क्रांति

पूंजीवादी संकट : अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता – अंतिम किश्त

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इससे पहले, कड़ी जोड़ने के लिए देखें :

1. पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

2. पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

मैं इन विकल्पों के बारे में और अधिक जानने के लिए अधीर था. क्या उनके उदारवादी विश्वास के केंद्र में, यह विरोधाभास नहीं था कि वर्तमान संकट से पूंजीवाद के विकल्प निकल सकेंगे ? कुल मिलाकर, संगठित श्रम की वास्तविक तबाही के साथ-साथ व्यक्तिवाद का फैलाव जिसने, निश्चित रूप से, सामूहिक कार्रवाई के रूपों के विकास के विरुद्ध शक्ति झोंकी दी है, नव-उदारवाद के परिणामों में से एक रहा है. हार्वे को यह स्वीकार करने में प्रसन्नता है कि पूंजीवाद विरोधी लहर की कोई भी संभावना. मानसिक अवधारानाओं के मूल में परिवर्तन. पर निर्भर करती है. और इसकी कोई संभावना नहीं है कि इस सन्दर्भ में, अकादमी की ओर से कोई नेतृत्व मिलेगा. नए क्लासिकीय अर्थशास्त्र और तर्कसंगत राजनीतिक सिद्धांत का चुनाव, ऐसे, जैसे कुछ भी न घटित हुआ हो और शेखीखोर व्यावसायिक स्कूलों द्वारा एक या इससे अधिक, नए व्यावसायिक नीति शास्त्र संबंधी कोर्स या लोगों के दिवालियेपन से कैसे धन कमायें, इनके अलावा, उनके पास देने के लिए कुछ नहीं होगा. अंत में, संकट मानव के लालच से जन्मा है जिसके लिए कुछ नहीं किया जा सकता. न ही हम, परम्परावादी मार्क्सवादी सर्वहारा की चेतना के अचानक उत्थान की उम्मीद कर सकते हैं. बीते समय में, इन औद्योगिक कामगारों को  सदैव क्रांति के अग्रगामी सैन्य दस्ते माना जाता था. परन्तु, हार्वे का सुझाव है कि यह गलती थी. फैक्ट्री श्रम को ‘सच्चा वर्ग चैतन्य’ मानने की आसक्ति रही है लेकिन इस वर्ग की भूमिका सदैव बहुत सीमित रही है, अगर भ्रमित न भी हुए हों, तब भी वामपंथियों के भी गलत विचार रहे हैं . जंगलों और खेतों में काम करनेवाले, गैरकानूनी मजदूर बस्तियों में कैजुयल श्रम के अनौपचारिक सेक्टर में, घरेलू सेवक, और अधिक सामान्य रूप से सेवा सेक्टर में और उत्पादन के विस्तृत क्षेत्र या निर्मित परिवेश में लगी हुई मजदूरों की विशाल सेना और शहरी खाईयों (प्राय शाब्दिक), इन सबको दूसरे दर्जे के अभिनेता नहीं माना जा सकता.

इन कामगारों, जिन्हें कई बार इनकी जिन्दगी और रोजगार की प्रकृति की अनिश्चतता को दर्शाने के लिए, बेठिकाना’ श्रम (देखें : Precarious, Precarisation, Precariat ) की श्रेणी में रखा जाता है, की संख्या में, नए उदारीकरण द्वारा थोपी गयी, बदली अवस्था के श्रम-संबंधों के कारण पिछले 30 वर्षों में भारी बढौतरी हुई हैं.

और हार्वे एक और प्रवर्ग का ज़िक्र करते हैं जिसका स्वत्वहरण हो चुका है. इसमें शामिल हैं वे सभी किसान और ग्रामीण जनसंख्या जिन्हें उनकी भूमि से खदेड़ा जा चुका है, वैधानिक ( राज्य द्वारा मंजूरशुदा ) और गैर-वैधानिक, बस्तीवादी, नव-बस्तीवादी या साम्राज्यवादी हथकंडो द्वारा अपने प्राकृतिक संसाधनों और अपनी जीवन पद्वति से वंचित कर दिया गया है और जोर-जबरदस्ती से विनिमय मण्डी … बलपूर्वक पैसे-कौड़ी और टैक्स संबंधों  में धकेल दिया गया है.

बेशक, हार्वे वंचित और स्वत्वहरित लोगों के महान गठबंधन के सपने की बात करते हुए खुश होते हैं, लेकिन, वे तस्लीम करते हैं कि इस प्रकार के ग्रुपों से निर्मित होनेवाली बहुत सी लहरों की संभावना स्थानीय पहलकदमी वाली और यहाँ तक कि  उत्पादन-विरोधी भी हो सकती हैं. परन्तु इस हद तक कि उनमें से अधिकतर उसी स्थान, जैसे मेट्रो शहरो में, मौजूद हैं और वे (जैसाकि, औद्योगिक क्रांति के प्रारंभिक काल में, फैक्ट्री कामगारों के साथ होना माना जाता है)  साझे कार्यभार तैयार कर सकते हैं और अपने-अपने अनुभवों के साथ, इस रूप-रेखा को गढ़ सकते हैं कि वह क्या है जिसे साझे तौर पर किया जा सकता है, कैसे पूंजीवाद कार्य करता है.

और भी बहुत से ग्रुप हो सकते हैं, जो पूंजीवाद के विरुद्ध इस साझे कार्यभार में सम्मिलित हो सकते है जैसे, भारत और ब्राज़ील में विस्थापन और स्वत्वहरण के प्रतिरोध से पैदा हुई लहरे और पहचान के सवाल पर,औरतों, बच्चों, समलिंगियों, और नस्लीय और प्रजातीय और धार्मिक अल्पसंख्यक  लोगों की आजादी की लहर, जिनकी इस ‘सूर्य के नीचे समान स्थान की मांग’ रही है.

उन सभी लोगों के लिए जो अपने-अपने तरीकों से पूंजीवाद की सीमा और असफलता से बच निकलने की इच्छा रख्ते हैं, शब्द ‘कम्युनिस्ट’ के लेबल का प्रयोग अनुचित होगा. ‘कम्युनिज्म’ एक ऐसा  भारी भरकम शब्द है कि इसे राजनीतिक भाषणों में पुन:प्रयोग करना बड़ा मुश्किल है. शायद, हमें इस लहर को, हमारी लहर को, पूंजीवाद विरोधी या फिर स्वयं को ‘रोष की पार्टी’ कहना चाहिए जो वाल-स्ट्रीट की पार्टी और इसके अनुचरों, इसके धर्ममण्डको को हर जगह हराने के लिए तैयार हो और उसे वहां ले जाकर छोड़ दे.

बेशक ये साहसी शब्द थे, लेकिन RSA के प्रश्नकाल के दौरान, मैंने महसूस किया कि यद्यपि वहां काफी लोग थे जो हार्वे के आर्थिक विश्लेषण को मानने को तैयार थे, लेकिन वहां ऐसे लोग भी थे जो पूंजीवाद विरोधी लहर के उत्थान के बारे में उनके सीमित से राजनीतिक आशावाद को भी स्वीकृत करने पर राजी नहीं थे. इसलिए, जब मैंने उन्हें अकेले पाया, तो मैंने इस पर थोडा और बोलने के लिए कहा. क्या यह सही नहीं है कि लोगों का वह अधिकतर हिस्सा जिसे वे  पूंजीवाद विरोधी गठबंधन कहते हैं, उनमें अपनी-अपनी दयनीय स्थिति को छोड़कर, ऐसा बहुत थोडा है जो साझा हो. इतिहास में मुश्किल से ही ऐसा है, जिसने इस प्रकार के बलहीन ग्रुपों द्वारा किसी प्रकार के बदलाव को प्रभावित किया हो.

मैं नहीं मानता कि यह सही हो. ‘पेरिस कम्यून’ किसने पैदा किया ? ‘बेठिकाना’ कामगारों और निर्माण व्यवसाय के श्रमिकों की अहम भूमिका रही थी. जो सच है वह यह कि लोग, जिनके पास सुरक्षित रोजगार नहीं हैं, इनके लिए सांगठनिक रूप ढूँढना बहुत मुश्किल होता है. यही कारण है कि अमेरिका में बहुत थोड़े लोग मिलेंगे जो यूनियन बनाने में दिलचस्पी रखते हों. लेकिन मानव अधिकार संगठन जैसी ‘अप्रकट’ ( covert ) यूनियन बनाने में इच्छुक लोगों की संख्या अधिक से अधिक होगी. अगर आप अपने को मानव अधिकार संगठन बनाने के लिए निरुपित करते हो, तो आप श्रम कानून के अधीन नहीं आते हो. एक मानव अधिकार संगठन अस्थाई श्रमिक को संगठित कर सकता है और फिर भी कह सकता है “हम यूनियन नहीं है”. वे बेघरों के साथ भी ऐसा ही करते हैं. मैं बेघरों की ‘Picture the Homeless’ के लिए काम करता हूँ जो, सक्रिय रुप से, इन नए सहस्वामित्व वाले घरों पर कब्ज़ा करने की बाते करती है और बेघरों को वहां बसाती है.

डेविड हार्वे ने अपना अल्प समय, ब्रिटेन में अपनी नयी पुस्तक प्रकाशित कराने  में, लगाया. उसके साथ अपनी मीटिंगों के दौरान, मैं एक ऐसे व्यक्ति से प्रभावित था जो एक अमेरिकन विश्वविद्यालय ( हालाँकि उनका जन्म ब्रिटेन का है ) का  अकादमी होने के बावजूद मार्क्सवाद का झंडा, ऊँचा उठाये हुए था . यहाँ उनका स्वागत समारोह उनके लिए अनुकूलित होने की वजाय, खुद उनके ही प्रवेशाधिकार पत्र से था. लेकिन अमेरिका में उनके व्याख्यानों और पुस्तकों की स्थिति कैसी है ?

“इसे मुख्य मीडिया में कैसे लिया जाता है. वे इसका उत्तर पूर्ण चुप्पी से देते हैं. मेरे काम का रिवियू होना बड़ा मुश्किल है. लेकिन मुझे इसका अभ्यस्त होना पड़ता है. मैं लोहे की छत के नीचे हूँ. दूर बेसमेंट में काम करता हुआ. किसी हद तक विक्टर ह्यूगो की कहानी की तरह. मैं सीवरों में विध्वंस का कार्य कर रहा हूँ.

क्या वे बेख़ौफ़, बहिष्कार होने के डर के बिना, शब्द मार्क्सवाद का प्रयोग कर सकते हैं ? ” इसमें बड़ी मुश्किल है. वहां एक ‘फोक्स न्यूज़’ नाम से उद्योग है जो ओबामा को मार्क्सवादी कहने में व्यस्त है.  यह मेककार्थिज्म की लंबी विरासत है. हम इस स्थिति को तस्लीम नहीं करते कि मेककार्थिज्म का इस देश पर कितना गंभीर असर है और 1950 से पहले की स्थिति को दोबारा प्राप्त करना कितना मुश्किल है .

“लेकिन कुछ स्थान हैं, जहाँ मैं खुलकर बोल सकता हूँ. वहाँ समाजवादी वर्कर पार्टियाँ हैं और रेवोलुशनरी कम्युनिस्ट पार्टी है. उनका न्यूयार्क में बुक-स्टोर है और मैं कई बार वहाँ जाता हूँ और बातचीत करता रहता हूँ. लेकिन वहाँ, मार्क्स का पूर्ण रूप से पुन:मूल्यांकन हो रहा है. 30 वर्ष पहले यह बड़ा हठधर्मी और कट्ठ्मुल्ला था. लेकिन अब यह बहस और बातचीत के लिए अधिक खुल्ले मैदान की तरह है. और इस अर्थ में, मैं उम्मीद करता हूँ कि एक और मार्क्सवाद, एक और कम्युनिज्म संभव है.

परन्तु फिर भी, अगर यह सच है कि मार्क्सवाद पर अब तत्परता से बहस होती है, क्या लोगों के रवैये में, निश्चित रूप से, इसके परिणाम या इसके अनीश्वरवाद संबंधी, न्यूनीकरण नहीं रहा है ?

“आप नहीं जानते कि अमेरिका में तेज़ी से बड़ा होता हुआ धार्मिक ग्रुप कौनसा है ? वे मुझे सवाल करते हैं. मोर्मनों का. अनीश्वरवादी ? उनकी असीम वृद्धि हुई है. मुझे नहीं पता कि आपने इसपर ध्यान दिया है. लेकिन ओबामा ने अपने उदघाटन भाषण में सभी धर्मों का ज़िक्र किया और अनीश्वरदियों को भी शामिल किया. पहली बार. और वह जानता है कि वह क्या कर रहा है. क्योंकि बहुत से इन्डिपेनडेंट भी अनीश्वरवादी हैं. एक अनीश्वरवादी लहर उदय हो रही है. धार्मिक रूढ़ीवाद चिंतनीय है लेकिन इसकी स्थिति अल्पसंख्यक की है. अधिकतर धर्म रेडिकल लेफ्ट विंग या रेडिकल राईट विंग हैं और इस प्रकार का विचार कि अमेरिका में धर्म केवल रुढ़िवादी हो सकता है, बहुत अनुपयुक्त लगता है. पादरियों का एक विंग है जो कह रहा है कि हमें सामाजिक असमानता और ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ कुछ करना चाहिए. इसलिए पादरियों की लहर एकतरफा नहीं है.

अंतिम क्षणों में, ICA में, अपने प्रकाशकों से मिलने की हड़बड़ी से पहले, वे और मैं अकेले रह गये. मैंने उन्हें, उनके व्याख्यान और उनकी 75 वर्ष की अवस्था में भी, अपने विषय प्रति, नौजवान अकादमियों के मुकाबले अधिक प्रत्यक्ष तत्परता के लिए धन्यवाद कहा. इसीसे,  एक और सवाल निकल आया. हालाँकि मैं जानता था कि उनकी स्वयं की न्यूयार्क शहर की ‘सिटी यूनिवर्सिटी’ रेडिकल विचारकों के लिए कुछ-कुछ सुरक्षित सा ठिकाना मुहैया करवाने के लिए प्रसिद्ध रही है , लेकिन क्या उन्हें इस तरह का खतरा महसूस नहीं होता कि, ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों की अपेक्षा उनके विश्वविद्यालयों का रुझान ज्यादा मैनेजमेंट वाला होता जा रहा है जोकि बड़े व्यवसाय या राज्य से जुडा हुआ हो ?

” हाँ, सही है. और खतरा दो तरह से आता है. एक तो सीधे-सीधे दमन द्वारा. परन्तु जो दूसरा और महत्वपूर्ण खतरा है वह यह कि वे अकादमियों से विश्विद्यालय के लिए अधिक धन कमाने की मांग रखते हैं. मेरे एक डीन हैं जो कह रहे हैं कि मैं अधिक धन अर्जित नहीं कर पा रहा हूँ. उनका कहना है कि जहाँ तक धन का सवाल है, मैं बेकार हूँ. इसलिए मैंने उनसे पूछा कि मैं क्या करूँ ?  क्या मुझे जनरल मोटर्स द्वारा मुहैया करवाए गए फंडों से मार्क्सवादी अध्ययन के लिए संस्थान खड़ा करना चाहिए ? और डीन ने कहा, ” हाँ, यह अच्छा विचार है. अगर आप यह सब कर पायें तो मैं आपका समर्थन करूंगा . “

बाहर उनका इंतजार करती हुई टैक्सी की ओर बढ़ते हुए, वे अब भी, मंद-मंद मुस्करा रहे थे.

पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’

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हार्वे की ओर इस कशिश के पीछे कुछ और भी कारण हैं. सावधानीपूर्वक तराशी हुई उनकी दाढ़ी और भले चचा जैसे रूप-रंग में, वे, काफी हद तक, एक भद्र क्रांतिकारी जैसे दीखते हैं. वे बेमिसाल वाक्पटुता के मालिक हैं. मार्क्सवाद की मौजूदा प्रासंगिगता पर उनकी पुस्तकें और व्याख्यान – अढाई लाख से अधिक जिज्ञासू विद्यार्थियों द्वारा उनके इंटरनेट पर उपलब्ध पूंजी पर व्याख्यानों को डाउनलोड किया जाना – एक तरह का साहित्यिक उत्साह और मार्क्स को उनकी श्रेष्टता के साथ  आह्वान करने के विश्वास का भाव. वे उस वक्त विशेषरूप से अकाट्य होते हैं जब वे पूंजीवाद का, अनंत प्रवाह के रूप में, वर्णन करते हैं, कि कैसे यह निरंतर अपनी रुकावटों को पार कर जाता है, जैसे ही इसे मुनाफा कमाने के नये अवसर मिल जाते हैं.इसे एक उपमा ही कहेंगे कि वे सत्रहवीं सदी के अपने हमनाम ‘विलियम हार्वे’ को प्रसंतापूर्वक इस बात का श्रेय देते हैं कि कैसे वे  शरीर में खून को प्रणालीबद्ध रूप से दौड़ता हुआ दिखाया करते थे. यहाँ उसी उपमा को काम करते हुए देखा जा सकता है.

“एक तरफ अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएं और क्रेडिट के फेरीवाले जौंक की भांति विश्वभर के लोगों का ‘ढांचागत समन्वय’ कार्यक्रमों और हर तरह की तिकडमों ( जैसे क्रेडिट कार्ड की फीस का एकदम दोगुना हो जाना ) द्वारा जितना खून चूस सकते हैं,चूसते रहते हैं – कोई फर्क नहीं पड़ता के वे कितने गरीब हो चुके हैं. दूसरी और केन्द्रीय बैंक अपनी अर्थव्यवस्थाओं में बाढ़ ले आते हैं और ग्लोबल बॉडी पोलीटिक में इस उम्मीद के साथ कि इस तरह के आकस्मिक आधानों से वह रोग ठीक हो जायेगा जिसे रेडिकल रोगनिदान और हस्तक्षेप की जरूरत है,  अत्यधिक तरलता का विस्तार कर देते हैं.

सभी मार्क्सवादियों की भांति, डेविड हार्वे भी विसंगतियों और विरोधाभासों के बीच मौज-मस्ती करते हैं. जैसेकि उन्होंने अपने व्याख्यान के बाद मेरे साथ अपने इन्टरवियू में बताया, ” मैं द्वन्द विज्ञानी हूँ. समाज में मौजूद विसंगतियों की खुदाई करने में मेरा विश्वास है. और मैं उनको प्रगतिशील बदलाव की गति के मार्ग के लिए प्रयोग करता हूँ. यह चिंतन और व्याख्या करने का तरीका है, जिसे प्रयोग में लाना बड़ा ही आसान है, अगर आप इसका प्रयोग इस तरह से करें कि लोग इसके साथ स्वयं को अभेद पायें बजाय इसके कि आपको कहना पड़े कि इसे समझने के लिए आपको हेगेल के तीनों और मार्क्स  के चारों खण्डों का अध्ययन करना पड़ेगा. बढ़िया नाटक, हेलमेट ( शेकस्पियर का एक नाटक ) की संरचना द्वंदात्मक है. अगर ऐसा न होता तो यह बहुत उबाऊ होता. और यही कारण है कि मुझे इतिहास और ऐतिहासिक बदलाव बहुत आकर्षित करते हैं.

अपनी [RSA ] के साथ बातचीत और अपनी उम्दा पठनीय पुस्तक में हार्वे, थेचरवाद के वर्षों के दौरान, नवउदारीवादी क्रांति से पैदा हुई विसंगतियों पर ,लुत्फ़ उठाते हैं. इससे पहले पूंजीवाद की समस्याओं को पूंजी के संबंध में श्रम की शक्ति को रखकर परिभाषित किया जाता था. नए यूनियन विरोधी विधान और ग्लोबल आउटसोर्सिंग के विकास, जिससे पूंजीपति अविकसित देशों की भोली-भाली जनता के श्रम को निचोड़ सकें, द्वारा संगठित श्रम को पीछे हटने के लिए मजबूर करके ही मुनाफे संभव हो सकते थे. परन्तु इसके तुरंत बाद एक नयी समस्या खड़ी हो गयी. अब, चूँकि वास्तविक उजरत बहुत घट गयी थी, पूंजीवाद द्वारा उत्पादित वस्तुओं को मजदूर वर्ग द्वारा खरीदना किस प्रकार संभव हो सकता था ? इसका हल आसान क्रेडिट में ढूंढा जाने वाला था.

क्रेडिट का अधिकतर हिस्सा, आवास बाज़ार में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक नयी समस्या थी. इस कर्ज का अधिकतर भाग आवास बाज़ार को ईधन मुहैया करवाने के रूप में प्रयोग किया गया. परन्तु यहाँ एक और विरोधाभास था. एक तरफ बैंकों ने बिल्डरों को क्रेडिट की लंबी-लंबी स्कीमें थमा दी ताकि वे और अधिक घरों का निर्माण कर सकें. और उसी वक्त, उन्हीं बैंकों ने, उन लोगों को कर्ज दे दिया जो इस नयी खड़ी की गयी संपत्ति को खरीदना चाहते थे. यह पोंजी स्कीम – एक निवेश संबंधी घोटाला जिसमें शुरू के निवेशकों को मिलनेवाला तथाकथित लाभ नए जुडनेवाले निवेशकों के फंडों से सीधा प्राप्त हो जाता है – का सटीक उदाहरण था. अन्य सभी पोंज़ी स्कीमों की भांति, पूरी ईमारत उस वक्त भरभराकर गिर गयी जब निवेशकों ने नकदी वसूलने का फैसला किया.

लेकिन हम इतने अधिक लोगों की उस क्षेत्र में, जो उदाहरणतय, मैन्युफेक्चरिंग जैसे क्षेत्र में निवेश के मुकाबले संदिग्ध हो, में निवेश की इच्छा की किस प्रकार व्याख्या करेंगे ? और यही है वह जहाँ, हम हार्वे के विश्लेषण की गरी की झलक पाते हैं. वे तर्क देते हैं की बीतें दिनों वित्तीय संकटों में हुए प्रवर्धनों को उत्साहित करने के लिए जो चीज थी, वह थी, पूंजीवाद की तीन प्रतिशत की मिश्रित दर से वृद्धि की प्रतिबद्धता. बीते समय में, सीमित विश्व में जिसमें इतनी अधिक अविकसित मंडियां हों , अमेरिका और ब्रिटेन के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना संभव था. लेकिन अब जबकि चीन और भारत भी उसी दर या उससे भी अधिक दर से विकसित हो रहे हैं, पूंजीवादी उद्यमों के लिए अपने बेशी-मुनाफों का निवेश करने का क्षेत्र सिकुड़ रहा है. वर्तमान समय में, £1.5 ट्रिलियन नए निवेश की खोज में पड़े हैं. २० वर्षों के समय में, वे £ 3 ट्रिलियन हो जायेंगे. इसलिए उसका अनुसन्धान हुआ, जिसे हार्वे ‘फ़र्ज़ी मंडियां’ : व्युत्पादन (derivatives ) की मंडियां, भविष्य में व्युत्पादन के व्युत्पादन और कार्बन  ट्रेडिंग कहना पसंद करते हैं. शुरू में, ये इनमें निवेश करनेवालों को, उद्योग में निवेश की तुलना में अधिक प्रतिलाभ देने का वायदा करते है लेकिन वे, जैसाकि हमने अपने दम पर देखा है, अंतिम रूप में, भ्रम साबित होते हैं .

जैसे-जैसे [RSA ] के श्रोताओं की ध्यान-मुद्रा साफ़ होती जाती है, इस दलील से प्रभावित न होना मुश्किल लगता है और विशेषरूप से तब, जब इसे, पिछले बारह महीनों के दौरान अन्य अर्थशास्त्रियों की टूटी-फूटी टिप्पणियों के कोंट्रासट में रखते हैं. परन्तु मैं अपनी उस वक्त की बेचैनी को दबा नहीं सका जब हार्वे  मौजूदा स्थिति पर रेडिकल हल पेश करने की और बढ़ रहे थे, जहाँ ऐसा लगता था कि यह ताज़ा पूंजीवादी संकट इसके कफ़न के लिए अंतिम कील साबित होगा. मैं इसलिए चौकस था कि इस तरह की भविष्यवाणियाँ पहले भी कई बार हुई थीं. पूंजीवाद, हमें बहुत से सिद्धान्तकारों द्वारा बताया गया था , 1973 के तेल संकट,या IMF के 1976 के संकट , या 1987 के काले सोमवार के साथ या 1992 के काले बुधवार के साथ, अपने चरम बिंदु पर पहुँच गया था. परन्तु भविष्यवाणियाँ फेल साबित हुईं. बार-बार पूंजीवाद, जीवित रहने में, सफल रहा. इसलिए क्या मौजूदा स्थिति में कुछ ऐसा है जो वास्तव में अलग हो ?

ऐसी कोई बात नहीं है जिसने मुझे परेशान किया हो. हार्वे इतनी तैयारी में हैं कि वे पूंजीवाद द्वारा संकटों पर काबू पाने और कुशलतापूर्वक मुनाफा कमाने के नए रास्तों की खोज को तस्लीम नहीं कर पाते. बीते समय में, इसने अपने इस मकसद को हासिल करने के लिए कई अतार्किक तरीके खोजे थे. और इसने ऐसा ही किया, जैसे हार्वे अपनी पुस्तक ‘पूंजीवाद की पहेली’  [ The Enigma of Capital ] में इसके द्वारा युद्ध के रास्ते से, परिसम्पत्तियों के अवमूल्यन से, उत्पादक क्षमता के अपकर्ष से, अपसर्जन और अन्य सृजनात्मकता की तबाही द्वारा, अपनी समस्याओं का हल करता रहा है. इन सभी समाधानों से चौंकानेवाले परिणाम निकले हैं. मानव जीवन अस्त-व्यस्त और जहाँ तक कि तबाह हो जाता है, सारा कैरियर और जीवनभर की उपलब्धियां खतरे में पड़ जाती हैं, गहरे पैठ कर चुके विश्वास को चुनौती मिलती है, रूह घायल हो जाती है और मानव के गौरव का परित्याग कर दिया जाता है. सृजनात्मक तबाही शानदार, सुन्दर, बुरे और अच्छे – सभी पर भारी पड़ती है. संकट, हम निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं, ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’ है.

परन्तु निसंदेह, उनकी जिज्ञासा यह दिखाने की है, कि वर्तमान संकट पिछले सभी संकटों, जिनपर काबू पा लिया गया था, की तुलना में कहीं अधिक गंभीर है और उनकी जिज्ञासा यह सुझाव देने की होती है कि प्रत्येक समझदार व्यक्ति के पास ‘पूंजीवाद विरोधी अभियान’ में शामिल होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है, लेकिन फिर भी, वे भविष्यवेत्ता बनने से बहुत दूर हैं.

क्या पूंजीवाद वर्तमान सदमे से बच निकलेगा ? हाँ, बेशक. लेकिन हार्वे विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि इसकी भारी कीमत चुकानी होगी. लोगों की अधिकतर आबादी को अपनी मेहनत के फल को उन्हें देना होगा, जो सत्ता में हैं, अपने बहुत से अधिकारों और अपने साधनों की सख्त मुशक्त से हासिल की गयी कीमत ( आवास से लेकर पेंशन फंड, हर वस्तु) का त्याग करना होगा और प्रचुर मात्रा में, परिवेशी अपकर्ष का दर्द झेलना होगा. केवल इतना ही नहीं कि अपने जीवन स्तर में कटौती बल्कि इसका अर्थ होगा बहुत से गरीब लोग, जो पहले ही जीवित रहने का संघर्ष कर रहे हैं, उनके लिए भूखमरी. थोड़े से राजनीतिक दमन से कहीं अधिक, आनेवाली अशांति का गला घोंटने के लिए, पुलिस हिंसा और मिलट्री राज्य नियंत्रण की आवश्यकता पड़ेगी. जिस वक्त,  हार्वे यह सब कह रहे थे, ठीक उसी वक्त, एथेन की गल्लियों में लड़ाई बढ़नी शुरू हो गयी थी.

यद्यपि, इस सब का मतलब निराश होने से नहीं है. संकंट विरोधाभास और संभावनाओं के वे क्षण होते हैं, जिनसे विकल्प के तरीके, समाजवादी और पूंजीवाद विरोधी, सभी जन्म लेते हैं.

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एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

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लिंक जोड़ने के लिए देखें —  ‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

मार्क्सवाद और देश दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि पूंजीवाद अपने जन्म से ही लंगड़ा-लूला पैदा हुआ है और उसे मेहनतकश अवाम ने न केवल चुनौतीपूर्ण टक्कर ही दी है, बल्कि बीसवीं सदी में बुर्जुआ वर्ग से सत्ता छीनकर सोवियत यूनियन और चीन में महान समाजवादी तजुर्बे भी किये हैं. हालाँकि अपने इन प्रारंभिक तजुर्बों में मेहनतकश वर्ग ,वक्ती तौर पर, हार गया है और सोवियत यूनियन और यहाँ तक की चीन की वर्तमान संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडे तले पूंजीपति वर्ग ने अपनी सत्ता को स्थापित कर लिया है. डॉ. झुनझुनवाला [ देखें — वामपंथ की सैद्धांतिक भूल ] बंगाल में सत्तासीन रही संशोधनवादी पार्टी की हार का ज़िक्र करते हैं और मार्क्सवाद की थ्योरी को त्रुटिपूर्ण होने का फ़तवा सुना देते हैं, बिना यह जाने कि मार्क्सवाद कोई कठमुल्ला उपदेशात्मक शास्त्र नहीं है, बल्कि वर्गीय समाज के संघर्ष में, ऐसा समाज शास्त्र है जो सर्वहारा पक्षावलम्बी है. मार्क्सवाद ने अपने संघर्ष के दौरान न केवल पूंजीपति वर्ग से टक्कर ली है बल्कि लाल झंडे के तले अराजकतावाद, आतंकवाद, अर्थवाद, ट्रेड-यूनियनवाद आदि संशोधनवाद, जो मार्क्सवाद को इतना पतला और कमजोर कर देना चाहता है ताकि यह पूंजीपति वर्ग की सत्ता को चुनौती न देकर उसकी सेवा में हाज़िर हो और अपने संसदमार्गी कृत्यों से मजदूर वर्ग के आक्रोश पर ठन्डे पानी के छींटे मारकर उनकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करता रहे, केखिलाफ भी संघर्ष किया है.

अपने इस आलेख में, डॉ. झुनझुनवाला इस प्रकार के निष्कर्ष निकालते हैं जैसे,  ‘मार्क्सवादी बाजार विरोधी है जबकि बाज़ार सभी को उनकी क्षमतानुसार काम करने के अवसर प्रदान करता है’. बाज़ार का महिमामंडन करते हुए वे लिखते हैं,
“हम देखते हैं कि आर्टिस्ट को पेंटिंग बनाने में ही मजा आता है। पेंटिंग बिक गई, इतनी ही जानकारी उसके लिए पर्याप्त होती है। किसान गेहूं का उत्पादन करके प्रफुल्लित होता है, यद्यपि उसे पता नहीं होता कि रोटी कौन खाएगा। श्रमिक को यदि उसके स्वभाव के अनुकूल काम मिल जाए तो वह सुखी होता है। आर्टिस्ट को हल चलाने में लगा दिया जाए तो वह दुखी होगा और किसान को पेंटिंग करने के लिए ब्रश थमा दी जाए तो वह भी दुखी होगा। विशेष यह कि व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य ढूंढने में बाजार से मदद मिलती है। श्रमिक मन चाहा कार्य पकड़ सकता है। इसलिए मूल रूप से बाजार सुखदायी है।

डॉ. झुनझुनवाला जी, किसान, श्रमिक, और आर्टिस्ट जन्म से पैदा नहीं होते. व्यक्ति का मनपसंद कार्य वह नहीं होता जो वह कर रहा होता है. वर्गीय समाज का विकास इसका मुख्य निर्धारक होता और व्यक्ति की इच्छा गौण. मोटे तौर पर वर्गीय समाज आदिम साम्यवाद से लेकर मालिक-गुलाम, सामंत-किसान और अब पूंजीपति-मजदूर — चार चरणों से होकर गुजरा है . यह सब किसी एक व्यक्ति के चाहने या न चाहने से नहीं हुआ. वर्ग-संघर्ष इसका वस्तुगत चरित्र रहा है.बाजार भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से पैदा हुआ है. चूँकि पूंजीपति वर्ग और  समाज के अस्तित्व के लिए बाज़ार जरूरी है, इसलिए इसका महिमामंडन भी जरूरी है, जोकि आप बाखूबी कर रहे हैं. आपका यह “मूल रूप से बाजार” श्रमिक – जिसके पास अपनी श्रम-शक्ति बेचने के सिवा और कुछ नहीं होता – को नहीं, आपको सुखदायी लगता है।

हमारा यह मानना है कि मार्क्सवाद बाज़ार विरोधी है लेकिन उस प्रकार से नहीं जिस प्रकार डॉ. झुनझुनवाला पेश करते हैं. अपने सारे आलेख में वे ,बड़ी चालाकी के साथ, मार्क्स के मूल्य के श्रम-सिद्धांत का ज़िक्र तक नहीं करते और मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ सिद्ध कर देते हैं. यही वह बाज़ार होता है जहाँ श्रम-शक्ति पण्य (कमोडिटी) के रूप में बिकती है और अपनी विशिष्टता ( श्रम-शक्ति अकेली ऐसी पण्य है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है) के कारण अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है जिसमें से पूंजीपति वर्ग न केवल अपना मुनाफा वसूलता है बल्कि उसकी सेवा में हाज़िर राज्य और उसकी संस्थाओं के खर्च भी निकलते हैं. अपनी विशेष हैसियत के कारण, पूंजीवादी उत्पादन क्रिया से लूटे गये अतिरिक्त मूल्य पर हक़ का पहला दावेदार पूंजीपति वर्ग होता है. यही कारण है कि इस वर्ग की खुशामद द्वारा बुर्जुआ वर्ग का  बुद्धिजीवी (ध्यान रहे बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा संकल्प नहीं है जिसकी अवस्थिति वर्ग-हितों से ऊपर हो ) चंद हड्डियों की अपेक्षा पाले रहता है. ऐसा नहीं है कि एक संशोधनवादी, संसदमार्गी  और मजदूर वर्ग में अर्थवाद द्वारा उसकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करनेवाली माकपा ‘स्टाईल मा‌र्क्सवादियों की पार्टी’ की हार से डॉ. झुनझुनवाला को मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ दिखाई देने लगी हों और वे बड़ी ईमानदारी से मार्क्सवाद पर चिन्तन-मनन करने लगे हों. कारण उनकी पूंजीवादी वर्ग-स्थिति है और वे माकपा जैसी संशोधनवादी पार्टी की हार से व्याकुल इसलिए हैं कि कहीं मजदूरों की, इन संशोधनवादी पार्टियों के प्रति, आस्था न डगमगा जाये और वे, विकल्प के तौर पर, अपनी सच्ची कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण न कर लें.

मार्क्स ने पूंजीवादी समाज की विशेषताओं में से एक – श्रम के अलगाव का ज़िक्र किया है. अकेला मजदूर वर्ग ही सक्षम है जो पूंजीपति वर्ग से संघर्ष द्वारा – वर्गीय समाज को ख़त्म करने की प्रक्रिया द्वारा – इस मर्ज़ का इलाज करेगा. इसलिए मार्क्सवाद की अवस्थिति वर्तमान और भविष्य में है. लेकिन डॉ. झुनझुनवाला मार्क्स को उस ग्रामीण परिवेश में भेज देते हैं, जहाँ  “गाँव का व्यक्ति किसान के लिए हल बनाता है …वह उसमें अपने प्राण आहूत करता है। उसके सामने ही किसान उसका उपयोग करता है, जिसे देखकर दोनों का मन लहलहाता है।” पता नहीं किस युग में और कैसे किसान जोकि  सामंतो द्वारा शोषित रहा है अपनी उस वक्त की मेहनतकश की स्थिति पर प्रफुल्लित होता रहा है ? ‘अह़ा ग्राम्य जीवन’ का ‘नोस्तालजिया’ मार्क्स का नहीं डॉ. झुनझुनवाला का है जिन्होंने बीते का रुदन करनेवाले कवियों से इसका महिमा मंडन सुन रखा है   वे भूल जाते हैं कि मार्क्स की रचनाओं के तीन स्रोत और तीन अंग उस वक्त के विकसित पूंजीवाद के तीन देशों – दर्शन के लिए जर्मनी, अर्थशास्त्र के लिए इंग्लैण्ड और क्रांतियों व समाजवाद के लिए फ़्रांस – से लिए गए हैं. अब तो सारा विश्व पूंजीवाद के नियमों के अनुसार गतिमान है और कृषि में भी किसान बैलों के पीछे-पीछे हल पकडे नहीं भटकता बल्कि कृषि संबंधी उत्पादन में उसके श्रम की भूमिका गौण हो गयी है और मजदूर वर्ग ही वहाँ उत्पादन क्रिया में मुख्य रूप से सक्रीय है.  कृषि उत्पादन में पूंजीवादी संबंधों की मुकम्मल स्थापना ने छोटे किसानों की तबाही निश्चित कर दी है और वे मजदूर वर्ग की अवस्थिति और दृष्टिकोण अपनाने को बाध्य होते जा रहे हैं. भविष्य में उनका बड़ा हिस्सा मजदूरों द्वारा संपन्न की जानेवाली इक्कीसवीं सदी की नई समाजवादी क्रांतियों के लिए अहम भूमिका अदा करेगा.

डॉ. झुनझुनवाला  लिखते हैं, “एक प्रमुख अखबार ने लिखा है कि वामपंथी विचारधारा तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक देश में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहेगी। यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित है.”

यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित हो सकता है लेकिन एक मार्क्सवादी के लिए नहीं. मार्क्सवाद की विशिष्टता है कि इसने इस वस्तुगत सच्चाई की निशानदेही की है जिसमें, पूंजीवाद ने अपनी विकास प्रक्रिया के दौरान, समाजके एक छोर पर अकूत धन-दौलत और दूसरे सिरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया है. गरीबी,  बीमारी और असमानता जैसी अलामतें इसके जरूरी बाई-प्रोडक्ट हैं. मार्क्सवाद ने एक और कटु सत्य इंगित किया है जो पूंजीपतियों और उनके डॉ झुनझुनवाला जैसे बुद्धिजीविओं को सताता रहता है. पूंजीवाद द्वारा पैदा किये गए कंगाली के इस विशाल समुद्र के सापेक्ष पूंजीपतियों की खुशहाली की चंद मीनारों की औकात अल्पसंख्यक और कमजोर की है जो  कभी भी भरभराकर गिर सकती हैं. मार्क्सवादी विचारधारा की प्रासंगिगता, केवल देश या दुनिया में, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहने तक ही नहीं है बल्कि यह प्रासंगिक रहेगा तब तक, जब तक, वर्गीय समाज का अस्तित्व रहेगा. केवल वर्गविहीन समाज में इसका स्थान म्यूजियम में होगा.

वे अपनी कलम मजदूर वर्ग की तानाशाही पर चलाते हुए मध्यम वर्ग में इस बुर्जुआ लोकतंत्र के भ्रम को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. हो सकता है कि पढेलिखे मध्यम वर्ग के एक हिस्से की, इस बुर्जुआ लोकतंत्र में भारी आस्था हो, लेकिन मजदूर वर्ग इस बात को भली-भांति समझता है कि यह लोकतंत्र बुर्जुआ वर्ग का, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतंत्र है. मजदूर वर्ग के लिए यह तानाशाही ही है. किसी भी वर्गीय समाज में ऐसा लोकतंत्र नहीं हो सकता जो सर्वमान्य हो और न ही सर्वहारा वर्ग, जब वह सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, बुर्जुआ वर्ग और उसके पैरोकारों को लोकतान्त्रिक हक़ देने की छूट दे सकता है, क्योंकि इसका अर्थ होगा – पूंजीवाद की पुनर्स्थापना.

अपने आलेख के अंत में, वे वामपंथ को सैद्धांतिक संजीवनी की घुट्टी पिलाते हुए  और “थ्योरी का  नवीनीकरण” करने की सलाह देते हुए “बाजार का बहिष्कार करने के स्थान पर बाजार पर लगाम लगाने” और ” सरकारी तंत्र के विस्तार के स्थान पर ऐसी पालिसी की मांग” जो  “हल्के सरकारी तंत्र से भारी जनहित हासिल करे” जैसी चलताऊ बातों करके खुश हो लेते हैं, जैसेकि उन्होंने अपने इस आलेख में मार्क्सवाद की ऐसी की तैसी कर दी हो. उनके हलके सरकारी तंत्र और जनतंत्र पर मार्क्सवाद का कहना है कि जब मजदूर वर्ग समाजवाद के संक्रमण काल में बुर्जुआ वर्ग का नामोनिशान मिटा देगा तो उसे किसी भी तरह के -हलके या भारी तंत्र – की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय – दूसरी किश्त

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आलेख की प्रथम किश्त के लिए देखें : मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय

नोट : इस आलेख में मार्क्स की रचनाओं संबंधी दिए गए बहुत से नुक्तो से शहीद भगत सिंह विचार मंच असहमत है, लेकिन नेट पर हिंदी भाषा में इस प्रकार की सामग्री का नितांत अभाव खटकता है जिसे दूर किया जाना चाहिए.

मार्क्स और अर्थशास्त्र

पूंजी का प्रथम खंड, पण्य उत्पादन के विचार के विश्लेषण से प्रारंभ होता है. पण्य की परिभाषा है, बाह्य उपयोगी वस्तु जिसे मण्डी में विनिमय के लिए प्रस्तुत किया जाता है. इस प्रकार, पण्य उत्पादन के लिए दो जरूरी शर्ते हैं; मण्डी का अस्तित्व जिसमें विनिमय हो सके और सामाजिक श्रम-विभाजन जिससे भिन्न-भिन्न लोग भिन्न भिन्न उत्पादों का उत्पादन करें क्योंकि इसके बिना विनिमय के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं बचता. मार्क्स कहते हैं की पण्य में दो बातें होती हैं ; उपयोग मूल्य (value) – अन्य शब्दों में उपयोग और विनिमय मूल्य – शुरू में समझने के लिए हम वस्तु की उस कीमत(price) से लेते हैं जिसका हम भुगतान करते हैं. मार्क्स का मानना है कि उपयोग मूल्य को आसानी से समझा जा सकता है परन्तु उनका दृढतापूर्वक आग्रह है कि विनिमय मूल्य एक पेचीदा मसला है और सापेक्ष विनिमय मूल्य व्याख्या की मांग करते हैं. क्यों किसी पण्य की एक निश्चित मात्रा किसी अन्य पण्य की एक निश्चित मात्रा से बदल ली जाती है ? पण्य के उत्पादन के लिए लगने वाले श्रम की शर्त द्वारा वे इसकी व्याख्या करते हैं. यही नहीं वे कहते है कि जरूरी सामाजिक श्रम वह श्रम होती है जिसे किसी अर्थव्यवस्था में किसी उत्पादक कार्य के लिए, श्रमिक वर्ग में मौजूद उत्पादकता और प्रबलता के औसत स्तर तक निचोड़ा जाता है. इस प्रकार, मूल्य के श्रम सिद्धांत का आग्रह है कि किसी पण्य के मूल्य का निर्धारण उस पर लगी सामाजिक जरूरी श्रम की मात्रा के द्वारा होता है. मूल्य के श्रम सिद्धांत की पैरवी के लिए मार्क्स अपने तर्कों को दो चरणों में पेश करते हैं. पहले चरण में उनका तर्क है कि अगर दो वस्तुओं की तुलना की जाती है तो इनको, किसी समान संकेत के दोनों तरफ रखने के अर्थ में, तीसरी वस्तु की आवश्यकता होगी जो मात्रा में इन दोनों वस्तुओं के समान हो ताकि ये दोनों वस्तुएं उस वस्तु से समानयन हो जाएँ. चूँकि अब दोनों वस्तुओं को आपस में बदला जा सकता है इसलिए, मार्क्स कहते हैं, अब जरूरी है कि कोई ऐसे तीसरी वस्तु हो जिसमें इन दोनों वस्तुओं का साझा हो. यही से दूसरे चरण के लिए प्रोत्साहन मिलता है जो कि उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ की खोज है. यह उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ केवल श्रम ही हो सकती है जिसमें साझा गुण हैं.

मार्क्स कहते हैं कि पूंजीवाद के विशिष्ट गुण हैं जिसमें केवल वस्तुओं का विनिमय ही नहीं होता बल्कि पण्यों की खरीद और उनको अन्य पण्यों जिनमें और अधिक मूल्य हो, में रूपांतरण द्वारा मुनाफा अर्जित करने के उद्देश्य से, धन के रूप में पूंजी को बढ़ाना होता है. मार्क्स का दावा है कि उनसे पहले के किसी भी सिद्धांतकार ने पर्याप्त रूप से, इस बात की व्याख्या नहीं की है कि कैसे पूंजीवाद समुचित रूप में मुनाफा पैदा करता है. मार्क्स इसका हल पूंजीवाद में श्रमिक के शोषण में देखते हैं. उत्पादन की स्थिति पैदा करने के लिए, पूंजीपति पण्य के रूप में श्रमिक की श्रम-शक्ति – उसके एक निश्चित कार्य दिवस के लिए काम करने की क्षमता – को खरीदता है. इस पण्य के मूल्य का निर्धारण भी अन्य पण्यों के मूल्य के निर्धारण की भांति; इसके उत्पादन में खर्च हुई सामाजिक जरूरी श्रम द्वारा होता है. इस केस में एक कार्य दिवस की श्रम-शक्ति का मूल्य उन पण्यों के मूल्य के समान है जो उसे (श्रमिक को) एक दिन के लिए जीवित रखने के लिए पर्याप्त हैं. मान लीजिए कि इन पण्यों के उत्पादन पर चार घंटे खर्च होते हैं तो कार्य दिवस के पहले चार घंटे उस मूल्य को पैदा करने में खर्च किये जायेंगे जिसे श्रमिक को मजदूरी के रूप में भुगतान किया जाता है. इसे जरूरी श्रम कहते हैं. इसके अलावा की जानेवाली श्रम को अतिरिक्त श्रम कहते हैं जो पूंजीपति के लिए अतिरिक्त (बेशी) मूल्य पैदा करती है. मार्क्स के अनुसार यही अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत होता है. मार्क्स के विश्लेषण के अनुसार अकेली श्रम-शक्ति ही ऐसी पण्य है जो अपनी औकात से अधिक मूल्य पैदा कर सकती है. इसी कारण इसे, अस्थिर पूंजी (variable capital ) के नाम से जाना जाता है. अन्य पण्य अपने से निर्मित नई पण्य में अपना मूल्य स्थानातरण कर देती हैं लेकिन कोई नया मूल्य पैदा नहीं कर सकती. उन्हें स्थिर पूंजी (constant capital ) कहा जाता है. मुनाफा जरूरी श्रम से प्राप्त मजदूरी से ऊपर की गयी अतिरिक्त श्रम से आता है. यही है मुनाफे का अतिरिक्त मूल्य सिद्धांत.

इतिहास का सिद्धांत

इस सिद्धांत के बारे में मार्क्स विस्तारपूर्वक ज्यादा नहीं लिखते. इसलिए इसकी विषय-वस्तु को उनकी अलग-अलग रचनाओं – दोनों प्रकार से जहाँ वे भूतकाल  और भविष्य की घटनाओं का सैद्धांतिक विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं और दूसरा विशुद्ध सैद्धांतिक प्रकृति का विश्लेषण –  से लेना पड़ता है. १८५९ की राजनीतिक अर्थशास्त्र की भूमिका ने प्रामाणिक ख्याति अर्जित कर ली है. यद्यपि १८४५ में फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर लिखी गई ‘जर्मन वैचारिकी’ एक मजबूत प्रारंभिक स्रोत है जिसमें मार्क्स ऐतिहासिक भौतिकवाद संबंधी दृष्टिकोण के मूल नियमों के बारे में लिखते हैं. पहले हम इन दोनों रचनाओं की संक्षिप्त रूपरेखा खींचेगे, तत्पश्चात उनके अब के सबसे प्रबल पक्षसमर्थक जी. ए. कोहेन की मार्क्स के इतिहास संबंधी सिद्धांत की पुनर्रचना पर निगाह डालेंगे.

जर्मन वैचारिकी

जर्मन वैचारिकी में मार्क्स और एंगेल्स उस वक्त के जर्मनी के दर्शन जिसकी खासियत विचारवाद थी, के विरुद्ध नए भौतिकवादी तरीको को रखते हैं. उनकी शुरुआत, जैसा कि वे कहते हैं, ” असल मनुष्यों”  से होती है  जोकि आवश्यक रूप से उत्पादनशील होते हैं और उनके लिए जरूरी होता है कि वे अपनी भौतिक जरूरतों की पूर्ति हेतू निर्वाह के साधनों का उत्पादन करें. जरूरतों की संतुष्टि से, भौतिक और सामाजिक, दोनों प्रकार की जरूरतें पैदा हो जाती हैं और मानवीय उत्पादक शक्तियों के विकास की दशानुसार नए सामाजिक रूपों का उदय हो जाता है. भौतिक जीवन सामाजिक जीवन को नियत करता है. इसलिए सामाजिक विश्लेषण की प्रथम दिशा भौतिक उत्पादन से सामाजिक रूपों की ओर और तत्पश्चात चेतना के रूपों की ओर है. जैसे-जैसे उत्पादन के भौतिक साधन विकसित होते जाते हैं , वैसे-वैसे ‘सहयोग के ढंग’ या आर्थिक संरचनाओं का  उत्थान और पतन होता रहता है और अंत में जब श्रमिक वर्ग की पीड़ादायक स्थिति और विकल्प के प्रति उनकी जागरूकता, उन्हें क्रांतिकारी बनने के लिए उकसाएगी तो साम्यवाद वास्तविक संभावना बन जायेगा.

1859 प्राक्कथन

‘जर्मन वैचारिकी’ के मसौदे में ऐतिहासिक भौतिकवाद के सभी कुंजीवत तत्व मौजूद हैं, निसंदेह, इसकी शब्दाबली मार्क्स की अधिक विकसित लेखन सामग्री के बराबर नहीं है.  1859 प्राक्कथन में मार्क्स के वक्तव्य ने इसे और अधिक प्रखर रूप में प्रस्तुत किया है. प्राक्कथन में मार्क्स के विचारों की कोहेन की पुनर्रचना की शुरुआत, जैसाकि वे कहते हैं, विकास सिद्धांत जोकि पूर्व अनुमानित है न कि प्राक्कथन में स्पष्ट रूप से वर्णित, से होती है. इस सिद्धांत के अनुसार उत्पादक शक्तियों की अभिरुचि, समय के साथ-साथ, ओर अधिक शक्तिशाली बनने के अर्थ में, विकास की ओर होती है. इसका अर्थ यह नहीं है कि वे सदैव विकसित ही होती रहती हैं, परंतू उनमें इस प्रकार का रुझान होता है. उत्पादक शक्तियां , उत्पादक तरीके से लागू होनेवाले ज्ञान : तकनीक के साथ उत्पादन के साधन हैं. दूसरा सिद्धांत प्रमुखता का सिद्धांत है जिसके दो पहलू हैं. पहला सिद्धांत कहता है कि  उत्पादक शक्तियों के विकास के स्तर द्वारा आर्थिक संरचना की प्रकृति की व्याख्या की जाती है और दूसरे सिद्धांत के अनुसार अधिसंरचना – समाज की राजनीतिक और वैधानिक संस्थाओं – की प्रकृति की व्याख्या आर्थिक संरचना की प्रकृति के द्वारा होती है. समाज की वैचारिकी, जैसे समाज में विद्यमान धार्मिक, कलात्मक, नैतिक और दार्शनिक मतों की प्रकृति की व्याख्या भी समाज की आर्थिक संरचना की शर्तों के अनुसार होती है.

क्रांति और युग परिवर्तन को किसी आर्थिक संरचना द्वारा उसकी उत्पादक शक्तियों के और अधिक विकास की सक्षमता के अभाव के परिणामस्वरूप समझा सकता है. विकास के इस चरण पर उत्पादक शक्तियों के विकास के पैरों में बेड़ियाँ पड़ जाती हैं, और, सिद्धांतानुसार, जैसे ही कोई आर्थिक संरचना विकास में बाधक बन जाती है – विस्फोट हो जाता है – क्रांति घटित हो जाती है और परिणामस्वरूप एक ऐसी आर्थिक संरचना इसका स्थान ग्रहण करती है जो उत्पादक शक्तियों के विकास को आगे बढ़ाये.

सिद्धांत के इस प्रारूप में आकर्षक सादगी और शक्ति है. सुखद लगता है कि मानव उत्पादक शक्ति समय के साथ-साथ विकसित होती रहती है और यह भी सुखद लगता है कि आर्थिक संरचनाओं का अस्तित्व तब तक कायम रहता है जब तक वे उत्पादक शक्तियों को विकसित करती रहती हैं और ऐसा करने के अभाव में उनका प्रतिस्थापन हो जाता है. परंतू उस वक्त गंभीर समस्याएं उभर आती हैं जब हम इन हड्डियों पर और अधिक मांस चढाने की कोशिश करते हैं.

व्यावहारिक व्याख्या

अंग्रेजी भाषीय राजनीतिक दर्शन में कोहेन के काम से पहले ऐतिहासिक भौतिकवाद एक सुसंगत दृष्टिकोण के रूप में नहीं माना जाता था. इस द्वेष को एच. बी. एक्टन के समापन शब्दों – युग का भ्रम ; ” “मार्क्सवाद एक दार्शनिक गड़बड़झाला है” में व्यक्त किया जा सकता है. कोहेन द्वारा विशेष रूप से अपनायी गई एक मुश्किल उत्पादक शक्तियों की प्राथमिकता और मार्क्स द्वारा उत्पादक शक्तियों के विकास के आर्थिक  संरचना की प्राथमिकता के दावों के बीच की विसंगतियां हैं. उदाहरण के लिए ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ में मार्क्स कहते हैं, ” उत्पादन के औजारों की सतत क्रांति किये बिना बुर्जुआजी अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकती”. ऐसा लगता है कि यह आर्थिक संरचना – पूंजीवाद जो कि उत्पादन की शक्तियों का विकास करता है – को कारणात्मक और व्याख्यात्मक प्राथमिकता देता हो. उपरी तौर पर ही सही, लेकिन कोहेन इसे स्वीकार करते हैं जिससे एक विसंगति उत्पन्न हो जाती है. ऐसा लगता है कि आर्थिक संरचना और उत्पादक शक्तियां ; दोनों एक दूसरे पर वर्चस्व बनाये रखती हों. ‘अंतिम तौर पर निर्धारक’ या ‘द्वंदात्मक संबंधों का विचार’ जैसे अस्पष्ट संकल्पों से असंतुष्ट होकर कोहेन चैतन्य रूप से स्पष्टता के मानक और विश्लेषणात्मक दर्शन की शक्ति द्वारा ऐतिहासिक भौतिकवाद की पुनर्रचना का वर्जन देने की कोशिश करते हैं.

इस सैद्धांतिक नवाचार की कुंजी व्यावहारिक व्याख्या  ( कई बार इसे परिणामात्मक व्याख्या भी कहा जाता है ) की अवधारणा के आग्रह में है. हर्षपूर्वक, यहाँ से आवश्यक गमन “आर्थिक संरचना उत्पादक शक्तियों का विकास करती ही हैं” की ओर होता है, लेकिन इसे स्वीकार कर लेने के पश्चात, सिद्धांत के अनुसार, प्रश्न उठता हैकि हमारे पास पूंजीवाद क्यों है ? अन्य शब्दों में, अगर पूंजीवाद उत्पादक शक्तियों को विकसित करने में असफल हो जाता है तो यह ओझल हो जायेगा. और हकीकत में, यह ऐतिहासिक भौतिकवाद में खूबसूरती से फिट बैठता है. क्योंकि मार्क्स दावा करते हैं कि जब आर्थिक संरचना उत्पादक शक्तियों को विकसित नहीं करती – जब ये उसके पैरों की बेड़ियाँ बन जाती हैं – इसका क्रांतिकरण हो जाता है और युग बदल जाता है. इस प्रक्रार, “पैरों की बेड़ियों” का विचार व्यावहारिक व्याख्या के विरुद्ध हो जाता है. आवश्यक रूप से, ‘पैरों की बेड़ियाँ’ से अभिप्राय किसी आर्थिक संरचना के क्रियाविहीन होने से हैं.

अब साफ़ है कि इससे ऐतिहासिक भौतिकवाद में सुसंगति आ जाती है. परंतू सवाल पैदा होता है कि क्या यह इसके लिए बहुत बड़ी कीमत नहीं है ? क्या व्यवहारिक व्याख्या सुसंगत प्रणाली का औजार है ? समस्या है कि हम पूछ सकते हैं कि वह कौनसी चीज है जो यह शर्त उत्पन्न करती है कि कोई भी आर्थिक संरचना तब तक जीवित रहेगी जब तक वह उत्पादक शक्तियों को विकसित करती रहेगा ? जॉन एलस्टर इसे सख्ती से कोहेन के विरुद्ध रखते हैं. अगर हम तर्क करें कि इतिहास का मार्गदर्शन करनेवाला कोई कर्ता होता है जिसका उद्देश्य, जहाँ तक संभव हो, उत्पादक शक्तियों को विकसित करना होता है, तब इसका अर्थ होगा कि इस प्रकार का कर्ता सबसे बढ़िया काम करनेवाली आर्थिक संरचना का चुनाव करके इस उद्देश्य की पूर्ति हेतू इतिहास में दखल दे. यदपि मार्क्स इस प्रकार की कोई भी  आधिभौतिक मान्यताएं नहीं देते. कई बार मार्क्स और कई बार कोहेन के बारेमें, इतिहास  में उद्देश्य संबंधी आग्रह के बारेमें, एलस्टर बहुत आलोचनात्मक हैं.

कोहेन इस मुश्किल से भली-भांति अवगत हैं परन्तु जैवविकास में इसके प्रयोग की ऐतिहासिक भौतिकवाद के साथ तुलना करते हुए, वे व्यावहारिक व्याख्या का बचाव करते हैं. समकालीन जीव विज्ञान में यह आम है कि चीते की धारियों और पक्षियों की हड्डियों के खोखलेपन की व्याख्या उनके इन गुणों के आधार पर होती है. यहाँ उद्देश्य स्पष्ट हैं और ये उद्देश्य किसी और के नहीं हैं. इसका स्पष्ट विरोध एक है कि जैवविकास में इन व्यावहारिक व्याख्याओं के लिए हम एक कारणात्मक कहानी – एक ऐसी कहानी जिसमें अवसर विभेद और सर्वोतम का जीवित रहना सम्मलित होते हैं – देते हैं. इस प्रकार, इन व्यावहारिक व्याख्याओं का कारणात्मक फीडबैक लूप द्वारा बचाव किया जाता है जिससे क्रियाविहीन तत्त्व, मुकाबले में मौजूद बेहतर तत्त्वों द्वारा फ़िल्टर कर दिए जाते हैं. पृष्ठभूमि में मौजूद इन विवरणों को कोहेन ‘विवर्धन’ (elaborations ) कहते हैं और व्यावहारिक व्याख्याओं में इस प्रकार के ‘विवर्धन’ की जरूरतों को स्वीकार करते हैं. परंतू वे मानक कारणात्मक व्याख्याओं में भी ‘विवर्धन’ की जरूरत पर बल देते हैं. हम,उदाहरण के लिए, इस प्रकार व्याख्या से संतुष्ट हो जाते हैं कि गुलदस्ता टूट गया क्योंकि इस फर्श पर फैंक दिया गया परंतू बहुत सारी मात्रा में, और सूचना दरकार होती है कि कैसे ये व्याख्याएँ कार्य करती हैं. कोहेन दावा करते हैं कि  व्यावहारिक व्याख्याओं को प्रस्तावित करना न्यायसंगत ठहराया जा सकता है बेशक हम इनके ‘विवर्धन’ से अनजान हों. वास्तव में, जीव विज्ञान में भी, व्यावहारिक व्याख्याओं का कारणात्मक ‘विवर्धन’ विस्तृत रूप से. अभी-अभी प्राप्त हुआ है. डार्विन और लामार्क से पहले, कारणात्मक विवर्धन का अकेला उम्मीदवार ‘ भगवान के उद्देश्य’ से अपील ही था. डार्विन ने एक सुसंगत प्रणाली को रेखांकित किया परन्तु जेनेटिक सिद्धांत के अभाव में, वे इसे विस्तृत विवरण के साथ विस्तार न दे पाए. इस मामले में हमारा ज्ञान भी अभी तक अपूर्ण है. यद्यपि, यह कहना एकदम तर्कसंगत लगता है कि पक्षियों की खोखली हड्डियाँ होती हैं क्योंकि ये उनकी उडान में मददगार होती हैं. कोहेन का पक्ष है कि सबूत में वजन  कि जीव अपने वातावरण के अनुसार अनुकूलित हो जाते हैं, डार्विन के पूर्व के नास्तिक को भी व्यावहारिक व्याख्या के न्यायसंगत दावे की आज्ञा दे देगा. इस प्रकार किसी उम्मीदवार के अभाव में भी, अगर विवेचनात्मक सबूत में वजन हो, व्यावहारिक व्याख्या को प्रस्तावित करने को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है.

इस मोड़ पर, मसले का विभाजन सैद्धांतिक और प्रयोगाश्रित प्रश्नों में हो जाता है. प्रयोगाश्रित प्रश्न है कि क्या हमारे पास इस बात के प्रमाण हैं या नहीं कि समाज के रूप तब तक विद्यमान रहते हैं जब तक वे उत्पादक शक्तियों को विकसित करते रहते हैं और वे उस वक्त असफल हो जाते हैं जब क्रांतियों द्वारा उनका प्रतिस्थापन कर दिया जाता है.मानना पड़ेगा कि प्रयोगाश्रित प्रश्न अपूर्ण है और ऐसा भी दीखता है कि गतिरोध और जहाँ तक कि प्रतिगमन की ऐसी लंबी समयावधियां रही हैं जब क्रियाविहीन आर्थिक संरचनाओं में क्रांतियाँ घटित नहीं हुई हैं.

सैद्धांतिक मसला है कि क्या मार्क्सवादी व्यावहारिक व्याख्याओं को टेक देने के लिए हमारे पास कोई विस्तृत व्याख्या है ? यह स्थिति दुविधाजनक है. पहली अवस्था में यह डार्विन की कहानी और अवसर विभेद और सर्वोतम का जीवित रहना के आग्रह द्वारा दी गई व्याख्या की नक़ल करने की कोशिश है. इस मामले में ‘सर्वोतम’ का अर्थ होगा, उत्पादक शक्तियों को विकसित करने  में ‘ नेतृत्व के लिए सबसे सक्षम’. अवसर विभेद से आशय होगा वे लोग जो अलग-अलग आर्थिक संबंधों के लिए जोर आजमाईश करते हैं. इस प्रकार, अनुभव से नयी आर्थिक संरचनाएं शुरू होती हैं, उत्पादक शक्तियों के विकास द्वारा फलती-फूलती और कायम रहती हैं. चूंकि, इसमें समस्या यह है कि इस प्रकार का विवरण मार्क्स की अपेक्षा से ज्यादा बड़े संयोग के तत्व से परिचय करवाता है.  मार्क्स सोचते थे कि प्रत्येक व्यक्ति इस योग्य हो कि वह अंततोगत्वा कम्युनिज्म के आगमन का पूर्वानुमान लगा सके. डार्विन के सिद्धांत के अंतर्गत लंबी अवधि के पूर्वानुमानों का प्रावधान नहीं है क्योंकि हर चीज विशेष परिस्थितियों के संयोग के अधीन है. जीव विज्ञान के सादृश्य ऐतिहासिक भौतिकवाद के रूप को विकसित करने से संयोग के भारी-भरकम तत्व को उत्तराधिकार में प्राप्त करना होगा. दुविधा यह है कि सिद्धांत को विकसित करने वाला सबसे बढ़िया मॉडल डाँवाडोल सिद्धांत द्वारा पूर्वानुमान लगता है जबकि सिद्धांत का समुचित पक्ष पूर्वानुमान में है. इस प्रकार, विस्तृत व्याख्या पैदा करनेवाले वैकल्पिक साधनों की तलाश की जरूरत पड़ती है या फिर सिद्धांत की पूर्वानुमान की आकांक्षा को त्यागना होता है.

अगली किश्त में समाप्य

आभार सहित http://plato.stanford.edu/entries/marx/ से हिंदी में अनुवादित

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मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय

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प्रारंभिक कार्य

कार्ल मार्क्स को जिस बौद्धिक वातावरण में काम करना पड़ा, उस पर हेगेल के विचारों का वर्चस्व था. हेगेल के विचारों की प्रतिक्रिया में ‘यंग हेगेलियन’ नामक युवकों का समूह हेगेल के विचारों के रुढ़िवादी आशय को नकारता था. इन चिंतकों में से सबसे प्रसिद्ध लुडविग फायरबाख थे, जिन्होंने हेगेल के विचारवाद को रूपांतरित करने की कोशिश की और इस प्रकार हेगेल के धर्म और राज्य के सिद्धांत की आलोचना प्रस्तुत की. १८४० के दशक की शुरुआत में मार्क्स द्वारा लिखित दार्शनिक साहित्य का बड़ा भाग हेगेल, फायरबाख और अन्य ‘यंग हेगेलियन’ के कार्यों के खिलाफ अपनी स्वयं की स्थिति को रखने का रिकार्ड है.

