विचारणीय : मीडिया से

पूंजीवादी संकट : अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता – अंतिम किश्त

Posted on Updated on

इससे पहले, कड़ी जोड़ने के लिए देखें :

1. पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

2. पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

मैं इन विकल्पों के बारे में और अधिक जानने के लिए अधीर था. क्या उनके उदारवादी विश्वास के केंद्र में, यह विरोधाभास नहीं था कि वर्तमान संकट से पूंजीवाद के विकल्प निकल सकेंगे ? कुल मिलाकर, संगठित श्रम की वास्तविक तबाही के साथ-साथ व्यक्तिवाद का फैलाव जिसने, निश्चित रूप से, सामूहिक कार्रवाई के रूपों के विकास के विरुद्ध शक्ति झोंकी दी है, नव-उदारवाद के परिणामों में से एक रहा है. हार्वे को यह स्वीकार करने में प्रसन्नता है कि पूंजीवाद विरोधी लहर की कोई भी संभावना. मानसिक अवधारानाओं के मूल में परिवर्तन. पर निर्भर करती है. और इसकी कोई संभावना नहीं है कि इस सन्दर्भ में, अकादमी की ओर से कोई नेतृत्व मिलेगा. नए क्लासिकीय अर्थशास्त्र और तर्कसंगत राजनीतिक सिद्धांत का चुनाव, ऐसे, जैसे कुछ भी न घटित हुआ हो और शेखीखोर व्यावसायिक स्कूलों द्वारा एक या इससे अधिक, नए व्यावसायिक नीति शास्त्र संबंधी कोर्स या लोगों के दिवालियेपन से कैसे धन कमायें, इनके अलावा, उनके पास देने के लिए कुछ नहीं होगा. अंत में, संकट मानव के लालच से जन्मा है जिसके लिए कुछ नहीं किया जा सकता. न ही हम, परम्परावादी मार्क्सवादी सर्वहारा की चेतना के अचानक उत्थान की उम्मीद कर सकते हैं. बीते समय में, इन औद्योगिक कामगारों को  सदैव क्रांति के अग्रगामी सैन्य दस्ते माना जाता था. परन्तु, हार्वे का सुझाव है कि यह गलती थी. फैक्ट्री श्रम को ‘सच्चा वर्ग चैतन्य’ मानने की आसक्ति रही है लेकिन इस वर्ग की भूमिका सदैव बहुत सीमित रही है, अगर भ्रमित न भी हुए हों, तब भी वामपंथियों के भी गलत विचार रहे हैं . जंगलों और खेतों में काम करनेवाले, गैरकानूनी मजदूर बस्तियों में कैजुयल श्रम के अनौपचारिक सेक्टर में, घरेलू सेवक, और अधिक सामान्य रूप से सेवा सेक्टर में और उत्पादन के विस्तृत क्षेत्र या निर्मित परिवेश में लगी हुई मजदूरों की विशाल सेना और शहरी खाईयों (प्राय शाब्दिक), इन सबको दूसरे दर्जे के अभिनेता नहीं माना जा सकता.

इन कामगारों, जिन्हें कई बार इनकी जिन्दगी और रोजगार की प्रकृति की अनिश्चतता को दर्शाने के लिए, बेठिकाना’ श्रम (देखें : Precarious, Precarisation, Precariat ) की श्रेणी में रखा जाता है, की संख्या में, नए उदारीकरण द्वारा थोपी गयी, बदली अवस्था के श्रम-संबंधों के कारण पिछले 30 वर्षों में भारी बढौतरी हुई हैं.

और हार्वे एक और प्रवर्ग का ज़िक्र करते हैं जिसका स्वत्वहरण हो चुका है. इसमें शामिल हैं वे सभी किसान और ग्रामीण जनसंख्या जिन्हें उनकी भूमि से खदेड़ा जा चुका है, वैधानिक ( राज्य द्वारा मंजूरशुदा ) और गैर-वैधानिक, बस्तीवादी, नव-बस्तीवादी या साम्राज्यवादी हथकंडो द्वारा अपने प्राकृतिक संसाधनों और अपनी जीवन पद्वति से वंचित कर दिया गया है और जोर-जबरदस्ती से विनिमय मण्डी … बलपूर्वक पैसे-कौड़ी और टैक्स संबंधों  में धकेल दिया गया है.

बेशक, हार्वे वंचित और स्वत्वहरित लोगों के महान गठबंधन के सपने की बात करते हुए खुश होते हैं, लेकिन, वे तस्लीम करते हैं कि इस प्रकार के ग्रुपों से निर्मित होनेवाली बहुत सी लहरों की संभावना स्थानीय पहलकदमी वाली और यहाँ तक कि  उत्पादन-विरोधी भी हो सकती हैं. परन्तु इस हद तक कि उनमें से अधिकतर उसी स्थान, जैसे मेट्रो शहरो में, मौजूद हैं और वे (जैसाकि, औद्योगिक क्रांति के प्रारंभिक काल में, फैक्ट्री कामगारों के साथ होना माना जाता है)  साझे कार्यभार तैयार कर सकते हैं और अपने-अपने अनुभवों के साथ, इस रूप-रेखा को गढ़ सकते हैं कि वह क्या है जिसे साझे तौर पर किया जा सकता है, कैसे पूंजीवाद कार्य करता है.

और भी बहुत से ग्रुप हो सकते हैं, जो पूंजीवाद के विरुद्ध इस साझे कार्यभार में सम्मिलित हो सकते है जैसे, भारत और ब्राज़ील में विस्थापन और स्वत्वहरण के प्रतिरोध से पैदा हुई लहरे और पहचान के सवाल पर,औरतों, बच्चों, समलिंगियों, और नस्लीय और प्रजातीय और धार्मिक अल्पसंख्यक  लोगों की आजादी की लहर, जिनकी इस ‘सूर्य के नीचे समान स्थान की मांग’ रही है.

उन सभी लोगों के लिए जो अपने-अपने तरीकों से पूंजीवाद की सीमा और असफलता से बच निकलने की इच्छा रख्ते हैं, शब्द ‘कम्युनिस्ट’ के लेबल का प्रयोग अनुचित होगा. ‘कम्युनिज्म’ एक ऐसा  भारी भरकम शब्द है कि इसे राजनीतिक भाषणों में पुन:प्रयोग करना बड़ा मुश्किल है. शायद, हमें इस लहर को, हमारी लहर को, पूंजीवाद विरोधी या फिर स्वयं को ‘रोष की पार्टी’ कहना चाहिए जो वाल-स्ट्रीट की पार्टी और इसके अनुचरों, इसके धर्ममण्डको को हर जगह हराने के लिए तैयार हो और उसे वहां ले जाकर छोड़ दे.

बेशक ये साहसी शब्द थे, लेकिन RSA के प्रश्नकाल के दौरान, मैंने महसूस किया कि यद्यपि वहां काफी लोग थे जो हार्वे के आर्थिक विश्लेषण को मानने को तैयार थे, लेकिन वहां ऐसे लोग भी थे जो पूंजीवाद विरोधी लहर के उत्थान के बारे में उनके सीमित से राजनीतिक आशावाद को भी स्वीकृत करने पर राजी नहीं थे. इसलिए, जब मैंने उन्हें अकेले पाया, तो मैंने इस पर थोडा और बोलने के लिए कहा. क्या यह सही नहीं है कि लोगों का वह अधिकतर हिस्सा जिसे वे  पूंजीवाद विरोधी गठबंधन कहते हैं, उनमें अपनी-अपनी दयनीय स्थिति को छोड़कर, ऐसा बहुत थोडा है जो साझा हो. इतिहास में मुश्किल से ही ऐसा है, जिसने इस प्रकार के बलहीन ग्रुपों द्वारा किसी प्रकार के बदलाव को प्रभावित किया हो.

मैं नहीं मानता कि यह सही हो. ‘पेरिस कम्यून’ किसने पैदा किया ? ‘बेठिकाना’ कामगारों और निर्माण व्यवसाय के श्रमिकों की अहम भूमिका रही थी. जो सच है वह यह कि लोग, जिनके पास सुरक्षित रोजगार नहीं हैं, इनके लिए सांगठनिक रूप ढूँढना बहुत मुश्किल होता है. यही कारण है कि अमेरिका में बहुत थोड़े लोग मिलेंगे जो यूनियन बनाने में दिलचस्पी रखते हों. लेकिन मानव अधिकार संगठन जैसी ‘अप्रकट’ ( covert ) यूनियन बनाने में इच्छुक लोगों की संख्या अधिक से अधिक होगी. अगर आप अपने को मानव अधिकार संगठन बनाने के लिए निरुपित करते हो, तो आप श्रम कानून के अधीन नहीं आते हो. एक मानव अधिकार संगठन अस्थाई श्रमिक को संगठित कर सकता है और फिर भी कह सकता है “हम यूनियन नहीं है”. वे बेघरों के साथ भी ऐसा ही करते हैं. मैं बेघरों की ‘Picture the Homeless’ के लिए काम करता हूँ जो, सक्रिय रुप से, इन नए सहस्वामित्व वाले घरों पर कब्ज़ा करने की बाते करती है और बेघरों को वहां बसाती है.

डेविड हार्वे ने अपना अल्प समय, ब्रिटेन में अपनी नयी पुस्तक प्रकाशित कराने  में, लगाया. उसके साथ अपनी मीटिंगों के दौरान, मैं एक ऐसे व्यक्ति से प्रभावित था जो एक अमेरिकन विश्वविद्यालय ( हालाँकि उनका जन्म ब्रिटेन का है ) का  अकादमी होने के बावजूद मार्क्सवाद का झंडा, ऊँचा उठाये हुए था . यहाँ उनका स्वागत समारोह उनके लिए अनुकूलित होने की वजाय, खुद उनके ही प्रवेशाधिकार पत्र से था. लेकिन अमेरिका में उनके व्याख्यानों और पुस्तकों की स्थिति कैसी है ?

“इसे मुख्य मीडिया में कैसे लिया जाता है. वे इसका उत्तर पूर्ण चुप्पी से देते हैं. मेरे काम का रिवियू होना बड़ा मुश्किल है. लेकिन मुझे इसका अभ्यस्त होना पड़ता है. मैं लोहे की छत के नीचे हूँ. दूर बेसमेंट में काम करता हुआ. किसी हद तक विक्टर ह्यूगो की कहानी की तरह. मैं सीवरों में विध्वंस का कार्य कर रहा हूँ.

क्या वे बेख़ौफ़, बहिष्कार होने के डर के बिना, शब्द मार्क्सवाद का प्रयोग कर सकते हैं ? ” इसमें बड़ी मुश्किल है. वहां एक ‘फोक्स न्यूज़’ नाम से उद्योग है जो ओबामा को मार्क्सवादी कहने में व्यस्त है.  यह मेककार्थिज्म की लंबी विरासत है. हम इस स्थिति को तस्लीम नहीं करते कि मेककार्थिज्म का इस देश पर कितना गंभीर असर है और 1950 से पहले की स्थिति को दोबारा प्राप्त करना कितना मुश्किल है .

