काले कानून

डार्विन के जन्मदिन पर विशेष

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जीव विकास का सिद्धांत – डार्विन और वाद-विवाद

डॉ अमृत

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

डार्विन की उपलब्धियां

डार्विन के आलोचक

नव-डार्विनवाद

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

बीते वर्ष 2009 के 12 फरवरी के दिन, मानव  प्रकृति विज्ञानी चार्ल्स डार्विन का दो सौवां जनमदिन था और संयोगवश 150 साल पहले ही नवम्बर 1859 में ही मनुष्य की वैज्ञानिक समझ का एक  मील पत्थर चार्ल्स डार्विन द्वारा लिखित पुस्तक ‘ जीवों की उत्पत्ति’ छपी थी । इन दोनों ही ऐतिहासिक  दिनों की याद को समर्पित 2009 का वर्ष, डार्विन के सिद्धांत को आम लोगों में प्रचारित करने और इस पर हो रहे हमलों का जवाब देने के लिए पूरी दुनिया में मनाया गया । इन कार्यक्रमों की समाप्ति 12 फरवरी 2010 को होगी । इसके अलावा पिछले कुछ सालों में 12 फरवरी का दिन डार्विन दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है ।

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के शहर सर्युस्बरी में हुआ । उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे और दादा इरासमस डार्विन एक प्रकृति दार्शनिक, डॉक्टर और कवि थे । पिता की इच्छा थी कि डार्विन डॉक्टर बनें लेकिन उनकी रूचि प्रकृति विज्ञान में थी । 1828 में पिता ने डार्विन को पादरी बनाने के लिए क्राईस्ट कॉलेज, कैम्ब्रिज में दाखिल करवा दिया  । यहाँ उनका मेल वनस्पति विज्ञान के प्रोफैसर स्टीवन हैन्स्लो से हुआ और वहां काम करने लगे । डार्विन पहले ही लामारक के जीव विकास सम्बन्धी विचारों को पढ़ चुके थे और अब इनकी रूचि और भी बढ़ गयी । इसी दौरान वह प्रकृति का ध्यान से निरीक्षण करने में लग गये और कीड़े मकौड़े तथा पौधे एकत्रित करने में जुट गये । 1831 में उनकी पढाई पूरी हो गयी ।

इंग्लैण्ड में विभिन्न स्थानों पर प्रकृति का निरीक्षण करने के लिए घूमते-घूमते, उनके प्रोफेसर हैन्स्लो ने, उनकी सिफारिश एक सर्वेक्षण करने जा रहे जहाज पर बतौर प्रकृति विज्ञानी कर दी । डार्विन के पिता नें इनकार कर दिया, लेकिन आखिरकार डार्विन ने किसी न किसी तरह उन्हें अपनी यात्रा का खर्च उठाने के लिए मना ही लिया और 27 दिसंबर, 1831 को डार्विन एच. एम. एस. बीगल नामक जहाज पर सफ़र के लिए निकल पड़े । किसे पता था कि यह सफ़र जीव विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति लाने वाला है और पृथ्वी पर मौजूद जीवों और पौधों की उत्पत्ति और विभिन्नता के बारे में  मनुष्य की सदियों पुरानी अवधारणाओं को सदा के लिए बदलने वाला है ।

अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन नें तथ्यों का भण्डार इकट्ठा  कर लिया और अक्तूबर 1836 में इंग्लैंड वापिस आने पर अध्ययन में जुट गये । उनके द्वारा पृथ्वी की सरंचना संबंधी लिखे गये लेखों की वजह से , वह अपनी यात्रा से लौटने से पहले ही काफी प्रसिद्ध हो चुके थे । वापसी पर उनके संबंध उस समय के कई बड़े-बड़े विज्ञानियों से बन गये और वे कई साईंस सोसायटियों के मैम्बर चुने गये । अपने सफरनामे के बारे में किताब लिखते वक्त बहुत ज्यादा मेहनत के दबाव के चलते 1838 में वे बीमार हो गये और डॉक्टरों के कहने पर उन्हें लन्दन वापिस अपने पिता के घर जाना पड़ा । पर यहाँ भी उनकी खोजी रूचि कायम रही । वह अपना ज्यादा समय दुधारू पशुओं को पालने वाले किसानों के साथ बातें करते हुए और उनके द्वारा पशुओं की नसल सुधार के कामों का निरीक्षण करते हुए बिताते थे । हृदयस्पंदन और जठरीय रोग के दर्दों की ये बीमारी इसके बाद डार्विन का उम्र भर पीछा करती रही ।

अपने अध्ययन के आरंभिक वर्षों में ही, डार्विन जीव विकास संबंधी अपनी दो महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं का विकास कर चुके थे । ये दो अवधारणाएं- ‘ प्राकृतिक चयन’ (Natural Selection) और ‘योग्यतम का बचाव’ (Survival of the fittest) थी । डार्विन की अवधारणाओं ने यह पक्के तौर पर सिद्ध कर देना था कि प्रकृति पल-पल बदलती है । यह अपने आरम्भकाल से एकसमान नहीं रही जैसाकि उस समय की धार्मिक शिक्षाओं में बताया जाता था । डार्विन को पता था कि उसकी खोजों का समाज के कठमुल्लों की तरफ से भयंकर विरोध किया जायेगा । कुछ इस डर की वजह से और कुछ अपनी खोजों को प्रमाणिक तौर पर और मजबूत बनाने के लिए प्रकृति में से तथ्य इकट्ठे करने और अध्ययन करने के कारण डार्विन 1859 तक अपनी इस क्रान्तिकारी खोज को प्रकाशित न कर सके ।

1856 के शुरुआती दिनों में चार्ल्स डार्विन के दोस्त चार्ल्स लिल को एक और विज्ञानी अल्फ्रेड वालेस का पत्र मिला जिस में वालेस ने डार्विन की अवधारणाओं के साथ मिलती जुलती बातें कहीं । इसके बाद लिल ने डार्विन को अपनी खोजों को छपवाने के लिए कहा और उसके कहने पर डार्विन ने, जीवों की प्रजातिओं की उत्पत्ति’ (Origin of Species) से सम्बंधित एक खोज पत्र लिखना शुरू किया । जून, 1858 में डार्विन को वालेस का पत्र मिला जिसमें उसने ‘प्राकृतिक चयन’ की धारणा का  जिक्र किया । 1859 में 1 जुलाई के दिन , डार्विन और वालेस ने इकट्ठे ही अपनी खोजों के बारे में खोज पत्र पढने का निर्णय किया, पर अपने बेटे की मृत्यु की वजह से डार्विन इसमें शामिल न हो सके । आखिरकार नवम्बर में डार्विन की पुस्तक’ जीवों की उत्पत्ति’ (Origin of Species) छप कर लोगों में पहुँच गयी ।

जैसाकि उम्मीद ही थी, किताब की काफी प्रशंसा हुई और कुछ ही दिनों में इसके पहले संस्करण की सारी प्रतियाँ बिक गयीं । वैज्ञानिकों में बहुतों ने डार्विन की उपलब्धियों के साथ सहमती प्रकट की, चाहे कुछ वैज्ञानिकों ने डार्विन की अवधारणाओं का सख्त विरोध भी किया । सबसे ज्यादा भयानक विद्रोह धार्मिक कठमुल्लों और कट्टरपंथियों ने किया और डार्विन के भद्दे कार्टून बना कर बांटे गये । जब डार्विन नें यह रहस्योदघाटन किया कि मनुष्य का विकास बंदरों की एक नसल एप (Ape) से हुआ है तो इसका प्रचंड विरोध हुआ । डार्विन का चेहरा बन्दर के धड़ के ऊपर लगा कर उसकी खिल्ली उड़ाई गयी । लेकिन उनकी खोजों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कट्टरपंथी चर्च ने अब उसकी खोजों को अपने धार्मिक लबादे में फिट करना शुरू कर दिया ।

अपने खोज कार्य जारी रखते हुए, डार्विन ने इसके बाद ‘मनुष्य की उत्पत्ति’ (Descent of Man) और अन्य कई किताबें लिखीं । 19 अप्रैल, 1882 के दिन 73 वर्ष की उम्र में इस महान विज्ञानी की मृत्यु हो गयी जो अपने पीछे छोड़ गया मानवता को अपनी बेमिसाल उपलब्धियां ।

डार्विन की उपलब्धियां

एच. एम. एस. बीगल के साथ अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन ने अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्य इकट्ठे किये । गैलापैगोस टापू पर उनका ध्यान घरेलू चिड़ियों जैसे पक्षियों की एक नस्ल पर गया । इन पक्षियों की शक्ल-सूरत आपस में काफी मिलती जुलती थी और ये पक्षी मुख्य धरती पर पाए जाने वाले इसी किस्म के पक्षियों से भी मिलते जुलते थे । पर टापुओं पर रहने वाले पक्षी कीड़े खाकर गुजारा करते थे जबकि दक्षिण अमेरिका की मुख्य धरती वाले पक्षी पौधों के बीज खाते थे । कीड़े खाने वाले पक्षियों की चोंच बीज खाने वाले पक्षियों से लम्बी थीं । अतः डार्विन ने यह परिणाम निकला कि किसी कारणवश यह पक्षी मुख्य धरती से टापुओं पर आ गए । बदलते हालत में जीवन निर्वाह के लिए उन्हें कीड़ों पर निर्भर होना पड़ा । लेकिन आम तौर पर कीड़े वृक्षों के तनों में गहरे छुपे होते थे, अतः समयानुसार टापुओं पर लम्बी चोंच वाले पक्षी अस्तित्व में आ गए ।

इसी तरह उन्होंने दक्षिणी अमेरिका के तट के साथ साथ एक दक्षिण अमेरिकी जानवर ‘सलौथ’  के अवशेषों का अध्ययन किया । इन आलोप हो चुके जानवरों का आकार हाथी जितना था, परन्तु उस समय के अमेरिकी सलौथों का आकार काफी छोटा था, डार्विन ने अपने अध्ययन से यह परिणाम निकला कि छोटे आकार के सलौथ अलोप हो चुके सलौथों से ही विकसित हुए हैं ।

इस तरह डार्विन ने उस समय तक खोजे गए विभिन्न अवशेषों का अध्ययन किया । उनके समय तक अवशेषों पर खोज करने वाले वैज्ञानिकों को धरती कि सतह पर चट्टानों की अलग अलग परतें मिलीं और प्रत्येक परत में अलग अलग किस्म के जानवरों और पौधों के अवशेष मिले । डार्विन ने अपने अध्ययन से यह जाना कि नीचे की परत से ऊपर की तरफ आते हुए, इन परतों में जानवरों और पौधों के विकास का सिलसिला सीधा-सीधा नजर आ रहा था । उस समय तक यह भी पता लग चुका था कि चट्टानों की एक परत जमने में लाखों साल लग जाते हैं । इससे डार्विन का यह निश्चय पक्का हो गया कि धरती पर जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहा है, और यह बदलता रहा है । डार्विन इस नतीजे पर भी पहुँच गए कि जीवन की उत्पत्ति किसी सरल रूप में हुई और इस सरल रूप से विकसित होते हुए जीवों और पौधों की अलग अलग प्रजातियाँ अस्तित्व में आयीं और इस प्रक्रिया में लाखों वर्ष लगे।  आज वैज्ञानिक यह जान चुके हैं कि धरती की उम्र लगभग 4.5 बिलियन वर्ष है । जीवन के प्रथम प्रारूप 3.5 मिलियन वर्ष पहले अस्तित्व में आये । मनुष्य का जनम कोई एक लाख वर्ष पहले ही हुआ है ।

अपने पुश्तैनी घर में रहते समय डार्विन ने देखा कि किसान ज्यादा दूध देने वाले पशुओं का चयन करके और उनका प्रजनन करवाकर ज्यादा दूध देने वाले पशुओं की गिनती बढ़ा लेते हैं । उन्होंने इसको ‘कृत्रिम चयन’ (Artificial Selection) का नाम दिया । लेकिन उन्होंने इससे आगे चलते हुए अपने पास उपलब्ध अन्य तथ्यों के आधार पर यह सिद्धांत दिया कि प्रकृति में भी इस तरह की ‘प्राकृतिक चयन’ की प्रक्रिया घटित होती है ।

इसको एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है । एक ख़ास किस्म का उड़ने वाला कीड़ा पक्षियों द्वारा खाया जाता है । इस कीड़े की दो किस्में हैं – एक सफ़ेद पंखों वाला जो ज़हरीला नहीं है और दूसरा चमकीले रंगों वाला ज़हरीला कीड़ा । धीरे धीरे पक्षी पंखों के रंग से ज़हरीले कीड़े को पहचानने लगते हैं और उसे खाना बंद कर देते हैं । शुरू में चमकीले पंखों वाले कीड़ों की गिनती काफी थी, लेकिन कुछ ही पीढ़ियों बाद चमकीले रंग वाले कीड़ों की बहुतायत हो जाएगी क्योंकि उनके पास प्रजनन करने के और अपने से आगे नए कीड़े पैदा करने के मौके सफ़ेद पंखों वाले कीड़ों से तुलनात्मक रूप में ज्यादा हैं । इस तरह चमकीले पंखों वाले कीड़े प्राकृतिक चयन के ज़रीये बहुतायत में आ जाते हैं ।

इस तरह डार्विन ने देखा कि प्रकृति में जीव जन्तु बहुत ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं लेकिन प्रत्येक जीव प्रजाति की संख्या को नियंत्रण में रखने के लिए किसी तरह का कोई नियम होना जरूरी है । यहीं से उन्होंने अपने दूसरे, जो कि मुख्य रूप में विवाद का कारण बना, ‘योग्यतम के बचाव’ के सिद्धांत को रूप दिया । उनके मुताबिक वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार सबसे योग्य जीव ‘जिंदा रहने के संघर्ष’ में कामयाब हो जाते हैं और प्रजनन कर पाते हैं और बाकी मर जाते हैं । इस तरह जिंदा रहने के लिए लाभकारी गुण चुनिन्दा रूप में अगली पीढ़ियों में चले जाते हैं ।

इन दोनों सिद्धांतों के आधार पर डार्विन नें यह नतीजा निकाला कि लाभकारी लक्षणों और वातावरण के अनुसार ढलने के लिए जीवों में आये बदलाव, जो कि पीढी दर पीढ़ी जीवों में संचारित हो सकते हों, इकट्ठे होते रहते हैं और समय आने पर एक बिलकुल ही नयी प्रजाति के अस्तित्व में आ जाने का कारण बनते हैं ।

डार्विन के सिद्धांतों की अपनी खामियां भी हैं । लेकिन फिर भी डार्विन के सिद्धांत आधुनिक जीव विकास के सिद्धांत की बुनियाद हैं । उनके दिए गए सिद्धांतों के बिना आज भी किसी जीव विकास के सिद्धांत की कल्पना संभव नहीं  । डार्विन की सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण  देन थी, संसार के सदा-सदा स्थिर रहने वाली अवधारणा का सदा सदा के लिए अंत ! यही बात डार्विन के विरोधियों को सबसे ज्यादा चुभती है ।

इन सिद्धांतों के अलावा डार्विन की मानवता को और भी बहुत महत्त्वपूर्ण और क्रांतिकारी देन है । डार्विन के दोस्त, टॉमस हक्सले नें उस समय दिखाया कि शारीरिक रचना के पक्ष से मनुष्य बहुत हद तक ऐप (Ape) के साथ मिलता जुलता है । 1871 में डार्विन नें अपनी पुस्तक ‘मनुष्य का विकास’ प्रकाशित की । इस पुस्तक में उसने मनुष्य की सांस्कृतिक विकास और मनुष्यों में पाए जाने वाली लैंगिक, शारीरिक, और सांस्कृतिक विभिन्नताओं की व्याख्या के लिए ‘लैंगिक चयन’ का सिद्धांत पेश किया । इस पुस्तक में उन्होंने जोर दिया कि सारे मनुष्य एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं और यह विकास अफ्रीका महांद्वीप में हुआ । उस समय अलग-अलग नस्ल के मनुष्यों को अलग अलग प्रजातियाँ मानने और कुछ नस्लों को दूसरी नस्लों से बेहतर मानने और उनके अलग-अलग तौर पर विकसित होने के सिद्धांतों का काफी बोलबाला था, लेकिन डार्विन के द्वारा एक ही पूर्वज से सारे मनुष्यों के विकास के सिद्धांत को पेश करने के बाद बाकी सिद्धांत धीरे धीरे प्रभावहीन हो गए । डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता अब डी.एन. ए. के अध्ययन से भी हो चुकी है ।

डार्विन के आलोचक

जैसे ही डार्विन नें, बाईबल की अवधारणा, कि धरती की उम्र 6000 साल है और संसार की रचना’ परम परमेश्वर प्रभु’ नें 6 दिनों में और सदा सदा के लिए की थी, पर चोट की और इसको अपनी खोजों द्वारा तीतर-बीतर कर दिया; तो धार्मिक कट्टरपंथियों नें उसके खिलाफ जेहाद छेड़ दी । लेकिन अब समय बदल चुका था, अब मध्य युग का सामंती ढांचा नहीं रहा था, अब पूंजीवादी ढांचा अस्तित्व में आ चुका था, और विज्ञान की जरूरत उसके लिए जिंदा रहने की शर्त था, इसलिए थोड़े ही समय में डार्विन के सिद्धांतों को वैज्ञानिकों की तरफ से मान्यता मिल गयी । अब डार्विन के सिद्धांत को पूंजीवादी प्रबंध को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और उसके क्रांतिकारी अंश को को छुपाने की कोशिशें होने लगीं ।

‘अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष’ और ‘ योग्यतम का बचाव’ नामक डार्विन की अवधारणाओं को पूंजीवादी प्रबंध को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और आज भी इसी प्रकार की दलीलें देने वालों की कमीं नहीं है । लेकिन ये सिद्धांतकार ‘अपने अस्तित्व के लिए सर्वहारा के संघर्ष’ से भी उतना ही डरते हैं जितना जोर ये पूँजीवाद को जायज ठहराने के लिए लगाते हैं । ‘ योग्यतम का बचाव’ के सिद्धांत द्वारा पूंजीवादी शोषकों को जायज ठहराने और अल्पमत द्वारा विशाल बहुमत की लूट को ठीक सिद्ध करने की कोशिशें लगातार होती रही हैं । पर यह राग अलापने वाले जन संघर्ष की जगह शान्तिपूर्ण सुधारों और कानूनी कार्रवाई द्वारा गरीबी ख़त्म करने जैसे भद्दे सिद्धांतों को भी साथ-साथ पेश करते रहते हैं । इन दलीलों के बिना भी देखा जाये तो दूसरे जानवरों और मनुष्यों में बहुत अंतर है । मनुष्य वातावरण के साथ खुद भी बदलता है और उसे भी अपने अनुकूल ढाल लेता है, जबकि यह गुण दूसरे जानवरों में बहुत कम विकसित है । इसके अलावा मनुष्य उत्पादन प्रक्रिया में प्रकृति के साथ संघर्ष करता है और जीवन निर्वाह के लिए औजारों का निर्माण करता है । और चूँकि यह सब सामूहिक रूप में ही संभव है, इसलिए ‘योग्यतम का बचाव’ की अवधारणा मनुष्यों पर लागू ही नहीं होती. और तो और, पूंजीवादी प्रणाली में जब भी इन औजारों की (बहुतायत) हो जाती है तो संकट आ जाता है, फिर बहुतायत होने के बावजूद संघर्ष की अवधारणा की तो इसमें कोई गुन्जाईश ही नहीं रह जाती ।

इससे भी बढ़कर, डार्विन की यह अवधारणा मुख्य तौर पर अलग अलग जीवों की प्रजातियों और किसी जीव प्रजाति की जनसँख्या को कंट्रोल में रखने तक ही सीमित रहती है । पहली सूरत में यह अवधारणा मनुष्यों में आपस में लागू नहीं होती, दूसरी सूरत में , जिन यूरोपीय देशों की जनसँख्या वृद्धि दर शून्य हो चुकी है पूंजीवादी दैत्य वहां भी लोगों को संघर्ष करने के लिए मजबूर कर रहा है । जिन देशों में जनसँख्या बढ़ रही है, वहां डार्विन के योग्यतम के बचाव के सिद्धांत के मुताबिक पूंजीपतियों की संख्या बढ़नी चाहिए, लेकिन हो तो इसके विपरीत रहा है, गरीबों (अयोग्यों) की संख्या बढ़ रही है और पूंजीपतियों की या तो स्थिर है या कम हो रही है ।

चर्च और अन्य धार्मिक कट्टरपंथी, जिनमें सिर्फ इसाई ही नहीं, अन्य सभी धर्मों के पादरी-पुजारी भी शामिल हैं, के विरोध और डार्विन के सिद्धांतों को तोड़-फोड़ कर की गयी व्याख्याओं से भी पूँजीवाद का कुछ नहीं संवर सका । इस सबके बावजूद इस पूंजीवादी प्रबंध को डार्विन के सिद्धांतों और पूरे जीव विकास के सिद्धांत से ही खतरा बना हुआ है । एक बार फिर मध्य-युगीन काले दौर के सिरे से खारिज किये जा चुके गैर-वैज्ञानिक ईश्वरवादी सरंचना के सिद्धांत को नए लबादे में सजा कर लोगों पर थोपा जा रहा है और लोगों में भौतिकवादी वैज्ञानिक नज़रिये की पकड़ को कमजोर करने की कोशिशें हो रहीं हैं । इन सब कोशिशों के पीछे हर तरह के धार्मिक कट्टरपंथी और फासीवादी ताने-बाने से लेकर सरकारों, कोर्पोरेट जगत, और लोक कल्याण प्रपंच रचने वाली संस्थाएं शामिल हैं ।

