विचारणीय : मीडिया से

पूंजीवादी संकट : अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता – अंतिम किश्त

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इससे पहले, कड़ी जोड़ने के लिए देखें :

1. पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

2. पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

मैं इन विकल्पों के बारे में और अधिक जानने के लिए अधीर था. क्या उनके उदारवादी विश्वास के केंद्र में, यह विरोधाभास नहीं था कि वर्तमान संकट से पूंजीवाद के विकल्प निकल सकेंगे ? कुल मिलाकर, संगठित श्रम की वास्तविक तबाही के साथ-साथ व्यक्तिवाद का फैलाव जिसने, निश्चित रूप से, सामूहिक कार्रवाई के रूपों के विकास के विरुद्ध शक्ति झोंकी दी है, नव-उदारवाद के परिणामों में से एक रहा है. हार्वे को यह स्वीकार करने में प्रसन्नता है कि पूंजीवाद विरोधी लहर की कोई भी संभावना. मानसिक अवधारानाओं के मूल में परिवर्तन. पर निर्भर करती है. और इसकी कोई संभावना नहीं है कि इस सन्दर्भ में, अकादमी की ओर से कोई नेतृत्व मिलेगा. नए क्लासिकीय अर्थशास्त्र और तर्कसंगत राजनीतिक सिद्धांत का चुनाव, ऐसे, जैसे कुछ भी न घटित हुआ हो और शेखीखोर व्यावसायिक स्कूलों द्वारा एक या इससे अधिक, नए व्यावसायिक नीति शास्त्र संबंधी कोर्स या लोगों के दिवालियेपन से कैसे धन कमायें, इनके अलावा, उनके पास देने के लिए कुछ नहीं होगा. अंत में, संकट मानव के लालच से जन्मा है जिसके लिए कुछ नहीं किया जा सकता. न ही हम, परम्परावादी मार्क्सवादी सर्वहारा की चेतना के अचानक उत्थान की उम्मीद कर सकते हैं. बीते समय में, इन औद्योगिक कामगारों को  सदैव क्रांति के अग्रगामी सैन्य दस्ते माना जाता था. परन्तु, हार्वे का सुझाव है कि यह गलती थी. फैक्ट्री श्रम को ‘सच्चा वर्ग चैतन्य’ मानने की आसक्ति रही है लेकिन इस वर्ग की भूमिका सदैव बहुत सीमित रही है, अगर भ्रमित न भी हुए हों, तब भी वामपंथियों के भी गलत विचार रहे हैं . जंगलों और खेतों में काम करनेवाले, गैरकानूनी मजदूर बस्तियों में कैजुयल श्रम के अनौपचारिक सेक्टर में, घरेलू सेवक, और अधिक सामान्य रूप से सेवा सेक्टर में और उत्पादन के विस्तृत क्षेत्र या निर्मित परिवेश में लगी हुई मजदूरों की विशाल सेना और शहरी खाईयों (प्राय शाब्दिक), इन सबको दूसरे दर्जे के अभिनेता नहीं माना जा सकता.

इन कामगारों, जिन्हें कई बार इनकी जिन्दगी और रोजगार की प्रकृति की अनिश्चतता को दर्शाने के लिए, बेठिकाना’ श्रम (देखें : Precarious, Precarisation, Precariat ) की श्रेणी में रखा जाता है, की संख्या में, नए उदारीकरण द्वारा थोपी गयी, बदली अवस्था के श्रम-संबंधों के कारण पिछले 30 वर्षों में भारी बढौतरी हुई हैं.

और हार्वे एक और प्रवर्ग का ज़िक्र करते हैं जिसका स्वत्वहरण हो चुका है. इसमें शामिल हैं वे सभी किसान और ग्रामीण जनसंख्या जिन्हें उनकी भूमि से खदेड़ा जा चुका है, वैधानिक ( राज्य द्वारा मंजूरशुदा ) और गैर-वैधानिक, बस्तीवादी, नव-बस्तीवादी या साम्राज्यवादी हथकंडो द्वारा अपने प्राकृतिक संसाधनों और अपनी जीवन पद्वति से वंचित कर दिया गया है और जोर-जबरदस्ती से विनिमय मण्डी … बलपूर्वक पैसे-कौड़ी और टैक्स संबंधों  में धकेल दिया गया है.

बेशक, हार्वे वंचित और स्वत्वहरित लोगों के महान गठबंधन के सपने की बात करते हुए खुश होते हैं, लेकिन, वे तस्लीम करते हैं कि इस प्रकार के ग्रुपों से निर्मित होनेवाली बहुत सी लहरों की संभावना स्थानीय पहलकदमी वाली और यहाँ तक कि  उत्पादन-विरोधी भी हो सकती हैं. परन्तु इस हद तक कि उनमें से अधिकतर उसी स्थान, जैसे मेट्रो शहरो में, मौजूद हैं और वे (जैसाकि, औद्योगिक क्रांति के प्रारंभिक काल में, फैक्ट्री कामगारों के साथ होना माना जाता है)  साझे कार्यभार तैयार कर सकते हैं और अपने-अपने अनुभवों के साथ, इस रूप-रेखा को गढ़ सकते हैं कि वह क्या है जिसे साझे तौर पर किया जा सकता है, कैसे पूंजीवाद कार्य करता है.

और भी बहुत से ग्रुप हो सकते हैं, जो पूंजीवाद के विरुद्ध इस साझे कार्यभार में सम्मिलित हो सकते है जैसे, भारत और ब्राज़ील में विस्थापन और स्वत्वहरण के प्रतिरोध से पैदा हुई लहरे और पहचान के सवाल पर,औरतों, बच्चों, समलिंगियों, और नस्लीय और प्रजातीय और धार्मिक अल्पसंख्यक  लोगों की आजादी की लहर, जिनकी इस ‘सूर्य के नीचे समान स्थान की मांग’ रही है.

उन सभी लोगों के लिए जो अपने-अपने तरीकों से पूंजीवाद की सीमा और असफलता से बच निकलने की इच्छा रख्ते हैं, शब्द ‘कम्युनिस्ट’ के लेबल का प्रयोग अनुचित होगा. ‘कम्युनिज्म’ एक ऐसा  भारी भरकम शब्द है कि इसे राजनीतिक भाषणों में पुन:प्रयोग करना बड़ा मुश्किल है. शायद, हमें इस लहर को, हमारी लहर को, पूंजीवाद विरोधी या फिर स्वयं को ‘रोष की पार्टी’ कहना चाहिए जो वाल-स्ट्रीट की पार्टी और इसके अनुचरों, इसके धर्ममण्डको को हर जगह हराने के लिए तैयार हो और उसे वहां ले जाकर छोड़ दे.

बेशक ये साहसी शब्द थे, लेकिन RSA के प्रश्नकाल के दौरान, मैंने महसूस किया कि यद्यपि वहां काफी लोग थे जो हार्वे के आर्थिक विश्लेषण को मानने को तैयार थे, लेकिन वहां ऐसे लोग भी थे जो पूंजीवाद विरोधी लहर के उत्थान के बारे में उनके सीमित से राजनीतिक आशावाद को भी स्वीकृत करने पर राजी नहीं थे. इसलिए, जब मैंने उन्हें अकेले पाया, तो मैंने इस पर थोडा और बोलने के लिए कहा. क्या यह सही नहीं है कि लोगों का वह अधिकतर हिस्सा जिसे वे  पूंजीवाद विरोधी गठबंधन कहते हैं, उनमें अपनी-अपनी दयनीय स्थिति को छोड़कर, ऐसा बहुत थोडा है जो साझा हो. इतिहास में मुश्किल से ही ऐसा है, जिसने इस प्रकार के बलहीन ग्रुपों द्वारा किसी प्रकार के बदलाव को प्रभावित किया हो.

मैं नहीं मानता कि यह सही हो. ‘पेरिस कम्यून’ किसने पैदा किया ? ‘बेठिकाना’ कामगारों और निर्माण व्यवसाय के श्रमिकों की अहम भूमिका रही थी. जो सच है वह यह कि लोग, जिनके पास सुरक्षित रोजगार नहीं हैं, इनके लिए सांगठनिक रूप ढूँढना बहुत मुश्किल होता है. यही कारण है कि अमेरिका में बहुत थोड़े लोग मिलेंगे जो यूनियन बनाने में दिलचस्पी रखते हों. लेकिन मानव अधिकार संगठन जैसी ‘अप्रकट’ ( covert ) यूनियन बनाने में इच्छुक लोगों की संख्या अधिक से अधिक होगी. अगर आप अपने को मानव अधिकार संगठन बनाने के लिए निरुपित करते हो, तो आप श्रम कानून के अधीन नहीं आते हो. एक मानव अधिकार संगठन अस्थाई श्रमिक को संगठित कर सकता है और फिर भी कह सकता है “हम यूनियन नहीं है”. वे बेघरों के साथ भी ऐसा ही करते हैं. मैं बेघरों की ‘Picture the Homeless’ के लिए काम करता हूँ जो, सक्रिय रुप से, इन नए सहस्वामित्व वाले घरों पर कब्ज़ा करने की बाते करती है और बेघरों को वहां बसाती है.

डेविड हार्वे ने अपना अल्प समय, ब्रिटेन में अपनी नयी पुस्तक प्रकाशित कराने  में, लगाया. उसके साथ अपनी मीटिंगों के दौरान, मैं एक ऐसे व्यक्ति से प्रभावित था जो एक अमेरिकन विश्वविद्यालय ( हालाँकि उनका जन्म ब्रिटेन का है ) का  अकादमी होने के बावजूद मार्क्सवाद का झंडा, ऊँचा उठाये हुए था . यहाँ उनका स्वागत समारोह उनके लिए अनुकूलित होने की वजाय, खुद उनके ही प्रवेशाधिकार पत्र से था. लेकिन अमेरिका में उनके व्याख्यानों और पुस्तकों की स्थिति कैसी है ?

“इसे मुख्य मीडिया में कैसे लिया जाता है. वे इसका उत्तर पूर्ण चुप्पी से देते हैं. मेरे काम का रिवियू होना बड़ा मुश्किल है. लेकिन मुझे इसका अभ्यस्त होना पड़ता है. मैं लोहे की छत के नीचे हूँ. दूर बेसमेंट में काम करता हुआ. किसी हद तक विक्टर ह्यूगो की कहानी की तरह. मैं सीवरों में विध्वंस का कार्य कर रहा हूँ.

क्या वे बेख़ौफ़, बहिष्कार होने के डर के बिना, शब्द मार्क्सवाद का प्रयोग कर सकते हैं ? ” इसमें बड़ी मुश्किल है. वहां एक ‘फोक्स न्यूज़’ नाम से उद्योग है जो ओबामा को मार्क्सवादी कहने में व्यस्त है.  यह मेककार्थिज्म की लंबी विरासत है. हम इस स्थिति को तस्लीम नहीं करते कि मेककार्थिज्म का इस देश पर कितना गंभीर असर है और 1950 से पहले की स्थिति को दोबारा प्राप्त करना कितना मुश्किल है .

“लेकिन कुछ स्थान हैं, जहाँ मैं खुलकर बोल सकता हूँ. वहाँ समाजवादी वर्कर पार्टियाँ हैं और रेवोलुशनरी कम्युनिस्ट पार्टी है. उनका न्यूयार्क में बुक-स्टोर है और मैं कई बार वहाँ जाता हूँ और बातचीत करता रहता हूँ. लेकिन वहाँ, मार्क्स का पूर्ण रूप से पुन:मूल्यांकन हो रहा है. 30 वर्ष पहले यह बड़ा हठधर्मी और कट्ठ्मुल्ला था. लेकिन अब यह बहस और बातचीत के लिए अधिक खुल्ले मैदान की तरह है. और इस अर्थ में, मैं उम्मीद करता हूँ कि एक और मार्क्सवाद, एक और कम्युनिज्म संभव है.

परन्तु फिर भी, अगर यह सच है कि मार्क्सवाद पर अब तत्परता से बहस होती है, क्या लोगों के रवैये में, निश्चित रूप से, इसके परिणाम या इसके अनीश्वरवाद संबंधी, न्यूनीकरण नहीं रहा है ?

“आप नहीं जानते कि अमेरिका में तेज़ी से बड़ा होता हुआ धार्मिक ग्रुप कौनसा है ? वे मुझे सवाल करते हैं. मोर्मनों का. अनीश्वरवादी ? उनकी असीम वृद्धि हुई है. मुझे नहीं पता कि आपने इसपर ध्यान दिया है. लेकिन ओबामा ने अपने उदघाटन भाषण में सभी धर्मों का ज़िक्र किया और अनीश्वरदियों को भी शामिल किया. पहली बार. और वह जानता है कि वह क्या कर रहा है. क्योंकि बहुत से इन्डिपेनडेंट भी अनीश्वरवादी हैं. एक अनीश्वरवादी लहर उदय हो रही है. धार्मिक रूढ़ीवाद चिंतनीय है लेकिन इसकी स्थिति अल्पसंख्यक की है. अधिकतर धर्म रेडिकल लेफ्ट विंग या रेडिकल राईट विंग हैं और इस प्रकार का विचार कि अमेरिका में धर्म केवल रुढ़िवादी हो सकता है, बहुत अनुपयुक्त लगता है. पादरियों का एक विंग है जो कह रहा है कि हमें सामाजिक असमानता और ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ कुछ करना चाहिए. इसलिए पादरियों की लहर एकतरफा नहीं है.

अंतिम क्षणों में, ICA में, अपने प्रकाशकों से मिलने की हड़बड़ी से पहले, वे और मैं अकेले रह गये. मैंने उन्हें, उनके व्याख्यान और उनकी 75 वर्ष की अवस्था में भी, अपने विषय प्रति, नौजवान अकादमियों के मुकाबले अधिक प्रत्यक्ष तत्परता के लिए धन्यवाद कहा. इसीसे,  एक और सवाल निकल आया. हालाँकि मैं जानता था कि उनकी स्वयं की न्यूयार्क शहर की ‘सिटी यूनिवर्सिटी’ रेडिकल विचारकों के लिए कुछ-कुछ सुरक्षित सा ठिकाना मुहैया करवाने के लिए प्रसिद्ध रही है , लेकिन क्या उन्हें इस तरह का खतरा महसूस नहीं होता कि, ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों की अपेक्षा उनके विश्वविद्यालयों का रुझान ज्यादा मैनेजमेंट वाला होता जा रहा है जोकि बड़े व्यवसाय या राज्य से जुडा हुआ हो ?

” हाँ, सही है. और खतरा दो तरह से आता है. एक तो सीधे-सीधे दमन द्वारा. परन्तु जो दूसरा और महत्वपूर्ण खतरा है वह यह कि वे अकादमियों से विश्विद्यालय के लिए अधिक धन कमाने की मांग रखते हैं. मेरे एक डीन हैं जो कह रहे हैं कि मैं अधिक धन अर्जित नहीं कर पा रहा हूँ. उनका कहना है कि जहाँ तक धन का सवाल है, मैं बेकार हूँ. इसलिए मैंने उनसे पूछा कि मैं क्या करूँ ?  क्या मुझे जनरल मोटर्स द्वारा मुहैया करवाए गए फंडों से मार्क्सवादी अध्ययन के लिए संस्थान खड़ा करना चाहिए ? और डीन ने कहा, ” हाँ, यह अच्छा विचार है. अगर आप यह सब कर पायें तो मैं आपका समर्थन करूंगा . “

बाहर उनका इंतजार करती हुई टैक्सी की ओर बढ़ते हुए, वे अब भी, मंद-मंद मुस्करा रहे थे.

पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

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हार्वे की ओर इस कशिश के पीछे कुछ और भी कारण हैं. सावधानीपूर्वक तराशी हुई उनकी दाढ़ी और भले चचा जैसे रूप-रंग में, वे, काफी हद तक, एक भद्र क्रांतिकारी जैसे दीखते हैं. वे बेमिसाल वाक्पटुता के मालिक हैं. मार्क्सवाद की मौजूदा प्रासंगिगता पर उनकी पुस्तकें और व्याख्यान – अढाई लाख से अधिक जिज्ञासू विद्यार्थियों द्वारा उनके इंटरनेट पर उपलब्ध पूंजी पर व्याख्यानों को डाउनलोड किया जाना – एक तरह का साहित्यिक उत्साह और मार्क्स को उनकी श्रेष्टता के साथ  आह्वान करने के विश्वास का भाव. वे उस वक्त विशेषरूप से अकाट्य होते हैं जब वे पूंजीवाद का, अनंत प्रवाह के रूप में, वर्णन करते हैं, कि कैसे यह निरंतर अपनी रुकावटों को पार कर जाता है, जैसे ही इसे मुनाफा कमाने के नये अवसर मिल जाते हैं.इसे एक उपमा ही कहेंगे कि वे सत्रहवीं सदी के अपने हमनाम ‘विलियम हार्वे’ को प्रसंतापूर्वक इस बात का श्रेय देते हैं कि कैसे वे  शरीर में खून को प्रणालीबद्ध रूप से दौड़ता हुआ दिखाया करते थे. यहाँ उसी उपमा को काम करते हुए देखा जा सकता है.

“एक तरफ अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं और क्रेडिट के फेरीवाले जौंक की भांति विश्वभर के लोगों का ‘ढांचागत समन्वय’ कार्यक्रमों और हर तरह की तिकडमों ( जैसे क्रेडिट कार्ड की फीस का एकदम दोगुना हो जाना ) द्वारा जितना खून चूस सकते हैं,चूसते रहते हैं – कोई फर्क नहीं पड़ता के वे कितने गरीब हो चुके हैं. दूसरी और केन्द्रीय बैंक अपनी अर्थव्यवस्थाओं में बाढ़ ले आते हैं और ग्लोबल बॉडी पोलीटिक में इस उम्मीद के साथ कि इस तरह के आकस्मिक आधानों से वह रोग ठीक हो जायेगा जिसे रेडिकल रोगनिदान और हस्तक्षेप की जरूरत है,  अत्यधिक तरलता का विस्तार कर देते हैं.

सभी मार्क्सवादियों की भांति, डेविड हार्वे भी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच मौज-मस्ती करते हैं. जैसेकि उन्होंने अपने व्याख्यान के बाद मेरे साथ अपने इन्टरवियू में बताया, ” मैं द्वन्द विज्ञानी हूँ. समाज में मौजूद विसंगतियों की खुदाई करने में मेरा विश्वास है. और मैं उनको प्रगतिशील बदलाव की गति के मार्ग के लिए प्रयोग करता हूँ. यह चिंतन और व्याख्या करने का तरीका है, जिसे प्रयोग में लाना बड़ा ही आसान है, अगर आप इसका प्रयोग इस तरह से करें कि लोग इसके साथ स्वयं को अभेद पायें बजाय इसके कि आपको कहना पड़े कि इसे समझने के लिए आपको हेगेल के तीनों और मार्क्स  के चारों खण्डों का अध्ययन करना पड़ेगा. बढ़िया नाटक, हेलमेट ( शेकस्पियर का एक नाटक ) की संरचना द्वंदात्मक है. अगर ऐसा न होता तो यह बहुत उबाऊ होता. और यही कारण है कि मुझे इतिहास और ऐतिहासिक बदलाव बहुत आकर्षित करते हैं.

अपनी [RSA ] के साथ बातचीत और अपनी उम्दा पठनीय पुस्तक में हार्वे, थेचरवाद के वर्षों के दौरान, नवउदारीवादी क्रांति से पैदा हुई विसंगतियों पर ,लुत्फ़ उठाते हैं. इससे पहले पूंजीवाद की समस्याओं को पूंजी के संबंध में श्रम की शक्ति को रखकर परिभाषित किया जाता था. नए यूनियन विरोधी विधान और ग्लोबल आउटसोर्सिंग के विकास, जिससे पूंजीपति अविकसित देशों की भोली-भाली जनता के श्रम को निचोड़ सकें, द्वारा संगठित श्रम को पीछे हटने के लिए मजबूर करके ही मुनाफे संभव हो सकते थे. परन्तु इसके तुरंत बाद एक नयी समस्या खड़ी हो गयी. अब, चूँकि वास्तविक उजरत बहुत घट गयी थी, पूंजीवाद द्वारा उत्पादित वस्तुओं को मजदूर वर्ग द्वारा खरीदना किस प्रकार संभव हो सकता था ? इसका हल आसान क्रेडिट में ढूंढा जाने वाला था.

क्रेडिट का अधिकतर हिस्सा, आवास बाज़ार में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक नयी समस्या थी. इस कर्ज का अधिकतर भाग आवास बाज़ार को ईधन मुहैया करवाने के रूप में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक और विरोधाभास था. एक तरफ बैंकों ने बिल्डरों को क्रेडिट की लंबी-लंबी स्कीमें थमा दी ताकि वे और अधिक घरों का निर्माण कर सकें. और उसी वक्त, उन्हीं बैंकों ने, उन लोगों को कर्ज दे दिया जो इस नयी खड़ी की गयी संपत्ति को खरीदना चाहते थे. यह पोंजी स्कीम – एक निवेश संबंधी घोटाला जिसमें शुरू के निवेशकों को मिलनेवाला तथाकथित लाभ नए जुडनेवाले निवेशकों के फंडों से सीधा प्राप्त हो जाता है – का सटीक उदाहरण था. अन्य सभी पोंज़ी स्कीमों की भांति, पूरी ईमारत उस वक्त भरभराकर गिर गयी जब निवेशकों ने नकदी वसूलने का फैसला किया.

लेकिन हम इतने अधिक लोगों की उस क्षेत्र में, जो उदाहरणतय, मैन्युफेक्चरिंग जैसे क्षेत्र में निवेश के मुकाबले संदिग्ध हो, में निवेश की इच्छा की किस प्रकार व्याख्या करेंगे ? और यही है वह जहाँ, हम हार्वे के विश्लेषण की गरी की झलक पाते हैं. वे तर्क देते हैं की बीतें दिनों वित्तीय संकटों में हुए प्रवर्धनों को उत्साहित करने के लिए जो चीज थी, वह थी, पूंजीवाद की तीन प्रतिशत की मिश्रित दर से वृद्धि की प्रतिबद्धता. बीते समय में, सीमित विश्व में जिसमें इतनी अधिक अविकसित मंडियां हों , अमेरिका और ब्रिटेन के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना संभव था. लेकिन अब जबकि चीन और भारत भी उसी दर या उससे भी अधिक दर से विकसित हो रहे हैं, पूंजीवादी उद्यमों के लिए अपने बेशी-मुनाफों का निवेश करने का क्षेत्र सिकुड़ रहा है. वर्तमान समय में, £1.5 ट्रिलियन नए निवेश की खोज में पड़े हैं. २० वर्षों के समय में, वे £ 3 ट्रिलियन हो जायेंगे. इसलिए उसका अनुसन्धान हुआ, जिसे हार्वे ‘फ़र्ज़ी मंडियां’ : व्युत्पादन (derivatives ) की मंडियां, भविष्य में व्युत्पादन के व्युत्पादन और कार्बन  ट्रेडिंग कहना पसंद करते हैं. शुरू में, ये इनमें निवेश करनेवालों को, उद्योग में निवेश की तुलना में अधिक प्रतिलाभ देने का वायदा करते है लेकिन वे, जैसाकि हमने अपने दम पर देखा है, अंतिम रूप में, भ्रम साबित होते हैं .

जैसे-जैसे [RSA ] के श्रोताओं की ध्यान-मुद्रा साफ़ होती जाती है, इस दलील से प्रभावित न होना मुश्किल लगता है और विशेषरूप से तब, जब इसे, पिछले बारह महीनों के दौरान अन्य अर्थशास्त्रियों की टूटी-फूटी टिप्पणियों के कोंट्रासट में रखते हैं. परन्तु मैं अपनी उस वक्त की बेचैनी को दबा नहीं सका जब हार्वे  मौजूदा स्थिति पर रेडिकल हल पेश करने की और बढ़ रहे थे, जहाँ ऐसा लगता था कि यह ताज़ा पूंजीवादी संकट इसके कफ़न के लिए अंतिम कील साबित होगा. मैं इसलिए चौकस था कि इस तरह की भविष्यवाणियाँ पहले भी कई बार हुई थीं. पूंजीवाद, हमें बहुत से सिद्धान्तकारों द्वारा बताया गया था , 1973 के तेल संकट,या IMF के 1976 के संकट , या 1987 के काले सोमवार के साथ या 1992 के काले बुधवार के साथ, अपने चरम बिंदु पर पहुँच गया था. परन्तु भविष्यवाणियाँ फेल साबित हुईं. बार-बार पूंजीवाद, जीवित रहने में, सफल रहा. इसलिए क्या मौजूदा स्थिति में कुछ ऐसा है जो वास्तव में अलग हो ?

ऐसी कोई बात नहीं है जिसने मुझे परेशान किया हो. हार्वे इतनी तैयारी में हैं कि वे पूंजीवाद द्वारा संकटों पर काबू पाने और कुशलतापूर्वक मुनाफा कमाने के नए रास्तों की खोज को तस्लीम नहीं कर पाते. बीते समय में, इसने अपने इस मकसद को हासिल करने के लिए कई अतार्किक तरीके खोजे थे. और इसने ऐसा ही किया, जैसे हार्वे अपनी पुस्तक ‘पूंजीवाद की पहेली’  [ The Enigma of Capital ] में इसके द्वारा युद्ध के रास्ते से, परिसम्पत्तियों के अवमूल्यन से, उत्पादक क्षमता के अपकर्ष से, अपसर्जन और अन्य सृजनात्मकता की तबाही द्वारा, अपनी समस्याओं का हल करता रहा है. इन सभी समाधानों से चौंकानेवाले परिणाम निकले हैं. मानव जीवन अस्त-व्यस्त और जहाँ तक कि तबाह हो जाता है, सारा कैरियर और जीवनभर की उपलब्धियां खतरे में पड़ जाती हैं, गहरे पैठ कर चुके विश्वास को चुनौती मिलती है, रूह घायल हो जाती है और मानव के गौरव का परित्याग कर दिया जाता है. सृजनात्मक तबाही शानदार, सुन्दर, बुरे और अच्छे – सभी पर भारी पड़ती है. संकट, हम निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं, ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’ है.

परन्तु निसंदेह, उनकी जिज्ञासा यह दिखाने की है, कि वर्तमान संकट पिछले सभी संकटों, जिनपर काबू पा लिया गया था, की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है और उनकी जिज्ञासा यह सुझाव देने की होती है कि प्रत्येक समझदार व्यक्ति के पास ‘पूंजीवाद विरोधी अभियान’ में शामिल होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है, लेकिन फिर भी, वे भविष्यवेत्ता बनने से बहुत दूर हैं.

क्या पूंजीवाद वर्तमान सदमे से बच निकलेगा ? हाँ, बेशक. लेकिन हार्वे विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि इसकी भारी कीमत चुकानी होगी. लोगों की अधिकतर आबादी को अपनी मेहनत के फल को उन्हें देना होगा, जो सत्ता में हैं, अपने बहुत से अधिकारों और अपने साधनों की सख्त मुशक्त से हासिल की गयी कीमत ( आवास से लेकर पेंशन फंड, हर वस्तु) का त्याग करना होगा और प्रचुर मात्रा में, परिवेशी अपकर्ष का दर्द झेलना होगा. केवल इतना ही नहीं कि अपने जीवन स्तर में कटौती बल्कि इसका अर्थ होगा बहुत से गरीब लोग, जो पहले ही जीवित रहने का संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए भूखमरी. थोड़े से राजनीतिक दमन से कहीं अधिक, आनेवाली अशांति का गला घोंटने के लिए, पुलिस हिंसा और मिलट्री राज्य नियंत्रण की आवश्यकता पड़ेगी. जिस वक्त,  हार्वे यह सब कह रहे थे, ठीक उसी वक्त, एथेन की गल्लियों में लड़ाई बढ़नी शुरू हो गयी थी.

यद्यपि, इस सब का मतलब निराश होने से नहीं है. संकंट विरोधाभास और संभावनाओं के वे क्षण होते हैं, जिनसे विकल्प के तरीके, समाजवादी और पूंजीवाद विरोधी, सभी जन्म लेते हैं.

अगली अंतिम किश्त में समाप्य

पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

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इससे पहले, लिंक जोड़ने के लिए देखें : वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पोंजी स्कीम जैसी है ?

विश्व आर्थिक मंदी ने एक बार फिर सारी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को मार्क्स की ओर मुड़ने के लिए मजबूर कर दिया है.  ‘द्वंदात्मक भौतिकवादी’ भूगोलवेत्ता ‘डेविड  हार्वे’ जो चालीस वर्षों से मार्क्स की पूंजी पढ़ा रहें हैं और जिन्हें पहली बार गंभीरता से लिया जा रहा है, से ‘लॉरी टेलर’ की मुलाकात पर आधारित यह आलेख ‘http://newhumanist.org.uk’ से लिया गया है.

डेविड हार्वे तुरंत अपनी तरंग में आ जाते हैं. “पूंजीवाद” वे रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स ,  लन्दन के हाल में अपने श्रोताओं से कहते हैं, “कभी भी अपने संकटों का समाधान नहीं करता. यह उन्हें केवल एक स्थान से दूसरी स्थान पर ले जाता है. ब्राज़ील से रूस, से अर्जन्टीना, से अमेरिका, से ब्रिटेन, से यूनान”.

जैसे ही वे इन बार-बार आनेवाले संकटों,  और विशेषरूप से, 1970 के बाद से उनकी बारंबारता में नाटकीय बढौतरी के कारकों का विश्लेषण करना शुरू करते हैं, मैं अपनी नज़र, श्रोताओं पर डालता हूँ. मैं अपनी चैयरमेन की सीट से देख सकता हूँ कि व्याख्यान सभागार खचाखच भरा हुआ है. कोई भी कुर्सी खाली नहीं है और लगभग दर्जन एक श्रोता गलियारे में खड़े हुए हैं. रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स [RSA]   के लंच-समय के व्याख्यानों में, अक्सर, अच्छी हाजिरी होती है लेकिन क्या कमरे में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति ने इस बात को तस्लीम कर लिया था कि जो कुछ वे आज इस वक्ता से सुनने जा रहे हैं, वह आज के पूंजीवाद का विश्लेषण है जो मार्क्स से शुरू होकर मार्क्स पर ख़त्म होता है, ऐसा विश्लेषण जोकि कई प्रकार से वैसा ही है, जैसा मैंने ७० और ८० के दशक में सैंकड़ों नीरस सभाओं में कट्टर समाजवादियों से सुना था.

कोई कारण नहीं था कि मैं फिक्रमंद होता. इस पर भी कि हार्वे ने तुरंत मार्क्स के प्रति अपना कर्ज तस्लीम किया और बार-बार वे मार्क्स को उद्घृत करते रहे. फिर भी, तीस मिनट के व्याख्यान में, किसी भी क्षण,  उनके अमीर श्रोताओं में बेचैनी  का कोई चिह्न नहीं था और समापन पर, प्रश्नौतर काल में, केवल एक श्रोता का सुझाव था कि मार्क्स को छोड़कर कुछ भी, हमारे मौजूदा आर्थिक संकट को समझने के लिए, सबसे बढ़िया हो सकता है.

निसंदेह, उस आर्थिक सिद्धांत को, जिसे सोवियत यूनियन के ढह-ढेरी हो जाने पर, भले ही अतार्किक रूप से ही सही, इतिहास में जगह दे दी गयी थी, स्वीकार करने की चाहत के पीछे एक बढ़िया कारण था. बिलकुल सीधी सी बात है कि विश्वभर के अर्थशास्त्रियों की,  इतिहास में अभी-अभी  घटित हुई घटनाओं पर एक भी संतोषजनक व्याख्या देने की पूर्ण असक्षमता. इसी तथ्य को श्रोताओं के सामने सही और साफ-साफ तरीके से प्रस्तुत करने में, हार्वे पूरी तरह से माहिर हैं.

अपनी ताज़ा पुस्तक, ‘पूंजी की पहेली और पूंजीवाद के संकट’ की प्रस्तावना में, वे यह कहानी सुनाते हैं, ” जब प्रतापी महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने नवंबर 2008 में, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के अर्थशास्त्रियों से यह पूछा कि क्यों नहीं वे मौजूदा आर्थिक संकट की आमद को देख पाए ( एक ऐसा सवाल जोकि निसंदेह प्रत्येक व्यक्ति की जबान पर था, लेकिन जिसे कोई सामन्ती शासक ही, इस तरह, हलके अंदाज में पूछ सकता था और उत्तर की अपेक्षा पाल सकता था ) तो अर्थशास्त्रियों के पास, देने के लिए, कोई जवाब तैयार नहीं था. छह महीने के मुख्य नीति निर्धारकों के साथ मिलकर किये गए अध्ययन, जुगाली और गहन विचार-विमर्श  के बाद, ब्रिटिश अकादमी के गलियारे में एकत्रित हुए सभी अर्थशास्त्रियों ने, एक साझे पत्र में, प्रतापी महारानी के सामने स्वीकार किया कि वे ,किसी हद तक, उस दृष्टि को खो चुके हैं जिसे वे ‘प्रणालीबद्ध जोखिम’ के नाम से जाना करते थे.

हार्वे, इस एपिसोड की स्विफटियन विडंबना का रस्सावदान करते हुए कहते हैं, “शिक्षित अर्थशास्त्रियों की अपनी असफलता पर बहानेबाजी करने की नाकाम कोशिश का यह दृश्य है, उस वक्त, जब वे बुरी तरह से डरे हुए सचेत हैं कि उनमें से किसी ने भी कपडे नहीं पहने हुए हैं. परन्तु यह सब उनको (हार्वे को) मार्क्स को जगाने का पूर्ण तरीका मुहैया करवाता है. किंकर्तव्यविमूढ़, वे अर्थशास्त्री, उन छः महीनों के लंबे अन्तराल के बाद, अंत में, यह पहचान गए थे कि उनकी असफलता का वास्तविक रहस्य क्या था.  जर्नलिस्टों और टिपण्णीकर्त्ताओं द्वारा पेश किये गये अधपक्के सिद्धांतों को भूल जाईये.  ताज़ा संकट, हार्वे अपने [RSA] के भावविभोर श्रोताओं से कहते हैं, किसी मानवीय कमजोरी या अप्रयाप्त वित्तीय बन्दोबस्त या किन्सियाई दृष्टि को त्यागने से या अंग्रेजों या अमेरिकियों या यूनानियों की विलक्षण सांस्कृतिक असफलताओं के कारण सिर के बल खड़ा नहीं हुआ है. यह पूंजीवाद की प्रणालीबद्ध असफलता है.  और इस प्रकार की असफलता पर विश्वसनीय लगने वाली केवल एक ही व्याख्या है, जिसे बूढ़े भले मार्क्स में खोजा जा सकता है.

[RSA] द्वारा तैयार की गयी इस कार्टून फिल्म की पार्श्व-ध्वनी, स्वयं हार्वे के उपरोक्त व्याख्यान का ही ऑडियो है.

शेष अगली किश्त [पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’] में

एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

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लिंक जोड़ने के लिए देखें —  ‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

मार्क्सवाद और देश दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि पूंजीवाद अपने जन्म से ही लंगड़ा-लूला पैदा हुआ है और उसे मेहनतकश अवाम ने न केवल चुनौतीपूर्ण टक्कर ही दी है, बल्कि बीसवीं सदी में बुर्जुआ वर्ग से सत्ता छीनकर सोवियत यूनियन और चीन में महान समाजवादी तजुर्बे भी किये हैं. हालाँकि अपने इन प्रारंभिक तजुर्बों में मेहनतकश वर्ग ,वक्ती तौर पर, हार गया है और सोवियत यूनियन और यहाँ तक की चीन की वर्तमान संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडे तले पूंजीपति वर्ग ने अपनी सत्ता को स्थापित कर लिया है. डॉ. झुनझुनवाला [ देखें — वामपंथ की सैद्धांतिक भूल ] बंगाल में सत्तासीन रही संशोधनवादी पार्टी की हार का ज़िक्र करते हैं और मार्क्सवाद की थ्योरी को त्रुटिपूर्ण होने का फ़तवा सुना देते हैं, बिना यह जाने कि मार्क्सवाद कोई कठमुल्ला उपदेशात्मक शास्त्र नहीं है, बल्कि वर्गीय समाज के संघर्ष में, ऐसा समाज शास्त्र है जो सर्वहारा पक्षावलम्बी है. मार्क्सवाद ने अपने संघर्ष के दौरान न केवल पूंजीपति वर्ग से टक्कर ली है बल्कि लाल झंडे के तले अराजकतावाद, आतंकवाद, अर्थवाद, ट्रेड-यूनियनवाद आदि संशोधनवाद, जो मार्क्सवाद को इतना पतला और कमजोर कर देना चाहता है ताकि यह पूंजीपति वर्ग की सत्ता को चुनौती न देकर उसकी सेवा में हाज़िर हो और अपने संसदमार्गी कृत्यों से मजदूर वर्ग के आक्रोश पर ठन्डे पानी के छींटे मारकर उनकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करता रहे, केखिलाफ भी संघर्ष किया है.

