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पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

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इससे पहले, लिंक जोड़ने के लिए देखें : वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पोंजी स्कीम जैसी है ?

विश्व आर्थिक मंदी ने एक बार फिर सारी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को मार्क्स की ओर मुड़ने के लिए मजबूर कर दिया है.  ‘द्वंदात्मक भौतिकवादी’ भूगोलवेत्ता ‘डेविड  हार्वे’ जो चालीस वर्षों से मार्क्स की पूंजी पढ़ा रहें हैं और जिन्हें पहली बार गंभीरता से लिया जा रहा है, से ‘लॉरी टेलर’ की मुलाकात पर आधारित यह आलेख ‘http://newhumanist.org.uk’ से लिया गया है.

डेविड हार्वे तुरंत अपनी तरंग में आ जाते हैं. “पूंजीवाद” वे रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स ,  लन्दन के हाल में अपने श्रोताओं से कहते हैं, “कभी भी अपने संकटों का समाधान नहीं करता. यह उन्हें केवल एक स्थान से दूसरी स्थान पर ले जाता है. ब्राज़ील से रूस, से अर्जन्टीना, से अमेरिका, से ब्रिटेन, से यूनान”.

जैसे ही वे इन बार-बार आनेवाले संकटों,  और विशेषरूप से, 1970 के बाद से उनकी बारंबारता में नाटकीय बढौतरी के कारकों का विश्लेषण करना शुरू करते हैं, मैं अपनी नज़र, श्रोताओं पर डालता हूँ. मैं अपनी चैयरमेन की सीट से देख सकता हूँ कि व्याख्यान सभागार खचाखच भरा हुआ है. कोई भी कुर्सी खाली नहीं है और लगभग दर्जन एक श्रोता गलियारे में खड़े हुए हैं. रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स [RSA]   के लंच-समय के व्याख्यानों में, अक्सर, अच्छी हाजिरी होती है लेकिन क्या कमरे में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति ने इस बात को तस्लीम कर लिया था कि जो कुछ वे आज इस वक्ता से सुनने जा रहे हैं, वह आज के पूंजीवाद का विश्लेषण है जो मार्क्स से शुरू होकर मार्क्स पर ख़त्म होता है, ऐसा विश्लेषण जोकि कई प्रकार से वैसा ही है, जैसा मैंने ७० और ८० के दशक में सैंकड़ों नीरस सभाओं में कट्टर समाजवादियों से सुना था.

कोई कारण नहीं था कि मैं फिक्रमंद होता. इस पर भी कि हार्वे ने तुरंत मार्क्स के प्रति अपना कर्ज तस्लीम किया और बार-बार वे मार्क्स को उद्घृत करते रहे. फिर भी, तीस मिनट के व्याख्यान में, किसी भी क्षण,  उनके अमीर श्रोताओं में बेचैनी  का कोई चिह्न नहीं था और समापन पर, प्रश्नौतर काल में, केवल एक श्रोता का सुझाव था कि मार्क्स को छोड़कर कुछ भी, हमारे मौजूदा आर्थिक संकट को समझने के लिए, सबसे बढ़िया हो सकता है.

निसंदेह, उस आर्थिक सिद्धांत को, जिसे सोवियत यूनियन के ढह-ढेरी हो जाने पर, भले ही अतार्किक रूप से ही सही, इतिहास में जगह दे दी गयी थी, स्वीकार करने की चाहत के पीछे एक बढ़िया कारण था. बिलकुल सीधी सी बात है कि विश्वभर के अर्थशास्त्रियों की,  इतिहास में अभी-अभी  घटित हुई घटनाओं पर एक भी संतोषजनक व्याख्या देने की पूर्ण असक्षमता. इसी तथ्य को श्रोताओं के सामने सही और साफ-साफ तरीके से प्रस्तुत करने में, हार्वे पूरी तरह से माहिर हैं.

अपनी ताज़ा पुस्तक, ‘पूंजी की पहेली और पूंजीवाद के संकट’ की प्रस्तावना में, वे यह कहानी सुनाते हैं, ” जब प्रतापी महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने नवंबर 2008 में, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के अर्थशास्त्रियों से यह पूछा कि क्यों नहीं वे मौजूदा आर्थिक संकट की आमद को देख पाए ( एक ऐसा सवाल जोकि निसंदेह प्रत्येक व्यक्ति की जबान पर था, लेकिन जिसे कोई सामन्ती शासक ही, इस तरह, हलके अंदाज में पूछ सकता था और उत्तर की अपेक्षा पाल सकता था ) तो अर्थशास्त्रियों के पास, देने के लिए, कोई जवाब तैयार नहीं था. छह महीने के मुख्य नीति निर्धारकों के साथ मिलकर किये गए अध्ययन, जुगाली और गहन विचार-विमर्श  के बाद, ब्रिटिश अकादमी के गलियारे में एकत्रित हुए सभी अर्थशास्त्रियों ने, एक साझे पत्र में, प्रतापी महारानी के सामने स्वीकार किया कि वे ,किसी हद तक, उस दृष्टि को खो चुके हैं जिसे वे ‘प्रणालीबद्ध जोखिम’ के नाम से जाना करते थे.

हार्वे, इस एपिसोड की स्विफटियन विडंबना का रस्सावदान करते हुए कहते हैं, “शिक्षित अर्थशास्त्रियों की अपनी असफलता पर बहानेबाजी करने की नाकाम कोशिश का यह दृश्य है, उस वक्त, जब वे बुरी तरह से डरे हुए सचेत हैं कि उनमें से किसी ने भी कपडे नहीं पहने हुए हैं. परन्तु यह सब उनको (हार्वे को) मार्क्स को जगाने का पूर्ण तरीका मुहैया करवाता है. किंकर्तव्यविमूढ़, वे अर्थशास्त्री, उन छः महीनों के लंबे अन्तराल के बाद, अंत में, यह पहचान गए थे कि उनकी असफलता का वास्तविक रहस्य क्या था.  जर्नलिस्टों और टिपण्णीकर्त्ताओं द्वारा पेश किये गये अधपक्के सिद्धांतों को भूल जाईये.  ताज़ा संकट, हार्वे अपने [RSA] के भावविभोर श्रोताओं से कहते हैं, किसी मानवीय कमजोरी या अप्रयाप्त वित्तीय बन्दोबस्त या किन्सियाई दृष्टि को त्यागने से या अंग्रेजों या अमेरिकियों या यूनानियों की विलक्षण सांस्कृतिक असफलताओं के कारण सिर के बल खड़ा नहीं हुआ है. यह पूंजीवाद की प्रणालीबद्ध असफलता है.  और इस प्रकार की असफलता पर विश्वसनीय लगने वाली केवल एक ही व्याख्या है, जिसे बूढ़े भले मार्क्स में खोजा जा सकता है.

[RSA] द्वारा तैयार की गयी इस कार्टून फिल्म की पार्श्व-ध्वनी, स्वयं हार्वे के उपरोक्त व्याख्यान का ही ऑडियो है.

शेष अगली किश्त [पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’] में

मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय

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प्रारंभिक कार्य

कार्ल मार्क्स को जिस बौद्धिक वातावरण में काम करना पड़ा, उस पर हेगेल के विचारों का वर्चस्व था. हेगेल के विचारों की प्रतिक्रिया में ‘यंग हेगेलियन’ नामक युवकों का समूह हेगेल के विचारों के रुढ़िवादी आशय को नकारता था. इन चिंतकों में से सबसे प्रसिद्ध लुडविग फायरबाख थे, जिन्होंने हेगेल के विचारवाद को रूपांतरित करने की कोशिश की और इस प्रकार हेगेल के धर्म और राज्य के सिद्धांत की आलोचना प्रस्तुत की. १८४० के दशक की शुरुआत में मार्क्स द्वारा लिखित दार्शनिक साहित्य का बड़ा भाग हेगेल, फायरबाख और अन्य ‘यंग हेगेलियन’ के कार्यों के खिलाफ अपनी स्वयं की स्थिति को रखने का रिकार्ड है.

यहूदियों के सवाल पर

इस रचना में मार्क्स अपने और अपने उदारवादी ‘यंग हेगेलियन’ साथियों – विशेषतया, ब्रुनो बायर के बीच की दूरी को स्पष्ट करते हैं. एक नास्तिक के नजरिये से, बायर ने अभी-अभी यहूदियों की स्वतंत्रता के विरुद्ध लिखा था. उनके अनुसार यहूदियों और ईसाईयों, दोनों का धर्म उनकी मुक्ति में सबसे बड़ा बाधक है. प्रत्युत्तर में मार्क्स , ‘राजनीतिक मुक्ति के सवाल की विलक्षणता’ – आवश्यक रूप से उदार अधिकारों और स्वतंत्रता का अनुदान और मानव मुक्ति के बीच फर्क को दिखाते हुए अपने सर्वाधिक तर्कों में एक का इस्तेमाल करते हैं. मार्क्स बायर को उत्तर देते हुए कहते हैं कि धर्म की सतत व्यापकता के तहत भी राजनीतिक स्वतंत्रता पूर्ण रूप से संभव है जिसका समकालीन उदाहरण संयुक्त राज्य प्रदर्शित करते हैं. लेकिन उदारवाद के अनगिनत आलोचकों द्वारा पुन: स्थापित तर्क की गहराई तक जाते हुए मार्क्स का कहना है कि मानव मुक्ति के लिए राजनीतिक मुक्ति न केवल अप्रयाप्त है बल्कि , यह किसी हद तक, उसकी स्वतंत्रता में रूकावट का ही काम करती है. न्याय के उदारवादी अधिकार और विचार इस विचार पर खड़े हैं कि हम में से प्रत्येक अन्य व्यक्तियों से सुरक्षा चाहता है. इस प्रकार, उदारवादी अधिकार अलगाव के अधिकार हैं, जिन्हें इस प्रकार डिज़ाईन किया जाता है कि वे हमें इस प्रकार वर्णित खतरों से संरक्षण प्रदान करें. इस दृष्टिकोण पर आधारित स्वतंत्रता किसी भी प्रकार की दखलंदाजी से स्वतंत्रता है. यह दृष्टिकोण जिस वस्तु को छोड़ देता है, मार्क्स के लिए वही संभावना बन जाती है – तथ्य की इस रौशनी में कि वास्तविक स्वतंत्रता को, सकारात्मक रूप से, हमारे अन्य व्यक्तियों के साथ संबंधों में ढूंढा जाना है. इस मानव समाज में ढूंढा और खोजा जाना है न कि एकांगी रूप में. इस प्रकार, अधिकारों के राज्य की जिद, हमें उत्साहित करती है कि हम उन्हें इस प्रकार देखें कि मानव मुक्ति में निहित वास्तविक मुक्ति की संभावना धुंधली पड़ जाये. अब हमें साफ़ तौर पर समझ आ जाना चाहिए कि मार्क्स राजनीतिक स्वतन्त्र के विरुद्ध नहीं हैं क्योंकि वे समझ रहे होते हैं कि उदारवाद उसके समय की जर्मनी में मौजूद पूर्वाग्रहों और पक्षपात से भरपूर प्रणालियों में एक बड़े सुधार  का ही काम कर रहा होता है. यद्यपि, इस प्रकार के राजनीतिक रूप से स्वतन्त्र उदारवाद को मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता के रास्ते को पार करना होगा. दुर्भाग्य से, मार्क्स यह नहीं बताते कि मानव स्वतंत्रता क्या है लेकिन यह साफ़ है कि इसका गहरा संबंध अलगाव से मुक्त श्रम के विचार से है, जिसका जिक्र हम आगे करेंगे.

A Contribution to the Critique of Hegel’s Philosophy of Right

Introduction

अपनी इस रचना में मार्क्स धर्म को अफीम कहते हैं और इसी रचना में वे अपने धर्म संबंधी विचारों का सविस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं. इस रचना में वे विचार करते हैं कि किस तरह जर्मनी में क्रांति का सवाल हल हो सकता है और सर्वहारा वर्ग द्वारा सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति के लिए अदा की जानेवाली भूमिका से अवगत करवाते हैं.

धर्म के संबंध में, मार्क्स धर्मशास्त्र के विरुद्ध फायरबाख के उस दावे को स्वीकार करते हैं जिसमें उनका कहना है कि मानव ने अपने ही रूप के अनुसार भगवान के रूप को गढ़ा है. फायरबाख की विलक्षण देन इस तर्क में थी कि परमात्मा की पूजा मानव को अपनी स्वयं की शक्तियों से पूरा लाभ उठाने से वंचित कर देती हैं. फायरबाख की इस देन को ज्यादातर स्वीकार करते हुए मार्क्स फायरबाख की इस कमी की और इशारा करते हैं कि वे इस बात को समझने में असमर्थ हैं कि लोग क्यों धार्मिक अलगाव का शिकार हो जाते हैं और किस प्रकार वे इससे पार जा सकते हैं. मार्क्स की व्याख्या है कि धर्म भौतिक संसार में अलगाव का ही परिणाम है और इसे तब तक ख़त्म नहीं किया जा सकता जब तक इस भौतिक संसार में मौजूद अलगाव को समाप्त नहीं किया जाता. संक्षिप्त में उस भौतिक जीवन का वर्णन स्पष्टता से नहीं किया गया है जो इस अलगाव को पैदा करता है. यद्यपि, ऐसा लगता है कि अलगाव के दो पहलू जिम्मेदार हैं. एक तो श्रम का अलगाव है जिसका जिक्र अभी किया जायेगा. दूसरा, मानव जाति की अपने सामुदायिक तत्व के प्रति अभिव्यक्ति. चाहे हम इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार करें या न करें लेकिन मानव जाति समुदाय के रूप में अस्तित्व में होती है और जो मानव जीवन को संभव बनाता है वह है – हम सभी को अपनी आगोश में समेटा हुआ मजबूत सामाजिक और आर्थिक नेटवर्क जिस पर हमारी परस्पर निर्भरता कायम होती है. इस संबंध में, मार्क्स के विचार इस प्रकार दीखते हैं कि हमें अपनी संस्थाओं में सामुदायिक अस्तित्व को स्वीकृति देनी चाहिए. शुरू से ही, धर्म ने अपनी कुटिलता से इस बात को समझ लिया था और उसने एक मिथ्यावादी सामुदायिकता के विचार को पैदा किया जिसमें सभी लोग भगवान की नज़र में समान होते हैं. सुधार उपरांत विखंडन के बाद, जब धर्म समानता के भ्रम को फैलाने के अयोग्य हो जाता है, राज्य इस आवश्यकता की पूर्ति नागरिकों के समुदाय का भ्रम, जिसमें सभी लोग कानून के सम्मुख समान होते हैं, पैदा करके करता है.  परंतू राज्य और धर्म दोनों से उस वक्त पार जाया जा सकेगा जब सामाजिक और आर्थिक समानता का सच्चा समुदाय अस्तित्व में आ जायेगा.

निसंदेह, हमारे सामने यह प्रश्न है कि किस प्रकार इस तरह के समाज का निर्माण संभव हो सकता है. फायरबाख पर अपने तीसरे सिद्धांत की रौशनी में मार्क्स का अध्ययन दिलचस्प होगा जिसमें वे वैकल्पिक सिद्धांत की आलोचना करते हैं. रॉबर्ट ओवेन और अन्य लोगों का बेडौल भौतिकवाद मानता है कि मानव जाति के भाग्य की निर्धारक उसकी भौतिक परिस्थितियां होती हैं और इसलिए, एक मुक्त समाज के लिए यह जरूरी और प्रयाप्त है कि उन भौतिक परिस्थितियों को सही रूप से बदला जाये. लेकिन सवाल पैदा होता है कि कैसे? ओवेन जैसे प्रबुद्ध परोपकारी द्वारा, जो कि अपने चमत्कार से इन भौतिक परिस्थितियों के निर्धारण को तोड़ देगा जो प्रत्येक को जकड़े हुए है ? मार्क्स का  प्रत्युत्तर है कि सर्वहारा अपने स्वयं के रूपांतरण की क्रिया के दौरान ही इसे तोड़ सकेगा. वास्तव में, अगर सर्वहारा लोग स्वयं के लिए क्रांति नहीं करते हैं (निसंदेह, दार्शनिकों के मार्गदर्शन में ) वे इसे हासिल करने के योग्य नहीं हो सकेंगे.

Economic and Philosophical Manuscripts

इस पुस्तक में कई दिलचस्प विषय हैं जिसमें प्रमुख रूप से निजी संम्पत्ति, कम्युनिज्म, धन और हेगेल की आलोचना शामिल है. यद्यपि, इस रचना में श्रम का अलगाव ही केंद्र में है. यहाँ मार्क्स पूंजीवाद में मजदूर की चार तरह के श्रम के अलगाव से पैदा हुई पीड़ा का जिक्र करते हैं. सबसे पहले उत्पाद से पैदा हुई पीड़ा, जिसे उसी वक्त इसके उत्पादक (मजदूर) से छीन लिया जाता है जब यह उत्पादित हो जाता है. दूसरे, उत्पादन क्रिया (काम) से, जिसे सजा के रूप में अनुभव किया जाता है. तीसरे, मानव जाति के चरित्रानुसार, क्योंकि मनुष्य अंधाधुंध उत्पादन करते हैं न कि अपनी सही मानवीय क्षमताओं के अनुसार. अंत में, अन्य मनुष्यों से, जहाँ विनिमय का संबंध परस्पर आवश्यकता को प्रतिस्थापित कर देता है. इन प्रवर्गों का एक दूसरे में गढ़मढ़ होना हमें आश्चर्यचकित नहीं करता क्योंकि इन रचनाओं में हम मार्क्स  की बेमिसाल खोज-प्रणाली संबंधी आकांक्षा से रूबरू होते हैं. आवश्यक रूप से, वे अर्थशास्त्र में प्रवर्गों के हेगेलियन निगमन को लागू करने का प्रयत्न करते हैं. उनकी कोशिश इस तथ्य को प्रदर्शित करने की होती है कि बुर्जुआ अर्थशास्त्र के सभी प्रवर्ग – मजदूरी, लगान, विनिमय,मुनाफा इत्यादि अंतिम रूप में,अलगाव की अवधारणा के विश्लेषण से ही निकलते हैं. परिणामस्वरूप श्रम के अलगाव का प्रत्येक प्रवर्ग अपने पूर्वक प्रवर्ग से ही निगमन करता है. यदपि  मार्क्स श्रम के अलगाव से पैदा हुए इन प्रवर्गों के निगमन के सिवा और अधिक कुछ नहीं कहते. यह बिलकुल संभव है कि अपने लेखन कार्य की क्रिया के दौरान मार्क्स ने अर्थशास्त्र संबंधी मसलों से निपटने के लिए एक अलग तरीके-प्रणाली की जरूरत को महसूस किया हो. तथापि, हमें श्रम के अलगाव के स्वभाव संबंधी एक बेमिसाल पठन सामग्री प्राप्त होती है. अलगाव से मुक्ति का विचार नकारात्मक से निकालना पड़ता है.  अंत में जेम्स मिल पर पठन सामग्री की सहायता से, जिसमें अलगाव से मुक्त श्रम का, संक्षिप्त में उन शर्तों पर, वर्णन किया गया है कि अपनी शक्तियों के सत्यापन के रूप में उत्पादन से उत्पादक की तुरंत तुष्टि के साथ-साथ उत्पादन अन्य लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है जिससे, दोनों पार्टियों के लिए हमारी परस्पर निर्भरता के रूप में, मानवीय सार का सत्यापन हो जाता है. मानव जाति के सार के दोनों पहलू स्पष्ट हो जाते हैं : हमारी निजी मानव शक्तियां और समुदाय के रूप में एक-दूसरे पर निर्भरता.

इसे समझना महत्वपूर्ण होगा कि मार्क्स के लिए अलगाव कोई मनोगत भावना नहीं है. विमुख व्यक्ति विमुख शक्तियों के हाथों की कठपुतली है – यदपि, ये विमुख शक्तियां भी मानव के कर्मों का ही उत्पाद हैं. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में हम ऐसे फैसले लेते हैं जिनके अनचाहे परिणाम निकलते हैं और जो बाद में चलकर, मिश्रित रूप से, बड़े पैमाने की सामाजिक शक्तियां बन जाती हैं जिनके पूर्ण अधोषित परिणाम होते हैं. मार्क्स की नज़र में, पूंजीवाद की संस्थाएं – जो मानव व्यवहार का ही परिणाम हैं -हमारे भविष्य संबंधी व्यवहार को आकार देने के लिए वापस आ जाती हैं और इस प्रकार निर्धारक का कार्य करती हैं. उदाहरण के लिए, जब तक पूंजीपति की इच्छा व्यवसाय में बने रहने की होती है, उसके लिए जरूरी होता है कि वह कानूनी सीमा तक अपने मजदूरों का शोषण करे. बेशक वह अपराध बोध से भी लबरेज़ हो जाये लेकिन पूंजीपति को निर्दयी शोषक के रूप में जीना पड़ता है. इस प्रकार मजदूर को उपलब्ध कार्य में से सबसे बढ़िया का चुनाव करना होता है, इसके अलावा कोई अन्य तर्कसंगत विकल्प नहीं होता. परंतू इस क्रिया को दुहराते समय हम उसी संरचना को सुदृढ़ करते जाते हैं जो हमारा दमन करती है. इस स्थिति से पार जाने की इच्छा और हमारे भाग्य पर सामूहिक नियन्त्रण प्राप्त कर लेना – अभ्यास में चाहे इसका कुछ भी अर्थ हो, मार्क्स के सामाजिक विश्लेषण में निहित आवश्यक तत्वों में से एक है.

‘Theses on Feuerbach’

मार्क्स की सबसे प्रसिद्ध और विस्मरणीय उक्तियों में से एक, “दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है. “, इसी पुस्तक से ली गयी है.  इस पुस्तक में सम्मलित  ग्यारह सिद्धांतों में से अधिकतर का ऊपर पहले ही वर्णन किया जा चुका है. (उदाहरण के लिए धर्म संबंधी सिद्धांतो ४, ६ और ७ और क्रांति संबंधी सिद्धांत ३ का ) इसलिए हम सिद्धांत १ तक सीमित रहेंगे जो की स्पष्ट रूप से दार्शनिक सिद्धांत है.

