फ़्रांसिसी दार्शनिक ओगुस्त कोंत (A . Konte ) अग्रणी था जिसके अनुसार नारी समुदाय की असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति का मूल कारण “नारी की प्राकृतिक दुर्बलता” में निहित है, स्त्रियाँ स्वाभाविक एवं प्राकृतिक तौर पर पारिवारिक जिम्मेदारियों, प्रजनन, शिशुपालन आदि के लिए ही बनी होती हैं और कभी भी वे सामाजिक तौर पर पुरुषों के समकक्ष नहीं हो सकतीं । स्त्री-पुरुष असमानता का यह जीवशास्त्रीय सिद्धांत उन्नीसवीं शताब्दी के बुर्जुआ समाज का सर्वाधिक प्रभावशाली बुर्जुआ पुरुष-स्वामित्ववादी सिद्धांत था जिसका प्रभाव आज भी बड़े पैमाने पर मौजूद है । ब्रिटेन के विक्टोरियन सामाजिक मूल्यों पर भी इन विचारों का जबर्दस्त प्रभाव मौजूद था । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जर्मनी में प्रचलित पेटी-बुर्जुआ “थियरी ऑफ द थ्री केज” (German–Kirche, Kuche, Kinder-Church, Kitchen, Children) भी सारत: कोंत के विचारों का ही विस्तार था जिसके अनुसार, स्त्रियों की रूचि और सक्रियता का दायरा केवल चर्च, रसोई और बच्चों तक ही सीमित होना चाहिए । आगे चलकर फासिस्टों और नात्सियों ने इसी सिद्धांत के परिष्कृत रूप को इटली एवं जर्मनी में अपनाया और लागू किया । आज भी बुर्जुआ प्रतिक्रियावादी नवनात्सी तत्व और धार्मिक पुनरुत्थानवादी इस तरह के तर्क देते रहते हैं । गोर्बचोवी संशोधनवादियों ने भी स्त्रियों की सामाजिक भूमिका में कटौती करते हुए उनकी प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक बनावट का तर्क दिया और देंगपंथी संशोधनवादी भी आज घुमा-फिराकर ऐसे तर्क देते रहते हैं ।

एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जैसे-जैसे बुर्जुआ वर्ग अपनी सत्ता का सुदृढीकरण करता गया, नारी आन्दोलन के बुर्जुआ चरित्र, फ्रेमवर्क और नेतृत्व की सीमाएं ज्यादा से ज्यादा साफ़ होती चली गई । मताधिकार, सम्पत्ति के अधिकार और यौन आधार पर बरती जाने वाली हर प्रकार की असमानता के विरुद्ध जनवादी अधिकारों के व्यापक दायरे में क्रांतिकारी संघर्ष चलाने और उसे सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष से जोड़ने के बजाय, उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, बुर्जुआ नारी आन्दोलन के नेतृत्व ने फ़्रांसिसी क्रांति काल की परम्परा को छोड़ते हुए अपना उद्देश्य केवल बुर्जुआ समाज के फ्रेमवर्क के भीतर, अपने ही वर्ग के पुरुषों से स्त्रियों की समानता तक सीमित कर दिया और स्त्री-प्रश्न की अवधारणा को संकीर्ण करके संघर्ष को सुधारों के दायरे में कैद कर दिया । उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में उपरोक्त मांग के पूरक के तौर पर सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियों के काम करने के अधिकार की मांग उठाई गई ।

लेकिन नारी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा उस समय भी पूरी तरह से निष्प्राण नहीं हो गयी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के चौथे-पांचवें दशक में फ़्रांस में बड़े पैमाने पर ऐसा क्रांतिकारी यथार्थवादी साहित्य उत्पादित हुआ जिसमें स्त्रियों की पारिवारिक गुलामी और सामाजिक असमानता की आलोचना की गयी थी । इसमें जी. सांद (G. Sand) के उपन्यासों की अग्रणी भूमिका थी । इसी समय अमेरिका और ब्रिटेन में संगठित रूप से नारी मताधिकार आन्दोलन की शुरुआत हुई जहाँ सामाजिक जीवन में स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने लगी थीं । १८३० के दशक में अमेरिका में काले लोगों की मुक्ति के संघर्ष में १०० से भी अधिक दासता-विरोधी “नारी सोसायटी” जैसे संगठन हिस्सा ले रहे थे और ब्रिटेन में चार्टिस्ट आन्दोलन में स्त्रियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं । वास्तव में, पूंजीवादी समाज के विकास के नियम और विज्ञान, तकनोलाजी एवं संस्कृति का विकास, उत्पादन और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ, खुद ही वस्तुगत तौर पर, स्त्रियों की मातहती के सिद्धांतों की आधारहीनता को ज्यादा से ज्यादा उजागर करते जा रहे थे । सर्वप्रथम, उस काल के क्रांतिकारी जनवादी सिद्धान्तकारों, विशेषकर सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिये और राबर्ट ओवेन जैसे सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि काल्पनिक समाजवादी विचारकों ने स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता के बुर्जुआ सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाते हुए नारी उत्पीडन और बुर्जुआ समाज की प्रकृति के बीच के अंतर्संबंधों को उजागर किया था । नारी मुक्ति के बुर्जुआ सिद्धान्तकारों के विपरीत इन दार्शनिकों ने पहलों बार स्त्रियों को समानता का दर्जा देने के समाज के पुनर्गठन की अपनी योजना का एक बुनियादी मुद्दा बनाया । चार्ल्स फूरिये ने पहली बार यह स्पष्ट बताया कि किसी भी समाज में आजादी का एक बुनियादी पैमाना यह है कि उस समाज विशेष में स्त्रियाँ किस हद तक आजाद हैं ।

उन्नीसवीं शताब्दी के रुसी क्रांतिकारी जनवादियों ने इसी विचार-सरणि  को आगे बढ़ते हुए सामाजिक जीवन के साथ ही क्रांतिकारी संघर्ष में भी स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया । नारी मुक्ति के सर्वाधिक प्रखर प्रवक्ता चेर्नीशेव्स्की ने अपने उपन्यास “क्या करें” ( What is to be done )  में एक ऐसा स्त्री-चरित्र प्रस्तुत किया जिसने संकीर्ण पारिवारिक दायरे से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र सामाजिक-आर्थिक स्थिति बनाई थी और जो सामाजिक सक्रियताओं में भी संलग्न थी । चेर्नीशेव्स्की का यह उपन्यास यूटोपिया के तत्वों के बावजूद युगीन परिप्रेक्ष्य में, नारी-मुक्ति के सन्दर्भ में भी क्रांतिकारी महत्व रखता है ।

3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में

यूरोप में १८४८-४९ की क्रांतियों तथा जून १८४८ में पेरिस में हुए प्रथम सर्वहारा विद्रोह सहित विभिन्न देशों में उठ खड़े हुए मजदूर आंदोलनों ने स्त्रियों के राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों के संघर्ष को एक नया संवेग प्रदान किया । १८४८ में फ़्रांस में फिर से नारी क्लबों का गठन हुआ जिन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों को समान अधिकार देने के लिए संघर्षों की नए सिरे से शुरुआत की. इसी वर्ष फ़्रांस में स्त्री कामगारों के पहले स्वतंत्र संगठन की स्थापना हुई । जर्मनी और आस्ट्रिया में भी राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के उद्देश्य से स्त्री यूनियन गठित हुए ।

एक व्यापक आधार पर, एक सुनिश्चित कार्यक्रम के साथ नारीवादी आन्दोलन की शुरुआत का प्रस्थान-बिंदु जुलाई, १८४८ को माना जाता है जब एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन, लुकेसिया कफिन मोट और कुछ अन्य ने सेनेका फाल्स, न्यूयार्क में पहली बार नारी अधिकार कांग्रेस आयोजित करके नारी स्वतन्त्रता का एक घोषणा-पत्र जारी किया जिसमें पूर्ण कानूनी समानता, पूर्ण शैक्षिक एवं व्यावसायिक अवसर, समान मुआवजा और मजदूरी कमाने के अधिकार तथा वित देने के अधिकार की मांग की गयी थी । एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन तथा सूसन बराउनवेल एंथनी के नेतृत्व में यह आन्दोलन तेज गति से फैला और जल्दी ही यूरोप तक जा पहुंचा । ब्रिटेन में १८६० के दशक में चुनावी सुधारों के दौर में नारी मताधिकार आन्दोलन भी बड़े पैमाने पर उठ खड़ा हुआ । १८६७ में पारिलियामेंट में स्त्रियों को मताधिकार देने के जे. एस मिल के प्रस्ताव को रद्द कर दिए जाने के बाद कई नगरों में नारी मताधिकार सोसायिटीयों की स्थापना हो गयी, जिनको मिलाकर बाद में राष्ट्रीय एसोसिएशन बनाया गया । अमेरिका में १८६९ में दो नारी मताधिकार संगठनों का गठन हुआ । १८९० में इनकी एकता के बाद राष्ट्रीय अमेरिकी नारी मताधिकार संघ अस्तित्व में आया । १८८२ में फ़्रांसिसी नारी अधिकार लीग का गठन हुआ ।

मुख्यत: उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के प्रभाव में जनवादी चेतना संचरित होने लगी थी जिससे स्त्री समुदाय भी अछूता नहीं रह गया था । इस दौरान लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की आजादी और बराबरी की मांग को लेकर आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो हालाँकि व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के आभाव में मुख्यत: नारीवादी ( Fiminist ) प्रकृति का था, फिर भी यह लातिनी देशों की स्त्रियों की नयी चेतना का द्योतक था । इसी अवधि में पहले जापान, भारत और इंडोनेशिया में और फिर तुर्की और ईरान में नारी आन्दोलन ने अपना पहला कदम आगे बढ़ाया । १८८८ में अमेरिकी नारीवादियों की पहल पर अंतरराष्ट्रीय नारी परिषद (International Council of Women ) की स्थापना हुई । १९०४ में अंतरराष्ट्रीय नारी मताधिकार संश्रय ( International Women Suffrage Alliance) की स्थापना हुई जिसका नाम १९४६ में बदलकर ‘अंतरराष्ट्रीय नारी संश्रय समान अधिकार-समान दायित्व’ (International Alliance of Women – Equal Rights-Equal Responsibilities ) कर दिया गया ।

इस दौरान एक महत्वपूर्ण विकास यह हुआ कि स्त्रियों की नयी चेतना और संघबद्ध होने की आंकाक्षा को देखते हुए उनकी “स्थिति में सुधार” और “उनके विकास” की आड़ लेकर आध्यात्मिक, धार्मिक सुधारवादी और संकीर्ण राष्ट्रवादी ग्रुपों ने भी भांति-भांति के नारी संगठनों की स्थापना की जिनका मूल उद्देश्य स्त्रियों की मुक्तिकामी आकांक्षा को सुधारों के दायरे में कैद करना, उन्हें मजदूर आंदोलनों, क्रांतिकारी बुर्जुआ जनवादी आंदोलनों और राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के प्रभाव से दूर रखना तथा इस तरह निहित वर्ग स्वार्थों की सेवा करना था ।

4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा


नारी आंदोलनों में सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण के विकास की प्रक्रिया उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में शुरू हई । नारी-प्रश्न के वर्गीय आधारों को उद्घाटित करते हुए मार्क्स और एंगेल्स ने  पहली बार यह स्पष्ट किया कि निजी सम्पत्ति और वर्गीय समाज के संघटन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही स्त्री की दासता की शुरुआत हुई । उन्होंने स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में कामगार स्त्रियाँ निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम होने के साथ-साथ यौन आधार पर शोषण-उत्पीडन का शिकार तो हैं ही, सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ भी सामाजिक श्रम से कटी हुयी या तो नारकीय घरेलू दासता एवं पुरुष स्वामित्व के बोझ से दबी हुई हैं या बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के लिए आरक्षित कुछ विशिष्ट अपमानजनक पेशों में लगी हुयी निहायत निरंकुश स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं । उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में मेहनतकश स्त्रियों की समस्यायों का समाधान असंभव है और स्त्री समुदाय की सच्ची मुक्ति की दिशा में पहला कदम पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था का खात्मा है ।

मार्क्स-एंगेल्स ने यह स्पष्ट किया कि नारी मुक्ति  की दिशा में पहला कदम यह होगा कि स्त्री मजदूरों की वर्ग चेतना को उन्नत किया जाये, सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ाई जाये और उन्हें मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलनों में शामिल किया जाये । पहले इंटरनेशनल ने नारी मजदूरों के श्रम के संरक्षण से संबंधित दो प्रस्ताव पारित किये थे । इन प्रस्तावों ने स्त्रियों के उत्पीडन और उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व एवं मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के बीच अंतर्संबंधों को उद्घाटित  करने के साथ ही नारी अधिकारों के प्रति प्रूधोंवादी दृष्टिकोण के दिवालियेपन को भी उजागर कर दिया । प्रूधों और उसके चेले सामाजिक रूप से उपयोगी श्रम में स्त्रियों की भागीदारी का विरोध करते थे और उनकी सामाजिक समानता की बात करते हुए भी परिवार और बच्चों की देखभाल ही उनकी प्रमुख जिम्मेदारी मानते थे ।  स्त्री कामगारों के श्रम-संरक्षण संबंधी पहले इंटरनेशनल के निर्णय ने सर्वहारा नारी आन्दोलन के विकास का सैद्धांतिक आधार तैयार करने का काम किया । मार्क्स-एंगेल्स ने, और आगे चलकर लेनिन, स्टालिन और माओ ने — अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के इन पाँचों महान शिक्षकों ने कामगार औरतों की उत्पीडित आबादी को सर्वहारा क्रांति की सबसे बड़ी आरक्षित शक्ति ( Greatest Reserve ) के रूप में देखा । सर्वहारा क्रांति और स्त्री प्रश्न के समाधान के द्वंदात्मक अंतर्संबंधों को निरुपित करते हुए लेनिन ने लिखा था, ” स्त्रियों के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल किये बिना सर्वहारा अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं हासिल कर सकता ।”

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में क्रांतिकारी संघर्षों में, विशेषकर १८७१ के युगांतरकारी पेरिस कम्यून में शौर्यपूर्ण भागीदारी के साथ ही स्त्रियों ने राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में स्वतंत्र रूप से भी हिस्सा लिया और अपने संगठन बनाये । फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन में स्त्रियों ने अपनी ट्रेड युनियने संगठित कीं ।  उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में फ़्रांस और ब्रिटेन में स्त्री कामगारों के कई संगठन पहले इंटरनेशनल में भी शामिल हुए । जर्मन कामगार औरतें ‘ इंटरनेशनल प्रोफेशनल एसोसियेशन ऑफ मैन्युफैक्चरी , इंडस्ट्रियल एंड हैंडीक्राफ्ट  वर्कर्स’ में शामिल हो गयीं जिसकी स्थापना १८६९ में क्रिम्मित्स्चू (सैक्सनी) में हुई थी और जो इंटरनेशनल के विचारों से प्रभावित था । स्त्री-प्रश्न पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण को विकसित और व्याख्यायित करने में तथा वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित सर्वहारा नारी आंदोलनों को विकसित करने में बेबेल की सुप्रिसिद्ध कृति ‘नारी और समाजवाद’ (Women and Socialism ) ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में मजदूर स्त्रियों का आन्दोलन जर्मनी में सर्वाधिक तेज गति से विकसित हुआ । १८९१ में जर्मनी की सामाजिक जनवादी पार्टी ने अपने कार्यक्रम (एर्फुर्ट कार्यक्रम ) में नारी मताधिकार की मांग को शामिल किया । पार्टी ने स्त्रियों-पुरुषों की सांगठनिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार किया और ट्रेड यूनियनों में स्त्रियों की भरती के विशेष प्रयास शुरू किये गये । १८९१ में स्त्री कामगारों की एक पत्रिका -Gleichcheit – का प्रकाशन भी शुरू हुआ जो १८९२ से १९१७ तक क्लारा जेटकिन के निर्देशन में प्रकाशित होती रही । सन १९०० से जर्मनी भर में नियमित नारी सम्मेलनों के आयोजन की शुरुआत हुई ।

पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली की अपनी जरूरतों के चलते और सर्वहारा आंदोलनों और विशेष तौर पर नारी आंदोलनों की विविध धाराओं-प्रवृतियों के दबाव के नाते उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यूरोप में स्त्रियों की शिक्षा और श्रम-संरक्षण से संबंधित कई कानून बने और उनकी कानूनी हैसियत में कुछ महत्वपूर्ण सुधार हुए । उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में १८४७ में ही स्त्रियों का श्रम दिवस दस घंटे का कर दिया गया था । मार्क्सवाद के संस्थापकों ने इस कानून को मजदूर वर्ग की एक बड़ी जीत की संज्ञा दी थी । स्त्री मजदूरों के संरक्षण से संबंधित कई अन्य कानून इस दौरान विभिन्न यूरोपीय देशों में बने । स्त्रियाँ  ट्रेड युनियनों में शामिल होने लगीं । १८८९ में ट्रेड यूनियन्स कांग्रेस में उनकी सदस्यता का प्रश्न सारत: हल हो गया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही स्त्री आन्दोलन के दबाव में, पहले सम्पन्न और फिर आम परिवारों की लड़कियों के लिए माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना यूरोप में और फिर एशिया-लातिनी अमेरिका के कुछ देशों में हुई । ब्रिटेन में स्त्रियों को सबसे पहले शिक्षक का पेशा अपनाने का अधिकार मिला । फिर धीरे-धीरे कुछ अन्य क्षेत्रों में भी उन्हें रोजगार के अवसर मिले । १८५८ में ब्रिटेन में स्त्रियों को तलाक का अधिकार प्राप्त हुआ, यद्यपि इस सन्दर्भ में १९३८ तक उनके अधिकार पुरुषों की अपेक्षा कम थे । १८७० से १९०० के बीच ब्रिटिश स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार हासिल किये । १८६९ में कर भुगतान करने वाली स्त्री नागरिकों को म्युनिसिपल चुनावों में भागीदारी का अधिकार मिला और १९१८ में शादीशुदा स्त्रियों तथा ३० वर्ष से अधिक आयु वाली, विश्वविद्यालय डिप्लोमा प्राप्त की हुई स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । १९२८ में २१ वर्ष आयु वाली स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । अमेरिका में स्त्रियों को शिक्षण पेशा अपनाने का अधिकार उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही मिल चुका था । १८५० से १८७० के बीच वहाँ स्त्रियों को तथाकथित “लिबरल” पेशे अपनाने का अधिकार प्राप्त हुआ और १८८० के बाद तथाकथित “पुरुष” पेशों में भी उन्हें स्वीकार किया जाने लगा । १८४८ में वहाँ शादीशुदा औरतों को सम्पत्ति रखने का अधिकार प्राप्त हुआ । १८७४ में वहाँ पहली बार स्त्रियों के श्रम दिवस को सीमित करने का कानून (मैसाचुसेट्स  ) में बना । १९२० में अमेरिकी संविधान में हुए उन्नीसवें संशोधन द्वारा स्त्रियों के मताधिकार पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया गया । फ़्रांस में भी उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार प्राप्त कर लिए थे । १८९२ में उनके श्रम के संरक्षण से संबंधित पहला कानून बना, उनका अधिकतम लम्बा श्रम दिवस ११ घंटे का तय किया गया जिसे १९०४ में घटाकर १० घंटे कर दिया गया । स्त्री मताधिकार संबंधी विधेयक फ़्रांस में पहली बार १८४८ में पेश किया गया था, लेकिन १९४४ में जाकर उन्हें यह अधिकार हासिल हो सका । जर्मनी में औरतों को मत देने का अधिकार १९१९ के वाईमर संविधान द्वारा प्राप्त हुआ था, लेकिन १९३३ में सत्ता में आने के साथ ही नात्सियों ने लम्बे और कठिन संघर्षों द्वारा अर्जित उनके सभी राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों को समाप्त कर दिया ।

इन कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की चर्चा के बाद, संक्षेप में, इतना ही उल्लेख यहाँ पर्याप्त है कि कुछ एक अपवादों को छोडकर, पश्चिमी देशों की स्त्रियों ने बीसवीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते बुर्जुआ सामाजिक ढांचे के भीतर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लिए थे । पर यह कहते हुए कुछ बातों को रेखांकित करना निहायत जरूरी है । पहली बात यह कि कानूनी तौर पर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लेने के बावजूद वास्तव में आज तक उन्हें सामाजिक समानता प्राप्त नहीं है । वे दोयम दर्जे की नागरिक हैं । काम करने वाली औरतें वहाँ असंगठित क्षेत्र में सस्ता श्रम बेचने को बाध्य हैं और निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम हैं । मुख्यत: मध्यम वर्ग और अन्य सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ और सामान्यत: सभी स्त्रियाँ वहाँ घरेलू दासता से पूर्णत: मुक्त नहीं हो सकी हैं । जीवन के हर क्षेत्र में उन्हें आर्थिक शोषण के साथ ही यौन-उत्पीडन का भी शिकार होना पड़ता है । धार्मिक मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही, तरह-तरह की फासिस्ट प्रवृतियों और साथ ही बीमार बुर्जुआ संस्कृति का दबाव भी उन्हें ही सबसे अधिक झेलना पड़ता है । अभी भी गर्भपात और तलाक से लेकर बलात्कार तक — बहुत सारे मामलों में, पश्चिमी देशों में कानून स्त्रियों के प्रति भेदभावपूर्ण बने हुए हैं । दूसरी बात यह है कि पश्चिम की स्त्रियों ने जो भी अधिकार प्राप्त किये हैं, वह उन्हें  बुर्जुआ समाज ने तोहफे के तौर पर नहीं दिए हैं । ये अधिकार सामाजिक क्रांतियों, वर्ग-संघर्षों और नारी समुदाय के शताब्दियों लम्बे संघर्ष द्वारा अर्जित हुए हैं । बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों में व्यापक आम जनता और स्त्रियों की भागीदारी के दौर में स्त्रियों को अपने नागरिक अधिकारों की पहली किश्त हासिल हुई । राज्यसत्ता पर काबिज होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने जब आम जनता पर अपना अधिनायकत्व लागू किया तो स्त्रियों के जनवादी अधिकारों को भी उसने हडपने की हर कोशिश की और केवल उसी हद तक उन्हें नागरिकता के अधिकार दिए जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली की जरूरत थी । पुन: उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब क्रांतियों का नया विस्फोट हुआ और सर्वहारा वर्ग राजनीतिक संघर्ष के मंच पर उतरा तो नारी आन्दोलन को भी महत्वपूर्ण संवेग प्राप्त हुआ और बाद के पचास वर्षों के संघर्षों के दौरान पश्चिम में नारी समुदाय ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित कीं । इस समय मजदूर स्त्रियाँ नारी मध्यवर्गीय स्त्रियों के आगे आ खड़ी हुई थीं । बीसवीं शताब्दी में, अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत संघ में, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोपीय देशों में और १९४९ की नई जनवादी क्रांति के बाद चीन में तथा मेहनतकशों के शासन वाले कुछ अन्य देशों में स्त्री समुदाय ने पहली बार समानता के जो अधिकार अर्जित किये, उनसे भी पश्चिमी देशों की और साथ ही राष्ट्रीय जनवाद की लड़ाई लड़ रहे एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों की मुक्तिकामी स्त्रियों के आंदोलनों को भी नई प्रेरणा और नया संवेग प्राप्त हुआ । तीसरी बात जो गौरतलब है, वह यह कि उन्नीसवीं शताब्दी में, जब तक यूरोप क्रांतियों का केंद्र रहा, तभी तक नारी आन्दोलन वहाँ तेजी से विकसित होता हुआ एक के बाद एक नई जीतें हासिल करता रहा । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू में विश्व पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में संक्रमण के बाद क्रांतियों का केंद्र खिसककर जब रूस और एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों-नवउपनिवेशों में आ गया तो नारी आन्दोलन का मुख्य रंगमंच भी इन्हीं देशों में स्थानांतरित हो गया । यह वस्तुगत ऐतिहासिक तथ्य इसी सत्य को पुष्ट करता है कि नारी आन्दोलन, उसका भविष्य और उसकी जीत-हार की नियति सामाजिक संघर्षों और क्रांतियों के साथ अविभाज्यत: जुडी हुई है । आगे हम सर्वहारा क्रांतियों की धारा और उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों की धारा के साथ जारी नारी मुक्ति आंदोलनों की अत्यंत संक्षिप्त चर्चा करेंगे ।

5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन

मार्क्स-एंगेल्स के बाद लेनिन ने नारी-प्रश्न पर मार्क्सवादी चिंतन को आगे बढाया । लेनिन के काल में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन में कामगार औरतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने की प्रक्रिया उन्नत धरातल पर शुरू हुई. नारी-मुक्ति के प्रश्न पर लेनिन के कई महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अवदान थे । बुर्जुआ नारीवाद की नारी-मुक्ति विषयक वर्गेतर सोच और “यौन मुक्ति” की बुर्जुआ अवधारणाओं के साथ ही उन्होंने मार्क्सवाद से प्रेरित नारी-मुक्ति आन्दोलन की धारा में मौजूद कई अवैज्ञानिक धारणाओं और विजातीय रुझानों का विरोध किया । स्वतन्त्रता का अर्थ असामाजिक स्वच्छंदता और पुरुष के शोषण से मुक्ति का अर्थ “यौन मुक्ति” नहीं होता, यह कम्युनिस्ट नैतिकता और विज्ञान के विरुद्ध है — इसे लेनिन ने एकाधिक बार स्पष्ट किया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में क्लारा जेटकिन, क्रुप्सकाया, अलेक्सांद्रा कोल्लोंताई और अनेंसा आरमाँ आदि कम्युनिस्ट नेत्रियों ने अपनी सक्रियताओं और लेखन के द्वारा भी नारी मुक्ति के मोर्चे पर अहम भूमिका निभाई । इन अग्रणी व्यक्तित्वों के साथ लेनिन के वाद-विवाद और विचार-विमर्श के दौरान नारी मुक्ति के कई पक्षों पर मार्क्सवादी अवस्थिति महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुई ।

बीसवीं शताब्दी के शुरू होते-होते सर्वहारा नारी आन्दोलन के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के लिए पूर्वपीठिका तैयार हो चुकी थी । दूसरे इंटरनेशनल की कांग्रेस में नारी आन्दोलन और नारी समस्या के विविध पहलुओं पर नियमित रूप से बहसें हुआ करती थीं । १८९३ में ज्यूरिख कांग्रेस में यह कहा गया की स्त्रियों के श्रम के कानूनी संरक्ष्ण को पूरा समर्थन देना पूरी दुनिया के मजदूरों का कर्तव्य है । दूसरे इंटरनेशनल की लन्दन कांग्रेस (१८९६) को महिला प्रतिनिधियों के सम्मेलन ने स्त्री-पुरुष– दोनों ही समुदायों के सर्वहारा वर्ग के आम संगठन को स्वीकृति देने के साथ ही इस बात पर जोर दिया कि मेहनतकश वर्गों के नारी आन्दोलन और नारीवाद (Feminism ) के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खिंची जानी चाहिए ।

स्त्री समाजवादियों के पहले और दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (स्टुट्गार्ट, १९०७ और कोपेनहेगेन, १९१० ) मेहनतकश नारी आन्दोलन की विकास-यात्रा के दो महत्वपूर्ण मील पत्थर थे । पहले सम्मेलन ने बिना किसी लिंग-भेद के सार्विक एवं समान मताधिकार का प्रस्ताव पारित किया जिसे दूसरे इंटरनेशनल के स्टुट्गार्ट कांग्रेस ने भी स्वीकार किया । पहले सम्म्मेलन की प्रतिनिधियों ने क्लारा जेटकिन की अध्यक्षता में एक अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना करने और उसके मुखपत्र के प्रकाशन का भी निर्णय लिया । दूसरे सम्म्मेलन में सत्रह देशों की महिला प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । इसी सम्मेलन में प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब दक्षिणपंथी अवसरवादी काउत्स्की और उसके अनुयाइयों के विश्वासघात के कारण अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन में फूट पड़ी ठीक उसी समय मेहनतकश नारी आन्दोलन को भी एक गंभीर धक्का लगा ।  अधिकांश सामाजिक जनवादी स्त्री संगठनों ने भी विश्वयुद्ध में काउत्स्कीपंथियों की ही भांति अंधराष्ट्रवादी अवस्थिति अपनाई । बुर्जुआ नारीवादी संगठन तो पहले से ही यही अवस्थिति अपनाए हुए थे । लेकिन बोलेशेविक प्रस्ताव को ख़ारिज करके एक शांतिवादी प्रस्ताव स्वीकार करने के बावजूद बर्न अंतरराष्ट्रीय स्त्री समाजवादी सम्मेलन (१९१५) ने, जो बोलेशेविकों की पहल पर आयोजित हुई थी, समाजवादी अवस्थिति अपनाने वाली स्त्री समाजवादियों की एकता को बहाल रखने में अहम भूमिका निभाई । युद्ध के दौरान युद्ध में शामिल देशों की स्त्रियों ने भुखमरी और बदहाली के खिलाफ कई प्रदर्शन आयोजित किये । ८ मार्च (२३ फरवरी ) १९१७ को बोलेशेविकों की पेत्रोग्राद कमेटी की अपील पर भुखमरी, युद्ध और जारशाही के विरुद्ध रुसी स्त्रियों के प्रदर्शन ने एक व्यापक जनांदोलन का सूत्रपात किया जिसकी चरम परिणति फरवरी क्रांति के रूप में सामने आई । अक्टूबर समाजवादी क्रांति की तैयारी में रूस की महिला मजदूरों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । क्रांति के बाद सोवियत संघ में नारी आन्दोलन ने हर संभव तरीके से समाजवादी निर्माण के कामों को आगे बढ़ाने में, समाजवाद की रक्षा में और सामाजिक-राजनीतिक जीवन में आम स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने में एक अग्रणी भूमिका निभाई । समाजवादी सोवियत संघ की सर्वहारा राज्यसत्ता ने दुनिया के इतिहास में पहली बार न केवल स्त्री समुदाय को कानूनी तौर पर पुरुषों के साथ पूर्ण समानता के अवसर प्रदान किये बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में व्यवहारत: इसे लागू करने की दिशा में भी हर संभव कदम उठाये । सोवियत संघ स्त्री-मुक्ति के सन्दर्भ में भी पूरी दुनिया के लिए एक नया प्रकाश स्तंभ बन गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अक्टूबर क्रांति के प्रभाव में पूरी दुनिया में नारी आन्दोलन में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई । एक ओर जहाँ आम उत्पीडित नारी समुदाय समाजवाद की विचारधारा की ओर तेजी से आकृष्ट हुआ, वहीँ बुर्जुआ नारी संगठनों ने ज्यादा से ज्यादा खुले तौर पर बुर्जुआ व्यवस्था की हिफाजत का काम शुरू कर दिया । यूरोप की संशोधनवादी सामाजिक जनवादी पार्टियों ने पूंजीवाद की दूसरी सुरक्षापंक्ति का काम करते हुए स्त्रियों के बीच अपनी गतिविधियाँ तेज कर दीं ।

सोवियत संघ के बाहर, सर्वहारा विचारधारा पर आधारित नारी आन्दोलन ने १९२० के दशक में सुनिश्चित शक्ल अख्तियार करना शुरू किया । नारी आन्दोलन को क्रान्तिकारी आन्दोलन का अपरिहार्य बुनियादी अंग मानते हुए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कांग्रेस में मेहनतकश स्त्रियों के बीच कम्युनिस्टों के काम के प्रश्न पर लगातार गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श होता रहा । १९२० में कोमिन्टर्न के निर्देशन में अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना हुई जिसकी सेक्रेटरी क्लारा जेटकिन थीं । महिला कम्युनिस्टों का एक प्रेस भी स्थापित हुआ और एक अंतरराष्ट्रीय महिला पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ । १९२० से १९२६ के बीच महिला कम्युनिस्टों के चार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुए ।

यद्यपि नारी आन्दोलन पर दूसरे इंटरनेशनल के विचारधारात्मक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने महिला कम्युनिस्ट संगठनों के कामों पर विशेष जोर दिया, पर लेनिन और इंटरनेशनल के अन्य अग्रणी नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि स्त्रियों के गैर-पार्टी संगठन और सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों की मांगों को लेकर संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठन भी बनाये जाने चाहिए जिसमें मेहनतकश स्त्रियों के अतिरिक्त जनता के अन्य वर्गों की स्त्रियाँ भी हिस्सा लें । सोवियत संघ के बाहर के देशों में नारी आदोलन में मौजूद संकीर्णतावादी भटकावों और संगठनों की कमजोरी के कारण व्यापक स्त्रियों को उनके जनवादी अधिकारों की मांग और यौन-असमानता के विरोध के आधार पर संगठित करने में तीसरे दशक तक तो कोई विशेष सफलता नहीं प्राप्त हो सकी, लेकिन चौथे दशक में फासिज्म के उभार ने तात्कालिक रूप से, वस्तुगत तौर पर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं कि फासिज्म और साम्राज्यवादी युद्ध-विरोधी संयुक्त मोर्चे में जनता के सभी वर्गों की — विशेषकर कामगार और मध्यम वर्ग की स्त्रियों के संगठित होने की प्रक्रिया शुरू हो गई । जहाँ भी फासिस्ट ताकतें सत्ता में आयीं, प्रगतिशील नारी संगठनों के साथ ही उन्होंने उन बुर्जुआ नारी संगठनों को भी कुचल दिया जो नारी मुक्ति या स्त्रियों के समान अधिकारों की बात करती थीं । इसके साथ ही फासिज्म-विरोधी लोक मोर्चे के एक अंग के रूप में एक जनवादी, फासिज्म-विरोधी नारी आन्दोलन के संघटित होने की प्रक्रिया शुरू हो गयी । अगस्त १९३४ में सोवियत संघ सहित कई देशों के प्रगतिशील नारी संगठनों की पहल पर पेरिस में युद्ध  और फासिज्म-विरोधी महिला विश्व कांग्रेस आयोजित हुआ जिसमें कम्युनिस्ट शांतिवादी, नारीवादी और क्रिश्चियन समाजवादी स्त्री संगठनों एवं ग्रुपों के कुल १०९६ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । कांग्रेस में युद्ध और फासिज्म-विरोधी विश्व महिला कमेटी का गठन किया गया । पुन: मई १९३८ में मार्सिइएज (Marseillis) में युद्ध-विरोधी अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन का आयोजन हुआ ।

यद्यपि विश्वयुद्ध के दौरान जनवादी महिला आन्दोलन के विकास की दिशा में सांगठनिक-परिमाणात्मक शक्ति की दृष्टि से कोई बहुत महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई, लेकिन फासिज्म के रूप में सामने आई बुर्जुआ अधिनायकत्व की नग्नता ने और उसके विश्वव्यापी प्रतिरोध ने इसके लिए आवश्यक पूर्वाधार तैयार कर दिया ।

जिन उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में मुक्तियुद्ध जारी थे, वहां पहले से ही जनवादी नारी आन्दोलन के संगठित होने की प्रक्रिया जारी थी । फासिज्म-विरोधी संघर्ष के अनुभवों, फासिज्म की पराजय, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादी शक्तियों के निर्बल हो जाने और एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर के उठ खड़े होने के व्यापक प्रभाव दुनिया की आधी आबादी की चेतना पर और नारी आन्दोलन पर भी पड़ा । तीसरी दुनिया के देशों में उपनिवेशवाद की पराजय की प्रक्रिया शुरू होने के इस दौर में उन अधिकांश देशों में समाजवाद को सच्चा मित्र मानने वाला जनवादी नारी आन्दोलन शक्तिशाली होता चला गया । चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जारी मुक्ति-संघर्ष में स्त्रियों की भागीदारी और मुक्त क्षेत्रों में उनकी सामाजिक स्थिति पहले से ही दुनिया भर के पिछड़े देशों की स्त्रियों को आकृष्ट कर रही थी । १९४९ में नई जनवादी क्रांति संपन्न होने के बाद मध्ययुगीन पित्रसत्तात्मक स्वेच्छाचारिता से भरे समाज में स्त्रियों को पूर्ण बराबरी का कानूनी दर्ज़ा देकर और फिर समाज में उसे एक वास्तविकता में रूपांतरित करने की शुरुआत करके चीन के सर्वहारा राज्य ने ऐतिहासिक काम किया था उस पर पूरी दुनिया की स्त्रियों और मुक्तिकामी जनता की निगाहें टिकी हुई थीं । द्वितीय विश्व्यद्धोत्तर काल में पश्चिम के देशों की स्त्रियाँ भी अपने जनवादी अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने की जरूरत शिद्दत के साथ महसूस कर रहीं थीं ।

इन्हीं परिस्थितियों में, अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन ने आगे की ओर कुछ महत्वपूर्ण डग भरे । इनमें सर्वाधिक महत्पूर्ण कदम था दिसंबर, १९४५ में महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ( Women’s International Democratic Federation — W.I.D.F.) की स्थापना, जिसमें ३९ देशों के राष्ट्रीय स्त्री-संगठनों ने भाग लिया । महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ने स्त्रियों की आम मांगों को लेकर अलग-अलग देशों में और विश्व स्तर पर सक्रिय विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्त्री संगठनों के साथ साझा कार्रवाइयों की भी कोशिश की, लेकिन उस समय पूरी दुनिया में जारी कम्युनिज्म-विरोधी मुहीम के प्रभाव में बहुत सारे बुर्जुआ, तथाकथित परम्परागत स्त्री संगठनों के नेतृत्व ने इसे स्वीकार नहीं किया ।

१९५६ में रूस में ख्रुश्चेव द्वारा प्रतिक्रांतिकारी तख्तापलट और रूस तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना ने विष-स्तर पर जारी वर्ग-संघर्ष को भारी धक्का पहुँचाने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन को भी भारी नुकसान पहुँचाया । साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष, पूंजीवादी देशों में और तीसरी दुनिया के नवस्वाधीन देशों में जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष और व्यवस्था-विरोधी संघर्ष में स्त्री आन्दोलन की क्रान्तिकारी भागीदारी के विपरीत — संशोधनवादियों ने दुनिया भर में नारी मुक्ति आन्दोलन को सुधारवाद और शांतिवाद के दलदल में ले जाकर धंसा देने की हर चंद कोशिशें कीं और काफी हद तक इसमें सफलता भी प्राप्त की । यही कारण था कि छठे दशक के अंत तक दुनिया भर के नारी आन्दोलन में गतिरोध और शून्य की सी स्थिति उत्पन्न हो गयी थी । यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसमें बुर्जुआ नारीवाद के नये उभार ने सातवें दशक में जन्म लिया ।

6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन

जैसाकि उपर उल्लेख किया जा चुका है, पश्चिम के देशों में बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों की पूर्वपीठिका तैयार होने के साथ ही, यानि प्रबोधन काल (Age of Enlightenment ) के दौर में नारी मुक्ति की चेतना का जन्म हुआ और बुर्जुआ क्रांतियों के दौर में स्त्री समुदाय ने अपने सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी ।

एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों में बुर्जुआ विकास का स्वरूप यूरोप जैसा नहीं रहा । यहाँ बुर्जुआ वर्ग पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रांति की प्रक्रिया से गुजरकर सत्ता में नहीं आया । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों के पूर्ण औपनिवेशीकरण के बाद वहाँ की पुरानी सामाजिक-आर्थिक संरचना को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया । बाद में इन देशों में औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से जिस बुर्जुआ वर्ग का जन्म हुआ, वह एक समझौतापरस्त वर्ग था । वह अमेरिका या फ़्रांसिसी क्रांति के वाहक बुर्जुआ वर्ग की भांति क्रान्तिकारी भौतिकवाद और जनवाद के मूल्यों से लैस नहीं था । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों में इसी बुर्जुआ वर्ग ने अलग-अलग परिस्थितियों में कहीं एक हद तक क्रान्तिकारी संघर्ष करके तो कहीं ‘समझौता-दबाव-समझौता’ की रणनीति अपनाकर और कहीं पूरी तरह साम्राज्यवाद के साथ समझौता करके सत्ता हासिल की । तीसरी दुनिया के इस बुर्जुआ वर्ग की राजनीतिक स्वतन्त्रता भी उनके चरित्र और उनके संघर्ष या समझौते की प्रकृति के ही अनुरूप कम या ज्यादा थी, पर कहीं भी इस नये बुर्जुआ वर्ग ने न तो साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद किया और न ही क्लासिकीय अर्थों में उस रूप में जनवाद को ही बहाल किया, जैसाकि फ़्रांस या अमेरिका के बुर्जुआ वर्ग ने किया था ।

इन सभी देशों में नारी आन्दोलन के उद्भव और विकास की प्रक्रिया और उसका चरित्र भी इन देशों के इतिहास की उपरोक्त विशिष्टता से ही निर्धारितहुआ ।

एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी प्रक्रिया घटित न होने के कारण इन देशों के सामाजिक जीवन एवं मूल्यों में जनवादी मूल्यों-मान्यताओं की व्याप्ति अत्यंत कम थी और नारी समुदाय उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में भी मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था और मूल्यों-मान्यताओं के बंधन में जकड़ा रहा । काफी हद तक यह स्थिति आज भी बनी हुई है । फिर भी उन्नीसवीं शताब्दी में नारी मुक्ति की जो चेतना तीसरी दुनिया के देशों के नारी समुदाय में संचरित हुई, उसकी प्रक्रिया राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के दौर में शुरू हुई ।

अधिकांश लातिन अमेरिका देशों (जैसे मैक्सिको, क्यूबा, ब्राज़ील, हैती, निकारागुआ आदि ) में स्पेनी उपनिवेशवादियों के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हो चुकी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में लातिन अमेरिका देशों में स्त्रियों के संगठनों के बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, हालाँकि यह मध्यवर्गीय शिक्षित मिश्रित आबादी से नीचे मूल इंडियन आबादी तक नहीं पहुँच पाई थी और इन संगठनों की प्रकृति सारत: बुर्जुआ नारीवादी थी । बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में मैक्सिको और ब्राज़ील की अधूरी राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों और क्यूबा, निकारागुआ आदि देशों में उग्र रूप से जारी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों ने पूरे लातिन अमेरिका में नारी मुक्ति आन्दोलन को भी नया संवेग प्रदान किया । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत सारे लातिन अमेरिकी देशों में कम्युनिस्ट संगठनों के बनने की प्रक्रिया भी दूसरे इंटरनेशनल के काल में ही शुरू हो चुकी थी और इस शताब्दी के तीसरे दशक तक अधिकांश देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थापना हो चुकी थी । सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों और क्रांतिकारी मध्यमवर्ग के क्रांतिकारी संघर्षों की लंबी परम्परा ने भी लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति और उनके आन्दोलन पर विशेष प्रभाव डाला । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी नवउपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों का जो नया चक्र लातिनी देशों में शुरू हुआ, उसने आम मध्यवर्गीय और कामगार स्त्रियों को भी और काफी हद तक मूल आबादी की स्त्रियों को भी संघर्ष की मुख्य धारा से जोड़ने के साथ ही स्त्री-मुक्ति की धारा से भी जोड़ने में कामयाबी हासिल की ।

ख्रुश्चेवी लहर से लेकर गोर्बचोवी लहर तक के प्रतिकूल प्रभाव लातिन अमेरिकी जनता के मुक्ति-संघर्षों पर भी पड़े और मुख्यत: संशोधनवादी प्रभाव के चलते आज इन देशों के कई छापामार मुक्ति संघर्षों का (जैसे, अलसल्वाडोर, कोलम्बिया आदि में ) विघटन हो चूका है । कई सारी क्रांतियाँ (जैसे क्यूबा, निकारागुआ आदि ) अपने मध्यवर्गीय नेतृत्व के चरित्र के अनुरूप अपने अधूरे कार्यभारों को पूरा करने के बाद या तो विफिल हो चुकी हैं या विपथगमन कर चुकी हैं । इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव वहाँ के नारी आन्दोलन पर भी पड़ा है । लेकिन आज फिर पेरू में वहाँ की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वहाँ की स्त्रियाँ छापामार सेना और जनकार्रवाइयों में हिस्सा ले रही हैं, आधार इलाकों में लोक कमेटियों में शामिल होकर राजनीतिक कार्यों में, सामाजिक गतिविधियों में तथा सामाजिक उत्पादन में बराबरी की हिस्सेदारी कर रही हैं और साथ ही उन्होंने क्रांतिकारी जनसंगठनों के रूप में अपने संगठन बनाये हैं ।

काले अफ़्रीकी देशों में स्त्रियों ने वर्गीय समाज की गुलामी से औपनिवेशिक काल में ही पहली बार साक्षात्कार किया । दास समाज और सामंती समाज की पितृसत्तात्मक गुलामी के लंबे अतीत और सामन्ती पार्थक्य से वंचित रहने के कारण, पचास और साठ के दशक में राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के विस्फोट के साथ ही स्त्रियों की भारी आबादी उनमें शामिल हुई । नवस्वाधीन अफ़्रीकी देशों की स्त्रियों ने अपने लिए महत्वपूर्ण जनवादी अधिकार अर्जित किये । पर अब इन देशों का विकास गतिरुद्ध हो चुका है और केवल विश्व पूंजीवाद से निर्णायक विच्छेद करके, नई सर्वहारा क्रांतियाँ ही पुन: इन्हें प्रगतिपथ पर आगे बढ़ा सकती हैं । आज अफ़्रीकी देशों में भी पूंजी की सत्ता और यौन-असमानता की शिकार नारी समुदाय के नये आन्दोलन और स्वतंत्र संगठनों के गठन का वस्तुगत आधार तैयार है, पर उनका भविष्य क्रांतियों के नये चक्र की शुरुआत के साथ जुडा हुआ है ।

तुर्की, ईरान और मिस्र में नारी आन्दोलन की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में राष्ट्रीय जनवाद के लिए संघर्ष शुरू होने के साथ ही हो चुकी थी और स्त्रियों ने वहाँ लंबे संघर्ष के दौरान कई जनवादी अधिकार प्राप्त किये, पर फ़िलहाल वहाँ भी नारी मुक्ति-संघर्ष आज ठहराव और गतिरोध का शिकार है । सीरिया और इराक में भी सामाजिक-राजनीतिक जीवन में स्त्रियों ने कुछ महत्वपूर्ण अधिकार अर्जित कर लिए हैं, पर वर्तमान गतिरोध आज वहाँ की भी सच्चाई है । अरब अफ़्रीकी और पश्चिमी एशिया के अन्य अधिकांश मुस्लिम देशों में स्त्रियाँ आज भी अपने सामाजिक अधिकारों से वंचित पूरी तरह मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक गुलामी और सामन्ती पार्थक्य का शिकार बनी हुई हैं । साम्राज्यवादियों के टट्टू प्रतिक्रियावादी शेखों और शाहों के विरुद्ध जब तक इन देशों में जनक्रांतियाँ आगे कदम नहीं बढ़ाएंगी, तब तक नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रक्रिया वहाँ संवेग नहीं ग्रहण कर सकती ।

एशिया के अन्य देशों में चीन और वियतनाम, कोरिया आदि जिन देशों में साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधी संघर्ष का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग ने किया और जहाँ कुछ दशकों के लिए भी सर्वहारा सत्ता कायम रह सकी, उन देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के बावजूद आज भी स्त्रियों की सभी उपलब्धियां खोई नहीं हैं । आज भी अन्य एशियाई देशों की तुलना में स्त्रियों की इन देशों में वास्तव में अधिक सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं, यद्यपि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि चीन, वियतनाम आदि देशों में आज पूंजीवाद की लहर ने न केवल उन्हें निकृष्टतम कोटि का उजरती मजदूर बना दिया है और न केवल उनके अधिकारों में कटौतियां की जा रही हैं, बल्कि अब इन देशों में नारी-विरोधी अपराधों की भी भरमार हो गई है ।

भारत और एशिया के अन्य कई देशों में यद्यपि नारी मुक्ति-आन्दोलन की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही हो चुकी थी, पर राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व के समझौतापरस्त चरित्र के कारण इन देशों में जीवन के अन्य क्षेत्रों की ही भांति नारी अधिकार आन्दोलन के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी जनवादी मूल्यों की लड़ाई क्रांतिकारी और व्यापक पैमाने पर नहीं लड़ी गई । मध्यवर्गीय क्रांतिकारी आन्दोलन और सर्वहारा आन्दोलन की धाराएं अपनी जिन अन्तर्निहित कमजोरियों के कारण राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग के हाथों से नहीं छीन सकीं, उन्हीं कारणों से वे नारी आन्दोलन को भी एक क्रांतिकारी दिशा और संवेग नहीं दे सकीं । लंबे संघर्षों और निरंतरता के बावजूद भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों की स्त्रियों ने जो भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार अर्जित किये, वे बहुत कम थे । यही नहीं, कानूनी और संवैधानिक तौर पर उन्हें समानता के जो अधिकार मिले भी हैं, वे समाजी जीवन में व्याप्त निरंकुश स्वेच्छाचारिता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण मूलत: और मुख्यत: निष्प्रभावी बने हुए हैं ।

राष्ट्रीय आन्दोलन के समझौतापरस्त बुर्जुआ नेतृत्व तथा राष्ट्रीय जनवाद के कार्यभारों के अधूरे और गैरक्रांतिकारी ढंग से पूरा होने के कारण ही भारत, नेपाल आदि पिछड़े देशों में औरतों की गुलामी आज भी अधिक गहरी, व्यापक, निरंकुश और संगठित रूप में कायम है । सीमित हद तक शिक्षा और जनवादी चेतना के प्रसार के बावजूद बहुसंख्यक नारी आबादी आज भी बर्बर निरंकुश दासता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मकता के मूल्यों से जकड़ी हुई है, भयानक अमानवीय पार्थक्य ( Segregation ) की शिकार है और साथ ही पूंजी की सत्ता की उजरती गुलामी के रथ में भी जोत दी गई है । आधी आबादी की अपार क्रांतिकारी सम्भावना सम्पन्न जनशक्ति को निर्बंध क्रांतिकारी चेतना से लैस करना, क्रांतिकारी नारी आन्दोलन को नये सिरे से खड़ा करना और साथ ही सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के हर मोर्चे पर योद्धाओं की कतारों में स्त्रियों को ला खड़ा करना इन सभी देशों में क्रांतियों का एक अत्यंत कठिन लेकिन अनिवार्यत; आवश्यक कार्यभार है ।

तीसरी दुनिया के इन सभी देशों में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के विरुद्ध तथा राष्ट्रीय जनवादी क्रांति के छूटे हुए कार्यभारों को पूरा करने के लिए सर्वहारा क्रांतियों का जो नया चक्र शुरू होगा, अब नारी मुक्ति आन्दोलन का भविष्य भी उसी के साथ द्वंदात्मक रूप से जुडा हुआ है ।

