फासिज्म

अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस पर विशेष

Posted on Updated on

विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति का प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की दिशा

कात्यायनी

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर
3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में
4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा
5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन
6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन
7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति
8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर
9. और अंत में…

आज एक कठिन समय में हम यहाँ पर नारी मुक्ति आन्दोलन की कुछ बुनियादी समस्याओं पर बातचीत के लिए इकट्ठा हुए हैं । सामायिक तौर पर यह पराजय, विपर्यय, पुनरुत्थान, फासिज़्म की शक्तियों के विश्वव्यापी उभार और क्रांति की शक्तियों के पीछे हटने का दौर है । कुछ समय के लिए, आज एक बार फिर क्रांति की लहर पर प्रतिक्रांति की लहर विश्व स्तर पर हावी है ।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी ऐसे कठिन दौर आते हैं तो अँधेरे की ताकतें मेहनतकश आम जनता के साथ ही औरतों की आधी आबादी पर भी अपनी पूरी ताकत के साथ हमला बोल देती है और न केवल उनकी मुक्ति की लड़ाई को कुचल देना चाहती है बल्कि अतीत के अनगिनत लंबे संघर्षों से अर्जित उनकी आजादी और जनवादी अधिकारों को भी छीन लेने पर उतारू हो जाती हैं । आज भी ऐसा ही हो रहा है । हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो विश्व सर्वहारा क्रांति के एक नये चक्र की शुरुआत का समय है, अक्टूबर क्रांति के नये संस्करण के निर्माण का समय है । साथ ही, यह नारी मुक्ति आन्दोलन के लिए भी एक नई शुरुआत का समय है, क्योंकि इतिहास ने यह अंतिम तौर पर सिद्ध कर दिया है कि एक पूंजीवादी विश्व में नारी मुक्ति का प्रश्न अंतिम तौर पर हल नहीं हो सकता और यह भी कि इस आधी आबादी की मुक्ति की लड़ाई के बिना शोषण-उत्पीडन से मेहनतकश जनता की मुक्ति की लड़ाई भी विजयी नहीं हो सकती ।

आज अपने प्रयासों को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया में, विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति के प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा पर विचार करते हुए हमें सर्वोपरी तौर पर उन विचारधारात्मक-सैद्धांतिक हमलों का जवाब देना होगा जो नारी मुक्ति विषयक तरह-तरह के बुर्जुआ सिद्धांतों के रूप में हमारे ऊपर किये जा रहे हैं । जीवन और संघर्ष के अन्य मोर्चों की ही तरह आज नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी जनवाद के नाम पर मुक्त बाजार का पश्चिमी उपभोक्तावादी दर्शन तरह-तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है और एक बार फिर, नये-नये रूपों में, जोर-शोर से बीमार बुर्जुआ संस्कृति, व्यक्तिवाद, पुरुष-विरोधी नारीवाद, अराजकतावाद, यौन-स्वच्छंदतावाद की तरह-तरह की खिचड़ी परोसी जा रही है । फ़्रांसिसी फुकोयामा के “इतिहास के अंत” और पश्चिम में जन्मे “विचारधारा के अंत” के नारे की तर्ज पर नारी आन्दोलन को भी विचारधारा से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं क्योंकि बकौल इन मुक्त चिंतकों के, “विचारधारा ने नारी की आजादी की लड़ाई को कोई योगदान नहीं दिया ।” ऐसे लोगों के उत्तर में बस बर्तोल्त ब्रेखत का एक बयान उद्धृत किया जा सकता है, जो उन्होंने २६ जुलाई, १९३८ को वाल्टर बेंजामिन से बातचीत के दौरान दिया था, “विचारधारा के विरुद्ध संघर्ष खुद में एक नई विचारधारा बन जाता है ।” वास्तव में इन तमाम मुक्त चिंतनधाराओं का सारतत्व यह है कि व्यवस्था-परिवर्तन की बुनियादी लड़ाई से नारी मुक्ति संघर्ष को अलग करके वर्तमान सामाजिक-आर्थिक दायरे के भीतर सीमित कर दिया जाये । इनका एकमात्र उद्देश्य स्त्रियों को यह समझाना है कि उनकी आजादी के प्रश्न का सामाजिक क्रांति के प्रश्न से कुछ भी लेना-देना नहीं है और यह एक स्वायत्त-स्वतंत्र प्रश्न है । आज न केवल अलग-अलग किस्म की बुर्जुआ सुधारवादी चिंतनधाराएं, बल्कि सत्तर के दशक के यूरोकम्युनिज़्म से लेकर अस्सी के दशक में उभरी भांति-भांति की पश्चिमी नववामपंथी धाराएं तथा गोर्बचोवी लहर और देंगपंथी नकली कम्युनिज़्म  से प्रभावित धाराएं भी या तो स्त्रियों की मुक्ति के आन्दोलन को कुछ सामाजिक-आर्थिक मांगों, पर्यावरण या स्वास्थ्य के मुद्दों तक ही सीमित करके और उसे नारी मुक्ति के बुनियादी मुद्दे, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संघर्ष के दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य से काटकर सुधारवाद और अर्थवाद के दलदल में धंसा देना चाहती हैं या फिर केवल बाल की खाल निकालने जैसी कुछ अकादमिक बहसों और बौद्धिक कवायद तक मह्दूद कर देना चाहती हैं ।

आज नारी मुक्ति संघर्ष को एक क्रांतिकारी दिशा देने और एक नई शुरुआत करने के लिए यह जरूरी है कि इम  अपने आन्दोलन में मौजूद इन सभी विजातीय प्रवृत्तियों और रुझानों को लंबे वाद-विवाद में परास्त करें, उनके प्रभाव को निर्मूल करें और एक सही, ठोस लाइन और कार्यक्रम के इर्द-गिर्द अलग-अलग देशों में मेहनतकश स्त्रियों और मध्यवर्गीय स्त्रियों को गोलबंद एवं संगठित करें तथा साथ ही, उन्हें जनता के सभी वर्गों के क्रांतिकारी संघर्षों के साथ जोड़ें । तीसरी दुनिया के देश आज भी साम्राज्यवाद की कमजोर कड़ी हैं, जहाँ सामाजिक क्रांतियों के विस्फोटक की वस्तुगत परिस्थितियाँ सर्वाधिक परिपक्व हैं । ऐसे देशों में क्रांतिकारी नारी मुक्ति के आन्दोलन के हिरावल दस्तों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा है क्योंकि आधी आबादी की भागीदारी के बिना न तो कोई सर्वहारा क्रांति सफल हो सकती है और न सर्वहारा क्रांति के बिना आधी आबादी की वास्तविक मुक्ति की शुरुआत हो सकती है । ऐसे समय में, नेपाल में नारी मुक्ति आन्दोलन से संबंधित विषय पर संगोष्टी का आयोजन बहुत ख़ुशी की बात है, जहाँ क्रांति की शक्तियां आज तरह-तरह के अवसरवादी-दक्षिणपंथी भटकावों से संघर्ष करते हुए जनता के विभिन्न वर्गों को संगठित कर रही हैं । हम नेपाल में इस संगोष्टी के आयोजक कामरेडों का क्रांतिकारी अभिनंदन करते हैं ।

अपने इस निबन्ध में हमारा मन्तव्य नारी मुक्ति संघर्ष की विश्व-ऐतिहासिक यात्रा का एक संक्षिप्त सिंहावलोकन प्रस्तुत करते हुए उसके सामने आज उपस्थित कार्यभारों और चुनौतियों को रेखांकित करना है । हर नई शुरुआत के समय इतिहास का पुनरवालोकन जरूरी होता है । द्वंदात्मक भौतिकवादी जीवन-दृष्टि हमें यही बताती है कि इतिहास के मुल्यांकन-पुनर्मुल्यांकन का मूल अर्थ केवल भविष्य के लिए नये कार्यभारों का निर्धारण ही होता है ।

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

अब तक वर्ग-अंतरविरोधों से युक्त जितने भी समाजों का इतिहास हमें ज्ञात है, स्त्रियाँ उन सभी में परिवार और समाज – दोनों में पुरुषों के मातहत ही रही हैं । पूरे सामाजिक ढाँचे में सर्वाधिक शोषित-उत्पीड़ित तबकों में ही उनका स्थान रहा है । जब वर्ग समाज का प्रादुर्भाव हो रहा था और निजी स्वामित्व के तत्व और मानसिकता पैदा हो रही थी उसी समय पितृसत्तात्मक व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थी, और स्वाभाविक तौर पर, उसके प्रतिरोध की स्त्री-चेतना भी उत्पन्न हो चुकी थी जिसके साक्ष्य हमें अलग-अलग संस्कृतियों की पुराणकथाओं  और लोकगाथाओं में आज भी देखने को मिल जाते हैं ।
पर इतिहास के पूरे प्राकपूंजीवादी काल में उत्पीड़न के विरुद्ध विद्रोह की नारी चेतना अपने समय के विस्मरण के बाद नारी समुदाय ने अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्षों एवं क्रांतियों में भूदास या दास जैसे वर्गों के सदस्य के रूप में शिरकत तो की लेकिन पुरुषों के मुकाबले अपनी हीनतर सामाजिक-पारिवारिक स्थिति के विरुद्ध या अपनी स्वतंत्र अस्मिता एवं सामाजिक स्थिति के लिए उसने पूंजीवाद के आविर्भाव के पूर्व संघर्ष नहीं किया, क्योंकि तब इसका वस्तुगत आधार ही समाज में मौजूद नहीं था । समाज और परिवार में स्त्रियों की भूमिका, मातृत्व, शिशुपालन आदि स्थितियों के नाते वर्ग समाज में पैदा होनेवाली उनकी मजबूरियां, घरेलू श्रम की गुलामी, समाज में निकृष्टतम  कोटि के उजरती मजदूर की स्थिति, यौन असमानता, यौन शोषण, यौन उत्पीडन – इन सबके कुल योग के रूप में नारी प्रश्न (Women Question ) को विश्व इतिहास के पूंजीवादी युग में ही सुसंगत रूप में देखा गया और नारी मुक्ति की एक नई अवधारणा विकसित हुई, जिसका संबंध पुनर्जागरण काल के मानववाद और प्रबोधन के युग की तर्कपरकता एवं जनवाद की अवधारणा तथा बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों से था ।

सामंतवाद के युग तक स्त्रियों को सम्पत्ति के अधिकार सहित कोई भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं था और उनकी इस सामाजिक-पारिवारिक मातहती की स्थिति को धर्म, कानून और सामाजिक विधानों की स्वीकृति प्राप्त थी । सामन्तवाद के गर्भ में जब पूंजीवाद का भ्रूण विकसित हो रहा था, उसी समय से सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी शुरू होकर बढती चली गई । यही वह भौतिक आधार था, जिसने पहली बार स्त्रियों के भीतर सामाजिक अधिकारों की चेतना को जन्म दिया ।

पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के अंतर्गत सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी और साथ ही उनके अधिकारों के अभाव के जारी रहने की स्थिति के नाते शुरू से ही बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के प्रति परस्पर विरोधी रुख और दृष्टिकोण अलग-अलग रूपों में मौजूद रहे । पुनर्जागरण काल में एक ओर जहाँ प्राचीन ग्रीक और रोमन परिवारों के मॉडल और रोमन कानूनों के नमूनों के अनुकरण ने स्त्रियों की गुलामी को तात्कालिक तौर पर पुख्ता बनाया, वहीं पुनर्जागरण काल के महामानवों द्वारा प्रवर्तित मानववाद के क्रांतिकारी दर्शन ने धर्मकेन्द्रित (Theocentric ) समाज की जगह मानवकेन्द्रित (Anthropocentric ) समाज के मूल्यों का प्रतिपादन करके, सामाजिक व्यवस्था की तमाम दैवी स्वीकृतियों पर प्रश्नचिह्न उठाकर और लौकिकता के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित करके, प्रकारांतर से स्त्रियों की गुलामी की धार्मिक-अलौकिक स्वीकृति और सामंती समाज-व्यवस्था के विधानों की मानवेतर स्वीकृति को भी ध्वस्त करने का काम किया । तात्कालिक तौर पर सोहलवीं शताब्दी में धर्मसुधार काल के दौरान प्यूरिटनिज्म और काल्विनिज्म के प्रभाव में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति भले ही बहुत बदतर दिखाई दे रही हो, पर एक ओर दर्शन के स्तर पर मानववाद की विचारधारा और दूसरी ओर सामाजिक उत्पादन में लगातार बढती स्त्रियों की भागीदारी उनकी मुक्ति की चेतना को लगातार विकसित कर रही थी, जिसकी पहली मुखर अभिव्यक्ति बुर्जुआ क्रांतियों की पूर्वबेला में, प्रबोधन काल के दौरान सामने आई ।

स्त्रियों ने सबसे पहले समानता की मांग बुर्जुआ व्यवस्था के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया के शुरुआती काल में ही उठाई । अमेरिकी क्रांति (१७७५-१७८३) के दौरान मर्सी वारेन और एबिगेल एडम्स के नेतृत्व में स्त्रियों ने मताधिकार और सम्पत्ति के अधिकार सहित सामाजिक समानता की मांग करते हुए जार्ज वाशिंगटन और टॉमस जैफर्सन पर स्त्रियों की आबादी के मसले को संविधान में शामिल करने के लिए दबाव डाला, पर बुर्जुआ वर्ग के एक बड़े हिस्से के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका । प्रबोधन काल के दार्शनिकों के क्रांतिकारी भौतिकवादी दर्शन, वैज्ञानिक तर्कपरकता तथा सामाजिक न्याय और स्वतन्त्रता-समानता-भ्रातृत्व के रूप में जनवाद की अवधारणाओं ने सामाजिक उत्पादन के साथ ही सामंती स्वेच्छाचारिता-विरोधी राजनीतिक संघर्ष में भी सीधे भागीदारी कर रही स्त्रियों की आबादी को गहराई से प्रभावित किया । प्रबोधन काल के क्रांतिकारी दार्शनिकों ने पहली बार यह विचार प्रस्तुत किया कि स्त्रियों की उत्पीड़ित स्थिति मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों का हनन है । फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान फ़्रांसिसी बुर्जुआ विचारधारा का एक अग्रणी प्रवक्ता ए. कोंदोर्से (A .Condorcet ) स्त्रियों की समानता का प्रबल पक्षधर था । उसका मानना था कि स्त्रियों के बारे में समाज में मौजूद गहरे पूर्वाग्रह उनकी असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति की जड़ हैं । अपने समय के अन्य बुर्जुआ विचारकों की तरह कोंदोर्से भी स्त्री-प्रश्न के वर्गीय एवं आर्थिक आधारों को देख न सका । उसका यह विश्वास था कि कानूनी समानता और शिक्षा के जरिए स्त्रियों की मुक्ति संभव है । आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में भी, पश्चिम के कई बुर्जुआ विचारकों ने ऐसे ही विचार प्रस्तुत किये । ब्रिटिश दार्शनिक, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री जेम्स स्टुअर्ट मिल ने भी अपनी पुस्तक “ऑन द सब्जेक्शन ऑफ वुमन” (१८६९) में इन्हीं विचारों का प्रतिपादन किया ।

संगठित नारी आन्दोलन की शुरुआत सर्वप्रथम महान फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान हुई । उस समय स्त्रियाँ भी जन-प्रदर्शनों सहित सभी राजनीतिक कार्रवाइयों में हिस्सा ले रही थीं । समानता के लिए स्त्रियों के संघर्ष के लक्ष्य को समर्पित पहली पत्रिका का प्रकाशन क्रांति के दौरान फ़्रांस में ही शुरू हुआ वहीं क्रांतिकारी नारी क्लबों (Women’s Revolutionary Club) के रूप में स्त्रियों के पहले संगठन अस्तित्व में आये जिन्होंने सभी पक्षधर राजनीतिक संघर्षों में खुलकर भागीदारी करते हुए यह मांग की कि आजादी, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत बिना किसी लिंगभेद के लागू किये जाने चाहिए । ओलिम्प द गाउजेस (Olympe de Gouges, 1748-93) ने “मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा” (Declaration of the Rights of the Man and the Citizen) के मॉडल पर “स्त्रियों और स्त्री नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” तैयार की और उसे १७९१ में राष्ट्रीय असेम्बली के समक्ष प्रस्तुत किया । इस घोषणा पत्र में “स्त्रियों पर पुरुषों के शासन” का विरोध किया गया था और सार्विक मताधिकारों के व्यवहार के लिए स्त्री-पुरुषों के बीच पूर्ण सामाजिक-राजनीतिक समानता की मांग की गई थी । यद्यपि फ़्रांसिसी क्रांति के अधिकांश नेताओं ने स्त्रियों की समानता के विचार को ख़ारिज कर दिया और १७९३ के अंत में सभी नारी क्लबों को बंद कर दिया गया, लेकिन फिर भी इस युगांतरकारी क्रांति ने सामंती संबंधों पर निर्णायक मारक प्रहार करने के साथ ही कई कानूनों के द्वारा और नये सामाजिक मूल्यों के द्वारा औरतों की कानूनी स्थिति में भारी परिवर्तन किया । १७९१ में एक कानून बनाकर स्त्रियों की शिक्षा का प्रावधान किया गया, २० सितंबर १७९२ की आज्ञाप्ति द्वारा उन्हें कई नागरिक अधिकार प्रदान किये गये और अप्रैल १७९४ में कन्वेंशन द्वारा पारित एक कानून ने उनके लिए तलाक लेना आसान बना दिया । लेकिन थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया के काल में नारी मुक्ति संघर्ष की ये उपलब्धियां एक बार फिर, मूलत: छीन गयी । नेपोलियोनिक कोड (१८०४) और अन्य यूरोपीय देशों की ऐसी ही बुर्जुआ नागरिक संहिताओं ने एक बार फिर स्त्रियों के नागरिक अधिकारों को अतिसीमित कर दिया और परिवार, शादी, तलाक, अभिभावकत्व और संपत्ति के अधिकार सहित सभी मामलों में उन्हें कानूनी तौर पर एक बार फिर पूरी तरह पुरुषों के मातहत बना दिया ।

बुर्जुआ क्रांतियों के काल में नारी आन्दोलन का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मेरी वोल्सटोन क्राफ्ट की पुस्तक “स्त्री के अधिकारों का औचित्य-प्रतिपादन” ( A Vindication of the Rights of Women) थी, जो कुल मिलाकर ओलिम्प द गाउजेस के दस्तावेज के प्रतिपादनों को ही उन्नत एवं विस्तृत रूप में प्रस्तुत करती थी । उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के नारीवादी आन्दोलन (Feminist Movement ) की बुनियादी रुपरेखा सर्वप्रथम इसी पुस्तक में दिखाई देती है ।

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर

फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों का सार-संकलन करते हुए कहा जा सकता है कि जब सामन्तवाद के विरुद्ध बुर्जुआ वर्ग के साथ ही पूरी जनता इनमें शिरकत कर रही थी, तब स्वतन्त्रता, समानता और जनवाद के विचारों का प्रतिपादन अधिक क्रांतिकारी रूप में किया जा रहा था, पर बुर्जुआ सत्ता की स्थापना और सुदृढीकरण कें नये शासक वर्ग ने जिस प्रकार मेहनतकशों को, ठीक उसी प्रकार स्त्रियों को भी उसी हद तक आजादी और नागरिक अधिकार दिए, जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली और उत्पादन एवं विनिमय के संबंधों के लिए जरूरी था । इससे थोड़ी भी अधिक आजादी यदि स्त्रियों को मिल सकी, तो उसका एकमात्र कारण नारी समुदाय की नई चेतना और उसके संघर्षों का दबाव एवं भय था । पूंजीवाद ने सामन्ती मध्ययुगीन स्वेच्छाचारिता, घरेलू गुलामी, व्यक्तित्वहीनता, अनागरिकता और विलासिता एवं उपभोग की सामग्री होने की स्थिति से नारी समुदाय को बाहर तो निकला, पर पूरी तरह से नहीं । सत्ता में आने के साथ ही उसने जब चर्च के साथ “पवित्र गठबंधन” कर लिया तो स्त्रियों की गुलामी के सामंती मूल्यों के कुछ तत्वों को उसने फिर से अपना लिया । उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान स्त्रियाँ शिक्षा, नौकरी, सम्पत्ति के अधिकार मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं और उन्हें काफी हद तक अर्जित भी किया, लेकिन उनकी नागरिकता दोयम दर्जे की ही थी और पूंजीवादी उत्पादन तन्त्र में वे निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलामों (Wage Slaves ) में तब्दील कर दी गयी । फिर भी बुर्जुआ क्रांतियाँ ऐतिहासिक तौर पर नारी मुक्ति संघर्ष को एक कदम आगे ले आई, उन्हें सामंती समाज के निरंकुश दमन से एक हद तक छुटकारा दिलाया, सामाजिक उत्पादन में उनकी भागीदारी की स्थितियां पैदा की और उनके भीतर अपने जनवादी अधिकारों, स्वतंत्र अस्मिता और स्वतंत्र पहचान के लिए लड़ने की, सामाजिक-राजनीतिक क्रियाकलापों और संघर्षों में हिस्सा लेने की और एक नई जमीन पर खड़े होकर यौन-असमानता एवं यौन-उत्पीडन का विरोध करने की चेतना पैदा की ।

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यूरोप और अमेरिका के बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के अधिकारों की वास्तविक और वैधिक अनुपस्थिति की जो स्थिति बनी, उसे कई बुर्जुआ लेखकों-विचारकों से सैद्धांतिक समर्थन प्राप्त हुआ । बुर्जुआ साहित्य में बड़े पैमाने पर प्रस्तुत और आज भी पूरी दुनिया में व्यापक स्तर पर मान्यताप्राप्त तथाकथित जीवशास्त्रीय सिद्धांत के प्रारंभिक पैरोकारों में फ़्रांसिसी दार्शनिक ओगुस्त कोंत (A . Konte ) अग्रणी था जिसके अनुसार नारी समुदाय की असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति का मूल कारण “नारी की प्राकृतिक दुर्बलता” में निहित है, स्त्रियाँ स्वाभाविक एवं प्राकृतिक तौर पर पारिवारिक जिम्मेदारियों, प्रजनन, शिशुपालन आदि के लिए ही बनी होती हैं और कभी भी वे सामाजिक तौर पर पुरुषों के समकक्ष नहीं हो सकतीं । स्त्री-पुरुष असमानता का यह जीवशास्त्रीय सिद्धांत उन्नीसवीं शताब्दी के बुर्जुआ समाज का सर्वाधिक प्रभावशाली बुर्जुआ पुरुष-स्वामित्ववादी सिद्धांत था जिसका प्रभाव आज भी बड़े पैमाने पर मौजूद है । ब्रिटेन के विक्टोरियन सामाजिक मूल्यों पर भी इन विचारों का जबर्दस्त प्रभाव मौजूद था । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जर्मनी में प्रचलित पेटी-बुर्जुआ “थियरी ऑफ द थ्री केज” (German–Kirche, Kuche, Kinder-Church, Kitchen, Children) भी सारत: कोंत के विचारों का ही विस्तार था जिसके अनुसार, स्त्रियों की रूचि और सक्रियता का दायरा केवल चर्च, रसोई और बच्चों तक ही सीमित होना चाहिए । आगे चलकर फासिस्टों और नात्सियों ने इसी सिद्धांत के परिष्कृत रूप को इटली एवं जर्मनी में अपनाया और लागू किया । आज भी बुर्जुआ प्रतिक्रियावादी नवनात्सी तत्व और धार्मिक पुनरुत्थानवादी इस तरह के तर्क देते रहते हैं । गोर्बचोवी संशोधनवादियों ने भी स्त्रियों की सामाजिक भूमिका में कटौती करते हुए उनकी प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक बनावट का तर्क दिया और देंगपंथी संशोधनवादी भी आज घुमा-फिराकर ऐसे तर्क देते रहते हैं ।

एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जैसे-जैसे बुर्जुआ वर्ग अपनी सत्ता का सुदृढीकरण करता गया, नारी आन्दोलन के बुर्जुआ चरित्र, फ्रेमवर्क और नेतृत्व की सीमाएं ज्यादा से ज्यादा साफ़ होती चली गई । मताधिकार, सम्पत्ति के अधिकार और यौन आधार पर बरती जाने वाली हर प्रकार की असमानता के विरुद्ध जनवादी अधिकारों के व्यापक दायरे में क्रांतिकारी संघर्ष चलाने और उसे सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष से जोड़ने के बजाय, उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, बुर्जुआ नारी आन्दोलन के नेतृत्व ने फ़्रांसिसी क्रांति काल की परम्परा को छोड़ते हुए अपना उद्देश्य केवल बुर्जुआ समाज के फ्रेमवर्क के भीतर, अपने ही वर्ग के पुरुषों से स्त्रियों की समानता तक सीमित कर दिया और स्त्री-प्रश्न की अवधारणा को संकीर्ण करके संघर्ष को सुधारों के दायरे में कैद कर दिया । उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में उपरोक्त मांग के पूरक के तौर पर सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियों के काम करने के अधिकार की मांग उठाई गई ।

लेकिन नारी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा उस समय भी पूरी तरह से निष्प्राण नहीं हो गयी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के चौथे-पांचवें दशक में फ़्रांस में बड़े पैमाने पर ऐसा क्रांतिकारी यथार्थवादी साहित्य उत्पादित हुआ जिसमें स्त्रियों की पारिवारिक गुलामी और सामाजिक असमानता की आलोचना की गयी थी । इसमें जी. सांद (G. Sand) के उपन्यासों की अग्रणी भूमिका थी । इसी समय अमेरिका और ब्रिटेन में संगठित रूप से नारी मताधिकार आन्दोलन की शुरुआत हुई जहाँ सामाजिक जीवन में स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने लगी थीं । १८३० के दशक में अमेरिका में काले लोगों की मुक्ति के संघर्ष में १०० से भी अधिक दासता-विरोधी “नारी सोसायटी” जैसे संगठन हिस्सा ले रहे थे और ब्रिटेन में चार्टिस्ट आन्दोलन में स्त्रियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं । वास्तव में, पूंजीवादी समाज के विकास के नियम और विज्ञान, तकनोलाजी एवं संस्कृति का विकास, उत्पादन और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ, खुद ही वस्तुगत तौर पर, स्त्रियों की मातहती के सिद्धांतों की आधारहीनता को ज्यादा से ज्यादा उजागर करते जा रहे थे । सर्वप्रथम, उस काल के क्रांतिकारी जनवादी सिद्धान्तकारों, विशेषकर सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिये और राबर्ट ओवेन जैसे सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि काल्पनिक समाजवादी विचारकों ने स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता के बुर्जुआ सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाते हुए नारी उत्पीडन और बुर्जुआ समाज की प्रकृति के बीच के अंतर्संबंधों को उजागर किया था । नारी मुक्ति के बुर्जुआ सिद्धान्तकारों के विपरीत इन दार्शनिकों ने पहलों बार स्त्रियों को समानता का दर्जा देने के समाज के पुनर्गठन की अपनी योजना का एक बुनियादी मुद्दा बनाया । चार्ल्स फूरिये ने पहली बार यह स्पष्ट बताया कि किसी भी समाज में आजादी का एक बुनियादी पैमाना यह है कि उस समाज विशेष में स्त्रियाँ किस हद तक आजाद हैं ।

उन्नीसवीं शताब्दी के रुसी क्रांतिकारी जनवादियों ने इसी विचार-सरणि  को आगे बढ़ते हुए सामाजिक जीवन के साथ ही क्रांतिकारी संघर्ष में भी स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया । नारी मुक्ति के सर्वाधिक प्रखर प्रवक्ता चेर्नीशेव्स्की ने अपने उपन्यास “क्या करें” ( What is to be done )  में एक ऐसा स्त्री-चरित्र प्रस्तुत किया जिसने संकीर्ण पारिवारिक दायरे से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र सामाजिक-आर्थिक स्थिति बनाई थी और जो सामाजिक सक्रियताओं में भी संलग्न थी । चेर्नीशेव्स्की का यह उपन्यास यूटोपिया के तत्वों के बावजूद युगीन परिप्रेक्ष्य में, नारी-मुक्ति के सन्दर्भ में भी क्रांतिकारी महत्व रखता है ।

3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में

यूरोप में १८४८-४९ की क्रांतियों तथा जून १८४८ में पेरिस में हुए प्रथम सर्वहारा विद्रोह सहित विभिन्न देशों में उठ खड़े हुए मजदूर आंदोलनों ने स्त्रियों के राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों के संघर्ष को एक नया संवेग प्रदान किया । १८४८ में फ़्रांस में फिर से नारी क्लबों का गठन हुआ जिन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों को समान अधिकार देने के लिए संघर्षों की नए सिरे से शुरुआत की. इसी वर्ष फ़्रांस में स्त्री कामगारों के पहले स्वतंत्र संगठन की स्थापना हुई । जर्मनी और आस्ट्रिया में भी राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के उद्देश्य से स्त्री यूनियन गठित हुए ।

एक व्यापक आधार पर, एक सुनिश्चित कार्यक्रम के साथ नारीवादी आन्दोलन की शुरुआत का प्रस्थान-बिंदु जुलाई, १८४८ को माना जाता है जब एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन, लुकेसिया कफिन मोट और कुछ अन्य ने सेनेका फाल्स, न्यूयार्क में पहली बार नारी अधिकार कांग्रेस आयोजित करके नारी स्वतन्त्रता का एक घोषणा-पत्र जारी किया जिसमें पूर्ण कानूनी समानता, पूर्ण शैक्षिक एवं व्यावसायिक अवसर, समान मुआवजा और मजदूरी कमाने के अधिकार तथा वित देने के अधिकार की मांग की गयी थी । एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन तथा सूसन बराउनवेल एंथनी के नेतृत्व में यह आन्दोलन तेज गति से फैला और जल्दी ही यूरोप तक जा पहुंचा । ब्रिटेन में १८६० के दशक में चुनावी सुधारों के दौर में नारी मताधिकार आन्दोलन भी बड़े पैमाने पर उठ खड़ा हुआ । १८६७ में पारिलियामेंट में स्त्रियों को मताधिकार देने के जे. एस मिल के प्रस्ताव को रद्द कर दिए जाने के बाद कई नगरों में नारी मताधिकार सोसायिटीयों की स्थापना हो गयी, जिनको मिलाकर बाद में राष्ट्रीय एसोसिएशन बनाया गया । अमेरिका में १८६९ में दो नारी मताधिकार संगठनों का गठन हुआ । १८९० में इनकी एकता के बाद राष्ट्रीय अमेरिकी नारी मताधिकार संघ अस्तित्व में आया । १८८२ में फ़्रांसिसी नारी अधिकार लीग का गठन हुआ ।

मुख्यत: उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के प्रभाव में जनवादी चेतना संचरित होने लगी थी जिससे स्त्री समुदाय भी अछूता नहीं रह गया था । इस दौरान लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की आजादी और बराबरी की मांग को लेकर आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो हालाँकि व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के आभाव में मुख्यत: नारीवादी ( Fiminist ) प्रकृति का था, फिर भी यह लातिनी देशों की स्त्रियों की नयी चेतना का द्योतक था । इसी अवधि में पहले जापान, भारत और इंडोनेशिया में और फिर तुर्की और ईरान में नारी आन्दोलन ने अपना पहला कदम आगे बढ़ाया । १८८८ में अमेरिकी नारीवादियों की पहल पर अंतरराष्ट्रीय नारी परिषद (International Council of Women ) की स्थापना हुई । १९०४ में अंतरराष्ट्रीय नारी मताधिकार संश्रय ( International Women Suffrage Alliance) की स्थापना हुई जिसका नाम १९४६ में बदलकर ‘अंतरराष्ट्रीय नारी संश्रय समान अधिकार-समान दायित्व’ (International Alliance of Women – Equal Rights-Equal Responsibilities ) कर दिया गया ।

इस दौरान एक महत्वपूर्ण विकास यह हुआ कि स्त्रियों की नयी चेतना और संघबद्ध होने की आंकाक्षा को देखते हुए उनकी “स्थिति में सुधार” और “उनके विकास” की आड़ लेकर आध्यात्मिक, धार्मिक सुधारवादी और संकीर्ण राष्ट्रवादी ग्रुपों ने भी भांति-भांति के नारी संगठनों की स्थापना की जिनका मूल उद्देश्य स्त्रियों की मुक्तिकामी आकांक्षा को सुधारों के दायरे में कैद करना, उन्हें मजदूर आंदोलनों, क्रांतिकारी बुर्जुआ जनवादी आंदोलनों और राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के प्रभाव से दूर रखना तथा इस तरह निहित वर्ग स्वार्थों की सेवा करना था ।

4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा


नारी आंदोलनों में सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण के विकास की प्रक्रिया उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में शुरू हई । नारी-प्रश्न के वर्गीय आधारों को उद्घाटित करते हुए मार्क्स और एंगेल्स ने  पहली बार यह स्पष्ट किया कि निजी सम्पत्ति और वर्गीय समाज के संघटन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही स्त्री की दासता की शुरुआत हुई । उन्होंने स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में कामगार स्त्रियाँ निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम होने के साथ-साथ यौन आधार पर शोषण-उत्पीडन का शिकार तो हैं ही, सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ भी सामाजिक श्रम से कटी हुयी या तो नारकीय घरेलू दासता एवं पुरुष स्वामित्व के बोझ से दबी हुई हैं या बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के लिए आरक्षित कुछ विशिष्ट अपमानजनक पेशों में लगी हुयी निहायत निरंकुश स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं । उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में मेहनतकश स्त्रियों की समस्यायों का समाधान असंभव है और स्त्री समुदाय की सच्ची मुक्ति की दिशा में पहला कदम पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था का खात्मा है ।

मार्क्स-एंगेल्स ने यह स्पष्ट किया कि नारी मुक्ति  की दिशा में पहला कदम यह होगा कि स्त्री मजदूरों की वर्ग चेतना को उन्नत किया जाये, सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ाई जाये और उन्हें मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलनों में शामिल किया जाये । पहले इंटरनेशनल ने नारी मजदूरों के श्रम के संरक्षण से संबंधित दो प्रस्ताव पारित किये थे । इन प्रस्तावों ने स्त्रियों के उत्पीडन और उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व एवं मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के बीच अंतर्संबंधों को उद्घाटित  करने के साथ ही नारी अधिकारों के प्रति प्रूधोंवादी दृष्टिकोण के दिवालियेपन को भी उजागर कर दिया । प्रूधों और उसके चेले सामाजिक रूप से उपयोगी श्रम में स्त्रियों की भागीदारी का विरोध करते थे और उनकी सामाजिक समानता की बात करते हुए भी परिवार और बच्चों की देखभाल ही उनकी प्रमुख जिम्मेदारी मानते थे ।  स्त्री कामगारों के श्रम-संरक्षण संबंधी पहले इंटरनेशनल के निर्णय ने सर्वहारा नारी आन्दोलन के विकास का सैद्धांतिक आधार तैयार करने का काम किया । मार्क्स-एंगेल्स ने, और आगे चलकर लेनिन, स्टालिन और माओ ने — अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के इन पाँचों महान शिक्षकों ने कामगार औरतों की उत्पीडित आबादी को सर्वहारा क्रांति की सबसे बड़ी आरक्षित शक्ति ( Greatest Reserve ) के रूप में देखा । सर्वहारा क्रांति और स्त्री प्रश्न के समाधान के द्वंदात्मक अंतर्संबंधों को निरुपित करते हुए लेनिन ने लिखा था, ” स्त्रियों के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल किये बिना सर्वहारा अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं हासिल कर सकता ।”

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में क्रांतिकारी संघर्षों में, विशेषकर १८७१ के युगांतरकारी पेरिस कम्यून में शौर्यपूर्ण भागीदारी के साथ ही स्त्रियों ने राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में स्वतंत्र रूप से भी हिस्सा लिया और अपने संगठन बनाये । फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन में स्त्रियों ने अपनी ट्रेड युनियने संगठित कीं ।  उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में फ़्रांस और ब्रिटेन में स्त्री कामगारों के कई संगठन पहले इंटरनेशनल में भी शामिल हुए । जर्मन कामगार औरतें ‘ इंटरनेशनल प्रोफेशनल एसोसियेशन ऑफ मैन्युफैक्चरी , इंडस्ट्रियल एंड हैंडीक्राफ्ट  वर्कर्स’ में शामिल हो गयीं जिसकी स्थापना १८६९ में क्रिम्मित्स्चू (सैक्सनी) में हुई थी और जो इंटरनेशनल के विचारों से प्रभावित था । स्त्री-प्रश्न पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण को विकसित और व्याख्यायित करने में तथा वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित सर्वहारा नारी आंदोलनों को विकसित करने में बेबेल की सुप्रिसिद्ध कृति ‘नारी और समाजवाद’ (Women and Socialism ) ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में मजदूर स्त्रियों का आन्दोलन जर्मनी में सर्वाधिक तेज गति से विकसित हुआ । १८९१ में जर्मनी की सामाजिक जनवादी पार्टी ने अपने कार्यक्रम (एर्फुर्ट कार्यक्रम ) में नारी मताधिकार की मांग को शामिल किया । पार्टी ने स्त्रियों-पुरुषों की सांगठनिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार किया और ट्रेड यूनियनों में स्त्रियों की भरती के विशेष प्रयास शुरू किये गये । १८९१ में स्त्री कामगारों की एक पत्रिका -Gleichcheit – का प्रकाशन भी शुरू हुआ जो १८९२ से १९१७ तक क्लारा जेटकिन के निर्देशन में प्रकाशित होती रही । सन १९०० से जर्मनी भर में नियमित नारी सम्मेलनों के आयोजन की शुरुआत हुई ।

पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली की अपनी जरूरतों के चलते और सर्वहारा आंदोलनों और विशेष तौर पर नारी आंदोलनों की विविध धाराओं-प्रवृतियों के दबाव के नाते उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यूरोप में स्त्रियों की शिक्षा और श्रम-संरक्षण से संबंधित कई कानून बने और उनकी कानूनी हैसियत में कुछ महत्वपूर्ण सुधार हुए । उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में १८४७ में ही स्त्रियों का श्रम दिवस दस घंटे का कर दिया गया था । मार्क्सवाद के संस्थापकों ने इस कानून को मजदूर वर्ग की एक बड़ी जीत की संज्ञा दी थी । स्त्री मजदूरों के संरक्षण से संबंधित कई अन्य कानून इस दौरान विभिन्न यूरोपीय देशों में बने । स्त्रियाँ  ट्रेड युनियनों में शामिल होने लगीं । १८८९ में ट्रेड यूनियन्स कांग्रेस में उनकी सदस्यता का प्रश्न सारत: हल हो गया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही स्त्री आन्दोलन के दबाव में, पहले सम्पन्न और फिर आम परिवारों की लड़कियों के लिए माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना यूरोप में और फिर एशिया-लातिनी अमेरिका के कुछ देशों में हुई । ब्रिटेन में स्त्रियों को सबसे पहले शिक्षक का पेशा अपनाने का अधिकार मिला । फिर धीरे-धीरे कुछ अन्य क्षेत्रों में भी उन्हें रोजगार के अवसर मिले । १८५८ में ब्रिटेन में स्त्रियों को तलाक का अधिकार प्राप्त हुआ, यद्यपि इस सन्दर्भ में १९३८ तक उनके अधिकार पुरुषों की अपेक्षा कम थे । १८७० से १९०० के बीच ब्रिटिश स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार हासिल किये । १८६९ में कर भुगतान करने वाली स्त्री नागरिकों को म्युनिसिपल चुनावों में भागीदारी का अधिकार मिला और १९१८ में शादीशुदा स्त्रियों तथा ३० वर्ष से अधिक आयु वाली, विश्वविद्यालय डिप्लोमा प्राप्त की हुई स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । १९२८ में २१ वर्ष आयु वाली स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । अमेरिका में स्त्रियों को शिक्षण पेशा अपनाने का अधिकार उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही मिल चुका था । १८५० से १८७० के बीच वहाँ स्त्रियों को तथाकथित “लिबरल” पेशे अपनाने का अधिकार प्राप्त हुआ और १८८० के बाद तथाकथित “पुरुष” पेशों में भी उन्हें स्वीकार किया जाने लगा । १८४८ में वहाँ शादीशुदा औरतों को सम्पत्ति रखने का अधिकार प्राप्त हुआ । १८७४ में वहाँ पहली बार स्त्रियों के श्रम दिवस को सीमित करने का कानून (मैसाचुसेट्स  ) में बना । १९२० में अमेरिकी संविधान में हुए उन्नीसवें संशोधन द्वारा स्त्रियों के मताधिकार पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया गया । फ़्रांस में भी उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार प्राप्त कर लिए थे । १८९२ में उनके श्रम के संरक्षण से संबंधित पहला कानून बना, उनका अधिकतम लम्बा श्रम दिवस ११ घंटे का तय किया गया जिसे १९०४ में घटाकर १० घंटे कर दिया गया । स्त्री मताधिकार संबंधी विधेयक फ़्रांस में पहली बार १८४८ में पेश किया गया था, लेकिन १९४४ में जाकर उन्हें यह अधिकार हासिल हो सका । जर्मनी में औरतों को मत देने का अधिकार १९१९ के वाईमर संविधान द्वारा प्राप्त हुआ था, लेकिन १९३३ में सत्ता में आने के साथ ही नात्सियों ने लम्बे और कठिन संघर्षों द्वारा अर्जित उनके सभी राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों को समाप्त कर दिया ।

इन कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की चर्चा के बाद, संक्षेप में, इतना ही उल्लेख यहाँ पर्याप्त है कि कुछ एक अपवादों को छोडकर, पश्चिमी देशों की स्त्रियों ने बीसवीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते बुर्जुआ सामाजिक ढांचे के भीतर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लिए थे । पर यह कहते हुए कुछ बातों को रेखांकित करना निहायत जरूरी है । पहली बात यह कि कानूनी तौर पर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लेने के बावजूद वास्तव में आज तक उन्हें सामाजिक समानता प्राप्त नहीं है । वे दोयम दर्जे की नागरिक हैं । काम करने वाली औरतें वहाँ असंगठित क्षेत्र में सस्ता श्रम बेचने को बाध्य हैं और निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम हैं । मुख्यत: मध्यम वर्ग और अन्य सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ और सामान्यत: सभी स्त्रियाँ वहाँ घरेलू दासता से पूर्णत: मुक्त नहीं हो सकी हैं । जीवन के हर क्षेत्र में उन्हें आर्थिक शोषण के साथ ही यौन-उत्पीडन का भी शिकार होना पड़ता है । धार्मिक मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही, तरह-तरह की फासिस्ट प्रवृतियों और साथ ही बीमार बुर्जुआ संस्कृति का दबाव भी उन्हें ही सबसे अधिक झेलना पड़ता है । अभी भी गर्भपात और तलाक से लेकर बलात्कार तक — बहुत सारे मामलों में, पश्चिमी देशों में कानून स्त्रियों के प्रति भेदभावपूर्ण बने हुए हैं । दूसरी बात यह है कि पश्चिम की स्त्रियों ने जो भी अधिकार प्राप्त किये हैं, वह उन्हें  बुर्जुआ समाज ने तोहफे के तौर पर नहीं दिए हैं । ये अधिकार सामाजिक क्रांतियों, वर्ग-संघर्षों और नारी समुदाय के शताब्दियों लम्बे संघर्ष द्वारा अर्जित हुए हैं । बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों में व्यापक आम जनता और स्त्रियों की भागीदारी के दौर में स्त्रियों को अपने नागरिक अधिकारों की पहली किश्त हासिल हुई । राज्यसत्ता पर काबिज होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने जब आम जनता पर अपना अधिनायकत्व लागू किया तो स्त्रियों के जनवादी अधिकारों को भी उसने हडपने की हर कोशिश की और केवल उसी हद तक उन्हें नागरिकता के अधिकार दिए जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली की जरूरत थी । पुन: उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब क्रांतियों का नया विस्फोट हुआ और सर्वहारा वर्ग राजनीतिक संघर्ष के मंच पर उतरा तो नारी आन्दोलन को भी महत्वपूर्ण संवेग प्राप्त हुआ और बाद के पचास वर्षों के संघर्षों के दौरान पश्चिम में नारी समुदाय ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित कीं । इस समय मजदूर स्त्रियाँ नारी मध्यवर्गीय स्त्रियों के आगे आ खड़ी हुई थीं । बीसवीं शताब्दी में, अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत संघ में, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोपीय देशों में और १९४९ की नई जनवादी क्रांति के बाद चीन में तथा मेहनतकशों के शासन वाले कुछ अन्य देशों में स्त्री समुदाय ने पहली बार समानता के जो अधिकार अर्जित किये, उनसे भी पश्चिमी देशों की और साथ ही राष्ट्रीय जनवाद की लड़ाई लड़ रहे एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों की मुक्तिकामी स्त्रियों के आंदोलनों को भी नई प्रेरणा और नया संवेग प्राप्त हुआ । तीसरी बात जो गौरतलब है, वह यह कि उन्नीसवीं शताब्दी में, जब तक यूरोप क्रांतियों का केंद्र रहा, तभी तक नारी आन्दोलन वहाँ तेजी से विकसित होता हुआ एक के बाद एक नई जीतें हासिल करता रहा । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू में विश्व पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में संक्रमण के बाद क्रांतियों का केंद्र खिसककर जब रूस और एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों-नवउपनिवेशों में आ गया तो नारी आन्दोलन का मुख्य रंगमंच भी इन्हीं देशों में स्थानांतरित हो गया । यह वस्तुगत ऐतिहासिक तथ्य इसी सत्य को पुष्ट करता है कि नारी आन्दोलन, उसका भविष्य और उसकी जीत-हार की नियति सामाजिक संघर्षों और क्रांतियों के साथ अविभाज्यत: जुडी हुई है । आगे हम सर्वहारा क्रांतियों की धारा और उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों की धारा के साथ जारी नारी मुक्ति आंदोलनों की अत्यंत संक्षिप्त चर्चा करेंगे ।

5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन

मार्क्स-एंगेल्स के बाद लेनिन ने नारी-प्रश्न पर मार्क्सवादी चिंतन को आगे बढाया । लेनिन के काल में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन में कामगार औरतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने की प्रक्रिया उन्नत धरातल पर शुरू हुई. नारी-मुक्ति के प्रश्न पर लेनिन के कई महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अवदान थे । बुर्जुआ नारीवाद की नारी-मुक्ति विषयक वर्गेतर सोच और “यौन मुक्ति” की बुर्जुआ अवधारणाओं के साथ ही उन्होंने मार्क्सवाद से प्रेरित नारी-मुक्ति आन्दोलन की धारा में मौजूद कई अवैज्ञानिक धारणाओं और विजातीय रुझानों का विरोध किया । स्वतन्त्रता का अर्थ असामाजिक स्वच्छंदता और पुरुष के शोषण से मुक्ति का अर्थ “यौन मुक्ति” नहीं होता, यह कम्युनिस्ट नैतिकता और विज्ञान के विरुद्ध है — इसे लेनिन ने एकाधिक बार स्पष्ट किया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में क्लारा जेटकिन, क्रुप्सकाया, अलेक्सांद्रा कोल्लोंताई और अनेंसा आरमाँ आदि कम्युनिस्ट नेत्रियों ने अपनी सक्रियताओं और लेखन के द्वारा भी नारी मुक्ति के मोर्चे पर अहम भूमिका निभाई । इन अग्रणी व्यक्तित्वों के साथ लेनिन के वाद-विवाद और विचार-विमर्श के दौरान नारी मुक्ति के कई पक्षों पर मार्क्सवादी अवस्थिति महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुई ।

बीसवीं शताब्दी के शुरू होते-होते सर्वहारा नारी आन्दोलन के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के लिए पूर्वपीठिका तैयार हो चुकी थी । दूसरे इंटरनेशनल की कांग्रेस में नारी आन्दोलन और नारी समस्या के विविध पहलुओं पर नियमित रूप से बहसें हुआ करती थीं । १८९३ में ज्यूरिख कांग्रेस में यह कहा गया की स्त्रियों के श्रम के कानूनी संरक्ष्ण को पूरा समर्थन देना पूरी दुनिया के मजदूरों का कर्तव्य है । दूसरे इंटरनेशनल की लन्दन कांग्रेस (१८९६) को महिला प्रतिनिधियों के सम्मेलन ने स्त्री-पुरुष– दोनों ही समुदायों के सर्वहारा वर्ग के आम संगठन को स्वीकृति देने के साथ ही इस बात पर जोर दिया कि मेहनतकश वर्गों के नारी आन्दोलन और नारीवाद (Feminism ) के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खिंची जानी चाहिए ।

स्त्री समाजवादियों के पहले और दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (स्टुट्गार्ट, १९०७ और कोपेनहेगेन, १९१० ) मेहनतकश नारी आन्दोलन की विकास-यात्रा के दो महत्वपूर्ण मील पत्थर थे । पहले सम्मेलन ने बिना किसी लिंग-भेद के सार्विक एवं समान मताधिकार का प्रस्ताव पारित किया जिसे दूसरे इंटरनेशनल के स्टुट्गार्ट कांग्रेस ने भी स्वीकार किया । पहले सम्म्मेलन की प्रतिनिधियों ने क्लारा जेटकिन की अध्यक्षता में एक अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना करने और उसके मुखपत्र के प्रकाशन का भी निर्णय लिया । दूसरे सम्म्मेलन में सत्रह देशों की महिला प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । इसी सम्मेलन में प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब दक्षिणपंथी अवसरवादी काउत्स्की और उसके अनुयाइयों के विश्वासघात के कारण अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन में फूट पड़ी ठीक उसी समय मेहनतकश नारी आन्दोलन को भी एक गंभीर धक्का लगा ।  अधिकांश सामाजिक जनवादी स्त्री संगठनों ने भी विश्वयुद्ध में काउत्स्कीपंथियों की ही भांति अंधराष्ट्रवादी अवस्थिति अपनाई । बुर्जुआ नारीवादी संगठन तो पहले से ही यही अवस्थिति अपनाए हुए थे । लेकिन बोलेशेविक प्रस्ताव को ख़ारिज करके एक शांतिवादी प्रस्ताव स्वीकार करने के बावजूद बर्न अंतरराष्ट्रीय स्त्री समाजवादी सम्मेलन (१९१५) ने, जो बोलेशेविकों की पहल पर आयोजित हुई थी, समाजवादी अवस्थिति अपनाने वाली स्त्री समाजवादियों की एकता को बहाल रखने में अहम भूमिका निभाई । युद्ध के दौरान युद्ध में शामिल देशों की स्त्रियों ने भुखमरी और बदहाली के खिलाफ कई प्रदर्शन आयोजित किये । ८ मार्च (२३ फरवरी ) १९१७ को बोलेशेविकों की पेत्रोग्राद कमेटी की अपील पर भुखमरी, युद्ध और जारशाही के विरुद्ध रुसी स्त्रियों के प्रदर्शन ने एक व्यापक जनांदोलन का सूत्रपात किया जिसकी चरम परिणति फरवरी क्रांति के रूप में सामने आई । अक्टूबर समाजवादी क्रांति की तैयारी में रूस की महिला मजदूरों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । क्रांति के बाद सोवियत संघ में नारी आन्दोलन ने हर संभव तरीके से समाजवादी निर्माण के कामों को आगे बढ़ाने में, समाजवाद की रक्षा में और सामाजिक-राजनीतिक जीवन में आम स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने में एक अग्रणी भूमिका निभाई । समाजवादी सोवियत संघ की सर्वहारा राज्यसत्ता ने दुनिया के इतिहास में पहली बार न केवल स्त्री समुदाय को कानूनी तौर पर पुरुषों के साथ पूर्ण समानता के अवसर प्रदान किये बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में व्यवहारत: इसे लागू करने की दिशा में भी हर संभव कदम उठाये । सोवियत संघ स्त्री-मुक्ति के सन्दर्भ में भी पूरी दुनिया के लिए एक नया प्रकाश स्तंभ बन गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अक्टूबर क्रांति के प्रभाव में पूरी दुनिया में नारी आन्दोलन में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई । एक ओर जहाँ आम उत्पीडित नारी समुदाय समाजवाद की विचारधारा की ओर तेजी से आकृष्ट हुआ, वहीँ बुर्जुआ नारी संगठनों ने ज्यादा से ज्यादा खुले तौर पर बुर्जुआ व्यवस्था की हिफाजत का काम शुरू कर दिया । यूरोप की संशोधनवादी सामाजिक जनवादी पार्टियों ने पूंजीवाद की दूसरी सुरक्षापंक्ति का काम करते हुए स्त्रियों के बीच अपनी गतिविधियाँ तेज कर दीं ।

सोवियत संघ के बाहर, सर्वहारा विचारधारा पर आधारित नारी आन्दोलन ने १९२० के दशक में सुनिश्चित शक्ल अख्तियार करना शुरू किया । नारी आन्दोलन को क्रान्तिकारी आन्दोलन का अपरिहार्य बुनियादी अंग मानते हुए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कांग्रेस में मेहनतकश स्त्रियों के बीच कम्युनिस्टों के काम के प्रश्न पर लगातार गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श होता रहा । १९२० में कोमिन्टर्न के निर्देशन में अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना हुई जिसकी सेक्रेटरी क्लारा जेटकिन थीं । महिला कम्युनिस्टों का एक प्रेस भी स्थापित हुआ और एक अंतरराष्ट्रीय महिला पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ । १९२० से १९२६ के बीच महिला कम्युनिस्टों के चार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुए ।

यद्यपि नारी आन्दोलन पर दूसरे इंटरनेशनल के विचारधारात्मक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने महिला कम्युनिस्ट संगठनों के कामों पर विशेष जोर दिया, पर लेनिन और इंटरनेशनल के अन्य अग्रणी नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि स्त्रियों के गैर-पार्टी संगठन और सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों की मांगों को लेकर संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठन भी बनाये जाने चाहिए जिसमें मेहनतकश स्त्रियों के अतिरिक्त जनता के अन्य वर्गों की स्त्रियाँ भी हिस्सा लें । सोवियत संघ के बाहर के देशों में नारी आदोलन में मौजूद संकीर्णतावादी भटकावों और संगठनों की कमजोरी के कारण व्यापक स्त्रियों को उनके जनवादी अधिकारों की मांग और यौन-असमानता के विरोध के आधार पर संगठित करने में तीसरे दशक तक तो कोई विशेष सफलता नहीं प्राप्त हो सकी, लेकिन चौथे दशक में फासिज्म के उभार ने तात्कालिक रूप से, वस्तुगत तौर पर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं कि फासिज्म और साम्राज्यवादी युद्ध-विरोधी संयुक्त मोर्चे में जनता के सभी वर्गों की — विशेषकर कामगार और मध्यम वर्ग की स्त्रियों के संगठित होने की प्रक्रिया शुरू हो गई । जहाँ भी फासिस्ट ताकतें सत्ता में आयीं, प्रगतिशील नारी संगठनों के साथ ही उन्होंने उन बुर्जुआ नारी संगठनों को भी कुचल दिया जो नारी मुक्ति या स्त्रियों के समान अधिकारों की बात करती थीं । इसके साथ ही फासिज्म-विरोधी लोक मोर्चे के एक अंग के रूप में एक जनवादी, फासिज्म-विरोधी नारी आन्दोलन के संघटित होने की प्रक्रिया शुरू हो गयी । अगस्त १९३४ में सोवियत संघ सहित कई देशों के प्रगतिशील नारी संगठनों की पहल पर पेरिस में युद्ध  और फासिज्म-विरोधी महिला विश्व कांग्रेस आयोजित हुआ जिसमें कम्युनिस्ट शांतिवादी, नारीवादी और क्रिश्चियन समाजवादी स्त्री संगठनों एवं ग्रुपों के कुल १०९६ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । कांग्रेस में युद्ध और फासिज्म-विरोधी विश्व महिला कमेटी का गठन किया गया । पुन: मई १९३८ में मार्सिइएज (Marseillis) में युद्ध-विरोधी अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन का आयोजन हुआ ।

यद्यपि विश्वयुद्ध के दौरान जनवादी महिला आन्दोलन के विकास की दिशा में सांगठनिक-परिमाणात्मक शक्ति की दृष्टि से कोई बहुत महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई, लेकिन फासिज्म के रूप में सामने आई बुर्जुआ अधिनायकत्व की नग्नता ने और उसके विश्वव्यापी प्रतिरोध ने इसके लिए आवश्यक पूर्वाधार तैयार कर दिया ।

जिन उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में मुक्तियुद्ध जारी थे, वहां पहले से ही जनवादी नारी आन्दोलन के संगठित होने की प्रक्रिया जारी थी । फासिज्म-विरोधी संघर्ष के अनुभवों, फासिज्म की पराजय, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादी शक्तियों के निर्बल हो जाने और एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर के उठ खड़े होने के व्यापक प्रभाव दुनिया की आधी आबादी की चेतना पर और नारी आन्दोलन पर भी पड़ा । तीसरी दुनिया के देशों में उपनिवेशवाद की पराजय की प्रक्रिया शुरू होने के इस दौर में उन अधिकांश देशों में समाजवाद को सच्चा मित्र मानने वाला जनवादी नारी आन्दोलन शक्तिशाली होता चला गया । चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जारी मुक्ति-संघर्ष में स्त्रियों की भागीदारी और मुक्त क्षेत्रों में उनकी सामाजिक स्थिति पहले से ही दुनिया भर के पिछड़े देशों की स्त्रियों को आकृष्ट कर रही थी । १९४९ में नई जनवादी क्रांति संपन्न होने के बाद मध्ययुगीन पित्रसत्तात्मक स्वेच्छाचारिता से भरे समाज में स्त्रियों को पूर्ण बराबरी का कानूनी दर्ज़ा देकर और फिर समाज में उसे एक वास्तविकता में रूपांतरित करने की शुरुआत करके चीन के सर्वहारा राज्य ने ऐतिहासिक काम किया था उस पर पूरी दुनिया की स्त्रियों और मुक्तिकामी जनता की निगाहें टिकी हुई थीं । द्वितीय विश्व्यद्धोत्तर काल में पश्चिम के देशों की स्त्रियाँ भी अपने जनवादी अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने की जरूरत शिद्दत के साथ महसूस कर रहीं थीं ।

इन्हीं परिस्थितियों में, अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन ने आगे की ओर कुछ महत्वपूर्ण डग भरे । इनमें सर्वाधिक महत्पूर्ण कदम था दिसंबर, १९४५ में महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ( Women’s International Democratic Federation — W.I.D.F.) की स्थापना, जिसमें ३९ देशों के राष्ट्रीय स्त्री-संगठनों ने भाग लिया । महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ने स्त्रियों की आम मांगों को लेकर अलग-अलग देशों में और विश्व स्तर पर सक्रिय विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्त्री संगठनों के साथ साझा कार्रवाइयों की भी कोशिश की, लेकिन उस समय पूरी दुनिया में जारी कम्युनिज्म-विरोधी मुहीम के प्रभाव में बहुत सारे बुर्जुआ, तथाकथित परम्परागत स्त्री संगठनों के नेतृत्व ने इसे स्वीकार नहीं किया ।

१९५६ में रूस में ख्रुश्चेव द्वारा प्रतिक्रांतिकारी तख्तापलट और रूस तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना ने विष-स्तर पर जारी वर्ग-संघर्ष को भारी धक्का पहुँचाने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन को भी भारी नुकसान पहुँचाया । साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष, पूंजीवादी देशों में और तीसरी दुनिया के नवस्वाधीन देशों में जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष और व्यवस्था-विरोधी संघर्ष में स्त्री आन्दोलन की क्रान्तिकारी भागीदारी के विपरीत — संशोधनवादियों ने दुनिया भर में नारी मुक्ति आन्दोलन को सुधारवाद और शांतिवाद के दलदल में ले जाकर धंसा देने की हर चंद कोशिशें कीं और काफी हद तक इसमें सफलता भी प्राप्त की । यही कारण था कि छठे दशक के अंत तक दुनिया भर के नारी आन्दोलन में गतिरोध और शून्य की सी स्थिति उत्पन्न हो गयी थी । यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसमें बुर्जुआ नारीवाद के नये उभार ने सातवें दशक में जन्म लिया ।

6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन

जैसाकि उपर उल्लेख किया जा चुका है, पश्चिम के देशों में बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों की पूर्वपीठिका तैयार होने के साथ ही, यानि प्रबोधन काल (Age of Enlightenment ) के दौर में नारी मुक्ति की चेतना का जन्म हुआ और बुर्जुआ क्रांतियों के दौर में स्त्री समुदाय ने अपने सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी ।

एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों में बुर्जुआ विकास का स्वरूप यूरोप जैसा नहीं रहा । यहाँ बुर्जुआ वर्ग पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रांति की प्रक्रिया से गुजरकर सत्ता में नहीं आया । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों के पूर्ण औपनिवेशीकरण के बाद वहाँ की पुरानी सामाजिक-आर्थिक संरचना को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया । बाद में इन देशों में औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से जिस बुर्जुआ वर्ग का जन्म हुआ, वह एक समझौतापरस्त वर्ग था । वह अमेरिका या फ़्रांसिसी क्रांति के वाहक बुर्जुआ वर्ग की भांति क्रान्तिकारी भौतिकवाद और जनवाद के मूल्यों से लैस नहीं था । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों में इसी बुर्जुआ वर्ग ने अलग-अलग परिस्थितियों में कहीं एक हद तक क्रान्तिकारी संघर्ष करके तो कहीं ‘समझौता-दबाव-समझौता’ की रणनीति अपनाकर और कहीं पूरी तरह साम्राज्यवाद के साथ समझौता करके सत्ता हासिल की । तीसरी दुनिया के इस बुर्जुआ वर्ग की राजनीतिक स्वतन्त्रता भी उनके चरित्र और उनके संघर्ष या समझौते की प्रकृति के ही अनुरूप कम या ज्यादा थी, पर कहीं भी इस नये बुर्जुआ वर्ग ने न तो साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद किया और न ही क्लासिकीय अर्थों में उस रूप में जनवाद को ही बहाल किया, जैसाकि फ़्रांस या अमेरिका के बुर्जुआ वर्ग ने किया था ।

इन सभी देशों में नारी आन्दोलन के उद्भव और विकास की प्रक्रिया और उसका चरित्र भी इन देशों के इतिहास की उपरोक्त विशिष्टता से ही निर्धारितहुआ ।

एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी प्रक्रिया घटित न होने के कारण इन देशों के सामाजिक जीवन एवं मूल्यों में जनवादी मूल्यों-मान्यताओं की व्याप्ति अत्यंत कम थी और नारी समुदाय उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में भी मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था और मूल्यों-मान्यताओं के बंधन में जकड़ा रहा । काफी हद तक यह स्थिति आज भी बनी हुई है । फिर भी उन्नीसवीं शताब्दी में नारी मुक्ति की जो चेतना तीसरी दुनिया के देशों के नारी समुदाय में संचरित हुई, उसकी प्रक्रिया राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के दौर में शुरू हुई ।

अधिकांश लातिन अमेरिका देशों (जैसे मैक्सिको, क्यूबा, ब्राज़ील, हैती, निकारागुआ आदि ) में स्पेनी उपनिवेशवादियों के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हो चुकी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में लातिन अमेरिका देशों में स्त्रियों के संगठनों के बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, हालाँकि यह मध्यवर्गीय शिक्षित मिश्रित आबादी से नीचे मूल इंडियन आबादी तक नहीं पहुँच पाई थी और इन संगठनों की प्रकृति सारत: बुर्जुआ नारीवादी थी । बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में मैक्सिको और ब्राज़ील की अधूरी राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों और क्यूबा, निकारागुआ आदि देशों में उग्र रूप से जारी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों ने पूरे लातिन अमेरिका में नारी मुक्ति आन्दोलन को भी नया संवेग प्रदान किया । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत सारे लातिन अमेरिकी देशों में कम्युनिस्ट संगठनों के बनने की प्रक्रिया भी दूसरे इंटरनेशनल के काल में ही शुरू हो चुकी थी और इस शताब्दी के तीसरे दशक तक अधिकांश देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थापना हो चुकी थी । सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों और क्रांतिकारी मध्यमवर्ग के क्रांतिकारी संघर्षों की लंबी परम्परा ने भी लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति और उनके आन्दोलन पर विशेष प्रभाव डाला । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी नवउपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों का जो नया चक्र लातिनी देशों में शुरू हुआ, उसने आम मध्यवर्गीय और कामगार स्त्रियों को भी और काफी हद तक मूल आबादी की स्त्रियों को भी संघर्ष की मुख्य धारा से जोड़ने के साथ ही स्त्री-मुक्ति की धारा से भी जोड़ने में कामयाबी हासिल की ।

ख्रुश्चेवी लहर से लेकर गोर्बचोवी लहर तक के प्रतिकूल प्रभाव लातिन अमेरिकी जनता के मुक्ति-संघर्षों पर भी पड़े और मुख्यत: संशोधनवादी प्रभाव के चलते आज इन देशों के कई छापामार मुक्ति संघर्षों का (जैसे, अलसल्वाडोर, कोलम्बिया आदि में ) विघटन हो चूका है । कई सारी क्रांतियाँ (जैसे क्यूबा, निकारागुआ आदि ) अपने मध्यवर्गीय नेतृत्व के चरित्र के अनुरूप अपने अधूरे कार्यभारों को पूरा करने के बाद या तो विफिल हो चुकी हैं या विपथगमन कर चुकी हैं । इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव वहाँ के नारी आन्दोलन पर भी पड़ा है । लेकिन आज फिर पेरू में वहाँ की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वहाँ की स्त्रियाँ छापामार सेना और जनकार्रवाइयों में हिस्सा ले रही हैं, आधार इलाकों में लोक कमेटियों में शामिल होकर राजनीतिक कार्यों में, सामाजिक गतिविधियों में तथा सामाजिक उत्पादन में बराबरी की हिस्सेदारी कर रही हैं और साथ ही उन्होंने क्रांतिकारी जनसंगठनों के रूप में अपने संगठन बनाये हैं ।

काले अफ़्रीकी देशों में स्त्रियों ने वर्गीय समाज की गुलामी से औपनिवेशिक काल में ही पहली बार साक्षात्कार किया । दास समाज और सामंती समाज की पितृसत्तात्मक गुलामी के लंबे अतीत और सामन्ती पार्थक्य से वंचित रहने के कारण, पचास और साठ के दशक में राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के विस्फोट के साथ ही स्त्रियों की भारी आबादी उनमें शामिल हुई । नवस्वाधीन अफ़्रीकी देशों की स्त्रियों ने अपने लिए महत्वपूर्ण जनवादी अधिकार अर्जित किये । पर अब इन देशों का विकास गतिरुद्ध हो चुका है और केवल विश्व पूंजीवाद से निर्णायक विच्छेद करके, नई सर्वहारा क्रांतियाँ ही पुन: इन्हें प्रगतिपथ पर आगे बढ़ा सकती हैं । आज अफ़्रीकी देशों में भी पूंजी की सत्ता और यौन-असमानता की शिकार नारी समुदाय के नये आन्दोलन और स्वतंत्र संगठनों के गठन का वस्तुगत आधार तैयार है, पर उनका भविष्य क्रांतियों के नये चक्र की शुरुआत के साथ जुडा हुआ है ।