“लेकिन कुछ स्थान हैं, जहाँ मैं खुलकर बोल सकता हूँ. वहाँ समाजवादी वर्कर पार्टियाँ हैं और रेवोलुशनरी कम्युनिस्ट पार्टी है. उनका न्यूयार्क में बुक-स्टोर है और मैं कई बार वहाँ जाता हूँ और बातचीत करता रहता हूँ. लेकिन वहाँ, मार्क्स का पूर्ण रूप से पुन:मूल्यांकन हो रहा है. 30 वर्ष पहले यह बड़ा हठधर्मी और कट्ठ्मुल्ला था. लेकिन अब यह बहस और बातचीत के लिए अधिक खुल्ले मैदान की तरह है. और इस अर्थ में, मैं उम्मीद करता हूँ कि एक और मार्क्सवाद, एक और कम्युनिज्म संभव है.

परन्तु फिर भी, अगर यह सच है कि मार्क्सवाद पर अब तत्परता से बहस होती है, क्या लोगों के रवैये में, निश्चित रूप से, इसके परिणाम या इसके अनीश्वरवाद संबंधी, न्यूनीकरण नहीं रहा है ?

“आप नहीं जानते कि अमेरिका में तेज़ी से बड़ा होता हुआ धार्मिक ग्रुप कौनसा है ? वे मुझे सवाल करते हैं. मोर्मनों का. अनीश्वरवादी ? उनकी असीम वृद्धि हुई है. मुझे नहीं पता कि आपने इसपर ध्यान दिया है. लेकिन ओबामा ने अपने उदघाटन भाषण में सभी धर्मों का ज़िक्र किया और अनीश्वरदियों को भी शामिल किया. पहली बार. और वह जानता है कि वह क्या कर रहा है. क्योंकि बहुत से इन्डिपेनडेंट भी अनीश्वरवादी हैं. एक अनीश्वरवादी लहर उदय हो रही है. धार्मिक रूढ़ीवाद चिंतनीय है लेकिन इसकी स्थिति अल्पसंख्यक की है. अधिकतर धर्म रेडिकल लेफ्ट विंग या रेडिकल राईट विंग हैं और इस प्रकार का विचार कि अमेरिका में धर्म केवल रुढ़िवादी हो सकता है, बहुत अनुपयुक्त लगता है. पादरियों का एक विंग है जो कह रहा है कि हमें सामाजिक असमानता और ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ कुछ करना चाहिए. इसलिए पादरियों की लहर एकतरफा नहीं है.

अंतिम क्षणों में, ICA में, अपने प्रकाशकों से मिलने की हड़बड़ी से पहले, वे और मैं अकेले रह गये. मैंने उन्हें, उनके व्याख्यान और उनकी 75 वर्ष की अवस्था में भी, अपने विषय प्रति, नौजवान अकादमियों के मुकाबले अधिक प्रत्यक्ष तत्परता के लिए धन्यवाद कहा. इसीसे,  एक और सवाल निकल आया. हालाँकि मैं जानता था कि उनकी स्वयं की न्यूयार्क शहर की ‘सिटी यूनिवर्सिटी’ रेडिकल विचारकों के लिए कुछ-कुछ सुरक्षित सा ठिकाना मुहैया करवाने के लिए प्रसिद्ध रही है , लेकिन क्या उन्हें इस तरह का खतरा महसूस नहीं होता कि, ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों की अपेक्षा उनके विश्वविद्यालयों का रुझान ज्यादा मैनेजमेंट वाला होता जा रहा है जोकि बड़े व्यवसाय या राज्य से जुडा हुआ हो ?

” हाँ, सही है. और खतरा दो तरह से आता है. एक तो सीधे-सीधे दमन द्वारा. परन्तु जो दूसरा और महत्वपूर्ण खतरा है वह यह कि वे अकादमियों से विश्विद्यालय के लिए अधिक धन कमाने की मांग रखते हैं. मेरे एक डीन हैं जो कह रहे हैं कि मैं अधिक धन अर्जित नहीं कर पा रहा हूँ. उनका कहना है कि जहाँ तक धन का सवाल है, मैं बेकार हूँ. इसलिए मैंने उनसे पूछा कि मैं क्या करूँ ?  क्या मुझे जनरल मोटर्स द्वारा मुहैया करवाए गए फंडों से मार्क्सवादी अध्ययन के लिए संस्थान खड़ा करना चाहिए ? और डीन ने कहा, ” हाँ, यह अच्छा विचार है. अगर आप यह सब कर पायें तो मैं आपका समर्थन करूंगा . “

बाहर उनका इंतजार करती हुई टैक्सी की ओर बढ़ते हुए, वे अब भी, मंद-मंद मुस्करा रहे थे.

Advertisements

पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

Posted on Updated on

हार्वे की ओर इस कशिश के पीछे कुछ और भी कारण हैं. सावधानीपूर्वक तराशी हुई उनकी दाढ़ी और भले चचा जैसे रूप-रंग में, वे, काफी हद तक, एक भद्र क्रांतिकारी जैसे दीखते हैं. वे बेमिसाल वाक्पटुता के मालिक हैं. मार्क्सवाद की मौजूदा प्रासंगिगता पर उनकी पुस्तकें और व्याख्यान – अढाई लाख से अधिक जिज्ञासू विद्यार्थियों द्वारा उनके इंटरनेट पर उपलब्ध पूंजी पर व्याख्यानों को डाउनलोड किया जाना – एक तरह का साहित्यिक उत्साह और मार्क्स को उनकी श्रेष्टता के साथ  आह्वान करने के विश्वास का भाव. वे उस वक्त विशेषरूप से अकाट्य होते हैं जब वे पूंजीवाद का, अनंत प्रवाह के रूप में, वर्णन करते हैं, कि कैसे यह निरंतर अपनी रुकावटों को पार कर जाता है, जैसे ही इसे मुनाफा कमाने के नये अवसर मिल जाते हैं.इसे एक उपमा ही कहेंगे कि वे सत्रहवीं सदी के अपने हमनाम ‘विलियम हार्वे’ को प्रसंतापूर्वक इस बात का श्रेय देते हैं कि कैसे वे  शरीर में खून को प्रणालीबद्ध रूप से दौड़ता हुआ दिखाया करते थे. यहाँ उसी उपमा को काम करते हुए देखा जा सकता है.

“एक तरफ अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं और क्रेडिट के फेरीवाले जौंक की भांति विश्वभर के लोगों का ‘ढांचागत समन्वय’ कार्यक्रमों और हर तरह की तिकडमों ( जैसे क्रेडिट कार्ड की फीस का एकदम दोगुना हो जाना ) द्वारा जितना खून चूस सकते हैं,चूसते रहते हैं – कोई फर्क नहीं पड़ता के वे कितने गरीब हो चुके हैं. दूसरी और केन्द्रीय बैंक अपनी अर्थव्यवस्थाओं में बाढ़ ले आते हैं और ग्लोबल बॉडी पोलीटिक में इस उम्मीद के साथ कि इस तरह के आकस्मिक आधानों से वह रोग ठीक हो जायेगा जिसे रेडिकल रोगनिदान और हस्तक्षेप की जरूरत है,  अत्यधिक तरलता का विस्तार कर देते हैं.

सभी मार्क्सवादियों की भांति, डेविड हार्वे भी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच मौज-मस्ती करते हैं. जैसेकि उन्होंने अपने व्याख्यान के बाद मेरे साथ अपने इन्टरवियू में बताया, ” मैं द्वन्द विज्ञानी हूँ. समाज में मौजूद विसंगतियों की खुदाई करने में मेरा विश्वास है. और मैं उनको प्रगतिशील बदलाव की गति के मार्ग के लिए प्रयोग करता हूँ. यह चिंतन और व्याख्या करने का तरीका है, जिसे प्रयोग में लाना बड़ा ही आसान है, अगर आप इसका प्रयोग इस तरह से करें कि लोग इसके साथ स्वयं को अभेद पायें बजाय इसके कि आपको कहना पड़े कि इसे समझने के लिए आपको हेगेल के तीनों और मार्क्स  के चारों खण्डों का अध्ययन करना पड़ेगा. बढ़िया नाटक, हेलमेट ( शेकस्पियर का एक नाटक ) की संरचना द्वंदात्मक है. अगर ऐसा न होता तो यह बहुत उबाऊ होता. और यही कारण है कि मुझे इतिहास और ऐतिहासिक बदलाव बहुत आकर्षित करते हैं.

अपनी [RSA ] के साथ बातचीत और अपनी उम्दा पठनीय पुस्तक में हार्वे, थेचरवाद के वर्षों के दौरान, नवउदारीवादी क्रांति से पैदा हुई विसंगतियों पर ,लुत्फ़ उठाते हैं. इससे पहले पूंजीवाद की समस्याओं को पूंजी के संबंध में श्रम की शक्ति को रखकर परिभाषित किया जाता था. नए यूनियन विरोधी विधान और ग्लोबल आउटसोर्सिंग के विकास, जिससे पूंजीपति अविकसित देशों की भोली-भाली जनता के श्रम को निचोड़ सकें, द्वारा संगठित श्रम को पीछे हटने के लिए मजबूर करके ही मुनाफे संभव हो सकते थे. परन्तु इसके तुरंत बाद एक नयी समस्या खड़ी हो गयी. अब, चूँकि वास्तविक उजरत बहुत घट गयी थी, पूंजीवाद द्वारा उत्पादित वस्तुओं को मजदूर वर्ग द्वारा खरीदना किस प्रकार संभव हो सकता था ? इसका हल आसान क्रेडिट में ढूंढा जाने वाला था.

क्रेडिट का अधिकतर हिस्सा, आवास बाज़ार में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक नयी समस्या थी. इस कर्ज का अधिकतर भाग आवास बाज़ार को ईधन मुहैया करवाने के रूप में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक और विरोधाभास था. एक तरफ बैंकों ने बिल्डरों को क्रेडिट की लंबी-लंबी स्कीमें थमा दी ताकि वे और अधिक घरों का निर्माण कर सकें. और उसी वक्त, उन्हीं बैंकों ने, उन लोगों को कर्ज दे दिया जो इस नयी खड़ी की गयी संपत्ति को खरीदना चाहते थे. यह पोंजी स्कीम – एक निवेश संबंधी घोटाला जिसमें शुरू के निवेशकों को मिलनेवाला तथाकथित लाभ नए जुडनेवाले निवेशकों के फंडों से सीधा प्राप्त हो जाता है – का सटीक उदाहरण था. अन्य सभी पोंज़ी स्कीमों की भांति, पूरी ईमारत उस वक्त भरभराकर गिर गयी जब निवेशकों ने नकदी वसूलने का फैसला किया.