अपने इस आलेख में, डॉ. झुनझुनवाला इस प्रकार के निष्कर्ष निकालते हैं जैसे,  ‘मार्क्सवादी बाजार विरोधी है जबकि बाज़ार सभी को उनकी क्षमतानुसार काम करने के अवसर प्रदान करता है’. बाज़ार का महिमामंडन करते हुए वे लिखते हैं,
“हम देखते हैं कि आर्टिस्ट को पेंटिंग बनाने में ही मजा आता है। पेंटिंग बिक गई, इतनी ही जानकारी उसके लिए पर्याप्त होती है। किसान गेहूं का उत्पादन करके प्रफुल्लित होता है, यद्यपि उसे पता नहीं होता कि रोटी कौन खाएगा। श्रमिक को यदि उसके स्वभाव के अनुकूल काम मिल जाए तो वह सुखी होता है। आर्टिस्ट को हल चलाने में लगा दिया जाए तो वह दुखी होगा और किसान को पेंटिंग करने के लिए ब्रश थमा दी जाए तो वह भी दुखी होगा। विशेष यह कि व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य ढूंढने में बाजार से मदद मिलती है। श्रमिक मन चाहा कार्य पकड़ सकता है। इसलिए मूल रूप से बाजार सुखदायी है।

डॉ. झुनझुनवाला जी, किसान, श्रमिक, और आर्टिस्ट जन्म से पैदा नहीं होते. व्यक्ति का मनपसंद कार्य वह नहीं होता जो वह कर रहा होता है. वर्गीय समाज का विकास इसका मुख्य निर्धारक होता और व्यक्ति की इच्छा गौण. मोटे तौर पर वर्गीय समाज आदिम साम्यवाद से लेकर मालिक-गुलाम, सामंत-किसान और अब पूंजीपति-मजदूर — चार चरणों से होकर गुजरा है . यह सब किसी एक व्यक्ति के चाहने या न चाहने से नहीं हुआ. वर्ग-संघर्ष इसका वस्तुगत चरित्र रहा है.बाजार भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से पैदा हुआ है. चूँकि पूंजीपति वर्ग और  समाज के अस्तित्व के लिए बाज़ार जरूरी है, इसलिए इसका महिमामंडन भी जरूरी है, जोकि आप बाखूबी कर रहे हैं. आपका यह “मूल रूप से बाजार” श्रमिक – जिसके पास अपनी श्रम-शक्ति बेचने के सिवा और कुछ नहीं होता – को नहीं, आपको सुखदायी लगता है।

हमारा यह मानना है कि मार्क्सवाद बाज़ार विरोधी है लेकिन उस प्रकार से नहीं जिस प्रकार डॉ. झुनझुनवाला पेश करते हैं. अपने सारे आलेख में वे ,बड़ी चालाकी के साथ, मार्क्स के मूल्य के श्रम-सिद्धांत का ज़िक्र तक नहीं करते और मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ सिद्ध कर देते हैं. यही वह बाज़ार होता है जहाँ श्रम-शक्ति पण्य (कमोडिटी) के रूप में बिकती है और अपनी विशिष्टता ( श्रम-शक्ति अकेली ऐसी पण्य है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है) के कारण अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है जिसमें से पूंजीपति वर्ग न केवल अपना मुनाफा वसूलता है बल्कि उसकी सेवा में हाज़िर राज्य और उसकी संस्थाओं के खर्च भी निकलते हैं. अपनी विशेष हैसियत के कारण, पूंजीवादी उत्पादन क्रिया से लूटे गये अतिरिक्त मूल्य पर हक़ का पहला दावेदार पूंजीपति वर्ग होता है. यही कारण है कि इस वर्ग की खुशामद द्वारा बुर्जुआ वर्ग का  बुद्धिजीवी (ध्यान रहे बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा संकल्प नहीं है जिसकी अवस्थिति वर्ग-हितों से ऊपर हो ) चंद हड्डियों की अपेक्षा पाले रहता है. ऐसा नहीं है कि एक संशोधनवादी, संसदमार्गी  और मजदूर वर्ग में अर्थवाद द्वारा उसकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करनेवाली माकपा ‘स्टाईल मा‌र्क्सवादियों की पार्टी’ की हार से डॉ. झुनझुनवाला को मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ दिखाई देने लगी हों और वे बड़ी ईमानदारी से मार्क्सवाद पर चिन्तन-मनन करने लगे हों. कारण उनकी पूंजीवादी वर्ग-स्थिति है और वे माकपा जैसी संशोधनवादी पार्टी की हार से व्याकुल इसलिए हैं कि कहीं मजदूरों की, इन संशोधनवादी पार्टियों के प्रति, आस्था न डगमगा जाये और वे, विकल्प के तौर पर, अपनी सच्ची कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण न कर लें.

मार्क्स ने पूंजीवादी समाज की विशेषताओं में से एक – श्रम के अलगाव का ज़िक्र किया है. अकेला मजदूर वर्ग ही सक्षम है जो पूंजीपति वर्ग से संघर्ष द्वारा – वर्गीय समाज को ख़त्म करने की प्रक्रिया द्वारा – इस मर्ज़ का इलाज करेगा. इसलिए मार्क्सवाद की अवस्थिति वर्तमान और भविष्य में है. लेकिन डॉ. झुनझुनवाला मार्क्स को उस ग्रामीण परिवेश में भेज देते हैं, जहाँ  “गाँव का व्यक्ति किसान के लिए हल बनाता है …वह उसमें अपने प्राण आहूत करता है। उसके सामने ही किसान उसका उपयोग करता है, जिसे देखकर दोनों का मन लहलहाता है।” पता नहीं किस युग में और कैसे किसान जोकि  सामंतो द्वारा शोषित रहा है अपनी उस वक्त की मेहनतकश की स्थिति पर प्रफुल्लित होता रहा है ? ‘अह़ा ग्राम्य जीवन’ का ‘नोस्तालजिया’ मार्क्स का नहीं डॉ. झुनझुनवाला का है जिन्होंने बीते का रुदन करनेवाले कवियों से इसका महिमा मंडन सुन रखा है   वे भूल जाते हैं कि मार्क्स की रचनाओं के तीन स्रोत और तीन अंग उस वक्त के विकसित पूंजीवाद के तीन देशों – दर्शन के लिए जर्मनी, अर्थशास्त्र के लिए इंग्लैण्ड और क्रांतियों व समाजवाद के लिए फ़्रांस – से लिए गए हैं. अब तो सारा विश्व पूंजीवाद के नियमों के अनुसार गतिमान है और कृषि में भी किसान बैलों के पीछे-पीछे हल पकडे नहीं भटकता बल्कि कृषि संबंधी उत्पादन में उसके श्रम की भूमिका गौण हो गयी है और मजदूर वर्ग ही वहाँ उत्पादन क्रिया में मुख्य रूप से सक्रीय है.  कृषि उत्पादन में पूंजीवादी संबंधों की मुकम्मल स्थापना ने छोटे किसानों की तबाही निश्चित कर दी है और वे मजदूर वर्ग की अवस्थिति और दृष्टिकोण अपनाने को बाध्य होते जा रहे हैं. भविष्य में उनका बड़ा हिस्सा मजदूरों द्वारा संपन्न की जानेवाली इक्कीसवीं सदी की नई समाजवादी क्रांतियों के लिए अहम भूमिका अदा करेगा.

डॉ. झुनझुनवाला  लिखते हैं, “एक प्रमुख अखबार ने लिखा है कि वामपंथी विचारधारा तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक देश में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहेगी। यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित है.”

यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित हो सकता है लेकिन एक मार्क्सवादी के लिए नहीं. मार्क्सवाद की विशिष्टता है कि इसने इस वस्तुगत सच्चाई की निशानदेही की है जिसमें, पूंजीवाद ने अपनी विकास प्रक्रिया के दौरान, समाजके एक छोर पर अकूत धन-दौलत और दूसरे सिरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया है. गरीबी,  बीमारी और असमानता जैसी अलामतें इसके जरूरी बाई-प्रोडक्ट हैं. मार्क्सवाद ने एक और कटु सत्य इंगित किया है जो पूंजीपतियों और उनके डॉ झुनझुनवाला जैसे बुद्धिजीविओं को सताता रहता है. पूंजीवाद द्वारा पैदा किये गए कंगाली के इस विशाल समुद्र के सापेक्ष पूंजीपतियों की खुशहाली की चंद मीनारों की औकात अल्पसंख्यक और कमजोर की है जो  कभी भी भरभराकर गिर सकती हैं. मार्क्सवादी विचारधारा की प्रासंगिगता, केवल देश या दुनिया में, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहने तक ही नहीं है बल्कि यह प्रासंगिक रहेगा तब तक, जब तक, वर्गीय समाज का अस्तित्व रहेगा. केवल वर्गविहीन समाज में इसका स्थान म्यूजियम में होगा.

वे अपनी कलम मजदूर वर्ग की तानाशाही पर चलाते हुए मध्यम वर्ग में इस बुर्जुआ लोकतंत्र के भ्रम को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. हो सकता है कि पढेलिखे मध्यम वर्ग के एक हिस्से की, इस बुर्जुआ लोकतंत्र में भारी आस्था हो, लेकिन मजदूर वर्ग इस बात को भली-भांति समझता है कि यह लोकतंत्र बुर्जुआ वर्ग का, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतंत्र है. मजदूर वर्ग के लिए यह तानाशाही ही है. किसी भी वर्गीय समाज में ऐसा लोकतंत्र नहीं हो सकता जो सर्वमान्य हो और न ही सर्वहारा वर्ग, जब वह सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, बुर्जुआ वर्ग और उसके पैरोकारों को लोकतान्त्रिक हक़ देने की छूट दे सकता है, क्योंकि इसका अर्थ होगा – पूंजीवाद की पुनर्स्थापना.

अपने आलेख के अंत में, वे वामपंथ को सैद्धांतिक संजीवनी की घुट्टी पिलाते हुए  और “थ्योरी का  नवीनीकरण” करने की सलाह देते हुए “बाजार का बहिष्कार करने के स्थान पर बाजार पर लगाम लगाने” और ” सरकारी तंत्र के विस्तार के स्थान पर ऐसी पालिसी की मांग” जो  “हल्के सरकारी तंत्र से भारी जनहित हासिल करे” जैसी चलताऊ बातों करके खुश हो लेते हैं, जैसेकि उन्होंने अपने इस आलेख में मार्क्सवाद की ऐसी की तैसी कर दी हो. उनके हलके सरकारी तंत्र और जनतंत्र पर मार्क्सवाद का कहना है कि जब मजदूर वर्ग समाजवाद के संक्रमण काल में बुर्जुआ वर्ग का नामोनिशान मिटा देगा तो उसे किसी भी तरह के -हलके या भारी तंत्र – की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

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इसी महीने की चौदह तारीख के अंक में ‘दैनिक जागरण’ अपने ‘नजरिया’ नामक कालम के नीचे श्रम का मूल्य ‘ और ‘ वामपंथ की सैद्धांतिक भूल( देखने के लिए चटका लगायें ) नामक आलेखों द्वारा मार्क्सवाद पर आक्रमण करता है ताकि  मध्यम वर्ग के पाठक वर्ग का वह हिस्सा जो अपने नजरिया के लिए केवल बुर्जुआ वर्ग के मीडिया और बुद्धिजीवियों पर आश्रित है, भ्रमित हो जाये . डॉ..भरत झुनझुनवाला बुर्जुआ मीडिया के ‘आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों (तथाकथित) में से एक हैं. इसी प्रकार के तथाकथित बड़े नामों को पाल-पोसकर ही पूंजीपति वर्ग सत्ता में रह सकता है. उनके नाम की साख को दाग नहीं लगना चाहिए. इसलिए वह बड़ी चालाकी के साथ  डॉ..भरत झुनझुनवाला को मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ में मीन-मेख निकालने से [ जोकि डॉ..भरत झुनझुनवाला जैसा व्यक्ति क्या निकालेगा ? ] बचा लेता है. इनके स्थान पर वह डा. सरोजनी पाण्डेय की अस्थायी प्रतिनियुक्ति करता है. डा. सरोजनी पाण्डेय के इस आलेख में ऐसा कुछ नहीं है जिसे वैज्ञानिक कहा जाये. वे “भगवान बुद्ध के निर्वाण-सुख”,  “शिव जी का तांडव नृत्य और पार्वती जी के मुख की शोभा” जैसी अमूर्त धारणाओं और पौराणिक  हस्तियों का सहारा लेकर, इसे भावुक बनाने की नाकाम कोशिश करती हैं और समझती हैं कि अब मध्यम वर्ग के लोगों को मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ समझने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी. अपने पाठकों को भावुकता के रंग में रंगने के लिए वे कहने लगती हैं,

“एक मजदूर दिनभर कठिन परिश्रम करके अपनी मजदूरी पाता है। यदि उसकी मेहनत पर गौर करके मालिक उसे दस-बीस रुपये अधिक दे दे, तो उसके चेहरे पर खुशी की जो चमक दिखाई देती है” , उसके  बदले में वे “अपने मालिक के लिए उसके दिल से दुआ” की भी  अपेक्षा करती हैं जोकि “प्रार्थना से कम नहीं” है.

इस प्रकार की भावुक बातों के द्वारा वे मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ के उस सवाल को निगलने की नाकाम कोशिश करती हैं जो उनसे ( डा. सरोजनी पाण्डेय से ) पूछा जा सकता है. वह सवाल है कि “दिनभर कठिन परिश्रम करने वाले  मजदूर की मेहनत पर गौर करके मालिक उसे दस-बीस रुपये अधिक” कहाँ से लाकर देगा ? यही वह बुनियादी सवाल है जिससे बचाव करते हुए, अख़बार ‘जागरण’ अपने आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ बड़े नाम – डॉ..भरत झुनझुनवाला – के स्थान पर  डॉ. कमला पाण्डेय की प्रतिनियुक्ति, एक अलग लेख ‘श्रम का मूल्य’ लिखने के लिए’ करता है. वे विचारी वैज्ञानिक मसले का हल भावुकता के अंध कुएं में गोते लगाते हुए ढूँढती हैं.

खैर, मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ को संक्षिप्त रूप में, एक बार फिर समझने के लिए, इस पेज पर थोडा और रुकें.

मार्क्स का ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’

पूंजी का प्रथम खंड, पण्य उत्पादन के विचार के विश्लेषण से प्रारंभ होता है. पण्य की परिभाषा है, बाह्य उपयोगी वस्तु जिसे मण्डी में विनिमय के लिए प्रस्तुत किया जाता है. इस प्रकार, पण्य उत्पादन के लिए दो जरूरी शर्ते हैं; मण्डी का अस्तित्व जिसमें विनिमय हो सके और सामाजिक श्रम-विभाजन जिससे भिन्न-भिन्न लोग भिन्न भिन्न उत्पादों का उत्पादन करें क्योंकि इसके बिना विनिमय के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं बचता. मार्क्स कहते हैं कि  पण्य में दो बातें होती हैं ; उपयोग मूल्य (value) और विनिमय मूल्य . मार्क्स का मानना है कि उपयोग मूल्य को आसानी से समझा जा सकता है परन्तु उनका दृढतापूर्वक आग्रह है कि विनिमय मूल्य एक पेचीदा मसला है और सापेक्ष विनिमय मूल्य व्याख्या की मांग करते हैं. क्यों किसी पण्य की एक निश्चित मात्रा किसी अन्य पण्य की एक निश्चित मात्रा से बदल ली जाती है ? पण्य के उत्पादन के लिए लगने वाले श्रम की शर्त द्वारा वे इसकी व्याख्या करते हैं. यही नहीं वे कहते है कि जरूरी सामाजिक श्रम वह श्रम होती है जिसे किसी अर्थव्यवस्था में किसी उत्पादक कार्य के लिए, श्रमिक वर्ग में मौजूद उत्पादकता और प्रबलता के औसत स्तर तक निचोड़ा जाता है. इस प्रकार, मूल्य का श्रम सिद्धांत कहता है कि किसी पण्य के मूल्य का निर्धारण उस पर लगी सामाजिक जरूरी श्रम की मात्रा के द्वारा होता है. मूल्य के श्रम सिद्धांत की पैरवी के लिए मार्क्स अपने तर्कों को दो चरणों में पेश करते हैं. पहले चरण में उनका तर्क है कि अगर दो वस्तुओं की तुलना की जाती है तो इनको, किसी समान संकेत के दोनों तरफ रखने के अर्थ में, तीसरी वस्तु की आवश्यकता होगी जो मात्रा या गुण में इन दोनों वस्तुओं के समान हो ताकि ये दोनों वस्तुएं उस वस्तु से समानयन हो जाएँ. चूँकि अब दोनों वस्तुओं को आपस में बदला जा सकता है इसलिए, मार्क्स कहते हैं, अब जरूरी है कि कोई ऐसी तीसरी वस्तु है, जिसमें इन दोनों वस्तुओं का साझा है. यही से दूसरे चरण के लिए प्रोत्साहन मिलता है जो कि उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ की खोज है. यह उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ केवल श्रम ही हो सकती है जिसमें साझा गुण हैं.

मार्क्स कहते हैं कि पूंजीवाद के विशिष्ट गुण हैं जिसमें केवल वस्तुओं का विनिमय ही नहीं होता बल्कि पण्यों की खरीद और उनको अन्य पण्यों जिनमें और अधिक मूल्य होता है, में रूपांतरण द्वारा मुनाफा अर्जित करने के उद्देश्य से, धन के रूप में पूंजी को बढ़ाना होता है. मार्क्स का दावा है कि उनसे पहले के किसी भी सिद्धांतकार ने पर्याप्त रूप से, इस बात की व्याख्या नहीं की है कि कैसे पूंजीवाद समुचित रूप में मुनाफा पैदा करता है. मार्क्स इसका हल पूंजीवाद में श्रमिक के शोषण में देखते हैं. उत्पादन की स्थिति पैदा करने के लिए, पूंजीपति पण्य के रूप में श्रमिक की श्रम-शक्ति – उसके एक निश्चित कार्य दिवस के लिए काम करने की क्षमता – को खरीदता है. इस पण्य – मजदूर की एक निश्चित कार्य दिवस के लिए काम करने की क्षमता – के मूल्य का निर्धारण भी अन्य पण्यों के मूल्य के निर्धारण की भांति; इसके उत्पादन में खर्च हुई सामाजिक जरूरी श्रम द्वारा होता है. इस केस में एक कार्य दिवस की श्रम-शक्ति का मूल्य उन पण्यों के मूल्य के समान है जो उसे (श्रमिक को) एक दिन के लिए जीवित रखने के लिए पर्याप्त हैं. मान लीजिए कि इन पण्यों के उत्पादन पर चार घंटे खर्च होते हैं तो कार्य दिवस के पहले चार घंटे उस मूल्य को पैदा करने में खर्च किये जायेंगे जिसे श्रमिक को मजदूरी के रूप में भुगतान किया जाता है. इसे जरूरी श्रम कहते हैं. इसके अलावा की जानेवाली श्रम को अतिरिक्त श्रम कहते हैं जो पूंजीपति के लिए अतिरिक्त (बेशी) मूल्य पैदा करती है. मार्क्स के अनुसार यही अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत होता है. मार्क्स के विश्लेषण के अनुसार अकेली श्रम-शक्ति ही ऐसी पण्य है जो अपनी औकात से अधिक मूल्य पैदा कर सकती है. इसी कारण इसे, अस्थिर पूंजी (variable capital ) के नाम से जाना जाता है. अन्य पण्य अपने से निर्मित नई पण्य में अपना मूल्य स्थानातरण कर देती हैं लेकिन कोई नया मूल्य पैदा नहीं कर सकती. उन्हें स्थिर पूंजी (constant capital ) कहा जाता है. मुनाफा जरूरी श्रम से प्राप्त मजदूरी से ऊपर की गयी अतिरिक्त श्रम से आता है.

यही है पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत  – श्रमिक से निचोड़ा गया अतिरिक्त-मूल्य . इसी अतिरिक्त मूल्य में से, उस  दिनभर कठिन परिश्रम करने वाले मजदूर की मेहनत पर गौर करते हुए मालिक से”, तरस की गुहार लगाते हुए, डॉ. कमला पाण्डेयदस-बीस रुपये अधिक देनें” को कहती हैं. मसला गंभीर था न कि भावुक, इसीलिए तो “फैज” जैसे विद्वान  कवि की कलम ने ऐसा गीत लिख दिया, जिसकी विषय-वस्तु में ‘ इक खेत नहीं, इक देश नहीं’, बल्कि सारी दुनिया को जीतने  की जिद  है.

http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio2/moba-ila-para-da-unaloda-karane-ke-li-e-krantikari-gita/ikdeshnhin.mp3?attredirects=0 हम मेहनतकश जग वालों से – इस गीत को सुनने के लिए इस प्लेयर के दायीं ओर चटका लगायें.

डॉ. झुनझुनवाला के आलेख का जवाब –देखें — एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

लक्ष्मी-पूजन करें लेकिन

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जब भी हम बाजार से कोई वस्तु खरीदते हैं तो हम उसके भौतिक गुणों की ओर ही देखते हैं. हो सकता है हम उसके गुणों, सुन्दरता आदि की तारीफ भी करें. लेकिन इन वस्तुओं को राजनीतिक अर्थशास्त्र में पण्य या जिंस कहा जाता है. अगर आप भी इनकी पूजा करने की योजना बना रहे हैं तो यह सब करने से पहले अपनी आँखों से उस परदे को हटाने की कोशिश कीजियेगा जिसे “पण्यों की जड़ पूजा’ कहा जाता है.

जिंस रूप का रहस्यमई रूप इस तथ्य के कारण है कि जिंस, जोकि श्रम का उत्पाद होती है अपने उत्पादन की क्रिया में निहित मनुष्य के सामाजिक संबंधों का प्रतिबिम्बन करती है.

उदाहरण के लिए, जिंस के मूल्य का परिमाण मनुष्य के जिस्म की श्रम-शक्ति के खर्च का मापन है. इसके अलावा विभिन्न उत्पादकों के बीच के सामाजिक संबंध उन द्वारा उत्पादित की गयी जिंसों के संबंधों को भी प्रकट करते हैं.

इस प्रकार, जिंस रूप और जिंसों के बीच मूल्य-संबंधों का इस बात से कोई लेनादेना नहीं होता कि उनके भौतिक गुण क्या हैं और वे किन पदार्थों से निर्मित हुए हैं. इसके विपरीत अहमियत इस बात की है कि उनके उत्पादन और विनिमय में सामाजिक संबंधों का रूप कैसा है.

‘पण्यों की जड़ पूजा’ पण्यों को उत्पादित करने वाली श्रम के सामाजिक चरित्र से पैदा होती है. भौतिक वस्तुएं केवल इसलिए पण्य या जिंस बन जाती हैं क्योंकि श्रम उन्हें अलग-अलग स्थान पर और व्यक्तिगत तौर पर उत्पादित करती है. यह विनिमय होने से ही संभव होता है कि श्रम के उत्पाद मूल्यों की एकरूपता या समरूपता प्राप्त करते हैं जो उनके  उपयोगी गुण और भौतिक गुणों से भिन्न होता है. इस प्रकार, मानव द्वारा निर्मित भौतिक वस्तुओं को कृत्रिम रूप से उनका स्वयं का ‘जीवन’  दे दिया जाता है अर्थात ऐसा लगता है कि मूल्य तो वस्तु के भौतिक गुणों में ही छुपा हुआ है न कि उस श्रम शक्ति की इकाईयों में जो इनके उत्पादन के समय खर्च हुई थीं.

पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूर अपनी मजदूरी के अलावा जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करता है उसे अधिशेष मूल्य भी कहते हैं. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपति का मुनाफा और अन्य वर्गों की आमदनी आती है. मजदूर को उतनी ही मजदूरी मिलती है जितनी उसके जिन्दा रहने और अपनी नसल के पुनरुत्थान के लिए आवश्यक हो. न कम न ज्यादा. अगर कम मिलेगी तो मजदूर का जीवन और पुनरुत्थान नहीं हो पायेगा. ज्यादा होने पर मजदूर मजदूरी नहीं करेगा. इसी तर्क पर पूंजीवाद कार्यशील होता है. लेकिन मजदूर द्वारा पैदा की गयी अतिरिक्त कीमत की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में जो कुत्ता घसीटी होती है, उसकी कामना करना ही लक्ष्मी-पूजन है.

अगर अब भी आप ‘लक्ष्मी पूजन’ या ‘पण्यों की जड़ पूजा’ करेंगे तो हमें आपसे कुछ नहीं कहना है !

सन्दर्भ साभार :   THE FETISHISM OF COMMODITIES AND THE SECRET THEREOF

प्रो.एल.पी.जी. बुद्धिजीवी बनाम वामपंथी बुद्धिजीवी

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पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक में और उसके बाद भारत में एक ऐसा वर्ग पनपा है जिसे प्रो.एल.पी.जी. वर्ग के नाम से जाना जाता है. अंग्रेजी में इसका विस्तार है Pro. Liberalization, Privatization और Globalisation. इसके प्रबुद्ध नागरिकों में प्रोफेसर, इंजिनियर, डॉक्टर, विज्ञानी, जज,वकील , सिविल सर्वेन्ट्स वगैरा-वगैरा शामिल हैं. देश-दुनिया की समस्यायों पर यह वर्ग भी अपने फ़िक्र का इजहार करता रहता है जैसे बिजली ठप होने से आम आदमी परेशान, ट्रेफिक से आम आदमी परेशान, प्रदुषण से आम आदमी परेशान, पेट्रोल के दाम बढ़ने से आम आदमी परेशान, पुलिस की ज्यादतियों से आम आदमी परेशान, कानून-व्यवस्था से आम आदमी परेशान वगैरा-वगैरा. लेकिन यहाँ आम आदमी से अभिप्राय इस प्रो.एल.पी.जी. वर्ग से सम्बंधित लोगों से ही होता है. इनकी पसंदीदा नीतियों के कारण देश की 84 करोड़ आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, उनका इन आम आदमियों के फ़िक्र की  लिस्ट में कहीं कोई जिक्र नहीं होता. साफ और सीधे शब्दों में कहे तो इनकी नज़र में यह 84 करोड़ की आबादी ‘आम आदमी’ नहीं है.

अभी-अभी संपन्न हुए देश की महापंचायत के चुनावों से पहले इस वर्ग के प्रबुद्ध लोग प्रिंट मीडिया, रेडियो और टेलिविज़न पर अपने इस ‘आम आदमी’ के इस महापंचायत के चुनावों प्रति उपेक्षा से फिक्रमंद पाए गए. उनका मानना था कि देश की मिडल क्लास का अधिकांश वोट डालने नहीं जाता है. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ आबादी बड़े जोश-खरोश के साथ इन चुनावों में भाग लेती है. या यूँ कहें कि यह इलेक्शन इस 84 करोड़ आबादी की महत्वाकांक्षा की अभिव्यक्ति तो करता है लेकिन मिडल क्लास के लिए इसका कोई अर्थ नहीं है. तो इसके प्रबुद्ध नागरिकों का फिक्रमंद होना लाजिमी था. देश को योग द्वारा स्वस्थ करने का बीडा उठाने वाले बाबा रामदेव भी इनके फ़िक्र में शामिल हो गए. उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि इस लोकतंत्र की रक्षा के लिए वोट डालना हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी या मूलभूत कर्तव्य बना देना चाहिए. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ की वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है या इन चुनावों में भाग लेती है.

अब हम मान कर चलते हैं कि 84 करोड़  वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है लेकिन मिडल या अपर मिडल क्लास का बोट डालने प्रति रवैया नकारात्मक है. इसकी पड़ताल होनी चाहिए. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बुर्जुआजी इस देश के हर कोने में अपनी पैठ जमा चुकी है. कहीं ऐसा तो नहीं कि देश के हर कस्बे, हर गाँव में प्रभावशाली हो चुकी इस बुर्जुआजी के लोगों के असर के अधीन इस  84 करोड़ आबादी के लोग अपना वोट डालने के लिए बाध्य हों? क्योंकि कस्बों में ही नहीं बल्कि गांवों में भी देश के मजदूर वर्ग को अपनी श्रम शक्ति बेचने के लिए प्रभावशाली लोगों के सामने गिडगिडाना पड़ता है. भारत एक ऐसा देश है जहाँ श्रम-शक्ति सस्ती और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और मजदूरों को इसे बेचने के लिए आपस में होड़ करनी पड़ती है. इसका नतीजा यह होता है कि मजदूर को श्रम-शक्ति के खरीददार से मधुर सम्बन्ध बनाने पड़ते हैं. श्रम-शक्ति का खरीददार इस बुर्जुआ राज्य का एक प्रतिनिधि भी होता है. इस बात की पूरी सम्भावना है कि वह श्रम-शक्ति के मालिक यानि मजदूर को न केवल वोट डालने के लिए बाध्य करे बल्कि अपनी इच्छा के उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने के लिए बाध्य करे.

जहाँ तक मिडल या अपर मिडल क्लास के वोट न डालने का प्रश्न है तो इसके राज की कुंजी भी उपरोक्त तथ्य में छुपी हुई है. देश की पूंजीवादी प्रणाली द्वारा मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष का एक भाग इनके यहाँ सुनिश्चित रूप से पहुँचता रहता है. यह क्लास उतनी बाध्य नहीं हो सकती जितना कि मजदूर वर्ग.

अगर आपको उपरोक्त आकलन मनोगत लगता हो तो ज़रूरी है कि आप एक प्रश्नावली बनाएँ और अपने आस-पास के सौ-पचास मजदूर लोगों से प्रश्न करें. पूरी उम्मीद है कि नतीजा वही निकलेगा जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है. उपरोक्त आकलन उन बुद्धिजीवियों के लिए चुनौती के रूप पेश किया गया है जो 84 करोड़ की आबादी के इलेक्शन में भाग लेने पर गदगद है.

अब हम उस बुद्धिजीवी को लेते हैं जो इस Liberalization, Privatization और Globalisation को संशय की दृष्टि से देखता है. इसे वामपंथी बुद्धिजीवी कह सकते हैं. हालाँकि इस विपर्यय के दौर में उसकी स्थिति अल्पसंख्यक की ही है लेकिन फ़िक्र इस तथ्य से नहीं कि वह अल्पसंख्यक है फ़िक्र उसकी अकर्मण्यता से है. इन्हें अपनी अकर्मण्यता से छुटकारा पाना होगा. इन्हें तो लाज़मी एक प्रश्नावली बनानी चाहिए और इस बुर्जुआ लोकतंत्र की सार्थकता की पड़ताल करनी चाहिए. बुद्धिजीवियों के इस वर्ग के लिए माओ त्से तुङ के इन विचारों की आज भी पूरी सार्थकता है,

“चूँकि बुद्धिजीवियों का काम मजदूर-किसान जनसमुदाय की सेवा करना है, इसलिए, सर्वप्रथम और सर्वोपरि तौर पर, उन्हें उनको (यानी मजदूर-किसानों को – अनु.) जानना होगा तथा उनके जीवन, काम और विचारों से परिचित होना होगा. हम जनता के बीच जाने के लिए , कारखानों में और गांवों में जाने के लिए, बुद्धिजीवियों को प्रोत्साहित करते हैं. यदि आप अपने पूरे जीवन में एक मजदूर या किसान से कभी नहीं मिलते, तो यह बहुत बुरी बात है. हमारे सरकारी कर्मियों, लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों और वैज्ञानिक शोधकर्मियों को मजदूरों और किसानों के निकट जाने के लिए हर अवसर का लाभ उठाना चाहिए. कुछ लोग महज नज़र दौड़ने के लिए कारखानों और गांवों में जा सकते हैं; “इसे घोडे की पीठ पर बैठे-बैठे फूलों को देखना” कहा जा सकता है और इसका कोई फायदा नहीं हो सकता. दूसरे लोग वहां कुछ महीने रुक सकते हैं, जाँच-पड़ताल कर सकते हैं और दोस्त बना सकते हैं; इसे “फूलों को देखने के लिए (घोडे से -अनु.) नीचे उतरना” कहा जा सकता है. कुछ और दूसरे लोग वहाँ रुक सकते हैं और पर्याप्त समय तक, जैसे कि दो या तीन वर्षों तक या उससे भी अधिक समय तक वहां रह सकते हैं; इसे “बस जाना” कहा जा सकता है. कुछ बुद्धिजीवी मजदूरों और किसानों के बीच रहते हैं , जैसे कि, कारखानों में औद्योगिक तकनीशियन तथा देहातों में कृषि-तकनीशियन और ग्रामीण स्कूल शिक्षक. उन्हें अपना काम अच्छी तरह से करना चाहिए और मजदूरों और किसानों के साथ घुलमिल जाना चाहिए. हमें ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिसमें, “मजदूरों और किसानों का करीबी बन जाना” दरअसल एक आदत में ढल जाये, दूसरे शब्दों में, हमारे पास ऐसा करने वाले बुद्धिजीवियों की एक भारी संख्या होनी चाहिए. सभी तो नहीं लेकिन निश्चय ही, कुछ ऐसे हैं जो एक या दूसरे कारण से (मजदूरों-किसानों के बीच-अनु.) जा पाने में असमर्थ हैं, लेकिन हमें आशा है कि अधिक से अधिक जितने लोगों का जा पाना संभव होगा, वे जायेंगे. वे सभी एक ही समय नहीं जा सकते, लेकिन वे अलग-अलग समयों में टोलियों में जा सकते हैं. पुराने दिनों में जब हम लोग येनान में थे, बुद्धिजीवियों को सक्षम बनाया गया था कि वे मजदूरों और किसानों से सीधे संपर्क बना सकें. येनान में बहुतेरे ऐसे थे जिनकी सोच बहुत उलझी हुई थी और वे तमाम किस्म की अनोखी दलीलों के साथ सामने आते थे. हमारा एक फोरम था, जो उन्हें जनता के बीच जाने के लिए राय-परामर्श देता था. बाद में बहुतेरे गए, और नतीजा बहुत अच्छा रहा. एक बुद्धिजीवी का किताबी ज्ञान जब तक व्यवहार के साथ एकीकृत नहीं हो जाता, तब तक वह पूरा नहीं होता, बल्कि वह बहुत अधिक अधूरा भी हो सकता है. मुख्यत: पुस्तकों को पढने के ज़रिए ही बुद्धिजीवी हमारे पूर्वजों के अनुभवों को अर्जित करते हैं. निश्चय ही, पुस्तकें पढना ज़रूरी है; लेकिन यह अपने आप समस्याएं हल नहीं कर सकता. वास्तविक परिस्थिति का अध्ययन, व्यावहारिक अनुभव और ठोस सामग्री का परीक्षण, तथा मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना ज़रूरी है. मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना आसान काम नहीं है. अभी भी जब लोग कारखानों और गांवों में जा रहे हैं, कुछ मामलों में नतीजे अच्छे हैं लेकिन कुछ में नहीं हैं. यहाँ जो चीज निहित है वह है रुख या अवस्थिति का सवाल, यानी, व्यक्ति-विशेष के विश्व-दृष्टिकोण का सवाल. हम “सैंकडों विचार-सरणियों को परस्पर संघर्ष करने देने” की हिमायत करते हैं और जानने-सीखने की हर शाखा में बहुतेरी सरणियाँ और प्रवृत्तियां हो सकती हैं; लेकिन विश्व दृष्टिकोण के मामले में आज बुनियादी तौर पर सिर्फ दो सरणियाँ हैं, सर्वहारा और बुर्जुआ. इसमें से एक हो सकता है या दूसरा, या तो सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण या फिर बुर्जुआ विश्व-दृष्टिकोण. कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण किसी भी अन्य वर्ग का नहीं बल्कि सिर्फ सर्वहारा का विश्व-दृष्टिकोण है. हमारे आज के बुद्धिजीवियों में से अधिकांश पुराने समाज से और गैर-कामगार लोगों के परिवारों से आते हैं. जो मजदूरों या किसानों के परिवारों से आते हैं, वे भी अभी बुर्जुआ बुद्धिजीवी ही हैं क्योंकि मुक्ति से पहले जो शिक्षा उन्होंने हासिल की थी वह बुर्जुआ शिक्षा थी और उनका विश्व-दृष्टिकोण मूलत: बुर्जुआ था. यदि वे पुराने विश्व-दृष्टिकोण, अवस्थिति और भावनाओं में मजदूरों और किसानों से अलग बने रहेंगे, और वे गोल छेदों में चौकोर खूंटियों के समान होंगे, और मजदूर और किसान उनके सामने अपना दिल नहीं खोलेंगे. यदि बुद्धिजीवी खुद को मजदूरों और किसानों के साथ एकीकृत कर लें और उनके बीच दोस्ती बना लें तो जो मार्क्सवाद उन्होंने किताबों में पढ़ रखा है, वह सही मायने में अपना हो सकता है. मार्क्सवाद पर वास्तविक पकड बनाने के लिए, सिर्फ किताबों से ही नहीं, बल्कि मुख्यत: वर्ग-संघर्ष के ज़रिए, व्यावहारिक कार्य और मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए सीखना होगा. कुछ मार्क्सवादी किताबें पढने के साथ ही जब हमारे बुद्धिजीवी मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए और अपने खुद के व्यावहारिक कार्य के ज़रिए कुछ समझदारी हासिल कर लेंगे तो हम सभी एक ही भाषा, न केवल देशभक्ति की सामान्य भाषा और समाजवादी व्यवस्था की सामान्य भाषा बोलने लगेंगे बल्कि शायद कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण की सामान्य भाषा भी बोलने लगेंगे. यदि ऐसा हो जाता है तो हम सभी निश्चय ही बेहतर काम करेंगे.” (दर्शन विषयक सम्बन्धी पॉँच निबंध, पृ.114-16,  बिगुल पुस्तिका  श्रृंखला से)

इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34) की हिफाजित में

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“कोट, कपड़ा, आदि उपयोग-मूल्य, अर्थात पण्यों के ढांचे, दो तत्त्वों के योग होते हैं – पदार्थ और श्रम के. उन पर जो उपयोगी श्रम खर्च किया गया है, यदि आप उसे अलग कर दें, तो एक ऐसा भौतिक आधार-तत्त्व हमेशा बचा रहेगा, जो बिना मनुष्य की सहायता के प्रकृति से मिलता है. मनुष्य केवल प्रकृति की तरह काम कर सकता है, अर्थात वह भी केवल पदार्थ का रूप बदलकर ही काम कर सकता है. यही नहीं रूप बदलने के इस काम में उसे प्रकृति की शक्तियों से बराबर मदद मिलती है. इस प्रकार हम देखते हैं कि अकेला श्रम भौतिक संपत्ति का, अथवा श्रम के पैदा किये हुए, उपयोग-मूल्यों का एकमात्र स्रोत नहीं है जैसा कि विलियम पैटी ने कहा है, श्रम उसका बाप है और पृथ्वी उसकी माँ है. (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

“विश्व की सभी परिघटनाएं , चाहे वे मनुष्य के हाथ का फल हों अथवा प्रकृति के सार्विक नियमों का परिणाम, वास्तव में सृजन नहीं बल्कि पदार्थ के रूपों में परिवर्तन है. मानव बुद्धि जब कभी उत्पादन के विचार का विश्लेषण करती है, तो उसे केवल दो ही तत्त्व दिखाई पड़ते हैं – एक जोड़ना, दूसरा तोड़ना; यही बात मूल्य ” (उपयोग-मूल्य, हालाँकि फिजियोक्रेटों के साथ वाद-विवाद के इस अंश में वेर्री के मन में भी यह बात पूरी तरह साफ़ नहीं है कि वह किस प्रकार के मूल्य की चर्चा कर रहा है) “अथवा धन के उत्पादन के संबंध में भी लोगू होती है, जब मनुष्य द्वारा पृथ्वी, वायू, और जल को अनाज में रूपांतरित कर दिया जाता है, या एक कीड़े के चेपदार स्त्राव को रेशम में, या धातु  के अलग-अलग टुकडों को एक घड़ी में बदल दिया जाता है.” _Pietro Verri, Meditazioni sulla Economia Politica (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

श्रम और पण्य-मूल्य दोनों का चरित्र दुहरा है लेकिन हम यहाँ पण्य-मूल्य के दुहरे चरित्र के सामान्य विश्लेषण तक सीमित  रहेंगे. पण्य-मूल्य के दोहरे चरित्र में पहली विशेषता उसके उपयोग मूल्य से है जैसे पानी, धुप, वायू, आदि. ये सभी धन का एक रूप हैं लेकिन ये पण्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि इसमें मानवी श्रम नहीं लगा है और इन्हें हासिल करने के लिए भुगतान के किसी भी रूप की आवश्यकता नहीं पड़ती.