इस नए प्रचारित किये जा रहे सिद्धांत का नाम है ‘सचेतन सृजन'(Intelligent Design) । इनके ज्यादातर तर्क तो डार्विन के समकालीन विरोधी विलियम पैले (William Paley)  से उधार लिए हुए हैं । इस दलील के अनुसार, जैसेकि किसी जटिल जेब घड़ी या किसी आधुनिक मशीन या कंप्यूटर जैसे यन्त्र बनाने के लिए किसी सचेतन शक्ति यानीकि मानव दिमाग की जरूरत होती है, उसी तरह जैसे किसी बहुत ही जटिल मानव अंग जैसेकि आँख, दिमाग, या अन्य जीव जंतुओं को पैदा करने के लिए या सृजन के लिए भी किसी सचेतन शक्ति की जरूरत है, जोकि इनके अनुसार ईश्वर ही हो सकता है  । यह बिलकुल वैसे ही जैसे कोई कहे कि दूध भी पानी की तरह तरल पदार्थ है इसलिए यह पानी की ही तरह धरती में से नल लगाकर निकाला गया होगा या फिर पानी दूध की तरह किसी गाय-भैंस को दुहने से मिलता होगा । खैर इनके तर्क की थोड़ी और छानबीन करते हैं । घड़ी या मशीन बनाने के लिए बहुत सारे मनुष्यों को इकट्ठे होकर या अलग अलग रहकर औजारों का इस्तेमाल करते हुए और भट्टियों में लोहा पिघलाते हुए श्रम करना पड़ता है, और दूसरी तरफ इनके ईश्वर के औजार और भट्टियाँ कहाँ हैं और वह दिखाई क्यों नहीं देते, तो ये भाग निकलेंगे ।

इसी तर्क को थोडा और आगे लेकर जाइये – घडी, मशीन या कंप्यूटर को बनाने वाला सचेतन मानव  दिमाग बहुत जटिल है, तो इतने जटिल मानव दिमाग को बनाने वाली शक्ति तो और भी जटिल होगी । फिर इस और भी जटिल शक्ति को बनाने के लिए और भी ज्यादा जटिल शक्ति – और इस यह जटिलता का पहाड़ा कभी न ख़त्म होने वाला थोथा तर्क बन जाता है ।

एक और तर्क के अनुसार जीवाणु (Bacteria) को गति प्रदान करने वाले हिस्से फ्लैजिला (Flagella), मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली या उसकी आँख जैसे अंग इतने ज्यादा विकसित हैं कि इनके किसी और कम विकसित रूप से विकसित होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता और अपने कम विकसित रूपों में इनकी कोई उपयोगिता संभव भी नहीं होगी; यह तर्क भी थोथा सिद्ध किया जा चुका है. जैसे कि आँख के विकास की विभिन्न अवस्थाओं के विकसित रूप जैविक संसार में पाए जाते हैं. कीट-पतंगे में आँखों का इस्तेमाल होता है और उससे कम विकसित प्राणियों में भी । इसी तरह गाय-भैंसों की आँखों की बनावट काफी हद तक मनुष्य की आँखों से मेल खाती है, लेकिन उनमें रंग पहचानने की योग्यता नहीं होती, और वे चीज़ों को काले और सफ़ेद रंग की अलग शेड्स में ही देख सकती हैं । लेकिन कोई पागल ही यह कहेगा कि उन्हें आखों का कोई लाभ नहीं या फिर उनकी आँखें बेकार हैं । प्रतिरक्षा प्रणाली भी हर तरह के प्राणी में मौजूद है और फ्लैजिला के विभिन्न स्तरों के विकसित रूप जीवाणु (Bacteria) में पाए जाते हैं । लेकिन जैसेकि प्रत्येक विचारवादी का काम होता है, एक तर्क के प्रमाणित हो जाने के बाद कोई दूसरा कुतर्क ढूँढने की बौद्धिक कसरत में लग जाना । और तो और, इनकी विज्ञान की किताब ‘बाइबल’ में धरती की उम्र 6000 साल बताई गयी है और सृष्टि के सृजन में ईश्वर को 6 दिन लगे. आज के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर धरती की उम्र 4.5 बिलियन वर्ष या इससे भी ज्यादा आंकी गयी है और जीवन की उत्पत्ति के आरंभिक प्रमाण भी 3.5 बिलियन साल पुराने हैं.

एक और काम, जो यह ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांतकार करते हैं, वह है- वैज्ञानिक सिद्धांतों में किन्हीं छोटी सी त्रुटियों को ढूंढना और फिर उसकी आधार पर पूरे सिद्धांत के ऊपर विवाद खड़ा करना. और इन त्रुटियों को विज्ञान द्वारा दूर कर लेने पर ऐसी ही कोई और तुच्छ कोशिश । यह है नया विज्ञान – जो अपने आप को प्रमाणित करने में असमर्थ है, लेकिन दूसरी सिद्धांतों की छोटी सी त्रुटियों को भी आधार बनाकर हो हल्ला मचाता है । एक और बहुत ही ‘शानदार’ विचार, जो ऐसे विज्ञानी लोग अक्सर प्रचार करते हैं, वो है- साईंस को ईश्वर भरोसे रहने वाली ‘आस्तिक साईंस’ बनाना जिससे कि ये समझते हैं कि विज्ञान को और वैज्ञानिकों को बहुत फायदा मिलेगा और विज्ञान को सही दिशा मिलेगी ।

इस पूरे ‘विज्ञान'(?) को लोगों में प्रचारित करने और लोगों के दिमागों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता का कूड़-कबाड़ा ठूसने के काम को पूरा करने के लिए अमेरिका और इंग्लैंड में शक्तिशाली राजनैतिक लाबी है, और इसमें कोई हैरानी की बात नहीं इस लाबी का मुख्य हिस्सा राजनैतिक हलकों की दक्षिणपंथी फासीवादी धारा है । जैसाकि होता ही है फासीवाद को वित्तीय सहायता की भी कोई कमी नहीं है ।

यह प्रतिक्रियावादी शक्तियां अमेरिकी सरकार पर लगातार यह दबाव बनाती रही हैं कि धार्मिक विश्वास पर आधारित स्कूलों का खर्च सरकार उठाये, इन स्कूलों में मुख्य तौर पर ईसाई मिशनरी स्कूल हैं । अमीर संस्थाओं ने इस प्रचार मुहीम के लिए लाखों-करोड़ों डॉलर खर्चे । अकेली वाल्टन फैमिली फाऊंडेशन नें 2006 में 28 मिलियन डॉलर इस तरह का दबाव बना रहे संगठनों पर खर्च किये । याद रखा जाना चाहिए कि यह फाऊंडेशन वाल-मार्ट के सहारे चलती है, जो कि ट्रेड-यूनियनों के सबसे खूंखार विरोधियों में से जानी जाती है ।

एक और अमेरिकी संस्था, टेम्पलटन फाऊंडेशन नें वर्ष २००६ में ६० मिलियन डॉलर, उन व्यक्तिओं के प्रोजेक्टों के लिए बांटे, जो ‘विज्ञान’ और अध्यात्मवादी विचारों का मेल मिलाप कराने की कोशिशों में जुटे हुए हैं । इन व्यक्तिओं में अमेरिका और इंग्लैंड के अलावा पूरी दुनिया के अध्यापक, विद्यार्थी, पत्रकार, शोध-कर्त्ता और युनिवर्सिटियों के प्रोफैसर, अकादमीशियन शामिल हैं. यू. एस. क्रॉनिकल ऑफ़ हायर एजुकेशन में छपे एक लेख के अनुसार उपरोक्त संस्था नें २५० मिलियन डॉलर से ज्यादा की धनराशी विज्ञान की इस तरह की ‘सेवा’ के लिए खर्ची । यह संस्था खुले-आम पूँजीवाद तथा मुनाफा आधारित उद्यम की हिमायत करती है ।

इस तरह की एक संस्था वार्डी फाऊंडेशन ब्रिटेन में काम करती है । यह संस्था मुख्य तौर पर वार्डी कार बिजनैस के मुनाफे पर चलती है । इसका मुख्य काम भी ईसाई मूल्यों और मान्यताओं का प्रचार करना और स्कूल खोलना है । इस संस्था के स्कूलों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता को विज्ञान के तौर पर पढ़ाया जाता है ।

भारत में भी ऐसी संस्थाएं मौजूद हैं. इनमें से एक है- कृष्णा कान्सैंस (चेतना). यह संस्था भी अपने अन्य कामों के साथ-साथ ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांत का प्रचार करने के लिए जगह जगह व्याख्यानों का आयोजन करती है और पर्चे बांटती है ।

पूंजीवादी प्रतिक्रियावादी शक्तियों के उपाय सिर्फ नए सिद्धांत घड़ने और उनका प्रचार करने तक ही सीमित नहीं हैं, वह पूंजीवादी सत्ता को अपने ‘विज्ञान’ (?) को लोगों पर थोपने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं । स्कूलों में ‘सचेतन सृजनात्मकता’ के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए अमेरिकी अदालत में केस किया गया । सारे पूंजीपति ऐसे सिद्धांतकारों और ऐसे सिद्धांतों के पक्ष में खड़े हैं । मिसिसिपी, उकलहामा और न्यू मैक्सिको की प्रतिनिधि सभाओं में वर्ष 2009 के दौरान डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत को एक ‘विवादग्रस्त सिद्धांत’ का दर्ज़ा देने या फिर दूसरे सिद्धांतों की शिक्षा देने के बिल दाखिल हो चुके हैं । लुसिआना स्टेट की प्रतिनधि सभा तो एक ऐसा ही बिल पास भी कर चुकी है और गवर्नर बॉबी जिंदल ने हस्ताक्षर भी कर दिये हैं ।

इस तरह की ही लड़ाई टेक्सास में चल रही है, जिसके अनुसार कक्षाओं में अध्यापकों को डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत की आलोचना करनी अनिवार्य हो जायेगी । यह सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं, इंग्लैंड में भी ऐसी ही कोशिशें जारी हैं, और यूरोप के कई और देशों में भी बाइबल की उत्पत्ति की धारणा को स्कूलों के सिलेबस में पढ़ाने के उपाए किये जा रहे हैं । भारत में भी वह दिन दूर नहीं, यहाँ भी ज्योतिष को तो पहले ही विज्ञान का दर्ज़ा मिल चुका है ।

और तो और कानास यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर पाल मिरेकी को डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता करने की वजह से जान से मारने की धमकियाँ दीं गयीं, उसको बुरी तरह पीटा गया जिस वजह से उन्हें अस्पताल दाखिल करवाना पड़ा । उन्हें  उस पद से हटा दिया गया और उनसे अपराधियों की तरह पूछताछ की गयी ।

आम तौर पर विज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्य या किसी संग्रहालय के निर्माण के लिए कोर्पोरेट जगत चंदा मुहैया करवाता है । लेकिन नवम्बर 2005 में जब ‘अमेरिकन मियुसियम ऑफ नैचुरल हिस्ट्री’ को नए सिरे से बनाने और जीव विकास के सिद्धांत को लोगों में प्रचारित करने की बात हुई तो किसी भी कोर्पोरेट घराने नें चंदा देने की ज़हमत नहीं उठायी और इस संग्रहालय द्वारा लगाई गयी प्रदर्शनी ‘डार्विन’ को मीडिया में कोई कवरेज नहीं दी गयी । लेकिन जब 25 मिलियन डॉलर की लागत से ‘ईश्वरवादी उत्पत्ति’ के संग्रहालय को बनाने की बात चली तो कोर्पोरेट जगत नें दिल खोलकर चंदे मुहैया करवाए । इस संग्रहालय में डायनासोरों को मनुष्यों के साथ रहते हुए दिखाया जा रहा है । इस तरह पढ़ाया जाता है कि भयानक बाढ़ आने से पहले मनुष्य और डायनासोर इकट्ठे धरती पर रहते थे । वैज्ञानिक इस बकवास को कब का रद्द कर चुके हैं । डायनासोर लगभग 63 मिलियन वर्ष पहले धरती से अलोप हो चुके हैं और मनुष्य जैसे पहले प्राणी की उत्पत्ति 4 से 10 मिलियन वर्ष से पुरानी नहीं । यह है वह विज्ञान जिसे पूँजीवाद पढ़ा रहा है और फाईनैंस कर रहा है । जबकि पूंजीवादी टहलुये यह डींग मारते नहीं थकते कि पूँजीवाद के बिना विज्ञान का विकास रुक जाएगा ।

नव-डार्विनवाद

एक और  छुपा हुआ हमला हुआ है डार्विन के सिद्धांत पर । यह छुपा हुआ इस अर्थ में है क्योंकि यह स्वयं को डार्विन के मानने और फैलाने के चोगे में छिपाकर रखता है, इसका नाम है नव-डार्विनवाद । इसीका ही विस्तारित रूप है, आधुनिक जीव विकास का सिद्धांत ।

नव-डार्विनवाद शब्द का प्रयोग सबसे पहले वीज़मैन (Weissman ) नाम के विज्ञानी के सिद्धांत के अनुयायियों के लिए किया गया । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में १८९५ में वीज़मैन ने यह सिद्ध किया कि वातावरण के प्रभाव अधीन किसी जीव में होनेवाले बदलाव आगमी पीढ़ी के जीवों में संचारित नहीं हो सकते । इसको वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज्म थियूरी’ कहा जाता है । इस सिद्धांत ने मुख्य तौर पर लैमार्क के जीव विकास के सिद्धांत पर चोट की और जीव विज्ञानियों ने लैमार्क के ‘वातावरण के प्रभाव के अधीन आनेवाले बदलाव का कारण जीव विकास होने के सिद्धांत ‘ को पूरी तरह रद्द कर दिया । अपने सिद्धांत को सही सिद्ध करने के लिए वीज़मैन ने कुछ प्रयोग किये जिनमें चूहों की पूँछें काटने वाला प्रयोग सबसे प्रसिद्ध है ।

वीजमैन के इस प्रयोग में, पीढ़ी दर पीढ़ी चूहों की पूँछें काटी गयी, पर हरवार चूहों की अगली पीढ़ी में पूंछ उग आती थी. इससे उसने यह नतीजा निकाला कि शरीर पर पडनेवाले प्रभाव वंशानुगत तौर पर अगली पीढ़ियों में संचारित नहीं होते. सबसे पहले तो इस प्रयोग में बहुत बड़ी खामियां है – जैसेकि जीव विकास प्राकृतिक स्थिति में होता है और उसे बहुत लंबा समय लगता है । दूसरा उस गुण की, जो प्रकृति में संचरण के लिए जीव के लिए लाभदायिक होता है, प्राकृतिक देन होता है । इस प्रयोग को करने से पहले चूहे के लिए पूंछ की उपयोगिता है या नहीं, के बारे में  कुछ भी निर्धारित नहीं किया गया । इसके अलावा नये अध्ययनों और खोजों से यह स्पष्ट हो गया है कि शारीरिक तौर पर पडनेवाले बाहरी प्रभाव, एक जीव से उसकी, जहाँ तक कि कई पीढ़ियों तक भी संचारित हो सकते हैं और इससे विज्ञान की एक पूरी शाखा ‘ऐपीजैनेटिक्स’ अस्तित्व में आ गयी है.

वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज़्म थियूरी’ और डार्विन की ‘प्राकृतिक चुनाव’ को आधार बनाकर ही आधुनिक जीव विकास अस्तित्व में आया । इस सिद्धांत के अनुसार जीवों में आये अलग-अलग बदलावों में कुछ बदलाव, जो जीव के लिए वातावरण में संचरण और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, प्रकृति द्वारा चुन्न लिए जाते हैं । भाव कि जिस जीव में ये लाभदायिक बदलाव आते हैं, उस जीव को वातावरण में जिंदा रहने का ज्यादा मौका मिलता है और इसलिए उस द्वारा प्रजनन करने के अवसर भी ज्यादा होते हैं और धीरे-धीरे बदलावों वाले जीवों की गिनती मुख्य हो जाती है और समय पाकर और बदलावों के जमा होते जाने के कारण एक नयी प्रजाति अस्तित्व में आ जाती है । यहाँ तक बिलकुल डार्विन के सिद्धांतानुसार है. पर आधुनिक जीव विकास संबंधी सिद्धांतानुसार बदलावों के आने का कारण वातावरण और हालात अनुसार स्वयं को ढलने की जीव की जरूरत नहीं, बल्कि बदलाव जीव के जीनस में संयोगवश होनेवाले  आकस्मिक परिवर्तन हैं । इस प्रकार नव-डार्विनवादी प्राकृतिक परिस्थितियों का जीव पर पड़नेवाले प्रभावों से बिलकुल मुकर जाते हैं ।  यहां से शुरू हुआ यह विचारवादी तर्क बढ़ता हुआ यहाँ तक चला जाता है कि मानव की बनावट और स्वभाव सबकुछ पहले ही निश्चित है और इसे मानव की सामाजिक परिस्थितियों को बदलने से बदला नहीं जा सकता और ऐसा करने के प्रयत्न गैर-वैज्ञानिक और प्रकृति के विरुद्ध हैं और डार्विन विरोधी हैं । नव डार्विनवादी परम्परा में से मुख्य हैं – रिचर्ड डाकिंज़ और स्टीवन पिंकर ।

बीसवीं शताब्दी के पिछले अर्द्ध की महत्त्वपूर्ण खोज पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों की बनावट और अन्य लक्षणों संबंधी सूचना संचारित करनेवाला रसायन डी.एन.ए. है. १९५३ में वाटसन और क्रिक ने डी.एन.ए. की बनावट का मॉडल विकसित कर लिया और इसके बाद जीनज़ की खोज हुई. जीन डी.एन.ए. एक विशेष प्रकार से डिज़ाईन किया गया और यह शरीर के किसी एक हिस्से या लक्ष्ण संबंधी सूचना जमा रखता है, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह सूचना संचारित करता है, जैसे आँखों का रंग, आदमी का कद, चमड़ी का रंग, जीव के बालों का रंग आदि. जीन कोशिका के केन्द्रक (नीयूक्लियस) में पड़े रहते हैं और कोशिका की क्रियायों को रेगूलेट करते हैं । इस खोज के पश्चात कुछ विज्ञानियों ने प्रत्येक मानवी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक या सामाजिक, का आधार जीन के रूप में डी.एन.ए. के टुकड़े को बना दिया । जीव विकास होता है तो जीनों में सांयोगिक बदलावों से होता है, कोई मनुष्य अपराध कर लेता है तो उसके जीन में नुक्स है, अगर कोई उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेता है तो उसके जीन बेहतर हैं, अगर कोई आलिशान घर में रहता है, तो उसके जीन ही इतने काबिल हैं, अगर कोई पूंजीपति अमीर बनता जा रहा है और मजदूर दिन प्रतिदिन गरीब तो अमीर पूंजीपति के जीन गरीब मजदूर के जीनों से बेहतर हैं, अगर किसी को क्रोध अधिक आता है तो उसमें क्रोध वाले जीन अधिक हैं इत्यादि ।

रिचर्ड डाकिंज़ ने मानव की संस्कृति और स्वभाव की व्याख्या करने हेतू एक नया सिद्धांत पेश किया, कि हर व्यक्ति में स्वभाव के अलग-अलग लक्षणों के लिए, जैसे क्रोध, लालच, परोपकार, खीझना, हंसमुख होना आदि के लिए जीनज़ की तरह ही ‘मीमज़’ (Memes) होते हैं । चाहे अभी तक इन ‘मीमज़’ का पता-ठिकाना नहीं चला है । उसके अनुसार ‘मीमज़’ ही मानव का स्वभाव और सभ्यता तय करती हैं और इन्हें बाह्य वातावरण और मानव की परिस्थितियों के बदलने से बदला नहीं जा सकता । लेकिन अगर थोडा बारीकी में जाएँ, तो देखेंगे कि हर समाज और मानव समूह की सभ्यता प्रत्येक पीढ़ी के साथ बदलती रहती है, बल्कि एक मनुष्य के स्वभाव और सभ्यता में उसके जीवन काल में परिवर्तन आते रहते हैं । अगर डाकिंज़ के अनुसार चलें तो हर अपराधी की सन्तान अपराधी होगी, शराबी की शराबी, गुस्सैल की सन्तान गुस्सैल, शर्मीले  की संतान शर्मीली और हंसमुख की सन्तान हंसमुख. और इससे भी बढ़कर मानव सारी उम्र एक जैसा ही बना रहेगा । पर हम देखते हैं ऐसा बिलकुल नहीं होता, प्रतिदिन डाकिन्ज़ साहेब का सिद्धांत मानव जीवन द्वारा गलत साबित किया जाता है । असल में इस प्रकार के सिद्धांत सिर्फ इसलिए निर्मित किये जाते हैं ताकि लोगों को मुर्ख बनाया जा सके । दूसरे महारथी स्टीवन पिंकर का ‘विकासवादी मनोविज्ञान’ का वर्णन भी कुछ इसी प्रकार का ही है । बस पिंकर साहेब ‘मीमज़’ के स्थान पर मॉडियूल (Module) शब्द का प्रयोग करते हैं । इनके अनुसार भी मानव स्वभाव को, इसलिए मानव समाज को बदला नहीं जा सकता । इस सिद्धांत को मनोविज्ञानियों द्वारा पूर्णतया रद्द किया जा चूका है । ज्यादातर मनोविज्ञानी यह मानते हैं कि मानव स्वभाव चाहे कुछ हद तक वंशानुगत होता है पर ज्यादातर यह सामाजिक हालात और मानव के छोटी उम्र में पालन-पोषण, माता-पिता का प्यार, सेहत और शिक्षा पर निर्भर करता है ।

इस सोच के कारण, बहुत समय तक यह समझा जाता रहा कि मानव के विकास दौरान सबसे पहले दिमाग का आकार बड़ा हुआ, उसने अपने हाथ का प्रयोग और सीधा खड़ा होना सीखा, इसी कारण से ही वह भाषा का प्रयोग करने लगा और अपने दिमाग द्वारा सोचने से ही वह समूह बनाकर, फिर मानव समाज के रूप में रहने लगा । पर, असल में, जैसाकि एंगेल्ज़ ने अपने आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ में पेश किया था, सबसे पहले मानव के पूर्वज वृक्षों से उतरकर धरती पर चलने लगे जिस दौरान वे सीधा खड़े रहकर चलना सीखे । इस प्रकार अगले पंजे चलने से मुक्त होकर अन्य कार्यों के लिए प्रयुक्त होने लगे, जिस कारण मानव औजारों का प्रयोग करने लगा, जो बाद में भाषा और सामाजिक उत्पादन का कारण बना । इसके साथ ही हाथों का प्रयोग होने के कारण दिमाग का आकार बड़ा होने लगा, जो हाथों के विकास होने से कहीं बाद में जाकर हुआ । इन सच्चाईयों को आधुनिक जीवाश्म विज्ञान ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है ।