अपने पहले सिद्धांत में मार्क्स ‘अब तक के आर्विभूत अस्तित्व’ के भौतिकवाद और विचारवाद के प्रति अपनी आपत्ति दर्ज करवाते हैं. विश्व की भौतिक वास्तविकता को समझने में मदद के लिए भौतिकवाद की सराहना की जाती  है लेकिन उस भौतिक संसार को जिसे मानव अपनी सक्रीय भूमिका द्वारा  निर्मित करते हैं और जिसमें हम विचरण करते हैं, की अवहेलना के लिए आलोचना की जाती है. विचारवाद, जहाँ तक हेगेल ने इसे विकसित किया, मनुष्य की सक्रीय मनोगत दखलंदाजी की निशानदेही करता है. परंतू यह इसे केवल चिंतन और विचार तक सीमित कर देता है : विश्व का निर्माण उन प्रवर्गों द्वारा संपन्न होता है जो हम इस पर लागू करते हैं. मार्क्स दोनों परम्पराओं को संयुक्त करके एक दृष्टिकोण को प्रस्तावित करते हैं जिसमें मानव जाति ही, उस विश्व का जिसमें वह जीती  है, का निर्माण या कम से कम रूपांतरण करती है. परंतू यह रूपांतरण चिंतन में घटित न होकर वास्तविक भौतिक क्रिया द्वारा आकार लेता है. परम अवधारानाओं के दखल से नहीं बल्कि मानव के कस्सी-फाबड़े पर खून-पसीना बहाने से. इतिहास का यह भौतिकवादी वर्जन पार निकल जाता है और वर्तमान की सभी दार्शनिक अवधारानाओं को अस्वीकृत कर देता है. आगे चलकर, यही मार्क्स के इतिहास के सिद्धांत का आधार बनता है. जैसाकि मार्क्स १८४४ में लिखित पांडुलिपि में लिखते हैं, ” उद्योग में हम मानव का प्रकृति से वास्तविक रूप से ऐतिहासिक संबंध देखते हैं. यह चिंतन दर्शन के इतिहास पर मनन के साथ-साथ उनके जर्नलिस्ट के रूप में सामाजिक और आर्थिक यथार्थ के अनुभव से पैदा होता है जो मार्क्स द्वारा भविष्य में किये जानेवाले कार्यों के एजेंडा को निर्धारित कर देता है.

शेष अगली कड़ी में : मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय – दूसरी किश्त

आभार सहित http://plato.stanford.edu/entries/marx/ से हिंदी में अनुवादित

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श्रम और पूंजी की टक्कर – एक ऐसा ‘वैषम्य’ जिसका निपटारा बल प्रयोग द्वारा ही होता है

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श्री दिनेशराय द्विवेदी जी द्वारा लिखित आलेख ‘उद्यम भी श्रम ही है‘ और श्री ज्ञानदत्त जी पाण्डेय द्वारा लिखित आलेख  ‘उद्यम और श्रम’ की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में यह ज़रूरी हो गया कि पाठको को पूंजी और श्रम के उस बुनियादी ‘वैषम्य’ जो इन दोनों के बीच है – इस ‘वैषम्य’ का निपटारा किसी तीसरे हम जैसे पाठक या जज की दखलान्दाजी से सर्वदा मुक्त है, इस बिंदु को समझना होगा और अपने मनोगत विचारों से मुक्ति पानी होगी.

श्रम-शक्ति अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती  है  लेकिन अन्य जिंसो से इसलिए अलग है कि इसे मनुष्य के शरीर से अलग नहीं किया जा सकता और दूसरी जिंसों के विपरीत यह अकेली ऐसी जिन्स है जो  बेशी मूल्य या अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष (surplus value) पैदा करती है.

लेकिन दूसरी जिंसों की तरह ही इसका भी बाज़ार में विनिमय होता है. दूसरी जिंसों की तरह इसका मूल्य भी इसके पुनरुत्थान पर खर्च – श्रम शक्ति के बराबर होता है. लेकिन एक बार पूंजीपति द्वारा इसे खरीदने पर उसे यह अधिकार मिल जाता है कि वह इसका ‘काम के दिन’ में मूल्य पैदा करने के लिए उपयोग कर सके .

‘काम के दिन’ के दौरान मजदूर द्वारा किया गया वह श्रम जो उसके जिन्दा  रहने और उसकी श्रमशक्ति के पुनरुत्पादन के लिए ज़रूरी होता है, ज़रूरी श्रम कहलाता है जबकि इसके अतिरिक्त समय के लिए किया गया श्रम – यही, केवल यही वह श्रम होता है जो अतिरिक्त मूल्य, या बेशी मूल्य, या अधिशेष (surplus value) जिसे लूटने वाला पूंजीपति वर्ग अपनी बहियों में “शुभ लाभ” के नाम से दर्ज करता है, अतिरिक्त श्रम कहलाता है.

लेकिन प्रश्न उठता है कि ‘काम के दिन’ की लम्बाई की क्या परिभाषा या ‘परिमाण’ हो ? पूंजीपति इसे ज्यादा से ज्यादा लम्बा करना चाहेगा जबकि श्रमिक इसे छोटा !

मार्क्स की ‘पूंजी’ के प्रथम खंड के ‘काम के दिन’ नामक अध्याय से यह उद्धरण जिसमें एक मजदूर पूंजीपति को संबोधित  है, काबिले-गौर है ;

मैंने जो पण्य (जिंस)   तुम्हारे हाथ बेचा है, वह दूसरे पण्यों की भीड़ से इस बात में भिन्न है कि उसका उपयोग मूल्य का सृजन करता है, और वह मूल्य उसके अपने मूल्य से अधिक होता है. इसलिए तो तुमने उसे खरीदा है. तुम्हारी दृष्टि में जो पूँजी का स्वयंस्फूर्त विस्तार है, वह मेरी दृष्टि में श्रम शक्ति का अतिरिक्त उपभोग है. मंडी में तुम और मैं केवल एक ही नियम मानते है, और वह है पण्यों का विनिमय का नियम. और पण्यों के उपभोग पर बेचने वाले का, जो पण्य को हस्तांतरित कर चुका है, अधिकार नहीं होता; पण्य के उपभोग पर उसे खरीदने वाले का अधिकार होता है, जिसने पण्य को हासिल कर लिया है. इसलिए मेरी दैनिक श्रमशक्ति के उपभोग पर तुम्हारा अधिकार है. लेकिन उसका जो दाम तुम हर रोज देते हो, वह इसके लिए काफी होना चाहिए कि मैं अपनी श्रमशक्ति का रोजाना पुनरुत्पादन कर सकूँ और उसे फिर से बेच सकूँ. बढती हुई आयु, इत्यादी के कारण शक्ति का जो स्वाभाविक ह्रास होता है, उसको छोड़कर मेरे लिए यह संभव होना चाहिए कि मैं हर नयी सुबह को पहले जैसे सामान्य बल, स्वास्थ्य तथा ताज़गी के साथ काम कर सकूँ. तुम मुझे हर घडी “मितव्ययिता” और “परिवर्जन” का उपदेश सुनाते रहते हो. अच्छी बात है ! अब मैं भी विवेक और “मितव्ययिता” से काम लूँगा और अपनी एकमात्र संपत्ति – यानि अपनी श्रम-शक्ति – के किसी भी प्रकार के मूर्खतापूर्ण अपव्यय का परिवर्जन करूंगा. मैं हर रोज अब केवल उतनी ही श्रमशक्ति का उपयोग करूंगा, केवल उतनी ही श्रमशक्ति से काम करूंगा, केवल उतनी ही श्रमशक्ति को क्रियाशील बनाउंगा, जितनी उसकी सामान्य अवधि तथा स्वस्थ विकास के अनुरूप होगी. काम के दिन का मनमाना विस्तार करके, मुमकिन है,  तुम एक ही दिन में इतनी श्रमशक्ति इस्तेमाल कर डालो, जिसे मैं तीन दिन में भी पुन: प्राप्त न कर सकूँ. श्रम के रूप में तुम्हारा जितना लाभ होगा, श्रम के सारतत्त्व के रूप में उतना ही मेरा नुकसान हो जायेगा. मेरी श्रमशक्ति का उपयोग करना एक बात है, और उसे लूटकर चौपट कर देना बिलकुल दूसरी बात है. यदि एक औसत मजदूर (उचित मात्रा में काम करते हुए) औसतन तीस वर्ष तक जिंदा रह सकता है, तो मेरी श्रमशक्ति का वह मूल्य, जो तुम मुझे रोज देते हो, उसके कुल मूल्य का 1/365*30 या 1/10,950 वां भाग होता है. किन्तु यदि तुम मेरी श्रमशक्ति को तीस के बजाए दस वर्षों में ही खर्च  कर डालते हो तो तुम रोजाना मुझको मेरी श्रमशक्ति के कुल मूल्य के 1/3,650 के बजाए उसका 1/10,950 , यानि उसके दैनिक मूल्य का केवल 1/3 ही देते हो. इस तरह तुम मेरे पण्य के मूल्य का 2/3 भाग प्रतिदिन लूट लेते हो. तुम मुझे दाम दोगे एक दिन की श्रमशक्ति के, लेकिन इस्तेमाल करोगे तीन दिन की श्रमशक्ति. यह हम लोगों के करार और विनिमय के नियम के खिलाफ है. इसलिए मैं मांग करता हूँ कि काम का दिन सामान्य लम्बाई का हो, (मजूदूर के लिए सामान्य लम्बाई का अर्थ उतना ही है जितना उसकी श्रम शक्ति के पुनरुत्थान के लिए ज़रूरी है -अधिशेष के लिए एक पल भी अतिरिक्त नहीं ) और इस मांग को मनमाने के लिए मैं तुम्हारे हृदय को द्रवित नहीं करना चाहता, क्योंकि रूपए-पैसे के मामले में भावनाओं का कोई स्थान नहीं होता. मुमकिन है कि तुम एक आदर्श नागरिक हो, संभव है कि तुम पशु-निर्दयता- निवारण समिति के सदस्य भी हो और ऊपर से तुम्हारा साधुपन सारी दुनिया में विख्यात हो. लेकिन मेरे सामने खड़े हुए तुम जिस चीज का प्रतिनिधित्व करते है, उसकी छाती में हृदय का प्रभाव है.  वहां जो कुछ धड़कता सा लगता है, वह मेरे ही दिल की आवाज है. मैं सामान्य दीर्घता के काम के दिन की इसलिए मांग करता हूँ कि दूसरे हर विक्रेता की तरह मैं भी अपने पण्य का पूरा-पूरा मूल्य चाहता हूँ.

इस तरह हम देखते हैं कि कुछ बहुत ही लोचदार सीमाओं के अलावा पण्यों के विनिमय का स्वरूप खुद काम के दिन पर, या बेशी श्रम पर, कोई प्रतिबन्ध नहीं लगता. पूंजीपति जब काम के दिन को ज्यादा से ज्यादा खींचना चाहता है, और मुमकिन है, तो एक दिन के दो दिन बनाने की कोशिश करता है, तब वह खरीददार के रूप में अपने अधिकार का उपयोग करता है. दूसरी तरफ, उसके हाथ बेचा जाने वाला पण्य इस अजीब तरह का है कि उसका खरीददार एक सीमा से अधिक उपयोग नहीं कर सकता, और जब मजदूर काम के दिन को घटाकर एक निश्चित एवं सामान्य अवधि का दिन कर देना चाहता है, तब वह भी बेचने वाले के रूप में अपने अधिकार का ही प्रयोग करता है. इसलिए यहाँ असल में अधिकारों का विरोध सामने आता है, एक अधिकार दूसरे अधिकार से टकराता है, और दोनों अधिकार ऐसे हैं, जिन पर विनिमय की मुहर लगी हुई है. जब सामान अधिकारों की टक्कर होती है, तब बल प्रयोग द्वारा ही निर्णय होता है. यही कारण है कि पूंजीवादी उत्पादन के इतिहास में काम का दिन कितना लम्बा हो, इस प्रश्न का निर्णय एक संघर्ष के द्वारा होता है, जो संघर्ष सामूहिक पूँजी अर्थात पूंजीपतियों के वर्ग और सामूहिक श्रम अर्थात मजदूर वर्ग के बीच चलता है.

मजदूरों के आर्थिक हितों की रक्षा के नाम पर तिरंगा, भगवा और लाल – सभी अपनी-अपनी राजनितिक रोटियां सेकते रहें हैं. इसे ही ‘अर्थवाद’ कहा जाता है जो मार्क्सवाद का ‘संशोधनवाद‘ है. सर्वहारा वर्ग की असली लडाई राजनीतिक होने के कारण ‘राजनीतिक सत्ता का प्रश्न‘ ही उसके लिए मुख्य प्रश्न है जिसे, एक ट्रेड यूनियन के नेताओं द्वारा दूसरी ट्रेड यूनियन के नेताओं पर लाँछ्नात्मक आरोप-प्रति आरोप लगाते हुए,  अर्थवाद के ठंडे मानी में डुबो दिया जाता है.

उपरोक्त चर्चा के सन्दर्भ में कुछ लोग सर्वहारा वर्ग के पक्ष में खड़े होंगे तो कुछ पूंजीपति वर्ग के. दोनों स्वागतयोग्य हैं क्योंकि दोनों ढोंगी नहीं हैं लेकिन कोई ऐसा भी है जो निरपेक्ष होने का ढोंग करता है. इस प्रकार के ‘ गैर- राजनितिक बुद्धिजीवी’ के लिए हमने एक टिपण्णी के प्रत्युत्तर में लिखा था;

कुछ लोग अपनी जीविका के लिए, अपनी श्रम शक्ति बेचते हैं, चाहे वह शारीरिक श्रम हो या मानसिक. दूसरे लोग, पूँजी के मालिक होने की हैसियत से श्रम शक्ति खरीदते हैं और इसी प्रक्रिया द्बारा अपनी पूँजी में वृद्धि करते हैं. इसी आधार पर, मोटे तौर पर समाज में दो तरह के लोग हैं, एक पूँजी के मालिक और, दूसरे श्रम शक्ति बेचकर जिन्दा रहने वाले मजदूर वर्ग के लोग. अपनी वर्गीय स्थिति की बदौलत मजदूर वर्ग, अपनी श्रम शक्ति बेचने की मजबूरी के कारण पूंजीपतियों की बेरहम लूट का शिकार होते हैं.

समाज के अन्य तबके व वर्ग, समाज के इन दो मुख्य वर्गों के बीच इन वर्गों के सहयोगी या विरोधी की भूमिका अदा करते हैं. मानवीय इतिहास की एक विशेष मंजिल पर मानवीय श्रम का शारीरिक और मानसिक श्रम में विभाजन हो गया. शारीरिक श्रम या मानसिक श्रम विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों की पैदावार है न कि किसी व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह की जन्मजात विशेषता. समाज के विकास की विकसित मंजिल में यह विभाजन भी आलोप हो जाएगा.

एक गैर राजनितिक बुद्धीजीवी, इस सच्चाई से अनजान ख़ुद ही अपने आप को महान और किस्मत का धनी होने के भ्रम में, अपने ही सीमित खोल में बनाये काल्पनिक संसार में संतुष्ट है. जब कभी, वह अपने इस काल्पनिक संसार के भ्रम से मुक्त होकर, खोल के बाहर झांकेगा, तो आवश्य ही इस संसार की क्रूर हकीकतें उसे निष्पक्ष नहीं रहने देंगीं. अगर वह ईमानदार है तो वह सच्चाई, न्याय और गौरव के पक्ष में खड़ा होगा. परन्तु सच्चाई को समझकर भी, यदि वह निष्पक्ष और गैर राजनितिक होने का नाटक करता है तो वह दम्भी है, सच का सामना करने से घबराता है. भविष्य का आजाद मनुष्य, मानवीय इतिहास के इस बेरहम और मुश्किल दौर में, उस द्बारा दिखाई गई कायरता पर अवश्य सवाल उठाएगा.

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मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दावली – कुछ विरासत से और कुछ …

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कुछ  मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दों  को परिभाषित करने की एक कोशिश लेकिन बहुत से मतभेद हो सकते हैं. आओ,  सब मिलकर मार्क्सवादी पारिभाषिक शब्दों को परिभाषित करें.

वैज्ञानिक समाजवाद : ‘यूटोपिया’ और आदर्श समाजवाद के विपरीत मार्क्स एंगेल्ज़ द्वारा परिभाषित समाजवाद- पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच की स्टेज. एक संक्रमण काल. पूंजीवाद  से इस लिए अलग कि सत्ता पर कब्जा सर्वहारा वर्ग का, इसलिए सर्वहारा का जनतंत्र या सर्वहारा का बुर्जुआ पर अधिनायकवाद वैसे ही जैसे बुर्जुआ वर्ग के अधिनायकवाद के चलते  पूंजीवादी बुर्जुआ जनतंत्र. साम्यवाद से दोनों भिन्न क्योंकि दोनों में वर्गों का सतत संघर्ष जारी. इतिहास की कुटील और टेडी-मेढी चाल के चलते ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ का ऐतिहासिक रूप से एक बार हारना – एक कड़वी सच्चाई. कुछ विद्वानों और विशेषकर बुर्जुआ चाटुकार बुद्धिजीवियों द्वारा साम्यवाद को बदनाम करने के लिए इस “वैज्ञानिक समाजवाद ” को ही साम्यवाद का नाम देना.

चीन में भी,नकली समाजवाद का चरित्र आज पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। चीन में समाजवाद की सारी उपलब्धियाँ समाप्त हो चुकी है। कम्यूनों का विघटन हो चुका है। खेती और उद्योग में समाजवाद के राजकीय पूँजीवाद में रूपान्तरण के बाद अब निजीकरण और उदारीकरण की मुहिम बेलगाम जारी है। अब यह केवल समय की बात है कि समाजवाद का चोंगा और नकली लाल झण्डा वहाँ कब धूल में फेंक दिया जायेगा। माकपा और भाकपा अपने असली चरित्र को ढँकने के लिए आज चीन के इसी “बाज़ार समाजवाद” के गुण गाती हैं।

संशोधनवाद : संशोधनवाद उस सिद्धांत का प्रतिनिधि जो मार्क्सवादी सिद्धांतों को तोड़-मरोड़ कर विकृत करता है ताकि यह (मार्क्सवाद) बुर्जुआ वर्ग के हितों के लिए नुकसान रहित बन जाये. प्राय: यह मार्क्सवाद को सुधारवाद बना देता है. संशोधनवाद का सम्बन्ध स्तालिन की मृत्यु के बाद ख्रुश्चेव और माओ त्से तुङ के बाद देङपंथी टोली से भी लिया जाता है जिनके नेतृत्व में बुर्जुआ वर्ग सर्वहारा वर्ग पर पुन: अधिनायकवाद स्थापित कर सका.

वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद : लेनिन की एक उक्ति है कि किसी भी दल में संशोधनवाद के कर्मों की सजा  कतारें वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद में चुकाती हैं. भारत में अगर नकसलबाडी जैसा वामपंथी कम्युनिज्म या दुस्साहसवाद उभरा तो निश्चित रूप से इसके दूसरे सिरे (ध्रुव) पर संशोधनवाद था. वामपंथी कम्युनिस्टों में अधिकतर मिडल क्लास के लोग आते हैं – पूँजी के सताए ये लोग क्रांति के एजेंडा पर तो तुंरत पहुँच जाते हैं लेकिन अवाम को चेतन करने की लंबी और मुश्किल रणनीति या प्रोग्राम बनाने से घबराते हैं.

विरोधों की एकता : ब्रहामंड में विद्यमान पदार्थ, व्यापार (phinomenon), व्यक्ति, समाज, अवधारणा आदि को समझने के लिए दो मुख्य विरोधी ध्रुवों की निशानदेही. किसी भी व्यापार के अस्तित्व या गतिशीलता (dynamism) की ज़रूरी शर्त. अन्य गौण विसंगतियां या ध्रुवों द्वारा किसी एक के साथ अभेद होना.

उदाहरण के लिए पूंजीवाद विवाह संस्था जिसमें विवाह एक अवधारणा है जिसका एक सिरा दो व्यक्तियों के मिलन का तो दूसरा दो बराबर की पूंजियों के मिलन का है. देखना यह है कि इन दोनों सिरों से गतिमान विवाहिक सम्बन्धों की विसंगति (contradiction) किसके पक्ष में हल होती है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा सिरा प्रधान है और कौनसा गौण. चूंकि पूंजीवाद में दो पूंजियों के मिलन का सिरा प्रधान होता है इसलिए इसे दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो पूंजियों का मिलन ही कहा जाता है जबकि गौण सिरे पर दो व्यक्ति भी मिलते हैं- प्यार करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं – ये बच्चे पूंजी के सच्चे वारिस होते हैं. अगर ऐसा नहीं होता है तो .. तो.. बच्चों को बागी करार दिया जाता है.

गोर्की ने कहा था कि इस संसार को परिभाषित करना बड़ा ही आसान है क्योंकि लोग दो कामों में लगे हुए हैं :

१. धन के ढेर लगाना और

२. अपने हिस्से के श्रम को दूसरों से करवाना.

यही पागलपन इस दुनिया की सच्चाई है पर इसे ही आदर्श माना जाता है.

जुन्कर या प्रशियाई : प्रशिया -जर्मनी के अधीन एक राज्य, यूरोप के अन्य देशों के विपरीत, बिस्मार्क की अगुआई में यहाँ, पूंजीवाद ने सामंती व्यवस्था को  क्रांतिकारी ढंग से तबाह न करके, बुर्जुआ जनतंत्र के विकास का एक लम्बा और पीडादायक तरीका अपनाया. भारत की आज़ादी की क्रांतिकारियों की अगुआई में जारी लहर कांग्रेस की अगुआई में जारी लहर से हार गयी. भगत सिंह का यह शक कि कांग्रेस अंग्रेजों से समझौता कर लेगी, का सच होना भी एक कड़वी सच्चाई है, आज़ादी के बाद क्रांतिकारी दलों की दयनीय स्थिति और भारत के बुर्जुआ राज्य का विकास जुन्कर या प्रशियाई विकास से मिलता जुलता,  या सामंती समाज की कोशिकायों को तबाह न करते हुए उन्हीं कोशिकायों में बुर्जुआ समाज की कोशिकायों की  घुसपैठ – यही कारण है कि भारत इस इक्कीसवीं सदी में भी एक विकसित बुर्जुआ राज्य होते हुए भी सामंती बुराईयों-कद्रों-कीमतों को, व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं बल्कि संस्थागत तौर पर भी संभाले हुए है. देखे : 1857, आरंभिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता

आधार : सभ्य समाज में उत्पादक शक्तियों के विकास की स्टेज, उत्पादन के साधनों पर किस वर्ग का कब्ज़ा, मनुष्यों के आपसी उत्पादन सम्बन्ध या आर्थिक सम्बन्ध. “राजनितिक अर्थशास्त्र जिंसों के आपसी संबंधों का अध्ययन न होकर मनुष्यों के आपसी संबंधों का विज्ञान है”- एंगेल्स

अधिरचना : आधार तय करता है कि अधिरचना कैसी हो. न्यायपालिका, विधानपालिका, कार्यपालिका, धर्म, नैतिकता, दर्शन और स्वयं राज्य रुपी संस्था अधिरचना के ही अंग है.

विचारवादियों के विपरीत मार्क्सवादियों के अनुसार इनका विकास ऐतिहासिक है जबकि विचारवादियों के अनुसार अधिरचना के ये अंग सदैव विद्यमान रहें हैं. वर्ग-संघर्ष के इतिहास अनुसार जब आधार के दोनों विरोधी ध्रुवों से गतिमान इस आधार की विसंगति किसी एक के पक्ष में हल होना छोड़ देती है तो उसी वक्त अधिरचना में तनाव आ जाता जिसे आधार और अधिरचना का द्वंद इन्कलाब द्वारा सुलझा लेता है. अगर ऐसा नहीं होता तो भी धीरे-धीरे, पीडादायक तरीके से विसंगतियाँ हल तो हो ही जाती हैं. इस पीडा से बचने के लिए क्रांतिकारी चेतना की शक्ति का प्रयोग करते हैं ताकि इन्कलाब हो. चेतना की भूमिका उसी प्रकार जैसे किसी संवेदनशील पदार्थ पर बाहर से इलेक्ट्रोन की बमबारी करके पदार्थ की प्रकृति को बदला जा सकता है या फिर जैसे एक बीज जो खोल में सुरक्षित है, उसे भिगोकर, बीजकर उसके विरोधों की एकता को भंग किया जा सकता है, बीज का निषेध ही पौधा है, पौधे का निषेध, फूल….फल…और फिर बीज, लेकिन बीज वही बीज नहीं जो पहले था, यह ज्यादा विकसित है.