पण्य की दूसरी विशेषता उसमें लगे मानवीय श्रम से सम्बंधित है जिस कारण उसका विनिमय मूल्य होता है.

अरस्तू का हवाला देते हुए मार्क्स लिखते हैं.”अरस्तू कहते हैं कि विनिमय समानता के बिना नहीं हो सकता, और समानता उस वक्त तक नहीं हो सकती, जब तक की दोनों वस्तुएं एक ही मापदंड से न मापी जा सकती हों.” “लेकिन यहाँ आकर वे (अरस्तू) ठहर जाते हैं और मूल्य के रूप का आगे विश्लेषण करना बंद कर देते हैं.

मार्क्स आगे लिखते हैं ,” अरस्तू की प्रतिभा का चमत्कार इसी बात में प्रकट होता है कि उन्होंने पण्यों के मूल्यों के अभिव्यक्ति में समानता का सम्बन्ध देखा. वह जिस समाज (गुलाम और मालिक-गुलाम) में रहते थे, केवल उसकी विशेष परिस्थितियों ने ही उन्हें यह पता नहीं लगाने दिया कि इस समानता की तह में ‘सचमुच” क्या था.(मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. 79)

“महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” सूत जी [इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34)] द्वारा पांडे जी के  इस कथन की स्वीकृति के  साथ हम भी सहमत हैं लेकिन यह भी जोड़ देना चाहते हैं कि यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” गति में होने के कारण हमेशा बना नहीं रह सकता क्योंकि पांडे जी के परदादा जो  कुरता पहना करते थे वह बामुश्किल दस या पंद्रह लोगों की श्रम का फल था और अंत में जिसके पास इसे बेचने का अधिकार (अगर था तो ) वह  दस या पंद्रह पर एक  का ही था. लेकिन आज इन्होने जिस 100 रूपए की शर्ट को पहना हुआ है उस पर लगी हुई श्रम, अगर हम कहें कि, विश्व के सौ करोड़ लोगों की श्रम है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

पूँजीवाद की सबसे बड़ी विसंगतियों में एक श्रम का इतने उच्च धरातल पर समाजीकरण परंतु इसके विपरीत श्रम के उत्पादों पर मुट्ठीभर लोगों का मालिकाना हक़ जिनकी संख्या निरंतर घटती जा रही  है …. यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है जबकि यह विसंगति और अधिक गहराती जा रही है …देखना है कि इसका क्लाईमैक्स कहाँ होता है

उपरोक्त वस्तुगत और साक्षात उदाहरण उन बुद्दिजीवियों के मुहं पर तमाचा है जो मार्क्सवाद को आयातित और अप्रासंगिक बताते हैं. बल्कि यह साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा शोषित  भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए पहले से अधिक, कहीं अधिक प्रासंगिक है.  इस बात को लेनिन ने नोट कर लिया था और मार्क्स के  शब्द “कम्युनिस्म का हौवा यूरोप पर मंडरा रहा है”  को दरुस्त करते हुए, बदले हुए हालात में उन्होंने कहा कि,” विश्व पूँजी के साम्राज्यवाद में प्रवेश करने के कारण क्रांतियों का धुरा अब यूरोप न होकर पूर्व है.”

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी आपके इतना भर लिख देने से कि  “महालक्ष्मी श्रम से उत्पन्न नहीं होतीं, वे श्रम के लिये मानव को प्रेरित करती हैं। महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” काम नहीं चलेगा. बात को तर्क-वितर्क से आगे बढाएं.

और आपका फ़िक्र कि “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.

….मार्क्स के इन शब्दों “To leave an error unrefuted is to encourage intellectual immorality. ...के साथ हम अपने आलेख को विराम देते हैं और पांडे जी से आशा करतें हैं कि वे बहस को आगे बढाएँगे.

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ज्ञानदत्त जी ऐसा कुतर्क तो गृहमंत्रालय भी नहीं करेगा

बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ

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– अमेरिका स्थित एक अध्ययन समूह सिटीग्रुप ने कहा है कि निर्यात आधारित जैसे कि जवाहरात, आभूषण, आटो इण्डस्ट्री और टेक्सटाइल सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले उद्योग है जिनमें 2008 के आखि़र में 5,00,000 नौकरियाँ ख़त्म हो गयीं। यह आँकड़ा केवल उस संगठित क्षेत्र का है जो देश की काम करने वाली जनसंख्या का सिर्फ 10 प्रतिशत है।

– अमेरिका में दिसम्बर 1974 के बाद सबसे ज़्यादा नौकरियाँ जाने के आँकड़े को छूते हुए 2008 की शुरुआत से अब तक 30 लाख नौकरियाँ ख़त्म हो गयी हैं। यह गिरावट द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है।

– अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने वैश्विक बेरोज़गारी के 2 से 5 करोड़ होने का पूर्वानुमान लगाया है।

– विश्व बैंक का पूर्वानुमान है कि मन्दी के चलते 2008 के मुकाबले 2009 में औद्योगिक उत्पादन 15 प्रतिशत तक कम हो सकता है। यह भी बताया गया कि 116 विकासशील देशों में से 94 देशों में आर्थिक विकास में कमी आयी है। इनमें से 43 देशों में ग़रीबी का स्तर ऊँचा है।

– पिछले साल नवम्बर में सरकार और विपक्ष द्वारा आलोचना करने के बाद हमारे देश के उद्योग संगठन एसौचेम ने कुछ उद्योग क्षेत्रों की नौकरियों में 25-30 प्रतिशत कमी आने की अपनी रिपोर्ट को वापस ले लिया था।

– राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे संस्थान के अनुसार भारत में शहरी ग़रीबी 25 प्रतिशत से ज़्यादा है। शहरों में 8 करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीबी में जीते हैं। यह संख्या मिड्ड की जनसंख्या के बराबर है। शहरी ग़रीबी अरक्षित समूहों जैसे महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों की विशेष ज़रूरतों के अलावा रहने, साफ पानी, साफ-सफाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और रोज़गार की समस्याएँ पैदा करती है।

– 2001 की जनगणना के मुताबिक बड़े शहरों की शहरी आबादी का 22.6 प्रतिशत हिस्सा यानी लगभग सवा चार करोड़ लोग झुग्गियों में रहते हैं। यह मोटे तौर पर स्पेन या कोलम्बिया के आकार के बराबर है।

– झुग्गियों में रहने वाले सबसे ज़्यादा लोग, लगभग एक करोड़ 12 लाख, महाराष्ट्र में हैं। झुग्गियों की आबादी बढ़ी है लेकिन झुग्गियों की संख्या कम हुई है यानी सघन हुई हैं।

– संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने जी-20 देशों की बैठक में कहा कि मन्दी का असर ग़रीब देशों में कहीं ज़्यादा पड़ता है सिर्फ नौकरी जाने या आमदनी कम होने के तौर पर ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा सूचकों – जीवन सम्भाव्यता, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या और पढ़ाई पूरी करने वाले बच्चों की संख्या में यह दिखायी देता है। आर्थिक मन्दी की सबसे ज़्यादा मार झेलने वाले लोगों में ग़रीब देशों की महिलाएँ, बच्चे और ग़रीब होते हैं। हाल में मन्दी के दौरान के आँकड़े बताते हैं कि स्कूली पढ़ाई छुड़वाने वाले बच्चों में लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या बहुत ज़्यादा थी।

– मन्दी के नतीजे में चीज़ें महँगी होती हैं, ग़रीबी बढ़ती है और ग़रीबी बढ़ना अपने आप मृत्यु दर बढ़ने में बदल जाता है। जैसेकि सकल घरेलू उत्पाद में 3 प्रतिशत की कमी को प्रति 1000 शिशुओं के जन्म पर 47 से 120 और ज़्यादा मृत्यु दर से जोड़ा जा सकता है। विकासशील देशों में उस देश के अमीर बच्चों की तुलना में ग़रीब बच्चों के मरने की सम्भावना चार गुना बढ़ गयी है और लड़कों की तुलना में लड़कियों की शिशु मृत्युदर पाँच गुना बढ़ गयी है।

– यह संकट ग़रीब देशों में कई लोगों के लिए जीवन और मौत का सवाल है और आर्थिक विकास, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या और मृत्यु दर के पुराने स्तर पर पहुँचने में कई साल लग सकते हैं। अनुमान के मुताबिक 2010 में आर्थिक स्थिति बहाल होने तक मानव विकास को पहुँची चोट गम्भीर होगी और सामाजिक बहाली में कई साल लगेंगे। पुराने संकट का इतिहास बताता है कि इसके दुष्प्रभाव 2020 तक पड़ते रहेंगे।
‘बिगुल’ मई 2009 से साभार

भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन में संशोधनवाद

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इतिहास के कुछ ज़रूरी और दिलचस्प तथ्य

ऐसा नहीं है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का चरित्र शुरू से ही संशोधनवादी रहा हो। पार्टी की गम्भीर विचारधारात्मक कमज़ोरियों, और उनके चलते बारम्बार होने वाली राजनीतिक गलतियों, और उनके चलते राष्ट्रीय आन्दोलन पर अपना राजनीतिक वर्चस्व न कायम कर पाने के बावजूद, कम्युनिस्ट कतारों ने साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधी संघर्ष के दौरान बेमिसाल और अकूत कुर्बानियाँ दीं। कम्युनिस्ट पार्टी पर मज़दूरों और किसानों का पूरा भरोसा था। 1951 में तेलंगाना किसान संघर्ष की पराजय के बाद का समय वह ऐतिहासिक मुकाम था, जब, कहा जा सकता है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का वर्ग-चरित्र गुणात्मक रूप से बदल गया और सर्वहारा वर्ग की पार्टी होने के बजाय वह बुर्जुआ व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति बन गयी। वह कम्युनिस्ट नामधारी बुर्जुआ सुधारवादी पार्टी बन गयी।

लेकिन ऐसा रातोरात और अनायास नहीं हुआ। पार्टी अपने जन्मकाल से ही विचारधारात्मक रूप से कमज़ोर थी और कभी दक्षिणपन्थी तो कभी वामपंथी (ज्यादातर दक्षिणपन्थी) भटकावों का शिकार होती रही। 1920 में ताशकन्द में एम.एन. राय व विदेश स्थित कुछ अन्य भारतीय कम्युनिस्टों की पहल पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले कम्युनिस्ट ग्रुप मूलत: अलग-अलग और स्वायत्त ढंग से काम करते रहे। पुन: 1925 में सत्यभक्त की पहल पर कानपुर में अखिल भारतीय कम्युनिस्ट कान्फ़्रेन्स में पार्टी की घोषणा हुई, लेकिन उसके बाद भी एक एकीकृत केन्द्रीय नेतृत्व के मातहत पार्टी का सुगठित क्रान्तिकारी ढाँचा नहीं बन सका। कानपुर कान्फ़्रेन्स तो लेनिनवादी अर्थों में एक पार्टी कांग्रेस थी भी नहीं।

बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में, मज़दूरों और किसानों के प्रचण्ड आन्दोलनों, उनके बीच कम्युनिस्ट पार्टी की व्यापक स्वीकार्यता एवं आधार, भगतसिंह जैसे मेधावी युवा क्रान्तिकारियों के कम्युनिज्म की तरफ झुकाव और कांग्रेस की स्थिति (असहयोग आन्दोलन की वापसी के बाद का और स्वराज पार्टी का दौर) ख़राब होने के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी इस स्थिति का लाभ नहीं उठा सकी। यह अलग से विस्तृत चर्चा का विषय है। मूल बात यह है कि विचारधारात्मक रूप से कमज़ोर एक ढीली-ढाली पार्टी से यह अपेक्षा की ही नहीं जा सकती थी।

1933 में पहली बार, कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल, ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के आग्रहपूर्ण सुझावों-अपीलों के बाद, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का एक स्वीकृत सुगठित ढाँचा बनाने की कोशिशों की शुरुआत हुई और एक केन्द्रीय कमेटी का गठन हुआ। लेकिन वास्तव में उसके बाद भी पार्टी का ढाँचा ढीला-ढाला ही बना रहा। पी.सी. जोशी के सेक्रेटरी होने के दौरान पार्टी प्राय: दक्षिणपन्थी भटकाव का शिकार रही तो रणदिवे के नेतृत्व की छोटी-सी अविध अतिवामपन्थी भटकाव से ग्रस्त रही। पार्टी की विचारधारात्मक कमज़ोरी का आलम यह था कि 1951 तक पार्टी के पास क्रान्ति का एक व्यवस्थित कार्यक्रम तक नहीं था।

1951 में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा इस विडम्बना की ओर इंगित करने और आवश्यक सुझाव देने के बाद, भारतीय पार्टी के प्रतिनिधिमण्डल ने एक नीति-निर्धारक वक्तव्य जारी किया और फ़िर उसी आधार पर एक कार्यक्रम तैयार कर लिया गया। यानी तीस वर्षों तक पार्टी अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा प्रस्तुत आम दिशा के आधार पर राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की एक मोटी समझदारी के आधार पर ही काम करती रही। रूस और चीन की पार्टियों की तरह भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने देश की ठोस परिस्थितियों का – उत्पादन-सम्बन्धों और अधिरचना का ठोस अध्ययन-मूल्यांकन करके क्रान्ति का कार्यक्रम तय करने की कभी कोशिश नहीं की। इसके पीछे पार्टी की विचारधारात्मक कमज़ोरी ही मूल कारण थी और कार्यक्रम की सुसंगत समझ के अभाव के चलते पैदा हुए गतिरोध ने, फ़िर अपनी पारी में, इस विचारधारात्मक कमज़ोरी को बढ़ाने का ही काम किया।

तेलंगाना किसान संघर्ष की पराजय के बाद पार्टी नेतृत्व ने पूरी तरह से बुर्जुआ वर्ग की सत्ता के प्रति आत्मसमर्पणवादी रुख अपनाया। 1952 के पहले आम चुनाव में भागीदारी तक पार्टी पूरी तरह से संशोधनवादी हो चुकी थी। संसदीय चुनावों में भागीदारी और अर्थवादी ढंग से मज़दूरों-किसानों की माँगों को लेकर आन्दोलन -यही दो उसके रुटीनी काम रह गये थे। पार्टी के रहे-सहे लेनिनवादी ढाँचे को भी विसर्जित कर दिया गया और इसे पूरी तरह से खुले ढाँचे वाली और ट्रेडयूनियनों जैसी चवन्निया मेम्बरी वाली पार्टी बना दिया गया।

सोवियत संघ में –ख्रुर्श्चेवी संशोधनवाद के हावी होने और 1956 की बीसवीं कांग्रेस के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संशोधनवाद को अन्तरराष्ट्रीय प्रमाण पत्र भी मिल गया। 1958 में अमृतसर की विशेष कांग्रेस में पार्टी संविधान की प्रस्तावना से, सर्वसम्मति से, क्रान्तिकारी हिंसा की अवधारणा को निकाल बाहर करने के बाद पार्टी का संशोधनवादी दीक्षा-संस्कार पूरा हो गया। लेकिन अब पार्टी के संशोधनवादी ही दो धड़ों में बँट गए। डांगे-अधिकारी- राजेश्वर राव आदि के नेतृत्व वाले धड़े का कहना था कि कांग्रेस के भीतर और बाहर के रूढ़िवादी बुर्जुआ वर्ग का विरोध करते हुए नेहरू के नेतृत्व में प्रगतिशील राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधि जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को पूरा कर रहे हैं अत: कम्युनिस्ट पार्टी को उनका समर्थन करना चाहिए, और इस काम के पूरा होने के बाद उसका दायित्व होगा संसद के रास्ते सत्ता में आकर समाजवादी क्रान्ति को अंजाम देना। ये लोग राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की बात कर रहे थे, जबकि लोक जनवादी क्रान्ति की बात करने वाला सुन्दरैया-गोपालन-नम्बूदिरिपाद आदि के नेतृत्व वाला दूसरा धड़ा कह रहा था कि सत्तारूढ़ कांग्रेस साम्राज्यवाद से समझौते कर रही है और भूमि सुधार के वायदे से मुकर रही है, अत: जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों को पूरा करने के लिए हमें बुर्जुआ वर्ग के रैडिकल हिस्सों को साथ लेकर संघर्ष करना होगा। दोनों ही धड़े जनवादी क्रान्ति की बात करते हुए, सत्तासीन बुर्जुआ वर्ग के चरित्र का अलग-अलग आकलन करते हुए अलग-अलग कार्यकारी नतीजे निकाल रहे थे लेकिन दोनों के वर्ग-चरित्र में कोई फ़र्क नहीं था। दोनों ही धड़े संसदीय मार्ग को मुख्य मार्ग के रूप में चुन चुके थे। दोनों बोल्शेविक सांगठनिक उसूलों व ढाँचे का परित्याग कर चुके थे और काउत्स्की, मार्तोव और खुर्श्चेव की राह अपना चुके थे। फ़र्क सिर्फ यह था कि एक धड़ा सीधे उछलकर बुर्जुआ वर्ग की गोद में बैठ जाना चाहता था, जबकि दूसरा विपक्षी संसदीय पार्टी की भूमिका निभाना चाहता था ताकि रैडिकल विरोध का तेवर दिखलाकर जनता को ज्यादा दिनों तक ठगा जा सके। एक धड़ा अर्थवाद का पैरोकार था तो दूसरा उसके बरक्स ज्यादा जुझारू अर्थवाद की बानगी पेश कर रहा था। देश की परिस्थितियों के विश्लेषण और कार्यक्रम से सम्बिन्धत मतभेदों-विवादों का तो वैसे भी कोई मतलब नहीं था, क्योंकि यदि क्रान्ति करनी ही नहीं थी तो कार्यक्रम को तो `कोल्ड स्टोरेज´ में ही रखे रहना था। 1964 में दोनों धड़े औपचारिक रूप से अलग हो गये। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) से अलग होने वाली भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व ने भाकपा को संशोधनवादी बताया और कतारों की नज़रों में खुद को क्रान्तिकारी सिद्ध करने के लिए खूब गरमागरम बातें कीं।

लेकिन असलियत यह थी कि माकपा भी एक संशोधनवादी पार्टी ही थी और ज्यादा धूर्त और कुटिल संशोधनवादी पार्टी थी। इस नयी संशोधनवादी पार्टी की असलियत को उजागर करने के लिए केवल कुछ तथ्य ही काफी होंगे। 1964 में गठित इस नयी पार्टी ने अमृतसर कांग्रेस द्वारा पार्टी संविधान में किये गये परिवर्तन को दुरुस्त करने की कोई कोशिश नहीं की। शान्तिपूर्ण संक्रमण की जगह क्रान्ति के मार्ग की खुली घोषणा और संसदीय चुनावों में भागीदारी को मात्र रणकौशल बताने की जगह इसने सन्सदीय और संसदेतर मार्ग जैसी गोल-मोल भाषा का अपने कार्यक्रम में इस्तेमाल किया जिसकी आवश्यकतानुसार मनमानी व्याख्या की जा सकती थी। आर्थिक और राजनीतिक संघर्षों के अन्तर्सम्बन्धों के बारे में इसकी सोच मूलत: लेनिनवादी न होकर संघाधिपत्यवादियों एवं अर्थवादियों जैसी ही थी। फ़र्क यह था कि इसके अर्थवाद का तेवर भाकपा के अर्थवाद के मुकाबले अधिक जुझारू था। इसके असली चरित्र का सबसे स्पष्ट संकेतक यह था कि भाकपा की ही तरह यह भी पूरी तरह से खुली पार्टी थी और सदस्यता के मानक भाकपा से कुछ अधिक सख्त लगने के बावजूद (अब तो वह भी नहीं है) यह भी चवन्निया मेम्बरी वाली `मास पार्टी´ ही थी।

ख्रुर्श्चेवी संशोधनवाद के विरुद्ध चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का संघर्ष 1957 से ही जारी था, जो 1963 में `महान बहस´ नाम से प्रसिद्ध खुली बहस के रूप में फूट पड़ा और अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन औपचारिक रूप से विभाजित हो गया। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) के नेतृत्व ने पहले तो इस बहस की कतारों को जानकारी ही नहीं दी। इस मायने में भाकपा नेतृत्व की पोज़ीशन साफ थी। वह डंके की चोट पर ख्रुर्श्चेवी संशोधनवाद के साथ खड़ा था। महान बहस की जानकारी और दस्तावेज़ जब कतारों तक पहुँचने लगे तो माकपा-नेतृत्व पोज़ीशन लेने को बाध्य हुआ। पोज़ीशन भी उसने अजीबोगरीब ली। उसका कहना था कि सोवियत पार्टी का चरित्र संशोधनवादी है लेकिन राज्य और समाज का चरित्र समाजवादी है। साथ ही उसका यह भी कहना था कि ख्रुर्श्चेवी संशोधनवाद का विरोध करने वाली चीनी पार्टी “वाम” संकीर्णतावाद व दुस्साहसवाद की शिकार है।

अब यदि मान लें कि साठ के दशक में सोवियत समाज अभी समाजवादी बना हुआ था, तो भी, यदि सत्ता संशोधनवादी पार्टी (यानी सारत: पूँजीवादी पार्टी) के हाथ में थी तो राज्य और समाज का समाजवादी चरित्र कुछेक वर्षों से अधिक बना ही नहीं रह सकता था। लेकिन माकपा अगले बीस-पच्चीस वर्षों तक (यानी सोवियत संघ के विघटन के समय तक) न केवल सोवियत संघ को समाजवादी देश मानती रही, बल्कि दूसरी ओर, धीरे-धीरे सोवियत पार्टी को संशोधनवादी कहना भी बन्द कर दिया। इसके विपरीत, माओ और चीन की पार्टी के प्रति उसका रुख प्राय: चुप्पी का रहा।

सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की उसने या तो दबी जुबान से आलोचना की, या फ़िर उसके प्रति चुप्पी का रुख अपनाया। चीन में माओ की मृत्यु के बाद तो मानो इस पार्टी की बाँछें खिल उठीं। वहाँ पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद देंग सियाओ-पिंग और उसके चेले-चाटियों ने समाजवादी संक्रमण विषयक माओ की नीतियों को पूरी तरह से तिलांजलि दे दी और ‘चार आधुनिकीकरणों’ तथा उत्पादक शक्तियों के विकास के सिद्धांत के नाम पर वर्ग सहयोग की नीतियों पर अमल की शुरुआत की। दुनिया के सर्वहारा वर्ग को ठगने के लिए उन्होंने पूँजीवादी पुनस्थापना की अपनी नीतियों को “बाज़ार समाजवाद” का नाम दिया।

लेकिन इस नकली समाजवाद का चरित्र आज पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। चीन में समाजवाद की सारी उपलब्धियाँ समाप्त हो चुकी है। कम्यूनों का विघटन हो चुका है। खेती और उद्योग में समाजवाद के राजकीय पूँजीवाद में रूपान्तरण के बाद अब निजीकरण और उदारीकरण की मुहिम बेलगाम जारी है। अब यह केवल समय की बात है कि समाजवाद का चोंगा और नकली लाल झण्डा वहाँ कब धूल में फेंक दिया जायेगा। माकपा और भाकपा अपने असली चरित्र को ढँकने के लिए आज चीन के इसी “बाज़ार समाजवाद” के गुण गाती हैं। उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों के विरोध का जुबानी जमाख़र्च करते हुए ये पार्टियाँ वास्तव में इन्हीं की पैरोकार बनी हुई हैं। बंगाल, केरल और त्रिपुरा में सत्तासीन रहते हुए वे इन्हीं नीतियों को लागू करती हैं, लेकिन केन्द्र में वे इन नीतियों के विरोध की नौटंकी करती हैं और भूमण्डलीकरण की बर्बरता को ढँकने के लिए उसे मानवीय चेहरा देने की, उसकी अन्धाधुन्ध रफ्ऱतार को कम करने की और नेहरूकालीन पब्लिक सेक्टर के ढाँचे को बनाये रखने की वकालत करती हैं। बस यही इनका “समाजवाद” है! ये पार्टियाँ कम्युनिज्म के नाम पर मज़दूर वर्ग की आँखों में धूल झोंककर उन्हें वर्ग-संघर्ष के रास्ते से विमुख करती हैं, उन्हें मात्र कुछ रियायतों की माँग करने और आर्थिक संघर्षों तक सीमित रखती हैं, संसदीय राजनीति के प्रति उनके विभ्रमों को बनाये रखते हुए उनकी चेतना के क्रान्तिकारीकरण को रोकने का काम करती हैं, तथा उनके आक्रोश के दबाव को कम करने वाले `सेफ्टीवॉल्व´ का तथा पूँजीवादी व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति का काम करती हैं।

आज साम्प्रदायिक फासीवाद का विरोध करने का बहाना बनाकर ये संशोधनवादी रंगे सियार कांग्रेस की अगुवाई वाले गठबन्धन सरकार के खम्भे बने हुए हैं। ये संसदीय बातबहादुर भला और कर भी क्या सकते हैं? फासीवाद का मुकाबला करने के लिए मेहनतकश जनता की जुझारू लामबन्दी ही एकमात्र रास्ता हो सकती है, लेकिन वह तो इनके बूते की बात है ही नहीं। ये तो बस संसद में गत्ते की तलवारें भाँज सकते हैं, कभी कांग्रेस की पूँछ में कंघी कर सकते हैं तो कभी तीसरे मोर्चे का घिसा रिकार्ड बजा सकते हैं।

शेर की खाल ओढ़े इन छद्म वामपन्थी गीदड़ों की जमात में भाकपा और माकपा अकेले नहीं हैं। और भी कई नकली वामपन्थी छुटभैये हैं और कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठनों के बीच से निकलकर भाकपा (मा-ले) लिबरेशन को भी इस जमात में शामिल हुए पच्चीस वर्षों से भी कुछ अधिक समय बीत चुका है। 1967 में नक्सलबाड़ी किसान उभार ने माकपा के भीतर मौजूद क्रान्तिकारी कतारों में ज़बरदस्त आशा का संचार किया था। संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद के बाद एक शानदार नयी शुरुआत हुई ही थी कि उसे “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के राहु ने ग्रस लिया। भाकपा (मा-ले) इसी भटकाव के रास्ते पर आगे बढ़ी और खण्ड- खण्ड विभाजन की त्रासदी का शिकार हुई।

कुछ क्रान्तिकारी संगठनों ने क्रान्तिकारी जनदिशा की पोज़ीशन पर खड़े होकर “वामपन्थी”दुस्साहसवाद का विरोध किया था, वे भी भारतीय समाज की प्रकृति और क्रान्ति की मंज़िल के बारे में अपनी ग़लत समझ के कारण जनता के विभिन्न वर्गों की सही क्रान्तिकारी लामबन्दी कर पाने और वर्ग-संघर्ष को आगे बढ़ा पाने में विफल रहे। नतीजतन ठहराव का शिकार होकर कालान्तर में वे भी बिखराव और संशोधनवादी विचलन का शिकार हो गये।

भाकपा (मा-लेद्ध (लिबरेशन) पच्चीस वर्षों पहले तक “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन का शिकार था। पर उसके पिट जाने के बाद धीरे-धीरे रेंगते-घिसटते आज दक्षिणपन्थी भटकाव के दूसरे छोर तक जा पहुंचा है और आज खाँटी संसदवाद की बानगी पेश कर रहा है। भाकपा (माओवादी” आज “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के भटकाव का प्रतिनिधित्व कर रहा है और मार्क्सवाद-लेनिनवाद की क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु को बदनाम कर रहा है।

अन्य कई सारे कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन हैं जो अलग-अलग अंशों में संशोधनवादी भटकावों-विच्युतियों के शिकार हैं और भारतीय समाज के पूँजीवादी चरित्र की असलियत को समझने के बजाय आज भी नई जनवादी क्रान्ति के चरखे पर “मार्क्सवादी” नरोदवाद का सूत काते जा रहे हैं।

कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी शिविर आज लम्बे गतिरोध का शिकार होकर विघटित होने के मुकाम तक जा पहुँचा है। हालाँकि आज भी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तत्त्वों की सबसे बड़ी तादाद इसी धारा के संगठनों में मौजूद हैं, लेकिन इन संगठनों को एकजुट करके आज एक सर्वभारतीय पार्टी का पुनर्गठन एक असम्भवप्राय काम हो चुका है। अब नये सिरे से मार्क्सवाद- लेनिनवाद की सुसंगत एवं गहरी समझ तथा भारतीय क्रान्ति के कार्यक्रम की सही समझ के आधार पर एक क्रान्तिकारी पार्टी का नये सिरे से निर्माण करके ही भारत में सर्वहारा क्रान्ति को अंजाम तक पहुँचाया जा सकता है।

इसके लिए हमें क्रान्ति की कतारों में नई भर्ती करनी होगी, उनकी क्रान्तिकारी शिक्षा-दीक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण के काम को लगन और मेहनत से पूरा करना होगा, कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को संशोधनवादियों और अतिवामपन्थी कठमुल्लों का पुछल्ला बने रहने से मुक्त होने का आह्वान करना होगा और इसके लिए उनके सामने क्रान्तिकारी जनदिशा की व्यावहारिक मिसाल पेश करनी होगी। लेकिन इस काम को सार्थक ढंग से तभी अंजाम दिया जा सकता है जबकि कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास से सबक लेकर हम अपनी विचारधारात्मक कमज़ोरी को दूर कर सकें और बोल्शेविक साँचे-खाँचे में तपी-ढली पार्टी का ढाँचा खड़ा कर सकें। संशोधनवादी भितरघातियों के विरुद्ध निरन्तर समझौताहीन संघर्ष के बिना तथा मज़दूर वर्ग के बीच इनकी पहचान एकदम साफ किये बिना हम इस लक्ष्य में कदापि सफल नहीं हो सकते। बेशक हमें अतिवामपन्थी भटकाव के विरुद्ध भी सतत संघर्ष करना होगा, लेकिन आज भी हमारी मुख्य लड़ाई संशोधनवाद से ही है। • •देखें : संशोधनबाद के बारे में (PDF File)

लाभकारी मूल्य..लागत मूल्य : एक बहस

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लाभकारी मूल्य, लागत मूल्य, मध्यम किसान और छोटे पैमाने के माल-उत्पादन के बारे में मार्क्सवादी दृष्टिकोण : एक बहस मज़दूर अख़बार `बिगुल´ के पन्नों पर दिसम्बर 2002 से फरवरी 2005 के बीच लागत मूल्य, लाभकारी मूल्य और मँझोले किसानों के प्रति सर्वहारा क्रान्तिकारियों के दृष्टिकोण को लेकर एक महत्त्वपूर्ण बहस चली थी।

बहस में एस. प्रताप की मूल अवस्थिति यह थी कि छोटे और मँझोले किसानों की मुख्य माँग कृषि का लागत मूल्य कम करने की होनी चाहिए और यह कि लाभकारी मूल्य की माँग मुख्यत: बड़े किसानों को ही लाभ पहुँचाती है, लेकिन इसके साथ ही वे (गन्ना किसानों की बात करते हुए अपने पहले लेख में) यह भी कहते हैं कि गन्ने का वाजिब मूल्य पाने के लिए उन्हें मिलों पर लगातार दबाव बनाये रखने की रणनीति अपनानी होगी। सुखदेव, नीरज और `बिगुल´ सम्पादक-मण्डल की अवस्थिति यह है कि न केवल लाभकारी मूल्य की माँग बल्कि लागत मूल्य घटाने की माँग भी वर्ग-चरित्र की दृष्टि से मुनाफे के लिए उत्पादन करने वाले और मज़दूरों की श्रम-शक्ति ख़रीदकर अधिशेष निचोड़ने वाले मालिक किसानों की माँग है। यह माँग सर्वहारा के वर्गहित के खिलाफ़ है। लागत मूल्य घटाने की माँग का मतलब है ग़रीब किसानों और मँझोले किसानों के निचले संस्तर को पूँजीवाद के अन्तर्गत खुशहाली की भ्रान्ति देना, छोटी जोतों को पूँजीवाद के चतुर्दिक हमले से बचाकर सामाजिक विकास की गति को अनुपयोगी रूप से धीमा करना और उजरती मज़दूरों की कीमत पर मालिक किसानों के हितों की हिफ़ाज़त करना। यह माँग न केवल मँझोले बल्कि धनी किसानों को भी लाभ पहुँचायेगी, लेकिन सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा आबादी के हितों के सर्वथा प्रतिकूल होगी। इस पक्ष का कहना है कि लागत मूल्य घटाने की माँग पर नहीं, बल्कि अन्य कुछ माँगों पर सर्वहारा वर्ग को छोटे-मँझोले किसानों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करनी होगी। फिर बहस का दायरा विस्तारित होकर इस मुद्दे पर केन्द्रित हो गया है कि मँझोले किसानों के प्रवर्ग को किस प्रकार परिभाषित किया जाये और समाजवादी क्रान्ति की पक्षधर क्रान्तिकारी शक्तियों का उनके प्रति क्या रुख़ होना चाहिए। पूरी बहस के दौरान एस. प्रताप ने कई बार अपनी अवस्थिति में अवसरवादी गोलमाल किया है पर इससे उनकी मूल अवस्थिति पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा है। पूरी बहस पढ़कर पाठक स्वयं इसे देखेंगे और सही-ग़लत का फैसला करेंगे।

`बिगुल´ के फरवरी 2005 अंक में सम्पादक-मण्डल ने इस बहस का सम्पादकीय समाहार कर दिया, लेकिन एस. प्रताप इस निर्णय से असन्तुष्ट थे। उनका मानना था कि ग़ैर-जनवादी ढंग से इस बहस को बीच में ही रोक दिया गया। `बिगुल´ सम्पादकों का कहना था कि दोनों पक्षों के सभी तर्क आने के बाद ही बहस का समाहार किया गया था और यह कि `बिगुल´ के पन्नों पर अनन्तकाल तक यह बहस नहीं चल सकती, इसलिए इसे किसी और माध्यम या मंच से आगे चलाया जायेगा। इस निर्णय से असन्तुष्ट एस. प्रताप ने `बिगुल´ को अपनी दो टिप्पणियाँ (क्रमश: जनवरी 2005 और फरवरी 2005 में) भेजीं। उन्हें सन्तुष्ट करने के लिए `बिगुल´ सम्पादक-मण्डल ने ये दोनों टिप्पणियाँ अप्रैल 2005 में सुखदेव को भेज दीं, जिनका उत्तर उन्होंने जून, 2005 में लिखकर भेजा। एस. प्रताप की अन्तिम दो टिप्पणियाँ और सुखदेव का जवाब `बिगुल´ में प्रकाशित नहीं हुए। हमारी योजना थी कि इन्हें शामिल करके पूरी बहस को पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर दिया जायेगा। अब उसी योजना को, कुछ अपरिहार्य कारणों से, किंचित विलम्ब से लागू करते हुए, यह पुस्तिका प्रकाशित की जा रही है।

इस पुस्तिका के प्रकाशन का उद्देश्य एस. प्रताप जैसे लोगों और उनकी वर्ग-अवस्थिति को स्पष्ट करना मात्र ही नहीं है। ऐसे तमाम बड़बोले ‘चिन्तक’ और निठल्ले कलमघसीट बहुत सारा “मौलिक” चिन्तन करते रहते हैं। उन सब पर बहस चलाना ऊर्जा का अपव्यय होगा। इस पूरी बहस को प्रकाशित करने का मूल कारण यह है कि भारत के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन में लागत मूल्य, लाभकारी मूल्य और मँझोले किसानों के सवाल पर भारी भ्रान्ति व्याप्त है। ज़्यादातर की अवस्थिति इस मामले में कमोबेश एस. प्रताप जैसी ही है। अपने को मार्क्सवादी कहते हुए भी उनकी मूल अवस्थिति नरोदवादी है। इसलिए इस प्रश्न पर सफाई बेहद ज़रूरी है।

यह बहस इस प्रयोजन को काफ़ी हद तक सिद्ध करेगी, इसका हमें विश्वास है। बहरहाल, हमने दोनों पक्षों को यथावत यहाँ प्रस्तुत कर दिया है और सही-ग़लत का फैसला पाठकों पर छोड़ दिया है।….इस बहस को पूरा पढ़ने के लिए देखें पीडीऍफ़ फाइल ..