इसके बारे में ज्यादा विस्तार से जॉन पिकार्ड के आलेख “एंगेल्ज़ और मानव विकास’ में पढ़ा जा सकता । जीनज़ में आनेवाली तब्दीलियों के जीव विकास में भूमिका के बारे में ब्रिटिश विज्ञानी जे. बी. एस. हालडेल ने भी अपने आलेखों में विस्तार सहित लिखा है ।

हाल्डेल ने १९२९ में जीवन के पहले रूपों की  उत्पत्ति के रहस्यों से आवरण उठाया । हालडेल के समय में ही, एक सोवियत विज्ञानी, अलेग्जान्द्र उपरेन भी उन्हीं नतीजों पर पहुंचा, इसलिए इस थियूरी को उभयनिष्ठ तौर पर उपरेन-हाल्डेल मॉडल कहा जाता है । इन दोनों विज्ञानियों ने अपने खोज कार्यों में द्वंदात्मक भौतिकवाद को लागू करते हुए इस सिद्धांत की खोज की । १९५३ में मिलर और युरे ने प्रयोगशाला में इस थियूरी को सही सिद्ध कर दिया । अब इस सिद्धांत को थोडा सुधार कर के.आर. एन.ए. मॉडल का रूप दे दिया गया है ।

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

द्वंदात्मक भौतिकवादी नजरिये के जन्मदाता, मार्क्स और एंगेल्ज़, ने डार्विन की खोजों का पुरजोर समर्थन किया । इसके अलावा इसके अधूरेपन और भविष्य में इसके और विस्तारित होने की पेशनगोई भी की । डार्विन की खोजों ने मार्क्स-एंगेल्ज़ के भौतिकवादी नजरिये को प्रकृति में और स्पष्टता से सिद्ध किया । जनवरी १८६१ में मार्क्स ने एंगेल्ज़ को लिखा, “डार्विन की पुस्तक (जीवों की उत्पति – अनु.) बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इसने मुझे वर्ग संघर्ष के लिए प्राकृतिक आधार प्रदान किया है । पर इसमें हमें विकास के अपरिपक्व तरीके को भी सहन करना पड़ता है । अपनी सभी सीमाओं के बावजूद, न सिर्फ उदेश्यवाद (Taleology) (हर वस्तु के पीछे कोई न कोई उदेश्य होता है. अनु.) की प्राकृतिक विज्ञान में विद्यमान धारणा पर निर्णायक चोट है, बल्कि अपने तार्किक मतलब की भी अच्छी तरह व्याख्या करती है ।”

‘डियूरिंग विरुद्ध’ पुस्तक में एंगेल्ज़ ने लिखा, ” जीव विकास का सिद्धांत अभी अपने प्रारंभिक चरणों में है और इसमें कोई शक नहीं कि भविष्य की खोजें हमारी अब तक की जीव विकास संबंधी धारणाओं, डार्विन की खोजों समेत, को बदल देंगी ।”

इसी प्रकार एंगेल्ज़ ने ‘डाईलेक्ट्स ऑफ नेचर’ में भी डार्विन के ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ के सिद्धांत का मूल्यांकन कुछ इस प्रकार किया, ” डार्विन से पहले तक, उसके अबतक के पक्के अनुयायी भी प्रकृति में सामंजस्यपूर्ण सहयोग पर जोर देते हैं, कि कैसे पौधे, जीव, जंतुओं को खाद्य-खुराक और आक्सीज़न प्रदान करते हैं और जीव जंतु पौधों को बदले में खाद, अमोनिया और कार्बोनिक एसिड (कार्बन डाईआक्साईड – अनु.) प्रदान करते हैं । जैसे ही डार्विन का सिद्धांत सामने आया, इन्हें हर जगह संघर्ष ही दिखाई देने लगा । दोनों ही नजरिये अपनी-अपनी सीमाओं के अन्दर ठीक हैं, पर दोनों ही एक समान तरह से एकतरफा और तुअस्बग्रस्त हैं । जैसे प्रकृति में निर्जीव वस्तुओं के संबंध अनुरूपता के टकराव दोनों तरह के होते हैं, वैसे ही सजीव वस्तुओं में भी सचेतन और अचेतन सहयोग के साथ-साथ सचेतन और अचेतन संघर्ष भी होता है । इसलिए, प्रकृति के संबंध में, सिर्फ संघर्ष को ही सबकुछ मान लेना ठीक नहीं । बल्कि ऐतिहासिक जीव विकास और जटिलता की पूरी दौलत को एक छोटे से और एकतरफा वाक्यांश ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ में बाँधने की इच्छा करनी बचकाना ही होगी । इसका कुछ भी मतलब नहीं है ।

‘डार्विन का जीवित रहने के लिए संघर्ष’ का सिद्धांत समाज में प्रचलित अवधारणाओं जैसे सबकी सबके खिलाफ जंग, की हौबिस की थियूरी , मुकाबले की बुर्जुआ अर्थशास्त्र की अवधारणा और माल्थस की जनसंख्या संबंधी अवधारणा का प्रकृति विज्ञान में लागू करने का प्रयत्न हैं । जब ऐसा करके सफलता हासिल कर ली गयी है (बेशक इस मूलभूत आधार, माल्थस की थियूरी पर आज तक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है), यह आसान हो जाता है कि प्रकृति विज्ञान की अवधारणाओं को समाज के इतिहास पर लागू कर दिया जाये और इसे बिलकुल सीधे-सादे तरीके से कहा जाता है कि इस तरह ये प्रस्तुतियां समाज के चिरस्थायी नियमों के तौर पर सिद्ध की जा चुकी हैं । ” (मार्क्स-एंगेल्ज़,  सम्पूर्ण रचनाएँ, जिल्द  25, पेज, 583-584, अंग्रेजी एडिशन 1987, प्रगति प्रकाशन.)

“जीवित रहने के लिए संघर्ष – सबसे बड़ी बात यह है कि इसे पौधों और जनसँख्या की अधिक बढौतरी तक ही सीमित रखा जाये, जोकि पौधों और निम्न जंतुओं के विकास के कुछ चरणों में वास्तव में होता है । परन्तु इन्हें उन परिस्थितियों में, जिसकी जीव-जंतुओं और पौधों को नए वातावरण पर भू-परिस्थितियों वाले नए भूभागों में परवास से बिलकुल अलग रखा जाना चाहिए जिनमें जीवों की प्रजातियाँ बदलती हैं, पुरानी मर जाती हैं और नई विकसित उनका स्थान ग्रहण कर लेती हैं, जनसँख्या में अधिक बढौतरी हुए बिना ही । नए वातावरण में जो जीव स्वयं को ढाल लेते हैं, जीवित रह जाते हैं और लगातार बदलावों से स्वयं को एक नई प्रजाति में विकसित कर लेते हैं पर ज्यादा स्थिर जीव मर जाते हैं और विलुप्त हो जाते हैं, साथ ही मंझोले जीव-रूप भी विलुप्त हो जाते हैं । यह सब कुछ किसी भी माल्थसवाद के बिना संभव है और होता है भी है, और अगर यह लागू भी होता है तो यह उस प्रक्रिया को, ज्यादा से ज्यादा थोडा तेज कर देता है ।”वही पेज, 582-83)

“चलें तर्क करने के लिए ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ नाम के वाक्यांश को मान भी लें । एक जानवर ज्यादा से ज्यादा इकठ्ठा कर सकता है, पर इन्सान तो उत्पादन करता है । वह जीवित रहने के साधन तैयार करता है, ज्यादा विस्तारित शब्दों में, जोकि प्रकृति ने उसके बिना न बनाये होते । यह जानवरों पर लागू होनेवाले नियमों को मानव समाज पर अपरिपक्व तरीके से लागू करना मुश्किल बना देता है । उत्पादन के कारण जल्दी ही ‘जीवित रहने का संघर्ष’ शुरू हो जाता है, पर यह संघर्ष जीवित रहने के साधनों के लिए नहीं, बल्कि मनोरंजन और विकसित होने के साधनों के लिए होता है । यहाँ – क्योंकि विकसित होने के साधन भी सामाजिक तौर पर पैदा होते हैं – जानवरों पर लागू होनेवाले नियम पूरी तरह से  आधारहीन हो जाते हैं । अंत में, पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में, उत्पादन का स्तर इतना ऊँचा हो जाता है कि समाज जीवित रहने, मनोरंजन और विकसित होने के साधनों का अब और पूरी तरह उपयोग नहीं कर सकता क्योंकि उत्पादन करने वालों के बड़े हिस्से को इन साधनों के उपयोग करने से गैर-कुदरती तरीके से और जबरन हटा दिया जाता है । और इसीलिए संतुलन कायम रखने के लिए एक संकट (आर्थिक संकट – अनु.) प्रत्येक दस वर्षों बाद न सिर्फ जीवित रहने के, मनोरंजन और विकसित होने के साधन, बल्कि उत्पादन शक्तियों के एक बड़े हिस्से का भी विनाश कर देता है । इस प्रकार, यह ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ कुछ इस तरह का रूप धारण कर लेता है – बुर्जुआ समाज द्वारा पैदा की गई वस्तुएं और उत्पादक शक्तियों की पूंजीवादी प्रणाली के विनाशकारी, विध्वंशकारी प्रभावों से रक्षा करने के लिए, सामाजिक उत्पादन और वितरण का अधिकार, इस कार्य के लिए अयोग्य हो चुकी पूंजीपति जमात के हाथों से छीन लें और इसको उत्पादन करनेवाले जन-समूहों को सौंप दें -और यह है समाजवादी क्रांति ।

“वर्ग संघर्षों के क्रमिक सिलसिले के तौर पर इतिहास का बोध, इनको ‘जीवित रहने के संघर्ष’ के बहुत कम विभेदन वाले चरणों तक सीमित कर देने से विषय-वस्तु और गंभीरता के पक्ष के लिहाज से कहीं अधिक अमीर है ।” (वही, पेज -584 -85 )

“डार्विन को पता नहीं था कि उसने मानवता, विशेषतया अपने देववासियों पर कितना कड़वा व्यंग्य लिख दिया है, जब उसने यह दिखा दिया कि ‘मुक्त प्रतिस्पर्द्धा’ , जीवित रहने के लिए संघर्ष जिसको अर्थशास्त्री सबसे ऊँची ऐतिहासिक उपलब्धि समझते हैं, जानवरों की दुनिया में एक आम स्थिति है । जैसे उत्पादन की क्रिया ने मानव को अन्य जानवरों से जीव-वैज्ञानिक तौर पर विभेदन प्रदान किया, उसी प्रकार सामाजिक पक्ष से भी ; सिर्फ चैतन्य तौर पर सामाजिक उत्पादन के ढांचे, जिसमें उत्पादन और वितरण योजनाबद्ध तरीके से होगा, मानवता को अन्य जानवरों से श्रेष्ठता प्रदान करेगी । इतिहास विकास इस प्रकार को दिन-प्रतिदिन आवश्यक ही नहीं बना रहा, बल्कि अधिकाधिक संभव भी बना रहा है ।” (वही, पेज -331 )

जैसे एंगेल्ज ने ‘ डियूरिंग विरुद्ध’ में यह कहा था कि जीव विकास के सिद्धांत अभी और विकसित होंगे, उसी प्रकार डार्विन को भी अपने सिद्धांत में विद्यमान खामियों का अहसास था ।

जीवाश्म विज्ञान के अनुसार, कैंबरियन युग (६००-७०० मिलियन वर्ष) से पहले की चट्टानों में जीवों के बहुत कम अंश मिलते हैं और वह भी ‘परोकेरीआईक’ नाम के आरंभिक जीव-रूप ही मिलते हैं । पर इससे बिलकुल बाद की चट्टानों में एकदम ही अलग तरह के बहुभांति जीव-रूप मिलते हैं । इनमें वर्तमान में मौजूद जीवों के लगभग बहुत जीव-रूप मिल जाते हैं. इसको ‘कैंबरियन धमाका’ कहा जाता है । यह ध्यान रखना चाहिए कि यह ‘कैंबरियन धमाका’ कोई रातों-रात हो गयी घटना नहीं थी, बल्कि कई मिलियन वर्षों में होनेवाली घटना थी, पर भू-वैज्ञानिक तौर पर देखा जाये तो पृथ्वी की उम्र के मुकाबले यह घटना एक धमाके की तरह ही तेजी से होनेवाली घटना थी । इसके पश्चात् अनेक प्रजातियाँ अस्तित्व में आ गयीं । डार्विन के समय भी इस तथ्य का ज्ञान था । बाद में यह भी सिद्ध हो गया कि समय-समय पर पृथ्वी पर कुछ इस प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं, चाहे ये परिस्थितियाँ कई मिलियन वर्ष लंबी होती हैं, पर फिर भी भू-वैज्ञानिक तौर पर बहुत छोटी होती हैं, जिस दौरान पृथ्वी पर उस वक्त मौजूद बहुत सारी प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं और उनके स्थान पर नई प्रजातियाँ पैदा हो जाती हैं जो समय के साथ धीरे-धीरे विकास करती हैं, विकास के इस चरण में, जब नई प्रजातियों के अस्तित्व में आ जाने के बाद के समय में ‘प्राकृतिक चुनाव’ अहम भूमिका निभाता है । इस तरह जीवों की प्रजातियों के तेजी से विलुप्त होने की अब तक छः घटनाएँ हो चुकी हैं ।

सबसे बड़ी विलुप्त होनेवाली स्थिति २५० मिलियन वर्ष पहले पेकिअन्योक-मीजोयोक युगों के बीच पैदा हुई जब जल और थल दोनों जगहों के ५० फीसदी जंतुओं और रेंगने वाले ८० फीसदी जंतुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो गयीं । इस प्रकार की अंतिम घटना ६३ मिलियन वर्षों पहले हुई जिसके परिणामस्वरूप अन्य अनेक प्रजातियों समेत डाइनासोर भी विलुप्त हो गये । पर ये घटनाये जीव विकास के राह में रूकावट नहीं बनती हैं, बल्कि जीव विकास को नए और उच्च धरातल पर ले जाती हैं । क्योंकि इन घटनाओं से नई प्रजातियाँ अस्तित्व में आती हैं जो पहले वाली प्रजातियों के मुकाबले अधिक विकसित होती हैं ।

‘कैंबरियन धमाके’ की डार्विन अपनी खोजों के आधार पर व्याख्या करने में असफल थे, पर उस समय डार्विन ने यह कहा कि किसी कारण जीवाश्म संबंधी मानव जानकारी अभी अधूरी है और भविष्य में यह जानकारी मुकम्मल हो जाएगी । पर समय के साथ यह पता चला कि जीवाश्म संबंधी जानकारी बिलकुल सही थी और जीवाश्म में अधूरापन इतना भी अधिक नहीं है कि ‘कैंबरियन धमाके’ को सिर्फ जानकारी का अधूरापन कह कर काम चला लिया जाये । इसी प्रकार कई बार प्रजातियों के बीच के रूप भाव ‘लिंक प्रजाति’ भी नहीं मिलती, उन स्थितियों में डार्विन के सिद्धांतों के अनुसार नई प्रजाति की उत्पति की व्याख्या करनी मुश्किल हो जाती है ।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, अमरीका के भू-विज्ञानी स्टीफन जे गोल्ड और नीलज़ ऐलड्रिज़  ने १९७१ में जीव विकास का नया सिद्धांत पेश किया, जो न सिर्फ डार्विन के सिद्धांत के महत्त्व को बनाये रखता है, बल्कि इस और अधिक अमीर बनाते हुए जीव विकास के सिद्धांत को इस काबिल बना देता है, जिससे ‘कैंबरियन धमाका’ और तेजी से प्रजातियों के विलुप्त होने से पैदा होनेवाली घटनाओं की सटीक व्याख्या होती है । इस सिद्धांत का नाम है – ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ .

गोल्ड और ऐलड्रिज़ ने  अपने निबंधों में यह काफी हद तक सिद्ध कर दिया कि जीव विकास की प्रक्रिया हर समय एक ही रफ़्तार से सीधी रेखा में नहीं चलती बल्कि इस प्रक्रिया में धीमें और लटकते हुए अंतरालों में कुछ पड़ाव ऐसे आते हैं जब जीव विकास की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है । इस तीव्र दौर में धीमें विकास के दौरान जमा हुए मात्रात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तनों में बदल जाते हैं । गोल्ड के अनुसार जीव विकास सदैव प्रगतिशील ही नहीं होता, बल्कि कई बार विपर्ययवादी भी होता है, क्योंकि कई जीव जीवित रहने के लिए दूसरे जीवों के परजीवी बन जाते हैं, जैसे की वृक्षों पर लटकती हुई अमरबेल, अलग-अलग परजीवी कीड़े आदि ।

डार्विन इस प्रकार की संभावना से अनजान नहीं थे । ‘जीव की उत्पति’ के पांचवें एडिशन में डार्विन लिखते हैं, “समय के जिन खण्डों में प्रजातियों में परिवर्तन आते हैं, वे प्रजातियों के लगभग स्थिर रहनेवाले समय खण्डों के मुकाबले छोटे होते हैं ।” चार्ल्स डार्विन, जीवों की उत्पति, १८६९ लन्दन, जॉन मरे, पांचवां एडिशन, पेज -५५१)

इस सिद्धांत के प्रस्तुत करने के समय से ही गोल्ड और ऐलड्रिज़ का बाकी बहुत सारे विज्ञानियों द्वारा निरंतर विरोध होता रहा है क्योंकि छलांगों द्वारा जीव विकास का सिद्धांत पूंजीवाद के बंधक चाकर गुलामों को हजम नहीं होते और वे धीमें और लटकते हुए बदलावों के सिद्धांत को ही एकमात्र सही सिद्धांत सिद्ध करने पर तुले रहते हैं । इस विरोधी शिविर में एक बार रिचर्ड डाकिनज़ और जॉन मेरिनार्ड स्मिथ प्रमुख रहे हैं । अपने मृत्यु के वर्ष, २००२ तक, गोल्ड ने अपने सिद्धांत की डटकर हिमायत की और अन्य तरह के शंकों का निवारण किया. चार्ल्स डार्विन के बाद, स्टीफन जे गोल्ड को जीव विकास के क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा नाम माना जाता है ।

गोल्ड के सिद्धांतों की रोशनी में आज, छलांगों द्वारा जीव विकास के सिद्धांत को अधिकाधिक मान्यता मिल रही है और जीव विकास विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे तरीकों की खोज हो रही है जो इस सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं ।

गोल्ड अपनी पुस्तक ‘पांडाज थंब’ में लिखते हैं, ” सोवियत यूनियन में विज्ञानियों को एक अलग तरह की दार्शनिक शिक्षा मिलती है – एंगेल्स द्वारा, हीगेल से लेकर, और विकसित किये गये द्वंदात्मक नियमों की शिक्षा. द्वंदात्मक नियम स्पष्ट तौर पर धीमे-तेज विकास के हामी हैं. वे मात्रा के गुणों में परिवर्तन की बात करते हैं । यह अजीब लग सकता है, पर ये बताते हैं कि किसी प्रणाली में धीरे-धीरे इकठ्ठे होनेवाले परिवर्तन या तो दबाव के परिणामस्वरूप वह प्रणाली ऐसी स्थिति में पहुँच जाती है, जब एकदम छलांग द्वारा परिवर्तन होता है. पानी को गर्म करो, यह उबल जायेगा, मजदूरों को अधिकाधिक दबायो, क्रांति हो जाएगी । ऐलड्रिज़ और मुझे यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि बहुत पहले रूसी जीवाश्म विज्ञानी भी हमारी ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ मॉडल जैसे जीव विकासी सिद्धांतों की धारणाएं रखते हैं । ”

अपनी पुस्तक ‘डार्विन के बाद अब तक’ में, गोल्ड, एंगेल्स के आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ का वर्णन करते हुए लिखते हैं, ” असल में, उन्नीसवीं शताब्दी में एक बहुत ही शानदार आलेख प्रकाशित हुआ, जिसके लिखनेवाले के बारे में जानकर, बहुत से पाठक हैरान हो जायेंगे – फ्रेडरिक एंगेल्स । (बेशक यह जानकर, कि एंगेल्स भी प्राकृतिक विज्ञान में गहरी दिलचस्पी रखते थे और वे अपने दर्शन ‘द्वंदात्मक भौतिकवाद’  को एक मजबूत आधार पर निर्मित करते हैं । वे अपनी पुस्तक ‘प्रकृति में द्वंदवाद’ को पूरा न कर सके ) उनकी मृत्यु के बाद, १८९६ में एंगेल्स द्वारा लिखित ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ प्रकाशित हुई  पर पश्चिमी विज्ञान पर इसका कोई असर न हुआ ।” क्योंकि उनके  अनुसार पश्चिमी सोच में पक्षपात बहुत गहराई तक पैठ कर चुका था ।

असल में देखा जाये तो डार्विन के सिद्धांतों पर होनेवाले सैद्धांतिक हमले असल में द्वंदात्मक भौतिकवादी दर्शन को नकारने के नाकाम परन्तु योजनाबद्ध प्रयत्न हैं । आज की परिस्थितियों में परजीवी हो चुके पूंजीवाद को सबसे अधिक खतरा मार्क्सवादी भौतिकवादी दर्शन से है क्योंकि यह वह दर्शन है जो समाज को गति में दिखाता है और वर्णन करता है कि प्रत्येक वस्तु गति में है । जैसे जीव विकास एक निरंतर गतिमान क्रिया है, वैसे ही, मानव समाज भी निरंतर गतिमान है । मानव समाज में भी प्राचीन मिट जाता है और नया उसका स्थान ग्रहण कर लेता है । इसी तरह आरंभिक कबीलाई समाजों के स्थान को गुलामदारी प्रबंध ने ग्रहण किया और फिर सामंतवाद और पूंजीवादी प्रबंध । प्रत्येक प्रबंध अपनी उम्र भोगकर इतिहास के रंगमंच से रुखसत हो गया और उसके स्थान को नये प्रबंध ने संभाल लिया । पूंजीवाद के चाकर इस सच्चाई को नकारने के लिए, हर उस सोच, वैज्ञानिक खोज या मानवीय कोशिश को सबसे पहले दबाने की कोशिश करते हैं, अगर ऐसा नहीं होता है, तो उसकी इस तरह से व्याख्या करने की कोशिश करते हैं कि उसके अन्दर का भौतिकवादी तत्त्व ख़त्म हो जाये और वह पूंजीवादी प्रबंध को सदैव से न्यायोचित ऐलान करने लगे ।

उन्नीसवीं शताब्दी में, जब पूंजीवाद के उभार का दौर था, उस वक्त पूंजीवादी चाकरों की कोशिश होती थी कि किसी वैज्ञानिक खोज से होनेवाले फायदा अधिकाधिक उठाया जाये और इस खोज से आम लोगों तक पहुँचने वाली भौतिकवादी चेतना को किसी न किसी तरह से दूर किया जाये । इससे भी अधिक, अगर हो सके तो उन खोजों को पूंजीवादी-चिरस्थायी तौर पर लोगों की नजरों में परिपक्व सिद्धांत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाये । इस प्रकार फासीवाद को जायज ठहराने के लिए पूंजीवादी चाकरों ने विज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया । नस्ल सुधारने को एक विज्ञान का दर्जा दिया गया । इस तथाकथित विज्ञान के आधार पर उन्नीसवीं शताब्दी के पूरार्द्ध में अमरीका में २०,००० लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गयी और नाज़ी जर्मनी में ३.७५,००० लोगों को नपुंसक बना दिया गया । इस काम को सिरे चढाने के लिए बाकायदा कानून बनाये गये । अमरीका के लगभग सभी राज्यों में कानून बनाकर नस्ल सुधारने के विभाग तक बनाये गये ।

विज्ञान के नामपर इस प्रकार के मानवता विरोधी कारनामे बाद में भी जारी रहे । बेशक उपरोक्त किस्म के नस्ल सुधार को विज्ञान द्वारा रद्द किया जा चुका है, पर यह अलग-अलग रूपों में सामने आने लगा जैसेकि साईको सर्जरी । इसके अनुसार सामाजिक समस्याओं का इलाज भी दिमाग का आपरेशन करके किया जा सकता है । इस तरह के ही दो तथाकथित विज्ञानी, वर्तमान मार्क और फ्रैंक इरविन ने यह सुझाव भी पेश कर दिया कि शहरों में होनेवाले दंगे भी दिमागी परेशानी के कारण होते हैं और इसका इलाज झुग्गियों में रहनेवाले लोगों के नेताओं के आपरेशन द्वारा हो सकता है और ऐसा किया भी गया । ऐलन वूड्स और टेड ग्रांट के अनुसार – १९७१ में, अमरीका में ऐसे ही लोगों का इलाज करने के लिए उचित ‘बीमारों’ की सूची मांगी गयी । आपरेशन द्वारा इलाज के लिए भेजे गये आदमियों में अप्रैल, १९७१ के कामगारों की हड़ताल के नेताओं में से एक शामिल था । ये हैं पूंजीवादी चाकरों के कारनामे और वैज्ञानिक खोज !