7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति

अक्टूबर क्रान्ति के बाद मानव इतिहास में पहली बार कोई ऐसी राज्यसत्ता अस्तित्व में आयी, जिसने औरतों को हर मायने में सामान अधिकार दिए, समान सुविधाओं के अतिरिक्त हर क्षेत्र में समान काम के अवसर, समान काम के लिए समान वेतन, समान सामजिक राजनीतिक अधिकार, विवाह और तलाक के सम्बन्ध में बराबर अधिकार, अतीत में वेश्यावृत्ति जैसे पेशों के लिए विवश औरतों का सामजिक पुनर्वास आदि अनेकों कदम उठाकर रूस की समाजवादी सरकार नें निस्संदेह एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक काम किया । समाजवादी निर्माण के पूरे दौर में, नारी मुक्ति के क्षेत्र की उपलब्धियां भी अभूतपूर्व थीं । पिछड़े हुए रूसी समाज में क्रान्ति के बाद के चार दशकों में उत्पादन, सामजिक-राजनीतिक कार्रवाईयों , सामरिक मोर्चे और बौद्धिक गतिविधियों के दायरे में जितनी तेजी से औरतों की हिस्सेदारी बढ़ी, वह रफ़्तार जनवादी क्रांतियों के बाद यूरोप-अमेरिका के देशों में पूरी दो शताब्दियों के दौरान कभी नहीं रही थी । चंद-एक दशकों में ही सोवियत समाज से यौन अपराध और यौन रोगों का पूर्ण उच्छेदन हो गया, इस तथ्य को पश्चिम का मीडिया भी स्वीकार करता था । खेतों कारखानों में उत्पादन के मोर्चे पर ही नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चे पर भी लाखों सोवियत वीरांगनाओं नें जिस शौर्य और साहस का परिचय दिया था, उसने काफी हद तक इस सच्चाई को सत्यापित कर दिया कि नारी समुदाय की सीमा सिर्फ यही है कि उसे समाज में पुरुषों के साथ बराबरी की स्थिति, अवसर और परिवेश नहीं प्राप्त है ।

लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजवादी समाज में नारी समुदाय यौन-शोषण-उत्पीड़न से तथा आर्थिक शोषण से पूरी तरह मुक्त हो चुका होता है और पूर्ण समता की स्थिति कायम हो गयी होती है । ऐसा न तो कभी हुआ था और न ही ऐसा हो पाना संभव ही है । इस मुद्दे पर स्पष्टता के लिए जरूरी है कि पहले समाजवाद की अंतर्रचना को ही भली-भाँती समझ लिया जाये ।

समाजवाद एक स्थायी सामाजिक आर्थिक संरचना नहीं है । यह पूँजीवाद और वर्गविहीन समाज के बीच का एक लम्बा संक्रमणकाल है । इस दौर में छोटे पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन लम्बे समय तक बना रहता है, बाजार के नियम काम कार्य रहते हैं, माल-अर्थव्यवस्था भी मौजूद रहती है और इनके आधार पर पूंजीवादी मूल्य-मान्यताएं-संस्कृति रोज-रोज, हर क्षण पैदा होती रहती हैं, पूंजीवादी राज्यतंत्र के नाश के बाद भी पुराने समाज की वैचारिक-सामजिक-सांस्कृतिक अधिरचनाएं लगातार मौजूद रहती हैं और समाजवाद के विरूद्ध, एवं उसे ख़त्म कर देने के लिए लगातार एक भौतिक शक्ति का काम करती रहती हैं । वर्ग संघर्ष जारी रहता है और उत्तरोत्तर तीखा होता जाता है । सर्वहारा का राज्य और सर्वहारा की पार्टी लगातार पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली और मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के विरूद्ध कारगर ढंग से संघर्ष को जारी रखते हुए ही समाजवादी समाज को उस मंजिल तक पंहुचा सकती हैं, जहां वस्तु का बाजार मूल्य पूर्णतः समाप्त हो जाता है और मात्र उपयोग-मूल्य एवं प्रभाव मूल्य का ही अस्तित्व रह जाता है । केवल इसी मंजिल पर पहुंचकर समाज में हर तरह की असमानता समाप्त हो सकती है और नारी समुदाय भी तभी पूर्ण समता और स्वतंत्रता की स्थिति प्राप्त कर सकता है । लेकिन यह मार्ग अनेकों आरोहों-अवरोहों, जय-पराजयों और मोड़ों-घुमावों से भरा हुआ होता है तथा बहुत लम्बा होता है ।

रूस और चीन के समाज ने समाजवादी क्रान्ति और निर्माण के दौर में विकास के अभूतपूर्व लम्बे डग भरे और सामजिक न्याय और समता के अपूर्व कीर्तिमान स्थापित किये, लेकिन वे पूर्ण समता और पूर्ण न्याय से युक्त समाज नहीं थे । संवैधानिक स्तर पर औरत को सभी अधिकार मिल चुके थे, लेकिन सामजिक पारिवारिक स्तर पर यह स्थिति नहीं थी । ऐसा समझना एक वैधिक विभ्रम(Juridical Illusion) होगा । उत्पादन के तंत्र पर पूर्ण सामाजिक स्वामित्व के बगैर यह संभव नहीं था और इसके लिए अधिरचना के धरातल पर सतत क्रांतियों की भी अपरिहार्य आबश्यकता थी ।

समाजवाद की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बावजूद स्तालिनकालीन रूस में ऐसा न हो सका, जो कालान्तार में समाजवाद के ठहराव और अन्ततोगत्वा पराजय का कारण बना । स्तालिन की सर्वाधिक गंभीर गलती उनकी यह दार्शनिक भूल थी कि वे समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के अस्तित्व को और उसकी निरंतरता को वास्तविक रूप में पहचान नहीं सके । यह काम सर्वप्रथम माओ-त्से-तुंग ने किया । सोवियत संघ में समाजवाद की उपलब्धियों और पराजय की शिक्षाओं का तथा चीन में समाजवादी प्रयोगों का सार संकलन करते हुए माओ ने पहली बार समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को स्पष्टतः निरूपित किया और सर्वहारा के अधिनायकत्व के अंतर्गत वर्ग संघर्ष को जारी रखने के सिद्धांत और पद्धति का प्रतिपादन किया । पहले यह उल्लेख किया जा चुका है कि मार्क्सवाद के विकास की परम्परा में उत्पादक शक्तियों के विकास पर अधिक जोर देने की यांत्रिकता शुरू से ही मौजूद थी और मूलाधार एवं अधिरचना के द्वंद्वात्मक संबंधों की समझ काफी हद तक अस्पष्ट थी । सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की सैद्धांतिक पार्श्वभूमि की सर्जना करते हुए माओ त्से तुंग ने पहली बार इनका स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया और मूलाधार के रूपांतरण को जारी रखने के लिए तथा पूंजीवादी पुनर्स्थापना के सभी भौतिक आधारों को नष्ट करने के लिए अधिरचना के निरंतर क्रान्तिकारीकरण या अधिरचना में सतत क्रान्ति की अवधारणा प्रस्तुत की । पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि समाजवादी संक्रमण के दौरान पूंजीवादी उत्पादन के छोटे से छोटे रूप की समाप्ति की लम्बी प्रक्रिया के साथ ही उसकी अनिवार्य पूर्वशर्त एवं समांतर प्रक्रिया के रूप में तथा ज्यादा महत्व देकर कला-साहित्य-संस्कृति, शिक्षा एवं सामाजिक मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के प्रत्येक दायरे में अनवरत क्रान्ति की प्रक्रिया को जारी रखे बगैर समाज की विषमताओं एवं उत्पीड़न के विविध सूक्षम एवं स्थूल रूपों को कदापि समाप्त नहीं किया जा सकता । नारी-पुरूष असमानता, नारी उत्पीड़न पर आधारित पारिवारिक ढांचा एवं वैवाहिक सम्बन्ध, पुरूष-स्वामित्ववादी मानसिकता आदि ऐसी ही सामाजिक संस्थाएं और मूल्य मान्यताएं हैं, जिन्हें समाजवादी समाज के भीतर अनवरत सांस्कृतिक क्रांतियों से गुजरने के बाद ही, क्रमशः निर्मूल किया जा सकेगा । यह सच्चाई केवल समाजवादी समाज के लिए ही लागू नहीं होती है, बल्कि आज भी नारी मुक्ति आन्दोलन के मार्क्सवादी समर्थकों के भीतर मौजूद तमाम यांत्रिक धारणाओं, अर्थवादी भटकावों और भ्रांतियों से मुक्ति के लिए सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की इस दार्शनिक अंतर्वस्तु को जानना समझना जरूरी है ।

मूलाधार और अधिरचना के द्वंदात्मक संबंधों के, सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति द्वारा प्रस्तुत निरूपण, अधिरचना में क्रान्ति की अपरिहार्यता पर उसके जोर और सर्वहारा अधिनायक्तव के अंतर्गत सतत क्रान्ति की उसकी अवधारणा की सम्यक समझदारी के आधार पर ही आज नारी मुक्ति की दिशा से सम्बंधित निम्नलिखित प्रश्नों को भलीभांति समझा जा सकता है ।

1. नारी-उत्पीडन के बुनियादी कारण आर्थिक होंने के बावजूद आर्थिक प्रश्नों के अतिरिक्त सामाजिक- सांस्कृतिक धरातल पर भी स्त्रियों को संगठित होकर संघर्ष करना जरूरी है और पुरूष्सत्तात्मक व्यवस्था की मान्यताओं-संस्थाओं से सघर्ष एक दीर्घकालिक संघर्ष है ।

2. समाजवादी संक्रमण के अंतर्गत भी एक लम्बे समय के संघर्ष के बाद ही स्त्रियों की पूर्ण मुक्ति संभव है और यह कि यह प्रश्न समाजवाद की विजय-पराजय के साथ जुड़ा हुआ है ।

3. नारी मोर्चे पर कामगार स्त्रियों के संगठनों के अतिरिक्त और सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष मोर्चात्मक(Frontal) संगठनों के अतिरिक्त संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठनों की अपरिहार्य आवश्यकता है, जिनमें मध्यमवर्ग सहित जनता के सभी वर्गों की स्त्रियाँ पुरूष उत्पीडन के सर्वतोमुखी विरोध और अपने सामजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के एक कार्यक्रम के आधार पर संगठित हों, ऐसे नारी संगठन सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष नेतृत्व में न होकर सांगठनिक तौर पर, स्वतन्त्र स्वायत्त हों और पार्टी अपनी नीतियों से उन्हें प्रभावित करके, उनके भीतर काम करते हुए उन्हें दिशा देने का प्रयास करे ।

4. स्त्रियों की सहस्त्राब्दियों पुरानी मानसिक गुलामी को नष्ट करने के लिए नारी संगठनों की पहलकदमी, निर्णय लेने की आजादी और सापेक्षिक स्वायत्तता को बढाने के साथ ही, सर्वहारा वर्ग की पार्टी के लिए यह भी जरूरी है की राजनितिक-सांस्कृतिक शिक्षा और आन्दोलन के विशेष प्रयासों से पार्टी-कतारों में स्त्रियों की भरती की प्रक्रिया तेज की जाये और साथ की संघर्ष के हर मोर्चे पर — सभी तरह के जनसंगठनों में स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी बढाई जाये और उनकी पहलकदमी को निरुत्साहित करने की पुरूष-स्वामित्ववादी प्रवृत्तियों के विरूद्ध सतत संघर्ष किया जाये ।

5.पुरूषों की प्रत्यक्ष-परोक्ष चौधराहट(जो हर स्तर पर बुर्जुआ तत्वों को बल प्रदान करती है) से सामाजिक सक्रियता के हर दायरे में औरतों के लिए बच पाना अत्यंत कठिन है और पुराने मूल्यों के पूर्ण उच्छेदन तक यह समस्या समाजवाद की अवधि में भी बनी रहेगी । इससे यह स्पष्ट है कि जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता और स्वतन्त्र पहचान के लिए संघर्ष का प्रश्न दूरगामी और ऐतिहासिक महत्त्व रखता है । इसे एक बुर्जुआ दृष्टिकोण कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । इस प्रश्न को भी नारी आन्दोलन के एजेंडे पर अलग से रेखांकित करके शामिल करना अनिवार्य है ।

पूर्वी यूरोप और भूतपूर्व सोवियत संघ में 1956 में और चीन में 1976 में पूंजीवादी पुनर्स्थापना होने के बाद से लेकर अब तक के काल में, इन देशों में लोभ लालच , प्रतियोगिता, अपराध, भ्रष्टाचार, लूटमार और असमानता की नैतिक स्वीकृति से युक्त एक नग्न उपभोक्ता संस्कृति अस्तित्व में आई है । जाहिरा तौर पर इसका सर्वाधिक शिकार प्रत्यक्ष उत्पादक और स्त्री समुदाय ही हुआ है । इन सभी देशों में इधर नए सिरे से बलात्कार, स्त्री-भ्रूण ह्त्या, पत्नि उत्पीडन आदि नारी विरोधी अपराधों का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर गया जो समाजवाद के कुछ दशकों के भीतर पूरी तरह समाप्त हो चुके थे । अब विगत कुछ वर्षों के भीतर रूस और पूर्वी यूरोप में खुले निजी इजारेदार पूँजीवाद के आने के बाद यह प्रक्रिया और अधिक तेज हो गयी है, इस तथ्य को बुर्जुआ मीडिया भी स्वीकार कर रहा है । वेश्यावृत्ति, कालगर्ल आदि के पेशों और कैबरे नृत्य, अश्लील पत्रिकाओं आदि की बाढ़ आ गयी है, 1956 के पहले के सोवियत संघ और 1976 के पहले के चीन में जिन यौन रोगों के पूर्ण उन्मूलन के तथ्य को पश्चिम भी स्वीकार करता था, अब उनके इलाज के लिए अस्पताल खोले जा रहे है । चीन में लड़कियों की भ्रूण हत्या, अपहरण करके बलात विवाह और दहेज़ सरकार की चिंता के विषय बन चुके है । फिल्मों और साहित्य में नारी छवि की यौन-उत्पीड़क प्रस्तुति, मॉडलिंग जैसे पेशों के जरिये यौन-शोषण, नग्नतावाद, हर तरह के नारी स्वातंत्र्य विरोधी मूल्य और पुरूष स्वामित्व की मानसिकता तेजी से फलफूल रही है । उत्पादन के क्षेत्र में पुरूष व स्त्री के कामों की प्रकृति में भेद करके नारी श्रम को ज्यादा से ज्यादा सस्ता बनाया जा रहा है, उन्हें तथाकथित “हलके”, ‘स्त्रियोचित”, उबाऊ, श्रमसाध्य कामों में लगाया जा रहा है और “गृहिणी” के दायित्व से बाँधा जा रहा है । समाजवाद के अंतर्गत शिक्षा और सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों-पुरूषों की भागीदारी में स्त्रियों का अनुपात लगारार बढ़ा था, जो अब तेजी से घटता जा रहा है । स्मरणीय है कि येल्त्सिन के आने से पूर्व गोर्बाचोव ने ही, जो”मानवीय चेहरे वाले समाज ” की बातें किया करता था, लगभग दो सौ तरह के कामों में स्त्रियों की भागीदारी पर रोक लगा दी थी ताकि वे श्रम से थके पतियों की देखभाल और “समाजवाद के नौनिहालों’ के लालन-पालन पर उचित ध्यान दे सकें ।

और यह सब कुछ सर्वथा स्वाभाविक है । अर्थतंत्र का विकास पूंजीवादी दिशा में हो, राज्यसत्ता पर बुर्जुआ वर्ग काबिज हो और पूरे समाज की अधिरचना का समाजवादी रूपांतरण जारी रहे — यह असंभव है । जैसाकि पहले उल्लेख किया जा चुका है, समाजवाद नारी -समस्या का समाधान नहीं बल्कि समाधान की शुरुआत है । स्त्री की असमानतापूर्ण स्थिति और उसके शोषण के विविध रूप समाजवादी संक्रमण के दौरान भी मौजूद रहेंगे, पर वे क्रमशः क्षरण और विलोपन की दिशा में अग्रसर होंगे । और यह प्रक्रिया स्वतः नहीं होगी, अधिरचना में अनवरत क्रान्ति के जरिए– सतत सांस्कृतिक क्रान्ति के जरिए होगी । पूंजीवादी पुनर्स्थापना की यह तार्किक परिणति है कि औरत फिर से दोयम दर्जे की नागरिक, सबसे निचले दर्जे की उजरती मजदूर और एक उपभोक्ता सामग्री या पण्य वस्तु में तब्दील का दी जाये । रूस, पूर्वी यूरोप और चीन में यही हुआ है ।

हमारी उपरोक्त बातों का यह मतलब कतई नहीं है कि मार्क्सवाद के सूत्रों में नारी मुक्ति के प्रश्न का कोई शाश्वत समाधान या आज की स्थिति का कोई किया-कराया विश्लेषण रखा हुआ है । यह मार्क्सवाद की एक प्रस्तरीकृत रूढ़ समझ ही हो सकती है । अपनी द्वंद्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी दृष्टिकोण पर आधारित ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर मार्क्सवाद ने पहली बार नारी प्रश्न को विश्व-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अवस्थित करके देखा, पूरे सामजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक तंत्र से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल की, वर्गीय उत्पीड़न से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों को स्पष्ट किया और इसे सामजिक क्रान्ति का एक अनिवार्य अंग बताया । महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति तक के प्रयोगों नें इस समझ को ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट किया और नारी मुक्ति के लम्बे संघर्ष की दीर्घकालिक अवधि के लिए सांस्कृतिक क्रान्ति नें आम दिशा (General Line) की एक रूपरेखा प्रस्तुत की । अब शेष काम उन्हें पूरा करना होगा जो इस मोर्चे पर काम कर रहे हैं । अभी तक असमाधानित समस्याओं का हल ढूँढने के साथ ही, आज के युग ने जो सर्वथा नयी समस्यायें पैदा की हैं, उनपर भी वे ही लोग सोचेंगे जो इनके रूबरू खड़े हैं ।

8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर

साठ के दशक में जो नारीवादी आन्दोलन पहले अमेरिका और फिर पूरे पश्चिमी जगत में फूट पड़ा, वह सारतः नारी उत्पीडन के विरूद्ध एक अन्धविद्रोह था । उसकी कई शाखाएं और उपशाखाएँ आगे चलकर फलीं-फूलीं, लेकिन उनके पास न तो नारी-समस्या के सभी पहलुओं की कोई इतिहाससम्मत तर्कपरक व्याख्या थी और न ही दूरगामी सामाजिक संघर्ष के रूप में नारी मुक्ति के सघर्ष को आगे ले जाने का कोई ठोस कार्यक्रम ।

वैसे आधुनिक नारीवाद के सिद्धांत का पहला मील का पत्थर पहली बार 1946 में फ्रांसीसी में और 1953 में अंग्रेजी में प्रकाशित सिमोन द बोउवा (Simone de Beauvoir ) की कृति “द सेकेण्ड सेक्स” था, जिसमें व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण और नारी आन्दोलन की एक स्पष्ट दिशा के अभाव के बावजूद नारी उत्पीड़न के कई सूक्ष्म पहलुओं को रेखांकित किया गया था और यह प्रस्थापना दी गयी थी कि स्त्रियों की मुक्ति में ही पुरूषों की भी मुक्ति है जो स्वयं पुरूष स्वामित्व की मानवद्रोही मानसिकता के दास हैं । साठ के दशक के नारीवादी आन्दोलन की चेतना इस विचार से काफी प्रभावित थी । ऐसी दूसरी प्रसिद्ध कृति सुप्रसिद्ध नारीवादी नेता और 1966 में राष्ट्रीय नारी संगठन (अमेरिका) का गठन करने वाली बेट्टी फ्रीडन(Betty Friedan) की 1963 में प्रकाशित पुस्तक द फेमिनिन मिस्टिक(The Feminine Mystique) थी जिसमें स्त्रियों की घरेलू दासता और पुरूष-स्वामित्व को स्वीकार करने के लिए उनके दिमाग के ‘कंडीशनिंग’ की प्रक्रिया की उग्र लेकिन एकांगी एवं अनैतिहासिक आलोचना की गयी थी ।

साठ का दशक आधुनिक इतिहास के द्वित्तीय विश्वयुद्धोतर काल का एक महत्वपूरण मोड़ बिंदु था । विश्व पूंजीवादी तंत्र के सरदार उस समय गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे । तीस के दशक की मंदी के बाद अमेरिका तक में एक बार फिर बेरोजगारी पैदा हो रही थी और युवा असंतोष तीखा हो रहा था । पूरी दुनिया में जारी मुक्ति-युद्धों की लगातार सफलता साम्राज्यवाद के लिए एक गंभीर संकट को जन्म दे रही थी । वियतनाम में अमेरिका की पराजय निश्चितप्राय प्रतीत होने लगी थी । इसी सामाजिक उथल-पुथल के दौर में अमेरिका में अश्वेत आबादी का आन्दोलन नयी शक्ति के साथ फूट पड़ा था । मैकार्थीवाद और शीतयुद्ध के दौरान संचित जनता का आक्रोश सड़कों पर आ गया था । 1968 में हिन्दचीन में अमेरिकी हस्तक्षेप के विरूद्ध छात्रों-नौजवानों और फिर व्यापक अमेरिकी जनता का आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो नागरिक अधिकारों के आन्दोलन के साथ जुड़कर व्यवस्था के लिए संकट बन गया था । इसी समय फ्रांस में छात्रों का आन्दोलन एक ज्वार की भांति उठ खड़ा हुआ जिसमें बाद में मजदूर भी शामिल हो गए और अन्ततोगत्वा लौह पुरूष कहलाने वाले दगाल को राष्ट्रीय सभा भंग करने व इस्तीफ़ा देने के लिए विवश होना पड़ा । पूरा पश्चिमी जगत एक संकट और उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था । पश्चिमी नारी समुदाय भी इस उथल-पुथल से अछूता नहीं था बल्कि उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहा था । सच तो यह है कि यूरोप-अमेरिका में जनांदोलनों में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर स्त्रियाँ हिस्सा ले रहीं थीं । उत्पादन के अतिरिक्त सामाजिक सक्रियता के दायरे में इस बढती हुई शिरकत ने पश्चिम की नारियों — विशेषकर उनके युवा हिस्से की चेतना का धरातल नयी ऊंचाईयों तक उन्नत किया और दोयम दर्जे की नागरिकता एवं हर तरह के यौन-भेद के विरूद्ध स्त्रियों का प्रबल स्वतः स्फूर्त विद्रोह उठ खड़ा हुआ ।

साठ के दशक का पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन नारी शोषण के विरुद्ध एक बगावती उभार था । इस आन्दोलन में विविध चिन्तनों की मौजूदगी के बावजूद, इसकी कोई सुविचारित वैचारिक पूर्वपीठिका, दिशा और कार्यक्रम नहीं था । द्वित्तीय विश्वयुद्धोत्तर पश्चिमी उपभोक्ता संस्कृति की प्रतिक्रिया में पैदा हुई यह एक बगावत थी । पर विडंबना यह थी कि स्वयं इसकी दार्शनिक अंतर्वस्तु भी बुर्जुआ थी, जिसके चलते जल्दी ही आन्दोलन की मुख्यधारा ने विकृत उच्छ्रंखल बुर्जुआ संस्कृति के नैतिक-सामाजिक मूल्यों को अपना लिया । इस अंध-विद्रोह ने यौन-शोषण और यौन-उत्पीड़न पर खड़ी सामाजिक संस्थाओं की जगह मूल्य-संस्थाओं की कोई समग्र वैकल्पिक व्यवस्था नहीं प्रस्तुत की । विवाह, परिवार, एकल यौन-संबधों आदि को अराजकतावादी ढंग से नकारने की चेष्टा की गयी । पूर लड़ाई को पुरूष सत्ता के विरूद्ध केन्द्रित किया गया और इस सत्ता के ऐतिहासिक-सामाजिक-आर्थिक आधारों को जानने समझने की कोई विशेष चेष्टा नहीं की गयी । जाहिरा तौर पर ऐसा कोई आन्दोलन समाज में लम्बे समय तक टिका नहीं रह सकता और यही हुआ ।

पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन का सामाजिक विद्रोही तत्व धीरे धीरे क्षरित होता गया और आठवें दशक के मध्य तक यह एक बहुत छोटे से हिस्से, बुद्धिजीवी और युवा नारियों तक ही सिमट कर रह गया । यौन-भेद में ही सभी असमानताओं का कारण ढूँढने वाली बुर्जुआ अराजकतावादी स्त्रियाँ और संस्थाएं पूरी सच्चाई को ही सिर के बल खड़ा करती रहीं और अन्ततोगत्वा व्यवस्था को ही लाभ पहुंचाने का काम करती रहीं । पश्चिम के जिन नारीवादी विचारकों ने सातवें-आठवें दशक में कई पुस्तकें लिखीं , उनमे से किसी ने विश्लेषण का कोई समग्र, इतिहाससंगत नमूना प्रस्तुत नहीं किया । लेकिन यह जरूर है कि औरत की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता के प्रश्न को, समाज में उसकी अपनी स्वतन्त्र पहचान के प्रश्न को पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन ने चिन्ता और गाम्भीर्य के साथ उठाया और इतिहास के एजेंडा पर इसे महत्वपूर्ण स्थान दिलाया, भले ही उसने स्वयं इसका काल्पनिक अथवा अराजकतावादी समाधान प्रस्तुत किया हो । यही नहीं, गर्भपात, तलाक आदि मामलों को लेकर नारीवादी संगठनों ने जो मांगे उठाई और आन्दोलन चलाए, वे भी अत्यंन्त महत्वपूर्ण थे । नारीवादी आन्दोलन के दर्शन और इतिहासदृष्टि की अवैज्ञानिकता के बावजूद, इसके द्वारा उठाई गयी अधिकाँश मांगों और समस्यायों को एक सही सैद्धांतिक फ्रेमवर्क में अवस्थित करके एक क्रांतिकारी नारी आन्दोलन के कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है और उसके अनुभवों से काफी कुछ सीखा जा सकता है ।

9. और अंत में…

पश्चिम के पूंजीवादी समाज में, पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (Renaissance-Elightenment-Revolution) की ऐतिहासिक विकास-यात्रा के परिणामस्वरूप वहां के समाज में पुरूष-स्वामित्व और वर्चस्व के रूप सूक्ष्म है. जनतांत्रिक मूल्य सामाजिक जीवन में इस हद तक रचे-बसे हैं कि वहां इनका नग्न रूप कायम नहीं रह सकता । वहां स्त्री के साथ यौन-आधार पर कायम सामाजिक असमानता और भेदभाव मुख्य प्रश्न हैं । यौन-उत्पीड़न के आम रूप अत्यंत सूक्षम हैं । नारी की अस्मिता का प्रश्न पश्चिम में प्रबल है । नारी आन्दोलन का प्रमुख सांस्कृतिक पक्ष वहां उपभोक्ता संस्कृति की विकृतियों के विरुद्ध जनमानस तैयार करने का है ।

तीसरी दुनिया के अधिकाँश पिछड़े हुए देशों में नारी उत्पीड़न के नए पूंजीवादी रूपों के साथ-साथ उसके मध्ययुगीन नग्न स्वेच्छाचारी रूप भी कायम हैं । इनमें से कुछ देशों में आज भी अर्द्धसामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक तंत्र किसी-न-किसी रूप में कायम हैं और जिन देशों में साम्राज्यवाद पर आश्रित बुर्जुआ व्यवस्थाएं कायम हुई हैं, वे जनतांत्रिक मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं-संस्थाओं के मामले में पश्चिमी व्यवस्थाओं से बहुत पीछे हैं । भारत को उदाहरण के तौर पर लें । समाज विकास की मंथर गति तथा जनवादी क्रांतियों और तज्जन्य जनवादी मूल्यों के अभाव के चलते हमारे समाज में मूल्यों-मान्यताओं का प्राक्पूंजीवादी ढांचा अत्यंत धीमी गति से क्षरित होता हुआ आज भी कायम है और भारतीय पूंजीवाद नें इन्हें अपना लिया है । मनु के विधान यहाँ आज भी जिन्दा हैं । शिक्षा के प्रसार के बावजूद सामाजिक क्रियाकलापों से बहुसंख्यक नारी समुदाय, यहाँ तक कि उसका वह हिस्सा भी काफी हद तक कटा हुआ है जो सामाजिक उत्पादन में लगा हुआ है । मजदूर और गरीब किसान औरतें निकृष्टतम कोटि के उजरती गुलाम के रूप में ही सही, पर सामाजिक उत्पादन की कार्रवाई में हिस्सा लेती हैं, पर मध्यमवर्गीय औरतों , यहाँ तक तक कि शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक का बहुलांश चूल्हे- चौखट से पूरी तरह बंधा हुआ है और पति की सेवा, बच्चों का लालन-पालन और घरेलू उपयोग की चीजों के उत्पादन से अधिक कुछ नहीं करता । नौकरी करने वाली मध्यमवर्गीय स्त्रियां भी घरेलू गुलामी से मुक्त नहीं हैं । आज भी औरतों का पुरूषों से और पूरे समाज में जितना अमानवीय पार्थक्य (Segregation) भारत में है, उतना मध्य पूर्व के कुछ देशों को छोड़कर कहीं नहीं है । इस आधी आबादी को आर्थिक शोषण, लूटमार, मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं की दिमागी गुलामी, यौन-उत्पीड़न, पुरूष-स्वामित्व, पार्थक्य (Segregation) और अलगाव (Alienation) से मुक्त करना भारत और ऐसे तमाम देशों की क्रांतियों का दायित्व ही नहीं, बल्कि उनकी लड़ाई का एक ऐसा जरूरी मोर्चा है, जिस पर लड़े बिना ये क्रांतियाँ सफल हो ही नहीं सकतीं ।

भारत जैसे देशों में नारी मुक्ति आन्दोलन को वैचारिक धरातल पर तमाम विजातीय बुर्जुआ विचारों से संघर्ष करते हुए सही वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि, इतिहास-दृष्टि, संस्कृति और दिशा से खुद को समृद्ध बनाना होगा । साथ ही साम्राज्यवाद से आयातित और देशी पूँजीवाद द्वारा पोषित बुर्जुआ नारीवाद के दर्शनं के समूल नाश के लिए समग्र जनमुक्ति एवं नारी-मुक्ति की जातीय, जन-परम्पराओं से खुद को वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर अविच्छिन्न रूप से जोड़ना होगा ।

साम्राज्यवाद के वर्तमान नए दौर में यह बात अब दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि बुर्जुआ व्यवस्था के दायरे के भीतर, सुधारों के दायरे के भीतर नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी अब कुछ हासिल कर पाने की रत्ती भर भी गुंजाईश शेष नहीं है । उलटे, ढांचागत असाध्य संकट के दौर में — आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर में, पूरी दुनिया की पूंजीवादी व्यवस्थाएं अब ज्यादा से ज्यादा निरंकुश होते जाने की दिशा में अग्रसर हैं । ऐसे में अबतक के संघर्षों से अर्जित जनवादी अधिकारों की हिफाजत के लिए भी नारी समुदाय को राज्यसत्ता के विरूद्ध जुझारू लड़ाई लड़नी पड़ेगी । पहली बात तो यह है कि यह लड़ाई स्त्रियां तभी लड़ सकती हैं जब वे मजदूरों-किसानों के क्रांतिकारी संघर्षों में, लोक अधिकार आदोलनों में, क्रांतिकारी सांस्कृतिक आन्दोलनों में, क्रांतिकारी छात्र-युवा आन्दोलनों में पूरी भागीदारी करें । तभी वे आम जनता के पुरूष समुदाय को नयी चेतना देकर अपनी मुक्ति के लिए समर्थन हासिल कर सकेंगी और नारी मुक्ति के संघर्ष को स्त्री बनाम पुरूष का सघर्ष से बचाया जा सकेगा । दूसरी बात यह कि आज कामगार स्त्रियों के संगठन बनाने के अतिरिक्त जनमुक्ति संघर्ष के हिरावलों और अन्य क्रांतिकारी आन्दोलनों के नेतृत्व को मध्यमवर्गीय और जनता के सभी बर्गों की स्त्रियों को नारी उत्पीड़न और जनवादी अधिकारों के प्रश्न पर,व्यापक आधार वाले (वर्गीय संयुक्त मोर्चे की प्रकृति वाले) नारी संगठनों के बैनर तले संगठित करने की भी पहले से बहुत अधिक जरूरत है । साथ ही नारी मुक्ति के मुद्दे को उठाने वाले पहले से ही मौजूद ऐसे संगठनों को भी साथ लेने और उनमें शामिल होकर काम करने की संभावना मौजूद होने पर उनका उपयोग अवश्य ही किया जाना चाहिए । भारत जैसे देशों में स्त्रियों के जनवादी अधिकारों के लिए आंदोलनरत तमाम नारी संगठन महानगरों के शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक ही सिमटे हुए है । इनके साथ आम सहमती के कार्यक्रम पर सहमती के आधार पर काम किया जा सकता है और इनका विस्तार गावों-शहरों की आम स्त्रियों तक भी किया जा सकता है ।

तीसरी बात, यह कि जिस हद तक बुर्जुआ व्यवस्था और विश्वपूंजीवादी तंत्र की जरूरत है, उस हद तक सुधारपरक कार्रवाईयों के लिए आज बड़े पैमाने पर सरकारी आर्थिक मदद और तथाकथित स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिये आने वाली साम्राज्यवादी मदद के जरिये भारत जैसे देशों के कोने-कोने में तथाकथित स्त्री संगठन सुधार और आन्दोलन की कार्रवाईयों में लगे हैं । इनका मूल मकसद स्त्रियों को सुधार के दायरे में कैद करके उनकी तेजी से उन्नत होती चेतना को कुंद करना और उन्हें क्रान्ति की धारा में शामिल होने से रोकना है । स्त्री आन्दोलन के इन खतरनाक घुसपैठियों के विरुद्ध आज बड़े पैमाने पर प्रचार की और उनके प्रभाव को समाप्त करने की जरूरत है ।

इस सभी बातों और इनके सभी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही आज नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा और एक सुसंगत कार्यक्रम का निर्धारण किया जा सकता है ।

BACK TO POST [ १०-११ मार्च १९९२ को काठमांडू नेपाल में ‘अखिल नेपाल महिला संघ’ के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय भाषण के रूप में प्रस्तुत निबन्ध. नेपाली भाषा में पुस्तिकाकार प्रकाशित. ‘दायित्वबोध’, मार्च-जून, १९९३, जुलाई-अगस्त,१९९३ और नवंबर-दिसंबर, १९९३ अंकों में धारावाहिक प्रकाशित ]

डार्विन के जन्मदिन पर विशेष

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जीव विकास का सिद्धांत – डार्विन और वाद-विवाद

डॉ अमृत

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

डार्विन की उपलब्धियां

डार्विन के आलोचक

नव-डार्विनवाद

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

बीते वर्ष 2009 के 12 फरवरी के दिन, मानव  प्रकृति विज्ञानी चार्ल्स डार्विन का दो सौवां जनमदिन था और संयोगवश 150 साल पहले ही नवम्बर 1859 में ही मनुष्य की वैज्ञानिक समझ का एक  मील पत्थर चार्ल्स डार्विन द्वारा लिखित पुस्तक ‘ जीवों की उत्पत्ति’ छपी थी । इन दोनों ही ऐतिहासिक  दिनों की याद को समर्पित 2009 का वर्ष, डार्विन के सिद्धांत को आम लोगों में प्रचारित करने और इस पर हो रहे हमलों का जवाब देने के लिए पूरी दुनिया में मनाया गया । इन कार्यक्रमों की समाप्ति 12 फरवरी 2010 को होगी । इसके अलावा पिछले कुछ सालों में 12 फरवरी का दिन डार्विन दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है ।

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के शहर सर्युस्बरी में हुआ । उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे और दादा इरासमस डार्विन एक प्रकृति दार्शनिक, डॉक्टर और कवि थे । पिता की इच्छा थी कि डार्विन डॉक्टर बनें लेकिन उनकी रूचि प्रकृति विज्ञान में थी । 1828 में पिता ने डार्विन को पादरी बनाने के लिए क्राईस्ट कॉलेज, कैम्ब्रिज में दाखिल करवा दिया  । यहाँ उनका मेल वनस्पति विज्ञान के प्रोफैसर स्टीवन हैन्स्लो से हुआ और वहां काम करने लगे । डार्विन पहले ही लामारक के जीव विकास सम्बन्धी विचारों को पढ़ चुके थे और अब इनकी रूचि और भी बढ़ गयी । इसी दौरान वह प्रकृति का ध्यान से निरीक्षण करने में लग गये और कीड़े मकौड़े तथा पौधे एकत्रित करने में जुट गये । 1831 में उनकी पढाई पूरी हो गयी ।

इंग्लैण्ड में विभिन्न स्थानों पर प्रकृति का निरीक्षण करने के लिए घूमते-घूमते, उनके प्रोफेसर हैन्स्लो ने, उनकी सिफारिश एक सर्वेक्षण करने जा रहे जहाज पर बतौर प्रकृति विज्ञानी कर दी । डार्विन के पिता नें इनकार कर दिया, लेकिन आखिरकार डार्विन ने किसी न किसी तरह उन्हें अपनी यात्रा का खर्च उठाने के लिए मना ही लिया और 27 दिसंबर, 1831 को डार्विन एच. एम. एस. बीगल नामक जहाज पर सफ़र के लिए निकल पड़े । किसे पता था कि यह सफ़र जीव विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति लाने वाला है और पृथ्वी पर मौजूद जीवों और पौधों की उत्पत्ति और विभिन्नता के बारे में  मनुष्य की सदियों पुरानी अवधारणाओं को सदा के लिए बदलने वाला है ।

अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन नें तथ्यों का भण्डार इकट्ठा  कर लिया और अक्तूबर 1836 में इंग्लैंड वापिस आने पर अध्ययन में जुट गये । उनके द्वारा पृथ्वी की सरंचना संबंधी लिखे गये लेखों की वजह से , वह अपनी यात्रा से लौटने से पहले ही काफी प्रसिद्ध हो चुके थे । वापसी पर उनके संबंध उस समय के कई बड़े-बड़े विज्ञानियों से बन गये और वे कई साईंस सोसायटियों के मैम्बर चुने गये । अपने सफरनामे के बारे में किताब लिखते वक्त बहुत ज्यादा मेहनत के दबाव के चलते 1838 में वे बीमार हो गये और डॉक्टरों के कहने पर उन्हें लन्दन वापिस अपने पिता के घर जाना पड़ा । पर यहाँ भी उनकी खोजी रूचि कायम रही । वह अपना ज्यादा समय दुधारू पशुओं को पालने वाले किसानों के साथ बातें करते हुए और उनके द्वारा पशुओं की नसल सुधार के कामों का निरीक्षण करते हुए बिताते थे । हृदयस्पंदन और जठरीय रोग के दर्दों की ये बीमारी इसके बाद डार्विन का उम्र भर पीछा करती रही ।

अपने अध्ययन के आरंभिक वर्षों में ही, डार्विन जीव विकास संबंधी अपनी दो महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं का विकास कर चुके थे । ये दो अवधारणाएं- ‘ प्राकृतिक चयन’ (Natural Selection) और ‘योग्यतम का बचाव’ (Survival of the fittest) थी । डार्विन की अवधारणाओं ने यह पक्के तौर पर सिद्ध कर देना था कि प्रकृति पल-पल बदलती है । यह अपने आरम्भकाल से एकसमान नहीं रही जैसाकि उस समय की धार्मिक शिक्षाओं में बताया जाता था । डार्विन को पता था कि उसकी खोजों का समाज के कठमुल्लों की तरफ से भयंकर विरोध किया जायेगा । कुछ इस डर की वजह से और कुछ अपनी खोजों को प्रमाणिक तौर पर और मजबूत बनाने के लिए प्रकृति में से तथ्य इकट्ठे करने और अध्ययन करने के कारण डार्विन 1859 तक अपनी इस क्रान्तिकारी खोज को प्रकाशित न कर सके ।

1856 के शुरुआती दिनों में चार्ल्स डार्विन के दोस्त चार्ल्स लिल को एक और विज्ञानी अल्फ्रेड वालेस का पत्र मिला जिस में वालेस ने डार्विन की अवधारणाओं के साथ मिलती जुलती बातें कहीं । इसके बाद लिल ने डार्विन को अपनी खोजों को छपवाने के लिए कहा और उसके कहने पर डार्विन ने, जीवों की प्रजातिओं की उत्पत्ति’ (Origin of Species) से सम्बंधित एक खोज पत्र लिखना शुरू किया । जून, 1858 में डार्विन को वालेस का पत्र मिला जिसमें उसने ‘प्राकृतिक चयन’ की धारणा का  जिक्र किया । 1859 में 1 जुलाई के दिन , डार्विन और वालेस ने इकट्ठे ही अपनी खोजों के बारे में खोज पत्र पढने का निर्णय किया, पर अपने बेटे की मृत्यु की वजह से डार्विन इसमें शामिल न हो सके । आखिरकार नवम्बर में डार्विन की पुस्तक’ जीवों की उत्पत्ति’ (Origin of Species) छप कर लोगों में पहुँच गयी ।

जैसाकि उम्मीद ही थी, किताब की काफी प्रशंसा हुई और कुछ ही दिनों में इसके पहले संस्करण की सारी प्रतियाँ बिक गयीं । वैज्ञानिकों में बहुतों ने डार्विन की उपलब्धियों के साथ सहमती प्रकट की, चाहे कुछ वैज्ञानिकों ने डार्विन की अवधारणाओं का सख्त विरोध भी किया । सबसे ज्यादा भयानक विद्रोह धार्मिक कठमुल्लों और कट्टरपंथियों ने किया और डार्विन के भद्दे कार्टून बना कर बांटे गये । जब डार्विन नें यह रहस्योदघाटन किया कि मनुष्य का विकास बंदरों की एक नसल एप (Ape) से हुआ है तो इसका प्रचंड विरोध हुआ । डार्विन का चेहरा बन्दर के धड़ के ऊपर लगा कर उसकी खिल्ली उड़ाई गयी । लेकिन उनकी खोजों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कट्टरपंथी चर्च ने अब उसकी खोजों को अपने धार्मिक लबादे में फिट करना शुरू कर दिया ।

अपने खोज कार्य जारी रखते हुए, डार्विन ने इसके बाद ‘मनुष्य की उत्पत्ति’ (Descent of Man) और अन्य कई किताबें लिखीं । 19 अप्रैल, 1882 के दिन 73 वर्ष की उम्र में इस महान विज्ञानी की मृत्यु हो गयी जो अपने पीछे छोड़ गया मानवता को अपनी बेमिसाल उपलब्धियां ।

डार्विन की उपलब्धियां

एच. एम. एस. बीगल के साथ अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन ने अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्य इकट्ठे किये । गैलापैगोस टापू पर उनका ध्यान घरेलू चिड़ियों जैसे पक्षियों की एक नस्ल पर गया । इन पक्षियों की शक्ल-सूरत आपस में काफी मिलती जुलती थी और ये पक्षी मुख्य धरती पर पाए जाने वाले इसी किस्म के पक्षियों से भी मिलते जुलते थे । पर टापुओं पर रहने वाले पक्षी कीड़े खाकर गुजारा करते थे जबकि दक्षिण अमेरिका की मुख्य धरती वाले पक्षी पौधों के बीज खाते थे । कीड़े खाने वाले पक्षियों की चोंच बीज खाने वाले पक्षियों से लम्बी थीं । अतः डार्विन ने यह परिणाम निकला कि किसी कारणवश यह पक्षी मुख्य धरती से टापुओं पर आ गए । बदलते हालत में जीवन निर्वाह के लिए उन्हें कीड़ों पर निर्भर होना पड़ा । लेकिन आम तौर पर कीड़े वृक्षों के तनों में गहरे छुपे होते थे, अतः समयानुसार टापुओं पर लम्बी चोंच वाले पक्षी अस्तित्व में आ गए ।

इसी तरह उन्होंने दक्षिणी अमेरिका के तट के साथ साथ एक दक्षिण अमेरिकी जानवर ‘सलौथ’  के अवशेषों का अध्ययन किया । इन आलोप हो चुके जानवरों का आकार हाथी जितना था, परन्तु उस समय के अमेरिकी सलौथों का आकार काफी छोटा था, डार्विन ने अपने अध्ययन से यह परिणाम निकला कि छोटे आकार के सलौथ अलोप हो चुके सलौथों से ही विकसित हुए हैं ।

इस तरह डार्विन ने उस समय तक खोजे गए विभिन्न अवशेषों का अध्ययन किया । उनके समय तक अवशेषों पर खोज करने वाले वैज्ञानिकों को धरती कि सतह पर चट्टानों की अलग अलग परतें मिलीं और प्रत्येक परत में अलग अलग किस्म के जानवरों और पौधों के अवशेष मिले । डार्विन ने अपने अध्ययन से यह जाना कि नीचे की परत से ऊपर की तरफ आते हुए, इन परतों में जानवरों और पौधों के विकास का सिलसिला सीधा-सीधा नजर आ रहा था । उस समय तक यह भी पता लग चुका था कि चट्टानों की एक परत जमने में लाखों साल लग जाते हैं । इससे डार्विन का यह निश्चय पक्का हो गया कि धरती पर जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहा है, और यह बदलता रहा है । डार्विन इस नतीजे पर भी पहुँच गए कि जीवन की उत्पत्ति किसी सरल रूप में हुई और इस सरल रूप से विकसित होते हुए जीवों और पौधों की अलग अलग प्रजातियाँ अस्तित्व में आयीं और इस प्रक्रिया में लाखों वर्ष लगे।  आज वैज्ञानिक यह जान चुके हैं कि धरती की उम्र लगभग 4.5 बिलियन वर्ष है । जीवन के प्रथम प्रारूप 3.5 मिलियन वर्ष पहले अस्तित्व में आये । मनुष्य का जनम कोई एक लाख वर्ष पहले ही हुआ है ।

अपने पुश्तैनी घर में रहते समय डार्विन ने देखा कि किसान ज्यादा दूध देने वाले पशुओं का चयन करके और उनका प्रजनन करवाकर ज्यादा दूध देने वाले पशुओं की गिनती बढ़ा लेते हैं । उन्होंने इसको ‘कृत्रिम चयन’ (Artificial Selection) का नाम दिया । लेकिन उन्होंने इससे आगे चलते हुए अपने पास उपलब्ध अन्य तथ्यों के आधार पर यह सिद्धांत दिया कि प्रकृति में भी इस तरह की ‘प्राकृतिक चयन’ की प्रक्रिया घटित होती है ।

इसको एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है । एक ख़ास किस्म का उड़ने वाला कीड़ा पक्षियों द्वारा खाया जाता है । इस कीड़े की दो किस्में हैं – एक सफ़ेद पंखों वाला जो ज़हरीला नहीं है और दूसरा चमकीले रंगों वाला ज़हरीला कीड़ा । धीरे धीरे पक्षी पंखों के रंग से ज़हरीले कीड़े को पहचानने लगते हैं और उसे खाना बंद कर देते हैं । शुरू में चमकीले पंखों वाले कीड़ों की गिनती काफी थी, लेकिन कुछ ही पीढ़ियों बाद चमकीले रंग वाले कीड़ों की बहुतायत हो जाएगी क्योंकि उनके पास प्रजनन करने के और अपने से आगे नए कीड़े पैदा करने के मौके सफ़ेद पंखों वाले कीड़ों से तुलनात्मक रूप में ज्यादा हैं । इस तरह चमकीले पंखों वाले कीड़े प्राकृतिक चयन के ज़रीये बहुतायत में आ जाते हैं ।

इस तरह डार्विन ने देखा कि प्रकृति में जीव जन्तु बहुत ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं लेकिन प्रत्येक जीव प्रजाति की संख्या को नियंत्रण में रखने के लिए किसी तरह का कोई नियम होना जरूरी है । यहीं से उन्होंने अपने दूसरे, जो कि मुख्य रूप में विवाद का कारण बना, ‘योग्यतम के बचाव’ के सिद्धांत को रूप दिया । उनके मुताबिक वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार सबसे योग्य जीव ‘जिंदा रहने के संघर्ष’ में कामयाब हो जाते हैं और प्रजनन कर पाते हैं और बाकी मर जाते हैं । इस तरह जिंदा रहने के लिए लाभकारी गुण चुनिन्दा रूप में अगली पीढ़ियों में चले जाते हैं ।

इन दोनों सिद्धांतों के आधार पर डार्विन नें यह नतीजा निकाला कि लाभकारी लक्षणों और वातावरण के अनुसार ढलने के लिए जीवों में आये बदलाव, जो कि पीढी दर पीढ़ी जीवों में संचारित हो सकते हों, इकट्ठे होते रहते हैं और समय आने पर एक बिलकुल ही नयी प्रजाति के अस्तित्व में आ जाने का कारण बनते हैं ।

डार्विन के सिद्धांतों की अपनी खामियां भी हैं । लेकिन फिर भी डार्विन के सिद्धांत आधुनिक जीव विकास के सिद्धांत की बुनियाद हैं । उनके दिए गए सिद्धांतों के बिना आज भी किसी जीव विकास के सिद्धांत की कल्पना संभव नहीं  । डार्विन की सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण  देन थी, संसार के सदा-सदा स्थिर रहने वाली अवधारणा का सदा सदा के लिए अंत ! यही बात डार्विन के विरोधियों को सबसे ज्यादा चुभती है ।

इन सिद्धांतों के अलावा डार्विन की मानवता को और भी बहुत महत्त्वपूर्ण और क्रांतिकारी देन है । डार्विन के दोस्त, टॉमस हक्सले नें उस समय दिखाया कि शारीरिक रचना के पक्ष से मनुष्य बहुत हद तक ऐप (Ape) के साथ मिलता जुलता है । 1871 में डार्विन नें अपनी पुस्तक ‘मनुष्य का विकास’ प्रकाशित की । इस पुस्तक में उसने मनुष्य की सांस्कृतिक विकास और मनुष्यों में पाए जाने वाली लैंगिक, शारीरिक, और सांस्कृतिक विभिन्नताओं की व्याख्या के लिए ‘लैंगिक चयन’ का सिद्धांत पेश किया । इस पुस्तक में उन्होंने जोर दिया कि सारे मनुष्य एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं और यह विकास अफ्रीका महांद्वीप में हुआ । उस समय अलग-अलग नस्ल के मनुष्यों को अलग अलग प्रजातियाँ मानने और कुछ नस्लों को दूसरी नस्लों से बेहतर मानने और उनके अलग-अलग तौर पर विकसित होने के सिद्धांतों का काफी बोलबाला था, लेकिन डार्विन के द्वारा एक ही पूर्वज से सारे मनुष्यों के विकास के सिद्धांत को पेश करने के बाद बाकी सिद्धांत धीरे धीरे प्रभावहीन हो गए । डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता अब डी.एन. ए. के अध्ययन से भी हो चुकी है ।