लेकिन हम इतने अधिक लोगों की उस क्षेत्र में, जो उदाहरणतय, मैन्युफेक्चरिंग जैसे क्षेत्र में निवेश के मुकाबले संदिग्ध हो, में निवेश की इच्छा की किस प्रकार व्याख्या करेंगे ? और यही है वह जहाँ, हम हार्वे के विश्लेषण की गरी की झलक पाते हैं. वे तर्क देते हैं की बीतें दिनों वित्तीय संकटों में हुए प्रवर्धनों को उत्साहित करने के लिए जो चीज थी, वह थी, पूंजीवाद की तीन प्रतिशत की मिश्रित दर से वृद्धि की प्रतिबद्धता. बीते समय में, सीमित विश्व में जिसमें इतनी अधिक अविकसित मंडियां हों , अमेरिका और ब्रिटेन के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना संभव था. लेकिन अब जबकि चीन और भारत भी उसी दर या उससे भी अधिक दर से विकसित हो रहे हैं, पूंजीवादी उद्यमों के लिए अपने बेशी-मुनाफों का निवेश करने का क्षेत्र सिकुड़ रहा है. वर्तमान समय में, £1.5 ट्रिलियन नए निवेश की खोज में पड़े हैं. २० वर्षों के समय में, वे £ 3 ट्रिलियन हो जायेंगे. इसलिए उसका अनुसन्धान हुआ, जिसे हार्वे ‘फ़र्ज़ी मंडियां’ : व्युत्पादन (derivatives ) की मंडियां, भविष्य में व्युत्पादन के व्युत्पादन और कार्बन  ट्रेडिंग कहना पसंद करते हैं. शुरू में, ये इनमें निवेश करनेवालों को, उद्योग में निवेश की तुलना में अधिक प्रतिलाभ देने का वायदा करते है लेकिन वे, जैसाकि हमने अपने दम पर देखा है, अंतिम रूप में, भ्रम साबित होते हैं .

जैसे-जैसे [RSA ] के श्रोताओं की ध्यान-मुद्रा साफ़ होती जाती है, इस दलील से प्रभावित न होना मुश्किल लगता है और विशेषरूप से तब, जब इसे, पिछले बारह महीनों के दौरान अन्य अर्थशास्त्रियों की टूटी-फूटी टिप्पणियों के कोंट्रासट में रखते हैं. परन्तु मैं अपनी उस वक्त की बेचैनी को दबा नहीं सका जब हार्वे  मौजूदा स्थिति पर रेडिकल हल पेश करने की और बढ़ रहे थे, जहाँ ऐसा लगता था कि यह ताज़ा पूंजीवादी संकट इसके कफ़न के लिए अंतिम कील साबित होगा. मैं इसलिए चौकस था कि इस तरह की भविष्यवाणियाँ पहले भी कई बार हुई थीं. पूंजीवाद, हमें बहुत से सिद्धान्तकारों द्वारा बताया गया था , 1973 के तेल संकट,या IMF के 1976 के संकट , या 1987 के काले सोमवार के साथ या 1992 के काले बुधवार के साथ, अपने चरम बिंदु पर पहुँच गया था. परन्तु भविष्यवाणियाँ फेल साबित हुईं. बार-बार पूंजीवाद, जीवित रहने में, सफल रहा. इसलिए क्या मौजूदा स्थिति में कुछ ऐसा है जो वास्तव में अलग हो ?

ऐसी कोई बात नहीं है जिसने मुझे परेशान किया हो. हार्वे इतनी तैयारी में हैं कि वे पूंजीवाद द्वारा संकटों पर काबू पाने और कुशलतापूर्वक मुनाफा कमाने के नए रास्तों की खोज को तस्लीम नहीं कर पाते. बीते समय में, इसने अपने इस मकसद को हासिल करने के लिए कई अतार्किक तरीके खोजे थे. और इसने ऐसा ही किया, जैसे हार्वे अपनी पुस्तक ‘पूंजीवाद की पहेली’  [ The Enigma of Capital ] में इसके द्वारा युद्ध के रास्ते से, परिसम्पत्तियों के अवमूल्यन से, उत्पादक क्षमता के अपकर्ष से, अपसर्जन और अन्य सृजनात्मकता की तबाही द्वारा, अपनी समस्याओं का हल करता रहा है. इन सभी समाधानों से चौंकानेवाले परिणाम निकले हैं. मानव जीवन अस्त-व्यस्त और जहाँ तक कि तबाह हो जाता है, सारा कैरियर और जीवनभर की उपलब्धियां खतरे में पड़ जाती हैं, गहरे पैठ कर चुके विश्वास को चुनौती मिलती है, रूह घायल हो जाती है और मानव के गौरव का परित्याग कर दिया जाता है. सृजनात्मक तबाही शानदार, सुन्दर, बुरे और अच्छे – सभी पर भारी पड़ती है. संकट, हम निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं, ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’ है.

परन्तु निसंदेह, उनकी जिज्ञासा यह दिखाने की है, कि वर्तमान संकट पिछले सभी संकटों, जिनपर काबू पा लिया गया था, की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है और उनकी जिज्ञासा यह सुझाव देने की होती है कि प्रत्येक समझदार व्यक्ति के पास ‘पूंजीवाद विरोधी अभियान’ में शामिल होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है, लेकिन फिर भी, वे भविष्यवेत्ता बनने से बहुत दूर हैं.

क्या पूंजीवाद वर्तमान सदमे से बच निकलेगा ? हाँ, बेशक. लेकिन हार्वे विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि इसकी भारी कीमत चुकानी होगी. लोगों की अधिकतर आबादी को अपनी मेहनत के फल को उन्हें देना होगा, जो सत्ता में हैं, अपने बहुत से अधिकारों और अपने साधनों की सख्त मुशक्त से हासिल की गयी कीमत ( आवास से लेकर पेंशन फंड, हर वस्तु) का त्याग करना होगा और प्रचुर मात्रा में, परिवेशी अपकर्ष का दर्द झेलना होगा. केवल इतना ही नहीं कि अपने जीवन स्तर में कटौती बल्कि इसका अर्थ होगा बहुत से गरीब लोग, जो पहले ही जीवित रहने का संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए भूखमरी. थोड़े से राजनीतिक दमन से कहीं अधिक, आनेवाली अशांति का गला घोंटने के लिए, पुलिस हिंसा और मिलट्री राज्य नियंत्रण की आवश्यकता पड़ेगी. जिस वक्त,  हार्वे यह सब कह रहे थे, ठीक उसी वक्त, एथेन की गल्लियों में लड़ाई बढ़नी शुरू हो गयी थी.

यद्यपि, इस सब का मतलब निराश होने से नहीं है. संकंट विरोधाभास और संभावनाओं के वे क्षण होते हैं, जिनसे विकल्प के तरीके, समाजवादी और पूंजीवाद विरोधी, सभी जन्म लेते हैं.

अगली अंतिम किश्त में समाप्य

पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

Posted on Updated on

इससे पहले, लिंक जोड़ने के लिए देखें : वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पोंजी स्कीम जैसी है ?

विश्व आर्थिक मंदी ने एक बार फिर सारी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को मार्क्स की ओर मुड़ने के लिए मजबूर कर दिया है.  ‘द्वंदात्मक भौतिकवादी’ भूगोलवेत्ता ‘डेविड  हार्वे’ जो चालीस वर्षों से मार्क्स की पूंजी पढ़ा रहें हैं और जिन्हें पहली बार गंभीरता से लिया जा रहा है, से ‘लॉरी टेलर’ की मुलाकात पर आधारित यह आलेख ‘http://newhumanist.org.uk’ से लिया गया है.

डेविड हार्वे तुरंत अपनी तरंग में आ जाते हैं. “पूंजीवाद” वे रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स ,  लन्दन के हाल में अपने श्रोताओं से कहते हैं, “कभी भी अपने संकटों का समाधान नहीं करता. यह उन्हें केवल एक स्थान से दूसरी स्थान पर ले जाता है. ब्राज़ील से रूस, से अर्जन्टीना, से अमेरिका, से ब्रिटेन, से यूनान”.

जैसे ही वे इन बार-बार आनेवाले संकटों,  और विशेषरूप से, 1970 के बाद से उनकी बारंबारता में नाटकीय बढौतरी के कारकों का विश्लेषण करना शुरू करते हैं, मैं अपनी नज़र, श्रोताओं पर डालता हूँ. मैं अपनी चैयरमेन की सीट से देख सकता हूँ कि व्याख्यान सभागार खचाखच भरा हुआ है. कोई भी कुर्सी खाली नहीं है और लगभग दर्जन एक श्रोता गलियारे में खड़े हुए हैं. रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स [RSA]   के लंच-समय के व्याख्यानों में, अक्सर, अच्छी हाजिरी होती है लेकिन क्या कमरे में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति ने इस बात को तस्लीम कर लिया था कि जो कुछ वे आज इस वक्ता से सुनने जा रहे हैं, वह आज के पूंजीवाद का विश्लेषण है जो मार्क्स से शुरू होकर मार्क्स पर ख़त्म होता है, ऐसा विश्लेषण जोकि कई प्रकार से वैसा ही है, जैसा मैंने ७० और ८० के दशक में सैंकड़ों नीरस सभाओं में कट्टर समाजवादियों से सुना था.

कोई कारण नहीं था कि मैं फिक्रमंद होता. इस पर भी कि हार्वे ने तुरंत मार्क्स के प्रति अपना कर्ज तस्लीम किया और बार-बार वे मार्क्स को उद्घृत करते रहे. फिर भी, तीस मिनट के व्याख्यान में, किसी भी क्षण,  उनके अमीर श्रोताओं में बेचैनी  का कोई चिह्न नहीं था और समापन पर, प्रश्नौतर काल में, केवल एक श्रोता का सुझाव था कि मार्क्स को छोड़कर कुछ भी, हमारे मौजूदा आर्थिक संकट को समझने के लिए, सबसे बढ़िया हो सकता है.

निसंदेह, उस आर्थिक सिद्धांत को, जिसे सोवियत यूनियन के ढह-ढेरी हो जाने पर, भले ही अतार्किक रूप से ही सही, इतिहास में जगह दे दी गयी थी, स्वीकार करने की चाहत के पीछे एक बढ़िया कारण था. बिलकुल सीधी सी बात है कि विश्वभर के अर्थशास्त्रियों की,  इतिहास में अभी-अभी  घटित हुई घटनाओं पर एक भी संतोषजनक व्याख्या देने की पूर्ण असक्षमता. इसी तथ्य को श्रोताओं के सामने सही और साफ-साफ तरीके से प्रस्तुत करने में, हार्वे पूरी तरह से माहिर हैं.

अपनी ताज़ा पुस्तक, ‘पूंजी की पहेली और पूंजीवाद के संकट’ की प्रस्तावना में, वे यह कहानी सुनाते हैं, ” जब प्रतापी महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने नवंबर 2008 में, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के अर्थशास्त्रियों से यह पूछा कि क्यों नहीं वे मौजूदा आर्थिक संकट की आमद को देख पाए ( एक ऐसा सवाल जोकि निसंदेह प्रत्येक व्यक्ति की जबान पर था, लेकिन जिसे कोई सामन्ती शासक ही, इस तरह, हलके अंदाज में पूछ सकता था और उत्तर की अपेक्षा पाल सकता था ) तो अर्थशास्त्रियों के पास, देने के लिए, कोई जवाब तैयार नहीं था. छह महीने के मुख्य नीति निर्धारकों के साथ मिलकर किये गए अध्ययन, जुगाली और गहन विचार-विमर्श  के बाद, ब्रिटिश अकादमी के गलियारे में एकत्रित हुए सभी अर्थशास्त्रियों ने, एक साझे पत्र में, प्रतापी महारानी के सामने स्वीकार किया कि वे ,किसी हद तक, उस दृष्टि को खो चुके हैं जिसे वे ‘प्रणालीबद्ध जोखिम’ के नाम से जाना करते थे.