जीव विज्ञान से बाहर दूसरे विज्ञानों में भी यही स्थिति है । क्वांटम भौतिकी के दार्शनिक नतीजे ‘कोपनहेगन व्याख्या’ इसकी ज्वलंत मिसाल है । जैसे-जैसे पूंजीवाद और अधिक परजीवी होता जा रहा है, उतना ही अधिक यह विज्ञान-विरोधी भी होता जा रहा है । पहले तो यह विज्ञान से निकलने वाले भौतिकवादी परिणामों को बिगाड़ता था, पर अब तो यह विज्ञान के विकास में ही रूकावट बनता जा रहा है ।

पूंजीवाद ने पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाले जीवाश्मों को पण्य (commodity) बना दिया है । जीवाश्मों की पूरी दुनिया में फैली एक मंडी है । पूरी मानवता की धरोहर, ये जीवाश्म कुछ लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति बनते जा रहे हैं । ऐसा एक उदाहरण एक ४७ मिलियन वर्ष पुराने एक कैमूर के जीवाश्म का है । यह अभी-अभी ‘ढूँढा’ गया । यह जीवाश्म दूध पिलाने वाले ऊपरी श्रेणी के और आरंभिक दूध पिलाने वाले प्राणियों के बीच एक महत्त्वपूर्ण लिंक है । पर यह जीवाश्म १९८३ से लेकर २५ वर्षों तक एक जीवाश्म इकठ्ठे करने के शौक़ीन व्यक्ति की व्यक्तिगत सम्पत्ति बना रहा । इस प्रकार और भी जीवाश्मों को, जो व्यक्तिगत सम्पत्ति हैं, किराए पर खोज-कार्यों के लिए दिया जाता है ।

मेडिकल क्षेत्र के बारे में तो जितना कहा जाये उतना ही कम है । दवा कम्पनियां, उस खोज-कार्य जिसमें से मुनाफे की संभावना कम हो या मुनाफे पर चोट करता हो, पर धेला भी नहीं खर्च करतीं । ऐसे कार्यों के लिए अक्सर लोगों को जेब से खर्च उठाना होता है या फिर सरकारों के सामने नाक रगड़नी पड़ती है । बहुत से ऐसे खोज-कार्य बीच में ही बंद हो जाते हैं या फिर बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं ।

स्टेम सैल रीसर्च का भी इसीलिए विरोध हो रहा है । बेशक यह विरोध नैतिक और धर्म के चोगे के नीचे हो रहा है । इसका विरोध करनेवाले भी वही हैं, जो समलैंगिक और गर्भपात संबंधी कानूनों का विरोध करते हैं । और इन फासीवादी समूहों को आशीर्वाद किसका है, यह भी सबको पता है ।

इसी प्रकार १९९० में शुरू हुई, बैटरी से चलनेवाली बिजली की कार की परियोजना भी तेल कंपनियों, ऑटो कंपनियों और अमरीका सरकार की मिलीभगत से ठप होकर रह गयी है और यह कार कभी भी सड़क पर नहीं उतर सकी । इस बैटरी से चलनेवाले व्हीकल ने जहाँ प्रदुषण को कम करना था, वही तेल की खपत भी कम करनी थी, पर यह सब तेल कम्पनियों को किस तरह बर्दाश्त होता, इसलिए मिलमिलाकर पूरी परियोजना को कोल्ड स्टोर में रख दिया गया ।

इस प्रकार साफ़ है कि लोगों में भौतिकवादी चैतन्य के प्रसार को रोकने के लिए और इसे कुंठित करने के प्रयासों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में, जीव विकास के सिद्धांत पर, जोकि उतने ही प्रमाणों से सिद्ध हो चुके हैं जितने प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है पृथ्वी प्लेट जैसी नहीं, बल्कि गेंद जैसी, सूर्य पृथ्वी के नहीं, पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और सूर्य और चन्द्र ग्रहण किसी राहू-केतू के कारण नहीं बल्कि सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा के एक रेखा में आ जाने से लगते हैं, विवाद पैदा कर वैज्ञानिक प्राप्तियों और सिद्धांतों के उन क्रांतिकारी अंशों को कमजोर करने की कोशिशे हो रही हैं जो किसी भी वस्तु के चिरस्थाई होने की अवधारणा के परखचे उड़ा देते हैं । इसके साथ ही विज्ञान और दर्शन को मानवता की भलाई के लिए उपयोग के स्थान पर पूंजीवाद की पूरी अधिसंरचना इन्हें मुनाफे की चौहदी में कैद करने और श्रमिक लोगों की अधिकाधिक रत निचोड़ने के साधन मात्र बनाने के लिए दिनरात पंजों के बल खड़ी रहती है । इसलिए वर्तमान समय में, न्याय और समानता पर आधारित शोषण रहित समाज के सृजन का स्वप्न देखनेवाले लोगों के लिए यह जरूरी है कि भौतिकवादी वैज्ञानिक चैतन्य के हक़ में खड़े होने और डार्विन के सिद्धांतों समेत विज्ञान के हर क्षेत्र में हो रहे विचारवादी हमलों का और वैज्ञानिक तथ्यों को विकृत करके पूंजीवाद की सेवा करनेवालों का मुंह-तोड़ जवाब देने के लिए तैयारी करें ।

पंजाबी पत्रिका, नवें समाजवादी इन्कलाब दा बुलारा ‘प्रतिबद्ध’ के जनवरी, २०१० अंक से आभार सहित |

download pdf  : डार्विन के जन्मदिन पर विशेष

आज शहीदे-आजम का 102वां जन्मदिन है

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अमर शहीदों का पैगाम, जारी रखना है संग्राम !

भगत सिंह की बात सुनों,

नई क्रांति की राह चलो !

मेहनतकश बहनों और भाईयो,bhagat singh

28 सितंबर को महान शहीदे-आजम का 102वाँ जन्मदिन है. शहीदे-आजम के जन्मदिन पर जरूरत है कि हम महज रस्मी श्रद्धान्जलियों से हटकर अपने महबूब शहीद की याद को सच्चे दिल से ताजा करें. यह ज़रुरत सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे विदेशी गुलामी से देश को आजाद करवाने के लिए भरी जवानी में अपनी जान तक की बाजी लगा गए. भयंकर शोषण उत्पीडन का शिकार मेहनतकश जनता के लिए शहीद भगतसिंह को याद करना आज इससे भी गहरे अर्थ रखता है.

शहीद भगतसिंह के विचारों को दबाने की जितनी साजिशें अंग्रेजों ने की थी, वे आजाद भारत के लुटेरे हुक्मरानों की साजिशों के सामने कुछ भी नहीं है. बेहद घिनोनी साजिशों के तहत शहीदे-आजम भगतसिंह के विचारों को दबाने की कोशिश की गयी. १९४७ के बाद देश की राज्यसत्ता पर काबिज हुए काले अंग्रेजों ने शहीद भगतसिंह की आजादी की लडाई के बारे में इस झूठ का हमेशा प्रचार किया कि वे तो सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे. उनके मुताबिक शहीद भगतसिंह के बुतों पर फूल मालाएं पहनना ही उन्हें श्रद्धांजलि देने का तरीका है. लेकिन यह कड़वी सच्चाई किसी से छुपी नहीं है कि हम आज भी एक बेहद अँधेरे समय में रह रहे हैं. साधारण जनता के लिए इस देश में आज़ादी नाम की कोई चीज नहीं है. शहीद भगतसिंह के सपनों के समाज का निर्माण होना अभी बाकी है.

शहीद भगतसिंह और उनके साथियों ने एक ऐसे समाज के निर्माण का सपना देखा था जहाँ इन्सान के हाथों इन्सान की लूट न हो, जहाँ अमीरी-गरीबी की असामानताएं न हों, जहाँ धर्मों-जातियों-क्षेत्रों के नाम पर झगडे न हों, जहाँ स्त्री-पुरषों में असमानता न हो. वे एक ऐसे समाज के लिए संघर्ष करते रहे जहाँ मेहनतकश जनता रहने-खाने-पहनने सहित शिक्षा-स्वास्थ्य, मनोरंजन, आदि सहूलतें हासिल कर सके. वे हर मेहनतकश व्यक्ति के लिए इन्सान की ज़िन्दगी, मान-सम्मान की ज़िन्दगी चाहते थे.  लेकिन शहीदे-आजम भगत सिंह के प्यारे मेहनतकश लोग आज भी इस आजाद देश में गुलामों की ज़िन्दगी जीनेपर मजबूर कर दिए गए हैं. देश की साधारण जनता की बेहद दर्दनाक परस्थितियाँ शहीद भगतसिंह के सपनों के तार-तार होने की कहानी बयान कर रही हैं.

देश में १८ करोड़ लोग फुटपाथों पर सोते हैं, १८ करोड़ लोग झुगी-झोपडियों में रहते हैं. हर रोज ९ हज़ार बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर रहे हैं. ३५ करोड़ लोगों को भूखे सोना पड़ता है. देश के लगभग ८० करोड़ से भी अधिक औद्योगिक और खेतियर मजदूर और गरीब किसान दिन-रात की कड़ी मेहनत के बावजूद भी भूख और कंगाली से जूझ रहे हैं. करोडों नौजवानों के पास कोई रोजगार नहीं है. आर्थिक तंगियों-परेशानियों से घिरे लोग आत्महत्या कर रहे हैं. कमरतोड़ महँगाई गरीबों के मुहं से रोटी का आखिरी बचा निवाला भी छीनने जा रही है. फल, दूध, दही तो गरीबों की पहुँच से पहले ही बाहर थे – अब आलू, दाल भी खरीद पाना गरीबों के लिए असंभव सा होता जा रहा है.

हमारे इस आजाद भारत में हर सेकंड में एक स्त्री बलात्कार का शिकार होती है. हर वर्ष ५० हज़ार से अधिक बच्चे गायब होते हैं जिनमें से अधिकतर लड़कियां होती हैं. इनमें से अधिकतर लड़कियों को देह व्यापार के धंधे में जबरन धकेल दिया जाता है. इन बच्चों को भीख मांगने पर मजबूर कर दिया जाता है या फिर उनके शरीर के अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं.

यह शहीद भगतसिंह के सपनों की आज़ादी नहीं है. यह आज़ादी पूंजीपतियों की आज़ादी है.देश की ऊपर की आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का ८५ प्रतिशत है, वहीँ गरीबी का शिकार देश की निचली ६० प्रतिशत के पास सिर्फ २ प्रतिशत ही है. आज़ादी के ६ दशकों के दौरान २२ पूंजीपति घरानों की संपत्ति में ५०० गुना से भी अधिक बढोत्तरी हुई है. साम्राज्यवादी लूटेरों को भारतीय मेहनतकश जनता को लूटने के लिए बेहिसाब छूटें दी जा रही है. संसद-विधानसभाएँ चोर-गुंडे-बदमाशों-परजीवियों के अड्डे हैं जहाँ पूंजीपतियों द्वारा मेहनतकशों के हो रहे लूट-शोषण को बनाए रखने की स्कीमें बनाई जाती हैं, हक़-अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली जनता के दमन के लिए काले कानून तैयार किये जाते हैं.

यह है वह काली आज़ादी जिसकी जय जयकार करते देश के लूटरे हुकमरान कभी नहीं थकते.

क्रांतिकारी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि अंग्रेजों से राज्यसत्ता भारतियों के हाथ आ जाने से ही देश की विशाल जनता की हालत में कोई बदलाव नहीं आने वाला. शहीद भगतसिंह ने कहा था :

हम यह कहना चाहते हैं कि एक जंग लड़ी जा रही है जो तब तक जारी रहेगी जब तक इन्सान के हाथों इन्सान की लूट जारी रहेगी, जब तक कुछ शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता की आमदनी से साधनों पर कब्जा जमाये रखेंगे. यह लूटेरे अंग्रेज हों या भारतीय इससे स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता.

यह थे शहीद-भगतसिंह के जंगे-आजादी के सच्चे मायने जिन्हें दबाये रखने की कोशिशे भारतीय लूटेरे हुकमरानों द्वारा आज तक जारी है. हुकमरानों ने इतिहास की किताबों में शहीद भगतसिंह की आजादी की लड़ाई को हमेशा तोड़-मरोड़कर पेश किया. यही कारण है कि आज पढ़े-लिखे लोग भी भगतसिंह की जंगे-आज़ादी के इन मायनों से अनजान हैं – लेकिन लूटेरे हुकमरान कितनी भी साजिशें क्यों न रचते हों, शहीद भगतसिंह के विचार आज भी जिंदा है. जैसा कि शहीदे-आजम ने कहा था : हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली, ये मुशते खाक है फानी, रहे, रहे, न रहे. समाज के आमूलचूल बदलाव की तड़फ रखने वाले आज भी शहीदे-आजम की क्रांतिकारी सोच से प्रेरणा और मार्गदर्शन ले रहे हैं – शहीदे-आजम आज भी लूट,शोषण, जुल्म, दमन, अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले जिंदादिल इंसानों के दिलों की धड़कन हैं. वे आज भी जलती मशाल की तरह इन्कलाब की राह रोशन कर रहे हैं. लूटेरों के दिलों में आज भी भगतसिंह के विचार खौफ पैदा कर रहे हैं. उनके विचारों को दबाकर रखने की कोशिश के रूप में शहीद भगतसिंह को एक बार नहीं बल्कि अनेकों-अनेक बार फाँसी लगाने की कोशिशें होती आई हैं लेकिन शोषितों-उत्पीडितों के दिलों में वे आज भी लूट,शोषण, जुल्म, दमन, अन्याय, गुलामी से मुक्ति की आशा बनकर अमर हैं. वे आज भी हर मेहनतकश को इन्सान के हाथों इन्सान की लूट रहित नए समाज के निर्माण के महान पथ के राही बनने के लिए ललकार रहे हैं.

आज के अँधेरे समय में शहीद भगतसिंह के विचारों पर अमल करना ही उन्हें एकमात्र सच्ची श्रद्धाजंली हो सकती है. आओ , शहीद भगतसिंह के जन्मदिन पर उनके सपनों के समाज के निर्माण का प्रण लें.

हम सभी सच्चे लोगों को शहीद भगत सिंह के

सपनो के समाज के निर्माण के लिए चल रही जदोजहद में

हमारे हमसफ़र बनने का आह्वान करते हैं !

कारखाना मजदूर यूनियन लुधियाना

संपर्क : शहीद भगत सिंह पुस्तकालय, गली न. ५, लक्ष्मण नगर, ग्यासपुरा, लुधियाना

फ़ोन : 98771-43788 , 98886 -55663

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प्रथम अरविन्द स्मृति संगोष्ठी कार्यक्रम

Posted on Updated on

(24 जुलाई, 2009)

विषय

भूमण्डलीकरण के दौर में

श्रम कानून और मज़दूर वर्ग के

प्रतिरोध  के नये रूप

भूमण्डलीकरण पर विमर्श अभी भी अकादमिक जगत में प्रचलित फैशन बना हुआ है। लेकिन साथ ही यह उन लोगों के लिए भी अध्ययन-मनन और विचार-विमर्श का एक केन्द्रीय विषय है, जो व्यापक मेहनतकश जनसमुदाय की मुक्ति से जुड़े प्रश्नों पर जेनुइन सरोकार के साथ सोचते हैं या जो मज़दूर आन्दोलन को नयी ज़मीन पर फिर से खड़ा करने के अनथक प्रयासों में जुटे हुए हैं।

विगत शताब्दी के लगभग अन्तिम दो दशकों के दौरान वित्तीय पूँजी के वैश्विक नियंत्रण एवं वर्चस्व के नये रूपों एवं संरचनाओं के सामने आने के साथ ही पूँजी की कार्यप्रणाली में जो व्यापक और सूक्ष्म बदलाव आये तथा अतिलाभ निचोड़ने की जो नयी प्रविधियां विकसित हुई, कुल मिलाकर इनको ही भूमण्डलीकरण परिघटना का केन्द्रीय संघटक अवयव माना जाता है। यही वह समय था जब विपर्यय और प्रतिक्रिया की लहर विश्वव्यापी बन चुकी थी। बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रान्तियों की पराजय के बाद, पूँजीवाद के पक्षधर सिद्धांतकार और प्रचारक धर्मशास्त्रियों की तरह पूँजीवाद के अमरत्व की घोषणा कर रहे थे। कहने की ज़रूरत नहीं कि विश्वव्यापी मन्दी के वर्तमान दौर ने पूँजीवाद के असाध्य ढाँचागत संकट की गम्भीरता दर्शाकर इस मिथक को ध्वस्त कर दिया है। लेकिन पूँजी का भूमण्डलीय तन्त्र अपने आन्तरिक संकटों से स्वयं ही टूट-बिखरकर किसी नये ढाँचे के लिए जगह नहीं बना देगा। यह अपनी जड़ता की शक्ति के सहारे तबतक चलता रहेगा और अपना आंशिक पुनर्गठन करता रहेगा, जबतक कि श्रम की शक्तियाँ सुनियोजित प्रयासों से इसे तोड़कर नये ढाँचे का निर्माण नहीं करेंगी।

विचारणीय प्रश्न यह है कि छिटपुट मुठभेड़ों, असंगठित- स्वयंस्फूर्त प्रतिरोधों और आत्मरक्षात्मक उपक्रमों के अतिरिक्त मज़दूर वर्ग आज कहीं भी पूँजी के संगठित हमलों एवं दबाव का प्रभावी ढंग से उत्तर नहीं दे पा रहा है। अपने ऐतिहासिक मिशन और दूरगामी राजनीतिक संघर्ष को आगे बढ़ा पाना तो दूर, मज़दूर वर्ग अपने तात्कालिक एवं आंशिक हितों की लड़ाई को, आर्थिक माँगों एवं सीमित जनवादी अधिकारों की लड़ाई को भी प्रभावी ढंग से संगठित नहीं कर पा रहा है। यह एक जलता हुआ सवाल है, जिसके रूबरू हम-आप खड़े हैं!