तुर्की, ईरान और मिस्र में नारी आन्दोलन की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में राष्ट्रीय जनवाद के लिए संघर्ष शुरू होने के साथ ही हो चुकी थी और स्त्रियों ने वहाँ लंबे संघर्ष के दौरान कई जनवादी अधिकार प्राप्त किये, पर फ़िलहाल वहाँ भी नारी मुक्ति-संघर्ष आज ठहराव और गतिरोध का शिकार है । सीरिया और इराक में भी सामाजिक-राजनीतिक जीवन में स्त्रियों ने कुछ महत्वपूर्ण अधिकार अर्जित कर लिए हैं, पर वर्तमान गतिरोध आज वहाँ की भी सच्चाई है । अरब अफ़्रीकी और पश्चिमी एशिया के अन्य अधिकांश मुस्लिम देशों में स्त्रियाँ आज भी अपने सामाजिक अधिकारों से वंचित पूरी तरह मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक गुलामी और सामन्ती पार्थक्य का शिकार बनी हुई हैं । साम्राज्यवादियों के टट्टू प्रतिक्रियावादी शेखों और शाहों के विरुद्ध जब तक इन देशों में जनक्रांतियाँ आगे कदम नहीं बढ़ाएंगी, तब तक नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रक्रिया वहाँ संवेग नहीं ग्रहण कर सकती ।

एशिया के अन्य देशों में चीन और वियतनाम, कोरिया आदि जिन देशों में साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधी संघर्ष का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग ने किया और जहाँ कुछ दशकों के लिए भी सर्वहारा सत्ता कायम रह सकी, उन देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के बावजूद आज भी स्त्रियों की सभी उपलब्धियां खोई नहीं हैं । आज भी अन्य एशियाई देशों की तुलना में स्त्रियों की इन देशों में वास्तव में अधिक सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं, यद्यपि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि चीन, वियतनाम आदि देशों में आज पूंजीवाद की लहर ने न केवल उन्हें निकृष्टतम कोटि का उजरती मजदूर बना दिया है और न केवल उनके अधिकारों में कटौतियां की जा रही हैं, बल्कि अब इन देशों में नारी-विरोधी अपराधों की भी भरमार हो गई है ।

भारत और एशिया के अन्य कई देशों में यद्यपि नारी मुक्ति-आन्दोलन की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही हो चुकी थी, पर राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व के समझौतापरस्त चरित्र के कारण इन देशों में जीवन के अन्य क्षेत्रों की ही भांति नारी अधिकार आन्दोलन के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी जनवादी मूल्यों की लड़ाई क्रांतिकारी और व्यापक पैमाने पर नहीं लड़ी गई । मध्यवर्गीय क्रांतिकारी आन्दोलन और सर्वहारा आन्दोलन की धाराएं अपनी जिन अन्तर्निहित कमजोरियों के कारण राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग के हाथों से नहीं छीन सकीं, उन्हीं कारणों से वे नारी आन्दोलन को भी एक क्रांतिकारी दिशा और संवेग नहीं दे सकीं । लंबे संघर्षों और निरंतरता के बावजूद भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों की स्त्रियों ने जो भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार अर्जित किये, वे बहुत कम थे । यही नहीं, कानूनी और संवैधानिक तौर पर उन्हें समानता के जो अधिकार मिले भी हैं, वे समाजी जीवन में व्याप्त निरंकुश स्वेच्छाचारिता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण मूलत: और मुख्यत: निष्प्रभावी बने हुए हैं ।

राष्ट्रीय आन्दोलन के समझौतापरस्त बुर्जुआ नेतृत्व तथा राष्ट्रीय जनवाद के कार्यभारों के अधूरे और गैरक्रांतिकारी ढंग से पूरा होने के कारण ही भारत, नेपाल आदि पिछड़े देशों में औरतों की गुलामी आज भी अधिक गहरी, व्यापक, निरंकुश और संगठित रूप में कायम है । सीमित हद तक शिक्षा और जनवादी चेतना के प्रसार के बावजूद बहुसंख्यक नारी आबादी आज भी बर्बर निरंकुश दासता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मकता के मूल्यों से जकड़ी हुई है, भयानक अमानवीय पार्थक्य ( Segregation ) की शिकार है और साथ ही पूंजी की सत्ता की उजरती गुलामी के रथ में भी जोत दी गई है । आधी आबादी की अपार क्रांतिकारी सम्भावना सम्पन्न जनशक्ति को निर्बंध क्रांतिकारी चेतना से लैस करना, क्रांतिकारी नारी आन्दोलन को नये सिरे से खड़ा करना और साथ ही सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के हर मोर्चे पर योद्धाओं की कतारों में स्त्रियों को ला खड़ा करना इन सभी देशों में क्रांतियों का एक अत्यंत कठिन लेकिन अनिवार्यत; आवश्यक कार्यभार है ।

तीसरी दुनिया के इन सभी देशों में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के विरुद्ध तथा राष्ट्रीय जनवादी क्रांति के छूटे हुए कार्यभारों को पूरा करने के लिए सर्वहारा क्रांतियों का जो नया चक्र शुरू होगा, अब नारी मुक्ति आन्दोलन का भविष्य भी उसी के साथ द्वंदात्मक रूप से जुडा हुआ है ।

7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति

अक्टूबर क्रान्ति के बाद मानव इतिहास में पहली बार कोई ऐसी राज्यसत्ता अस्तित्व में आयी, जिसने औरतों को हर मायने में सामान अधिकार दिए, समान सुविधाओं के अतिरिक्त हर क्षेत्र में समान काम के अवसर, समान काम के लिए समान वेतन, समान सामजिक राजनीतिक अधिकार, विवाह और तलाक के सम्बन्ध में बराबर अधिकार, अतीत में वेश्यावृत्ति जैसे पेशों के लिए विवश औरतों का सामजिक पुनर्वास आदि अनेकों कदम उठाकर रूस की समाजवादी सरकार नें निस्संदेह एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक काम किया । समाजवादी निर्माण के पूरे दौर में, नारी मुक्ति के क्षेत्र की उपलब्धियां भी अभूतपूर्व थीं । पिछड़े हुए रूसी समाज में क्रान्ति के बाद के चार दशकों में उत्पादन, सामजिक-राजनीतिक कार्रवाईयों , सामरिक मोर्चे और बौद्धिक गतिविधियों के दायरे में जितनी तेजी से औरतों की हिस्सेदारी बढ़ी, वह रफ़्तार जनवादी क्रांतियों के बाद यूरोप-अमेरिका के देशों में पूरी दो शताब्दियों के दौरान कभी नहीं रही थी । चंद-एक दशकों में ही सोवियत समाज से यौन अपराध और यौन रोगों का पूर्ण उच्छेदन हो गया, इस तथ्य को पश्चिम का मीडिया भी स्वीकार करता था । खेतों कारखानों में उत्पादन के मोर्चे पर ही नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चे पर भी लाखों सोवियत वीरांगनाओं नें जिस शौर्य और साहस का परिचय दिया था, उसने काफी हद तक इस सच्चाई को सत्यापित कर दिया कि नारी समुदाय की सीमा सिर्फ यही है कि उसे समाज में पुरुषों के साथ बराबरी की स्थिति, अवसर और परिवेश नहीं प्राप्त है ।

लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजवादी समाज में नारी समुदाय यौन-शोषण-उत्पीड़न से तथा आर्थिक शोषण से पूरी तरह मुक्त हो चुका होता है और पूर्ण समता की स्थिति कायम हो गयी होती है । ऐसा न तो कभी हुआ था और न ही ऐसा हो पाना संभव ही है । इस मुद्दे पर स्पष्टता के लिए जरूरी है कि पहले समाजवाद की अंतर्रचना को ही भली-भाँती समझ लिया जाये ।

समाजवाद एक स्थायी सामाजिक आर्थिक संरचना नहीं है । यह पूँजीवाद और वर्गविहीन समाज के बीच का एक लम्बा संक्रमणकाल है । इस दौर में छोटे पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन लम्बे समय तक बना रहता है, बाजार के नियम काम कार्य रहते हैं, माल-अर्थव्यवस्था भी मौजूद रहती है और इनके आधार पर पूंजीवादी मूल्य-मान्यताएं-संस्कृति रोज-रोज, हर क्षण पैदा होती रहती हैं, पूंजीवादी राज्यतंत्र के नाश के बाद भी पुराने समाज की वैचारिक-सामजिक-सांस्कृतिक अधिरचनाएं लगातार मौजूद रहती हैं और समाजवाद के विरूद्ध, एवं उसे ख़त्म कर देने के लिए लगातार एक भौतिक शक्ति का काम करती रहती हैं । वर्ग संघर्ष जारी रहता है और उत्तरोत्तर तीखा होता जाता है । सर्वहारा का राज्य और सर्वहारा की पार्टी लगातार पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली और मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के विरूद्ध कारगर ढंग से संघर्ष को जारी रखते हुए ही समाजवादी समाज को उस मंजिल तक पंहुचा सकती हैं, जहां वस्तु का बाजार मूल्य पूर्णतः समाप्त हो जाता है और मात्र उपयोग-मूल्य एवं प्रभाव मूल्य का ही अस्तित्व रह जाता है । केवल इसी मंजिल पर पहुंचकर समाज में हर तरह की असमानता समाप्त हो सकती है और नारी समुदाय भी तभी पूर्ण समता और स्वतंत्रता की स्थिति प्राप्त कर सकता है । लेकिन यह मार्ग अनेकों आरोहों-अवरोहों, जय-पराजयों और मोड़ों-घुमावों से भरा हुआ होता है तथा बहुत लम्बा होता है ।

रूस और चीन के समाज ने समाजवादी क्रान्ति और निर्माण के दौर में विकास के अभूतपूर्व लम्बे डग भरे और सामजिक न्याय और समता के अपूर्व कीर्तिमान स्थापित किये, लेकिन वे पूर्ण समता और पूर्ण न्याय से युक्त समाज नहीं थे । संवैधानिक स्तर पर औरत को सभी अधिकार मिल चुके थे, लेकिन सामजिक पारिवारिक स्तर पर यह स्थिति नहीं थी । ऐसा समझना एक वैधिक विभ्रम(Juridical Illusion) होगा । उत्पादन के तंत्र पर पूर्ण सामाजिक स्वामित्व के बगैर यह संभव नहीं था और इसके लिए अधिरचना के धरातल पर सतत क्रांतियों की भी अपरिहार्य आबश्यकता थी ।

समाजवाद की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बावजूद स्तालिनकालीन रूस में ऐसा न हो सका, जो कालान्तार में समाजवाद के ठहराव और अन्ततोगत्वा पराजय का कारण बना । स्तालिन की सर्वाधिक गंभीर गलती उनकी यह दार्शनिक भूल थी कि वे समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के अस्तित्व को और उसकी निरंतरता को वास्तविक रूप में पहचान नहीं सके । यह काम सर्वप्रथम माओ-त्से-तुंग ने किया । सोवियत संघ में समाजवाद की उपलब्धियों और पराजय की शिक्षाओं का तथा चीन में समाजवादी प्रयोगों का सार संकलन करते हुए माओ ने पहली बार समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को स्पष्टतः निरूपित किया और सर्वहारा के अधिनायकत्व के अंतर्गत वर्ग संघर्ष को जारी रखने के सिद्धांत और पद्धति का प्रतिपादन किया । पहले यह उल्लेख किया जा चुका है कि मार्क्सवाद के विकास की परम्परा में उत्पादक शक्तियों के विकास पर अधिक जोर देने की यांत्रिकता शुरू से ही मौजूद थी और मूलाधार एवं अधिरचना के द्वंद्वात्मक संबंधों की समझ काफी हद तक अस्पष्ट थी । सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की सैद्धांतिक पार्श्वभूमि की सर्जना करते हुए माओ त्से तुंग ने पहली बार इनका स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया और मूलाधार के रूपांतरण को जारी रखने के लिए तथा पूंजीवादी पुनर्स्थापना के सभी भौतिक आधारों को नष्ट करने के लिए अधिरचना के निरंतर क्रान्तिकारीकरण या अधिरचना में सतत क्रान्ति की अवधारणा प्रस्तुत की । पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि समाजवादी संक्रमण के दौरान पूंजीवादी उत्पादन के छोटे से छोटे रूप की समाप्ति की लम्बी प्रक्रिया के साथ ही उसकी अनिवार्य पूर्वशर्त एवं समांतर प्रक्रिया के रूप में तथा ज्यादा महत्व देकर कला-साहित्य-संस्कृति, शिक्षा एवं सामाजिक मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के प्रत्येक दायरे में अनवरत क्रान्ति की प्रक्रिया को जारी रखे बगैर समाज की विषमताओं एवं उत्पीड़न के विविध सूक्षम एवं स्थूल रूपों को कदापि समाप्त नहीं किया जा सकता । नारी-पुरूष असमानता, नारी उत्पीड़न पर आधारित पारिवारिक ढांचा एवं वैवाहिक सम्बन्ध, पुरूष-स्वामित्ववादी मानसिकता आदि ऐसी ही सामाजिक संस्थाएं और मूल्य मान्यताएं हैं, जिन्हें समाजवादी समाज के भीतर अनवरत सांस्कृतिक क्रांतियों से गुजरने के बाद ही, क्रमशः निर्मूल किया जा सकेगा । यह सच्चाई केवल समाजवादी समाज के लिए ही लागू नहीं होती है, बल्कि आज भी नारी मुक्ति आन्दोलन के मार्क्सवादी समर्थकों के भीतर मौजूद तमाम यांत्रिक धारणाओं, अर्थवादी भटकावों और भ्रांतियों से मुक्ति के लिए सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की इस दार्शनिक अंतर्वस्तु को जानना समझना जरूरी है ।

मूलाधार और अधिरचना के द्वंदात्मक संबंधों के, सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति द्वारा प्रस्तुत निरूपण, अधिरचना में क्रान्ति की अपरिहार्यता पर उसके जोर और सर्वहारा अधिनायक्तव के अंतर्गत सतत क्रान्ति की उसकी अवधारणा की सम्यक समझदारी के आधार पर ही आज नारी मुक्ति की दिशा से सम्बंधित निम्नलिखित प्रश्नों को भलीभांति समझा जा सकता है ।

1. नारी-उत्पीडन के बुनियादी कारण आर्थिक होंने के बावजूद आर्थिक प्रश्नों के अतिरिक्त सामाजिक- सांस्कृतिक धरातल पर भी स्त्रियों को संगठित होकर संघर्ष करना जरूरी है और पुरूष्सत्तात्मक व्यवस्था की मान्यताओं-संस्थाओं से सघर्ष एक दीर्घकालिक संघर्ष है ।

2. समाजवादी संक्रमण के अंतर्गत भी एक लम्बे समय के संघर्ष के बाद ही स्त्रियों की पूर्ण मुक्ति संभव है और यह कि यह प्रश्न समाजवाद की विजय-पराजय के साथ जुड़ा हुआ है ।

3. नारी मोर्चे पर कामगार स्त्रियों के संगठनों के अतिरिक्त और सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष मोर्चात्मक(Frontal) संगठनों के अतिरिक्त संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठनों की अपरिहार्य आवश्यकता है, जिनमें मध्यमवर्ग सहित जनता के सभी वर्गों की स्त्रियाँ पुरूष उत्पीडन के सर्वतोमुखी विरोध और अपने सामजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के एक कार्यक्रम के आधार पर संगठित हों, ऐसे नारी संगठन सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष नेतृत्व में न होकर सांगठनिक तौर पर, स्वतन्त्र स्वायत्त हों और पार्टी अपनी नीतियों से उन्हें प्रभावित करके, उनके भीतर काम करते हुए उन्हें दिशा देने का प्रयास करे ।

4. स्त्रियों की सहस्त्राब्दियों पुरानी मानसिक गुलामी को नष्ट करने के लिए नारी संगठनों की पहलकदमी, निर्णय लेने की आजादी और सापेक्षिक स्वायत्तता को बढाने के साथ ही, सर्वहारा वर्ग की पार्टी के लिए यह भी जरूरी है की राजनितिक-सांस्कृतिक शिक्षा और आन्दोलन के विशेष प्रयासों से पार्टी-कतारों में स्त्रियों की भरती की प्रक्रिया तेज की जाये और साथ की संघर्ष के हर मोर्चे पर — सभी तरह के जनसंगठनों में स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी बढाई जाये और उनकी पहलकदमी को निरुत्साहित करने की पुरूष-स्वामित्ववादी प्रवृत्तियों के विरूद्ध सतत संघर्ष किया जाये ।

5.पुरूषों की प्रत्यक्ष-परोक्ष चौधराहट(जो हर स्तर पर बुर्जुआ तत्वों को बल प्रदान करती है) से सामाजिक सक्रियता के हर दायरे में औरतों के लिए बच पाना अत्यंत कठिन है और पुराने मूल्यों के पूर्ण उच्छेदन तक यह समस्या समाजवाद की अवधि में भी बनी रहेगी । इससे यह स्पष्ट है कि जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता और स्वतन्त्र पहचान के लिए संघर्ष का प्रश्न दूरगामी और ऐतिहासिक महत्त्व रखता है । इसे एक बुर्जुआ दृष्टिकोण कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । इस प्रश्न को भी नारी आन्दोलन के एजेंडे पर अलग से रेखांकित करके शामिल करना अनिवार्य है ।

पूर्वी यूरोप और भूतपूर्व सोवियत संघ में 1956 में और चीन में 1976 में पूंजीवादी पुनर्स्थापना होने के बाद से लेकर अब तक के काल में, इन देशों में लोभ लालच , प्रतियोगिता, अपराध, भ्रष्टाचार, लूटमार और असमानता की नैतिक स्वीकृति से युक्त एक नग्न उपभोक्ता संस्कृति अस्तित्व में आई है । जाहिरा तौर पर इसका सर्वाधिक शिकार प्रत्यक्ष उत्पादक और स्त्री समुदाय ही हुआ है । इन सभी देशों में इधर नए सिरे से बलात्कार, स्त्री-भ्रूण ह्त्या, पत्नि उत्पीडन आदि नारी विरोधी अपराधों का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर गया जो समाजवाद के कुछ दशकों के भीतर पूरी तरह समाप्त हो चुके थे । अब विगत कुछ वर्षों के भीतर रूस और पूर्वी यूरोप में खुले निजी इजारेदार पूँजीवाद के आने के बाद यह प्रक्रिया और अधिक तेज हो गयी है, इस तथ्य को बुर्जुआ मीडिया भी स्वीकार कर रहा है । वेश्यावृत्ति, कालगर्ल आदि के पेशों और कैबरे नृत्य, अश्लील पत्रिकाओं आदि की बाढ़ आ गयी है, 1956 के पहले के सोवियत संघ और 1976 के पहले के चीन में जिन यौन रोगों के पूर्ण उन्मूलन के तथ्य को पश्चिम भी स्वीकार करता था, अब उनके इलाज के लिए अस्पताल खोले जा रहे है । चीन में लड़कियों की भ्रूण हत्या, अपहरण करके बलात विवाह और दहेज़ सरकार की चिंता के विषय बन चुके है । फिल्मों और साहित्य में नारी छवि की यौन-उत्पीड़क प्रस्तुति, मॉडलिंग जैसे पेशों के जरिये यौन-शोषण, नग्नतावाद, हर तरह के नारी स्वातंत्र्य विरोधी मूल्य और पुरूष स्वामित्व की मानसिकता तेजी से फलफूल रही है । उत्पादन के क्षेत्र में पुरूष व स्त्री के कामों की प्रकृति में भेद करके नारी श्रम को ज्यादा से ज्यादा सस्ता बनाया जा रहा है, उन्हें तथाकथित “हलके”, ‘स्त्रियोचित”, उबाऊ, श्रमसाध्य कामों में लगाया जा रहा है और “गृहिणी” के दायित्व से बाँधा जा रहा है । समाजवाद के अंतर्गत शिक्षा और सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों-पुरूषों की भागीदारी में स्त्रियों का अनुपात लगारार बढ़ा था, जो अब तेजी से घटता जा रहा है । स्मरणीय है कि येल्त्सिन के आने से पूर्व गोर्बाचोव ने ही, जो”मानवीय चेहरे वाले समाज ” की बातें किया करता था, लगभग दो सौ तरह के कामों में स्त्रियों की भागीदारी पर रोक लगा दी थी ताकि वे श्रम से थके पतियों की देखभाल और “समाजवाद के नौनिहालों’ के लालन-पालन पर उचित ध्यान दे सकें ।

और यह सब कुछ सर्वथा स्वाभाविक है । अर्थतंत्र का विकास पूंजीवादी दिशा में हो, राज्यसत्ता पर बुर्जुआ वर्ग काबिज हो और पूरे समाज की अधिरचना का समाजवादी रूपांतरण जारी रहे — यह असंभव है । जैसाकि पहले उल्लेख किया जा चुका है, समाजवाद नारी -समस्या का समाधान नहीं बल्कि समाधान की शुरुआत है । स्त्री की असमानतापूर्ण स्थिति और उसके शोषण के विविध रूप समाजवादी संक्रमण के दौरान भी मौजूद रहेंगे, पर वे क्रमशः क्षरण और विलोपन की दिशा में अग्रसर होंगे । और यह प्रक्रिया स्वतः नहीं होगी, अधिरचना में अनवरत क्रान्ति के जरिए– सतत सांस्कृतिक क्रान्ति के जरिए होगी । पूंजीवादी पुनर्स्थापना की यह तार्किक परिणति है कि औरत फिर से दोयम दर्जे की नागरिक, सबसे निचले दर्जे की उजरती मजदूर और एक उपभोक्ता सामग्री या पण्य वस्तु में तब्दील का दी जाये । रूस, पूर्वी यूरोप और चीन में यही हुआ है ।

हमारी उपरोक्त बातों का यह मतलब कतई नहीं है कि मार्क्सवाद के सूत्रों में नारी मुक्ति के प्रश्न का कोई शाश्वत समाधान या आज की स्थिति का कोई किया-कराया विश्लेषण रखा हुआ है । यह मार्क्सवाद की एक प्रस्तरीकृत रूढ़ समझ ही हो सकती है । अपनी द्वंद्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी दृष्टिकोण पर आधारित ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर मार्क्सवाद ने पहली बार नारी प्रश्न को विश्व-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अवस्थित करके देखा, पूरे सामजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक तंत्र से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल की, वर्गीय उत्पीड़न से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों को स्पष्ट किया और इसे सामजिक क्रान्ति का एक अनिवार्य अंग बताया । महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति तक के प्रयोगों नें इस समझ को ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट किया और नारी मुक्ति के लम्बे संघर्ष की दीर्घकालिक अवधि के लिए सांस्कृतिक क्रान्ति नें आम दिशा (General Line) की एक रूपरेखा प्रस्तुत की । अब शेष काम उन्हें पूरा करना होगा जो इस मोर्चे पर काम कर रहे हैं । अभी तक असमाधानित समस्याओं का हल ढूँढने के साथ ही, आज के युग ने जो सर्वथा नयी समस्यायें पैदा की हैं, उनपर भी वे ही लोग सोचेंगे जो इनके रूबरू खड़े हैं ।

8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर

साठ के दशक में जो नारीवादी आन्दोलन पहले अमेरिका और फिर पूरे पश्चिमी जगत में फूट पड़ा, वह सारतः नारी उत्पीडन के विरूद्ध एक अन्धविद्रोह था । उसकी कई शाखाएं और उपशाखाएँ आगे चलकर फलीं-फूलीं, लेकिन उनके पास न तो नारी-समस्या के सभी पहलुओं की कोई इतिहाससम्मत तर्कपरक व्याख्या थी और न ही दूरगामी सामाजिक संघर्ष के रूप में नारी मुक्ति के सघर्ष को आगे ले जाने का कोई ठोस कार्यक्रम ।

वैसे आधुनिक नारीवाद के सिद्धांत का पहला मील का पत्थर पहली बार 1946 में फ्रांसीसी में और 1953 में अंग्रेजी में प्रकाशित सिमोन द बोउवा (Simone de Beauvoir ) की कृति “द सेकेण्ड सेक्स” था, जिसमें व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण और नारी आन्दोलन की एक स्पष्ट दिशा के अभाव के बावजूद नारी उत्पीड़न के कई सूक्ष्म पहलुओं को रेखांकित किया गया था और यह प्रस्थापना दी गयी थी कि स्त्रियों की मुक्ति में ही पुरूषों की भी मुक्ति है जो स्वयं पुरूष स्वामित्व की मानवद्रोही मानसिकता के दास हैं । साठ के दशक के नारीवादी आन्दोलन की चेतना इस विचार से काफी प्रभावित थी । ऐसी दूसरी प्रसिद्ध कृति सुप्रसिद्ध नारीवादी नेता और 1966 में राष्ट्रीय नारी संगठन (अमेरिका) का गठन करने वाली बेट्टी फ्रीडन(Betty Friedan) की 1963 में प्रकाशित पुस्तक द फेमिनिन मिस्टिक(The Feminine Mystique) थी जिसमें स्त्रियों की घरेलू दासता और पुरूष-स्वामित्व को स्वीकार करने के लिए उनके दिमाग के ‘कंडीशनिंग’ की प्रक्रिया की उग्र लेकिन एकांगी एवं अनैतिहासिक आलोचना की गयी थी ।

साठ का दशक आधुनिक इतिहास के द्वित्तीय विश्वयुद्धोतर काल का एक महत्वपूरण मोड़ बिंदु था । विश्व पूंजीवादी तंत्र के सरदार उस समय गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे । तीस के दशक की मंदी के बाद अमेरिका तक में एक बार फिर बेरोजगारी पैदा हो रही थी और युवा असंतोष तीखा हो रहा था । पूरी दुनिया में जारी मुक्ति-युद्धों की लगातार सफलता साम्राज्यवाद के लिए एक गंभीर संकट को जन्म दे रही थी । वियतनाम में अमेरिका की पराजय निश्चितप्राय प्रतीत होने लगी थी । इसी सामाजिक उथल-पुथल के दौर में अमेरिका में अश्वेत आबादी का आन्दोलन नयी शक्ति के साथ फूट पड़ा था । मैकार्थीवाद और शीतयुद्ध के दौरान संचित जनता का आक्रोश सड़कों पर आ गया था । 1968 में हिन्दचीन में अमेरिकी हस्तक्षेप के विरूद्ध छात्रों-नौजवानों और फिर व्यापक अमेरिकी जनता का आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो नागरिक अधिकारों के आन्दोलन के साथ जुड़कर व्यवस्था के लिए संकट बन गया था । इसी समय फ्रांस में छात्रों का आन्दोलन एक ज्वार की भांति उठ खड़ा हुआ जिसमें बाद में मजदूर भी शामिल हो गए और अन्ततोगत्वा लौह पुरूष कहलाने वाले दगाल को राष्ट्रीय सभा भंग करने व इस्तीफ़ा देने के लिए विवश होना पड़ा । पूरा पश्चिमी जगत एक संकट और उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था । पश्चिमी नारी समुदाय भी इस उथल-पुथल से अछूता नहीं था बल्कि उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहा था । सच तो यह है कि यूरोप-अमेरिका में जनांदोलनों में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर स्त्रियाँ हिस्सा ले रहीं थीं । उत्पादन के अतिरिक्त सामाजिक सक्रियता के दायरे में इस बढती हुई शिरकत ने पश्चिम की नारियों — विशेषकर उनके युवा हिस्से की चेतना का धरातल नयी ऊंचाईयों तक उन्नत किया और दोयम दर्जे की नागरिकता एवं हर तरह के यौन-भेद के विरूद्ध स्त्रियों का प्रबल स्वतः स्फूर्त विद्रोह उठ खड़ा हुआ ।

साठ के दशक का पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन नारी शोषण के विरुद्ध एक बगावती उभार था । इस आन्दोलन में विविध चिन्तनों की मौजूदगी के बावजूद, इसकी कोई सुविचारित वैचारिक पूर्वपीठिका, दिशा और कार्यक्रम नहीं था । द्वित्तीय विश्वयुद्धोत्तर पश्चिमी उपभोक्ता संस्कृति की प्रतिक्रिया में पैदा हुई यह एक बगावत थी । पर विडंबना यह थी कि स्वयं इसकी दार्शनिक अंतर्वस्तु भी बुर्जुआ थी, जिसके चलते जल्दी ही आन्दोलन की मुख्यधारा ने विकृत उच्छ्रंखल बुर्जुआ संस्कृति के नैतिक-सामाजिक मूल्यों को अपना लिया । इस अंध-विद्रोह ने यौन-शोषण और यौन-उत्पीड़न पर खड़ी सामाजिक संस्थाओं की जगह मूल्य-संस्थाओं की कोई समग्र वैकल्पिक व्यवस्था नहीं प्रस्तुत की । विवाह, परिवार, एकल यौन-संबधों आदि को अराजकतावादी ढंग से नकारने की चेष्टा की गयी । पूर लड़ाई को पुरूष सत्ता के विरूद्ध केन्द्रित किया गया और इस सत्ता के ऐतिहासिक-सामाजिक-आर्थिक आधारों को जानने समझने की कोई विशेष चेष्टा नहीं की गयी । जाहिरा तौर पर ऐसा कोई आन्दोलन समाज में लम्बे समय तक टिका नहीं रह सकता और यही हुआ ।

पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन का सामाजिक विद्रोही तत्व धीरे धीरे क्षरित होता गया और आठवें दशक के मध्य तक यह एक बहुत छोटे से हिस्से, बुद्धिजीवी और युवा नारियों तक ही सिमट कर रह गया । यौन-भेद में ही सभी असमानताओं का कारण ढूँढने वाली बुर्जुआ अराजकतावादी स्त्रियाँ और संस्थाएं पूरी सच्चाई को ही सिर के बल खड़ा करती रहीं और अन्ततोगत्वा व्यवस्था को ही लाभ पहुंचाने का काम करती रहीं । पश्चिम के जिन नारीवादी विचारकों ने सातवें-आठवें दशक में कई पुस्तकें लिखीं , उनमे से किसी ने विश्लेषण का कोई समग्र, इतिहाससंगत नमूना प्रस्तुत नहीं किया । लेकिन यह जरूर है कि औरत की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता के प्रश्न को, समाज में उसकी अपनी स्वतन्त्र पहचान के प्रश्न को पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन ने चिन्ता और गाम्भीर्य के साथ उठाया और इतिहास के एजेंडा पर इसे महत्वपूर्ण स्थान दिलाया, भले ही उसने स्वयं इसका काल्पनिक अथवा अराजकतावादी समाधान प्रस्तुत किया हो । यही नहीं, गर्भपात, तलाक आदि मामलों को लेकर नारीवादी संगठनों ने जो मांगे उठाई और आन्दोलन चलाए, वे भी अत्यंन्त महत्वपूर्ण थे । नारीवादी आन्दोलन के दर्शन और इतिहासदृष्टि की अवैज्ञानिकता के बावजूद, इसके द्वारा उठाई गयी अधिकाँश मांगों और समस्यायों को एक सही सैद्धांतिक फ्रेमवर्क में अवस्थित करके एक क्रांतिकारी नारी आन्दोलन के कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है और उसके अनुभवों से काफी कुछ सीखा जा सकता है ।

9. और अंत में…

पश्चिम के पूंजीवादी समाज में, पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (Renaissance-Elightenment-Revolution) की ऐतिहासिक विकास-यात्रा के परिणामस्वरूप वहां के समाज में पुरूष-स्वामित्व और वर्चस्व के रूप सूक्ष्म है. जनतांत्रिक मूल्य सामाजिक जीवन में इस हद तक रचे-बसे हैं कि वहां इनका नग्न रूप कायम नहीं रह सकता । वहां स्त्री के साथ यौन-आधार पर कायम सामाजिक असमानता और भेदभाव मुख्य प्रश्न हैं । यौन-उत्पीड़न के आम रूप अत्यंत सूक्षम हैं । नारी की अस्मिता का प्रश्न पश्चिम में प्रबल है । नारी आन्दोलन का प्रमुख सांस्कृतिक पक्ष वहां उपभोक्ता संस्कृति की विकृतियों के विरुद्ध जनमानस तैयार करने का है ।

तीसरी दुनिया के अधिकाँश पिछड़े हुए देशों में नारी उत्पीड़न के नए पूंजीवादी रूपों के साथ-साथ उसके मध्ययुगीन नग्न स्वेच्छाचारी रूप भी कायम हैं । इनमें से कुछ देशों में आज भी अर्द्धसामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक तंत्र किसी-न-किसी रूप में कायम हैं और जिन देशों में साम्राज्यवाद पर आश्रित बुर्जुआ व्यवस्थाएं कायम हुई हैं, वे जनतांत्रिक मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं-संस्थाओं के मामले में पश्चिमी व्यवस्थाओं से बहुत पीछे हैं । भारत को उदाहरण के तौर पर लें । समाज विकास की मंथर गति तथा जनवादी क्रांतियों और तज्जन्य जनवादी मूल्यों के अभाव के चलते हमारे समाज में मूल्यों-मान्यताओं का प्राक्पूंजीवादी ढांचा अत्यंत धीमी गति से क्षरित होता हुआ आज भी कायम है और भारतीय पूंजीवाद नें इन्हें अपना लिया है । मनु के विधान यहाँ आज भी जिन्दा हैं । शिक्षा के प्रसार के बावजूद सामाजिक क्रियाकलापों से बहुसंख्यक नारी समुदाय, यहाँ तक कि उसका वह हिस्सा भी काफी हद तक कटा हुआ है जो सामाजिक उत्पादन में लगा हुआ है । मजदूर और गरीब किसान औरतें निकृष्टतम कोटि के उजरती गुलाम के रूप में ही सही, पर सामाजिक उत्पादन की कार्रवाई में हिस्सा लेती हैं, पर मध्यमवर्गीय औरतों , यहाँ तक तक कि शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक का बहुलांश चूल्हे- चौखट से पूरी तरह बंधा हुआ है और पति की सेवा, बच्चों का लालन-पालन और घरेलू उपयोग की चीजों के उत्पादन से अधिक कुछ नहीं करता । नौकरी करने वाली मध्यमवर्गीय स्त्रियां भी घरेलू गुलामी से मुक्त नहीं हैं । आज भी औरतों का पुरूषों से और पूरे समाज में जितना अमानवीय पार्थक्य (Segregation) भारत में है, उतना मध्य पूर्व के कुछ देशों को छोड़कर कहीं नहीं है । इस आधी आबादी को आर्थिक शोषण, लूटमार, मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं की दिमागी गुलामी, यौन-उत्पीड़न, पुरूष-स्वामित्व, पार्थक्य (Segregation) और अलगाव (Alienation) से मुक्त करना भारत और ऐसे तमाम देशों की क्रांतियों का दायित्व ही नहीं, बल्कि उनकी लड़ाई का एक ऐसा जरूरी मोर्चा है, जिस पर लड़े बिना ये क्रांतियाँ सफल हो ही नहीं सकतीं ।

भारत जैसे देशों में नारी मुक्ति आन्दोलन को वैचारिक धरातल पर तमाम विजातीय बुर्जुआ विचारों से संघर्ष करते हुए सही वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि, इतिहास-दृष्टि, संस्कृति और दिशा से खुद को समृद्ध बनाना होगा । साथ ही साम्राज्यवाद से आयातित और देशी पूँजीवाद द्वारा पोषित बुर्जुआ नारीवाद के दर्शनं के समूल नाश के लिए समग्र जनमुक्ति एवं नारी-मुक्ति की जातीय, जन-परम्पराओं से खुद को वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर अविच्छिन्न रूप से जोड़ना होगा ।

साम्राज्यवाद के वर्तमान नए दौर में यह बात अब दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि बुर्जुआ व्यवस्था के दायरे के भीतर, सुधारों के दायरे के भीतर नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी अब कुछ हासिल कर पाने की रत्ती भर भी गुंजाईश शेष नहीं है । उलटे, ढांचागत असाध्य संकट के दौर में — आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर में, पूरी दुनिया की पूंजीवादी व्यवस्थाएं अब ज्यादा से ज्यादा निरंकुश होते जाने की दिशा में अग्रसर हैं । ऐसे में अबतक के संघर्षों से अर्जित जनवादी अधिकारों की हिफाजत के लिए भी नारी समुदाय को राज्यसत्ता के विरूद्ध जुझारू लड़ाई लड़नी पड़ेगी । पहली बात तो यह है कि यह लड़ाई स्त्रियां तभी लड़ सकती हैं जब वे मजदूरों-किसानों के क्रांतिकारी संघर्षों में, लोक अधिकार आदोलनों में, क्रांतिकारी सांस्कृतिक आन्दोलनों में, क्रांतिकारी छात्र-युवा आन्दोलनों में पूरी भागीदारी करें । तभी वे आम जनता के पुरूष समुदाय को नयी चेतना देकर अपनी मुक्ति के लिए समर्थन हासिल कर सकेंगी और नारी मुक्ति के संघर्ष को स्त्री बनाम पुरूष का सघर्ष से बचाया जा सकेगा । दूसरी बात यह कि आज कामगार स्त्रियों के संगठन बनाने के अतिरिक्त जनमुक्ति संघर्ष के हिरावलों और अन्य क्रांतिकारी आन्दोलनों के नेतृत्व को मध्यमवर्गीय और जनता के सभी बर्गों की स्त्रियों को नारी उत्पीड़न और जनवादी अधिकारों के प्रश्न पर,व्यापक आधार वाले (वर्गीय संयुक्त मोर्चे की प्रकृति वाले) नारी संगठनों के बैनर तले संगठित करने की भी पहले से बहुत अधिक जरूरत है । साथ ही नारी मुक्ति के मुद्दे को उठाने वाले पहले से ही मौजूद ऐसे संगठनों को भी साथ लेने और उनमें शामिल होकर काम करने की संभावना मौजूद होने पर उनका उपयोग अवश्य ही किया जाना चाहिए । भारत जैसे देशों में स्त्रियों के जनवादी अधिकारों के लिए आंदोलनरत तमाम नारी संगठन महानगरों के शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक ही सिमटे हुए है । इनके साथ आम सहमती के कार्यक्रम पर सहमती के आधार पर काम किया जा सकता है और इनका विस्तार गावों-शहरों की आम स्त्रियों तक भी किया जा सकता है ।

तीसरी बात, यह कि जिस हद तक बुर्जुआ व्यवस्था और विश्वपूंजीवादी तंत्र की जरूरत है, उस हद तक सुधारपरक कार्रवाईयों के लिए आज बड़े पैमाने पर सरकारी आर्थिक मदद और तथाकथित स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिये आने वाली साम्राज्यवादी मदद के जरिये भारत जैसे देशों के कोने-कोने में तथाकथित स्त्री संगठन सुधार और आन्दोलन की कार्रवाईयों में लगे हैं । इनका मूल मकसद स्त्रियों को सुधार के दायरे में कैद करके उनकी तेजी से उन्नत होती चेतना को कुंद करना और उन्हें क्रान्ति की धारा में शामिल होने से रोकना है । स्त्री आन्दोलन के इन खतरनाक घुसपैठियों के विरुद्ध आज बड़े पैमाने पर प्रचार की और उनके प्रभाव को समाप्त करने की जरूरत है ।

इस सभी बातों और इनके सभी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही आज नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा और एक सुसंगत कार्यक्रम का निर्धारण किया जा सकता है ।

BACK TO POST [ १०-११ मार्च १९९२ को काठमांडू नेपाल में ‘अखिल नेपाल महिला संघ’ के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय भाषण के रूप में प्रस्तुत निबन्ध. नेपाली भाषा में पुस्तिकाकार प्रकाशित. ‘दायित्वबोध’, मार्च-जून, १९९३, जुलाई-अगस्त,१९९३ और नवंबर-दिसंबर, १९९३ अंकों में धारावाहिक प्रकाशित ]

डार्विन के जन्मदिन पर विशेष

Posted on Updated on

जीव विकास का सिद्धांत – डार्विन और वाद-विवाद

डॉ अमृत

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

डार्विन की उपलब्धियां

डार्विन के आलोचक

नव-डार्विनवाद

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

बीते वर्ष 2009 के 12 फरवरी के दिन, मानव  प्रकृति विज्ञानी चार्ल्स डार्विन का दो सौवां जनमदिन था और संयोगवश 150 साल पहले ही नवम्बर 1859 में ही मनुष्य की वैज्ञानिक समझ का एक  मील पत्थर चार्ल्स डार्विन द्वारा लिखित पुस्तक ‘ जीवों की उत्पत्ति’ छपी थी । इन दोनों ही ऐतिहासिक  दिनों की याद को समर्पित 2009 का वर्ष, डार्विन के सिद्धांत को आम लोगों में प्रचारित करने और इस पर हो रहे हमलों का जवाब देने के लिए पूरी दुनिया में मनाया गया । इन कार्यक्रमों की समाप्ति 12 फरवरी 2010 को होगी । इसके अलावा पिछले कुछ सालों में 12 फरवरी का दिन डार्विन दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है ।

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के शहर सर्युस्बरी में हुआ । उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे और दादा इरासमस डार्विन एक प्रकृति दार्शनिक, डॉक्टर और कवि थे । पिता की इच्छा थी कि डार्विन डॉक्टर बनें लेकिन उनकी रूचि प्रकृति विज्ञान में थी । 1828 में पिता ने डार्विन को पादरी बनाने के लिए क्राईस्ट कॉलेज, कैम्ब्रिज में दाखिल करवा दिया  । यहाँ उनका मेल वनस्पति विज्ञान के प्रोफैसर स्टीवन हैन्स्लो से हुआ और वहां काम करने लगे । डार्विन पहले ही लामारक के जीव विकास सम्बन्धी विचारों को पढ़ चुके थे और अब इनकी रूचि और भी बढ़ गयी । इसी दौरान वह प्रकृति का ध्यान से निरीक्षण करने में लग गये और कीड़े मकौड़े तथा पौधे एकत्रित करने में जुट गये । 1831 में उनकी पढाई पूरी हो गयी ।

इंग्लैण्ड में विभिन्न स्थानों पर प्रकृति का निरीक्षण करने के लिए घूमते-घूमते, उनके प्रोफेसर हैन्स्लो ने, उनकी सिफारिश एक सर्वेक्षण करने जा रहे जहाज पर बतौर प्रकृति विज्ञानी कर दी । डार्विन के पिता नें इनकार कर दिया, लेकिन आखिरकार डार्विन ने किसी न किसी तरह उन्हें अपनी यात्रा का खर्च उठाने के लिए मना ही लिया और 27 दिसंबर, 1831 को डार्विन एच. एम. एस. बीगल नामक जहाज पर सफ़र के लिए निकल पड़े । किसे पता था कि यह सफ़र जीव विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति लाने वाला है और पृथ्वी पर मौजूद जीवों और पौधों की उत्पत्ति और विभिन्नता के बारे में  मनुष्य की सदियों पुरानी अवधारणाओं को सदा के लिए बदलने वाला है ।

अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन नें तथ्यों का भण्डार इकट्ठा  कर लिया और अक्तूबर 1836 में इंग्लैंड वापिस आने पर अध्ययन में जुट गये । उनके द्वारा पृथ्वी की सरंचना संबंधी लिखे गये लेखों की वजह से , वह अपनी यात्रा से लौटने से पहले ही काफी प्रसिद्ध हो चुके थे । वापसी पर उनके संबंध उस समय के कई बड़े-बड़े विज्ञानियों से बन गये और वे कई साईंस सोसायटियों के मैम्बर चुने गये । अपने सफरनामे के बारे में किताब लिखते वक्त बहुत ज्यादा मेहनत के दबाव के चलते 1838 में वे बीमार हो गये और डॉक्टरों के कहने पर उन्हें लन्दन वापिस अपने पिता के घर जाना पड़ा । पर यहाँ भी उनकी खोजी रूचि कायम रही । वह अपना ज्यादा समय दुधारू पशुओं को पालने वाले किसानों के साथ बातें करते हुए और उनके द्वारा पशुओं की नसल सुधार के कामों का निरीक्षण करते हुए बिताते थे । हृदयस्पंदन और जठरीय रोग के दर्दों की ये बीमारी इसके बाद डार्विन का उम्र भर पीछा करती रही ।

अपने अध्ययन के आरंभिक वर्षों में ही, डार्विन जीव विकास संबंधी अपनी दो महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं का विकास कर चुके थे । ये दो अवधारणाएं- ‘ प्राकृतिक चयन’ (Natural Selection) और ‘योग्यतम का बचाव’ (Survival of the fittest) थी । डार्विन की अवधारणाओं ने यह पक्के तौर पर सिद्ध कर देना था कि प्रकृति पल-पल बदलती है । यह अपने आरम्भकाल से एकसमान नहीं रही जैसाकि उस समय की धार्मिक शिक्षाओं में बताया जाता था । डार्विन को पता था कि उसकी खोजों का समाज के कठमुल्लों की तरफ से भयंकर विरोध किया जायेगा । कुछ इस डर की वजह से और कुछ अपनी खोजों को प्रमाणिक तौर पर और मजबूत बनाने के लिए प्रकृति में से तथ्य इकट्ठे करने और अध्ययन करने के कारण डार्विन 1859 तक अपनी इस क्रान्तिकारी खोज को प्रकाशित न कर सके ।

1856 के शुरुआती दिनों में चार्ल्स डार्विन के दोस्त चार्ल्स लिल को एक और विज्ञानी अल्फ्रेड वालेस का पत्र मिला जिस में वालेस ने डार्विन की अवधारणाओं के साथ मिलती जुलती बातें कहीं । इसके बाद लिल ने डार्विन को अपनी खोजों को छपवाने के लिए कहा और उसके कहने पर डार्विन ने, जीवों की प्रजातिओं की उत्पत्ति’ (Origin of Species) से सम्बंधित एक खोज पत्र लिखना शुरू किया । जून, 1858 में डार्विन को वालेस का पत्र मिला जिसमें उसने ‘प्राकृतिक चयन’ की धारणा का  जिक्र किया । 1859 में 1 जुलाई के दिन , डार्विन और वालेस ने इकट्ठे ही अपनी खोजों के बारे में खोज पत्र पढने का निर्णय किया, पर अपने बेटे की मृत्यु की वजह से डार्विन इसमें शामिल न हो सके । आखिरकार नवम्बर में डार्विन की पुस्तक’ जीवों की उत्पत्ति’ (Origin of Species) छप कर लोगों में पहुँच गयी ।

जैसाकि उम्मीद ही थी, किताब की काफी प्रशंसा हुई और कुछ ही दिनों में इसके पहले संस्करण की सारी प्रतियाँ बिक गयीं । वैज्ञानिकों में बहुतों ने डार्विन की उपलब्धियों के साथ सहमती प्रकट की, चाहे कुछ वैज्ञानिकों ने डार्विन की अवधारणाओं का सख्त विरोध भी किया । सबसे ज्यादा भयानक विद्रोह धार्मिक कठमुल्लों और कट्टरपंथियों ने किया और डार्विन के भद्दे कार्टून बना कर बांटे गये । जब डार्विन नें यह रहस्योदघाटन किया कि मनुष्य का विकास बंदरों की एक नसल एप (Ape) से हुआ है तो इसका प्रचंड विरोध हुआ । डार्विन का चेहरा बन्दर के धड़ के ऊपर लगा कर उसकी खिल्ली उड़ाई गयी । लेकिन उनकी खोजों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कट्टरपंथी चर्च ने अब उसकी खोजों को अपने धार्मिक लबादे में फिट करना शुरू कर दिया ।

अपने खोज कार्य जारी रखते हुए, डार्विन ने इसके बाद ‘मनुष्य की उत्पत्ति’ (Descent of Man) और अन्य कई किताबें लिखीं । 19 अप्रैल, 1882 के दिन 73 वर्ष की उम्र में इस महान विज्ञानी की मृत्यु हो गयी जो अपने पीछे छोड़ गया मानवता को अपनी बेमिसाल उपलब्धियां ।

डार्विन की उपलब्धियां

एच. एम. एस. बीगल के साथ अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन ने अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्य इकट्ठे किये । गैलापैगोस टापू पर उनका ध्यान घरेलू चिड़ियों जैसे पक्षियों की एक नस्ल पर गया । इन पक्षियों की शक्ल-सूरत आपस में काफी मिलती जुलती थी और ये पक्षी मुख्य धरती पर पाए जाने वाले इसी किस्म के पक्षियों से भी मिलते जुलते थे । पर टापुओं पर रहने वाले पक्षी कीड़े खाकर गुजारा करते थे जबकि दक्षिण अमेरिका की मुख्य धरती वाले पक्षी पौधों के बीज खाते थे । कीड़े खाने वाले पक्षियों की चोंच बीज खाने वाले पक्षियों से लम्बी थीं । अतः डार्विन ने यह परिणाम निकला कि किसी कारणवश यह पक्षी मुख्य धरती से टापुओं पर आ गए । बदलते हालत में जीवन निर्वाह के लिए उन्हें कीड़ों पर निर्भर होना पड़ा । लेकिन आम तौर पर कीड़े वृक्षों के तनों में गहरे छुपे होते थे, अतः समयानुसार टापुओं पर लम्बी चोंच वाले पक्षी अस्तित्व में आ गए ।

इसी तरह उन्होंने दक्षिणी अमेरिका के तट के साथ साथ एक दक्षिण अमेरिकी जानवर ‘सलौथ’  के अवशेषों का अध्ययन किया । इन आलोप हो चुके जानवरों का आकार हाथी जितना था, परन्तु उस समय के अमेरिकी सलौथों का आकार काफी छोटा था, डार्विन ने अपने अध्ययन से यह परिणाम निकला कि छोटे आकार के सलौथ अलोप हो चुके सलौथों से ही विकसित हुए हैं ।

इस तरह डार्विन ने उस समय तक खोजे गए विभिन्न अवशेषों का अध्ययन किया । उनके समय तक अवशेषों पर खोज करने वाले वैज्ञानिकों को धरती कि सतह पर चट्टानों की अलग अलग परतें मिलीं और प्रत्येक परत में अलग अलग किस्म के जानवरों और पौधों के अवशेष मिले । डार्विन ने अपने अध्ययन से यह जाना कि नीचे की परत से ऊपर की तरफ आते हुए, इन परतों में जानवरों और पौधों के विकास का सिलसिला सीधा-सीधा नजर आ रहा था । उस समय तक यह भी पता लग चुका था कि चट्टानों की एक परत जमने में लाखों साल लग जाते हैं । इससे डार्विन का यह निश्चय पक्का हो गया कि धरती पर जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहा है, और यह बदलता रहा है । डार्विन इस नतीजे पर भी पहुँच गए कि जीवन की उत्पत्ति किसी सरल रूप में हुई और इस सरल रूप से विकसित होते हुए जीवों और पौधों की अलग अलग प्रजातियाँ अस्तित्व में आयीं और इस प्रक्रिया में लाखों वर्ष लगे।  आज वैज्ञानिक यह जान चुके हैं कि धरती की उम्र लगभग 4.5 बिलियन वर्ष है । जीवन के प्रथम प्रारूप 3.5 मिलियन वर्ष पहले अस्तित्व में आये । मनुष्य का जनम कोई एक लाख वर्ष पहले ही हुआ है ।

अपने पुश्तैनी घर में रहते समय डार्विन ने देखा कि किसान ज्यादा दूध देने वाले पशुओं का चयन करके और उनका प्रजनन करवाकर ज्यादा दूध देने वाले पशुओं की गिनती बढ़ा लेते हैं । उन्होंने इसको ‘कृत्रिम चयन’ (Artificial Selection) का नाम दिया । लेकिन उन्होंने इससे आगे चलते हुए अपने पास उपलब्ध अन्य तथ्यों के आधार पर यह सिद्धांत दिया कि प्रकृति में भी इस तरह की ‘प्राकृतिक चयन’ की प्रक्रिया घटित होती है ।

इसको एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है । एक ख़ास किस्म का उड़ने वाला कीड़ा पक्षियों द्वारा खाया जाता है । इस कीड़े की दो किस्में हैं – एक सफ़ेद पंखों वाला जो ज़हरीला नहीं है और दूसरा चमकीले रंगों वाला ज़हरीला कीड़ा । धीरे धीरे पक्षी पंखों के रंग से ज़हरीले कीड़े को पहचानने लगते हैं और उसे खाना बंद कर देते हैं । शुरू में चमकीले पंखों वाले कीड़ों की गिनती काफी थी, लेकिन कुछ ही पीढ़ियों बाद चमकीले रंग वाले कीड़ों की बहुतायत हो जाएगी क्योंकि उनके पास प्रजनन करने के और अपने से आगे नए कीड़े पैदा करने के मौके सफ़ेद पंखों वाले कीड़ों से तुलनात्मक रूप में ज्यादा हैं । इस तरह चमकीले पंखों वाले कीड़े प्राकृतिक चयन के ज़रीये बहुतायत में आ जाते हैं ।

इस तरह डार्विन ने देखा कि प्रकृति में जीव जन्तु बहुत ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं लेकिन प्रत्येक जीव प्रजाति की संख्या को नियंत्रण में रखने के लिए किसी तरह का कोई नियम होना जरूरी है । यहीं से उन्होंने अपने दूसरे, जो कि मुख्य रूप में विवाद का कारण बना, ‘योग्यतम के बचाव’ के सिद्धांत को रूप दिया । उनके मुताबिक वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार सबसे योग्य जीव ‘जिंदा रहने के संघर्ष’ में कामयाब हो जाते हैं और प्रजनन कर पाते हैं और बाकी मर जाते हैं । इस तरह जिंदा रहने के लिए लाभकारी गुण चुनिन्दा रूप में अगली पीढ़ियों में चले जाते हैं ।

इन दोनों सिद्धांतों के आधार पर डार्विन नें यह नतीजा निकाला कि लाभकारी लक्षणों और वातावरण के अनुसार ढलने के लिए जीवों में आये बदलाव, जो कि पीढी दर पीढ़ी जीवों में संचारित हो सकते हों, इकट्ठे होते रहते हैं और समय आने पर एक बिलकुल ही नयी प्रजाति के अस्तित्व में आ जाने का कारण बनते हैं ।

डार्विन के सिद्धांतों की अपनी खामियां भी हैं । लेकिन फिर भी डार्विन के सिद्धांत आधुनिक जीव विकास के सिद्धांत की बुनियाद हैं । उनके दिए गए सिद्धांतों के बिना आज भी किसी जीव विकास के सिद्धांत की कल्पना संभव नहीं  । डार्विन की सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण  देन थी, संसार के सदा-सदा स्थिर रहने वाली अवधारणा का सदा सदा के लिए अंत ! यही बात डार्विन के विरोधियों को सबसे ज्यादा चुभती है ।

इन सिद्धांतों के अलावा डार्विन की मानवता को और भी बहुत महत्त्वपूर्ण और क्रांतिकारी देन है । डार्विन के दोस्त, टॉमस हक्सले नें उस समय दिखाया कि शारीरिक रचना के पक्ष से मनुष्य बहुत हद तक ऐप (Ape) के साथ मिलता जुलता है । 1871 में डार्विन नें अपनी पुस्तक ‘मनुष्य का विकास’ प्रकाशित की । इस पुस्तक में उसने मनुष्य की सांस्कृतिक विकास और मनुष्यों में पाए जाने वाली लैंगिक, शारीरिक, और सांस्कृतिक विभिन्नताओं की व्याख्या के लिए ‘लैंगिक चयन’ का सिद्धांत पेश किया । इस पुस्तक में उन्होंने जोर दिया कि सारे मनुष्य एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं और यह विकास अफ्रीका महांद्वीप में हुआ । उस समय अलग-अलग नस्ल के मनुष्यों को अलग अलग प्रजातियाँ मानने और कुछ नस्लों को दूसरी नस्लों से बेहतर मानने और उनके अलग-अलग तौर पर विकसित होने के सिद्धांतों का काफी बोलबाला था, लेकिन डार्विन के द्वारा एक ही पूर्वज से सारे मनुष्यों के विकास के सिद्धांत को पेश करने के बाद बाकी सिद्धांत धीरे धीरे प्रभावहीन हो गए । डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता अब डी.एन. ए. के अध्ययन से भी हो चुकी है ।

डार्विन के आलोचक

जैसे ही डार्विन नें, बाईबल की अवधारणा, कि धरती की उम्र 6000 साल है और संसार की रचना’ परम परमेश्वर प्रभु’ नें 6 दिनों में और सदा सदा के लिए की थी, पर चोट की और इसको अपनी खोजों द्वारा तीतर-बीतर कर दिया; तो धार्मिक कट्टरपंथियों नें उसके खिलाफ जेहाद छेड़ दी । लेकिन अब समय बदल चुका था, अब मध्य युग का सामंती ढांचा नहीं रहा था, अब पूंजीवादी ढांचा अस्तित्व में आ चुका था, और विज्ञान की जरूरत उसके लिए जिंदा रहने की शर्त था, इसलिए थोड़े ही समय में डार्विन के सिद्धांतों को वैज्ञानिकों की तरफ से मान्यता मिल गयी । अब डार्विन के सिद्धांत को पूंजीवादी प्रबंध को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और उसके क्रांतिकारी अंश को को छुपाने की कोशिशें होने लगीं ।

‘अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष’ और ‘ योग्यतम का बचाव’ नामक डार्विन की अवधारणाओं को पूंजीवादी प्रबंध को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और आज भी इसी प्रकार की दलीलें देने वालों की कमीं नहीं है । लेकिन ये सिद्धांतकार ‘अपने अस्तित्व के लिए सर्वहारा के संघर्ष’ से भी उतना ही डरते हैं जितना जोर ये पूँजीवाद को जायज ठहराने के लिए लगाते हैं । ‘ योग्यतम का बचाव’ के सिद्धांत द्वारा पूंजीवादी शोषकों को जायज ठहराने और अल्पमत द्वारा विशाल बहुमत की लूट को ठीक सिद्ध करने की कोशिशें लगातार होती रही हैं । पर यह राग अलापने वाले जन संघर्ष की जगह शान्तिपूर्ण सुधारों और कानूनी कार्रवाई द्वारा गरीबी ख़त्म करने जैसे भद्दे सिद्धांतों को भी साथ-साथ पेश करते रहते हैं । इन दलीलों के बिना भी देखा जाये तो दूसरे जानवरों और मनुष्यों में बहुत अंतर है । मनुष्य वातावरण के साथ खुद भी बदलता है और उसे भी अपने अनुकूल ढाल लेता है, जबकि यह गुण दूसरे जानवरों में बहुत कम विकसित है । इसके अलावा मनुष्य उत्पादन प्रक्रिया में प्रकृति के साथ संघर्ष करता है और जीवन निर्वाह के लिए औजारों का निर्माण करता है । और चूँकि यह सब सामूहिक रूप में ही संभव है, इसलिए ‘योग्यतम का बचाव’ की अवधारणा मनुष्यों पर लागू ही नहीं होती. और तो और, पूंजीवादी प्रणाली में जब भी इन औजारों की (बहुतायत) हो जाती है तो संकट आ जाता है, फिर बहुतायत होने के बावजूद संघर्ष की अवधारणा की तो इसमें कोई गुन्जाईश ही नहीं रह जाती ।

इससे भी बढ़कर, डार्विन की यह अवधारणा मुख्य तौर पर अलग अलग जीवों की प्रजातियों और किसी जीव प्रजाति की जनसँख्या को कंट्रोल में रखने तक ही सीमित रहती है । पहली सूरत में यह अवधारणा मनुष्यों में आपस में लागू नहीं होती, दूसरी सूरत में , जिन यूरोपीय देशों की जनसँख्या वृद्धि दर शून्य हो चुकी है पूंजीवादी दैत्य वहां भी लोगों को संघर्ष करने के लिए मजबूर कर रहा है । जिन देशों में जनसँख्या बढ़ रही है, वहां डार्विन के योग्यतम के बचाव के सिद्धांत के मुताबिक पूंजीपतियों की संख्या बढ़नी चाहिए, लेकिन हो तो इसके विपरीत रहा है, गरीबों (अयोग्यों) की संख्या बढ़ रही है और पूंजीपतियों की या तो स्थिर है या कम हो रही है ।

चर्च और अन्य धार्मिक कट्टरपंथी, जिनमें सिर्फ इसाई ही नहीं, अन्य सभी धर्मों के पादरी-पुजारी भी शामिल हैं, के विरोध और डार्विन के सिद्धांतों को तोड़-फोड़ कर की गयी व्याख्याओं से भी पूँजीवाद का कुछ नहीं संवर सका । इस सबके बावजूद इस पूंजीवादी प्रबंध को डार्विन के सिद्धांतों और पूरे जीव विकास के सिद्धांत से ही खतरा बना हुआ है । एक बार फिर मध्य-युगीन काले दौर के सिरे से खारिज किये जा चुके गैर-वैज्ञानिक ईश्वरवादी सरंचना के सिद्धांत को नए लबादे में सजा कर लोगों पर थोपा जा रहा है और लोगों में भौतिकवादी वैज्ञानिक नज़रिये की पकड़ को कमजोर करने की कोशिशें हो रहीं हैं । इन सब कोशिशों के पीछे हर तरह के धार्मिक कट्टरपंथी और फासीवादी ताने-बाने से लेकर सरकारों, कोर्पोरेट जगत, और लोक कल्याण प्रपंच रचने वाली संस्थाएं शामिल हैं ।

इस नए प्रचारित किये जा रहे सिद्धांत का नाम है ‘सचेतन सृजन'(Intelligent Design) । इनके ज्यादातर तर्क तो डार्विन के समकालीन विरोधी विलियम पैले (William Paley)  से उधार लिए हुए हैं । इस दलील के अनुसार, जैसेकि किसी जटिल जेब घड़ी या किसी आधुनिक मशीन या कंप्यूटर जैसे यन्त्र बनाने के लिए किसी सचेतन शक्ति यानीकि मानव दिमाग की जरूरत होती है, उसी तरह जैसे किसी बहुत ही जटिल मानव अंग जैसेकि आँख, दिमाग, या अन्य जीव जंतुओं को पैदा करने के लिए या सृजन के लिए भी किसी सचेतन शक्ति की जरूरत है, जोकि इनके अनुसार ईश्वर ही हो सकता है  । यह बिलकुल वैसे ही जैसे कोई कहे कि दूध भी पानी की तरह तरल पदार्थ है इसलिए यह पानी की ही तरह धरती में से नल लगाकर निकाला गया होगा या फिर पानी दूध की तरह किसी गाय-भैंस को दुहने से मिलता होगा । खैर इनके तर्क की थोड़ी और छानबीन करते हैं । घड़ी या मशीन बनाने के लिए बहुत सारे मनुष्यों को इकट्ठे होकर या अलग अलग रहकर औजारों का इस्तेमाल करते हुए और भट्टियों में लोहा पिघलाते हुए श्रम करना पड़ता है, और दूसरी तरफ इनके ईश्वर के औजार और भट्टियाँ कहाँ हैं और वह दिखाई क्यों नहीं देते, तो ये भाग निकलेंगे ।

इसी तर्क को थोडा और आगे लेकर जाइये – घडी, मशीन या कंप्यूटर को बनाने वाला सचेतन मानव  दिमाग बहुत जटिल है, तो इतने जटिल मानव दिमाग को बनाने वाली शक्ति तो और भी जटिल होगी । फिर इस और भी जटिल शक्ति को बनाने के लिए और भी ज्यादा जटिल शक्ति – और इस यह जटिलता का पहाड़ा कभी न ख़त्म होने वाला थोथा तर्क बन जाता है ।

एक और तर्क के अनुसार जीवाणु (Bacteria) को गति प्रदान करने वाले हिस्से फ्लैजिला (Flagella), मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली या उसकी आँख जैसे अंग इतने ज्यादा विकसित हैं कि इनके किसी और कम विकसित रूप से विकसित होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता और अपने कम विकसित रूपों में इनकी कोई उपयोगिता संभव भी नहीं होगी; यह तर्क भी थोथा सिद्ध किया जा चुका है. जैसे कि आँख के विकास की विभिन्न अवस्थाओं के विकसित रूप जैविक संसार में पाए जाते हैं. कीट-पतंगे में आँखों का इस्तेमाल होता है और उससे कम विकसित प्राणियों में भी । इसी तरह गाय-भैंसों की आँखों की बनावट काफी हद तक मनुष्य की आँखों से मेल खाती है, लेकिन उनमें रंग पहचानने की योग्यता नहीं होती, और वे चीज़ों को काले और सफ़ेद रंग की अलग शेड्स में ही देख सकती हैं । लेकिन कोई पागल ही यह कहेगा कि उन्हें आखों का कोई लाभ नहीं या फिर उनकी आँखें बेकार हैं । प्रतिरक्षा प्रणाली भी हर तरह के प्राणी में मौजूद है और फ्लैजिला के विभिन्न स्तरों के विकसित रूप जीवाणु (Bacteria) में पाए जाते हैं । लेकिन जैसेकि प्रत्येक विचारवादी का काम होता है, एक तर्क के प्रमाणित हो जाने के बाद कोई दूसरा कुतर्क ढूँढने की बौद्धिक कसरत में लग जाना । और तो और, इनकी विज्ञान की किताब ‘बाइबल’ में धरती की उम्र 6000 साल बताई गयी है और सृष्टि के सृजन में ईश्वर को 6 दिन लगे. आज के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर धरती की उम्र 4.5 बिलियन वर्ष या इससे भी ज्यादा आंकी गयी है और जीवन की उत्पत्ति के आरंभिक प्रमाण भी 3.5 बिलियन साल पुराने हैं.

