लेनिन

मूल्य का नियम 1 परिचय

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मार्क्स की पूंजी पर आधारित इन अंग्रेजी फिल्मों को इस ब्लॉग द्वारा, हिंदी में डब करके प्रस्तुत करने का कार्य जारी है. फिल्मों की स्क्रिप्ट के कुछ अंशों से हमारे मतभेद हैं. पाठकों से अनुरोध है कि वे इन फिल्मों को आलोचनात्मक तरीके से आत्मसात करें. फिर भी इन फिल्मों का सर्वहारा वर्ग के नए जागरण और प्रबोधन के लिए बहुत महत्त्व है जिसके लिए यह ब्लॉग http://kapitalism101.wordpress.com का  बहुत आभारी है.


आर्थिक संकट वैचारिक संकट का भी समय होता है. यह समय होता है जब लोग अपने विश्व दृष्टिकोण का पुनर्मुल्यांकन करना शुरू कर देते हैं. वे अपनी सबसे मूलभूत पूर्वधारनाओं पर सवालिया निशान लगाने लगते हैं. प्रत्येक आर्थिक संकट से मुख्यधारा के आर्थिक चिंतन में पुनर्विचार और पुनर्गठन पैदा हुआ है. मजे की बात यह है कि यह पुनर्विचार सदैव आर्थिक प्रणाली के लिए रेडिकल चुनौती के सन्दर्भ में रहा है.

सीमांत उपयोगिता सिद्धांत , जो अब भी आधुनिक मुख्यधारा के आर्थिक सिद्धांत के लिए आधार मुहैया करता है, १८०० के अंतिम काल की महामंदी पर कार्ल मार्क्स की ‘पूंजीवाद की आलोचना’ द्वारा चुनौती के प्रत्युतर में पैदा हुआ था. १९३० की महामंदी से,उदारवादी अर्थशास्त्र की असफलता ,सफल बोल्शेविक क्रांति और पश्चिम में मजबूत मेहनतकशों की लहरों से चुनौती के रूप में,  कीन्सवाद पैदा हुआ था. १९७० के संकट से, कीन्सवाद की संकट झेलने की असफलताओं और विशाल लोक वामपंथी लहरें जैसे युद्ध विरोधी, नागरिक अधिकार, स्त्री लहरे और मजबूत श्रम की शक्ति, के विरुद्ध हथियार के रूप में नव उदारीकरण पैदा हुआ.

एलन ग्रीनस्पेन :
“याद रखें कि वैचारिकी एक ऐसा प्रत्ययात्मक चौखटा है जिससे लोग हकीकत का सामना करते हैं. प्रत्येक के पास एक है…जीवित रहने के लिए आपको एक वैचारिकी चाहिए. सवाल यह है कि क्या यह सही है या नहीं. और जो मैं आपसे कह रहा हूँ, मुझे एक त्रुटी दिखी है – मैं नहीं जानता कि यह कितनी सही और स्थायी है, परन्तु इस हकीकत ने मुझे बहुत परेशान किया है.”

नव उदारवादी संस्थापना की ओर से अपनी असफलता पर इस तरह की स्वीकृतियों से मौजूदा समय की मुख्यधारा की आर्थिक वैचारिकी पर प्रश्नचिह्न लगता है. लेकिन स्पष्ट नहीं है कि हम इस वैचारिक संकट में इस आर्थिक प्रणाली को योग्य टक्कर देने के सन्दर्भ में प्रवेश कर रहे हैं. सोवियत तरह की केंद्र न्योजित प्रणालियों की असफलता ने पूंजीवाद के विकल्पों पर विचार की लोकप्रिय चेतना को धो डाला है. इस समय कार्ल मार्क्स के विचारों का यह देखने के लिए कि वे पूंजीवाद की आलोचना में क्या सही-सही कहने की कोशिश कर रहे थे, पुनर्मुल्यांकन करना उपयोगी होगा – इसलिए नहीं कि हम लेनिन, स्टालिन, माओ और अन्य जो मार्क्स के विचारों पर दावा करते हैं, के राजनीतिक अनुभवों को दोहराने की इच्छा रखते हैं , पर क्योंकि मार्क्स पूंजीवाद की पूर्ण और प्रणालीबद्ध आलोचना प्रस्तुत करते हैं जोकि आर्थिक चिंतन के इतिहास में पूर्णतया अलग, पूर्णतया अद्वितीय है. इस तरह के रेडिकल विचार हमारी मौजूदा स्थिति और सामाजिक रूपांतरण की संभावनाओं की नयी समझ की खोज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. जीवित रहने के लिए वह समाज खतरनाक है जो विशेषतय संकट के लंबे अन्तराल में प्रवेश करने पर भी आत्मालोचना की क्षमता नहीं रखता.

मार्क्स और सभी प्रसिद्ध बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों में निर्णायक भिन्नता है. सभी बुर्जुआ अर्थशास्त्री संकट को पूंजीवाद के प्राकृतिक संतुलन को खिन करनेवाली कोई बाह्य वस्तु मानते हैं. पूंजीवाद की प्रवृति असमानता, शोषण और संकट यानिकी जब स्पष्ट हो जाता है कि उनके सिद्धांत और असलियत में असंगतता है तो बुर्जुआ अर्थशास्त्री असलियत को उनके मॉडल के विपरीत होने पर दोषी ठहराते हैं. राज्य के दखल, मजदूर लहरें, मानवीय लोभ आदि के रूप में हमलावर बाह्य शक्तियों द्वारा असलियत को विषाक्त किया जाता है. आज हम इसी प्रकार के दक्षिणपंथी लोकप्रिय उत्थान की प्रतिक्रियावादी समझ को देख रहे हैं जोकि विदेशियों, वाम बुद्धिजीवियों, समलिंगियों, गैर ईसाई और काले राष्ट्र अध्यक्षों की आक्रामक घुसपैठ पर समाज की समस्यायों का दोष मढ़ते हैं.

मार्क्स विपरीत पद्वति अपनाते हैं. वे सामाजिक विरोधों को व्यवस्था के भीतर देखते हैं. ये सामाजिक विरोध व्यवस्था में इतने बुनियादी हैं कि ये अपने गुरुत्वीय क्षेत्र में समाज के सभी अंगों को खींच लेते हैं.

बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों ने सदैव मंडी को स्वतंत्रता और समानता का क्षेत्र माना है. तथ्य यह है कि मंडी वाले समाज में इतनी असमानता, संकट और अधूरी स्वतंत्रता है कि इसे सिद्धांत में नहीं बल्कि हकीकत में देखा जा सकता है. आम लोगों की सोच के विपरीत मार्क्स इन सामाजिक बुराईयों के विश्लेषण से शुरुआत करते हुए मंडी के संबंधों की आलोचना की ओर नहीं बढ़ते. मार्क्स इजारेदारी, गरीबी, शोषण और राज्य की हिंसा पर बोलते हुए आगे नहीं बढ़ते. वे उसी मंडी के स्वतन्त्र क्षेत्र से शुरू होते हैं जो  उनके बुर्जुआ आलोचकों को बहुत प्रिय है, और दिखाते हैं कि किस तरह ये सभी सामाजिक विरोध इस मूल उत्पादन संबंध से प्रकट हो जाते हैं. पूंजीवादी उत्पादन का मंडी विनिमय के लिए उत्पादन होने के तथ्य के कारण मार्क्स के लिए यहीं से शुरुआत होती है. आधारभूत उत्पादन का यह रूप कानून जैसे गुण अख्तियार कर लेता है जिसे वे ‘मूल्य का नियम’ से पुकारते हैं.

मंडी में दिलचस्प लगने वाली कौनसी वस्तु मार्क्स को मिली ? यह कोई आपकी इच्छानुसार वस्तुएं खरीदने या बेचने की स्वतंत्रता नहीं थी. तथ्य यह है, कि मंडी समाज के सामाजिक जीवन में भाग लेने के लिए, प्रत्येक को चीजें खरीदनी या बेचनी पड़ती हैं. जीवित रहने के लिए, समाज में भाग लेने के लिए, प्रत्येक को चीजें खरीदने और अपनी श्रम के उत्पाद बेचने के लिए, मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.  यह विलक्षण रूप से,  प्रारंभिक समाजों से जहाँ मेहनतकश अपने श्रम से स्वयं को पालते थे, यानिकी वे अपने उपयोग के लिए श्रम द्वारा वस्तुएं उत्पादित करते थे, से अलग तरह का सामाजिक संगठन है. पूंजीवादी समाज में उत्पादित होनेवाली चीजें स्वयं के लिए नहीं होती. लोग उनका उत्पादन विनिमय के लिए करते हैं. इस लिए सामाजिक श्रम प्रक्रिया, परोक्ष रूप से, विनिमय के द्वारा तालमेल बिठाती है.

मंडी द्वारा परोक्ष रूप से तालमेल बिठाने वाले, निजी उत्पादकों के समाज में लोगों के मध्य सामाजिक संबंध, जिंसों के संबंध, चीजों के मध्य संबंधों का रूप ले लेते हैं. लोगों के बीच संबंध जिन्स मूल्यों में प्रकट होनेवाले मूल्य संबंध बन जाते हैं. आर्थिक रूप से, लोग एक दूसरे से धन और मूल्य द्वारा संबंधित हो जाते हैं. जिन्स संबंधों का यह संसार, व्यक्तियों के नियंत्रण से बाहर  स्वतन्त्र रूप ले लेता है जो प्रतिप्रभाव पैदा करता है और उनके रिश्तों को नियंत्रित करता है. एडम स्मिथ ने इसे ‘मंडी का ओझल हाथ’ कहा.  मार्क्स इसे ‘मूल्य का नियम’ कहते हैं.

मूल्य का नियम क्या है ? ये अव्यक्तिगत, समाज पर अपना असर डालनेवाली अर्थ की अंध शक्तियां हैं. वह समाज अद्वितीय है जहाँ श्रम का प्रमुख रूप मंडी में, विनिमय के लिए उत्पादित होता है. लोगों के बीच के संबंध जिंसों के बीच मूल्य संबंध बन जाते हैं. और ये मूल्य संबंध अव्यक्तिगत शक्तियां बन जाते हैं जिनके समाज के लिए अनचाहे परिणाम होते हैं. उदाहरण के लिए, हमें मिलती है पूँजी.

अपने श्रम के लिए, लोगों ने सदैव, औजारों और अन्य संसाधनों का उपयोग किया है. इन्हें उत्पादन के साधन कहते हैं. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में, ये उत्पादन के साधन पूंजी बन जाते हैं. औजार, मशीन, कच्चा माल और यहाँ तक कि कामगार मूल्य के साथ जिन्स बन जाते हैं. इससे मंडी में उत्पादन के साधनों को खरीदना और इन उत्पादन के साधनों के उत्पादों को मुनाफे के लिए बेचना संभव हो जाता है. दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति उत्पादन में धन निवेश कर सकता है ताकि और अधिक धन कमा सके . मूल्य, उसके खुद में उद्देश्य की तलाश, समाज की प्रधान शक्ति बन जाती है. यही है जो पूंजी है, सामाजिक क़ीमत से उपराम, मूल्य का अपने ही लिए विस्तार. पूंजी एक वर्ग का रूप ले लेती है जो उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है और अन्य लोगों को मुनाफे के लिए उत्पादन करना पड़ता है.

स्वाभाविक रूप से पूंजी की विषमता से आर्थिक और  भूमंडलीय अन्तरिक्ष में, दौलत और कंगाली के ध्रुव खड़े हो जाते हैं. पूंजी स्व-निषेधित भी होती है. हालाँकि यह कामगार पर काबू पानेवाली, एक अव्यक्तिगत शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन मुनाफा पैदा करने के लिए इसे कामगार की आवश्यकता पड़ती है. इसकी जड़ में है सामाजिक विरोध. इस सामाजिक विरोध से, निरंतर अस्थिरता और सामयिक संकट  फूटते रहते है.

बहुत से अन्य और ये सभी रेडिकल अर्थ मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ के भाग हैं.

यह वीडियो सीरिज मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ पर विभिन्न विषयों को शामिल करेगी : उपयोग मूल्य, विनिमय मूल्य और मूल्य में अंतर, पूर्ति, मांग और मूल्य का मूल्य से संबंध, अमूर्त श्रम, शोषण, संकट, सामाजिक आवश्यक श्रम समय और यहाँ तक कि विश्व को बदलने के लिए ‘मूल्य का नियम’ की समझ . उम्मीद की जाती है कि आज रेडिकल लहरों को सही तरह से समझने के महत्व के लिए इनका योगदान होगा क्योंकि उन्हें ऐसे विचार चाहियें  जिनसे वे अपनी मांगे और रणकौशल को स्पष्टता से बयान कर सकें.

तल्खी से लिखी आपकी टिपण्णी. शुक्रिया

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दिनेश कुमार बिस्सा की एक टिपण्णी बड़ी दिलचस्प रही, हालाँकि उन्होंने बड़े व्यंग्यात्मक अंदाज से मार्क्सवाद पर तीर छोड़े हैं. लेकिन उनकी टिपण्णी उन लोगों की टिप्पणियों से कहीं बेहतर है जो मार्क्सवाद में आस्था रखते हैं, जबकि मार्क्सवाद आस्था का नहीं कर्मों का विज्ञान है. चलिए, दिनेश जी की टिपण्णी से शुरू करते हैं :

“मार्क्सवाद से समाज मैं असमानता मिट कर समानता आ जाती है, भूखे के पेट में रोटी, बेरोजगार के हाथ में काम, नंगे के तन पर कपडा, बच्चों के हाथ में कापी-कलम. गरीबी मिट कर सभी लोग अमीरी के सागर में गोते लगाने लगते हैं, मतलब सब कुछ  अच्छा ही अच्छा. उदाहरण : कम्युनिस्ट देशों रूस, क्यूबा, चीन. भारत के दो महान राज्य, केरल और पश्चिम बंगाल…. इन जगहों में गरीबी और असमानता, शोषण आदि के दर्शन भी नहीं होंगे. दिन में चिराग लेकर ढूंढ लो, तो भी…दिनेश कुमार बिस्सा.

दिनेश भाई, हम यह अंदाजा तो नहीं लगा सकते की आपके घोर मार्क्सवादी विरोध के पीछे आपका अनुभव या फिर आपकी मिडल क्लास की आदर्शवादी-समतावादी संभावनाओं की पूर्ति में मार्क्सवाद के इतिहास ( इतिहास वह नहीं जो है, बल्कि वह जो आपका मन, आपकी सहूलत से गढ़ना चाहता है ) का खरा न उतरना रहा है या फिर कुछ पूर्वाग्रह जो मिडल क्लास की जीवन स्थितियों से उनकी विचार शैली में आ जाते हैं. लेकिन इससे हमें अपना दृष्टिकोण, पाठकों के सामने स्पष्ट करने का मौका मिल गया, जिसका प्रेरणा स्रोत तल्खी से लिखी, आपकी यह टिपण्णी है. शुक्रिया

बीसवीं सदी की क्रांतियों और परिणामस्वरूप समाजवाद को लागू करने की मुश्किलें, समाजवाद के भीतर बुर्जुआ वर्ग का होना, अवसर मिलते ही, उन द्वारा मजदूर वर्ग के अधिनायकवाद के स्थान पर फिर से बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना (वह भी लाल झंडे तले, कम्युनिस्ट भीतरघातियों द्वारा जो शुद्ध से शुद्ध कम्युनिस्ट पार्टी में होते हैं, और हम यह दावा नहीं करते कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा. यह काम हम उन लोगों के लिए छोड़ देते हैं जिन्हें अपने और अपनी पार्टियों के शुद्ध होने पर गर्व है) हमारा फ़िलहाल इतना ही आग्रह है कि पूंजीवाद अपने विकास के उस चरण पर पहुँच चुका है, जहाँ इसकी अप्रासंगिगता स्पष्ट दिखाई देती है.

जहाँ तक मार्क्सवाद के प्रासंगिक होने का अर्थ है, तो यह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है. विश्व के हर कोने में पूंजीवादी संबंधों का वर्चस्व हो चुका है. बेशक सबसे धनाढ्य कार्पोरेशनों के पास विज्ञान और उच्च तकनीक से सुपर मुनाफा कमाना संभव है, लेकिन तीव्र गति के युग में, विज्ञान और तकनीक अन्य मझौले पूंजीपतियों के पास पहुँच कर उनका सुपर मुनाफा बंद कर देती हैं. ( सुपर मुनाफे से आशय है कि उच्च तकनीक द्वारा कम मजदूरों से अधिक उत्पादन करना जिसके परिणामस्वरूप सुपर मुनाफे का स्रोत कमजोर पूंजीपति वर्ग के बेशी मूल्य का साझा पूल होता है)

आपने यूनानी देवता सफिंक्स की मिथ तो सुनी ही होगी. वे एक पहेली द्वारा ऐथंज़ शहर की रक्षा किया करते थे. शहर में आनेवाले अजनबी को पहेली हल करनी होती थी. असफलता का मतलब था, मौत. मार्क्स ने पूंजीवाद की मौत के लिए कोई पहेली तो गढ़ी नहीं है, लेकिन उस पहेली को हल किया है, जिसे जो  भी जान लेता है, उसे पूंजीवाद की मौत स्पष्ट दिखाई देने लगती है. चलिए हम उस पहेली को आपके सामने रखते हैं.

बड़े पूंजीपतियों ने विज्ञान और तकनीक की मदद से सुपर मुनाफा कमाना शुरू कर दिया. लेकिन देर सवेर वह छोटे पूंजीपतियों के पास पहुँच गयी. उन्हें उच्चतर तकनीक की आवश्यकता पड़ी. लेकिन जल्दी ही यह भी दूसरों के पास पहुँच गयी. इस क्रिया का परिणाम यह हुआ कि उत्पादन, बिना मजदूर के होने लगा. (हालाँकि, ऑटोमेटिड से ऑटोमेटिड मशीन के लिए व्यक्ति की आवश्यकता होगी, लेकिन इतना दिखाई दे ही रहा है कि मजदूरों की संख्या कम से कम की जा सकती है और उनके शोषण की दर में इंतिहा बढौतरी की जा सकती है जोकि की जा चुकी है और की जा रही है) अब पूंजीपति बिना मजदूर की मदद से (या उनकी न्यूनतम  संख्या से) उत्पादन कर रहे हैं. समस्या यह है कि,

पूंजीपति मंडी में जिंसों को बेचकर मुनाफा अर्जित करना चाहता है, लेकिन वहां  कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जिसके पास क्रय करने के लिए धन हो, क्योंकि इसके लिए, धन तो मजदूरों के पास होना चाहिए था. लेकिन उन्हें कौन दे क्योंकि वे काम तो करते नहीं. मुट्ठीभर पूंजीपति और उनके पास विशाल उत्पादन ! हाँ वे स्वयं उपभोगता बनकर, एक दूसरे के उत्पादन का थोडा बहुत उपभोग कर सकते हैं, लेकिन यहाँ तो विज्ञान और तकनीक की मदद से चंद मजदूरों ने जो पैदा किया है, उसके लिए कम से कम आठ सौ करोड़ व्यक्तियों की आवश्यकता है और वे (पूंजीपति) हैं आठ करोड़. यही पूंजीवाद का संकट है, जो फूटता रहता है और उनके चाटुकार बुद्धिजीवी पूंजीपतियों को इसके अन्दर नहीं, बाहर अमूर्त चीजों में होने की ओर, इशारों द्वारा उन्हें भरमाते रहते हैं.

2008 से फूटी महामंदी वैसे ही  बरक़रार है और विकसित राष्ट्रों की अर्थव्यवस्थाएं डब्बल डिप्रेशन की और बढ़ रही हैं. भारत का मध्यम वर्ग खुश है कि यहाँ आठ प्रतिशत की विकास दर बनी हुई है (हालाँकि इस विकास से पैदा हुई भूख ने संकटों से घिरे नेपाल और पिछड़े पाकिस्तान को भी पीछे छोड़ दिए है – बकौल स्वतन्त्र एजेंसियों की ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार) लेकिन हमारे एक मिडिल क्लास बुद्धिजीवी इस विकास की दर से इतने आत्ममुग्ध हैं कि उनको विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का यह आकलन गलत लगता है कि यह दर केवल 2015 तक जारी रहने वाली है, उसके बाद धीमी गति से 2022 तक और बस उसके बाद तो घिसटेगा.

दिनेश भाई या उनकी ही तरह के मिडल क्लास के लोगों से हमारा आग्रह है कि मार्क्सवाद उनके लिए नहीं है क्योंकि मिडल क्लास चरित्र के लिहाज से बुर्जुआ विचारधारा की पैरोकार होती है, लेकिन बुर्जुआ वर्ग द्वारा पैदा की गयी होड़, उनकी छोटी सी पूंजी को हड़प कर लेती है, तो छटपटाता हुआ यह वर्ग, अपने कुछ रेडिकल प्रतिनिधियों द्वारा मार्क्सवाद से सहानुभूति की उम्मीद पाल लेता है.

इसके अलावा कुछ लोग अपनी उच्च बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी मार्क्सवाद की और खींचे चले आते हैं. ध्यान रहे, बौद्धिक क्षमता आसमान से पैदा नहीं होती, इसके ऐतिहासिक विकास, अध्ययन-चिंतन के लिए मेहनतकश वर्ग द्वारा मुहैया करवाई गयी अतिरिक्त मूल्य की लूट रही है. उनके ज्ञान और चिंतन का स्रोत भी श्रमिक वर्ग ही रहा है, जिसका कर्ज चुकाने की उनकी लालसा, उन्हें इधर खींच लाती है.

मगर मार्क्सवाद मिडल क्लास का नहीं, सर्वहारा वर्ग के कर्मों का विज्ञान है. इसका इतिहास कठमुल्लाओं का इतिहास नहीं है. अगर मिडल क्लास से आये लोगों ने,संजीदगी से, इसका चिन्तनं-मनन किया है तो वे निराश नहीं हुए हैं, बल्कि एक नए इन्सान के रूप में, उनका पुनर्जन्म ही हुआ है. स्वयं मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ इसके उदाहरण हैं. उन्होंने न केवल मजदूर वर्ग की मुक्ति के इस विज्ञान को अपनाया बल्कि मिडल क्लास के समाजवाद, नैतिकता और मूल्यों की गंदगी से इसकी हिफाजित के लिए संघर्ष किया.

दिनेश की समस्या यह है कि वे एक पैरे में मार्क्सवाद के इतिहास को समेट देना चाहते हैं. उनके इस पैरे की विषय-वस्तु को दो हिस्सों में  बांटा जा सकता है. एक मार्क्सवाद का समतावादी, गरीबी रहित सभी को अमीरी के ठाठ-बाठ मुहैया करवाने वाला ‘पंडोरा का डिब्बा’ और दूसरा इस पंडोरे के डिब्बे से निकला वह इतिहास जो रूस से शुरू होकर भारत के पश्चिम बंगाल और केरल तक का है. अंबानियों और टाटाओं के मुकाबले मिडल क्लास गरीब हो सकती और समाजवाद से सहानुभूति की उम्मीद पाल सकती है. फैशनेबुल तौर पर, मजदूर वर्ग के आंदोलनों के उभार के दौर में, वे धारा में खींचे चले आते हैं. यह ऐसे होते है जैसे आप अपने रिश्तेदार के घर जाएँ और उस घर के सदस्य अपने घर के निर्माण में व्यस्त हों. आपकी उनके घर से कोई दिलचस्पी न थी लेकिन उनके साथ आप भी खिंच लिए और लगे हाथ बंटाने. पर निर्माण कार्य पूरा होते ही, घरवाले घर में बसने लगे लेकिन आप फालतू करार दे दिए गए.

वैज्ञानिक समाजवाद सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद होता है जिसमें मिडल क्लास और उसके बुद्धिजीवियों के एक हिस्से को घुटन होने लगती है. अपने  वर्गीय दृष्टिकोण से पैदा हुए दिग्भ्रमण के कारण, उनका जल्दी ही मोहभंग हो जाता है. वे पुरानी  स्थिति को बहाल करने के लिए छटपटाने लगते हैं और कई बार उनकी कोशिश बुर्जुआजी की पुनर्बहाली के काम आती है, जैसा कि इतिहास में हुआ है.

फिर भी अगर दिनेश भाई जैसे लोग, संजीदगी से मार्क्सवाद को अपनाना चाहते हैं तो उन्हें इस ब्लॉग की और से सुझाव है कि वे मार्क्सवाद पर मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ आदि की रचनाये पढ़ें. इनसे उन्हें पता चलेगा कि कैसे मार्क्सवाद उन लोगों से जो गरीबी को इस तरह से मिटाकर… और सभी के लिए अमीरी की स्थिति की यूटोपिया बातें करते थे…टक्कर लेकर और विरोध में विकसित हुआ है. लाल झंडे का मतलब मार्क्सवाद नहीं होता. इसके इतिहास में वे सभी स्थितियां शामिल हैं जिन्हें संशोधनवाद, सिंडीकेट्वाद ,ट्रेड यूनियनवाद,अर्थवाद, मिडल क्लास का अवसरवाद,कम्युनिस्टों का उदारतावाद ,अतिवामपंथवाद , दुस्साहसवाद , दायें-बाएं भटकाव, सोवियत यूनियन और चीन की क्रांतियों के बाद हुए तीक्ष्ण वर्ग-संघर्ष और परिणामस्वरूप मजदूर वर्ग की लाल झंडे तले बुर्जुआ वर्ग से शिकस्त और समाजवाद (जिसके बारे में मिडल क्लास सोचती है कि यह कोई उनके चौखटे के अनुसार कोई पकी-पकाई स्थायी चीज हो, जिसकी कोई समस्या न हो) और इस समाजवाद से साम्यवाद में संक्रमण और सर्वहारा वर्ग का अधिनायकवाद वगैरा, वगैरा. अगर आप को यह सब भारी-भारी लगता है, तो मुआफ कीजियेगा, यह सब आपके लिए नहीं है.

हम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजदूर वर्ग के संघर्षों की बदौलत बदली स्थितियों, विशेषरूप से, सोवियत यूनियन और चीन की क्रांतियों की प्राप्तियों और उनकी हार को स्वीकार करते हैं. सर्वहारा वर्ग द्वारा विकसित किये गए उसके नेताओं और बदले में इन नेताओं द्वारा सर्वहारा वर्ग की सेवा को तस्लीम करते हैं, भले ही, इन नेताओं द्वारा ऐसी गलतियाँ भी हुई हैं  जिनसे बचा जा सकता था. लेकिन उनकी गलतियाँ समाज विज्ञानियों की गलतियाँ थी जिनका होना स्वभाविक होता है लेकिन दोहराना बेवकूफी. जीत-हार की इस अमीर विरासत का मालिक सर्वहारा वर्ग है जो अच्छी तरह जनता है कि उसने इसका कैसे समाहार करना है.

हम साफ़ साफ़ बता देना चाहते हैं कि इक्कीसवीं सदी बीसवीं सदी से पूर्णतया भिन्न है. विश्व के पिछड़े से पिछड़े हिस्से में भी तत्व रूप से सामंतवाद गायब है और वह पूंजीवाद के पैंतरे के अनुसार गतिमान है. भारत के आदिवासी बहुल और पिछड़े अफगानिस्तान जैसे क्षेत्रों का वास्ता जागीरदारों से नहीं देशी-विदेशी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से है. विज्ञान और तकनीक के विकास में पूंजीवादी संबंध बेड़ियाँ बन गए हैं. उच्च वैज्ञानिक तकनीक के विकास ने सर्वहारा वर्ग की उत्पादन क्षमता में इंतहा बढौतरी की, लेकिन बुर्जुआजी ने श्रम सघनता को लागू किया है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, 1970 के दशक के बाद, पूंजीपतियों के पास एकत्रित होने वाली वित्तीय पूंजी की मात्रा में भी इंतहा बढौतरी हुई है, जिसके उत्पादन कार्य में लगने की संभावना निशेष हो चुकी है. लेकिन श्रमिक वर्ग की, इसके बिलकुल उल्ट, आमदनी में गिरावट आई है. पूंजीपतियों की समस्या यह है कि उनको उनकी  महत्त्वाकांक्षानुसार उपभोगता वर्ग नहीं मिल पा रहा. मिलेगा भी कैसे क्योंकि श्रमिक वर्ग द्वारा पैदा किये मूल्य का अधिकतर हिस्सा तो पूंजीपति वर्ग की जेब में सट्टेबाजी और जुआरी-जुगाड़ों में मशगूल है. हम राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों की नहीं, नयी समाजवादी क्रांतियों की पूर्वबेला में जी रहे हैं.

और अंत में मिडल क्लास के नौजवानों से  : आपके आदर्श अमेरिका और यूरोप ने तस्लीम कर लिया है कि नवउदारीकरण उनकी बेवकूफी थी. लेकिन हमारा मानना है कि यह सब नाटक है. नवउदारीकरण का अर्थ था कि पूंजीवादी खुल्ले मुकाबले में श्रमिक-वर्ग की रगों से खून के अंतिम कतरे को निचोड़ लेना. लेकिन पूंजीवाद के आन्तरिक विरोधाभास होते है, जिन्हें उनके बुद्धिजीवी बाहर तलाशते रहते हैं और मुसीबत पड़ने पर राज्य जो उनका सच्चा सेवादार है, से लोगों की बचतों पर डाका डालने के लिए, बैलआउट मांगते हुए बिलकुल नहीं शर्माते. उनकी खुले मुकाबले की श्रेष्टता का भंडाफोड़ हो जाता है.

भारत जैसी ही चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका आदि अर्थव्यवस्थाओं के में जी रहे  मिडल क्लास के गगनविहारियों के पास 2022 तक ऊँची उड़ान भरने का मौका है. हालाँकि उनके अधिकतर हिस्से को सर्वहारा वर्ग में तब्दील होते हुए देखा जा सकेगा. हमारी इस पीड़ा से लुत्फ़ उठाने का कोई मंशा नहीं है लेकिन आपसे प्रार्थना है कि आप चीजों को गति में देखने की आदत डालें. मार्क्सवाद वैसा सुहावना नहीं है, जिसका जिक्र दिनेश जी ने किया है. बल्कि इसके विपरीत कहीं अधिक पीड़ादायक है. लेकिन ये शब्द ‘सुहावना’ और ‘पीड़ादायक’ रिलेटिव हैं. इनके अर्थ बुर्जुआ वर्ग, मिडल क्लास और सर्वहारा के लिए न केवल अलग-अलग होते हैं बल्कि कई अवस्थाओं में विपरीत भी होते हैं.

पूंजीवादी व्यवस्था में अनाज का बेशी उत्पादन सड़ने के लिए शापग्रस्त है

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इतिहास से दो संदर्भों का जिक्र जरूरी है. पहला भारत के एक प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का, जिनका कहना था कि  अगर संपन्न लोग सप्ताह में एक बार व्रत रखें तो लाखों भूखे भारतियों का पेट भर सकता है और दूसरे लेनिन का जो अक्टूबर क्रांति के बाद उन किसानों से मिलते हैं, जिन्हें शिकायत होती है कि उनसे अनाज की जो मात्र उगाही गयी है, वह जायज नहीं है. शास्त्री जिस देश का प्रतिनिधित्व करते है उसके केंद्र में सत्ताधारी वर्ग का लालच है. उनका व्रत एक नौटंकी से बढ़कर नहीं है. दूसरी और जब किसान लेनिन को अपनी शिकायत दर्ज करवाते हैं तो लेनिन का  कहना है कि सचमुच उनका देश विपदा का मारा है. लेकिन फिर भी, वे उन किसानों को एक पत्र लिखकर देते हैं जिसमें उनसे उगाहे गए अनाज में से कुछ मात्रा का वापस होने का वचन होता है. किसानों के साथ अपनी मुलाकात के समापन पर वे उनसे कहते हैं  कि वैसे तो उनकी साझी रसोई का भोजन साधारण किस्म का होता है, लेकिन रसोइये का कहना है कि आज खाना ठीक बना है. इसलिए वे किसानों से आग्रह करते हैं कि वे साझी रसोई से खाना खाकर जाएँ. किसान खाना खाते हैं. किसानों का मत होता है कि जो खाना उन्होंने उस रसोई में खाया, वैसा घटिया खाना उन्हें जिंदगी में कभी नहीं खाया था. खैर, लेनिन भी उस रसोई में भोजन करने के लिए जाते हैं. किसान सोचते हैं कि लेनिन के लिए शायद कोई विशेष भोज की व्यवस्था हो. वे चोरी-चोरी रसोई के सुराखों से लेनिन को खाना खाते हुए देखते हैं. वे हैरान होते हैं कि लेनिन भी उसी घटिया खाने को मजे से खा रहे होते हैं. तब उनका मन पलटता है. वे लेनिन को उनका लिखा हुआ पत्रलौटा देते हैं.

हमारा इस प्रकार का कोई निष्कर्ष नहीं है कि शास्त्री, लेनिन के मुकाबले कम ईमानदार हैं. मगर दोनों के दृष्टिकोण में जो बुनियादी फर्क है वह यह कि एक उस निर्माणाधीन समाजवादी व्यवस्था का सेवक है जिसके हित मेहनतकश अवाम से जुड़े हुए हैं जबकि दूसरा अच्छी तरह से जानता है कि उसके देश का मेहनतकशों से कुछ भी लेनादेना नहीं है. यह देश जिस रास्ते पर चल रहा है वहाँ केवल परजीवी लोगों की कभी न संतुष्ट होनेवाली लालच की भूख है और वह इसी लालच की भूख का प्रतिनिधित्व करता है. दोनों देश युद्ध या युद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहे होते हैं. सोवियत यूनियन के लाल गार्ड अपने ही देश के प्रतिक्रियावादी दस्तों से लड़ रहे होते हैं जबकि भारत और पाकिस्तान के गरीब लोगों का आपसी युद्ध से कोई लेनादेना नहीं है. अलबता वहाँ के शासक वर्ग अपने देशों के बुनियादी मसलों से लोगों का ध्यान बांटने के लिए अवाम पर युद्ध थोपे हुए हैं.

मूख्य मुद्दे की ओर चलें. देश में जारी मौनसून की वजह से देश के कई निचले हिस्सों में बाढ़ का पानी भरने से सरकारी गोदामों और खुल्ले में रखा अनाज भीग कर सड़ने लगा. मीडिया ने जब इसे उजागर किया तो सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने प्रश्न पूछा कि क्यों नहीं इस सड़ते हुए अनाज को गरीबों में मुफ्त बाँट दिया जाता ?

हमारी कार्यपालिका बुर्जुआ वर्ग की सच्ची सेवक है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त सुझाव से भ्रम होता है कि शायद यह संस्था वर्गों की आपसी टक्कर से ऊपर – निष्पक्ष हो. ध्यान रहे सुप्रीम कोर्ट अनाज को तभी गरीबों में मुफ्त बांटने के लिए कहता है जब यह सड़ रहा होता है. सुरक्षित पड़े अनाज पर गरीब लोगों का कोई हक़ नहीं है. खैर, इससे इतना तो हुआ ही है कि पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति बढ़ते हुए आक्रोश पर ठन्डे पानी के छींटे पड़ गए हैं.

जैसा कि अपेक्षित था, कृषि मंत्री शरद पवार ने अपनी चुप्पी को , एक न एक दिन, तोडना ही था. सो उन्होंने कह दिया कि अनाज भले ही सड़ता है तो सड़ जाये लेकिन इसे गरीबों में मुफ्त बाँटना संभव नहीं है. शरद पवार पर पूंजीवादी व्यवस्था की आत्मा मण्डी , जहाँ जिंसों का मूल्य उगाहा जाता है, को बचाने की जिम्मेदारी है. अगर अनाज को मुफ्त में बाँटने की परम्परा शुरू हो गयी तो मण्डी व्यवस्था कमजोर होकर तबाह भी हो सकती है, जोकि पूंजीवादी व्यवस्था की सेहत के लिए दरुस्त नहीं है.

थोडा सा इस व्यवस्था को भी समझा जाये. हमारे देश की खेती का पूंजीवादीकरण हो चुका है. सामंतवादी व्यवस्था जहाँ समाज का एक बड़ा हिस्सा किसानों के रूप में काम करता था, उसे अपने उत्पादन के एक हिस्से को, सामंतों और राज्य-व्यवस्था को, कर के रूप में, देना पड़ता था. बाकी बचे अनाज पर उसका हक़ होता था. अपनी रोटी की आवश्यकता पूरी करने के बाद जो अनाज बचता था, उसे वह मण्डी में बेच देता था. मण्डी में अन्य उत्पादक इसके खरीददार होते थे. जैसा कि हम जानते हैं कि मण्डी में जिंसों के आपसी विनिमय के लिए जरूरी शर्त जिंसों  के उत्पादन पर लगी श्रम-शक्ति की मात्रा का समान होना होता है. यह शर्त सामंतवादी व्यवस्था और पूंजीवादी व्यवस्था में, कमोबेश एक जैसी होती है.

लेकिन सवाल पैदा होता है कि पूंजीवादी व्यवस्था में क्योंकर ऐसा होता है कि एक तरफ भूखमरी और दूसरा तरफ गोदामों में सड़ता हुआ अनाज ? पूंजीवादी व्यवस्था का विश्लेषण करने पर मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचे कि उत्पादक मशीनों और मजदूरों की सहायता से उत्पादन करवाते हैं. मशीनें और कच्चा माल उत्पादन प्रक्रिया के दौरान अपने भौतिक गुणों में तबदीली कर लेते हैं, परंतू उनके मूल्य में कोई बढौतरी नहीं होती. इसलिए मार्क्स मशीनों और कच्चे माल को स्थिर पूंजी कहते हैं. उत्पादन प्रक्रिया में उत्पादन से पहले का मूल्य ही नए उत्पाद में हस्तगत हो जाता है. इस क्रिया को अंजाम देने के लिए मनुष्य की श्रम-शक्ति दरकार होती है. इसे भी मण्डी से उन शर्तों पर ख़रीदा जाता जैसे स्थिर पूंजी खरीदी जाती है. अर्थात काम के एक दिन के लिए दरकार श्रम-शक्ति के पुन:उत्पादन पर खर्च हुई जीवनोर्पाजन वस्तुओं के मूल्य के बराबर. उत्पादन के दौरान यह भी नए उत्पाद में हस्तगत हो जाती है. लेकिन नए उत्पाद का मूल्य अपने पर आये सभी खर्चों से अधिक होता है. यह सब श्रम-शक्ति के कारण होता है जो अपने मूल्य से अधिक मूल्य पैदा करने का गुण रखती है. इसलिए इसे परिवर्ती पूंजी कहते हैं. फैक्ट्री की तरह यह नियम पूंजीवादी कृषि उत्पादन  पर भी लागू होता है.

काम के दिन के दौरान वह समय जो मजदूर अपने जीवनोर्पाजन वस्तुओं के मूल्य के बराबर मूल्य पैदा करने के लिए खर्च करता है, उसे जरूरी श्रम-समय कहते है. इसके अतिरिक्त लगे श्रम को बेशी श्रम-समय कहते हैं जिससे बेशी उत्पादन या बेशी मूल्य पैदा होता है.

इसे एक उदाहरण  से समझा जा सकता है. मान लो एक कार्य दिवस 10 घंटे का है. मजदूर 5 घंटों में अपने जीवित रहने के लिए जरूरी मूल्य को पैदा कर लेता है. अन्य 5 घंटे वह बेशी उत्पादन या बेशी मूल्य पैदा करने के लिए खर्च करता है तो,
शोषण की दर % = अतिरिक्त श्रम / जरूरी श्रम * 100
या 5 / 5 * 100 = 100 %

लेकिन मशीनों की रफ़्तार बढ़ाकर और तकनीक में होनेवाले निरंतर सुधार से मजदूर की उत्पादन क्षमता में इतनी अधिक बढौतरी हो चुकी है कि अपने जीवन निर्वाह के लिए जरूरी मूल्य को वह एक घंटे या इससे भी कम समय में पैदा कर लेता है. अगर वह जरूरी मूल्य को एक घंटे में पैदा करता है तो,

उसके शोषण की दर % = = अतिरिक्त श्रम / जरूरी श्रम * 100
या 9 / 1 * 100 =900 %

हम अपने मूल प्रश्न की ओर लोटते हैं कि अनाज सड़ क्यों रहा है ? क्यों नहीं गरीब इसे खरीद पा रहे ? उत्तर आसान है कि मजदूरों के शोषण की दर में बेशुमार बढौतरी ने उसकी  खरीद शक्ति को सीमित कर दिया है जबकि दूसरी ओर बेशी मूल्य के रूप में पूंजीपति वर्ग के पास बेशुमार दौलत इकठ्ठी हो चुकी है. पूंजीपति तो इतना अधिक अनाज खाने से रहा और मजदूर के पास इसे खरीदने के पैसे नहीं हैं !

सुप्रीम कोर्ट का यह कथन कि सड़ते हुए अनाज को गरीबों में बाँट दिया जाये , सीधा-साधा लगता है. लेकिन ऐसा है नहीं. इसे क्रियांविंत करने का मतलब होगा पूंजीपति वर्ग के पास मौजूद नोटों का मिटटी हो जाना. मण्डी में छाई मंदी का यही कारण होता है – जिसमें बाज़ार में वस्तुओं की भरमार होती है लेकिन कोई खरीदार नहीं होता, क्योंकि मूल्य का बड़ा हिस्सा तो पूंजीपति वर्ग के गल्लों में कैद होता है और मजदूर वर्ग की खरीदने की शक्ति संतृप्त हो चुकी होती है.

पूंजीवाद का इतिहास मण्डी में छाई मंदी से निपटने के लिए बेशी उत्पाद को समुद्र वगैरा में डंप करने के लिए कुख्यात रहा है. भारत में अच्छी मौनसून ने अनाज के और अधिक बेशी उत्पादन की संभावना पैदा की है जिससे अनाज को संभालने के लिए इस व्यवस्था को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता. हो सकता है पूंजीवाद की ‘मैनेजिंग कमेटी’ सरकार को इसे समुद्र में डंप करना पड़ता. बाढ़ ने उसके कार्य को आसान कर दिया था. लेकिन मीडिया की आपसी होड़ के चलते मामला पेचीदा हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि इससे जनता में आक्रोश बढ़ सकता है. सही मौके पर सही बयान दाग कर उसने पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति अपनी सही सदभावाना ही दिखाई है.

सवाल पैदा होता है कि आखिर कब तक इस प्रकार के ठन्डे छींटों की बौछार से जनता के आक्रोश को दबाकर इस व्यवस्था को बचाकर रखा जा सकेगा ? मजदूर वर्ग की न केवल चेतना में बढौतरी हो रही है बल्कि वह नए सिरे से संगठित होकर अपने हितों की दुश्मन, इस पूरी पूंजीवादी व्यवस्था को, इसे इसके अंजाम – इसके लिए इतिहास में सुरक्षित कचरा पेटी – के हवाले करने के लिए चाक-चौबंद हो रहा है.

अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस पर विशेष

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विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति का प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की दिशा

कात्यायनी

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर
3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में
4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा
5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन
6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन
7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति
8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर
9. और अंत में…

आज एक कठिन समय में हम यहाँ पर नारी मुक्ति आन्दोलन की कुछ बुनियादी समस्याओं पर बातचीत के लिए इकट्ठा हुए हैं । सामायिक तौर पर यह पराजय, विपर्यय, पुनरुत्थान, फासिज़्म की शक्तियों के विश्वव्यापी उभार और क्रांति की शक्तियों के पीछे हटने का दौर है । कुछ समय के लिए, आज एक बार फिर क्रांति की लहर पर प्रतिक्रांति की लहर विश्व स्तर पर हावी है ।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी ऐसे कठिन दौर आते हैं तो अँधेरे की ताकतें मेहनतकश आम जनता के साथ ही औरतों की आधी आबादी पर भी अपनी पूरी ताकत के साथ हमला बोल देती है और न केवल उनकी मुक्ति की लड़ाई को कुचल देना चाहती है बल्कि अतीत के अनगिनत लंबे संघर्षों से अर्जित उनकी आजादी और जनवादी अधिकारों को भी छीन लेने पर उतारू हो जाती हैं । आज भी ऐसा ही हो रहा है । हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो विश्व सर्वहारा क्रांति के एक नये चक्र की शुरुआत का समय है, अक्टूबर क्रांति के नये संस्करण के निर्माण का समय है । साथ ही, यह नारी मुक्ति आन्दोलन के लिए भी एक नई शुरुआत का समय है, क्योंकि इतिहास ने यह अंतिम तौर पर सिद्ध कर दिया है कि एक पूंजीवादी विश्व में नारी मुक्ति का प्रश्न अंतिम तौर पर हल नहीं हो सकता और यह भी कि इस आधी आबादी की मुक्ति की लड़ाई के बिना शोषण-उत्पीडन से मेहनतकश जनता की मुक्ति की लड़ाई भी विजयी नहीं हो सकती ।

आज अपने प्रयासों को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया में, विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति के प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा पर विचार करते हुए हमें सर्वोपरी तौर पर उन विचारधारात्मक-सैद्धांतिक हमलों का जवाब देना होगा जो नारी मुक्ति विषयक तरह-तरह के बुर्जुआ सिद्धांतों के रूप में हमारे ऊपर किये जा रहे हैं । जीवन और संघर्ष के अन्य मोर्चों की ही तरह आज नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी जनवाद के नाम पर मुक्त बाजार का पश्चिमी उपभोक्तावादी दर्शन तरह-तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है और एक बार फिर, नये-नये रूपों में, जोर-शोर से बीमार बुर्जुआ संस्कृति, व्यक्तिवाद, पुरुष-विरोधी नारीवाद, अराजकतावाद, यौन-स्वच्छंदतावाद की तरह-तरह की खिचड़ी परोसी जा रही है । फ़्रांसिसी फुकोयामा के “इतिहास के अंत” और पश्चिम में जन्मे “विचारधारा के अंत” के नारे की तर्ज पर नारी आन्दोलन को भी विचारधारा से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं क्योंकि बकौल इन मुक्त चिंतकों के, “विचारधारा ने नारी की आजादी की लड़ाई को कोई योगदान नहीं दिया ।” ऐसे लोगों के उत्तर में बस बर्तोल्त ब्रेखत का एक बयान उद्धृत किया जा सकता है, जो उन्होंने २६ जुलाई, १९३८ को वाल्टर बेंजामिन से बातचीत के दौरान दिया था, “विचारधारा के विरुद्ध संघर्ष खुद में एक नई विचारधारा बन जाता है ।” वास्तव में इन तमाम मुक्त चिंतनधाराओं का सारतत्व यह है कि व्यवस्था-परिवर्तन की बुनियादी लड़ाई से नारी मुक्ति संघर्ष को अलग करके वर्तमान सामाजिक-आर्थिक दायरे के भीतर सीमित कर दिया जाये । इनका एकमात्र उद्देश्य स्त्रियों को यह समझाना है कि उनकी आजादी के प्रश्न का सामाजिक क्रांति के प्रश्न से कुछ भी लेना-देना नहीं है और यह एक स्वायत्त-स्वतंत्र प्रश्न है । आज न केवल अलग-अलग किस्म की बुर्जुआ सुधारवादी चिंतनधाराएं, बल्कि सत्तर के दशक के यूरोकम्युनिज़्म से लेकर अस्सी के दशक में उभरी भांति-भांति की पश्चिमी नववामपंथी धाराएं तथा गोर्बचोवी लहर और देंगपंथी नकली कम्युनिज़्म  से प्रभावित धाराएं भी या तो स्त्रियों की मुक्ति के आन्दोलन को कुछ सामाजिक-आर्थिक मांगों, पर्यावरण या स्वास्थ्य के मुद्दों तक ही सीमित करके और उसे नारी मुक्ति के बुनियादी मुद्दे, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संघर्ष के दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य से काटकर सुधारवाद और अर्थवाद के दलदल में धंसा देना चाहती हैं या फिर केवल बाल की खाल निकालने जैसी कुछ अकादमिक बहसों और बौद्धिक कवायद तक मह्दूद कर देना चाहती हैं ।

आज नारी मुक्ति संघर्ष को एक क्रांतिकारी दिशा देने और एक नई शुरुआत करने के लिए यह जरूरी है कि इम  अपने आन्दोलन में मौजूद इन सभी विजातीय प्रवृत्तियों और रुझानों को लंबे वाद-विवाद में परास्त करें, उनके प्रभाव को निर्मूल करें और एक सही, ठोस लाइन और कार्यक्रम के इर्द-गिर्द अलग-अलग देशों में मेहनतकश स्त्रियों और मध्यवर्गीय स्त्रियों को गोलबंद एवं संगठित करें तथा साथ ही, उन्हें जनता के सभी वर्गों के क्रांतिकारी संघर्षों के साथ जोड़ें । तीसरी दुनिया के देश आज भी साम्राज्यवाद की कमजोर कड़ी हैं, जहाँ सामाजिक क्रांतियों के विस्फोटक की वस्तुगत परिस्थितियाँ सर्वाधिक परिपक्व हैं । ऐसे देशों में क्रांतिकारी नारी मुक्ति के आन्दोलन के हिरावल दस्तों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा है क्योंकि आधी आबादी की भागीदारी के बिना न तो कोई सर्वहारा क्रांति सफल हो सकती है और न सर्वहारा क्रांति के बिना आधी आबादी की वास्तविक मुक्ति की शुरुआत हो सकती है । ऐसे समय में, नेपाल में नारी मुक्ति आन्दोलन से संबंधित विषय पर संगोष्टी का आयोजन बहुत ख़ुशी की बात है, जहाँ क्रांति की शक्तियां आज तरह-तरह के अवसरवादी-दक्षिणपंथी भटकावों से संघर्ष करते हुए जनता के विभिन्न वर्गों को संगठित कर रही हैं । हम नेपाल में इस संगोष्टी के आयोजक कामरेडों का क्रांतिकारी अभिनंदन करते हैं ।

अपने इस निबन्ध में हमारा मन्तव्य नारी मुक्ति संघर्ष की विश्व-ऐतिहासिक यात्रा का एक संक्षिप्त सिंहावलोकन प्रस्तुत करते हुए उसके सामने आज उपस्थित कार्यभारों और चुनौतियों को रेखांकित करना है । हर नई शुरुआत के समय इतिहास का पुनरवालोकन जरूरी होता है । द्वंदात्मक भौतिकवादी जीवन-दृष्टि हमें यही बताती है कि इतिहास के मुल्यांकन-पुनर्मुल्यांकन का मूल अर्थ केवल भविष्य के लिए नये कार्यभारों का निर्धारण ही होता है ।

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

अब तक वर्ग-अंतरविरोधों से युक्त जितने भी समाजों का इतिहास हमें ज्ञात है, स्त्रियाँ उन सभी में परिवार और समाज – दोनों में पुरुषों के मातहत ही रही हैं । पूरे सामाजिक ढाँचे में सर्वाधिक शोषित-उत्पीड़ित तबकों में ही उनका स्थान रहा है । जब वर्ग समाज का प्रादुर्भाव हो रहा था और निजी स्वामित्व के तत्व और मानसिकता पैदा हो रही थी उसी समय पितृसत्तात्मक व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थी, और स्वाभाविक तौर पर, उसके प्रतिरोध की स्त्री-चेतना भी उत्पन्न हो चुकी थी जिसके साक्ष्य हमें अलग-अलग संस्कृतियों की पुराणकथाओं  और लोकगाथाओं में आज भी देखने को मिल जाते हैं ।
पर इतिहास के पूरे प्राकपूंजीवादी काल में उत्पीड़न के विरुद्ध विद्रोह की नारी चेतना अपने समय के विस्मरण के बाद नारी समुदाय ने अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्षों एवं क्रांतियों में भूदास या दास जैसे वर्गों के सदस्य के रूप में शिरकत तो की लेकिन पुरुषों के मुकाबले अपनी हीनतर सामाजिक-पारिवारिक स्थिति के विरुद्ध या अपनी स्वतंत्र अस्मिता एवं सामाजिक स्थिति के लिए उसने पूंजीवाद के आविर्भाव के पूर्व संघर्ष नहीं किया, क्योंकि तब इसका वस्तुगत आधार ही समाज में मौजूद नहीं था । समाज और परिवार में स्त्रियों की भूमिका, मातृत्व, शिशुपालन आदि स्थितियों के नाते वर्ग समाज में पैदा होनेवाली उनकी मजबूरियां, घरेलू श्रम की गुलामी, समाज में निकृष्टतम  कोटि के उजरती मजदूर की स्थिति, यौन असमानता, यौन शोषण, यौन उत्पीडन – इन सबके कुल योग के रूप में नारी प्रश्न (Women Question ) को विश्व इतिहास के पूंजीवादी युग में ही सुसंगत रूप में देखा गया और नारी मुक्ति की एक नई अवधारणा विकसित हुई, जिसका संबंध पुनर्जागरण काल के मानववाद और प्रबोधन के युग की तर्कपरकता एवं जनवाद की अवधारणा तथा बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों से था ।

सामंतवाद के युग तक स्त्रियों को सम्पत्ति के अधिकार सहित कोई भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं था और उनकी इस सामाजिक-पारिवारिक मातहती की स्थिति को धर्म, कानून और सामाजिक विधानों की स्वीकृति प्राप्त थी । सामन्तवाद के गर्भ में जब पूंजीवाद का भ्रूण विकसित हो रहा था, उसी समय से सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी शुरू होकर बढती चली गई । यही वह भौतिक आधार था, जिसने पहली बार स्त्रियों के भीतर सामाजिक अधिकारों की चेतना को जन्म दिया ।

पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के अंतर्गत सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी और साथ ही उनके अधिकारों के अभाव के जारी रहने की स्थिति के नाते शुरू से ही बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के प्रति परस्पर विरोधी रुख और दृष्टिकोण अलग-अलग रूपों में मौजूद रहे । पुनर्जागरण काल में एक ओर जहाँ प्राचीन ग्रीक और रोमन परिवारों के मॉडल और रोमन कानूनों के नमूनों के अनुकरण ने स्त्रियों की गुलामी को तात्कालिक तौर पर पुख्ता बनाया, वहीं पुनर्जागरण काल के महामानवों द्वारा प्रवर्तित मानववाद के क्रांतिकारी दर्शन ने धर्मकेन्द्रित (Theocentric ) समाज की जगह मानवकेन्द्रित (Anthropocentric ) समाज के मूल्यों का प्रतिपादन करके, सामाजिक व्यवस्था की तमाम दैवी स्वीकृतियों पर प्रश्नचिह्न उठाकर और लौकिकता के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित करके, प्रकारांतर से स्त्रियों की गुलामी की धार्मिक-अलौकिक स्वीकृति और सामंती समाज-व्यवस्था के विधानों की मानवेतर स्वीकृति को भी ध्वस्त करने का काम किया । तात्कालिक तौर पर सोहलवीं शताब्दी में धर्मसुधार काल के दौरान प्यूरिटनिज्म और काल्विनिज्म के प्रभाव में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति भले ही बहुत बदतर दिखाई दे रही हो, पर एक ओर दर्शन के स्तर पर मानववाद की विचारधारा और दूसरी ओर सामाजिक उत्पादन में लगातार बढती स्त्रियों की भागीदारी उनकी मुक्ति की चेतना को लगातार विकसित कर रही थी, जिसकी पहली मुखर अभिव्यक्ति बुर्जुआ क्रांतियों की पूर्वबेला में, प्रबोधन काल के दौरान सामने आई ।

स्त्रियों ने सबसे पहले समानता की मांग बुर्जुआ व्यवस्था के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया के शुरुआती काल में ही उठाई । अमेरिकी क्रांति (१७७५-१७८३) के दौरान मर्सी वारेन और एबिगेल एडम्स के नेतृत्व में स्त्रियों ने मताधिकार और सम्पत्ति के अधिकार सहित सामाजिक समानता की मांग करते हुए जार्ज वाशिंगटन और टॉमस जैफर्सन पर स्त्रियों की आबादी के मसले को संविधान में शामिल करने के लिए दबाव डाला, पर बुर्जुआ वर्ग के एक बड़े हिस्से के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका । प्रबोधन काल के दार्शनिकों के क्रांतिकारी भौतिकवादी दर्शन, वैज्ञानिक तर्कपरकता तथा सामाजिक न्याय और स्वतन्त्रता-समानता-भ्रातृत्व के रूप में जनवाद की अवधारणाओं ने सामाजिक उत्पादन के साथ ही सामंती स्वेच्छाचारिता-विरोधी राजनीतिक संघर्ष में भी सीधे भागीदारी कर रही स्त्रियों की आबादी को गहराई से प्रभावित किया । प्रबोधन काल के क्रांतिकारी दार्शनिकों ने पहली बार यह विचार प्रस्तुत किया कि स्त्रियों की उत्पीड़ित स्थिति मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों का हनन है । फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान फ़्रांसिसी बुर्जुआ विचारधारा का एक अग्रणी प्रवक्ता ए. कोंदोर्से (A .Condorcet ) स्त्रियों की समानता का प्रबल पक्षधर था । उसका मानना था कि स्त्रियों के बारे में समाज में मौजूद गहरे पूर्वाग्रह उनकी असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति की जड़ हैं । अपने समय के अन्य बुर्जुआ विचारकों की तरह कोंदोर्से भी स्त्री-प्रश्न के वर्गीय एवं आर्थिक आधारों को देख न सका । उसका यह विश्वास था कि कानूनी समानता और शिक्षा के जरिए स्त्रियों की मुक्ति संभव है । आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में भी, पश्चिम के कई बुर्जुआ विचारकों ने ऐसे ही विचार प्रस्तुत किये । ब्रिटिश दार्शनिक, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री जेम्स स्टुअर्ट मिल ने भी अपनी पुस्तक “ऑन द सब्जेक्शन ऑफ वुमन” (१८६९) में इन्हीं विचारों का प्रतिपादन किया ।

संगठित नारी आन्दोलन की शुरुआत सर्वप्रथम महान फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान हुई । उस समय स्त्रियाँ भी जन-प्रदर्शनों सहित सभी राजनीतिक कार्रवाइयों में हिस्सा ले रही थीं । समानता के लिए स्त्रियों के संघर्ष के लक्ष्य को समर्पित पहली पत्रिका का प्रकाशन क्रांति के दौरान फ़्रांस में ही शुरू हुआ वहीं क्रांतिकारी नारी क्लबों (Women’s Revolutionary Club) के रूप में स्त्रियों के पहले संगठन अस्तित्व में आये जिन्होंने सभी पक्षधर राजनीतिक संघर्षों में खुलकर भागीदारी करते हुए यह मांग की कि आजादी, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत बिना किसी लिंगभेद के लागू किये जाने चाहिए । ओलिम्प द गाउजेस (Olympe de Gouges, 1748-93) ने “मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा” (Declaration of the Rights of the Man and the Citizen) के मॉडल पर “स्त्रियों और स्त्री नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” तैयार की और उसे १७९१ में राष्ट्रीय असेम्बली के समक्ष प्रस्तुत किया । इस घोषणा पत्र में “स्त्रियों पर पुरुषों के शासन” का विरोध किया गया था और सार्विक मताधिकारों के व्यवहार के लिए स्त्री-पुरुषों के बीच पूर्ण सामाजिक-राजनीतिक समानता की मांग की गई थी । यद्यपि फ़्रांसिसी क्रांति के अधिकांश नेताओं ने स्त्रियों की समानता के विचार को ख़ारिज कर दिया और १७९३ के अंत में सभी नारी क्लबों को बंद कर दिया गया, लेकिन फिर भी इस युगांतरकारी क्रांति ने सामंती संबंधों पर निर्णायक मारक प्रहार करने के साथ ही कई कानूनों के द्वारा और नये सामाजिक मूल्यों के द्वारा औरतों की कानूनी स्थिति में भारी परिवर्तन किया । १७९१ में एक कानून बनाकर स्त्रियों की शिक्षा का प्रावधान किया गया, २० सितंबर १७९२ की आज्ञाप्ति द्वारा उन्हें कई नागरिक अधिकार प्रदान किये गये और अप्रैल १७९४ में कन्वेंशन द्वारा पारित एक कानून ने उनके लिए तलाक लेना आसान बना दिया । लेकिन थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया के काल में नारी मुक्ति संघर्ष की ये उपलब्धियां एक बार फिर, मूलत: छीन गयी । नेपोलियोनिक कोड (१८०४) और अन्य यूरोपीय देशों की ऐसी ही बुर्जुआ नागरिक संहिताओं ने एक बार फिर स्त्रियों के नागरिक अधिकारों को अतिसीमित कर दिया और परिवार, शादी, तलाक, अभिभावकत्व और संपत्ति के अधिकार सहित सभी मामलों में उन्हें कानूनी तौर पर एक बार फिर पूरी तरह पुरुषों के मातहत बना दिया ।

बुर्जुआ क्रांतियों के काल में नारी आन्दोलन का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मेरी वोल्सटोन क्राफ्ट की पुस्तक “स्त्री के अधिकारों का औचित्य-प्रतिपादन” ( A Vindication of the Rights of Women) थी, जो कुल मिलाकर ओलिम्प द गाउजेस के दस्तावेज के प्रतिपादनों को ही उन्नत एवं विस्तृत रूप में प्रस्तुत करती थी । उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के नारीवादी आन्दोलन (Feminist Movement ) की बुनियादी रुपरेखा सर्वप्रथम इसी पुस्तक में दिखाई देती है ।

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर

फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों का सार-संकलन करते हुए कहा जा सकता है कि जब सामन्तवाद के विरुद्ध बुर्जुआ वर्ग के साथ ही पूरी जनता इनमें शिरकत कर रही थी, तब स्वतन्त्रता, समानता और जनवाद के विचारों का प्रतिपादन अधिक क्रांतिकारी रूप में किया जा रहा था, पर बुर्जुआ सत्ता की स्थापना और सुदृढीकरण कें नये शासक वर्ग ने जिस प्रकार मेहनतकशों को, ठीक उसी प्रकार स्त्रियों को भी उसी हद तक आजादी और नागरिक अधिकार दिए, जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली और उत्पादन एवं विनिमय के संबंधों के लिए जरूरी था । इससे थोड़ी भी अधिक आजादी यदि स्त्रियों को मिल सकी, तो उसका एकमात्र कारण नारी समुदाय की नई चेतना और उसके संघर्षों का दबाव एवं भय था । पूंजीवाद ने सामन्ती मध्ययुगीन स्वेच्छाचारिता, घरेलू गुलामी, व्यक्तित्वहीनता, अनागरिकता और विलासिता एवं उपभोग की सामग्री होने की स्थिति से नारी समुदाय को बाहर तो निकला, पर पूरी तरह से नहीं । सत्ता में आने के साथ ही उसने जब चर्च के साथ “पवित्र गठबंधन” कर लिया तो स्त्रियों की गुलामी के सामंती मूल्यों के कुछ तत्वों को उसने फिर से अपना लिया । उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान स्त्रियाँ शिक्षा, नौकरी, सम्पत्ति के अधिकार मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं और उन्हें काफी हद तक अर्जित भी किया, लेकिन उनकी नागरिकता दोयम दर्जे की ही थी और पूंजीवादी उत्पादन तन्त्र में वे निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलामों (Wage Slaves ) में तब्दील कर दी गयी । फिर भी बुर्जुआ क्रांतियाँ ऐतिहासिक तौर पर नारी मुक्ति संघर्ष को एक कदम आगे ले आई, उन्हें सामंती समाज के निरंकुश दमन से एक हद तक छुटकारा दिलाया, सामाजिक उत्पादन में उनकी भागीदारी की स्थितियां पैदा की और उनके भीतर अपने जनवादी अधिकारों, स्वतंत्र अस्मिता और स्वतंत्र पहचान के लिए लड़ने की, सामाजिक-राजनीतिक क्रियाकलापों और संघर्षों में हिस्सा लेने की और एक नई जमीन पर खड़े होकर यौन-असमानता एवं यौन-उत्पीडन का विरोध करने की चेतना पैदा की ।

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यूरोप और अमेरिका के बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के अधिकारों की वास्तविक और वैधिक अनुपस्थिति की जो स्थिति बनी, उसे कई बुर्जुआ लेखकों-विचारकों से सैद्धांतिक समर्थन प्राप्त हुआ । बुर्जुआ साहित्य में बड़े पैमाने पर प्रस्तुत और आज भी पूरी दुनिया में व्यापक स्तर पर मान्यताप्राप्त तथाकथित जीवशास्त्रीय सिद्धांत के प्रारंभिक पैरोकारों में फ़्रांसिसी दार्शनिक ओगुस्त कोंत (A . Konte ) अग्रणी था जिसके अनुसार नारी समुदाय की असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति का मूल कारण “नारी की प्राकृतिक दुर्बलता” में निहित है, स्त्रियाँ स्वाभाविक एवं प्राकृतिक तौर पर पारिवारिक जिम्मेदारियों, प्रजनन, शिशुपालन आदि के लिए ही बनी होती हैं और कभी भी वे सामाजिक तौर पर पुरुषों के समकक्ष नहीं हो सकतीं । स्त्री-पुरुष असमानता का यह जीवशास्त्रीय सिद्धांत उन्नीसवीं शताब्दी के बुर्जुआ समाज का सर्वाधिक प्रभावशाली बुर्जुआ पुरुष-स्वामित्ववादी सिद्धांत था जिसका प्रभाव आज भी बड़े पैमाने पर मौजूद है । ब्रिटेन के विक्टोरियन सामाजिक मूल्यों पर भी इन विचारों का जबर्दस्त प्रभाव मौजूद था । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जर्मनी में प्रचलित पेटी-बुर्जुआ “थियरी ऑफ द थ्री केज” (German–Kirche, Kuche, Kinder-Church, Kitchen, Children) भी सारत: कोंत के विचारों का ही विस्तार था जिसके अनुसार, स्त्रियों की रूचि और सक्रियता का दायरा केवल चर्च, रसोई और बच्चों तक ही सीमित होना चाहिए । आगे चलकर फासिस्टों और नात्सियों ने इसी सिद्धांत के परिष्कृत रूप को इटली एवं जर्मनी में अपनाया और लागू किया । आज भी बुर्जुआ प्रतिक्रियावादी नवनात्सी तत्व और धार्मिक पुनरुत्थानवादी इस तरह के तर्क देते रहते हैं । गोर्बचोवी संशोधनवादियों ने भी स्त्रियों की सामाजिक भूमिका में कटौती करते हुए उनकी प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक बनावट का तर्क दिया और देंगपंथी संशोधनवादी भी आज घुमा-फिराकर ऐसे तर्क देते रहते हैं ।

एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जैसे-जैसे बुर्जुआ वर्ग अपनी सत्ता का सुदृढीकरण करता गया, नारी आन्दोलन के बुर्जुआ चरित्र, फ्रेमवर्क और नेतृत्व की सीमाएं ज्यादा से ज्यादा साफ़ होती चली गई । मताधिकार, सम्पत्ति के अधिकार और यौन आधार पर बरती जाने वाली हर प्रकार की असमानता के विरुद्ध जनवादी अधिकारों के व्यापक दायरे में क्रांतिकारी संघर्ष चलाने और उसे सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष से जोड़ने के बजाय, उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, बुर्जुआ नारी आन्दोलन के नेतृत्व ने फ़्रांसिसी क्रांति काल की परम्परा को छोड़ते हुए अपना उद्देश्य केवल बुर्जुआ समाज के फ्रेमवर्क के भीतर, अपने ही वर्ग के पुरुषों से स्त्रियों की समानता तक सीमित कर दिया और स्त्री-प्रश्न की अवधारणा को संकीर्ण करके संघर्ष को सुधारों के दायरे में कैद कर दिया । उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में उपरोक्त मांग के पूरक के तौर पर सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियों के काम करने के अधिकार की मांग उठाई गई ।

लेकिन नारी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा उस समय भी पूरी तरह से निष्प्राण नहीं हो गयी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के चौथे-पांचवें दशक में फ़्रांस में बड़े पैमाने पर ऐसा क्रांतिकारी यथार्थवादी साहित्य उत्पादित हुआ जिसमें स्त्रियों की पारिवारिक गुलामी और सामाजिक असमानता की आलोचना की गयी थी । इसमें जी. सांद (G. Sand) के उपन्यासों की अग्रणी भूमिका थी । इसी समय अमेरिका और ब्रिटेन में संगठित रूप से नारी मताधिकार आन्दोलन की शुरुआत हुई जहाँ सामाजिक जीवन में स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने लगी थीं । १८३० के दशक में अमेरिका में काले लोगों की मुक्ति के संघर्ष में १०० से भी अधिक दासता-विरोधी “नारी सोसायटी” जैसे संगठन हिस्सा ले रहे थे और ब्रिटेन में चार्टिस्ट आन्दोलन में स्त्रियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं । वास्तव में, पूंजीवादी समाज के विकास के नियम और विज्ञान, तकनोलाजी एवं संस्कृति का विकास, उत्पादन और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ, खुद ही वस्तुगत तौर पर, स्त्रियों की मातहती के सिद्धांतों की आधारहीनता को ज्यादा से ज्यादा उजागर करते जा रहे थे । सर्वप्रथम, उस काल के क्रांतिकारी जनवादी सिद्धान्तकारों, विशेषकर सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिये और राबर्ट ओवेन जैसे सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि काल्पनिक समाजवादी विचारकों ने स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता के बुर्जुआ सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाते हुए नारी उत्पीडन और बुर्जुआ समाज की प्रकृति के बीच के अंतर्संबंधों को उजागर किया था । नारी मुक्ति के बुर्जुआ सिद्धान्तकारों के विपरीत इन दार्शनिकों ने पहलों बार स्त्रियों को समानता का दर्जा देने के समाज के पुनर्गठन की अपनी योजना का एक बुनियादी मुद्दा बनाया । चार्ल्स फूरिये ने पहली बार यह स्पष्ट बताया कि किसी भी समाज में आजादी का एक बुनियादी पैमाना यह है कि उस समाज विशेष में स्त्रियाँ किस हद तक आजाद हैं ।

उन्नीसवीं शताब्दी के रुसी क्रांतिकारी जनवादियों ने इसी विचार-सरणि  को आगे बढ़ते हुए सामाजिक जीवन के साथ ही क्रांतिकारी संघर्ष में भी स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया । नारी मुक्ति के सर्वाधिक प्रखर प्रवक्ता चेर्नीशेव्स्की ने अपने उपन्यास “क्या करें” ( What is to be done )  में एक ऐसा स्त्री-चरित्र प्रस्तुत किया जिसने संकीर्ण पारिवारिक दायरे से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र सामाजिक-आर्थिक स्थिति बनाई थी और जो सामाजिक सक्रियताओं में भी संलग्न थी । चेर्नीशेव्स्की का यह उपन्यास यूटोपिया के तत्वों के बावजूद युगीन परिप्रेक्ष्य में, नारी-मुक्ति के सन्दर्भ में भी क्रांतिकारी महत्व रखता है ।

3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में

यूरोप में १८४८-४९ की क्रांतियों तथा जून १८४८ में पेरिस में हुए प्रथम सर्वहारा विद्रोह सहित विभिन्न देशों में उठ खड़े हुए मजदूर आंदोलनों ने स्त्रियों के राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों के संघर्ष को एक नया संवेग प्रदान किया । १८४८ में फ़्रांस में फिर से नारी क्लबों का गठन हुआ जिन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों को समान अधिकार देने के लिए संघर्षों की नए सिरे से शुरुआत की. इसी वर्ष फ़्रांस में स्त्री कामगारों के पहले स्वतंत्र संगठन की स्थापना हुई । जर्मनी और आस्ट्रिया में भी राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के उद्देश्य से स्त्री यूनियन गठित हुए ।

एक व्यापक आधार पर, एक सुनिश्चित कार्यक्रम के साथ नारीवादी आन्दोलन की शुरुआत का प्रस्थान-बिंदु जुलाई, १८४८ को माना जाता है जब एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन, लुकेसिया कफिन मोट और कुछ अन्य ने सेनेका फाल्स, न्यूयार्क में पहली बार नारी अधिकार कांग्रेस आयोजित करके नारी स्वतन्त्रता का एक घोषणा-पत्र जारी किया जिसमें पूर्ण कानूनी समानता, पूर्ण शैक्षिक एवं व्यावसायिक अवसर, समान मुआवजा और मजदूरी कमाने के अधिकार तथा वित देने के अधिकार की मांग की गयी थी । एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन तथा सूसन बराउनवेल एंथनी के नेतृत्व में यह आन्दोलन तेज गति से फैला और जल्दी ही यूरोप तक जा पहुंचा । ब्रिटेन में १८६० के दशक में चुनावी सुधारों के दौर में नारी मताधिकार आन्दोलन भी बड़े पैमाने पर उठ खड़ा हुआ । १८६७ में पारिलियामेंट में स्त्रियों को मताधिकार देने के जे. एस मिल के प्रस्ताव को रद्द कर दिए जाने के बाद कई नगरों में नारी मताधिकार सोसायिटीयों की स्थापना हो गयी, जिनको मिलाकर बाद में राष्ट्रीय एसोसिएशन बनाया गया । अमेरिका में १८६९ में दो नारी मताधिकार संगठनों का गठन हुआ । १८९० में इनकी एकता के बाद राष्ट्रीय अमेरिकी नारी मताधिकार संघ अस्तित्व में आया । १८८२ में फ़्रांसिसी नारी अधिकार लीग का गठन हुआ ।

मुख्यत: उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के प्रभाव में जनवादी चेतना संचरित होने लगी थी जिससे स्त्री समुदाय भी अछूता नहीं रह गया था । इस दौरान लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की आजादी और बराबरी की मांग को लेकर आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो हालाँकि व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के आभाव में मुख्यत: नारीवादी ( Fiminist ) प्रकृति का था, फिर भी यह लातिनी देशों की स्त्रियों की नयी चेतना का द्योतक था । इसी अवधि में पहले जापान, भारत और इंडोनेशिया में और फिर तुर्की और ईरान में नारी आन्दोलन ने अपना पहला कदम आगे बढ़ाया । १८८८ में अमेरिकी नारीवादियों की पहल पर अंतरराष्ट्रीय नारी परिषद (International Council of Women ) की स्थापना हुई । १९०४ में अंतरराष्ट्रीय नारी मताधिकार संश्रय ( International Women Suffrage Alliance) की स्थापना हुई जिसका नाम १९४६ में बदलकर ‘अंतरराष्ट्रीय नारी संश्रय समान अधिकार-समान दायित्व’ (International Alliance of Women – Equal Rights-Equal Responsibilities ) कर दिया गया ।

इस दौरान एक महत्वपूर्ण विकास यह हुआ कि स्त्रियों की नयी चेतना और संघबद्ध होने की आंकाक्षा को देखते हुए उनकी “स्थिति में सुधार” और “उनके विकास” की आड़ लेकर आध्यात्मिक, धार्मिक सुधारवादी और संकीर्ण राष्ट्रवादी ग्रुपों ने भी भांति-भांति के नारी संगठनों की स्थापना की जिनका मूल उद्देश्य स्त्रियों की मुक्तिकामी आकांक्षा को सुधारों के दायरे में कैद करना, उन्हें मजदूर आंदोलनों, क्रांतिकारी बुर्जुआ जनवादी आंदोलनों और राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के प्रभाव से दूर रखना तथा इस तरह निहित वर्ग स्वार्थों की सेवा करना था ।

4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा


नारी आंदोलनों में सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण के विकास की प्रक्रिया उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में शुरू हई । नारी-प्रश्न के वर्गीय आधारों को उद्घाटित करते हुए मार्क्स और एंगेल्स ने  पहली बार यह स्पष्ट किया कि निजी सम्पत्ति और वर्गीय समाज के संघटन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही स्त्री की दासता की शुरुआत हुई । उन्होंने स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में कामगार स्त्रियाँ निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम होने के साथ-साथ यौन आधार पर शोषण-उत्पीडन का शिकार तो हैं ही, सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ भी सामाजिक श्रम से कटी हुयी या तो नारकीय घरेलू दासता एवं पुरुष स्वामित्व के बोझ से दबी हुई हैं या बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के लिए आरक्षित कुछ विशिष्ट अपमानजनक पेशों में लगी हुयी निहायत निरंकुश स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं । उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में मेहनतकश स्त्रियों की समस्यायों का समाधान असंभव है और स्त्री समुदाय की सच्ची मुक्ति की दिशा में पहला कदम पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था का खात्मा है ।

मार्क्स-एंगेल्स ने यह स्पष्ट किया कि नारी मुक्ति  की दिशा में पहला कदम यह होगा कि स्त्री मजदूरों की वर्ग चेतना को उन्नत किया जाये, सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ाई जाये और उन्हें मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलनों में शामिल किया जाये । पहले इंटरनेशनल ने नारी मजदूरों के श्रम के संरक्षण से संबंधित दो प्रस्ताव पारित किये थे । इन प्रस्तावों ने स्त्रियों के उत्पीडन और उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व एवं मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के बीच अंतर्संबंधों को उद्घाटित  करने के साथ ही नारी अधिकारों के प्रति प्रूधोंवादी दृष्टिकोण के दिवालियेपन को भी उजागर कर दिया । प्रूधों और उसके चेले सामाजिक रूप से उपयोगी श्रम में स्त्रियों की भागीदारी का विरोध करते थे और उनकी सामाजिक समानता की बात करते हुए भी परिवार और बच्चों की देखभाल ही उनकी प्रमुख जिम्मेदारी मानते थे ।  स्त्री कामगारों के श्रम-संरक्षण संबंधी पहले इंटरनेशनल के निर्णय ने सर्वहारा नारी आन्दोलन के विकास का सैद्धांतिक आधार तैयार करने का काम किया । मार्क्स-एंगेल्स ने, और आगे चलकर लेनिन, स्टालिन और माओ ने — अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के इन पाँचों महान शिक्षकों ने कामगार औरतों की उत्पीडित आबादी को सर्वहारा क्रांति की सबसे बड़ी आरक्षित शक्ति ( Greatest Reserve ) के रूप में देखा । सर्वहारा क्रांति और स्त्री प्रश्न के समाधान के द्वंदात्मक अंतर्संबंधों को निरुपित करते हुए लेनिन ने लिखा था, ” स्त्रियों के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल किये बिना सर्वहारा अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं हासिल कर सकता ।”

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में क्रांतिकारी संघर्षों में, विशेषकर १८७१ के युगांतरकारी पेरिस कम्यून में शौर्यपूर्ण भागीदारी के साथ ही स्त्रियों ने राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में स्वतंत्र रूप से भी हिस्सा लिया और अपने संगठन बनाये । फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन में स्त्रियों ने अपनी ट्रेड युनियने संगठित कीं ।  उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में फ़्रांस और ब्रिटेन में स्त्री कामगारों के कई संगठन पहले इंटरनेशनल में भी शामिल हुए । जर्मन कामगार औरतें ‘ इंटरनेशनल प्रोफेशनल एसोसियेशन ऑफ मैन्युफैक्चरी , इंडस्ट्रियल एंड हैंडीक्राफ्ट  वर्कर्स’ में शामिल हो गयीं जिसकी स्थापना १८६९ में क्रिम्मित्स्चू (सैक्सनी) में हुई थी और जो इंटरनेशनल के विचारों से प्रभावित था । स्त्री-प्रश्न पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण को विकसित और व्याख्यायित करने में तथा वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित सर्वहारा नारी आंदोलनों को विकसित करने में बेबेल की सुप्रिसिद्ध कृति ‘नारी और समाजवाद’ (Women and Socialism ) ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में मजदूर स्त्रियों का आन्दोलन जर्मनी में सर्वाधिक तेज गति से विकसित हुआ । १८९१ में जर्मनी की सामाजिक जनवादी पार्टी ने अपने कार्यक्रम (एर्फुर्ट कार्यक्रम ) में नारी मताधिकार की मांग को शामिल किया । पार्टी ने स्त्रियों-पुरुषों की सांगठनिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार किया और ट्रेड यूनियनों में स्त्रियों की भरती के विशेष प्रयास शुरू किये गये । १८९१ में स्त्री कामगारों की एक पत्रिका -Gleichcheit – का प्रकाशन भी शुरू हुआ जो १८९२ से १९१७ तक क्लारा जेटकिन के निर्देशन में प्रकाशित होती रही । सन १९०० से जर्मनी भर में नियमित नारी सम्मेलनों के आयोजन की शुरुआत हुई ।

पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली की अपनी जरूरतों के चलते और सर्वहारा आंदोलनों और विशेष तौर पर नारी आंदोलनों की विविध धाराओं-प्रवृतियों के दबाव के नाते उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यूरोप में स्त्रियों की शिक्षा और श्रम-संरक्षण से संबंधित कई कानून बने और उनकी कानूनी हैसियत में कुछ महत्वपूर्ण सुधार हुए । उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में १८४७ में ही स्त्रियों का श्रम दिवस दस घंटे का कर दिया गया था । मार्क्सवाद के संस्थापकों ने इस कानून को मजदूर वर्ग की एक बड़ी जीत की संज्ञा दी थी । स्त्री मजदूरों के संरक्षण से संबंधित कई अन्य कानून इस दौरान विभिन्न यूरोपीय देशों में बने । स्त्रियाँ  ट्रेड युनियनों में शामिल होने लगीं । १८८९ में ट्रेड यूनियन्स कांग्रेस में उनकी सदस्यता का प्रश्न सारत: हल हो गया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही स्त्री आन्दोलन के दबाव में, पहले सम्पन्न और फिर आम परिवारों की लड़कियों के लिए माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना यूरोप में और फिर एशिया-लातिनी अमेरिका के कुछ देशों में हुई । ब्रिटेन में स्त्रियों को सबसे पहले शिक्षक का पेशा अपनाने का अधिकार मिला । फिर धीरे-धीरे कुछ अन्य क्षेत्रों में भी उन्हें रोजगार के अवसर मिले । १८५८ में ब्रिटेन में स्त्रियों को तलाक का अधिकार प्राप्त हुआ, यद्यपि इस सन्दर्भ में १९३८ तक उनके अधिकार पुरुषों की अपेक्षा कम थे । १८७० से १९०० के बीच ब्रिटिश स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार हासिल किये । १८६९ में कर भुगतान करने वाली स्त्री नागरिकों को म्युनिसिपल चुनावों में भागीदारी का अधिकार मिला और १९१८ में शादीशुदा स्त्रियों तथा ३० वर्ष से अधिक आयु वाली, विश्वविद्यालय डिप्लोमा प्राप्त की हुई स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । १९२८ में २१ वर्ष आयु वाली स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । अमेरिका में स्त्रियों को शिक्षण पेशा अपनाने का अधिकार उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही मिल चुका था । १८५० से १८७० के बीच वहाँ स्त्रियों को तथाकथित “लिबरल” पेशे अपनाने का अधिकार प्राप्त हुआ और १८८० के बाद तथाकथित “पुरुष” पेशों में भी उन्हें स्वीकार किया जाने लगा । १८४८ में वहाँ शादीशुदा औरतों को सम्पत्ति रखने का अधिकार प्राप्त हुआ । १८७४ में वहाँ पहली बार स्त्रियों के श्रम दिवस को सीमित करने का कानून (मैसाचुसेट्स  ) में बना । १९२० में अमेरिकी संविधान में हुए उन्नीसवें संशोधन द्वारा स्त्रियों के मताधिकार पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया गया । फ़्रांस में भी उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार प्राप्त कर लिए थे । १८९२ में उनके श्रम के संरक्षण से संबंधित पहला कानून बना, उनका अधिकतम लम्बा श्रम दिवस ११ घंटे का तय किया गया जिसे १९०४ में घटाकर १० घंटे कर दिया गया । स्त्री मताधिकार संबंधी विधेयक फ़्रांस में पहली बार १८४८ में पेश किया गया था, लेकिन १९४४ में जाकर उन्हें यह अधिकार हासिल हो सका । जर्मनी में औरतों को मत देने का अधिकार १९१९ के वाईमर संविधान द्वारा प्राप्त हुआ था, लेकिन १९३३ में सत्ता में आने के साथ ही नात्सियों ने लम्बे और कठिन संघर्षों द्वारा अर्जित उनके सभी राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों को समाप्त कर दिया ।

इन कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की चर्चा के बाद, संक्षेप में, इतना ही उल्लेख यहाँ पर्याप्त है कि कुछ एक अपवादों को छोडकर, पश्चिमी देशों की स्त्रियों ने बीसवीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते बुर्जुआ सामाजिक ढांचे के भीतर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लिए थे । पर यह कहते हुए कुछ बातों को रेखांकित करना निहायत जरूरी है । पहली बात यह कि कानूनी तौर पर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लेने के बावजूद वास्तव में आज तक उन्हें सामाजिक समानता प्राप्त नहीं है । वे दोयम दर्जे की नागरिक हैं । काम करने वाली औरतें वहाँ असंगठित क्षेत्र में सस्ता श्रम बेचने को बाध्य हैं और निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम हैं । मुख्यत: मध्यम वर्ग और अन्य सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ और सामान्यत: सभी स्त्रियाँ वहाँ घरेलू दासता से पूर्णत: मुक्त नहीं हो सकी हैं । जीवन के हर क्षेत्र में उन्हें आर्थिक शोषण के साथ ही यौन-उत्पीडन का भी शिकार होना पड़ता है । धार्मिक मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही, तरह-तरह की फासिस्ट प्रवृतियों और साथ ही बीमार बुर्जुआ संस्कृति का दबाव भी उन्हें ही सबसे अधिक झेलना पड़ता है । अभी भी गर्भपात और तलाक से लेकर बलात्कार तक — बहुत सारे मामलों में, पश्चिमी देशों में कानून स्त्रियों के प्रति भेदभावपूर्ण बने हुए हैं । दूसरी बात यह है कि पश्चिम की स्त्रियों ने जो भी अधिकार प्राप्त किये हैं, वह उन्हें  बुर्जुआ समाज ने तोहफे के तौर पर नहीं दिए हैं । ये अधिकार सामाजिक क्रांतियों, वर्ग-संघर्षों और नारी समुदाय के शताब्दियों लम्बे संघर्ष द्वारा अर्जित हुए हैं । बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों में व्यापक आम जनता और स्त्रियों की भागीदारी के दौर में स्त्रियों को अपने नागरिक अधिकारों की पहली किश्त हासिल हुई । राज्यसत्ता पर काबिज होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने जब आम जनता पर अपना अधिनायकत्व लागू किया तो स्त्रियों के जनवादी अधिकारों को भी उसने हडपने की हर कोशिश की और केवल उसी हद तक उन्हें नागरिकता के अधिकार दिए जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली की जरूरत थी । पुन: उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब क्रांतियों का नया विस्फोट हुआ और सर्वहारा वर्ग राजनीतिक संघर्ष के मंच पर उतरा तो नारी आन्दोलन को भी महत्वपूर्ण संवेग प्राप्त हुआ और बाद के पचास वर्षों के संघर्षों के दौरान पश्चिम में नारी समुदाय ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित कीं । इस समय मजदूर स्त्रियाँ नारी मध्यवर्गीय स्त्रियों के आगे आ खड़ी हुई थीं । बीसवीं शताब्दी में, अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत संघ में, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोपीय देशों में और १९४९ की नई जनवादी क्रांति के बाद चीन में तथा मेहनतकशों के शासन वाले कुछ अन्य देशों में स्त्री समुदाय ने पहली बार समानता के जो अधिकार अर्जित किये, उनसे भी पश्चिमी देशों की और साथ ही राष्ट्रीय जनवाद की लड़ाई लड़ रहे एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों की मुक्तिकामी स्त्रियों के आंदोलनों को भी नई प्रेरणा और नया संवेग प्राप्त हुआ । तीसरी बात जो गौरतलब है, वह यह कि उन्नीसवीं शताब्दी में, जब तक यूरोप क्रांतियों का केंद्र रहा, तभी तक नारी आन्दोलन वहाँ तेजी से विकसित होता हुआ एक के बाद एक नई जीतें हासिल करता रहा । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू में विश्व पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में संक्रमण के बाद क्रांतियों का केंद्र खिसककर जब रूस और एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों-नवउपनिवेशों में आ गया तो नारी आन्दोलन का मुख्य रंगमंच भी इन्हीं देशों में स्थानांतरित हो गया । यह वस्तुगत ऐतिहासिक तथ्य इसी सत्य को पुष्ट करता है कि नारी आन्दोलन, उसका भविष्य और उसकी जीत-हार की नियति सामाजिक संघर्षों और क्रांतियों के साथ अविभाज्यत: जुडी हुई है । आगे हम सर्वहारा क्रांतियों की धारा और उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों की धारा के साथ जारी नारी मुक्ति आंदोलनों की अत्यंत संक्षिप्त चर्चा करेंगे ।

5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन

मार्क्स-एंगेल्स के बाद लेनिन ने नारी-प्रश्न पर मार्क्सवादी चिंतन को आगे बढाया । लेनिन के काल में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन में कामगार औरतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने की प्रक्रिया उन्नत धरातल पर शुरू हुई. नारी-मुक्ति के प्रश्न पर लेनिन के कई महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अवदान थे । बुर्जुआ नारीवाद की नारी-मुक्ति विषयक वर्गेतर सोच और “यौन मुक्ति” की बुर्जुआ अवधारणाओं के साथ ही उन्होंने मार्क्सवाद से प्रेरित नारी-मुक्ति आन्दोलन की धारा में मौजूद कई अवैज्ञानिक धारणाओं और विजातीय रुझानों का विरोध किया । स्वतन्त्रता का अर्थ असामाजिक स्वच्छंदता और पुरुष के शोषण से मुक्ति का अर्थ “यौन मुक्ति” नहीं होता, यह कम्युनिस्ट नैतिकता और विज्ञान के विरुद्ध है — इसे लेनिन ने एकाधिक बार स्पष्ट किया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में क्लारा जेटकिन, क्रुप्सकाया, अलेक्सांद्रा कोल्लोंताई और अनेंसा आरमाँ आदि कम्युनिस्ट नेत्रियों ने अपनी सक्रियताओं और लेखन के द्वारा भी नारी मुक्ति के मोर्चे पर अहम भूमिका निभाई । इन अग्रणी व्यक्तित्वों के साथ लेनिन के वाद-विवाद और विचार-विमर्श के दौरान नारी मुक्ति के कई पक्षों पर मार्क्सवादी अवस्थिति महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुई ।

बीसवीं शताब्दी के शुरू होते-होते सर्वहारा नारी आन्दोलन के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के लिए पूर्वपीठिका तैयार हो चुकी थी । दूसरे इंटरनेशनल की कांग्रेस में नारी आन्दोलन और नारी समस्या के विविध पहलुओं पर नियमित रूप से बहसें हुआ करती थीं । १८९३ में ज्यूरिख कांग्रेस में यह कहा गया की स्त्रियों के श्रम के कानूनी संरक्ष्ण को पूरा समर्थन देना पूरी दुनिया के मजदूरों का कर्तव्य है । दूसरे इंटरनेशनल की लन्दन कांग्रेस (१८९६) को महिला प्रतिनिधियों के सम्मेलन ने स्त्री-पुरुष– दोनों ही समुदायों के सर्वहारा वर्ग के आम संगठन को स्वीकृति देने के साथ ही इस बात पर जोर दिया कि मेहनतकश वर्गों के नारी आन्दोलन और नारीवाद (Feminism ) के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खिंची जानी चाहिए ।

स्त्री समाजवादियों के पहले और दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (स्टुट्गार्ट, १९०७ और कोपेनहेगेन, १९१० ) मेहनतकश नारी आन्दोलन की विकास-यात्रा के दो महत्वपूर्ण मील पत्थर थे । पहले सम्मेलन ने बिना किसी लिंग-भेद के सार्विक एवं समान मताधिकार का प्रस्ताव पारित किया जिसे दूसरे इंटरनेशनल के स्टुट्गार्ट कांग्रेस ने भी स्वीकार किया । पहले सम्म्मेलन की प्रतिनिधियों ने क्लारा जेटकिन की अध्यक्षता में एक अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना करने और उसके मुखपत्र के प्रकाशन का भी निर्णय लिया । दूसरे सम्म्मेलन में सत्रह देशों की महिला प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । इसी सम्मेलन में प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब दक्षिणपंथी अवसरवादी काउत्स्की और उसके अनुयाइयों के विश्वासघात के कारण अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन में फूट पड़ी ठीक उसी समय मेहनतकश नारी आन्दोलन को भी एक गंभीर धक्का लगा ।  अधिकांश सामाजिक जनवादी स्त्री संगठनों ने भी विश्वयुद्ध में काउत्स्कीपंथियों की ही भांति अंधराष्ट्रवादी अवस्थिति अपनाई । बुर्जुआ नारीवादी संगठन तो पहले से ही यही अवस्थिति अपनाए हुए थे । लेकिन बोलेशेविक प्रस्ताव को ख़ारिज करके एक शांतिवादी प्रस्ताव स्वीकार करने के बावजूद बर्न अंतरराष्ट्रीय स्त्री समाजवादी सम्मेलन (१९१५) ने, जो बोलेशेविकों की पहल पर आयोजित हुई थी, समाजवादी अवस्थिति अपनाने वाली स्त्री समाजवादियों की एकता को बहाल रखने में अहम भूमिका निभाई । युद्ध के दौरान युद्ध में शामिल देशों की स्त्रियों ने भुखमरी और बदहाली के खिलाफ कई प्रदर्शन आयोजित किये । ८ मार्च (२३ फरवरी ) १९१७ को बोलेशेविकों की पेत्रोग्राद कमेटी की अपील पर भुखमरी, युद्ध और जारशाही के विरुद्ध रुसी स्त्रियों के प्रदर्शन ने एक व्यापक जनांदोलन का सूत्रपात किया जिसकी चरम परिणति फरवरी क्रांति के रूप में सामने आई । अक्टूबर समाजवादी क्रांति की तैयारी में रूस की महिला मजदूरों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । क्रांति के बाद सोवियत संघ में नारी आन्दोलन ने हर संभव तरीके से समाजवादी निर्माण के कामों को आगे बढ़ाने में, समाजवाद की रक्षा में और सामाजिक-राजनीतिक जीवन में आम स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने में एक अग्रणी भूमिका निभाई । समाजवादी सोवियत संघ की सर्वहारा राज्यसत्ता ने दुनिया के इतिहास में पहली बार न केवल स्त्री समुदाय को कानूनी तौर पर पुरुषों के साथ पूर्ण समानता के अवसर प्रदान किये बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में व्यवहारत: इसे लागू करने की दिशा में भी हर संभव कदम उठाये । सोवियत संघ स्त्री-मुक्ति के सन्दर्भ में भी पूरी दुनिया के लिए एक नया प्रकाश स्तंभ बन गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अक्टूबर क्रांति के प्रभाव में पूरी दुनिया में नारी आन्दोलन में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई । एक ओर जहाँ आम उत्पीडित नारी समुदाय समाजवाद की विचारधारा की ओर तेजी से आकृष्ट हुआ, वहीँ बुर्जुआ नारी संगठनों ने ज्यादा से ज्यादा खुले तौर पर बुर्जुआ व्यवस्था की हिफाजत का काम शुरू कर दिया । यूरोप की संशोधनवादी सामाजिक जनवादी पार्टियों ने पूंजीवाद की दूसरी सुरक्षापंक्ति का काम करते हुए स्त्रियों के बीच अपनी गतिविधियाँ तेज कर दीं ।

सोवियत संघ के बाहर, सर्वहारा विचारधारा पर आधारित नारी आन्दोलन ने १९२० के दशक में सुनिश्चित शक्ल अख्तियार करना शुरू किया । नारी आन्दोलन को क्रान्तिकारी आन्दोलन का अपरिहार्य बुनियादी अंग मानते हुए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कांग्रेस में मेहनतकश स्त्रियों के बीच कम्युनिस्टों के काम के प्रश्न पर लगातार गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श होता रहा । १९२० में कोमिन्टर्न के निर्देशन में अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना हुई जिसकी सेक्रेटरी क्लारा जेटकिन थीं । महिला कम्युनिस्टों का एक प्रेस भी स्थापित हुआ और एक अंतरराष्ट्रीय महिला पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ । १९२० से १९२६ के बीच महिला कम्युनिस्टों के चार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुए ।

यद्यपि नारी आन्दोलन पर दूसरे इंटरनेशनल के विचारधारात्मक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने महिला कम्युनिस्ट संगठनों के कामों पर विशेष जोर दिया, पर लेनिन और इंटरनेशनल के अन्य अग्रणी नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि स्त्रियों के गैर-पार्टी संगठन और सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों की मांगों को लेकर संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठन भी बनाये जाने चाहिए जिसमें मेहनतकश स्त्रियों के अतिरिक्त जनता के अन्य वर्गों की स्त्रियाँ भी हिस्सा लें । सोवियत संघ के बाहर के देशों में नारी आदोलन में मौजूद संकीर्णतावादी भटकावों और संगठनों की कमजोरी के कारण व्यापक स्त्रियों को उनके जनवादी अधिकारों की मांग और यौन-असमानता के विरोध के आधार पर संगठित करने में तीसरे दशक तक तो कोई विशेष सफलता नहीं प्राप्त हो सकी, लेकिन चौथे दशक में फासिज्म के उभार ने तात्कालिक रूप से, वस्तुगत तौर पर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं कि फासिज्म और साम्राज्यवादी युद्ध-विरोधी संयुक्त मोर्चे में जनता के सभी वर्गों की — विशेषकर कामगार और मध्यम वर्ग की स्त्रियों के संगठित होने की प्रक्रिया शुरू हो गई । जहाँ भी फासिस्ट ताकतें सत्ता में आयीं, प्रगतिशील नारी संगठनों के साथ ही उन्होंने उन बुर्जुआ नारी संगठनों को भी कुचल दिया जो नारी मुक्ति या स्त्रियों के समान अधिकारों की बात करती थीं । इसके साथ ही फासिज्म-विरोधी लोक मोर्चे के एक अंग के रूप में एक जनवादी, फासिज्म-विरोधी नारी आन्दोलन के संघटित होने की प्रक्रिया शुरू हो गयी । अगस्त १९३४ में सोवियत संघ सहित कई देशों के प्रगतिशील नारी संगठनों की पहल पर पेरिस में युद्ध  और फासिज्म-विरोधी महिला विश्व कांग्रेस आयोजित हुआ जिसमें कम्युनिस्ट शांतिवादी, नारीवादी और क्रिश्चियन समाजवादी स्त्री संगठनों एवं ग्रुपों के कुल १०९६ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । कांग्रेस में युद्ध और फासिज्म-विरोधी विश्व महिला कमेटी का गठन किया गया । पुन: मई १९३८ में मार्सिइएज (Marseillis) में युद्ध-विरोधी अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन का आयोजन हुआ ।

यद्यपि विश्वयुद्ध के दौरान जनवादी महिला आन्दोलन के विकास की दिशा में सांगठनिक-परिमाणात्मक शक्ति की दृष्टि से कोई बहुत महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई, लेकिन फासिज्म के रूप में सामने आई बुर्जुआ अधिनायकत्व की नग्नता ने और उसके विश्वव्यापी प्रतिरोध ने इसके लिए आवश्यक पूर्वाधार तैयार कर दिया ।

जिन उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में मुक्तियुद्ध जारी थे, वहां पहले से ही जनवादी नारी आन्दोलन के संगठित होने की प्रक्रिया जारी थी । फासिज्म-विरोधी संघर्ष के अनुभवों, फासिज्म की पराजय, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादी शक्तियों के निर्बल हो जाने और एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर के उठ खड़े होने के व्यापक प्रभाव दुनिया की आधी आबादी की चेतना पर और नारी आन्दोलन पर भी पड़ा । तीसरी दुनिया के देशों में उपनिवेशवाद की पराजय की प्रक्रिया शुरू होने के इस दौर में उन अधिकांश देशों में समाजवाद को सच्चा मित्र मानने वाला जनवादी नारी आन्दोलन शक्तिशाली होता चला गया । चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जारी मुक्ति-संघर्ष में स्त्रियों की भागीदारी और मुक्त क्षेत्रों में उनकी सामाजिक स्थिति पहले से ही दुनिया भर के पिछड़े देशों की स्त्रियों को आकृष्ट कर रही थी । १९४९ में नई जनवादी क्रांति संपन्न होने के बाद मध्ययुगीन पित्रसत्तात्मक स्वेच्छाचारिता से भरे समाज में स्त्रियों को पूर्ण बराबरी का कानूनी दर्ज़ा देकर और फिर समाज में उसे एक वास्तविकता में रूपांतरित करने की शुरुआत करके चीन के सर्वहारा राज्य ने ऐतिहासिक काम किया था उस पर पूरी दुनिया की स्त्रियों और मुक्तिकामी जनता की निगाहें टिकी हुई थीं । द्वितीय विश्व्यद्धोत्तर काल में पश्चिम के देशों की स्त्रियाँ भी अपने जनवादी अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने की जरूरत शिद्दत के साथ महसूस कर रहीं थीं ।

इन्हीं परिस्थितियों में, अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन ने आगे की ओर कुछ महत्वपूर्ण डग भरे । इनमें सर्वाधिक महत्पूर्ण कदम था दिसंबर, १९४५ में महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ( Women’s International Democratic Federation — W.I.D.F.) की स्थापना, जिसमें ३९ देशों के राष्ट्रीय स्त्री-संगठनों ने भाग लिया । महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ने स्त्रियों की आम मांगों को लेकर अलग-अलग देशों में और विश्व स्तर पर सक्रिय विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्त्री संगठनों के साथ साझा कार्रवाइयों की भी कोशिश की, लेकिन उस समय पूरी दुनिया में जारी कम्युनिज्म-विरोधी मुहीम के प्रभाव में बहुत सारे बुर्जुआ, तथाकथित परम्परागत स्त्री संगठनों के नेतृत्व ने इसे स्वीकार नहीं किया ।

१९५६ में रूस में ख्रुश्चेव द्वारा प्रतिक्रांतिकारी तख्तापलट और रूस तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना ने विष-स्तर पर जारी वर्ग-संघर्ष को भारी धक्का पहुँचाने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन को भी भारी नुकसान पहुँचाया । साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष, पूंजीवादी देशों में और तीसरी दुनिया के नवस्वाधीन देशों में जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष और व्यवस्था-विरोधी संघर्ष में स्त्री आन्दोलन की क्रान्तिकारी भागीदारी के विपरीत — संशोधनवादियों ने दुनिया भर में नारी मुक्ति आन्दोलन को सुधारवाद और शांतिवाद के दलदल में ले जाकर धंसा देने की हर चंद कोशिशें कीं और काफी हद तक इसमें सफलता भी प्राप्त की । यही कारण था कि छठे दशक के अंत तक दुनिया भर के नारी आन्दोलन में गतिरोध और शून्य की सी स्थिति उत्पन्न हो गयी थी । यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसमें बुर्जुआ नारीवाद के नये उभार ने सातवें दशक में जन्म लिया ।

6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन

जैसाकि उपर उल्लेख किया जा चुका है, पश्चिम के देशों में बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों की पूर्वपीठिका तैयार होने के साथ ही, यानि प्रबोधन काल (Age of Enlightenment ) के दौर में नारी मुक्ति की चेतना का जन्म हुआ और बुर्जुआ क्रांतियों के दौर में स्त्री समुदाय ने अपने सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी ।

एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों में बुर्जुआ विकास का स्वरूप यूरोप जैसा नहीं रहा । यहाँ बुर्जुआ वर्ग पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रांति की प्रक्रिया से गुजरकर सत्ता में नहीं आया । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों के पूर्ण औपनिवेशीकरण के बाद वहाँ की पुरानी सामाजिक-आर्थिक संरचना को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया । बाद में इन देशों में औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से जिस बुर्जुआ वर्ग का जन्म हुआ, वह एक समझौतापरस्त वर्ग था । वह अमेरिका या फ़्रांसिसी क्रांति के वाहक बुर्जुआ वर्ग की भांति क्रान्तिकारी भौतिकवाद और जनवाद के मूल्यों से लैस नहीं था । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों में इसी बुर्जुआ वर्ग ने अलग-अलग परिस्थितियों में कहीं एक हद तक क्रान्तिकारी संघर्ष करके तो कहीं ‘समझौता-दबाव-समझौता’ की रणनीति अपनाकर और कहीं पूरी तरह साम्राज्यवाद के साथ समझौता करके सत्ता हासिल की । तीसरी दुनिया के इस बुर्जुआ वर्ग की राजनीतिक स्वतन्त्रता भी उनके चरित्र और उनके संघर्ष या समझौते की प्रकृति के ही अनुरूप कम या ज्यादा थी, पर कहीं भी इस नये बुर्जुआ वर्ग ने न तो साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद किया और न ही क्लासिकीय अर्थों में उस रूप में जनवाद को ही बहाल किया, जैसाकि फ़्रांस या अमेरिका के बुर्जुआ वर्ग ने किया था ।

इन सभी देशों में नारी आन्दोलन के उद्भव और विकास की प्रक्रिया और उसका चरित्र भी इन देशों के इतिहास की उपरोक्त विशिष्टता से ही निर्धारितहुआ ।

एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी प्रक्रिया घटित न होने के कारण इन देशों के सामाजिक जीवन एवं मूल्यों में जनवादी मूल्यों-मान्यताओं की व्याप्ति अत्यंत कम थी और नारी समुदाय उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में भी मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था और मूल्यों-मान्यताओं के बंधन में जकड़ा रहा । काफी हद तक यह स्थिति आज भी बनी हुई है । फिर भी उन्नीसवीं शताब्दी में नारी मुक्ति की जो चेतना तीसरी दुनिया के देशों के नारी समुदाय में संचरित हुई, उसकी प्रक्रिया राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के दौर में शुरू हुई ।

अधिकांश लातिन अमेरिका देशों (जैसे मैक्सिको, क्यूबा, ब्राज़ील, हैती, निकारागुआ आदि ) में स्पेनी उपनिवेशवादियों के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हो चुकी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में लातिन अमेरिका देशों में स्त्रियों के संगठनों के बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, हालाँकि यह मध्यवर्गीय शिक्षित मिश्रित आबादी से नीचे मूल इंडियन आबादी तक नहीं पहुँच पाई थी और इन संगठनों की प्रकृति सारत: बुर्जुआ नारीवादी थी । बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में मैक्सिको और ब्राज़ील की अधूरी राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों और क्यूबा, निकारागुआ आदि देशों में उग्र रूप से जारी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों ने पूरे लातिन अमेरिका में नारी मुक्ति आन्दोलन को भी नया संवेग प्रदान किया । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत सारे लातिन अमेरिकी देशों में कम्युनिस्ट संगठनों के बनने की प्रक्रिया भी दूसरे इंटरनेशनल के काल में ही शुरू हो चुकी थी और इस शताब्दी के तीसरे दशक तक अधिकांश देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थापना हो चुकी थी । सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों और क्रांतिकारी मध्यमवर्ग के क्रांतिकारी संघर्षों की लंबी परम्परा ने भी लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति और उनके आन्दोलन पर विशेष प्रभाव डाला । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी नवउपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों का जो नया चक्र लातिनी देशों में शुरू हुआ, उसने आम मध्यवर्गीय और कामगार स्त्रियों को भी और काफी हद तक मूल आबादी की स्त्रियों को भी संघर्ष की मुख्य धारा से जोड़ने के साथ ही स्त्री-मुक्ति की धारा से भी जोड़ने में कामयाबी हासिल की ।

ख्रुश्चेवी लहर से लेकर गोर्बचोवी लहर तक के प्रतिकूल प्रभाव लातिन अमेरिकी जनता के मुक्ति-संघर्षों पर भी पड़े और मुख्यत: संशोधनवादी प्रभाव के चलते आज इन देशों के कई छापामार मुक्ति संघर्षों का (जैसे, अलसल्वाडोर, कोलम्बिया आदि में ) विघटन हो चूका है । कई सारी क्रांतियाँ (जैसे क्यूबा, निकारागुआ आदि ) अपने मध्यवर्गीय नेतृत्व के चरित्र के अनुरूप अपने अधूरे कार्यभारों को पूरा करने के बाद या तो विफिल हो चुकी हैं या विपथगमन कर चुकी हैं । इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव वहाँ के नारी आन्दोलन पर भी पड़ा है । लेकिन आज फिर पेरू में वहाँ की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वहाँ की स्त्रियाँ छापामार सेना और जनकार्रवाइयों में हिस्सा ले रही हैं, आधार इलाकों में लोक कमेटियों में शामिल होकर राजनीतिक कार्यों में, सामाजिक गतिविधियों में तथा सामाजिक उत्पादन में बराबरी की हिस्सेदारी कर रही हैं और साथ ही उन्होंने क्रांतिकारी जनसंगठनों के रूप में अपने संगठन बनाये हैं ।

काले अफ़्रीकी देशों में स्त्रियों ने वर्गीय समाज की गुलामी से औपनिवेशिक काल में ही पहली बार साक्षात्कार किया । दास समाज और सामंती समाज की पितृसत्तात्मक गुलामी के लंबे अतीत और सामन्ती पार्थक्य से वंचित रहने के कारण, पचास और साठ के दशक में राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के विस्फोट के साथ ही स्त्रियों की भारी आबादी उनमें शामिल हुई । नवस्वाधीन अफ़्रीकी देशों की स्त्रियों ने अपने लिए महत्वपूर्ण जनवादी अधिकार अर्जित किये । पर अब इन देशों का विकास गतिरुद्ध हो चुका है और केवल विश्व पूंजीवाद से निर्णायक विच्छेद करके, नई सर्वहारा क्रांतियाँ ही पुन: इन्हें प्रगतिपथ पर आगे बढ़ा सकती हैं । आज अफ़्रीकी देशों में भी पूंजी की सत्ता और यौन-असमानता की शिकार नारी समुदाय के नये आन्दोलन और स्वतंत्र संगठनों के गठन का वस्तुगत आधार तैयार है, पर उनका भविष्य क्रांतियों के नये चक्र की शुरुआत के साथ जुडा हुआ है ।

तुर्की, ईरान और मिस्र में नारी आन्दोलन की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में राष्ट्रीय जनवाद के लिए संघर्ष शुरू होने के साथ ही हो चुकी थी और स्त्रियों ने वहाँ लंबे संघर्ष के दौरान कई जनवादी अधिकार प्राप्त किये, पर फ़िलहाल वहाँ भी नारी मुक्ति-संघर्ष आज ठहराव और गतिरोध का शिकार है । सीरिया और इराक में भी सामाजिक-राजनीतिक जीवन में स्त्रियों ने कुछ महत्वपूर्ण अधिकार अर्जित कर लिए हैं, पर वर्तमान गतिरोध आज वहाँ की भी सच्चाई है । अरब अफ़्रीकी और पश्चिमी एशिया के अन्य अधिकांश मुस्लिम देशों में स्त्रियाँ आज भी अपने सामाजिक अधिकारों से वंचित पूरी तरह मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक गुलामी और सामन्ती पार्थक्य का शिकार बनी हुई हैं । साम्राज्यवादियों के टट्टू प्रतिक्रियावादी शेखों और शाहों के विरुद्ध जब तक इन देशों में जनक्रांतियाँ आगे कदम नहीं बढ़ाएंगी, तब तक नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रक्रिया वहाँ संवेग नहीं ग्रहण कर सकती ।

एशिया के अन्य देशों में चीन और वियतनाम, कोरिया आदि जिन देशों में साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधी संघर्ष का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग ने किया और जहाँ कुछ दशकों के लिए भी सर्वहारा सत्ता कायम रह सकी, उन देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के बावजूद आज भी स्त्रियों की सभी उपलब्धियां खोई नहीं हैं । आज भी अन्य एशियाई देशों की तुलना में स्त्रियों की इन देशों में वास्तव में अधिक सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं, यद्यपि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि चीन, वियतनाम आदि देशों में आज पूंजीवाद की लहर ने न केवल उन्हें निकृष्टतम कोटि का उजरती मजदूर बना दिया है और न केवल उनके अधिकारों में कटौतियां की जा रही हैं, बल्कि अब इन देशों में नारी-विरोधी अपराधों की भी भरमार हो गई है ।

भारत और एशिया के अन्य कई देशों में यद्यपि नारी मुक्ति-आन्दोलन की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही हो चुकी थी, पर राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व के समझौतापरस्त चरित्र के कारण इन देशों में जीवन के अन्य क्षेत्रों की ही भांति नारी अधिकार आन्दोलन के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी जनवादी मूल्यों की लड़ाई क्रांतिकारी और व्यापक पैमाने पर नहीं लड़ी गई । मध्यवर्गीय क्रांतिकारी आन्दोलन और सर्वहारा आन्दोलन की धाराएं अपनी जिन अन्तर्निहित कमजोरियों के कारण राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग के हाथों से नहीं छीन सकीं, उन्हीं कारणों से वे नारी आन्दोलन को भी एक क्रांतिकारी दिशा और संवेग नहीं दे सकीं । लंबे संघर्षों और निरंतरता के बावजूद भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों की स्त्रियों ने जो भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार अर्जित किये, वे बहुत कम थे । यही नहीं, कानूनी और संवैधानिक तौर पर उन्हें समानता के जो अधिकार मिले भी हैं, वे समाजी जीवन में व्याप्त निरंकुश स्वेच्छाचारिता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण मूलत: और मुख्यत: निष्प्रभावी बने हुए हैं ।

राष्ट्रीय आन्दोलन के समझौतापरस्त बुर्जुआ नेतृत्व तथा राष्ट्रीय जनवाद के कार्यभारों के अधूरे और गैरक्रांतिकारी ढंग से पूरा होने के कारण ही भारत, नेपाल आदि पिछड़े देशों में औरतों की गुलामी आज भी अधिक गहरी, व्यापक, निरंकुश और संगठित रूप में कायम है । सीमित हद तक शिक्षा और जनवादी चेतना के प्रसार के बावजूद बहुसंख्यक नारी आबादी आज भी बर्बर निरंकुश दासता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मकता के मूल्यों से जकड़ी हुई है, भयानक अमानवीय पार्थक्य ( Segregation ) की शिकार है और साथ ही पूंजी की सत्ता की उजरती गुलामी के रथ में भी जोत दी गई है । आधी आबादी की अपार क्रांतिकारी सम्भावना सम्पन्न जनशक्ति को निर्बंध क्रांतिकारी चेतना से लैस करना, क्रांतिकारी नारी आन्दोलन को नये सिरे से खड़ा करना और साथ ही सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के हर मोर्चे पर योद्धाओं की कतारों में स्त्रियों को ला खड़ा करना इन सभी देशों में क्रांतियों का एक अत्यंत कठिन लेकिन अनिवार्यत; आवश्यक कार्यभार है ।

तीसरी दुनिया के इन सभी देशों में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के विरुद्ध तथा राष्ट्रीय जनवादी क्रांति के छूटे हुए कार्यभारों को पूरा करने के लिए सर्वहारा क्रांतियों का जो नया चक्र शुरू होगा, अब नारी मुक्ति आन्दोलन का भविष्य भी उसी के साथ द्वंदात्मक रूप से जुडा हुआ है ।

7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति

अक्टूबर क्रान्ति के बाद मानव इतिहास में पहली बार कोई ऐसी राज्यसत्ता अस्तित्व में आयी, जिसने औरतों को हर मायने में सामान अधिकार दिए, समान सुविधाओं के अतिरिक्त हर क्षेत्र में समान काम के अवसर, समान काम के लिए समान वेतन, समान सामजिक राजनीतिक अधिकार, विवाह और तलाक के सम्बन्ध में बराबर अधिकार, अतीत में वेश्यावृत्ति जैसे पेशों के लिए विवश औरतों का सामजिक पुनर्वास आदि अनेकों कदम उठाकर रूस की समाजवादी सरकार नें निस्संदेह एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक काम किया । समाजवादी निर्माण के पूरे दौर में, नारी मुक्ति के क्षेत्र की उपलब्धियां भी अभूतपूर्व थीं । पिछड़े हुए रूसी समाज में क्रान्ति के बाद के चार दशकों में उत्पादन, सामजिक-राजनीतिक कार्रवाईयों , सामरिक मोर्चे और बौद्धिक गतिविधियों के दायरे में जितनी तेजी से औरतों की हिस्सेदारी बढ़ी, वह रफ़्तार जनवादी क्रांतियों के बाद यूरोप-अमेरिका के देशों में पूरी दो शताब्दियों के दौरान कभी नहीं रही थी । चंद-एक दशकों में ही सोवियत समाज से यौन अपराध और यौन रोगों का पूर्ण उच्छेदन हो गया, इस तथ्य को पश्चिम का मीडिया भी स्वीकार करता था । खेतों कारखानों में उत्पादन के मोर्चे पर ही नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चे पर भी लाखों सोवियत वीरांगनाओं नें जिस शौर्य और साहस का परिचय दिया था, उसने काफी हद तक इस सच्चाई को सत्यापित कर दिया कि नारी समुदाय की सीमा सिर्फ यही है कि उसे समाज में पुरुषों के साथ बराबरी की स्थिति, अवसर और परिवेश नहीं प्राप्त है ।

लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजवादी समाज में नारी समुदाय यौन-शोषण-उत्पीड़न से तथा आर्थिक शोषण से पूरी तरह मुक्त हो चुका होता है और पूर्ण समता की स्थिति कायम हो गयी होती है । ऐसा न तो कभी हुआ था और न ही ऐसा हो पाना संभव ही है । इस मुद्दे पर स्पष्टता के लिए जरूरी है कि पहले समाजवाद की अंतर्रचना को ही भली-भाँती समझ लिया जाये ।

समाजवाद एक स्थायी सामाजिक आर्थिक संरचना नहीं है । यह पूँजीवाद और वर्गविहीन समाज के बीच का एक लम्बा संक्रमणकाल है । इस दौर में छोटे पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन लम्बे समय तक बना रहता है, बाजार के नियम काम कार्य रहते हैं, माल-अर्थव्यवस्था भी मौजूद रहती है और इनके आधार पर पूंजीवादी मूल्य-मान्यताएं-संस्कृति रोज-रोज, हर क्षण पैदा होती रहती हैं, पूंजीवादी राज्यतंत्र के नाश के बाद भी पुराने समाज की वैचारिक-सामजिक-सांस्कृतिक अधिरचनाएं लगातार मौजूद रहती हैं और समाजवाद के विरूद्ध, एवं उसे ख़त्म कर देने के लिए लगातार एक भौतिक शक्ति का काम करती रहती हैं । वर्ग संघर्ष जारी रहता है और उत्तरोत्तर तीखा होता जाता है । सर्वहारा का राज्य और सर्वहारा की पार्टी लगातार पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली और मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के विरूद्ध कारगर ढंग से संघर्ष को जारी रखते हुए ही समाजवादी समाज को उस मंजिल तक पंहुचा सकती हैं, जहां वस्तु का बाजार मूल्य पूर्णतः समाप्त हो जाता है और मात्र उपयोग-मूल्य एवं प्रभाव मूल्य का ही अस्तित्व रह जाता है । केवल इसी मंजिल पर पहुंचकर समाज में हर तरह की असमानता समाप्त हो सकती है और नारी समुदाय भी तभी पूर्ण समता और स्वतंत्रता की स्थिति प्राप्त कर सकता है । लेकिन यह मार्ग अनेकों आरोहों-अवरोहों, जय-पराजयों और मोड़ों-घुमावों से भरा हुआ होता है तथा बहुत लम्बा होता है ।

रूस और चीन के समाज ने समाजवादी क्रान्ति और निर्माण के दौर में विकास के अभूतपूर्व लम्बे डग भरे और सामजिक न्याय और समता के अपूर्व कीर्तिमान स्थापित किये, लेकिन वे पूर्ण समता और पूर्ण न्याय से युक्त समाज नहीं थे । संवैधानिक स्तर पर औरत को सभी अधिकार मिल चुके थे, लेकिन सामजिक पारिवारिक स्तर पर यह स्थिति नहीं थी । ऐसा समझना एक वैधिक विभ्रम(Juridical Illusion) होगा । उत्पादन के तंत्र पर पूर्ण सामाजिक स्वामित्व के बगैर यह संभव नहीं था और इसके लिए अधिरचना के धरातल पर सतत क्रांतियों की भी अपरिहार्य आबश्यकता थी ।

समाजवाद की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बावजूद स्तालिनकालीन रूस में ऐसा न हो सका, जो कालान्तार में समाजवाद के ठहराव और अन्ततोगत्वा पराजय का कारण बना । स्तालिन की सर्वाधिक गंभीर गलती उनकी यह दार्शनिक भूल थी कि वे समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के अस्तित्व को और उसकी निरंतरता को वास्तविक रूप में पहचान नहीं सके । यह काम सर्वप्रथम माओ-त्से-तुंग ने किया । सोवियत संघ में समाजवाद की उपलब्धियों और पराजय की शिक्षाओं का तथा चीन में समाजवादी प्रयोगों का सार संकलन करते हुए माओ ने पहली बार समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को स्पष्टतः निरूपित किया और सर्वहारा के अधिनायकत्व के अंतर्गत वर्ग संघर्ष को जारी रखने के सिद्धांत और पद्धति का प्रतिपादन किया । पहले यह उल्लेख किया जा चुका है कि मार्क्सवाद के विकास की परम्परा में उत्पादक शक्तियों के विकास पर अधिक जोर देने की यांत्रिकता शुरू से ही मौजूद थी और मूलाधार एवं अधिरचना के द्वंद्वात्मक संबंधों की समझ काफी हद तक अस्पष्ट थी । सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की सैद्धांतिक पार्श्वभूमि की सर्जना करते हुए माओ त्से तुंग ने पहली बार इनका स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया और मूलाधार के रूपांतरण को जारी रखने के लिए तथा पूंजीवादी पुनर्स्थापना के सभी भौतिक आधारों को नष्ट करने के लिए अधिरचना के निरंतर क्रान्तिकारीकरण या अधिरचना में सतत क्रान्ति की अवधारणा प्रस्तुत की । पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि समाजवादी संक्रमण के दौरान पूंजीवादी उत्पादन के छोटे से छोटे रूप की समाप्ति की लम्बी प्रक्रिया के साथ ही उसकी अनिवार्य पूर्वशर्त एवं समांतर प्रक्रिया के रूप में तथा ज्यादा महत्व देकर कला-साहित्य-संस्कृति, शिक्षा एवं सामाजिक मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के प्रत्येक दायरे में अनवरत क्रान्ति की प्रक्रिया को जारी रखे बगैर समाज की विषमताओं एवं उत्पीड़न के विविध सूक्षम एवं स्थूल रूपों को कदापि समाप्त नहीं किया जा सकता । नारी-पुरूष असमानता, नारी उत्पीड़न पर आधारित पारिवारिक ढांचा एवं वैवाहिक सम्बन्ध, पुरूष-स्वामित्ववादी मानसिकता आदि ऐसी ही सामाजिक संस्थाएं और मूल्य मान्यताएं हैं, जिन्हें समाजवादी समाज के भीतर अनवरत सांस्कृतिक क्रांतियों से गुजरने के बाद ही, क्रमशः निर्मूल किया जा सकेगा । यह सच्चाई केवल समाजवादी समाज के लिए ही लागू नहीं होती है, बल्कि आज भी नारी मुक्ति आन्दोलन के मार्क्सवादी समर्थकों के भीतर मौजूद तमाम यांत्रिक धारणाओं, अर्थवादी भटकावों और भ्रांतियों से मुक्ति के लिए सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की इस दार्शनिक अंतर्वस्तु को जानना समझना जरूरी है ।

मूलाधार और अधिरचना के द्वंदात्मक संबंधों के, सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति द्वारा प्रस्तुत निरूपण, अधिरचना में क्रान्ति की अपरिहार्यता पर उसके जोर और सर्वहारा अधिनायक्तव के अंतर्गत सतत क्रान्ति की उसकी अवधारणा की सम्यक समझदारी के आधार पर ही आज नारी मुक्ति की दिशा से सम्बंधित निम्नलिखित प्रश्नों को भलीभांति समझा जा सकता है ।

1. नारी-उत्पीडन के बुनियादी कारण आर्थिक होंने के बावजूद आर्थिक प्रश्नों के अतिरिक्त सामाजिक- सांस्कृतिक धरातल पर भी स्त्रियों को संगठित होकर संघर्ष करना जरूरी है और पुरूष्सत्तात्मक व्यवस्था की मान्यताओं-संस्थाओं से सघर्ष एक दीर्घकालिक संघर्ष है ।

2. समाजवादी संक्रमण के अंतर्गत भी एक लम्बे समय के संघर्ष के बाद ही स्त्रियों की पूर्ण मुक्ति संभव है और यह कि यह प्रश्न समाजवाद की विजय-पराजय के साथ जुड़ा हुआ है ।

3. नारी मोर्चे पर कामगार स्त्रियों के संगठनों के अतिरिक्त और सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष मोर्चात्मक(Frontal) संगठनों के अतिरिक्त संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठनों की अपरिहार्य आवश्यकता है, जिनमें मध्यमवर्ग सहित जनता के सभी वर्गों की स्त्रियाँ पुरूष उत्पीडन के सर्वतोमुखी विरोध और अपने सामजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के एक कार्यक्रम के आधार पर संगठित हों, ऐसे नारी संगठन सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष नेतृत्व में न होकर सांगठनिक तौर पर, स्वतन्त्र स्वायत्त हों और पार्टी अपनी नीतियों से उन्हें प्रभावित करके, उनके भीतर काम करते हुए उन्हें दिशा देने का प्रयास करे ।

4. स्त्रियों की सहस्त्राब्दियों पुरानी मानसिक गुलामी को नष्ट करने के लिए नारी संगठनों की पहलकदमी, निर्णय लेने की आजादी और सापेक्षिक स्वायत्तता को बढाने के साथ ही, सर्वहारा वर्ग की पार्टी के लिए यह भी जरूरी है की राजनितिक-सांस्कृतिक शिक्षा और आन्दोलन के विशेष प्रयासों से पार्टी-कतारों में स्त्रियों की भरती की प्रक्रिया तेज की जाये और साथ की संघर्ष के हर मोर्चे पर — सभी तरह के जनसंगठनों में स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी बढाई जाये और उनकी पहलकदमी को निरुत्साहित करने की पुरूष-स्वामित्ववादी प्रवृत्तियों के विरूद्ध सतत संघर्ष किया जाये ।

5.पुरूषों की प्रत्यक्ष-परोक्ष चौधराहट(जो हर स्तर पर बुर्जुआ तत्वों को बल प्रदान करती है) से सामाजिक सक्रियता के हर दायरे में औरतों के लिए बच पाना अत्यंत कठिन है और पुराने मूल्यों के पूर्ण उच्छेदन तक यह समस्या समाजवाद की अवधि में भी बनी रहेगी । इससे यह स्पष्ट है कि जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता और स्वतन्त्र पहचान के लिए संघर्ष का प्रश्न दूरगामी और ऐतिहासिक महत्त्व रखता है । इसे एक बुर्जुआ दृष्टिकोण कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । इस प्रश्न को भी नारी आन्दोलन के एजेंडे पर अलग से रेखांकित करके शामिल करना अनिवार्य है ।

पूर्वी यूरोप और भूतपूर्व सोवियत संघ में 1956 में और चीन में 1976 में पूंजीवादी पुनर्स्थापना होने के बाद से लेकर अब तक के काल में, इन देशों में लोभ लालच , प्रतियोगिता, अपराध, भ्रष्टाचार, लूटमार और असमानता की नैतिक स्वीकृति से युक्त एक नग्न उपभोक्ता संस्कृति अस्तित्व में आई है । जाहिरा तौर पर इसका सर्वाधिक शिकार प्रत्यक्ष उत्पादक और स्त्री समुदाय ही हुआ है । इन सभी देशों में इधर नए सिरे से बलात्कार, स्त्री-भ्रूण ह्त्या, पत्नि उत्पीडन आदि नारी विरोधी अपराधों का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर गया जो समाजवाद के कुछ दशकों के भीतर पूरी तरह समाप्त हो चुके थे । अब विगत कुछ वर्षों के भीतर रूस और पूर्वी यूरोप में खुले निजी इजारेदार पूँजीवाद के आने के बाद यह प्रक्रिया और अधिक तेज हो गयी है, इस तथ्य को बुर्जुआ मीडिया भी स्वीकार कर रहा है । वेश्यावृत्ति, कालगर्ल आदि के पेशों और कैबरे नृत्य, अश्लील पत्रिकाओं आदि की बाढ़ आ गयी है, 1956 के पहले के सोवियत संघ और 1976 के पहले के चीन में जिन यौन रोगों के पूर्ण उन्मूलन के तथ्य को पश्चिम भी स्वीकार करता था, अब उनके इलाज के लिए अस्पताल खोले जा रहे है । चीन में लड़कियों की भ्रूण हत्या, अपहरण करके बलात विवाह और दहेज़ सरकार की चिंता के विषय बन चुके है । फिल्मों और साहित्य में नारी छवि की यौन-उत्पीड़क प्रस्तुति, मॉडलिंग जैसे पेशों के जरिये यौन-शोषण, नग्नतावाद, हर तरह के नारी स्वातंत्र्य विरोधी मूल्य और पुरूष स्वामित्व की मानसिकता तेजी से फलफूल रही है । उत्पादन के क्षेत्र में पुरूष व स्त्री के कामों की प्रकृति में भेद करके नारी श्रम को ज्यादा से ज्यादा सस्ता बनाया जा रहा है, उन्हें तथाकथित “हलके”, ‘स्त्रियोचित”, उबाऊ, श्रमसाध्य कामों में लगाया जा रहा है और “गृहिणी” के दायित्व से बाँधा जा रहा है । समाजवाद के अंतर्गत शिक्षा और सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों-पुरूषों की भागीदारी में स्त्रियों का अनुपात लगारार बढ़ा था, जो अब तेजी से घटता जा रहा है । स्मरणीय है कि येल्त्सिन के आने से पूर्व गोर्बाचोव ने ही, जो”मानवीय चेहरे वाले समाज ” की बातें किया करता था, लगभग दो सौ तरह के कामों में स्त्रियों की भागीदारी पर रोक लगा दी थी ताकि वे श्रम से थके पतियों की देखभाल और “समाजवाद के नौनिहालों’ के लालन-पालन पर उचित ध्यान दे सकें ।

और यह सब कुछ सर्वथा स्वाभाविक है । अर्थतंत्र का विकास पूंजीवादी दिशा में हो, राज्यसत्ता पर बुर्जुआ वर्ग काबिज हो और पूरे समाज की अधिरचना का समाजवादी रूपांतरण जारी रहे — यह असंभव है । जैसाकि पहले उल्लेख किया जा चुका है, समाजवाद नारी -समस्या का समाधान नहीं बल्कि समाधान की शुरुआत है । स्त्री की असमानतापूर्ण स्थिति और उसके शोषण के विविध रूप समाजवादी संक्रमण के दौरान भी मौजूद रहेंगे, पर वे क्रमशः क्षरण और विलोपन की दिशा में अग्रसर होंगे । और यह प्रक्रिया स्वतः नहीं होगी, अधिरचना में अनवरत क्रान्ति के जरिए– सतत सांस्कृतिक क्रान्ति के जरिए होगी । पूंजीवादी पुनर्स्थापना की यह तार्किक परिणति है कि औरत फिर से दोयम दर्जे की नागरिक, सबसे निचले दर्जे की उजरती मजदूर और एक उपभोक्ता सामग्री या पण्य वस्तु में तब्दील का दी जाये । रूस, पूर्वी यूरोप और चीन में यही हुआ है ।

हमारी उपरोक्त बातों का यह मतलब कतई नहीं है कि मार्क्सवाद के सूत्रों में नारी मुक्ति के प्रश्न का कोई शाश्वत समाधान या आज की स्थिति का कोई किया-कराया विश्लेषण रखा हुआ है । यह मार्क्सवाद की एक प्रस्तरीकृत रूढ़ समझ ही हो सकती है । अपनी द्वंद्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी दृष्टिकोण पर आधारित ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर मार्क्सवाद ने पहली बार नारी प्रश्न को विश्व-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अवस्थित करके देखा, पूरे सामजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक तंत्र से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल की, वर्गीय उत्पीड़न से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों को स्पष्ट किया और इसे सामजिक क्रान्ति का एक अनिवार्य अंग बताया । महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति तक के प्रयोगों नें इस समझ को ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट किया और नारी मुक्ति के लम्बे संघर्ष की दीर्घकालिक अवधि के लिए सांस्कृतिक क्रान्ति नें आम दिशा (General Line) की एक रूपरेखा प्रस्तुत की । अब शेष काम उन्हें पूरा करना होगा जो इस मोर्चे पर काम कर रहे हैं । अभी तक असमाधानित समस्याओं का हल ढूँढने के साथ ही, आज के युग ने जो सर्वथा नयी समस्यायें पैदा की हैं, उनपर भी वे ही लोग सोचेंगे जो इनके रूबरू खड़े हैं ।

8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर

साठ के दशक में जो नारीवादी आन्दोलन पहले अमेरिका और फिर पूरे पश्चिमी जगत में फूट पड़ा, वह सारतः नारी उत्पीडन के विरूद्ध एक अन्धविद्रोह था । उसकी कई शाखाएं और उपशाखाएँ आगे चलकर फलीं-फूलीं, लेकिन उनके पास न तो नारी-समस्या के सभी पहलुओं की कोई इतिहाससम्मत तर्कपरक व्याख्या थी और न ही दूरगामी सामाजिक संघर्ष के रूप में नारी मुक्ति के सघर्ष को आगे ले जाने का कोई ठोस कार्यक्रम ।

वैसे आधुनिक नारीवाद के सिद्धांत का पहला मील का पत्थर पहली बार 1946 में फ्रांसीसी में और 1953 में अंग्रेजी में प्रकाशित सिमोन द बोउवा (Simone de Beauvoir ) की कृति “द सेकेण्ड सेक्स” था, जिसमें व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण और नारी आन्दोलन की एक स्पष्ट दिशा के अभाव के बावजूद नारी उत्पीड़न के कई सूक्ष्म पहलुओं को रेखांकित किया गया था और यह प्रस्थापना दी गयी थी कि स्त्रियों की मुक्ति में ही पुरूषों की भी मुक्ति है जो स्वयं पुरूष स्वामित्व की मानवद्रोही मानसिकता के दास हैं । साठ के दशक के नारीवादी आन्दोलन की चेतना इस विचार से काफी प्रभावित थी । ऐसी दूसरी प्रसिद्ध कृति सुप्रसिद्ध नारीवादी नेता और 1966 में राष्ट्रीय नारी संगठन (अमेरिका) का गठन करने वाली बेट्टी फ्रीडन(Betty Friedan) की 1963 में प्रकाशित पुस्तक द फेमिनिन मिस्टिक(The Feminine Mystique) थी जिसमें स्त्रियों की घरेलू दासता और पुरूष-स्वामित्व को स्वीकार करने के लिए उनके दिमाग के ‘कंडीशनिंग’ की प्रक्रिया की उग्र लेकिन एकांगी एवं अनैतिहासिक आलोचना की गयी थी ।

साठ का दशक आधुनिक इतिहास के द्वित्तीय विश्वयुद्धोतर काल का एक महत्वपूरण मोड़ बिंदु था । विश्व पूंजीवादी तंत्र के सरदार उस समय गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे । तीस के दशक की मंदी के बाद अमेरिका तक में एक बार फिर बेरोजगारी पैदा हो रही थी और युवा असंतोष तीखा हो रहा था । पूरी दुनिया में जारी मुक्ति-युद्धों की लगातार सफलता साम्राज्यवाद के लिए एक गंभीर संकट को जन्म दे रही थी । वियतनाम में अमेरिका की पराजय निश्चितप्राय प्रतीत होने लगी थी । इसी सामाजिक उथल-पुथल के दौर में अमेरिका में अश्वेत आबादी का आन्दोलन नयी शक्ति के साथ फूट पड़ा था । मैकार्थीवाद और शीतयुद्ध के दौरान संचित जनता का आक्रोश सड़कों पर आ गया था । 1968 में हिन्दचीन में अमेरिकी हस्तक्षेप के विरूद्ध छात्रों-नौजवानों और फिर व्यापक अमेरिकी जनता का आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो नागरिक अधिकारों के आन्दोलन के साथ जुड़कर व्यवस्था के लिए संकट बन गया था । इसी समय फ्रांस में छात्रों का आन्दोलन एक ज्वार की भांति उठ खड़ा हुआ जिसमें बाद में मजदूर भी शामिल हो गए और अन्ततोगत्वा लौह पुरूष कहलाने वाले दगाल को राष्ट्रीय सभा भंग करने व इस्तीफ़ा देने के लिए विवश होना पड़ा । पूरा पश्चिमी जगत एक संकट और उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था । पश्चिमी नारी समुदाय भी इस उथल-पुथल से अछूता नहीं था बल्कि उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहा था । सच तो यह है कि यूरोप-अमेरिका में जनांदोलनों में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर स्त्रियाँ हिस्सा ले रहीं थीं । उत्पादन के अतिरिक्त सामाजिक सक्रियता के दायरे में इस बढती हुई शिरकत ने पश्चिम की नारियों — विशेषकर उनके युवा हिस्से की चेतना का धरातल नयी ऊंचाईयों तक उन्नत किया और दोयम दर्जे की नागरिकता एवं हर तरह के यौन-भेद के विरूद्ध स्त्रियों का प्रबल स्वतः स्फूर्त विद्रोह उठ खड़ा हुआ ।

साठ के दशक का पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन नारी शोषण के विरुद्ध एक बगावती उभार था । इस आन्दोलन में विविध चिन्तनों की मौजूदगी के बावजूद, इसकी कोई सुविचारित वैचारिक पूर्वपीठिका, दिशा और कार्यक्रम नहीं था । द्वित्तीय विश्वयुद्धोत्तर पश्चिमी उपभोक्ता संस्कृति की प्रतिक्रिया में पैदा हुई यह एक बगावत थी । पर विडंबना यह थी कि स्वयं इसकी दार्शनिक अंतर्वस्तु भी बुर्जुआ थी, जिसके चलते जल्दी ही आन्दोलन की मुख्यधारा ने विकृत उच्छ्रंखल बुर्जुआ संस्कृति के नैतिक-सामाजिक मूल्यों को अपना लिया । इस अंध-विद्रोह ने यौन-शोषण और यौन-उत्पीड़न पर खड़ी सामाजिक संस्थाओं की जगह मूल्य-संस्थाओं की कोई समग्र वैकल्पिक व्यवस्था नहीं प्रस्तुत की । विवाह, परिवार, एकल यौन-संबधों आदि को अराजकतावादी ढंग से नकारने की चेष्टा की गयी । पूर लड़ाई को पुरूष सत्ता के विरूद्ध केन्द्रित किया गया और इस सत्ता के ऐतिहासिक-सामाजिक-आर्थिक आधारों को जानने समझने की कोई विशेष चेष्टा नहीं की गयी । जाहिरा तौर पर ऐसा कोई आन्दोलन समाज में लम्बे समय तक टिका नहीं रह सकता और यही हुआ ।

पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन का सामाजिक विद्रोही तत्व धीरे धीरे क्षरित होता गया और आठवें दशक के मध्य तक यह एक बहुत छोटे से हिस्से, बुद्धिजीवी और युवा नारियों तक ही सिमट कर रह गया । यौन-भेद में ही सभी असमानताओं का कारण ढूँढने वाली बुर्जुआ अराजकतावादी स्त्रियाँ और संस्थाएं पूरी सच्चाई को ही सिर के बल खड़ा करती रहीं और अन्ततोगत्वा व्यवस्था को ही लाभ पहुंचाने का काम करती रहीं । पश्चिम के जिन नारीवादी विचारकों ने सातवें-आठवें दशक में कई पुस्तकें लिखीं , उनमे से किसी ने विश्लेषण का कोई समग्र, इतिहाससंगत नमूना प्रस्तुत नहीं किया । लेकिन यह जरूर है कि औरत की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता के प्रश्न को, समाज में उसकी अपनी स्वतन्त्र पहचान के प्रश्न को पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन ने चिन्ता और गाम्भीर्य के साथ उठाया और इतिहास के एजेंडा पर इसे महत्वपूर्ण स्थान दिलाया, भले ही उसने स्वयं इसका काल्पनिक अथवा अराजकतावादी समाधान प्रस्तुत किया हो । यही नहीं, गर्भपात, तलाक आदि मामलों को लेकर नारीवादी संगठनों ने जो मांगे उठाई और आन्दोलन चलाए, वे भी अत्यंन्त महत्वपूर्ण थे । नारीवादी आन्दोलन के दर्शन और इतिहासदृष्टि की अवैज्ञानिकता के बावजूद, इसके द्वारा उठाई गयी अधिकाँश मांगों और समस्यायों को एक सही सैद्धांतिक फ्रेमवर्क में अवस्थित करके एक क्रांतिकारी नारी आन्दोलन के कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है और उसके अनुभवों से काफी कुछ सीखा जा सकता है ।

9. और अंत में…

पश्चिम के पूंजीवादी समाज में, पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (Renaissance-Elightenment-Revolution) की ऐतिहासिक विकास-यात्रा के परिणामस्वरूप वहां के समाज में पुरूष-स्वामित्व और वर्चस्व के रूप सूक्ष्म है. जनतांत्रिक मूल्य सामाजिक जीवन में इस हद तक रचे-बसे हैं कि वहां इनका नग्न रूप कायम नहीं रह सकता । वहां स्त्री के साथ यौन-आधार पर कायम सामाजिक असमानता और भेदभाव मुख्य प्रश्न हैं । यौन-उत्पीड़न के आम रूप अत्यंत सूक्षम हैं । नारी की अस्मिता का प्रश्न पश्चिम में प्रबल है । नारी आन्दोलन का प्रमुख सांस्कृतिक पक्ष वहां उपभोक्ता संस्कृति की विकृतियों के विरुद्ध जनमानस तैयार करने का है ।

तीसरी दुनिया के अधिकाँश पिछड़े हुए देशों में नारी उत्पीड़न के नए पूंजीवादी रूपों के साथ-साथ उसके मध्ययुगीन नग्न स्वेच्छाचारी रूप भी कायम हैं । इनमें से कुछ देशों में आज भी अर्द्धसामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक तंत्र किसी-न-किसी रूप में कायम हैं और जिन देशों में साम्राज्यवाद पर आश्रित बुर्जुआ व्यवस्थाएं कायम हुई हैं, वे जनतांत्रिक मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं-संस्थाओं के मामले में पश्चिमी व्यवस्थाओं से बहुत पीछे हैं । भारत को उदाहरण के तौर पर लें । समाज विकास की मंथर गति तथा जनवादी क्रांतियों और तज्जन्य जनवादी मूल्यों के अभाव के चलते हमारे समाज में मूल्यों-मान्यताओं का प्राक्पूंजीवादी ढांचा अत्यंत धीमी गति से क्षरित होता हुआ आज भी कायम है और भारतीय पूंजीवाद नें इन्हें अपना लिया है । मनु के विधान यहाँ आज भी जिन्दा हैं । शिक्षा के प्रसार के बावजूद सामाजिक क्रियाकलापों से बहुसंख्यक नारी समुदाय, यहाँ तक कि उसका वह हिस्सा भी काफी हद तक कटा हुआ है जो सामाजिक उत्पादन में लगा हुआ है । मजदूर और गरीब किसान औरतें निकृष्टतम कोटि के उजरती गुलाम के रूप में ही सही, पर सामाजिक उत्पादन की कार्रवाई में हिस्सा लेती हैं, पर मध्यमवर्गीय औरतों , यहाँ तक तक कि शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक का बहुलांश चूल्हे- चौखट से पूरी तरह बंधा हुआ है और पति की सेवा, बच्चों का लालन-पालन और घरेलू उपयोग की चीजों के उत्पादन से अधिक कुछ नहीं करता । नौकरी करने वाली मध्यमवर्गीय स्त्रियां भी घरेलू गुलामी से मुक्त नहीं हैं । आज भी औरतों का पुरूषों से और पूरे समाज में जितना अमानवीय पार्थक्य (Segregation) भारत में है, उतना मध्य पूर्व के कुछ देशों को छोड़कर कहीं नहीं है । इस आधी आबादी को आर्थिक शोषण, लूटमार, मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं की दिमागी गुलामी, यौन-उत्पीड़न, पुरूष-स्वामित्व, पार्थक्य (Segregation) और अलगाव (Alienation) से मुक्त करना भारत और ऐसे तमाम देशों की क्रांतियों का दायित्व ही नहीं, बल्कि उनकी लड़ाई का एक ऐसा जरूरी मोर्चा है, जिस पर लड़े बिना ये क्रांतियाँ सफल हो ही नहीं सकतीं ।

भारत जैसे देशों में नारी मुक्ति आन्दोलन को वैचारिक धरातल पर तमाम विजातीय बुर्जुआ विचारों से संघर्ष करते हुए सही वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि, इतिहास-दृष्टि, संस्कृति और दिशा से खुद को समृद्ध बनाना होगा । साथ ही साम्राज्यवाद से आयातित और देशी पूँजीवाद द्वारा पोषित बुर्जुआ नारीवाद के दर्शनं के समूल नाश के लिए समग्र जनमुक्ति एवं नारी-मुक्ति की जातीय, जन-परम्पराओं से खुद को वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर अविच्छिन्न रूप से जोड़ना होगा ।

साम्राज्यवाद के वर्तमान नए दौर में यह बात अब दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि बुर्जुआ व्यवस्था के दायरे के भीतर, सुधारों के दायरे के भीतर नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी अब कुछ हासिल कर पाने की रत्ती भर भी गुंजाईश शेष नहीं है । उलटे, ढांचागत असाध्य संकट के दौर में — आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर में, पूरी दुनिया की पूंजीवादी व्यवस्थाएं अब ज्यादा से ज्यादा निरंकुश होते जाने की दिशा में अग्रसर हैं । ऐसे में अबतक के संघर्षों से अर्जित जनवादी अधिकारों की हिफाजत के लिए भी नारी समुदाय को राज्यसत्ता के विरूद्ध जुझारू लड़ाई लड़नी पड़ेगी । पहली बात तो यह है कि यह लड़ाई स्त्रियां तभी लड़ सकती हैं जब वे मजदूरों-किसानों के क्रांतिकारी संघर्षों में, लोक अधिकार आदोलनों में, क्रांतिकारी सांस्कृतिक आन्दोलनों में, क्रांतिकारी छात्र-युवा आन्दोलनों में पूरी भागीदारी करें । तभी वे आम जनता के पुरूष समुदाय को नयी चेतना देकर अपनी मुक्ति के लिए समर्थन हासिल कर सकेंगी और नारी मुक्ति के संघर्ष को स्त्री बनाम पुरूष का सघर्ष से बचाया जा सकेगा । दूसरी बात यह कि आज कामगार स्त्रियों के संगठन बनाने के अतिरिक्त जनमुक्ति संघर्ष के हिरावलों और अन्य क्रांतिकारी आन्दोलनों के नेतृत्व को मध्यमवर्गीय और जनता के सभी बर्गों की स्त्रियों को नारी उत्पीड़न और जनवादी अधिकारों के प्रश्न पर,व्यापक आधार वाले (वर्गीय संयुक्त मोर्चे की प्रकृति वाले) नारी संगठनों के बैनर तले संगठित करने की भी पहले से बहुत अधिक जरूरत है । साथ ही नारी मुक्ति के मुद्दे को उठाने वाले पहले से ही मौजूद ऐसे संगठनों को भी साथ लेने और उनमें शामिल होकर काम करने की संभावना मौजूद होने पर उनका उपयोग अवश्य ही किया जाना चाहिए । भारत जैसे देशों में स्त्रियों के जनवादी अधिकारों के लिए आंदोलनरत तमाम नारी संगठन महानगरों के शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक ही सिमटे हुए है । इनके साथ आम सहमती के कार्यक्रम पर सहमती के आधार पर काम किया जा सकता है और इनका विस्तार गावों-शहरों की आम स्त्रियों तक भी किया जा सकता है ।

तीसरी बात, यह कि जिस हद तक बुर्जुआ व्यवस्था और विश्वपूंजीवादी तंत्र की जरूरत है, उस हद तक सुधारपरक कार्रवाईयों के लिए आज बड़े पैमाने पर सरकारी आर्थिक मदद और तथाकथित स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिये आने वाली साम्राज्यवादी मदद के जरिये भारत जैसे देशों के कोने-कोने में तथाकथित स्त्री संगठन सुधार और आन्दोलन की कार्रवाईयों में लगे हैं । इनका मूल मकसद स्त्रियों को सुधार के दायरे में कैद करके उनकी तेजी से उन्नत होती चेतना को कुंद करना और उन्हें क्रान्ति की धारा में शामिल होने से रोकना है । स्त्री आन्दोलन के इन खतरनाक घुसपैठियों के विरुद्ध आज बड़े पैमाने पर प्रचार की और उनके प्रभाव को समाप्त करने की जरूरत है ।

इस सभी बातों और इनके सभी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही आज नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा और एक सुसंगत कार्यक्रम का निर्धारण किया जा सकता है ।

BACK TO POST [ १०-११ मार्च १९९२ को काठमांडू नेपाल में ‘अखिल नेपाल महिला संघ’ के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय भाषण के रूप में प्रस्तुत निबन्ध. नेपाली भाषा में पुस्तिकाकार प्रकाशित. ‘दायित्वबोध’, मार्च-जून, १९९३, जुलाई-अगस्त,१९९३ और नवंबर-दिसंबर, १९९३ अंकों में धारावाहिक प्रकाशित ]

आग्नेय अक्टूबर

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अक्टूबर क्रांति की ९२वीँ वर्षगांठ पर

बोल्शेविकों ने विद्रोह की ज़ोरदार तैयारियाँ शुरू कीं। लेनिन ने कहा कि दोनों राजधानियों – मास्को और पेत्रोग्राद – में मज़दूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियतों में बहुमत हासिल करने के बाद, बोल्शेविक अपने हाथ में राज्यसत्ता ले सकते हैं, और उन्हें लेना चाहिए। तय किये हुए रास्ते पर नज़र डालते हुए, लेनिन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि `जनता का बहुमत हमारे साथ है।´ अपने लेखों और केन्द्रीय समिति और बोल्शेविक संगठनों के नाम अपने ख़तों में, लेनिन ने विद्रोह की एक विस्तृत योजना बनायी और बतलाया कि फौजी दस्ते, जल-सेना और रेड गार्ड दस्तों को किस तरह इस्तेमाल करना चाहिए, विद्रोह की सफलता निश्चित करने के लिए पेत्रोग्राद के किन मुख्य स्थानों पर कब्ज़ा करना चाहिए, इत्यादि।

7 अक्टूबर को, लेनिन गुप्त रूप से फिनलैण्ड से पेत्रोग्राद आये। 10 अक्टूबर 1917 को, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ऐतिहासिक बैठक हुई जिसमें अगले कुछ दिनों में सशस्त्र विद्रोह आरम्भ करने का फैसला किया गया। पार्टी की केन्द्रीय समिति के ऐतिहासिक प्रस्ताव में, जिसे लेनिन ने लिखा था, कहा गया था :

“केन्द्रीय समिति यह समझती है कि रूसी क्रान्ति की अन्तरराष्ट्रीय परिस्थिति (जर्मन जल-सेना में विद्रोह, जो समूचे यूरोप में विश्व समाजवादी क्रान्ति का चरम प्रदर्शन है, रूस की क्रान्ति का गला घोंटने के उद्देश्य से साम्राज्यवादियों के बीच शान्ति की धमकी), साथ ही सैनिक परिस्थिति (रूसी पूँजीपतियों और केरेन्स्की एण्ड कम्पनी का यह निश्चित फैसला कि पेत्रोग्राद जर्मनों को सौंप दिया जाये) और सोवियतों में सर्वहारा पार्टी का बहुमत हासिल करना, – यह सब और इसके साथ यह कि किसान-विद्रोह हो रहे हैं और आम जनता का विश्वास तेज़ी से पार्टी पर जम रहा है (मास्को के चुनाव), और अन्त में एक दूसरे कार्निलोव काण्ड के लिए जो खुली तैयारी हो रही है (पेत्रोग्राद से फौजें हटाना, मास्को और मिंस्क में हमारी जनता की कार्रवाई वग़ैरह) पर विचार करें और फैसला करें।” (लेनिन, संकलित रचनाएँ, अंग्रेज़ी संस्करण, खण्ड 2, पृष्ठ 135)

केन्द्रीय समिति के दो सदस्य, कामेनेव और ज़िनोवियेव, इस ऐतिहासिक प्रस्ताव के खिलाफ बोले और उन्होंने उसके विरुद्ध वोट दिया। मेंशेविकों की तरह, वे पूँजीवादी संसदीय जनतन्त्र का सपना देखते थे और मज़दूर वर्ग पर यह कहकर कीचड़ उछालते थे कि समाजवादी क्रान्ति करने के लिए वह काफी मज़बूत नहीं है, कि वह सत्ता हाथ में लेने के लिए काफी परिपक्व नहीं है।

हालाँकि इस बैठक में त्रात्स्की ने सीधे इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट नहीं दिया, फिर भी उसने एक संशोधन रखा जिससे विद्रोह की सम्भावना नहीं के बराबर हो जाती और विद्रोह निष्फल हो जाता। उसने प्रस्ताव रखा कि सोवियतों की दूसरी कांग्रेस शुरू होने से पहले विद्रोह शुरू न किया जाये। इस प्रस्ताव का मतलब था – विद्रोह में विलम्ब करना, उसकी तारीख़ ज़ाहिर कर देना और अस्थायी सरकार को आगाह कर देना।

बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति ने विद्रोह का संगठन करने के लिए अपने प्रतिनिधियों को दोन्येत्स प्रदेश, यूराल, हैलसिंगफोर्स, क्रोन्स्तात, दक्षिण-पश्चिमी मोर्चा और दूसरी जगहों पर भेजा। पार्टी ने ख़ासतौर से सूबों में विद्रोह का संचालन करने के लिए कामरेड बोरोशिलोव, मोलोतोव, जरजन्स्की, ओजानिकित्से, किरोव, कगानोविच, कुइवीशेव, फ्रुन्जे, यारोस्लाव्स्की और दूसरे साथियों को मुकर्रर किया। कामरेड ज्दानोव ने यूराल में शंद्रिस्क की फौज में काम जारी रखा। केन्द्रीय समिति के प्रतिनिधियों ने सूबों के बोल्शेविक संगठनों के प्रमुख सदस्यों को विद्रोह की योजना बतायी और पेत्रोग्राद के विद्रोह का समर्थन करने के लिए उन्हें तैयार रहने के लिए बटोरा।

पार्टी की केन्द्रीय समिति के निर्देश से, पेत्रोग्राद-सोवियत की एक क्रान्तिकारी फौजी कमेटी बनायी गयी। यह संस्था विद्रोह का कानूनी तौर पर चलने वाला हेडक्वार्टर बन गयी। उधर क्रान्ति-विरोधी भी जल्दी-जल्दी अपनी शक्ति बटोर रहे थे। फौज के अफसरों ने एक क्रान्ति-विरोधी संगठन बनाया, जिसका नाम अफसरों की सभा था। हर जगह क्रान्ति विरोधियों ने लड़ाकू दस्ते बनाने के लिए हेडक्वार्टर कायम किये। अक्टूबर के अन्त तक, क्रान्ति विरोधियों की कमान में 43 लड़ाकू दस्ते बन गये। सेण्ट जॉर्ज के क्रॉस को मानने वालों के ख़ास दस्ते बनाये गये।

केरेन्स्की की सरकार ने शासन केन्द्र पेत्रोग्राद से मास्को ले जाने के सवाल पर विचार किया। इससे स्पष्ट हो गया कि शहर में विद्रोह रोकने के लिए वह पेत्रोग्राद को जर्मनों के हाथ सौंपने की तैयारी कर रही है। पेत्रोग्राद के मज़दूरों और सैनिकों के विरोध ने अस्थायी सरकार को पेत्रोग्राद में ही रहने पर मजबूर किया।

16 अक्टूबर को, पार्टी की केन्द्रीय समिति की एक विस्तृत बैठक हुई। इस बैठक में विद्रोह का संचालन करने के लिए एक पार्टी केन्द्र चुना गया, जिसके अगुआ कामरेड स्तालिन थे। यह पार्टी केन्द्र पेत्रोग्राद-सोवियत की क्रान्तिकारी फौजी कमेटी का प्रमुख नेतृत्व था और समूचे विद्रोह का अमली संचालन उसके हाथ में था।

केन्द्रीय समिति की बैठक में, समर्पणवादियों – ज़िनोवियेव और कामेनेव ने विद्रोह का फिर विरोध किया। यहाँ मुँह की खाकर, उन्होंने विद्रोह के खिलाफ, पार्टी के खिलाफ खुल्लमखुल्ला अख़बारों में लिखा। 18 अक्टूबर को, मेंशेविक अख़बार नोवाया जीज्न (नव जीवन) ने कामेनेव और ज़िनोवियेव का बयान छापा, जिसमें कहा गया था कि बोल्शेविक विद्रोह की तैयारी कर रहे हैं और वे (कामेनेव और ज़िनोवियेव) समझते हैं कि यह दुस्साहसपूर्ण जुआ खेलना है। इस तरह, कामेनेव और ज़िनोवियेव ने दुश्मन को केन्द्रीय समिति का विद्रोह सम्बन्धी फैसला बता दिया( उन्होंने यह प्रकट कर दिया कि कुछ ही दिनों में विद्रोह शुरू करने की योजना बनायी गयी है। यह ग़द्दारी थी। इस सिलसिले में, लेनिन ने लिखा था : “कामेनेव और ज़िनोवियेव ने सशस्त्र विद्रोह के बारे में अपनी पार्टी की केन्द्रीय समिति का फैसला दग़ाबाज़ी से रोद्जियांको और केरेन्स्की को बतला दिया है।” लेनिन ने केन्द्रीय समिति के सामने ज़िनोवियेव और कामेनेव को पार्टी से निकालने का सवाल रखा।

ग़द्दारों से चेतावनी पाकर, क्रान्ति के दुश्मन तुरन्त ही, इस बात के उपाय करने लगे कि विद्रोह को रोक दें और क्रान्ति के संचालक दल – बोल्शेविक पार्टी – का नाश कर दें। अस्थायी सरकार ने एक गुप्त बैठक बुलायी, जिसमें बोल्शेविकों का मुकाबला करने के लिए क्या उपाय किये जायें, इसका फैसला हुआ। 19 अक्टूबर को, अस्थायी सरकार ने युद्ध के मोर्चे से जल्दी-जल्दी फौजें पेत्रोग्राद बुलायीं। सड़कों पर भारी पहरा लगा दिया गया। क्रान्ति विरोधी ख़ासतौर से मास्को में भारी फौज इकट्ठा करने में कामयाब हुए। अस्थायी सरकार ने एक योजना बनायी कि सोवियतों की दूसरी कांग्रेस शुरू होने से पहले बोल्शेविक केन्द्रीय समिति के हेडक्वार्टर स्मोल्नी पर हमला किया जाये और उस पर कब्ज़ा कर लिया जाये और बोल्शेविक संचालन-केन्द्र का नाश कर दिया जाये। इसी उद्देश्य से, हुकूमत ने पेत्रोग्राद में वह फौज बुलायी जिसकी वफ़ादारी पर उसे भरोसा था।

लेकिन, अस्थायी सरकार की ज़िन्दगी के दिन और घण्टे भी गिनती के रह गये थे। समाजवादी क्रान्ति की विजय-यात्रा को अब कोई भी नहीं रोक सकता था। 21 अक्टूबर को, बोल्शेविकों ने सभी क्रान्तिकारी फौजी दस्तों के पास क्रान्तिकारी फौजी समिति के कमिसार भेजे। विद्रोह होने से पहले के बचे हुए दिनों में फौजी दस्तों, मिलों और कारख़ानों में कार्रवाई की ज़ोरदार तैयारी की गयी। युद्धपोत अव्रोरा और जारियास्वोबोदी के लिए भी निश्चित निर्देश भेजे गये।

पेत्रोग्राद सोवियत की एक बैठक में, त्रात्स्की ने डींग हाँकने की जीम में दुश्मन को वह तारीख़ बतला दी जब बोल्शेविक सशस्त्र विद्रोह शुरू करने वाले थे। केरेन्स्की सरकार विद्रोह को असफल न कर दे, इसलिए पार्टी की केन्द्रीय समिति ने फैसला किया कि निश्चित किये हुए समय से पहले ही विद्रोह शुरू कर दिया जाये और आखिरी मंज़िल तक ले जाया जाये। उसने विद्रोह की तारीख़ सोवियतों की दूसरी कांग्रेस के शुरू होने से पहले के दिन रखी। 24 अक्टूबर (6 नवम्बर) को सुबह तड़के, केरेन्स्की ने हमला शुरू कर दिया। उसने बोल्शेविक पार्टी के केन्द्रीय पत्र रबोचीपूत (मज़दूर पथ) को बन्द करने का हुक्म दिया और सम्पादकीय दफ़्तर और बोल्शेविकों के छापेख़ाने पर हथियारबन्द गाड़ियाँ भेजीं। लेकिन 10 बजे सबेरे तक, कामरेड स्तालिन के निर्देश पर, रेड गार्डों के दस्तों और क्रान्तिकारी सैनिकों ने हथियारबन्द गाड़ियों को पीछे ठेल दिया और छापेख़ाने और रबोचीपूत के सम्पादकीय दफ़्तरों पर और ज्यादा पहरा बिठा दिया। लगभग 11 बजे सबेरे रबोचीपूत प्रकाशित हुआ, जिसमें अस्थायी सरकार का तख्ता उलट देने के लिए आह्वान था। उसी समय, विद्रोह के पार्टी केन्द्र के निर्देश से क्रान्तिकारी सैनिकों और रेड गार्डों के दस्ते स्मोल्नी की तरफ दौड़ाये गये। विद्रोह शुरू हो गया।

24 अक्टूबर की रात को, लेनिन स्मोल्नी आ पहुँचे और उन्होंने खुद विद्रोह के संचालन का भार सँभाला। उस रातभर फौज के क्रान्तिकारी दस्ते और रेड गार्डों के जत्थे बराबर स्मोल्नी आते रहे। बोल्शेविकों ने शीतप्रासाद घेरने के लिए, जहाँ अस्थायी सरकार ने अपना अड्डा बनाया था, उन्हें राजधानी के केन्द्र की तरफ भेजा। 25 अक्टूबर (7 नवम्बर) को, रेड गार्डों के दस्तों और क्रान्तिकारी सैनिकों ने रेलवे स्टेशनों, डाकख़ानों, तारघरों, मन्त्री-गृहों और राज्य बैंक पर कब्ज़ा कर लिया।

प्रेद पार्लियामेण्ट भंग कर दी गयी।

बोल्शेविक केन्द्रीय समिति और पेत्रोग्राद सोवियत का हेडक्वार्टर, स्मोल्नी क्रान्ति का हेडक्वार्टर बन गया, जहाँ से लड़ाई के बारे में सभी हुक्म भेजे जाते थे। पेत्रोग्राद के मज़दूरों ने उन दिनों दिखला दिया कि बोल्शेविक पार्टी की देखरेख में उन्होंने कैसी महान शिक्षा पायी है। फौज के क्रान्तिकारी दस्तों ने, जिन्हें बोल्शेविकों के काम ने विद्रोह के लिए तैयार किया था, नपे-तुले ढंग से लड़ाई की आज्ञाओं का पालन किया और वे रेड गार्डों के दस्तों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़े। जल सेना फौज से पीछे न रही। क्रोन्स्तात बोल्शेविक पार्टी का गढ़ था और बहुत दिन पहले ही अस्थायी सरकार का प्रभुत्व मानने से इन्कार कर चुका था। युद्धपोत अव्रोरा ने अपनी तोपें शीतप्रासाद की तरफ मोड़ दीं और, 25 अक्टूबर को, उनकी घन गरजन ने एक नया युग आरम्भ किया, महान समाजवादी क्रान्ति का युग आरम्भ किया।

25 अक्टूबर (7 नवम्बर) को, बोल्शेविकों ने (रूस के नागरिकों के नाम) एक घोषणापत्र निकाला। इसमें कहा गया था कि पूँजीवादी अस्थायी सरकार हटा दी गयी है और राज्यसत्ता सोवियतों के हाथ में आ गयी है।

अस्थायी सरकार ने कैडेटों और लड़ाकू जत्थों की छत्रछाया में शीतप्रासाद में शरण ली थी। 25 अक्टूबर की रात को क्रान्तिकारी मज़दूरों, सैनिकों और जहाज़ियों ने शीतप्रासाद पर हल्ला बोलकर कब्ज़ा कर लिया और अस्थायी सरकार को गिरफ़्तार कर लिया। पेत्रोग्राद में सशस्त्र विद्रोह की विजय हुई।

सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस 25 अक्टूबर (7 नवम्बर) 1917 की शाम को 10 बजकर 45 मिनट पर स्मोल्नी में शुरू हुई, जबकि पेत्रोग्राद का विद्रोह विजय गौरव से दमक रहा था और राजधानी में सत्ता सचमुच पेत्रोग्राद सोवियत के हाथ में आ गयी थी। कांग्रेस में बोल्शेविकों को भारी बहुमत मिला। मेंशेविकों, बुन्दवादियों और दक्षिणपन्थी समाजवादी क्रान्तिकारियों ने देखा कि अब उनके दिन बीत चुके हैं, इसलिए वे कांग्रेस से बाहर चले गये और उन्होंने ऐलान किया कि वे कांग्रेस के काम में हिस्सा लेने से इन्कार करते हैं। सोवियतों की कांग्रेस में उनका एक बयान पढ़ा गया, जिसमें उन्होंने अक्टूबर क्रान्ति को एक `फौजी षड्यन्त्र´ बताया था। कांग्रेस ने मेंशेविकों और समाजवादी क्रान्तिकारियों की निन्दा की और उनके चले जाने पर अफसोस करना तो दूर, उसका स्वागत किया। कांग्रेस ने ऐलान किया कि ग़द्दारों के चले जाने से अब वह मज़दूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सच्ची क्रान्तिकारी कांग्रेस हो गयी है।

कांग्रेस ने ऐलान किया कि सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में आ गयी है। सोवियतों की दूसरी कांग्रेस के घोषणापत्रा में कहा गया :

“मज़दूरों, सैनिकों और किसानों के भारी बहुमत का समर्थन पाकर और पेत्रोग्राद में होने वाले मज़दूरों और सैनिकों के सफल विद्रोह का समर्थन पाकर, कांग्रेस अपने हाथ में सत्ता लेती है।”

26 अक्टूबर (8 नवम्बर) 1917 की रात को, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस ने शान्ति सम्बन्धी आज्ञप्ति स्वीकार की। कांग्रेस ने युद्ध करने वाले देशों का आह्वान किया कि कम से कम तीन महीने के लिए सुलह कर लें, जिससे शान्ति की बातचीत की जा सके। कांग्रेस ने एक तरफ तो युद्ध करने वाले देशों की जनता और वहाँ की सरकारों से अपनी बात कही, दूसरी तरफ उसने ‘संसार के तीन प्रमुख राज्यों यानी ब्रिटेन, फ्रांसिस और जर्मनी के वर्ग-चेतन मज़दूरों से’ अपील की। उसने इन मज़दूरों से कहा कि वे ‘शान्ति के उद्देश्य को सफलता की मंज़िल तक ले जाने में और साथ ही सभी तरह की गुलामी और शोषण से मेहनतकश और शोषित जनता की मुक्ति के उद्देश्य को सफलता की मंज़िल तक ले जाने में’ मदद करें। उसी रात को, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस ने भूमि सम्बन्धी आज्ञप्ति स्वीकार की जिसमें कहा गया था : “भूमि पर ज़मींदारों की मिल्कियत बिना मुआवज़े के तुरन्त ख़त्म की जाती है।” खेती के इस कानून का आधार किसानों का एक निर्देश पत्र (नकाज, मैण्डेट) था, जो अलग-अलग जगहों के किसानों के 242 मैण्डेटों को मिलाकर बनाया गया था। इसके अनुसार, ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत हमेशा के लिए ख़त्म कर दी गयी और उसके बदले सार्वजनिक या राज्य की मिल्कियत कायम हुई। ज़मींदारों, ज़ार के परिवार और मठों की ज़मीन बिना पैसा दिये हुए सभी मेहनतकशों को इस्तेमाल के लिए देने का हुक्म हुआ।

इस आज्ञापत्र से, किसानों ने अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति से 15 करोड़ देस्यातिन (40 करोड़ एकड़ से ऊपर) ज़मीन पायी जो पहले ज़मींदारों, पूँजीपतियों, ज़ार के परिवार, मठों और गिरजाघरों के पास थी।

इसके अलावा, किसानों को उस लगान से मुक्त कर दिया गया जो वे ज़मींदारों को देते थे और जो सालाना 50 करोड़ स्वर्ण रूबल होता था।

खनिज पदार्थों के तमाम साधन (तेल, कोयला, धातुएँ, वग़ैरह), जंगल और जलाशय जनता की सम्पत्ति हो गये।

अन्त में, सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस ने पहली सोवियत सरकार बनायी – जनकमिसारों की समिति बनायी जिसमें सभी बोल्शेविक थे। जनकमिसारों की पहली समिति के पहले सभापति लेनिन चुने गये।

इससे सोवियतों की दूसरी ऐतिहासिक कांग्रेस का काम ख़त्म हुआ।

कांग्रेस के प्रतिनिधि इधर-उधर बिखर गये, जिससे कि पेत्रोग्राद में सोवियतों की जीत की ख़बर फैला दें और सोवियतों की सत्ता सारे देश में फैलाने का काम निश्चित करें। हर जगह सोवियतों के हाथ तुरन्त ही सत्ता नहीं आ गयी। जब पेत्रोग्राद में सोवियत सरकार बन चुकी थी, तब मास्को में कई दिन तक डटकर और घनघोर लड़ाई होती रही। सत्ता मास्को-सोवियत के हाथ में न जाये, इसके लिए क्रान्ति-विरोधी मेंशेविक और समाजवादी क्रान्तिकारी पार्टियों ने ग़द्दारों और कैडेटों से मिलकर मज़दूरों और सैनिकों के खिलाफ हथियारबन्द लड़ाई शुरू कर दी। बागि़यों को हराने और मास्को में सोवियतों की सत्ता कायम करने में कई दिन लग गये।

खुद पेत्रोग्राद में और उसके कई ज़िलों में क्रान्ति की जीत के शुरू के दिनों में ही सोवियत सत्ता को ख़त्म करने की क्रान्ति विरोधी कोशिशें की गयीं। 10 नवम्बर 1917 को, केरेन्स्की ने, जो विद्रोह के समय पेत्रोग्राद से उत्तरी मोर्चे को भाग गया था, कई कज्ज़ाक दस्ते इकट्ठा किये और जनरल क्रासनोव की कमान में उन्हें पेत्रोग्राद के खिलाफ भेजा। 11 नवम्बर 1917 को, एक क्रान्ति-विरोधी संगठन ने पेत्रोग्राद में कैडेटों से बग़ावत करायी। इस संगठन के नेता समाजवादी क्रान्तिकारी थे, और उसका नाम रखा था – “पितृभूमि और क्रान्ति के उद्धार की कमेटी”। लेकिन, बिना ज्यादा कठिनाई के बग़ावत दबा दी गयी। एक ही दिन में, 11 नवम्बर की शाम तक, जहाज़ियों और रेड गार्डों के दस्तों ने कैडेट-विद्रोह दबा दिया और 13 नवम्बर को जनरल क्रासनोव पुलकोवो पहाड़ियों के पास हरा दिया गया। लेनिन ने व्यक्तिगत रूप से सोवियत-विरोधी बग़ावत दबाने का संचालन किया, जैसे उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अक्टूबर विद्रोह का संचालन किया था। उनकी अटूट दृढ़ता और विजय में उनके शान्त विश्वास ने जनता को प्रेरित और संगठित किया। दुश्मन कुचल दिया गया। क्रासनोव गिरफ़्तार कर लिया गया और उसने `वचन दिया´ कि सोवियत सत्ता के खिलाफ लड़ाई बन्द कर देगा। और, `वचन देने पर´ वह छोड़ दिया गया। लेकिन जैसाकि आगे मालूम हुआ, जनरल ने अपना वचन तोड़ दिया। जहाँ तक केरेन्स्की का सम्बन्ध था, वह औरत का भेष बनाकर `किसी अज्ञात दिशा में ग़ायब´ हो गया।

फौज के जनरल हेडक्वार्टर पर, मोगीलेव में प्रधान सेनापति जनरल दुखोनिन ने भी बग़ावत करने की कोशिश की। जब सोवियत सरकार ने उसे हुक्म दिया कि जर्मन कमान से सुलह करने के लिए तुरन्त बातचीत चलाओ, तो उसने इन्कार कर दिया। इस पर, सोवियत सरकार के हुक्म से उसे हटा दिया गया। क्रान्ति विरोधी जनरल हेडक्वार्टर भंग कर दिया गया और खुद दुखोनिन को उसके खिलाफ विद्रोह करने वाले सैनिकों ने मार डाला। पार्टी के भीतर कुछ नामी-गिरामी अवसरवादियों – कामेनेव, ज़िनोवियेव, राइकोव, श्लीयापनीकोव, वग़ैरह – ने भी सोवियत सत्ता के खिलाफ धावा बोला। उन्होंने माँग की कि एक `संयुक्त समाजवादी सरकार´ बनायी जाये, जिसमें मेंशेविक और समाजवादी क्रान्तिकारी भी शामिल किये जायें जिन्हें अक्टूबर क्रान्ति ने अभी-अभी परास्त किया था। 15 नवम्बर 1917 को, बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें इन क्रान्ति-विरोधी पार्टियों के साथ समझौता करना नामंजूर कर दिया गया और कामेनेव तथा ज़िनोवियेव को क्रान्ति का हड़ताल-तोड़क कहा गया।

17 नवम्बर को, पार्टी की नीति से असहमत होते हुए कामेनेव, ज़िनोवियेव, राइकोव और मिल्यूतिन ने ऐलान किया कि वे केन्द्रीय समिति से इस्तीफा देते हैं। उसी दिन, 17 नवम्बर को, नोगिन ने अपनी तरफ से और जनकमिसार समिति के सदस्यों – राइकोव, वी. मिल्यूतिन, तियोदोरोविच, ए. श्लीयापनीकोव, डी. रियाज़ानोव, यूरेनेव और लारिन – की तरफ से ऐलान किया कि वे पार्टी की केन्द्रीय समिति की नीति से असहमत हैं और जनकमिसार समिति से इस्तीफा देते हैं। इन मुट्ठीभर ग़द्दारों के भाग खड़े होने से, अक्टूबर क्रान्ति के दुश्मनों के यहाँ खुशियाँ मनायी जाने लगीं। पूँजीपति और उनके पिट्ठू खुशी से फूलकर कहने लगे कि बोल्शेविज्म ख़त्म हो गया और बोल्शेविक पार्टी जल्द ही समाप्त होने वाली है। लेकिन इन मुट्ठीभर ग़द्दारों की वजह से, पार्टी एक क्षण के लिए भी विचलित न हुई। पार्टी की केन्द्रीय समिति ने घृणा के साथ उन्हें क्रान्ति से भाग खड़े होने वाला और पूँजीपतियों का साझीदार कहकर उनकी निन्दा की और अपने आगे के काम में लग गयी।

जहाँ तक `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों का सवाल था, वे किसान जनता पर अपना असर बनाये रखना चाहते थे। किसानों की हमदर्दी निश्चित रूप से बोल्शेविकों के साथ थी। इसलिए, `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों ने फैसला किया कि बोल्शेविकों से झगड़ा न करें और फिलहाल उनके साथ संयुक्त मोर्चा बनाये रहें। नवम्बर 1917 में, किसान सोवियतों की कांग्रेस हुई। उसने अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति से हासिल हुए सभी लाभ स्वीकार किये और सोवियत सरकार के आज्ञा-पत्रों का समर्थन किया। `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों के साथ एक समझौता हुआ और उनमें से कई को जनकमिसार समिति में जगहें दी गयीं (कोलेगायेव, स्प्रिदोनोवा, प्रोश्यान और स्टाइनबर्ग)। लेकिन, यह समझौता ब्रेस्ट-लिटोव्स्क की संधि होने और ग़रीब किसानों की कमेटियाँ बनने तक ही कायम रहा। उसके बाद किसानों में गहरी दरार पड़ी। `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारी अधिकाधिक कुलक हित ज़ाहिर करने लगे। उन्होंने बोल्शेविकों के खिलाफ बग़ावत की और सोवियत सत्ता ने उन्हें परास्त कर दिया।

अक्टूबर 1917 से फरवरी 1918 तक, देश के विशाल प्रदेशों में सोवियत क्रान्ति इतनी तेज़ी से फैली कि लेनिन ने उसे सोवियत सत्ता की `विजय-यात्रा´ कहा।

महान अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति विजयी हुई।

रूस में समाजवादी क्रान्ति की इस अपेक्षाकृत आसान विजय के कई कारण थे। नीचे लिखे हुए मुख्य कारण ध्यान देने योग्य हैं :

(1) अक्टूबर क्रान्ति का दुश्मन अपेक्षाकृत ऐसा कमज़ोर, ऐसा असंगठित और राजनीतिक रूप से ऐसा अनुभवहीन था जैसेकि रूसी पूँजीपति। रूसी पूँजीपति आर्थिक रूप से अब भी कमज़ोर थे और पूरी तरह सरकारी ठेकों पर निर्भर थे। उनमें राजनीतिक आत्मनिर्भरता और पहलकदमी इतनी न थी कि परिस्थिति से निकलने का रास्ता ढूँढ़ सकें। मसलन, बड़े पैमाने पर राजनीतिक गुटबन्दी और राजनीतिक दगाबाज़ी में उन्हें फ्रांसीसी पूँजीपतियों का-सा तजुर्बा न था, न अंग्रेज़ पूँजीपतियों की तरह, उन्होंने विशद रूप से सोचे हुए चतुर समझौते करने की शिक्षा पायी थी। हाल ही में, उन्होंने ज़ार से समझौता करने की कोशिश की थी। फरवरी क्रान्ति ने ज़ार का तख्ता उलट दिया था और सत्ता खुद पूँजीपतियों के हाथ में आ गयी थी लेकिन बुनियादी तौर से घृणित ज़ार की नीति पर ही चलने के सिवा उन्हें और कुछ न सूझ पड़ा। ज़ार की तरह, उन्होंने `विजय तक युद्ध करने´ का समर्थन किया, हालाँकि युद्ध चलाना देश की शक्ति से परे था और जनता तथा फौज दोनों युद्ध से बुरी तरह चूर हो चुके थे। ज़ार की तरह, कुल मिलाकर वे भी रियासती ज़मीन बनाये रखने के पक्ष में थे, हालाँकि ज़मीन की कमी और ज़मींदारों के जुवे के बोझ से किसान मर रहे थे। जहाँ तक उनकी मज़दूर नीति का सम्बन्ध था, वे मज़दूर वर्ग से नफरत करने में ज़ार के भी कान काट चुके थे। उन्होंने कारख़ानेदारों के जुवे को बनाये रखने और मज़बूत करने की ही कोशिश नहीं की, बल्कि उन्होंने बड़े पैमाने पर तालाबन्दी करके उसे असहनीय बना दिया।

कोई ताज्जुब नहीं कि जनता ने ज़ार की नीति और पूँजीपतियों की नीति में कोई बुनियादी भेद नहीं देखा, और जो घृणा उसके दिल में ज़ार के लिए थी वही पूँजीपतियों की अस्थायी सरकार के लिए हो गयी।

जब तक समाजवादी क्रान्तिकारी और मेंशेविक पार्टियों का थोड़ा बहुत असर जनता पर था, तब तक पूँजीपति उन्हें पर्दे की तरह इस्तेमाल कर सकते थे और अपनी सत्ता बनाये रख सकते थे। लेकिन, जब मेंशेविकों और समाजवादी क्रान्तिकारियों ने ज़ाहिर कर दिया कि वे साम्राज्यवादी पूँजीपतियों के दलाल हैं और इस तरह जनता में उन्होंने अपना असर खो दिया, तब पूँजीपतियों और उनकी अस्थायी सरकार का कोई मददगार न रहा।

(2) अक्टूबर क्रान्ति का नेतृत्व रूस के मज़दूर वर्ग जैसे क्रान्तिकारी वर्ग ने किया। यह ऐसा वर्ग था जो संघर्ष की आँच में तप चुका था, जो थोड़ी ही अवधि में दो क्रान्तियों से गुज़र चुका था और जो तीसरी क्रान्ति के शुरू होने से पहले शान्ति, ज़मीन, स्वाधीनता और समाजवाद के लिए संघर्ष में जनता का नायक माना जा चुका था। अगर क्रान्ति का नेता रूस के मज़दूर वर्ग जैसा न होता, ऐसा नेता जिसने जनता का विश्वास पा लिया था, तो मज़दूरों और किसानों की मैत्री न होती और इस तरह की मैत्री के बिना अक्टूबर क्रान्ति की विजय असम्भव होती।

(3) रूस के मज़दूर वर्ग को क्रान्ति में ग़रीब किसानों जैसा समर्थ साथी मिला, जो किसान जनता का भारी बहुसंख्यक भाग था। जहाँ तक आम मेहनतकश किसानों का सवाल था, क्रान्ति के आठ महीनों का तजुर्बा बेकार नहीं गया। इस तजुर्बे की तुलना `साधारण´ विकास के बीसियों सालों के तजुर्बे से निस्सन्देह की जा सकती है। इन दिनों, उन्हें मौका मिला कि वे अमल में रूस की तमाम पार्टियों को परख लें और अपनी दिलजमई कर लें कि न तो कान्स्टीट्यूशनल डेमोक्रेट और न समाजवादी क्रान्तिकारी या मेंशेविक ही ज़मींदारों से कोई गम्भीर झगड़ा मोल लेंगे, या किसानों के हित के लिए अपना बलिदान करेंगे, कि रूस में एक ही पार्टी है – बोल्शेविक पार्टी – जिसका ज़मींदारों से कोई सम्बन्ध नहीं है और जो उन्हें किसानों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए कुचलने को तैयार है। सर्वहारा और ग़रीब किसानों की मैत्री का यह दृढ़ आधार था। मज़दूर वर्ग और ग़रीब किसानों की इस मैत्री के कायम होने से, मध्यम किसानों की गति निश्चित हो गयी। ये मध्यम किसान बहुत दिन तक ढुलमुल रहे थे और अक्टूबर विद्रोह के शुरू होने से पहले ही पूरी तरह क्रान्ति की तरफ आये थे और उन्होंने ग़रीब किसानों से नाता जोड़ा था।

कहना न होगा कि इस मैत्री के बिना अक्टूबर क्रान्ति विजयी न होती।

(4) मज़दूर वर्ग का नेतृत्व राजनीतिक संघर्षों में तपी और परखी हुई बोल्शेविक पार्टी जैसी पार्टी ने किया था। बोल्शेविक पार्टी इतनी साहसी पार्टी थी कि निर्णायक हमले में जनता का नेतृत्व कर सके। वह इतनी सावधान पार्टी थी कि मंज़िल की तरफ जाने के रास्ते में ढँकी-मुँदी खाई-खन्दकों से बचकर निकल सके। ऐसी ही पार्टी विभिन्न क्रान्तिकारी आन्दोलनों को चतुराई से एक ही सामान्य क्रान्तिकारी धारा में मिला सकती थी। शान्ति के लिए आम जनवादी आन्दोलन, जातीय स्वाधीनता और जातीय समानता के लिए पीड़ित जातियों का आन्दोलन और पूँजीपतियों का तख्ता उलटने के लिए और सर्वहारा अधिनायकत्व कायम करने के लिए सर्वहारा वर्ग का समाजवादी आन्दोलन – इन सबको ऐसी ही पार्टी एक सामान्य क्रान्तिकारी धारा में मिला सकती थी।

इसमें सन्देह नहीं कि इन विभिन्न क्रान्तिकारी धाराओं के एक ही सामान्य शक्तिशाली क्रान्तिकारी धारा में मिलने ने रूस में पूँजीवाद की तकदीर का फैसला कर दिया।

(5) अक्टूबर क्रान्ति ऐसे समय आरम्भ हुई जबकि साम्राज्यवादी युद्ध अभी ज़ोरों पर था, जबकि प्रमुख पूँजीवादी राज्य दो विरोधी खेमों में बँटे हुए थे और जब परस्पर युद्ध में फँसे रहने और एक-दूसरे की जड़ें काटने में लगे रहने से, वे `रूसी मामलों´ में सफलता से दख़ल न दे सकते थे और सक्रिय रूप से अक्टूबर क्रान्ति का विरोध न कर सकते थे। निस्सन्देह, अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति की जीत में इस बात से बहुत मदद मिली।

(`बिगुल´, फरवरी 1998 और मार्च-अप्रैल ´98 में धारावाहिक प्रकाशित)

बुझी नहीं है अक्टूबर क्रांति की मशाल – पीडीऍफ़

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अक्टूबर क्रान्ति की मशाल बुझी नहीं है! बुझ नहीं सकती!

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अक्टूबर क्रांति की ९२वीँ वर्षगांठ पर

अब से ठीक 79 वर्ष पहले, 1917 में (पुराने कैलेण्डर के अनुसार अक्टूबर में और नये कैलेण्डर के अनुसार नवम्बर में) मेहनतकश अवाम ने, क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग की अगुवाई में, रूस में पहली बार पूँजीपतियों और सभी सम्पत्तिवान लुटेरों की राज्यसत्ता को बलपूर्वक उखाड़ फेंका था और पहली बार महान लेनिन और उनकी बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सर्वहारा राज्यसत्ता की – सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की स्थापना की थी।

मानव समाज के वर्गों में बँटने के बाद के हज़ारों वर्षों के इतिहास में यह पहली ऐसी क्रान्ति थी जिसमें राज्यसत्ता एक शोषक वर्ग से दूसरे, नये शोषक वर्ग के हाथ में नहीं बल्कि मेहनतकश शोषित-उत्पीड़ित जनता के हाथों में गयी थी। इतिहास की पहली सचेतन संगठित क्रान्ति जिसने पहली बार उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व का नाश कर दिया और समता के साथ तरक्की की रफ्त़ार का नया रिकार्ड कायम किया |

दबे-कुचले लोगों ने पूरे मानव इतिहास में बग़ावतें तो अनगिनत बार की थीं लेकिन पेरिस कम्यून (1871 में पेरिस के मज़दूरों द्वारा सम्पन्न क्रान्ति और पहली सर्वहारा सत्ता की स्थापना, जिसे 72 दिनों बाद फ्रांसीसी पूँजीपतियों ने पूरे यूरोप के प्रतिक्रियावादियों की मदद से कुचल दिया) की शुरुआती कोशिश के बाद, अक्टूबर क्रान्ति मेहनतकश वर्गों की पहली योजनाबद्ध, सचेतन तौर पर संगठित क्रान्ति थी जिसके पीछे एक दर्शन था, एक विचारधारा थी, एक कार्यक्रम था, एक युद्धनीति थी और एक ऐसे रास्ते की रूपरेखा भी थी जिससे होकर आगे बढ़ते हुए एक नये समाज की रचना करनी थी।

निजी सम्पत्ति और वर्ग-शोषण के अस्तित्व में आने के लगभग चार हज़ार वर्षों बाद पहली बार मेहनतकशों की सोवियत सत्ता ने अब तक असम्भव और महज़ किताबी माने जाने वाली बात को सम्भव बनाकर वास्तविकता की ज़मीन पर उतार दिया। लेनिन और फिर स्तालिन के नेतृत्व वाली सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में स्थापित सर्वहारा सत्ता – सर्वहारा अधिनायकत्व ने अब तक सम्पत्ति का अपहरण करने वालों की ही सम्पत्ति का अपहरण कर लिया और फिर ज्ञात इतिहास में पहली बार उत्पादन के साधनों – यानी कल-कारख़ानों, खेतों, संचार-यातायात के साधनों आदि पर निजी स्वामित्व का ख़ात्मा कर दिया गया। इस सोच को ग़लत ही नहीं बल्कि उल्टा साबित कर दिया गया कि खेतों और कारख़ानों पर निजी मालिकाने के बिना समाज का कामकाज चल ही नहीं सकता। कामकाज चला ही नहीं बल्कि दौड़ा, और अद्भुत, चमत्कारी रफ़्तार से दौड़ा! उत्पादन और भौतिक प्रगति के सभी पुराने रिकॉर्ड टूट गये और मानदण्ड छोटे पड़ गये!

आज दुनियाभर का पूँजीवादी प्रेस समाजवाद पर चाहे जितना कीचड़ उछाल ले, तमाम झूठ-फरेब के बावजूद इस सच्चाई को उसे आज से पचास वर्षों पहले ही स्वीकारने के लिए मजबूर होना पड़ा था कि 1917 के बाद सोवियत संघ में वैज्ञानिक-मशीनी तरक्की और आम मेहनतकशों की चेतना, हुनर, शिक्षा, संस्कृति वग़ैरह की तरक्की की रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि जो चीज़ें हासिल करने में पश्चिमी यूरोप के देशों को करीब दो सौ वर्षों का समय लगा वह उसने सिर्फ 20-25 वर्षों में हासिल कर लिया। फ्रांसीसी क्रान्ति और इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति के बाद पश्चिमी दुनिया में जो भी तरक्की पूँजीवादी रास्ते से हासिल हुई थी, उसके साथ ही धनी-ग़रीब के बीच की खाई भी तेज़ रफ़्तार से बढ़ती चली गयी थी और पूँजीपतियों के जनवाद की यह असलियत सामने आती चली गयी थी कि वह धनिकों के बीच की स्वतन्त्रता , समानता, भ्रातृत्व है जबकि ग़रीबों-मेहनतकशों के ऊपर तानाशाही है। यह स्वाभाविक था, क्योंकि पश्चिम में सारी तरक्की जनता की खुशहाली और न्याय के लिए नहीं बल्कि नयी-नयी मशीनों द्वारा मेहनतकशों को निचोड़कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए पूँजीपतियों में लगी होड़ का नतीजा थी। दूसरी ओर सोवियत संघ में निजी मालिकाने के बलपूर्वक ख़ात्मे के बाद मुनाफाख़ोरी और लूट के मूल एवं मुख्य आधार को ख़त्म करके मेहनतकश जनता की राज्यसत्ता ने आम लोगों को पहली बार अपनी तरक्की के लिए उत्पादन का अवसर दिया तथा साथ ही सांस्कृतिक-शैक्षिक तरक्की और ज़िन्दगी की हर तरह की बेहतरी के लिए भी खुद अपनी पहल पर काम करने का मौका दिया। इसी का नतीजा था कि समाजवादी विकास ने जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने और पूरे सोवियत संघ को उन्नत औद्योगिक देशों की कतार में ला खड़ा करने के साथ ही समाज में ज्यादा से ज्यादा समानता स्थापित की और हज़ारों वर्षों से कायम विशेषाधिकारों, भौतिक-सांस्कृतिक अन्तरों और उनकी ज़मीन के मौजूद रहने के बावजूद पूँजीपतियों, भूस्वामियों, नौकरशाहों, सट्टेबाज़ों, व्यापारियों आदि सभी तरह के परोपजीवी वर्गों के प्रत्यक्ष शोषण को दो दशकों के भीतर ही समाप्त कर दिया। समाजवाद के रास्ते ने उद्योगों और खेतीबाड़ी की अभूतपूर्व तरक्की के साथ ही नि:शुल्क एवं समान शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि सुविधाओं को सर्वसुलभ बना दिया तथा बेरोज़गारी का पूरी तरह ख़ात्मा कर दिया। ग़ौरतलब बात यह है कि उद्योगों पर समूची जनता का मालिकाना स्थापित करके (यानी मेहनतकशों की राज्यसत्ता के अन्तर्गत राष्ट्रीकरण करके) और खेती का सामूहिकीकरण करके (यानी खेतों में काम करने वाले सभी किसानों के सामूहिक मालिकाने वाले बड़े फार्म स्थापित करके) सोवियत संघ ने ऊपर गिनायी गयीं उपलब्धियां उस समय हासिल कीं जब पूरी पूँजीवादी दुनिया महामन्दी (1930-40 के बीच) के भँवरों में पछाड़ खा रही थी।

स्तालिन के भूत से आज भी क्यों डरते हैं पूंजीपति और क्यों उन्हें आज भी गाली देते हैं उनके भाड़े के टट्टू ?

समाजवाद के महान निर्माता स्तालिन के बारे में आज पूँजीवादी अख़बारों के दो कौड़ी के भाड़े के टट्टू भी तरह-तरह के झूठ गढ़ रहे हैं। हम उन्हें सिर्फ याद दिलाना चाहते हैं कि कभी पूँजीवादी दुनिया के एच.जी. वेल्स, रोम्याँ रोलाँ, बर्नार्ड शॉ, बर्ट्रेड रसेल, चार्ली चैपलिन आदि और भारत के लाला लाजपत राय, गणेश शंकर विद्यार्थी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, नेहरू, प्रेमचन्द आदि जैसे महापुरुषों ने भी स्तालिन और सोवियत संघ की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि साम्राज्यवादी कुत्तों की गलाकाटू होड़ ने जब दूसरे महायुद्ध को और फासिस्ट-नात्सी भस्मासुरों को जन्म दिया तो हिटलर की सिर्फ 54 डिवीज़नों ने लगभग पूरे यूरोप को रौंदकर विश्वविजय का ख़तरा पैदा कर दिया था। उस समय उसकी 200 डिवीज़नों का मुकाबला करते हुए सोवियत जनता और लाल सेना ने हिटलर की पूरी सत्ता को ही तबाह कर डाला था। इसमें दो करोड़ सोवियत जनता ने अपनी बेमिसाल कुर्बानी स्तालिन की बहुप्रचारित ‘तानाशाही’ के डर से नहीं बल्कि समाजवाद और विश्व मानवता की हिफाज़त के लिए दी थी। उस समय तो रूज़वेल्ट, चर्चिल और दगॉल भी स्तालिन की बड़ाई कर रहे थे और पीछे-पीछे चल रहे थे तथा पश्चिमी अख़बार उन्हें ‘चाचा स्तालिन’ (`अंकल जो´) कह रहे थे, पर विश्वयुद्ध समाप्त होते ही स्तालिन को फिर तानाशाह कहा जाने लगा और सोवियत संघ नामक ‘शैतानी राज्य’ को तबाह कर दिये जाने का आह्वान किया जाने लगा। यह है पूँजीवाद का दोगलापन, जो स्वयंसिद्ध है।

पर दुनिया के पूँजीवादी इतिहासकार आज भी इस तथ्य से इन्कार नहीं कर पाते कि अक्टूबर क्रान्ति के तोपों के धमाकों ने दुनियाभर के मेहनतकशों को पूँजी की सत्ता के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा देने के साथ ही एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका की जनता के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों को भी ज़बरदस्त उछाल देने का काम किया। सोवियत संघ लगातार औपनिवेशिक गुलामी के विरुद्ध लड़ने वाले क्रान्तिकारियों को और आम जनता को प्रेरणा देता रहा और यथासम्भव मदद भी। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में भी सर्वहारा सत्ताएँ स्थापित हुई और चीन में माओ और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई नयी जनवादी क्रान्ति ने अक्टूबर क्रान्ति के बाद एक और, नया मील का पत्थर कायम किया। शक्तिशाली समाजवादी खेमे की मौजूदगी ने एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिकी देशों की जनता पर कायम औपनिवेशिक और नवऔपनिवेशिक शिकंजे को ढीला करने में भी अहम भूमिका निभायी।

पर इतिहास कभी भी सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ता। यह आती-जाती लहरों के रूप में, ज्वार और भाटे के रूप में आगे बढ़ता है, सर्पिल रास्तों से होकर, अनेकों मोड़ों और घुमावों से होकर आगे बढ़ता है।

समाजवाद की फिलहाली हार के बुनियादी कारण क्या हैं ?

यह जानना बेहद जरू़री है!

समाजवादी समाज पूरी तरह वर्गविहीन, शोषणविहीन समाज नहीं होता, बल्कि इसकी शुरुआती अवस्था होता है। वह पूँजीवाद और कम्युनिज्म के बीच का ‘वर्ग समाज और वर्गविहीन समाज’ के बीच का काल होता है( कम्युनिज्म की सिर्फ प्रथम अवस्था होता है। मेहनतकश वर्ग इस दौरान बलपूर्वक सम्पत्तिवान, परजीवी वर्गों पर शासन कायम करके उत्पादन के साधनों पर से उनका स्वामित्व छीन लेता है( पर ये पुराने शोषक-शासक अपनी उसी लुटेरी मानसिकता और अपने ‘खोये हुए स्वर्ग’ को फिर से पाने की चाहत के साथ समाज में मौजूद होते हैं। इसके साथ ही छोटे पैमाने पर (गाँव के मँझोले व छोटे किसानों, छोटे उद्यमियों-कारोबारियों आदि के बीच) पूँजीवादी किस्म का उत्पादन समाजवाद के शुरुआती समयों में लम्बी अवधि तक मौजूद रहता है, निजी स्वामित्व छोटे पैमाने पर मौजूद रहता है और आम जनता के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के भीतर धनी बनने की और मुनाफा कमाने की पुरानी बीमारी भी मौजूद रहती है। यह छोटे पैमाने का पूँजीवादी उत्पादन नये-नये पूँजीवादी तत्त्वों और मानसिकता को समाजवाद के भीतर नये सिरे से पैदा भी करता रहता है। इसके अलावा समाजवादी समाज में भी शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम करने वालों के बीच, कारख़ानों में काम करने वाले और खेतों में काम करने वालों के बीच तथा गाँव में रहने वालों और शहर में रहने वालों के बीच का अन्तर भी मौजूद रहता है। इसके अतिरिक्त, समाजवाद के बहुत आगे की मंज़िलों में ही यह सम्भव हो सकता है कि लोग क्षमता मुताबिक काम करते हैं और ज़रूरत मुताबिक पाते हैं। शुरू में तो लम्बे समय तक यही हो सकता है कि लोग जितना श्रम करें उसी के हिसाब से उन्हें मजदूरी मिले। अब चूँकि लोगों की श्रम करने की प्राकृतिक क्षमता एक नहीं होती, इस कारण से भी समाजवाद के शुरुआती लम्बे समय में असमानता पैदा होने का एक आधार मौजूद रहता है। कुल मतलब यह कि उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज का मालिकाना कायम करना शोषण और असमानता के ख़ात्मे का सबसे ज़रूरी पहला कदम है, पर यही सब कुछ नहीं। इसके बाद भी समाज में असमानता और पूँजीवाद के उतने किस्म के उत्पादन केन्द्र और पालन-पोषण केन्द्र मौजूद रहते हैं, जो ऊपर गिनाये गये हैं। इन्हीं कारणों से समाजवादी समाज के भीतर भी नये किस्म के पूँजीवादी तत्त्व मज़बूत होते जाते हैं और समय रहते इन खरपतवारों को नष्ट करके ज़मीन की अच्छी तरह निराई-गुड़ाई और कीटनाशकों का छिड़काव न किया जाये तो यह समाजवाद की पूरी फसल तबाह कर डालते हैं। ये नये पूँजीवादी तत्त्व कम्युनिस्ट पार्टी और सर्वहारा राज्यसत्ता पर काबिज़ हो जाते हैं और पूँजीवाद की पुनर्स्थापना हो जाती है।

1953 में स्तालिन की मृत्यु के बाद सोवियत संघ में यही हुआ। ख्रुश्चेव के नेतृत्व में वहाँ एक नये किस्म का पूँजीवाद बहाल हो गया -‘समाजवादी’ मुखौटे और नकली लाल झण्डे वाला, सरकारी या राजकीय पूँजीवाद – बहुत कुछ हमारे देश के `पब्लिक सेक्टर´ जैसा! 1990 में यह मुखौटा भी गिर गया और महान अक्टूबर क्रान्ति के देश में एक बार फिर खुला पूँजीवाद बहाल हो गया।

सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति ने दिखलायी नयी राह!

दरअसल स्तालिन भी समाजवाद के भीतर मौजूद और नये सिरे से पनपने वाले बुर्जुआ तत्त्वों को पहचान नहीं सके, उनके द्वारा समाजवाद की हार के ख़तरे को देख नहीं सके और उनके विरुद्ध सतत क्रान्ति चलाते हुए कम्युनिज्म की दिशा में आगे बढ़ने की राह नहीं निकाल सके। इस दिशा में लेनिन ने सोचना ज़रूर शुरू किया था, पर वक्त ने उन्हें मौका नहीं दिया और 1924 में उनका निधन हो गया। स्तालिन की ग़लतियों ओर चीन के समाजवादी प्रयोगों से सबक लेकर माओ त्से-तुङ ने इस महान काम को अंजाम दिया और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का वह प्रयोग किया जो विश्व सर्वहारा क्रान्ति के डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में पेरिस कम्यून और अक्टूबर क्रान्ति के बाद कायम तीसरा कीर्ति स्तम्भ है। हालाँकि चीन में भी माओ की मृत्यु के बाद पूँजीवादी तत्त्व सत्ता पर काबिज़ हो गये और पूँजीवाद की पुनर्स्थापना हो गयी, पर इससे सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का महत्त्व कम नहीं होता क्योंकि पहली बार इस महान क्रान्ति ने पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने, पूँजीवादी तत्त्वों को लगातार कमज़ोर करते जाने और वर्गविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ते जाने की ठोस, स्पष्ट राह बतलायी थी।

मेहनतकश अवाम अगर इतिहास से शिक्षा लेकर क्रान्ति के विज्ञान की समझ नहीं हासिल करेगा तो पूँजीपाति वर्ग और उसके भोंपुओं के भ्रामक प्रचारों से मुक्त नहीं हो पायेगा और यह मानता रहेगा कि समाजवाद की हार हो गयी है, वह असफल सिद्ध हो गयी। पूँजीवादी समाज की विपत्तियों से तंग, परेशान-बदहाल होकर वह समय-समय पर विद्रोह भी करता रहेगा, लेकिन समाजवाद की अन्तिम जीत में विश्वास और क्रान्ति के विज्ञान की समझ के अभाव में वह कभी भी पूँजीवाद का नाश नहीं कर सकेगा क्योंकि पूँजीवाद का एकमात्र विकल्प समाजवाद ही है।

अमर नहीं है पूँजीवाद! इसे मरना ही है!

हमें इस बात को अच्छी तरह से समझना होगा कि अतीत में भी क्रान्तियों के शुरुआती संस्करण असफल होते रहे हैं। सात-आठ सौ वर्षों तक कई दास विद्रोह कुचल दिये गये, तब कहीं जाकर दास प्रथा के युग का पूरी दुनिया से ख़ात्मा हो सका था। सामन्तवर्ग से संघर्ष करते हुए निर्णायक विजय हासिल करने में और पूँजीवादी सामाजिक ढाँचे का निर्माण करने में पूँजीपति वर्ग को तकरीबन चार सौ वर्षों का समय लग गया। फिर इसमें निराश या भग्नहृदय होने की भला क्या बात हो सकती है कि समाजवादी क्रान्ति फिलहाल कुछ समय के लिए सदियों से जड़ जमाये पूँजीवाद से हार गयी है और सर्वहारा वर्ग को फ़ौरी तौर पर पीछे हट जाना पड़ा है! और फिर हमें यह भी तो याद रखना होगा कि समाजवादी क्रान्ति मानव इतिहास की सर्वाधिक व्यापक, गहरी और बुनियादी क्रान्ति है, क्योंकि पहले की सभी क्रान्तियों ने एक पुरानी पड़ चुकी शोषण की व्यवस्था की जगह एक नये प्रकार की शोषण की व्यवस्था की स्थापना की जबकि समाजवादी क्रान्ति का लक्ष्य सभी वर्ग व्यवस्थाओं का, हर तरह के शोषण का और हर तरह की असमानता का नाश करना है। राज्यसत्ता पर सर्वहारा वर्ग के काबिज़ होने के बाद लम्बे समय के संघर्ष में ही यह सम्भव हो सकता है और इस लम्बे संक्रमण काल के दौरान एक से अधिक बार सर्वहारा वर्ग को हार का सामना भी करना पड़ सकता है।

हमें यह बात ठीक से समझ लेनी होगी कि प्रकृति और समाज की कोई भी चीज़, कोई भी ऐतिहासिक युग और कोई भी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था अमर नहीं होती। पूँजीवाद भी अजर-अमर नहीं है। दास प्रथा और सामन्त प्रथा की तरह पूँजी की उजरती गुलामी की प्रथा भी आज मानव समाज के पैरों की बेड़ी बन चुकी है जो उसको आगे नहीं बढ़ने दे रही है। अत:, निश्चित ही, मानवता इन बेड़ियों को तोड़ फेंकेगी। समूचे विश्व पूँजीवाद और इसके शीर्ष पर आसीन साम्राज्यवादी देशों तक की अर्थव्यवस्था आज एक लम्बी मन्दी और ठहराव के ऐसे ढाँचागत संकट से ग्रस्त है जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था। हालात बताते हैं कि इसकी मृत्यु अब सुदूर भविष्य की बात नहीं है। तब तक यह केवल घिसट-घिसटकर साँसें गिन सकता है जब तक कि मेहनतकश अवाम फिर से संगठित होकर इसके नाश की लड़ाई न छेड़ दे। हालाँकि पूरी दुनिया में अभी क्रान्ति की लहर पर प्रतिक्रान्ति की लहर हावी है, पर दुनिया के अलग-अलग कोनों से एक नये उभार के पूर्वसंकेत मिलने शुरू हो चुके हैं। रूस, भूतपूर्व सोवियत संघ के दूसरे घटक देशों में, और पूर्वी यूरोप के देशों में मेहनतकश जनता ने नकली समाजवाद का गन्दा चेहरा तो पहले ही देख लिया था, अब वह पश्चिमी दुनिया के ‘स्वर्ग’ की असलियत भी जान चुकी है। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था के साथ मिलते ही इन देशों की कमज़ोर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था गम्भीर संकट के भँवर में जा फँसी है तथा बेरोज़गारी, महँगाई, अभाव और भ्रष्टाचार की मार झेलती और मुट्ठीभर लोगों के धनी होने की कीमत अपनी कंगाली से चुकाती जनता एक बार फिर सड़कों पर उतर चुकी है। उसके एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के हाथ में आज लेनिन और स्तालिन के पोस्टर और लाल परचम हैं और लबों पर सच्चे समाजवाद की बहाली के नारे हैं। वहाँ कई क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट संगठन नयी अक्टूबर क्रान्ति की रणनीति पर बहसें चला रहे हैं और पश्चिम के पूँजीवादी अख़बार भी इन देशों में ‘बोल्शेविक पुनरुत्थान’ की ख़बरें छाप रहे हैं। माओ के देश की जनता भी सोई नहीं है। वहाँ देङ सियाओ-पिङ के ‘बाज़ार समाजवाद’ नामधारी पूँजीवाद के खिलाफ किसानों ओर युवाओं की बग़ावतें हो रही हैं और बदनाम करने की तमाम कोशिशों के बावजूद जनता महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दिनों को याद कर रही है!

ज़ाहिर है कि सन्नाटा टूटने लगा है।

मिट्टी में दबे अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के बीज अंकुरित होने लगे हैं।

लातिन अमेरिकी देशों में किसानों-मज़दूरों के आन्दोलन और छापामार संघर्षों का नया सिलसिला शुरू हो चुका है। और अब एशिया भी जग रहा है। इण्डोनेशिया के ताज़ा जन-उभार से हुई शुरुआत की आहटें भारतीय उपमहाद्वीप तक में सुनायी पड़ रही हैं। भारत की जनता भी सोई नहीं रह सकती। नयी आर्थिक नीतियों के अमल ने साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की लूट और लगातार बढ़ती महँगाई-बेरोज़गारी-असमानता और भ्रष्टाचार को जिन आखिरी हदों तक पहुँचा दिया है, वहाँ पहुँचना एक जागते ज्वालामुखी के दहाने पर पहुँचने के समान है।

ज़ाहिरा तौर पर, भारतीय मेहनतकश अवाम को भी अपना ऐतिहासिक मिशन पूरा करने के लिए आगे कदम बढ़ाना होगा। यह पूरी दुनिया की तरह भारत में भी एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और नये सर्वहारा ज्ञानोदय का दौर है। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के इस नये दौर में भारतीय सर्वहारा वर्ग और मेहनतकश जनता को साम्राज्यवाद और उसके जूनियर पार्टनर बने भारतीय पूँजीपति वर्ग की राज्यसत्ता को उखाड़कर पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली को ही नष्ट कर देना है तथा राज्यसत्ता उत्पादन और समाज के पूरे तन्त्र पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेना है। यही क्रान्तिकारी लोक स्वराज्य के नारे का मतलब है। यही है भारत की नयी समाजवादी क्रान्ति जो आज की नयी परिस्थितियों के अनुरूप अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति का एक नया संस्करण है। भारत के मेहनतकशों को अक्टूबर क्रान्ति के दिखाये मार्ग पर आगे बढ़ना होगा, नये सिरे से अपनी नयी, नये ढंग की इंकलाबी पार्टी बनानी होगी और अपने देश की ज़मीन पर मौलिक ढंग से अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण की आधारशिला स्थापित करनी होगी।

इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि हम दुनिया की पहली समाजवादी क्रान्ति के प्रयोग के सारतत्त्व को, उसके निचोड़ को, उसकी सबसे बुनियादी शिक्षाओं को गाँठ बाँध लें। वे क्या हैं ?

अक्टबूर क्रान्ति की सबसे बुनियादी शिक्षाएँ

1. सर्वहारा क्रान्ति की सबसे पहली ज़रूरत है सर्वहारा वर्ग की, पूरे देश के स्तर पर संगठित एक क्रान्तिकारी पार्टी। यह क्रान्तिकारी पार्टी लेनिन के मार्गदर्शन में निर्मित बोल्शेविक पार्टी की तरह संघर्षों की आग में तपकर इस्पात बनी हो, पूँजीवाद की सशस्त्र सेना-पुलिस से लैस राज्यसत्ता से लोहा लेने में सक्षम हो (न कि महज़ चुनावबाज़ी और ट्रेडयूनियनबाज़ी का धन्धा करती हो), औद्योगिक सर्वहारा और ग्रामीण सर्वहारा में ही नहीं बल्कि बहुसंख्यक ग़रीब व परेशानहाल मँझोले किसानों में भी इसकी गहरी पैठ हो और यह अपने देश की परिस्थितियों की समझ के आधार पर क्रान्ति का कार्यक्रम और रास्ता तय करने में सक्षम हो, तभी यह अक्टूबर क्रान्ति का नया संस्करण तैयार कर सकती है।

2. जब हम अक्टूबर क्रान्ति के पहले के रूस में करीब बीस वर्षों तक जारी, ऐसी पार्टी के निर्माण और गठन की प्रक्रिया पर निगाह डालते हैं तो यह सच्चाई दिन की रोशनी की तरह साफ हो जाती है कि कठिन विचारधारात्मक संघर्ष, अटल विचारधारात्मक दृढ़ता और गहरी विचारधारात्मक समझ के बिना कोई सच्ची सर्वहारा पार्टी क्रान्ति करना तो दूर, गठित ही नहीं हो सकती और यदि गठित हो भी गयी तो जल्दी ही बिखर जायेगी। लेनिन और उनके साथी बोल्शेविकों ने एकदम अलग-थलग पड़ जाने का ख़तरा मोल लेते हुए भी विचारधारा के प्रश्न पर कोई समझौता नहीं किया और मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी विचारधारा में किसी भी तरह की मिलावट की मेंशेविकों और कार्ल काउत्स्की के चेलों की साज़िशों को एकदम से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने पार्टी को कभी भी चवन्निया मेम्बरी वाली महज़ चुनावबाज़, यूनियनबाज़, धन्धेबाज़ संगठन नहीं बनने दिया। दाँवपेंच के रूप में लेनिन की पार्टी ने पूँजीवादी चुनावों और संसद का भी इस्तेमाल किया और ट्रेडयूनियनों में काम करते हुए आर्थिक संघर्ष भी लगातार चलाये तथा जनता को जगाने के लिए विभिन्न प्रकार की राजनीतिक सुधारपरक कार्रवाइयाँ भी कीं, पर पार्टी ने इस बात को कभी नहीं भुलाया कि बिना बल-प्रयोग और हिंसा के, महज़ चुनावों के ज़रिये शोषक वर्गों से सत्ता छीनी नहीं जा सकती। वे पूँजीवादी राज्यसत्ता की सैन्य शक्ति और दमनतन्त्र को उखाड़ फेंकने के लिए क्रान्तिकारी तैयारी लगातार करते रहे और एक बार फिर अक्टूबर क्रान्ति ने इस बात को सही साबित किया कि शोषक वर्ग कभी भी समझाने-बुझाने या अल्पमत-बहुमत से सत्ता नहीं सौंप सकते। अक्टूबर क्रान्ति की इस शिक्षा को याद रखने का मतलब यह है कि भारत का सर्वहारा वर्ग भी भा.क.पा., मा.क.पा., भा.क.पा. मा-ले (लिबरेशन ग्रुप) और ऐसे तमाम सुधारवादी, अर्थवादी, पूँजीवादी संसदवादी कम्युनिस्ट संगठनों के भ्रमजाल से बाहर आकर कम्युनिज्म के सही क्रान्तिकारी चरित्र को पहचाने। ये सभी मदारी मेंशेविकों और काउत्स्कीपंथियों के उन सिद्धान्तों को ही नये लेबल लगाकर पेश करते हें जिनके खिलाफ लगातार लड़कर बोल्शेविक पार्टी ने विचारधारात्मक दृढ़ता हासिल की और तभी जाकर अक्टूबर क्रान्ति विजयी हो सकी।

3. साथ ही, अक्टूबर क्रान्ति और उसके नेता लेनिन की यह भी शिक्षा है कि क्रान्ति मुट्ठीभर समझदार और बहादुर क्रान्तिकारी नहीं, बल्कि व्यापक मेहनतकश जनता करती है। बहादुर और समझदार क्रान्तिकारी उस मेहनतकश जनता के हरावल दस्ता होते हैं जो जनता के रोज़मर्रा की छोटी-छोटी लड़ाइयों में हिस्सा लेते हुए, ट्रेडयूनियनों (बुर्जुआ और प्रतिक्रियावादी ट्रेडयूनियनों में भी) भागीदारी करके आर्थिक माँगों पर और साथ ही राजनीतिक माँगों पर भी लड़ते हुए, सम्भव होने पर रणकौशल के तौर पर पूँजीवादी चुनाव और संसद में भी भागीदारी करते हुए जनता की राजनीतिक चेतना का ज्यादा से ज्यादा क्रान्तिकारीकरण करते हैं और उसे शासक वर्गों के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार करते हैं। अर्थवाद और संसदवाद के विरोध के नाम पर इन सभी रूपों-रणकौशलों को छोड़कर किसी भी रूप में महज़ हथियारबन्द कार्रवाइयों पर ज़ोर देना वामपन्थी दुस्साहसवाद, या ‘अतिवामपन्थ’ का मध्यमवर्गीय भटकाव है जिसका फायदा अन्ततोगत्वा भाकपा-माकपा ब्राण्ड नकली कम्युनिस्टों और पूँजीवादी सत्ता को ही मिलता है।

4. अक्टूबर क्रान्ति का निचोड़ निकालते हुए लेनिन ने सैकड़ों बार विचारधारात्मक दृढ़ता को स्पष्ट किया था और कहा था कि वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को कभी न भूलो। इनको भूलने का मतलब ही है पूँजीवादी जनवाद और शान्तिपूर्ण संक्रमण के भ्रमजालों में जा फँसना और क्रान्ति के मार्ग को भूल जाना। हालात में चाहे जो भी बदलाव आ जाये, यदि पूँजीवाद पूँजीवाद है तो इसका अर्थ है कि राज्यसत्ता पूँजीपति वर्ग के हाथों में है, जिसे सिर्फ बलपूर्वक ही उखाड़ा जा सकता है और शोषक वर्गों को तब तक बलपूर्वक दबाये रखना पड़ेगा जब तक कि वर्ग के रूप में उनका अस्तित्व कायम रहेगा। आगे चलकर अक्टूबर क्रान्ति की इस शिक्षा को माओ ने महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान पुष्ट करने के साथ ही आगे विकसित किया और बताया कि सर्वहारा वर्ग राज्यसत्ता पर काबिज़ होने के बाद एक लम्बे समय तक यदि अपने अधिनायकत्व के अन्तर्गत सभी पूँजीवादी तत्त्वों के विरुद्ध सतत क्रान्ति नहीं चलायेगा और पूँजीवादी मूल्यों-विचारों-संस्थाओं के विरुद्ध सतत सांस्कृतिक क्रान्ति नहीं चलायेगा तो पूँजीवाद की पुनर्स्थापना अवश्यम्भावी होगी। अक्टूबर क्रान्ति की मशाल से पूँजीवादी जंगल राज में दावानल भड़काने के लिए इन शिक्षाओं को दिल में भलीभाँति बैठा लेना होगा, हर तरह के कठमुल्लेपन से मुक्त होकर आज की दुनिया और अपने देश की पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली, सामाजिक संरचना और राज्यतन्त्र की सही समझ कायम करनी होगी और लगातार क्रान्तिकारी कार्रवाइयों में धीरज तथा मुस्तैदी के साथ सन्नद्ध होकर एक ऐसी क्रान्तिकारी पार्टी का पुनर्गठन करना होगा जो अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के निर्माण में सक्षम हो।

(`बिगुल´, नवम्बर-दिसम्बर 1996 में प्रकाशित

बुझी नहीं है अक्टूबर क्रांति की मशाल – पीडीऍफ़

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चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प

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http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio2/Home/chunav2009kashmir.mp3?attredirects=0

इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

आम तौर पर क्या होता है कि लोग हमें यहाँ सी पी आई या सी पी एम से भिन्न नहीं समझते. इसमें कोई शक नहीं है कि हम उनसे अलग है लेकिन यह बात उपरी स्तर पर हल हो गयी और एक दूसरे से तोड़-विछोड़ा करने से पहले ताने-मेहने और वाद-विवाद का अभाव रहा है और लोग अक्सर इस तरह की बातें करते हैं कि कामरेडों, इस बार तो बड़ी बढ़िया बात है कि तुम्हारा आदमी भी चुनाव लड़ रहा है या फिर पूछते है कि अब किसे वोट दी जाये. इससे एक बड़ी पेचीदा स्थिति पैदा हो जाती है. इस पर हमें बड़े सीधे-साधे ढंग से अपनी स्थिति प्रकट करनी होती है. उन्हें बताया जाता है कि हमारे यहाँ भारत में दो तरह के कम्युनिस्ट हैं – एक वे जो चुनावों में भाग लेते हैं, इन्हें इलेक्शनबाज या संसदमार्गी कम्युनिस्ट कहा जाता है, दूसरे वे जो चुनावों में भाग नहीं लेते हैं. इनमें से एक वे हैं जो दुस्साहसवादी  या नकसलवादी कम्युनिस्ट है जो केवल हथियारों के बल पर इन्कलाब करना चाहते हैं. पहले वाले कम्युनिस्टों के भी आगे कई प्रवर्ग है जैसे सी.पी.आई., सी.पी.एम., सी.पी.एम. लिबरेशन आदि. और जो चुनाव नहीं लड़ते हैं उनमें भी कई तरह के हैं जैसे कुछ क्रांतिकारी ग्रुप हैं और इसके अलावा नकसली और माओवादी भी चुनावों में भाग नहीं लेते हैं..

उपरोक्त चर्चा का आशय क्या है ? इसे समझने के लिए आईए हम भारतीय बुर्जुआजी और इसके  लोकतंत्र (यानि बुर्जुआ लोकतंत्र, जिसके ऐतिहासिक विकास के थोड़े से वस्तुगत अध्ययन से हम इसे बुर्जुआ वर्ग की सर्वहारा वर्ग पर तानाशाही से बढ़कर कुछ नहीं समझते) के विकास और इतिहास को देखें. भारतीय बुर्जुआजी अंगरेजों के समय में पैदा हुई थी. यह पश्चिम या यूरोप के पूंजीपति वर्ग की तरह किसी स्वतन्त्र मुकाबले में संघर्ष से पैदा नहीं हुई है. अग्रेजी साम्राज्य के दौरान कभी छिप-छिप कर तो कभी थोडा सा मुखर होकर यह धीरे-धीरे अपना अस्तित्त्व ग्रहण करती गयी. कभी भी इसने खुलकर या संघर्षमयी तरीके से अपनी जरूरतों या मांगों को नहीं रखा. इसके विपरीत यह समयानुसार अपनी मांगे रखकर और फिर समझौता फिर मांगे और फिर समझौता की प्रक्रिया द्वारा पैदा हुई है. चाहे पहला विश्वयुद्ध हो या फिर दूसरा. जब भी इसने देखा कि अब अंग्रेजी साम्राज्यवाद उलझा हुआ है या किसी और कारण से – ये अपनी मांगे प्रस्तुत कर देती रही है. जैसे १९४२  में जब इसने देखा कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद दूसरे विश्वयुद्ध में उलझा हुआ है तो विश्व साम्राज्यवाद के अंतरविरोधों  का फायदा उठाते हुए ठीक कांग्रेस की अगुआई में इसने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’  शुरू कर दिया. इसने कभी भी उस समय के मेहनतकश वर्ग किसान या मजदूर वर्ग की मांगो को अपने आंदोलनों या मांगों का हिस्सा नहीं बनाया. १९४७ से पहले भी और बाद में भी इसका यही रुझान रहा है,  कभी चीन से समझौता तो कभी अमेरिका से या फिर रूस से.

अभी कुछ दिन पहले ही हरियाणा  के वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंदर हुड्डा के पिता श्री रणवीर हुड्डा का निधन हुआ है. वे हमारी उस सविधान सभा के सदस्य थे जो अंग्रेजी शासन के दौरान गठित हुई थी. उस ज़माने में इस संविधान सभा के सदस्य होने के लिए जो शर्तें निर्धारित थी उनमें केवल भारत की १५ प्रतिशत आबादी ही कवर होती थी. जैसे कि भूमि का मामला या आबियाना कर का भुगतान कौन लोग करते हैं. अन्य ८५ प्रतिशत आबादी को इसमें शामिल होने का कोई अधिकार नहीं था. इन पंद्रह फीसदी लोगों में  से चुनें हुए लोग ही उस संविधान सभा के सदस्य हुए.  जैसा कि होता रहा है,  भारतीय जब विदेश में निर्मित किसी चीज को देखते रहे हैं और फिर उसकी नक़ल करके उस पर ‘भारत में निर्मित’ का ठप्पा लगाते रहे हैं. ठीक वैसे ही इस संविधान सभा द्वारा निर्मित सविधान को ही १९४७ के बाद झाड़-पोंछकर संविधान का दर्जा दे दिया गया. संविधान के निर्माण से पहले संविधान सभा के लिए जिसमें आम लोग शामिल हों, के चुनाव के लिए किसी भी प्रकार की संविधान सभा का चुनाव नहीं हुआ. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कानून के अनुसार मुट्ठीभर वे लोग जो कुलीन थे और जो पैसे-टक्के वाले थे, वे ही भारत के वर्तमान संविधान के निर्माता रहे हैं (अगर इन्हें निर्माता  कहा जाये तो भी). संक्षेप में यही है हमारे संविधान का इतिहास जिसके बारे में बड़ी-बड़ी डींगे हांकी जाती है कि इसमें अम्बेडकर था , हुडा था या कोई और, और यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, उन लोग के बुत लगाये जाते हैं और उन्हें महानता की उपाधियाँ दी जाती है. ऐसी कोई बात नहीं है कि उनके बुत लगायें जाएँ और उन्हें ये उपाधियाँ दी जाएँ.

अब हम भारत की चुनाव प्रणाली की ओर आते हैं. हम देखते हैं कि यह प्रणाली कितनी खर्चीली है और आम लोगों की आकाँक्षाओं पर किसी भी प्रकार से खरी नहीं उतरती है. लेनिन के ‘राज्य और इन्कलाब’ के शब्दों के अनुसार इसमें होता सिर्फ इतना ही है कि हर पांच वर्षों के बाद देखना होता है कि लुटेरे वर्ग का कौनसा धड़ा अब लोगों के कपडे उतारेगा. आओ थोडा सा देखें कि इनके वेतन, भत्तों और अन्य सहूलतों की फेहरिस्त कितनी खर्चीली है. हम देखते हैं कि एक विधायक का चुनाव खर्च करोड़ रुपये या उससे बढ़कर है. चर्चा होती है कि फलां व्यक्ति फलां पार्टी से टिकट लेने के लिए इतने करोड़ देने को तैयार है. चुनाव उम्मीदवारों में से किसी एक का चुनाव करने के लिए हमें चुनाव से किसी गिरोह, भू माफिया या भ्रष्ट व्यक्ति से एक को चुनना होता है. ताज़ा चुनी गयी लोकसभा में ३०० सांसद यानि ५६ फीसदी घोषित करोड़पति हैं. वो ज़माने चले गए जब कामरेड भी कहा करते थे कि एक वोट और एक नोट. अब हम देखते हैं कि हमारी ये जो संसदमार्गी कम्युनिस्ट पार्टियाँ हैं इन्हें कोई बड़े पूंजीपति तो नहीं लेकिन निम्न पूंजीपति वर्ग या प्रोफेसर, वकील या कुलीन मजदूर वर्ग ने इन्हें थोडा-बहुत फंड या पैसा देना शुरू कर दिया है. लेकिन हम देखते हैं कि बुद्धदेव भटाचार्य ने भी उन नीतियों को पश्चिम बंगाल में लागू कर दिया है जो बुर्जुआ की मन-पसंद रही हैं, तो फंड और पैसा देने वाला ये वर्ग भी निराशा का शिकार है. इतिहास में हम देखते हैं कि पहली बार जब केरल में  नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में वामपंथियों की सरकार बनी तो उस वक्त नेहरू प्रधान मंत्री थे और इंदिरा कांग्रेस की प्रधान. उन्होंने इस सरकार को तुंरत तोड़ दिया. लेकिन धीरे-धीरे भारत की बुर्जुआजी को और इसका प्रतिनिधित्व करने वाले दलों ने इस बात को समझा और आत्मसात किया कि ऐसी कोई बात नहीं है कि इन नामधारी कम्युनिस्टों से डरा जाये, तो उन्होंने इनको बर्दाशत करना शुरू कर दिया और इन्हें इनका वाजिब हक़ और सम्मान (?) देना शुरू कर दिया.

अब हम देखते हैं कि जिस देश की ८४ करोड़ आबादी जो २० रुपये दैनिक से गुज़ारा चलाती है, इस चुनावी नौटंकी में सिवाय अपना तमाशा बना लेने से, उन्हें कुछ हासिल नहीं होता है और न ही हो सकता है, वे अपने को बड़ी हास्यपद स्थिति में पाती है. ये आंकड़े कुछ वर्ष पुराने हैं. इन्हीं के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमंडल का रोजाना खर्च पंद्रह लाख रूपये है, प्रधानमंत्री दफ्तर पर प्रतिदिन दो लाख अड़तीस हज़ार रुपये खर्च होते हैं. राष्ट्रपति पर प्रतिदिन चार लाख चौदह हज़ार. संसद की एक घंटे की कार्रवाई पर सोलह लाख रुपये और इस प्रकार राज्य सभा की एक घंटे की कार्रवाई और राज्य विधान सभा की कार्रवाई  पर बारह-पंद्रह लाख रुपये प्रति घंटा खर्च होते हैं. इनके सदस्यों के वेतन कम दीखते हों लेकिन अन्य सहूलतें और  अन्य आमदनी का कोई हिसाब नहीं है. संसद की अलग-अलग कमेटियों में भाग लेने के लिए ४०० रुपये प्रतिदिन, सदन की मीटिंग बेशक न चलती हो तो भी ८००० रुपये प्रति मास लोगों से संपर्क के लिए चुनाव भता, दफ्तर में आने के लिए २५० ० रुपये , एक या दो सहायक रखने के लिए ६००० रुपये, प्रत्येक सदस्य को स्कूटर , ए.सी. या कार आदि सहूलतें,  फोन बिना कराये के , एक लाख मुफ्त फोन काल्स , फर्स्ट क्लास रेलवे और हवाई यात्रा की टिकटों पर भारी छूट. प्रत्येक सांसद अपने परिवार समेत ३२ हवाई यात्रायें मुफ्त कर सकता है , ..अन्य कमाई  को छोड़ दें. अन्य संस्थाओं के आफिसरों और अमले के खर्च पर लेनिन के ‘राज्य ओर इन्कलाब’ पुस्तक के शब्द कि इन प्रोफेसरों और आफिसरों के इतने बड़े वेतन, यह परोक्ष रूप से रिश्वत नहीं तो और क्या है? इस भारी-भरकम  रकम को खर्च करके यह मशीनरी लोगों पर राज्य करती है. मंत्री परिषद की सुरक्षा पर ५० करोड़ और अन्य प्रमुख हस्तियों की सुरक्षा पर एक अरब 61 करोड़ खर्च.

इसी ऑडियो के सार का बाकी हिस्सा अगली किश्त में जिसमें बुर्जुआजी के ऐतिहासिक विकास और बदल के बारे में चर्चा करेंगे.

चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प – दूसरी किश्त

सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यक्तिवाद, अराजकतावाद, उदारतावाद का विरोध करो!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

आज ऐसे ही कथित वामपन्थी लेखकों-संस्कृतिक कर्मियों का बोलबाला है जो “मुक्त लोग” हैं। राजनीति पर खुली-दो टूक चर्चा से वे बिदकते-कतराते हैं। किसी भी तरह का अनुशासन उन्हें अपनी “सर्जनात्मकता” के हाथों की हथकड़ी प्रतीत होती है। वे अकेले अपने दम-बूते जनता और इतिहास की “सेवा” करते हैं। वास्तव में यह मध्यवर्गीय अराजकतावाद है, व्यक्तिवाद और फिलिस्टाइनवाद है। सामूहिक शक्ति और सर्जना का अनुशासित योग भौतिक उत्पादन के लिए ज़रूरी है और आत्मिक उत्पादन के लिए भी। इस बात का विरोध करने वाले समष्टिगत सर्जना के भविष्य और उत्पादक श्रमजीवी के प्रतिनिधि लेखक नहीं हो सकते। हम बेझिझक, बल देकर यह कहना चाहते हैं कि यह स्थापना आज भी पूरी तरह सही है कि सर्वहारा वर्ग का कला-साहित्य समूचे सर्वहारा क्रान्तिकारी कार्य का एक अंग है। जैसाकि लेनिन ने कहा था, यह समूची क्रान्तिकारी मशीनरी के दाँते और पेंच के समान है। “कला और साहित्य राजनीति के मातहत होते हैं, लेकिन वे खुद भी राजनीति पर अपना महान प्रभाव डालते हैं। क्रान्तिकारी कला और साहित्य समूचे क्रान्तिकारी कार्य का एक अंग हैं, ये दोनों इस कार्य के दाँते और पेंच हैं, तथा ये कुछ अन्य अपेक्षाकृत अधिक महत्त्वपूर्ण पुर्जों की तुलना में कम महत्त्वपूर्ण और कम आवश्यक भले हीं हों, मगर समूची मशीनरी के अनिवार्य दाँते और पेंच हैं तथा समूचे क्रान्तिकारी कार्य के अनिवार्य अंग हैं।” – (माओ त्से-तुङ  : येनान कला-साहित्य गोष्ठी में भाषण)

हम इसे अपरिहार्य समझते हैं, इसलिए अधिकांश प्रगतिशील सुजान-सर्जकों के लिए उबाऊ-बिदकाऊ बात होते हुए भी इस “पुरानी स्थापना” को दुहराना चाहते हैं कि संस्कृति के मोर्चे को राजनीतिक धरातल के वर्ग-संघर्ष से जोड़ना होगा और सांस्कृतिक सृजन और प्रचार के काम को पूरे क्रान्तिकारी उपक्रम का अनिवार्य अंग बनाना होगा। कहा जा सकता है कि सांस्कृतिक मोर्चे पर भी उदारतावाद के विरुद्ध संघर्ष आज बेहद ज़रूरी है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ शिशिर-बसंत 2002 से साभार

नए सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन— महत्तव्पूर्ण सामजिक-आर्थिक सरंचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में सृजन और आन्दोलन के सभी कार्यों को आज एकदम नये सिरे से संगठित करने की ज़रूरत है। हम सर्वहारा क्रान्ति की पक्षधर अवस्थिति से यह बात कह रहे हैं।

समय और समाज जब जनता के प्रचण्ड वेगवाही सांस्कृतिक आन्दोलन की माँग कर रहे हैं, तब कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में अराजकता, विभ्रम, भटकाव, अवसरवाद और ठहराव का बोलबाला है। ताकत कम नहीं है, पर कोशिशें बिखरी हुई हैं। जहाँ ईमानदारी और मेहनत से लगी हुई टीमें हैं, वहाँ वैचारिक समझ कमज़ोर है और अनुभववाद तथा `लकीर की फकीरी´ का बोलबाला है। निस्संकोच कहा जा सकता है कि प्रगतिशील वाम सांस्कृतिक धारा पर आज प्रच्छन्न बुर्जुआ और निम्न-बुर्जुआ धाराएँ हावी हैं। एक ओर नामधारी वाम के पुराने मठाधीशों-महामण्डलेश्वरों की गद्दियाँ और अखाड़े हैं तो दूसरी ओर विश्व के नये यथार्थ के अवगाहन और अतीत की “जड़ीभूत” विचारधारात्मक चिन्तन-पद्धतियों के पुनरीक्षण का दावा करने वाले अकर्मक “नव-मार्क्सवाद” के नौबढ़ प्रणेताओं के अड्डे हैं। क्रान्तिकारी वाम शिविर से जुड़े कई एक सांस्कृतिक संगठन और टोलियाँ हैं, पर उनका विचार-पक्ष कमज़ोर है। वे कला-साहित्य-संस्कृति की द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी समझ से, अपनी समृद्ध वैचारिक विरासत से और अतीत के सर्जनात्मक प्रयोगों से अपरिचित हैं। वे भरपूर जोश से क्रान्तिकारी आन्दोलन और प्रचार की कार्रवाइयों में लगे हैं, लेकिन वैचारिक समझ के अभाव में उनके सांस्कृतिक कार्य दिशाहीन और निष्प्रभावी होकर रह जा रहे हैं।

हमें इस भंवर से बाहर निकलना होगा। क्योंकि हमारे देश और समूची दुनिया के सामने आज यह प्रश्न पहले हमेशा की अपेक्षा अधिक ज्वलन्त और भयावह रूप में खड़ा है – या तो समाजवाद, या फिर बर्बरता! कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी यही प्रश्न केन्द्रीय है।

अकर्मण्य वैचारिक समझ घोड़े की लीद से बेहतर नहीं होती। वास्तविक आशावाद नियतत्ववादी नहीं होता। यदि हम आशावादी हैं तो हमें अपनी आशाओं को फलीभूत करने के लिए जी-जान से जूझना होगा। अकर्मक ज्ञान और अन्धा आशावाद – इन दोनों से बचना होगा।

नये सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन – महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संरचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

आज की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की इस निबन्ध में सविस्तार चर्चा सम्भव नहीं है और इसकी ज़रूरत भी नहीं है। लेकिन अलग से यह करना ही होगा क्योंकि सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुनिश्चित समझ के बिना संस्कृतिकर्मी भी अपने समय के जीवन के मर्म को नहीं पकड़ सकते। इसके बग़ैर वे सतह की परिघटनाओं को ही सारभूत यथार्थ मानकर प्रस्तुत करेंगे। इसके बिना वे भविष्य की ओर जारी यात्रा की गतिकी को नहीं समझ सकते और अपने कार्यभार नहीं निर्धारित कर सकते। आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, हमारे देश के आम लोगों का जीवन सर्वग्रासी संकट के जिस विषैले-दमघोंटू अन्धकार में घुट रहा है, उसकी हम यहाँ सूत्रवत चर्चा करेंगे। इतनी चर्चा पृष्ठभूमि के तौर पर ज़रूरी है।

हम आज भी साम्राज्यवाद के युग में जी रहे हैं जिसकी बुनियादी अभिलाक्षणिकताओं को और उन्नीसवीं शताब्दी के `स्वतंत्र प्रतियोगिता के युग´ से जिसकी भिन्नताओं को लेनिन ने उद्घाटित किया था। लेकिन आज, सतह की परिघटनाओं-प्रवृत्तियों के पर्यवेक्षण के आधार पर भी यह महसूस किया जा सकता है कि स्थितियों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं। विश्व-पूँजीवाद के असमाधेय संकटों की, साम्राज्यवाद की अभूतपूर्व आक्रामकता की, नई तकनोलॉजी के प्रयोग की, तीसरी दुनिया के देशों में निर्बन्ध पूँजी-निवेश और लूट की, इन देशों के बुर्जुआ शासक वर्ग के आत्म समर्पण की, मज़दूरों से अतिलाभ निचोड़ने की नई-नई तरकीबों और उनके छिनते अधिकारों की, सट्टेबाज़ी और अनुत्पादक प्रवृत्तियों की, सूचना-संचार के तंत्र की नई प्रभाविता की, फ़ासीवादी शक्तियों के नये उभार की और पहले से भिन्न तमाम लक्षणों-प्रवृत्तियों की चर्चा तो आम तौर पर होती है। इन तमाम बदलावों के पीछे सिर्फ़ यही कारण नहीं है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम संस्करण आज पराजित और विफल हो चुके हैं और सोवियत संघ के नेतृत्व में नामधारी समाजवादी (वस्तुत: राजकीय पूँजीवादी) ढाँचे वाले देशों का शिविर विघटित हो चुका है। इससे भी बुनियादी कारण (और ये दोनों अन्तर्सम्बन्धित हैं) यह है कि साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की कार्यप्रणाली और लगातार पैदा होने वाले अपने संकटों को निपटाने के उसेक तौर-तरीकों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं, और इनके चलते, विश्व पूँजीवाद के समूचे परिदृश्य में कुछ महत्त्वपूर्ण नई चीज़ें पैदा हुई हैं। इन बुनियादी कारणों को समझने की ज़रूरत है। इन बदलावों की पृष्ठभूमि के बनने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हो चुकी थी, गत शताब्दी के आठवें दशक से इनके लक्षण सतह पर उभरने लगे थे और अन्तिम दशक के दौरान एक नया बदला हुआ परिदृश्य एकदम सामने आ चुका था।

पहली बात, वित्तीय पूँजी की जो वरीयता और निर्णायक भूमिका उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में स्थापित हुई थी, वह गत शताब्दी के आठवें दशक तक चरम वर्चस्व में रूपान्तरित हो चुकी थी। दुनिया भर में निवेशित कुल पूँजी का तीन-चौथाई से भी अधिक आज सट्टा बाज़ार, मीडिया, मनोरंजन उद्योग और अन्य अनुत्पादक कार्रवाइयों में लगा हुआ है। वित्तीय पूँजी ने वास्तविक उत्पादन से स्वतंत्र होकर सम्पूर्ण विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व कायम कर लिया है और कीन्स की आशंका को हूबहू साकार करते हुए, उद्योग सट्टेबाज़ी के भंवर में सतह पर तैरने वाला बुलबुला बनकर रह गया है। आज जो पूँजी का विश्वव्यापी प्रसार दीख रहा है, वह सट्टेबाज़ी, मुद्रा-बाज़ारों में ऋण-सर्जन में सतत् वृद्धि और मुद्रा-पूँजी के अन्तरराष्ट्रीय आवागमन के रूप में है। साम्राज्यवाद के दौर में पूँजी के जिस परजीवी, परभक्षी, अनुत्पादक और जुआड़ी चरित्र की चर्चा लेनिन ने की थी, वह उस समय से कई गुना अधिक हो चुकी है।

आज विश्व-स्तर पर बुर्जुआ जनवाद के बचे-खुचे मूल्यों के भी निश्शेष होने, तरह-तरह की मूलतत्त्ववादी-नवफ़ासीवादी राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के सिर उठाने, तर्कणा और मानववाद के विरुद्ध नानाविध सांस्कृतिक उपक्रमों-उद्यमों के जन्म लेने तथा साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में माल-अन्धभक्ति, निरंकुशता, अतर्कपरकता, कलावाद-रूपवाद और मानवद्रोही प्रवृत्तियों के नये-नये रूपों के उभरने की ज़मीन यही है।

विश्व-स्तर पर पूँजी का विकास शेयर बाज़ारों और जुआघरों का `बाई-प्रोडक्ट´ बन जाने के चलते संकट के विस्फोट और महाध्वंस का भय हमेशा साम्राज्यवादियों-पूँजीपतियों के सिर पर सवार रहता है। बीच-बीच की अल्पकालिक राहतों के बावजूद, दीर्घकालिक मन्दी का दौर विगत तीन दशकों से लगातार मौजूद है। कभी तेज़ कभी मद्धम होता व्यापार युद्ध, बड़े-बड़े घरानों में से कुछ के तबाह होने का या किसी और द्वारा निगल लिये जाने का तथा नई-नई इजारेदारियों के गठन का सिलसिला लगातार जारी है। उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों, पूर्वी यूरोप के देशों और भूतपूर्व सोवियत संघ के घटक देशों के बाज़ार को साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी के लिए पूरी तरह खोल दिया है और चीन में “बाज़ार समाजवाद” की पिपिहरी बजाने वाले नये शासकों ने भी उसके स्वागत के लिए लाल गलीचे बिछा दिए हैं, पर पश्चिमी पूँजी का अजीर्ण रोग लगातार मौजूद है।

भूतपूर्व समाजवादी देशों में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना और राजकीय पूँजीवाद के सोवियत “समाजवादी” ढाँचे के विघटन के बाद पश्चिमी ढंग के पूँजीवादी ढाँचे की स्थापना मुख्यत: उन देशों के आन्तरिक वर्ग-संघर्ष का परिणाम थी, लेकिन इसमें साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की तथा साम्राज्यवादी घुसपैठ, घेरेबन्दी और षड्यंत्र की भी एक अहम भूमिका थी। इसी प्रकार, उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के तहत, एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों के बाज़ारों में साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी खुला चरागाह बना देने, सार्वजनिक क्षेत्र के विघटन का बुर्जुआ राज्य की बची-खुची “कल्याणकारी” भूमिका के निरस्तीकरण और “श्रम-सुधारों” के पीछे साम्राज्यवादी देशों के दबाव के साथ ही इन देशों के सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग की अपनी आवश्यकता और विवशता भी है। इन देशों में सत्तासीन होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोधों का लाभ उठाते हुए और जनता को निचोड़कर राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा कर एक सीमा तक पूँजीवाद का विकास किया। अब यह सिलसिला संतृप्ति-बिन्दु तक जा पहुँचा था। नई तकनोलॉजी, पूँजी और बाज़ार की अपनी ज़रूरतों के चलते साम्राज्यवादियों के गिरोह के दिशा-निर्देशों पर चलना अब इनके सामने एकमात्र विकल्प था। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर का यही सारतत्त्व है। इस नये दौर में पूँजी का वैश्विक प्रवाह एकदम निर्बन्ध हो गया है। साम्राज्यवादी शोषण इस नये दौर में प्रत्यक्ष राजनीतिक शासन या नियंत्रण के माध्यम से काम नहीं कर रहा है। राजनीतिक-सामरिक बल-प्रयोग और दबाव का अनिवार्य पहलू मौजूद है, लेकिन साम्राज्यवादी शोषण की प्रक्रिया मुख्यत: उस विशाल अन्तर के ज़रिए काम करती है जो विकसित देशों और पिछड़े देशों की उत्पादक शक्तियों के बीच बना हुआ है।

भारत और तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों के पूँजीपति वर्ग के किसी भी हिस्से का अब राष्ट्रीय चरित्र नहीं रह गया है। साम्राज्यवाद से विनियोजित अधिशेष में अपने हिस्से को लेकर देशी पूँजीपति वर्ग के अन्तरविरोध मौजूद हैं और वे समय-समय पर उग्र भी हो जाते हैं। देश के भीतर इजारेदार और ग़ैर इजारेदार पूँजी के बीच, बड़ी और छोटी पूँजी के बीच भी अन्तरविरोध हैं, पर वे ग़ैरदुश्मनाना अन्तरविरोध हैं। पूँजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा अब साम्राज्यवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए जनता के अन्य वर्गों के साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है।

राष्ट्रीय प्रश्न की ही तरह भूमि-प्रश्न भी अब सामाजिक क्रान्ति के एजेण्डे पर अपने पूर्ववर्ती रूप में उपस्थित नहीं रह गया है। प्रतिक्रियावादी “प्रशियाई” मार्ग से प्राक्पूँजीवादी भूमि-सुधारों के रूपान्तरण का काम पूँजीवादी व्यवस्था में सम्भव हदों तक, मुख्यत: पूरा हो चुका है। पुराने सामन्ती भूस्वामियों का एक बड़ा हिस्सा पूँजीवादी भूस्वामी बन चुका है। पहले के बड़े काश्तकार आज के बड़े मालिक किसान-कुलक बन चुके हैं। किसान आबादी का तेज़ विभेदीकरण गत तीन दशकों की एक महत्त्वपूर्ण परिघटना है। निम्न-मध्यम और छोटे किसान उजड़कर सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की पाँतों में शामिल हो रहे हैं। उच्च-मध्यम किसान धनी किसानों की कतारों में शामिल हो रहे हैं। पिछले दशक के दौरान यह प्रक्रिया और अधिक तेज़ हो गई है। गाँवों में भी श्रम और पूँजी का अन्तरविरोध ही प्रधान हो गया है। जहाँ अभी पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था की संक्रमणशील स्थिति है, वहाँ भी यही स्थिति है। वहाँ से भारी संख्या में उजड़कर किसान आबादी शहरों और विकसित पूँजीवादी खेती वाले इलाकों की ओर पलायन कर रही है। सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के आज सिर्फ़ अवशेष ही मौजूद हैं। गाँवों में वित्तीय पूँजी की पैठ मज़बूत हुई है, वे राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी में आ गए हैं, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था की जड़ता टूट गई है और कृषि और सहायक क्षेत्रों में भी माल-उत्पादन प्रभावी प्रवृत्ति बन गई है।

इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारतीय मध्यवर्ग का भी विगत कुछ दशकों के दौरान तेज़ विस्तार और विभेदीकरण हुआ है। मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों (प्रोफेसरों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों, नौकरशाहों, विशेषज्ञों आदि का) का एक बड़ा हिस्सा आज पूरी तरह से व्यवस्था के पक्ष में खड़ा हो चुका है। आम नौकरीपेशा, तबाहहाल मध्यवर्गीय कतारों से यह एकदम अलग खड़ा है। मध्यवर्ग के निचले संस्तरों की करीबी मेहनतकश वर्गों से बन रही है, हालाँकि उनकी निराशा, पिछड़े मूल्यों, जातिगत संस्कारों आदि का लाभ उठाकर धार्मिक कट्टरपन्थी ताकतें उनके एक हिस्से को अपने प्रभाव में लेने में फ़िलहाल कामयाब हैं। उच्च मध्यवर्ग आज उदारीकरण-निजीकरण के प्रवक्ता-समर्थक और धुर प्रतिक्रियावादी संस्कृति के संवाहक के रूप में व्यवस्था से नाभिनालबद्ध है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि हमारा पिछड़ा हुआ पूँजीवादी समाज आज राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के बजाय एक ऐसी नई समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में है जिसकी अन्तर्वस्तु साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी है। राष्ट्रीय जनवाद के अधूरे पड़े काम भी आज इसी के कार्यभारों में समाहित हो गए हैं। इस काम में सर्वहारा वर्ग का साथ मुख्यत: गाँव और शहर की भारी ग़रीब आबादी देगी और मध्यवर्ग और मध्यम किसानों के नीचे के संस्तर देंगे। बीच के संस्तर ढुलमुल सहयोगी होंगे। पूंजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा, खुशहाल मालिक किसान और उच्च मध्यवर्ग अब किसी भी सूरत में मेहनतकशों के रणनीतिक संश्रयकारी नहीं बनेंगे।

लेनिन के समय और आज के समय के बीच का एक महत्त्वपूर्ण फर्क यह है कि राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियाँ आज विश्व सर्वहारा क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण संघटक तत्त्व नहीं रह गई हैं। एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के अर्द्धऔद्योगीकृत पिछड़े देश ही आज भी साम्राज्यवाद की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं, पर इनमें से अधिकांश देशों में सामाजिक क्रान्तियों का एजेण्डा बदल चुका है। अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण, विश्व-सर्वहारा क्रान्ति के दूसरे चक्र में, वस्तुगत परिस्थितियों की दृष्टि से, इन्हीं देशों में सम्भावित हैं, पर इन क्रान्तियों की अन्तर्वस्तु अब साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी होगी। ये देशी-विदेशी पूँजी के संश्रय के विरुद्ध केन्द्रित नई समाजवादी क्रान्तियाँ होंगी, जो न केवल चीनी क्रान्ति से, बल्कि कई मायनों में सोवियत समाजवादी क्रान्ति से भी भिन्न होंगी।

सामाजिक शक्तियों के इस नये ध्रुवीकरण के अनुसार ही सांस्कृतिक मोर्चे के कार्यभारों की बुनियादी रूपरेखा तय होगी। कहा जा सकता है कि आज हमारी लड़ाई राष्ट्रीय जनवादी संस्कृति की नहीं बल्कि सर्वहारा जनवादी संस्कृति की, या कहें कि सर्वहारा संस्कृति की है। अब लोगों को यह बताने का अनुकूल समय है कि सिर्फ़ सर्वहारा जनवाद ही वास्तविक जनवाद होता है, कि आज सिर्फ़ दो ही मुख्य सांस्कृतिक पक्ष हैं – पूँजी की संस्कृति का पक्ष और श्रम की संस्कृति का पक्ष, और लोगों को इन्हीं दो के बीच अपना पक्ष चुनना होगा। कला-साहित्य के दायरे में व्यक्तिवाद और अलगाव की संस्कृति पर निर्णायक प्रहार के लिए आज निजी स्वामित्व की नैतिकता पर ही प्रश्न खड़े करने होंगे, लोभ-लाभ, बाज़ार और माल के रहस्यवाद की संस्कृति के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करना होगा, सम्पत्ति सम्बन्धों की तफसीलों को प्रस्तुत करना होगा और बुर्जुआ अधिकारों तथा अन्तरवैयक्तिक असमानताओं की सामाजिक-ऐतिहासिक बुनियादों को उद्घाटित करना होगा। इन्हीं बुनियादी कार्यभारों के इर्दगिर्द हमें राजनीतिक सत्ता, साम्राज्यवादी लूट और षड्यंत्र आदि के भण्डाफोड़ के प्रचारात्मक और आन्दोलनात्मक, रुटीनी और फ़ौरी, सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्य भी संगठित करने होंगे। सामाजिक जीवन में जो सामन्ती सांस्कृतिक मूल्य मौजूद हैं, वे सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग और साम्राज्यवादियों के लिए एकदम उपयुक्त हैं, अत: उन्होंने उन सभी को अपनाकर अपने सांस्कृतिक तंत्र का अंग बना लिया है। तर्कणा और भौतिकवाद की जगह अन्धविश्वास, रहस्यवाद आदि ही आज बुर्जुआ वर्ग की ज़रूरत हैं। जाति-समस्या, दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न को भी आज इसी नज़रिए से देखना होगा। इन मुद्दों पर जनवादी सुधार की पैबन्दगीरी का समय बीत चुका है। ऐसा करना महज़ बुर्जुआ गुलामगीरी होगी। सामाजिक मुक्ति के ये बुनियादी प्रश्न समाजवादी परियोजना के अनिवार्य बुनियादी मुद्दे हैं।

साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की संस्कृति में भी आज कोई अन्तरविरोध नहीं है। दोनों में सहयोग और एकता है, और काफ़ी हद तक तो एकरूपता भी है। राष्ट्रवादी संस्कृति की ज़मीन से साम्राज्यवादी संस्कृति का विरोध आज इतिहास की बात बन चुका है। सामाजिक-आर्थिक संरचना और सामाजिक-राजनीतिक क्रान्ति के स्वरूप के आधार पर, जनपक्षधर संस्कृति कर्म की सर्वाधिक सामान्य रूपरेखा की इस चर्चा के बाद, हम पूँजी के भूमण्डलीकरण के इस नये दौर की कुछ और नई प्रवृत्तियों की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

हम समझते हैं कि साम्राज्यवाद की आज की अति उग्र आक्रामकता के पीछे उसकी शक्ति नहीं, बल्कि उसका असमाधेय ढाँचागत संकट है। समाजवाद की तात्कालिक विफलता, तीसरी दुनिया के शासक वर्गों की घुटनाटेकू मुद्राओं और विश्व-क्रान्ति की धारा की वर्तमान संकटग्रस्तता के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था में उछाल या त्वरण के कोई विश्वसनीय संकेत नहीं हैं। साझा हितों के लिए, एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका में अमेरिकी सामरिक हस्तक्षेपों और कुचक्रों के पीछे सभी साम्राज्यवादी देश एकजुट दीखते हैं, लेकिन यह दौर-विशेष की विशिष्टता है। साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोध एक बार फिर गहरा रहे हैं और आने वाले दिनों में नये व्यापार-युद्धों और शक्ति-समीकरणों के संकेत अभी से मिलने लगे हैं।

अत: कहा जा सकता है कि ऊपरी तौर पर एकतरफ़ा ढंग से पूरी दुनिया की जनता पर हावी दीखता साम्राज्यवाद अन्दर से खोखला हो रहा है। यह आज भी कागजी बाघ ही है, बल्कि पहले से भी अधिक कागजी है। आज यह अपनी जड़ता की शक्ति से जीवित है और इसलिए जीवित है कि सर्वहारा क्रान्तियों और समाजवादी प्रयोगों का सिलसिला, पहले चक्र की विफलता के बाद, अभी फिर से गतिमान नहीं हो सका है।

इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय और पुनरुत्थान का यह समय अभूतपूर्व संकट का समय है। बुर्जुआ क्रान्तियों के प्रवाह को भी पराजय और पुन:स्थापन के दौरों से गुज़रना पड़ा था पर उनका संकट इतना विकट और लम्बा नहीं था। लेकिन जो क्रान्ति दूरगामी तौर पर, सहशताब्दियों लम्बे, वर्ग-समाज के समूचे इतिहास के विरुद्ध निर्देशित है, जो इतिहास की सर्वाधिक युगान्तरकारी और पहली `सचेतन क्रान्ति´ है, उसकी अवधि लम्बी होना, कठिनाइयाँ विकट होना, पराजय प्रचण्ड होना और रास्ता जटिल और आरोह-अवरोहपूर्ण होना, ऐतिहासिक दृष्टि से स्वाभाविक प्रतीत होता है।

विगत लगभग दो शताब्दियों के विश्व-इतिहास का समाहार करते हुए कहा जा सकता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच विश्व-ऐतिहासिक महासमर के पहले चक्र की शुरुआत हुई। पेरिस कम्यून (1871), अक्टूबर क्रान्ति (1917) और चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति (1966-76) इस यात्रा के तीन महानतम कीर्ति स्तम्भ – तीन मील के पत्थर थे। रूस में स्तालिन की मृत्यु के बाद संशोधनवादी पार्टी और राज्य पर काबिज हो गए और वहाँ समाजवाद का मुखौटा कायम रखते हुए नये नौकरशाह बुर्जुआ वर्ग ने राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा किया। एक ओर सामाजिक साम्राज्यवादी सोवियत संघ ने विश्व के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों के साथ विश्वासघात किया तथा उन्हें विघटित करने और अपना पिछलग्गू बनाने की कोशिश की। दूसरी ओर पश्चिमी साम्राज्यवादी शिविर के सामने एक चुनौती प्रस्तुत करके और साम्राज्यवादी शिविर के अन्तरविरोधों को उग्र बनाकर उसने वस्तुगत तौर पर विश्व-पूँजीवाद के संकट को बढ़ाने का काम भी किया। साथ ही, सोवियत संघ की मौजूदगी और दो अतिमहाशक्तियों के शिविरों के बीच की उग्र प्रतिस्पर्धा का लाभ पिछड़े देशों के शासक वर्गों ने भी उठाया। पश्चिमी खेमे की थोपी गई शर्तों का आंशिक विरोध सोवियत “सहायता” के सहारे करने में वे सफल रहे। सोवियत संघ में और पूर्वी यूरोप के देशों में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद भी चीन में सर्वहारा सत्ता की मौजूदगी और समाजवादी प्रयोगों के सिलसिले से पूरी दुनिया में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों और सर्वहारा क्रान्तियों की धारा को प्रेरणा और संवेग मिलता रहा। सोवियत संघ और अपने देश के प्रयोगों के विश्लेषण के आधार पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और माओ त्से-तुङ ने समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को उद्घाटित करने और पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने के उपाय विकसित करने और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के रूप में उन्हें अमल में लाने का युगान्तरकारी काम किया। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद वहाँ भी पूँजीवादी पुनर्स्थापना हो गई। इसका मुख्य कारण यह था कि 1949 से लेकर सांस्कृतिक क्रान्ति शुरू होने तक, वहाँ भी बुर्जुआ वर्ग ने समाज में अपने आधार के विस्तार के साथ ही पार्टी और राज्य के भीतर भी अपने समान्तर सदर मुकाम कायम कर लिए थे। दूसरे, अनुकूल विश्व-परिस्थितियों से भी उन्हें शक्ति मिली। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो सर्वहारा क्रान्ति के पहले संस्करणों की पराजय अप्रत्याशित नहीं लगती। मार्क्स-एंगेल्स और लेनिन ने पहले भी इस बात की चर्चा की थी कि समाजवादी संक्रमण की दीर्घावधि में वर्ग-संघर्ष लगातार जारी रहेगा, पूँजीवादी पुनर्स्थापना के ख़तरे लम्बे समय तक मौजूद रहेंगे। लेनिन ने पूँजीवादी पुनर्स्थापना के विभिन्न स्रोतों का उल्लेख किया था। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान माओ ने एकाधिक बार कहा था कि पूंजीवादी तत्त्वों के सत्तासीन होने की सम्भावनाएँ लम्बे समय तक मौजूद रहेंगी और समाजवाद की निर्णायक विजय के लिए कई सांस्कृतिक क्रान्तियों की आवश्यकता होगी। इस दृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र का, पराजय के रूप में समापन मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि को सत्यापित ही करता है। क्रान्तियों के विगत प्रयोगों की विफलता विचारधारा की पराजय नहीं है। पूँजीवाद इतिहास का अन्त नहीं है। यह स्वयं अपने भीतर से समाजवाद की आवश्यकता पैदा करता है। और उसकी वाहक शक्तियों को भी। विश्व पूँजीवाद की वर्तमान स्थिति स्वयं इसका प्रमाण है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच वर्ग-महासमर का पहला विश्व-ऐतिहासिक चक्र 1976 में चीन में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद समाप्त हो गया और अब दूसरे विश्व-ऐतिहासिक चक्र की शुरुआत हो चुकी है। इन दो चक्रों के बीच के संक्रमण-काल में एक महत्त्वपूर्ण घटना यह घटी है कि समाजवाद के नाम पर कायम, सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के राजकीय पूँजीवादी ढाँचे विघटित हो गए हैं। चीन के “बाज़ार समाजवाद” का पूँजीवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा हुआ है और यह तय है कि देर-सबेर इसे भी विघटित हो जाना है। समाजवाद के बारे में भ्रम पैदा करने वाले स्रोत समाप्त हो गए हैं। इधर भूण्डलीकरण के दौर में ऐसी स्थिति पैदा हुई है कि संशोधनवाद, सामाजिक जनवाद, अर्थवाद, ट्रेड यूनियनवाद आदि की सीमाएँ भी मेहनतकश जनता को स्पष्टत: दीखने लगी हैं और उसे यह बताने के लिए अनुकूल स्थितियाँ तैयार हुई हैं कि वास्तविक प्रश्न राज्यसत्ता का है, राजनीतिक संघर्ष का है। संशोधनवादी-सुधारवादी प्रवृत्तियों का आधार मध्यवर्ग और कुलीन मज़दूरों में मौजूद है, पर उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की चपेट में इनका भी एक हिस्सा अब आने लगा है और उसकी चेतना का भी `रैडिकलाइज़ेशन´ हो रहा है। परम्परागत चुनावी वामपन्थी और ट्रेड-यूनियन सुधारवाद की, व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति के रूप में प्रभाविता कम होने के साथ ही साम्राज्यवाद और पूँजीवादी व्यवस्था ने इधर नये सिरे से एन.जी.ओ.-सुधारवाद के रूप में एक नई सुरक्षा-पंक्ति खड़ी करने की कोशिश की है। एन.जीओ. व्यवस्था-विरोध का छद्म खड़ा करते हुए एक नये `सेफ्टी वॉल्व´ का और `ट्रोजन हॉर्स´ का काम कर रहे हैं, जनहित के कार्यों से बुर्जुआ राज्यसत्ता को पूरी तरह पीछे हटने का मौका दे रहे हैं, और साथ ही, सस्ता श्रम निचोड़ने का ज़रिया भी बने हुए हैं। इनका विश्वव्यापी नेटवर्क फण्ड-बैंक-डब्ल्यू.टी.ओ. की तिकड़ी का ही अनिवार्य पूरक तंत्र है। यह आश्चर्यजनक नहीं कि पुराने गांधीवादियों-समाजवादियों से लेकर नकली वामपिन्थयों और भगोड़ों की सभी किस्में आज एन.जी.ओ. के साथ मधुयामिनी मना रही हैं।

सर्वहारा क्रान्ति के दो विश्व ऐतिहासिक चक्रों के बीच की विशिष्टता यह रही है कि उसने समाजवाद को बदनाम करने वाले नकली लाल झण्डे को चींथकर धूल में फेंक दिया है, सुधारवाद और “कल्याणकारी राज्य” के कीन्सियाई नुस्खों की असलियत साफ़ कर दी है और विश्व पूँजीवाद की घोर मानवद्रोही बर्बरता को एकदम उजागर कर दिया है। एक बार फिर, उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप की तरह, पूरी दुनिया में श्रम और पूँजी की ताकतें एकदम आमने-सामने खड़ी हैं। साम्राज्यवादी भेड़िये और तीसरी दुनिया के देशों में सत्तारूढ़ उनके छुटभैये मेहनतकशों से अतिलाभ निचोड़ते हुए उनके एक बड़े हिस्से को लगातार सड़कों पर धकेल रहे हैं और तबाह कर रहे हैं। दूसरी ओर विश्व स्तर पर युद्ध और विनाश का जो कहर वे बरपा कर रहे हैं, वह कुल मिलाकर विश्वयुद्धों की तबाही से कम नहीं है। दूसरी ओर, दुनिया के पिछड़े देशों से लेकर समृद्ध देशों तक में एक बार फिर विद्रोह का लावा खौल रहा है। जगह-जगह जन-उभारों और आन्दोलनों के ज्वार भी उठने लगे हैं। इस पूरी स्थिति का समस्यापरक पक्ष यह है कि सर्वहारा क्रान्ति की मनोगत शक्तियाँ अभी कमज़ोर और बिखरी हुई हैं। विगत पराजयों का सार-संकलन अभी पूरा नहीं हुआ है। साथ ही, नई सर्वहारा क्रान्तियों की प्रकृति और रास्ते को समझने के लिए, परिस्थितियों में आए नये बदलावों को समझने का काम भी अभी बहुत कम हुआ है। लेकिन, ठहराव के दौर के संकटों और चुनौतियों के बजाय आज हम एक नई शुरुआत के दौर के संकटों और चुनौतियों के रूबरू खड़े हैं। इसी नये दौर के कार्यभारों को हम एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और नये सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभारों के रूप में देख-समझ रहे हैं।

एकदम ठोस शब्दों में कहें कि सर्वहारा क्रान्ति के नए संस्करण की सर्जना के लिए हमें सबसे पहला काम यह करना है कि अतीत की सर्वहारा क्रान्तियों और संघर्षों के इतिहास को विस्मृति के अँधेरे से बाहर लाना है, तमाम मिथ्या-प्रचारों और विभ्रमों की धूल-राख उड़ाकर उसे जनता के सामने प्रस्तुत करना है। हमें सर्वहारा क्रान्ति की विचारधारा के बारे में फैलाई जा रही भ्रान्तियों और झूठे प्रचारों का प्रतिकार करते हुए उसे मेहनतकश जनता के वर्ग-सचेत संस्तरों तक और उनके पक्ष में खड़े परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों तक लेकर जाना है। यह सर्वहारा पुनर्जागरण का पक्ष है। एक नये सर्वहारा प्रबोधन के केन्द्रीय कार्यभार क्या हैं? हमें सर्वहारा वर्ग की विचारधारा को आज के विश्व-ऐतिहासिक सन्दर्भों में जानना-समझना है। मार्क्सवाद एक गत्यात्मक विज्ञान है। अतीत की क्रान्तियों का अध्ययन हम भविष्य की क्रान्तियों के लिए कर रहे हैं। महानतम क्रान्तियों का भी अनुकरण नई क्रान्तियों को जन्म नहीं दे सकता। अतीत के प्रयोगों से सीखते हुए स्थितियों में आए परिवर्तनों को सदा-सर्वदा ध्यान में रखना होता है। और फिर नये चक्र की सर्वहारा क्रान्तियों का रंगंमच तो पूर्व की अपेक्षा कई महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ लिये हुए है। इतिहास के अध्ययन, वर्तमान जीवन के अध्ययन और सामाजिक प्रयोगों के त्रिकोणात्मक संघातों के बीच ही नई क्रान्तियों के मार्गदर्शक सूत्र और रणनीति का विकास होगा। यह समय घनघोर वैचारिक बहस-मुबाहसे का होगा। साथ ही, यह जनता के बीच शिक्षा और प्रचार का तथा प्रारिम्भक स्तर के सामाजिक प्रयोग का समय होगा। यही नये सर्वहारा प्रबोधन का केन्द्रीय कार्यभार है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये दोनों कार्यभार अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ गुंथे-बुने हैं और इन्हें साथ-साथ अंजाम दिया जाएगा। यह भी स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि यह पूरी प्रक्रिया सर्वहारा क्रान्ति की हरावल शक्ति को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया की सहवर्ती होगी, पूर्ववर्ती या अनुवर्ती नहीं।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’

शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

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कड़ी जोड़ने के लिए देखे :

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

“हमने लिखा
“आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं…..साथ ही हमने जोड़ा था कि “वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.”
किसी प्रकार की गलतफहमी न हो हम साफ़ कर देना चाहते हैं कि;

आज के किसान का चरित्र वह नहीं है जो तब था और वह मजदूर के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति का वाहक था जो नहीं हुई. इसके विपरीत राष्ट्रीय जनतंत्र के कार्यभार ने बुर्जुआ राज्य और बुर्जुआ सरकारों के नेतृत्व में प्रशियाई जुन्कर तरीके से धीमे परन्तु पीडादायक तरीके से संपन्न होना था और वह हुआ भी. इस दौरान किसान उस मेहनतकश के क्रांतिकारी चरित्र को खो बैठा जो कि मजदूर वर्ग की सहायक रिजर्व सेना का होता है. पूँजी का सताया यह  वर्ग यदि क्रांतिकारी दीखता है तो केवल इसलिए क्योंकि मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से अपना दृष्टिकोण त्यागकर यह अपना भविष्य सुरक्षित कर लेना चाहता है. हम इसका स्वागत करते हैं परंतु मजदूरों के हितों को ताक में रखकर इनके बोनुस, लाभकारी मूल्यों की हिफाजत की वकालत हम नहीं करते. हाँ, बुर्जुआ राज्य द्वारा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पूँजी की चाकरी बजाते हुए पुलिस और फौज द्वारा इनके हासिल जनतांत्रिक अधिकारों के हनन की हम भर्त्सना करते हैं बेशक किसी लाल झंडे के नेतृत्व में कामरेडों ने वह कर दिखाया हो जिसे करने में बुर्जुआ दल भी शरमातें हैं.

आज के किसान का चरित्र – हमारी पहुँच – कुछ और स्पष्टता : देखें

हमने बार-बार लिखा है कि सीपीआई, सीपीआई (एम) सीपीआई (एम एल ) संशोधनवादी पार्टियाँ हैं और इनका चरित्र बुर्जुआ पार्टियों से कहीं ज्यादा, कहीं अधिक कुटील है लेकिन इनकी कतारों की बहुसंख्यक  गिनती  और इनके समर्थक बुद्धिजीवियों की बहुसंख्या, अब भी ईमानदार है हालाँकि ,किसी भी वस्तु, घटनावृत  अथवा व्यापार की गतिकी की दशा-दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि वस्तु, घटनावृत  अथवा व्यापार के बुनियादी  मुख्य विरोधी ध्रुवों में प्रधानता किसकी है. इस घटनावृत को ठीक इसी प्रकार समझा जा सकता है जैसे किसी समाज में मेहनतकश अवाम तो बहुसंख्यक हो लेकिन उस समाज की विरोधों की एकता से पैदा होने वाली गतिकी उसके पक्ष के विपरीत अल्पसंख्यक परजीवी वर्गों के पक्ष में हल होती हो.

लेकिन निम्नलिखित रिपोर्ट में वर्णित तथ्य भी गौर करने लायक हैं ;

1990  के दशक में, सी.पी.एम. की चंडीगढ़ में संपन्न हुई पंद्रहवीं कांग्रेस में एक चौकाने वाला तथ्य प्रकाश में आया. पार्टी के आधे से ज्यादा सदस्य गैर-मेहनतकश वर्ग और गैर-किसान वर्ग से आये थे या यूं कहें कि  – मिडल क्लास से. इससे सी.पी.एम. की मेहनतकश वर्गों को जन-आंदोलनों में  न खींच सकने की क्षमता और उसके रेडिकल शिक्षित युवा की और आकर्षण का  पता चलता है. उस समय से जारी इस नुक्स और बेपरवाही के चलते हालत यह हो गयी है कि विद्यार्थियों, युवायों और महिलायों के मोर्चे ही लगभग सभी  पोलित ब्यूरो और संसद  के टॉप नेताओं  की आपूर्ति करते हैं.  नव युवाओं में शायद ही कोई सदस्य हो जो ट्रेड यूनियन, किसान और जन-आन्दोलन से उठकर आया हो. हरकिशन सिंह सुरजीत और ज्योति बसु किसान और श्रमिक वर्ग आंदोलनों से उभरे थे जबकि प्रकाश करात और बुद्धदेव भट्टाचार्य विश्वविद्यालयों  के कुलीन वर्ग से आये हैं. पार्टी में इस मालदार शिक्षित वर्ग की प्रधानता ने पार्टी को ,जिसे कहा जा सकता है कि, “तर्कसंगत सिद्धांतों की राजनीति” में बदल दिया…देखें : A Logical Defeat

कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी कम्युनिस्टों के इस प्रकार अलग-अलग खेमों में बँटे होने से चिंतित हो जाते हैं. हालाँकि कुछ विशेष परस्थितियों में ‘टैक्टिस’ के लिहाज़ से यहाँ तक कि जनतांत्रिक बुर्जुआ दलों तक के साथ सांझे मोर्चे के लिए समझौता करने से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन समझौता आखिर समझौता ही होता है जो कभी भी किसी पक्ष को, एक पल के लिए भी, पीडामुक्त  नहीं करता और उसे दशकों तक निभाना (यहाँ इशारा भारतीय वाम मोर्चा से है) हद दर्जे की निम्न अवसरवादिता नहीं तो और क्या है?

जहाँ तक सैद्धांतिक एकता का प्रश्न है तो मजदूरों के लिए लेनिन के कहे गए इन शब्दों का आज भी उतना ही महत्त्व है,

“मज़दूरों को एकता की ज़रूरत अवश्य है और इस बात को समझना महत्त्वपूर्ण है कि उन्हें छोड़कर और कोई भी उन्हें यह एकता ‘प्रदान’ नहीं कर सकता, कोई भी एकता प्राप्त करने में उनकी सहायता नहीं कर सकता। एकता स्थापित करने का ‘वचन’ नहीं दिया जा सकता – यह झूठा दम्भ होगा, आत्मप्रवंचना होगी (एकता बुद्धिजीवी ग्रुपों के बीच ‘समझौतों’ द्वारा ‘पैदा’ नहीं की जा सकती। ऐसा सोचना गहन रूप से दुखद, भोलापन भरा और अज्ञानता भरा भ्रम है।” “एकता को लड़कर जीतना होगा, और उसे स्वयं मज़दूर ही, वर्गचेतन मज़दूर ही अपने दृढ़, अथक परिश्रम द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। इससे ज्यादा आसान दूसरी चीज़ नहीं हो सकती है कि ‘एकता’ शब्द को गज-गज भर लम्बे अक्षरों में लिखा जाये, उसका वचन दिया जाये और अपने को ‘एकता’ का पक्षधर घोषित किया जाये।”

शब्द कम्युनिस्ट से अभिप्राय सत्तासीन दल के शेयर होल्डर रहे संशोधनवादी वामपंथी धडे और दुस्साहसवादियों से लिया जाता हैं. हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि छिटपुट ही सही परंतु कुछ क्रांतिकारी ग्रुप उपरोक्त दो धाराओं से बिलकुल हटके हैं लेकिन इसका मतलब हरगिज़ नहीं कि  कोई नया मार्क्सवाद ईजाद कर लिया गया है बल्कि आज विपर्य के इस दौर में मार्क्सवाद की हिफाजित तथाकथित मार्क्सवादियों से करने की सख्त ज़रुरत है और इन संशोधनवादी मार्क्सवादियों को नंगा करना क्रांतिकारी ग्रुपों का एक कार्यभार है जबकि दुस्साहसवाद इतना कुटील नहीं, उसे हराया जा सकता है. जहाँ तक सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी के होने न होने का सवाल है, इसके लिए देखें : कहाँ से फूटेंगी उम्मीद की किरणें

हमारे कर्मों का मार्गदर्शक होते हुए मार्क्सवाद निरंतर विकासमान सिद्धांत है जिसे समय-समय पर कर्म-सिद्धांत-कर्म के सूत्र द्वारा एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन माओ आदि मार्क्सवादियों ने विकसित किया है. वैज्ञानिक समाजवाद के प्रथम प्रयोग हार जाने के बाद, नई समाजवादी क्रान्तियों (समाजवादी क्रांतियाँ – क्योंकि 21वीं शताब्दी 20वीं शताब्दी से इसलिए भिन्न है कि दुनिया के लगभग प्रत्येक हिस्से में पूंजीवाद विकसित हो चूका है)  का अगला चक्र शुरू ही होने वाला है.

मार्क्सवाद को असफल नहीं माना जा सकता अलबता मजदूर वर्ग का इस संक्रमण दौर में बुर्जुआओं से हार जाने का अर्थ केवल यही है कि समाजवादी क्रांतियों का प्रथम चक्र पूरा हो गया है और सर्वहारा वर्ग अगले चक्र की तैयारी की  इस प्रचंड झंझावाती समय की पूर्वबेला से पहले सोया हुआ दीखता है लेकिन यह मान लेना कि मजदूरवर्ग नए समाजवादी क्रांतियों के तजुर्बे नहीं करेगा क्योंकि समाजवाद तो फेल हो चुका है , क्रांतिकारियों के लिए भाग्यवादी और पलायनवादी – हाथ पर हाथ रखकर बैठना होगा जबकि इसके विपरीत मजदूर वर्ग बड़ी शिद्दत के साथ समाजवादी क्रांतियों की इस प्रक्रिया को अंजाम देगा – बेशक हजारों-हज़ार क्रांतियाँ फेल हो जाएँ क्योंकि बुर्जुआ वर्ग अपने-आप तो उसे यह मौका देगा नहीं कि आओ मैं तुम्हें सिखाता हूँ कि राज्य का संचालन कैसे किया जाता है ! ऐसे में सर्वहारा के पास हारी हुई क्रांतियों के निष्कर्ष और निष्पत्तियों का समाहार करते हुए और मार्क्सवाद की कसौटी पर इसे आत्मसात करते हुए नए समाजवादी तजुर्बे करने और सीखने के सिवा और कोई चारा नहीं है. इसी प्रक्रिया द्वारा ही मार्क्सवाद एक कट्ठ्मुल्लापन (dogma) होने के विपरीत अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास द्वारा अपने विकास की उच्चतर मंजिल को छूएगा और यह क्रांतियों के पिछले रोल मॉडल रहे फ्रेमवर्कों को तहस नहस कर डालेगा.

सुरेश चिपलूनकर [ Suresh Chiplunkar ] के इन शब्दों “बहरहाल, अकेले प्याज़ के मुद्दे पर जब भाजपा सरकार गिर सकती है तो सभी वस्तुओं के गत 5 साल में तीन गुना महंगे होने पर भी सरकार का न गिरना “आश्चर्यजनक” क्यों नहीं है, यह मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं” का हम स्वागत करते हैं. हमने लिखा था

“वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा.”

पूंजीवादी में महंगाई कोई नया घटनावृत नहीं है. दशकों बीत गए जब मुंबईया फिल्मों में ‘बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी’, लोगों ने सुना और महंगाई की इस परिघटना को पूंजीवाद के एक ज़रूरी लक्षण के रूप में स्वीकार किया. दरअसल, पेट्टी-बुर्जुआ बुर्जुआओँ  का सताया होने के कारण महंगाई -महंगाई चिल्लाने लगता है जबकि वस्तुओं और मजदूरी की दर सरकार द्वारा तय न होकर क्लासिकीय पूंजीवादी व्यवस्था में (इस क्लासिकीय पूंजीवाद के चेहरे को लोक-हितेषी दिखाने हेतू, 1930 की पहली विश्व महामंदी से डरे पूंजीवाद को बचाने के लिए कीन्स समाजवाद से उधार लेकर नुस्खे-टोटके प्रगट हुए थे जिसे बुर्जुआ राज्यों ने नवउदारवादी दौर में फैंक दिया. विडम्बना यह है कि पूंजीवाद कीन्स के नुस्खों-टोटकों की ओर वापस भी नहीं लौट सकता) मार्केट द्वारा मांग और पूर्ति के नियमानुसार निर्धारित होती हैं जिसे पूंजीवाद में निहित कई फैक्टर प्रभावित करते हैं क्योंकि मांग और पूर्ति अपने-आप वस्तुओं और मज़दूरी की दर तय नहीं कर सकती. पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों को भारत जैसे देश में, बेहद सस्ती दरों पर श्रम शक्ति का उपलब्ध होने का कारण, यहाँ की बढ़ी हुई जनसंख्या  में दीखता है जबकि इसका राज प्रधानमंत्री के उस वक्तव्य में निहित है कि यहाँ की 70 प्रतिशत आबादी 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती है. श्रम-शक्ति के पुनरुत्थान के लिए इतना कम खर्च बहुत ही कम देशों में होता है. बहरहाल, कहना इतना ही है कि पूंजीवाद में, श्रम-शक्ति भी अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती है और उसके पुनरुत्थान का खर्च या श्रम-शक्ति का मूल्य उसके पुनरुत्थान पर लगे सामाजिक ज़रूरी श्रम-समय (Socially necessary labor time) के बराबर होता है.

महंगाई से हम न केवल चिंतित हैं बल्कि इसकी सबसे ज्यादा मार सर्वहारा वर्ग पर ही पड़ने के कारण  पीड़ित भी हैं  लेकिन पेट्टी-बुर्जुआ के वर्ग दृष्टिकोण के अनुसार बिलकुल नहीं. चरित्र में भारत जैसी ही पूंजीवादी दृष्टिकोण अनुसार  तेजी से विकास की और अग्रसर विश्व की ब्राजील, अर्जेंटीना, मेक्सिको, चीले, द. अफ्रीका, नाईजिरिया, मिस्त्र, ईरान, तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिप्पीन्स, भारत आदि लगभग दर्ज़न एक अर्थव्यवस्थाओं को, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, दुनिया के सबसे सस्ते मुल्को में शुमार करते हैं क्योंकि पूंजी द्वारा यहाँ  उपलब्ध श्रम-शक्ति का अँध-शोषण, बेहद सस्ती दरों पर किया जाता है. सस्ती श्रम-शक्ति होने के कारण सस्ती जिन्से उपलब्ध करवाना केवल इन्हीं मुल्कों के बस की ही बात है. ये देश दुनिया के विकसित पूंजीवादी देशों के मुकाबले में सस्ती उपभोक्तावादी जिंसों का धडाधड उत्पादन कर रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी पूँजी के इस खेल में देशी पूंजीपति मिलकर सर्वहारा वर्ग का कचूमर निकाले हुए हैं जिसे हम विकास के नाम पर अनदेखा नहीं कर सकते. इस लिहाज से हमारा यह कहना कि भारत मुकाबलतन महंगा देश न होकर एक सस्ता देश है कहाँ गलत है ? क्या इसकी पुष्टि वे नहीं करते जिनके पास डॉलर हैं ? उपरी वर्गों की तो छोडिये मध्यम वर्ग के जीवन स्तर की 1970 की दशा और उसकी वर्तमान उपभोक्तावादी स्थिति की तुलना कीजिए. अब जरा सर्वहारा वर्ग जिसके बारे में प्रधानमंत्री जी बीस रूपए से कम गुजारा करने वाला वर्ग बताते हैं उसके 1970 के जीवन स्तर और आज के जीवन स्तर की तुलना कीजिए. क्या उसने उन चरागाहों को नहीं खो दिया जहाँ वह अपनी भेड़ बकरियां चराकर गुज़र-बसर कर लिया करता था? क्या उसके नीचे से उसकी झोंपडी की ज़मीन नहीं खिसक गयी है?

लेकिन हम सत्तर या उसके पीछे की दलदल में वापस लौटने का भी इरादा नहीं रखते हैं. कुछ महानुभावों की यादों में “अहा ग्राम्य जीवन’ का नोस्टालिजिया हो सकता है वे हमसे उसी नोस्टालिजिया में जीने की स्वतंत्रता की मांग कर सकते हैं जिसका हमें कोई शिकवा नहीं है लेकिन हम भी उनसे, लेनिन की भाषा की मदद लेकर, कहना चाहते हैं कि ऐ महानुभावों ! आप उस दलदल में लौट जाना चाहते हैं, आपको वहाँ लौटने की पूरी स्वतंत्रता और हक़ है लेकिन हम भी स्वतन्त्र हैं कि आप को उस दलदल में छोड़कर आगे बढे, हमें पूरा हक़ है कि, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, इस पूंजीवाद के  दानवी चेहरे से लोक-हितेषी मेक-अप का पर्दाफाश करें क्योंकि पूंजीवाद मेहनतकश अवाम की जीवनचर्या को पहले से कहीं ज्यादा बदतर, पहले से कहीं ज्यादा दुष्कर बनाए जा रहा है. विकास के नाम पर जिसमे पेट्टी-बुर्जुआ अपने दिलो-दिमाग को पूंजीपति टोली के साथ मिलाकर रखता है और विकास-विकास की चिल्ल-पौ मचाता रहता है लेकिन जब पूँजी अपने तर्क द्वारा उसे हजम कर जाती है तो वह चिल्लाने लग जाता है पर  फिर भी वह अपने पेट्टी-बुर्जुआ दृष्टिकोण का त्याग नहीं करता – मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण को नहीं अपनाता, का उपहास उडाने की हमें भी पूरी स्वतंत्रता है. हम सर्वहारा वर्ग से आह्वान करते हैं कि पूंजी के इस दुश्चक्र को तोड़कर ही, वह केवल और केवल समाजवादी क्रांति द्वारा समाज और इतिहास को आगे गति दे सकता है क्योंकि पूंजी अपने ही तर्क द्वारा अप्रासंगिक हो चुकी है , यदि वह प्रासंगिक है तो केवल उसके हरकत में न होने से है.

विज्ञान की प्रत्येक शाखा की अपनी एक अलग शब्दावली होती है. फिजिक्स, कैमिस्ट्री या जीवविज्ञान का अध्ययन करते समय नए विद्यार्थियों को उनके कुछ शब्द सीखने पड़ते हैं. इसी प्रकार राजनीती और समाजशास्त्र के सिद्धांतों के अध्ययन के वक्त सम्बंधित शब्दावली की गैर-मौजूदगी में ये विषय बेहद “बोझिल” और कठिन लगते हैं. सुरेश चिपलूनकर कहते हैं;

“मैं तो एक मूढ़ व्यक्ति हूँ”, न तो मैं बड़ी-बड़ी ना समझ में आने वाली पुस्तकें पढ़ता हूँ, न ही वैसा लिख पाता हूँ… 🙂 । मैंने तो अपनी असफ़लता को भी खुल्लमखुल्ला स्वीकार किया है” और वे मांग करते हैं कि “मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं…।”

विज्ञान की भाषा विज्ञान के युग में वैज्ञानिक न होगी तो कैसी होगी. क्या हम रोजमर्रा की खाने-पीने और अघाने वाली भाषा द्वारा इसका अध्ययन-मनन कर सकते हैं ? यह मेहनत से जी चुराना नहीं तो और क्या है?  यह सब पलायनवाद नहीं तो और क्या है ?

रहा सवाल, मजदूर वर्ग द्वारा इस भारी-भरकम शब्दाबली को सीखने-समझने का तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्स की ‘पूंजी’ छपते ही, जर्मन की मजदूर जमात में लोकप्रिय हो गयी थी. हाँ, प्रोफेसरों को इसे समझने-पढने में जो दिक्कत आती है उसके बारे में हम कुछ कह नहीं सकते. मौजूदा समय  विपर्य का दौर है – मजदूर वर्ग की लहर का  दौर नहीं. बुद्धिजीवी वर्ग के लिए इस तरह के दौर का इतिहास में बड़ा महत्त्व रहा है क्योंकि इस शांति भरे दौर (?) में वह चिन्तन-मनन करने के लिए काफी समय निकाल सकता है. जहाँ तक लहर के दौर का सवाल है तो उस वक्त सर्वहारा वर्ग यह नहीं देखता कि मार्क्स, लेनिन, माओ आदि ने क्या कहा. वह देखता है तो अपने हित ! उस वक्त समस्या होती है तो बुद्धिजीवी वर्ग के लिए. सैद्धांतिक अस्त्र से रहित उसके प्रतिक्रियावादियों के हाथों खेल जाने की पूरी-पूरी संभावना होती है जबकि इसके विपरीत अगर वह सिद्धांत से चाक-चौबंद होता है तो क्रांति और समाज को आगे की ओर गति देने वाली उस वाहक शक्ति को वह, सही दिशा प्रदान कर सकता है और एक नए युग का सूत्रपात करने में अपनी भूमिका निभा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे एक प्रसूति-विशेषज्ञ की भूमिका जनन-पीड़ाओं  को कम करने की होती है.

दूसरा सवाल कि सिद्धांत को  अमल द्वारा कैसे परखा जाये तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्सवाद कोई एकेडमिक चीज तो है नहीं ! इसे परखने की लैब तो यह समाज ही है. इसके लिए बस इतना ही, कि आमलेट खाने के लिए अंडा तो फोड़ना ही होगा.

अंत में एक बार फिर, हम बुद्धिजीवी वर्ग का आह्वान करते हैं कि वह आगे बढे और इस संजीदा बहस को संजीदगी के साथ ही आगे बढाए.

नोट : श्रम-शक्ति अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती तो है लेकिन अन्य जिंसो से इसलिए अलग है कि इसे मनुष्य के शरीर से अलग नहीं किया जा सकता और दूसरी जिंसों के विपरीत यह अकेली ऐसी जिन्स है जो  बेशी मूल्य या अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष (surplus value) पैदा करती है.

सुने : दुनिया के हर सवाल केhttp://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/duniakeharsavaalke.mp3?attredirects=0

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कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

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इस पोस्ट से सम्बंधित प्राप्त टिप्पणियों के पश्चात् यह ज़रूरी हो गया है कि इस विषय पर वाद-विवाद जारी रखा जाये. चूंकि वर्तमान समाज वर्गों में विभाजित है इसलिए समाज में विचारों और दृष्टिकोण की विभिन्नता होना स्वाभाविक और  लाजिम है; कि  विचारों की विभिन्नता और उनके बीच जारी संघर्ष विचारों के विकास की ज़रूरी शर्त है. कला नैतिकता, धर्म, राजनीति, दर्शन आदि ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में मौजूद विचार चेतना के ही रूप हैं. हालाँकि सामाजिक चेतना का कोई भी रूप वस्तुगत यथार्थ से स्वतन्त्र नहीं होता बल्कि मानवी दिमाग अन्दर वस्तुगत यथार्थ का ही प्रतिबिम्बन होता है. सर्वहारा वर्ग के नव पुनर्जागरण और सर्वहारा वर्ग के नवप्रबोधन का यह आधुनिक  दौर समाज, राजनीति और संस्कृति आदि विषयों पर बुद्धिजीवी वर्ग से पहले के मुकाबले में कहीं अधिक संजीदगी की मांग करता है. अफ़सोस तब होता है जब विद्वान् कहलवाने वाले कुछ सज्जन बिना जाँच-परख किए और निम्न दर्जे के फतवे जारी करते हुए अपनी घोर अज्ञानता और असहनशीलता का प्रगटावा करते हुए दिखाई देते हैं.

लोकसभा चुनावों में जीत-हार के विश्लेषण की अपेक्षा पूंजीवादी जनतंत्र के नाम खेले जाने वाले इस खेल में, आम आदमी के साथ होने वाले छल को समझना ज़्यादा ज़रूरी है. आर्थिक असमानता की इस प्रणाली में राजनितिक अधिकारों की असमानता का जो हश्र होता है, वह किसी व्याख्या की मांग नहीं करता. बेहद खर्चीले इन चुनावों में बड़ी-बड़ी पूंजीवादी पार्टियाँ स्टार खिलाडी की हैसियत से सबसे ज्यादा पैसा बहाती हैं. क्षेत्रीय पूंजीपतियों की पार्टियाँ और निम्न बुर्जुआ विचारधारा की छोटी पार्टियाँ भी अपनी क्षमता से अधिक जोर-आजमाईश करती हैं. वामपंथी पार्टियाँ जो देश के कुछ भागों में असरदायक हैं, ने कभी भी मजदूरों और किसानों के संघर्षों को आर्थिक संघर्षों के दायरे से बाहर नहीं आने दिया. राजनीती के क्षेत्र में भी इनकी कार्रवाही सामाजिक-जनवाद यानिकि छोटे-मोटे आर्थिक सुधारों की लडाई तक सिमिट कर रह गयी है. ‘राज्य’ के चरित्र का ठोस विश्लेषण करके, देश में जारी वर्ग संघर्ष में, अलग-अलग वर्गों की पार्टियों का ठोस विश्लेषण करके, समाजवादी क्रांति का कोई प्रोग्राम ड्राफ्ट करना तो इनके एजेंडा पर रह ही नहीं  गया है . पूंजीपति वर्गों द्वारा प्रायोजित किए जाने  वाले  जनतंत्र के इस खेल में, ये भी अपनी किस्मत-आजमाईश के लिए प्रयत्नशील रहते हैं.

वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के इस दौर में आम लोगों की कंगाली और बदहाली में कई गुना बढोत्तरी हो चुकी है.

देश के कई हिस्सों, विशेषतय:  पश्चिमी बंगाल में किसानों में वामपंथ का काफी प्रभाव रहा है. कृषि में पूंजीवादी विकास ने किसानी क्षेत्र में जो आक्रोश पैदा किया है, कभी वामपंथ उस आक्रोश  का प्रतिनिधित्व करता रहा है जबकि अब  इस किसान वर्ग का प्रतिनिधित्व अन्य निम्न-बुर्जुआ हाथों में जाता हुआ साफ दीखाई दे रहा है.

इन चुनावों में 10 हज़ार करोड़ रूपए से अधिक की राशिः के ‘इन्वेस्ट’ (?) होने की रिपोर्टें हैं. पूंजीवादी ढांचे के अर्न्तगत बड़ा उत्पादक निरंतर छोटे उत्पादक को हड़प करता रहता है लेकिन अपनी विशेष आवश्यकताओं के मद्देनज़र बड़े उत्पादक को, किसी हद तक, छोटे उत्पादक की निरंतर आवश्यकता बनी रहती है. इसलिए नष्ट होने के साथ-साथ छोटा उत्पादक नए-नए रूपों में, जन्म भी लेता रहता है. जहाँ तक प्रतिस्पर्द्धा का सम्बन्ध है, छोटा उत्पादक बड़े उत्पादक के मुकाबले टिक नहीं पाता बल्कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बड़े उत्पादक के रहमोकर्म पर आश्रित और श्रापित होता है. राजनीती में यही अमल सीधे-सरल रूप से तो नहीं पर बड़े ही जटिल ढंग से प्रतिबिंबित होता है. लेकिन पूंजीवाद का बुनियादी स्वभाव यहाँ पर भी कायम रहता है. बड़े पूंजीपतियों की पार्टियों के समक्ष छोटे पूंजीपतियों की पार्टियों का जमें रहना, इतना आसान नहीं होता. पूंजीवादी चुनावों में छोटी पूंजीवादी पार्टियों का वही हाल होता है जो पूंजीवादी उत्पादन के क्षेत्र में छोटे उत्पादकों का होता है. इन चुनावों में करोड़पति प्रतिनिधियों की संख्या पहले से कहीं अधिक है और शेष बचे हुए सांसद करोड़पतियों के बफादार सेवादारों की हैसियत से, ससंद में पहुंचे हैं.

जहाँ तक विश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों का सम्बन्ध है, लगभग सभी संसदमार्गी पार्टियों के बीच आम सहमति बन गयी है – यहाँ तक कि वामपंथी पार्टियाँ भी, सैद्धांतिक विरोध के बावजूद, अमल में इन्हें लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. बंगाल की मिसाल तो सामने है ही, केंद्र में भी वामपंथी पार्टियों की हिमायत से चलने वाली पिछली श्री मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा भी यह अमल निर्बाध रूप से जारी रहा. हाँ, अपने-अपने वोट-बैंक के हिसाब-किताब के साथ-साथ, इन सभी पार्टियों के दरमियान, इन नीतियों को लागू करने सम्बन्धी तौर-तरीकों बारे मतभेद रहे हैं.

संसदीय चुनाव, बहुसंख्यक आबादी की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. इस सारे अमल में, आम आदमी की हालत का अंदाजा पाठक स्वयं लगा सकते हैं!  जहाँ तक आम आदमी के स्वयं समझने का सवाल है, वह पहले से कहीं अधिक बेहतर ढंग से समझे हुए है.

जब आम आदमी की बात हो रही हो तो तब हमारे कुछ विद्वान् बुद्धिजीवी सज्जन मेहनतकश वर्ग के बारे में बड़ी ही अजीब किस्म की धारणा पाले बैठे हैं. वे आम लोगों को अनपढ, गंवार या पता नहीं और किन-किन खिताबों से नवाजते हैं. आओ ज़रा हकीकत पर नज़र डालें.

पढाई या ज्ञान का बुनियादी मकसद, जिन्दा रहने या मानव के विकास के लिए, ज़रूरी वस्तुओं के उत्पादन के ढंग-तरीकों की खोज करना था. आरंभिक काल से, इसी मकसद के लिए, श्रम  को अमल में लाने हेतू, सामूहिक सरगर्मी को अपनाते हुए ही भाषा का जन्म हुआ. श्रम के अमल में आने के कारण, मानव पशु जगत से अलग हुआ और चिंतनशील प्राणी के रूप में, इस ब्रह्माण्ड के रंगमंच पर प्रगट हुआ. मानव चिंतन की पहली आवश्यकता या मानवी चिंतन की उत्पति, जिन्दा रहने के लिए उत्पादन की आवश्यकता से ही पैदा हुई.

आज भी मजदूर जो जटिल मशीनरी की बारीकियों को समझ सकता है, खेत मजदूर या किसान (केवल मेहनतकश) अति आधुनिक बीज तैयार कर सकता है, उसे अनपढ, गंवार कहना, अपनी अज्ञानता की नुमाईश करना नहीं तो और क्या है ?

जिस तरह यूरोप में, प्राचीन सामंतशाही को ख़त्म करने के लिए एक दौर गतिमान हुआ जिसके परिणामस्वरूप पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक दौर भी गतिमान हुआ और जिसका नतीजा बुर्जुआ इन्कलाब हुए और आधुनिक बुर्जुआ जनतंत्रों की स्थापना हुई थी इसी प्रकार भारत में [ देखें : 1857, आरंभिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता PDF File ]भी अपने ढंग की बौद्धिक सरगरमियां चलती रही हैं जिनकी तुलना (हर तुलना लंगडी होती है) कुछ भारतीय विद्वानों ने यूरोप के पुनर्जागरण और प्रबोधन से की है. यहाँ नोट करने वाली बात यह है कि बस्तीवादी घटनावृत ने हमारे देश में उस वक्त जारी इस घटनावृत को, बीच राह में ही कत्ल कर दिया या यूं कहें की उसकी भ्रूण हत्या हो गयी जिसकि परिणति, भारत के यूरोप से अलग किस्म के बौद्धिक अमल से गुजरने में हुई. विशेष ऐतिहासिक परस्थितियों के परिणामस्वरूप, हमारे यहाँ के बुद्धिजीवी, बड़े संभल-संभलकर चलने वाले, अपनी सुख-सुविधाओं के छिनने से डरते हुए, एक विशेष किस्म की सुविधाभोगी मानसिकता से ग्रस्त रहे हैं.

हम ईमानदार और जिंदा-ज़मीर के बुद्धिजीवियों से अपील करते हैं कि इतिहास की इस सच्चाई को समझने और पचाने की कोशिश करें. मजदूर वर्ग और मेहनतकश वर्गों को , राजनितिक तौर पर शिक्षित करने के लिए, आपकी सेवाओ की ज़रुरत है. आज हमारे देश में और विश्व स्तर पर भी, सर्वहारा नवपुनर्जागरण और प्रबोधन के अमल में बुद्धिजीविओं को अपना फ़र्ज़ पहचानना होगा.

सुने : भागो मत दुनिया को बदलोhttp://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/bhagomat.duniyakobadlo.mp3?attredirects=0

…शेष अगली किश्त

कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

में समाप्य

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जिस देश का प्रधानमंत्री स्वयं स्वीकार करे की देश की 7० प्रतिशत जनता 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती हैं वहां सुरेश चिपलूनकर [ कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है ] का यह कहना कि जनता को अपनी गरीबी या महंगाई जैसे मुद्दों से कोई वास्ता नहीं हैं, बात ज़रा गले से उतरी नहीं.

वैसे उन्होंने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि वे भारतीय जनता पार्टी की हार से दुखी हैं, ऐसे में जनता जनार्दन को दोषी करार दे देना ! कहीं उन्हें यह भ्रम तो नहीं कि वे सर्वज्ञाता हैं और जनता बेवकूफ.

वैसे आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं. उस ज़माने में किसान, मजदूर और देहाती का चरित्र मेहनतकश का था और मेहनतकश परजीवी वर्गों को हमेशा बेवकूफ दीखते हैं चाहे वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.

समाज शास्त्र कभी जनता को दोषी नहीं ठहराता अलबता वह सोई हुई हो सकती है, सोना कोई बुरी बात नहीं, किसी को उसे उठाना नहीं आता और वह मनोगत तरीके से दोष जनता पर मढ़ दे ? अगर हम समझतें हैं कि जनता हमारी मनोगत इच्छाओं का ख्याल करे, तो हमारी ओर लाखों नहीं करोडों उँगलियाँ उठ जाएँगी लेकिन अपनी इस मनोगत बीमारी की वजह से हो सकता है हमें एक भी दिखाई न दे.

वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा. और आतंकवाद पर वे चिंतित हैं मगर एकांगी तरीके से, समग्रता से नहीं, उन्हेँ हम दीपायन बोस के आतंकवाद के बारे में विभ्रम और यर्थाथ के अध्ययन की सलाह देंगे और इस पर एक विस्तृत टिपण्णी की अपेक्षा भी करेंगे.

अफलातून जी वास्तव में अफलातून हैं, उसी यूनानी परम्परा के जिसने जेल से भागने से इंकार कर दिया था कि इससे राज्य का पवित्र कानून टूटता है, उसी राज्य का जिसमें गुलाम और मालिक दो वर्ग थे और जहर का प्याला अपने लबों से लगा लिया मगर राज्य के तर्क पर आंच नहीं आने दी. ये बात करेंगे मगर शब्दों के हेरफेर के साथ. अब इन्होनें एक नया शब्द जोड़ बिठा दिया  “संघर्षशील प्रतिपक्ष” ? इसे अगर परिभाषित कर लें तो हम भी कुछ आगे बढ़ें.

वैसे सुरेश जी की एक बात से “लेकिन एकमात्र खुशी इस चुनाव रिजल्ट की यही है कि इन तीनों से पीछा छूटा” हम भी सहमत हैं लेकिन इसके साथ हम ये भी जोड़ देना चाहते हैं कि वामपंथी, समाजवादी, कम्युनिस्ट, जनशक्ति, बहुज़न जैसे शब्दों का प्रयोग करने से आप और हम (अवसरवादी) वे नहीं हो जाते जो इन शब्दों के अर्थ हैं लेकिन आप जैसे विचारवादी या आदर्शवादी लोग जो विचार को प्रथम और पदार्थ को गौण मानते हैं मानेंगे थोड़े ही. कोई लाख सर पटक ले तब भी आप नहीं मानेगे कि मनुष्य को उसके भौतिक हालात ही किसी विचार का कायल बनाते हैं. हाँ अपवाद हो सकतें हैं लेकिन हम वर्ग की बात कर रहें हैं. यहाँ अटल जी, मनमोहन सिंह और बहुतेरे वामपंथी, (एक का ज़िक्र हमने भी किसी अख़बार में पढ़ा कि वे राजस्थान से विधायक हैं परंतु पीले कार्डधारी हैं, खजाने से तनख्वाह नहीं लेते और राशन की दुकान पर उन्हें लाईन में खड़े देखा जा सकता है ), साफ़ और स्वच्छ छवि के हैं.

आप मिलना चाहेंगे उनसे ? मगर क्या फायदा. असल सवाल तो उन दलों का है – उनके चरित्र का है और साथ ही क्या बुर्जुआओं को साफ़ और स्वच्छ छवि के सेवक नहीं चाहिएँ?

एक कन्फ्यूजन हो सकता है कि कहीं हमने कांग्रेस को उस 70 प्रतिशत का सच्चा प्रतिनिधि तो घोषित नहीं कर दिया. बिल्कुल नहीं. बस विकल्पहीनता.

कुछ भविष्यवाणी हो सकती है. 20 प्रतिशत लोगों का लोकतंत्र जिसे हम बुर्जुआ अधिनायकवाद कहते हैं (इसलिए नहीं कि ऐसा हम कहते हैं यह तो हर कोई बगैर सिद्धांत के अपने अनुभव से ही समझता है) और अधिक मज़बूत हुआ है और आने वाले समय में श्रम और पूँजी की झड़पें त्वरित होंगी. इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए.

मार्क्सवाद से तो तथाकथित मार्क्सवादी भी मुनकर हो गएँ हैं आप की तो बात छोड़िए. लेकिन लेनिन द्वारा गद्दार कायुत्सकी के लिए कहे गए शब्द कि बुर्जुआ लोकतंत्र जहाँ पूँजी का राज होता है वहां मजदूर वर्ग संसदीय ढंग से सत्ता हासिल कर लेगा यह कोई लुच्चा और शोहदा ही कह सकता है. और लेनिन के यह शब्द उनकी मृत्यु के बाद चिल्ली और इंडोनेशिया में (केवल इंडोनेशिया में जहाँ कम्युनिस्ट संसदीय ढंग से मज़बूत हो रहे थे, 10 लाख लोगों को यह कहकर कत्ल कर दिया गया कि वे कम्युनिस्ट हैं) सही साबित हुए.

हाँ आप गलती न करें कि हम कोई भारतीय माओवाद या नकसलवाद का नया संस्करण हैं इसके लिए आप हमारा नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1 देखें.

और अब दो टूक बात. बुर्जुआ दलों का तो ऐसा होता ही है लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट दलों का स्वरूप भी संघाधिपत्यवादी रहा है. आप दो लाईनों के बीच लम्बा और सतत संघर्ष चलाए बगैर किसी बोलेश्विक चरित्र की पार्टी के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकते. यह गैर वैज्ञानिक है, गैर मार्क्सवादी है, विचारवादी और आदर्शवादी तरीका है जिसकी परणिति संशोधनवाद और दुस्साहसवाद ही होती है.

शहीद भगत सिंह विचार मंच उन बुद्धिजीवियों से यह स्पष्ट कर देना चाहता है कि भारत की वे पार्टियाँ जिन्हें कम्युनिस्ट पार्टियाँ कहा जाता (और यहाँ तक की विश्व की 99 प्रतिशत कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी) अपने उल्ट में बदल चुकीं हैं. हमें इसका अफ़सोस नहीं करना चाहिए क्योंकि सिद्धांत कहता है कि चीजें देर-सवेर अपने विपरीत में बदल जाती हैं. आज बीते युग की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियों को इकठ्ठा करके भानुमती का कुनबा जोड़ने से कुछ हासिल नहीं होने वाला. आज पार्टी गठन की अपेक्षा पार्टी निर्माण प्रमुख है.

हम उन बुद्धिजीवियों से जो श्रम को धन (यहाँ श्रीमान अफलातून द्वारा प्रस्तुत सुनील जी के उस लेख [ तलाश एक नए मार्क्सवाद की (२) : ले. सुनील ] का जिक्र भी करना ज़रूरी समझेंगे जिसमें उन्होंने बिना पूँजी और मार्क्स पढ़े किसी नए सिद्धांत को लिखने की सलाह दे डाली थी, उसमें उन्होंने मार्क्स  पर आरोप लगाया था कि वे श्रम की बिनाह पर धन के स्रोत में प्रकृति की भूमिका से मुनकर हैं जबकि पूंजी के प्रथम खंड के प्रथम अध्याय में मार्क्स ने उन अर्थशास्त्रियों को गलत ठहराया था जो श्रम को ही एकमात्र धन का स्रोत मानते थे) और ज्ञान का स्रोत मानते हैं, इस लम्बी और पीडादायक प्रक्रिया का हिस्सा बनने का आह्वान करते हैं ताकि वे अपने सर पर ज्ञान के इस क़र्ज़ का कुछ भुगतान करके सर्वहारा की अदालत में अपने कर्मों द्वारा कुछ तो सच्चे हों.
आमीन !

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शिकागो की हड़ताल और हे मार्केट की घटना

पहली मई को शिकागो में हड़ताल का रूप सबसे आक्रामक था। शिकागो उस समय जुझारू वामपन्थी मज़दूर आन्दोलन का केन्द्र था। हालाँकि वह आन्दोलन मज़दूरों की समस्याओं पर पर्याप्त रूप से साफ राजनीतिक रुख नहीं रखता था, फ़िर भी वह एक लड़ाकू और जुझारू आन्दोलन था। वह मज़दूरों का, आन्दोलन में जुझारू भावना बढ़ाने के लिए, आह्वान करने को हमेशा तैयार रहता था, ताकि मज़दूरों के जीवन की स्थितियों और काम करने की स्थितियों में सुधार लाया जा सके।

चूंकि शिकागो की हड़ताल में कई जुझारू मज़दूर दलों ने भाग लिया, इसलिए ऐसा माना गया कि शिकागो में हड़ताल सबसे बड़े पैमाने पर हुई। एक `आठ-घण्टा एसोसिएशन´ काफी पहले ही इस हड़ताल की तैयारी के लिए बन गया था। वामपन्थी लेबर यूनियनों से बनी `सेन्ट्रल लेबर यूनियन´ ने `आठ-घण्टा एसोसिएशन´ को पूरा सहयोग दिया, जो एक संयुक्त मोर्चा था, जिसमें फेडरेशन से लेकर `नाइट्स ऑफ लेबर´ और `सोशलिस्ट लेबर पार्टी´ तक शामिल थीं। `सोशलिस्ट लेबर पार्टी´ अमेरिकी मज़दूर वर्ग की पहली संगठित समाजवादी राजनीतिक पार्टी थी।

पहली मई के पिछले दिन रविवार को `सेन्ट्रल लेबर यूनियन´ ने एक लामबन्दी प्रदर्शन किया जिसमें 25,000 मज़दूरों ने हिस्सा लिया। पहली मई को शिकागो में मज़दूरों का एक विशाल सैलाब उमड़ा और संगठित मज़दूर आन्दोलन के आह्वान पर शहर के सारे औजार चलने बन्द हो गए और मशीनें रुक गयीं। मज़दूर आन्दोलन को कभी भी वर्ग-एकता के इतने शानदार और प्रभावी प्रदर्शन का एहसास नहीं हुआ था। उस समय आठ घण्टे के कार्य-दिवस के महत्त्व ने, और हड़ताल के चरित्र और विस्तार ने पूरे आन्दोलन को एक विशेष राजनीतिक अर्थ दे दिया। अगले कुछ दिनों में यह राजनीतिक अर्थ और भी गहरा होता गया। `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन पहली मई, 1886 की हड़ताल में अपनी पराकाष्ठा पर था। और इसने अमेरिकी मज़दूर वर्ग की लड़ाई के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया था।

इस दौरान मज़दूरों के दुश्मन भी चुप नहीं बैठे रहे। शिकागो में मालिकों और शहर के प्रशासन की मिली-जुली शक्तियों ने, जो जुझारू नेताओं को ख़त्म करने के लिए, और इसके जरिए शिकागो के समग्र मज़दूर आन्दोलन को रौंद डालने के लिए छटपटा रहीं थीं, मज़दूरों के जुलूस को गिरफ्तार कर लिया। 3 और 4 मई की घटनाएँ जो `हे मार्केट कांड´ के नाम से जानीं जातीं हैं, साफ तौर पर पहली मई की हड़ताल का परिणाम थीं। 4 मई को हे मार्केट स्क्वायर पर हुए प्रदर्शन में, 3 मई को `मैककार्मिक रीपर वर्क्स´ पर मज़दूरों की एक सभा पर पुलिस के बर्बर हमले का विरोध करने का आह्वान किया गया। इस क्रूर हमले में छ: मज़दूर मारे गए थे और कई घायल हुए थे। यह सभा जो हे मार्केट स्क्वायर पर हो रही थी, ख़त्म ही होने वाली थी कि पुलिस ने मज़दूरों की भीड़ पर हमला कर दिया। इसी बीच अचानक भीड़ में एक बम फेंका गया। इस हमले में चार मज़दूर और सात पुलिसवाले मारे गये। हे मार्केट का भयंकर रक्तपात, मज़दूर नेताओं पार्सन्स, स्पाइस, फ़िशर और एंजेल को फांसी और शिकागो के तमाम जुझारू नेताओं को कैद – संघर्षरत मज़दूरों को शिकागो के मालिकों का यह जवाब था। पूरे देश की मिलों-फैक्टरियों के मालिकों को चेतावनी मिल चुकी थी। 1886 के उत्तरार्द्ध में मालिकों ने 1885-86 के आन्दोलन के दौरान खोई हुई अपनी पुरानी स्थिति को फ़िर से पाने के लिए काफी आक्रामक रुख अपनाया।

शिकागो के मज़दूर नेताओं की फांसी के एक साल बाद फेडरेशन, (जो अब `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नाम से प्रसिद्ध हो चुका था) के सेंट लूई के सम्मेलन में, 1888 में, `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन को नए सिरे से जीवित करने का संकल्प लिया गया। पहली मई को, जो अब एक परम्परा बन चुकी थी, और जो दो साल पहले मज़दूरों के राजनीतिक वर्ग-प्रश्न के आधार पर हुए संघर्ष का केन्द्र-बिन्दु बन चुकी थी, `काम के घण्टे आठ करो´ की फ़िर से शुरुआत का दिन बनने का सम्मान मिला। पहली मई, 1890 को पूरे देश में छोटे कार्य-दिवस के लिए हड़तालें हुईं। 1889 के सम्मेलन में `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेता सैमुएल गोम्पर्स के नेतृत्व में हड़ताल आन्दोलन को सीमित करने की नीच कोशिश कामयाब हो गई। यह तय हुआ `कारपेन्टर्स यूनियन´, जिसे हड़ताल के लिए सबसे अच्छी तरह से तैयार यूनियन माना जाता था, हड़ताल में पहल करेगी और अगर यह पहल सफल सिद्ध होगी तो दूसरी यूनियनें भी हड़ताल में कूद पड़ेंगीं।

मई-दिवस अन्तराष्ट्रीय बन गया

गोम्पर्स ने अपनी आत्मकथा में मई-दिवस को पूरी दुनिया में प्रचलित करने में `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ का योगदान इस प्रकार बताया है : “जैसे-जैसे काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की योजनाएँ विकसित हो रही थीं, वैसे-वैसे हम यह लगातार सोच रहे थे कि हम अपने लक्ष्य को विस्तारित कैसे करें। जैसे-जैसे पेरिस में होने वाली मज़दूरों की अन्तरराष्ट्रीय कांग्रेस (इण्टरनेशनल वर्किन्गमेन्स कांग्रेस) का समय पास आता जा रहा था, मुझे यह बात समझ में आ रही थी कि, इस कांग्रेस से विश्वव्यापी सहानुभूति पाकर हम अपने आन्दोलन को लाभ पहुंचा सकते हैं।” गोम्पर्स ने काफी पहले ही अपने सुधारवादी और अवसरवादी रुझानों को दिखला दिया था। उसकी यही रुझानें आगे चलकर उसकी वर्ग-सहयोगवादी नीतियों में पूर्णत: फलीभूत हुईं। यही गोम्पर्स अब समाजवादी मज़दूरों के उस आन्दोलन का समर्थन पाने को तत्पर था, जिसके प्रभाव का उसने जबरदस्त विरोध किया था।

14 जुलाई, 1889 को बास्तीय के पतन की सौवीं सालगिरह पर, पेरिस में, कई देशों के संगठित समाजवादी आन्दोलनों के नेता एकत्र हुए। वे पेरिस में उस अन्तरराष्ट्रीय संगठन (प्रथम इण्टरनेशनल) के ढंग का मज़दूरों का एक अन्तराष्ट्रीय संगठन फ़िर से बनाने के लिए जुटे थे, जिसे 25 साल पहले उनके महान शिक्षकों-कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स ने बनाया था। `दूसरे इण्टरनेशनल´ की इस स्थापना बैठक में एकत्रित हुए प्रतिनिधियों ने अमेरिकी प्रतिनिधियों से 1884-86 के दौरान अमेरिका में चले 8 घंटे कार्य-दिवस के आन्दोलन के बारे में और हाल ही में उसके नये सिरे से उठ खडे़ होने के बारे में सुना। अमेरिकी मज़दूरों के उदाहरण से उत्साहित होकर पेरिस कांग्रेस ने निम्न प्रस्ताव स्वीकार किया : “कांग्रेस एक विशाल अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शन आयोजित करने का निर्णय लेती है ताकि एक विशेष दिन, सभी देशों में ओर सभी शहरों में मेहनतकश जनसमुदाय राजकीय अधिकारियों से कार्यदिवस कानूनी तौर पर घटाकर आठ घण्टे करने की तथा पेरिस कांग्रेस के अन्य निर्णयों को लागू करने की माँग करे। चूंकि `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ ने दिसम्बर 1888 में अपने सेंट लुई सम्मेलन में, पहले ही ऐसे प्रदर्शन के लिए पहली मई 1890 का दिन तय किया है, इसलिए इस दिन को अन्तराष्ट्रीय प्रदर्शन के लिए स्वीकार किया जाता है। विभिन्न देशों के मज़दूरों को अपने देश में मौजूद परिस्थितियों के अनुसार इस प्रदर्शन को जरूर आयोजित करना चाहिए।”

1890 का मई दिवस कई यूरोपीय देशों में मनाया गया। अमेरिका में समाजवादी पीटर मैकगाथर के नेतृत्व में `कारपेन्टर्स यूनियन´ ने आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग को लेकर हड़ताल आयोजित किया जिसमें निर्माण कार्य के मज़दूरों की अन्य यूनियनों ने भी भाग लिया। समाजवादियों के विरुद्ध असाधारण कठोर नियमों के बावजूद मज़दूरों ने जर्मनी के औद्योगिक शहरों में मई-दिवस मनाया। हालाँकि अधिकारियों ने चेतावनी दी थी और मज़दूरों के दमन का प्रयास भी किया लेकिन दूसरी यूरोपीय राजधानियों में भी इसी प्रकार प्रदर्शन हुए। अमेरिका में शिकागो और न्यूयार्क शहरों में हुए प्रदर्शनों का विशेष महत्त्व था। कई हज़ार लोगों ने आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग को लेकर सड़कों पर जुलूस निकाला और ये प्रदर्शन शहर के मुख्य केन्द्रों पर खुली सभाओं के साथ समाप्त हुए।

1891 की ब्रुसेल्स में आयोजित अगली कांग्रेस में इण्टरनेशनल ने मई दिवस के मूल लक्ष्य, यानी `काम के घण्टे आठ करो´ को तो दोहराया ही, लेकिन साथ ही उसने यह भी जोड़ा कि इस दिन अनिवार्य रूप से काम करने की परिस्थितियों में सुधार करने और राष्ट्रों के बीच शान्ति सुनिश्चित करने के लिए भी प्रदर्शन होना चाहिए। इस संशोधित प्रस्ताव में आठ घण्टे के कार्य-दिवस के लिए “मई-दिवस के प्रदर्शनों के वर्ग चरित्र” और उन माँगों के महत्त्व पर जोर दिया गया जो “वर्ग-संघर्ष को और गहरा कर रहे थे।” प्रस्ताव में यह भी माँग की गई है कि “जहाँ भी संभव हो” काम रोक दिया जाए। हालाँकि मई-दिवस की हड़तालों के पीछे कुछ ख़ास और तात्कालिक मुद्दे थे लेकिन इण्टरनेशनल ने प्रदर्शनों के उद्देश्यों को विस्तारित करने और उन्हें ठोस रूप देने का प्रयास शुरू कर दिया। ब्रिटिश श्रमिक संगठनों ने मई-दिवस की तात्कालिक माँगों पर भी हड़ताल करने से इनकार करके, और जर्मन सामाजिक जनवादियों के साथ मिलकर मई-दिवस के प्रदर्शन को मई के पहले रविवार तक स्थगित करने के पक्ष में मतदान किया।

अन्तरराष्ट्रीय मई-दिवस पर एंगेल्स के विचार

एंगेल्स ने 1 मई, 1890 को लिखी गई, `कम्युनिस्ट घोषणापत्र´ के चौथे जर्मन संस्करण की प्रस्तावना में, अन्तरराष्ट्रीय सर्वहारा संगठनों के इतिहास की समीक्षा करते हुए प्रथम अन्तरराष्ट्रीय मई-दिवस के महत्त्व की ओर ध्यान खींचा :

“जब मैं यह पक्तियाँ लिख रहा हूँ, यूरोप और अमेरिका का सर्वहारा अपनी शक्तियों की समीक्षा कर रहा है, यह पहला मौका है जब, सर्वहारा वर्ग एक झण्डे तले, एक तात्कालिक लक्ष्य के वास्ते, एक सेना के रूप में, गोलबन्द हुआ है : आठ घण्टे के कार्य-दिवस को कानून द्वारा स्थापित कराने के लिए…। यह शानदार दृश्य जो हम देख रहे हैं, वह पूरी दुनिया के पूँजीपतियों, भूस्वामियों को यह बात अच्छी तरह समझा देगा कि पूरी दुनिया के सर्वहारा वास्तव में एक हैं। काश! आज मार्क्स भी इस शानदार दृश्य को अपनी आँखों से देखने के लिए मेरे साथ होते।”

सर्वहारा के एक साथ हो रहे अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शन पूरी दुनिया के मज़दूरों की कल्पनाओं और क्रान्तिकारी सहजवृत्तियों को अधिकाधिक जागृत कर रहे थे और हर साल प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले मज़दूरों की संख्या बढ़ती जा रही थी।

1893 में ज्यूरिख में हुई इण्टरनेशनल की कांग्रेस में पहली मई के प्रस्ताव में जोड़ा गया निम्नलिखित अंश खुद ही आन्दोलन के प्रति मज़दूरों के बढ़ते समर्थन को दिखलाता है। इस कांग्रेस में एंगेल्स भी उपस्थित थे।

“पहली मई के दिन आठ घण्टे के कार्य दिवस के लिए होने वाले प्रदर्शन को साथ ही साथ अनिवार्यत: सामाजिक परिवर्तन के जरिये वर्ग विभेदों को नष्ट करने की मज़दूर वर्ग की दृढ़निश्चयी आंकाक्षा का प्रदर्शन भी होना चाहिए। इस प्रकार मज़दूर वर्ग को उस राह पर कदम रखना चाहिए जो सभी मनुष्यों के लिए शान्ति अर्थात अन्तरराष्ट्रीय शान्ति की ओर ले जाने वाली एकमात्र राह है।”

अनेक पार्टियों के सुधारवादी नेताओं ने पहली मई के प्रदर्शनों को ओजहीन बनाने की कोशिश की। उन्होंने संघर्ष के इन दिनों को आराम और मनोरंजन के दिनों में बदलने की कोशिश की। इसीलिए वे हमेशा मई-दिवस का प्रदर्शन पहली मई के सबसे नजदीक वाले रविवार को आयोजित करने पर जोर देते थे। रविवार को मज़दूरों को हड़ताल के जरिए काम ठप करने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उस दिन वैसे भी काम नहीं होता था। सुधारवादी नेताओं के लिए यह दिन मात्र मज़दूरों का एक अन्तराष्ट्रीय छुट्टी का दिन था, शोभायात्रायों का दिन और दूर देहातों के मैदानों में खेल का दिन था। जबकि मई-दिवस के बारे में ज्यूरिख कांग्रेस के प्रस्ताव में माँग यह की गई थी कि मई-दिवस “वर्ग-विभेद के खात्मे के लिए मज़दूर-वर्ग की दृढ़निश्चयी आकांक्षा के प्रदर्शनों का दिन” होना चाहिए, यानी, एक ऐसा प्रदर्शन जो शोषण और उजरती गुलामी पर आधारित पूँजीवादी व्यवस्था के ध्वंस के लिए हो लेकिन इससे सुधारवादियों को कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि वे अपने आप को इण्टरनेशनल के निर्णयों से बंधा हुआ नहीं मानते थे। वे इण्टरनेशनल की कांग्रेसों को मात्र अन्तरराष्ट्रीय दोस्ती और सद्भाव के लिए किए जाने वाले जमावड़े समझते थे। जैसे जमावड़े प्रथम विश्वयुद्ध से पहले अनेक यूरोपीय राजधानियों में हुआ करते थे। उन्होंने सर्वहारा-वर्ग की अन्तरराष्ट्रीय एकजुट कार्रवाइयों को हतोत्साहित और विफल करने के हर सम्भव प्रयास किये। अन्तरराष्ट्रीय कांग्रेसों के निर्णय, जो उनके विचारों से मेल नहीं खाते थे, उनके लिए कागजी प्रस्ताव मात्र थे। बीस साल बाद इन सुधारवादियों का “समाजवाद” और “अन्तरराष्ट्रीयतावाद” पूरी दुनिया के सामने बिल्कुल बेनकाब और नंगा खड़ा था। 1914 में इण्टरनेशनल बिखर गया, क्योंकि अपने जन्म से ही वह अपनी मृत्यु का कारण साथ लेकर चल रहा था, और वह कारण थे – मज़दूर-वर्ग को गुमराह करने वाले सुधारवादी नेता।

1900 की पेरिस की अन्तरराष्ट्रीय कांग्रेस में पुरानी कांग्रेसों में ली गई मई-दिवस के प्रस्ताव को दोहराया गया। साथ ही इस प्रस्ताव को इस बात के साथ और भी शक्तिशाली बनाएगी। लगातार बढ़ते मई-दिवस के प्रदर्शन अब शक्ति-प्रदर्शन में बदलते जा रहे थे। प्रदर्शनों में भाग लेने वाले और पहली मई को काम-बन्दी में हिस्सा लेने वाले मज़दूरों की तादाद लगातार बढ़ रही थी। मई-दिवस लाल-दिवस बन गया, एक ऐसा दिन जो जब भी आता था तो सभी देशों के प्रतिक्रियावादी शासकों के लिए अपशकुन साथ लेकर आता था।

मई दिवस पर लेनिन के विचार

रूसी क्रान्तिकारी आन्दोलन में अपनी शुरुआती सक्रियताओं के दौर में ही लेनिन ने रूसी मज़दूरों से मई-दिवस का परिचय कराने में और उन्हें यह बताने में कि यह प्रदर्शनों और संघर्षों का दिन है, विशेष योगदान दिया। 1896 में, जब लेनिन जेल में थे, उन्होंने `मज़दूर वर्ग की मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाली सेंट पीटर्सबर्ग यूनियन´ नामक एक मज़दूर संगठन के लिए मई-दिवस का एक पर्चा लिखा। यह मज़दूर-संगठन रूस में बने सबसे पहले मार्क्सवादी राजनीतिक ग्रुपों में से एक था। यह दस्तावेज़, गैर-कानूनी तरीके से जेल से बाहर लाया गया, मीमोग्राफी द्वारा इसकी दो हज़ार प्रतियों की नकल उतारी गयी और उन्हें चालीस कारखानों के मज़दूरों के बीच वितरित किया गया। यह पर्चा काफी छोटा था ताकि कम समझदार मज़दूर भी आसानी से समझ सकें। उस समय के एक व्यक्ति ने, जिसने पर्चे के प्रकाशन में मदद की थी, लिखा है – “जब एक महीने बाद 1896 में प्रसिद्ध टेक्सटाइल हड़ताल हुई, तो मज़दूर हमें बता रहे थे कि इस आन्दोलन  को संवेग देने वाला प्रथम प्रेरणास्रोत वही छोटा सा मई-दिवस पर्चा था।”

इस पर्चे में, फैक्टरियों के मालिक किस तरह अपने मुनाफे के लिए मज़दूरों का शोषण करते हैं, और अपनी स्थिति को सुधारने की माँग करने पर सरकार उन पर किस तरह अत्याचार करती है, यह बताने के बाद लेनिन मज़दूरों को मई-दिवस के महत्त्व के बारे में बताते हैं।

फ़्राँस, जर्मनी, इंग्लैण्ड और अन्य देशों में मज़दूर पहले ही शक्तिशाली यूनियनों में एकजुट हो चुके हैं, और उन्होंने अपने अनेक अधिकारों को लड़कर जीता है। वे 19 अप्रैल (1 मई) ¹पहले रुसी कैलेण्डर पश्चिमी यूरोपीय कैलेण्डर से 13 दिन पीछे चलता था।’  को एकत्र होते हैं, जो एक सामान्य छुट्टी का दिन होता है। उस दिन वे दमघोंटू कारखानों को छोड़कर, संगीत की लय पर अपने लहराते हुए झण्डों के साथ शहर की मुख्य सड़कों पर मार्च करते हैं – अपने मालिकों को लगातार अपनी बढ़ती हुई शक्ति दिखलाते हुए। उस दिन भारी संख्या में मज़दूर इन प्रदर्शनों में जुटते हैं, जहाँ भाषणों में, बीते सालों में मालिकों पर मिली जीतों को फ़िर से गिनाया जाता है और आने वाले सालों में संघर्षों की रणनीति तैयार की जाती है। इन प्रदर्शनों में मज़दूरों की हुंकार के नीचे दबे मालिकों की यह हिम्मत नहीं होती कि वे कारखानों में न आने के लिए मज़दूरों पर एक पैसे का भी जुर्माना करें। उसी दिन मज़दूर फ़िर से मालिकों के सामने फ़िर अपनी पुरानी मुख्य माँग रखते हैं : `आठ घण्टे काम, आठ घण्टे आराम, आठ घण्टे मनोरंजन´। यही वह माँग है जिसे आप और दूसरे देशों के मज़दूर लगातार बुलन्द कर रहे हैं।”

रूसी क्रान्तिकारी आन्दोलन ने मई-दिवस का पूरा फायदा उठाया। नवम्बर, 1900 में `खारकोव में मई दिवस´ नामक पुस्तिका में प्रकाशित प्राक्कथन में लेनिन ने लिखा :

“अगले छ: महीनों में, रूसी मज़दूर नयी शताब्दी के पहले वर्ष का मई-दिवस मनाएँगे। यही वह समय होगा कि जितना संभव हो उतनी बड़ी संख्या में जगह-जगह मई-दिवस मनाएँ। इसमें बड़े पैमाने पर मज़दूर हिस्सा लें। लेकिन हमारा लक्ष्य सिर्फ बड़ी संख्या में मज़दूरों का भाग लेना नही हैं, बल्कि पूरी तरह संगठित होकर भाग लेना है। एक संकल्प के साथ भाग लेना है, जो एक ऐसे संघर्ष का रूप ले, जिसे कुचला न जा सके, जो रूसी जनता को राजनीतिक आजादी दिला सके, और नतीजतन जो सर्वहारा को अपने वर्ग-विकास और फ़िर समाजवाद के लिए एक खुली लड़ाई का मौका दे।”

यह आसानी से समझा जा सकता है कि लेनिन मई-दिवस के प्रदर्शनों को कितना महत्त्व देते थे। उन्होंने मज़दूरों का छ: महीने पहले ही आह्वान कर दिया था कि मई-दिवस पर संगठित हो, उसे कैसे मनाएँ। उनके लिए मई-दिवस “रूसी जनता की राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए एक अदमनीय संघर्ष को खड़ा करने” के लिए और “सर्वहारा के वर्ग-विकास और समाजवाद के लिए रैलियां करने” का दिन था।

मई-दिवस के आयोजन कैसे “महान राजनीतिक प्रदर्शन बन सकते हैं”, इस पर बोलते हुए लेनिन ने 1900 के खारकोव मई-दिवस आयोजन को एक विशिष्ट महत्त्व की घटनाय् बताते हुए कहा-“इस दिन सड़कों पर बड़ी-बड़ी सभाएँ हुईं, भारी संख्या में मजूदरों ने हड़तलों में भाग लिया, लाल झण्डे फहराए गए, परचे में छपी माँगें प्रस्तुत की गयीं, और इन माँगों, यानी आठ घण्टे के कार्य-दिवस और राजनीतिक स्वतंत्रता की माँगों, के क्रान्तिकारी चरित्र का प्रदर्शन हुआ।”

लेनिन ने खारकोव के पार्टी नेताओं की आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग के साथ अन्य छोटी-मोटी और शुद्ध आर्थिक माँगों को मिलाने के लिए कड़ी भर्त्सना की, क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि मई-दिवस का राजनीतिक चरित्र किसी भी तरह धुंधला हो। इसके बारे में उपर्युक्त प्राक्कथन में ही वह लिखते हैं :

“इन माँगों में सबसे पहली माँग होगी आठ घण्टे के कार्य-दिवस की आम माँग, जो सभी देशों के सर्वहारा-वर्ग ने की है। इस माँग का सबसे पहले रखा जाना खारकोव के मज़दूरों की अन्तरराष्ट्रीय समाजवादी मज़दूर आन्दोलन के साथ एकजुटता के अहसास को दर्शाता है और निश्चित रूप से इसी लिए इस माँग को छोटी-मोटी आर्थिक माँगों से नहीं मिलाया जाना चाहिए, जैसे – फोरमैन द्वारा अच्छे बर्ताव की माँग या तनख्वाह में दस फीसदी की बढ़ोत्तरी की माँग। आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग पूरे सर्वहारा वर्ग की माँग है और सर्वहारा उसे एक-एक मालिक के सामने नहीं बल्कि सरकार के सामने रखता है, क्योंकि ये ही आज के सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के प्रतिनिधि हैं। सर्वहारा वर्ग यह माँग समूचे पूँजीपति वर्ग के सामने रखता है जो सभी उत्पादन के साधनों का मालिक है।”

मई-दिवस के राजनीतिक नारे

अन्तरराष्ट्रीय सर्वहारा के लिए मई-दिवस एक ख़ास दिन बन गया था। आठ घण्टे के कार्य-दिवस की मूल माँग के साथ कुछ दूसरे महत्त्वपूर्ण नारे जुड़ गए जिन पर मज़दूरों को मई-दिवस की हड़ताल और प्रदर्शनों के दौरान ध्यान देने के लिए आह्वान किया गया। इनमें ये नारे शामिल थे –

“अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर-वर्ग  की एकता-जिन्दाबाद”,

“साम्राज्यवादी युद्ध और औपनिवेशिक उत्पीड़न का विरोध करो”,

“राजनीतिक बंदियों को मुक्त करो”,

“सार्वभौमिक मताधिकार दो”,

“आन्दोलन करने का अधिकार दो”,

“मज़दूरों को राजनीतिक और आर्थिक संगठन बनाने का अधिकार दो।”

पुरानी इण्टरनेशनल में मई-दिवस के प्रश्न पर आखिरी बार 1904 में एम्सटर्डम कांग्रेस में विचार हुआ था। मई-दिवस के प्रदर्शनों में इस्तेमाल हो रहे नारों और इस बात पर समीक्षा करते हुए कि, कई देशों में अभी भी मई-दिवस पहली मई के बजाय मई के पहले रविवार को मनाया जा रहा है, इस कांग्रेस में पारित प्रस्ताव पुन: इन शब्दों में समाप्त होता है :

“एम्सटर्डम में अन्तरराष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस सभी देशों की सामाजिक-जनवादी पार्टियों और ट्रेड यूनियनों का आह्वान करती है कि वे पहली मई को पूरी ऊर्जा के साथ प्रदर्शन करें ताकि आठ घण्टे के कार्य-दिवस को कानून द्वारा लागू किया जा सके सर्वहारा की वर्ग माँगों को हासिल किया जा सके और अन्तरराष्ट्रीय शान्ति को स्थापित किया जा सके। पहली मई के प्रदर्शन का सबसे प्रभावशाली तरीका है – काम-बन्दी। इसलिए कांग्रेस सभी देशों के सर्वहारा संगठनों के लिए यह आदेश जारी करती है कि जहाँ भी सम्भव हो मज़दूरों को हानि पहुंचाए बिना पहली मई को काम बन्द कर दें।”

जब अप्रैल, 1912 में साइबेरिया में लेना के सोने के खानों के मज़दूरों का कत्लेआम हुआ तो रूस में एक बार फ़िर क्रान्तिकारी सर्वहारा जन कार्रवाई का प्रश्न उठने लगा। उसी साल के मई-दिवस पर सैंकड़ों हज़ार मज़दूर काम बन्द करके सड़कों पर उतर आए। यह जार के अत्याचारों को चुनौती थी जो 1905 की असपफल रूसी क्रान्ति के बाद से और भी निरंकुश शासन कर रहा था। इस मई-दिवस के बारे में लेनिन ने लिखा है :

“पूरे रूस में हुई मई की महान हड़ताल, इससे जुड़े सड़कों पर हुए प्रदर्शन, मज़दूरों का क्रान्तिकारी ऐलान, मज़दूरों को दिए गए क्रान्तिकारी भाषण, साफ तौर पर यह बताते हैं कि रूस एक बार फ़िर धधकती हुई, क्रान्तिकारी परिस्थिति में प्रवेश कर रहा है।”

पहले विश्व-युद्ध के दौरान मई-दिवस

सामाजिक-जनवादी नेताओं द्वारा युद्ध के दौरान किया गया विश्वासघात 1915 में अपनी पूरी नग्नता के साथ सामने आ गया। उन्होंने अगस्त, 1914 में साम्राज्यवादी सरकारों से हाथ मिला लिया था। इन विश्वासघातियों का यह भण्डाफोड़ इसी दोस्ती का अवश्यम्भावी परिणाम था। जर्मनी के सामाजिक जनवादियों ने मज़दूरों को काम पर लगे रहने के लिए कहा और फ्रांसीसी समाजवादियों ने एक विशेष घोषणा-पत्र में मालिकों को पहली मई से न घबराने के लिए आश्वस्त किया। दूसरे युद्धरत देशों के समाजवादियों के बहुलांश में भी ऐसी ही रुझानें दीख रही थीं। इन हालात में केवल रूस में बोल्शेविक और अन्य देशों में अल्पमत क्रान्तिकारी ही समाजवाद और अन्तरराष्ट्रीयतावाद के प्रति ईमानदार बने हुए थे। लेनिन, रोजा लक्जम्बर्ग और कार्ल लीबनेख्त की आवाजें सामाजिक अन्धराष्ट्रवाद के नशे में पागल लोगों के विरोध में उठ खड़ी हुईं। 1916 के मई-दिवस के दिन आंशिक रूप से हुई हड़तालों और सड़कों पर हुई खुली झड़पों ने यह दिखा दिया कि सभी युद्धरत देशों के मज़दूर अपनेआप को कमीने गद्दारों के जहरीले असर से मुक्त कर रहे हैं। सभी क्रान्तिकारियों की तरह लेनिन की नजर में “अवसरवाद का पतन (दूसरे इण्टरनेशनल का पतन) मज़दूर आन्दोलन के लिए काफी फायदेमन्द था” और लेनिन द्वारा गद्दारों से मुक्त एक नया इण्टरनेशनल बनाने का आह्वान वक्त की पुकार थी।

1915 की जिमरवाल्ड और 1916 की कीन्थॉल समाजवादी कांग्रेस में यह निश्चय किया गया कि लेनिन के `साम्राज्यवादी युद्ध को गृह-युद्ध में बदलने´ के नारे के तहत सारी दुनिया की क्रान्तिकारी अन्तरराष्ट्रीयतावादी पार्टियों और छोटी-छोटी समाजवादी पार्टियों की एकता को मजबूत किया जाएगा। 1916 के मई-दिवस पर कार्ल लीबनेख्त और समाजवादी आन्दोलन में उनके समर्थकों के नेतृत्व में बर्लिन में हुए विशाल प्रदर्शन मज़दूर-वर्ग की जीवन्त शक्तियों के प्रमाण थे, जो पुलिस के दमन और आधिकारिक नेताओं के विरोध के बावजूद आगे बढ़ती जा रही थी।

1917 में अमेरिका में युद्ध की घोषणा के बावजूद मई-दिवस की गतिविधियां रुकी नहीं। समाजवादी पार्टी के सर्वहारा तत्वों ने सेंट लुई में अप्रैल के शुरू में हुए आपात अधिवेशन में पारित युद्ध-विरोधी प्रस्ताव को गंभीरता से लिया, और मई-दिवस का इस्तेमाल साम्राज्यवादी युद्ध के विरोध में प्रदर्शन के लिए किया। 1919 में क्लीवलैण्ड में हुआ मई-दिवस का प्रदर्शन ख़ास तौर पर उग्र था। इसका नेतृत्व करने वाले चार्ल्स ई. रथेनबर्ग समाजवादी पार्टी के स्थानीय सेक्रेटरी थे। आगे चलकर वे कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक बने और उसके जनरल सेक्रेटरी भी रहे। 20,000 से भी ज्यादा मज़दूरों ने, इस प्रदर्शन में, पब्लिक स्क्वायर की सड़कों पर मार्च किया, और वहाँ पर हज़ारों नये लोगों ने इसमें जुड़कर इस प्रदर्शन को महान बनाया। पुलिस ने क्रूरता से इन मज़दूरों की सभा पर हमला किया जिसमें एक मज़दूर की मृत्यु हो गयी और अनेक मज़दूर बुरी तरह घायल हो गये।

1917 मई-दिवस, जुलाई और फ़िर अक्टूबर के दिन रूसी क्रान्ति के विकास के विभिन्न चरण थे जो बाद में रूसी क्रान्ति को उसके लक्ष्य तक ले गये। रूसी क्रान्ति ने , जिसने मानव जाति के इतिहास में एक नये युग की शुरुआत की, मई-दिवस की परम्पराओं को नया संवेग और महत्त्व दिया। धरती के छठे भाग पर सर्वहारा शक्ति की विजय ने उस आकांक्षा को जीवन में उतार दिया था जो `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेताओं के मई-दिवस प्रदर्शन की इस प्रतिज्ञा से झलकता है जो उन्होंने 1890 को न्यूयार्क के यूनियन स्क्वायर पर ली थी- “आठ घण्टे के कार्य-दिवस के लिए संघर्ष करते हुए हम अपने अन्तिम लक्ष्य से कभी नजर नही हटायेंगे – यानी (पूँजीवादी) उजरत प्रणाली का ध्वंस।”

रूसी मज़दूर-वर्ग इस लक्ष्य को सबसे पहले पूरा करने में सफल हुआ था। लेकिन 1917 के बाद `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेता उस लक्ष्य से काफी दूर जा चुके थे, जिसकी उन्होंने 1890 में घोषणा की थी। अब उनका पहला सरोकार पूँजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने और साम्राज्यवाद के लिए राहें आसान करना था। वे नहीं चाहते थे कि अमेरिकी मज़दूरों को रूसी सर्वहारा की उन ऐतिहासिक उपलब्धियों से प्रेरणा मिले, जिन्होंने मई-दिवस की संघर्ष भावना को एक नया अर्थ दिया था और जिस दिन मज़दूर-वर्ग अपनी अन्तरराष्ट्रीय एकजुटता तथा पूँजीवादी शोषण एवं उजरती गुलामी की व्यवस्था से मुक्ति के लक्ष्य की घोषणा करता है।

1923 में मई-दिवस के लिए `वर्कर´ नामक साप्ताहिक में चार्ल्स ई. रथेनबर्ग ने लिखा :

“मई-दिवस -वह दिन जो पूँजीवादियों के दिल में डर और मज़दूरों के दिल में आशा पैदा करता है। इस साल सारी दुनिया के मज़दूर अमेरिका में कम्युनिस्ट आन्दोलन को हमेशा से ज्यादा मजबूत पाएँगे….. महान उपलब्धियों के लिए रास्ता साफ है, और दुनिया की किसी भी जगह की तरह अमेरिका का भविष्य भी कम्युनिज्म है।”

इसी साप्ताहिक `वर्कर´ के करीब सत्रह साल पहले के एक अंक में जो कि मई-दिवस विशेषांक था, यूजीन वी. डेब्स ने लिखा था : यह सबसे पहला और एकमात्र अन्तराष्ट्रीय दिवस है। यह मज़दूर-वर्ग से सरोकार रखता है और क्रान्ति को समर्पित है।” यह अंक 27 अप्रैल 1907 को प्रकाशित हुआ था।

मई-दिवस की इस बढ़ती हुई जुझारू परम्परा के जवाब में `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेताओं ने केवल श्रम-दिवस के रिवाज को प्रोत्साहित किया, जो सितम्बर के पहले सोमवार को मनाया जाता था। मूलत: 1885 में स्थानीय स्तर पर इस दिन को स्वीकार किया गया था और बाद में मई-दिवस के आयोजनों को प्रभावहीन बनाने के लिए कई राज्य सरकारों ने इसे मान्यता दे दी। हूवर प्रशासन ने `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के सहयोग से पहली मई को `बाल स्वास्थ्य दिवस´ घोषित कर एक और जवाबी कार्रवाई की। बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में अचानक पैदा हुई इस रुचि को 1928 के `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के सम्मेलन के लिए कार्यकारिणी परिषद द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट को पढ़कर समझा जा सकता है। इसमें लिखा गया था – “कम्युनिस्ट अभी भी पहली मई को मज़दूर-दिवस के रूप में मनाते हैं। लेकिन आज के बाद से पहली मई `बाल स्वास्थ्य दिवस´ के रूप में जाना जाएगा। क्योंकि राष्ट्रपति ने कांग्रेस द्वारा पारित प्रस्ताव के मुताबिक यह आह्वान करते हुए लोगों से कहा है कि वे अब पहली मई को `बाल स्वास्थ्य दिवस´ के रूप में मनाएँ। इसका लक्ष्य यह है कि इस पूरे साल लोगों में बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा के प्रति जागरुकता पैदा की जाए। यह एक सबसे मूल्यवान लक्ष्य है। इसके साथ ही अब मई-दिवस न ही हड़ताल-दिवस के रूप में जाना जाएगा और न ही कम्युनिस्ट दिवस के रूप में।” (जोर लेखक का)

1929 का संकट

अनुभवों से कोई सीख न लेते हुए, विश्व-युद्ध के लगभग एक दशक बाद, प्रतिक्रियावादी ट्रेड यूनियन नेता, पूँजीवाद के अन्तर्गत स्थाई सम्पन्नता आने के भ्रम के बीज बो रहे थे। उनकी इस बात में कोई रुचि नहीं थी कि किस तरह हज़ारों-लाखों असंगठित मज़दूरों को एक झण्डे तले लाया जाए और इस बात से अवगत कराया जाय कि पूँजीवाद भारी संकटों के बीच फँसने और इन संकटों का बोझ मज़दूरों के उपर डालने वाला है। जब 1929 के अन्त में आर्थिक ध्वंस आया, और ट्रस्टों एवं एकाधिकारी संघों ने इस संकट का सारा बोझ मज़दूरों पर डालना चाहा तो मज़दूरों के पास एक ही रास्ता बचा – हड़तालों और बेरोज़गार मज़दूरों के जन-संघर्षों का रास्ता। इन संघर्षों के परिणामस्वरूप, जिनका नेतृत्व कम्युनिस्टों ने किया था, अमेरिकी मज़दूर और अधिक भयंकर विपदाओं को रोकने और अपने जनतान्त्रिक अधिकारों का दायरा बढ़ाने में सफल रहे। साथ ही, उन्होंने 1930 के दशक में, `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ और सी.आई.ओ. दोनों में, अमेरिकी मज़दूर वर्ग के इतिहास में ट्रेड यूनियन संगठन की महानतम प्रगति को दर्ज कराया। सी.आई.ओ. का 1935 में जन्म और विभिन्न उद्योगों के मज़दूरों में तेजी से इसका विस्तार पूरे मज़दूर आन्दोलन और देश के लिए ऐतिहासिक महत्त्व की प्रमुख उपलब्धि था। अमेरिकी मज़दूरों के इस उभार के नतीजतन नीग्रो लोगों के बराबर हकों के लिए संघर्ष और अमेरिका में एक जनतान्त्रिक मोर्चे को और मजबूत बनाने की स्थितियां बन गयीं।

साम्राज्यवादी युद्ध और क्रान्ति तथा एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट के द्वारा झकझोर दिए जाने के बाद, केवल डेढ़ दशक के छोटे से कालक्रम में विश्व पूँजीवाद स्पष्टत: एक आम संकट के दौर में प्रवेश कर गया। साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा जिसने प्रथम विश्व युद्ध को जन्म दिया था, इस संकट के कारण और भी भयंकर होती गयी। विश्व के छठे भाग पर पूँजीवाद के ख़त्म हो जाने, उपनिवेशों में स्वतंत्रता के लिए संघर्षों का दुर्दमनीय विकास और उन्नत पूँजीवादी देशों में अपने जीवन स्तर को उठाने तथा अपने जनतान्त्रिक अधिकारों को बनाये रखने एवं विस्तारित करने के लिए लगातार फौलादी होते इरादों से पूँजीवाद का यह आम संकट बढ़ता ही गया। ट्रस्ट और इज़ारेदार आर्थिक और राजनीतिक जीवन पर अपनी पकड़ बचाए रखने की बदहवासी भरी कोशिशों में लग गए और इतिहास के अपरिहार्य विकास को रोकने के लिए फासीवाद की आतंकवादी तानाशाही की शरण में चले गए। फ्रांस, इंग्लैण्ड और अमेरिका के इज़ारेदारों ने फासीवादी आन्दोलनों को प्रोत्साहित करने के लिए वह सब कुछ किया जो उनके बूते में था। उन्होंने पराजित जर्मनी और उन सभी देशों में, जहाँ मज़दूर वर्ग और प्रगतिशील ताकतों की कमजोरी और बिखराव ने फासीवादी विजय के लिए दरवाजे खोल दिए थे, फासीवाद को बढ़ावा दिया और अपनी थैलियां खोल दीं। इज़ारेदार पूंजी के इन सारे विश्वव्यापी प्रयासों ने न केवल जनतान्त्रिक उपलब्धियों को, जो शताब्दियों के संघर्षों के बाद हासिल हुई थीं, नष्ट करने की कोशिश की, बल्कि एक नए विश्व-युद्ध का रास्ता भी साफ कर दिया।

फासीवाद के विरुद्ध संघर्ष

1933 से 1939 के दौरान जर्मन फासीवाद ने पूरी दुनिया के प्रतिक्रियावादियों की भूमिका निभायी। एंग्लो-अमेरिकन साम्राज्यवाद से प्रोत्साहन पाकर और पूरी दुनिया पर कब्जा जमाने के अपने साम्राज्यवादी मंसूबों के तहत जर्मन फासीवाद ने योजनाबद्ध ढंग से दूसरे विश्वयुद्ध की तैयारियां शुरू कर दी थी। यह वही एंग्लो-अमेरिकी साम्राज्यवाद था जिसका शुरू से एक लक्ष्य था, समाजवाद के विनाश के लिए युद्ध, जिसके लिए अब वह नाजी जर्मनी को खड़ा करने में सहायता कर रहा था। दूसरी ओर जापानी साम्राज्यवाद भी अपने स्वार्थों के लिए इस कुकृत्य में शामिल हो गया। अपनी प्रकृति के अनुसार इस तरह का कोई भी युद्ध हर देश की राष्ट्रीय स्वतंत्रता के खिलाफ खड़ा होता था। इन स्थितियों में लगातार यह बात साफ होती गयी थी कि, मानव जाति का विकास मज़दूरों, किसानों और उपनिवेशों की दबाई और कुचली गयी जनता के हाथ में है। केवल वे ही कदम बढ़ा कर, पहल लेकर और अपनी एकता और प्रतिरोध के जरिए सभी देशों की जनतान्त्रिक शक्तियों व तत्वों को अपने इर्द-गिर्द गोलबन्द कर सकते हैं और इज़ारेदार पूँजी द्वारा प्रेरित प्रतिक्रियावाद के बढ़ते अनर्थकारी विकास को रोक सकते थे। इसीलिए, तीस के पूरे दशक के दौरान मई-दिवस, फासीवाद हमले का प्रतिरोध करने और एक नए विश्व-विध्वंस का विरोध करने के लिए सभी जनतान्त्रिक शक्तियों एवं जनता की एकता के आह्वान को लगातार गुंजायमान करता रहा।

द्वितीय विश्व-युद्ध ने साफ तौर पर यह दिखला दिया कि मज़दूर-वर्ग ही किसी राष्ट्र की वास्तविक रीढ़ की हड्डी है। फासीवाद शक्ति हथियाने और दुनिया को एक विनाशकारी युद्ध में झोंकने में इसलिए कामयाब हो सका क्योंकि मज़दूर वर्ग असंगठित था। लेकिन वह कहीं भी एकजुट और युद्धरत मज़दूर वर्ग पर विजय हासिल न कर सका, जो हर जगह प्रगति और जनतंत्र की रक्षा का नेतृत्व कर रहा था और मानवजाति के जनतान्त्रिक बहुमत को अपने इर्द-गिर्द गोलबन्द कर रहा था ताकि फासीवादी दानव का सर कुचला जा सके। इस युद्ध में हर जगह के जनतान्त्रिक लोगों ने अपनी आँखों से यह देखा कि ये सोवियत रूस और हर जगह के मज़दूर ही थे जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता, जनतंत्र और प्रगति के लिए फासीवाद के विरुद्ध इस ऐतिहासिक महायुद्ध की अगली कतारों में थे।

इस युद्ध के दौरान हर जगह के मज़दूरों ने काम पर रहकर और फासीवादी सेनाओं के ध्वंस के लिए हथियार बनाकर मई-दिवस मनाया। जब 1945 में युद्ध ख़त्म हुआ तो युद्ध के बाद के पहले मई-दिवस समारोहों में लाखों-लाख मज़दूर उमड़ पड़े, ख़ासकर यूरोप के विजेता और आजाद हुए देशों में। इन मज़दूरों ने युद्ध को जारी रखने की और फासीवाद के सभी अवशेषों को जड़ से उखाड़ फेंकने की अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी, ताकि हर-हमेशा के लिए पूरे मज़दूर वर्ग की जनता के अन्य प्रगतिशील तत्वों के साथ एकता कायम की जा सके, जो हमेशा के लिए इज़ारेदार पूँजी को इसके लिए अक्षम बना दे कि वह फ़िर से फासीवाद की छत्रछाया में जा सके और फासीवाद फ़िर अपना आदमखोर शासन कायम कर सके, ताकि जनतंत्र को जो जनता की सर्वश्रेष्ठ शक्ति है, स्थापित और विकसित किया जा सके, ताकि एक अनश्वर शान्ति का निर्माण किया जा सके और दमन- उत्पीड़न-शोषण से मुक्त समाजवादी विश्व के पथ पर अग्रसर हुआ जा सके।

हर देश का मज़दूर वर्ग मई-दिवस के अवसर पर, मानव-जाति के खुशहाल भविष्य और शान्ति के लिए संघर्ष करते हुए, अन्तरराष्ट्रीय एकजुटता और मैत्री की भावना के साथ सारी दुनिया की जनता को सलाम करता है।

कारखाने का निरंकुशतंत्र

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19. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

श्रम के साधन की अपरिवर्ती गति के तहत मज़दूरों की यांत्रिक अधीनता और काम करने वाले समुदाय की विचित्र बुनावट (जो भिन्न-भिन्न वर्ग के स्त्री और पुरुष से मिलकर बनती है) के कारण बैरक जैसा अनुशासन पैदा हो जाता है. यह अनुशासन फैक्टरी में पूर्ण व्यवस्था का रूप ले लेता है और उसमें दूसरों के काम की देखरेख करने का उपर्युक्त श्रम पूरी तरह से विकसित हो जाता है. इससे मज़दूर काम करने वालों और काम की देखरेख करने वालों, औद्योगिक सेना के साधारण सिपाहियों और हवलदारों में बंट जाता है… फैक्टरी नियमावली (जिसमें पूंजी निजी कानून बनाने वाले व्यक्ति की तरह और अपनी इच्छा के अनुसार मज़दूरों पर कायम अपने निरंकुश शासन को कानून का रूप देती है. परन्तु इस निरंकुशता के साथ उतरदायित्व का वह विभाजन जुड़ा हुआ नहीं होता है, और न ही उसके साथ प्रतिनिधिमूलक प्रणालियाँ जुडी होती हैं जो अन्य मामलों में बुर्जुआ वर्ग को बहुत पसंद होती हैं) श्रम-प्रक्रिया के उस सामाजिक नियमन का पूंजीवादी प्रहसन मात्र होता है जो विशाल पैमाने की सहकारिता के लिए और श्रम के औज़ारों के – विशेषकर मशीनों के – सामूहिक उपयोग के लिए आवश्यक होता है. मार-मारकर गुलामों से काम लेने वाले सरदार के कोड़ों का स्थान फोरमैन के जुमानों का रजिस्टर ले लेता है. सभी प्रकार के दंड स्वाभाविक रूप से जुर्मानों और उज़रत में कटौती का रूप धारण कर लेते हैं, और फैक्टरी लाइकरगसों की विधायी प्रतिभा ऐसी व्यवस्था करती है कि उनके बनाये कानूनों के कठोर अनुपालन की अपेक्षा उनके उल्लंघन से सेवायोजक को अधिक लाभ होता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 453-4)
मार्क्स इस सम्बन्ध में एंगेल्स को उद्धृत करते हैं जिन्होंने इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की जीवन स्थितियों के बारे में लिखी पुस्तक में, बीस साल पहले, कारखानों में कायम निरंकुशता का सजीव चित्रण किया था : “बुर्जुआ वर्ग ने सर्वहारा को जिस गुलामी की जंजीर से जकड़ दिया है, उस पर जितना अधिक प्रकाश फैक्टरी-व्यवस्था में पड़ता है, उतना और कहीं नहीं पड़ता. इस व्यवस्था में हर प्रकार की स्वाधीनता – कानूनी तौर पर और वास्तव में दोनों तरह – ख़त्म हो जाती है. मज़दूर को सुबह साढे पॉँच बजे फैक्टरी में हाज़िर होना पड़ता है. यदि उसे दो चार मिनट की देर हो जाती है तो उस पर जुर्माना किया जाता है. यदि वह दस मिनट देर से पहुँचता है तो उसे नाश्ते के समय तक घुसने नहीं दिया जाता और उसकी एक चौथाई मज़दूरी काट ली जाती है. उसे मालिक के हुक्म पर खाना, पीना और सोना पड़ता है…फैक्टरी की निरंकुश सीटी उसे बिस्तर से उठा देती है, नाश्ता और खाना बीच में छुड़ा देती है. और कारखानें में उस पर क्या गुजरती है ? यहाँ पर कारखाने का मालिक निरंकुश विधि-निर्माता होता है. वह जैसे चाहता है, वैसे नियम बनाता है, नियमावली में अपनी इच्छानुसार परिवर्तन करता रहता है और नयी बातें जोड़ता रहता है, और अगर वह बिलकुल बेहूदा बातें उसमें शामिल कर लेता है, तब भी अदालतें मज़दूर से यही कहती हैं, कि : ‘तुमने ये करार अपनी मर्ज़ी से किया है, अब तो तुम्हें उसका पालन करना ही होगा…नौ वर्ष की आयु से मृत्यु तक इन मज़दूरों को हर घड़ी यह मानसिक और शारीरिक यातना सहन करनी पड़ती है.” (कैपिटल, खंड 1, पृ. 453)
क्रांति के पहले रूस में कारखानों में कायम निरंकुशता का घृणित रूप, रूसी कारखाना मालिकों द्वारा जुर्मानों की व्यवस्था में किये गये परिमार्जन के स्तर को लेनिन के पैम्फ्लेट (‘दण्डों के कानून की व्याख्या’ – Explanation of the Law on Fines Imposed on Factory Workers) में अच्छे तरीके से चित्रित किया गया है.

दर्शन के प्रश्नों पर-2

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दर्शन के प्रश्नों पर-1

अब तक, विश्लेषण और संश्लेषण को स्पष्ट ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है। विश्लेषण अधिक स्पष्ट है लेकिन संश्लेषण के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा गया है। मैंने आई सू-चि[27] से बात की। उसका कहना है कि आजकल सिर्फ़ अवधारणात्मक संश्लेषण और विश्लेषण की बात की जाती है, और वस्तुगत प्रयोगात्मक संश्लेषण तथा विश्लेषण की बात नहीं की जाती। हम कम्युनिस्ट पार्टी और क्वोमिन्ताङ, सर्वहारा और बुर्जुआ, भूस्वामियों और किसानों, चीनी जनता और साम्राज्यवादियों का विश्लेषण और संश्लेषण कैसे करेंगे? उदाहरण के लिए, कम्युनिस्ट पार्टी और क्वोमिन्ताङ के मामले में हम ऐसा कैसे करेंगे। विश्लेषण तो बस यह प्रश्न है कि हम कितने मज़बूत हैं, हमारे पास कितना इलाका है, हमारे कितने सदस्य हैं, कितने सैनिक हैं, हमारी कमजोरियाँ क्या हैं? हमारे हाथ में कोई बड़ा शहर नहीं है, हमारी सेना की संख्या सिर्फ़ 1,200,000 है, हमारे पास कोई विदेशी सहायता नहीं है, जबकि क्वोमिन्ताङ को भारी विदेशी सहायता मिलती है। अगर आप येनान की तुलना शंघाई से करें, तो येनान की आबादी सिर्फ़ 7,000 है, इसमें (पार्टी और सरकार के) संगठनों के लोगों तथा सैनिकों (येनान में तैनात) को जोड़ दें, तो कुल योग 20,000 होता है। वहाँ सिर्फ़ दस्तकारी और खेती होती है। किसी बड़े शहर से इसकी तुलना कैसे की जा सकती है? हमारा मज़बूत पक्ष है कि हमारे साथ जनता का समर्थन है जबकि क्वोमिन्ताङ जनता से कटी हुई है। आपके पास ज्यादा इलाका है, लेकिन आपके सैनिक दबाव डालकर भरती किये गये हैं, और अफसरों तथा सिपाहियों के बीच टकराव है। स्वाभाविक है, उनकी सेना के एक खासे बड़े हिस्से के पास लड़ने की काफी क्षमता है, और ऐसा कतई नहीं है कि वे एक ही प्रहार से ढेर हो जायेंगे। उनका कमज़ोर पक्ष इस बात में है, उसकी कुंजी यह है कि वे आम जनता से कटे हुए हैं। हम आम जनता के साथ एकजुट हैं; वे आम जनता से कटे हैं।

वे अपने प्रचार में कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी सम्पत्ति को और पत्नियों को सर्वोपभोग्य बना देगी और वे इन बातों को प्राथमिक स्कूलों तक के स्तर पर प्रचारित करते हैं। उन्होंने एक गीत बनाया था: `जब चू तेह और माओ त्से-तुङ आयेंगे, मारते-काटते और तबाही मचाते हुए, तो तुम क्या करोगे?´ उन्होंने प्राइमरी स्कूल के विद्यार्थियों को यह गीत सिखा दिया, और जैसे ही विद्यार्थियों ने इसे गाया, सारे बच्चों ने घर जाकर अपने माता-पिता भाई-बहनों से इसके बारे में पूछा, और इस तरह हमारे लिए इस प्रचार का उलटा ही असर हुआ। एक छोटे बच्चे ने (गीत) सुनकर अपने पिता से पूछा। उसके पिता ने जवाब दिया : `तुम्हें पूछना नहीं चाहिए( जब तुम बड़े हो जाओगे तो खुद देखकर समझ जाओगे।´ वह मध्यमार्गी था। फिर बच्चे ने अपने चाचा से भी पूछा। चाचा ने उसे डाँट लगायी, और जवाब दिया : `ये सब मारने-काटने का क्या मामला है? अगर मुझसे फिर पूछा तो मार खाओगे।´ उसका चाचा पहले कम्युनिस्ट युवा लीग का सदस्य था। सभी अख़बार और रेडियो स्टेशन हम पर हमला करते थे। ढेर सारे अख़बार थे, हर शहर में कई दर्जन, हर धड़े का अपना अखबार था, और वे सब के सब, निरपवाद रूप से, कम्युनिस्ट विरोधी थे। क्या सारे सामान्य लोगों ने उनकी बात सुनी? कतई नहीं! हमें चीन के मामलों का कुछ अनुभव हुआ है, चीन एक `गौरैया´ है।[28] विदेशों में भी, अमीर-ग़रीब, प्रतिक्रान्ति और क्रान्ति, मार्क्सवाद-लेनिनवाद और संशोधनवाद के सिवा कुछ नहीं है। आपको यह बिल्कुल नहीं मानना चाहिए कि हर कोई कम्युनिस्ट-विरोधी प्रचार को मान लेगा और कम्युनिज्म का विरोध करने में शामिल हो जायेगा। क्या हम उस समय अखबार नहीं पढ़ते थे? फिर भी हम उनसे प्रभावित नहीं थे।

मैंने `लाल महल का सपना´ पाँच बार पढ़ी है, और इससे प्रभावित नहीं हुआ हूँ। मैं इसे इतिहास के तौर पढ़ता हूँ। पहले मैंने इसे कहानी के तौर पर पढ़ा, और फिर इतिहास के तौर पर। जब लोग `लाल महल का सपना´ पढ़ते हैं, तो वे चौथे अध्याय को ध्यान से नहीं पढ़ते , लेकिन दरअसल इसी अध्याय में इस किताब का सार है। इसमें लेङ लू-सिङ है जो जुङ-कुओ का वर्णन करता है, और गीत तथा टिप्पणियाँ रचता है। चौथे अध्याय `लौकी वाला भिक्षु लौकी का मामला तय करता है´ में `अफसरों के लिए ताबीज´ की चर्चा की गयी है। यह चार बड़े खानदानों का परिचय कराता है :

नानकिङ चिया के लिए

कहो हिप हिप हुर्रा!

वे जार भर-भरकर

तौलते हैं अपना सोना।

आह-पाङ महल

छूता है आसमान,

लेकिन इसमें समा नहीं पाता

नानकिङ शिह खानदान।

समन्दर के राजा को

जब कम पड़ते हैं। सोने के पलंग

तो पहुँचता है वह नानकिङ वाङ।

नानकिङ सुएह हैं इतने अमीर

कि उनके पैसे गिनने में

लग जायेगा सारा दिन….[29]

`लाल महल का सपना´ में चारों बड़े खानदानों का वर्णन किया गया हैं यह एक भीषण वर्ग संघर्ष के बारे में है, जिससे दर्जनों लोगों का भविष्य जुड़ा है, हालाँकि इनमें से बीस-तीस लोग ही शासक वर्ग में हैं। (गणना की गयी है कि (इस श्रेणी में) तैंतीस लोग हैं।) अन्य सभी, तीन सौ से ज्यादा लोग, दास हैं, जैसे युएह याङ, सू-चि, दूसरी बहन यु, तीसरी बहन यु, आदि। इतिहास पढ़ते समय, यदि आप वर्ग संघर्ष को अपना प्रस्थान-बिन्दु न बनायें, तो आप भ्रम में पड़ जायेंगे। वर्ग विश्लेषण से ही चीज़ों का स्पष्ट विश्लेषण किया जा सकता है। `लाल महल का सपना´ और आज तक, इस किताब पर हुए शोध से मुद्दे स्पष्ट नहीं हो सके हैं( इससे हम समझ सकते हैं कि समस्या कितनी कठिन है। यु पिङ-पो और वाङ कुन-लुन दोनों इसके विशेषज्ञ हैं।[30] हो चि फाङ [31][32] नामक एक सज्जन भी प्रकट हुए हैं। ये सब तो `लाल महल का सपना´ पर हाल में हुए शोध से सम्बन्धित हैं, पुराने अध्ययनों को तो मैं गिनाउँगा ही नहीं। `लाल महल का सपना´ के बारे में त्साई युवान-पेई का दृष्टिकोण गलत था( हू-शिह का दृष्टिकोण कुछ अधिक सही था।[33]

संश्लेषण क्या है? कि किस तरह दो विपरीत तत्व, क्वोमिन्ताङ और कम्युनिस्ट पार्टी मुख्य भूमि (चीन – अनु.) पर संश्लेषित हो गये। संश्लेषण इस तरह घटित हुआ: उनकी सेनाएँ आयीं, और हम उन्हें हज़म कर गये, हम एक-एक कौर करके उन्हें खा गये। यह याङ सिएन-चेन द्वारा बताये गये ढंग से दो को एक में मिलाने का मामला नहीं था, यह शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में मौजूद दो विपरीत तत्वों का संश्लेषण नहीं था। वे शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में नहीं रहना चाहते, वे आपको हजम कर जाना चाहते हैं वरना, वे येनान पर हमला क्यों करते? उनकी सेना तीनों सीमाओं पर तीन सिएन को छोड़कर उत्तरी शेन्सी मे हर जगह घुस चुकी थी। आपके पास अपनी आज़ादी है, और हमारे पास अपनी आज़ादी हैं आप 250,000 हैं, और हम 25,000 लोग।[34] चन्द ब्रिगेड, 20,000 आदमियों से कुछ ज्यादा। विश्लेषण कर लेने के बाद, अब हम संश्लेषण कैसे करें? अगर आप कहीं जाना चाहते हैं, तो सीधे आगे जाइये( हम फिर भी एक-एक कौर करके आपकी सेना को निगल जायेंगे। अगर हम जीतने के लिए लड़ सकते थे, तो हम लड़ते थे, अगर नहीं जीत सकते थे, तो हम पीछे हट जाते थे। मार्च 1947 से मार्च 1948 तक, (दुश्मन की) एक पूरी सेना हवा में ग़ायब हो गयी, क्योंकि हमने उनके दसियों दजार सैनिकों को ख़त्म कर दिया। जब हमने ई-चुझान का घेरा डाला, और ल्यू कान शहर को मुक्त कराने आया, तो मुख्य कमाण्डर ल्यू कान मारा गया, उसके तीन डिवीज़नल कमाण्डरों में से दो मारे गये और तीसरा बन्दी बना लिया गया, और पूरी सेना का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। यह संश्लेषण था। उनकी तमाम बन्दूकें और तोपखाना हमारे पक्ष में संश्लेषित हो गया और सैनिक भी संश्लेषित हो गये। जो हमारे साथ रहना चाहते थे वे रह सकते थे और जो नहीं रहना चाहते थे उन्हें हमने जाने का ख़र्चा दे दिया। जब हमने ल्यू-कान को ख़त्म कर दिया तो ई-चुआन में तैनात ब्रिगेड ने बिना लड़े हथियार डाला दिये। तीन बड़े अभियानों – ल्याओ-शेव, हुआई-हाई और पीकिङ- त्येनित्सन – में संश्लेषण का हमारा तरीका क्या था? फू त्सो-ह 400,000 आदमियों की अपनी सेना सहित, बिना लड़े, हमारे पक्ष में संश्लेषित हो गया और उन्होंने अपनी सारी रायफलें सौंप दीं।[35] एक चीज़ का दूसरे को खा जाना, बड़ी मछली का छोटी मछली को खा जाना, यह संश्लेषण है। इसे इस तरह से किताबों में कभी प्रस्तुत नहीं किया गया है। मैंने भी कभी अपनी किताबों में इसे इस ढंग से नहीं प्रस्तुत किया है। याङ सिएन-चिन मानते हैं कि दो मिलकर एक हो जाते हैं और संश्लेषण दो विपरीत तत्वों के बीच का अटूट बन्धन हैं। इस दुनिया में कौन से बन्धन अटूट हैं? चीज़ें एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती है, लेकिन अन्तत: उन्हें टूटना होता है। कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे अलग नहीं किया जा सकता। हमारे संघर्ष के करीब बीस वर्षों में, हममें से भी बहुत से लोगों को दुश्मन हजम कर गया। जब 300,000 आदमियों की लाल सेना शेन-कान-निङ क्षेत्र में पहुँची, तो सिर्फ़ 20,000 लोग बचे थे। बाकी में से, कुछ हजम कर लिये गये थे, कुछ बिखर गये थे, कुछ मारे गये या घायल हुए थे।

हमें विपरीत तत्वों की एकता पर चर्चा करने के लिए अपने जीवन को प्रस्थान बिन्दु बनाना चाहिए। (कामरेड काङ शेङ : `सिर्फ़ अवधारणाओं की बात करने से काम नहीं चलेगा।´)

जब विश्लेषण चल रहा होता है, तो संश्लेषण भी होता है, और जब संश्लेषण हो रहा होता है, तो विश्लेषण भी होता है। जब लोग जानवरों और पौधों को खाते हैं, तो वे भी विश्लेषण से शुरू करते हैं। हम बालू क्यों नहीं खाते? अगर चावल में बालू हो तो वह खाने लायक नहीं होता। हम घोड़े, गाय या भेड़ की तरह घास क्यों नहीं खाते, सिर्फ़ बन्दगोभी जैसी चीज़ें क्यों खाते हैं? हमें हर चीज़ का विश्लेषण करना चाहिए। शेन वुङ ने सौ जड़ी-बूटियों को चखा,[36] और दवाओं के लिए उनके इस्तेमाल की शुरुआत की। दसियों हज़ार साल बाद, विश्लेषण ने स्पष्ट रूप से यह उजागर किया कि क्या खाया जा सकता है और क्या नहीं। टिड्डे, साँप और कछुए खाये जा सकते हैं। केकड़े, कुत्ते और जलीय जन्तु खाये जा सकते हैं। कुछ विदेशी उन्हें नहीं खाते। उत्तरी शेन्सी में लोग जलीय जन्तुओं को नहीं खाते, वे मछलियाँ नहीं खाते। वे वहाँ बिल्ली भी नहीं खाते। एक बार पीली नदी की भारी बाढ़ से हज़ारों किलों मछलियाँ किनारों पर जमा हो गयी( और उन्होंने उन सबकी खाद बना डाली। मैं एक देशी दार्शनिक हूँ, आप लोग विदेशी दार्शनिक हैं। (कामरेड काङ शेङ `क्या अध्यक्ष तीन श्रेणियों के प्रश्न पर कुछ कह सकते हैं?´) एंगेल्स ने तीन श्रेणियों की चर्चा की है, लेकिन जहाँ तक मेरी बात है मैं उनमें से दो श्रेणियों में विश्वास नहीं करता। (विपरीत तत्वों की एकता सबसे बुनियादी नियम है, गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण विपरीत तत्वों गुण और मात्रा की एकता है, और निषेध का निषेध होता ही नहीं है) उसी स्तर पर, गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण, निषेध का निषेध, और विपरीत तत्वों की एकता के नियम को साथ-साथ रहना एकतत्ववाद नहीं, बल्कि `त्रितत्वाद´ है। सबसे बुनियादी चीज़ है विपरीत तत्वों की एकता। गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण विपरीत तत्वों गुण और मात्रा की एकता है। निषेध का निषेध जैसी कोई चीज़ नहीं है। अभिपुष्टि, निषेध, अभिपुष्टि, निषेध… चीज़ों की विकास प्रक्रिया में, घटनाओं की श्रंखला में हर कहीं अभिपुष्टि और निषेध दोनों होते हैं। दास स्वामियों के समाज ने आदिम समाज का निषेध किया, लेकिन सामन्ती समाज के सन्दर्भ में, यह एक सकारात्मक बात थी। सामन्ती समाज दास समाज के सम्बन्ध में निषेध था, लेकिन पूँजीवादी समाज के सन्दर्भ में यह सकारात्मक था। पूँजीवादी समाज सामन्ती समाज के सम्बन्ध में निषेध था, लेकिन समाजवादी समाज के सन्दर्भ में यह फिर सकारात्मक है। संश्लेषण की पद्धति क्या होती है! क्या यह सम्भव है कि दास समाज के साथ-साथ आदिम समाज का भी अस्तित्व बना रहे? वे साथ-साथ मौजूद होते हैं, लेकिन यह समग्र का एक छोटा-सा हिस्सा है। समग्र तस्वीर यह है कि आदिम समाज समाप्त हो जायेगा। इससे भी बाढ़कर यह है कि समाज का विकास कई मंजिलों से गुजरकर होता है। आदिम समाज भी अनेक मंजिलों में बँटा हुआ है। उस समय तक, मृत पतियों के साथ औरतों को दफन कर देने की प्रथा नहीं थी, लेकिन तब पुरुष स्त्रियों के अधीन थे और फिर चीज़ें अपने विपरीत की ओर बढ़ीं और स्त्रियाँ पुरुषों के अधीन हो गयीं। इतिहास की यह मंजिल अब तक स्पष्ट नहीं हो पायी है, हालाँकि करीब दस लाख वर्ष से ज्यादा समय से यह चला आ रहा है। वर्ग समाज अभी 5000 वर्ष पुराना नहीं हुआ है, आदिम युग के अन्त में लुङ शान और याङ शाओ [37] जैसी संस्कृतियों में रँगे हुए बर्तन होते थे। एक शब्द में, एक दूसरे को हड़प कर जाता है, एक दूसरे को उखाड़ फेंकता है, वर्ग ख़त्म कर दिया जाता है, दूसरा वर्ग उठता है, एक समाज का खात्मा हो जाता है, दूसरा समाज उठ खड़ा होता है। स्वाभाविक रूप से, विकास की प्रक्रिया में हर चीज़ बिल्कुल शुद्ध नहीं होती। जब यह सामन्ती समाज तक पहुँचती है, तो दास प्रणाली की कुछ चीज़ें अब भी बची रहती हैं, हालाँकि सामाजिक ढाँचे का अधिकांश भाग सामन्ती प्रणाली की अभिलाक्षणिकताओं के अनुसार होता है। अब भी कुछ भू-दास और कुछ बँधुआ मजदूर होते हैं, जैसे दस्तकार कारीगर। पूँजीवाद समाज भी बिल्कुल शुद्ध नहीं होता, और ज्यादा उन्नत पूँजीवादी समाजों में भी एक पिछड़ा भाग भी होता है। उदाहरण के लिए, दक्षिणी संयुक्त राज्य अमेरिका में दास प्रणाली थी। लिंकन ने दास प्रणाली ख़त्म कर दी, लेकिन वहाँ अब भी काले गुलाम हैं, उनका संघर्ष बहुत तीखा है। दो करोड़ से ज्यादा लोग इसमें शामिल हैं और ये काफी बड़ी संख्या है। एक चीज़ दूसरी को नष्ट कर देती है, चीज़ें पैदा होती हैं, विकसित होती हैं, और नष्ट हो जाती हैं, हर कहीं ऐसा ही है। अगर चीज़ें दूसरी चीज़ों द्वारा नष्ट नहीं करती, तो वे खुद ही नष्ट हो जाती हैं। लोग क्यों मरते हैं? क्या कुलीन लोग भी मरते हैं? यह एक प्राकृतिक नियम है। जंगल मनुष्यों से ज्यादा जीवित रहते हैं, लेकिन वे भी कुछ हज़ार वर्ष तक रहते हैं। यदि मृत्यु जैसी चीज़ न होती, तो यह स्थिति असहनीय होती। अगर हम आज कनफ़्यूशियस को जीवित देख सकते, तो धरती इतने सारे लोगों को सँभालने लायक नहीं रहती। मैं चुआङ-ल्यू[38] के रवैये का समर्थन करता हूँ। जब उसकी पत्नी मर गयी तो वह थाली बजाकर गाना गाने लगा। जब लोग मरें, तो द्वन्द्ववाद की विजय का जश्न मनाने के लिए पुराने के ध्वंस का जश्न मनाने के लिए पार्टियाँ होनी चाहिए। समाजवाद भी समाप्त हो जायेगा। इसका समाप्त न होना ठीक नहीं, क्योंकि जब तक यह समाप्त नहीं होगा तब तक कम्युनिज्म नहीं आयेगा। कम्युनिज्म हज़ारों हज़ार साल तक रहेगा। मैं नहीं मानता कि कम्युनिज्म के तहत कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होंगे, कि यह गुणात्मक बदलावों द्वारा मंज़िलों में बँटा नहीं होगा। मैं इसे नहीं मानता! मात्रा गुण में बदलती है, और गुण मात्रा में बदल जाता है। मैं यह नहीं मानता कि यह दसियों लाख वर्ष तक बिना बदले गुणात्मक रूप से बिल्कुल एक समान बना रह सकता है! द्वन्द्ववाद की रोशनी में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। फिर यह सिद्धान्त है, `हरेक से उसकी क्षमतानुसार, हरेक को उसकी आवश्यकतानुसार।´ क्या आप मानते हैं कि वे दस लाख वर्ष तक इसी अर्थशास्त्र पर चलते रहेंगे? क्या आपने इसके बारे में सोचा है? अगर ऐसा होता, तो हमें अर्थशास्त्रियों की ज़रूरत नहीं होती, या फिर हम बस एक पाठ्यपुस्तक से काम चला सकते, और द्वन्द्ववाद ख़त्म हो जाता। विपरीत ध्रुवों की ओर निरन्तर गति द्वन्द्ववाद का प्राण है। अन्तत: मनुष्य जाति का भी अन्त होगा। जब धर्मशास्त्री कयामत के दिन की बात करते हैं, तो वे निराशावादी होते हैं। हम कहते हैं कि मनुष्य जाति का अन्त कुछ ऐसी चीज़ होगी जो मनुष्य जाति से भी उन्नत किसी चीज़ को जन्म देगी। मनुष्य जाति अभी अपनी शैशवावस्था में है। एंगेल्स ने आवश्यकता के राज्य से स्वतन्त्रता के राज्य में प्रवेश करने की बात की थी, और कहा था कि स्वतन्त्रता का अर्थ है आवश्यकता की समझ। यह वाक्य अधूरा है। यह आधी बात कहता है और शेष को अनकहा छोड़ देता है। क्या इसे महज समझने से आप स्वतन्त्र हो जायेंगे? स्वतन्त्रता का अर्थ है आवश्यकता की समझ और आवश्यकता का रूपान्तरण – आपको कुछ काम भी तो करना होता है। अगर आप बिना कोई काम किये सिर्फ़ खायेंगे, अगर आप महज समझेंगे, तो क्या यह काफ़ी होगा? जब आप कोई नियम ढूँढ़ते हैं, तो आपको इसे लागू करना आना चाहिए, आपको दुनिया का नये सिरे से निर्माण करना होगा, आपको जमीन खोदनी और इमारतें खड़ी करनी होंगी, आपको खदानें खोदनी होंगी, उद्योग लगाने होंगे। भविष्य में और भी ज्यादा लोग होंगे, और अनाज काफी नहीं होगा, तो लोगों को खनिजों से भोजन प्राप्त करना होगा। इस तरह, केवल रूपान्तरण द्वारा ही स्वतन्त्रता हासिल की जा सकती है। क्या भविष्य में इतनी स्वतन्त्रता सम्भव होगी? लेनिन ने कहा था कि भविष्य में, आसमान में इधर-उधर भागते हवाई जहाज इतने ज्यादा होंगे जैसे कि पतंगें। हर जगह वे टकरा जायेंगे, तो हम इसके बारे में क्या करेंगे? हम उन्हें कैसे चलायेंगे? और अगर हम ऐसा कर लेंगे, तो क्या चीज़ें इतनी स्वतन्त्र रहेंगी? पीकिङ में इस समय 10,000 बसें हैं, टोक्यो में 100,000 (वाहन) हैं (या यह 800,000 है?) इसलिए वहाँ वाहन दुर्घटनाएँ ज्यादा होती हैं। हमारे यहाँ कम कारें हैं और हम ड्राइवरों और लोगों को शिक्षित भी करते हैं, इसलिए दुर्घटनाएँ कम होती हैं। अब से 10,000 साल बाद पीकिङ में क्या होगा? क्या तब भी 10,000 बसें ही रहेंगी? वे कुछ नया अविष्कार कर सकते हैं, जिससे वे परिवहन के इन साधनों को त्याग सकते हैं, ताकि मनुष्य उड़ सके, किसी सरल-से यान्त्रिक उपकरण का प्रयोग करके किसी भी जगह उड़कर जा सके, और जहाँ जी चाहे उतर सके। आवश्यकता को सिर्फ़ समझने से कुछ नहीं होगा, हमें चीज़ों को बदलना भी होगा। मैं नहीं मानता कि कम्युनिज्म मंजिलों में विभाजित नहीं होगा, और कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होंगे। लेनिन ने कहा था कि सारी चीज़ें विभाजित की जा सकती हैं। उन्होंने परमाणु का उदाहरण दिया और कहा कि न सिर्फ़ परमाणु को विभाजित किया जा सकता है बल्कि इलेक्ट्रान को भी विभाजित किया जा सकता है। पहले, यह माना जाता था कि इसे विभाजित नहीं किया जा सकता, परमाणु के नाभिक के विखण्डन से जुड़ी विज्ञान की शाखा की उम्र अभी ज्यादा नहीं है, बस बीस या तीस वर्ष हुए हैं। हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने परमाणु के नाभिक को उसके संघटकों जैसे प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, एण्टी-न्यूट्रान, मेज़ान और एण्टी- मेज़ॉन में बाँटा है। ये तो भारी वाले संघटक हैं इसके अलावा हल्के वाले भी हैं। इनमें से ज्यादातर खोजें द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान या उसके बाद हुई हैं। यह तथ्य कुछ समय पहले खोजा जा चुका था कि इलेक्ट्रान को परमाणु के नाभिक से अलग किया जा सकता है। बिजली के तार में ताँबे या अल्युमिनियम से अलग किये गये इलेक्ट्रानों का प्रयोग किया जाता है। पृथ्वी के 300 ली के वातावरण में, भी असम्बद्ध इलेक्ट्रानों की परतों का पता लगाया गया है। वहाँ भी इलेक्ट्रान और परमाणु का नाभिक अलग-अलग हैं। अब तक इलेक्ट्रानों को तोड़ा नहीं जा सका है लेकिन एक दिन वे अवश्य ही इसे भी तोड़ सकेंगे। चुआ³-त्जू ने कहा है, `एक फुट की लम्बाई, जिसे रोज़ आधा किया जाता है, कभी भी घटकर शून्य नहीं होगी।´ (चुआङ-त्जू, अध्याय 33 का उद्धरण) यह सच है। अगर आपको विश्वास नहीं है, तो ज़रा सोचिये। अगर इसे घटा कर शून्य किया जा सकता, तो विज्ञान ही नहीं होता। तमाम तरह की चीज़ें निरन्तर और असीम ढंग से विकसित होती रहती हैं, और वे अनन्त हैं। समय और स्थान अनन्त हैं। जहाँ तक स्थान का सवाल है, वृहत और सूक्ष्य दोनों दृष्टिकोण से देखने पर, यह अनन्त है, इसे अन्तहीन ढंग से विभाजित किया जा सकता है। इसलिए, दस लाख वर्ष बाद भी वैज्ञानिकों के लिए करने को काम होगा। मैं `बुलेटिन ऑफ नेचुरल साइंसेज़´ में मूलभूत कणों पर सकाटा के लेख की बहुत सराहना करता हूँ।[39] मैंने पहले इस तरह का कोई लेख नहीं देखा। यह द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। वह लेनिन को उद्धृत करते हैं। दर्शनशास्त्र की कमजोरी है कि इसने व्यावहारिक दर्शन नहीं, सिर्फ़ किताबी दर्शन पैदा किया है। हमें हमेशा नई-नई चीज़ें सामने लानी चाहिए। वरना हमारा यहाँ क्या काम है? हमें वंशज किसलिए चाहिए? नयी चीज़ें यथार्थ में मिलती हैं, हमें यथार्थ को समझना चाहिए। अन्तिम विश्लेषण में, जेन चि-यू[40] मार्क्सवादी हैं या नहीं? मैं बौद्ध धर्म पर उनके उन लेखों की काफी सराहना करता हूँ। (उनके पीछे) कुछ शोध किया गया दिखता है, वह ताङ युङ-तुङ[41] के शिष्य हैं। वह सिर्फ़ ताङ वंश के बौद्ध धर्म की चर्चा करते हैं, और बाद के समय के बौद्ध धर्म पर सीधे कुछ नहीं कहते। सुङ और मिङ अधिभूतवाद ताङ वंश के चान स्कूल से विकसित हुए, और यह मनोगत प्रत्ययवाद से वस्तुगत प्रत्ययवाद की ओर एक आन्दोलन था।[42] बौद्ध धर्म और ताओ पन्थ दोनों ही हैं, और दोनों के बीच फर्क न करना ग़लत है। उन पर ध्यान देना उचित कैसे हो सकता है? हान यू की बातों का कोई मतलब नहीं है। उसका नारा था( `उनके विचारों से सीखो, उनकी अभिव्यक्ति के ढंग से नहीं।´ उसके विचार पूरी तरह दूसरों से नकल किये हुए थे, उसने बस निबन्धों का रूप और संरचना बदल दी। उसकी बातें बेमतलब थीं, और जो कुछ उसने कहा वह मूलत: प्राचीन पुस्तकों से लिया गया था। `शिक्षकों पर विमर्श´ जैसे लेखनों में कुछ नयापन है। ल्यू-हाउ अलग था, वह बौद्ध और ताओ भौतिकवाद की एक-एक बात जानता था।[43] लेकिन उसकी `स्वर्ग उत्तर देता है´ बहुत छोटी है। उसकी `स्वर्ग उत्तर देता है´ चू युआन की `स्वर्ग पूछता है´ से पैदा हुई है।[44] हज़ारों साल में सिर्फ़ इस एक आदमी ने `स्वर्ग उत्तर देता है´ जैसी कोई चीज़ लिखी है। `स्वर्ग उत्तर देता है´ और `स्वर्ग पूछता है´ किसके बारे में हैं? `स्वर्ग पूछता है´ में स्पष्ट ढंग से व्याख्या करने के लिए टिप्पणियाँ न हों, तो इसे पढ़कर आप कुछ नहीं समझ पायेंगे, आपको एक सामान्य झलक मिलेगी। `स्वर्ग पूछता है´ वाकई अद्भुत है, हज़ारों वर्ष पहले इसने ब्रह्माण्ड, प्रकृति और मनुष्य पर सवाल उठाये थे। (दो को एक में मिलाने के प्रश्न पर चर्चा के सम्बन्ध में) हुङ चि को कुछ अच्छी चीज़ें पुनर्मुद्रित करने और एक रिपोर्ट लिखने के लिए कहें।

टिप्पणियाँ

27आई सू-ची (1910-66) अपनी मृत्यु के समय उच्चतर पार्टी स्कूल के उपाध्यक्ष थे। वह पार्टी के अग्रणी दार्शनिक प्रवक्ताओं में से एक थे, जिन्होंने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर कृतियों का रूसी से अनुवाद किया था, और मार्क्सवाद को जनसाधारण तक ले जाने के लिए अनेक पुस्तकें तथा लेख लिखे थे। 1 नवम्बर 1964 को उन्होंने पीपुल्स डेली में `बुर्जुआ´ दार्शनिक याङ सिएन-चेन पर हमला करते हुए एक लेख प्रकाशित कराया।

28 `गौरैया की चीरफाड़´ की उपमा ज्ञान अर्जित करने और अनुभवों का समाहार करने का एक अनुप्रयुक्त सिद्धान्त और कार्य पद्धति है। किसी परिघटना की अनेक पुनरावृत्तियों के सामान्यीकरण का प्रयास करने के बजाय, यह कार्य पद्धति किसी प्रोटोटाइप के सांगोपांग अध्ययन और जांच-पड़ताल के ज़रिये उसका गहन विश्लेषण करने और इस विश्लेषण के ज़रिये अनुभवों का सार-संकलन करने की हिमायत करती है। यह नारा इस आम कहावत से निकला है कि `गौरैया छोटी भले ही होती है लेकिन उसमें सभी ज़रूरी अंग होते हैं।´ यहाँ माओ कहते हैं कि व्यापक अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भों में पूरा चीन आज की दुनिया में क्रान्ति की समस्याओं का एक लघु रूप है।

29 पुस्तक (दि स्टोरी ऑफ दि स्टोन) के अध्याय 2 में जुङ कुओ के ड्यूक की हवेली में लेङ त्जू-सिंग के उपदेश। `अधिकारियों के लिए ताबीज´ इलाके के अमीर और असरदार परिवारों की एक सूची थी जिसे बॉटल-गूर्ड के भूतपूर्व शिष्य को साथ रखना पड़ता था ताकि उन्हें नाराज़ करके अपना भविष्य चौपट करने से बच सके। (दि स्टोरी ऑफ दि स्टोन)

30 इस मुद्दे पर कॉमरेड माओ द्वारा की गयी आलोचनाओं के लिए देखें लाल भवन का सपना के बारे में पत्र´´ (संकलित रचनाएँ, खण्ड 5) वाङ कुन-लेन 1950 के दशक में पीकिङ के उप महापौर थे

31 हो चि-फाङ (1911-) एक कवि तथा साहित्य जगत के प्रभावी व्यक्ति थे। 1954 में यू यिंग-पो के विरुद्ध चली मुहिम में उन्होंने एक सीमा तक उसका यह कहकर बचाव किया कि लाल भवन का सपना की यू की व्याख्या ग़लत है लेकिन वे राजनीतिक रूप से वफादार हैं। महान अग्रवर्ती छलाँग के वक्त स्वयं उनकी आलोचना की गयी।

32 इस विषय पर वू शिह-चाङ की कृति अंग्रेज़ी में अनूदित है : ऑन `लाल भवन का सपना´ (क्लैरण्डन प्रेस, 1961)

33 यहाँ माओ के विचार लू शुन से मेल खाते हैं।

34 माओ द्वारा यहाँ दिये गये आँकड़े 1946 में गृह युद्ध नये सिरे से छिड़ जाने जाने से अधिक जापान विरोधी युद्ध के आरिम्भक दिनों के हैं जब जन मुक्ति सेना की ताकत कम से कम पाँच लाख तक की हो गयी थी।

35 जनवरी 1949 में, पेइपिंग (जिस नाम से तब उसे जाना जाता था) में राष्ट्रवादी गैरीसन के कमाण्डर जनरल फू त्सो-इ ने व्यर्थ की बरबादी से बचने के लिए बिना लड़े ही आतमसमर्पण कर दिया। बाद में पीकिङ सरकार में वह जल संरक्षण मन्त्री बने।

36 कहा जाता है कि प्रसिद्ध सम्राट शेन नुङ ने तीसरी शताब्दी ई.पू. में कृषि कला सिखायी थी, और ख़ास तौर पर वनस्पतियों के औषधीय गुणों का पता लगाया था।

37 लुङ शान और यान शाओ संस्कृतियाँ, जो क्रमश: उत्तर-पूर्वी और उत्तर- पश्चिमी चीन में स्थित हैं, उत्तरपाषाण काल की दो उल्लेखनीय संस्कृतियाँ थीं। जैसा कि माओ कहते हैं, वे अपनी मृदभाँड कला के लिए विशेष रूप से जानी जाती हैं।

38 चुआङ-त्जू नामक पुस्तक, जिसका एक अंश ही दूसरी शताब्दी ई.पू. के उत्तरार्द्ध में रहने वाले इसी नाम के व्यक्ति ने लिखा था, न केवल ताओ धर्म के शास्त्रीय ग्रन्थों में से एक है (लाओ-त्जू और बुक ऑफ चेंजेंस के साथ) बल्कि चीन के इतिहास की महानतम साहित्यिक कृतियों में से भी एक है।

39 नगोया विश्वविद्यालय के एक जापानी भौतिकीविद सकाटा शियूची का मानना था कि `मूलभूत कण एक एकल, भौतिक, विभेदीकृत और असीम श्रेणी होते हैं जिनसे प्राकृतिक व्यवस्था बनी होती है।´ इन विचारों को प्रस्तुत करने वाला उनका एक लेख जून 1965 में रेड फ्लैग में छपा था।

40 सम्भवत: माओ जेन चि-यू द्वारा 1963 में प्रकाशित और 1973 में पुनर्मुद्रित लेखों के एक संग्रह की बात कर रहे हैं : `हान एवं ताङ राजवंशों में बौद्ध विचारधारा पर संकलित निबन्ध,´ (पीकिङ )। इन अध्ययनों में वह द्वन्द्ववाद के विषय में लेनिन को काफ़ी विस्तार से उद्धृत करते हैं।

41 ताङ युङ-तुङ (1892-1964) जिन्हें जेन चि-यु अपना शिक्षक मानते हैं, बौद्ध धर्म के अग्रणी इतिहासकार थे, जिन्होंने हान, वेई, चिन और उत्तरी एवं दक्षिणी राजवंशों में चीनी बौद्ध धर्म के बारे में तथा भारतीय दर्शन के इतिहास आदि पर लिखा था। 1948 से लेकर 1954 में बीमार पड़ने तक वह पीकिङ विश्वविद्यालय में मानविकी के डीन थे।

42 चान बौद्ध धर्म (जो उसके जापानी नाम ज़ेन से अधिक प्रसिद्ध है) के प्रभाव में, सुङ और मिङ वंशों के चीनी दार्शनिकों ने कनफ़्यूशियसवाद और बौद्ध धर्म का संश्लेषण किया जिसमें केन्द्रीय भूमिका ली अवधारणा (सिद्धान्त या तर्क) की होती है, जिसे नव-कनफ़्यूशियसवाद के नाम से जाना जाता है।

43 हान यू और ल्यू त्सुङ-युआन। हान-यू ने प्राचीन शैली की अधिकता से बचते हुए प्राचीन क्लासिकी अवधि की सादगी को पुनर्सृजित करने की कोशिश की। `उनके विचारों से सीखने´ का माओ द्वारा उद्धृत नारा अभिव्यक्ति के पुराने पड़ गये तरीकों से बचते हुए प्राचीन कनफ़्यूशियस- वादी सन्तों से प्रेरणा लेने के इस लक्ष्य का हवाला देता है। उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाया लेकिन फिर भी उससे कुछ विचार लिये। ल्यू त्सु³-युआन, जिन्हें माओ यहाँ उनके साहित्यिक नाम ल्यू त्जू-हाउ के नाम से पुकारते हैं, हान यू के करीबी दोस्त थे।

44 ल्यू त्सुङ-युआन का निबन्ध `स्वर्ग उत्तर देता है´ में चू युआन द्वारा अपनी कविता `स्वर्ग पूछता है´ में ब्रह्माण्ड के बारे में उठाये गये कुछ प्रश्नों के उत्तर दिये गये हैं।

अनुवाद : सत्यम

दर्शन के प्रश्नों पर

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वार्ता विशेष

माओ त्से-तुङ

18 अगस्त, 1964


यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अपने कुछ वरिष्ठ कामरेडों के साथ माओ त्से-तुङ की एक अनौपचारिक वातचीत का पाठ है जिसमें उन्होंने चीन में समाजवादी निर्माण की समस्याओं और समाजवादी समाज में जारी वर्ग संघर्ष से जोड़ते हुए कुछ दार्शनिक प्रश्नों पर, ख़ासकर द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के बारे में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विचार व्यक्त किये हैं। बातचीत का ढंग अनौपचारिक है और वार्ता में अनेक विषयों को छुआ गया है लेकिन यहाँ की गयी बातें बेहद गम्भीर और विचारोत्तेजक हैं। -सं

जब वर्ग संघर्ष हो तभी दर्शन भी सम्भव हो सकता है। व्यवहार से अलग ज्ञानमीमांसा की चर्चा करना समय की बर्बादी है। दर्शन का अध्ययन करने वाले कामरेडों को देहात में जाना चाहिए। उन्हें इन सर्दियों में या अगले वसन्त में वहाँ जाकर वर्ग संघर्ष में हिस्सा लेना चाहिए। जिनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है उन्हें भी जाना चाहिए। वहाँ जाने से लोग मर नहीं जायेंगे। बस इतना होगा कि उन्हें सर्दी लग जायेगी, और अगर वे कुछ अतिरिक्त कपड़े पहन लेंगे तो कोई दिक्कत नहीं होगी।

फ़िलहाल विश्वविद्यालयों में वे जिस तरह से इसका अध्ययन करते हैं किताब से किताब तक, एक अवधारणा से दूसरी अवधारणा तक जाते हुए, वह किसी काम का नहीं है। दर्शन किताबों से कैसे आ सकता है? मार्क्सवाद के तीन बुनियादी संघटक हैं वैज्ञानिक समाजवाद, दर्शन और राजनीतिक अर्थशास्त्र।[1] इसका आधार है समाज विज्ञान, वर्ग संघर्ष। सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच संघर्ष है। मार्क्स और दूसरे लोगों ने इसे देखा था। यूटोपियाई समाजवादी हमेशा बुर्जुआ वर्ग को उदार होने के लिए राज़ी करने की कोशिश करते है। यह नहीं चलेगा, सर्वहारा के वर्ग संघर्ष पर भरोसा करना ज़रूरी है। उस समय, कई हड़तालें हो चुकी थीं। इंग्लैण्ड की संसदीय जाँच ने पाया कि बारह घण्टे काम का दिन पूँजीपतियों के हित के लिए आठ घण्टे काम के दिन के मुकाबले कम अनुकूल है। इसी दृष्टिकोण से आरम्भ करके मार्क्सवाद सामने आया। बुनियाद तो वर्ग संघर्ष है। दर्शनशास्त्र का अध्ययन इसके बाद ही हो सकता है। किसका दर्शन? बुर्जुआ वर्ग का दर्शन, या सर्वहारा वर्ग का दर्शन? सर्वहारा वर्ग का दर्शन मार्क्सवादी दर्शन है। सर्वहारा वर्ग का अर्थशास्त्र भी है, जिसने क्लासिकीय अर्थशास्त्र को बदल डाला है। जो लोग दर्शनशास्त्र से जुड़े हैं, वे मानते हैं कि दर्शन का स्थान पहले है। उत्पीड़क उत्पीड़ितों का उत्पीड़न करते हैं, जबकि उत्पीड़ितों को दर्शन की तलाश शुरू करने से पहले उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ने और उससे निकलने का रास्ता तलाश करना पड़ता है। जब लोगों ने इसे अपना प्रस्थान बिन्दु बनाया तभी मार्क्सवाद- लेनिनवाद सामने आया और तभी उन्हें दर्शन का पता चला। हम सब इससे होकर गुज़रे हैं। दूसरे लोग मुझे मारना चाहते थे( च्याङ काई-शेक मुझे मारना चाहता था। इस तरह हम वर्ग संघर्ष में शामिल हुए, हमने दार्शनिक ढंग से सोचना शुरू किया।

विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को इन सर्दियों में (देहात में – अनु.) जाना शुरू कर देना चाहिए -मैं समाज विज्ञानों की बात कर रहा हूँ। प्राकृतिक विज्ञान के विद्यार्थियों को अभी नहीं भेजना चाहिए, हालाँकि हम एक-दो बार उन्हें भेज सकते हैं। समाज विज्ञानों – इतिहास, राजनीतिक अर्थशास्त्र, साहित्य, कानून – का अध्ययन करने वाले सभी लोगों को, हरेक को जाना चाहिए। प्रोफेसरों, असिस्टेण्ट प्रोफेसरों, प्रशासनिक कर्मचारियों और विद्यार्थियों सभी को, पाँच महीने की सीमित अवधि के लिए जाना चाहिए। अगर वे पाँच महीने के लिए कारखानों में जायेंगे, तो वे कुछ बोधात्मक ज्ञान हासिल करेंगे। घोड़े, गायें, भेड़ें, मुर्गियाँ कुत्ते, सुअर, धान, ज्वार, सेम, गेहूँ, बाजरे की किस्में, इन सब चीज़ों को वे देख सकेंगे। यदि वे सर्दियों में जायेंगे, तो फसल नहीं देख पायेंगे, पर कम से कम वे जमीन और लोगों को देख सकेंगे। वर्ग संघर्ष का अनुभव हासिल करना – मैं इसे ही विश्वविद्यालय कहता हूँ। लोग बहस करते हैं कि कौन- सा विश्वविद्यालय बेहतर हं, पीकिङ विश्वविद्यालय या `जन विश्वविद्यालय´।[2] जहाँ तक मेरी बात है, मैं तो खुले मैदानों के विश्वविद्यालय का स्नातक हूँ, मैंने वहीं थोड़ा-बहुत सीखा है। अतीत में मैंने कनफ़्यूशियस का अध्ययन किया और चार पुस्तकों तथा पाँच शास्त्रों पर छह वर्ष ख़र्च किये।[3] मैंने उन्हें रट लिया, पर मैंने उन्हें समझा नहीं। उस समय, मुझे कनफ़्यूशियस में गहरा विश्वास था, और मैंने लेख भी लिखे (उसके विचारों को स्पष्ट करते हुए) बाद में मैं सात वर्ष तक एक बुर्जुआ स्कूल में गया। सात धन छह बराबर तेरह वर्ष होते हैं। मैंने आम तौर पर पढ़ाई जानेवाली सारी बुर्जुआ चीज़ों का अध्ययन किया – प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञानों को। थोड़ा शिक्षाशास्त्र भी सिखाते थे। इसमें पाँच वर्ष नार्मल स्कूल में दो वर्ष मिडिल स्कूल में और साथ ही पुस्तकालय में बिताया गया मेरा समय शामिल है।[4] उस समय मैं काण्ट के द्वैतवाद, खासकर उसके प्रत्ययवाद में विश्वास करता था। मूलत: मैं एक सामन्तवादी और बुर्जुआ लोकतन्त्र का समर्थक था। समाज ने मुझे क्रान्ति में भाग लेने की ओर धकेला। मैंने प्राथमिक स्कूल के शिक्षक और एक चार-वर्षीय स्कूल के प्रिंसिपल के रूप में कुछ वर्ष बिताये। मैंने एक छह-वर्षीय स्कूल में इतिहास और चीनी भाषा भी पढ़ाई। मैंने थोड़े समय तक एक मिडिल स्कूल में भी पढ़ाया, पर मैं कुछ भी समझता नहीं था। जब मैं कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुआ, तो मैं जानता था कि हमें क्रान्ति करनी है, पर किसके खिलाफ? और हम ऐसा करेंगे कैसे? बेशक हमें साम्राज्यवाद ओर पुराने समाज के खिलाफ क्रान्ति करनी थी। मुझे ठीक से यही नहीं पता था कि साम्राज्यवाद किस किस्म की चीज़ है, और इस बात की तो और भी कम समझ थी कि हम इसके खिलाफ क्रान्ति कैसे करेंगे। मैं तेरह वर्षों में जो कुछ भी सीखा था, उसमें से कुछ भी क्रान्ति करने के लिए किसी काम का नहीं था। मैंने एकमात्र औज़ार – भाषा – का इस्तेमाल किया। लेख लिखना एक औज़ार है। जहाँ तक मेरे अध्ययनों का सवाल है, मैंने उसका बिल्कुल भी प्रयोग नहीं किया। कनफ़्यूशियस कहता था : सदाशयता मानवजाति का अभिलाक्षणिक गुण है। सदाशयी व्यक्ति दूसरों से प्रेम करता है।[5] वह किससे प्रेम करता था? सभी मनुष्यों से? ऐसा कतई नहीं था। क्या वह शोषकों से प्रेम करता था? बिल्कुल ऐसा भी नहीं था। वह शोषकों के सिर्फ़ एक हिस्से से प्रेम करता था। वरना, कनफ़्यूशियस कोई ऊँचा अधिकारी क्यों न बन सका? लोग उसे नहीं चाहते थे। वह उन्हें प्रेम करता था और चाहता था कि वे एकजुट हो जायें। लेकिन जब भुखमरी की, और (इस उक्ति) `श्रेष्ठ व्यक्ति ग़रीबी को झेल सकता है´ की बात आयी, तो वह मरते-मरते बचा। कुआङ के लोग उसे मार डालना चाहते थे।[6] ऐसे लोग भी थे जो चिन की पश्चिम की यात्रा पर साथ न जाने के लिए उसकी आलोचना करते थे। वास्तव में, `गीति-काव्यों की पुस्तक´ (बुक ऑफ ओड्स) में शामिल कविता `सातवें माह में अग्नि तारा भूमध्य रेखा को पार करता है´ में शेन्सी की घटनाओं का उल्लेख है। `पीला पक्षी´ कविता में उस घटना की चर्चा है जब चिन के युवराज मू के तीन उच्च अधिकारियों को मारकर उसी के साथ दफना दिया गया था।[7] सू-मा चिरोन [8]की `गीति-काव्यों की पुस्तक´ के बारे में बहुत अच्छी राय थी। वह कहता था कि इसकी 300 कविताएँ प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों ने जागृत अवस्था में लिखी थीं। `गीति-काव्यों की पुस्तक´ की कविताओं का एक बड़ा हिस्सा राज्यों की शैली में लिखा गया है, वे आम लोगों के लोकगीत है, ऋषि-मुनि और कोई नहीं बल्कि आम लोग ही हैं। `जागृत अवस्था में लिखी थीं´ का मतलब यह है कि जब किसी व्यक्ति का हृदय क्रोध से भर उठता था तब वह कविता लिखता था!

तुम न बोते हो न काटते हो;

फिर तुम्हारे तीन सौ कोठार धान से कैसे भरे रहते है?

तुम शिकार में कभी दौड़ते नहीं हों;

फिर तुम्हारे अहाते में तीतर लटकते कैसे दिखते हैं?

ओ श्रेष्ठ मनुष्य!

वह अपनी अकर्मण्यता की रोटी

नहीं खाता![9]

`काम के न काज के, दुश्मन अनाज के´ कहावत यहीं से पैदा हुई। यह कविता देवताओं को दोषी ठहराती है और शासकों का विरोध करती है। कनफ़्यूशियस थोड़ा जनवादी भी था। उसने (`गीति-काव्यों की पुस्तक´ में) स्त्री-पुरुष के प्रेम के बारे में कविताओं को भी शामिल किया है। अपनी टिप्पणियों में, चू सि ने उन्हें गुप्त प्रेम सम्बन्धों के रूप में वर्णित किया है।[10] वास्तव में, कुछ ऐसे हैं और कुछ नहीं हैं, जो ऐसे नहीं हैं। उनमें राजकुमार और प्रजा के सम्बन्धों के बारे में लिखने के लिए पुरुष और स्त्री के बिम्बों का प्रयोग किया गया है। पाँच राजवंशों और दस काउन्टियों के काल में शू (आज का शेच्वान) में `चिन की पत्नी सर्दियों का रोना रोती है´ शीर्षक ऐवेई चुआङ की एक कविता थी।[11] उसने अपनी युवावस्था में इसे लिखा था और यह अपने राजकुमार के लिए उसकी विरह वेदना के बारे में है।

देहात में जाने के मामले पर लौटते है। लोगों को इन सर्दियों और वसन्त से शुरू करके, समूहों में और बारी-बारी से, वर्ग संघर्ष में भाग लेने के लिए जाना चाहिए। सिर्फ़ इसी ढंग से वे कुछ सीख सकते है, क्रान्ति के बारे में सीख सकते है। आप बुद्धिजीवी लोग सारा दिन अपने सरकारी दफ्तरों में बैठते हैं, अच्छा खाते हैं, अच्छा पहनते हैं, पैदल तक नहीं चलते हैं। इसीलिए आप बीमार पड़ते हैं। कपड़े, भोजन, मकान और व्यायाम की कमी बीमारी पैदा करने वाले चार बड़े कारण हैं। अगर अच्छी जीवन स्थितियों का भोग करने की हालत में तब्दीली लाकर, आप कुछ बुरी स्थितियों में जाते हैं, अगर आप वर्ग संघर्ष में हिस्सा लेने के लिए जाते हैं, अगर आप `चार सफाई अभियानों´ और `पाँच विरोध अभियानों´[12] के बीच जाते हैं और कठोर बनने के एक दौर से गुजरते हैं, तो आप बुद्धिजीवी लोग एक नये रूप में नजर आयेंगे।

अगर आप वर्ग संघर्ष में नहीं लगे हैं, तो आप भला किस दर्शन को लेकर चल रहे हैं?

क्यों न वहाँ जाकर इसे आज़मायें? अगर आपकी बीमारी ज्यादा गम्भीर हो जाये तो आप वापस आ जाइयेगा – आपको मरने की हालत में पहुँच जाने को निर्धारक रेखा बनाना चाहिए। जब आप इतने बीमार हो जाये कि मरने वाले हों तो आपको वापस आ जाना चाहिए। जैसे ही आप वहाँ जायेंगे, आपमें कुछ जोश आ जायेगा। (काङ शेङ बीच में बोलते हैं : `दर्शन और समाज विज्ञान विभागों के शोध संस्थानों और विज्ञान अकादमी को भी जाना चाहिए। फ़िलहाल, वे प्राचीन वस्तुओं के अध्ययन हेतु संस्थानों में तब्दील हो जाने, धूप-लोहबान के चढ़ावों से पोषण पाने वाले परीलोक में तब्दील हो जाने के कगार पर हैं। दर्शनशास्त्र संस्थान का कोई भी व्यक्ति कुआङ-मिङ जि-पाओ नहीं पढ़ता।´) मैं सिर्फ़ कुआङ-मिङ जि-पाओ और वेन-हुई पाओ[13] ही पढ़ता हूँ, मैं पीपुल्स डेली नहीं पढ़ता, क्योंकि पीपुल्स डेली में सैद्धान्तिक लेख नहीं छपते( जब हम कोई प्रस्ताव पारित करते हैं, तब वे उसे प्रकाशित करते हैं। लिबरेशन आर्मी डेली जीवन्त है, यह पठनीय है। (कामरेड काङ शेङ: `साहित्य संस्थान चाउ कुचेङ[14] पर कोई ध्यान नहीं देता, और अर्थशास्त्र संस्थान सुन येह-फाङ[15] और लिबरमैनिज्म की ओर उसके झुकाव, पूँजीवाद की ओर उसके झुकाव पर ध्यान नहीं देता।´)

उन्हें पूँजीवाद की ओर जाने दीजिये। समाज बहुत जटिल है। अगर हर कोई सिर्फ़ समाजवाद की ओर जाये, और पूँजीवाद की ओर न जाये, तो क्या यह ज्यादा ही सरल नहीं होगा? तब क्या हमारे यहाँ विरोधों की एकता ख़त्म नहीं हो जायेगी, और सिर्फ़ एकांगिकता ही नहीं रह जायेगी? उन्हें ऐसा करने दीजिये। उन्हें हम पर पागलपनभरे हमले करने दीजिये, सड़कों पर प्रदर्शन करने दीजिये, हथियार उठाकर बगावत करने दीजिये – मैं इन सब चीज़ों का समर्थन करता हूँ। समाज बहुत जटिल है, एक भी ऐसा कम्यून, एक भी सिएन, केन्द्रीय कमेटी का एक भी ऐसा विभाग नहीं है, जहाँ हम एक को दो में नहीं बाँट सकते। जरा देखिये क्या ग्रामीण कार्य विभाग को भंग नहीं कर दिया गया है?[16] यह पूरी तरह व्यक्तिगत गृहणियों के आधार पर लेखा-जोखा करने और `चार महान स्वतन्त्रताओं – धन उधार देने, व्यापार करने, श्रम भाड़े पर लेने और जमीन की खरीद-फरोख्त करने की स्वतन्त्रता – का प्रचार करने में जुटा हुआ था। अतीत में, उन्होंने (इस आशय की) एक घोषणा जारी की थी। तेङ त्जू-हुई का मुझसे विवाद हुआ था। केन्द्रीय कमेटी की एक बैठक में उन्होंने चार महान स्वतन्त्रताओं को लागू करने का विचार प्रस्तुत किया था[17]

नव जनवाद को सुदृढ़ करना, और इसे निरन्तर सुदृढ़ करते जाना, पूँजीवाद पर अमल करना है।[18] नव जनवाद सर्वहारा के नेतृत्व में एक बुर्जुआ-जनवादी क्रान्ति है। यह सिर्फ़ भूस्वामियों और दलाल पूँजीपतियों को छूती है, राष्ट्रीय पूँजीपति वर्ग को तो यह हाथ भी नहीं लगाती। जमीन का बँटवारा करना और उसे किसानों को दे देना सामन्ती भूस्वामियों की सम्पत्ति को किसानों की व्यक्तिगत सम्पत्ति में तब्दील करना है, और यह बुर्जुआ क्रान्ति के दायरे में ही आता है। जमीन का बँटवारा कोई बड़ी बात नहीं है – मैकआर्थर ने जापान में ऐसा किया। नेपोलियन ने भी जमीन का बँटवारा किया था। भूमि सुधारों से पूँजीवाद का खात्मा नहीं हो सकता। न ही इससे समाजवाद आ सकता है।

अभी हम जिस अवस्था में हैं उसमें एक तिहाई सत्ता दुश्मन या दुश्मन के हमदर्दों के हाथों में है। हम लोग पन्द्रह वर्षों से लगे हुए हैं औ अब दो-तिहाई शासन-सूत्र हमारे नियन्त्रण में हैं। आज की स्थिति में, आप एक (पार्टी) ब्रांच सेक्रेटरी को सिगरेट के चन्द पैकेटों से ख़रीद सकते हैं, अपनी बेटी का उससे ब्याह कर देने पर तो खैर कहना ही क्या। कुछ ऐसे इलाके हैं जहाँ भूमि सुधार शान्तिपूर्ण ढंग से पूरा किया गया, और भूमि सुधार टोलियाँ बहत कमजोर थीं( अब आप देख सकते हैं कि वहाँ ढेरों समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं।

मुझे दर्शन के बारे में सामग्रियाँ मिल गयी हैं। (यहाँ अन्तरविरोधों की समस्या पर सामग्रियों का ज़िक्र है – स्टेनोग्राफ़र की टिप्पणी।) मैंने रूपरेखा पर एक नजर डाली है। (यहाँ `दो को एक में मिलाओ´ की आलोचना करते हुए एक लेख की रूपरेखा का जिक्र है – स्टेनोग्राफर की टिप्पणी।)[19] मैं शेष को नहीं पढ़ पाया हूँ। मैंने विश्लेषण और संश्लेषण के बारे में सामग्रियों को भी देखा है। विपरीत तत्वों की एकता के नियम, बुर्जुआ वर्ग इसके बारे में क्या कहता है, मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्तालिन इसके बारे में क्या कहते हैं, संशोधनवादी इसके बारे में क्या कहते हैं, उन पर इस तरह की सामग्री इकट्ठा करना अच्छी बात है। जहाँ तक बुर्जुआ वर्ग की बात है, याङ सिएन-चेन इसकी बात करता है, और पहले हीगेल इसकी बात करते थे। ऐसे लोग पुराने जमाने में होते थे। अब तो वे और भी बुरे हैं। बोग्दोनोव और लुनाचार्स्की भी थे, जो देववाद (Deism) की बात करते थे। मैंने बोग्दानोव का अर्थशास्त्र पढ़ा है कि आदिम संचय वाले हिस्से को उन्होंने ठीक माना था। (काङ शेङ : `बोग्दानोव के आर्थिक सिद्धान्त शायद आधुनिक संशोधनवाद के आर्थिक सिद्धान्तों से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध थे। काउत्स्की के आर्थिक सिद्धान्त ख्रुश्चेव के आर्थिक सिद्धान्तों से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध थे, और युगोस्लाविया भी सोवियत संघ से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध हैं आखिरकार, जिलास ने स्तालिन के बारे में कुछ अच्छी बातें कहीं थी, उसने कहा था कि चीनी समस्याओं पर स्तालिन ने आत्मालोचना की थी।´)

स्तालिन ने महसूस किया था कि चीनी समस्याओं के सम्बन्ध में उनसे गलतियाँ हुई, और वे कोई छोटी गलतियाँ नहीं थीं। हम करोड़ों लोगों की आबादी वाला विशाल देश हैं, और उन्होंने हमारी क्रान्ति का, और सत्ता पर हमारे कब्जा करने का विरोध किया। हमने पूरे देश में सत्ता पर कब्जा करने के लिए बरसों तक तैयारी की, समूचा जापान-विरोधी युद्ध एक तैयारी थी। अगर आप उस दौर के केन्द्रीय कमेटी के दस्तावेजों को देखें, `नव जनवाद के बारे में´ सहित, तो यह बात एकदम साफ हो जायेगी। कहने का मतलब कि आप बुर्जुआ वर्ग का अधिनायकत्व कायम नहीं कर सकते, आप सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में नव जनवाद ही कायम कर सकते हैं, आप सर्वहारा के नेतृत्व में लोक जनवादी अधिनाकत्व ही कायम कर सकते है। हमारे देश में, अस्सी वर्ष तक, बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में की गयी सभी जनवादी क्रान्तियाँ असफल रहीं। हमारे नेतृत्व में जनवादी क्रान्ति निश्चित ही विजयी होगी। एकमात्र रास्ता यही है, और कोई रास्ता नहीं है। यह पहला कदम है। दूसरा कदम समाजवाद के निर्माण का होगा। इस तरह, `नव जनवाद के बारे में´ एक सम्पूर्ण कार्यक्रम है। इसमें राजनीतिक, अर्थशास्त्र और संस्कृति की भी चर्चा की गयी है। सिर्फ़ सैन्य मामलों की इसमें चर्चा नहीं की गयी। (काङ शेङ : `नव जनवाद के बारे में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मैंने स्पेनी कामरेडों से पूछा, और उन्होंने कहा कि उनके लिए समस्या नव जनवाद की स्थापना नहीं, बल्कि बुर्जुआ जनवाद की स्थापना करना था। उन्होंने अपने देश में तीन बिन्दुओँ सेना, देहात , राजनीतिक सत्ता – पर ध्यान नहीं दिया। वे पूरी तरह सोवियत विदेश नीति के मातहत हो गये, और कुछ भी हासिल नहीं कर पाये।´)

ये चेन तू-सिङ की नीतियाँ हैं! (कामरेड काङ शेङ : `वे कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ने सेना संगठित की और, फिर उसे दूसरों को सौंप दिया।´)

ये बेकार की बात है। ( कामरेड काङ शेङ : `वे राजनीतिक सत्ता भी नहीं चाहते थे, न ही उन्होंने किसानों को गोलबन्द किया। उस समय पर, सोवियत संघ ने कहा कि यदि वे सर्वहारा का नेतृत्व थोपेंगे, तो इंग्लैण्ड और फ्रांस इसका विरोध करेंगे, और यह सोवियत संघ के हित में नहीं होगा।´)

क्यूबा के बारे में क्या खयाल है? क्यूबा में उन्होंने राजनीतिक सत्ता और सेना गठित करने पर ही ध्यान दिया, और किसानों को भी गोलबन्द किया, जैसा (हमने) अतीत में किया था( इसीलिए वे कामयाब हुए।

(कामरेड काङ शेङ `साथ ही, जब वे (स्पेनी) लड़े, तो उन्होंने सामान्य ढंग से युद्ध किया, बुर्जुआ वर्ग के तरीके से, वे आखिर तक मैड्रिड की रक्षा करते रहे।[20] हर चीज़ में, उन्होंने खुद को सोवियत विदेश नीति के मातहत कर लिया था।´)

तीसरे इण्टरनेशनल को भंग किये जाने के पहले भी, हमने तीसरे इण्टरनेशनल के आदेशों को नहीं माना। तसुन्यी सम्मेलन में हमने आदेश नहीं माने, और उसके बाद दस वर्ष के अरसे तक, शुद्धीकरण अभियान से सातवीं कांग्रेस तक, जब अन्तत: हमने एक प्रस्ताव पारित किया (`हमारी पार्टी के इतिहास के कुछ प्रश्नों के बारे में प्रस्ताव´)[21] और वामवाद (की ग़लतियों) को ठीक कर लिया, हमने उनके आदेशों का बिल्कुल पालन नहीं किया। वे कठमुल्लावादी चीन की विशेषताओं का अध्ययन करने में पूरी तरह असफल रहे( जब वे देहात में गये, उसके दस वर्ष बाद भी, वे देहात में भूमि सम्पत्ति और वर्ग सम्बन्धों को समझने में पूरी तरह असफल रहे। आप महज़ देहात में जाने से देहात को नहीं समझ सकते, आपको देहात के सभी वर्गों और तबकों के बीच के सम्बन्धों का अध्ययन करना चाहिए। मैंने इन समस्याओं पर दस वर्ष से अधिक ख़र्च किये तब जाकर आखिरकार वे मेरे सामने स्पष्ट हुई। आपको हर किस्म के लोगों से सम्पर्क करना पड़ेगा, चायखानों से लेकर जुआघरों तक, और उनकी जाँच-पड़ताल करनी होगी। 1925 में, मैं किसान आन्दोलन प्रशिक्षण संस्थान[22] में सक्रिय था, और ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वेक्षण करता था। अपने पैतृक गाँव में, मैं ग़रीब किसानों की जाँच पड़ताल करने के लिए उनसे मिलता था। उनकी हालत दयनीय थी, उनके पास खाने को कुछ नहीं था। एक किसान था जिसके साथ मैंने गोटियों का खेल खेला (स्वर्ग, धरती, इन्सान, मेलजोल, मेई चिएन, चाङ साङ और बेंच के साथ खेला जाने वाला) और उसके बाद उसे अपने साथ खाना खाने के लिए आमन्त्रित किया। खाने के पहले, बाद में और खाना खाते हुए, मैंने उससे बातें की और मेरी समझ में आया कि देहात में वर्ग संघर्ष इतना तीखा क्यों है। वह मुझसे बात करने को इसलिए तैयार था क्योंकि : सबसे पहले तो मैंने उससे इन्सान के तौर पर बरताव किया( और तीसरे, वह थोड़े पैसे बनाने में सफल रहा था। मैं जानबूझकर हार रहा था( मैं एक या दो डालर हार गया, और नतीजतन वह काफी सन्तुष्ट था। एक दोस्त है जो अब भी दो बार मुझसे मिलने आया! मुक्ति के बाद। एक बार, उन दिनों में, वह काफी बुरी हालत में था, और वह एक डालर उधार लेने के लिए मुझे ढूँढ़ते हुए आया। मैंने उसे तीन डालर दिये, ऐसी मदद के तौर पर जिसे लौटाना नहीं था। उन दिनों में, ऐसी न लौटाने वाली मदद मिलना मुश्किल होता था। मेरे पिता का सोचना था कि अगर कोई आदमी अपना ख्याल नहीं रखता, उसे लोक-परलोक दोनों जगह सजा मिलेगी। मेरी माँ उनका विरोध करती थीं। जब मेरे पिता की मृत्यु हुई, तो बहुत थोडे़-से लोग शवयात्रा में शामिल हुए। जब मेरी माँ की मृत्यु हुई तो बहुत से लोग उनकी शवयात्रा में गये। एक बार को लाओ हुई ने हमारे घर को लूट लिया। मैंने कहा कि उन्होंने ठीक ही किया, क्योंकि लोगों के पास कुछ भी नहीं है। मेरी माँ भी इस बात को स्वीकार नहीं कर सकी।

एक बार चाङशा में चावल के लिए दंगे भड़क उठे जिनमें प्रान्तीय गवर्नर की पिटाई हो गयी। सियाङ-सियाङ से कुछ फेरी वाले अपनी सेम बेचकर घर लौट रहे थे। मैंने उन्हें रोककर हालात के बारे में पूछा। देहात में लाल और हरे गिरोह भी सभाएँ करते थे और बडे़ परिवारों को तबाह कर देते थे। इसकी ख़बरें शंघाई के अख़बारों में छपती थीं, और गड़बड़ियाँ तभी दबायी जा सकीं जब चाङशा से सैनिक भेजे गये। उनमें अनुशासन नहीं था, वे मध्यम किसानों का चावल छीन लेते थे, और इसलिए वे अलग-थलग पड़ गये। उनका एक नेता इधर-उधर भागता रहा, और आखिर पहाड़ियों में जाकर छिपा, लेकिन उसे वहाँ पकड़ लिया गया और मार दिया गया। बाद में, देहात के गणमान्य लोगों ने बैठक की, और कुछ और ग़रीब किसानों को मार डाला। उस समय तक कोई कम्युनिस्ट पार्टी नहीं थी। ये स्वत:स्फूर्त वर्ग संघर्ष थे।

समाज ने हमें धकेलकर राजनीतिक मंच पर ला खड़ा किया। पहले मार्क्सवाद से कोई वास्ता रखने के बारे में कौन सोचता था? मैंने तो इसका नाम भी नहीं सुना था। मैंने जिन लोगों के बारे में सुना, और पढ़ा था वे थे कनफ़्यूशियस, नेपोलियन, वाशिंगटन, पीटर महान, मेईजी पुनर्स्थापना, तीन विख्यात इतालवी (देशभक्त) – यूँ कहें कि सब पूँजीवाद के (नायक) थे। मैंने फ्रैंकलिन की एक आत्मकथा भी पढ़ी थी। वह एक ग़रीब परिवार से आये थे( बाद में वह लेखक बने, और बिजली के बारे में प्रयोग भी किये। (चेन पो-ता : `सबसे पहले फ्रैंकलिन ने ही यह प्रस्थापना दी थी कि मनुष्य औज़ार बनाने वाला प्राणी है।´) उन्होंने मनुष्य के औज़ार बनाने वाला प्राणी होने की बात कही। पहले वे कहते थे कि मनुष्य सोचने वाला प्राणी है, `हृदय सोच सकता है।´[23] वे कहते थे कि मनुष्य समस्त सृष्टि की आत्मा है। किसने सभा बुलाकर उसे चुना (इस पदवी के लिए)? उसने स्वयं को यह गौरव प्रदान किया। यह प्रस्थापना सामन्ती युग में मौजूद थी। बाद में, मार्क्स ने यह विचार रखा कि मनुष्य औज़ार-निर्माता है, और मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सच तो यह है कि (क्रमिक विकास दस लाख वर्ष से गुजरने के बाद ही मनुष्य का बड़ा मस्तिष्क और एक जोड़ी हाथ विकसित हुए। भविष्य में, जानवर विकसित होते रहेंगे। मैं नहीं मानता कि सिर्फ़ मनुष्य के ही दो हाथ हो सकते हैं। क्या घोड़ों, गायों, भेड़ों का क्रमिक विकास नहीं हो सकता है? क्या सिर्फ़ बन्दरों का क्रमिक विकास हो सकता है? और इससे भी बढ़कर क्या यह हो सकता है कि बन्दरों की सिर्फ़ एक प्रजाति क्रमिक विकास करे, तथा अन्य सभी क्रमिक विकास करने में असमर्थ हैं? क्या दस लाख वर्ष बाद, एक करोड़ वर्ष बाद, घोड़े, गायें और भेड़ें वैसे ही रहेंगी जैसी वे आज हैं? मैं सोचता हूँ कि उनमें बदलाव होता रहेगा। घोड़े, गायें, भेड़ें, कीड़े सब बदल जायेंगे। प्राणियों का विकास वनस्पतियों से हुआ है, वे समुद्री शैवालों से विकसित हुए हैं। चाङ ताई-येन यह सब जानता था। जिस किताब में वह काङ यु-वेइ से क्रान्ति के बारे में बहस करता है, उसमें उसने इन सिद्धान्तों को स्पष्ट किया है।[24] मूल रूप में पृथ्वी मृत थी, न कोई वनस्पतियाँ थीं, न पानी, न हवा। मुझे पता नहीं कितने करोड़ वर्ष बाद जाकर पानी बना( हाइड्रोजन और ऑक्सीजन तुरन्त किसी पुराने तरीके से पानी में तब्दील नहीं हो गयी।

पानी का भी अपना इतिहास है। इससे भी पहले, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन भी मौजूद नहीं थे। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के पैदा होने के बाद ही यह सम्भावना बनी कि इन दो तत्वों के मिलने से पानी बनेगा।

हमे प्राकृतिक विज्ञानों के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए, इस विषय की अनदेखी करने से काम नहीं चलेगा। हमें कुछ किताबें ज़रूर पढ़नी चाहिए। हमारे वर्तमान संघर्षों की ज़रूरतों के कारण पढ़ने और निरुद्देश्य पढ़ने के बीच बहुत अन्तर है। फू यिङ [25] कहता है कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के लाखों बार साथ आने के बाद कहीं पानी बनता है( यह दो चीज़ों के मिलकर एक बन जाने का सीधा मामला नहीं है। वह इस बारे में ठीक ही कहता है। मैं उससे मिलना और बात करना चाहता हूँ। (लू पिङ [26] से) आप लोगों को फू यिङ की हरेक बात का विरोध नहीं करना चाहिए।

टिप्पणियाँ

1 यानी, 1) मार्क्सवादी दर्शन, अर्थात द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद, जो प्रकृति, मानव समाज और मनुष्य के विचारों में मौजूद अन्तरविरोधों के विकास के सामान्य सिद्धान्त से सम्बिन्धत ही( 2) मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र जो समाज की अर्थव्यवस्था के विकास को नियन्त्रित करने वाले नियमों की व्याख्या करता है और इस बात का पर्दाफ़ाश करता है कि पूँजीपति वर्ग किस तरह मेहनतकश वर्ग का शोषण करता है (अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त)( और 3) वैज्ञानिक समाजवाद जो यह दिखाता है कि पूँजीवादी समाज का विकास समाज की एक उच्चतर मंजिल में होना ही है और सर्वहारा पूँजीवादी व्यवस्था की कब्र खोदता है। (ब्योरे के लिए देखें लेनिन की मार्क्सवाद के तीन स्रोत और तीन संघटक अंग।)

2 पीकिङ विश्वविद्यालय को, जो 1919 के 4 मई आन्दोलन की शुरुआत करने वाले पुराने पीकिङ विश्वविद्यालय और अमेरिकी आर्थिक सहायता से चलने वाले येनचिङ विश्वविद्यालय को मिलाकर बना है, 1949 के बाद से चीन में सामान्य बौद्धिक श्रेष्ठता के लिए सबसे उँचा दर्ज़ा हासिल है। पीकिङ में ही स्थित जन विश्वविद्यालय ख़ास तौर पर मज़दूर-किसान पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए अधिक सुगम पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने के लिए स्थापित किया गया था।

3 कनफ़्यूशियस की क्लासिकी कृतियों में `चार पुस्तकें´ आरम्भिक विद्यार्थियों द्वारा पढ़ी जाने वाली मुख्य सामग्री थी, पाँच क्लासिकी कृतियाँ इसका कुछ बड़ा रूप था।

4 माओ त्से-तुङ ने अपने विविध शैक्षिक अनुभवों में, 1912-13 की सर्दियों में हुनान प्रान्तीय पुस्तकालय में पढ़ाई करते हुए गुज़ारे गये छह माह के समय को सबसे मूल्यवान अनुभवों में से एक माना है।

5 पहला वाक्य `माध्य का सिद्धान्त´ से है, दूसरा है `मेन्शियस´, ग्रन्थ चार से।

6 यह उद्धरण कनफ़्यूशियस की कृति `एनालेक्ट्स´ से लिया गया है। `एनालेक्ट्स´ में उस घटना का उल्लेख है जिसमें कुआङ के लोगों ने कनफ़्यूशियस को बन्दी बना लिया था और उसे मार डालना चाहते थे।

7 माओ का तर्क यह लगता है कि चाहे कनफ़्यूशियस वहाँ गया हो या नहीं, चिन (आज के शेन्सी में स्थित पहली सहस्त्राब्दी ईसापूर्व का एक राज्य, जिसके शासक ने बाद में पूरे चीन को जीत लिया और 221 ई.पू. में चिन वंश की नींव डाली), वह चिन के विरुद्ध नहीं था क्योंकि उसने उस क्षेत्र की दो कविताओं को `बुक ऑफ़ ओड्स´ में शामिल किया है, जिनमें से दो को माओ ने उद्धृत किया है।

8 सू-मा चिएन (145-90 ई.पू.) चीन का पहला महान इतिहासकार था, जिसने चीन के आरिम्भक दिनों से लेकर अपने समय तक चीन का इतिहास बताने वाले शिह-चि (ऐतिहासिक अभिलेख) को संकलित किया था।

9 उपरोक्त कविता और दो पूर्वोलिखित कविताओं के शीर्षक `गीतिकाव्यों की पुस्तक´ के लेग्ग्स के संस्करण से लिये गये हैं।

10 चीनी आलोचकों ने पारम्परिक तौर पर प्रेम कविताओं की व्याख्या अधिकारी और उसके राजा के सम्बन्धों के रूपक के रूप में की है( चू सि (नीचे टिप्पणी 42 देखें) का मानना था कि उन्हें अभिधा में लिया जाना चाहिए। माओ सहजबुद्धि की दृष्टि से यह विचार प्रस्तुत करते हैं कि कभी उनका शाब्दिक अर्थ लिया लाना चाहिए और कभी नहीं।

11 वेई चुआङ (858-910) उत्तरवर्ती ताङ तथा आरिम्भक पाँच राजवंशों (907 से शुरू) काल का एक प्रमुख कवि था। माओ का तर्क है कि `गीतिकाव्यों की पुस्तक´ तथा समस्त क्लासिकी काव्य पर व्याख्या के एक ही सिद्धान्त लागू किये जाने चाहिए।

12 “Four Clean Ups“ और “Five antis” के लिए देखें संकलित रचनाएँ, खण्ड पाँच।

13 `चीन जनवादी लीग´ का पत्र कुआंग- मिङ जिह-पाओ अप्रैल 1957 में, जब `फूल खिलना और विचारों का टकराव´ ज़ोर-शोर से जारी था, पार्टी की आलोचना करने में सबसे आगे था। शंघाई से प्रकाशित वेन-हुई पाओ एक गैर-पार्टी पत्र था जिसकी माओ ने 1957 में बुर्जुआ प्रवृत्तियों के लिए आलोचना की थी। नवम्बर 1965 में, उसने सांस्कृतिक क्रान्ति की शुरुआत करने के माध्यम का काम किया।

14 चाउ कू-चेङ चीनी और विश्व इतिहास पर अनेक कृतियों के लेखक थे। 1950 के बाद से, वह शंघाई में फुतान विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। 1962 में, उन्होंने इतिहास और कला पर एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें उन्होंने `ज़ाइटजीस्ट´ पर विचार व्यक्त किये थे जिन्हें य सिएन-चेन के दार्शनिक सिद्धान्तों की सौन्दर्यशास्त्र के दायरे में अभिव्यक्ति माना गया (देखें नीचे, टिप्पणी 19)।

15 सुन येह-फाङ इस समय विज्ञान अकादेमी के अर्थशास्त्र संस्थान के निदेशक थे( 1966 में उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। जैसा कि काङ शेङ की टिप्पणी से पता चलता है, उन्होंने समाजवादी अर्थव्यवस्था में मुनाफे के उद्देश्य की भूमिका के बारे में कुछ सोवियत और पूर्वी यूरोपीय अर्थशास्त्रियों के विचारों को अपना लिया था जिनके साथ उसका पेशेवर सम्पर्क था।

16 1955 की गर्मियों में, 31 जुलाई के माओ के भाषण द्वारा कृषि उत्पादकों के कोआपरेटिवों के गठन को नया संवेग प्रदान करने के ठीक पहले, पार्टी के ग्रामीण कार्य विभाग ने (ल्यू शाओ-चि के उकसाने पर) अनेक कोआपरेटिवों को यह कहकर भंग कर दिया कि इन्हें जल्दबाज़ी में और समय से पहले गठित किया गया था।

17 तेङ त्ज़ू-हुई (1895-1972) 1952 से ग्रामीण कार्य विभाग का प्रमुख रहा था, हालांकि 1955 में कोआपरेटिवों को `भंग करने´ या `बुरी कोआपरेटिवों की छंटाई करने´ की ज़िम्मेदारी में उसकी हिस्सेदारी के कारण 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध से उसका प्रभाव कम हो गया था। लेकिन ऐसा लगता है कि इसके बावजूद 1960 के दशक के आरम्भ में माओ के विचारों के विरोध में अपने विचार ज़ोर-शोर से व्यक्त करने लायक हैसियत उसकी बनी हुई थी। यह वही वक्त था जबकि माओ द्वारा यहाँ बतायी गयी नीतियाँ पार्टी के भीतर विवाद का विषय थीं। (अधिक ब्योरे के लिए देखें `संकलित रचनाएँ´ के खण्ड पाँच का पृ. 224-225, अंग्रेज़ी संस्करण।)

18 एक दक्षिणपन्थी अवसरवादी दृष्टिकोण जिसकी वकालत ल्यू शाओ-ची और दूसरे करते थे। इस सम्बन्ध में देखें, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के पोलित बयूरो की बैठक में माओ त्से-तुङ का भाषण “आम दिशा से विपथगमन करने वाले दक्षिणपन्थी विचलनवादी विचारों का विरोध करो,” संकलित रचनाएँ, खण्ड पाँच।

19 `दो मिलकर एक हो जाते हैं´ का विचार सबसे पहले 1960 के दशक में याङ सिएन-चेन (1899-) ने पेश किया था, जो 1955 से, उच्चतर पार्टी स्कूल का अध्यक्ष रहा था। जुलाई 1964 से इस सूत्रीकरण पर प्रेस में इस आधार पर तीखा हमला बोला गया कि यह संघर्ष और अन्तरविरोध के महत्व को कम कर देता है और माओ के इस दृष्टिकोण के विपरीत है कि `एक दो में बँट जाता है,´ यानी संघर्ष, खासकर वर्ग संघर्ष निरन्तर बार-बार उभरता रहता है, तब भी जबकि विशिष्ट अन्तरविरोध हल हो गये हों। स्टेनोग्राफ़र के नोट में उल्लिखित `एक लेख की रूपरेखा´ सम्भवत: याङ पर होने वाले किसी हमले का सारांश था जिसे पूर्वस्वीकृति के लिए अध्यक्ष को दिया गया था।

20 अक्टूबर 1936 में शुरू हुई मैड्रिड की रक्षा दो वर्ष पाँच महीने तक चलती रही। 1936 में, फ़ासिस्ट जर्मनी और इटली ने स्पेनी फ़ासिस्ट युद्ध सरदार फ्रांको का इस्तेमाल करके स्पेन के विरुद्ध हमलावर युद्ध छेड़ दिया। पॉपुलर फ्रण्ट सरकार के नेतृत्व में, स्पेन के लोगों ने बहादुराना ढंग से हमले के खिलाफ जनवाद की हिफ़ाजत की। स्पेन की राजधानी मैड्रिड की लड़ाई पूरे युद्ध में सबसे तीखी लड़ाई थी। मार्च 1939 में मैड्रिड दुश्मन के हाथों में चला गया कयोंकि ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य साम्राज्यवादी देशों ने “अ-हस्तक्षेप´´ की अपनी पाखण्डी नीति के द्वारा हमलावरों की मदद की और पॉपुलर फ्रण्ट के भीतर मतभेद उभर आये। इस आलोचना का मुद्दा ज़ाहिरा तौर पर यह नहीं है कि स्पेन के रिपब्लिकन आखिरी सांस तक लड़ते रहे, बल्कि यह है कि वे इस बात को समझ नहीं सके कि कुछ मज़बूत क्षेत्रीय बिन्दु अपने आप में निर्णायक नहीं हो सकते।

21 कृपया देखें “हमारी पार्टी के इतिहास में कुछ प्रश्नों के बारे में प्रस्ताव,´´ 20 अप्रैल 1945 को स्वीकृत। संकलित रचनाएँ, खण्ड 3

22 माओ ने इस संस्थान में अपना काम 1925 में शुरू किया था, लेकिन 1926 में ही उन्होंने प्रिंसिपल के तौर पर काम किया और अपना मुख्य योगदान किया।

23 यह उद्धरण मेन्शियस, ग्रन्थ 4, भाग ए, अध्याय 15 से है।

24 सम्भवत: यहाँ 1903 में प्रकाशित चाङ पिंग-लिन के प्रसिद्ध लेख `काङ यु-वेई के क्रान्ति के नाम पत्र का खण्डन´ का उल्लेख है। इस लेख में चाङ ने न केवल क्रान्ति बनाम क्रमिक सुधार के मुद्दे पर बल्कि चीनी और माँचू लोगों के बीच नस्ली भिन्नता के महत्त्व को लेकर भी काङ पर तीखा हमला किया जिसे काङ कम करके पेश करते थे। चाङ का तर्क था कि मांचू लोग एक परायी और पतनशील नस्ल के हैं जोकि चीन पर शासन करने के लिए कत्तई अनुपयुक्त हैं। इसी सन्दर्भ में उन्होंने क्रमिक विकास की चर्चा की, और यह बताया कि मौजूदा नस्ली अन्तर इतिहासजन्य हैं।

25 फू यिंग कोई चीनी वैज्ञानिक लगते हैं जोकि 1964 में जीवित थे क्योंकि माओ उनसे मिलने की बात करते हैं।

26 लू पिंग (1910-) उस समय पीकिङ विश्वविद्यालय के अध्यक्ष थे( जून 1966 में उन्हें पद से हटा दिया गया और उनके विरुद्ध संघर्ष चलाया गया।

दर्शन के प्रश्नों पर-2

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-2

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निकट अतीत की पृष्ठभूमि : नक्सलबाड़ी-पूर्व दो दशकों के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन

नक्सलबाड़ी में क्रान्तिकारी किसान-उभार के ऐतिहासिक महत्त्व के वस्तुगत आकलन के लिए यह जानना ज़रूरी है कि भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में ये हालात क्यों और किस प्रकार तैयार हुए कि पश्चिम बंगाल के एक सुदूर तराई अंचल में स्थानीय कम्युनिस्ट संगठनकर्ताओं के नेतृत्व में किसानों का हथियारबन्द जन-विद्रोह शुरू हुआ (जो बमुश्किल तमाम सिर्फ़ ढाई माह तक ही चला) और उसके पक्ष-विपक्ष में पूरे देश का कम्युनिस्ट आन्दोलन बँट गया तथा वह घटना संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद का मानक, प्रस्थान-बिन्दु, रूपक और प्रतीक-चिन्ह बन गयी। नक्सलबाड़ी तेलंगाना के छूटे हुए सिरे को पकड़कर आगे विस्तार दे सकता था, पर ऐसा नहीं हो सका। कई रूपों में नक्सलबाड़ी के बाद, मा.ले. आन्दोलन की मुख्य धारा ने रणदिवे-कालीन “वामपन्थी” संकीर्णतावाद को ही और अधिक विकृत भोंडे़ रूप में दुहराया। मज़दूर आन्दोलन संशोधनवादी पाप की कीमत अतिवामपन्थी भटकाव के दण्ड के रूप में चुकाता है। लेनिन की इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए 17 वर्षो लम्बे संशोधनवादी दौर की प्रतिक्रिया नक्सलबाड़ी किसान उभार के दो वर्षो बाद “वामपन्थी” आतंकवाद के रूप में सामने आयी। लेकिन इन बातों को अहसास के गहरे धरातल पर जाकर समझने के लिए तेलंगाना किसान संघर्ष और उसके उत्तरवर्ती सत्रह वर्षो के पार्टी इतिहास की अति संक्षिप्त चर्चा यहाँ ज़रूरी है। नक्सलबाड़ी के ऐतिहासिक महत्त्व और उसकी ऐतिहासिक विफलता – इन दोनों को ही समझने के लिए यह चर्चा ज़रूरी है।

नक्सलबाड़ी स्वातन्त्रयोत्तर भारत के इतिहास के एक ऐसे दौर में हुआ जब नेहरू की पूँजीवादी नीतियों के समाजवादी मुखौटे की असलियत उजागर हो चुकी थी। महँगाई और बेरोज़गारी से त्रस्त आम लोग सड़कों पर उतर रहे थे। छात्र-युवा आन्दोलन, मज़दूर आन्दोलन और महँगाई-विरोधी जनान्दोलनों का अविराम क्रम जारी था। पूँजीवादी संसदीय राजनीति के दायरे के भीतर इस व्यापक मोहभंग और जनाक्रोश की अभिव्यक्ति 1967 के आम चुनावों के बाद, पहली बार देश के नौ राज्यों में ग़ैरकांग्रेसी सरकारों के गठन के रूप में सामने आयी। लेकिन अहम बात यह थी कि 1947 के बाद के वर्षो में और तेभागा-तेलंगाना-पुनप्रा-वायलार और नौसेना-विद्रोह के दिनों के बाद, पहली बार देशव्यापी स्तर पर जनसमुदाय में व्यवस्था-विरोधी भावनाएँ और क्रान्तिकारी परिवर्तन की आकांक्षाएँ उमड़-घुमड़ रही थीं जिन्हें दिशा और नेतृत्व देने वाली कोई क्रान्तिकारी शक्ति राजनीतिक रंगमंच पर मौजूद नहीं थी। स्मरणीय है कि यही वह समय था जब वियतनामी क्रान्ति अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध विजयोन्मुख थी और पूरी दुनिया में, यहाँ तक कि पश्चिमी देशों में भी छात्र-युवा, बुद्धिजीवी और मेहनतकश सड़कों पर उतरकर उसका समर्थन कर रहे थे। अफ़्रीकी देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष एक के बाद एक जीतें हासिल कर रहे थे और लातिन अमेरिका में भी सैनिक जुण्टाओं के विरुद्ध प्रतिरोध संघर्ष उफान पर थे। फ्रांस में छात्र आन्दोलन और अमेरिका में अश्वेतों, स्त्रियों और युवाओं के आन्दोलनों तथा युद्ध-विरोधी आन्दोलन का अविराम सिलसिला जारी था। सोवियत संशोधनवाद के विरुद्ध चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा चलायी गयी `महान बहस´ के बाद, 1966 से चीन में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का तूफ़ान शुरू हो चुका था, जो न केवल पूरी दुनिया के मेहनतकशों और कम्युनिस्ट कतारों को संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष करने और क्रान्ति का मार्ग चुनने के लिए प्रेरित कर रहा था, बल्कि बड़े पैमाने पर युवाओं और बुद्धिजीवियों को भी माओ के विचारों और चीनी सांस्कृतिक क्रान्ति के युगान्तरकारी प्रयोग की ओर आकृष्ट कर रहा था। यह अन्तरराष्ट्रीय माहौल भारत की उन्नत चेतना वाली कम्युनिस्ट कतारों को और रैडिकल छात्रों-युवाओं-बुद्धिजीवियों को भी गहराई से प्रभावित और प्रेरित कर रहा था। इधर देश के भीतर, संशोधनवादी नेतृत्व से कम्युनिस्ट कतारों का मोहभंग निराशा से आगे बढ़कर आक्रोश और विद्रोह की भावना में परिणत होता जा रहा था। 1964 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद नेतृत्व के एक हिस्से को संशोधनवादी घोषित करते हुए दूसरे हिस्से ने जब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का गठन किया था तो रैडिकल कतारों का बहुलांश उसमें इस उम्मीद से शामिल हुआ था कि नयी पार्टी तेलंगाना की विरासत को आगे बढ़ाते हुए क्रान्तिकारी संघर्षो में उतरेगी, लेकिन जल्दी ही यह स्पष्ट होने लगा कि अपने तमाम भ्रामक रैडिकल तेवर के बावजूद माकपा के नेतृत्व भी अर्थवादी-संसदवादी सीमाओं का अतिक्रमण करने के लिए तैयार नहीं है। चीन की पार्टी द्वारा खुर्श्चेवी संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष (`महान बहस´) के दस्तावेज़ भारत के कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों को जब मिले (टूट के कगार पर खड़ी भाकपा के डांगेपन्थी धड़े ने ही नहीं बल्कि बासवपुनैया-सुन्दरैया-नम्बूदरीपाद-रणदिवे धड़े ने भी इस पॉलिमिक्स को कतारों तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की, और उन्हें तब तक अँधेरे में रखा जब तक कि ये दस्तावेज़ अलग स्रोतों से कतारों तक नहीं पहुँच गये) और फिर इस बहस से भारत की कम्युनिस्ट कतारों के अग्रिम तत्त्व परिचित हुए, तो यहाँ भी संशोधनवाद के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के लिए एक नयी दिशा मिली। 1966 में चीन में महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के शुरू होते ही वहाँ पार्टी के भीतर के बुर्जुआ हेडक्वार्टर को ध्वस्त करने के माओ के आह्वान ने भारतीय कम्युनिस्ट कतारों को भी नेतृत्व पर काबिज़ संशोधनवादियों के विरुद्ध खुली बग़ावत की प्रेरणा दी।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर दो लाइनों का संघर्ष किसी न किसी रूप में तेलंगाना किसान संघर्ष के समय से ही जारी था। इसमें नेतृत्व का एक पक्ष संशोधनवादी विचलन का शिकार था और दूसरा पक्ष जो कतारों की क्रान्तिकारी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता था, वह भी विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण विसंगति, अनिर्णय और अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट नेतृत्व और बड़ी पार्टियों पर मार्गदर्शन के लिए निर्भरता की प्रवृत्ति का शिकार था। इसके परिणामास्वरूप, यह दूसरा पक्ष भी 1950 का दशक शुरू होते-होते संशोधनवादी पंककुण्ड में जा गिरा और दोनों पक्षों के बीच मतभेद का मुद्दा सिर्फ़ यह रह गया कि राष्ट्रीय जनवाद के नारे के तहत नेहरू सरकार के प्रति सहयोग का रास्ता अपनाया जाये या लोक जनवाद के नारे के तहत मुख्यत: संसदीय विपक्ष की भूमिका निभाते हुए कुछ रैडिकल जनान्दोलन भी चलाये जायें।

तेलंगाना किसान संघर्ष कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चला पहला ऐसा सशस्त्र संघर्ष था जिसके परिणामस्वरूप 16000 वर्ग मील का क्षेत्र – जिसमें तीन हज़ार गाँव शामिल थे – मुक्त किया गया था और लगभग डेढ़ वर्षो तक इस क्षेत्र की सारी शासन-व्यवस्था किसानों की गाँव कमेटियों के हाथों में थी। कुल 4,000 किसान और पार्टी के छापामार इसमें शहीद हुए और दस हज़ार कम्युनिस्ट कार्यकर्ता तीन से चार वर्षो तक जेलों में बन्द रहे। इस दौरान कुल 30 लाख एकड़ ज़मीन किसानों में बाँटी गयी, बेदखली और बेगार प्रथा बन्द कर दी गयी और न्यूनतम मज़दूरी लागू कर दी गयी।

फ़रवरी-मार्च 1948 में जब भाकपा की दूसरी कांग्रेस में दक्षिणपन्थी पी.सी. जोशी को हटाकर बी.टी. रणदिवे को पार्टी महासचिव बनाया गया, उस समय तेलंगाना किसान संघर्ष सशस्त्र छापामार संघर्ष की मंज़िल तक पहुँच चुका था। ग़ौरतलब है तेलंगाना के प्रतिनिधियों के ज़ोर देने के बाद ही दूसरी कांग्रेस की थीसिस में तेलंगाना संघर्ष के महत्त्व का उल्लेख करते हुए उसे समर्थन दिया गया और पूरे देश में ऐसे संघर्ष संगठित करने तथा मज़दूर वर्ग से भी उनके समर्थन में आन्दोलन करने का आह्वान किया गया। लेकिन इस आह्वान के पीछे “वामपन्थी” अवसरवादी रणदिवे की यह सोच थी कि इससे पूरे देश में सशस्त्र आम विद्रोह की स्थिति पैदा हो जायेगी। रणदिवे ने युगोस्लाविया की टीटोपन्थी संशोधनवादी पार्टी के एक सिद्धान्तकार एडवर्ड कार्डेल्ज़ के विचार के आधार पर यह थीसिस पेश की कि जनवादी और समाजवादी क्रान्तियाँ एक साथ होनी चाहिए, और कम्युनिस्टों को न केवल बड़े बुर्जुआ को बल्कि सभी बुर्जुआओं को अपने हमले का निशाना बनाते हुए देशव्यापी आम हड़ताल और सशस्त्र विद्रोह का मार्ग अपनाना चाहिए। इस “वामपन्थी” दुस्साहसवाद ने भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन को जो क्षति पहुँचायी, वह इतिहास का एक तथ्य है। साथ ही, इस लाइन ने तेलंगाना संघर्ष के अग्रवर्ती विकास को भी रोकने का काम किया। मई, 1948 में आन्ध्र की पार्टी इकाई ने रणदिवे थीसिस का विरोध करते हुए अपनी यह लाइन रखी कि भारतीय क्रान्ति का चरित्र रूसी क्रान्ति से भिन्न है और यह चीन में जारी नवजनवादी क्रान्ति से काफ़ी हद तक समानता रखती है, यहाँ चार वर्गों का संयुक्त मोर्चा बनाना होगा और दीर्घकालिक लोकयुद्ध का मार्ग अपनाना होगा। आन्ध्र थीसिस में माओ त्से-तुँग के नवजनवाद के सिद्धान्त को प्रासंगिक बताते हुए भारत में सर्वहारा क्रान्ति को दो अवस्थाओं में सम्पन्न करने की योजना प्रस्तुत की गयी। रणदिवे ने इस थीसिस का विरोध करते हुए माओ के विचारों का भी विरोध किया और उन्हें टीटो और अल-ब्राउडर की श्रेणी का संशोधनवादी तक कह डाला। दो वर्षो तक पार्टी पर रणदिवे-लाइन के वर्चस्व ने तेलंगाना संघर्ष को भारी क्षति पहुँचाई। देश के विभिन्न हिस्सों में किसान संघर्षो को तेलंगाना की राह पर आगे बढ़ाने और मज़दूर वर्ग के संघर्षो को उनके साथ जोड़ने के बजाय “वामपन्थी” दुस्साहसवाद ने पार्टी को जन समुदाय से अलग-थलग कर दिया और कतारों की पहलकदमी को पंगु बना दिया गया। 1949 में चीनी क्रान्ति के बाद, 1950 में कोमिन्फॉर्म ने माओ के नवजनवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया। सोवियत पार्टी के एक सिद्धान्तकार जुकोव ने उपनिवेशों और अर्द्धउपनिवेशों में चार वर्गों के संश्रय को अनिवार्य बताया और दूसरे सिद्धान्तकार बालाबुशेविच ने तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करते हुए उसे कृषि क्रान्ति का अग्रदूत और भारतीय जनता की लोक जनवादी सत्ता स्थापित करने का प्रथम प्रयास बताया। अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व से नयी दिशा मिलते ही भारत में भी रणदिवे की “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन रातोंरात अलग-थलग पड़ गयी। मई-जून 1950 में राजेश्वर राव पार्टी के महासचिव बने और पार्टी ने आन्ध्र-थीसिस को आधिकारिक लाइन के तौर पर स्वीकार किया। लेकिन इस समय तक, पहले ही काफ़ी देर हो चुकी थी। देशव्यापी स्तर पर संघर्ष के विस्तार की सम्भावनाओं का, ग़लत लाइन काफ़ी हद तक गला घोंट चुकी थी और नयी बुर्जुआ सत्ता को अपने सुदृढ़ीकरण के लिए तीन वर्षो का कीमती समय मिल चुका था। चूँकि “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन की पराजय पूरी पार्टी में चले दो लाइनों के अन्दरूनी संघर्ष की परिणति नहीं थी बल्कि कोमिन्फॉर्म और सोवियत पार्टी की अवस्थिति के हिसाब से चलने की प्रवृत्ति का नतीजा थी, इसलिए पार्टी कतारें सही-गलत के बारे में विभ्रमग्रस्त थीं। विभ्रम का यह सिलसिला पहले से ही चल रहा था और 1947 से तो लगातार जारी था। राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय घटनाओं के प्रति ग़लत अवस्थिति अपनाने और फिर उन्हें आनन-फानन में उलट देने तथा पार्टी नेतृत्व में लगातार दो छोरों की विरोधी लाइनों की मौजूदगी के चलते कतारें निराश हो रही थीं। इसी समय भारतीय सेना ने हैदराबाद में प्रवेश किया। निजाम के आत्मसमर्पण के बाद, भारतीय सेना ने कम्युनिस्ट छापामार दस्तों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। छोटे-छोटे छापामार दस्तों में बँटी जनता की सशस्त्र सेना का सामना अब उन्नत हथियारों से लैस 50-60 हज़ार संख्या वाली सेना से था। फिर भी बहुत कठिनाइयों और अभूतपूर्व दमन के बाद ही भारतीय सेना छापामार दस्तों को पीछे धकेल सकी। मलाया सरकार की ब्रिग्स योजना की ही तरह ऐसे गाँव बसाये गये जहाँ के निवासियों को सेना के नियन्त्रण में रहना था। जंगलों की दो हज़ार आदिवासी बस्तियों को नेस्तनाबूद कर दिया गया और लोगों को यातना शिविरों में रखा गया। छापामार गाँवों को छोड़कर निकटवर्ती जंगलों में चले गये और वहाँ भी सेना का दबाव बढ़ने पर दूरवर्ती जंगली क्षेत्रों में बिखर गये।

उल्लेखनीय है कि पार्टी के बम्बई मुख्यालय में हावी एस.ए. डांगे, घाटे और अजय घोष आदि का दक्षिणपन्थी धड़ा शुरू से ही आन्ध्र लाइन का विरोध कर रहा था। तेलंगाना में सेना-प्रवेश के बाद वहाँ भी रवि नारायण रेड़्डी के नेतृत्व में कुछ लोग संघर्ष को वापस लेने के लिए दबाव बनाने लगे, हालाँकि आन्ध्र कमेटी का बड़ा हिस्सा फिर भी संग्राम को जारी रखना चाहता था। उसका मानना था कि फ़ौरी तौर पर नुकसान के बावजूद, संघर्ष को जारी रखना और देश के अन्य अनुकूल परिस्थितियों वाले भूभागों में उसका फैलाव मुमकिन है। इस समय दक्षिणपन्थी धड़े का हाथ मज़बूत करने मेँ ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी और उसके एक नेता रजनी पामदत्त ने विशेष भूमिका निभाई। दत्त का मानना था कि शीतयुद्ध की नयी विश्वपरिस्थितियों में भारत के कम्युनिस्टों को सशस्त्र संघर्ष के रास्ते को छोड़कर विश्व शान्ति आन्दोलन को मज़बूत बनाने का काम करना चाहिए और साम्राज्यवादी शिविर से भारत सरकार के दूर रहने और समाजवादी खेमे से नज़दीकी रिश्ता बनाने तथा कोरियाई जनयुद्ध का समर्थन करने के लिए नेहरू सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। इसी विचार का विकसित रूप आगे चलकर भाकपा के दक्षिणपन्थी धड़े के राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा की सोच और “प्रगतिशील” बुर्जुआ नेहरू सरकार के प्रति सहयोग- समर्थन की नीति के रूप में सामने आया। पार्टी के संशोधनवादियों ने आधिभौतिक निगमनात्मक पद्धति से अन्तरराष्ट्रीय अन्तरविरोधों के ही अनुसार राष्ट्रीय अन्तरविरोधों को भी देखने तथा दोनों में विरोध होने पर अन्तरराष्ट्रीय अन्तरविरोधों के हिसाब से अपना कार्यभार तय करने का काम एक बार फिर किया। यह ग़लती द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी की गयी थी और उसके पहले भी की जाती रही थी। ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक समिति ने भारतीय पार्टी को लिखे गये एक पत्र में अपने उपरोक्त सुझावों के साथ ही कानूनी कामों में लगने तथा डेढ़ वर्षो बाद होने वाले आगामी आम चुनाव पर ज़ोर दिया और साथ ही नेतृत्व को बदलने की भी राय दी क्योंकि राजेश्वर राव के नेतृत्व वाली केन्द्रीय कमेटी जनवादी तरीके से नहीं चुनी गयी थी। इन परिस्थितियों ने पार्टी में दक्षिणपन्थी नेतृत्व के हाथ मज़बूत करने का काम किया। 1 जुलाई, 1950 को राजेश्वर राव की जगह अजय घोष पार्टी के महासचिव बनाये गये। पार्टी में मौजूद मतभेद, संकट और विभ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए, एक बार फिर अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व पर भरोसा किया गया और चार सदस्यों का एक प्रतिनिधिमण्डल 1951 के प्रारम्भ में सोवियत पार्टी के नेतृत्व से बातचीत करने के लिए मास्को गया। इसमें दो – राजेश्वर राव और बासवपुनैया तेलंगाना संघर्ष के नेता थे, जबकि अन्य दो – अजय घोष और डांगे उसका विरोध कर रहे थे। सोवियत पार्टी की ओर से स्तालिन, मालेंकोव, मालरोव और सुस्लोव ने बातचीत की। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, इस बातचीत के बाद भारतीय प्रतिनिधिमण्डल भारत लौटा तो पहली बार भारत में जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम का एक मसौदा तैयार किया गया और एक नीति-विषयक वक्तव्य जारी किया गया। नीति-विषयक वक्तव्य रणकौशलात्मक लाइन के वृहद दस्तावेज़ का ही एक अंश था जिसे कानूनी तौर पर प्रकाशित किया गया। उपरोक्त दोनों दस्तावेज़ों में हालाँकि सशस्त्र संघर्ष का जिक्र नहीं था लेकिन रणकौशल-विषयक दस्तावेज़ में “अपरिपक्व विद्रोह और जोखिम भरी कार्रवाइयों से सावधान रहते हुए” किसानों के छापामार युद्ध के साथ ही मज़दूरों की वर्गीय हड़तालों और संघर्ष के अन्य रूपों के इस्तेमाल की बात कही गयी थी। उसमें इस धारणा को भी ग़लत ठहराया गया था कि देश के किसी हिस्से में सशस्त्र विद्रोह तभी शुरू किया जा सकता है, जब पूरे देश में विद्रोह की स्थिति तैयार हो। दस्तावेज़ के अनुसार, किसी एक बड़े भूभाग में किसान संघर्ष के ज़मीन-ज़ब्ती के स्तर पर पहुँचने के बाद, व्यापक जनान्दोलन और छापामार युद्ध यदि ठीक तरह से संगठित हों तो देश भर के किसानों को उद्वेलित करके संघर्ष को उच्च धरातल पर पहुँचा देना सम्भव है। किसान-संघर्ष के बारे में सोवियत पार्टी के आम सुझाव सही थे, पर तेलंगाना संघर्ष के बारे में ठोस निर्णय भारतीय पार्टी के नेतृत्व को लेना था, जिस पर दक्षिणपन्थी अवसरवादी हावी हो चुके थे। केन्द्रीय कमेटी ने आन्ध्र की कमेटी को संघर्ष केवल तब तक जारी रखने को कहा जब तक पार्टी सरकार से उसे स्थगित करने की शर्तो पर बातचीत पूरी न कर ले। इन शर्तो में किसानों के कब्ज़े की ज़मीन ज़मींदारों को वापस न करना, कैदियों की रिहाई, मुकदमे वापस लेना और पार्टी से प्रतिबन्ध हटाना प्रमुख थीं। लेकिन केन्द्रीय कमेटी के इस निर्णय के विपरीत अजय घोष के नेतृत्व वाले दक्षिणपन्थी धड़े और आन्ध्र के रवि नारायण रेड्डी गुट ने बिना शर्त संघर्ष वापसी के लिए दबाव बनाना शुरू किया। पार्टी की इस स्थिति का लाभ उठाकर नेहरू सरकार ने किसी भी शर्त को मानने और बातचीत करने से इन्कार कर दिया। मई, 1951 तक केन्द्रीय कमेटी में आन्ध्र के सदस्य भी मान चुके थे कि अब आंशिक छापामार संघर्ष भी जारी रख पाना सम्भव नहीं है। अक्टूबर, 1951 में पार्टी ने बिना किसी शर्त, निहायत घुटनाटेकू ढंग से संघर्ष वापस लेने की घोषणा कर दी। जंगल के छापामार नेताओं को इसकी ख़बर बाद में लगी। पार्टी अब पूरी तरह से संसदीय राह पर चल पड़ी। दक्षिणपन्थी धड़े के सामने उसके विरोधियों ने आत्मसमर्पण कर दिया और कतारों में भारी पस्ती का माहौल फैल गया।

आज पश्चदृष्टि से देखने पर कहा जा सकता है कि तेलंगाना संघर्ष की तत्कालीन पराजय कई कारणों से उस समय लगभग तय हो चुकी थी। इसका सर्वोपरि कारण यह था कि पार्टी बोल्शेविक ढंग से एकीकृत नहीं थी और उसमें ऊपर से नीचे तक “वाम” और दक्षिण के धड़े मौजूद थे, इसलिए वह भारतीय क्रान्ति को नेतृत्व देने में अक्षम थी। 1946 से 1951 के बीच पहले पी.सी. जोशी काल के दक्षिणपन्थी भटकाव ने, फिर रणदिवे काल के “वामपन्थी” भटकाव ने और फिर अजय घोष काल के दक्षिणपन्थी भटकाव ने पूरे देश स्तर पर और तेलंगाना के स्तर पर पार्टी के कार्यो को काफ़ी नुकसान पहुँचाया था। यह एक ऐसा संक्रमण-काल था, जब नयी सत्ता के सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थीं लेकिन नौसेना-विद्रोह, तेभागा-तेलंगाना-पुनप्रा वायलार के किसान संघर्षों और देशव्यापी मज़दूर आन्दोलनों को एक कड़ी में पिरोकर जनक्रान्ति की धारा को आगे बढ़ाने में पार्टी-नेतृत्व नाकाम रहा। यदि यह प्रक्रिया आगे बढ़ती तो कांग्रेस की समझौतापरस्ती का पहलू और नंगा होकर सामने आता और पार्टी के नेतृत्व में यदि जनवादी क्रान्ति जल्दी पूरी नहीं भी होती तो या तो दीर्घकालिक लोकयुद्ध मज़बूत आधार पर, आगे की मंज़िलों में प्रविष्ट हो गया होता या जनसंघर्षों के दबाव में नेहरू सरकार भूमि क्रान्ति के कार्यभारों को हालाँकि प्रशियाई मार्ग से ही सही और ऊपर से ही सही लेकिन तेज़ी के साथ पूरा करने को विवश हो जाती और तेज़ पूँजीवादी विकास के साथ भारत जल्दी ही समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में प्रविष्ट हो जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1951 तक, पार्टी-नेतृत्व में मतभेद के चलते तेलंगाना संघर्ष को इतना नुकसान पहुँच चुका था कि कम से कम, फौरी तौर पर उसकी पराजय सुनिश्चित हो चुकी थी। फिर भी, उस समय यदि नेतृत्व पर दक्षिणपन्थी धड़ा काबिज़ नहीं होता और पूरी तरह से आत्मसमर्पण करने के बजाय, फौरी तौर पर पीछे हटने और अपनी सैन्य शक्ति को दुर्गम जंगल क्षेत्रों में बिखरा देने के बाद, नये सिरे से उस क्षेत्र में तथा देश के अन्य ऐसे भूभागों में किसान-संघर्ष संगठित किये जाते, तो स्थिति को सँभालकर फिर से आगे बढ़ने का अवसर मिल जाता। इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राजेश्वर राव के नेतृत्व में जिस धड़े ने तेलंगाना में सही लाइन ली थी, वह भी विचारधारात्मक रूप से कमज़ोर था। इसके चलते, कुछ समय तक केन्द्रीय कमेटी में प्रभावी होने के दौर में भी वह अपनी लाइन का देशव्यापी स्तर पर सुदृढ़ीकरण नहीं कर सका, विरोधी लाइन के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के बजाय उसने समझौता करने का रुख़ अपनाया और अन्तत: घुटने टेक दिये। इस बुनियादी तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि 1951 तक भारत की पार्टी के पास न तो जनवादी क्रान्ति का कोई सुसंगत कार्यक्रम था, न ही कोई भूमि-क्रान्ति का कार्यक्रम (एग्रेरियन प्रोग्राम)। 1951 में सोवियत पार्टी की राय से, जब कार्यक्रम और रणकौशलात्मक लाइन के दस्तावेज़ तैयार हुए तब तक नेतृत्व पर दक्षिणपन्थी काबिज़ हो चुके थे, पार्टी संशोधनवाद की राह पर आगे बढ़ चुकी थी और तेलंगाना संघर्ष की पराजय तय हो चुकी थी। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि चीनी क्रान्ति जैसे दीर्घकालिक लोकयुद्ध के मार्ग का पक्षधर धड़ा, अपनी सही अवस्थिति के बावजूद, यदि स्थितियाँ उसके अनुकूल होतीं, तब भी संघर्ष को किस हद तक आगे ले जा पाता, यह संदिग्ध है, क्योंकि विचारधारात्मक रूप से यह धड़ा भी काफ़ी अपरिपक्व था और भारतीय परिस्थितियाँ हूबहू चीन जैसी नहीं थीं। क्रान्ति पूर्व अर्द्धऔपनिवेशिक चीन एक प्राक्औपनिवेशिक मंज़िल में था, जबकि 1947 के बाद का भारत विउपनिवेशीकरण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हो पाने के बावजूद एक उत्तर औपनिवेशिक समाज था, जिसकी एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता थी, जो एक ऐसे औद्योगिक पूँजीपति वर्ग के हाथों में थी, जो चीन जैसा दलाल पूँजीपति वर्ग नहीं था। अपनी इस प्रकृति के चलते आगे चलकर राष्ट्रीय बाज़ार के निर्माण के लिए, प्रशियाई मार्ग से सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण का मार्ग अपनाना और साम्राज्यवादियों का कनिष्ठ साझीदार होते हुए भी अन्तर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर अपने आर्थिक विकल्पों का विस्तार करना इसके लिए अपरिहार्य था। भारतीय पूँजीपति वर्ग के इस चरित्र की ओर सबसे पहले इतिहासकार डी.डी. कोसम्बी ने इंगित किया था। इस मायने में 1951 का कार्यक्रम वर्ग-सम्बन्धों की दृष्टि से तत्कालीन समय में क्रान्ति की मंज़िल और मार्ग का तो ठीक निर्धारण कर रहा था लेकिन भारतीय पूँजीपति वर्ग और राज्यसत्ता के चरित्र के मूल्यांकन में सटीकता और स्पष्टता की कमी के चलते वह भारतीय समाज के विकास की दिशा के बारे में कुछ नहीं कहता था। वह इस बात को स्पष्ट नहीं करता था कि सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति यदि सम्पन्न नहीं होती, तो भारतीय पूँजीपति वर्ग ग़ैरक्रान्तिकारी रास्ते से, ऊपर से क्रमश: भूमि सम्बन्धों को बदलने का काम करता ही, क्योंकि यह उसके वर्गहित का तकाज़ा था। वह इस बात को भी स्पष्ट नहीं करता था कि एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता और सापेक्षत: अधिक पूँजीवादी विकास के कारण, 1947-51 के दौरान राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की मंज़िल होते हुए भी, दीर्घकालिक लोकयुद्ध के चीनी रास्ते को हूबहू यहाँ लागू कर पाना सम्भव नहीं था। उस समय चीनी पार्टी ने भी आगाह किया था कि हर उपनिवेश-अर्द्धउपनिवेश- नवउपनिवेश में छापामार किसान संघर्ष के चीनी अनुभव को आँख मूँदकर दुहराया नहीं जा सकता। इन जटिल, तरल संक्रमणकालीन स्थितियों में, यदि सब कुछ तेलंगाना में सही लाइन लागू करने वाले धड़े के अनुकूल होता, तो भी यह कह पाना मुश्किल है कि अपनी विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण, वह संघर्ष को कहाँ तक आगे ले जा पाता और चीनी क्रान्ति के मार्ग के अन्धानुकरण की प्रवृत्ति से बच पाता भी या नहीं। भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के उत्तरवर्ती दौर का इतिहास तो यही बताता है कि ऐसा बहुत मुश्किल होता।

बहरहाल, इतिहास में जो घटित हुआ, वह यह कि पार्टी 1951 में ही शान्तिपूर्ण संविधानवाद का रास्ता अपना चुकी थी और मुख्यत: और मूलत: मेंशेविक और काउत्स्कीपन्थी यूरोपीय पार्टियों के साँचे में ढल चुकी थी। 1951 से लेकर 1962-63 तक इसमें दो लाइनों का संघर्ष वस्तुत: संसदवाद-अर्थवाद की नरम धारा और रैडिकल धारा के बीच संघर्ष के रूप में ही मौजूद रहा। कतारों का बड़ा हिस्सा क्रान्तिकारी आकांक्षाओं और चरित्र वाला था। (हालाँकि सुधारवादी तत्त्वों की नयी भरती लगातार जारी थी), लेकिन अपनी विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण वह नेतृत्व के रैडिकल संशोधनवादी धड़े को ही क्रान्तिकारी मानता था। जो नरमपन्थी उदारवादी धड़ा था, उसका नेतृत्व डांगे, मोहित सेन, भवानी सेन, भूपेश गुप्त, दामोदरन, जी. अधिकारी आदि के हाथों में था और मध्यमार्गी अजय घोष भी मूलत: उन्हीं के साथ थे। दूसरे धड़े का नेतृत्व सुन्दरैया, गोपालन, बासवपुनैया, प्रमोद दासगुप्ता आदि के हाथों में था। पहले धड़े की राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति की थीसिस यह थी कि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस में मौजूद धड़ा प्रगतिशील राष्ट्रीय बुर्जुआ वर्ग का प्रतिनिधि है और नेहरू सरकार विउपनिवेशीकरण और भूमि-सुधारों के राष्ट्रीय जनवादी कार्यभारों को अंजाम दे रही है, इसलिए भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को उसके प्रति मुख्यत: सहयोग का रुख़ अपनाना चाहिए। साथ ही, यह सरकार समाजवादी शिविर के प्रति भी दोस्ताना रुख़ रखती है। इसे मज़बूत बनाने के लिए और साथ ही विश्व शान्ति आन्दोलन को मज़बूत बनाकर शीतयुद्ध का प्रतिकार करने के लिए नेहरू सरकार के प्रति सहयोगी रुख़ अपनाना ज़रूरी है। दूसरी ओर रैडिकल संशोधनवादी धड़े का यह मानना था कि भारत में राज्यसत्ता का बड़ा साझीदार बड़ा पूँजीपति वर्ग है जो साम्राज्यवाद के साथ समझौते कर रहा है और राष्ट्रीय जनवादी कार्यभारों को कतई पूरा नहीं करना चाहता। इसके विरुद्ध चार वर्गो के रणनीतिक संश्रय के आधार पर लोक जनवादी क्रान्ति के लिए संघर्ष करना होगा, जिसका केन्द्रीय तत्त्व भूमि क्रान्ति होगा। ऊपरी तौर पर देखने पर यह कार्यक्रम क्रान्तिकारी लगता था, लेकिन वास्तविकता यह थी कि क्रान्तिकारी किसान संघर्ष को पुनस्संगठित करके तेलंगाना किसान-संघर्ष की परम्परा को आगे बढ़ाने की कोई ठोस कार्य-योजना इसके वाहक धड़े ने कभी प्रस्तुत नहीं की। जगह-जगह भूमिहीनों के बीच ग़ैरमजरुआ, पंचायती व सीलिंग से निकली ज़मीन बाँटने, सरकार पर भूमि-सुधारों की गति तेज़ करने के लिए दबाव बनाने, न्यूनतम मज़दूरी जैसी माँगों पर संघर्ष करने, संसद में नेहरू की नीतियों के खिलाफ़ रैडिकल भाषण देने और औद्योगिक मज़दूरों की बोनस, वेतनवृद्धि व अन्य सुविधाओं को लेकर आन्दोलन संगठित करने के अतिरिक्त लोक जनवादी क्रान्ति का कार्यक्रम देने वाले धड़े ने और कुछ भी नहीं किया। यहाँ यह उल्लेख भी कर दिया जाना चाहिए कि 1955-56 के दौरान अजय घोष, नम्बूदरिपाद, डांगे, जगन्नाथ सरकार, बालकृष्ण मेनन आदि कुछ लोग इस तरीके की बात कर रहे थे कि भारतीय सत्तारूढ़ बुर्जुआ भी बिस्मार्ककालीन प्रशा की तरह, ऊपर से, भूस्वामित्व ढाँचे का क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण कर रहा है, लेकिन फिर वे इस मसले पर कायराना और अवसरवादी ढंग से चुप्पी साध गये। यूँ तो एक संशोधनवादी पार्टी के लिए कार्यक्रम के सही-ग़लत होने का कोई मतलब नहीं होता, लेकिन यह ज़रूर है कि भूमि सम्बन्धों के रूपान्तरण से जुड़े पक्षों पर उस समय यदि बहस चली होती तो नक्सलबाड़ी के बाद, कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच भी यह मुद्दा बहस के एजेण्डे पर आसानी से आ जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।, कहा जा सकता है कि पहला धड़ा जहाँ एकदम सामाजिक जनवादी आचरण करते हुए पार्टी को बुर्जुआ वर्ग की गोद में बैठा देना चाहता था, वहीं दूसरा धड़ा रैडिकल अर्थवादी-ट्रेडयूनियनवादी-संसदवादी विरोध की कार्रवाइयाँ चलाते हुए एक ज़िम्मेदार संसदीय विपक्ष, व्यवस्था के भीतर सक्रिय एक `प्रेशर ब्लॉक´ और व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा-पंक्ति की भूमिका निभाना चाहता था। लेकिन इस धड़े के संशोधनवादी चरित्र को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि संसदीय और आर्थिक संघर्षों के अतिरिक्त इसने 1951 से 1964 तक किसानों के क्रान्तिकारी भूमि संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए तथा मज़दूर वर्ग के बीच क्रान्तिकारी राजनीतिक प्रचार एवं राजनीतिक संघर्ष संगठित करने के लिए कुछ भी नहीं किया। पूरी पार्टी के कानूनी बना दिये जाने और चवन्नियाँ सदस्यता सहित सभी मेंशेविक ढंग-ढर्रों को अपना लेने पर इस धड़े ने कभी कोई सवाल नहीं उठाया। 1958 में हुई पार्टी की पाँचवीं (विशेष) कांग्रेस (अमृतसर) में जब सोवियत पार्टी की बीसवीं कांग्रेस में स्वीकृत खुर्श्चेवी संशोधनवादी नीतियों को अपनाया गया और पार्टी संविधान की प्रस्तावना से `क्रान्तिकारी हिंसा´ शब्दावली को हटा दिया गया तो एक भी प्रतिनिधि ने इसका विरोध नहीं किया। नक्सलबाड़ी किसान-उभार से जन्मी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धारा के भी नेतृत्व की विचारधारात्मक कमज़ोरी को समझने के लिए यहीं पर यह उल्लेख भी ज़रूरी है कि इस कांग्रेस में भावी मा-ले नेतृत्व के कई लोग भी प्रतिनिधि के रूप में मौजूद थे। उनमें डी.वी. राव (केन्द्रीय कमेटी के सदस्य भी थे) और नागी रेड्डी तो राष्ट्रीय स्तर के नेता माने जाते थे जबकि कई अन्य राज्य स्तर के नेता थे। छठी कांग्रेस (विजयवाड़ा, 1961) में दो परस्पर-विरोधी कार्यक्रम के मसौदों पर अवश्य गम्भीर मतभेद सामने आया, लेकिन सोवियत प्रतिनिधिमण्डल के खुर्श्चेवपन्थियों के बीच-बचाव से फूट को टाल दिया गया। उल्लेखनीय है कि 1956-61 के दौरान खुर्श्चेवी संशोधनवाद का विरोध परोक्ष रूप से करते हुए चीन की पार्टी स्तालिन और सर्वहारा क्रान्ति के मार्क्सवादी-लेनिनवादी उसूलों के पक्ष में सकारात्मक तौर पर अपने मुखपत्रों में लिख रही थी, लेकिन संशोधनवाद पर खुला हमला बोलने की जगह वह पार्टी-स्तर पर बातचीत के ज़रिये मतभेदों को हल करने की कोशिश कर रही थी। उसे उम्मीद थी कि पूरी सोवियत पार्टी शायद खुर्श्चेव के साथ न हो और बातचीत करके सोवियत पार्टी को सही रास्ते पर लाया जा सकता है तथा विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन को फूट से बचाया जा सकता है। इसी प्रक्रिया में 1957 और 1960 के अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट सम्मेलनों द्वारा पारित दस्तावेज़ों में चीन की पार्टी ने अपनी अवस्थिति दर्ज कराने के बावजूद समझौते भी किये। इन विचारधारात्मक समझौतों के चलते इन दस्तावेज़ों में कई संशोधनवादी प्रस्थापनाएँ शामिल हो गयी थीं, जिनका पूरा लाभ पूरी दुनिया की पार्टियों के संशोधनवादियों ने उठाया। चीन की पार्टी की उम्मीदों का इतिहास के अनुभव समर्थन नहीं करते थे और उसका आचरण सुधारवाद और संशोधनवाद के विरुद्ध तत्क्षण संघर्ष छेड़ देने के मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के आचरण से मेल नहीं खाता था। संशोधनवाद के विरुद्ध खुले संघर्ष में चीन की पार्टी द्वारा किये गये अनावश्यक विलम्ब से पूरी दुनिया के कम्युनिस्ट आन्दोलन में संशोधनवादियों को लाभ मिला। कतारों को दिग्भ्रमित करने और अपना सुदृढ़ीकरण करने में उन्होंने इस अन्तराल का भरपूर लाभ उठाया। भारत के कम्युनिस्ट नेतृत्व को तो दुनिया की किसी बड़ी पार्टी या मान्य अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व से दिशा पाये बिना सोचने की आदत ही नहीं थी। ऐसे में, पाँचवीं और छठी कांग्रेस में खुर्श्चेवी संशोधनवाद पर सवाल उठाने का भला सवाल ही कहाँ उठता है? कतारों की क्रान्तिकारी स्पिरिट भी 1951 के बाद से लगातार क्षरित हो रही थी। अब स्तालिन की आलोचना और संसदीय मार्ग की स्वीकृति ने उनमें और अधिक पस्ती और निराशा पैदा करने का काम किया।

1962 में भारत के चीन युद्ध के समय डांगेपन्थी धड़े ने अपनी वर्ग-सहयोगी लाइन की तार्किक परिणति के तौर पर अन्धराष्ट्रवादी अवस्थिति अपनायी और चीन को हमलावर मानते हुए नेहरू सरकार की सीमानीति को पुरज़ोर समर्थन दिया। उस समय चीन पश्चिमी शक्तियों की घेरेबन्दी और कुत्साप्रचार के घटाटोप का शिकार था, फिर भी पश्चिमी मीडिया और पश्चिमी बुद्धिजीवियों का बहुलांश भारत-चीन सीमा विवाद में अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों की शह और अपनी क्षेत्रीय विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षा के चलते उकसावे और हमले की कार्रवाई के लिए भारत को ही ज़िम्मेदार मानता था। कई पुस्तकों में इन तथ्यों की सविस्तार चर्चा मिलती है जिसमें अमेरिकी पत्रकार नेविल मैक्सवेल की पुस्तक सर्वाधिक प्रसिद्ध है। भारत में भी पुराने क्रान्तिकारी पं. सुन्दरलाल सहित कई लोग नेहरू की विस्तारवादी नीतियों और हमले की कार्रवाई के कटु आलोचक थे और तथ्यों को सामने लाने वाली कई पुस्तकें व लेख यहाँ भी लिखे गये लेकिन अन्धराष्ट्रवादी प्रचार की लहर में वे व्यापक जनता तक नहीं पहुँच सके। भारत की कम्युनिस्ट कतारें सीमा-विवाद सम्बन्धी इस सारी सामग्री से परिचित नहीं थीं, लेकिन अपने सहज वर्ग-बोध से समाजवादी चीन को विस्तारवादी और हमलावर मानने को वे तैयार नहीं थी और भारतीय बुर्जुआ सत्ता के प्रतिक्रियावादी तथा विस्तारवादी चरित्र को भी वे भली-भाँति समझती थीं। भारी अन्धराष्ट्रवादी लहर का मुकाबला करते हुए भारत की कम्युनिस्ट कतारों के बड़े हिस्से ने नेहरू सरकार की हमलावर विस्तारवादी सीमा-नीति का विरोध किया। पार्टी-नेतृत्व के भीतर डांगेपन्थियों का विरोधी जो दूसरा धड़ा था (जो कि अल्पमत में था), उसने डांगेपन्थियों के बहुमत द्वारा ली गयी लाइन को मार्क्सवाद-विरोधी और बुर्जुआ राष्ट्रवाद के अवसरवादी सिद्धान्त पर आधारित घोषित किया। लेकिन आने वाले समय की घटनाओं ने सिद्ध किया कि ऐसा सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावाद के प्रति प्रतिबद्धता के चलते नहीं, बल्कि क्रान्तिकारी कतारों को अपने पक्ष में करने के लिए किया गया था। चीनी “हमले” के मिथक के पीछे की सच्चाइयों को साहसपूर्वक उजागर करने और अन्धराष्ट्रवाद-विरोधी प्रचार का कोई कार्यक्रम हाथ में लेने के बजाय, इस दूसरे धड़े की ओर से राममूर्ति ने पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में एक वैकल्पिक प्रस्ताव पेश किया जिसमें सिर्फ़ इतना ही कहा गया था कि चीन और भारत दो महान पड़ोसी देश हैं, उन्हें आपसी युद्ध में नहीं उलझना चाहिए क्योंकि इससे दोनों देशों को तबाही-बर्बादी का सामना करना पड़ेगा। लेकिन इस कायराना जोड़तोड़ के बावजूद वे बच नहीं सके। भारत सरकार ने उनमें से अधिकांश को, डांगे द्वारा दी गयी सूची के आधार पर, गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया।

1963 के उत्तरार्द्ध से, `क्रान्ति या शान्तिपूर्ण संक्रमण?´ के बुनियादी विचारधारात्मक प्रश्न पर, भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन में शायद पहली बार अभूतपूर्व आयामों वाली एक ऐसी बहस की शुरुआत हुई जिसने समूची पार्टी कतारों को अपनी ज़द में ले लिया। 1957 से 1962 के बीच सोवियत पार्टी और चीनी पार्टी का जो भी साहित्य भारत की कम्युनिस्ट कतारों के एक हिस्से तक पहुँच पा रहा था, उससे यह बात तो स्पष्ट हो ही चुकी थी कि चीन की पार्टी न केवल तोग्लियाती और टीटो के संशोधनवाद का विरोध करती है, बल्कि वह खुर्श्चेव के तीन “शान्तिपूर्णों” के सिद्धान्त और उसके द्वारा प्रस्तुत स्तालिन की आलोचना को भी स्वीकार नहीं करती है। लेकिन पूरे देश की व्यापक कतारों तक सोवियत लेखन की ही पहुँच थी। चीनी पार्टी का साहित्य ज्यादातर कुछ महानगरों के मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों और प्रबुद्ध कतारों तक ही पहुँच पाता था। पार्टी नेतृत्व अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के बीच जारी मतभेदों से परिचित था, लेकिन उसके दूसरे धड़े ने भी कभी चीनी पार्टी की अवस्थिति को कतारों तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की। जून, 1963 में चीनी पार्टी ने पहली बार बहस को खुला करते हुए खुर्श्चेवी लाइन के विरुद्ध विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन की वैकल्पिक आम दिशा का दस्तावेज़ प्रस्तुत किया। इसके बाद सितम्बर 1963 से लेकर जुलाई 1964 के बीच क्रमश: नौ निबन्धों के ज़रिये चीनी पार्टी ने ख्रुश्चेवी नकली कम्युनिज्म को पूरी तरह बेनकाब करते हुए सोवियत पार्टी को पूँजीवादी रास्ते का राही घोषित किया। यही बहस अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास में `महान बहस´ नाम से प्रसिद्ध हुई। उस समय आधिकारिक पार्टी-लाइन का विरोध करने वाले धड़े का बड़ा हिस्सा जेल में था। जो लोग बाहर थे, उन्होंने `महान बहस´ के दस्तावेज़ों को पार्टी-कतारों तक पहुँचाने के लिए कुछ भी नहीं किया। ये दस्तावेज़ मुख्यत: बुद्धिजीवियों के बीच से पार्टी कतारों तक पहुँचे और फिर वहां से तेज़ी से फैले। अब पहलकदमी पूरी तरह से कतारों के हाथ में थी। जुझारू कतारों के बड़े हिस्से ने चीनी अवस्थिति का समर्थन किया। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि चीनी “हमले” के दुष्प्रचार और अन्धराष्ट्रवादी लहर का निशाना दरअसल चीनी पार्टी की क्रान्तिकारी लाइन है, इसलिए कतारों ने अन्धराष्ट्रवाद के विरुद्ध साहसिक प्रचार-कार्य पूरी तरह से अपनी स्वतन्त्र पहल पर करना शुरू किया। यह मुहिम बंगाल में सर्वाधिक सशक्त थी। कलकत्ता के शहीद मैदान में एक भारी रैली हुई और फिर सड़कों पर जुलूस निकाला गया। जिसका प्रमुख नारा था : `चीन का हौवा खड़ा करने वाले साम्राज्यवाद के एजेण्ट हैं।´ पूरी स्थिति को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि पार्टी का बांगला मुखपत्र `स्वाधीनता´ नेतृत्व के 16 आधिकारिक पार्टी-लाइन विरोधी गुट के नियन्त्रण में होने के बावजूद इस पूरे मसले पर चुप्पी साधे हुए था। दूसरी ओर, पार्टी कतारों की पहल पर शुरू हुआ नया साप्ताहिक `देशहितैषी´ और नया मासिक `नन्दन´ इस पूरे प्रश्न पर जुझारू मुखरता के साथ स्टैण्ड लेकर लिख रहे थे और संशोधनवाद पर चोट कर रहे थे।

आधिकारिक पार्टी-लाइन विरोधी पक्ष के नेतागण जब जेलों से बाहर आये तो स्थितियाँ उन्हें अपनी समझ और नियन्त्रण की सीमा से परे प्रतीत हुई। जेल जाने से पहले वे चीनी लाइन के साथ जोड़कर देखे जाते थे, हालाँकि वे स्वयं ऐसा नहीं कहते थे। जेल में उनके भीतर भी मतभेद पैदा हो गये थे। कुछ उदारपन्थियों का कहना था कि सोवियत और चीनी पार्टी – दोनों की अवस्थितियाँ ग़लत हैं जबकि उनके विरोधियों का कहना था कि चीनी अवस्थिति मुख्यत: सही है। आधिकारिक लाइन विरोधी नेतृत्व का एक छोटा-सा हिस्सा जो बंगाल में गिरफ़्तारी से बच गया था और भूमिगत होकर पार्टी की राज्य कमेटी के रूप में काम कर रहा था, उसने `पृथ्वीराज´ छद्मनाम से एक दस्तावेज़ निकाला था जिसमें यह स्पष्ट कहा गया था कि अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में मतभेद मार्क्सवाद के बुनियादी उसूलों पर हैं। लेकिन यह कहने के बावजूद, `पृथ्वीराज´ इकाई के एक सदस्य समर मुखर्जी ने स्पष्ट कर दिया था कि वे फूट के लिए अपनी ओर से कोई पहल नहीं करेंगे। जेल से बाहर आये नेताओं की भी यही सोच थी, लेकिन उन्होंने महसूस किया कि कतारों में यह भावना प्रचण्ड रूप में मौजूद है कि पार्टी नेतृत्व पर हावी डांगेपन्थियों के बहुमत के साथ सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में विचारधारात्मक मुद्दे से कतारों का ध्यान हटाने के लिए आधिकारिक पार्टी-लाइन विरोधी धड़े ने राष्ट्रीय अभिलेखागार से डांगे का वह पत्र निकलवाकर ख़ूब ज़ोर-शोर से कतारों में बाँटना शुरू कर दिया, जो उसने ब्रिटिश सत्ता को जेल से माफ़ीनामे के तौर पर भेजा था। लेकिन यह जुगत काम न आयी। विचारधारात्मक संघर्ष और तीखा हो गया और इन नेताओं के सामने इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प शेष नहीं बचा कि वे एक नयी पार्टी के गठन की दिशा में आगे कदम बढ़ायें। इस उद्देश्य से तेनाली (आन्ध्र प्रदेश) में एक कन्वेंशन बुलाया गया। लेकिन नेताओं के इस धड़े की नीयत और चरित्र को इस बात से समझा जा सकता है कि इस कन्वेंशन के ऐन पहले ज्योति बसु समझौते का एक प्रस्ताव लेकर भूपेश गुप्त और राजेश्वर राव से मिलने उड़कर दिल्ली पहुँचे। उनकी शर्त थी कि यदि अगली पार्टी कांग्रेस 1962 की सदस्यता के आधार पर हो और यदि डांगे को पार्टी-चेयरमैन पद से हटा दिया जाये, तो नयी पार्टी बनाने का विचार छोड़ा जा सकता है। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि ऐसे नेतृत्व के लिए, फूट का मुद्दा विचारधारात्मक-राजनीतिक नहीं था, बल्कि संसदीय राजनीति के दायरे में ही अधिक नरम या अधिक गरम नीतियों-रणनीतियों को लेकर था। `पृथ्वीराज दस्तावेज़´ में सोवियत व चीनी पार्टी के बीच के मतभेदों को विचारधारात्मक बताते हुए चीनी अवस्थिति का स्पष्ट समर्थन किया गया था जबकि राष्ट्रीय परिषद में हावी डांगेपन्थियों ने यह प्रस्ताव पारित करवाया था कि चीन आक्रमणकारी है। इन दोनों लाइनों के एक ही पार्टी में सहअस्तित्व की बात सोचने वाले लोग परले दरजे के अवसरवादी ही हो सकते थे।

ऐसे अवसरवादी नेतृत्व के प्रति रैडिकल कतारें शुरू से ही सशंकित थीं, फिर भी उन्हें यही लगा कि डांगेपिन्थयों से अलग होने के बाद इस नये नेतृत्व के ढुलमुलपन पर दबाव बनाकर नयी पार्टी को रास्ते पर लाया जा सकता है। कतारों को तब और आश्चर्य हुआ था जब, जिस नेतृत्व से एक क्रान्तिकारी लाइन लागू करने की अपेक्षा थी, वह दमनकारी राज्य मशीनरी की भरपूर सक्रियता के समय खुले तौर पर एक कांग्रेस के लिए एकत्र हुआ और फिर वही हुआ जो होना था। आधिकारिक-लाइन विरोधी सभी अग्रणी नेताओं को शान्तिपूर्वक उठाकर जेल में डाल दिया गया। जब अन्धराष्ट्रवादी लहर के खिलाफ़ रैडिकल कतारें सड़कों पर थीं, उस समय नेतृत्व के इस धड़े को जेल शायद अधिक महफ़ूज़ जगह लगी। कतारों के इस नये नेतृत्व के प्रति शंकाओं को तब और अधिक बल मिला जब नयी पार्टी (माकपा) के गठन के लिए प्रस्तावित कांग्रेस के लिए इसने मसौदा पार्टी कार्यक्रम वितरित किया। हालाँकि लोक जनवादी क्रान्ति की बात करते हुए इसमें मजदूर वर्ग के नेतृत्व, मज़दूर-किसान संश्रय पर आधारित संयुक्त मोर्चे और भूमि-क्रान्ति के धुरी होने की बात की गयी थी, लेकिन इसमें संशोधनवाद और सुधारवाद के कई तत्त्व थे और भविष्य में क्रान्तिकारी लाइन को पूरी तरह से छोड़ देने की तमाम गुंजाइशें इसमें अन्तर्निहित थीं, जिन्हें रैडिकल कतारों के एक बड़े हिस्से ने भाँप लिया। नतीजतन, कांग्रेस की तैयारी के लिए आयोजित पार्टी कन्वेंशन के सभी स्तरों पर तीखी बहसें उठ खड़ी हुई। यहाँ तक कि पार्टी कांग्रेस तक में कार्यक्रम का एक वैकल्पिक मसौदा पेश किया गया, लेकिन पुराने नौकरशाहाना ढंग से, जोड़तोड़ के बहुमत के सहारे हर रैडिकल आलोचना को दबा दिया गया। पार्टी कार्यक्रम के मसौदे के सिर्फ़ कुछ शब्दों में छोटे-मोटे बदलाव किये गये।

इतना कुछ होने के बावजूद, रैडिकल कतारें यह समझने में विफल रहीं कि जो नयी पार्टी गठित की जा रही है, वह भी नेतृत्व और नीतियों की दृष्टि से एक संशोधनवादी पार्टी है। उन्हें अपेक्षा थी कि इस पार्टी के भीतर दो लाइनों का संघर्ष चलाकर और मध्यमार्गियों को ठिकाने लगाकर इसे क्रान्तिकारी रास्ते पर उन्मुख किया जा सकता है। इस विभ्रम के लिए पार्टी की विचारधारात्मक कमज़ोरी का लम्बा इतिहास, राजनीतिक शिक्षा के अभाव की लम्बी परम्परा और निपट संशोधनवाद का चौदह वर्षों लम्बा दौर ज़िम्मेदार थे। नवगठित पार्टी ने सर्वहारा क्रान्ति के मूलभूत विचारधारात्मक प्रश्न पर जो अवस्थिति अपनायी उसकी सारवस्तु स्पष्टत: संशोधनवादी थी। खुर्श्चेवी संशोधनवाद की आलोचना करने के बावजूद माकपा-नेतृत्व का मानना था कि चीनी पार्टी अतिवामपन्थी संकीर्णतावादी भटकाव की शिकार है। सोवियत संघ के बारे में उनका कहना था कि वहाँ की पार्टी संशोधनवादी भटकाव की शिकार है किन्तु राज्य और समाज का चरित्र अभी भी समाजवादी है। यह अवस्थिति अपने आप में हास्यास्पद रूप से विसंगतिपूर्ण थी। लेनिन की परिभाषा के अनुसार, संशोधनवादी पार्टी का मतलब है समाजवादी मुखौटे वाली बुर्जुआ पार्टी। ऐसी कोई पार्टी यदि राज्य पर काबिज़ हो तो राज्य का चरित्र सर्वहारा अधिनायकत्व का नहीं, बल्कि बुर्जुआ अधिनायकत्व का ही होगा और उस राज्य के होते समाजवादी समाज का विघटन केवल समय की बात होगी। 1955 से 1964 तक सोवियत संघ का समाजवादी तानाबाना पूरी तरह विघटित हो चुका था और उसका स्थान राजकीय इजारेदार पूँजीवाद ले चुका था। 1968 में चेकोस्लोवाकिया पर हमले के बाद, सोवियत संघ का साम्राज्यवादी चरित्र भी नंगा हो गया। बाद के दशक के दौरान, राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों को मदद देने के नाम पर उनमें फूट डालने, उन्हें सशस्त्र संघर्ष का रास्ता छोड़ समझौते की नसीहत देने, नवस्वाधीन देशों का सहायता के नाम पर शोषण करने और पूर्वी यूरोपीय देशों की जनता का शोषण करने की सोवियत नीति ने सोवियत संघ के सामाजिक साम्राज्यवादी चरित्र को दिन के उजाले की तरह साफ़ कर दिया। लेकिन माकपा नेतृत्व सोवियत संघ को तब तक समाजवादी मानता रहा जब तक राजकीय पूँजीवाद का स्थान पश्चिमी ढंग के निजी पूँजीवाद ने नहीं ले लिया और सोवियत संघ का विघटन नहीं हो गया। माकपा की थीसिस के अनुसार, पैंतीस वर्षों तक एक संशोधनवादी पार्टी के शासन में राज्य और समाज का चरित्र समाजवादी बना रहा। मार्क्सवाद के साथ इससे बड़ा मज़ाक भला और क्या हो सकता है! और बात केवल इतनी ही नहीं थी। धीरे-धीरे माकपा ने सोवियत पार्टी को संशोधनवादी कहना भी बन्द कर दिया।

पूँजीवादी पुनर्स्थापना के कारणों और समाजवादी संक्रमण की अवधि में जारी वर्ग संघर्ष की प्रकृति के बारे में माओ त्से-तुङ के विश्लेषण और सैद्धान्तिक निष्पत्तियों पर माकपा ने कभी विस्तार से कुछ नहीं लिखा, लेकिन महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के प्रयोग को वह शुरू से अस्वीकार करती रही और ल्यू शाओ-ची व देङ सियाओ-पिङ के उत्पादक शक्तियों के विकास के संशोधनवादी सिद्धान्त को मार्क्सवादी मानती रही। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि वह आज के चीन के “बाज़ार समाजवाद” नामधारी नग्न पूँजीवाद को समाजवाद मानती है और सांस्कृतिक क्रान्ति को देङपंथियों के सुर में सुर मिलाते हुए एक “अतिवामपन्थी भूल” और “महाविपदा” घोषित करती है। वैसे, आम तौर पर मध्यमार्ग अपनाने वाली हर संशोधनवादी पार्टी की तरह माकपा अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के हर अहम विचारधारात्मक मसले पर प्राय: चुप्पी का ही रवैया अख्तियार करती रही है और विवश होने पर ही अपनी संशोधनवादी अवस्थिति को रखती रही है। `महान बहस´ में चीन की अवस्थिति को कथनी में सही मानते हुए भी उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों-नवउपनिवेशों में क्रान्ति सहित विश्व सर्वहारा क्रान्ति की आम दिशा के बारे में चीनी पार्टी द्वारा 1963 में प्रस्तुत अवस्थिति की जगह उसने खुर्श्चेवी संशोधनवादी आम दिशा को ही सारत: स्वीकार किया। माओ की मृत्यु के बाद, चीन में प्रतिक्रियावादी तख्तापलट करके सत्तासीन हुए पूँजीवादी पथगामियों ने सोवियत पार्टी को जब बिरादराना पार्टी कहना शुरू कर दिया, तो माकपा ने इसका कोई विरोध नहीं किया और उनके इस कुटिल पैंतरापलट को चुपचाप स्वीकार कर लिया। माकपा का यह संशोधनवादी चरित्र समय बीतने के साथ ही ज्यादा से ज्यादा नंगा होता गया, लेकिन विचारधारात्मक अवस्थिति और पार्टी की प्रकृति की दृष्टि से देखें तो अपने जन्मकाल से ही यह एक संशोधनवादी पार्टी थी।

यानी संकीर्ण अनुभववादी पर्यवेक्षण के बजाय, यदि पार्टी संगठन के लेनिनवादी उसूलों के नज़रिये से देखा जाये तो माकपा का संशोधनवादी चरित्र 1964 में ही एकदम साफ़ था। 1951 से ही जारी पार्टी के एकदम खुले, कानूनी, संसदीय चरित्र और कार्यप्रणाली को माकपा ने यथावत जारी रखा। पार्टी-सदस्यता की प्रकृति इसमें मेंशेविकों से भी गयी-गुज़री थी। अमृतसर कांग्रेस में पार्टी संविधान में किया गया बदलाव भी 1964 की सातवीं कांग्रेस में यथावत कायम रखा गया। लोक जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम के अनुसार, क्रान्ति का मार्ग दीर्घकालिक लोकयुद्ध का ही हो सकता था, लेकिन इसका कोई उल्लेख करने की जगह पार्टी कार्यक्रम में कपटपूर्ण भाषा में “संसदीय और ग़ैरसंसदीय” रास्ते का उल्लेख किया गया। कोई भी क्रान्तिकारी पार्टी बुर्जुआ संसदीय चुनावों का परिस्थिति अनुसार रणकौशल के तौर पर ही इस्तेमाल करती है। संसदीय रास्ते को ग़ैर संसदीय मार्ग के समकक्ष रखना अपने आप में संशोधनवाद है। यूँ बाद में मा-ले आन्दोलन की “वामपन्थी” दुस्साहसवादी धारा के चुनाव-बहिष्कार के नारे का विरोध करते हुए माकपा लेनिन के हवाले से यही कहती थी कि एक रणकौशल के तौर पर चुनाव का इस्तेमाल किया जा सकता है और वह यही कर रही है। लेकिन विगत तीन दशकों से बुर्जुआ व्यवस्था के अन्तर्गत एक राज्य में शासन करते हुए वह बुर्जुआ नीतियों को भरपूर वफ़ादारी के साथ लागू करती रही है और जनसंघर्षों की तैयारी के लिए चुनाव व संसदीय मंच का इस्तेमाल करने की जगह लगातार हर जनान्दोलन को कुचलने के लिए राज्यतन्त्र का बर्बर निरंकुश ढंग से इस्तेमाल करती रही है। अपना यह चरित्र वह नक्सलबाड़ी किसान उभार का बर्बर दमन करके साठ के दशक के अन्तिम वर्षों में ही नंगा कर चुकी थी।

जहाँ तक कार्यक्रम का प्रश्न है, माकपा ने अपने लोक-जनवादी कार्यक्रम के अन्तर्गत भारतीय बड़े पूँजीपति वर्ग का चरित्र दलाल न मानकर दोहरी प्रकृति का माना था और कुल मिलाकर इसकी स्थिति साम्राज्यवाद के कनिष्ठ साझीदार की मानी थी, जो वास्तविकता के अधिक निकट था। लेकिन सत्तारूढ़ पूँजीपति वर्ग के इस चरित्र का अन्तर्निहित तर्क यही हो सकता था कि वह अपने औद्योगिक-वित्तीय हितों के अनुरूप, ऊपर से, एक क्रमिक प्रक्रिया में, प्रशा के जुंकर-टाइप रूपान्तरण से मिलते-जुलते रास्ते से अर्द्धसामन्ती भूमि-सम्बन्धों को बदलने की कोशिश करे, सामन्ती भूस्वामियों को पूँजीवादी भूस्वामी बनने का अवसर दे (और जो ऐसा न करें, उन्हें उजड़ने के लिए स्वतन्त्र छोड़ दे), धनी काश्तकारों को मुनाफ़ाखोर कुलक बना दे, अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर तथा आयात-प्रतिस्थापन की नीति अपनाकर अपने आर्थिक हितों की हिफ़ाज़त एवं विस्तार करे तथा सुदूरवर्ती गाँवों तक को एक राष्ट्रीय बाज़ार के अन्तर्गत लाने की कोशिश करे। वास्तव में हुआ भी यही (और यह प्रक्रिया 1964 में गति पकड़ चुकी थी)। माकपा से जुड़े अर्थशास्त्री देश में पूँजीवादी विकास की सच्चाई को अंशों में स्वीकारते भी रहे हैं, हालाँकि इस तर्क को उसकी स्वाभाविक निष्पत्ति तक पहुँचाने से कन्नी काटते रहे हैं। माकपा भारतीय पूँजीपति वर्ग के चरित्र-निरूपण से निगमित तर्क को उसके नतीजे तक पहुँचाने की जगह, आज तक यही मानती है कि भारत विगत आधी सदी से लोक जनवादी क्रान्ति की मंज़िल में ही खड़ा है। वैसे किसी संशोधनवादी पार्टी के लिए क्रान्ति के कार्यक्रम का कोई खास मतलब नहीं होता। भारत में समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल मानने वाली कई छोटी-छोटी संशोधनवादी पार्टियाँ भी हैं, जो गाँवों और शहरों के सर्वहाराओं को लेकर लगातार अर्थवादी-ट्रेडयूनियनवादी कवायद करती रहती हैं और संसद-विधानसभाओं के चुनाव लड़ती रहती हैं, या फिर मात्र सिद्धान्त-चर्वण करती रहती हैं। लेकिन माकपा सापेक्षत: एक बड़े सामाजिक आधार वाली पार्टी है, जिसे गाँवों में बड़े मँझोले मालिक किसानों को और शहरों में छोटे बुर्जुआओं और उच्च मध्यवर्ग को हर हाल में अपने साथ रखना है, वरना उसके वोट बैंक को भारी नुकसान पहुँचेगा (संगठित मज़दूरों के आर्थिक हितों को लेकर, मरियल ही सही, लेकिन कानूनी और अर्थवादी लड़ाइयाँ लड़कर तथा संसद में वेतन संशोधन, पी.एफ., पेंशन, सेवाशर्तों आदि पर सत्ता का विरोध करने का पाखण्ड करके वह उनमें अपना वोट बैंक बनाये रखती है, पर मात्र इसी आधार पर उसकी चुनावी गोट लाल नहीं हो सकती)। इसलिए गाँवों के बड़े मालिक किसानों, शहरों के छोटे बुर्जुआओं और उच्च मध्य वर्ग के प्रति वर्ग-सहयोगवादी रवैया अपनाने में लोक जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम में निहित चार वर्गो के रणनीतिक संश्रय की सोच माकपा को एक सैद्धान्तिक आड़ देने का काम करती है। इसीलिए माकपा आज भी लोक जनवादी कार्यक्रम की बात करती है।

बहरहाल, यह तो आगे की बात हुई। हमें 1964 के काल में वापस लौटना होगा। माकपा का जो संशोधनवादी चरित्र आज उसके घनघोर जनविरोधी सामाजिक-जनवादी चरित्र के रूप में एकदम नंगा हो चुका है, वह अपने जन्मकाल से वैसा ही था। लेकिन चूँकि माकपा नेतृत्व उस समय डांगेपन्थी संशोधनवादियों पर हमले कर रहा था और चूँकि वह दबी-जुबान से ही सही लेकिन खुर्श्चेवी संशोधनवाद का विरोध करता प्रतीत हो रहा था इसलिए आनुभविक ढंग से चीज़ों को देखने के आदी, निम्न सैद्धान्तिक समझ और चेतना वाली कतारों के बड़े हिस्से ने उन्हें क्रान्तिकारी समझा। फिर भी यह एक निर्विवाद सच्चाई है कि कतारों का एक बड़ा हिस्सा उन्हें संशय की दृष्टि से देख रहा था और मध्यमार्गी ढुलमुलपन का शिकार मान रहा था। जो अधिक चेतनशील कार्यकर्ता थे, वे 1964 की कांग्रेस के बाद मायूस थे, पर उन्हें कोई विकल्प नहीं दीख रहा था। एक बड़ा हिस्सा ऐसा था जो नेतृत्व को संशोधनवादी मानते हुए भी, पार्टी के साथ फ़िलहाली तौर पर ही था और इंतजार की मानसिकता में था। बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं का एक अच्छा-खासा हिस्सा ऐसा भी था, जो इस नये नेतृत्व से कोई उम्मीद नहीं रखने के कारण निष्क्रिय हो गया था। कुल मिलाकर कहें, तो एक सर्वभारतीय पार्टी के गठन से जिस उत्साह, उम्मीद और जोश का माहौल होना चाहिए था, वह कहीं भी नहीं था।.…जारी

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-3

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-4

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1

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एक सिंहावलोकन -दीपायन बोस

कुछ चीज़ें धकेल दी गयी हैं

अँधेरे में

उन्हें बाहर लाना है,

जड़ों तक जाना है

और वहाँ से ऊपर उठना है

टहनियों को फैलाते हुए

आकाश की ओर।

सदी के इस छोर से

उठानी है फिर आवाज़

`मुक्ति´ शब्द को

एक घिसा हुआ सिक्का होने से

बचाना है।

जनता की सुषुप्त-अज्ञात मेधा तक जाना है

जो जड़-निर्जीव चीज़ों को

सक्रिय जीवन में रूपान्तरित करेगी

एक बार फिर।

जीवन से अपहृत चीज़ों की

बरामदगी होगी ही एक न एक दिन।

आकाश को प्राप्त होगा

उसका नीलापन,

वृक्षों को उनका हरापन,

तुषारनद को उसकी श्वेताभा

और सूर्योदय को उसकी लाली

तुम्हारे रक्त से…

– शशि प्रकाश

इतिहास की कई एक हारी गयी लड़ाइयाँ ऐसी भी हैं जिन्होंने देश-विदेश के जीवन और भविष्य की दिशा को जीती गयी लड़ाइयों की तुलना में कम नहीं, बल्कि कभी-कभी तो कुछ अधिक ही प्रभावित किया। ऐसी अल्पजीवी घटनाएँ धूमकेतु के समान क्षितिज पर प्रकट हुई और विलुप्त हो गयीं, लेकिन लोक-स्मृतियों में अपना अमिट स्थान सुरक्षित कर गयीं और आने वाली पीढ़ियों को लम्बे समय तक, इतिहास-निर्माण के लिए आगे डग भरने को प्रेरित करती रहीं। 1967 का नक्सलबाड़ी किसान-उभार भारतीय इतिहास के स्वातन्त्रयोत्तर काल की एक ऐसी ही महान ऐतिहासिक घटना थी।

नक्सलबाड़ी का क्रान्तिकारी जन-उभार एक ऐतिहासिक विस्फोट की तरह घटित हुआ जिसने भारतीय शासक वर्ग के प्रतिक्रियावादी चरित्र और नीतियों को एक झटके के साथ नंगा करने के साथ ही भारत की कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) सहित संशोधनवाद और संसदमार्गी वामपन्थ के विश्वासघाती जन-विरोधी चरित्र को उजागर करते हुए भारत के श्रमजीवी जनसमुदाय को यह सन्देश दिया कि सर्वहारा क्रान्ति के हरावल दस्ते के निर्माण एवं गठन के काम को नये सिरे से हाथ में लेना होगा। नक्सलबाड़ी के तत्काल बाद, सर्वहारा वर्ग की एक अखिल भारतीय पार्टी के गठन की दिशा में तूफ़ानी सरगर्मियों के साथ एक नयी शुरुआत हुई, लेकिन जल्दी ही यह नयी शुरुआत “वामपन्थी” आतंकवाद के भँवर में जा फँसी। तमाम घोषणाओं और दावों के बावजूद, कड़वा ऐतिहासिक तथ्य यह है कि देश स्तर पर सर्वहारा वर्ग की एक एकीकृत क्रान्तिकारी पार्टी नक्सलबाड़ी के उत्तरवर्ती प्रयासों के परिणामस्वरूप वस्तुत: अस्तित्व में आ ही नहीं सकी। 1969 में जिस भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मा-ले) की घोषणा हुई, वह पिछले सैंतीस वर्षो से कई ग्रुपों और संगठनों में बँटी हुई, एकता और फूट के अनवरत सिलसिले से गुज़रती रही है। नक्सलबाड़ी की मूल प्रेरणा से गठित जो कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन भाकपा (मा-ले) में शामिल नहीं हुए थे, उनकी भी यही स्थिति रही है। इन सभी कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठनों के जिस समूह को कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी शिविर कहा जाता रहा है, उनमें से कुछ आज भी “वामपन्थी” दुस्साहसवादी निम्न-पूँजीवादी लाइन के संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण को अमल में ला रहे हैं, कुछ दक्षिणपन्थी सिरे की ओर विपथगमन की प्रक्रिया में हैं तो कुछ सीधे संसदमार्गी वामपन्थियों की पंगत में जा बैठे हैं, कुछ का अस्तित्व बस नाम को ही बचा हुआ है तो कुछ बाकायदा विसर्जित हो चुके हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो नववामपन्थी “मुक्त चिन्तन” की राह पकड़ कर चिन्तन कक्षों में मुक्ति के नये सूत्र ईजाद कर रहे हैं। इस त्रासद स्थिति के कारणों की पड़ताल ज़रूरी है और आगे हम ऐसा करने की एक कोशिश भी करेंगे, लेकिन इतना तय है कि नक्सलबाड़ी में 1967 में घटी घटना भारतीय इतिहास का एक मोड़-बिन्दु और भारतीय वामपन्थ के इतिहास का एक सन्दर्भ-बिन्दु थी। इस घटना ने, और यहाँ से शुरू हुई मार्क्सवादी-लेनिनवादी राजनीतिक धारा ने पूरे भारतीय राजनीतिक परिदृश्य को, सामाजिक ताने-बाने को और सांस्कृतिक-साहित्यिक आन्दोलन को गहराई से प्रभावित किया। भारतीय समाज और राजनीति का स्वरूप वैसा कतई नहीं रह गया जैसा कि वह पहले था। बुर्जुआ मीडिया ने क्रान्तिकारी वामपन्थ के लिए एक नया शब्द ईजाद किया – नक्सलवाद, और पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग ज़िले के उस सुदूर ग्रामीण अंचल ने इतिहास में अपना स्थान सुरक्षित करा लिया। आज अपने ढंग से, बुर्जुआ राजनीतिज्ञ और व्यवस्था के सिद्धान्तकार-सलाहकार भी स्वीकार करते हैं कि “नक्सलवाद समस्या” कानून-व्यवस्था की नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक है और इसका समाधान भी सामाजिक-आर्थिक ही हो सकता है।

नक्सलबाड़ी का क्रान्तिकारी जन-उभार भारत में क्रान्तिकारी वामपन्थ की नयी शुरुआत और संशोधनवादी राजनीति से निर्णायक विच्छेद की एक प्रतीक घटना सिद्ध हुआ। इसने मज़दूर-किसान जनता के सामने राज्यसत्ता के प्रश्न को एक बार फिर केन्द्रीय प्रश्न बना दिया। तेलंगाना-तेभागा-पुनप्रा वायलार और नौसेना विद्रोह के दिनों के बाद, एक बार फिर देशव्यापी स्तर पर जनसमुदाय की क्रान्तिकारी ऊर्जा और पहलकदमी निर्बन्ध हुई, लेकिन “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के विचारधारात्मक विचलन और विरासत के तौर पर प्राप्त विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण भारतीय सामाजिक-आर्थिक संरचना एवं राज्यसत्ता की प्रकृति की ग़लत समझ और उस आधार पर निर्धारित क्रान्ति की ग़लत रणनीति एवं आम रणकौशल के परिणामस्वरूप यह धारा आगे बढ़ने के बजाय गतिरोध और विघटन का शिकार हो गयी। अब पिछले चार दशकों में गंगा में काफ़ी पानी बह चुका है। 1967 में सामाजिक संक्रमण की जो दिशा थी, उस दिशा में यात्रा काफ़ी आगे के एक सुनिश्चित मुकाम तक पहुँच चुकी है। प्रतिक्रान्तिकारी ढंग से, ऊपर से, क्रमिक विकास के रास्ते से, शासक वर्गो द्वारा किये पूँजीवादी भूमि-सुधारों ने किसान आबादी के विभेदीकरण, सर्वहाराकरण और विस्थापन को तीव्र करने के साथ ही गाँवों में भी पूँजी और श्रम के अन्तरविरोध को एकदम स्पष्ट और अत्याधिक तीखा बना दिया है। पूँजीवादी माल-उत्पादन की प्रणाली का वर्चस्व वहाँ निर्णायक ढंग से स्थापित हो चुका है और प्राक्-पूँजीवादी अवशेषों का दायरा अत्याधिक संकुचित हो चुका है। देश में देशी-विदेशी पूँजीपतियों के उद्योग-धन्धों और औद्योगिक सर्वहारा आबादी का भारी विस्तार हुआ है। भूमण्डलीकरण के दौर की नवउदारवादी नीतियों को स्वीकार कर भारतीय पूँजीपति वर्ग ने राजकीय उद्योगों का लगातार, बड़े पैमाने पर निजीकरण किया है और विदेशी पूँजी के लिए राष्ट्रीय बाज़ार को लगभग पूरी तरह से खोल दिया गया है। भारतीय पूँजीपति वर्ग आज की नयी परिस्थितियों में, विश्व पूँजीवादी तन्त्र में साम्राज्यवादी लुटेरों के कनिष्ठ सहयोगी एवं भागीदार की भूमिका में व्यवस्थित हो चुका है। कृषि और उद्योग – दोनों ही क्षेत्रों में आज देशी-विदेशी पूँजी और श्रम के बीच का अन्तरविरोध एकदम स्पष्ट हो चुका है।

1960 के दशक में भी समाज-विकास की यही दिशा थी, लेकिन तब एक संक्रमणशील तरल परिस्थिति थी और विकासमान सारभूत यथार्थ को पहचानकर क्रान्ति की मंज़िल का निर्धारण उच्च विचारधारात्मक क्षमता वाले परिपक्व नेतृत्व, गहन पर्यवेक्षण एवं अध्ययन तथा राजनीतिक वाद-विवाद की एक लम्बी प्रक्रिया की माँग करता था। नक्सलबाड़ी से उभरा नेतृत्व ऐसा नहीं था, और “वामपन्थी” संकीर्णतावाद ने जनवादी ढंग से विचारों के आदान-प्रदान की सम्भावनाओं का गला घोंट दिया। चीनी क्रान्ति के मार्ग के अनुसरण का नारा दिया गया, लेकिन उस पर भी यदि जनदिशा लागू करते हुए अमल किया जाता तो शायद अनुभवों के समाहार से सही नतीजों तक पहुँचा जा सकता था। पर पहले “वामपन्थी” आतंकवाद और फिर दक्षिणपन्थी विचलनों ने इस सम्भावना के द्वार भी रुद्ध कर दिये। आज पीछे मुड़कर जब हम इतिहास को देखते हैं और विश्लेषण-समाहार करते हैं, तो ज़ाहिर है कि चार दशक पहले के समय में पीछे लौटकर ग़लतियों को ठीक नहीं किया जा सकता। तब से भारतीय समाज काफ़ी आगे निकल आया है। जो 1967 या 1970 में हो सकता था या होना चाहिए था, आज उसकी स्थिति ही नहीं है। नक्सलबाड़ी किसान-उभार आज नहीं हो सकता। उस दौरान, जहाँ तक, जिस हद और मुकाम तक, चीज़ें सही ढंग से विकसित हुई, वह हमारी विरासत है लेकिन उसकी पुनरावृत्ति नहीं की जा सकती। इतिहास निरन्तरता और परिवर्तन के द्वन्द्व से आगे बढ़ता है। नक्सलबाड़ी और वहाँ से पैदा हुई क्रान्तिकारी वाम धारा के सन्दर्भ में, निरन्तरता के पहलू पर परिवर्तन का पहलू आज प्रधान है। यानी हम वस्तुगत परिस्थितियों और क्रान्ति की मनोगत शक्तियों – इन दोनों ही के सन्दर्भ में एक नये दौर में जी रहे हैं। फिर भी यह तय है कि उस दौर के इतिहास के सही, वस्तुपरक सार-संकलन के बिना, इस दौर में भी कोई नयी शुरुआत आगे नहीं बढ़ सकती। जो विचारधारात्मक भटकाव, पहुँच और पद्धति की जो ग़लतियाँ उस समय सही कार्यभार और सही मार्ग के निर्धारण में बाधक बनी थीं, उनका यदि सही-सटीक, बेलागलपेट विश्लेषण नहीं किया गया तो वही ग़लतियाँ किसी भी नयी यात्रा को बार-बार विपथगामी बनाती रहेंगी। यह जानना ही होगा कि अतीत के किन प्रेतों से हमें पीछा छुड़ाना है और अतीत की किस विरासत को आत्मसात करके उसे आगे विस्तार देना है।

इतिहासग्रस्त होकर इतिहास का निर्माण नहीं किया जा सकता। इतिहास के प्रेत तब तक किसी आन्दोलन या देश का पीछा करते रहते हैं जबतक कि उसके सभी सकारात्मक-नकारात्मक अनुभवों का समाहार करके उन्हें आत्मसात न कर लिया जाये और फिर इसके बाद भी, हम जब कभी नयी परिस्थितियों के रूबरू होते हैं तो नयी ज़मीन पर खड़े होकर, एक बार फिर इतिहास के साथ आलोचनात्मक रिश्ता कायम करते हैं।इतिहास, वस्तुत: अतीत के साथ वर्तमान का निरन्तर जारी संवाद होता है। इतिहासग्रस्तता से मुक्ति और नयी परिस्थितियों में भारत में सर्वहारा क्रान्ति की तैयारी – इन दोनों ही उद्देश्यों से (जो एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं), आज नक्सलबाड़ी का आलोचनात्मक पुनरावलोकन ज़रूरी है। जैसा कि हम कह चुके हैं, आज नक्सलबाड़ी और वहाँ से शुरू हुई प्रक्रिया को, उसकी ग़लतियाँ सुधारकर दुहराया नहीं जा सकता। लेकिन नक्सलबाड़ी से शुरू हुई प्रक्रिया की विफलता और विपथगमन और तज्जन्य दीर्घकालिक गतिरोध के कुछ बुनियादी कारण ऐसे भी हैं जिन्हें समझना आज बेहद ज़रूरी है। इसी उद्देश्य से यहाँ हम नक्सलबाड़ी किसान-उभार और वहाँ से शुरू हुए कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के इतिहास की चर्चा करेंगे। ज़ाहिर है कि नक्सलबाड़ी की ऐतिहासिक महत्ता और विफलता के आधारभूत कारणों की पूरे भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास की पृष्ठभूमि के बिना ठीक-ठीक शिनाख्त नहीं की जा सकती। नक्सलबाड़ी भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास का एक नया मुकाम था, पर यह उस इतिहास की निरन्तरता से विच्छिन्न कोई आकिस्मक घटना नहीं थी। यूँ कहें कि नक्सलबाड़ी और वहाँ से शुरू हुई कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धारा के सिर पर भी इतिहास का एक बोझ था, जिससे वह उबर नहीं सकी। भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास का एक नया मोड़-बिन्दु होने के बावजूद, नक्सलबाड़ी और उससे जन्मी नयी धारा ऐतिहासिक निरन्तरता के कुछ बुनियादी नकारात्मक पक्षों से मुक्त नहीं हो सकी। आगे हम देखेंगे कि इन सभी नकारात्मक पक्षों की कुंजीभूत कड़ी थी विचारधारात्मक कमज़ोरी जिससे भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन शुरू से ही ग्रस्त था। हम इस कमज़ोरी की निरन्तरता के वस्तुगत ऐतिहासिक कारण पर भी अपने कुछ अन्तिम विचार संक्षेप में रखेंगे। यह चर्चा इसलिए भी ज़रूरी है कि हम समझ सकें कि नक्सलबाड़ी और कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन की सकारात्मक-नकारात्मक – दोनों ही उपलब्धियों के लिए ऐतिहासिक संयोग-दुर्योग या कुछ व्यक्तियों की भूमिका बुनियादी नहीं थी। हाँ, नेतृत्व की भूमिका इस मायने में ज़रूर अहम थी कि इतिहास का सही-सटीक समाहार करने और ठोस परिस्थितियों का अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल तय करने का काम उसे ही करना था। हम यहाँ कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास के विस्तार में तो नहीं जा सकते, लेकिन इसके कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं और मुकामों का यहाँ पृष्ठभूमि के तौर पर उल्लेख ज़रूर करेंगे जो कहीं न कहीं नक्सलबाड़ी किसान उभार से जन्मे कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन की महत्ता और विफलता के ऐतिहासिक मूल तक पहुँचने में हमारी मदद करेंगे।

भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास की कुछ बातें

: एक सामान्य परिप्रेक्ष्य

भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन का इतिहास लगभग नौ दशक पुराना है। नक्सलबाड़ी किसान उभार के समय तक यह आधी शताब्दी की यात्रा पूरी कर चुका था। इस पूरी यात्रा के दौरान इसने गौरवशाली संघर्षो और शौर्यपूर्ण बलिदानों के अनेक कीर्तिस्तम्भ स्थापित किये, लेकिन यह विचारणीय मुद्दा आज भी हमारे सामने यक्षप्रश्न की तरह खड़ा है कि राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन पर कम्युनिस्ट धारा अपना राजनीतिक वर्चस्व