अक्सर ऐसा होता है कि अतीत के शानदार और सफल संघर्षों से सम्मोहित होकर हम उनका अनुकरण करने लगते हैं। इसके पीछे एक कारण परिवर्तन के लिए हमारी व्यग्रता का होना भी होता है, जबकि ज़रूरत इस बात की होती है कि नये बदलावों का अध्ययन किया जाये और नयी राहों का संधान किया जाये। उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के मज़दूर आन्दोलनों के अनुभवों का अध्ययन-समाहार ज़रूरी है, पर उन्हीं की प्रतिछवि में आज के मज़दूर आन्दोलन को नहीं देखा जा सकता। हमें निरन्तरता और परिवर्तन के द्वन्द्व को सही ढंग से समझना होगा।

इक्कीसवीं सदी में पूँजी की कार्य-प्रणाली वही नहीं है जो बीसवीं शताब्दी में थी और उसमें कई बुनियादी ढाँचागत बदलाव भी आये हैं। इस स्थिति में, ज़ाहिर है कि श्रम के पक्ष को भी प्रतिरोध के तौर-तरीकों और रणनीति में कुछ बुनियादी बदलाव लाने होंगे। स्वचालन और अन्य नयी तकनीकों के सहारे पूँजी ने अतिलाभ निचोड़ने के नये तौर-तरीके विकसित कर लिये हैं। ज्यादातर मामलों में, बड़े-बड़े कारखानों में मज़दूरों की भारी आबादी के संकेन्द्रण का स्थान कई छोटे-छोटे कारखानों में मज़दूरों की छोटी-छोटी आबादियों के बिखराव ने ले लिया है। किसी एक माल के दस हिस्से न सिर्फ एक देश के दस हिस्सों में बल्कि दुनिया के दस देशों में बिखरे संयंत्रों में बनते हैं और फिर ग्यारहवीं जगह आपस में जुड़ते हैं। इसे इन दिनों प्राय: `ग्लोबल असेम्बली लाइन´ या `विखण्डित असेम्बली लाइन´ कहा जाता है। प्राय: इन सभी कारख़ानों में अधिकांश मज़दूर ठेका, दिहाड़ी, कैजुअल होते हैं या पीसरेट पर काम करते हैं। कुशल मज़दूरों की एक बहुत छोटी आबादी ही नियमित की श्रेणी में आती है। कम मज़दूरी देकर स्त्रियों और बच्चों से काम लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इन्हीं नयी चीज़ों को आज श्रम के अनौपचारिकीकरण, परिधिकरण, ठेकाकरण, स्त्रीकरण आदि नामों से जाना जाता है। तात्पर्य यह कि कई तरीकों से मज़दूरों की संगठित शक्ति और चेतना को विखण्डित करने के साथ ही कई स्तरों पर मज़दूरों को आपस में ही बाँट दिया गया है और एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है। संगठित बड़ी ट्रेड यूनियनें ज्यादातर बेहतर वेतन और जीवनस्थितियों वाले नियमित मज़दूरों और कुलीन मज़दूरों की अत्यन्त छोटी-सी आबादी के आर्थिक हितों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं।

भूमण्डलीकरण के दौर ने राष्ट्र-राज्य की भूमिका का भी पुनर्निर्धारण किया है। पूँजी की आवाजाही के लिए राष्ट्र-राज्यों की सीमाएँ ज्यादा से ज्यादा खुल गयी हैं जबकि श्रम की आवाजाही की बंदिशें और शर्तें बढ़ गयी हैं। निजीकरण की अंधाधुंध मुहिम में शिक्षा, स्वास्थ्य आदि – सबकुछ को उत्पाद का दर्जा देकर बाज़ार के हवाले कर दिया गया है, लेकिन श्रम को नियंत्रित करने के मामले में सरकार, नौकरशाही और न्यायपालिका ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने लगी हैं। यूँ तो बुर्जुआ श्रम कानून पहले भी मज़दूरों के आर्थिक हितों और राजनीतिक अधिकारों की सीमित हिफाजित ही कर पाते थे, पर आज श्रम कानूनों और श्रम न्यायालयों का जैसे कोई मतलब ही नहीं रह गया है। लम्बे संघर्षों के बाद रोज़गार-सुरक्षा, काम के घण्टे, न्यूनतम मज़दूरी, ओवरटाइम, आवास आदि से जुड़े जो अधिकार मज़दूर वर्ग ने हासिल किये थे – वे उसके हाथ से छिन चुके हैं और इन मुद्दों पर आन्दोलन संगठित करने की परिस्थितियाँ एकदम वैसी ही नहीं हैं, जैसी आज से सौ या पचास साल पहले थीं।

मज़दूर आन्दोलन से जुड़े इन सभी प्रश्नों और समस्याओं को एक साथ रखने का मतलब यह कतई नहीं है कि हमारा दृष्टिकोण निराशावादी है। बल्कि हम वैज्ञानिक और यथार्थवादी अप्रोच एवं पद्धति अपनाकर सामने उपस्थित समस्याओं का सिद्धांत एवं व्यवहार के धरातल पर हल निकालना चाहते हैं और वर्तमान गतिरोध् को तोड़ने की कोशिशों को गति देना चाहते हैं। यहाँ हमने आज के दौर में मज़दूर आन्दोलन के समक्ष उपस्थित समस्याओं-चुनौतियों के बारे में संक्षिप्त चर्चा की है। प्रस्तावित संगोष्ठी में सिर्फ इन समस्याओं पर ही नहीं, बल्कि मज़दूर आन्दोलन के नये रूपों और नयी रणनीतियों पर भी सहभागियों के साथ मिलबैठकर बात करेंगे |

यह संगोष्ठी हम अपने प्रिय दिवंगत साथी अरविन्द सिंह की स्मृति में आयोजित कर रहे हैं। 24 जुलाई, 2009 साथी अरविन्द की पहली पुण्यतिथि है। गत वर्ष इसी दिन, उनका असामयिक निध्न हो गया था। तब उनकी आयु मात्र 44 वर्ष थी। वाम प्रगतिशील धारा के अधिकांश बुद्धिजीवी, क्रान्तिकारी वामधारा के राजनीतिक कार्यकर्ता और मज़दूर संगठनकर्ता साथी अरविन्द से परिचित हैं। वे मज़दूर अख़बार `बिगुल´ और वाम बौद्धिक पत्रिका `दायित्वबोध´ से जुड़े थे। छात्र-युवा आन्दोलन में लगभग डेढ़ दशक की सक्रियता के बाद वे मज़दूरों को संगठित करने के काम में लगभग एक दशक से लगे हुए थे। दिल्ली और नोएडा से लेकर पूर्वी उत्तरप्रदेश तक कई मज़दूर संघर्षों में वे अग्रणी भूमिका निभा चुके थे। अपने अन्तिम समय में भी वे गोरखपुर में सफाईकर्मियों के आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। उनका छोटा किन्तु सघन जीवन राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। `भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम कानून और मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध के नये रूप´ जैसे ज्वलन्त और जीवन्त विषय पर संगोष्ठी का आयोजन ऐसे साथी को याद करने का शायद सबसे सही-सटीक तरीका होगा। हम सभी मज़दूर कार्यकर्ताओं, मज़दूर आन्दोलन से जुड़ाव एवं हमदर्दी रखने वाले बुद्धिजीवियों और नागरिकों को इस संगोष्ठी में भाग लेने के लिए गर्मजोशी एवं हार्दिक आग्रह के साथ आमंत्रित करते हैं। हमें विश्वास है कि आन्दोलन की मौजूदा चुनौतियों पर हम जीवन्त और उपयोगी चर्चा करेंगे।

सधन्यवाद ,

साभिवादन,

कात्यायनी

अध्यक्ष

राहुल फाउण्डेशन

कार्यक्रम

प्रथम सत्र

पूर्वाह्न 11 बजे से 2 बजे तक

भोजनावकाश

अपरांत 2 से 2.30 बजे तक

द्वितीय सत्र

अपरांत 2.30 से सायं 7.30 बजे तक

प्रथम अरविन्द स्मृति संगोष्टी

(24 जुलाई 2009)

comrade-arvind

विषय

भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम कानून और मज़दूर

वर्ग के प्रतिरोध के नये रूप

स्थान:

गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान सभागार

दीनदयाल उपाध्याय मार्ग

(निकट आई.टी.ओ.)

नई दिल्ली

संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों से मज़दूर संगठनकर्ताओं, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं, श्रम कानूनों के विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों के भाग लेने की पुष्टि हो चुकी है। आपसे हमारा पुरज़ोर अनुरोध् है कि जल्द से जल्द अपनी भागीदारी की पुष्टि करें और अपने आने की सूचना दें।

गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान सभागार

नई दिल्ली

सुबह 11 बजे से शाम 7.30 बजे तक

आप सादर आमंत्रित हैं!

सम्पर्क:

कात्यायनी (0522-2786782)

सत्यम (099104 62009 / 011-2783 4130)

आयोजक:

राहुल फाउण्डेशन


फासीवाद के 14 लक्षण

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डा. लॉरेंस ब्रिट

डा. लॉरेंस ब्रिट  – एक राजनीतिक विज्ञानी जिन्होंने फासीवादी शासनों जैसे हिटलर (जर्मनी), मुसोलिनी (इटली ) फ्रेंको (स्पेन), सुहार्तो  (इंडोनेशिया), और पिनोचेट (चिली) का अध्ययन  किया और निम्नलिखित 14 लक्षणों की निशानदेही की है;

1. शक्तिशाली और सतत राष्ट्रवाद — फासिस्ट शासन देश भक्ति के आदर्श वाक्यों, गीतों, नारों , प्रतीकों और अन्य सामग्री का निरंतर उपयोग करते हैं. हर जगह झंडे दिखाई देते हैं जैसे वस्त्रों पर झंडों के प्रतीक और सार्वजानिक स्थानों पर झंडों की भरमार.

2. मानव अधिकारों के मान्यता प्रति तिरस्कार — क्योंकि दुश्मनों से डर है इसलिए फासिस्ट शासनों द्वारा लोगो को लुभाया जाता है कि यह सब सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वक्त की ज़रुरत है. शासकों के दृष्टिकोण से लोग घटनाक्रम को देखना शुरू कर देते हैं और यहाँ तक कि वे अत्याचार, हत्याओं, और आनन-फानन में सुनाई गयी कैदियों को लम्बी सजाओं  का अनुमोदन करना भी शुरू कर देते हैं.

3. दुश्मन या गद्दार की पहचान एक एकीकृत कार्य बन जाता है — लोग कथित आम खतरे और दुश्मन – उदारवादी; कम्युनिस्टों, समाजवादियों, आतंकवादियों, आदि के खात्मे की ज़रुरत प्रति उन्मांद की हद तक एकीकृत किए जाते हैं.

4. मिलिट्री का वर्चस्व — बेशक व्यापक घरेलू समस्याएं होती हैं पर  सरकार सेना का विषम फंडिंग पोषण करती है. घरेलू एजेंडे की उपेक्षा की जाती है ताकि मिलट्री और सैनिकों का हौंसला बुलंद और ग्लैमरपूर्ण बना रहे.

5. उग्र लिंग-विभेदीकरण — फासिस्ट राष्ट्रों की सरकारें लगभग पुरुष प्रभुत्व वाली होती  हैं. फासीवादी शासनों के अधीन, पारंपरिक लिंग भूमिकाओं को और अधिक कठोर बना दिया जाता है. गर्भपात का सख्त विरोध होता है और कानून और राष्ट्रीय नीति होमोफोबिया और गे विरोधी होती है

6. नियंत्रित मास मीडिया – कभी कभी तो मीडिया सीधे सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है, लेकिन अन्य मामलों में, परोक्ष सरकार विनियमन, या  प्रवक्ताओं और अधिकारियों द्वारा पैदा की गयी सहानुभूति द्वारा मीडिया को नियंत्रित किया जाता  है.   सामान्य युद्धकालीन सेंसरशिप विशेष रूप से होती है.

7. राष्ट्रीय सुरक्षा का जुनून – एक प्रेरक उपकरण के रूप में सरकार द्वारा इस डर का जनता पर प्रयोग किया जाता है.

8.धर्म और सरकार का अपवित्र गठबंधन — फासिस्ट देशों में सरकारें एक उपकरण के रूप में सबसे आम धर्म को आम राय में हेरफेर करने के लिए प्रयोग करती हैं. सरकारी नेताओं द्वारा धार्मिक शब्दाडंबर और शब्दावली का प्रयोग सरेआम होता है बेशक धर्म के प्रमुख सिद्धांत सरकार और सरकारी कार्रवाईयों के विरुद्ध होते हैं.

9. कारपोरेट पावर संरक्षित होती है – फासीवादी राष्ट्र में औद्योगिक और व्यवसायिक शिष्टजन सरकारी नेताओं को शक्ति से नवाजते हैं जिससे अभिजात वर्ग और सरकार में एक पारस्परिक रूप से लाभप्रद रिश्ते की स्थापना होती है.

10. श्रम शक्ति को दबाया जाता है – श्रम-संगठनों का पूर्ण रूप से उन्मूलन कर दिया जाता है या कठोरता से दबा दिया जाता है क्योंकि फासिस्ट सरकार के लिए एक संगठित श्रम-शक्ति ही वास्तविक खतरा होती है.

11. बुद्धिजीवियों और कला प्रति तिरस्कार – फासीवादी राष्ट्र उच्च शिक्षा और अकादमिया के प्रति दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं. अकादमिया और प्रोफेसरों को सेंसर करना और यहाँ तक कि गिरफ्तार करना असामान्य नहीं होता. कला में स्वतन्त्र अभिव्यक्ति पर खुले आक्रमण किए जाते हैं और सरकार कला की फंडिंग करने से प्राय: इंकार कर देती है.

12. अपराध और सजा प्रति जुनून – फासिस्ट सरकारों के अधीन  कानून लागू करने के लिए पुलिस को लगभग असीमित अधिकार दिए जाते हैं.  पुलिस ज्यादितियों के प्रति लोग प्राय: निरपेक्ष होते हैं  यहाँ तक कि वे सिविल आज़ादी तक को देशभक्ति के नाम पर कुर्बान कर देते हैं. फासिस्ट राष्ट्रों में अक्सर असीमित शक्ति वाले  विशेष पुलिस बल होते हैं.

13. उग्र भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार — फासिस्ट राष्ट्रों का राज्य संचालन मित्रों के समूह द्वारा किया जाता है जो अक्सर एक दूसरे को सरकारी ओहदों पर नियुक्त करते हैं  और एक दूसरे को जवाबदेही से बचाने के लिए सरकारी शक्ति और प्राधिकार का प्रयोग किया जाता है. सरकारी नेताओं द्वारा राष्ट्रीय संसाधनों और खजाने को लूटना असामान्य बात नहीं होती.

14.चुनाव महज धोखाधड़ी होते हैं — कभी-कभी होने वाले चुनाव महज दिखावा होते हैं. विरोधियों के विरुद्ध लाँछनात्मक अभियान चलाए जाते है और कई बार हत्या तक कर दी जाती है , विधानपालिका के अधिकारक्षेत्र का प्रयोग वोटिंग संख्या या राजनीतिक जिला सीमाओं को नियंत्रण करने के लिए और मीडिया का दुरूपयोग करने के लिए किया जाता है.

कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

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जिस देश का प्रधानमंत्री स्वयं स्वीकार करे की देश की 7० प्रतिशत जनता 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती हैं वहां सुरेश चिपलूनकर [ कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है ] का यह कहना कि जनता को अपनी गरीबी या महंगाई जैसे मुद्दों से कोई वास्ता नहीं हैं, बात ज़रा गले से उतरी नहीं.

वैसे उन्होंने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि वे भारतीय जनता पार्टी की हार से दुखी हैं, ऐसे में जनता जनार्दन को दोषी करार दे देना ! कहीं उन्हें यह भ्रम तो नहीं कि वे सर्वज्ञाता हैं और जनता बेवकूफ.

वैसे आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं. उस ज़माने में किसान, मजदूर और देहाती का चरित्र मेहनतकश का था और मेहनतकश परजीवी वर्गों को हमेशा बेवकूफ दीखते हैं चाहे वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.

समाज शास्त्र कभी जनता को दोषी नहीं ठहराता अलबता वह सोई हुई हो सकती है, सोना कोई बुरी बात नहीं, किसी को उसे उठाना नहीं आता और वह मनोगत तरीके से दोष जनता पर मढ़ दे ? अगर हम समझतें हैं कि जनता हमारी मनोगत इच्छाओं का ख्याल करे, तो हमारी ओर लाखों नहीं करोडों उँगलियाँ उठ जाएँगी लेकिन अपनी इस मनोगत बीमारी की वजह से हो सकता है हमें एक भी दिखाई न दे.

वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा. और आतंकवाद पर वे चिंतित हैं मगर एकांगी तरीके से, समग्रता से नहीं, उन्हेँ हम दीपायन बोस के आतंकवाद के बारे में विभ्रम और यर्थाथ के अध्ययन की सलाह देंगे और इस पर एक विस्तृत टिपण्णी की अपेक्षा भी करेंगे.

अफलातून जी वास्तव में अफलातून हैं, उसी यूनानी परम्परा के जिसने जेल से भागने से इंकार कर दिया था कि इससे राज्य का पवित्र कानून टूटता है, उसी राज्य का जिसमें गुलाम और मालिक दो वर्ग थे और जहर का प्याला अपने लबों से लगा लिया मगर राज्य के तर्क पर आंच नहीं आने दी. ये बात करेंगे मगर शब्दों के हेरफेर के साथ. अब इन्होनें एक नया शब्द जोड़ बिठा दिया  “संघर्षशील प्रतिपक्ष” ? इसे अगर परिभाषित कर लें तो हम भी कुछ आगे बढ़ें.

वैसे सुरेश जी की एक बात से “लेकिन एकमात्र खुशी इस चुनाव रिजल्ट की यही है कि इन तीनों से पीछा छूटा” हम भी सहमत हैं लेकिन इसके साथ हम ये भी जोड़ देना चाहते हैं कि वामपंथी, समाजवादी, कम्युनिस्ट, जनशक्ति, बहुज़न जैसे शब्दों का प्रयोग करने से आप और हम (अवसरवादी) वे नहीं हो जाते जो इन शब्दों के अर्थ हैं लेकिन आप जैसे विचारवादी या आदर्शवादी लोग जो विचार को प्रथम और पदार्थ को गौण मानते हैं मानेंगे थोड़े ही. कोई लाख सर पटक ले तब भी आप नहीं मानेगे कि मनुष्य को उसके भौतिक हालात ही किसी विचार का कायल बनाते हैं. हाँ अपवाद हो सकतें हैं लेकिन हम वर्ग की बात कर रहें हैं. यहाँ अटल जी, मनमोहन सिंह और बहुतेरे वामपंथी, (एक का ज़िक्र हमने भी किसी अख़बार में पढ़ा कि वे राजस्थान से विधायक हैं परंतु पीले कार्डधारी हैं, खजाने से तनख्वाह नहीं लेते और राशन की दुकान पर उन्हें लाईन में खड़े देखा जा सकता है ), साफ़ और स्वच्छ छवि के हैं.

आप मिलना चाहेंगे उनसे ? मगर क्या फायदा. असल सवाल तो उन दलों का है – उनके चरित्र का है और साथ ही क्या बुर्जुआओं को साफ़ और स्वच्छ छवि के सेवक नहीं चाहिएँ?

एक कन्फ्यूजन हो सकता है कि कहीं हमने कांग्रेस को उस 70 प्रतिशत का सच्चा प्रतिनिधि तो घोषित नहीं कर दिया. बिल्कुल नहीं. बस विकल्पहीनता.

कुछ भविष्यवाणी हो सकती है. 20 प्रतिशत लोगों का लोकतंत्र जिसे हम बुर्जुआ अधिनायकवाद कहते हैं (इसलिए नहीं कि ऐसा हम कहते हैं यह तो हर कोई बगैर सिद्धांत के अपने अनुभव से ही समझता है) और अधिक मज़बूत हुआ है और आने वाले समय में श्रम और पूँजी की झड़पें त्वरित होंगी. इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए.

मार्क्सवाद से तो तथाकथित मार्क्सवादी भी मुनकर हो गएँ हैं आप की तो बात छोड़िए. लेकिन लेनिन द्वारा गद्दार कायुत्सकी के लिए कहे गए शब्द कि बुर्जुआ लोकतंत्र जहाँ पूँजी का राज होता है वहां मजदूर वर्ग संसदीय ढंग से सत्ता हासिल कर लेगा यह कोई लुच्चा और शोहदा ही कह सकता है. और लेनिन के यह शब्द उनकी मृत्यु के बाद चिल्ली और इंडोनेशिया में (केवल इंडोनेशिया में जहाँ कम्युनिस्ट संसदीय ढंग से मज़बूत हो रहे थे, 10 लाख लोगों को यह कहकर कत्ल कर दिया गया कि वे कम्युनिस्ट हैं) सही साबित हुए.

हाँ आप गलती न करें कि हम कोई भारतीय माओवाद या नकसलवाद का नया संस्करण हैं इसके लिए आप हमारा नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1 देखें.

और अब दो टूक बात. बुर्जुआ दलों का तो ऐसा होता ही है लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट दलों का स्वरूप भी संघाधिपत्यवादी रहा है. आप दो लाईनों के बीच लम्बा और सतत संघर्ष चलाए बगैर किसी बोलेश्विक चरित्र की पार्टी के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकते. यह गैर वैज्ञानिक है, गैर मार्क्सवादी है, विचारवादी और आदर्शवादी तरीका है जिसकी परणिति संशोधनवाद और दुस्साहसवाद ही होती है.

शहीद भगत सिंह विचार मंच उन बुद्धिजीवियों से यह स्पष्ट कर देना चाहता है कि भारत की वे पार्टियाँ जिन्हें कम्युनिस्ट पार्टियाँ कहा जाता (और यहाँ तक की विश्व की 99 प्रतिशत कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी) अपने उल्ट में बदल चुकीं हैं. हमें इसका अफ़सोस नहीं करना चाहिए क्योंकि सिद्धांत कहता है कि चीजें देर-सवेर अपने विपरीत में बदल जाती हैं. आज बीते युग की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियों को इकठ्ठा करके भानुमती का कुनबा जोड़ने से कुछ हासिल नहीं होने वाला. आज पार्टी गठन की अपेक्षा पार्टी निर्माण प्रमुख है.

हम उन बुद्धिजीवियों से जो श्रम को धन (यहाँ श्रीमान अफलातून द्वारा प्रस्तुत सुनील जी के उस लेख [ तलाश एक नए मार्क्सवाद की (२) : ले. सुनील ] का जिक्र भी करना ज़रूरी समझेंगे जिसमें उन्होंने बिना पूँजी और मार्क्स पढ़े किसी नए सिद्धांत को लिखने की सलाह दे डाली थी, उसमें उन्होंने मार्क्स  पर आरोप लगाया था कि वे श्रम की बिनाह पर धन के स्रोत में प्रकृति की भूमिका से मुनकर हैं जबकि पूंजी के प्रथम खंड के प्रथम अध्याय में मार्क्स ने उन अर्थशास्त्रियों को गलत ठहराया था जो श्रम को ही एकमात्र धन का स्रोत मानते थे) और ज्ञान का स्रोत मानते हैं, इस लम्बी और पीडादायक प्रक्रिया का हिस्सा बनने का आह्वान करते हैं ताकि वे अपने सर पर ज्ञान के इस क़र्ज़ का कुछ भुगतान करके सर्वहारा की अदालत में अपने कर्मों द्वारा कुछ तो सच्चे हों.
आमीन !