एक और काम, जो यह ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांतकार करते हैं, वह है- वैज्ञानिक सिद्धांतों में किन्हीं छोटी सी त्रुटियों को ढूंढना और फिर उसकी आधार पर पूरे सिद्धांत के ऊपर विवाद खड़ा करना. और इन त्रुटियों को विज्ञान द्वारा दूर कर लेने पर ऐसी ही कोई और तुच्छ कोशिश । यह है नया विज्ञान – जो अपने आप को प्रमाणित करने में असमर्थ है, लेकिन दूसरी सिद्धांतों की छोटी सी त्रुटियों को भी आधार बनाकर हो हल्ला मचाता है । एक और बहुत ही ‘शानदार’ विचार, जो ऐसे विज्ञानी लोग अक्सर प्रचार करते हैं, वो है- साईंस को ईश्वर भरोसे रहने वाली ‘आस्तिक साईंस’ बनाना जिससे कि ये समझते हैं कि विज्ञान को और वैज्ञानिकों को बहुत फायदा मिलेगा और विज्ञान को सही दिशा मिलेगी ।

इस पूरे ‘विज्ञान'(?) को लोगों में प्रचारित करने और लोगों के दिमागों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता का कूड़-कबाड़ा ठूसने के काम को पूरा करने के लिए अमेरिका और इंग्लैंड में शक्तिशाली राजनैतिक लाबी है, और इसमें कोई हैरानी की बात नहीं इस लाबी का मुख्य हिस्सा राजनैतिक हलकों की दक्षिणपंथी फासीवादी धारा है । जैसाकि होता ही है फासीवाद को वित्तीय सहायता की भी कोई कमी नहीं है ।

यह प्रतिक्रियावादी शक्तियां अमेरिकी सरकार पर लगातार यह दबाव बनाती रही हैं कि धार्मिक विश्वास पर आधारित स्कूलों का खर्च सरकार उठाये, इन स्कूलों में मुख्य तौर पर ईसाई मिशनरी स्कूल हैं । अमीर संस्थाओं ने इस प्रचार मुहीम के लिए लाखों-करोड़ों डॉलर खर्चे । अकेली वाल्टन फैमिली फाऊंडेशन नें 2006 में 28 मिलियन डॉलर इस तरह का दबाव बना रहे संगठनों पर खर्च किये । याद रखा जाना चाहिए कि यह फाऊंडेशन वाल-मार्ट के सहारे चलती है, जो कि ट्रेड-यूनियनों के सबसे खूंखार विरोधियों में से जानी जाती है ।

एक और अमेरिकी संस्था, टेम्पलटन फाऊंडेशन नें वर्ष २००६ में ६० मिलियन डॉलर, उन व्यक्तिओं के प्रोजेक्टों के लिए बांटे, जो ‘विज्ञान’ और अध्यात्मवादी विचारों का मेल मिलाप कराने की कोशिशों में जुटे हुए हैं । इन व्यक्तिओं में अमेरिका और इंग्लैंड के अलावा पूरी दुनिया के अध्यापक, विद्यार्थी, पत्रकार, शोध-कर्त्ता और युनिवर्सिटियों के प्रोफैसर, अकादमीशियन शामिल हैं. यू. एस. क्रॉनिकल ऑफ़ हायर एजुकेशन में छपे एक लेख के अनुसार उपरोक्त संस्था नें २५० मिलियन डॉलर से ज्यादा की धनराशी विज्ञान की इस तरह की ‘सेवा’ के लिए खर्ची । यह संस्था खुले-आम पूँजीवाद तथा मुनाफा आधारित उद्यम की हिमायत करती है ।

इस तरह की एक संस्था वार्डी फाऊंडेशन ब्रिटेन में काम करती है । यह संस्था मुख्य तौर पर वार्डी कार बिजनैस के मुनाफे पर चलती है । इसका मुख्य काम भी ईसाई मूल्यों और मान्यताओं का प्रचार करना और स्कूल खोलना है । इस संस्था के स्कूलों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता को विज्ञान के तौर पर पढ़ाया जाता है ।

भारत में भी ऐसी संस्थाएं मौजूद हैं. इनमें से एक है- कृष्णा कान्सैंस (चेतना). यह संस्था भी अपने अन्य कामों के साथ-साथ ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांत का प्रचार करने के लिए जगह जगह व्याख्यानों का आयोजन करती है और पर्चे बांटती है ।

पूंजीवादी प्रतिक्रियावादी शक्तियों के उपाय सिर्फ नए सिद्धांत घड़ने और उनका प्रचार करने तक ही सीमित नहीं हैं, वह पूंजीवादी सत्ता को अपने ‘विज्ञान’ (?) को लोगों पर थोपने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं । स्कूलों में ‘सचेतन सृजनात्मकता’ के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए अमेरिकी अदालत में केस किया गया । सारे पूंजीपति ऐसे सिद्धांतकारों और ऐसे सिद्धांतों के पक्ष में खड़े हैं । मिसिसिपी, उकलहामा और न्यू मैक्सिको की प्रतिनिधि सभाओं में वर्ष 2009 के दौरान डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत को एक ‘विवादग्रस्त सिद्धांत’ का दर्ज़ा देने या फिर दूसरे सिद्धांतों की शिक्षा देने के बिल दाखिल हो चुके हैं । लुसिआना स्टेट की प्रतिनधि सभा तो एक ऐसा ही बिल पास भी कर चुकी है और गवर्नर बॉबी जिंदल ने हस्ताक्षर भी कर दिये हैं ।

इस तरह की ही लड़ाई टेक्सास में चल रही है, जिसके अनुसार कक्षाओं में अध्यापकों को डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत की आलोचना करनी अनिवार्य हो जायेगी । यह सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं, इंग्लैंड में भी ऐसी ही कोशिशें जारी हैं, और यूरोप के कई और देशों में भी बाइबल की उत्पत्ति की धारणा को स्कूलों के सिलेबस में पढ़ाने के उपाए किये जा रहे हैं । भारत में भी वह दिन दूर नहीं, यहाँ भी ज्योतिष को तो पहले ही विज्ञान का दर्ज़ा मिल चुका है ।

और तो और कानास यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर पाल मिरेकी को डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता करने की वजह से जान से मारने की धमकियाँ दीं गयीं, उसको बुरी तरह पीटा गया जिस वजह से उन्हें अस्पताल दाखिल करवाना पड़ा । उन्हें  उस पद से हटा दिया गया और उनसे अपराधियों की तरह पूछताछ की गयी ।

आम तौर पर विज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्य या किसी संग्रहालय के निर्माण के लिए कोर्पोरेट जगत चंदा मुहैया करवाता है । लेकिन नवम्बर 2005 में जब ‘अमेरिकन मियुसियम ऑफ नैचुरल हिस्ट्री’ को नए सिरे से बनाने और जीव विकास के सिद्धांत को लोगों में प्रचारित करने की बात हुई तो किसी भी कोर्पोरेट घराने नें चंदा देने की ज़हमत नहीं उठायी और इस संग्रहालय द्वारा लगाई गयी प्रदर्शनी ‘डार्विन’ को मीडिया में कोई कवरेज नहीं दी गयी । लेकिन जब 25 मिलियन डॉलर की लागत से ‘ईश्वरवादी उत्पत्ति’ के संग्रहालय को बनाने की बात चली तो कोर्पोरेट जगत नें दिल खोलकर चंदे मुहैया करवाए । इस संग्रहालय में डायनासोरों को मनुष्यों के साथ रहते हुए दिखाया जा रहा है । इस तरह पढ़ाया जाता है कि भयानक बाढ़ आने से पहले मनुष्य और डायनासोर इकट्ठे धरती पर रहते थे । वैज्ञानिक इस बकवास को कब का रद्द कर चुके हैं । डायनासोर लगभग 63 मिलियन वर्ष पहले धरती से अलोप हो चुके हैं और मनुष्य जैसे पहले प्राणी की उत्पत्ति 4 से 10 मिलियन वर्ष से पुरानी नहीं । यह है वह विज्ञान जिसे पूँजीवाद पढ़ा रहा है और फाईनैंस कर रहा है । जबकि पूंजीवादी टहलुये यह डींग मारते नहीं थकते कि पूँजीवाद के बिना विज्ञान का विकास रुक जाएगा ।

नव-डार्विनवाद

एक और  छुपा हुआ हमला हुआ है डार्विन के सिद्धांत पर । यह छुपा हुआ इस अर्थ में है क्योंकि यह स्वयं को डार्विन के मानने और फैलाने के चोगे में छिपाकर रखता है, इसका नाम है नव-डार्विनवाद । इसीका ही विस्तारित रूप है, आधुनिक जीव विकास का सिद्धांत ।

नव-डार्विनवाद शब्द का प्रयोग सबसे पहले वीज़मैन (Weissman ) नाम के विज्ञानी के सिद्धांत के अनुयायियों के लिए किया गया । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में १८९५ में वीज़मैन ने यह सिद्ध किया कि वातावरण के प्रभाव अधीन किसी जीव में होनेवाले बदलाव आगमी पीढ़ी के जीवों में संचारित नहीं हो सकते । इसको वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज्म थियूरी’ कहा जाता है । इस सिद्धांत ने मुख्य तौर पर लैमार्क के जीव विकास के सिद्धांत पर चोट की और जीव विज्ञानियों ने लैमार्क के ‘वातावरण के प्रभाव के अधीन आनेवाले बदलाव का कारण जीव विकास होने के सिद्धांत ‘ को पूरी तरह रद्द कर दिया । अपने सिद्धांत को सही सिद्ध करने के लिए वीज़मैन ने कुछ प्रयोग किये जिनमें चूहों की पूँछें काटने वाला प्रयोग सबसे प्रसिद्ध है ।

वीजमैन के इस प्रयोग में, पीढ़ी दर पीढ़ी चूहों की पूँछें काटी गयी, पर हरवार चूहों की अगली पीढ़ी में पूंछ उग आती थी. इससे उसने यह नतीजा निकाला कि शरीर पर पडनेवाले प्रभाव वंशानुगत तौर पर अगली पीढ़ियों में संचारित नहीं होते. सबसे पहले तो इस प्रयोग में बहुत बड़ी खामियां है – जैसेकि जीव विकास प्राकृतिक स्थिति में होता है और उसे बहुत लंबा समय लगता है । दूसरा उस गुण की, जो प्रकृति में संचरण के लिए जीव के लिए लाभदायिक होता है, प्राकृतिक देन होता है । इस प्रयोग को करने से पहले चूहे के लिए पूंछ की उपयोगिता है या नहीं, के बारे में  कुछ भी निर्धारित नहीं किया गया । इसके अलावा नये अध्ययनों और खोजों से यह स्पष्ट हो गया है कि शारीरिक तौर पर पडनेवाले बाहरी प्रभाव, एक जीव से उसकी, जहाँ तक कि कई पीढ़ियों तक भी संचारित हो सकते हैं और इससे विज्ञान की एक पूरी शाखा ‘ऐपीजैनेटिक्स’ अस्तित्व में आ गयी है.

वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज़्म थियूरी’ और डार्विन की ‘प्राकृतिक चुनाव’ को आधार बनाकर ही आधुनिक जीव विकास अस्तित्व में आया । इस सिद्धांत के अनुसार जीवों में आये अलग-अलग बदलावों में कुछ बदलाव, जो जीव के लिए वातावरण में संचरण और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, प्रकृति द्वारा चुन्न लिए जाते हैं । भाव कि जिस जीव में ये लाभदायिक बदलाव आते हैं, उस जीव को वातावरण में जिंदा रहने का ज्यादा मौका मिलता है और इसलिए उस द्वारा प्रजनन करने के अवसर भी ज्यादा होते हैं और धीरे-धीरे बदलावों वाले जीवों की गिनती मुख्य हो जाती है और समय पाकर और बदलावों के जमा होते जाने के कारण एक नयी प्रजाति अस्तित्व में आ जाती है । यहाँ तक बिलकुल डार्विन के सिद्धांतानुसार है. पर आधुनिक जीव विकास संबंधी सिद्धांतानुसार बदलावों के आने का कारण वातावरण और हालात अनुसार स्वयं को ढलने की जीव की जरूरत नहीं, बल्कि बदलाव जीव के जीनस में संयोगवश होनेवाले  आकस्मिक परिवर्तन हैं । इस प्रकार नव-डार्विनवादी प्राकृतिक परिस्थितियों का जीव पर पड़नेवाले प्रभावों से बिलकुल मुकर जाते हैं ।  यहां से शुरू हुआ यह विचारवादी तर्क बढ़ता हुआ यहाँ तक चला जाता है कि मानव की बनावट और स्वभाव सबकुछ पहले ही निश्चित है और इसे मानव की सामाजिक परिस्थितियों को बदलने से बदला नहीं जा सकता और ऐसा करने के प्रयत्न गैर-वैज्ञानिक और प्रकृति के विरुद्ध हैं और डार्विन विरोधी हैं । नव डार्विनवादी परम्परा में से मुख्य हैं – रिचर्ड डाकिंज़ और स्टीवन पिंकर ।

बीसवीं शताब्दी के पिछले अर्द्ध की महत्त्वपूर्ण खोज पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों की बनावट और अन्य लक्षणों संबंधी सूचना संचारित करनेवाला रसायन डी.एन.ए. है. १९५३ में वाटसन और क्रिक ने डी.एन.ए. की बनावट का मॉडल विकसित कर लिया और इसके बाद जीनज़ की खोज हुई. जीन डी.एन.ए. एक विशेष प्रकार से डिज़ाईन किया गया और यह शरीर के किसी एक हिस्से या लक्ष्ण संबंधी सूचना जमा रखता है, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह सूचना संचारित करता है, जैसे आँखों का रंग, आदमी का कद, चमड़ी का रंग, जीव के बालों का रंग आदि. जीन कोशिका के केन्द्रक (नीयूक्लियस) में पड़े रहते हैं और कोशिका की क्रियायों को रेगूलेट करते हैं । इस खोज के पश्चात कुछ विज्ञानियों ने प्रत्येक मानवी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक या सामाजिक, का आधार जीन के रूप में डी.एन.ए. के टुकड़े को बना दिया । जीव विकास होता है तो जीनों में सांयोगिक बदलावों से होता है, कोई मनुष्य अपराध कर लेता है तो उसके जीन में नुक्स है, अगर कोई उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेता है तो उसके जीन बेहतर हैं, अगर कोई आलिशान घर में रहता है, तो उसके जीन ही इतने काबिल हैं, अगर कोई पूंजीपति अमीर बनता जा रहा है और मजदूर दिन प्रतिदिन गरीब तो अमीर पूंजीपति के जीन गरीब मजदूर के जीनों से बेहतर हैं, अगर किसी को क्रोध अधिक आता है तो उसमें क्रोध वाले जीन अधिक हैं इत्यादि ।

रिचर्ड डाकिंज़ ने मानव की संस्कृति और स्वभाव की व्याख्या करने हेतू एक नया सिद्धांत पेश किया, कि हर व्यक्ति में स्वभाव के अलग-अलग लक्षणों के लिए, जैसे क्रोध, लालच, परोपकार, खीझना, हंसमुख होना आदि के लिए जीनज़ की तरह ही ‘मीमज़’ (Memes) होते हैं । चाहे अभी तक इन ‘मीमज़’ का पता-ठिकाना नहीं चला है । उसके अनुसार ‘मीमज़’ ही मानव का स्वभाव और सभ्यता तय करती हैं और इन्हें बाह्य वातावरण और मानव की परिस्थितियों के बदलने से बदला नहीं जा सकता । लेकिन अगर थोडा बारीकी में जाएँ, तो देखेंगे कि हर समाज और मानव समूह की सभ्यता प्रत्येक पीढ़ी के साथ बदलती रहती है, बल्कि एक मनुष्य के स्वभाव और सभ्यता में उसके जीवन काल में परिवर्तन आते रहते हैं । अगर डाकिंज़ के अनुसार चलें तो हर अपराधी की सन्तान अपराधी होगी, शराबी की शराबी, गुस्सैल की सन्तान गुस्सैल, शर्मीले  की संतान शर्मीली और हंसमुख की सन्तान हंसमुख. और इससे भी बढ़कर मानव सारी उम्र एक जैसा ही बना रहेगा । पर हम देखते हैं ऐसा बिलकुल नहीं होता, प्रतिदिन डाकिन्ज़ साहेब का सिद्धांत मानव जीवन द्वारा गलत साबित किया जाता है । असल में इस प्रकार के सिद्धांत सिर्फ इसलिए निर्मित किये जाते हैं ताकि लोगों को मुर्ख बनाया जा सके । दूसरे महारथी स्टीवन पिंकर का ‘विकासवादी मनोविज्ञान’ का वर्णन भी कुछ इसी प्रकार का ही है । बस पिंकर साहेब ‘मीमज़’ के स्थान पर मॉडियूल (Module) शब्द का प्रयोग करते हैं । इनके अनुसार भी मानव स्वभाव को, इसलिए मानव समाज को बदला नहीं जा सकता । इस सिद्धांत को मनोविज्ञानियों द्वारा पूर्णतया रद्द किया जा चूका है । ज्यादातर मनोविज्ञानी यह मानते हैं कि मानव स्वभाव चाहे कुछ हद तक वंशानुगत होता है पर ज्यादातर यह सामाजिक हालात और मानव के छोटी उम्र में पालन-पोषण, माता-पिता का प्यार, सेहत और शिक्षा पर निर्भर करता है ।

इस सोच के कारण, बहुत समय तक यह समझा जाता रहा कि मानव के विकास दौरान सबसे पहले दिमाग का आकार बड़ा हुआ, उसने अपने हाथ का प्रयोग और सीधा खड़ा होना सीखा, इसी कारण से ही वह भाषा का प्रयोग करने लगा और अपने दिमाग द्वारा सोचने से ही वह समूह बनाकर, फिर मानव समाज के रूप में रहने लगा । पर, असल में, जैसाकि एंगेल्ज़ ने अपने आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ में पेश किया था, सबसे पहले मानव के पूर्वज वृक्षों से उतरकर धरती पर चलने लगे जिस दौरान वे सीधा खड़े रहकर चलना सीखे । इस प्रकार अगले पंजे चलने से मुक्त होकर अन्य कार्यों के लिए प्रयुक्त होने लगे, जिस कारण मानव औजारों का प्रयोग करने लगा, जो बाद में भाषा और सामाजिक उत्पादन का कारण बना । इसके साथ ही हाथों का प्रयोग होने के कारण दिमाग का आकार बड़ा होने लगा, जो हाथों के विकास होने से कहीं बाद में जाकर हुआ । इन सच्चाईयों को आधुनिक जीवाश्म विज्ञान ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है ।

इसके बारे में ज्यादा विस्तार से जॉन पिकार्ड के आलेख “एंगेल्ज़ और मानव विकास’ में पढ़ा जा सकता । जीनज़ में आनेवाली तब्दीलियों के जीव विकास में भूमिका के बारे में ब्रिटिश विज्ञानी जे. बी. एस. हालडेल ने भी अपने आलेखों में विस्तार सहित लिखा है ।

हाल्डेल ने १९२९ में जीवन के पहले रूपों की  उत्पत्ति के रहस्यों से आवरण उठाया । हालडेल के समय में ही, एक सोवियत विज्ञानी, अलेग्जान्द्र उपरेन भी उन्हीं नतीजों पर पहुंचा, इसलिए इस थियूरी को उभयनिष्ठ तौर पर उपरेन-हाल्डेल मॉडल कहा जाता है । इन दोनों विज्ञानियों ने अपने खोज कार्यों में द्वंदात्मक भौतिकवाद को लागू करते हुए इस सिद्धांत की खोज की । १९५३ में मिलर और युरे ने प्रयोगशाला में इस थियूरी को सही सिद्ध कर दिया । अब इस सिद्धांत को थोडा सुधार कर के.आर. एन.ए. मॉडल का रूप दे दिया गया है ।

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

द्वंदात्मक भौतिकवादी नजरिये के जन्मदाता, मार्क्स और एंगेल्ज़, ने डार्विन की खोजों का पुरजोर समर्थन किया । इसके अलावा इसके अधूरेपन और भविष्य में इसके और विस्तारित होने की पेशनगोई भी की । डार्विन की खोजों ने मार्क्स-एंगेल्ज़ के भौतिकवादी नजरिये को प्रकृति में और स्पष्टता से सिद्ध किया । जनवरी १८६१ में मार्क्स ने एंगेल्ज़ को लिखा, “डार्विन की पुस्तक (जीवों की उत्पति – अनु.) बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इसने मुझे वर्ग संघर्ष के लिए प्राकृतिक आधार प्रदान किया है । पर इसमें हमें विकास के अपरिपक्व तरीके को भी सहन करना पड़ता है । अपनी सभी सीमाओं के बावजूद, न सिर्फ उदेश्यवाद (Taleology) (हर वस्तु के पीछे कोई न कोई उदेश्य होता है. अनु.) की प्राकृतिक विज्ञान में विद्यमान धारणा पर निर्णायक चोट है, बल्कि अपने तार्किक मतलब की भी अच्छी तरह व्याख्या करती है ।”

‘डियूरिंग विरुद्ध’ पुस्तक में एंगेल्ज़ ने लिखा, ” जीव विकास का सिद्धांत अभी अपने प्रारंभिक चरणों में है और इसमें कोई शक नहीं कि भविष्य की खोजें हमारी अब तक की जीव विकास संबंधी धारणाओं, डार्विन की खोजों समेत, को बदल देंगी ।”

इसी प्रकार एंगेल्ज़ ने ‘डाईलेक्ट्स ऑफ नेचर’ में भी डार्विन के ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ के सिद्धांत का मूल्यांकन कुछ इस प्रकार किया, ” डार्विन से पहले तक, उसके अबतक के पक्के अनुयायी भी प्रकृति में सामंजस्यपूर्ण सहयोग पर जोर देते हैं, कि कैसे पौधे, जीव, जंतुओं को खाद्य-खुराक और आक्सीज़न प्रदान करते हैं और जीव जंतु पौधों को बदले में खाद, अमोनिया और कार्बोनिक एसिड (कार्बन डाईआक्साईड – अनु.) प्रदान करते हैं । जैसे ही डार्विन का सिद्धांत सामने आया, इन्हें हर जगह संघर्ष ही दिखाई देने लगा । दोनों ही नजरिये अपनी-अपनी सीमाओं के अन्दर ठीक हैं, पर दोनों ही एक समान तरह से एकतरफा और तुअस्बग्रस्त हैं । जैसे प्रकृति में निर्जीव वस्तुओं के संबंध अनुरूपता के टकराव दोनों तरह के होते हैं, वैसे ही सजीव वस्तुओं में भी सचेतन और अचेतन सहयोग के साथ-साथ सचेतन और अचेतन संघर्ष भी होता है । इसलिए, प्रकृति के संबंध में, सिर्फ संघर्ष को ही सबकुछ मान लेना ठीक नहीं । बल्कि ऐतिहासिक जीव विकास और जटिलता की पूरी दौलत को एक छोटे से और एकतरफा वाक्यांश ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ में बाँधने की इच्छा करनी बचकाना ही होगी । इसका कुछ भी मतलब नहीं है ।

‘डार्विन का जीवित रहने के लिए संघर्ष’ का सिद्धांत समाज में प्रचलित अवधारणाओं जैसे सबकी सबके खिलाफ जंग, की हौबिस की थियूरी , मुकाबले की बुर्जुआ अर्थशास्त्र की अवधारणा और माल्थस की जनसंख्या संबंधी अवधारणा का प्रकृति विज्ञान में लागू करने का प्रयत्न हैं । जब ऐसा करके सफलता हासिल कर ली गयी है (बेशक इस मूलभूत आधार, माल्थस की थियूरी पर आज तक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है), यह आसान हो जाता है कि प्रकृति विज्ञान की अवधारणाओं को समाज के इतिहास पर लागू कर दिया जाये और इसे बिलकुल सीधे-सादे तरीके से कहा जाता है कि इस तरह ये प्रस्तुतियां समाज के चिरस्थायी नियमों के तौर पर सिद्ध की जा चुकी हैं । ” (मार्क्स-एंगेल्ज़,  सम्पूर्ण रचनाएँ, जिल्द  25, पेज, 583-584, अंग्रेजी एडिशन 1987, प्रगति प्रकाशन.)

“जीवित रहने के लिए संघर्ष – सबसे बड़ी बात यह है कि इसे पौधों और जनसँख्या की अधिक बढौतरी तक ही सीमित रखा जाये, जोकि पौधों और निम्न जंतुओं के विकास के कुछ चरणों में वास्तव में होता है । परन्तु इन्हें उन परिस्थितियों में, जिसकी जीव-जंतुओं और पौधों को नए वातावरण पर भू-परिस्थितियों वाले नए भूभागों में परवास से बिलकुल अलग रखा जाना चाहिए जिनमें जीवों की प्रजातियाँ बदलती हैं, पुरानी मर जाती हैं और नई विकसित उनका स्थान ग्रहण कर लेती हैं, जनसँख्या में अधिक बढौतरी हुए बिना ही । नए वातावरण में जो जीव स्वयं को ढाल लेते हैं, जीवित रह जाते हैं और लगातार बदलावों से स्वयं को एक नई प्रजाति में विकसित कर लेते हैं पर ज्यादा स्थिर जीव मर जाते हैं और विलुप्त हो जाते हैं, साथ ही मंझोले जीव-रूप भी विलुप्त हो जाते हैं । यह सब कुछ किसी भी माल्थसवाद के बिना संभव है और होता है भी है, और अगर यह लागू भी होता है तो यह उस प्रक्रिया को, ज्यादा से ज्यादा थोडा तेज कर देता है ।”वही पेज, 582-83)

“चलें तर्क करने के लिए ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ नाम के वाक्यांश को मान भी लें । एक जानवर ज्यादा से ज्यादा इकठ्ठा कर सकता है, पर इन्सान तो उत्पादन करता है । वह जीवित रहने के साधन तैयार करता है, ज्यादा विस्तारित शब्दों में, जोकि प्रकृति ने उसके बिना न बनाये होते । यह जानवरों पर लागू होनेवाले नियमों को मानव समाज पर अपरिपक्व तरीके से लागू करना मुश्किल बना देता है । उत्पादन के कारण जल्दी ही ‘जीवित रहने का संघर्ष’ शुरू हो जाता है, पर यह संघर्ष जीवित रहने के साधनों के लिए नहीं, बल्कि मनोरंजन और विकसित होने के साधनों के लिए होता है । यहाँ – क्योंकि विकसित होने के साधन भी सामाजिक तौर पर पैदा होते हैं – जानवरों पर लागू होनेवाले नियम पूरी तरह से  आधारहीन हो जाते हैं । अंत में, पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में, उत्पादन का स्तर इतना ऊँचा हो जाता है कि समाज जीवित रहने, मनोरंजन और विकसित होने के साधनों का अब और पूरी तरह उपयोग नहीं कर सकता क्योंकि उत्पादन करने वालों के बड़े हिस्से को इन साधनों के उपयोग करने से गैर-कुदरती तरीके से और जबरन हटा दिया जाता है । और इसीलिए संतुलन कायम रखने के लिए एक संकट (आर्थिक संकट – अनु.) प्रत्येक दस वर्षों बाद न सिर्फ जीवित रहने के, मनोरंजन और विकसित होने के साधन, बल्कि उत्पादन शक्तियों के एक बड़े हिस्से का भी विनाश कर देता है । इस प्रकार, यह ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ कुछ इस तरह का रूप धारण कर लेता है – बुर्जुआ समाज द्वारा पैदा की गई वस्तुएं और उत्पादक शक्तियों की पूंजीवादी प्रणाली के विनाशकारी, विध्वंशकारी प्रभावों से रक्षा करने के लिए, सामाजिक उत्पादन और वितरण का अधिकार, इस कार्य के लिए अयोग्य हो चुकी पूंजीपति जमात के हाथों से छीन लें और इसको उत्पादन करनेवाले जन-समूहों को सौंप दें -और यह है समाजवादी क्रांति ।

“वर्ग संघर्षों के क्रमिक सिलसिले के तौर पर इतिहास का बोध, इनको ‘जीवित रहने के संघर्ष’ के बहुत कम विभेदन वाले चरणों तक सीमित कर देने से विषय-वस्तु और गंभीरता के पक्ष के लिहाज से कहीं अधिक अमीर है ।” (वही, पेज -584 -85 )

“डार्विन को पता नहीं था कि उसने मानवता, विशेषतया अपने देववासियों पर कितना कड़वा व्यंग्य लिख दिया है, जब उसने यह दिखा दिया कि ‘मुक्त प्रतिस्पर्द्धा’ , जीवित रहने के लिए संघर्ष जिसको अर्थशास्त्री सबसे ऊँची ऐतिहासिक उपलब्धि समझते हैं, जानवरों की दुनिया में एक आम स्थिति है । जैसे उत्पादन की क्रिया ने मानव को अन्य जानवरों से जीव-वैज्ञानिक तौर पर विभेदन प्रदान किया, उसी प्रकार सामाजिक पक्ष से भी ; सिर्फ चैतन्य तौर पर सामाजिक उत्पादन के ढांचे, जिसमें उत्पादन और वितरण योजनाबद्ध तरीके से होगा, मानवता को अन्य जानवरों से श्रेष्ठता प्रदान करेगी । इतिहास विकास इस प्रकार को दिन-प्रतिदिन आवश्यक ही नहीं बना रहा, बल्कि अधिकाधिक संभव भी बना रहा है ।” (वही, पेज -331 )

जैसे एंगेल्ज ने ‘ डियूरिंग विरुद्ध’ में यह कहा था कि जीव विकास के सिद्धांत अभी और विकसित होंगे, उसी प्रकार डार्विन को भी अपने सिद्धांत में विद्यमान खामियों का अहसास था ।

जीवाश्म विज्ञान के अनुसार, कैंबरियन युग (६००-७०० मिलियन वर्ष) से पहले की चट्टानों में जीवों के बहुत कम अंश मिलते हैं और वह भी ‘परोकेरीआईक’ नाम के आरंभिक जीव-रूप ही मिलते हैं । पर इससे बिलकुल बाद की चट्टानों में एकदम ही अलग तरह के बहुभांति जीव-रूप मिलते हैं । इनमें वर्तमान में मौजूद जीवों के लगभग बहुत जीव-रूप मिल जाते हैं. इसको ‘कैंबरियन धमाका’ कहा जाता है । यह ध्यान रखना चाहिए कि यह ‘कैंबरियन धमाका’ कोई रातों-रात हो गयी घटना नहीं थी, बल्कि कई मिलियन वर्षों में होनेवाली घटना थी, पर भू-वैज्ञानिक तौर पर देखा जाये तो पृथ्वी की उम्र के मुकाबले यह घटना एक धमाके की तरह ही तेजी से होनेवाली घटना थी । इसके पश्चात् अनेक प्रजातियाँ अस्तित्व में आ गयीं । डार्विन के समय भी इस तथ्य का ज्ञान था । बाद में यह भी सिद्ध हो गया कि समय-समय पर पृथ्वी पर कुछ इस प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं, चाहे ये परिस्थितियाँ कई मिलियन वर्ष लंबी होती हैं, पर फिर भी भू-वैज्ञानिक तौर पर बहुत छोटी होती हैं, जिस दौरान पृथ्वी पर उस वक्त मौजूद बहुत सारी प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं और उनके स्थान पर नई प्रजातियाँ पैदा हो जाती हैं जो समय के साथ धीरे-धीरे विकास करती हैं, विकास के इस चरण में, जब नई प्रजातियों के अस्तित्व में आ जाने के बाद के समय में ‘प्राकृतिक चुनाव’ अहम भूमिका निभाता है । इस तरह जीवों की प्रजातियों के तेजी से विलुप्त होने की अब तक छः घटनाएँ हो चुकी हैं ।

सबसे बड़ी विलुप्त होनेवाली स्थिति २५० मिलियन वर्ष पहले पेकिअन्योक-मीजोयोक युगों के बीच पैदा हुई जब जल और थल दोनों जगहों के ५० फीसदी जंतुओं और रेंगने वाले ८० फीसदी जंतुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो गयीं । इस प्रकार की अंतिम घटना ६३ मिलियन वर्षों पहले हुई जिसके परिणामस्वरूप अन्य अनेक प्रजातियों समेत डाइनासोर भी विलुप्त हो गये । पर ये घटनाये जीव विकास के राह में रूकावट नहीं बनती हैं, बल्कि जीव विकास को नए और उच्च धरातल पर ले जाती हैं । क्योंकि इन घटनाओं से नई प्रजातियाँ अस्तित्व में आती हैं जो पहले वाली प्रजातियों के मुकाबले अधिक विकसित होती हैं ।

‘कैंबरियन धमाके’ की डार्विन अपनी खोजों के आधार पर व्याख्या करने में असफल थे, पर उस समय डार्विन ने यह कहा कि किसी कारण जीवाश्म संबंधी मानव जानकारी अभी अधूरी है और भविष्य में यह जानकारी मुकम्मल हो जाएगी । पर समय के साथ यह पता चला कि जीवाश्म संबंधी जानकारी बिलकुल सही थी और जीवाश्म में अधूरापन इतना भी अधिक नहीं है कि ‘कैंबरियन धमाके’ को सिर्फ जानकारी का अधूरापन कह कर काम चला लिया जाये । इसी प्रकार कई बार प्रजातियों के बीच के रूप भाव ‘लिंक प्रजाति’ भी नहीं मिलती, उन स्थितियों में डार्विन के सिद्धांतों के अनुसार नई प्रजाति की उत्पति की व्याख्या करनी मुश्किल हो जाती है ।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, अमरीका के भू-विज्ञानी स्टीफन जे गोल्ड और नीलज़ ऐलड्रिज़  ने १९७१ में जीव विकास का नया सिद्धांत पेश किया, जो न सिर्फ डार्विन के सिद्धांत के महत्त्व को बनाये रखता है, बल्कि इस और अधिक अमीर बनाते हुए जीव विकास के सिद्धांत को इस काबिल बना देता है, जिससे ‘कैंबरियन धमाका’ और तेजी से प्रजातियों के विलुप्त होने से पैदा होनेवाली घटनाओं की सटीक व्याख्या होती है । इस सिद्धांत का नाम है – ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ .

गोल्ड और ऐलड्रिज़ ने  अपने निबंधों में यह काफी हद तक सिद्ध कर दिया कि जीव विकास की प्रक्रिया हर समय एक ही रफ़्तार से सीधी रेखा में नहीं चलती बल्कि इस प्रक्रिया में धीमें और लटकते हुए अंतरालों में कुछ पड़ाव ऐसे आते हैं जब जीव विकास की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है । इस तीव्र दौर में धीमें विकास के दौरान जमा हुए मात्रात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तनों में बदल जाते हैं । गोल्ड के अनुसार जीव विकास सदैव प्रगतिशील ही नहीं होता, बल्कि कई बार विपर्ययवादी भी होता है, क्योंकि कई जीव जीवित रहने के लिए दूसरे जीवों के परजीवी बन जाते हैं, जैसे की वृक्षों पर लटकती हुई अमरबेल, अलग-अलग परजीवी कीड़े आदि ।

डार्विन इस प्रकार की संभावना से अनजान नहीं थे । ‘जीव की उत्पति’ के पांचवें एडिशन में डार्विन लिखते हैं, “समय के जिन खण्डों में प्रजातियों में परिवर्तन आते हैं, वे प्रजातियों के लगभग स्थिर रहनेवाले समय खण्डों के मुकाबले छोटे होते हैं ।” चार्ल्स डार्विन, जीवों की उत्पति, १८६९ लन्दन, जॉन मरे, पांचवां एडिशन, पेज -५५१)

इस सिद्धांत के प्रस्तुत करने के समय से ही गोल्ड और ऐलड्रिज़ का बाकी बहुत सारे विज्ञानियों द्वारा निरंतर विरोध होता रहा है क्योंकि छलांगों द्वारा जीव विकास का सिद्धांत पूंजीवाद के बंधक चाकर गुलामों को हजम नहीं होते और वे धीमें और लटकते हुए बदलावों के सिद्धांत को ही एकमात्र सही सिद्धांत सिद्ध करने पर तुले रहते हैं । इस विरोधी शिविर में एक बार रिचर्ड डाकिनज़ और जॉन मेरिनार्ड स्मिथ प्रमुख रहे हैं । अपने मृत्यु के वर्ष, २००२ तक, गोल्ड ने अपने सिद्धांत की डटकर हिमायत की और अन्य तरह के शंकों का निवारण किया. चार्ल्स डार्विन के बाद, स्टीफन जे गोल्ड को जीव विकास के क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा नाम माना जाता है ।

गोल्ड के सिद्धांतों की रोशनी में आज, छलांगों द्वारा जीव विकास के सिद्धांत को अधिकाधिक मान्यता मिल रही है और जीव विकास विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे तरीकों की खोज हो रही है जो इस सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं ।

गोल्ड अपनी पुस्तक ‘पांडाज थंब’ में लिखते हैं, ” सोवियत यूनियन में विज्ञानियों को एक अलग तरह की दार्शनिक शिक्षा मिलती है – एंगेल्स द्वारा, हीगेल से लेकर, और विकसित किये गये द्वंदात्मक नियमों की शिक्षा. द्वंदात्मक नियम स्पष्ट तौर पर धीमे-तेज विकास के हामी हैं. वे मात्रा के गुणों में परिवर्तन की बात करते हैं । यह अजीब लग सकता है, पर ये बताते हैं कि किसी प्रणाली में धीरे-धीरे इकठ्ठे होनेवाले परिवर्तन या तो दबाव के परिणामस्वरूप वह प्रणाली ऐसी स्थिति में पहुँच जाती है, जब एकदम छलांग द्वारा परिवर्तन होता है. पानी को गर्म करो, यह उबल जायेगा, मजदूरों को अधिकाधिक दबायो, क्रांति हो जाएगी । ऐलड्रिज़ और मुझे यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि बहुत पहले रूसी जीवाश्म विज्ञानी भी हमारी ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ मॉडल जैसे जीव विकासी सिद्धांतों की धारणाएं रखते हैं । ”

अपनी पुस्तक ‘डार्विन के बाद अब तक’ में, गोल्ड, एंगेल्स के आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ का वर्णन करते हुए लिखते हैं, ” असल में, उन्नीसवीं शताब्दी में एक बहुत ही शानदार आलेख प्रकाशित हुआ, जिसके लिखनेवाले के बारे में जानकर, बहुत से पाठक हैरान हो जायेंगे – फ्रेडरिक एंगेल्स । (बेशक यह जानकर, कि एंगेल्स भी प्राकृतिक विज्ञान में गहरी दिलचस्पी रखते थे और वे अपने दर्शन ‘द्वंदात्मक भौतिकवाद’  को एक मजबूत आधार पर निर्मित करते हैं । वे अपनी पुस्तक ‘प्रकृति में द्वंदवाद’ को पूरा न कर सके ) उनकी मृत्यु के बाद, १८९६ में एंगेल्स द्वारा लिखित ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ प्रकाशित हुई  पर पश्चिमी विज्ञान पर इसका कोई असर न हुआ ।” क्योंकि उनके  अनुसार पश्चिमी सोच में पक्षपात बहुत गहराई तक पैठ कर चुका था ।

असल में देखा जाये तो डार्विन के सिद्धांतों पर होनेवाले सैद्धांतिक हमले असल में द्वंदात्मक भौतिकवादी दर्शन को नकारने के नाकाम परन्तु योजनाबद्ध प्रयत्न हैं । आज की परिस्थितियों में परजीवी हो चुके पूंजीवाद को सबसे अधिक खतरा मार्क्सवादी भौतिकवादी दर्शन से है क्योंकि यह वह दर्शन है जो समाज को गति में दिखाता है और वर्णन करता है कि प्रत्येक वस्तु गति में है । जैसे जीव विकास एक निरंतर गतिमान क्रिया है, वैसे ही, मानव समाज भी निरंतर गतिमान है । मानव समाज में भी प्राचीन मिट जाता है और नया उसका स्थान ग्रहण कर लेता है । इसी तरह आरंभिक कबीलाई समाजों के स्थान को गुलामदारी प्रबंध ने ग्रहण किया और फिर सामंतवाद और पूंजीवादी प्रबंध । प्रत्येक प्रबंध अपनी उम्र भोगकर इतिहास के रंगमंच से रुखसत हो गया और उसके स्थान को नये प्रबंध ने संभाल लिया । पूंजीवाद के चाकर इस सच्चाई को नकारने के लिए, हर उस सोच, वैज्ञानिक खोज या मानवीय कोशिश को सबसे पहले दबाने की कोशिश करते हैं, अगर ऐसा नहीं होता है, तो उसकी इस तरह से व्याख्या करने की कोशिश करते हैं कि उसके अन्दर का भौतिकवादी तत्त्व ख़त्म हो जाये और वह पूंजीवादी प्रबंध को सदैव से न्यायोचित ऐलान करने लगे ।

उन्नीसवीं शताब्दी में, जब पूंजीवाद के उभार का दौर था, उस वक्त पूंजीवादी चाकरों की कोशिश होती थी कि किसी वैज्ञानिक खोज से होनेवाले फायदा अधिकाधिक उठाया जाये और इस खोज से आम लोगों तक पहुँचने वाली भौतिकवादी चेतना को किसी न किसी तरह से दूर किया जाये । इससे भी अधिक, अगर हो सके तो उन खोजों को पूंजीवादी-चिरस्थायी तौर पर लोगों की नजरों में परिपक्व सिद्धांत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाये । इस प्रकार फासीवाद को जायज ठहराने के लिए पूंजीवादी चाकरों ने विज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया । नस्ल सुधारने को एक विज्ञान का दर्जा दिया गया । इस तथाकथित विज्ञान के आधार पर उन्नीसवीं शताब्दी के पूरार्द्ध में अमरीका में २०,००० लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गयी और नाज़ी जर्मनी में ३.७५,००० लोगों को नपुंसक बना दिया गया । इस काम को सिरे चढाने के लिए बाकायदा कानून बनाये गये । अमरीका के लगभग सभी राज्यों में कानून बनाकर नस्ल सुधारने के विभाग तक बनाये गये ।

विज्ञान के नामपर इस प्रकार के मानवता विरोधी कारनामे बाद में भी जारी रहे । बेशक उपरोक्त किस्म के नस्ल सुधार को विज्ञान द्वारा रद्द किया जा चुका है, पर यह अलग-अलग रूपों में सामने आने लगा जैसेकि साईको सर्जरी । इसके अनुसार सामाजिक समस्याओं का इलाज भी दिमाग का आपरेशन करके किया जा सकता है । इस तरह के ही दो तथाकथित विज्ञानी, वर्तमान मार्क और फ्रैंक इरविन ने यह सुझाव भी पेश कर दिया कि शहरों में होनेवाले दंगे भी दिमागी परेशानी के कारण होते हैं और इसका इलाज झुग्गियों में रहनेवाले लोगों के नेताओं के आपरेशन द्वारा हो सकता है और ऐसा किया भी गया । ऐलन वूड्स और टेड ग्रांट के अनुसार – १९७१ में, अमरीका में ऐसे ही लोगों का इलाज करने के लिए उचित ‘बीमारों’ की सूची मांगी गयी । आपरेशन द्वारा इलाज के लिए भेजे गये आदमियों में अप्रैल, १९७१ के कामगारों की हड़ताल के नेताओं में से एक शामिल था । ये हैं पूंजीवादी चाकरों के कारनामे और वैज्ञानिक खोज !

जीव विज्ञान से बाहर दूसरे विज्ञानों में भी यही स्थिति है । क्वांटम भौतिकी के दार्शनिक नतीजे ‘कोपनहेगन व्याख्या’ इसकी ज्वलंत मिसाल है । जैसे-जैसे पूंजीवाद और अधिक परजीवी होता जा रहा है, उतना ही अधिक यह विज्ञान-विरोधी भी होता जा रहा है । पहले तो यह विज्ञान से निकलने वाले भौतिकवादी परिणामों को बिगाड़ता था, पर अब तो यह विज्ञान के विकास में ही रूकावट बनता जा रहा है ।

पूंजीवाद ने पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाले जीवाश्मों को पण्य (commodity) बना दिया है । जीवाश्मों की पूरी दुनिया में फैली एक मंडी है । पूरी मानवता की धरोहर, ये जीवाश्म कुछ लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति बनते जा रहे हैं । ऐसा एक उदाहरण एक ४७ मिलियन वर्ष पुराने एक कैमूर के जीवाश्म का है । यह अभी-अभी ‘ढूँढा’ गया । यह जीवाश्म दूध पिलाने वाले ऊपरी श्रेणी के और आरंभिक दूध पिलाने वाले प्राणियों के बीच एक महत्त्वपूर्ण लिंक है । पर यह जीवाश्म १९८३ से लेकर २५ वर्षों तक एक जीवाश्म इकठ्ठे करने के शौक़ीन व्यक्ति की व्यक्तिगत सम्पत्ति बना रहा । इस प्रकार और भी जीवाश्मों को, जो व्यक्तिगत सम्पत्ति हैं, किराए पर खोज-कार्यों के लिए दिया जाता है ।

मेडिकल क्षेत्र के बारे में तो जितना कहा जाये उतना ही कम है । दवा कम्पनियां, उस खोज-कार्य जिसमें से मुनाफे की संभावना कम हो या मुनाफे पर चोट करता हो, पर धेला भी नहीं खर्च करतीं । ऐसे कार्यों के लिए अक्सर लोगों को जेब से खर्च उठाना होता है या फिर सरकारों के सामने नाक रगड़नी पड़ती है । बहुत से ऐसे खोज-कार्य बीच में ही बंद हो जाते हैं या फिर बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं ।

स्टेम सैल रीसर्च का भी इसीलिए विरोध हो रहा है । बेशक यह विरोध नैतिक और धर्म के चोगे के नीचे हो रहा है । इसका विरोध करनेवाले भी वही हैं, जो समलैंगिक और गर्भपात संबंधी कानूनों का विरोध करते हैं । और इन फासीवादी समूहों को आशीर्वाद किसका है, यह भी सबको पता है ।

इसी प्रकार १९९० में शुरू हुई, बैटरी से चलनेवाली बिजली की कार की परियोजना भी तेल कंपनियों, ऑटो कंपनियों और अमरीका सरकार की मिलीभगत से ठप होकर रह गयी है और यह कार कभी भी सड़क पर नहीं उतर सकी । इस बैटरी से चलनेवाले व्हीकल ने जहाँ प्रदुषण को कम करना था, वही तेल की खपत भी कम करनी थी, पर यह सब तेल कम्पनियों को किस तरह बर्दाश्त होता, इसलिए मिलमिलाकर पूरी परियोजना को कोल्ड स्टोर में रख दिया गया ।

इस प्रकार साफ़ है कि लोगों में भौतिकवादी चैतन्य के प्रसार को रोकने के लिए और इसे कुंठित करने के प्रयासों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में, जीव विकास के सिद्धांत पर, जोकि उतने ही प्रमाणों से सिद्ध हो चुके हैं जितने प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है पृथ्वी प्लेट जैसी नहीं, बल्कि गेंद जैसी, सूर्य पृथ्वी के नहीं, पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और सूर्य और चन्द्र ग्रहण किसी राहू-केतू के कारण नहीं बल्कि सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा के एक रेखा में आ जाने से लगते हैं, विवाद पैदा कर वैज्ञानिक प्राप्तियों और सिद्धांतों के उन क्रांतिकारी अंशों को कमजोर करने की कोशिशे हो रही हैं जो किसी भी वस्तु के चिरस्थाई होने की अवधारणा के परखचे उड़ा देते हैं । इसके साथ ही विज्ञान और दर्शन को मानवता की भलाई के लिए उपयोग के स्थान पर पूंजीवाद की पूरी अधिसंरचना इन्हें मुनाफे की चौहदी में कैद करने और श्रमिक लोगों की अधिकाधिक रत निचोड़ने के साधन मात्र बनाने के लिए दिनरात पंजों के बल खड़ी रहती है । इसलिए वर्तमान समय में, न्याय और समानता पर आधारित शोषण रहित समाज के सृजन का स्वप्न देखनेवाले लोगों के लिए यह जरूरी है कि भौतिकवादी वैज्ञानिक चैतन्य के हक़ में खड़े होने और डार्विन के सिद्धांतों समेत विज्ञान के हर क्षेत्र में हो रहे विचारवादी हमलों का और वैज्ञानिक तथ्यों को विकृत करके पूंजीवाद की सेवा करनेवालों का मुंह-तोड़ जवाब देने के लिए तैयारी करें ।

पंजाबी पत्रिका, नवें समाजवादी इन्कलाब दा बुलारा ‘प्रतिबद्ध’ के जनवरी, २०१० अंक से आभार सहित |

download pdf  : डार्विन के जन्मदिन पर विशेष

हैती, भूकंप,तथाकथित ज्योतिष शास्त्र, पूंजीवाद और समाजवाद का परस्पर गहरा संबंध है, भाई !

Posted on Updated on

पूंजीवादी रूस के शहर नेफ्तेगोर्स्क में 27 मई 1995 के रेक्टर पैमाने 7.6 के भूकम्प ने इसकी कुल आबादी 3500 में से 2000 लोगों की जान ली. इस त्रासदी पर माइक देविड़ो ने अपनी ‘ मास्को डायरी  : रूसी आपदाएं, प्राकृतिक और अप्राकृतिक’ में समाजवादी सोवियत यूनियन के शहर ताशकंद के अप्रैल  26, 1966 के रेक्टर पैमाने 7.5 के भूकंप पर समाजवादी राज्य और उसकी जनता के बारे में लिखा है कि किस प्रकार राज्य और जनता का सैलाब इस शहर के लोगों की मदद के लिए उमड़ पड़ा. अविभाजित सोवियत यूनियन में पूंजीवाद की पुन:स्थापना हो चुकी थी लेकिन समाजवादी भावना का , पूर्ण रूप से, अंत नहीं हुआ था. अपनी यादों को ताज़ा करते हुए वे लिखते हैं,

“भूकम्प जिसने सखालिन द्वीप के शहर नेफ्तेगोर्स्क को गर्क कर दिया है, इससे भी बड़ी त्रासदी का प्रतीक है – उल्ट रूसी इन्कलाब, जिसने रूस और भूतपूर्व सोवियत यूनियन को समतल कर दिया है. प्राकृतिक आपदाएं सामाजिक व्यवस्थाओं की सीमाओं में फर्क करना नहीं जानती. लेकिन सोवियत यूनियन 26 अप्रैल 1966 के भूकम्प जिसने ताशकंद को तबाह कर दिया, पर किस प्रकार कार्यशील होता है और किस प्रकार पूंजीवादी रूस नेफ्तेगोर्स्क के भूकम्प और संभावित दुर्घटनाओं से निपटता है, में अंतर इतना साफ़ है कि वह अपनी कहानी स्वयं बयान करता  है.

मैं 1969 में ताशकंद में था. मैंने उज्बेकिस्तान की राजधानी ( 10 लाख की जनसंख्या का शहर) के जिंदा बचे लोगों से, उनके दहशत के न केवल किस्से ही सुने हैं बल्कि मैंने देखा है – ताशकंद को, सभी 15 गणराज्यों द्वारा, पुनर्निर्मित रूप में और पहले से भी अधिक सुन्दर रूप में ! वह भी केवल तीन वर्षों में ! 35 प्रतिशत शहर तबाह हो गया था. 95,000 लोग बेघर हुए, 45 प्रतिशत संयंत्रों को भारी नुकसान पहुंचा. 180 स्कूल, 600 दुकाने ढह-ढेरी हो गईं. भूकम्प के कुछ घंटों बाद ही CPSU   के महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव और प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन ताशकंद आ गए. USSR की सेना द्वारा तुरंत हरकत करने की उसकी प्रकृति ने  ‘महान राष्ट्रीय युद्ध” के दौरान सभी लोगों के हरकत में आने की यादों को ताज़ा कर दिया. प्रत्येक गणराज्य से लोग ताशकंद के लिए उमड़ पड़े. मास्को, लेनिनग्राद, रूस गणराज्य के सभी भागों से, उक्रेन से, अजेबेर्जान से, जोर्जिया, कजाखिस्तान, बेलारूस और बाल्टिक गणराज्यों से निर्माणकर्मी, ताशकंद के लिए रवाना हो गये. इन गणराज्यों ने वहाँ राहत सामग्री, औजार, और अपनी मशीने उतारना शुरू कर दिया. अपनी छुट्टियों का त्याग करते हुए सैनिक और विद्यार्थी उनसे जा जुड़े. ताशकंद के लोगों ने उनका अपने मुक्तिदाताओं के रूप में स्वागत किया. निर्माणकर्मी मेक-शिफ्ट बैरकों में दो से तीन वर्षों तक रहे.

सितंबर तक स्कूल पुन: खुल गये और 20,000 अपार्टमेंटों का निर्माण कर लिया गया – जो पिछले वर्षभर में निर्मित हुए कुल अपार्टमेंटों की संख्या का दोगुना था. लेकिन प्रतीकात्मक रूप से, जो चीज मैंने पाई, वह थी, “ताशकंद के पुन:निर्माण के समय समग्र सोवियत भावना” – प्रत्येक गणराज्य की विशेष भवन निर्माण शैली और कला, इस नए बसे शहर का अंग बन गयी.

और नेफ्तेगोर्स्क ? खो गया है वह महान परिवार जो अपने ही जैसे परिवार के दुःख भरे हालात से विचलित हो गया था ! खो गयी है वह बहन-भाईचारे की भावना जो एक को दूसरे से बाँधे हुए थी ! वर्तमान “स्वतंत्र” गणराज्यों से सांत्वना और टोकन सहायता आई है, पर यह आई है अजनबियों से ! पूंजीवादी रूस ने नेफ्तेगोर्स्क के सभी भूकंपलिख स्टेशनों का “मितव्ययीकरण” कर दिया है.  विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वे चालू हालत में होते, तो तबाही की समय पर चेतावनी मिल सकती थी.

राष्ट्रपति येल्स्तिन इस शहर में अभी तक नहीं आये हैं. भूकंप के कुछ दिनों बाद, प्रधानमंत्री  चेर्नोगिर्दिन ने अपनी छुट्टियाँ समाप्त कीं, लेकिन मास्को जाने के लिए. इतना ही काफी नहीं है कि प्राकृतिक आपदाओं  से निपटने के लिए दृष्टिकोण में इतना बड़ा अंतर है, बल्कि सच्चाई यह है कि अब आपदाएं पूंजीवादी रूस और ‘स्वतंत्र’ गणराज्यों के लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन गयी हैं. भाई-भाई के बीच खून-खराबा, चैचैनया का नागरिक युद्ध, 20 लाख रूसी शरणार्थी जो युद्ध से भाग आये हैं, और उनके साथ केन्द्रीय एशिया और बाल्टिक के “स्वतंत्र” गणराज्यों द्वारा भेदभाव, नागोमों काराबाख में आर्मीनिया युद्ध के शरणार्थी; माल्डोवा – प्रेदानेस्त्रोवा, ओसेतिया इंगुश गणराज्य, अब्कासिया; जोर्जिया – भूतपूर्व सोवियत यूनियन का  कोई भी ऐसा अंग नहीं है , जो सामाजिक तबाही और मानव-त्रासदी से अछूता हो. और इसके साथ ही हमें शामिल करना चाहिए मास्को के नरसंहार को. 1988 के आर्मीनिया के भूकंप से तबाह शहर अब तक  भी पुन: निर्मित नहीं हो सके हैं . ये समाजवाद के अवरोहण से, अपराधी पूंजीवाद के पोषण के लिए, वसूली करने की क्रूरता के साक्षी हैं. आर्मीनिया के येल्स्तिनों ने भाई को भाई से लड़कर मरने के लिए करोड़ों खर्च कर दिए हैं और भूकंप से प्रभावित 2 लाख से अधिक लोग अस्थायी घुरनों में रहने को विवश हैं. ग्रोस्नी और नेफ्तेगोर्स्क, स्तालिनग्राद और ताशकंद में यही फर्क है.

यह फर्क पूंजीवादी रूस और भूतपूर्व सोवियत यूनियन के लोगों का साये की तरह पीछा करता है. पायनियर कैम्प या तो बंद कर दिए गए हैं या फिर उनका व्यवसायीकरण हो गया है. काले सागर के अनापा में छुट्टियाँ बिताने का प्रति माता या पिता और एक बच्चे का 21 दिनों का खर्च 4,500,000 से 5,000,000 रूबल तक है. सोवियत ज़माने में यह खर्च 200 रूबल था जिसका 70 प्रतिशत ट्रेड युनियाने देती थीं. नेफ्तेगोर्स्क के भूकंप ने कड़वाहट में ही बढौतरी की है. तबाही का लगातार भरता हुआ यह वह जाम है जिसे रूस और भूतपूर्व गणराज्यों के लोग पी रहे हैं.”

लेखक के उपरोक्त संस्मरण को प्रकाशित करके हम साबित करना चाहते हैं कि समाजवाद और पूंजीवाद , भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाएं और तथाकथित ज्योतिष अंकविज्ञान आपस में जुड़े हुए हैं, क्योंकि समाजवाद प्राकृतिक आपदाओं से निपटते हुए मानव की जरूरतों और  गौरव की रक्षा करता है. जबकि तथाकथिक ज्योतिष अंकविज्ञान का मकसद पूंजीवाद की तरह ही, मानव द्वारा मानव की मजबूरी और अज्ञानता से लाभ कमाना होता है. पाठकों को भूलना नहीं चाहिए कि जब तक समाजवाद, हमारी पृथ्वी के एक बड़े हिस्से पर, विद्यमान था, तो इसके डर के चलते, पूंजीवाद वह सभी  सहूलियतें  देता रहा जो समाजवाद का अभिन्न अंग होती हैं. और अब उसे इन सहूलियतों जैसे आवास, शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के “मितव्ययीकरण” और निजीकरण को उदारवादी नीतियों के रूप में प्रचारित करके और लागू करके, मुनाफे की हवस की पूर्ति होने पर, मज़ा आता है. उदारीकरण से इनका अर्थ पूंजीपतियों के लिए “उदार” और मेहनतकश जनता के प्रति “क्रूर” होना होता है.

दूर जाने की जरूरत नहीं है. हमारे देश में कुछ वर्ष पूर्व आई  सुनामी और गुजरात के भूकम्प-पीड़ितों  के लिए आई अंतरराष्ट्रीय मदद को पीड़ित लोगों तक पहुँचाने के लिए सक्रिय नौकरशाही द्वारा आपस में बंदरबांट के, हम चश्मदीद गवाह हैं. ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि, पूंजीवादी समाज द्वारा निर्मित मानव और उसके दूसरों के कपड़े तक उतार लेने के संस्कार, उससे उसके इन्सान होने के मायने ही छीन लेते हैं.

एक लंबे समय तक हमारी पृथ्वी के एक बड़े हिस्से पर समाजवाद रहा है. ऐसा नहीं है कि समाजवाद ने भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना न किया हो. पाठकों को इनका अध्ययन करना चाहिए. लेकिन मुख्य मुद्दा पूंजीवादी समाज और समाजवादी समाज के उदेश्य में फर्क का है. एक के केंद्र में व्यक्तिगत मुनाफे की हवस है तो दूसरे के केंद्र में पूरा मानव समाज और उसकी भलाई. मानव के साथ व्यवहार करते समय पूंजीवाद को फ़िक्र होता है कि किस प्रकार उसका शोषण किया जाये. इस उद्देश्य की पूर्ति हेतू वह मनुष्यों को अलग-अलग  स्थानों पर, चालाकी या धूर्तता से, ‘ठिकाने लगाने’  – जहाँ उनका अधिक से अधिक शोषण हो, की फ़िराक में लगा रहता. जबकि समाजवाद में , जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं, मनुष्य नहीं बल्कि वस्तुओं का प्रबन्धन स्थान ले लेता है. इस समाज को इंसानों को ‘ठिकाने लगाने’ का कतई फ़िक्र नहीं होता – इसे फ़िक्र होता है कि किस प्रकार मानव की जरूरतों को केंद्र में रखकर उत्पादन किया जाये और वस्तुओं को जरूरतमंदों तक पहुँचाया जाये. किसी भी रूप में मुनाफा, समाजवादी समाज का उद्देश्य नहीं होता.

वैज्ञानिक विकास और तकनीक के तेज विकास की इस इक्कीसवीं शताब्दी में “हैती के भूकंप” से पैदा हुई प्राकृतिक त्रासदी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

मानव आदिम युग से आधुनिक युग तक, जीवन के संघर्ष में, प्रकृति के साथ अपने द्वंदात्मक रिश्तों की बदौलत, संघर्ष करता हुआ, विकास की मौजूदा मंजिल तक पहुंचा है. विज्ञान और तकनीक के मौजूदा स्तर ने ऐसा भौतिक आधार तैयार कर दिया है, जिसके द्वारा भूख, कंगाली और आवास की समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है. भूचाल और सुनामी जैसे कहर से घटित होनेवाली तबाही पर, बेशक पूरी तरह से नहीं, पर काफी हद तक निपटा जा सकता है. प्राकृतिक विपदाओं की पूर्व-सूचना हासिल करनेवाले अन्वेषण कार्यों को तरजीह देनी चाहिए. भवन-निर्माण और आवासीय घरों के निर्माण की ऐसी तकनीक विकसित करने पर जोर देना चाहिए, जिनसे प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए, कम से कम नुकसान हो.

कौनसी समस्या है जो इस तरह के कार्यों को अंजाम देने में रूकावट बनती है ? दूसरे विश्व-युद्ध के समय ब्रिटिश सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार रहे, प्रसिद्ध विज्ञानी जॉन डेस्मोंड बरनाल ने लिखा है, ” प्रचुरता और अवकाश के एक युग की समूची  संभावनाएं हमारे पास हैं, लेकिन हमारा यथार्थ एक विभाजित विश्व का है, जिसमें इतनी भूखमरी, मूर्खता और क्रूरता है जितनी आज तक कभी नहीं रही.” – विज्ञान की सामाजिक भूमिका, पेज 7. हैती के भूकंप  में लाखों लोगों की मौत, भारी गिनती में बेघर और जख्मी लोगों के दुखों और मुसीबतों ने, सभ्य समाज को हिला कर रख दिया है.

एक ब्लॉगर सज्जन का प्रश्न है कि हैती, भूकंप, ज्योतिषशास्त्र , समाजवाद और पूंजीवाद का आपस में क्या संबंध है ? शायद हमारे यह विद्वान सज्जन, जानबूझ कर, अपनी किसी मजबूरी के चलते, इतने महत्त्वपूर्ण प्रश्न को, मज़ाकिय ढंग से उछाल रहे हैं. आज साधारण लोग भी समझते हैं कि मानव-विश्व के निरंतर विकास के चलते, प्राकृतिक-विश्व से दो-चार होने की मानव-सामर्थ्य में निरंतर बढौतरी हुई है. आदिम युग में मौजूद प्रकृति की ओर से प्रस्तुत लाखों चुनौतियों पर वर्चस्व हासिल कर, समाज के विकास को गति प्रदान की. बड़ी-बड़ी नदियों पर बाँध बनाकर, भयंकर तबाहियों पर काबू पाया जा चुका है. तकनीक के विकास से, पैदावार के क्षेत्र में, असीम बढौतरी हुई है. हर युग में, पैदावार का स्तर और उसके वितरण का तरीका ही, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संरचना को तय करता है. मानव-समाज, आदिम कबीलाई सामाजिक संरचना से लेकर, गुलामदारी, सामंती और पूंजीवादी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं से भी आगे समाजवाद के प्रारंभिक प्रयोग भी कर चुका है.

प्राकृतिक-विश्व और मानव-विश्व के संबंध सदैव एकसार नहीं रहे हैं. इन संबंधों के विकास ने मानव को, प्रकृति की विध्वंसकारी शक्तियों पर वर्चस्व हासिल करने के योग्य बनाया है. प्रकृति का हिस्सा होते हुए भी, प्रकृति और मानव के संघर्ष में, मानव ने प्रकृति को अपने हित में बदलते हुए, लगातार स्वयं को भी बदला है.

पूर्व पूंजीवादी समाजों में, मानव और प्रकृति के संघर्ष में, प्रकृति से हुई छेड़छाड़, समूचे प्राकृतिक-विश्व को, कोई उल्लेखनीय हानि नहीं पहुंचाती थी. मानव द्वारा प्रकृति के खजानों के उपयोग दौरान होनेवाले नुकसान, प्रकृति द्वारा स्वयं पुन: भरपाई के सामर्थ्य के दायरे का, उल्लंघन नहीं करते थे.

हमारा इस तर्क से कोई मतभेद नहीं है कि भूकम्प और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएं, पृथ्वी की उत्पति के समय से ही, यानी लाखों-करोड़ों वर्षों से ही, घटित होती आ रही हैं. प्राकृतिक परिघटनाओं के अपने नियम हैं, जिनकी बदौलत पृथ्वी के अंदर और बाहर के वातावरण में घटित होनेवाली हलचल, कई बार भयानक तबाही का सबब बनती है. इस बात से भी सभी सहमत हैं कि जंगलों की तबाही, मशीनरी के अंधाधुंध उपयोग, जंग-युद्धों में उपयोग होनेवाले बारूद और रासायनिक हथियार और परमाणु तजुर्बों से पैदा होनेवाले प्रदुषण से प्रकृति का संतुलन लडखडा रहा है. प्रकृति अपने जख्मों की बहाली के लिए, सचेत मानव प्रयास की मोहताज हो गयी है.

मतभेद इस सच की पेशकारी को लेकर है. बड़ी चालाकी से, तमाम मानव जाति को, इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर, मुजरिम अपने गुनाहों पर पर्दा डाल देता है. कौन है वह मुजरिम, जो इक्कीसवीं शताब्दी के रोशन दिमाग इन्सान को भी, चकमा देने में कामयाब हो जाता है ? इस सवाल के जवाब से पहले, हमारे लिए, अपने वर्तमान और भूतकाल  के संबंधों के बारे में, थोड़ी सी चर्चा जरूरी है.

आज मानव के पास ज्ञान का एक बड़ा खजाना मौजूद है. इसके अलावा, समस्त मानव जाति को खुशहाल और बढ़िया जिंदगी मुहैया करवा सकने के सभी साधन मौजूद हैं. विज्ञान और तकनीक के विकास ने, वह भौतिक आधार तैयार कर दिया है, जिसपर, ऐसा समाज निर्मित होना संभव है, जहाँ भूखमरी और बिमारियों समेत, हर किस्म के अभाव पर वर्चस्व हासिल किया जा सकता है.

अपने आरंभिक दौर में, मानव प्रकृति की शक्तियों के अधीन था.  आदिम समाज मजबूरी का साम्यवाद था. उत्पादक शक्तियों के विकास के एक विशेष पड़ाव पर, मानव समाज वर्गों में – मालिक और गुलामों में विभाजित हो गया. यह सब कैसे हुआ? समाज विकास के किन नियमों ने, उन ऐतिहासिक परिवर्तनों को दिशा और गति दी, यह एक अलग विषय है. मानव-संस्कृतियों के इतिहास में, अलग-अलग भौतिक भूभागों में, वहां के वातावरण और ऐतिहासिक परस्थितियों की विभिन्नताओं के चलते, अपनी-अपनी विशेषताएँ मौजूद थीं, जिनके कारण वे अपनी अलग पहचान रखते हैं. परंतु ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि अपनी सभी विभिन्नताओं के बावजूद, प्रत्येक भूभाग के इतिहास में, कुछ चीजें साझी हैं. मिसाल के लिए, सभी की सभी सभ्यताएं, अपने-अपने विशेष लक्षणों के बावजूद, आदिम समाजवादी समाज, गुलामों-मालिकों के समाज और सामंतवादी सामाजिक-राजनीतिक आर्थिक प्रबंधों के दौर में से गुजरी हैं.

आज का युग, पूंजीवाद का युग है. इंग्लैण्ड के औद्योगिक इन्कलाब और फ़्रांसिसी इन्कलाब से शुरू हुई, आर्थिक और राजनीतिक तब्दीलियों ने, लगभग समस्त दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. पूंजीवाद के आगमन ने, मध्यकालीन जड़ता को तोड़कर, मानव-सभ्यता को बेहद तेजी से, पहले के मुकाबले विकास के बेहद ऊँचे स्तर पर, पहुंचा दिया. मजदूर वर्ग और मेहनतकश लोगों के आधार पर टिका पूंजीवाद, अपने विकास के साथ-साथ, आम लोगों के लिए भारी मुसीबतें साथ ही लेकर आया. अपने चरित्र के चलते ही, पूंजीवादी विकास समस्त संसार में एकसमान नहीं हुआ. असमान विकास इसके तौर-तरीकों में ही निहित है. पूंजीवादी विकास की आन्तरिक विरोधता के कारण, यह निरंतर मंदी के चक्रों की सजा भुगतता आ रहा है. पूंजीवाद का इतिहास, बस्तीवाद, नवबस्तीवाद के दौरों से गुजरता हुआ, आज नव-आर्थिक साम्राज्यवादी दौर से गुजर रहा है. बीसवीं सदी के आरंभ में ही, पूंजीवाद के साम्राज्यवादी पूंजीवाद की मंजिल में पहुँचने के साथ, इसके चरित्र में अधिकतर परजीविपन आ गया है. साम्राज्यवादी पूंजी ने, जहाँ दुनिया भर के कमजोर राष्ट्रों को, अपने कच्चे माल की मंडियां बनाकर लूटा, वहीं अपने-अपने देश के मजदूरों की लूट की दर को भी लगातार बढ़ाना जारी रखा. परिणामस्वरूप यूरोप के देशों और अमेरिका के मजदूर वर्ग ने, पूंजीवाद की बर्बर लूट के विरुद्ध, शानदार संघर्ष किये. दूसरी तरफ, साम्राज्यवादी पूंजी की लूट के शिकार, तीसरी दुनिया के देशों में, लड़े जानेवाले महान राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों ने, दुनिया में बस्तीवाद का निपटारा कर दिया. पूंजीवाद के इतिहास पर नज़र दौड़ाने पर, जो विशेष लक्षण उभरता है, वह है – विकास की विषमता. विश्व स्तर पर पूंजीवाद विरुद्ध, मजदूर वर्ग की विकसित राजनीतिक चेतना, विचारधारा के रूप में, प्रकट हुई. रूस, चीन, क्यूबा, पूर्वी यूरोप और एशिया के कई देशों में समाजवादी इन्कलाब करके, मजदूर वर्ग ने साम्यवादी समाज के निर्माण के पहले तजुर्बे किये.

बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक विश्व रंगमंच पर, पूंजीवादी राजनीतिक आर्थिक संरचनाओं में भी, भारी फर्क नज़र आते हैं. एक तरफ साम्राज्यवादी पूंजीवाद, अपनी क्रूरता और लूट के सर्वोच्च स्वरूप फासीवाद समेत, अपने देश के मजदूरों और मेहनतकशों और तीसरी दुनिया के देशों की कच्चे माल की सीधी लूट के रूप में मौजूद था. दूसरी ओर तीसरी दुनिया के गुलाम देश, राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के द्वारा, बस्तीवादी गुलामी और अपनी पुरानी सामंती व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे. तीसरी दुनिया के  देशों का आर्थिक-सामाजिक स्तर भी एकसमान नहीं था. अफ्रीका, लातिनी अमरीका, मध्य पूर्व और एशिया के और कई देश, अपने-अपने राजनीतिक-आर्थिक धरातल के अनुसार, अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे. इन नवस्वतन्त्र देशों में क्यूबा, उत्तरी कोरिया, इंडो चीन और चीन जैसे देशों ने, समाजवादी क्रांतियों का रास्ता चुना. तब तक, 1917 का रूसी इन्कलाब, दुनियाभर के मजदूरों के लिए, विचारधारा के क्षेत्र में, उच्च प्रेरणा स्रोत बन चुका था. दुनिया के बड़े हिस्से में, मजदूर और मेहनतकश लोग, हर किस्म की लूट-खसूट ख़त्म करके, कम्युनिस्ट समाज के निर्माण की ओर अग्रसर होने के पहले प्रयोग कर रहे थे. परिणाम स्वरूप, इतिहास ने पहली वार, मजदूर वर्ग की बेमिसाल शक्ति के दर्शन किए.

