कविता

हिंदुस्तान भी मेरा है और पाकिस्तान भी मेरा है

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पाकिस्तानी शायर हबीब ज़ालिब की कलम से

ग़ज़ल

हिंदुस्तान भी मेरा है और पाकिस्तान भी मेरा है

लेकिन इन दोनों मुल्कों में अमरीका का डेरा है

ऐड की गंदम खाकर हमने कितने धोखे खाए हैं

पूछ ना हमने अमरीका के कितने नाज़ उठाये हैं

फिर भी अब तक वादी-ए-गुल को संगीनों ने घेरा है
हिंदुस्तान भी मेरा है और पाकिस्तान भी मेरा है

खान बहादुर छोड़ना होगा अब तो साथ अंग्रेजों का
तौबा गरेबाँ आ पहुंचा है फिर से हाथ अंग्रेजों का

मैकमिलन तेरा ना हुआ तो कनेडी कब तेरा है
हिंदुस्तान भी मेरा है और पाकिस्तान भी मेरा है

ये धरती है असल में, प्यारे, मजदूरों दहकनों की
इस धरती पर चल ना सकेगी मर्जी चंद घरानों की
ज़ुल्म की रात रहेगी कब तक अब नज़दीक सवेरा है
हिंदुस्तान भी मेरा है और पाकिस्तान भी मेरा है

मौलाना

बहुत मैंने सुनी है आपकी तक़रीर मौलाना

मगर बदली नहीं अब तक मेरी तकदीर मौलाना

खुदरा शुक्र की तलकीन अपने पास ही रखें

ये लगती है मेरे सीने पे बन कर तीर मौलाना

नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्ज़ा ढिठाई से

यही है जुर्म मेरा और यही तकसीर मौलाना

हकीकत का क्या है, ये तो आप जाने या खुदा जाने

सुना है जिम्मी कार्टर है आपकी पीर मौलाना

जमीन हो वड़ेरों की, मशीनें हों लुटेरों की

खुदा ने लिखके दी है ये तुम्हें तहरीर मौलाना

करोड़ों क्यों नहीं मिलकर फिलस्तीन के लिए लड़ते

दुआ ही से फ़क्त कटती नहीं ज़ंजीर मौलाना

पाकिस्तान का मतलब क्या

रोटी, कपड़ा और दवा
घर रहने को छोटा सा
मुफ्त मुझे तालीम दिला
मैं भी मुसलमाँ हूँ वलाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्ललाह…

अमरीका से मांग न भीख
मत कर लोगों की तजहीक
रोक ना जम्हूरी तहरीक
छोड़ ना आज़ादी की राह
पाकिस्तान का मतलब है क्या
ला इलाह इल्ललाह…

खेत वड़ेरों से ले लो
मिल्लें लुटेरों से ले लो
मुल्क अंधेरों से ले लो
रहे ना कोई अलीजाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्ललाह…

सरहंद, सिंध, बलूचिस्तान
तीनों हैं पंजाब की जान
और बंगाल है सब की आन
आये ना उनके लब पे आह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्ललाह…

बात यही है बुनियादी
घासिब की हो बर्बादी
हक़ कहते हैं हक़ आगाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्ललाह…

ख़तरे में इस्लाम नहीं
खतरा है ज़र्दारों को
गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

सारी ज़मीं को घेरे हुए हैं
आख़िर चंद घराने क्यों
नाम नबी का लेनेवाले
उल्फत से बेगाने क्यों

खतरा है खूंख्वारों को
रंग-बिरंगी कारों को
अमरीका के प्यारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

आज हमारे नारों से लर्जां है बपा एवानों में
बिक न सकेगें हसरतो-अरमाँ ऊँची सजी दुकानों में

खतरा है बटमारों को
मगरिब के बाज़ारों को
चोरों को,मक्कारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

अमन का परचम लेकर उट्ठो
हर इंसान से प्यार करो
अपना तो मन्शूर है जालिब
सारे जहाँ से प्यार करो