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पाँच क्रान्तिकारी जनसंगठनों का साझा चुनावी भण्डाफोड़ अभियान

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चुनावी राजनीति के मायाजाल से बाहर आओ!


नये मज़दूर इन्कलाब की अलख जगाओ!!

देशभर में लोकसभा चुनाव के लिए जारी धमाचौकड़ी के बीच बिगुल मज़दूर दस्ता, देहाती मज़दूर यूनियन, दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा, और स्‍त्री मुक्ति लीग ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश sajha abhiyanऔर पंजाब के अलग-अलग इलाकों  में चुनावी भण्डाफोड़ अभियान चलाकर लोगों को यह बताया कि वर्तमान संसदीय ढाँचे के भीतर देश की समस्याओं का हल तलाशना एक मृगमरीचिका है। ऊपर से नीचे तक सड़ चुकी इस आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को ध्वस्त कर बराबरी और न्याय पर टिका नया हिन्दुस्तान बनाने के लिए आम अवाम को संगठित करके एक नया इन्कलाब लाना होगा।

दिल्ली, लखनऊ, गोरखपुर, लुधियाना, चण्डीगढ़ आदि शहरों में इन संगठनों के कार्यकर्ताओं ने चुनावी राजनीति का भण्डाफोड़ करते हुए बड़े पैमाने पर पर्चे बाँटे, नुक्कड़ सभाएँ कीं, घर-घर सम्पर्क किया, ट्रेनों-बसों में और बस-रेलवे स्टेशनों पर प्रचार अभियान चलाये और दीवारों पर पोस्टर लगाये। दिल्ली, लखनऊ और गोरखपुर में चुनावी राजनीति की असलियत उजागर करने वाली एक आकर्षक पोस्टर प्रदर्शनी भी जगह-जगह लगायी गयी जिसने बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान खींचा। दिल्ली में रोहिणी इलाके में जागरूक नागरिक मंच ने अपनी दीवाल पत्रिका ‘पहल’ के ज़रिये भी चुनावी राजनीति के भ्रमजाल पर करारी चोट की।

राजधानी दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय, करावलनगर, शहीद भगतसिंह कालोनी, प्रकाश विहार, अंकुर एन्क्लेव, शिव विहार, कमल विहार, मुस्तफाबाद, नरेला, राजा विहार, सूरज पार्क, बादली आदि इलाकों  में चलाये गये भण्डाफोड़ अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं ने कहा कि चुनाव में बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं। इस बार मीडिया में धुआँधार प्रचार अभियान चलाकर लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कोई इसे परिवर्तन की अग्नि बता रहा है तो कोई कह रहा है कि महज़ एक वोट से हम देश की तकदीर बदल सकते हैं। लेकिन असलियत यह है कि हमसे कहा जा रहा है कि हम चुनें लम्पटों, लुटेरों, भ्रष्टाचारियों, व्यभिचारियों के इस या उस गिरोह को, थैलीशाहों के इस या उस टुकड़खोर को, जहरीले साँपों, भेड़ियों और लकड़बग्घों की इस या उस नस्ल को। किसी भी पार्टी के लिए आम जनता की तबाही-बर्बादी कोई मुद्दा नहीं है। बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी, छँटनी, पूँजीपतियों की लूट-खसोट, पुलिसिया अत्याचार, भ्रष्टाचार किसी पार्टी के लिए कोई मुद्दा नहीं है। ग़रीबों के लिए स्वास्थ्य, सबके लिए बराबर और सस्ती शिक्षा, रोज़गार, बिजली, पानी, घर जैसी माँगें इस चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। हमेशा की तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नफरत भरी राजनीति ज़ोर-शोर से जारी है। चुनाव जीतने के लिए जनता का समर्थन नहीं बल्कि जातीय समीकरणों के जोड़-तोड़ भिड़ाये जा रहे हैं।

नुक्कड़ सभाओं में वक्ताओं ने कहा कि असलियत तो पहले भी यही थी मगर इस पर भ्रम के परदे पड़े हुए थे। लेकिन ख़ास तौर पर पिछले 25-30 वर्षों में यह सच्चाई ज़्यादा से ज़्यादा नंगे रूप में उजागर होती गयी है कि यह जनतन्त्र नहीं बल्कि बेहद निरंकुश किस्म का धनतन्त्र है। हमें बस यह चुनने की आज़ादी है कि अगले पाँच वर्षों तक कौन हमारा ख़ून निचोड़े, किसके हाथों से हम दरबदर किये जायें!

लखनऊ में जीपीओ पार्क, हाई कोर्ट, मुंशी पुलिया, पालीटेक्निक चौराहा, चौक, अमीनाबाद आदि इलाकों में भण्डाफोड़ पोस्टर प्रदर्शनी लगायी गयी और पर्चे बाँटे गये। प्रदर्शनी स्थल पर जुटी भीड़ को सम्बोधित करते हुए कार्यकर्ताओं ने कहा कि 1952 में चुनावी ख़र्च महज़ डेढ़ करोड़ रुपये का था जो अब बढ़ते-बढ़ते 13,000 करोड़ तक पहुँच चुका है – और यह तो महज़ घोषित ख़र्च है। पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा किया जाने वाला असली ख़र्च तो इससे कई-कई गुना ज़्यादा है। चुनाव ख़त्म होते ही यह सारा ख़र्च आम ग़रीब जनता से ही वसूला जायेगा।

गोरखपुर में दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा के कार्यकर्ताओं ने बिछिया, रामलीला बाज़ार, सब्ज़ी मण्डी, शाहपुर, धरमपुर, लेबर चौक, इन्दिरा तिराहा आदि पर नुक्कड़ सभाएँ कीं, पोस्टर प्रदर्शनी लगायी और बड़े पैमाने पर पर्चे बाँटे। सभाओं में कहा गया कि भगवाधारी भाजपा हो या तिरंगा उड़ाने वाली कांग्रेस, हरे-नीले-पीले झण्डे वाली तमाम क्षेत्रीय पार्टियाँ हों या लाल झण्डे को बेचकर संसद में सीट ख़रीदने वाले नकली वामपन्थी – लुटेरी आर्थिक नीतियों के सवाल पर सबमें एकता है। यह बात दिनोदिन साफ होती जा रही है कि सरकार चाहे इसकी हो या उसकी – वह शासक वर्गों की मैनेजिंग कमेटी ही होती है। यह जनतन्त्र पूँजीपतियों का अधिनायकतन्त्र ही है। लोगों को अपने तथाकथित “प्रतिनिधियों” का चुनाव बस इसीलिए करना है ताकि वे संसद के सुअरबाड़े में बैठकर जनता को दबाने के नये-नये कानून बनायें, निरर्थक बहसें और जूतम-पैजार करें और देशी-विदेशी धनपतियों की सेवा करते हुए अपने पड़पोतों और पड़पड़पोतों तक के लिए कमाकर धर दें।

पंजाब में लुधियाना, चण्डीगढ़ सहित अनेक स्थानों पर चलाये गये भण्डाफोड़ अभियान में कार्यकर्ताओं ने अपने भाषणों और पर्चों में कहा कि इस बार सभी चुनावी धन्धेबाजोँ का मुख्य मुद्दा है कि प्रधानमन्त्री कौन बने। लेकिन किसी की नीतियों में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। कांग्रेस की अगुवाई वाला यू.पी.ए. गठबन्धन हो, भाजपा की अगुवाई वाला एन.डी.ए. गठबन्धन हो, तीसरा मोर्चा हो या अन्य कोई भी चौथा-पाँचवाँ गठबन्धन या मोर्चा, सभी की नीतियाँ देसी-विदेशी पूँजी के पक्ष में और मेहनतकश जनता के विपक्ष में चलायी जा रही निजीकरण- उदारीकरण की नीतियों से ज़रा भी इधर-उधर नहीं जाती हैं। आज सैकड़ों करोड़पति गुण्डे-अपराधी लोकसभा के चुनाव लड़ रहे हैं। जिस देश की 77 प्रतिशत जनता रोज़ाना महज़ 20 रुपये पर गुज़ारा करती हो वहाँ की जनता को कहा जा रहा है कि वे अपने भाग्य का फैसला करने के लिए करोड़पतियों को चुनें। चुनाव लड़ रहे नेताओं में से 15 प्रतिशत ऐसे हैं जो इस देश के बुर्जुआ कानून के अनुसार भी अपराधी हैं। कहने को तो साधरण ग़रीब आदमी भी चुनाव में हिस्सा ले सकता है, लेकिन हम जानते ही हैं कि चुनाव धन और गुण्डागर्दी के सहारे ही जीते जाते हैं।

उन्होंने कहा कि आज जनता विकल्पहीनता की स्थिति में है और क्रान्ति की शक्तियाँ कमजोर हैं। पर रास्ता एक ही है। इलेक्शन नहीं, इन्कलाब का रास्ता! मेहनतकशों को चुनावी मदारियों से कोई भी आस छोड़कर अपने क्रान्तिकारी संगठन बनाने के लिए आगे आना होगा। इस देश की सूरत बदलने वाले सच्चे क्रान्तिकारी विकल्प का निर्माण चुनावी नौटंकी से नहीं बल्कि जनता के क्रान्तिकारी संघर्षों से ही होगा। जब जनता ख़ुद संगठित हो जायेगी तब वह वास्तव में चुनाव कर सकेगी – वह चुनाव होगा यथास्थिति और क्रान्ति के बीच, लोकतन्त्र के स्वांग और वास्तविक लोकसत्ता के बीच! हमें इसकी तैयारी आज से ही शुरू कर देनी चाहिए।

सभी जगह अभियान टोलियों ने मेहनतकशों, इंसाफपसन्द नागरिकों और नौजवानों का आह्नान किया कि वे नयी सदी की नयी क्रान्ति की कतारों को संगठित करने के लिए आगे आयें। शहीदेआज़म भगतसिंह के सन्देश को सुनें और क्रान्ति का पैग़ाम हर दिल तक ले जाने में जुट जायें। चुनावी मदारियों के मायाजाल से बाहर आयें और जनता की सच्ची लोकसत्ता कायम करने के लिए लम्बी लड़ाई की राह पर डट जायें।

– बिगुल संवाददाता

नए इंकलाब की मशाल जलाओ ! क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का परचम ऊँचा उठाओ !!

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उठो ! जागो !! आगे बढो !!!

आज़ादी मुनाफाखोरों लुटेरों के लिए ! जनतंत्र चोरों-मुफ्तखोरों के लिए !!

एक ही विक्लप — एक ही रास्ता

नए इंकलाब की मशाल जलाओ ! क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का परचम ऊँचा उठाओ !!

इक्कीसवीं सदी तक आते-आते आज़ादी और जनतंत्र के सारे छल-छद्म उजागर हो चुके हैं. पूंजीवादी राज, समाज और संस्कृति के कुरूपतम वीभत्सतम रूप आज हमारे सामने हैं. १५ अगस्त 1947 की जिस आज़ादी को मशहूर शायर फैज़ ने ‘दाग़-दाग़ उजाला’ कहा था, वह आधी सदी बीतते-बीतते भादों की अमावस की कलि रात में तब्दील हो चुकी है. देश जल रहा है.जालिम नीरो की जारज औलादें बांसुरी बजा रही हैं.

इतिहास के इस अभूतपूर्व कठिन दौर में शहीदेआज़म भगत सिंह के शब्दों को दोहराते हुए हम इंसानियत की रूह में हरकत पैदा करने के लिए एक बार फिर क्रांति की स्पिरिट को ताज़ा करने का आह्वान करते है. हम देशी-विदेशी पूंजीपतियों के जालिमाना लूटतंत्र को तबाहो-बर्बाद करके हिंद महासागर में फेंक देने के लिए और उत्पादन, राज-काज और समाज के पूरे तंत्र पर आगे बढ़कर कब्ज़ा करने लेने के लिए मेहनतकश अवाम को आवाज़ देते है और क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा बुलंद करते हैं.

हम मानते हैं की नए सिरे से सब कुछ शुरू करना होगा. मेहनतकश जनता के राज्य और समतामूलक समाज के निर्माण की परियोजनायों को पुनर्जीवित करना होगा. पूरी दुनिया के पैमाने पर, पिछली सदी के आखिरी चौथी हिस्से के दौरान मेहनतकशों के इन्कलाबों का कारवां रुक-सा गया है, और भटका और बिखराव भी है. पूंजीवादी लूट और हुकूमत के तौर-तरीकों में भी अहम् बदलाब आये हैं. उन्हें समझना होगा और नई क्रांतियों की राह निकालनी होगी. यह कठिन हैं. पर असम्भव नहीं. हर नया काम कठिन लगता है. हर नई शुरुआत मज़बूत संकल्पों की मांग करती है. इतिहास के हजारों वर्षों के सफ़र का यह सबक है और पूंजीवादी लूटतंत्र के असाध्य और लाईलाज बिमारियों को देखते हुए यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि पराजय झेलने के बाद क्रांतियाँ फिर से परवान चढेँगी. यह सदी नई, फैसलाकुन क्रांतियों की सदी है.

यह हमारा दृढ विश्वास है और इस विश्वास के पर्याप्त कारण हैं की भारत की मेहनतकश जनता भी इस नए विश्व-एतिहासिक महासमर में पीछे नहीं रहेगी, बल्कि अगली कतारों में रहेगी. 85 फीसदी लोगों के दुखों और बरबादियों के सागर में 15 फीसदी लोगों के समृद्धि के टापू और उन पर खड़ी विलासता की मीनारें हमेशां के लिए कायम नहीं रह सकती. यह तूफ़ान के पहले का सन्नाटा है. इसलिए हुक्मरान बेचैन हैं. तरह-तरह के नए काले कानून बनाकर, पुलिस-फौज को चाक-चौबंद करके वे निश्चिंत हो जाना चाहते हैं, पर हो नहीं पाते. उन्हें लगने लगा है कि आम जनता को बाँटने-बरगलाने के लिए उछाले जाने वाले मुद्दे और छोडे जाने वाले शिगूफे भी बहुत दिनों तक काम नहीं आएंगे. पूंजीवादी जनतंत्र की कलई चारों ओर से उतर रही है. नया रंग-रोगन टिकता नहीं. इसलिए भारत की पूंजीवादी राज्यसत्ता फासिस्ट निरंकुशशाही की ओर खिसकती जा रही है.

इसलिए, क्रांतिकारी लोकस्वराज्य अभियान के ज़रिए हम इतिहास को गढ़ने वाले और अपने बलिष्ट हाथों से समय के प्रवाह को मोड़ देने वाले मेहनतकश अवाम के पराक्रम को ललकार रहे हैं और नई,कठिन और निर्णायक लड़ाई की तैयारी में शामिल होने के लिए उन तमाम लोगों को निमंत्रण दे रहे हैं, जिनकी आत्माएं युवा हैं, जो सच्चे अर्थों में जिन्दा हैं.

बढती लूट, निचुड़ती जनता : तबाही के सागर में ऐयाशी के टापू

इस देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी किसानों, मजदूरों और आम मध्यम वर्ग के लोगों ने, लेकिन छल-कपट से और क्रांतिकारी नेतृत्व की कमजोरियों-गलतियों का लाभ उठाकर देशी पूंजीपति वर्ग के नुमाइंदे उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे ढांचे पर काबिज हो गए.

समाजवाद का नारा लगाते हुए उन्होंने जनता को निचोड़कर पब्लिक सेक्टर में उद्योगों का विशाल ढांचा खड़ा किया, जिनमें मजदूरों को चूसकर अफसरशाही नेताशाही को ऐशो-आराम के सरंजाम मुहैया कराये गए और पूंजी का अम्बार इक्कठा किया गया. साथ ही विदेशी पूंजी को भी लूट की सारी सुविधाएँ मुहैया करी गयी. देशी पूंजीपति लुटेरों के जूनियर पार्टनर के रूप में वे भूतपूर्व सामंती भूस्वामी भी कतार में शामिल हो गए, जो अपने तौर-तरीके बदलकर अब पूंजीवादी भूस्वामी बन चुके थे. इसके साथ ही व्यापारियों, ठेकेदारों, उच्च मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों, अफसरों, नेताओं, दलालों और काले धन वालों की लम्बी-चौडी जमातें भी खूब फलती-फूलती रहीं. सारी संपदा पैदा करने वाली जनता को पूंजीवादी विकास का सिर्फ जूठन ही नसीब हुआ.

“समाजवाद” का गुब्बारा जब फूस हो गया ओर देशी पूंजीवादी ढांचे का चौतरफा संकट लाइलाज हो गया तो अपने लूटतंत्र को चलाने के लिए शासक वर्गों ने ओर उनकी सभी पार्टियों ने, यहाँ तक कि नकली वामपंथियों ने भी, आम सहमती से , बारह वर्षों पहले उदारीकरण ओर निजीकरण का रास्ता पकडा ओर जनता के खून पसीने से खड़े राजकीय उद्योगों को सीधे-सीधे देशी-विदेशी पूंजीपतियों को सौंपना शुरू कर दिया. अर्थतंत्र को साम्राज्यवादियों के लिए पूरी तरह खोल दिया गया. साथ ही, विदेशी कर्जों के सूद के रूप में सालाना देश से बाहर जाने वाले धन में भी कई गुने का इजाफा हो गया.

उदारीकरण के पिछले 17 वर्षों ने “समाजवाद” के मुखौटे को नोचकर पूंजीवादी जनतंत्र के खुनी चहरे को एकदम नंगा कर दिया है. आधी सदी के तथाकथित विकास का कुल बैलेंस शीट यह है कि ऊपर के 22 पूंजीपति घरानों की परिसंपत्तियों में 1951 से 2000 के बीच 500 गुने से अधिक की बढोत्तरी हुई. इन घरानों की परिभाषा में बहुराष्ट्रीय निगम शामिल नहीं है, जिनके शुद्ध मुनाफे में सैंकडों गुना की वृद्धि हुई है. दूसरी ओर, देश में गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों की ओर बेरोजगारों की संख्या में लगातार बढोत्तरी की रफ्तार उदारीकरण के 17 वर्षों ने ओर अधिक तेज़ कर दी है. एशिया विकास बैंक के मुताबिक इस समय हमारे देश की 55 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे रह रही है. छुपी हुई ओर अर्द्ध बेरोजगारी को छोड़ दे, तो भी अर्थशास्त्रियों के अनुसार, बेरोजगारी की कुल संख्या आज 20 से 25 करोड़ के बीच जा पहुंची है.

देश में आज कुल 20 करोड़ मजदूर असंगठित हैं. पुराने श्रम कानूनों को किश्तों में निष्प्रभावी बनाते हुए सरकार देशी-विदेशी पूंजीपतियों के आधुनिक उद्योगों को भी यह छूट दे रही है कि वे ज्यादा से ज्यादा काम दिहाडी ओर ठेका मजदूरों से लें ओर उन्हें चंद टुकडों के लिए बारह-बारह, चौदह-चौदह घंटे काम करने के लिए मजबूर करें. खेत-मजदूरों की स्थिति तो इससे भी बदतर है.

पूंजी की मार से अपनी जगह-ज़मीन से उजड़कर उजरती मजदूरों की कतारों में शामिल होने वाले मध्यम ओर गरीब किसानों की संख्या में विगत बारह वर्षों में करोडों की बढोत्तरी हो गयी है. इन्हीं सत्रह वर्षों के दौरान लाखों छोटे व मझोले दर्जे के उद्योगों की बंदी से और छंटनी से करीब 4 करोड़ मजदूर बेकार हो चुके हैं. विगत आधी सदी के दौरान, बड़े बांधों और बिजली परियोजनायों के निर्माण स्थलों से करोडों लोगों को उजाडा जा चुका है.

देश में कार, मोटरसाइकिल, ए.सी., फ्रिज, टी.वी., वाशिंग मशीन आदि के नए-नए ब्रांडों के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है, पर अनाज के उत्पादन में वृद्धि की रफ्तार तेजी से घटती जा रही है और आम गरीब आदमी के खाने-पीने और इस्तेमाल की अन्य चीजों और दवा-इलाज़ की कीमतों में रिकार्ड तोड़ वृद्धि हो रही है. प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के खर्चों में दस-दस गुने की वृद्धि हो रही है ओर बेटे-बेटी की इंजिनियर-डाक्टर बनाने का सपना तो अब आम मध्य वर्ग का आदमी तक नहीं देख सकता.

1991 से लेकर आज तक सभी सरकारों के प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री ओर भाड़े के अर्थशास्त्री यह कहते आ रहे हैं कि उदारीकरण-निजीकरण ही एकमात्र विक्लप है. वे एक मायने में सही कहते हैं. पूंजीवादी व्यवस्था के सामने आज यही एकमात्र एकमात्र विकल्प है ओर इसके जो विनाशकारी नतीजे सामने हैं, वे स्पष्ट कर देते हैं कि भविष्य क्या होगा ! पूंजीवादी हकूमत को जो करना था, उसने वह किया है. अब इस देश की मेहनतकश जनता को वह करना होगा जो उसे करना चाहिए.

कितना छली संविधान ओर कितना महंगा “जनतंत्र”

आर्थिक ढांचे पर सरसरी नज़र डालने के बाद, आइए राजनितिक ढांचे का भी संक्षेप में जायजा लें.

भारतीय संविधान का निर्माण जिस संविधान सभा ने किया था, उसका चुनाव पूरी जनता ने नहीं बल्कि महज़ 15 फीसदी कुलीन नागरिकों ने किया था. यह संविधान वास्तव में 1935 के ‘गवर्नमेंट आफ़ इंडिया एक्ट’ का ही संशोधित रूप था. यह भारत को ‘संप्रभु जनतांत्रिक गणराज्य’ घोषित करते हुए भी जनता को अति सीमित जनवादी अधिकार देता है और इन्हें भी हड़प लेने के प्रावधान इसके भीतर ही मौजूद हैं. इससे भी बड़ी बात यह है कि ब्रिटिशकालीन न्यायव्यवस्था और पुलिस तंत्र को लगभग ज्यों का त्यों कायम रखने के चलते आम जनता के अति सीमित सवैधानिक अधिकारों का भी कुछ खास मतलब नहीं रह जाता है.