लाभकारी मूल्य..लागत मूल्य : एक बहस

कात्यायनी की दो कविताएँ – ‘अपराजिता’ और ‘वह रचती है जीवन और ……’

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अपराजिता

(सृष्टि ने नारी को रचते समय बिस्तर, घर, जेवर, अपवित्र इच्छाएँ, इर्ष्या, बेईमानी और दुर्व्यवहार दिया. – मनु)

हाँ

उन्होंने यही

सिर्फ यही दिया हमें

अपनी वहशी वासनाओं की तृप्ति के लिए

दिया एक बिस्तर,

जीवन घिसने के लिए, राख होते रहने के

लिए

लाद दिया उस पर तमाम अपवित्र इच्छाओं

और दुष्कर्मों का भार |

पर नहीं कर सके पराजित वे

हमारी अजेय आत्मा को

उनके उत्तराधिकारी

और फिर उनके उत्तराधिकारियों के

उत्तराधिकारी भी

नहीं पराजित कर सके जिस तरह

मानवता की अमर – अजेय आत्मा को,

आज भी वह संघर्षरत है

नित – निरंतर

उनके साथ

जिनके पास खोने को सिर्फ जंजीरें ही हैं

बिलकुल हमारी ही तरह !


वह रचती है जीवन और ……

(नारी की रचना इसलिए हुई है कि पुरुष अपने पुत्रों, देवताओं से वंश चला सके – ऋग्वेद संहिता)

नारी की रचना हुई

मात्र वंश चलाने के लिए,

जीवन को रचने के लिए

-उन्होंने कहा चार हज़ार वर्षों पहले

नए समाज-विधान की रचना करते हुए |

पर वे भूल गए कि

नहीं रचा जा सकता कुछ भी

बिना कुछ सोचे हुए |

जो भी कोई कुछ रचता है – वह सोचता है |

वह रचती है

जीवन

और जीवन के बारे में सोचती है लगातार |

सोचती है –

जीवन का केंद्रबिंदु क्या है

सोचती है –

जीवन का सौन्दर्य क्या है

सोचती है –

वह कौनसी चीज़ है

जिसके बिना सब कुछ अधूरा है,

प्यार भी, सौन्दर्य भी, मातृत्व भी…

सोचती है वह

और पूछती है चीख -चीखकर |

प्रतिध्वनि गूंजती है

घाटियों में मैदानों में

पहाडों से , समुद्र की ऊँची लहरों से

टकराकर

आज़ादी !!! आज़ादी !!! आज़ादी !!!

भारतीय लोकतंत्र की पंचवर्षीय महानौटंकी का मंच सज रहा है!

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चुनाव? लुटेरों के गिरोह जुटने लगे हैं!

जोड़-तोड़, झूठ-फरेब, धार्मिक उन्माद, नफरत, रक्तपात, भ्रष्टाचार से भरपूर

भारतीय लोकतंत्र की पंचवर्षीय महानौटंकी का मंच सज रहा है!

मालिक लोग आते हैं, जाते हैं

कभी नीला कुर्ता पहनकर,

कभी सफ़ेद, कभी हरा

तो कभी लाल कुर्ता पहनकर |

महान हैं मालिक लोग

पहले पॉँच साल पर आते थे

पर अब तो और भी

जल्दी-जल्दी आते हैं

हमारे द्वार पर याचक बनकर |

मालिक लोग चले जाते हैं

तुम वहीँ के वहीँ रह जाते हो

आश्वासनों की अफीम चाटते

किस्मत का रोना रोते;

धरम-करम के भरम में जीते |

आगे बढो !

मालिकों के रंग-बिरंगे कुर्ते को नोचकर

उन्हें नंगा करो |

तभी तुम उनकी असलियत जान सकोगे |

तभी तुम्हें इस मायाजाल से मुक्ति मिलेगी |

तभी तुम्हें दिखाई देगा

अपनी मुक्ति का रास्ता |

भेडियों, कुत्तों, लकड़बग्घों

और सूअरों के बीच से आखिर

हम किसको चुनें ?

ये सब पूंजीवादी नरभक्षी

राक्षसों के टुकडखोर पालतू हैं !

यह चुनाव एक धोखा है !

विकल्प क्या है? –संसदीय

राजनीती के भ्रम से निकलो!

क्रांति के मार्ग पर आगे बढो!

असली चुनाव

इस या उस

पूंजीवादी चुनावी पार्टी

के बीच नहीं

बल्कि

इंकलाबी राजनीति

और पूंजीवादी राजनीति

के बीच हैं |

चुन लो

चुनावी मृगमरीचिका में

जीना है

या

इन्कलाब की तैयारी की

कठिन राह पर चलना है?

मेहनतकश साथियों! नौजवान दोस्तों!

सोचो!

62 सालों तक

चुनावी

मदारियों से

उम्मीदें पालने की बजाय

यदि हमने इन्कलाब की राह चुनी होती

तो भगत सिंह के सपनों का भारत

आज एक हकीकत होता !


सही विचार आखिर कहाँ से आते हैं?

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माओ त्से तुंग

सही विचार आखिर कहाँ से आते हैं? क्या

वे आसमान से टपक पड़ते हैं? नहीं। क्या वे

हमारे दिमाग में स्वाभाविक रूप से पैदा हो जाते

हैं? नहीं। वे सामाजिक व्यवहार से, और केवल

सामाजिक व्यवहार से ही पैदा होते हैं वे तीन

किस्म के सामाजिक व्यवहार से पैदा होते हैं –

उत्पादन-संघर्ष, वर्ग-संघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग

से पैदा होते हैं। मनुष्य का सामाजिक अस्तित्व

ही उसके विचारों का निर्णय करता है। जहाँ एक

बार आम जनता ने आगे बढ़े हुए वर्ग के सही

विचारों को आत्मसात कर लिया, तो ये विचार

एक ऐसी भौतिक शक्ति में बदल जाते हैं जो

समाज को और दुनिया को बदल डालती है।

अपने सामाजिक व्यवहार के दौरान मनुष्य विभिन्न

प्रकार के संघषो में लगा रहता है और अपनी

सफलताओं और असफलताओं से समृद्ध अनुभव

प्राप्त करता है। मनुष्य की पाँच ज्ञानेन्द्रियों-आँख,

कान, नाक, जीभ और त्वचा – के जरिये वस्तुगत

बाह्य जगत की असंख्य घटनाओं का प्रतिबिम्ब

उसके मस्तिष्क पर पड़ता है। ज्ञान शुरू में

इन्द्रियग्राह्य होता है। धारणात्मक ज्ञान अर्थात विचारों

की स्थिति में तब छलाँग भरी जा सकती है जब

इन्द्रियग्राह्य ज्ञान काफी मात्रा में प्राप्त कर लिया

जाये। यह ज्ञानप्राप्ति की एक प्रक्रिया है। यह

ज्ञानप्राप्ति की समूची प्रक्रिया की पहली मंज़िल

है, एक ऐसी मंज़िल जो हमें वस्तुगत पदार्थ से

मनोगत चेतना की तरफ ले जाती है, अस्तित्व

से विचारों की तरफ ले जाती है। किसी व्यक्ति

की चेतना या विचार (जिनमें सिद्धांत, नीतियाँ,

योजनाएँ अथवा उपाय शामिल हैं; वस्तुगत बाह्य

जगत के नियमों को सही ढंग से प्रतिबिम्बित

करते हैं अथवा नहीं, यह इस मंज़िल में साबित

नहीं हो सकता तथा इस मंजिल में यह निश्चित

करना सम्भव नहीं कि वे सही हैं अथवा नहीं।

इसके बाद ज्ञानप्राप्ति की प्रक्रिया की दूसरी मंज़िल

आती है, एक ऐसी मंज़िल जो हमें चेतना से

पदार्थ की तरफ वापस ले जाती है, विचारों से

अस्तित्व की तरफ वापस ले जाती है, तथा जिसमें

पहली मंज़िल के दौरान प्राप्त किये गये ज्ञान को

सामाजिक व्यवहार में उतारा जाता है, ताकि इस

बात का पता लगाया जा सके कि ये सिद्धांत,

नीतियाँ, योजनाएँ अथवा उपाय प्रत्याशित सफलता

प्राप्त कर सकेंगे अथवा नहीं। आम तौर पर,

इनमें से जो सफल हो जाते हैं वे सही होते हैं और

जो असफल हो जाते हैं वे ग़लत होते हैं, तथा

यह बात प्रकृति के खिलाफ मनुष्य के संघर्ष के

बारे में विशेष रूप से सच साबित होती है।

सामाजिक संघर्ष में, कभी-कभी आगे बढ़े हुए

वर्ग का प्रतिनीधित्व करने वाली शक्तियों को

पराजय का मुँह देखना पड़ता है, इसलिए नहीं

कि उनके विचार ग़लत हैं बल्कि इसलिए कि

संघर्ष करने वाली शक्तियों के तुलनात्मक बल

की दृष्टि से फिलहाल वे शक्तियाँ उतनी ज्यादा

बलशाली नहीं हैं जितनी कि प्रतिक्रियावादी

शक्तियाँ; इसलिए उन्हें अस्थायी तौर से पराजय

का मुँह देखना पड़ता है, लेकिन देर-सबेर विजय

अवश्य उन्हीं को प्राप्त होती है।

मनुष्य का ज्ञान व्यवहार की कसौटी के

जरिये छलाँग भर कर एक नयी मंज़िल पर पहुँच

जाता है। यह छलाँग पहले की छलाँग से और

ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। क्योंकि सिर्फ यही

छलाँग ज्ञानप्राप्ति की पहली छलाँग अर्थात  वस्तुगत

बाह्य जगत को प्रतिबीम्बित करने के दौरान बनने

वाले विचारों, सिद्धांतों, नीतियों, योजनाओं अथवा

उपायों के सही होने अथवा गलत होने को साबित

करती है। सच्चाई को परखने का दूसरा कोई

तरीका नहीं है। यही नहीं, दुनिया का ज्ञान प्राप्त

करने का सर्वहारा वर्ग का एकमात्र उद्देश्य है उसे

बदल डालना। अकसर सही ज्ञान की प्राप्ति केवल

पदार्थ से चेतना की तरफ जाने और फिर चेतना

से पदार्थ की तरफ लौटने की प्रक्रिया को, अर्थात

व्यवहार से ज्ञान की तरफ जाने और फिर  ज्ञान

से व्यवहार की तरफ लौट आने की प्रक्रिया को

बार-बार दोहराने से ही होती है। यही मार्क्सवाद

का ज्ञान-सिद्धांत है, द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का

ज्ञान-सिद्धांत है।

हमारे साथियों में बहुत से लोग ऐसे हैं जो

इस ज्ञान-सिद्धांत को नहीं समझ पाते। जब

उनसे यह पूछा जाता है कि उनके विचारों, रायों,

नीतियों, तरीकों, योजनाओं व निष्कर्षों,  धारा-प्रवाह

भाषणों व लम्बे-लम्बे लेखों का मूल आधार

क्या है, तो यह सवाल उन्हें एकदम अजीब-सा

मालूम होता है और वे इसका जवाब नहीं दे

पाते। और न वे इस बात को ही समझ पाते हैं

कि पदार्थ को चेतना में बदला जा सकता है और

चेतना को पदार्थ में, हालाँकि इस प्रकार की

छलाँग लगाना एक ऐसी चीज़ है जो रोज़मर्रा की

ज़िन्दगी में मौजूद रहती है। इसलिए यह आवश्यक

है कि हम अपने साथियों को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद

के ज्ञान-सिद्धांत की शिक्षा दें, ताकि वे अपने

विचारों को सही दिशा प्रदान कर सकें, जाँच-

पड़ताल व अध्ययन करने और अनुभवों का

निचोड़ निकालने में कुशल हो जायें, कठिनाइयों

पर विजय प्राप्त कर सकें, कम से कम गलतियाँ

करें, अपना काम बेहतर ढंग से करें, तथा पुरज़ोर

संघर्ष करें, जिससे हम चीन को एक महान और

शक्तिशाली समाजवादी देश बना सकें तथा समूची

दुनिया के शोषित-उत्पीड़ित लोगों के व्यापक

समुदाय की सहायता करते हुए अपने महान

अन्तरराष्ट्रवादी कर्तव्य को, जिसे हमें निभाना है,

पूरा कर सकें।

(मई १९६३)

\’बिगुल\’ जनवरी 2009 से साभार

नताशा- एक महिला बोल्शेविक संगठनकर्ता एक संक्षिप्त जीवनी

Posted on Updated on

–एल. काताषेवा

रूस की अक्टूबर क्रान्ति के लिए मज़दूरों को संगठित, शिक्षित और प्रशिक्षित करने के लिए हज़ारों बोल्शेविक कार्यकर्ताओं ने बरसों तक बेहद कठिन हालात में, ज़बर्दस्त कुबानियों से भरा जीवन जीते हुए काम किया। उनमें बहुत बड़ी संख्या में महिला बोल्शेविक कार्यकर्ता भी थीं। ऐसी ही एक बोल्शेविक मज़दूर संगठनकर्ता थीं नताशा समोइलोवा जो आखिरी साँस तक मज़दूरों के बीच काम करती रहीं। इस अंक से हम `बिगुल´ के पाठकों के लिए उनकी एक संक्षिप्त जीवनी का धारावाहिक प्रकाशन कर रहे हैं। हमें विश्वास है कि आम मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं को इससे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। – सम्पादक

……..ओदेस्सा छोड़ने के नताशा के फैसले ने उन्हें काफी तकलीफ दी। मज़दूर उनके वहाँ से चले जान का ग़लत अर्थ न निकालें, इसके लिए उन्होंने ओदेस्सा के सामाजिक-जनवादी संगठन के ग़लत रणकौशलों पर स्पष्ट और मुखर बयान दिया। उनका पत्र इस प्रकार था :

मैं  ओदेस्सा कमेटी के सदस्यों (बोल्शेविकों) के समक्ष बयान देती हूँ कि निम्न कारणों से स्थानीय संयुक्त संगठन में बने रहना मुझे सम्भव नहीं जान

पड़ता : पहली बात तो यह कि रणकौशलात्मक सवालों पर बोल्शेविकों और मेंशेविकों के बीच की असहमतियाँ अभी भी इतनी गम्भीर हैं कि इस समय

एकता करना समझौते के रास्ते पर कदम बढ़ाना है और एकमात्र सच्चे क्रान्तिकारी रणकौशलों से किनारा करने के समान है, जिसे बोल्शेविक अभी तक अपनाते आये हैं, और जिसने उन्हें वामपन्थी और सही अर्थों में आरएसडीएलपी (रूसी सामाजिक जनवादी पार्टी) का क्रान्तिकारी धड़ा बनाये रखा है। महत्त्वपूर्ण मसलों पर असहमत होते हुए एकता करना सिर्फ यांत्रिक ही होगा और स्थानीय परिस्थितियों में व्यावहारिक तौर पर इसका नतीजा

बोल्शेविकों पर मेंशेविकों का वर्चस्व होगा, जबकि, मौजूदा हालात में वर्चस्व के लिए सैद्धांतिक  लड़ाई निश्चित रूप से निरर्थक होगी और सिर्फ नये मतभेद,

टकराव और नये विभाजन का कारण बनेगी। यह एकता काम को और भी असंगठित करेगी और चीज़ों को सुधारने में कोई मदद नहीं करेगी। मैं यह भी मानती हूँ कि यहाँ जो एकता हुई है वह पार्टी अनुशासन की सभी धारणाओं का बुनियादी तौर पर उल्लंघन करती है, जिसका बोल्शेविकों ने मेंशेविकों की पार्टी विरोधी और विघटनकारी प्रवृत्तियों के खिलाफ  अपने संघर्ष में हमेशा ही ज़ोरदार बचाव किया है। मैं बाहरी ज़िलों की एक बैठक में बोलने वालों में से उस एक व्यक्ति के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूँ जिसने घोषणा की थी कि `हमें तीसरी कांग्रेस की काग़ज़ी घोषणा पर ध्यान देने की ज़रूरत नहीं है´, मुझे लगता है कि स्थानीय संगठन को पूरी पार्टी (यानी बोल्शेविकों) की सहमति के बिना मेंशेविकों के साथ एकता जैसा महत्त्वपूर्ण फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं है, और इस मामले में एकमात्र उचित और विश्वसनीय रास्ता पार्टी के तमाम कार्यकर्ताओं की चौथी कांग्रेस बुलाना है। एकता के रास्ते पर समझ में न आने वाली हड़बड़ी से आगे बढ़ रहे ओदेस्सा के संगठन ने केन्द्रीय

कमेटी या बोल्शेविकों की दूसरी कमेटियों को सूचित करना भी ज़रूरी नहीं समझा। उसने सेण्ट पीटर्सबर्ग और मास्को की कमेटियों के उस उदाहरण की भी सिरे से अवहेलना की जिन्होंने सिर्फ संघीय लाइन पर ही एकता को सम्भव माना था। इस तरह स्थानीय संगठन को स्थापित केन्द्रों और पार्टी की सीमाओं से बाहर रखकर, एकता ने पार्टी सम्बन्धों में और भी अफरातफरी पैदा कर दी है, ख़ासकर तब जबकि हम मानकर चलें कि चौथी कांग्रेस ने पार्टी के दोनों धड़ों के बीच सिर्फ संघीय आधार पर ही एकता का निर्णय किया था। तब ओदेस्सा का संगठन, एकता करने वाले संगठन के तौर पर, किसी भी पार्टी से बाहर होगा। संक्षेप  में मैं कहूँगी कि जिन लोगों के नेतृत्व में मैंने कई महीने काम किया है, अब तक जिन्हें मैं गम्भीर राजनीतिक सिद्धांतों  वाले भरोसेमन्द नेता मानती थी, वे हालात का सामना करने में अक्षम साबित हुए हैं। ऐसे महत्त्वपूर्ण क्षण में जब बाहरी ज़िलों के अपेक्षाकृत कम विश्वसनीय हिस्से एकता का रुझान दर्शा रहे थे, उन ढुलमुल कॉमरेडों को प्रभावित करने

के नज़रिये से बातचीत करने के बजाय वे बहाव के साथ बह गये और अपनी असंगति से उन सिद्धांतों  को नीचा दिखाया, पहले मैं उन्हें, जिनका पैरोकार

मानती थी। वही दिग्गज जो हफ्ते  भर पहले तक एकता की बात भी नहीं सुनना चाहते थे, किसी जादू के ज़ोर से उन्होंने एकता का पक्ष लेना शुरू कर दिया, और यह कहते हुए उसका औचित्य सिद्ध  करने लगे कि जब बाहरी ज़िले एकता चाहते हैं तो संघ का आग्रह करना अटपटा जान पड़ता है। यह सच है कि उनमें से कुछ ने दावा किया कि सिद्धान्तत: वे संघ के पक्ष में हैं, लेकिन बाहरी ज़िलों की बैठकों में उन्होंने एकता के सवाल का कोई विरोध नहीं किया, और हमारे नेताओं ने पार्टी में हुए पिछले विभाजन के बारे में लोकरंजक शब्दावली, जैसेकि उसे `सिर्फ नेताओं ने उकसाया था´, कि वह एकता में बाधा डालने की इच्छा रखने वाले `मुट्ठीभर´ बुद्धिजीवियों का काम था, का जवाब सिर्फ शर्मनाक और आपराधिक चुप्पी से दिया। इस तरह की सैद्धांतिक  अस्थिरता ने स्थानीय नेतृत्व में मेरा सारा विश्वास हिलाकर रख दिया और

उपर्युक्त  कारणों के साथ मिलकर इसने मुझे ओदेस्सा का संगठन छोड़ने पर विवश कर दिया।

लेकिन  प्रचारक नताशा की यह आपत्ति अपना लक्ष्य पूरा न कर सकी। वह डाकपेटी में पत्र डाल ही रही थीं कि उन्हें गिरफ्ऱतार कर लिया गया। उन्हें रोस्तोव जेल में डाल दिया गया और उनका पत्र ज़ारशाही के एजेण्टों के हाथ लग गया (1917 की क्रान्ति ने ओखराना राजनीतिक पुलिस’ के धूल भरे अभिलेखागार से निकालकर इसे सार्वजनिक किया।

जीवनी की पूर्ण सामग्री हेतु निम्न लिंकों पर जाएँ

‘बिगुल’ जनवरी 2009

‘बिगुल’ फरवरी 2009


तनख्वाह का सच

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आपस की बात
मजदूर भाइयो, मैं अभी कुछ दिनों से ही फैक्ट्री में काम करने लगा हूँ, किंतु इतने में ही मैंने जो चीज जान ली है वह है तनख्वाह देने की पीछे का सच. हमें तनख्वाह क्यों और कितनी दी जाए इसके पीछे मालिक का अपना मतलब होता है. लुटेरा मालिक एक मजदूर को उतना ही देता हैं जितना मज़दूर को जिंदा रहने की लिए न्यूनतम जरूरत होती है. मालिक को खूब अच्छी तरह पता है कि मज़दूर को किसी तरह रोटी, कपडा और दवा चाहिए, साथ में एक किराए का कमरा, क्योंकि अधिकतर मज़दूर अपने गावों से दूर शहरों में काम करने आयें हैं,. इन सभी चीजों की लिए इतनी महंगाई में २०००-२५०० रुपये देना ठीक होगा. मालिक को पता है अगर मैं २००० रुपये भी नहीं दूँगा तो मज़दूर भूखा या नंगा तो काम करने आएगा नहीं. मज़दूर फैक्ट्री आये तभी मालिकों की लिए १२-१४ घंटों तक काम करके रोज मालिकों की लिए करोड़ों रुपये मुनाफ़ा बनाएगा. अगर मज़दूर को जिंदा रहने लायक मजदूरी भी नहीं दी गयी तो एक दिन मज़दूर वर्ग ही मिट जाएगा और इन चोर पूंजीपतियों -मालिकों का मुनाफा बंद हो जाएगा. जिस (मुनाफे) को ये लुटेरे कभी भी किसी भी हालत में बंद नहीं होने देंगे. और इसी मुनाफे को जारी रखने की लिए वह कम तनख्वाह देकर मज़दूरों को जिंदा रखता है ताकि उसका मुनाफा बनता रहे. कल्पना करें कि आटा ५ रुपये किलो, चावल ५ रुपये किलो, सरसों तेल २० रुपये किलो, सभी सब्बजियाँ ४ रुपये किलो हो जायें तो तुरंत मालिक सभी की तनख्वाह १००० रुपये कर देगा और पुराने मज़दूरों को किसी न किसी बहाने निकाल कर नये मजदूरों की भर्ती ले लेगा. क्योंकि इन सारी चीजों के सस्ते होने पर मालिक भी हिसाब लगायेगा कि अब १००० रुपये में मज़दूर जिंदा रह सकता है तो २००० रुपये क्यों दिया जाए.
एक बात और कम्पनी में देखने को मिली कि कम्पनी में जो पुराने मज़दूर हैं जो थोड़ा काम जानते हैं उनको कुछ ज्यादा पैसा (३०००-३५००) देकर मालिक कुछ-कुछ अपना बफादार बना लेता है. और मालिक साजिशाना ढंग से मज़दूरों की बीच भी दो वर्ग पैदा कर देता है और इससे होता यह है कि नये मज़दूर जब किसी तरह का विरोध करते हैं तो पुराने मज़दूर जल्दी उनका साथ नहीं देते. पुराने मज़दूर कहते हैं हमें क्या है हमें तो ३००० रुपये मिल ही रहा है. वह सोचता है मुझे इन मजदूरों से ज्यादा पैसा तो मिल ही रहा है और कुछ दिन काम करके कारीगर बन जाऊंगा तो और तनख्वाह बढ़ जायेगी. और मैं अच्छी जिंदगी जीने लगूंगा. वह यह भूल जाता है कि वह जिस मालिक के लिए काम कर रहा है , वह मालिक उसी की मेहनत से हर महीने बिना कुछ किए लाखों रुपया मुनाफा कमाता है और अपनी संपत्ति में कई गुणा की बढोत्तरी करता रहता है. और वह मज़दूर कारीगर सीखने को ही अपना लक्ष्य बनाकर सालों गुजार देता हैं. वह मज़दूर अपनी तुलना अपने से नीचे वाले मज़दूर से करता है जबकि उसे चाहिए कि वह अपनी तुलना उस नये मज़दूर से न करके उस मालिक से करके देखे कि उसका मालिक कितना ज्यादा मुनाफा बटोर रहा है. सभी मजदूरों को समझना चाहिए कि ये लुटेरा जो लाखों-करोडों कमाता है वह हमारी खून-पसीने से बनाया गया मुनाफा होता है अगर हम मज़दूर वर्ग न हो तो ये लुटेरे भूखों मरेंगे. इसलिए मजदूरों को अपनी ताकत समझनी होगी और मजदूरों को संगठित होकर इन मालिकों की खिलाफ लडाई में हिस्सा लेना होगा. नए मजदूरों के साथ पुराने मज़दूरों को भी समझना होगा कि उसे जो थोड़ा ज्यादा तनख्वाह मिल रही है उससे कुछ नहीं होने वाला. उसका सारा मुनाफा तो मालिक हड़प जाता है और फ़िर इन पैसों से अगले साल ६-८ मशीने बढा ली जाती हैं और इसीके साथ मालिक का मुनाफा और फ़िर कुछ नये मजदूरों का शोषण बढ़ता जाता है.
‘बिगुल’ दिसम्बर २००८ से साभार

दो -वर्गों का समाज

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सबसे खुबसूरत है वह समुद्र

जिसे अब तक देखा नही हमने

सबसे खूबसूरत बच्चा

अब तक बड़ा नहीं हुआ

सबसे खुबसूरत हैं वे दिन

जिन्हें अब तक जिया नहीं हमने

सबसे ख़ूबसूरत हैं वे बातें

जो अभी कही जानी है

—नाजिम हिकमत

दो -वर्गों का  समाज

अगर आप किसी आधुनिक समाज शास्त्री से सवाल करें कि वर्ग कितने होते हैं, उनका जवाब होगा छ: , या शायद तीन, या बारह, या कोई अन्य संख्या जो उनकी  कल्पना को भाए. ‘वर्ग’ की बहुत सी परिभाषाएँ दी जाती हैं. वे प्राय नकली और अप्रयाप्त होती हैं.

एक बेहतर सहायक उत्तर

हमरा समाज दो वर्गों में विभाजित है. इसमें एक मेहनतकश वर्ग और दूसरा पूंजीपति वर्ग शामिल है. मेहनतकश वर्ग को अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए काम करना पड़ता है जबकि पूंजीपति वर्ग के जीने के लिए प्रयाप्त धन होता है. अगर आप को आश्चर्य हो कि आप किस वर्ग से सम्बन्ध रखते हैं, अपने आप से एक सवाल करें कि अगर  आप कल से काम करना बंद कर दें तो क्या आप अपने निवेश पर गुज़ारा कर सकते हैं?. पूंजीवादी  वर्ग इस प्रकार आपकी तरह टूट जाए, सवाल ही पैदा नहीं होता . प्रत्येक श्रेणी में कुछ लोग शामिल होते हैं. निसंदेह ज्यादातर लोग मेहनतकश श्रेणी में शामिल हैं और पूजीपति श्रेणी जनसँख्या  का एक छोटा सा ही हिस्सा हैं. लेकिन, पूंजीवाद को समझने के दृष्टिकोण  से वे एक बहुत महतवपूर्ण अंश हैं.

सहायता के लिए इस परिभाषा का क्या महत्व है

केवल दो ही श्रेणीओं के होने के पीछे क्या कारण है ? उत्तर बड़ा सरल है, वह है कि, आपको यह समझना है कि कैसे   पूंजीवाद काम करता है. श्रेणी हमें बताती है कि हम अपनी वर्तमान अवस्था में क्यों हैं. यह हमें समझाती है कि किस प्रकार समाज गुलाम समाज से सामंतवाद को पार करते हुए  पूंजीवाद में विकसित हुआ और बदल गया. विशेष आर्थिक हित के कारण एक वर्ग ने दूसरे वर्ग से समाज के आर्थिक आधार को छीन लिया.

परंतु श्रेणी केवल इतना ही नहीं समझाती कि  इस पूंजीवाद के झंझट में हम कैसे फंस गए बल्कि पूंजीवाद किस प्रकार काम करता है , का विश्लेषण भी करती है. अधिकतर लोगों के जीवन का मुख्य तथ्य है काम— घर में काम ताकि उजरती-गुलाम का गुजरा हो सके या फ़िर जीने के लिए मजदूरी करने का काम. क्यों ? ऐसा हमेशा से नहीं रहा. सामंती युग में भू-दास खेतों पर काम करते हुए , भोजन का उत्पादन करते थे ताकि वे उसे खा सके . इस प्रकार वे अपना समय व्यतीत करते थे. निश्चय ही, अगर उत्पाद  भू-पति को देना पड़ता था, यह परेशानियों का सबब था, फ़िर भी ये परेशानियाँ आधुनिक उजरती गुलाम की परेशानियों से बिल्कुल अलग तरह की थीं.

वर्ग पूंजीवाद की दुर्घतानायों का भी विश्लेषण करता है: युद्ध, जिसे हम इसलिए लड़ते हैं ताकि पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा हो सके. अकाल तभी पड़ता है जब पूंजीपति श्रेणी हमारे खान-पान से मुनाफा नहीं कमा रही होती. काम से हमें दूर रखकर बेरोज़गारी इसलिए पैदा की  जाती है ताकि हम मजदूरों में मुकाबला पैदा करके मजदूरी को कम से कम रखा जा सके, और इस प्रकार और बहुत सी बातें. इस प्रकार अब हमारे पास बचती हैं दो श्रेणियां , चूंकि यही हमें चाहिए यह जानने के लिए कि किस प्रकार हम पूंजीवाद तक पहुच गए और यह पूंजीवाद किस प्रकार विकसित हुआ.

सबसे महत्वपूर्ण कारण कि केवल दो ही श्रेणियां क्यों हैं, का इन दो कारणों से कुछ भी लेना-देना नहीं है. यह एक तथ्य है कि इससे हमें समझ आती है कि किस तरह हम इस पूंजीवाद के झंझट से मुक्त हो सकते हैं. हम, मेहनतकश श्रेणी के लोगों का इसी में हित है कि इस बीमार पूंजीवादी श्रेणी जिसमे हमें बलात रूप से धकेल दिया गया है, से किस तरह मुक्ति पाई जाए.केवल वर्ग-चेतना के कार्य  की पहचान करके ही एक वर्ग-विहीन समाज की स्थापना हो सकती है. एक रास्ता है जिस पर चलकर ऐसा किया जा सकता है और वह रास्ता है वैज्ञानिक समाजवाद का, केवल  इसी रास्ते पर चलकर वर्ग-विहीन समाज जिसे साम्यवाद कहतें हैं, की मंजिल को पाया जा सकता है. एक वर्ग के रूप में संगठित होकर हम समाज बदल सकते हैं. अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमें पूंजीवाद से यूँ ही चिपके रहना होगा.

राजनितिक लोगो का यह दावा की हम वर्ग-विहीन समाज में ही तो रह रहें हैं, निश्चित रूप से गुमराह करने वाला है, काश कि वे इमानदारी से इसे स्वीकार कर पाते. समाज विज्ञानी ग़लत बताते हैं कि पूंजीवाद और वर्गों का अस्तित्व सदैव रहा है और सदैव रहेगा. हमारा यह मानना कि समाज दो वर्गों में विभाजित है पूर्ण रूप से ठीक हैं क्योंकि कोई और नहीं बल्कि यही तरीका हमें समझाता है कि किस प्रकार हम युद्ध, अकाल, गरीबी और बेरोजगारी पर काबू पा सकते हैं. हमें जरूरत है वर्ग-चेतना की और उससे भी बढ़कर इस बात के लिए चेतन होने की कि हम मेहनतकश वर्ग से तालुक रखते हैं और वे पूंजीपति वर्ग से. इसलिए वर्ग दो होते हैं.

योगेन्द्र
yogendrapjoshi@gmail.com | 59.94.119.46

समाज में मोटे तौर पर तीन प्रकार के लोग मिलेंगे: प्रथम जो अपनी बुद्धि के बल पर जीवनयापन करते हैं और बुद्धिबल के सहारे समाज में प्रतिष्ठा भी पा जाते हैं; दूसरे वे हैं जो दैहिक श्रम के भरोसे जीते हैं और समाज उन्हें सम्मान देने की नहीं सोचता; और तीसरे वे हैं जो किस्मत लेकर पैदा होते हैं, जिनके पास संसाधन होते हैं बिना कुछ किये मौज से जीने के लिये । तीनों ही सुख से जीने की तमन्ना लेकर आते हैं, और यह जरूरी नहीं कि वे समष्टि के हित की कामना लिये हों । जो कुछ अलग होते हैं वे तीनों वर्गों में होते हैं और अपवाद होते हैं न कि नियम !

– योगेन्द्र जोशी (indiaversusbharat.wordpress.com; hinditathaakuchhaur.wordpress.com;
jindageebasyaheehai.wordpress.com; vichaarsankalan.wordpress.com)


शहीद भगत सिंह विचार मंच, संतनगर

इस सामाजिक आर्थिक प्रबंध में, मनुष्य की किस्म उसकी सामाजिक भूमिका और रोज़ी-रोटी के लिए उस द्वारा अपनाए जाने वाले ढंगों से निर्धारित होती है. निजी संपत्ति की नींव पर टिके इस प्रबंध में, प्रत्येक आदमी को अपनी भूमिका स्वयं चुनने की स्वतंत्रता नहीं है. जन्मजात किस्मत का धनी कोई पैदा नहीं होता. इस वर्गीय समाज में, उसकी आर्थिक हैसियत ही उसे किस्मत का धनी या बदकिस्मत बनाती है. यह सामाजिक आर्थिक हैसियत किसी मनुष्य की जन्मजात विशेषता के कारण नहीं होती.

कुछ लोग अपनी जीविका के लिए, अपनी श्रम शक्ति बेचते हैं, चाहे वह शारीरिक श्रम हो या मानसिक. दूसरे लोग, पूँजी के मालिक होने की हैसियत से श्रम शक्ति खरीदते हैं और इसी प्रक्रिया द्बारा अपनी पूँजी में वृद्धि करते हैं. इसी आधार पर, मोटे तौर पर समाज में दो तरह के लोग हैं, एक पूँजी के मालिक और, दूसरे श्रम शक्ति बेचकर जिन्दा रहने वाले मजदूर वर्ग के लोग. अपनी वर्गीय स्थिति की बदौलत मजदूर वर्ग, अपनी श्रम शक्ति बेचने की मजबूरी के कारण पूंजीपतियों की बेरहम लूट का शिकार होते हैं.

समाज के अन्य तबके व वर्ग, समाज के इन दो मुख्य वर्गों के बीच इन वर्गों के सहयोगी या विरोधी की भूमिका अदा करते हैं. मानवीय इतिहास की एक विशेष मंजिल पर मानवीय श्रम का शारीरिक और मानसिक श्रम में विभाजन हो गया. शारीरिक श्रम या मानसिक श्रम विशेष इतिहासिक परिस्थितियों की पैदावार है न कि किसी व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह की जन्मजात विशेषता. समाज के विकास की विकसित मंजिल में यह विभाजन भी आलोप हो जाएगा.

एक गैर राजनितिक बुद्धीजीवी, इस सच्चाई से अनजान ख़ुद ही अपने आप को महान और किस्मत का धनी होने के भ्रम में, अपने ही सीमित खोल में बनाये काल्पनिक संसार में संतुष्ट है. जब कभी, वह अपने इस काल्पनिक संसार के भ्रम से मुक्त होकर, खोल के बाहर झांकेगा, तो आवश्य ही इस संसार की क्रूर हकीकतें उसे निष्पक्ष नहीं रहने देंगीं. अगर वह ईमानदार है तो वह सच्चाई, न्याय और गौरव के पक्ष में खड़ा होगा. परन्तु सच्चाई को समझकर भी, यदि वह निष्पक्ष और गैर राजनितिक होने का नाटक करता है तो वह दम्भी है, सच का सामना करने से घबराता है. भविष्य का आजाद मनुष्य, मानवीय इतिहास के इस बेरहम और मुश्किल दौर में, उस द्बारा दिखाई गई कायरता पर अवश्य सवाल उठाएगा.