डार्विन के आलोचक

जैसे ही डार्विन नें, बाईबल की अवधारणा, कि धरती की उम्र 6000 साल है और संसार की रचना’ परम परमेश्वर प्रभु’ नें 6 दिनों में और सदा सदा के लिए की थी, पर चोट की और इसको अपनी खोजों द्वारा तीतर-बीतर कर दिया; तो धार्मिक कट्टरपंथियों नें उसके खिलाफ जेहाद छेड़ दी । लेकिन अब समय बदल चुका था, अब मध्य युग का सामंती ढांचा नहीं रहा था, अब पूंजीवादी ढांचा अस्तित्व में आ चुका था, और विज्ञान की जरूरत उसके लिए जिंदा रहने की शर्त था, इसलिए थोड़े ही समय में डार्विन के सिद्धांतों को वैज्ञानिकों की तरफ से मान्यता मिल गयी । अब डार्विन के सिद्धांत को पूंजीवादी प्रबंध को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और उसके क्रांतिकारी अंश को को छुपाने की कोशिशें होने लगीं ।

‘अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष’ और ‘ योग्यतम का बचाव’ नामक डार्विन की अवधारणाओं को पूंजीवादी प्रबंध को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और आज भी इसी प्रकार की दलीलें देने वालों की कमीं नहीं है । लेकिन ये सिद्धांतकार ‘अपने अस्तित्व के लिए सर्वहारा के संघर्ष’ से भी उतना ही डरते हैं जितना जोर ये पूँजीवाद को जायज ठहराने के लिए लगाते हैं । ‘ योग्यतम का बचाव’ के सिद्धांत द्वारा पूंजीवादी शोषकों को जायज ठहराने और अल्पमत द्वारा विशाल बहुमत की लूट को ठीक सिद्ध करने की कोशिशें लगातार होती रही हैं । पर यह राग अलापने वाले जन संघर्ष की जगह शान्तिपूर्ण सुधारों और कानूनी कार्रवाई द्वारा गरीबी ख़त्म करने जैसे भद्दे सिद्धांतों को भी साथ-साथ पेश करते रहते हैं । इन दलीलों के बिना भी देखा जाये तो दूसरे जानवरों और मनुष्यों में बहुत अंतर है । मनुष्य वातावरण के साथ खुद भी बदलता है और उसे भी अपने अनुकूल ढाल लेता है, जबकि यह गुण दूसरे जानवरों में बहुत कम विकसित है । इसके अलावा मनुष्य उत्पादन प्रक्रिया में प्रकृति के साथ संघर्ष करता है और जीवन निर्वाह के लिए औजारों का निर्माण करता है । और चूँकि यह सब सामूहिक रूप में ही संभव है, इसलिए ‘योग्यतम का बचाव’ की अवधारणा मनुष्यों पर लागू ही नहीं होती. और तो और, पूंजीवादी प्रणाली में जब भी इन औजारों की (बहुतायत) हो जाती है तो संकट आ जाता है, फिर बहुतायत होने के बावजूद संघर्ष की अवधारणा की तो इसमें कोई गुन्जाईश ही नहीं रह जाती ।

इससे भी बढ़कर, डार्विन की यह अवधारणा मुख्य तौर पर अलग अलग जीवों की प्रजातियों और किसी जीव प्रजाति की जनसँख्या को कंट्रोल में रखने तक ही सीमित रहती है । पहली सूरत में यह अवधारणा मनुष्यों में आपस में लागू नहीं होती, दूसरी सूरत में , जिन यूरोपीय देशों की जनसँख्या वृद्धि दर शून्य हो चुकी है पूंजीवादी दैत्य वहां भी लोगों को संघर्ष करने के लिए मजबूर कर रहा है । जिन देशों में जनसँख्या बढ़ रही है, वहां डार्विन के योग्यतम के बचाव के सिद्धांत के मुताबिक पूंजीपतियों की संख्या बढ़नी चाहिए, लेकिन हो तो इसके विपरीत रहा है, गरीबों (अयोग्यों) की संख्या बढ़ रही है और पूंजीपतियों की या तो स्थिर है या कम हो रही है ।

चर्च और अन्य धार्मिक कट्टरपंथी, जिनमें सिर्फ इसाई ही नहीं, अन्य सभी धर्मों के पादरी-पुजारी भी शामिल हैं, के विरोध और डार्विन के सिद्धांतों को तोड़-फोड़ कर की गयी व्याख्याओं से भी पूँजीवाद का कुछ नहीं संवर सका । इस सबके बावजूद इस पूंजीवादी प्रबंध को डार्विन के सिद्धांतों और पूरे जीव विकास के सिद्धांत से ही खतरा बना हुआ है । एक बार फिर मध्य-युगीन काले दौर के सिरे से खारिज किये जा चुके गैर-वैज्ञानिक ईश्वरवादी सरंचना के सिद्धांत को नए लबादे में सजा कर लोगों पर थोपा जा रहा है और लोगों में भौतिकवादी वैज्ञानिक नज़रिये की पकड़ को कमजोर करने की कोशिशें हो रहीं हैं । इन सब कोशिशों के पीछे हर तरह के धार्मिक कट्टरपंथी और फासीवादी ताने-बाने से लेकर सरकारों, कोर्पोरेट जगत, और लोक कल्याण प्रपंच रचने वाली संस्थाएं शामिल हैं ।

इस नए प्रचारित किये जा रहे सिद्धांत का नाम है ‘सचेतन सृजन'(Intelligent Design) । इनके ज्यादातर तर्क तो डार्विन के समकालीन विरोधी विलियम पैले (William Paley)  से उधार लिए हुए हैं । इस दलील के अनुसार, जैसेकि किसी जटिल जेब घड़ी या किसी आधुनिक मशीन या कंप्यूटर जैसे यन्त्र बनाने के लिए किसी सचेतन शक्ति यानीकि मानव दिमाग की जरूरत होती है, उसी तरह जैसे किसी बहुत ही जटिल मानव अंग जैसेकि आँख, दिमाग, या अन्य जीव जंतुओं को पैदा करने के लिए या सृजन के लिए भी किसी सचेतन शक्ति की जरूरत है, जोकि इनके अनुसार ईश्वर ही हो सकता है  । यह बिलकुल वैसे ही जैसे कोई कहे कि दूध भी पानी की तरह तरल पदार्थ है इसलिए यह पानी की ही तरह धरती में से नल लगाकर निकाला गया होगा या फिर पानी दूध की तरह किसी गाय-भैंस को दुहने से मिलता होगा । खैर इनके तर्क की थोड़ी और छानबीन करते हैं । घड़ी या मशीन बनाने के लिए बहुत सारे मनुष्यों को इकट्ठे होकर या अलग अलग रहकर औजारों का इस्तेमाल करते हुए और भट्टियों में लोहा पिघलाते हुए श्रम करना पड़ता है, और दूसरी तरफ इनके ईश्वर के औजार और भट्टियाँ कहाँ हैं और वह दिखाई क्यों नहीं देते, तो ये भाग निकलेंगे ।

इसी तर्क को थोडा और आगे लेकर जाइये – घडी, मशीन या कंप्यूटर को बनाने वाला सचेतन मानव  दिमाग बहुत जटिल है, तो इतने जटिल मानव दिमाग को बनाने वाली शक्ति तो और भी जटिल होगी । फिर इस और भी जटिल शक्ति को बनाने के लिए और भी ज्यादा जटिल शक्ति – और इस यह जटिलता का पहाड़ा कभी न ख़त्म होने वाला थोथा तर्क बन जाता है ।

एक और तर्क के अनुसार जीवाणु (Bacteria) को गति प्रदान करने वाले हिस्से फ्लैजिला (Flagella), मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली या उसकी आँख जैसे अंग इतने ज्यादा विकसित हैं कि इनके किसी और कम विकसित रूप से विकसित होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता और अपने कम विकसित रूपों में इनकी कोई उपयोगिता संभव भी नहीं होगी; यह तर्क भी थोथा सिद्ध किया जा चुका है. जैसे कि आँख के विकास की विभिन्न अवस्थाओं के विकसित रूप जैविक संसार में पाए जाते हैं. कीट-पतंगे में आँखों का इस्तेमाल होता है और उससे कम विकसित प्राणियों में भी । इसी तरह गाय-भैंसों की आँखों की बनावट काफी हद तक मनुष्य की आँखों से मेल खाती है, लेकिन उनमें रंग पहचानने की योग्यता नहीं होती, और वे चीज़ों को काले और सफ़ेद रंग की अलग शेड्स में ही देख सकती हैं । लेकिन कोई पागल ही यह कहेगा कि उन्हें आखों का कोई लाभ नहीं या फिर उनकी आँखें बेकार हैं । प्रतिरक्षा प्रणाली भी हर तरह के प्राणी में मौजूद है और फ्लैजिला के विभिन्न स्तरों के विकसित रूप जीवाणु (Bacteria) में पाए जाते हैं । लेकिन जैसेकि प्रत्येक विचारवादी का काम होता है, एक तर्क के प्रमाणित हो जाने के बाद कोई दूसरा कुतर्क ढूँढने की बौद्धिक कसरत में लग जाना । और तो और, इनकी विज्ञान की किताब ‘बाइबल’ में धरती की उम्र 6000 साल बताई गयी है और सृष्टि के सृजन में ईश्वर को 6 दिन लगे. आज के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर धरती की उम्र 4.5 बिलियन वर्ष या इससे भी ज्यादा आंकी गयी है और जीवन की उत्पत्ति के आरंभिक प्रमाण भी 3.5 बिलियन साल पुराने हैं.

एक और काम, जो यह ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांतकार करते हैं, वह है- वैज्ञानिक सिद्धांतों में किन्हीं छोटी सी त्रुटियों को ढूंढना और फिर उसकी आधार पर पूरे सिद्धांत के ऊपर विवाद खड़ा करना. और इन त्रुटियों को विज्ञान द्वारा दूर कर लेने पर ऐसी ही कोई और तुच्छ कोशिश । यह है नया विज्ञान – जो अपने आप को प्रमाणित करने में असमर्थ है, लेकिन दूसरी सिद्धांतों की छोटी सी त्रुटियों को भी आधार बनाकर हो हल्ला मचाता है । एक और बहुत ही ‘शानदार’ विचार, जो ऐसे विज्ञानी लोग अक्सर प्रचार करते हैं, वो है- साईंस को ईश्वर भरोसे रहने वाली ‘आस्तिक साईंस’ बनाना जिससे कि ये समझते हैं कि विज्ञान को और वैज्ञानिकों को बहुत फायदा मिलेगा और विज्ञान को सही दिशा मिलेगी ।

इस पूरे ‘विज्ञान'(?) को लोगों में प्रचारित करने और लोगों के दिमागों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता का कूड़-कबाड़ा ठूसने के काम को पूरा करने के लिए अमेरिका और इंग्लैंड में शक्तिशाली राजनैतिक लाबी है, और इसमें कोई हैरानी की बात नहीं इस लाबी का मुख्य हिस्सा राजनैतिक हलकों की दक्षिणपंथी फासीवादी धारा है । जैसाकि होता ही है फासीवाद को वित्तीय सहायता की भी कोई कमी नहीं है ।

यह प्रतिक्रियावादी शक्तियां अमेरिकी सरकार पर लगातार यह दबाव बनाती रही हैं कि धार्मिक विश्वास पर आधारित स्कूलों का खर्च सरकार उठाये, इन स्कूलों में मुख्य तौर पर ईसाई मिशनरी स्कूल हैं । अमीर संस्थाओं ने इस प्रचार मुहीम के लिए लाखों-करोड़ों डॉलर खर्चे । अकेली वाल्टन फैमिली फाऊंडेशन नें 2006 में 28 मिलियन डॉलर इस तरह का दबाव बना रहे संगठनों पर खर्च किये । याद रखा जाना चाहिए कि यह फाऊंडेशन वाल-मार्ट के सहारे चलती है, जो कि ट्रेड-यूनियनों के सबसे खूंखार विरोधियों में से जानी जाती है ।

एक और अमेरिकी संस्था, टेम्पलटन फाऊंडेशन नें वर्ष २००६ में ६० मिलियन डॉलर, उन व्यक्तिओं के प्रोजेक्टों के लिए बांटे, जो ‘विज्ञान’ और अध्यात्मवादी विचारों का मेल मिलाप कराने की कोशिशों में जुटे हुए हैं । इन व्यक्तिओं में अमेरिका और इंग्लैंड के अलावा पूरी दुनिया के अध्यापक, विद्यार्थी, पत्रकार, शोध-कर्त्ता और युनिवर्सिटियों के प्रोफैसर, अकादमीशियन शामिल हैं. यू. एस. क्रॉनिकल ऑफ़ हायर एजुकेशन में छपे एक लेख के अनुसार उपरोक्त संस्था नें २५० मिलियन डॉलर से ज्यादा की धनराशी विज्ञान की इस तरह की ‘सेवा’ के लिए खर्ची । यह संस्था खुले-आम पूँजीवाद तथा मुनाफा आधारित उद्यम की हिमायत करती है ।

इस तरह की एक संस्था वार्डी फाऊंडेशन ब्रिटेन में काम करती है । यह संस्था मुख्य तौर पर वार्डी कार बिजनैस के मुनाफे पर चलती है । इसका मुख्य काम भी ईसाई मूल्यों और मान्यताओं का प्रचार करना और स्कूल खोलना है । इस संस्था के स्कूलों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता को विज्ञान के तौर पर पढ़ाया जाता है ।

भारत में भी ऐसी संस्थाएं मौजूद हैं. इनमें से एक है- कृष्णा कान्सैंस (चेतना). यह संस्था भी अपने अन्य कामों के साथ-साथ ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांत का प्रचार करने के लिए जगह जगह व्याख्यानों का आयोजन करती है और पर्चे बांटती है ।

पूंजीवादी प्रतिक्रियावादी शक्तियों के उपाय सिर्फ नए सिद्धांत घड़ने और उनका प्रचार करने तक ही सीमित नहीं हैं, वह पूंजीवादी सत्ता को अपने ‘विज्ञान’ (?) को लोगों पर थोपने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं । स्कूलों में ‘सचेतन सृजनात्मकता’ के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए अमेरिकी अदालत में केस किया गया । सारे पूंजीपति ऐसे सिद्धांतकारों और ऐसे सिद्धांतों के पक्ष में खड़े हैं । मिसिसिपी, उकलहामा और न्यू मैक्सिको की प्रतिनिधि सभाओं में वर्ष 2009 के दौरान डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत को एक ‘विवादग्रस्त सिद्धांत’ का दर्ज़ा देने या फिर दूसरे सिद्धांतों की शिक्षा देने के बिल दाखिल हो चुके हैं । लुसिआना स्टेट की प्रतिनधि सभा तो एक ऐसा ही बिल पास भी कर चुकी है और गवर्नर बॉबी जिंदल ने हस्ताक्षर भी कर दिये हैं ।

इस तरह की ही लड़ाई टेक्सास में चल रही है, जिसके अनुसार कक्षाओं में अध्यापकों को डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत की आलोचना करनी अनिवार्य हो जायेगी । यह सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं, इंग्लैंड में भी ऐसी ही कोशिशें जारी हैं, और यूरोप के कई और देशों में भी बाइबल की उत्पत्ति की धारणा को स्कूलों के सिलेबस में पढ़ाने के उपाए किये जा रहे हैं । भारत में भी वह दिन दूर नहीं, यहाँ भी ज्योतिष को तो पहले ही विज्ञान का दर्ज़ा मिल चुका है ।

और तो और कानास यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर पाल मिरेकी को डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता करने की वजह से जान से मारने की धमकियाँ दीं गयीं, उसको बुरी तरह पीटा गया जिस वजह से उन्हें अस्पताल दाखिल करवाना पड़ा । उन्हें  उस पद से हटा दिया गया और उनसे अपराधियों की तरह पूछताछ की गयी ।

आम तौर पर विज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्य या किसी संग्रहालय के निर्माण के लिए कोर्पोरेट जगत चंदा मुहैया करवाता है । लेकिन नवम्बर 2005 में जब ‘अमेरिकन मियुसियम ऑफ नैचुरल हिस्ट्री’ को नए सिरे से बनाने और जीव विकास के सिद्धांत को लोगों में प्रचारित करने की बात हुई तो किसी भी कोर्पोरेट घराने नें चंदा देने की ज़हमत नहीं उठायी और इस संग्रहालय द्वारा लगाई गयी प्रदर्शनी ‘डार्विन’ को मीडिया में कोई कवरेज नहीं दी गयी । लेकिन जब 25 मिलियन डॉलर की लागत से ‘ईश्वरवादी उत्पत्ति’ के संग्रहालय को बनाने की बात चली तो कोर्पोरेट जगत नें दिल खोलकर चंदे मुहैया करवाए । इस संग्रहालय में डायनासोरों को मनुष्यों के साथ रहते हुए दिखाया जा रहा है । इस तरह पढ़ाया जाता है कि भयानक बाढ़ आने से पहले मनुष्य और डायनासोर इकट्ठे धरती पर रहते थे । वैज्ञानिक इस बकवास को कब का रद्द कर चुके हैं । डायनासोर लगभग 63 मिलियन वर्ष पहले धरती से अलोप हो चुके हैं और मनुष्य जैसे पहले प्राणी की उत्पत्ति 4 से 10 मिलियन वर्ष से पुरानी नहीं । यह है वह विज्ञान जिसे पूँजीवाद पढ़ा रहा है और फाईनैंस कर रहा है । जबकि पूंजीवादी टहलुये यह डींग मारते नहीं थकते कि पूँजीवाद के बिना विज्ञान का विकास रुक जाएगा ।

नव-डार्विनवाद

एक और  छुपा हुआ हमला हुआ है डार्विन के सिद्धांत पर । यह छुपा हुआ इस अर्थ में है क्योंकि यह स्वयं को डार्विन के मानने और फैलाने के चोगे में छिपाकर रखता है, इसका नाम है नव-डार्विनवाद । इसीका ही विस्तारित रूप है, आधुनिक जीव विकास का सिद्धांत ।

नव-डार्विनवाद शब्द का प्रयोग सबसे पहले वीज़मैन (Weissman ) नाम के विज्ञानी के सिद्धांत के अनुयायियों के लिए किया गया । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में १८९५ में वीज़मैन ने यह सिद्ध किया कि वातावरण के प्रभाव अधीन किसी जीव में होनेवाले बदलाव आगमी पीढ़ी के जीवों में संचारित नहीं हो सकते । इसको वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज्म थियूरी’ कहा जाता है । इस सिद्धांत ने मुख्य तौर पर लैमार्क के जीव विकास के सिद्धांत पर चोट की और जीव विज्ञानियों ने लैमार्क के ‘वातावरण के प्रभाव के अधीन आनेवाले बदलाव का कारण जीव विकास होने के सिद्धांत ‘ को पूरी तरह रद्द कर दिया । अपने सिद्धांत को सही सिद्ध करने के लिए वीज़मैन ने कुछ प्रयोग किये जिनमें चूहों की पूँछें काटने वाला प्रयोग सबसे प्रसिद्ध है ।

वीजमैन के इस प्रयोग में, पीढ़ी दर पीढ़ी चूहों की पूँछें काटी गयी, पर हरवार चूहों की अगली पीढ़ी में पूंछ उग आती थी. इससे उसने यह नतीजा निकाला कि शरीर पर पडनेवाले प्रभाव वंशानुगत तौर पर अगली पीढ़ियों में संचारित नहीं होते. सबसे पहले तो इस प्रयोग में बहुत बड़ी खामियां है – जैसेकि जीव विकास प्राकृतिक स्थिति में होता है और उसे बहुत लंबा समय लगता है । दूसरा उस गुण की, जो प्रकृति में संचरण के लिए जीव के लिए लाभदायिक होता है, प्राकृतिक देन होता है । इस प्रयोग को करने से पहले चूहे के लिए पूंछ की उपयोगिता है या नहीं, के बारे में  कुछ भी निर्धारित नहीं किया गया । इसके अलावा नये अध्ययनों और खोजों से यह स्पष्ट हो गया है कि शारीरिक तौर पर पडनेवाले बाहरी प्रभाव, एक जीव से उसकी, जहाँ तक कि कई पीढ़ियों तक भी संचारित हो सकते हैं और इससे विज्ञान की एक पूरी शाखा ‘ऐपीजैनेटिक्स’ अस्तित्व में आ गयी है.

वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज़्म थियूरी’ और डार्विन की ‘प्राकृतिक चुनाव’ को आधार बनाकर ही आधुनिक जीव विकास अस्तित्व में आया । इस सिद्धांत के अनुसार जीवों में आये अलग-अलग बदलावों में कुछ बदलाव, जो जीव के लिए वातावरण में संचरण और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, प्रकृति द्वारा चुन्न लिए जाते हैं । भाव कि जिस जीव में ये लाभदायिक बदलाव आते हैं, उस जीव को वातावरण में जिंदा रहने का ज्यादा मौका मिलता है और इसलिए उस द्वारा प्रजनन करने के अवसर भी ज्यादा होते हैं और धीरे-धीरे बदलावों वाले जीवों की गिनती मुख्य हो जाती है और समय पाकर और बदलावों के जमा होते जाने के कारण एक नयी प्रजाति अस्तित्व में आ जाती है । यहाँ तक बिलकुल डार्विन के सिद्धांतानुसार है. पर आधुनिक जीव विकास संबंधी सिद्धांतानुसार बदलावों के आने का कारण वातावरण और हालात अनुसार स्वयं को ढलने की जीव की जरूरत नहीं, बल्कि बदलाव जीव के जीनस में संयोगवश होनेवाले  आकस्मिक परिवर्तन हैं । इस प्रकार नव-डार्विनवादी प्राकृतिक परिस्थितियों का जीव पर पड़नेवाले प्रभावों से बिलकुल मुकर जाते हैं ।  यहां से शुरू हुआ यह विचारवादी तर्क बढ़ता हुआ यहाँ तक चला जाता है कि मानव की बनावट और स्वभाव सबकुछ पहले ही निश्चित है और इसे मानव की सामाजिक परिस्थितियों को बदलने से बदला नहीं जा सकता और ऐसा करने के प्रयत्न गैर-वैज्ञानिक और प्रकृति के विरुद्ध हैं और डार्विन विरोधी हैं । नव डार्विनवादी परम्परा में से मुख्य हैं – रिचर्ड डाकिंज़ और स्टीवन पिंकर ।

बीसवीं शताब्दी के पिछले अर्द्ध की महत्त्वपूर्ण खोज पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों की बनावट और अन्य लक्षणों संबंधी सूचना संचारित करनेवाला रसायन डी.एन.ए. है. १९५३ में वाटसन और क्रिक ने डी.एन.ए. की बनावट का मॉडल विकसित कर लिया और इसके बाद जीनज़ की खोज हुई. जीन डी.एन.ए. एक विशेष प्रकार से डिज़ाईन किया गया और यह शरीर के किसी एक हिस्से या लक्ष्ण संबंधी सूचना जमा रखता है, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह सूचना संचारित करता है, जैसे आँखों का रंग, आदमी का कद, चमड़ी का रंग, जीव के बालों का रंग आदि. जीन कोशिका के केन्द्रक (नीयूक्लियस) में पड़े रहते हैं और कोशिका की क्रियायों को रेगूलेट करते हैं । इस खोज के पश्चात कुछ विज्ञानियों ने प्रत्येक मानवी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक या सामाजिक, का आधार जीन के रूप में डी.एन.ए. के टुकड़े को बना दिया । जीव विकास होता है तो जीनों में सांयोगिक बदलावों से होता है, कोई मनुष्य अपराध कर लेता है तो उसके जीन में नुक्स है, अगर कोई उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेता है तो उसके जीन बेहतर हैं, अगर कोई आलिशान घर में रहता है, तो उसके जीन ही इतने काबिल हैं, अगर कोई पूंजीपति अमीर बनता जा रहा है और मजदूर दिन प्रतिदिन गरीब तो अमीर पूंजीपति के जीन गरीब मजदूर के जीनों से बेहतर हैं, अगर किसी को क्रोध अधिक आता है तो उसमें क्रोध वाले जीन अधिक हैं इत्यादि ।

रिचर्ड डाकिंज़ ने मानव की संस्कृति और स्वभाव की व्याख्या करने हेतू एक नया सिद्धांत पेश किया, कि हर व्यक्ति में स्वभाव के अलग-अलग लक्षणों के लिए, जैसे क्रोध, लालच, परोपकार, खीझना, हंसमुख होना आदि के लिए जीनज़ की तरह ही ‘मीमज़’ (Memes) होते हैं । चाहे अभी तक इन ‘मीमज़’ का पता-ठिकाना नहीं चला है । उसके अनुसार ‘मीमज़’ ही मानव का स्वभाव और सभ्यता तय करती हैं और इन्हें बाह्य वातावरण और मानव की परिस्थितियों के बदलने से बदला नहीं जा सकता । लेकिन अगर थोडा बारीकी में जाएँ, तो देखेंगे कि हर समाज और मानव समूह की सभ्यता प्रत्येक पीढ़ी के साथ बदलती रहती है, बल्कि एक मनुष्य के स्वभाव और सभ्यता में उसके जीवन काल में परिवर्तन आते रहते हैं । अगर डाकिंज़ के अनुसार चलें तो हर अपराधी की सन्तान अपराधी होगी, शराबी की शराबी, गुस्सैल की सन्तान गुस्सैल, शर्मीले  की संतान शर्मीली और हंसमुख की सन्तान हंसमुख. और इससे भी बढ़कर मानव सारी उम्र एक जैसा ही बना रहेगा । पर हम देखते हैं ऐसा बिलकुल नहीं होता, प्रतिदिन डाकिन्ज़ साहेब का सिद्धांत मानव जीवन द्वारा गलत साबित किया जाता है । असल में इस प्रकार के सिद्धांत सिर्फ इसलिए निर्मित किये जाते हैं ताकि लोगों को मुर्ख बनाया जा सके । दूसरे महारथी स्टीवन पिंकर का ‘विकासवादी मनोविज्ञान’ का वर्णन भी कुछ इसी प्रकार का ही है । बस पिंकर साहेब ‘मीमज़’ के स्थान पर मॉडियूल (Module) शब्द का प्रयोग करते हैं । इनके अनुसार भी मानव स्वभाव को, इसलिए मानव समाज को बदला नहीं जा सकता । इस सिद्धांत को मनोविज्ञानियों द्वारा पूर्णतया रद्द किया जा चूका है । ज्यादातर मनोविज्ञानी यह मानते हैं कि मानव स्वभाव चाहे कुछ हद तक वंशानुगत होता है पर ज्यादातर यह सामाजिक हालात और मानव के छोटी उम्र में पालन-पोषण, माता-पिता का प्यार, सेहत और शिक्षा पर निर्भर करता है ।

इस सोच के कारण, बहुत समय तक यह समझा जाता रहा कि मानव के विकास दौरान सबसे पहले दिमाग का आकार बड़ा हुआ, उसने अपने हाथ का प्रयोग और सीधा खड़ा होना सीखा, इसी कारण से ही वह भाषा का प्रयोग करने लगा और अपने दिमाग द्वारा सोचने से ही वह समूह बनाकर, फिर मानव समाज के रूप में रहने लगा । पर, असल में, जैसाकि एंगेल्ज़ ने अपने आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ में पेश किया था, सबसे पहले मानव के पूर्वज वृक्षों से उतरकर धरती पर चलने लगे जिस दौरान वे सीधा खड़े रहकर चलना सीखे । इस प्रकार अगले पंजे चलने से मुक्त होकर अन्य कार्यों के लिए प्रयुक्त होने लगे, जिस कारण मानव औजारों का प्रयोग करने लगा, जो बाद में भाषा और सामाजिक उत्पादन का कारण बना । इसके साथ ही हाथों का प्रयोग होने के कारण दिमाग का आकार बड़ा होने लगा, जो हाथों के विकास होने से कहीं बाद में जाकर हुआ । इन सच्चाईयों को आधुनिक जीवाश्म विज्ञान ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है ।

इसके बारे में ज्यादा विस्तार से जॉन पिकार्ड के आलेख “एंगेल्ज़ और मानव विकास’ में पढ़ा जा सकता । जीनज़ में आनेवाली तब्दीलियों के जीव विकास में भूमिका के बारे में ब्रिटिश विज्ञानी जे. बी. एस. हालडेल ने भी अपने आलेखों में विस्तार सहित लिखा है ।

हाल्डेल ने १९२९ में जीवन के पहले रूपों की  उत्पत्ति के रहस्यों से आवरण उठाया । हालडेल के समय में ही, एक सोवियत विज्ञानी, अलेग्जान्द्र उपरेन भी उन्हीं नतीजों पर पहुंचा, इसलिए इस थियूरी को उभयनिष्ठ तौर पर उपरेन-हाल्डेल मॉडल कहा जाता है । इन दोनों विज्ञानियों ने अपने खोज कार्यों में द्वंदात्मक भौतिकवाद को लागू करते हुए इस सिद्धांत की खोज की । १९५३ में मिलर और युरे ने प्रयोगशाला में इस थियूरी को सही सिद्ध कर दिया । अब इस सिद्धांत को थोडा सुधार कर के.आर. एन.ए. मॉडल का रूप दे दिया गया है ।

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

द्वंदात्मक भौतिकवादी नजरिये के जन्मदाता, मार्क्स और एंगेल्ज़, ने डार्विन की खोजों का पुरजोर समर्थन किया । इसके अलावा इसके अधूरेपन और भविष्य में इसके और विस्तारित होने की पेशनगोई भी की । डार्विन की खोजों ने मार्क्स-एंगेल्ज़ के भौतिकवादी नजरिये को प्रकृति में और स्पष्टता से सिद्ध किया । जनवरी १८६१ में मार्क्स ने एंगेल्ज़ को लिखा, “डार्विन की पुस्तक (जीवों की उत्पति – अनु.) बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इसने मुझे वर्ग संघर्ष के लिए प्राकृतिक आधार प्रदान किया है । पर इसमें हमें विकास के अपरिपक्व तरीके को भी सहन करना पड़ता है । अपनी सभी सीमाओं के बावजूद, न सिर्फ उदेश्यवाद (Taleology) (हर वस्तु के पीछे कोई न कोई उदेश्य होता है. अनु.) की प्राकृतिक विज्ञान में विद्यमान धारणा पर निर्णायक चोट है, बल्कि अपने तार्किक मतलब की भी अच्छी तरह व्याख्या करती है ।”

‘डियूरिंग विरुद्ध’ पुस्तक में एंगेल्ज़ ने लिखा, ” जीव विकास का सिद्धांत अभी अपने प्रारंभिक चरणों में है और इसमें कोई शक नहीं कि भविष्य की खोजें हमारी अब तक की जीव विकास संबंधी धारणाओं, डार्विन की खोजों समेत, को बदल देंगी ।”

इसी प्रकार एंगेल्ज़ ने ‘डाईलेक्ट्स ऑफ नेचर’ में भी डार्विन के ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ के सिद्धांत का मूल्यांकन कुछ इस प्रकार किया, ” डार्विन से पहले तक, उसके अबतक के पक्के अनुयायी भी प्रकृति में सामंजस्यपूर्ण सहयोग पर जोर देते हैं, कि कैसे पौधे, जीव, जंतुओं को खाद्य-खुराक और आक्सीज़न प्रदान करते हैं और जीव जंतु पौधों को बदले में खाद, अमोनिया और कार्बोनिक एसिड (कार्बन डाईआक्साईड – अनु.) प्रदान करते हैं । जैसे ही डार्विन का सिद्धांत सामने आया, इन्हें हर जगह संघर्ष ही दिखाई देने लगा । दोनों ही नजरिये अपनी-अपनी सीमाओं के अन्दर ठीक हैं, पर दोनों ही एक समान तरह से एकतरफा और तुअस्बग्रस्त हैं । जैसे प्रकृति में निर्जीव वस्तुओं के संबंध अनुरूपता के टकराव दोनों तरह के होते हैं, वैसे ही सजीव वस्तुओं में भी सचेतन और अचेतन सहयोग के साथ-साथ सचेतन और अचेतन संघर्ष भी होता है । इसलिए, प्रकृति के संबंध में, सिर्फ संघर्ष को ही सबकुछ मान लेना ठीक नहीं । बल्कि ऐतिहासिक जीव विकास और जटिलता की पूरी दौलत को एक छोटे से और एकतरफा वाक्यांश ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ में बाँधने की इच्छा करनी बचकाना ही होगी । इसका कुछ भी मतलब नहीं है ।

‘डार्विन का जीवित रहने के लिए संघर्ष’ का सिद्धांत समाज में प्रचलित अवधारणाओं जैसे सबकी सबके खिलाफ जंग, की हौबिस की थियूरी , मुकाबले की बुर्जुआ अर्थशास्त्र की अवधारणा और माल्थस की जनसंख्या संबंधी अवधारणा का प्रकृति विज्ञान में लागू करने का प्रयत्न हैं । जब ऐसा करके सफलता हासिल कर ली गयी है (बेशक इस मूलभूत आधार, माल्थस की थियूरी पर आज तक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है), यह आसान हो जाता है कि प्रकृति विज्ञान की अवधारणाओं को समाज के इतिहास पर लागू कर दिया जाये और इसे बिलकुल सीधे-सादे तरीके से कहा जाता है कि इस तरह ये प्रस्तुतियां समाज के चिरस्थायी नियमों के तौर पर सिद्ध की जा चुकी हैं । ” (मार्क्स-एंगेल्ज़,  सम्पूर्ण रचनाएँ, जिल्द  25, पेज, 583-584, अंग्रेजी एडिशन 1987, प्रगति प्रकाशन.)

“जीवित रहने के लिए संघर्ष – सबसे बड़ी बात यह है कि इसे पौधों और जनसँख्या की अधिक बढौतरी तक ही सीमित रखा जाये, जोकि पौधों और निम्न जंतुओं के विकास के कुछ चरणों में वास्तव में होता है । परन्तु इन्हें उन परिस्थितियों में, जिसकी जीव-जंतुओं और पौधों को नए वातावरण पर भू-परिस्थितियों वाले नए भूभागों में परवास से बिलकुल अलग रखा जाना चाहिए जिनमें जीवों की प्रजातियाँ बदलती हैं, पुरानी मर जाती हैं और नई विकसित उनका स्थान ग्रहण कर लेती हैं, जनसँख्या में अधिक बढौतरी हुए बिना ही । नए वातावरण में जो जीव स्वयं को ढाल लेते हैं, जीवित रह जाते हैं और लगातार बदलावों से स्वयं को एक नई प्रजाति में विकसित कर लेते हैं पर ज्यादा स्थिर जीव मर जाते हैं और विलुप्त हो जाते हैं, साथ ही मंझोले जीव-रूप भी विलुप्त हो जाते हैं । यह सब कुछ किसी भी माल्थसवाद के बिना संभव है और होता है भी है, और अगर यह लागू भी होता है तो यह उस प्रक्रिया को, ज्यादा से ज्यादा थोडा तेज कर देता है ।”वही पेज, 582-83)

“चलें तर्क करने के लिए ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ नाम के वाक्यांश को मान भी लें । एक जानवर ज्यादा से ज्यादा इकठ्ठा कर सकता है, पर इन्सान तो उत्पादन करता है । वह जीवित रहने के साधन तैयार करता है, ज्यादा विस्तारित शब्दों में, जोकि प्रकृति ने उसके बिना न बनाये होते । यह जानवरों पर लागू होनेवाले नियमों को मानव समाज पर अपरिपक्व तरीके से लागू करना मुश्किल बना देता है । उत्पादन के कारण जल्दी ही ‘जीवित रहने का संघर्ष’ शुरू हो जाता है, पर यह संघर्ष जीवित रहने के साधनों के लिए नहीं, बल्कि मनोरंजन और विकसित होने के साधनों के लिए होता है । यहाँ – क्योंकि विकसित होने के साधन भी सामाजिक तौर पर पैदा होते हैं – जानवरों पर लागू होनेवाले नियम पूरी तरह से  आधारहीन हो जाते हैं । अंत में, पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में, उत्पादन का स्तर इतना ऊँचा हो जाता है कि समाज जीवित रहने, मनोरंजन और विकसित होने के साधनों का अब और पूरी तरह उपयोग नहीं कर सकता क्योंकि उत्पादन करने वालों के बड़े हिस्से को इन साधनों के उपयोग करने से गैर-कुदरती तरीके से और जबरन हटा दिया जाता है । और इसीलिए संतुलन कायम रखने के लिए एक संकट (आर्थिक संकट – अनु.) प्रत्येक दस वर्षों बाद न सिर्फ जीवित रहने के, मनोरंजन और विकसित होने के साधन, बल्कि उत्पादन शक्तियों के एक बड़े हिस्से का भी विनाश कर देता है । इस प्रकार, यह ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ कुछ इस तरह का रूप धारण कर लेता है – बुर्जुआ समाज द्वारा पैदा की गई वस्तुएं और उत्पादक शक्तियों की पूंजीवादी प्रणाली के विनाशकारी, विध्वंशकारी प्रभावों से रक्षा करने के लिए, सामाजिक उत्पादन और वितरण का अधिकार, इस कार्य के लिए अयोग्य हो चुकी पूंजीपति जमात के हाथों से छीन लें और इसको उत्पादन करनेवाले जन-समूहों को सौंप दें -और यह है समाजवादी क्रांति ।

“वर्ग संघर्षों के क्रमिक सिलसिले के तौर पर इतिहास का बोध, इनको ‘जीवित रहने के संघर्ष’ के बहुत कम विभेदन वाले चरणों तक सीमित कर देने से विषय-वस्तु और गंभीरता के पक्ष के लिहाज से कहीं अधिक अमीर है ।” (वही, पेज -584 -85 )

“डार्विन को पता नहीं था कि उसने मानवता, विशेषतया अपने देववासियों पर कितना कड़वा व्यंग्य लिख दिया है, जब उसने यह दिखा दिया कि ‘मुक्त प्रतिस्पर्द्धा’ , जीवित रहने के लिए संघर्ष जिसको अर्थशास्त्री सबसे ऊँची ऐतिहासिक उपलब्धि समझते हैं, जानवरों की दुनिया में एक आम स्थिति है । जैसे उत्पादन की क्रिया ने मानव को अन्य जानवरों से जीव-वैज्ञानिक तौर पर विभेदन प्रदान किया, उसी प्रकार सामाजिक पक्ष से भी ; सिर्फ चैतन्य तौर पर सामाजिक उत्पादन के ढांचे, जिसमें उत्पादन और वितरण योजनाबद्ध तरीके से होगा, मानवता को अन्य जानवरों से श्रेष्ठता प्रदान करेगी । इतिहास विकास इस प्रकार को दिन-प्रतिदिन आवश्यक ही नहीं बना रहा, बल्कि अधिकाधिक संभव भी बना रहा है ।” (वही, पेज -331 )

जैसे एंगेल्ज ने ‘ डियूरिंग विरुद्ध’ में यह कहा था कि जीव विकास के सिद्धांत अभी और विकसित होंगे, उसी प्रकार डार्विन को भी अपने सिद्धांत में विद्यमान खामियों का अहसास था ।

जीवाश्म विज्ञान के अनुसार, कैंबरियन युग (६००-७०० मिलियन वर्ष) से पहले की चट्टानों में जीवों के बहुत कम अंश मिलते हैं और वह भी ‘परोकेरीआईक’ नाम के आरंभिक जीव-रूप ही मिलते हैं । पर इससे बिलकुल बाद की चट्टानों में एकदम ही अलग तरह के बहुभांति जीव-रूप मिलते हैं । इनमें वर्तमान में मौजूद जीवों के लगभग बहुत जीव-रूप मिल जाते हैं. इसको ‘कैंबरियन धमाका’ कहा जाता है । यह ध्यान रखना चाहिए कि यह ‘कैंबरियन धमाका’ कोई रातों-रात हो गयी घटना नहीं थी, बल्कि कई मिलियन वर्षों में होनेवाली घटना थी, पर भू-वैज्ञानिक तौर पर देखा जाये तो पृथ्वी की उम्र के मुकाबले यह घटना एक धमाके की तरह ही तेजी से होनेवाली घटना थी । इसके पश्चात् अनेक प्रजातियाँ अस्तित्व में आ गयीं । डार्विन के समय भी इस तथ्य का ज्ञान था । बाद में यह भी सिद्ध हो गया कि समय-समय पर पृथ्वी पर कुछ इस प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं, चाहे ये परिस्थितियाँ कई मिलियन वर्ष लंबी होती हैं, पर फिर भी भू-वैज्ञानिक तौर पर बहुत छोटी होती हैं, जिस दौरान पृथ्वी पर उस वक्त मौजूद बहुत सारी प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं और उनके स्थान पर नई प्रजातियाँ पैदा हो जाती हैं जो समय के साथ धीरे-धीरे विकास करती हैं, विकास के इस चरण में, जब नई प्रजातियों के अस्तित्व में आ जाने के बाद के समय में ‘प्राकृतिक चुनाव’ अहम भूमिका निभाता है । इस तरह जीवों की प्रजातियों के तेजी से विलुप्त होने की अब तक छः घटनाएँ हो चुकी हैं ।

सबसे बड़ी विलुप्त होनेवाली स्थिति २५० मिलियन वर्ष पहले पेकिअन्योक-मीजोयोक युगों के बीच पैदा हुई जब जल और थल दोनों जगहों के ५० फीसदी जंतुओं और रेंगने वाले ८० फीसदी जंतुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो गयीं । इस प्रकार की अंतिम घटना ६३ मिलियन वर्षों पहले हुई जिसके परिणामस्वरूप अन्य अनेक प्रजातियों समेत डाइनासोर भी विलुप्त हो गये । पर ये घटनाये जीव विकास के राह में रूकावट नहीं बनती हैं, बल्कि जीव विकास को नए और उच्च धरातल पर ले जाती हैं । क्योंकि इन घटनाओं से नई प्रजातियाँ अस्तित्व में आती हैं जो पहले वाली प्रजातियों के मुकाबले अधिक विकसित होती हैं ।

‘कैंबरियन धमाके’ की डार्विन अपनी खोजों के आधार पर व्याख्या करने में असफल थे, पर उस समय डार्विन ने यह कहा कि किसी कारण जीवाश्म संबंधी मानव जानकारी अभी अधूरी है और भविष्य में यह जानकारी मुकम्मल हो जाएगी । पर समय के साथ यह पता चला कि जीवाश्म संबंधी जानकारी बिलकुल सही थी और जीवाश्म में अधूरापन इतना भी अधिक नहीं है कि ‘कैंबरियन धमाके’ को सिर्फ जानकारी का अधूरापन कह कर काम चला लिया जाये । इसी प्रकार कई बार प्रजातियों के बीच के रूप भाव ‘लिंक प्रजाति’ भी नहीं मिलती, उन स्थितियों में डार्विन के सिद्धांतों के अनुसार नई प्रजाति की उत्पति की व्याख्या करनी मुश्किल हो जाती है ।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, अमरीका के भू-विज्ञानी स्टीफन जे गोल्ड और नीलज़ ऐलड्रिज़  ने १९७१ में जीव विकास का नया सिद्धांत पेश किया, जो न सिर्फ डार्विन के सिद्धांत के महत्त्व को बनाये रखता है, बल्कि इस और अधिक अमीर बनाते हुए जीव विकास के सिद्धांत को इस काबिल बना देता है, जिससे ‘कैंबरियन धमाका’ और तेजी से प्रजातियों के विलुप्त होने से पैदा होनेवाली घटनाओं की सटीक व्याख्या होती है । इस सिद्धांत का नाम है – ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ .

गोल्ड और ऐलड्रिज़ ने  अपने निबंधों में यह काफी हद तक सिद्ध कर दिया कि जीव विकास की प्रक्रिया हर समय एक ही रफ़्तार से सीधी रेखा में नहीं चलती बल्कि इस प्रक्रिया में धीमें और लटकते हुए अंतरालों में कुछ पड़ाव ऐसे आते हैं जब जीव विकास की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है । इस तीव्र दौर में धीमें विकास के दौरान जमा हुए मात्रात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तनों में बदल जाते हैं । गोल्ड के अनुसार जीव विकास सदैव प्रगतिशील ही नहीं होता, बल्कि कई बार विपर्ययवादी भी होता है, क्योंकि कई जीव जीवित रहने के लिए दूसरे जीवों के परजीवी बन जाते हैं, जैसे की वृक्षों पर लटकती हुई अमरबेल, अलग-अलग परजीवी कीड़े आदि ।

डार्विन इस प्रकार की संभावना से अनजान नहीं थे । ‘जीव की उत्पति’ के पांचवें एडिशन में डार्विन लिखते हैं, “समय के जिन खण्डों में प्रजातियों में परिवर्तन आते हैं, वे प्रजातियों के लगभग स्थिर रहनेवाले समय खण्डों के मुकाबले छोटे होते हैं ।” चार्ल्स डार्विन, जीवों की उत्पति, १८६९ लन्दन, जॉन मरे, पांचवां एडिशन, पेज -५५१)

इस सिद्धांत के प्रस्तुत करने के समय से ही गोल्ड और ऐलड्रिज़ का बाकी बहुत सारे विज्ञानियों द्वारा निरंतर विरोध होता रहा है क्योंकि छलांगों द्वारा जीव विकास का सिद्धांत पूंजीवाद के बंधक चाकर गुलामों को हजम नहीं होते और वे धीमें और लटकते हुए बदलावों के सिद्धांत को ही एकमात्र सही सिद्धांत सिद्ध करने पर तुले रहते हैं । इस विरोधी शिविर में एक बार रिचर्ड डाकिनज़ और जॉन मेरिनार्ड स्मिथ प्रमुख रहे हैं । अपने मृत्यु के वर्ष, २००२ तक, गोल्ड ने अपने सिद्धांत की डटकर हिमायत की और अन्य तरह के शंकों का निवारण किया. चार्ल्स डार्विन के बाद, स्टीफन जे गोल्ड को जीव विकास के क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा नाम माना जाता है ।

गोल्ड के सिद्धांतों की रोशनी में आज, छलांगों द्वारा जीव विकास के सिद्धांत को अधिकाधिक मान्यता मिल रही है और जीव विकास विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे तरीकों की खोज हो रही है जो इस सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं ।

गोल्ड अपनी पुस्तक ‘पांडाज थंब’ में लिखते हैं, ” सोवियत यूनियन में विज्ञानियों को एक अलग तरह की दार्शनिक शिक्षा मिलती है – एंगेल्स द्वारा, हीगेल से लेकर, और विकसित किये गये द्वंदात्मक नियमों की शिक्षा. द्वंदात्मक नियम स्पष्ट तौर पर धीमे-तेज विकास के हामी हैं. वे मात्रा के गुणों में परिवर्तन की बात करते हैं । यह अजीब लग सकता है, पर ये बताते हैं कि किसी प्रणाली में धीरे-धीरे इकठ्ठे होनेवाले परिवर्तन या तो दबाव के परिणामस्वरूप वह प्रणाली ऐसी स्थिति में पहुँच जाती है, जब एकदम छलांग द्वारा परिवर्तन होता है. पानी को गर्म करो, यह उबल जायेगा, मजदूरों को अधिकाधिक दबायो, क्रांति हो जाएगी । ऐलड्रिज़ और मुझे यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि बहुत पहले रूसी जीवाश्म विज्ञानी भी हमारी ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ मॉडल जैसे जीव विकासी सिद्धांतों की धारणाएं रखते हैं । ”

अपनी पुस्तक ‘डार्विन के बाद अब तक’ में, गोल्ड, एंगेल्स के आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ का वर्णन करते हुए लिखते हैं, ” असल में, उन्नीसवीं शताब्दी में एक बहुत ही शानदार आलेख प्रकाशित हुआ, जिसके लिखनेवाले के बारे में जानकर, बहुत से पाठक हैरान हो जायेंगे – फ्रेडरिक एंगेल्स । (बेशक यह जानकर, कि एंगेल्स भी प्राकृतिक विज्ञान में गहरी दिलचस्पी रखते थे और वे अपने दर्शन ‘द्वंदात्मक भौतिकवाद’  को एक मजबूत आधार पर निर्मित करते हैं । वे अपनी पुस्तक ‘प्रकृति में द्वंदवाद’ को पूरा न कर सके ) उनकी मृत्यु के बाद, १८९६ में एंगेल्स द्वारा लिखित ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ प्रकाशित हुई  पर पश्चिमी विज्ञान पर इसका कोई असर न हुआ ।” क्योंकि उनके  अनुसार पश्चिमी सोच में पक्षपात बहुत गहराई तक पैठ कर चुका था ।

असल में देखा जाये तो डार्विन के सिद्धांतों पर होनेवाले सैद्धांतिक हमले असल में द्वंदात्मक भौतिकवादी दर्शन को नकारने के नाकाम परन्तु योजनाबद्ध प्रयत्न हैं । आज की परिस्थितियों में परजीवी हो चुके पूंजीवाद को सबसे अधिक खतरा मार्क्सवादी भौतिकवादी दर्शन से है क्योंकि यह वह दर्शन है जो समाज को गति में दिखाता है और वर्णन करता है कि प्रत्येक वस्तु गति में है । जैसे जीव विकास एक निरंतर गतिमान क्रिया है, वैसे ही, मानव समाज भी निरंतर गतिमान है । मानव समाज में भी प्राचीन मिट जाता है और नया उसका स्थान ग्रहण कर लेता है । इसी तरह आरंभिक कबीलाई समाजों के स्थान को गुलामदारी प्रबंध ने ग्रहण किया और फिर सामंतवाद और पूंजीवादी प्रबंध । प्रत्येक प्रबंध अपनी उम्र भोगकर इतिहास के रंगमंच से रुखसत हो गया और उसके स्थान को नये प्रबंध ने संभाल लिया । पूंजीवाद के चाकर इस सच्चाई को नकारने के लिए, हर उस सोच, वैज्ञानिक खोज या मानवीय कोशिश को सबसे पहले दबाने की कोशिश करते हैं, अगर ऐसा नहीं होता है, तो उसकी इस तरह से व्याख्या करने की कोशिश करते हैं कि उसके अन्दर का भौतिकवादी तत्त्व ख़त्म हो जाये और वह पूंजीवादी प्रबंध को सदैव से न्यायोचित ऐलान करने लगे ।

उन्नीसवीं शताब्दी में, जब पूंजीवाद के उभार का दौर था, उस वक्त पूंजीवादी चाकरों की कोशिश होती थी कि किसी वैज्ञानिक खोज से होनेवाले फायदा अधिकाधिक उठाया जाये और इस खोज से आम लोगों तक पहुँचने वाली भौतिकवादी चेतना को किसी न किसी तरह से दूर किया जाये । इससे भी अधिक, अगर हो सके तो उन खोजों को पूंजीवादी-चिरस्थायी तौर पर लोगों की नजरों में परिपक्व सिद्धांत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाये । इस प्रकार फासीवाद को जायज ठहराने के लिए पूंजीवादी चाकरों ने विज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया । नस्ल सुधारने को एक विज्ञान का दर्जा दिया गया । इस तथाकथित विज्ञान के आधार पर उन्नीसवीं शताब्दी के पूरार्द्ध में अमरीका में २०,००० लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गयी और नाज़ी जर्मनी में ३.७५,००० लोगों को नपुंसक बना दिया गया । इस काम को सिरे चढाने के लिए बाकायदा कानून बनाये गये । अमरीका के लगभग सभी राज्यों में कानून बनाकर नस्ल सुधारने के विभाग तक बनाये गये ।

विज्ञान के नामपर इस प्रकार के मानवता विरोधी कारनामे बाद में भी जारी रहे । बेशक उपरोक्त किस्म के नस्ल सुधार को विज्ञान द्वारा रद्द किया जा चुका है, पर यह अलग-अलग रूपों में सामने आने लगा जैसेकि साईको सर्जरी । इसके अनुसार सामाजिक समस्याओं का इलाज भी दिमाग का आपरेशन करके किया जा सकता है । इस तरह के ही दो तथाकथित विज्ञानी, वर्तमान मार्क और फ्रैंक इरविन ने यह सुझाव भी पेश कर दिया कि शहरों में होनेवाले दंगे भी दिमागी परेशानी के कारण होते हैं और इसका इलाज झुग्गियों में रहनेवाले लोगों के नेताओं के आपरेशन द्वारा हो सकता है और ऐसा किया भी गया । ऐलन वूड्स और टेड ग्रांट के अनुसार – १९७१ में, अमरीका में ऐसे ही लोगों का इलाज करने के लिए उचित ‘बीमारों’ की सूची मांगी गयी । आपरेशन द्वारा इलाज के लिए भेजे गये आदमियों में अप्रैल, १९७१ के कामगारों की हड़ताल के नेताओं में से एक शामिल था । ये हैं पूंजीवादी चाकरों के कारनामे और वैज्ञानिक खोज !