इस सविधान के तहत, अरबों-खरबों के खर्च से जो चुनाव होते है, वे दरअसल जन-प्रतिनिधियों के चुनाव होते ही नहीं. चुनाव सिर्फ इस बात का होता है की अगले पॉँच वर्ष तक सरकार के रूप में “शासक वर्गों की मैनेजिंग कमिटी” का काम किस पार्टी या गठबंधन के लोग संभालेंगे ! अरबों-खरबों के खर्च से होने वाले ये चुनाव अब पॉँच साल के भीतर दो-दो, तीन-तीन बार हो रहे हैं और अपनी व्यवस्था के इस संकट का बोझ भी शासक वर्ग जनता से ही वसूल रहा है.

चुनाव के बाद अब जरा सरकार चलाने के खर्चों पर भी नजर डालें. औसत भारतीय आदमी की दैनिक आय लगभग 29 रुपये 50 पैसे है जबकि देश के राष्ट्र्पति पर रोजाना लगभग 4 लाख 14 हज़ार खर्च होते हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय पर लगभर 2 लाख 38 हज़ार रूपये कह्र्च होते हैं. केन्द्रीय मंत्रिमंडल का दैनिक खर्च लगभग 15 लाख रूपये है. संसद की एक घंटे की कार्रवाई पर लगभग 16 लाख रूपये खर्च होते हैं. इसमें सभी विधानसभाओं के खर्चों, राज्यों के मंत्रिमंडलों के खर्चों, एम.पी.-एम.एल.ए. के वेतन-भत्तों और विधानसभा चुनावों के खर्चों को जोड़ देने पर यह बात सहज ही समझी जा सकती है कि यह “जनतंत्र” कितना खर्चीला और कितना परजीवी है.

वर्ष 1999-2000 के केन्द्रीय बज़ट में विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा पर एक अरब 61 करोड़ रूपये और केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सुरक्षा पर 50 करोड़ 52 लाख रूपये की व्यवस्था की गयी थी. सभी राज्यों के मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर होने वाला खर्च भी इसमें शामिल करने पर इस मद की विशालता का आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है.

यह खर्च तो सिर्फ तथाकथित जनप्रतिनिधियों का है. विराट नौकरशाही तंत्र, पुलिस विभाग, अर्द्धसैनिक बलों और फौजी मशीनरी पर सालाना खरबों रूपए का जो अनुत्पादक खर्च होता है, उसका बोझ भी अपना पेट काटकर जनता ही उठाती है.

जो पूंजीवादी लुटेरों के बफादार कुत्ते हैं, वे भौकने, काटखाने और चौकीदारी करने की पूरी कीमत वसूल करते हैं. और पूंजीपति यह कीमत खुद नहीं देते, बल्कि जनतंत्र ने नाम पर उसी जनता से वसूल करते हैं, जिसकी हड्डियों से वे अपना मुनाफा निचोड़ते हैं.

संसदीय “जनतंत्र” की नंगई एकदम सामने आ जाने ने बाद विभिन्न राज्यों की कांग्रेसी, भाजपाई और नकली वामपंथी सरकारों ने पंचायती राज ने नाम पर सत्ता के विकेंद्रीकरण का नया शोशा उछाला है और पंचायतों को अधिक अधिकारसंपन्न बनाने का दावा किया है. यह वास्तव में गावों के स्तर पर धनी किसानों और पूंजीवादी भूस्वामियों को अधिक अधिकारसंपन्न बनाकर लूट और सत्ता में भागीदारी के लिए उन्हें अधिक अवसर देने का ही उपक्रम है. ऐसा करके, वास्तव में पूंजीवादी व्यवस्था के स्थानीय खंभों को मजबूत बनाया जा रहा है और ऐसा, शीर्ष पर, या पूरे ढांचे में, कोई बदलाव लाये बिना ही किया जा रहा है. आर्थिक शक्ति से वंचित आम लोग पंचायतों में निहित सीमित अधिकारों का भी तब तक इस्तेमाल नहीं कर सकते जब तक कि आर्थिक-सामाजिक ढांचे में बुनियादी बदलाव नहीं किया जाये, या फिर व्यापक जनता की संघर्षशील एकजुटता का बलशाही दबाब नहीं बनाया जाये.

हम क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा क्यों बुलंद करते हैं?

देश के इतिहास के ऐसे मोड़ पर, जब समय के गर्भ में महत्त्वपूर्ण बदलाव के बीज पल रहे हैं, हम पूंजीवादी संसदीय जनतंत्र की खर्चीली धोखाधडी और तथाकथित पंचायती राज के कपटपूर्ण शगूफे को सिरे से खारिज करने के लिए उन सबका आह्वान करते हैं, जो इस व्यवस्था में छले जा रहे हैं, ठगे जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं और आवाज़ उठाने पर कुचले जा रहे हैं. इस व्यवस्था में जिनका कोई भविष्य नहीं है, वे ही नई व्यवस्था बनाने के लिए आगे आएंगे. उन्हें आगे आना ही होगा !

देश के विभिन्न क्रांतिकारी जनसंगठनों द्वारा चलाया जा रहा क्रांतिकारी लोक स्वराज्य अभियान यही सन्देश देश के जन-जन तक ले जाने के काम में जुटा है कि साम्राज्यवाद और पूंजीवाद का एक-एक दिन हमारे लिए भारी है. इसका नाश हमारे अस्तित्व की शर्त है !

इनके विरुद्ध हम क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा क्यों बुलंद करते हैं? क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का मतलब है उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले सामाजिक वर्गों का नियंत्रण, फैसले की पूरी ताकत उन्हीं के हाथों में. इसका सारतत्व है – ‘सारी सत्ता मेहनतकशों को!’, इसका तात्पर्य है – विश्व पूंजीवादी तंत्र से नाभिनालबद्ध देशी पूंजीवादी व्यवस्था को चकनाचूर करके पूरे समाज के आर्थिक आधार और ऊपरी ढांचे का न्याय और समानता के आधार पर पुनर्गठन !

कुछ पूंजीवादी सुधारवादी और कुछ दिग्भ्रमित लोग आज विदेशी लूट और राष्ट्र की नई “गुलामी” के खिलाफ “स्वदेशी” का नारा दे रहे हैं. फासिस्ट संघ परिवार तक ने इसके लिए एक मंच बना रखा है. यह नारा भटकाने वाला है. विदेशी आज देशी लुटेरों से गाँठ जोड़कर ही जनता को लूट रहे हैं. देशी पूंजीपति लूट की बंदरबांट में अपने हिस्से के लिए साम्राज्यवादियों से खींचतान करते हैं और “स्वदेशी” की गुहार लगाते हैं, पर तकनोलाजी और पूंजी के लिए और विश्व बाज़ार में टिके रहने की खातिर वे उनसे गांठ जोड़ने के लिए मजबूर हैं. सवाल देश की गुलामी का नहीं है. मेहनतकश तो हर हाल में पूंजी का उजरती गुलाम है, चाहे वह देशी पूंजी हो या विदेशी. भूमंडलीकरण के दौर में गरीब देशों में पूंजीवादी लूट साम्राज्यवाद से गांठ जोड़कर ही जारी रह सकती है.

सवाल आज विदेशी गुलामी बनाम स्वदेशी का नहीं है, बल्कि सवाल पूरी पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली और पूंजीवादी सामाजिक-राजनितिक- सांस्कृतिक प्रणाली को ही नष्ट करने का है जो अनैतिहासिक और मानवद्रोही हो चुकी है.

इक्कसवीं सदी में इतिहास के एजेंडे पर यही केन्द्रीय मुद्दा है. क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा उस पूंजीवादी सत्ता को उखाड़ फैंकने के लिए संघर्ष का नारा है, जिसने देशी पूंजीपतियों की लूट के साथ ही साम्राज्यवादी देशों और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के लिए देश के दरवाजे खोल दिये हैं.

क्रांतिकारी लोक स्वराज्य अभियान पूंजीवादी जनतंत्र के सभी स्वांगों और छल-छद्मों का भंडाफोड़ करते हुए वर्तमान संसदीय प्रणाली को सिरे से खारिज करने का और सरकारी पंचायती राज की असलियत को समझने का आह्वान करता है.

क्रांतिकारी लोक स्वराज्य अभियान व्यापक परिवर्तन के हर मोर्चे पर सन्नद्ध होने के साथ-साथ गाँव-गाँव में, शहर के मुहल्लों और मजदूर बस्तियों में जनता की वैकल्पिक सत्ता के क्रांतिकारी केन्द्रों के रूप में लोक स्वराज्य पंचायतों के गठन का आह्वान करता है.

हम जानते है, हमारा रास्ता लम्बा है. पर यही एकमात्र विकल्प है. यही इतिहास का रास्ता है. इसलिए हमारा यह संग्रामी संकल्प है कि ” लोक स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम हर कीमत पर उसे लेकर रहेंगे.”

नौजवान भारत सभा की ओर से जारी

यदि आप भी इस मुहीम में शामिल होना चाहते हैं तो इन पतों में से किसी पर भी संपर्क कीजिए :

1. बी- 100, मुकुंद विहार, करावल नगर, दिल्ली-110094, फोन-011-65976788, 099993-79381

2. डॉ. परमिंदर, गाँव- पख्खोवाल, जिला-लुधियाना. फोन 98886-96323

3. शहीद भगत सिंह लाईब्रेरी, गली नंबर-5, लक्ष्मण नगर, ग्यासपुरा, लुधियाना. फोन. 98771-43788

4. नवकाशदीप, गली नंबर-6/ बाईं ओर, डोगर बस्ती, फरीदकोट. फोन-94663-47046

5. गुलशन कुमार, शहीद भगत सिंह लाईब्रेरी, मकान नंबर-112, सैक्टर 22 सी, संगतपुरा मोहला, मण्डी गोबिंदगढ़. फोन-98728-65599

6. अमनदीप, भाईरुपा, बठिंडा. फोन- 97793-68203


आतंकवाद इस पूंजीवादी व्यवस्था का पैदा किया नासूर है

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मुंबई में आतंकवादी हमला

यह अंधराष्ट्रवादी जूनून में बहने का नहीं,

संजीदगी से सोचने और फ़ैसला करने का वक्त है.

मुंबई में आतंकवादी हमले की घटना पिछले कुछ दिनों से प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की सुर्खियों में है. जाहिर है कोई भी विवेकवान और संवेदनशील व्यक्ति इस घटना और इससे पैदा हुई स्थिति पर  औपचारिक या अखबारी ढंग से भावनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करेगा बल्कि पूरे राजनितिक-सामाजिक परिदृश्य पर अत्यन्त चिंता और सरोकार के साथ विचार करेगा.

यह घटना एक बार फ़िर यह दर्शाती है कि जब प्रगति की धारा पर गतिरोध की धारा हावी होती है तो किस तरह राजनीती के एजेंडा पर शासक वर्गों की राजनीती हावी हो जाती है और उनके तरह-तरह के टकराव विकृत रूपों में सामने आते हैं जिनकी कीमत जनता को चुकानी पड़ती है. देश के भीतर और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के स्तर पर शासक धड़ों के बीच के टकराव विभिन्न रूपों में समाज में कलह-विग्रह पैदा करते रहे हैं. इसके अलावा शासक जमात की नीतियों की बदौलत एक लम्बी प्रक्रिया में आतंकवाद पैदा हुआ और फैलता गया है. शासक वर्ग एक हद तक अपने-अपने हितों के लिए इसका इस्तेमाल भी करते रहे हैं लेकिन कभी-कभी यह उनके हाथ से बाहर निकल जाता रहा है. दोनों ही सूरतों में इसकी कीमत जनता ही चुकाती रही है.

एक क्रान्तिकारी मजदूर अख़बार के नाते ‘बिगुल’ इस घटना पर दुःख व्यक्त करता है और इसकी कठोर निंदा करता है. ‘बिगुल’ के पन्नों पर हम बार-बार अपनी यह राय जाहिर करते रहे हैं कि आतंकवाद किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता. लेकिन ऐसे समय में रस्मी तौर पर देशभक्ति का मुजाहिरा करने की बजाय इस समस्या की जड़ों पर संजीदगी से सोचने की जरूरत है.

पूंजीवादी मीडिया ने इस घटना के समय से ही जैसा उन्मादभरा माहौल बना रखा है उसमें संजीदगी से सोचने की ज़रूरत और भी बढ़ गयी है. टीआरपी बढाने के लिए सनसनी के भूखे मीडिया को तो इस घटना ने मानो मुंहमांगी मुराद दे दी. घटना के ‘दिन’ से ही सारे टीवी चैनल एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में जुट गये थे. किसी का कैमरामैन कमांडो के पीछे-पीछे घुसा जा रहा था तो किसी का रिपोर्टर अपनी सारी अभिनय प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए रिपोर्टिंग को ज्यादा से ज्यादा नाटकीय बना रहा था. गोली चलने, बम फटने, आग लगने, या किसी के मरने के दृश्य को किसने सबसे पहले दिखाया इसे बताने की होड़ का बेशर्मीभरा प्रदर्शन लगातार तीन दिन तक चलता रहा. कुल मिलाकर, इस पूरी घटना को देशभक्ति के पुट वाली जासूसी या अपराध कथा जैसा बना दिया गया. अधिकांश चैनलों और अख़बारों की रिपोर्टिंग ने साम्प्रदायिकता का रंग चढी हुई देशभक्ति और अंधराष्ट्रवादी भावनाओं को उभाड़ने का ही काम किया. हालाँकि कुछ संजीदा पत्रकारों और बुद्धिजीविओं ने कहा कि किसी एक सम्प्रदाय विशेष को कठघरे में खडा करना या सीधे पाकिस्तान को निशाना बनाना ठीक नहीं है, लेकिन यह धारा कमज़ोर थी.

इस बात में ज़्यादा संदेह नहीं है कि इस हमले के पीछे जैश-ऐ-मोहम्मद या लश्करे-तैयबा और अल-कायदा जैसे संगठनों का हाथ हो सकता है और इसके लिए पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किया गया है. पाकिस्तान में आज कई वर्ग शक्तियों का टकराव बहुत तीखा हो चुका है और बहुत सी शक्तियाँ सत्ता के नियंत्रण से स्वतंत्र होकर काम कर रही हैं. आईएसआई और सेना के भीतर पुनरुत्थानवादी कट्टरपंथियों  के मज़बूत धडे हैं और ये पूरी तरह सरकार के कहने से नहीं चलते हैं. साथ ही यह भी सच है कि जब-जब शासक वर्ग आर्थिक-राजनितिक संकट में फंसते हैं तब-तब अंधराष्ट्रवाद की लहर पैदा करने की कोशिक की जाती है. इससे दोनों हुक्मरानों के हित सधते हैं. अपने-अपने शासक वर्गों की जरूरतों के मुताबिक कभी ये युद्ध के लिए आमादा दिखाई पड़ते हैं तो कभी गले मिलते नजर आते हैं. जो मुशर्रफ कारगिल में युद्ध के लिए जिम्मेदार था, वही कुछ महीने बाद आगरा में शान्ति दूत बना नजर आता है.

पाकिस्तान में भी कुछ लोगों ने इस मौके पर संजीदगी से काम करने की बात कही लेकिन आसिफ अली जरदारी की कमजोर सत्ता ने इस तरह के बयान देकर फ़िर वही पुराना दांव खेलना शुरू कर दिया है कि हम हर तरह से तैयार हैं-दोस्ती चाहो तो दोस्ती, जंग चाहो तो जंग कर लो. यह अयूब खान और भुट्टो के जमाने से चला आ रहा आजमूदा दांव है. भूलना नही चाहिए कि पाकिस्तान की आर्थिक हालत इस समय इतनी खराब है कि अभी एक महिना पहले वह दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गया था. ऐसे में, इस घटनाक्रम से ज़रदारी की भी गोट लाल हो रही है और भारत-विरोधी अंधराष्ट्रवादी लहर पैदा कर उसका फायद उठाने की वे पूरी कोशिश कर रहे हैं.

भारतीय शासक वर्ग के विभिन्न धड़े भी अपने-अपने ढंग से इसका फायदा उठाने में लगे हैं. आर्थिक मंदी और कमरतोड़ महंगाई से निपट पाने में पूरी तरह नाकाम मनमोहन सिंह सरकार को मूल मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने का मौका मिल गया है. चुनाव में अल्पसंख्यक वोटों के लिए पोटा हटाने का कांग्रेस ने वादा तो किया था लेकिन ऐसा कड़ा कानून आज भारतीय शासक वर्ग की ज़रूरत भी है और इस मुद्दे पर भाजपा के हमले से वह दबाब में भी है. इस घटना के बहाने उसे पोटा से भी सख्त कानून बनाने का मौका मिल गया है.

उधर भाजपा को ऐन विधानसभा चुनाव के पहले एक ऐसा मुद्दा मिल गया जिसे वह जमकर भुनाने की कोशिश कर रही है और जिसके शोर में मालेगंव तथा नांदेड़ आदि बम धमाकों में पकडे गया हिंदू आतंकवादियों का मामला फिलहाल पृष्ठभूमि में चला गया है. संघ गिरोह के संगठनों को हम तो पहले भी आतंकवादी मानते थे- गुजरात और उड़ीसा में जो कुछ इन्होने किया वह भी आतंकवाद ही था. योजनाबद्ध ढंग से बहशी भीड़ को लेकर गर्भवती औरतों के पेट चीरकर बच्चों को काट डालना, सामूहिक बलात्कार, लोगों को जिंदा जला देना- ये सब भी बर्बर, वहशी आतंकवाद ही है. लेकिन इनका दूसरा रूप भी जनता के सामने नंगा हो रहा था जिस पर अब पर्दा पड़ गया है. इसे भुनाने के लिए ये इतने उतावले थे कि मुठभेड़ अभी जारी ही थी कि नरेंद्र मोदी और आडवणी मुंबई पहुंचकर बयानबाजी करने लगे.

मीडिया में लगातार इस पर चर्चा जारी है कि यह घटना सुरक्षा इंतजामों और खुफिया तन्त्र की खामियों का नतीजा है. पर सच तो यह है कि महज़ इंतजामों को चाक-चौबंद करके ऐसे हमलों को नहीं रोका जा सकता. अगर भारत इजराइल से हथियारों का सौदा करेगा, अमेरिका के इशारे पर इरान विरोधी बयान देगा, अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीन के साथ दिखाई जाने वाली रस्मी एकता से भी पीछे हटेगा, अफगानिस्तान में हामिद करजई की अमेरिकी कठपुतली सरकार के साथ गलबहियां डालेगा और अमेरिका टट्टू जैसा आचरण करेगा तो ख़ुद अमेरिका के पैदा किए हुए तालिबान और अलकायदा जैसे भस्मासुरों का यहाँ-वहां निशाना बनने से भला कब तक बचेगा. भारतीय विदेशनीति के चलते इसकी छवि दिन-ब-दिन अमेंरिका-परस्त और पश्चिम परस्त बनती जा रही है. बेशक, आतंकवाद द्वारा साम्राज्यवाद का कोई विरोध नहीं किया जा सकता और अंततः यह साम्राज्यवाद को फायदा ही पहुंचता है लेकिन जो आतंकवादी संगठन सोचते हैं कि अपने ढंग से साम्राज्यवाद पर चोट कर रहे हैं उन्होंने भारत को भी निशाने पर ले लिया है.

इसके साथ ही, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आडवणी की रथयात्रा और बाबरी मस्जिद गिराए जाने के समय से हो रही घटनाएँ देश के अल्पसंख्यक समुदाय के अलगाव और अपमान को लगातार बढाती रही हैं. किसी क्रान्तिकारी विकल्प की गैर-मौजूदगी में उनकी गहन निराशा और घुटन बढ़ती जा रही है. जब गुजरात जैसे नरसंहार और टीवी पर बाबू बजरंगी जैसे लोगों को सरेआम अपनी बर्बर हरकतों का बयान करते दिखाने के बाद भी किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती और दूसरी तरफ महज़ अल्पसंख्यक होने के कारण हजारों नौजवानों  को गिरफ्तार और टॉर्चर किया जाता है, फर्जी मुठभेडों में मार दिया जाता है तो इस देश में इन्साफ मिलने की उनकी उम्मीद दिन-ब-दिन ख़त्म होती जाती है. ऐसे में गहरी निराशा और बेबसी की हालत में, कोई उपाय न देखकर प्रतिक्रियास्वरूप कुछ युवा आतंकवाद की तरफ मुड़ सकते है. मुंबई जैसी घटनाओं के बाद बना माहौल, जिसमे मीडिया की मुख्य भूमिका है, अल्पसंख्यकों के अलगाव को और बढा ही रहा है. अख़बारों में भी ऐसी अनेक घटनाओं की खबर आई है कि २६ नवंबर के बाद स्कूल से लेकर कार्यालय और रेल-बस तक में लोगों को उनके मजहब के कारण अपमानित किया गया है. बुर्जुआ राज्य के हित में दूर तक सोचने वाले कुछ संजीदा बुद्धिजीवी संयम से काम लेने की सलाह दे रहे हैं और ऐसी बाते कर रहे हैं कि संकट की इस घडी में हम सबको एक रहना चाहिए, आदि-आदि. लेकिन प्रकारान्तर से ये भी उस समुदाय के अलगाव को बढाने का ही काम कर रहे हैं जिसकी वफादारी को हिंदू कट्टरपंथी पाकिस्तान से जोड़कर उसे गैर-देशभक्त साबित करने पर तुले रहते हैं.