पूंजीवाद और समाजवाद के संघर्ष के इन पहले प्रयोगों में, मजदूर वर्ग वक्ती तौर पर हार गया है. इन देशों में पूंजीपति वर्ग ने विश्व पूंजीवाद की मदद से, समाजवादी देशों में, पूंजीवाद की पुन:स्थापना कर ली है.

नए आजाद हुए अधिकतर देशों में भी, पूंजीवादी आर्थिक रिश्ते स्थापित हो चुके हैं. आज मोटे तौर पर हमारे देशों में, पूर्व पूंजीवादी आर्थिक-रूपों का निपटारा हो चुका है. राजनीतिक ढांचे के रूप में जहाँ कहीं, पिछड़े सामंती रूप नज़र आ रहे हैं, वहाँ भी आर्थिक-सामाजिक क्षेत्र में, पूंजीवादी रिश्ते अपनी पकड़ बना चुके हैं.

सारांश के तौर पर, अपनी सभी क्षेत्रीय विशेषताओं और विभिन्नताओं के बावजूद, सारा विश्व पूंजीवाद के तर्क अनुसार गतिमान है.

इस व्याख्या की रौशनी में, हम अपने पहले प्रश्न की ओर आते हैं. मानव-विश्व के इतिहास का प्राकृतिक-विश्व पर गहरा असर पड़ता है. आज जलवायु प्रदुषण, ओजोन परत में सुराख़, कार्बन उत्सर्जन, गलेशियारों का पिघलना, वनों की बर्बादी, भूकम्प और सुनामी आदि की चर्चा के समय, विज्ञानी और विद्वान सज्जन, समस्त मानव जाति की गलतियों की ओर  ऊँगली उठाते हैं. इसी मुकाम पर सामाजिक व्यवस्थाओं और प्राकृतिक परिघटनाओं में घटित होनेवाली हलचलों का परस्पर संबंध, महत्त्व ग्रहण करता है. मानव-इतिहास में, पूंजीवादी प्रबंध ही एक ऐसा प्रबंध है, जहाँ पूंजीपति वर्ग की मुनाफे की हवस बेलगाम हो जाती.  इसी मुनाफे की हवस ने, जंगल तबाह कर दिए हैं, पृथ्वी के धरातल तले पानी बेहद घटा दिया है. जंग-युद्धों के लिए और आधुनिक तकनीक के विकास के लिए, विज्ञान का दुरूपयोग किया है. जाने या अनजाने, सारी मानव जाति को, इस तबाही के लिए जिम्मेदार ठहराना, असल मुजरिम को छुपाने या पनाह देने के तुल्य है. यह तरीका पीड़ित मानव-जाति के विरुद्ध, पूंजीपति वर्गों की सेवा करता है.

आज हर क्षेत्र में जो आर्थिक सरगर्मी नजर आ रही है, उसका मुख्य प्रेरणा स्रोत ‘मुनाफा’ है. माल मंडी के लिए उत्पादित होता है, मानव-आवश्यकता के लिए नहीं. परिणाम स्वरूप महंगाई, अन्न का संकट और बेरोजगारी जैसी समस्यायों का हल नज़र नहीं आ रहा.

बेहिसाब उत्पादक क्षमता वाले, भारत जैसे देश की आधी से ज्यादा आबादी, रात को भूखा सोती है.

अति आधुनिक सुविधायों से सुसज्जित हस्पतालों का जाल बिछ जाने के बावजूद, ये सहूलियतें 90 फीसदी जनता की पहुँच से बाहर हैं.

मानव गौरव, पैसे की कमीनी दौड़ तले, कुचला जा रहा है. सभी आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सरगर्मियों का केंद्र मानव न होकर ‘मुनाफा’ हो गया है. यह स्थिति मुठ्ठीभर धन-पशुओं का तुष्टिकरण तो कर सकती है लेकिन करोड़ों मेहनतकश लोगों की जीवन-स्थितियों को बेहतर नहीं बना सकती. मजदूर और मेहनतकश लोगों की मुक्ति और अच्छा भविष्य, इस पूंजीवादी प्रबंध के खात्मे और समाजवादी प्रबंध के निर्माण के संघर्ष से जुड़ा हुआ है. केवल निजी संपत्ति के खात्मेवाले समाजवादी प्रबंध के निर्माण द्वारा ही, सभी लोगों को, अपनी योग्यताओं के सर्वांगीण विकास के लिए, अवसर उपलब्ध हो सकते हैं, जिसके केंद्र में, मुनाफे की हवस में पागल हुए, धन-पशु नहीं, बल्कि आम लोग होंगे. बीसवीं शताब्दी के समाजवादी क्रांतियों के प्रथम चक्र के प्रयोगों ने साबित कर दिया है कि किसी भी अन्य प्रबंध की भांति, पूंजीवादी प्रबंध भी  स्थायी नहीं है. इन इन्कलाबों ने, मजदूर वर्ग की असीम शक्ति और सामर्थ्य को भी इतिहास के रंगमंच पर प्रकट कर दिया है. वक्ती तौर पर, समाजवाद की हार और पूंजीवाद की पुन:स्थापना से, पूंजीवादी शिविर में जो जश्न का माहौल बना हुआ था, उसका भी आर्थिक महामंदी ने निपटारा कर दिया है.

इक्कीसवीं शताब्दी, विश्वभर में, नये समाजवादी इन्कलाबों के अगले चक्र की सदी होगी. जहाँ प्रत्येक मनुष्य के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ, समस्त मानव जाति, प्राकृतिक आपदाओं का मुकाबला करने के लिए, समर्थ होगी.

विशेष आभार : http://www.hartford-hwp.com/archives/63/055.html

अक्टूबर क्रान्ति की मशाल बुझी नहीं है! बुझ नहीं सकती!

Posted on Updated on

अक्टूबर क्रांति की ९२वीँ वर्षगांठ पर

अब से ठीक 79 वर्ष पहले, 1917 में (पुराने कैलेण्डर के अनुसार अक्टूबर में और नये कैलेण्डर के अनुसार नवम्बर में) मेहनतकश अवाम ने, क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग की अगुवाई में, रूस में पहली बार पूँजीपतियों और सभी सम्पत्तिवान लुटेरों की राज्यसत्ता को बलपूर्वक उखाड़ फेंका था और पहली बार महान लेनिन और उनकी बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सर्वहारा राज्यसत्ता की – सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की स्थापना की थी।

मानव समाज के वर्गों में बँटने के बाद के हज़ारों वर्षों के इतिहास में यह पहली ऐसी क्रान्ति थी जिसमें राज्यसत्ता एक शोषक वर्ग से दूसरे, नये शोषक वर्ग के हाथ में नहीं बल्कि मेहनतकश शोषित-उत्पीड़ित जनता के हाथों में गयी थी। इतिहास की पहली सचेतन संगठित क्रान्ति जिसने पहली बार उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व का नाश कर दिया और समता के साथ तरक्की की रफ्त़ार का नया रिकार्ड कायम किया |

दबे-कुचले लोगों ने पूरे मानव इतिहास में बग़ावतें तो अनगिनत बार की थीं लेकिन पेरिस कम्यून (1871 में पेरिस के मज़दूरों द्वारा सम्पन्न क्रान्ति और पहली सर्वहारा सत्ता की स्थापना, जिसे 72 दिनों बाद फ्रांसीसी पूँजीपतियों ने पूरे यूरोप के प्रतिक्रियावादियों की मदद से कुचल दिया) की शुरुआती कोशिश के बाद, अक्टूबर क्रान्ति मेहनतकश वर्गों की पहली योजनाबद्ध, सचेतन तौर पर संगठित क्रान्ति थी जिसके पीछे एक दर्शन था, एक विचारधारा थी, एक कार्यक्रम था, एक युद्धनीति थी और एक ऐसे रास्ते की रूपरेखा भी थी जिससे होकर आगे बढ़ते हुए एक नये समाज की रचना करनी थी।

निजी सम्पत्ति और वर्ग-शोषण के अस्तित्व में आने के लगभग चार हज़ार वर्षों बाद पहली बार मेहनतकशों की सोवियत सत्ता ने अब तक असम्भव और महज़ किताबी माने जाने वाली बात को सम्भव बनाकर वास्तविकता की ज़मीन पर उतार दिया। लेनिन और फिर स्तालिन के नेतृत्व वाली सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में स्थापित सर्वहारा सत्ता – सर्वहारा अधिनायकत्व ने अब तक सम्पत्ति का अपहरण करने वालों की ही सम्पत्ति का अपहरण कर लिया और फिर ज्ञात इतिहास में पहली बार उत्पादन के साधनों – यानी कल-कारख़ानों, खेतों, संचार-यातायात के साधनों आदि पर निजी स्वामित्व का ख़ात्मा कर दिया गया। इस सोच को ग़लत ही नहीं बल्कि उल्टा साबित कर दिया गया कि खेतों और कारख़ानों पर निजी मालिकाने के बिना समाज का कामकाज चल ही नहीं सकता। कामकाज चला ही नहीं बल्कि दौड़ा, और अद्भुत, चमत्कारी रफ़्तार से दौड़ा! उत्पादन और भौतिक प्रगति के सभी पुराने रिकॉर्ड टूट गये और मानदण्ड छोटे पड़ गये!

आज दुनियाभर का पूँजीवादी प्रेस समाजवाद पर चाहे जितना कीचड़ उछाल ले, तमाम झूठ-फरेब के बावजूद इस सच्चाई को उसे आज से पचास वर्षों पहले ही स्वीकारने के लिए मजबूर होना पड़ा था कि 1917 के बाद सोवियत संघ में वैज्ञानिक-मशीनी तरक्की और आम मेहनतकशों की चेतना, हुनर, शिक्षा, संस्कृति वग़ैरह की तरक्की की रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि जो चीज़ें हासिल करने में पश्चिमी यूरोप के देशों को करीब दो सौ वर्षों का समय लगा वह उसने सिर्फ 20-25 वर्षों में हासिल कर लिया। फ्रांसीसी क्रान्ति और इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति के बाद पश्चिमी दुनिया में जो भी तरक्की पूँजीवादी रास्ते से हासिल हुई थी, उसके साथ ही धनी-ग़रीब के बीच की खाई भी तेज़ रफ़्तार से बढ़ती चली गयी थी और पूँजीपतियों के जनवाद की यह असलियत सामने आती चली गयी थी कि वह धनिकों के बीच की स्वतन्त्रता , समानता, भ्रातृत्व है जबकि ग़रीबों-मेहनतकशों के ऊपर तानाशाही है। यह स्वाभाविक था, क्योंकि पश्चिम में सारी तरक्की जनता की खुशहाली और न्याय के लिए नहीं बल्कि नयी-नयी मशीनों द्वारा मेहनतकशों को निचोड़कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए पूँजीपतियों में लगी होड़ का नतीजा थी। दूसरी ओर सोवियत संघ में निजी मालिकाने के बलपूर्वक ख़ात्मे के बाद मुनाफाख़ोरी और लूट के मूल एवं मुख्य आधार को ख़त्म करके मेहनतकश जनता की राज्यसत्ता ने आम लोगों को पहली बार अपनी तरक्की के लिए उत्पादन का अवसर दिया तथा साथ ही सांस्कृतिक-शैक्षिक तरक्की और ज़िन्दगी की हर तरह की बेहतरी के लिए भी खुद अपनी पहल पर काम करने का मौका दिया। इसी का नतीजा था कि समाजवादी विकास ने जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने और पूरे सोवियत संघ को उन्नत औद्योगिक देशों की कतार में ला खड़ा करने के साथ ही समाज में ज्यादा से ज्यादा समानता स्थापित की और हज़ारों वर्षों से कायम विशेषाधिकारों, भौतिक-सांस्कृतिक अन्तरों और उनकी ज़मीन के मौजूद रहने के बावजूद पूँजीपतियों, भूस्वामियों, नौकरशाहों, सट्टेबाज़ों, व्यापारियों आदि सभी तरह के परोपजीवी वर्गों के प्रत्यक्ष शोषण को दो दशकों के भीतर ही समाप्त कर दिया। समाजवाद के रास्ते ने उद्योगों और खेतीबाड़ी की अभूतपूर्व तरक्की के साथ ही नि:शुल्क एवं समान शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि सुविधाओं को सर्वसुलभ बना दिया तथा बेरोज़गारी का पूरी तरह ख़ात्मा कर दिया। ग़ौरतलब बात यह है कि उद्योगों पर समूची जनता का मालिकाना स्थापित करके (यानी मेहनतकशों की राज्यसत्ता के अन्तर्गत राष्ट्रीकरण करके) और खेती का सामूहिकीकरण करके (यानी खेतों में काम करने वाले सभी किसानों के सामूहिक मालिकाने वाले बड़े फार्म स्थापित करके) सोवियत संघ ने ऊपर गिनायी गयीं उपलब्धियां उस समय हासिल कीं जब पूरी पूँजीवादी दुनिया महामन्दी (1930-40 के बीच) के भँवरों में पछाड़ खा रही थी।

स्तालिन के भूत से आज भी क्यों डरते हैं पूंजीपति और क्यों उन्हें आज भी गाली देते हैं उनके भाड़े के टट्टू ?

समाजवाद के महान निर्माता स्तालिन के बारे में आज पूँजीवादी अख़बारों के दो कौड़ी के भाड़े के टट्टू भी तरह-तरह के झूठ गढ़ रहे हैं। हम उन्हें सिर्फ याद दिलाना चाहते हैं कि कभी पूँजीवादी दुनिया के एच.जी. वेल्स, रोम्याँ रोलाँ, बर्नार्ड शॉ, बर्ट्रेड रसेल, चार्ली चैपलिन आदि और भारत के लाला लाजपत राय, गणेश शंकर विद्यार्थी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, नेहरू, प्रेमचन्द आदि जैसे महापुरुषों ने भी स्तालिन और सोवियत संघ की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि साम्राज्यवादी कुत्तों की गलाकाटू होड़ ने जब दूसरे महायुद्ध को और फासिस्ट-नात्सी भस्मासुरों को जन्म दिया तो हिटलर की सिर्फ 54 डिवीज़नों ने लगभग पूरे यूरोप को रौंदकर विश्वविजय का ख़तरा पैदा कर दिया था। उस समय उसकी 200 डिवीज़नों का मुकाबला करते हुए सोवियत जनता और लाल सेना ने हिटलर की पूरी सत्ता को ही तबाह कर डाला था। इसमें दो करोड़ सोवियत जनता ने अपनी बेमिसाल कुर्बानी स्तालिन की बहुप्रचारित ‘तानाशाही’ के डर से नहीं बल्कि समाजवाद और विश्व मानवता की हिफाज़त के लिए दी थी। उस समय तो रूज़वेल्ट, चर्चिल और दगॉल भी स्तालिन की बड़ाई कर रहे थे और पीछे-पीछे चल रहे थे तथा पश्चिमी अख़बार उन्हें ‘चाचा स्तालिन’ (`अंकल जो´) कह रहे थे, पर विश्वयुद्ध समाप्त होते ही स्तालिन को फिर तानाशाह कहा जाने लगा और सोवियत संघ नामक ‘शैतानी राज्य’ को तबाह कर दिये जाने का आह्वान किया जाने लगा। यह है पूँजीवाद का दोगलापन, जो स्वयंसिद्ध है।

पर दुनिया के पूँजीवादी इतिहासकार आज भी इस तथ्य से इन्कार नहीं कर पाते कि अक्टूबर क्रान्ति के तोपों के धमाकों ने दुनियाभर के मेहनतकशों को पूँजी की सत्ता के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा देने के साथ ही एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका की जनता के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों को भी ज़बरदस्त उछाल देने का काम किया। सोवियत संघ लगातार औपनिवेशिक गुलामी के विरुद्ध लड़ने वाले क्रान्तिकारियों को और आम जनता को प्रेरणा देता रहा और यथासम्भव मदद भी। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में भी सर्वहारा सत्ताएँ स्थापित हुई और चीन में माओ और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई नयी जनवादी क्रान्ति ने अक्टूबर क्रान्ति के बाद एक और, नया मील का पत्थर कायम किया। शक्तिशाली समाजवादी खेमे की मौजूदगी ने एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिकी देशों की जनता पर कायम औपनिवेशिक और नवऔपनिवेशिक शिकंजे को ढीला करने में भी अहम भूमिका निभायी।

पर इतिहास कभी भी सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ता। यह आती-जाती लहरों के रूप में, ज्वार और भाटे के रूप में आगे बढ़ता है, सर्पिल रास्तों से होकर, अनेकों मोड़ों और घुमावों से होकर आगे बढ़ता है।

समाजवाद की फिलहाली हार के बुनियादी कारण क्या हैं ?

यह जानना बेहद जरू़री है!

समाजवादी समाज पूरी तरह वर्गविहीन, शोषणविहीन समाज नहीं होता, बल्कि इसकी शुरुआती अवस्था होता है। वह पूँजीवाद और कम्युनिज्म के बीच का ‘वर्ग समाज और वर्गविहीन समाज’ के बीच का काल होता है( कम्युनिज्म की सिर्फ प्रथम अवस्था होता है। मेहनतकश वर्ग इस दौरान बलपूर्वक सम्पत्तिवान, परजीवी वर्गों पर शासन कायम करके उत्पादन के साधनों पर से उनका स्वामित्व छीन लेता है( पर ये पुराने शोषक-शासक अपनी उसी लुटेरी मानसिकता और अपने ‘खोये हुए स्वर्ग’ को फिर से पाने की चाहत के साथ समाज में मौजूद होते हैं। इसके साथ ही छोटे पैमाने पर (गाँव के मँझोले व छोटे किसानों, छोटे उद्यमियों-कारोबारियों आदि के बीच) पूँजीवादी किस्म का उत्पादन समाजवाद के शुरुआती समयों में लम्बी अवधि तक मौजूद रहता है, निजी स्वामित्व छोटे पैमाने पर मौजूद रहता है और आम जनता के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के भीतर धनी बनने की और मुनाफा कमाने की पुरानी बीमारी भी मौजूद रहती है। यह छोटे पैमाने का पूँजीवादी उत्पादन नये-नये पूँजीवादी तत्त्वों और मानसिकता को समाजवाद के भीतर नये सिरे से पैदा भी करता रहता है। इसके अलावा समाजवादी समाज में भी शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम करने वालों के बीच, कारख़ानों में काम करने वाले और खेतों में काम करने वालों के बीच तथा गाँव में रहने वालों और शहर में रहने वालों के बीच का अन्तर भी मौजूद रहता है। इसके अतिरिक्त, समाजवाद के बहुत आगे की मंज़िलों में ही यह सम्भव हो सकता है कि लोग क्षमता मुताबिक काम करते हैं और ज़रूरत मुताबिक पाते हैं। शुरू में तो लम्बे समय तक यही हो सकता है कि लोग जितना श्रम करें उसी के हिसाब से उन्हें मजदूरी मिले। अब चूँकि लोगों की श्रम करने की प्राकृतिक क्षमता एक नहीं होती, इस कारण से भी समाजवाद के शुरुआती लम्बे समय में असमानता पैदा होने का एक आधार मौजूद रहता है। कुल मतलब यह कि उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज का मालिकाना कायम करना शोषण और असमानता के ख़ात्मे का सबसे ज़रूरी पहला कदम है, पर यही सब कुछ नहीं। इसके बाद भी समाज में असमानता और पूँजीवाद के उतने किस्म के उत्पादन केन्द्र और पालन-पोषण केन्द्र मौजूद रहते हैं, जो ऊपर गिनाये गये हैं। इन्हीं कारणों से समाजवादी समाज के भीतर भी नये किस्म के पूँजीवादी तत्त्व मज़बूत होते जाते हैं और समय रहते इन खरपतवारों को नष्ट करके ज़मीन की अच्छी तरह निराई-गुड़ाई और कीटनाशकों का छिड़काव न किया जाये तो यह समाजवाद की पूरी फसल तबाह कर डालते हैं। ये नये पूँजीवादी तत्त्व कम्युनिस्ट पार्टी और सर्वहारा राज्यसत्ता पर काबिज़ हो जाते हैं और पूँजीवाद की पुनर्स्थापना हो जाती है।

1953 में स्तालिन की मृत्यु के बाद सोवियत संघ में यही हुआ। ख्रुश्चेव के नेतृत्व में वहाँ एक नये किस्म का पूँजीवाद बहाल हो गया -‘समाजवादी’ मुखौटे और नकली लाल झण्डे वाला, सरकारी या राजकीय पूँजीवाद – बहुत कुछ हमारे देश के `पब्लिक सेक्टर´ जैसा! 1990 में यह मुखौटा भी गिर गया और महान अक्टूबर क्रान्ति के देश में एक बार फिर खुला पूँजीवाद बहाल हो गया।

सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति ने दिखलायी नयी राह!

दरअसल स्तालिन भी समाजवाद के भीतर मौजूद और नये सिरे से पनपने वाले बुर्जुआ तत्त्वों को पहचान नहीं सके, उनके द्वारा समाजवाद की हार के ख़तरे को देख नहीं सके और उनके विरुद्ध सतत क्रान्ति चलाते हुए कम्युनिज्म की दिशा में आगे बढ़ने की राह नहीं निकाल सके। इस दिशा में लेनिन ने सोचना ज़रूर शुरू किया था, पर वक्त ने उन्हें मौका नहीं दिया और 1924 में उनका निधन हो गया। स्तालिन की ग़लतियों ओर चीन के समाजवादी प्रयोगों से सबक लेकर माओ त्से-तुङ ने इस महान काम को अंजाम दिया और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का वह प्रयोग किया जो विश्व सर्वहारा क्रान्ति के डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में पेरिस कम्यून और अक्टूबर क्रान्ति के बाद कायम तीसरा कीर्ति स्तम्भ है। हालाँकि चीन में भी माओ की मृत्यु के बाद पूँजीवादी तत्त्व सत्ता पर काबिज़ हो गये और पूँजीवाद की पुनर्स्थापना हो गयी, पर इससे सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का महत्त्व कम नहीं होता क्योंकि पहली बार इस महान क्रान्ति ने पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने, पूँजीवादी तत्त्वों को लगातार कमज़ोर करते जाने और वर्गविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ते जाने की ठोस, स्पष्ट राह बतलायी थी।

मेहनतकश अवाम अगर इतिहास से शिक्षा लेकर क्रान्ति के विज्ञान की समझ नहीं हासिल करेगा तो पूँजीपाति वर्ग और उसके भोंपुओं के भ्रामक प्रचारों से मुक्त नहीं हो पायेगा और यह मानता रहेगा कि समाजवाद की हार हो गयी है, वह असफल सिद्ध हो गयी। पूँजीवादी समाज की विपत्तियों से तंग, परेशान-बदहाल होकर वह समय-समय पर विद्रोह भी करता रहेगा, लेकिन समाजवाद की अन्तिम जीत में विश्वास और क्रान्ति के विज्ञान की समझ के अभाव में वह कभी भी पूँजीवाद का नाश नहीं कर सकेगा क्योंकि पूँजीवाद का एकमात्र विकल्प समाजवाद ही है।

अमर नहीं है पूँजीवाद! इसे मरना ही है!

हमें इस बात को अच्छी तरह से समझना होगा कि अतीत में भी क्रान्तियों के शुरुआती संस्करण असफल होते रहे हैं। सात-आठ सौ वर्षों तक कई दास विद्रोह कुचल दिये गये, तब कहीं जाकर दास प्रथा के युग का पूरी दुनिया से ख़ात्मा हो सका था। सामन्तवर्ग से संघर्ष करते हुए निर्णायक विजय हासिल करने में और पूँजीवादी सामाजिक ढाँचे का निर्माण करने में पूँजीपति वर्ग को तकरीबन चार सौ वर्षों का समय लग गया। फिर इसमें निराश या भग्नहृदय होने की भला क्या बात हो सकती है कि समाजवादी क्रान्ति फिलहाल कुछ समय के लिए सदियों से जड़ जमाये पूँजीवाद से हार गयी है और सर्वहारा वर्ग को फ़ौरी तौर पर पीछे हट जाना पड़ा है! और फिर हमें यह भी तो याद रखना होगा कि समाजवादी क्रान्ति मानव इतिहास की सर्वाधिक व्यापक, गहरी और बुनियादी क्रान्ति है, क्योंकि पहले की सभी क्रान्तियों ने एक पुरानी पड़ चुकी शोषण की व्यवस्था की जगह एक नये प्रकार की शोषण की व्यवस्था की स्थापना की जबकि समाजवादी क्रान्ति का लक्ष्य सभी वर्ग व्यवस्थाओं का, हर तरह के शोषण का और हर तरह की असमानता का नाश करना है। राज्यसत्ता पर सर्वहारा वर्ग के काबिज़ होने के बाद लम्बे समय के संघर्ष में ही यह सम्भव हो सकता है और इस लम्बे संक्रमण काल के दौरान एक से अधिक बार सर्वहारा वर्ग को हार का सामना भी करना पड़ सकता है।

हमें यह बात ठीक से समझ लेनी होगी कि प्रकृति और समाज की कोई भी चीज़, कोई भी ऐतिहासिक युग और कोई भी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था अमर नहीं होती। पूँजीवाद भी अजर-अमर नहीं है। दास प्रथा और सामन्त प्रथा की तरह पूँजी की उजरती गुलामी की प्रथा भी आज मानव समाज के पैरों की बेड़ी बन चुकी है जो उसको आगे नहीं बढ़ने दे रही है। अत:, निश्चित ही, मानवता इन बेड़ियों को तोड़ फेंकेगी। समूचे विश्व पूँजीवाद और इसके शीर्ष पर आसीन साम्राज्यवादी देशों तक की अर्थव्यवस्था आज एक लम्बी मन्दी और ठहराव के ऐसे ढाँचागत संकट से ग्रस्त है जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था। हालात बताते हैं कि इसकी मृत्यु अब सुदूर भविष्य की बात नहीं है। तब तक यह केवल घिसट-घिसटकर साँसें गिन सकता है जब तक कि मेहनतकश अवाम फिर से संगठित होकर इसके नाश की लड़ाई न छेड़ दे। हालाँकि पूरी दुनिया में अभी क्रान्ति की लहर पर प्रतिक्रान्ति की लहर हावी है, पर दुनिया के अलग-अलग कोनों से एक नये उभार के पूर्वसंकेत मिलने शुरू हो चुके हैं। रूस, भूतपूर्व सोवियत संघ के दूसरे घटक देशों में, और पूर्वी यूरोप के देशों में मेहनतकश जनता ने नकली समाजवाद का गन्दा चेहरा तो पहले ही देख लिया था, अब वह पश्चिमी दुनिया के ‘स्वर्ग’ की असलियत भी जान चुकी है। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था के साथ मिलते ही इन देशों की कमज़ोर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था गम्भीर संकट के भँवर में जा फँसी है तथा बेरोज़गारी, महँगाई, अभाव और भ्रष्टाचार की मार झेलती और मुट्ठीभर लोगों के धनी होने की कीमत अपनी कंगाली से चुकाती जनता एक बार फिर सड़कों पर उतर चुकी है। उसके एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के हाथ में आज लेनिन और स्तालिन के पोस्टर और लाल परचम हैं और लबों पर सच्चे समाजवाद की बहाली के नारे हैं। वहाँ कई क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट संगठन नयी अक्टूबर क्रान्ति की रणनीति पर बहसें चला रहे हैं और पश्चिम के पूँजीवादी अख़बार भी इन देशों में ‘बोल्शेविक पुनरुत्थान’ की ख़बरें छाप रहे हैं। माओ के देश की जनता भी सोई नहीं है। वहाँ देङ सियाओ-पिङ के ‘बाज़ार समाजवाद’ नामधारी पूँजीवाद के खिलाफ किसानों ओर युवाओं की बग़ावतें हो रही हैं और बदनाम करने की तमाम कोशिशों के बावजूद जनता महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दिनों को याद कर रही है!

ज़ाहिर है कि सन्नाटा टूटने लगा है।

मिट्टी में दबे अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के बीज अंकुरित होने लगे हैं।

लातिन अमेरिकी देशों में किसानों-मज़दूरों के आन्दोलन और छापामार संघर्षों का नया सिलसिला शुरू हो चुका है। और अब एशिया भी जग रहा है। इण्डोनेशिया के ताज़ा जन-उभार से हुई शुरुआत की आहटें भारतीय उपमहाद्वीप तक में सुनायी पड़ रही हैं। भारत की जनता भी सोई नहीं रह सकती। नयी आर्थिक नीतियों के अमल ने साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की लूट और लगातार बढ़ती महँगाई-बेरोज़गारी-असमानता और भ्रष्टाचार को जिन आखिरी हदों तक पहुँचा दिया है, वहाँ पहुँचना एक जागते ज्वालामुखी के दहाने पर पहुँचने के समान है।

ज़ाहिरा तौर पर, भारतीय मेहनतकश अवाम को भी अपना ऐतिहासिक मिशन पूरा करने के लिए आगे कदम बढ़ाना होगा। यह पूरी दुनिया की तरह भारत में भी एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और नये सर्वहारा ज्ञानोदय का दौर है। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के इस नये दौर में भारतीय सर्वहारा वर्ग और मेहनतकश जनता को साम्राज्यवाद और उसके जूनियर पार्टनर बने भारतीय पूँजीपति वर्ग की राज्यसत्ता को उखाड़कर पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली को ही नष्ट कर देना है तथा राज्यसत्ता उत्पादन और समाज के पूरे तन्त्र पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेना है। यही क्रान्तिकारी लोक स्वराज्य के नारे का मतलब है। यही है भारत की नयी समाजवादी क्रान्ति जो आज की नयी परिस्थितियों के अनुरूप अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति का एक नया संस्करण है। भारत के मेहनतकशों को अक्टूबर क्रान्ति के दिखाये मार्ग पर आगे बढ़ना होगा, नये सिरे से अपनी नयी, नये ढंग की इंकलाबी पार्टी बनानी होगी और अपने देश की ज़मीन पर मौलिक ढंग से अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण की आधारशिला स्थापित करनी होगी।

इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि हम दुनिया की पहली समाजवादी क्रान्ति के प्रयोग के सारतत्त्व को, उसके निचोड़ को, उसकी सबसे बुनियादी शिक्षाओं को गाँठ बाँध लें। वे क्या हैं ?

अक्टबूर क्रान्ति की सबसे बुनियादी शिक्षाएँ

1. सर्वहारा क्रान्ति की सबसे पहली ज़रूरत है सर्वहारा वर्ग की, पूरे देश के स्तर पर संगठित एक क्रान्तिकारी पार्टी। यह क्रान्तिकारी पार्टी लेनिन के मार्गदर्शन में निर्मित बोल्शेविक पार्टी की तरह संघर्षों की आग में तपकर इस्पात बनी हो, पूँजीवाद की सशस्त्र सेना-पुलिस से लैस राज्यसत्ता से लोहा लेने में सक्षम हो (न कि महज़ चुनावबाज़ी और ट्रेडयूनियनबाज़ी का धन्धा करती हो), औद्योगिक सर्वहारा और ग्रामीण सर्वहारा में ही नहीं बल्कि बहुसंख्यक ग़रीब व परेशानहाल मँझोले किसानों में भी इसकी गहरी पैठ हो और यह अपने देश की परिस्थितियों की समझ के आधार पर क्रान्ति का कार्यक्रम और रास्ता तय करने में सक्षम हो, तभी यह अक्टूबर क्रान्ति का नया संस्करण तैयार कर सकती है।

2. जब हम अक्टूबर क्रान्ति के पहले के रूस में करीब बीस वर्षों तक जारी, ऐसी पार्टी के निर्माण और गठन की प्रक्रिया पर निगाह डालते हैं तो यह सच्चाई दिन की रोशनी की तरह साफ हो जाती है कि कठिन विचारधारात्मक संघर्ष, अटल विचारधारात्मक दृढ़ता और गहरी विचारधारात्मक समझ के बिना कोई सच्ची सर्वहारा पार्टी क्रान्ति करना तो दूर, गठित ही नहीं हो सकती और यदि गठित हो भी गयी तो जल्दी ही बिखर जायेगी। लेनिन और उनके साथी बोल्शेविकों ने एकदम अलग-थलग पड़ जाने का ख़तरा मोल लेते हुए भी विचारधारा के प्रश्न पर कोई समझौता नहीं किया और मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी विचारधारा में किसी भी तरह की मिलावट की मेंशेविकों और कार्ल काउत्स्की के चेलों की साज़िशों को एकदम से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने पार्टी को कभी भी चवन्निया मेम्बरी वाली महज़ चुनावबाज़, यूनियनबाज़, धन्धेबाज़ संगठन नहीं बनने दिया। दाँवपेंच के रूप में लेनिन की पार्टी ने पूँजीवादी चुनावों और संसद का भी इस्तेमाल किया और ट्रेडयूनियनों में काम करते हुए आर्थिक संघर्ष भी लगातार चलाये तथा जनता को जगाने के लिए विभिन्न प्रकार की राजनीतिक सुधारपरक कार्रवाइयाँ भी कीं, पर पार्टी ने इस बात को कभी नहीं भुलाया कि बिना बल-प्रयोग और हिंसा के, महज़ चुनावों के ज़रिये शोषक वर्गों से सत्ता छीनी नहीं जा सकती। वे पूँजीवादी राज्यसत्ता की सैन्य शक्ति और दमनतन्त्र को उखाड़ फेंकने के लिए क्रान्तिकारी तैयारी लगातार करते रहे और एक बार फिर अक्टूबर क्रान्ति ने इस बात को सही साबित किया कि शोषक वर्ग कभी भी समझाने-बुझाने या अल्पमत-बहुमत से सत्ता नहीं सौंप सकते। अक्टूबर क्रान्ति की इस शिक्षा को याद रखने का मतलब यह है कि भारत का सर्वहारा वर्ग भी भा.क.पा., मा.क.पा., भा.क.पा. मा-ले (लिबरेशन ग्रुप) और ऐसे तमाम सुधारवादी, अर्थवादी, पूँजीवादी संसदवादी कम्युनिस्ट संगठनों के भ्रमजाल से बाहर आकर कम्युनिज्म के सही क्रान्तिकारी चरित्र को पहचाने। ये सभी मदारी मेंशेविकों और काउत्स्कीपंथियों के उन सिद्धान्तों को ही नये लेबल लगाकर पेश करते हें जिनके खिलाफ लगातार लड़कर बोल्शेविक पार्टी ने विचारधारात्मक दृढ़ता हासिल की और तभी जाकर अक्टूबर क्रान्ति विजयी हो सकी।

3. साथ ही, अक्टूबर क्रान्ति और उसके नेता लेनिन की यह भी शिक्षा है कि क्रान्ति मुट्ठीभर समझदार और बहादुर क्रान्तिकारी नहीं, बल्कि व्यापक मेहनतकश जनता करती है। बहादुर और समझदार क्रान्तिकारी उस मेहनतकश जनता के हरावल दस्ता होते हैं जो जनता के रोज़मर्रा की छोटी-छोटी लड़ाइयों में हिस्सा लेते हुए, ट्रेडयूनियनों (बुर्जुआ और प्रतिक्रियावादी ट्रेडयूनियनों में भी) भागीदारी करके आर्थिक माँगों पर और साथ ही राजनीतिक माँगों पर भी लड़ते हुए, सम्भव होने पर रणकौशल के तौर पर पूँजीवादी चुनाव और संसद में भी भागीदारी करते हुए जनता की राजनीतिक चेतना का ज्यादा से ज्यादा क्रान्तिकारीकरण करते हैं और उसे शासक वर्गों के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार करते हैं। अर्थवाद और संसदवाद के विरोध के नाम पर इन सभी रूपों-रणकौशलों को छोड़कर किसी भी रूप में महज़ हथियारबन्द कार्रवाइयों पर ज़ोर देना वामपन्थी दुस्साहसवाद, या ‘अतिवामपन्थ’ का मध्यमवर्गीय भटकाव है जिसका फायदा अन्ततोगत्वा भाकपा-माकपा ब्राण्ड नकली कम्युनिस्टों और पूँजीवादी सत्ता को ही मिलता है।

4. अक्टूबर क्रान्ति का निचोड़ निकालते हुए लेनिन ने सैकड़ों बार विचारधारात्मक दृढ़ता को स्पष्ट किया था और कहा था कि वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को कभी न भूलो। इनको भूलने का मतलब ही है पूँजीवादी जनवाद और शान्तिपूर्ण संक्रमण के भ्रमजालों में जा फँसना और क्रान्ति के मार्ग को भूल जाना। हालात में चाहे जो भी बदलाव आ जाये, यदि पूँजीवाद पूँजीवाद है तो इसका अर्थ है कि राज्यसत्ता पूँजीपति वर्ग के हाथों में है, जिसे सिर्फ बलपूर्वक ही उखाड़ा जा सकता है और शोषक वर्गों को तब तक बलपूर्वक दबाये रखना पड़ेगा जब तक कि वर्ग के रूप में उनका अस्तित्व कायम रहेगा। आगे चलकर अक्टूबर क्रान्ति की इस शिक्षा को माओ ने महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान पुष्ट करने के साथ ही आगे विकसित किया और बताया कि सर्वहारा वर्ग राज्यसत्ता पर काबिज़ होने के बाद एक लम्बे समय तक यदि अपने अधिनायकत्व के अन्तर्गत सभी पूँजीवादी तत्त्वों के विरुद्ध सतत क्रान्ति नहीं चलायेगा और पूँजीवादी मूल्यों-विचारों-संस्थाओं के विरुद्ध सतत सांस्कृतिक क्रान्ति नहीं चलायेगा तो पूँजीवाद की पुनर्स्थापना अवश्यम्भावी होगी। अक्टूबर क्रान्ति की मशाल से पूँजीवादी जंगल राज में दावानल भड़काने के लिए इन शिक्षाओं को दिल में भलीभाँति बैठा लेना होगा, हर तरह के कठमुल्लेपन से मुक्त होकर आज की दुनिया और अपने देश की पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली, सामाजिक संरचना और राज्यतन्त्र की सही समझ कायम करनी होगी और लगातार क्रान्तिकारी कार्रवाइयों में धीरज तथा मुस्तैदी के साथ सन्नद्ध होकर एक ऐसी क्रान्तिकारी पार्टी का पुनर्गठन करना होगा जो अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के निर्माण में सक्षम हो।

(`बिगुल´, नवम्बर-दिसम्बर 1996 में प्रकाशित

बुझी नहीं है अक्टूबर क्रांति की मशाल – पीडीऍफ़

.

भगत सिंह, कम्युनिस्ट और गाँधी होने का मतलब

Posted on Updated on

पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों द्वारा जानबूझकर परंतु कुछ पढ़े-लिखे लोगों द्वारा अनजाने में भावुकतावश यह प्रचारित किया जाता है कि गाँधी और भगत सिंह, दोनों आज़ादी के दीवाने थे. उनका मकसद इस देश को अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति दिलाने तक सीमित था. लेकिन बात एकदम इसके उल्ट है. दोनों में कोई भी भावुक नहीं था. इसमें कोई शक नहीं है कि कांग्रेस की अगुआई में जारी स्वतंत्रता आन्दोलन अन्य आंदोलनों पर वर्चस्व बनाये हुए था. कांग्रेस में गाँधी का तानाशाही प्रभाव भी सर्वविदित है. ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की गहराती अंतरराष्ट्रीय स्थिति से लाभ उठाकर गाँधी और कांग्रेस का मकसद महज  उभरती भारतीय बुर्जुआजी की सेवा करना था. भगत सिंह कांग्रेस की इस स्थिति से भली-भांति परिचित हो गए थे. यही कारण था कि वे केवल २३ वर्ष की अल्पायु भोगने के बावजूद कांग्रेस और गाँधी की विचारधारा के विरोध में  अपने विचारों को इस कद्र विकसित कर पाए. इसी टकराव और द्वंद में भगतसिंह के विचारों की परिपक्वता निहित है. इतना ही नहीं देश में जारी कमजोर समाजवादी विचारधारा के और उनके मतभेद भी सिद्ध होते हैं. १९२० में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन मास्को में हो चुका था. क्या भगतसिंह अपने समय की मुख्यधारा की समाजवादी राजनीती से जुड़ पाए ? अगर ऐसा था तो क्यों उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से खुद को दूर रखा ? क्या कारण था कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपने समय के इन ओजस्वी क्रांतिकारियों को प्रभावित करने में असफल रही? क्या कारण था कि उस समय के बहादुर युवकों ने आंतकवादी और आत्मघाती रास्ते को चुना? अगर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लोग परिपक्व थे तो वे इन युवकों को क्यों नहीं संभाल पाए? क्यों वे इस पार्टी द्वारा जारी अपीलों को ठुकराते रहे ?

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म मास्को से  उधार और आयातित समाजवाद से था. भारत की वस्तुगत स्थिति के आकलन और फिर क्रांति संबंधी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने के कार्यभार को इन्होने लंबे समय तक  हाथ में ही नहीं लिया. जहाँ तक की दूसरे विश्व-युद्घ के शुरू होने पर भी यह पार्टी इस योग्य नहीं थी कि स्तालिन की हिटलर और फासिज्म के विरुद्ध  अंग्रेजों की मदद के आदेश को तत्त्व-रूप से  समझ सके और स्वतन्त्र रूप से इस स्थिति का भारतीय मेहनतकश अवाम के लिए फायदा उठा सके.  बड़े लीडरों को छोड़ दें तो आज भी इन पार्टियों के आम काडर का मार्क्सवाद में हाथ तंग ही है. किसी भी प्रकार का वैचारिक संघर्ष इन्हें आतंकित ही करता रहा है. बल्कि इन्होने अवसरवादी ढंग से मार्क्सवाद को संशोधित करने के रास्ते पर पलायन करना उचित समझा. यह ज़रूरी था कि इस संशोधनवाद के दूसरे सिरे पर दुस्साहसवाद [देखें : नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक] होता !

भगतसिंह अंग्रेजी साम्राज्यवाद और स्थानीय बुर्जुआजी द्वारा भारतीय मजदूर और किसान के शोषण से भली-भांति परिचित हो गए थे. नवयुवकों के नाम पत्र जारी करते हुए और क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा तैयार करते हुए उन्होंने लिखा :

“अगर आप मजदूरों और किसानों को आन्दोलन में सक्रीय रूप से खींचने की योजना बनाने जा रहे हो, तो मैं आपसे कहना चाहूँगा कि उन्हें भावुक शब्दाडंबर से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता. वे आपसे पूछेंगे कि तुम्हारी इस क्रांति जिसमें तुम उन्हें कुर्बानी का आह्वान करने जा रहे हो, उन्हें इससे क्या हासिल होगा. लोगों को इससे क्या फर्क पड़ता है कि लोर्ड रीडिंग के स्थान पर सर पुरषोतम दास ठाकुर सरकार का प्रतिनिधि हो? किसानो से इससे क्या फर्क पड़ेगा कि लोर्ड इरविंग के स्थान पर सर तेज बहादुर सपरू आ जाएँ ? राष्ट्रीय भावनायों की अपील उपहास है. आप इसका प्रयोग अपने काम के लिए नहीं कर सकते.”

जब स्तालिन अपने शिष्यों को गाँधी का अनुसरण करने की सिफारिशें कर रहे थे, भगत सिंह गाँधी के झूठे प्रवचनों का पर्दाफाश कर रहे थे :

भगतसिंह गाँधी (तस्वीर) के झूठ्ठे  प्रवचनों का अख़बारों और पर्चों में पर्दाफाश किया करते थे
भगतसिंह गाँधी (तस्वीर) के झूठे प्रवचनों का अख़बारों और पर्चों में पर्दाफाश किया करते थे

“वह (गाँधी) शुरू से ही जानता था कि उसकी लहर का अंत किसी समझौते में हो जायेगा. इस प्रकार की प्रतिबद्धता से हम नफरत करते हैं.”

उन्होंने आगे कांग्रेस के बारे में अपने शंके जाहिर करते हुए लिखा  :

“कांग्रेस का उद्देश्य क्या है? कि वर्तमान लहर किसी समझौते में बदल जाये या पूरी तरह से असफल रहे. मैंने इसे इसलिए कहा है कि वास्तविक क्रांतिकारी शक्तियों को लहर में शामिल होने का आह्वान नहीं किया गया है. इस लहर का संचालन मध्यम वर्ग के दूकानदारों और कुछ पूंजीपतियों के आधार पर किया जा रहा है. ये दोनों वर्ग, और विशेषकर पूंजीपति अपनी जायदाद को दांव पर लगाने का खतरा नहीं सहेड़ सकते. क्रांति की वास्तविक सेनाएं – किसान और मजदूर गांवों और फेक्टरियों में है. लेकिन अपने बुर्जुआ नेता उन्हें शामिल करने का साहस नहीं कर सकते. ये सोये हुए शेर, अगर जाग गए तो वे हमारे लीडरों के मिशन के पूरा होने के बाद भी नहीं रुकेंगे.”

भगत सिंह के इन शब्दों की पुष्टि उस वक्त हो गयी जब बंबई के बुनकरों की कार्रवाई के बाद गाँधी ने  क्रांतिकारी शक्तियों पर अपनी चिंता जाहिर की :

राजनितिक उद्देश्यों के लिए सर्वहारा का प्रयोग खतरनाक हो सकता है.”

हमारे सविधान की प्रस्तावना में जिस समाजवाद का जिक्र किया है, इसके निर्माण के लिए सर्वदलीए कांफ्रेंस बुलाई गयी, जिसमें नेहरू समिति बनाई गयी. जवाहर नेहरू के बारे में वे लिखते हैं :

“समझ नहीं आता कि पंडित जवाहर लाल आदि जोकि समाजवादी विचारों के समर्थक हैं, क्यों इस समिति में शामिल होकर अपना आदर्श बदल सके? क्या वह इन्क़लाब नहीं चाहते? वैसे ही इन्क़लाब – इन्क़लाब चिल्लाते रहते हैं? क्या उन्हे आशा है कि यह सरकार स्वयं ही, जो माँगें प्रस्तुत क़ी गयी हैं उन्हे स्वीकार कर लेगी? (ऐसा सोचना ) जान – बूझकर आँखें मूंदना है..

कांग्रेस, नेहरू और गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत पर वे आगे लिखते हैं :

“नेहरू साहब केवल सरकार को भयभीत करने के लिए ही पूर्ण स्वतंत्रता का शोर मचाते रहते हैं और चाहते अधीन राज ही हैं? असल में यह आशा कि अभी कुछ मिलेगा, अभी कुछ मिलेगा, बहुत बर्बाद करती है | दास , बरकेन हैड क़ी चापलूसी में कितना गिर गया था, यह उसके फ़रीदपुर के संबोधन से ही पता चल सकता है| आज सभी नेता उस राह पर चल पड़े है|
स्वतंत्रता कभी दान में प्राप्त नहीं होगी| लेने से मिलेगी| शक्ति से हासिल क़ी जाती है| जब ताक़त थी तब लॉर्ड रीडिंग गोल मेज कांफ्रेंस के लिए महात्मा गाँधी के पीछे – पीछे फिरता था और अब जब आंदोलन दब गया, तो दास और नेहरू बार बार ज़ोर लगा रहे हैं और किसी ने गोलमेज तो दूर  , ” स्टूल कान्फ्रेंस ” भी न मानी| इसलिए अपना और देश का  समय बर्बाद करने से अच्छा है कि मैदान में आकर देश को स्वतन्त्रता – संघर्ष के लिए तैयार करना चाहिए|  नहीं तो मुँह धोकर सभी तैयार रहें कि आ रहा है –स्वराज्य का पार्सल!”

गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत को वे मजदूरों और किसानों के जुझारू वर्गीय चरित्र को कुंठित करने का फंदा मानते थे ताकि भारतीय पूंजीपतियों के संपत्ति रखने के अधिकार की रक्षा हो सके :

“यह गाँधी के अहिंसा और समझौतावादी सिद्धांत से ही हुआ है कि राष्ट्रीय आन्दोलन की इस लहर में दरार पैदा हो गयी है.”

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन के घोषणा पत्र में वे गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत की निरर्थकता को सिद्ध करते हैं क्योंकि वे समझते थे कि मौजूदा राज्य सत्ता का अस्तित्व ही हिंसा के सहारे टिका हुआ है. वे लिखते हैं;

“आज यह फैशन-सा हो गया है कि अहिंसा के बारे में अंधाधुंध और निरर्थक बात की जाये. महात्मा गाँधी महान हैं और हम उनके सम्मान पर कोई भी आंच नहीं ला देना चाहते लेकिन हम दृढ़ता से कहते हैं कि हम उनके देश को स्वतन्त्र कराने के ढंग को पूर्णतया नामंजूर  करते हैं. यदि देश में चलाये जा रहे उनके असहयोग आन्दोलन द्वारा लोक-जाग्रति में उनकी भागीदारी के लिए उन्हें सलाम न करें तो यह हमारे लिए नाशुक्रापन होगा. परंतु हमारे लिए महात्मा असंभावनाओं का दार्शनिक है. अहिंसा भले ही एक नेक आदर्श है लेकिन यह अतीत की चीज है. जिस स्थिति में आज हम हैं, सिर्फ अहिंसा से  आजादी कभी भी प्राप्त नहीं की जा सकती. दुनिया सिरे तक हथियारों से लैस है और (ऐसी) दुनिया पर हम हावी हैं ! अमन की सारी बातें ईमानदार हो सकती हैं लेकिन हम जो गुलाम कौम हैं, हमें ऐसी झूठे सिद्धांतों से नहीं भटकना चाहिए. हम पूछते हैं कि जब दुनिया का वातावरण हिंसा और गरीब की लूट से भरा पड़ा है, तब देश को अहिंसा के रास्ते पर चलाने की क्या तुक है? हम अपने पूरे जोर के साथ कहते हैं कि कौम के नौजवान कच्ची नींद के इन सपनों के बहकावे में नहीं आ सकते.”

कांग्रेस का उद्देश्य भगतसिंह और उनके साथियों से जैसे-तैसे पिंड छुडाना था. कांग्रेस पार्टी का इतिहास लिखने वाले मन्मथनाथ गुप्त अपनी  पुस्तक ‘क्रांति-युग के संस्मरण’ में लिखते हैं :

“जिस समय भगत सिंह तथा उसके साथी फांसीघर में बंद थे उस समय उनकी सज़ा के संबंध में गाँधीजी और वाइसराय के बीच औपचारिक बातें हुई, क्योंकि उन्हें जो फाँसी दी जाने वाली थी उससे देश में बड़ी हलचल मच रही थी| स्वयं कॉंग्रेस वाले भी इस बात के लिए बहुत उत्सुक थे कि इस समय जो सद्‍भाव चारों ओर दिखाई पड़ रहा है, उसका लाभ उठा कर उनकी फाँसी की सज़ा बदलवा दी जाय | किंतु वायसराय ने इस संबंध मे स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहा| हमेशा एक मर्यादा रखकर उन्होंने इस सबंध में बातें की| उन्होंने गाँधी जी से केवल यही कहा कि मैं पंजाब सरकार को इस संबंध में लिखूंगा| इसके अतिरिक्त और कोई वादा उन्होंने नहीं किया| यह ठीक है कि स्वयं उन्हीं को सज़ा रद्द करने का अधिकार था किंतु यह अधिकार राजनैतिक कारणों के लिए उपयोग में लाने योग्य नहीं था| दूसरीओर राजनैतिक कारण ही पंजाब सरकार को इस बात के मानने में बाधक हो रहे थे.”

” कांग्रेस का इतिहास”–पट्टाभिसीतारमैया के हवाले से वे आगे लिखते हैं;

“दरअसल वे बाधक थे भी| चाहे जो हो लार्ड इर्विन इस बारे में कुछ करने में असमर्थ थे| अलबत्ता कराची कॉंग्रेस अधिवेशन हो लेने तक फाँसी रुकवा देने का उन्होंने जिम्मा लिया| मार्च के अंतिम साप्ताह में कराची में कॉंग्रेस अधिवेशन होने वाला था किंतु स्वयं गाँधीजी ने ही निश्चित रूप से वाइसराय से कहा –यदि इन नौजवानो को फाँसी पर लटकाना ही तो कॉंग्रेस अधिवेशन के बाद ऐसा किया जाय, उसके बजाय पहले ही ऐसा करना ठीक होगा| इससे देश को साफ-साफ यह पता चल जाएगा कि वस्तुत: उसकी स्थिति क्या है और लोगों के दिलों में झूठी आशाएं न बँधेगी| कांग्रेस में गाँधी-इर्विन समझौता अपने गुणों के कारण ही पास या रद्द होगा, यह जानते बूझते हुए कि तीन नवजवानों को फाँसी दे दी गयी है| ”

जेल में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और मार्क्सवादी साहित्य के अध्ययन  द्वारा वे वर्ग-संघर्ष की पहचान को और अधिक स्पष्ट रूप से पहचानने में सफल हुए. फाँसी लगने से तीन दिन पूर्व, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव द्वारा फाँसी के बजाय गोली से उड़ाए जाने की मांग करते हुए पंजाब के गवर्नर को लिखे गए पत्र से इसकी पुष्टि होती है :

“यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक कि शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना अधिकार जमाये रखेंगे| चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति , अंग्रेज शासक या सर्वथा भारतीय  ही हों| यदि कुछ भारतीय पूंजीपतियों  द्वारा  ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी इस स्थिति में कोई अन्तर  नहीं पड़ता|”

भगत सिंह व्यक्तिगत हिंसा में विश्वास नहीं रखते थे लेकिन वर्गीय हिंसा को वे अच्छी तरह से पहचानते थे. क्रांतिकारी वर्गों द्वारा प्रतिक्रयावादी वर्गों के खिलाफ हिंसा को वे जायज मानते थे. बेशक भगतसिंह आज की ज़रूरतों के अनुसार सिद्धान्तिक अगुआई नहीं दे सकते लेकिन क्रांतिकारियों के लिए भगत सिंह जैसी स्पिरिट का होना आवश्यक है. भगत सिंह ने अपना अंतिम समय जेल में बिताया. यही वह समय था जब वे मार्क्सवाद को थोडा ही सही लेकिन समझ और आत्मसात कर पाए. जेल से स्मगल किये गए साहित्य का आज भी महत्त्व है. यहीं पर वे व्यक्तिगत हिंसा और वर्गीय हिंसा में फर्क सीखने में कामयाब हुए. पंजाबी के क्रांतिकारी कवि ‘पाश’ के अनुसार  क्रांतिकारियों को यहीं से अपना सफ़र शुरू करना चाहिए;

”भगत सिंह ने पहली बार
पंजाब को
जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से
बुद्धिवाद की ओर मोड़ा था
जिस दिन फांसी दी गयी
उसकी कोठरी में लेनिन की किताब मिली
जिसका एक पन्ना मोड़ा गया था
पंजाब की जवानी को
उसके आखिरी दिन से
इस मुड़े पन्ने से बढ़ना है आगे, चलना है आगे”

सन्दर्भ साभार :  शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज : पीडीऍफ़

सर्वहारा वर्ग, “जन-साधारण” और किसान वर्ग – शोषण के रूपों का महत्त्व

Posted on Updated on

28.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

सर्वहारा वर्ग के शोषण का चरित्र और स्तर अन्य उत्पीडित तथा शोषित वर्गों से भिन्न होता है. माल उत्पादन के अर्न्तगत अर्थात पूंजीवाद (माल उत्पादन का वह रूप जिसमें माल के रूप में मानव श्रम बाज़ार में आता है) के अर्न्तगत केवल सर्वहारा शोषण की असली बुनियाद के खिलाफ लड़ता है क्योंकि अन्य वर्गों की अपेक्षा सर्वहारा वर्ग माल उत्पादन से अधिक प्रभावित होता है. माल उत्पादन के व्यवस्था में सर्वहारा वर्ग खुद की बिक्री से, अपनी श्रमशक्ति की बिक्री से अपनी गुज़र करता है जबकि अन्य उत्पीड़ित वर्ग (प्रत्येक किस्म के निम्न-बुर्जुआ, किसान, स्वतन्त्र कारीगर) का माल उत्पादन से कोई विरोध नहीं होता है. अपनी निम्नवर्गीय स्थिति के चलते वे केवल उन बंधिशों को ख़त्म करना चाहते हैं जो स्पर्द्धा के क्षेत्र में उनके उत्पाद को प्रतिकूल स्थिति में पहुंचा देती हैं.

इसलिए यह तथ्य कि सर्वहारा को गुलाम बना लिया जाता है, प्रधान महत्त्व का प्रश्न नहीं है. अन्य वर्ग भी इसी तरह गुलाम बनाये जाते हैं. गुलाम बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया तरीका और गुलामी जो शक्ल अख्तियार करती है, वही महत्त्वपूर्ण होता है;  क्योंकि गुलामी का रूप बदल जाने से गुलाम की मानसिकता बदल जाती है यानि वे विचार बदल जाते हैं जो गुलाम के मस्तिष्क में पैदा होते हैं या पैदा हो सकते हैं. उस वक्त भी जब अपने वर्गीय हितों के बावजूद निम्न-बुर्जुआ और कृषक वर्ग का दृष्टिकोण उन्हें शासक वर्गों के अनिच्छुक मित्र बना देता है यानि पूंजीवादी समाज के अन्य अधिकांश लोगों की भांति निजी मालिकाने की व्यवस्था उन्हें भी मानव मुक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अंतिम सीमा मालूम पड़ने लगती है तब सर्वहारा का दृष्टिकोण अपने हितों के और भी अनुकूल बनता जाता है. इसकी वजह घोषणापत्र में इन शब्दों में व्यक्त की गयी है,

“आज बुर्जुआ के मुकाबले में जितने वर्ग खड़े हैं उनमें से केवल सर्वहारा ही वास्तव में क्रांतिकारी वर्ग है. बड़े पैमाने के उद्योग के विकास के साथ अन्य वर्ग क्षीण होते जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं लेकिन सर्वहारा वर्ग उद्योग का सर्वाधिक विशिष्ट उत्पाद है.”

सर्वहारा शब्द के आधुनिक बोध में बड़े पैमाने के उद्योग का एक उत्पाद है. जैसे-जैसे बड़े पैमाने के उद्योग का विस्तार होता जाता है, उसकी संख्या में वृद्धि होती जाती है. लेकिन संख्या में यह वृद्दि एकमात्र महत्त्व की वस्तु नहीं है. पुराने समय में भी जनता आन्दोलन करती थी. आन्दोलन की क्षमता उसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है और सर्वहारा एक नए किस्म का उत्पीड़ित और दमित समूह है. जबकि पूंजीवाद के विकास के साथ मेहनतकशों के अन्य वर्गों का महत्त्व घटता जा रहा है, उत्पादन के सामान्य संगठन में एक महत्तवपूर्ण घटक के रूप में सर्वहारा का महत्त्व बढ़ता जा रहा है. अन्य उत्पीड़ित वर्गों की उर्जा बिखरी होती है और इसका उपयोग सामाजिक संरचना के व्यापक रूप से पृथक कई अंगों पर ही किया जा सकता है लेकिन सर्वहारा की उर्जा कुछ महत्तवपूर्ण बिन्दुओं पर केन्द्रित होती है जो सर्वहारा जैसे शिल्पगत पूर्वाग्रह, धार्मिक कट्टरपन, राष्ट्रीय भावनाओं आदि से वे छुटकारा पा लेते हैं और इस प्रकार वे बेहतर जीवन के लिए संघर्ष करने वाली महान सेना के रूप में ज्यादा आसानी से संयुक्त हो जाते हैं.

नरोदवादियों या लोकरंजकवादियों को हमारी “संकीर्ण” मार्क्सीय शब्दावली से नफ़रत है. वे अक्सर “जनता” शब्द का प्रयोग करते हैं. आर्थिक विकास के दौरान यह जनता कई टुकडों में बंट जाती है जिनके अपने अलग-अलग विशिष्ट हित होते हैं. दूसरी ओर सर्वहारा जिसके सदस्य मूलत: आबादी के विभिन्न संस्तरों से आते हैं, आर्थिक विकास के दौरान समान हितों वाले व्यक्तियों से गठित एक एकीकृत इकाई में तब्दील हो जाते हैं. निस्संदेह अन्य उत्पीडित वर्ग भी होते हैं जिनका क्रांतिकारी महत्त्व होता है. लेकिन उनके क्रांतिकारी महत्त्व की वजह यह होती है कि

“वे अपनी वर्ग स्थिति से फिसलकर नीचे सर्वहारा की कतारों में पहुँच जाने से डरते हैं. इस प्रकार वे अपने वर्तमान हितों की नहीं बल्कि भावी हितों की रक्षा करते हैं और सर्वहारा के दृष्टिकोण को अपनाने के लिए अपने दृष्टिकोण का परित्याग कर देते हैं.”

सर्वहारा की वर्गीय विचारधारा को काम के बोझ से दबे मेहनतकश लोग बड़ी तादाद में अपनाने लगते हैं. सम्पूर्ण मानव जाति की मुक्ति के लिए संघर्षरत आन्दोलन की अगुआई मुट्ठीभर चिन्तक नहीं करते हैं बल्कि यह काम अपने ऐतिहासिक मिशन के प्रति सुचेत सर्वहारा वर्ग की शक्तिशाली सेना करती है.

निम्न-बुर्जुआ को सर्वहारा दृष्टिकोण अपनाने के लिए बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है. इसे जानने के लिए हमें सिर्फ अपने चारों ओर नज़र डालने की ज़रुरतभर है. जर्मन सेंटर पार्टी या इतालवी पीपुल्स पार्टी जैसी विभिन्न राष्ट्रवादी, यहूदी-विरोधी और पुरोहितवादी पार्टियों पर गौर कीजिए. इन पार्टियों का बहुलांश कारीगरों और किसानों से मिलकर बना है. व्यक्तिगत संपत्ति में वृद्धि और उसे सुदृढ़ बनाकर अपनी तकदीर संवारने की आशा का परित्याग करना उनके लिए बहुत कठिन होता है. सर्वहारा दृष्टिकोण को अपनाने के लिए उन्हें विकास के ऊँचे धरातल पर पहुंचना ज़रूरी होता है.

पहले ही बताया जा चूका है कि आधुनिक मेहनतकश वर्ग किस तरीके से अस्तित्व में आया और कैसे बड़े पैमाने के उद्योग ने उन हालत को पैदा किया जिन्होंने एक पृथक वर्ग के रूप में इसके गठन की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया था. मजदूरों के लिए पूंजी की सत्ता समान जीवन स्थिति और साझा हित का सृजन करती है. मालिक किसान एकदम भिन्न स्थिति में जीते हैं. फ्रांसीसी किसान को उदाहरण के रूप में लेकर मार्क्स इसका ब्यौरा इस प्रकार देते हैं :

“फ्रांसीसी आबादी में छोटी जोत वाले किसान बहुसंख्यक हैं. पूरे देश में वे समान स्थिति में जीते हैं लेकिन उनके बीच सम्बन्ध बहुत कम बन पाते हैं. उनकी उत्पादन प्रणाली प्रारंभिक सम्बन्ध बनाने की बजाय उन्हें एक-दूसरे के अलग रखती है. फ्रांस में संचार साधनों की अपर्याप्तता और किसानों की गरीबी उनके अलगाव को ज्यादा तीखा बना देती है. उनकी जोत इतनी छोटी होती है कि श्रम विभाजन की संभावना बहुत कम होती है और वैज्ञानिक ढंग से खेती करने की कोई गुंजाईश नहीं होती है. इसलिए किसान समुदाय में विकास की विविधता, बुद्धिकौशल और विशिष्टीकरण और सामाजिक संबंधों की संपन्नता का अभाव होता है क्योंकि अपने उपभोग की अधिकांश वस्तुएं अपने भूखंड से पैदा कर लेता है. इस प्रकार अपनी ज़िन्दगी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए वह सामाजिक संसर्ग पर उतना निर्भर नहीं रहता है बल्कि प्रकृति के साथ आदान-प्रदान से इन्हें पूरा करता है. एक छोटी सी जोत पर निर्भर एक किसान और उसका परिवार यहाँ है, एक छोटी सी जोत के साथ एक किसान और उसके बीवी-बच्चे वहाँ हैं. करीब बीसेक ऐसे अणुओं के समूह से एक गाँव बनता है और कई गांवों के समूह से एक जिला बनता है. फ्रांसीसी राष्ट्र का विराट जन-समुदाय तुल्य परिमाणों के साधारण योग से मिलकर बना है ठीक उसी तरह जिस तरह बोरे में भरे ढेर सारे आलूओं से एक बोरा आलू बनता है. लाखों किसान परिवार ऐसी आर्थिक स्थिति में जीते हैं और उनकी जीवन पद्धति, उनके हितों और उनकी संस्कृति को अन्य वर्गों से पृथक करती है और उन्हें कमोवश अन्य वर्गों के विरोध में खड़ा कर देती है. इस दृष्टिकोण से ये किसान परिवार एक वर्ग का गठन करते हैं. इन किसानों के बीच अंतरसंबंध केवल स्थानीय स्वर बनता है और उनके हितों की एकरूपता समुदाय, राष्ट्रीय सम्बन्ध-सूत्र या राजनीतिक संगठन के रूप में अभिव्यक्त नहीं होती है. इस दृष्टिकोण से ये किसान एक वर्ग का गठन नहीं करते हैं. इसलिए संसद या कांग्रेस के माध्यम से अपने बलबूते अपने वर्ग हितों का दावा पेश करने में वे सफल नहीं हो पाते हैं. वे अपना प्रतिनिधित्व खुद नहीं कर पाते हैं और कोई दूसरा ही उनका यह काम करता है. जो कोई भी उनका स्वामी और मालिक बन जाये, उन पर प्रभुता हासिल कर ले, अप्रतिबंधित शासकीय शक्तियों का उपयोग करे, अन्य वर्गों से उनकी रक्षा करे और असमान से उनके लिए धूप और वारिश भेजता रहे, वही उनका प्रतिनिधि बन सकता है. इसलिए किसानों की राजनीतिक आकांक्षा की अंतिम अभिव्यक्ति वह कार्यकारी सत्ता होती है जो पूरे समाज को अपने निरंकुश शासन के अधीन कर लेती है.” (मार्क्स, द एटीन्थ ब्रूमेर ऑफ़ लुई बोनापार्ट, पृ. 132-33)

अपने अस्तित्व में इन्हीं स्थितियों के चलते, कृषक वर्ग साझा नीति को आगे बढाने के काम से तालमेल नहीं बिठा पाते हैं. 1381 के दौरान वाट टायलर (जिसे 1381 में मार दिया गया) के नेतृत्व में किसान आन्दोलन इंग्लैंड में चला, 1358 में फ्रांस में विद्रोह हुआ और 1525 में जर्मनी में महान किसान युद्ध हुआ. इन सभी कथित किसान युद्धों को तभी राजनीतिक महत्त्व मिल पाया जब अस्थाई तौर पर ही सही, किसानों ने अपनी शक्ति को आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे नगरों के आन्दोलन से जोड़ दिया. यह कहा जा सकता है कि आबादी के हिस्से के रूप में किसानों के साझा हित हो सकते हैं लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उनके हित सदैव समान होते हैं . वे एक जन के रूप में तभी उठ खडे होते हैं जब अत्यधिक दरिद्रता उन्हें सभी जगह घेर लेती है और विद्यमान सामाजिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली उन पर ऐसा ताज़ा आघात करती है जिससे उनका सब्र का प्याला छलक जाता है. स्थानीय हित सदैव प्रबल बने रहते हैं. इसके फलस्वरूप, प्रतिरोध की इच्छा बलबती होने के बावजूद, कृषक वर्ग आसानी से कथित सुधारों के झांसे में आ जाता है और अपनी ओर फेंके गए टुकडों से आसानी से धोखा खा जाता है. शुरुआती उत्साह ज़ल्दी ही समाप्त हो जाता है और एक गाँव के बाद दूसरा गाँव, मात्र छोटे-मोटे सुधारों से संतुष्ट हो जाता है और ‘साझा उद्देश्य’ का परित्याग कर देते हैं. एक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करते रहने की क्षमता राजनीतिक सक्रियता का एक रूप है. इस नज़रिए से किसान कभी भी ज्यादा सक्रीय नहीं रहे हैं, उस वक्त भी नहीं जब कृषक वर्ग का शेष आबादी से विभेदीकरण नहीं हुआ था.