हार्वे, इस एपिसोड की स्विफटियन विडंबना का रस्सावदान करते हुए कहते हैं, “शिक्षित अर्थशास्त्रियों की अपनी असफलता पर बहानेबाजी करने की नाकाम कोशिश का यह दृश्य है, उस वक्त, जब वे बुरी तरह से डरे हुए सचेत हैं कि उनमें से किसी ने भी कपडे नहीं पहने हुए हैं. परन्तु यह सब उनको (हार्वे को) मार्क्स को जगाने का पूर्ण तरीका मुहैया करवाता है. किंकर्तव्यविमूढ़, वे अर्थशास्त्री, उन छः महीनों के लंबे अन्तराल के बाद, अंत में, यह पहचान गए थे कि उनकी असफलता का वास्तविक रहस्य क्या था.  जर्नलिस्टों और टिपण्णीकर्त्ताओं द्वारा पेश किये गये अधपक्के सिद्धांतों को भूल जाईये.  ताज़ा संकट, हार्वे अपने [RSA] के भावविभोर श्रोताओं से कहते हैं, किसी मानवीय कमजोरी या अप्रयाप्त वित्तीय बन्दोबस्त या किन्सियाई दृष्टि को त्यागने से या अंग्रेजों या अमेरिकियों या यूनानियों की विलक्षण सांस्कृतिक असफलताओं के कारण सिर के बल खड़ा नहीं हुआ है. यह पूंजीवाद की प्रणालीबद्ध असफलता है.  और इस प्रकार की असफलता पर विश्वसनीय लगने वाली केवल एक ही व्याख्या है, जिसे बूढ़े भले मार्क्स में खोजा जा सकता है.

[RSA] द्वारा तैयार की गयी इस कार्टून फिल्म की पार्श्व-ध्वनी, स्वयं हार्वे के उपरोक्त व्याख्यान का ही ऑडियो है.

शेष अगली किश्त [पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’] में

एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

Posted on Updated on

लिंक जोड़ने के लिए देखें —  ‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

मार्क्सवाद और देश दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि पूंजीवाद अपने जन्म से ही लंगड़ा-लूला पैदा हुआ है और उसे मेहनतकश अवाम ने न केवल चुनौतीपूर्ण टक्कर ही दी है, बल्कि बीसवीं सदी में बुर्जुआ वर्ग से सत्ता छीनकर सोवियत यूनियन और चीन में महान समाजवादी तजुर्बे भी किये हैं. हालाँकि अपने इन प्रारंभिक तजुर्बों में मेहनतकश वर्ग ,वक्ती तौर पर, हार गया है और सोवियत यूनियन और यहाँ तक की चीन की वर्तमान संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडे तले पूंजीपति वर्ग ने अपनी सत्ता को स्थापित कर लिया है. डॉ. झुनझुनवाला [ देखें — वामपंथ की सैद्धांतिक भूल ] बंगाल में सत्तासीन रही संशोधनवादी पार्टी की हार का ज़िक्र करते हैं और मार्क्सवाद की थ्योरी को त्रुटिपूर्ण होने का फ़तवा सुना देते हैं, बिना यह जाने कि मार्क्सवाद कोई कठमुल्ला उपदेशात्मक शास्त्र नहीं है, बल्कि वर्गीय समाज के संघर्ष में, ऐसा समाज शास्त्र है जो सर्वहारा पक्षावलम्बी है. मार्क्सवाद ने अपने संघर्ष के दौरान न केवल पूंजीपति वर्ग से टक्कर ली है बल्कि लाल झंडे के तले अराजकतावाद, आतंकवाद, अर्थवाद, ट्रेड-यूनियनवाद आदि संशोधनवाद, जो मार्क्सवाद को इतना पतला और कमजोर कर देना चाहता है ताकि यह पूंजीपति वर्ग की सत्ता को चुनौती न देकर उसकी सेवा में हाज़िर हो और अपने संसदमार्गी कृत्यों से मजदूर वर्ग के आक्रोश पर ठन्डे पानी के छींटे मारकर उनकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करता रहे, केखिलाफ भी संघर्ष किया है.

अपने इस आलेख में, डॉ. झुनझुनवाला इस प्रकार के निष्कर्ष निकालते हैं जैसे,  ‘मार्क्सवादी बाजार विरोधी है जबकि बाज़ार सभी को उनकी क्षमतानुसार काम करने के अवसर प्रदान करता है’. बाज़ार का महिमामंडन करते हुए वे लिखते हैं,
“हम देखते हैं कि आर्टिस्ट को पेंटिंग बनाने में ही मजा आता है। पेंटिंग बिक गई, इतनी ही जानकारी उसके लिए पर्याप्त होती है। किसान गेहूं का उत्पादन करके प्रफुल्लित होता है, यद्यपि उसे पता नहीं होता कि रोटी कौन खाएगा। श्रमिक को यदि उसके स्वभाव के अनुकूल काम मिल जाए तो वह सुखी होता है। आर्टिस्ट को हल चलाने में लगा दिया जाए तो वह दुखी होगा और किसान को पेंटिंग करने के लिए ब्रश थमा दी जाए तो वह भी दुखी होगा। विशेष यह कि व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य ढूंढने में बाजार से मदद मिलती है। श्रमिक मन चाहा कार्य पकड़ सकता है। इसलिए मूल रूप से बाजार सुखदायी है।

डॉ. झुनझुनवाला जी, किसान, श्रमिक, और आर्टिस्ट जन्म से पैदा नहीं होते. व्यक्ति का मनपसंद कार्य वह नहीं होता जो वह कर रहा होता है. वर्गीय समाज का विकास इसका मुख्य निर्धारक होता और व्यक्ति की इच्छा गौण. मोटे तौर पर वर्गीय समाज आदिम साम्यवाद से लेकर मालिक-गुलाम, सामंत-किसान और अब पूंजीपति-मजदूर — चार चरणों से होकर गुजरा है . यह सब किसी एक व्यक्ति के चाहने या न चाहने से नहीं हुआ. वर्ग-संघर्ष इसका वस्तुगत चरित्र रहा है.बाजार भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से पैदा हुआ है. चूँकि पूंजीपति वर्ग और  समाज के अस्तित्व के लिए बाज़ार जरूरी है, इसलिए इसका महिमामंडन भी जरूरी है, जोकि आप बाखूबी कर रहे हैं. आपका यह “मूल रूप से बाजार” श्रमिक – जिसके पास अपनी श्रम-शक्ति बेचने के सिवा और कुछ नहीं होता – को नहीं, आपको सुखदायी लगता है।

हमारा यह मानना है कि मार्क्सवाद बाज़ार विरोधी है लेकिन उस प्रकार से नहीं जिस प्रकार डॉ. झुनझुनवाला पेश करते हैं. अपने सारे आलेख में वे ,बड़ी चालाकी के साथ, मार्क्स के मूल्य के श्रम-सिद्धांत का ज़िक्र तक नहीं करते और मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ सिद्ध कर देते हैं. यही वह बाज़ार होता है जहाँ श्रम-शक्ति पण्य (कमोडिटी) के रूप में बिकती है और अपनी विशिष्टता ( श्रम-शक्ति अकेली ऐसी पण्य है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है) के कारण अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है जिसमें से पूंजीपति वर्ग न केवल अपना मुनाफा वसूलता है बल्कि उसकी सेवा में हाज़िर राज्य और उसकी संस्थाओं के खर्च भी निकलते हैं. अपनी विशेष हैसियत के कारण, पूंजीवादी उत्पादन क्रिया से लूटे गये अतिरिक्त मूल्य पर हक़ का पहला दावेदार पूंजीपति वर्ग होता है. यही कारण है कि इस वर्ग की खुशामद द्वारा बुर्जुआ वर्ग का  बुद्धिजीवी (ध्यान रहे बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा संकल्प नहीं है जिसकी अवस्थिति वर्ग-हितों से ऊपर हो ) चंद हड्डियों की अपेक्षा पाले रहता है. ऐसा नहीं है कि एक संशोधनवादी, संसदमार्गी  और मजदूर वर्ग में अर्थवाद द्वारा उसकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करनेवाली माकपा ‘स्टाईल मा‌र्क्सवादियों की पार्टी’ की हार से डॉ. झुनझुनवाला को मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ दिखाई देने लगी हों और वे बड़ी ईमानदारी से मार्क्सवाद पर चिन्तन-मनन करने लगे हों. कारण उनकी पूंजीवादी वर्ग-स्थिति है और वे माकपा जैसी संशोधनवादी पार्टी की हार से व्याकुल इसलिए हैं कि कहीं मजदूरों की, इन संशोधनवादी पार्टियों के प्रति, आस्था न डगमगा जाये और वे, विकल्प के तौर पर, अपनी सच्ची कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण न कर लें.

मार्क्स ने पूंजीवादी समाज की विशेषताओं में से एक – श्रम के अलगाव का ज़िक्र किया है. अकेला मजदूर वर्ग ही सक्षम है जो पूंजीपति वर्ग से संघर्ष द्वारा – वर्गीय समाज को ख़त्म करने की प्रक्रिया द्वारा – इस मर्ज़ का इलाज करेगा. इसलिए मार्क्सवाद की अवस्थिति वर्तमान और भविष्य में है. लेकिन डॉ. झुनझुनवाला मार्क्स को उस ग्रामीण परिवेश में भेज देते हैं, जहाँ  “गाँव का व्यक्ति किसान के लिए हल बनाता है …वह उसमें अपने प्राण आहूत करता है। उसके सामने ही किसान उसका उपयोग करता है, जिसे देखकर दोनों का मन लहलहाता है।” पता नहीं किस युग में और कैसे किसान जोकि  सामंतो द्वारा शोषित रहा है अपनी उस वक्त की मेहनतकश की स्थिति पर प्रफुल्लित होता रहा है ? ‘अह़ा ग्राम्य जीवन’ का ‘नोस्तालजिया’ मार्क्स का नहीं डॉ. झुनझुनवाला का है जिन्होंने बीते का रुदन करनेवाले कवियों से इसका महिमा मंडन सुन रखा है   वे भूल जाते हैं कि मार्क्स की रचनाओं के तीन स्रोत और तीन अंग उस वक्त के विकसित पूंजीवाद के तीन देशों – दर्शन के लिए जर्मनी, अर्थशास्त्र के लिए इंग्लैण्ड और क्रांतियों व समाजवाद के लिए फ़्रांस – से लिए गए हैं. अब तो सारा विश्व पूंजीवाद के नियमों के अनुसार गतिमान है और कृषि में भी किसान बैलों के पीछे-पीछे हल पकडे नहीं भटकता बल्कि कृषि संबंधी उत्पादन में उसके श्रम की भूमिका गौण हो गयी है और मजदूर वर्ग ही वहाँ उत्पादन क्रिया में मुख्य रूप से सक्रीय है.  कृषि उत्पादन में पूंजीवादी संबंधों की मुकम्मल स्थापना ने छोटे किसानों की तबाही निश्चित कर दी है और वे मजदूर वर्ग की अवस्थिति और दृष्टिकोण अपनाने को बाध्य होते जा रहे हैं. भविष्य में उनका बड़ा हिस्सा मजदूरों द्वारा संपन्न की जानेवाली इक्कीसवीं सदी की नई समाजवादी क्रांतियों के लिए अहम भूमिका अदा करेगा.

डॉ. झुनझुनवाला  लिखते हैं, “एक प्रमुख अखबार ने लिखा है कि वामपंथी विचारधारा तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक देश में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहेगी। यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित है.”

यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित हो सकता है लेकिन एक मार्क्सवादी के लिए नहीं. मार्क्सवाद की विशिष्टता है कि इसने इस वस्तुगत सच्चाई की निशानदेही की है जिसमें, पूंजीवाद ने अपनी विकास प्रक्रिया के दौरान, समाजके एक छोर पर अकूत धन-दौलत और दूसरे सिरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया है. गरीबी,  बीमारी और असमानता जैसी अलामतें इसके जरूरी बाई-प्रोडक्ट हैं. मार्क्सवाद ने एक और कटु सत्य इंगित किया है जो पूंजीपतियों और उनके डॉ झुनझुनवाला जैसे बुद्धिजीविओं को सताता रहता है. पूंजीवाद द्वारा पैदा किये गए कंगाली के इस विशाल समुद्र के सापेक्ष पूंजीपतियों की खुशहाली की चंद मीनारों की औकात अल्पसंख्यक और कमजोर की है जो  कभी भी भरभराकर गिर सकती हैं. मार्क्सवादी विचारधारा की प्रासंगिगता, केवल देश या दुनिया में, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहने तक ही नहीं है बल्कि यह प्रासंगिक रहेगा तब तक, जब तक, वर्गीय समाज का अस्तित्व रहेगा. केवल वर्गविहीन समाज में इसका स्थान म्यूजियम में होगा.

वे अपनी कलम मजदूर वर्ग की तानाशाही पर चलाते हुए मध्यम वर्ग में इस बुर्जुआ लोकतंत्र के भ्रम को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. हो सकता है कि पढेलिखे मध्यम वर्ग के एक हिस्से की, इस बुर्जुआ लोकतंत्र में भारी आस्था हो, लेकिन मजदूर वर्ग इस बात को भली-भांति समझता है कि यह लोकतंत्र बुर्जुआ वर्ग का, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतंत्र है. मजदूर वर्ग के लिए यह तानाशाही ही है. किसी भी वर्गीय समाज में ऐसा लोकतंत्र नहीं हो सकता जो सर्वमान्य हो और न ही सर्वहारा वर्ग, जब वह सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, बुर्जुआ वर्ग और उसके पैरोकारों को लोकतान्त्रिक हक़ देने की छूट दे सकता है, क्योंकि इसका अर्थ होगा – पूंजीवाद की पुनर्स्थापना.

अपने आलेख के अंत में, वे वामपंथ को सैद्धांतिक संजीवनी की घुट्टी पिलाते हुए  और “थ्योरी का  नवीनीकरण” करने की सलाह देते हुए “बाजार का बहिष्कार करने के स्थान पर बाजार पर लगाम लगाने” और ” सरकारी तंत्र के विस्तार के स्थान पर ऐसी पालिसी की मांग” जो  “हल्के सरकारी तंत्र से भारी जनहित हासिल करे” जैसी चलताऊ बातों करके खुश हो लेते हैं, जैसेकि उन्होंने अपने इस आलेख में मार्क्सवाद की ऐसी की तैसी कर दी हो. उनके हलके सरकारी तंत्र और जनतंत्र पर मार्क्सवाद का कहना है कि जब मजदूर वर्ग समाजवाद के संक्रमण काल में बुर्जुआ वर्ग का नामोनिशान मिटा देगा तो उसे किसी भी तरह के -हलके या भारी तंत्र – की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

Posted on Updated on

इसी महीने की चौदह तारीख के अंक में ‘दैनिक जागरण’ अपने ‘नजरिया’ नामक कालम के नीचे श्रम का मूल्य ‘ और ‘ वामपंथ की सैद्धांतिक भूल( देखने के लिए चटका लगायें ) नामक आलेखों द्वारा मार्क्सवाद पर आक्रमण करता है ताकि  मध्यम वर्ग के पाठक वर्ग का वह हिस्सा जो अपने नजरिया के लिए केवल बुर्जुआ वर्ग के मीडिया और बुद्धिजीवियों पर आश्रित है, भ्रमित हो जाये . डॉ..भरत झुनझुनवाला बुर्जुआ मीडिया के ‘आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों (तथाकथित) में से एक हैं. इसी प्रकार के तथाकथित बड़े नामों को पाल-पोसकर ही पूंजीपति वर्ग सत्ता में रह सकता है. उनके नाम की साख को दाग नहीं लगना चाहिए. इसलिए वह बड़ी चालाकी के साथ  डॉ..भरत झुनझुनवाला को मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ में मीन-मेख निकालने से [ जोकि डॉ..भरत झुनझुनवाला जैसा व्यक्ति क्या निकालेगा ? ] बचा लेता है. इनके स्थान पर वह डा. सरोजनी पाण्डेय की अस्थायी प्रतिनियुक्ति करता है. डा. सरोजनी पाण्डेय के इस आलेख में ऐसा कुछ नहीं है जिसे वैज्ञानिक कहा जाये. वे “भगवान बुद्ध के निर्वाण-सुख”,  “शिव जी का तांडव नृत्य और पार्वती जी के मुख की शोभा” जैसी अमूर्त धारणाओं और पौराणिक  हस्तियों का सहारा लेकर, इसे भावुक बनाने की नाकाम कोशिश करती हैं और समझती हैं कि अब मध्यम वर्ग के लोगों को मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ समझने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी. अपने पाठकों को भावुकता के रंग में रंगने के लिए वे कहने लगती हैं,

“एक मजदूर दिनभर कठिन परिश्रम करके अपनी मजदूरी पाता है। यदि उसकी मेहनत पर गौर करके मालिक उसे दस-बीस रुपये अधिक दे दे, तो उसके चेहरे पर खुशी की जो चमक दिखाई देती है” , उसके  बदले में वे “अपने मालिक के लिए उसके दिल से दुआ” की भी  अपेक्षा करती हैं जोकि “प्रार्थना से कम नहीं” है.

इस प्रकार की भावुक बातों के द्वारा वे मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ के उस सवाल को निगलने की नाकाम कोशिश करती हैं जो उनसे ( डा. सरोजनी पाण्डेय से ) पूछा जा सकता है. वह सवाल है कि “दिनभर कठिन परिश्रम करने वाले  मजदूर की मेहनत पर गौर करके मालिक उसे दस-बीस रुपये अधिक” कहाँ से लाकर देगा ? यही वह बुनियादी सवाल है जिससे बचाव करते हुए, अख़बार ‘जागरण’ अपने आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ बड़े नाम – डॉ..भरत झुनझुनवाला – के स्थान पर  डॉ. कमला पाण्डेय की प्रतिनियुक्ति, एक अलग लेख ‘श्रम का मूल्य’ लिखने के लिए’ करता है. वे विचारी वैज्ञानिक मसले का हल भावुकता के अंध कुएं में गोते लगाते हुए ढूँढती हैं.

खैर, मार्क्स के ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’ को संक्षिप्त रूप में, एक बार फिर समझने के लिए, इस पेज पर थोडा और रुकें.

मार्क्स का ‘मूल्य का श्रम-सिद्धांत’

पूंजी का प्रथम खंड, पण्य उत्पादन के विचार के विश्लेषण से प्रारंभ होता है. पण्य की परिभाषा है, बाह्य उपयोगी वस्तु जिसे मण्डी में विनिमय के लिए प्रस्तुत किया जाता है. इस प्रकार, पण्य उत्पादन के लिए दो जरूरी शर्ते हैं; मण्डी का अस्तित्व जिसमें विनिमय हो सके और सामाजिक श्रम-विभाजन जिससे भिन्न-भिन्न लोग भिन्न भिन्न उत्पादों का उत्पादन करें क्योंकि इसके बिना विनिमय के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं बचता. मार्क्स कहते हैं कि  पण्य में दो बातें होती हैं ; उपयोग मूल्य (value) और विनिमय मूल्य . मार्क्स का मानना है कि उपयोग मूल्य को आसानी से समझा जा सकता है परन्तु उनका दृढतापूर्वक आग्रह है कि विनिमय मूल्य एक पेचीदा मसला है और सापेक्ष विनिमय मूल्य व्याख्या की मांग करते हैं. क्यों किसी पण्य की एक निश्चित मात्रा किसी अन्य पण्य की एक निश्चित मात्रा से बदल ली जाती है ? पण्य के उत्पादन के लिए लगने वाले श्रम की शर्त द्वारा वे इसकी व्याख्या करते हैं. यही नहीं वे कहते है कि जरूरी सामाजिक श्रम वह श्रम होती है जिसे किसी अर्थव्यवस्था में किसी उत्पादक कार्य के लिए, श्रमिक वर्ग में मौजूद उत्पादकता और प्रबलता के औसत स्तर तक निचोड़ा जाता है. इस प्रकार, मूल्य का श्रम सिद्धांत कहता है कि किसी पण्य के मूल्य का निर्धारण उस पर लगी सामाजिक जरूरी श्रम की मात्रा के द्वारा होता है. मूल्य के श्रम सिद्धांत की पैरवी के लिए मार्क्स अपने तर्कों को दो चरणों में पेश करते हैं. पहले चरण में उनका तर्क है कि अगर दो वस्तुओं की तुलना की जाती है तो इनको, किसी समान संकेत के दोनों तरफ रखने के अर्थ में, तीसरी वस्तु की आवश्यकता होगी जो मात्रा या गुण में इन दोनों वस्तुओं के समान हो ताकि ये दोनों वस्तुएं उस वस्तु से समानयन हो जाएँ. चूँकि अब दोनों वस्तुओं को आपस में बदला जा सकता है इसलिए, मार्क्स कहते हैं, अब जरूरी है कि कोई ऐसी तीसरी वस्तु है, जिसमें इन दोनों वस्तुओं का साझा है. यही से दूसरे चरण के लिए प्रोत्साहन मिलता है जो कि उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ की खोज है. यह उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ केवल श्रम ही हो सकती है जिसमें साझा गुण हैं.

मार्क्स कहते हैं कि पूंजीवाद के विशिष्ट गुण हैं जिसमें केवल वस्तुओं का विनिमय ही नहीं होता बल्कि पण्यों की खरीद और उनको अन्य पण्यों जिनमें और अधिक मूल्य होता है, में रूपांतरण द्वारा मुनाफा अर्जित करने के उद्देश्य से, धन के रूप में पूंजी को बढ़ाना होता है. मार्क्स का दावा है कि उनसे पहले के किसी भी सिद्धांतकार ने पर्याप्त रूप से, इस बात की व्याख्या नहीं की है कि कैसे पूंजीवाद समुचित रूप में मुनाफा पैदा करता है. मार्क्स इसका हल पूंजीवाद में श्रमिक के शोषण में देखते हैं. उत्पादन की स्थिति पैदा करने के लिए, पूंजीपति पण्य के रूप में श्रमिक की श्रम-शक्ति – उसके एक निश्चित कार्य दिवस के लिए काम करने की क्षमता – को खरीदता है. इस पण्य – मजदूर की एक निश्चित कार्य दिवस के लिए काम करने की क्षमता – के मूल्य का निर्धारण भी अन्य पण्यों के मूल्य के निर्धारण की भांति; इसके उत्पादन में खर्च हुई सामाजिक जरूरी श्रम द्वारा होता है. इस केस में एक कार्य दिवस की श्रम-शक्ति का मूल्य उन पण्यों के मूल्य के समान है जो उसे (श्रमिक को) एक दिन के लिए जीवित रखने के लिए पर्याप्त हैं. मान लीजिए कि इन पण्यों के उत्पादन पर चार घंटे खर्च होते हैं तो कार्य दिवस के पहले चार घंटे उस मूल्य को पैदा करने में खर्च किये जायेंगे जिसे श्रमिक को मजदूरी के रूप में भुगतान किया जाता है. इसे जरूरी श्रम कहते हैं. इसके अलावा की जानेवाली श्रम को अतिरिक्त श्रम कहते हैं जो पूंजीपति के लिए अतिरिक्त (बेशी) मूल्य पैदा करती है. मार्क्स के अनुसार यही अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत होता है. मार्क्स के विश्लेषण के अनुसार अकेली श्रम-शक्ति ही ऐसी पण्य है जो अपनी औकात से अधिक मूल्य पैदा कर सकती है. इसी कारण इसे, अस्थिर पूंजी (variable capital ) के नाम से जाना जाता है. अन्य पण्य अपने से निर्मित नई पण्य में अपना मूल्य स्थानातरण कर देती हैं लेकिन कोई नया मूल्य पैदा नहीं कर सकती. उन्हें स्थिर पूंजी (constant capital ) कहा जाता है. मुनाफा जरूरी श्रम से प्राप्त मजदूरी से ऊपर की गयी अतिरिक्त श्रम से आता है.

यही है पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत  – श्रमिक से निचोड़ा गया अतिरिक्त-मूल्य . इसी अतिरिक्त मूल्य में से, उस  दिनभर कठिन परिश्रम करने वाले मजदूर की मेहनत पर गौर करते हुए मालिक से”, तरस की गुहार लगाते हुए, डॉ. कमला पाण्डेयदस-बीस रुपये अधिक देनें” को कहती हैं. मसला गंभीर था न कि भावुक, इसीलिए तो “फैज” जैसे विद्वान  कवि की कलम ने ऐसा गीत लिख दिया, जिसकी विषय-वस्तु में ‘ इक खेत नहीं, इक देश नहीं’, बल्कि सारी दुनिया को जीतने  की जिद  है.

http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio2/moba-ila-para-da-unaloda-karane-ke-li-e-krantikari-gita/ikdeshnhin.mp3?attredirects=0 हम मेहनतकश जग वालों से – इस गीत को सुनने के लिए इस प्लेयर के दायीं ओर चटका लगायें.

डॉ. झुनझुनवाला के आलेख का जवाब –देखें — एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

लक्ष्मी-पूजन करें लेकिन

Posted on Updated on

जब भी हम बाजार से कोई वस्तु खरीदते हैं तो हम उसके भौतिक गुणों की ओर ही देखते हैं. हो सकता है हम उसके गुणों, सुन्दरता आदि की तारीफ भी करें. लेकिन इन वस्तुओं को राजनीतिक अर्थशास्त्र में पण्य या जिंस कहा जाता है. अगर आप भी इनकी पूजा करने की योजना बना रहे हैं तो यह सब करने से पहले अपनी आँखों से उस परदे को हटाने की कोशिश कीजियेगा जिसे “पण्यों की जड़ पूजा’ कहा जाता है.

जिंस रूप का रहस्यमई रूप इस तथ्य के कारण है कि जिंस, जोकि श्रम का उत्पाद होती है अपने उत्पादन की क्रिया में निहित मनुष्य के सामाजिक संबंधों का प्रतिबिम्बन करती है.

उदाहरण के लिए, जिंस के मूल्य का परिमाण मनुष्य के जिस्म की श्रम-शक्ति के खर्च का मापन है. इसके अलावा विभिन्न उत्पादकों के बीच के सामाजिक संबंध उन द्वारा उत्पादित की गयी जिंसों के संबंधों को भी प्रकट करते हैं.

इस प्रकार, जिंस रूप और जिंसों के बीच मूल्य-संबंधों का इस बात से कोई लेनादेना नहीं होता कि उनके भौतिक गुण क्या हैं और वे किन पदार्थों से निर्मित हुए हैं. इसके विपरीत अहमियत इस बात की है कि उनके उत्पादन और विनिमय में सामाजिक संबंधों का रूप कैसा है.

‘पण्यों की जड़ पूजा’ पण्यों को उत्पादित करने वाली श्रम के सामाजिक चरित्र से पैदा होती है. भौतिक वस्तुएं केवल इसलिए पण्य या जिंस बन जाती हैं क्योंकि श्रम उन्हें अलग-अलग स्थान पर और व्यक्तिगत तौर पर उत्पादित करती है. यह विनिमय होने से ही संभव होता है कि श्रम के उत्पाद मूल्यों की एकरूपता या समरूपता प्राप्त करते हैं जो उनके  उपयोगी गुण और भौतिक गुणों से भिन्न होता है. इस प्रकार, मानव द्वारा निर्मित भौतिक वस्तुओं को कृत्रिम रूप से उनका स्वयं का ‘जीवन’  दे दिया जाता है अर्थात ऐसा लगता है कि मूल्य तो वस्तु के भौतिक गुणों में ही छुपा हुआ है न कि उस श्रम शक्ति की इकाईयों में जो इनके उत्पादन के समय खर्च हुई थीं.

पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूर अपनी मजदूरी के अलावा जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करता है उसे अधिशेष मूल्य भी कहते हैं. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपति का मुनाफा और अन्य वर्गों की आमदनी आती है. मजदूर को उतनी ही मजदूरी मिलती है जितनी उसके जिन्दा रहने और अपनी नसल के पुनरुत्थान के लिए आवश्यक हो. न कम न ज्यादा. अगर कम मिलेगी तो मजदूर का जीवन और पुनरुत्थान नहीं हो पायेगा. ज्यादा होने पर मजदूर मजदूरी नहीं करेगा. इसी तर्क पर पूंजीवाद कार्यशील होता है. लेकिन मजदूर द्वारा पैदा की गयी अतिरिक्त कीमत की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में जो कुत्ता घसीटी होती है, उसकी कामना करना ही लक्ष्मी-पूजन है.

अगर अब भी आप ‘लक्ष्मी पूजन’ या ‘पण्यों की जड़ पूजा’ करेंगे तो हमें आपसे कुछ नहीं कहना है !

सन्दर्भ साभार :   THE FETISHISM OF COMMODITIES AND THE SECRET THEREOF

प्रो.एल.पी.जी. बुद्धिजीवी बनाम वामपंथी बुद्धिजीवी

Posted on Updated on

पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक में और उसके बाद भारत में एक ऐसा वर्ग पनपा है जिसे प्रो.एल.पी.जी. वर्ग के नाम से जाना जाता है. अंग्रेजी में इसका विस्तार है Pro. Liberalization, Privatization और Globalisation. इसके प्रबुद्ध नागरिकों में प्रोफेसर, इंजिनियर, डॉक्टर, विज्ञानी, जज,वकील , सिविल सर्वेन्ट्स वगैरा-वगैरा शामिल हैं. देश-दुनिया की समस्यायों पर यह वर्ग भी अपने फ़िक्र का इजहार करता रहता है जैसे बिजली ठप होने से आम आदमी परेशान, ट्रेफिक से आम आदमी परेशान, प्रदुषण से आम आदमी परेशान, पेट्रोल के दाम बढ़ने से आम आदमी परेशान, पुलिस की ज्यादतियों से आम आदमी परेशान, कानून-व्यवस्था से आम आदमी परेशान वगैरा-वगैरा. लेकिन यहाँ आम आदमी से अभिप्राय इस प्रो.एल.पी.जी. वर्ग से सम्बंधित लोगों से ही होता है. इनकी पसंदीदा नीतियों के कारण देश की 84 करोड़ आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, उनका इन आम आदमियों के फ़िक्र की  लिस्ट में कहीं कोई जिक्र नहीं होता. साफ और सीधे शब्दों में कहे तो इनकी नज़र में यह 84 करोड़ की आबादी ‘आम आदमी’ नहीं है.

अभी-अभी संपन्न हुए देश की महापंचायत के चुनावों से पहले इस वर्ग के प्रबुद्ध लोग प्रिंट मीडिया, रेडियो और टेलिविज़न पर अपने इस ‘आम आदमी’ के इस महापंचायत के चुनावों प्रति उपेक्षा से फिक्रमंद पाए गए. उनका मानना था कि देश की मिडल क्लास का अधिकांश वोट डालने नहीं जाता है. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ आबादी बड़े जोश-खरोश के साथ इन चुनावों में भाग लेती है. या यूँ कहें कि यह इलेक्शन इस 84 करोड़ आबादी की महत्वाकांक्षा की अभिव्यक्ति तो करता है लेकिन मिडल क्लास के लिए इसका कोई अर्थ नहीं है. तो इसके प्रबुद्ध नागरिकों का फिक्रमंद होना लाजिमी था. देश को योग द्वारा स्वस्थ करने का बीडा उठाने वाले बाबा रामदेव भी इनके फ़िक्र में शामिल हो गए. उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि इस लोकतंत्र की रक्षा के लिए वोट डालना हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी या मूलभूत कर्तव्य बना देना चाहिए. लेकिन वे खुश थे कि 84 करोड़ की वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है या इन चुनावों में भाग लेती है.

अब हम मान कर चलते हैं कि 84 करोड़  वह आबादी जो गरीबी की दलदल में धकेल दी गयी है, बड़ी शिद्दत के साथ ख़ुशी-ख़ुशी वोट डालने जाती है लेकिन मिडल या अपर मिडल क्लास का बोट डालने प्रति रवैया नकारात्मक है. इसकी पड़ताल होनी चाहिए. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बुर्जुआजी इस देश के हर कोने में अपनी पैठ जमा चुकी है. कहीं ऐसा तो नहीं कि देश के हर कस्बे, हर गाँव में प्रभावशाली हो चुकी इस बुर्जुआजी के लोगों के असर के अधीन इस  84 करोड़ आबादी के लोग अपना वोट डालने के लिए बाध्य हों? क्योंकि कस्बों में ही नहीं बल्कि गांवों में भी देश के मजदूर वर्ग को अपनी श्रम शक्ति बेचने के लिए प्रभावशाली लोगों के सामने गिडगिडाना पड़ता है. भारत एक ऐसा देश है जहाँ श्रम-शक्ति सस्ती और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और मजदूरों को इसे बेचने के लिए आपस में होड़ करनी पड़ती है. इसका नतीजा यह होता है कि मजदूर को श्रम-शक्ति के खरीददार से मधुर सम्बन्ध बनाने पड़ते हैं. श्रम-शक्ति का खरीददार इस बुर्जुआ राज्य का एक प्रतिनिधि भी होता है. इस बात की पूरी सम्भावना है कि वह श्रम-शक्ति के मालिक यानि मजदूर को न केवल वोट डालने के लिए बाध्य करे बल्कि अपनी इच्छा के उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने के लिए बाध्य करे.

जहाँ तक मिडल या अपर मिडल क्लास के वोट न डालने का प्रश्न है तो इसके राज की कुंजी भी उपरोक्त तथ्य में छुपी हुई है. देश की पूंजीवादी प्रणाली द्वारा मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष का एक भाग इनके यहाँ सुनिश्चित रूप से पहुँचता रहता है. यह क्लास उतनी बाध्य नहीं हो सकती जितना कि मजदूर वर्ग.

अगर आपको उपरोक्त आकलन मनोगत लगता हो तो ज़रूरी है कि आप एक प्रश्नावली बनाएँ और अपने आस-पास के सौ-पचास मजदूर लोगों से प्रश्न करें. पूरी उम्मीद है कि नतीजा वही निकलेगा जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है. उपरोक्त आकलन उन बुद्धिजीवियों के लिए चुनौती के रूप पेश किया गया है जो 84 करोड़ की आबादी के इलेक्शन में भाग लेने पर गदगद है.

अब हम उस बुद्धिजीवी को लेते हैं जो इस Liberalization, Privatization और Globalisation को संशय की दृष्टि से देखता है. इसे वामपंथी बुद्धिजीवी कह सकते हैं. हालाँकि इस विपर्यय के दौर में उसकी स्थिति अल्पसंख्यक की ही है लेकिन फ़िक्र इस तथ्य से नहीं कि वह अल्पसंख्यक है फ़िक्र उसकी अकर्मण्यता से है. इन्हें अपनी अकर्मण्यता से छुटकारा पाना होगा. इन्हें तो लाज़मी एक प्रश्नावली बनानी चाहिए और इस बुर्जुआ लोकतंत्र की सार्थकता की पड़ताल करनी चाहिए. बुद्धिजीवियों के इस वर्ग के लिए माओ त्से तुङ के इन विचारों की आज भी पूरी सार्थकता है,

“चूँकि बुद्धिजीवियों का काम मजदूर-किसान जनसमुदाय की सेवा करना है, इसलिए, सर्वप्रथम और सर्वोपरि तौर पर, उन्हें उनको (यानी मजदूर-किसानों को – अनु.) जानना होगा तथा उनके जीवन, काम और विचारों से परिचित होना होगा. हम जनता के बीच जाने के लिए , कारखानों में और गांवों में जाने के लिए, बुद्धिजीवियों को प्रोत्साहित करते हैं. यदि आप अपने पूरे जीवन में एक मजदूर या किसान से कभी नहीं मिलते, तो यह बहुत बुरी बात है. हमारे सरकारी कर्मियों, लेखकों, कलाकारों, शिक्षकों और वैज्ञानिक शोधकर्मियों को मजदूरों और किसानों के निकट जाने के लिए हर अवसर का लाभ उठाना चाहिए. कुछ लोग महज नज़र दौड़ने के लिए कारखानों और गांवों में जा सकते हैं; “इसे घोडे की पीठ पर बैठे-बैठे फूलों को देखना” कहा जा सकता है और इसका कोई फायदा नहीं हो सकता. दूसरे लोग वहां कुछ महीने रुक सकते हैं, जाँच-पड़ताल कर सकते हैं और दोस्त बना सकते हैं; इसे “फूलों को देखने के लिए (घोडे से -अनु.) नीचे उतरना” कहा जा सकता है. कुछ और दूसरे लोग वहाँ रुक सकते हैं और पर्याप्त समय तक, जैसे कि दो या तीन वर्षों तक या उससे भी अधिक समय तक वहां रह सकते हैं; इसे “बस जाना” कहा जा सकता है. कुछ बुद्धिजीवी मजदूरों और किसानों के बीच रहते हैं , जैसे कि, कारखानों में औद्योगिक तकनीशियन तथा देहातों में कृषि-तकनीशियन और ग्रामीण स्कूल शिक्षक. उन्हें अपना काम अच्छी तरह से करना चाहिए और मजदूरों और किसानों के साथ घुलमिल जाना चाहिए. हमें ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिसमें, “मजदूरों और किसानों का करीबी बन जाना” दरअसल एक आदत में ढल जाये, दूसरे शब्दों में, हमारे पास ऐसा करने वाले बुद्धिजीवियों की एक भारी संख्या होनी चाहिए. सभी तो नहीं लेकिन निश्चय ही, कुछ ऐसे हैं जो एक या दूसरे कारण से (मजदूरों-किसानों के बीच-अनु.) जा पाने में असमर्थ हैं, लेकिन हमें आशा है कि अधिक से अधिक जितने लोगों का जा पाना संभव होगा, वे जायेंगे. वे सभी एक ही समय नहीं जा सकते, लेकिन वे अलग-अलग समयों में टोलियों में जा सकते हैं. पुराने दिनों में जब हम लोग येनान में थे, बुद्धिजीवियों को सक्षम बनाया गया था कि वे मजदूरों और किसानों से सीधे संपर्क बना सकें. येनान में बहुतेरे ऐसे थे जिनकी सोच बहुत उलझी हुई थी और वे तमाम किस्म की अनोखी दलीलों के साथ सामने आते थे. हमारा एक फोरम था, जो उन्हें जनता के बीच जाने के लिए राय-परामर्श देता था. बाद में बहुतेरे गए, और नतीजा बहुत अच्छा रहा. एक बुद्धिजीवी का किताबी ज्ञान जब तक व्यवहार के साथ एकीकृत नहीं हो जाता, तब तक वह पूरा नहीं होता, बल्कि वह बहुत अधिक अधूरा भी हो सकता है. मुख्यत: पुस्तकों को पढने के ज़रिए ही बुद्धिजीवी हमारे पूर्वजों के अनुभवों को अर्जित करते हैं. निश्चय ही, पुस्तकें पढना ज़रूरी है; लेकिन यह अपने आप समस्याएं हल नहीं कर सकता. वास्तविक परिस्थिति का अध्ययन, व्यावहारिक अनुभव और ठोस सामग्री का परीक्षण, तथा मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना ज़रूरी है. मजदूरों और किसानों के साथ दोस्ती बनाना आसान काम नहीं है. अभी भी जब लोग कारखानों और गांवों में जा रहे हैं, कुछ मामलों में नतीजे अच्छे हैं लेकिन कुछ में नहीं हैं. यहाँ जो चीज निहित है वह है रुख या अवस्थिति का सवाल, यानी, व्यक्ति-विशेष के विश्व-दृष्टिकोण का सवाल. हम “सैंकडों विचार-सरणियों को परस्पर संघर्ष करने देने” की हिमायत करते हैं और जानने-सीखने की हर शाखा में बहुतेरी सरणियाँ और प्रवृत्तियां हो सकती हैं; लेकिन विश्व दृष्टिकोण के मामले में आज बुनियादी तौर पर सिर्फ दो सरणियाँ हैं, सर्वहारा और बुर्जुआ. इसमें से एक हो सकता है या दूसरा, या तो सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण या फिर बुर्जुआ विश्व-दृष्टिकोण. कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण किसी भी अन्य वर्ग का नहीं बल्कि सिर्फ सर्वहारा का विश्व-दृष्टिकोण है. हमारे आज के बुद्धिजीवियों में से अधिकांश पुराने समाज से और गैर-कामगार लोगों के परिवारों से आते हैं. जो मजदूरों या किसानों के परिवारों से आते हैं, वे भी अभी बुर्जुआ बुद्धिजीवी ही हैं क्योंकि मुक्ति से पहले जो शिक्षा उन्होंने हासिल की थी वह बुर्जुआ शिक्षा थी और उनका विश्व-दृष्टिकोण मूलत: बुर्जुआ था. यदि वे पुराने विश्व-दृष्टिकोण, अवस्थिति और भावनाओं में मजदूरों और किसानों से अलग बने रहेंगे, और वे गोल छेदों में चौकोर खूंटियों के समान होंगे, और मजदूर और किसान उनके सामने अपना दिल नहीं खोलेंगे. यदि बुद्धिजीवी खुद को मजदूरों और किसानों के साथ एकीकृत कर लें और उनके बीच दोस्ती बना लें तो जो मार्क्सवाद उन्होंने किताबों में पढ़ रखा है, वह सही मायने में अपना हो सकता है. मार्क्सवाद पर वास्तविक पकड बनाने के लिए, सिर्फ किताबों से ही नहीं, बल्कि मुख्यत: वर्ग-संघर्ष के ज़रिए, व्यावहारिक कार्य और मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए सीखना होगा. कुछ मार्क्सवादी किताबें पढने के साथ ही जब हमारे बुद्धिजीवी मजदूर-किसान जनता के साथ घनिष्ट सम्बन्ध के ज़रिए और अपने खुद के व्यावहारिक कार्य के ज़रिए कुछ समझदारी हासिल कर लेंगे तो हम सभी एक ही भाषा, न केवल देशभक्ति की सामान्य भाषा और समाजवादी व्यवस्था की सामान्य भाषा बोलने लगेंगे बल्कि शायद कम्युनिस्ट विश्व-दृष्टिकोण की सामान्य भाषा भी बोलने लगेंगे. यदि ऐसा हो जाता है तो हम सभी निश्चय ही बेहतर काम करेंगे.” (दर्शन विषयक सम्बन्धी पॉँच निबंध, पृ.114-16,  बिगुल पुस्तिका  श्रृंखला से)

इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34) की हिफाजित में

Posted on Updated on

“कोट, कपड़ा, आदि उपयोग-मूल्य, अर्थात पण्यों के ढांचे, दो तत्त्वों के योग होते हैं – पदार्थ और श्रम के. उन पर जो उपयोगी श्रम खर्च किया गया है, यदि आप उसे अलग कर दें, तो एक ऐसा भौतिक आधार-तत्त्व हमेशा बचा रहेगा, जो बिना मनुष्य की सहायता के प्रकृति से मिलता है. मनुष्य केवल प्रकृति की तरह काम कर सकता है, अर्थात वह भी केवल पदार्थ का रूप बदलकर ही काम कर सकता है. यही नहीं रूप बदलने के इस काम में उसे प्रकृति की शक्तियों से बराबर मदद मिलती है. इस प्रकार हम देखते हैं कि अकेला श्रम भौतिक संपत्ति का, अथवा श्रम के पैदा किये हुए, उपयोग-मूल्यों का एकमात्र स्रोत नहीं है जैसा कि विलियम पैटी ने कहा है, श्रम उसका बाप है और पृथ्वी उसकी माँ है. (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

“विश्व की सभी परिघटनाएं , चाहे वे मनुष्य के हाथ का फल हों अथवा प्रकृति के सार्विक नियमों का परिणाम, वास्तव में सृजन नहीं बल्कि पदार्थ के रूपों में परिवर्तन है. मानव बुद्धि जब कभी उत्पादन के विचार का विश्लेषण करती है, तो उसे केवल दो ही तत्त्व दिखाई पड़ते हैं – एक जोड़ना, दूसरा तोड़ना; यही बात मूल्य ” (उपयोग-मूल्य, हालाँकि फिजियोक्रेटों के साथ वाद-विवाद के इस अंश में वेर्री के मन में भी यह बात पूरी तरह साफ़ नहीं है कि वह किस प्रकार के मूल्य की चर्चा कर रहा है) “अथवा धन के उत्पादन के संबंध में भी लोगू होती है, जब मनुष्य द्वारा पृथ्वी, वायू, और जल को अनाज में रूपांतरित कर दिया जाता है, या एक कीड़े के चेपदार स्त्राव को रेशम में, या धातु  के अलग-अलग टुकडों को एक घड़ी में बदल दिया जाता है.” _Pietro Verri, Meditazioni sulla Economia Politica (मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. ६३)

श्रम और पण्य-मूल्य दोनों का चरित्र दुहरा है लेकिन हम यहाँ पण्य-मूल्य के दुहरे चरित्र के सामान्य विश्लेषण तक सीमित  रहेंगे. पण्य-मूल्य के दोहरे चरित्र में पहली विशेषता उसके उपयोग मूल्य से है जैसे पानी, धुप, वायू, आदि. ये सभी धन का एक रूप हैं लेकिन ये पण्य इसलिए नहीं हैं क्योंकि इसमें मानवी श्रम नहीं लगा है और इन्हें हासिल करने के लिए भुगतान के किसी भी रूप की आवश्यकता नहीं पड़ती.

पण्य की दूसरी विशेषता उसमें लगे मानवीय श्रम से सम्बंधित है जिस कारण उसका विनिमय मूल्य होता है.

अरस्तू का हवाला देते हुए मार्क्स लिखते हैं.”अरस्तू कहते हैं कि विनिमय समानता के बिना नहीं हो सकता, और समानता उस वक्त तक नहीं हो सकती, जब तक की दोनों वस्तुएं एक ही मापदंड से न मापी जा सकती हों.” “लेकिन यहाँ आकर वे (अरस्तू) ठहर जाते हैं और मूल्य के रूप का आगे विश्लेषण करना बंद कर देते हैं.

मार्क्स आगे लिखते हैं ,” अरस्तू की प्रतिभा का चमत्कार इसी बात में प्रकट होता है कि उन्होंने पण्यों के मूल्यों के अभिव्यक्ति में समानता का सम्बन्ध देखा. वह जिस समाज (गुलाम और मालिक-गुलाम) में रहते थे, केवल उसकी विशेष परिस्थितियों ने ही उन्हें यह पता नहीं लगाने दिया कि इस समानता की तह में ‘सचमुच” क्या था.(मार्क्स, पूँजी, खंड 1, पृ. 79)

“महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” सूत जी [इस युग का प्रधान वैषम्य : जनतन्तर कथा (34)] द्वारा पांडे जी के  इस कथन की स्वीकृति के  साथ हम भी सहमत हैं लेकिन यह भी जोड़ देना चाहते हैं कि यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” गति में होने के कारण हमेशा बना नहीं रह सकता क्योंकि पांडे जी के परदादा जो  कुरता पहना करते थे वह बामुश्किल दस या पंद्रह लोगों की श्रम का फल था और अंत में जिसके पास इसे बेचने का अधिकार (अगर था तो ) वह  दस या पंद्रह पर एक  का ही था. लेकिन आज इन्होने जिस 100 रूपए की शर्ट को पहना हुआ है उस पर लगी हुई श्रम, अगर हम कहें कि, विश्व के सौ करोड़ लोगों की श्रम है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी.

पूँजीवाद की सबसे बड़ी विसंगतियों में एक श्रम का इतने उच्च धरातल पर समाजीकरण परंतु इसके विपरीत श्रम के उत्पादों पर मुट्ठीभर लोगों का मालिकाना हक़ जिनकी संख्या निरंतर घटती जा रही  है …. यह “सामंजस्य और सौन्दर्य” दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है जबकि यह विसंगति और अधिक गहराती जा रही है …देखना है कि इसका क्लाईमैक्स कहाँ होता है

उपरोक्त वस्तुगत और साक्षात उदाहरण उन बुद्दिजीवियों के मुहं पर तमाचा है जो मार्क्सवाद को आयातित और अप्रासंगिक बताते हैं. बल्कि यह साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा शोषित  भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए पहले से अधिक, कहीं अधिक प्रासंगिक है.  इस बात को लेनिन ने नोट कर लिया था और मार्क्स के  शब्द “कम्युनिस्म का हौवा यूरोप पर मंडरा रहा है”  को दरुस्त करते हुए, बदले हुए हालात में उन्होंने कहा कि,” विश्व पूँजी के साम्राज्यवाद में प्रवेश करने के कारण क्रांतियों का धुरा अब यूरोप न होकर पूर्व है.”

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी आपके इतना भर लिख देने से कि  “महालक्ष्मी श्रम से उत्पन्न नहीं होतीं, वे श्रम के लिये मानव को प्रेरित करती हैं। महालक्ष्मी को वह स्थान प्रिय नहीं, जहां सामंजस्य और सौन्दर्य नहीं।” काम नहीं चलेगा. बात को तर्क-वितर्क से आगे बढाएं.

और आपका फ़िक्र कि “सूत जी सठिया गये हैं!” का फ़िक्र करते-करते … आपके ज्ञान की विशालता कहीं आपके नाम ज्ञानदत्त के लिए खतरा न बन जाये, ज़रा संभल कर … और किसी साईकैट्रिस्ट के संपर्क में रहीएगा.

….मार्क्स के इन शब्दों “To leave an error unrefuted is to encourage intellectual immorality. ...के साथ हम अपने आलेख को विराम देते हैं और पांडे जी से आशा करतें हैं कि वे बहस को आगे बढाएँगे.

Possibly Related Posts:

ज्ञानदत्त जी ऐसा कुतर्क तो गृहमंत्रालय भी नहीं करेगा

बोलते आँकड़े चीखती सच्चाइयाँ

Posted on Updated on

– अमेरिका स्थित एक अध्ययन समूह सिटीग्रुप ने कहा है कि निर्यात आधारित जैसे कि जवाहरात, आभूषण, आटो इण्डस्ट्री और टेक्सटाइल सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले उद्योग है जिनमें 2008 के आखि़र में 5,00,000 नौकरियाँ ख़त्म हो गयीं। यह आँकड़ा केवल उस संगठित क्षेत्र का है जो देश की काम करने वाली जनसंख्या का सिर्फ 10 प्रतिशत है।

– अमेरिका में दिसम्बर 1974 के बाद सबसे ज़्यादा नौकरियाँ जाने के आँकड़े को छूते हुए 2008 की शुरुआत से अब तक 30 लाख नौकरियाँ ख़त्म हो गयी हैं। यह गिरावट द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अब तक की सबसे बड़ी गिरावट है।

– अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने वैश्विक बेरोज़गारी के 2 से 5 करोड़ होने का पूर्वानुमान लगाया है।

– विश्व बैंक का पूर्वानुमान है कि मन्दी के चलते 2008 के मुकाबले 2009 में औद्योगिक उत्पादन 15 प्रतिशत तक कम हो सकता है। यह भी बताया गया कि 116 विकासशील देशों में से 94 देशों में आर्थिक विकास में कमी आयी है। इनमें से 43 देशों में ग़रीबी का स्तर ऊँचा है।

– पिछले साल नवम्बर में सरकार और विपक्ष द्वारा आलोचना करने के बाद हमारे देश के उद्योग संगठन एसौचेम ने कुछ उद्योग क्षेत्रों की नौकरियों में 25-30 प्रतिशत कमी आने की अपनी रिपोर्ट को वापस ले लिया था।

– राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे संस्थान के अनुसार भारत में शहरी ग़रीबी 25 प्रतिशत से ज़्यादा है। शहरों में 8 करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीबी में जीते हैं। यह संख्या मिड्ड की जनसंख्या के बराबर है। शहरी ग़रीबी अरक्षित समूहों जैसे महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों की विशेष ज़रूरतों के अलावा रहने, साफ पानी, साफ-सफाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और रोज़गार की समस्याएँ पैदा करती है।

– 2001 की जनगणना के मुताबिक बड़े शहरों की शहरी आबादी का 22.6 प्रतिशत हिस्सा यानी लगभग सवा चार करोड़ लोग झुग्गियों में रहते हैं। यह मोटे तौर पर स्पेन या कोलम्बिया के आकार के बराबर है।

– झुग्गियों में रहने वाले सबसे ज़्यादा लोग, लगभग एक करोड़ 12 लाख, महाराष्ट्र में हैं। झुग्गियों की आबादी बढ़ी है लेकिन झुग्गियों की संख्या कम हुई है यानी सघन हुई हैं।

– संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने जी-20 देशों की बैठक में कहा कि मन्दी का असर ग़रीब देशों में कहीं ज़्यादा पड़ता है सिर्फ नौकरी जाने या आमदनी कम होने के तौर पर ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा सूचकों – जीवन सम्भाव्यता, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या और पढ़ाई पूरी करने वाले बच्चों की संख्या में यह दिखायी देता है। आर्थिक मन्दी की सबसे ज़्यादा मार झेलने वाले लोगों में ग़रीब देशों की महिलाएँ, बच्चे और ग़रीब होते हैं। हाल में मन्दी के दौरान के आँकड़े बताते हैं कि स्कूली पढ़ाई छुड़वाने वाले बच्चों में लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या बहुत ज़्यादा थी।

– मन्दी के नतीजे में चीज़ें महँगी होती हैं, ग़रीबी बढ़ती है और ग़रीबी बढ़ना अपने आप मृत्यु दर बढ़ने में बदल जाता है। जैसेकि सकल घरेलू उत्पाद में 3 प्रतिशत की कमी को प्रति 1000 शिशुओं के जन्म पर 47 से 120 और ज़्यादा मृत्यु दर से जोड़ा जा सकता है। विकासशील देशों में उस देश के अमीर बच्चों की तुलना में ग़रीब बच्चों के मरने की सम्भावना चार गुना बढ़ गयी है और लड़कों की तुलना में लड़कियों की शिशु मृत्युदर पाँच गुना बढ़ गयी है।

– यह संकट ग़रीब देशों में कई लोगों के लिए जीवन और मौत का सवाल है और आर्थिक विकास, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या और मृत्यु दर के पुराने स्तर पर पहुँचने में कई साल लग सकते हैं। अनुमान के मुताबिक 2010 में आर्थिक स्थिति बहाल होने तक मानव विकास को पहुँची चोट गम्भीर होगी और सामाजिक बहाली में कई साल लगेंगे। पुराने संकट का इतिहास बताता है कि इसके दुष्प्रभाव 2020 तक पड़ते रहेंगे।
‘बिगुल’ मई 2009 से साभार