खतरा है दरबारों को
शाहों के गम्ख्वारों को
नव्वाबों,गद्दारों को
ख़तरे में इस्लाम नहीं

http://www.revolutionarydemocracy.org/rdv9n1/jalibpoems.htm से साभार

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अच्छाई से तफ्तीश

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पैर आगे बढाओ : हमने सुना है
कि तुम अच्छे इंसान हो |
तुम्हे ख़रीदा नहीं जा सकता, परन्तु बिजली
जो घर पे गिरती है,
भी नहीं खरीदी जा सकती |
तुम उसपर पक्के हो जो तुमने कहा |
लेकिन क्या कहा था तुमने ?
तुम ईमानदार हो | तुम्हारा मतलब तुम्हारा नजरिया |
कौनसा नजरिया ?
तुम दलेर हो |
किसके खिलाफ ?
तुम दानिशमंद हो |
किसके लिए ?
तुम्हें खुद के फायदे से मतलब नहीं |
तो किसके फायदे से मतलब है ?
तुम अच्छे दोस्त हो |
क्या तुम अच्छे लोगों के भी दोस्त हो ?
तो सुनो : हम जानते हैं |
तुम हमारे दुश्मन हो | इस वजह से
हम तुझे दीवार के साथ खड़ा करेंगे |
लेकिन तुम्हारी खूबियों और गुणों के लिहाज से
हम तुझे बढ़िया  दीवार के साथ खड़ा करेंगे
और बढ़िया  बन्दूक की बढ़िया  गोली से
उड़ा देंगे
और बढ़िया बेलचे के साथ बढ़िया जमीन में
दफ़ना देंगे |

translated from Brotolt Brecht’s “The Interrogation of the Good”

कार्ल मार्क्स

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कार्ल मार्क्स (1818-1883) मार्क्सवाद और प्रबल राजनीतिक विज्ञान के संस्थापक , जिसके विचारों ने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के इतिहास को नये आयाम दिए.

५ मई १८१८ को पश्चिम जर्मनी के ट्रायर में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ. उसके पिता एक कामयाब वकील थे, जिन्हें प्रशिया के कानूनानुसार अपने व्यवसाय को चलाने के लिए यहूदी से ईसाई धर्म अपनाना पड़ा.

सत्रह वर्ष की आयु में कानून की विद्या हासिल करने के लिए मार्क्स बोन विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए. वहाँ उनकी गिनती तेज-तरार विद्यार्थियों में नहीं होती थी. फिक्रमंद पिता ने उनका स्थानांतरण कठोर अनुशासन के लिए विख्यात बर्लिन के विश्वविद्यालय में करवा दिया. अपने अध्ययन के दौरान नौजवान मार्क्स रेडिकल विचारों और दर्शन की ओर झुकते गये. एक बार तो वे ‘यंग हेगल्स’ नामक विद्यार्थियों के एक समूह से जुड़ गये जो हेगल के विचारों को अस्वीकार कर चुके थे.

१९ जून १८४३ को उनका विवाह प्रशिया के नवाब की सुशिक्षित सपुत्री जेनी वोन वेस्टफालें से संपन्न हुआ. शादी के तुरंत बाद सरकार की सेंसरशिप, जिसका रवैया वामपंथी आन्दोलनकारियों के प्रति दिन-प्रतिदिन कठोर से कठोरतम होता जा रहा था, ने उन्हें देश छोड़कर पेरिस जाने के लिए मजबूर कर दिया.

१८४० का पेरिस उस ज़माने के क्रांतिकारियों की सबसे प्रिय कर्मस्थली थी. यहाँ मार्क्स की मुलाकात बहुत से क्रांतिकारियों से हुई जिनमे फ्रेडरिक एंगेल्स आगे चलकर उनके जीवनभर के वैचारिक मित्र बन गये.

१८४४ में एंगेल्स बहुत ही प्रभावशाली पुस्तक ‘Conditions of the WorkingClass in England ‘ लिख चुके थे. इस पुस्तक ने मार्क्स के सर्वहारा वर्ग द्वारा संपन्न किये जानेवाली क्रांति  के विचार को विकसित करने में  मदद की. इसी पुस्तक से प्रेरणा पाकर मार्क्स ने Economic and Philosophic Manuscripts नामक अपनी पहली  पुस्तक की रचना की. पूंजीवाद के अधीन श्रम के अलगाव से मुक्ति के लिए साम्यवाद की जीत की अवश्यम्भाविता के पक्ष में तर्क के कारण इस पुस्तक का एक नैतिक और दार्शनिक महत्व रहा है.

दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है.

मार्क्स की दिलचस्पी इतिहास के विकास और परिवर्तन में भी थी, जो समाज में नैसर्गिक रूप से चलता रहता है. अपने इस विचार को उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी समझ बताया. मार्क्स का विश्वास दिन-प्रतिदिन इस सच्चाई की ओर दृढ होता गया कि सर्वहारा वर्ग की क्रांति न केवल वांछनीय है बल्कि ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण अवश्यंभावी है.