असरदार कार्रवाई करने की किसानों की क्षमता और भी घट जाती है जब वे वित्तीय अर्थव्यवस्था के अधीन हो जाते हैं. उनका विभेदीकरण न केवल समुदाय, गाँव में हो जाता है बल्कि वे विभिन्न क्षेत्रीय समूहों में बिखर जाते हैं जिनके अपने विशिष्ट हित होते हैं. क्रांति में, किसान समुदाय ने सक्रीय भूमिका शायद ही कभी निभाई है. शहरों में क्रांति शुरू हो जाने के बाद ही कृषक आन्दोलन शुरू होता है और इसे जारी रखने में सहायक होता है. यही वह घटनाक्रम है जो महान फ्रांसीसी क्रांति के दौरान घटित हुआ और ठीक ऐसा ही जर्मनी और ऑस्ट्रिया में.

बुर्जुआ दार्शनिक, विशेषतया यूरोपीय महाद्वीप के बुर्जुआ दार्शनिक, व्यक्तियों के उस समूह को सर्वहारा का अभिन्न अंग मानते हैं जिसे मार्क्स ने “लम्पट सर्वहारा” (कंगाल या आवारा सर्वहारा) की संज्ञा दी है. इन महानुभावों के नज़रिए से प्रत्येक सर्वहारा भिखारी होता है, “कंगाल” होता है, “आवारा” होता है. स्टिर्नर (बाकुनिन के शिक्षकों में से एक) के साथ हुए वाद-विवाद में मार्क्स प्रमाणित करते हैं कि

“केवल बर्बाद सर्वहारा कंगाल की स्थिति में पहुँच जाता है. बुर्जुआ दवाब के खिलाफ सर्वहारा की प्रतिरोध क्षमता जब ख़त्म हो जाती है तब वह इस सबसे निचले पायदान पर पहुँच जाता है. इसलिए केवल वही मेहनतकश कंगाल बन जाता है जिसकी सम्पूर्ण शक्ति निचोड़ ली जाती है.” (मार्क्स ,Der heileige Max Stirner, बर्नस्टीन द्वारा संपादित, Dokumente des Sozialismus में संकलित, खंड 3, पृ. 175)

पूंजी में जब मार्क्स सापेक्ष बेशी आबादी के विभिन्न रूपों का विश्लेषण करते हैं, तब वह बताते हैं कि सापेक्ष बेशी आबादी का तलछट कंगाली की ज़िन्दगी बसर करता है. कंगाल सर्वहारा को वे अलग श्रेणी में रखते हैं जिनमें वे आवारा लोगों, अपराधियों, वेश्याओं और समाज के लिए घातक अन्य व्यक्तियों को शामिल करते हैं. वह बताते हैं (पृ. 712) कि “कंगाली सक्रीय श्रम सेना का विकलांग-गृह और औद्योगिक रिज़र्व सेना के गले का पत्थर होती है.” औद्योगिक उत्पादन से बहिष्कृत ये लोग महानगरों में इकठ्ठा होते जाते हैं, वे गुंडा, आवारागर्द, बदमाश, आदि बन जाते हैं, वे उत्पादन प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं निभाते हैं, प्रतिक्रियावादियों से साँठ-गांठ करने के लिए हरदम तैयार रहते हैं और इस प्रकार ब्लैक हंडरैड या फासीवादियों की कतारों में बढोत्तरी करते रहते हैं.

अठाहरवीं ब्रूमेर में मार्क्स ने उन ऐतिहासिक परिस्थितियों का प्रतिभाशाली विश्लेषण किया है जिन्होंने नेपोलियन तृतीय (1808-1873) को तख्ता पलट करने में मदद की. इस पुस्तक में वे उस क्रांति के सफलतापूर्ण संपन्न होने के लिए पेरिस के लम्पट सर्वहारा द्वारा निभाई गयी महत्त्वपूर्ण भूमिका से अवगत कराते हैं. इस क्रांति ने तीसरे नेपोलियन के अधीन बुर्जुआ शक्ति को सुदृढ़ बना दिया था. ‘दस दिसम्बर सोसायटी’, 1849 में बनी थी.

“एक परोपकारी समाज की स्थापना के बहाने पेरिस के लम्पट सर्वहारा का एक गुप्त संगठन बनाया गया. इसके प्रत्येक विभाग का मुखिया एक बोनापार्तवादी गुर्गा था और पूरी सोसायटी का सरदार एक बोनापार्तवादी जनरल था. बीमार ऐयाश जिनकी रोज़ी का जरिया और वंशावली संदिग्ध थी, बुर्जुआ कतारों से निकाल दिए गए दिवालिया सट्टेबाज़ के अलावा आवारा लोग, फौज से निकाल दिए गये सिपाही, जेल से छूटे मुजरिम, जेलों से भगौड़े कैदी, ठग, बाजीगर, पेशेवर भिखमंगे, पाकेटमार, जादूगर, जुआडी, औरतों के दलाल, चकला मालिक, कुली, पत्रकार, बाजावाले, चिथड़े बीनने वाले, सान धरने वाले ठठेरे — यानि वह पूरा, इधर-उधर बिखरा हुआ, अनिश्चित शक्ल का विघटित जन-समुदाय जिसे फ्रांसीसी लोग समूहवाचक संज्ञा ‘ला बोहेम’ कहते हैं – यही थे लुइ बोनापार्ट के सगोत्रीय तत्त्व जिनको लेकर उसने ‘दस दिसम्बर सोसायटी’ के ढांचे का बहुलांश गठित किया था.” (मार्क्स, द एटीन्थ ब्रूमेर ऑफ़ लुई बोनापार्ट, पृ. 83)

फासीवाद के 14 लक्षण

Posted on Updated on

डा. लॉरेंस ब्रिट

डा. लॉरेंस ब्रिट  – एक राजनीतिक विज्ञानी जिन्होंने फासीवादी शासनों जैसे हिटलर (जर्मनी), मुसोलिनी (इटली ) फ्रेंको (स्पेन), सुहार्तो  (इंडोनेशिया), और पिनोचेट (चिली) का अध्ययन  किया और निम्नलिखित 14 लक्षणों की निशानदेही की है;

1. शक्तिशाली और सतत राष्ट्रवाद — फासिस्ट शासन देश भक्ति के आदर्श वाक्यों, गीतों, नारों , प्रतीकों और अन्य सामग्री का निरंतर उपयोग करते हैं. हर जगह झंडे दिखाई देते हैं जैसे वस्त्रों पर झंडों के प्रतीक और सार्वजानिक स्थानों पर झंडों की भरमार.

2. मानव अधिकारों के मान्यता प्रति तिरस्कार — क्योंकि दुश्मनों से डर है इसलिए फासिस्ट शासनों द्वारा लोगो को लुभाया जाता है कि यह सब सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वक्त की ज़रुरत है. शासकों के दृष्टिकोण से लोग घटनाक्रम को देखना शुरू कर देते हैं और यहाँ तक कि वे अत्याचार, हत्याओं, और आनन-फानन में सुनाई गयी कैदियों को लम्बी सजाओं  का अनुमोदन करना भी शुरू कर देते हैं.

3. दुश्मन या गद्दार की पहचान एक एकीकृत कार्य बन जाता है — लोग कथित आम खतरे और दुश्मन – उदारवादी; कम्युनिस्टों, समाजवादियों, आतंकवादियों, आदि के खात्मे की ज़रुरत प्रति उन्मांद की हद तक एकीकृत किए जाते हैं.

4. मिलिट्री का वर्चस्व — बेशक व्यापक घरेलू समस्याएं होती हैं पर  सरकार सेना का विषम फंडिंग पोषण करती है. घरेलू एजेंडे की उपेक्षा की जाती है ताकि मिलट्री और सैनिकों का हौंसला बुलंद और ग्लैमरपूर्ण बना रहे.

5. उग्र लिंग-विभेदीकरण — फासिस्ट राष्ट्रों की सरकारें लगभग पुरुष प्रभुत्व वाली होती  हैं. फासीवादी शासनों के अधीन, पारंपरिक लिंग भूमिकाओं को और अधिक कठोर बना दिया जाता है. गर्भपात का सख्त विरोध होता है और कानून और राष्ट्रीय नीति होमोफोबिया और गे विरोधी होती है

6. नियंत्रित मास मीडिया – कभी कभी तो मीडिया सीधे सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है, लेकिन अन्य मामलों में, परोक्ष सरकार विनियमन, या  प्रवक्ताओं और अधिकारियों द्वारा पैदा की गयी सहानुभूति द्वारा मीडिया को नियंत्रित किया जाता  है.   सामान्य युद्धकालीन सेंसरशिप विशेष रूप से होती है.

7. राष्ट्रीय सुरक्षा का जुनून – एक प्रेरक उपकरण के रूप में सरकार द्वारा इस डर का जनता पर प्रयोग किया जाता है.

8.धर्म और सरकार का अपवित्र गठबंधन — फासिस्ट देशों में सरकारें एक उपकरण के रूप में सबसे आम धर्म को आम राय में हेरफेर करने के लिए प्रयोग करती हैं. सरकारी नेताओं द्वारा धार्मिक शब्दाडंबर और शब्दावली का प्रयोग सरेआम होता है बेशक धर्म के प्रमुख सिद्धांत सरकार और सरकारी कार्रवाईयों के विरुद्ध होते हैं.

9. कारपोरेट पावर संरक्षित होती है – फासीवादी राष्ट्र में औद्योगिक और व्यवसायिक शिष्टजन सरकारी नेताओं को शक्ति से नवाजते हैं जिससे अभिजात वर्ग और सरकार में एक पारस्परिक रूप से लाभप्रद रिश्ते की स्थापना होती है.

10. श्रम शक्ति को दबाया जाता है – श्रम-संगठनों का पूर्ण रूप से उन्मूलन कर दिया जाता है या कठोरता से दबा दिया जाता है क्योंकि फासिस्ट सरकार के लिए एक संगठित श्रम-शक्ति ही वास्तविक खतरा होती है.

11. बुद्धिजीवियों और कला प्रति तिरस्कार – फासीवादी राष्ट्र उच्च शिक्षा और अकादमिया के प्रति दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं. अकादमिया और प्रोफेसरों को सेंसर करना और यहाँ तक कि गिरफ्तार करना असामान्य नहीं होता. कला में स्वतन्त्र अभिव्यक्ति पर खुले आक्रमण किए जाते हैं और सरकार कला की फंडिंग करने से प्राय: इंकार कर देती है.

12. अपराध और सजा प्रति जुनून – फासिस्ट सरकारों के अधीन  कानून लागू करने के लिए पुलिस को लगभग असीमित अधिकार दिए जाते हैं.  पुलिस ज्यादितियों के प्रति लोग प्राय: निरपेक्ष होते हैं  यहाँ तक कि वे सिविल आज़ादी तक को देशभक्ति के नाम पर कुर्बान कर देते हैं. फासिस्ट राष्ट्रों में अक्सर असीमित शक्ति वाले  विशेष पुलिस बल होते हैं.

13. उग्र भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार — फासिस्ट राष्ट्रों का राज्य संचालन मित्रों के समूह द्वारा किया जाता है जो अक्सर एक दूसरे को सरकारी ओहदों पर नियुक्त करते हैं  और एक दूसरे को जवाबदेही से बचाने के लिए सरकारी शक्ति और प्राधिकार का प्रयोग किया जाता है. सरकारी नेताओं द्वारा राष्ट्रीय संसाधनों और खजाने को लूटना असामान्य बात नहीं होती.

14.चुनाव महज धोखाधड़ी होते हैं — कभी-कभी होने वाले चुनाव महज दिखावा होते हैं. विरोधियों के विरुद्ध लाँछनात्मक अभियान चलाए जाते है और कई बार हत्या तक कर दी जाती है , विधानपालिका के अधिकारक्षेत्र का प्रयोग वोटिंग संख्या या राजनीतिक जिला सीमाओं को नियंत्रण करने के लिए और मीडिया का दुरूपयोग करने के लिए किया जाता है.

सांस्कृतिक मोर्चे पर अन्तरराष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण का प्रश्न

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कहने की आवश्यकता नहीं कि जीवन के हर क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का नज़रिया व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भों में हर-हमेशा अन्तरराष्ट्रीयतावादी होता है। लेकिन आज पूँजी के भूमण्डलीकरण के नये दौर में, एक ओर जहाँ बुर्जुआ राष्ट्रवाद क्षरित-स्खलित होकर, अपनी ऐतिहासिक सकारात्मकता खोकर फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद का लगभग समानार्थी-सा बन गया है, वहीं सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावादी चेतना का ज्यादा मज़बूत और व्यापक भौतिक आधार भी तैयार हुआ है।

सर्वहारा अन्तरराष्ट्रीयतावाद के दो सन्दर्भों की चर्चा प्रकारान्तर से ऊपर के दो उपशीर्षकों के अन्तर्गत आ चुकी है। पहली बात, राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियों का दौर बीतने के बाद राष्ट्रवाद के रणनीतिक नारों का झण्डा सर्वहारा वर्ग और मुक्तिकामी जनों के विरुद्ध अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। अन्तरविरोध आज सीधे-सीधे श्रम और पूँजी के दो शिविरों के बीच है। संस्कृति के मोर्चे पर आज यह एक अति महत्त्वपूर्ण काम है कि हम फासिस्ट अन्धराष्ट्रवाद सहित प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ राष्ट्रवाद की संस्कृति का व्यापक भण्डाफोड़ और विरोध करें और श्रम की संस्कृति का, अन्तरराष्ट्रीयतावादी श्रमिक एकजुटता के विचार का विकल्प सामने रखें। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति दो चीज़ें हैं। राष्ट्रवाद एक बुर्जुआ परिघटना के रूप में जब अपनी ऐतिहासिक प्रासंगिकता खो देगा, तब भी देशभक्ति की भावना व संस्कृति बनी रहेगी। वह बुर्जुआ देशभक्ति की संस्कृति न होकर सर्वहारा देशभक्ति की संस्कृति होगी। सर्वहारा वर्ग ही अपने देश की जनता, संस्कृति और प्रकृति को वास्तविक प्यार करता है और अपने देश में समाजवाद की विजय के बाद वह समाजवादी मातृभूति की रक्षा के लिए हर कीमत चुकाने को तैयार रहेगा।

दूसरी बात, जब हम अपनी सांस्कृतिक-वैचारिक परम्परा की बात करते हैं तो इसका एक पक्ष है हमारे देश की मुक्तिकामी जनता के इतिहास की विरासत और दूसरा पक्ष है, पूरी दुनिया के सर्वहारा संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों से जुड़ी सांस्कृतिक विरासत और पूरी दुनिया की मुक्तिकामी जनता की सांस्कृतिक विरासत। यही संस्कृति के क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग का सही-सन्तुलित अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिया है।

जब हम सांस्कृतिक क्षेत्र में सर्वहारा वर्ग के अन्तरराष्ट्रीयतावादी नज़रिए की बात करते हैं तो उसका मतलब सिर्फ यही नहीं होता कि पूरी दुनिया के सर्वहारा वर्ग के कला-साहित्य की समृद्ध सम्पदा को हम अपनी विरासत के रूप में स्वीकार करते हैं, इसका मतलब यह भी होता है कि यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन काल के मानवतावादी, जुझारू भौतिकवादी, जनवादी साहित्य तथा उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप और रूस के महान यथार्थवादी और क्रान्तिकारी जनवादी साहित्य की पूरी परम्परा का हम अपने को उत्तराधिकारी मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि समूचे विश्व के समग्र क्लासिकीय साहित्य-सम्पदा को हम अपनी विरासत मानते हैं। इसका मतलब यह भी होता है कि किसी भी देश के सर्वहारा का क्रान्तिकारी सांस्कृतिक आन्दोलन विश्व मज़दूर आन्दोलन के अतिरिक्त, सभी देशों के राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों, प्रतिरोध संघर्षों और जन-आन्दोलनों के दौर के कला-साहित्य की विरासत को अपनाता है, उनका द्वन्द्वात्मक विश्लेषण करता है तथा उनके ज़रूरी अवयवों को आत्मसात कर लेता है। यह महज़ एक सैद्धान्तिक `अप्रोच´ का सवाल नहीं, ठोस व्यावहारिक कार्रवाई का मुद्दा है। एक उदाहरण लें। अफ्रीकी जनता के प्रतिरोध-संगीत, अमेरिकी अश्वेतों के प्रतिरोध संगीत, मेक्सिको व लातिन अमेरिकी देशों की अधूरी क्रान्तियों और किसान संघर्षों के दौरान सृजित क्रान्तिकारी संगीत – इन सभी में पूंजी की सत्ता, वर्चस्व और उत्पीड़न के प्रतिरोध के तत्त्व हैं, समानता के स्वप्न हैं, संघर्ष की आग है। भारतीय सर्वहारा का संगीत आन्दोलन अपने देश के जन संघर्षों के गीत-संगीत और लोक संगीत के अतिरिक्त उपरोक्त अन्तरराष्ट्रीय विरासत को भी अपनाएगा और इस सतत्-सुदीर्घ प्रक्रिया में सर्वहारा संगीत की सार्वभौमिक सम्प्रेषणीयता, उसकी एक सच्ची “अन्तरराष्ट्रीय भाषा” विकसित होगी। यही बात सर्वहारा के समाजवादी यथार्थवादी थिएटर और सिनेमा के लिए, तथा साहित्य के लिए भी लागू होती है।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ , शिशिर-बसंत 2002 से साभार

धार्मिक कट्टरपन्थ फ़ासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर सही क्रान्तिकारी रणनीति अपनाओ!

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर समकालीन धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी उभार की वैचारिक-ऐतिहासिक समझ में गम्भीर दृष्टि-दोष दीखते हैं और इनका प्रतिरोध भी प्राय: रस्मी, प्रतीकात्मक और कुलीनतावादी सीमान्तों में कैद दीखता है।

नाटकों, कविताओं और कहानियों में प्राय: हिन्दुत्ववादी कट्टरपंथियों का विरोध `सर्वधर्म समभाव´ की ज़मीन से या बुर्जुआ मानवतावाद या बुर्जुआ जनवाद की ज़मीन से करने की प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। यह सर्वहारा संस्कृतिकर्मी का सिरदर्द नहीं है कि संघ परिवार ने संविधान और न्यायतंत्र को ख़तरे में डाल दिया है। इसकी चिन्ता संविधान और न्यायतंत्र के पहरुए करें। हम यदि इसका हवाला भी देंगे तो पूरी व्यवस्था के चरित्र और फ़ासीवाद के चरित्र को समझाने और `एक्सपोज़र´ के नज़रिए से देंगे। लोगों की निजी धार्मिक आस्थाओं के अनुपालन के जनवादी अधिकार के प्रति अपनी पूर्ण प्रतिबद्धता ज़ाहिर करते हुए भी, हमें “उदार हिन्दू” या “रैडिकल हिन्दू” का रुख अपनाने के बजाय धर्म के जन्म और इतिहास की भौतिकवादी समझ का प्रचार करना होगा, धर्म के प्रति सही सर्वहारा नज़रिए को स्पष्ट करना होगा, धर्म और साम्प्रदायिकता के बीच के फर्क को स्पष्ट करते हुए एक आधुनिक परिघटना के रूप में साम्प्रदायिकता की समझ बनानी होगी तथा संकटग्रस्त पूँजीवाद की विचारधारा और राजनीति के रूप में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी उभार का विश्लेषण प्रस्तुत करना होगा। हमें यह स्पष्ट करना होगा कि भारत में धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी उभार यहाँ की पूँजीवादी व्यवस्था के सर्वग्रासी संकट की राजनीतिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति होने के साथ ही, पुनरुत्थान और विपर्यय के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में, धार्मिक कट्टरपन्थ के विश्वव्यापी उभार का भी एक हिस्सा है। इसका सम्बन्ध मूलगामी तौर पर, विश्व पूँजीवाद के ढाँचागत संकट से है, आर्थिक कट्टरपन्थ की वापसी के दौर से है तथा बुर्जुआ जनवाद के निर्णायक विश्व-ऐतिहासिक पराभव के दौर से है।

यह सर्वहारा की अवस्थिति नहीं हो सकती कि वह निर्गुण भक्ति आन्दोलन के सहारे, गांधीवादी मानवतावाद के सहारे या नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के सहारे या संविधान पर ख़तरे की दुहाई देते हुए साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का विरोध करे। कबीर और निर्गुण भक्ति आन्दोलन की सन्त परम्परा जनता की महान सांस्कृतिक परम्परा है, पर यह आन्दोलन मध्ययुगीन सामन्ती निरंकुश स्वेच्छाचारिता, ब्राह्मणवादी जातिगत उत्पीड़न और कर्मकाण्डों के विरुद्ध किसानों-दस्तकारों के “नये धार्मिक” तर्कों पर ही आधारित था। आज का धार्मिक कट्टरपन्थ मध्ययुगीन प्रतिक्रियावादी अधिरचना के बहुतेरे तत्त्वों को अपनाए हुए है, लेकिन यह एक आधुनिक परिघटना है, इसकी जड़ें वित्तीय पूँजी के वैश्विक तंत्र और भारतीय पूँजीवादी राज, समाज, उत्पादन और संस्कृति की रुग्णता में हैं। गांधी की आत्मा का आवाहन भी साम्प्रदायिकता के प्रेत से निपटने में काम नहीं आ सकता, क्योंकि गांधी के मानवतावाद में धार्मिक पुराणपन्थ और धार्मिक `यूटोपिया´ का जो स्थान था, उसके चलते धर्म के धार्मिक कट्टरपन्थी इस्तेमाल के विरुद्ध वह आज जनता के वैचारिक सांस्कृतिक अस्त्र की भूमिका निभाने में कतई अक्षम हो चुका है। एक मरियल किस्म के भौतिकवाद की ज़मीन पर खड़ी नेहरू की धर्मनिरपेक्षता को भी आज पुनर्जीवित कर पाना ठीक उसी प्रकार सम्भव नहीं है जिस प्रकार नेहरूवादी “समाजवाद” के दिनों को वापस लौटा लाना।

यह इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुसंगत समझ का अभाव ही है कि भगवान सिंह जैसे रचनाकार साम्प्रदायिकता को सुनिश्चित सामाजिकार्थिक भौतिक आधार से उद्भूत सांस्कृतिक-राजनीतिक परिघटना के रूप में नहीं बल्कि एक मनोवैज्ञानिक समस्या या रुग्णता के रूप में देखते हैं (`उन्माद´ उपन्यास)।

जहाँ तक धार्मिक कट्टरपन्थ के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यावहारिक-आन्दोलनात्मक कार्रवाइयों का सम्बन्ध है, इनका स्वरूप अत्यन्त संकुचित, अनुष्ठानिक और कुलीनतावादी है तथा इनकी अन्तर्वस्तु मुख्यत: सामाजिक जनवादी है। वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों की अधिकांश कार्रवाइयाँ शहरी मध्यवर्ग तक सीमित हैं। संघ परिवारी फ़ासिस्टों की आक्रामक कार्रवाइयों के विरुद्ध दिल्ली-बम्बई के अभिजात सांस्कृतिक अड्डों पर रस्मी विरोध-प्रदर्शन, साम्प्रदायिक दंगा ग्रस्त क्षेत्रों में टीमें भेजना और रिपोर्टें (वह भी प्राय: अंग्रेज़ी में) जारी करना, उन्नत चेतना वाले शिक्षित मध्यवर्ग तक सीमिति साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ-कहानी-निबन्ध आदि लिखना, कुछ गोष्ठी-सेमिनार व अन्य आयोजन तथा कभी-कभार कुछ नुक्कड़ नाटक जैसे कार्यक्रम – विगत लगभग डेढ़ दशक के फ़ासीवादी उभार के ग्राफ के समान्तर हमारी सांस्कृतिक जन-कार्रवाइयों की यही स्थिति है। दरअसल, राजनीतिक दायरे में संसदमार्गी वामपन्थ संसदीय-संवैधानिक सीमान्तों के भीतर, मुख्यत: संसदीय जनवाद की हिफ़ाज़त के नारे के साथ, मतदान की राजनीति को धुरी बनाकर, फ़ासीवाद का जैसा विरोध कर रहा है, काफी कुछ वैसा ही सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हो रहा है।

फ़ासीवाद की वैचारिक समझ के लिए गम्भीर विमर्श और जनता के जनवादी अधिकारों पर फ़ासिस्ट डकैती का फौरी विरोध ज़रूरी है, लेकिन सवाल यह है कि फासिज्म के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष करने वाले मज़दूर वर्ग और बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी को जागृत, शिक्षित और गोलबन्द करने के लिए हम क्या कर रहे हैं? धार्मिक कट्टरपन्थ के हर पहलू पर सीधी-सादी भाषा में पर्चे, पुस्तिकाएँ लिखकर उनका व्यापक वितरण, औद्योगिक क्षेत्रों में और गाँव के ग़रीबों के बीच गीतों-नाटकों आदि के ज़रिए व्यापक शिक्षा और प्रचार के काम क्यों नहीं संगठित हो पा रहे हैं? क्या इसके लिए वामपन्थी लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के भीतर व्याप्त मध्यवर्गीय कुलीनता-कायरता और सुविधाभोगी स्वार्थपरता ज़िम्मेदार नहीं है?

हमें याद रखना होगा कि मज़दूरों और अन्य मेहनतकश वर्गों के बीच धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवादी राजनीति के असली “चाल-चेहरे-चरित्र” को नंगा करना हमारा सर्वोपरि दायित्व है। सच्चे वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों को याद रखना होगा कि फ़ासीवाद के रस्मी सामाजिक जनवादी संशोधनवादी विरोधों ने प्रकारान्तर से उसकी मदद ही की है। सामाजिक-जनवादी विभ्रमों से छुटकारा पाए बग़ैर मध्यवर्ग का रैडिकल जनवादी हिस्सा भी धार्मिक कट्टरपन्थ के विरुद्ध आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार नहीं हो सकेगा और सर्वहारा वर्ग के साथ क्रान्तिकारी संयुक्त मोर्चा में शामिल नहीं हो सकेगा। तकरीबन 75 वर्षों पहले कही गई भगतसिंह की ये बातें आज भी प्रासंगिक हैं और सांस्कृतिक मोर्चे के सेनानियों को भी इन पर अवश्य ही ग़ौर करना चाहिए, “लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब मेहनतकशों और किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए। और इनके हत्थे चढ़ कुछ नहीं करना चाहिए। संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता और देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा। इससे किसी दिन तुम्हारी ज़ंजीरें कट जाएँगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी…” (साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज´)

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर विचारधारात्मक संघर्ष

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

वर्ग-संघर्ष की वैज्ञानिक चेतना को विकसित करने के लिए हमें कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर भी वर्ग-संघर्ष को तीखा करने का काम करना होगा। हमें श्रम की दुनिया में क्रान्ति की वस्तुगत आवश्यकता को एक बार फिर आम जनगण की उद्दाम, दुर्निवार आकांक्षा में रूपान्तरित कर देना है। साहित्य का, समग्र संस्कृति कर्म का कर्तव्य है कि वह लोगों को निराशा और विभ्रमों से छुटकारा दिलाकर तमाम मानवद्रोही शक्तियों और मानवद्रोही व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह में उठ खड़ा होने के लिए तैयार करे। जीवन के अन्य सभी मोर्चों की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी हमें आज “नये संघर्षोंको गौरवमण्डित करने के लिए”, “सम्मुख उपस्थित कार्यभार को कल्पना में वृहद आकार देने के लिए”, “एक बार फिर क्रान्ति की आत्मा को जागृत करने के लिए” अतीत के संघर्षों की महानता-महत्ता और वैचारिक परम्परा का पुनरान्वेषण करना है। इस दृष्टि से सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आज की पहली प्राथमिकता वैचारिक कार्य और वैचारिक तैयारियों की है।

किसी भी मोर्चे पर नई तैयारियाँ हर-हमेशा विचारधारात्मक धरातल से ही शुरू होती हैं। भविष्य का विजेता वर्ग अपने विरोधी को सबसे पहले विचारधारात्मक मोर्चे पर ही शिकस्त देता है। सांस्कृतिक मोर्चे पर भी आज पहली ज़रूरत वैचारिक सफ़ाई और तैयारी की, वैचारिक आक्रमणों के प्रतिकार की और वैचारिक प्रत्याक्रमण की है। ध्यान रखना होगा कि यह बुनियादी काम है, पर एकमात्र नहीं। और यह भी याद रखना होगा कि इसे “अध्ययन-कक्ष के योद्धा” और निठल्ले विमर्शक नहीं, बल्कि जनता के बीच सक्रिय सांस्कृतिक सेनानी ही अंजाम दे सकेंगे। विपर्यय, पुनरुत्थान और संक्रमण के समय में इतिहास का पुनरीक्षण, वर्तमान का विश्लेषण और भविष्य की दिशा तय करने का काम केन्द्रीय बन जाता है, अत: विचार-पक्ष पर केन्द्रीय ज़ोर स्वाभाविक हो जाता है।

अतीत में ऐसा कई बार हुआ है कि ऐतिहासिक संक्रमण कालों में संस्कृति का क्षेत्र विचारधारात्मक संघर्ष का अहम मोर्चा, और कभी-कभी तो मुख्य रंगमंच बन जाता रहा है। यूरोपीय पुनर्जागरण और प्रबोधन-काल के इतिहास की बस हम याद दिलाना चाहेंगे।

लेकिन जब हम कहते हैं कि आज संस्कृति का क्षेत्र विचारधारात्मक संघर्ष का केन्द्रीय रणांगन बना हुआ है तो यह इतिहास-निगमित सूत्र के दुहराने के रूप में नहीं बल्कि इस समय मौजूद स्थिति के वस्तुगत मूल्यांकन के रूप में कहते हैं। हम देखें, राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में तो स्थिति यह है कि वर्तमान परिस्थितियाँ बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों के मुँह से मार्क्सवादी प्रस्थापनाएँ उगलवा रही हैं। सीधे विचारधारा के क्षेत्र में, मार्क्सवादी दर्शन या समाजवादी प्रयोगों की शिक्षाओं को तोड़ने-मरोड़ने का काम तो हो रहा है, पर वास्तव में बुर्जुआ वर्ग कोई नया हमला बोल ही नहीं सका है। जिन मुद्दों पर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारिम्भक दो दशकों तक मार्क्सवाद बुर्जुआ विचारधारा को परास्त कर चुका है, उन्हें ही भाड़े के कलमघसीट कुछ यूँ उठा रहे हैं मानो यह एकदम नई बात हो, मार्क्सवाद पर कोई नया सवाल हो। समाजवाद की फ़िलहाली पराजय को लेकर जो भी बातें की जा रही हैं, उनके उत्तर लेनिन के अन्तिम दौर के चिन्तन से लेकर माओ के सांस्कृतिक क्रान्ति-कालीन चिन्तन तक में मौजूद हैं।

देखा जाए तो अधिक षड्यंत्रकारी और प्रभावी ढंग से, अमूर्त बौद्धिक निरूपणों-सूत्रीकरणों का वाग्जाल रचते हुए, विगत दो दशकों के दौरान जो “सांस्कृतिक विमर्श” हुए हैं और जो नये सामाजिक, सांस्कृतिक और सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त गढ़े गए हैं, उन्होंने द्वन्द्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी जीवन-दृष्टि पर सर्वाधिक प्रभावी चोटें की हैं। इन नये विमर्शों-सिद्धान्तों में हम उत्तर-आधुनिकतावाद, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर-मार्क्सवाद, उत्तर-मार्क्सवादी नारीवाद, प्राच्यवाद, `सबआल्टर्न´ इतिहास-लेखन आदि-आदि-सभी को शामिल कर रहे हैं। इनके तर्क भी दरअसल नये नहीं हैं। इनमें हीगेल का विदू्रप है और नीत्शे से लेकर स्पेंग्लर तक की अनुगूँजें हैं, पर “सांस्कृतिक विमर्शों” में इन्हें प्रभावी ढंग से नया और समकालीन बनाकर पेश किया जा रहा है। संशोधनवादियों और अकादमिक वामपन्थियों का एक हिस्सा पक्ष-परिवर्तन करके इस जमात में शामिल हो गया है, दूसरा हिस्सा इनसे काफ़ी-कुछ उधार लेकर समन्वयवाद की राह चल रहा है और तीसरा हिस्सा इनका आधा-अधूरा, मरियल और अमूर्त अकादमिक विमर्श की ही भाषा में जवाब दे रहा है। सही ईमानदार, वामपन्थी लेखक-संस्कृतिकर्मी प्राय: दिग्भ्रमित हैं और ख़ास तौर पर जनपक्षधर युवा बुद्धिजीवियों पर इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इससे सांस्कृतिक मोर्चे की वैचारिक तैयारी और नई कतारों की तैयारी का काम भी प्रभावित हो रहा है।

संस्कृति के मोर्चे पर एक और दृष्टि से नये पुनर्जागरण और नये प्रबोधन के वैचारिक कार्यों को देखना-समझना ज़रूरी है। पुनरुत्थान के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में, वित्तीय पूँजी की “अन्तिम विजय” के इस दौर में, फ़ासीवादी प्रवृत्तियों का नया उभार एक विश्वव्यापी परिघटना है और हमारे देश में भी इनका श्मशान-नृत्य जारी है। वैचारिक धरातल पर, अतीत की ही तरह, इतिहास और संस्कृति के विकृतिकरण पर इनका मुख्य ज़ोर है। इसलिए भी, एक ओर जहाँ इनसे निर्णायक संघर्ष के लिए मेहनतकश जनता की लामबन्दी का काम तेज़ करना होगा, वही संस्कृति के क्षेत्र में इनके मुकाबले के लिए जमकर वैचारिक कार्य करना होगा और व्यापक प्रचार-कार्य भी।

सच पूछें तो आज समूचे बुर्जुआ वर्ग का दर्शन ही तर्कणा और जनवाद के मूल्यों से इतना रिक्त हो चुका है कि फ़ासीवादी विचार-दर्शन से उसकी विभाजक रेखा धूमिल हो गई है। यह अनायास नहीं है कि तमाम किस्म की “उत्तर” विचार-सरणियाँ आज बुर्जुआ पुनर्जागरण और उसकी मानववाद और इहलोकवाद की परम्परा को तथा बुर्जुआ प्रबोधनकाल और उसकी तर्कणा और जनवाद की विरासत को ही सिरे से खारिज करने का काम कर रही हैं। उस महान क्रान्तिकारी विरासत का वास्तविक वारिस तो सर्वहारा वर्ग ही है। उन्नीसवीं शताब्दी में सत्तारूढ़ होते ही बुर्जुआ वर्ग ने स्वतंत्रता-समानता-भ्रातृत्व के लाल झण्डे को धूल में फेंक दिया था तो सर्वहारा वर्ग ने उसे आगे बढ़कर उठा लिया था। आज जीवन में मानववाद और तर्कणा के प्राधिकार को स्थापित करने की लम्बी लड़ाई एक बार फिर एक उग्र चरण में है। यह सर्वहारा मानववाद और द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी तर्कणा के झण्डे को ऊँचा उठाने का समय है। यह आज के नये पुनर्जागरण और नये प्रबोधन का केन्द्रीय काम है और संस्कृति का मोर्चा ऐसे समय में बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

निचोड़ के तौर पर संस्कृति के मोर्चे के वैचारिक कार्यों को ठोस रूप में कुछ यूँ निरूपित किया जा सकता है :

(1) सबसे पहली बात तो यह कि सर्वहारा-संस्कृति के सर्जकों-शिल्पियों को मार्क्सवादी दर्शन और राजनीतिक अर्थशास्त्र का एक हद तक अध्ययन अवश्य करना होगा, तभी वे बुर्जुआ विभ्रमों से मुक्त हो सकते हैं, बुर्जुआ सांस्कृतिक विचारों का प्रतिकार कर सकते हैं और सामाजिक जीवन की प्रतीतियों की सतह भेदकर सारभूत यथार्थ को पकड़ सकते हैं।

(2) हमें साहित्य-कला-संस्कृति की मार्क्सवादी वैचारिकी के अध्ययन-मनन का काम करना होगा। पहले किया भी हो तो नये सिरे से करना होगा, विस्मृतियों की कालिख पोंछनी होगी। अतीत के सैद्धान्तिक बहसों-विमर्शों और प्रयोगों का नये सिरे से अध्ययन करना होगा और महत्त्वपूर्ण चीज़ों को पुनर्प्रस्तुत करना होगा।

(3) हमें तमाम “उत्तर” विचार-सरणियों की, अन्य नये-नये बुर्जुआ और “नववामपन्थी” संस्कृति-सिद्धान्तों की वैज्ञानिक आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

(4) हमें आज के बुर्जुआ मीडिया-विशेषज्ञों और बुर्जुआ संस्कृति उद्योग के सिद्धान्तकारों के नये-नये सिद्धान्तों की सांगोपांग चीर-फाड़ करनी होगी।

(5) हमें आज के सामाजिक यथार्थ और नई सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटनाओं-प्रवृत्तियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करना होगा और इस प्रक्रिया में मार्क्सवादी कला-दर्शन और सौन्दर्य-शास्त्र को समृद्ध और समकालीन बनाने की सतत्-प्रक्रिया को नया संवेग देना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

नए सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन— महत्तव्पूर्ण सामजिक-आर्थिक सरंचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

Posted on Updated on

एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में सृजन और आन्दोलन के सभी कार्यों को आज एकदम नये सिरे से संगठित करने की ज़रूरत है। हम सर्वहारा क्रान्ति की पक्षधर अवस्थिति से यह बात कह रहे हैं।

समय और समाज जब जनता के प्रचण्ड वेगवाही सांस्कृतिक आन्दोलन की माँग कर रहे हैं, तब कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में अराजकता, विभ्रम, भटकाव, अवसरवाद और ठहराव का बोलबाला है। ताकत कम नहीं है, पर कोशिशें बिखरी हुई हैं। जहाँ ईमानदारी और मेहनत से लगी हुई टीमें हैं, वहाँ वैचारिक समझ कमज़ोर है और अनुभववाद तथा `लकीर की फकीरी´ का बोलबाला है। निस्संकोच कहा जा सकता है कि प्रगतिशील वाम सांस्कृतिक धारा पर आज प्रच्छन्न बुर्जुआ और निम्न-बुर्जुआ धाराएँ हावी हैं। एक ओर नामधारी वाम के पुराने मठाधीशों-महामण्डलेश्वरों की गद्दियाँ और अखाड़े हैं तो दूसरी ओर विश्व के नये यथार्थ के अवगाहन और अतीत की “जड़ीभूत” विचारधारात्मक चिन्तन-पद्धतियों के पुनरीक्षण का दावा करने वाले अकर्मक “नव-मार्क्सवाद” के नौबढ़ प्रणेताओं के अड्डे हैं। क्रान्तिकारी वाम शिविर से जुड़े कई एक सांस्कृतिक संगठन और टोलियाँ हैं, पर उनका विचार-पक्ष कमज़ोर है। वे कला-साहित्य-संस्कृति की द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी समझ से, अपनी समृद्ध वैचारिक विरासत से और अतीत के सर्जनात्मक प्रयोगों से अपरिचित हैं। वे भरपूर जोश से क्रान्तिकारी आन्दोलन और प्रचार की कार्रवाइयों में लगे हैं, लेकिन वैचारिक समझ के अभाव में उनके सांस्कृतिक कार्य दिशाहीन और निष्प्रभावी होकर रह जा रहे हैं।

हमें इस भंवर से बाहर निकलना होगा। क्योंकि हमारे देश और समूची दुनिया के सामने आज यह प्रश्न पहले हमेशा की अपेक्षा अधिक ज्वलन्त और भयावह रूप में खड़ा है – या तो समाजवाद, या फिर बर्बरता! कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी यही प्रश्न केन्द्रीय है।

अकर्मण्य वैचारिक समझ घोड़े की लीद से बेहतर नहीं होती। वास्तविक आशावाद नियतत्ववादी नहीं होता। यदि हम आशावादी हैं तो हमें अपनी आशाओं को फलीभूत करने के लिए जी-जान से जूझना होगा। अकर्मक ज्ञान और अन्धा आशावाद – इन दोनों से बचना होगा।

नये सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन – महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संरचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

आज की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की इस निबन्ध में सविस्तार चर्चा सम्भव नहीं है और इसकी ज़रूरत भी नहीं है। लेकिन अलग से यह करना ही होगा क्योंकि सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुनिश्चित समझ के बिना संस्कृतिकर्मी भी अपने समय के जीवन के मर्म को नहीं पकड़ सकते। इसके बग़ैर वे सतह की परिघटनाओं को ही सारभूत यथार्थ मानकर प्रस्तुत करेंगे। इसके बिना वे भविष्य की ओर जारी यात्रा की गतिकी को नहीं समझ सकते और अपने कार्यभार नहीं निर्धारित कर सकते। आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, हमारे देश के आम लोगों का जीवन सर्वग्रासी संकट के जिस विषैले-दमघोंटू अन्धकार में घुट रहा है, उसकी हम यहाँ सूत्रवत चर्चा करेंगे। इतनी चर्चा पृष्ठभूमि के तौर पर ज़रूरी है।

हम आज भी साम्राज्यवाद के युग में जी रहे हैं जिसकी बुनियादी अभिलाक्षणिकताओं को और उन्नीसवीं शताब्दी के `स्वतंत्र प्रतियोगिता के युग´ से जिसकी भिन्नताओं को लेनिन ने उद्घाटित किया था। लेकिन आज, सतह की परिघटनाओं-प्रवृत्तियों के पर्यवेक्षण के आधार पर भी यह महसूस किया जा सकता है कि स्थितियों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं। विश्व-पूँजीवाद के असमाधेय संकटों की, साम्राज्यवाद की अभूतपूर्व आक्रामकता की, नई तकनोलॉजी के प्रयोग की, तीसरी दुनिया के देशों में निर्बन्ध पूँजी-निवेश और लूट की, इन देशों के बुर्जुआ शासक वर्ग के आत्म समर्पण की, मज़दूरों से अतिलाभ निचोड़ने की नई-नई तरकीबों और उनके छिनते अधिकारों की, सट्टेबाज़ी और अनुत्पादक प्रवृत्तियों की, सूचना-संचार के तंत्र की नई प्रभाविता की, फ़ासीवादी शक्तियों के नये उभार की और पहले से भिन्न तमाम लक्षणों-प्रवृत्तियों की चर्चा तो आम तौर पर होती है। इन तमाम बदलावों के पीछे सिर्फ़ यही कारण नहीं है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम संस्करण आज पराजित और विफल हो चुके हैं और सोवियत संघ के नेतृत्व में नामधारी समाजवादी (वस्तुत: राजकीय पूँजीवादी) ढाँचे वाले देशों का शिविर विघटित हो चुका है। इससे भी बुनियादी कारण (और ये दोनों अन्तर्सम्बन्धित हैं) यह है कि साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की कार्यप्रणाली और लगातार पैदा होने वाले अपने संकटों को निपटाने के उसेक तौर-तरीकों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं, और इनके चलते, विश्व पूँजीवाद के समूचे परिदृश्य में कुछ महत्त्वपूर्ण नई चीज़ें पैदा हुई हैं। इन बुनियादी कारणों को समझने की ज़रूरत है। इन बदलावों की पृष्ठभूमि के बनने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हो चुकी थी, गत शताब्दी के आठवें दशक से इनके लक्षण सतह पर उभरने लगे थे और अन्तिम दशक के दौरान एक नया बदला हुआ परिदृश्य एकदम सामने आ चुका था।

पहली बात, वित्तीय पूँजी की जो वरीयता और निर्णायक भूमिका उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में स्थापित हुई थी, वह गत शताब्दी के आठवें दशक तक चरम वर्चस्व में रूपान्तरित हो चुकी थी। दुनिया भर में निवेशित कुल पूँजी का तीन-चौथाई से भी अधिक आज सट्टा बाज़ार, मीडिया, मनोरंजन उद्योग और अन्य अनुत्पादक कार्रवाइयों में लगा हुआ है। वित्तीय पूँजी ने वास्तविक उत्पादन से स्वतंत्र होकर सम्पूर्ण विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व कायम कर लिया है और कीन्स की आशंका को हूबहू साकार करते हुए, उद्योग सट्टेबाज़ी के भंवर में सतह पर तैरने वाला बुलबुला बनकर रह गया है। आज जो पूँजी का विश्वव्यापी प्रसार दीख रहा है, वह सट्टेबाज़ी, मुद्रा-बाज़ारों में ऋण-सर्जन में सतत् वृद्धि और मुद्रा-पूँजी के अन्तरराष्ट्रीय आवागमन के रूप में है। साम्राज्यवाद के दौर में पूँजी के जिस परजीवी, परभक्षी, अनुत्पादक और जुआड़ी चरित्र की चर्चा लेनिन ने की थी, वह उस समय से कई गुना अधिक हो चुकी है।

आज विश्व-स्तर पर बुर्जुआ जनवाद के बचे-खुचे मूल्यों के भी निश्शेष होने, तरह-तरह की मूलतत्त्ववादी-नवफ़ासीवादी राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के सिर उठाने, तर्कणा और मानववाद के विरुद्ध नानाविध सांस्कृतिक उपक्रमों-उद्यमों के जन्म लेने तथा साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में माल-अन्धभक्ति, निरंकुशता, अतर्कपरकता, कलावाद-रूपवाद और मानवद्रोही प्रवृत्तियों के नये-नये रूपों के उभरने की ज़मीन यही है।

विश्व-स्तर पर पूँजी का विकास शेयर बाज़ारों और जुआघरों का `बाई-प्रोडक्ट´ बन जाने के चलते संकट के विस्फोट और महाध्वंस का भय हमेशा साम्राज्यवादियों-पूँजीपतियों के सिर पर सवार रहता है। बीच-बीच की अल्पकालिक राहतों के बावजूद, दीर्घकालिक मन्दी का दौर विगत तीन दशकों से लगातार मौजूद है। कभी तेज़ कभी मद्धम होता व्यापार युद्ध, बड़े-बड़े घरानों में से कुछ के तबाह होने का या किसी और द्वारा निगल लिये जाने का तथा नई-नई इजारेदारियों के गठन का सिलसिला लगातार जारी है। उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों, पूर्वी यूरोप के देशों और भूतपूर्व सोवियत संघ के घटक देशों के बाज़ार को साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी के लिए पूरी तरह खोल दिया है और चीन में “बाज़ार समाजवाद” की पिपिहरी बजाने वाले नये शासकों ने भी उसके स्वागत के लिए लाल गलीचे बिछा दिए हैं, पर पश्चिमी पूँजी का अजीर्ण रोग लगातार मौजूद है।

भूतपूर्व समाजवादी देशों में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना और राजकीय पूँजीवाद के सोवियत “समाजवादी” ढाँचे के विघटन के बाद पश्चिमी ढंग के पूँजीवादी ढाँचे की स्थापना मुख्यत: उन देशों के आन्तरिक वर्ग-संघर्ष का परिणाम थी, लेकिन इसमें साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की तथा साम्राज्यवादी घुसपैठ, घेरेबन्दी और षड्यंत्र की भी एक अहम भूमिका थी। इसी प्रकार, उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के तहत, एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों के बाज़ारों में साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी खुला चरागाह बना देने, सार्वजनिक क्षेत्र के विघटन का बुर्जुआ राज्य की बची-खुची “कल्याणकारी” भूमिका के निरस्तीकरण और “श्रम-सुधारों” के पीछे साम्राज्यवादी देशों के दबाव के साथ ही इन देशों के सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग की अपनी आवश्यकता और विवशता भी है। इन देशों में सत्तासीन होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोधों का लाभ उठाते हुए और जनता को निचोड़कर राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा कर एक सीमा तक पूँजीवाद का विकास किया। अब यह सिलसिला संतृप्ति-बिन्दु तक जा पहुँचा था। नई तकनोलॉजी, पूँजी और बाज़ार की अपनी ज़रूरतों के चलते साम्राज्यवादियों के गिरोह के दिशा-निर्देशों पर चलना अब इनके सामने एकमात्र विकल्प था। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर का यही सारतत्त्व है। इस नये दौर में पूँजी का वैश्विक प्रवाह एकदम निर्बन्ध हो गया है। साम्राज्यवादी शोषण इस नये दौर में प्रत्यक्ष राजनीतिक शासन या नियंत्रण के माध्यम से काम नहीं कर रहा है। राजनीतिक-सामरिक बल-प्रयोग और दबाव का अनिवार्य पहलू मौजूद है, लेकिन साम्राज्यवादी शोषण की प्रक्रिया मुख्यत: उस विशाल अन्तर के ज़रिए काम करती है जो विकसित देशों और पिछड़े देशों की उत्पादक शक्तियों के बीच बना हुआ है।

भारत और तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों के पूँजीपति वर्ग के किसी भी हिस्से का अब राष्ट्रीय चरित्र नहीं रह गया है। साम्राज्यवाद से विनियोजित अधिशेष में अपने हिस्से को लेकर देशी पूँजीपति वर्ग के अन्तरविरोध मौजूद हैं और वे समय-समय पर उग्र भी हो जाते हैं। देश के भीतर इजारेदार और ग़ैर इजारेदार पूँजी के बीच, बड़ी और छोटी पूँजी के बीच भी अन्तरविरोध हैं, पर वे ग़ैरदुश्मनाना अन्तरविरोध हैं। पूँजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा अब साम्राज्यवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए जनता के अन्य वर्गों के साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है।

राष्ट्रीय प्रश्न की ही तरह भूमि-प्रश्न भी अब सामाजिक क्रान्ति के एजेण्डे पर अपने पूर्ववर्ती रूप में उपस्थित नहीं रह गया है। प्रतिक्रियावादी “प्रशियाई” मार्ग से प्राक्पूँजीवादी भूमि-सुधारों के रूपान्तरण का काम पूँजीवादी व्यवस्था में सम्भव हदों तक, मुख्यत: पूरा हो चुका है। पुराने सामन्ती भूस्वामियों का एक बड़ा हिस्सा पूँजीवादी भूस्वामी बन चुका है। पहले के बड़े काश्तकार आज के बड़े मालिक किसान-कुलक बन चुके हैं। किसान आबादी का तेज़ विभेदीकरण गत तीन दशकों की एक महत्त्वपूर्ण परिघटना है। निम्न-मध्यम और छोटे किसान उजड़कर सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की पाँतों में शामिल हो रहे हैं। उच्च-मध्यम किसान धनी किसानों की कतारों में शामिल हो रहे हैं। पिछले दशक के दौरान यह प्रक्रिया और अधिक तेज़ हो गई है। गाँवों में भी श्रम और पूँजी का अन्तरविरोध ही प्रधान हो गया है। जहाँ अभी पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था की संक्रमणशील स्थिति है, वहाँ भी यही स्थिति है। वहाँ से भारी संख्या में उजड़कर किसान आबादी शहरों और विकसित पूँजीवादी खेती वाले इलाकों की ओर पलायन कर रही है। सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के आज सिर्फ़ अवशेष ही मौजूद हैं। गाँवों में वित्तीय पूँजी की पैठ मज़बूत हुई है, वे राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी में आ गए हैं, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था की जड़ता टूट गई है और कृषि और सहायक क्षेत्रों में भी माल-उत्पादन प्रभावी प्रवृत्ति बन गई है।

इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारतीय मध्यवर्ग का भी विगत कुछ दशकों के दौरान तेज़ विस्तार और विभेदीकरण हुआ है। मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों (प्रोफेसरों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों, नौकरशाहों, विशेषज्ञों आदि का) का एक बड़ा हिस्सा आज पूरी तरह से व्यवस्था के पक्ष में खड़ा हो चुका है। आम नौकरीपेशा, तबाहहाल मध्यवर्गीय कतारों से यह एकदम अलग खड़ा है। मध्यवर्ग के निचले संस्तरों की करीबी मेहनतकश वर्गों से बन रही है, हालाँकि उनकी निराशा, पिछड़े मूल्यों, जातिगत संस्कारों आदि का लाभ उठाकर धार्मिक कट्टरपन्थी ताकतें उनके एक हिस्से को अपने प्रभाव में लेने में फ़िलहाल कामयाब हैं। उच्च मध्यवर्ग आज उदारीकरण-निजीकरण के प्रवक्ता-समर्थक और धुर प्रतिक्रियावादी संस्कृति के संवाहक के रूप में व्यवस्था से नाभिनालबद्ध है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि हमारा पिछड़ा हुआ पूँजीवादी समाज आज राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के बजाय एक ऐसी नई समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में है जिसकी अन्तर्वस्तु साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी है। राष्ट्रीय जनवाद के अधूरे पड़े काम भी आज इसी के कार्यभारों में समाहित हो गए हैं। इस काम में सर्वहारा वर्ग का साथ मुख्यत: गाँव और शहर की भारी ग़रीब आबादी देगी और मध्यवर्ग और मध्यम किसानों के नीचे के संस्तर देंगे। बीच के संस्तर ढुलमुल सहयोगी होंगे। पूंजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा, खुशहाल मालिक किसान और उच्च मध्यवर्ग अब किसी भी सूरत में मेहनतकशों के रणनीतिक संश्रयकारी नहीं बनेंगे।

लेनिन के समय और आज के समय के बीच का एक महत्त्वपूर्ण फर्क यह है कि राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियाँ आज विश्व सर्वहारा क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण संघटक तत्त्व नहीं रह गई हैं। एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के अर्द्धऔद्योगीकृत पिछड़े देश ही आज भी साम्राज्यवाद की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं, पर इनमें से अधिकांश देशों में सामाजिक क्रान्तियों का एजेण्डा बदल चुका है। अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण, विश्व-सर्वहारा क्रान्ति के दूसरे चक्र में, वस्तुगत परिस्थितियों की दृष्टि से, इन्हीं देशों में सम्भावित हैं, पर इन क्रान्तियों की अन्तर्वस्तु अब साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी होगी। ये देशी-विदेशी पूँजी के संश्रय के विरुद्ध केन्द्रित नई समाजवादी क्रान्तियाँ होंगी, जो न केवल चीनी क्रान्ति से, बल्कि कई मायनों में सोवियत समाजवादी क्रान्ति से भी भिन्न होंगी।

सामाजिक शक्तियों के इस नये ध्रुवीकरण के अनुसार ही सांस्कृतिक मोर्चे के कार्यभारों की बुनियादी रूपरेखा तय होगी। कहा जा सकता है कि आज हमारी लड़ाई राष्ट्रीय जनवादी संस्कृति की नहीं बल्कि सर्वहारा जनवादी संस्कृति की, या कहें कि सर्वहारा संस्कृति की है। अब लोगों को यह बताने का अनुकूल समय है कि सिर्फ़ सर्वहारा जनवाद ही वास्तविक जनवाद होता है, कि आज सिर्फ़ दो ही मुख्य सांस्कृतिक पक्ष हैं – पूँजी की संस्कृति का पक्ष और श्रम की संस्कृति का पक्ष, और लोगों को इन्हीं दो के बीच अपना पक्ष चुनना होगा। कला-साहित्य के दायरे में व्यक्तिवाद और अलगाव की संस्कृति पर निर्णायक प्रहार के लिए आज निजी स्वामित्व की नैतिकता पर ही प्रश्न खड़े करने होंगे, लोभ-लाभ, बाज़ार और माल के रहस्यवाद की संस्कृति के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करना होगा, सम्पत्ति सम्बन्धों की तफसीलों को प्रस्तुत करना होगा और बुर्जुआ अधिकारों तथा अन्तरवैयक्तिक असमानताओं की सामाजिक-ऐतिहासिक बुनियादों को उद्घाटित करना होगा। इन्हीं बुनियादी कार्यभारों के इर्दगिर्द हमें राजनीतिक सत्ता, साम्राज्यवादी लूट और षड्यंत्र आदि के भण्डाफोड़ के प्रचारात्मक और आन्दोलनात्मक, रुटीनी और फ़ौरी, सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्य भी संगठित करने होंगे। सामाजिक जीवन में जो सामन्ती सांस्कृतिक मूल्य मौजूद हैं, वे सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग और साम्राज्यवादियों के लिए एकदम उपयुक्त हैं, अत: उन्होंने उन सभी को अपनाकर अपने सांस्कृतिक तंत्र का अंग बना लिया है। तर्कणा और भौतिकवाद की जगह अन्धविश्वास, रहस्यवाद आदि ही आज बुर्जुआ वर्ग की ज़रूरत हैं। जाति-समस्या, दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न को भी आज इसी नज़रिए से देखना होगा। इन मुद्दों पर जनवादी सुधार की पैबन्दगीरी का समय बीत चुका है। ऐसा करना महज़ बुर्जुआ गुलामगीरी होगी। सामाजिक मुक्ति के ये बुनियादी प्रश्न समाजवादी परियोजना के अनिवार्य बुनियादी मुद्दे हैं।

साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की संस्कृति में भी आज कोई अन्तरविरोध नहीं है। दोनों में सहयोग और एकता है, और काफ़ी हद तक तो एकरूपता भी है। राष्ट्रवादी संस्कृति की ज़मीन से साम्राज्यवादी संस्कृति का विरोध आज इतिहास की बात बन चुका है। सामाजिक-आर्थिक संरचना और सामाजिक-राजनीतिक क्रान्ति के स्वरूप के आधार पर, जनपक्षधर संस्कृति कर्म की सर्वाधिक सामान्य रूपरेखा की इस चर्चा के बाद, हम पूँजी के भूमण्डलीकरण के इस नये दौर की कुछ और नई प्रवृत्तियों की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

हम समझते हैं कि साम्राज्यवाद की आज की अति उग्र आक्रामकता के पीछे उसकी शक्ति नहीं, बल्कि उसका असमाधेय ढाँचागत संकट है। समाजवाद की तात्कालिक विफलता, तीसरी दुनिया के शासक वर्गों की घुटनाटेकू मुद्राओं और विश्व-क्रान्ति की धारा की वर्तमान संकटग्रस्तता के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था में उछाल या त्वरण के कोई विश्वसनीय संकेत नहीं हैं। साझा हितों के लिए, एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिका में अमेरिकी सामरिक हस्तक्षेपों और कुचक्रों के पीछे सभी साम्राज्यवादी देश एकजुट दीखते हैं, लेकिन यह दौर-विशेष की विशिष्टता है। साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोध एक बार फिर गहरा रहे हैं और आने वाले दिनों में नये व्यापार-युद्धों और शक्ति-समीकरणों के संकेत अभी से मिलने लगे हैं।

अत: कहा जा सकता है कि ऊपरी तौर पर एकतरफ़ा ढंग से पूरी दुनिया की जनता पर हावी दीखता साम्राज्यवाद अन्दर से खोखला हो रहा है। यह आज भी कागजी बाघ ही है, बल्कि पहले से भी अधिक कागजी है। आज यह अपनी जड़ता की शक्ति से जीवित है और इसलिए जीवित है कि सर्वहारा क्रान्तियों और समाजवादी प्रयोगों का सिलसिला, पहले चक्र की विफलता के बाद, अभी फिर से गतिमान नहीं हो सका है।

इस सच्चाई से इन्कार नहीं किया जा सकता कि विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय और पुनरुत्थान का यह समय अभूतपूर्व संकट का समय है। बुर्जुआ क्रान्तियों के प्रवाह को भी पराजय और पुन:स्थापन के दौरों से गुज़रना पड़ा था पर उनका संकट इतना विकट और लम्बा नहीं था। लेकिन जो क्रान्ति दूरगामी तौर पर, सहशताब्दियों लम्बे, वर्ग-समाज के समूचे इतिहास के विरुद्ध निर्देशित है, जो इतिहास की सर्वाधिक युगान्तरकारी और पहली `सचेतन क्रान्ति´ है, उसकी अवधि लम्बी होना, कठिनाइयाँ विकट होना, पराजय प्रचण्ड होना और रास्ता जटिल और आरोह-अवरोहपूर्ण होना, ऐतिहासिक दृष्टि से स्वाभाविक प्रतीत होता है।

विगत लगभग दो शताब्दियों के विश्व-इतिहास का समाहार करते हुए कहा जा सकता है कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच विश्व-ऐतिहासिक महासमर के पहले चक्र की शुरुआत हुई। पेरिस कम्यून (1871), अक्टूबर क्रान्ति (1917) और चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति (1966-76) इस यात्रा के तीन महानतम कीर्ति स्तम्भ – तीन मील के पत्थर थे। रूस में स्तालिन की मृत्यु के बाद संशोधनवादी पार्टी और राज्य पर काबिज हो गए और वहाँ समाजवाद का मुखौटा कायम रखते हुए नये नौकरशाह बुर्जुआ वर्ग ने राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा किया। एक ओर सामाजिक साम्राज्यवादी सोवियत संघ ने विश्व के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों और सर्वहारा क्रान्तियों के साथ विश्वासघात किया तथा उन्हें विघटित करने और अपना पिछलग्गू बनाने की कोशिश की। दूसरी ओर पश्चिमी साम्राज्यवादी शिविर के सामने एक चुनौती प्रस्तुत करके और साम्राज्यवादी शिविर के अन्तरविरोधों को उग्र बनाकर उसने वस्तुगत तौर पर विश्व-पूँजीवाद के संकट को बढ़ाने का काम भी किया। साथ ही, सोवियत संघ की मौजूदगी और दो अतिमहाशक्तियों के शिविरों के बीच की उग्र प्रतिस्पर्धा का लाभ पिछड़े देशों के शासक वर्गों ने भी उठाया। पश्चिमी खेमे की थोपी गई शर्तों का आंशिक विरोध सोवियत “सहायता” के सहारे करने में वे सफल रहे। सोवियत संघ में और पूर्वी यूरोप के देशों में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद भी चीन में सर्वहारा सत्ता की मौजूदगी और समाजवादी प्रयोगों के सिलसिले से पूरी दुनिया में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों और सर्वहारा क्रान्तियों की धारा को प्रेरणा और संवेग मिलता रहा। सोवियत संघ और अपने देश के प्रयोगों के विश्लेषण के आधार पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और माओ त्से-तुङ ने समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को उद्घाटित करने और पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने के उपाय विकसित करने और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के रूप में उन्हें अमल में लाने का युगान्तरकारी काम किया। 1976 में माओ की मृत्यु के बाद वहाँ भी पूँजीवादी पुनर्स्थापना हो गई। इसका मुख्य कारण यह था कि 1949 से लेकर सांस्कृतिक क्रान्ति शुरू होने तक, वहाँ भी बुर्जुआ वर्ग ने समाज में अपने आधार के विस्तार के साथ ही पार्टी और राज्य के भीतर भी अपने समान्तर सदर मुकाम कायम कर लिए थे। दूसरे, अनुकूल विश्व-परिस्थितियों से भी उन्हें शक्ति मिली। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो सर्वहारा क्रान्ति के पहले संस्करणों की पराजय अप्रत्याशित नहीं लगती। मार्क्स-एंगेल्स और लेनिन ने पहले भी इस बात की चर्चा की थी कि समाजवादी संक्रमण की दीर्घावधि में वर्ग-संघर्ष लगातार जारी रहेगा, पूँजीवादी पुनर्स्थापना के ख़तरे लम्बे समय तक मौजूद रहेंगे। लेनिन ने पूँजीवादी पुनर्स्थापना के विभिन्न स्रोतों का उल्लेख किया था। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान माओ ने एकाधिक बार कहा था कि पूंजीवादी तत्त्वों के सत्तासीन होने की सम्भावनाएँ लम्बे समय तक मौजूद रहेंगी और समाजवाद की निर्णायक विजय के लिए कई सांस्कृतिक क्रान्तियों की आवश्यकता होगी। इस दृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र का, पराजय के रूप में समापन मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि को सत्यापित ही करता है। क्रान्तियों के विगत प्रयोगों की विफलता विचारधारा की पराजय नहीं है। पूँजीवाद इतिहास का अन्त नहीं है। यह स्वयं अपने भीतर से समाजवाद की आवश्यकता पैदा करता है। और उसकी वाहक शक्तियों को भी। विश्व पूँजीवाद की वर्तमान स्थिति स्वयं इसका प्रमाण है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच वर्ग-महासमर का पहला विश्व-ऐतिहासिक चक्र 1976 में चीन में पूँजीवादी पुनर्स्थापना के बाद समाप्त हो गया और अब दूसरे विश्व-ऐतिहासिक चक्र की शुरुआत हो चुकी है। इन दो चक्रों के बीच के संक्रमण-काल में एक महत्त्वपूर्ण घटना यह घटी है कि समाजवाद के नाम पर कायम, सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के राजकीय पूँजीवादी ढाँचे विघटित हो गए हैं। चीन के “बाज़ार समाजवाद” का पूँजीवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा हुआ है और यह तय है कि देर-सबेर इसे भी विघटित हो जाना है। समाजवाद के बारे में भ्रम पैदा करने वाले स्रोत समाप्त हो गए हैं। इधर भूण्डलीकरण के दौर में ऐसी स्थिति पैदा हुई है कि संशोधनवाद, सामाजिक जनवाद, अर्थवाद, ट्रेड यूनियनवाद आदि की सीमाएँ भी मेहनतकश जनता को स्पष्टत: दीखने लगी हैं और उसे यह बताने के लिए अनुकूल स्थितियाँ तैयार हुई हैं कि वास्तविक प्रश्न राज्यसत्ता का है, राजनीतिक संघर्ष का है। संशोधनवादी-सुधारवादी प्रवृत्तियों का आधार मध्यवर्ग और कुलीन मज़दूरों में मौजूद है, पर उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों की चपेट में इनका भी एक हिस्सा अब आने लगा है और उसकी चेतना का भी `रैडिकलाइज़ेशन´ हो रहा है। परम्परागत चुनावी वामपन्थी और ट्रेड-यूनियन सुधारवाद की, व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति के रूप में प्रभाविता कम होने के साथ ही साम्राज्यवाद और पूँजीवादी व्यवस्था ने इधर नये सिरे से एन.जी.ओ.-सुधारवाद के रूप में एक नई सुरक्षा-पंक्ति खड़ी करने की कोशिश की है। एन.जीओ. व्यवस्था-विरोध का छद्म खड़ा करते हुए एक नये `सेफ्टी वॉल्व´ का और `ट्रोजन हॉर्स´ का काम कर रहे हैं, जनहित के कार्यों से बुर्जुआ राज्यसत्ता को पूरी तरह पीछे हटने का मौका दे रहे हैं, और साथ ही, सस्ता श्रम निचोड़ने का ज़रिया भी बने हुए हैं। इनका विश्वव्यापी नेटवर्क फण्ड-बैंक-डब्ल्यू.टी.ओ. की तिकड़ी का ही अनिवार्य पूरक तंत्र है। यह आश्चर्यजनक नहीं कि पुराने गांधीवादियों-समाजवादियों से लेकर नकली वामपिन्थयों और भगोड़ों की सभी किस्में आज एन.जी.ओ. के साथ मधुयामिनी मना रही हैं।

सर्वहारा क्रान्ति के दो विश्व ऐतिहासिक चक्रों के बीच की विशिष्टता यह रही है कि उसने समाजवाद को बदनाम करने वाले नकली लाल झण्डे को चींथकर धूल में फेंक दिया है, सुधारवाद और “कल्याणकारी राज्य” के कीन्सियाई नुस्खों की असलियत साफ़ कर दी है और विश्व पूँजीवाद की घोर मानवद्रोही बर्बरता को एकदम उजागर कर दिया है। एक बार फिर, उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोप की तरह, पूरी दुनिया में श्रम और पूँजी की ताकतें एकदम आमने-सामने खड़ी हैं। साम्राज्यवादी भेड़िये और तीसरी दुनिया के देशों में सत्तारूढ़ उनके छुटभैये मेहनतकशों से अतिलाभ निचोड़ते हुए उनके एक बड़े हिस्से को लगातार सड़कों पर धकेल रहे हैं और तबाह कर रहे हैं। दूसरी ओर विश्व स्तर पर युद्ध और विनाश का जो कहर वे बरपा कर रहे हैं, वह कुल मिलाकर विश्वयुद्धों की तबाही से कम नहीं है। दूसरी ओर, दुनिया के पिछड़े देशों से लेकर समृद्ध देशों तक में एक बार फिर विद्रोह का लावा खौल रहा है। जगह-जगह जन-उभारों और आन्दोलनों के ज्वार भी उठने लगे हैं। इस पूरी स्थिति का समस्यापरक पक्ष यह है कि सर्वहारा क्रान्ति की मनोगत शक्तियाँ अभी कमज़ोर और बिखरी हुई हैं। विगत पराजयों का सार-संकलन अभी पूरा नहीं हुआ है। साथ ही, नई सर्वहारा क्रान्तियों की प्रकृति और रास्ते को समझने के लिए, परिस्थितियों में आए नये बदलावों को समझने का काम भी अभी बहुत कम हुआ है। लेकिन, ठहराव के दौर के संकटों और चुनौतियों के बजाय आज हम एक नई शुरुआत के दौर के संकटों और चुनौतियों के रूबरू खड़े हैं। इसी नये दौर के कार्यभारों को हम एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और नये सर्वहारा प्रबोधन के कार्यभारों के रूप में देख-समझ रहे हैं।

एकदम ठोस शब्दों में कहें कि सर्वहारा क्रान्ति के नए संस्करण की सर्जना के लिए हमें सबसे पहला काम यह करना है कि अतीत की सर्वहारा क्रान्तियों और संघर्षों के इतिहास को विस्मृति के अँधेरे से बाहर लाना है, तमाम मिथ्या-प्रचारों और विभ्रमों की धूल-राख उड़ाकर उसे जनता के सामने प्रस्तुत करना है। हमें सर्वहारा क्रान्ति की विचारधारा के बारे में फैलाई जा रही भ्रान्तियों और झूठे प्रचारों का प्रतिकार करते हुए उसे मेहनतकश जनता के वर्ग-सचेत संस्तरों तक और उनके पक्ष में खड़े परिवर्तनकामी बुद्धिजीवियों तक लेकर जाना है। यह सर्वहारा पुनर्जागरण का पक्ष है। एक नये सर्वहारा प्रबोधन के केन्द्रीय कार्यभार क्या हैं? हमें सर्वहारा वर्ग की विचारधारा को आज के विश्व-ऐतिहासिक सन्दर्भों में जानना-समझना है। मार्क्सवाद एक गत्यात्मक विज्ञान है। अतीत की क्रान्तियों का अध्ययन हम भविष्य की क्रान्तियों के लिए कर रहे हैं। महानतम क्रान्तियों का भी अनुकरण नई क्रान्तियों को जन्म नहीं दे सकता। अतीत के प्रयोगों से सीखते हुए स्थितियों में आए परिवर्तनों को सदा-सर्वदा ध्यान में रखना होता है। और फिर नये चक्र की सर्वहारा क्रान्तियों का रंगंमच तो पूर्व की अपेक्षा कई महत्त्वपूर्ण भिन्नताएँ लिये हुए है। इतिहास के अध्ययन, वर्तमान जीवन के अध्ययन और सामाजिक प्रयोगों के त्रिकोणात्मक संघातों के बीच ही नई क्रान्तियों के मार्गदर्शक सूत्र और रणनीति का विकास होगा। यह समय घनघोर वैचारिक बहस-मुबाहसे का होगा। साथ ही, यह जनता के बीच शिक्षा और प्रचार का तथा प्रारिम्भक स्तर के सामाजिक प्रयोग का समय होगा। यही नये सर्वहारा प्रबोधन का केन्द्रीय कार्यभार है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये दोनों कार्यभार अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ गुंथे-बुने हैं और इन्हें साथ-साथ अंजाम दिया जाएगा। यह भी स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि यह पूरी प्रक्रिया सर्वहारा क्रान्ति की हरावल शक्ति को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया की सहवर्ती होगी, पूर्ववर्ती या अनुवर्ती नहीं।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’

शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

Posted on Updated on

जिस देश का प्रधानमंत्री स्वयं स्वीकार करे की देश की 7० प्रतिशत जनता 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती हैं वहां सुरेश चिपलूनकर [ कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है ] का यह कहना कि जनता को अपनी गरीबी या महंगाई जैसे मुद्दों से कोई वास्ता नहीं हैं, बात ज़रा गले से उतरी नहीं.