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

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(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

1.   नए सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन—- महत्तव्पूर्ण सामजिक-आर्थिक सरंचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर
2.   कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर विचारधारात्मक संघर्ष
3.   सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यक्तिवाद, अराजकतावाद, उदारतावाद का विरोध करो!
4.   “वामपंथी” कलावाद, रूपवाद, और मध्यवर्गीय लम्पटता का विरोध करो!
5.   कला-साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक जनवादी प्रवृतियों का विरोध करो!
6.   धार्मिक कट्टरपंथी फासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर सही क्रांतिकारी रणनीति अपनाओ!
7.   दलित प्रशन पर सही रुख अपनाओ!
8.   स्त्री प्रशन पर सही रुख अपनाओ!
9.   कला-साहित्य-संस्कृति में ‘लोकवाद” और “स्वदेशीवाद”  का विरोध करो!
10.  न तो इतिहास ग्रस्त, न ही इतिहास विमुख!
11.  सांस्कृतिक मोर्चे पर अन्तरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण का प्रश्न
12.  सांस्कृतिक मोर्चे पर जन-दिशा का सवाल– ‘जनता के बीच जाओ, जनता से सीखो! जन-जीवन और सामाजिक संबंधों का गहन-गहरा-व्यापक अध्ययन करो!
13.  सांस्कृतिक मोर्चे पर नई भरती करो| मध्यवर्ग के बीच से ही नहीं, मजदूर वर्ग के बीच से भी!
14.  कलात्मक स्तर और लोकप्रियता के द्वंद्वात्मक संबंधों के बारे में
15.  पूंजीवादी संस्कृति उद्योग के विरुद्ध जवाबी कारवाई के तौर पर एक व्यापक, बहुमुखी सांस्कृतिक जन-अभियान संगठित करना होगा!

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किसानों के लिए लाभकारी मूल्य और मुख्यधारा के कम्युनिस्ट

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(कई दिनों तक इन्टरनेट पर सर्फिंग करने के बाद यह तथ्य तो उजागर हो गया कि मेहनतकश वर्ग की वकालत करने वाले मुख्यधारा के  ये ‘कम्युनिस्ट’ जो अपनी-अपनी इन्टरनेट-साईटों पर रोजाना हजारों की संख्या में पन्ने तो काले करते हैं,लेकिन  आज तक इन्होने (कम्युनिस्ट क्लासिक्स तो दूर)  मार्क्स-एंगेल्ज़ द्वारा रचित ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ तक को क्षेत्रीय भाषाओँ में की तो बात ही छोड़ दें, हिन्दी भाषा में भी प्रकाशित करना गवारा क्यों नहीं समझा. लेकिन, भाषा की बिल्कुल सरल शैली में लिखित सुखविंदर के इस लेख से मार्क्स के अधिशेष/या अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की व्याख्या ने मुख्यधारा के कम्युनिस्टों की नीतिओं और अवसरवादिता का पर्दाफाश कर दिया. इन संशोधनवादी और लेफ्ट-विंग कम्युनिज्म के शिकार कम्युनिस्टों  से किसी भी प्रकार की उम्मीद न करते हुए,अन्य कार्यों के अतिरिक्त, नव सर्वहारा पुनर्जागरण और नव सर्वहारा प्रबोधन के इस काल में सर्वहारा  के सच्चे सेवकों के कन्धों से कन्धा मिलाते हुए मार्क्सवाद को सर्वहारा के बीच ले जाने के  कार्यभार में हम भी अपने आप को  सम्मलित समझते है. इसी सिलसिले को आगे बढाते हुए हम सुखविंदर के लेख को इस ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहे हैं–शहीद भगत सिंह विचार मंच के सदस्यों द्वारा)

पंजाब  का किसान आन्दोलन और कम्युनिस्ट–सुखविंदर

दायित्वबोध के 2005,जुलाई-सितम्बर  से साभार

यूँ तो हरित क्रांति के सभी इलाकों की ही यह खासियत रही है कि वहां धनी किसानों के नेतृत्व में  किसानों का कोई-न-कोई आन्दोलन चलता ही रहता है, लेकिन पंजाब का किसान आन्दोलन पिछले कुछ वर्षों से विशेष तौर से चर्चा का विषय बना हुआ है. यहाँ हमारी दिलचस्पी किसान आन्दोलन में कम  और पंजाब के कम्युनिस्टों की इन आंदोलनों के प्रति पहुँच में ज़्यादा है. मालिक वर्गों की मांगो/मसलों/आंदोलनों के प्रति मजदूर वर्ग के प्रतिनिधियों की पहुँच (एप्रोच) क्या हो? आज एक बार फ़िर हमें इस प्रश्न के रूबरू होना पड़ रहा है.
पंजाब में इन दिनों भी अलग-अलग इलाकों में कहीं ज़्यादा तो कहीं कम, किसान आन्दोलन हरकत में हैं. इस आन्दोलन का नेतृत्व सीपीआई, सीपीआई (एम्), सीपीएम से निकले पासला ग्रुप, और सीपीआई (एमएल) न्यू डेमोक्रेसी से संबधित किसान संगठन कर रहे हैं. इन किसान संगठनों  के आलावा भारतीय किसान यूनियन (एकता) के दोनों ग्रुप भी इस आन्दोलन में शामिल हैं,जिनका समर्थन और मार्गदर्शन पंजाबी में प्रकाशित पत्रिकाएं सुर्ख रेखा, दिशा, दोनों लाल तारा और लाल परचम कर रहे हैं, जो मजदूर वर्ग की वैज्ञानिक विचारधारा मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद विचारधारा  को मानने का दावा करते हैं और भारत में नव-जनवाद, समाजवाद और कम्युनिज्म स्थापित करने की बातें करते हैं.
इन किसान संगठनों के आलावा पंजाब में कुछ और भी किसान संगठन सक्रिय हैं पर उनकी कार्रवाईयां इस लेख के  दायरे से बाहर हैं. उपरोक्त ‘कम्युनिस्ट’ किसान संगठनों द्वारा चलाये गए और चलाये जा रहे आन्दोलन की मुख्य मांगे इस प्रकार हैं :
१. उत्पादों के लाभकारी मूल्य हासिल करना,
२. कृषि लागतों पर सब्सिडी  हासिल करना,
३. कृषि उत्पादों के लिए सुरक्षित मण्डी हासिल करना, और
४. किसानों के कर्जे माफ़ करना.
इसके आलावा और भी मांगे हो सकती हैं लेकिन हमारे लिए उनका ज्यादा महत्व नहीं.
अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व और उपरोक्त पत्रिकाओं-पर्चों के समर्थन और मार्गदर्शन में उक्त मांगो पर चल रहे किसान आन्दोलन का मजदूर वर्ग के विचारधारात्मक नज़रिए से विश्लेषण करना इस लेख का मुख्य मकसद है.
जहाँ तक कृषि मालों गेहूं, धान, दूध आदि की कीमतों में बढोतरी की मांग का सवाल है, तो यह बात दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि यह मांग मजदूर वर्ग के विरोध में जाती है. हर प्रकार के मालिकाने से महरूम, कम मजदूरी पर मुश्किल से गुज़ारा करते मजदूरों को इन वस्तुओं की कीमत में बढोत्तरी की कीमत अपने जिंदा रहने के लिए बेहद जरूरी उपभोग या जिंदगी की ओर  बुनियादी ज़रूरतों में कटौती करके चुकानी पड़ती हैं. क्या कम्युनिस्टों को ऐसी मजदूर विरोधी मांगों पर चलने वाले आन्दोलनों का नेतृत्व, समर्थन या मार्गदर्शन करना चाहिए? और जो यह सब कर रहे हैं क्या वे मजदूर वर्ग के साथ गद्दारी नहीं कर रहे? यह बात इतनी सीधी और सरल है कि इसकी ज्यादा व्याख्या की ज़रूरत नहीं.
कृषि मालों के लाभकारी मूल्यों की लडाई जहाँ मजदूर वर्ग के विरोध  में है, वहीं यह मांग कृषि पूंजीपति या धनी किसानों के हक़ में है, क्योंकि, यही वह वर्ग है, जिसको कृषि मालों की कीमतों में बढोतरी का सबसे ज्यादा फायदा होता है.
किसानी अलग-अलग परतों में बंटी हुई है. कृषि में हुए पूंजीवादी विकास ने इसके अच्छे-खास हिस्से को खेत-मजदूरों में बदल दिया है. मालिक किसानों की बड़ी संख्या गरीब और मध्यम किसानों की है. किसानी का यह हिस्सा खासकर गरीब किसानी आज पूँजी की मार  अधीन आ गई है. गरीब और मध्यम किसान अपनी ज़मीनें बेचकर सम्पत्तिहीन मजदूरों की कतारों में शामिल हो रहे हैं और यह प्रक्रिया दिन-बा-दिन तेज़ होती जा रही है.
माल उत्पादक होने के चलते गरीब किसान भी अन्य  मालिक किसानों (धनी किसानों) के साथ ही अपनी वर्गीय नजदीकी महसूस करता है. उसको यह भ्रम होता है कि अगर उसकी फसल ( चाहे उसके पास बेचने के लिए बहुत अधिक फसल न हो) की ज्यादा कीमत मिले तो वह एक माल उत्पादक के रूप में बचा रह सकता है और किसी समय बड़ा मालिक भी बन सकता है. लाभकारी मूल्यों की लडाई में धनी किसान गरीब किसानों की इस मानसिकता का फायदा उठाते हैं. चूंकि मालिक किसानों का बड़ा हिस्सा गरीब किसानों और मध्यम किसानों का है इसलिए इनके, खासकर गरीब किसानों के समर्थन के बिना धनी किसान न तो अपनी लडाई लड़ सकते हैं और न ही जीत सकते हैं. इसलिए धनी किसान गरीब किसानों का मित्र होने का पाखण्ड करते हैं. धनी किसान कृषि लागतों में बढोतरी होने के कारण कृषि मालों के दामों में बढोतरी किए जाने की वकालत करते हैं. इस प्रकार वे गरीब किसानों को गुमराह करके अपने आन्दोलन में शामिल कर लेते हैं. इस प्रकार अगर कृषि मालों की कीमतें बढ़ जायें तो गरीब किसान के मुकाबले धनी किसानों के मुनाफे कई गुणा  बढ़ जाते हैं. विस्तृत पुनरुत्पादन करने वाला धनी किसानों का यह वर्ग इस बढे हुए मुनाफे को दोबारा कृषि में निवेश करता है. विस्तृत पुनरुत्पादन की एक शर्त यह भी है कि कृषि में लगी पूँजी में बढोतरी के साथ-साथ धनी किसानों के मालिकाने के अधीन ज़मीन में भी बढोतरी हो. इसलिए वह पहले से ही तबाही के कगार पर खड़े किसानों की ज़मीन खरीदकर उन्हें मजदूरों की कतारों में धकेल देते हैं. इसलिए गरीब किसानों के लिए लाभकारी मूल्यों की लडाई एक धोखा, एक छलावा ही साबित होती है.
इस प्रकार देखा जाए तो कृषि उत्पादों के लाभकारी मूल्यों की लडाई जहाँ मजदूर वर्ग के साथ गद्दारी है, वहीं छोटे किसान के साथ धोखा है और इस धोखाधडी भरे धंधे  में शामिल है यहाँ कम्युनिस्टों  का लेबल लगाई हुई पार्टियाँ और ‘कम्युनिस्ट विचारधारा को समर्पित पत्रिकाएं’ लेकिन लाभकारी मूल्यों का अभी और विश्लेषण बाकी है.

धनी किसान और उनकी समर्थक ‘कम्युनिस्ट’ पार्टियाँ और उपर जिक्र में आई पत्रिकाएं कृषि लागत बढ़ने से कृषि मालों की कीमतों में बढोत्तरी  की जो वकालत करती हैं उसकी चीरफाड़ भी जरूरी है. मार्क्सवादी अर्थशास्त्र बताता है कि किसी भी माल की कीमत उसके मूल्य की ही मुद्रा के रूप में अभिव्यक्ति है. मूल्य का सारतत्व किसी माल के उत्पादन में खर्च हुआ श्रम-काल होता है. उत्पादन प्रक्रिया शुरू करने के लिए पूंजीपति अपनी पूँजी को दो मदों पर खर्च करता है. एक मशीनरी, कच्चा माल आदि पर, पूँजी का यह  हिस्सा स्थिर पूँजी कहलाता है; दूसरा श्रम-शक्ति की खरीद पर, पूँजी का यह हिस्सा परिवर्तनशील पूँजी कहलाता है. मशीनरी, कच्चा माल आदि भी चूंकि श्रम के ही उत्पाद होते हैं, इसलिए इसकी कीमत भी उनके उत्पादन के ऊपर खर्च हुए कुल श्रम-काल से ही तय होती है. कच्चे माल पर जब श्रम-शक्ति कार्य करती है, तो कुल मूल्य में बढोत्तरी होती है. लेकिन कच्चा माल नए उत्पादित माल को सिर्फ़ उतने हीं मूल्य का हस्तांतरण कर सकता है, जितना उसमें पहले से ही मौजूद हो. यानी कच्चा माल कोई मूल्य पैदा नहीं करता. सिर्फ़ श्रम-शक्ति ही है जो नया मूल्य सृजित करती है. लेकिन पूँजी का मालिक श्रम-शक्ति के मालिक अर्थात मजदूर को उसके द्वारा सृजित कुल मूल्य का सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा ही देता है, बाकी ख़ुद हड़प जाता है. पूँजी का मालिक इस माल को इसमें जोड़े गए मूल्य के ऊपर बेचकर ही मुनाफा कमाता है. मार्क्स इसकी इस प्रकार व्याख्या करते हैं,” मान लीजिए कि श्रम का एक औसत घंटा 6 पेन्स के बराबर मूल्य में जुडा हुआ है, या श्रम के 12 औसत घंटों में 6 शिलिंग का मूल्य जुडा हुआ होता है. यह भी मान लीजिए कि श्रम का मूल्य 3 शिलिंग, या 6 घंटे के श्रम की उपज है. अब यदि किसी माल में लगे हुए कच्चे माल, मशीन आदि में 24 घंटे का औसत श्रम लगा है, तो उसका मूल्य 12 शिलिग़ होगा. इस पर यदि पूंजीपति द्वारा लगाया हुआ मजदूर इन उत्पादन के साधनों में 12 घंटे का श्रम जोड़ देता है, तो ये 12 घंटे 6 शिलिंग के अतिरिक्त मूल्य में फलीभूत होंगे. इस प्रकार उपज  का कुल मूल्य 36 घंटे के फलीभूत श्रम, या 18 शिलिंग के बराबर होगा. लेकिन चूंकि श्रम का मूल्य, या मजदूर की मजदूरी केवल 3 शिलिंग है, पूंजीपति को मजदूर के उस 6 घंटे के अतिरिक्त श्रम के लिए कुछ भी नहीं देना होगा जो माल के मूल्य में शामिल हो गया है. अब यदि पूंजीपति इस माल उसके मूल्य 18 शिलिंग पर बेचता है तो उसे 3 शिलिंग का वह मूल्य भी प्राप्त होता है, जिसके लिए उसने कुछ नहीं दिया. ये 3 शिलिंग अतिरिक्त मूल्य या मुनाफे के रूप में है, जो सीधे पूंजीपति की जेब में जाता है. इस प्रकार माल को उसके मूल्य से अधिक दामों पर न बेचकर, बल्कि उसके सही मूल्य पर बेचकर पूंजीपति 3 शिलिंग का मुनाफा प्राप्त करता है. “ (मार्क्स: मजदूरी, दाम और मुनाफा)

अगर पूंजीपति अपने माल को उसके  मूल्य से अधिक बेचने में कामयाब भी हो जाए, तो इससे समूची अर्थव्यवस्था में मालों के कुल मूल्य में कोई बढोत्तरी नहीं होगी. इस प्रकार हम देखते हैं कि मुनाफा मण्डी में नहीं, बल्कि उत्पादन की प्रक्रिया में पैदा होता है. पूंजीपति मण्डी में  अपने माल के विनिमय से मुनाफा इसलिए प्राप्त करता है क्योंकि उसके माल में पहले से ही मुनाफा निहित होता है. “वाणिज्यिक पूँजी साधारण रूप में परिचलन के क्षेत्र में कार्यशील पूँजी है. परिचलन की प्रक्रिया कुल पुनरुत्पादन की प्रक्रिया का ही एक पड़ाव है. परंतू परिचलन प्रक्रिया में कोई मूल्य पैदा नहीं होता और इसलिए न ही कोई अतिरिक्त मूल्य पैदा होता है. सिर्फ़ मूल्य का एक मात्रा के रूप में हस्तांतरण  होता है…..अगर उत्पादित मालों की बिक्री से अतिरिक्त मूल्य हासिल किया जाता है तो सिर्फ़ इसलिए कि वह पहले से ही उसमें निहित था.” (कार्ल मार्क्स: पूँजी, खंड 3, पृष्ठ 279, अंग्रेजी संस्करण)

इस प्रकार जो लोग मण्डी में मुनाफा ढूंढते हैं, वे होने का परिचय देते हैं. कृषि मालों के लाभकारी मूल्य की मांग व्यर्थ है क्योंकि कृषि मालों में तो पहले से ही मुनाफा निहित होता है

.मण्डी में वस्तुओं की खरीद-फरोख्त व्यापर कहलाती है. पूंजीवादी मण्डी में पूंजीपति अपने माल की ज्यादा से ज्यादा कीमत प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं. मण्डी में माल की उसके मूल्य से ज्यादा दाम पर बिक्री जहाँ एक को लाभ पहुंचाती है, वहीं दूसरे को उतना ही नुकसान झेलना पड़ता है. इस सम्बन्ध में कार्ल मार्क्स, बेंजामिन  फ्रैंकलिन का हवाला देते हैं, “जंग डकैती है, व्यापर आम तौर पर धोखाधडी  है.” (कार्ल मार्क्स: पूँजी, खंड-1, पृष्ठ 161,  अंग्रेज़ी संस्करण)
इस प्रकार मण्डी में कृषि मालों की कीमत बढाने की मांग करने वाले बेंजामिन फ्रैंकलिन के शब्दों में धोखाधडी के वकील हैं. ये धोखाधडी भी वे मजदूर वर्ग के साथ ही कर रहे हैं, जिसके रहनुमा होने का वे दावा कर रहें हैं. क्योंकि मालों के दामों की बढोत्तरी का धनी किसान को जितना लाभ होता है, उसी अनुपात में मजदूरों को उसका नुकसान होता है.

.दरअसल, लाभ या मुनाफा बढ़ाने की लडाई पूंजीपतियों के इस या उस गुट की तो हो सकती लेकिन मजदूर वर्ग की नहीं. कृषि मालों के लाभकारी मूल्य की लडाई समाज में पैदा होने वाले कुल  अतिरिक्त मूल्य में औद्योगिक और व्यापारिक पूँजी की बनिस्पत, कृषि बुर्जुआ वर्ग का हिस्सा बढ़ाने की लडाई है और इसके समर्थन में खड़ी ‘कम्युनिस्ट पार्टियाँ’ और उपरोक्त पत्रिकाएं उसी प्रसंग में कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली जिस सब्सिडी की मांग उठाती हैं उस पर भी विचार करने की जरूरत है. सब्सिडी अर्थात कृषि उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली स्थिर पूँजी पर सब्सिडी जिसके संबध में आजकल पंजाब में उपरोक्त किसान संगठनों के नेतृत्व में कृषि क्षेत्र को मुफ्त बिजली दिए जाने के लिए संघर्ष चल रहा है. स्थिर पूँजी क्योंकि कोई नया मूल्य नहीं पैदा करती, सिर्फ़ अपने मूल्य का ही नए उत्पादित मूल्य में हस्तान्तरण करती है, इसलिए स्थिर पूँजी के दाम गिरने से नए उत्पादित  माल का दाम भी गिर जाएगा, जिससे किसान के कुल लाभ में कोई बढोत्तरी नही होगी. निस्संदेह मजदूर वर्ग के प्रतिनिधियों को किसानों के मुनाफे के बढ़ने या गिरने से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए. इस सब की चर्चा तो हम उक्त पार्टियों और पत्रिकाओं  की विचारधारात्मक कंगाली को बेनकाब करने के लिए ही कर रहे हैं.
अगर सब्सिडी की मांग किसी खास इलाके के किसानों के लिए की जाती है, तो सब्सिडी मिलने के उपरांत उस इलाके के किसानों को एक फायदा जरूर होगा कि  उनके उत्पादन की दूसरे इलाके के किसानों के उत्पादन के मुकाबले मण्डी में मुकाबले की योग्यता बढ़ जायेगी. एक इलाके के किसानों का कम लागत पर तैयार माल दूसरे इलाके के किसानों की तबाही का सबब बन सकता है. इससे ज्यादा कृषि सब्सिडी का ओर कोई नतीजा नहीं निकलेगा.
‘कम्युनिस्ट पार्टियों’, पत्रिकायों की रहनुमाई में चल रहे किसान आन्दोलन की अगली महत्वपूर्ण मांग है सुरक्षित मण्डी की. अर्थात किसान जो भी पैदा करे, वह आराम से लाभदायक दामों पर बिक जाए. यह है सुरक्षित पूंजीवादी मण्डी का यूटोपिया. ये लोग मण्डी तो चाहते हैं, लेकिन मुकाबला नहीं. ये लोग पूंजीवाद तो चाहते हैं, लेकिन तबाही नहीं. अगर ये भूल गए हों, तो इन्हें याद दिला दें कि पूंजीवादी मण्डी मूल्य के नियम के मुताबिक चलती है. उत्पादन के साधनों के निजी मालिकाने के अधीन काम करते इस नियम के तहत पूंजीवादी मण्डी हमेशा अराजकता की हालत में रहती है. उत्पादन के स्वत:स्फूर्त नियामक के तौर पर काम करता है. मूल्य के इर्द-गिर्द मालों के दामों में उतार-चढाव,  पूंजीपतियों को कुछ खास वस्तुओं का उत्पादन घटाने या बढ़ाने और उत्पादन के उन क्षेत्रों में अपनी पूँजी लगाने के लिए मजबूर करता है, जहाँ दाम ज्यादा हों. इसका नतीजा अलग-अलग आर्थिक क्षेत्रों में पूँजी और श्रम के स्वत:स्फूर्त पुनर्वितरण में निकलता है. माल उत्पादक अपने मालों की लागत कम करने की कोशिश करता है, लेकिन प्रतिस्पर्धा की परिस्थतियों के अधीन हर कोई इसमें सफल नहीं होता. वे लोग जो अपने मालों को बेचने के उपरांत अपने खर्च पूरे नहीं कर पाते, तबाह हो जाते हैं.इसके विपरीत जो सुधरी हुई तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, इसके कारण श्रम की लागत घटा लेते हैं, वे ओर भी अमीर हो जाते हैं. इस प्रकार माल उत्पादकों के वर्गीय ध्रुवीकरण  का आर्थिक आधार तैयार होता है. इस प्रकार मूल्य के नियम के आधार पर सरल माल उत्पादन के पूंजीवादी उत्पादन में तब्दील हो जाने का आधार अस्तित्व में आता है. यानि वे छोटे उत्पादक जो ख़ुद की श्रम शक्ति से मालों का उत्पादन करतें हैं (सरल माल उत्पादन) तबाह हो जाते हैं और उनकी बची-खुची पूँजी बड़े माल उत्पादकों के हाथों में चली जाती है. इस प्रकार पूंजीवादी उत्पादन (दूसरों की श्रम-शक्ति खरीदकर उत्पादन करवाना) अस्तित्व में आता है

पूंजीवादी मण्डी के नियम इतने बेरहम हैं कि इसके तहत कुछ का फायदा और बहुतों की तबाही अपरिहार्य है. इसका एक ही हल है, पूंजीवादी मण्डी यानि पूंजीवादी व्यवस्था  की तबाही. पूंजीवाद की यह नियति मजदूर वर्ग के हाथों तय है. इसलिए जरूरी है कि इस लडाई में मजदूर वर्ग के दोस्तों, गरीब और मध्यम किसानों, खासकर गरीब किसानों को सुरक्षित मण्डी, लाभकारी मूल्यों आदि के भ्रमोँ  से मुक्त करके उन्हें मजदूर वर्ग के पक्ष में लाया जाए. लेकिन ये कम्युनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएं इस मकसद की विपरीत दिशा में ज़ोर लगा रहीं हैं.
उक्त किसान संगठन और उनके ‘कम्युनिस्ट नेता, समर्थक, मार्गदर्शक पत्रिकायों की चौथी महत्वपूर्ण मांग है किसानों की कर्जा मुक्ति, जिसकी आजकल पंजाब में बहुत चर्चा है. इस प्रश्न पर पंजाब के बुर्जुआ सियासतदान, बुर्जुआ अख़बार, उक्त किस्म की कम्यनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएँ आज एक ही बोली बोल रहें हैं. कृषि मालों के लाभकारी मूल्यों, कर्जा मुक्ति आदि मसलों पर इन अलग-अलग कैम्पों के लोगों के बीच पंजाब में चाहे-अनचाहे एक अपवित्र गठबंधन बना हुआ है.
‘सुर्ख रेखा’ ने जिस तरह किसानी की क़र्ज़ माफ़ी का प्रचार किया है और आज भी कर रही है, उससे तो यूँ प्रतीत होता है जैसे ‘सुर्ख रेखा’  को मालिक किसानों के कर्जा माफ़ी ‘संग्राम’ में से भी नई जनवादी क्रांति निकलती नज़र आती है. यही हाल इस बिरादरी कीं अन्य पत्रिकाओं का भी है. अगर देखा जाए तो ज्यादा कर्जा उसी को मिलता है जिसके पास ज्यादा पूँजी हो यानि कर्जा देने वाले को अपनी पूँजी वापस मिलने का भरोसा हो. दुनिया के बड़े मगरमच्छों एनरोंन  और वर्डकॉम  का उदहारण हमारे सामने है. वर्डकॉम के दिवालिया होने के समय उस पर 30 अरब डालर  का क़र्ज़ था, पंजाब के सभी किसानों के ऊपर कुल कर्जे से कई गुना ज्यादा. ऐसे हे हमारे देश के छोटे-बड़े उद्योगपतियों और मालिक किसानों के अलग-अलग स्तरों के क़र्ज़ देखे जा सकते हैं. पंजाबी ट्रिब्यून में डॉ. अनूप सिंह के एक लेख के अनुसार, “1996-1997 तक 5701 करोड़ रूपये के कुल कर्जे में से 21.57 प्रतिशत यानि 1230 करोड़ रु का कर्जा 5 एकड़ तक की मालिकी वाले किसानो के ऊपर है. 28.57 प्रतिशत यानि 1637 करोड़ रु 5 से 10 एकड़ की की जमीन मालिकी वाले किसानों पर है. बाकि 2820 करोड़ का कर्जा 10 एकड़ से ज्यादा की मालिकी वाले किसानों पर था.” इससे स्पष्ट है कि जिनके  पास ज़मीन ज्यादा है, उन्हीं पर कर्जा भी ज्यादा है. ये कम्यनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएँ किसानी की सभी परतों के कर्जे माफ़ करने की मांग कर रही हैं. वैसे इनको इतना  तो पता ही होगा कि पूंजीपति के  लिए कर्जा भी मुनाफा बढ़ाने का ही एक साधन होता है.

1998 में पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़, के प्रो. एच.एस. शेरगिल की “ग्रामीण पंजाब में उधारी और क़र्ज़” शीर्षक से प्रस्तुत अध्धयन रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब के किसानों पर कुल कर्जा 5700 करोड़ रु है, जो कि पंजाब के किसानों की मालिकी के अधीन कुल ज़मीन की कुल कीमत का सिर्फ़ 4 प्रतिशत ही बनता है. अगर कृष में किसानों द्वारा की कुल पूँजी निवेश और किसानों की घरेलू संपत्ति भी जोड़ ली जाए तो किसानों की कुल पूँजी के बनिस्पत कुल कर्जे का प्रतिशत और भी नीचे गिर जाएगा. तथ्यों की रोशनी में पाठक देख सकतें हैं कि इन पार्टियों  और पत्रिकाओं द्वारा किसानी कर्जे के उठाए जा रहे धुएँ की असलियत क्या है.
इस विश्लेषण की रोशनी में देखा जा सकता है कि आज ये कम्यनिस्ट पार्टियाँ और पत्रिकाएँ किसकी सेवा कर रही हैं. छोटे मालिकाने को बचाए रखने की प्रतिक्रियावादी कोशिशों में डूबे हुए ये लोग मजदूर वर्ग की विचारधारा और उसके वर्गीय रुख को त्याग कर मजदूर वर्ग के दुश्मन शोषक वर्गों के दृष्टिकोण  पर खड़े है.
अंत में इनको लेनिन की यह नसीयत याद दिला देते है,” कोई पूछ सकता कि इसका हल क्या है, किसानों की हालत कैसे सुधारी जा सकती है? छोटे किसान ख़ुद को मजदूर वर्ग के आन्दोलन से जोड़कर और समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष में ज़मीन और साधनों (कारखाने, मशीनें आदि) को सामाजिक संपत्ति के रूप में बदल देने में मजदूरों की मदद करके खुद को पूँजी की जकड़  से मुक्त कर सकते है. छोटे पैमाने की खेती और छोटी  जोतों को बचाने की कोशिश सामाजिक विकास की गति को अनुपयोगी रूप में धीमा करना होगा. इसका मतलब पूंजीवाद के अधीन ही खुशहाली की सम्भावना के भ्रम से किसानों को धोखा देना होगा. इसका मतलब श्रमिक वर्गों में फ़ुट डालना और बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों के लिए एक सुविधाजनक स्थिति  पैदा करना होगा.” (मजदूर, पार्टी और किसान)

(जैकारा, जून २००३ से अनूदित)

नेपाल–बहस के लिए

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कोइराला वंश का पतन

लक्ष्मण पन्त, सदस्य, विदेश ब्यूरो, नेपाल की

कम्युनिस्ट पार्टी  (माओवादी)

प्रधानमंत्री पद पर कॉ. प्रचंड की ऐतिहासिक विजय से नेपाल में एक नए युग का सूत्रपात हुआ है. नेपाली जनता ने नेपाली क्रांति के उस मॉडल का पुन: समर्थन किया है जिसमें खुली और गुप्त गतिविधियों, कलम और बन्दूक, बैलेट और बुलेट एवं जनयुद्ध और जनांदोलन दोनों का मेल किया गया है. चेयरमैन प्रचंड की जीत के साथ ही, हमारी पार्टी अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के एक सौ साठ वर्षों  के इतिहास में सत्ता तक पहुँचने वाली पहली ऐसे पार्टी बन गई है, जिसके पास सर्वहारा वर्ग की अलग सेना है और जो इन अलग-अलग तरीकों का प्रयोग करते हुए सत्ता में पहुँची है. नेकपा (माओवादी) , 1976 में कॉ. माओ के देहांत के बत्तीस वर्षों बाद सरकार का नेतृत्व  करने वाली पहली कम्युनिस्ट पार्टी है.
समूची दुनिया में एक के बाद एक कम्युनिस्ट सत्ताओं के पतन की प्रष्ठभूमि के बरक्स हमारे देश की माओवादी सरकार इस मायने  में भी भिन्न है कि यह सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग की संयुक्त तानाशाही पर आधारित है. किसी भी मार्क्सवादी प्रस्थापना में इस प्रकर की संयुक्त तानाशाही का ज़िक्र नहीं मिलता. मार्क्सवादी विचार के अनुसार राज्यसत्ता में दो विरोधी वर्गों की संयुक्त  तानाशाही सम्भव नहीं है. हालाँकि, नेपाल के अनुभव ने साबित कर दिया है कि इससे अलग भी कुछ किया जा सकता है. आने वाले दिनों में नेपाल के अनुभव और प्रयोग के दार्शनिक और राजनितिक आधार का संश्लेषण करना होगा. इतिहास ने राज्य की दोहरी तानाशाही को सही ठहराने का दायित्व इक्कीसवीं सदी के माओवादियों के कन्धों  पर डाला है.
चेयरमेन  प्रचंड की जीत का एक और ऐतिहासिक पहलू भी है. उनकी जीत के साथ ही पॉँच दशक  पुरानी  ‘कांग्रेसशाही ‘ और कोइराला वंश का अंत हो गया, जो विस्तारवाद और साम्राज्यवाद का मुख्य सुरक्षाकवच  बना रहा और सामंतवाद एवं साम्राज्यवाद का मूर्त रूप था. इस अर्थ में भी श्रावण की 30वीं  तारीख का ऐतिहासिक महत्व है. कोइराला वंश का ढहना, साम्राज्यवाद का एक खम्बा गिरने का द्योतक है. यह राजशाही के अंत से कम मत्वपूर्ण नहीं है. वस्तुत: नेपाली जनता राजशाही और कोइराला वंश दोनों ही से समान रूप से पीड़ित थी. कोइराला वंश और ‘कांग्रेसशाही’ आधी  सदी तक राजशाही का मुख्य आधार रहे.
राजशाही कें अंत तक नेपाली जनता का प्रधान अंतरविरोध सामंतवाद के साथ था. यह स्पष्ट है कि राजशाही के अंत के बाद, नेपाली जनता का प्रधान अंतरविरोध बदल गया है, और अब यह अंतरविरोध साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के साथ है. दूसरे शब्दों में, गिरिजा प्रसाद कोइराला का अंत, साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के खिलाफ नेपाली जनता के राष्ट्रीय संघर्ष की एक महत्वपूर्ण घटना है.
गणतंत्र की स्थापना के बाद क्रांति का तात्कालिक लक्ष्य बदल गया है और उसी के अनुसार क्रांति के मित्रों एवं शत्रुओं का समीकरण भी बदला है. स्पष्टत: अब मित्र, शत्रुओं में तब्दील हो गए हैं और शत्रु, मित्र बन गए हैं. सामंतवाद और साम्राज्यवाद के दो विराट पहाडों में से एक-सामंतवाद के विशाल पहाड़ को नेपाली जनता ने ध्वस्त कर दिया है. अब नेपाली जनता के समक्ष साम्राज्यवाद और विस्तारवाद की भयावह और विराट चट्टान है. गत चार माह के दौरान नेकपा(माओवादी) को सरकार बनाने से रोकनें की साजिशें इसी का परिणाम थीं.
नेपाली जनता ने सामंतवाद को पराजित करके लोकतंत्र के संघर्ष को काफी हद तक जीत लिया है, लेकिन अभी इसे संस्थागत स्वरूप देने का काम बाकी है. हालाँकि, पूर्ण संप्रभु राष्ट्रवाद के लिए संघर्ष शुरू करना और जीतना अभी बाकी है. फिलहाल यह नहीं बताया जा सकता कि उस संघर्ष की प्रकृति और पद्धति क्या होगी. फ़िर भी, इसमें कोई दो राय नहीं है कि राष्ट्रवाद  के संघर्ष की प्रकृति  राष्ट्रीय ही होगी और यह अधिक जटिल एवं अधिक तीखा होगा. ऐसे में पार्टी की राजनितिक लाइन भी उसी दिशा में निर्देशित होगी.
साम्राज्यवाद-विस्तारवाद और उनके सहयोगियों के समर्थन के बिना लोकतंत्र के लिए संघर्ष में विजय प्राप्त करना सम्भव नहीं था. इसलिए, बारह-सूत्री समझौते को मील का पत्थर कहा गया है. राजशाही के अंत तक, नेपाली कांग्रेस- जिसका साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के साथ क़रीबी सम्बन्ध है–जैसी माओवाद की कट्टर विरोधी ताकतों को नेतृत्व देना कोई  छोटी सफलता नहीं है. इस सफलता ने, संसदीय पार्टियों के साथ गठबंधन करने, बातचीत, गोलमेज सम्मलेन, अंतरिम सरकार को आगे बढाने और सविधान सभा के जरिये जनवादी गणतंत्र की प्राप्ति के लिए, दूसरे राष्ट्रीय सम्मलेन द्वारा निरुपित की गई  और केन्द्रीय कमेटी की चुनवांग मीटिंग द्वारा निर्धारित की गई राजनितिक लाइन के सही होने को साबित किया है.
सविधान सभा के चुनाव के बाद तेजी से परिवर्तित होती परिस्थितियों के कारण क्रांतिकारी कतारों में प्रतिक्रिया के कई स्वर उभरे और एक प्रकार की सनसनी फ़ैल गई.राष्टपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव एवं यूएमएल से गठजोड़ के उपरांत पार्टी में और अधिक उथल-पुथल एवं सनसनी व्याप्त हो गई. सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न, जिसने पार्टी की आम कतारों को झकझोरा, यह था कि हमें सरकार में शामिल होना चाहिए या नहीं?
हमें उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर  अंश में नहीं, बल्कि सम्पूर्णता में और रूप के बजाय सार में तलाशने होंगे. इन सवालों के जवाब पार्टी द्वारा तय की गई रणनीति में निहित है, उसके रणकौशलों (टैक्टिक्स) में नहीं. क्रांति कभी सीधी रेखा में नहीं बढती. क्रांति का विकास कई बार आगे पीछे होते हुए, विजयों-पराजयों, आक्रमणों-सुरक्षा के सिलसिले से गुजरते हुए होता है. संख्या के हिसाब से, राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी की हार को इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए. साथ ही, एक पल के लिए भी यह नहीं भुलाया जा सकता की साम्राज्यवाद थक कर बैठ नहीं गया है. वह हताशा में, क्रांति और माओवादी  पार्टी को नष्ट करने और पीएलऐ  को निशस्त्र  करने की साजिशें रच रहा है. हमने सविधान सभा के चुनावों में साम्राज्यवाद पर करारा प्रहार करते हुए उसे रक्षात्मक रूख अपनाने को मजबूर कर दिया. इसके बाद, वे हमें धोखा  देने में कुछ हद तक सफल भी हुए. उन्होंने आक्रामक रूख अपना लिया था और हम रक्षात्मक स्थिति में आ गए थे. क्रांति का यही नियम है. निरंतर विजय और लगातार पराजय दोनों ही सम्भव नहीं हैं. हालाँकि, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में हमारे प्रत्याशी की हार हुई है क्योंकि इस घटनाक्रम ने वास्तविक राष्ट्रवादी ताकतों में नेपाली कांग्रेस के खिलाफ नफरत के बीज डाल दिए है. हमने अन्तरविरोध को  सतह पर लेने में सहायता की है, मधेश में असली मेहनतकश अवाम का हमारी पार्टी में विश्वास बढाया है और नेपाली कांग्रेस की सत्ता की भूख को भी उजागर किया है. इसी वजह से, संख्या के खेल में पार्टी की हार के बावजूद इसे हम पार्टी की बड़ी विचारधारात्मक  जीत कह रहे है. आगामी दिनों में यह राष्टवाद के संघर्ष में आधार का काम करेगी. कॉ. प्रचंड की जीत ने, एक बार फ़िर, साम्राज्यवादियों को रक्षात्मक रूख अपनाने को मजबूर  करते हुए उनकी रणनीति को निष्फल कर दिया है. इससे हमारी पार्टी आक्रामक स्थिति में आ गई है.
इस बात से इंकार नहीं है कि साम्राज्यवाद और विस्तारवाद नेपाली क्रांति की राह की रुकावटें है. पार्टी ने जनयुद्ध आरंभ होने के पहले ही क्रांति के दो मुख्य शत्रुओं के रूप में साम्राज्यवाद और विस्तारवाद को चिन्हित कर लिया था. पार्टी के इस वैज्ञानिक निरूपण की पुष्टि इस तथ्य से हो जाती है कि अतीत में जनयुद्ध को कुचलने के लिए राजशाही को इन्हीं शक्तियों का समर्थन प्राप्त हुआ था. यदि, १२ सूत्रीय समझौते से लेकर राष्टपति चुनाव तक की अवधि को देखा जाए तो पुन: इसकी पुष्टि हुई है. राजशाही के अंत के बाद, जोकि विदेशी प्रतिक्रिया का मुख्य ज़रिया था, साम्राज्यवादी ताकतों ने राज्यसत्ता के शून्य को भरने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रखा है. चुनाव में गिरिजा के परिवार के अधिकांश सदस्यों  की हार के बावजूद प्रधानमंत्री पद नहीं छोड़ने  की उनकी इच्छा यहीं रेखांकित करती है.
केन्द्रीय प्रश्न यह है कि अब क्रांति का लक्ष्य क्या है और आन्दोलन किसके खिलाफ़ और कैसे शुरू किया जाए. निश्चित तौर पर,राष्ट्रवाद के लिए संघर्ष में संघर्ष का निशाना वे ताकतें होंगी जो साम्राज्यवाद और विस्तारवाद के बचाव में आगे आएंगी. गिरिजा को उखाड़ फेंकने में प्राप्त हुई सफलता साम्राज्यवाद के खिलाफ़ संघर्ष की महत्वपूर्ण कड़ी है.
हम  पुराने अन्तरविरोध के निषेध और नए अन्तरविरोध के उभार के संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे है. यह प्रक्रिया एक निश्चित अवधि में पूर्ण होगी. इस अवधि एवं इस प्रक्रिया के पुरा होने  तक पेटी-बुर्जुआ उतावलेपन में आन्दोलन या उभार  की या शान्ति की प्रक्रिया से हटने की बात करना आत्मघाती होगा. आने वाले समय में सम्पूर्ण संघर्ष के साथ-साथ राष्ट्रवाद के संघर्ष को आगे बढाने के लिए केवल राष्ट्रिय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक धुर्वीकरण  और गठबंधन की आवश्यकता है. यह चरण देशभक्त, जनवादी और वाम ताकतों के साथ गठबंधन करने का है. यह सरकार में  शामिल होकर या सरकार से बाहर रहकर, दोनों ही तरीकों से समान रूप से किया जा सकता है. ऐसा नहीं है कि पार्टी सरकार में शामिल होगी या शामिल नहीं होगी तो वह ‘ख़त्म’ हो जायेगी. सरकार में शामिल हुआ जाए या नहीं हुआ जाए इसकी बहस शुरू करने से अधिक महत्वपूर्ण और उपयुक्त इस पर चर्चाओं की शुरुआत करना होगा कि भविष्य में हम क्रांति के भू-आयामी मोर्चों की लामबंदी और मोर्च की शुरुआत  कर सकेंगे या नहीं. सरकार में शामिल होने या नहीं होने के प्रश्न से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम क्रांतिकारी ताकतों और प्रतिक्रियावादी ताकतों का तीखा धुर्वीकरण कर पाने में सक्षम होंगे या नहीं.
सरकार में शामिल होने या नहीं होने का प्रश्न सैद्धांतिक प्रश्न नहीं है. यह एक रणकौशलात्मक प्रश्न है. यदि सरकार में शामिल होने से हमें भावी क्रांति को आगे बढाने में सहायता मिलती है, इससे जनतंत्र को हासिल करने का मार्ग प्रशस्त होता है, राष्ट्रवाद  के संघर्ष में जीत सुनिश्चित होती है या इससे क्रांति, नवजनवादी क्रांति की दिशा में एक कदम आगे बढ़ती है, तो सरकार में भागीदारी करना सही है, अन्यथा ऐसा करना गलत होगा. यदि हम क्रांति की नई योजना, नीति और कार्यक्रम बनाने और बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप नई राजनितिक  एवं सैन्य लाइन के निरुप्पन में असफल रहते हैं तो हम सरकार में शामिल नहीं होने पर भी क्रांति को आगे नहीं बढा सकते हैं. यदि हम सरकार में रहते हुए भी वर्ग संघर्ष को धारदार और तेज कर सकते हैं, तो हम क्रांति के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं. अंग्रेजी से अनुवाद : संदीप शर्मा