यहूदियों के सवाल पर

इस रचना में मार्क्स अपने और अपने उदारवादी ‘यंग हेगेलियन’ साथियों – विशेषतया, ब्रुनो बायर के बीच की दूरी को स्पष्ट करते हैं. एक नास्तिक के नजरिये से, बायर ने अभी-अभी यहूदियों की स्वतंत्रता के विरुद्ध लिखा था. उनके अनुसार यहूदियों और ईसाईयों, दोनों का धर्म उनकी मुक्ति में सबसे बड़ा बाधक है. प्रत्युत्तर में मार्क्स , ‘राजनीतिक मुक्ति के सवाल की विलक्षणता’ – आवश्यक रूप से उदार अधिकारों और स्वतंत्रता का अनुदान और मानव मुक्ति के बीच फर्क को दिखाते हुए अपने सर्वाधिक तर्कों में एक का इस्तेमाल करते हैं. मार्क्स बायर को उत्तर देते हुए कहते हैं कि धर्म की सतत व्यापकता के तहत भी राजनीतिक स्वतंत्रता पूर्ण रूप से संभव है जिसका समकालीन उदाहरण संयुक्त राज्य प्रदर्शित करते हैं. लेकिन उदारवाद के अनगिनत आलोचकों द्वारा पुन: स्थापित तर्क की गहराई तक जाते हुए मार्क्स का कहना है कि मानव मुक्ति के लिए राजनीतिक मुक्ति न केवल अप्रयाप्त है बल्कि , यह किसी हद तक, उसकी स्वतंत्रता में रूकावट का ही काम करती है. न्याय के उदारवादी अधिकार और विचार इस विचार पर खड़े हैं कि हम में से प्रत्येक अन्य व्यक्तियों से सुरक्षा चाहता है. इस प्रकार, उदारवादी अधिकार अलगाव के अधिकार हैं, जिन्हें इस प्रकार डिज़ाईन किया जाता है कि वे हमें इस प्रकार वर्णित खतरों से संरक्षण प्रदान करें. इस दृष्टिकोण पर आधारित स्वतंत्रता किसी भी प्रकार की दखलंदाजी से स्वतंत्रता है. यह दृष्टिकोण जिस वस्तु को छोड़ देता है, मार्क्स के लिए वही संभावना बन जाती है – तथ्य की इस रौशनी में कि वास्तविक स्वतंत्रता को, सकारात्मक रूप से, हमारे अन्य व्यक्तियों के साथ संबंधों में ढूंढा जाना है. इस मानव समाज में ढूंढा और खोजा जाना है न कि एकांगी रूप में. इस प्रकार, अधिकारों के राज्य की जिद, हमें उत्साहित करती है कि हम उन्हें इस प्रकार देखें कि मानव मुक्ति में निहित वास्तविक मुक्ति की संभावना धुंधली पड़ जाये. अब हमें साफ़ तौर पर समझ आ जाना चाहिए कि मार्क्स राजनीतिक स्वतन्त्र के विरुद्ध नहीं हैं क्योंकि वे समझ रहे होते हैं कि उदारवाद उसके समय की जर्मनी में मौजूद पूर्वाग्रहों और पक्षपात से भरपूर प्रणालियों में एक बड़े सुधार  का ही काम कर रहा होता है. यद्यपि, इस प्रकार के राजनीतिक रूप से स्वतन्त्र उदारवाद को मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता के रास्ते को पार करना होगा. दुर्भाग्य से, मार्क्स यह नहीं बताते कि मानव स्वतंत्रता क्या है लेकिन यह साफ़ है कि इसका गहरा संबंध अलगाव से मुक्त श्रम के विचार से है, जिसका जिक्र हम आगे करेंगे.

A Contribution to the Critique of Hegel’s Philosophy of Right

Introduction

अपनी इस रचना में मार्क्स धर्म को अफीम कहते हैं और इसी रचना में वे अपने धर्म संबंधी विचारों का सविस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं. इस रचना में वे विचार करते हैं कि किस तरह जर्मनी में क्रांति का सवाल हल हो सकता है और सर्वहारा वर्ग द्वारा सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति के लिए अदा की जानेवाली भूमिका से अवगत करवाते हैं.

धर्म के संबंध में, मार्क्स धर्मशास्त्र के विरुद्ध फायरबाख के उस दावे को स्वीकार करते हैं जिसमें उनका कहना है कि मानव ने अपने ही रूप के अनुसार भगवान के रूप को गढ़ा है. फायरबाख की विलक्षण देन इस तर्क में थी कि परमात्मा की पूजा मानव को अपनी स्वयं की शक्तियों से पूरा लाभ उठाने से वंचित कर देती हैं. फायरबाख की इस देन को ज्यादातर स्वीकार करते हुए मार्क्स फायरबाख की इस कमी की और इशारा करते हैं कि वे इस बात को समझने में असमर्थ हैं कि लोग क्यों धार्मिक अलगाव का शिकार हो जाते हैं और किस प्रकार वे इससे पार जा सकते हैं. मार्क्स की व्याख्या है कि धर्म भौतिक संसार में अलगाव का ही परिणाम है और इसे तब तक ख़त्म नहीं किया जा सकता जब तक इस भौतिक संसार में मौजूद अलगाव को समाप्त नहीं किया जाता. संक्षिप्त में उस भौतिक जीवन का वर्णन स्पष्टता से नहीं किया गया है जो इस अलगाव को पैदा करता है. यद्यपि, ऐसा लगता है कि अलगाव के दो पहलू जिम्मेदार हैं. एक तो श्रम का अलगाव है जिसका जिक्र अभी किया जायेगा. दूसरा, मानव जाति की अपने सामुदायिक तत्व के प्रति अभिव्यक्ति. चाहे हम इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार करें या न करें लेकिन मानव जाति समुदाय के रूप में अस्तित्व में होती है और जो मानव जीवन को संभव बनाता है वह है – हम सभी को अपनी आगोश में समेटा हुआ मजबूत सामाजिक और आर्थिक नेटवर्क जिस पर हमारी परस्पर निर्भरता कायम होती है. इस संबंध में, मार्क्स के विचार इस प्रकार दीखते हैं कि हमें अपनी संस्थाओं में सामुदायिक अस्तित्व को स्वीकृति देनी चाहिए. शुरू से ही, धर्म ने अपनी कुटिलता से इस बात को समझ लिया था और उसने एक मिथ्यावादी सामुदायिकता के विचार को पैदा किया जिसमें सभी लोग भगवान की नज़र में समान होते हैं. सुधार उपरांत विखंडन के बाद, जब धर्म समानता के भ्रम को फैलाने के अयोग्य हो जाता है, राज्य इस आवश्यकता की पूर्ति नागरिकों के समुदाय का भ्रम, जिसमें सभी लोग कानून के सम्मुख समान होते हैं, पैदा करके करता है.  परंतू राज्य और धर्म दोनों से उस वक्त पार जाया जा सकेगा जब सामाजिक और आर्थिक समानता का सच्चा समुदाय अस्तित्व में आ जायेगा.

निसंदेह, हमारे सामने यह प्रश्न है कि किस प्रकार इस तरह के समाज का निर्माण संभव हो सकता है. फायरबाख पर अपने तीसरे सिद्धांत की रौशनी में मार्क्स का अध्ययन दिलचस्प होगा जिसमें वे वैकल्पिक सिद्धांत की आलोचना करते हैं. रॉबर्ट ओवेन और अन्य लोगों का बेडौल भौतिकवाद मानता है कि मानव जाति के भाग्य की निर्धारक उसकी भौतिक परिस्थितियां होती हैं और इसलिए, एक मुक्त समाज के लिए यह जरूरी और प्रयाप्त है कि उन भौतिक परिस्थितियों को सही रूप से बदला जाये. लेकिन सवाल पैदा होता है कि कैसे? ओवेन जैसे प्रबुद्ध परोपकारी द्वारा, जो कि अपने चमत्कार से इन भौतिक परिस्थितियों के निर्धारण को तोड़ देगा जो प्रत्येक को जकड़े हुए है ? मार्क्स का  प्रत्युत्तर है कि सर्वहारा अपने स्वयं के रूपांतरण की क्रिया के दौरान ही इसे तोड़ सकेगा. वास्तव में, अगर सर्वहारा लोग स्वयं के लिए क्रांति नहीं करते हैं (निसंदेह, दार्शनिकों के मार्गदर्शन में ) वे इसे हासिल करने के योग्य नहीं हो सकेंगे.

Economic and Philosophical Manuscripts

इस पुस्तक में कई दिलचस्प विषय हैं जिसमें प्रमुख रूप से निजी संम्पत्ति, कम्युनिज्म, धन और हेगेल की आलोचना शामिल है. यद्यपि, इस रचना में श्रम का अलगाव ही केंद्र में है. यहाँ मार्क्स पूंजीवाद में मजदूर की चार तरह के श्रम के अलगाव से पैदा हुई पीड़ा का जिक्र करते हैं. सबसे पहले उत्पाद से पैदा हुई पीड़ा, जिसे उसी वक्त इसके उत्पादक (मजदूर) से छीन लिया जाता है जब यह उत्पादित हो जाता है. दूसरे, उत्पादन क्रिया (काम) से, जिसे सजा के रूप में अनुभव किया जाता है. तीसरे, मानव जाति के चरित्रानुसार, क्योंकि मनुष्य अंधाधुंध उत्पादन करते हैं न कि अपनी सही मानवीय क्षमताओं के अनुसार. अंत में, अन्य मनुष्यों से, जहाँ विनिमय का संबंध परस्पर आवश्यकता को प्रतिस्थापित कर देता है. इन प्रवर्गों का एक दूसरे में गढ़मढ़ होना हमें आश्चर्यचकित नहीं करता क्योंकि इन रचनाओं में हम मार्क्स  की बेमिसाल खोज-प्रणाली संबंधी आकांक्षा से रूबरू होते हैं. आवश्यक रूप से, वे अर्थशास्त्र में प्रवर्गों के हेगेलियन निगमन को लागू करने का प्रयत्न करते हैं. उनकी कोशिश इस तथ्य को प्रदर्शित करने की होती है कि बुर्जुआ अर्थशास्त्र के सभी प्रवर्ग – मजदूरी, लगान, विनिमय,मुनाफा इत्यादि अंतिम रूप में,अलगाव की अवधारणा के विश्लेषण से ही निकलते हैं. परिणामस्वरूप श्रम के अलगाव का प्रत्येक प्रवर्ग अपने पूर्वक प्रवर्ग से ही निगमन करता है. यदपि  मार्क्स श्रम के अलगाव से पैदा हुए इन प्रवर्गों के निगमन के सिवा और अधिक कुछ नहीं कहते. यह बिलकुल संभव है कि अपने लेखन कार्य की क्रिया के दौरान मार्क्स ने अर्थशास्त्र संबंधी मसलों से निपटने के लिए एक अलग तरीके-प्रणाली की जरूरत को महसूस किया हो. तथापि, हमें श्रम के अलगाव के स्वभाव संबंधी एक बेमिसाल पठन सामग्री प्राप्त होती है. अलगाव से मुक्ति का विचार नकारात्मक से निकालना पड़ता है.  अंत में जेम्स मिल पर पठन सामग्री की सहायता से, जिसमें अलगाव से मुक्त श्रम का, संक्षिप्त में उन शर्तों पर, वर्णन किया गया है कि अपनी शक्तियों के सत्यापन के रूप में उत्पादन से उत्पादक की तुरंत तुष्टि के साथ-साथ उत्पादन अन्य लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है जिससे, दोनों पार्टियों के लिए हमारी परस्पर निर्भरता के रूप में, मानवीय सार का सत्यापन हो जाता है. मानव जाति के सार के दोनों पहलू स्पष्ट हो जाते हैं : हमारी निजी मानव शक्तियां और समुदाय के रूप में एक-दूसरे पर निर्भरता.

इसे समझना महत्वपूर्ण होगा कि मार्क्स के लिए अलगाव कोई मनोगत भावना नहीं है. विमुख व्यक्ति विमुख शक्तियों के हाथों की कठपुतली है – यदपि, ये विमुख शक्तियां भी मानव के कर्मों का ही उत्पाद हैं. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में हम ऐसे फैसले लेते हैं जिनके अनचाहे परिणाम निकलते हैं और जो बाद में चलकर, मिश्रित रूप से, बड़े पैमाने की सामाजिक शक्तियां बन जाती हैं जिनके पूर्ण अधोषित परिणाम होते हैं. मार्क्स की नज़र में, पूंजीवाद की संस्थाएं – जो मानव व्यवहार का ही परिणाम हैं -हमारे भविष्य संबंधी व्यवहार को आकार देने के लिए वापस आ जाती हैं और इस प्रकार निर्धारक का कार्य करती हैं. उदाहरण के लिए, जब तक पूंजीपति की इच्छा व्यवसाय में बने रहने की होती है, उसके लिए जरूरी होता है कि वह कानूनी सीमा तक अपने मजदूरों का शोषण करे. बेशक वह अपराध बोध से भी लबरेज़ हो जाये लेकिन पूंजीपति को निर्दयी शोषक के रूप में जीना पड़ता है. इस प्रकार मजदूर को उपलब्ध कार्य में से सबसे बढ़िया का चुनाव करना होता है, इसके अलावा कोई अन्य तर्कसंगत विकल्प नहीं होता. परंतू इस क्रिया को दुहराते समय हम उसी संरचना को सुदृढ़ करते जाते हैं जो हमारा दमन करती है. इस स्थिति से पार जाने की इच्छा और हमारे भाग्य पर सामूहिक नियन्त्रण प्राप्त कर लेना – अभ्यास में चाहे इसका कुछ भी अर्थ हो, मार्क्स के सामाजिक विश्लेषण में निहित आवश्यक तत्वों में से एक है.

‘Theses on Feuerbach’

मार्क्स की सबसे प्रसिद्ध और विस्मरणीय उक्तियों में से एक, “दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है. “, इसी पुस्तक से ली गयी है.  इस पुस्तक में सम्मलित  ग्यारह सिद्धांतों में से अधिकतर का ऊपर पहले ही वर्णन किया जा चुका है. (उदाहरण के लिए धर्म संबंधी सिद्धांतो ४, ६ और ७ और क्रांति संबंधी सिद्धांत ३ का ) इसलिए हम सिद्धांत १ तक सीमित रहेंगे जो की स्पष्ट रूप से दार्शनिक सिद्धांत है.

अपने पहले सिद्धांत में मार्क्स ‘अब तक के आर्विभूत अस्तित्व’ के भौतिकवाद और विचारवाद के प्रति अपनी आपत्ति दर्ज करवाते हैं. विश्व की भौतिक वास्तविकता को समझने में मदद के लिए भौतिकवाद की सराहना की जाती  है लेकिन उस भौतिक संसार को जिसे मानव अपनी सक्रीय भूमिका द्वारा  निर्मित करते हैं और जिसमें हम विचरण करते हैं, की अवहेलना के लिए आलोचना की जाती है. विचारवाद, जहाँ तक हेगेल ने इसे विकसित किया, मनुष्य की सक्रीय मनोगत दखलंदाजी की निशानदेही करता है. परंतू यह इसे केवल चिंतन और विचार तक सीमित कर देता है : विश्व का निर्माण उन प्रवर्गों द्वारा संपन्न होता है जो हम इस पर लागू करते हैं. मार्क्स दोनों परम्पराओं को संयुक्त करके एक दृष्टिकोण को प्रस्तावित करते हैं जिसमें मानव जाति ही, उस विश्व का जिसमें वह जीती  है, का निर्माण या कम से कम रूपांतरण करती है. परंतू यह रूपांतरण चिंतन में घटित न होकर वास्तविक भौतिक क्रिया द्वारा आकार लेता है. परम अवधारानाओं के दखल से नहीं बल्कि मानव के कस्सी-फाबड़े पर खून-पसीना बहाने से. इतिहास का यह भौतिकवादी वर्जन पार निकल जाता है और वर्तमान की सभी दार्शनिक अवधारानाओं को अस्वीकृत कर देता है. आगे चलकर, यही मार्क्स के इतिहास के सिद्धांत का आधार बनता है. जैसाकि मार्क्स १८४४ में लिखित पांडुलिपि में लिखते हैं, ” उद्योग में हम मानव का प्रकृति से वास्तविक रूप से ऐतिहासिक संबंध देखते हैं. यह चिंतन दर्शन के इतिहास पर मनन के साथ-साथ उनके जर्नलिस्ट के रूप में सामाजिक और आर्थिक यथार्थ के अनुभव से पैदा होता है जो मार्क्स द्वारा भविष्य में किये जानेवाले कार्यों के एजेंडा को निर्धारित कर देता है.

शेष अगली कड़ी में : मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय – दूसरी किश्त

आभार सहित http://plato.stanford.edu/entries/marx/ से हिंदी में अनुवादित

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कार्ल मार्क्स

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कार्ल मार्क्स (1818-1883) मार्क्सवाद और प्रबल राजनीतिक विज्ञान के संस्थापक , जिसके विचारों ने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के इतिहास को नये आयाम दिए.

५ मई १८१८ को पश्चिम जर्मनी के ट्रायर में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ. उसके पिता एक कामयाब वकील थे, जिन्हें प्रशिया के कानूनानुसार अपने व्यवसाय को चलाने के लिए यहूदी से ईसाई धर्म अपनाना पड़ा.

सत्रह वर्ष की आयु में कानून की विद्या हासिल करने के लिए मार्क्स बोन विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए. वहाँ उनकी गिनती तेज-तरार विद्यार्थियों में नहीं होती थी. फिक्रमंद पिता ने उनका स्थानांतरण कठोर अनुशासन के लिए विख्यात बर्लिन के विश्वविद्यालय में करवा दिया. अपने अध्ययन के दौरान नौजवान मार्क्स रेडिकल विचारों और दर्शन की ओर झुकते गये. एक बार तो वे ‘यंग हेगल्स’ नामक विद्यार्थियों के एक समूह से जुड़ गये जो हेगल के विचारों को अस्वीकार कर चुके थे.

१९ जून १८४३ को उनका विवाह प्रशिया के नवाब की सुशिक्षित सपुत्री जेनी वोन वेस्टफालें से संपन्न हुआ. शादी के तुरंत बाद सरकार की सेंसरशिप, जिसका रवैया वामपंथी आन्दोलनकारियों के प्रति दिन-प्रतिदिन कठोर से कठोरतम होता जा रहा था, ने उन्हें देश छोड़कर पेरिस जाने के लिए मजबूर कर दिया.

१८४० का पेरिस उस ज़माने के क्रांतिकारियों की सबसे प्रिय कर्मस्थली थी. यहाँ मार्क्स की मुलाकात बहुत से क्रांतिकारियों से हुई जिनमे फ्रेडरिक एंगेल्स आगे चलकर उनके जीवनभर के वैचारिक मित्र बन गये.

१८४४ में एंगेल्स बहुत ही प्रभावशाली पुस्तक ‘Conditions of the WorkingClass in England ‘ लिख चुके थे. इस पुस्तक ने मार्क्स के सर्वहारा वर्ग द्वारा संपन्न किये जानेवाली क्रांति  के विचार को विकसित करने में  मदद की. इसी पुस्तक से प्रेरणा पाकर मार्क्स ने Economic and Philosophic Manuscripts नामक अपनी पहली  पुस्तक की रचना की. पूंजीवाद के अधीन श्रम के अलगाव से मुक्ति के लिए साम्यवाद की जीत की अवश्यम्भाविता के पक्ष में तर्क के कारण इस पुस्तक का एक नैतिक और दार्शनिक महत्व रहा है.

दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है.

मार्क्स की दिलचस्पी इतिहास के विकास और परिवर्तन में भी थी, जो समाज में नैसर्गिक रूप से चलता रहता है. अपने इस विचार को उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी समझ बताया. मार्क्स का विश्वास दिन-प्रतिदिन इस सच्चाई की ओर दृढ होता गया कि सर्वहारा वर्ग की क्रांति न केवल वांछनीय है बल्कि ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण अवश्यंभावी है.

इसी समय मार्क्स और एंगेल्स ने अपना सबसे प्रसिद्ध पंफलेट ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ लिखा.

“कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. वे खुलेंआम एलान करते हैं कि उनके लक्ष्य पूरी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बलपूर्वक उलटने से ही सिद्ध किये जा सकते हैं. कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग को कांपने दो. सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.

दुनिया के मजदूरों, एक हो ! ”

मार्क्स की ज्यादातर रचनाओं के विपरीत मार्क्स की यह कृति संक्षिप्त और प्रासंगिक होने के साथ-साथ अग्निमय और प्रेरणादायक भाषा के प्रयोग द्वारा क्रांति की इच्छा पैदा करने की क्षमता रखती है.

“अभी तक आर्विभूत समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है.” – कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, प्रथम अध्याय.

क्रांतियों, जिन्होंने १८४८ में समस्त यूरोप को अपनी आगोश में ले लिया था, ने मार्क्स को फ़्रांसिसी और बेल्जियन अधिकारिओं की नज़रों में संदिग्ध बना दिया . उन्हें लंदन में शरण लेनी पड़ी और उनका शेष रचनात्मक जीवन वहीँ बीता.

कम्युनिस्ट लहर की इस तरुणावस्था में मार्क्स इसके साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़ते गये. प्रथम कम्युनिस्ट इंटरनेशनल  में अराजकतावादी बकुनिन के विरुद्ध उन्होंने प्रबल और प्रभावशाली तर्क रखे.

एक और प्रबल घटना १८७१ का पेरिस कम्यून की स्थापना थी जिसे सर्वहारा वर्ग दो महीने के संघर्ष के बाद हार गया. मार्क्स ने इसका पुरजोर मूल्यांकन किया और इसे भविष्य की कम्युनिस्ट क्रांतियों के अग्रदूत की उपाधि प्रदान की.

मार्क्स अपना अधिक से अधिक समय  ब्रिटिश लायब्रेरी में राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए बिताते थे. इसी के परिणामस्वरूप उनकी मास्टरपीस रचना ‘पूँजी’ (दास कैपिटल) का जन्म हुआ. यह पुस्तक पूंजीवादी समाज और अर्थशास्त्र की गतिकी के नियमों का सघन और विस्तृत संकलन हैं.

“पहली दृष्टि में पण्य बहुत मामूली सी और आसानी से समझ में आनेवाली चीज मालूम होता है. किन्तु उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वास्तव में वह एक बहुत अजीब चीज है, जो आधिभौतिक सूक्ष्मताओं और धर्मशास्त्रीय बारीकियों से ओतप्रोत है. जहाँ तक वह उपयोग मूल्य है, वहां तक, चाहे हम उसपर इस दृष्टिकोण से विचार करें कि वह अपने गुणों से मानव आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है” – पूंजी, अध्याय १, प्रथम खंड

अपने निरन्तर विकसित होते हुए मार्क्सवादी दृष्टिकोण अनुसार मार्क्स ने जीवन के हर पहलू पर लिखा.  अक्सर पूंजीपतियों के तलुयाचाट बुद्धिजीवी मार्क्स के “धर्म लोगों के लिए अफीम है” को सन्दर्भ से तोड़कर एक फिकरे के रूप में प्रयोग करते रहे हैं. वर्गीय समाज के अस्तित्व में आने की ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ के अनुसार उत्पादन की प्रक्रिया ने समाज के एक छोर पर मुट्ठीभर अमीर जबकि दूसरे छोरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया. आत्मिक उत्पादन में एक तरफ दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, साहित्य,गीत और संगीत पैदा हुआ तो दूसरी और धर्म. दिखने में धर्म गरीबों को मुफ्त का तोहफा लगता रहा हो लेकिन शोषक वर्ग के सच्चे सेवादार के रूप में इसने गरीब जनता को पैरों के नीचे रौंधने का ही काम किया.

” धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन  परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है.”
— (Contribution to the Critique of Hegel\’s Philosophy of Right)

अपने समय के सर्वाधिक घृणा पाने वाले व्यक्ति कार्ल मार्क्स, जिन पर सबसे अधिक कीचड उछाला गया, के रोशन दिमाग ने १८८३ को हमेशा के लिए काम करना बंद कर दिया. निरंकुश और गणतंत्रीय, दोनों प्रकार की सरकारों ने उन्हें अपने राज्य से खदेड़ा. बुर्जुआजी, चाहे वह अनुदार रही हो चाहे अति जनवादी, मार्क्स के प्रति लान्छनात्मक शब्दों का प्रयोग करने  में आपस में होड़ करती हुई नजर आई. वे इसे इस प्रकार हटा देते थे जैसे यह कोई मकड़ी का जाला हो. पूर्ण लापरवाही के साथ, जब बहुत जरूरी आवश्यकता उन्हें विवश करती, वे तभी जवाब देते. उनकी मृत्यु उनके चहेते करोड़ों क्रांतिकारी मेहनतकश साथियों के लिए एक आघात थी. साईबेरिया से कैलिफोर्निया, यूरोप और अमेरिका के सभी भागों और जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं “मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि  बेशक उनके बहुत से विरोधी रहे हों, लेकिन उनका कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं था.”

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अंतरराष्ट्रीय नारी दिवस पर विशेष

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विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति का प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की दिशा

कात्यायनी

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर
3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में
4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा
5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन
6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन
7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति
8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर
9. और अंत में…

आज एक कठिन समय में हम यहाँ पर नारी मुक्ति आन्दोलन की कुछ बुनियादी समस्याओं पर बातचीत के लिए इकट्ठा हुए हैं । सामायिक तौर पर यह पराजय, विपर्यय, पुनरुत्थान, फासिज़्म की शक्तियों के विश्वव्यापी उभार और क्रांति की शक्तियों के पीछे हटने का दौर है । कुछ समय के लिए, आज एक बार फिर क्रांति की लहर पर प्रतिक्रांति की लहर विश्व स्तर पर हावी है ।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी ऐसे कठिन दौर आते हैं तो अँधेरे की ताकतें मेहनतकश आम जनता के साथ ही औरतों की आधी आबादी पर भी अपनी पूरी ताकत के साथ हमला बोल देती है और न केवल उनकी मुक्ति की लड़ाई को कुचल देना चाहती है बल्कि अतीत के अनगिनत लंबे संघर्षों से अर्जित उनकी आजादी और जनवादी अधिकारों को भी छीन लेने पर उतारू हो जाती हैं । आज भी ऐसा ही हो रहा है । हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो विश्व सर्वहारा क्रांति के एक नये चक्र की शुरुआत का समय है, अक्टूबर क्रांति के नये संस्करण के निर्माण का समय है । साथ ही, यह नारी मुक्ति आन्दोलन के लिए भी एक नई शुरुआत का समय है, क्योंकि इतिहास ने यह अंतिम तौर पर सिद्ध कर दिया है कि एक पूंजीवादी विश्व में नारी मुक्ति का प्रश्न अंतिम तौर पर हल नहीं हो सकता और यह भी कि इस आधी आबादी की मुक्ति की लड़ाई के बिना शोषण-उत्पीडन से मेहनतकश जनता की मुक्ति की लड़ाई भी विजयी नहीं हो सकती ।

आज अपने प्रयासों को नये सिरे से संगठित करने की प्रक्रिया में, विश्व ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नारी मुक्ति के प्रश्न और समकालीन नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा पर विचार करते हुए हमें सर्वोपरी तौर पर उन विचारधारात्मक-सैद्धांतिक हमलों का जवाब देना होगा जो नारी मुक्ति विषयक तरह-तरह के बुर्जुआ सिद्धांतों के रूप में हमारे ऊपर किये जा रहे हैं । जीवन और संघर्ष के अन्य मोर्चों की ही तरह आज नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी जनवाद के नाम पर मुक्त बाजार का पश्चिमी उपभोक्तावादी दर्शन तरह-तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है और एक बार फिर, नये-नये रूपों में, जोर-शोर से बीमार बुर्जुआ संस्कृति, व्यक्तिवाद, पुरुष-विरोधी नारीवाद, अराजकतावाद, यौन-स्वच्छंदतावाद की तरह-तरह की खिचड़ी परोसी जा रही है । फ़्रांसिसी फुकोयामा के “इतिहास के अंत” और पश्चिम में जन्मे “विचारधारा के अंत” के नारे की तर्ज पर नारी आन्दोलन को भी विचारधारा से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं क्योंकि बकौल इन मुक्त चिंतकों के, “विचारधारा ने नारी की आजादी की लड़ाई को कोई योगदान नहीं दिया ।” ऐसे लोगों के उत्तर में बस बर्तोल्त ब्रेखत का एक बयान उद्धृत किया जा सकता है, जो उन्होंने २६ जुलाई, १९३८ को वाल्टर बेंजामिन से बातचीत के दौरान दिया था, “विचारधारा के विरुद्ध संघर्ष खुद में एक नई विचारधारा बन जाता है ।” वास्तव में इन तमाम मुक्त चिंतनधाराओं का सारतत्व यह है कि व्यवस्था-परिवर्तन की बुनियादी लड़ाई से नारी मुक्ति संघर्ष को अलग करके वर्तमान सामाजिक-आर्थिक दायरे के भीतर सीमित कर दिया जाये । इनका एकमात्र उद्देश्य स्त्रियों को यह समझाना है कि उनकी आजादी के प्रश्न का सामाजिक क्रांति के प्रश्न से कुछ भी लेना-देना नहीं है और यह एक स्वायत्त-स्वतंत्र प्रश्न है । आज न केवल अलग-अलग किस्म की बुर्जुआ सुधारवादी चिंतनधाराएं, बल्कि सत्तर के दशक के यूरोकम्युनिज़्म से लेकर अस्सी के दशक में उभरी भांति-भांति की पश्चिमी नववामपंथी धाराएं तथा गोर्बचोवी लहर और देंगपंथी नकली कम्युनिज़्म  से प्रभावित धाराएं भी या तो स्त्रियों की मुक्ति के आन्दोलन को कुछ सामाजिक-आर्थिक मांगों, पर्यावरण या स्वास्थ्य के मुद्दों तक ही सीमित करके और उसे नारी मुक्ति के बुनियादी मुद्दे, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संघर्ष के दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य से काटकर सुधारवाद और अर्थवाद के दलदल में धंसा देना चाहती हैं या फिर केवल बाल की खाल निकालने जैसी कुछ अकादमिक बहसों और बौद्धिक कवायद तक मह्दूद कर देना चाहती हैं ।

आज नारी मुक्ति संघर्ष को एक क्रांतिकारी दिशा देने और एक नई शुरुआत करने के लिए यह जरूरी है कि इम  अपने आन्दोलन में मौजूद इन सभी विजातीय प्रवृत्तियों और रुझानों को लंबे वाद-विवाद में परास्त करें, उनके प्रभाव को निर्मूल करें और एक सही, ठोस लाइन और कार्यक्रम के इर्द-गिर्द अलग-अलग देशों में मेहनतकश स्त्रियों और मध्यवर्गीय स्त्रियों को गोलबंद एवं संगठित करें तथा साथ ही, उन्हें जनता के सभी वर्गों के क्रांतिकारी संघर्षों के साथ जोड़ें । तीसरी दुनिया के देश आज भी साम्राज्यवाद की कमजोर कड़ी हैं, जहाँ सामाजिक क्रांतियों के विस्फोटक की वस्तुगत परिस्थितियाँ सर्वाधिक परिपक्व हैं । ऐसे देशों में क्रांतिकारी नारी मुक्ति के आन्दोलन के हिरावल दस्तों की जिम्मेदारी और भी ज्यादा है क्योंकि आधी आबादी की भागीदारी के बिना न तो कोई सर्वहारा क्रांति सफल हो सकती है और न सर्वहारा क्रांति के बिना आधी आबादी की वास्तविक मुक्ति की शुरुआत हो सकती है । ऐसे समय में, नेपाल में नारी मुक्ति आन्दोलन से संबंधित विषय पर संगोष्टी का आयोजन बहुत ख़ुशी की बात है, जहाँ क्रांति की शक्तियां आज तरह-तरह के अवसरवादी-दक्षिणपंथी भटकावों से संघर्ष करते हुए जनता के विभिन्न वर्गों को संगठित कर रही हैं । हम नेपाल में इस संगोष्टी के आयोजक कामरेडों का क्रांतिकारी अभिनंदन करते हैं ।

अपने इस निबन्ध में हमारा मन्तव्य नारी मुक्ति संघर्ष की विश्व-ऐतिहासिक यात्रा का एक संक्षिप्त सिंहावलोकन प्रस्तुत करते हुए उसके सामने आज उपस्थित कार्यभारों और चुनौतियों को रेखांकित करना है । हर नई शुरुआत के समय इतिहास का पुनरवालोकन जरूरी होता है । द्वंदात्मक भौतिकवादी जीवन-दृष्टि हमें यही बताती है कि इतिहास के मुल्यांकन-पुनर्मुल्यांकन का मूल अर्थ केवल भविष्य के लिए नये कार्यभारों का निर्धारण ही होता है ।

1. प्रबोधन काल और बुर्जुआ क्रांतियों का युग : नारी मुक्ति आन्दोलन की शैशवावस्था

अब तक वर्ग-अंतरविरोधों से युक्त जितने भी समाजों का इतिहास हमें ज्ञात है, स्त्रियाँ उन सभी में परिवार और समाज – दोनों में पुरुषों के मातहत ही रही हैं । पूरे सामाजिक ढाँचे में सर्वाधिक शोषित-उत्पीड़ित तबकों में ही उनका स्थान रहा है । जब वर्ग समाज का प्रादुर्भाव हो रहा था और निजी स्वामित्व के तत्व और मानसिकता पैदा हो रही थी उसी समय पितृसत्तात्मक व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थी, और स्वाभाविक तौर पर, उसके प्रतिरोध की स्त्री-चेतना भी उत्पन्न हो चुकी थी जिसके साक्ष्य हमें अलग-अलग संस्कृतियों की पुराणकथाओं  और लोकगाथाओं में आज भी देखने को मिल जाते हैं ।
पर इतिहास के पूरे प्राकपूंजीवादी काल में उत्पीड़न के विरुद्ध विद्रोह की नारी चेतना अपने समय के विस्मरण के बाद नारी समुदाय ने अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्षों एवं क्रांतियों में भूदास या दास जैसे वर्गों के सदस्य के रूप में शिरकत तो की लेकिन पुरुषों के मुकाबले अपनी हीनतर सामाजिक-पारिवारिक स्थिति के विरुद्ध या अपनी स्वतंत्र अस्मिता एवं सामाजिक स्थिति के लिए उसने पूंजीवाद के आविर्भाव के पूर्व संघर्ष नहीं किया, क्योंकि तब इसका वस्तुगत आधार ही समाज में मौजूद नहीं था । समाज और परिवार में स्त्रियों की भूमिका, मातृत्व, शिशुपालन आदि स्थितियों के नाते वर्ग समाज में पैदा होनेवाली उनकी मजबूरियां, घरेलू श्रम की गुलामी, समाज में निकृष्टतम  कोटि के उजरती मजदूर की स्थिति, यौन असमानता, यौन शोषण, यौन उत्पीडन – इन सबके कुल योग के रूप में नारी प्रश्न (Women Question ) को विश्व इतिहास के पूंजीवादी युग में ही सुसंगत रूप में देखा गया और नारी मुक्ति की एक नई अवधारणा विकसित हुई, जिसका संबंध पुनर्जागरण काल के मानववाद और प्रबोधन के युग की तर्कपरकता एवं जनवाद की अवधारणा तथा बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों से था ।

सामंतवाद के युग तक स्त्रियों को सम्पत्ति के अधिकार सहित कोई भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं था और उनकी इस सामाजिक-पारिवारिक मातहती की स्थिति को धर्म, कानून और सामाजिक विधानों की स्वीकृति प्राप्त थी । सामन्तवाद के गर्भ में जब पूंजीवाद का भ्रूण विकसित हो रहा था, उसी समय से सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी शुरू होकर बढती चली गई । यही वह भौतिक आधार था, जिसने पहली बार स्त्रियों के भीतर सामाजिक अधिकारों की चेतना को जन्म दिया ।

पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के अंतर्गत सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों की भागीदारी और साथ ही उनके अधिकारों के अभाव के जारी रहने की स्थिति के नाते शुरू से ही बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के प्रति परस्पर विरोधी रुख और दृष्टिकोण अलग-अलग रूपों में मौजूद रहे । पुनर्जागरण काल में एक ओर जहाँ प्राचीन ग्रीक और रोमन परिवारों के मॉडल और रोमन कानूनों के नमूनों के अनुकरण ने स्त्रियों की गुलामी को तात्कालिक तौर पर पुख्ता बनाया, वहीं पुनर्जागरण काल के महामानवों द्वारा प्रवर्तित मानववाद के क्रांतिकारी दर्शन ने धर्मकेन्द्रित (Theocentric ) समाज की जगह मानवकेन्द्रित (Anthropocentric ) समाज के मूल्यों का प्रतिपादन करके, सामाजिक व्यवस्था की तमाम दैवी स्वीकृतियों पर प्रश्नचिह्न उठाकर और लौकिकता के मूल्यों-मान्यताओं को स्थापित करके, प्रकारांतर से स्त्रियों की गुलामी की धार्मिक-अलौकिक स्वीकृति और सामंती समाज-व्यवस्था के विधानों की मानवेतर स्वीकृति को भी ध्वस्त करने का काम किया । तात्कालिक तौर पर सोहलवीं शताब्दी में धर्मसुधार काल के दौरान प्यूरिटनिज्म और काल्विनिज्म के प्रभाव में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति भले ही बहुत बदतर दिखाई दे रही हो, पर एक ओर दर्शन के स्तर पर मानववाद की विचारधारा और दूसरी ओर सामाजिक उत्पादन में लगातार बढती स्त्रियों की भागीदारी उनकी मुक्ति की चेतना को लगातार विकसित कर रही थी, जिसकी पहली मुखर अभिव्यक्ति बुर्जुआ क्रांतियों की पूर्वबेला में, प्रबोधन काल के दौरान सामने आई ।

स्त्रियों ने सबसे पहले समानता की मांग बुर्जुआ व्यवस्था के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया के शुरुआती काल में ही उठाई । अमेरिकी क्रांति (१७७५-१७८३) के दौरान मर्सी वारेन और एबिगेल एडम्स के नेतृत्व में स्त्रियों ने मताधिकार और सम्पत्ति के अधिकार सहित सामाजिक समानता की मांग करते हुए जार्ज वाशिंगटन और टॉमस जैफर्सन पर स्त्रियों की आबादी के मसले को संविधान में शामिल करने के लिए दबाव डाला, पर बुर्जुआ वर्ग के एक बड़े हिस्से के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका । प्रबोधन काल के दार्शनिकों के क्रांतिकारी भौतिकवादी दर्शन, वैज्ञानिक तर्कपरकता तथा सामाजिक न्याय और स्वतन्त्रता-समानता-भ्रातृत्व के रूप में जनवाद की अवधारणाओं ने सामाजिक उत्पादन के साथ ही सामंती स्वेच्छाचारिता-विरोधी राजनीतिक संघर्ष में भी सीधे भागीदारी कर रही स्त्रियों की आबादी को गहराई से प्रभावित किया । प्रबोधन काल के क्रांतिकारी दार्शनिकों ने पहली बार यह विचार प्रस्तुत किया कि स्त्रियों की उत्पीड़ित स्थिति मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों का हनन है । फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान फ़्रांसिसी बुर्जुआ विचारधारा का एक अग्रणी प्रवक्ता ए. कोंदोर्से (A .Condorcet ) स्त्रियों की समानता का प्रबल पक्षधर था । उसका मानना था कि स्त्रियों के बारे में समाज में मौजूद गहरे पूर्वाग्रह उनकी असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति की जड़ हैं । अपने समय के अन्य बुर्जुआ विचारकों की तरह कोंदोर्से भी स्त्री-प्रश्न के वर्गीय एवं आर्थिक आधारों को देख न सका । उसका यह विश्वास था कि कानूनी समानता और शिक्षा के जरिए स्त्रियों की मुक्ति संभव है । आगे चलकर उन्नीसवीं शताब्दी में भी, पश्चिम के कई बुर्जुआ विचारकों ने ऐसे ही विचार प्रस्तुत किये । ब्रिटिश दार्शनिक, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री जेम्स स्टुअर्ट मिल ने भी अपनी पुस्तक “ऑन द सब्जेक्शन ऑफ वुमन” (१८६९) में इन्हीं विचारों का प्रतिपादन किया ।

संगठित नारी आन्दोलन की शुरुआत सर्वप्रथम महान फ़्रांसिसी क्रांति के दौरान हुई । उस समय स्त्रियाँ भी जन-प्रदर्शनों सहित सभी राजनीतिक कार्रवाइयों में हिस्सा ले रही थीं । समानता के लिए स्त्रियों के संघर्ष के लक्ष्य को समर्पित पहली पत्रिका का प्रकाशन क्रांति के दौरान फ़्रांस में ही शुरू हुआ वहीं क्रांतिकारी नारी क्लबों (Women’s Revolutionary Club) के रूप में स्त्रियों के पहले संगठन अस्तित्व में आये जिन्होंने सभी पक्षधर राजनीतिक संघर्षों में खुलकर भागीदारी करते हुए यह मांग की कि आजादी, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत बिना किसी लिंगभेद के लागू किये जाने चाहिए । ओलिम्प द गाउजेस (Olympe de Gouges, 1748-93) ने “मनुष्य और नागरिक के अधिकारों की घोषणा” (Declaration of the Rights of the Man and the Citizen) के मॉडल पर “स्त्रियों और स्त्री नागरिकों के अधिकारों की घोषणा” तैयार की और उसे १७९१ में राष्ट्रीय असेम्बली के समक्ष प्रस्तुत किया । इस घोषणा पत्र में “स्त्रियों पर पुरुषों के शासन” का विरोध किया गया था और सार्विक मताधिकारों के व्यवहार के लिए स्त्री-पुरुषों के बीच पूर्ण सामाजिक-राजनीतिक समानता की मांग की गई थी । यद्यपि फ़्रांसिसी क्रांति के अधिकांश नेताओं ने स्त्रियों की समानता के विचार को ख़ारिज कर दिया और १७९३ के अंत में सभी नारी क्लबों को बंद कर दिया गया, लेकिन फिर भी इस युगांतरकारी क्रांति ने सामंती संबंधों पर निर्णायक मारक प्रहार करने के साथ ही कई कानूनों के द्वारा और नये सामाजिक मूल्यों के द्वारा औरतों की कानूनी स्थिति में भारी परिवर्तन किया । १७९१ में एक कानून बनाकर स्त्रियों की शिक्षा का प्रावधान किया गया, २० सितंबर १७९२ की आज्ञाप्ति द्वारा उन्हें कई नागरिक अधिकार प्रदान किये गये और अप्रैल १७९४ में कन्वेंशन द्वारा पारित एक कानून ने उनके लिए तलाक लेना आसान बना दिया । लेकिन थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया के काल में नारी मुक्ति संघर्ष की ये उपलब्धियां एक बार फिर, मूलत: छीन गयी । नेपोलियोनिक कोड (१८०४) और अन्य यूरोपीय देशों की ऐसी ही बुर्जुआ नागरिक संहिताओं ने एक बार फिर स्त्रियों के नागरिक अधिकारों को अतिसीमित कर दिया और परिवार, शादी, तलाक, अभिभावकत्व और संपत्ति के अधिकार सहित सभी मामलों में उन्हें कानूनी तौर पर एक बार फिर पूरी तरह पुरुषों के मातहत बना दिया ।

बुर्जुआ क्रांतियों के काल में नारी आन्दोलन का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज मेरी वोल्सटोन क्राफ्ट की पुस्तक “स्त्री के अधिकारों का औचित्य-प्रतिपादन” ( A Vindication of the Rights of Women) थी, जो कुल मिलाकर ओलिम्प द गाउजेस के दस्तावेज के प्रतिपादनों को ही उन्नत एवं विस्तृत रूप में प्रस्तुत करती थी । उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के नारीवादी आन्दोलन (Feminist Movement ) की बुनियादी रुपरेखा सर्वप्रथम इसी पुस्तक में दिखाई देती है ।

2. उन्नीसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध : बुर्जुआ सत्ता का सुदृढीकरण और स्त्री समुदाय की पूंजीवादी गुलामी का नया दौर

फ़्रांसिसी और अमेरिकी क्रांतियों का सार-संकलन करते हुए कहा जा सकता है कि जब सामन्तवाद के विरुद्ध बुर्जुआ वर्ग के साथ ही पूरी जनता इनमें शिरकत कर रही थी, तब स्वतन्त्रता, समानता और जनवाद के विचारों का प्रतिपादन अधिक क्रांतिकारी रूप में किया जा रहा था, पर बुर्जुआ सत्ता की स्थापना और सुदृढीकरण कें नये शासक वर्ग ने जिस प्रकार मेहनतकशों को, ठीक उसी प्रकार स्त्रियों को भी उसी हद तक आजादी और नागरिक अधिकार दिए, जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली और उत्पादन एवं विनिमय के संबंधों के लिए जरूरी था । इससे थोड़ी भी अधिक आजादी यदि स्त्रियों को मिल सकी, तो उसका एकमात्र कारण नारी समुदाय की नई चेतना और उसके संघर्षों का दबाव एवं भय था । पूंजीवाद ने सामन्ती मध्ययुगीन स्वेच्छाचारिता, घरेलू गुलामी, व्यक्तित्वहीनता, अनागरिकता और विलासिता एवं उपभोग की सामग्री होने की स्थिति से नारी समुदाय को बाहर तो निकला, पर पूरी तरह से नहीं । सत्ता में आने के साथ ही उसने जब चर्च के साथ “पवित्र गठबंधन” कर लिया तो स्त्रियों की गुलामी के सामंती मूल्यों के कुछ तत्वों को उसने फिर से अपना लिया । उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान स्त्रियाँ शिक्षा, नौकरी, सम्पत्ति के अधिकार मताधिकार सहित सभी नागरिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रहीं और उन्हें काफी हद तक अर्जित भी किया, लेकिन उनकी नागरिकता दोयम दर्जे की ही थी और पूंजीवादी उत्पादन तन्त्र में वे निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलामों (Wage Slaves ) में तब्दील कर दी गयी । फिर भी बुर्जुआ क्रांतियाँ ऐतिहासिक तौर पर नारी मुक्ति संघर्ष को एक कदम आगे ले आई, उन्हें सामंती समाज के निरंकुश दमन से एक हद तक छुटकारा दिलाया, सामाजिक उत्पादन में उनकी भागीदारी की स्थितियां पैदा की और उनके भीतर अपने जनवादी अधिकारों, स्वतंत्र अस्मिता और स्वतंत्र पहचान के लिए लड़ने की, सामाजिक-राजनीतिक क्रियाकलापों और संघर्षों में हिस्सा लेने की और एक नई जमीन पर खड़े होकर यौन-असमानता एवं यौन-उत्पीडन का विरोध करने की चेतना पैदा की ।

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में यूरोप और अमेरिका के बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के अधिकारों की वास्तविक और वैधिक अनुपस्थिति की जो स्थिति बनी, उसे कई बुर्जुआ लेखकों-विचारकों से सैद्धांतिक समर्थन प्राप्त हुआ । बुर्जुआ साहित्य में बड़े पैमाने पर प्रस्तुत और आज भी पूरी दुनिया में व्यापक स्तर पर मान्यताप्राप्त तथाकथित जीवशास्त्रीय सिद्धांत के प्रारंभिक पैरोकारों में फ़्रांसिसी दार्शनिक ओगुस्त कोंत (A . Konte ) अग्रणी था जिसके अनुसार नारी समुदाय की असमानतापूर्ण सामाजिक स्थिति का मूल कारण “नारी की प्राकृतिक दुर्बलता” में निहित है, स्त्रियाँ स्वाभाविक एवं प्राकृतिक तौर पर पारिवारिक जिम्मेदारियों, प्रजनन, शिशुपालन आदि के लिए ही बनी होती हैं और कभी भी वे सामाजिक तौर पर पुरुषों के समकक्ष नहीं हो सकतीं । स्त्री-पुरुष असमानता का यह जीवशास्त्रीय सिद्धांत उन्नीसवीं शताब्दी के बुर्जुआ समाज का सर्वाधिक प्रभावशाली बुर्जुआ पुरुष-स्वामित्ववादी सिद्धांत था जिसका प्रभाव आज भी बड़े पैमाने पर मौजूद है । ब्रिटेन के विक्टोरियन सामाजिक मूल्यों पर भी इन विचारों का जबर्दस्त प्रभाव मौजूद था । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जर्मनी में प्रचलित पेटी-बुर्जुआ “थियरी ऑफ द थ्री केज” (German–Kirche, Kuche, Kinder-Church, Kitchen, Children) भी सारत: कोंत के विचारों का ही विस्तार था जिसके अनुसार, स्त्रियों की रूचि और सक्रियता का दायरा केवल चर्च, रसोई और बच्चों तक ही सीमित होना चाहिए । आगे चलकर फासिस्टों और नात्सियों ने इसी सिद्धांत के परिष्कृत रूप को इटली एवं जर्मनी में अपनाया और लागू किया । आज भी बुर्जुआ प्रतिक्रियावादी नवनात्सी तत्व और धार्मिक पुनरुत्थानवादी इस तरह के तर्क देते रहते हैं । गोर्बचोवी संशोधनवादियों ने भी स्त्रियों की सामाजिक भूमिका में कटौती करते हुए उनकी प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक बनावट का तर्क दिया और देंगपंथी संशोधनवादी भी आज घुमा-फिराकर ऐसे तर्क देते रहते हैं ।

एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जैसे-जैसे बुर्जुआ वर्ग अपनी सत्ता का सुदृढीकरण करता गया, नारी आन्दोलन के बुर्जुआ चरित्र, फ्रेमवर्क और नेतृत्व की सीमाएं ज्यादा से ज्यादा साफ़ होती चली गई । मताधिकार, सम्पत्ति के अधिकार और यौन आधार पर बरती जाने वाली हर प्रकार की असमानता के विरुद्ध जनवादी अधिकारों के व्यापक दायरे में क्रांतिकारी संघर्ष चलाने और उसे सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष से जोड़ने के बजाय, उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, बुर्जुआ नारी आन्दोलन के नेतृत्व ने फ़्रांसिसी क्रांति काल की परम्परा को छोड़ते हुए अपना उद्देश्य केवल बुर्जुआ समाज के फ्रेमवर्क के भीतर, अपने ही वर्ग के पुरुषों से स्त्रियों की समानता तक सीमित कर दिया और स्त्री-प्रश्न की अवधारणा को संकीर्ण करके संघर्ष को सुधारों के दायरे में कैद कर दिया । उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में उपरोक्त मांग के पूरक के तौर पर सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियों के काम करने के अधिकार की मांग उठाई गई ।

लेकिन नारी आन्दोलन की क्रांतिकारी धारा उस समय भी पूरी तरह से निष्प्राण नहीं हो गयी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के चौथे-पांचवें दशक में फ़्रांस में बड़े पैमाने पर ऐसा क्रांतिकारी यथार्थवादी साहित्य उत्पादित हुआ जिसमें स्त्रियों की पारिवारिक गुलामी और सामाजिक असमानता की आलोचना की गयी थी । इसमें जी. सांद (G. Sand) के उपन्यासों की अग्रणी भूमिका थी । इसी समय अमेरिका और ब्रिटेन में संगठित रूप से नारी मताधिकार आन्दोलन की शुरुआत हुई जहाँ सामाजिक जीवन में स्त्रियाँ बड़े पैमाने पर हिस्सा लेने लगी थीं । १८३० के दशक में अमेरिका में काले लोगों की मुक्ति के संघर्ष में १०० से भी अधिक दासता-विरोधी “नारी सोसायटी” जैसे संगठन हिस्सा ले रहे थे और ब्रिटेन में चार्टिस्ट आन्दोलन में स्त्रियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थीं । वास्तव में, पूंजीवादी समाज के विकास के नियम और विज्ञान, तकनोलाजी एवं संस्कृति का विकास, उत्पादन और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ, खुद ही वस्तुगत तौर पर, स्त्रियों की मातहती के सिद्धांतों की आधारहीनता को ज्यादा से ज्यादा उजागर करते जा रहे थे । सर्वप्रथम, उस काल के क्रांतिकारी जनवादी सिद्धान्तकारों, विशेषकर सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिये और राबर्ट ओवेन जैसे सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि काल्पनिक समाजवादी विचारकों ने स्त्रियों की सामाजिक पराधीनता के बुर्जुआ सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ाते हुए नारी उत्पीडन और बुर्जुआ समाज की प्रकृति के बीच के अंतर्संबंधों को उजागर किया था । नारी मुक्ति के बुर्जुआ सिद्धान्तकारों के विपरीत इन दार्शनिकों ने पहलों बार स्त्रियों को समानता का दर्जा देने के समाज के पुनर्गठन की अपनी योजना का एक बुनियादी मुद्दा बनाया । चार्ल्स फूरिये ने पहली बार यह स्पष्ट बताया कि किसी भी समाज में आजादी का एक बुनियादी पैमाना यह है कि उस समाज विशेष में स्त्रियाँ किस हद तक आजाद हैं ।

उन्नीसवीं शताब्दी के रुसी क्रांतिकारी जनवादियों ने इसी विचार-सरणि  को आगे बढ़ते हुए सामाजिक जीवन के साथ ही क्रांतिकारी संघर्ष में भी स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया । नारी मुक्ति के सर्वाधिक प्रखर प्रवक्ता चेर्नीशेव्स्की ने अपने उपन्यास “क्या करें” ( What is to be done )  में एक ऐसा स्त्री-चरित्र प्रस्तुत किया जिसने संकीर्ण पारिवारिक दायरे से मुक्त होकर अपनी स्वतंत्र सामाजिक-आर्थिक स्थिति बनाई थी और जो सामाजिक सक्रियताओं में भी संलग्न थी । चेर्नीशेव्स्की का यह उपन्यास यूटोपिया के तत्वों के बावजूद युगीन परिप्रेक्ष्य में, नारी-मुक्ति के सन्दर्भ में भी क्रांतिकारी महत्व रखता है ।

3. उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध : नयी क्रांतियों और सर्वहारा संघर्षों की शुरुआत : नारी मुक्ति संघर्ष एक नये चरण में

यूरोप में १८४८-४९ की क्रांतियों तथा जून १८४८ में पेरिस में हुए प्रथम सर्वहारा विद्रोह सहित विभिन्न देशों में उठ खड़े हुए मजदूर आंदोलनों ने स्त्रियों के राजनीतिक एवं नागरिक अधिकारों के संघर्ष को एक नया संवेग प्रदान किया । १८४८ में फ़्रांस में फिर से नारी क्लबों का गठन हुआ जिन्होंने राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों को समान अधिकार देने के लिए संघर्षों की नए सिरे से शुरुआत की. इसी वर्ष फ़्रांस में स्त्री कामगारों के पहले स्वतंत्र संगठन की स्थापना हुई । जर्मनी और आस्ट्रिया में भी राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के उद्देश्य से स्त्री यूनियन गठित हुए ।

एक व्यापक आधार पर, एक सुनिश्चित कार्यक्रम के साथ नारीवादी आन्दोलन की शुरुआत का प्रस्थान-बिंदु जुलाई, १८४८ को माना जाता है जब एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन, लुकेसिया कफिन मोट और कुछ अन्य ने सेनेका फाल्स, न्यूयार्क में पहली बार नारी अधिकार कांग्रेस आयोजित करके नारी स्वतन्त्रता का एक घोषणा-पत्र जारी किया जिसमें पूर्ण कानूनी समानता, पूर्ण शैक्षिक एवं व्यावसायिक अवसर, समान मुआवजा और मजदूरी कमाने के अधिकार तथा वित देने के अधिकार की मांग की गयी थी । एलिजाबेथ कैंडी स्टेन्टन तथा सूसन बराउनवेल एंथनी के नेतृत्व में यह आन्दोलन तेज गति से फैला और जल्दी ही यूरोप तक जा पहुंचा । ब्रिटेन में १८६० के दशक में चुनावी सुधारों के दौर में नारी मताधिकार आन्दोलन भी बड़े पैमाने पर उठ खड़ा हुआ । १८६७ में पारिलियामेंट में स्त्रियों को मताधिकार देने के जे. एस मिल के प्रस्ताव को रद्द कर दिए जाने के बाद कई नगरों में नारी मताधिकार सोसायिटीयों की स्थापना हो गयी, जिनको मिलाकर बाद में राष्ट्रीय एसोसिएशन बनाया गया । अमेरिका में १८६९ में दो नारी मताधिकार संगठनों का गठन हुआ । १८९० में इनकी एकता के बाद राष्ट्रीय अमेरिकी नारी मताधिकार संघ अस्तित्व में आया । १८८२ में फ़्रांसिसी नारी अधिकार लीग का गठन हुआ ।

मुख्यत: उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के प्रभाव में जनवादी चेतना संचरित होने लगी थी जिससे स्त्री समुदाय भी अछूता नहीं रह गया था । इस दौरान लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की आजादी और बराबरी की मांग को लेकर आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो हालाँकि व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के आभाव में मुख्यत: नारीवादी ( Fiminist ) प्रकृति का था, फिर भी यह लातिनी देशों की स्त्रियों की नयी चेतना का द्योतक था । इसी अवधि में पहले जापान, भारत और इंडोनेशिया में और फिर तुर्की और ईरान में नारी आन्दोलन ने अपना पहला कदम आगे बढ़ाया । १८८८ में अमेरिकी नारीवादियों की पहल पर अंतरराष्ट्रीय नारी परिषद (International Council of Women ) की स्थापना हुई । १९०४ में अंतरराष्ट्रीय नारी मताधिकार संश्रय ( International Women Suffrage Alliance) की स्थापना हुई जिसका नाम १९४६ में बदलकर ‘अंतरराष्ट्रीय नारी संश्रय समान अधिकार-समान दायित्व’ (International Alliance of Women – Equal Rights-Equal Responsibilities ) कर दिया गया ।

इस दौरान एक महत्वपूर्ण विकास यह हुआ कि स्त्रियों की नयी चेतना और संघबद्ध होने की आंकाक्षा को देखते हुए उनकी “स्थिति में सुधार” और “उनके विकास” की आड़ लेकर आध्यात्मिक, धार्मिक सुधारवादी और संकीर्ण राष्ट्रवादी ग्रुपों ने भी भांति-भांति के नारी संगठनों की स्थापना की जिनका मूल उद्देश्य स्त्रियों की मुक्तिकामी आकांक्षा को सुधारों के दायरे में कैद करना, उन्हें मजदूर आंदोलनों, क्रांतिकारी बुर्जुआ जनवादी आंदोलनों और राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के प्रभाव से दूर रखना तथा इस तरह निहित वर्ग स्वार्थों की सेवा करना था ।

4. नारी मुक्ति आन्दोलन और सर्वहारा की नयी धारा


नारी आंदोलनों में सर्वहारा विश्व-दृष्टिकोण के विकास की प्रक्रिया उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में शुरू हई । नारी-प्रश्न के वर्गीय आधारों को उद्घाटित करते हुए मार्क्स और एंगेल्स ने  पहली बार यह स्पष्ट किया कि निजी सम्पत्ति और वर्गीय समाज के संघटन की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही स्त्री की दासता की शुरुआत हुई । उन्होंने स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में कामगार स्त्रियाँ निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम होने के साथ-साथ यौन आधार पर शोषण-उत्पीडन का शिकार तो हैं ही, सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ भी सामाजिक श्रम से कटी हुयी या तो नारकीय घरेलू दासता एवं पुरुष स्वामित्व के बोझ से दबी हुई हैं या बुर्जुआ समाज में स्त्रियों के लिए आरक्षित कुछ विशिष्ट अपमानजनक पेशों में लगी हुयी निहायत निरंकुश स्वेच्छाचारिता की शिकार हैं । उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पूंजीवादी समाज में मेहनतकश स्त्रियों की समस्यायों का समाधान असंभव है और स्त्री समुदाय की सच्ची मुक्ति की दिशा में पहला कदम पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था का खात्मा है ।

मार्क्स-एंगेल्स ने यह स्पष्ट किया कि नारी मुक्ति  की दिशा में पहला कदम यह होगा कि स्त्री मजदूरों की वर्ग चेतना को उन्नत किया जाये, सामाजिक-राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ाई जाये और उन्हें मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलनों में शामिल किया जाये । पहले इंटरनेशनल ने नारी मजदूरों के श्रम के संरक्षण से संबंधित दो प्रस्ताव पारित किये थे । इन प्रस्तावों ने स्त्रियों के उत्पीडन और उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व एवं मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के बीच अंतर्संबंधों को उद्घाटित  करने के साथ ही नारी अधिकारों के प्रति प्रूधोंवादी दृष्टिकोण के दिवालियेपन को भी उजागर कर दिया । प्रूधों और उसके चेले सामाजिक रूप से उपयोगी श्रम में स्त्रियों की भागीदारी का विरोध करते थे और उनकी सामाजिक समानता की बात करते हुए भी परिवार और बच्चों की देखभाल ही उनकी प्रमुख जिम्मेदारी मानते थे ।  स्त्री कामगारों के श्रम-संरक्षण संबंधी पहले इंटरनेशनल के निर्णय ने सर्वहारा नारी आन्दोलन के विकास का सैद्धांतिक आधार तैयार करने का काम किया । मार्क्स-एंगेल्स ने, और आगे चलकर लेनिन, स्टालिन और माओ ने — अंतरराष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के इन पाँचों महान शिक्षकों ने कामगार औरतों की उत्पीडित आबादी को सर्वहारा क्रांति की सबसे बड़ी आरक्षित शक्ति ( Greatest Reserve ) के रूप में देखा । सर्वहारा क्रांति और स्त्री प्रश्न के समाधान के द्वंदात्मक अंतर्संबंधों को निरुपित करते हुए लेनिन ने लिखा था, ” स्त्रियों के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता हासिल किये बिना सर्वहारा अपनी पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं हासिल कर सकता ।”

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में क्रांतिकारी संघर्षों में, विशेषकर १८७१ के युगांतरकारी पेरिस कम्यून में शौर्यपूर्ण भागीदारी के साथ ही स्त्रियों ने राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में स्वतंत्र रूप से भी हिस्सा लिया और अपने संगठन बनाये । फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन में स्त्रियों ने अपनी ट्रेड युनियने संगठित कीं ।  उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में फ़्रांस और ब्रिटेन में स्त्री कामगारों के कई संगठन पहले इंटरनेशनल में भी शामिल हुए । जर्मन कामगार औरतें ‘ इंटरनेशनल प्रोफेशनल एसोसियेशन ऑफ मैन्युफैक्चरी , इंडस्ट्रियल एंड हैंडीक्राफ्ट  वर्कर्स’ में शामिल हो गयीं जिसकी स्थापना १८६९ में क्रिम्मित्स्चू (सैक्सनी) में हुई थी और जो इंटरनेशनल के विचारों से प्रभावित था । स्त्री-प्रश्न पर मार्क्सवादी दृष्टिकोण को विकसित और व्याख्यायित करने में तथा वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांतों पर आधारित सर्वहारा नारी आंदोलनों को विकसित करने में बेबेल की सुप्रिसिद्ध कृति ‘नारी और समाजवाद’ (Women and Socialism ) ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में मजदूर स्त्रियों का आन्दोलन जर्मनी में सर्वाधिक तेज गति से विकसित हुआ । १८९१ में जर्मनी की सामाजिक जनवादी पार्टी ने अपने कार्यक्रम (एर्फुर्ट कार्यक्रम ) में नारी मताधिकार की मांग को शामिल किया । पार्टी ने स्त्रियों-पुरुषों की सांगठनिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार किया और ट्रेड यूनियनों में स्त्रियों की भरती के विशेष प्रयास शुरू किये गये । १८९१ में स्त्री कामगारों की एक पत्रिका -Gleichcheit – का प्रकाशन भी शुरू हुआ जो १८९२ से १९१७ तक क्लारा जेटकिन के निर्देशन में प्रकाशित होती रही । सन १९०० से जर्मनी भर में नियमित नारी सम्मेलनों के आयोजन की शुरुआत हुई ।

पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली की अपनी जरूरतों के चलते और सर्वहारा आंदोलनों और विशेष तौर पर नारी आंदोलनों की विविध धाराओं-प्रवृतियों के दबाव के नाते उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में यूरोप में स्त्रियों की शिक्षा और श्रम-संरक्षण से संबंधित कई कानून बने और उनकी कानूनी हैसियत में कुछ महत्वपूर्ण सुधार हुए । उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन में १८४७ में ही स्त्रियों का श्रम दिवस दस घंटे का कर दिया गया था । मार्क्सवाद के संस्थापकों ने इस कानून को मजदूर वर्ग की एक बड़ी जीत की संज्ञा दी थी । स्त्री मजदूरों के संरक्षण से संबंधित कई अन्य कानून इस दौरान विभिन्न यूरोपीय देशों में बने । स्त्रियाँ  ट्रेड युनियनों में शामिल होने लगीं । १८८९ में ट्रेड यूनियन्स कांग्रेस में उनकी सदस्यता का प्रश्न सारत: हल हो गया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही स्त्री आन्दोलन के दबाव में, पहले सम्पन्न और फिर आम परिवारों की लड़कियों के लिए माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना यूरोप में और फिर एशिया-लातिनी अमेरिका के कुछ देशों में हुई । ब्रिटेन में स्त्रियों को सबसे पहले शिक्षक का पेशा अपनाने का अधिकार मिला । फिर धीरे-धीरे कुछ अन्य क्षेत्रों में भी उन्हें रोजगार के अवसर मिले । १८५८ में ब्रिटेन में स्त्रियों को तलाक का अधिकार प्राप्त हुआ, यद्यपि इस सन्दर्भ में १९३८ तक उनके अधिकार पुरुषों की अपेक्षा कम थे । १८७० से १९०० के बीच ब्रिटिश स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार हासिल किये । १८६९ में कर भुगतान करने वाली स्त्री नागरिकों को म्युनिसिपल चुनावों में भागीदारी का अधिकार मिला और १९१८ में शादीशुदा स्त्रियों तथा ३० वर्ष से अधिक आयु वाली, विश्वविद्यालय डिप्लोमा प्राप्त की हुई स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । १९२८ में २१ वर्ष आयु वाली स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुआ । अमेरिका में स्त्रियों को शिक्षण पेशा अपनाने का अधिकार उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही मिल चुका था । १८५० से १८७० के बीच वहाँ स्त्रियों को तथाकथित “लिबरल” पेशे अपनाने का अधिकार प्राप्त हुआ और १८८० के बाद तथाकथित “पुरुष” पेशों में भी उन्हें स्वीकार किया जाने लगा । १८४८ में वहाँ शादीशुदा औरतों को सम्पत्ति रखने का अधिकार प्राप्त हुआ । १८७४ में वहाँ पहली बार स्त्रियों के श्रम दिवस को सीमित करने का कानून (मैसाचुसेट्स  ) में बना । १९२० में अमेरिकी संविधान में हुए उन्नीसवें संशोधन द्वारा स्त्रियों के मताधिकार पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त कर दिया गया । फ़्रांस में भी उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में स्त्रियों ने कई महत्वपूर्ण नागरिक अधिकार प्राप्त कर लिए थे । १८९२ में उनके श्रम के संरक्षण से संबंधित पहला कानून बना, उनका अधिकतम लम्बा श्रम दिवस ११ घंटे का तय किया गया जिसे १९०४ में घटाकर १० घंटे कर दिया गया । स्त्री मताधिकार संबंधी विधेयक फ़्रांस में पहली बार १८४८ में पेश किया गया था, लेकिन १९४४ में जाकर उन्हें यह अधिकार हासिल हो सका । जर्मनी में औरतों को मत देने का अधिकार १९१९ के वाईमर संविधान द्वारा प्राप्त हुआ था, लेकिन १९३३ में सत्ता में आने के साथ ही नात्सियों ने लम्बे और कठिन संघर्षों द्वारा अर्जित उनके सभी राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों को समाप्त कर दिया ।

इन कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की चर्चा के बाद, संक्षेप में, इतना ही उल्लेख यहाँ पर्याप्त है कि कुछ एक अपवादों को छोडकर, पश्चिमी देशों की स्त्रियों ने बीसवीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते बुर्जुआ सामाजिक ढांचे के भीतर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लिए थे । पर यह कहते हुए कुछ बातों को रेखांकित करना निहायत जरूरी है । पहली बात यह कि कानूनी तौर पर अधिकांश बुनियादी नागरिक अधिकार हासिल कर लेने के बावजूद वास्तव में आज तक उन्हें सामाजिक समानता प्राप्त नहीं है । वे दोयम दर्जे की नागरिक हैं । काम करने वाली औरतें वहाँ असंगठित क्षेत्र में सस्ता श्रम बेचने को बाध्य हैं और निकृष्टतम कोटि की उजरती गुलाम हैं । मुख्यत: मध्यम वर्ग और अन्य सम्पत्तिशाली वर्गों की स्त्रियाँ और सामान्यत: सभी स्त्रियाँ वहाँ घरेलू दासता से पूर्णत: मुक्त नहीं हो सकी हैं । जीवन के हर क्षेत्र में उन्हें आर्थिक शोषण के साथ ही यौन-उत्पीडन का भी शिकार होना पड़ता है । धार्मिक मूल्यों-मान्यताओं के साथ ही, तरह-तरह की फासिस्ट प्रवृतियों और साथ ही बीमार बुर्जुआ संस्कृति का दबाव भी उन्हें ही सबसे अधिक झेलना पड़ता है । अभी भी गर्भपात और तलाक से लेकर बलात्कार तक — बहुत सारे मामलों में, पश्चिमी देशों में कानून स्त्रियों के प्रति भेदभावपूर्ण बने हुए हैं । दूसरी बात यह है कि पश्चिम की स्त्रियों ने जो भी अधिकार प्राप्त किये हैं, वह उन्हें  बुर्जुआ समाज ने तोहफे के तौर पर नहीं दिए हैं । ये अधिकार सामाजिक क्रांतियों, वर्ग-संघर्षों और नारी समुदाय के शताब्दियों लम्बे संघर्ष द्वारा अर्जित हुए हैं । बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों में व्यापक आम जनता और स्त्रियों की भागीदारी के दौर में स्त्रियों को अपने नागरिक अधिकारों की पहली किश्त हासिल हुई । राज्यसत्ता पर काबिज होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने जब आम जनता पर अपना अधिनायकत्व लागू किया तो स्त्रियों के जनवादी अधिकारों को भी उसने हडपने की हर कोशिश की और केवल उसी हद तक उन्हें नागरिकता के अधिकार दिए जिस हद तक बुर्जुआ उत्पादन-प्रणाली की जरूरत थी । पुन: उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में जब क्रांतियों का नया विस्फोट हुआ और सर्वहारा वर्ग राजनीतिक संघर्ष के मंच पर उतरा तो नारी आन्दोलन को भी महत्वपूर्ण संवेग प्राप्त हुआ और बाद के पचास वर्षों के संघर्षों के दौरान पश्चिम में नारी समुदाय ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित कीं । इस समय मजदूर स्त्रियाँ नारी मध्यवर्गीय स्त्रियों के आगे आ खड़ी हुई थीं । बीसवीं शताब्दी में, अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत संघ में, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोपीय देशों में और १९४९ की नई जनवादी क्रांति के बाद चीन में तथा मेहनतकशों के शासन वाले कुछ अन्य देशों में स्त्री समुदाय ने पहली बार समानता के जो अधिकार अर्जित किये, उनसे भी पश्चिमी देशों की और साथ ही राष्ट्रीय जनवाद की लड़ाई लड़ रहे एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों की मुक्तिकामी स्त्रियों के आंदोलनों को भी नई प्रेरणा और नया संवेग प्राप्त हुआ । तीसरी बात जो गौरतलब है, वह यह कि उन्नीसवीं शताब्दी में, जब तक यूरोप क्रांतियों का केंद्र रहा, तभी तक नारी आन्दोलन वहाँ तेजी से विकसित होता हुआ एक के बाद एक नई जीतें हासिल करता रहा । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के शुरू में विश्व पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में संक्रमण के बाद क्रांतियों का केंद्र खिसककर जब रूस और एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों-नवउपनिवेशों में आ गया तो नारी आन्दोलन का मुख्य रंगमंच भी इन्हीं देशों में स्थानांतरित हो गया । यह वस्तुगत ऐतिहासिक तथ्य इसी सत्य को पुष्ट करता है कि नारी आन्दोलन, उसका भविष्य और उसकी जीत-हार की नियति सामाजिक संघर्षों और क्रांतियों के साथ अविभाज्यत: जुडी हुई है । आगे हम सर्वहारा क्रांतियों की धारा और उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में जारी राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों की धारा के साथ जारी नारी मुक्ति आंदोलनों की अत्यंत संक्षिप्त चर्चा करेंगे ।

5. बीसवीं शताब्दी में अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन और नारी-मुक्ति आन्दोलन

मार्क्स-एंगेल्स के बाद लेनिन ने नारी-प्रश्न पर मार्क्सवादी चिंतन को आगे बढाया । लेनिन के काल में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन में कामगार औरतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने की प्रक्रिया उन्नत धरातल पर शुरू हुई. नारी-मुक्ति के प्रश्न पर लेनिन के कई महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अवदान थे । बुर्जुआ नारीवाद की नारी-मुक्ति विषयक वर्गेतर सोच और “यौन मुक्ति” की बुर्जुआ अवधारणाओं के साथ ही उन्होंने मार्क्सवाद से प्रेरित नारी-मुक्ति आन्दोलन की धारा में मौजूद कई अवैज्ञानिक धारणाओं और विजातीय रुझानों का विरोध किया । स्वतन्त्रता का अर्थ असामाजिक स्वच्छंदता और पुरुष के शोषण से मुक्ति का अर्थ “यौन मुक्ति” नहीं होता, यह कम्युनिस्ट नैतिकता और विज्ञान के विरुद्ध है — इसे लेनिन ने एकाधिक बार स्पष्ट किया ।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में क्लारा जेटकिन, क्रुप्सकाया, अलेक्सांद्रा कोल्लोंताई और अनेंसा आरमाँ आदि कम्युनिस्ट नेत्रियों ने अपनी सक्रियताओं और लेखन के द्वारा भी नारी मुक्ति के मोर्चे पर अहम भूमिका निभाई । इन अग्रणी व्यक्तित्वों के साथ लेनिन के वाद-विवाद और विचार-विमर्श के दौरान नारी मुक्ति के कई पक्षों पर मार्क्सवादी अवस्थिति महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुई ।

बीसवीं शताब्दी के शुरू होते-होते सर्वहारा नारी आन्दोलन के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के लिए पूर्वपीठिका तैयार हो चुकी थी । दूसरे इंटरनेशनल की कांग्रेस में नारी आन्दोलन और नारी समस्या के विविध पहलुओं पर नियमित रूप से बहसें हुआ करती थीं । १८९३ में ज्यूरिख कांग्रेस में यह कहा गया की स्त्रियों के श्रम के कानूनी संरक्ष्ण को पूरा समर्थन देना पूरी दुनिया के मजदूरों का कर्तव्य है । दूसरे इंटरनेशनल की लन्दन कांग्रेस (१८९६) को महिला प्रतिनिधियों के सम्मेलन ने स्त्री-पुरुष– दोनों ही समुदायों के सर्वहारा वर्ग के आम संगठन को स्वीकृति देने के साथ ही इस बात पर जोर दिया कि मेहनतकश वर्गों के नारी आन्दोलन और नारीवाद (Feminism ) के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खिंची जानी चाहिए ।

स्त्री समाजवादियों के पहले और दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (स्टुट्गार्ट, १९०७ और कोपेनहेगेन, १९१० ) मेहनतकश नारी आन्दोलन की विकास-यात्रा के दो महत्वपूर्ण मील पत्थर थे । पहले सम्मेलन ने बिना किसी लिंग-भेद के सार्विक एवं समान मताधिकार का प्रस्ताव पारित किया जिसे दूसरे इंटरनेशनल के स्टुट्गार्ट कांग्रेस ने भी स्वीकार किया । पहले सम्म्मेलन की प्रतिनिधियों ने क्लारा जेटकिन की अध्यक्षता में एक अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना करने और उसके मुखपत्र के प्रकाशन का भी निर्णय लिया । दूसरे सम्म्मेलन में सत्रह देशों की महिला प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । इसी सम्मेलन में प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब दक्षिणपंथी अवसरवादी काउत्स्की और उसके अनुयाइयों के विश्वासघात के कारण अंतरराष्ट्रीय मजदूर आन्दोलन में फूट पड़ी ठीक उसी समय मेहनतकश नारी आन्दोलन को भी एक गंभीर धक्का लगा ।  अधिकांश सामाजिक जनवादी स्त्री संगठनों ने भी विश्वयुद्ध में काउत्स्कीपंथियों की ही भांति अंधराष्ट्रवादी अवस्थिति अपनाई । बुर्जुआ नारीवादी संगठन तो पहले से ही यही अवस्थिति अपनाए हुए थे । लेकिन बोलेशेविक प्रस्ताव को ख़ारिज करके एक शांतिवादी प्रस्ताव स्वीकार करने के बावजूद बर्न अंतरराष्ट्रीय स्त्री समाजवादी सम्मेलन (१९१५) ने, जो बोलेशेविकों की पहल पर आयोजित हुई थी, समाजवादी अवस्थिति अपनाने वाली स्त्री समाजवादियों की एकता को बहाल रखने में अहम भूमिका निभाई । युद्ध के दौरान युद्ध में शामिल देशों की स्त्रियों ने भुखमरी और बदहाली के खिलाफ कई प्रदर्शन आयोजित किये । ८ मार्च (२३ फरवरी ) १९१७ को बोलेशेविकों की पेत्रोग्राद कमेटी की अपील पर भुखमरी, युद्ध और जारशाही के विरुद्ध रुसी स्त्रियों के प्रदर्शन ने एक व्यापक जनांदोलन का सूत्रपात किया जिसकी चरम परिणति फरवरी क्रांति के रूप में सामने आई । अक्टूबर समाजवादी क्रांति की तैयारी में रूस की महिला मजदूरों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । क्रांति के बाद सोवियत संघ में नारी आन्दोलन ने हर संभव तरीके से समाजवादी निर्माण के कामों को आगे बढ़ाने में, समाजवाद की रक्षा में और सामाजिक-राजनीतिक जीवन में आम स्त्रियों की भागीदारी बढ़ाने में एक अग्रणी भूमिका निभाई । समाजवादी सोवियत संघ की सर्वहारा राज्यसत्ता ने दुनिया के इतिहास में पहली बार न केवल स्त्री समुदाय को कानूनी तौर पर पुरुषों के साथ पूर्ण समानता के अवसर प्रदान किये बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक जीवन में व्यवहारत: इसे लागू करने की दिशा में भी हर संभव कदम उठाये । सोवियत संघ स्त्री-मुक्ति के सन्दर्भ में भी पूरी दुनिया के लिए एक नया प्रकाश स्तंभ बन गया ।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अक्टूबर क्रांति के प्रभाव में पूरी दुनिया में नारी आन्दोलन में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई । एक ओर जहाँ आम उत्पीडित नारी समुदाय समाजवाद की विचारधारा की ओर तेजी से आकृष्ट हुआ, वहीँ बुर्जुआ नारी संगठनों ने ज्यादा से ज्यादा खुले तौर पर बुर्जुआ व्यवस्था की हिफाजत का काम शुरू कर दिया । यूरोप की संशोधनवादी सामाजिक जनवादी पार्टियों ने पूंजीवाद की दूसरी सुरक्षापंक्ति का काम करते हुए स्त्रियों के बीच अपनी गतिविधियाँ तेज कर दीं ।

सोवियत संघ के बाहर, सर्वहारा विचारधारा पर आधारित नारी आन्दोलन ने १९२० के दशक में सुनिश्चित शक्ल अख्तियार करना शुरू किया । नारी आन्दोलन को क्रान्तिकारी आन्दोलन का अपरिहार्य बुनियादी अंग मानते हुए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कांग्रेस में मेहनतकश स्त्रियों के बीच कम्युनिस्टों के काम के प्रश्न पर लगातार गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श होता रहा । १९२० में कोमिन्टर्न के निर्देशन में अंतरराष्ट्रीय महिला सचिवालय की स्थापना हुई जिसकी सेक्रेटरी क्लारा जेटकिन थीं । महिला कम्युनिस्टों का एक प्रेस भी स्थापित हुआ और एक अंतरराष्ट्रीय महिला पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ । १९२० से १९२६ के बीच महिला कम्युनिस्टों के चार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुए ।

यद्यपि नारी आन्दोलन पर दूसरे इंटरनेशनल के विचारधारात्मक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने महिला कम्युनिस्ट संगठनों के कामों पर विशेष जोर दिया, पर लेनिन और इंटरनेशनल के अन्य अग्रणी नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि स्त्रियों के गैर-पार्टी संगठन और सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों की मांगों को लेकर संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठन भी बनाये जाने चाहिए जिसमें मेहनतकश स्त्रियों के अतिरिक्त जनता के अन्य वर्गों की स्त्रियाँ भी हिस्सा लें । सोवियत संघ के बाहर के देशों में नारी आदोलन में मौजूद संकीर्णतावादी भटकावों और संगठनों की कमजोरी के कारण व्यापक स्त्रियों को उनके जनवादी अधिकारों की मांग और यौन-असमानता के विरोध के आधार पर संगठित करने में तीसरे दशक तक तो कोई विशेष सफलता नहीं प्राप्त हो सकी, लेकिन चौथे दशक में फासिज्म के उभार ने तात्कालिक रूप से, वस्तुगत तौर पर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं कि फासिज्म और साम्राज्यवादी युद्ध-विरोधी संयुक्त मोर्चे में जनता के सभी वर्गों की — विशेषकर कामगार और मध्यम वर्ग की स्त्रियों के संगठित होने की प्रक्रिया शुरू हो गई । जहाँ भी फासिस्ट ताकतें सत्ता में आयीं, प्रगतिशील नारी संगठनों के साथ ही उन्होंने उन बुर्जुआ नारी संगठनों को भी कुचल दिया जो नारी मुक्ति या स्त्रियों के समान अधिकारों की बात करती थीं । इसके साथ ही फासिज्म-विरोधी लोक मोर्चे के एक अंग के रूप में एक जनवादी, फासिज्म-विरोधी नारी आन्दोलन के संघटित होने की प्रक्रिया शुरू हो गयी । अगस्त १९३४ में सोवियत संघ सहित कई देशों के प्रगतिशील नारी संगठनों की पहल पर पेरिस में युद्ध  और फासिज्म-विरोधी महिला विश्व कांग्रेस आयोजित हुआ जिसमें कम्युनिस्ट शांतिवादी, नारीवादी और क्रिश्चियन समाजवादी स्त्री संगठनों एवं ग्रुपों के कुल १०९६ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । कांग्रेस में युद्ध और फासिज्म-विरोधी विश्व महिला कमेटी का गठन किया गया । पुन: मई १९३८ में मार्सिइएज (Marseillis) में युद्ध-विरोधी अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन का आयोजन हुआ ।

यद्यपि विश्वयुद्ध के दौरान जनवादी महिला आन्दोलन के विकास की दिशा में सांगठनिक-परिमाणात्मक शक्ति की दृष्टि से कोई बहुत महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हुई, लेकिन फासिज्म के रूप में सामने आई बुर्जुआ अधिनायकत्व की नग्नता ने और उसके विश्वव्यापी प्रतिरोध ने इसके लिए आवश्यक पूर्वाधार तैयार कर दिया ।

जिन उपनिवेशों-अर्द्धउपनिवेशों में मुक्तियुद्ध जारी थे, वहां पहले से ही जनवादी नारी आन्दोलन के संगठित होने की प्रक्रिया जारी थी । फासिज्म-विरोधी संघर्ष के अनुभवों, फासिज्म की पराजय, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद साम्राज्यवादी शक्तियों के निर्बल हो जाने और एक शक्तिशाली समाजवादी शिविर के उठ खड़े होने के व्यापक प्रभाव दुनिया की आधी आबादी की चेतना पर और नारी आन्दोलन पर भी पड़ा । तीसरी दुनिया के देशों में उपनिवेशवाद की पराजय की प्रक्रिया शुरू होने के इस दौर में उन अधिकांश देशों में समाजवाद को सच्चा मित्र मानने वाला जनवादी नारी आन्दोलन शक्तिशाली होता चला गया । चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में जारी मुक्ति-संघर्ष में स्त्रियों की भागीदारी और मुक्त क्षेत्रों में उनकी सामाजिक स्थिति पहले से ही दुनिया भर के पिछड़े देशों की स्त्रियों को आकृष्ट कर रही थी । १९४९ में नई जनवादी क्रांति संपन्न होने के बाद मध्ययुगीन पित्रसत्तात्मक स्वेच्छाचारिता से भरे समाज में स्त्रियों को पूर्ण बराबरी का कानूनी दर्ज़ा देकर और फिर समाज में उसे एक वास्तविकता में रूपांतरित करने की शुरुआत करके चीन के सर्वहारा राज्य ने ऐतिहासिक काम किया था उस पर पूरी दुनिया की स्त्रियों और मुक्तिकामी जनता की निगाहें टिकी हुई थीं । द्वितीय विश्व्यद्धोत्तर काल में पश्चिम के देशों की स्त्रियाँ भी अपने जनवादी अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने की जरूरत शिद्दत के साथ महसूस कर रहीं थीं ।

इन्हीं परिस्थितियों में, अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन ने आगे की ओर कुछ महत्वपूर्ण डग भरे । इनमें सर्वाधिक महत्पूर्ण कदम था दिसंबर, १९४५ में महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ( Women’s International Democratic Federation — W.I.D.F.) की स्थापना, जिसमें ३९ देशों के राष्ट्रीय स्त्री-संगठनों ने भाग लिया । महिला अंतरराष्ट्रीय जनवादी संघ ने स्त्रियों की आम मांगों को लेकर अलग-अलग देशों में और विश्व स्तर पर सक्रिय विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्त्री संगठनों के साथ साझा कार्रवाइयों की भी कोशिश की, लेकिन उस समय पूरी दुनिया में जारी कम्युनिज्म-विरोधी मुहीम के प्रभाव में बहुत सारे बुर्जुआ, तथाकथित परम्परागत स्त्री संगठनों के नेतृत्व ने इसे स्वीकार नहीं किया ।

१९५६ में रूस में ख्रुश्चेव द्वारा प्रतिक्रांतिकारी तख्तापलट और रूस तथा पूर्वी यूरोपीय देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना ने विष-स्तर पर जारी वर्ग-संघर्ष को भारी धक्का पहुँचाने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय नारी आन्दोलन को भी भारी नुकसान पहुँचाया । साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष, पूंजीवादी देशों में और तीसरी दुनिया के नवस्वाधीन देशों में जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष और व्यवस्था-विरोधी संघर्ष में स्त्री आन्दोलन की क्रान्तिकारी भागीदारी के विपरीत — संशोधनवादियों ने दुनिया भर में नारी मुक्ति आन्दोलन को सुधारवाद और शांतिवाद के दलदल में ले जाकर धंसा देने की हर चंद कोशिशें कीं और काफी हद तक इसमें सफलता भी प्राप्त की । यही कारण था कि छठे दशक के अंत तक दुनिया भर के नारी आन्दोलन में गतिरोध और शून्य की सी स्थिति उत्पन्न हो गयी थी । यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसमें बुर्जुआ नारीवाद के नये उभार ने सातवें दशक में जन्म लिया ।

6. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और नारी आन्दोलन

जैसाकि उपर उल्लेख किया जा चुका है, पश्चिम के देशों में बुर्जुआ जनवादी क्रांतियों की पूर्वपीठिका तैयार होने के साथ ही, यानि प्रबोधन काल (Age of Enlightenment ) के दौर में नारी मुक्ति की चेतना का जन्म हुआ और बुर्जुआ क्रांतियों के दौर में स्त्री समुदाय ने अपने सामाजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी ।

एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों में बुर्जुआ विकास का स्वरूप यूरोप जैसा नहीं रहा । यहाँ बुर्जुआ वर्ग पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रांति की प्रक्रिया से गुजरकर सत्ता में नहीं आया । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों के पूर्ण औपनिवेशीकरण के बाद वहाँ की पुरानी सामाजिक-आर्थिक संरचना को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया । बाद में इन देशों में औपनिवेशिक सामाजिक-आर्थिक संरचना के गर्भ से जिस बुर्जुआ वर्ग का जन्म हुआ, वह एक समझौतापरस्त वर्ग था । वह अमेरिका या फ़्रांसिसी क्रांति के वाहक बुर्जुआ वर्ग की भांति क्रान्तिकारी भौतिकवाद और जनवाद के मूल्यों से लैस नहीं था । लातिन अमेरिका और एशिया के अधिकांश देशों में इसी बुर्जुआ वर्ग ने अलग-अलग परिस्थितियों में कहीं एक हद तक क्रान्तिकारी संघर्ष करके तो कहीं ‘समझौता-दबाव-समझौता’ की रणनीति अपनाकर और कहीं पूरी तरह साम्राज्यवाद के साथ समझौता करके सत्ता हासिल की । तीसरी दुनिया के इस बुर्जुआ वर्ग की राजनीतिक स्वतन्त्रता भी उनके चरित्र और उनके संघर्ष या समझौते की प्रकृति के ही अनुरूप कम या ज्यादा थी, पर कहीं भी इस नये बुर्जुआ वर्ग ने न तो साम्राज्यवाद से निर्णायक विच्छेद किया और न ही क्लासिकीय अर्थों में उस रूप में जनवाद को ही बहाल किया, जैसाकि फ़्रांस या अमेरिका के बुर्जुआ वर्ग ने किया था ।

इन सभी देशों में नारी आन्दोलन के उद्भव और विकास की प्रक्रिया और उसका चरित्र भी इन देशों के इतिहास की उपरोक्त विशिष्टता से ही निर्धारितहुआ ।

एशिया और लातिन अमेरिका के देशों में पुनर्जागरण या प्रबोधन जैसी प्रक्रिया घटित न होने के कारण इन देशों के सामाजिक जीवन एवं मूल्यों में जनवादी मूल्यों-मान्यताओं की व्याप्ति अत्यंत कम थी और नारी समुदाय उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में भी मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था और मूल्यों-मान्यताओं के बंधन में जकड़ा रहा । काफी हद तक यह स्थिति आज भी बनी हुई है । फिर भी उन्नीसवीं शताब्दी में नारी मुक्ति की जो चेतना तीसरी दुनिया के देशों के नारी समुदाय में संचरित हुई, उसकी प्रक्रिया राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के दौर में शुरू हुई ।

अधिकांश लातिन अमेरिका देशों (जैसे मैक्सिको, क्यूबा, ब्राज़ील, हैती, निकारागुआ आदि ) में स्पेनी उपनिवेशवादियों के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी में हो चुकी थी । उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में लातिन अमेरिका देशों में स्त्रियों के संगठनों के बनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, हालाँकि यह मध्यवर्गीय शिक्षित मिश्रित आबादी से नीचे मूल इंडियन आबादी तक नहीं पहुँच पाई थी और इन संगठनों की प्रकृति सारत: बुर्जुआ नारीवादी थी । बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में मैक्सिको और ब्राज़ील की अधूरी राष्ट्रीय जनवादी क्रांतियों और क्यूबा, निकारागुआ आदि देशों में उग्र रूप से जारी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों ने पूरे लातिन अमेरिका में नारी मुक्ति आन्दोलन को भी नया संवेग प्रदान किया । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत सारे लातिन अमेरिकी देशों में कम्युनिस्ट संगठनों के बनने की प्रक्रिया भी दूसरे इंटरनेशनल के काल में ही शुरू हो चुकी थी और इस शताब्दी के तीसरे दशक तक अधिकांश देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थापना हो चुकी थी । सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों और क्रांतिकारी मध्यमवर्ग के क्रांतिकारी संघर्षों की लंबी परम्परा ने भी लातिन अमेरिकी देशों में स्त्रियों की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति और उनके आन्दोलन पर विशेष प्रभाव डाला । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिकी नवउपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्षों का जो नया चक्र लातिनी देशों में शुरू हुआ, उसने आम मध्यवर्गीय और कामगार स्त्रियों को भी और काफी हद तक मूल आबादी की स्त्रियों को भी संघर्ष की मुख्य धारा से जोड़ने के साथ ही स्त्री-मुक्ति की धारा से भी जोड़ने में कामयाबी हासिल की ।

ख्रुश्चेवी लहर से लेकर गोर्बचोवी लहर तक के प्रतिकूल प्रभाव लातिन अमेरिकी जनता के मुक्ति-संघर्षों पर भी पड़े और मुख्यत: संशोधनवादी प्रभाव के चलते आज इन देशों के कई छापामार मुक्ति संघर्षों का (जैसे, अलसल्वाडोर, कोलम्बिया आदि में ) विघटन हो चूका है । कई सारी क्रांतियाँ (जैसे क्यूबा, निकारागुआ आदि ) अपने मध्यवर्गीय नेतृत्व के चरित्र के अनुरूप अपने अधूरे कार्यभारों को पूरा करने के बाद या तो विफिल हो चुकी हैं या विपथगमन कर चुकी हैं । इस स्थिति का प्रतिकूल प्रभाव वहाँ के नारी आन्दोलन पर भी पड़ा है । लेकिन आज फिर पेरू में वहाँ की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में वहाँ की स्त्रियाँ छापामार सेना और जनकार्रवाइयों में हिस्सा ले रही हैं, आधार इलाकों में लोक कमेटियों में शामिल होकर राजनीतिक कार्यों में, सामाजिक गतिविधियों में तथा सामाजिक उत्पादन में बराबरी की हिस्सेदारी कर रही हैं और साथ ही उन्होंने क्रांतिकारी जनसंगठनों के रूप में अपने संगठन बनाये हैं ।

काले अफ़्रीकी देशों में स्त्रियों ने वर्गीय समाज की गुलामी से औपनिवेशिक काल में ही पहली बार साक्षात्कार किया । दास समाज और सामंती समाज की पितृसत्तात्मक गुलामी के लंबे अतीत और सामन्ती पार्थक्य से वंचित रहने के कारण, पचास और साठ के दशक में राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों के विस्फोट के साथ ही स्त्रियों की भारी आबादी उनमें शामिल हुई । नवस्वाधीन अफ़्रीकी देशों की स्त्रियों ने अपने लिए महत्वपूर्ण जनवादी अधिकार अर्जित किये । पर अब इन देशों का विकास गतिरुद्ध हो चुका है और केवल विश्व पूंजीवाद से निर्णायक विच्छेद करके, नई सर्वहारा क्रांतियाँ ही पुन: इन्हें प्रगतिपथ पर आगे बढ़ा सकती हैं । आज अफ़्रीकी देशों में भी पूंजी की सत्ता और यौन-असमानता की शिकार नारी समुदाय के नये आन्दोलन और स्वतंत्र संगठनों के गठन का वस्तुगत आधार तैयार है, पर उनका भविष्य क्रांतियों के नये चक्र की शुरुआत के साथ जुडा हुआ है ।

तुर्की, ईरान और मिस्र में नारी आन्दोलन की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में राष्ट्रीय जनवाद के लिए संघर्ष शुरू होने के साथ ही हो चुकी थी और स्त्रियों ने वहाँ लंबे संघर्ष के दौरान कई जनवादी अधिकार प्राप्त किये, पर फ़िलहाल वहाँ भी नारी मुक्ति-संघर्ष आज ठहराव और गतिरोध का शिकार है । सीरिया और इराक में भी सामाजिक-राजनीतिक जीवन में स्त्रियों ने कुछ महत्वपूर्ण अधिकार अर्जित कर लिए हैं, पर वर्तमान गतिरोध आज वहाँ की भी सच्चाई है । अरब अफ़्रीकी और पश्चिमी एशिया के अन्य अधिकांश मुस्लिम देशों में स्त्रियाँ आज भी अपने सामाजिक अधिकारों से वंचित पूरी तरह मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक गुलामी और सामन्ती पार्थक्य का शिकार बनी हुई हैं । साम्राज्यवादियों के टट्टू प्रतिक्रियावादी शेखों और शाहों के विरुद्ध जब तक इन देशों में जनक्रांतियाँ आगे कदम नहीं बढ़ाएंगी, तब तक नारी मुक्ति आन्दोलन की प्रक्रिया वहाँ संवेग नहीं ग्रहण कर सकती ।

एशिया के अन्य देशों में चीन और वियतनाम, कोरिया आदि जिन देशों में साम्राज्यवाद-सामन्तवाद विरोधी संघर्ष का नेतृत्व सर्वहारा वर्ग ने किया और जहाँ कुछ दशकों के लिए भी सर्वहारा सत्ता कायम रह सकी, उन देशों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के बावजूद आज भी स्त्रियों की सभी उपलब्धियां खोई नहीं हैं । आज भी अन्य एशियाई देशों की तुलना में स्त्रियों की इन देशों में वास्तव में अधिक सामाजिक-राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं, यद्यपि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष यह है कि चीन, वियतनाम आदि देशों में आज पूंजीवाद की लहर ने न केवल उन्हें निकृष्टतम कोटि का उजरती मजदूर बना दिया है और न केवल उनके अधिकारों में कटौतियां की जा रही हैं, बल्कि अब इन देशों में नारी-विरोधी अपराधों की भी भरमार हो गई है ।

भारत और एशिया के अन्य कई देशों में यद्यपि नारी मुक्ति-आन्दोलन की शुरुआत उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही हो चुकी थी, पर राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व के समझौतापरस्त चरित्र के कारण इन देशों में जीवन के अन्य क्षेत्रों की ही भांति नारी अधिकार आन्दोलन के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी जनवादी मूल्यों की लड़ाई क्रांतिकारी और व्यापक पैमाने पर नहीं लड़ी गई । मध्यवर्गीय क्रांतिकारी आन्दोलन और सर्वहारा आन्दोलन की धाराएं अपनी जिन अन्तर्निहित कमजोरियों के कारण राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व बुर्जुआ वर्ग के हाथों से नहीं छीन सकीं, उन्हीं कारणों से वे नारी आन्दोलन को भी एक क्रांतिकारी दिशा और संवेग नहीं दे सकीं । लंबे संघर्षों और निरंतरता के बावजूद भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों की स्त्रियों ने जो भी सामाजिक-राजनीतिक अधिकार अर्जित किये, वे बहुत कम थे । यही नहीं, कानूनी और संवैधानिक तौर पर उन्हें समानता के जो अधिकार मिले भी हैं, वे समाजी जीवन में व्याप्त निरंकुश स्वेच्छाचारिता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक मूल्यों के कारण मूलत: और मुख्यत: निष्प्रभावी बने हुए हैं ।

राष्ट्रीय आन्दोलन के समझौतापरस्त बुर्जुआ नेतृत्व तथा राष्ट्रीय जनवाद के कार्यभारों के अधूरे और गैरक्रांतिकारी ढंग से पूरा होने के कारण ही भारत, नेपाल आदि पिछड़े देशों में औरतों की गुलामी आज भी अधिक गहरी, व्यापक, निरंकुश और संगठित रूप में कायम है । सीमित हद तक शिक्षा और जनवादी चेतना के प्रसार के बावजूद बहुसंख्यक नारी आबादी आज भी बर्बर निरंकुश दासता और मध्ययुगीन पितृसत्तात्मकता के मूल्यों से जकड़ी हुई है, भयानक अमानवीय पार्थक्य ( Segregation ) की शिकार है और साथ ही पूंजी की सत्ता की उजरती गुलामी के रथ में भी जोत दी गई है । आधी आबादी की अपार क्रांतिकारी सम्भावना सम्पन्न जनशक्ति को निर्बंध क्रांतिकारी चेतना से लैस करना, क्रांतिकारी नारी आन्दोलन को नये सिरे से खड़ा करना और साथ ही सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के हर मोर्चे पर योद्धाओं की कतारों में स्त्रियों को ला खड़ा करना इन सभी देशों में क्रांतियों का एक अत्यंत कठिन लेकिन अनिवार्यत; आवश्यक कार्यभार है ।

तीसरी दुनिया के इन सभी देशों में साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के विरुद्ध तथा राष्ट्रीय जनवादी क्रांति के छूटे हुए कार्यभारों को पूरा करने के लिए सर्वहारा क्रांतियों का जो नया चक्र शुरू होगा, अब नारी मुक्ति आन्दोलन का भविष्य भी उसी के साथ द्वंदात्मक रूप से जुडा हुआ है ।

7. नारी मुक्ति, समाजवाद और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति

अक्टूबर क्रान्ति के बाद मानव इतिहास में पहली बार कोई ऐसी राज्यसत्ता अस्तित्व में आयी, जिसने औरतों को हर मायने में सामान अधिकार दिए, समान सुविधाओं के अतिरिक्त हर क्षेत्र में समान काम के अवसर, समान काम के लिए समान वेतन, समान सामजिक राजनीतिक अधिकार, विवाह और तलाक के सम्बन्ध में बराबर अधिकार, अतीत में वेश्यावृत्ति जैसे पेशों के लिए विवश औरतों का सामजिक पुनर्वास आदि अनेकों कदम उठाकर रूस की समाजवादी सरकार नें निस्संदेह एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक काम किया । समाजवादी निर्माण के पूरे दौर में, नारी मुक्ति के क्षेत्र की उपलब्धियां भी अभूतपूर्व थीं । पिछड़े हुए रूसी समाज में क्रान्ति के बाद के चार दशकों में उत्पादन, सामजिक-राजनीतिक कार्रवाईयों , सामरिक मोर्चे और बौद्धिक गतिविधियों के दायरे में जितनी तेजी से औरतों की हिस्सेदारी बढ़ी, वह रफ़्तार जनवादी क्रांतियों के बाद यूरोप-अमेरिका के देशों में पूरी दो शताब्दियों के दौरान कभी नहीं रही थी । चंद-एक दशकों में ही सोवियत समाज से यौन अपराध और यौन रोगों का पूर्ण उच्छेदन हो गया, इस तथ्य को पश्चिम का मीडिया भी स्वीकार करता था । खेतों कारखानों में उत्पादन के मोर्चे पर ही नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध के मोर्चे पर भी लाखों सोवियत वीरांगनाओं नें जिस शौर्य और साहस का परिचय दिया था, उसने काफी हद तक इस सच्चाई को सत्यापित कर दिया कि नारी समुदाय की सीमा सिर्फ यही है कि उसे समाज में पुरुषों के साथ बराबरी की स्थिति, अवसर और परिवेश नहीं प्राप्त है ।

लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि समाजवादी समाज में नारी समुदाय यौन-शोषण-उत्पीड़न से तथा आर्थिक शोषण से पूरी तरह मुक्त हो चुका होता है और पूर्ण समता की स्थिति कायम हो गयी होती है । ऐसा न तो कभी हुआ था और न ही ऐसा हो पाना संभव ही है । इस मुद्दे पर स्पष्टता के लिए जरूरी है कि पहले समाजवाद की अंतर्रचना को ही भली-भाँती समझ लिया जाये ।

समाजवाद एक स्थायी सामाजिक आर्थिक संरचना नहीं है । यह पूँजीवाद और वर्गविहीन समाज के बीच का एक लम्बा संक्रमणकाल है । इस दौर में छोटे पैमाने का पूंजीवादी उत्पादन लम्बे समय तक बना रहता है, बाजार के नियम काम कार्य रहते हैं, माल-अर्थव्यवस्था भी मौजूद रहती है और इनके आधार पर पूंजीवादी मूल्य-मान्यताएं-संस्कृति रोज-रोज, हर क्षण पैदा होती रहती हैं, पूंजीवादी राज्यतंत्र के नाश के बाद भी पुराने समाज की वैचारिक-सामजिक-सांस्कृतिक अधिरचनाएं लगातार मौजूद रहती हैं और समाजवाद के विरूद्ध, एवं उसे ख़त्म कर देने के लिए लगातार एक भौतिक शक्ति का काम करती रहती हैं । वर्ग संघर्ष जारी रहता है और उत्तरोत्तर तीखा होता जाता है । सर्वहारा का राज्य और सर्वहारा की पार्टी लगातार पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली और मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के विरूद्ध कारगर ढंग से संघर्ष को जारी रखते हुए ही समाजवादी समाज को उस मंजिल तक पंहुचा सकती हैं, जहां वस्तु का बाजार मूल्य पूर्णतः समाप्त हो जाता है और मात्र उपयोग-मूल्य एवं प्रभाव मूल्य का ही अस्तित्व रह जाता है । केवल इसी मंजिल पर पहुंचकर समाज में हर तरह की असमानता समाप्त हो सकती है और नारी समुदाय भी तभी पूर्ण समता और स्वतंत्रता की स्थिति प्राप्त कर सकता है । लेकिन यह मार्ग अनेकों आरोहों-अवरोहों, जय-पराजयों और मोड़ों-घुमावों से भरा हुआ होता है तथा बहुत लम्बा होता है ।

रूस और चीन के समाज ने समाजवादी क्रान्ति और निर्माण के दौर में विकास के अभूतपूर्व लम्बे डग भरे और सामजिक न्याय और समता के अपूर्व कीर्तिमान स्थापित किये, लेकिन वे पूर्ण समता और पूर्ण न्याय से युक्त समाज नहीं थे । संवैधानिक स्तर पर औरत को सभी अधिकार मिल चुके थे, लेकिन सामजिक पारिवारिक स्तर पर यह स्थिति नहीं थी । ऐसा समझना एक वैधिक विभ्रम(Juridical Illusion) होगा । उत्पादन के तंत्र पर पूर्ण सामाजिक स्वामित्व के बगैर यह संभव नहीं था और इसके लिए अधिरचना के धरातल पर सतत क्रांतियों की भी अपरिहार्य आबश्यकता थी ।

समाजवाद की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के बावजूद स्तालिनकालीन रूस में ऐसा न हो सका, जो कालान्तार में समाजवाद के ठहराव और अन्ततोगत्वा पराजय का कारण बना । स्तालिन की सर्वाधिक गंभीर गलती उनकी यह दार्शनिक भूल थी कि वे समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के अस्तित्व को और उसकी निरंतरता को वास्तविक रूप में पहचान नहीं सके । यह काम सर्वप्रथम माओ-त्से-तुंग ने किया । सोवियत संघ में समाजवाद की उपलब्धियों और पराजय की शिक्षाओं का तथा चीन में समाजवादी प्रयोगों का सार संकलन करते हुए माओ ने पहली बार समाजवादी समाज में वर्ग-संघर्ष के नियमों को स्पष्टतः निरूपित किया और सर्वहारा के अधिनायकत्व के अंतर्गत वर्ग संघर्ष को जारी रखने के सिद्धांत और पद्धति का प्रतिपादन किया । पहले यह उल्लेख किया जा चुका है कि मार्क्सवाद के विकास की परम्परा में उत्पादक शक्तियों के विकास पर अधिक जोर देने की यांत्रिकता शुरू से ही मौजूद थी और मूलाधार एवं अधिरचना के द्वंद्वात्मक संबंधों की समझ काफी हद तक अस्पष्ट थी । सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की सैद्धांतिक पार्श्वभूमि की सर्जना करते हुए माओ त्से तुंग ने पहली बार इनका स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत किया और मूलाधार के रूपांतरण को जारी रखने के लिए तथा पूंजीवादी पुनर्स्थापना के सभी भौतिक आधारों को नष्ट करने के लिए अधिरचना के निरंतर क्रान्तिकारीकरण या अधिरचना में सतत क्रान्ति की अवधारणा प्रस्तुत की । पहली बार यह स्पष्ट हुआ कि समाजवादी संक्रमण के दौरान पूंजीवादी उत्पादन के छोटे से छोटे रूप की समाप्ति की लम्बी प्रक्रिया के साथ ही उसकी अनिवार्य पूर्वशर्त एवं समांतर प्रक्रिया के रूप में तथा ज्यादा महत्व देकर कला-साहित्य-संस्कृति, शिक्षा एवं सामाजिक मूल्यों-मान्यताओं-संस्थाओं के प्रत्येक दायरे में अनवरत क्रान्ति की प्रक्रिया को जारी रखे बगैर समाज की विषमताओं एवं उत्पीड़न के विविध सूक्षम एवं स्थूल रूपों को कदापि समाप्त नहीं किया जा सकता । नारी-पुरूष असमानता, नारी उत्पीड़न पर आधारित पारिवारिक ढांचा एवं वैवाहिक सम्बन्ध, पुरूष-स्वामित्ववादी मानसिकता आदि ऐसी ही सामाजिक संस्थाएं और मूल्य मान्यताएं हैं, जिन्हें समाजवादी समाज के भीतर अनवरत सांस्कृतिक क्रांतियों से गुजरने के बाद ही, क्रमशः निर्मूल किया जा सकेगा । यह सच्चाई केवल समाजवादी समाज के लिए ही लागू नहीं होती है, बल्कि आज भी नारी मुक्ति आन्दोलन के मार्क्सवादी समर्थकों के भीतर मौजूद तमाम यांत्रिक धारणाओं, अर्थवादी भटकावों और भ्रांतियों से मुक्ति के लिए सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की इस दार्शनिक अंतर्वस्तु को जानना समझना जरूरी है ।

मूलाधार और अधिरचना के द्वंदात्मक संबंधों के, सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति द्वारा प्रस्तुत निरूपण, अधिरचना में क्रान्ति की अपरिहार्यता पर उसके जोर और सर्वहारा अधिनायक्तव के अंतर्गत सतत क्रान्ति की उसकी अवधारणा की सम्यक समझदारी के आधार पर ही आज नारी मुक्ति की दिशा से सम्बंधित निम्नलिखित प्रश्नों को भलीभांति समझा जा सकता है ।

1. नारी-उत्पीडन के बुनियादी कारण आर्थिक होंने के बावजूद आर्थिक प्रश्नों के अतिरिक्त सामाजिक- सांस्कृतिक धरातल पर भी स्त्रियों को संगठित होकर संघर्ष करना जरूरी है और पुरूष्सत्तात्मक व्यवस्था की मान्यताओं-संस्थाओं से सघर्ष एक दीर्घकालिक संघर्ष है ।

2. समाजवादी संक्रमण के अंतर्गत भी एक लम्बे समय के संघर्ष के बाद ही स्त्रियों की पूर्ण मुक्ति संभव है और यह कि यह प्रश्न समाजवाद की विजय-पराजय के साथ जुड़ा हुआ है ।

3. नारी मोर्चे पर कामगार स्त्रियों के संगठनों के अतिरिक्त और सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष मोर्चात्मक(Frontal) संगठनों के अतिरिक्त संयुक्त मोर्चे के स्वरूप वाले ऐसे नारी संगठनों की अपरिहार्य आवश्यकता है, जिनमें मध्यमवर्ग सहित जनता के सभी वर्गों की स्त्रियाँ पुरूष उत्पीडन के सर्वतोमुखी विरोध और अपने सामजिक-राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष के एक कार्यक्रम के आधार पर संगठित हों, ऐसे नारी संगठन सर्वहारा पार्टी के प्रत्यक्ष नेतृत्व में न होकर सांगठनिक तौर पर, स्वतन्त्र स्वायत्त हों और पार्टी अपनी नीतियों से उन्हें प्रभावित करके, उनके भीतर काम करते हुए उन्हें दिशा देने का प्रयास करे ।

4. स्त्रियों की सहस्त्राब्दियों पुरानी मानसिक गुलामी को नष्ट करने के लिए नारी संगठनों की पहलकदमी, निर्णय लेने की आजादी और सापेक्षिक स्वायत्तता को बढाने के साथ ही, सर्वहारा वर्ग की पार्टी के लिए यह भी जरूरी है की राजनितिक-सांस्कृतिक शिक्षा और आन्दोलन के विशेष प्रयासों से पार्टी-कतारों में स्त्रियों की भरती की प्रक्रिया तेज की जाये और साथ की संघर्ष के हर मोर्चे पर — सभी तरह के जनसंगठनों में स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी बढाई जाये और उनकी पहलकदमी को निरुत्साहित करने की पुरूष-स्वामित्ववादी प्रवृत्तियों के विरूद्ध सतत संघर्ष किया जाये ।

5.पुरूषों की प्रत्यक्ष-परोक्ष चौधराहट(जो हर स्तर पर बुर्जुआ तत्वों को बल प्रदान करती है) से सामाजिक सक्रियता के हर दायरे में औरतों के लिए बच पाना अत्यंत कठिन है और पुराने मूल्यों के पूर्ण उच्छेदन तक यह समस्या समाजवाद की अवधि में भी बनी रहेगी । इससे यह स्पष्ट है कि जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता और स्वतन्त्र पहचान के लिए संघर्ष का प्रश्न दूरगामी और ऐतिहासिक महत्त्व रखता है । इसे एक बुर्जुआ दृष्टिकोण कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । इस प्रश्न को भी नारी आन्दोलन के एजेंडे पर अलग से रेखांकित करके शामिल करना अनिवार्य है ।

पूर्वी यूरोप और भूतपूर्व सोवियत संघ में 1956 में और चीन में 1976 में पूंजीवादी पुनर्स्थापना होने के बाद से लेकर अब तक के काल में, इन देशों में लोभ लालच , प्रतियोगिता, अपराध, भ्रष्टाचार, लूटमार और असमानता की नैतिक स्वीकृति से युक्त एक नग्न उपभोक्ता संस्कृति अस्तित्व में आई है । जाहिरा तौर पर इसका सर्वाधिक शिकार प्रत्यक्ष उत्पादक और स्त्री समुदाय ही हुआ है । इन सभी देशों में इधर नए सिरे से बलात्कार, स्त्री-भ्रूण ह्त्या, पत्नि उत्पीडन आदि नारी विरोधी अपराधों का ग्राफ काफी तेजी से ऊपर गया जो समाजवाद के कुछ दशकों के भीतर पूरी तरह समाप्त हो चुके थे । अब विगत कुछ वर्षों के भीतर रूस और पूर्वी यूरोप में खुले निजी इजारेदार पूँजीवाद के आने के बाद यह प्रक्रिया और अधिक तेज हो गयी है, इस तथ्य को बुर्जुआ मीडिया भी स्वीकार कर रहा है । वेश्यावृत्ति, कालगर्ल आदि के पेशों और कैबरे नृत्य, अश्लील पत्रिकाओं आदि की बाढ़ आ गयी है, 1956 के पहले के सोवियत संघ और 1976 के पहले के चीन में जिन यौन रोगों के पूर्ण उन्मूलन के तथ्य को पश्चिम भी स्वीकार करता था, अब उनके इलाज के लिए अस्पताल खोले जा रहे है । चीन में लड़कियों की भ्रूण हत्या, अपहरण करके बलात विवाह और दहेज़ सरकार की चिंता के विषय बन चुके है । फिल्मों और साहित्य में नारी छवि की यौन-उत्पीड़क प्रस्तुति, मॉडलिंग जैसे पेशों के जरिये यौन-शोषण, नग्नतावाद, हर तरह के नारी स्वातंत्र्य विरोधी मूल्य और पुरूष स्वामित्व की मानसिकता तेजी से फलफूल रही है । उत्पादन के क्षेत्र में पुरूष व स्त्री के कामों की प्रकृति में भेद करके नारी श्रम को ज्यादा से ज्यादा सस्ता बनाया जा रहा है, उन्हें तथाकथित “हलके”, ‘स्त्रियोचित”, उबाऊ, श्रमसाध्य कामों में लगाया जा रहा है और “गृहिणी” के दायित्व से बाँधा जा रहा है । समाजवाद के अंतर्गत शिक्षा और सामाजिक उत्पादन में स्त्रियों-पुरूषों की भागीदारी में स्त्रियों का अनुपात लगारार बढ़ा था, जो अब तेजी से घटता जा रहा है । स्मरणीय है कि येल्त्सिन के आने से पूर्व गोर्बाचोव ने ही, जो”मानवीय चेहरे वाले समाज ” की बातें किया करता था, लगभग दो सौ तरह के कामों में स्त्रियों की भागीदारी पर रोक लगा दी थी ताकि वे श्रम से थके पतियों की देखभाल और “समाजवाद के नौनिहालों’ के लालन-पालन पर उचित ध्यान दे सकें ।

और यह सब कुछ सर्वथा स्वाभाविक है । अर्थतंत्र का विकास पूंजीवादी दिशा में हो, राज्यसत्ता पर बुर्जुआ वर्ग काबिज हो और पूरे समाज की अधिरचना का समाजवादी रूपांतरण जारी रहे — यह असंभव है । जैसाकि पहले उल्लेख किया जा चुका है, समाजवाद नारी -समस्या का समाधान नहीं बल्कि समाधान की शुरुआत है । स्त्री की असमानतापूर्ण स्थिति और उसके शोषण के विविध रूप समाजवादी संक्रमण के दौरान भी मौजूद रहेंगे, पर वे क्रमशः क्षरण और विलोपन की दिशा में अग्रसर होंगे । और यह प्रक्रिया स्वतः नहीं होगी, अधिरचना में अनवरत क्रान्ति के जरिए– सतत सांस्कृतिक क्रान्ति के जरिए होगी । पूंजीवादी पुनर्स्थापना की यह तार्किक परिणति है कि औरत फिर से दोयम दर्जे की नागरिक, सबसे निचले दर्जे की उजरती मजदूर और एक उपभोक्ता सामग्री या पण्य वस्तु में तब्दील का दी जाये । रूस, पूर्वी यूरोप और चीन में यही हुआ है ।

हमारी उपरोक्त बातों का यह मतलब कतई नहीं है कि मार्क्सवाद के सूत्रों में नारी मुक्ति के प्रश्न का कोई शाश्वत समाधान या आज की स्थिति का कोई किया-कराया विश्लेषण रखा हुआ है । यह मार्क्सवाद की एक प्रस्तरीकृत रूढ़ समझ ही हो सकती है । अपनी द्वंद्वात्मक पद्धति और भौतिकवादी दृष्टिकोण पर आधारित ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर मार्क्सवाद ने पहली बार नारी प्रश्न को विश्व-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अवस्थित करके देखा, पूरे सामजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक तंत्र से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल की, वर्गीय उत्पीड़न से नारी उत्पीड़न के अन्तर्सम्बन्धों को स्पष्ट किया और इसे सामजिक क्रान्ति का एक अनिवार्य अंग बताया । महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति तक के प्रयोगों नें इस समझ को ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट किया और नारी मुक्ति के लम्बे संघर्ष की दीर्घकालिक अवधि के लिए सांस्कृतिक क्रान्ति नें आम दिशा (General Line) की एक रूपरेखा प्रस्तुत की । अब शेष काम उन्हें पूरा करना होगा जो इस मोर्चे पर काम कर रहे हैं । अभी तक असमाधानित समस्याओं का हल ढूँढने के साथ ही, आज के युग ने जो सर्वथा नयी समस्यायें पैदा की हैं, उनपर भी वे ही लोग सोचेंगे जो इनके रूबरू खड़े हैं ।

8. द्वितीय विश्वयुद्धोतर काल : नारीवाद की नयी लहर

साठ के दशक में जो नारीवादी आन्दोलन पहले अमेरिका और फिर पूरे पश्चिमी जगत में फूट पड़ा, वह सारतः नारी उत्पीडन के विरूद्ध एक अन्धविद्रोह था । उसकी कई शाखाएं और उपशाखाएँ आगे चलकर फलीं-फूलीं, लेकिन उनके पास न तो नारी-समस्या के सभी पहलुओं की कोई इतिहाससम्मत तर्कपरक व्याख्या थी और न ही दूरगामी सामाजिक संघर्ष के रूप में नारी मुक्ति के सघर्ष को आगे ले जाने का कोई ठोस कार्यक्रम ।

वैसे आधुनिक नारीवाद के सिद्धांत का पहला मील का पत्थर पहली बार 1946 में फ्रांसीसी में और 1953 में अंग्रेजी में प्रकाशित सिमोन द बोउवा (Simone de Beauvoir ) की कृति “द सेकेण्ड सेक्स” था, जिसमें व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण और नारी आन्दोलन की एक स्पष्ट दिशा के अभाव के बावजूद नारी उत्पीड़न के कई सूक्ष्म पहलुओं को रेखांकित किया गया था और यह प्रस्थापना दी गयी थी कि स्त्रियों की मुक्ति में ही पुरूषों की भी मुक्ति है जो स्वयं पुरूष स्वामित्व की मानवद्रोही मानसिकता के दास हैं । साठ के दशक के नारीवादी आन्दोलन की चेतना इस विचार से काफी प्रभावित थी । ऐसी दूसरी प्रसिद्ध कृति सुप्रसिद्ध नारीवादी नेता और 1966 में राष्ट्रीय नारी संगठन (अमेरिका) का गठन करने वाली बेट्टी फ्रीडन(Betty Friedan) की 1963 में प्रकाशित पुस्तक द फेमिनिन मिस्टिक(The Feminine Mystique) थी जिसमें स्त्रियों की घरेलू दासता और पुरूष-स्वामित्व को स्वीकार करने के लिए उनके दिमाग के ‘कंडीशनिंग’ की प्रक्रिया की उग्र लेकिन एकांगी एवं अनैतिहासिक आलोचना की गयी थी ।

साठ का दशक आधुनिक इतिहास के द्वित्तीय विश्वयुद्धोतर काल का एक महत्वपूरण मोड़ बिंदु था । विश्व पूंजीवादी तंत्र के सरदार उस समय गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे । तीस के दशक की मंदी के बाद अमेरिका तक में एक बार फिर बेरोजगारी पैदा हो रही थी और युवा असंतोष तीखा हो रहा था । पूरी दुनिया में जारी मुक्ति-युद्धों की लगातार सफलता साम्राज्यवाद के लिए एक गंभीर संकट को जन्म दे रही थी । वियतनाम में अमेरिका की पराजय निश्चितप्राय प्रतीत होने लगी थी । इसी सामाजिक उथल-पुथल के दौर में अमेरिका में अश्वेत आबादी का आन्दोलन नयी शक्ति के साथ फूट पड़ा था । मैकार्थीवाद और शीतयुद्ध के दौरान संचित जनता का आक्रोश सड़कों पर आ गया था । 1968 में हिन्दचीन में अमेरिकी हस्तक्षेप के विरूद्ध छात्रों-नौजवानों और फिर व्यापक अमेरिकी जनता का आन्दोलन उठ खड़ा हुआ था जो नागरिक अधिकारों के आन्दोलन के साथ जुड़कर व्यवस्था के लिए संकट बन गया था । इसी समय फ्रांस में छात्रों का आन्दोलन एक ज्वार की भांति उठ खड़ा हुआ जिसमें बाद में मजदूर भी शामिल हो गए और अन्ततोगत्वा लौह पुरूष कहलाने वाले दगाल को राष्ट्रीय सभा भंग करने व इस्तीफ़ा देने के लिए विवश होना पड़ा । पूरा पश्चिमी जगत एक संकट और उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था । पश्चिमी नारी समुदाय भी इस उथल-पुथल से अछूता नहीं था बल्कि उसमें बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहा था । सच तो यह है कि यूरोप-अमेरिका में जनांदोलनों में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर स्त्रियाँ हिस्सा ले रहीं थीं । उत्पादन के अतिरिक्त सामाजिक सक्रियता के दायरे में इस बढती हुई शिरकत ने पश्चिम की नारियों — विशेषकर उनके युवा हिस्से की चेतना का धरातल नयी ऊंचाईयों तक उन्नत किया और दोयम दर्जे की नागरिकता एवं हर तरह के यौन-भेद के विरूद्ध स्त्रियों का प्रबल स्वतः स्फूर्त विद्रोह उठ खड़ा हुआ ।

साठ के दशक का पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन नारी शोषण के विरुद्ध एक बगावती उभार था । इस आन्दोलन में विविध चिन्तनों की मौजूदगी के बावजूद, इसकी कोई सुविचारित वैचारिक पूर्वपीठिका, दिशा और कार्यक्रम नहीं था । द्वित्तीय विश्वयुद्धोत्तर पश्चिमी उपभोक्ता संस्कृति की प्रतिक्रिया में पैदा हुई यह एक बगावत थी । पर विडंबना यह थी कि स्वयं इसकी दार्शनिक अंतर्वस्तु भी बुर्जुआ थी, जिसके चलते जल्दी ही आन्दोलन की मुख्यधारा ने विकृत उच्छ्रंखल बुर्जुआ संस्कृति के नैतिक-सामाजिक मूल्यों को अपना लिया । इस अंध-विद्रोह ने यौन-शोषण और यौन-उत्पीड़न पर खड़ी सामाजिक संस्थाओं की जगह मूल्य-संस्थाओं की कोई समग्र वैकल्पिक व्यवस्था नहीं प्रस्तुत की । विवाह, परिवार, एकल यौन-संबधों आदि को अराजकतावादी ढंग से नकारने की चेष्टा की गयी । पूर लड़ाई को पुरूष सत्ता के विरूद्ध केन्द्रित किया गया और इस सत्ता के ऐतिहासिक-सामाजिक-आर्थिक आधारों को जानने समझने की कोई विशेष चेष्टा नहीं की गयी । जाहिरा तौर पर ऐसा कोई आन्दोलन समाज में लम्बे समय तक टिका नहीं रह सकता और यही हुआ ।

पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन का सामाजिक विद्रोही तत्व धीरे धीरे क्षरित होता गया और आठवें दशक के मध्य तक यह एक बहुत छोटे से हिस्से, बुद्धिजीवी और युवा नारियों तक ही सिमट कर रह गया । यौन-भेद में ही सभी असमानताओं का कारण ढूँढने वाली बुर्जुआ अराजकतावादी स्त्रियाँ और संस्थाएं पूरी सच्चाई को ही सिर के बल खड़ा करती रहीं और अन्ततोगत्वा व्यवस्था को ही लाभ पहुंचाने का काम करती रहीं । पश्चिम के जिन नारीवादी विचारकों ने सातवें-आठवें दशक में कई पुस्तकें लिखीं , उनमे से किसी ने विश्लेषण का कोई समग्र, इतिहाससंगत नमूना प्रस्तुत नहीं किया । लेकिन यह जरूर है कि औरत की अपनी स्वतन्त्र अस्मिता के प्रश्न को, समाज में उसकी अपनी स्वतन्त्र पहचान के प्रश्न को पश्चिमी नारीवादी आन्दोलन ने चिन्ता और गाम्भीर्य के साथ उठाया और इतिहास के एजेंडा पर इसे महत्वपूर्ण स्थान दिलाया, भले ही उसने स्वयं इसका काल्पनिक अथवा अराजकतावादी समाधान प्रस्तुत किया हो । यही नहीं, गर्भपात, तलाक आदि मामलों को लेकर नारीवादी संगठनों ने जो मांगे उठाई और आन्दोलन चलाए, वे भी अत्यंन्त महत्वपूर्ण थे । नारीवादी आन्दोलन के दर्शन और इतिहासदृष्टि की अवैज्ञानिकता के बावजूद, इसके द्वारा उठाई गयी अधिकाँश मांगों और समस्यायों को एक सही सैद्धांतिक फ्रेमवर्क में अवस्थित करके एक क्रांतिकारी नारी आन्दोलन के कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है और उसके अनुभवों से काफी कुछ सीखा जा सकता है ।

9. और अंत में…

पश्चिम के पूंजीवादी समाज में, पुनर्जागरण-प्रबोधन-क्रान्ति (Renaissance-Elightenment-Revolution) की ऐतिहासिक विकास-यात्रा के परिणामस्वरूप वहां के समाज में पुरूष-स्वामित्व और वर्चस्व के रूप सूक्ष्म है. जनतांत्रिक मूल्य सामाजिक जीवन में इस हद तक रचे-बसे हैं कि वहां इनका नग्न रूप कायम नहीं रह सकता । वहां स्त्री के साथ यौन-आधार पर कायम सामाजिक असमानता और भेदभाव मुख्य प्रश्न हैं । यौन-उत्पीड़न के आम रूप अत्यंत सूक्षम हैं । नारी की अस्मिता का प्रश्न पश्चिम में प्रबल है । नारी आन्दोलन का प्रमुख सांस्कृतिक पक्ष वहां उपभोक्ता संस्कृति की विकृतियों के विरुद्ध जनमानस तैयार करने का है ।