जीव विज्ञान से बाहर दूसरे विज्ञानों में भी यही स्थिति है । क्वांटम भौतिकी के दार्शनिक नतीजे ‘कोपनहेगन व्याख्या’ इसकी ज्वलंत मिसाल है । जैसे-जैसे पूंजीवाद और अधिक परजीवी होता जा रहा है, उतना ही अधिक यह विज्ञान-विरोधी भी होता जा रहा है । पहले तो यह विज्ञान से निकलने वाले भौतिकवादी परिणामों को बिगाड़ता था, पर अब तो यह विज्ञान के विकास में ही रूकावट बनता जा रहा है ।

पूंजीवाद ने पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाले जीवाश्मों को पण्य (commodity) बना दिया है । जीवाश्मों की पूरी दुनिया में फैली एक मंडी है । पूरी मानवता की धरोहर, ये जीवाश्म कुछ लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति बनते जा रहे हैं । ऐसा एक उदाहरण एक ४७ मिलियन वर्ष पुराने एक कैमूर के जीवाश्म का है । यह अभी-अभी ‘ढूँढा’ गया । यह जीवाश्म दूध पिलाने वाले ऊपरी श्रेणी के और आरंभिक दूध पिलाने वाले प्राणियों के बीच एक महत्त्वपूर्ण लिंक है । पर यह जीवाश्म १९८३ से लेकर २५ वर्षों तक एक जीवाश्म इकठ्ठे करने के शौक़ीन व्यक्ति की व्यक्तिगत सम्पत्ति बना रहा । इस प्रकार और भी जीवाश्मों को, जो व्यक्तिगत सम्पत्ति हैं, किराए पर खोज-कार्यों के लिए दिया जाता है ।

मेडिकल क्षेत्र के बारे में तो जितना कहा जाये उतना ही कम है । दवा कम्पनियां, उस खोज-कार्य जिसमें से मुनाफे की संभावना कम हो या मुनाफे पर चोट करता हो, पर धेला भी नहीं खर्च करतीं । ऐसे कार्यों के लिए अक्सर लोगों को जेब से खर्च उठाना होता है या फिर सरकारों के सामने नाक रगड़नी पड़ती है । बहुत से ऐसे खोज-कार्य बीच में ही बंद हो जाते हैं या फिर बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं ।

स्टेम सैल रीसर्च का भी इसीलिए विरोध हो रहा है । बेशक यह विरोध नैतिक और धर्म के चोगे के नीचे हो रहा है । इसका विरोध करनेवाले भी वही हैं, जो समलैंगिक और गर्भपात संबंधी कानूनों का विरोध करते हैं । और इन फासीवादी समूहों को आशीर्वाद किसका है, यह भी सबको पता है ।

इसी प्रकार १९९० में शुरू हुई, बैटरी से चलनेवाली बिजली की कार की परियोजना भी तेल कंपनियों, ऑटो कंपनियों और अमरीका सरकार की मिलीभगत से ठप होकर रह गयी है और यह कार कभी भी सड़क पर नहीं उतर सकी । इस बैटरी से चलनेवाले व्हीकल ने जहाँ प्रदुषण को कम करना था, वही तेल की खपत भी कम करनी थी, पर यह सब तेल कम्पनियों को किस तरह बर्दाश्त होता, इसलिए मिलमिलाकर पूरी परियोजना को कोल्ड स्टोर में रख दिया गया ।

इस प्रकार साफ़ है कि लोगों में भौतिकवादी चैतन्य के प्रसार को रोकने के लिए और इसे कुंठित करने के प्रयासों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में, जीव विकास के सिद्धांत पर, जोकि उतने ही प्रमाणों से सिद्ध हो चुके हैं जितने प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है पृथ्वी प्लेट जैसी नहीं, बल्कि गेंद जैसी, सूर्य पृथ्वी के नहीं, पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और सूर्य और चन्द्र ग्रहण किसी राहू-केतू के कारण नहीं बल्कि सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा के एक रेखा में आ जाने से लगते हैं, विवाद पैदा कर वैज्ञानिक प्राप्तियों और सिद्धांतों के उन क्रांतिकारी अंशों को कमजोर करने की कोशिशे हो रही हैं जो किसी भी वस्तु के चिरस्थाई होने की अवधारणा के परखचे उड़ा देते हैं । इसके साथ ही विज्ञान और दर्शन को मानवता की भलाई के लिए उपयोग के स्थान पर पूंजीवाद की पूरी अधिसंरचना इन्हें मुनाफे की चौहदी में कैद करने और श्रमिक लोगों की अधिकाधिक रत निचोड़ने के साधन मात्र बनाने के लिए दिनरात पंजों के बल खड़ी रहती है । इसलिए वर्तमान समय में, न्याय और समानता पर आधारित शोषण रहित समाज के सृजन का स्वप्न देखनेवाले लोगों के लिए यह जरूरी है कि भौतिकवादी वैज्ञानिक चैतन्य के हक़ में खड़े होने और डार्विन के सिद्धांतों समेत विज्ञान के हर क्षेत्र में हो रहे विचारवादी हमलों का और वैज्ञानिक तथ्यों को विकृत करके पूंजीवाद की सेवा करनेवालों का मुंह-तोड़ जवाब देने के लिए तैयारी करें ।

पंजाबी पत्रिका, नवें समाजवादी इन्कलाब दा बुलारा ‘प्रतिबद्ध’ के जनवरी, २०१० अंक से आभार सहित |

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हैती, भूकंप,तथाकथित ज्योतिष शास्त्र, पूंजीवाद और समाजवाद का परस्पर गहरा संबंध है, भाई !

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पूंजीवादी रूस के शहर नेफ्तेगोर्स्क में 27 मई 1995 के रेक्टर पैमाने 7.6 के भूकम्प ने इसकी कुल आबादी 3500 में से 2000 लोगों की जान ली. इस त्रासदी पर माइक देविड़ो ने अपनी ‘ मास्को डायरी  : रूसी आपदाएं, प्राकृतिक और अप्राकृतिक’ में समाजवादी सोवियत यूनियन के शहर ताशकंद के अप्रैल  26, 1966 के रेक्टर पैमाने 7.5 के भूकंप पर समाजवादी राज्य और उसकी जनता के बारे में लिखा है कि किस प्रकार राज्य और जनता का सैलाब इस शहर के लोगों की मदद के लिए उमड़ पड़ा. अविभाजित सोवियत यूनियन में पूंजीवाद की पुन:स्थापना हो चुकी थी लेकिन समाजवादी भावना का , पूर्ण रूप से, अंत नहीं हुआ था. अपनी यादों को ताज़ा करते हुए वे लिखते हैं,

“भूकम्प जिसने सखालिन द्वीप के शहर नेफ्तेगोर्स्क को गर्क कर दिया है, इससे भी बड़ी त्रासदी का प्रतीक है – उल्ट रूसी इन्कलाब, जिसने रूस और भूतपूर्व सोवियत यूनियन को समतल कर दिया है. प्राकृतिक आपदाएं सामाजिक व्यवस्थाओं की सीमाओं में फर्क करना नहीं जानती. लेकिन सोवियत यूनियन 26 अप्रैल 1966 के भूकम्प जिसने ताशकंद को तबाह कर दिया, पर किस प्रकार कार्यशील होता है और किस प्रकार पूंजीवादी रूस नेफ्तेगोर्स्क के भूकम्प और संभावित दुर्घटनाओं से निपटता है, में अंतर इतना साफ़ है कि वह अपनी कहानी स्वयं बयान करता  है.

मैं 1969 में ताशकंद में था. मैंने उज्बेकिस्तान की राजधानी ( 10 लाख की जनसंख्या का शहर) के जिंदा बचे लोगों से, उनके दहशत के न केवल किस्से ही सुने हैं बल्कि मैंने देखा है – ताशकंद को, सभी 15 गणराज्यों द्वारा, पुनर्निर्मित रूप में और पहले से भी अधिक सुन्दर रूप में ! वह भी केवल तीन वर्षों में ! 35 प्रतिशत शहर तबाह हो गया था. 95,000 लोग बेघर हुए, 45 प्रतिशत संयंत्रों को भारी नुकसान पहुंचा. 180 स्कूल, 600 दुकाने ढह-ढेरी हो गईं. भूकम्प के कुछ घंटों बाद ही CPSU   के महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव और प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन ताशकंद आ गए. USSR की सेना द्वारा तुरंत हरकत करने की उसकी प्रकृति ने  ‘महान राष्ट्रीय युद्ध” के दौरान सभी लोगों के हरकत में आने की यादों को ताज़ा कर दिया. प्रत्येक गणराज्य से लोग ताशकंद के लिए उमड़ पड़े. मास्को, लेनिनग्राद, रूस गणराज्य के सभी भागों से, उक्रेन से, अजेबेर्जान से, जोर्जिया, कजाखिस्तान, बेलारूस और बाल्टिक गणराज्यों से निर्माणकर्मी, ताशकंद के लिए रवाना हो गये. इन गणराज्यों ने वहाँ राहत सामग्री, औजार, और अपनी मशीने उतारना शुरू कर दिया. अपनी छुट्टियों का त्याग करते हुए सैनिक और विद्यार्थी उनसे जा जुड़े. ताशकंद के लोगों ने उनका अपने मुक्तिदाताओं के रूप में स्वागत किया. निर्माणकर्मी मेक-शिफ्ट बैरकों में दो से तीन वर्षों तक रहे.

सितंबर तक स्कूल पुन: खुल गये और 20,000 अपार्टमेंटों का निर्माण कर लिया गया – जो पिछले वर्षभर में निर्मित हुए कुल अपार्टमेंटों की संख्या का दोगुना था. लेकिन प्रतीकात्मक रूप से, जो चीज मैंने पाई, वह थी, “ताशकंद के पुन:निर्माण के समय समग्र सोवियत भावना” – प्रत्येक गणराज्य की विशेष भवन निर्माण शैली और कला, इस नए बसे शहर का अंग बन गयी.

और नेफ्तेगोर्स्क ? खो गया है वह महान परिवार जो अपने ही जैसे परिवार के दुःख भरे हालात से विचलित हो गया था ! खो गयी है वह बहन-भाईचारे की भावना जो एक को दूसरे से बाँधे हुए थी ! वर्तमान “स्वतंत्र” गणराज्यों से सांत्वना और टोकन सहायता आई है, पर यह आई है अजनबियों से ! पूंजीवादी रूस ने नेफ्तेगोर्स्क के सभी भूकंपलिख स्टेशनों का “मितव्ययीकरण” कर दिया है.  विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वे चालू हालत में होते, तो तबाही की समय पर चेतावनी मिल सकती थी.

राष्ट्रपति येल्स्तिन इस शहर में अभी तक नहीं आये हैं. भूकंप के कुछ दिनों बाद, प्रधानमंत्री  चेर्नोगिर्दिन ने अपनी छुट्टियाँ समाप्त कीं, लेकिन मास्को जाने के लिए. इतना ही काफी नहीं है कि प्राकृतिक आपदाओं  से निपटने के लिए दृष्टिकोण में इतना बड़ा अंतर है, बल्कि सच्चाई यह है कि अब आपदाएं पूंजीवादी रूस और ‘स्वतंत्र’ गणराज्यों के लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन गयी हैं. भाई-भाई के बीच खून-खराबा, चैचैनया का नागरिक युद्ध, 20 लाख रूसी शरणार्थी जो युद्ध से भाग आये हैं, और उनके साथ केन्द्रीय एशिया और बाल्टिक के “स्वतंत्र” गणराज्यों द्वारा भेदभाव, नागोमों काराबाख में आर्मीनिया युद्ध के शरणार्थी; माल्डोवा – प्रेदानेस्त्रोवा, ओसेतिया इंगुश गणराज्य, अब्कासिया; जोर्जिया – भूतपूर्व सोवियत यूनियन का  कोई भी ऐसा अंग नहीं है , जो सामाजिक तबाही और मानव-त्रासदी से अछूता हो. और इसके साथ ही हमें शामिल करना चाहिए मास्को के नरसंहार को. 1988 के आर्मीनिया के भूकंप से तबाह शहर अब तक  भी पुन: निर्मित नहीं हो सके हैं . ये समाजवाद के अवरोहण से, अपराधी पूंजीवाद के पोषण के लिए, वसूली करने की क्रूरता के साक्षी हैं. आर्मीनिया के येल्स्तिनों ने भाई को भाई से लड़कर मरने के लिए करोड़ों खर्च कर दिए हैं और भूकंप से प्रभावित 2 लाख से अधिक लोग अस्थायी घुरनों में रहने को विवश हैं. ग्रोस्नी और नेफ्तेगोर्स्क, स्तालिनग्राद और ताशकंद में यही फर्क है.

यह फर्क पूंजीवादी रूस और भूतपूर्व सोवियत यूनियन के लोगों का साये की तरह पीछा करता है. पायनियर कैम्प या तो बंद कर दिए गए हैं या फिर उनका व्यवसायीकरण हो गया है. काले सागर के अनापा में छुट्टियाँ बिताने का प्रति माता या पिता और एक बच्चे का 21 दिनों का खर्च 4,500,000 से 5,000,000 रूबल तक है. सोवियत ज़माने में यह खर्च 200 रूबल था जिसका 70 प्रतिशत ट्रेड युनियाने देती थीं. नेफ्तेगोर्स्क के भूकंप ने कड़वाहट में ही बढौतरी की है. तबाही का लगातार भरता हुआ यह वह जाम है जिसे रूस और भूतपूर्व गणराज्यों के लोग पी रहे हैं.”

लेखक के उपरोक्त संस्मरण को प्रकाशित करके हम साबित करना चाहते हैं कि समाजवाद और पूंजीवाद , भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाएं और तथाकथित ज्योतिष अंकविज्ञान आपस में जुड़े हुए हैं, क्योंकि समाजवाद प्राकृतिक आपदाओं से निपटते हुए मानव की जरूरतों और  गौरव की रक्षा करता है. जबकि तथाकथिक ज्योतिष अंकविज्ञान का मकसद पूंजीवाद की तरह ही, मानव द्वारा मानव की मजबूरी और अज्ञानता से लाभ कमाना होता है. पाठकों को भूलना नहीं चाहिए कि जब तक समाजवाद, हमारी पृथ्वी के एक बड़े हिस्से पर, विद्यमान था, तो इसके डर के चलते, पूंजीवाद वह सभी  सहूलियतें  देता रहा जो समाजवाद का अभिन्न अंग होती हैं. और अब उसे इन सहूलियतों जैसे आवास, शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के “मितव्ययीकरण” और निजीकरण को उदारवादी नीतियों के रूप में प्रचारित करके और लागू करके, मुनाफे की हवस की पूर्ति होने पर, मज़ा आता है. उदारीकरण से इनका अर्थ पूंजीपतियों के लिए “उदार” और मेहनतकश जनता के प्रति “क्रूर” होना होता है.

दूर जाने की जरूरत नहीं है. हमारे देश में कुछ वर्ष पूर्व आई  सुनामी और गुजरात के भूकम्प-पीड़ितों  के लिए आई अंतरराष्ट्रीय मदद को पीड़ित लोगों तक पहुँचाने के लिए सक्रिय नौकरशाही द्वारा आपस में बंदरबांट के, हम चश्मदीद गवाह हैं. ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि, पूंजीवादी समाज द्वारा निर्मित मानव और उसके दूसरों के कपड़े तक उतार लेने के संस्कार, उससे उसके इन्सान होने के मायने ही छीन लेते हैं.

एक लंबे समय तक हमारी पृथ्वी के एक बड़े हिस्से पर समाजवाद रहा है. ऐसा नहीं है कि समाजवाद ने भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना न किया हो. पाठकों को इनका अध्ययन करना चाहिए. लेकिन मुख्य मुद्दा पूंजीवादी समाज और समाजवादी समाज के उदेश्य में फर्क का है. एक के केंद्र में व्यक्तिगत मुनाफे की हवस है तो दूसरे के केंद्र में पूरा मानव समाज और उसकी भलाई. मानव के साथ व्यवहार करते समय पूंजीवाद को फ़िक्र होता है कि किस प्रकार उसका शोषण किया जाये. इस उद्देश्य की पूर्ति हेतू वह मनुष्यों को अलग-अलग  स्थानों पर, चालाकी या धूर्तता से, ‘ठिकाने लगाने’  – जहाँ उनका अधिक से अधिक शोषण हो, की फ़िराक में लगा रहता. जबकि समाजवाद में , जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं, मनुष्य नहीं बल्कि वस्तुओं का प्रबन्धन स्थान ले लेता है. इस समाज को इंसानों को ‘ठिकाने लगाने’ का कतई फ़िक्र नहीं होता – इसे फ़िक्र होता है कि किस प्रकार मानव की जरूरतों को केंद्र में रखकर उत्पादन किया जाये और वस्तुओं को जरूरतमंदों तक पहुँचाया जाये. किसी भी रूप में मुनाफा, समाजवादी समाज का उद्देश्य नहीं होता.

वैज्ञानिक विकास और तकनीक के तेज विकास की इस इक्कीसवीं शताब्दी में “हैती के भूकंप” से पैदा हुई प्राकृतिक त्रासदी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

मानव आदिम युग से आधुनिक युग तक, जीवन के संघर्ष में, प्रकृति के साथ अपने द्वंदात्मक रिश्तों की बदौलत, संघर्ष करता हुआ, विकास की मौजूदा मंजिल तक पहुंचा है. विज्ञान और तकनीक के मौजूदा स्तर ने ऐसा भौतिक आधार तैयार कर दिया है, जिसके द्वारा भूख, कंगाली और आवास की समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है. भूचाल और सुनामी जैसे कहर से घटित होनेवाली तबाही पर, बेशक पूरी तरह से नहीं, पर काफी हद तक निपटा जा सकता है. प्राकृतिक विपदाओं की पूर्व-सूचना हासिल करनेवाले अन्वेषण कार्यों को तरजीह देनी चाहिए. भवन-निर्माण और आवासीय घरों के निर्माण की ऐसी तकनीक विकसित करने पर जोर देना चाहिए, जिनसे प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए, कम से कम नुकसान हो.

कौनसी समस्या है जो इस तरह के कार्यों को अंजाम देने में रूकावट बनती है ? दूसरे विश्व-युद्ध के समय ब्रिटिश सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार रहे, प्रसिद्ध विज्ञानी जॉन डेस्मोंड बरनाल ने लिखा है, ” प्रचुरता और अवकाश के एक युग की समूची  संभावनाएं हमारे पास हैं, लेकिन हमारा यथार्थ एक विभाजित विश्व का है, जिसमें इतनी भूखमरी, मूर्खता और क्रूरता है जितनी आज तक कभी नहीं रही.” – विज्ञान की सामाजिक भूमिका, पेज 7. हैती के भूकंप  में लाखों लोगों की मौत, भारी गिनती में बेघर और जख्मी लोगों के दुखों और मुसीबतों ने, सभ्य समाज को हिला कर रख दिया है.

एक ब्लॉगर सज्जन का प्रश्न है कि हैती, भूकंप, ज्योतिषशास्त्र , समाजवाद और पूंजीवाद का आपस में क्या संबंध है ? शायद हमारे यह विद्वान सज्जन, जानबूझ कर, अपनी किसी मजबूरी के चलते, इतने महत्त्वपूर्ण प्रश्न को, मज़ाकिय ढंग से उछाल रहे हैं. आज साधारण लोग भी समझते हैं कि मानव-विश्व के निरंतर विकास के चलते, प्राकृतिक-विश्व से दो-चार होने की मानव-सामर्थ्य में निरंतर बढौतरी हुई है. आदिम युग में मौजूद प्रकृति की ओर से प्रस्तुत लाखों चुनौतियों पर वर्चस्व हासिल कर, समाज के विकास को गति प्रदान की. बड़ी-बड़ी नदियों पर बाँध बनाकर, भयंकर तबाहियों पर काबू पाया जा चुका है. तकनीक के विकास से, पैदावार के क्षेत्र में, असीम बढौतरी हुई है. हर युग में, पैदावार का स्तर और उसके वितरण का तरीका ही, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संरचना को तय करता है. मानव-समाज, आदिम कबीलाई सामाजिक संरचना से लेकर, गुलामदारी, सामंती और पूंजीवादी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं से भी आगे समाजवाद के प्रारंभिक प्रयोग भी कर चुका है.

प्राकृतिक-विश्व और मानव-विश्व के संबंध सदैव एकसार नहीं रहे हैं. इन संबंधों के विकास ने मानव को, प्रकृति की विध्वंसकारी शक्तियों पर वर्चस्व हासिल करने के योग्य बनाया है. प्रकृति का हिस्सा होते हुए भी, प्रकृति और मानव के संघर्ष में, मानव ने प्रकृति को अपने हित में बदलते हुए, लगातार स्वयं को भी बदला है.

पूर्व पूंजीवादी समाजों में, मानव और प्रकृति के संघर्ष में, प्रकृति से हुई छेड़छाड़, समूचे प्राकृतिक-विश्व को, कोई उल्लेखनीय हानि नहीं पहुंचाती थी. मानव द्वारा प्रकृति के खजानों के उपयोग दौरान होनेवाले नुकसान, प्रकृति द्वारा स्वयं पुन: भरपाई के सामर्थ्य के दायरे का, उल्लंघन नहीं करते थे.

हमारा इस तर्क से कोई मतभेद नहीं है कि भूकम्प और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएं, पृथ्वी की उत्पति के समय से ही, यानी लाखों-करोड़ों वर्षों से ही, घटित होती आ रही हैं. प्राकृतिक परिघटनाओं के अपने नियम हैं, जिनकी बदौलत पृथ्वी के अंदर और बाहर के वातावरण में घटित होनेवाली हलचल, कई बार भयानक तबाही का सबब बनती है. इस बात से भी सभी सहमत हैं कि जंगलों की तबाही, मशीनरी के अंधाधुंध उपयोग, जंग-युद्धों में उपयोग होनेवाले बारूद और रासायनिक हथियार और परमाणु तजुर्बों से पैदा होनेवाले प्रदुषण से प्रकृति का संतुलन लडखडा रहा है. प्रकृति अपने जख्मों की बहाली के लिए, सचेत मानव प्रयास की मोहताज हो गयी है.

मतभेद इस सच की पेशकारी को लेकर है. बड़ी चालाकी से, तमाम मानव जाति को, इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर, मुजरिम अपने गुनाहों पर पर्दा डाल देता है. कौन है वह मुजरिम, जो इक्कीसवीं शताब्दी के रोशन दिमाग इन्सान को भी, चकमा देने में कामयाब हो जाता है ? इस सवाल के जवाब से पहले, हमारे लिए, अपने वर्तमान और भूतकाल  के संबंधों के बारे में, थोड़ी सी चर्चा जरूरी है.

आज मानव के पास ज्ञान का एक बड़ा खजाना मौजूद है. इसके अलावा, समस्त मानव जाति को खुशहाल और बढ़िया जिंदगी मुहैया करवा सकने के सभी साधन मौजूद हैं. विज्ञान और तकनीक के विकास ने, वह भौतिक आधार तैयार कर दिया है, जिसपर, ऐसा समाज निर्मित होना संभव है, जहाँ भूखमरी और बिमारियों समेत, हर किस्म के अभाव पर वर्चस्व हासिल किया जा सकता है.

अपने आरंभिक दौर में, मानव प्रकृति की शक्तियों के अधीन था.  आदिम समाज मजबूरी का साम्यवाद था. उत्पादक शक्तियों के विकास के एक विशेष पड़ाव पर, मानव समाज वर्गों में – मालिक और गुलामों में विभाजित हो गया. यह सब कैसे हुआ? समाज विकास के किन नियमों ने, उन ऐतिहासिक परिवर्तनों को दिशा और गति दी, यह एक अलग विषय है. मानव-संस्कृतियों के इतिहास में, अलग-अलग भौतिक भूभागों में, वहां के वातावरण और ऐतिहासिक परस्थितियों की विभिन्नताओं के चलते, अपनी-अपनी विशेषताएँ मौजूद थीं, जिनके कारण वे अपनी अलग पहचान रखते हैं. परंतु ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि अपनी सभी विभिन्नताओं के बावजूद, प्रत्येक भूभाग के इतिहास में, कुछ चीजें साझी हैं. मिसाल के लिए, सभी की सभी सभ्यताएं, अपने-अपने विशेष लक्षणों के बावजूद, आदिम समाजवादी समाज, गुलामों-मालिकों के समाज और सामंतवादी सामाजिक-राजनीतिक आर्थिक प्रबंधों के दौर में से गुजरी हैं.

आज का युग, पूंजीवाद का युग है. इंग्लैण्ड के औद्योगिक इन्कलाब और फ़्रांसिसी इन्कलाब से शुरू हुई, आर्थिक और राजनीतिक तब्दीलियों ने, लगभग समस्त दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. पूंजीवाद के आगमन ने, मध्यकालीन जड़ता को तोड़कर, मानव-सभ्यता को बेहद तेजी से, पहले के मुकाबले विकास के बेहद ऊँचे स्तर पर, पहुंचा दिया. मजदूर वर्ग और मेहनतकश लोगों के आधार पर टिका पूंजीवाद, अपने विकास के साथ-साथ, आम लोगों के लिए भारी मुसीबतें साथ ही लेकर आया. अपने चरित्र के चलते ही, पूंजीवादी विकास समस्त संसार में एकसमान नहीं हुआ. असमान विकास इसके तौर-तरीकों में ही निहित है. पूंजीवादी विकास की आन्तरिक विरोधता के कारण, यह निरंतर मंदी के चक्रों की सजा भुगतता आ रहा है. पूंजीवाद का इतिहास, बस्तीवाद, नवबस्तीवाद के दौरों से गुजरता हुआ, आज नव-आर्थिक साम्राज्यवादी दौर से गुजर रहा है. बीसवीं सदी के आरंभ में ही, पूंजीवाद के साम्राज्यवादी पूंजीवाद की मंजिल में पहुँचने के साथ, इसके चरित्र में अधिकतर परजीविपन आ गया है. साम्राज्यवादी पूंजी ने, जहाँ दुनिया भर के कमजोर राष्ट्रों को, अपने कच्चे माल की मंडियां बनाकर लूटा, वहीं अपने-अपने देश के मजदूरों की लूट की दर को भी लगातार बढ़ाना जारी रखा. परिणामस्वरूप यूरोप के देशों और अमेरिका के मजदूर वर्ग ने, पूंजीवाद की बर्बर लूट के विरुद्ध, शानदार संघर्ष किये. दूसरी तरफ, साम्राज्यवादी पूंजी की लूट के शिकार, तीसरी दुनिया के देशों में, लड़े जानेवाले महान राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों ने, दुनिया में बस्तीवाद का निपटारा कर दिया. पूंजीवाद के इतिहास पर नज़र दौड़ाने पर, जो विशेष लक्षण उभरता है, वह है – विकास की विषमता. विश्व स्तर पर पूंजीवाद विरुद्ध, मजदूर वर्ग की विकसित राजनीतिक चेतना, विचारधारा के रूप में, प्रकट हुई. रूस, चीन, क्यूबा, पूर्वी यूरोप और एशिया के कई देशों में समाजवादी इन्कलाब करके, मजदूर वर्ग ने साम्यवादी समाज के निर्माण के पहले तजुर्बे किये.

बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक विश्व रंगमंच पर, पूंजीवादी राजनीतिक आर्थिक संरचनाओं में भी, भारी फर्क नज़र आते हैं. एक तरफ साम्राज्यवादी पूंजीवाद, अपनी क्रूरता और लूट के सर्वोच्च स्वरूप फासीवाद समेत, अपने देश के मजदूरों और मेहनतकशों और तीसरी दुनिया के देशों की कच्चे माल की सीधी लूट के रूप में मौजूद था. दूसरी ओर तीसरी दुनिया के गुलाम देश, राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के द्वारा, बस्तीवादी गुलामी और अपनी पुरानी सामंती व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे. तीसरी दुनिया के  देशों का आर्थिक-सामाजिक स्तर भी एकसमान नहीं था. अफ्रीका, लातिनी अमरीका, मध्य पूर्व और एशिया के और कई देश, अपने-अपने राजनीतिक-आर्थिक धरातल के अनुसार, अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे. इन नवस्वतन्त्र देशों में क्यूबा, उत्तरी कोरिया, इंडो चीन और चीन जैसे देशों ने, समाजवादी क्रांतियों का रास्ता चुना. तब तक, 1917 का रूसी इन्कलाब, दुनियाभर के मजदूरों के लिए, विचारधारा के क्षेत्र में, उच्च प्रेरणा स्रोत बन चुका था. दुनिया के बड़े हिस्से में, मजदूर और मेहनतकश लोग, हर किस्म की लूट-खसूट ख़त्म करके, कम्युनिस्ट समाज के निर्माण की ओर अग्रसर होने के पहले प्रयोग कर रहे थे. परिणाम स्वरूप, इतिहास ने पहली वार, मजदूर वर्ग की बेमिसाल शक्ति के दर्शन किए.

पूंजीवाद और समाजवाद के संघर्ष के इन पहले प्रयोगों में, मजदूर वर्ग वक्ती तौर पर हार गया है. इन देशों में पूंजीपति वर्ग ने विश्व पूंजीवाद की मदद से, समाजवादी देशों में, पूंजीवाद की पुन:स्थापना कर ली है.

नए आजाद हुए अधिकतर देशों में भी, पूंजीवादी आर्थिक रिश्ते स्थापित हो चुके हैं. आज मोटे तौर पर हमारे देशों में, पूर्व पूंजीवादी आर्थिक-रूपों का निपटारा हो चुका है. राजनीतिक ढांचे के रूप में जहाँ कहीं, पिछड़े सामंती रूप नज़र आ रहे हैं, वहाँ भी आर्थिक-सामाजिक क्षेत्र में, पूंजीवादी रिश्ते अपनी पकड़ बना चुके हैं.

सारांश के तौर पर, अपनी सभी क्षेत्रीय विशेषताओं और विभिन्नताओं के बावजूद, सारा विश्व पूंजीवाद के तर्क अनुसार गतिमान है.

इस व्याख्या की रौशनी में, हम अपने पहले प्रश्न की ओर आते हैं. मानव-विश्व के इतिहास का प्राकृतिक-विश्व पर गहरा असर पड़ता है. आज जलवायु प्रदुषण, ओजोन परत में सुराख़, कार्बन उत्सर्जन, गलेशियारों का पिघलना, वनों की बर्बादी, भूकम्प और सुनामी आदि की चर्चा के समय, विज्ञानी और विद्वान सज्जन, समस्त मानव जाति की गलतियों की ओर  ऊँगली उठाते हैं. इसी मुकाम पर सामाजिक व्यवस्थाओं और प्राकृतिक परिघटनाओं में घटित होनेवाली हलचलों का परस्पर संबंध, महत्त्व ग्रहण करता है. मानव-इतिहास में, पूंजीवादी प्रबंध ही एक ऐसा प्रबंध है, जहाँ पूंजीपति वर्ग की मुनाफे की हवस बेलगाम हो जाती.  इसी मुनाफे की हवस ने, जंगल तबाह कर दिए हैं, पृथ्वी के धरातल तले पानी बेहद घटा दिया है. जंग-युद्धों के लिए और आधुनिक तकनीक के विकास के लिए, विज्ञान का दुरूपयोग किया है. जाने या अनजाने, सारी मानव जाति को, इस तबाही के लिए जिम्मेदार ठहराना, असल मुजरिम को छुपाने या पनाह देने के तुल्य है. यह तरीका पीड़ित मानव-जाति के विरुद्ध, पूंजीपति वर्गों की सेवा करता है.

आज हर क्षेत्र में जो आर्थिक सरगर्मी नजर आ रही है, उसका मुख्य प्रेरणा स्रोत ‘मुनाफा’ है. माल मंडी के लिए उत्पादित होता है, मानव-आवश्यकता के लिए नहीं. परिणाम स्वरूप महंगाई, अन्न का संकट और बेरोजगारी जैसी समस्यायों का हल नज़र नहीं आ रहा.

बेहिसाब उत्पादक क्षमता वाले, भारत जैसे देश की आधी से ज्यादा आबादी, रात को भूखा सोती है.

अति आधुनिक सुविधायों से सुसज्जित हस्पतालों का जाल बिछ जाने के बावजूद, ये सहूलियतें 90 फीसदी जनता की पहुँच से बाहर हैं.

मानव गौरव, पैसे की कमीनी दौड़ तले, कुचला जा रहा है. सभी आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सरगर्मियों का केंद्र मानव न होकर ‘मुनाफा’ हो गया है. यह स्थिति मुठ्ठीभर धन-पशुओं का तुष्टिकरण तो कर सकती है लेकिन करोड़ों मेहनतकश लोगों की जीवन-स्थितियों को बेहतर नहीं बना सकती. मजदूर और मेहनतकश लोगों की मुक्ति और अच्छा भविष्य, इस पूंजीवादी प्रबंध के खात्मे और समाजवादी प्रबंध के निर्माण के संघर्ष से जुड़ा हुआ है. केवल निजी संपत्ति के खात्मेवाले समाजवादी प्रबंध के निर्माण द्वारा ही, सभी लोगों को, अपनी योग्यताओं के सर्वांगीण विकास के लिए, अवसर उपलब्ध हो सकते हैं, जिसके केंद्र में, मुनाफे की हवस में पागल हुए, धन-पशु नहीं, बल्कि आम लोग होंगे. बीसवीं शताब्दी के समाजवादी क्रांतियों के प्रथम चक्र के प्रयोगों ने साबित कर दिया है कि किसी भी अन्य प्रबंध की भांति, पूंजीवादी प्रबंध भी  स्थायी नहीं है. इन इन्कलाबों ने, मजदूर वर्ग की असीम शक्ति और सामर्थ्य को भी इतिहास के रंगमंच पर प्रकट कर दिया है. वक्ती तौर पर, समाजवाद की हार और पूंजीवाद की पुन:स्थापना से, पूंजीवादी शिविर में जो जश्न का माहौल बना हुआ था, उसका भी आर्थिक महामंदी ने निपटारा कर दिया है.

इक्कीसवीं शताब्दी, विश्वभर में, नये समाजवादी इन्कलाबों के अगले चक्र की सदी होगी. जहाँ प्रत्येक मनुष्य के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ, समस्त मानव जाति, प्राकृतिक आपदाओं का मुकाबला करने के लिए, समर्थ होगी.

विशेष आभार : http://www.hartford-hwp.com/archives/63/055.html

जलवायु संकट के लिए जिम्मेदार स्वयं पूंजीपति और उनकी व्यवस्था है न कि आम लोग

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धरती पर जलवायु संकट मनुष्य के इतिहास का एक अटल परिणाम है. यह सामाजिक और आर्थिक रिश्तों पर निर्भर करता है. पूंजीवादी प्रचार, जलवायु संबंधी समस्या को सामाजिक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य  से अलग करके रखता है. यह इसे राजनीति से ऊपर समझता है. समाज और वर्ग से ऊपर की कोई शै के रूप में इसे पेश करने का इसका उद्देश्य यह होता है कि पूंजीपति वर्ग और पूंजीपति प्रबंध को, इन संकटों को पैदा करने के लिए जिम्मेदार न ठहराया जा सके.

पिछले दिनों ‘कोपनहेगन पृथ्वी सम्मेलन’  जलवायु को प्रदुषण-मुक्त करने के लिए, दुनिया भर के शीर्ष नेताओं का, हमारे समय का, सबसे बड़ा जमावड़ा था. कार्बन उत्सर्जन के सवाल को जोर-शोर से उठाया गया. एक-दूसरे पर दोषारोपण हुआ. दुनिया की तबाही का आतंक उत्पन्न करते हुए, स्वयं के मुनाफों के कारोबार को, मंदी के इस दौर में, कैसे बचाकर रखा जा सकता है, विश्व पूंजीवादी प्रबंध में स्वयं की भूमिका को ज्यादा से ज्यादा किस प्रकार प्रभावशाली बनाया जा सकता है, इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतू, प्रकृति-हितैषी और मानवता के हितैषी होने के अपने मुखौटे पहनकर, सारी दुनिया की बड़ी-बड़ी प्रतिभायों ने, तरह-तरहके घुट्टी-पिलाउ हल पेश किये.

सबसे बढकर, सवाल इस प्रकार पेश किया जा रहा है कि आम लोगों में भय पैदा हो. संसार की तबाही और कई देशों के समुद्र में डूब जाने की भविष्यवाणियां पेश की जा रही हैं. धरती पर बढ़ते हुए तापमान की समस्या के ठोस हल खोजने की अपेक्षा, लोगों को डराने के लिए, इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है जबकि जलवायु के सवाल को सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से अलग करके नहीं समझा जा सकता.

आज की समस्यायों का मुख्य दोषी खुद पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक प्रबंध है. पूंजीवाद के आगमन से पहले की व्यवस्थाओं में मानव प्रकृति के साथ संघर्ष में – उसे बदलते हुए, आप जो कुछ प्राप्त करता था, उसका पैमाना बड़ा सीमित होता था. मानव के प्रकृति के साथ संघर्ष में, प्राकृतिक वातावरण को कोई उल्लेखनीय नुकसान नहीं पहुंचता था. प्रकृति मानव की उपजीविका का सदैव बड़ा स्रोत रही है. आज भी मानव और प्रकृति के संघर्ष में, विरोध और विकास संबंधी नियमानुसार, समस्याओं के हल होते रहते हैं. हमारी धरती और ब्रह्मंड की तबाही की बातें करनेवाले, गैर-वैज्ञानिक और एकतरफा ढंग से सोचते हैं. लेकिन आज का बड़ा सवाल है – पूंजीपतियों की मुनाफे की हवस ने जो हालात हमारी धरती पर पैदा कर दिए हैं उससे आम लोगों की जिंदगी और कठिन होती जा रही. आज पूंजीपतियों ने आम मेहनतकशों और श्रम-जीविओं के शोषण के साथ-साथ, प्रकृति का भी निर्लज्जता की हद तक शोषण किया है. ( इसने प्रकृति के सौन्दर्य को नष्ट करने का गुनाह किया है. नदियों, नालों और समुद्र के पानी को प्रदूषित किया है. परिवहन के साधनों को योजनाबद्ध ढंग से व्यवस्थित करने की बजाय, अपने मुनाफे की अंधी हवस में, प्राईवेट परिवहन के उद्योग (मिसाल के लिए, कार उद्योग ) को प्रोत्साहित करके, हवाओं में प्रदुषण को बेहद मात्रा में बढ़ा दिया है. पूरी की पूरी उत्पादन प्रणाली में – आम आदमी की सेहत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. परमाणु कचरा समुद्र में फैंका जा रहा है. हथियारों का बड़ी मात्रा में उत्पादन करके, मानवता की तबाही के साथ-साथ, प्रकृति की तबाही भी की जा रही है. पहले मुनाफे की हवस के चलते वातावरण खराब किया जाता है, फिर वातावरण को ठीक रखने के नाम पर – अमीर आबादी के चौगिरदे को साफ-सुथरा रखने के नाम पर, मेहनतकश आबादी के बड़े हिस्सों को शहर के बाहर के क्षेत्रों में स्लम्ज़  में धकेल दिया है जो धरती पर नरक के साक्षात नमूने हैं.

पूंजीवाद के अपने जन्म से, मुनाफे की इस बेरहम जंग ने भयानक तबाही मचाई है. मानव द्वारा मानव का शोषण और मानव द्वारा प्रकृति का शोषण , पूंजीवादी प्रबंध में अपने शिखर पर पहुंचा है. इंग्लैण्ड में पूंजीवाद के विकास और बाड़ाबंदियों के निर्धारण के समय किसानों का उजाड़ा, अमेरिका में जंगलों और आदिवासी (रेड इन्डियन) आबादी की तबाही, ( और वर्तमान में, भारत में नक्सलवादियों की समस्या तो एक बहाना है, असल में निशाना तो वह इलाका है जहाँ आदिवासी बसे हुए हैं जिनकी बदकिस्मती यह है कि ये जंगल खनिज और वनसम्पदा से भरपूर  हैं और पूंजीपति और साम्राज्यवादी इस लूट से अपनी नजर हटा पाने में अक्षम हैं ) विश्व के अन्य हिस्सों में जंगलों की बर्बादी के साथ, मुनाफा तो कुछ मुठ्ठीभर पूंजीपतियों ने कमाया, पर मुसीबतें आई आम लोगों के हिस्से में ! मुनाफे की हवस के सामने प्रकृति तो क्या, मानव जिंदगी की सीधी तबाही  भी पूंजीपति वर्ग को विचलित नहीं कर पाती ! अमेरिका में पूंजीवाद के फैलाव के समय,उनके कारनामों का जिक्र करते हुए मार्क्स लिखते हैं,

प्रोटेस्टेंट मत के उन गंभीर साधकों – न्यू इंग्लैण्ड के प्यूरिटनों  – ने १७०३ में अपनी असेंबली के कुछ अध्यादेशों के द्वारा अमरीकी आदिवासियों को मारकर उनकी खोपड़ी की त्वचा लाने या उन्हें जिंदा पकड़ लाने के लिए प्रति आदिवासी ४० पाउंड  पुरस्कार की घोषणा की थी. १७२० में प्रति त्वचा १०० पाउंड पुरस्कार का ऐलान किया गया था. १७४४ में, जब मैस्साचुसेटस-बे  ने एक खास कबीले को विद्रोही घोषित किया, तो निम्नलिखित पुरस्कारों की घोषणा की गयी : १२ वर्ष या उससे अधिक आयु के पुरषों को मार डालने के लिए प्रति त्वचा १०० पाउंड (नई मुद्रा में), पुरषों को पकड़ लाने के लिए प्रति व्यक्ति १०५ पाउंड, स्त्रियों और बच्चों को पकड़ लाने के लिए प्रति व्यक्ति ५५ पाउंड. कुछ दशक और बीत जाने के बाद औपनिवेशिक व्यवस्था ने न्यू इंग्लैण्ड के उपनिवेशों की नींव डालनेवाले इन piligrim fathers [पवित्र हृदय यात्रियों] के वंशजों से बदला लिया, जो इस बीच विद्रोही बन बैठे थे. अंग्रेजों के उकसाने पर और अंग्रेजों के पैसे के एवज में अमरीकी आदिवासी अपने गंडासों से इन लोगों के सिर काटने लगे. ब्रिटिश संसद ने घोषणा की कि विद्रोही अमरीकियों के पीछे कुत्ते छोडकर और आदिवासियों से उनके सिर कटवाकर वह केवल ” भगवान और प्रकृति के दिए हुए साधनों” का ही उपयोग कर रही है.– कार्ल मार्क्स ‘पूंजी’ प्रथम खंड, सफा ७६२, प्रगति प्रकाशन मास्को.

सामर्थ्यशाली “राष्ट्रीयताएं  हर उस बदनामी बारे सनक की हद तक शेखियां बघारा करती  जो उनके लिए पूंजी के एकत्रीकरण का साधन बनती , अगर वह पूंजी एकत्रित करने का ढंग होती” – मार्क्स, कैपिटल जिल्द १, सफा ७१०.

उपरोक्त विवरण से हम साबित करना चाहते हैं – पूंजीपति वर्ग, प्रदुषण संबंधी, सभी लोगों को, व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार ठहराकर, अपने गुनाहों को छिपाने का यत्न करते हैं.

पहले प्रदुषण फैलायो, फिर प्रदुषण हटाने की मुहीम के नेता के रूप में, ऐसी स्कीमें और हल पेश करो कि और मुनाफे कमाए जा सकें – अपने गुनाहों पर पर्दा डाला जा सके. सब कुछ इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि असल गुनाहगार, मुक्तिदाता दिखाई दे.

बात को इस प्रकार पेश किया जा रहा है जैसे कि यह कोई विकसित, विकासशील और गरीब देशों के बीच का झगड़ा हो. इन सभी देशों के पूंजीपति प्रतिनिधि, खुद के अपने मेहनतकशों और श्रम-जीवियों के शोषण से ध्यान हटाने के लिए, स्वयं को, उनके मसीहाओं के रूप में पेश कर रहे हैं.

आज जलवायु या प्रदुषण की समस्या को, विश्व पूंजीवादी प्रबंध के विरुद्ध लड़ाई से अलग करके, हल नहीं किया जा सकता. पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक प्रबंध में मुनाफे का स्रोत श्रमिक से निचोड़ा गया अधिशेष होता है. जब पूंजीपति फैक्ट्री या फार्म में उत्पादन की प्रक्रिया शुरू करवाता है केवल तभी अधिशेष मूल्य पैदा हो सकता है. लेकिन विश्व के तमाम हिस्सों में फैला पूंजीपति वर्ग मंडी और प्रतिस्पर्द्धा जैसे मुख्य कारणों के चलते कुल उत्पादन प्रक्रिया को योजनाबद्ध नहीं कर सकता, भले ही, एक फैक्टरी या फार्म में उत्पादन की प्रक्रिया को अंजाम देते समय पूंजीपति छोटी से छोटी मद को अपनी योजना में शामिल करता है. लेकिन जब बात किसी देश या विश्व के कुल उत्पादन की प्रक्रिया को योजनाबद्ध करने की आती है, तो पूंजीपति ही नहीं बल्कि उनके बुद्धिजीवी भी घबरा जाते हैं क्योंकि इसका अर्थ होता है एक ऐसी प्रणाली की स्थापना जिसमें इस मुठ्ठीभर परजीवी वर्ग के एशो-आराम को खतरा होता है. ये दोहरे मापदंड राजनीतिक तो हो सकते हैं लेकिन वैज्ञानिक नहीं. विज्ञान के नियम किसी वर्ग के हितों की रक्षा की जिद्द पूरी करने हेतू नहीं बदलते.गैर-योजनाबद्ध और अराजक उत्पादन प्रणाली में पर्यावरण और जलवायु संबंधी मुश्किलों पर काबू पाना ना मुम्मकिन है जबकि पूंजीपति और उनके बुद्धिजीवी इसे पूंजीवाद की चौहद्धी के भीतर ही हल करना चाहते हैं.

हम फिर बुद्धिजीवियों से अपील करते हैं कि वे वीरता से सच का साथ दें.  अगर समस्या की गंभीरता को देखते हुए सवाल ठीक ढंग से पेश किया जायेगा तभी उसका सही जवाब मिल सकता है, लेकिन पूंजीपति और उनके बुद्धिजीवी कभी नहीं चाहेंगे कि इसे ठीक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाये. उनके उद्देश्य समस्याओं को सनसनी तरीके से पेश करना और ऐसे अप्रासंगिक सवाल खड़े करना होता है ताकि लोग भी अप्रासंगिक हल ढूंढने की अंध कवायद करते हुए विचारों की भूल-भुलैया में सिर पटकते रहें.विचारधारा के क्षेत्र में फैले प्रदुषण के विरुद्ध लड़े बिना वातावरण संबंधी समस्या समेत, मानवता के सामने दरपेश समस्यायों का हल संभव नहीं.

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गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

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एक तरफ तो उत्तर प्रदेश की सरकार ‘सर्वजन हिताय’ होने का दावा करती है लेकिन दूसरी और इस सरकार के गोरखपुर का प्रशासन मजदूरों की बैचैनी का अर्थ उनके माओवादियों से संबंध होने से निकालता है. आज जब दुनिया महामंदी की चपेट में है और वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए लोगों की बचतों को  झोंका जा रहा और पूंजीवाद चाहता है कि कैसे वह इस विश्व महामंदी से निजात पाए, ठीक उसी वक्त,  स्थानीय पेटी-पूंजीपतियों को छोड़ दें तो इस प्रकार की स्थिति में सरकारों का मजदूरवर्ग से इस तरह के निम्न स्तर के हथकंडों का इस्तेमाल करते हुए उलझना स्वयं पूंजीपति वर्ग को भी नापंसंद होगा. पूंजीवाद की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा उपभोग भी होती है ताकि माल मंडियों में बिक जाये. क्या मजदूर वर्ग की जेब में कुछ डाले बिना मार्केट या देश को मंदी से उभारा जा सकता है?