आधार और अधिरचना पर मार्क्स द्वारा लिखित ‘पूंजी’ पृ. 100, नोट- 32, देखें ;

“अर्थशास्त्रियों का तर्क-वितर्क अजीब ढंग का होता है. उनके लिए केवल दो प्रकार की ही संस्थाएं हैं : बनावटी संस्थाएं और प्राकृतिक संस्थाएं. सामंती संस्थाएं बनावटी संस्थाएं हैं, बुर्जुआ सस्थाएं प्राकृतिक संस्थाएं हैं. इस बात में वे धर्मशास्त्रियों से मिलते हैं. वे लोग भी दो प्रकार के धर्म मानते हैं. उनके अपने धर्म छोड़कर उनकी दृष्टि में बाकी हर धर्म मनुष्यों की मनगढ़ंत है, जब के अपने धर्म के बारे में वे समझते  हैं की वह ईश्वर से उद्भूत हुआ है.-(Karl Marx, Misere de la Philosophie, Response a la philosophie de la misere par M. Proudhon, 1847, p. 113) मि. बस्तिया के हाल पर सचमुच हंसी आती है. उनका ख्याल है की प्राचीन काल में यूनानी और रोमन लोग केवल  लूट-मार के सहारे ही जीवन बसर करते थे. लेकिन जब लोग सदियों तक लूट-मार करते हैं , तो कोई ऐसी चीज हमेशा होनी चाहिए , जिसे वे लूट सकें; लूटमार की चीजों का लगातार पुनरुत्पादन होते रहना चाहिए. परिणाम स्वरूप इससे ऐसा लगेगा कि यूनानियों और रोमनों के यहाँ भी उत्पादन की क्रिया थी. चुनांचे उनके यहाँ कोई अर्थव्यवस्था भी रही होगी, और जिस प्रकार बुर्जुआ अर्थव्यवस्था हमारी आधुनिक दुनिया का भौतिक आधार है, उसी प्रकार वह अर्थव्यवस्था यूनानियों और रोमनों की दुनिया का भौतिक आधार रही होगी. या शायद बस्तिया के कथन का अर्थ यह है कि दास प्रथा पर आधारित उत्पादन विधि लूटमार की प्रणाली पर आधारित होती है ? यदि यह बात है, तो बस्तिया खतरनाक ज़मीन पर पांव रख रहे हैं. यदि अरस्तू जैसा महान विचारक दासों के श्रम को समझने में गलती कर गया, तो बस्तिया जैसा बौना अर्थशास्त्री मजदूरी लेकर काम करने वाले मजदूरों के श्रम को कैसे सही तौर पर समझ सकता है ? मैं इस अवसर से लाभ उठाकर अमेरिका में प्रकाशित एक जर्मन पत्र के उस एतराज का संक्षेप में जवाब देना चाहता हूँ, जो उसने मेरी रचना, Zur Kritik der Politschen Oekonomie, 1859 पर किया है. मेरा मत है कि प्रत्येक विशिष्ट उत्पादन-प्रणाली  और उसके अनुरूप सामाजिक सम्बन्ध, या संक्षेप में कहें, तो समाज का आर्थिक ढांचा ही वह वास्तविक आधार होता है, जिस पर कानूनी और राजनीतिक उपरी ढांचा खडा किया जा सकता है और जिसके अनुरूप चिंतन के भी कुछ निश्चित सामाजिक रूप होते हैं; मेरा मत है कि उत्पादन की प्रणाली आमतौर पर सामाजिक, राजनितिक एवं बौद्धिक जीवन के स्वरूप को निर्धारित करती है. इस पत्र की राय में, मेरा यह मत हमारे अपने ज़माने के लिए तो बहुत सही है, क्योंकि उसमें भौतिक स्वार्थों का बोलबाला है, लेकिन वह मध्य युग के लिए सही नहीं है, जिसमें कैथोलिक धर्म का बोलबाला था, और वह एन्थेंस और रोम के लिए भी सही नहीं है, जहाँ राजनीति का ही डंका बजता था. अब सबसे पहले तो किसी का यह सोचना सचमुच बड़ा अजीब लगता है कि मध्य युग और प्राचीन संसार के बारे में ये पिटी-पिटाई बातें किसी दूसरे को मालूम नहीं है. बहरहाल इतनी बात तो स्पष्ट है कि मध्य युग के लोग केवल कैथोलिक धर्म के सहारे या प्राचीन संसार के लोग केवल राजनीति के सहारे जिंदा नहीं रह सकते थे. इसके विपरीत, उनके जीविका कमाने के ढंग से ही यह बात साफ़ हो जाती है कि क्यों एक काल में राजनीति और दूसरे काल में कैथोलिक धर्म की मुख्य भूमिका थी. जहाँ तक बाकी बातों का सम्बन्ध है, तो, उदाहरण के लिए, रोमन गणतंत्र के इतिहास की मामूली जानकारी भी यह जानने के लिए काफी है कि रोमन गणतंत्र का गुप्त इतिहास वास्तव में उसकी भूसंपत्ति का इतिहास है. दूसरी और, डॉन क्विकज़ोट बहुत पहले अपनी इस गलत समझ का खामियाजा अदा कर चूका है कि मध्य युग के सूरमा-सरदारों जैसा आचरण समाज के सभी आर्थिक रूपों से मेल खा सकता है.

ट्रेड यूनियन आन्दोलन का उद्भव और विकास

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25.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

मजदूरों के ट्रेड यूनियन आन्दोलन के विकास की दिशा की सैद्धांतिक व्याख्या करने का प्रयास एंगेल्स ने किया था. उनके विचार अपने समकालीन अर्थशास्त्रियों और समाजवादियों से भिन्न थे और उन्होंने 1845 में ही यह सिद्ध कर दिया था की ट्रेड यूनियनें मज़दूरों और उद्योगपतियों के बीच संघर्ष की अनिवार्य परिणति हैं और मज़दूर वर्ग के सभी संगठनों का आधार ट्रेड यूनियन होगा. अपने आरंभिक दौर में, हड़ताल अवधि में जन्मी मज़दूरों की एकजुटता अल्पजीवी होती थी. चूंकि सभी किस्म के संगठन कानून द्वारा प्रतिबंधित थे, चूंकि मज़दूर वर्ग की समस्त संस्थाएं और संघ कानून का उल्लंघन माने जाते थे (जिसे महान फ्रांसीसी क्रांति की घटनाओं के बाद विशेष रूप से सख्त बना  दिया गया था जब 1799-1800 में विशेष विधेयक लागू कर दिया गया), इसलिए मज़दूरों ने गुप्त सोसायटियां बनाना आरंभ कर दिया जिनकी संख्या और सक्रियता बढ़ती चली गयी. मज़दूरों ने प्रचंड संघर्ष किया जिसमें रैडिकल बुर्जुआ ने मज़दूरों की मदद की. इस संघर्ष ने 1816, 1817 एवं 1819 के दौरान अर्द्ध-क्रांतिकारी रूप धारण कर लिया था. इस संघर्ष ने प्रतिक्रियावादी सिडमाउथ मंत्रिमंडल को बदनाम छह कानून पारित करने के लिए मजबूर कर दिया था. आखिरकार इस संघर्ष के बाद 1824 में एक अधिनियम पारित किया गया जिसने उन सभी कानूनों को मंसूख कर दिया जो किसी भी किस्म के संगठन को प्रतिबंधित करते थे. यद्यपि संगठन बनाने का अधिकार प्रदान करने वाले इस कानून को आंशिक रूप से अगले ही साल रद्द कर दिया गया था तथापि मज़दूर अनिरस्त विशेषाधिकारों का धीरे-धीरे उपयोग करने लगे.
“उद्योग की प्रत्येक शाखा में ट्रेड यूनियनें बन गयीं. बुर्जुआ के अत्याचार और अन्याय से मज़दूरों को बचाने का काम ये खुलकर करने लगीं. उनके उद्देश्य थे;

1. सामूहिक समझौते से मज़दूरी निर्धारित कराना,
2. यूनियन के सभी सदस्यों की ओर से सेवायोजकों से समझौता करना,
3. उद्यमी के लाभांश अनुसार मज़दूरी नियंत्रित करना,
4. यथासंभव मज़दूरी में वृद्धि करना और
5. कारखानों की प्रत्येक शाखा में मज़दूरी का समान स्तर कायम रखना.

इसलिए ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि प्राय: पूंजीपतियों से एक मानक मज़दूरी तय करने के प्रश्न पर वार्ता किया करते थे जो समस्त सेवायोजकों के लिए बाध्यकारी होती थी. यदि कोई सेवायोजक मानक दर से मज़दूरी अदा करने से मना कर देता था तो उसे होश में लाने के लिए हड़ताल की घोषणा कर दी जाती थी. इसके अलावा ये प्रशिक्षुओं की संख्या के सीमा निर्धारण द्वारा श्रम की मांग को बनाए रखने की कोशिश करते थे ताकि मज़दूरी के स्तर को कायम रखा जा सके. वे कारखाना मालिकों को नयी मशीनों को उपयोग में लाने की कोशिश करने से रोकने का प्रयास करते थे जिनके कारण मज़दूरी कम होती थी. इतना ही नहीं, ट्रेड यूनियनें काम से निकाल दिये गए सदस्यों को धन के रूप में, मदद भी दिया करती थीं. (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 215)

एंगेल्स इस तथ्य से भलीभांति परिचित थे कि ब्रिटिश मज़दूरों ने अपने जीवन काल में ही राष्ट्रीय स्तर की यूनियनें बनाना शुरू कर दिया था. “जब कभी सम्भव हुआ और स्थिति अनुकूल हुई, स्थानीय शिल्प संघों ने संयुक्त होकर महासंघ बनाया. निर्धारित अवधि में इन निकायों के अधिवेशन सम्पन्न किये जाते थे जिनके प्रतिनिधि इन यूनियनों द्वारा मनोनीत होते थे. इन यूनियनों ने न केवल शिल्प विशेष के सारे मज़दूरों को एक बड़े संघ में एकजुट करने का प्रयास किया बल्कि समय-समय पर (उदाहरण के लिए 1830 में) उन्होंने इंग्लैंड के सभी मज़दूरों को एक बड़ी ट्रेड यूनियन में ऐक्यबद्ध करने का प्रयास किया जिसके अन्तर्गत प्रत्येक शिल्प के मजदूर स्वतन्त्र रूप से संगठित होते थे.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 215-16)
इसी प्रकार एंगेल्स ट्रेड यूनियनों के संघर्ष के तरीकों का विवरण प्रस्तुत  करते हैं. सबसे पहले हड़ताल होती है, फिर भेदी मज़दूरों, हड़ताल तोड़ने वाले मज़दूरों का मुकाबला किया जाता है और गैर-युनियनवादियों को इस मार्ग पर चलाने के लिए दबाब डाला जाता है.

एंगेल्स यह स्वीकार करते थे कि मेहनतकश वर्ग के संगठन का एक आवश्यक घटक ट्रेड यूनियन है लेकिन वे पूंजीवादी समाज में इसके महत्त्व की सीमा को भी पूरे तौर पर समझते थे. “इन संघों का इतिहास विरल विजयों से अलंकृत पराजयों की लम्बी श्रृंखला की कहानी है. यह बताने की ज़रुरत नहीं है कि ट्रेड यूनियनवाद अपनी सारी ताकत लगाकर भी इस स्थिति में नहीं आ पाता कि उस आर्थिक नियम को बदल दे जिसके अर्न्तगत, उज़रतें श्रम बाज़ार में मांग और आपूर्ति से तय होती हैं.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 216-17)
यद्यपि हड़ताल करना निरर्थक प्रतीत होता है फिर भी यह बात एकदम साफ़ है कि यदि मेहनतकश उज़रत में कटौती का विरोध नहीं करें तो ऐसे विरोध के अभाव में सेवायोजकों के लालच की कोई सीमा नहीं होगी. “युनियने और उनके नाम से की गयी हड़ताल का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि इससे प्रथमत: मजदूरों के बीच प्रतिस्पर्द्धा का उन्मूलन होता है. यह उस पूर्वधारणा  पर आधारित है कि खुद मजदूरों के बीच प्रतिद्वंदिता, उनमें एकजुटता का आभाव, मजदूरों के एक समूह के हितों का दुसरे मज़दूरों के हितों से शत्रुतापूर्ण संबंधों पर बुर्जुआ का शासन स्थापित होता है.”(एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 218-19)

एंगेल्स हड़ताल की भर्त्सना करने वाले समाजवादियों और अर्थशास्त्रियों को याद दिलाते हैं कि इन कार्रवाईयों का शैक्षिक महत्त्व होता है. “हो सकता है कि हड़तालें झड़पों से ज्यादा कुछ न हों; कभी-कभी वे महत्त्वपूर्ण टकराव हो सकती हैं. वे निर्णायक भिदंतें नहीं होती हैं लेकिन इससे पूरी तौर से स्पष्ट हो जाता है कि सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच antim संघर्ष आसन्न है. मज़दूरों  के लिए हड़तालें सैनिक प्रशिक्षण विद्यालय का काम करती हैं. इस विद्यालय में सर्वहारा उस महान संघर्ष के लिए प्रशिक्षण पाटा है जोकि अपरिहार्य है. हड़ताल इस बात का ऐलान है कि मज़दूरों की प्रथक प्रशाखाएं समग्रता में मज़दूर आन्दोलन में निष्ठां रखती हैं…. युद्धकला की पाठशाला के रूप में, हड़तालों का कोई सनी नहीं है.” (एंगेल्स, द कंडीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 224)
प्रूधों (1809-1865) हड़तालों की भर्त्सना करते थे और उनका तर्क था कि वे “अवैधानिक” होती हैं. लेकिन मार्क्स ने एंगेल्स के निष्कर्षों को महत्त्व देते हुए तथा उन्हें और अधिक स्पष्ट करते हुए बताया कि एक वर्ग के रूप में सर्वहारा के विकास एवं ट्रेड यूनियन के विकास में निकट का सम्बन्ध है.

“जब कभी और जहाँ कहीं मजदूर अपनी ताकत को इकठ्ठा करने की कोशिश करते हैं तो इस एकता का सबसे पहला रूप एक गठबंधन होता है. बड़े पैमाने का उद्योग एक-दुसरे से अंजन लोगों के समूह को एक स्थान पर इकठ्ठा कर देता है. प्रतिस्पर्द्धा उन्हें एक-दुसरे से अलग करती हैं. उजरतोँ के स्तर को कायम रखना उनका साझा हित होता है जो उनके स्वामी के हितों के प्रतिकूल होता है. उज़रत में कटौती के किसी प्रयास का मुकाबला करने के लिए वे एक हो जाते हैं और एक ‘गठबंधन’ बना लेते हैं. इस गठबंधन के दो उद्देश्य होते हैं – पहला मजदूरों के बीच प्रतिस्पर्द्धा कम करना और दूसरा पूंजीपति से संघर्ष में मज़दूरों की सारी शक्ति को केन्द्रित कर देना. ऐसा मालूम हो सकता है कि पहला उद्देश्य उज़रतों के स्तर को कायम रखने के प्रयास से अधिक कुछ नहीं है. तो भी सूक्ष्मतर  निरीक्षण से यह बात समझ में आ जाती है कि जिस हद तक मज़दूरों की विभिन्न श्रेणियां समूह बनाने की ओर प्रवृत होती हैं. पूंजीपतियों की पूर्ण एकता के मद्देनज़र, मजदूरों की इन एकीकृत समूहों को कायम रखना, इसका गठन करने वाले मजदूरों के नज़रिए से उज़रत का स्तर बनाये रखने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण बन जाता है. इस बात की सत्यता ने अंग्रेज़ अर्थशास्त्रियों को बहुत आश्चर्यचकित कर दिया है जब वे यह देखते हैं कि मजदूर उन यूनियनों को धन उपलब्ध करने के लिए अपनी मजदूरी का बडा हिस्सा दे देते हैं जिनका गठन, इन अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, मजदूरों की उज़रत की सुरक्षा के लिए किया जाता है. इस संघर्ष के दौरान, वास्तविक गृहयुद्ध में आगामी संघर्ष के सभी तत्त्वों का एका स्थापित हो जाता है. इसके साथ गठबंधन ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं कि उनका चरित्र राजनीतिक हो जाता है.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ. 136)

पूंजीवाद के खिलाफ मेहनतकश वर्ग के प्रतिरोध के विभिन्न रूप

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23.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

पूंजीवादी समाज मेहनतकशों को जड़ बस्तुओं की सीमा तक नीचे गिरा देता है. मज़दूर मानवीय गरिमा के बोध को तभी तक बरक़रार रख सकता है जब तक वह अपनी इस स्थिति के विरुद्ध विरोध प्रकट करता रहता है, और बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध विद्रोह करता रहता है और बुर्जुआ सामाजिक व्यवस्था से घृणा करता रहता है. इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की दशा में एंगेल्स बताते हैं कि “आधुनिक अर्थों में उद्योगों का विकास अपनी प्रारंभिक मन्ज़िल से जब आगे बढा उसके तुंरत बाद बुर्जुआ के खिलाफ मजदूरों का विद्रोह शुरू हो गया था. इस विद्रोह का सबसे पुराना, सबसे अधिक भोंडा और सबसे कम प्रभावी रूप अपराधिक गति विधियों में अभिव्यक्त हुआ. मज़दूर गरीबी और अभाव में जीता है और दूसरों को बेहतर स्थितियों में ज़िन्दगी बसर करते हुए देखता है. उसे यह समझ में नहीं आता था कि वह क्यों कष्ट झेलता है जबकि वह धनी निकम्मे लोगों की अपेक्षा समाज के लिए ज्यादा काम करता हैं. संपत्ति के प्रति उसकी पारंपरिक श्रद्धा पर ज़रुरत हावी हो गयी – और वह चोरी करने लगा. जैसे-जैसे उद्योगों का विकास हुआ उसी अनुपात में अपराध में भी वृद्धि होने लगी. गिरफ्तारी के वार्षिक आंकडे, कपास की गांठों की खपत के वार्षिक आंकडों के समरूप पाए गए. मजदूरों को जल्दी ही यह समझ आ गया कि अपराध करने में कोई फायदा नहीं है. अपराधी एक व्यक्ति के रूप में अलग-अलग, समाज की प्रचलित व्यवस्था के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराता है तो समाज की समग्र शक्ति सक्रीय हो जाती है और अपनी जबरदस्त ताकत से उसे कुचल डालती है. चोरी करना विरोध दर्ज करने का सर्वाधिक अपरिष्कृत रूप है और इसी वजह से यह मज़दूर वर्ग के अभिमत की सामान्य अभिव्यक्ति कभी नहीं बन पाई, हालाँकि मज़दूर अपने अंतर्मन में इस कृत्य को क्षम्य मानते रहे हैं.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ़ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 213-4) ठीक यही बात विरोध के उस दूसरे रूप पर भी लागू होती जोकि पूंजीवादी विकास के शुरुआती दौर में प्रकट हुआ था अर्थात कारखाना मालिकों, ओवरसियरों की हत्या करना.
कारखानों में बलवा सामूहिक विरोध करने का पहला रूप है जिसमें संपत्ति नष्ट की जाती थी विशेषतया मशीनें तोड़ दी जाती थीं. मशीनों के खिलाफ मजदूरों का संघर्ष नयी मशीनरी के आविष्कार के आरंभ से शुरू हो गया था. लेकिन सामूहिक कार्रवाइयाँ  उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में शुरू हुई. मजदूरों ने नाटिन्घम, यार्कशायर और लंकाशायर में मशीनों को नष्ट करने का सुनियोजित अभियान आरंभ किया जिन्हें ‘लुड़्डाइट्स’ कहा जाता था. 1811 के अंत में बलवाइयों ने नाटिन्घम और पड़ोसी जिलों में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी. लेस और स्टॉकिन्ग  बनाने के चौखटों को नष्ट करने से उन्होंने अपनी शुरुआत की. इन मंडलियों का सरदार एक मिथकीय काल्पनिक चरित्र जनरल लुड़्ड के नाम से जाना जाता था जिसके नाम पर कारखाना मालिकों के खिलाफ हिंसात्मक कार्रवाइयाँ की जाती थीं, औद्योगिक संपत्ति नष्ट की जाती थी और मशीनों के छोटे-छोटे टुकड़े कर दिए जाते थे. पुलिस ‘लुड़्डाइट्स’ का सामना कर पाने में असमर्थ थी और विद्रोह को दबाने के लिए सेना की मदद लेनी पडी. एक विधेयक प्रस्तुत किया गया जिसके तहत किसी मज़दूर को मृत्यु दंड दिया जा सकता था यदि उस पर मशीन तोड़ने का आरोप  सिद्ध हो जाता. इस अत्यधिक दमनात्मक विधेयक के विरोध की एक उल्लेखनीय उपलब्धि लोर्ड बायरन (1788-1824) का हॉउस ऑफ़ लॉर्ड्स में दिया गया भाषण है. इस भाषण में उन्होंने नाटिंघम के मजदूरों की तकलीफों का सजीव चित्र पेश किया था. लुड्डाइट आन्दोलन का सजीव और कल्पनापूर्ण चित्रण अर्न्स्ट टालर के नाटक द मशीन रेकर्स में किया गया है. यह आन्दोलन 1812 में पुनर्जीवित हो उठा और जनवरी 1813 में तीन व्यक्तियों को फाँसी दे दी गयी. कार्टराइट के कारखाने पर हमले के सप्ताह के दौरान चौदह व्यक्तियों को प्राणदंड दिया गया. उत्तेज़ना फैलाने वाले एजेंटों की मदद से सरकार ने पूरी तौर से इस संगठन को नष्ट कर दिया. उद्योग की समृद्धि में नयी जान आ जाने और अंशत: कॉर्बेट (1762-1835) के आन्दोलन के परिणामस्वरूप, जिसने मजदूरों को मशीनों को तोड़ने की मुर्खता का अहसास करा दिया था (जो उनकी बढती जा रही समझदारी का बोध कराता है), लुड्डाइट आन्दोलन का अंत हो गया. फिर भी विरोध के इस स्वरूप ने अपनेआप को बदलती परस्थितियों के अनुकूल ढालना जारी रखा और जब कभी नयी मशीनें उपयोग में लायी गयीं इसका सहारा लिया गया. इस प्रकार अठारह सौ तीस के दशक में इंग्लैंड के सम्पूर्ण ग्रामीण क्षेत्र में ‘लाल मुर्गा’ बांग देता रहा. अर्थात जैक स्विंग के नेतृत्व में कृषि मजदूरों ने पुआल के ढेरों और खलिहानों में आग लगायी. “जनरल लुड्ड” की भांति “जैक स्विंग” भी एक काल्पनिक चरित्र था.
जर्मनी में अठारह सौ चालीस के दशक में सिलेसियाई बुनकरों ने आन्दोलन के ठीक इसी रूप को अपनाया. इसका ज़िक्र मार्क्स के मित्र विल्हेल्म वुल्फ ने अपनी रचनाओं में किया है और गरहार्ट हाफमैन ने अपने प्रसिद्द नाटक द वीवर्स में इसका उपयोग कथावस्तु में किया. उन्नीसवीं शताब्दी के आठवें और नौवें दशक में रूस में मशीनों को तोड़ने वाला बलवा हुआ. “काफी समय बीत जाने और काफी अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद मजदूर मशीन और पूंजी द्वारा मशीन के उपयोग में भेद कर पाए और उन्होंने अपने प्रहार का निशाना उत्पादन के भौतिक औजारों को नहीं बल्कि उस विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था को बनाना सीखा जो इन औजारों का उपयोग करती है.” (मार्क्स, कैपिटल, भाग 1, 458)