तीसरी दुनिया के अधिकाँश पिछड़े हुए देशों में नारी उत्पीड़न के नए पूंजीवादी रूपों के साथ-साथ उसके मध्ययुगीन नग्न स्वेच्छाचारी रूप भी कायम हैं । इनमें से कुछ देशों में आज भी अर्द्धसामंती-अर्द्धऔपनिवेशिक तंत्र किसी-न-किसी रूप में कायम हैं और जिन देशों में साम्राज्यवाद पर आश्रित बुर्जुआ व्यवस्थाएं कायम हुई हैं, वे जनतांत्रिक मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं-संस्थाओं के मामले में पश्चिमी व्यवस्थाओं से बहुत पीछे हैं । भारत को उदाहरण के तौर पर लें । समाज विकास की मंथर गति तथा जनवादी क्रांतियों और तज्जन्य जनवादी मूल्यों के अभाव के चलते हमारे समाज में मूल्यों-मान्यताओं का प्राक्पूंजीवादी ढांचा अत्यंत धीमी गति से क्षरित होता हुआ आज भी कायम है और भारतीय पूंजीवाद नें इन्हें अपना लिया है । मनु के विधान यहाँ आज भी जिन्दा हैं । शिक्षा के प्रसार के बावजूद सामाजिक क्रियाकलापों से बहुसंख्यक नारी समुदाय, यहाँ तक कि उसका वह हिस्सा भी काफी हद तक कटा हुआ है जो सामाजिक उत्पादन में लगा हुआ है । मजदूर और गरीब किसान औरतें निकृष्टतम कोटि के उजरती गुलाम के रूप में ही सही, पर सामाजिक उत्पादन की कार्रवाई में हिस्सा लेती हैं, पर मध्यमवर्गीय औरतों , यहाँ तक तक कि शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक का बहुलांश चूल्हे- चौखट से पूरी तरह बंधा हुआ है और पति की सेवा, बच्चों का लालन-पालन और घरेलू उपयोग की चीजों के उत्पादन से अधिक कुछ नहीं करता । नौकरी करने वाली मध्यमवर्गीय स्त्रियां भी घरेलू गुलामी से मुक्त नहीं हैं । आज भी औरतों का पुरूषों से और पूरे समाज में जितना अमानवीय पार्थक्य (Segregation) भारत में है, उतना मध्य पूर्व के कुछ देशों को छोड़कर कहीं नहीं है । इस आधी आबादी को आर्थिक शोषण, लूटमार, मूल्यों-मान्यताओं-परम्पराओं की दिमागी गुलामी, यौन-उत्पीड़न, पुरूष-स्वामित्व, पार्थक्य (Segregation) और अलगाव (Alienation) से मुक्त करना भारत और ऐसे तमाम देशों की क्रांतियों का दायित्व ही नहीं, बल्कि उनकी लड़ाई का एक ऐसा जरूरी मोर्चा है, जिस पर लड़े बिना ये क्रांतियाँ सफल हो ही नहीं सकतीं ।

भारत जैसे देशों में नारी मुक्ति आन्दोलन को वैचारिक धरातल पर तमाम विजातीय बुर्जुआ विचारों से संघर्ष करते हुए सही वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि, इतिहास-दृष्टि, संस्कृति और दिशा से खुद को समृद्ध बनाना होगा । साथ ही साम्राज्यवाद से आयातित और देशी पूँजीवाद द्वारा पोषित बुर्जुआ नारीवाद के दर्शनं के समूल नाश के लिए समग्र जनमुक्ति एवं नारी-मुक्ति की जातीय, जन-परम्पराओं से खुद को वैचारिक-सांस्कृतिक स्तर पर अविच्छिन्न रूप से जोड़ना होगा ।

साम्राज्यवाद के वर्तमान नए दौर में यह बात अब दिन के उजाले की तरह साफ़ है कि बुर्जुआ व्यवस्था के दायरे के भीतर, सुधारों के दायरे के भीतर नारी मुक्ति के मोर्चे पर भी अब कुछ हासिल कर पाने की रत्ती भर भी गुंजाईश शेष नहीं है । उलटे, ढांचागत असाध्य संकट के दौर में — आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर में, पूरी दुनिया की पूंजीवादी व्यवस्थाएं अब ज्यादा से ज्यादा निरंकुश होते जाने की दिशा में अग्रसर हैं । ऐसे में अबतक के संघर्षों से अर्जित जनवादी अधिकारों की हिफाजत के लिए भी नारी समुदाय को राज्यसत्ता के विरूद्ध जुझारू लड़ाई लड़नी पड़ेगी । पहली बात तो यह है कि यह लड़ाई स्त्रियां तभी लड़ सकती हैं जब वे मजदूरों-किसानों के क्रांतिकारी संघर्षों में, लोक अधिकार आदोलनों में, क्रांतिकारी सांस्कृतिक आन्दोलनों में, क्रांतिकारी छात्र-युवा आन्दोलनों में पूरी भागीदारी करें । तभी वे आम जनता के पुरूष समुदाय को नयी चेतना देकर अपनी मुक्ति के लिए समर्थन हासिल कर सकेंगी और नारी मुक्ति के संघर्ष को स्त्री बनाम पुरूष का सघर्ष से बचाया जा सकेगा । दूसरी बात यह कि आज कामगार स्त्रियों के संगठन बनाने के अतिरिक्त जनमुक्ति संघर्ष के हिरावलों और अन्य क्रांतिकारी आन्दोलनों के नेतृत्व को मध्यमवर्गीय और जनता के सभी बर्गों की स्त्रियों को नारी उत्पीड़न और जनवादी अधिकारों के प्रश्न पर,व्यापक आधार वाले (वर्गीय संयुक्त मोर्चे की प्रकृति वाले) नारी संगठनों के बैनर तले संगठित करने की भी पहले से बहुत अधिक जरूरत है । साथ ही नारी मुक्ति के मुद्दे को उठाने वाले पहले से ही मौजूद ऐसे संगठनों को भी साथ लेने और उनमें शामिल होकर काम करने की संभावना मौजूद होने पर उनका उपयोग अवश्य ही किया जाना चाहिए । भारत जैसे देशों में स्त्रियों के जनवादी अधिकारों के लिए आंदोलनरत तमाम नारी संगठन महानगरों के शिक्षित मध्यमवर्गीय औरतों तक ही सिमटे हुए है । इनके साथ आम सहमती के कार्यक्रम पर सहमती के आधार पर काम किया जा सकता है और इनका विस्तार गावों-शहरों की आम स्त्रियों तक भी किया जा सकता है ।

तीसरी बात, यह कि जिस हद तक बुर्जुआ व्यवस्था और विश्वपूंजीवादी तंत्र की जरूरत है, उस हद तक सुधारपरक कार्रवाईयों के लिए आज बड़े पैमाने पर सरकारी आर्थिक मदद और तथाकथित स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिये आने वाली साम्राज्यवादी मदद के जरिये भारत जैसे देशों के कोने-कोने में तथाकथित स्त्री संगठन सुधार और आन्दोलन की कार्रवाईयों में लगे हैं । इनका मूल मकसद स्त्रियों को सुधार के दायरे में कैद करके उनकी तेजी से उन्नत होती चेतना को कुंद करना और उन्हें क्रान्ति की धारा में शामिल होने से रोकना है । स्त्री आन्दोलन के इन खतरनाक घुसपैठियों के विरुद्ध आज बड़े पैमाने पर प्रचार की और उनके प्रभाव को समाप्त करने की जरूरत है ।

इस सभी बातों और इनके सभी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही आज नारी मुक्ति आन्दोलन की आम दिशा और एक सुसंगत कार्यक्रम का निर्धारण किया जा सकता है ।

BACK TO POST [ १०-११ मार्च १९९२ को काठमांडू नेपाल में ‘अखिल नेपाल महिला संघ’ के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय भाषण के रूप में प्रस्तुत निबन्ध. नेपाली भाषा में पुस्तिकाकार प्रकाशित. ‘दायित्वबोध’, मार्च-जून, १९९३, जुलाई-अगस्त,१९९३ और नवंबर-दिसंबर, १९९३ अंकों में धारावाहिक प्रकाशित ]

डार्विन के जन्मदिन पर विशेष

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जीव विकास का सिद्धांत – डार्विन और वाद-विवाद

डॉ अमृत

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

डार्विन की उपलब्धियां

डार्विन के आलोचक

नव-डार्विनवाद

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

बीते वर्ष 2009 के 12 फरवरी के दिन, मानव  प्रकृति विज्ञानी चार्ल्स डार्विन का दो सौवां जनमदिन था और संयोगवश 150 साल पहले ही नवम्बर 1859 में ही मनुष्य की वैज्ञानिक समझ का एक  मील पत्थर चार्ल्स डार्विन द्वारा लिखित पुस्तक ‘ जीवों की उत्पत्ति’ छपी थी । इन दोनों ही ऐतिहासिक  दिनों की याद को समर्पित 2009 का वर्ष, डार्विन के सिद्धांत को आम लोगों में प्रचारित करने और इस पर हो रहे हमलों का जवाब देने के लिए पूरी दुनिया में मनाया गया । इन कार्यक्रमों की समाप्ति 12 फरवरी 2010 को होगी । इसके अलावा पिछले कुछ सालों में 12 फरवरी का दिन डार्विन दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है ।

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के शहर सर्युस्बरी में हुआ । उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे और दादा इरासमस डार्विन एक प्रकृति दार्शनिक, डॉक्टर और कवि थे । पिता की इच्छा थी कि डार्विन डॉक्टर बनें लेकिन उनकी रूचि प्रकृति विज्ञान में थी । 1828 में पिता ने डार्विन को पादरी बनाने के लिए क्राईस्ट कॉलेज, कैम्ब्रिज में दाखिल करवा दिया  । यहाँ उनका मेल वनस्पति विज्ञान के प्रोफैसर स्टीवन हैन्स्लो से हुआ और वहां काम करने लगे । डार्विन पहले ही लामारक के जीव विकास सम्बन्धी विचारों को पढ़ चुके थे और अब इनकी रूचि और भी बढ़ गयी । इसी दौरान वह प्रकृति का ध्यान से निरीक्षण करने में लग गये और कीड़े मकौड़े तथा पौधे एकत्रित करने में जुट गये । 1831 में उनकी पढाई पूरी हो गयी ।

इंग्लैण्ड में विभिन्न स्थानों पर प्रकृति का निरीक्षण करने के लिए घूमते-घूमते, उनके प्रोफेसर हैन्स्लो ने, उनकी सिफारिश एक सर्वेक्षण करने जा रहे जहाज पर बतौर प्रकृति विज्ञानी कर दी । डार्विन के पिता नें इनकार कर दिया, लेकिन आखिरकार डार्विन ने किसी न किसी तरह उन्हें अपनी यात्रा का खर्च उठाने के लिए मना ही लिया और 27 दिसंबर, 1831 को डार्विन एच. एम. एस. बीगल नामक जहाज पर सफ़र के लिए निकल पड़े । किसे पता था कि यह सफ़र जीव विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति लाने वाला है और पृथ्वी पर मौजूद जीवों और पौधों की उत्पत्ति और विभिन्नता के बारे में  मनुष्य की सदियों पुरानी अवधारणाओं को सदा के लिए बदलने वाला है ।

अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन नें तथ्यों का भण्डार इकट्ठा  कर लिया और अक्तूबर 1836 में इंग्लैंड वापिस आने पर अध्ययन में जुट गये । उनके द्वारा पृथ्वी की सरंचना संबंधी लिखे गये लेखों की वजह से , वह अपनी यात्रा से लौटने से पहले ही काफी प्रसिद्ध हो चुके थे । वापसी पर उनके संबंध उस समय के कई बड़े-बड़े विज्ञानियों से बन गये और वे कई साईंस सोसायटियों के मैम्बर चुने गये । अपने सफरनामे के बारे में किताब लिखते वक्त बहुत ज्यादा मेहनत के दबाव के चलते 1838 में वे बीमार हो गये और डॉक्टरों के कहने पर उन्हें लन्दन वापिस अपने पिता के घर जाना पड़ा । पर यहाँ भी उनकी खोजी रूचि कायम रही । वह अपना ज्यादा समय दुधारू पशुओं को पालने वाले किसानों के साथ बातें करते हुए और उनके द्वारा पशुओं की नसल सुधार के कामों का निरीक्षण करते हुए बिताते थे । हृदयस्पंदन और जठरीय रोग के दर्दों की ये बीमारी इसके बाद डार्विन का उम्र भर पीछा करती रही ।

अपने अध्ययन के आरंभिक वर्षों में ही, डार्विन जीव विकास संबंधी अपनी दो महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं का विकास कर चुके थे । ये दो अवधारणाएं- ‘ प्राकृतिक चयन’ (Natural Selection) और ‘योग्यतम का बचाव’ (Survival of the fittest) थी । डार्विन की अवधारणाओं ने यह पक्के तौर पर सिद्ध कर देना था कि प्रकृति पल-पल बदलती है । यह अपने आरम्भकाल से एकसमान नहीं रही जैसाकि उस समय की धार्मिक शिक्षाओं में बताया जाता था । डार्विन को पता था कि उसकी खोजों का समाज के कठमुल्लों की तरफ से भयंकर विरोध किया जायेगा । कुछ इस डर की वजह से और कुछ अपनी खोजों को प्रमाणिक तौर पर और मजबूत बनाने के लिए प्रकृति में से तथ्य इकट्ठे करने और अध्ययन करने के कारण डार्विन 1859 तक अपनी इस क्रान्तिकारी खोज को प्रकाशित न कर सके ।

1856 के शुरुआती दिनों में चार्ल्स डार्विन के दोस्त चार्ल्स लिल को एक और विज्ञानी अल्फ्रेड वालेस का पत्र मिला जिस में वालेस ने डार्विन की अवधारणाओं के साथ मिलती जुलती बातें कहीं । इसके बाद लिल ने डार्विन को अपनी खोजों को छपवाने के लिए कहा और उसके कहने पर डार्विन ने, जीवों की प्रजातिओं की उत्पत्ति’ (Origin of Species) से सम्बंधित एक खोज पत्र लिखना शुरू किया । जून, 1858 में डार्विन को वालेस का पत्र मिला जिसमें उसने ‘प्राकृतिक चयन’ की धारणा का  जिक्र किया । 1859 में 1 जुलाई के दिन , डार्विन और वालेस ने इकट्ठे ही अपनी खोजों के बारे में खोज पत्र पढने का निर्णय किया, पर अपने बेटे की मृत्यु की वजह से डार्विन इसमें शामिल न हो सके । आखिरकार नवम्बर में डार्विन की पुस्तक’ जीवों की उत्पत्ति’ (Origin of Species) छप कर लोगों में पहुँच गयी ।

जैसाकि उम्मीद ही थी, किताब की काफी प्रशंसा हुई और कुछ ही दिनों में इसके पहले संस्करण की सारी प्रतियाँ बिक गयीं । वैज्ञानिकों में बहुतों ने डार्विन की उपलब्धियों के साथ सहमती प्रकट की, चाहे कुछ वैज्ञानिकों ने डार्विन की अवधारणाओं का सख्त विरोध भी किया । सबसे ज्यादा भयानक विद्रोह धार्मिक कठमुल्लों और कट्टरपंथियों ने किया और डार्विन के भद्दे कार्टून बना कर बांटे गये । जब डार्विन नें यह रहस्योदघाटन किया कि मनुष्य का विकास बंदरों की एक नसल एप (Ape) से हुआ है तो इसका प्रचंड विरोध हुआ । डार्विन का चेहरा बन्दर के धड़ के ऊपर लगा कर उसकी खिल्ली उड़ाई गयी । लेकिन उनकी खोजों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कट्टरपंथी चर्च ने अब उसकी खोजों को अपने धार्मिक लबादे में फिट करना शुरू कर दिया ।

अपने खोज कार्य जारी रखते हुए, डार्विन ने इसके बाद ‘मनुष्य की उत्पत्ति’ (Descent of Man) और अन्य कई किताबें लिखीं । 19 अप्रैल, 1882 के दिन 73 वर्ष की उम्र में इस महान विज्ञानी की मृत्यु हो गयी जो अपने पीछे छोड़ गया मानवता को अपनी बेमिसाल उपलब्धियां ।

डार्विन की उपलब्धियां

एच. एम. एस. बीगल के साथ अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन ने अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्य इकट्ठे किये । गैलापैगोस टापू पर उनका ध्यान घरेलू चिड़ियों जैसे पक्षियों की एक नस्ल पर गया । इन पक्षियों की शक्ल-सूरत आपस में काफी मिलती जुलती थी और ये पक्षी मुख्य धरती पर पाए जाने वाले इसी किस्म के पक्षियों से भी मिलते जुलते थे । पर टापुओं पर रहने वाले पक्षी कीड़े खाकर गुजारा करते थे जबकि दक्षिण अमेरिका की मुख्य धरती वाले पक्षी पौधों के बीज खाते थे । कीड़े खाने वाले पक्षियों की चोंच बीज खाने वाले पक्षियों से लम्बी थीं । अतः डार्विन ने यह परिणाम निकला कि किसी कारणवश यह पक्षी मुख्य धरती से टापुओं पर आ गए । बदलते हालत में जीवन निर्वाह के लिए उन्हें कीड़ों पर निर्भर होना पड़ा । लेकिन आम तौर पर कीड़े वृक्षों के तनों में गहरे छुपे होते थे, अतः समयानुसार टापुओं पर लम्बी चोंच वाले पक्षी अस्तित्व में आ गए ।

इसी तरह उन्होंने दक्षिणी अमेरिका के तट के साथ साथ एक दक्षिण अमेरिकी जानवर ‘सलौथ’  के अवशेषों का अध्ययन किया । इन आलोप हो चुके जानवरों का आकार हाथी जितना था, परन्तु उस समय के अमेरिकी सलौथों का आकार काफी छोटा था, डार्विन ने अपने अध्ययन से यह परिणाम निकला कि छोटे आकार के सलौथ अलोप हो चुके सलौथों से ही विकसित हुए हैं ।

इस तरह डार्विन ने उस समय तक खोजे गए विभिन्न अवशेषों का अध्ययन किया । उनके समय तक अवशेषों पर खोज करने वाले वैज्ञानिकों को धरती कि सतह पर चट्टानों की अलग अलग परतें मिलीं और प्रत्येक परत में अलग अलग किस्म के जानवरों और पौधों के अवशेष मिले । डार्विन ने अपने अध्ययन से यह जाना कि नीचे की परत से ऊपर की तरफ आते हुए, इन परतों में जानवरों और पौधों के विकास का सिलसिला सीधा-सीधा नजर आ रहा था । उस समय तक यह भी पता लग चुका था कि चट्टानों की एक परत जमने में लाखों साल लग जाते हैं । इससे डार्विन का यह निश्चय पक्का हो गया कि धरती पर जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहा है, और यह बदलता रहा है । डार्विन इस नतीजे पर भी पहुँच गए कि जीवन की उत्पत्ति किसी सरल रूप में हुई और इस सरल रूप से विकसित होते हुए जीवों और पौधों की अलग अलग प्रजातियाँ अस्तित्व में आयीं और इस प्रक्रिया में लाखों वर्ष लगे।  आज वैज्ञानिक यह जान चुके हैं कि धरती की उम्र लगभग 4.5 बिलियन वर्ष है । जीवन के प्रथम प्रारूप 3.5 मिलियन वर्ष पहले अस्तित्व में आये । मनुष्य का जनम कोई एक लाख वर्ष पहले ही हुआ है ।

अपने पुश्तैनी घर में रहते समय डार्विन ने देखा कि किसान ज्यादा दूध देने वाले पशुओं का चयन करके और उनका प्रजनन करवाकर ज्यादा दूध देने वाले पशुओं की गिनती बढ़ा लेते हैं । उन्होंने इसको ‘कृत्रिम चयन’ (Artificial Selection) का नाम दिया । लेकिन उन्होंने इससे आगे चलते हुए अपने पास उपलब्ध अन्य तथ्यों के आधार पर यह सिद्धांत दिया कि प्रकृति में भी इस तरह की ‘प्राकृतिक चयन’ की प्रक्रिया घटित होती है ।

इसको एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है । एक ख़ास किस्म का उड़ने वाला कीड़ा पक्षियों द्वारा खाया जाता है । इस कीड़े की दो किस्में हैं – एक सफ़ेद पंखों वाला जो ज़हरीला नहीं है और दूसरा चमकीले रंगों वाला ज़हरीला कीड़ा । धीरे धीरे पक्षी पंखों के रंग से ज़हरीले कीड़े को पहचानने लगते हैं और उसे खाना बंद कर देते हैं । शुरू में चमकीले पंखों वाले कीड़ों की गिनती काफी थी, लेकिन कुछ ही पीढ़ियों बाद चमकीले रंग वाले कीड़ों की बहुतायत हो जाएगी क्योंकि उनके पास प्रजनन करने के और अपने से आगे नए कीड़े पैदा करने के मौके सफ़ेद पंखों वाले कीड़ों से तुलनात्मक रूप में ज्यादा हैं । इस तरह चमकीले पंखों वाले कीड़े प्राकृतिक चयन के ज़रीये बहुतायत में आ जाते हैं ।

इस तरह डार्विन ने देखा कि प्रकृति में जीव जन्तु बहुत ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं लेकिन प्रत्येक जीव प्रजाति की संख्या को नियंत्रण में रखने के लिए किसी तरह का कोई नियम होना जरूरी है । यहीं से उन्होंने अपने दूसरे, जो कि मुख्य रूप में विवाद का कारण बना, ‘योग्यतम के बचाव’ के सिद्धांत को रूप दिया । उनके मुताबिक वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार सबसे योग्य जीव ‘जिंदा रहने के संघर्ष’ में कामयाब हो जाते हैं और प्रजनन कर पाते हैं और बाकी मर जाते हैं । इस तरह जिंदा रहने के लिए लाभकारी गुण चुनिन्दा रूप में अगली पीढ़ियों में चले जाते हैं ।

इन दोनों सिद्धांतों के आधार पर डार्विन नें यह नतीजा निकाला कि लाभकारी लक्षणों और वातावरण के अनुसार ढलने के लिए जीवों में आये बदलाव, जो कि पीढी दर पीढ़ी जीवों में संचारित हो सकते हों, इकट्ठे होते रहते हैं और समय आने पर एक बिलकुल ही नयी प्रजाति के अस्तित्व में आ जाने का कारण बनते हैं ।

डार्विन के सिद्धांतों की अपनी खामियां भी हैं । लेकिन फिर भी डार्विन के सिद्धांत आधुनिक जीव विकास के सिद्धांत की बुनियाद हैं । उनके दिए गए सिद्धांतों के बिना आज भी किसी जीव विकास के सिद्धांत की कल्पना संभव नहीं  । डार्विन की सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण  देन थी, संसार के सदा-सदा स्थिर रहने वाली अवधारणा का सदा सदा के लिए अंत ! यही बात डार्विन के विरोधियों को सबसे ज्यादा चुभती है ।

इन सिद्धांतों के अलावा डार्विन की मानवता को और भी बहुत महत्त्वपूर्ण और क्रांतिकारी देन है । डार्विन के दोस्त, टॉमस हक्सले नें उस समय दिखाया कि शारीरिक रचना के पक्ष से मनुष्य बहुत हद तक ऐप (Ape) के साथ मिलता जुलता है । 1871 में डार्विन नें अपनी पुस्तक ‘मनुष्य का विकास’ प्रकाशित की । इस पुस्तक में उसने मनुष्य की सांस्कृतिक विकास और मनुष्यों में पाए जाने वाली लैंगिक, शारीरिक, और सांस्कृतिक विभिन्नताओं की व्याख्या के लिए ‘लैंगिक चयन’ का सिद्धांत पेश किया । इस पुस्तक में उन्होंने जोर दिया कि सारे मनुष्य एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं और यह विकास अफ्रीका महांद्वीप में हुआ । उस समय अलग-अलग नस्ल के मनुष्यों को अलग अलग प्रजातियाँ मानने और कुछ नस्लों को दूसरी नस्लों से बेहतर मानने और उनके अलग-अलग तौर पर विकसित होने के सिद्धांतों का काफी बोलबाला था, लेकिन डार्विन के द्वारा एक ही पूर्वज से सारे मनुष्यों के विकास के सिद्धांत को पेश करने के बाद बाकी सिद्धांत धीरे धीरे प्रभावहीन हो गए । डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता अब डी.एन. ए. के अध्ययन से भी हो चुकी है ।

डार्विन के आलोचक

जैसे ही डार्विन नें, बाईबल की अवधारणा, कि धरती की उम्र 6000 साल है और संसार की रचना’ परम परमेश्वर प्रभु’ नें 6 दिनों में और सदा सदा के लिए की थी, पर चोट की और इसको अपनी खोजों द्वारा तीतर-बीतर कर दिया; तो धार्मिक कट्टरपंथियों नें उसके खिलाफ जेहाद छेड़ दी । लेकिन अब समय बदल चुका था, अब मध्य युग का सामंती ढांचा नहीं रहा था, अब पूंजीवादी ढांचा अस्तित्व में आ चुका था, और विज्ञान की जरूरत उसके लिए जिंदा रहने की शर्त था, इसलिए थोड़े ही समय में डार्विन के सिद्धांतों को वैज्ञानिकों की तरफ से मान्यता मिल गयी । अब डार्विन के सिद्धांत को पूंजीवादी प्रबंध को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और उसके क्रांतिकारी अंश को को छुपाने की कोशिशें होने लगीं ।

‘अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष’ और ‘ योग्यतम का बचाव’ नामक डार्विन की अवधारणाओं को पूंजीवादी प्रबंध को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और आज भी इसी प्रकार की दलीलें देने वालों की कमीं नहीं है । लेकिन ये सिद्धांतकार ‘अपने अस्तित्व के लिए सर्वहारा के संघर्ष’ से भी उतना ही डरते हैं जितना जोर ये पूँजीवाद को जायज ठहराने के लिए लगाते हैं । ‘ योग्यतम का बचाव’ के सिद्धांत द्वारा पूंजीवादी शोषकों को जायज ठहराने और अल्पमत द्वारा विशाल बहुमत की लूट को ठीक सिद्ध करने की कोशिशें लगातार होती रही हैं । पर यह राग अलापने वाले जन संघर्ष की जगह शान्तिपूर्ण सुधारों और कानूनी कार्रवाई द्वारा गरीबी ख़त्म करने जैसे भद्दे सिद्धांतों को भी साथ-साथ पेश करते रहते हैं । इन दलीलों के बिना भी देखा जाये तो दूसरे जानवरों और मनुष्यों में बहुत अंतर है । मनुष्य वातावरण के साथ खुद भी बदलता है और उसे भी अपने अनुकूल ढाल लेता है, जबकि यह गुण दूसरे जानवरों में बहुत कम विकसित है । इसके अलावा मनुष्य उत्पादन प्रक्रिया में प्रकृति के साथ संघर्ष करता है और जीवन निर्वाह के लिए औजारों का निर्माण करता है । और चूँकि यह सब सामूहिक रूप में ही संभव है, इसलिए ‘योग्यतम का बचाव’ की अवधारणा मनुष्यों पर लागू ही नहीं होती. और तो और, पूंजीवादी प्रणाली में जब भी इन औजारों की (बहुतायत) हो जाती है तो संकट आ जाता है, फिर बहुतायत होने के बावजूद संघर्ष की अवधारणा की तो इसमें कोई गुन्जाईश ही नहीं रह जाती ।

इससे भी बढ़कर, डार्विन की यह अवधारणा मुख्य तौर पर अलग अलग जीवों की प्रजातियों और किसी जीव प्रजाति की जनसँख्या को कंट्रोल में रखने तक ही सीमित रहती है । पहली सूरत में यह अवधारणा मनुष्यों में आपस में लागू नहीं होती, दूसरी सूरत में , जिन यूरोपीय देशों की जनसँख्या वृद्धि दर शून्य हो चुकी है पूंजीवादी दैत्य वहां भी लोगों को संघर्ष करने के लिए मजबूर कर रहा है । जिन देशों में जनसँख्या बढ़ रही है, वहां डार्विन के योग्यतम के बचाव के सिद्धांत के मुताबिक पूंजीपतियों की संख्या बढ़नी चाहिए, लेकिन हो तो इसके विपरीत रहा है, गरीबों (अयोग्यों) की संख्या बढ़ रही है और पूंजीपतियों की या तो स्थिर है या कम हो रही है ।

चर्च और अन्य धार्मिक कट्टरपंथी, जिनमें सिर्फ इसाई ही नहीं, अन्य सभी धर्मों के पादरी-पुजारी भी शामिल हैं, के विरोध और डार्विन के सिद्धांतों को तोड़-फोड़ कर की गयी व्याख्याओं से भी पूँजीवाद का कुछ नहीं संवर सका । इस सबके बावजूद इस पूंजीवादी प्रबंध को डार्विन के सिद्धांतों और पूरे जीव विकास के सिद्धांत से ही खतरा बना हुआ है । एक बार फिर मध्य-युगीन काले दौर के सिरे से खारिज किये जा चुके गैर-वैज्ञानिक ईश्वरवादी सरंचना के सिद्धांत को नए लबादे में सजा कर लोगों पर थोपा जा रहा है और लोगों में भौतिकवादी वैज्ञानिक नज़रिये की पकड़ को कमजोर करने की कोशिशें हो रहीं हैं । इन सब कोशिशों के पीछे हर तरह के धार्मिक कट्टरपंथी और फासीवादी ताने-बाने से लेकर सरकारों, कोर्पोरेट जगत, और लोक कल्याण प्रपंच रचने वाली संस्थाएं शामिल हैं ।

इस नए प्रचारित किये जा रहे सिद्धांत का नाम है ‘सचेतन सृजन'(Intelligent Design) । इनके ज्यादातर तर्क तो डार्विन के समकालीन विरोधी विलियम पैले (William Paley)  से उधार लिए हुए हैं । इस दलील के अनुसार, जैसेकि किसी जटिल जेब घड़ी या किसी आधुनिक मशीन या कंप्यूटर जैसे यन्त्र बनाने के लिए किसी सचेतन शक्ति यानीकि मानव दिमाग की जरूरत होती है, उसी तरह जैसे किसी बहुत ही जटिल मानव अंग जैसेकि आँख, दिमाग, या अन्य जीव जंतुओं को पैदा करने के लिए या सृजन के लिए भी किसी सचेतन शक्ति की जरूरत है, जोकि इनके अनुसार ईश्वर ही हो सकता है  । यह बिलकुल वैसे ही जैसे कोई कहे कि दूध भी पानी की तरह तरल पदार्थ है इसलिए यह पानी की ही तरह धरती में से नल लगाकर निकाला गया होगा या फिर पानी दूध की तरह किसी गाय-भैंस को दुहने से मिलता होगा । खैर इनके तर्क की थोड़ी और छानबीन करते हैं । घड़ी या मशीन बनाने के लिए बहुत सारे मनुष्यों को इकट्ठे होकर या अलग अलग रहकर औजारों का इस्तेमाल करते हुए और भट्टियों में लोहा पिघलाते हुए श्रम करना पड़ता है, और दूसरी तरफ इनके ईश्वर के औजार और भट्टियाँ कहाँ हैं और वह दिखाई क्यों नहीं देते, तो ये भाग निकलेंगे ।

इसी तर्क को थोडा और आगे लेकर जाइये – घडी, मशीन या कंप्यूटर को बनाने वाला सचेतन मानव  दिमाग बहुत जटिल है, तो इतने जटिल मानव दिमाग को बनाने वाली शक्ति तो और भी जटिल होगी । फिर इस और भी जटिल शक्ति को बनाने के लिए और भी ज्यादा जटिल शक्ति – और इस यह जटिलता का पहाड़ा कभी न ख़त्म होने वाला थोथा तर्क बन जाता है ।

एक और तर्क के अनुसार जीवाणु (Bacteria) को गति प्रदान करने वाले हिस्से फ्लैजिला (Flagella), मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली या उसकी आँख जैसे अंग इतने ज्यादा विकसित हैं कि इनके किसी और कम विकसित रूप से विकसित होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता और अपने कम विकसित रूपों में इनकी कोई उपयोगिता संभव भी नहीं होगी; यह तर्क भी थोथा सिद्ध किया जा चुका है. जैसे कि आँख के विकास की विभिन्न अवस्थाओं के विकसित रूप जैविक संसार में पाए जाते हैं. कीट-पतंगे में आँखों का इस्तेमाल होता है और उससे कम विकसित प्राणियों में भी । इसी तरह गाय-भैंसों की आँखों की बनावट काफी हद तक मनुष्य की आँखों से मेल खाती है, लेकिन उनमें रंग पहचानने की योग्यता नहीं होती, और वे चीज़ों को काले और सफ़ेद रंग की अलग शेड्स में ही देख सकती हैं । लेकिन कोई पागल ही यह कहेगा कि उन्हें आखों का कोई लाभ नहीं या फिर उनकी आँखें बेकार हैं । प्रतिरक्षा प्रणाली भी हर तरह के प्राणी में मौजूद है और फ्लैजिला के विभिन्न स्तरों के विकसित रूप जीवाणु (Bacteria) में पाए जाते हैं । लेकिन जैसेकि प्रत्येक विचारवादी का काम होता है, एक तर्क के प्रमाणित हो जाने के बाद कोई दूसरा कुतर्क ढूँढने की बौद्धिक कसरत में लग जाना । और तो और, इनकी विज्ञान की किताब ‘बाइबल’ में धरती की उम्र 6000 साल बताई गयी है और सृष्टि के सृजन में ईश्वर को 6 दिन लगे. आज के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर धरती की उम्र 4.5 बिलियन वर्ष या इससे भी ज्यादा आंकी गयी है और जीवन की उत्पत्ति के आरंभिक प्रमाण भी 3.5 बिलियन साल पुराने हैं.

एक और काम, जो यह ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांतकार करते हैं, वह है- वैज्ञानिक सिद्धांतों में किन्हीं छोटी सी त्रुटियों को ढूंढना और फिर उसकी आधार पर पूरे सिद्धांत के ऊपर विवाद खड़ा करना. और इन त्रुटियों को विज्ञान द्वारा दूर कर लेने पर ऐसी ही कोई और तुच्छ कोशिश । यह है नया विज्ञान – जो अपने आप को प्रमाणित करने में असमर्थ है, लेकिन दूसरी सिद्धांतों की छोटी सी त्रुटियों को भी आधार बनाकर हो हल्ला मचाता है । एक और बहुत ही ‘शानदार’ विचार, जो ऐसे विज्ञानी लोग अक्सर प्रचार करते हैं, वो है- साईंस को ईश्वर भरोसे रहने वाली ‘आस्तिक साईंस’ बनाना जिससे कि ये समझते हैं कि विज्ञान को और वैज्ञानिकों को बहुत फायदा मिलेगा और विज्ञान को सही दिशा मिलेगी ।

इस पूरे ‘विज्ञान'(?) को लोगों में प्रचारित करने और लोगों के दिमागों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता का कूड़-कबाड़ा ठूसने के काम को पूरा करने के लिए अमेरिका और इंग्लैंड में शक्तिशाली राजनैतिक लाबी है, और इसमें कोई हैरानी की बात नहीं इस लाबी का मुख्य हिस्सा राजनैतिक हलकों की दक्षिणपंथी फासीवादी धारा है । जैसाकि होता ही है फासीवाद को वित्तीय सहायता की भी कोई कमी नहीं है ।

यह प्रतिक्रियावादी शक्तियां अमेरिकी सरकार पर लगातार यह दबाव बनाती रही हैं कि धार्मिक विश्वास पर आधारित स्कूलों का खर्च सरकार उठाये, इन स्कूलों में मुख्य तौर पर ईसाई मिशनरी स्कूल हैं । अमीर संस्थाओं ने इस प्रचार मुहीम के लिए लाखों-करोड़ों डॉलर खर्चे । अकेली वाल्टन फैमिली फाऊंडेशन नें 2006 में 28 मिलियन डॉलर इस तरह का दबाव बना रहे संगठनों पर खर्च किये । याद रखा जाना चाहिए कि यह फाऊंडेशन वाल-मार्ट के सहारे चलती है, जो कि ट्रेड-यूनियनों के सबसे खूंखार विरोधियों में से जानी जाती है ।

एक और अमेरिकी संस्था, टेम्पलटन फाऊंडेशन नें वर्ष २००६ में ६० मिलियन डॉलर, उन व्यक्तिओं के प्रोजेक्टों के लिए बांटे, जो ‘विज्ञान’ और अध्यात्मवादी विचारों का मेल मिलाप कराने की कोशिशों में जुटे हुए हैं । इन व्यक्तिओं में अमेरिका और इंग्लैंड के अलावा पूरी दुनिया के अध्यापक, विद्यार्थी, पत्रकार, शोध-कर्त्ता और युनिवर्सिटियों के प्रोफैसर, अकादमीशियन शामिल हैं. यू. एस. क्रॉनिकल ऑफ़ हायर एजुकेशन में छपे एक लेख के अनुसार उपरोक्त संस्था नें २५० मिलियन डॉलर से ज्यादा की धनराशी विज्ञान की इस तरह की ‘सेवा’ के लिए खर्ची । यह संस्था खुले-आम पूँजीवाद तथा मुनाफा आधारित उद्यम की हिमायत करती है ।

इस तरह की एक संस्था वार्डी फाऊंडेशन ब्रिटेन में काम करती है । यह संस्था मुख्य तौर पर वार्डी कार बिजनैस के मुनाफे पर चलती है । इसका मुख्य काम भी ईसाई मूल्यों और मान्यताओं का प्रचार करना और स्कूल खोलना है । इस संस्था के स्कूलों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता को विज्ञान के तौर पर पढ़ाया जाता है ।

भारत में भी ऐसी संस्थाएं मौजूद हैं. इनमें से एक है- कृष्णा कान्सैंस (चेतना). यह संस्था भी अपने अन्य कामों के साथ-साथ ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांत का प्रचार करने के लिए जगह जगह व्याख्यानों का आयोजन करती है और पर्चे बांटती है ।

पूंजीवादी प्रतिक्रियावादी शक्तियों के उपाय सिर्फ नए सिद्धांत घड़ने और उनका प्रचार करने तक ही सीमित नहीं हैं, वह पूंजीवादी सत्ता को अपने ‘विज्ञान’ (?) को लोगों पर थोपने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं । स्कूलों में ‘सचेतन सृजनात्मकता’ के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए अमेरिकी अदालत में केस किया गया । सारे पूंजीपति ऐसे सिद्धांतकारों और ऐसे सिद्धांतों के पक्ष में खड़े हैं । मिसिसिपी, उकलहामा और न्यू मैक्सिको की प्रतिनिधि सभाओं में वर्ष 2009 के दौरान डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत को एक ‘विवादग्रस्त सिद्धांत’ का दर्ज़ा देने या फिर दूसरे सिद्धांतों की शिक्षा देने के बिल दाखिल हो चुके हैं । लुसिआना स्टेट की प्रतिनधि सभा तो एक ऐसा ही बिल पास भी कर चुकी है और गवर्नर बॉबी जिंदल ने हस्ताक्षर भी कर दिये हैं ।

इस तरह की ही लड़ाई टेक्सास में चल रही है, जिसके अनुसार कक्षाओं में अध्यापकों को डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत की आलोचना करनी अनिवार्य हो जायेगी । यह सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं, इंग्लैंड में भी ऐसी ही कोशिशें जारी हैं, और यूरोप के कई और देशों में भी बाइबल की उत्पत्ति की धारणा को स्कूलों के सिलेबस में पढ़ाने के उपाए किये जा रहे हैं । भारत में भी वह दिन दूर नहीं, यहाँ भी ज्योतिष को तो पहले ही विज्ञान का दर्ज़ा मिल चुका है ।

और तो और कानास यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर पाल मिरेकी को डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता करने की वजह से जान से मारने की धमकियाँ दीं गयीं, उसको बुरी तरह पीटा गया जिस वजह से उन्हें अस्पताल दाखिल करवाना पड़ा । उन्हें  उस पद से हटा दिया गया और उनसे अपराधियों की तरह पूछताछ की गयी ।

आम तौर पर विज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्य या किसी संग्रहालय के निर्माण के लिए कोर्पोरेट जगत चंदा मुहैया करवाता है । लेकिन नवम्बर 2005 में जब ‘अमेरिकन मियुसियम ऑफ नैचुरल हिस्ट्री’ को नए सिरे से बनाने और जीव विकास के सिद्धांत को लोगों में प्रचारित करने की बात हुई तो किसी भी कोर्पोरेट घराने नें चंदा देने की ज़हमत नहीं उठायी और इस संग्रहालय द्वारा लगाई गयी प्रदर्शनी ‘डार्विन’ को मीडिया में कोई कवरेज नहीं दी गयी । लेकिन जब 25 मिलियन डॉलर की लागत से ‘ईश्वरवादी उत्पत्ति’ के संग्रहालय को बनाने की बात चली तो कोर्पोरेट जगत नें दिल खोलकर चंदे मुहैया करवाए । इस संग्रहालय में डायनासोरों को मनुष्यों के साथ रहते हुए दिखाया जा रहा है । इस तरह पढ़ाया जाता है कि भयानक बाढ़ आने से पहले मनुष्य और डायनासोर इकट्ठे धरती पर रहते थे । वैज्ञानिक इस बकवास को कब का रद्द कर चुके हैं । डायनासोर लगभग 63 मिलियन वर्ष पहले धरती से अलोप हो चुके हैं और मनुष्य जैसे पहले प्राणी की उत्पत्ति 4 से 10 मिलियन वर्ष से पुरानी नहीं । यह है वह विज्ञान जिसे पूँजीवाद पढ़ा रहा है और फाईनैंस कर रहा है । जबकि पूंजीवादी टहलुये यह डींग मारते नहीं थकते कि पूँजीवाद के बिना विज्ञान का विकास रुक जाएगा ।

नव-डार्विनवाद

एक और  छुपा हुआ हमला हुआ है डार्विन के सिद्धांत पर । यह छुपा हुआ इस अर्थ में है क्योंकि यह स्वयं को डार्विन के मानने और फैलाने के चोगे में छिपाकर रखता है, इसका नाम है नव-डार्विनवाद । इसीका ही विस्तारित रूप है, आधुनिक जीव विकास का सिद्धांत ।

नव-डार्विनवाद शब्द का प्रयोग सबसे पहले वीज़मैन (Weissman ) नाम के विज्ञानी के सिद्धांत के अनुयायियों के लिए किया गया । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में १८९५ में वीज़मैन ने यह सिद्ध किया कि वातावरण के प्रभाव अधीन किसी जीव में होनेवाले बदलाव आगमी पीढ़ी के जीवों में संचारित नहीं हो सकते । इसको वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज्म थियूरी’ कहा जाता है । इस सिद्धांत ने मुख्य तौर पर लैमार्क के जीव विकास के सिद्धांत पर चोट की और जीव विज्ञानियों ने लैमार्क के ‘वातावरण के प्रभाव के अधीन आनेवाले बदलाव का कारण जीव विकास होने के सिद्धांत ‘ को पूरी तरह रद्द कर दिया । अपने सिद्धांत को सही सिद्ध करने के लिए वीज़मैन ने कुछ प्रयोग किये जिनमें चूहों की पूँछें काटने वाला प्रयोग सबसे प्रसिद्ध है ।

वीजमैन के इस प्रयोग में, पीढ़ी दर पीढ़ी चूहों की पूँछें काटी गयी, पर हरवार चूहों की अगली पीढ़ी में पूंछ उग आती थी. इससे उसने यह नतीजा निकाला कि शरीर पर पडनेवाले प्रभाव वंशानुगत तौर पर अगली पीढ़ियों में संचारित नहीं होते. सबसे पहले तो इस प्रयोग में बहुत बड़ी खामियां है – जैसेकि जीव विकास प्राकृतिक स्थिति में होता है और उसे बहुत लंबा समय लगता है । दूसरा उस गुण की, जो प्रकृति में संचरण के लिए जीव के लिए लाभदायिक होता है, प्राकृतिक देन होता है । इस प्रयोग को करने से पहले चूहे के लिए पूंछ की उपयोगिता है या नहीं, के बारे में  कुछ भी निर्धारित नहीं किया गया । इसके अलावा नये अध्ययनों और खोजों से यह स्पष्ट हो गया है कि शारीरिक तौर पर पडनेवाले बाहरी प्रभाव, एक जीव से उसकी, जहाँ तक कि कई पीढ़ियों तक भी संचारित हो सकते हैं और इससे विज्ञान की एक पूरी शाखा ‘ऐपीजैनेटिक्स’ अस्तित्व में आ गयी है.

वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज़्म थियूरी’ और डार्विन की ‘प्राकृतिक चुनाव’ को आधार बनाकर ही आधुनिक जीव विकास अस्तित्व में आया । इस सिद्धांत के अनुसार जीवों में आये अलग-अलग बदलावों में कुछ बदलाव, जो जीव के लिए वातावरण में संचरण और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, प्रकृति द्वारा चुन्न लिए जाते हैं । भाव कि जिस जीव में ये लाभदायिक बदलाव आते हैं, उस जीव को वातावरण में जिंदा रहने का ज्यादा मौका मिलता है और इसलिए उस द्वारा प्रजनन करने के अवसर भी ज्यादा होते हैं और धीरे-धीरे बदलावों वाले जीवों की गिनती मुख्य हो जाती है और समय पाकर और बदलावों के जमा होते जाने के कारण एक नयी प्रजाति अस्तित्व में आ जाती है । यहाँ तक बिलकुल डार्विन के सिद्धांतानुसार है. पर आधुनिक जीव विकास संबंधी सिद्धांतानुसार बदलावों के आने का कारण वातावरण और हालात अनुसार स्वयं को ढलने की जीव की जरूरत नहीं, बल्कि बदलाव जीव के जीनस में संयोगवश होनेवाले  आकस्मिक परिवर्तन हैं । इस प्रकार नव-डार्विनवादी प्राकृतिक परिस्थितियों का जीव पर पड़नेवाले प्रभावों से बिलकुल मुकर जाते हैं ।  यहां से शुरू हुआ यह विचारवादी तर्क बढ़ता हुआ यहाँ तक चला जाता है कि मानव की बनावट और स्वभाव सबकुछ पहले ही निश्चित है और इसे मानव की सामाजिक परिस्थितियों को बदलने से बदला नहीं जा सकता और ऐसा करने के प्रयत्न गैर-वैज्ञानिक और प्रकृति के विरुद्ध हैं और डार्विन विरोधी हैं । नव डार्विनवादी परम्परा में से मुख्य हैं – रिचर्ड डाकिंज़ और स्टीवन पिंकर ।

बीसवीं शताब्दी के पिछले अर्द्ध की महत्त्वपूर्ण खोज पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों की बनावट और अन्य लक्षणों संबंधी सूचना संचारित करनेवाला रसायन डी.एन.ए. है. १९५३ में वाटसन और क्रिक ने डी.एन.ए. की बनावट का मॉडल विकसित कर लिया और इसके बाद जीनज़ की खोज हुई. जीन डी.एन.ए. एक विशेष प्रकार से डिज़ाईन किया गया और यह शरीर के किसी एक हिस्से या लक्ष्ण संबंधी सूचना जमा रखता है, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह सूचना संचारित करता है, जैसे आँखों का रंग, आदमी का कद, चमड़ी का रंग, जीव के बालों का रंग आदि. जीन कोशिका के केन्द्रक (नीयूक्लियस) में पड़े रहते हैं और कोशिका की क्रियायों को रेगूलेट करते हैं । इस खोज के पश्चात कुछ विज्ञानियों ने प्रत्येक मानवी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक या सामाजिक, का आधार जीन के रूप में डी.एन.ए. के टुकड़े को बना दिया । जीव विकास होता है तो जीनों में सांयोगिक बदलावों से होता है, कोई मनुष्य अपराध कर लेता है तो उसके जीन में नुक्स है, अगर कोई उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेता है तो उसके जीन बेहतर हैं, अगर कोई आलिशान घर में रहता है, तो उसके जीन ही इतने काबिल हैं, अगर कोई पूंजीपति अमीर बनता जा रहा है और मजदूर दिन प्रतिदिन गरीब तो अमीर पूंजीपति के जीन गरीब मजदूर के जीनों से बेहतर हैं, अगर किसी को क्रोध अधिक आता है तो उसमें क्रोध वाले जीन अधिक हैं इत्यादि ।

रिचर्ड डाकिंज़ ने मानव की संस्कृति और स्वभाव की व्याख्या करने हेतू एक नया सिद्धांत पेश किया, कि हर व्यक्ति में स्वभाव के अलग-अलग लक्षणों के लिए, जैसे क्रोध, लालच, परोपकार, खीझना, हंसमुख होना आदि के लिए जीनज़ की तरह ही ‘मीमज़’ (Memes) होते हैं । चाहे अभी तक इन ‘मीमज़’ का पता-ठिकाना नहीं चला है । उसके अनुसार ‘मीमज़’ ही मानव का स्वभाव और सभ्यता तय करती हैं और इन्हें बाह्य वातावरण और मानव की परिस्थितियों के बदलने से बदला नहीं जा सकता । लेकिन अगर थोडा बारीकी में जाएँ, तो देखेंगे कि हर समाज और मानव समूह की सभ्यता प्रत्येक पीढ़ी के साथ बदलती रहती है, बल्कि एक मनुष्य के स्वभाव और सभ्यता में उसके जीवन काल में परिवर्तन आते रहते हैं । अगर डाकिंज़ के अनुसार चलें तो हर अपराधी की सन्तान अपराधी होगी, शराबी की शराबी, गुस्सैल की सन्तान गुस्सैल, शर्मीले  की संतान शर्मीली और हंसमुख की सन्तान हंसमुख. और इससे भी बढ़कर मानव सारी उम्र एक जैसा ही बना रहेगा । पर हम देखते हैं ऐसा बिलकुल नहीं होता, प्रतिदिन डाकिन्ज़ साहेब का सिद्धांत मानव जीवन द्वारा गलत साबित किया जाता है । असल में इस प्रकार के सिद्धांत सिर्फ इसलिए निर्मित किये जाते हैं ताकि लोगों को मुर्ख बनाया जा सके । दूसरे महारथी स्टीवन पिंकर का ‘विकासवादी मनोविज्ञान’ का वर्णन भी कुछ इसी प्रकार का ही है । बस पिंकर साहेब ‘मीमज़’ के स्थान पर मॉडियूल (Module) शब्द का प्रयोग करते हैं । इनके अनुसार भी मानव स्वभाव को, इसलिए मानव समाज को बदला नहीं जा सकता । इस सिद्धांत को मनोविज्ञानियों द्वारा पूर्णतया रद्द किया जा चूका है । ज्यादातर मनोविज्ञानी यह मानते हैं कि मानव स्वभाव चाहे कुछ हद तक वंशानुगत होता है पर ज्यादातर यह सामाजिक हालात और मानव के छोटी उम्र में पालन-पोषण, माता-पिता का प्यार, सेहत और शिक्षा पर निर्भर करता है ।

इस सोच के कारण, बहुत समय तक यह समझा जाता रहा कि मानव के विकास दौरान सबसे पहले दिमाग का आकार बड़ा हुआ, उसने अपने हाथ का प्रयोग और सीधा खड़ा होना सीखा, इसी कारण से ही वह भाषा का प्रयोग करने लगा और अपने दिमाग द्वारा सोचने से ही वह समूह बनाकर, फिर मानव समाज के रूप में रहने लगा । पर, असल में, जैसाकि एंगेल्ज़ ने अपने आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ में पेश किया था, सबसे पहले मानव के पूर्वज वृक्षों से उतरकर धरती पर चलने लगे जिस दौरान वे सीधा खड़े रहकर चलना सीखे । इस प्रकार अगले पंजे चलने से मुक्त होकर अन्य कार्यों के लिए प्रयुक्त होने लगे, जिस कारण मानव औजारों का प्रयोग करने लगा, जो बाद में भाषा और सामाजिक उत्पादन का कारण बना । इसके साथ ही हाथों का प्रयोग होने के कारण दिमाग का आकार बड़ा होने लगा, जो हाथों के विकास होने से कहीं बाद में जाकर हुआ । इन सच्चाईयों को आधुनिक जीवाश्म विज्ञान ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है ।

इसके बारे में ज्यादा विस्तार से जॉन पिकार्ड के आलेख “एंगेल्ज़ और मानव विकास’ में पढ़ा जा सकता । जीनज़ में आनेवाली तब्दीलियों के जीव विकास में भूमिका के बारे में ब्रिटिश विज्ञानी जे. बी. एस. हालडेल ने भी अपने आलेखों में विस्तार सहित लिखा है ।

हाल्डेल ने १९२९ में जीवन के पहले रूपों की  उत्पत्ति के रहस्यों से आवरण उठाया । हालडेल के समय में ही, एक सोवियत विज्ञानी, अलेग्जान्द्र उपरेन भी उन्हीं नतीजों पर पहुंचा, इसलिए इस थियूरी को उभयनिष्ठ तौर पर उपरेन-हाल्डेल मॉडल कहा जाता है । इन दोनों विज्ञानियों ने अपने खोज कार्यों में द्वंदात्मक भौतिकवाद को लागू करते हुए इस सिद्धांत की खोज की । १९५३ में मिलर और युरे ने प्रयोगशाला में इस थियूरी को सही सिद्ध कर दिया । अब इस सिद्धांत को थोडा सुधार कर के.आर. एन.ए. मॉडल का रूप दे दिया गया है ।

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

द्वंदात्मक भौतिकवादी नजरिये के जन्मदाता, मार्क्स और एंगेल्ज़, ने डार्विन की खोजों का पुरजोर समर्थन किया । इसके अलावा इसके अधूरेपन और भविष्य में इसके और विस्तारित होने की पेशनगोई भी की । डार्विन की खोजों ने मार्क्स-एंगेल्ज़ के भौतिकवादी नजरिये को प्रकृति में और स्पष्टता से सिद्ध किया । जनवरी १८६१ में मार्क्स ने एंगेल्ज़ को लिखा, “डार्विन की पुस्तक (जीवों की उत्पति – अनु.) बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इसने मुझे वर्ग संघर्ष के लिए प्राकृतिक आधार प्रदान किया है । पर इसमें हमें विकास के अपरिपक्व तरीके को भी सहन करना पड़ता है । अपनी सभी सीमाओं के बावजूद, न सिर्फ उदेश्यवाद (Taleology) (हर वस्तु के पीछे कोई न कोई उदेश्य होता है. अनु.) की प्राकृतिक विज्ञान में विद्यमान धारणा पर निर्णायक चोट है, बल्कि अपने तार्किक मतलब की भी अच्छी तरह व्याख्या करती है ।”

‘डियूरिंग विरुद्ध’ पुस्तक में एंगेल्ज़ ने लिखा, ” जीव विकास का सिद्धांत अभी अपने प्रारंभिक चरणों में है और इसमें कोई शक नहीं कि भविष्य की खोजें हमारी अब तक की जीव विकास संबंधी धारणाओं, डार्विन की खोजों समेत, को बदल देंगी ।”

इसी प्रकार एंगेल्ज़ ने ‘डाईलेक्ट्स ऑफ नेचर’ में भी डार्विन के ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ के सिद्धांत का मूल्यांकन कुछ इस प्रकार किया, ” डार्विन से पहले तक, उसके अबतक के पक्के अनुयायी भी प्रकृति में सामंजस्यपूर्ण सहयोग पर जोर देते हैं, कि कैसे पौधे, जीव, जंतुओं को खाद्य-खुराक और आक्सीज़न प्रदान करते हैं और जीव जंतु पौधों को बदले में खाद, अमोनिया और कार्बोनिक एसिड (कार्बन डाईआक्साईड – अनु.) प्रदान करते हैं । जैसे ही डार्विन का सिद्धांत सामने आया, इन्हें हर जगह संघर्ष ही दिखाई देने लगा । दोनों ही नजरिये अपनी-अपनी सीमाओं के अन्दर ठीक हैं, पर दोनों ही एक समान तरह से एकतरफा और तुअस्बग्रस्त हैं । जैसे प्रकृति में निर्जीव वस्तुओं के संबंध अनुरूपता के टकराव दोनों तरह के होते हैं, वैसे ही सजीव वस्तुओं में भी सचेतन और अचेतन सहयोग के साथ-साथ सचेतन और अचेतन संघर्ष भी होता है । इसलिए, प्रकृति के संबंध में, सिर्फ संघर्ष को ही सबकुछ मान लेना ठीक नहीं । बल्कि ऐतिहासिक जीव विकास और जटिलता की पूरी दौलत को एक छोटे से और एकतरफा वाक्यांश ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ में बाँधने की इच्छा करनी बचकाना ही होगी । इसका कुछ भी मतलब नहीं है ।

‘डार्विन का जीवित रहने के लिए संघर्ष’ का सिद्धांत समाज में प्रचलित अवधारणाओं जैसे सबकी सबके खिलाफ जंग, की हौबिस की थियूरी , मुकाबले की बुर्जुआ अर्थशास्त्र की अवधारणा और माल्थस की जनसंख्या संबंधी अवधारणा का प्रकृति विज्ञान में लागू करने का प्रयत्न हैं । जब ऐसा करके सफलता हासिल कर ली गयी है (बेशक इस मूलभूत आधार, माल्थस की थियूरी पर आज तक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है), यह आसान हो जाता है कि प्रकृति विज्ञान की अवधारणाओं को समाज के इतिहास पर लागू कर दिया जाये और इसे बिलकुल सीधे-सादे तरीके से कहा जाता है कि इस तरह ये प्रस्तुतियां समाज के चिरस्थायी नियमों के तौर पर सिद्ध की जा चुकी हैं । ” (मार्क्स-एंगेल्ज़,  सम्पूर्ण रचनाएँ, जिल्द  25, पेज, 583-584, अंग्रेजी एडिशन 1987, प्रगति प्रकाशन.)

“जीवित रहने के लिए संघर्ष – सबसे बड़ी बात यह है कि इसे पौधों और जनसँख्या की अधिक बढौतरी तक ही सीमित रखा जाये, जोकि पौधों और निम्न जंतुओं के विकास के कुछ चरणों में वास्तव में होता है । परन्तु इन्हें उन परिस्थितियों में, जिसकी जीव-जंतुओं और पौधों को नए वातावरण पर भू-परिस्थितियों वाले नए भूभागों में परवास से बिलकुल अलग रखा जाना चाहिए जिनमें जीवों की प्रजातियाँ बदलती हैं, पुरानी मर जाती हैं और नई विकसित उनका स्थान ग्रहण कर लेती हैं, जनसँख्या में अधिक बढौतरी हुए बिना ही । नए वातावरण में जो जीव स्वयं को ढाल लेते हैं, जीवित रह जाते हैं और लगातार बदलावों से स्वयं को एक नई प्रजाति में विकसित कर लेते हैं पर ज्यादा स्थिर जीव मर जाते हैं और विलुप्त हो जाते हैं, साथ ही मंझोले जीव-रूप भी विलुप्त हो जाते हैं । यह सब कुछ किसी भी माल्थसवाद के बिना संभव है और होता है भी है, और अगर यह लागू भी होता है तो यह उस प्रक्रिया को, ज्यादा से ज्यादा थोडा तेज कर देता है ।”वही पेज, 582-83)

“चलें तर्क करने के लिए ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ नाम के वाक्यांश को मान भी लें । एक जानवर ज्यादा से ज्यादा इकठ्ठा कर सकता है, पर इन्सान तो उत्पादन करता है । वह जीवित रहने के साधन तैयार करता है, ज्यादा विस्तारित शब्दों में, जोकि प्रकृति ने उसके बिना न बनाये होते । यह जानवरों पर लागू होनेवाले नियमों को मानव समाज पर अपरिपक्व तरीके से लागू करना मुश्किल बना देता है । उत्पादन के कारण जल्दी ही ‘जीवित रहने का संघर्ष’ शुरू हो जाता है, पर यह संघर्ष जीवित रहने के साधनों के लिए नहीं, बल्कि मनोरंजन और विकसित होने के साधनों के लिए होता है । यहाँ – क्योंकि विकसित होने के साधन भी सामाजिक तौर पर पैदा होते हैं – जानवरों पर लागू होनेवाले नियम पूरी तरह से  आधारहीन हो जाते हैं । अंत में, पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में, उत्पादन का स्तर इतना ऊँचा हो जाता है कि समाज जीवित रहने, मनोरंजन और विकसित होने के साधनों का अब और पूरी तरह उपयोग नहीं कर सकता क्योंकि उत्पादन करने वालों के बड़े हिस्से को इन साधनों के उपयोग करने से गैर-कुदरती तरीके से और जबरन हटा दिया जाता है । और इसीलिए संतुलन कायम रखने के लिए एक संकट (आर्थिक संकट – अनु.) प्रत्येक दस वर्षों बाद न सिर्फ जीवित रहने के, मनोरंजन और विकसित होने के साधन, बल्कि उत्पादन शक्तियों के एक बड़े हिस्से का भी विनाश कर देता है । इस प्रकार, यह ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ कुछ इस तरह का रूप धारण कर लेता है – बुर्जुआ समाज द्वारा पैदा की गई वस्तुएं और उत्पादक शक्तियों की पूंजीवादी प्रणाली के विनाशकारी, विध्वंशकारी प्रभावों से रक्षा करने के लिए, सामाजिक उत्पादन और वितरण का अधिकार, इस कार्य के लिए अयोग्य हो चुकी पूंजीपति जमात के हाथों से छीन लें और इसको उत्पादन करनेवाले जन-समूहों को सौंप दें -और यह है समाजवादी क्रांति ।

“वर्ग संघर्षों के क्रमिक सिलसिले के तौर पर इतिहास का बोध, इनको ‘जीवित रहने के संघर्ष’ के बहुत कम विभेदन वाले चरणों तक सीमित कर देने से विषय-वस्तु और गंभीरता के पक्ष के लिहाज से कहीं अधिक अमीर है ।” (वही, पेज -584 -85 )

“डार्विन को पता नहीं था कि उसने मानवता, विशेषतया अपने देववासियों पर कितना कड़वा व्यंग्य लिख दिया है, जब उसने यह दिखा दिया कि ‘मुक्त प्रतिस्पर्द्धा’ , जीवित रहने के लिए संघर्ष जिसको अर्थशास्त्री सबसे ऊँची ऐतिहासिक उपलब्धि समझते हैं, जानवरों की दुनिया में एक आम स्थिति है । जैसे उत्पादन की क्रिया ने मानव को अन्य जानवरों से जीव-वैज्ञानिक तौर पर विभेदन प्रदान किया, उसी प्रकार सामाजिक पक्ष से भी ; सिर्फ चैतन्य तौर पर सामाजिक उत्पादन के ढांचे, जिसमें उत्पादन और वितरण योजनाबद्ध तरीके से होगा, मानवता को अन्य जानवरों से श्रेष्ठता प्रदान करेगी । इतिहास विकास इस प्रकार को दिन-प्रतिदिन आवश्यक ही नहीं बना रहा, बल्कि अधिकाधिक संभव भी बना रहा है ।” (वही, पेज -331 )

जैसे एंगेल्ज ने ‘ डियूरिंग विरुद्ध’ में यह कहा था कि जीव विकास के सिद्धांत अभी और विकसित होंगे, उसी प्रकार डार्विन को भी अपने सिद्धांत में विद्यमान खामियों का अहसास था ।

जीवाश्म विज्ञान के अनुसार, कैंबरियन युग (६००-७०० मिलियन वर्ष) से पहले की चट्टानों में जीवों के बहुत कम अंश मिलते हैं और वह भी ‘परोकेरीआईक’ नाम के आरंभिक जीव-रूप ही मिलते हैं । पर इससे बिलकुल बाद की चट्टानों में एकदम ही अलग तरह के बहुभांति जीव-रूप मिलते हैं । इनमें वर्तमान में मौजूद जीवों के लगभग बहुत जीव-रूप मिल जाते हैं. इसको ‘कैंबरियन धमाका’ कहा जाता है । यह ध्यान रखना चाहिए कि यह ‘कैंबरियन धमाका’ कोई रातों-रात हो गयी घटना नहीं थी, बल्कि कई मिलियन वर्षों में होनेवाली घटना थी, पर भू-वैज्ञानिक तौर पर देखा जाये तो पृथ्वी की उम्र के मुकाबले यह घटना एक धमाके की तरह ही तेजी से होनेवाली घटना थी । इसके पश्चात् अनेक प्रजातियाँ अस्तित्व में आ गयीं । डार्विन के समय भी इस तथ्य का ज्ञान था । बाद में यह भी सिद्ध हो गया कि समय-समय पर पृथ्वी पर कुछ इस प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं, चाहे ये परिस्थितियाँ कई मिलियन वर्ष लंबी होती हैं, पर फिर भी भू-वैज्ञानिक तौर पर बहुत छोटी होती हैं, जिस दौरान पृथ्वी पर उस वक्त मौजूद बहुत सारी प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं और उनके स्थान पर नई प्रजातियाँ पैदा हो जाती हैं जो समय के साथ धीरे-धीरे विकास करती हैं, विकास के इस चरण में, जब नई प्रजातियों के अस्तित्व में आ जाने के बाद के समय में ‘प्राकृतिक चुनाव’ अहम भूमिका निभाता है । इस तरह जीवों की प्रजातियों के तेजी से विलुप्त होने की अब तक छः घटनाएँ हो चुकी हैं ।

सबसे बड़ी विलुप्त होनेवाली स्थिति २५० मिलियन वर्ष पहले पेकिअन्योक-मीजोयोक युगों के बीच पैदा हुई जब जल और थल दोनों जगहों के ५० फीसदी जंतुओं और रेंगने वाले ८० फीसदी जंतुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो गयीं । इस प्रकार की अंतिम घटना ६३ मिलियन वर्षों पहले हुई जिसके परिणामस्वरूप अन्य अनेक प्रजातियों समेत डाइनासोर भी विलुप्त हो गये । पर ये घटनाये जीव विकास के राह में रूकावट नहीं बनती हैं, बल्कि जीव विकास को नए और उच्च धरातल पर ले जाती हैं । क्योंकि इन घटनाओं से नई प्रजातियाँ अस्तित्व में आती हैं जो पहले वाली प्रजातियों के मुकाबले अधिक विकसित होती हैं ।

‘कैंबरियन धमाके’ की डार्विन अपनी खोजों के आधार पर व्याख्या करने में असफल थे, पर उस समय डार्विन ने यह कहा कि किसी कारण जीवाश्म संबंधी मानव जानकारी अभी अधूरी है और भविष्य में यह जानकारी मुकम्मल हो जाएगी । पर समय के साथ यह पता चला कि जीवाश्म संबंधी जानकारी बिलकुल सही थी और जीवाश्म में अधूरापन इतना भी अधिक नहीं है कि ‘कैंबरियन धमाके’ को सिर्फ जानकारी का अधूरापन कह कर काम चला लिया जाये । इसी प्रकार कई बार प्रजातियों के बीच के रूप भाव ‘लिंक प्रजाति’ भी नहीं मिलती, उन स्थितियों में डार्विन के सिद्धांतों के अनुसार नई प्रजाति की उत्पति की व्याख्या करनी मुश्किल हो जाती है ।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, अमरीका के भू-विज्ञानी स्टीफन जे गोल्ड और नीलज़ ऐलड्रिज़  ने १९७१ में जीव विकास का नया सिद्धांत पेश किया, जो न सिर्फ डार्विन के सिद्धांत के महत्त्व को बनाये रखता है, बल्कि इस और अधिक अमीर बनाते हुए जीव विकास के सिद्धांत को इस काबिल बना देता है, जिससे ‘कैंबरियन धमाका’ और तेजी से प्रजातियों के विलुप्त होने से पैदा होनेवाली घटनाओं की सटीक व्याख्या होती है । इस सिद्धांत का नाम है – ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ .

गोल्ड और ऐलड्रिज़ ने  अपने निबंधों में यह काफी हद तक सिद्ध कर दिया कि जीव विकास की प्रक्रिया हर समय एक ही रफ़्तार से सीधी रेखा में नहीं चलती बल्कि इस प्रक्रिया में धीमें और लटकते हुए अंतरालों में कुछ पड़ाव ऐसे आते हैं जब जीव विकास की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है । इस तीव्र दौर में धीमें विकास के दौरान जमा हुए मात्रात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तनों में बदल जाते हैं । गोल्ड के अनुसार जीव विकास सदैव प्रगतिशील ही नहीं होता, बल्कि कई बार विपर्ययवादी भी होता है, क्योंकि कई जीव जीवित रहने के लिए दूसरे जीवों के परजीवी बन जाते हैं, जैसे की वृक्षों पर लटकती हुई अमरबेल, अलग-अलग परजीवी कीड़े आदि ।

डार्विन इस प्रकार की संभावना से अनजान नहीं थे । ‘जीव की उत्पति’ के पांचवें एडिशन में डार्विन लिखते हैं, “समय के जिन खण्डों में प्रजातियों में परिवर्तन आते हैं, वे प्रजातियों के लगभग स्थिर रहनेवाले समय खण्डों के मुकाबले छोटे होते हैं ।” चार्ल्स डार्विन, जीवों की उत्पति, १८६९ लन्दन, जॉन मरे, पांचवां एडिशन, पेज -५५१)

इस सिद्धांत के प्रस्तुत करने के समय से ही गोल्ड और ऐलड्रिज़ का बाकी बहुत सारे विज्ञानियों द्वारा निरंतर विरोध होता रहा है क्योंकि छलांगों द्वारा जीव विकास का सिद्धांत पूंजीवाद के बंधक चाकर गुलामों को हजम नहीं होते और वे धीमें और लटकते हुए बदलावों के सिद्धांत को ही एकमात्र सही सिद्धांत सिद्ध करने पर तुले रहते हैं । इस विरोधी शिविर में एक बार रिचर्ड डाकिनज़ और जॉन मेरिनार्ड स्मिथ प्रमुख रहे हैं । अपने मृत्यु के वर्ष, २००२ तक, गोल्ड ने अपने सिद्धांत की डटकर हिमायत की और अन्य तरह के शंकों का निवारण किया. चार्ल्स डार्विन के बाद, स्टीफन जे गोल्ड को जीव विकास के क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा नाम माना जाता है ।

गोल्ड के सिद्धांतों की रोशनी में आज, छलांगों द्वारा जीव विकास के सिद्धांत को अधिकाधिक मान्यता मिल रही है और जीव विकास विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे तरीकों की खोज हो रही है जो इस सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं ।

गोल्ड अपनी पुस्तक ‘पांडाज थंब’ में लिखते हैं, ” सोवियत यूनियन में विज्ञानियों को एक अलग तरह की दार्शनिक शिक्षा मिलती है – एंगेल्स द्वारा, हीगेल से लेकर, और विकसित किये गये द्वंदात्मक नियमों की शिक्षा. द्वंदात्मक नियम स्पष्ट तौर पर धीमे-तेज विकास के हामी हैं. वे मात्रा के गुणों में परिवर्तन की बात करते हैं । यह अजीब लग सकता है, पर ये बताते हैं कि किसी प्रणाली में धीरे-धीरे इकठ्ठे होनेवाले परिवर्तन या तो दबाव के परिणामस्वरूप वह प्रणाली ऐसी स्थिति में पहुँच जाती है, जब एकदम छलांग द्वारा परिवर्तन होता है. पानी को गर्म करो, यह उबल जायेगा, मजदूरों को अधिकाधिक दबायो, क्रांति हो जाएगी । ऐलड्रिज़ और मुझे यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि बहुत पहले रूसी जीवाश्म विज्ञानी भी हमारी ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ मॉडल जैसे जीव विकासी सिद्धांतों की धारणाएं रखते हैं । ”

अपनी पुस्तक ‘डार्विन के बाद अब तक’ में, गोल्ड, एंगेल्स के आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ का वर्णन करते हुए लिखते हैं, ” असल में, उन्नीसवीं शताब्दी में एक बहुत ही शानदार आलेख प्रकाशित हुआ, जिसके लिखनेवाले के बारे में जानकर, बहुत से पाठक हैरान हो जायेंगे – फ्रेडरिक एंगेल्स । (बेशक यह जानकर, कि एंगेल्स भी प्राकृतिक विज्ञान में गहरी दिलचस्पी रखते थे और वे अपने दर्शन ‘द्वंदात्मक भौतिकवाद’  को एक मजबूत आधार पर निर्मित करते हैं । वे अपनी पुस्तक ‘प्रकृति में द्वंदवाद’ को पूरा न कर सके ) उनकी मृत्यु के बाद, १८९६ में एंगेल्स द्वारा लिखित ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ प्रकाशित हुई  पर पश्चिमी विज्ञान पर इसका कोई असर न हुआ ।” क्योंकि उनके  अनुसार पश्चिमी सोच में पक्षपात बहुत गहराई तक पैठ कर चुका था ।

असल में देखा जाये तो डार्विन के सिद्धांतों पर होनेवाले सैद्धांतिक हमले असल में द्वंदात्मक भौतिकवादी दर्शन को नकारने के नाकाम परन्तु योजनाबद्ध प्रयत्न हैं । आज की परिस्थितियों में परजीवी हो चुके पूंजीवाद को सबसे अधिक खतरा मार्क्सवादी भौतिकवादी दर्शन से है क्योंकि यह वह दर्शन है जो समाज को गति में दिखाता है और वर्णन करता है कि प्रत्येक वस्तु गति में है । जैसे जीव विकास एक निरंतर गतिमान क्रिया है, वैसे ही, मानव समाज भी निरंतर गतिमान है । मानव समाज में भी प्राचीन मिट जाता है और नया उसका स्थान ग्रहण कर लेता है । इसी तरह आरंभिक कबीलाई समाजों के स्थान को गुलामदारी प्रबंध ने ग्रहण किया और फिर सामंतवाद और पूंजीवादी प्रबंध । प्रत्येक प्रबंध अपनी उम्र भोगकर इतिहास के रंगमंच से रुखसत हो गया और उसके स्थान को नये प्रबंध ने संभाल लिया । पूंजीवाद के चाकर इस सच्चाई को नकारने के लिए, हर उस सोच, वैज्ञानिक खोज या मानवीय कोशिश को सबसे पहले दबाने की कोशिश करते हैं, अगर ऐसा नहीं होता है, तो उसकी इस तरह से व्याख्या करने की कोशिश करते हैं कि उसके अन्दर का भौतिकवादी तत्त्व ख़त्म हो जाये और वह पूंजीवादी प्रबंध को सदैव से न्यायोचित ऐलान करने लगे ।

उन्नीसवीं शताब्दी में, जब पूंजीवाद के उभार का दौर था, उस वक्त पूंजीवादी चाकरों की कोशिश होती थी कि किसी वैज्ञानिक खोज से होनेवाले फायदा अधिकाधिक उठाया जाये और इस खोज से आम लोगों तक पहुँचने वाली भौतिकवादी चेतना को किसी न किसी तरह से दूर किया जाये । इससे भी अधिक, अगर हो सके तो उन खोजों को पूंजीवादी-चिरस्थायी तौर पर लोगों की नजरों में परिपक्व सिद्धांत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाये । इस प्रकार फासीवाद को जायज ठहराने के लिए पूंजीवादी चाकरों ने विज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया । नस्ल सुधारने को एक विज्ञान का दर्जा दिया गया । इस तथाकथित विज्ञान के आधार पर उन्नीसवीं शताब्दी के पूरार्द्ध में अमरीका में २०,००० लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गयी और नाज़ी जर्मनी में ३.७५,००० लोगों को नपुंसक बना दिया गया । इस काम को सिरे चढाने के लिए बाकायदा कानून बनाये गये । अमरीका के लगभग सभी राज्यों में कानून बनाकर नस्ल सुधारने के विभाग तक बनाये गये ।

विज्ञान के नामपर इस प्रकार के मानवता विरोधी कारनामे बाद में भी जारी रहे । बेशक उपरोक्त किस्म के नस्ल सुधार को विज्ञान द्वारा रद्द किया जा चुका है, पर यह अलग-अलग रूपों में सामने आने लगा जैसेकि साईको सर्जरी । इसके अनुसार सामाजिक समस्याओं का इलाज भी दिमाग का आपरेशन करके किया जा सकता है । इस तरह के ही दो तथाकथित विज्ञानी, वर्तमान मार्क और फ्रैंक इरविन ने यह सुझाव भी पेश कर दिया कि शहरों में होनेवाले दंगे भी दिमागी परेशानी के कारण होते हैं और इसका इलाज झुग्गियों में रहनेवाले लोगों के नेताओं के आपरेशन द्वारा हो सकता है और ऐसा किया भी गया । ऐलन वूड्स और टेड ग्रांट के अनुसार – १९७१ में, अमरीका में ऐसे ही लोगों का इलाज करने के लिए उचित ‘बीमारों’ की सूची मांगी गयी । आपरेशन द्वारा इलाज के लिए भेजे गये आदमियों में अप्रैल, १९७१ के कामगारों की हड़ताल के नेताओं में से एक शामिल था । ये हैं पूंजीवादी चाकरों के कारनामे और वैज्ञानिक खोज !

जीव विज्ञान से बाहर दूसरे विज्ञानों में भी यही स्थिति है । क्वांटम भौतिकी के दार्शनिक नतीजे ‘कोपनहेगन व्याख्या’ इसकी ज्वलंत मिसाल है । जैसे-जैसे पूंजीवाद और अधिक परजीवी होता जा रहा है, उतना ही अधिक यह विज्ञान-विरोधी भी होता जा रहा है । पहले तो यह विज्ञान से निकलने वाले भौतिकवादी परिणामों को बिगाड़ता था, पर अब तो यह विज्ञान के विकास में ही रूकावट बनता जा रहा है ।

पूंजीवाद ने पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाले जीवाश्मों को पण्य (commodity) बना दिया है । जीवाश्मों की पूरी दुनिया में फैली एक मंडी है । पूरी मानवता की धरोहर, ये जीवाश्म कुछ लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति बनते जा रहे हैं । ऐसा एक उदाहरण एक ४७ मिलियन वर्ष पुराने एक कैमूर के जीवाश्म का है । यह अभी-अभी ‘ढूँढा’ गया । यह जीवाश्म दूध पिलाने वाले ऊपरी श्रेणी के और आरंभिक दूध पिलाने वाले प्राणियों के बीच एक महत्त्वपूर्ण लिंक है । पर यह जीवाश्म १९८३ से लेकर २५ वर्षों तक एक जीवाश्म इकठ्ठे करने के शौक़ीन व्यक्ति की व्यक्तिगत सम्पत्ति बना रहा । इस प्रकार और भी जीवाश्मों को, जो व्यक्तिगत सम्पत्ति हैं, किराए पर खोज-कार्यों के लिए दिया जाता है ।

मेडिकल क्षेत्र के बारे में तो जितना कहा जाये उतना ही कम है । दवा कम्पनियां, उस खोज-कार्य जिसमें से मुनाफे की संभावना कम हो या मुनाफे पर चोट करता हो, पर धेला भी नहीं खर्च करतीं । ऐसे कार्यों के लिए अक्सर लोगों को जेब से खर्च उठाना होता है या फिर सरकारों के सामने नाक रगड़नी पड़ती है । बहुत से ऐसे खोज-कार्य बीच में ही बंद हो जाते हैं या फिर बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं ।

स्टेम सैल रीसर्च का भी इसीलिए विरोध हो रहा है । बेशक यह विरोध नैतिक और धर्म के चोगे के नीचे हो रहा है । इसका विरोध करनेवाले भी वही हैं, जो समलैंगिक और गर्भपात संबंधी कानूनों का विरोध करते हैं । और इन फासीवादी समूहों को आशीर्वाद किसका है, यह भी सबको पता है ।

इसी प्रकार १९९० में शुरू हुई, बैटरी से चलनेवाली बिजली की कार की परियोजना भी तेल कंपनियों, ऑटो कंपनियों और अमरीका सरकार की मिलीभगत से ठप होकर रह गयी है और यह कार कभी भी सड़क पर नहीं उतर सकी । इस बैटरी से चलनेवाले व्हीकल ने जहाँ प्रदुषण को कम करना था, वही तेल की खपत भी कम करनी थी, पर यह सब तेल कम्पनियों को किस तरह बर्दाश्त होता, इसलिए मिलमिलाकर पूरी परियोजना को कोल्ड स्टोर में रख दिया गया ।

इस प्रकार साफ़ है कि लोगों में भौतिकवादी चैतन्य के प्रसार को रोकने के लिए और इसे कुंठित करने के प्रयासों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में, जीव विकास के सिद्धांत पर, जोकि उतने ही प्रमाणों से सिद्ध हो चुके हैं जितने प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है पृथ्वी प्लेट जैसी नहीं, बल्कि गेंद जैसी, सूर्य पृथ्वी के नहीं, पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और सूर्य और चन्द्र ग्रहण किसी राहू-केतू के कारण नहीं बल्कि सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा के एक रेखा में आ जाने से लगते हैं, विवाद पैदा कर वैज्ञानिक प्राप्तियों और सिद्धांतों के उन क्रांतिकारी अंशों को कमजोर करने की कोशिशे हो रही हैं जो किसी भी वस्तु के चिरस्थाई होने की अवधारणा के परखचे उड़ा देते हैं । इसके साथ ही विज्ञान और दर्शन को मानवता की भलाई के लिए उपयोग के स्थान पर पूंजीवाद की पूरी अधिसंरचना इन्हें मुनाफे की चौहदी में कैद करने और श्रमिक लोगों की अधिकाधिक रत निचोड़ने के साधन मात्र बनाने के लिए दिनरात पंजों के बल खड़ी रहती है । इसलिए वर्तमान समय में, न्याय और समानता पर आधारित शोषण रहित समाज के सृजन का स्वप्न देखनेवाले लोगों के लिए यह जरूरी है कि भौतिकवादी वैज्ञानिक चैतन्य के हक़ में खड़े होने और डार्विन के सिद्धांतों समेत विज्ञान के हर क्षेत्र में हो रहे विचारवादी हमलों का और वैज्ञानिक तथ्यों को विकृत करके पूंजीवाद की सेवा करनेवालों का मुंह-तोड़ जवाब देने के लिए तैयारी करें ।

पंजाबी पत्रिका, नवें समाजवादी इन्कलाब दा बुलारा ‘प्रतिबद्ध’ के जनवरी, २०१० अंक से आभार सहित |

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हैती, भूकंप,तथाकथित ज्योतिष शास्त्र, पूंजीवाद और समाजवाद का परस्पर गहरा संबंध है, भाई !

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पूंजीवादी रूस के शहर नेफ्तेगोर्स्क में 27 मई 1995 के रेक्टर पैमाने 7.6 के भूकम्प ने इसकी कुल आबादी 3500 में से 2000 लोगों की जान ली. इस त्रासदी पर माइक देविड़ो ने अपनी ‘ मास्को डायरी  : रूसी आपदाएं, प्राकृतिक और अप्राकृतिक’ में समाजवादी सोवियत यूनियन के शहर ताशकंद के अप्रैल  26, 1966 के रेक्टर पैमाने 7.5 के भूकंप पर समाजवादी राज्य और उसकी जनता के बारे में लिखा है कि किस प्रकार राज्य और जनता का सैलाब इस शहर के लोगों की मदद के लिए उमड़ पड़ा. अविभाजित सोवियत यूनियन में पूंजीवाद की पुन:स्थापना हो चुकी थी लेकिन समाजवादी भावना का , पूर्ण रूप से, अंत नहीं हुआ था. अपनी यादों को ताज़ा करते हुए वे लिखते हैं,

“भूकम्प जिसने सखालिन द्वीप के शहर नेफ्तेगोर्स्क को गर्क कर दिया है, इससे भी बड़ी त्रासदी का प्रतीक है – उल्ट रूसी इन्कलाब, जिसने रूस और भूतपूर्व सोवियत यूनियन को समतल कर दिया है. प्राकृतिक आपदाएं सामाजिक व्यवस्थाओं की सीमाओं में फर्क करना नहीं जानती. लेकिन सोवियत यूनियन 26 अप्रैल 1966 के भूकम्प जिसने ताशकंद को तबाह कर दिया, पर किस प्रकार कार्यशील होता है और किस प्रकार पूंजीवादी रूस नेफ्तेगोर्स्क के भूकम्प और संभावित दुर्घटनाओं से निपटता है, में अंतर इतना साफ़ है कि वह अपनी कहानी स्वयं बयान करता  है.

मैं 1969 में ताशकंद में था. मैंने उज्बेकिस्तान की राजधानी ( 10 लाख की जनसंख्या का शहर) के जिंदा बचे लोगों से, उनके दहशत के न केवल किस्से ही सुने हैं बल्कि मैंने देखा है – ताशकंद को, सभी 15 गणराज्यों द्वारा, पुनर्निर्मित रूप में और पहले से भी अधिक सुन्दर रूप में ! वह भी केवल तीन वर्षों में ! 35 प्रतिशत शहर तबाह हो गया था. 95,000 लोग बेघर हुए, 45 प्रतिशत संयंत्रों को भारी नुकसान पहुंचा. 180 स्कूल, 600 दुकाने ढह-ढेरी हो गईं. भूकम्प के कुछ घंटों बाद ही CPSU   के महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव और प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन ताशकंद आ गए. USSR की सेना द्वारा तुरंत हरकत करने की उसकी प्रकृति ने  ‘महान राष्ट्रीय युद्ध” के दौरान सभी लोगों के हरकत में आने की यादों को ताज़ा कर दिया. प्रत्येक गणराज्य से लोग ताशकंद के लिए उमड़ पड़े. मास्को, लेनिनग्राद, रूस गणराज्य के सभी भागों से, उक्रेन से, अजेबेर्जान से, जोर्जिया, कजाखिस्तान, बेलारूस और बाल्टिक गणराज्यों से निर्माणकर्मी, ताशकंद के लिए रवाना हो गये. इन गणराज्यों ने वहाँ राहत सामग्री, औजार, और अपनी मशीने उतारना शुरू कर दिया. अपनी छुट्टियों का त्याग करते हुए सैनिक और विद्यार्थी उनसे जा जुड़े. ताशकंद के लोगों ने उनका अपने मुक्तिदाताओं के रूप में स्वागत किया. निर्माणकर्मी मेक-शिफ्ट बैरकों में दो से तीन वर्षों तक रहे.

सितंबर तक स्कूल पुन: खुल गये और 20,000 अपार्टमेंटों का निर्माण कर लिया गया – जो पिछले वर्षभर में निर्मित हुए कुल अपार्टमेंटों की संख्या का दोगुना था. लेकिन प्रतीकात्मक रूप से, जो चीज मैंने पाई, वह थी, “ताशकंद के पुन:निर्माण के समय समग्र सोवियत भावना” – प्रत्येक गणराज्य की विशेष भवन निर्माण शैली और कला, इस नए बसे शहर का अंग बन गयी.

और नेफ्तेगोर्स्क ? खो गया है वह महान परिवार जो अपने ही जैसे परिवार के दुःख भरे हालात से विचलित हो गया था ! खो गयी है वह बहन-भाईचारे की भावना जो एक को दूसरे से बाँधे हुए थी ! वर्तमान “स्वतंत्र” गणराज्यों से सांत्वना और टोकन सहायता आई है, पर यह आई है अजनबियों से ! पूंजीवादी रूस ने नेफ्तेगोर्स्क के सभी भूकंपलिख स्टेशनों का “मितव्ययीकरण” कर दिया है.  विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वे चालू हालत में होते, तो तबाही की समय पर चेतावनी मिल सकती थी.

राष्ट्रपति येल्स्तिन इस शहर में अभी तक नहीं आये हैं. भूकंप के कुछ दिनों बाद, प्रधानमंत्री  चेर्नोगिर्दिन ने अपनी छुट्टियाँ समाप्त कीं, लेकिन मास्को जाने के लिए. इतना ही काफी नहीं है कि प्राकृतिक आपदाओं  से निपटने के लिए दृष्टिकोण में इतना बड़ा अंतर है, बल्कि सच्चाई यह है कि अब आपदाएं पूंजीवादी रूस और ‘स्वतंत्र’ गणराज्यों के लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन गयी हैं. भाई-भाई के बीच खून-खराबा, चैचैनया का नागरिक युद्ध, 20 लाख रूसी शरणार्थी जो युद्ध से भाग आये हैं, और उनके साथ केन्द्रीय एशिया और बाल्टिक के “स्वतंत्र” गणराज्यों द्वारा भेदभाव, नागोमों काराबाख में आर्मीनिया युद्ध के शरणार्थी; माल्डोवा – प्रेदानेस्त्रोवा, ओसेतिया इंगुश गणराज्य, अब्कासिया; जोर्जिया – भूतपूर्व सोवियत यूनियन का  कोई भी ऐसा अंग नहीं है , जो सामाजिक तबाही और मानव-त्रासदी से अछूता हो. और इसके साथ ही हमें शामिल करना चाहिए मास्को के नरसंहार को. 1988 के आर्मीनिया के भूकंप से तबाह शहर अब तक  भी पुन: निर्मित नहीं हो सके हैं . ये समाजवाद के अवरोहण से, अपराधी पूंजीवाद के पोषण के लिए, वसूली करने की क्रूरता के साक्षी हैं. आर्मीनिया के येल्स्तिनों ने भाई को भाई से लड़कर मरने के लिए करोड़ों खर्च कर दिए हैं और भूकंप से प्रभावित 2 लाख से अधिक लोग अस्थायी घुरनों में रहने को विवश हैं. ग्रोस्नी और नेफ्तेगोर्स्क, स्तालिनग्राद और ताशकंद में यही फर्क है.

यह फर्क पूंजीवादी रूस और भूतपूर्व सोवियत यूनियन के लोगों का साये की तरह पीछा करता है. पायनियर कैम्प या तो बंद कर दिए गए हैं या फिर उनका व्यवसायीकरण हो गया है. काले सागर के अनापा में छुट्टियाँ बिताने का प्रति माता या पिता और एक बच्चे का 21 दिनों का खर्च 4,500,000 से 5,000,000 रूबल तक है. सोवियत ज़माने में यह खर्च 200 रूबल था जिसका 70 प्रतिशत ट्रेड युनियाने देती थीं. नेफ्तेगोर्स्क के भूकंप ने कड़वाहट में ही बढौतरी की है. तबाही का लगातार भरता हुआ यह वह जाम है जिसे रूस और भूतपूर्व गणराज्यों के लोग पी रहे हैं.”

लेखक के उपरोक्त संस्मरण को प्रकाशित करके हम साबित करना चाहते हैं कि समाजवाद और पूंजीवाद , भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाएं और तथाकथित ज्योतिष अंकविज्ञान आपस में जुड़े हुए हैं, क्योंकि समाजवाद प्राकृतिक आपदाओं से निपटते हुए मानव की जरूरतों और  गौरव की रक्षा करता है. जबकि तथाकथिक ज्योतिष अंकविज्ञान का मकसद पूंजीवाद की तरह ही, मानव द्वारा मानव की मजबूरी और अज्ञानता से लाभ कमाना होता है. पाठकों को भूलना नहीं चाहिए कि जब तक समाजवाद, हमारी पृथ्वी के एक बड़े हिस्से पर, विद्यमान था, तो इसके डर के चलते, पूंजीवाद वह सभी  सहूलियतें  देता रहा जो समाजवाद का अभिन्न अंग होती हैं. और अब उसे इन सहूलियतों जैसे आवास, शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के “मितव्ययीकरण” और निजीकरण को उदारवादी नीतियों के रूप में प्रचारित करके और लागू करके, मुनाफे की हवस की पूर्ति होने पर, मज़ा आता है. उदारीकरण से इनका अर्थ पूंजीपतियों के लिए “उदार” और मेहनतकश जनता के प्रति “क्रूर” होना होता है.

दूर जाने की जरूरत नहीं है. हमारे देश में कुछ वर्ष पूर्व आई  सुनामी और गुजरात के भूकम्प-पीड़ितों  के लिए आई अंतरराष्ट्रीय मदद को पीड़ित लोगों तक पहुँचाने के लिए सक्रिय नौकरशाही द्वारा आपस में बंदरबांट के, हम चश्मदीद गवाह हैं. ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि, पूंजीवादी समाज द्वारा निर्मित मानव और उसके दूसरों के कपड़े तक उतार लेने के संस्कार, उससे उसके इन्सान होने के मायने ही छीन लेते हैं.

एक लंबे समय तक हमारी पृथ्वी के एक बड़े हिस्से पर समाजवाद रहा है. ऐसा नहीं है कि समाजवाद ने भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना न किया हो. पाठकों को इनका अध्ययन करना चाहिए. लेकिन मुख्य मुद्दा पूंजीवादी समाज और समाजवादी समाज के उदेश्य में फर्क का है. एक के केंद्र में व्यक्तिगत मुनाफे की हवस है तो दूसरे के केंद्र में पूरा मानव समाज और उसकी भलाई. मानव के साथ व्यवहार करते समय पूंजीवाद को फ़िक्र होता है कि किस प्रकार उसका शोषण किया जाये. इस उद्देश्य की पूर्ति हेतू वह मनुष्यों को अलग-अलग  स्थानों पर, चालाकी या धूर्तता से, ‘ठिकाने लगाने’  – जहाँ उनका अधिक से अधिक शोषण हो, की फ़िराक में लगा रहता. जबकि समाजवाद में , जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं, मनुष्य नहीं बल्कि वस्तुओं का प्रबन्धन स्थान ले लेता है. इस समाज को इंसानों को ‘ठिकाने लगाने’ का कतई फ़िक्र नहीं होता – इसे फ़िक्र होता है कि किस प्रकार मानव की जरूरतों को केंद्र में रखकर उत्पादन किया जाये और वस्तुओं को जरूरतमंदों तक पहुँचाया जाये. किसी भी रूप में मुनाफा, समाजवादी समाज का उद्देश्य नहीं होता.

वैज्ञानिक विकास और तकनीक के तेज विकास की इस इक्कीसवीं शताब्दी में “हैती के भूकंप” से पैदा हुई प्राकृतिक त्रासदी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

मानव आदिम युग से आधुनिक युग तक, जीवन के संघर्ष में, प्रकृति के साथ अपने द्वंदात्मक रिश्तों की बदौलत, संघर्ष करता हुआ, विकास की मौजूदा मंजिल तक पहुंचा है. विज्ञान और तकनीक के मौजूदा स्तर ने ऐसा भौतिक आधार तैयार कर दिया है, जिसके द्वारा भूख, कंगाली और आवास की समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है. भूचाल और सुनामी जैसे कहर से घटित होनेवाली तबाही पर, बेशक पूरी तरह से नहीं, पर काफी हद तक निपटा जा सकता है. प्राकृतिक विपदाओं की पूर्व-सूचना हासिल करनेवाले अन्वेषण कार्यों को तरजीह देनी चाहिए. भवन-निर्माण और आवासीय घरों के निर्माण की ऐसी तकनीक विकसित करने पर जोर देना चाहिए, जिनसे प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए, कम से कम नुकसान हो.

कौनसी समस्या है जो इस तरह के कार्यों को अंजाम देने में रूकावट बनती है ? दूसरे विश्व-युद्ध के समय ब्रिटिश सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार रहे, प्रसिद्ध विज्ञानी जॉन डेस्मोंड बरनाल ने लिखा है, ” प्रचुरता और अवकाश के एक युग की समूची  संभावनाएं हमारे पास हैं, लेकिन हमारा यथार्थ एक विभाजित विश्व का है, जिसमें इतनी भूखमरी, मूर्खता और क्रूरता है जितनी आज तक कभी नहीं रही.” – विज्ञान की सामाजिक भूमिका, पेज 7. हैती के भूकंप  में लाखों लोगों की मौत, भारी गिनती में बेघर और जख्मी लोगों के दुखों और मुसीबतों ने, सभ्य समाज को हिला कर रख दिया है.

एक ब्लॉगर सज्जन का प्रश्न है कि हैती, भूकंप, ज्योतिषशास्त्र , समाजवाद और पूंजीवाद का आपस में क्या संबंध है ? शायद हमारे यह विद्वान सज्जन, जानबूझ कर, अपनी किसी मजबूरी के चलते, इतने महत्त्वपूर्ण प्रश्न को, मज़ाकिय ढंग से उछाल रहे हैं. आज साधारण लोग भी समझते हैं कि मानव-विश्व के निरंतर विकास के चलते, प्राकृतिक-विश्व से दो-चार होने की मानव-सामर्थ्य में निरंतर बढौतरी हुई है. आदिम युग में मौजूद प्रकृति की ओर से प्रस्तुत लाखों चुनौतियों पर वर्चस्व हासिल कर, समाज के विकास को गति प्रदान की. बड़ी-बड़ी नदियों पर बाँध बनाकर, भयंकर तबाहियों पर काबू पाया जा चुका है. तकनीक के विकास से, पैदावार के क्षेत्र में, असीम बढौतरी हुई है. हर युग में, पैदावार का स्तर और उसके वितरण का तरीका ही, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संरचना को तय करता है. मानव-समाज, आदिम कबीलाई सामाजिक संरचना से लेकर, गुलामदारी, सामंती और पूंजीवादी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं से भी आगे समाजवाद के प्रारंभिक प्रयोग भी कर चुका है.

प्राकृतिक-विश्व और मानव-विश्व के संबंध सदैव एकसार नहीं रहे हैं. इन संबंधों के विकास ने मानव को, प्रकृति की विध्वंसकारी शक्तियों पर वर्चस्व हासिल करने के योग्य बनाया है. प्रकृति का हिस्सा होते हुए भी, प्रकृति और मानव के संघर्ष में, मानव ने प्रकृति को अपने हित में बदलते हुए, लगातार स्वयं को भी बदला है.

पूर्व पूंजीवादी समाजों में, मानव और प्रकृति के संघर्ष में, प्रकृति से हुई छेड़छाड़, समूचे प्राकृतिक-विश्व को, कोई उल्लेखनीय हानि नहीं पहुंचाती थी. मानव द्वारा प्रकृति के खजानों के उपयोग दौरान होनेवाले नुकसान, प्रकृति द्वारा स्वयं पुन: भरपाई के सामर्थ्य के दायरे का, उल्लंघन नहीं करते थे.

हमारा इस तर्क से कोई मतभेद नहीं है कि भूकम्प और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएं, पृथ्वी की उत्पति के समय से ही, यानी लाखों-करोड़ों वर्षों से ही, घटित होती आ रही हैं. प्राकृतिक परिघटनाओं के अपने नियम हैं, जिनकी बदौलत पृथ्वी के अंदर और बाहर के वातावरण में घटित होनेवाली हलचल, कई बार भयानक तबाही का सबब बनती है. इस बात से भी सभी सहमत हैं कि जंगलों की तबाही, मशीनरी के अंधाधुंध उपयोग, जंग-युद्धों में उपयोग होनेवाले बारूद और रासायनिक हथियार और परमाणु तजुर्बों से पैदा होनेवाले प्रदुषण से प्रकृति का संतुलन लडखडा रहा है. प्रकृति अपने जख्मों की बहाली के लिए, सचेत मानव प्रयास की मोहताज हो गयी है.

मतभेद इस सच की पेशकारी को लेकर है. बड़ी चालाकी से, तमाम मानव जाति को, इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर, मुजरिम अपने गुनाहों पर पर्दा डाल देता है. कौन है वह मुजरिम, जो इक्कीसवीं शताब्दी के रोशन दिमाग इन्सान को भी, चकमा देने में कामयाब हो जाता है ? इस सवाल के जवाब से पहले, हमारे लिए, अपने वर्तमान और भूतकाल  के संबंधों के बारे में, थोड़ी सी चर्चा जरूरी है.

आज मानव के पास ज्ञान का एक बड़ा खजाना मौजूद है. इसके अलावा, समस्त मानव जाति को खुशहाल और बढ़िया जिंदगी मुहैया करवा सकने के सभी साधन मौजूद हैं. विज्ञान और तकनीक के विकास ने, वह भौतिक आधार तैयार कर दिया है, जिसपर, ऐसा समाज निर्मित होना संभव है, जहाँ भूखमरी और बिमारियों समेत, हर किस्म के अभाव पर वर्चस्व हासिल किया जा सकता है.

अपने आरंभिक दौर में, मानव प्रकृति की शक्तियों के अधीन था.  आदिम समाज मजबूरी का साम्यवाद था. उत्पादक शक्तियों के विकास के एक विशेष पड़ाव पर, मानव समाज वर्गों में – मालिक और गुलामों में विभाजित हो गया. यह सब कैसे हुआ? समाज विकास के किन नियमों ने, उन ऐतिहासिक परिवर्तनों को दिशा और गति दी, यह एक अलग विषय है. मानव-संस्कृतियों के इतिहास में, अलग-अलग भौतिक भूभागों में, वहां के वातावरण और ऐतिहासिक परस्थितियों की विभिन्नताओं के चलते, अपनी-अपनी विशेषताएँ मौजूद थीं, जिनके कारण वे अपनी अलग पहचान रखते हैं. परंतु ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि अपनी सभी विभिन्नताओं के बावजूद, प्रत्येक भूभाग के इतिहास में, कुछ चीजें साझी हैं. मिसाल के लिए, सभी की सभी सभ्यताएं, अपने-अपने विशेष लक्षणों के बावजूद, आदिम समाजवादी समाज, गुलामों-मालिकों के समाज और सामंतवादी सामाजिक-राजनीतिक आर्थिक प्रबंधों के दौर में से गुजरी हैं.

आज का युग, पूंजीवाद का युग है. इंग्लैण्ड के औद्योगिक इन्कलाब और फ़्रांसिसी इन्कलाब से शुरू हुई, आर्थिक और राजनीतिक तब्दीलियों ने, लगभग समस्त दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. पूंजीवाद के आगमन ने, मध्यकालीन जड़ता को तोड़कर, मानव-सभ्यता को बेहद तेजी से, पहले के मुकाबले विकास के बेहद ऊँचे स्तर पर, पहुंचा दिया. मजदूर वर्ग और मेहनतकश लोगों के आधार पर टिका पूंजीवाद, अपने विकास के साथ-साथ, आम लोगों के लिए भारी मुसीबतें साथ ही लेकर आया. अपने चरित्र के चलते ही, पूंजीवादी विकास समस्त संसार में एकसमान नहीं हुआ. असमान विकास इसके तौर-तरीकों में ही निहित है. पूंजीवादी विकास की आन्तरिक विरोधता के कारण, यह निरंतर मंदी के चक्रों की सजा भुगतता आ रहा है. पूंजीवाद का इतिहास, बस्तीवाद, नवबस्तीवाद के दौरों से गुजरता हुआ, आज नव-आर्थिक साम्राज्यवादी दौर से गुजर रहा है. बीसवीं सदी के आरंभ में ही, पूंजीवाद के साम्राज्यवादी पूंजीवाद की मंजिल में पहुँचने के साथ, इसके चरित्र में अधिकतर परजीविपन आ गया है. साम्राज्यवादी पूंजी ने, जहाँ दुनिया भर के कमजोर राष्ट्रों को, अपने कच्चे माल की मंडियां बनाकर लूटा, वहीं अपने-अपने देश के मजदूरों की लूट की दर को भी लगातार बढ़ाना जारी रखा. परिणामस्वरूप यूरोप के देशों और अमेरिका के मजदूर वर्ग ने, पूंजीवाद की बर्बर लूट के विरुद्ध, शानदार संघर्ष किये. दूसरी तरफ, साम्राज्यवादी पूंजी की लूट के शिकार, तीसरी दुनिया के देशों में, लड़े जानेवाले महान राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों ने, दुनिया में बस्तीवाद का निपटारा कर दिया. पूंजीवाद के इतिहास पर नज़र दौड़ाने पर, जो विशेष लक्षण उभरता है, वह है – विकास की विषमता. विश्व स्तर पर पूंजीवाद विरुद्ध, मजदूर वर्ग की विकसित राजनीतिक चेतना, विचारधारा के रूप में, प्रकट हुई. रूस, चीन, क्यूबा, पूर्वी यूरोप और एशिया के कई देशों में समाजवादी इन्कलाब करके, मजदूर वर्ग ने साम्यवादी समाज के निर्माण के पहले तजुर्बे किये.

बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक विश्व रंगमंच पर, पूंजीवादी राजनीतिक आर्थिक संरचनाओं में भी, भारी फर्क नज़र आते हैं. एक तरफ साम्राज्यवादी पूंजीवाद, अपनी क्रूरता और लूट के सर्वोच्च स्वरूप फासीवाद समेत, अपने देश के मजदूरों और मेहनतकशों और तीसरी दुनिया के देशों की कच्चे माल की सीधी लूट के रूप में मौजूद था. दूसरी ओर तीसरी दुनिया के गुलाम देश, राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के द्वारा, बस्तीवादी गुलामी और अपनी पुरानी सामंती व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे. तीसरी दुनिया के  देशों का आर्थिक-सामाजिक स्तर भी एकसमान नहीं था. अफ्रीका, लातिनी अमरीका, मध्य पूर्व और एशिया के और कई देश, अपने-अपने राजनीतिक-आर्थिक धरातल के अनुसार, अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे. इन नवस्वतन्त्र देशों में क्यूबा, उत्तरी कोरिया, इंडो चीन और चीन जैसे देशों ने, समाजवादी क्रांतियों का रास्ता चुना. तब तक, 1917 का रूसी इन्कलाब, दुनियाभर के मजदूरों के लिए, विचारधारा के क्षेत्र में, उच्च प्रेरणा स्रोत बन चुका था. दुनिया के बड़े हिस्से में, मजदूर और मेहनतकश लोग, हर किस्म की लूट-खसूट ख़त्म करके, कम्युनिस्ट समाज के निर्माण की ओर अग्रसर होने के पहले प्रयोग कर रहे थे. परिणाम स्वरूप, इतिहास ने पहली वार, मजदूर वर्ग की बेमिसाल शक्ति के दर्शन किए.

पूंजीवाद और समाजवाद के संघर्ष के इन पहले प्रयोगों में, मजदूर वर्ग वक्ती तौर पर हार गया है. इन देशों में पूंजीपति वर्ग ने विश्व पूंजीवाद की मदद से, समाजवादी देशों में, पूंजीवाद की पुन:स्थापना कर ली है.

नए आजाद हुए अधिकतर देशों में भी, पूंजीवादी आर्थिक रिश्ते स्थापित हो चुके हैं. आज मोटे तौर पर हमारे देशों में, पूर्व पूंजीवादी आर्थिक-रूपों का निपटारा हो चुका है. राजनीतिक ढांचे के रूप में जहाँ कहीं, पिछड़े सामंती रूप नज़र आ रहे हैं, वहाँ भी आर्थिक-सामाजिक क्षेत्र में, पूंजीवादी रिश्ते अपनी पकड़ बना चुके हैं.

सारांश के तौर पर, अपनी सभी क्षेत्रीय विशेषताओं और विभिन्नताओं के बावजूद, सारा विश्व पूंजीवाद के तर्क अनुसार गतिमान है.

इस व्याख्या की रौशनी में, हम अपने पहले प्रश्न की ओर आते हैं. मानव-विश्व के इतिहास का प्राकृतिक-विश्व पर गहरा असर पड़ता है. आज जलवायु प्रदुषण, ओजोन परत में सुराख़, कार्बन उत्सर्जन, गलेशियारों का पिघलना, वनों की बर्बादी, भूकम्प और सुनामी आदि की चर्चा के समय, विज्ञानी और विद्वान सज्जन, समस्त मानव जाति की गलतियों की ओर  ऊँगली उठाते हैं. इसी मुकाम पर सामाजिक व्यवस्थाओं और प्राकृतिक परिघटनाओं में घटित होनेवाली हलचलों का परस्पर संबंध, महत्त्व ग्रहण करता है. मानव-इतिहास में, पूंजीवादी प्रबंध ही एक ऐसा प्रबंध है, जहाँ पूंजीपति वर्ग की मुनाफे की हवस बेलगाम हो जाती.  इसी मुनाफे की हवस ने, जंगल तबाह कर दिए हैं, पृथ्वी के धरातल तले पानी बेहद घटा दिया है. जंग-युद्धों के लिए और आधुनिक तकनीक के विकास के लिए, विज्ञान का दुरूपयोग किया है. जाने या अनजाने, सारी मानव जाति को, इस तबाही के लिए जिम्मेदार ठहराना, असल मुजरिम को छुपाने या पनाह देने के तुल्य है. यह तरीका पीड़ित मानव-जाति के विरुद्ध, पूंजीपति वर्गों की सेवा करता है.

आज हर क्षेत्र में जो आर्थिक सरगर्मी नजर आ रही है, उसका मुख्य प्रेरणा स्रोत ‘मुनाफा’ है. माल मंडी के लिए उत्पादित होता है, मानव-आवश्यकता के लिए नहीं. परिणाम स्वरूप महंगाई, अन्न का संकट और बेरोजगारी जैसी समस्यायों का हल नज़र नहीं आ रहा.

बेहिसाब उत्पादक क्षमता वाले, भारत जैसे देश की आधी से ज्यादा आबादी, रात को भूखा सोती है.

अति आधुनिक सुविधायों से सुसज्जित हस्पतालों का जाल बिछ जाने के बावजूद, ये सहूलियतें 90 फीसदी जनता की पहुँच से बाहर हैं.

मानव गौरव, पैसे की कमीनी दौड़ तले, कुचला जा रहा है. सभी आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सरगर्मियों का केंद्र मानव न होकर ‘मुनाफा’ हो गया है. यह स्थिति मुठ्ठीभर धन-पशुओं का तुष्टिकरण तो कर सकती है लेकिन करोड़ों मेहनतकश लोगों की जीवन-स्थितियों को बेहतर नहीं बना सकती. मजदूर और मेहनतकश लोगों की मुक्ति और अच्छा भविष्य, इस पूंजीवादी प्रबंध के खात्मे और समाजवादी प्रबंध के निर्माण के संघर्ष से जुड़ा हुआ है. केवल निजी संपत्ति के खात्मेवाले समाजवादी प्रबंध के निर्माण द्वारा ही, सभी लोगों को, अपनी योग्यताओं के सर्वांगीण विकास के लिए, अवसर उपलब्ध हो सकते हैं, जिसके केंद्र में, मुनाफे की हवस में पागल हुए, धन-पशु नहीं, बल्कि आम लोग होंगे. बीसवीं शताब्दी के समाजवादी क्रांतियों के प्रथम चक्र के प्रयोगों ने साबित कर दिया है कि किसी भी अन्य प्रबंध की भांति, पूंजीवादी प्रबंध भी  स्थायी नहीं है. इन इन्कलाबों ने, मजदूर वर्ग की असीम शक्ति और सामर्थ्य को भी इतिहास के रंगमंच पर प्रकट कर दिया है. वक्ती तौर पर, समाजवाद की हार और पूंजीवाद की पुन:स्थापना से, पूंजीवादी शिविर में जो जश्न का माहौल बना हुआ था, उसका भी आर्थिक महामंदी ने निपटारा कर दिया है.

इक्कीसवीं शताब्दी, विश्वभर में, नये समाजवादी इन्कलाबों के अगले चक्र की सदी होगी. जहाँ प्रत्येक मनुष्य के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ, समस्त मानव जाति, प्राकृतिक आपदाओं का मुकाबला करने के लिए, समर्थ होगी.

विशेष आभार : http://www.hartford-hwp.com/archives/63/055.html

अमेरिका में क्रांति नजदीक है : रेमंड लोट्टा – अर्थशास्त्री

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नोट : गिरिजेश राव के एतराज को स्वीकार करते हुए इस वीडियो से संबंधित सामग्री से परिचय करवाने की कोशिश के रूप में, निम्नलिखित सामग्री को हिंदी में छापा जा रहा है.

इस संक्षिप्त से इंटरवियू  में रेमंड लोट्टा का कहना है कि हमारे अधिकत्तर दुखों का कारण है – विश्व पूंजीवाद, जिसका नेतृत्व अमेरिका करता है. जलवायु संकट और मौजूदा वित्तीय संकट जिससे विश्व पूंजीवाद बाहर नहीं निकल रहा है – इसका कारण बाहर नहीं, पूंजीवाद के अंदर, उसकी कार्यप्रणाली की विशेषताओं में ही छुपा हुआ है. इसे उल्ट कर ही हम पूंजीवाद द्वारा निर्मित आपदाओं से मुक्ति पा सकते हैं.

हमारे बुद्दिजीवियों के एक बड़े हिस्से द्वारा २० शताब्दी के कम्युनिस्ट तजुर्बों को एकतरफा ख़ारिज करने का शक्तिशाली रुझान पाया जाता है. यह एक अराजकतावादी दृष्टिकोण है. सही दृष्टिकोण, इन तजुर्बों को इनकी प्राप्तियों और कमियों समेत स्वीकार करने में है जबकि बुद्धिजीवियों के एक बड़े हिस्से द्वारा इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया जाता है. उनके अनुसार समाजवाद के  उन तजुर्बों ने समाजवाद को एक असफल सामाजिक व्यवस्था घोषित कर दिया है. वे इसे तजुर्बे के तौर पर नहीं लेना चाहते. वे समाजवाद से इस प्रकार की अपेक्षा पाले रहते हैं जैसे यह एक पूर्ण प्रणाली हो. वे इसमें किसी भी प्रकार का नुक्स नहीं देखना चाहते जबकि इसका मतलब होगा – गतिहीन और वर्ग-संघर्ष से मुक्त स्थिति. वे यह मानने को तैयार नहीं होते कि पूंजीवाद और समाजवाद में फर्क केवल इतना ही होता है कि सत्ता पूंजीपतियों के हाथ में न होकर मेहनतकशों के हाथ में होती है. वे इल्ज़ाम लगाते हैं कि वहां तानाशाही थी जबकि पूंजीवाद लोकतंत्र को वे एक आदर्श और सबसे बढिया मॉडल होने का श्रेय देते हैं. लेकिन इसकी हकीकत उस वक्त खुल जाती है जब चुनावों में आम आदमी ठगा जाता है और सत्ता सदैव पूंजीपति वर्ग के के पास ही रहती है. रेमंड लोट्टा का कहना  है कि पूंजीवाद भी तानाशाही होता है. एक ऐसी तानाशाही जिसमें पूंजीपतियों की अल्पसंख्यक आबादी मेहनतकशों पर शासन करती है क्योंकि वह उत्पादन के साधनों की मालिक होती है. अपनी इसी सामाजिक हैसियत से वह मेहनतकशों को उजरती गुलाम बना डालती है. जब मेहनतकश आबादी सत्ता हासिल कर लेती है उसे समाजवाद कहते हैं. लेकिन इसका मतलब यह हरगिज नहीं होता कि सामन्तो और पूंजीपतियों के अल्पसंख्यक वर्ग का खात्मा हो गया. वे समाजवाद में मौजूद रहते हैं. उनसे संघर्ष चलता रहता है.

रेमंड लोट्टा का कहना है कि संघर्ष का नतीजा मेहनतकशों की हार में भी हो सकता. चीन में समाजवाद के तजुर्बे के दौरान इसे माओ ने नोट कर लिया था. माओ का कहना था कि क्रांति के बाद क्रांति सतत रूप से जारी रहनी चाहिए, वर्ना देर-स्वर जीती हुई क्रांति हार जाएगी.

सोवियत यूनियन और चीन के तजुर्बे यही कहते हैं. वहां मजदूर वर्ग अपने दुश्मन वर्ग से हार चुका है. दूसरे शब्दों में, क्रांतियाँ असफल नहीं हुई लेकिन वे हारी जा चुकी हैं. वर्ग-संघर्ष समाजवाद का एक बुनियादी लक्ष्ण होता है. समाजवाद अपनी उच्चत्तर मंजिल साम्यवाद में क्यों प्रवेश नहीं कर पाया ?, इस प्रश्न का उत्तर समाजवाद जोकि पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच का संक्रमण काल होता है, में चलनेवाले वर्ग-संघर्ष में ही है जिसके पहले तजुर्बों में मेहनतकश आबादी बुर्जुआ तत्त्वों से मात खा चुकी है. लेकिन मेहनतकशों को यह नसीहत देना कि समाजवाद एक असफल प्रणाली है – इसका मतलब है कि वे समाजवाद पर नए तजुर्बे न करें. क्या इसके बिना उस समाज की स्थापना संभव है जिसे राज्य-विहीन और वर्गविहीन  समाज कहा जाता  है ? हारी हुई क्रांतियों से जरूरी सबक ग्रहण करते हुए, मेहनतकश वर्ग ने नये समाजवादी तजुर्बे हासिल करने है. इसके अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है. उसे अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास से सीखना होता है. इसके विपरीत सिद्धांत-अभ्यास-सिद्धांत एक विचारवादी नजरिया है जिसे मेहनतकश वर्ग ख़ारिज करता है.

“क्या अमेरिका के लोग समाजवाद अपनायेगे ?” इस  प्रश्न के उत्तर में रेमंड लोट्टा का कहना है, ” कठोर शब्दों में कहा जाये तो अभी नहीं”. लेकिन वे क्रांतिकारी लोगों द्वारा क्रांति के लिए की जानेवाली कोशिशों को सघन और व्यापक करने का आह्वान करते हैं.

चुनाव, राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी

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हमने लिखा था कि वर्तमान संसदीय प्रणाली द्वारा मजदूर वर्ग कभी सत्ता प्राप्त नहीं कर सकता. लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि मजदूर वर्ग चुनाव प्रक्रिया में बिलकुल भाग नहीं लेता. एक वोटर के रूप में वह इसमें भाग जरूर लेता है लेकिन प्रभुत्वशाली लोगों में से किसी एक को चुनने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं होता.मजदूर वर्ग और पूंजीपति वर्ग के परस्पर विरोध द्वारा एक्यबद्ध और गतिशील वर्तमान वर्गीय समाज जो कि अलग-अलग पड़ावों से गुजरकर वर्तमान पूंजीवादी जनवादी प्रणाली के साथ प्रकट होता है, अपने पूर्व के वर्गीय समाजों की भांति सम्पत्तिहीन – वर्तमान में सर्वहारा वर्ग को – सत्ता में कितनी भागीदारी दे सकता है (या नहीं दे सकता है), की जाँच-पड़ताल हेतू जरूरी है कि हम कुछ अति महत्वपूर्ण तथ्यों और आंकडों पर नजर दौडाएं जो हाल ही में संपन्न हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में सामने आये हैं.  इससे हम यह भी आसानी से समझ सकते है कि किस प्रकार यह चुनाव प्रणाली पूंजी और जनता के बीच चलने वाले विरोध का हल करती है. चुनावों की हकीकत को जानने के लिए और इस पूरी चुनाव प्रक्रिया की सार्थकता संबंधी आम लोगों में जाकर उनके नज़रिए को जानने की कोशिश करें तो इसकी असलियत को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है. हमारी इस रिपोर्ट का आधार पिछले दिनों संपन्न हुई विधान सभा के चुनावों पर अलग-अलग लोगों के विचार और प्रतिक्रियाएं हैं.

1. पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान चाहे वे राजनीतिक दलों के मंच रहे हों या फिर प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के – बहस का स्तर बहुत निम्न दर्जे का रहा है. इनकी बहस में गंभीर किस्म के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सरोकार गायब थे. राजनीतिक दलों में बहुत निम्न स्तर की लांछनबाजी  देखने को मिली. स्वयं बुर्जुआ वर्ग द्वारा स्वीकृत आचार-व्यवहार का पूर्ण अभाव नजर आया. गंभीर सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों की अपेक्षा, जीत-हार संबंधी जोड़-तोड़, धार्मिक और जाति आधारित प्रतिक्रियावादी समीकरणों द्वारा जोड़-घटा के फार्मूलों की खोज और समीक्षा का प्रभुत्व था.

2. अख़बारों और टीवी पर अपने हक़ में प्रचार करवाने हेतू और अपने विरोधी उम्मीदवार के विरुद्ध -समाचार प्रकाशित करवाने हेतू, लाखों और करोडों के सौदे तय हुए. मीडिया की रिपोर्ट अनुसार कई दैनिक अख़बारों ने २५ से ५० लाख तक के सौदे किये.

3. सारी चुनाव प्रक्रिया इतनी महँगी थी कि देश की बहुसंख्यक आबादी अपने आप ही, इस चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित हो गयी है.  चुनाव दफ्तर से जारी सूचना में उम्मीदवारों के रोजाना खर्च का ब्योरा प्रकाशित किया गया है. इनकी रिपोर्ट के अनुसार कुछ उम्मीदवारों का दैनिक खर्च दो सौ रूपये से तीन सौ रूपये तक का था. इन वेचारे गरीब उम्मीदवारों में कुछ ऐसे उम्मीदवारों के नाम भी शामिल थे जिनकी चुनाव मुहीम की तामझाम, लाम-लश्कर और खर्चीली चुनाव रैलियों की आभा मध्यकालीन युग के राजाओं-महाराजाओं को भी मात दे दे!  चुनाव कमीशन को भले ही यह सब नज़र न आया हो लेकिन आम लोग पानी की तरह बहाए जानेवाले इस धन और शक्ति के प्रदर्शन के प्रत्यक्ष गवाह हैं.

4. वाम संसदीय पार्टियाँ जो सैद्धान्तिक तौर पर लोगों प्रति प्रतिबद्धता का दावा करती रहती हैं – इस सारे दृश्य के आन्तरिक सच का पर्दाफाश करते हुए, मजदूर और मेहनतकश लोगों की चेतना को उन्नत करने की बजाय, लगभग दूसरी पार्टियों की तरह इस्तेमाल होने वाले हथकंडों की नक़ल करती हुई नज़र आयीं. प्रतिस्पर्धा के इस युग में जिस प्रकार मण्डी में छोटा उत्पादन, बड़े स्तर पर होने वाले उत्पादन के आगे, नहीं टिक सकता, उसी तरह, संसदीय वामपंथी पार्टियाँ भी लगातार हाशिये पर आ रही हैं.

लोग चुनावों में हिस्सा क्यों लेते हैं – किस तरह लेते हैं ?

सैद्धांतिक तौर पर कहा जाता है कि चुनाव द्वारा लोग अपनी सरकार चुनते हैं जिसने आनेवाले पॉँच वर्षों के लिए देश या संबंधित राज्य का प्रबंधन संचालित करना  होता है. सरकार इस समग्र राजतन्त्र जिसमें पुलिस, फौज और न्यायपालिका भी सम्मलित होती है, का एक अहम् हिस्सा होती है.  सभ्यता के इतिहास में राज्य-प्रबंधन के सञ्चालन के लिए बननेवाली सरकारों के रूप सदैव एक जैसे नहीं रहे. आदिम समाज के कबीलाई गणराज्यों से चलकर पूरे मध्य युग में राजशाहियों के अलग-अलग रूपों से गुजरते हुए सरकारों का आधुनिक रूप – जिसे जनता की जनता  द्वारा और जनता  के लिए सरकार का नाम दिया जाता है – आज के विश्व में, सरकार का प्रमुख रूप (मॉडल ) है. राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान इसी रूप अथवा मॉडल से संबंधित तथ्यों ने जिस तस्वीर को उभार कर हमारे सामने पेश किया है, उनका संक्षिप्त परिचय और सार निम्नलिखित है.,

1. सबसे पहले, चुनावों के दौरान सबसे अधिक क्रियाशील हिस्सा – राजनीतिक पार्टियाँ और उनके कार्यकर्त्ताओं की बात करें. बड़ी राजनीतिक पार्टियों की टिकट के लिए दौड़, जहाँ प्रचार माध्यम के लिए बड़ा मसाला तैयार करती रही, वहीँ आम जनता में इस संबंधी चर्चा ने पूरी चुनाव मुहीम को दिलचस्प बनाये रखा. टिकट हासिल करने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते हैं – बड़ी गिनती में टिकटों के चाहवान अपने-अपने हक़ में मुहीम लामबद्ध करते हैं.  लोगों की भीड़ जुटाकर दवाब बनाया जाता है. लेकिन दिलचस्प पहलू यह होता है कि वे कौन लोग होते हैं जो इनकी भीड़ जुटाते हैं? ये वहीँ लोग होते हैं जिनकी बहुसंख्यक गिनती को राजनीतिक पार्टियाँ अपने सक्रीय और जमीन से जुड़े हुए कार्यकर्ता बताती हैं. इन्हीं स्थानीय लोगों में, आर्थिक तौर पर प्रभावशाली और राजनीतिक पृष्ठभूमि के परिवारों से कुछ बेहद महत्त्वाकांक्षी नौजवान, नेतृत्त्व की भूमिका निभाते दीखाई देते हैं. गरीब किसान, मध्यम वर्ग और दलित मजदूर वर्ग से भी कुछ लोग , बेशक दूसरे दर्जे की भूमिका निभाने के लिए ही सही, इनका हिस्सा बनते रहते हैं. लोगों के काम निकलवाने के नाम पर बने ये स्वयंभू लोकसेवक, प्रशासन और आम लोगों में मध्यस्ता करने के साथ-साथ, ज्यादातर पुलिस के मुखबिर और टाउट का धंधा करते हैं. किसानों और मध्यम वर्ग का वह हिस्सा जो  पूंजीवाद के विकास के फलस्वरूप उजड़कर ऐयाश, पाकेटमार, चोर, उचका आदि बन जाता है, जिसे मार्क्स लम्पट सर्वहारा कहते हैं, भी इसी तरह का लोकसेवक होता है. ज्यादातर इस प्रकार के लोकसेवकों को, किसी राजनीतिक दल के बड़े नेता की सरपरस्ती हासिल होती है. अक्सर ये छोटे नेता भी अपने साथ, अपनी हैसियत अनुसार, चापलूसों का एक घेरा बनाकर रखते हैं. अपनी इसी हैसियत का प्रयोग ये लोग अपनी आर्थिक हालत को सुधारने के लिए करते हैं. इसमें मुख्य तौर पर सरकारी ठेके लेने के अलावा, पुलिस और राजनीतिक नेताओं की सरपरस्ती में, कई तरह के अवैध धंधे भी शामिल होते हैं. यहीं स्थानीय नेता, शहरों और गांवों में, अपने सरपरस्त  नेता का गुणगान करते हुए, उनकी साफ़-सुथरी और स्वच्छ छवि के व्याखान करते, उनकी शक्ति और सामर्थ्य की कहानिया सुनाते हुए, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री और पार्टी के बड़े नेताओं के साथ उनकी नजदीकी का विश्वास दिलाते हुए, आम वोटरों को अपने मनपसंद लीडर के हक़ में फुसलाते हुए, कभी नहीं थकते. पहले ये नेता, अपने सरपरस्त बड़े नेता के लिए टिकट हेतू भीड़ जुटाते हैं फिर उनकी इच्छानुसार वोट डलवाते हैं. गरीब जनता को मिलनेवाली सरकारी सहूलतें, मिसाल के लिए, बुढापा पेंशन, पीले कार्ड बनवाना, गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को सस्ते रेट का अनाज और मकान  बनवाने के लिए ग्रांट वगैरा, जो आधे-अधूरे तरीके से, केवल मुट्ठीभर लोगों के पास ही पहुंचती हैं – इन्हीं सहूलतों का सेहरा, व्यक्तिगत तौर पर अपने सिर लेते हैं. अपने हक़ में वोट भुगताने के लिए ये नेता जी-जान से कोशिश करते हैं.

2. मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में होनेवाले कुत्ताघसीटी वैसे तो प्रतिदिन चौबीसों घंटे चलती रहती है लेकिन चुनावों के समय इसका नज़ारा बहुत ही दिलचस्प हो जाता है. इन वर्गों से संबंधित लोगों के बयान ही नहीं बदलते, दल भी बदल जाते हैं. आश्चर्य और अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है लेकिन है यह सच कि इन्हीं वर्गों से कुछ लोगों द्वारा एक ही दिन में एक से अधिक दलों में अदला-बदली और आना-जाना होता रहता है  और इस प्रकार अपनी शख्सियत की कायापल्टी करते हुए ये लोग अच्छा खासा मनोरंजक समां भी बांधे रखते हैं.

3. किसी भी चुनाव बूथ पर नजर रखने पर आपको लगेगा कि खाते-पीते घराने के लोग दोपहर से पहले ही अपने मत का प्रयोग कर जाते हैं जबकि सर्वहारा जनता दोपहर बाद आती है. बूथ के आस-पास मौजूद लोगों में चर्चा का  विषय होता है कि मजदूर लोग वोट डालने तब आएंगे जब नकद पैसे वसूल कर लेंगे. इस प्रकार की चर्चा से हम यह गलत निष्कर्ष निकाल लेतें हैं कि केवल मजदूर वर्ग अपना वोट बेचता है लेकिन मध्यम वर्ग नहीं. वह भी प्रभावित होता है, बल्कि ज्यादा प्रभावित होता है. या यूं कहिये कि उसकी प्रभावित होने की औकात ज्यादा है और वह अधिक कीमत लेता है. इस वर्ग का एक हिस्सा राजनीती में इस प्रकार सक्रीय होता है कि वह समाज की बहुसंख्यक  आबादी को प्रभावित करता है और उस बहुसंख्यक आबादी के वोटों को भी वेचने की योग्यता रखता है. मध्यम वर्ग का वोट बेचने का तरीका साधारण न होकर जटिल होता है और जरूरी नहीं होता कि वह मजदूर की भांति मौके पर ही सौदा करे. उसके सौदेवाजी के गुर जटिल और दीर्घकालिक होते हैं. इसी वर्ग ने सरकारी पद,लाइसेंस और ठेके हथियाने होते हैं.इसी वर्ग से उजड़कर लम्पट मजदूर के रूप में प्रकट हुए नए वर्ग  के लोग अपने ही नहीं बल्कि मजदूरों के वोट भी बेच जाते हैं. पूंजीपतियों और धनासेठों से मिलनेवाली सफ़ेद और काले धन की थैलियाँ, बुर्जुआ पार्टियों के लोगों द्वारा, प्राय इन्हीं  लोगों को सौंपी जाती हैं, क्योंकि यही वे लोग होते हैं जो पूंजीपतियों की अपेक्षा मजदूर वर्ग में आसानी से घुल-मिल जाते हैं. उन्हें यह सहूलियत होती है की वे पूंजीपतियों द्वारा लुटाई (???) गई इस धनराशी के एक हिस्से को मजदूरों में बाँट सके लेकिन बड़े हिस्से को स्वयं हड़प कर जाएँ.

4. जहाँ तक मजदूर वर्ग के मतदान करने और वोट बेचने का सवाल है तो जिस प्रकार न चाहते हुए भी वह एक उजरती गुलाम  के रूप में पूंजीपतियों के खेतों और कारखानों में सोलह-सोलह घंटे खटने के लिए विवश होता है – उसे अपनी श्रम-शक्ति को बेचना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार वह मजबूरीवश मतदान करने और वोट बेचने के लिए भी बाध्य होता है. पूंजीपति वर्ग और बुर्जुआ मीडिया के लिए चुनाव भले ही एक जश्न रहा हो लेकिन मजदूर वर्ग से बातचीत करने पर इसकी असलियत कुछ और ही बयान करती नज़र आती है.