भारत जैसे देश में तुलनात्मक रूप से उत्पादन क्रिया के दौरान मजदूरों पर होनेवाले खर्च में लगातार गिरावट आ रही है अर्थात देश की कुल पैदावार में मजदूरों के हिस्से केवल ६ प्रतिशत ही आता है जबकि उनकी संख्या ८४ करोड़ है. लेकिन खाने-पीने की बुनियादी चीजों के दामों में बढोत्तरी ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. मजदूरों के लिए जीवन-निर्वाह करना भी मुश्किल होता जा रहा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पूंजीपति एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण अनुसार भारत दुनिया के सबसे सस्ती मजदूरी वाले देशों में से एक है. उनके अनुसार यह स्थिति आगामी अठारह-बीस सालों तक बनी रहेगी. उनके अनुसार यहाँ की इस सस्ती श्रम का लाभ विश्व पूंजी को ही होना है.यहीं नहीं वे भारत को एक बड़ी मंडी के रूप में भी देखते हैं जहाँ माल खपाया जा सकता है. चीन के बाद भारत दूसरा देश है जहाँ विकास दर सबसे ऊँची है. लेकिन मजदूरों की मजदूरी में होनेवाली थोडी-बहुत बढोत्तरी बुनियादी वस्तुओं की कीमत के मुकाबले बढ़ने की अपेक्षा कम हों तो कैसे मजदूर अपना जीवन निर्वाह कर पायेगा? क्या  स्वयं पूंजीवादी के तर्कानुसार भी इस प्रकार का रवैया उचित है?

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गोरखपुर : अपने परिवारों समेत धरने पर बैठे महिला एवं पुरुष मजदूर

पूंजी के अपने तर्क अनुसार किसी भी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए जरूरी होता है कि मजदूरी में बढोत्तरी हो ताकि मजदूर ज्यादा वस्तुएं खरीद सकें. लेकिन गोरखपुर जैसे शहर में जहाँ मजदूर अपनी थोडी सी मजदूरी, रोजगार सुरक्षा और यूनियन बनाने के बुनियादी लडाई ही लड़ रहे हैं, उन्हें माओवादी कहना कहाँ तक उचित है? सबसे चिताजनक पहलू यह है की मजदूरों के बीच की हर तरह की बैचैनी का हल निकालने की बजाय उसे माओवादी-आतंकवादी कार्रवाई कहकर कुचलने की कोशिश की जाती है और उनके लीडरों पर झूठे केस बनाए जाते हैं और मजदूर नेताओं को जेलों में डाला जाता है.

उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करते समय देश की कार्यपालिका और न्यापालिका जैसी संस्थाओं का रवैया ज्यादा से ज्यादा मजदूर विरोधी होता गया है. गुडगाँव जैसे औद्योगिक नगर जहाँ एक मजदूर की मौत पर एक लाख मजदूरों की बड़ी संख्या सड़कों पर आ जाती , वहां पर भी मजदूरों को यूनियन तक बनाने की इजाजित नहीं है. रिको ऑटो कंपनी के संचालक मजदूरों के हड़ताल पर जाने और यूनियन बनाने को गैर-कानूनी कार्य कहते हैं. इसे ऐतिहासिक प्रसंग में देखें तो यह सही भी है क्योंकि मजदूरवर्ग की लहर के विपर्य के इस दौर में मजदूरों ने यूनियन बनाने, धरना देने, हड़ताल करने और गेट मीटिंगे औयोजित करने के अधिकारों को खो दिया है. उन्हें आज अपनों संघर्षों द्वारा जीते इन बुनियादी अधिकारों की रक्षा ही सबसे बड़ा कार्यभार लगता है जबकि वर्गों में विभाजित समाज में ये अधिकार भी उसी तरह गतिशील होते हैं जिस तरह समाज. अपने कालजयी संघर्षों द्वारा जीते गए इन अधिकारों को खो देना उन्हें निराश करता ही रहेगा जब तक वे स्वयं को राजनीतिक चेतना से चाकचौबंद नहीं करेंगे और इस वर्ग विभाजित व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन नहीं कर देंगे. गुडगाँव तो औद्योगिक उपक्रमों की हब है. इसके अलावा भारत के कोने-कोने में छोटे बड़े लाखों औद्योगिक उपक्रमों में देश के मजदूर वर्ग की आबादी का ९३ प्रतिशत भाग काम कर रहा है. मजदूरों की इस बड़ी तादाद को असंगठित मजदूर यानिकि वह मजदूर जो किसी मजदूर ट्रेड यूनियन का भाग नहीं है, कहते हैं. देश के इन छोटे और मझौले उपक्रमों में कार्य करनेवाले मजदूरों की बैचैनी ने हड़ताल और धरने  का रूप भी लेना है. पूंजीपतियों की आपसी गलाकाट होड़ के चलते और मंडी के उतार-चढाव और मंदी का ज्यादा असर छोटी पूंजी पर अधिक पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि  मजदूर वर्ग के हितों की अनदेखी करके इन उपक्रमों की रखवाली की जाये. लेकिन प्रशासन और सरकारी नुमाँईन्दो का इन पेटी-बुर्जुआ पूंजीपतियों और उनके गुंडों से साँठगाँठ   चिंता का विषय है. सरकार के लिए सोचने वाली बात यह भी है कि क्या मजदूरों और उनको नेताओं को माओवादी आतंकवादी कहकर झुट्ठे मुकद्दमों में फँसाना खुद पूंजीपति वर्ग या व्यवस्था के लिए ठीक है?

किसी प्रकार का आंतंकवाद चाहे वह धार्मिक मूलवादी खेमे की ओर से हो या वामपंथी दुस्साहसवाद के रूप में हो, निंदनीय है. सत्ताधारी वर्ग की दमनकारी नीतियाँ भी हर प्रकार का आतंकवाद पैदा करती हैं. सत्ताधारी वर्ग के राजकीय आतंकवाद  के परिणामस्वरूप धार्मिक मूलवादी आतंकवाद, दक्षिणपंथी आतंकवाद, वामपंथी आतंकवाद आदि, की फसल उगने की उपजाऊ भूमि तैयार होती है.हर किस्म का आतंकवाद मजदूर वर्ग की एकता और सांगठनिक क्षमता को कमजोर करता है… लेकिन गोरखपुर के स्थानीय प्रशासन द्वारा मजदूरों को माओवादियों से जोड़ना चिंता का विषय है. अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक  तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी. जी  पहले यह कह चुके हैं कि गोरखपुर में नक्सली नहीं है.

यूनिसेफ  की रिपोर्ट अनुसार पिछले ४० वर्षों के अन्तराल के बाद ग्लोबल वित्तीय संकट और ईंधन, भोजन और चारे की कीमतों में बढोत्तरी के कारण दक्षिण एशिया भूखमरी की उच्चतम शिखर को छू रहा है. इसमें कोई शक नहीं की उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी सेक्टरों और कृषि में भी बढ़िया विकास करते दिखाई गयी है लेकिन विडम्बना देखीए कि भरपूर अनाज पैदा होने के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा की हालत में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है. यह उपहास नहीं तो और क्या है कि उडीसा जैसे राज्य में अब भी लोग भूख से मर रहे हैं जबकि वेयरहाउस और गोदामों में अनाज सड रहा है?

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गोरखपुर : हड़ताल के दौरान सामूहिक रसोई

यहीं नहीं एम्.एस स्वामीनाथन रीसर्च फ़ाऊँडेशन (MSSRF) और विश्व खाद्य कार्यक्रम  (WFP) द्वारा एक रिपोर्ट तैयार करवाई गयी. इसमें कहा गया कि भोजन में प्रयाप्त पौष्टिक तत्त्वों की कमी के कारण  भारत का हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का शिकार है और ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2001 के अनुसार भारत का क्रमांक 94 है.

लेकिन पूंजीपति वर्ग खुश होता है कि विश्वमंदी  का भारत पर असर नहीं हुआ है. संसेक्स में फिर उछाल देखने को मिल रही है. प्रथम फिस्कल छमाही के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में ऑटो सेक्टर की विक्री में बढोत्तरी १४.५१ प्रतिशत रही है. इस प्रकार की बातें पूंजीपति लोगों और उनकी सरकारों को अच्छी लगती हैं. लेकिन ऑटो सेक्टर की हब रहे गुडगाँव जैसे शहर में पूंजीपतियों के किराये के गुंडों के हाथों होनेवाली मजदूर की मौत के बाद एक लाख मजदूरों का प्रदशर्न उन्हें परेशान कर देता है. तेरह-तेरह वर्षों से कार्यरत पंकज कुमार सिंह जैसे मजदूर अपनी मजदूरी से संतुष्ट नहीं हैं. अपनी जायज मांगों को मनमाने के लिए जब वे यूनियन बनाने की पहलकदमी करते हैं तो मैनेजमेंट स्थानीय प्रशासन और अपने निजी गुंडों की मदद से उन्हें दबाने की कोशिश करती है. पूंजीपतियों की मुनाफा कमाने की हवस मजदूरों को इंसान समझती ही नहीं. उन्हें तो चाहिए इन्सान के रूप में एक ऐसा मशीन का पूर्जा जो मशीन के दूसरे पूर्जों से मिलकर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करे. पूंजीपति यह देख ही नहीं पाते कि मशीन और इन्सान में बुनियादी फर्क है. मशीन अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष पैदा नहीं कर सकती. यह केवल मजदूर की श्रम-शक्ति से ही संभव होता है. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपतियों का मुनाफा, मैनेजमेंट के खर्चे और कार्पोरेट टैक्स जिससे सरकारे चलती हैं, आता है.

गुडगाँव की रिको ऑटो कंपनी के मजदूर की हत्या पर भारत की न्यूज एजेंसी पी.टी.आई . अपनी टिपण्णी में यह बात स्वीकार करती है कि गुडगाँव-मानेसर बेल्ट में मजदूर असंतोष कोई नई बात नहीं है. पहले २००० में मारुती उद्योग की मजदूरों की तीन महीने की हड़ताल और फिर २००५ में होंडा मोटर्स एंड स्कूटर के मजदूरों पर पुलिस द्वारा अधाधुंध लाठीचार्च जिसमें १६७ मजदूरों के घायल हुए थे, को नोट करते हुए पला झाड़ लेती है जैसे यह रूटीन की सामान्यतय घटने वाली बातें हों. लेकिन स्थिति का दूसरा पहलू यह भी है कि २००० और फिर २००५ और अब २००९ में मजदूरों का एकसाथ इतनी बड़ी तादाद में खड़े हो जाना, और फिर इन वर्षों के बीच का अन्तराल इतना बड़ा नहीं है कि इतिहास के लिए यह कोई दूर की बात हो. मजदूर वर्ग के असंतोष और वैचैनी के यहीं वे सिग्नल हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग द्वारा ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग की हमदर्द पार्टियों और बुद्धिजीवियों द्वारा नज़रंदाज किया जाता है. मजदूरों के प्रारंभिक सिग्नल भले ही किसी नज़दीक की क्रांति की और संकेत नहीं करते लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग को इन्हीं सिग्नलों को समझना है और इतिहास में अपने स्थान और जिम्मेदारी का भलीभांति निर्वाह करना है.

गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता
गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता

आज मजदूर वर्ग और क्रांतिकारी खेमा अलगाव और विखराव का शिकार है. लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी चुप्पी साधे हुए है. बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का समर्थन और हमदर्दी हमेशा मजदूरवर्ग से रही है. अपनी उच्चतम बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी बुद्धिजीवी लोग अपने स्वयं के वर्ग की सीमाओं को तोड़कर मजदूरों के साथ खड़े होते रहें है. बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा स्वयं को मजदूर वर्ग से अपने आप को अभेद भी पाता रहा है. लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. क्या भारत का बुद्धिजीवी इतना आत्मसंतुष्ट हो सकता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर हाँ  में है तो उसके बुद्धिजीवी होने पर प्रश्नचिह्न लगता है! लेकिन इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होती और न हो सकती है. समाजवादी खेमे के ढह-ढेरी हो जाने  के बाद हम भी मानते हैं कि समाज को आगे की ओर गति देने वाले आंदोलनों या क्रांतियों की प्रासंगिगता पर प्रश्न चिह्न लगा था और पूंजीवाद के अजर-अमर होने के भ्रम को भी खूब हवा मिली थी. अब स्थिति वैसी भी नहीं है. पूंजीवादी एक के बाद एक नए संकटों में फंसता जा रहा है. बुद्धिजीवियों के स्तर के अनुसार पूंजीवाद में भी ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें एक पल के लिए भी संतुष्ट कर पाए. इस प्रकार की स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रह सकती. यह बुद्धिजीवी वर्ग ही होता है जिसने सबसे पहले अपनी चुप्पी तोड़नी होती है क्योंकि अपनी संवेदनशीलता के कारण वहीँ पहला वर्ग होता है जो सबसे पहले टूटता है.

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गोरखपुर : इस पूरे आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया

देश में चुनाव हों लेकिन बुनियादी मुद्दे गायब हों ! एक ऐसा वक्त जब आम जनता अपने जिंदा रहने की लडाई लड़ रही हो और चुनावों में भाग लेनेवाली पार्टियों की ओर से अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जाना ! इसके अलावा राजनीतिक दलों की बहसों का स्तर इतना निम्न स्तर का कि बुद्धिजीवी तो क्या आम आदमी भी इसका नोटिस लेने से नहीं बच पाया. विचारधारात्मक, सैद्धांतिक और राजनीतिक बहस सिरे से ही गायब थी. सामाजिक बहस में भी मुद्दे गायब थे. केवल जोड़तोड़ या तिकड़म द्वारा किस दल की सरकार बनेगी, जैसी चर्चाओं पर अटकलबाजी होती रही. इस प्रकार की स्थिति पर  देश के बुद्धिजीवी वर्ग का मूक दर्शक बने रहना नागरिक समाज के लिए नुकसानदेय है. इतिहास में उसे अपनी भूमिका और स्थान की पहचान करनी ही होगी.

पूंजीपतियों के गुंडों द्वारा गुडगाँव में मजदूर की हत्या और गोरखपुर के मजदूर और मजदूर नेताओं पर झूठे मुकद्दमे निंदनीय हैं. मजदूर वर्ग के हितों पर इस प्रकार का कुठारघात असहनीय है. पूंजीपति इसके लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने पर तुले हुए हैं. हमारे पडौसी देश नेपाल जहाँ पशुओं की हत्या और अत्याचार पर रोक संबंधी बहस चल रही है और हमारे यहाँ मजदूरों पर इस तरह के जुर्म किये जा रहे हैं. नेपाल जैसे पिछडे देश के साथ तुलना करते समय हमारा सीना गर्व से फूल जाता हैं लेकिन अपने ही देश में पशुओं पर नहीं बल्कि इंसानों और मजदूरों पर होनेवाले जुर्म पर हम मूक बने रहते हैं, क्या इस प्रकार की स्थिति शोभनीय है? बुद्धिजीवी वर्ग को सोचना होगा कि सभ्य समाज को इस वक्त अगर कोई खतरा है तो वह पूंजीपतियों के गुंडों की दहशत और प्रशासनिक मिलीभगत से ही है. उसे अपना प्रतिरोध दर्ज करवाना होगा. यही समय की मांग है.

उपरोक्त पोस्ट पर लगी हुई सभी तस्वीरें नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ से धन्यवाद सहित ली गयी हैं.

गोरखपुर के मजदूर संघर्ष से संबंधित पोस्टें :

प्रथम अरविन्द स्मृति संगोष्ठी कार्यक्रम

Posted on Updated on

(24 जुलाई, 2009)

विषय

भूमण्डलीकरण के दौर में

श्रम कानून और मज़दूर वर्ग के

प्रतिरोध  के नये रूप

भूमण्डलीकरण पर विमर्श अभी भी अकादमिक जगत में प्रचलित फैशन बना हुआ है। लेकिन साथ ही यह उन लोगों के लिए भी अध्ययन-मनन और विचार-विमर्श का एक केन्द्रीय विषय है, जो व्यापक मेहनतकश जनसमुदाय की मुक्ति से जुड़े प्रश्नों पर जेनुइन सरोकार के साथ सोचते हैं या जो मज़दूर आन्दोलन को नयी ज़मीन पर फिर से खड़ा करने के अनथक प्रयासों में जुटे हुए हैं।

विगत शताब्दी के लगभग अन्तिम दो दशकों के दौरान वित्तीय पूँजी के वैश्विक नियंत्रण एवं वर्चस्व के नये रूपों एवं संरचनाओं के सामने आने के साथ ही पूँजी की कार्यप्रणाली में जो व्यापक और सूक्ष्म बदलाव आये तथा अतिलाभ निचोड़ने की जो नयी प्रविधियां विकसित हुई, कुल मिलाकर इनको ही भूमण्डलीकरण परिघटना का केन्द्रीय संघटक अवयव माना जाता है। यही वह समय था जब विपर्यय और प्रतिक्रिया की लहर विश्वव्यापी बन चुकी थी। बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रान्तियों की पराजय के बाद, पूँजीवाद के पक्षधर सिद्धांतकार और प्रचारक धर्मशास्त्रियों की तरह पूँजीवाद के अमरत्व की घोषणा कर रहे थे। कहने की ज़रूरत नहीं कि विश्वव्यापी मन्दी के वर्तमान दौर ने पूँजीवाद के असाध्य ढाँचागत संकट की गम्भीरता दर्शाकर इस मिथक को ध्वस्त कर दिया है। लेकिन पूँजी का भूमण्डलीय तन्त्र अपने आन्तरिक संकटों से स्वयं ही टूट-बिखरकर किसी नये ढाँचे के लिए जगह नहीं बना देगा। यह अपनी जड़ता की शक्ति के सहारे तबतक चलता रहेगा और अपना आंशिक पुनर्गठन करता रहेगा, जबतक कि श्रम की शक्तियाँ सुनियोजित प्रयासों से इसे तोड़कर नये ढाँचे का निर्माण नहीं करेंगी।

विचारणीय प्रश्न यह है कि छिटपुट मुठभेड़ों, असंगठित- स्वयंस्फूर्त प्रतिरोधों और आत्मरक्षात्मक उपक्रमों के अतिरिक्त मज़दूर वर्ग आज कहीं भी पूँजी के संगठित हमलों एवं दबाव का प्रभावी ढंग से उत्तर नहीं दे पा रहा है। अपने ऐतिहासिक मिशन और दूरगामी राजनीतिक संघर्ष को आगे बढ़ा पाना तो दूर, मज़दूर वर्ग अपने तात्कालिक एवं आंशिक हितों की लड़ाई को, आर्थिक माँगों एवं सीमित जनवादी अधिकारों की लड़ाई को भी प्रभावी ढंग से संगठित नहीं कर पा रहा है। यह एक जलता हुआ सवाल है, जिसके रूबरू हम-आप खड़े हैं!

अक्सर ऐसा होता है कि अतीत के शानदार और सफल संघर्षों से सम्मोहित होकर हम उनका अनुकरण करने लगते हैं। इसके पीछे एक कारण परिवर्तन के लिए हमारी व्यग्रता का होना भी होता है, जबकि ज़रूरत इस बात की होती है कि नये बदलावों का अध्ययन किया जाये और नयी राहों का संधान किया जाये। उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के मज़दूर आन्दोलनों के अनुभवों का अध्ययन-समाहार ज़रूरी है, पर उन्हीं की प्रतिछवि में आज के मज़दूर आन्दोलन को नहीं देखा जा सकता। हमें निरन्तरता और परिवर्तन के द्वन्द्व को सही ढंग से समझना होगा।

इक्कीसवीं सदी में पूँजी की कार्य-प्रणाली वही नहीं है जो बीसवीं शताब्दी में थी और उसमें कई बुनियादी ढाँचागत बदलाव भी आये हैं। इस स्थिति में, ज़ाहिर है कि श्रम के पक्ष को भी प्रतिरोध के तौर-तरीकों और रणनीति में कुछ बुनियादी बदलाव लाने होंगे। स्वचालन और अन्य नयी तकनीकों के सहारे पूँजी ने अतिलाभ निचोड़ने के नये तौर-तरीके विकसित कर लिये हैं। ज्यादातर मामलों में, बड़े-बड़े कारखानों में मज़दूरों की भारी आबादी के संकेन्द्रण का स्थान कई छोटे-छोटे कारखानों में मज़दूरों की छोटी-छोटी आबादियों के बिखराव ने ले लिया है। किसी एक माल के दस हिस्से न सिर्फ एक देश के दस हिस्सों में बल्कि दुनिया के दस देशों में बिखरे संयंत्रों में बनते हैं और फिर ग्यारहवीं जगह आपस में जुड़ते हैं। इसे इन दिनों प्राय: `ग्लोबल असेम्बली लाइन´ या `विखण्डित असेम्बली लाइन´ कहा जाता है। प्राय: इन सभी कारख़ानों में अधिकांश मज़दूर ठेका, दिहाड़ी, कैजुअल होते हैं या पीसरेट पर काम करते हैं। कुशल मज़दूरों की एक बहुत छोटी आबादी ही नियमित की श्रेणी में आती है। कम मज़दूरी देकर स्त्रियों और बच्चों से काम लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इन्हीं नयी चीज़ों को आज श्रम के अनौपचारिकीकरण, परिधिकरण, ठेकाकरण, स्त्रीकरण आदि नामों से जाना जाता है। तात्पर्य यह कि कई तरीकों से मज़दूरों की संगठित शक्ति और चेतना को विखण्डित करने के साथ ही कई स्तरों पर मज़दूरों को आपस में ही बाँट दिया गया है और एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है। संगठित बड़ी ट्रेड यूनियनें ज्यादातर बेहतर वेतन और जीवनस्थितियों वाले नियमित मज़दूरों और कुलीन मज़दूरों की अत्यन्त छोटी-सी आबादी के आर्थिक हितों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं।

भूमण्डलीकरण के दौर ने राष्ट्र-राज्य की भूमिका का भी पुनर्निर्धारण किया है। पूँजी की आवाजाही के लिए राष्ट्र-राज्यों की सीमाएँ ज्यादा से ज्यादा खुल गयी हैं जबकि श्रम की आवाजाही की बंदिशें और शर्तें बढ़ गयी हैं। निजीकरण की अंधाधुंध मुहिम में शिक्षा, स्वास्थ्य आदि – सबकुछ को उत्पाद का दर्जा देकर बाज़ार के हवाले कर दिया गया है, लेकिन श्रम को नियंत्रित करने के मामले में सरकार, नौकरशाही और न्यायपालिका ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने लगी हैं। यूँ तो बुर्जुआ श्रम कानून पहले भी मज़दूरों के आर्थिक हितों और राजनीतिक अधिकारों की सीमित हिफाजित ही कर पाते थे, पर आज श्रम कानूनों और श्रम न्यायालयों का जैसे कोई मतलब ही नहीं रह गया है। लम्बे संघर्षों के बाद रोज़गार-सुरक्षा, काम के घण्टे, न्यूनतम मज़दूरी, ओवरटाइम, आवास आदि से जुड़े जो अधिकार मज़दूर वर्ग ने हासिल किये थे – वे उसके हाथ से छिन चुके हैं और इन मुद्दों पर आन्दोलन संगठित करने की परिस्थितियाँ एकदम वैसी ही नहीं हैं, जैसी आज से सौ या पचास साल पहले थीं।

मज़दूर आन्दोलन से जुड़े इन सभी प्रश्नों और समस्याओं को एक साथ रखने का मतलब यह कतई नहीं है कि हमारा दृष्टिकोण निराशावादी है। बल्कि हम वैज्ञानिक और यथार्थवादी अप्रोच एवं पद्धति अपनाकर सामने उपस्थित समस्याओं का सिद्धांत एवं व्यवहार के धरातल पर हल निकालना चाहते हैं और वर्तमान गतिरोध् को तोड़ने की कोशिशों को गति देना चाहते हैं। यहाँ हमने आज के दौर में मज़दूर आन्दोलन के समक्ष उपस्थित समस्याओं-चुनौतियों के बारे में संक्षिप्त चर्चा की है। प्रस्तावित संगोष्ठी में सिर्फ इन समस्याओं पर ही नहीं, बल्कि मज़दूर आन्दोलन के नये रूपों और नयी रणनीतियों पर भी सहभागियों के साथ मिलबैठकर बात करेंगे |

यह संगोष्ठी हम अपने प्रिय दिवंगत साथी अरविन्द सिंह की स्मृति में आयोजित कर रहे हैं। 24 जुलाई, 2009 साथी अरविन्द की पहली पुण्यतिथि है। गत वर्ष इसी दिन, उनका असामयिक निध्न हो गया था। तब उनकी आयु मात्र 44 वर्ष थी। वाम प्रगतिशील धारा के अधिकांश बुद्धिजीवी, क्रान्तिकारी वामधारा के राजनीतिक कार्यकर्ता और मज़दूर संगठनकर्ता साथी अरविन्द से परिचित हैं। वे मज़दूर अख़बार `बिगुल´ और वाम बौद्धिक पत्रिका `दायित्वबोध´ से जुड़े थे। छात्र-युवा आन्दोलन में लगभग डेढ़ दशक की सक्रियता के बाद वे मज़दूरों को संगठित करने के काम में लगभग एक दशक से लगे हुए थे। दिल्ली और नोएडा से लेकर पूर्वी उत्तरप्रदेश तक कई मज़दूर संघर्षों में वे अग्रणी भूमिका निभा चुके थे। अपने अन्तिम समय में भी वे गोरखपुर में सफाईकर्मियों के आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। उनका छोटा किन्तु सघन जीवन राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। `भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम कानून और मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध के नये रूप´ जैसे ज्वलन्त और जीवन्त विषय पर संगोष्ठी का आयोजन ऐसे साथी को याद करने का शायद सबसे सही-सटीक तरीका होगा। हम सभी मज़दूर कार्यकर्ताओं, मज़दूर आन्दोलन से जुड़ाव एवं हमदर्दी रखने वाले बुद्धिजीवियों और नागरिकों को इस संगोष्ठी में भाग लेने के लिए गर्मजोशी एवं हार्दिक आग्रह के साथ आमंत्रित करते हैं। हमें विश्वास है कि आन्दोलन की मौजूदा चुनौतियों पर हम जीवन्त और उपयोगी चर्चा करेंगे।

सधन्यवाद ,

साभिवादन,

कात्यायनी

अध्यक्ष

राहुल फाउण्डेशन

कार्यक्रम

प्रथम सत्र

पूर्वाह्न 11 बजे से 2 बजे तक

भोजनावकाश

अपरांत 2 से 2.30 बजे तक

द्वितीय सत्र

अपरांत 2.30 से सायं 7.30 बजे तक

प्रथम अरविन्द स्मृति संगोष्टी

(24 जुलाई 2009)

comrade-arvind

विषय

भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम कानून और मज़दूर

वर्ग के प्रतिरोध के नये रूप

स्थान:

गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान सभागार

दीनदयाल उपाध्याय मार्ग

(निकट आई.टी.ओ.)

नई दिल्ली

संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों से मज़दूर संगठनकर्ताओं, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं, श्रम कानूनों के विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों के भाग लेने की पुष्टि हो चुकी है। आपसे हमारा पुरज़ोर अनुरोध् है कि जल्द से जल्द अपनी भागीदारी की पुष्टि करें और अपने आने की सूचना दें।

गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान सभागार

नई दिल्ली

सुबह 11 बजे से शाम 7.30 बजे तक

आप सादर आमंत्रित हैं!

सम्पर्क:

कात्यायनी (0522-2786782)

सत्यम (099104 62009 / 011-2783 4130)

आयोजक:

राहुल फाउण्डेशन


सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र का विकास और क्रांति

Posted on Updated on

30.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

“वर्ग विरोध पर आधारित समाज में शोषित वर्ग अनिवार्यत: विद्यमान रहता है. इसलिए शोषित वर्ग की मुक्ति से नए समाज का निर्माण होता है. शोषित वर्ग की मुक्ति के लिए आवश्यक है कि विद्यमान उत्पादक शक्तियों  और प्रभावी सामाजिक सम्बन्ध परस्पर अनुकूल न हों. उत्पादन के औजारों में क्रांतिकारी वर्ग स्वयं सर्वाधिक ताकतवर उत्पादक शक्ति बन जाता है. क्रांतिकारी तत्त्वों के एक वर्ग के रूप में संघठन के लिए आवश्यक है कि पुराने समाज में समस्त उत्पादक शक्तियों का हर सम्भव विकास वास्तव में पूरा हो गया हो. तब क्या हम इस विचार को लें उडे कि पूर्व समाज के ध्वंस से दूसरे वर्ग का प्रभुत्व स्थापित हो जायेगा? कि इस नए प्रभुत्व की परिणति एक नयी राजनीतिक सत्ता की स्थापना में होगी? बिलकुल नहीं. मेहनतकश वर्ग की मुक्ति की यह अनिवार्य शर्त है कि समस्त वर्गों का खत्म हो जाये. पूर्व इतिहास में इसका सटीक उदाहरण मिलता है. राज्य से समस्त वर्गों, समस्त श्रेणियों के उन्मूलन से ही तीसरे वर्ग यानी बुर्जुआ वर्ग की मुक्ति का सवाल हल हुआ.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ.137)

सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र के प्रश्न पर आगे की टिपण्णी (42) में और अधिक विचार किया जायेगा. यहाँ पर पाठकों को मात्र यह याद दिलाने की ज़रुरत है कि घोषणापत्र के रचयिताओं ने ‘राष्ट्रीय’ शब्द का प्रयोग शासकीय और राज्यक्षेत्र के अर्थ में किया था. जब वे वर्ग संघर्ष के “मुख्यतया राष्ट्रीय” होने की चर्चा करते हैं तब उनका आशय यह होता है कि यह संघर्ष फ्रांस, इंग्लैंड, बेल्जियम आदि राष्ट्र-राज्यों की सीमा के अन्दर होता है. बुर्जुआ वर्ग को पराजित करने के लिए आवश्यक है कि सर्वहारा इस संघर्ष में अन्य देशों के सर्वहारा को मित्र के रूप में लामबंद करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध छेड़ दे. लेकिन ऐसा करने के पहले उसे अपने देश के बुर्जुआ से निपटना पड़ता है. दूसरा इंटरनेशनल इसलिए असफल हो गया क्योंकि इसके नेताओं ने ‘पितृभूमि की रक्षा’ के नारे को अपना लिया था जिसके तहत शुरुआत तो विदेशी बुर्जुआ को नष्ट करने से होनी थी लेकिन इसमें न केवल सीमा पार के सर्वहारा बंधुओं बल्कि अपने सह-राष्ट्रीय सर्वहारा बंधुओं को अपनी  तरफ करना ज़रूरी था. भीषणतम गृहयुद्धों में, क्रांति की अवधि में, राष्ट्रों के बीच अत्यधिक धर्मांध संघर्षों में, यहाँ तक कि इतिहास की पूरी अवधि में, इतना अधिक खून नहीं बहा है, इतनी अधिक जानें नहीं गयी हैं जितना कि हाल के विश्वयुद्ध में खून बहा है और जानें गयी हैं. ठीक उन्हीं लोगों ने इस विश्वयुद्ध का समर्थन किया था जिन्होंने अपने देश में बुर्जुआ सत्ता को बलात उखाड़ फेंकने से इस भय से इंकार कर दिया था कि इससे रक्तपात हो सकता है.

“विकास के दौरान मेहनतकश वर्ग पुराने बुर्जुआ समाज के स्थान पर एक ऐसा समाज स्थापित करेगा जिसमें वर्गों और वर्ग विरोध का लोप हो जायेगा. चूँकि राजनीतिक सत्ता बुर्जुआ समाज में विद्यमान विरोधों की आधिकारिक अभिव्यक्ति होती है, मात्र इसलिए सामान्य अर्थों में कोई राजनीतिक सत्ता नहीं होगी. उस वक्त तक सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच शत्रुता तो भिन्न वर्गों के संघर्ष के रूप में लेकिन बनी रहती है. जब यह संघर्ष अपने चर्म पर पहुँचता है तो क्रांति में तब्दील हो जाता है. क्या हमें यह जानकर आर्श्चय होना चाहिए कि वर्ग शत्रुता पर आधारित समाज का अंत सशस्त्र भिडंत से होगा और आमने-सामने की लडाई से इसका विघटन होगा? यह दावा नहीं किया जा सकता कि सामाजिक आन्दोलन राजनीतिक आन्दोलन का निषेध करता है. अभी तक कोई ऐसा राजनीतिक आन्दोलन नहीं हुआ जो सामाजिक आन्दोलन न रहा हो, जो सामाजिक आन्दोलन के साथ न चलता हो. केवल ऐसी सामाजिक अवस्था में, जिसमें वर्गों और वर्ग शत्रुता का अस्तित्व ही नहीं होगा, समाजिक विकास क्रांति का रूप धारण करना बंद कर देगा. लेकिन तब तक, हर बार जब समाज में व्यापक कायापलट होने वाली होती है, तब सामाजिक विज्ञान का निष्कर्ष जॉर्ज सान्द (1804-1876) के शब्दों में यह होगा — युद्ध या मौत : खूनी संघर्ष या विनाश, यही है वह विकल्प जिससे बचा नहीं जा सकता.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ.137-138)

सर्वहारा वर्ग, “जन-साधारण” और किसान वर्ग – शोषण के रूपों का महत्त्व

Posted on Updated on

28.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

सर्वहारा वर्ग के शोषण का चरित्र और स्तर अन्य उत्पीडित तथा शोषित वर्गों से भिन्न होता है. माल उत्पादन के अर्न्तगत अर्थात पूंजीवाद (माल उत्पादन का वह रूप जिसमें माल के रूप में मानव श्रम बाज़ार में आता है) के अर्न्तगत केवल सर्वहारा शोषण की असली बुनियाद के खिलाफ लड़ता है क्योंकि अन्य वर्गों की अपेक्षा सर्वहारा वर्ग माल उत्पादन से अधिक प्रभावित होता है. माल उत्पादन के व्यवस्था में सर्वहारा वर्ग खुद की बिक्री से, अपनी श्रमशक्ति की बिक्री से अपनी गुज़र करता है जबकि अन्य उत्पीड़ित वर्ग (प्रत्येक किस्म के निम्न-बुर्जुआ, किसान, स्वतन्त्र कारीगर) का माल उत्पादन से कोई विरोध नहीं होता है. अपनी निम्नवर्गीय स्थिति के चलते वे केवल उन बंधिशों को ख़त्म करना चाहते हैं जो स्पर्द्धा के क्षेत्र में उनके उत्पाद को प्रतिकूल स्थिति में पहुंचा देती हैं.

इसलिए यह तथ्य कि सर्वहारा को गुलाम बना लिया जाता है, प्रधान महत्त्व का प्रश्न नहीं है. अन्य वर्ग भी इसी तरह गुलाम बनाये जाते हैं. गुलाम बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया तरीका और गुलामी जो शक्ल अख्तियार करती है, वही महत्त्वपूर्ण होता है;  क्योंकि गुलामी का रूप बदल जाने से गुलाम की मानसिकता बदल जाती है यानि वे विचार बदल जाते हैं जो गुलाम के मस्तिष्क में पैदा होते हैं या पैदा हो सकते हैं. उस वक्त भी जब अपने वर्गीय हितों के बावजूद निम्न-बुर्जुआ और कृषक वर्ग का दृष्टिकोण उन्हें शासक वर्गों के अनिच्छुक मित्र बना देता है यानि पूंजीवादी समाज के अन्य अधिकांश लोगों की भांति निजी मालिकाने की व्यवस्था उन्हें भी मानव मुक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अंतिम सीमा मालूम पड़ने लगती है तब सर्वहारा का दृष्टिकोण अपने हितों के और भी अनुकूल बनता जाता है. इसकी वजह घोषणापत्र में इन शब्दों में व्यक्त की गयी है,

“आज बुर्जुआ के मुकाबले में जितने वर्ग खड़े हैं उनमें से केवल सर्वहारा ही वास्तव में क्रांतिकारी वर्ग है. बड़े पैमाने के उद्योग के विकास के साथ अन्य वर्ग क्षीण होते जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं लेकिन सर्वहारा वर्ग उद्योग का सर्वाधिक विशिष्ट उत्पाद है.”

सर्वहारा शब्द के आधुनिक बोध में बड़े पैमाने के उद्योग का एक उत्पाद है. जैसे-जैसे बड़े पैमाने के उद्योग का विस्तार होता जाता है, उसकी संख्या में वृद्धि होती जाती है. लेकिन संख्या में यह वृद्दि एकमात्र महत्त्व की वस्तु नहीं है. पुराने समय में भी जनता आन्दोलन करती थी. आन्दोलन की क्षमता उसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है और सर्वहारा एक नए किस्म का उत्पीड़ित और दमित समूह है. जबकि पूंजीवाद के विकास के साथ मेहनतकशों के अन्य वर्गों का महत्त्व घटता जा रहा है, उत्पादन के सामान्य संगठन में एक महत्तवपूर्ण घटक के रूप में सर्वहारा का महत्त्व बढ़ता जा रहा है. अन्य उत्पीड़ित वर्गों की उर्जा बिखरी होती है और इसका उपयोग सामाजिक संरचना के व्यापक रूप से पृथक कई अंगों पर ही किया जा सकता है लेकिन सर्वहारा की उर्जा कुछ महत्तवपूर्ण बिन्दुओं पर केन्द्रित होती है जो सर्वहारा जैसे शिल्पगत पूर्वाग्रह, धार्मिक कट्टरपन, राष्ट्रीय भावनाओं आदि से वे छुटकारा पा लेते हैं और इस प्रकार वे बेहतर जीवन के लिए संघर्ष करने वाली महान सेना के रूप में ज्यादा आसानी से संयुक्त हो जाते हैं.

नरोदवादियों या लोकरंजकवादियों को हमारी “संकीर्ण” मार्क्सीय शब्दावली से नफ़रत है. वे अक्सर “जनता” शब्द का प्रयोग करते हैं. आर्थिक विकास के दौरान यह जनता कई टुकडों में बंट जाती है जिनके अपने अलग-अलग विशिष्ट हित होते हैं. दूसरी ओर सर्वहारा जिसके सदस्य मूलत: आबादी के विभिन्न संस्तरों से आते हैं, आर्थिक विकास के दौरान समान हितों वाले व्यक्तियों से गठित एक एकीकृत इकाई में तब्दील हो जाते हैं. निस्संदेह अन्य उत्पीडित वर्ग भी होते हैं जिनका क्रांतिकारी महत्त्व होता है. लेकिन उनके क्रांतिकारी महत्त्व की वजह यह होती है कि

“वे अपनी वर्ग स्थिति से फिसलकर नीचे सर्वहारा की कतारों में पहुँच जाने से डरते हैं. इस प्रकार वे अपने वर्तमान हितों की नहीं बल्कि भावी हितों की रक्षा करते हैं और सर्वहारा के दृष्टिकोण को अपनाने के लिए अपने दृष्टिकोण का परित्याग कर देते हैं.”

सर्वहारा की वर्गीय विचारधारा को काम के बोझ से दबे मेहनतकश लोग बड़ी तादाद में अपनाने लगते हैं. सम्पूर्ण मानव जाति की मुक्ति के लिए संघर्षरत आन्दोलन की अगुआई मुट्ठीभर चिन्तक नहीं करते हैं बल्कि यह काम अपने ऐतिहासिक मिशन के प्रति सुचेत सर्वहारा वर्ग की शक्तिशाली सेना करती है.

निम्न-बुर्जुआ को सर्वहारा दृष्टिकोण अपनाने के लिए बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है. इसे जानने के लिए हमें सिर्फ अपने चारों ओर नज़र डालने की ज़रुरतभर है. जर्मन सेंटर पार्टी या इतालवी पीपुल्स पार्टी जैसी विभिन्न राष्ट्रवादी, यहूदी-विरोधी और पुरोहितवादी पार्टियों पर गौर कीजिए. इन पार्टियों का बहुलांश कारीगरों और किसानों से मिलकर बना है. व्यक्तिगत संपत्ति में वृद्धि और उसे सुदृढ़ बनाकर अपनी तकदीर संवारने की आशा का परित्याग करना उनके लिए बहुत कठिन होता है. सर्वहारा दृष्टिकोण को अपनाने के लिए उन्हें विकास के ऊँचे धरातल पर पहुंचना ज़रूरी होता है.

पहले ही बताया जा चूका है कि आधुनिक मेहनतकश वर्ग किस तरीके से अस्तित्व में आया और कैसे बड़े पैमाने के उद्योग ने उन हालत को पैदा किया जिन्होंने एक पृथक वर्ग के रूप में इसके गठन की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया था. मजदूरों के लिए पूंजी की सत्ता समान जीवन स्थिति और साझा हित का सृजन करती है. मालिक किसान एकदम भिन्न स्थिति में जीते हैं. फ्रांसीसी किसान को उदाहरण के रूप में लेकर मार्क्स इसका ब्यौरा इस प्रकार देते हैं :

“फ्रांसीसी आबादी में छोटी जोत वाले किसान बहुसंख्यक हैं. पूरे देश में वे समान स्थिति में जीते हैं लेकिन उनके बीच सम्बन्ध बहुत कम बन पाते हैं. उनकी उत्पादन प्रणाली प्रारंभिक सम्बन्ध बनाने की बजाय उन्हें एक-दूसरे के अलग रखती है. फ्रांस में संचार साधनों की अपर्याप्तता और किसानों की गरीबी उनके अलगाव को ज्यादा तीखा बना देती है. उनकी जोत इतनी छोटी होती है कि श्रम विभाजन की संभावना बहुत कम होती है और वैज्ञानिक ढंग से खेती करने की कोई गुंजाईश नहीं होती है. इसलिए किसान समुदाय में विकास की विविधता, बुद्धिकौशल और विशिष्टीकरण और सामाजिक संबंधों की संपन्नता का अभाव होता है क्योंकि अपने उपभोग की अधिकांश वस्तुएं अपने भूखंड से पैदा कर लेता है. इस प्रकार अपनी ज़िन्दगी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए वह सामाजिक संसर्ग पर उतना निर्भर नहीं रहता है बल्कि प्रकृति के साथ आदान-प्रदान से इन्हें पूरा करता है. एक छोटी सी जोत पर निर्भर एक किसान और उसका परिवार यहाँ है, एक छोटी सी जोत के साथ एक किसान और उसके बीवी-बच्चे वहाँ हैं. करीब बीसेक ऐसे अणुओं के समूह से एक गाँव बनता है और कई गांवों के समूह से एक जिला बनता है. फ्रांसीसी राष्ट्र का विराट जन-समुदाय तुल्य परिमाणों के साधारण योग से मिलकर बना है ठीक उसी तरह जिस तरह बोरे में भरे ढेर सारे आलूओं से एक बोरा आलू बनता है. लाखों किसान परिवार ऐसी आर्थिक स्थिति में जीते हैं और उनकी जीवन पद्धति, उनके हितों और उनकी संस्कृति को अन्य वर्गों से पृथक करती है और उन्हें कमोवश अन्य वर्गों के विरोध में खड़ा कर देती है. इस दृष्टिकोण से ये किसान परिवार एक वर्ग का गठन करते हैं. इन किसानों के बीच अंतरसंबंध केवल स्थानीय स्वर बनता है और उनके हितों की एकरूपता समुदाय, राष्ट्रीय सम्बन्ध-सूत्र या राजनीतिक संगठन के रूप में अभिव्यक्त नहीं होती है. इस दृष्टिकोण से ये किसान एक वर्ग का गठन नहीं करते हैं. इसलिए संसद या कांग्रेस के माध्यम से अपने बलबूते अपने वर्ग हितों का दावा पेश करने में वे सफल नहीं हो पाते हैं. वे अपना प्रतिनिधित्व खुद नहीं कर पाते हैं और कोई दूसरा ही उनका यह काम करता है. जो कोई भी उनका स्वामी और मालिक बन जाये, उन पर प्रभुता हासिल कर ले, अप्रतिबंधित शासकीय शक्तियों का उपयोग करे, अन्य वर्गों से उनकी रक्षा करे और असमान से उनके लिए धूप और वारिश भेजता रहे, वही उनका प्रतिनिधि बन सकता है. इसलिए किसानों की राजनीतिक आकांक्षा की अंतिम अभिव्यक्ति वह कार्यकारी सत्ता होती है जो पूरे समाज को अपने निरंकुश शासन के अधीन कर लेती है.” (मार्क्स, द एटीन्थ ब्रूमेर ऑफ़ लुई बोनापार्ट, पृ. 132-33)

अपने अस्तित्व में इन्हीं स्थितियों के चलते, कृषक वर्ग साझा नीति को आगे बढाने के काम से तालमेल नहीं बिठा पाते हैं. 1381 के दौरान वाट टायलर (जिसे 1381 में मार दिया गया) के नेतृत्व में किसान आन्दोलन इंग्लैंड में चला, 1358 में फ्रांस में विद्रोह हुआ और 1525 में जर्मनी में महान किसान युद्ध हुआ. इन सभी कथित किसान युद्धों को तभी राजनीतिक महत्त्व मिल पाया जब अस्थाई तौर पर ही सही, किसानों ने अपनी शक्ति को आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे नगरों के आन्दोलन से जोड़ दिया. यह कहा जा सकता है कि आबादी के हिस्से के रूप में किसानों के साझा हित हो सकते हैं लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उनके हित सदैव समान होते हैं . वे एक जन के रूप में तभी उठ खडे होते हैं जब अत्यधिक दरिद्रता उन्हें सभी जगह घेर लेती है और विद्यमान सामाजिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली उन पर ऐसा ताज़ा आघात करती है जिससे उनका सब्र का प्याला छलक जाता है. स्थानीय हित सदैव प्रबल बने रहते हैं. इसके फलस्वरूप, प्रतिरोध की इच्छा बलबती होने के बावजूद, कृषक वर्ग आसानी से कथित सुधारों के झांसे में आ जाता है और अपनी ओर फेंके गए टुकडों से आसानी से धोखा खा जाता है. शुरुआती उत्साह ज़ल्दी ही समाप्त हो जाता है और एक गाँव के बाद दूसरा गाँव, मात्र छोटे-मोटे सुधारों से संतुष्ट हो जाता है और ‘साझा उद्देश्य’ का परित्याग कर देते हैं. एक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करते रहने की क्षमता राजनीतिक सक्रियता का एक रूप है. इस नज़रिए से किसान कभी भी ज्यादा सक्रीय नहीं रहे हैं, उस वक्त भी नहीं जब कृषक वर्ग का शेष आबादी से विभेदीकरण नहीं हुआ था.

असरदार कार्रवाई करने की किसानों की क्षमता और भी घट जाती है जब वे वित्तीय अर्थव्यवस्था के अधीन हो जाते हैं. उनका विभेदीकरण न केवल समुदाय, गाँव में हो जाता है बल्कि वे विभिन्न क्षेत्रीय समूहों में बिखर जाते हैं जिनके अपने विशिष्ट हित होते हैं. क्रांति में, किसान समुदाय ने सक्रीय भूमिका शायद ही कभी निभाई है. शहरों में क्रांति शुरू हो जाने के बाद ही कृषक आन्दोलन शुरू होता है और इसे जारी रखने में सहायक होता है. यही वह घटनाक्रम है जो महान फ्रांसीसी क्रांति के दौरान घटित हुआ और ठीक ऐसा ही जर्मनी और ऑस्ट्रिया में.

बुर्जुआ दार्शनिक, विशेषतया यूरोपीय महाद्वीप के बुर्जुआ दार्शनिक, व्यक्तियों के उस समूह को सर्वहारा का अभिन्न अंग मानते हैं जिसे मार्क्स ने “लम्पट सर्वहारा” (कंगाल या आवारा सर्वहारा) की संज्ञा दी है. इन महानुभावों के नज़रिए से प्रत्येक सर्वहारा भिखारी होता है, “कंगाल” होता है, “आवारा” होता है. स्टिर्नर (बाकुनिन के शिक्षकों में से एक) के साथ हुए वाद-विवाद में मार्क्स प्रमाणित करते हैं कि

“केवल बर्बाद सर्वहारा कंगाल की स्थिति में पहुँच जाता है. बुर्जुआ दवाब के खिलाफ सर्वहारा की प्रतिरोध क्षमता जब ख़त्म हो जाती है तब वह इस सबसे निचले पायदान पर पहुँच जाता है. इसलिए केवल वही मेहनतकश कंगाल बन जाता है जिसकी सम्पूर्ण शक्ति निचोड़ ली जाती है.” (मार्क्स ,Der heileige Max Stirner, बर्नस्टीन द्वारा संपादित, Dokumente des Sozialismus में संकलित, खंड 3, पृ. 175)

पूंजी में जब मार्क्स सापेक्ष बेशी आबादी के विभिन्न रूपों का विश्लेषण करते हैं, तब वह बताते हैं कि सापेक्ष बेशी आबादी का तलछट कंगाली की ज़िन्दगी बसर करता है. कंगाल सर्वहारा को वे अलग श्रेणी में रखते हैं जिनमें वे आवारा लोगों, अपराधियों, वेश्याओं और समाज के लिए घातक अन्य व्यक्तियों को शामिल करते हैं. वह बताते हैं (पृ. 712) कि “कंगाली सक्रीय श्रम सेना का विकलांग-गृह और औद्योगिक रिज़र्व सेना के गले का पत्थर होती है.” औद्योगिक उत्पादन से बहिष्कृत ये लोग महानगरों में इकठ्ठा होते जाते हैं, वे गुंडा, आवारागर्द, बदमाश, आदि बन जाते हैं, वे उत्पादन प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं निभाते हैं, प्रतिक्रियावादियों से साँठ-गांठ करने के लिए हरदम तैयार रहते हैं और इस प्रकार ब्लैक हंडरैड या फासीवादियों की कतारों में बढोत्तरी करते रहते हैं.

अठाहरवीं ब्रूमेर में मार्क्स ने उन ऐतिहासिक परिस्थितियों का प्रतिभाशाली विश्लेषण किया है जिन्होंने नेपोलियन तृतीय (1808-1873) को तख्ता पलट करने में मदद की. इस पुस्तक में वे उस क्रांति के सफलतापूर्ण संपन्न होने के लिए पेरिस के लम्पट सर्वहारा द्वारा निभाई गयी महत्त्वपूर्ण भूमिका से अवगत कराते हैं. इस क्रांति ने तीसरे नेपोलियन के अधीन बुर्जुआ शक्ति को सुदृढ़ बना दिया था. ‘दस दिसम्बर सोसायटी’, 1849 में बनी थी.