वैसे उन्होंने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि वे भारतीय जनता पार्टी की हार से दुखी हैं, ऐसे में जनता जनार्दन को दोषी करार दे देना ! कहीं उन्हें यह भ्रम तो नहीं कि वे सर्वज्ञाता हैं और जनता बेवकूफ.

वैसे आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं. उस ज़माने में किसान, मजदूर और देहाती का चरित्र मेहनतकश का था और मेहनतकश परजीवी वर्गों को हमेशा बेवकूफ दीखते हैं चाहे वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.

समाज शास्त्र कभी जनता को दोषी नहीं ठहराता अलबता वह सोई हुई हो सकती है, सोना कोई बुरी बात नहीं, किसी को उसे उठाना नहीं आता और वह मनोगत तरीके से दोष जनता पर मढ़ दे ? अगर हम समझतें हैं कि जनता हमारी मनोगत इच्छाओं का ख्याल करे, तो हमारी ओर लाखों नहीं करोडों उँगलियाँ उठ जाएँगी लेकिन अपनी इस मनोगत बीमारी की वजह से हो सकता है हमें एक भी दिखाई न दे.

वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा. और आतंकवाद पर वे चिंतित हैं मगर एकांगी तरीके से, समग्रता से नहीं, उन्हेँ हम दीपायन बोस के आतंकवाद के बारे में विभ्रम और यर्थाथ के अध्ययन की सलाह देंगे और इस पर एक विस्तृत टिपण्णी की अपेक्षा भी करेंगे.

अफलातून जी वास्तव में अफलातून हैं, उसी यूनानी परम्परा के जिसने जेल से भागने से इंकार कर दिया था कि इससे राज्य का पवित्र कानून टूटता है, उसी राज्य का जिसमें गुलाम और मालिक दो वर्ग थे और जहर का प्याला अपने लबों से लगा लिया मगर राज्य के तर्क पर आंच नहीं आने दी. ये बात करेंगे मगर शब्दों के हेरफेर के साथ. अब इन्होनें एक नया शब्द जोड़ बिठा दिया  “संघर्षशील प्रतिपक्ष” ? इसे अगर परिभाषित कर लें तो हम भी कुछ आगे बढ़ें.

वैसे सुरेश जी की एक बात से “लेकिन एकमात्र खुशी इस चुनाव रिजल्ट की यही है कि इन तीनों से पीछा छूटा” हम भी सहमत हैं लेकिन इसके साथ हम ये भी जोड़ देना चाहते हैं कि वामपंथी, समाजवादी, कम्युनिस्ट, जनशक्ति, बहुज़न जैसे शब्दों का प्रयोग करने से आप और हम (अवसरवादी) वे नहीं हो जाते जो इन शब्दों के अर्थ हैं लेकिन आप जैसे विचारवादी या आदर्शवादी लोग जो विचार को प्रथम और पदार्थ को गौण मानते हैं मानेंगे थोड़े ही. कोई लाख सर पटक ले तब भी आप नहीं मानेगे कि मनुष्य को उसके भौतिक हालात ही किसी विचार का कायल बनाते हैं. हाँ अपवाद हो सकतें हैं लेकिन हम वर्ग की बात कर रहें हैं. यहाँ अटल जी, मनमोहन सिंह और बहुतेरे वामपंथी, (एक का ज़िक्र हमने भी किसी अख़बार में पढ़ा कि वे राजस्थान से विधायक हैं परंतु पीले कार्डधारी हैं, खजाने से तनख्वाह नहीं लेते और राशन की दुकान पर उन्हें लाईन में खड़े देखा जा सकता है ), साफ़ और स्वच्छ छवि के हैं.

आप मिलना चाहेंगे उनसे ? मगर क्या फायदा. असल सवाल तो उन दलों का है – उनके चरित्र का है और साथ ही क्या बुर्जुआओं को साफ़ और स्वच्छ छवि के सेवक नहीं चाहिएँ?

एक कन्फ्यूजन हो सकता है कि कहीं हमने कांग्रेस को उस 70 प्रतिशत का सच्चा प्रतिनिधि तो घोषित नहीं कर दिया. बिल्कुल नहीं. बस विकल्पहीनता.

कुछ भविष्यवाणी हो सकती है. 20 प्रतिशत लोगों का लोकतंत्र जिसे हम बुर्जुआ अधिनायकवाद कहते हैं (इसलिए नहीं कि ऐसा हम कहते हैं यह तो हर कोई बगैर सिद्धांत के अपने अनुभव से ही समझता है) और अधिक मज़बूत हुआ है और आने वाले समय में श्रम और पूँजी की झड़पें त्वरित होंगी. इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए.

मार्क्सवाद से तो तथाकथित मार्क्सवादी भी मुनकर हो गएँ हैं आप की तो बात छोड़िए. लेकिन लेनिन द्वारा गद्दार कायुत्सकी के लिए कहे गए शब्द कि बुर्जुआ लोकतंत्र जहाँ पूँजी का राज होता है वहां मजदूर वर्ग संसदीय ढंग से सत्ता हासिल कर लेगा यह कोई लुच्चा और शोहदा ही कह सकता है. और लेनिन के यह शब्द उनकी मृत्यु के बाद चिल्ली और इंडोनेशिया में (केवल इंडोनेशिया में जहाँ कम्युनिस्ट संसदीय ढंग से मज़बूत हो रहे थे, 10 लाख लोगों को यह कहकर कत्ल कर दिया गया कि वे कम्युनिस्ट हैं) सही साबित हुए.

हाँ आप गलती न करें कि हम कोई भारतीय माओवाद या नकसलवाद का नया संस्करण हैं इसके लिए आप हमारा नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1 देखें.

और अब दो टूक बात. बुर्जुआ दलों का तो ऐसा होता ही है लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट दलों का स्वरूप भी संघाधिपत्यवादी रहा है. आप दो लाईनों के बीच लम्बा और सतत संघर्ष चलाए बगैर किसी बोलेश्विक चरित्र की पार्टी के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकते. यह गैर वैज्ञानिक है, गैर मार्क्सवादी है, विचारवादी और आदर्शवादी तरीका है जिसकी परणिति संशोधनवाद और दुस्साहसवाद ही होती है.

शहीद भगत सिंह विचार मंच उन बुद्धिजीवियों से यह स्पष्ट कर देना चाहता है कि भारत की वे पार्टियाँ जिन्हें कम्युनिस्ट पार्टियाँ कहा जाता (और यहाँ तक की विश्व की 99 प्रतिशत कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी) अपने उल्ट में बदल चुकीं हैं. हमें इसका अफ़सोस नहीं करना चाहिए क्योंकि सिद्धांत कहता है कि चीजें देर-सवेर अपने विपरीत में बदल जाती हैं. आज बीते युग की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियों को इकठ्ठा करके भानुमती का कुनबा जोड़ने से कुछ हासिल नहीं होने वाला. आज पार्टी गठन की अपेक्षा पार्टी निर्माण प्रमुख है.

हम उन बुद्धिजीवियों से जो श्रम को धन (यहाँ श्रीमान अफलातून द्वारा प्रस्तुत सुनील जी के उस लेख [ तलाश एक नए मार्क्सवाद की (२) : ले. सुनील ] का जिक्र भी करना ज़रूरी समझेंगे जिसमें उन्होंने बिना पूँजी और मार्क्स पढ़े किसी नए सिद्धांत को लिखने की सलाह दे डाली थी, उसमें उन्होंने मार्क्स  पर आरोप लगाया था कि वे श्रम की बिनाह पर धन के स्रोत में प्रकृति की भूमिका से मुनकर हैं जबकि पूंजी के प्रथम खंड के प्रथम अध्याय में मार्क्स ने उन अर्थशास्त्रियों को गलत ठहराया था जो श्रम को ही एकमात्र धन का स्रोत मानते थे) और ज्ञान का स्रोत मानते हैं, इस लम्बी और पीडादायक प्रक्रिया का हिस्सा बनने का आह्वान करते हैं ताकि वे अपने सर पर ज्ञान के इस क़र्ज़ का कुछ भुगतान करके सर्वहारा की अदालत में अपने कर्मों द्वारा कुछ तो सच्चे हों.
आमीन !

related posts :

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

आज के किसान का चरित्र – हमारी पहुँच – कुछ और स्पष्टता

मई दिवस का इतिहास-2

Posted on Updated on

इस पोस्ट का पहला भाग ….यहाँ देखें

शिकागो की हड़ताल और हे मार्केट की घटना

पहली मई को शिकागो में हड़ताल का रूप सबसे आक्रामक था। शिकागो उस समय जुझारू वामपन्थी मज़दूर आन्दोलन का केन्द्र था। हालाँकि वह आन्दोलन मज़दूरों की समस्याओं पर पर्याप्त रूप से साफ राजनीतिक रुख नहीं रखता था, फ़िर भी वह एक लड़ाकू और जुझारू आन्दोलन था। वह मज़दूरों का, आन्दोलन में जुझारू भावना बढ़ाने के लिए, आह्वान करने को हमेशा तैयार रहता था, ताकि मज़दूरों के जीवन की स्थितियों और काम करने की स्थितियों में सुधार लाया जा सके।

चूंकि शिकागो की हड़ताल में कई जुझारू मज़दूर दलों ने भाग लिया, इसलिए ऐसा माना गया कि शिकागो में हड़ताल सबसे बड़े पैमाने पर हुई। एक `आठ-घण्टा एसोसिएशन´ काफी पहले ही इस हड़ताल की तैयारी के लिए बन गया था। वामपन्थी लेबर यूनियनों से बनी `सेन्ट्रल लेबर यूनियन´ ने `आठ-घण्टा एसोसिएशन´ को पूरा सहयोग दिया, जो एक संयुक्त मोर्चा था, जिसमें फेडरेशन से लेकर `नाइट्स ऑफ लेबर´ और `सोशलिस्ट लेबर पार्टी´ तक शामिल थीं। `सोशलिस्ट लेबर पार्टी´ अमेरिकी मज़दूर वर्ग की पहली संगठित समाजवादी राजनीतिक पार्टी थी।

पहली मई के पिछले दिन रविवार को `सेन्ट्रल लेबर यूनियन´ ने एक लामबन्दी प्रदर्शन किया जिसमें 25,000 मज़दूरों ने हिस्सा लिया। पहली मई को शिकागो में मज़दूरों का एक विशाल सैलाब उमड़ा और संगठित मज़दूर आन्दोलन के आह्वान पर शहर के सारे औजार चलने बन्द हो गए और मशीनें रुक गयीं। मज़दूर आन्दोलन को कभी भी वर्ग-एकता के इतने शानदार और प्रभावी प्रदर्शन का एहसास नहीं हुआ था। उस समय आठ घण्टे के कार्य-दिवस के महत्त्व ने, और हड़ताल के चरित्र और विस्तार ने पूरे आन्दोलन को एक विशेष राजनीतिक अर्थ दे दिया। अगले कुछ दिनों में यह राजनीतिक अर्थ और भी गहरा होता गया। `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन पहली मई, 1886 की हड़ताल में अपनी पराकाष्ठा पर था। और इसने अमेरिकी मज़दूर वर्ग की लड़ाई के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया था।

इस दौरान मज़दूरों के दुश्मन भी चुप नहीं बैठे रहे। शिकागो में मालिकों और शहर के प्रशासन की मिली-जुली शक्तियों ने, जो जुझारू नेताओं को ख़त्म करने के लिए, और इसके जरिए शिकागो के समग्र मज़दूर आन्दोलन को रौंद डालने के लिए छटपटा रहीं थीं, मज़दूरों के जुलूस को गिरफ्तार कर लिया। 3 और 4 मई की घटनाएँ जो `हे मार्केट कांड´ के नाम से जानीं जातीं हैं, साफ तौर पर पहली मई की हड़ताल का परिणाम थीं। 4 मई को हे मार्केट स्क्वायर पर हुए प्रदर्शन में, 3 मई को `मैककार्मिक रीपर वर्क्स´ पर मज़दूरों की एक सभा पर पुलिस के बर्बर हमले का विरोध करने का आह्वान किया गया। इस क्रूर हमले में छ: मज़दूर मारे गए थे और कई घायल हुए थे। यह सभा जो हे मार्केट स्क्वायर पर हो रही थी, ख़त्म ही होने वाली थी कि पुलिस ने मज़दूरों की भीड़ पर हमला कर दिया। इसी बीच अचानक भीड़ में एक बम फेंका गया। इस हमले में चार मज़दूर और सात पुलिसवाले मारे गये। हे मार्केट का भयंकर रक्तपात, मज़दूर नेताओं पार्सन्स, स्पाइस, फ़िशर और एंजेल को फांसी और शिकागो के तमाम जुझारू नेताओं को कैद – संघर्षरत मज़दूरों को शिकागो के मालिकों का यह जवाब था। पूरे देश की मिलों-फैक्टरियों के मालिकों को चेतावनी मिल चुकी थी। 1886 के उत्तरार्द्ध में मालिकों ने 1885-86 के आन्दोलन के दौरान खोई हुई अपनी पुरानी स्थिति को फ़िर से पाने के लिए काफी आक्रामक रुख अपनाया।

शिकागो के मज़दूर नेताओं की फांसी के एक साल बाद फेडरेशन, (जो अब `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नाम से प्रसिद्ध हो चुका था) के सेंट लूई के सम्मेलन में, 1888 में, `काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन को नए सिरे से जीवित करने का संकल्प लिया गया। पहली मई को, जो अब एक परम्परा बन चुकी थी, और जो दो साल पहले मज़दूरों के राजनीतिक वर्ग-प्रश्न के आधार पर हुए संघर्ष का केन्द्र-बिन्दु बन चुकी थी, `काम के घण्टे आठ करो´ की फ़िर से शुरुआत का दिन बनने का सम्मान मिला। पहली मई, 1890 को पूरे देश में छोटे कार्य-दिवस के लिए हड़तालें हुईं। 1889 के सम्मेलन में `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेता सैमुएल गोम्पर्स के नेतृत्व में हड़ताल आन्दोलन को सीमित करने की नीच कोशिश कामयाब हो गई। यह तय हुआ `कारपेन्टर्स यूनियन´, जिसे हड़ताल के लिए सबसे अच्छी तरह से तैयार यूनियन माना जाता था, हड़ताल में पहल करेगी और अगर यह पहल सफल सिद्ध होगी तो दूसरी यूनियनें भी हड़ताल में कूद पड़ेंगीं।

मई-दिवस अन्तराष्ट्रीय बन गया

गोम्पर्स ने अपनी आत्मकथा में मई-दिवस को पूरी दुनिया में प्रचलित करने में `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ का योगदान इस प्रकार बताया है : “जैसे-जैसे काम के घण्टे आठ करो´ आन्दोलन की योजनाएँ विकसित हो रही थीं, वैसे-वैसे हम यह लगातार सोच रहे थे कि हम अपने लक्ष्य को विस्तारित कैसे करें। जैसे-जैसे पेरिस में होने वाली मज़दूरों की अन्तरराष्ट्रीय कांग्रेस (इण्टरनेशनल वर्किन्गमेन्स कांग्रेस) का समय पास आता जा रहा था, मुझे यह बात समझ में आ रही थी कि, इस कांग्रेस से विश्वव्यापी सहानुभूति पाकर हम अपने आन्दोलन को लाभ पहुंचा सकते हैं।” गोम्पर्स ने काफी पहले ही अपने सुधारवादी और अवसरवादी रुझानों को दिखला दिया था। उसकी यही रुझानें आगे चलकर उसकी वर्ग-सहयोगवादी नीतियों में पूर्णत: फलीभूत हुईं। यही गोम्पर्स अब समाजवादी मज़दूरों के उस आन्दोलन का समर्थन पाने को तत्पर था, जिसके प्रभाव का उसने जबरदस्त विरोध किया था।

14 जुलाई, 1889 को बास्तीय के पतन की सौवीं सालगिरह पर, पेरिस में, कई देशों के संगठित समाजवादी आन्दोलनों के नेता एकत्र हुए। वे पेरिस में उस अन्तरराष्ट्रीय संगठन (प्रथम इण्टरनेशनल) के ढंग का मज़दूरों का एक अन्तराष्ट्रीय संगठन फ़िर से बनाने के लिए जुटे थे, जिसे 25 साल पहले उनके महान शिक्षकों-कार्ल मार्क्स और फ़्रेडरिक एंगेल्स ने बनाया था। `दूसरे इण्टरनेशनल´ की इस स्थापना बैठक में एकत्रित हुए प्रतिनिधियों ने अमेरिकी प्रतिनिधियों से 1884-86 के दौरान अमेरिका में चले 8 घंटे कार्य-दिवस के आन्दोलन के बारे में और हाल ही में उसके नये सिरे से उठ खडे़ होने के बारे में सुना। अमेरिकी मज़दूरों के उदाहरण से उत्साहित होकर पेरिस कांग्रेस ने निम्न प्रस्ताव स्वीकार किया : “कांग्रेस एक विशाल अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शन आयोजित करने का निर्णय लेती है ताकि एक विशेष दिन, सभी देशों में ओर सभी शहरों में मेहनतकश जनसमुदाय राजकीय अधिकारियों से कार्यदिवस कानूनी तौर पर घटाकर आठ घण्टे करने की तथा पेरिस कांग्रेस के अन्य निर्णयों को लागू करने की माँग करे। चूंकि `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ ने दिसम्बर 1888 में अपने सेंट लुई सम्मेलन में, पहले ही ऐसे प्रदर्शन के लिए पहली मई 1890 का दिन तय किया है, इसलिए इस दिन को अन्तराष्ट्रीय प्रदर्शन के लिए स्वीकार किया जाता है। विभिन्न देशों के मज़दूरों को अपने देश में मौजूद परिस्थितियों के अनुसार इस प्रदर्शन को जरूर आयोजित करना चाहिए।”

1890 का मई दिवस कई यूरोपीय देशों में मनाया गया। अमेरिका में समाजवादी पीटर मैकगाथर के नेतृत्व में `कारपेन्टर्स यूनियन´ ने आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग को लेकर हड़ताल आयोजित किया जिसमें निर्माण कार्य के मज़दूरों की अन्य यूनियनों ने भी भाग लिया। समाजवादियों के विरुद्ध असाधारण कठोर नियमों के बावजूद मज़दूरों ने जर्मनी के औद्योगिक शहरों में मई-दिवस मनाया। हालाँकि अधिकारियों ने चेतावनी दी थी और मज़दूरों के दमन का प्रयास भी किया लेकिन दूसरी यूरोपीय राजधानियों में भी इसी प्रकार प्रदर्शन हुए। अमेरिका में शिकागो और न्यूयार्क शहरों में हुए प्रदर्शनों का विशेष महत्त्व था। कई हज़ार लोगों ने आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग को लेकर सड़कों पर जुलूस निकाला और ये प्रदर्शन शहर के मुख्य केन्द्रों पर खुली सभाओं के साथ समाप्त हुए।

1891 की ब्रुसेल्स में आयोजित अगली कांग्रेस में इण्टरनेशनल ने मई दिवस के मूल लक्ष्य, यानी `काम के घण्टे आठ करो´ को तो दोहराया ही, लेकिन साथ ही उसने यह भी जोड़ा कि इस दिन अनिवार्य रूप से काम करने की परिस्थितियों में सुधार करने और राष्ट्रों के बीच शान्ति सुनिश्चित करने के लिए भी प्रदर्शन होना चाहिए। इस संशोधित प्रस्ताव में आठ घण्टे के कार्य-दिवस के लिए “मई-दिवस के प्रदर्शनों के वर्ग चरित्र” और उन माँगों के महत्त्व पर जोर दिया गया जो “वर्ग-संघर्ष को और गहरा कर रहे थे।” प्रस्ताव में यह भी माँग की गई है कि “जहाँ भी संभव हो” काम रोक दिया जाए। हालाँकि मई-दिवस की हड़तालों के पीछे कुछ ख़ास और तात्कालिक मुद्दे थे लेकिन इण्टरनेशनल ने प्रदर्शनों के उद्देश्यों को विस्तारित करने और उन्हें ठोस रूप देने का प्रयास शुरू कर दिया। ब्रिटिश श्रमिक संगठनों ने मई-दिवस की तात्कालिक माँगों पर भी हड़ताल करने से इनकार करके, और जर्मन सामाजिक जनवादियों के साथ मिलकर मई-दिवस के प्रदर्शन को मई के पहले रविवार तक स्थगित करने के पक्ष में मतदान किया।

अन्तरराष्ट्रीय मई-दिवस पर एंगेल्स के विचार

एंगेल्स ने 1 मई, 1890 को लिखी गई, `कम्युनिस्ट घोषणापत्र´ के चौथे जर्मन संस्करण की प्रस्तावना में, अन्तरराष्ट्रीय सर्वहारा संगठनों के इतिहास की समीक्षा करते हुए प्रथम अन्तरराष्ट्रीय मई-दिवस के महत्त्व की ओर ध्यान खींचा :

“जब मैं यह पक्तियाँ लिख रहा हूँ, यूरोप और अमेरिका का सर्वहारा अपनी शक्तियों की समीक्षा कर रहा है, यह पहला मौका है जब, सर्वहारा वर्ग एक झण्डे तले, एक तात्कालिक लक्ष्य के वास्ते, एक सेना के रूप में, गोलबन्द हुआ है : आठ घण्टे के कार्य-दिवस को कानून द्वारा स्थापित कराने के लिए…। यह शानदार दृश्य जो हम देख रहे हैं, वह पूरी दुनिया के पूँजीपतियों, भूस्वामियों को यह बात अच्छी तरह समझा देगा कि पूरी दुनिया के सर्वहारा वास्तव में एक हैं। काश! आज मार्क्स भी इस शानदार दृश्य को अपनी आँखों से देखने के लिए मेरे साथ होते।”

सर्वहारा के एक साथ हो रहे अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शन पूरी दुनिया के मज़दूरों की कल्पनाओं और क्रान्तिकारी सहजवृत्तियों को अधिकाधिक जागृत कर रहे थे और हर साल प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले मज़दूरों की संख्या बढ़ती जा रही थी।

1893 में ज्यूरिख में हुई इण्टरनेशनल की कांग्रेस में पहली मई के प्रस्ताव में जोड़ा गया निम्नलिखित अंश खुद ही आन्दोलन के प्रति मज़दूरों के बढ़ते समर्थन को दिखलाता है। इस कांग्रेस में एंगेल्स भी उपस्थित थे।

“पहली मई के दिन आठ घण्टे के कार्य दिवस के लिए होने वाले प्रदर्शन को साथ ही साथ अनिवार्यत: सामाजिक परिवर्तन के जरिये वर्ग विभेदों को नष्ट करने की मज़दूर वर्ग की दृढ़निश्चयी आंकाक्षा का प्रदर्शन भी होना चाहिए। इस प्रकार मज़दूर वर्ग को उस राह पर कदम रखना चाहिए जो सभी मनुष्यों के लिए शान्ति अर्थात अन्तरराष्ट्रीय शान्ति की ओर ले जाने वाली एकमात्र राह है।”

अनेक पार्टियों के सुधारवादी नेताओं ने पहली मई के प्रदर्शनों को ओजहीन बनाने की कोशिश की। उन्होंने संघर्ष के इन दिनों को आराम और मनोरंजन के दिनों में बदलने की कोशिश की। इसीलिए वे हमेशा मई-दिवस का प्रदर्शन पहली मई के सबसे नजदीक वाले रविवार को आयोजित करने पर जोर देते थे। रविवार को मज़दूरों को हड़ताल के जरिए काम ठप करने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उस दिन वैसे भी काम नहीं होता था। सुधारवादी नेताओं के लिए यह दिन मात्र मज़दूरों का एक अन्तराष्ट्रीय छुट्टी का दिन था, शोभायात्रायों का दिन और दूर देहातों के मैदानों में खेल का दिन था। जबकि मई-दिवस के बारे में ज्यूरिख कांग्रेस के प्रस्ताव में माँग यह की गई थी कि मई-दिवस “वर्ग-विभेद के खात्मे के लिए मज़दूर-वर्ग की दृढ़निश्चयी आकांक्षा के प्रदर्शनों का दिन” होना चाहिए, यानी, एक ऐसा प्रदर्शन जो शोषण और उजरती गुलामी पर आधारित पूँजीवादी व्यवस्था के ध्वंस के लिए हो लेकिन इससे सुधारवादियों को कोई दिक्कत नहीं थी, क्योंकि वे अपने आप को इण्टरनेशनल के निर्णयों से बंधा हुआ नहीं मानते थे। वे इण्टरनेशनल की कांग्रेसों को मात्र अन्तरराष्ट्रीय दोस्ती और सद्भाव के लिए किए जाने वाले जमावड़े समझते थे। जैसे जमावड़े प्रथम विश्वयुद्ध से पहले अनेक यूरोपीय राजधानियों में हुआ करते थे। उन्होंने सर्वहारा-वर्ग की अन्तरराष्ट्रीय एकजुट कार्रवाइयों को हतोत्साहित और विफल करने के हर सम्भव प्रयास किये। अन्तरराष्ट्रीय कांग्रेसों के निर्णय, जो उनके विचारों से मेल नहीं खाते थे, उनके लिए कागजी प्रस्ताव मात्र थे। बीस साल बाद इन सुधारवादियों का “समाजवाद” और “अन्तरराष्ट्रीयतावाद” पूरी दुनिया के सामने बिल्कुल बेनकाब और नंगा खड़ा था। 1914 में इण्टरनेशनल बिखर गया, क्योंकि अपने जन्म से ही वह अपनी मृत्यु का कारण साथ लेकर चल रहा था, और वह कारण थे – मज़दूर-वर्ग को गुमराह करने वाले सुधारवादी नेता।

1900 की पेरिस की अन्तरराष्ट्रीय कांग्रेस में पुरानी कांग्रेसों में ली गई मई-दिवस के प्रस्ताव को दोहराया गया। साथ ही इस प्रस्ताव को इस बात के साथ और भी शक्तिशाली बनाएगी। लगातार बढ़ते मई-दिवस के प्रदर्शन अब शक्ति-प्रदर्शन में बदलते जा रहे थे। प्रदर्शनों में भाग लेने वाले और पहली मई को काम-बन्दी में हिस्सा लेने वाले मज़दूरों की तादाद लगातार बढ़ रही थी। मई-दिवस लाल-दिवस बन गया, एक ऐसा दिन जो जब भी आता था तो सभी देशों के प्रतिक्रियावादी शासकों के लिए अपशकुन साथ लेकर आता था।

मई दिवस पर लेनिन के विचार

रूसी क्रान्तिकारी आन्दोलन में अपनी शुरुआती सक्रियताओं के दौर में ही लेनिन ने रूसी मज़दूरों से मई-दिवस का परिचय कराने में और उन्हें यह बताने में कि यह प्रदर्शनों और संघर्षों का दिन है, विशेष योगदान दिया। 1896 में, जब लेनिन जेल में थे, उन्होंने `मज़दूर वर्ग की मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाली सेंट पीटर्सबर्ग यूनियन´ नामक एक मज़दूर संगठन के लिए मई-दिवस का एक पर्चा लिखा। यह मज़दूर-संगठन रूस में बने सबसे पहले मार्क्सवादी राजनीतिक ग्रुपों में से एक था। यह दस्तावेज़, गैर-कानूनी तरीके से जेल से बाहर लाया गया, मीमोग्राफी द्वारा इसकी दो हज़ार प्रतियों की नकल उतारी गयी और उन्हें चालीस कारखानों के मज़दूरों के बीच वितरित किया गया। यह पर्चा काफी छोटा था ताकि कम समझदार मज़दूर भी आसानी से समझ सकें। उस समय के एक व्यक्ति ने, जिसने पर्चे के प्रकाशन में मदद की थी, लिखा है – “जब एक महीने बाद 1896 में प्रसिद्ध टेक्सटाइल हड़ताल हुई, तो मज़दूर हमें बता रहे थे कि इस आन्दोलन  को संवेग देने वाला प्रथम प्रेरणास्रोत वही छोटा सा मई-दिवस पर्चा था।”

इस पर्चे में, फैक्टरियों के मालिक किस तरह अपने मुनाफे के लिए मज़दूरों का शोषण करते हैं, और अपनी स्थिति को सुधारने की माँग करने पर सरकार उन पर किस तरह अत्याचार करती है, यह बताने के बाद लेनिन मज़दूरों को मई-दिवस के महत्त्व के बारे में बताते हैं।

फ़्राँस, जर्मनी, इंग्लैण्ड और अन्य देशों में मज़दूर पहले ही शक्तिशाली यूनियनों में एकजुट हो चुके हैं, और उन्होंने अपने अनेक अधिकारों को लड़कर जीता है। वे 19 अप्रैल (1 मई) ¹पहले रुसी कैलेण्डर पश्चिमी यूरोपीय कैलेण्डर से 13 दिन पीछे चलता था।’  को एकत्र होते हैं, जो एक सामान्य छुट्टी का दिन होता है। उस दिन वे दमघोंटू कारखानों को छोड़कर, संगीत की लय पर अपने लहराते हुए झण्डों के साथ शहर की मुख्य सड़कों पर मार्च करते हैं – अपने मालिकों को लगातार अपनी बढ़ती हुई शक्ति दिखलाते हुए। उस दिन भारी संख्या में मज़दूर इन प्रदर्शनों में जुटते हैं, जहाँ भाषणों में, बीते सालों में मालिकों पर मिली जीतों को फ़िर से गिनाया जाता है और आने वाले सालों में संघर्षों की रणनीति तैयार की जाती है। इन प्रदर्शनों में मज़दूरों की हुंकार के नीचे दबे मालिकों की यह हिम्मत नहीं होती कि वे कारखानों में न आने के लिए मज़दूरों पर एक पैसे का भी जुर्माना करें। उसी दिन मज़दूर फ़िर से मालिकों के सामने फ़िर अपनी पुरानी मुख्य माँग रखते हैं : `आठ घण्टे काम, आठ घण्टे आराम, आठ घण्टे मनोरंजन´। यही वह माँग है जिसे आप और दूसरे देशों के मज़दूर लगातार बुलन्द कर रहे हैं।”

रूसी क्रान्तिकारी आन्दोलन ने मई-दिवस का पूरा फायदा उठाया। नवम्बर, 1900 में `खारकोव में मई दिवस´ नामक पुस्तिका में प्रकाशित प्राक्कथन में लेनिन ने लिखा :

“अगले छ: महीनों में, रूसी मज़दूर नयी शताब्दी के पहले वर्ष का मई-दिवस मनाएँगे। यही वह समय होगा कि जितना संभव हो उतनी बड़ी संख्या में जगह-जगह मई-दिवस मनाएँ। इसमें बड़े पैमाने पर मज़दूर हिस्सा लें। लेकिन हमारा लक्ष्य सिर्फ बड़ी संख्या में मज़दूरों का भाग लेना नही हैं, बल्कि पूरी तरह संगठित होकर भाग लेना है। एक संकल्प के साथ भाग लेना है, जो एक ऐसे संघर्ष का रूप ले, जिसे कुचला न जा सके, जो रूसी जनता को राजनीतिक आजादी दिला सके, और नतीजतन जो सर्वहारा को अपने वर्ग-विकास और फ़िर समाजवाद के लिए एक खुली लड़ाई का मौका दे।”

यह आसानी से समझा जा सकता है कि लेनिन मई-दिवस के प्रदर्शनों को कितना महत्त्व देते थे। उन्होंने मज़दूरों का छ: महीने पहले ही आह्वान कर दिया था कि मई-दिवस पर संगठित हो, उसे कैसे मनाएँ। उनके लिए मई-दिवस “रूसी जनता की राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए एक अदमनीय संघर्ष को खड़ा करने” के लिए और “सर्वहारा के वर्ग-विकास और समाजवाद के लिए रैलियां करने” का दिन था।

मई-दिवस के आयोजन कैसे “महान राजनीतिक प्रदर्शन बन सकते हैं”, इस पर बोलते हुए लेनिन ने 1900 के खारकोव मई-दिवस आयोजन को एक विशिष्ट महत्त्व की घटनाय् बताते हुए कहा-“इस दिन सड़कों पर बड़ी-बड़ी सभाएँ हुईं, भारी संख्या में मजूदरों ने हड़तलों में भाग लिया, लाल झण्डे फहराए गए, परचे में छपी माँगें प्रस्तुत की गयीं, और इन माँगों, यानी आठ घण्टे के कार्य-दिवस और राजनीतिक स्वतंत्रता की माँगों, के क्रान्तिकारी चरित्र का प्रदर्शन हुआ।”

लेनिन ने खारकोव के पार्टी नेताओं की आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग के साथ अन्य छोटी-मोटी और शुद्ध आर्थिक माँगों को मिलाने के लिए कड़ी भर्त्सना की, क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि मई-दिवस का राजनीतिक चरित्र किसी भी तरह धुंधला हो। इसके बारे में उपर्युक्त प्राक्कथन में ही वह लिखते हैं :

“इन माँगों में सबसे पहली माँग होगी आठ घण्टे के कार्य-दिवस की आम माँग, जो सभी देशों के सर्वहारा-वर्ग ने की है। इस माँग का सबसे पहले रखा जाना खारकोव के मज़दूरों की अन्तरराष्ट्रीय समाजवादी मज़दूर आन्दोलन के साथ एकजुटता के अहसास को दर्शाता है और निश्चित रूप से इसी लिए इस माँग को छोटी-मोटी आर्थिक माँगों से नहीं मिलाया जाना चाहिए, जैसे – फोरमैन द्वारा अच्छे बर्ताव की माँग या तनख्वाह में दस फीसदी की बढ़ोत्तरी की माँग। आठ घण्टे के कार्य-दिवस की माँग पूरे सर्वहारा वर्ग की माँग है और सर्वहारा उसे एक-एक मालिक के सामने नहीं बल्कि सरकार के सामने रखता है, क्योंकि ये ही आज के सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के प्रतिनिधि हैं। सर्वहारा वर्ग यह माँग समूचे पूँजीपति वर्ग के सामने रखता है जो सभी उत्पादन के साधनों का मालिक है।”

मई-दिवस के राजनीतिक नारे

अन्तरराष्ट्रीय सर्वहारा के लिए मई-दिवस एक ख़ास दिन बन गया था। आठ घण्टे के कार्य-दिवस की मूल माँग के साथ कुछ दूसरे महत्त्वपूर्ण नारे जुड़ गए जिन पर मज़दूरों को मई-दिवस की हड़ताल और प्रदर्शनों के दौरान ध्यान देने के लिए आह्वान किया गया। इनमें ये नारे शामिल थे –

“अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर-वर्ग  की एकता-जिन्दाबाद”,

“साम्राज्यवादी युद्ध और औपनिवेशिक उत्पीड़न का विरोध करो”,

“राजनीतिक बंदियों को मुक्त करो”,

“सार्वभौमिक मताधिकार दो”,

“आन्दोलन करने का अधिकार दो”,

“मज़दूरों को राजनीतिक और आर्थिक संगठन बनाने का अधिकार दो।”

पुरानी इण्टरनेशनल में मई-दिवस के प्रश्न पर आखिरी बार 1904 में एम्सटर्डम कांग्रेस में विचार हुआ था। मई-दिवस के प्रदर्शनों में इस्तेमाल हो रहे नारों और इस बात पर समीक्षा करते हुए कि, कई देशों में अभी भी मई-दिवस पहली मई के बजाय मई के पहले रविवार को मनाया जा रहा है, इस कांग्रेस में पारित प्रस्ताव पुन: इन शब्दों में समाप्त होता है :

“एम्सटर्डम में अन्तरराष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस सभी देशों की सामाजिक-जनवादी पार्टियों और ट्रेड यूनियनों का आह्वान करती है कि वे पहली मई को पूरी ऊर्जा के साथ प्रदर्शन करें ताकि आठ घण्टे के कार्य-दिवस को कानून द्वारा लागू किया जा सके सर्वहारा की वर्ग माँगों को हासिल किया जा सके और अन्तरराष्ट्रीय शान्ति को स्थापित किया जा सके। पहली मई के प्रदर्शन का सबसे प्रभावशाली तरीका है – काम-बन्दी। इसलिए कांग्रेस सभी देशों के सर्वहारा संगठनों के लिए यह आदेश जारी करती है कि जहाँ भी सम्भव हो मज़दूरों को हानि पहुंचाए बिना पहली मई को काम बन्द कर दें।”

जब अप्रैल, 1912 में साइबेरिया में लेना के सोने के खानों के मज़दूरों का कत्लेआम हुआ तो रूस में एक बार फ़िर क्रान्तिकारी सर्वहारा जन कार्रवाई का प्रश्न उठने लगा। उसी साल के मई-दिवस पर सैंकड़ों हज़ार मज़दूर काम बन्द करके सड़कों पर उतर आए। यह जार के अत्याचारों को चुनौती थी जो 1905 की असपफल रूसी क्रान्ति के बाद से और भी निरंकुश शासन कर रहा था। इस मई-दिवस के बारे में लेनिन ने लिखा है :

“पूरे रूस में हुई मई की महान हड़ताल, इससे जुड़े सड़कों पर हुए प्रदर्शन, मज़दूरों का क्रान्तिकारी ऐलान, मज़दूरों को दिए गए क्रान्तिकारी भाषण, साफ तौर पर यह बताते हैं कि रूस एक बार फ़िर धधकती हुई, क्रान्तिकारी परिस्थिति में प्रवेश कर रहा है।”

पहले विश्व-युद्ध के दौरान मई-दिवस

सामाजिक-जनवादी नेताओं द्वारा युद्ध के दौरान किया गया विश्वासघात 1915 में अपनी पूरी नग्नता के साथ सामने आ गया। उन्होंने अगस्त, 1914 में साम्राज्यवादी सरकारों से हाथ मिला लिया था। इन विश्वासघातियों का यह भण्डाफोड़ इसी दोस्ती का अवश्यम्भावी परिणाम था। जर्मनी के सामाजिक जनवादियों ने मज़दूरों को काम पर लगे रहने के लिए कहा और फ्रांसीसी समाजवादियों ने एक विशेष घोषणा-पत्र में मालिकों को पहली मई से न घबराने के लिए आश्वस्त किया। दूसरे युद्धरत देशों के समाजवादियों के बहुलांश में भी ऐसी ही रुझानें दीख रही थीं। इन हालात में केवल रूस में बोल्शेविक और अन्य देशों में अल्पमत क्रान्तिकारी ही समाजवाद और अन्तरराष्ट्रीयतावाद के प्रति ईमानदार बने हुए थे। लेनिन, रोजा लक्जम्बर्ग और कार्ल लीबनेख्त की आवाजें सामाजिक अन्धराष्ट्रवाद के नशे में पागल लोगों के विरोध में उठ खड़ी हुईं। 1916 के मई-दिवस के दिन आंशिक रूप से हुई हड़तालों और सड़कों पर हुई खुली झड़पों ने यह दिखा दिया कि सभी युद्धरत देशों के मज़दूर अपनेआप को कमीने गद्दारों के जहरीले असर से मुक्त कर रहे हैं। सभी क्रान्तिकारियों की तरह लेनिन की नजर में “अवसरवाद का पतन (दूसरे इण्टरनेशनल का पतन) मज़दूर आन्दोलन के लिए काफी फायदेमन्द था” और लेनिन द्वारा गद्दारों से मुक्त एक नया इण्टरनेशनल बनाने का आह्वान वक्त की पुकार थी।

1915 की जिमरवाल्ड और 1916 की कीन्थॉल समाजवादी कांग्रेस में यह निश्चय किया गया कि लेनिन के `साम्राज्यवादी युद्ध को गृह-युद्ध में बदलने´ के नारे के तहत सारी दुनिया की क्रान्तिकारी अन्तरराष्ट्रीयतावादी पार्टियों और छोटी-छोटी समाजवादी पार्टियों की एकता को मजबूत किया जाएगा। 1916 के मई-दिवस पर कार्ल लीबनेख्त और समाजवादी आन्दोलन में उनके समर्थकों के नेतृत्व में बर्लिन में हुए विशाल प्रदर्शन मज़दूर-वर्ग की जीवन्त शक्तियों के प्रमाण थे, जो पुलिस के दमन और आधिकारिक नेताओं के विरोध के बावजूद आगे बढ़ती जा रही थी।

1917 में अमेरिका में युद्ध की घोषणा के बावजूद मई-दिवस की गतिविधियां रुकी नहीं। समाजवादी पार्टी के सर्वहारा तत्वों ने सेंट लुई में अप्रैल के शुरू में हुए आपात अधिवेशन में पारित युद्ध-विरोधी प्रस्ताव को गंभीरता से लिया, और मई-दिवस का इस्तेमाल साम्राज्यवादी युद्ध के विरोध में प्रदर्शन के लिए किया। 1919 में क्लीवलैण्ड में हुआ मई-दिवस का प्रदर्शन ख़ास तौर पर उग्र था। इसका नेतृत्व करने वाले चार्ल्स ई. रथेनबर्ग समाजवादी पार्टी के स्थानीय सेक्रेटरी थे। आगे चलकर वे कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक बने और उसके जनरल सेक्रेटरी भी रहे। 20,000 से भी ज्यादा मज़दूरों ने, इस प्रदर्शन में, पब्लिक स्क्वायर की सड़कों पर मार्च किया, और वहाँ पर हज़ारों नये लोगों ने इसमें जुड़कर इस प्रदर्शन को महान बनाया। पुलिस ने क्रूरता से इन मज़दूरों की सभा पर हमला किया जिसमें एक मज़दूर की मृत्यु हो गयी और अनेक मज़दूर बुरी तरह घायल हो गये।

1917 मई-दिवस, जुलाई और फ़िर अक्टूबर के दिन रूसी क्रान्ति के विकास के विभिन्न चरण थे जो बाद में रूसी क्रान्ति को उसके लक्ष्य तक ले गये। रूसी क्रान्ति ने , जिसने मानव जाति के इतिहास में एक नये युग की शुरुआत की, मई-दिवस की परम्पराओं को नया संवेग और महत्त्व दिया। धरती के छठे भाग पर सर्वहारा शक्ति की विजय ने उस आकांक्षा को जीवन में उतार दिया था जो `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेताओं के मई-दिवस प्रदर्शन की इस प्रतिज्ञा से झलकता है जो उन्होंने 1890 को न्यूयार्क के यूनियन स्क्वायर पर ली थी- “आठ घण्टे के कार्य-दिवस के लिए संघर्ष करते हुए हम अपने अन्तिम लक्ष्य से कभी नजर नही हटायेंगे – यानी (पूँजीवादी) उजरत प्रणाली का ध्वंस।”

रूसी मज़दूर-वर्ग इस लक्ष्य को सबसे पहले पूरा करने में सफल हुआ था। लेकिन 1917 के बाद `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेता उस लक्ष्य से काफी दूर जा चुके थे, जिसकी उन्होंने 1890 में घोषणा की थी। अब उनका पहला सरोकार पूँजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने और साम्राज्यवाद के लिए राहें आसान करना था। वे नहीं चाहते थे कि अमेरिकी मज़दूरों को रूसी सर्वहारा की उन ऐतिहासिक उपलब्धियों से प्रेरणा मिले, जिन्होंने मई-दिवस की संघर्ष भावना को एक नया अर्थ दिया था और जिस दिन मज़दूर-वर्ग अपनी अन्तरराष्ट्रीय एकजुटता तथा पूँजीवादी शोषण एवं उजरती गुलामी की व्यवस्था से मुक्ति के लक्ष्य की घोषणा करता है।

1923 में मई-दिवस के लिए `वर्कर´ नामक साप्ताहिक में चार्ल्स ई. रथेनबर्ग ने लिखा :

“मई-दिवस -वह दिन जो पूँजीवादियों के दिल में डर और मज़दूरों के दिल में आशा पैदा करता है। इस साल सारी दुनिया के मज़दूर अमेरिका में कम्युनिस्ट आन्दोलन को हमेशा से ज्यादा मजबूत पाएँगे….. महान उपलब्धियों के लिए रास्ता साफ है, और दुनिया की किसी भी जगह की तरह अमेरिका का भविष्य भी कम्युनिज्म है।”

इसी साप्ताहिक `वर्कर´ के करीब सत्रह साल पहले के एक अंक में जो कि मई-दिवस विशेषांक था, यूजीन वी. डेब्स ने लिखा था : यह सबसे पहला और एकमात्र अन्तराष्ट्रीय दिवस है। यह मज़दूर-वर्ग से सरोकार रखता है और क्रान्ति को समर्पित है।” यह अंक 27 अप्रैल 1907 को प्रकाशित हुआ था।

मई-दिवस की इस बढ़ती हुई जुझारू परम्परा के जवाब में `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के नेताओं ने केवल श्रम-दिवस के रिवाज को प्रोत्साहित किया, जो सितम्बर के पहले सोमवार को मनाया जाता था। मूलत: 1885 में स्थानीय स्तर पर इस दिन को स्वीकार किया गया था और बाद में मई-दिवस के आयोजनों को प्रभावहीन बनाने के लिए कई राज्य सरकारों ने इसे मान्यता दे दी। हूवर प्रशासन ने `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के सहयोग से पहली मई को `बाल स्वास्थ्य दिवस´ घोषित कर एक और जवाबी कार्रवाई की। बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में अचानक पैदा हुई इस रुचि को 1928 के `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ के सम्मेलन के लिए कार्यकारिणी परिषद द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट को पढ़कर समझा जा सकता है। इसमें लिखा गया था – “कम्युनिस्ट अभी भी पहली मई को मज़दूर-दिवस के रूप में मनाते हैं। लेकिन आज के बाद से पहली मई `बाल स्वास्थ्य दिवस´ के रूप में जाना जाएगा। क्योंकि राष्ट्रपति ने कांग्रेस द्वारा पारित प्रस्ताव के मुताबिक यह आह्वान करते हुए लोगों से कहा है कि वे अब पहली मई को `बाल स्वास्थ्य दिवस´ के रूप में मनाएँ। इसका लक्ष्य यह है कि इस पूरे साल लोगों में बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा के प्रति जागरुकता पैदा की जाए। यह एक सबसे मूल्यवान लक्ष्य है। इसके साथ ही अब मई-दिवस न ही हड़ताल-दिवस के रूप में जाना जाएगा और न ही कम्युनिस्ट दिवस के रूप में।” (जोर लेखक का)

1929 का संकट

अनुभवों से कोई सीख न लेते हुए, विश्व-युद्ध के लगभग एक दशक बाद, प्रतिक्रियावादी ट्रेड यूनियन नेता, पूँजीवाद के अन्तर्गत स्थाई सम्पन्नता आने के भ्रम के बीज बो रहे थे। उनकी इस बात में कोई रुचि नहीं थी कि किस तरह हज़ारों-लाखों असंगठित मज़दूरों को एक झण्डे तले लाया जाए और इस बात से अवगत कराया जाय कि पूँजीवाद भारी संकटों के बीच फँसने और इन संकटों का बोझ मज़दूरों के उपर डालने वाला है। जब 1929 के अन्त में आर्थिक ध्वंस आया, और ट्रस्टों एवं एकाधिकारी संघों ने इस संकट का सारा बोझ मज़दूरों पर डालना चाहा तो मज़दूरों के पास एक ही रास्ता बचा – हड़तालों और बेरोज़गार मज़दूरों के जन-संघर्षों का रास्ता। इन संघर्षों के परिणामस्वरूप, जिनका नेतृत्व कम्युनिस्टों ने किया था, अमेरिकी मज़दूर और अधिक भयंकर विपदाओं को रोकने और अपने जनतान्त्रिक अधिकारों का दायरा बढ़ाने में सफल रहे। साथ ही, उन्होंने 1930 के दशक में, `अमेरिकन फेडरेशन ऑफ लेबर´ और सी.आई.ओ. दोनों में, अमेरिकी मज़दूर वर्ग के इतिहास में ट्रेड यूनियन संगठन की महानतम प्रगति को दर्ज कराया। सी.आई.ओ. का 1935 में जन्म और विभिन्न उद्योगों के मज़दूरों में तेजी से इसका विस्तार पूरे मज़दूर आन्दोलन और देश के लिए ऐतिहासिक महत्त्व की प्रमुख उपलब्धि था। अमेरिकी मज़दूरों के इस उभार के नतीजतन नीग्रो लोगों के बराबर हकों के लिए संघर्ष और अमेरिका में एक जनतान्त्रिक मोर्चे को और मजबूत बनाने की स्थितियां बन गयीं।

साम्राज्यवादी युद्ध और क्रान्ति तथा एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट के द्वारा झकझोर दिए जाने के बाद, केवल डेढ़ दशक के छोटे से कालक्रम में विश्व पूँजीवाद स्पष्टत: एक आम संकट के दौर में प्रवेश कर गया। साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा जिसने प्रथम विश्व युद्ध को जन्म दिया था, इस संकट के कारण और भी भयंकर होती गयी। विश्व के छठे भाग पर पूँजीवाद के ख़त्म हो जाने, उपनिवेशों में स्वतंत्रता के लिए संघर्षों का दुर्दमनीय विकास और उन्नत पूँजीवादी देशों में अपने जीवन स्तर को उठाने तथा अपने जनतान्त्रिक अधिकारों को बनाये रखने एवं विस्तारित करने के लिए लगातार फौलादी होते इरादों से पूँजीवाद का यह आम संकट बढ़ता ही गया। ट्रस्ट और इज़ारेदार आर्थिक और राजनीतिक जीवन पर अपनी पकड़ बचाए रखने की बदहवासी भरी कोशिशों में लग गए और इतिहास के अपरिहार्य विकास को रोकने के लिए फासीवाद की आतंकवादी तानाशाही की शरण में चले गए। फ्रांस, इंग्लैण्ड और अमेरिका के इज़ारेदारों ने फासीवादी आन्दोलनों को प्रोत्साहित करने के लिए वह सब कुछ किया जो उनके बूते में था। उन्होंने पराजित जर्मनी और उन सभी देशों में, जहाँ मज़दूर वर्ग और प्रगतिशील ताकतों की कमजोरी और बिखराव ने फासीवादी विजय के लिए दरवाजे खोल दिए थे, फासीवाद को बढ़ावा दिया और अपनी थैलियां खोल दीं। इज़ारेदार पूंजी के इन सारे विश्वव्यापी प्रयासों ने न केवल जनतान्त्रिक उपलब्धियों को, जो शताब्दियों के संघर्षों के बाद हासिल हुई थीं, नष्ट करने की कोशिश की, बल्कि एक नए विश्व-युद्ध का रास्ता भी साफ कर दिया।

फासीवाद के विरुद्ध संघर्ष

1933 से 1939 के दौरान जर्मन फासीवाद ने पूरी दुनिया के प्रतिक्रियावादियों की भूमिका निभायी। एंग्लो-अमेरिकन साम्राज्यवाद से प्रोत्साहन पाकर और पूरी दुनिया पर कब्जा जमाने के अपने साम्राज्यवादी मंसूबों के तहत जर्मन फासीवाद ने योजनाबद्ध ढंग से दूसरे विश्वयुद्ध की तैयारियां शुरू कर दी थी। यह वही एंग्लो-अमेरिकी साम्राज्यवाद था जिसका शुरू से एक लक्ष्य था, समाजवाद के विनाश के लिए युद्ध, जिसके लिए अब वह नाजी जर्मनी को खड़ा करने में सहायता कर रहा था। दूसरी ओर जापानी साम्राज्यवाद भी अपने स्वार्थों के लिए इस कुकृत्य में शामिल हो गया। अपनी प्रकृति के अनुसार इस तरह का कोई भी युद्ध हर देश की राष्ट्रीय स्वतंत्रता के खिलाफ खड़ा होता था। इन स्थितियों में लगातार यह बात साफ होती गयी थी कि, मानव जाति का विकास मज़दूरों, किसानों और उपनिवेशों की दबाई और कुचली गयी जनता के हाथ में है। केवल वे ही कदम बढ़ा कर, पहल लेकर और अपनी एकता और प्रतिरोध के जरिए सभी देशों की जनतान्त्रिक शक्तियों व तत्वों को अपने इर्द-गिर्द गोलबन्द कर सकते हैं और इज़ारेदार पूँजी द्वारा प्रेरित प्रतिक्रियावाद के बढ़ते अनर्थकारी विकास को रोक सकते थे। इसीलिए, तीस के पूरे दशक के दौरान मई-दिवस, फासीवाद हमले का प्रतिरोध करने और एक नए विश्व-विध्वंस का विरोध करने के लिए सभी जनतान्त्रिक शक्तियों एवं जनता की एकता के आह्वान को लगातार गुंजायमान करता रहा।

द्वितीय विश्व-युद्ध ने साफ तौर पर यह दिखला दिया कि मज़दूर-वर्ग ही किसी राष्ट्र की वास्तविक रीढ़ की हड्डी है। फासीवाद शक्ति हथियाने और दुनिया को एक विनाशकारी युद्ध में झोंकने में इसलिए कामयाब हो सका क्योंकि मज़दूर वर्ग असंगठित था। लेकिन वह कहीं भी एकजुट और युद्धरत मज़दूर वर्ग पर विजय हासिल न कर सका, जो हर जगह प्रगति और जनतंत्र की रक्षा का नेतृत्व कर रहा था और मानवजाति के जनतान्त्रिक बहुमत को अपने इर्द-गिर्द गोलबन्द कर रहा था ताकि फासीवादी दानव का सर कुचला जा सके। इस युद्ध में हर जगह के जनतान्त्रिक लोगों ने अपनी आँखों से यह देखा कि ये सोवियत रूस और हर जगह के मज़दूर ही थे जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता, जनतंत्र और प्रगति के लिए फासीवाद के विरुद्ध इस ऐतिहासिक महायुद्ध की अगली कतारों में थे।

इस युद्ध के दौरान हर जगह के मज़दूरों ने काम पर रहकर और फासीवादी सेनाओं के ध्वंस के लिए हथियार बनाकर मई-दिवस मनाया। जब 1945 में युद्ध ख़त्म हुआ तो युद्ध के बाद के पहले मई-दिवस समारोहों में लाखों-लाख मज़दूर उमड़ पड़े, ख़ासकर यूरोप के विजेता और आजाद हुए देशों में। इन मज़दूरों ने युद्ध को जारी रखने की और फासीवाद के सभी अवशेषों को जड़ से उखाड़ फेंकने की अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी, ताकि हर-हमेशा के लिए पूरे मज़दूर वर्ग की जनता के अन्य प्रगतिशील तत्वों के साथ एकता कायम की जा सके, जो हमेशा के लिए इज़ारेदार पूँजी को इसके लिए अक्षम बना दे कि वह फ़िर से फासीवाद की छत्रछाया में जा सके और फासीवाद फ़िर अपना आदमखोर शासन कायम कर सके, ताकि जनतंत्र को जो जनता की सर्वश्रेष्ठ शक्ति है, स्थापित और विकसित किया जा सके, ताकि एक अनश्वर शान्ति का निर्माण किया जा सके और दमन- उत्पीड़न-शोषण से मुक्त समाजवादी विश्व के पथ पर अग्रसर हुआ जा सके।

हर देश का मज़दूर वर्ग मई-दिवस के अवसर पर, मानव-जाति के खुशहाल भविष्य और शान्ति के लिए संघर्ष करते हुए, अन्तरराष्ट्रीय एकजुटता और मैत्री की भावना के साथ सारी दुनिया की जनता को सलाम करता है।

पाँच क्रान्तिकारी जनसंगठनों का साझा चुनावी भण्डाफोड़ अभियान

Posted on Updated on

चुनावी राजनीति के मायाजाल से बाहर आओ!


नये मज़दूर इन्कलाब की अलख जगाओ!!

देशभर में लोकसभा चुनाव के लिए जारी धमाचौकड़ी के बीच बिगुल मज़दूर दस्ता, देहाती मज़दूर यूनियन, दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा, और स्‍त्री मुक्ति लीग ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश sajha abhiyanऔर पंजाब के अलग-अलग इलाकों  में चुनावी भण्डाफोड़ अभियान चलाकर लोगों को यह बताया कि वर्तमान संसदीय ढाँचे के भीतर देश की समस्याओं का हल तलाशना एक मृगमरीचिका है। ऊपर से नीचे तक सड़ चुकी इस आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को ध्वस्त कर बराबरी और न्याय पर टिका नया हिन्दुस्तान बनाने के लिए आम अवाम को संगठित करके एक नया इन्कलाब लाना होगा।

दिल्ली, लखनऊ, गोरखपुर, लुधियाना, चण्डीगढ़ आदि शहरों में इन संगठनों के कार्यकर्ताओं ने चुनावी राजनीति का भण्डाफोड़ करते हुए बड़े पैमाने पर पर्चे बाँटे, नुक्कड़ सभाएँ कीं, घर-घर सम्पर्क किया, ट्रेनों-बसों में और बस-रेलवे स्टेशनों पर प्रचार अभियान चलाये और दीवारों पर पोस्टर लगाये। दिल्ली, लखनऊ और गोरखपुर में चुनावी राजनीति की असलियत उजागर करने वाली एक आकर्षक पोस्टर प्रदर्शनी भी जगह-जगह लगायी गयी जिसने बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान खींचा। दिल्ली में रोहिणी इलाके में जागरूक नागरिक मंच ने अपनी दीवाल पत्रिका ‘पहल’ के ज़रिये भी चुनावी राजनीति के भ्रमजाल पर करारी चोट की।

राजधानी दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय, करावलनगर, शहीद भगतसिंह कालोनी, प्रकाश विहार, अंकुर एन्क्लेव, शिव विहार, कमल विहार, मुस्तफाबाद, नरेला, राजा विहार, सूरज पार्क, बादली आदि इलाकों  में चलाये गये भण्डाफोड़ अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं ने कहा कि चुनाव में बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं। इस बार मीडिया में धुआँधार प्रचार अभियान चलाकर लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कोई इसे परिवर्तन की अग्नि बता रहा है तो कोई कह रहा है कि महज़ एक वोट से हम देश की तकदीर बदल सकते हैं। लेकिन असलियत यह है कि हमसे कहा जा रहा है कि हम चुनें लम्पटों, लुटेरों, भ्रष्टाचारियों, व्यभिचारियों के इस या उस गिरोह को, थैलीशाहों के इस या उस टुकड़खोर को, जहरीले साँपों, भेड़ियों और लकड़बग्घों की इस या उस नस्ल को। किसी भी पार्टी के लिए आम जनता की तबाही-बर्बादी कोई मुद्दा नहीं है। बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी, छँटनी, पूँजीपतियों की लूट-खसोट, पुलिसिया अत्याचार, भ्रष्टाचार किसी पार्टी के लिए कोई मुद्दा नहीं है। ग़रीबों के लिए स्वास्थ्य, सबके लिए बराबर और सस्ती शिक्षा, रोज़गार, बिजली, पानी, घर जैसी माँगें इस चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। हमेशा की तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नफरत भरी राजनीति ज़ोर-शोर से जारी है। चुनाव जीतने के लिए जनता का समर्थन नहीं बल्कि जातीय समीकरणों के जोड़-तोड़ भिड़ाये जा रहे हैं।

नुक्कड़ सभाओं में वक्ताओं ने कहा कि असलियत तो पहले भी यही थी मगर इस पर भ्रम के परदे पड़े हुए थे। लेकिन ख़ास तौर पर पिछले 25-30 वर्षों में यह सच्चाई ज़्यादा से ज़्यादा नंगे रूप में उजागर होती गयी है कि यह जनतन्त्र नहीं बल्कि बेहद निरंकुश किस्म का धनतन्त्र है। हमें बस यह चुनने की आज़ादी है कि अगले पाँच वर्षों तक कौन हमारा ख़ून निचोड़े, किसके हाथों से हम दरबदर किये जायें!