5. इस क्रियाशील हिस्से की चर्चा के बाद  लोगों के व्यवहार की चर्चा करें तो जो दृष्टान्त नजर आता है वह एकसार नहीं है. अलग-अलग वर्गों में विभाजित होने के कारण लोग, चुनावों के बारे में एक जैसा दृष्टिकोण नहीं रखते. अमीर लोगों, कारखानेदारों, व्यापारियों, उच्च मध्यम वर्ग,पेशेवर लोग (डॉक्टर वकील आदि) और अमीर किसानों के लिए, सरकार और उसके दरबार में दस्तक देनें का यह एक सुनहरी अवसर होता है. तेजी से अमीर होने की लालसा की पूर्ति हेतू राजतन्त्र और खास करके  नौकरशाही और पुलिसतंत्र के साथ मजबूत गठजोड़ करने के लिए, इस तरह के संपर्क आवश्यक होते हैं. इस कार्य हेतू ये वर्ग चंदे मुहैया करवाते हैं. व्यवहारिक तौर पर ये लोग इस चुनाव प्रक्रिया के साथ पूरी तरह जुड़े होते हैं.

6. देश के उत्पादन के साधनों का मालिक बनी भारत की वर्तमान बुर्जुआ जमात के पास बेचने के लिए वह सबकुछ है जो मजदूरवर्ग ने पैदा किया है. इसी के बदौलत उसकी हैसियत एक अच्छे खरीदार की भी बन जाती है. कहने का अर्थ यह है कि वह बिकता नहीं बल्कि खरीददार होता है. एक वर्ग के रूप में वह अच्छी तरह जानता है कि कौन-कौन से राजनीतिक दल, किस हैसियत और रूप में, किस-किस प्रकार की भूमिका, उसके हितों की रक्षा करने हेतू, निभा सकते हैं. मजदूरों को मजदूरी देते समय कठोर और उग्र स्वभाव का यह पूंजीपति वर्ग इन राजनीतिक दलों को चंदा देते समय एकदम उदार और विनम्र दीखता है.

7. ज्यादातर शहरी और ग्रामीण मजदूर और गरीब किसान और छोटे दुकानदार, जिनकी ज़िन्दगी की खुशहाली के सभी दरवाजे बंद हो चुके हैं, निराशा और बेबसी के शिकार हैं. ये लोग दिल से किसी भी पार्टी या नेता पर विश्वास नहीं करते. ऊपर वर्णित राजनीतिक कार्यकर्त्ता जो अमीर होने की लालसा के चलते, हर प्रकार के नैतिक बंधनों से मुक्त हैं, जब गरीब जनता की बेबसी और मजबूरी को अपने हक़ में भुगतान करवाने में सफल हो जाते हैं, तो यह भ्रम पाल लेते हैं कि गरीब वोटरों को खरीद लिया गया है. हर प्रकार के नशे, पैसा, शराब, धार्मिक और जातीय नेताओं के फरमान और डरावे, इनके आम हथियार हैं.

8. बेहद बुरे, सामाजिक-आर्थिक हालात के प्रतिक्रियास्वरूप कुछ लुम्पन तत्त्व पैदा होते रहते हैं. गरीब आबादी के बीच का लुम्पन हिस्सा, बहुत हद तक और जल्दी ही इन लोगों का दुमछल्ला बन जाता है. पर देखने में आया है कि आम मेहनतकश आबादी का विश्वास यह गँवा चुका है. उत्पादन की क्रिया में जैसे उजरती मजदूर अपनी इच्छा के विपरीत, पूंजीपति की शर्तों पर काम करने के लिए मजबूर है – लगभग उसी तरह अपनी बेबसियों के सदके, यह उनके लिए मतदान करता है.

अपनी प्रसिद्ध रचना ‘परिवार, निजी सम्पति और राज्य की उत्पत्ति’ में फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं,

“इतिहास में अब तक जितने राज्य हुए हैं, उन्में से अधिकतर में नागरिकों को उनकी धन-दौलत के अनुसार कम या ज्यादा अधिकार दिए गए हैं, जिससे यह बात सीधे तौर पर साबित हो जाती है कि राज्य सम्पत्तिवान वर्ग की सम्पत्तिहीन वर्ग से रक्षा करने का एक संगठन है. एथेंस और रोम में ऐसा ही था, जहाँ नागरिकों का संपत्ति अनुसार विभाजन किया जाता था. मध्ययुगीन सामंती राज्य में भी यही हालत थी जहाँ राजनीतिक प्रभाव की मात्रा भू-स्वामित्व के पैमाने से निर्धारित होती थी. आधुनिक प्रातिनिधिक राज्यों में जो मताधिकार-अहर्ता पाई जाती है , उसमें भी यह बात साफ़ दिखाई देती है. तिस पर भी स्वामित्व के भेदों की राजनीतिक मान्यता किसी भी प्रकार अनिवार्य नहीं है : इसके विपरीत, वह राज्य के विकास के निम्न स्तर का द्योतक है. राज्य का सबसे ऊँचा रूप, यानि जनवादी जनतंत्र, जो समाज की आधुनिक परिस्थितियों में अनिवार्यत: आवश्यक बनता जा रहा है और जो राज्य का एकमात्र रूप है जिसमें ही सर्वहारा तथा पूंजीपति वर्ग का अंतिम और निर्णायक संघर्ष लड़ा जा सकता है – यह जनवादी जनतंत्र औपचारिक रूप से स्वामित्व के अंतर का कोई ख्याल नहीं करता. उसमें धन-दौलत अप्रत्यक्ष रूप से, पर और भी ज्यादा कारगर ढंग से, अपना असर डालती है. एक तो सीधे-सीधे राज्य के अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के रूप में, जिसका क्लासिकीय उदाहरण अमरीका है. दूसरे, सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज को अपना केंद्र बनाती हुई न केवल यातायात को, बल्कि उत्पादन को भी अपने हाथ में केन्द्रित करती जाती हैं, उतनी ही अधिक आसानी से यह गठबंधन होता जाता है. अमरीका के अलावा नवीनतम फ्रांसीसी जनतंत्र भी उसके ज्वलंत उदाहरण हैं और नेक बुढे स्विटज़रलैंड ने भी इस क्षेत्र में काफी मार्के की कामयाबी हासिल की है. परन्तु सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज के इस बन्धुत्वपूर्ण गठबंधन की स्थापना करने के लिए जनवादी जनतंत्र की आवश्यकता नहीं है. इसका प्रमाण इंग्लैंड के अलावा नवीन जर्मन साम्राज्य भी है, जहाँ कोई नहीं कह सकता कि सार्विक मताधिकार लागू करने से किसका स्थान अधिक ऊँचा हुआ है -बिस्मार्क का या ब्लाइखरोडर का. अंतिम बात यह है कि सम्पत्तिवान वर्ग सार्विक मताधिकार के द्वारा सीधे शासन करता है. जब तक कि उत्पीडित वर्ग – परिणामस्वरूप इस मामले में सर्वहारा वर्ग – इतना परिपक्व नहीं हो जाता कि अपने को स्वतन्त्र  करने के योग्य हो जाये, तब तक उसका अधिकांश भाग वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को ही एकमात्र संभव व्यवस्था समझाता रहेगा और इसलिए वह राजनीतिक रूप से पूंजीपति वर्ग का दुमछल्ला, उसका उग्र वामपक्ष बना रहेगा. लेकिन जैसे-जैसे यह वर्ग परिपक्व होकर स्वयं अपने को मुक्त करने के योग्य बनाता जाता है, वह अपने को खुद अपनी पार्टी के रूप में संगठित करता है, और पूंजीपतियों के नहीं, बल्कि खुद अपने प्रतिनिधि चुनता है. अतएव, सार्विक मताधिकार मजदूर वर्ग की परिपक्वता की कसौटी है. वर्तमान राज्य में वह इससे अधिक कुछ नहीं है और न कभी हो सकता है; परन्तु इतना काफी है. जिस दिन सार्विक मताधिकार का थर्मामीटर यह सूचना देगा कि मजदूरों में उबाल आनेवाला है , उस दिन मजदूर पूंजीपतियों की ही तरह जान जायेंगे कि उन्हें क्या करना है.”

वे आगे लिखते हैं,

“इस संविधान को अपनी नींव बनाकर सभ्यता ने ऐसे-ऐसे काम कर दिखाए हैं, जो पुराने गोत्र-समाज की सामर्थ्य के बिल्कुल बाहर थे.  परंतु ये काम उसने किये मनुष्य की सबसे नीच अंतर्वृत्तियों  और आवेगों को उभारते हुए और उसकी तमाम अन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचाकर विकसित करते हुए. सभ्यता के अस्तित्व के पहले दिन से लेकर आज तक नग्न लोभ ही उसकी मूल प्रेरणा रहा है. धन कमाओ, और धन कमाओ और जितना बन सके उतना कमाओ ! समाज का धन नहीं, एक अकेले क्षुद्र व्यक्ति का धन – बस यही सभ्यता का एकमात्र और निर्णायक उद्देश्य रहा है. यदि इसके साथ ही समाज में विज्ञान का अधिकाधिक विकास होता गया और समय-समय पर कला के सम्पूर्णतम  विकास के युग भी बार-बार आते रहे, तो इसका कारण केवल यह था कि धन बटोरने में आज जो भारी सफलताएँ प्राप्त हुई हैं, वे विज्ञान और कला की इन उपलब्धियों के बिना प्राप्त नहीं की जा सकती थीं.”

“सभ्यता का आधार चूँकि एक वर्ग का दूसरे वर्ग का शोषण है, इसलिए उसका सम्पूर्ण विकास सदा अविरत अंतर्विरोध के अविच्छिन्न क्रम में होता रहा है. उत्पादन में हर प्रगति साथ ही साथ उत्पीडित वर्ग की, यानि समाज के बहुसंख्यक भाग की अवस्था में पश्चादगति भी होती है. एक के लिए जो वरदान है, दूसरे के लिए आवश्यक रूप से अभिशाप बन जाता है. जब भी किसी वर्ग को नयी स्वतंत्रता मिलती है, तो वह दूसरे वर्ग के लिए नए उत्पीडन का कारण बन जाती है… जहाँ बर्बर लोगों में अधिकारों और कर्त्तव्यों के बीच भेद की कोई रेखा नहीं खिंची जा सकती थी, वहां सभ्यता एक वर्ग को लगभग सारे अधिकार देकर और दूसरे वर्ग पर लगभग सारे कर्त्तव्यों का बोझ लादकर अधिकारों और कर्त्तव्यों के भेद एवं विरोध को इतना स्पष्ट कर देती हैं कि मूर्ख से मूर्ख आदमी भी उन्हें समझ सकता है.” (देखें : Origins of the Family, Private Property, and the State का Chapter IX: Barbarism and Civilization

वर्तमान बुर्जुआ लोकतान्त्रिक प्रणाली जो अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों की वर्गीय राज्य व्यवस्थाओं का निषेद्ध करते हुए वर्तमान विश्व मंच पर अंतरराष्ट्रीय पूँजी की चाकरी हेतू प्रकट हुई है, अपने अंतरविरोधों के कारण, जन्म से ही लूली-लंगडी है जिसका निषेध अवश्यम्भावी है क्योंकि अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों के विपरीत इसने इस वर्गीय समाज के साथ अपनी कब्र खोदनेवाले उस वर्ग को जन्म दिया है जिसे सर्वहारा या उजरती गुलाम कहते हैं. यहीं वह वर्ग है जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता लेकिन पाने के लिए सारा विश्व है. यह सर्वहारा वर्ग ही बुर्जुआ और समाजवादी क्रांतियों की जीत-हार की अमीर विरासत का असली मालिक है. इक्कीसवीं शताब्दी में घटित होने वाली नई समाजवादी क्रांतियों के कार्यभार को संपन्न करवाने हेतू इसने उन बोलेश्विक चरित्र की सच्ची कम्युनिस्ट पार्टियों और नेताओं को भी जन्म देना हैं क्योंकि समाज को आगे की ओर गति देनेवाली क्रांतियाँ स्वयंस्फूर्त ढंग से संम्पन्न नहीं हो सकती. लेकिन चिंता का पहलू यह भी है कि वर्तमान समय का बुद्धिजीवी वर्ग आज के इस युग के क्षुद्र व्यक्ति ‘पूंजीपति’ द्वारा  सर्वहारा की कमाई की निर्मम लूट और इस लूट की भौंडी प्रदर्शनी पर, चुप्पी साधे है जबकि देश और दुनिया के वस्तुपरक हालात, मजदूर वर्ग द्वारा की जानेवाली क्रांतियों के पक्ष में, लगातार विकसित होते जा रहें हैं. भारत के सबसे अधिक विकसित पूंजीवादी राज्यों में से एक हरियाणा के मजदूर प्रतिदिन बारह घंटे से अधिक श्रम करने पर मजबूर हैं क्योंकि सरकार की ओर से निर्धारित की गयी न्यूनतम मजदूरी – 3510  रूपये प्रति महिना, लागू नहीं हो रही.  कोई भी राजनीतिक दल इसके बारे में गंभीर नहीं है. गुडगाँव जैसे शहर में मजदूर असंतोष को लाठियों और गोलियों से दबाया जा रहा है . एक रिपोर्ट अनुसार राज्य की 56  प्रतिशत औरतें और 83  प्रतिशत बच्चे खून की कमी का शिकार हैं. इस प्रकार की स्थिति पर बुद्धिजीवी वर्ग के चुप्पी के इस कष्टदायक और चिंताजनक पहलू पर ब्रटोल्ट ब्रेष्ट के इन शब्दों के साथ इस आलेख को फ़िलहाल यहीं विराम दिया जाता है,

“किस चीज का इंतजार है और कब तक ?
दुनिया को तुम्हारी जरूरत है |”

गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

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एक तरफ तो उत्तर प्रदेश की सरकार ‘सर्वजन हिताय’ होने का दावा करती है लेकिन दूसरी और इस सरकार के गोरखपुर का प्रशासन मजदूरों की बैचैनी का अर्थ उनके माओवादियों से संबंध होने से निकालता है. आज जब दुनिया महामंदी की चपेट में है और वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए लोगों की बचतों को  झोंका जा रहा और पूंजीवाद चाहता है कि कैसे वह इस विश्व महामंदी से निजात पाए, ठीक उसी वक्त,  स्थानीय पेटी-पूंजीपतियों को छोड़ दें तो इस प्रकार की स्थिति में सरकारों का मजदूरवर्ग से इस तरह के निम्न स्तर के हथकंडों का इस्तेमाल करते हुए उलझना स्वयं पूंजीपति वर्ग को भी नापंसंद होगा. पूंजीवाद की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा उपभोग भी होती है ताकि माल मंडियों में बिक जाये. क्या मजदूर वर्ग की जेब में कुछ डाले बिना मार्केट या देश को मंदी से उभारा जा सकता है?

भारत जैसे देश में तुलनात्मक रूप से उत्पादन क्रिया के दौरान मजदूरों पर होनेवाले खर्च में लगातार गिरावट आ रही है अर्थात देश की कुल पैदावार में मजदूरों के हिस्से केवल ६ प्रतिशत ही आता है जबकि उनकी संख्या ८४ करोड़ है. लेकिन खाने-पीने की बुनियादी चीजों के दामों में बढोत्तरी ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. मजदूरों के लिए जीवन-निर्वाह करना भी मुश्किल होता जा रहा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पूंजीपति एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण अनुसार भारत दुनिया के सबसे सस्ती मजदूरी वाले देशों में से एक है. उनके अनुसार यह स्थिति आगामी अठारह-बीस सालों तक बनी रहेगी. उनके अनुसार यहाँ की इस सस्ती श्रम का लाभ विश्व पूंजी को ही होना है.यहीं नहीं वे भारत को एक बड़ी मंडी के रूप में भी देखते हैं जहाँ माल खपाया जा सकता है. चीन के बाद भारत दूसरा देश है जहाँ विकास दर सबसे ऊँची है. लेकिन मजदूरों की मजदूरी में होनेवाली थोडी-बहुत बढोत्तरी बुनियादी वस्तुओं की कीमत के मुकाबले बढ़ने की अपेक्षा कम हों तो कैसे मजदूर अपना जीवन निर्वाह कर पायेगा? क्या  स्वयं पूंजीवादी के तर्कानुसार भी इस प्रकार का रवैया उचित है?

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गोरखपुर : अपने परिवारों समेत धरने पर बैठे महिला एवं पुरुष मजदूर

पूंजी के अपने तर्क अनुसार किसी भी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए जरूरी होता है कि मजदूरी में बढोत्तरी हो ताकि मजदूर ज्यादा वस्तुएं खरीद सकें. लेकिन गोरखपुर जैसे शहर में जहाँ मजदूर अपनी थोडी सी मजदूरी, रोजगार सुरक्षा और यूनियन बनाने के बुनियादी लडाई ही लड़ रहे हैं, उन्हें माओवादी कहना कहाँ तक उचित है? सबसे चिताजनक पहलू यह है की मजदूरों के बीच की हर तरह की बैचैनी का हल निकालने की बजाय उसे माओवादी-आतंकवादी कार्रवाई कहकर कुचलने की कोशिश की जाती है और उनके लीडरों पर झूठे केस बनाए जाते हैं और मजदूर नेताओं को जेलों में डाला जाता है.

उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करते समय देश की कार्यपालिका और न्यापालिका जैसी संस्थाओं का रवैया ज्यादा से ज्यादा मजदूर विरोधी होता गया है. गुडगाँव जैसे औद्योगिक नगर जहाँ एक मजदूर की मौत पर एक लाख मजदूरों की बड़ी संख्या सड़कों पर आ जाती , वहां पर भी मजदूरों को यूनियन तक बनाने की इजाजित नहीं है. रिको ऑटो कंपनी के संचालक मजदूरों के हड़ताल पर जाने और यूनियन बनाने को गैर-कानूनी कार्य कहते हैं. इसे ऐतिहासिक प्रसंग में देखें तो यह सही भी है क्योंकि मजदूरवर्ग की लहर के विपर्य के इस दौर में मजदूरों ने यूनियन बनाने, धरना देने, हड़ताल करने और गेट मीटिंगे औयोजित करने के अधिकारों को खो दिया है. उन्हें आज अपनों संघर्षों द्वारा जीते इन बुनियादी अधिकारों की रक्षा ही सबसे बड़ा कार्यभार लगता है जबकि वर्गों में विभाजित समाज में ये अधिकार भी उसी तरह गतिशील होते हैं जिस तरह समाज. अपने कालजयी संघर्षों द्वारा जीते गए इन अधिकारों को खो देना उन्हें निराश करता ही रहेगा जब तक वे स्वयं को राजनीतिक चेतना से चाकचौबंद नहीं करेंगे और इस वर्ग विभाजित व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन नहीं कर देंगे. गुडगाँव तो औद्योगिक उपक्रमों की हब है. इसके अलावा भारत के कोने-कोने में छोटे बड़े लाखों औद्योगिक उपक्रमों में देश के मजदूर वर्ग की आबादी का ९३ प्रतिशत भाग काम कर रहा है. मजदूरों की इस बड़ी तादाद को असंगठित मजदूर यानिकि वह मजदूर जो किसी मजदूर ट्रेड यूनियन का भाग नहीं है, कहते हैं. देश के इन छोटे और मझौले उपक्रमों में कार्य करनेवाले मजदूरों की बैचैनी ने हड़ताल और धरने  का रूप भी लेना है. पूंजीपतियों की आपसी गलाकाट होड़ के चलते और मंडी के उतार-चढाव और मंदी का ज्यादा असर छोटी पूंजी पर अधिक पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि  मजदूर वर्ग के हितों की अनदेखी करके इन उपक्रमों की रखवाली की जाये. लेकिन प्रशासन और सरकारी नुमाँईन्दो का इन पेटी-बुर्जुआ पूंजीपतियों और उनके गुंडों से साँठगाँठ   चिंता का विषय है. सरकार के लिए सोचने वाली बात यह भी है कि क्या मजदूरों और उनको नेताओं को माओवादी आतंकवादी कहकर झुट्ठे मुकद्दमों में फँसाना खुद पूंजीपति वर्ग या व्यवस्था के लिए ठीक है?

किसी प्रकार का आंतंकवाद चाहे वह धार्मिक मूलवादी खेमे की ओर से हो या वामपंथी दुस्साहसवाद के रूप में हो, निंदनीय है. सत्ताधारी वर्ग की दमनकारी नीतियाँ भी हर प्रकार का आतंकवाद पैदा करती हैं. सत्ताधारी वर्ग के राजकीय आतंकवाद  के परिणामस्वरूप धार्मिक मूलवादी आतंकवाद, दक्षिणपंथी आतंकवाद, वामपंथी आतंकवाद आदि, की फसल उगने की उपजाऊ भूमि तैयार होती है.हर किस्म का आतंकवाद मजदूर वर्ग की एकता और सांगठनिक क्षमता को कमजोर करता है… लेकिन गोरखपुर के स्थानीय प्रशासन द्वारा मजदूरों को माओवादियों से जोड़ना चिंता का विषय है. अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक  तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी. जी  पहले यह कह चुके हैं कि गोरखपुर में नक्सली नहीं है.

यूनिसेफ  की रिपोर्ट अनुसार पिछले ४० वर्षों के अन्तराल के बाद ग्लोबल वित्तीय संकट और ईंधन, भोजन और चारे की कीमतों में बढोत्तरी के कारण दक्षिण एशिया भूखमरी की उच्चतम शिखर को छू रहा है. इसमें कोई शक नहीं की उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी सेक्टरों और कृषि में भी बढ़िया विकास करते दिखाई गयी है लेकिन विडम्बना देखीए कि भरपूर अनाज पैदा होने के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा की हालत में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है. यह उपहास नहीं तो और क्या है कि उडीसा जैसे राज्य में अब भी लोग भूख से मर रहे हैं जबकि वेयरहाउस और गोदामों में अनाज सड रहा है?

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गोरखपुर : हड़ताल के दौरान सामूहिक रसोई

यहीं नहीं एम्.एस स्वामीनाथन रीसर्च फ़ाऊँडेशन (MSSRF) और विश्व खाद्य कार्यक्रम  (WFP) द्वारा एक रिपोर्ट तैयार करवाई गयी. इसमें कहा गया कि भोजन में प्रयाप्त पौष्टिक तत्त्वों की कमी के कारण  भारत का हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का शिकार है और ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2001 के अनुसार भारत का क्रमांक 94 है.

लेकिन पूंजीपति वर्ग खुश होता है कि विश्वमंदी  का भारत पर असर नहीं हुआ है. संसेक्स में फिर उछाल देखने को मिल रही है. प्रथम फिस्कल छमाही के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में ऑटो सेक्टर की विक्री में बढोत्तरी १४.५१ प्रतिशत रही है. इस प्रकार की बातें पूंजीपति लोगों और उनकी सरकारों को अच्छी लगती हैं. लेकिन ऑटो सेक्टर की हब रहे गुडगाँव जैसे शहर में पूंजीपतियों के किराये के गुंडों के हाथों होनेवाली मजदूर की मौत के बाद एक लाख मजदूरों का प्रदशर्न उन्हें परेशान कर देता है. तेरह-तेरह वर्षों से कार्यरत पंकज कुमार सिंह जैसे मजदूर अपनी मजदूरी से संतुष्ट नहीं हैं. अपनी जायज मांगों को मनमाने के लिए जब वे यूनियन बनाने की पहलकदमी करते हैं तो मैनेजमेंट स्थानीय प्रशासन और अपने निजी गुंडों की मदद से उन्हें दबाने की कोशिश करती है. पूंजीपतियों की मुनाफा कमाने की हवस मजदूरों को इंसान समझती ही नहीं. उन्हें तो चाहिए इन्सान के रूप में एक ऐसा मशीन का पूर्जा जो मशीन के दूसरे पूर्जों से मिलकर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करे. पूंजीपति यह देख ही नहीं पाते कि मशीन और इन्सान में बुनियादी फर्क है. मशीन अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष पैदा नहीं कर सकती. यह केवल मजदूर की श्रम-शक्ति से ही संभव होता है. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपतियों का मुनाफा, मैनेजमेंट के खर्चे और कार्पोरेट टैक्स जिससे सरकारे चलती हैं, आता है.

गुडगाँव की रिको ऑटो कंपनी के मजदूर की हत्या पर भारत की न्यूज एजेंसी पी.टी.आई . अपनी टिपण्णी में यह बात स्वीकार करती है कि गुडगाँव-मानेसर बेल्ट में मजदूर असंतोष कोई नई बात नहीं है. पहले २००० में मारुती उद्योग की मजदूरों की तीन महीने की हड़ताल और फिर २००५ में होंडा मोटर्स एंड स्कूटर के मजदूरों पर पुलिस द्वारा अधाधुंध लाठीचार्च जिसमें १६७ मजदूरों के घायल हुए थे, को नोट करते हुए पला झाड़ लेती है जैसे यह रूटीन की सामान्यतय घटने वाली बातें हों. लेकिन स्थिति का दूसरा पहलू यह भी है कि २००० और फिर २००५ और अब २००९ में मजदूरों का एकसाथ इतनी बड़ी तादाद में खड़े हो जाना, और फिर इन वर्षों के बीच का अन्तराल इतना बड़ा नहीं है कि इतिहास के लिए यह कोई दूर की बात हो. मजदूर वर्ग के असंतोष और वैचैनी के यहीं वे सिग्नल हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग द्वारा ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग की हमदर्द पार्टियों और बुद्धिजीवियों द्वारा नज़रंदाज किया जाता है. मजदूरों के प्रारंभिक सिग्नल भले ही किसी नज़दीक की क्रांति की और संकेत नहीं करते लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग को इन्हीं सिग्नलों को समझना है और इतिहास में अपने स्थान और जिम्मेदारी का भलीभांति निर्वाह करना है.

गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता
गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता

आज मजदूर वर्ग और क्रांतिकारी खेमा अलगाव और विखराव का शिकार है. लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी चुप्पी साधे हुए है. बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का समर्थन और हमदर्दी हमेशा मजदूरवर्ग से रही है. अपनी उच्चतम बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी बुद्धिजीवी लोग अपने स्वयं के वर्ग की सीमाओं को तोड़कर मजदूरों के साथ खड़े होते रहें है. बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा स्वयं को मजदूर वर्ग से अपने आप को अभेद भी पाता रहा है. लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. क्या भारत का बुद्धिजीवी इतना आत्मसंतुष्ट हो सकता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर हाँ  में है तो उसके बुद्धिजीवी होने पर प्रश्नचिह्न लगता है! लेकिन इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होती और न हो सकती है. समाजवादी खेमे के ढह-ढेरी हो जाने  के बाद हम भी मानते हैं कि समाज को आगे की ओर गति देने वाले आंदोलनों या क्रांतियों की प्रासंगिगता पर प्रश्न चिह्न लगा था और पूंजीवाद के अजर-अमर होने के भ्रम को भी खूब हवा मिली थी. अब स्थिति वैसी भी नहीं है. पूंजीवादी एक के बाद एक नए संकटों में फंसता जा रहा है. बुद्धिजीवियों के स्तर के अनुसार पूंजीवाद में भी ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें एक पल के लिए भी संतुष्ट कर पाए. इस प्रकार की स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रह सकती. यह बुद्धिजीवी वर्ग ही होता है जिसने सबसे पहले अपनी चुप्पी तोड़नी होती है क्योंकि अपनी संवेदनशीलता के कारण वहीँ पहला वर्ग होता है जो सबसे पहले टूटता है.

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गोरखपुर : इस पूरे आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया

देश में चुनाव हों लेकिन बुनियादी मुद्दे गायब हों ! एक ऐसा वक्त जब आम जनता अपने जिंदा रहने की लडाई लड़ रही हो और चुनावों में भाग लेनेवाली पार्टियों की ओर से अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जाना ! इसके अलावा राजनीतिक दलों की बहसों का स्तर इतना निम्न स्तर का कि बुद्धिजीवी तो क्या आम आदमी भी इसका नोटिस लेने से नहीं बच पाया. विचारधारात्मक, सैद्धांतिक और राजनीतिक बहस सिरे से ही गायब थी. सामाजिक बहस में भी मुद्दे गायब थे. केवल जोड़तोड़ या तिकड़म द्वारा किस दल की सरकार बनेगी, जैसी चर्चाओं पर अटकलबाजी होती रही. इस प्रकार की स्थिति पर  देश के बुद्धिजीवी वर्ग का मूक दर्शक बने रहना नागरिक समाज के लिए नुकसानदेय है. इतिहास में उसे अपनी भूमिका और स्थान की पहचान करनी ही होगी.

पूंजीपतियों के गुंडों द्वारा गुडगाँव में मजदूर की हत्या और गोरखपुर के मजदूर और मजदूर नेताओं पर झूठे मुकद्दमे निंदनीय हैं. मजदूर वर्ग के हितों पर इस प्रकार का कुठारघात असहनीय है. पूंजीपति इसके लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने पर तुले हुए हैं. हमारे पडौसी देश नेपाल जहाँ पशुओं की हत्या और अत्याचार पर रोक संबंधी बहस चल रही है और हमारे यहाँ मजदूरों पर इस तरह के जुर्म किये जा रहे हैं. नेपाल जैसे पिछडे देश के साथ तुलना करते समय हमारा सीना गर्व से फूल जाता हैं लेकिन अपने ही देश में पशुओं पर नहीं बल्कि इंसानों और मजदूरों पर होनेवाले जुर्म पर हम मूक बने रहते हैं, क्या इस प्रकार की स्थिति शोभनीय है? बुद्धिजीवी वर्ग को सोचना होगा कि सभ्य समाज को इस वक्त अगर कोई खतरा है तो वह पूंजीपतियों के गुंडों की दहशत और प्रशासनिक मिलीभगत से ही है. उसे अपना प्रतिरोध दर्ज करवाना होगा. यही समय की मांग है.

उपरोक्त पोस्ट पर लगी हुई सभी तस्वीरें नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ से धन्यवाद सहित ली गयी हैं.

गोरखपुर के मजदूर संघर्ष से संबंधित पोस्टें :

आग्नेय अक्टूबर

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अक्टूबर क्रांति की ९२वीँ वर्षगांठ पर

बोल्शेविकों ने विद्रोह की ज़ोरदार तैयारियाँ शुरू कीं। लेनिन ने कहा कि दोनों राजधानियों – मास्को और पेत्रोग्राद – में मज़दूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियतों में बहुमत हासिल करने के बाद, बोल्शेविक अपने हाथ में राज्यसत्ता ले सकते हैं, और उन्हें लेना चाहिए। तय किये हुए रास्ते पर नज़र डालते हुए, लेनिन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि `जनता का बहुमत हमारे साथ है।´ अपने लेखों और केन्द्रीय समिति और बोल्शेविक संगठनों के नाम अपने ख़तों में, लेनिन ने विद्रोह की एक विस्तृत योजना बनायी और बतलाया कि फौजी दस्ते, जल-सेना और रेड गार्ड दस्तों को किस तरह इस्तेमाल करना चाहिए, विद्रोह की सफलता निश्चित करने के लिए पेत्रोग्राद के किन मुख्य स्थानों पर कब्ज़ा करना चाहिए, इत्यादि।

7 अक्टूबर को, लेनिन गुप्त रूप से फिनलैण्ड से पेत्रोग्राद आये। 10 अक्टूबर 1917 को, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ऐतिहासिक बैठक हुई जिसमें अगले कुछ दिनों में सशस्त्र विद्रोह आरम्भ करने का फैसला किया गया। पार्टी की केन्द्रीय समिति के ऐतिहासिक प्रस्ताव में, जिसे लेनिन ने लिखा था, कहा गया था :

“केन्द्रीय समिति यह समझती है कि रूसी क्रान्ति की अन्तरराष्ट्रीय परिस्थिति (जर्मन जल-सेना में विद्रोह, जो समूचे यूरोप में विश्व समाजवादी क्रान्ति का चरम प्रदर्शन है, रूस की क्रान्ति का गला घोंटने के उद्देश्य से साम्राज्यवादियों के बीच शान्ति की धमकी), साथ ही सैनिक परिस्थिति (रूसी पूँजीपतियों और केरेन्स्की एण्ड कम्पनी का यह निश्चित फैसला कि पेत्रोग्राद जर्मनों को सौंप दिया जाये) और सोवियतों में सर्वहारा पार्टी का बहुमत हासिल करना, – यह सब और इसके साथ यह कि किसान-विद्रोह हो रहे हैं और आम जनता का विश्वास तेज़ी से पार्टी पर जम रहा है (मास्को के चुनाव), और अन्त में एक दूसरे कार्निलोव काण्ड के लिए जो खुली तैयारी हो रही है (पेत्रोग्राद से फौजें हटाना, मास्को और मिंस्क में हमारी जनता की कार्रवाई वग़ैरह) पर विचार करें और फैसला करें।” (लेनिन, संकलित रचनाएँ, अंग्रेज़ी संस्करण, खण्ड 2, पृष्ठ 135)

केन्द्रीय समिति के दो सदस्य, कामेनेव और ज़िनोवियेव, इस ऐतिहासिक प्रस्ताव के खिलाफ बोले और उन्होंने उसके विरुद्ध वोट दिया। मेंशेविकों की तरह, वे पूँजीवादी संसदीय जनतन्त्र का सपना देखते थे और मज़दूर वर्ग पर यह कहकर कीचड़ उछालते थे कि समाजवादी क्रान्ति करने के लिए वह काफी मज़बूत नहीं है, कि वह सत्ता हाथ में लेने के लिए काफी परिपक्व नहीं है।

हालाँकि इस बैठक में त्रात्स्की ने सीधे इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट नहीं दिया, फिर भी उसने एक संशोधन रखा जिससे विद्रोह की सम्भावना नहीं के बराबर हो जाती और विद्रोह निष्फल हो जाता। उसने प्रस्ताव रखा कि सोवियतों की दूसरी कांग्रेस शुरू होने से पहले विद्रोह शुरू न किया जाये। इस प्रस्ताव का मतलब था – विद्रोह में विलम्ब करना, उसकी तारीख़ ज़ाहिर कर देना और अस्थायी सरकार को आगाह कर देना।

बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति ने विद्रोह का संगठन करने के लिए अपने प्रतिनिधियों को दोन्येत्स प्रदेश, यूराल, हैलसिंगफोर्स, क्रोन्स्तात, दक्षिण-पश्चिमी मोर्चा और दूसरी जगहों पर भेजा। पार्टी ने ख़ासतौर से सूबों में विद्रोह का संचालन करने के लिए कामरेड बोरोशिलोव, मोलोतोव, जरजन्स्की, ओजानिकित्से, किरोव, कगानोविच, कुइवीशेव, फ्रुन्जे, यारोस्लाव्स्की और दूसरे साथियों को मुकर्रर किया। कामरेड ज्दानोव ने यूराल में शंद्रिस्क की फौज में काम जारी रखा। केन्द्रीय समिति के प्रतिनिधियों ने सूबों के बोल्शेविक संगठनों के प्रमुख सदस्यों को विद्रोह की योजना बतायी और पेत्रोग्राद के विद्रोह का समर्थन करने के लिए उन्हें तैयार रहने के लिए बटोरा।

पार्टी की केन्द्रीय समिति के निर्देश से, पेत्रोग्राद-सोवियत की एक क्रान्तिकारी फौजी कमेटी बनायी गयी। यह संस्था विद्रोह का कानूनी तौर पर चलने वाला हेडक्वार्टर बन गयी। उधर क्रान्ति-विरोधी भी जल्दी-जल्दी अपनी शक्ति बटोर रहे थे। फौज के अफसरों ने एक क्रान्ति-विरोधी संगठन बनाया, जिसका नाम अफसरों की सभा था। हर जगह क्रान्ति विरोधियों ने लड़ाकू दस्ते बनाने के लिए हेडक्वार्टर कायम किये। अक्टूबर के अन्त तक, क्रान्ति विरोधियों की कमान में 43 लड़ाकू दस्ते बन गये। सेण्ट जॉर्ज के क्रॉस को मानने वालों के ख़ास दस्ते बनाये गये।

केरेन्स्की की सरकार ने शासन केन्द्र पेत्रोग्राद से मास्को ले जाने के सवाल पर विचार किया। इससे स्पष्ट हो गया कि शहर में विद्रोह रोकने के लिए वह पेत्रोग्राद को जर्मनों के हाथ सौंपने की तैयारी कर रही है। पेत्रोग्राद के मज़दूरों और सैनिकों के विरोध ने अस्थायी सरकार को पेत्रोग्राद में ही रहने पर मजबूर किया।

16 अक्टूबर को, पार्टी की केन्द्रीय समिति की एक विस्तृत बैठक हुई। इस बैठक में विद्रोह का संचालन करने के लिए एक पार्टी केन्द्र चुना गया, जिसके अगुआ कामरेड स्तालिन थे। यह पार्टी केन्द्र पेत्रोग्राद-सोवियत की क्रान्तिकारी फौजी कमेटी का प्रमुख नेतृत्व था और समूचे विद्रोह का अमली संचालन उसके हाथ में था।

केन्द्रीय समिति की बैठक में, समर्पणवादियों – ज़िनोवियेव और कामेनेव ने विद्रोह का फिर विरोध किया। यहाँ मुँह की खाकर, उन्होंने विद्रोह के खिलाफ, पार्टी के खिलाफ खुल्लमखुल्ला अख़बारों में लिखा। 18 अक्टूबर को, मेंशेविक अख़बार नोवाया जीज्न (नव जीवन) ने कामेनेव और ज़िनोवियेव का बयान छापा, जिसमें कहा गया था कि बोल्शेविक विद्रोह की तैयारी कर रहे हैं और वे (कामेनेव और ज़िनोवियेव) समझते हैं कि यह दुस्साहसपूर्ण जुआ खेलना है। इस तरह, कामेनेव और ज़िनोवियेव ने दुश्मन को केन्द्रीय समिति का विद्रोह सम्बन्धी फैसला बता दिया( उन्होंने यह प्रकट कर दिया कि कुछ ही दिनों में विद्रोह शुरू करने की योजना बनायी गयी है। यह ग़द्दारी थी। इस सिलसिले में, लेनिन ने लिखा था : “कामेनेव और ज़िनोवियेव ने सशस्त्र विद्रोह के बारे में अपनी पार्टी की केन्द्रीय समिति का फैसला दग़ाबाज़ी से रोद्जियांको और केरेन्स्की को बतला दिया है।” लेनिन ने केन्द्रीय समिति के सामने ज़िनोवियेव और कामेनेव को पार्टी से निकालने का सवाल रखा।

ग़द्दारों से चेतावनी पाकर, क्रान्ति के दुश्मन तुरन्त ही, इस बात के उपाय करने लगे कि विद्रोह को रोक दें और क्रान्ति के संचालक दल – बोल्शेविक पार्टी – का नाश कर दें। अस्थायी सरकार ने एक गुप्त बैठक बुलायी, जिसमें बोल्शेविकों का मुकाबला करने के लिए क्या उपाय किये जायें, इसका फैसला हुआ। 19 अक्टूबर को, अस्थायी सरकार ने युद्ध के मोर्चे से जल्दी-जल्दी फौजें पेत्रोग्राद बुलायीं। सड़कों पर भारी पहरा लगा दिया गया। क्रान्ति विरोधी ख़ासतौर से मास्को में भारी फौज इकट्ठा करने में कामयाब हुए। अस्थायी सरकार ने एक योजना बनायी कि सोवियतों की दूसरी कांग्रेस शुरू होने से पहले बोल्शेविक केन्द्रीय समिति के हेडक्वार्टर स्मोल्नी पर हमला किया जाये और उस पर कब्ज़ा कर लिया जाये और बोल्शेविक संचालन-केन्द्र का नाश कर दिया जाये। इसी उद्देश्य से, हुकूमत ने पेत्रोग्राद में वह फौज बुलायी जिसकी वफ़ादारी पर उसे भरोसा था।

लेकिन, अस्थायी सरकार की ज़िन्दगी के दिन और घण्टे भी गिनती के रह गये थे। समाजवादी क्रान्ति की विजय-यात्रा को अब कोई भी नहीं रोक सकता था। 21 अक्टूबर को, बोल्शेविकों ने सभी क्रान्तिकारी फौजी दस्तों के पास क्रान्तिकारी फौजी समिति के कमिसार भेजे। विद्रोह होने से पहले के बचे हुए दिनों में फौजी दस्तों, मिलों और कारख़ानों में कार्रवाई की ज़ोरदार तैयारी की गयी। युद्धपोत अव्रोरा और जारियास्वोबोदी के लिए भी निश्चित निर्देश भेजे गये।

पेत्रोग्राद सोवियत की एक बैठक में, त्रात्स्की ने डींग हाँकने की जीम में दुश्मन को वह तारीख़ बतला दी जब बोल्शेविक सशस्त्र विद्रोह शुरू करने वाले थे। केरेन्स्की सरकार विद्रोह को असफल न कर दे, इसलिए पार्टी की केन्द्रीय समिति ने फैसला किया कि निश्चित किये हुए समय से पहले ही विद्रोह शुरू कर दिया जाये और आखिरी मंज़िल तक ले जाया जाये। उसने विद्रोह की तारीख़ सोवियतों की दूसरी कांग्रेस के शुरू होने से पहले के दिन रखी। 24 अक्टूबर (6 नवम्बर) को सुबह तड़के, केरेन्स्की ने हमला शुरू कर दिया। उसने बोल्शेविक पार्टी के केन्द्रीय पत्र रबोचीपूत (मज़दूर पथ) को बन्द करने का हुक्म दिया और सम्पादकीय दफ़्तर और बोल्शेविकों के छापेख़ाने पर हथियारबन्द गाड़ियाँ भेजीं। लेकिन 10 बजे सबेरे तक, कामरेड स्तालिन के निर्देश पर, रेड गार्डों के दस्तों और क्रान्तिकारी सैनिकों ने हथियारबन्द गाड़ियों को पीछे ठेल दिया और छापेख़ाने और रबोचीपूत के सम्पादकीय दफ़्तरों पर और ज्यादा पहरा बिठा दिया। लगभग 11 बजे सबेरे रबोचीपूत प्रकाशित हुआ, जिसमें अस्थायी सरकार का तख्ता उलट देने के लिए आह्वान था। उसी समय, विद्रोह के पार्टी केन्द्र के निर्देश से क्रान्तिकारी सैनिकों और रेड गार्डों के दस्ते स्मोल्नी की तरफ दौड़ाये गये। विद्रोह शुरू हो गया।

24 अक्टूबर की रात को, लेनिन स्मोल्नी आ पहुँचे और उन्होंने खुद विद्रोह के संचालन का भार सँभाला। उस रातभर फौज के क्रान्तिकारी दस्ते और रेड गार्डों के जत्थे बराबर स्मोल्नी आते रहे। बोल्शेविकों ने शीतप्रासाद घेरने के लिए, जहाँ अस्थायी सरकार ने अपना अड्डा बनाया था, उन्हें राजधानी के केन्द्र की तरफ भेजा। 25 अक्टूबर (7 नवम्बर) को, रेड गार्डों के दस्तों और क्रान्तिकारी सैनिकों ने रेलवे स्टेशनों, डाकख़ानों, तारघरों, मन्त्री-गृहों और राज्य बैंक पर कब्ज़ा कर लिया।

प्रेद पार्लियामेण्ट भंग कर दी गयी।

बोल्शेविक केन्द्रीय समिति और पेत्रोग्राद सोवियत का हेडक्वार्टर, स्मोल्नी क्रान्ति का हेडक्वार्टर बन गया, जहाँ से लड़ाई के बारे में सभी हुक्म भेजे जाते थे। पेत्रोग्राद के मज़दूरों ने उन दिनों दिखला दिया कि बोल्शेविक पार्टी की देखरेख में उन्होंने कैसी महान शिक्षा पायी है। फौज के क्रान्तिकारी दस्तों ने, जिन्हें बोल्शेविकों के काम ने विद्रोह के लिए तैयार किया था, नपे-तुले ढंग से लड़ाई की आज्ञाओं का पालन किया और वे रेड गार्डों के दस्तों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़े। जल सेना फौज से पीछे न रही। क्रोन्स्तात बोल्शेविक पार्टी का गढ़ था और बहुत दिन पहले ही अस्थायी सरकार का प्रभुत्व मानने से इन्कार कर चुका था। युद्धपोत अव्रोरा ने अपनी तोपें शीतप्रासाद की तरफ मोड़ दीं और, 25 अक्टूबर को, उनकी घन गरजन ने एक नया युग आरम्भ किया, महान समाजवादी क्रान्ति का युग आरम्भ किया।

25 अक्टूबर (7 नवम्बर) को, बोल्शेविकों ने (रूस के नागरिकों के नाम) एक घोषणापत्र निकाला। इसमें कहा गया था कि पूँजीवादी अस्थायी सरकार हटा दी गयी है और राज्यसत्ता सोवियतों के हाथ में आ गयी है।

अस्थायी सरकार ने कैडेटों और लड़ाकू जत्थों की छत्रछाया में शीतप्रासाद में शरण ली थी। 25 अक्टूबर की रात को क्रान्तिकारी मज़दूरों, सैनिकों और जहाज़ियों ने शीतप्रासाद पर हल्ला बोलकर कब्ज़ा कर लिया और अस्थायी सरकार को गिरफ़्तार कर लिया। पेत्रोग्राद में सशस्त्र विद्रोह की विजय हुई।

सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस 25 अक्टूबर (7 नवम्बर) 1917 की शाम को 10 बजकर 45 मिनट पर स्मोल्नी में शुरू हुई, जबकि पेत्रोग्राद का विद्रोह विजय गौरव से दमक रहा था और राजधानी में सत्ता सचमुच पेत्रोग्राद सोवियत के हाथ में आ गयी थी। कांग्रेस में बोल्शेविकों को भारी बहुमत मिला। मेंशेविकों, बुन्दवादियों और दक्षिणपन्थी समाजवादी क्रान्तिकारियों ने देखा कि अब उनके दिन बीत चुके हैं, इसलिए वे कांग्रेस से बाहर चले गये और उन्होंने ऐलान किया कि वे कांग्रेस के काम में हिस्सा लेने से इन्कार करते हैं। सोवियतों की कांग्रेस में उनका एक बयान पढ़ा गया, जिसमें उन्होंने अक्टूबर क्रान्ति को एक `फौजी षड्यन्त्र´ बताया था। कांग्रेस ने मेंशेविकों और समाजवादी क्रान्तिकारियों की निन्दा की और उनके चले जाने पर अफसोस करना तो दूर, उसका स्वागत किया। कांग्रेस ने ऐलान किया कि ग़द्दारों के चले जाने से अब वह मज़दूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सच्ची क्रान्तिकारी कांग्रेस हो गयी है।

कांग्रेस ने ऐलान किया कि सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में आ गयी है। सोवियतों की दूसरी कांग्रेस के घोषणापत्रा में कहा गया :

“मज़दूरों, सैनिकों और किसानों के भारी बहुमत का समर्थन पाकर और पेत्रोग्राद में होने वाले मज़दूरों और सैनिकों के सफल विद्रोह का समर्थन पाकर, कांग्रेस अपने हाथ में सत्ता लेती है।”

26 अक्टूबर (8 नवम्बर) 1917 की रात को, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस ने शान्ति सम्बन्धी आज्ञप्ति स्वीकार की। कांग्रेस ने युद्ध करने वाले देशों का आह्वान किया कि कम से कम तीन महीने के लिए सुलह कर लें, जिससे शान्ति की बातचीत की जा सके। कांग्रेस ने एक तरफ तो युद्ध करने वाले देशों की जनता और वहाँ की सरकारों से अपनी बात कही, दूसरी तरफ उसने ‘संसार के तीन प्रमुख राज्यों यानी ब्रिटेन, फ्रांसिस और जर्मनी के वर्ग-चेतन मज़दूरों से’ अपील की। उसने इन मज़दूरों से कहा कि वे ‘शान्ति के उद्देश्य को सफलता की मंज़िल तक ले जाने में और साथ ही सभी तरह की गुलामी और शोषण से मेहनतकश और शोषित जनता की मुक्ति के उद्देश्य को सफलता की मंज़िल तक ले जाने में’ मदद करें। उसी रात को, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस ने भूमि सम्बन्धी आज्ञप्ति स्वीकार की जिसमें कहा गया था : “भूमि पर ज़मींदारों की मिल्कियत बिना मुआवज़े के तुरन्त ख़त्म की जाती है।” खेती के इस कानून का आधार किसानों का एक निर्देश पत्र (नकाज, मैण्डेट) था, जो अलग-अलग जगहों के किसानों के 242 मैण्डेटों को मिलाकर बनाया गया था। इसके अनुसार, ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत हमेशा के लिए ख़त्म कर दी गयी और उसके बदले सार्वजनिक या राज्य की मिल्कियत कायम हुई। ज़मींदारों, ज़ार के परिवार और मठों की ज़मीन बिना पैसा दिये हुए सभी मेहनतकशों को इस्तेमाल के लिए देने का हुक्म हुआ।

इस आज्ञापत्र से, किसानों ने अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति से 15 करोड़ देस्यातिन (40 करोड़ एकड़ से ऊपर) ज़मीन पायी जो पहले ज़मींदारों, पूँजीपतियों, ज़ार के परिवार, मठों और गिरजाघरों के पास थी।

इसके अलावा, किसानों को उस लगान से मुक्त कर दिया गया जो वे ज़मींदारों को देते थे और जो सालाना 50 करोड़ स्वर्ण रूबल होता था।

खनिज पदार्थों के तमाम साधन (तेल, कोयला, धातुएँ, वग़ैरह), जंगल और जलाशय जनता की सम्पत्ति हो गये।

अन्त में, सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस ने पहली सोवियत सरकार बनायी – जनकमिसारों की समिति बनायी जिसमें सभी बोल्शेविक थे। जनकमिसारों की पहली समिति के पहले सभापति लेनिन चुने गये।

इससे सोवियतों की दूसरी ऐतिहासिक कांग्रेस का काम ख़त्म हुआ।

कांग्रेस के प्रतिनिधि इधर-उधर बिखर गये, जिससे कि पेत्रोग्राद में सोवियतों की जीत की ख़बर फैला दें और सोवियतों की सत्ता सारे देश में फैलाने का काम निश्चित करें। हर जगह सोवियतों के हाथ तुरन्त ही सत्ता नहीं आ गयी। जब पेत्रोग्राद में सोवियत सरकार बन चुकी थी, तब मास्को में कई दिन तक डटकर और घनघोर लड़ाई होती रही। सत्ता मास्को-सोवियत के हाथ में न जाये, इसके लिए क्रान्ति-विरोधी मेंशेविक और समाजवादी क्रान्तिकारी पार्टियों ने ग़द्दारों और कैडेटों से मिलकर मज़दूरों और सैनिकों के खिलाफ हथियारबन्द लड़ाई शुरू कर दी। बागि़यों को हराने और मास्को में सोवियतों की सत्ता कायम करने में कई दिन लग गये।

खुद पेत्रोग्राद में और उसके कई ज़िलों में क्रान्ति की जीत के शुरू के दिनों में ही सोवियत सत्ता को ख़त्म करने की क्रान्ति विरोधी कोशिशें की गयीं। 10 नवम्बर 1917 को, केरेन्स्की ने, जो विद्रोह के समय पेत्रोग्राद से उत्तरी मोर्चे को भाग गया था, कई कज्ज़ाक दस्ते इकट्ठा किये और जनरल क्रासनोव की कमान में उन्हें पेत्रोग्राद के खिलाफ भेजा। 11 नवम्बर 1917 को, एक क्रान्ति-विरोधी संगठन ने पेत्रोग्राद में कैडेटों से बग़ावत करायी। इस संगठन के नेता समाजवादी क्रान्तिकारी थे, और उसका नाम रखा था – “पितृभूमि और क्रान्ति के उद्धार की कमेटी”। लेकिन, बिना ज्यादा कठिनाई के बग़ावत दबा दी गयी। एक ही दिन में, 11 नवम्बर की शाम तक, जहाज़ियों और रेड गार्डों के दस्तों ने कैडेट-विद्रोह दबा दिया और 13 नवम्बर को जनरल क्रासनोव पुलकोवो पहाड़ियों के पास हरा दिया गया। लेनिन ने व्यक्तिगत रूप से सोवियत-विरोधी बग़ावत दबाने का संचालन किया, जैसे उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अक्टूबर विद्रोह का संचालन किया था। उनकी अटूट दृढ़ता और विजय में उनके शान्त विश्वास ने जनता को प्रेरित और संगठित किया। दुश्मन कुचल दिया गया। क्रासनोव गिरफ़्तार कर लिया गया और उसने `वचन दिया´ कि सोवियत सत्ता के खिलाफ लड़ाई बन्द कर देगा। और, `वचन देने पर´ वह छोड़ दिया गया। लेकिन जैसाकि आगे मालूम हुआ, जनरल ने अपना वचन तोड़ दिया। जहाँ तक केरेन्स्की का सम्बन्ध था, वह औरत का भेष बनाकर `किसी अज्ञात दिशा में ग़ायब´ हो गया।

फौज के जनरल हेडक्वार्टर पर, मोगीलेव में प्रधान सेनापति जनरल दुखोनिन ने भी बग़ावत करने की कोशिश की। जब सोवियत सरकार ने उसे हुक्म दिया कि जर्मन कमान से सुलह करने के लिए तुरन्त बातचीत चलाओ, तो उसने इन्कार कर दिया। इस पर, सोवियत सरकार के हुक्म से उसे हटा दिया गया। क्रान्ति विरोधी जनरल हेडक्वार्टर भंग कर दिया गया और खुद दुखोनिन को उसके खिलाफ विद्रोह करने वाले सैनिकों ने मार डाला। पार्टी के भीतर कुछ नामी-गिरामी अवसरवादियों – कामेनेव, ज़िनोवियेव, राइकोव, श्लीयापनीकोव, वग़ैरह – ने भी सोवियत सत्ता के खिलाफ धावा बोला। उन्होंने माँग की कि एक `संयुक्त समाजवादी सरकार´ बनायी जाये, जिसमें मेंशेविक और समाजवादी क्रान्तिकारी भी शामिल किये जायें जिन्हें अक्टूबर क्रान्ति ने अभी-अभी परास्त किया था। 15 नवम्बर 1917 को, बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें इन क्रान्ति-विरोधी पार्टियों के साथ समझौता करना नामंजूर कर दिया गया और कामेनेव तथा ज़िनोवियेव को क्रान्ति का हड़ताल-तोड़क कहा गया।

17 नवम्बर को, पार्टी की नीति से असहमत होते हुए कामेनेव, ज़िनोवियेव, राइकोव और मिल्यूतिन ने ऐलान किया कि वे केन्द्रीय समिति से इस्तीफा देते हैं। उसी दिन, 17 नवम्बर को, नोगिन ने अपनी तरफ से और जनकमिसार समिति के सदस्यों – राइकोव, वी. मिल्यूतिन, तियोदोरोविच, ए. श्लीयापनीकोव, डी. रियाज़ानोव, यूरेनेव और लारिन – की तरफ से ऐलान किया कि वे पार्टी की केन्द्रीय समिति की नीति से असहमत हैं और जनकमिसार समिति से इस्तीफा देते हैं। इन मुट्ठीभर ग़द्दारों के भाग खड़े होने से, अक्टूबर क्रान्ति के दुश्मनों के यहाँ खुशियाँ मनायी जाने लगीं। पूँजीपति और उनके पिट्ठू खुशी से फूलकर कहने लगे कि बोल्शेविज्म ख़त्म हो गया और बोल्शेविक पार्टी जल्द ही समाप्त होने वाली है। लेकिन इन मुट्ठीभर ग़द्दारों की वजह से, पार्टी एक क्षण के लिए भी विचलित न हुई। पार्टी की केन्द्रीय समिति ने घृणा के साथ उन्हें क्रान्ति से भाग खड़े होने वाला और पूँजीपतियों का साझीदार कहकर उनकी निन्दा की और अपने आगे के काम में लग गयी।

जहाँ तक `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों का सवाल था, वे किसान जनता पर अपना असर बनाये रखना चाहते थे। किसानों की हमदर्दी निश्चित रूप से बोल्शेविकों के साथ थी। इसलिए, `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों ने फैसला किया कि बोल्शेविकों से झगड़ा न करें और फिलहाल उनके साथ संयुक्त मोर्चा बनाये रहें। नवम्बर 1917 में, किसान सोवियतों की कांग्रेस हुई। उसने अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति से हासिल हुए सभी लाभ स्वीकार किये और सोवियत सरकार के आज्ञा-पत्रों का समर्थन किया। `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों के साथ एक समझौता हुआ और उनमें से कई को जनकमिसार समिति में जगहें दी गयीं (कोलेगायेव, स्प्रिदोनोवा, प्रोश्यान और स्टाइनबर्ग)। लेकिन, यह समझौता ब्रेस्ट-लिटोव्स्क की संधि होने और ग़रीब किसानों की कमेटियाँ बनने तक ही कायम रहा। उसके बाद किसानों में गहरी दरार पड़ी। `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारी अधिकाधिक कुलक हित ज़ाहिर करने लगे। उन्होंने बोल्शेविकों के खिलाफ बग़ावत की और सोवियत सत्ता ने उन्हें परास्त कर दिया।

अक्टूबर 1917 से फरवरी 1918 तक, देश के विशाल प्रदेशों में सोवियत क्रान्ति इतनी तेज़ी से फैली कि लेनिन ने उसे सोवियत सत्ता की `विजय-यात्रा´ कहा।

महान अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति विजयी हुई।

रूस में समाजवादी क्रान्ति की इस अपेक्षाकृत आसान विजय के कई कारण थे। नीचे लिखे हुए मुख्य कारण ध्यान देने योग्य हैं :

(1) अक्टूबर क्रान्ति का दुश्मन अपेक्षाकृत ऐसा कमज़ोर, ऐसा असंगठित और राजनीतिक रूप से ऐसा अनुभवहीन था जैसेकि रूसी पूँजीपति। रूसी पूँजीपति आर्थिक रूप से अब भी कमज़ोर थे और पूरी तरह सरकारी ठेकों पर निर्भर थे। उनमें राजनीतिक आत्मनिर्भरता और पहलकदमी इतनी न थी कि परिस्थिति से निकलने का रास्ता ढूँढ़ सकें। मसलन, बड़े पैमाने पर राजनीतिक गुटबन्दी और राजनीतिक दगाबाज़ी में उन्हें फ्रांसीसी पूँजीपतियों का-सा तजुर्बा न था, न अंग्रेज़ पूँजीपतियों की तरह, उन्होंने विशद रूप से सोचे हुए चतुर समझौते करने की शिक्षा पायी थी। हाल ही में, उन्होंने ज़ार से समझौता करने की कोशिश की थी। फरवरी क्रान्ति ने ज़ार का तख्ता उलट दिया था और सत्ता खुद पूँजीपतियों के हाथ में आ गयी थी लेकिन बुनियादी तौर से घृणित ज़ार की नीति पर ही चलने के सिवा उन्हें और कुछ न सूझ पड़ा। ज़ार की तरह, उन्होंने `विजय तक युद्ध करने´ का समर्थन किया, हालाँकि युद्ध चलाना देश की शक्ति से परे था और जनता तथा फौज दोनों युद्ध से बुरी तरह चूर हो चुके थे। ज़ार की तरह, कुल मिलाकर वे भी रियासती ज़मीन बनाये रखने के पक्ष में थे, हालाँकि ज़मीन की कमी और ज़मींदारों के जुवे के बोझ से किसान मर रहे थे। जहाँ तक उनकी मज़दूर नीति का सम्बन्ध था, वे मज़दूर वर्ग से नफरत करने में ज़ार के भी कान काट चुके थे। उन्होंने कारख़ानेदारों के जुवे को बनाये रखने और मज़बूत करने की ही कोशिश नहीं की, बल्कि उन्होंने बड़े पैमाने पर तालाबन्दी करके उसे असहनीय बना दिया।

कोई ताज्जुब नहीं कि जनता ने ज़ार की नीति और पूँजीपतियों की नीति में कोई बुनियादी भेद नहीं देखा, और जो घृणा उसके दिल में ज़ार के लिए थी वही पूँजीपतियों की अस्थायी सरकार के लिए हो गयी।

जब तक समाजवादी क्रान्तिकारी और मेंशेविक पार्टियों का थोड़ा बहुत असर जनता पर था, तब तक पूँजीपति उन्हें पर्दे की तरह इस्तेमाल कर सकते थे और अपनी सत्ता बनाये रख सकते थे। लेकिन, जब मेंशेविकों और समाजवादी क्रान्तिकारियों ने ज़ाहिर कर दिया कि वे साम्राज्यवादी पूँजीपतियों के दलाल हैं और इस तरह जनता में उन्होंने अपना असर खो दिया, तब पूँजीपतियों और उनकी अस्थायी सरकार का कोई मददगार न रहा।

(2) अक्टूबर क्रान्ति का नेतृत्व रूस के मज़दूर वर्ग जैसे क्रान्तिकारी वर्ग ने किया। यह ऐसा वर्ग था जो संघर्ष की आँच में तप चुका था, जो थोड़ी ही अवधि में दो क्रान्तियों से गुज़र चुका था और जो तीसरी क्रान्ति के शुरू होने से पहले शान्ति, ज़मीन, स्वाधीनता और समाजवाद के लिए संघर्ष में जनता का नायक माना जा चुका था। अगर क्रान्ति का नेता रूस के मज़दूर वर्ग जैसा न होता, ऐसा नेता जिसने जनता का विश्वास पा लिया था, तो मज़दूरों और किसानों की मैत्री न होती और इस तरह की मैत्री के बिना अक्टूबर क्रान्ति की विजय असम्भव होती।

(3) रूस के मज़दूर वर्ग को क्रान्ति में ग़रीब किसानों जैसा समर्थ साथी मिला, जो किसान जनता का भारी बहुसंख्यक भाग था। जहाँ तक आम मेहनतकश किसानों का सवाल था, क्रान्ति के आठ महीनों का तजुर्बा बेकार नहीं गया। इस तजुर्बे की तुलना `साधारण´ विकास के बीसियों सालों के तजुर्बे से निस्सन्देह की जा सकती है। इन दिनों, उन्हें मौका मिला कि वे अमल में रूस की तमाम पार्टियों को परख लें और अपनी दिलजमई कर लें कि न तो कान्स्टीट्यूशनल डेमोक्रेट और न समाजवादी क्रान्तिकारी या मेंशेविक ही ज़मींदारों से कोई गम्भीर झगड़ा मोल लेंगे, या किसानों के हित के लिए अपना बलिदान करेंगे, कि रूस में एक ही पार्टी है – बोल्शेविक पार्टी – जिसका ज़मींदारों से कोई सम्बन्ध नहीं है और जो उन्हें किसानों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए कुचलने को तैयार है। सर्वहारा और ग़रीब किसानों की मैत्री का यह दृढ़ आधार था। मज़दूर वर्ग और ग़रीब किसानों की इस मैत्री के कायम होने से, मध्यम किसानों की गति निश्चित हो गयी। ये मध्यम किसान बहुत दिन तक ढुलमुल रहे थे और अक्टूबर विद्रोह के शुरू होने से पहले ही पूरी तरह क्रान्ति की तरफ आये थे और उन्होंने ग़रीब किसानों से नाता जोड़ा था।

कहना न होगा कि इस मैत्री के बिना अक्टूबर क्रान्ति विजयी न होती।

(4) मज़दूर वर्ग का नेतृत्व राजनीतिक संघर्षों में तपी और परखी हुई बोल्शेविक पार्टी जैसी पार्टी ने किया था। बोल्शेविक पार्टी इतनी साहसी पार्टी थी कि निर्णायक हमले में जनता का नेतृत्व कर सके। वह इतनी सावधान पार्टी थी कि मंज़िल की तरफ जाने के रास्ते में ढँकी-मुँदी खाई-खन्दकों से बचकर निकल सके। ऐसी ही पार्टी विभिन्न क्रान्तिकारी आन्दोलनों को चतुराई से एक ही सामान्य क्रान्तिकारी धारा में मिला सकती थी। शान्ति के लिए आम जनवादी आन्दोलन, जातीय स्वाधीनता और जातीय समानता के लिए पीड़ित जातियों का आन्दोलन और पूँजीपतियों का तख्ता उलटने के लिए और सर्वहारा अधिनायकत्व कायम करने के लिए सर्वहारा वर्ग का समाजवादी आन्दोलन – इन सबको ऐसी ही पार्टी एक सामान्य क्रान्तिकारी धारा में मिला सकती थी।

इसमें सन्देह नहीं कि इन विभिन्न क्रान्तिकारी धाराओं के एक ही सामान्य शक्तिशाली क्रान्तिकारी धारा में मिलने ने रूस में पूँजीवाद की तकदीर का फैसला कर दिया।

(5) अक्टूबर क्रान्ति ऐसे समय आरम्भ हुई जबकि साम्राज्यवादी युद्ध अभी ज़ोरों पर था, जबकि प्रमुख पूँजीवादी राज्य दो विरोधी खेमों में बँटे हुए थे और जब परस्पर युद्ध में फँसे रहने और एक-दूसरे की जड़ें काटने में लगे रहने से, वे `रूसी मामलों´ में सफलता से दख़ल न दे सकते थे और सक्रिय रूप से अक्टूबर क्रान्ति का विरोध न कर सकते थे। निस्सन्देह, अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति की जीत में इस बात से बहुत मदद मिली।

(`बिगुल´, फरवरी 1998 और मार्च-अप्रैल ´98 में धारावाहिक प्रकाशित)

बुझी नहीं है अक्टूबर क्रांति की मशाल – पीडीऍफ़

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होन्डुरस की घटनाओं ने खोली बुर्जुआ लोकतंत्र की पोल

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एक करोड़पति जमींदार राष्ट्रपति जिसका जुर्म था कि उसने अपने देश को अमेरिकन पक्षीय खेमें से निकाल लिया और  लैटिन अमेरिका के बाएं मुहाज के खेमे से हाथ मिलाया और लोक-पक्षीय सुधारों की शुरुआत करना करना शुरू की, के जबरन तख्तापलट के विरुद्ध लोगों के प्रतिरोध के फूटने के क्रांति में परिवर्तन होने की संभावना की और संकेत किये जा रहे हैं.

honduras resists

३० सितंबर को अर्जन्टीना के दैनिक ‘कलारिन’ में वर्तमान राष्टपति रोबर्टो माईकलेटी जिसने चुने हुए राष्ट्रपति मैन्युल जेलाया को मिलट्री एक्शन द्वारा जबरन हटा दिया का बयान प्रकाशित हुआ ,” हमने जेलाया को हटा दिया क्योंकि वह लेफ्टिस्ट था… इससे हम परेशान थे.