मजदूर पूंजीपति को उधार देता है

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21.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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“ऐसे प्रत्येक देश में, जिसमें पूंजीवादी ढंग का उत्पादन पाया जाता है, यह रिवाज होता है कि जब तक श्रम-शक्ति का करार में निश्चित समय तक, जैसे, मिसाल के लिए, एक सप्ताह तक प्रयोग नहीं कर लिया जाता, तब तक उसके दाम नहीं दिए जाते. इसलिए, हर जगह मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य पूंजीपति को पेशगी दे देता है, मज़दूर अपनी श्रम-शक्ति के क्रेता को दाम पाने के पहले ही उसके उपयोग की इजाज़त दे देता है; हर कहीं मज़दूर पूंजीपति को उधार देता है. यह उधार महज़ कोई हवाई चीज नहीं होता, इसका सबूत सिर्फ यह है कि पूंजीपति का दिवाला निकलने पर मजदूरी के पैसे अक्सर डूब जाते हैं बल्कि यह भी कि उसके इससे कहीं अधिक स्थायी अनेक दूसरे नतीजे भी होते हैं.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 162)
मार्क्स यहाँ पर एक टिप्पणी देते हैं जिसमें वह आंकडे देते हुए यह सिद्ध करते हैं कि उन मज़दूरों से जिन्हें एक सप्ताह बाद मजदूरी मिलती है, दूकानदार ज़्यादा दाम वसूल करता है क्योंकि उन्हें अपनी ज़रुरत की चीजें उधार पर लेनी पड़ती हैं.
उस मज़दूर की स्थिति और ज़्यादा ख़राब होती है जो अपनी मजदूरी एक पखवाड़े या एक महीने के बाद पाता है. वह चीजों की और ज़्यादा कीमत चुकाने के लिए बाध्य हो जाता है और वास्तव में उस दूकानदार का गुलाम बन जाता है जो उसे चीजें उधार देता है. मज़दूर जो माल खरीदता है वे यदि वास्तव में मिलावटी नहीं होते तो निम्न गुणवत्ता के होते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान खाद्य सामग्री की मिलावट ने विकराल रूप धारण कर लिया था. इसी प्रकार आवास के मामले में मज़दूर भवन स्वामी की दया पर निर्भर रहता है. आवास जितना घटिया होता उतना अधिक उसकी मरम्मत पर खर्च आता है और असंदिग्ध रूप से सर्वाधिक मंहगे वे आवास होते हैं जिसमें आबादी का निर्धनतम वर्ग निवास करता है. “आवासों के सट्टेबाज गरीबी की इन खानों से इतना अधिक मुनाफा कमाते हैं कि पोटोसी की चांदी की खानों के मालिकों के मुहं में भी पानी आ जाये.”(मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 727)

22. निम्न और मध्यम बुर्जुआ सर्वहारा की कतारों में शामिल होते हैं

“समाज के उच्चतर संस्तरों से आये लोगों से भी मज़दूर वर्ग की संख्या में वृद्धि होती है. ढेरों छोटे उद्यमी और अनर्जित आय के छोटे हिस्सेदार सर्वहारा की कतारों में शामिल होते जाते हैं और अपने श्रम को श्रम बाज़ार में बिक्री के लिए मज़दूरों के साथ-साथ पेश कर देते हैं. काम की याचना में ऊपर उठे हाथों का जंगल लगातार ज़्यादा घना होता जाता है जबकि ये हाथ लगातार पतले होते जाते हैं. यह बात एकदम साफ़ है कि जब सफलता की पहली शर्त बड़े पैमाने का उत्पादन हो तो छोटा उत्पादक स्पर्द्धा में टिक नहीं सकता. दूसरे शब्दों में कोई भी इंसान एक ही वक्त में छोटे उत्पादक के साथ-साथ बड़ा उत्पादक नहीं बना रह सकता. इस तथ्य के विस्तृत निरूपण की आवश्यकता नहीं है कि पूंजी पर ब्याज उसी अनुपात में घटता जाता है जिस अनुपात में पूंजी में वृद्धि होती जाती है अर्थात पूंजी की मात्रा और उसके क्षेत्र के विस्तार में वृद्धि होती जाती है. अनर्जित आय के छोटे हिस्सेदारों के लिए अपनी पूंजी के ब्याज से जीवनयापन कर पाना मुश्किल होता जाता है. इसलिए वह औद्योगिक प्रक्रिया में सक्रीय भागीदार बनने के लिए विवश कर दिया जाता है अर्थात यह छोटे कारखाना मालिकों की खाली जगह को भरता जाता है जो खुद भी सर्वहारा वर्ग में भरती के लिए विवश होते जाते हैं.” (मार्क्स, Lohnarbeit and Kapital, पृ. 39)

मैन्युफैक्चर और बड़े पैमाने के उत्पादन (मशीनोफैक्चर) की कालावधियों में श्रम विभाजन

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17. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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दस्तकार किसी वस्तु के एक के बाद एक दूसरे हिस्से को बनाते जाते हैं जो अंत में विक्रय के लिए तैयार माल बन जाता है. शिल्प संघ के विकास की उच्चतम अवस्था में भी उत्पादन के क्षेत्र में उपविभाजन की संख्या बहुत कम थी. लेकिन विनिर्माण की शुरुआत के साथ, श्रम का विशुद्ध यांत्रिक विभाजन हुआ जिसके अर्न्तगत माल तैयार करने की उत्पादन प्रक्रिया में मजदूर काम के एक छोटे हिस्से को पूरा करता है. तो भी इस अवधि में भी उद्योग की कुछ शाखाओं में उत्पादन की विस्तृत प्रक्रियाओं में श्रम विभाजन हुआ और दूसरी शाखाएँ बची रह गयी. इसके अलावा विनिर्माण के अर्न्तगत मजदूर अपने हाथ से सारा उत्पादन करता था जो उसकी दक्षता और योग्यता पर निर्भर करता था.
“दस्तकारी और मैन्युफैक्चर में मजदूर औजारों का इस्तेमाल करता है, कारखाना में मजदूर मशीन की सेवा करता है. पहली स्थिति में मजदूर श्रम के साधनों के संचालन पर नियंत्रण रखता है तो दूसरी स्थिति में मजदूर की गतिविधियाँ मशीन के अधीन होती हैं. विनिर्माण में मजदूर सक्रीय तंत्र का एक हिस्सा होते हैं. कारखानों में मजदूरों से स्वतन्त्र एक जड़ तंत्र होता है और मजदूर इसमें जीवित उपांगो की तरह शरीक होते हैं. अंतहीन चाकरी और कठिन परिश्रम की नीरस नित्य-क्रिया, जिसमें एक ही यांत्रिक प्रक्रिया को लगातार दुहराना पड़ता है, सिसिफस की यंत्रणा के समान होता है अर्थात चट्टान जैसा कड़ी मेहनत का बोझ थके हुए कर्मी पर गिरता रहता है. मशीनों पर काम करने से स्नायुतंत्र पर अवसादक असर पड़ता है. इसी के साथ यह मांसपेशियों की विविध गतिविधियों में व्यवधान उत्पन्न कर देता है और स्वतन्त्र शारीरिक और बौधिक गतिविधियों को रोक देता है. यहाँ तक की काम के बोझ को हल्का कर देना यंत्रणा का साधन बन जाता है क्योंकि मशीन मजदूर को काम से मुक्त नहीं करती है बल्कि काम में उसकी दिलचस्पी को ख़त्म कर देती है. ” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, पृ. 451) मशीन पर काम करने वाले मज़दूर की तुलना सिसिफस से करने वाला उद्धरण मार्क्स ने एंगेल्स की पुस्तक द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, 1845, पृ. 217, से और एंगेल्स ने जेम्स फिलिप के, एम.डी. की पुस्तक मैनचेस्टर के वस्त्र उत्पादन में नियोजित मज़दूर वर्ग की नैतिक एवं भौतिक जीवन स्थितियां से लिया है. (रिजवे, लन्दन 1832, पृ.8)
मशीन से उत्पादन करने के लिए यह आवश्यक होता है कि कच्चे माल, अर्द्ध-निर्मित सामान और औजारों की आपूर्ति में वृद्धि हो और इससे उद्योग की ज़्यादा शाखाएँ खोलने के लिए प्रेरणा मिलती है. उत्पादन प्रणाली की असंख्य नयी किस्मों और उप-किस्मों द्वारा इस कच्ची सामग्री और अर्द्ध-निर्मित सामान को तैयार किया जाता है जिससे ‘ट्रेडों’ की संख्या में भारी वृद्धि हो जाती है. जर्मन आंकडों के अनुसार 1882 में ट्रेडों और पेशों की संख्या 6000 आंकी गयी थी. 1895 में यह संख्या लगभग 10,000 हो गयी थी.
इस प्रकार पूंजीवाद के अर्न्तगत बड़े पैमाने के उत्पादन ने न केवल स्थायी विशेषता वाले पुराने श्रम विभाजन को समाप्त कर दिया बल्कि विशिष्ट प्रक्रियाओं की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि कर दी. इससे विशेष काम करने वाले मज़दूर की स्थिति पहले से ज़्यादा खराब हो जाती है यदि इस बात को ध्यान में रखा जाये कि यह घटनाओं में निहित संकटों पर पूर्णतया आश्रित होता है जिससे उसके भौतिक जीवन के आधार की सुरक्षा और दृढ़ता जोखिम में पड़ जाती है.

सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक विकास

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16. ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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वर्तमान समय में ‘सर्वहारा’ (‘प्रोंवितारिया’) का तात्पर्य उस व्यक्ति से है जिसके जीवकोपार्जन का एकमात्र साधन अपनी श्रमशक्ति का विक्रय है. लैटिन भाषा के शब्द ‘प्रोलितारियास’ का मूल अर्थ यह नहीं था. प्राचीन रोम के ज़माने में ‘प्रोलितारियास’ शब्द का प्रयोग उस व्यक्ति के लिए किया जाता था जिसकी एकमात्र सम्पत्ति उसके वंशज, उसकी संताने (प्रोलेस) होती थीं. आरंभ में सर्वहारा जोकि रोम की आबादी का निर्धनतम वर्ग था, को सैनिक सेवा और करों की अदायगी से मुक्त कर दिया गया था. बाद में सर्वहारा को सेना में भर्ती किया जाने लगा जिसका संभरण राज्य करता था. गृहयुद्धों के दौर में जब रोम का किसान समुदाय बरबाद हो गया तथा (रोमन) साम्राज्य के अधीन हो गया, तो सर्वहारा सेना का केन्द्रक बन गया था. शांति के समय सैनिकों के इस समूह का भरण-पोषण राज्य करता था तथा उन्हें अनाज की नियमित रसद दी जाती थी. इस प्रकार नाम के अलावा इन रोमन सर्वहारा और आज के भूमिहीन आवासहीन यूरोपीय सर्वहारा के बीच अन्य कोई साम्य नहीं है. हमें इस बात की भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जैसाकि मार्क्स बताते हैं,”कि प्राचीन रोम में वर्ग संघर्ष स्वतन्त्र धनिकों और स्वतन्त्र निर्धनों यानि कि विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यकों के दायरे में जारी रहा था. दास वर्ग जोकि आबादी का बड़ा उत्पादक हिस्सा था, उस निष्क्रिय मंच का काम कर रहा था जिस पर यह संघर्ष चल रहा था. लोग सिसमोंदी की उल्लेखनीय उक्ति को भूल गए हैं कि ‘रोम का सर्वहारा राज्य के खर्च पर जीता था जबकि आधुनिक समाज सर्वहारा के दम पर जीता है”. (कार्ल मार्क्स, द एटीन्थ ब्रूमेर ऑफ लुई बोनापार्ट, पृ. 18-19) The Eighteenth Brumaire of Louis Bonaparte- by Karl Marx
उज़रती मजदूरों के वर्ग को व्यक्त करने के अर्थों में ‘सर्वहारा शब्द का व्यापक उपयोग उन्नीसवीं शताब्दी के पहले अर्धांश के पूर्व आरंभ नहीं हुआ था. एंगेल्स ने इंग्लैंड में मेहनतकश वर्ग की जीवनस्थितियों के सम्बन्ध में अपनी पुस्तक में पहली बार इंग्लैंड के सर्वहारा के अठारह सौ चालीस के दशक तक का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया है. इस पुस्तक के मूल जर्मन संस्करण की प्रस्तावना में एंगेल्स बताते हैं कि उन्होंने “मेहनतकश, श्रमजीवी, सम्पत्ति-अधिकार रहित वर्ग और सर्वहारा” शब्द का प्रयोग एक ही परिघटना को व्यक्त करने के लिए किया है. अन्य स्थान पर वह लिखते हैं, “सर्वहारा समाज का वह वर्ग है जो अपने जीवन-निर्वाह के लिए, पूंजी से हासिल किए गए मुनाफे पर नहीं बल्कि पूरे तौर पर अपने श्रम (श्रमशक्ति) की बिक्री पर निर्भर करता है. उसका सुख-दुःख ज़िन्दगी और मौत, सम्पूर्ण अस्तित्व श्रम (श्रमशक्ति) की मांग पर, कारोबार के अच्छे और बुरे वक्त के बीच झूलते रहने पर, उन उतार-चढावों पर जो अनियंत्रित प्रतिस्पर्द्धा का परिणाम होते हैं, पर निर्भर करता है. संक्षेप में, सर्वहारा अथवा सर्वहारा वर्ग उन्नीसवीं सदी का मेहनतकश वर्ग है.” इंग्लैंड में उज़रती मजदूरों या श्रमजीवियों का वर्ग चौदहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में अस्तित्व में आ गया था. एक सौ पचास वर्षों के दौरान आबादी के निम्नतर संस्तर इसमें शामिल थे. धीरे-धीरे करके यह (वर्ग) कारीगरों, शिल्पकारों और किसानों से अलग हुआ तथा सामंती बंधनों से मुक्त हो सका.
जहाँ तक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है, अपने प्रादुर्भाव के आरंभिक दिनों से ही, सर्वहारा का अन्य शिल्पों या कृषि कर्म में लगे रहने वाले मेहनतकशों से विभेदीकरण बहुत कम हुआ था. लेकिन जैसे-जैसे पूंजीवाद विकसित होता गया, सर्वहारा ने अपनी खुद की अभिलाक्षणिकताएँ धारण कर लीं. सर्वहारा, स्वतन्त्र किसान और शिल्पकार के बीच भिन्नता इस तथ्य में निहित है कि सर्वहारा मजदूर श्रम के साधनों से वंचित होता है, कि उसे अपने लिए नहीं (किसान और शिल्पकार की भांति) बल्कि पूंजी के मालिक अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए श्रम करना पड़ता है. वह स्वयं को, अपनी श्रमशक्ति को इस तरह बेचता है मानो वह कोई माल हो और इसके बदले वह उज़रत पाता है.
जब तक पूंजीवाद अपनी शैशवावस्था में था, जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में सामंती अधिकारी और नगरों में व्यापारिक निगम वित्तीय पूंजी और व्यापारिक पूंजी के औद्योगिक पूंजी में रूपांतरण को बाधित करते रहे, जब तक विनिर्माण उद्योग केवल उन नगरीय बस्तियों में पनपते रहे जो शिल्प-संघों के नियंत्रण में नहीं थे- दमनात्मक कानूनों के बावजूद उजरती मजदूर, सर्वहारा पूंजी संचय के परिणामस्वरूप अपने श्रम की बढती मांग का पूरा लाभ उठाते रहे. गिरजाघर से जुड़ी परिसंपत्तियों की लूटमार, राज्य की संपत्तियों के वितरण और सामूहिक भूमि की व्यापक बाड़ेबंदी जिसने लाखों किसानों को आजीविका से वंचित कर दिया तथा राजमार्गों, गलियों में व्यर्थ ही काम की तलाश में भटकने पर मजबूर कर दिया, के बाद मजदूरों की हालत अकस्मात बहुत बिगड़ गयी. विनिर्माण की वृद्धि ने, स्वतन्त्र उद्यमोँ को खड़ा करने के लिए अत्यंत आवश्यक पूंजी संचय ने उज़रती मज़दूर की स्वयं मालिक बन जाने की आशाओं पर पानी फेर दिया था – क्योंकि स्वतन्त्र शिल्पों का स्थान भी पूंजीवादी उद्यम लेते जा रहे थे. यह सही है कि विनिर्माण उद्योग केवल धीरे-धीरे (सत्रहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश  से लेकर अठाहरवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश तक के सौ सालों या इससे कुछ ज्यादा अवधि के दौरान ही) नगरीय उत्पादन तथा ग्रामीण उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित कर सका था. लेकिन कारीगरों और घरेलू नौकरों के आते जाने से सर्वहारा की कतारों में लगातार वृद्धि हो रही थी. इन सभी नए घटकों के बावजूद वर्ग के रूप में सर्वहारा का विभेदीकरण ज्यादा तेजी से हो रहा था. नगरीय शिल्पकार और ग्रामीण घरेलू नौकर पूरी तौर पर तभी गायब हुए जब मशीन से विशाल पैमाने का उत्पादन शुरू हुआ. वे कई खंडों में सर्वहारा की कतारों में फेंके गए और इस प्रकार ख़त्म हो गयी उनकी “आदिम अवस्था” में वापस लौटने की सम्भावना. बडे पैमाने पर मशीन से उत्पादन की शुरुआत ने ऐसे व्यक्तियों के वर्ग को जन्म दिया जो बाज़ार में अपनी चमड़ी बेचने खुद जाते हैं और रोज़गार की तलाश में अपने शरीर को प्रतिस्पर्द्धा की भंवर में झोंक देते हैं.
एंगेल्स बताते हैं,”आधुनिक बुर्जुआ समाज का प्रधान लक्षण सभी की सभी के खिलाफ जंग है जिसकी सर्वाधिक पूर्ण अभिव्यक्ति ‘प्रतिस्पर्द्धा” शब्द से होती है. यह युद्ध जिंदगी के लिए, अस्तित्व के लिए, प्रत्येक चीज़ के लिए किया जाता है और ज़रुरत पड़ जाये तो मृत्यु तक चलता रहता है. यह युद्ध समाज के विभिन्न वर्गों के बीच ही नहीं बल्कि इन वर्गों के अलग-अलग सदस्यों के बीच भी छिड़ा रहता है. हरेक इन्सान दूसरे इन्सान के रास्ते का रोड़ा होता. इसलिए हरेक इन्सान दूसरे इन्सान को अपने रास्ते से हटा देने और उसकी जगह लेने की कोशिश करता है. मजदूर एक-दूसरे से ठीक उसी तरह प्रतिस्पर्द्धा करते हैं जिस तरह एक बुर्जुआ दूसरे बुर्जुआ से प्रतिस्पर्द्धा करता है. शक्तिचालित करघे का बुनकर, हथकरघा बुनकर, रोजगारशुदा या ज़्यादा उज़रत पाने वाले  साथी से प्रतिस्पर्द्धा करता है और उसका स्थान लेना चाहता है. जहाँ तक मजदूरों का सवाल है, यह प्रतिस्पर्द्धा विद्यमान स्थितियों का निकृष्टतम पक्ष है क्योंकि यही सर्वाधिक असरदार हथियार है जो बुर्जुआ वर्ग सर्वहारा के खिलाफ इस्तेमाल करता है. (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 75-76)

संकटों के सिद्धांत और इतिहास के बारे में कुछ बातें

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‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

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अंग्रेज़ मेहनतकश वर्ग जीवनस्थितियों का चित्रण करने वाली अपनी पुस्तक में एंगेल्स संकटों के बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं. वह सिद्ध करते हैं कि पूंजीवादी उत्पादन और प्रतिस्पर्द्धा की प्रवृति ही उन्हें (संकटों) उत्पन्न करती है.”आधुनिक उत्पादन और उत्पाद वितरण की अराजक स्थितियां, उत्पादन की वे स्थितियां जोकि आवश्यकता की तुष्टि के लिए न होकर लाभ से नियंत्रित होती है, वह स्थितियां जिसमें धनी बन जाने की कोशिश में प्रत्येक व्यक्ति खुद की स्वंतंत्र लीक पर काम करता है, ये स्थितियां बार-बार मंदी पैदा करने से नहीं चुकती हैं. औद्योगिक विकास के युग के आरंभ में मंदी उद्योग की एक या दूसरी शाखा या एक बाज़ार तक सीमित रहती थी. लेकिन प्रतिस्पर्द्धियों की कार्रवाईयों के चलते उद्योग की एक शाखा में रोज़गार से वंचित मजदूर उद्योग की दूसरी शाखा में रोज़गार पाने के लिए धावा बोल देते हैं जिसमें काम सीखना तुलनात्मक रूप से आसान होता है. इस प्रकार वे उत्पाद जिन्हें एक बाज़ार में खरीददार नहीं मिलते आगे बढ़कर दूसरे बाज़ार में पहुँच जाते हैं, आदि, आदि. ये छोटे-छोटे संकट इकठ्ठा होकर कालांतर में बड़े पैमाने के संकटों में तब्दील हो जाते हैं. इन संकटों का दस्तूर यह होता है कि विकास और व्यापक समृद्धि की अल्पकालीन अवधि के बाद हर पाँच वर्ष में वे प्रकट हो जाते हैं.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ. 82)

अन्यंत्र एंगेल्स पॉँच वर्षीय या छः वर्षीय चक्रों की चर्चा करते हैं और ‘कम्युनिज्म के सिद्धांत’  [The Principles of Communism-Frederick Engels 1847] में सात वर्षीय अवधि का उल्लेख करते है. “इस शताब्दी की पूरी अवधि के दौरान, उद्योगों का जीवन समृद्धि के दौरों और संकटों के दौरों के बीच झूलता रहा. इस तरह के संकट पॉँच साल से सात साल के नियमित अंतरालों में पैदा होते रहे. अपने साथ मजदूरों के लिए असहनीय दुर्दशा, व्यापक क्रांतिकारी उफान और मौजूदा व्यवस्था के लिए सबसे बड़े संकट लाता गया.”

सन 1848 के बहुत सालों बाद जब मार्क्स पूंजी लिख रहे थे, तब उन्होंने ध्यान दिया कि तेजी और मंदी के बीच उतार-चढाव के ये चक्र पॉँच या सात वर्षों की नहीं बल्कि दस या पंद्रह सालों की अवधि को समेट लेते हैं.

पहला संकट सन 1825-1826 में आया जिसने राष्ट्रव्यापी असर पैदा किया. उसके आरंभ में सट्टेबाजी की कार्रवाईयों में प्रस्फोट हुआ था. अगला व्यापक संकट 1836-37 में आया. इसके पहले ब्रिटेन के उद्योग और निर्यात में बहुत वृद्धि हुई थी. निर्यात में यह वृद्धि विशेष थी जिसे उत्तरी अमेरिका में बाज़ार मिल गया था. 1847 में तीसरे संकट के संकेत मिलने लगे थे. 1845 और 1846 के “रेलवे में पूंजी लगाने के उन्माद” जिसमें रेलवे निर्माण में विह्वल उतावली में पूंजी उड़ेली जा रही थी, के बाद तेजी से मंदी आयी.

जिस गति से रेलवे का निर्माण किया जा रहा था, उससे बड़ी भारी संख्या में लोगों को काम मिला. लेकिन बाद में लगभग पचास हज़ार लोग बेरोजगार हो गए. इस संकट की चरम अवस्था में जिसने ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका और वास्तव में समूचे यूरोपीय महाद्वीप को (रूस को छोड़कर) लपेट में लिया था और जिसने 1848 की क्रांतिकारी उथल-पुथल का मार्ग प्रशस्त कर दिया था, कम्युनिस्ट लीग के अनुरोध पर मार्क्स ने घोषणापत्र की रचना की.

डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

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14. पूंजीवाद और प्रकृति पर मनुष्य की विजय

सन 1848 तक प्रकृति पर मनुष्य की विजय का काम बहुत धीमी गति से चल रहा था. फिर भी वाट के आविष्कार की व्यापक स्वीकृति के बाद वायु शक्ति और जलशक्ति के बेहतर इस्तेमाल के साथ-साथ वाष्पशक्ति के उपयोग का विकास तेजी से हो रहा था. 1820 से ओस्टेड (1777-1851), सीबेक (1770-1831) और फैराडे (1791-1867) जैसे वैज्ञानिकों ने विद्युत परिघटना के क्षेत्र में एक के बाद दुसरे आविष्कार किये. लेकिन विद्युत तार और विद्युत धातुशोधन के अपवाद को छोड़कर विनिर्माण उद्योग में इन आविष्कारों का लाभ नहीं उठाया जा सका. हालाँकि उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी तृतीयाँश में उद्योग की एक शाखा के रूप में विद्युत तकनीक अस्तित्व में आ चुकी थी.

कृषि में रसायन विज्ञान का उपयोग, जिसे कभी-कभी कृषि रसायन कहा जाता है, का श्रेय मुख्य रूप से जस्टस वान लीबिंग (1806-1873) नामक जर्मन को जाता है. हालाँकि इस सिलसिले में हम्फ्री डेवी (1772-1829) नामक अँगरेज़ का उल्लेख किया जा सकता है जिसकी कृषि रसायन के प्रारंभिक ज्ञान पर पुस्तक 1813 में प्रकाशित हुई थी. इस विषय पर लीबिंग की प्रथम कृति (Die Chemie in ihrer Ammending aur Agriculther und Phisiology) शीर्षक की पुस्तक जिसका लयों फ्लेफेयर (1818-1898) ने तुरंत अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया था) 1840 में प्रकाशित हुई. मार्क्स बताते हैं, “लीबिंग का एक अमर अवदान यह है कि उन्होंने प्राकृतिक विज्ञान के दृष्टिकोण से आधुनिक खेती के नकारात्मक और विनाशकारी पहलू का विवेचन किया है (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1,548, टिपण्णी). इसके ठीक पहले मूल पाठ में लिखा है : “पूंजीवादी उत्पादन आबादी को लगातार बड़े केन्द्रों में एकत्रित करके शहरी आबादी के महत्त्व को बढाकर एक ओर समाज की गतिशीलता में वृद्धि कर देता है तो दूसरी ओर मनुष्य और धरती के बीच पदार्थों की अदला-बदली को अर्थात भोजन और वस्त्र के रूप में मनुष्य धरती से जिन तत्त्वों को लेकर उपयोग कर लेता है, उनकी धरती को वापसी, जो धरती को उपजाऊ बनाये रखने के लिए सदा सहज आवश्यक होता है, को अस्त-व्यस्त कर डालता है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1,546-47)

लीबिंग पहले व्यक्ति थे जिन्होनें सिद्ध किया कि ज़मीन की उर्वरा शक्ति चुक जाने का कारण यह है कि इन्सान और उसके द्वारा जोती गयी ज़मीन के बीच विनिमय संबंधों में अस्त-व्यस्तता आ गयी है क्योंकि अपनी वृद्धि के दौरान फसलें ज़मीन से कुछ पदार्थों को चूस लेती हैं जिन्हें ज़मीन को वापस लौटा देने में इन्सान असमर्थ रहता है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और इसमें शहर के गाँव से अलगाव की एक अभिलाक्षणिकता धरती को कई उर्वरक पदार्थों से वंचित कर देना और प्राकृतिक खाद के रूप में इन पदार्थों को धरती को वापस न लौटा पाना है. प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के अर्न्तगत ज़मीन की उपज का लगभग पूरे हिस्से का उपभोग उस इलाके में हो जाता है जहाँ पैदावार होती है, उपभोक्ताओं, इन्सान और जानवर दोनों, द्वारा प्राकृतिक खाद ज़मीन की उर्वरा शक्ति को प्रतिपूर्ति के लिए पर्याप्त हुआ करती थी. लेकिन विशाल से विशालतर शहरों के विकास के कारण कृषि उत्पादों का उपयोग कृषि क्षेत्रों से दूर होने लगा और प्राकृतिक उर्वरक पदार्थ बर्बाद होने लगा. प्राकृतिक खाद के अभाव के कारण कृत्रिम उर्वरकों की खोज ज़रूरी हो गयी ताकि ज़मीन को उन खनिजों की वापसी की जा सके जिन्हें फसलों ने अपने पोषण के लिए इस्तेमाल कर डाला था. लीबिंग का मत था कि खनिज अवयवों की आपूर्ति सीमित होती है क्योंकि जमीन उनकी असीमित मात्रा मुहैया कराने में असमर्थ होती है. इसलिए किसान की मुख्य ज़िम्मेदारी और खादों का कार्य जमीन को उन खनिजों की प्रतिपूर्ति होना चाहिए जिन्हें प्रत्येक फसल, जिसकी उनके विश्लेषण से पता चलता है, अपनी वृद्धि के लिए जमीन से ले लेती है. इसलिए एक ऐसी कृत्रिम खाद तैयार की गयी जिसमें आवश्यक खनिज पदार्थ जैसे फास्फोरिक अम्ल, पोटेशियम और नाइट्रोजन विद्यमान थे. अठारह सौ चालीस की दशाब्दी और उसके बाद से, कृत्रिम खाद का उपयोग ज्यादा लोकप्रिय होने लगा. अब उत्पादित नाइट्रोजन युक्त खाद, सुपरफास्फेट जैसे उर्वरक और मूल धातु-कचरा, धुली हुई हड्डियाँ और मिश्रित खाद का इस्तेमाल किया जाता है. मूल धातु कचरा स्टील निर्माण का अपशिष्ट उत्पाद है और इसके उर्वरकीय गुणों की खोज 1878 के पहले नहीं हो पाई थी.

औद्योगिक उत्पादन में रसायनशास्त्र का उपयोग अठारवीं शताब्दी के अंत में आरंभ हुआ. सन 1787 के लगभग निकोलस लाब्लांक (1742-1806) ने समुद्री नमक से सोडा कार्बोनेट बनाने की महत्वपूर्ण समस्या पर ध्यान केन्द्रित किया. इन प्रयोगों में उसके अवदान ने कृत्रिम क्षार उत्पादन के विशाल उद्योग का आधार निर्मित किया जिसके उत्पाद विरंजन कार्यों (विशेषतया कुछ किस्म के कागजों के लिए), आतिशबाजी, दियासलाई, साबुन, वस्त्रों, रंगों आदि में प्रयोग किए जाते है. प्रदीपक के रूप में कोल गैस के पहले व्यावहारिक उपयोग का श्रेय विलियम मरडक (1754-1839) को दिया जाता है जिन्होंने सन 1792 से 1802 के बीच इस दिशा में सम्भावना प्रर्दशित करने वाले प्रयोग किए. इन प्रयोगों ने अगला पड़ाव तब पार किया जब एक जर्मन ने, जो 1804 में इंग्लैंड आया था, लिसियम थियेटर ख़रीदा और अपनी विधि का वहां प्रदर्शन किया. इसका परिणाम यह हुआ कि पॉल माल में नयी प्रकाश व्यवस्था की स्थापना के साथ ही लन्दन में गैस आधारित सार्वजानिक प्रकाश व्यवस्था आरंभ हो गयी. कोयले के आसवन से मुख्य ठोस अवशेष कोक प्राप्त होता है और द्रव अवशेष टार और अमोनियामय लिकर प्राप्त होता है. उप-उत्पात के रूप में हमें बेंजीन, एनिलीन डाई, विभिन्न कीटनाशक, नैप्थलीन, सैक्रीन आदि प्राप्त होते हैं. उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में शेवारिल (1786-1889) की वसा और तेलों पर परीक्षणों और लाब्लांक की साधारण नमक से कास्टिक सोडा बनाने की खोजों ने साबुन और मोमबत्ती बनाने की विधियों और मात्राओं में आमूल परिवर्तन कर दिया. लेकिन घोषणापत्र के पहले प्रकाशन के कई वर्षों बाद अठारह सौ पचास के दशक में ही उद्योग में रासायनिक शोध के उपयोग का युग आरम्भ हो सका. सन 1848 से कुछ वर्षों बाद वस्त्र उत्पादन में औद्योगिक क्रांति जो अभी तक मुख्य रूप से कताई और बुनाई से सम्बंधित प्रक्रियाओं तक सीमित थी, रंगाई और परिष्करण के क्षेत्र में सुधार के साथ अपनी अंतिम मंजिल तक पहुँच गयी. 1856 में डब्ल्यू.एच. पार्किन ने पहला एनिलिन डाई अर्थात माव नाम का पहला रंगीन पदार्थ बनाया. कोलतार के आसवन से अन्य चमकदार रंगीन पदार्थों की खोजों का ताँता लग गया. आज इतने किस्म के रंगीन पदार्थ मौजूद हैं कि रंगसाज को उलझन में डाल देते हैं. उनसे हर किस्म के रंग बनाए जा सकते हैं जिनके गुण सर्वाधिक विविधपूर्ण होते हैं. उनमें से कुछ रंग अल्पकालिक लेकिन ज्यादातर रंग स्थायी और विभिन्न प्रभावों को सहन करने वाले होते हैं.

धरती के सुदूरवर्ती हिस्सों पर खेती करने का काम (घोषणापत्र के पाठ में मार्क्स और एंगेल्स इस प्रक्रिया का सन्दर्भ देते हैं) 1848 तक प्रारंभिक मंजिल पार कर चूका था. 1815 में संयुक्त राज्य का कपास का उत्पादन 73,000 गांठ था जो बढ़कर 1840 में 1,348,000 गांठों तक पहुँच गया था. 1840 में गेहूं का उत्पादन 84,800,000 बुशेल था लेकिन 1901-1905 के पाँच वर्षों में वार्षिक औसत 662,000,000 बुशेल प्रतिवर्ष हो गया था. जहाँ तक समस्त किस्मों के अनाजों के सम्पूर्ण उत्पादन का प्रश्न है, यह 1848 में 377.000,000 बुशेल था जबकि 1901-1905 के वर्षों के बीच औसत वार्षिक उत्पादन 2,100,000,000 बुशेल था. 1850 के बाद कनाडा, दक्ष्णि अमेरिका, आस्ट्रेलिया, साइबेरिया, अफ्रीका आदि व्यापार के लिए खुले.

अठारवीं शताब्दी के अंतिम तृतीयाँश तक नौपरिवहन के लिए नदियों का प्रयोग पुराने तरीके से ही किया जा रहा था. अठारवीं शताब्दी के मध्य में इंग्लैंड में नहरों के निर्माण का काम आरंभ हो गया था और फ्रांस में भी नहरों का जाल बिछ गया था. नहर निर्माण के आरंभिक वर्षों में बनाई गयी ज्यादातर नहरे बजरा और नौका नहरों के नाम से जानी जाती थीं तथा सीमित गहराई और चौडाई के कारण छोटे आकार के जलयान के लिए उपयुक्त थीं. नहरों के विकास का कारण बढ़ते व्यापार की तत्काल ज़रुरत को पूरा करना था. जैसे-जैसे नहर निर्माण की तकनीक में सुधार होता गया, जलमार्गों की गहराई और चौडाई इतनी बढाई गयी कि इसमें समुद्री जहाज भी चलने लगे. ज्यादातर जहाजी नहरें इसलिए निर्मित की गयीं ताकि बीच में पड़ने वाले जलडमरू मध्य को काटकर दो सागरों के बीच यात्रा समय को कम किया जा सके. (उदाहरण के लिए केलिडोनियन नहर और श्वेज़ नहर) या कि महत्त्वपूर्ण आंतरिक स्थानों को समुद्री बंदरगाहों में परिवर्तित किया जा सके (मैनचेस्टर जहाजी नहर और फ्लैंडर्स में जीब्रुगे-ब्रुग्स नहर). एक छल्ले से दुसरे छल्ले तक कटाई करके नदियों की टेढ़े-मेढे घुमावदार धारा से बचाया गया और बांध और जलाशय द्वारा नदी की तलहटी का ढाल नौपरिवहन योग्य बनाया गया. जलमार्गों और नदियों के मुहानों को प्राय: वाष्पशक्ति से चालित ड्रेजिंग मशीनों द्वारा साफ़ किया जाता है. बड़े पैमाने के रेलवे निर्माण के आरंभ होने के बाद ही नहरों का विकास समाप्त हुआ.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-10. विश्व बाज़ार का मात्रात्मक और गुणात्मक विकास

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10. विश्व बाज़ार का मात्रात्मक और गुणात्मक विकास

“मशीनों के आविष्कार के पहले प्रत्येक देश की औद्योगिक गतिविधि मुख्यतया देशज भूमि में पैदा होने वाले कच्चे सामान के उत्पादन को लगातार विकसित करते जाने में निहित थी. इस प्रकार ग्रेट ब्रिटेन देशी भेड़ों के ऊन से कपड़ा बनाता था, जर्मनी पटसन को लिनेन में परिवर्तित करता था, फ्रांस रेशम और पटसन पैदा करता था और इनसे तैयार माल बना लेता था, ईस्ट इंडीज़ और लेवांत कपास उगाते थे और इससे सूती सामान बनाते थे,आदि-आदि. वाष्प-चालित मशीन के उपयोग से श्रम विभाजन में इतना अधिक विस्तार हो गया कि विशाल पैमाने के उद्योग देशज भूमि से उखड़ते गए और विश्व बाज़ार, अंतरराष्ट्रीय विनिमय और अंतरराष्ट्रीय श्रम पर पूर्णतया निर्भर हो गए.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ 110)

यदि यूरोपीय उद्योग को कपास,जूट, पेट्रोलियम और रबर उपलब्ध न होता तो इसकी नियति इसे विनाश की ओर ले जाती. इटली का इन्जीनियरिंग और ऑटोमोबाइल उद्योग कोयला और धातु के निर्यात पर पूर्णतया निर्भर है. मध्ययुगीन व्यापर के सर्वाधिक समृद्धिशाली काल में एक साल में सेंट गोथार्ड दर्रे से गुजरने वाले सारे सामान को अब आसानी से कुछ अदद साधारण मालगाडियों में भरा जा सकता था. अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विकास का स्तर निम्न आंकडों से स्पष्ट हो जाता है. 1800 में मालों के अंतरराष्ट्रीय कारोबार की कीमत 6,050,000,000,मार्क आंकी गयी थी, ( 1 मार्क = 8 औंस चांदी); पर था; 1840 में इसकी कीमत 11,500,000,000 तक पहुच गयी और और 1850 में इसका आकलन 16,650,000,000 किया गया था. बीसवीं सदी के आरंभ में अंतरराष्ट्रीय कारोबार 1850 की तुलना में पांच गुना बढ़ गया था और 88,500,000,000 मार्क तक पहुँच गया था जो 1912 तक छलांग लगाकर 169,000,000,000 मार्क तक पहुँच गया था. विश्व बाज़ार में पहुँचने वाले सामानों कि विविधता में दस गुना वृद्धि हो गयी थी. अठारवीं शताब्दी के अंत तक कुछ ‘कुलीन’ सामान उच्च वर्गों द्वारा वांछित माल बाज़ार में आये जिनकी मात्रा बढती गयी. बाल्टिक सागर और यूरोप के उत्तर-पश्चिमी सागर तट के बीच अनाज और इमारती लकड़ी का समुद्री व्यापार तेजी से होता था. 1790 में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बड़े केंद्र, लन्दन में जलपोतों में भरकर 580,000 टन माल बन्दरगाह पर आया था. एक सौ साल बाद यह आंकडा बढ़कर 7,709,000 टन हो गया. सूती वस्त्र उद्योग के विकास से उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में कच्चे कपास उगाने की मांग में बढोत्तरी ज़्यादा से ज़्यादा होती चली गयी. 1790 में 2,000,000 पाउंड वजन की फसल हुई. 1820 में यह आंकडा बढ़कर 180,000,000 पाउंड हो गया था. इससे इंग्लैंड में कच्चे कपास के आयात में भारी वृद्धि हुई. 1751 में आयात की मात्रा 5,000,000 पाउंड थी, 1920 तक यह बढ़कर 142,000,000 पाउंड पहुँच गयी.

उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान विश्व बाज़ार में आने वाले माल की संरचना में समग्र परिवर्तन हो गया. उत्तरी अमेरिका से गेहूं, कपास, पेट्रोलियम और ताम्बा, दक्षिणी अमेरिका से कॉफी, ग्वानों, चिली का शोरा, गोश्त; एशिया से गेहूं, जूट, कपास, चावल और चाय; आस्ट्रेलिया से गेहूं, गोश्त और ऊन- यह सब विविध सामान हजारों वाष्प-चालित जहाजों में समुद्री रास्ते से आते हैं और विश्व बाज़ार को मालों से पाट देते हैं.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-8. पूंजीवाद का क्रांतिकारी चरित्र व 9. पुरे विश्व में पूंजीवाद का विस्तार

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8. पूंजीवाद का क्रांतिकारी चरित्र

“जब तक हस्तशिल्प और मैन्युफैक्चर सामाजिक उत्पादन के सामान्य आधार बने रहते हैं तब तक उत्पादक का उत्पादन की केवल एक विशिष्ट शाखा के अधीन रहना और उसके धंधे की विविधता का छिन्न-भिन्न हो जाना आगे के विकास का आवश्यक कदम होता है. इस मूलाधार के सहारे उत्पादन की प्रत्येक विशेष शाखा अनुभव के फलस्वरूप समुचित तकनीकी रूप प्राप्त कर लेती है, उसका क्रमश: परिष्करण करती जाती है और ज्यों ही यह रूप एक निश्चित मात्रा में परिपक्वता हासिल कर लेता है वैसे ही उसका उस रूप में ठोस ढंग से ढलना तीव्रता से हो जाता  है. वाणिज्य के द्वारा प्राप्त नए कच्चे माल के अलावा श्रम के औजारों में होने वाला क्रमिक परिवर्तन ही इसमें थोडा-बहुत फर्क डालता है. एक बार अनुभव से सिद्ध सर्वाधिक उपयोगी रूप जब प्राप्त हो जाता है तब श्रम के औजार का वह रूप मानों पत्थर में ढल जाता है, जो इस ढंग से प्रगट होता है जिससे कि अनेक औजार कई हज़ार वर्षों से एक पीढी से दूसरी पीढी को एक ही रूप में मिलते गए हैं… आधुनिक उद्योग किसी भी उत्पादन प्रक्रिया के वर्तमान रूप को उसका अंतिम रूप नहीं समझता और न ही व्यवहार में उसे ऐसा मानता है. इसलिए इसका तकनीकी आधार क्रांतिकारी है जबकि इसके पहले वाली उत्पादन की तमाम प्रणालियाँ बुनियादी तौर पर रुढिवादी   थीं. मशीनों, रासायनिक प्रक्रियायों तथा अन्य तरीकों की सहायता से आधुनिक उद्योग उत्पादन के तकनीकी आधार के साथ-साथ मजदूरों के काम और श्रम-प्रक्रिया के सामाजिक संयोजन में लगातार परिवर्तन कर रहा है. साथ ही यह उसी निरंतरता से इस समाज में पाए जाने वाले श्रम विभाजनों में परिवर्तन कर देता है तथा पूंजी की मात्रा तथा मजदूरों के समूहों को उत्पादन की एक शाखा से दूसरी शाखा में लगातार स्थानांतरित करता रहता है.” (मार्क्स, कैपिटल खंड 1, 524-526) पूंजीवाद के ऐतिहासिक भूमिका के प्रश्न के उत्तर के लिए देखें, प्लेखानोव (1856-1918) Georgi Plekhanov – Our Differences (हमारे मतभेद, रचनावली, रूसी संस्करण, खंड 1, पृ. 230-237)

9. पूरे विश्व में पूंजीवाद का विस्तार

सोलहवीं शताब्दी के दौरान पूरी दुनिया में बाज़ार के विस्तार ने पूंजीवाद के विकास को संवेग प्रदान किया. लेकिन अठारवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के बाद ही बुर्जुआ वर्ग धरती के सारे क्षेत्र पर फैलने में सफल हो सका. पृथ्वी के दूरस्थ स्थानों में प्रवेश करने के लिए बुर्जुआ वर्ग ने धर्म-प्रचारकों और वैज्ञानिकों का इस्तेमाल किया. 1770 से 1848 के बीच अंग्रेजों ने आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और सारे हिंदुस्तान पर अधिकार कर लिया था. फ्रांस, जिसे नेपोलियन के युद्धों में अपने अधिकांश औपनिवेशिक क्षेत्रों को अंग्रेजों के हवाले करना पड़ता, ने उत्तरी अफ्रीका के बड़े क्षेत्रों को कब्जे में करके अपने नुकसान की भरपाई कर ली थी.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-7. विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

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7. विनिमय का विकास और नकद भुगतान का प्रभुत्व

“विनिमय का अपना अलग इतिहास है और यह विकास के विभिन्न मंजिलों से होकर गुजरा है. एक वक्त था, उदाहरण के लिए मध्ययुग में, जब केवल फ़ाजिल चीजों यानि केवल उन चीजों का जो जनता की ज़रूरतों से अधिक उत्पादित होती थीं, का विनिमय किया जाता था. दूसरा वक्त आया जब न केवल उत्पादन का अधिशेष बल्कि उद्योग का सम्पूर्ण उत्पाद वाणिज्य के क्षेत्र में पहुँचने लगा. यह वह वक्त था जब उत्पादन पूर्णतया विनिमय पर निर्भर हो गया था. अंत में वह दिन भी आ गया जब उन चीजों का जिन्हें पहले अहस्तान्तरणीय समझा जाता था, विनिमय और मोल-टोल होने लगा. वास्तव में वे चीजें बेचीं भी जाने लगी. वे चीजें भी जो अभी तक सौंपी जाती थीं, विनिमय नहीं की जाती थीं, दी जाती थीं, बेची नहीं जाती थीं – सतीत्व, प्रेम, अभिमत, विज्ञानं, अंतरात्मा आदि – वाणिज्य के हवाले कर दी गयीं. यह बड़े पैमाने के भ्रष्टाचार और सार्विक धन -लोलुपता का वक्त है या राजनितिक अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो यह एक ऐसा वक्त है जबकि हर चीज़ चाहे भौतिक हो या आत्मिक, बिक्री योग्य माल बन गयी है, उचित मूल्य-निर्धारण हेतु बाज़ार में ले जायी जा रही है.” ((मार्क्स, द पॉवर्टी ऑफ फिलासफी, बीपीएच, कलकत्ता, पृ. 26)

“जब किसी माल में विनिमय-मूल्य को संभाले रखने और जमा करने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है, तब मुद्रा के प्रति लालच का जन्म होता है. मालों का परिचलन बढ़ने के साथ मुद्रा की, अर्थात उस सर्वथा सामाजिक रूप की जिसका हर वक्त इस्तेमाल किया जा सकता है, शक्ति बढती जाती है. १५०३ में जैमाका से लिखे पत्र में कोलंबस बताते हैं : “सोना एक आश्चर्यजनक वस्तु है. जिसके पास पास है वह जो भी चाहे हासिल कर सकता है. सोना आत्माओं के स्वर्ग तक जाने का रास्ता बना सकता है.” मुद्रा चूंकि यह खुलासा नहीं करती है कि कौनसी चीज़ उसमें रूपांतरित हुई है, इसलिए हर चीज़ चाहे वह माल हो या न हो, सोने से बदली जा सकती है. हर चीज़ बिकाऊ बन जाती है और हर चीज़ खरीदी जा सकती है. परिचलन वह विशाल सामाजिक दहनपात्र बन जाता है जिसमें हर चीज़ डाली जाती है और जिसमें से हर चीज़ मुद्रा का रूप धारण करके निकल आती है. यहाँ तक कि संतों की हड्डियाँ तक इस कीमियागिरी के सामने नहीं ठहर पाती हैं. इसमें से ज्यादा नाजुक चीजें, वे पवित्र चीजें जो मनुष्यों के व्यापारिक लेन-देन से बाहर हैं, तो इस कीमियागिरी के सामने और भी कम ठहर पाती हैं. जिस प्रकार मालों के बीच मात्रात्मक भिन्नता का लोप मुद्रा में हो जाता है उसी प्रकार मुद्रा बेरहमी से सबकुछ सपाट कर देने वाला, अपनी ओर से हर तरह के भेदभाव समाप्त कर देती है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1, अंग्रेजी संस्करण, 112-13) capital

औद्योगिक क्रांति की पूर्वसंध्या पर ब्रिटेन में विद्यमान काव्यात्मक और पितृसत्तात्मक संबंधो को एंगेल्स ने अपनी कृति इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की दशा (द कन्डीशन ऑफ द वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, लंदन, 1892) में भली-भांति चित्रित किया है. १८४५ में लिखते समय इस पुस्तक में वह उन बुनकरों का चित्र प्रस्तुत करते हैं जो अभी भी भूमि के छोटे टुकड़े पर मालिकाना हक़ रखे हुए थे : “मेहनतकशों के इस वर्ग का नैतिक और बौद्धिक जीवन किस तरह का था , इसका अनुमान लगाने के लिए कल्पना की उड़ान की आवश्यकता नहीं है. वे शहर से कटे रहते थे जहाँ वे कभी नहीं जाते थे (क्योंकि घुमंतू एजेंट उनसे धागा और कपड़ा खरीद लेते थे और बुनकरों को इसके बदले में मजदूरी दे दिया करते थे). यहाँ तक कि साड़ी जिंदगी शहर के पास गुजारने के बावजूद, अपने बुढापे में वे कहा करते थे कि उन्होंने वहां अभी तक कदम नहीं रखा. यह स्थिति तब तक चलती रही जब तक कि मशीन के प्रवेश ने उन्हें आजीविका के साधन से वंचित नहीं कर दिया और उन्हें रोजगार की खोज में शहर जाने को मजबूर नहीं कर दिया. बुनाई के काम से मिली छुट्टी के दौरान वे अपनी छोटी जोत में खेती करते थे जिसकी वजय से उनका बौद्धिक और नैतिक स्तर अपने इलाके के भूधर किसान से मिलता-जुलता था जिससे वे स्वेच्छा से मेल-जोल बढाते और सर्वाधिक आत्मीयता के सम्बन्ध बनाए रखते थे. अपने इलाके के प्रमुख भूस्वामी ज़मींदार को वे सहज ही अपना श्रेष्ठ समझते थे. वे अपने छोटे-मोटे झगड़ों के निपटारे के लिए उससे सलाह लेने जाते और इस पूज्य सम्बन्ध को बनाये रखने के लिए उसे यथोचित सम्मान भी देते थे. वे ‘सम्मानीय लोग’ माने जाते थे जो अच्छे पति और पिता हुआ करते थे. वे सदाचारी जीवन बिताया करते थे क्योंकि उन्हें अनैतिक बना देने वाला कोई प्रलोभन मौजूद नहीं था यदि यह तथ्य ध्यान में रखा जाये कि उन दिनों ग्रामीण क्षेत्रों में शराबखाने और चकले नहीं हुआ करते थे. और चूंकि मेरा मेज़बान जिसके भटियारखाने में वे कभी-कभार अपना गला तर करने जाते थे, उन्हीं की तरह “भला” आदमी, या शायद असामी किसान होता जिसे अपनी अच्छी बियर अपनी अच्छी श्रेणी पर गर्व हुआ करता और जो छुट्टी के दिन या त्यौहार पर अपनी दूकान बंद कर देने की सावधानी बरतता. बच्चे घर पर रखे जाते थे, उन्हें आज्ञापालन की शिक्षा दी जाती थी और उनका लालन-पालन परमेश्वर पर श्रद्धा बनाये रखने वाले माहौल में किया जाता. जब तक नौजवान अविवाहित रहते, यह पितृसत्तात्मक सम्बन्ध उन्हें दृढ़ता से बांधे रखता था. विवाह होने तक बच्चे ग्रामीण सादगी और अपने बाल सखाओं के निकट साहचर्य में रहकर बड़े होते थे. यद्यपि विवाह के पहले स्त्री-पुरुष के बीच अन्तरंग संबंध कायम होना लगभग सामान्य था तो भी इन जोड़ों के बीच यह बात बिलकुल साफ़ हुआ करती थी कि यह वैवाहिक समारोह का पूर्वाभ्यास मात्र है जिसे कालांतर में संपन्न कर दिया जाता था. संक्षेप में,उन दिनों अंग्रेज़ कारीगरों और शिल्पकारों की सक्रीय जिंदगी और सेवा-निवृति का वक्त एकांत में, बौद्धिक गतिविधि और प्रचंड व्याकुलता का उनकी जीवन-शैली में कोई स्थान लिए बिना, बीत जाता था जो आज भी (1845) जर्मनी के कुछ हिस्सों में पाया जाता है. शायद ही कभी उन्हें पढना आता और बिरले ही वे लिखना जानते. वे नियमित रूप से गिरजाघर जाते थे, कभी भी राजनीती पर बात नहीं करते थे, कभी भी कोई सामूहिक षड़यंत्र नहीं रचते थे, गंभीर चिंतन के लिए वक्त नहीं निकालते थे, शारीरिक रंगरेलियों और क्रीडाओं को बहुत पसंद करते थे, बाइबिल के प्रवचन को पारम्परिक श्रद्धा के साथ सुनते थे और अपने से श्रेष्ठों को पूरी नम्रता के साथ नीचे झुककर और श्रद्धापूर्वक सम्मान देते थे. लेकिन बौद्धिक दृष्टिकोण से वे मृत थे, जिंदगी से उनका सरोकार अपने संकीर्ण हितों, अपने करघे और अपने छोटे बगीचे तक सीमित थे और उनकी सीमित दुनिया के पार समग्र मानवता को आलोड़ित करने वाले प्रचंड आन्दोलन की कोई समझ नहीं थी. वे अपने शांत और निष्क्रिय जीवन के आदी हो गये थे. यदि औद्योगिक क्रांति नहीं हुई होती, तो उन्हें उस जिंदगी से निजात नहीं मिलती जो रूमानी किस्म की मोहकता के बावजूद मानवीय अस्तित्व के लायक नहीं थी. सच्चाई यह है कि वे इन्सान नहीं थे बल्कि मात्र मशीन बन गये थे जो उन कुलीनों के एक छोटे से समूह की सेवा कर रही थी जोकि अभी तक इतिहास का आधार रहे थे. (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ 2-4) The Condition of the Working Class in England — Frederick Engels

पूंजीवादी समाज का प्रधान घटक, नकद भुगतान, बुर्जुआ की मनोवृत्ति का प्रमुख प्रेरक तत्त्व है. इसलिए इस नारे “मुद्रा को बटुवे में रख लो” का जन्म हुआ. एंगेल्स निम्न पंक्तियों में इसका सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं : “जब तक उसके मजदूर अपने जीते जी उसके लिए प्रचुर धन अर्जित करते रहते है, अंग्रेज़ बुर्जुआ को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे भूख से मर रहे हैं या नहीं. हर चीज़ की कीमत मुद्रा में आंकी जाती है और हर वह चीज़ जो मुद्रा न अर्जित कर पाती हो उसे उपहासास्पद, अव्यवहारिक और विचारधारात्मक मूर्खता समझा जाता है…उसके लिए मजदूर इन्सान न होकर मात्र एक ‘कारीगर’ होता है और मजदूर के सामने भी बुर्जुआ उनकी चर्चा इसी तरह करता है. जैसाकि कार्लाईल कहते हैं कि बुर्जुआ यह मानता है कि “नकद भुगतान एक इन्सान और दूसरे इन्सान के बीच का एक मात्र सम्बन्ध है.” यहाँ तक कि वह बंधन जो पति को पत्नी के साथ बाँधता है, सो में से निन्यानबे मामलों में नकद मुद्रा के रूप में व्यक्त किया जा सकता है. दासत्व की दयनीय स्थिति जो मुद्रा ने बुर्जुआ पर थोपी है, उसने अंग्रेजी भाषा पर भी अपनी छाप छोड़ दी है. यदि आप यह बताना चाहते हैं कि किसी व्यक्ति के पास 10,000 पाउंड हैं तो उसे इस तरह कहा जाता है कि ‘अमुक व्यक्ति की कीमत 10,000 पाउंड है.’ जिसके पास धन होता है वह ‘सम्मानीय समझा जाता है और तदनुसार उसे महत्त्व दिया जाता है : उसकी गणना बेहतर किस्म के लोगों’ में की जाती है और वह ज्यादा असर डालता है. वह जो कुछ भी करता है उसके साथियों के लिए मानक बन जाता है. यह अवांछित मनोवृत्ति सारी भाषा में समां गयी है. सभी सम्बन्धों को व्यापारिक शब्दावली से उधार लिए गए शब्दों में व्यक्त किया जाता है और इसका समाहार आर्थिक श्रेणियों में किया जाता है. आपूर्ति और मांग का सूत्र अंग्रेजों के समग्र जीवन दृष्टिकोण को व्यक्त करता है. इसलिए मानवीय गतिविधि के प्रत्येक क्षेत्र में स्वतन्त्र प्रतिस्पर्द्धा का होना आवश्यक है, इसलिए शासन, चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में अवरोधहीनता और अहस्तक्षेप की नीति का पालन आवश्यक है. जल्दी ही अहस्तक्षेप की नीति धर्म के क्षेत्र में प्रवेश कर जायेगी क्योंकि जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा है राजकीय चर्च का चुनौतीरहित प्राधिकार ज़्यादा तेज़ी से ध्वस्त होता जा रहा है.” (एंगेल्स, द कन्डीशन ऑफ वर्किंग क्लास इन इंग्लैंड, पृ 277)

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-6. बुर्जुआ वर्ग का राजनितिक विकास

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6. बुर्जुआ वर्ग का राजनितिक विकास

यहाँ पर लेखकों का मंतव्य सर्वप्रथम और प्रमुख रूप से फ्रांसीसी बुर्जुआ के राजनितिक विकास पर विचार करना है. अन्यंत्र मार्क्स लिखते हैं : “बुर्जुआ वर्ग के इतिहास को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है. पहले चरण के दौरान सामंती व्यवस्था और निरंकुश राजतन्त्र के अधीन बुर्जुआ वर्ग के रूप में विभेदीकृत होता है. दूसरा चरण तब आता है जब यह वर्ग के रूप में पहले से ही संगठित हो जाता है, सामंती सामाजिक व्यवस्था और राजतन्त्र को उखाड़ फेंकता है और पुरानी व्यवस्था के स्थान पर बुर्जुआ व्यवस्था स्थापित कर लेता है. पहले चरण को दूसरे चरण की अपेक्षा ज्यादा वक्त लगा और अपनी कार्यसिद्धि के लिए अधिक उर्जा व्यय करनी पड़ी”. (मार्क्स, द पॉवर्टी ऑफ फिलासफी, बीपीएच, कलकत्ता, पृ.136-37)  [The Poverty of Philosophy Answer to the Philosophy of Poverty by M. Proudhon]

बाहरवीं और तेरहवीं शताब्दी में, फ्रांसीसी कम्यून सामंती जागीरदारों के खिलाफ संघर्ष में उलझे हुए थे और सामंतों की बीच झगडों का उसने फायदा उठाया. (जिसकी एंगेल्स घोषणापत्र के बाद के संस्करणों की टिपण्णी में बताते हैं कि “कम्यून” नाम इटली और फ्रांस के शहरी समुदायों ने तब अपनाया था जब उन्होंने सामंती स्वामियों से स्व-शासन का अधिकार क्रय कर लिया था.) चौदहवीं शताब्दी के प्रारन्भिक वर्षों में उन्होंने स्टेट्स जनरल के प्रतिनिधित्व की मांग की. इस सभा को पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करना था. 1356 से 1358 तक पेरिस के व्यापारियों के अध्यक्ष एतियन मार्सेल (मृत्यु 1358) के नेतृत्व में, पेरिस के बुर्जुआ ने स्टेट्स जनरल को वास्तविक प्रातिनिधिक संस्था में बदलने की कोशिश की जिसकी बैठक, राजा के बुलावे की प्रतीक्षा किये बिना निर्धारित अवधि पर की जा सके. निरंकुश सम्राट ने विभिन्न श्रेणियों (पुरोहित वर्ग,कुलीन वर्ग आदि  के बीच मतभेदों का फायदा उठाकर बुर्जुआ पक्ष से समझौता कर लिया. बुर्जुआ वर्ग “थर्ड एस्टेट” (राज्य का तीसरा स्तम्भ), कर-योग्य श्रेणी, केंद्रीकृत राजतान्त्रिक राज्य का एक मान्यता-प्राप्त अंग बन गया जिसने राजकीय तंत्र का उपयोग व्यापारिक और औद्योगिक विकास के हित में करने के लिए अपनी सारी शक्ति केन्द्रित कर दी. इस आन्दोलन के शीर्ष पर वे बुर्जुआ धन्नासेठ थे जिन्होंने उन दरबारी कुलीनों के साथ मिलकर जो समर्थन के लिए इस उभरती ताकत की ओर उन्मुख हो गए थे, राजतंत्रीय शक्ति का उपयोग अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति के एक साधन के रूप में करने की कोशिश की. इस नीति की असफलता ने, क्योंकि यह मेहनतकश जनता के निर्मम शोषण और निम्न-बुर्जुआ हितों की पूर्ण उपेक्षा पर आधारित थे, महान फ्रांसीसी क्रांति का रास्ता साफ़ कर दिया जो अठारहवीं शताब्दी के अंत में भड़क उठी थी. नेपोलियन के मध्यवर्ती शासन (1815 में समाप्त हो गया था) और बूर्बो वंश की पुनप्रतिष्ठा के बाद 1830 में क्रांति हुई और “जुलाई राजतन्त्र” की स्थापना हुई जोकि बुर्जुआ मताधिकार पर आधारित संसदीय सरकार का क्लासिकीय रूप था.

नीदरलैंड में, नागरिकों, ने सामंती संस्थाओं के खिलाफ अविराम संघर्ष किया.यह संघर्ष कभी-कभी वास्तविक गृह-युद्ध (उदाहरण के लिए 1324 का वाइप्रे और ब्रूगे के नेतृत्व में फ्लेमिश नगरों का विद्रोह जो कई वर्षों तक चला)  का रूप धारण कर लेता था. सोलहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश के दौरान नीदरलैंड के बुर्जुआ ने मध्यवर्ती और निम्न कुलीनों के सहयोग से हैप्सबर्ग वंश के शासन के खिलाफ राष्ट्रीय विद्रोह का नेतृत्व किया और लम्बे और तीखे संघर्ष के बाद लोलैंड ने विदेशी शासन से स्वतंत्रता प्राप्त कर ली. नीदरलैंड पहला बुर्जुआ राज्य बना और सत्रहवीं शताब्दी के बाद से ही अन्य सभी बुर्जुआ राज्यों के लिए मॉडल बन गया जोकि कालांतर में पश्चिमी यूरोप में स्थापित हुए.

इटली के स्वतन्त्र नगर गणराज्य, भूस्वामी कुलीनों के शासन के जुवे को उतार फेंकने के बाद, धीरे-धीरे व्यापारिक और औद्योगिक अल्पतन्त्र का रूप धारण करने लगे. लेकिन उत्तरी इटली की व्यापारिक प्रधानता (जहाँ पर व्यापारिक पूंजीवाद का विकास यूरोप के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा पहले हो गया था) के ह्नास के साथ-साथ नगरों में पूंजीवाद के विकास में गतिरोध आ गया. इस प्रकार इन व्यापारिक नगरों ने अपना पहले वाला महत्त्व खो दिया और उन्नीसवीं शताब्दी में ही इतालवी बुर्जुआ के सुदृढीकरण की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू हो पाई.

ग्रेट ब्रिटेन में नगरीय समुदाय ने संसदीय प्रतिनिधित्व बहुत अरसा पहले हासिल कर लिया था लेकिन औद्योगिक पूंजीवाद का विकास आरंभ होने के बाद ही ब्रिटिश बुर्जुआ का सलाहकार और याचक की भूमिका से संतुष्ट होना ख़त्म हो गया और राजनितिक सत्ता के लिए उसका संघर्ष उग्रतर होता चला गया. संसदीय युद्ध जो 1641 से 1649 तक चला, चार्ल्स प्रथम को फांसी और ओलिवर क्रोमवेल के नेतृत्व में राष्ट्रकुल की स्थापना के बाद ख़त्म हुआ. स्टुअर्ट वंश की पुनप्रतिष्ठा की अल्पावधि के बाद क्रांति 1688 में नए रूप में भड़क उठी और इस मर्तबा संसदीय राजतन्त्र स्थापित करने में सफल हो गयी. अब बुर्जुआ को भूस्वामी अभिजातों के रूप में सुयोग्य मित्र मिल गया था जिसका बुर्जुआकरण तेजी से हो रहा था. आर्थिक क्षेत्र में सत्ता बुर्जुआ के अधिक प्रभावशाली संस्तर के अधीन हो गयी जैसाकि फ्रांस में भी इसके बाद घटित हुआ. 1832 में चुनाव सुधारों और 1846 में अनाज कानून के बाद उन्नीसवीं शताब्दी काफी आगे बढ़ गयी थी तब जाकर विश्व बाज़ार के शोषण के लिए एकजुट समग्र बुर्जुआ वर्ग के लिए ब्रिटिश राज्य ज्वाइण्ट-स्टॉक कंपनी में तबदील हो गयी.

जिन देशों में राजनितिक एकता स्थापित नहीं हो पाई थी उनमें राजनितिक केन्द्रीकरण का सटीक अध्ययन जर्मनी और इटली जैसे देशों के उन्नीसवीं सदी के इतिहास में किया जा सकता है. जहाँ तक फ्रांस का सवाल है इस प्रक्रिया ने विशेषतया तीव्र और विशिष्ट रूप धारण कर लिया था. यहाँ पर बुर्जुआ राजनितिक केन्द्रीकरण 1789 और 1815 के वर्षों के दौरान हो गया था हालाँकि 1830, 1845-50 और 1870-75 के दौरान इसे परिपूर्ण किया गया.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-5. औद्योगिक क्रांति और मशीन से उत्पादन का विकास

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5. औद्योगिक क्रांति और मशीन से उत्पादन का विकास

अठारहवीं शताब्दी के अंत में नयी मशीनों के आविष्कार से औद्योगिक क्रांति शुरू हुई थी जिसके परिणामस्वरूप पूंजीवादी मैन्युफैक्चर का स्थान बड़े पैमाने के उत्पादन ने लिया था. इसमें इंग्लैंड ने नेतृत्व प्रदान किया था और मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि यह क्रांति उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम अर्धांश के पहले समाप्त नहीं हुई थी. इसकी शुरुआत कुछ अदद खोजों और आविष्कारों, प्रमुख रूप से पशु-प्रजनन, कृषि, खनन, वस्त्र-उत्पादन के क्षेत्रों में, के साथ हुई थी. इसे शुरुआती संवेग मिला उन यंत्रों के विस्तार से जिन्हें वर्किंग मशीन के नाम से जाना जाता था. इन वर्किंग मशीनों ने कारीगरों के औजारों और मैन्युफैक्चर करने वाले श्रम को विस्थापित कर दिया. 1733 में जान के (1733 से 1764 तक फला-फूला) ने अपनी फ्लाई-शटल का पेटेंट प्राप्त किया जिससे शटल को आगे पीछे ले जाने के लिए केवल एक व्यक्ति की जरूरत रह गयी थी. यांत्रिक कताई के विकास में प्रथम चरण पूरा करने का काम लेवी पाल (मृत्यु 1759) के आविष्कार से संपन्न हुआ जिन्हें 1738 में इसका पेटेंट प्राप्त हुआ और जिसकी सहायता जान वायट (1700-1766) ने की थी. “बिना अँगुलियों के कताई करने” में समर्थ मशीन के रूप में इसकी चर्चा की गयी है (कैपिटल, खंड 1,392). 1766 में जेम्स हरग्रीव्ज़ (1778 में मृत्यु) जो एक बुनकर और बढ़ई था, ने सूती कपडा के मैन्युफैक्चर में इस्तेमाल की जाने वाली स्पिनिंग- जेनी का आविष्कार किया. 1767 में रिचर्ड आर्कराईट (1732-1792) ने प्रसिद्व कताई ढांचे का आविष्कार किया जिसका मुख्य महत्त्व ताना का प्रावधान किया जाना था जिसका हरग्रीव्ज़ के आविष्कार में अभाव था. सैम्युअल क्राम्पटन (1733-1827) जोकि एक परिश्रमी  किसान और बुनकर था, ने कताई चट्टी के  आविष्कार में पॉँच साल लगाए और इस मशीन ने सबसे बारीक धागा बनाने में हरग्रीव्ज़ और आर्कराईट की मशीन को पीछे छोड़ दिया. पहले पावरलूम का आविष्कार एडम कार्टराईट (1743-1823) द्वारा 1785 में ही कर लिया गया था लेकिन इसके कुछ सालों बाद ही सूती कपडा मिल के मालिक जान होरक्स (1768-1804) द्वारा ही यह आविष्कार लोक-सुलभ बन सका. उन्नीसवीं शताब्दी के तीसरे और चौथे दशक तक वस्त्र-उद्योग में, पावरलूम ने पुराने किस्म के हैंडलूम का स्थान ले लिया था.

अठारवीं शताब्दी के दौरान खनन-उद्योग के विकास (1700 में कोयला उत्पादन 214,800 टन से बढ़कर  1770 में 7,205,400 टन हो गया था) ने पानी निकालने वाली मशीन के सार्विक उपयोग को आवश्यक बना दिया. वाष्प-शक्ति का पहला व्यवहारिक उपयोग खानों से पानी बाहर निकालने के काम में  ही किया गया. वाट के इंजन ने वाष्प-चालित पम्पों के उपयोग को व्यापक बनाने का ही काम किया जिसकी शुरुआत न्युकोमेन (1663-1729)  द्वारा की गयी थी. वाट का नया पम्प दुहरा काम करने वाला इंजन था जिसका और सुधार उस पेटेंट के ज़रिए किया गया जो उसने 1784 में प्राप्त किया. अब उस चालक बल. जिसका अभी तक लगभग पूरे तौर पर केवल खनन उद्योग में उपयोग किया जा रहा था, का लाभदायक ढंग से उपयोग कताई मीलों और पावरलूम को चलाने में किया जाने लगा और इस प्रकार उर्जा के स्रोत के रूप में वाष्प ने जल का स्थान ले लिया. उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश में वस्त्र-उद्योग में वाष्प शक्ति का उपयोग लगभग सार्विक हो गया था. इसके बाद वाष्प-चालित परिवहन की बारी आई. 1807 में रॉबर्ट फुल्टन स्टीफेंसन  (1765-1815) ने वाष्प-चालित नौपरिवहन की खोज को परिपूर्ण किया और जार्ज स्टीफेंसन (1781-1848) ने रेल इंजन बनाया जिसका सफल परिक्षण 1814 में हुआ. पांच साल बाद प्रयोग के लिए उसने रेल की पटरी बिछ्बायी. 1819 में पहले वाष्प-पोत ने अमेरिका से यूरोप की यात्रा की और इसी समुद्री यात्रा में 26 दिन का वक्त लगा. वर्ष 1825 में इंग्लैंड में पहला रेलमार्ग जनसाधारण के लिए खोल दिया गया. 1830 में ब्रिटिश रेलमार्ग लगभग 57 मील लम्बाई में बिछ गया था, 1840 में 843 मील और 1850 में यह दूरी 6630 मील तक पहुँच गयी थी.

कृषि के क्षेत्र में, पुरानी तीन-खेत व्यवस्था का स्थान फसलों के चक्रानुसरण ने ले लिया. रॉबर्ट बेकवेल (1725-1795) ने पशुधन प्रजनन के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों से इसे कारखाना उद्योग की एक शाखा जैसा बना दिया और बाज़ार की विभिन्न ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के जानवरों का उत्पादन करने में उसने आश्चर्यजनक कुशलता का परिचय दिया. लम्बे बालों वाली लीसेस्टर भेड़ और लम्बे सींगों वाले डिश्ले मवेशी, जोकि बहुत प्रसिद्द थे, के प्रजनन में उसे विशेषज्ञता हासिल थी. पुराने ग्रामीण सम्बन्ध अब ज्यादातर पूंजीवादी उत्पादन की दशाओँ के अनुकूल होते जा रहे थे. भूस्वामी कुलीन वर्ग और भूमिहीन किसान के साथ-साथ बड़ी जोत वाले किसान का उदय हुआ जोकि सार रूप में औद्योगिक पूंजीपति था जो भूमि पर उज़रती मजदूर के श्रम का शोषण करता था और इस प्रकार अपने लिए लाभ और भूस्वामी के लिए लगान निकालता था. उन्नीसवीं शताब्दी में कृषि में पूंजीवादी प्रवृत्ति बहुत सुस्पष्ट हो गयी थी.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-4. मैन्युफैक्चर

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[‘कम्यूनिस्ट घोषणापत्र’ पर राजनीतिशास्त्र के कई विद्वानों ने व्याख्याएँ और टिप्पणियां लिखी हैं. इनमें अब तक सर्वाधिक गंभीर, वैज्ञानिक और सटीक व्याख्याएँ-टिप्पणियां क्रांति के बाद मास्को में स्थापित मार्क्स-एंगेल्स इन्स्टीट्यूट के निदेशक डेविड रियाज़ानोव की ही मानी जाती रही हैं. 1923 में प्रकाशित कम्यूनिस्ट घोषणापत्र की ये व्याख्याएँ-टिप्पणियां तत्काल पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गयीं और अधिकांश कम्यूनिस्ट पार्टियों ने इन्हें पाठ्यपुस्तक-सा बना लिया था. रियाज़ानोव की घोषणापत्र पत्र पर विस्तृत, व्याख्याओं को यहाँ श्रंखलाबद्ध रूप से प्रकाशित किया जा रहा है जो कि कम्युनिज्म के गंभीर अध्येताओं के साथ ही युवा कार्यकर्त्ताओं और इस युग की परिवर्तनकारी विचारधारा को समझने में रूचि रखने वाले हर व्यक्ति के लिए आज भी बहुमूल्य और बेहद उपयोगी सिद्ध होंगी–संपादक ]

4. मैन्युफैक्चर

यहाँ पर हम औद्योगिक विकास के चरण के रूप में मैन्युफैक्चर की चर्चा कर रहे हैं. ऐतिहासिक दृष्टि से स्वतन्त्र कारीगर के खिलाफ प्रतितुलन के रूप में मैन्युफैक्चर का विकास हुआ था. जब व्यापारिक पूंजीपति स्वतन्त्र कारीगरों को अपने जाल में फंसा लेता है तब वह व्यापारी-उद्धमी के रूप में स्वंतंत्र कारीगरों को बड़ी संख्या में एक छत के नीचे इकठ्ठा कर देता है जो किसी नियत कार्य (उदाहरण के लिए दर्जी का काम) के एक या दूसरे हिस्से को पूरा करने के लिए काम करते हैं या फिर किसी माल के विभिन्न हिस्सों को बनाते है, फिर इन हिस्सों को जोड़कर कोई एकल उत्पाद (जैसेकि बैलगाडी) बनाया जाता है. इस तरह के मैन्युफैक्चर का लाभ, इसकी शुरुआत के आरम्भिक दिनों में, इस बात में निहित है कि उत्पादन का बहुत विस्तार हो जाता है और अनावश्यक व्यय कम हो जाता है. इस आधार पर एक व्यवस्था निर्मित होती है जिसमें ज्यादातर विशेषीकृत श्रम की आवश्यकता होती है जब तक कि मैन्युफैक्चर एक एकीकृत प्रक्रिया में रूपांतरित न हो जाये जिसके अंतर्गत पृथक अनुभाग की निगरानी उन मज़दूरों द्वारा की जाती है जो स्वयं किसी वस्तु का एक गौण हिस्सा बनाते हैं जबकि उनके पूर्वगामी पूरी वस्तु को बनाया करते थे. इस प्रकार इस प्रक्रिया में वे एक औजार बन जाते हैं. इंग्लैंड में, हॉलैंड में और बाद में फ्रांस में पूंजीवादी उत्पादन का मैन्युफैक्चरिंग काल सोलहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश में आरम्भ हुआ और अठारहवीं शताब्दी की आरम्भिक दशाब्दियों में अपने चरम पर पहुंचा. [यहाँ पर यह ध्यान रखना जरूरी है घोषणा पत्र के रचयिताओं ने ऊपर व्याख्यायित सीमित अर्थों में “मैन्युफैक्चरिंग” शब्द का प्रयोग किया है न कि वृहद् अर्थों में जो “मशीन के उत्पादन” को भी समेट लेता है जिसका उल्लेख अगली टिपण्णी में किया गया है.]

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-3. मध्ययुगीन अर्थव्यवस्था का ह्नास, भूगोलिक खोजों का युग और विश्व-बाज़ार की शुरुआत

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3. मध्ययुगीन अर्थव्यवस्था का ह्नास, भूगोलिक खोजों का युग और विश्व-बाज़ार की शुरुआत

पंद्रहवीं शताब्दी के दूसरे अर्धांश के पहले से ही छोटे पैमाने के उत्पादन पर आधारित मध्ययुगीन समाज अपकर्ष की सक्रिय प्रक्रिया से गुज़र रहा था. देश और विदेश में विनिमय के साधनों की त्वरित वृद्धि के परिणामस्वरूप वित्तीय अर्थव्यवस्था के उदय ने वित्तीय और व्यापारिक पूँजी के विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं. ग्रामीण क्षेत्रों में सामंती शुल्क का भुगतान जिन्स  के रूप में किया जा रहा था; स्वतन्त्र किसान और भूदासों की छोटे पैमाने के कृषि उत्पादन की स्थिति एक साथ ख़राब हो रही थी; सामन्ती जमींदार फार्मर बनते जा रहे थे और मुद्रा के रूप में धन इकठ्ठा करने के लिए प्रत्येक साधन का इस्तेमाल कर रहे थे. सामन्ती जागीरदारों ने विशाल कर्मचारी समुदाय और दरबारी लोगों को निकाल दिया. इन बेसहारा लोगों और उन बेदखल किसानों, जिन्हें उस भूमि से वंचित कर दिया गया था जिसे वे और उनके पूर्वज अनगिनत पीढियों से जोतते आ रहे थे, ने “हट्टे-कट्टे बदमाशों और आवारा लोगों” की कतारों में वृद्धि कर दी जो राजमार्ग पर गतिरोध उत्पन्न कर देते थे और शहरों में भीड़-भाड़ कर देते थे. स्वतन्त्र शिल्प-संघ जिनमें उस्तादों और कारीगरों के बीच अनबन से दरार पड़ गयी थी, व्यापारिक पूँजी के अधीन हो गए.

धातुकर्मीय उत्पादन, वस्त्र उत्पादन, नौपरिवहन, युद्ध-सामग्री उत्पादन, घड़ी-निर्माण, खगोलीय यंत्रों के क्षेत्रों में हुए अनेक तकनीकी सुधारों; छापाखानों का आविष्कार; वैज्ञानिक अनुसन्धान की प्रगति, विशेषतया खगोलीय विश्व में नयी खोजों – इन सबने उत्पादक शक्तियों के विकास को जोरदार संवेग प्रदान किया और उद्धमी मानसिकता के व्यक्तियों को पहल करने के लिए प्रोत्साहित किया. भूमध्य सागर के पश्चिमी हिस्से या अटलांटिक महासागर के तटवर्ती क्षेत्रों (जेनोआ या लिस्बन) जैसे बंदरगाहों में व्यवसाय का संचालन करने वाले व्यापारियों और मैन्युफैक्चर करने वालों, तथा एशियाई व्यापार पर एकाधिकार रखने वाले और पूर्वी भूमध्य सागर के स्वामी वेनिसवासियों के बीच प्रतिस्पर्द्धा ने पुर्तगालियों, जेनेवावासियों और स्पेनी व्यापारिक दु:साहसियों को इंडीज़ के लिए नए मार्ग की तलाश के लिए उकसाया. पुर्तगाल के राजा जोआओ और गांट के जान की पुत्री अंग्रेज़ राजकुमारी फिलिप्पा के चौथे पुत्र महान नौसंचालक राजकुमार हेनरी (1394-1460) ने पंद्रहवीं शताब्दी के आरम्भिक अर्द्धांश में ही भौगोलिक खोजों में किये गए योगदान के लिए ख्याति प्राप्त कर ली थी. उसने अफ्रीका के तट पर स्थित उन स्थानों के लिए जहाज भेजे जो अब तक अनजान थे और 1418 तथा 1420 में उसके कप्तानों ने पोटों सान्टो और मडीरा की दुबारा खोज की. अजोर्स की खोज के लिए समुद्री अभियान भेजने का श्रेय भी उसको जाता है जिसका पुर्तगालवासियों द्वारा उपनिवेशीकरण तेजी से आगे बढा. 1460 तक राजकुमार हेनरी के पोत भूमध्यरेखा के निकटतर स्थानों, केप वर्डे से करीब एक सौ लीग से आगे तक पहुँच गए थे. इसके बाद 1486 में बार्थोलेम्यू (1455-1500) ने केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाया. इसके पहले कि  पुर्तगाली इंडीज़ के नए मार्ग की खोज के लिए अगला अभियान भेज सकें, जेनेवावासी नाविक क्रिस्टोफ़र कोलम्बस (1446-1506) ने अपने अभियान में पश्चिम की ओर रूख़ किया और 1492 में वेस्ट इंडीज़ के टापुओं की खोज की. जान कैबर (1450-1557)  1497 में अमेरिका के उत्तरी तट पर उतरा. लेकिन इसके एक साल बाद ही वास्को डि गामा (1451-1512) ने डियाज़ द्वारा शुरू किये गए काम को पूरा किया और भारत के समुद्री मार्ग का पता लगाया. दो वर्ष बाद “फ्लोरेंसवासी नाविक अमेरिगो वेस्पूची (1451-1512) ब्राजील के तट तक पहुँच गया और उसी के नाम पर अमेरिकी महाद्वीप का नामकरण हुआ. 1500 में पुर्तगाली सेनापति पेड्रों अल्वारेज़ कैब्रल (मृत्यु 1526) जिसे उसके राजा ने डिगामा के मार्ग का अनुसरण करने के लिए नियुक्त किया था, को प्रतिकूल हवाओं ने अपने मार्ग से इतना दूर हटने के लिए बाध्य कर दिया कि वह उस साल गुड फ़्राइडे के दिन ब्राजील के तट पर जा पहुँचा. अंत में 1520 में फर्डीनण्ड मैगलन (1470-1521), पृथ्वी का चक्कर लगाने वाला पहला नाविक, उस जलडमरूमध्य से होकर प्रशांत महासागर में पहुँच गया जो अभी भी उसके नाम से जाना जाता है.

इन समुद्री यात्राओं और खोजों के कारण विश्व बाज़ार का इतना अधिक विस्तार हो गया कि इसने सौलहवीं शताब्दी के बढ़ते उत्पादन को खपा लिया. इसी शताब्दी में समकालीन बुर्जुआ युग का जन्म हुआ.

मेक्सिको में कार्टेज़ (1485-1547), पेरू में पिजारो (1476-1541) जैसे शुरुआती अत्याचारी विजेताओं द्वारा नए खोजे गए देशों की निर्मम लूट और आदिवासियों के उन्मूलन का स्थान सोलहवीं शताब्दी के दुसरे अर्धांश में ही, दास श्रम की सहायता से अछूती भूमि के सुव्यवस्थित शोषण ने ले लिया. कुछ शताब्दियों में ही अफ्रीका उन श्वेतों का आखेट-क्षेत्र बन गया जो अमेरिकी बाज़ार के लिए नीग्रो दासों की तलाश में रहते थे. 1508 से 1860 के बीच “परोपकारी” पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी और सर्वोपरि रूप से ब्रिटिश दास व्यापारियों के शिकार लगभग डेढ़ करोड़ नीग्रो अटलांटिक महासागर के पार जहाजों में भरकर लाये गए थे और उतनी ही संख्या में इस समुद्री यात्रा में मर गए थे. “लिवरपूल दास व्यापार का प्रशस्ति गान करते हैं. उदाहरण के लिए 1795 में लिखी डॉ. आइकिन की पूर्व उद्धृत रचना को देखा जा सकता है जिसमें लिखा है कि दासों का व्यापार ‘निर्भय साहसिकता की उस भावना से मेल खाता है जो लिवरपूल के व्यापार का विशेष गुण हैं और जिसकी सहायता से लिवरपूल इतनी तेजी से अपनी वर्तमान समृद्धि प्राप्त कर सका है; उससे जहाज़ों और नाविकों को बड़े पैमाने पर काम मिला है और देश के मैन्युफ़ैक्चरों के बने सामान की मांग बढ़ी है.” (मार्क्स, कैपिटल, खंड 1 पृ 885) उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब इंग्लैंड के सूती वस्त्र उद्योग ने अमेरिका के दक्षिण प्रान्तों में कच्चे कपास के उत्पादन को अतिरिक्त संवेग प्रदान किया, तब अटलांटिक महासागर के पार दास-प्रथा राष्ट्रीय संस्था बन चुकी थी और दासों का प्रजनन एक वाणिज्यिक उद्धम बन चुका था.

बोलीविया में 1545 के बाद से और मेक्सिको में 1548 से सोने और चाँदी की खानों की खोज और दोहन ने यूरोपवासियों के हाथों में सोने और चाँदी के विशाल सुरक्षित भंडार बनाने में योगदान किया. 1501 से 1544 तक चाँदी के उत्पादन की कीमत 460 मिलियन मार्क के आसपास थी. (‘मार्क’ पौण्ड औंस भार प्रकृति वाले अंग्रेजी पौण्ड का आधा होता है) 1546 से 1600 तक उत्पादन 2880 मार्क तक बढ़ गया था. उन चाँदी के सिक्के के मूल्य, जो परिचलन में थे, में भी समानुपातिक वृद्धि हो गयी थी.

ब्रिटेनवासियों द्वारा उत्तरी अमेरिका का योजनाबद्ध उपनिवेशीकरण 1620 में आरंभ हो चुका था. फ्रांसीसियों ने इसका अनुसरण किया. आरंभ में ईस्टइंडीज़ के शासन संचालन का काम पुर्तगालियों के हाथों में था. लेकिन 1600 में डच और ब्रिटिश ने लगभग एक साथ एक विशेष अभियान आरंभ किया जिससे धीरे-धीरे, अपने यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों (पहले पुर्तगालियों और बाद में फ्रांसीसियों) से संघर्ष करते हुए उन्होंने ईस्ट इंडीज़ पर अधिकार कर लिया. चीन से व्यापारिक सम्बन्ध कायम करने वाले यूरोपीय लोग , पुर्तगाली थे जिन्होंने 1557 में मकाओ पर अधिकार कर लिया. 1684 के बाद ही अंग्रेज़ चीन के तट पर स्थापित हो सके.

मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पर डेविड रियाज़ानोव की व्याख्यात्मक टिप्पणियां/बुर्जुआ और सर्वहारा-2. हेक्स्टहाउज़ेन, मॉरेर और मॉर्गन

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2. हेक्स्टहाउज़ेन, मॉरेर और मॉर्गन

कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र के बाद के संस्करणों में एंगेल्स (1820 -1895) ने “समस्त मानव-समाज के इतिहास” वाक्यांश के बाद निम्न टिपण्णी जोड़ दी थी : ‘अर्थात समस्त लिपिबद्ध इतिहास” 1847 में समाज का आदिम इतिहास अर्थात लिखित इतिहास से पहले का सामाजिक संगठन बिलकुल अज्ञात था.उसके बाद हेक्स्टहाउज़ेन ने रूस में भूमि के सामुदायिक स्वामित्व का पता लगाया,  मॉरेन ने सिद्ध किया कि यही सामुदायिक स्वामित्व समस्त ट्यूटन नस्लों के इतिहास का सामाजिक आधार था और धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता गया कि भारत से लेकर आयरलैंड तक समाज का आदि रूप ग्राम समुदाय था जिसमें भूमि का स्वामित्व समुदाय के पास होता था. गोत्र के असली स्वरूप और कबीले के साथ उसके सम्बन्ध की मॉर्गेन की महत्ती खोज द्वारा विस्तार से इस आदिम कम्युनिस्ट समाज का आन्तरिक संगठन. अपने ठेठ रूप में, अनावृत हुआ. इस आदिम समाज के विघटन के साथ समाज का अलग-अलग वर्गों में विभाजन आरंभ हुआ तो कालांतर में विरोधी वर्ग बन गए.”

ऑगस्ट फ़ान हेक्स्टहाउज़ेन (1792-1866) प्रशिया के एक सामंत थे. 1843 में निकोलस प्रथम के अनुरोध पर भूमि कानूनों, कृषि की समस्याओं और किसानों के जीवन के बारे में पड़ताल करने और रिपोर्ट देने के लिए वह रूस गये. (रूसी ग्रामीण जीवन का अध्ययन) नाम की रचना में उनके श्रम का परिणाम संग्रहित है. जिसका पहला खंड 1847 में, और तीसरा खंड 1852 में, कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र के प्रकाशन के लगभग पॉँच वर्ष बाद प्रकाशित हुआ. तीसरा खंड मुख्यतया रूसी कृषि पंचायती संस्थाओं के बारे में है. रूस में यात्रा के दौरान हेक्स्टहाउज़ेन के साथ अलेक्सांद्र हर्ज़न थे जिनकी क्रांतिकारी राजनितिक रचनाओं ने बाद में उन्हें इतनी प्रसिद्धि दी. अपने मित्र से प्रभावित होने के कारण हेक्स्टहाउज़ेन ने रूसी कृषि पंचायती संस्थाओं के महत्त्व पर बल दिया जिन्हें वह सर्वहारा विकास की अवधि से गुज़रने की “महामारी’ से रूस को बचाने का एक साधन मानते थे.

जार्ज लुडविग फान मॉरेर (1790-1872) महान जर्मन इतिहासकार, कानूनविद, राजनेता और जर्मनी की प्राचीन संस्थाओं पर कई रचनाओं के लेखक थे. कई खंडो वाली इन रचनाओं का प्रकाशन अठारह सौ पचास और साठ के दशक में हुआ था और इनमें जर्मनी की ग्रामीण और नगरीय पंचायती संस्थाओं पर सर्वांगीण  रूप से विचार किया था. पुराने दृष्टिकोण के खिलाफ (जिसके अवशेष कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र में भी पाए जाते हैं) मॉरेर ने सिद्ध किया कि मध्ययुग के आरंभ में नगर क्षेत्रों का विकास मध्ययुगीन दास-प्रथा से उदभूत न होकर स्वतन्त्र ग्रामीण समुदाय (मध्युगीन मार्क) से हुआ था.

अमेरिकावासी लुईस हेनरी मॉर्गन (1818-1881) (Ancient Society Or Researches in the Lines of Human Progress from Savagery through Barbarism to Civilization By Lewis H. Morgan, LL. D) नृवंशविज्ञानी  और आदिम सामाजिक संगठनों के अध्येता थे. वह इराक्यू इंडियनों के बीच रहे, उन्हीं के जैसा जीवन जिया था और उनके आचरण तथा रीती-रिवाज का अध्ययन किया. उनका मत था कि एतिहासिक विकास में बुनियादी महत्त्व के कारक तकनीक के क्षेत्र में खोजों, आविष्कारों, जीवन की भौतिक परिस्थितियों के विकास में निहित हैं. मानव परिवार के विकास, विशेषतया सगोत्रता एवं विवाह सम्बन्धी रीती-रिवाज़ सम्बंधित  उनके विचारों की ओर एंगेल्स आकृष्ट हुए और 1884 में पहली बार प्रकाशित अपनी पुस्तक परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति (The Origin of the Family, Private Property and the State) में इनका विवेचन किया. इस पुस्तक में एंगेल्स ने इतिहास के आरंभ से समाज के विकास की दिशा का पता लगाने और वर्ग समाज में इसके क्रमिक परिवर्तन को समझाने की कोशिश की है.

शोलोखोव के नावल ‘धीरे बहे दोन रे’ पर आधारित बनी महाकाव्यात्मक रुसी फ़िल्म के डाउनलोड लिंक्स

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शोलोखोव के नावल के इसी शीर्षक पर आधारित बनी इस लगभग साढ़े पॉँच घंटे की महाकाव्यात्मक फ़िल्म में मध्यम श्रेणी के एक कजाकी किसान परिवार के दुखांत को प्रर्दशित किया गया जो 1914 से 1920 के अन्तराल में कभी बाएं तो कभी दायें पक्ष को अपनाता है जबकि मिखाइल जो मजदूर वर्ग से है उसे लालों के साथ होने के लिए निर्णय करने में किसी प्रकार की हिचकचाहट नहीं होती. वर्ग संघर्ष के उस दौर में मिखाइल द्वारा अपनी प्रेमिका के सगे भाई प्योत्र को गोली का शिकार करते हुए दिखाया गया है. आवश्यकता पड़ने पर वह अपनी होने वाली सास और प्रेमिका के दूसरे जीवित भाई ग्रेगोरी के सम्मुख अपने इस कृत्य को न्यायसंगत भी ठहरता है. फ़िल्म रुसी भाषा में है जिसे अंग्रेज़ी में डब किया गया है.photo-2
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वर्गीय समाज में औरत की दशा

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परिवार को बचाने के करुण क्रंदन के खिलाफ

एक पत्र : कात्यायनी

प्रिय भाई,
‘बचा रहे परिवार!’ लेकिन क्यो? इस ” पवित्र संस्था ” से मोहासक्ती का कारण? क्यो बचा रहे परिवार? इसलिए  कि प्रेम जीवित रहे, उष्मा बनी रहे, नागरिकता की पहली पाठशाला सुरक्षित रहे ? सब बकवास है !
जिस तरह हर संपत्ति-साम्राज्य लूट, ठगी और अपराध की बुनियाद पर टिका होता है ठीक उसी तरह हर परिवार का ताना- बाना स्त्री की गुलामी और अस्मिता-विहीनताकी बुनियाद पर खड़ा है– चाहे वह मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक ढाँचे वाला सामंती संयुक्त परिवार हो या पूंजीवादी ढंग से | परिवार वर्ग-निरपेक्ष संस्था नहीं| परिवार का प्यार मूल्य-मुक्त प्यार होता ही नहीं| पूर्ण समानता और स्वतंत्र  अस्मिता  की चाहत रखने वाली कोई स्त्री भला क्यो चाहेगी कि बचा रहे परिवार?नहीं ,कृपया मुझे अराजकतावादी या स्वच्छंदतावादी नं समझें | यह तो बुर्जुयाओं और उन फिलिस्टाइन बुद्धिजीवियों और अतीत की रागात्मकता के लिए विलाप करने वाले
अतीतजीवियों का गुण है |
इतिहास में पीछे की ओर चलें | एक विवाह प्रथा
की स्थापना के साथ ही एक ओर जहाँ मानव सभ्यता के उच्च्तर, अधिक वैज्ञानिक नैतिक मूल्यों का जन्म हुआ, वहीं पुरुष द्वारा स्त्री को दास बनाए जाने की शुरुआत भी यहीं से हुई | धीरे-धीरे स्त्री एक सजीव, पारिवारिक संपत्ति में रूपांतरित होती गई| संपत्ति-सन्चय और क़ानूनी वारिसों को उसका हस्तांतरण परिवार का मुख्य उद्देश्य बन गया |
सामंती समाज के पितृसत्तात्मक पारिवारिक ढाँचे में उपर से जो रागात्मकता, स्त्री के प्रति उदार संरक्षण-भाव, यदा-कदा श्रद्धा भाव और उसके सौंदर्य के प्रति सूख्म जागरूकता दिखाई देती है, वह सब उपरी चीज़ है और खांटी ‘ पुरुष दृष्टि’  को वह सब कुछ भाता है |प्रतीति को भेदकर सार तक पहुँचने पर पता चलता है कि स्त्री सामंती समाज में विलासिता और निजी उपभोग की वस्तु मात्र थी और साथ ही वंश चलाने का ज़रूरी साधन| उसकी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान या अस्मिता नहीं थी|
अपने ‘पवनी-परजा’, हाथी-घोड़े, नौकरों आदि के प्रति संरक्षण भाव रखने वाले सामंत स्त्रियों  के प्रति संरक्षण-भाव रखते थे. इस प्रभावी संस्कृति से, कुछ भिन्नता (सापेक्षिक आजादी)  के बावजूद किसान एवं भूदास परिवार की स्त्रियाँ भी अलग नहीं थी. साथ ही वे सामंतों द्वारा उपभोग्य भी मानी जाती थी. यही पुराने परवारिक ढांचे की “सुखद रागात्मकता” और काव्यात्मकता है, जिसके टूटने-बिखरने  पर आज दुखी आत्माएं विलाप कर रही हैं.

पूंजीवाद ने अपनी जरूरतों से स्त्रियों को चूल्हे-चौखाठे की गुलामी  से आंशिक मुक्ति दिलाई और स्त्रियाँ को दोयम दर्जे की नागरिकता देने के साथ ही उसे निकृष्टतम कोटि का उजरती गुलाम बनाकर सडकों पर धकेल दिया. पूंजीवाद के विकसित ‘अवस्था की उपभोक्ता संस्कृति में, सूचना तंत्र, प्रचार तंत्र और नए मनोरंजन-उद्योग के अंतर्गत स्त्री ख़ुद में एक उपभोक्ता  सामग्री बनकर रह गई. पुराने सामंती परिवार के राग-अनुराग को तोड़कर पूँजी ने घटिया उपयोगितावाद  को जन्म दिया और पूँजी पर, निजी लाभ के आधार पर खड़े पूंजीवाद परिवार में बेगानापन (Alienation) पोर-पोर में रच बस गया. “मध्ययुगीन प्यार” के स्वप्नलोक वें विचरण करती दुखी आत्मायों को लगने लगा कि परिवार टूट रहा है, प्रलय आ रहा है. लेकिन यह परिवार का “टूटना” नहीं बल्कि उसका पूंजीवादी रूपांतरण था.
आज के भारत में जिसे “परिवारों का टूटना-बिखरना” कहा जा रहा है, वह क्या है? उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय समाज भूमि-संबंधों के ‘जुन्कर  टाईप’ रूपांतरण और उद्योगों के विकास के साथ ही एक अर्द्धऔद्योगीकृत  समाज में क्रमश: रूपांतरित होता चला गया है. यहाँ साम्राज्यवाद पर निर्भर, एक बौना, बीमार, विकलांग पूंजीवाद विकसित हुआ है. अठारवीं-उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय पूंजीवाद से भिन्न, उपनिवेशवाद के गर्भ से जन्मा, साम्राज्यवादी विश्व-परिवेश में पला-बढ़ा यह पूंजीवाद जीवन के हर क्षेत्र में सामंती मूल्यों-मान्यताओं से समझौतों किए हुए है, उन्हें ‘एडाप्ट’ किए हुए है और स्वस्थ जनतांत्रिक  मूल्यों एवं तर्कपरकता  से रिक्त है. इस संक्रमणकालीन भारतीय समाज में स्त्रियों की पीड़ा दोहरी है. संयुक्त परिवार के ढांचे के टूटने, नाभिक परिवारों के बढ़ते जाने और आंशिक सामाजिक आजादी के बावजूद मूल्यों-मान्यताओं के धरातल पर वह पितृसत्तात्मक स्वेच्छाचारिता को भी  भुगत रही है और उपभोक्ता संस्कृति की नई नग्न निरंकुशता को भी. पति उसे शिक्षित और आधुनिक देखना-दिखाना चाहता है. अपनी मित्र मण्डली को प्रभावित  करना, उसे  जलाना चाहता है, पर यह नहीं चाहता कि वह इसकी इच्छाओं की सीमारेखा लांघकर किसी पुरूष से (या यहाँ तक कि किसी स्त्री से भी) स्वतन्त्र सम्बन्ध बनाये. वह यह तो चाहता है कि घर का बोझ हल्का करने के लिए पत्नी कमाए, पर यह नहीं चाहता कि वह अपने दफ्तर या कारखाने में स्वतन्त्र रिश्ते बनाये. यंत्र मानव की तरह वह बस पैसे कमाये और आज्ञाकारी सुशील पत्नी की तरह समय से घर आ जाए. उच्च से लेकर उच्च मध्यवर्ग तक में, किटी पार्टियाँ, लायंस-रोटरी की पार्टियों में जाने की आजादी है और पत्नियों की  अदलाबदली और स्वच्छंद यौनापभोग का खुला-गुप्त चलन  भी बढ़ रहा है. मध्य वर्ग से लेकर कामगार वर्गों तक की कामकाजू स्त्रियों का शारीरिक-मानसिक श्रम सबसे सस्ता है. बाहरी कामकाज या नौकरी में पुरूष से अधिक श्रम करने के बावजूद उसे घर का कामकाज और बच्चों का लालन-पालन भी करना है. कुछ “उदार” पति इसमें हाथ बांटकर उसे उपकृत जरूर करते रहते हैं.
कुल मिलाकर, पूंजीवादी किस्म का निजी स्वामित्व आज हमारे समाज में भी परिवार के अन्दर सम्भन्धों के रूप  को मुख्यत: प्रभावित करने लगा है. भौतिक स्वार्थ और विवाह के वाणिज्यिक लाभों की उपस्थति स्पष्ट है. पुरानी रागात्मकता समाप्त  हो रही है और पति-पत्नी रिश्तों तक में बेगानापन घुल चुका है. पति-पत्नी के बीच के यौन सम्बन्ध भी अस्सी फीसदी मात्रा में वैधिक वेश्यागमन और सामाजिक मान्यताप्राप्त बलात्कार ही है.

और तब आप सभी फ़िलिस्ताईन आत्माएं “जाने कहाँ गए वो दिन…..” गाते हुए. रोते-सिसकते हुए, पुराने समय के “रागात्मक प्यार” और सुखद माहौल को याद करते हुए अंतत: करुण क्रंदन कर उठते हैं–“बचा रहे परिवार!”

सामाजिक विकास की इस मंजिल पर पहुंचकर पूंजीवादी परिवार का ताना-बाना भी पूरी दुनिया में दूटने-बिखरने लगा है. हमारे देश में परिवार के पितृसत्तात्मक  ढांचे की रागात्मकता  लगभग नष्ट हो चुकी है और पूंजीवादी परिवार की जो सामाजिक इकाई पैदा हुई है, वह जन्म से ही विकलांग, बीमार और शैशवकाल  में ही संकटग्रस्त है. कारण कि समाजवाद  पर विजय की उन्मत्त घोषणाओं और प्राथमिक सामाजिक प्रयोगों की बिफलता के बावजूद यह सच है कि पूंजीवाद  अब मानवता को कुच्छ भी सकारात्मक दे सकने की क्षमता खोकर अन्तकारी रोगों से ग्रस्त हो चुका है. परिवार के पूंजीवादी ढांचों को भी नष्ट होना ही है–पश्चिम में भी, रूस व पूर्वी यूरोप में भी तथा एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका में भी. इसे आप बचा नहीं सकते. और सामंती पितृसतात्मक मध्ययुगीन सामाजिक-पारिवारिक ढांचे की रागात्मकता के “स्वर्ण-युग” को वापस ला नहीं सकता. फ़िर फालतू का रोना-कलपना काहे को? वर्तमान की समस्या का समाधान अतीत में नहीं है. इतिहास के स्वाभाविक गति में जो चीज टूटनी है वह तो टूटनी ही है. पूंजीवादी समाज की ही तरह क्षरित-विघटित होते पूंजीवाद परिवार की पीड़ा-व्यथा, यंत्रणा-विकृति से मुक्ति का एकमात्र तरीका समाज-विकास की गति के आम नियमों और आम दिशा को समझकर उस दिशा में अपनी चेष्टाओं को निर्देशित करना ही हो सकता है– चाहे वह सामाजिक सक्रियता के क्षेत्र में हो या कलात्मक-सांस्कृतिक उद्यम के क्षेत्र में.
प्यार को बचाने के लिए परिवार को बचना जरूरी नहीं है. समाज के नैतिक-आत्मिक-सौन्दर्यात्मक मूल्यों और भौतिक जरूरतों की एक अभिव्यक्ति समाज के इस नाभिक के रूप में हुई, जो निजी दैनंदिन जीवन के संघटन का सबसे महत्वपूर्ण रूप थी. पर मानवीय सारतत्व और प्यार की अभिव्यक्ति भविष्य के नए समाज में किसी और संघटन के रूप में होगी. यदि उसे परिवार की संज्ञा दी भी जाए तो कम से कम यह कहना होगा कि उसका ढांचा मौजूदा पारवारिक ढांचे से गुणात्मक रूप से भिन्न होगा. उसमें संपत्ति संचय, उत्तराधिकार और निजी लाभ का तत्व नहीं होगा. उसमें बाध्यता या विवशता का कोई तत्व नहीं होगा. कानूनी पारिवारिक संघटन की आवश्यकता और आर्थिक उपभोग-संबंधो के महत्त्व के घटते जाने के साथ ही, नई सामाजिक-आर्थिक संरचना के अंतर्गत स्त्री-पुरूष सम्बन्ध और माता-पिता-सन्तान सम्बन्ध के नये रूप और उनके नए,परिष्कृत, नैतिक-सौन्दर्यात्मक-मनोवैज्ञानिक पहलू विकसित होंगे. यह एक लंबा संक्रमण काल होगा, पर इतिहास विकास की आम दिशा यही है. समाजवादी संक्रमण के शुरुआती अल्पकालिक अवधि में ही पारिवारिक जीवन और स्त्री की स्थिती में आये परिवर्तनों ने इसे सिद्ध कर दिखाया कि यह सम्भव है और देर-सवेर यही होगा. मौजूदा विपर्यय चिरस्थाई नहीं है.
भारत में जिस तरह पूरे सामाजिक-राजनितिक तंत्र में, ठीक उसी तरह आत्मिक-निजी जीवन में भी एक पुरानी बुराई का स्थान नई बुराई ने ले लिया है. पितृसत्तात्मक सामंती पारवारिक ढांचे की स्वेच्छाचारिता, कूपमंडूक रागात्मकता, स्त्रियों के पार्थक्य (segregation) आदि का स्थान आज बाज़ार-उपनिवेशवाद के दौर में पूंजीवादी पारवारिक  ढांचे की निरंकुशता, नग्न यौन-उत्पीडन, उपभोक्ता संस्कृति और बेगानापन (Alienation) ने ले लिया है. और यह नया ढांचा अभी से क्षरनशील     है, विघटनोंमुख है. साथ ही, सकारात्मक पहलू यह भी है कि स्त्री के भीतर अपनी अस्मिता की नई  पहचान और नई मुक्ति-चेतना पैदा हुई है. अभी वह सहस्त्राब्दियों पुराने संस्कारों से मुक्त नहीं हो सकी है, पर अब वह दिन दूर भी नहीं कि वह सच्ची समानता व स्वतन्त्र इच्छा पर नैतिक प्यार की उदात्तता व गरिमा को हासिल करने के लिए परिवार की मौजूदा संस्था, इसके व्यभिचारी, उत्पीड़क, शोषक, निरंकुश स्वरूप को लात मारकर ध्वस्त कर देगी. इसे बचाने की गुहार बेकार है. वर्तमान की दुर्दशा का समाधान अतीत में नहीं, भविष्य में देखना होगा.
आगे की एक शताब्दी के दौरान जो कुछ घटित होगा, उसके बारेमें सोचते हुए मार्क्स और एंगेल्स द्वारा आज से लगभग डेढ़ शताब्दी पूर्व कही गई बातें बरबस याद आ जाती हैं और आम दिशा एवं आम रूपरेखा के तौर पर आज भी प्रासंगिक प्रतीत होती हैं. ‘कम्युनिस्ट घोषणा पत्र’ के एक पूरे हिस्से पर हमें गौर करना चाहिए और “परिवार को बचाने” की चिल्ल-पों बंद कर देनी चाहिए :

“परिवार का विनाश! कम्युनिस्टों के इस कलंकपूर्ण प्रस्ताव से कट्टर से कट्टर उग्रवादी भी भड़क उठते हैं.
“मौजूदा परिवार, पूंजीवादी परिवार, किस आधार पर खड़ा  है? पूँजी पर, निजी फायेदे पर. अपने पूर्ण विकसित रूप में इस तरह का परिवार केवल पूंजीपति वर्ग के बीच पाया जाता है. यह स्थिति अपना संपूरक सर्वहारा  वर्ग में परिवार के व्यवहारत: अभाव और बाजारू वेश्यावृत्ति में पाती है.
“वह संपूरक जब मिट जाएगा तो सामान्य क्रम में पूंजीवाद परिवार भी मिट जाएगा, और पूँजी के मिटने के साथ-साथ ये दोनों मिट जायेंगे.
“क्या आप हमारे ऊपर यह आरोप लगाते हैं कि हम बच्चों का उनके माता-पिता द्वारा शोषण किया जाना बंद कर देना चाहते हैं?
इस अपराध को हम स्वीकार करते है.
“लेकिन आप कहेंगे कि घरेलू शिक्षा की जगह सामाजिक शिक्षा कायम करके हम एक अत्यन्त पवित्र सम्बन्ध को नष्ट कर देते हैं.
“और आपकी शिक्षा? क्या वह भी सामाजिक नहीं है और उन सामाजिक अवस्थायों से निर्धारित नहीं होतीहै, जिनमें आप समाज के, प्रत्यक्ष या परोक्ष, हस्तक्षेप से स्कूलों आदि के ज़रिए शिक्षा देते हैं? शिक्षा में हस्तक्षेप कम्युनिस्टों की ईजाद नहीं है; कम्युनिस्ट तो केवल इस हस्तक्षेप के स्वरूप को बदल देना चाहते हैं और शासक वर्ग के प्रभाव से शिक्षा का उदार करना चाहते हैं.
“जैसे-जैसे आधुनिक उद्योग की क्रिया द्वारा सर्वहारा वर्ग में समस्त पारिवारिक संबंधों की धज्जियाँ उड़ती जा रही हैं; वैसे-वैसे परिवार और शिक्षा तथा माता-पिता और बच्चों  के पुनीत अन्योन्य सम्बन्ध के बारे में पूंजीपतियों की बकवास ओर भी घिनौनी दिखाई देने लगी है.
“लेकिन पूरा का पूरा पूंजीपति वर्ग गला फाड़कर एक स्वर में चिल्ला  उठता है–तुम कम्युनिस्ट तो औरतों को सर्वोपभोग्य बना दोगे!
“पूंजीपति वर्ग अपनी पत्नी को उत्पादन के एक औजार के सिवा कुछ नहीं समझाता. उसने सुन रखा है कि कम्युनिस्ट समाज में उत्पादन के औजारों का सामूहिक रूप में उपयोग होगा. इसलिए, स्वभावत; वह इसके आलावा और कोई निष्कर्ष  नहीं निकाल पाता कि समाज में सभी चीजों की तरह औरतें भी सवोपभोग्य हो जाएँगी.
” वह स्वप्न में भी नहीं सोच सकता कि दरअसल मकसद  यह है कि औरत की उत्पादन के औजार जैसी स्थिति को ख़तम कर दिया जाए.
“कुछ भी हो, स्त्रियों  की सर्वोपभोग्यता के खिलाफ पूंजीपतियों के सदाचारी आक्रोश से अधिक हास्यास्पद दूसरी और कोई चीज़ नहीं है; वे यह समझने का बहाना करते हैं कि कम्युनिज्म के अंतर्गत स्त्रियों की सर्वोपभोग्य खुल्लमखुल्ला स्थापित करने की कोई ज़रूरत नहीं है, वह बाबा आदम के ज़माने से चली आ रही है.
“हमारे पूंजीपतियों को मजदूरों की बहू-बेटियों को अपनी मर्जी के मुताबिक इस्तेमाल करने से संतोष नहीं होता, वेश्याओं से भी उनका मन नहीं भरता, इसलिए एक दूसरे की बीवियों पर हाथ साफ  करने में उन्हें विशेष आनंद प्राप्त होता है.
“पूंजीपति विवाह वास्तव में पत्नियों की साझेदारी की ही एक व्यवस्था है, इसलिए कम्युनिस्टों  के खिलाफ अधिक से अधिक यही आरोप लगाया जा सकता है कि वे स्त्रियों की सर्वोपभोग्यता की मौजूदा ढोंगपूर्ण और गुप्त प्रथा  को खुला, कानूनी रूप दे देना चाहते हैं. कुछ भी हो, बात अपने-आप में साफ है कि उत्पादन की वर्तमान  व्यवस्था जब ख़तम हो जायेगी, तब स्त्रियों की उस व्यवस्था से उत्पन्न सर्वोपभोग्यता के, अर्थात बाजारू और खानगी, दोनों प्रकार की वेश्यावृत्ति  का, अनिवार्वत: अंत हो जाएगा.”-
—-(मार्क्स-एंगेल्स : कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र)
हमारे देश के अधिकांश प्रगतिशील  और वामपंथी लेखक-चिन्तक इस मामले में दिग्भ्रम-संभ्रम-विभ्रम-मतिभ्रम के शिकार हैं और समाज की इस बुनियादी कोशिका-परिवार के वर्ग-स्वरूप और पूँजी की नानाविध गतियों की वैज्ञानिक समझदारी के अभाव में वे कभी नैतिकतावादी पोंगा पंडित बन बैठते हैं, तो कभी अवैज्ञानिक, अराजकतावादी, स्वच्छंदतावादी बुर्जुआ नारीवाद की इस या उस धारा के साथ मधुयामिनी व्यतीत करने की घोषणा कर बैठते हैं. अब यह बात दीगर है कि उन्हें उस प्रश्न से निशा-निमंत्रण कभी नहीं प्राप्त होते…और तब कुढ़कर, या थककर वे उत्तर आधुनिकतावादी विमर्श में लीन हो जाते हैं या नारी-मुक्ति प्रसंग का उत्तर-मार्क्सवादी वृतांत रचने लगते हैं.
….बहरहाल, लुब्बे ,लुब्बाब यह है कि मैं परिवार को बचाने के विलाप में कतई शिरकत नहीं कर सकती. प्रश्न परिवार को बचाने का नहीं, एक उच्चतर नैतिक-सौन्दर्यात्मक-उदात्त धरातल पर मानवीय प्रेम  की प्राण-प्रतिष्ठा का है, एक ऐसी सामाजिक कोशिका के निर्माण का है जिसमें स्त्री पूर्ण समानता, स्वावलंबन और स्वतन्त्र अस्मिता के आधार पर, घरेलू गुलामी के सभी रूपों से मुक्ति पाकर, सामाजिक उत्पादन की प्रक्रिया  में बराबर की भागीदारी करते हुए, जिसे चाहे प्यार कर सके और पा सके. हमें अब तक मौजूद परिवार के सभी किस्म के ढांचों के नाश की कामना करनी चाहिए और समाज को इस दिशा में आगे ले जाने का सचेतन उद्यम करना चाहिए.
मेरी कवितायों में प्यार की कामना कहीं भी “सुखी पारिवारिक  जीवन” की कामना के रूप में प्रगट नहीं होती. ‘औरत और घर’ एक भूतपूर्व नगरबधू की दुर्गपति से प्रार्थना’, ‘त्रिया चरित्र पुरुषस्य भाग्यम्..’ आदि कविताएँ उदाहरण हैं.

—-‘दुर्ग द्वार पर दस्तक’ से.