लखनऊ में जीपीओ पार्क, हाई कोर्ट, मुंशी पुलिया, पालीटेक्निक चौराहा, चौक, अमीनाबाद आदि इलाकों में भण्डाफोड़ पोस्टर प्रदर्शनी लगायी गयी और पर्चे बाँटे गये। प्रदर्शनी स्थल पर जुटी भीड़ को सम्बोधित करते हुए कार्यकर्ताओं ने कहा कि 1952 में चुनावी ख़र्च महज़ डेढ़ करोड़ रुपये का था जो अब बढ़ते-बढ़ते 13,000 करोड़ तक पहुँच चुका है – और यह तो महज़ घोषित ख़र्च है। पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा किया जाने वाला असली ख़र्च तो इससे कई-कई गुना ज़्यादा है। चुनाव ख़त्म होते ही यह सारा ख़र्च आम ग़रीब जनता से ही वसूला जायेगा।

गोरखपुर में दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा के कार्यकर्ताओं ने बिछिया, रामलीला बाज़ार, सब्ज़ी मण्डी, शाहपुर, धरमपुर, लेबर चौक, इन्दिरा तिराहा आदि पर नुक्कड़ सभाएँ कीं, पोस्टर प्रदर्शनी लगायी और बड़े पैमाने पर पर्चे बाँटे। सभाओं में कहा गया कि भगवाधारी भाजपा हो या तिरंगा उड़ाने वाली कांग्रेस, हरे-नीले-पीले झण्डे वाली तमाम क्षेत्रीय पार्टियाँ हों या लाल झण्डे को बेचकर संसद में सीट ख़रीदने वाले नकली वामपन्थी – लुटेरी आर्थिक नीतियों के सवाल पर सबमें एकता है। यह बात दिनोदिन साफ होती जा रही है कि सरकार चाहे इसकी हो या उसकी – वह शासक वर्गों की मैनेजिंग कमेटी ही होती है। यह जनतन्त्र पूँजीपतियों का अधिनायकतन्त्र ही है। लोगों को अपने तथाकथित “प्रतिनिधियों” का चुनाव बस इसीलिए करना है ताकि वे संसद के सुअरबाड़े में बैठकर जनता को दबाने के नये-नये कानून बनायें, निरर्थक बहसें और जूतम-पैजार करें और देशी-विदेशी धनपतियों की सेवा करते हुए अपने पड़पोतों और पड़पड़पोतों तक के लिए कमाकर धर दें।

पंजाब में लुधियाना, चण्डीगढ़ सहित अनेक स्थानों पर चलाये गये भण्डाफोड़ अभियान में कार्यकर्ताओं ने अपने भाषणों और पर्चों में कहा कि इस बार सभी चुनावी धन्धेबाजोँ का मुख्य मुद्दा है कि प्रधानमन्त्री कौन बने। लेकिन किसी की नीतियों में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। कांग्रेस की अगुवाई वाला यू.पी.ए. गठबन्धन हो, भाजपा की अगुवाई वाला एन.डी.ए. गठबन्धन हो, तीसरा मोर्चा हो या अन्य कोई भी चौथा-पाँचवाँ गठबन्धन या मोर्चा, सभी की नीतियाँ देसी-विदेशी पूँजी के पक्ष में और मेहनतकश जनता के विपक्ष में चलायी जा रही निजीकरण- उदारीकरण की नीतियों से ज़रा भी इधर-उधर नहीं जाती हैं। आज सैकड़ों करोड़पति गुण्डे-अपराधी लोकसभा के चुनाव लड़ रहे हैं। जिस देश की 77 प्रतिशत जनता रोज़ाना महज़ 20 रुपये पर गुज़ारा करती हो वहाँ की जनता को कहा जा रहा है कि वे अपने भाग्य का फैसला करने के लिए करोड़पतियों को चुनें। चुनाव लड़ रहे नेताओं में से 15 प्रतिशत ऐसे हैं जो इस देश के बुर्जुआ कानून के अनुसार भी अपराधी हैं। कहने को तो साधरण ग़रीब आदमी भी चुनाव में हिस्सा ले सकता है, लेकिन हम जानते ही हैं कि चुनाव धन और गुण्डागर्दी के सहारे ही जीते जाते हैं।

उन्होंने कहा कि आज जनता विकल्पहीनता की स्थिति में है और क्रान्ति की शक्तियाँ कमजोर हैं। पर रास्ता एक ही है। इलेक्शन नहीं, इन्कलाब का रास्ता! मेहनतकशों को चुनावी मदारियों से कोई भी आस छोड़कर अपने क्रान्तिकारी संगठन बनाने के लिए आगे आना होगा। इस देश की सूरत बदलने वाले सच्चे क्रान्तिकारी विकल्प का निर्माण चुनावी नौटंकी से नहीं बल्कि जनता के क्रान्तिकारी संघर्षों से ही होगा। जब जनता ख़ुद संगठित हो जायेगी तब वह वास्तव में चुनाव कर सकेगी – वह चुनाव होगा यथास्थिति और क्रान्ति के बीच, लोकतन्त्र के स्वांग और वास्तविक लोकसत्ता के बीच! हमें इसकी तैयारी आज से ही शुरू कर देनी चाहिए।

सभी जगह अभियान टोलियों ने मेहनतकशों, इंसाफपसन्द नागरिकों और नौजवानों का आह्नान किया कि वे नयी सदी की नयी क्रान्ति की कतारों को संगठित करने के लिए आगे आयें। शहीदेआज़म भगतसिंह के सन्देश को सुनें और क्रान्ति का पैग़ाम हर दिल तक ले जाने में जुट जायें। चुनावी मदारियों के मायाजाल से बाहर आयें और जनता की सच्ची लोकसत्ता कायम करने के लिए लम्बी लड़ाई की राह पर डट जायें।

– बिगुल संवाददाता

प्रेम, परम्परा और विद्रोह

Posted on Updated on

कात्यायनी

बाबू बजरंगी आज एक राष्ट्रीय परिघटना बन चुका है। अहमदाबाद के इस शख्स का दावा है कि अब तक वह सैकड़ों हिन्दू कन्याओं को “मुक्त” करा चुका है। “मुक्ति” का यह काम बाबू बजरंगी मुस्लिम युवकों के साथ हिन्दू युवतियों के प्रेमविवाह को बलपूर्वक तुड़वाकर किया करता है। ज़ाहिर है कि अन्तरधार्मिक विवाहों, या यूँ कहें कि दो वयस्कों द्वारा परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध कायम करने के स्वतन्त्र निर्णय को संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बावजूद बाबू बजरंगी का “मुक्ति अभियान” यदि अब तक निर्बाध चलता रहा है तो इसके पीछे गुजरात की भाजपा सरकार द्वारा प्राप्त परोक्ष सत्ता-संरक्षण का भी एक महत्त्वपूर्ण हाथ है।

लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा, जो साम्प्रदायिक कट्टरपन्थी नहीं है, वह भी अपने रूढ़िवादी मानस के कारण, अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक प्रेम-विवाहों का ही विरोधी है और बाबू बजरंगी जैसों की हरकतों के निर्बाध जारी रहने में समाज के इस हिस्से की भी एक परोक्ष भूमिका होती है। समाज के पढ़े-लिखे, प्रबुद्ध माने जाने वाले लोगों का बहुलांश आज भी ऐसा ही है जो युवाओं के बीच प्रेम-सम्बन्ध को ही ग़लत मानता है और उसे अनाचार एवं अनैतिकता की कोटि में रखकर देखता है। बहुत कम ही ऐसे अभिभावक हैं जो अपने बेटों या बेटियों के प्रेम-सम्बन्ध को सहर्ष स्वीकार करते हों और अपनी ज़िन्दगी के बारे में निर्णय लेने के उनके अधिकार को दिल से मान्यता देते हों। यदि वे स्वीकार करते भी हैं तो ज्यादातर मामलों में विवशता और अनिच्छा के साथ ही। और जब बात किसी अन्य धर्म के या अपने से निम्न मानी जाने वाली किसी जाति (विशेषकर दलित) के युवक या युवती के साथ, अपने बेटे या बेटी के प्रेम की हो तो अधिकांश उदारमना माने जाने वाले नागरिक भी जो रुख अपनाते हैं, उससे यह साफ हो जाता है कि हमारे देश का उदार और सेक्युलर दिलो-दिमाग़ भी वास्तव में कितना उदार और सेक्युलर होता है! यही कारण है कि जब धर्म या जाति से बाहर प्रेम करने के कारण किसी बेटी को अपने ही घर में काटकर या जलाकर मार दिया जाता है या किसी दलित या मुस्लिम युवक को सरेआम फाँसी पर लटकाकर मार दिया जाता है या उसकी बोटी-बोटी काट दी जाती है या उसके परिवार को गाँव-शहर छोड़ने तक पर मज़बूर कर दिया जाता है तो ऐसे मसलों को लेकर केवल महानगरों का सेक्युलर और प्रगतिशील बुद्धिजीवी समुदाय ही (ग़ौरतलब है कि ऐसे बुद्धिजीवी महानगरीय बुद्धिजीवियों के बीच भी अल्पसंख्यक ही हैं) कुछ चीख़-पुकार मचाता है, शासन-प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की जाती है, कुछ प्रतीकात्मक धरने-प्रदर्शन होते हैं, कुछ जाँच टीमें घटनास्थल का दौरा करती हैं, अखबारों में लेख-टिप्पणियाँ छपती हैं (और लगे हाथों फ्रीलांसर नामधारियों की कुछ कमाई भी हो जाती है), टी.वी. चैनलों को `मुकाबला´, `टक्कर´ या ऐसे ही नाम वाले किसी कार्यक्रम के लिए मसाला मिल जाता है और कुछ प्रचार-पिपासु, धनपिपासु सेक्युलर बुद्धिजीवियों को भी अपनी गोट लाल करने का मौका मिल जाता है। जल्दी ही मामला ठण्डा पड़ जाता है और फिर ऐसे ही किसी नये मामले का इन्तज़ार होता है जो लम्बा कतई नहीं होता।
मुद्दा केवल किसी एक बाबू बजरंगी का नहीं है। देश के बहुतेरे छोटे-बड़े शहरों और ग्रामीण अंचलों में ऐसे गिरोह मौजूद हैं जो धर्म और संस्कृति के नाम पर ऐसे कारनामों को अंजाम दिया करते हैं और बात केवल धार्मिक कट्टरपन्थी फासीवादी राजनीति से प्रेरित गिरोहों की ही नहीं है। ऐसे पिताओं और परिवारों के बारे में भी आये दिन खबरें छपती रहती हैं जो जाति-धर्म के बाहर प्रेम या विवाह करने के चलते अपनी ही सन्तानों की जान के दुश्मन बन जाते हैं। देश के कुछ हिस्सों में, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में जाति-बिरादरी की पंचायतों की मध्ययुगीन सत्ता इतनी मज़बूत है कि जाति-धर्म के बाहर शादी करना तो दूर, सगोत्रीय विवाह की वर्जना तक को तोड़ने के चलते पंचायतों द्वारा सरेआम मौत की सज़ा दे दी जाती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ्ऱफरनगर, सहारनपुर, मेरठ आदि ज़िलों से लेकर हरियाणा तक से हर वर्ष ऐसी कई घटनाओं की खबरें आती रहती हैं और उससे कई गुना घटनाएँ ऐसी होती हैं जो खबर बन पाने से पहले ही दबा दी जाती हैं। इन सभी मामलों में पुलिस और प्रशासन का रवैया भी पूरी तरह पंचायतों के साथ हुआ करता है। अपने जातिगत और धार्मिक पूर्वाग्रहों के चलते पुलिस और प्रशासन के कर्मचारियों की सहानुभूति भी पंचायतों के रूढ़िवादी बड़े-बुजुर्गों के साथ ही हुआ करती है। यहाँ तक कि न्यायपालिका भी इन पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होती। आये दिन दिल्ली-मुम्बई से लेकर देश के छोटे-छोटे शहरों तक में पार्कों-सिनेमाघरों-कैम्पसों आदि सार्वजनिक स्थानों पर  घुसकर बजरंगियों-शिवसैनिकों और पुलिस द्वारा प्रेमी जोड़ों की पिटाई को भी इसी आम सामाजिक प्रवृत्ति से जोड़कर देखा जाना चाहिए क्योंकि आम लोग ऐसी घटनाओं का मुखर प्रतिवाद नहीं करते।
कहा जा सकता है कि प्रेम करने की आज़ादी सहित किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत आज़ादी, निजता और निर्णय की स्वतन्त्रता के विरुद्ध एक बर्बर किस्म की निरंकुशता पूरी भारतीय सामाजिक संरचना के ताने-बाने में सर्वव्याप्त प्रतीत होती है। सोचने की बात यह है कि उत्पादन की आधुनिक प्रक्रिया अपनाने, आधुनिकतम उपभोक्ता सामग्रियों का इस्तेमाल करने और भौतिक जीवन में आधुनिक तौर-तरीके अपनाने के बावजूद हमारे समाज में निजता, व्यक्तिगत आज़ादी, तर्कणा आदि आधुनिक जीवन-मूल्यों का सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व आज तक क्यों नहीं स्थापित हो सका? भारत में सतत विकासमान पूँजीवाद मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं के साथ इतना कुशल-सफल तालमेल क्यों और किस प्रकार बनाये हुए है? इस बात को सुसंगत ढंग से केवल ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ही समझा जा सकता है।
यह सही है कि आज का पश्चिमी समाज समृद्धि के शिखर पर आसीन होने के बावजूद, आर्थिक स्तर पर असाध्य ढाँचागत संकट, राजनीतिक स्तर पर पूँजीवादी जनवाद के क्षरण एवं विघटन तथा सांस्कृतिक-सामाजिक स्तर पर विघटन, अलगाव, नैतिक अध:पतन और अराजकता का शिकार है। पारिवारिक ढाँचे का ताना-बाना वहाँ बिखर रहा है। अपराधों, मानसिक रोगों और आत्मिक वंचना का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है। पूरी दुनिया को लूटकर समृद्धि का द्वीप बसाने वाले पश्चिमी महाप्रभुओं से इतिहास उनकी करनी का वाजिब हिसाब वसूल रहा है। लेकिन इन सबके बावजूद इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि पश्चिम में नागरिकों के आपसी रिश्तों और परिवार सहित सभी सामाजिक संस्थाओं में जनवाद के मूल्य इस तरह रचे-बसे हुए हैं कि कैथोलिक, प्रोटेस्टेण्ट, यहूदी, मुसलमान, श्वेत, अश्वेत – किसी भी धर्म या नस्ल के व्यक्ति यदि आपस में प्यार या शादी करें तो सामाजिक बहिष्कार या पंचायती दण्ड जैसी किसी बात की तो कल्पना तक नहीं की जा सकती। हो सकता है कि परिवार की पुरानी पीढ़ी कहीं-कहीं इस बात का विरोध करे, पर यह विरोध प्राय: उसूली मतभेद के दायरे तक ही सीमित रहता है। जहाँ तक समाज का सम्बन्ध है, लोग इसे किन्हीं दो व्यक्तियों का निजी मामला ही मानते हैं। यह सही है कि ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका आदि देशों में अश्वेतों और अन्य आप्रवासियों का पार्थक्य, दोयम दर्जे की आर्थिक स्थिति और उनके प्रति विद्वेष भाव लगातार मौजूद रहता है और पिछले कुछ दशकों के दौरान कुछ नवनात्सीवादी गिरोह इन्हें हिंसा और गुण्डागर्दी का भी शिकार बनाते रहे हैं। धनी-ग़रीब के अन्तर और वर्ग-अन्तरविरोध भी वहाँ तीखे रूप में मौजूद हैं। लेकिन सामाजिक ताने-बाने में वहाँ निजता और व्यक्तिगत आज़ादी के जनवादी मूल्य इस तरह रचे-बसे हैं कि धर्म या नस्ल के बाहर प्रेम या विवाह को मन ही मन ग़लत मानने वाले लोग भी इसका संगठित और मुखर विरोध नहीं करते। पश्चिम में `मैचमेकर्स´ द्वारा परिवारों के बीच बातचीत करके शादियाँ कराने की परम्परा उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक ही दम तोड़ने लगी थी। प्रेम और विवाह के मामलों में वहाँ के समाज में मुख्य और स्थापित प्रवृत्ति युवाओं को पूरी आज़ादी देने की है। इसका मुख्य कारण है कि मानववाद, इहलौकिकता, वैयक्तिकता और जनवाद के मूल्यों को सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों और क्रान्तियों के कई शताब्दियों लम्बे सिलसिले ने यूरोपीय समाज के पोर-पोर में इस कदर रचा-बसा दिया था कि साम्राज्यवाद की एक पूरी सदी बीत जाने के बावजूद, पश्चिमी पूँजीवादी राज्यसत्ताओं के बढ़ते निरंकुश चरित्र और पूँजीवादी जनवाद के पतन-विघटन की प्रक्रिया के समापन बिन्दु के निकट पहुँचने के बावजूद, तमाम सामाजिक विषमताओं, आर्थिक लूट, सामाजिक- सांस्कृतिक-नैतिक अध:पतन तथा पण्यपूजा (कमोडिटी फेटिशिज्म) और अलगाव (एलियनेशन) के घटाटोप के बावजूद, वहाँ नागरिकों के आपसी रिश्तों और मूल्यों-मान्यताओं में व्यक्तियों की निजता और व्यक्तिगत आज़ादी को पूरा सम्मान देने की प्रवृत्ति आज भी इस तरह स्थापित है कि उसे वापस पीछे नहीं धकेला जा सकता। पंचायती न्याय की मध्ययुगीन कबीलाई बर्बरता के बारे में, अन्तरधार्मिक-अन्तरजातीय विवाह करने पर सामाजिक बहिष्कार, अपना गाँव-शहर छोड़ने के लिए विवश होने या हत्या से कीमत चुकाने के बारे में या प्रेमी जोड़ों की पार्कों में सामूहिक पिटाई जैसी घटना के बारे में वहाँ का एक आम नागरिक सोच तक नहीं सकता।
यूरोपीय पूँजीवादी समाज पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (रेनेसाँ-एनलाइटेनमेण्ट- रिवोल्यूशन) की शताब्दियों लम्बी प्रक्रिया से गुज़रकर अस्तित्व में आया था। इस प्रक्रिया में अधिकांश मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं का वर्चस्व वहाँ लगभग समाप्त हो गया था। यद्यपि सत्तासीन होने के बाद यूरोपीय पूँजीपति वर्ग ने चर्च से “पवित्र गठबन्धन” करके तर्कणा और जनवाद के झण्डे को धूल में फेंक दिया और पुनर्जागरण-प्रबोधन के समस्त मानववादी-जनवादी आदर्शोँ को तिलांजलि दे दी, लेकिन ये मूल्य सामाजिक-सांस्कृतिक अधिरचना के ताने-बाने  में इस कदर रच-बस चुके थे कि सामाजिक जनमानस में इनकी अन्तर्व्याप्ति को समूल नष्ट करके मध्ययुग की ओर वापस नहीं लौटा जा सकता था। पूँजीवाद के ऐतिहासिक विश्वासघात और असली चरित्र को उजागर करने में उन्नीसवीं शताब्दी के आलोचनात्मक यथार्थवादी कला-साहित्य ने भी एक विशेष भूमिका निभायी। यह तुलनात्मक अध्ययन अलग से पर्याप्त गहराई और विस्तार की माँग करता है, जो यहाँ सम्भव नहीं है।
भारतीय इतिहास की गति और दिशा इस सन्दर्भ में यूरोप से सर्वथा भिन्न रही है। यहाँ मध्ययुगीन सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संरचना का ताना-बाना जब अन्दर से टूटने-बिखरने की दिशा में अग्रसर था और इसके भीतर से प्रगतिशील पूँजीवादी तत्त्वों के उद्भव और विकास की प्रक्रिया गति पकड़ रही थी, उसी समय देश के उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गयी। उपनिवेशीकरण की व्यवस्थित प्रक्रिया ने एक शताब्दी के भीतर भारतीय समाज की स्वाभाविक आन्तरिक गति की हत्या कर दी और यहाँ की संक्रमणशील देशज सामाजिक- आर्थिक संरचना को नष्ट करके ऊपर से एक औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना आरोपित कर दी। निश्चय ही भारतीय मध्ययुगीन सामाजिक-आर्थिक संरचना की अपनी विशिष्टताएँ थीं, यह यूरोपीय सामन्तवाद से काफी भिन्न था और यहाँ पूँजीवादी विकास की बहुतेरी बाधाएँ-समस्याएँ भी थीं। लेकिन ये बाधाएँ पूँजीवादी विकास को रोक नहीं सकती थीं। प्राक्-ब्रिटिश भारत में पूँजीवादी विकास के उपादान मौजूद थे। यदि भारत उपनिवेश नहीं बनता तो उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ ही पूँजी भारतीय समाज के पोर-पोर में घुस जाती और फिर वह समय भी आता जब एक सर्वसमावेशी सामाजिक झंझावात के साथ यहाँ भी इतिहास को तेज़ गति देने वाला पूँजीवाद अपनी भौतिक-आत्मिक समग्रता के साथ अस्तित्व में आता। मध्ययुगीन समाज के परमाणु के नाभिक पर सतत प्रहार उसे विखण्डित कर देते और ऊर्जा का अजस्त्र स्रोत फूट पड़ता। मुख्यत: किसानों-दस्तकारों की शक्ति से संगठित मध्यकालीन भारत के भक्ति आन्दोलन और किसान-संघर्षों ने इस दिशा में एक पूर्वसंकेत दे भी दिया था। तमाम पारिस्थितिक भिन्नताओं के बावजूद भारतीय भक्ति आन्दोलन और यूरोपीय धर्म-सुधार आन्दोलन में तात्त्विक समानता के बहुतेरे अवयव मौजूद दीखते हैं। भारतीय इतिहास हूबहू पुनर्जागरण-प्रबोधन-बुर्जुआ क्रान्ति के यूरोपीय मार्ग का अनुकरण करता हुआ आगे बढ़ता, यह मानना मूर्खता होगी। रूस और जापान जैसे देशों ने भी पूँजीवादी विकास का अपना सापेक्षत: भिन्न मार्ग चुना था और यूरोप में भी जर्मनी और पूर्वी यूरोपीय देशों का रास्ता ब्रिटेन, फ़्रान्स, अमेरिका आदि देशों से काफी भिन्नता लिये हुए था। लेकिन इतना तय है कि यदि भारत का उपनिवेशीकरण नहीं होता तो अपनी स्वाभाविक गति और प्रक्रिया से यहाँ जो पूँजीवाद विकसित होता, वह आज के भारतीय पूँजीवाद जैसा रुग्ण-बौना-विकलांग नहीं होता। उसमें इतनी शक्ति होती कि वह मध्ययुगीन आर्थिक मूलाधार के साथ ही अधिरचना को भी चकनाचूर कर देता। यहाँ भी यूरोपीय पुनर्जागरण-प्रबोधन की भाँति कुछ आमूलगामी सामाजिक-सांस्कृतिक- वैचारिक तूफान उठ खड़े होते जो मानववाद, जनवाद और तर्कणा के मूल्यों को समाज के रन्ध्र-रन्ध्र में पैठा देते। ऐसी स्थिति में भारतीय मानस भी प्राचीन भारत की भौतिकवादी चिन्तन-परम्परा का पुन:स्मरण करता और दर्शन-कला-साहित्य से लेकर जीवन-मूल्यों तक के धरातल पर जुझारू भौतिकवादी चिन्तन की एक सशक्त आधुनिक परम्परा अस्तित्व में आती। लेकिन उपनिवेशीकरण ने इन सभी सम्भावनाओं को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। अंग्रेज़ों ने न केवल पूरे देश को समुद्री डाकुओं से भी अधिक बर्बर तरीके से लूटा-खसोटा, बल्कि उनकी नीतियों ने यहाँ कृषि से दस्तकारी और दस्तकारी से उद्योग तक की स्वाभाविक यात्रा की सारी सम्भावनाओं की भ्रूण हत्या कर दी। भूमि के औपनिवेशिक बन्दोबस्त ने भारत में एक नये किस्म की अर्द्धसामन्ती भूमि-व्यवस्था को जन्म दिया। विश्व-प्रसिद्ध भारतीय दस्तकारी तबाह हो गयी और भारत की आर्थिक- सामाजिक संरचना अपनी स्वतन्त्र गति और स्वतन्त्र सम्भावनाओं के साथ अकाल मृत्यु का शिकार हो गयी। इसकी दिशा और नियति पूरी तरह से ब्रिटिश वित्तीय पूँजी के हितों के अधीन हो गयी।
जिसे भारतीय इतिहासकार प्राय: भारतीय पुनर्जागरणय् की संज्ञा से विभूषित करते हैं, उसमें यूरोपीय पुनर्जागरण जैसा क्रान्तिकारी कुछ भी नहीं था। वह कोई महान या प्रगतिशील जनक्रान्ति कतई नहीं थी। वह औपनिवेशिक सामाजिक- आर्थिक संरचना के भीतर पले-बढ़े एक छोटे से पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की आवाज़ थी जो स्वामिभक्त ब्रिटिश प्रजा के रूप में कुछ अधिकारों की याचना कर रहा था। भारतीय समाज में सुधारों की इसकी माँग और इसके सुधार आन्दोलनों का प्रभाव शहरी मध्य वर्ग तक सीमित था और किसानों-दस्तकारों तथा आम मेहनतकश जनता उससे सर्वथा अछूती थी। आज़ादी की आधी सदी बाद भी भारतीय बौद्धिक जगत की निर्वीर्यता, जनविमुखता और कायरता इसी बात का प्रमाण है कि भारतीय इतिहास में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी कोई चीज़ कभी घटित ही नहीं हुई। हमारी सामाजिक संरचना में जनवाद और तर्कणा के मूल्यों के अभाव और आधुनिक पूँजीवादी जीवन-प्रणाली के साथ मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं का विचित्र सहअस्तित्व भी दरअसल इसी तथ्य को प्रमाणित करता है।
औपनिवेशिक काल में भारत में जिस पूँजीवाद का विकास हुआ, वह किसी क्रान्तिकारी परिवर्तन का नहीं, बल्कि ब्रिटिश वित्तीय पूँजी के हितसाधन के लिए उठाये गये कदमों की गौण गति का परिणाम था जो उपनिवेशवादियों की इच्छा से स्वतन्त्र था। इस मरियल, रीढ़विहीन पूँजीवाद की स्वाभाविक गति को भी उपनिवेशवाद ने कदम-कदम पर नियन्त्रित और बाधित करने का काम किया। लेकिन इतिहास की गति शासक वर्गों की इच्छानुकूल नहीं होती और उनके द्वारा उठाया गया हर कदम स्वयंस्फूर्त ढंग से एक प्रतिरोधी गति एवं प्रभाव को गौण पहलू के रूप में जन्म देता है और फिर कालान्तर में यह गौण पहलू मुख्य पहलू भी बन जाया करता है। औपनिवेशिक काल में भारत में पूँजीवाद का विकास इसी रूप में हुआ और फिर उपनिवेशवाद के संकट, अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पद्धा और विश्वयुद्धों का लाभ उठाकर भारतीय पूँजीपति वर्ग ने अपनी शक्ति बढ़ाने का काम किया। अपनी बढ़ती शक्ति के अनुपात में ही इसकी आवाज़ भी मुखर होती गयी और फिर एक दिन इसने राजनीतिक आज़ादी भी हासिल कर ली, लेकिन यह राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति जैसा कुछ भी नहीं था। भारतीय पूँजीवाद ने साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद करने के बजाय उसके कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका निभायी और भूमि क्रान्ति के जनवादी कार्यभार को भी एक झटके के साथ पूरा करने के बजाय क्रमिक पूँजीवादी रूपान्तरण का दुस्सह यन्त्रणादायी प्रतिगामी पथ अपनाया। ज़ाहिर है कि ऐसी स्थिति में सामाजिक-सांस्कृतिक- वैचारिक अधिरचना में भी, औपनिवेशिक काल और उत्तर-औपनिवेशिक काल में कभी क्रान्तिकारी परिवर्तन की कोई प्रक्रिया घटित ही नहीं हुई। यूरोपीय पूँजीवाद कम से कम पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया में जनता के साथ जुड़ा हुआ और प्रगतिशील मूल्यों का वाहक था। भारत में ऐसी कोई प्रक्रिया घटित ही नहीं हुई। भारतीय पूँजीपति वर्ग ने शुरू से ही प्राक्-पूँजीवादी मूल्यों- मान्यताओं के साथ समझौते का रुख़ अपनाया और साम्राज्यवाद की सदी में क्रमिक विकास की प्रक्रिया में जिन बुर्जुआ मूल्यों को इसने क्रमश: अपनाया, वे तर्कणा, मानववाद, जनवाद और जुझारू भौतिकवाद के मूल्य नहीं थे, बल्कि सड़े-गले प्रतिक्रियावादी बुर्जुआ मूल्य ही थे।

भारतीय पूँजीवाद कृषि से दस्तकारी और दस्तकारी से उद्योग की स्वाभाविक प्रक्रिया से नहीं जन्मा था। यह बर्गरों की सन्तान नहीं था। यह आरोपित औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना की सन्तान था और इसका विकास उपनिवेशवाद के अनिवार्य आन्तरिक अन्तरविरोध का परिणाम था। क्रान्तिकारी संघर्ष के बजाय इसने `समझौता-दबाव-समझौता´ की रणनीति अपनाकर राजनीतिक स्वतन्त्रता तक की यात्रा तय की। इसका चरित्र शुरू से ही दुहरा था। राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्यधारा का नेतृत्व करते हुए इसने जिन वायदों-नारों पर जनसमुदाय को साथ लिया, उनसे बार-बार मुकरता रहा और विश्वासघात करता रहा। ज़ाहिर है कि औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से पैदा हुआ और साम्राज्यवादी विश्व-परिवेश में पला-बढ़ा पूँजीवाद ऐसा ही हो सकता था। भारतीय समाज के औपनिवेशिक अतीत की इस त्रासदी को समझना ही राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के दौरान और आज के भारत में विभिन्न वर्गों की भूमिका को, उनके संघर्षों की कमज़ोरियों को, मूलाधार और अधिरचना के विविध पक्षों को, भावी परिवर्तन की दिशा और समस्याओं को तथा आज के आधुनिक पूँजीवादी समाज में पण्य-पूजा और अलगाव आदि पूँजीवादी विकृतियों के साथ-साथ मध्ययुगीन बर्बर परम्पराओं-रूढ़ियों-मान्यताओं के विचित्र सहमेल को समझने की एक कुंजीभूत कड़ी है। औपनिवेशिक अतीत के जन्मचिह्न  केवल भारतीय पूँजीपति वर्ग ही नहीं बल्कि अन्य वर्गों के शरीर पर भी अंकित हैं। पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया के हाशिये पर खड़ा रूस बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक मध्ययुगीन बर्बरता के आगोश में जकड़ा हुआ था, लेकिन चूँकि औपनिवेशिक गुलामी ने उसकी स्वतन्त्र आन्तरिक गति का गला नहीं घोंटा था, इसलिए उस देश में हर्ज़ेन, बेलिंस्की, चेर्निशेव्स्की, दोब्रोल्यूबोव जैसे क्रान्तिकारी जनवादी विचारकों और पुश्किन, गोगोल, लर्मन्तोव, तुर्गनेव, तोल्स्तोय, दोस्तोयेव्स्की, कोरोलेंको, चेख़व आदि यथार्थवादी लेखकों ने अपने कृतित्व से तथा उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यवर्गीय क्रान्तिकारियों ने अपने शौर्य से न केवल एक भावी युगान्तरकारी क्रान्ति की ज़मीन तैयार की, बल्कि क्रान्तिकारी जनवादी विचारों से पूरे सामाजिक मानस को सींचने का काम किया। चीन भी निहायत पिछड़ा और साम्राज्यवादी लूट-खसोट से तबाह देश था, लेकिन भारत की तरह उसका पूर्ण उपनिवेशीकरण नहीं हो सका। इसीलिए न केवल उस देश ने सुन यात-सेन, लू शुन और माओ जैसे जननायक पैदा किये, बल्कि वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी ने अन्तरराष्ट्रीय नेतृत्व पर अन्धी निर्भरता और अनुकरण के बजाय अपनी क्रान्ति का मार्ग स्वयं ढूँढ़ा। चीनी क्रान्ति ने आधी सदी के भीतर ही उत्पादन-सम्बन्धों के साथ-साथ चीनी जनमानस में गहराई तक पैठे मध्ययुगीन बर्बर मूल्यों, रहस्यवाद और धार्मिक रूढ़ियों को काफी हद तक उखाड़ फेंका था। इस तुलना के द्वारा (ध्यान रखते हुए कि हर तुलना लँगड़ी होती है) हम कहना यह चाहते हैं कि उपनिवेशीकरण की त्रासदी ने न केवल भारतीय पूँजीपति वर्ग को, बल्कि बुद्धिजीवियों और सर्वहारा वर्ग सहित हमारे समाज के सभी वर्गों को प्रभावित किया तथा उनके वैचारिक-सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलनों को कमज़ोर बनाने का काम किया। निश्चय ही, राष्ट्रीय आन्दोलन और वर्ग-संघर्ष की ऊष्मा ने भारत में भी राधामोहन गोकुल और राहुल सांकृत्यायन जैसे उग्र परम्पराभंजक चिन्तक, भगत सिंह जैसे युवा विचारक क्रान्तिकारी और प्रेमचन्द जैसे महान जनवादी यथार्थवादी लेखक को जन्म दिया, लेकिन क्षितिज पर अनवरत प्रज्वलित इन मशालों की संख्या बहुत कम है, क्योंकि औपनिवेशिक भारत में किसी युगान्तरकारी वैचारिक- सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन की ज़मीन ही बहुत कमज़ोर थी। कोई आश्चर्य नहीं कि तिलक जैसे उग्र राष्ट्रवादी तथा युगान्तर-अनुशीलन के मध्यवर्गीय क्रान्तिकारी राष्ट्रीय मुक्ति का नया वैचारिक आधार तर्कणा एवं भौतिकवादी विश्वदृष्टि आधारित मानववाद-जनवाद के आधार पर तैयार करने के बजाय खोये हुए गौरवशालीय अतीत की पुनर्स्थापना और धार्मिक विश्वासों का सहारा लेते थे। गाँधी भारतीय परिस्थितियों में, बुर्जुआ मानववाद की प्रतिमूर्त कहे जा सकते हैं, लेकिन जनमानस को साथ लेने के लिए उन्होंने रूढ़ियों, धार्मिक अन्धविश्वासों और पुरातनपन्थी रीतियों का भरपूर सहारा लिया। इससे (महात्माय् बनकर) जनता को साथ लेने में तो वे सफल रहे लेकिन साथ ही, रूढ़ियों-परम्पराओं को पुन:संस्कारित करके नया जीवन देने में भी उनकी भूमिका अहम हो गयी। राष्ट्रीय आन्दोलन की विभिन्न धाराओं के अधिकांश मुख्य नायकों के विचारों की तुलना यदि वाल्तेयर, दिदेरो, रूसो या टॉमस पेन, जेफर्सन, वाशिंगटन या हर्ज़ेन, चेर्निशेव्स्की आदि के उग्र रूढ़िभंजक विचारों से करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रीय आन्दोलनकालीन अधिकांश भारतीय राष्ट्रीय जनवादी विचारकों ने काफी हद तक (भविष्य की कविता) के बजाय (अतीत की कविता) को अपना आदर्श और प्रेरक-स्रोत बनाया और फलत: अपने दौर में एक प्रगतिशील भूमिका निभाने के बावजूद, दूरगामी तौर पर, वस्तुगत रूप में पुनरुत्थानवादी और रूढ़िवादी यथास्थितिवाद की ज़मीन को ही मज़बूत करने का काम किया।
आज़ादी मिलने के बाद के छह दशकों के दौरान हमारे देश में सामन्ती भूमि- सम्बन्धों के टूटने और पूँजीवादी विकास की जो क्रमिक, मन्थर प्रक्रिया रही है, वह आर्थिक धरातल पर तो घोर यन्त्रणादायी और जनविरोधी रही ही है, मूल्यों- मान्यताओं-संस्थाओं के धरातल पर भी यह प्रक्रिया कुछ भी ऊर्जस्वी और सकारात्मक दे पाने की क्षमता से सर्वथा रिक्त रही है। भारतीय पूँजीपति वर्ग किसी भी सामाजिक आन्दोलन में जनसमुदाय की पहलकदमी और सृजनशीलता के निर्बन्ध होने से हमेशा ही आतंकित रहा है। इसीलिए हमारे देश में पूँजीवादी विकास का रास्ता “नीचे से” नहीं बल्कि “ऊपर से” अपनाया गया, यानी जन-पहलकदमी और सामाजिक आन्दोलनों के बजाय बुर्जुआ राज्यसत्ता की नीतियों पर अमल के द्वारा यहाँ पूँजीवाद का क्रमिक विकास हुआ, जिसकी सबसे तेज़ गति चार दशक बाद 1990 के दशक में देखने को मिली, जब पूरी दुनिया साम्राज्यवादी भूमण्डलीकरण की चपेट में आ चुकी थी।
ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक तौर पर समझा जा सकता है कि बुर्जुआ जनवाद के स्वस्थ-सकारात्मक मूल्य क्यों हमारे समाज के ताने-बाने में पैठ ही नहीं पाये। किसी नागरिक को जो सीमित जनवादी और नागरिक अधिकार तथा व्यक्तिगत आज़ादी संविधान की किताब और कानून की धाराएँ प्रदान करती भी हैं, उन्हें न केवल पुलिस और प्रशासन का तन्त्र उस तक पहुँचने नहीं देता, बल्कि मध्ययुगीन रूढ़ियों-परम्पराओं का सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व भी उन्हें निष्प्रभावी बनाने में एक अहम भूमिका निभाता है। रूढ़ियों का यह सामाजिक- सांस्कृतिक वर्चस्व ही वह प्रमुख उपादान है, जिसके ज़रिये प्रभुत्वशाली वर्ग और उसकी राज्यसत्ता आम जनता से अपने शासन के पक्ष में “स्वयंस्पफूर्त”-सी प्रतीत होने वाली सहमति प्राप्त करती है।

कहा जा सकता है कि भारतीय बुर्जुआ समाज क्लासिकी अर्थों. में, पूरी तरह से एक नागरिक समाज नहीं बन पाया है, क्योंकि न केवल प्राक्-बुर्जुआ समाज की विविध सामुदायिक अस्मिताएँ, बल्कि मूल्य-मान्यताएँ-संस्थाएँ भी आज प्रभावी और वर्चस्वकारी रूप में मौजूद हैं। लेकिन ये मूल्य-मान्यताएँ-संस्थाएँ किसी सामन्ती अभिजन समाज की नहीं, बल्कि भारतीय बुर्जुआ वर्ग या कहें कि भारतीय बुर्जुआ समाज के नये, आधुनिक अभिजन समाज की सेवा करती हैं। जो भारतीय बुर्जुआ वर्ग नये बुर्जुआ मूल्यों के सृजन में जन्मना असमर्थ था उसने एक क्रमिक प्रक्रिया में अर्द्धसामन्ती आर्थिक सम्बन्धों को तो नष्ट किया लेकिन सामन्ती मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं को संकुचित संशोधन-परिष्कार के साथ अपना लिया और बुर्जुआ राज और समाज की सेवा में, या कहें कि पूँजीवाद की सेवा में सन्नद्ध कर लिया। यह कृषि और औद्योगिक उत्पादन में तो बुर्जुआ तर्कपरकता की शिक्षा देता है, लेकिन कला-साहित्य-संस्कृति और सामाजिक जीवन में अवैज्ञानिक मध्ययुगीन मूल्यों को अक्षत बने रहने देता है और न केवल बने रहने देता है, बल्कि उन्हें खाद-पानी देने का काम भी करता है।
कुछ उदाहरण लें। दहेज़ एक पुरानी सामन्ती संस्था है। लेकिन आज शहरों के आधुनिक मध्य वर्ग और व्यापारियों में इसका चलन सबसे ज्यादा है। दहेज़ के लिए स्त्रियाँ जला दी जाती हैं और फिर दहेज़ बटोरने के लिए एक और शादी का रास्ता साफ हो जाता है। यानी दहेज़, व्यापार या उद्यम के लिए पूँजी जुटाने का एक माध्यम बन गया है, न कि सामन्ती शान का प्रतीक रह गया है। यही कारण है कि पहले दहेज़ का खूब प्रदर्शन होता था, पर आज यह छिपाकर, पर्दे की ओट में ले लिया जाता है। सभी बुर्जुआ चुनावी पार्टियाँ अपनी नीतियाँ बुर्जुआ शासक वर्गों के हितसाधन के लिए तैयार करती हैं और आम लोग भी जानते होते हैं कि उनमें से कोई भी उनकी ज़िन्दगी में कोई महत्त्वपूर्ण बदलाव नहीं ला सकती, लेकिन भारत में वोट बैंक की राजनीति किसी भी लोकलुभावन आर्थिक वायदे या राजनीतिक नारे से अधिक जातिगत समीकरणों पर आधारित होती है। जातियों और उनकी पंचायतों के मुखियाओं के माध्यम से आम जनता की जातिगत एकता के संस्कारों का लाभ उठाकर, उनके वोट आसानी से हासिल कर लिये जाते हैं। भारत के चुनाव विशेषज्ञों की सारी विशेषज्ञता इस बात में निहित होती है कि वे जातिगत सामाजिक समीकरणों को किस हद तक समझते हैं। टेलीविज़न आधुनिकतम प्रौद्योगिकी-आधारित एक ऐसा माध्यम है जो जनमानस और सांस्कृतिक मूल्यों को बदलने में शायद सबसे प्रभावी भूमिका निभा सकता है। लेकिन टेलीविजन पर धार्मिक प्रचार के चैनलों की संख्या एक दर्जन के आसपास है, जबकि विज्ञान-तकनोलॉजी-वैज्ञानिक जीवनदृष्टि पर केन्द्रित एक भी चैनल नहीं है। न्यूज़ चैनलों से लेकर मनोरंजन के चैनलों तक सर्वाधिक सामग्री जादू-टोना, भूत-प्रेत, अन्धविश्वास, परम्परा-पूजा और रूढ़ियों के प्रचार से जुड़ी होती है।
इन सभी उदाहरणों के माध्यम से हम कहना यह चाहते हैं कि भारतीय समाज एक ऐसा, विशिष्ट प्रकृति का पूँजीवादी समाज है जिसमें उत्पादन और विनिमय की प्रणाली के स्तर पर पूँजी का, बाज़ार का वर्चस्व स्थापित हो चुका है, पर इस विशिष्ट प्रकृति के पूँजीवाद ने अधिकांश प्राक्-पूँजीवादी मूल्यों- मान्यताओं-संस्थाओं को तोड़ने की बजाय अपना लिया है तथा विविध रूपों में पूँजी और पूँजीवादी व्यवस्था की सेवा में सन्नद्ध कर दिया है। हमारे समाज में तमाम मध्ययुगीन स्वेच्छाचारी मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही अलगाव, पण्य पूजा, व्यक्तिवाद और बुर्जुआ निरंकुशता जैसे पतनशील बुर्जुआ मूल्यों का एक विचित्र सहमेल मौजूद है। पुरानी बुराइयों के साथ नयी बुराइयों का यह सहअस्तित्व बुर्जुआ समाज के हर प्रकार के अन्याय को सामाजिक स्वीकृति प्रदान करने का काम करता है। यह एक ऐसा बुर्जुआ समाज है जिसमें प्राक्-नागरिक समाज के मूल्यों-मान्यताओं का सहारा लेकर शोषक वर्ग शासित वर्ग में यह भ्रम पैदा करता है कि व्यवस्था उनकी सहमति (कन्सेण्ट) से चल रही है। इस रूप में शासक वर्ग शासित वर्गों पर अपना वर्चस्व, यानी सहयोजन के साथ प्रभुत्व, स्थापित करता है, जैसाकि प्रत्येक नागरिक समाज में होता है। इस वर्चस्व के ज़रिये बुर्जुआ राज्य की रक्षा होती है और अपनी पारी में, राज्य अपनी संस्थाओं के ज़रिये इस वर्चस्व को बनाये रखने में भूमिका निभाता है। यानी भारत का बुर्जुआ समाज एक ऐसा नागरिक समाज है, जिसमें शासक वर्ग के वर्चस्व को बनाये रखने में प्राक्-नागरिक समाज की अस्मिताओं-मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं की अहम भूमिका होती है। इन अर्थों में यहाँ की स्थिति यूरोपीय नागरिक समाजों से काफी हद तक भिन्न है।

लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर आज प्राक्-नागरिक समाज के मूल्यों-मान्यताओं के विरुद्ध संघर्ष करके एक यूरोपीय ढंग के नागरिक समाज (यानी बुर्जुआ समाज) के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित किया जा सकता है। इतिहास के इस दौर में यह सम्भव नहीं है। हम पीछे मुड़कर बुर्जुआ पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति की प्रक्रिया नये सिरे से शुरू नहीं कर सकते। इतिहास की विशिष्ट गति से आविर्भूत जो भी भारतीय बुर्जुआ समाज हमारे सामने मौजूद है, उसे नष्ट करके ही इसकी सभी बुराइयों से छुटकारा पाया जा सकता है जिनमें मध्ययुगीन मूल्य-मान्यताएँ भी शामिल हैं। नये सिरे से एक आदर्श बुर्जुआ समाज नहीं बनाया जा सकता। वर्तमान बुर्जुआ समाज का विकल्प एक ऐसा समाज ही हो सकता है, जिसमें उत्पादन मुनाफे के लिए नहीं बल्कि सामाजिक आवश्यकताओं को केन्द्र में रखकर होता हो, जिसमें उत्पादन, राजकाज और समाज पर बहुसंख्यक उत्पादक जनसमुदाय का नियन्त्रण कायम हो। ऐसे समाज में न केवल श्रम-विभाजन, अलगाव और पण्य पूजा की संस्कृति नहीं होगी, बल्कि तर्कणा, जनवाद और व्यक्तिगत आज़ादी का निषेध करने वाली सभी मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं का अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा। ज़ाहिर है कि यह सबकुछ एक झटके से नहीं हो जायेगा। राजनीतिक व्यवस्था- परिवर्तन और आर्थिक सम्बन्धों के परिवर्तन के साथ-साथ और उसके बाद भी सतत समाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही ऐसा सम्भव हो सकेगा।
हरेक राजनीतिक आन्दोलन की पूर्ववर्ती, सहवर्ती और अनुवर्ती सामाजिक- सांस्कृतिक आन्दोलन की स्वयंस्फूर्त धाराएँ अनिवार्यत: उपस्थित होती हैं। लेकिन इन सहवर्ती-अनुवर्ती धाराओं की स्वयंस्फूर्त गति एवं परिणति पर नियतत्त्ववादी ढंग से ज़ोर नहीं दिया जाना चाहिए। यानी, यह मानकर नहीं चला जाना चाहिए कि राजनीतिक व्यवस्था-परिवर्तन और आर्थिक सम्बन्धों के बदलने के साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक अधिरचनात्मक तन्त्र भी स्वत: बदल जायेगा। आर्थिक मूलाधार से आविर्भूत-निर्धारित होने के बावजूद अधिरचना की अपनी सापेक्षत:  स्वतन्त्र गति होती है और उसे बदलने के लिए अधिरचना के धरातल पर भी सचेतन प्रयास की, अधिरचना में क्रान्ति की, आवश्यकता होती है। राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलनों को जन्म और गति देती है और साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन राजनीतिक परिवर्तन की प्रक्रिया को मज़बूत, गतिमान और गहरा बनाते हैं। भारत में औपनिवेशिक दौर, राष्ट्रीय आन्दोलन और उसके बाद पूँजीवादी समाज-विकास का जो विशिष्ट इतिहास रहा, आज के समाज में मध्ययुगीन मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं की मौजूदगी उसी का एक प्रतिपफल है। जो काम राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के दौर में हो सकता था, वह नहीं हुआ। सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ता किंचित सुगबुगाहट और ऊपरी बदलावों के बावजूद बनी रही। अब एक प्रबल वेगवाही सामाजिक झंझावात ही इस जड़ता को तोड़कर भारतीय समाज की शिराओं में एक नयी ऊर्जस्विता और संवेग का संचार कर सकता है। यह तूफान पूँजीवादी सामाजिक-आर्थिक संरचना और राजनीतिक व्यवस्था के साथ ही उन सभी नये-पुराने मूल्यों और संस्थाओं को भी अपना निशाना बनायेगा जो इस व्यवस्था से सहारा पाते हैं और इसे सहारा देते हैं।

प्रेम की आज़ादी के प्रश्न को भी इसी ऐतिहासिक-सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य में देखा-समझा जा सकता है। व्यक्तिगत और खण्डित संघर्ष इस प्रश्न को एजेण्डा पर उपस्थित तो कर सकते हैं, लेकिन हल नहीं कर सकते। सामाजिक ताने-बाने में जनवाद और व्यक्तिगत आज़ादी के अभाव और मध्ययुगीन कबीलाई, निरंकुश स्वेच्छाचारिता के प्रभुत्व को तोड़े बिना, परम्पराओं और रूढ़ियों की जकड़बन्दी को छिन्न-भिन्न किये बिना, प्रेम की आज़ादी हासिल नहीं की जा सकती। इसलिए यह सवाल एक आमूलगामी सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति का सवाल है। हमें भूलना नहीं होगा कि प्रेम और जीवनसाथी चुनने की आज़ादी का प्रश्न जाति-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न से तथा धार्मिक आधार पर कायम सामाजिक पार्थक्य की समस्या से बुनियादी रूप से जुड़ा हुआ है। इन प्रश्नों पर एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन ही समस्या के अन्तिम हल की दिशा में जाने वाला एकमात्र रास्ता है। और साथ ही, इसके बिना, राजनीतिक व्यवस्था-परिवर्तन की किसी लड़ाई को भी अंजाम तक नहीं पहुँचाया जा सकता। जो समाज अपनी युवा पीढ़ी को अपनी ज़िन्दगी के बारे में बुनियादी फैसले लेने तक की इजाज़त नहीं देता, जहाँ परिवार में पुरानी पीढ़ी और पुरुषों का निरंकुश स्वेच्छाचारी अधिनायकत्व आज भी प्रभावी है, जिस समाज के मानस पर रूढ़ियों-परम्पराओं की ऑक्टोपसी जकड़ कायम है, वह समाज बुर्जुआ समाज के सभी अन्याय-अनाचार को और बुर्जुआ राज्य के वर्चस्व को स्वीकारने के लिए अभिशप्त है। इसीलिए, कोई आश्चर्य नहीं कि संविधान और कानून की किताबों में व्यक्तिगत आज़ादी और जनवाद की दुहाई देने वाली बुर्जुआ राज्यसत्ता अपने तमाम प्रचार-माध्यमों के ज़रिये धार्मिक-जातिगत रूढ़ियों-मान्यताओं, अन्धविश्वासों और मध्ययुगीन मूल्यों को बढ़ावा देने का काम करती है, क्योंकि इन्हीं के माध्यम से वह जनसमुदाय से अपने शासन के लिए एक किस्म की “स्वयंस्फ़ूर्त” सहमति हासिल करती है और यह भ्रम पैदा करती है कि उनका प्रभुत्व जनता की सहमति से कायम है। जो समाज भविष्य के नागरिकों को रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह करने की इजाज़त नहीं देता, वह अपनी गुलामी की बेड़ियों को खुद ही मज़बूत बनाने का काम करता है। इन्हीं रूढ़ियों-परम्पराओं के ऐतिहासिक कूड़े-कचरे के ढेर से वे फ़ासिस्‍ट गिरोह खाद-पानी पाते हैं जो मूलत: एक असाध्य संकटग्रस्त बुर्जुआ समाज की उपज होते हैं। “अतीत के गौरव” की वापसी का नारा देती हुई ये फ़ासिस्‍ट शक्तियाँ वस्तुत: पूँजी के निरंकुश सर्वसत्तावादी शासन की वकालत करती हैं और धार्मिक-जातिगत- नस्ली-लैंगिक रूढ़ियों को मज़बूत बनाकर व्यवस्था की बुनियाद को मज़बूत करने में एक अहम भूमिका निभाती हैं। बाबू बजरंगी और प्रेमी जोड़ों पर हमले करने वाले गुण्डागिरोह इन्हीं शक्तियों के प्रतिनिधि उदाहरण हैं।

प्रेम की आज़ादी का सवाल रूढ़ियों से विद्रोह का प्रश्न है। यह जाति-प्रथा के विरुद्ध भी विद्रोह है। सच्चे अर्थों में प्रेम की आज़ादी का प्रश्न स्त्री की आज़ादी के प्रश्न से भी जुड़ा है, क्योंकि प्रेम आज़ाद और समान लोगों के बीच ही वास्तव में सम्भव है। प्रेम के प्रश्न को हम सामाजिक-आर्थिक मुक्ति के बुनियादी प्रश्न से अलग काटकर नहीं देख सकते। सामाजिक-सांस्कृतिक क्रान्ति के एजेण्डा से हम इस प्रश्न को अलग नहीं कर सकते। इस प्रश्न को लेकर हमारे समाज में संघर्ष के दो रूप बनते हैं। एक,फौरी तथा दूसरा दूरगामी। फौरी तौर पर, जब भी कहीं कोई बाबू बजरंगी या धार्मिक कट्टरपंथियों का कोई गिरोह या कोई जाति-पंचायत प्रेमी जोड़ों को ज़बरन अलग करती है या कोई सज़ा सुनाती है, तो यह व्यक्तिगत आज़ादी या जनवादी अधिकार का एक मसला बनता है। इस मसले को लेकर क्रान्तिकारी छात्र-युवा संगठनों, सांस्कृतिक संगठनों, नागरिक अधिकार संगठनों आदि को आगे आना चाहिए और रस्मी कवायदों से आगे बढ़कर प्रतिरोध की संगठित आवाज़ उठानी चाहिए, संविधान और कानून रस्मी तौर पर हमें जो अधिकार देते हैं उनका भी सहारा लेना चाहिए और व्यापक आम जनता के बीच अपनी बात ले जाकर समर्थन हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। यह प्रक्रिया युवा समुदाय और समाज के प्रबुद्ध तत्त्वों की चेतना को `रैडिकल´ बनाने का भी काम करेगी। लेकिन मात्र इसी उपक्रम को समस्या का अन्तिम समाधान मान लेना एक सुधारवादी दृष्टिकोण होगा। यह केवल फौरी कार्यभार ही हो सकता है। इसके साथ एक दूरगामी कार्यभार भी है और वही फौरी कार्यभार को भी एक क्रान्तिकारी परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।
प्रेम की आज़ादी का प्रश्न बुनियादी तौर पर समाज के मौजूदा आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक ढाँचे के क्रान्तिकारी परिवर्तन से जुड़ा हुआ है और इस रूप में यह बुर्जुआ समाज-विरोधी नयी मुक्ति-परियोजना का एक अंग है। जातिगत-धार्मिक रूढ़ियों से मुक्ति और स्त्रियों की आज़ादी के प्रश्न से भी यह अविभाज्यत: जुड़ा हुआ है। इस रूप में इस समस्या का हल एक दीर्घकालिक संघर्ष के परिप्रेक्ष्य के बिना सम्भव नहीं। व्यवस्था-परिवर्तन के क्रान्तिकारी संघर्ष की कड़ियों के रूप में संगठित युवाओं के आन्दोलन, सांस्कृतिक आन्दोलन, स्त्री-आन्दोलन और नागरिक अधिकार आन्दोलन की एक लम्बी और जुझारू प्रक्रिया ही इस समस्या के निर्णायक समाधान की दिशा में भारतीय समाज को आगे ले जा सकती है। यही नहीं, व्यवस्था-परिवर्तन के बाद भी समाज की हरावल शक्तियों को सामाजिक- सांस्कृतिक अधिरचना में सतत क्रान्ति की दीर्घकालिक प्रक्रिया चलानी होगी, तभी सच्चे अर्थों में समानता और आज़ादी की सामाजिक व्यवस्था कायम होने के साथ ही रूढ़ियों की दिमाग़ी गुलामी से और मानवद्रोही पुरातनपन्थी मूल्यों के सांस्कृतिक वर्चस्व से छुटकारा मिल सकेगा और सच्चे अर्थों में आदर्श मानवीय प्रेम को ज़िन्दगी की सच्चाई बनाया जा सकेगा, जो कम से कम आज, सुदूर भविष्य की कोई चीज़ प्रतीत होती है।
अब इस प्रश्न के एक और पहलू पर भी विचार कर लिया जाना चाहिए। चाहे अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक विवाह करने वाले किसी युवा जोड़े पर जाति- बिरादरी के पंचों द्वारा बर्बर अत्याचार का सवाल हो, चाहे एम.एफ. हुसैन के चित्रों के विरुद्ध हिन्दुत्ववादी फासिस्टों की मुहिम हो, या चाहे नागरिक अधिकार, जनवादी अधिकार और व्यक्तिगत आज़ादी से जुड़ा कोई भी मसला हो, इन सवालों पर पढ़े-लिखे मध्य वर्ग का या आम छात्रों-युवाओं का भी बड़ा हिस्सा संगठित होकर सड़कों पर नहीं उतरता। ऊपर हमने इसके सामाजिक-ऐतिहासिक कारणों की आम चर्चा की है। लेकिन उस आम कारण के एक विशिष्ट विस्तार पर भी चर्चा ज़रूरी है, जो आज के भारतीय समाज में प्रगतिशील एवं जनवादी माने जाने वाले बुद्धिजीवियों की स्थिति और आम जनता के विभिन्न वर्गो के साथ उनके रिश्तों से जुड़ी हुई है।
जब भी अन्तरजातीय-अन्तरधार्मिक प्रेम या विवाह करने वाले किसी जोड़े पर अत्याचार की या नागरिक अधिकार के हनन की कोई घटना सामने आती है तो दिल्ली या किसी राज्य की राजधानी या किसी अन्य महानगर की सड़कों पर कुछ थोड़े से मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी उसके प्रतीकात्मक विरोध के लिए आगे आते हैं। (दिल्ली में) मण्डी हाउस से होकर जन्तर-मन्तर तक, कहीं भी कुछ लोग धरने पर बैठ जाते हैं, किसी एक शाम को मोमबत्ती जुलूस या मौन जुलूस निकाल दिया जाता है, एक जाँच दल घटना-स्थल का दौरा करने के बाद वापस आकर प्रेस के लिए और बुद्धिजीवियों के बीच सीमित वितरण के लिए एक रिपोर्ट जारी कर देता है और कुछ जनहित याचिकाएँ दाखिल कर दी जाती हैं। इन सभी कार्रवाइयों का दायरा अत्यन्त सीमित और अनुष्ठानिक होता है। इनका कर्ता-धर्ता जो बुद्धिजीवी समुदाय होता है, वह केवल तात्कालिक और संकुचित दायरे की इन गतिविधियों से अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री करके अपने प्रगतिशील और जनवादी होने का “प्रमाण” प्रस्तुत कर देता है। व्यापक आम आबादी तक अपनी बात पहुँचाने का, प्रचार और उद्वेलन की विविधरूपा कार्रवाइयों द्वारा उसे जागृत और संगठित करने का तथा ऐसे तमाम मुद्दों को लेकर सामाजिक- सांस्कृतिक आन्दोलन संगठित करने का कोई दूरगामी-दीर्घकालिक कार्यक्रम उनके एजेण्डे पर वस्तुत: होता ही नहीं। उनकी अपेक्षा केवल सत्ता से होती है कि वह संवैधानिक प्रावधानों-कानूनों का सहारा लेकर प्रतिक्रियावादी सामाजिक-राजनीतिक ताकतों के हमलों से आम लोगों के जनवादी अधिकारों और व्यक्तिगत आज़ादी की हिफाज़त सुनिश्चित करे। लोकतन्त्र के मुखौटे को बनाये रखने के लिए सरकार और प्रशासन तन्त्र भी कुछ रस्मी कार्रवाई करते हैं, कभी-कभार कुछ जाँच, कुछ गिरफ़्तारियाँ होती हैं और कुछ कानूनी कार्रवाइयाँ भी शुरू होती हैं और फ़िर समय बीतने के साथ ही सब कुछ ठण्डा पड़ जाता है।
दरअसल सत्ता और सभी पूँजीवादी चुनावी दलों के सामाजिक अवलम्ब ज़मीनी स्तर पर वही प्रतिगामी और रूढ़िवादी तत्त्व होते हैं, जो सामाजिक स्तर पर जाति-उत्पीड़न, स्त्री-उत्पीड़न और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अलगाव एवं उत्पीड़न के सूत्रधार होते हैं। इसलिए हमारे देश की बुर्जुआ सत्ता यदि चाहे भी तो उनके विरुद्ध कोई कारगर कदम नहीं उठा सकती। यदि उसे सीमित हद तक कोई प्रभावी कदम उठाने के लिए मज़बूर भी करना हो तो व्यापक जन-भागीदारी वाले किसी सामाजिक आन्दोलन के द्वारा ही यह सम्भव हो सकता है। इससे भी अहम बात यह है कि ऐसा कोई सामाजिक आन्दोलन सत्ता के कदमों और कानूनों का मोहताज नहीं होगा, वह स्वयं नये सामाजिक मूल्यों को जन्म देगा, जनमानस में उन्हें स्थापित करेगा और रूढ़िवादी शक्तियों एवं संस्थाओं के वर्चस्व को तोड़ने की आमूलगामी प्रक्रिया को आगे बढ़ायेगा। इस काम को वह बुद्धिजीवी समाज कतई अंजाम नहीं दे सकता जो प्रगतिशील, वैज्ञानिक और जनवादी मूल्यों का आग्रही तो है, लेकिन समाज में उन मूल्यों को स्थापित करने के लिए न तो कोई तकलीफ झेलने के लिए तैयार है और न ही कोई जोखिम उठाने के लिए तैयार है।

जो बुद्धिजीवी आज वामपन्थी, प्रगतिशील, सेक्युलर और जनवादी होने का दम भरते हैं तथा तमाम रस्मी एवं प्रतीकात्मक कार्रवाइयों में लगे रहते हैं, उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर निगाह डालने से बात साफ हो जायेगी। प्राय: ये महानगरों में रहने वाले विश्वविद्यालयों-कॉलेजों के प्राध्यापक, मीडियाकर्मी, वकील, फ्रीलांसर पत्रकार व लेखक तथा एन.जी.ओ. व सिविल सोसाइटी संगठनों के कर्ता-धर्ता हैं। कुछ थोड़े से डॉक्टर, इंजीनियर जैसे स्वतन्त्र प्रोफेशनल्स और नौकरशाह भी इनमें शामिल हैं जो प्राय: प्रगतिशील लेखक या संस्कृतिकर्मी हुआ करते हैं। आर्थिक आय की दृष्टि से इनमें से अधिकांश का जीवन सुरक्षित है, इनकी एक सामाजिक हैसियत और इज्ज़त है। यह कथित प्रगतिशील जमात आज़ादी के बाद की आधी सदी, विशेषकर पिछले लगभग तीन दशकों के दौरान, तेज़ी से सुख-सुविधा सम्पन्न हुए मध्य वर्ग की उस ऊपरी परत का अंग बन चुकी है, जिसे इस पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर आर्थिक सुरक्षा के साथ ही सामाजिक हैसियत की बाड़ेबन्दी की सुरक्षा और जनवादी अधिकार भी हासिल हैं। इस सुविधासम्पन्न विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक उपभोक्ता वर्ग में प्रोफेसर, मीडियाकर्मी, वकील आदि के रूप में रोज़ी कमाने वाले जो प्रगतिशील लोग शामिल हैं, वे अपने निजी जीवन में यदि जाति-धर्म को नहीं मानते हैं, स्वयं प्रेम-विवाह करते हैं, अपने बच्चों को इसकी इजाज़त देते हैं और प्रगतिशील आचरण करते हैं, तो भी वे इन मूल्यों को व्यापक आम आबादी के बीच ले जाने के लिए किसी सामाजिक-सांस्कृतिक मुहिम का भागीदार बनने की जहमत या जोखिम नहीं उठाते। साथ ही, इनमें कुछ ऐसे भी हैं जो प्रगतिशीलता की बात तो करते हैं, लेकिन अपनी निजी व पारिवारिक ज़िन्दगी में निहायत पुराणपन्थी हैं। चुनावी वामपन्थी दलों के नेताओं में से अधिकांश ऐसे ही हैं। इनमें से पहली कोटि के प्रगतिशीलों का कुलीनतावादी जनवाद और वामपन्थ हो या दूसरी कोटि के प्रगतिशीलों का दोगला-दुरंगा जनवाद और वामपन्थ मेहनतकश और सामान्य मध्य वर्ग के लोग उन्हें भली-भाँति पहचानते हैं और उनसे घृणा करते हैं। कुलीनतावादी प्रगतिशीलों और छद्म वामपिन्थयों का जीवन मुख्य तौर पर के ऊपरी पन्द्रह-बीस करोड़ आबादी के जीवन का हिस्सा बन चुका है, उस उच्च मध्यवर्गीय आबादी का हिस्सा बन चुका है जो एक लम्बी पीड़ादायी क्रमिक प्रक्रिया में, विकृत और आधे-अधूरे ढंग से, पूँजीवादी जनवादी क्रान्ति के कार्यभारों के पूरा होने के बाद, आम जनसमुदाय के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात कर चुका है। उसे देश की लगभग पचपन करोड़ सर्वहारा- अर्द्धसर्वहारा आबादी या रोज़ाना बीस रुपये से कम पर जीने वाली चौरासी करोड़ आबादी के जीवन के अँधेरे और यन्त्राणाओं से अब कुछ भी लेना-देना नहीं रह गया है। एक परजीवी जमात के रूप में वह मेहनतकशों से निचोड़े गये अधिशेष का भागीदार बन चुका है। आर्थिक-सामाजिक दृष्टि से इस परजीवी वर्ग का हिस्सा बन चुके जो बुद्धिजीवी प्रगतिशील, जनवादी और सेक्युलर विचार रखते हैं, उनकी कुलीनतावादी, अनुष्ठानिक, नपुंसक प्रगतिशीलता आम लोगों में घृणा और दूरी के अतिरिक्त भला और कौन-सा भाव पैदा कर सकती है? इस तबके की जो स्त्रियाँ हैं, ऊपरी तौर पर आम लोगों को वे आज़ाद लगती हैं (हालाँकि वस्तुत: ऐसा होता नहीं) और यह आज़ादी उनकी विशेष सुविधा प्रतीत होती है जिसके चलते मेहनतकश और आम मध्य वर्ग की स्त्रियाँ (ऊपर से सम्मान देती हुई भी) उनसे बेगानगी या घृणा तक का भाव महसूस करती हैं तथा उन्हें अपने से एकदम अलग मानती हैं।
उपरोक्त पूरी चर्चा के ज़रिये हम इस सच्चाई की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं कि प्रेम करने की आज़ादी पर रोक सहित किसी भी मध्ययुगीन बर्बरता, धार्मिक कट्टरपन्थी हमले या जातिवादी उत्पीड़न के विरुद्ध कुलीनतावादी प्रगतिशीलों की रस्मी, प्रतीकात्मक कार्रवाइयों का रूढ़िवादी शक्तियों और मूल्यों पर तो कोई असर नहीं ही पड़ता है, उल्टे आम जनता पर भी इनका उल्टा ही प्रभाव पड़ता है। सुविधासम्पन्न, कुलीनतावादी प्रगतिशीलों का जीवन आम लोगों से इतना दूर है कि उनके जीवन-मूल्य (यदि वास्तविक हों तो भी) जनता को आकृष्ट नहीं करते।
एक दूसरी बात जो ग़ौरतलब है, वह यह कि आज के भारतीय समाज में मध्ययुगीन बुराइयों के साथ-साथ आधुनिक बुर्जुआ जीवन की तमाम बुराइयाँ और विकृतियाँ भी मौजूद हैं। आम लोगों को पुरानी बुराइयों के विकल्प के तौर पर समाज में आधुनिक बुर्जुआ जीवन की बुराइयाँ ही नज़र आती हैं। पुरानी बुराइयों के साथ जीने की उन्हें आदत पड़ चुकी है। उनसे उनका परिचय पुराना है। इसलिए नयी बुराइयाँ उन्हें ज्यादा भयावह प्रतीत होती हैं। आधुनिक बुर्जुआ जीवन की सामाजिक-सांस्कृतिक विकृतियों को देखकर वे पुराने जीवन-मूल्यों से चिपके रहने का स्वाभाविक विकल्प चुनते हैं। महानगरों में तरह-तरह के सेक्स रैकेट, प्रेम-विवाहों की विफलता, यौन अपराधों आदि की खबरें पढ़-सुनकर और मीडिया में बढ़ती अश्लीलता आदि देखकर आम नागरिक इन्हें आधुनिक जीवन का प्रतिफल मानते हैं और इनसे सहज प्रतिक्रियास्वरूप उन रूढ़ियों को अपना शरण्य बनाते हैं जिनके साथ जीने के वे शताब्दियों से और पीढ़ियों से आदी रहे हैं। इसका एक वस्तुगत कारण आज की ऐतिहासिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में भी मौजूद है, जब प्रगति की धारा पर विपर्यय और प्रतिगामी पुनरुत्थान की धारा हावी है और चतुर्दक गतिरोध का माहौल है। और मनोगत कारण यह है कि विपर्यय और गतिरोध के इस दौर में ऐतिहासिक परिवर्तन की वाहक मनोगत शक्तियाँ अभी बिखरी हुई और निहायत कमज़ोर हैं। नये सिरे से नयी ज़मीन पर उनके उठ खड़े होने की प्रक्रिया अभी एकदम शुरुआती दौर में है। ऐसी ही शक्तियाँ अपने विचार और व्यवहार के द्वारा जनता के सामने मध्ययुगीन और विकृत बुर्जुआ जीवन मूल्यों का नया, मानवीय और वैज्ञानिक विकल्प प्रस्तुत कर सकती हैं।
फ़िलहाल की गतिरुद्ध स्थिति के बारे में भगत सिंह का उद्धरण एकदम सटीक ढंग से लागू होता है और ऐसी स्थिति में नयी क्रान्तिकारी शक्तियों के दायित्व के बारे में भी यह एकदम सही बात कहता है : “जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, अन्यथा पतन और बरबादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह ज़रूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा की जाये, ताकि इन्सानियत की रूह में हरकत पैदा हो।”

…इस आलेख का शेष भाग देखें : प्रेम, परम्‍परा और विद्रोह pdf file

दर्शन के प्रश्नों पर-2

Posted on Updated on

दर्शन के प्रश्नों पर-1

अब तक, विश्लेषण और संश्लेषण को स्पष्ट ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है। विश्लेषण अधिक स्पष्ट है लेकिन संश्लेषण के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा गया है। मैंने आई सू-चि[27] से बात की। उसका कहना है कि आजकल सिर्फ़ अवधारणात्मक संश्लेषण और विश्लेषण की बात की जाती है, और वस्तुगत प्रयोगात्मक संश्लेषण तथा विश्लेषण की बात नहीं की जाती। हम कम्युनिस्ट पार्टी और क्वोमिन्ताङ, सर्वहारा और बुर्जुआ, भूस्वामियों और किसानों, चीनी जनता और साम्राज्यवादियों का विश्लेषण और संश्लेषण कैसे करेंगे? उदाहरण के लिए, कम्युनिस्ट पार्टी और क्वोमिन्ताङ के मामले में हम ऐसा कैसे करेंगे। विश्लेषण तो बस यह प्रश्न है कि हम कितने मज़बूत हैं, हमारे पास कितना इलाका है, हमारे कितने सदस्य हैं, कितने सैनिक हैं, हमारी कमजोरियाँ क्या हैं? हमारे हाथ में कोई बड़ा शहर नहीं है, हमारी सेना की संख्या सिर्फ़ 1,200,000 है, हमारे पास कोई विदेशी सहायता नहीं है, जबकि क्वोमिन्ताङ को भारी विदेशी सहायता मिलती है। अगर आप येनान की तुलना शंघाई से करें, तो येनान की आबादी सिर्फ़ 7,000 है, इसमें (पार्टी और सरकार के) संगठनों के लोगों तथा सैनिकों (येनान में तैनात) को जोड़ दें, तो कुल योग 20,000 होता है। वहाँ सिर्फ़ दस्तकारी और खेती होती है। किसी बड़े शहर से इसकी तुलना कैसे की जा सकती है? हमारा मज़बूत पक्ष है कि हमारे साथ जनता का समर्थन है जबकि क्वोमिन्ताङ जनता से कटी हुई है। आपके पास ज्यादा इलाका है, लेकिन आपके सैनिक दबाव डालकर भरती किये गये हैं, और अफसरों तथा सिपाहियों के बीच टकराव है। स्वाभाविक है, उनकी सेना के एक खासे बड़े हिस्से के पास लड़ने की काफी क्षमता है, और ऐसा कतई नहीं है कि वे एक ही प्रहार से ढेर हो जायेंगे। उनका कमज़ोर पक्ष इस बात में है, उसकी कुंजी यह है कि वे आम जनता से कटे हुए हैं। हम आम जनता के साथ एकजुट हैं; वे आम जनता से कटे हैं।

वे अपने प्रचार में कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी सम्पत्ति को और पत्नियों को सर्वोपभोग्य बना देगी और वे इन बातों को प्राथमिक स्कूलों तक के स्तर पर प्रचारित करते हैं। उन्होंने एक गीत बनाया था: `जब चू तेह और माओ त्से-तुङ आयेंगे, मारते-काटते और तबाही मचाते हुए, तो तुम क्या करोगे?´ उन्होंने प्राइमरी स्कूल के विद्यार्थियों को यह गीत सिखा दिया, और जैसे ही विद्यार्थियों ने इसे गाया, सारे बच्चों ने घर जाकर अपने माता-पिता भाई-बहनों से इसके बारे में पूछा, और इस तरह हमारे लिए इस प्रचार का उलटा ही असर हुआ। एक छोटे बच्चे ने (गीत) सुनकर अपने पिता से पूछा। उसके पिता ने जवाब दिया : `तुम्हें पूछना नहीं चाहिए( जब तुम बड़े हो जाओगे तो खुद देखकर समझ जाओगे।´ वह मध्यमार्गी था। फिर बच्चे ने अपने चाचा से भी पूछा। चाचा ने उसे डाँट लगायी, और जवाब दिया : `ये सब मारने-काटने का क्या मामला है? अगर मुझसे फिर पूछा तो मार खाओगे।´ उसका चाचा पहले कम्युनिस्ट युवा लीग का सदस्य था। सभी अख़बार और रेडियो स्टेशन हम पर हमला करते थे। ढेर सारे अख़बार थे, हर शहर में कई दर्जन, हर धड़े का अपना अखबार था, और वे सब के सब, निरपवाद रूप से, कम्युनिस्ट विरोधी थे। क्या सारे सामान्य लोगों ने उनकी बात सुनी? कतई नहीं! हमें चीन के मामलों का कुछ अनुभव हुआ है, चीन एक `गौरैया´ है।[28] विदेशों में भी, अमीर-ग़रीब, प्रतिक्रान्ति और क्रान्ति, मार्क्सवाद-लेनिनवाद और संशोधनवाद के सिवा कुछ नहीं है। आपको यह बिल्कुल नहीं मानना चाहिए कि हर कोई कम्युनिस्ट-विरोधी प्रचार को मान लेगा और कम्युनिज्म का विरोध करने में शामिल हो जायेगा। क्या हम उस समय अखबार नहीं पढ़ते थे? फिर भी हम उनसे प्रभावित नहीं थे।

मैंने `लाल महल का सपना´ पाँच बार पढ़ी है, और इससे प्रभावित नहीं हुआ हूँ। मैं इसे इतिहास के तौर पढ़ता हूँ। पहले मैंने इसे कहानी के तौर पर पढ़ा, और फिर इतिहास के तौर पर। जब लोग `लाल महल का सपना´ पढ़ते हैं, तो वे चौथे अध्याय को ध्यान से नहीं पढ़ते , लेकिन दरअसल इसी अध्याय में इस किताब का सार है। इसमें लेङ लू-सिङ है जो जुङ-कुओ का वर्णन करता है, और गीत तथा टिप्पणियाँ रचता है। चौथे अध्याय `लौकी वाला भिक्षु लौकी का मामला तय करता है´ में `अफसरों के लिए ताबीज´ की चर्चा की गयी है। यह चार बड़े खानदानों का परिचय कराता है :

नानकिङ चिया के लिए

कहो हिप हिप हुर्रा!