लेकिन जबरन हटाये गए राष्ट्रपति मैन्युल जेलाया जिनका  बन्दूक की नोक पर अपहरण  किया गया और रिका के तट पर निर्वासित कर दिया गया, के सौ दिन बाद भी नए राष्ट्रपति रोबर्टो माईकलेटी की परेशानियों में कमी नहीं आई है. जेलाया वापस देश आ गए हैं और वहां ब्राजील के दूतावास में शरण लिए हुए हैं. इस घटना से सक्रीय हुए लोगों के होठों पर अपने राष्ट्रपति की पुनर्बहाली के अलावा और भी मांगे हैं.

निरंतर सख्त दमन के बावजूद लोगों का शांतिपूर्वक विरोध, हड़तालें और रास्ता रोको आन्दोलन जारी हैं. Honduras Resists की २ अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार ४००० लोगों को बंदी बनाया जा चूका है और १७ मारे गए हैं जबकि गैर सरकारी आंकडा इससे कहीं बड़ा है. इसी ब्लॉग पर लिखने वाली मारिया रीटा मैटामोरोस कहती हैं कि उन्हें प्रतिरोध के कारण प्राकृतिक संसाधन और पर्यावरण के सचिवालय से अपने पद से हटा दिया गया. वे कहती हैं,

“मुझे इसलिए अपने पद से हटा दिया गया कि चारों तरफ प्रतिरोध करनेवाले लोगों का दमन जारी है. लोग अपना देश बचाने की भावना से ओतप्रोत हैं. हमें लगता है कि हम न्याय के लिए लड़ रहे हैं. राष्ट्रपति जेलाया वे व्यक्ति थे जो गरीब लोगों के पक्ष में खड़े थे. उनका एकमात्र जुर्म गरीबों की मदद रहा है. वे लोकप्रिय थे. वे गरीब लोगों के साथ बैठ जाया करते थे. उनको ये बातें नागवार लगी. जेलाया ने अन्य राष्ट्रपतियों के उल्ट देश के पूंजीपतियों के इशारों पर चलने से इंकार कर दिया. और उन्होंने उसे उसकी औकात दिखा दी.

जिस लोकतंत्र की बड़ाई का व्याख्यान करते बुर्जुआ बुद्धिजीवी कभी नहीं थकते यही है उसकी असलियत. चिली, इंडोनेशिया  और नेपाल के बाद अब होन्डुरस ने भी इस तथ्य को उजागर कर दिया है कि जब भी किसी बुर्जुआ राज्य की मेहनतकश इस लोकतंत्र द्वारा अपने एजेंडा को लागू करने की कोशिश करती है, उसे सत्ता से बाहर कर दिया जाता है. नेपाल में माओवादी जब भी कोई लोकपक्षीय कार्रवाई करना चाहते थे, अन्य दलों के लोग एकसाथ खड़े होकर उनका विरोध कर देते थे.

मारिया रीटा मैटामोरोस कहती हैं,” वे हमारा दमन कर रहे हैं. यह लोकतंत्र नहीं है. लोकतंत्र का मतलब होता है शांति, संवाद और एक-दूसरे की बात सुनना. मेरा मानना है कि यहाँ कोई लोकतंत्र नहीं है. यहाँ केवल दमन है. और जो ‘राष्ट्रपति’ यहाँ बैठा है वह हथियारों के बल विराजमान हुआ है. लोग उसे नहीं चाहते. उस जैसा व्यक्ति शासन नहीं कर सकता क्योंकि वह सहनशील नहीं है.”

प्रतिरोध का हिस्सा होने के कारण २१ दिनों तक हिरासत में रही प्रोफ़ेसर अगुस्तिना फ्लोरेस लोपेज़ ने बताया कि ,” मेरी रिहाई की शर्तों में एक यह है कि मैं स्वयं को इस प्रतिरोध से दूर रखूँ और ज़लाया की बहाली के आन्दोलन से दूर रहूँ.  परंतु सलाखें मुझे चुप नहीं करा सकती  और जेल ने मेरे विश्वास को नहीं तोडा है. मैं समझती हूँ कि काम करने के कई तरीके हो सकते हैं. मेरे कार्यस्थल पर  और मेरे घर के पास भी आन्दोलन शुरू किया जाना है और गृहणियों के साथ मिलकर संविधान सभा की जीत तक संघर्ष करना है जिससे लोगों की उम्मीदें जुडी हुई हैं.”

इस तख्तापलट के विरूद्व नेशनल प्रतिरोध फ्रंट FNRG  के अध्यक्ष गिल्बर्टो रिओस ने,  ग्रीन विकली पत्रिका’ को बताया कि यह प्रतिरोध संगठित और मज़बूत है और होन्डुरस की मुक्ति के लिए सबकुछ करने को तैयार है. रिओस आगे कहते हैं ” स्पष्ट है कि यह प्रतिरोध मेहनतकश वर्ग चरित्र धारण किये हुए है. देश के  उपरी तबके की बहुसंख्या तख्तापलट के पक्ष में हैं लेकिन वे कुल जनसँख्या के मुकाबले में अल्पसंख्यक हैं. निचले तबके के लोग बहुसंख्या में हैं. उनकी तादाद ६५ प्रतिशत है. वे गरीबी में जी रहे हैं. वे इस तख्तापलट के प्रतिरोध के साथ अभेद हो गए है”

प्रतिरोध की मुख्य मांगों में पूर्व राष्ट्रपति जेलाया की बहाली और संविधान सभा का गठन है ताकि नए लोकतान्त्रिक संविधान को दोबारा लिखा जा सके.

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FNRG ने मजदूरों, किसानों और अन्य लोकप्रिय जमातों का कामयाबी के साथ नेतृत्व किया है. इसने परिवर्तनकारी शक्तिशाली बल का रूप ले लिया है. इसके एक लाख से भी अधिक कार्यकर्त्ता सक्रीय रूप से काम कर रहे हैं.

इस तीव्र वर्ग संघर्ष ने तेगुसिगल्पा के पास-पडौस और सारे देश की गरीब बस्तियों को जगा दिया है. जमीन से जुड़े हुए हजारों कार्यकर्त्ता लोगों की रहनुमाई कर रहें हैं.

तेगुसिगल्पा के केंद्र में प्रदर्शन करने और पास-पडौस में इसे जनाक्रोश के साथ मिलाने के रणकौशल से विश्वास हो गया है   कि लोगों ने इस प्रतिरोध का सन्देश पूरी तरह ग्रहण कर लिया  है. इसने दूर की बस्तियों में प्रदशर्न करने के रास्ते खोल दिए हैं और वहां के लोगों ने शहर के दमन से मुक्त “स्वतन्त्र ज़ोन” की घोषणा करनी शुरू कर दी है. यहाँ रात को युद्ध जैसी स्थिति हो जाती है. प्रतिरोध को दबाने के लिए पुलिस दमन की नीति अपनाई जाती है जिसके परिणामस्वरूप नेतृत्व के लिए स्थानीय लोगों की और अधिक संख्या  आगे बढ जाती है.

रिओस नोट करते हैं कि जब पुलिस प्रतिरोध का दमन करने के लिए लोगों के घरों में घुस जाती है तो वे लोग जो अबतक इस लहर के प्रति तटस्थ थे, लहर का भाग बन जाते हैं.

रिओस कहते हैं कि मध्यम श्रेणी और छोटे और मझोले व्यवसायिक लोग जो तानाशाही सरकार के कारण तबाह होने शुरू हो गए है , धीरे-धीरे इस आन्दोलन में आने शुरू हो गए हैं.

लोगों के प्रतिरोध ने इस तख्तापलट सत्ता और इसके समर्थकों लिए एक बड़ा संकट खडा कर दिया है. देश की अर्थव्यवस्था को करोडों डालरों का घाटा हररोज सहना पड़ रहा है.

बदहवास सत्ता, जिसके बढ़ती हुई आन्तरिक कलह के चिह्न भी दिखने लगे हैं, ने २९ नवंबर के निर्धारित आम चुनावों तक सत्ता से चिपके रहने की इच्छा जाहिर की है जबकि बाएं मुहाज की लैटिन अमेरिका की सरकारों ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से इस सत्ता द्वारा निर्धारित चुनावों के विरोध की अपील की है.

वर्तमान सत्ता और जेलाया के बीच संवाद की कई कोशिशे हो चुकी हैं लेकिन उन्होंने FNRG की तरह अपने पद पर बहाली की शर्त पर ही संवाद होने का यकीन दिलाया है. जेलाया ने बातचीत के लिए FNRG से पॉँच सदस्य टीम का गठन किया है.

बातचीत के लिए अमेरिकन राज्यों के संगठन  की ओर से गठित शिष्टमंडल का उद्देश्य ‘सेन संधि’ के लिए सम्रर्थन जुटाना है जिसमें जेलाया की बहाली शामिल है लेकिन यह एक शक्ति के बँटवारे का समझौता है जिसमें तख्तापलट करने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की गयी है.

अमेरका जो इस तख्तापलट को हवा देता रहा है,इस संधि द्वारा समय लेना चाहता है ताकि इस दौरान  लोगों के इस वर्ग संघर्ष को अलग-थलग किया जा सके.

अक्टूबर क्रान्ति की मशाल बुझी नहीं है! बुझ नहीं सकती!

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अक्टूबर क्रांति की ९२वीँ वर्षगांठ पर

अब से ठीक 79 वर्ष पहले, 1917 में (पुराने कैलेण्डर के अनुसार अक्टूबर में और नये कैलेण्डर के अनुसार नवम्बर में) मेहनतकश अवाम ने, क्रान्तिकारी मज़दूर वर्ग की अगुवाई में, रूस में पहली बार पूँजीपतियों और सभी सम्पत्तिवान लुटेरों की राज्यसत्ता को बलपूर्वक उखाड़ फेंका था और पहली बार महान लेनिन और उनकी बोल्शेविक कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सर्वहारा राज्यसत्ता की – सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व की स्थापना की थी।

मानव समाज के वर्गों में बँटने के बाद के हज़ारों वर्षों के इतिहास में यह पहली ऐसी क्रान्ति थी जिसमें राज्यसत्ता एक शोषक वर्ग से दूसरे, नये शोषक वर्ग के हाथ में नहीं बल्कि मेहनतकश शोषित-उत्पीड़ित जनता के हाथों में गयी थी। इतिहास की पहली सचेतन संगठित क्रान्ति जिसने पहली बार उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व का नाश कर दिया और समता के साथ तरक्की की रफ्त़ार का नया रिकार्ड कायम किया |

दबे-कुचले लोगों ने पूरे मानव इतिहास में बग़ावतें तो अनगिनत बार की थीं लेकिन पेरिस कम्यून (1871 में पेरिस के मज़दूरों द्वारा सम्पन्न क्रान्ति और पहली सर्वहारा सत्ता की स्थापना, जिसे 72 दिनों बाद फ्रांसीसी पूँजीपतियों ने पूरे यूरोप के प्रतिक्रियावादियों की मदद से कुचल दिया) की शुरुआती कोशिश के बाद, अक्टूबर क्रान्ति मेहनतकश वर्गों की पहली योजनाबद्ध, सचेतन तौर पर संगठित क्रान्ति थी जिसके पीछे एक दर्शन था, एक विचारधारा थी, एक कार्यक्रम था, एक युद्धनीति थी और एक ऐसे रास्ते की रूपरेखा भी थी जिससे होकर आगे बढ़ते हुए एक नये समाज की रचना करनी थी।

निजी सम्पत्ति और वर्ग-शोषण के अस्तित्व में आने के लगभग चार हज़ार वर्षों बाद पहली बार मेहनतकशों की सोवियत सत्ता ने अब तक असम्भव और महज़ किताबी माने जाने वाली बात को सम्भव बनाकर वास्तविकता की ज़मीन पर उतार दिया। लेनिन और फिर स्तालिन के नेतृत्व वाली सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में स्थापित सर्वहारा सत्ता – सर्वहारा अधिनायकत्व ने अब तक सम्पत्ति का अपहरण करने वालों की ही सम्पत्ति का अपहरण कर लिया और फिर ज्ञात इतिहास में पहली बार उत्पादन के साधनों – यानी कल-कारख़ानों, खेतों, संचार-यातायात के साधनों आदि पर निजी स्वामित्व का ख़ात्मा कर दिया गया। इस सोच को ग़लत ही नहीं बल्कि उल्टा साबित कर दिया गया कि खेतों और कारख़ानों पर निजी मालिकाने के बिना समाज का कामकाज चल ही नहीं सकता। कामकाज चला ही नहीं बल्कि दौड़ा, और अद्भुत, चमत्कारी रफ़्तार से दौड़ा! उत्पादन और भौतिक प्रगति के सभी पुराने रिकॉर्ड टूट गये और मानदण्ड छोटे पड़ गये!

आज दुनियाभर का पूँजीवादी प्रेस समाजवाद पर चाहे जितना कीचड़ उछाल ले, तमाम झूठ-फरेब के बावजूद इस सच्चाई को उसे आज से पचास वर्षों पहले ही स्वीकारने के लिए मजबूर होना पड़ा था कि 1917 के बाद सोवियत संघ में वैज्ञानिक-मशीनी तरक्की और आम मेहनतकशों की चेतना, हुनर, शिक्षा, संस्कृति वग़ैरह की तरक्की की रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि जो चीज़ें हासिल करने में पश्चिमी यूरोप के देशों को करीब दो सौ वर्षों का समय लगा वह उसने सिर्फ 20-25 वर्षों में हासिल कर लिया। फ्रांसीसी क्रान्ति और इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति के बाद पश्चिमी दुनिया में जो भी तरक्की पूँजीवादी रास्ते से हासिल हुई थी, उसके साथ ही धनी-ग़रीब के बीच की खाई भी तेज़ रफ़्तार से बढ़ती चली गयी थी और पूँजीपतियों के जनवाद की यह असलियत सामने आती चली गयी थी कि वह धनिकों के बीच की स्वतन्त्रता , समानता, भ्रातृत्व है जबकि ग़रीबों-मेहनतकशों के ऊपर तानाशाही है। यह स्वाभाविक था, क्योंकि पश्चिम में सारी तरक्की जनता की खुशहाली और न्याय के लिए नहीं बल्कि नयी-नयी मशीनों द्वारा मेहनतकशों को निचोड़कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए पूँजीपतियों में लगी होड़ का नतीजा थी। दूसरी ओर सोवियत संघ में निजी मालिकाने के बलपूर्वक ख़ात्मे के बाद मुनाफाख़ोरी और लूट के मूल एवं मुख्य आधार को ख़त्म करके मेहनतकश जनता की राज्यसत्ता ने आम लोगों को पहली बार अपनी तरक्की के लिए उत्पादन का अवसर दिया तथा साथ ही सांस्कृतिक-शैक्षिक तरक्की और ज़िन्दगी की हर तरह की बेहतरी के लिए भी खुद अपनी पहल पर काम करने का मौका दिया। इसी का नतीजा था कि समाजवादी विकास ने जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने और पूरे सोवियत संघ को उन्नत औद्योगिक देशों की कतार में ला खड़ा करने के साथ ही समाज में ज्यादा से ज्यादा समानता स्थापित की और हज़ारों वर्षों से कायम विशेषाधिकारों, भौतिक-सांस्कृतिक अन्तरों और उनकी ज़मीन के मौजूद रहने के बावजूद पूँजीपतियों, भूस्वामियों, नौकरशाहों, सट्टेबाज़ों, व्यापारियों आदि सभी तरह के परोपजीवी वर्गों के प्रत्यक्ष शोषण को दो दशकों के भीतर ही समाप्त कर दिया। समाजवाद के रास्ते ने उद्योगों और खेतीबाड़ी की अभूतपूर्व तरक्की के साथ ही नि:शुल्क एवं समान शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि सुविधाओं को सर्वसुलभ बना दिया तथा बेरोज़गारी का पूरी तरह ख़ात्मा कर दिया। ग़ौरतलब बात यह है कि उद्योगों पर समूची जनता का मालिकाना स्थापित करके (यानी मेहनतकशों की राज्यसत्ता के अन्तर्गत राष्ट्रीकरण करके) और खेती का सामूहिकीकरण करके (यानी खेतों में काम करने वाले सभी किसानों के सामूहिक मालिकाने वाले बड़े फार्म स्थापित करके) सोवियत संघ ने ऊपर गिनायी गयीं उपलब्धियां उस समय हासिल कीं जब पूरी पूँजीवादी दुनिया महामन्दी (1930-40 के बीच) के भँवरों में पछाड़ खा रही थी।

स्तालिन के भूत से आज भी क्यों डरते हैं पूंजीपति और क्यों उन्हें आज भी गाली देते हैं उनके भाड़े के टट्टू ?

समाजवाद के महान निर्माता स्तालिन के बारे में आज पूँजीवादी अख़बारों के दो कौड़ी के भाड़े के टट्टू भी तरह-तरह के झूठ गढ़ रहे हैं। हम उन्हें सिर्फ याद दिलाना चाहते हैं कि कभी पूँजीवादी दुनिया के एच.जी. वेल्स, रोम्याँ रोलाँ, बर्नार्ड शॉ, बर्ट्रेड रसेल, चार्ली चैपलिन आदि और भारत के लाला लाजपत राय, गणेश शंकर विद्यार्थी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, नेहरू, प्रेमचन्द आदि जैसे महापुरुषों ने भी स्तालिन और सोवियत संघ की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि साम्राज्यवादी कुत्तों की गलाकाटू होड़ ने जब दूसरे महायुद्ध को और फासिस्ट-नात्सी भस्मासुरों को जन्म दिया तो हिटलर की सिर्फ 54 डिवीज़नों ने लगभग पूरे यूरोप को रौंदकर विश्वविजय का ख़तरा पैदा कर दिया था। उस समय उसकी 200 डिवीज़नों का मुकाबला करते हुए सोवियत जनता और लाल सेना ने हिटलर की पूरी सत्ता को ही तबाह कर डाला था। इसमें दो करोड़ सोवियत जनता ने अपनी बेमिसाल कुर्बानी स्तालिन की बहुप्रचारित ‘तानाशाही’ के डर से नहीं बल्कि समाजवाद और विश्व मानवता की हिफाज़त के लिए दी थी। उस समय तो रूज़वेल्ट, चर्चिल और दगॉल भी स्तालिन की बड़ाई कर रहे थे और पीछे-पीछे चल रहे थे तथा पश्चिमी अख़बार उन्हें ‘चाचा स्तालिन’ (`अंकल जो´) कह रहे थे, पर विश्वयुद्ध समाप्त होते ही स्तालिन को फिर तानाशाह कहा जाने लगा और सोवियत संघ नामक ‘शैतानी राज्य’ को तबाह कर दिये जाने का आह्वान किया जाने लगा। यह है पूँजीवाद का दोगलापन, जो स्वयंसिद्ध है।

पर दुनिया के पूँजीवादी इतिहासकार आज भी इस तथ्य से इन्कार नहीं कर पाते कि अक्टूबर क्रान्ति के तोपों के धमाकों ने दुनियाभर के मेहनतकशों को पूँजी की सत्ता के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा देने के साथ ही एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका की जनता के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों को भी ज़बरदस्त उछाल देने का काम किया। सोवियत संघ लगातार औपनिवेशिक गुलामी के विरुद्ध लड़ने वाले क्रान्तिकारियों को और आम जनता को प्रेरणा देता रहा और यथासम्भव मदद भी। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में भी सर्वहारा सत्ताएँ स्थापित हुई और चीन में माओ और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई नयी जनवादी क्रान्ति ने अक्टूबर क्रान्ति के बाद एक और, नया मील का पत्थर कायम किया। शक्तिशाली समाजवादी खेमे की मौजूदगी ने एशिया, अफ्रीका, लातिन अमेरिकी देशों की जनता पर कायम औपनिवेशिक और नवऔपनिवेशिक शिकंजे को ढीला करने में भी अहम भूमिका निभायी।

पर इतिहास कभी भी सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ता। यह आती-जाती लहरों के रूप में, ज्वार और भाटे के रूप में आगे बढ़ता है, सर्पिल रास्तों से होकर, अनेकों मोड़ों और घुमावों से होकर आगे बढ़ता है।

समाजवाद की फिलहाली हार के बुनियादी कारण क्या हैं ?

यह जानना बेहद जरू़री है!

समाजवादी समाज पूरी तरह वर्गविहीन, शोषणविहीन समाज नहीं होता, बल्कि इसकी शुरुआती अवस्था होता है। वह पूँजीवाद और कम्युनिज्म के बीच का ‘वर्ग समाज और वर्गविहीन समाज’ के बीच का काल होता है( कम्युनिज्म की सिर्फ प्रथम अवस्था होता है। मेहनतकश वर्ग इस दौरान बलपूर्वक सम्पत्तिवान, परजीवी वर्गों पर शासन कायम करके उत्पादन के साधनों पर से उनका स्वामित्व छीन लेता है( पर ये पुराने शोषक-शासक अपनी उसी लुटेरी मानसिकता और अपने ‘खोये हुए स्वर्ग’ को फिर से पाने की चाहत के साथ समाज में मौजूद होते हैं। इसके साथ ही छोटे पैमाने पर (गाँव के मँझोले व छोटे किसानों, छोटे उद्यमियों-कारोबारियों आदि के बीच) पूँजीवादी किस्म का उत्पादन समाजवाद के शुरुआती समयों में लम्बी अवधि तक मौजूद रहता है, निजी स्वामित्व छोटे पैमाने पर मौजूद रहता है और आम जनता के एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के भीतर धनी बनने की और मुनाफा कमाने की पुरानी बीमारी भी मौजूद रहती है। यह छोटे पैमाने का पूँजीवादी उत्पादन नये-नये पूँजीवादी तत्त्वों और मानसिकता को समाजवाद के भीतर नये सिरे से पैदा भी करता रहता है। इसके अलावा समाजवादी समाज में भी शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम करने वालों के बीच, कारख़ानों में काम करने वाले और खेतों में काम करने वालों के बीच तथा गाँव में रहने वालों और शहर में रहने वालों के बीच का अन्तर भी मौजूद रहता है। इसके अतिरिक्त, समाजवाद के बहुत आगे की मंज़िलों में ही यह सम्भव हो सकता है कि लोग क्षमता मुताबिक काम करते हैं और ज़रूरत मुताबिक पाते हैं। शुरू में तो लम्बे समय तक यही हो सकता है कि लोग जितना श्रम करें उसी के हिसाब से उन्हें मजदूरी मिले। अब चूँकि लोगों की श्रम करने की प्राकृतिक क्षमता एक नहीं होती, इस कारण से भी समाजवाद के शुरुआती लम्बे समय में असमानता पैदा होने का एक आधार मौजूद रहता है। कुल मतलब यह कि उत्पादन के साधनों पर पूरे समाज का मालिकाना कायम करना शोषण और असमानता के ख़ात्मे का सबसे ज़रूरी पहला कदम है, पर यही सब कुछ नहीं। इसके बाद भी समाज में असमानता और पूँजीवाद के उतने किस्म के उत्पादन केन्द्र और पालन-पोषण केन्द्र मौजूद रहते हैं, जो ऊपर गिनाये गये हैं। इन्हीं कारणों से समाजवादी समाज के भीतर भी नये किस्म के पूँजीवादी तत्त्व मज़बूत होते जाते हैं और समय रहते इन खरपतवारों को नष्ट करके ज़मीन की अच्छी तरह निराई-गुड़ाई और कीटनाशकों का छिड़काव न किया जाये तो यह समाजवाद की पूरी फसल तबाह कर डालते हैं। ये नये पूँजीवादी तत्त्व कम्युनिस्ट पार्टी और सर्वहारा राज्यसत्ता पर काबिज़ हो जाते हैं और पूँजीवाद की पुनर्स्थापना हो जाती है।

1953 में स्तालिन की मृत्यु के बाद सोवियत संघ में यही हुआ। ख्रुश्चेव के नेतृत्व में वहाँ एक नये किस्म का पूँजीवाद बहाल हो गया -‘समाजवादी’ मुखौटे और नकली लाल झण्डे वाला, सरकारी या राजकीय पूँजीवाद – बहुत कुछ हमारे देश के `पब्लिक सेक्टर´ जैसा! 1990 में यह मुखौटा भी गिर गया और महान अक्टूबर क्रान्ति के देश में एक बार फिर खुला पूँजीवाद बहाल हो गया।

सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति ने दिखलायी नयी राह!

दरअसल स्तालिन भी समाजवाद के भीतर मौजूद और नये सिरे से पनपने वाले बुर्जुआ तत्त्वों को पहचान नहीं सके, उनके द्वारा समाजवाद की हार के ख़तरे को देख नहीं सके और उनके विरुद्ध सतत क्रान्ति चलाते हुए कम्युनिज्म की दिशा में आगे बढ़ने की राह नहीं निकाल सके। इस दिशा में लेनिन ने सोचना ज़रूर शुरू किया था, पर वक्त ने उन्हें मौका नहीं दिया और 1924 में उनका निधन हो गया। स्तालिन की ग़लतियों ओर चीन के समाजवादी प्रयोगों से सबक लेकर माओ त्से-तुङ ने इस महान काम को अंजाम दिया और महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का वह प्रयोग किया जो विश्व सर्वहारा क्रान्ति के डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में पेरिस कम्यून और अक्टूबर क्रान्ति के बाद कायम तीसरा कीर्ति स्तम्भ है। हालाँकि चीन में भी माओ की मृत्यु के बाद पूँजीवादी तत्त्व सत्ता पर काबिज़ हो गये और पूँजीवाद की पुनर्स्थापना हो गयी, पर इससे सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का महत्त्व कम नहीं होता क्योंकि पहली बार इस महान क्रान्ति ने पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने, पूँजीवादी तत्त्वों को लगातार कमज़ोर करते जाने और वर्गविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ते जाने की ठोस, स्पष्ट राह बतलायी थी।

मेहनतकश अवाम अगर इतिहास से शिक्षा लेकर क्रान्ति के विज्ञान की समझ नहीं हासिल करेगा तो पूँजीपाति वर्ग और उसके भोंपुओं के भ्रामक प्रचारों से मुक्त नहीं हो पायेगा और यह मानता रहेगा कि समाजवाद की हार हो गयी है, वह असफल सिद्ध हो गयी। पूँजीवादी समाज की विपत्तियों से तंग, परेशान-बदहाल होकर वह समय-समय पर विद्रोह भी करता रहेगा, लेकिन समाजवाद की अन्तिम जीत में विश्वास और क्रान्ति के विज्ञान की समझ के अभाव में वह कभी भी पूँजीवाद का नाश नहीं कर सकेगा क्योंकि पूँजीवाद का एकमात्र विकल्प समाजवाद ही है।

अमर नहीं है पूँजीवाद! इसे मरना ही है!

हमें इस बात को अच्छी तरह से समझना होगा कि अतीत में भी क्रान्तियों के शुरुआती संस्करण असफल होते रहे हैं। सात-आठ सौ वर्षों तक कई दास विद्रोह कुचल दिये गये, तब कहीं जाकर दास प्रथा के युग का पूरी दुनिया से ख़ात्मा हो सका था। सामन्तवर्ग से संघर्ष करते हुए निर्णायक विजय हासिल करने में और पूँजीवादी सामाजिक ढाँचे का निर्माण करने में पूँजीपति वर्ग को तकरीबन चार सौ वर्षों का समय लग गया। फिर इसमें निराश या भग्नहृदय होने की भला क्या बात हो सकती है कि समाजवादी क्रान्ति फिलहाल कुछ समय के लिए सदियों से जड़ जमाये पूँजीवाद से हार गयी है और सर्वहारा वर्ग को फ़ौरी तौर पर पीछे हट जाना पड़ा है! और फिर हमें यह भी तो याद रखना होगा कि समाजवादी क्रान्ति मानव इतिहास की सर्वाधिक व्यापक, गहरी और बुनियादी क्रान्ति है, क्योंकि पहले की सभी क्रान्तियों ने एक पुरानी पड़ चुकी शोषण की व्यवस्था की जगह एक नये प्रकार की शोषण की व्यवस्था की स्थापना की जबकि समाजवादी क्रान्ति का लक्ष्य सभी वर्ग व्यवस्थाओं का, हर तरह के शोषण का और हर तरह की असमानता का नाश करना है। राज्यसत्ता पर सर्वहारा वर्ग के काबिज़ होने के बाद लम्बे समय के संघर्ष में ही यह सम्भव हो सकता है और इस लम्बे संक्रमण काल के दौरान एक से अधिक बार सर्वहारा वर्ग को हार का सामना भी करना पड़ सकता है।

हमें यह बात ठीक से समझ लेनी होगी कि प्रकृति और समाज की कोई भी चीज़, कोई भी ऐतिहासिक युग और कोई भी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था अमर नहीं होती। पूँजीवाद भी अजर-अमर नहीं है। दास प्रथा और सामन्त प्रथा की तरह पूँजी की उजरती गुलामी की प्रथा भी आज मानव समाज के पैरों की बेड़ी बन चुकी है जो उसको आगे नहीं बढ़ने दे रही है। अत:, निश्चित ही, मानवता इन बेड़ियों को तोड़ फेंकेगी। समूचे विश्व पूँजीवाद और इसके शीर्ष पर आसीन साम्राज्यवादी देशों तक की अर्थव्यवस्था आज एक लम्बी मन्दी और ठहराव के ऐसे ढाँचागत संकट से ग्रस्त है जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था। हालात बताते हैं कि इसकी मृत्यु अब सुदूर भविष्य की बात नहीं है। तब तक यह केवल घिसट-घिसटकर साँसें गिन सकता है जब तक कि मेहनतकश अवाम फिर से संगठित होकर इसके नाश की लड़ाई न छेड़ दे। हालाँकि पूरी दुनिया में अभी क्रान्ति की लहर पर प्रतिक्रान्ति की लहर हावी है, पर दुनिया के अलग-अलग कोनों से एक नये उभार के पूर्वसंकेत मिलने शुरू हो चुके हैं। रूस, भूतपूर्व सोवियत संघ के दूसरे घटक देशों में, और पूर्वी यूरोप के देशों में मेहनतकश जनता ने नकली समाजवाद का गन्दा चेहरा तो पहले ही देख लिया था, अब वह पश्चिमी दुनिया के ‘स्वर्ग’ की असलियत भी जान चुकी है। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था के साथ मिलते ही इन देशों की कमज़ोर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था गम्भीर संकट के भँवर में जा फँसी है तथा बेरोज़गारी, महँगाई, अभाव और भ्रष्टाचार की मार झेलती और मुट्ठीभर लोगों के धनी होने की कीमत अपनी कंगाली से चुकाती जनता एक बार फिर सड़कों पर उतर चुकी है। उसके एक अच्छे-ख़ासे हिस्से के हाथ में आज लेनिन और स्तालिन के पोस्टर और लाल परचम हैं और लबों पर सच्चे समाजवाद की बहाली के नारे हैं। वहाँ कई क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट संगठन नयी अक्टूबर क्रान्ति की रणनीति पर बहसें चला रहे हैं और पश्चिम के पूँजीवादी अख़बार भी इन देशों में ‘बोल्शेविक पुनरुत्थान’ की ख़बरें छाप रहे हैं। माओ के देश की जनता भी सोई नहीं है। वहाँ देङ सियाओ-पिङ के ‘बाज़ार समाजवाद’ नामधारी पूँजीवाद के खिलाफ किसानों ओर युवाओं की बग़ावतें हो रही हैं और बदनाम करने की तमाम कोशिशों के बावजूद जनता महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दिनों को याद कर रही है!

ज़ाहिर है कि सन्नाटा टूटने लगा है।

मिट्टी में दबे अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के बीज अंकुरित होने लगे हैं।

लातिन अमेरिकी देशों में किसानों-मज़दूरों के आन्दोलन और छापामार संघर्षों का नया सिलसिला शुरू हो चुका है। और अब एशिया भी जग रहा है। इण्डोनेशिया के ताज़ा जन-उभार से हुई शुरुआत की आहटें भारतीय उपमहाद्वीप तक में सुनायी पड़ रही हैं। भारत की जनता भी सोई नहीं रह सकती। नयी आर्थिक नीतियों के अमल ने साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की लूट और लगातार बढ़ती महँगाई-बेरोज़गारी-असमानता और भ्रष्टाचार को जिन आखिरी हदों तक पहुँचा दिया है, वहाँ पहुँचना एक जागते ज्वालामुखी के दहाने पर पहुँचने के समान है।

ज़ाहिरा तौर पर, भारतीय मेहनतकश अवाम को भी अपना ऐतिहासिक मिशन पूरा करने के लिए आगे कदम बढ़ाना होगा। यह पूरी दुनिया की तरह भारत में भी एक नये सर्वहारा पुनर्जागरण और नये सर्वहारा ज्ञानोदय का दौर है। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के इस नये दौर में भारतीय सर्वहारा वर्ग और मेहनतकश जनता को साम्राज्यवाद और उसके जूनियर पार्टनर बने भारतीय पूँजीपति वर्ग की राज्यसत्ता को उखाड़कर पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली को ही नष्ट कर देना है तथा राज्यसत्ता उत्पादन और समाज के पूरे तन्त्र पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेना है। यही क्रान्तिकारी लोक स्वराज्य के नारे का मतलब है। यही है भारत की नयी समाजवादी क्रान्ति जो आज की नयी परिस्थितियों के अनुरूप अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति का एक नया संस्करण है। भारत के मेहनतकशों को अक्टूबर क्रान्ति के दिखाये मार्ग पर आगे बढ़ना होगा, नये सिरे से अपनी नयी, नये ढंग की इंकलाबी पार्टी बनानी होगी और अपने देश की ज़मीन पर मौलिक ढंग से अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण की आधारशिला स्थापित करनी होगी।

इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि हम दुनिया की पहली समाजवादी क्रान्ति के प्रयोग के सारतत्त्व को, उसके निचोड़ को, उसकी सबसे बुनियादी शिक्षाओं को गाँठ बाँध लें। वे क्या हैं ?

अक्टबूर क्रान्ति की सबसे बुनियादी शिक्षाएँ

1. सर्वहारा क्रान्ति की सबसे पहली ज़रूरत है सर्वहारा वर्ग की, पूरे देश के स्तर पर संगठित एक क्रान्तिकारी पार्टी। यह क्रान्तिकारी पार्टी लेनिन के मार्गदर्शन में निर्मित बोल्शेविक पार्टी की तरह संघर्षों की आग में तपकर इस्पात बनी हो, पूँजीवाद की सशस्त्र सेना-पुलिस से लैस राज्यसत्ता से लोहा लेने में सक्षम हो (न कि महज़ चुनावबाज़ी और ट्रेडयूनियनबाज़ी का धन्धा करती हो), औद्योगिक सर्वहारा और ग्रामीण सर्वहारा में ही नहीं बल्कि बहुसंख्यक ग़रीब व परेशानहाल मँझोले किसानों में भी इसकी गहरी पैठ हो और यह अपने देश की परिस्थितियों की समझ के आधार पर क्रान्ति का कार्यक्रम और रास्ता तय करने में सक्षम हो, तभी यह अक्टूबर क्रान्ति का नया संस्करण तैयार कर सकती है।

2. जब हम अक्टूबर क्रान्ति के पहले के रूस में करीब बीस वर्षों तक जारी, ऐसी पार्टी के निर्माण और गठन की प्रक्रिया पर निगाह डालते हैं तो यह सच्चाई दिन की रोशनी की तरह साफ हो जाती है कि कठिन विचारधारात्मक संघर्ष, अटल विचारधारात्मक दृढ़ता और गहरी विचारधारात्मक समझ के बिना कोई सच्ची सर्वहारा पार्टी क्रान्ति करना तो दूर, गठित ही नहीं हो सकती और यदि गठित हो भी गयी तो जल्दी ही बिखर जायेगी। लेनिन और उनके साथी बोल्शेविकों ने एकदम अलग-थलग पड़ जाने का ख़तरा मोल लेते हुए भी विचारधारा के प्रश्न पर कोई समझौता नहीं किया और मार्क्सवाद की क्रान्तिकारी विचारधारा में किसी भी तरह की मिलावट की मेंशेविकों और कार्ल काउत्स्की के चेलों की साज़िशों को एकदम से ख़ारिज कर दिया। उन्होंने पार्टी को कभी भी चवन्निया मेम्बरी वाली महज़ चुनावबाज़, यूनियनबाज़, धन्धेबाज़ संगठन नहीं बनने दिया। दाँवपेंच के रूप में लेनिन की पार्टी ने पूँजीवादी चुनावों और संसद का भी इस्तेमाल किया और ट्रेडयूनियनों में काम करते हुए आर्थिक संघर्ष भी लगातार चलाये तथा जनता को जगाने के लिए विभिन्न प्रकार की राजनीतिक सुधारपरक कार्रवाइयाँ भी कीं, पर पार्टी ने इस बात को कभी नहीं भुलाया कि बिना बल-प्रयोग और हिंसा के, महज़ चुनावों के ज़रिये शोषक वर्गों से सत्ता छीनी नहीं जा सकती। वे पूँजीवादी राज्यसत्ता की सैन्य शक्ति और दमनतन्त्र को उखाड़ फेंकने के लिए क्रान्तिकारी तैयारी लगातार करते रहे और एक बार फिर अक्टूबर क्रान्ति ने इस बात को सही साबित किया कि शोषक वर्ग कभी भी समझाने-बुझाने या अल्पमत-बहुमत से सत्ता नहीं सौंप सकते। अक्टूबर क्रान्ति की इस शिक्षा को याद रखने का मतलब यह है कि भारत का सर्वहारा वर्ग भी भा.क.पा., मा.क.पा., भा.क.पा. मा-ले (लिबरेशन ग्रुप) और ऐसे तमाम सुधारवादी, अर्थवादी, पूँजीवादी संसदवादी कम्युनिस्ट संगठनों के भ्रमजाल से बाहर आकर कम्युनिज्म के सही क्रान्तिकारी चरित्र को पहचाने। ये सभी मदारी मेंशेविकों और काउत्स्कीपंथियों के उन सिद्धान्तों को ही नये लेबल लगाकर पेश करते हें जिनके खिलाफ लगातार लड़कर बोल्शेविक पार्टी ने विचारधारात्मक दृढ़ता हासिल की और तभी जाकर अक्टूबर क्रान्ति विजयी हो सकी।

3. साथ ही, अक्टूबर क्रान्ति और उसके नेता लेनिन की यह भी शिक्षा है कि क्रान्ति मुट्ठीभर समझदार और बहादुर क्रान्तिकारी नहीं, बल्कि व्यापक मेहनतकश जनता करती है। बहादुर और समझदार क्रान्तिकारी उस मेहनतकश जनता के हरावल दस्ता होते हैं जो जनता के रोज़मर्रा की छोटी-छोटी लड़ाइयों में हिस्सा लेते हुए, ट्रेडयूनियनों (बुर्जुआ और प्रतिक्रियावादी ट्रेडयूनियनों में भी) भागीदारी करके आर्थिक माँगों पर और साथ ही राजनीतिक माँगों पर भी लड़ते हुए, सम्भव होने पर रणकौशल के तौर पर पूँजीवादी चुनाव और संसद में भी भागीदारी करते हुए जनता की राजनीतिक चेतना का ज्यादा से ज्यादा क्रान्तिकारीकरण करते हैं और उसे शासक वर्गों के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार करते हैं। अर्थवाद और संसदवाद के विरोध के नाम पर इन सभी रूपों-रणकौशलों को छोड़कर किसी भी रूप में महज़ हथियारबन्द कार्रवाइयों पर ज़ोर देना वामपन्थी दुस्साहसवाद, या ‘अतिवामपन्थ’ का मध्यमवर्गीय भटकाव है जिसका फायदा अन्ततोगत्वा भाकपा-माकपा ब्राण्ड नकली कम्युनिस्टों और पूँजीवादी सत्ता को ही मिलता है।

4. अक्टूबर क्रान्ति का निचोड़ निकालते हुए लेनिन ने सैकड़ों बार विचारधारात्मक दृढ़ता को स्पष्ट किया था और कहा था कि वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को कभी न भूलो। इनको भूलने का मतलब ही है पूँजीवादी जनवाद और शान्तिपूर्ण संक्रमण के भ्रमजालों में जा फँसना और क्रान्ति के मार्ग को भूल जाना। हालात में चाहे जो भी बदलाव आ जाये, यदि पूँजीवाद पूँजीवाद है तो इसका अर्थ है कि राज्यसत्ता पूँजीपति वर्ग के हाथों में है, जिसे सिर्फ बलपूर्वक ही उखाड़ा जा सकता है और शोषक वर्गों को तब तक बलपूर्वक दबाये रखना पड़ेगा जब तक कि वर्ग के रूप में उनका अस्तित्व कायम रहेगा। आगे चलकर अक्टूबर क्रान्ति की इस शिक्षा को माओ ने महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान पुष्ट करने के साथ ही आगे विकसित किया और बताया कि सर्वहारा वर्ग राज्यसत्ता पर काबिज़ होने के बाद एक लम्बे समय तक यदि अपने अधिनायकत्व के अन्तर्गत सभी पूँजीवादी तत्त्वों के विरुद्ध सतत क्रान्ति नहीं चलायेगा और पूँजीवादी मूल्यों-विचारों-संस्थाओं के विरुद्ध सतत सांस्कृतिक क्रान्ति नहीं चलायेगा तो पूँजीवाद की पुनर्स्थापना अवश्यम्भावी होगी। अक्टूबर क्रान्ति की मशाल से पूँजीवादी जंगल राज में दावानल भड़काने के लिए इन शिक्षाओं को दिल में भलीभाँति बैठा लेना होगा, हर तरह के कठमुल्लेपन से मुक्त होकर आज की दुनिया और अपने देश की पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली, सामाजिक संरचना और राज्यतन्त्र की सही समझ कायम करनी होगी और लगातार क्रान्तिकारी कार्रवाइयों में धीरज तथा मुस्तैदी के साथ सन्नद्ध होकर एक ऐसी क्रान्तिकारी पार्टी का पुनर्गठन करना होगा जो अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण के निर्माण में सक्षम हो।

(`बिगुल´, नवम्बर-दिसम्बर 1996 में प्रकाशित

बुझी नहीं है अक्टूबर क्रांति की मशाल – पीडीऍफ़

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आज शहीदे-आजम का 102वां जन्मदिन है

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अमर शहीदों का पैगाम, जारी रखना है संग्राम !

भगत सिंह की बात सुनों,

नई क्रांति की राह चलो !

मेहनतकश बहनों और भाईयो,bhagat singh

28 सितंबर को महान शहीदे-आजम का 102वाँ जन्मदिन है. शहीदे-आजम के जन्मदिन पर जरूरत है कि हम महज रस्मी श्रद्धान्जलियों से हटकर अपने महबूब शहीद की याद को सच्चे दिल से ताजा करें. यह ज़रुरत सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे विदेशी गुलामी से देश को आजाद करवाने के लिए भरी जवानी में अपनी जान तक की बाजी लगा गए. भयंकर शोषण उत्पीडन का शिकार मेहनतकश जनता के लिए शहीद भगतसिंह को याद करना आज इससे भी गहरे अर्थ रखता है.

शहीद भगतसिंह के विचारों को दबाने की जितनी साजिशें अंग्रेजों ने की थी, वे आजाद भारत के लुटेरे हुक्मरानों की साजिशों के सामने कुछ भी नहीं है. बेहद घिनोनी साजिशों के तहत शहीदे-आजम भगतसिंह के विचारों को दबाने की कोशिश की गयी. १९४७ के बाद देश की राज्यसत्ता पर काबिज हुए काले अंग्रेजों ने शहीद भगतसिंह की आजादी की लडाई के बारे में इस झूठ का हमेशा प्रचार किया कि वे तो सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे. उनके मुताबिक शहीद भगतसिंह के बुतों पर फूल मालाएं पहनना ही उन्हें श्रद्धांजलि देने का तरीका है. लेकिन यह कड़वी सच्चाई किसी से छुपी नहीं है कि हम आज भी एक बेहद अँधेरे समय में रह रहे हैं. साधारण जनता के लिए इस देश में आज़ादी नाम की कोई चीज नहीं है. शहीद भगतसिंह के सपनों के समाज का निर्माण होना अभी बाकी है.

शहीद भगतसिंह और उनके साथियों ने एक ऐसे समाज के निर्माण का सपना देखा था जहाँ इन्सान के हाथों इन्सान की लूट न हो, जहाँ अमीरी-गरीबी की असामानताएं न हों, जहाँ धर्मों-जातियों-क्षेत्रों के नाम पर झगडे न हों, जहाँ स्त्री-पुरषों में असमानता न हो. वे एक ऐसे समाज के लिए संघर्ष करते रहे जहाँ मेहनतकश जनता रहने-खाने-पहनने सहित शिक्षा-स्वास्थ्य, मनोरंजन, आदि सहूलतें हासिल कर सके. वे हर मेहनतकश व्यक्ति के लिए इन्सान की ज़िन्दगी, मान-सम्मान की ज़िन्दगी चाहते थे.  लेकिन शहीदे-आजम भगत सिंह के प्यारे मेहनतकश लोग आज भी इस आजाद देश में गुलामों की ज़िन्दगी जीनेपर मजबूर कर दिए गए हैं. देश की साधारण जनता की बेहद दर्दनाक परस्थितियाँ शहीद भगतसिंह के सपनों के तार-तार होने की कहानी बयान कर रही हैं.

देश में १८ करोड़ लोग फुटपाथों पर सोते हैं, १८ करोड़ लोग झुगी-झोपडियों में रहते हैं. हर रोज ९ हज़ार बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर रहे हैं. ३५ करोड़ लोगों को भूखे सोना पड़ता है. देश के लगभग ८० करोड़ से भी अधिक औद्योगिक और खेतियर मजदूर और गरीब किसान दिन-रात की कड़ी मेहनत के बावजूद भी भूख और कंगाली से जूझ रहे हैं. करोडों नौजवानों के पास कोई रोजगार नहीं है. आर्थिक तंगियों-परेशानियों से घिरे लोग आत्महत्या कर रहे हैं. कमरतोड़ महँगाई गरीबों के मुहं से रोटी का आखिरी बचा निवाला भी छीनने जा रही है. फल, दूध, दही तो गरीबों की पहुँच से पहले ही बाहर थे – अब आलू, दाल भी खरीद पाना गरीबों के लिए असंभव सा होता जा रहा है.

हमारे इस आजाद भारत में हर सेकंड में एक स्त्री बलात्कार का शिकार होती है. हर वर्ष ५० हज़ार से अधिक बच्चे गायब होते हैं जिनमें से अधिकतर लड़कियां होती हैं. इनमें से अधिकतर लड़कियों को देह व्यापार के धंधे में जबरन धकेल दिया जाता है. इन बच्चों को भीख मांगने पर मजबूर कर दिया जाता है या फिर उनके शरीर के अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं.

यह शहीद भगतसिंह के सपनों की आज़ादी नहीं है. यह आज़ादी पूंजीपतियों की आज़ादी है.देश की ऊपर की आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का ८५ प्रतिशत है, वहीँ गरीबी का शिकार देश की निचली ६० प्रतिशत के पास सिर्फ २ प्रतिशत ही है. आज़ादी के ६ दशकों के दौरान २२ पूंजीपति घरानों की संपत्ति में ५०० गुना से भी अधिक बढोत्तरी हुई है. साम्राज्यवादी लूटेरों को भारतीय मेहनतकश जनता को लूटने के लिए बेहिसाब छूटें दी जा रही है. संसद-विधानसभाएँ चोर-गुंडे-बदमाशों-परजीवियों के अड्डे हैं जहाँ पूंजीपतियों द्वारा मेहनतकशों के हो रहे लूट-शोषण को बनाए रखने की स्कीमें बनाई जाती हैं, हक़-अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली जनता के दमन के लिए काले कानून तैयार किये जाते हैं.

यह है वह काली आज़ादी जिसकी जय जयकार करते देश के लूटरे हुकमरान कभी नहीं थकते.

क्रांतिकारी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि अंग्रेजों से राज्यसत्ता भारतियों के हाथ आ जाने से ही देश की विशाल जनता की हालत में कोई बदलाव नहीं आने वाला. शहीद भगतसिंह ने कहा था :

हम यह कहना चाहते हैं कि एक जंग लड़ी जा रही है जो तब तक जारी रहेगी जब तक इन्सान के हाथों इन्सान की लूट जारी रहेगी, जब तक कुछ शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता की आमदनी से साधनों पर कब्जा जमाये रखेंगे. यह लूटेरे अंग्रेज हों या भारतीय इससे स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता.

यह थे शहीद-भगतसिंह के जंगे-आजादी के सच्चे मायने जिन्हें दबाये रखने की कोशिशे भारतीय लूटेरे हुकमरानों द्वारा आज तक जारी है. हुकमरानों ने इतिहास की किताबों में शहीद भगतसिंह की आजादी की लड़ाई को हमेशा तोड़-मरोड़कर पेश किया. यही कारण है कि आज पढ़े-लिखे लोग भी भगतसिंह की जंगे-आज़ादी के इन मायनों से अनजान हैं – लेकिन लूटेरे हुकमरान कितनी भी साजिशें क्यों न रचते हों, शहीद भगतसिंह के विचार आज भी जिंदा है. जैसा कि शहीदे-आजम ने कहा था : हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली, ये मुशते खाक है फानी, रहे, रहे, न रहे. समाज के आमूलचूल बदलाव की तड़फ रखने वाले आज भी शहीदे-आजम की क्रांतिकारी सोच से प्रेरणा और मार्गदर्शन ले रहे हैं – शहीदे-आजम आज भी लूट,शोषण, जुल्म, दमन, अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले जिंदादिल इंसानों के दिलों की धड़कन हैं. वे आज भी जलती मशाल की तरह इन्कलाब की राह रोशन कर रहे हैं. लूटेरों के दिलों में आज भी भगतसिंह के विचार खौफ पैदा कर रहे हैं. उनके विचारों को दबाकर रखने की कोशिश के रूप में शहीद भगतसिंह को एक बार नहीं बल्कि अनेकों-अनेक बार फाँसी लगाने की कोशिशें होती आई हैं लेकिन शोषितों-उत्पीडितों के दिलों में वे आज भी लूट,शोषण, जुल्म, दमन, अन्याय, गुलामी से मुक्ति की आशा बनकर अमर हैं. वे आज भी हर मेहनतकश को इन्सान के हाथों इन्सान की लूट रहित नए समाज के निर्माण के महान पथ के राही बनने के लिए ललकार रहे हैं.

आज के अँधेरे समय में शहीद भगतसिंह के विचारों पर अमल करना ही उन्हें एकमात्र सच्ची श्रद्धाजंली हो सकती है. आओ , शहीद भगतसिंह के जन्मदिन पर उनके सपनों के समाज के निर्माण का प्रण लें.

हम सभी सच्चे लोगों को शहीद भगत सिंह के

सपनो के समाज के निर्माण के लिए चल रही जदोजहद में

हमारे हमसफ़र बनने का आह्वान करते हैं !

कारखाना मजदूर यूनियन लुधियाना

संपर्क : शहीद भगत सिंह पुस्तकालय, गली न. ५, लक्ष्मण नगर, ग्यासपुरा, लुधियाना

फ़ोन : 98771-43788 , 98886 -55663

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चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – क्या करें

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चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – अंतिम किश्त

इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

पहली बार क्या हुआ ? हुआ यह कि जब तेलंगाना का हथियारबंद संघर्ष हुआ तो, जब तक लडाई वहीँ तेलगाना तक सीमित थी तो ये काफी अच्छी तरह से संघर्ष को संचालित कर रहे थे लेकिन जैसे ही भारत की फौज ने इन पर चढाई की तो इन्हें पीछे भागना पड़ा. जो बुद्धिजीवी थे वे कमजोर साबित  हुए. उन्होंने कहा कि इस तरह की टक्कर का कोई फायदा नहीं है. तब उस तरह के हालात से डरते हुए उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि हथियारबंद संघर्ष का तरीका ठीक नहीं है. अब कोई और तरह के तरीके जैसे संसदवाद आदि आजमाए जाएँ. मतलब कि डर के कारण और हथियारबंद संघर्ष के ताव को न सहते हुए मार्क्सवाद को संशोधित करने के रास्ते चल पड़े. दुनिया भर में कम्युनिस्टों के संशोधनवाद के रास्ते पर चलने से भी पहले, यहाँ तक कि  ख्रुश्चेव से भी पहले भारत की कम्युनिस्ट पार्टी  (वर्तमान में सी.पी.आई.) ने संशोधनवादी रास्ता अपनाया.मार्शल टीटो से भी पहले के ये संशोधनवादी हैं. मार्शल टीटो भी संशोधनवादी हो गए थे. उन्होंने कहा था कि मजदूर वोटों द्वारा सत्ता हासिल कर लेंगे और समाजवाद की स्थापना हो जायेगी. और जब अमृतसर में इनकी कांफ्रेंस हुई, (उस वक्त सी.पी.आई. और सी.पी.एम. इकट्ठी थीं.) उस कांफ्रेंस में इन्होने इस संशोधन का प्रस्ताव रखा और पास किया जिसमें था कि अब वे केवल हथियारबंद इन्कलाब ही नहीं बल्कि कई और तरीकों की आजमाईश करेंगे. उसके बाद इन्होने जो अभ्यास किया है उसमें हथियारों का अभ्यास बिलकुल छोड़ दिया. इसके बाद इन पार्टियों के काडर में से अगर कोई ईमानदार सदस्य इनके लीडरों से पूछता था कि क्लासिकीय मार्क्सवाद तो हथियारों की प्रेक्टिस को नज़रंदाज़ नहीं करता है, तो ये जवाब देते थे कि आप मॉस मोबिलाईजेशन करें हम ऊपर की लीडरशिप से पूछकर बताएँगे. इन्होने क्रांतिकारियों की पार्टी से इसे एक मॉस पार्टी में बदलना शुरू कर दिया. जिसे कहते है कि दुअन्नी-चवन्नी की पार्टी जिसमें कोई भी शामिल हो सकता है. इसके पश्चात सी.पी.आई. और सी.पी.एम. आदि पार्टियों की यही कवायद रही है कि क्रांतिकारी पार्टी कि बजाय एक घोर जनवादी पार्टी , जनवादी भी नहीं, इससे भी आगे – जनवादी भी आगे की और देखते हैं एक बुर्जुआ जनवादी पार्टी बनाई जाये.

अब इनकी सोच क्या है? इनकी सोच है कि भारत एक धर्मों का देश है, धर्मों के और धर्मवालों के साथ मात्थापच्ची न करो, खुद नास्तिक रहो लेकिन धर्मों और धर्म वालों के साथ यूं मिल जाओ जैसे खिचड़ी में घी. कहने का अर्थ है कि किस प्रकार ये लोग विपरीत में बदले हैं. यह कोई सबब से नहीं हुआ कि  ये वामपंथी पार्टियाँ प्रतिक्रियावादी पार्टियों में बदल गयी हैं. इसके लिए ये मार्क्सवाद को संशोधित करके पहले ही रास्ता साफ़ कर चुके थे. ये लोग वैज्ञानिक विचारों से कुछ भी ग्रहण नहीं कर रहे हैं.इस प्रकार ये लोग कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे. संसद में कभी बहुमत में आकर भी नहीं, मतलब की इस पूंजीवादी ढांचे का निर्माण उन्होंने इस प्रकार किया है कि कभी भी मजदूर वर्ग इससे अपने एजेंडा को लागू करने में कामयाब नहीं हो सकता. एक उदाहरण देता हूँ. एक बार चौधरी देवी लाल चीन में गए. उन्हें वहां ट्रेक्टर  बहुत पसंद आये. देवी लाल कानून की अपेक्षा पंचायती ज्यादा थे. अब देखिये अगर पंचायत में आप को अधिकार है कि आपको पॉँच सौ रुपये तक के फैसले करवाने का हक़ है लेकिन आप ने फैसला कर दिया पॉँच हज़ार का तो बड़ी मुश्किल होगी. उन्होंने अफसरों से कहा कि वे इन ट्रेक्टरों को खरीदेंगे. लेकिन अफसरों ने जब देखा कि इस ‘डील’ से उन्हें तो कुछ भी नहीं मिलने वाला है, तो उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि इस देश से तो हम इस तरह की चीज नहीं खरीद सकते हैं. हमारे इस देश के साथ इस तरह के इकरार नहीं हैं. अगर अफसरशाही को इसमें अपने हित दिखाई देते तो वे उसी वक्त बता देते कि फलां-फलां धारा के तहत इन्हें खरीदा जा सकता है. हमारे कानून में बहुत सी एक दूसरे को काटती हुई धाराएँ है. एक से नहीं तो दूसरी से, इधर से नहीं तो कान उधर से पकडा जा सकता है.उस वक्त वैसे भी अफसरशाही किसानों को हिकारत की दृष्टि से देखती थी. इसलिए उसने कह दिया कि इस देश के साथ हमारा कुछ भी साँझा नहीं है. यह ‘डील’ नहीं हो सकती. हमारे कहने का भाव है कि संसद और कोई सोवियत जैसी चीज जिसे मजदूर वर्ग चाहता है उसके और इसके बीच का अंतर बहुत अधिक है.

फिर सवाल पैदा होता है कि मौजूदा हालात के तहत इंकलाबी शक्तियों को क्या करना चाहिए. इंकलाबी शक्तियों को समझना होगा कि जब तक हालात स्पष्ट इंकलाबी नहीं हो जाते तब तक चुनावों के बहिष्कार का मतलब अराजकतावाद होगा. मान लीजिये अगर हम बायकाट का नारा दे देते हैं तो चुनावों का बायकाट तो होगा नहीं, लेकिन हमारा बायकाट ज़रूर हो जायेगा.  जब तक मजदूरों के संगठन और आधार नहीं बन जाते, मजदूरों की लहरों के दौर की शुरुआत नहीं होती तब तक ऐसा सोचना भी गलत है. दूसरी और एक दो आदमी जीतवाकर, उन्हें सूअरबाड़े  में भेजकर और इस व्यवस्था का भंडा-फोड़ जैसी कार्रवाई करके भी मजूदरों और इंकलाबियों को कुछ हासिल नहीं होगा. अब स्थिति वह भी नहीं रही जिसके लिए पहले के दौर के इंकलाबी संसद का प्रचार के प्लेटफार्म के रूप में इस्तेमाल करने की सिफारिश किया करते थे. देश में मज़बूत एक इंकलाबी पार्टी जिसका की लोगों के बीच एक मज़बूत आधार हो, अपने थोड़े से इंकलाबी संसद में भेजकर प्रचार द्वारा लाभ उठा सकती है. लेकिन आज ऐसी स्थिति भी नहीं है. रूस में एक मज़बूत बोलेश्विक पार्टी थी. इसके थोड़े से व्यक्ति ही वहां की ‘दूमा’ के सदस्य थे लेकिन जब किसी मजदूर सदस्य ने बोलना होता था, तो सारे मजदूर अपने-अपने काम छोड़कर रेडियो-सेटों के चारों और इकट्ठे हो जाते थे. और उस वक्त इस तरह के जुर्म यानि कि रेडियो सुनने के अपराध में भी साईबीरिया की जेलों की सजा भुगतनी पड़ती थी. लेकिन मजदूरों के जोश और स्पिरिट में किसी प्रकार की कोई कमजोरी दिखाई नहीं देती थी. आज वैसी स्थिति नहीं है. असेम्बली लाइन को बिखरा दिया गया है. उत्पादन को एक देश के अन्दर के अलग-अलग कारखानों में ही नहीं बल्कि अलग-अलग देशों में और इसे फिर किसी अन्य देश में असेम्बल करने का दौर है. मजदूरों के प्रतिनिधि कारखानों में घुस ही नहीं पाते. अगर चले जाएँ तो उन्हें भी अपने साथ मिला लिया जाता है या ठिकाने लगा दिया जाता है. और इस प्रकार की हल्काबंदी की जाती है कि मजदूर बहुल आबादी को किसी एक सीट में बहुमत जैसी स्थिति में इकठ्ठा ही नहीं होने दिया जाता. सर्वे करवाए जाते हैं, अगर कहीं खतरा दिखाई देता है तो उस सीट का फिर परिसिमिन हो जाता है. उसे रिजर्व कर दिया जाता है या रिजर्वेशन भंग कर दी जाती है. हमारी यह पक्की धारणा है कि इन चुनावों में हमें एक अलग तरह से भाग लेना चाहिए. चुनावों में अपना उम्मीदवार खडा करना अपनी शक्ति जाया करने के सिवा कुछ नहीं है. बल्कि हमें चाहिए कि जब चुनावों के दौरान माहौल पूरी तरह से गर्म हो तो उस वक्त अपनी राजनीतिक सरगर्मियों को और अधिक तीव्र करें. लोगों से मिलकर उनतक अपनी बात पहुंचानी चाहिए. सभी बुर्जुआ और चुनावबाजी वामपंथी पार्टियों का भंडा-फोड़ करना चाहिए. लोगों को बताना चाहिए कि इन चुनावों से कुछ भी फर्क नहीं पड़ने वाला. फर्क तभी पड़ेगा जब सभी मेहनतकश अवाम खड़े होकर सारी ताकत अपने हाथ में लेंगे. लोगों को  बताया जाये कि किन-किन पार्टियों को किन-किन पूंजीपति और व्यावसायिक घरानों से कितना चंदा मिलता है. फिलहाल क्रांतिकारियों को इस तरह के या इससे मिलते-जुलते काम करने चाहिएं.

चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प – दूसरी किश्त

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इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

अब हम बदल के बारे में कुछ ऐतिहासिक बातें करते हैं. चुनावों के बारे में कहा जाता है कि ये तो बहुत ज़रूरी हैं और चुनाव कभी लोकसभा के तो कभी विधानसभा या पंचायतो और मयुन्सिपलिटी के चुनाव. ऊपर से लेकर नीचे तक चुनावों का जाल बुना गया है. लेकिन हम देखते हैं कि इन पर अरबों-खरबों का खर्च होता है.पिछले दिनों, आपने देखा होगा कि बुर्जुआ पत्रकार किस प्रकार पांच सितारा होटलों में ठहरे होते हैं , और ये लोग इन नेताओं और सरकारों के खिलाफ लिखते हैं ! जाने-माने पत्रकार खुशवंत सिंह पूछते हैं कि इन पत्रकारों और अख़बारों में से कोई एक भी ऐसा है जो अपनी जेब से खर्च करता हो ! ये पत्रकार, उनसे आप वहां मिल ही नहीं सकते . इसके विपरीत जब हम इसके बदल की बात करते हैं तो  हम मजदूरों के प्रारंभिक, बेशक  अल्पकालीन ही सही लेकिन महत्त्वपूर्ण अनुभवों को देखते हैं.१८७१ के पेरिस कम्यून में हम देखते हैं कि उन्होंने सारी बुर्जुआ मशीनरी को हटा दिया और सारे काम-काज को स्वयं संभाल लिया. उस अस्थाई ढांचे जिसने कुछ दिन ही शासन किया, वहां एक मजदूर वर्ग का प्रतिनिधि  शासन करने के अलावा फैक्टरी में भी काम करता था और उसकी तनख्वाह एक औसत मजदूर से ज्यादा नहीं थी. इसी प्रकार सोवियतें जो सोवियत यूनियन में बनीं. सोवियतें हमारी संसद की तरह थी लेकिन तत्त्व रूप से बिलकुल भिन्न. हमारी संसद अपने आप में कोई शासक शक्ति नहीं है बल्कि राज्य की शक्ति के कुल जोड़ का एक हिस्सा है. इसके विपरीत सोवियतें कानून ही नहीं बनाती थीं बल्कि उन्हें लागू भी करती थीं. हमारी संसद की तरह नहीं कि कानून को लागू करने के लिए भारी-भरकम अफसरशाही रखी जाये. और अफसरशाही उसे लागू करने में बीस-बीस साल या इससे भी अधिक समय लगाए और लोग इंसाफ का इंतजार करते-करते मर जाएँ. बुर्जुआ राज्य के दिखाने के दांत कोई और होते हैं और खाने वाले कोई और. संसद बुर्जुआ के दिखाने के दांत हैं जबकि अफसरशाही इसके खाने के. चीन में कम्युनों की मिसाल लें. महान सांस्कृतिक क्रांति जो माओ की अगुआई में शुरू हुई थी, उसके अनुभवों को देखें. हालाँकि दुनिया भर के वाईट-कालर बुद्धिजीवी वर्ग और चीन के बुद्धिजीवियों का भी कहना था की माओ ‘पागल’ हो गए हैं. उन्होंने कहा था कि अब प्रोफेसर और बुद्धिजीवी पढ़ने-पढाने के अलावा खेतों और फैक्ट्रियों में काम भी करेंगे और मजदूर और किसान स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढायेंगे. कई वस्तुगत कारणों के अलावा यह भी एक कारण था कि बुद्धिजीवी वर्ग जो क्रांति के समय मजदूर और किसान के साथ था, अपनी मंजिल आते ही इस जनवादी क्रांति की बस से नीचे कूद  गया !