इस वक्त देश की एकता की काफी बातें की जा रही हैं मानों टाटा-बिड़ला-अम्बानी से लेकर २० रूपये रोज़ पर जीने वाले ८४ करोड़ गरीब लोगों तक सबके हित एक ही हैं. आज तक देशभर में होने वाले बम-विस्फोटों, दंगे-फसाद में हजारों आम लोग मरते रहे, उनके घर जलते रहे पर इतना बडा मुद्दा कभी नहीं बना. इस बार सबसे अधिक बवंडर इसलिए भी मचा है क्योंकि आतंकवादियों ने ताज होटल जैसे भारत के “आर्थिक प्रतीकचिह्नों” पर हमला किया है. उस ताज होटल पर जिसके बारे में एक अख़बार ने लिखा कि ताज में घुसने पर पता चलता है कि विलासिता और शानो-शौकत क्या होती है ! जिसके एक सुइट का एक दिन का किराया एक मजदूर की साल भर की कमाई से ज़्यादा होता है ! छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर सबसे बड़ी संख्या में मारे गये आम लोगों के लिए इतनी चिंता और दुःख नहीं जताया जा रहा जितना की ताज और ओबरॉय होटलों में मरने वाले लोगों के लिए. सीएसटी  स्टेशन पर मरने वाले सारे लोग आम लोग थे- कोई दिनभर की मेहनत के बाद घर लौट रहा था, कोई परिवार सहित अपने गाँव जा रहा था, कोई नौकरी के इंटरव्यू के लिए ट्रेन पकड़ने आया था. लेकिन इस समाज में आम आदमी की जिंदगी भी सस्ती होती है और उसकी मौत भी.

मुंबई की घटना के बाद उद्योगपतियों से लेकर फ़िल्म-स्टारों तक उपरी तबके के तमाम लोग अचानक आतंकवाद के खिलाफ सड़क पर उतर आये क्योंकि इस हमले ने पहली बार उनके भीतर अपनी जान का भय पैदा कर दिया है. अब तक आतंकवादी हमलों में अक्सर आम लोग ही मरते थे और वे सोचते थे बंदूकधारी सिक्यूरिटी गार्डों और ऊँची दीवारों से घिरे अपने बंगलों में वे सुरक्षित हैं, लेकिन इस बार उन्हें लगने लगा कि अब तो हद ही हो गयी ! अब तो हम भी महफूज नहीं!

लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है. यह घटना देश की चोर, भ्रष्ट, विलासी और आपराधिक नेताशाही के खिलाफ़ आम जनता को स्वर देने का भी जरिया बन गयी. नेताओं की लूट-खसोट, निकम्मेपन और ख़ुद भयंकर खर्चीले सुरक्षा तन्त्र में रहते हुए जनता की सुरक्षा पर ध्यान न देने वाले नेताओं पर लोगों का गुस्सा फूट पडा. इस घटना पर लोगों की प्रतिक्रियाओं के कई पहलू थे लेकिन सबसे अधिक नफ़रत और गुस्सा हर पार्टी की नेताशाही के खिलाफ़ था. किसी ने कहा कि नेता बार-बार कहते हैं कि वे जनता के लिए प्राण न्यौछावर कर देंगे तो क्यों नहीं वे अपनी सुरक्षा छोड़कर लोगों के बीच चले आते. एक महिला ने कहा कि जितनी सुरक्षा एक-एक नेता को दी जाती है उतने में बच्चों के एक-एक स्कूल की सुरक्षा का इंतजाम किया जा सकता है- क्या सैंकडों बच्चों की जान एक नेता से भी कम कीमती है? बेशक, लोगों के गुस्से का यह उभार तात्कालिक है और किसी संगठित आन्दोलन के आभाव में जल्दी ही यह शांत हो जाएगा, लेकिन इसने सत्ताधारियों की पूरी जमात को इस बात का अहसास जरूर करा दिया होगा कि जनता  के मन में नेताओं के खिलाफ़ किस क़दर नफ़रत  भरी हुई है.

मुंबई की घटना कोई अलग-थलग घटना नहीं है और न ही सुरक्षा के सरकारी उपायों को चुस्त-दुरस्त करने से ऐसी घटनाओं की पुनरावृति को रोका जा सकता है. प्रश्न को व्यापक सन्दर्भों में देखना होगा. आतंकवाद एक वैश्विक परिघटना भी है जिसकी जड़ें साम्राज्यवादी देशों की नीतियों में हैं. भारतीय समाज का भी यह एक असाध्य रोग बन चुका है जिसे यहाँ की आर्थिक-राजनितिक स्थितियों ने पैदा किया है और खाद-पानी दिया है. यह पूंजीवादी व्यवस्था के चौतरफा संकट की ही एक अभिव्यक्ति है. विभिन्न रूपों में आतंकवादी घटनाएँ पूरे देश में हो रही हैं. इस व्यवस्था के पास इसका कोई समाधान नहीं है, बल्कि व्यवस्था का आर्थिक संकट इसके लिए और जमीन तैयार कर रहा है. आतंकवाद इस व्यवस्था का एक ऐसा नासूर है जो रिसता रहेगा और समाज में कलह और तकलीफ पैदा करता रहेगा. लोगों को आपस में लडाने वाली इस लुटेरी और अत्याचारी व्यवस्था के नाश के साथ ही इस नासूर का भी अंत होगा.

जनता का एक हिस्सा इन बातों को समझता भी है लेकिन जनता का बड़ा हिस्सा अंधराष्ट्रवादी जूनून में भी बहने लगता है. शासक वर्ग के हित भी इससे पूरे होते हैं. आतंकवाद रोकने के नाम पर संघीय जाँच एजेंसी गठित करने और पोटा से भी कड़ा कानून बनाने की जो कवायदें की जा रही हैं उनसे आतंकवाद को तो रोका नहीं जा सकेगा मगर इनका असली इस्तेमाल होगा मेहनतकशों के आंदोलनों को कुचलने के लिए. रासुका और टाडा से लेकर पोटा तक इसके उदाहरण हैं.

हर तरह का आतंकवाद जनता की वास्तविक मुक्ति के आन्दोलन को नुकसान पहुंचाता है. आतंकवाद के रास्ते से जनता कुछ हासिल नहीं कर सकती. असली सवाल एक क्रान्तिकारी विकल्प खडा करने का है. मेहनतकश वर्ग के उन्नत, वर्ग सचेत तत्वों को इस बात को समझना होगा और व्यापक मेहनतकश अवाम को इसके लिए संगठित करने की तैयारी करनी होगी.

“बिगुल” दिसंबर २००८ से साभार

आतंकवाद बनाम काले कानून : बहाना कोई निशाना कोई

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पिछले दिनों देश के कई इलाकों में हुए बम धमाकों के बाद देश में इस्लामी आतंकवाद का हौवा खड़ा करके नए-नए काले कानून बनाने की कवायद शुरू हो गई है. बेशक, इन आतंकवादी कार्रवाईयों की केवल कठोर शब्दों में निंदा ही की जा सकती है. इनमें मरने या घायल होने वाले ज्यादातर आम लोग होते है और इन घटनायों के बाद शुरू होने वाले दमन-उत्पीडन का शिकार भी आम मुस्लिम आबादी ही बनती है. लेकिन इस आतंकवाद के लिए जिम्मेदार सामाजिक-राजनितिक कारणों को समझना ज़रूरी है. हिन्दुत्ववादी संगठनों का आक्रामक अभियान, राज्यसत्ता का दमन-उत्पीडन, समाज में क़दम-क़दम पर मिलने वाला अपमान और अलगाव, और सबसे बढ़कर यह अहसास कि इस समाज में उन्हें इंसाफ नहीं मिल सकता-इससे पैदा होने वाली निराशा, बेबसी और गुस्सा कुछ मुस्लिम नौजवानों को इस्लामी कट्टरपंथ और आंतकवाद के रास्ते पर धकेल रहा है. लेकिन यह अंधी प्रतिक्रिया में पैदा होने वाला सांप्रदायिक आतंकवाद है और इसके लिए भी हिन्दुत्ववादी फासिस्ट संगठनों की जहरीली राजनीती और उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से शह देने वाली राज्यसत्ताएँ मुख्यत: जिम्मेदार हैं. दूसरे, यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बजरंग दल जैसे हिंदूवादी संगठनों के कई धमाकों में शामिल होने के सबूत बार-बार मिलते रहे हैं, लेकिन सरकार से लेकर मीडिया तक ऐसी खबरों को उभरने नहीं देते.

विभिन्न पूंजीवादी टी.वी. चैनलों पत्रिकाओं द्वारा इन आतंकवादियों को काबू में करने के लिए सख्त से सख्त कानून बनाने का शोर मचाया जा रहा है. आज जो कोई भी आतंकवाद के खिलाफ लिख या बोल रहा है उनमें से अधिकतर जनता को भ्रमित करने और उलझन में डालने के सिवा और कुछ नहीं कर रहे हैं.

कुछ ऐसे हिंदू कट्टरपंथी संगठन और नेता है जो खुलेआम सारी मुस्लिम आबादी के खिलाफ आग भड़काने में लगे हुए हैं. आम जनता इस तरह के प्रचार के कारण काफी हद तक आतंकवाद के खिलाफ गलत दृष्टिकोण अपना लेती है. आतंकवाद की असली जड़ को समझना चाहिए ताकि इसके खिलाफ सही दृष्टिकोण से मोर्चाबंदी की जा सके.

अल्पसंख्यक धर्मों (जैसे मुस्लिम और ईसाई) लोगों को देश के बाहर निकाल देने या उनके सभी जनवादी अधिकार छीन लेने का इच्छुक हिंदूत्ववादी कट्टरपंथी फासीवाद आतंकवाद की जड़ भी है और यह ख़ुद आतंकवादी भी है. वैसे तो हर धार्मिक कट्टरपंथ ही जनता का दुश्मन है लेकिन आज भारत में हिन्दुत्ववादी फासीवाद की जन-विरोधी भूमिका प्रमुख है.

यही मुख्य दुश्मन है. मुस्लिम कट्टरपंथी आतंकवाद सहित अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक कट्टरपंथी आतंकवाद इसी हिंदूत्ववादी फासीवाद की प्रतिक्रिया में पैदा हो रहे हैं. सन २००२ में गुजरात में हुआ मुस्लिम आबादी का योजनाबद्ध कत्लेआम भाजपा, आर.एस.एस., विश्व हिंदू परिषद् जैसे हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा किया गया था. वैसे तो यह बात २००२ में ही साफ़ हो गई थी लेकिन कुछ ही महीनों पहले अंग्रेजी की पत्रिका “तहलका” के स्टिंग आपरेशन के दौरान छुपे कैमरों ने इन संगठनों के नेताओं के इस नरसंहार में शामिल होने के पुख्ता सबूत जगजाहिर किए. हजारों लोगों का यह कत्लेआम आतंकवाद नहीं तो और क्या था? अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन मिलने और बाद में वापस लिए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में भी हिंसात्मक घटनाएँ घटी हैं उनमें भाजपा, आर.एस.एस. जैसे कट्टर हिंदू संगठनों द्वारा निभाया गया रोल हम सबके सामने है. यही हिंदूत्ववादी फासीवाद मुस्लिम कट्टरपंथी आतंकवाद को जन्म देता है और इसके फलने-फूलने के लिए खाद पानी मुहैया कराता है.

बेशक हमें अल्पसंख्यक धर्मों के कट्टरपंथियों का भी हर हालत में विरोध करना है. अल्पसंख्यक धार्मिक कट्टरपंथी फासीवादियों द्वारा फैलाये जा रहे भ्रमों को मजबूती देता है. इस तरह मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक कट्टरपंथ भी वापस हिंदू कट्टरपंथ को खाद-पानी मुहैया कराता है.

भारत में हर पूंजीवादी राजनितिक पार्टी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर फ़ासीवाद को इस्तेमाल करती है या इसके फलने-फूलने में योगदान देती है. लेकिन मुख्य फासीवादी ताकत हिंदू कट्टरपंथी संघ परिवार रहा है. इसके अहम् सूत्रधार आर.एस.एस. की स्थापना पिछली सदी के तीसरे दशक के दौरान हुई थी जब विश्व में फासीवाद का तेजी से उभार हो रहा था. आर.एस.एस. की ब्रिटिश गुलामी विरोधी संघर्ष में कोई भूमिका नहीं रही. बल्कि उस समय भी यह मध्ययुग के मुस्लिम हमलावरों के हवाले देकर साधारण मुस्लिम आबादी के विरुद्ध धार्मिक ज़हर फैलाने का ही काम कर रहा था और उन्हें निशाना बना रहा था. आर.एस.एस. के संस्थापकों में से एक अहम व्यक्ति डॉ. मुंजे फ़ासीवाद से बेहद प्रभावित था और भारत में भी मुसोलिनी और हिटलर जैसे किसी तानाशाह की कामना करता था. उसने इटली जाकर मुसोलिनी से मार्गदर्शन भी प्राप्त किया जिसके आधार पर उसे भारत में आर.एस.एस. का आर्किटेक्ट भी कहा जाता है. १९५२ में आर.एस.एस के राजनितिक शाखा जनसंघ का जन्म हुआ. १९७७ में जनसंघ ने जनता पार्टी में शामिल होकर केन्द्रीय सरकार में हिस्सेदारी प्राप्त की. इसके बाद भारतीय जनता पार्टी के तौर पर जनता पार्टी से अलग होकर इसकी ताकत तेज़ी से बढ़ी. ८० के दशक में पंजाब में कांग्रेस द्वारा ‘हिंदू कार्ड’ खेलने के बाद और फ़िर रामजन्मभूमि का मुद्दा उठने के साथ हिंदुत्व के कार्ड का योजनाबद्ध, खुला इस्तेमाल करने के लिए पूरा संघ परिवार सक्रीय हो गया. ९० के दशक की शुरुआत में ही आडवाणी की रथयात्रा से लेकर बाबरी मस्जिद का गिराया जाना और फ़िर २००२ में गुजरात में मुसलमानों का योजनाबद्ध कत्लेआम, अमरनाथ श्राइन बोर्ड ज़मीन के ताज़ा विवाद में संघ परिवार की भूमिका और अब उडीसा में ईसाईयों के कत्ल, उनके घरों और गिरजाघरों को आग लगाना आदि, यह सब संघ परिवार के हिंदू कट्टरपंथ के घिनौने कारनामें हैं.

यह बात ध्यान रखने वाली है कि संघ परिवार मौजूदा हिंदूत्ववादी फ़ासीवाद की वजह नहीं बल्कि साधन है. भारत में वैश्विकरण, उदारीकरण की बर्बर आर्थिक कट्टरपंथी नीतियों के लागू होने और इनके तबाह्कुन नतीजों के सामने आने के साथ-साथ हिन्दू कट्टरपंथी फ़ासीवाद में भी उभार आया. ८० के दशक में इंदिरा गाँधी द्वारा उदारतावादी आर्थिक नीतियों का आरंभ हुआ. राजीव गाँधी ने इस प्रक्रिया को जारी रखा. ‘९० के दशक की शुरुआत नई आर्थिक नीतियों के लागू होने से हुई. पिछले दशक के मुकाबले कहीं अधिक कठोरता के साथ उदारतावादी नीतियों के लागू होने का यह विशेष दौर था. “उदारीकरण” की नीतियों का असली चेहरा यानि पूंजीवादी ” आर्थिक कट्टरता” जगजाहिर होना लाजिमी था. इन नीतियों के संयोजक विश्व पूँजी और देशी पूँजी के मालिक यह अच्छी तरह से जानते थे कि इन तबाह्कुन नीतियों को लागू करना इतना आसान नहीं. बर्बर दमन के बिना इन नीतियों का लागू हो पाना असंभव था. इसी ने भारतीय राज्यसत्ता, जिसका जनवाद पहले ही काफी हद तक सीमित था को और गैर-जनवादी बना दिया. वैश्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण के प्रत्यक्ष विरोध या अन्य किसी भी स्तर पर अपने अधिकारों के लिए किए जा रहे संघर्षों में पुलिस दमन का जो घिनौना चेहरा देखने में आ रहा है वह भारतीय राज्यसत्ता के गैर-जनवादीकरण अर्थात फासीवादीकरण की ही निशानी है.

राज्यसत्ता के इसी गैर-जनवादीकरण-फासीवादीकरण के एक पहलू “बाँटो और राज करो” की नीति के तहत हिन्दुओं की भावनाओं को दूसरे धर्मों खास तौर पर मुसलमानों और ईसाईयों के खिलाफ भड़काना है. इस बाँटो और राज करो की नीति का असल निशाना प्रत्यक्ष रूप में मजदूरों और अन्य मेहनतकश लोगों के हुक्मरान वर्ग की नीतियों के खिलाफ हो रहे और संभावित संघर्ष बनते हैं. कोई हैरानी की बात नहीं है कि संघ परिवार अपने तीन मुख्य दुश्मनों में मुसलमान और ईसाईयों के साथ ही कम्युनिस्टों को भी रखता है.

“हिंदुत्व”, “स्वदेशी”, “भारतीय सभ्यता” आदि की दुहाई देने वाले संघ परिवार को वैश्विकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों से कोई परहेज नहीं रहा. जिस संघ परिवार का अपने ही देश में बसने वाले मुस्लिमों और ईसाईयों से धर्म नष्ट होता है उसे विदेशी पूँजी के आगे घुटने टेकने में कोई परहेज नहीं है, कोई शर्म नहीं है. संघ परिवार जो मुसलमानों और ईसाईयों को या तो इस देश से बाहर ही निकाल देने या इनके सभी जनवादी अधिकार छीन लेने का पक्षधर है उसे विदेशी पूँजी का बेसब्री से इंतजार रहता है. कांग्रेस द्वारा शुरू की गई नीतियों को ज़ोर-शोर से लागू करने में भारतीय जनता पार्टी सहित दूसरी सभी पूंजीवादी पार्टियों की बराबर की दिलचस्पी है.

सन २००२ में भाजपा के नेतृत्व में चल रही एन.डी.ए. की सरकार ने पोटा नाम का तथाकथित आतंकवाद विरोधी कानून बनाया था. पोटा कानून में यह दर्ज था की अगर कोई व्यक्ति इस कानून के तहत हिरासत में लिया जाता है तो हिरासत में लिए गए बयान को सबूत के तौर पर मान्यता दी जायेगी. दूसरा जब तक वह व्यक्ति ख़ुद को बेक़सूर साबित नहीं कर देगा तब तक कानून की नज़र में वह व्यक्ति गुनाहगार रहेगा. तीसरा, जमानत संबंधी बेहद सख्त धाराएं होने के चलते उसे लंबे समय तक जेल में ही रहना होगा. पोटा कानून के रहते आतंकवादी गतिविधियों में तो कोई कमी नहीं आई, पर हजारों बेक़सूर लोगों और अपने जायज़ हकों की मांग करने वाले लोगों को पोटा के तहत बंद कर दिया गया. गुजरात में आन्दोलन कर रहे मजदूरों से लेकर पंजाब, झारखण्ड, आंध्रप्रदेश आदि में किसानों तक को पोटा में बंद कर दिया गया. लेकिन सबसे बड़ी तादाद में आम मुसलमानों को इसके तहत गिरफ्तार करके बिना किसी सबूत के लंबे समय तक जेल में रखा गया. इसके भारी विरोध को देखते हुए कांग्रेस सहित कई पार्टियों ने पोटा ख़त्म करने को चुनावी मुद्दा बना दिया और यूपीए सरकार ने इसे ख़त्म कर दिया.

लेकिन कई राज्यों में खासकर वे राज्य जहाँ भाजपा के नेतृत्व की सरकारें हैं वहां योजनावद्ध अपराध को काबू करने के नाम पर पोटा जैसे काले कानून बनाये जा रहे है. गुजरात संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक, २००६, उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण, २००७ ऐसे ही विधेयक हैं जिन्हें इन राज्यों की सरकारें कानून का रूप देना चाहती हैं. महाराष्ट्र और कर्नाटक में पहले ही ऐसे कानून बने हुए हैं जिनकी तर्ज़ पर ये विधेयक तैयार किए गए हैं. आंध्र प्रदेश में पहले भी यह कानून बना हुआ था लेकिन ४ नवंबर २००४ इसके लागू रहने का समय समाप्त हो गया था. हाल की बम धमाकों की घटनाओं के बाद एल. के आडवाणी ने केन्द्र सरकार से यह मांग की है कि गुजरात संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक,२००७ को कानून के तौर पर जल्द से जल्द मंजूरी दी जाए. उनका यह भी बयान है की भाजपा की सरकार बनने पर पोटा को फ़िर से लागू कर दिया जाएगा. अब मनमोहन सरकार का फ़िर बयान आया है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए सरकार कानून को और सख्त करने के बारे में सोच रही है. लेकिन सबसे बड़े इन आतंकवादियों के काले कानूनों से न तो ऐसे घटनाएँ रुक सकती हैं और न ही इनका असल निशाना यह बम धमाकों वाला आतंकवाद है. बम-बन्दूक वाला आतंकवाद राज्यसत्ता का कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता. यह बात राज्यसत्ता भी अच्छी तरह जानती है. बम धमाकों में बेकसूर लोगों के मरने का भी राज्यसत्ता को असल में कोई दुःख नहीं है. लेकिन ऐसा आतंकवाद शासकवर्गों को अपनी सत्ता और मज़बूत करने के लिए टाडा, पोटा जैसे काले कानून बनाने का बहाना प्रदान करते हैं. काले कानूनों का मकसद होता है कि शासकवर्ग अपनी कट्टर नीतियों को लोगों पर थोप सकें. इस तरह काले कानूनों का असल निशाना वैश्विकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों के खिलाफ उठ रहे जनांदोलनों में भाग लेने वाले लोग बनते हैं. इसका एक सबूत यह है कि खालिस्तानी आतंकवाद से निपटने के नाम पर बनाए गए टाडा कानून का सबसे अधिक इस्तेमाल अहमदाबाद और औरंगाबाद के हड़ताली मजदूरों के खिलाफ हुआ था. हिंदू कट्टरपंथी फासीवाद का विरोध साम्राजवादी वैश्वीकरण और उदारीकरण की कट्टर आर्थिक नीतियों का विरोध है. यह पूंजीवादी राज्यसत्ता और लुटेरे आर्थिक प्रबंध की तबाही के लिए लड़े जा रहे संघर्ष का ही हिस्सा है. मौजूदा फासीवाद विरोधी संघर्ष पूंजीवाद-साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के रूप में राज्यसत्ता के क्रांतिकारी तख्तापलट के लिए संघर्ष है.

–लखविंदर ‘बिगुल’ अक्टूबर २००८ से साभार