अगली कड़ी में :

नेकपा (माओवादी) के विदेश ब्यूरो के सदस्य लक्ष्मण पन्त के ऊपर प्रकाशित लेख के मूल्यांकन से गंभीर मतभेद रखता हुआ आलोक रंजन का लेख भी हम प्रकाशित कर रहे हैं. पाठकों को याद दिला दें कि ‘बिगुल’ के मई ‘०८ और जून ‘०८  के अंकों में हमने नेपाल के कम्युनिस्ट  आन्दोलन के इतिहास के मूल्यांकन और नेपाली क्रांति की संभावनाओं-समस्यायों पर केंद्रित लेख दो किश्तों में छापा था. नेकपा (माओवादी) के वरिष्ठ नेता कॉ. बाबूराम भट्टराई का साक्षात्कार भी मई ‘०८ के अंक में प्रकाशित हुआ था. इस लेख को उसी की निरंतरता में, तथा उसी परिप्रेक्ष्य में रखकर पढ़ा जाना चाहिए. नेपाली क्रांति का प्रश्न दुनिया भर के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के सरोकार और चिंता से जुडा हुआ है. वहां होने वाले हर घटनाविकास का बारीकी से अध्ययन-विश्लेषण क्रांति की सैद्धांतिक-व्यवहारिक समस्याओं को समझने के लिए जरूरी है. इस दृष्टि से हम समझते हैं कि इन लेखों के प्रकाशन से एक सार्थक बहस की शुरुआत हो सकेगी. हम नेपाल और भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों से तथा वाम बुद्धिजीवियों से इस बहस में भागीदारी का अनुरोध करते हैं.

–संपादक ‘बिगुल’ .

नेपाली क्रांति किस ओर?–यहाँ देखें

कहाँ से फूटेंगी उम्मीद की किरणें

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नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ फरवरी २००८ से साभार

परिवर्तन के रास्ते और उसकी समस्याओं-चुनौतियों के बारे में कुछ बातें

[मजदूर वर्ग के एक राजनितिक अखबार की जरूरत के बारे में कुछ जरूरी बातें]

[कहाँ खड़ी है आज की दुनिया?]

[हमारा देश : नई समाजवादी क्रांति की मंज़िल में ]

[कहाँ खड़ा है देश का कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन?

[नये सिरे से पार्टी निर्माण में अख़बार की भूमिका

[शुरुआत कहाँ से करें?]

[नई समाजवादी क्रांति के तूफ़ान को निमंत्रण दो!]

मजदूर वर्ग के एक राजनितिक अखबार की जरूरत के बारे में कुछ जरूरी बातें

इस अंक के साथ ‘बिगुल’ प्रकाशन के दसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है. एक बेहद छोटी और अनुभवहीन टीम के साथ हमने इतिहास के इस कठिन अंधेरे दौर में अनचीन्हे रास्ते पर सफर शुरू किया था. अनुभव और टीम के अलग-अलग साथिओं की क्षमता की कमी को हमने अपने साझा संकल्प और ‘करते हुए सीखते जाने’ के विचार से भरपाई की और हम आगे बढ़ते रहे. इस कठिन और दुर्गम यात्रा पर हमारे हाथ-पाँव तो कई बार फूले लेकिन बोरिया-बिस्तर समेटने का ख्याल पल भर को भी मन में नहीं आया. ठहराव के मौकों पर देश की मेहनतकश जनता की मुक्ति का सपना हमारे दिलों को निराशा के अंधेरे में डूब जाने से बचाता रहा, पूँजी और लोभ-लाभ की दुनिया से नफरत हमें ताकत देती रही और मजदूर वर्ग के अतीत के महान संघर्षों की अग्निशिखाएं हमारी राहों को रोशन करती रही. एक दशक लंबे इस सफर के दौरान हमने अगर पीछे मुड़कर देखा भी  तो सिंहावलोकन की मुद्रा में-अपनी कमियों-कमजोरियों को जानने के लिए,जिससे आगे के सफर पर और अधिक मजबूती से कदम बढाये जा सकें. इस दौरान हम अपनी रफ्तार से कभी संतुष्ट नहीं रहे. ‘बिगुल’ के घोषित उद्देश्यों और जिम्मेंदारियों  का एक बेहद छोटा हिस्सा ही अब तक हम पूर कर सकें हैं. काफी कुछ किया जाना अभी बाकी है. जो बाकि है उसे पूरा करने के लिए हम कृतसंकल्प हैं क्योंकि हमें भरोसा है कि ‘बिगुल’ के जागरूक पाठकों की ताकत हमारे साथ खड़ी है. ‘बिगुल’ के प्रवेशांक में हमनें देश-दुनिया की वस्तुगत  परिस्थितियों और देश के क्रांतिकारी मजदूर आन्दोलन के हालात की ज़मीन पर खड़े होकर मजदूर वर्ग के अखिल भारतीय पैमाने के एक ऐसे राजनितिक अखबार की फौरी जरूरत के बारे में लिखा था जो सभी भारतीय भाषायों में एक साथ निकलता और कम से कम साप्ताहिक निकलता. उस समय अकेले अपने बूते ऐसा   अख़बार निकालना हमारे लिए सम्भव नहीं था. इसलिए हमने एक मासिक अख़बार से शुरुआत  की थी. उस समय अखिल भारतीय अख़बार एक ही सूरत में निकल सकता था जब देश के अधिकांश या कम से कम कुछ कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ग्रुपों, संगठनों की संयुक्त शक्ति इस काम को हाथ में लेती. लेकिन क्रांतिकारी संगठनों के बीच मौजूद जिन तमाम असूली और असली मतभेदों के चलते यह उस समय सम्भव नहीं था, वे आज भी न केवल बरक़रार हैं वरन अब तो यह संभावना लगभग ख़तम हो गई लगती  है.  नक्सलबाड़ी किसान उभार के चार दशक बाद  कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन के ठहराव-बिखराव की जो मौजूदा स्थिति  है उसे देखते हुए अब तो ऐसा नामुमकिन लग रहा है. हमने प्रवेशांक में लिखा था कि जितनी जल्दी हो सकेगा हम ‘बिगुल’ को दैनिक न सही तो कम से कम साप्ताहिक के स्तर तक ले आएंगे. हम इस लक्ष्य को अब तक हासिल नहीं कर सके हैं. लेकिन आज इसकी जरूरत हम पहले से भी काफी ज्यादा शिद्दत के साथ महसूस कर रहे हैं. एक दशक पहले ‘बिगुल’ प्रकाशन जब शुरू हुआ था तब देश में भूमंडलीकरण की नीतियों के नतीजे उतने खुले रूप में सामने नहीं आए थे. आज मजदूर वर्ग ही नहीं सभी मेहनतकश जमातें और यहाँ तक की मध्य वर्ग का बडा हिस्सा भी भूमंडलीकरण   की विनाशक ज़द में आ चुका है. एक तरफ़ मेहनत की दुनिया की घुटन बढती जा रही है दूसरी और मेहनत को हड़पने वाले परजीवियों  की दुनिया भोग-विलास और नैतिक अध:पतन के उस रसातल तक पहुँचती जा रही है जहाँ तक रोमन सभ्यता  भी नहीं पहुँची थी. क्या हमें इंतजार करते रहना चाहिए कि कोई विसूवियस जैसा ज्वालामुखी फ़िर से फूटे और पोम्पई शहर की तरह विलासियों की दुनिया को निगल जाए. हरगिज नहीं! जितना बड़ा सच यह है कि दुनिया बदलती है उतना बड़ा सच  यह भी है कि यह अपने आप नहीं बदलती. जिस तरह प्रकृति में किसी जड़ पिंड को गतिमान करने के लिए बाहरी बल की जरूरत होती है उसी तरह जड़ता और गतिरोध में पड़े समाज को गतिमान करने के लिए बाहर से बल लगाना पड़ता है. भूमंडलीकरण की नीतियों के खिलाफ दुनिया भर में यहाँ-वहां हो रहे छिटपुट जन विस्फोटों से, स्वत:स्फूर्त संघर्षों से विश्व पूंजीवाद के आततायी किले नहीं भहरा जायेंगे. यह भी नहीं होगा कि विश्व पूंजीवाद अपने तमाम असाध्य अंदरूनी अंतरविरोधों और ढांचागत  संकटों से अपने आप चरमराकर बैठ जाएगा. अतीत की तमाम मजदूर क्रांतियों का इतिहास भी यही बताता है कि दुनिया को संगठित नेतृत्व  वाली सुचेतन क्रांतियाँ ही बदल सकती हैं. और आज की पूंजीवादी दुनिया को केवल मार्क्सवादी विज्ञानं के मार्गदर्शन में काम करने वाली सर्वहारा वर्ग की क्रातिकारी पार्टी के नेतृत्व में संगठित जनसंघर्ष ही बदल सकते हैं. तभी एक नई दुनिया के बंद दरवाजे खुलेंगे. और सर्वहारा  वर्ग की ऐसी सही-सच्ची क्रातिकारी पार्टी का निर्माण एवं गठन करने के लिए जरूरी है मजदूर वर्ग का एक क्रान्तिकारी राजनितिक अख़बार! ऐसे अख़बार के बारे में हमारा यह  अहसास देश और दुनिया की वस्तुगत परिस्थितियों के साथ ही देश की कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन की मौजूदा स्थिति के ठोस, वैज्ञानिक आकलन पर खड़ा है.

कहाँ खड़ी है आज की दुनिया?

भविष्य के प्रति आशावादी होना चाहिए लेकिन उसकी इमारत ठोस जमीन पर खड़ी होनी चाहिए. क्रांतिकारी जब भविष्य के अपने मंसूबे बाँधता है तो अपने मन की चाहतों को वह सच्चाइयों पर थोपता नहीं. शुरुआत वह सच्चाइयों का साहसपूर्वक सामना करने से ही करता है. और आज की कड़वी सच्चाई यह है कि शोषण-दमन और प्रतिरोध की ताकतें पिछले एक दशक में भी प्रतिरोध की ताकतों पर हावी रही हैं. पूंजीवादी शोषण-दमन का तंत्र और अधिक संगठित हुआ है, जबकि प्रतिरोध आज भी असंगठित है, गतिरोध और निराशा का माहौल है. विश्व ऐतिहासिक स्तर पर सर्वहारा वर्ग और समाजवादी क्रांतियों  की पराजय के बाद, विश्व-शक्ति-संतुलन विगत लगभग तीन दशकों से पूंजीवाद के पक्ष में बना हुआ है. फ़िर भी अगर वस्तुगत परिस्थितियों  की बात की जाए तो साम्राज्यवाद-पूंजीवाद विरोधी नई सर्वहारा क्रांतियों की सर्वाधिक उर्वर  और सम्भावनासम्पन्न ज़मीन  एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका के उन पिछडे पूंजीवादी देशों में है जहाँ प्राक्पूंजीवादी उत्पादन-सम्बन्ध मूलत: और   मुख्यत: टूट चुके हैं और अवशेष-मात्र के रूप में मौजूद हैं, जहाँ पूंजीवादी उत्पादन-सम्बन्ध का वर्चस्व स्थापित हो चुका है, वहां की अर्थव्यवस्था विविधिकृत है, जहाँ बुनियादी एवं अवरचनागत उद्योगों  सहित औद्योगिक उत्पादन का भारी विकास हुआ है तथा औद्योगिक सर्वहारा वर्ग की भारी आबादी अस्तित्व में आ चुकी है, जहाँ गावों में पूँजी की व्यापक पैठ के साथ ही ग्रामीण सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा आबादी की भी एक भारी संख्या पैदा हो चुकी है, जहाँ पूंजीवादी सामाजिक-सांस्कृतिक तंत्र के विकास के चलते सर्वहारा क्रांति के सहयोगी शिक्षित निम्न मध्यवर्ग और क्रांतिकारी बुद्धिजीवी समुदाय का प्रचुर विकास हुआ है तथा जहाँ कुशल मजदूरों एवं तकनीशियनों-वैज्ञानिकों के साथ ही विज्ञानं-तकनोलोजी  के स्वतन्त्र विकास के लिए जरूरी मानव-उत्पादन मौजूद है. ऐसे अगली कतार के क्रांतिकारी सम्भावनासम्पन्न  देशों में ब्राजील, अर्जेंटीना, मेक्सिको, चीले, द. अफ्रीका, नाईजिरिया, मिस्त्र, ईरान, तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिप्पीन्स आदि के साथ ही भारत भी शामिल है. (चीन,पूर्व सोवियत संघ के घटक देशों और कुछ पूर्वी यूरोपीय देशों में भी नई क्रांतियों की परिस्थितियाँ तेजी से तैयार हो रही हैं, जहाँ की जनता कभी समाजवादी क्रांति के प्रयोगों, परिणामों को देख चुकी है, पर इन देशों की स्थिति कुछ भिन्न है जो अलग से चर्चा का विषय है). समस्या यह है कि तीसरी दुनिया के जिन देशों में ज़मीन तैयार है या हो रही है,वहां क्रांतिकारी कम्युनिस्ट शक्तियां बिखरी हुई हैं. वे देश स्तर की एक  पार्टी के रूप में संगठित नहीं हैं और व्यापक जनता के बीच उनका आधार भी देशव्यापी नहीं है. इसका एक वस्तुगत  कारण यह जरूर है कि सर्वहारा वर्ग  और पूंजीपति वर्ग के बीच जारी विश्व ऐतिहासिक महासमर के पहले चक्र की समाप्ति और इसके दूसरे, निर्णायक चक्र की शुरूआत के बीच अन्तराल में, प्रतिक्रिया की सभी शक्तियों ने क्रांतिकारी शक्तियों को पीछे धकेलने-कुचलने के लिए अपनी सारी शक्ति झोंक दी है. अतीत की क्रांतियों का शासक वर्गों ने भी समाहार किया है. हर देश की पूंजीवादी राज्यसता अपने सामाजिक-अवलम्बों के विकास के लिए पहले की अपेक्षा बहुत अधिक कुशलता से काम कर रही हैं और इसमें साम्राज्यवादी देशों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से भी भरपूर सहायता मिल रही है. साथ ही आज सिनेमा, टीवी और  प्रिंट-मिडीया सहित समस्त संचार माध्यमों का अभूतपूर्व प्रभावी  इस्तेमाल पूंजीवादी संस्कृति एवं विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए, व्यापक जन समुदाय की दिमागी गुलामी को लगातार खाद-पानी देने के लिए तथा कम्युनिज्म, विगित सर्वहारा  क्रांतियों, उनके नेताओं  और समाजवादी  प्रयोगों के बारे में भांति-भांति के सफ़ेद झूठों का प्रचार करके उन्हें कलंकित-लांछित करने के लिए, विश्व स्तर पर किया जा रहा है. इस ऐतिहासिक अन्तराल की वस्तुगत स्थिति का एक अहम पहलू यह भी है कि इसी दौरान विश्व पूंजीवाद की संरचना एवं कार्य-प्रणाली में कुछ ऐसे महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, जिन्हें समझे बिना इक्कीसवीं शताब्दी की नयी सर्वहारा क्रांतियों की रणनीति एवं आम रणकौशल की कोई समझ बनाई ही नहीं जा सकती. इन वैश्विक बदलावों को समझकर विश्व सर्वहारा क्रांति की नयी आम दिशा निर्धारत करने के लिए न तो विश्व सर्वहारा का मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन-माओ जैसा कोई मान्य नेतृत्व है, न ही सोवियत संघ और चीन जैसा कोई समाजवादी देश और वहां की अनुभवी पार्टियों जैसी कोई पार्टी है और न ही इन्टरनेशनल जैसा दुनिया भर की पार्टियों का कोई अंतरराष्ट्रीय मंच है.  ऐसी स्थिति में विश्व पूंजीवाद की कार्यप्रणाली में, और साथ ही दुनिया  के अधिकांश क्रांतिकारी सम्भावनासम्पन्न देशों की राज्यसत्ताओं  एवं सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं में आये बदलावों को जान-समझकर क्रांति की मंजिल और मार्ग को जानने-समझाने का काम इन देशों के छोटे-छोटे ग्रुपों-संगठनों में बनते-बिखरते  कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठनो को ही करना है. जो कम्युनिस्ट पार्टियाँ संशोधनवादी होकर संसद-मार्ग का राही बन चुकी हैं, वे क्रांति-मार्ग पर कदापि वापस नहीं लौट सकती. वे पतित होकर बुर्जुआ पार्टियाँ बन चुकी हैं, जिनका काम समाजवाद का मुखौटा लगाकर मेहनतकश जनता को धोखा देना है और पूंजीवाद व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा-पंक्ति की भूमिका निभानी है. विपरीततम   वस्तुगत स्थितियों से जूझकर अक्तूबर क्रांतिकारी ताकतें ही कर सकती हैं जो शांतिपूर्ण  संक्रमण के हर सिद्धांत का और संशोधनवाद के हर रूप का विरोध करती हैं, जो वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा अधिनायकवाद के सिद्धांत का और संशोधनवाद के हर रूप का विरोध करती हैं,जो वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा अधिनायकत्व के सिद्धांत को, बुर्जुआ राज्यसता को बलपूर्वक चकनाचूर करके सर्वहारा राज्यसता की स्थापना के सिद्धांत को तथा पूंजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने के लिए समाजवादी समाज में सर्वहारा वर्ग को सर्वोतोमुखी अधिनायाकतत्व के अंतर्गत नए-पुराने बुर्जुआ तत्वों, बुर्जुआ अधिकारों और बुर्जुआ विचारों के विरूद्ध सतत् वर्ग संघर्ष चलाने के उस सिद्धांत को स्वीकार करती हैं जो माओ के नेतृत्व में चीन में सर्वहारा सांस्कृतिक-क्रांति (1966-76) के दौरान प्रतिपादित किया गया. लेकिन कम्युनिज्म के इन क्रांतिकारी सिद्धांतों को स्वीकारने वाले कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठन अपनी तमाम ईमानदारी, बहादुरी और कुर्बानी के बावजूद और दुनिया के अधिकांश देशों में अपनी सक्रीय मौजूदगी के बावजूद, फिलहाल विचारधारात्मक रूप से काफी कमज़ोर हैं. माओ के महान अवदानों को वैज्ञानिक भाव के बजाय वे भक्ति भाव से स्वीकार करते हैं. इसी कठमुल्लावाद के चलते वे क्रांति के कार्यक्रम  के प्रश्न को भी प्राय: विचारधारा का प्रश्न बना देते हैं और माओ के विचारधारात्मक अवदानों को स्वीकारते हुए इस सीमा तक चले जाते हैं कि ऐसा मानने लगते हैं कि चूंकि माओ और चीन की पार्टी ने अपने समय में तीसरी  दुनिया के देशों में साम्राज्यवाद-सामंतवाद विरोधी नवजनवादी क्रांति की बात कही थी, इसलिए हमें वैसा ही करना होगा. इससे अलग सोचना ही वे मार्क्सवाद से विचलन मानते हैं. ये कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठन जीवन की ठोस सच्चाई  को सिद्धांतों के सांचे में फिट करने की कोशिश करते रहते हैं. यही कठमुल्लावाद है. इसी कठमुल्लावाद के चलते, साम्राज्यवाद की बुनियादी प्रकृति को समझकर आज उसकी कार्य प्रणाली एवं संरचना में आए बदलावों को समझने की बजाय अधिकांश कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठन साम्राज्यवाद  को हूबहू वैसा ही देखना चाहते हैं जैसा वह लेनिन के समय में था. वे राष्ट्रीय-औपनिवेशिक प्रश्न की समाप्ति के यथार्थ को, परजीवी, अनुत्पादक वित्तीय पूँजी के भारी विस्तार एवं निर्णायक वर्चस्व के यथार्थ को, राष्ट्र्पारीय निगमों के बदलते चरित्र एवं कार्यप्रणाली और वित्तीय पूँजी के भूमंडलीकरण के यथार्थ को, पूंजीवादी उत्पादन-पद्धति में आए अहम बदलावों के यथार्थ को, भूतपूर्व उपनिवेशों में प्राक् पूंजीवादी संबंधो की बजाय पूंजीवादी-उत्पादन-संबंधो की प्रधानता तथा क्रांति के रणनीतिक संश्रय  ( वर्गों के संयुक्त मोर्चे) में परिवर्तन के यथार्थ को समझने की कोशिश करने की बजाय उनकी अनदेखी करते हैं. ऐसे में उनके क्रांतिकारी सामाजिक प्रयोग मजदूर  वर्ग और सर्वहारा क्रांति के अन्य मित्र वर्गों को लामबंद करने के बजाय प्राय:  लकीर की फकीरी  और रूटीनी कवायद बनकर रह जाते हैं और कभी-कभी तो शासक वर्गों का कोई हिस्सा अपने आपसी संघर्षों में उनका इस्तेमाल भी कर लेता है. इस कठमुल्लावाद के चलते सामाजिक प्रयोगों की विफलता ने एक लंबे गतिरोध और व्यापक मेहनतकश जनता से अलगाव की स्थिति पैदा की है. इस स्थिति में, दुनिया के सभी अग्रणी क्रांतिकारी सम्भावना वाले देशों में न केवल देश स्तर की एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी के गठन का काम लंबित पड़ा हुआ है, बल्कि कठमुल्लावाद और गतिरोध की लम्बी अवधि दक्षिणपंथी  और “वामपंथी” अवसरवाद के विचारधारात्मक विचलनों को जन्म दे रही है. ने.क. पा. (माओवादी) के नेतृत्व में विजयोंमुख  जनवादी क्रांति का उदाहरण देते हुए दुनिया के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शिविर में हावी कठमुल्लावादी सोच जोर-शोर से यह साबित करने की कोशिश करती है कि अभी भी तीसरी दुनिया के देशों में नवजनवादी क्रांति की धारा ही विश्व सर्वहारा क्रांति की मुख्य धारा और मुख्य कड़ी बनी हुई है. हम नेपाल के माओवादी क्रांतिकारियों को (कुछ अहम विचारधारात्मक  मतभेदों, आपत्तियों एवं आशंकाओं के बावजूद) हार्दिक इंकलाबी सलामी देते हैं, लेकिन साथ ही,विनम्रतापूर्वक यह कहना चाहते हैं कि नेपाल की विजयोंमुख  क्रांति इक्कीसवीं सदी में होने वाली बीसवीं सदी की क्रांति है. यह इतिहास का एक ‘बैकलागहै. यह इक्कीसवीं सदी की प्रवृत्ति-निर्धारक  व मार्ग-निरूपक क्रांति नहीं  है. नेपाल दुनिया के उन थोड़े से पिछडे  देशों में से एक है, जहाँ बहुत कम औद्योगिक विकास  हुआ है और जहाँ प्राक् पूंजीवादी भूमि, सम्बन्ध मुख्यत: मौजूद है. भारत, ब्राजील, अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका आदि की ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों की स्थिति भी नेपाल से काफी भिन्न है. आज तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों में प्राक् पूंजीवादी भूमि सम्बन्ध मूलत: और  मुख्यत: नष्ट हो चुके हैं. वहां पूंजीवादी विकास मुख्य प्रवृति बन चुकी है. इन देशों का पूंजीपति वर्ग सत्तासीन होने के बाद साम्राज्यवादी देशों के पूंजीपतियों   का कनिष्ट साझेदार बन चुका है. इन देशों की बुर्जुआ राज्यसत्तायें देशी पूंजीपति  वर्ग के साथ ही साम्राज्यवादी शोषण का भी उपकरण बनी हुई हैं. इन देशों में साम्राज्यवाद-पूंजीवाद विरोधी, नयी समाजवादी क्रांति की स्थिति उत्पन्न हुई है और ऐसा विश्व पूंजीवाद के इतिहास के नए दौर की एक नई विशिष्टता है. इस नई ऐतिहासिक परिघटना की अनदेखी आज दुनिया के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शिविर की मुख्य समस्या है. जब तक यह समस्या हल नहीं होगी, तब तक विश्व सर्वहारा क्रांति की नई लहर आगे की ओर गतिमान नहीं हो सकती.

हमारा देश : नई समाजवादी क्रांति की मंज़िल में

भारत का कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन यदि विचारधारात्मक कमज़ोरी और  अधकचरेपन का शिकार नहीं होता तो भारतीय समाज के पूंजीवादी  रूपांतरण की  प्रक्रिया  को गत शताब्दी के सातवें-आठवें दशक में ही समझकर समाजवादी क्रांति के कार्यक्रम के नतीज़े तक पहुँच सकता था. और अब तो भारतीय समाज का पूंजीवादी चरित्र इतना स्पष्ट हो चुका है कि कठमुल्लेपन से मुक्त कोई नौसिखुआ मार्क्सवादी भी इसे देख समझ सकता है. गांवों  के छोटे और मंझोले किसान आज अपनी ज़मीन के मालिक ख़ुद हैं और सामंती लगान और उत्पीडन नहीं, बल्कि पूँजी की मार उनको लगातार जगह-ज़मीन से उजाड़कर दर-ब-दर कर रही है. किसान आबादी के विभेदीकरण और सर्वहारा की प्रक्रिया एकदम स्पष्ट है. सालाना लाखों छोटे और निम्न मध्यम किसान उजड़कर सर्वहारा की कतारों में शामिल हो रहे हैं. धनी और उच्च मध्यम किसान बाज़ार के लिए पैदा कर रहे हैं और खेतों में भाड़े के मजदूर लगाकर अधिशेष निचोड़ रहे हैं. गांवों में अनेकश: नए रास्तों और तरीकों से वित्तीय पूँजी की पैठ बढ़ी है और देश के सुदूरवर्ती हिस्से भी एक राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी  के भीतर आ गए हैं. गाँव के धनी और खुशहाल मध्यम किसान आज क्रांतिकारी भूमि-सुधार के लिए नहीं बल्कि निचोड़े जाने वाले अधिशेष में अपनी भागीदारी बढ़ाने को लेकर आन्दोलन करते हैं. कृषि-लागत कम करने और कृषि-उत्पादों के लाभकारी मूल्यों की मांग की यही अंतर्वस्तु है, इसे मार्क्सवादी अर्थशास्त्र का एक सामान्य विद्यार्थी  भी समझ सकता है. देश के पुराने औद्योगिक केन्द्रों को पीछे छोड़ते हुए आज सुदूरवर्ती कोनों तक लाखों की आबादी वाले नए-नए औद्योगिक केन्द्र विकसित हो गए हैं. यातायात-संचार के साधनों का विगत तीन दशकों के दौरान अभूतपूर्व तीव्र गति से विकास हुआ है. ऑंखें  खोल देने के लिए मात्र यह एक तथ्य ही काफ़ी है की पूरे देश के संगठित-असंगठित, ग्रामीण व शहरी सर्वहारा की आबादी आज पचास करोड़ के आसपास पहुँच रही है और इसमे यदि अर्धसर्वहारा की आबादी भी जोड़ दी जाए तो यह संख्या कुल आबादी के आधे को भी पार कर जायेगी. यह किसी प्राकृतिक अर्थव्यवस्था या अर्द्धसामंती उत्पादन संबंधो के दायरे में कत्तई संभव नहीं हो सकता था. आज का भारत न केवल क्रांतिपूर्व चीन से सर्वथा भिन्न है, बल्कि वह 1917  के रूस से भी कई गुना अधिक पूंजीवादी है. आज के भारत में केवल पूंजीवाद-विरोधी समाजवादी क्रांति की बात ही सोची जा सकती हैं. जहाँ तक साम्राज्यवाद का प्रश्न है, भारत जैसे सभी उत्तर औपनिवेशिक, पिछडे पूंजीवादी देश साम्राज्यवादी शोषण और लूट के शिकार हैं. हम आज भी साम्राज्यवाद के युग में ही जी रहे हैं, लेकिन साम्राज्यवादी शोषण की प्रकृति आज उपनिवेशों और नवउपनिवेशों के दौर से सर्वथा भिन्न है. भारतीय पूंजीवादी वर्ग आज देशी बाज़ार पर अपना निर्णायक वर्चस्व स्थापित करने के लिए राज्यसत्ता पर कब्ज़ा की लडाई नहीं लड़ रहा है. राज्यसत्ता पर तो वह 1947 से ही  काबिज़ है. अब उसकी मुख्य लडाई देश की मेहनतकश आबादी और आम जनता के विरुद्ध है लेकिन उद्योगों  और बाज़ार के विकास के लिए उसे पूँजी और तकनोलोजी, तेल व अन्य ज़रूरतों के लिए विश्व बाज़ार की भी ज़रूरत है. यह ज़रूरत भी उसे विश्व बाज़ार के चौधरियों के आगे झुकने के लिए मज़बूर करती है. अपनी इन ज़रूरतों और विवशताओं के चलते भारतीय पूंजीपति वर्ग साम्राज्यवाद के सामने घुटने टेककर समझौते करता है और उनके साथ मिलकर भारतीय जनता का शोषण करता है. ऐसा करते हुए वह साम्राज्यवादियों  से निचोड़े गए कुल अधिशेष में अपनी भागीदारी बढ़ाने को लेकर मोलतोल भी करता है और दबाब भी बनाता है, लेकिन उसकी यह लड़ाई राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई नहीं बल्कि बड़े लूटेरों से अपना हिस्सा बढ़ाने की छोटे लूटेरे की लड़ाई मात्र है. अपनी इसी लड़ाई में भारतीय पूंजीपति वर्ग साम्राज्यवादी लूटेरों की आपसी होड़ का भी यथासंभव लाभ उठाने की कोशिश करता है. आजादी के बाद के तीन दशकों तक, जनता से पाई-पाई निचोड़कर समाजवाद के नाम पर  राजकीय पूंजीवाद का ढांचा खड़ा करके उसने साम्राज्यवादी दबाब का एक हद तक मुकाबला किया, लेकिन देशी पूँजी की ताकत बढ़ने के साथ ही, निजीकरण की प्रक्रिया की शुरूआत हुई और फ़िर एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में अलग-अलग पूंजीपतियों  ने विदेशी कंपनियों से पूँजी और तकनोलाजी लेने के लिए सरकार पर दबाब बनाना शुरू किया. इसके चलते उदारीकरण  की प्रक्रिया तेज हुई. निजीकरण-उदारीकरण के इस नए दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था पर साम्राज्यवादी पूँजी का दबाब बहुत अधिक बढ़ा है लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं कि उपनिवेशवाद की वापसी हो रही है. ऐसा सोचना भारतीय पूंजीपति वर्ग की स्थिति को नहीं समझ पाने का नतीज़ा है. भारतीय पूंजीपति वर्ग विश्व पैमाने के अधिशेष विनियोजन में साम्राज्यवादी शक्तियों के कनिष्ट साझीदारों की पंगत में बैठकर इस देश की राज्यसत्ता पर काबिज़ बना हुआ है और उसकी राज्यसत्ता साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिए वचनवद्ध है. साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए पूंजीवाद का कोई भी हिस्सा अब जनता के अन्य वर्गों का रणनीतिक सहयोगी नहीं बन सकता. यानि साम्राज्यवाद-विरोध का प्रश्न आज राष्ट्रीय मुक्ति का प्रश्न न रहकर  देशी पूँजीपति वर्ग और उसकी राज्यसत्ता के विरुद्ध संघर्ष का ही एक अविभाज्य अंग बन गया है. भारत जैसे भूतपूर्व उपनिवेशों में आज एक सर्वथा नए प्रकार की समाजवादी क्रांति की-साम्राज्यवाद-पूंजीवाद विरोधी क्रांति की स्थिति प्रकट हुई है. इस नए स्थिति को समझे बिना भारतीय जनता की मुक्ति के उपक्रम को एक कदम भी आगे नहीं बढाया जा सकता.