“एक परोपकारी समाज की स्थापना के बहाने पेरिस के लम्पट सर्वहारा का एक गुप्त संगठन बनाया गया. इसके प्रत्येक विभाग का मुखिया एक बोनापार्तवादी गुर्गा था और पूरी सोसायटी का सरदार एक बोनापार्तवादी जनरल था. बीमार ऐयाश जिनकी रोज़ी का जरिया और वंशावली संदिग्ध थी, बुर्जुआ कतारों से निकाल दिए गए दिवालिया सट्टेबाज़ के अलावा आवारा लोग, फौज से निकाल दिए गये सिपाही, जेल से छूटे मुजरिम, जेलों से भगौड़े कैदी, ठग, बाजीगर, पेशेवर भिखमंगे, पाकेटमार, जादूगर, जुआडी, औरतों के दलाल, चकला मालिक, कुली, पत्रकार, बाजावाले, चिथड़े बीनने वाले, सान धरने वाले ठठेरे — यानि वह पूरा, इधर-उधर बिखरा हुआ, अनिश्चित शक्ल का विघटित जन-समुदाय जिसे फ्रांसीसी लोग समूहवाचक संज्ञा ‘ला बोहेम’ कहते हैं – यही थे लुइ बोनापार्ट के सगोत्रीय तत्त्व जिनको लेकर उसने ‘दस दिसम्बर सोसायटी’ के ढांचे का बहुलांश गठित किया था.” (मार्क्स, द एटीन्थ ब्रूमेर ऑफ़ लुई बोनापार्ट, पृ. 83)

बुर्जुआ समाज के अंतरविरोध और सर्वहारा द्वारा इनका उपयोग

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27.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

बुर्जुआ वर्ग की कतारों के बीच विरोध, पूंजीपति वर्ग के विभिन्न धडों के बीच अनबन, भूस्वामियों और औद्योगिक सम्पत्तिधारकों के बीच संघर्ष, एक ओर वित्तीय हितों के प्रतिनिधियों और दूसरी ओर मैन्युफैक्चरिंग हितों के प्रतिनिधियों के बीच तीखी होड़ – इन सभी संघर्षों के बीच पूंजीवादी समाज के गठन में ही मौजूद है.

“अपने ऐतिहासिक विकास के दौरान बुर्जुआ अनिवार्यत: अपने सुषुप्त अंतरविरोधों को बढाता जाता है…जैसे-जैसे बुर्जुआ व्यवस्था विकसित होती जाती है इसके ढांचे के अर्न्तगत नए सर्वहारा, आधुनिक युग की अभिलाक्षणिकताओं से युक्त सर्वहारा का विकास होता जाता है. बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच युद्ध छिड़ जाता है जो पहले अस्थाई आंशिक और अल्पकालिक संघर्षों और ध्वंसात्मक कार्रवाइयों के रूप में प्रकट होता है तथा जब इसकी समझ बन जाती है, इस पर ध्यान देना आवश्यक हो जाता है, इसका मूल्यांकन कर लिया जाता है, इसे स्वीकार कर लिया जाता है. अन्य वर्गों के खिलाफ खड़े, एक विशिष्ट वर्ग के रूप में गठित समकालीन बुर्जुआ वर्ग के सभी सदस्यों के हित समान होते हैं परन्तु इन सदस्यों के बीच-बीच के सम्बन्ध परस्पर विरोधी हितों पर आधारित होते हैं. यह विरोध बुर्जुआ व्यवस्था की आर्थिक संरचना में निहित होता है.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ, 971)

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम अर्धांश के दौरान ब्रिटिश बुर्जुआ समाज का इतिहास इस दावे का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है.

नेपोलियन (1769-1821) की अंतिम पराजय के ठीक बाद, 1815 में ब्रिटिश भूस्वामियों ने विदेशों से अनाज के आयात पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक विधेयक पेश किया और गेहूं के आयात को करमुक्त करने के लिए 80 शिलिंग का दाम निर्धारित किया. इस अधिनियम का उद्देश्य ब्रिटिश बाज़ार में प्रति क्वार्टर गेहूं की कीमत लगभग 80 शिलिंग बनाए रखना था. अनाज बाज़ार के महाद्वीपीय प्रतिस्पर्द्धा से मुक्त हो जाने से ब्रिटिश भूस्वामियों के लिए असाधारण रूप से ऊँची आय सुनिश्चित हो गयी. लेकिन  मध्य वर्गों ने इस नए कानून का कड़ा विरोध किया. यह जनमत निकाय छोटे कारखाना मालिकों, कारीगरों, सामान्तया निम्न-बुर्जुआ और औधोगिक बुर्जुआ के कई प्रतिनिधियों से बना था जो अपना लाभ बढाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. आरंभ में इस आन्दोलन ने शांतिपूर्ण विरोध का रूप धारण किया था लेकिन पूरी तरह से बेअसर साबित हुआ. प्रत्येक याचिका को सीधे अस्वीकार कर दिया गया.

यहाँ तक की सन 1832 के चुनाव सुधार से भी कुछ हासिल नहीं हुआ. अपनी आय की सुरक्षा के लिए भूस्वामी कुलीनों के सभी धडे एकजुट हो गए. अब औद्योगिक बुर्जुआ ने इस विवाद को राजनीती के क्षेत्र में ले जाने और ‘जनता’ को लामबंद करने का निर्णय किया. इसलिए 1839 में मैनचेस्टर में एंटी-कॉर्न लीग गठित की गयी जिसके प्रमुख मार्गदर्शक कॉबडेन (1804-1865) और ब्राईट (1811-1839) थे. संघर्ष ने अधिक उग्र रूप धारण कर लिया. दोनों पक्षों ने “निम्न श्रेणियों” से समर्थन देने की अपील की. प्रत्येक शिविर में दूसरे के खिलाफ आरोप लगाए जा रहे थे. औद्योगिक बुर्जुआ ने कृषि मजदूरों की भयंकर दुर्दशा की ओर ध्यान आकर्षित किया तो भूस्वामी कुलीन वर्ग ने औधोगिक उत्पादन में लगे मजदूरों की हिमायत की और कारखाना कानून के पक्ष में आन्दोलन करके अपना बदला लिया.

“एक ओर तो बुर्जुआ आन्दोलनकर्ताओं का हित यह प्रमाणित करने में था कि अनाज कानून से उन लोगों को कम लाभ पहुँचा है जो सचमुच अनाज पैदा करते हैं. दूसरी ओर, भूस्वामी कुलीन वर्ग फैक्टरी-व्यवस्था की जो तीव्र निंदा कर रहा था और ये सर्वथा भ्रष्ट, हृदयहीन और कुलीन आवारा लोग कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के साथ जो दिखावटी सहानुभूति प्रकट कर रहे थे तथा फैक्टरी-कानून बनवाने के लिए जिस “कुटनीतिक उत्साह” का प्रदर्शन कर रहे थे, उसे देख-देखकर बुर्जुआ वर्ग क्रोध से आग-बबूला हो रहा था. अंग्रेजी की एक पुराणी कहावत है कि “जब चोरों में खटपट हो जाती है, तब भले की बन आती है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड,1,पृ. 747)

आखिरकार 29 जून 1846 को पील (1788-1850) के प्रसिद्ध अधिनियम ने अनाज कानूनों को रद्द करके इस विवाद का अंत कर दिया. एंटी कॉर्न लीग को प्रत्येक मुद्दे पर जीत हासिल हुई. उस आन्दोलन को मजदूरों का समर्थन प्राप्त था. “अंग्रेज़ मजदूरों ने स्वतन्त्र व्यापारियों को जता दिया था कि वे स्वतन्त्र व्यापार के भ्रमों और भ्रांतियों से बुद्धू बनने वाले नहीं है. इसके बावजूद  यदि मजदूर भूस्वामी कुलीन वर्ग के खिलाफ स्वतन्त्र व्यापारियों के पक्ष में लामबंद हो गए थे तो इसलिए वे सामंतवाद के अवशेषों को ख़त्म करना चाहते थे ताकि उनके खिलाफ केवल एक शत्रु बचे. मजदूरों का अनुमान गलत साबित नहीं हुआ. विनिर्माण के हितपोषकों से बदला लेने के लिए, दस घंटे कार्यदिवस सम्बन्धी विवाद में भूसंपत्ति के समर्थक मजदूरों के पक्ष में लामबंद हो गए. इस सुधार के लिए मजदूर बीस सालों से व्यर्थ ही मांग कर रहे थे जबकि अनाज कानूनों के रद्द होने के तुंरत बाद बने नियमों में उनकी मांग मान ली गयी.” (ब्रसेल्स डेमोक्रेटिक एसोसिएशन के समक्ष 9 जनवरी 1848 को स्वतन्त्र व्यापार पर दिए गए मार्क्स के भाषण से. (देखें मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ, 186)

दस घंटे कार्यदिवस का विधेयक जिन परिस्थितियों में पेश किया गया था उनका जिक्र मार्क्स इस प्रकार करते हैं : “इन वर्षों में अनाज कानून रद्द कर दिए गए थे, कपास और अन्य कच्चे मालों पर आयात शुल्क समाप्त कर दिया गया था, स्वतन्त्र व्यापार के सिद्धांत को तमाम कानूनों का पथ-प्रदर्शक घोषित कर दिया गया था. संक्षेप में कहा जाये, तो मानों स्वर्ण-युग का आरंभ हो गया था. दूसरी ओर, इन्हीं वर्षों में चार्टिस्ट आन्दोलन और दस घंटे कार्यदिवस विधेयक के पक्ष में आन्दोलन अपनी चर्म सीमा पर पहुँच गया था. इन अदोलनों को अनुदार दल के लोगों का समर्थन प्राप्त था जोकि कारखाना मालिकों से बदला लेने के लिए बेकरार थे. (कॉबडेन और ब्राइट के नेतृत्व में) स्वतन्त्र व्यापार की क़समें खाने वाले समर्थकों के जोरदार विरोध के बावजूद यह विधेयक जिसके लिए कई वर्षों से संघर्ष चल रहा था, संसद में पास हो गया. (मार्क्स, कैपिटल, खंड,1,पृ. 289-90)

एंटी-कॉर्न लीग ने ब्रिटिश मजदूरों के लिए पाठशाला का काम भी किया जहाँ पर उन्होंने आन्दोलनात्मक तौर-तरीकों की शिक्षा ग्रहण की. लीग के नियंत्रण में बहुत बड़ी धनराशी उपलब्ध थी जिसे उसने समाचारपत्रों, पुस्तकों, पर्चों, पोस्टरों और घोषणापत्रों के प्रकाशन में खुले हाथ से खर्च किया. 1843 तक लीग पर्चों की 10,000,000 प्रतियाँ प्रकाशित कर चुकी थी.  लीग की कार्यकारी समिति उसकी सर्वोच्च सत्ता थी जिसके सदस्य इसकी विभिन्न शाखाओं की गतिविधियों को संचालित करते थे. लीग की कार्रवाइयों में पुरुष मजदूरों के संगठन और स्त्री-मजदूरों के संगठन साथ-साथ शिरकत करते थे. अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए लीग के प्रवक्ता बल-प्रयोग की अपील करने से नहीं घबराते थे और भूस्वामी कुलीन वर्ग की दुष्टता का बखान बहुत खुले शब्दों में करते थे जो उत्पादक वर्ग को भूखा मार डालना चाहता था.

एक और जहाँ बुर्जुआ क्रांति में उन कुलीनवर्गीय सिद्धान्तकारों की अच्छी-खासी तादाद थी जो बुर्जुआ विचारधारा को स्वीकार करते थे और उसका समर्थन करते थे दूसरी और ऐसे बुर्जुआ सिद्धान्तकार बिरले ही मिलेंगे जो सामाजिक विकास की दिशा को समझते हों और सर्वहारा दृष्टिकोण को अपनाने के लिए तत्पर हों. इसकी मुख्य वजह यह है कि बुर्जुआ और सर्वहारा के बीच खाई उससे कहीं ज्यादा गहरी थी जो कुलीन वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच मौजूद थी. रूसी क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास में (जनवादी पार्टियों का गठन करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग) के ऐसे सिद्धान्तकारों ने संघर्षरत सर्वहारा की कतारों में शामिल होने की इच्छा कदाचित ही प्रकट की थी.

सांस्कृतिक मोर्चे पर अन्तरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण का प्रश्न

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कहने की आवश्यकता नहीं कि जीवन के हर क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का नज़रिया व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भों में हर-हमेशा अन्तरराष्ट्रीयतावादी होता है। लेकिन आज पूँजी के भूमण्डलीकरण के नये दौर में, एक ओर जहाँ बुर्जुआ राष्ट्रवाद क्षरित-स्खलित होकर, अपनी ऐतिहासिक सकारात्मकता खोकर फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद का लगभग समानार्थी-सा बन गया है, वहीं सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावादी चेतना का ज्यादा मज़बूत और व्यापक भौतिक आधार भी तैयार हुआ है।

सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावाद के दो सन्दर्भों की चर्चा प्रकारान्तर से ऊपर के दो उपशीर्षकों के अन्तर्गत आ चुकी है। पहली बात, राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियों का दौर बीतने के बाद राष्ट्रवाद के रणनीतिक नारों का झण्डा सर्वहारा वर्ग और मुक्तिकामी जनों के विरुद्ध अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। अन्तरविरोध आज सीधे-सीधे श्रम और पूँजी के दो शिविरों के बीच है। संस्कृति के मोर्चे पर आज यह एक अति महत्त्वपूर्ण काम है कि हम फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद सहित प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ राष्ट्रवाद की संस्कृति का व्यापक भण्डाफोड़ और विरोध करें और श्रम की संस्कृति का, अन्तरराष्ट्रीयतावादी श्रमिक एकजुटता के विचार का विकल्प सामने रखें। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति दो चीज़ें हैं। राष्ट्रवाद एक बुर्जुआ परिघटना के रूप में जब अपनी ऐतिहासिक प्रासंगिकता खो देगा, तब भी देशभक्ति की भावना व संस्कृति बनी रहेगी। वह बुर्जुआ देशभक्ति की संस्कृति न होकर सर्वहारा देशभक्ति की संस्कृति होगी। सर्वहारा वर्ग ही अपने देश की जनता, संस्कृति और प्रकृति को वास्तविक प्यार करता है और अपने देश में समाजवाद की विजय के बाद वह समाजवादी मातृभूति की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार रहेगा।

दूसरी बात, जब हम अपनी सांस्कृतिक-वैचारिक परम्परा की बात करते हैं तो इसका एक पक्ष है हमारे देश की मुक्तिकामी जनता के इतिहास की विरासत और दूसरा पक्ष है, पूरी दुनिया के सर्वहारा संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों से जुड़ी सांस्कृतिक विरासत और पूरी दुनिया की मुक्तिकामी जनता की सांस्कृतिक विरासत। यही संस्कृति के क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का सही-सन्तुलित अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिया है।

जब हम सांस्कृतिक क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग के अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिए की बात करते हैं तो उसका मतलब सिर्फ यही नहीं होता कि पूरी दुनिया के सर्वहारा वर्ग के कला-साहित्य की समृद्ध सम्पदा को हम अपनी विरासत के रूप में स्वीकार करते हैं, इसका मतलब यह भी होता है कि यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन काल के मानवतावादी, जुझारू भौतिकवादी, जनवादी साहित्य तथा उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप और रूस के महान यथार्थवादी और क्रान्तिकारी जनवादी साहित्य की पूरी परम्परा का हम अपने को उत्तराधिकारी मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि समूचे विश्व के समग्र क्लासिकीय साहित्य-सम्पदा को हम अपनी विरासत मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि किसी भी देश के सर्वहारा का क्रान्तिकारी सांस्कृतिक आन्दोलन विश्व मज़दूर आन्दोलन के अतिरिक्त, सभी देशों के राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों, प्रतिरोध संघर्षों और जन-आन्दोलनों के दौर के कला-साहित्य की विरासत को अपनाता है, उनका द्वन्द्वात्मक विश्लेषण करता है तथा उनके ज़रूरी अवयवों को आत्मसात कर लेता है। यह महज़ एक सैद्धान्तिक `अप्रोच´ का सवाल नहीं, ठोस व्यावहारिक कार्रवाई का मुद्दा है। एक उदाहरण लें। अफ्रीकी जनता के प्रतिरोध-संगीत, अमेरिकी अश्वेतों के प्रतिरोध संगीत, मेक्सिको व लातिन अमेरिकी देशों की अधूरी क्रान्तियों और किसान संघर्षों के दौरान सृजित क्रान्तिकारी संगीत – इन सभी में पूंजी की सत्ता, वर्चस्व और उत्पीड़न के प्रतिरोध के तत्त्व हैं, समानता के स्वप्न हैं, संघर्ष की आग है। भारतीय सर्वहारा का संगीत आन्दोलन अपने देश के जन संघर्षों के गीत-संगीत और लोक संगीत के अतिरिक्त उपरोक्त अन्तरराष्ट्रीय विरासत को भी अपनाएगा और इस सतत्-सुदीर्घ प्रक्रिया में सर्वहारा संगीत की सार्वभौमिक सम्प्रेषणीयता, उसकी एक सच्ची “अन्तरराष्ट्रीय भाषा” विकसित होगी। यही बात सर्वहारा के समाजवादी यथार्थवादी थिएटर और सिनेमा के लिए, तथा साहित्य के लिए भी लागू होती है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ , शिशिर-बसंत 2002 से साभार

श्रम और पूंजी की टक्कर – एक ऐसा ‘वैषम्य’ जिसका निपटारा बल प्रयोग द्वारा ही होता है

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श्री दिनेशराय द्विवेदी जी द्वारा लिखित आलेख ‘उद्यम भी श्रम ही है‘ और श्री ज्ञानदत्त जी पाण्डेय द्वारा लिखित आलेख  ‘उद्यम और श्रम’ की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में यह ज़रूरी हो गया कि पाठको को पूंजी और श्रम के उस बुनियादी ‘वैषम्य’ जो इन दोनों के बीच है – इस ‘वैषम्य’ का निपटारा किसी तीसरे हम जैसे पाठक या जज की दखलान्दाजी से सर्वदा मुक्त है, इस बिंदु को समझना होगा और अपने मनोगत विचारों से मुक्ति पानी होगी.

श्रम-शक्ति अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती  है  लेकिन अन्य जिंसो से इसलिए अलग है कि इसे मनुष्य के शरीर से अलग नहीं किया जा सकता और दूसरी जिंसों के विपरीत यह अकेली ऐसी जिन्स है जो  बेशी मूल्य या अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष (surplus value) पैदा करती है.

लेकिन दूसरी जिंसों की तरह ही इसका भी बाज़ार में विनिमय होता है. दूसरी जिंसों की तरह इसका मूल्य भी इसके पुनरुत्थान पर खर्च – श्रम शक्ति के बराबर होता है. लेकिन एक बार पूंजीपति द्वारा इसे खरीदने पर उसे यह अधिकार मिल जाता है कि वह इसका ‘काम के दिन’ में मूल्य पैदा करने के लिए उपयोग कर सके .

‘काम के दिन’ के दौरान मजदूर द्वारा किया गया वह श्रम जो उसके जिन्दा  रहने और उसकी श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन के लिए ज़रूरी होता है, ज़रूरी श्रम कहलाता है जबकि इसके अतिरिक्त समय के लिए किया गया श्रम – यही, केवल यही वह श्रम होता है जो अतिरिक्त मूल्य, या बेशी मूल्य, या अधिशेष (surplus value) जिसे लूटने वाला पूंजीपति वर्ग अपनी बहियों में “शुभ लाभ” के नाम से दर्ज करता है, अतिरिक्त श्रम कहलाता है.

लेकिन प्रश्न उठता है कि ‘काम के दिन’ की लम्बाई की क्या परिभाषा या ‘परिमाण’ हो ? पूंजीपति इसे ज्यादा से ज्यादा लम्बा करना चाहेगा जबकि श्रमिक इसे छोटा !

मार्क्स की ‘पूंजी’ के प्रथम खंड के ‘काम के दिन’ नामक अध्याय से यह उद्धरण जिसमें एक मजदूर पूंजीपति को संबोधित  है, काबिले-गौर है ;

मैंने जो पण्य (जिंस)   तुम्हारे हाथ बेचा है, वह दूसरे पण्यों की भीड़ से इस बात में भिन्न है कि उसका उपयोग मूल्य का सृजन करता है, और वह मूल्य उसके अपने मूल्य से अधिक होता है. इसलिए तो तुमने उसे खरीदा है. तुम्हारी दृष्टि में जो पूँजी का स्वयंस्फूर्त विस्तार है, वह मेरी दृष्टि में श्रम शक्ति का अतिरिक्त उपभोग है. मंडी में तुम और मैं केवल एक ही नियम मानते है, और वह है पण्यों का विनिमय का नियम. और पण्यों के उपभोग पर बेचने वाले का, जो पण्य को हस्तांतरित कर चुका है, अधिकार नहीं होता; पण्य के उपभोग पर उसे खरीदने वाले का अधिकार होता है, जिसने पण्य को हासिल कर लिया है. इसलिए मेरी दैनिक श्रमशक्ति के उपभोग पर तुम्हारा अधिकार है. लेकिन उसका जो दाम तुम हर रोज देते हो, वह इसके लिए काफी होना चाहिए कि मैं अपनी श्रमशक्ति का रोजाना पुनरुत्पादन कर सकूँ और उसे फिर से बेच सकूँ. बढती हुई आयु, इत्यादी के कारण शक्ति का जो स्वाभाविक ह्रास होता है, उसको छोड़कर मेरे लिए यह संभव होना चाहिए कि मैं हर नयी सुबह को पहले जैसे सामान्य बल, स्वास्थ्य तथा ताज़गी के साथ काम कर सकूँ. तुम मुझे हर घडी “मितव्ययिता” और “परिवर्जन” का उपदेश सुनाते रहते हो. अच्छी बात है ! अब मैं भी विवेक और “मितव्ययिता” से काम लूँगा और अपनी एकमात्र संपत्ति – यानि अपनी श्रम-शक्ति – के किसी भी प्रकार के मूर्खतापूर्ण अपव्यय का परिवर्जन करूंगा. मैं हर रोज अब केवल उतनी ही श्रमशक्ति का उपयोग करूंगा, केवल उतनी ही श्रमशक्ति से काम करूंगा, केवल उतनी ही श्रमशक्ति को क्रियाशील बनाउंगा, जितनी उसकी सामान्य अवधि तथा स्वस्थ विकास के अनुरूप होगी. काम के दिन का मनमाना विस्तार करके, मुमकिन है,  तुम एक ही दिन में इतनी श्रमशक्ति इस्तेमाल कर डालो, जिसे मैं तीन दिन में भी पुन: प्राप्त न कर सकूँ. श्रम के रूप में तुम्हारा जितना लाभ होगा, श्रम के सारतत्त्व के रूप में उतना ही मेरा नुकसान हो जायेगा. मेरी श्रमशक्ति का उपयोग करना एक बात है, और उसे लूटकर चौपट कर देना बिलकुल दूसरी बात है. यदि एक औसत मजदूर (उचित मात्रा में काम करते हुए) औसतन तीस वर्ष तक जिंदा रह सकता है, तो मेरी श्रमशक्ति का वह मूल्य, जो तुम मुझे रोज देते हो, उसके कुल मूल्य का 1/365*30 या 1/10,950 वां भाग होता है. किन्तु यदि तुम मेरी श्रमशक्ति को तीस के बजाए दस वर्षों में ही खर्च  कर डालते हो तो तुम रोजाना मुझको मेरी श्रमशक्ति के कुल मूल्य के 1/3,650 के बजाए उसका 1/10,950 , यानि उसके दैनिक मूल्य का केवल 1/3 ही देते हो. इस तरह तुम मेरे पण्य के मूल्य का 2/3 भाग प्रतिदिन लूट लेते हो. तुम मुझे दाम दोगे एक दिन की श्रमशक्ति के, लेकिन इस्तेमाल करोगे तीन दिन की श्रमशक्ति. यह हम लोगों के करार और विनिमय के नियम के खिलाफ है. इसलिए मैं मांग करता हूँ कि काम का दिन सामान्य लम्बाई का हो, (मजूदूर के लिए सामान्य लम्बाई का अर्थ उतना ही है जितना उसकी श्रम शक्ति के पुनरुत्थान के लिए ज़रूरी है -अधिशेष के लिए एक पल भी अतिरिक्त नहीं ) और इस मांग को मनमाने के लिए मैं तुम्हारे हृदय को द्रवित नहीं करना चाहता, क्योंकि रूपए-पैसे के मामले में भावनाओं का कोई स्थान नहीं होता. मुमकिन है कि तुम एक आदर्श नागरिक हो, संभव है कि तुम पशु-निर्दयता- निवारण समिति के सदस्य भी हो और ऊपर से तुम्हारा साधुपन सारी दुनिया में विख्यात हो. लेकिन मेरे सामने खड़े हुए तुम जिस चीज का प्रतिनिधित्व करते है, उसकी छाती में हृदय का प्रभाव है.  वहां जो कुछ धड़कता सा लगता है, वह मेरे ही दिल की आवाज है. मैं सामान्य दीर्घता के काम के दिन की इसलिए मांग करता हूँ कि दूसरे हर विक्रेता की तरह मैं भी अपने पण्य का पूरा-पूरा मूल्य चाहता हूँ.

इस तरह हम देखते हैं कि कुछ बहुत ही लोचदार सीमाओं के अलावा पण्यों के विनिमय का स्वरूप खुद काम के दिन पर, या बेशी श्रम पर, कोई प्रतिबन्ध नहीं लगता. पूंजीपति जब काम के दिन को ज्यादा से ज्यादा खींचना चाहता है, और मुमकिन है, तो एक दिन के दो दिन बनाने की कोशिश करता है, तब वह खरीददार के रूप में अपने अधिकार का उपयोग करता है. दूसरी तरफ, उसके हाथ बेचा जाने वाला पण्य इस अजीब तरह का है कि उसका खरीददार एक सीमा से अधिक उपयोग नहीं कर सकता, और जब मजदूर काम के दिन को घटाकर एक निश्चित एवं सामान्य अवधि का दिन कर देना चाहता है, तब वह भी बेचने वाले के रूप में अपने अधिकार का ही प्रयोग करता है. इसलिए यहाँ असल में अधिकारों का विरोध सामने आता है, एक अधिकार दूसरे अधिकार से टकराता है, और दोनों अधिकार ऐसे हैं, जिन पर विनिमय की मुहर लगी हुई है. जब सामान अधिकारों की टक्कर होती है, तब बल प्रयोग द्वारा ही निर्णय होता है. यही कारण है कि पूंजीवादी उत्पादन के इतिहास में काम का दिन कितना लम्बा हो, इस प्रश्न का निर्णय एक संघर्ष के द्वारा होता है, जो संघर्ष सामूहिक पूँजी अर्थात पूंजीपतियों के वर्ग और सामूहिक श्रम अर्थात मजदूर वर्ग के बीच चलता है.

मजदूरों के आर्थिक हितों की रक्षा के नाम पर तिरंगा, भगवा और लाल – सभी अपनी-अपनी राजनितिक रोटियां सेकते रहें हैं. इसे ही ‘अर्थवाद’ कहा जाता है जो मार्क्सवाद का ‘संशोधनवाद‘ है. सर्वहारा वर्ग की असली लडाई राजनीतिक होने के कारण ‘राजनीतिक सत्ता का प्रश्न‘ ही उसके लिए मुख्य प्रश्न है जिसे, एक ट्रेड यूनियन के नेताओं द्वारा दूसरी ट्रेड यूनियन के नेताओं पर लाँछ्नात्मक आरोप-प्रति आरोप लगाते हुए,  अर्थवाद के ठंडे मानी में डुबो दिया जाता है.

उपरोक्त चर्चा के सन्दर्भ में कुछ लोग सर्वहारा वर्ग के पक्ष में खड़े होंगे तो कुछ पूंजीपति वर्ग के. दोनों स्वागतयोग्य हैं क्योंकि दोनों ढोंगी नहीं हैं लेकिन कोई ऐसा भी है जो निरपेक्ष होने का ढोंग करता है. इस प्रकार के ‘ गैर- राजनितिक बुद्धिजीवी’ के लिए हमने एक टिपण्णी के प्रत्युत्तर में लिखा था;

कुछ लोग अपनी जीविका के लिए, अपनी श्रम शक्ति बेचते हैं, चाहे वह शारीरिक श्रम हो या मानसिक. दूसरे लोग, पूँजी के मालिक होने की हैसियत से श्रम शक्ति खरीदते हैं और इसी प्रक्रिया द्बारा अपनी पूँजी में वृद्धि करते हैं. इसी आधार पर, मोटे तौर पर समाज में दो तरह के लोग हैं, एक पूँजी के मालिक और, दूसरे श्रम शक्ति बेचकर जिन्दा रहने वाले मजदूर वर्ग के लोग. अपनी वर्गीय स्थिति की बदौलत मजदूर वर्ग, अपनी श्रम शक्ति बेचने की मजबूरी के कारण पूंजीपतियों की बेरहम लूट का शिकार होते हैं.

समाज के अन्य तबके व वर्ग, समाज के इन दो मुख्य वर्गों के बीच इन वर्गों के सहयोगी या विरोधी की भूमिका अदा करते हैं. मानवीय इतिहास की एक विशेष मंजिल पर मानवीय श्रम का शारीरिक और मानसिक श्रम में विभाजन हो गया. शारीरिक श्रम या मानसिक श्रम विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों की पैदावार है न कि किसी व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह की जन्मजात विशेषता. समाज के विकास की विकसित मंजिल में यह विभाजन भी आलोप हो जाएगा.

एक गैर राजनितिक बुद्धीजीवी, इस सच्चाई से अनजान ख़ुद ही अपने आप को महान और किस्मत का धनी होने के भ्रम में, अपने ही सीमित खोल में बनाये काल्पनिक संसार में संतुष्ट है. जब कभी, वह अपने इस काल्पनिक संसार के भ्रम से मुक्त होकर, खोल के बाहर झांकेगा, तो आवश्य ही इस संसार की क्रूर हकीकतें उसे निष्पक्ष नहीं रहने देंगीं. अगर वह ईमानदार है तो वह सच्चाई, न्याय और गौरव के पक्ष में खड़ा होगा. परन्तु सच्चाई को समझकर भी, यदि वह निष्पक्ष और गैर राजनितिक होने का नाटक करता है तो वह दम्भी है, सच का सामना करने से घबराता है. भविष्य का आजाद मनुष्य, मानवीय इतिहास के इस बेरहम और मुश्किल दौर में, उस द्बारा दिखाई गई कायरता पर अवश्य सवाल उठाएगा.

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कात्यायनी, सत्यम

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाए बिना सांस्कृतिक मोर्चे पर सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन के कार्यभारों को पूरा कर पाना सम्भव नहीं होगा। दलित-मुक्ति के प्रश्न की उपेक्षा करके सर्वहारा क्रान्ति या जन-मुक्ति की परियोजना के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। सहशताब्दियों से सर्वाधिक व्यवस्थित और सर्वाधिक बर्बर शोषण-दमन के शिकार दलित देश की कुल आबादी में लगभग तीस प्रतिशत हैं और उनमें से 90 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की कतारों में शामिल हैं। यह आबादी यदि सम्पूर्ण जनता की मुक्ति और स्वतंत्रता-समानता की वास्तविक स्थापना की परियोजना के रूप में सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति को स्वीकार नहीं करेगी तो उसकी विजय असम्भव है। दूसरी ओर, समाजवादी क्रान्ति परियोजना से जुड़े बिना दलित-मुक्ति का प्रश्न भी असमाधानित ही बना रहेगा (क्योंकि पूँजीवादी दायरे के भीतर सुधार की सम्भावनाएँ अब समाप्तप्राय हैं) तथा समाजवादी क्रान्ति को लगातार चलाए बिना समाज को उस मुकाम तक पहुँचाया ही नहीं जा सकता जब जाति और धर्म के आधार पर किसी भी तरह का अन्तर बचा ही नहीं रह जाएगा।

इस प्रश्न की द्वन्द्वात्मक समझ की कमी के अभाव में अतीत में कम्युनिस्ट आन्दोलन और वाम जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन में वर्ग-अपचयनवाद (class-reductionism) का विचलन गम्भीर रूप में मौजूद था। आज इसी विचलन का दूसरा छोर वर्ग-विसर्जनवाद (class-liquidationism) या वर्ग-निषेधवाद के रूप में मौजूद है जब इस हद तक के फतवे दिए जा रहे हैं कि वर्ग-विश्लेषण की क्लासिकी मार्क्सवादी पद्धति से भारतीय जाति-व्यवस्था का विश्लेषण ही सम्भव नहीं है। दलित मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के “दलितवादी” चिन्तन के प्रति निहायत अनालोचनात्मक, आत्मसमर्पणकारी, समन्वयवादी रवैया अपनाया जा रहा है। यह एक घातक विसर्जनवादी, सुधारवादी प्रवृत्ति है जिसका आज खूब बोलबाला है। आज हिन्दी में जो दलित-लेखन हो रहा है, वह पक्षधर साहित्य है, प्रतिरोध का साहित्य है, रैडिकल आलोचनात्मक यथार्थवादी साहित्य है। लेकिन यह सच है कि यह सम्पूर्ण दलित आबादी के बजाय, मुख्यत: उस मध्यवर्गीय दलित का प्रातिनिधिक स्वर है, जिसका आर्थिक प्रश्न तो एक हद तक हल हो चुका है और अब सामाजिक अपमान व भेदभाव ही जिसके लिए केन्द्रीय प्रश्न है। इसीलिए समकालीन दलित लेखन का तेवर चाहे जितना तीखा हो, वह ठोस विकल्प के रूप में इसी व्यवस्था के भीतर कुछ सुधारों की माँग करता है, दलित-प्रश्न की समूल समाप्ति की कोई परियोजना नहीं प्रस्तुत करता तथा क्रान्ति के नाम से बिदकता है। यह अनायास नहीं कि जिन आन्दोलनों-संघर्षों में दलित आबादी की बहुतायत होती है या जो आन्दोलन गाँवों में दलित उत्पीड़न के ही किसी मुद्दे पर होते हैं उनसे यह दलित `भद्रलोक´ कोसों दूर रहता है। दलित साहित्य चूँकि अम्बेडकरवाद को ही अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त मानता है, अत: दलित अस्मिता की पहचान और उनके प्रतिरोध-आन्दोलन को संगठित करने में डा. अम्बेडकर की ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार करते हुए भी यह ज़रूरी है कि उनके विचारों की विस्तृत, तर्क और तथ्यपूर्ण विवेचना की जाए। प्रश्न यह है कि अम्बेडकर की दार्शनिक विश्वदृष्टि क्या थी? उनके मूलभूत राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचार क्या थे? दलित हितों के अर्जन और हिफाजित के अन्तरिम प्रावधानों और प्रतिरोध आन्दोलन के प्रोग्राम के साथ ही क्या डा. अम्बेडकर के पास दलित-प्रश्न के सम्पूर्ण और अन्तिम समाधान की कोई दूरगामी सांगोपांग परियोजना थी? ब्राह्मणवाद और जाति प्रश्न का `एक्सपोज़र´, विश्लेषण और भर्त्सना ज़रूरी है, लेकिन लगातार, लम्बे समय तक यहीं रुके रहना और इसे ही दलित आन्दोलन का पूरा प्रोग्राम बना देना कहाँ तक उचित है?

हम समझते हैं कि सामाजिक बदलाव एक वैज्ञानिक प्रश्न है और विज्ञान के प्रश्न निस्संकोच, बेलागलपेट बहस की माँग करते हैं। दलित-प्रश्न को लेकर मार्क्सवाद पर अधूरेपन का लेबल मात्र लगाने के बजाय इस पर मुद्देवार, विस्तृत बहस होनी चाहिए, अम्बेडकर के विचारों और दलित आन्दोलन के इतिहास पर भी बहस होनी चाहिए तथा दलित प्रश्न के वर्ग-विश्लेषण के साथ-साथ समकालीन दलित साहित्य को भी विश्लेषण के एजेण्डे पर लाया जाना चाहिए। तर्क-विचारहीन दलित-हित समर्थन का शोरगुल आज दलित प्रश्न पर सही कार्यदिशा अपनाने में गम्भीर विघ्न पैदा कर रहा है।

स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

समाजशास्त्रीय विमर्श की ही भाँति कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी आज बुर्जुआ नारीवाद के विविध नये-नये रूपों और किस्मों का खूब बोलबाला है। नववामपन्थी “मुक्त चिन्तक” स्त्री-प्रश्न पर क्लासिकी मार्क्सवाद के “अधूरेपन” और “यांत्रिकता” को स्वीकारते हुए बुर्जुआ नारीवादियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हैं।

एक गहरे वैचारिक कुचक्र के तहत सर्वहारा क्रान्ति और पार्टी-सिद्धान्त को पुरुष स्वामित्ववाद और स्त्री-उत्पीड़न के तत्त्वों से युक्त बताया जा रहा है और स्त्री-आन्दोलन की स्वायत्तता की वकालत करते हुए आधी आबादी को जन-मुक्ति-संघर्ष की ऐतिहासिक परियोजना से काटकर अलग करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। बुर्जुआ नारीवाद की सभी किस्में उन उच्च-मध्यवर्गीय स्त्रियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनका `स्वर्ग´ इसी व्यवस्था में सुरक्षित है। वे पुरुष-वर्चस्ववाद का विरोध तो करना चाहती हैं, लेकिन इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना में जमी उसकी जड़ों को नहीं देख पातीं क्योंकि इस व्यवस्था के वर्ग-उत्पीड़क चरित्र से उन्हें कोई शिकायत नहीं। एन.जी.ओ. प्रायोजित नारीवादियों का एक हिस्सा स्त्रियों, दलितों, विस्थापितों के उत्पीड़न और पर्यावरण के प्रश्न पर अलग-अलग जनसंघर्षों की हिमायत करता है लेकिन इन सबको एक ही मुक्ति-परियोजना के अभिन्न अंगों के रूप में नहीं देखता और विचारधारा और राजनीति के प्राधिकार को स्वीकार नहीं करता। यह अराजकतावाद और संघाधिपत्यवाद (syndicalism) का ही एक नया रूप है। भारत में तीव्र पूँजीवादीकरण से हुए मध्यवर्ग के विस्तार और बुर्जुआ संस्कृति के आच्छादनकारी प्रभाव ने बुर्जुआ नारीवाद के सामाजिक आधार को व्यापक बनाया है। सर्वहारा क्रान्तियों की विफलता से पैदा हुए परिवेश और बुर्जुआ वैचारिक-सांस्कृतिक प्रचार के प्रभाव में, निम्न-मध्यवर्गीय शिक्षित युवा स्त्रियों का एक बहुत बड़ा रैडिकल हिस्सा भी व्यापक मेहनतकश आबादी और आम मेहनतकश स्त्रियों के संघर्षों से जुड़ने के बजाय फिलहाल बुर्जुआ नारीवादी लहर के साथ बह रहा है। साहित्य-कला-संस्कृति की दुनिया में जारी स्त्री-विमर्श में पुरुष-वर्चस्ववाद के प्रश्न को एक समाज-निरपेक्ष, स्वायत्त प्रश्न के रूप में ही प्रस्तुत किया जा रहा है। स्त्री-मुक्ति के किसी व्यावहारिक सुदीर्घ कार्यक्रम के बिना सिर्फ़ गर्मागर्म लफ्फजी का अविराम सिलसिला जारी है। रचनात्मक लेखन का भी परिदृश्य हूबहू ऐसा ही है।

इस बेहद ज़रूरी और बुनियादी सवाल पर पुरज़ोर हस्तक्षेप की ज़रूरत है। नारीवादी विचारों और नारीवादी रचनाओं की सुव्यवस्थित आलोचना और मीमांसा प्रस्तुत की जानी चाहिए। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मार्क्सवाद स्त्री-प्रश्न को हल करने का कोई मॉडल या बना-बनाया फार्मूला नहीं प्रस्तुत करता बल्कि स्त्री की पराधीनता के इतिहास और आधारभूत कारणों की पड़ताल करता है तथा वर्गों के उन्मूलन की सुदीर्घ ऐतिहासिक परियोजना के एक अंग के तौर पर स्त्री-उत्पीड़न की समाप्ति की भी तर्कसम्मत सोच उसी प्रकार प्रस्तुत करता है जिस प्रकार मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण-उत्पीड़न के हर रूप के उन्मूलन की भविष्यवाणी करता है। आम स्त्रियों के बीच यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा क्रान्ति की तैयारी के प्रारम्भ-बिन्दु से ही स्त्री-प्रश्न उसके एजेण्डे पर अनिवार्यत: उपस्थित रहेगा, लेकिन स्त्री-पुरुष असमानता के भौतिक-ऐतिहासिक आधारों के नष्ट होने के बाद भी यौन-भेद और पुरुष-वर्चस्व की सहशताब्दियों पुरानी संस्कृति समाज में एक लम्बे समय तक मौजूद रहेगी और सतत् सांस्कृतिक क्रान्तियों की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही उसका निर्मूलन सम्भव हो सकेगा। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि स्त्री-मुक्ति की तमाम बुर्जुआ नारीवादी अवधारणाएँ इस प्रश्न के सम्पूर्ण हल की कोई दिशा नहीं बतलातीं, क्योंकि वे खुशहाल मध्यवर्गीय स्त्रियों से नीचे की स्त्रियों को सम्बोधित नहीं होतीं। साथ ही, मार्क्सवाद के नाम पर, स्त्री-प्रश्न पर प्रस्तुत की जाने वाली वर्ग-अपचयनवादी अवस्थिति की भी प्रखर आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

भारत में यह नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक अनिवार्यत: आधारभूत कार्यभार है कि व्यापक जनसमुदाय के बीच अन्धविश्वास, धार्मिक कुरीतियों, मध्ययुगीन निरंकुशता, नई बुर्जुआ निरंकुशता और धार्मिक मूलतत्त्ववादी फासीवादी विचारों से निरन्तर सिंचित-पोषित स्त्री-उत्पीड़न और पुरुष-वर्चस्व के तमाम रूपों के विरुद्ध एक रैडिकल सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार आन्दोलन की उद्वेलनकारी लहर पैदा की जाए। इसके बाद ही सामाजिक-राजनीतिक सरगर्मियों में आधी आबादी की पहलकदमी और भागीदारी बढ़ाने के प्रयास सार्थक और प्रभावी हो सकते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा के राजनीतिक और सांस्कृतिक हरावल अपने निजी आचरण-व्यवहार से यह सिद्ध करें कि वे दोहरे-दुरंगे लोग नहीं, बल्कि स्त्री-मुक्ति के सच्चे-सक्रिय पक्षधर हैं। समाज और व्यावहारिक स्थितियों की दुहाई देकर, निजी और पारिवारिक जीवन में पुरुष-वर्चस्ववादी आचरण करने वाले (जैसे घरेलू गुलामी को प्रश्रय देने वाले, दहेज व जाति-धर्म आधारित विवाहों को स्वीकार करने वाले, स्त्री-विरोधी सामाजिक आचारों को व्यावहारिकता की दुहाई देकर स्वीकारने वाले, अपने परिवार में प्रेम-विवाह जैसी चीज़ों का प्रत्यक्ष-परोक्ष विरोध करने वाले, आदि-आदि) पाखण्डी-कायर-धूर्त मध्यवर्गीय प्रगतिशीलों और संशोधनवादी कम्युनिस्टों ने स्त्री-समुदाय को सर्वहारा क्रान्ति के प्रवाह से काटकर अलग करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। अत: इस प्रश्न पर सांस्कृतिक आन्दोलन की शुरुआत हमें अपने निजी जीवन और आचरण से करनी होगी।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

वामपन्थी” कलावाद-रूपवाद और मध्यवर्गीय लम्पटता का विरोध करो!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

यह बिन्दु भी उपरोक्त बिन्दु से जुटा हुआ है। सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र की पराजय और क्रान्तिकारी वामपन्थी आन्दोलन की विघटन-विफलता के परिणाम जिन रूपों में सामने आए हैं, उनमें से एक यह भी है कि वामपन्थी और जनवादी का लेबल लगाकर घूमने वाले ऐसे “छैलों” की कविता-कहानी-नाटक की दुनिया में भरमार है जो अपने जीवन में तो हर तरह का अवसरवादी कुकर्म करते ही हैं, रचना के धरातल पर भी उनके मूल आग्रह कलावादी होते हैं। ख़ास तौर पर कविता के क्षेत्र में तो रूपवादी “वामपन्थ” का ज़ोर इतना अधिक है कि पुरोगामी और प्रतिगामी की विभाजक रेखा ही वहाँ धूमिल कर दी गई है। इसी तरह कहानी के क्षेत्र में यथार्थवाद के नाम पर प्रकृतवादी आग्रहों के बोलबाले का एक रूप मध्यवर्गीय लम्पटता का घटाटोप भी है। भारतीय जन-जीवन और संस्कृति की तबाही के सबसे नंगे, बर्बर और तेज़ रफ़्तार दौर में फूहड़-कामुक, यौनलोलुप और रुग्ण विवरण “यथार्थ-चित्राण” के नाम पर कहानियों से लेकर आत्मकथाओं के “भोगे हुए यथार्थ” और संस्मरणों के “बनारसी ठाठ” के रूप में खूब प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

इन घटिया प्रवृत्तियों के वास्तविक स्रोत को, इनके वर्ग-चरित्र को सविश्लेषण उजागर करना होगा, सर्वहारा संस्कृति के इन रेशमी रूमालधारियों को, इन भंड़ैतों, छैलों और रागरंग-प्रेमियों को बेनकाब करना होगा और इनके विरुद्ध समझौताविहीन संघर्ष चलाना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

नए सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन— महत्तव्पूर्ण सामजिक-आर्थिक सरंचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में सृजन और आन्दोलन के सभी कार्यों को आज एकदम नये सिरे से संगठित करने की ज़रूरत है। हम सर्वहारा क्रान्ति की पक्षधर अवस्थिति से यह बात कह रहे हैं।

समय और समाज जब जनता के प्रचण्ड वेगवाही सांस्कृतिक आन्दोलन की माँग कर रहे हैं, तब कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में अराजकता, विभ्रम, भटकाव, अवसरवाद और ठहराव का बोलबाला है। ताकत कम नहीं है, पर कोशिशें बिखरी हुई हैं। जहाँ ईमानदारी और मेहनत से लगी हुई टीमें हैं, वहाँ वैचारिक समझ कमज़ोर है और अनुभववाद तथा `लकीर की फकीरी´ का बोलबाला है। निस्संकोच कहा जा सकता है कि प्रगतिशील वाम सांस्कृतिक धारा पर आज प्रच्छन्न बुर्जुआ और निम्न-बुर्जुआ धाराएँ हावी हैं। एक ओर नामधारी वाम के पुराने मठाधीशों-महामण्डलेश्वरों की गद्दियाँ और अखाड़े हैं तो दूसरी ओर विश्व के नये यथार्थ के अवगाहन और अतीत की “जड़ीभूत” विचारधारात्मक चिन्तन-पद्धतियों के पुनरीक्षण का दावा करने वाले अकर्मक “नव-मार्क्सवाद” के नौबढ़ प्रणेताओं के अड्डे हैं। क्रान्तिकारी वाम शिविर से जुड़े कई एक सांस्कृतिक संगठन और टोलियाँ हैं, पर उनका विचार-पक्ष कमज़ोर है। वे कला-साहित्य-संस्कृति की द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी समझ से, अपनी समृद्ध वैचारिक विरासत से और अतीत के सर्जनात्मक प्रयोगों से अपरिचित हैं। वे भरपूर जोश से क्रान्तिकारी आन्दोलन और प्रचार की कार्रवाइयों में लगे हैं, लेकिन वैचारिक समझ के अभाव में उनके सांस्कृतिक कार्य दिशाहीन और निष्प्रभावी होकर रह जा रहे हैं।

हमें इस भंवर से बाहर निकलना होगा। क्योंकि हमारे देश और समूची दुनिया के सामने आज यह प्रश्न पहले हमेशा की अपेक्षा अधिक ज्वलन्त और भयावह रूप में खड़ा है – या तो समाजवाद, या फिर बर्बरता! कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी यही प्रश्न केन्द्रीय है।

अकर्मण्य वैचारिक समझ घोड़े की लीद से बेहतर नहीं होती। वास्तविक आशावाद नियतत्ववादी नहीं होता। यदि हम आशावादी हैं तो हमें अपनी आशाओं को फलीभूत करने के लिए जी-जान से जूझना होगा। अकर्मक ज्ञान और अन्धा आशावाद – इन दोनों से बचना होगा।

नये सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन – महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संरचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

आज की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की इस निबन्ध में सविस्तार चर्चा सम्भव नहीं है और इसकी ज़रूरत भी नहीं है। लेकिन अलग से यह करना ही होगा क्योंकि सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुनिश्चित समझ के बिना संस्कृतिकर्मी भी अपने समय के जीवन के मर्म को नहीं पकड़ सकते। इसके बग़ैर वे सतह की परिघटनाओं को ही सारभूत यथार्थ मानकर प्रस्तुत करेंगे। इसके बिना वे भविष्य की ओर जारी यात्रा की गतिकी को नहीं समझ सकते और अपने कार्यभार नहीं निर्धारित कर सकते। आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, हमारे देश के आम लोगों का जीवन सर्वग्रासी संकट के जिस विषैले-दमघोंटू अन्धकार में घुट रहा है, उसकी हम यहाँ सूत्रवत चर्चा करेंगे। इतनी चर्चा पृष्ठभूमि के तौर पर ज़रूरी है।

हम आज भी साम्राज्यवाद के युग में जी रहे हैं जिसकी बुनियादी अभिलाक्षणिकताओं को और उन्नीसवीं शताब्दी के `स्वतंत्र प्रतियोगिता के युग´ से जिसकी भिन्नताओं को लेनिन ने उद्घाटित किया था। लेकिन आज, सतह की परिघटनाओं-प्रवृत्तियों के पर्यवेक्षण के आधार पर भी यह महसूस किया जा सकता है कि स्थितियों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं। विश्व-पूँजीवाद के असमाधेय संकटों की, साम्राज्यवाद की अभूतपूर्व आक्रामकता की, नई तकनोलॉजी के प्रयोग की, तीसरी दुनिया के देशों में निर्बन्ध पूँजी-निवेश और लूट की, इन देशों के बुर्जुआ शासक वर्ग के आत्म समर्पण की, मज़दूरों से अतिलाभ निचोड़ने की नई-नई तरकीबों और उनके छिनते अधिकारों की, सट्टेबाज़ी और अनुत्पादक प्रवृत्तियों की, सूचना-संचार के तंत्र की नई प्रभाविता की, फ़ासीवादी शक्तियों के नये उभार की और पहले से भिन्न तमाम लक्षणों-प्रवृत्तियों की चर्चा तो आम तौर पर होती है। इन तमाम बदलावों के पीछे सिर्फ़ यही कारण नहीं है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम संस्करण आज पराजित और विफल हो चुके हैं और सोवियत संघ के नेतृत्व में नामधारी समाजवादी (वस्तुत: राजकीय पूँजीवादी) ढाँचे वाले देशों का शिविर विघटित हो चुका है। इससे भी बुनियादी कारण (और ये दोनों अन्तर्सम्बन्धित हैं) यह है कि साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की कार्यप्रणाली और लगातार पैदा होने वाले अपने संकटों को निपटाने के उसेक तौर-तरीकों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं, और इनके चलते, विश्व पूँजीवाद के समूचे परिदृश्य में कुछ महत्त्वपूर्ण नई चीज़ें पैदा हुई हैं। इन बुनियादी कारणों को समझने की ज़रूरत है। इन बदलावों की पृष्ठभूमि के बनने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हो चुकी थी, गत शताब्दी के आठवें दशक से इनके लक्षण सतह पर उभरने लगे थे और अन्तिम दशक के दौरान एक नया बदला हुआ परिदृश्य एकदम सामने आ चुका था।