अब हमारी इस नयी संसद के गठन पर इन्होने नौकरियों के लिए कुछ फार्म भरवाने शुरू किये हैं लेकिन ये आने वाले पॉँच सालों में इन फार्मों को छेड़ेंगे नहीं. अगर कर्मचारियों की भरती की भी जायेगी तो मुट्ठीभर लोगों की. तो यह है हमारी संसदीय प्रणाली. अगर हम इस संसदीय प्रणाली में इस बुर्जुआ राज्य की शक्ति के कुल जोड़ के एक अंग ‘संसद’ में बहुमत प्राप्त भी कर लेते हैं, जैसा की संशोधनवादी और संसदमार्गी कम्युनिस्टों का मानना है – हालाँकि इस प्रकार की स्थिति में इसकी कोई गुंजाईश भी नहीं दीखती, तो भी मजदूर वर्ग अपने ऐज़ंडा कि पैदावार या उत्पादन के साधनों के  समाजीकरण के साथ-साथ इन्हें सांझी मलकीयत में बदला जाये, तो किस प्रकार केवल कानून बनाकर इसे लागू किया जा सकता है जबकि सत्ता का एक बहुत बड़ा हिस्सा जैसे सरकारी अफसरशाही, पुलिस, फौज और स्वयं पूंजीपति वर्ग अपने निजी दल-बल और हथियारों के साथ इसके विरोध में मर-मिटने को तैयार-बर तैयार बैठा है ? हमारी चुनाव प्रणाली एक पूरे धंधे में बदल चुकी है. एक मजदूर कभी करोड़पति नहीं बन सकता (कौन बनेगा करोड़पति और स्लमडोग मिल्लियानेरी के भ्रम को अपने दिमाग से निकाल दें)

दूसरी बात जिसका कि ऐतिहासिक महत्त्व है वह है पूंजीवादी चुनाव और पूंजीवादी दल. पूंजीवादी दलों और पूंजीवादी चुनाव प्रणाली पूंजीवाद के जन्म के साथ-साथ पैदा हुए, ये हमेशा से इसी तरह विद्यमान नहीं रहे हैं. पूंजीवादी चुनावों का महत्त्व पूंजीवादी प्रणाली के अन्दर और इसे इसी प्रकार बरक़रार रखने में ही है. इसमें पूंजीपति या उनके उम्मीदवार ही चुनें जाते हैं या फिर वे जो इसी प्रणाली के अन्दर के रेस के घोडे होते हैं. अब तो उन्होंने इसे भी बर्दाश्त करना बंद कर दिया है. मिसाल के लिए हमारे प्रधान मंत्री और गृहमंत्री जो पहले वित्तमंत्री रहे हैं या तो चुनाव लड़ते ही नहीं या फिर हार जाते हैं लेकिन अमेरिकन पूंजीवादी साम्राज्य के, जिनकी कि भारतीय बुर्जुआजी जूनियर पार्टनर है, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थायों के इशारों पर सीधे नियुक्ति कर दी जाती है. इसके इलावा जातिवाद, धर्म, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, संप्रदाय आदि के प्रतिक्रियावादी समीकरणों में इन चुनावों को देखा जाता है. इस प्रकार इसे इतना पीछे-खींचू देखा जाता है,जैसे मिसाल के लिए अगर ‘हजका’ वालों ने राय सिख को खडा कर दिया तो लोकदल वालों ने देखा कि उनका ऐसा उम्मीदवार हो जो सिख न हो, भुमनशाह के डेरे को भी मानता हो और सच्चे सौदे का भी उपासक हो, कम्बोज हो लेकिन सिख नहीं मोना हो, उसे ढूंढकर खडा कर दिया है. इस तरह का सर्च-वर्क किया जाता है. वे लोग जो महीनों से टिकट पाने के लिए मुशक्कत कर रहे थे, हाथ मलते रह गए हैं ! उन्होंने एक कम्बोज को जो सिख नहीं है और जिसकी कि आढ़त की दुकान है और जो कृषि-पूंजीपति है उसे टिकट थमा दी है क्योंकि वह पूँजी के लिहाज से अन्य पार्टियों के उम्मीदवारों से किसी भी प्रकार से छोटा नहीं है. तो यह है वह स्थिति जिसके की हम सभी चश्मदीद गवाह हैं.

दूसरी और अपने उम्मीदवार जो चुंने जाते हैं. इस प्रकार की तो कोई बात नहीं है कि वर्तमान में हमारी ये बुर्जुआ पंचायते जो केवल बुर्जुआ वर्ग के हितों की रक्षा के लिए गठित की जाती हैं, हमारे सपने का हिस्सा हों. जिस प्रकार हम देखतें हैं की भगत सिंह का सपना सोवियतों की तर्ज़ पर पंचायतो के निर्माण का सपना था. अब सोवियतें क्या थीं ? जब हम कहते हैं की सारी सत्ता सोवियतों को? सोवियतों और पार्लियमैन्ट में क्या फर्क है? पंचायतो के निर्माण का सपना तो महात्मा गाँधी का भी था. लेकिन वह इसे वर्तमान और भविष्य के लिए नहीं देखता था बल्कि भारत के तथाकथित गौरवशाली अतीत की अन्धगली में छलांग लगा देता था. समाजवाद में सोवियत होगी इसके उल्ट की पार्लियमैन्ट हो. पार्लियमैन्ट क्या है ? यह कानून बनाती है जिसे इसे लागू करने का हक़ नहीं होता. इसे लागू करती है नौकरशाही जो जैसा कि हमने जिक्र किया, इसे लागू करने में बीस-बीस वर्ष लगा देती है. यह नौकरशाही ही इसके असली और खाने के दाँत होते हैं. अब मान लीजिये कि हमारी न्यायव्यवस्था में कोई व्यक्ति किसी मुकद्दमें में जीत भी जाता है तो नौकरशाही उसकी मदद तब ही करती है जब वह अपने विरोधी पक्ष से पूँजी के मामले में अधिक शक्तिशाली होता है.

बाकी हिस्सा अगली किश्त भारत के गाँव-गाँव तक पैठ कर चुकी बुर्जुआजी

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चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प

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http://sites.google.com/site/bigulcommunityradio2/Home/chunav2009kashmir.mp3?attredirects=0

इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

आम तौर पर क्या होता है कि लोग हमें यहाँ सी पी आई या सी पी एम से भिन्न नहीं समझते. इसमें कोई शक नहीं है कि हम उनसे अलग है लेकिन यह बात उपरी स्तर पर हल हो गयी और एक दूसरे से तोड़-विछोड़ा करने से पहले ताने-मेहने और वाद-विवाद का अभाव रहा है और लोग अक्सर इस तरह की बातें करते हैं कि कामरेडों, इस बार तो बड़ी बढ़िया बात है कि तुम्हारा आदमी भी चुनाव लड़ रहा है या फिर पूछते है कि अब किसे वोट दी जाये. इससे एक बड़ी पेचीदा स्थिति पैदा हो जाती है. इस पर हमें बड़े सीधे-साधे ढंग से अपनी स्थिति प्रकट करनी होती है. उन्हें बताया जाता है कि हमारे यहाँ भारत में दो तरह के कम्युनिस्ट हैं – एक वे जो चुनावों में भाग लेते हैं, इन्हें इलेक्शनबाज या संसदमार्गी कम्युनिस्ट कहा जाता है, दूसरे वे जो चुनावों में भाग नहीं लेते हैं. इनमें से एक वे हैं जो दुस्साहसवादी  या नकसलवादी कम्युनिस्ट है जो केवल हथियारों के बल पर इन्कलाब करना चाहते हैं. पहले वाले कम्युनिस्टों के भी आगे कई प्रवर्ग है जैसे सी.पी.आई., सी.पी.एम., सी.पी.एम. लिबरेशन आदि. और जो चुनाव नहीं लड़ते हैं उनमें भी कई तरह के हैं जैसे कुछ क्रांतिकारी ग्रुप हैं और इसके अलावा नकसली और माओवादी भी चुनावों में भाग नहीं लेते हैं..

उपरोक्त चर्चा का आशय क्या है ? इसे समझने के लिए आईए हम भारतीय बुर्जुआजी और इसके  लोकतंत्र (यानि बुर्जुआ लोकतंत्र, जिसके ऐतिहासिक विकास के थोड़े से वस्तुगत अध्ययन से हम इसे बुर्जुआ वर्ग की सर्वहारा वर्ग पर तानाशाही से बढ़कर कुछ नहीं समझते) के विकास और इतिहास को देखें. भारतीय बुर्जुआजी अंगरेजों के समय में पैदा हुई थी. यह पश्चिम या यूरोप के पूंजीपति वर्ग की तरह किसी स्वतन्त्र मुकाबले में संघर्ष से पैदा नहीं हुई है. अग्रेजी साम्राज्य के दौरान कभी छिप-छिप कर तो कभी थोडा सा मुखर होकर यह धीरे-धीरे अपना अस्तित्त्व ग्रहण करती गयी. कभी भी इसने खुलकर या संघर्षमयी तरीके से अपनी जरूरतों या मांगों को नहीं रखा. इसके विपरीत यह समयानुसार अपनी मांगे रखकर और फिर समझौता फिर मांगे और फिर समझौता की प्रक्रिया द्वारा पैदा हुई है. चाहे पहला विश्वयुद्ध हो या फिर दूसरा. जब भी इसने देखा कि अब अंग्रेजी साम्राज्यवाद उलझा हुआ है या किसी और कारण से – ये अपनी मांगे प्रस्तुत कर देती रही है. जैसे १९४२  में जब इसने देखा कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद दूसरे विश्वयुद्ध में उलझा हुआ है तो विश्व साम्राज्यवाद के अंतरविरोधों  का फायदा उठाते हुए ठीक कांग्रेस की अगुआई में इसने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’  शुरू कर दिया. इसने कभी भी उस समय के मेहनतकश वर्ग किसान या मजदूर वर्ग की मांगो को अपने आंदोलनों या मांगों का हिस्सा नहीं बनाया. १९४७ से पहले भी और बाद में भी इसका यही रुझान रहा है,  कभी चीन से समझौता तो कभी अमेरिका से या फिर रूस से.

अभी कुछ दिन पहले ही हरियाणा  के वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंदर हुड्डा के पिता श्री रणवीर हुड्डा का निधन हुआ है. वे हमारी उस सविधान सभा के सदस्य थे जो अंग्रेजी शासन के दौरान गठित हुई थी. उस ज़माने में इस संविधान सभा के सदस्य होने के लिए जो शर्तें निर्धारित थी उनमें केवल भारत की १५ प्रतिशत आबादी ही कवर होती थी. जैसे कि भूमि का मामला या आबियाना कर का भुगतान कौन लोग करते हैं. अन्य ८५ प्रतिशत आबादी को इसमें शामिल होने का कोई अधिकार नहीं था. इन पंद्रह फीसदी लोगों में  से चुनें हुए लोग ही उस संविधान सभा के सदस्य हुए.  जैसा कि होता रहा है,  भारतीय जब विदेश में निर्मित किसी चीज को देखते रहे हैं और फिर उसकी नक़ल करके उस पर ‘भारत में निर्मित’ का ठप्पा लगाते रहे हैं. ठीक वैसे ही इस संविधान सभा द्वारा निर्मित सविधान को ही १९४७ के बाद झाड़-पोंछकर संविधान का दर्जा दे दिया गया. संविधान के निर्माण से पहले संविधान सभा के लिए जिसमें आम लोग शामिल हों, के चुनाव के लिए किसी भी प्रकार की संविधान सभा का चुनाव नहीं हुआ. ब्रिटिश साम्राज्यवाद के कानून के अनुसार मुट्ठीभर वे लोग जो कुलीन थे और जो पैसे-टक्के वाले थे, वे ही भारत के वर्तमान संविधान के निर्माता रहे हैं (अगर इन्हें निर्माता  कहा जाये तो भी). संक्षेप में यही है हमारे संविधान का इतिहास जिसके बारे में बड़ी-बड़ी डींगे हांकी जाती है कि इसमें अम्बेडकर था , हुडा था या कोई और, और यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, उन लोग के बुत लगाये जाते हैं और उन्हें महानता की उपाधियाँ दी जाती है. ऐसी कोई बात नहीं है कि उनके बुत लगायें जाएँ और उन्हें ये उपाधियाँ दी जाएँ.

अब हम भारत की चुनाव प्रणाली की ओर आते हैं. हम देखते हैं कि यह प्रणाली कितनी खर्चीली है और आम लोगों की आकाँक्षाओं पर किसी भी प्रकार से खरी नहीं उतरती है. लेनिन के ‘राज्य और इन्कलाब’ के शब्दों के अनुसार इसमें होता सिर्फ इतना ही है कि हर पांच वर्षों के बाद देखना होता है कि लुटेरे वर्ग का कौनसा धड़ा अब लोगों के कपडे उतारेगा. आओ थोडा सा देखें कि इनके वेतन, भत्तों और अन्य सहूलतों की फेहरिस्त कितनी खर्चीली है. हम देखते हैं कि एक विधायक का चुनाव खर्च करोड़ रुपये या उससे बढ़कर है. चर्चा होती है कि फलां व्यक्ति फलां पार्टी से टिकट लेने के लिए इतने करोड़ देने को तैयार है. चुनाव उम्मीदवारों में से किसी एक का चुनाव करने के लिए हमें चुनाव से किसी गिरोह, भू माफिया या भ्रष्ट व्यक्ति से एक को चुनना होता है. ताज़ा चुनी गयी लोकसभा में ३०० सांसद यानि ५६ फीसदी घोषित करोड़पति हैं. वो ज़माने चले गए जब कामरेड भी कहा करते थे कि एक वोट और एक नोट. अब हम देखते हैं कि हमारी ये जो संसदमार्गी कम्युनिस्ट पार्टियाँ हैं इन्हें कोई बड़े पूंजीपति तो नहीं लेकिन निम्न पूंजीपति वर्ग या प्रोफेसर, वकील या कुलीन मजदूर वर्ग ने इन्हें थोडा-बहुत फंड या पैसा देना शुरू कर दिया है. लेकिन हम देखते हैं कि बुद्धदेव भटाचार्य ने भी उन नीतियों को पश्चिम बंगाल में लागू कर दिया है जो बुर्जुआ की मन-पसंद रही हैं, तो फंड और पैसा देने वाला ये वर्ग भी निराशा का शिकार है. इतिहास में हम देखते हैं कि पहली बार जब केरल में  नम्बूदरीपाद के नेतृत्व में वामपंथियों की सरकार बनी तो उस वक्त नेहरू प्रधान मंत्री थे और इंदिरा कांग्रेस की प्रधान. उन्होंने इस सरकार को तुंरत तोड़ दिया. लेकिन धीरे-धीरे भारत की बुर्जुआजी को और इसका प्रतिनिधित्व करने वाले दलों ने इस बात को समझा और आत्मसात किया कि ऐसी कोई बात नहीं है कि इन नामधारी कम्युनिस्टों से डरा जाये, तो उन्होंने इनको बर्दाशत करना शुरू कर दिया और इन्हें इनका वाजिब हक़ और सम्मान (?) देना शुरू कर दिया.

अब हम देखते हैं कि जिस देश की ८४ करोड़ आबादी जो २० रुपये दैनिक से गुज़ारा चलाती है, इस चुनावी नौटंकी में सिवाय अपना तमाशा बना लेने से, उन्हें कुछ हासिल नहीं होता है और न ही हो सकता है, वे अपने को बड़ी हास्यपद स्थिति में पाती है. ये आंकड़े कुछ वर्ष पुराने हैं. इन्हीं के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमंडल का रोजाना खर्च पंद्रह लाख रूपये है, प्रधानमंत्री दफ्तर पर प्रतिदिन दो लाख अड़तीस हज़ार रुपये खर्च होते हैं. राष्ट्रपति पर प्रतिदिन चार लाख चौदह हज़ार. संसद की एक घंटे की कार्रवाई पर सोलह लाख रुपये और इस प्रकार राज्य सभा की एक घंटे की कार्रवाई और राज्य विधान सभा की कार्रवाई  पर बारह-पंद्रह लाख रुपये प्रति घंटा खर्च होते हैं. इनके सदस्यों के वेतन कम दीखते हों लेकिन अन्य सहूलतें और  अन्य आमदनी का कोई हिसाब नहीं है. संसद की अलग-अलग कमेटियों में भाग लेने के लिए ४०० रुपये प्रतिदिन, सदन की मीटिंग बेशक न चलती हो तो भी ८००० रुपये प्रति मास लोगों से संपर्क के लिए चुनाव भता, दफ्तर में आने के लिए २५० ० रुपये , एक या दो सहायक रखने के लिए ६००० रुपये, प्रत्येक सदस्य को स्कूटर , ए.सी. या कार आदि सहूलतें,  फोन बिना कराये के , एक लाख मुफ्त फोन काल्स , फर्स्ट क्लास रेलवे और हवाई यात्रा की टिकटों पर भारी छूट. प्रत्येक सांसद अपने परिवार समेत ३२ हवाई यात्रायें मुफ्त कर सकता है , ..अन्य कमाई  को छोड़ दें. अन्य संस्थाओं के आफिसरों और अमले के खर्च पर लेनिन के ‘राज्य ओर इन्कलाब’ पुस्तक के शब्द कि इन प्रोफेसरों और आफिसरों के इतने बड़े वेतन, यह परोक्ष रूप से रिश्वत नहीं तो और क्या है? इस भारी-भरकम  रकम को खर्च करके यह मशीनरी लोगों पर राज्य करती है. मंत्री परिषद की सुरक्षा पर ५० करोड़ और अन्य प्रमुख हस्तियों की सुरक्षा पर एक अरब 61 करोड़ खर्च.

इसी ऑडियो के सार का बाकी हिस्सा अगली किश्त में जिसमें बुर्जुआजी के ऐतिहासिक विकास और बदल के बारे में चर्चा करेंगे.

चुनाव या कोई अन्य इंकलाबी विकल्प – दूसरी किश्त

सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र का विकास और क्रांति

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30.  ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ पर डेविड रियाजानोव

की व्याख्यात्मक टिप्पणियां

“वर्ग विरोध पर आधारित समाज में शोषित वर्ग अनिवार्यत: विद्यमान रहता है. इसलिए शोषित वर्ग की मुक्ति से नए समाज का निर्माण होता है. शोषित वर्ग की मुक्ति के लिए आवश्यक है कि विद्यमान उत्पादक शक्तियों  और प्रभावी सामाजिक सम्बन्ध परस्पर अनुकूल न हों. उत्पादन के औजारों में क्रांतिकारी वर्ग स्वयं सर्वाधिक ताकतवर उत्पादक शक्ति बन जाता है. क्रांतिकारी तत्त्वों के एक वर्ग के रूप में संघठन के लिए आवश्यक है कि पुराने समाज में समस्त उत्पादक शक्तियों का हर सम्भव विकास वास्तव में पूरा हो गया हो. तब क्या हम इस विचार को लें उडे कि पूर्व समाज के ध्वंस से दूसरे वर्ग का प्रभुत्व स्थापित हो जायेगा? कि इस नए प्रभुत्व की परिणति एक नयी राजनीतिक सत्ता की स्थापना में होगी? बिलकुल नहीं. मेहनतकश वर्ग की मुक्ति की यह अनिवार्य शर्त है कि समस्त वर्गों का खत्म हो जाये. पूर्व इतिहास में इसका सटीक उदाहरण मिलता है. राज्य से समस्त वर्गों, समस्त श्रेणियों के उन्मूलन से ही तीसरे वर्ग यानी बुर्जुआ वर्ग की मुक्ति का सवाल हल हुआ.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ.137)

सर्वहारा आन्दोलन के अंतरराष्ट्रीय चरित्र के प्रश्न पर आगे की टिपण्णी (42) में और अधिक विचार किया जायेगा. यहाँ पर पाठकों को मात्र यह याद दिलाने की ज़रुरत है कि घोषणापत्र के रचयिताओं ने ‘राष्ट्रीय’ शब्द का प्रयोग शासकीय और राज्यक्षेत्र के अर्थ में किया था. जब वे वर्ग संघर्ष के “मुख्यतया राष्ट्रीय” होने की चर्चा करते हैं तब उनका आशय यह होता है कि यह संघर्ष फ्रांस, इंग्लैंड, बेल्जियम आदि राष्ट्र-राज्यों की सीमा के अन्दर होता है. बुर्जुआ वर्ग को पराजित करने के लिए आवश्यक है कि सर्वहारा इस संघर्ष में अन्य देशों के सर्वहारा को मित्र के रूप में लामबंद करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध छेड़ दे. लेकिन ऐसा करने के पहले उसे अपने देश के बुर्जुआ से निपटना पड़ता है. दूसरा इंटरनेशनल इसलिए असफल हो गया क्योंकि इसके नेताओं ने ‘पितृभूमि की रक्षा’ के नारे को अपना लिया था जिसके तहत शुरुआत तो विदेशी बुर्जुआ को नष्ट करने से होनी थी लेकिन इसमें न केवल सीमा पार के सर्वहारा बंधुओं बल्कि अपने सह-राष्ट्रीय सर्वहारा बंधुओं को अपनी  तरफ करना ज़रूरी था. भीषणतम गृहयुद्धों में, क्रांति की अवधि में, राष्ट्रों के बीच अत्यधिक धर्मांध संघर्षों में, यहाँ तक कि इतिहास की पूरी अवधि में, इतना अधिक खून नहीं बहा है, इतनी अधिक जानें नहीं गयी हैं जितना कि हाल के विश्वयुद्ध में खून बहा है और जानें गयी हैं. ठीक उन्हीं लोगों ने इस विश्वयुद्ध का समर्थन किया था जिन्होंने अपने देश में बुर्जुआ सत्ता को बलात उखाड़ फेंकने से इस भय से इंकार कर दिया था कि इससे रक्तपात हो सकता है.

“विकास के दौरान मेहनतकश वर्ग पुराने बुर्जुआ समाज के स्थान पर एक ऐसा समाज स्थापित करेगा जिसमें वर्गों और वर्ग विरोध का लोप हो जायेगा. चूँकि राजनीतिक सत्ता बुर्जुआ समाज में विद्यमान विरोधों की आधिकारिक अभिव्यक्ति होती है, मात्र इसलिए सामान्य अर्थों में कोई राजनीतिक सत्ता नहीं होगी. उस वक्त तक सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच शत्रुता तो भिन्न वर्गों के संघर्ष के रूप में लेकिन बनी रहती है. जब यह संघर्ष अपने चर्म पर पहुँचता है तो क्रांति में तब्दील हो जाता है. क्या हमें यह जानकर आर्श्चय होना चाहिए कि वर्ग शत्रुता पर आधारित समाज का अंत सशस्त्र भिडंत से होगा और आमने-सामने की लडाई से इसका विघटन होगा? यह दावा नहीं किया जा सकता कि सामाजिक आन्दोलन राजनीतिक आन्दोलन का निषेध करता है. अभी तक कोई ऐसा राजनीतिक आन्दोलन नहीं हुआ जो सामाजिक आन्दोलन न रहा हो, जो सामाजिक आन्दोलन के साथ न चलता हो. केवल ऐसी सामाजिक अवस्था में, जिसमें वर्गों और वर्ग शत्रुता का अस्तित्व ही नहीं होगा, समाजिक विकास क्रांति का रूप धारण करना बंद कर देगा. लेकिन तब तक, हर बार जब समाज में व्यापक कायापलट होने वाली होती है, तब सामाजिक विज्ञान का निष्कर्ष जॉर्ज सान्द (1804-1876) के शब्दों में यह होगा — युद्ध या मौत : खूनी संघर्ष या विनाश, यही है वह विकल्प जिससे बचा नहीं जा सकता.” (मार्क्स, द पावर्टी ऑफ़ फिलासफी, पृ.137-138)

जब औजार क्रांति की माँग करते हैं

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श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के आलेख  उद्यम और श्रम की इन टिप्पणियों को  देखें ;

अभिषेक ओझा said… “लाल झण्डा माने अकार्यकुशलता पर प्रीमियम’: लाख टके की बात ! ”

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said… “जहाँ उद्यम उद्यमी और उद्योग का अर्थ श्रम का शोषण, शोषकपूँजीपति और पूँजी का विस्तारवाद, संस्कृत का श्लोक बुर्जुआओ की दलाल ब्राह्मणवादी मानसिकता समझा जाए तो व्याप्त औद्योगिक दुर्द्शा पर व्यक्त आपकी चिन्ता पर मरणासन्न मार्क्सवाद की ऎसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही है।
तू इधर उधर की न बात कर, ये बता कि कारवाँ लुटा क्यूँ कि तर्ज पर यह जवाबदेही बनती है कि भारत में २लाख से ज्यादा औद्योगिक इकाइयाँ बंद क्यों हैं? एशिया का मैनचेस्टर के नाम से जाना जानें वाला और जो १९४७ के पहले २ लाख तथा १९७० में लगभग १० लाख कामगारों को रोजगार देता था, वह कानपुर आज तबाह क्यों है? टैफ्को, लालइमली, एल्गिन, म्योर, अथर्टन, कानपुर टेक्सटाइल, रेल वैगन फैक्ट्री, जे०के०रेयन, जे०के०काटन, जे०के०जूट, स्वदेशी काटन,मिश्रा होजरी, ब्रशवेयर कारपोरेशन, मोतीलाल पदमपत शुगर मिल्स, गैंजेस फ्लोर मिल्स, न्यूकानपुर फ्लोर मिल्स, गणेश फ्लोर एण्ड वेजिटेबिल आयल मिल, श्रीराम महादेव फ्लोर मिल, एच ए एल, इण्डियन फर्टिलाइजर तथा अन्य सैकड़ों छोटे-बड़े कारखाने बन्द क्यों और किसकी वजह से हैं। सिर्फ और सिर्फ लाल झण्ड़े के कारण।”

काजल कुमार Kajal Kumar said… “आज लाल झंडे का मतलब केवल अधिकार रह गया है, न कि उत्तरदायित्व. ”

dhiru singh {धीरू सिंह} said… “मजदूर यूनियन तो स्पीड ब्रेकर है तरक्की उन्हें खलती है और हड़ताल उनकी आमदनी का जरिए है”

Amit said… “यूनियन श्रमिकों को संगठित करने और कुटिल उद्योगपतियों के द्वारा श्रमिकों का शोषण रोकने के लिए बनाई गई थीं लेकिन वहाँ भी वैसी ही कुटिल राजनीति होने लगी जैसी लोकतंत्रों में होती है। श्रमिक अपना विवेक बेच के यूनियन लीडरों के पीछे भेड़ों की भांति चलने लगे और लीडर स्वयं बादशाह बन गए।”

Mired Mirage said… “The conclusion I have reached is that neither the union, nor the owners care a damn for you.They all have vested interests. Labour or whatever, you are just pawns in this great game of chess….”

उपरोक्त कुछ टिप्पणियों से जो निष्कर्ष निकलते हैं :

१. मजदूर यूनियनों की अर्थवादी रोटियां सकने कि राजनीति और
२.  श्रमिकों, ट्रेड यूनियनों और उद्योगपतियों में से किसी एक पक्ष की जिद्द के कारण हड़ताल, तालाबंदी या किसी औद्योगिक इकाई द्वारा पूर्ण रूप से उत्पादन बंद.

पहला निष्कर्ष भी एक विस्तृत वाद-विवाद की मांग करता है लेकिन हम यहाँ केवल दूसरे निष्कर्ष जिसमें किसी औद्योगिक  संयंत्र में काम बंद होने के पीछे “श्रमिकों, ट्रेड यूनियनों और उद्योगपतियों में से किसी एक पक्ष की जिद्द” को दोषी ठहराया जाता है तक सीमित रहेंगे.

अनुभववादी या मनोगत तरीके से सोचने पर स्थिति के वस्तुगत निष्कर्ष सतही और अवैज्ञानिक होते हैं क्योंकि किसी एक संयंत्र में तालाबंदी आदि के पीछे हम केवल स्थानीय कारणों तक सीमित रह जाते हैं जबकि आज की इस उत्पादन की प्रक्रिया को स्थानीय, एकांगी और आंशिक रूप से न समझकर  इसे विश्व पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की विसंगतियों की समग्रता में देखना होगा. आज के नवउदारवादी युग में कोई भी ऐसा उत्पादन नहीं है जो साम्राज्यवादी पूंजी से निरपेक्ष हो.

थोडा सा सैद्धांतिक कारणों को समझने की कोशिश करते हैं,

पूंजी के दो भाग होते हैं. स्थिर (constant) पूंजी और परिवर्ती (variable) पूंजी. कच्चा माल, सहायक सामग्री और श्रम के औजार स्थिर पूंजी में शामिल होते हैं. उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान इनके मूल्य का कुछ भाग नए उत्पाद में रूपांतरित हो जाता है लेकिन इससे मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती.

दूसरी ओर, उत्पादन की प्रक्रिया में पूंजी के उस भाग के मूल्य में अवश्य परिवर्तन हो जाता है, जिसका प्रतिनिधित्व श्रम शक्ति करता है. वह खुद अपने मूल्य के समतुल्य का पुनरुत्पादन भी करता है और साथ ही उससे अधिक बेशी मूल्य भी पैदा कर देता है. इसे परिवर्ती पूंजी कहते हैं.

प्रतिस्पर्द्धा के चलते पूंजीपति के लिए ज़रूरी होता है कि वह स्थिर पूंजी वाले भाग पर नई से नई तकनीक का प्रयोग करते हुए और  परिवर्ती पूंजी पर मजदूरों की संख्या में कटौती करके श्रम सघनता बढाकर अधिक से अधिक उत्पादन करे. इससे अतिरिक्त मूल्य की दर बढ़ जाती या यूं कहें कि मजदूरों के शोषण की दर में बढोत्तरी होती है.  इस मामले में बड़ा पूंजीपति छोटे के मुकाबले में अधिक लाभ में रहता है. इस होड़ में  प्राय: छोटा पूंजीपति दम तोड़ देता है और उसकी औद्योगिक इकाई बंद हो जाती है. इसका एक परिणाम बेरोजगारी में वृद्धि होता है जो बड़े पूंजीपति द्वारा मजदूरों की संख्या में कटौती और बंद होने वाली औद्योगिक इकाई के कारण होती है.

इसके अलावा औद्योगिक इकाईयों के बंद होने के पीछे जो  दूसरा सैद्धांतिक तर्क सक्रीय है, उसे भी समझने की कोशिश करते हैं;

‘आयरन हील’ में  मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य की सरल व्याख्या करते हुए अर्नेस्ट निम्न निष्कर्ष निकालता है और प्रश्न करता है;

‘ मैं अपनी बात संक्षेप में दोहरा दूं. हमने एक विशेष औद्योगिक प्रक्रिया से बात शुरू की थी. एक जूता फैक्ट्री से हमने पाया कि जो हाल वहां है वही सारे औद्योगिक जगत में हैं. हमने पाया कि मजदूर को उत्पादन का एक हिस्सा मिलता है जिसे वह पूरी तरह खर्च कर देता है और पूंजीपति पूरा खर्च नहीं कर पाता. बचे हुए अतिरिक्त धन के लिए विदेशी बाज़ार अनिवार्य है. इस निवेश से वह देश भी अतिरिक्त पैदा करने में सक्षम हो जायेगा. जब एक दिन सभी इस स्थिति में पहुँच जायेंगे तो अंतत: इस अतिरिक्त का क्या होगा?

इसी अतिरिक्त ने वित्तीय साम्राज्यवादी पूंजी का रूप धारण करना शुरू किया लेकिन बीसवीं शताब्दी के शुरू में जब यह नावल प्रकाशित हुआ था उस वक्त वित्तीय पूंजी जो गैर उत्पादन कार्यों में लगती है , विश्व अर्थव्यवस्था की कुल पूंजी में उत्पादन की पूंजी के मुकाबले सतह पर तैरते एक बुलबुले समान थी. लेकिन आज स्थिति एकदम उल्ट है. आज वित्तीय पूंजी के मुकाबले उत्पादन कार्यों में लगी पूंजी एक बुलबुले समान है. जब इस अतिरिक्त के लिए उत्पादन कार्यों में लगने की कोई जगह नहीं है तो “किसी स्थानीय कुटीर उद्योग या मध्यम उद्योग की पूंजी” का मुकाबले में खड़े होना किस तरह से एक आसन कार्य हो सकता है ?

किसी स्थानीय कुटीर उद्योग या मध्यम उद्योग द्वारा जब उत्पादन शुरू होता है तो श्रम और पूंजी की टक्कर इस प्रक्रिया की एक आन्तरिक ज़रूरी शर्त होती है न कि बाहर से पैदा किया गया कोई छूत का रोग. खैर, उत्पादन शुरू हो जाता है, वस्तुओं के मूल्य का निर्धारण मार्केट ने तय करना होता है जिसे अन्य औद्योगिक इकाईयों की वस्तुओं के मूल्य से टक्कर लेनी होती है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में इस “कुटीर उद्योग या मध्यम उद्योग” का खड़े रहना असंभव नहीं तो इतना आसान और जोखिम रहित नहीं होता. निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि किसी भी संयंत्र में उत्पादन कार्य के ठप होने के पीछे ” श्रमिकों, ट्रेड यूनियनों और उद्योगपतियों में से किसी एक पक्ष की जिद्द” की अपेक्षा स्वयं पूंजी की आन्तरिक विसंगति कहीं ज्यादा जिम्मेदार होती है.

बीसवीं शताब्दी के शुरू में इसी अतिरिक्त ने, जिसके लिए उत्पादन के कार्यों के लिए कोई जगह बाकी नहीं बची रह गयी थी –  इसी अतिरिक्त ने वित्तीय पूंजी का रूप धारण करना शुरू किया जिसका चरित्र गैर-उत्पादन कार्यों में लगना होता है. वित्तीय पूंजी साम्राज्यवाद का एक ज़रूरी लक्ष्ण है. इसी अतिरिक्त मूल्य में लगातार बढोत्तरी का परिणाम था कि साम्राज्यवादी पूंजी विश्व का पुन: बटवारा करे जिसका परिणाम बीसवीं शताब्दी के दो विश्व-युद्ध  थे. अपने अतिरिक्त को खपाने का एक बढ़िया तरीका होता है कि मानवता को युद्ध में झोंक दिया जाये. इससे न केवल बेरोजगारी कम होती है बल्कि विरोधी देशों को जीतकर, वहां अपनी डमी सरकार की स्थापना द्वारा अपने हितों कि पूर्ति जारी रखी जा सकती है.

आज भले ही समाजवाद हार चुका हो लेकिन पूंजी का चरित्र किसी भी प्रकार से विकासोंमुखी नहीं है. पूंजी स्वयं परजीवी होती है जो मजदूर द्वारा पैदा किये गए अतिरिक्त से अपना विस्तार करती है. लेकिन आज तो पूंजी का एक भाग जो वित्तीय है जो उत्पादन की किसी भी प्रक्रिया में नहीं है, जो अपने विस्तार के लिए उस पूंजी से हिस्सा छीनता है जो स्वयं मजदूर से निचोडे गए अतिरिक्त पर निर्भर होती है – पूंजी का यह चरित्र किसी तरह से भी मानव हितैषी नहीं है. बीसवीं शताब्दी की यह भी एक विडम्बना ही थी कि एक तरफ समाजवाद हार गया और दूसरी तरफ पूंजीवाद की समस्याओं में लगातार बढोत्तरी हो रही थी.

उत्पादन की शक्तियों का बेहद विस्तार हो चुका है लेकिन उत्पादन सम्बन्ध वही पुराने हैं. इस आलेख के शुरू में दी गयी टिप्पणियों में वर्णित फ़िक्र और सुझाव ठीक वैसे ही हैं जैसे पैर के बढ़ने पर जूता बदलने की बजाय पैर को काटना. उत्पादन की शक्तियां जब विकसित हो जाती हैं तो वे पुराने आर्थिक संबंधों को तोड़ डालती हैं. मानव जाति का अब तक का विकास इसी बात की पुष्टि करता है. उत्पादन की शक्तियों के विकास पर माओ के इस कथन –“औजार मनुष्यों द्वारा निर्मित किए जाते हैं | जब औजार क्रांति की माँग करते हैं , वे मनुष्यों के अंदर से बोलते हैं” का महत्त्व कम नहीं हुआ है. भले ही समाजवाद अपने पहले प्रयोग में हार चुका हो लेकिन मानव जाति ने अगर आगे बढ़ना है तो यही एक रास्ता है.

आज के किसान का चरित्र – हमारी पहुँच – कुछ और स्पष्टता

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“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर
के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …
की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

लखविंदर

साथी,
आपने अपने ब्लॉग में लिखा है,

“आज के किसान का चरित्र वह नहीं है जो तब था और वह मजदूर के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति का वाहक था जो नहीं हुई. इसके विपरीत राष्ट्रीय जनतंत्र के कार्यभार ने बुर्जुआ राज्य और बुर्जुआ सरकारों के नेतृत्व में प्रशियाई जुन्कर तरीके से धीमे परन्तु पीडादायक तरीके से संपन्न होना था और वह हुआ भी. इस दौरान किसान उस मेहनतकश के क्रांतिकारी चरित्र को खो बैठा जो कि मजदूर वर्ग की सहायक रिजर्व सेना का होता है. पूँजी का सताया यह  वर्ग यदि क्रांतिकारी दीखता है तो केवल इसलिए क्योंकि मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से अपना दृष्टिकोण त्यागकर यह अपना भविष्य सुरक्षित कर लेना चाहता है. हम इसका स्वागत करते हैं परंतु मजदूरों के हितों को ताक में रखकर इनके बोनुस, लाभकारी मूल्यों की हिफाजत की वकालत हम नहीं करते. हाँ, बुर्जुआ राज्य द्वारा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पूँजी की चाकरी बजाते हुए पुलिस और फौज द्वारा इनके हासिल जनतांत्रिक अधिकारों के हनन की हम भर्त्सना करते हैं बेशक किसी लाल झंडे के नेतृत्व में कामरेडों ने वह कर दिखाया हो जिसे करने में बुर्जुआ दल भी शरमातें हैं.”

इससे किसानों के बारे में हमारी पहुँच स्पष्ट नहीं होती है। मैं कुछ स्पष्ट करना चाहता हूँ।

नव-जनवादी क्रांति के बारे में:  उत्पादन व्यवस्था अर्ध-सामंती होने के चलते इस व्यवस्था के विरूध होने वाली क्रांति का चरित्र पूंजीवादी ही हो सकता था। उदाहरण  के तौर पर कहा जाये तो सामंतों से भूमि की जब्ती और उसे किसानों को उनकी निजी जायदाद बना देने की मांग, स्वभाविक तौर पर उस समय की पूरी तरह से जायज मांग, एक पूंजीवादी जनवादी मांग है। स्पष्ट है कि इस तरह की क्रांति की धुरी और मुख्य ताकत सामंती व्यवस्था से उत्पीडत  किसाने ही बन सकते हैं। लेकिन क्रांति की अगुवाई अपनी क्रांतिकारी पार्टी के जरिये मजदूर वर्ग ही करता है जो आगे चलकर समाजवादी क्रांति को अंजाम देता है।

लेकिन आज जब सामंती या अर्ध-सामंती उत्पादन व्यवस्था नहीं बल्कि पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था है, उत्पादन के साधनों (कारखाने, भूमि, खदानें आदि) के समाजीकृत किये जाने से ही समाज आगे की दिशा में बढ़ सकता है। जमीन हलवाहक की या जमीन की दुबारा बाँट का प्रश्न हल हो चुका है ( जैसे कि आपने चर्चा की ही है।) यानि क्रांति  का चरित्र अब पूंजीवादी जनवादी नहीं बल्कि समाजवादी है। मजदूर वर्ग (शहरी और ग्रामीण दोनों मिलाकर, यह इसलिये रेखांकित किया क्यों कि आम तौर पर लोग गलतफहमी में सिर्फ इंडसट्रीयल वर्करों को ही मजदूर वर्ग मान बैठते हैं।) क्रांति की अगुवाई तो करेगा ही साथ में क्रांति की मुख्य ताकत भी बनता है। गरीब किसान जो किसानी का बहुसंख्यक हिस्सा हैं क्रांति का सच्चा मित्र होगा। पूंजीवादी समाज  में उसकी समस्याओं का हल ज़मीन के और मुट्ठीभर टुकड़े से हल होने वाला नहीं है। समाजवाद ही उसकी समस्याओं का हल कर सकता है। किसानी का धनी हिस्सा क्रांति का कट्टर दुश्मन बनता है। मध्यम किसान का चरित्र ढुलमुल मित्र वाला रहेगा। समाजवादी/ कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की यह पुरजोर कोशिश रहेगी कि यह हिस्सा अधिक से अधिक क्रांति के पक्ष में खड़ा हो। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि किसानों के इन मित्र  हिस्सों के सक्रिय समर्थन के बिना समाजवादी क्रांति विजयी नहीं हो सकती। लेकिन किसानों को साथ में लेने के लिये हम वह मुद्दे नहीं उठायेंगे जो मजदूर वर्ग के विरोध में जाते हों (जैसे कि आपने चर्चा की है)। सांझे मुद्दों के आधार पर सांझा मोर्चा बनाया जा सकता है। आवास, रोजगार, शिक्षा, महंगाई, असुरक्षा जैसे अनेकों अनेक मुद्दे हैं जो पूँजीवाद हल कर ही नहीं सकता। समाजवादी ही इन समस्याओं का हल कर सकता है। यह मुद्दे इन्हें पूंजीवादी राज्यसत्ता के कट्टर विरोधी बनाते हैं और समाजवादी के पक्ष में ला खड़ा करते हैं।

( मैंने समय की कमी के चलते बहुत थोड़े में अपनी बात कहनी की कोशिश की है। आपकी बात पढ़ कर मुझे यह लगा था कि आप किसानी के मित्र हिस्सों की क्रांति में भूमिका को ठीक से रेखांकित नहीं किये हैं जो कि बेहद जरूरी है। अगर हम किसानी के बारे में बात करते हुये किसानी के मित्र  हिस्से की अहम भूमिका को ठीक से रेखांकित नहीं करेंगे तो हमें ट्राटस्कीवाद के पैरोकार ही समझ लिया जायेगा। उम्मीद है आप मेरी बात को समझ पा रहे होंगे।)

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नए सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन— महत्तव्पूर्ण सामजिक-आर्थिक सरंचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में सृजन और आन्दोलन के सभी कार्यों को आज एकदम नये सिरे से संगठित करने की ज़रूरत है। हम सर्वहारा क्रान्ति की पक्षधर अवस्थिति से यह बात कह रहे हैं।

समय और समाज जब जनता के प्रचण्ड वेगवाही सांस्कृतिक आन्दोलन की माँग कर रहे हैं, तब कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में अराजकता, विभ्रम, भटकाव, अवसरवाद और ठहराव का बोलबाला है। ताकत कम नहीं है, पर कोशिशें बिखरी हुई हैं। जहाँ ईमानदारी और मेहनत से लगी हुई टीमें हैं, वहाँ वैचारिक समझ कमज़ोर है और अनुभववाद तथा `लकीर की फकीरी´ का बोलबाला है। निस्संकोच कहा जा सकता है कि प्रगतिशील वाम सांस्कृतिक धारा पर आज प्रच्छन्न बुर्जुआ और निम्न-बुर्जुआ धाराएँ हावी हैं। एक ओर नामधारी वाम के पुराने मठाधीशों-महामण्डलेश्वरों की गद्दियाँ और अखाड़े हैं तो दूसरी ओर विश्व के नये यथार्थ के अवगाहन और अतीत की “जड़ीभूत” विचारधारात्मक चिन्तन-पद्धतियों के पुनरीक्षण का दावा करने वाले अकर्मक “नव-मार्क्सवाद” के नौबढ़ प्रणेताओं के अड्डे हैं। क्रान्तिकारी वाम शिविर से जुड़े कई एक सांस्कृतिक संगठन और टोलियाँ हैं, पर उनका विचार-पक्ष कमज़ोर है। वे कला-साहित्य-संस्कृति की द्वन्द्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवादी समझ से, अपनी समृद्ध वैचारिक विरासत से और अतीत के सर्जनात्मक प्रयोगों से अपरिचित हैं। वे भरपूर जोश से क्रान्तिकारी आन्दोलन और प्रचार की कार्रवाइयों में लगे हैं, लेकिन वैचारिक समझ के अभाव में उनके सांस्कृतिक कार्य दिशाहीन और निष्प्रभावी होकर रह जा रहे हैं।

हमें इस भंवर से बाहर निकलना होगा। क्योंकि हमारे देश और समूची दुनिया के सामने आज यह प्रश्न पहले हमेशा की अपेक्षा अधिक ज्वलन्त और भयावह रूप में खड़ा है – या तो समाजवाद, या फिर बर्बरता! कला-साहित्य-संस्कृति की दुनिया में भी यही प्रश्न केन्द्रीय है।

अकर्मण्य वैचारिक समझ घोड़े की लीद से बेहतर नहीं होती। वास्तविक आशावाद नियतत्ववादी नहीं होता। यदि हम आशावादी हैं तो हमें अपनी आशाओं को फलीभूत करने के लिए जी-जान से जूझना होगा। अकर्मक ज्ञान और अन्धा आशावाद – इन दोनों से बचना होगा।

नये सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन – महत्त्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक संरचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

आज की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की इस निबन्ध में सविस्तार चर्चा सम्भव नहीं है और इसकी ज़रूरत भी नहीं है। लेकिन अलग से यह करना ही होगा क्योंकि सामाजिक-आर्थिक संरचना की सुनिश्चित समझ के बिना संस्कृतिकर्मी भी अपने समय के जीवन के मर्म को नहीं पकड़ सकते। इसके बग़ैर वे सतह की परिघटनाओं को ही सारभूत यथार्थ मानकर प्रस्तुत करेंगे। इसके बिना वे भविष्य की ओर जारी यात्रा की गतिकी को नहीं समझ सकते और अपने कार्यभार नहीं निर्धारित कर सकते। आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, हमारे देश के आम लोगों का जीवन सर्वग्रासी संकट के जिस विषैले-दमघोंटू अन्धकार में घुट रहा है, उसकी हम यहाँ सूत्रवत चर्चा करेंगे। इतनी चर्चा पृष्ठभूमि के तौर पर ज़रूरी है।

हम आज भी साम्राज्यवाद के युग में जी रहे हैं जिसकी बुनियादी अभिलाक्षणिकताओं को और उन्नीसवीं शताब्दी के `स्वतंत्र प्रतियोगिता के युग´ से जिसकी भिन्नताओं को लेनिन ने उद्घाटित किया था। लेकिन आज, सतह की परिघटनाओं-प्रवृत्तियों के पर्यवेक्षण के आधार पर भी यह महसूस किया जा सकता है कि स्थितियों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं। विश्व-पूँजीवाद के असमाधेय संकटों की, साम्राज्यवाद की अभूतपूर्व आक्रामकता की, नई तकनोलॉजी के प्रयोग की, तीसरी दुनिया के देशों में निर्बन्ध पूँजी-निवेश और लूट की, इन देशों के बुर्जुआ शासक वर्ग के आत्म समर्पण की, मज़दूरों से अतिलाभ निचोड़ने की नई-नई तरकीबों और उनके छिनते अधिकारों की, सट्टेबाज़ी और अनुत्पादक प्रवृत्तियों की, सूचना-संचार के तंत्र की नई प्रभाविता की, फ़ासीवादी शक्तियों के नये उभार की और पहले से भिन्न तमाम लक्षणों-प्रवृत्तियों की चर्चा तो आम तौर पर होती है। इन तमाम बदलावों के पीछे सिर्फ़ यही कारण नहीं है कि सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम संस्करण आज पराजित और विफल हो चुके हैं और सोवियत संघ के नेतृत्व में नामधारी समाजवादी (वस्तुत: राजकीय पूँजीवादी) ढाँचे वाले देशों का शिविर विघटित हो चुका है। इससे भी बुनियादी कारण (और ये दोनों अन्तर्सम्बन्धित हैं) यह है कि साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की कार्यप्रणाली और लगातार पैदा होने वाले अपने संकटों को निपटाने के उसेक तौर-तरीकों में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव आए हैं, और इनके चलते, विश्व पूँजीवाद के समूचे परिदृश्य में कुछ महत्त्वपूर्ण नई चीज़ें पैदा हुई हैं। इन बुनियादी कारणों को समझने की ज़रूरत है। इन बदलावों की पृष्ठभूमि के बनने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हो चुकी थी, गत शताब्दी के आठवें दशक से इनके लक्षण सतह पर उभरने लगे थे और अन्तिम दशक के दौरान एक नया बदला हुआ परिदृश्य एकदम सामने आ चुका था।

पहली बात, वित्तीय पूँजी की जो वरीयता और निर्णायक भूमिका उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में स्थापित हुई थी, वह गत शताब्दी के आठवें दशक तक चरम वर्चस्व में रूपान्तरित हो चुकी थी। दुनिया भर में निवेशित कुल पूँजी का तीन-चौथाई से भी अधिक आज सट्टा बाज़ार, मीडिया, मनोरंजन उद्योग और अन्य अनुत्पादक कार्रवाइयों में लगा हुआ है। वित्तीय पूँजी ने वास्तविक उत्पादन से स्वतंत्र होकर सम्पूर्ण विश्व-अर्थव्यवस्था पर अपना प्रभुत्व कायम कर लिया है और कीन्स की आशंका को हूबहू साकार करते हुए, उद्योग सट्टेबाज़ी के भंवर में सतह पर तैरने वाला बुलबुला बनकर रह गया है। आज जो पूँजी का विश्वव्यापी प्रसार दीख रहा है, वह सट्टेबाज़ी, मुद्रा-बाज़ारों में ऋण-सर्जन में सतत् वृद्धि और मुद्रा-पूँजी के अन्तरराष्ट्रीय आवागमन के रूप में है। साम्राज्यवाद के दौर में पूँजी के जिस परजीवी, परभक्षी, अनुत्पादक और जुआड़ी चरित्र की चर्चा लेनिन ने की थी, वह उस समय से कई गुना अधिक हो चुकी है।

आज विश्व-स्तर पर बुर्जुआ जनवाद के बचे-खुचे मूल्यों के भी निश्शेष होने, तरह-तरह की मूलतत्त्ववादी-नवफ़ासीवादी राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के सिर उठाने, तर्कणा और मानववाद के विरुद्ध नानाविध सांस्कृतिक उपक्रमों-उद्यमों के जन्म लेने तथा साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में माल-अन्धभक्ति, निरंकुशता, अतर्कपरकता, कलावाद-रूपवाद और मानवद्रोही प्रवृत्तियों के नये-नये रूपों के उभरने की ज़मीन यही है।

विश्व-स्तर पर पूँजी का विकास शेयर बाज़ारों और जुआघरों का `बाई-प्रोडक्ट´ बन जाने के चलते संकट के विस्फोट और महाध्वंस का भय हमेशा साम्राज्यवादियों-पूँजीपतियों के सिर पर सवार रहता है। बीच-बीच की अल्पकालिक राहतों के बावजूद, दीर्घकालिक मन्दी का दौर विगत तीन दशकों से लगातार मौजूद है। कभी तेज़ कभी मद्धम होता व्यापार युद्ध, बड़े-बड़े घरानों में से कुछ के तबाह होने का या किसी और द्वारा निगल लिये जाने का तथा नई-नई इजारेदारियों के गठन का सिलसिला लगातार जारी है। उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों, पूर्वी यूरोप के देशों और भूतपूर्व सोवियत संघ के घटक देशों के बाज़ार को साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी के लिए पूरी तरह खोल दिया है और चीन में “बाज़ार समाजवाद” की पिपिहरी बजाने वाले नये शासकों ने भी उसके स्वागत के लिए लाल गलीचे बिछा दिए हैं, पर पश्चिमी पूँजी का अजीर्ण रोग लगातार मौजूद है।

भूतपूर्व समाजवादी देशों में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना और राजकीय पूँजीवाद के सोवियत “समाजवादी” ढाँचे के विघटन के बाद पश्चिमी ढंग के पूँजीवादी ढाँचे की स्थापना मुख्यत: उन देशों के आन्तरिक वर्ग-संघर्ष का परिणाम थी, लेकिन इसमें साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी की तथा साम्राज्यवादी घुसपैठ, घेरेबन्दी और षड्यंत्र की भी एक अहम भूमिका थी। इसी प्रकार, उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के तहत, एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के देशों के बाज़ारों में साम्राज्यवादी वित्तीय पूँजी खुला चरागाह बना देने, सार्वजनिक क्षेत्र के विघटन का बुर्जुआ राज्य की बची-खुची “कल्याणकारी” भूमिका के निरस्तीकरण और “श्रम-सुधारों” के पीछे साम्राज्यवादी देशों के दबाव के साथ ही इन देशों के सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग की अपनी आवश्यकता और विवशता भी है। इन देशों में सत्तासीन होने के बाद बुर्जुआ वर्ग ने साम्राज्यवादियों के आपसी अन्तरविरोधों का लाभ उठाते हुए और जनता को निचोड़कर राजकीय पूँजीवाद का ढाँचा खड़ा कर एक सीमा तक पूँजीवाद का विकास किया। अब यह सिलसिला संतृप्ति-बिन्दु तक जा पहुँचा था। नई तकनोलॉजी, पूँजी और बाज़ार की अपनी ज़रूरतों के चलते साम्राज्यवादियों के गिरोह के दिशा-निर्देशों पर चलना अब इनके सामने एकमात्र विकल्प था। आर्थिक नवउपनिवेशवाद के वर्तमान दौर का यही सारतत्त्व है। इस नये दौर में पूँजी का वैश्विक प्रवाह एकदम निर्बन्ध हो गया है। साम्राज्यवादी शोषण इस नये दौर में प्रत्यक्ष राजनीतिक शासन या नियंत्रण के माध्यम से काम नहीं कर रहा है। राजनीतिक-सामरिक बल-प्रयोग और दबाव का अनिवार्य पहलू मौजूद है, लेकिन साम्राज्यवादी शोषण की प्रक्रिया मुख्यत: उस विशाल अन्तर के ज़रिए काम करती है जो विकसित देशों और पिछड़े देशों की उत्पादक शक्तियों के बीच बना हुआ है।

भारत और तीसरी दुनिया के अधिकांश देशों के पूँजीपति वर्ग के किसी भी हिस्से का अब राष्ट्रीय चरित्र नहीं रह गया है। साम्राज्यवाद से विनियोजित अधिशेष में अपने हिस्से को लेकर देशी पूँजीपति वर्ग के अन्तरविरोध मौजूद हैं और वे समय-समय पर उग्र भी हो जाते हैं। देश के भीतर इजारेदार और ग़ैर इजारेदार पूँजी के बीच, बड़ी और छोटी पूँजी के बीच भी अन्तरविरोध हैं, पर वे ग़ैरदुश्मनाना अन्तरविरोध हैं। पूँजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा अब साम्राज्यवाद के विरुद्ध क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए जनता के अन्य वर्गों के साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है।

राष्ट्रीय प्रश्न की ही तरह भूमि-प्रश्न भी अब सामाजिक क्रान्ति के एजेण्डे पर अपने पूर्ववर्ती रूप में उपस्थित नहीं रह गया है। प्रतिक्रियावादी “प्रशियाई” मार्ग से प्राक्पूँजीवादी भूमि-सुधारों के रूपान्तरण का काम पूँजीवादी व्यवस्था में सम्भव हदों तक, मुख्यत: पूरा हो चुका है। पुराने सामन्ती भूस्वामियों का एक बड़ा हिस्सा पूँजीवादी भूस्वामी बन चुका है। पहले के बड़े काश्तकार आज के बड़े मालिक किसान-कुलक बन चुके हैं। किसान आबादी का तेज़ विभेदीकरण गत तीन दशकों की एक महत्त्वपूर्ण परिघटना है। निम्न-मध्यम और छोटे किसान उजड़कर सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की पाँतों में शामिल हो रहे हैं। उच्च-मध्यम किसान धनी किसानों की कतारों में शामिल हो रहे हैं। पिछले दशक के दौरान यह प्रक्रिया और अधिक तेज़ हो गई है। गाँवों में भी श्रम और पूँजी का अन्तरविरोध ही प्रधान हो गया है। जहाँ अभी पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था की संक्रमणशील स्थिति है, वहाँ भी यही स्थिति है। वहाँ से भारी संख्या में उजड़कर किसान आबादी शहरों और विकसित पूँजीवादी खेती वाले इलाकों की ओर पलायन कर रही है। सामन्ती भूमि-सम्बन्धों के आज सिर्फ़ अवशेष ही मौजूद हैं। गाँवों में वित्तीय पूँजी की पैठ मज़बूत हुई है, वे राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी में आ गए हैं, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था की जड़ता टूट गई है और कृषि और सहायक क्षेत्रों में भी माल-उत्पादन प्रभावी प्रवृत्ति बन गई है।

इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारतीय मध्यवर्ग का भी विगत कुछ दशकों के दौरान तेज़ विस्तार और विभेदीकरण हुआ है। मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों (प्रोफेसरों, डॉक्टरों, इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों, नौकरशाहों, विशेषज्ञों आदि का) का एक बड़ा हिस्सा आज पूरी तरह से व्यवस्था के पक्ष में खड़ा हो चुका है। आम नौकरीपेशा, तबाहहाल मध्यवर्गीय कतारों से यह एकदम अलग खड़ा है। मध्यवर्ग के निचले संस्तरों की करीबी मेहनतकश वर्गों से बन रही है, हालाँकि उनकी निराशा, पिछड़े मूल्यों, जातिगत संस्कारों आदि का लाभ उठाकर धार्मिक कट्टरपन्थी ताकतें उनके एक हिस्से को अपने प्रभाव में लेने में फ़िलहाल कामयाब हैं। उच्च मध्यवर्ग आज उदारीकरण-निजीकरण के प्रवक्ता-समर्थक और धुर प्रतिक्रियावादी संस्कृति के संवाहक के रूप में व्यवस्था से नाभिनालबद्ध है।

निचोड़ के तौर पर कहा जा सकता है कि हमारा पिछड़ा हुआ पूँजीवादी समाज आज राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के बजाय एक ऐसी नई समाजवादी क्रान्ति की मंज़िल में है जिसकी अन्तर्वस्तु साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी है। राष्ट्रीय जनवाद के अधूरे पड़े काम भी आज इसी के कार्यभारों में समाहित हो गए हैं। इस काम में सर्वहारा वर्ग का साथ मुख्यत: गाँव और शहर की भारी ग़रीब आबादी देगी और मध्यवर्ग और मध्यम किसानों के नीचे के संस्तर देंगे। बीच के संस्तर ढुलमुल सहयोगी होंगे। पूंजीपति वर्ग का कोई भी हिस्सा, खुशहाल मालिक किसान और उच्च मध्यवर्ग अब किसी भी सूरत में मेहनतकशों के रणनीतिक संश्रयकारी नहीं बनेंगे।

लेनिन के समय और आज के समय के बीच का एक महत्त्वपूर्ण फर्क यह है कि राष्ट्रीय जनवादी क्रान्तियाँ आज विश्व सर्वहारा क्रान्ति का महत्त्वपूर्ण संघटक तत्त्व नहीं रह गई हैं। एशिया-अफ्रीका-लातिन अमेरिका के अर्द्धऔद्योगीकृत पिछड़े देश ही आज भी साम्राज्यवाद की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं, पर इनमें से अधिकांश देशों में सामाजिक क्रान्तियों का एजेण्डा बदल चुका है। अक्टूबर क्रान्ति के नये संस्करण, विश्व-सर्वहारा क्रान्ति के दूसरे चक्र में, वस्तुगत परिस्थितियों की दृष्टि से, इन्हीं देशों में सम्भावित हैं, पर इन क्रान्तियों की अन्तर्वस्तु अब साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी होगी। ये देशी-विदेशी पूँजी के संश्रय के विरुद्ध केन्द्रित नई समाजवादी क्रान्तियाँ होंगी, जो न केवल चीनी क्रान्ति से, बल्कि कई मायनों में सोवियत समाजवादी क्रान्ति से भी भिन्न होंगी।

सामाजिक शक्तियों के इस नये ध्रुवीकरण के अनुसार ही सांस्कृतिक मोर्चे के कार्यभारों की बुनियादी रूपरेखा तय होगी। कहा जा सकता है कि आज हमारी लड़ाई राष्ट्रीय जनवादी संस्कृति की नहीं बल्कि सर्वहारा जनवादी संस्कृति की, या कहें कि सर्वहारा संस्कृति की है। अब लोगों को यह बताने का अनुकूल समय है कि सिर्फ़ सर्वहारा जनवाद ही वास्तविक जनवाद होता है, कि आज सिर्फ़ दो ही मुख्य सांस्कृतिक पक्ष हैं – पूँजी की संस्कृति का पक्ष और श्रम की संस्कृति का पक्ष, और लोगों को इन्हीं दो के बीच अपना पक्ष चुनना होगा। कला-साहित्य के दायरे में व्यक्तिवाद और अलगाव की संस्कृति पर निर्णायक प्रहार के लिए आज निजी स्वामित्व की नैतिकता पर ही प्रश्न खड़े करने होंगे, लोभ-लाभ, बाज़ार और माल के रहस्यवाद की संस्कृति के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करना होगा, सम्पत्ति सम्बन्धों की तफसीलों को प्रस्तुत करना होगा और बुर्जुआ अधिकारों तथा अन्तरवैयक्तिक असमानताओं की सामाजिक-ऐतिहासिक बुनियादों को उद्घाटित करना होगा। इन्हीं बुनियादी कार्यभारों के इर्दगिर्द हमें राजनीतिक सत्ता, साम्राज्यवादी लूट और षड्यंत्र आदि के भण्डाफोड़ के प्रचारात्मक और आन्दोलनात्मक, रुटीनी और फ़ौरी, सांस्कृतिक-साहित्यिक कार्य भी संगठित करने होंगे। सामाजिक जीवन में जो सामन्ती सांस्कृतिक मूल्य मौजूद हैं, वे सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग और साम्राज्यवादियों के लिए एकदम उपयुक्त हैं, अत: उन्होंने उन सभी को अपनाकर अपने सांस्कृतिक तंत्र का अंग बना लिया है। तर्कणा और भौतिकवाद की जगह अन्धविश्वास, रहस्यवाद आदि ही आज बुर्जुआ वर्ग की ज़रूरत हैं। जाति-समस्या, दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न को भी आज इसी नज़रिए से देखना होगा। इन मुद्दों पर जनवादी सुधार की पैबन्दगीरी का समय बीत चुका है। ऐसा करना महज़ बुर्जुआ गुलामगीरी होगी। सामाजिक मुक्ति के ये बुनियादी प्रश्न समाजवादी परियोजना के अनिवार्य बुनियादी मुद्दे हैं।

साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद की संस्कृति में भी आज कोई अन्तरविरोध नहीं है। दोनों में सहयोग और एकता है, और काफ़ी हद तक तो एकरूपता भी है। राष्ट्रवादी संस्कृति की ज़मीन से साम्राज्यवादी संस्कृति का विरोध आज इतिहास की बात बन चुका है। सामाजिक-आर्थिक संरचना और सामाजिक-राजनीतिक क्रान्ति के स्वरूप के आधार पर, जनपक्षधर संस्कृति कर्म की सर्वाधिक सामान्य रूपरेखा की इस चर्चा के बाद, हम पूँजी के भूमण्डलीकरण के इस नये दौर की कुछ और नई प्रवृत्तियों की संक्षिप्त चर्चा करेंगे।

हम समझते हैं कि साम्राज्यवाद की आज की अति उग्र आक्रामकता के पीछ