कहाँ खड़ा है देश का कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन?

लेकिन ऐसा करने की बजाय, भारत के अधिकांश कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठन आज कर क्या रहे हैं? कुछ तो ऐसे छोटे-छोटे संगठन हैं जो कोई भी व्यवहारिक कार्रवाई करने की बजाय साल भर में मुखपत्र के एकाध-अंक निकालकर और कुछ संगोष्ठी-सम्मलेन करके बस अपने जिंदा होने का प्रमाण पेश करते रहते हैं. उनकी तो चर्चा करनी ही बेकार है. कुछ ऐसे हैं जो देश की पचास करोड़ आबादी को छोड़कर मालिक किसानो की लागत मूल्य कम करने और लाभकारी मूल्य तय करने की मांग को लेकर आंदोलनों में लगे रहते हैं और व्यवहारत: सर्वहारा वर्ग के हितों पर कुठारघात करते हुए, छोटे और मंझोले मालिक किसानों के आंदोलनों का पुछल्ला  बनकर नरोदवाद के विकृत भारतीय संस्करण प्रस्तुत करते रहते हैं. वे लोग वस्तुत: कम्युनिस्ट क्रांतिकारी नहीं बल्कि “मार्क्सवादी नरोदवादी” हैं. कृषि और कृषि से जुड़े उद्योगों की भारी ग्रामीण सर्वहारा आबादी को संगठित करने तथा राजनितिक प्रचार एवं आन्दोलन के द्वारा गाँव के गरीबों व छोटे किसानों को समाजवाद के झंडे तले इकठ्ठा करने की कोशिश कोई संगठन नहीं कर रहा. इसकी बजाय, यहाँ-वहां, सर्वोदवियों की तरह, भूमिहीनों के बीच पट्टा-वितरण जैसी मांग उठाकर कुछ संगठन ग्रामीण सर्वहारा में ज़मीन के निजी मालिकाने की भूख पैदा करके उन्हें समाजवाद के झंडे के खिलाफ़ खड़ा करने का प्रतिगामी काम ही कर रहे हैं. औद्योगिक सर्वहारा के बीच किसी भी मा. ले. संगठन की कोई प्रभावी पैठ-पकड़ आजतक नहीं बन पाई है. कुछ संगठन औद्योगिक सर्वहारा वर्ग में काम करने के नाम पर केवल मजदूर वर्ग  के कारखाना-केंद्रित आर्थिक संघर्षों तक ही अपने को सिमित रखे हुए  हैं और अर्थवाद-ट्रेडयूनियनवाद  की घिनौनी बानगी पेश कर रहे हैं. मजदूर वर्ग के बीच राजनितिक प्रचार कार्य, उनके बीच से पार्टी-भरती और राजनितिक मांगों के इर्द-गिर्द व्यापक  मज़दूर आबादी को लामबंद करने का काम उनके एजेंडे पर है ही नहीं. मज़दूर वर्ग के बीच जन-कार्य और पार्टी कार्य विषयक लेनिन की शिक्षाओं के एकदम उलट, ये संगठन मेंशेविकों से भी कई गुना अधिक घटिया सामाजिक जनवादी आचरण कर रहे हैं. भारतीय क्रांति के कार्यक्रम की ग़लत समझ के कारण, भारत का कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन शासक वर्गों की आपसी मोल-तोल में, वस्तुगत तौर पर, बटखरे के रूप में इस्तेमाल हो रहा है. जब कुछ कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठन जोर-शोर से कृषि-लागत कम करने और लाभकारी मूल्य की लड़ाई लड़ते हैं तो पूंजीपति वर्ग के साथ मोल-तोल में धनी किसानों के हाथों बटखरे के रूप  में इस्तेमाल हो जाते हैं. जब वे साम्राज्यवाद का विरोध करते हुए राष्ट्रीय मुक्ति का नारा देते हैं तो साम्राज्यवादियों और भारतीय  पूंजीपतियों के बटखरे के रूप में इस्तेमाल हो जाते हैं. कुछ संगठन किताबी फार्मूले की तरह समाजवादी क्रांति के कार्यक्रम को स्वीकार करते हैं, लेकिन इनमे से कुछ अपनी गैर बोल्शेविक सांगठनिक कार्यशैली के कारण जनदिशा को लागू कर पाने में पूरी तरह से विफल रहे हैं और निष्क्रिय उग्रपरिवर्तनवाद  का शिकार होकर आज एक मठ या  संप्रदाय में तब्दील हो चुके हैं. दुसरे कुछ ऐसे हैं जो मज़दूर वर्ग में काम करने के नाम पर केवल अर्थवादी और लोकरंजकतावादी आन्दोलनपंथी  कवायद करते रहते हैं. भूमि-प्रश्न पर इनकी समझ के दिवालियेपन का आलम  यह है  कि कृषि के लागत मूल्य को घटाने की मांग को ये समाजवादी क्रांति के कार्यक्रम की एक रणनीतिक मांग मानते हैं.

अपने आप को माओवादी कहने वाले जो “वामपंथी” दुस्साहसवादी  देश के सुदूर आदिवासी अंचलों में निहायत पिछडी चेतना वाली जनता के बीच “मुक्तक्षेत्र” बनाने का दावा करते हैं और लाल सेना की सशस्त्र कार्रवाई के नाम पर कुछ आतंकवादी कार्रवाईयां करते रहते हैं. वे भी देश के अन्य विकसित हिस्सों में पूरी तरह से “मार्क्सवादी” नरोदवादी आचरण करते हुए मालिक किसानों की लागत मूल्य-लाभकारी मूल्य की मांगों पर छिटपुट आन्दोलन करते रहते हैं और यहाँ-वहां कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों के बीच काम के नाम पर जुझारू अर्थवाद की विकृत बानगी प्रस्तुत करते रहते हैं.

निचोड़ के तौर  पर कहा जा सकता है कि तीन दशकों से भी अधिक समय से, एक ग़लत कार्यक्रम पर अमल की आधी-अधूरी कोशिशों और एक गैर बोल्वेशिक सांगठनिक कार्यशैली पर अमल ने भारत के अधिकांश कम्युनिस्ट क्रांतिकारी संगठनों के पहले से ही कमजोर विचारधारात्मक आधार को लगातार ज्यादा से ज्यादा कमज़ोर बनाया है और उनके भटकावों को क्रांतिकारी चरित्र के क्षरण-विघटन के मुकाम तक ला पहुँचाया है. अधिकांश संगठनो के नेतृत्व  राजनितिक अवसरवाद का शिकार हैं. वे सर्व भारतीय पार्टी खड़ी करने के प्रश्न पर संजीदा नहीं है और बौद्ध-भिक्षुओं की तरह रूटीनी कामों का घंटा बजाते हुए वक्त काट रहे हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो वे जरूर सोचते कि छत्तीस वर्षों से जारी ठहराव और विखराव के कारण सर्वथा बुनियादी हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो जूते के हिसाब से पैर काटने की बजाय वे भारतीय समाज के पूंजीवादी रूपांतरण  का अध्ययन करके कार्यक्रम के प्रश्न पर सही नतीज़े पर पहुँचने  की कोशिश ज़रूर करते और कठदलीली  या उपेक्षा का रवैया अपनाने के बजाय समाजवादी क्रांति की मंज़िल के पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों पर संजीदगी से विचार ज़रूर करते. बहरहाल, केन्द्रीय प्रश्न कार्यक्रम के प्रश्न पर मतभेद का रह ही नहीं गया है. अब मूल प्रश्न विचारधारा का हो गया है. ज्यादातर संगठनों ने बोल्शेविक सांगठनिक असूलों और कार्यप्रणाली को तिलांजलि दे दी है, उनका आचरण एकदम खुली सामाजिक जनवादी पार्टियों जैसा ही है तथा पेशेवर क्रांतिकारी या पार्टी सदस्य के उनके पैमाने बेहद ढीले-ढाले  हैं. यदि कोई संगठन विचारधारात्मक कमजोरी के कारण लंबे समय तक सर्वहारा वर्ग के बीच काम ही नहीं करेगा, या फ़िर लंबे समय तक अर्थवादी ढंग से काम करेगा तो कालांतर में विच्युति भटकाव का और फ़िर भटकाव विचारधारा से प्रस्थान का रूप ले ही लेगा और वह संगठन लाज़िमी तौर पर संशोधनवाद के गढे में जा गिरेगा. यदि कोई संगठन कार्यक्रम की अपनी गलत समझ के कारण लंबे समय तक मालिक किसानों की मांगो के लिए लड़ता हुआ परोक्षत: सर्वहारा वर्ग के हितों के विरुद्ध खड़ा होता रहेगा तो कालांतर में वह एक ऐसा नरोदवादी बन ही जाएगा, जिसके ऊपर बस एक मार्क्सवादी का लेबल भर चिपका होगा. यानि, विचारधारात्मक कमजोरी के चलते भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी भारतीय  क्रांति के कार्यक्रम की सही समझ तक नहीं पहुंच सके और अब, लंबे समय तक गलत कार्यक्रम के आधार पर राजनितिक व्यवहार ने उन्हें विचारधारा का ही परित्याग करने के मुकाम तक ला पहुँचाया है. किसी भी यथार्थवादी व्यक्ति को अब इस खोखली आशा का परित्याग कर देना चाहिए कि मा. ले.  शिविर के घटक संगठनों के बीच राजनितिक वाद-विवाद  और अनुभवों के आदान-प्रदान के आधार पर एकता कायम हो जायेगी और सर्वहारा वर्ग की सर्वभारतीय क्रांतिकारी  पार्टी अस्तित्व में आ जायेगी. जो छत्तीस वर्षो में नहीं हो सका वह अब नहीं हो सकता. यदि होना ही होता तो गत शताब्दी के सातवें या आठवें दशक तक ही हो गया होता. अब कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शिविर  की इन संरचनाओं  को यदि किसी चमत्कार से मिला भी दिया जाए तो देश स्तर की एक बोल्शेविक पार्टी की संरचना नहीं बल्कि एक ढीली-ढाली मेन्शेविक पार्टी जैसी  संरचना ही तैयार होगी. और सबसे प्रमुख बात तो यह है कि इन संगठनों के अवसरवादी नेतृत्व से अब यह उम्मीद पालना ही व्यर्थ है. जहाँ तक जुनूनी आतंकवादी धारा की बात है तो उनकी दुस्साहसवादी रणनीति दुर्गम जंगल-पहाडों और बेहद पिछड़े क्षेत्रों में वे कुलकों की मांग उठाते हुए नरोदवादी अमल करते रहेंगे, मजदूरों के बीच अर्थवाद करते रहेंगे और शहरों में बुद्धिजीवियों का तुष्टिकरण करते हुए उनका दुमछल्ला बनकर सामाजिक जनवादी आचरण करते रहेंगे. इस सतमेल खिचड़ी की  हांडी बहुत  देर आंच पर चढी नहीं रह सकती. कालांतर में, इस धारा का विघटन अवश्यम्भावी है. इससे छिटकी कुछ धाराएँ भा.क.पा. (मा.ले.) (लिबरेशन) की ही तरह सीधे संशोधनवाद का रास्ता पकड़ सकती हैं और मुमकिन है कि कोई एक या कुछ धडे “वामपंथी” दुस्साहसवाद के परचम को उठाये हुए इस या उस सुदूर कोने में अपना अस्तित्व बनाये रखें या फ़िर शहरी आतंकवाद का रास्ता पकड लें. भारत में पूंजीवादी विकास जिस बर्बरता के साथ मध्यवर्ग के निचले हिस्सों को भी पीस और निचोड़ रहा है, उसके चलते,खासकर निम्न मध्यवर्ग से, विद्रोही युवाओं का एक हिस्सा आत्मघाती उतावलेपन के साथ,व्यापक मेहनतकश जनता को जाग्रत व लामबंद किए बिना, स्वयं अपने साहस और आतंक एवं षड्यंत्र की रणनीति के सहारे आनन-फानन में क्रांति कर देने के लिए मैदान में उतरता रहेगा. निम्न पूंजीवादी क्रांतिकारी की यह प्रवृत्ति लैटिन अमेरिका से लेकर यूरोप तक के पिछड़े पूंजीवादी देशों में एक आम प्रवृति के रूप में मौजूद है. विश्व सर्वहारा आन्दोलन के उदभव से लेकर युवावस्था तक, यूरोप में (और रूस में भी) कम्युनिस्ट धारा की पूर्ववर्ती एवं सहवर्ती धारा के रूप में निम्नपूंजीवादी  क्रांतिवाद की यह प्रवृत्ति मौजूद थी और मजदूरों के एक अच्छे-खास हिस्से पर इनका भी प्रभाव मौजूद था. आश्चर्य नहीं है कि आने वाले दिनों में भारत में भी क्रांतिकारी मज़दूर आन्दोलन के साथ-साथ मध्यवर्गी क्रांतिवाद की एक या विविध धाराएं मौजूद रहें और (कोलम्बिया या अन्य कई लातीन अमेरिकी देशों के सशस्त्र ग्रुपों की तरह) उनमें से कई अपने को मार्क्सवादी या माओवादी भी कहते रहें. लेकिन समय बीतने के साथ ही मार्क्सवाद के साथ उनका दूर का रिश्ता भी बना नहीं रह पायेगा. जहाँ तक कतारों की बात है, यह सही है कि आज भी क्रांतिकारी कतारें मुख्यत: मा.ले. संगठनो के तहद ही संगठित हैं. पर गैर बोल्शेविक ढांचों वाले मा.ले. संगठनों में उन्हें मार्क्सवादी विज्ञान से शिक्षित नहीं  किया गया है और स्वतन्त्र पहलकदमी के साहस व निर्णय लेने की क्षमता का भी उनमें आभाव है. विभिन्न संगठनों में समय काटते हुए उनकी कार्यशैली भी सामाजिक जनवादी प्रदूषण का शिकार हो रही है और निराशा का  दीमक उनके भीतर भी पैठा हुआ है. उनके राजनितिक-सांगठनिक जीवन के व्यवहार  ने उन्हें स्वतन्त्र एवं निर्णय  लेने की क्षमता से लैस वह साहसिक चेतना और समझ नहीं दी है कि वे महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति की सच्ची माओवादी स्पिरिट में ‘विद्रोही न्यायसंगत है’ के नारे पर अमल करते हुए अवसरवादी नेतृत्व के विरुद्ध विद्रोह कर दें और अपनी पहल पर कोई नई शुरुआत कर सकें. लेकिन जो कतारें सैद्धांतिक मतभेदों और विवादों की जटिलताओं को नहीं समझ पाती है, उनके सामने यदि कोई सही लाइन व्यवहार में, निरूतरता और सुसंगति के साथ, लागू होती और आगे बढती दिखाई देती है तो फ़िर निर्णय तक पहुँचने में वे ज़रा भी देर नहीं करती. आगे भी ऐसा होगा. इतिहास और वर्तमान के इसी आकलन और विश्लेषण के आधार पर हमारा मानना है कि भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन का जो चरण नक्सलवादी से शुरू हुआ था, वह कमोबेश गत शताब्दी के नवें दशक तक ही समाप्त हो चुका था. हमें आज के समय को उस दौर की निरंतरता के रूप में नहीं, बल्कि उसके उत्तरवर्ती दौर के रूप में देखना होगा, यानि निरंतरता और परिवर्तन के ऐतिहासिक द्वंद में आज हमारा ज़ोर परिवर्तन के पहलू पर होना चाहिए. निस्संदेह नक्सलबाड़ी और कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आन्दोलन की विरासत को हम स्वीकार करते हैं और उसके साथ एक आलोचनात्मक सम्बन्ध निरंतर बनाये रखते हैं, लेकिन हमारे लिए वह अतीत की विरासत है, हमारा वर्तमान नहीं है. आज भावी भारतीय सर्वहारा क्रांति का हरावल दस्ता इस अतीत की राजनितिक संरचनाओं को जोड़-मिलाकर संघटित नहीं किया जा सकता क्योंकि ये राजनितिक संरचनाएं अपनी बोल्शेविक स्पिरिट और चरित्र, मुख्य रूप से, ज्यादातर मामलों में, खो चुकी है. यानि एक एकीकृत पार्टी बनाने की प्रक्रिया का प्रधान पहलू आज बदल चुका है. आज कार्यक्रम व निती विषयक मतभेदों को हल करके विभिन्न क्रांतिकारी कम्युनिस्ट संगठनों का  ढांचा नए सिरे से बनाने का प्रश्न बन गया है. यानि क्लासकीय लेनिनवादी शब्दावली में कहें तो, प्रधान पहलू पार्टी-गठन का नहीं बल्कि पार्टी-निर्माण का है. जिसे अबतक कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शिविर कहा जाता रहा है, वह मूलत: और मुख्यत: विघटित हो चुका है. अब शिविर के नेतृत्व से ‘पालिमिक्स’ के जरिए पार्टी-पुनर्गठन की अपेक्षा नहीं की जा सकती. बेशक जनमानस को प्रभावित करने वाले किसी भी विचार की आलोचना और उसके साथ बहस  का काम तो होता ही रहता है और इससे क्रांतिकारी कतारों की वैचारिक-राजनितिक शिक्षा भी होती रहती है, लेकिन ऐसी किसी संगठन के साथ एकता बनाना नहीं हो सकता. हम आज ऐसी अपेक्षा नहीं कर सकते.

नये सिरे से पार्टी निर्माण में अख़बार की भूमिका

यह सही है कि यूनियनें मज़दूर वर्ग के लिए वर्ग संघर्ष की प्राथमिक पाठशाला होती हैं, लेकिन ट्रेड यूनियन कार्रवाईयों से अपने आप पार्टी कार्य संगठित नहीं हो जाता. मजदूरों को ट्रेड यूनियनों में संगठित करने और उनके रोजमर्रे के संघर्षों को संगठित करने के प्रयासों के साथ-साथ हमें उनके बीच राजनितिक प्रचार का काम-समाजवाद के प्रचार का काम, मज़दूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन के प्रचार का काम शुरू कर देना होगा. मज़दूर आन्दोलन में वैज्ञानिक समाजवाद की विचारधारा केवल ऐसे सचेतन प्रयासों से ही डाली और स्थापित की जा सकती है. इस काम में मज़दूर वर्ग के एक राजनितिक अख़बार की भूमिका सबसे अहम होगी. ऐसा अख़बार राजनितिक प्रचार-संगठनकर्त्ता -आन्दोलनकर्त्ता के हाथों में पहुच कर स्वयं एक प्रचारक-संगठनकर्त्ता-आन्दोलनकर्त्ता बन जाएगा तथा मजदूरों के बीच से पार्टी-भरती और मजदूरों की क्रांतिकारी राजनितिक शिक्षा का प्रमुख साधन बन जाएगा. ऐसे अख़बार के मज़दूर रिपोर्टरों-एजेंटों-वितरकों का एक पूरा नेटवर्क खड़ा किया जा सकता है, उसके लिए मजदूरों से नियमित सहयोग जुटाने वाली टोलियाँ बनाई जा सकती हैं  और अख़बार के नियमित जागरूक  पाठकों को तथा मज़दूर रिपोर्टरों-एजेंटों को लेकर जगह-जगह मजदूरों के मार्क्सवादी अध्ययन-मंडल संगठित किए जा सकते हैं. इस प्रक्रिया में मजदूरों के बीच से पार्टी-भरती  और राजनितिक शिक्षा के काम को आगे बढाकर हमें पार्टी-निर्माण के काम को आगे बढ़ाना होगा. इस तरह मजदूरों के बीच से पार्टी-संगठनकर्त्ताओं की भरती और तैयारी के बाद ही ट्रेड-यूनियन कार्य को आगे की मंजिल में ले जाया जा सकता है तथा उसे अर्थवाद-ट्रेडयूनियनवाद से मुक्त रखते हुए क्रांतिकारी लाइन पर कायम रखने की एक  बुनियादी गारंटी हासिल की जा सकती है. साथ ही, ऐसा करके  ही, किसी कम्युनिस्ट क्रांतिकारी पार्टी के कम्पोजीशन में मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आए पेशेवर क्रांतिकारी व एक्टिविस्ट साथियों के मुकाबले मज़दूर पृष्ठभूमि के साथियों का अनुपात क्रमश: ज़्यादा से ज़्यादा बढाया जा सकता है, पार्टी के क्रांतिकारी सर्वहारा हिरावल चरित्र को ज़्यादा से ज़्यादा मजबूत बनाया जा सकता है, पार्टी के भीतर विजातीय तत्वों और लाईनों के खिलाफ़ नीचे से निगरानी का माहौल तैयार किया जा सकता है और इनकी ज़मीन कमज़ोर की जा सकती है. इसके साथ ही कम्युनिस्ट संगठनकर्त्ताओं   को व्यापक मजदूर आबादी के बीच तरह-तरह की संस्थाएं जनदुर्ग   के स्तंभों  के रूप में खड़ी करनी होगी  और व्यापक सार्वजनिक मंच संगठित करने होंगे. ये संस्थाएं और ये मंच न  केवल वर्ग के हिरावल दस्ते  को वर्ग के साथ मजबूती  से जोड़ने का काम करेंगे, बल्कि इनके नेतृत्व और संचालन  के जरिए आम मेहनतकश राजकाज  और समाज के ढांचे को चलाने का प्रशिक्षण भी लेंगे तथा अभ्यास भी करेंगे. इसे जनता की वैकल्पिक सत्ता के भ्रूण के रूप में देखा जा सकता है, जिन्हें शुरुआती दौर से ही हमें सचेतन रूप से विकसित करना होगा. भविष्य में इनके असली रूप किस रूप में सामने आएंगे, यह हम आज नहीं बता सकते, लेकिन क्रांतिकारी लोक स्वराज्य पंचायत के रूप में हम वैकल्पिक लोक सत्ता के सचेतन विकास की इस अवधारणा को प्रस्तुत करना चाहते हैं. अक्तूबर क्रांति के पूर्व सोवियतों का विकास स्वयंस्फूर्त ढंग से  (सबसे पहले 1905-07 की क्रांति के दौरान) हुआ था, जिसे बोल्शेविकों ने सर्वहारा सत्ता का  केन्द्रीय ऑर्गन बना दिया. अब इक्कीसवीं शताब्दी में, भारत के सर्वहारा  क्रांतिकारियों को नई समाजवादी क्रांति की तैयारी करते हुए मेहनतकश वर्गों की वैकल्पिक क्रांतिकारी सत्ता को सचेतन रूप से विकसित करना होगा और ऐसा शुरुआती दौर से ही करना होगा. यह एक विस्तृत चर्चा का विषय है, लेकिन यहाँ इंतना बता देना ज़रूरी है  कि आज की दुनिया में मजबूत सामाजिक अवलंबों वाली किसी बुर्जुआ राज्यसत्ता को आम बगावत के द्वारा चकनाचूर करने के लिए “वर्गों के बीच लंबा अवस्थितिगत युद्ध” अवश्यम्भावी होगा और इस “युद्ध” में सर्वहारा  वर्ग और मेहनतकश जनता के ऐसे जनदुर्गों की अपरिहार्यत: महत्वपूर्ण भूमिका होगी. साथ ही, जनता की वैकल्पिक सत्ता के निर्माण की प्रक्रिया को सचेतन रूप से आगे बढाकर ही, क्रांति के बाद सर्वहारा जनवाद के आधार को व्यापक बनाया जा सकता है और पूंजीवादी पुनर्स्थापना के लिए सचेष्ट बुर्जुआ तत्वों के विरुद्ध सतत् संघर्ष अधिक प्रभावी, निर्मम, निर्णायक और समझौताहीन ढंग से चलाया जा सकता है. स्पष्ट है कि नई समाजवादी क्रांति की सोच से जुड़ी वैकल्पिक सत्ता के सचेतन निर्माण की अवधारणा के पीछे सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति की शिक्षाओं  की अहम भूमिका है.

शुरुआत कहाँ से करें?

सर्वहारा के हिरावल दस्ते के फ़िर से निर्माण की प्रक्रिया आज, अभी प्रारंभिक अवस्था में है, बस शुरुआत करने की स्थिति में है.ऐसी स्थिति में सभी मोर्चों पर सभी कामों को एक साथ हाथ में कभी नहीं लिया जा सकता. आज महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि शुरुआत कहाँ से करें और हमारे कामों की प्राथमिकता क्या हो? पार्टी निर्माण के काम को आज का प्रमुख काम मानते हुए,सबसे पहले यह ज़रूरी है कि हम चंद चुने हुए औथोगिक केन्द्रों में औधोगिक सर्वहारा वर्ग  के बीच अपनी मुख्य एवं सर्वाधिक ताकत केंद्रित करें. वहां मजदूरों के जीवन के साथ एकरूप होकर क्रांतिकारी संगठनकर्त्ताओं को ठोस परिस्थितियों के हर पहलू की जाँच पड़ताल एवं अध्ययन करना होगा, मजदूर आबादी के बीच तरह-तरह की संस्थाएं बनाकर रचनात्मक कार्य करने होंगे , ताकत एवं अनुकूल  अवसर के हिसाब से मजदूरों के रोजमर्रे के आर्थिक एवं राजनितिक संघर्षों में भागीदारी  करते हुए उनके बीच व्यवहार  के धरातल पर क्रांतिकारी वाम राजनीती का प्राधिकार स्थापित करना होगा और इसके साथ-साथ राजनितिक शिक्षा एवं प्रचार की कार्रवाइयां  विशेष जोरदेकर संगठित करनी होंगी. यह जरूरी है कि मजदूर वर्ग के बीच से पार्टी-भरती और उस नई भरती की राजनितिक शिक्षा  एवं सांगठनिक-राजनितिक कार्यों में उसके मार्गदर्शन के लिए मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन और समाजवाद का सीधे प्रचार करते हुए,मजदूरों के शिक्षक, प्रचारक और संगठनकर्त्ता की भूमिका निभाए. ऐसा अख़बार पार्टी-निर्माण के प्रमुख उपकरण की भूमिका निभाएगा. लेकिन पार्टी-निर्माण के काम की इस प्रारंभिक अवस्था में भी, बुनियादी विचारधारात्मक कार्यभारों की उपेक्षा नहीं की जा सकती या उन्हें टाला नहीं जा सकता. विपर्यय और पूंजीवाद पुनरूथान के वर्तमान अंधकारमय दौर में पूरी दुनिया की बुर्जुआ मिडीया और बुर्जुआ राजनितिक साहित्य ने समाजवाद के बारे में तरह-तरह के कुत्सा प्रचार करके विगत सर्वहारा क्रांतियों की तमाम विस्मयकारी उपलब्धियों को झूठ के अम्बार तले ढँक दिया है. आज की युवा पीढी सर्वहारा क्रांति के विज्ञानं और विगत सर्वहारा क्रांतियों की वास्तविकताओं से सर्वथा अपरिचित है. उसे यह बताने की जरूरत है कि मार्क्सवाद के सिद्धांत क्या कहते हैं और इन सिद्धांतों  को अमल में लाते हुए बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रांतियों ने क्या उपलब्धियां हासिल की. उन्हें यह बताना होगा कि सर्वहारा क्रांतियों के प्रथम संस्करणों की पराजय कोई अप्रत्याशित बात नहीं थी और फ़िर उनके नए संस्करणों का सृज़न और विश्व  पूंजीवाद की पराजय भी अवश्यम्भावी है. उन्हें यह बताना होगा कि विगत क्रांतियों ने पराजय के बावजूद पूंजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने का उपाय भी बताया है और इस सन्दर्भ में चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति की शिक्षायों का युगांतरकारी महत्व है. आज के सर्वहारा  वर्ग की नई पीढी को इतिहास की इन्हीं शिक्षाओं से परिचित  करानेके कार्यभार को हम नए सर्वहारा पुनर्जागरण का नाम देते हैं. लेकिन इक्कीसवीं सदी की सर्वहारा क्रांतियाँ हू-ब-हू बीसवीं सदी की सर्वहारा क्रांतियों के नक्शे कदम पर चलेंगी, ऐसा ज़रूरी नहीं है. ये अपनी महान पूर्वज क्रांतियों से ज़रूरी बुनियादी शिक्षाएं लेंगी और फ़िर इस विरासत के साथ, वर्तमान परिस्थितियों का अध्ययन करके, पूँजी की सत्ता को निर्णायक शिकस्त देने की रणनीति एवं आम रणकौशल विकसित करेंगी. यह प्रक्रिया गहन सामाजिक प्रयोग, उनके सैद्धांतिक समाहार, गंभीर शोध-अध्ययन, वाद-विवाद, विचार-विमर्श और फ़िर नई सर्वहारा क्रांतियों की प्रकृति, स्वरूप एवं रास्ते से सर्वहारा वर्ग और क्रांतिकारी जनसमुदाय को परिचित कराने की प्रक्रिया होगी. इन्हीं कार्यभारों को हम नए सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभार के रूप में प्रस्तुत करते हैं. मार्क्सवादी दर्शन को सर्वोतोमुखी नई समृद्धि तो भावी नई समाजवादी क्रांतियाँ ही प्रदान करेंगी, लेकिन यह प्रक्रिया नए सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभारों को अंजाम देने के साथ ही शुरू हो जायेगी. नए सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभार विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय के वर्तमान दौर में, तथा विश्व पूंजीवाद की प्रकृति एवं कार्यप्रणाली का अध्ययन करके श्रम और पूँजी के बीच के विश्व-ऐतिहासिक महासमर के अगले चक्र में पूँजी की शक्तियों की अन्तिम पराजय को सुनिश्चित बनाने की सर्वोतोमुखी तैयारियों के कठिन चुनौतीपूर्ण दौर में, सर्वहारा वर्ग के अनिवार्य कार्यभार हैं जिन्हें सर्वहारा वर्ग का हिरावल  दस्ता अपनी सचेतन कार्रवाईओं के द्वारा नेतृत्व प्रदान करेगा. ये कार्यभार पार्टी-निर्माण के कार्यभारों के साथ अविभाज्यत: जुड़े हुए हैं और पार्टी-निर्माण के प्रारम्भिक चरण से ही इन्हें हाथ में लेना ही होगा, चाहे हमारे ऊपर अन्य आवश्यक राजनितिक-सांगठनिक कामों का बोझ कितना भी अधिक क्यों न हो! इन कार्यभारों  को पूरा करने वाला नेतृत्व ही नई समाजवादी क्रांति की लाइन को आगे बढ़ाने के लिए सैद्धांतिक अध्ययन और ठोस सामाजिक-आर्थिक-राजनितिक परस्थितियों के अध्ययन के काम को सफलतापूर्वक आगे बढ़ा पायेगा.

नई समाजवादी क्रांति के तूफ़ान को निमंत्रण दो!

इतिहास में पहले भी कई बार ऐसा देखा गया है कि राजनितिक पटल पर शासक वर्गों के आपसी संघर्ष ही सक्रीय और मुखर दिखते हैं तथा शासक वर्गों और शासित वर्गों के बीच के अंतर्विरोध नेपथ्य के नीम अंधेरे में धकेल दिए जाते हैं. ऐसा तब होता है जब क्रांति की लहर पर प्रतिक्रांति की लहर हावी होती है. हमारा समय विपर्यय और प्रतिक्रिया का ऐसा ही अँधेरा समय है. और यह अँधेरा पहले के ऐसे ही कालखंडों की तुलना में बहुत अधिक गहरा है, क्योंकि यह श्रम और पूँजी के बीच के विश्व ऐतिहासिक महासमर के दो चक्रों के बीच का ऐसा अन्तराल है, जब पहला चक्र श्रम की शक्तियों के पराजय के साथ समाप्त हुआ है और दूसरा चक्र अभी शुरू नहीं हो सका है. इसलिए, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि भावी क्रांतियों को रोकने के लिए विश्व-पूंजीवाद आज अपनी समस्त आत्मिक-भौतिक शक्ति का व्यापकतम, सूक्ष्मतम और कुशलतम इस्तेमाल कर रहा है. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि विश्व ऐतिहासिक महासमर के निर्णायक चक्र के पहले, प्रतिक्रिया और विपर्यय का अँधेरा इतना गहरा है और गतिरोध का यह कालखंड भी पहले के ऐसे ही कालखंडों  की अपेक्षा बहुत अधिक लंबा है. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि पूरी दुनिया में नई सर्वहारा क्रांतियों की हिरावल शक्तियां अभी भी ठहराव और बिखराव की शिकार हैं. यह सबकुछ इसलिए है कि हम युग-परिवर्तन के अबतक के सबसे प्रचंड झंझावाती समय की पूर्वबेला में जी रहे हैं. यह एक ऐसा समय है जब इतिहास का एजेंडा तय करने की ताकत शासक वर्गों के हाथों में है. कल इतिहास का एजेंडा तय करने की कमान सर्वहारा वर्ग के हाथों में होगी. यह एक ऐसा समय है  जब  शताब्दियों के समय में चंद दिनों के काम पूरे होते हैं, यानि इतिहास की गति इतनी मद्धम होती है कि गतिहीनता का आभास होता है. लेकिन इसके बाद एक ऐसा समय आना ही  है जब शताब्दियों के काम चंद दिनों में अंजाम दिय जायेंगे. लेकिन गतिरोध के इस दौर की सच्चाईओं को समझने का यह मतलब नहीं है कि हम इतिमिनान और आराम के साथ काम करें. हमें अनवरत उद्विग्न आत्मा के साथ काम करना होगा, जान लडाकर काम करना होगा. केवल वस्तुगत परिस्थतियों  से प्रभावित होना इंकलाबियों की फित्रित नहीं. वे मनोगत उपादानों से वस्तुगत सीमायों को सिकोड़ने-तोड़ने के उद्यम को कभी  नहीं छोड़ते. अपनी कम ताकत को हमेशा कम करके ही नहीं आंका जाना  चाहिए. अतीत की क्रांतियाँ बताती हैं कि  एक बार यदि सही राजनितिक लाइन के निष्कर्ष तक पहुच जाया जाए और सही सांगठनिक लाइन के आधार पर सांगठनिक काम करके उस राजनितिक लाइन को अमल में लाने वाली क्रांतिकारी कतारों की शक्ति को लामबंद कर दिया जाए तो बहुत कम समय में हालात को उल्ट-पुलटकर विस्मयकारी परिणाम हासिल  किए जा सकते हैं. हमें धारा के एकदम विरुद्ध तैरना है. इसलिए, विचारधारा पर अडिग रहना होगा, नए प्रयोगों के वैज्ञानिक साहस में रत्ती  भर कमी नहीं आने देनी होगी, जी-जान से जुटकर पार्टी-निर्माण के काम को अंजाम देना होगा और वर्षों के काम को चंद दिनों में पूरा करने का ज़ज्बा, हर हालत में कठिन से कठिन स्थितियों में भी बनाये रखना होगा|

मजदूरों में राजनीतिक वर्ग-चेतना

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ट्रेड-यूनियनवादी

और सामाजिक-जनवादी राजनीति :