पहली बात, वित्तीय पूँजी की जो वरीयता और निर्णायक भूमिका उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में स्थापित हुई थी, वह गत शताब्दी के आठवें दशक तक चरम वर्चस्व में रूपान्तरित हो चुकी थी। दुनिया भर में निवेशित कुल पूँजी का तीन-चौथाई से भी अधिक आज सट्टा बाज़ार, मीडिया, मनोरंजन उद्योग और अन्य अनुत्पादक कार्रवाइयों में लगा हुआ है। वित्तीय पूँजी ने वास्तविक उत्पादन से स्वतंत्र होकर सम्पूर्ण विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व कायम कर लिया है और कीन्स की आशंका को हूबहू साकार करते हुए, उद्योग सट्टेबाज़ी के भंवर में सतह पर तैरने वाला बुलबुला बनकर रह गया है। आज जो पूँजी का विश्वव्यापी प्रसार दीख रहा है, वह सट्टेबाज़ी, मुद्रा-बाज़ारों में ऋण-सर्जन में सतत् वृद्धि और मुद्रा-पूँजी के अन्तरराष्ट्रीय आवागमन के रूप में है। साम्राज्यवाद के दौर में पूँजी के जिस परजीवी, परभक्षी, अनुत्पादक और जुआड़ी चरित्र की चर्चा लेनिन ने की थी, वह उस समय से कई गुना अधिक हो चुकी है।

आज विश्व-स्तर पर बुर्जुआ जनवाद के बचे-खुचे मूल्यों के भी निश्शेष होने, तरह-तरह की मूलतत्त्ववादी-नवफ़ासीवादी राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के सिर उठाने, तर्कणा और मानववाद के विरुद्ध नानाविध सांस्कृतिक उपक्रमों-उद्यमों के जन्म लेने तथा साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में माल-अन्धभक्ति, निरंकुशता, अतर्कपरकता, कलावाद-रूपवाद और मानवद्रोही प्रवृत्तियों के नये-नये रूपों के उभरने की ज़मीन यही है।

विश्व-स्तर पर पूँजी का विकास शेयर बाज़ारों और जुआघरों का `बाई-प्रोडक्ट´ बन जाने के चलते संकट के विस्फोट और महाध्वंस का भय हमेशा साम्राज्यवादियों-पूँजीपतियों के सिर पर सवार रहता है। बीच-बीच की अल्पकालिक राहतों के बावजूद, दीर्घकालिक मन्दी का दौर विगत तीन दशकों से लगातार मौजूद है। कभी तेज़ कभी मद्धम होता व्यापार युद्ध, बड़े-बड़े घरानों में से कुछ के तबाह होने का या किसी और द्वारा निगल लिये जाने का तथा नई-नई इजारेदारियों के गठन का सिलसिला लगातार जारी है। उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों, पूर्वी यूरोप के देशों और भूतपूर्व सोवियत संघ के घटक देशों के बाज़ार को साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी के लिए पूरी तरह खोल दिया है और चीन में “बाज़ार समाजवाद” की पिपिहरी बजाने वाले नये शासकों ने भी उसके स्वागत के लिए लाल गलीचे बिछा दिए हैं, पर पश्चिमी पूँजी का अजीर्ण रोग लगातार मौजूद है।

भूतपूर्व समाजवादी देशों में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना और राजकीय पूँजीवाद के सोवियत “समाजवादी” ढाँचे के विघटन के बाद पश्चिमी ढंग के पूँजीवादी ढाँचे की स्थापना मुख्यत: उन देशों के आन्तरिक वर्ग-संघर्ष का परिणाम थी, लेकिन इसमें साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की तथा साम्राज्यवादी घुसपैठ, घेरेबन्दी और षड्यंत्र की भी एक अहम भूमिका थी। इसी प्रकार, उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के तहत, एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों के बाज़ारों में साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी खुला चरागाह बना देने, सार्वजनिक क्षेत्र के विघटन का बुर्जुआ राज्य की बची-खुची “कल्याणकारी” भूमिका के निरस्तीकरण और “श्रम-सुधारों” के पीछे साम्राज्यवादी देशों के दबाव के साथ ही इन देशों के सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग की अपनी आवश्यकता और विवशता भी है। इन देशों में सत्तासीन होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोधों का लाभ उठाते हुए और जनता को निचोड़कर राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा कर एक सीमा तक पूँजीवाद का विकास किया। अब यह सिलसिला संतृप्ति-बिन्दु तक जा पहुँचा था। नई तकनोलॉजी, पूँजी और बाज़ार की अपनी ज़रूरतों के चलते साम्राज्यवादियों के गिरोह के दिशा-निर्देशों पर चलना अब इनके सामने एकमात्र विकल्प था। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर का यही सारतत्त्व है। इस नये दौर में पूँजी का वैश्विक प्रवाह एकदम निर्बन्ध हो गया है। साम्राज्यवादी शोषण इस नये दौर में प्रत्यक्ष राजनीतिक शासन या नियंत्रण के माध्यम से काम नहीं कर रहा है। राजनीतिक-सामरिक बल-प्रयोग और दबाव का अनिवार्य पहलू मौजूद है, लेकिन साम्राज्यवादी शोषण की प्रक्रिया मुख्यत: उस विशाल अन्तर के ज़रिए काम करती है जो विकसित देशों और पिछड़े देशों की उत्पादक शक्तियों के बीच बना हुआ है।

भारत और तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों के पूँजीपति वर्ग के किसी भी हिस्से का अब राष्ट्रीय चरित्र नहीं रह गया है। साम्राज्यवाद से विनियोजित अधिशेष में अपने हिस्से को लेकर देशी पूँजीपति वर्ग के अन्तरविरोध मौजूद हैं और वे समय-समय पर उग्र भी हो जाते हैं। देश के भीतर इजारेदार और ग़ैर इजारेदार पूँजी के बीच, बड़ी और छोटी पूँजी के बीच भी अन्तरविरोध हैं, पर वे ग़ैरदुश्मनाना अन्तरविरोध हैं। पूँजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा अब साम्राज्यवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए जनता के अन्य वर्गों के साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है।

राष्ट्रीय प्रश्न की ही तरह भूमि-प्रश्न भी अब सामाजिक क्रान्ति के एजेण्डे पर अपने पूर्ववर्ती रूप में उपस्थित नहीं रह गया है। प्रतिक्रियावादी “प्रशियाई” मार्ग से प्राक्पूँजीवादी भूमि-सुधारों के रूपान्तरण का काम पूँजीवादी व्यवस्था में सम्भव हदों तक, मुख्यत: पूरा हो चुका है। पुराने सामन्ती भूस्वामियों का एक बड़ा हिस्सा पूँजीवादी भूस्वामी बन चुका है। पहले के बड़े काश्तकार आज के बड़े मालिक किसान-कुलक बन चुके हैं। किसान आबादी का तेज़ विभेदीकरण गत तीन दशकों की एक महत्त्वपूर्ण परिघटना है। निम्न-मध्यम और छोटे किसान उजड़कर सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की पाँतों में शामिल हो रहे हैं। उच्च-मध्यम किसान धनी किसानों की कतारों में शामिल हो रहे हैं। पिछले दशक के दौरान यह प्रक्रिया और अधिक तेज़ हो गई है। गाँवों में भी श्रम और पूँजी का अन्तरविरोध ही प्रधान हो गया है। जहाँ अभी पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था की संक्रमणशील स्थिति है, वहाँ भी यही स्थिति है। वहाँ से भारी संख्या में उजड़कर किसान आबादी शहरों और विकसित पूँजीवादी खेती वाले इलाकों की ओर पलायन कर रही है। सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के आज सिर्फ़ अवशेष ही मौजूद हैं। गाँवों में वित्तीय पूँजी की पैठ मज़बूत हुई है, वे राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी में आ गए हैं, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था की जड़ता टूट गई है और कृषि और सहायक क्षेत्रों में भी माल-उत्पादन प्रभावी प्रवृत्ति बन गई है।

इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारतीय मध्यवर्ग का भी विगत कुछ दशकों के दौरान तेज़ विस्तार और विभेदीकरण हुआ है। मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों (प्रोफेसरों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों, नौकरशाहों, विशेषज्ञों आदि का) का एक बड़ा हिस्सा आज पूरी तरह से व्यवस्था के पक्ष में खड़ा हो चुका है। आम नौकरीपेशा, तबाहहाल मध्यवर्गीय कतारों से यह एकदम अलग खड़ा है। मध्यवर्ग के निचले संस्तरों की करीबी मेहनतकश वर्गों से बन रही है, हालाँकि उनकी निराशा, पिछड़े मूल्यों, जातिगत संस्कारों आदि का लाभ उठाकर धार्मिक कट्टरपन्थी ताकतें उनके एक हिस्से को अपने प्रभाव में लेने में फ़िलहाल कामयाब हैं। उच्च मध्यवर्ग आज उदारीकरण-निजीकरण के प्रवक्ता-समर्थक और धुर प्रतिक्रियावादी संस्कृति के संवाहक के रूप में व्यवस्था से नाभिनालबद्ध है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि हमारा पिछड़ा हुआ पूँजीवादी समाज आज राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के बजाय एक ऐसी नई समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में है जिसकी अन्तर्वस्तु साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी है। राष्ट्रीय जनवाद के अधूरे पड़े काम भी आज इसी के कार्यभारों में समाहित हो गए हैं। इस काम में सर्वहारा वर्ग का साथ मुख्यत: गाँव और शहर की भारी ग़रीब आबादी देगी और मध्यवर्ग और मध्यम किसानों के नीचे के संस्तर देंगे। बीच के संस्तर ढुलमुल सहयोगी होंगे। पूंजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा, खुशहाल मालिक किसान और उच्च मध्यवर्ग अब किसी भी सूरत में मेहनतकशों के रणनीतिक संश्रयकारी नहीं बनेंगे।

लेनिन के समय और आज के समय के बीच का एक महत्त्वपूर्ण फर्क यह है कि राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियाँ आज विश्व सर्वहारा क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण संघटक तत्त्व नहीं रह गई हैं। एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के अर्द्धऔद्योगीकृत पिछड़े देश ही आज भी साम्राज्यवाद की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं, पर इनमें से अधिकांश देशों में सामाजिक क्रान्तियों का एजेण्डा बदल चुका है। अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण, विश्व-सर्वहारा क्रान्ति के दूसरे चक्र में, वस्तुगत परिस्थितियों की दृष्टि से, इन्हीं देशों में सम्भावित हैं, पर इन क्रान्तियों की अन्तर्वस्तु अब साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी होगी। ये देशी-विदेशी पूँजी के संश्रय के विरुद्ध केन्द्रित नई समाजवादी क्रान्तियाँ होंगी, जो न केवल चीनी क्रान्ति से, बल्कि कई मायनों में सोवियत समाजवादी क्रान्ति से भी भिन्न होंगी।

सामाजिक शक्तियों के इस नये ध्रुवीकरण के अनुसार ही सांस्कृतिक मोर्चे के कार्यभारों की बुनियादी रूपरेखा तय होगी। कहा जा सकता है कि आज हमारी लड़ाई राष्ट्रीय जनवादी संस्कृति की नहीं बल्कि सर्वहारा जनवादी संस्कृति की, या कहें कि सर्वहारा संस्कृति की है। अब लोगों को यह बताने का अनुकूल समय है कि सिर्फ़ सर्वहारा जनवाद ही वास्तविक जनवाद होता है, कि आज सिर्फ़ दो ही मुख्य सांस्कृतिक पक्ष हैं – पूँजी की संस्कृति का पक्ष और श्रम की संस्कृति का पक्ष, और लोगों को इन्हीं दो के बीच अपना पक्ष चुनना होगा। कला-साहित्य के दायरे में व्यक्तिवाद और अलगाव की संस्कृति पर निर्णायक प्रहार के लिए आज निजी स्वामित्व की नैतिकता पर ही प्रश्न खड़े करने होंगे, लोभ-लाभ, बाज़ार और माल के रहस्यवाद की संस्कृति के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करना होगा, सम्पत्ति सम्बन्धों की तफसीलों को प्रस्तुत करना होगा और बुर्जुआ अधिकारों तथा अन्तरवैयक्तिक असमानताओं की सामाजिक-ऐतिहासिक बुनियादों को उद्घाटित करना होगा। इन्हीं बुनियादी कार्यभारों के इर्दगिर्द हमें राजनीतिक सत्ता, साम्राज्यवादी लूट और षड्यंत्र आदि के भण्डाफोड़ के प्रचारात्मक और आन्दोलनात्मक, रुटीनी और फ़ौरी, सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्य भी संगठित करने होंगे। सामाजिक जीवन में जो सामन्ती सांस्कृतिक मूल्य मौजूद हैं, वे सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग और साम्राज्यवादियों के लिए एकदम उपयुक्त हैं, अत: उन्होंने उन सभी को अपनाकर अपने सांस्कृतिक तंत्र का अंग बना लिया है। तर्कणा और भौतिकवाद की जगह अन्धविश्वास, रहस्यवाद आदि ही आज बुर्जुआ वर्ग की ज़रूरत हैं। जाति-समस्या, दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न को भी आज इसी नज़रिए से देखना होगा। इन मुद्दों पर जनवादी सुधार की पैबन्दगीरी का समय बीत चुका है। ऐसा करना महज़ बुर्जुआ गुलामगीरी होगी। सामाजिक मुक्ति के ये बुनियादी प्रश्न समाजवादी परियोजना के अनिवार्य बुनियादी मुद्दे हैं।

साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की संस्कृति में भी आज कोई अन्तरविरोध नहीं है। दोनों में सहयोग और एकता है, और काफ़ी हद तक तो एकरूपता भी है। राष्ट्रवादी संस्कृति की ज़मीन से साम्राज्यवादी संस्कृति का विरोध आज इतिहास की बात बन चुका है। सामाजिक-आर्थिक संरचना और सामाजिक-राजनीतिक क्रान्ति के स्वरूप के आधार पर, जनपक्षधर संस्कृति कर्म की सर्वाधिक सामान्य रूपरेखा की इस चर्चा के बाद, हम पूँजी के भूमण्डलीकरण के इस नये दौर की कुछ और नई प्रवृत्तियों की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

हम समझते हैं कि साम्राज्यवाद की आज की अति उग्र आक्रामकता के पीछे उसकी शक्ति नहीं, बल्कि उसका असमाधेय ढाँचागत संकट है। समाजवाद की तात्कालिक विफलता, तीसरी दुनिया के शासक वर्गों की घुटनाटेकू मुद्राओं और विश्व-क्रान्ति की धारा की वर्तमान संकटग्रस्तता के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था में उछाल या त्वरण के कोई विश्वसनीय संकेत नहीं हैं। साझा हितों के लिए, एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका में अमेरिकी सामरिक हस्तक्षेपों और कुचक्रों के पीछे सभी साम्राज्यवादी देश एकजुट दीखते हैं, लेकिन यह दौर-विशेष की विशिष्टता है। साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोध एक बार फिर गहरा रहे हैं और आने वाले दिनों में नये व्यापार-युद्धों और शक्ति-समीकरणों के संकेत अभी से मिलने लगे हैं।

अत: कहा जा सकता है कि ऊपरी तौर पर एकतरफ़ा ढंग से पूरी दुनिया की जनता पर हावी दीखता साम्राज्यवाद अन्दर से खोखला हो रहा है। यह आज भी कागजी बाघ ही है, बल्कि पहले से भी अधिक कागजी है। आज यह अपनी जड़ता की शक्ति से जीवित है और इसलिए जीवित है कि सर्वहारा क्रान्तियों और समाजवादी प्रयोगों का सिलसिला, पहले चक्र की विफलता के बाद, अभी फिर से गतिमान नहीं हो सका है।

इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय और पुनरुत्थान का यह समय अभूतपूर्व संकट का समय है। बुर्जुआ क्रान्तियों के प्रवाह को भी पराजय और पुन:स्थापन के दौरों से गुज़रना पड़ा था पर उनका संकट इतना विकट और लम्बा नहीं था। लेकिन जो क्रान्ति दूरगामी तौर पर, सहशताब्दियों लम्बे, वर्ग-समाज के समूचे इतिहास के विरुद्ध निर्देशित है, जो इतिहास की सर्वाधिक युगान्तरकारी और पहली `सचेतन क्रान्ति´ है, उसकी अवधि लम्बी होना, कठिनाइयाँ विकट होना, पराजय प्रचण्ड होना और रास्ता जटिल और आरोह-अवरोहपूर्ण होना, ऐतिहासिक दृष्टि से स्वाभाविक प्रतीत होता है।

विगत लगभग दो शताब्दियों के विश्व-इतिहास का समाहार करते हुए कहा जा सकता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच विश्व-ऐतिहासिक महासमर के पहले चक्र की शुरुआत हुई। पेरिस कम्यून (1871), अक्टूबर क्रान्ति (1917) और चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति (1966-76) इस यात्रा के तीन महानतम कीर्ति स्तम्भ – तीन मील के पत्थर थे। रूस में स्तालिन की मृत्यु के बाद संशोधनवादी पार्टी और राज्य पर काबिज हो गए और वहाँ समाजवाद का मुखौटा कायम रखते हुए नये नौकरशाह बुर्जुआ वर्ग ने राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा किया। एक ओर सामाजिक साम्राज्यवादी सोवियत संघ ने विश्व के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों के साथ विश्वासघात किया तथा उन्हें विघटित करने और अपना पिछलग्गू बनाने की कोशिश की। दूसरी ओर पश्चिमी साम्राज्यवादी शिविर के सामने एक चुनौती प्रस्तुत करके और साम्राज्यवादी शिविर के अन्तरविरोधों को उग्र बनाकर उसने वस्तुगत तौर पर विश्व-पूँजीवाद के संकट को बढ़ाने का काम भी किया। साथ ही, सोवियत संघ की मौजूदगी और दो अतिमहाशक्तियों के शिविरों के बीच की उग्र प्रतिस्पर्धा का लाभ पिछड़े देशों के शासक वर्गों ने भी उठाया। पश्चिमी खेमे की थोपी गई शर्तों का आंशिक विरोध सोवियत “सहायता” के सहारे करने में वे सफल रहे। सोवियत संघ में और पूर्वी यूरोप के देशों में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद भी चीन में सर्वहारा सत्ता की मौजूदगी और समाजवादी प्रयोगों के सिलसिले से पूरी दुनिया में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों और सर्वहारा क्रान्तियों की धारा को प्रेरणा और संवेग मिलता रहा। सोवियत संघ और अपने देश के प्रयोगों के विश्लेषण के आधार पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और माओ त्से-तुङ ने समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को उद्घाटित करने और पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने के उपाय विकसित करने और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के रूप में उन्हें अमल में लाने का युगान्तरकारी काम किया। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद वहाँ भी पूँजीवादी पुनर्स्थापना हो गई। इसका मुख्य कारण यह था कि 1949 से लेकर सांस्कृतिक क्रान्ति शुरू होने तक, वहाँ भी बुर्जुआ वर्ग ने समाज में अपने आधार के विस्तार के साथ ही पार्टी और राज्य के भीतर भी अपने समान्तर सदर मुकाम कायम कर लिए थे। दूसरे, अनुकूल विश्व-परिस्थितियों से भी उन्हें शक्ति मिली। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो सर्वहारा क्रान्ति के पहले संस्करणों की पराजय अप्रत्याशित नहीं लगती। मार्क्स-एंगेल्स और लेनिन ने पहले भी इस बात की चर्चा की थी कि समाजवादी संक्रमण की दीर्घावधि में वर्ग-संघर्ष लगातार जारी रहेगा, पूँजीवादी पुनर्स्थापना के ख़तरे लम्बे समय तक मौजूद रहेंगे। लेनिन ने पूँजीवादी पुनर्स्थापना के विभिन्न स्रोतों का उल्लेख किया था। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान माओ ने एकाधिक बार कहा था कि पूंजीवादी तत्त्वों के सत्तासीन होने की सम्भावनाएँ लम्बे समय तक मौजूद रहेंगी और समाजवाद की निर्णायक विजय के लिए कई सांस्कृतिक क्रान्तियों की आवश्यकता होगी। इस दृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र का, पराजय के रूप में समापन मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि को सत्यापित ही करता है। क्रान्तियों के विगत प्रयोगों की विफलता विचारधारा की पराजय नहीं है। पूँजीवाद इतिहास का अन्त नहीं है। यह स्वयं अपने भीतर से समाजवाद की आवश्यकता पैदा करता है। और उसकी वाहक शक्तियों को भी। विश्व पूँजीवाद की वर्तमान स्थिति स्वयं इसका प्रमाण है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच वर्ग-महासमर का पहला विश्व-ऐतिहासिक चक्र 1976 में चीन में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद समाप्त हो गया और अब दूसरे विश्व-ऐतिहासिक चक्र की शुरुआत हो चुकी है। इन दो चक्रों के बीच के संक्रमण-काल में एक महत्त्वपूर्ण घटना यह घटी है कि समाजवाद के नाम पर कायम, सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के राजकीय पूँजीवादी ढाँचे विघटित हो गए हैं। चीन के “बाज़ार समाजवाद” का पूँजीवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा हुआ है और यह तय है कि देर-सबेर इसे भी विघटित हो जाना है। समाजवाद के बारे में भ्रम पैदा करने वाले स्रोत समाप्त हो गए हैं। इधर भूण्डलीकरण के दौर में ऐसी स्थिति पैदा हुई है कि संशोधनवाद, सामाजिक जनवाद, अर्थवाद, ट्रेड यूनियनवाद आदि की सीमाएँ भी मेहनतकश जनता को स्पष्टत: दीखने लगी हैं और उसे यह बताने के लिए अनुकूल स्थितियाँ तैयार हुई हैं कि वास्तविक प्रश्न राज्यसत्ता का है, राजनीतिक संघर्ष का है। संशोधनवादी-सुधारवादी प्रवृत्तियों का आधार मध्यवर्ग और कुलीन मज़दूरों में मौजूद है, पर उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की चपेट में इनका भी एक हिस्सा अब आने लगा है और उसकी चेतना का भी `रैडिकलाइज़ेशन´ हो रहा है। परम्परागत चुनावी वामपन्थी और ट्रेड-यूनियन सुधारवाद की, व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति के रूप में प्रभाविता कम होने के साथ ही साम्राज्यवाद और पूँजीवादी व्यवस्था ने इधर नये सिरे से एन.जी.ओ.-सुधारवाद के रूप में एक नई सुरक्षा-पंक्ति खड़ी करने की कोशिश की है। एन.जीओ. व्यवस्था-विरोध का छद्म खड़ा करते हुए एक नये `सेफ्टी वॉल्व´ का और `ट्रोजन हॉर्स´ का काम कर रहे हैं, जनहित के कार्यों से बुर्जुआ राज्यसत्ता को पूरी तरह पीछे हटने का मौका दे रहे हैं, और साथ ही, सस्ता श्रम निचोड़ने का ज़रिया भी बने हुए हैं। इनका विश्वव्यापी नेटवर्क फण्ड-बैंक-डब्ल्यू.टी.ओ. की तिकड़ी का ही अनिवार्य पूरक तंत्र है। यह आश्चर्यजनक नहीं कि पुराने गांधीवादियों-समाजवादियों से लेकर नकली वामपिन्थयों और भगोड़ों की सभी किस्में आज एन.जी.ओ. के साथ मधुयामिनी मना रही हैं।

सर्वहारा क्रान्ति के दो विश्व ऐतिहासिक चक्रों के बीच की विशिष्टता यह रही है कि उसने समाजवाद को बदनाम करने वाले नकली लाल झण्डे को चींथकर धूल में फेंक दिया है, सुधारवाद और “कल्याणकारी राज्य” के कीन्सियाई नुस्खों की असलियत साफ़ कर दी है और विश्व पूँजीवाद की घोर मानवद्रोही बर्बरता को एकदम उजागर कर दिया है। एक बार फिर, उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप की तरह, पूरी दुनिया में श्रम और पूँजी की ताकतें एकदम आमने-सामने खड़ी हैं। साम्राज्यवादी भेड़िये और तीसरी दुनिया के देशों में सत्तारूढ़ उनके छुटभैये मेहनतकशों से अतिलाभ निचोड़ते हुए उनके एक बड़े हिस्से को लगातार सड़कों पर धकेल रहे हैं और तबाह कर रहे हैं। दूसरी ओर विश्व स्तर पर युद्ध और विनाश का जो कहर वे बरपा कर रहे हैं, वह कुल मिलाकर विश्वयुद्धों की तबाही से कम नहीं है। दूसरी ओर, दुनिया के पिछड़े देशों से लेकर समृद्ध देशों तक में एक बार फिर विद्रोह का लावा खौल रहा है। जगह-जगह जन-उभारों और आन्दोलनों के ज्वार भी उठने लगे हैं। इस पूरी स्थिति का समस्यापरक पक्ष यह है कि सर्वहारा क्रान्ति की मनोगत शक्तियाँ अभी कमज़ोर और बिखरी हुई हैं। विगत पराजयों का सार-संकलन अभी पूरा नहीं हुआ है। साथ ही, नई सर्वहारा क्रान्तियों की प्रकृति और रास्ते को समझने के लिए, परिस्थितियों में आए नये बदलावों को समझने का काम भी अभी बहुत कम हुआ है। लेकिन, ठहराव के दौर के संकटों और चुनौतियों के बजाय आज हम एक नई शुरुआत के दौर के संकटों और चुनौतियों के रूबरू खड़े हैं। इसी नये दौर के कार्यभारों को हम एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और नये सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभारों के रूप में देख-समझ रहे हैं।

एकदम ठोस शब्दों में कहें कि सर्वहारा क्रान्ति के नए संस्करण की सर्जना के लिए हमें सबसे पहला काम यह करना है कि अतीत की सर्वहारा क्रान्तियों और संघर्षों के इतिहास को विस्मृति के अँधेरे से बाहर लाना है, तमाम मिथ्या-प्रचारों और विभ्रमों की धूल-राख उड़ाकर उसे जनता के सामने प्रस्तुत करना है। हमें सर्वहारा क्रान्ति की विचारधारा के बारे में फैलाई जा रही भ्रान्तियों और झूठे प्रचारों का प्रतिकार करते हुए उसे मेहनतकश जनता के वर्ग-सचेत संस्तरों तक और उनके पक्ष में खड़े परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों तक लेकर जाना है। यह सर्वहारा पुनर्जागरण का पक्ष है। एक नये सर्वहारा प्रबोधन के केन्द्रीय कार्यभार क्या हैं? हमें सर्वहारा वर्ग की विचारधारा को आज के विश्व-ऐतिहासिक सन्दर्भों में जानना-समझना है। मार्क्सवाद एक गत्यात्मक विज्ञान है। अतीत की क्रान्तियों का अध्ययन हम भविष्य की क्रान्तियों के लिए कर रहे हैं। महानतम क्रान्तियों का भी अनुकरण नई क्रान्तियों को जन्म नहीं दे सकता। अतीत के प्रयोगों से सीखते हुए स्थितियों में आए परिवर्तनों को सदा-सर्वदा ध्यान में रखना होता है। और फिर नये चक्र की सर्वहारा क्रान्तियों का रंगंमच तो पूर्व की अपेक्षा कई महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ लिये हुए है। इतिहास के अध्ययन, वर्तमान जीवन के अध्ययन और सामाजिक प्रयोगों के त्रिकोणात्मक संघातों के बीच ही नई क्रान्तियों के मार्गदर्शक सूत्र और रणनीति का विकास होगा। यह समय घनघोर वैचारिक बहस-मुबाहसे का होगा। साथ ही, यह जनता के बीच शिक्षा और प्रचार का तथा प्रारिम्भक स्तर के सामाजिक प्रयोग का समय होगा। यही नये सर्वहारा प्रबोधन का केन्द्रीय कार्यभार है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये दोनों कार्यभार अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ गुंथे-बुने हैं और इन्हें साथ-साथ अंजाम दिया जाएगा। यह भी स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि यह पूरी प्रक्रिया सर्वहारा क्रान्ति की हरावल शक्ति को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया की सहवर्ती होगी, पूर्ववर्ती या अनुवर्ती नहीं।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’

शिशिर-बसंत 2002 से साभार

नई समाजवादी क्रान्ति का उद्घोषक ‘बिगुल’ के मई-2009 अंक की विषय – सामग्री

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bigul naya ank bigमज़दूर वर्ग के लिए सबसे बुरी बातों में से एक शायद यह है कि मई दिवस को आज एक अनुष्ठान बना दिया गया है। यह मई दिवस के महान शहीदों का अपमान है। मई दिवस मज़दूरों के मक्कार, फरेबी, नकली नेताओं के लिए महज़ झण्डा फहराने, जुलूस निकालने, भाषण देने की एक रस्म हो सकता है, लेकिन वास्तव में यह उन शहीदों की कुर्बानियों की याददिहानी का एक मौका है, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी देकर पूरी दुनिया के मज़दूरों को यह सन्देश दिया था कि उन्हें अलग-अलग पेशों और कारख़ानों में बँटे-बिखरे रहकर महज़ अपनी पगार बढ़ाने के लिए लड़ने की बजाय एक वर्ग के रूप में एकजुट होकर अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा। काम के घण्टे कम करने की माँग उस समय की सर्वोपरि राजनीतिक माँग थी…

मई दिवस अनुष्ठान नहीं, संकल्पों को फौलादी बनाने का दिन है!

मज़दूरों का त्योहार मई दिवस आठ घण्टे काम के दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आन्दोलन से पैदा हुआ। उसके पहले मज़दूर चौदह से लेकर सोलह- सोलह घण्टे तक खटते थे। सारी दुनिया में अलग-अलग इस माँग को लेकर आन्दोलन होते रहे थे। अपने देश में भी 1862 में ही मज़दूरों ने इस माँग को लेकर कामबन्दी की थी। लेकिन पहली बार बड़े पैमाmay day 2ने पर 1886 में अमेरिका के विभिन्न मज़दूर संगठनों ने मिलकर आठ घण्टे काम के दिन की माँग पर एक विशाल आन्दोलन खड़ा करने का फैसला किया।

एक मई 1886 को पूरे अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 फैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे। शिकागो महानगर के आसपास सारा रेल यातायात ठप्प हो गया और शिकागो के ज़्यादातर कारख़ाने और वर्कशाप बन्द हो गये। शहर के मुख्य मार्ग मिशिगन एवेन्यू पर अल्बर्ट पार्सन्स के नेतृत्व में मज़दूरों ने एक शानदार जुलूस निकला….

मई 1886 का वह रक्तरंजित दिन

मशहूर भारतीय फ़िल्मकार सत्यजित रे ने अपनी एक फ़िल्म अमेरिका में प्रदर्शित की तो पहले शो में ही बहुत से अमेरिकी फ़िल्म बीच में ही छोड़कर आ गये क्योंकि सत्यजीत रे ने फ़िल्म के एक सीन में भारतीय लोगों को हाथों से खाना खाते हुए दिखाया था जिसे देखकर उन्हें वितृष्णा होने लगी थी। लेकिन अगर उन्हें इंसान के हाथों से सीवरेज की सफाई होती दिखला दी जाती तो शायद वे बेहोश हो जाते। सिर्फ अमेरिकी ही क्यों, इस नर्क के दर्शन से तो बहुत से भारतीय भी बेहोश हो जायेंगे। लोग अपने घरों में साफ-सुथरा टायलट इस्तेमाल करते हैं लेकिन वे शायद ही कभी सोचते हों कि उनके इस टायलट को साफ रखने के लिए इस दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो अपनी जान दे देते हैं। सिर्फ इसलिए कि दूसरे लोग एक साफ-सुथरी, ‘‘हाइजेनिक’’ ज़िन्दगी जी सकें….

चेन्नई के सफाई कामगारों की हालत

माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है…..

चीनी विशेषता वाले ”समाजवाद” में मज़दूरों के स्वास्थ्य की दुर्गति

हर साल करोड़ों स्‍त्री-पुरुष गाँवों में फसल का काम ख़त्म होते ही रोज़गार की तलाश में देश के महानगरों की ओर चल पड़ते हैं। निर्माणस्थलों, ईंटभट्ठों और पत्थर की खदानों में कमरतोड़ काम करने हुए ये रेल की पटरियों के नीचे या सड़कों के किनारे, या गन्दे नालों के किनारे बोरी या पालिथीन की झुग्गियों में रहते हैं, और अक्सर आधा पेट खाकर ही गुज़ारा कर लेते हैं

प्रवासी मज़दूर: चिकित्सा सेवाओं के शरणार्थी

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मधुबन, मऊ। प्रशासन की उपेक्षा और संवेदनहीनता से तंग आकर मधुबन तहसील के अन्तर्गत फतेहपुर मण्डाव ब्लाक के कई गाँवों के नरेगा मज़दूर अपनी  माँगों और मर्यादपुर ग्राम सभा की 5 माँगों को लेकर 22 अप्रैल से क्रमिक अनशन पर बैठे थे। इन गाँवों में मर्यादपुर, डुमरी, लखनौर, भिडवरा, जवाहिरपुर, गोबबाडी, रामपुर, अलीपुर-शेखपुर, ताजपुर, बेमडाड, गुरम्हा, छतहरा, लघुआई, लऊआसात शामिल थे। अनशन पर जाने से पूर्व उन्होंने ज़िला और तहसील स्तर पर हर जगह बार-बार पत्र लिखकर, ज्ञापन देकर अपनी आवाज़ पहुँचाने की कोशिश की, लेकिन मज़दूरों की आवाज़ कहीं नहीं सुनी गयी।

देहाती मज़दूर यूनियन द्वारा 8 दिन की क्रमिक भूख हड़ताल

5करीब डेढ़ महीने तक चली देशव्यापी चुनावी नौटंकी अब आख़िरी दौर में है। ‘बिगुल’ का यह अंक जब तक अधिकांश पाठकों के हाथों में पहुँचेगा तब तक चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे और दिल्ली की गद्दी तक पहुँचने के लिए पार्टियों के बीच जोड़-तोड़, सांसदों की खरीद-फरोख्त और हर तरह के सिद्धान्तों को ताक पर रखकर निकृष्टतम कोटि की सौदेबाज़ी शुरू हो चुकी होगी। पूँजीवादी राजनीति की पतनशीलता के जो दृश्य हम चुनावों के दौरान देख चुके हैं, उन्हें भी पीछे छोड़ते हुए तीन-तिकड़म, पाखण्ड, झूठ-फरेब का घिनौना नज़ारा पेश किया जा रहा होगा। जिस तरह इस चुनाव के दौरान न तो कोई मुद्दा था, न नीति – उसी तरह सरकार बनाने के सवाल पर भी किसी भी पार्टी का न तो कोई उसूल है, न नैतिकता! सिर्फ और सिर्फ सत्ता हासिल करने की कुत्ता घसीटी जारी है।

चुनावी नौटंकी का पटाक्षेप: अब सत्ता की कुत्ताघसीटी शुरू

नौजवान भारत सभा, बिगुल मज़दूर दस्ता और अखिल भारत नेपाली एकता मंच ने मिलकर अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस मनाया और भारत एवं नेपाल की मेहनतकश जनता के भाईचारे को और मज़बूत बनाने का संकल्प लिया।

मई दिवस के दिन सुबह ही गोरखपुर की सड़कें “दुनिया के मज़दूरों एक हो”, “मई दिवस ज़िन्दाबाद”, “साम्राज्यवाद-पूँजीवाद maydayका नाश हो”, “भारत और नेपाली जनता की एकजुटता ज़िन्दाबाद”, “इंकलाब ज़िन्दाबाद” जैसे नारों से गूँज उठीं। नगर निगम परिसर में स्थित लक्ष्मीबाई पार्क से शुरू हुआ मई दिवस का जुलूस बैंक रोड, सिनेमा रोड, गोलघर, इन्दिरा तिराहे से होता हुआ बिस्मिल तिराहे पर पहुँचकर सभा में तब्दील हो गया। जुलूस में शामिल लोग हाथों में आकर्षक तख्तियाँ लेकर चल रहे थे जिन पर ‘मेहनतकश जब जागेगा, तब नया सवेरा आयेगा’, ‘मई दिवस का है पैगाम, जागो मेहनतकश अवाम’ जैसे नारे लिखे थे….

मई दिवस पर याद किया मज़दूरों की शहादत को

कारपोरेट जगत में हमेशा ही मजदूरों का मनमाना शोषण होता रहा है लेकिन अब सरकारी उपक्रम भी बेहयाई से श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। वैसे तो मेट्रो रेल कारपोरेशन में श्रम कानूनों के खुले उल्लंघन की ख़बरें कर्मचारियों के आन्दोलन की बदौलत सामने आने लगी हैं लेकिन बेंगलोर मेट्रो तो इसमें भी दो कदम आगे निकल गयी है। वहाँ बच्चों से मज़दूरी करायी जा रही है ताकि कम पैसे पर उन्हें अधिक से अधिक निचोड़ा जा सके। केन्द्र और राज्य सरकार के निवेश और जापान बैंक के सहयोग से मिलने वाले 9,000 करोड़ के बजट के बाद भी बंगलोर मेट्रो के निर्माण के लिए बच्चों का खून और पसीना बहाया जा रहा है।..

बच्चों के खून-पसीने से बन रही है बेंगलोर मेट्रोदिल्ली मेट्रो की ट्रेनें

metro

दिल्ली मेट्रो की ट्रेनें, मॉल और दफ्तर जितने आलीशान हैं उसके कर्मचारियों की स्थिति उतनी ही बुरी है और मेट्रो प्रशासन का रवैया उतना ही तानाशाहीभरा। लेकिन दिल्ली मेट्रो रेल प्रशासन द्वारा कर्मचारियों के दमन-उत्पीड़न की हर कार्रवाई के साथ ही मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन और ज़ोर पकड़ रहा है। सफाईकर्मियों से शुरू हुए इस आन्दोलन में अब मेट्रो फीडर सेवा के ड्राइवर-कण्डक्टर भी शामिल हो गये हैं। मेट्रो प्रशासन के तानाशाही रवैये और डीएमआरसी-ठेका कम्पनी गँठजोड़ ने अपनी हरकतों से ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों की एकजुटता को और मज़बूत कर दिया है।

मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन

मित्रवत साथियो,
क्या आप जानते हैं कि शोषण करने वाला शोषण सहने वाले से ज्यादा गुनहगार होता है। और सभी जानते हैं, शोषण सहने वाला अधिक परिश्रमी होता है और शोषण करने वाला ऐयाशबाज़ होता है और हवेली में आरामदेह जीवन बिताता है।
लेकिन ऐसा क्यों?

ऐसा सवाल एक नहीं है बल्कि बहुत अधिक संख्या में हैं। लेकिन इन सवालों का जवाब एक ही है और वह है `अज्ञानता´। जो दिमाग़ और आँख होते हुए भी उन पर पट्टी बँधी हुई है। जो आज के हालात में `जानवर और मनुष्य एक समान जीने को मज़बूर है´, ऐसा क्यों? आप खुद समझिये और विचार कीजिये। आपके घर बैल होगा, अगर नहीं भी होगा तो सुने तो ज़रूर होंगे, बेचारा कितना मासूम परिश्रमी होता है। पूरे साल का अनाज पैदा करने में सहायता करता है। क्या उसका अधिकार नहीं है कि सोने के लिए पलंग मिले, उसका मालिक हमाम साबुन से नहाये तो उसे भी नहाने का हक हो, उसे भी अच्छे कपड़े मिलें, उसे भी खाने को अच्छा भोजन मिले, आपकी सम्पति में भी आधा हक हो…

आपस की बात

……..इसके अलावा और भी…

माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है

मई दिवस का इतिहास-2

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शिकागो की हड़ताल और हे मार्केट की घटना

पहली मई को शिकागो में हड़ताल का रूप सबसे आक्रामक था। शिकागो उस समय जुझारू वामपन्थी मज़दूर आन्दोलन का केन्द्र था। हालाँकि वह आन्दोलन मज़दूरों की समस्याओं पर पर्याप्त रूप से साफ राजनीतिक रुख नहीं रखता था, फ़िर भी वह एक लड़ाकू और जुझारू आन्दोलन था। वह मज़दूरों का, आन्दोलन में जुझारू भावना बढ़ाने के लिए, आह्वान करने को हमेशा तैयार रहता था, ताकि मज़दूरों के जीवन की स्थितियों और काम करने की स्थितियों में सुधार लाया जा सके।

चूंकि शिकागो की हड़ताल में कई जुझारू मज़दूर दलों ने भाग लिया, इसलिए ऐसा माना गया कि शिकागो में हड़ताल सबसे बड़े पैमाने पर हुई। एक `आठ-घण्टा एसोसिएशन´ काफी पहले ही इस हड़ताल की तैयारी के लिए बन गया था। वामपन्थी लेबर यूनियनों से बनी `सेन्ट्रल लेबर यूनियन´ ने `आठ-घण्टा एसोसिएशन´ को पूरा सहयोग दिया, जो एक संयुक्त मोर्चा था, जिसमें फेडरेशन से लेकर `नाइट्स ऑफ लेबर´ और `सोशलिस्ट लेबर पार्टी´ तक शामिल थीं। `सोशलिस्ट लेबर पार्टी´ अमेरिकी मज़दूर वर्ग की पहली संगठित समाजवादी राजनीतिक पार्टी थी।

पहली मई के पिछले दिन रविवार को `सेन्ट्रल लेबर यूनियन´ ने एक लामबन्दी प्रदर्शन किया जिसमें 25,000 मज़दूरों ने हिस्सा लिया। पहली मई को शिकागो में मज़दूरों का एक विशाल सैलाब उमड़ा और संगठित मज़दूर आन्दोलन के आह्वान पर शहर के सारे औजार चलने बन्द हो गए और मशीनें रुक गयीं। मज़दूर आन्दोलन को कभी भी वर्ग-एकता के इतने शानदार और प्रभावी प्रदर्शन का एहसास नहीं हुआ था। उस समय आठ घण्टे के कार्य-दिवस के महत्त्व ने, और हड़ताल के चरित्र और विस्तार ने पूरे आन्दोलन को एक विशेष राजनीतिक अर्थ दे दिया। अगले कुछ दिनों में यह राजनीतिक अर्थ और भी गहरा होता गया। `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन पहली मई, 1886 की हड़ताल में अपनी पराकाष्ठा पर था। और इसने अमेरिकी मज़दूर वर्ग की लड़ाई के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया था।

इस दौरान मज़दूरों के दुश्मन भी चुप नहीं बैठे रहे। शिकागो में मालिकों और शहर के प्रशासन की मिली-जुली शक्तियों ने, जो जुझारू नेताओं को ख़त्म करने के लिए, और इसके जरिए शिकागो के समग्र मज़दूर आन्दोलन को रौंद डालने के लिए छटपटा रहीं थीं, मज़दूरों के जुलूस को गिरफ्तार कर लिया। 3 और 4 मई की घटनाएँ जो `हे मार्केट कांड´ के नाम से जानीं जातीं हैं, साफ तौर पर पहली मई की हड़ताल का परिणाम थीं। 4 मई को हे मार्केट स्क्वायर पर हुए प्रदर्शन में, 3 मई को `मैककार्मिक रीपर वर्क्स´ पर मज़दूरों की एक सभा पर पुलिस के बर्बर हमले का विरोध करने का आह्वान किया गया। इस क्रूर हमले में छ: मज़दूर मारे गए थे और कई घायल हुए थे। यह सभा जो हे मार्केट स्क्वायर पर हो रही थी, ख़त्म ही होने वाली थी कि पुलिस ने मज़दूरों की भीड़ पर हमला कर दिया। इसी बीच अचानक भीड़ में एक बम फेंका गया। इस हमले में चार मज़दूर और सात पुलिसवाले मारे गये। हे मार्केट का भयंकर रक्तपात, मज़दूर नेताओं पार्सन्स, स्पाइस, फ़िशर और एंजेल को फांसी और शिकागो के तमाम जुझारू नेताओं को कैद – संघर्षरत मज़दूरों को शिकागो के मालिकों का यह जवाब था। पूरे देश की मिलों-फैक्टरियों के मालिकों को चेतावनी मिल चुकी थी। 1886 के उत्तरार्द्ध में मालिकों ने 1885-86 के आन्दोलन के दौरान खोई हुई अपनी पुरानी स्थिति को फ़िर से पाने के लिए काफी आक्रामक रुख अपनाया।

शिकागो के मज़दूर नेताओं की फांसी के एक साल बाद फेडरेशन, (जो अब `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नाम से प्रसिद्ध हो चुका था) के सेंट लूई के सम्मेलन में, 1888 में, `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन को नए सिरे से जीवित करने का संकल्प लिया गया। पहली मई को, जो अब एक परम्परा बन चुकी थी, और जो दो साल पहले मज़दूरों के राजनीतिक वर्ग-प्रश्न के आधार पर हुए संघर्ष का केन्द्र-बिन्दु बन चुकी थी, `काम के घण्टे आठ करो´ की फ़िर से शुरुआत का दिन बनने का सम्मान मिला। पहली मई, 1890 को पूरे देश में छोटे कार्य-दिवस के लिए हड़तालें हुईं। 1889 के सम्मेलन में `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेता सैमुएल गोम्पर्स के नेतृत्व में हड़ताल आन्दोलन को सीमित करने की नीच कोशिश कामयाब हो गई। यह तय हुआ `कारपेन्टर्स यूनियन´, जिसे हड़ताल के लिए सबसे अच्छी तरह से तैयार यूनियन माना जाता था, हड़ताल में पहल करेगी और अगर यह पहल सफल सिद्ध होगी तो दूसरी यूनियनें भी हड़ताल में कूद पड़ेंगीं।

मई-दिवस अन्तराष्ट्रीय बन गया

गोम्पर्स ने अपनी आत्मकथा में मई-दिवस को पूरी दुनिया में प्रचलित करने में `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ का योगदान इस प्रकार बताया है : “जैसे-जैसे काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की योजनाएँ विकसित हो रही थीं, वैसे-वैसे हम यह लगातार सोच रहे थे कि हम अपने लक्ष्य को विस्तारित कैसे करें। जैसे-जैसे पेरिस में होने वाली मज़दूरों की अन्तरराष्ट्रीय कांग्रेस (इण्टरनेशनल वर्किन्गमेन्स कांग्रेस) का समय पास आता जा रहा था, मुझे यह बात समझ में आ रही थी कि, इस कांग्रेस से विश्वव्यापी सहानुभूति पाकर हम अपने आन्दोलन को लाभ पहुंचा सकते हैं।” गोम्पर्स ने काफी पहले ही अपने सुधारवादी और अवसरवादी रुझानों को दिखला दिया था। उसकी यही रुझानें आगे चलकर उसकी वर्ग-सहयोगवादी नीतियों में पूर्णत: फलीभूत हुईं। यही गोम्पर्स अब समाजवादी मज़दूरों के उस आन्दोलन का समर्थन पाने को तत्पर था, जिसके प्रभाव का उसने जबरदस्त विरोध किया था।

14 जुलाई, 1889 को बास्तीय के पतन की सौवीं सालगिरह पर, पेरिस में, कई देशों के संगठित समाजवादी आन्दोलनों के नेता एकत्र हुए। वे पेरिस में उस अन्तरराष्ट्रीय संगठन (प्रथम इण्टरनेशनल) के ढंग का मज़दूरों का एक अन्तराष्ट्रीय संगठन फ़िर से बनाने के लिए जुटे थे, जिसे 25 साल पहले उनके महान शिक्षकों-कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स ने बनाया था। `दूसरे इण्टरनेशनल´ की इस स्थापना बैठक में एकत्रित हुए प्रतिनिधियों ने अमेरिकी प्रतिनिधियों से 1884-86 के दौरान अमेरिका में चले 8 घंटे कार्य-दिवस के आन्दोलन के बारे में और हाल ही में उसके नये सिरे से उठ खडे़ होने के बारे में सुना। अमेरिकी मज़दूरों के उदाहरण से उत्साहित होकर पेरिस कांग्रेस ने निम्न प्रस्ताव स्वीकार किया : “कांग्रेस एक विशाल अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शन आयोजित करने का निर्णय लेती है ताकि एक विशेष दिन, सभी देशों में ओर सभी शहरों में मेहनतकश जनसमुदाय राजकीय अधिकारियों से कार्यदिवस कानूनी तौर पर घटाकर आठ घण्टे करने की तथा पेरिस कांग्रेस के अन्य निर्णयों को लागू करने की माँग करे। चूंकि `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ ने दिसम्बर 1888 में अपने सेंट लुई सम्मेलन में, पहले ही ऐसे प्रदर्शन के लिए पहली मई 1890 का दिन तय किया है, इसलिए इस दिन को अन्तराष्ट्रीय प्रदर्शन के लिए स्वीकार किया जाता है। विभिन्न देशों के मज़दूरों को अपने देश में मौजूद परिस्थितियों के अनुसार इस प्रदर्शन को जरूर आयोजित करना चाहिए।”

1890 का मई दिवस कई यूरोपीय देशों में मनाया गया। अमेरिका में समाजवादी पीटर मैकगाथर के नेतृत्व में `कारपेन्टर्स यूनियन´ ने आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग को लेकर हड़ताल आयोजित किया जिसमें निर्माण कार्य के मज़दूरों की अन्य यूनियनों ने भी भाग लिया। समाजवादियों के विरुद्ध असाधारण कठोर नियमों के बावजूद मज़दूरों ने जर्मनी के औद्योगिक शहरों में मई-दिवस मनाया। हालाँकि अधिकारियों ने चेतावनी दी थी और मज़दूरों के दमन का प्रयास भी किया लेकिन दूसरी यूरोपीय राजधानियों में भी इसी प्रकार प्रदर्शन हुए। अमेरिका में शिकागो और न्यूयार्क शहरों में हुए प्रदर्शनों का विशेष महत्त्व था। कई हज़ार लोगों ने आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग को लेकर सड़कों पर जुलूस निकाला और ये प्रदर्शन शहर के मुख्य केन्द्रों पर खुली सभाओं के साथ समाप्त हुए।