वे जार भर-भरकर

तौलते हैं अपना सोना।

आह-पाङ महल

छूता है आसमान,

लेकिन इसमें समा नहीं पाता

नानकिङ शिह खानदान।

समन्दर के राजा को

जब कम पड़ते हैं। सोने के पलंग

तो पहुँचता है वह नानकिङ वाङ।

नानकिङ सुएह हैं इतने अमीर

कि उनके पैसे गिनने में

लग जायेगा सारा दिन….[29]

`लाल महल का सपना´ में चारों बड़े खानदानों का वर्णन किया गया हैं यह एक भीषण वर्ग संघर्ष के बारे में है, जिससे दर्जनों लोगों का भविष्य जुड़ा है, हालाँकि इनमें से बीस-तीस लोग ही शासक वर्ग में हैं। (गणना की गयी है कि (इस श्रेणी में) तैंतीस लोग हैं।) अन्य सभी, तीन सौ से ज्यादा लोग, दास हैं, जैसे युएह याङ, सू-चि, दूसरी बहन यु, तीसरी बहन यु, आदि। इतिहास पढ़ते समय, यदि आप वर्ग संघर्ष को अपना प्रस्थान-बिन्दु न बनायें, तो आप भ्रम में पड़ जायेंगे। वर्ग विश्लेषण से ही चीज़ों का स्पष्ट विश्लेषण किया जा सकता है। `लाल महल का सपना´ और आज तक, इस किताब पर हुए शोध से मुद्दे स्पष्ट नहीं हो सके हैं( इससे हम समझ सकते हैं कि समस्या कितनी कठिन है। यु पिङ-पो और वाङ कुन-लुन दोनों इसके विशेषज्ञ हैं।[30] हो चि फाङ [31][32] नामक एक सज्जन भी प्रकट हुए हैं। ये सब तो `लाल महल का सपना´ पर हाल में हुए शोध से सम्बन्धित हैं, पुराने अध्ययनों को तो मैं गिनाउँगा ही नहीं। `लाल महल का सपना´ के बारे में त्साई युवान-पेई का दृष्टिकोण गलत था( हू-शिह का दृष्टिकोण कुछ अधिक सही था।[33]

संश्लेषण क्या है? कि किस तरह दो विपरीत तत्व, क्वोमिन्ताङ और कम्युनिस्ट पार्टी मुख्य भूमि (चीन – अनु.) पर संश्लेषित हो गये। संश्लेषण इस तरह घटित हुआ: उनकी सेनाएँ आयीं, और हम उन्हें हज़म कर गये, हम एक-एक कौर करके उन्हें खा गये। यह याङ सिएन-चेन द्वारा बताये गये ढंग से दो को एक में मिलाने का मामला नहीं था, यह शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में मौजूद दो विपरीत तत्वों का संश्लेषण नहीं था। वे शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में नहीं रहना चाहते, वे आपको हजम कर जाना चाहते हैं वरना, वे येनान पर हमला क्यों करते? उनकी सेना तीनों सीमाओं पर तीन सिएन को छोड़कर उत्तरी शेन्सी मे हर जगह घुस चुकी थी। आपके पास अपनी आज़ादी है, और हमारे पास अपनी आज़ादी हैं आप 250,000 हैं, और हम 25,000 लोग।[34] चन्द ब्रिगेड, 20,000 आदमियों से कुछ ज्यादा। विश्लेषण कर लेने के बाद, अब हम संश्लेषण कैसे करें? अगर आप कहीं जाना चाहते हैं, तो सीधे आगे जाइये( हम फिर भी एक-एक कौर करके आपकी सेना को निगल जायेंगे। अगर हम जीतने के लिए लड़ सकते थे, तो हम लड़ते थे, अगर नहीं जीत सकते थे, तो हम पीछे हट जाते थे। मार्च 1947 से मार्च 1948 तक, (दुश्मन की) एक पूरी सेना हवा में ग़ायब हो गयी, क्योंकि हमने उनके दसियों दजार सैनिकों को ख़त्म कर दिया। जब हमने ई-चुझान का घेरा डाला, और ल्यू कान शहर को मुक्त कराने आया, तो मुख्य कमाण्डर ल्यू कान मारा गया, उसके तीन डिवीज़नल कमाण्डरों में से दो मारे गये और तीसरा बन्दी बना लिया गया, और पूरी सेना का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। यह संश्लेषण था। उनकी तमाम बन्दूकें और तोपखाना हमारे पक्ष में संश्लेषित हो गया और सैनिक भी संश्लेषित हो गये। जो हमारे साथ रहना चाहते थे वे रह सकते थे और जो नहीं रहना चाहते थे उन्हें हमने जाने का ख़र्चा दे दिया। जब हमने ल्यू-कान को ख़त्म कर दिया तो ई-चुआन में तैनात ब्रिगेड ने बिना लड़े हथियार डाला दिये। तीन बड़े अभियानों – ल्याओ-शेव, हुआई-हाई और पीकिङ- त्येनित्सन – में संश्लेषण का हमारा तरीका क्या था? फू त्सो-ह 400,000 आदमियों की अपनी सेना सहित, बिना लड़े, हमारे पक्ष में संश्लेषित हो गया और उन्होंने अपनी सारी रायफलें सौंप दीं।[35] एक चीज़ का दूसरे को खा जाना, बड़ी मछली का छोटी मछली को खा जाना, यह संश्लेषण है। इसे इस तरह से किताबों में कभी प्रस्तुत नहीं किया गया है। मैंने भी कभी अपनी किताबों में इसे इस ढंग से नहीं प्रस्तुत किया है। याङ सिएन-चिन मानते हैं कि दो मिलकर एक हो जाते हैं और संश्लेषण दो विपरीत तत्वों के बीच का अटूट बन्धन हैं। इस दुनिया में कौन से बन्धन अटूट हैं? चीज़ें एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती है, लेकिन अन्तत: उन्हें टूटना होता है। कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे अलग नहीं किया जा सकता। हमारे संघर्ष के करीब बीस वर्षों में, हममें से भी बहुत से लोगों को दुश्मन हजम कर गया। जब 300,000 आदमियों की लाल सेना शेन-कान-निङ क्षेत्र में पहुँची, तो सिर्फ़ 20,000 लोग बचे थे। बाकी में से, कुछ हजम कर लिये गये थे, कुछ बिखर गये थे, कुछ मारे गये या घायल हुए थे।

हमें विपरीत तत्वों की एकता पर चर्चा करने के लिए अपने जीवन को प्रस्थान बिन्दु बनाना चाहिए। (कामरेड काङ शेङ : `सिर्फ़ अवधारणाओं की बात करने से काम नहीं चलेगा।´)

जब विश्लेषण चल रहा होता है, तो संश्लेषण भी होता है, और जब संश्लेषण हो रहा होता है, तो विश्लेषण भी होता है। जब लोग जानवरों और पौधों को खाते हैं, तो वे भी विश्लेषण से शुरू करते हैं। हम बालू क्यों नहीं खाते? अगर चावल में बालू हो तो वह खाने लायक नहीं होता। हम घोड़े, गाय या भेड़ की तरह घास क्यों नहीं खाते, सिर्फ़ बन्दगोभी जैसी चीज़ें क्यों खाते हैं? हमें हर चीज़ का विश्लेषण करना चाहिए। शेन वुङ ने सौ जड़ी-बूटियों को चखा,[36] और दवाओं के लिए उनके इस्तेमाल की शुरुआत की। दसियों हज़ार साल बाद, विश्लेषण ने स्पष्ट रूप से यह उजागर किया कि क्या खाया जा सकता है और क्या नहीं। टिड्डे, साँप और कछुए खाये जा सकते हैं। केकड़े, कुत्ते और जलीय जन्तु खाये जा सकते हैं। कुछ विदेशी उन्हें नहीं खाते। उत्तरी शेन्सी में लोग जलीय जन्तुओं को नहीं खाते, वे मछलियाँ नहीं खाते। वे वहाँ बिल्ली भी नहीं खाते। एक बार पीली नदी की भारी बाढ़ से हज़ारों किलों मछलियाँ किनारों पर जमा हो गयी( और उन्होंने उन सबकी खाद बना डाली। मैं एक देशी दार्शनिक हूँ, आप लोग विदेशी दार्शनिक हैं। (कामरेड काङ शेङ `क्या अध्यक्ष तीन श्रेणियों के प्रश्न पर कुछ कह सकते हैं?´) एंगेल्स ने तीन श्रेणियों की चर्चा की है, लेकिन जहाँ तक मेरी बात है मैं उनमें से दो श्रेणियों में विश्वास नहीं करता। (विपरीत तत्वों की एकता सबसे बुनियादी नियम है, गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण विपरीत तत्वों गुण और मात्रा की एकता है, और निषेध का निषेध होता ही नहीं है) उसी स्तर पर, गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण, निषेध का निषेध, और विपरीत तत्वों की एकता के नियम को साथ-साथ रहना एकतत्ववाद नहीं, बल्कि `त्रितत्वाद´ है। सबसे बुनियादी चीज़ है विपरीत तत्वों की एकता। गुण और मात्रा का एक-दूसरे में रूपान्तरण विपरीत तत्वों गुण और मात्रा की एकता है। निषेध का निषेध जैसी कोई चीज़ नहीं है। अभिपुष्टि, निषेध, अभिपुष्टि, निषेध… चीज़ों की विकास प्रक्रिया में, घटनाओं की श्रंखला में हर कहीं अभिपुष्टि और निषेध दोनों होते हैं। दास स्वामियों के समाज ने आदिम समाज का निषेध किया, लेकिन सामन्ती समाज के सन्दर्भ में, यह एक सकारात्मक बात थी। सामन्ती समाज दास समाज के सम्बन्ध में निषेध था, लेकिन पूँजीवादी समाज के सन्दर्भ में यह सकारात्मक था। पूँजीवादी समाज सामन्ती समाज के सम्बन्ध में निषेध था, लेकिन समाजवादी समाज के सन्दर्भ में यह फिर सकारात्मक है। संश्लेषण की पद्धति क्या होती है! क्या यह सम्भव है कि दास समाज के साथ-साथ आदिम समाज का भी अस्तित्व बना रहे? वे साथ-साथ मौजूद होते हैं, लेकिन यह समग्र का एक छोटा-सा हिस्सा है। समग्र तस्वीर यह है कि आदिम समाज समाप्त हो जायेगा। इससे भी बाढ़कर यह है कि समाज का विकास कई मंजिलों से गुजरकर होता है। आदिम समाज भी अनेक मंजिलों में बँटा हुआ है। उस समय तक, मृत पतियों के साथ औरतों को दफन कर देने की प्रथा नहीं थी, लेकिन तब पुरुष स्त्रियों के अधीन थे और फिर चीज़ें अपने विपरीत की ओर बढ़ीं और स्त्रियाँ पुरुषों के अधीन हो गयीं। इतिहास की यह मंजिल अब तक स्पष्ट नहीं हो पायी है, हालाँकि करीब दस लाख वर्ष से ज्यादा समय से यह चला आ रहा है। वर्ग समाज अभी 5000 वर्ष पुराना नहीं हुआ है, आदिम युग के अन्त में लुङ शान और याङ शाओ [37] जैसी संस्कृतियों में रँगे हुए बर्तन होते थे। एक शब्द में, एक दूसरे को हड़प कर जाता है, एक दूसरे को उखाड़ फेंकता है, वर्ग ख़त्म कर दिया जाता है, दूसरा वर्ग उठता है, एक समाज का खात्मा हो जाता है, दूसरा समाज उठ खड़ा होता है। स्वाभाविक रूप से, विकास की प्रक्रिया में हर चीज़ बिल्कुल शुद्ध नहीं होती। जब यह सामन्ती समाज तक पहुँचती है, तो दास प्रणाली की कुछ चीज़ें अब भी बची रहती हैं, हालाँकि सामाजिक ढाँचे का अधिकांश भाग सामन्ती प्रणाली की अभिलाक्षणिकताओं के अनुसार होता है। अब भी कुछ भू-दास और कुछ बँधुआ मजदूर होते हैं, जैसे दस्तकार कारीगर। पूँजीवाद समाज भी बिल्कुल शुद्ध नहीं होता, और ज्यादा उन्नत पूँजीवादी समाजों में भी एक पिछड़ा भाग भी होता है। उदाहरण के लिए, दक्षिणी संयुक्त राज्य अमेरिका में दास प्रणाली थी। लिंकन ने दास प्रणाली ख़त्म कर दी, लेकिन वहाँ अब भी काले गुलाम हैं, उनका संघर्ष बहुत तीखा है। दो करोड़ से ज्यादा लोग इसमें शामिल हैं और ये काफी बड़ी संख्या है। एक चीज़ दूसरी को नष्ट कर देती है, चीज़ें पैदा होती हैं, विकसित होती हैं, और नष्ट हो जाती हैं, हर कहीं ऐसा ही है। अगर चीज़ें दूसरी चीज़ों द्वारा नष्ट नहीं करती, तो वे खुद ही नष्ट हो जाती हैं। लोग क्यों मरते हैं? क्या कुलीन लोग भी मरते हैं? यह एक प्राकृतिक नियम है। जंगल मनुष्यों से ज्यादा जीवित रहते हैं, लेकिन वे भी कुछ हज़ार वर्ष तक रहते हैं। यदि मृत्यु जैसी चीज़ न होती, तो यह स्थिति असहनीय होती। अगर हम आज कनफ़्यूशियस को जीवित देख सकते, तो धरती इतने सारे लोगों को सँभालने लायक नहीं रहती। मैं चुआङ-ल्यू[38] के रवैये का समर्थन करता हूँ। जब उसकी पत्नी मर गयी तो वह थाली बजाकर गाना गाने लगा। जब लोग मरें, तो द्वन्द्ववाद की विजय का जश्न मनाने के लिए पुराने के ध्वंस का जश्न मनाने के लिए पार्टियाँ होनी चाहिए। समाजवाद भी समाप्त हो जायेगा। इसका समाप्त न होना ठीक नहीं, क्योंकि जब तक यह समाप्त नहीं होगा तब तक कम्युनिज्म नहीं आयेगा। कम्युनिज्म हज़ारों हज़ार साल तक रहेगा। मैं नहीं मानता कि कम्युनिज्म के तहत कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होंगे, कि यह गुणात्मक बदलावों द्वारा मंज़िलों में बँटा नहीं होगा। मैं इसे नहीं मानता! मात्रा गुण में बदलती है, और गुण मात्रा में बदल जाता है। मैं यह नहीं मानता कि यह दसियों लाख वर्ष तक बिना बदले गुणात्मक रूप से बिल्कुल एक समान बना रह सकता है! द्वन्द्ववाद की रोशनी में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। फिर यह सिद्धान्त है, `हरेक से उसकी क्षमतानुसार, हरेक को उसकी आवश्यकतानुसार।´ क्या आप मानते हैं कि वे दस लाख वर्ष तक इसी अर्थशास्त्र पर चलते रहेंगे? क्या आपने इसके बारे में सोचा है? अगर ऐसा होता, तो हमें अर्थशास्त्रियों की ज़रूरत नहीं होती, या फिर हम बस एक पाठ्यपुस्तक से काम चला सकते, और द्वन्द्ववाद ख़त्म हो जाता। विपरीत ध्रुवों की ओर निरन्तर गति द्वन्द्ववाद का प्राण है। अन्तत: मनुष्य जाति का भी अन्त होगा। जब धर्मशास्त्री कयामत के दिन की बात करते हैं, तो वे निराशावादी होते हैं। हम कहते हैं कि मनुष्य जाति का अन्त कुछ ऐसी चीज़ होगी जो मनुष्य जाति से भी उन्नत किसी चीज़ को जन्म देगी। मनुष्य जाति अभी अपनी शैशवावस्था में है। एंगेल्स ने आवश्यकता के राज्य से स्वतन्त्रता के राज्य में प्रवेश करने की बात की थी, और कहा था कि स्वतन्त्रता का अर्थ है आवश्यकता की समझ। यह वाक्य अधूरा है। यह आधी बात कहता है और शेष को अनकहा छोड़ देता है। क्या इसे महज समझने से आप स्वतन्त्र हो जायेंगे? स्वतन्त्रता का अर्थ है आवश्यकता की समझ और आवश्यकता का रूपान्तरण – आपको कुछ काम भी तो करना होता है। अगर आप बिना कोई काम किये सिर्फ़ खायेंगे, अगर आप महज समझेंगे, तो क्या यह काफ़ी होगा? जब आप कोई नियम ढूँढ़ते हैं, तो आपको इसे लागू करना आना चाहिए, आपको दुनिया का नये सिरे से निर्माण करना होगा, आपको जमीन खोदनी और इमारतें खड़ी करनी होंगी, आपको खदानें खोदनी होंगी, उद्योग लगाने होंगे। भविष्य में और भी ज्यादा लोग होंगे, और अनाज काफी नहीं होगा, तो लोगों को खनिजों से भोजन प्राप्त करना होगा। इस तरह, केवल रूपान्तरण द्वारा ही स्वतन्त्रता हासिल की जा सकती है। क्या भविष्य में इतनी स्वतन्त्रता सम्भव होगी? लेनिन ने कहा था कि भविष्य में, आसमान में इधर-उधर भागते हवाई जहाज इतने ज्यादा होंगे जैसे कि पतंगें। हर जगह वे टकरा जायेंगे, तो हम इसके बारे में क्या करेंगे? हम उन्हें कैसे चलायेंगे? और अगर हम ऐसा कर लेंगे, तो क्या चीज़ें इतनी स्वतन्त्र रहेंगी? पीकिङ में इस समय 10,000 बसें हैं, टोक्यो में 100,000 (वाहन) हैं (या यह 800,000 है?) इसलिए वहाँ वाहन दुर्घटनाएँ ज्यादा होती हैं। हमारे यहाँ कम कारें हैं और हम ड्राइवरों और लोगों को शिक्षित भी करते हैं, इसलिए दुर्घटनाएँ कम होती हैं। अब से 10,000 साल बाद पीकिङ में क्या होगा? क्या तब भी 10,000 बसें ही रहेंगी? वे कुछ नया अविष्कार कर सकते हैं, जिससे वे परिवहन के इन साधनों को त्याग सकते हैं, ताकि मनुष्य उड़ सके, किसी सरल-से यान्त्रिक उपकरण का प्रयोग करके किसी भी जगह उड़कर जा सके, और जहाँ जी चाहे उतर सके। आवश्यकता को सिर्फ़ समझने से कुछ नहीं होगा, हमें चीज़ों को बदलना भी होगा। मैं नहीं मानता कि कम्युनिज्म मंजिलों में विभाजित नहीं होगा, और कोई गुणात्मक बदलाव नहीं होंगे। लेनिन ने कहा था कि सारी चीज़ें विभाजित की जा सकती हैं। उन्होंने परमाणु का उदाहरण दिया और कहा कि न सिर्फ़ परमाणु को विभाजित किया जा सकता है बल्कि इलेक्ट्रान को भी विभाजित किया जा सकता है। पहले, यह माना जाता था कि इसे विभाजित नहीं किया जा सकता, परमाणु के नाभिक के विखण्डन से जुड़ी विज्ञान की शाखा की उम्र अभी ज्यादा नहीं है, बस बीस या तीस वर्ष हुए हैं। हाल के दशकों में वैज्ञानिकों ने परमाणु के नाभिक को उसके संघटकों जैसे प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, एण्टी-न्यूट्रान, मेज़ान और एण्टी- मेज़ॉन में बाँटा है। ये तो भारी वाले संघटक हैं इसके अलावा हल्के वाले भी हैं। इनमें से ज्यादातर खोजें द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान या उसके बाद हुई हैं। यह तथ्य कुछ समय पहले खोजा जा चुका था कि इलेक्ट्रान को परमाणु के नाभिक से अलग किया जा सकता है। बिजली के तार में ताँबे या अल्युमिनियम से अलग किये गये इलेक्ट्रानों का प्रयोग किया जाता है। पृथ्वी के 300 ली के वातावरण में, भी असम्बद्ध इलेक्ट्रानों की परतों का पता लगाया गया है। वहाँ भी इलेक्ट्रान और परमाणु का नाभिक अलग-अलग हैं। अब तक इलेक्ट्रानों को तोड़ा नहीं जा सका है लेकिन एक दिन वे अवश्य ही इसे भी तोड़ सकेंगे। चुआ³-त्जू ने कहा है, `एक फुट की लम्बाई, जिसे रोज़ आधा किया जाता है, कभी भी घटकर शून्य नहीं होगी।´ (चुआङ-त्जू, अध्याय 33 का उद्धरण) यह सच है। अगर आपको विश्वास नहीं है, तो ज़रा सोचिये। अगर इसे घटा कर शून्य किया जा सकता, तो विज्ञान ही नहीं होता। तमाम तरह की चीज़ें निरन्तर और असीम ढंग से विकसित होती रहती हैं, और वे अनन्त हैं। समय और स्थान अनन्त हैं। जहाँ तक स्थान का सवाल है, वृहत और सूक्ष्य दोनों दृष्टिकोण से देखने पर, यह अनन्त है, इसे अन्तहीन ढंग से विभाजित किया जा सकता है। इसलिए, दस लाख वर्ष बाद भी वैज्ञानिकों के लिए करने को काम होगा। मैं `बुलेटिन ऑफ नेचुरल साइंसेज़´ में मूलभूत कणों पर सकाटा के लेख की बहुत सराहना करता हूँ।[39] मैंने पहले इस तरह का कोई लेख नहीं देखा। यह द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। वह लेनिन को उद्धृत करते हैं। दर्शनशास्त्र की कमजोरी है कि इसने व्यावहारिक दर्शन नहीं, सिर्फ़ किताबी दर्शन पैदा किया है। हमें हमेशा नई-नई चीज़ें सामने लानी चाहिए। वरना हमारा यहाँ क्या काम है? हमें वंशज किसलिए चाहिए? नयी चीज़ें यथार्थ में मिलती हैं, हमें यथार्थ को समझना चाहिए। अन्तिम विश्लेषण में, जेन चि-यू[40] मार्क्सवादी हैं या नहीं? मैं बौद्ध धर्म पर उनके उन लेखों की काफी सराहना करता हूँ। (उनके पीछे) कुछ शोध किया गया दिखता है, वह ताङ युङ-तुङ[41] के शिष्य हैं। वह सिर्फ़ ताङ वंश के बौद्ध धर्म की चर्चा करते हैं, और बाद के समय के बौद्ध धर्म पर सीधे कुछ नहीं कहते। सुङ और मिङ अधिभूतवाद ताङ वंश के चान स्कूल से विकसित हुए, और यह मनोगत प्रत्ययवाद से वस्तुगत प्रत्ययवाद की ओर एक आन्दोलन था।[42] बौद्ध धर्म और ताओ पन्थ दोनों ही हैं, और दोनों के बीच फर्क न करना ग़लत है। उन पर ध्यान देना उचित कैसे हो सकता है? हान यू की बातों का कोई मतलब नहीं है। उसका नारा था( `उनके विचारों से सीखो, उनकी अभिव्यक्ति के ढंग से नहीं।´ उसके विचार पूरी तरह दूसरों से नकल किये हुए थे, उसने बस निबन्धों का रूप और संरचना बदल दी। उसकी बातें बेमतलब थीं, और जो कुछ उसने कहा वह मूलत: प्राचीन पुस्तकों से लिया गया था। `शिक्षकों पर विमर्श´ जैसे लेखनों में कुछ नयापन है। ल्यू-हाउ अलग था, वह बौद्ध और ताओ भौतिकवाद की एक-एक बात जानता था।[43] लेकिन उसकी `स्वर्ग उत्तर देता है´ बहुत छोटी है। उसकी `स्वर्ग उत्तर देता है´ चू युआन की `स्वर्ग पूछता है´ से पैदा हुई है।[44] हज़ारों साल में सिर्फ़ इस एक आदमी ने `स्वर्ग उत्तर देता है´ जैसी कोई चीज़ लिखी है। `स्वर्ग उत्तर देता है´ और `स्वर्ग पूछता है´ किसके बारे में हैं? `स्वर्ग पूछता है´ में स्पष्ट ढंग से व्याख्या करने के लिए टिप्पणियाँ न हों, तो इसे पढ़कर आप कुछ नहीं समझ पायेंगे, आपको एक सामान्य झलक मिलेगी। `स्वर्ग पूछता है´ वाकई अद्भुत है, हज़ारों वर्ष पहले इसने ब्रह्माण्ड, प्रकृति और मनुष्य पर सवाल उठाये थे। (दो को एक में मिलाने के प्रश्न पर चर्चा के सम्बन्ध में) हुङ चि को कुछ अच्छी चीज़ें पुनर्मुद्रित करने और एक रिपोर्ट लिखने के लिए कहें।

टिप्पणियाँ

27आई सू-ची (1910-66) अपनी मृत्यु के समय उच्चतर पार्टी स्कूल के उपाध्यक्ष थे। वह पार्टी के अग्रणी दार्शनिक प्रवक्ताओं में से एक थे, जिन्होंने द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर कृतियों का रूसी से अनुवाद किया था, और मार्क्सवाद को जनसाधारण तक ले जाने के लिए अनेक पुस्तकें तथा लेख लिखे थे। 1 नवम्बर 1964 को उन्होंने पीपुल्स डेली में `बुर्जुआ´ दार्शनिक याङ सिएन-चेन पर हमला करते हुए एक लेख प्रकाशित कराया।

28 `गौरैया की चीरफाड़´ की उपमा ज्ञान अर्जित करने और अनुभवों का समाहार करने का एक अनुप्रयुक्त सिद्धान्त और कार्य पद्धति है। किसी परिघटना की अनेक पुनरावृत्तियों के सामान्यीकरण का प्रयास करने के बजाय, यह कार्य पद्धति किसी प्रोटोटाइप के सांगोपांग अध्ययन और जांच-पड़ताल के ज़रिये उसका गहन विश्लेषण करने और इस विश्लेषण के ज़रिये अनुभवों का सार-संकलन करने की हिमायत करती है। यह नारा इस आम कहावत से निकला है कि `गौरैया छोटी भले ही होती है लेकिन उसमें सभी ज़रूरी अंग होते हैं।´ यहाँ माओ कहते हैं कि व्यापक अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भों में पूरा चीन आज की दुनिया में क्रान्ति की समस्याओं का एक लघु रूप है।

29 पुस्तक (दि स्टोरी ऑफ दि स्टोन) के अध्याय 2 में जुङ कुओ के ड्यूक की हवेली में लेङ त्जू-सिंग के उपदेश। `अधिकारियों के लिए ताबीज´ इलाके के अमीर और असरदार परिवारों की एक सूची थी जिसे बॉटल-गूर्ड के भूतपूर्व शिष्य को साथ रखना पड़ता था ताकि उन्हें नाराज़ करके अपना भविष्य चौपट करने से बच सके। (दि स्टोरी ऑफ दि स्टोन)

30 इस मुद्दे पर कॉमरेड माओ द्वारा की गयी आलोचनाओं के लिए देखें लाल भवन का सपना के बारे में पत्र´´ (संकलित रचनाएँ, खण्ड 5) वाङ कुन-लेन 1950 के दशक में पीकिङ के उप महापौर थे

31 हो चि-फाङ (1911-) एक कवि तथा साहित्य जगत के प्रभावी व्यक्ति थे। 1954 में यू यिंग-पो के विरुद्ध चली मुहिम में उन्होंने एक सीमा तक उसका यह कहकर बचाव किया कि लाल भवन का सपना की यू की व्याख्या ग़लत है लेकिन वे राजनीतिक रूप से वफादार हैं। महान अग्रवर्ती छलाँग के वक्त स्वयं उनकी आलोचना की गयी।

32 इस विषय पर वू शिह-चाङ की कृति अंग्रेज़ी में अनूदित है : ऑन `लाल भवन का सपना´ (क्लैरण्डन प्रेस, 1961)

33 यहाँ माओ के विचार लू शुन से मेल खाते हैं।

34 माओ द्वारा यहाँ दिये गये आँकड़े 1946 में गृह युद्ध नये सिरे से छिड़ जाने जाने से अधिक जापान विरोधी युद्ध के आरिम्भक दिनों के हैं जब जन मुक्ति सेना की ताकत कम से कम पाँच लाख तक की हो गयी थी।

35 जनवरी 1949 में, पेइपिंग (जिस नाम से तब उसे जाना जाता था) में राष्ट्रवादी गैरीसन के कमाण्डर जनरल फू त्सो-इ ने व्यर्थ की बरबादी से बचने के लिए बिना लड़े ही आतमसमर्पण कर दिया। बाद में पीकिङ सरकार में वह जल संरक्षण मन्त्री बने।

36 कहा जाता है कि प्रसिद्ध सम्राट शेन नुङ ने तीसरी शताब्दी ई.पू. में कृषि कला सिखायी थी, और ख़ास तौर पर वनस्पतियों के औषधीय गुणों का पता लगाया था।

37 लुङ शान और यान शाओ संस्कृतियाँ, जो क्रमश: उत्तर-पूर्वी और उत्तर- पश्चिमी चीन में स्थित हैं, उत्तरपाषाण काल की दो उल्लेखनीय संस्कृतियाँ थीं। जैसा कि माओ कहते हैं, वे अपनी मृदभाँड कला के लिए विशेष रूप से जानी जाती हैं।

38 चुआङ-त्जू नामक पुस्तक, जिसका एक अंश ही दूसरी शताब्दी ई.पू. के उत्तरार्द्ध में रहने वाले इसी नाम के व्यक्ति ने लिखा था, न केवल ताओ धर्म के शास्त्रीय ग्रन्थों में से एक है (लाओ-त्जू और बुक ऑफ चेंजेंस के साथ) बल्कि चीन के इतिहास की महानतम साहित्यिक कृतियों में से भी एक है।

39 नगोया विश्वविद्यालय के एक जापानी भौतिकीविद सकाटा शियूची का मानना था कि `मूलभूत कण एक एकल, भौतिक, विभेदीकृत और असीम श्रेणी होते हैं जिनसे प्राकृतिक व्यवस्था बनी होती है।´ इन विचारों को प्रस्तुत करने वाला उनका एक लेख जून 1965 में रेड फ्लैग में छपा था।

40 सम्भवत: माओ जेन चि-यू द्वारा 1963 में प्रकाशित और 1973 में पुनर्मुद्रित लेखों के एक संग्रह की बात कर रहे हैं : `हान एवं ताङ राजवंशों में बौद्ध विचारधारा पर संकलित निबन्ध,´ (पीकिङ )। इन अध्ययनों में वह द्वन्द्ववाद के विषय में लेनिन को काफ़ी विस्तार से उद्धृत करते हैं।

41 ताङ युङ-तुङ (1892-1964) जिन्हें जेन चि-यु अपना शिक्षक मानते हैं, बौद्ध धर्म के अग्रणी इतिहासकार थे, जिन्होंने हान, वेई, चिन और उत्तरी एवं दक्षिणी राजवंशों में चीनी बौद्ध धर्म के बारे में तथा भारतीय दर्शन के इतिहास आदि पर लिखा था। 1948 से लेकर 1954 में बीमार पड़ने तक वह पीकिङ विश्वविद्यालय में मानविकी के डीन थे।

42 चान बौद्ध धर्म (जो उसके जापानी नाम ज़ेन से अधिक प्रसिद्ध है) के प्रभाव में, सुङ और मिङ वंशों के चीनी दार्शनिकों ने कनफ़्यूशियसवाद और बौद्ध धर्म का संश्लेषण किया जिसमें केन्द्रीय भूमिका ली अवधारणा (सिद्धान्त या तर्क) की होती है, जिसे नव-कनफ़्यूशियसवाद के नाम से जाना जाता है।

43 हान यू और ल्यू त्सुङ-युआन। हान-यू ने प्राचीन शैली की अधिकता से बचते हुए प्राचीन क्लासिकी अवधि की सादगी को पुनर्सृजित करने की कोशिश की। `उनके विचारों से सीखने´ का माओ द्वारा उद्धृत नारा अभिव्यक्ति के पुराने पड़ गये तरीकों से बचते हुए प्राचीन कनफ़्यूशियस- वादी सन्तों से प्रेरणा लेने के इस लक्ष्य का हवाला देता है। उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति आलोचनात्मक रवैया अपनाया लेकिन फिर भी उससे कुछ विचार लिये। ल्यू त्सु³-युआन, जिन्हें माओ यहाँ उनके साहित्यिक नाम ल्यू त्जू-हाउ के नाम से पुकारते हैं, हान यू के करीबी दोस्त थे।

44 ल्यू त्सुङ-युआन का निबन्ध `स्वर्ग उत्तर देता है´ में चू युआन द्वारा अपनी कविता `स्वर्ग पूछता है´ में ब्रह्माण्ड के बारे में उठाये गये कुछ प्रश्नों के उत्तर दिये गये हैं।

अनुवाद : सत्यम

दर्शन के प्रश्नों पर

Posted on Updated on

वार्ता विशेष

माओ त्से-तुङ

18 अगस्त, 1964


यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अपने कुछ वरिष्ठ कामरेडों के साथ माओ त्से-तुङ की एक अनौपचारिक वातचीत का पाठ है जिसमें उन्होंने चीन में समाजवादी निर्माण की समस्याओं और समाजवादी समाज में जारी वर्ग संघर्ष से जोड़ते हुए कुछ दार्शनिक प्रश्नों पर, ख़ासकर द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद के बारे में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विचार व्यक्त किये हैं। बातचीत का ढंग अनौपचारिक है और वार्ता में अनेक विषयों को छुआ गया है लेकिन यहाँ की गयी बातें बेहद गम्भीर और विचारोत्तेजक हैं। -सं

जब वर्ग संघर्ष हो तभी दर्शन भी सम्भव हो सकता है। व्यवहार से अलग ज्ञानमीमांसा की चर्चा करना समय की बर्बादी है। दर्शन का अध्ययन करने वाले कामरेडों को देहात में जाना चाहिए। उन्हें इन सर्दियों में या अगले वसन्त में वहाँ जाकर वर्ग संघर्ष में हिस्सा लेना चाहिए। जिनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है उन्हें भी जाना चाहिए। वहाँ जाने से लोग मर नहीं जायेंगे। बस इतना होगा कि उन्हें सर्दी लग जायेगी, और अगर वे कुछ अतिरिक्त कपड़े पहन लेंगे तो कोई दिक्कत नहीं होगी।

फ़िलहाल विश्वविद्यालयों में वे जिस तरह से इसका अध्ययन करते हैं किताब से किताब तक, एक अवधारणा से दूसरी अवधारणा तक जाते हुए, वह किसी काम का नहीं है। दर्शन किताबों से कैसे आ सकता है? मार्क्सवाद के तीन बुनियादी संघटक हैं वैज्ञानिक समाजवाद, दर्शन और राजनीतिक अर्थशास्त्र।[1] इसका आधार है समाज विज्ञान, वर्ग संघर्ष। सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच संघर्ष है। मार्क्स और दूसरे लोगों ने इसे देखा था। यूटोपियाई समाजवादी हमेशा बुर्जुआ वर्ग को उदार होने के लिए राज़ी करने की कोशिश करते है। यह नहीं चलेगा, सर्वहारा के वर्ग संघर्ष पर भरोसा करना ज़रूरी है। उस समय, कई हड़तालें हो चुकी थीं। इंग्लैण्ड की संसदीय जाँच ने पाया कि बारह घण्टे काम का दिन पूँजीपतियों के हित के लिए आठ घण्टे काम के दिन के मुकाबले कम अनुकूल है। इसी दृष्टिकोण से आरम्भ करके मार्क्सवाद सामने आया। बुनियाद तो वर्ग संघर्ष है। दर्शनशास्त्र का अध्ययन इसके बाद ही हो सकता है। किसका दर्शन? बुर्जुआ वर्ग का दर्शन, या सर्वहारा वर्ग का दर्शन? सर्वहारा वर्ग का दर्शन मार्क्सवादी दर्शन है। सर्वहारा वर्ग का अर्थशास्त्र भी है, जिसने क्लासिकीय अर्थशास्त्र को बदल डाला है। जो लोग दर्शनशास्त्र से जुड़े हैं, वे मानते हैं कि दर्शन का स्थान पहले है। उत्पीड़क उत्पीड़ितों का उत्पीड़न करते हैं, जबकि उत्पीड़ितों को दर्शन की तलाश शुरू करने से पहले उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ने और उससे निकलने का रास्ता तलाश करना पड़ता है। जब लोगों ने इसे अपना प्रस्थान बिन्दु बनाया तभी मार्क्सवाद- लेनिनवाद सामने आया और तभी उन्हें दर्शन का पता चला। हम सब इससे होकर गुज़रे हैं। दूसरे लोग मुझे मारना चाहते थे( च्याङ काई-शेक मुझे मारना चाहता था। इस तरह हम वर्ग संघर्ष में शामिल हुए, हमने दार्शनिक ढंग से सोचना शुरू किया।

विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को इन सर्दियों में (देहात में – अनु.) जाना शुरू कर देना चाहिए -मैं समाज विज्ञानों की बात कर रहा हूँ। प्राकृतिक विज्ञान के विद्यार्थियों को अभी नहीं भेजना चाहिए, हालाँकि हम एक-दो बार उन्हें भेज सकते हैं। समाज विज्ञानों – इतिहास, राजनीतिक अर्थशास्त्र, साहित्य, कानून – का अध्ययन करने वाले सभी लोगों को, हरेक को जाना चाहिए। प्रोफेसरों, असिस्टेण्ट प्रोफेसरों, प्रशासनिक कर्मचारियों और विद्यार्थियों सभी को, पाँच महीने की सीमित अवधि के लिए जाना चाहिए। अगर वे पाँच महीने के लिए कारखानों में जायेंगे, तो वे कुछ बोधात्मक ज्ञान हासिल करेंगे। घोड़े, गायें, भेड़ें, मुर्गियाँ कुत्ते, सुअर, धान, ज्वार, सेम, गेहूँ, बाजरे की किस्में, इन सब चीज़ों को वे देख सकेंगे। यदि वे सर्दियों में जायेंगे, तो फसल नहीं देख पायेंगे, पर कम से कम वे जमीन और लोगों को देख सकेंगे। वर्ग संघर्ष का अनुभव हासिल करना – मैं इसे ही विश्वविद्यालय कहता हूँ। लोग बहस करते हैं कि कौन- सा विश्वविद्यालय बेहतर हं, पीकिङ विश्वविद्यालय या `जन विश्वविद्यालय´।[2] जहाँ तक मेरी बात है, मैं तो खुले मैदानों के विश्वविद्यालय का स्नातक हूँ, मैंने वहीं थोड़ा-बहुत सीखा है। अतीत में मैंने कनफ़्यूशियस का अध्ययन किया और चार पुस्तकों तथा पाँच शास्त्रों पर छह वर्ष ख़र्च किये।[3] मैंने उन्हें रट लिया, पर मैंने उन्हें समझा नहीं। उस समय, मुझे कनफ़्यूशियस में गहरा विश्वास था, और मैंने लेख भी लिखे (उसके विचारों को स्पष्ट करते हुए) बाद में मैं सात वर्ष तक एक बुर्जुआ स्कूल में गया। सात धन छह बराबर तेरह वर्ष होते हैं। मैंने आम तौर पर पढ़ाई जानेवाली सारी बुर्जुआ चीज़ों का अध्ययन किया – प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञानों को। थोड़ा शिक्षाशास्त्र भी सिखाते थे। इसमें पाँच वर्ष नार्मल स्कूल में दो वर्ष मिडिल स्कूल में और साथ ही पुस्तकालय में बिताया गया मेरा समय शामिल है।[4] उस समय मैं काण्ट के द्वैतवाद, खासकर उसके प्रत्ययवाद में विश्वास करता था। मूलत: मैं एक सामन्तवादी और बुर्जुआ लोकतन्त्र का समर्थक था। समाज ने मुझे क्रान्ति में भाग लेने की ओर धकेला। मैंने प्राथमिक स्कूल के शिक्षक और एक चार-वर्षीय स्कूल के प्रिंसिपल के रूप में कुछ वर्ष बिताये। मैंने एक छह-वर्षीय स्कूल में इतिहास और चीनी भाषा भी पढ़ाई। मैंने थोड़े समय तक एक मिडिल स्कूल में भी पढ़ाया, पर मैं कुछ भी समझता नहीं था। जब मैं कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुआ, तो मैं जानता था कि हमें क्रान्ति करनी है, पर किसके खिलाफ? और हम ऐसा करेंगे कैसे? बेशक हमें साम्राज्यवाद ओर पुराने समाज के खिलाफ क्रान्ति करनी थी। मुझे ठीक से यही नहीं पता था कि साम्राज्यवाद किस किस्म की चीज़ है, और इस बात की तो और भी कम समझ थी कि हम इसके खिलाफ क्रान्ति कैसे करेंगे। मैं तेरह वर्षों में जो कुछ भी सीखा था, उसमें से कुछ भी क्रान्ति करने के लिए किसी काम का नहीं था। मैंने एकमात्र औज़ार – भाषा – का इस्तेमाल किया। लेख लिखना एक औज़ार है। जहाँ तक मेरे अध्ययनों का सवाल है, मैंने उसका बिल्कुल भी प्रयोग नहीं किया। कनफ़्यूशियस कहता था : सदाशयता मानवजाति का अभिलाक्षणिक गुण है। सदाशयी व्यक्ति दूसरों से प्रेम करता है।[5] वह किससे प्रेम करता था? सभी मनुष्यों से? ऐसा कतई नहीं था। क्या वह शोषकों से प्रेम करता था? बिल्कुल ऐसा भी नहीं था। वह शोषकों के सिर्फ़ एक हिस्से से प्रेम करता था। वरना, कनफ़्यूशियस कोई ऊँचा अधिकारी क्यों न बन सका? लोग उसे नहीं चाहते थे। वह उन्हें प्रेम करता था और चाहता था कि वे एकजुट हो जायें। लेकिन जब भुखमरी की, और (इस उक्ति) `श्रेष्ठ व्यक्ति ग़रीबी को झेल सकता है´ की बात आयी, तो वह मरते-मरते बचा। कुआङ के लोग उसे मार डालना चाहते थे।[6] ऐसे लोग भी थे जो चिन की पश्चिम की यात्रा पर साथ न जाने के लिए उसकी आलोचना करते थे। वास्तव में, `गीति-काव्यों की पुस्तक´ (बुक ऑफ ओड्स) में शामिल कविता `सातवें माह में अग्नि तारा भूमध्य रेखा को पार करता है´ में शेन्सी की घटनाओं का उल्लेख है। `पीला पक्षी´ कविता में उस घटना की चर्चा है जब चिन के युवराज मू के तीन उच्च अधिकारियों को मारकर उसी के साथ दफना दिया गया था।[7] सू-मा चिरोन [8]की `गीति-काव्यों की पुस्तक´ के बारे में बहुत अच्छी राय थी। वह कहता था कि इसकी 300 कविताएँ प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों ने जागृत अवस्था में लिखी थीं। `गीति-काव्यों की पुस्तक´ की कविताओं का एक बड़ा हिस्सा राज्यों की शैली में लिखा गया है, वे आम लोगों के लोकगीत है, ऋषि-मुनि और कोई नहीं बल्कि आम लोग ही हैं। `जागृत अवस्था में लिखी थीं´ का मतलब यह है कि जब किसी व्यक्ति का हृदय क्रोध से भर उठता था तब वह कविता लिखता था!

तुम न बोते हो न काटते हो;

फिर तुम्हारे तीन सौ कोठार धान से कैसे भरे रहते है?

तुम शिकार में कभी दौड़ते नहीं हों;

फिर तुम्हारे अहाते में तीतर लटकते कैसे दिखते हैं?

ओ श्रेष्ठ मनुष्य!

वह अपनी अकर्मण्यता की रोटी

नहीं खाता![9]

`काम के न काज के, दुश्मन अनाज के´ कहावत यहीं से पैदा हुई। यह कविता देवताओं को दोषी ठहराती है और शासकों का विरोध करती है। कनफ़्यूशियस थोड़ा जनवादी भी था। उसने (`गीति-काव्यों की पुस्तक´ में) स्त्री-पुरुष के प्रेम के बारे में कविताओं को भी शामिल किया है। अपनी टिप्पणियों में, चू सि ने उन्हें गुप्त प्रेम सम्बन्धों के रूप में वर्णित किया है।[10] वास्तव में, कुछ ऐसे हैं और कुछ नहीं हैं, जो ऐसे नहीं हैं। उनमें राजकुमार और प्रजा के सम्बन्धों के बारे में लिखने के लिए पुरुष और स्त्री के बिम्बों का प्रयोग किया गया है। पाँच राजवंशों और दस काउन्टियों के काल में शू (आज का शेच्वान) में `चिन की पत्नी सर्दियों का रोना रोती है´ शीर्षक ऐवेई चुआङ की एक कविता थी।[11] उसने अपनी युवावस्था में इसे लिखा था और यह अपने राजकुमार के लिए उसकी विरह वेदना के बारे में है।

देहात में जाने के मामले पर लौटते है। लोगों को इन सर्दियों और वसन्त से शुरू करके, समूहों में और बारी-बारी से, वर्ग संघर्ष में भाग लेने के लिए जाना चाहिए। सिर्फ़ इसी ढंग से वे कुछ सीख सकते है, क्रान्ति के बारे में सीख सकते है। आप बुद्धिजीवी लोग सारा दिन अपने सरकारी दफ्तरों में बैठते हैं, अच्छा खाते हैं, अच्छा पहनते हैं, पैदल तक नहीं चलते हैं। इसीलिए आप बीमार पड़ते हैं। कपड़े, भोजन, मकान और व्यायाम की कमी बीमारी पैदा करने वाले चार बड़े कारण हैं। अगर अच्छी जीवन स्थितियों का भोग करने की हालत में तब्दीली लाकर, आप कुछ बुरी स्थितियों में जाते हैं, अगर आप वर्ग संघर्ष में हिस्सा लेने के लिए जाते हैं, अगर आप `चार सफाई अभियानों´ और `पाँच विरोध अभियानों´[12] के बीच जाते हैं और कठोर बनने के एक दौर से गुजरते हैं, तो आप बुद्धिजीवी लोग एक नये रूप में नजर आयेंगे।

अगर आप वर्ग संघर्ष में नहीं लगे हैं, तो आप भला किस दर्शन को लेकर चल रहे हैं?

क्यों न वहाँ जाकर इसे आज़मायें? अगर आपकी बीमारी ज्यादा गम्भीर हो जाये तो आप वापस आ जाइयेगा – आपको मरने की हालत में पहुँच जाने को निर्धारक रेखा बनाना चाहिए। जब आप इतने बीमार हो जाये कि मरने वाले हों तो आपको वापस आ जाना चाहिए। जैसे ही आप वहाँ जायेंगे, आपमें कुछ जोश आ जायेगा। (काङ शेङ बीच में बोलते हैं : `दर्शन और समाज विज्ञान विभागों के शोध संस्थानों और विज्ञान अकादमी को भी जाना चाहिए। फ़िलहाल, वे प्राचीन वस्तुओं के अध्ययन हेतु संस्थानों में तब्दील हो जाने, धूप-लोहबान के चढ़ावों से पोषण पाने वाले परीलोक में तब्दील हो जाने के कगार पर हैं। दर्शनशास्त्र संस्थान का कोई भी व्यक्ति कुआङ-मिङ जि-पाओ नहीं पढ़ता।´) मैं सिर्फ़ कुआङ-मिङ जि-पाओ और वेन-हुई पाओ[13] ही पढ़ता हूँ, मैं पीपुल्स डेली नहीं पढ़ता, क्योंकि पीपुल्स डेली में सैद्धान्तिक लेख नहीं छपते( जब हम कोई प्रस्ताव पारित करते हैं, तब वे उसे प्रकाशित करते हैं। लिबरेशन आर्मी डेली जीवन्त है, यह पठनीय है। (कामरेड काङ शेङ: `साहित्य संस्थान चाउ कुचेङ[14] पर कोई ध्यान नहीं देता, और अर्थशास्त्र संस्थान सुन येह-फाङ[15] और लिबरमैनिज्म की ओर उसके झुकाव, पूँजीवाद की ओर उसके झुकाव पर ध्यान नहीं देता।´)

उन्हें पूँजीवाद की ओर जाने दीजिये। समाज बहुत जटिल है। अगर हर कोई सिर्फ़ समाजवाद की ओर जाये, और पूँजीवाद की ओर न जाये, तो क्या यह ज्यादा ही सरल नहीं होगा? तब क्या हमारे यहाँ विरोधों की एकता ख़त्म नहीं हो जायेगी, और सिर्फ़ एकांगिकता ही नहीं रह जायेगी? उन्हें ऐसा करने दीजिये। उन्हें हम पर पागलपनभरे हमले करने दीजिये, सड़कों पर प्रदर्शन करने दीजिये, हथियार उठाकर बगावत करने दीजिये – मैं इन सब चीज़ों का समर्थन करता हूँ। समाज बहुत जटिल है, एक भी ऐसा कम्यून, एक भी सिएन, केन्द्रीय कमेटी का एक भी ऐसा विभाग नहीं है, जहाँ हम एक को दो में नहीं बाँट सकते। जरा देखिये क्या ग्रामीण कार्य विभाग को भंग नहीं कर दिया गया है?[16] यह पूरी तरह व्यक्तिगत गृहणियों के आधार पर लेखा-जोखा करने और `चार महान स्वतन्त्रताओं – धन उधार देने, व्यापार करने, श्रम भाड़े पर लेने और जमीन की खरीद-फरोख्त करने की स्वतन्त्रता – का प्रचार करने में जुटा हुआ था। अतीत में, उन्होंने (इस आशय की) एक घोषणा जारी की थी। तेङ त्जू-हुई का मुझसे विवाद हुआ था। केन्द्रीय कमेटी की एक बैठक में उन्होंने चार महान स्वतन्त्रताओं को लागू करने का विचार प्रस्तुत किया था[17]

नव जनवाद को सुदृढ़ करना, और इसे निरन्तर सुदृढ़ करते जाना, पूँजीवाद पर अमल करना है।[18] नव जनवाद सर्वहारा के नेतृत्व में एक बुर्जुआ-जनवादी क्रान्ति है। यह सिर्फ़ भूस्वामियों और दलाल पूँजीपतियों को छूती है, राष्ट्रीय पूँजीपति वर्ग को तो यह हाथ भी नहीं लगाती। जमीन का बँटवारा करना और उसे किसानों को दे देना सामन्ती भूस्वामियों की सम्पत्ति को किसानों की व्यक्तिगत सम्पत्ति में तब्दील करना है, और यह बुर्जुआ क्रान्ति के दायरे में ही आता है। जमीन का बँटवारा कोई बड़ी बात नहीं है – मैकआर्थर ने जापान में ऐसा किया। नेपोलियन ने भी जमीन का बँटवारा किया था। भूमि सुधारों से पूँजीवाद का खात्मा नहीं हो सकता। न ही इससे समाजवाद आ सकता है।

अभी हम जिस अवस्था में हैं उसमें एक तिहाई सत्ता दुश्मन या दुश्मन के हमदर्दों के हाथों में है। हम लोग पन्द्रह वर्षों से लगे हुए हैं औ अब दो-तिहाई शासन-सूत्र हमारे नियन्त्रण में हैं। आज की स्थिति में, आप एक (पार्टी) ब्रांच सेक्रेटरी को सिगरेट के चन्द पैकेटों से ख़रीद सकते हैं, अपनी बेटी का उससे ब्याह कर देने पर तो खैर कहना ही क्या। कुछ ऐसे इलाके हैं जहाँ भूमि सुधार शान्तिपूर्ण ढंग से पूरा किया गया, और भूमि सुधार टोलियाँ बहत कमजोर थीं( अब आप देख सकते हैं कि वहाँ ढेरों समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं।

मुझे दर्शन के बारे में सामग्रियाँ मिल गयी हैं। (यहाँ अन्तरविरोधों की समस्या पर सामग्रियों का ज़िक्र है – स्टेनोग्राफ़र की टिप्पणी।) मैंने रूपरेखा पर एक नजर डाली है। (यहाँ `दो को एक में मिलाओ´ की आलोचना करते हुए एक लेख की रूपरेखा का जिक्र है – स्टेनोग्राफर की टिप्पणी।)[19] मैं शेष को नहीं पढ़ पाया हूँ। मैंने विश्लेषण और संश्लेषण के बारे में सामग्रियों को भी देखा है। विपरीत तत्वों की एकता के नियम, बुर्जुआ वर्ग इसके बारे में क्या कहता है, मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन और स्तालिन इसके बारे में क्या कहते हैं, संशोधनवादी इसके बारे में क्या कहते हैं, उन पर इस तरह की सामग्री इकट्ठा करना अच्छी बात है। जहाँ तक बुर्जुआ वर्ग की बात है, याङ सिएन-चेन इसकी बात करता है, और पहले हीगेल इसकी बात करते थे। ऐसे लोग पुराने जमाने में होते थे। अब तो वे और भी बुरे हैं। बोग्दोनोव और लुनाचार्स्की भी थे, जो देववाद (Deism) की बात करते थे। मैंने बोग्दानोव का अर्थशास्त्र पढ़ा है कि आदिम संचय वाले हिस्से को उन्होंने ठीक माना था। (काङ शेङ : `बोग्दानोव के आर्थिक सिद्धान्त शायद आधुनिक संशोधनवाद के आर्थिक सिद्धान्तों से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध थे। काउत्स्की के आर्थिक सिद्धान्त ख्रुश्चेव के आर्थिक सिद्धान्तों से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध थे, और युगोस्लाविया भी सोवियत संघ से कुछ ज्यादा प्रबुद्ध हैं आखिरकार, जिलास ने स्तालिन के बारे में कुछ अच्छी बातें कहीं थी, उसने कहा था कि चीनी समस्याओं पर स्तालिन ने आत्मालोचना की थी।´)

स्तालिन ने महसूस किया था कि चीनी समस्याओं के सम्बन्ध में उनसे गलतियाँ हुई, और वे कोई छोटी गलतियाँ नहीं थीं। हम करोड़ों लोगों की आबादी वाला विशाल देश हैं, और उन्होंने हमारी क्रान्ति का, और सत्ता पर हमारे कब्जा करने का विरोध किया। हमने पूरे देश में सत्ता पर कब्जा करने के लिए बरसों तक तैयारी की, समूचा जापान-विरोधी युद्ध एक तैयारी थी। अगर आप उस दौर के केन्द्रीय कमेटी के दस्तावेजों को देखें, `नव जनवाद के बारे में´ सहित, तो यह बात एकदम साफ हो जायेगी। कहने का मतलब कि आप बुर्जुआ वर्ग का अधिनायकत्व कायम नहीं कर सकते, आप सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में नव जनवाद ही कायम कर सकते हैं, आप सर्वहारा के नेतृत्व में लोक जनवादी अधिनाकत्व ही कायम कर सकते है। हमारे देश में, अस्सी वर्ष तक, बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में की गयी सभी जनवादी क्रान्तियाँ असफल रहीं। हमारे नेतृत्व में जनवादी क्रान्ति निश्चित ही विजयी होगी। एकमात्र रास्ता यही है, और कोई रास्ता नहीं है। यह पहला कदम है। दूसरा कदम समाजवाद के निर्माण का होगा। इस तरह, `नव जनवाद के बारे में´ एक सम्पूर्ण कार्यक्रम है। इसमें राजनीतिक, अर्थशास्त्र और संस्कृति की भी चर्चा की गयी है। सिर्फ़ सैन्य मामलों की इसमें चर्चा नहीं की गयी। (काङ शेङ : `नव जनवाद के बारे में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मैंने स्पेनी कामरेडों से पूछा, और उन्होंने कहा कि उनके लिए समस्या नव जनवाद की स्थापना नहीं, बल्कि बुर्जुआ जनवाद की स्थापना करना था। उन्होंने अपने देश में तीन बिन्दुओँ सेना, देहात , राजनीतिक सत्ता – पर ध्यान नहीं दिया। वे पूरी तरह सोवियत विदेश नीति के मातहत हो गये, और कुछ भी हासिल नहीं कर पाये।´)

ये चेन तू-सिङ की नीतियाँ हैं! (कामरेड काङ शेङ : `वे कहते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ने सेना संगठित की और, फिर उसे दूसरों को सौंप दिया।´)

ये बेकार की बात है। ( कामरेड काङ शेङ : `वे राजनीतिक सत्ता भी नहीं चाहते थे, न ही उन्होंने किसानों को गोलबन्द किया। उस समय पर, सोवियत संघ ने कहा कि यदि वे सर्वहारा का नेतृत्व थोपेंगे, तो इंग्लैण्ड और फ्रांस इसका विरोध करेंगे, और यह सोवियत संघ के हित में नहीं होगा।´)

क्यूबा के बारे में क्या खयाल है? क्यूबा में उन्होंने राजनीतिक सत्ता और सेना गठित करने पर ही ध्यान दिया, और किसानों को भी गोलबन्द किया, जैसा (हमने) अतीत में किया था( इसीलिए वे कामयाब हुए।

(कामरेड काङ शेङ `साथ ही, जब वे (स्पेनी) लड़े, तो उन्होंने सामान्य ढंग से युद्ध किया, बुर्जुआ वर्ग के तरीके से, वे आखिर तक मैड्रिड की रक्षा करते रहे।[20] हर चीज़ में, उन्होंने खुद को सोवियत विदेश नीति के मातहत कर लिया था।´)

तीसरे इण्टरनेशनल को भंग किये जाने के पहले भी, हमने तीसरे इण्टरनेशनल के आदेशों को नहीं माना। तसुन्यी सम्मेलन में हमने आदेश नहीं माने, और उसके बाद दस वर्ष के अरसे तक, शुद्धीकरण अभियान से सातवीं कांग्रेस तक, जब अन्तत: हमने एक प्रस्ताव पारित किया (`हमारी पार्टी के इतिहास के कुछ प्रश्नों के बारे में प्रस्ताव´)[21] और वामवाद (की ग़लतियों) को ठीक कर लिया, हमने उनके आदेशों का बिल्कुल पालन नहीं किया। वे कठमुल्लावादी चीन की विशेषताओं का अध्ययन करने में पूरी तरह असफल रहे( जब वे देहात में गये, उसके दस वर्ष बाद भी, वे देहात में भूमि सम्पत्ति और वर्ग सम्बन्धों को समझने में पूरी तरह असफल रहे। आप महज़ देहात में जाने से देहात को नहीं समझ सकते, आपको देहात के सभी वर्गों और तबकों के बीच के सम्बन्धों का अध्ययन करना चाहिए। मैंने इन समस्याओं पर दस वर्ष से अधिक ख़र्च किये तब जाकर आखिरकार वे मेरे सामने स्पष्ट हुई। आपको हर किस्म के लोगों से सम्पर्क करना पड़ेगा, चायखानों से लेकर जुआघरों तक, और उनकी जाँच-पड़ताल करनी होगी। 1925 में, मैं किसान आन्दोलन प्रशिक्षण संस्थान[22] में सक्रिय था, और ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वेक्षण करता था। अपने पैतृक गाँव में, मैं ग़रीब किसानों की जाँच पड़ताल करने के लिए उनसे मिलता था। उनकी हालत दयनीय थी, उनके पास खाने को कुछ नहीं था। एक किसान था जिसके साथ मैंने गोटियों का खेल खेला (स्वर्ग, धरती, इन्सान, मेलजोल, मेई चिएन, चाङ साङ और बेंच के साथ खेला जाने वाला) और उसके बाद उसे अपने साथ खाना खाने के लिए आमन्त्रित किया। खाने के पहले, बाद में और खाना खाते हुए, मैंने उससे बातें की और मेरी समझ में आया कि देहात में वर्ग संघर्ष इतना तीखा क्यों है। वह मुझसे बात करने को इसलिए तैयार था क्योंकि : सबसे पहले तो मैंने उससे इन्सान के तौर पर बरताव किया( और तीसरे, वह थोड़े पैसे बनाने में सफल रहा था। मैं जानबूझकर हार रहा था( मैं एक या दो डालर हार गया, और नतीजतन वह काफी सन्तुष्ट था। एक दोस्त है जो अब भी दो बार मुझसे मिलने आया! मुक्ति के बाद। एक बार, उन दिनों में, वह काफी बुरी हालत में था, और वह एक डालर उधार लेने के लिए मुझे ढूँढ़ते हुए आया। मैंने उसे तीन डालर दिये, ऐसी मदद के तौर पर जिसे लौटाना नहीं था। उन दिनों में, ऐसी न लौटाने वाली मदद मिलना मुश्किल होता था। मेरे पिता का सोचना था कि अगर कोई आदमी अपना ख्याल नहीं रखता, उसे लोक-परलोक दोनों जगह सजा मिलेगी। मेरी माँ उनका विरोध करती थीं। जब मेरे पिता की मृत्यु हुई, तो बहुत थोडे़-से लोग शवयात्रा में शामिल हुए। जब मेरी माँ की मृत्यु हुई तो बहुत से लोग उनकी शवयात्रा में गये। एक बार को लाओ हुई ने हमारे घर को लूट लिया। मैंने कहा कि उन्होंने ठीक ही किया, क्योंकि लोगों के पास कुछ भी नहीं है। मेरी माँ भी इस बात को स्वीकार नहीं कर सकी।

एक बार चाङशा में चावल के लिए दंगे भड़क उठे जिनमें प्रान्तीय गवर्नर की पिटाई हो गयी। सियाङ-सियाङ से कुछ फेरी वाले अपनी सेम बेचकर घर लौट रहे थे। मैंने उन्हें रोककर हालात के बारे में पूछा। देहात में लाल और हरे गिरोह भी सभाएँ करते थे और बडे़ परिवारों को तबाह कर देते थे। इसकी ख़बरें शंघाई के अख़बारों में छपती थीं, और गड़बड़ियाँ तभी दबायी जा सकीं जब चाङशा से सैनिक भेजे गये। उनमें अनुशासन नहीं था, वे मध्यम किसानों का चावल छीन लेते थे, और इसलिए वे अलग-थलग पड़ गये। उनका एक नेता इधर-उधर भागता रहा, और आखिर पहाड़ियों में जाकर छिपा, लेकिन उसे वहाँ पकड़ लिया गया और मार दिया गया। बाद में, देहात के गणमान्य लोगों ने बैठक की, और कुछ और ग़रीब किसानों को मार डाला। उस समय तक कोई कम्युनिस्ट पार्टी नहीं थी। ये स्वत:स्फूर्त वर्ग संघर्ष थे।

समाज ने हमें धकेलकर राजनीतिक मंच पर ला खड़ा किया। पहले मार्क्सवाद से कोई वास्ता रखने के बारे में कौन सोचता था? मैंने तो इसका नाम भी नहीं सुना था। मैंने जिन लोगों के बारे में सुना, और पढ़ा था वे थे कनफ़्यूशियस, नेपोलियन, वाशिंगटन, पीटर महान, मेईजी पुनर्स्थापना, तीन विख्यात इतालवी (देशभक्त) – यूँ कहें कि सब पूँजीवाद के (नायक) थे। मैंने फ्रैंकलिन की एक आत्मकथा भी पढ़ी थी। वह एक ग़रीब परिवार स