व्ला.इ. लेनिन

“…..मजदूरों में राजनीतिक वर्ग-चेतना बाहर से ही लाई जा सकती है, यानी केवल आर्थिक संघर्ष के बाहर से, मजदूरों और मालिकों के संबंधों के क्षेत्रों के बाहर से | वह जिस एकमात्र क्षेत्र से आ सकती है, वह राज्यसत्ता तथा सरकार के साथ सभी वर्गों तथा संस्तरों के संबंधों का क्षेत है, वह सही वर्गों के आपसी संबंधों का क्षेत्र  है| इसलिए इस सवाल  का जवाब कि मजदूरों तक राजनीतिक  ज्ञान ले जाने के लिए क्या करना चाहिए, केवल यह नहीं हो सकता कि “मजदूरों के बीच जाओ” –अधिकतर व्यवहारिक कार्यकर्ता, विशेषकर वे लोग ,जिनका झुकाव अर्थवाद की ओर है, यह जवाब देकर ही संतोष कर लेते है| मजदूरों तक राजनीतिक ज्ञान ले जाने के लिए सामाजिक-जनवादी कार्यकर्ताओं  को आबादी के सभी वर्गों के बीच जाना चाहिए और अपनी सेना की टुकड़ियों को सभी दिशाओं में भेजना चाहिए|हमने इस बेडौल सूत्र को जान-बूझकर चुना है, हमने जान-बूझकर अपना मत अति सरल , एकदम दो-टूक ढंग से व्यक्त किया है–इसलिए नहीं कि हम विरोधाभासो का प्रयोग  करना चाहते है बल्कि इसलिए कि हम अर्थवादियों के वे काम करने की “प्रेरणा देना ” चाहते है जिसे समझने से वे इनकार करते हैं| अतएव हम पाठकों से प्रार्थना करेंगे कि वे झुंझलाएँ नहीं, बल्कि अंत तक हमारी बात ध्यान से सुने |
पिछले चन्द बरसों से जिस तरह का सामाजिक-जनवादी मंडल सबसे अधिक प्रचलित हो गया है, उसे ही ले लीजिए और उसके काम की जाँच कीजिए | ” मज़दूरों के साथ ” उसका संपर्क रहता है और वह इससे संतुष्ट रहता है, वह पर्चे निकालता  है, जिनमे कारखाने में होने वाले अनाचरों, पूंजीपतिओं के साथ सरकार के पक्षपात और पूलिस के ज़ुल्म  की निंदा की जाती है| मजदूरों की सभाओं में जो बहस होती है, वह इन विषयों के कभी बाहर नहीं जाती या जाती भी है, तो बहुत  कम| ऐसा बहुत कम देखने  में आता है कि क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास के बारे में, हमारी सरकार की घरेलू तथा विदेश नीति के प्रश्नों के बारे में, रूस तथा यूरोप के आर्थिक विकास की समस्याओं  के बारे में और आधुनिक समाज में विभिन्न वर्गों की स्थिति के बारे में भाषणों या वाद विवादों का संगठन किया जाता हो| और जहाँ तक समाज के अन्य वर्गों के साथ सुनियोजित ढंग से संपर्क स्थापित करने और बढ़ाने की बात है,उसके बारे में तो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता| वास्तविकता यह है कि इन मंडलों के अधिकतर सदस्यों की कल्पना के अनुसार आदर्श नेता वह है जो एक समाजवादी राजनीतिक रूप में नहीं बल्कि ट्रेड यूनियन के रूप में अधिक काम करता है क्योंकि हर ट्रेड यूनियन का, मिसाल के लिए, किसी ब्रिटिश ट्रेड यूनियन का, सचिव आर्थिक संघर्ष चलाने में हमेशा मजदूरों की मदद करता है |वह कारखानों में होने वाले अनाचारों का भंडाफोड़ करने में मदद करता है,उन क़ानूनों तथा कदमों के अनौचित्य का पर्दाफाश करता है;जिनसे हड़ताल करने और धरना देने की स्वतंत्रता पर आघात होता है;वह मजदूरों को समझता है कि पन्च-अदालत का जज ,जो स्वयं बुर्जुआ वर्गों से आता है,पक्षपातपूर्ण होता है,आदि-आदि| सारांश यह है कि ”मालिकों तथा सरकार के खिलाफ आर्थिक संघर्ष” ट्रेड यूनियन का प्रत्येक सचिव चलता है और उसके संचालन में मदद करता है| पर इस बात को हम जितना ज़ोर देकर कहें तोड़ा है कि बस इतने ही से सामाजिक-जनवाद नहीं हो जाता,कि सामाजिक जनवादी का आदर्श ट्रेड यूनियन का सचिव नहीं, बल्कि एक ऐसा जन नायक होना चाहिए, जिसमें अत्याचार और उत्पीड़न के प्रत्येक उदाहरण से, वह चाहे किसी भी स्थान पर हुआ हो और उसका चाहे किसी भी वर्ग या संस्तर  से संबंध हो, विचलित हो उठने की क्षमता हो; उसने इन तमाम उदाहरणों का सामान्यीकरण करके पुलिस की हिंसा तथा पूंजीवाद शोषण का एक अविभाज्य चित्र बनाने की क्षमता होनी चाहिए; उसमे प्रत्येक घटना का, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो, लाभ उठाकर अपने समाजवादी विश्वासों तथा अपनी जनवादी माँगों को सभी लोगों को समझा सकने और सभी लोगों को सर्वहारा के मुक्ति-संग्राम का विश्व ऐतिहासिक महत्व समझा सकने की क्षमता होनी चाहिए|  उदाहरण के लिए, (इंग्लैंड की सबसे शक्तिशाली ट्रेड यूनियानो में से एक, बॉयलर-मेकर्स सोसायटी के विख्यात सचिव एवम् नेता ) राबर्ट नाइट जैसे नेता की विल्हेल्म लीब्कनेख्त जैसे नेता  से तुलना करके देखिए और इन दोनो पर उन अंतरों  को लागू करने की कोशिश कीजिए, जिनमें मार्तीनोव नें ‘ईस्क्रा ‘ ( ‘चिंगारी’- रूसी भाषा में मजदूरों का क्रांतिकारी अख़बार ) के साथ अपने मतभेदों को प्रकट किया है| आप पायेंगे — मैं मार्तीनोव के लेख पर नज़र डालना शुरू कर रहा हूँ –कि जहाँ राबर्ट नाइट ”जनता का कुछ ठोस कार्रवाईयों  के लिए आह्वान ” ज़्यादा करते थे,वहाँ विल्हेल्म लीब्कनेख्त “सारी वर्तमान व्यवस्था का या उसकी आंशिक अभिव्यक्तियों का क्रांतिकारी स्पष्टीकरण” करने की और अधिक ध्यान देते थे; जहाँ राबर्ट नाइट ‘सर्वहारा की तात्कालिक माँगों को निर्धारित करते थे तथा उनको प्राप्त करने के उपाए बताते थे” वहाँ विल्हेल्म लीब्कनेख्त यह करने के साथ-साथ “विभिन्न विरोधी संस्तरों की सक्रिय गतिविधियों का संचालन करने” तथा “उनके लिए काम का एक सकारात्मक कार्यक्रम निर्दिष्ट करने” से नहीं हिचकते थे;  राबर्ट नाइट ही थे, जिन्होनें “जहाँ तक संभव हो, आर्थिक संघर्ष को ही राजनीतिक रूप देने” की कोशिश की और वह “सरकार के सामने ऐसी ठोस माँगें रखने में, जिनसे कोई ठोस नतीजा निकलने की उमीद हो”, बड़े शानदार ढंग से कामयाब हुए; लेकिन लीब्कनेख्त “एकांगी” ढंग का “भंडाफोड़” करने में अधिक मात्रा में लगे रहते थे; जहाँ राबर्ट नाइट “नीरस दैनिक संघर्ष की प्रगति” को अधिक महत्व देते थे, वहाँ लीब्कनेख्त  ”आकर्षक एवम्  पूर्ण विचारों के प्रचार” को ज़्यादा महत्वपूर्ण समझते थे; जहाँ लीब्कनेख्त ने अपनी देखरेख में निकलने वाले पत्र को ”क्रांतिकारी विरोध पक्ष का एक ऐसा मुखपत्र बना दिया था, जिसने हमारी देश  की अवस्था का, विशेषतया राजनीतिक अवस्था का,जहाँ तक वह आबादी  के सबसे विविध संस्तरों के हितों से टकराती थी, भंडाफोड़ किया”, वहाँ राबर्ट नाइट ”सर्वहारा वर्ग के संघर्ष के साथ घनिष्ठ और सजीव संपर्क रखते हुए मजदूर वर्ग के ध्येय के लिए काम करते थे–यदि “घनिष्ठ और सजीव संपर्क” रखने का मतलब स्वयंस्फूर्ति की पूजा करना है, जिस पर हम ऊपर  क्रिचेव्स्की तथा मार्तीनोव के उदाहरण का उपयोग करते हुए विचार कर चुके हैं–और “अपने प्रभाव के क्षेत्र को सीमित कर लेते थे”, क्योंकि मार्तीनोव की तरह उनका भी यह विश्वास था कि ऐसा करके वह “उस प्रभाव को ही गहरा बना देते थे”| संक्षेप में, आप देखेंगे कि मार्तीनोव सामाजिक-जनवाद को ट्रेड-यूनियनवाद के स्तर पर उतार लाते हैं, हालाँकि  वह ऐसा स्वभावत: इसलिए नहीं करते कि वह सामाजिक-जनवाद का भला नहीं चाहते, बल्कि केवल इसलिए करते हैं कि प्लेखानोव को समझने की तकलीफ़ गवारा करने की बजाय उन्हें प्लेखानोव को और ग़ूढ बनाने की जल्दी पड़ी हुई है |….. ‘क्या करें ?’ का एक अंश

समाजवादी व्यवस्था

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गरीबी दूर करने का एक ही रास्ता

— व्ला.इ.लेनिन

“…एक तरफ़ धन, एशो-आराम बराबर बढ़ते जा रहे हैं और दूसरी तरफ करोड़ो-करोड़ आदमी, जो अपनी  मेहनत से उस सारे धन को पैदा करते हैं,निर्धन और बेघर बने रहते हैं| किसान भूखो मरते हैं, मजदूर बेकार हो इधर-उधर  भटकते हैं,जबकि व्यापारी करोड़ो पूद ( एक पूद सोलह किलोग्राम के बराबर है|–सं ) अनाज रूस से बाहर दूसरे देशों में भेजते हैं और खाने तथा फेक्ट्रियां   इसलिए बंद कर दी जाती है कि माल बेचा नहीं जा सकता, उसके लिए बाजार नहीं है|

इसका कारण सबसे पहले यह है कि अधिकतर ज़मीन, सभी कल-कारखाने, वर्कशॉप, मशीनें, मकान, जहाज, इत्यादि थोड़े-से धनी आदमियों की मिल्कियत हैं| करोडो लोग इस जमीन, इन कारखानों और वर्क्शोपों   में काम करते  हैं, लेकिन ये सब कुछ हजार या दसियों हजार धनी लोगों-जमींदारों, व्यापारियों  और मिल मालिकों के हाथ में है| ये करोडों लोग  इन धनी  आदमियों के लिए मजूरी पर, उजरत पर, रोटी के एक टुकड़े के वास्ते काम करतें हैं| जीने भर के लिए जितना जरूरी है, उतना ही मजदूरों को मिलता  है| उससे अधिक जितना पैदा किया जाता है, वह धनी मालिकों के पास जाता है| वह उनका नफा उनकी “आमदनी” है| काम के तरीकों में सुधार  से और मशीनों के इस्तेमाल से जो कुछ फायदा होता   है, वह ज़मींदारों और पूंजीपतियों  की जेबों में चला जाता है : वे बेशुमार धन जमा करते हैं और मजदूरों को चंद टुकडों के सिवा कुछ नहीं मिलता| काम करने के लिए मजदूरों  को एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता है :एक बड़े फार्म या एक बड़े कारखानें में कितने ही हज़ार मजदूर एक साथ काम करते है| जब इस तरह से मजदूर इकट्ठा कर दिए जाते है और जब विभिन्न  प्रकार की मशीनें इस्तेमाल की जाती हैं, तब काम अधिक उत्पादनशील होता है : बिना मशीनों के अलग-अलग काम करके बहूत से मजदूर पहले जितना पैदा करते थे, उससे कहीं  अधिक आजकल  एक अकेला मजदूर पैदा करने लगा है | लेकिन काम के अधिक उत्पादनशील होने का फल  सभी मेहनतकशों  को नहीं  मिलता, वह मुट्ठी भर बड़े-बड़े ज़मींदारों, व्यापारियों  और मिल-मालिकों की जेबों में पहुँच जाता है|

अक्सर लोगो को यह कहते हुए सुना जाता है कि जमींदार या व्यापारी लोगों को “काम देते हैं” या वे गरीबों को रोजगार “देतें हैं|” मिसाल के लिए कहा जाता है कि पड़ोसी कारखाना या पड़ोस का बड़ा फार्म स्थानीय  किसानों की “परवरिश करता है” लेकिन असल में मजदूर अपनी मेहनत से ही अपनी परवरिश करते हैं और उन सबको खीलाते हैं, जो ख़ुद काम नहीं करते| लेकिन जमींदार के खेत में, कारखानें या रेलवे में काम करने की इजाज़त पाने के लिए मजदूर को वह सब मुफ्त में मालिक को दे देना पड़ता है, जो वह पैदा करता है, और उसे केवल नाममात्र की मजूरी मिलती है| इस तरह असल में न जमींदार और न व्यापारी मजदूरों को काम देते हैं, बल्कि मजदूर अपने श्रम के फल का अधिकतर हिस्सा मुफ्त में देकर सबके भरण-पोषण का भार उठाते हैं|

आगे चलिए| सभी आधुनिक  देशों में जनता की गरीबी इसलिए पैदा होती है कि मजदूरों के श्रम से जो तरह-तरह की चीज़ें पैदा की जाती हैं, वे सब बेचने के लिए मण्डी के लिए होती हैं| कारखानेदार और दस्तकार, जमींदार और धनी किसान जो कुछ भी  पैदा  करवाते हैं, जो पशु पालन करवाते हैं, या जिस अनाज की बोवाई-कटाई करवातें हैं, वह सब मण्डी में बेचने के लिए, बेचकर रुपया प्राप्त करने के लिए होता है| अब रुपया ही हर जगह राज करने वाली ताकत बन गया है| मनुष्य की मेहनत से जो भी माल तैयार होता है, सभी को रूपये से बदला जाता है| रुपए से आप जो भी चाहें, खरीद सकतें हैं| अर्थात जिस आदमी के पास कुछ नहीं है, रुपया उसे रुपयेवाले  आदमी के यहाँ काम करने के लिए मजबूर  कर सकता है| पुराने समय में,भूदास प्रथा के जमाने में, भूमि की प्रधानता थी| जिसके पास भूमि थी, वह ताकत  और राज-काज, दोनों का मालिक था| अब रूपये की, पूँजी की प्रधानता हो गई है| रूपये से जितनी चाहे जमीन खरीदी जा सकती है| रूपये न हों, तो जमीन भी किसी काम की नहीं रहेगी, क्योंकि हल अथवा अन्य औजार, घोडे-बैल खरीदने के लिए रुपयों की जरूरत पड़ती है; कपड़े-लत्ते और शहर के बने दूसरे आवश्यक सामान खरीदने के लिए, यहाँ तक की टैक्स देने के लिए भी रुपयों की जरूरत होती है| रुपया लेने के लिए लगभग सभी ज़मींदारों ने बैंक के पास ज़मीन रेहन रखी| रुपया पाने के लिए सरकार धनी आदमियों से और सारी दुनिया के बैंक-मालिकों से कर्जा लेती है और हर वर्ष इन कर्जों पर करोड़ो रूपये सूद देती है|

रूपये के वास्ते आज सभी लोगों के बीच भयानक आपसी  संघर्ष चल रहा है| हर आदमी कोशिश करता है की सस्ता ख़रीदे महंगा बेचे| हर आदमी होड़ में दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है| अपने सौदे को दूसरे से छिपाकर रखना चाहता है| रूपये के लिए सर्वत्र  होने वाली इस महामारी  में छोटे लोग,दस्तकार या किसान ही ज़्यादा घाटे में रहते हैं : होड़ में वे बड़े व्यापारियों या धनी किसानों से सदा पीछे रह जाते हैं| वह आज की कमाई को आज ही खाकर जीता है| पहला ही संकट, पहली ही दुर्घटना उसे अपने आखिरी चीज़ तक को गिरवी रखने के लिए या अपने पशु को मिट्टी के मोल बेच देने के लिए लाचार कर देती है | किसी कुलक (धनी किसान, जो उजरती मजदूर रखकर या सूद पर रुपया उधार देकर अथवा इसी प्रकार के अन्य उपायों  द्वारा लोगों के श्रम का शोषण करते हैं–लेनिन)  या साहूकार के हाथ में एक बार पड़ जाने पर वह शाहद ही अपने को उनके चंगुल से निकाल पाए| बहुदा उसका सत्यानाश हो जाता है| हर साल हजारों-लाखों छोटे किसान और दस्तकार अपने झोपडों को छोड़कर, अपनी जमीन को मुफ्त में ग्राम-समुदाय के हाथ में सौंपकर उजरती मज्रूर, खेत बनिहार, बेहुनर मजदूर, सर्वहारा बन जाते हैं| लेकिन धन के लिए इस संघर्ष में धनी का धन बढ़ता जाता है| धनी लोग करोडों रूबल बैंक में जमा करते जाते हैं| अपने धन के अलावा बैंक में दूसरे लोगों द्वारा जमा किए गए धन से भी वे मुनाफा कमाते हैं| छोटा  आदमी दसियों  या सैंकडों रूबल पर, जिन्हें वह बैंक या बचत-बैंक में जमा करता है, प्रति रूबल तीन या चार कोपेक सालाना सूद कमाएगा| धनी आदमी इन दसियों  रूबल  से करोडों बनाएगा और करोडों से अपना लेन-देन बढायेगा तथा एक-एक रूबल पर दस-बीस कोपेक कमाएगा|

इसलिए सामाजिक-जनवादी (क्रान्तिकारी) कहते हैं कि जनता की गरीबी को दूर करने का एक ही रास्ता है-मौजूदा व्यवस्था को नीचे से ऊपर तक बदलकर उसके स्थान पर समाजवादी व्यवस्था कायम करना| दूसरे शब्दों में,बड़े जमींदारों से उनकी  जागीरें, कारखानेदारों से उनकी मिलें और कारखाने और बैंकपतियों  से उनकी पूँजी छीन ली जाए उनके निजी स्वामित्व को ख़तम कर दिया जाए और उसे देश भर की समस्त श्रमजीवी जनता के हाथों में दे दिया जाए| ऐसा हो जाने पर धनी लोग जो दूसरों के श्रम पर जीते हैं, मजदूरों का श्रम इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे, बल्कि उसका उपयोग स्वयं  मजदूर तथा उनके चुने हुए प्रतिनिधि करेंगे|  ऐसा होने पर सांझे श्रम की उपज तथा मशीनों और सभी सुधारों से प्राप्त होने वाले  लाभ तमाम श्रमजीवियों, सभी मजदूरों को प्राप्त होंगे| धन और भी जल्दी से बढ़ना शुरू होगा,क्योंकि जब मजदूर पूंजीपति के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए काम करेंगे, वे काम को और अच्छे ढंग से करेंगे| मजदूरों का खाना-कपड़ा और रहन-सहन बेहतर होगा| उनकी गुजर-बसर का ढंग बिलकुल बदल जाएगा|

लेकिन सारे देश के मौजूदा निजाम को बदल देना आसान काम नहीं है| इसके लिए बहुत ज्यादा काम करना होगा, दीर्घ काल तक दृढ़ता से संगर्ष करना होगा| तमाम धनी, सभी संपत्तिवान, सारे बुर्जुआ अपनी सारी ताकत लगाकर अपने धन-संपत्ति की रक्षा करेंगे| सरकारी अफसर और फौज सारे धनी वर्ग की रक्षा  के लिए खड़ी होगी, क्योंकि सरकार ख़ुद धनी वर्ग के हाथ में है| मजदूरों को परायी मेहनत पर जीनेवालों से लड़ने के लिए आपस में मिलकर एक होना चाहिए और सभी सम्पत्तिहीनों  को एक होना चाहिए; उन्हें ख़ुद एक होना चाहिए और सभी सम्पत्तिहीनों को एक मजदूर वर्ग, एक ही सर्वहारा वर्ग के भीतर एक्यबद्ध  करना चाहिए| मजदूर वर्ग के लिए यह लडाई कोई आसान नहीं होगी, लेकिन अंत में मजदूरों की विजय होकर रहेगी, क्योंकि बुर्जुआ वर्ग- वे लोग, जो परायी  मेहनत पर जीतें हैं-सारी जनता में नगण्य अल्पसंख्या है, जबकि मजदूर वर्ग गिनती में सबसे ज्यादा है| सम्पत्तिवालों के खिलाफ मजदूरों के खड़े होने का अर्थ है हजारों के खिलाफ करोड़ों का खड़े होना| रूस के मजदूर इस महान लडाई के लिए अभी से मजदूरों की सामाजिक-जनवादी पार्टी (क्रान्तिकारी पार्टी) के भीतर एक्यबद्ध होने लगे हैं| छिपे-छिपे, पुलिस से बचकर एक्यबद्ध होना मुश्किल काम है, तो भी संगठन आगे बढ़ रहा है| जब रूसी जनता राजनितिक स्वतंत्रता हासिल  कर लेगी, तो मजदूर वर्ग को एक्यबद्ध करने का काम, समाजवाद का हेतु, बहुत जल्दी से, जर्मन मजदूरों से भी अधिक तेजी से आगे बढ़ जाएगा |

सर्वहारा का समाजवाद और अध्यात्मक समाजवादियों का विज्ञान और तकनीक के विकसित होने पर रुदन

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“औजार मनुष्यों द्वारा निर्मित किए जाते हैं | जब औजार क्रांति की माँग करते हैं , वे मनुष्यों के अंदर से बोलते हैं”– माओ त्से तुंग

समाजवादी कैंप जिसका संबंध सर्वहारा और कुम्युनिस्टों से है के ढह ढेरी हो जाने के बाद सभी अध्यात्मिक समाजवादियों, गाँधीवादियों और लोहियावादियों की पौ बारह हो गई है | पिछले  दिनों श्री अफ़लातून जो समाजवादी जनपरिषद के प्रधान भी हैं की ब्लॉग http://samatavadi.wordpress.com पर प्रकाशित सामग्री के अधय्यन का अवसर मिला|  लेख को आगे बढ़ाने से पहले श्री अफ़लातून द्वारा संपादित ब्लॉग को नज़रसानी कर  लें,

(देखे इंग्लैण्ड और अमरिका जैसा बनाने का मतलब )

दरअसल सभी अध्यात्मिक और विचारवादियों की भाँति गाँधीवादी और लोहियावादी समाजवादियों की समस्या अपने विचारवाद से है | विचारवाद और भौतिकवाद { जिसे मार्क्स, लेनिन और माओ ने अपने अब तक के उच्चतम स्तर द्वन्दात्मक भौतिकवाद तक पहुँचाया ) के बीच की लड़ाई उतनी ही पुरानी है जितना सभ्य समाज और वर्ग संघर्ष का इतिहास | वर्ग विहीन आदिम समाज एक भौतिकवादी समाज था | किसी  भी सभ्यता के प्राचीन ग्रंथों का वस्तुगत और क्रमवार अध्ययन इस बात की पुष्टि करवाएगा कि किस प्रकार मानव के वर्गीय समाज मे संक्रमण से धीरे-धीरे शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम के बीच विभाजन से ही विचारवाद और अध्यात्मिकवाद की उत्पत्ति हुई| वर्गीय समाज के विकास के इतिहास को जाने बिना पूंजीवाद के अंतर्विरोधों, शोषण, बेरोज़गारी,,प्रदूषण आदि का तटस्थ अध्ययन ही नहीं किया जा सकता | औद्योगीकरण और निरंतर विकसित होती हुई तकनीक को सभी समस्याओं की जड़ मान लेना बचकाना होगा क्योंकि मानव समाज के विकास की गति हमारी इच्छा के बाहर स्वतंत्र रूप से निरंतर जारी रहती है| किसी मनुष्य की मनोगत इच्छाओं द्वारा इस पर काबू पाना ही अध्यात्मिकवाद व विचारवाद कहलाता है|

अध्यात्मिकवाद समाजवादियों का समाजवाद पेटी-बुर्जुआ समाजवादियों से थोड़ा-थोड़ा नहीं बल्कि काफ़ी हद तक मेल ख़ाता है | यह बात नहीं है कि वे औद्योगीकरण के बिल्कुल विरुद्ध हैं और बिल्कुल आदिम समाज के औजारों से काम चलाने के पक्ष में हों– वे औद्योगीकरण चाहते हैं मगर उस सीमा तक जिससे छोटा किसान, छोटा दुकानदार, राज्य  के और अन्य सार्वजनिक व निजी उपक्रमों में लगे हुए लोगों का रोज़गार निर्बाध रूप से जारी रह सके | इस तरह की भोली ख्वाहिशें रखना इतिहास के पहिए को उल्ट दिशा में घूमाना होगा | समाजवादी खेमें की हार के बाद वे  इस नतीजे पर पहुँच जाते है कि औद्योगीकरण ( अति ) ही समाजवाद की हार का कारण रहा, दूसरे शब्दों में औद्योगीकरण और समाजवाद एक दूसरे के दुश्मन हैं और इस नतीजे पर पहुँच जाते हैं कि सोवियत यूनियन की हार उसके औद्योगीकरण से हुई, अन्य सभी बहुत से कारणों की स्वैच्छिक उल्लंघना की जाती है, जैसे कि उत्पादन की शक्तियों के विकास के बारे में स्टालिन की यांत्रिक (द्वन्दात्मक नहीं ) पहुँच  जिसकी कमियों को माओ ने आत्मसात करते हुए  सर्वहारा के सता में आ जाने पर उसे समाजवाद ( समाजवाद से साम्यवाद में रूपांतरण की लम्बी समयाबधि जिसे संक्रमण  काल भी कहते हैं ) में अधिसंरचना में सतत संघर्ष चलाने के लिए क्रांति के बाद सांस्कृतिक क्रांति पर बल दिया| ध्यान रहे वैज्ञानिक  समाजवाद कोई ऐसी इतिहास की आदर्श और स्थाई अवस्था  नहीं है जिसकी रूपरेखा  किसी  महामानव के दिमाग की उपज हो बल्कि एक ऐसा भौतिक धरातल और रणक्षेत्र है जिसमें वर्गों में आपसी संघर्ष की अवस्था होने के कारण पूँजी और श्रम के बीच का अन्तरविरोध जारी रहता है जिसके साम्यवाद में रूपांतरण और विपरीत में परिवर्तन की सम्भावनाये बराबर बनी रहती हैं–समाज आगे बढेगा या पीछे , का निर्धारण सर्वहारा और बुर्जुआ तत्वों जो इस संक्रमण काल की गतिकी  की लाजिमी शर्त होते हैं के प्रधान तत्व पर होती है | दूसरी बात, किसी भी समाज के आधारभूत ढांचे और उस पर विराजमान अधिसंरचना अर्थात संस्थाएं जैसे विधानपालिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, शिक्षा, धर्म आदि में आपसी सामंजस्य होना चाहिए | जब उत्पादन की शक्तियां अधिक विकसित हो जाती हैं परन्तु उत्पादन सम्बन्ध प्राचीन  बने रहते  हैं तो अधिसंरचना में तनाव आ जाता है और वे इन संबंधों  को तोड़ने के लिए लालायित हो जाती है | अब सवाल पैदा होता है की चीन में समाजवाद में ऐसी कौनसी  कमी थी कि  उत्पादन की शक्तियों के विकसित होने के बावजूद वह उच्चतर पड़ाव साम्यवाद में संक्रमित होने की बजाए निम्न पूंजीवाद में रूपांतरित हो गया| इतिहास की द्वंदात्मक समझ बताती है कि इतिहास की गति रैखिक और यांत्रिक न होकर पेंचदार और कुटिल होती है| साधारण ढंग से देखने और सोचने से ऐसा लगेगा की इतिहास वापिस उसी अवस्था में आ गया है जहाँ से शुरू हुआ था परन्तु सिद्धान्तिक  समझ यह देख लेगी कि वह अब भी तुलनात्मक और   गुणात्मक सतर पर उच्चतर पड़ाव पर है | सोविएत यूनियन और चीन की समाजवाद की हारों की समीक्षा करते हुए हमें सामन्तवाद से पूँजीवाद में रूपांतरण की उस लम्बी समयाबधि के उन एतिहासिक  तथ्यों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए  जब पूंजीवाद तुलनात्मक तौर पर अधिक तार्किक और न्यायसंगत होने के वावजूद सामन्तवादी व्यवस्था से कई बार हारा है और पहली वार यूरोप में उन्नीसवीं सदी में उसकी निर्णायक जीत हुई | यह अलग विषय है कि  पूंजीवाद जो अपने जन्म से ही लूला और लंगड़ा था को सर्वहारा की ओर से प्रतिरोध का सामना करना पड़ा और करना पड़ रहा है |

धन के पैदा होने में  प्रकृति के अलावा मनुष्य  के श्रम की अहम और अपरिहार्य रूप से आवश्यकता होती है  जो उसकी विनमय मूल्य निर्धारत करता है, जिस प्रकार धन का स्रोत मानवीय श्रम है उसी प्रकार ज्ञान का स्रोत भी मानवीय श्रम है, दूसरे शब्दों में द्वंदात्मक भौतिकवादी अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास में यकीन करते हें जबकि विचारवादियों के साथ इसके बिल्कुल विपरीत है| अपने चिट्ठे के विषय सूची को बनाने सम्बन्धी आई मुश्किलों का जिक्र करते संबंधी श्री अफलातून लिखते हैं ”  यहाँ ‘समाजवादी जनपरिषद’ की तमाम प्रविष्टियों के शीषक उनकी कड़ियों-सहित दे रहा हूँ। प्रविष्टियों का वर्गीकरण इस अनुक्रमणिका के लिए किया है। काश, प्रविष्टियाँ छापते वक्त यही वर्गीकरण रखा होता !” लेकिन कैसे? कोई दिव्या शक्ति उनका मार्ग दर्शन करती? नहीं, उन्हें यह मुहारत कड़े अनुभव से  ही मिल सकती थी और उन्होंने इस कड़े अनुभव का जिक्र अपने उस प्रष्ठ पर किया जिसका उन्हें तो कोई लाभ नहीं होगा लेकिन हम जैसे नौसिखुए उस कवायद को दुहराने से बच जायेंगे| औद्योगीकरण  और तकनीक की अवधाराणाओं को एक दूसरे में गढ़ मढ़ करने से भी बचना चाहिए | लेकिन तकनीक  का अब तक का इतिहास बिना औद्योगीकरण किए बिना कैसे सम्भव होता? विज्ञानं को केवल तकनीक तक आंकना और उसके विकास की समग्रता ( एक इकाई के विकास में अन्य बहुत सी इकाईओं के योगदान और बदले में स्वयं विकसित होने का इतिहास) को नजरअंदाज करना एकांगीपन कहलाता है| मसलन इन्टरनेट की सुविधा जिससे हम अपने विचारों को हजारों, लाखों लोगों  तक ले जा पाने की इच्छा तो रखे परन्तु यह कहें कि इसका विकास अमुक देश के लिए अनुचित है, हमारे विचारों के एकांगीपन को उजागर करेगा|

मार्क्सवाद एक पक्षावलम्बी, बल्कि सर्वहारा वर्ग का सर्वोच्च पक्षावलम्बी विज्ञान है| इस विज्ञान को ओर विकसित करने वाले सेवादार लेनिन, स्तालिन, माओ आदि को बुर्जुआ  वर्ग से मुखातिव होते हुए किसी छदम की आवश्यकता नहीं थी परन्तु बुर्जुआ वर्ग के सेवादारों को अपने अल्पसंख्यक स्वामी वर्ग की हिफाजित  के लिए बहुसंख्यक  वर्ग के सामने मुखौटे लगाकर जाने की आवश्यकता होती  है| गांधीजी महात्मा भी थे  और समाजवादी भी! लेकिन अजीब किस्म के| उनके समाजवाद में सर्वहारा वर्ग की दशा में  किसी प्रकार के सुधार की उम्मीद कैसे की जा सकती थी जब 1920 में अहमदाबाद के  मजदूरों में पहले तजुर्बे के बाद महात्मा गाँधी ने कहा था, “हमें मजदूरों के साथ सांठ-गांठ नहीं करनी चाहिए| फैक्टरी सर्वहारा का राजनितिक हितों के लिए इस्तेमाल खतरनाक है|” (मई 1921 के ‘दा टाईम्स’)

पूंजीवाद से पहले के सभी वर्गीय समाजों में  उत्पादन  की क्रिया का वस्तुत: इस प्रकार का समाजीकरण नहीं हुआ था जैसा  तकनीक की मदद द्वारा औद्योगीकरण से हुआ| उत्पादन  की क्रिया का समाजीकरण परंतु उत्पादन पर निजी स्वामित्व भी इसके अन्य अंतरविरोधों में निहित है जिसके कारण यह उस सर्वहारा से सहमा रहता है जिसने कंगाली के समुद्र में रहते हुए खुशहाली के चंद टापू पूंजीपतियों की ऐशगाह के लिए सृजित किए हैं| मार्क्स और एंगेल्स के लिए सत्ता का प्रश्न ही सर्वहारा का  मुख्य  प्रश्न था जिससे उपरोक्त अंतरविरोध हल होने के युग की शुरुआत होती है  | ऐसा  लगता है की  गांधीजी जो की उनके उत्तराधिकारियों की पीढी के थे को कम्युनिस्ट घोषणापत्र में वर्गों के पूर्ण उन्मूलन की अवधारणा ने सबसे ज्यादा चिंतित किया| सदियों से विराजमान स्वामी वर्ग के अधिनायकवाद की मौत को वे आत्मसात नहीं कर पा रहे थे| इससे चिंतित वे केवल  तकनीक  और औद्योगीकरण के प्रयोग की एकांगी चेतावनी ही नहीं देते बल्कि मुख्य धारा की राजनीती को  सर्वहारा को राजनीती  से दूर  (मार्क्स और एंगेल्स के उल्ट)  रखने की सलाह भी देते हैं और इस प्रकार ‘कम्युनिस्म की  भूत’ रूपी कठौती (गांधीजी के लिए) को फेंकते समय वे तकनीक और औद्योगीकरण  के लाभों रूपी बच्चे को भी फेंक देते हैं|

और अंत में कार्ल मार्क्स के यह शब्द

“हमारे युग में हर वस्तु अपने गर्भ में अपना विपरीत गुण धारण किए हुए प्रतीत होती है. हम देख रहे हैं कि मानव श्रम को कम करने और उसे फलदायी बनाने की अदभुत शक्ति से संपन्न मशीनें लोगों को भूखा मार रहीं हैं, उन्हें थककर चूर कर रही हैं. सम्पदा के नूतन स्रोतों को किसी अजीब जादू-टोने के जरिए अभाव के स्रोतों में परिणत किया जा रहा है. तकनीक की विजयें चरित्र के पतन से खरीदी जाती लगती हैं. मानवजाति  जिस रफ्तार से  प्रकृति पर अपना प्रभुत्व कायम करती जा रही है, मनुष्य दूसरे लोगों का अथवा अपनी ही नीचता का दास बनता लगता है. विज्ञान का शुद्ध प्रकाश तक अज्ञान की अँधेरी पाश्र्व भूमि के अलावा  और कहीं आलोकित होने में असमर्थ प्रतीत होता है. हमारे सारे आविष्कार तथा प्रगति का यही फल निकलता प्रतीत  होता  है कि भौतिक-शक्तियों को बौद्धिक शक्ति बनाया जा रहा है तथा मानव जीवन को प्रभावहीन बनाकर भौतिक शक्ति बनाया जा रहा है. एक और आधुनिक उद्योग तथा विज्ञान के बीच दूसरी और आधुनिक कंगाली तथा अध:पतन के बीच यह वैर विरोध; हमारे युग की उत्पादक शक्तियों तथा सामाजिक संबंधों के बीच यह वैरविरोध स्पृश्य दुर्दमनीय तथा अकाट्य तथ्य है. कुछ पार्टियाँ इस पर विलाप कर सकती हैं; कुछ आधुनिक  संघर्षों  से छुटकारा पा सकने  के लिए आधुनिक   तकनीकों से छुटकारा पाने की दुआएं मांग सकती हैं. या वे यह कल्पना कर सकती हैं कि उद्योग में इतनी विशिष्ट उन्नति राजनीती में उतनी ही विशिष्ट अवनति से पूर्ण होनी चाहिए. अपनी और से हम उस चतुर शैतान की प्रवृति को पहचानने में भूल नहीं करते जो इन तमाम अंतर्विरोधों में निरंतर प्रकट होता रहा है.हम जानते हैं कि समाज की नूतन शक्तियों को ठीक तरह से काम करने के लिए जिस चीज़ की ज़रूरत हैं, वह है उन्हें नूतन लोगों द्वारा वश में लाया जाना–और ये हैं मेहनतकश लोग.”

भारत और इक्कीसवीं शताब्दी का समाजवाद

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भक्ति कालीन पुनर्जागरण और उसकी

असम्यक ह्त्या

कबीरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ |

जो घर जारे  आपना   चले हमारे साथ ||

समाजवाद के प्रथम चरण के संसार भर में असफल हो जाने के बाद ( समाजवाद अपने प्रथम चरण में अपने अगले उच्च्तर पड़ाव साम्यवाद में प्रवेश करने में असफल रहा है और ज्यादातर कम्यूनिस्ट पार्टियों के चरित्र का बोलेश्विक तत्व या तो हार मान चुका है या फिर पूर्णतया अपने उल्ट में प्रवर्तित हो चुका है !) सर्वहारा के सच्चे सैनिक निठ्ठले बैठे हों, ऐसी स्थिति कि कल्पना मात्रा द्वंदात्मक भौतिकवाद से मुँह फेर लेना होगा | चौदवीं शताब्दीसे शुरू होने वाली भक्तिकालीन पुनर्जागरण की परम्परा जैसा कि श्री दामोदरन का कहना है ,”यदि यह आंदोलन सदा के लिये सामाजिक असमानताओं और जातिप्रथा से उत्पन्न अन्यायों को ख़त्म नहीं कर सका तो संभवत इसका कारण यह था कि कारीगर, व्यापारी और दस्तकार, जो इस आन्दोलन का मुख्य आर्थिक आधार थे, अब भी कमजोर और असंगठित थे, और इससे पहले कि उदयीमान पूंजीपति वर्ग एक वर्ग के रूप में अपना पूर्ण विकास प्राप्त करे, ब्रिटिश पूंजीपतियों ने देश को जीतकर अपने कब्जे में कर लिया और उसे ब्रिटिश साम्राज्य का एक अंग (और वह भी कालोनी के रूप में ) बना लिया | ( पूर्वोद्धृत, ३३७ ) को दूसरे शब्दों में इस तरह से कहा जा सकता है कि भारत में पूंजीवाद की जो विरोधविकास की स्वाभाविक अंदरूनी गतिथी जिसने यूरोप के पुनर्जागरण के महामानवों की श्रृंख्ला की भांति भारत की धरती पर रामानंद, कबीर,रैदास, दादू, मीरा और गुरु नानक की अगली उच्चतर पीढी को जन्म देना था की भ्रूण हत्या हो गई | कुछ अपवादों को दरकिनार करते हुए इसके वाद की श्रृंख्ला का बुद्धिजीवी अपेक्षित बौना पैदा हुआ | बौधिक क्षेत्र की इस गतिहीनता को दूर करने का कार्यभार भी अब सर्वहारा के कंधो पर गया है | … अगली किश्त में जारी