1891 की ब्रुसेल्स में आयोजित अगली कांग्रेस में इण्टरनेशनल ने मई दिवस के मूल लक्ष्य, यानी `काम के घण्टे आठ करो´ को तो दोहराया ही, लेकिन साथ ही उसने यह भी जोड़ा कि इस दिन अनिवार्य रूप से काम करने की परिस्थितियों में सुधार करने और राष्ट्रों के बीच शान्ति सुनिश्चित करने के लिए भी प्रदर्शन होना चाहिए। इस संशोधित प्रस्ताव में आठ घण्टे के कार्य-दिवस के लिए “मई-दिवस के प्रदर्शनों के वर्ग चरित्र” और उन माँगों के महत्त्व पर जोर दिया गया जो “वर्ग-संघर्ष को और गहरा कर रहे थे।” प्रस्ताव में यह भी माँग की गई है कि “जहाँ भी संभव हो” काम रोक दिया जाए। हालाँकि मई-दिवस की हड़तालों के पीछे कुछ ख़ास और तात्कालिक मुद्दे थे लेकिन इण्टरनेशनल ने प्रदर्शनों के उद्देश्यों को विस्तारित करने और उन्हें ठोस रूप देने का प्रयास शुरू कर दिया। ब्रिटिश श्रमिक संगठनों ने मई-दिवस की तात्कालिक माँगों पर भी हड़ताल करने से इनकार करके, और जर्मन सामाजिक जनवादियों के साथ मिलकर मई-दिवस के प्रदर्शन को मई के पहले रविवार तक स्थगित करने के पक्ष में मतदान किया।

अन्तरराष्ट्रीय मई-दिवस पर एंगेल्स के विचार

एंगेल्स ने 1 मई, 1890 को लिखी गई, `कम्युनिस्ट घोषणापत्र´ के चौथे जर्मन संस्करण की प्रस्तावना में, अन्तरराष्ट्रीय सर्वहारा संगठनों के इतिहास की समीक्षा करते हुए प्रथम अन्तरराष्ट्रीय मई-दिवस के महत्त्व की ओर ध्यान खींचा :

“जब मैं यह पक्तियाँ लिख रहा हूँ, यूरोप और अमेरिका का सर्वहारा अपनी शक्तियों की समीक्षा कर रहा है, यह पहला मौका है जब, सर्वहारा वर्ग एक झण्डे तले, एक तात्कालिक लक्ष्य के वास्ते, एक सेना के रूप में, गोलबन्द हुआ है : आठ घण्टे के कार्य-दिवस को कानून द्वारा स्थापित कराने के लिए…। यह शानदार दृश्य जो हम देख रहे हैं, वह पूरी दुनिया के पूँजीपतियों, भूस्वामियों को यह बात अच्छी तरह समझा देगा कि पूरी दुनिया के सर्वहारा वास्तव में एक हैं। काश! आज मार्क्स भी इस शानदार दृश्य को अपनी आँखों से देखने के लिए मेरे साथ होते।”

सर्वहारा के एक साथ हो रहे अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शन पूरी दुनिया के मज़दूरों की कल्पनाओं और क्रान्तिकारी सहजवृत्तियों को अधिकाधिक जागृत कर रहे थे और हर साल प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले मज़दूरों की संख्या बढ़ती जा रही थी।

1893 में ज्यूरिख में हुई इण्टरनेशनल की कांग्रेस में पहली मई के प्रस्ताव में जोड़ा गया निम्नलिखित अंश खुद ही आन्दोलन के प्रति मज़दूरों के बढ़ते समर्थन को दिखलाता है। इस कांग्रेस में एंगेल्स भी उपस्थित थे।

“पहली मई के दिन आठ घण्टे के कार्य दिवस के लिए होने वाले प्रदर्शन को साथ ही साथ अनिवार्यत: सामाजिक परिवर्तन के जरिये वर्ग विभेदों को नष्ट करने की मज़दूर वर्ग की दृढ़निश्चयी आंकाक्षा का प्रदर्शन भी होना चाहिए। इस प्रकार मज़दूर वर्ग को उस राह पर कदम रखना चाहिए जो सभी मनुष्यों के लिए शान्ति अर्थात अन्तरराष्ट्रीय शान्ति की ओर ले जाने वाली एकमात्र राह है।”

अनेक पार्टियों के सुधारवादी नेताओं ने पहली मई के प्रदर्शनों को ओजहीन बनाने की कोशिश की। उन्होंने संघर्ष के इन दिनों को आराम और मनोरंजन के दिनों में बदलने की कोशिश की। इसीलिए वे हमेशा मई-दिवस का प्रदर्शन पहली मई के सबसे नजदीक वाले रविवार को आयोजित करने पर जोर देते थे। रविवार को मज़दूरों को हड़ताल के जरिए काम ठप करने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उस दिन वैसे भी काम नहीं होता था। सुधारवादी नेताओं के लिए यह दिन मात्र मज़दूरों का एक अन्तराष्ट्रीय छुट्टी का दिन था, शोभायात्रायों का दिन और दूर देहातों के मैदानों में खेल का दिन था। जबकि मई-दिवस के बारे में ज्यूरिख कांग्रेस के प्रस्ताव में माँग यह की गई थी कि मई-दिवस “वर्ग-विभेद के खात्मे के लिए मज़दूर-वर्ग की दृढ़निश्चयी आकांक्षा के प्रदर्शनों का दिन” होना चाहिए, यानी, एक ऐसा प्रदर्शन जो शोषण और उजरती गुलामी पर आधारित पूँजीवादी व्यवस्था के ध्वंस के लिए हो लेकिन इससे सुधारवादियों को कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि वे अपने आप को इण्टरनेशनल के निर्णयों से बंधा हुआ नहीं मानते थे। वे इण्टरनेशनल की कांग्रेसों को मात्र अन्तरराष्ट्रीय दोस्ती और सद्भाव के लिए किए जाने वाले जमावड़े समझते थे। जैसे जमावड़े प्रथम विश्वयुद्ध से पहले अनेक यूरोपीय राजधानियों में हुआ करते थे। उन्होंने सर्वहारा-वर्ग की अन्तरराष्ट्रीय एकजुट कार्रवाइयों को हतोत्साहित और विफल करने के हर सम्भव प्रयास किये। अन्तरराष्ट्रीय कांग्रेसों के निर्णय, जो उनके विचारों से मेल नहीं खाते थे, उनके लिए कागजी प्रस्ताव मात्र थे। बीस साल बाद इन सुधारवादियों का “समाजवाद” और “अन्तरराष्ट्रीयतावाद” पूरी दुनिया के सामने बिल्कुल बेनकाब और नंगा खड़ा था। 1914 में इण्टरनेशनल बिखर गया, क्योंकि अपने जन्म से ही वह अपनी मृत्यु का कारण साथ लेकर चल रहा था, और वह कारण थे – मज़दूर-वर्ग को गुमराह करने वाले सुधारवादी नेता।

1900 की पेरिस की अन्तरराष्ट्रीय कांग्रेस में पुरानी कांग्रेसों में ली गई मई-दिवस के प्रस्ताव को दोहराया गया। साथ ही इस प्रस्ताव को इस बात के साथ और भी शक्तिशाली बनाएगी। लगातार बढ़ते मई-दिवस के प्रदर्शन अब शक्ति-प्रदर्शन में बदलते जा रहे थे। प्रदर्शनों में भाग लेने वाले और पहली मई को काम-बन्दी में हिस्सा लेने वाले मज़दूरों की तादाद लगातार बढ़ रही थी। मई-दिवस लाल-दिवस बन गया, एक ऐसा दिन जो जब भी आता था तो सभी देशों के प्रतिक्रियावादी शासकों के लिए अपशकुन साथ लेकर आता था।

मई दिवस पर लेनिन के विचार

रूसी क्रान्तिकारी आन्दोलन में अपनी शुरुआती सक्रियताओं के दौर में ही लेनिन ने रूसी मज़दूरों से मई-दिवस का परिचय कराने में और उन्हें यह बताने में कि यह प्रदर्शनों और संघर्षों का दिन है, विशेष योगदान दिया। 1896 में, जब लेनिन जेल में थे, उन्होंने `मज़दूर वर्ग की मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाली सेंट पीटर्सबर्ग यूनियन´ नामक एक मज़दूर संगठन के लिए मई-दिवस का एक पर्चा लिखा। यह मज़दूर-संगठन रूस में बने सबसे पहले मार्क्सवादी राजनीतिक ग्रुपों में से एक था। यह दस्तावेज़, गैर-कानूनी तरीके से जेल से बाहर लाया गया, मीमोग्राफी द्वारा इसकी दो हज़ार प्रतियों की नकल उतारी गयी और उन्हें चालीस कारखानों के मज़दूरों के बीच वितरित किया गया। यह पर्चा काफी छोटा था ताकि कम समझदार मज़दूर भी आसानी से समझ सकें। उस समय के एक व्यक्ति ने, जिसने पर्चे के प्रकाशन में मदद की थी, लिखा है – “जब एक महीने बाद 1896 में प्रसिद्ध टेक्सटाइल हड़ताल हुई, तो मज़दूर हमें बता रहे थे कि इस आन्दोलन  को संवेग देने वाला प्रथम प्रेरणास्रोत वही छोटा सा मई-दिवस पर्चा था।”

इस पर्चे में, फैक्टरियों के मालिक किस तरह अपने मुनाफे के लिए मज़दूरों का शोषण करते हैं, और अपनी स्थिति को सुधारने की माँग करने पर सरकार उन पर किस तरह अत्याचार करती है, यह बताने के बाद लेनिन मज़दूरों को मई-दिवस के महत्त्व के बारे में बताते हैं।

फ़्राँस, जर्मनी, इंग्लैण्ड और अन्य देशों में मज़दूर पहले ही शक्तिशाली यूनियनों में एकजुट हो चुके हैं, और उन्होंने अपने अनेक अधिकारों को लड़कर जीता है। वे 19 अप्रैल (1 मई) ¹पहले रुसी कैलेण्डर पश्चिमी यूरोपीय कैलेण्डर से 13 दिन पीछे चलता था।’  को एकत्र होते हैं, जो एक सामान्य छुट्टी का दिन होता है। उस दिन वे दमघोंटू कारखानों को छोड़कर, संगीत की लय पर अपने लहराते हुए झण्डों के साथ शहर की मुख्य सड़कों पर मार्च करते हैं – अपने मालिकों को लगातार अपनी बढ़ती हुई शक्ति दिखलाते हुए। उस दिन भारी संख्या में मज़दूर इन प्रदर्शनों में जुटते हैं, जहाँ भाषणों में, बीते सालों में मालिकों पर मिली जीतों को फ़िर से गिनाया जाता है और आने वाले सालों में संघर्षों की रणनीति तैयार की जाती है। इन प्रदर्शनों में मज़दूरों की हुंकार के नीचे दबे मालिकों की यह हिम्मत नहीं होती कि वे कारखानों में न आने के लिए मज़दूरों पर एक पैसे का भी जुर्माना करें। उसी दिन मज़दूर फ़िर से मालिकों के सामने फ़िर अपनी पुरानी मुख्य माँग रखते हैं : `आठ घण्टे काम, आठ घण्टे आराम, आठ घण्टे मनोरंजन´। यही वह माँग है जिसे आप और दूसरे देशों के मज़दूर लगातार बुलन्द कर रहे हैं।”

रूसी क्रान्तिकारी आन्दोलन ने मई-दिवस का पूरा फायदा उठाया। नवम्बर, 1900 में `खारकोव में मई दिवस´ नामक पुस्तिका में प्रकाशित प्राक्कथन में लेनिन ने लिखा :

“अगले छ: महीनों में, रूसी मज़दूर नयी शताब्दी के पहले वर्ष का मई-दिवस मनाएँगे। यही वह समय होगा कि जितना संभव हो उतनी बड़ी संख्या में जगह-जगह मई-दिवस मनाएँ। इसमें बड़े पैमाने पर मज़दूर हिस्सा लें। लेकिन हमारा लक्ष्य सिर्फ बड़ी संख्या में मज़दूरों का भाग लेना नही हैं, बल्कि पूरी तरह संगठित होकर भाग लेना है। एक संकल्प के साथ भाग लेना है, जो एक ऐसे संघर्ष का रूप ले, जिसे कुचला न जा सके, जो रूसी जनता को राजनीतिक आजादी दिला सके, और नतीजतन जो सर्वहारा को अपने वर्ग-विकास और फ़िर समाजवाद के लिए एक खुली लड़ाई का मौका दे।”

यह आसानी से समझा जा सकता है कि लेनिन मई-दिवस के प्रदर्शनों को कितना महत्त्व देते थे। उन्होंने मज़दूरों का छ: महीने पहले ही आह्वान कर दिया था कि मई-दिवस पर संगठित हो, उसे कैसे मनाएँ। उनके लिए मई-दिवस “रूसी जनता की राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए एक अदमनीय संघर्ष को खड़ा करने” के लिए और “सर्वहारा के वर्ग-विकास और समाजवाद के लिए रैलियां करने” का दिन था।

मई-दिवस के आयोजन कैसे “महान राजनीतिक प्रदर्शन बन सकते हैं”, इस पर बोलते हुए लेनिन ने 1900 के खारकोव मई-दिवस आयोजन को एक विशिष्ट महत्त्व की घटनाय् बताते हुए कहा-“इस दिन सड़कों पर बड़ी-बड़ी सभाएँ हुईं, भारी संख्या में मजूदरों ने हड़तलों में भाग लिया, लाल झण्डे फहराए गए, परचे में छपी माँगें प्रस्तुत की गयीं, और इन माँगों, यानी आठ घण्टे के कार्य-दिवस और राजनीतिक स्वतंत्रता की माँगों, के क्रान्तिकारी चरित्र का प्रदर्शन हुआ।”

लेनिन ने खारकोव के पार्टी नेताओं की आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग के साथ अन्य छोटी-मोटी और शुद्ध आर्थिक माँगों को मिलाने के लिए कड़ी भर्त्सना की, क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि मई-दिवस का राजनीतिक चरित्र किसी भी तरह धुंधला हो। इसके बारे में उपर्युक्त प्राक्कथन में ही वह लिखते हैं :

“इन माँगों में सबसे पहली माँग होगी आठ घण्टे के कार्य-दिवस की आम माँग, जो सभी देशों के सर्वहारा-वर्ग ने की है। इस माँग का सबसे पहले रखा जाना खारकोव के मज़दूरों की अन्तरराष्ट्रीय समाजवादी मज़दूर आन्दोलन के साथ एकजुटता के अहसास को दर्शाता है और निश्चित रूप से इसी लिए इस माँग को छोटी-मोटी आर्थिक माँगों से नहीं मिलाया जाना चाहिए, जैसे – फोरमैन द्वारा अच्छे बर्ताव की माँग या तनख्वाह में दस फीसदी की बढ़ोत्तरी की माँग। आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग पूरे सर्वहारा वर्ग की माँग है और सर्वहारा उसे एक-एक मालिक के सामने नहीं बल्कि सरकार के सामने रखता है, क्योंकि ये ही आज के सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के प्रतिनिधि हैं। सर्वहारा वर्ग यह माँग समूचे पूँजीपति वर्ग के सामने रखता है जो सभी उत्पादन के साधनों का मालिक है।”

मई-दिवस के राजनीतिक नारे

अन्तरराष्ट्रीय सर्वहारा के लिए मई-दिवस एक ख़ास दिन बन गया था। आठ घण्टे के कार्य-दिवस की मूल माँग के साथ कुछ दूसरे महत्त्वपूर्ण नारे जुड़ गए जिन पर मज़दूरों को मई-दिवस की हड़ताल और प्रदर्शनों के दौरान ध्यान देने के लिए आह्वान किया गया। इनमें ये नारे शामिल थे –

“अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर-वर्ग  की एकता-जिन्दाबाद”,

“साम्राज्यवादी युद्ध और औपनिवेशिक उत्पीड़न का विरोध करो”,

“राजनीतिक बंदियों को मुक्त करो”,

“सार्वभौमिक मताधिकार दो”,

“आन्दोलन करने का अधिकार दो”,

“मज़दूरों को राजनीतिक और आर्थिक संगठन बनाने का अधिकार दो।”

पुरानी इण्टरनेशनल में मई-दिवस के प्रश्न पर आखिरी बार 1904 में एम्सटर्डम कांग्रेस में विचार हुआ था। मई-दिवस के प्रदर्शनों में इस्तेमाल हो रहे नारों और इस बात पर समीक्षा करते हुए कि, कई देशों में अभी भी मई-दिवस पहली मई के बजाय मई के पहले रविवार को मनाया जा रहा है, इस कांग्रेस में पारित प्रस्ताव पुन: इन शब्दों में समाप्त होता है :

“एम्सटर्डम में अन्तरराष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस सभी देशों की सामाजिक-जनवादी पार्टियों और ट्रेड यूनियनों का आह्वान करती है कि वे पहली मई को पूरी ऊर्जा के साथ प्रदर्शन करें ताकि आठ घण्टे के कार्य-दिवस को कानून द्वारा लागू किया जा सके सर्वहारा की वर्ग माँगों को हासिल किया जा सके और अन्तरराष्ट्रीय शान्ति को स्थापित किया जा सके। पहली मई के प्रदर्शन का सबसे प्रभावशाली तरीका है – काम-बन्दी। इसलिए कांग्रेस सभी देशों के सर्वहारा संगठनों के लिए यह आदेश जारी करती है कि जहाँ भी सम्भव हो मज़दूरों को हानि पहुंचाए बिना पहली मई को काम बन्द कर दें।”

जब अप्रैल, 1912 में साइबेरिया में लेना के सोने के खानों के मज़दूरों का कत्लेआम हुआ तो रूस में एक बार फ़िर क्रान्तिकारी सर्वहारा जन कार्रवाई का प्रश्न उठने लगा। उसी साल के मई-दिवस पर सैंकड़ों हज़ार मज़दूर काम बन्द करके सड़कों पर उतर आए। यह जार के अत्याचारों को चुनौती थी जो 1905 की असपफल रूसी क्रान्ति के बाद से और भी निरंकुश शासन कर रहा था। इस मई-दिवस के बारे में लेनिन ने लिखा है :

“पूरे रूस में हुई मई की महान हड़ताल, इससे जुड़े सड़कों पर हुए प्रदर्शन, मज़दूरों का क्रान्तिकारी ऐलान, मज़दूरों को दिए गए क्रान्तिकारी भाषण, साफ तौर पर यह बताते हैं कि रूस एक बार फ़िर धधकती हुई, क्रान्तिकारी परिस्थिति में प्रवेश कर रहा है।”

पहले विश्व-युद्ध के दौरान मई-दिवस

सामाजिक-जनवादी नेताओं द्वारा युद्ध के दौरान किया गया विश्वासघात 1915 में अपनी पूरी नग्नता के साथ सामने आ गया। उन्होंने अगस्त, 1914 में साम्राज्यवादी सरकारों से हाथ मिला लिया था। इन विश्वासघातियों का यह भण्डाफोड़ इसी दोस्ती का अवश्यम्भावी परिणाम था। जर्मनी के सामाजिक जनवादियों ने मज़दूरों को काम पर लगे रहने के लिए कहा और फ्रांसीसी समाजवादियों ने एक विशेष घोषणा-पत्र में मालिकों को पहली मई से न घबराने के लिए आश्वस्त किया। दूसरे युद्धरत देशों के समाजवादियों के बहुलांश में भी ऐसी ही रुझानें दीख रही थीं। इन हालात में केवल रूस में बोल्शेविक और अन्य देशों में अल्पमत क्रान्तिकारी ही समाजवाद और अन्तरराष्ट्रीयतावाद के प्रति ईमानदार बने हुए थे। लेनिन, रोजा लक्जम्बर्ग और कार्ल लीबनेख्त की आवाजें सामाजिक अन्धराष्ट्रवाद के नशे में पागल लोगों के विरोध में उठ खड़ी हुईं। 1916 के मई-दिवस के दिन आंशिक रूप से हुई हड़तालों और सड़कों पर हुई खुली झड़पों ने यह दिखा दिया कि सभी युद्धरत देशों के मज़दूर अपनेआप को कमीने गद्दारों के जहरीले असर से मुक्त कर रहे हैं। सभी क्रान्तिकारियों की तरह लेनिन की नजर में “अवसरवाद का पतन (दूसरे इण्टरनेशनल का पतन) मज़दूर आन्दोलन के लिए काफी फायदेमन्द था” और लेनिन द्वारा गद्दारों से मुक्त एक नया इण्टरनेशनल बनाने का आह्वान वक्त की पुकार थी।

1915 की जिमरवाल्ड और 1916 की कीन्थॉल समाजवादी कांग्रेस में यह निश्चय किया गया कि लेनिन के `साम्राज्यवादी युद्ध को गृह-युद्ध में बदलने´ के नारे के तहत सारी दुनिया की क्रान्तिकारी अन्तरराष्ट्रीयतावादी पार्टियों और छोटी-छोटी समाजवादी पार्टियों की एकता को मजबूत किया जाएगा। 1916 के मई-दिवस पर कार्ल लीबनेख्त और समाजवादी आन्दोलन में उनके समर्थकों के नेतृत्व में बर्लिन में हुए विशाल प्रदर्शन मज़दूर-वर्ग की जीवन्त शक्तियों के प्रमाण थे, जो पुलिस के दमन और आधिकारिक नेताओं के विरोध के बावजूद आगे बढ़ती जा रही थी।

1917 में अमेरिका में युद्ध की घोषणा के बावजूद मई-दिवस की गतिविधियां रुकी नहीं। समाजवादी पार्टी के सर्वहारा तत्वों ने सेंट लुई में अप्रैल के शुरू में हुए आपात अधिवेशन में पारित युद्ध-विरोधी प्रस्ताव को गंभीरता से लिया, और मई-दिवस का इस्तेमाल साम्राज्यवादी युद्ध के विरोध में प्रदर्शन के लिए किया। 1919 में क्लीवलैण्ड में हुआ मई-दिवस का प्रदर्शन ख़ास तौर पर उग्र था। इसका नेतृत्व करने वाले चार्ल्स ई. रथेनबर्ग समाजवादी पार्टी के स्थानीय सेक्रेटरी थे। आगे चलकर वे कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक बने और उसके जनरल सेक्रेटरी भी रहे। 20,000 से भी ज्यादा मज़दूरों ने, इस प्रदर्शन में, पब्लिक स्क्वायर की सड़कों पर मार्च किया, और वहाँ पर हज़ारों नये लोगों ने इसमें जुड़कर इस प्रदर्शन को महान बनाया। पुलिस ने क्रूरता से इन मज़दूरों की सभा पर हमला किया जिसमें एक मज़दूर की मृत्यु हो गयी और अनेक मज़दूर बुरी तरह घायल हो गये।

1917 मई-दिवस, जुलाई और फ़िर अक्टूबर के दिन रूसी क्रान्ति के विकास के विभिन्न चरण थे जो बाद में रूसी क्रान्ति को उसके लक्ष्य तक ले गये। रूसी क्रान्ति ने , जिसने मानव जाति के इतिहास में एक नये युग की शुरुआत की, मई-दिवस की परम्पराओं को नया संवेग और महत्त्व दिया। धरती के छठे भाग पर सर्वहारा शक्ति की विजय ने उस आकांक्षा को जीवन में उतार दिया था जो `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेताओं के मई-दिवस प्रदर्शन की इस प्रतिज्ञा से झलकता है जो उन्होंने 1890 को न्यूयार्क के यूनियन स्क्वायर पर ली थी- “आठ घण्टे के कार्य-दिवस के लिए संघर्ष करते हुए हम अपने अन्तिम लक्ष्य से कभी नजर नही हटायेंगे – यानी (पूँजीवादी) उजरत प्रणाली का ध्वंस।”

रूसी मज़दूर-वर्ग इस लक्ष्य को सबसे पहले पूरा करने में सफल हुआ था। लेकिन 1917 के बाद `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेता उस लक्ष्य से काफी दूर जा चुके थे, जिसकी उन्होंने 1890 में घोषणा की थी। अब उनका पहला सरोकार पूँजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने और साम्राज्यवाद के लिए राहें आसान करना था। वे नहीं चाहते थे कि अमेरिकी मज़दूरों को रूसी सर्वहारा की उन ऐतिहासिक उपलब्धियों से प्रेरणा मिले, जिन्होंने मई-दिवस की संघर्ष भावना को एक नया अर्थ दिया था और जिस दिन मज़दूर-वर्ग अपनी अन्तरराष्ट्रीय एकजुटता तथा पूँजीवादी शोषण एवं उजरती गुलामी की व्यवस्था से मुक्ति के लक्ष्य की घोषणा करता है।

1923 में मई-दिवस के लिए `वर्कर´ नामक साप्ताहिक में चार्ल्स ई. रथेनबर्ग ने लिखा :

“मई-दिवस -वह दिन जो पूँजीवादियों के दिल में डर और मज़दूरों के दिल में आशा पैदा करता है। इस साल सारी दुनिया के मज़दूर अमेरिका में कम्युनिस्ट आन्दोलन को हमेशा से ज्यादा मजबूत पाएँगे….. महान उपलब्धियों के लिए रास्ता साफ है, और दुनिया की किसी भी जगह की तरह अमेरिका का भविष्य भी कम्युनिज्म है।”

इसी साप्ताहिक `वर्कर´ के करीब सत्रह साल पहले के एक अंक में जो कि मई-दिवस विशेषांक था, यूजीन वी. डेब्स ने लिखा था : यह सबसे पहला और एकमात्र अन्तराष्ट्रीय दिवस है। यह मज़दूर-वर्ग से सरोकार रखता है और क्रान्ति को समर्पित है।” यह अंक 27 अप्रैल 1907 को प्रकाशित हुआ था।

मई-दिवस की इस बढ़ती हुई जुझारू परम्परा के जवाब में `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेताओं ने केवल श्रम-दिवस के रिवाज को प्रोत्साहित किया, जो सितम्बर के पहले सोमवार को मनाया जाता था। मूलत: 1885 में स्थानीय स्तर पर इस दिन को स्वीकार किया गया था और बाद में मई-दिवस के आयोजनों को प्रभावहीन बनाने के लिए कई राज्य सरकारों ने इसे मान्यता दे दी। हूवर प्रशासन ने `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के सहयोग से पहली मई को `बाल स्वास्थ्य दिवस´ घोषित कर एक और जवाबी कार्रवाई की। बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में अचानक पैदा हुई इस रुचि को 1928 के `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के सम्मेलन के लिए कार्यकारिणी परिषद द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट को पढ़कर समझा जा सकता है। इसमें लिखा गया था – “कम्युनिस्ट अभी भी पहली मई को मज़दूर-दिवस के रूप में मनाते हैं। लेकिन आज के बाद से पहली मई `बाल स्वास्थ्य दिवस´ के रूप में जाना जाएगा। क्योंकि राष्ट्रपति ने कांग्रेस द्वारा पारित प्रस्ताव के मुताबिक यह आह्वान करते हुए लोगों से कहा है कि वे अब पहली मई को `बाल स्वास्थ्य दिवस´ के रूप में मनाएँ। इसका लक्ष्य यह है कि इस पूरे साल लोगों में बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा के प्रति जागरुकता पैदा की जाए। यह एक सबसे मूल्यवान लक्ष्य है। इसके साथ ही अब मई-दिवस न ही हड़ताल-दिवस के रूप में जाना जाएगा और न ही कम्युनिस्ट दिवस के रूप में।” (जोर लेखक का)

1929 का संकट

अनुभवों से कोई सीख न लेते हुए, विश्व-युद्ध के लगभग एक दशक बाद, प्रतिक्रियावादी ट्रेड यूनियन नेता, पूँजीवाद के अन्तर्गत स्थाई सम्पन्नता आने के भ्रम के बीज बो रहे थे। उनकी इस बात में कोई रुचि नहीं थी कि किस तरह हज़ारों-लाखों असंगठित मज़दूरों को एक झण्डे तले लाया जाए और इस बात से अवगत कराया जाय कि पूँजीवाद भारी संकटों के बीच फँसने और इन संकटों का बोझ मज़दूरों के उपर डालने वाला है। जब 1929 के अन्त में आर्थिक ध्वंस आया, और ट्रस्टों एवं एकाधिकारी संघों ने इस संकट का सारा बोझ मज़दूरों पर डालना चाहा तो मज़दूरों के पास एक ही रास्ता बचा – हड़तालों और बेरोज़गार मज़दूरों के जन-संघर्षों का रास्ता। इन संघर्षों के परिणामस्वरूप, जिनका नेतृत्व कम्युनिस्टों ने किया था, अमेरिकी मज़दूर और अधिक भयंकर विपदाओं को रोकने और अपने जनतान्त्रिक अधिकारों का दायरा बढ़ाने में सफल रहे। साथ ही, उन्होंने 1930 के दशक में, `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ और सी.आई.ओ. दोनों में, अमेरिकी मज़दूर वर्ग के इतिहास में ट्रेड यूनियन संगठन की महानतम प्रगति को दर्ज कराया। सी.आई.ओ. का 1935 में जन्म और विभिन्न उद्योगों के मज़दूरों में तेजी से इसका विस्तार पूरे मज़दूर आन्दोलन और देश के लिए ऐतिहासिक महत्त्व की प्रमुख उपलब्धि था। अमेरिकी मज़दूरों के इस उभार के नतीजतन नीग्रो लोगों के बराबर हकों के लिए संघर्ष और अमेरिका में एक जनतान्त्रिक मोर्चे को और मजबूत बनाने की स्थितियां बन गयीं।

साम्राज्यवादी युद्ध और क्रान्ति तथा एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट के द्वारा झकझोर दिए जाने के बाद, केवल डेढ़ दशक के छोटे से कालक्रम में विश्व पूँजीवाद स्पष्टत: एक आम संकट के दौर में प्रवेश कर गया। साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा जिसने प्रथम विश्व युद्ध को जन्म दिया था, इस संकट के कारण और भी भयंकर होती गयी। विश्व के छठे भाग पर पूँजीवाद के ख़त्म हो जाने, उपनिवेशों में स्वतंत्रता के लिए संघर्षों का दुर्दमनीय विकास और उन्नत पूँजीवादी देशों में अपने जीवन स्तर को उठाने तथा अपने जनतान्त्रिक अधिकारों को बनाये रखने एवं विस्तारित करने के लिए लगातार फौलादी होते इरादों से पूँजीवाद का यह आम संकट बढ़ता ही गया। ट्रस्ट और इज़ारेदार आर्थिक और राजनीतिक जीवन पर अपनी पकड़ बचाए रखने की बदहवासी भरी कोशिशों में लग गए और इतिहास के अपरिहार्य विकास को रोकने के लिए फासीवाद की आतंकवादी तानाशाही की शरण में चले गए। फ्रांस, इंग्लैण्ड और अमेरिका के इज़ारेदारों ने फासीवादी आन्दोलनों को प्रोत्साहित करने के लिए वह सब कुछ किया जो उनके बूते में था। उन्होंने पराजित जर्मनी और उन सभी देशों में, जहाँ मज़दूर वर्ग और प्रगतिशील ताकतों की कमजोरी और बिखराव ने फासीवादी विजय के लिए दरवाजे खोल दिए थे, फासीवाद को बढ़ावा दिया और अपनी थैलियां खोल दीं। इज़ारेदार पूंजी के इन सारे विश्वव्यापी प्रयासों ने न केवल जनतान्त्रिक उपलब्धियों को, जो शताब्दियों के संघर्षों के बाद हासिल हुई थीं, नष्ट करने की कोशिश की, बल्कि एक नए विश्व-युद्ध का रास्ता भी साफ कर दिया।

फासीवाद के विरुद्ध संघर्ष

1933 से 1939 के दौरान जर्मन फासीवाद ने पूरी दुनिया के प्रतिक्रियावादियों की भूमिका निभायी। एंग्लो-अमेरिकन साम्राज्यवाद से प्रोत्साहन पाकर और पूरी दुनिया पर कब्जा जमाने के अपने साम्राज्यवादी मंसूबों के तहत जर्मन फासीवाद ने योजनाबद्ध ढंग से दूसरे विश्वयुद्ध की तैयारियां शुरू कर दी थी। यह वही एंग्लो-अमेरिकी साम्राज्यवाद था जिसका शुरू से एक लक्ष्य था, समाजवाद के विनाश के लिए युद्ध, जिसके लिए अब वह नाजी जर्मनी को खड़ा करने में सहायता कर रहा था। दूसरी ओर जापानी साम्राज्यवाद भी अपने स्वार्थों के लिए इस कुकृत्य में शामिल हो गया। अपनी प्रकृति के अनुसार इस तरह का कोई भी युद्ध हर देश की राष्ट्रीय स्वतंत्रता के खिलाफ खड़ा होता था। इन स्थितियों में लगातार यह बात साफ होती गयी थी कि, मानव जाति का विकास मज़दूरों, किसानों और उपनिवेशों की दबाई और कुचली गयी जनता के हाथ में है। केवल वे ही कदम बढ़ा कर, पहल लेकर और अपनी एकता और प्रतिरोध के जरिए सभी देशों की जनतान्त्रिक शक्तियों व तत्वों को अपने इर्द-गिर्द गोलबन्द कर सकते हैं और इज़ारेदार पूँजी द्वारा प्रेरित प्रतिक्रियावाद के बढ़ते अनर्थकारी विकास को रोक सकते थे। इसीलिए, तीस के पूरे दशक के दौरान मई-दिवस, फासीवाद हमले का प्रतिरोध करने और एक नए विश्व-विध्वंस का विरोध करने के लिए सभी जनतान्त्रिक शक्तियों एवं जनता की एकता के आह्वान को लगातार गुंजायमान करता रहा।

द्वितीय विश्व-युद्ध ने साफ तौर पर यह दिखला दिया कि मज़दूर-वर्ग ही किसी राष्ट्र की वास्तविक रीढ़ की हड्डी है। फासीवाद शक्ति हथियाने और दुनिया को एक विनाशकारी युद्ध में झोंकने में इसलिए कामयाब हो सका क्योंकि मज़दूर वर्ग असंगठित था। लेकिन वह कहीं भी एकजुट और युद्धरत मज़दूर वर्ग पर विजय हासिल न कर सका, जो हर जगह प्रगति और जनतंत्र की रक्षा का नेतृत्व कर रहा था और मानवजाति के जनतान्त्रिक बहुमत को अपने इर्द-गिर्द गोलबन्द कर रहा था ताकि फासीवादी दानव का सर कुचला जा सके। इस युद्ध में हर जगह के जनतान्त्रिक लोगों ने अपनी आँखों से यह देखा कि ये सोवियत रूस और हर जगह के मज़दूर ही थे जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता, जनतंत्र और प्रगति के लिए फासीवाद के विरुद्ध इस ऐतिहासिक महायुद्ध की अगली कतारों में थे।

इस युद्ध के दौरान हर जगह के मज़दूरों ने काम पर रहकर और फासीवादी सेनाओं के ध्वंस के लिए हथियार बनाकर मई-दिवस मनाया। जब 1945 में युद्ध ख़त्म हुआ तो युद्ध के बाद के पहले मई-दिवस समारोहों में लाखों-लाख मज़दूर उमड़ पड़े, ख़ासकर यूरोप के विजेता और आजाद हुए देशों में। इन मज़दूरों ने युद्ध को जारी रखने की और फासीवाद के सभी अवशेषों को जड़ से उखाड़ फेंकने की अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी, ताकि हर-हमेशा के लिए पूरे मज़दूर वर्ग की जनता के अन्य प्रगतिशील तत्वों के साथ एकता कायम की जा सके, जो हमेशा के लिए इज़ारेदार पूँजी को इसके लिए अक्षम बना दे कि वह फ़िर से फासीवाद की छत्रछाया में जा सके और फासीवाद फ़िर अपना आदमखोर शासन कायम कर सके, ताकि जनतंत्र को जो जनता की सर्वश्रेष्ठ शक्ति है, स्थापित और विकसित किया जा सके, ताकि एक अनश्वर शान्ति का निर्माण किया जा सके और दमन- उत्पीड़न-शोषण से मुक्त समाजवादी विश्व के पथ पर अग्रसर हुआ जा सके।

हर देश का मज़दूर वर्ग मई-दिवस के अवसर पर, मानव-जाति के खुशहाल भविष्य और शान्ति के लिए संघर्ष करते हुए, अन्तरराष्ट्रीय एकजुटता और मैत्री की भावना के साथ सारी दुनिया की जनता को सलाम करता है।

मई दिवस का इतिहास

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अलेक्जेण्डर ट्रैक्टनबर्ग

अनुवाद : अभिनव सिन्हा

मई दिवस का जन्म काम के घण्टे कम करने के आन्दोलन से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। काम के घण्टे कम करने के इस आन्दोलन का मज़दूरों के लिए बहुत अधिक राजनीतिक महत्त्व है। जब अमेरिका में फैक्ट्री-व्यवस्था शुरू हुई, लगभग तभी यह संघर्ष उभरा।

हालाँकि अमेरिका में अधिक तनख्वाहों की माँग, शुरुआती हड़तालों में सबसे ज्यादा प्रचलित माँग थी, लेकिन जब भी मज़दूरों ने अपनी माँगों को सूत्रबद्ध किया, काम के घण्टे कम करने का प्रश्न और संगठित होने के अधिकार का प्रश्न केन्द्र में रहा। जैसे-जैसे शोषण बढ़ता गया, मज़दूरों को अमानवीय रूप से लम्बे काम के दिन और भी बोझिल महसूस होने लगे। इसके साथ ही मज़दूरों की काम के घण्टों में आवश्यक कमी की माँग भी मजबूत होती गयी।

उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में ही अमेरिका में मज़दूरों ने “सूर्योदय से सूर्यास्त” तक के काम के समय के विरोध में अपनी शिकायतें जता दी थीं। “सूर्योदय से सूर्यास्त” तक – यही उस समय के काम के घण्टे थे। चौदह, सोलह और यहाँ तक कि अट्ठारह घण्टे का कार्यकाल भी वहाँ आम बात थी। 1806 में अमेरिका की सरकार ने फ़िलाडेल्फिया के हड़ताली मोचियों के नेताओं पर साजिश के मुकदमे चलाए। इन मुकदमों में यह बात सामने आई कि मज़दूरों से उन्नीस या बीस घण्टों तक काम कराया जा रहा था।

उन्नीसवीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक काम के घण्टे कम करने के लिए हड़तालों से भरे हुए थे। कई औद्योगिक केन्द्रों में तो एक दिन में काम के घण्टे दस करने की निश्चित माँगें भी रखी गयीं। `मैकेनिक्स यूनियन ऑफ फ़िलाडेल्फिया´ को , जो दुनिया की पहली ट्रेड यूनियन मानी जाती है, 1827 में फ़िलाडेल्फिया में काम के घण्टे दस करने के लिए निर्माण-उद्योग के मज़दूरों की एक हड़ताल करवाने का श्रेय जाता है। 1834 में न्यूयॉर्क में नानबाइयों की हड़ताल के दौरान `वर्किँग मेन्स एडवोकेट´ नामक अखबार ने छापा था – “पावरोटी उद्योग में लगे कारीगर सालों से मिड्ड के गुलामों से भी ज्यादा यातनाएँ झेल रहे हैं। उन्हें हर चौबीस में से औसतन अट्ठारह से बीस घण्टों तक काम करना होता है।”

उन इलाकों में दस घण्टे के कार्य-दिवस की इस माँग ने जल्दी ही एक आन्दोलन का रूप ले लिया। इस आन्दोलन में हालाँकि 1837 के संकट से बाधा पड़ी, लेकिन फ़िर भी यह आन्दोलन दिन-पर-दिन विकसित होता गया, और इसी के चलते वांन ब्यूरेन की संघीय सरकार को सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए काम के घण्टे दस करने की घोषणा करनी पड़ी। पूरे विश्व-भर में काम के घण्टे दस करने का संघर्ष अगले कुछ दशकों में शुरू हो गया। जैसे ही यह माँग कई उद्योगों में मान ली गई, वैसे ही मज़दूरों ने काम के घण्टे आठ करने की माँग उठानी शुरू की। पचास के दशक के दौरान लेबर यूनियनों को संगठित करने की गतिविधियों ने इस नयी माँग को काफी बल दिया, हालाँकि 1857 के संकट से इसमें भी अवरोध आया था। यह माँग कुछ सुसंगठित उद्योगों में इस संकट के आने से पहले ही मान ली गयी थी। यह आन्दोलन मात्र अमेरिका तक ही सीमित नहीं था। यह आन्दोलन हर उस जगह प्रचलित हो चला था जहाँ उभरती हुई पूँजीवादी व्यवस्था के तहत मज़दूरों का शोषण हो रहा था । यह बात इस तथ्य से सामने आती है कि अमेरिका से पृथ्वी के दूसरे छोर पर स्थित आस्ट्रेलिया में निर्माण उद्योग के मज़दूरों ने यह नारा दिया – “आठ घण्टे काम, आठ घण्टे मनोरंजन, आठ घण्टे आराम” और उनकी यह माँग 1856 में मान भी ली गई।

`काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की अमेरिका में शुरुआत

वह संघर्ष, जिससे `मई दिवस´ का जन्म हुआ, अमेरिका में, 1884 में, `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन से शुरू हुआ। हालाँकि इससे एक पीढ़ी पहले भी एक राष्ट्रीय श्रम संगठन, `नेशनल लेबर यूनियन´ ने, जिसने एक जुझारू सांगठनिक केन्द्र के रूप में विकसित होने की आशा जगाई थी, छोटे कार्य दिवस का प्रश्न उठाया था और इस पर एक आन्दोलन खड़ा करने का प्रस्ताव रखा था। गृहयुद्ध के पहले साल (1861-62) ने कुछ राष्ट्रीय ट्रेड यूनियनों का लोप होते देखा। ये युद्ध शुरू होने के ठीक पहले बनी थीं। इनमें `मोल्डर्स यूनियन´, `मेकिनिस्ट्स और ब्लैकस्मिथस यूनियन´ प्रमुख थीं। लेकिन आने वाले कुछ सालों में कई स्थानीय श्रमिक संगठनों का राष्ट्रीय स्तर पर एकीकरण भी हुआ। इन यूनियनों को एक राष्ट्रीय संघ की जरूरत साफ दिखाई देने लगी। 20 अगस्त, 1866 को `नेशनल लेबर यूनियन´ बनाने वाली तीन ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि बाल्टीमोर में मिले। राष्ट्रीय संगठन के निर्माण के लिए जो आन्दोलन चला था उसका नेतृत्व विलियम एच. सिल्विस ने किया था। वह पुनर्गठित `मोल्डर्स यूनियन´ का नेता था। सिल्विस हालाँकि एक नौजवान आदमी था लेकिन उस समय के श्रमिक आन्दोलनों में उसकी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी। सिल्विस का प्रथम कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल के नेताओं से भी सम्पर्क था जो लन्दन में थे। उसने `नेशनल लेबर यूनियन´ को इण्टरनेशनल की जनरल काउंसिल से सम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रेरित किया और उसमें मदद भी की।

1866 में `नेशनल लेबर यूनियन´ के स्थापना समारोह में यह प्रतिज्ञा ली गई: “इस देश के श्रमिकों को पूँजीवादी गुलामी से मुक्त करने के लिए, वर्तमान समय की पहली और सबसे बड़ी जरूरत यह है कि अमेरिका के सभी राज्यों में आठ घण्टे के कार्य दिवस को सामान्य कार्य दिवस बनाने का कानून पास कराया जाए। जब तक यह लक्ष्य पूरा नहीं होता, तब तक हम अपनी पूरी शक्ति से संघर्ष करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हैं।”

इसी समारोह में कार्य दिवस को आठ घण्टे करने का कानून बनाने की माँग के साथ ही स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधियों के अधिकार की माँग को उठाना भी बहुमत से पारित हुआ। साथ ही यह तय हुआ कि इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए “ऐसे व्यक्तियों का चुनाव किया जाए जो औद्योगिक वर्गों के हितों को प्रोत्साहित करने और प्रस्तुत करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हों।”

`आठ-घण्टा दस्तों´ (आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग के लिए बने मज़दूर संगठन) का यह निर्माण `नेशनल लेबर यूनियन´ द्वारा किए गए आन्दोलन का ही परिणाम था। और `नेशनल लेबर यूनियन´ की इन गतिविधियों के ही परिणामस्वरूप कई राज्य सरकारों ने आठ घण्टे के कार्य दिवस का कानून पास करना स्वीकार कर लिया था। अमेरिकी कांग्रेस ने ठीक वैसा ही कानून 1868 में पारित कर दिया। इस `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की उत्प्रेरक नेता थीं बोस्टन की मेकेनिस्ट इरा स्टीवर्ड

हालाँकि शुरुआती दौर के श्रमिक आन्दोलन का कार्यक्रम और नीतियां प्राथमिक स्तर थीं और हमेशा उनका प्रभाव नहीं दिखता था, लेकिन फ़िर भी वह स्वस्थ सर्वहारा नैसर्गिकता पर आधारित थीं। वे एक जुझारू मज़दूर आन्दोलन की नींव बन सकतीं थीं। लेकिन बाद में सुधारवादी नेता और पूँजीवादी राजनीतिज्ञ इन संगठनों में घुस गये और उन्हें गलत मार्ग पर अग्रसर कर दिया। बहरहाल, चार पीढ़ियों पहले, अमेरिकी श्रमिकों के राष्ट्रीय संगठन एन. एल. यू., यानी `नेशनल लेबर यूनियन´ ने स्वयं को “पूंजीवादी गुलामी” के विरुद्ध घोषित किया और स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधि के अधिकार की माँग की।

सिल्विस का लन्दन में इण्टरनेशनल के साथ सम्पर्क जारी था। चूंकि सिल्विस `नेशनल लेबर यूनियन´ का अध्यक्ष था, एन. एल. यू. ने, 1867 के अपने सम्मेलन में अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर वर्ग आन्दोलन के साथ सहयोग करने के प्रस्ताव को स्वीकार किया, और 1869 में इण्टरनेशनल की जनरल काउंसिल के आमन्त्रण को स्वीकार किया और इण्टरनेशनल के बेसिल कांग्रेस में अपना एक प्रतिनिधि भी भेजा। दुर्भाग्य से, सिल्विस की एन. एल. यू. के सम्मेलन से पहले ही मृत्यु हो गयी और शिकागो से छपने वाले `वर्किन्गमेन्स एडवोकेट´ के सम्पादक ए. सी. कैमरॉन सिल्विस के स्थान पर प्रतिनिधि के रूप में सम्मेलन में गए। जनरल काउंसिल ने एक विशेष प्रस्ताव के तहत अपने इस आशावादी नौजवान अमेरिकी श्रमिक नेता की मृत्यु पर शोक जताया-

“सबकी आँखें सिल्विस पर रुक गई थीं। सिल्विस के पास अपनी महान क्षमताओं के अलावा अपनी सर्वहारा सेना के जनरल के रूप में दस वर्ष का अनुभव था – और सिल्विस अब नहीं रहे।” सिल्विस की मौत `नेशनल लेबर यूनियन´ के ह्रास का एक बहुत बड़ा कारण बनी। और यह ह्रास जल्दी ही एन. एल. यू. के अन्त के रूप में सामने आया।

`काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन पर मार्क्स के विचार

आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग करने का निर्णय `नेशनल लेबर यूनियन´ ने अगस्त, 1866 में लिया। उसी वर्ष सितम्बर में पहले इण्टरनेशनल की जेनेवा कांग्रेस में इस आठ घण्टे के कार्य दिवस की माँग निम्न रूप से दर्ज हुई – “काम के दिन की वैध सीमा तय करना एक प्राथमिक शर्त है जिसके बिना मज़दूर वर्ग की स्थिति में सुधार या उसकी मुक्ति का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता….. यह कांग्रेस आठ घण्टे के कार्य दिवस का प्रस्ताव रखती है।

” 1867 में प्रकाशित `पूँजी´ के पहले खण्ड के “कार्य दिवस” पर आधारित अध्याय में मार्क्स ने `नेशनल लेबर यूनियन´ द्वारा शुरू किए गए `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की ओर ध्यान दिलाया हैं। `पूँजी´ का यह हिस्सा काफी प्रसिद्ध है क्योंकि इसमें मार्क्स ने काले मज़दूरों और श्वेत मज़दूरों के वर्ग हितों की एकता के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है:

“जब तक दास प्रथा गणराज्य के एक हिस्से पर कलंक के समान चिपकी रही, तब तक अमेरिका में कोई भी स्वतंत्र मज़दूर आन्दोलन पंगु बना रहा। सफेद चमड़ी वाला मज़दूर कभी भी स्वयं को मुक्त नहीं कर सकता जब तक काली चमड़ी वाले मज़दूरों को अलग करके देखा जाएगा। लेकिन दास प्रथा की समाप्ति के साथ ही एक नए ओजस्वी जीवन के अंकुर फूटे। `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन के साथ ही वहाँ गृह-युद्ध का श्रीगणेश हुआ। `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन – एक ऐसा आन्दोलन था जो तेजी के साथ अटलांटिक से हिन्द तक, न्यू इंग्लैण्ड से कैलिफोर्निया तक फैल गया।”

मार्क्स ने इस बात की ओर ध्यान खींचा कि, किस तरह लगभग साथ-साथ, वास्तव में दो हफ्रतों के अन्दर, बाल्टीमोर में एक मज़दूर सम्मेलन ने आठ घण्टे के कार्य दिवस को बहुमत से पारित किया और इण्टरनेशनल की जेनेवा कांग्रेस ने ठीक वैसा ही निर्णय लिया। “इस तरह अटलांटिक के दोनों ओर मज़दूर आन्दोलन ने `उत्पादन की परिस्थितियों´ में गुणात्मक विकास किया।” यह कथन इसी बात को बताता है कि किस तरह कार्य दिवस की सीमाओं को तय करने का आन्दोलन चला और `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन के रूप में साकार हुआ।

जेनेवा कांग्रेस का निर्णय अमेरिकी `नेशनल लेबर यूनियन´ के निर्णय से कैसे मेल खाता है, उसे इस कथन में देखा जा सकता है – “चूँकि कार्य दिवस की सीमाएँ तय करने की माँग पूरे अमेरिका के मज़दूरों की माँगों को प्रस्तुत करती है, इसलिए यह कांग्रेस इस माँग को पूरी दुनिया के मज़दूरों के एक आम मोर्चे का रूप देती है।” इण्टरनेशनल की कांग्रेस पर, इसी मुद्दे पर अमेरिकी मज़दूर आन्दोलन का और जबर्दस्त प्रभाव पड़ा, लेकिन 23 साल बाद।

अमेरिका में मई दिवस का जन्म

1872 में जब पहले इण्टरनेशनल का हेडक्वार्टर लन्दन से न्यूयार्क आया, तो पहला इण्टरनेशनल एक अन्तरराष्ट्रीय संस्था के रूप में समाप्त हो गया, लेकिन औपचारिक रूप से इसका अस्तित्व 1876 तक बना रहा। इण्टरनेशनल पुन: गठित हुआ और दूसरे इण्टरनेशनल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूस