बाल श्रम

नई समाजवादी क्रान्ति का उद्घोषक ‘बिगुल’ के मई-2009 अंक की विषय – सामग्री

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bigul naya ank bigमज़दूर वर्ग के लिए सबसे बुरी बातों में से एक शायद यह है कि मई दिवस को आज एक अनुष्ठान बना दिया गया है। यह मई दिवस के महान शहीदों का अपमान है। मई दिवस मज़दूरों के मक्कार, फरेबी, नकली नेताओं के लिए महज़ झण्डा फहराने, जुलूस निकालने, भाषण देने की एक रस्म हो सकता है, लेकिन वास्तव में यह उन शहीदों की कुर्बानियों की याददिहानी का एक मौका है, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी देकर पूरी दुनिया के मज़दूरों को यह सन्देश दिया था कि उन्हें अलग-अलग पेशों और कारख़ानों में बँटे-बिखरे रहकर महज़ अपनी पगार बढ़ाने के लिए लड़ने की बजाय एक वर्ग के रूप में एकजुट होकर अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा। काम के घण्टे कम करने की माँग उस समय की सर्वोपरि राजनीतिक माँग थी…

मई दिवस अनुष्ठान नहीं, संकल्पों को फौलादी बनाने का दिन है!

मज़दूरों का त्योहार मई दिवस आठ घण्टे काम के दिन के लिए मज़दूरों के शानदार आन्दोलन से पैदा हुआ। उसके पहले मज़दूर चौदह से लेकर सोलह- सोलह घण्टे तक खटते थे। सारी दुनिया में अलग-अलग इस माँग को लेकर आन्दोलन होते रहे थे। अपने देश में भी 1862 में ही मज़दूरों ने इस माँग को लेकर कामबन्दी की थी। लेकिन पहली बार बड़े पैमाmay day 2ने पर 1886 में अमेरिका के विभिन्न मज़दूर संगठनों ने मिलकर आठ घण्टे काम के दिन की माँग पर एक विशाल आन्दोलन खड़ा करने का फैसला किया।

एक मई 1886 को पूरे अमेरिका के लाखों मज़दूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू की। इसमें 11,000 फैक्टरियों के कम से कम तीन लाख अस्सी हज़ार मज़दूर शामिल थे। शिकागो महानगर के आसपास सारा रेल यातायात ठप्प हो गया और शिकागो के ज़्यादातर कारख़ाने और वर्कशाप बन्द हो गये। शहर के मुख्य मार्ग मिशिगन एवेन्यू पर अल्बर्ट पार्सन्स के नेतृत्व में मज़दूरों ने एक शानदार जुलूस निकला….

मई 1886 का वह रक्तरंजित दिन

मशहूर भारतीय फ़िल्मकार सत्यजित रे ने अपनी एक फ़िल्म अमेरिका में प्रदर्शित की तो पहले शो में ही बहुत से अमेरिकी फ़िल्म बीच में ही छोड़कर आ गये क्योंकि सत्यजीत रे ने फ़िल्म के एक सीन में भारतीय लोगों को हाथों से खाना खाते हुए दिखाया था जिसे देखकर उन्हें वितृष्णा होने लगी थी। लेकिन अगर उन्हें इंसान के हाथों से सीवरेज की सफाई होती दिखला दी जाती तो शायद वे बेहोश हो जाते। सिर्फ अमेरिकी ही क्यों, इस नर्क के दर्शन से तो बहुत से भारतीय भी बेहोश हो जायेंगे। लोग अपने घरों में साफ-सुथरा टायलट इस्तेमाल करते हैं लेकिन वे शायद ही कभी सोचते हों कि उनके इस टायलट को साफ रखने के लिए इस दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो अपनी जान दे देते हैं। सिर्फ इसलिए कि दूसरे लोग एक साफ-सुथरी, ‘‘हाइजेनिक’’ ज़िन्दगी जी सकें….

चेन्नई के सफाई कामगारों की हालत

माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है…..

चीनी विशेषता वाले ”समाजवाद” में मज़दूरों के स्वास्थ्य की दुर्गति

हर साल करोड़ों स्‍त्री-पुरुष गाँवों में फसल का काम ख़त्म होते ही रोज़गार की तलाश में देश के महानगरों की ओर चल पड़ते हैं। निर्माणस्थलों, ईंटभट्ठों और पत्थर की खदानों में कमरतोड़ काम करने हुए ये रेल की पटरियों के नीचे या सड़कों के किनारे, या गन्दे नालों के किनारे बोरी या पालिथीन की झुग्गियों में रहते हैं, और अक्सर आधा पेट खाकर ही गुज़ारा कर लेते हैं

प्रवासी मज़दूर: चिकित्सा सेवाओं के शरणार्थी

dehati mazdoor

मधुबन, मऊ। प्रशासन की उपेक्षा और संवेदनहीनता से तंग आकर मधुबन तहसील के अन्तर्गत फतेहपुर मण्डाव ब्लाक के कई गाँवों के नरेगा मज़दूर अपनी  माँगों और मर्यादपुर ग्राम सभा की 5 माँगों को लेकर 22 अप्रैल से क्रमिक अनशन पर बैठे थे। इन गाँवों में मर्यादपुर, डुमरी, लखनौर, भिडवरा, जवाहिरपुर, गोबबाडी, रामपुर, अलीपुर-शेखपुर, ताजपुर, बेमडाड, गुरम्हा, छतहरा, लघुआई, लऊआसात शामिल थे। अनशन पर जाने से पूर्व उन्होंने ज़िला और तहसील स्तर पर हर जगह बार-बार पत्र लिखकर, ज्ञापन देकर अपनी आवाज़ पहुँचाने की कोशिश की, लेकिन मज़दूरों की आवाज़ कहीं नहीं सुनी गयी।

देहाती मज़दूर यूनियन द्वारा 8 दिन की क्रमिक भूख हड़ताल

5करीब डेढ़ महीने तक चली देशव्यापी चुनावी नौटंकी अब आख़िरी दौर में है। ‘बिगुल’ का यह अंक जब तक अधिकांश पाठकों के हाथों में पहुँचेगा तब तक चुनाव परिणाम घोषित हो चुके होंगे और दिल्ली की गद्दी तक पहुँचने के लिए पार्टियों के बीच जोड़-तोड़, सांसदों की खरीद-फरोख्त और हर तरह के सिद्धान्तों को ताक पर रखकर निकृष्टतम कोटि की सौदेबाज़ी शुरू हो चुकी होगी। पूँजीवादी राजनीति की पतनशीलता के जो दृश्य हम चुनावों के दौरान देख चुके हैं, उन्हें भी पीछे छोड़ते हुए तीन-तिकड़म, पाखण्ड, झूठ-फरेब का घिनौना नज़ारा पेश किया जा रहा होगा। जिस तरह इस चुनाव के दौरान न तो कोई मुद्दा था, न नीति – उसी तरह सरकार बनाने के सवाल पर भी किसी भी पार्टी का न तो कोई उसूल है, न नैतिकता! सिर्फ और सिर्फ सत्ता हासिल करने की कुत्ता घसीटी जारी है।

चुनावी नौटंकी का पटाक्षेप: अब सत्ता की कुत्ताघसीटी शुरू

नौजवान भारत सभा, बिगुल मज़दूर दस्ता और अखिल भारत नेपाली एकता मंच ने मिलकर अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस मनाया और भारत एवं नेपाल की मेहनतकश जनता के भाईचारे को और मज़बूत बनाने का संकल्प लिया।

मई दिवस के दिन सुबह ही गोरखपुर की सड़कें “दुनिया के मज़दूरों एक हो”, “मई दिवस ज़िन्दाबाद”, “साम्राज्यवाद-पूँजीवाद maydayका नाश हो”, “भारत और नेपाली जनता की एकजुटता ज़िन्दाबाद”, “इंकलाब ज़िन्दाबाद” जैसे नारों से गूँज उठीं। नगर निगम परिसर में स्थित लक्ष्मीबाई पार्क से शुरू हुआ मई दिवस का जुलूस बैंक रोड, सिनेमा रोड, गोलघर, इन्दिरा तिराहे से होता हुआ बिस्मिल तिराहे पर पहुँचकर सभा में तब्दील हो गया। जुलूस में शामिल लोग हाथों में आकर्षक तख्तियाँ लेकर चल रहे थे जिन पर ‘मेहनतकश जब जागेगा, तब नया सवेरा आयेगा’, ‘मई दिवस का है पैगाम, जागो मेहनतकश अवाम’ जैसे नारे लिखे थे….

मई दिवस पर याद किया मज़दूरों की शहादत को

कारपोरेट जगत में हमेशा ही मजदूरों का मनमाना शोषण होता रहा है लेकिन अब सरकारी उपक्रम भी बेहयाई से श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। वैसे तो मेट्रो रेल कारपोरेशन में श्रम कानूनों के खुले उल्लंघन की ख़बरें कर्मचारियों के आन्दोलन की बदौलत सामने आने लगी हैं लेकिन बेंगलोर मेट्रो तो इसमें भी दो कदम आगे निकल गयी है। वहाँ बच्चों से मज़दूरी करायी जा रही है ताकि कम पैसे पर उन्हें अधिक से अधिक निचोड़ा जा सके। केन्द्र और राज्य सरकार के निवेश और जापान बैंक के सहयोग से मिलने वाले 9,000 करोड़ के बजट के बाद भी बंगलोर मेट्रो के निर्माण के लिए बच्चों का खून और पसीना बहाया जा रहा है।..

बच्चों के खून-पसीने से बन रही है बेंगलोर मेट्रोदिल्ली मेट्रो की ट्रेनें

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दिल्ली मेट्रो की ट्रेनें, मॉल और दफ्तर जितने आलीशान हैं उसके कर्मचारियों की स्थिति उतनी ही बुरी है और मेट्रो प्रशासन का रवैया उतना ही तानाशाहीभरा। लेकिन दिल्ली मेट्रो रेल प्रशासन द्वारा कर्मचारियों के दमन-उत्पीड़न की हर कार्रवाई के साथ ही मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन और ज़ोर पकड़ रहा है। सफाईकर्मियों से शुरू हुए इस आन्दोलन में अब मेट्रो फीडर सेवा के ड्राइवर-कण्डक्टर भी शामिल हो गये हैं। मेट्रो प्रशासन के तानाशाही रवैये और डीएमआरसी-ठेका कम्पनी गँठजोड़ ने अपनी हरकतों से ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों की एकजुटता को और मज़बूत कर दिया है।

मेट्रो कर्मचारियों का आन्दोलन

मित्रवत साथियो,
क्या आप जानते हैं कि शोषण करने वाला शोषण सहने वाले से ज्यादा गुनहगार होता है। और सभी जानते हैं, शोषण सहने वाला अधिक परिश्रमी होता है और शोषण करने वाला ऐयाशबाज़ होता है और हवेली में आरामदेह जीवन बिताता है।
लेकिन ऐसा क्यों?

ऐसा सवाल एक नहीं है बल्कि बहुत अधिक संख्या में हैं। लेकिन इन सवालों का जवाब एक ही है और वह है `अज्ञानता´। जो दिमाग़ और आँख होते हुए भी उन पर पट्टी बँधी हुई है। जो आज के हालात में `जानवर और मनुष्य एक समान जीने को मज़बूर है´, ऐसा क्यों? आप खुद समझिये और विचार कीजिये। आपके घर बैल होगा, अगर नहीं भी होगा तो सुने तो ज़रूर होंगे, बेचारा कितना मासूम परिश्रमी होता है। पूरे साल का अनाज पैदा करने में सहायता करता है। क्या उसका अधिकार नहीं है कि सोने के लिए पलंग मिले, उसका मालिक हमाम साबुन से नहाये तो उसे भी नहाने का हक हो, उसे भी अच्छे कपड़े मिलें, उसे भी खाने को अच्छा भोजन मिले, आपकी सम्पति में भी आधा हक हो…

आपस की बात

……..इसके अलावा और भी…

माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है
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स्त्रियों और बच्चों का श्रम

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20. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

“जिस हद तक मशीनें शारीरिक शक्ति के अधिक उपयोग को अनावश्यक बना देती हैं, उस हद तक मशीनें सापेक्षत: कम शक्ति रखने वाले मज़दूरों के श्रम के उपयोग का साधन बन जाती है जिनका शरीरिक विकास अपूर्ण होता पर जिनके अंग अधिक लोचदार होते हैं. इसलिए मशीनों का इस्तेमाल करने वाले पूंजीपतियों को सबसे पहले स्त्रियों और बच्चों के श्रम की तलाश होती थी. श्रम और श्रमजीवियों का स्थान लेने वाला यह शक्तिशाली यंत्र शीघ्र ही मज़दूर के परिवार के प्रत्येक सदस्य को, बिना किसी आयु-भेद या लिंग-भेद के, पूंजी के प्रत्यक्ष दासों में भरती करके उज़रती मज़दूरों की संख्या में वृद्धि करने का साधन बन गया. पूंजीपति के लिए अनिवार्य श्रम ने न केवल बच्चों के खेलकूद की जगह ले ली बल्कि घरेलू क्षेत्र में परिवार की आवश्यकताओं के लिए किये जाने वाले सीमित और स्वतन्त्र श्रम की जगह भी ले ली.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 418-9)
पहले एक व्यस्क मज़दूर अपने श्रम से अपने परिवार का भरण-पोषण कर लेता था परन्तु पूंजीवाद में सारा परिवार कारखाने में घसीट लिया जाता है और काम करने के लिए बाध्य कर दिया जाता है. ऐसा भी हो सकता है कि किसी उद्योग में विकसित मज़दूर के लिए कोई काम न हो और वह दूसरे उद्योग में काम ढूँढने के लिए विवश हो जाये अथवा अपने भरण-पोषण के लिए अपने बच्चों पर निर्भर हो जाये. इंग्लैंड के वस्त्र उद्योग में 1861 में प्रति हज़ार नियोजित व्यक्तियों में से स्त्री मज़दूरों की संख्या सूती वस्त्र ट्रेड में 567 (1901 में यह संख्या 628 थी), ऊनी वस्त्र ट्रेड में 461 (1901 में यह संख्या 582 थी) और रेशम ट्रेड में 642 (1901 में यह संख्या 702 थी) थी. चीनी मिटटी के बर्तन, रसायन, वस्त्र, खाद्य जैसी उद्योग की दस विभिन्न शाखाओं में नियोजित पुरुष और स्त्रियों का अनुपात 1841 में 1,030,600 पुरुषों पर 463,000 स्त्रियों का और 1891 में 1,576,100 पुरुषों पर 1,447,500 स्त्रियों का था. जहाँ तक जर्मनी का सम्बन्ध है, वहां के वस्त्र उद्योग में नियोजित प्रति 100 पुरुषों पर नियोजित स्त्रियों की संख्या 1882 में 38, 1895 में 45, 1907 में 50 थी. परिधान उत्पादन के क्षेत्र में नियोजित प्रति 100 पुरुषों पर नियोजित स्त्रियों की संख्या 1882 में 40, 1895 में 45 और 1907 में 51 थी.

कारखाने का निरंकुशतंत्र

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19. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

श्रम के साधन की अपरिवर्ती गति के तहत मज़दूरों की यांत्रिक अधीनता और काम करने वाले समुदाय की विचित्र बुनावट (जो भिन्न-भिन्न वर्ग के स्त्री और पुरुष से मिलकर बनती है) के कारण बैरक जैसा अनुशासन पैदा हो जाता है. यह अनुशासन फैक्टरी में पूर्ण व्यवस्था का रूप ले लेता है और उसमें दूसरों के काम की देखरेख करने का उपर्युक्त श्रम पूरी तरह से विकसित हो जाता है. इससे मज़दूर काम करने वालों और काम की देखरेख करने वालों, औद्योगिक सेना के साधारण सिपाहियों और हवलदारों में बंट जाता है… फैक्टरी नियमावली (जिसमें पूंजी निजी कानून बनाने वाले व्यक्ति की तरह और अपनी इच्छा के अनुसार मज़दूरों पर कायम अपने निरंकुश शासन को कानून का रूप देती है. परन्तु इस निरंकुशता के साथ उतरदायित्व का वह विभाजन जुड़ा हुआ नहीं होता है, और न ही उसके साथ प्रतिनिधिमूलक प्रणालियाँ जुडी होती हैं जो अन्य मामलों में बुर्जुआ वर्ग को बहुत पसंद होती हैं) श्रम-प्रक्रिया के उस सामाजिक नियमन का पूंजीवादी प्रहसन मात्र होता है जो विशाल पैमाने की सहकारिता के लिए और श्रम के औज़ारों के – विशेषकर मशीनों के – सामूहिक उपयोग के लिए आवश्यक होता है. मार-मारकर गुलामों से काम लेने वाले सरदार के कोड़ों का स्थान फोरमैन के जुमानों का रजिस्टर ले लेता है. सभी प्रकार के दंड स्वाभाविक रूप से जुर्मानों और उज़रत में कटौती का रूप धारण कर लेते हैं, और फैक्टरी लाइकरगसों की विधायी प्रतिभा ऐसी व्यवस्था करती है कि उनके बनाये कानूनों के कठोर अनुपालन की अपेक्षा उनके उल्लंघन से सेवायोजक को अधिक लाभ होता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 453-4)
मार्क्स इस सम्बन्ध में एंगेल्स को उद्धृत करते हैं जिन्होंने इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की जीवन स्थितियों के बारे में लिखी पुस्तक में, बीस साल पहले, कारखानों में कायम निरंकुशता का सजीव चित्रण किया था : “बुर्जुआ वर्ग ने सर्वहारा को जिस गुलामी की जंजीर से जकड़ दिया है, उस पर जितना अधिक प्रकाश फैक्टरी-व्यवस्था में पड़ता है, उतना और कहीं नहीं पड़ता. इस व्यवस्था में हर प्रकार की स्वाधीनता – कानूनी तौर पर और वास्तव में दोनों तरह – ख़त्म हो जाती है. मज़दूर को सुबह साढे पॉँच बजे फैक्टरी में हाज़िर होना पड़ता है. यदि उसे दो चार मिनट की देर हो जाती है तो उस पर जुर्माना किया जाता है. यदि वह दस मिनट देर से पहुँचता है तो उसे नाश्ते के समय तक घुसने नहीं दिया जाता और उसकी एक चौथाई मज़दूरी काट ली जाती है. उसे मालिक के हुक्म पर खाना, पीना और सोना पड़ता है…फैक्टरी की निरंकुश सीटी उसे बिस्तर से उठा देती है, नाश्ता और खाना बीच में छुड़ा देती है. और कारखानें में उस पर क्या गुजरती है ? यहाँ पर कारखाने का मालिक निरंकुश विधि-निर्माता होता है. वह जैसे चाहता है, वैसे नियम बनाता है, नियमावली में अपनी इच्छानुसार परिवर्तन करता रहता है और नयी बातें जोड़ता रहता है, और अगर वह बिलकुल बेहूदा बातें उसमें शामिल कर लेता है, तब भी अदालतें मज़दूर से यही कहती हैं, कि : ‘तुमने ये करार अपनी मर्ज़ी से किया है, अब तो तुम्हें उसका पालन करना ही होगा…नौ वर्ष की आयु से मृत्यु तक इन मज़दूरों को हर घड़ी यह मानसिक और शारीरिक यातना सहन करनी पड़ती है.” (कैपिटल, खंड 1, पृ. 453)
क्रांति के पहले रूस में कारखानों में कायम निरंकुशता का घृणित रूप, रूसी कारखाना मालिकों द्वारा जुर्मानों की व्यवस्था में किये गये परिमार्जन के स्तर को लेनिन के पैम्फ्लेट (‘दण्डों के कानून की व्याख्या’ – Explanation of the Law on Fines Imposed on Factory Workers) में अच्छे तरीके से चित्रित किया गया है.

श्रम और श्रमशक्ति

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18. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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यहाँ पर मार्क्स और एंगेल्स उस पारिभाषिक शब्दावली का उपयोग करते हैं जिसे उन्होंने बाद के वर्षों में त्याग दिया था. माल के रूप में श्रम का उस श्रम से विभेदीकरण किया गया है जिसकी मात्रा किसी माल के मूल्य को निर्धारित करती है. मज़दूर के काम करने की क्षमता, किसी उत्पाद को बनाने की उसकी क्षमता को इंगित करने के लिए माल के रूप में “श्रम” शब्द का प्रयोग करने की बजाय मार्क्स ने बाद में “श्रमशक्ति” शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया. उत्पादन के साधन से वंचित होने के कारण मज़दूर उत्पादन के काम में अपनी क्षमता को लगाने की स्थिति में तब तक नहीं होता है जब तक वह स्वयं माल बाज़ार में प्रवेश नहीं करता और माल के रूप में अपनी श्रमशक्ति को नहीं बेचता. माल के रूप में श्रम का मूल्य या श्रमशक्ति के मूल्य का निर्धारण करने के सम्बन्ध में मार्क्स और एंगेल्स ने तदनुसार अपने विचार में संशोधन किया. Umrisse zu einer kritik der Nationalokonomie नामक अपनी पुस्तक और इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की जीवन स्थितियों के बारे में अपनी पुस्तक में एंगेल्स इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि श्रम का मूल्य ठीक उन्हीं नियमों द्वारा निर्धारित होता है जिन नियमों के अनुसार किसी अन्य माल का मूल्य निर्धारित होता है अर्थात अपने उत्पादन की लागत पर ! जहाँ तक मजदूर का प्रश्न है यह उसे श्रम करने योग्य बनाये रखने के लिए आवश्यक भरण-पोषण के साधन की लागत होती है. इसलिए जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक न्यूनतम धनराशी ही “श्रम” अर्थात श्रमशक्ति का मूल्य, मजदूर की उज़रत होती है. मार्क्स उनके निष्कर्षों से सहमत थे. दर्शन की दरिद्रता और फिर उज़रती श्रम और पूँजी में वह मजदूर के श्रम की उज़रत की परिभाषा निम्न प्रकार से देते हैं “साधारण श्रम यानि (श्रमशक्ति की) उत्पादन लागत उस व्यय के बराबर होती है जो मजदूर और उसके प्रजनन के जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक होता है. मजदूर और उसके प्रजनन के जीवन निर्वाह के  लिए उजरत का भुगतान किया जाता है. इस प्रकार निर्धारित मज़दूरी को न्यूनतम मज़दूरी के नाम से जाना जाता है. न्यूनतम मज़दूरी का सम्बन्ध सामान्य मानव जाति से है न की अलग-अलग मज़दूर से है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार माल का मूल्य साधारणतया उनकी उत्पादन लागत से निर्धारित होता है. ऐसे मज़दूर कुछ ही नहीं होते बल्कि उनकी संख्या लाखों में होती है जिन्हें इतनी भी मज़दूरी नहीं मिलती कि अपना जीवन निर्वाह कर सकें और अपनी जाति का प्रजनन कर सकें. अपने खुद के उतार-चढाव के ढांचे के अन्दर रहते हुए मज़दूर वर्ग की उज़रत इस न्यूनतम मज़दूरी के अनुकूल बन जाती है.” “मार्क्स, Lohnarbeit and Kapital, पृ. 24)
लासाल ने इस सूत्र को स्वीकार कर लिया था और इसे वह “मज़दूरी का कठोर नियम” कहते थे जोकि एक मुहावरा था जिसका प्रचार मूल्य के अलावा अन्य कोई महत्त्व नहीं था.
पूँजी में मार्क्स समझाते हैं कि श्रमशक्ति का मूल्य, अन्य दुसरे मालों की तरह इसके उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल से निर्धारित होता है और श्रमशक्ति के उत्पादन के लिए आवश्यक श्रमकाल उस श्रमकाल के बराबर होता है जो जीवन निर्वाह के साधनों के उत्पादन के लिए आवश्यक होता है जिनसे मज़दूर भोजन, वस्त्र, आवास आदि की आवश्यकता की पूर्ति करता है. लेकिन इन मूलभूत आवश्यकताओं का विस्तार, इन आवश्यकताओं की पूर्ति का स्तर तथा इनकी पूर्ति की क्षमता इतिहास द्वारा निर्धारित तत्त्वों का परिणाम होती है. यह बहुत हद तक सम्बंधित देश के सांस्कृतिक विकास पर निर्भर करता है और अन्य कारकों के अलावा उन स्थितियों पर निर्भर करता है जिनके अर्न्तगत स्वतन्त्र मजदूरों के वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ, उन आदतों पर जो इस वर्ग की बनीं, और उस जीवन स्तर पर जो इस वर्ग ने अपने लिए हासिल किया. इस प्रकार, अन्य मालों के विपरीत, श्रमशक्ति का मूल्य आंशिक रूप से ऐतिहासिक और नैतिक घटकों से निर्धारित होता है. जीवन निर्वाह की भौतिक आवश्यकताओं की मात्र लागत पर श्रमशक्ति के न्यूनतम मूल्य का आकलन किया जाता है. यदि श्रमशक्ति का मूल्य (मज़दूरी) न्यूनतम तक गिर जाता है, तब यह श्रमशक्ति के मूल्य के नीचे भी गिर जाता है. इस स्थिति में श्रमशक्ति का संपोषण प्रयाप्त स्तर तक नहीं होता है. मार्क्स यस भी सिद्ध करते हैं कि पूंजीवादी समाज में मज़दूर को अपने भरण-पोषण के लिए उत्पादन करने का अधिकार इसी प्रतिबन्ध के साथ मिलता है कि इसके अलावा वह बिना उज़रत के कुछ समय काम करे जो पूंजीपति के लिए बेशी (surplus) मूल्य उत्पन्न करता है. मार्क्स उन स्थितियों का भी खुलासा करते हैं जो पूंजीपति को इस अवैतनिक श्रम की मात्रा को बढाने में मदद करते हैं. कार्य दिवस लम्बा बनाकर, श्रम सघनता बढाकर, श्रम उत्पादकता में वृद्धि करके (आजकल विशेष आर्थिक ज़ोनों, SEZ की स्थापना इसी उद्देश्य से की जा रही है) इसे हासिल किया जाता है. इसके फलस्वरूप पूंजीपति श्रमशक्ति की कीमत, उजरत को कम से कम करते जाते हैं और यह श्रमशक्ति के मूल्य के नीचे तक पहुँच जाती है. (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, 158-165 में दिये गये विस्तृत विवेचन को देखें जिसका सारांश पूर्वोक्त कथन है.)

बाल मजदूरी का कारण गरीब माँ-बाप का लालच या बेबसी ?

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विद्वान प्रोफेसर जुत्शी साहब से दो बातें

अभी पिछले दिनों एक एन.जी.ओ. ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ की ओर से दिल्ली में एक संवादाता सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें फुटबाल सिलने वाले बच्चों की दशा और दिशा पर चर्चा हुई. इस संवाददाता सम्मेलन में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक विद्वान प्रोफेसर बी. जुत्शी ने फ़रमाया कि बाल मजदूरी के लिए बच्चों के माता-पिता ही जिम्मेदार हैं जो अतिरिक्त आय के लिए अपने बच्चों को काम में लगा देते हैं.

विद्वान प्रोफेसर साहब के खयाल से गरीब माँ-बाप थोड़ा कम इन्सान होते हैं, जो अपने बच्चों को प्यार नहीं करते, पढा-लिखाकर उनका भविष्य नहीं संवारना चाहते और “अतिरिक्त आमदनी” के लिए उनका वर्तमान और भविष्य उजरती गुलामी के अंधेरे में झोंक देना चाहते हैं.

आदरणीय जुत्शी साहब, हम लोग बरसों से नोएडा, दिल्ली की असंगठित, गरीब मेहनतकश आबादी के बीच काम कर रहे हैं. पिछले दिनों गाजियाबाद. नोएडा और दिल्ली की मजदूर बस्तियों से गायब होने वाले बच्चों के बारे में जाँच-पड़ताल करने और रिपोर्ट तैयार करने के दौरान हमें मजदूर बस्तियों के बच्चों के जीवन के बारे में कुछ और अधिक गहराई से जानने का अवसर मिला. हम आपको यकीन दिलाना चाहते हैं कि गरीब मजदूर भी सामान्य इन्सान होते हैं और शायद समृद्धि की चकाचौंध भरे अतिरेक में जीने वालों से अधिक इन्सान होते हैं. चंद एक अपवादस्वरूप, विमानवीकृत (डीह्यूमनाईज़ड) शराबखोर चरित्रों को छोड़ दे,  तो हर गरीब अपने बच्चे को किसी भी तरह से पढाना-लिखाना चाहता है. वह उसे उजरती गुलामी की रसातल से बाहर निकालना चाहता है, पर ठोस हकीकत की चट्टान से सर टकराकर समझ जाता है कि मजदूर का बच्चा भी ८५ फीसदी मामलों में मजदूरी करने की लिए ही पैदा होता है. जुत्शी साहब, इस सच्चाई को तो डेढ़ सौ साल पहले कार्ल मार्क्स ही नहीं, बहुतेरे बुर्जुआ यथार्थवादी साहित्यकार भी समझ चुके थे कि मजदूर अपनी श्रम शक्ति बेचकर  उतना ही हासिल कर पाते हैं कि श्रम करने के लिए जिंदा रहें और मजदूरों की नई पीढी पैदा कर सकें. आप शायद मंगल ग्रह से आये हैं या ज़्यादा किताबें पढ़ लेने से जिंदगी की हकीकत आपकी नजरों से ओझल हो गयी है. नोएडा और दिल्ली में ४० रूपये से साठ रूपये की दिहाड़ी पर औरत-मर्द मजदूर आठ, दस या कहीं-कहीं बारह घंटे काम करते हैं. सिंगल रेट पर कभी-कभार ओवर-टाइम मिल जाता है तो महीने में कई दिन बेकारी के भी होते हैं. मालिक या ठेकेदार की ओर से शिक्षा, स्वास्थ्य या आवास की कोई सुविधा नहीं होती. इन हालात में पति-पत्नी दोनों लगातार काम करने के बाद मुश्किल से दो जून की रोटी, झुग्गी का किराया, कुछ कपड़े आदि की जरूरतें पूरी कर पाते हैं. क़र्ज़ लिए बिना दवा इलाज नहीं हो पता और फ़िर उस क़र्ज़ को चुकाने का सिलसिला चलता रहता है. इस हालत में मुश्किल से ही मजदूरों के बच्चे दो जून की रोटी खा पाते हैं. सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए भी पेट में रोटी तो होनी चाहिए ही. क्या आप इन आंकडों से परिचित नहीं हैं कि अस्सी फीसदी से भी अधिक मजदूरों के बच्चे कुपोषण के शिकार होते हैं. आपका जो नजरिया है, उसके हिसाब से तो शायद गरीब लोग पैसा बचाने के लिए अपने बच्चों को रोटी नहीं देते. नहीं, प्रोफेसर महोदय, ऐसा नहीं हैं. जब हड्डियाँ गलाकर भी मजदूर बच्चे को भरपेट भोजन, तन पर कपडा और बीमारी में दवा नहीं दे पाता तो कलेजे पर सिल रखकर यह तय करता है कि कप-प्लेट धोकर, सामान धोकर, गाडियां साफकर या फुटबाल सिलकर शायद बच्चा जिंदा रह सके और जिंदगी की कोई बेहतर राह निकाल सके. उसके सामने कई विकल्प नहीं, बल्कि एकमात्र विकल्प होता है और वह उसे चुनने के लिए विवश होता है.

दूसरी बात आपको और बताएं जुत्शी साहब! कुछ मजदूर यदि बच्चों को पढा पाने की स्थिति में अगर होते भी हैं तो वे यह भली-भांति जानते हैं कि उनके बच्चे आप जैसे बच्चों के समान डॉक्टर, इंजिनियर, प्रोफेसर, वकील, तो दूर म्युनिसिपैलिटी के क्लर्क भी शायद ही बन पायें ऐसी स्थिति में वे उन्हें जल्दी ही मजदूरी के काम में लगा देना चाहते हैं ताकि उसी में हुनरमंद होकर शायद वे थोड़ा बेहतर जीवन जी सकें.

जुत्शी साहब, जरा इतिहास का अध्ययन कीजिए. पूंजीवाद की बुनियाद ही स्त्रियों और बच्चों के सस्ते श्रम को निचोड़कर तैयार हुई थी. बीच में मजदूरों ने लड़कर कुछ हक हासिल किए थे. अब बीसवीं सदी की मजदूर क्रांतियों की हार और मजदूर आन्दोलन के गतिरोध के बाद, नवउदारवादी दौर में, पूँजी की डायन एक बार फ़िर सस्ती श्रम की तलाश में पूरी पृथ्वी पर भाग रही है और असंगठित, दिहाड़ी, ठेका मजदूरों- विशेषकर स्त्रियों और बच्चों की हड्डियाँ निचोड़ रही है. “कल्याणकारी राज्य” हवा हो गया है. श्रम कानूनों और जीने के अधिकार का कोई मतलब नहीं रह गया है. ऐसी सूरत में पूंजीवादी लूट का अँधा-अमानवीय तर्क उस सीमा तक आगे न बढ़ जाए कि लोग जीने के लिए विद्रोह पर अमादा हो जायें, इसके लिए विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी फंडिंग से एन.जी.ओ. नेटवर्क खडा किया गया है जो पूंजीवादी बर्बरता को सुधार के रेशमी लबादे से ढकने, पूंजीवादी जनवार की तार-तार हो रही चादर की पैबंदसाजी करने और भड़कते जनाक्रोश पर कुछ पानी के छींटे मारने का काम करता है. ये तमाम एन.जी.ओ. पूंजीवादी व्यवस्था की बजाय जनता को ही, उसकी बदहालियों  के लिए दोषी ठहराते  हैं और धर्म-प्रचारकों की तरह उसके उत्थान की बातें करते रहते हैं.  ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ भी ऐसा ही एक एन.जी.ओ. है. कैलाश सत्यार्थी और ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ का  एक और उद्देश्य होता है. पिछडे देशों के पूंजीपति अपने देशों के सस्ते श्रम के चलते उत्पादित माल को सस्ते में बेचकर साम्राज्यवादी देशों के पूंजीपतियों के सामने कुछ क्षेत्रों में प्रतिस्पर्द्धा की स्थिति पैदा कर देते हैं, इसलिए धनी देशों के पूंजीपति एक ओर तो ख़ुद भी पिछडे देशों को अपना ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ बनाना चाहते हैं, दूसरी ओर वे अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों और वित्तपोषित एन.जी.ओ. द्वारा तीसरी दुनिया के देशों में बाल श्रम पर प्रतिबन्ध के लिए आवाज उठाकर इन देशों के पूंजीपतियों को प्रतिस्पर्द्धा से बाहर करने की कोशिश भी करते हैं. ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ को धनी देशों की फंडिंग एजेंसियों से पैसा किसलिए और क्यों मिलता है, इसे आप न जानते हों, इतने मासूम भी तो आप नहीं होंगे जुत्शी साहब!

अतरिक्त आय! क्या बात है! जुत्शी साहब, आपके लिए अतिरिक्त आय का मतलब है नये बंगले, कार, छुट्टियों में विदेश यात्रा या संम्पत्ति  बढाने के लिए, या फ़िर शेयर में लगाकर पैसे से पैसा बनाने के लिए कुछ धन जुटा लेना. पर गरीब के लिए अतिरिक्त और कुछ नहीं होता. पर आप जैसे प्रोफेसर लोग जो हफ्ते में तीन-चार क्लास लेकर साल में छः मास पढाते हैं और महीने में ३०-३५ हजार रूपए उठाते हैं, वे इस बात को नहीं समझ सकते. समृद्धि की मीनार की किसी मंजिल पर रहते हुए उसके तलघर के अंधेरे को देख पाना सम्भव भी नहीं होता.

जुत्शी साहब, आप तो शायद यही सोचते होंगे कि गरीबों के बच्चे ही अपने घरों से भागकर महानगरों के अपराधियों के हत्थे चढ़ जाते हैं, चोर-मवाली-पौकेटमार -भिखमंगे और नशेड़ी बन जाते हैं, उन्हें बेच दिया जाता है, उनके अंगों की तस्करी की जाती हैं, इसमें दोष गरीबों का ही है. आप शायद सोच भी नहीं सकते की समृद्धि की चकाचौंध और अमीरों के बच्चों को मिले ऐशो-आराम को तिल-तिल करके आभाव में जीते गरीबों के बच्चे किस निगाह से देखते हैं और उनके दिलो-दिमाग पर क्या प्रभाव पड़ता है. आप शायद यह नहीं जान सकते की पूरी दुनिया के लिए जीने की बुनियादी चीजें उत्पादित करने वाले जिन लोगों को इन्सान की तरह जीने के लिए न्यूनतम चीजें भी मयस्सर  नहीं होती, उनके घरेलू और सामाजिक परिवेश में किस कदर विमानवीकरण का घटाटोप होता है. इस आभाव और विमानवीकरण के परिवेश में घुटने वाले मासूम यदि घरों से भाग जाते हैं तो इसके लिए उनके बेबस माँ-बाप नहीं बल्कि यह सामाजिक ढांचा और राजनितिक व्यवस्था जिम्मेदार होती हैं.

पर ये बातें आपको बताने का फायदा ही क्या? आप इन्हें नहीं समझ सकते, क्योंकि सबकुछ समझकर न समझने वाले की समझ तो हकीम लुकमान भी नहीं बढा सकते!

-तपिश मैंदोला

‘बिगुल’ दिसंबर २००८ से साभार