इसी समय मार्क्स और एंगेल्स ने अपना सबसे प्रसिद्ध पंफलेट ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ लिखा.

“कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. वे खुलेंआम एलान करते हैं कि उनके लक्ष्य पूरी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बलपूर्वक उलटने से ही सिद्ध किये जा सकते हैं. कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग को कांपने दो. सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.

दुनिया के मजदूरों, एक हो ! ”

मार्क्स की ज्यादातर रचनाओं के विपरीत मार्क्स की यह कृति संक्षिप्त और प्रासंगिक होने के साथ-साथ अग्निमय और प्रेरणादायक भाषा के प्रयोग द्वारा क्रांति की इच्छा पैदा करने की क्षमता रखती है.

“अभी तक आर्विभूत समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है.” – कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, प्रथम अध्याय.

क्रांतियों, जिन्होंने १८४८ में समस्त यूरोप को अपनी आगोश में ले लिया था, ने मार्क्स को फ़्रांसिसी और बेल्जियन अधिकारिओं की नज़रों में संदिग्ध बना दिया . उन्हें लंदन में शरण लेनी पड़ी और उनका शेष रचनात्मक जीवन वहीँ बीता.

कम्युनिस्ट लहर की इस तरुणावस्था में मार्क्स इसके साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़ते गये. प्रथम कम्युनिस्ट इंटरनेशनल  में अराजकतावादी बकुनिन के विरुद्ध उन्होंने प्रबल और प्रभावशाली तर्क रखे.

एक और प्रबल घटना १८७१ का पेरिस कम्यून की स्थापना थी जिसे सर्वहारा वर्ग दो महीने के संघर्ष के बाद हार गया. मार्क्स ने इसका पुरजोर मूल्यांकन किया और इसे भविष्य की कम्युनिस्ट क्रांतियों के अग्रदूत की उपाधि प्रदान की.

मार्क्स अपना अधिक से अधिक समय  ब्रिटिश लायब्रेरी में राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए बिताते थे. इसी के परिणामस्वरूप उनकी मास्टरपीस रचना ‘पूँजी’ (दास कैपिटल) का जन्म हुआ. यह पुस्तक पूंजीवादी समाज और अर्थशास्त्र की गतिकी के नियमों का सघन और विस्तृत संकलन हैं.

“पहली दृष्टि में पण्य बहुत मामूली सी और आसानी से समझ में आनेवाली चीज मालूम होता है. किन्तु उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वास्तव में वह एक बहुत अजीब चीज है, जो आधिभौतिक सूक्ष्मताओं और धर्मशास्त्रीय बारीकियों से ओतप्रोत है. जहाँ तक वह उपयोग मूल्य है, वहां तक, चाहे हम उसपर इस दृष्टिकोण से विचार करें कि वह अपने गुणों से मानव आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है” – पूंजी, अध्याय १, प्रथम खंड

अपने निरन्तर विकसित होते हुए मार्क्सवादी दृष्टिकोण अनुसार मार्क्स ने जीवन के हर पहलू पर लिखा.  अक्सर पूंजीपतियों के तलुयाचाट बुद्धिजीवी मार्क्स के “धर्म लोगों के लिए अफीम है” को सन्दर्भ से तोड़कर एक फिकरे के रूप में प्रयोग करते रहे हैं. वर्गीय समाज के अस्तित्व में आने की ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ के अनुसार उत्पादन की प्रक्रिया ने समाज के एक छोर पर मुट्ठीभर अमीर जबकि दूसरे छोरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया. आत्मिक उत्पादन में एक तरफ दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, साहित्य,गीत और संगीत पैदा हुआ तो दूसरी और धर्म. दिखने में धर्म गरीबों को मुफ्त का तोहफा लगता रहा हो लेकिन शोषक वर्ग के सच्चे सेवादार के रूप में इसने गरीब जनता को पैरों के नीचे रौंधने का ही काम किया.

” धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन  परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है.”
— (Contribution to the Critique of Hegel\’s Philosophy of Right)

अपने समय के सर्वाधिक घृणा पाने वाले व्यक्ति कार्ल मार्क्स, जिन पर सबसे अधिक कीचड उछाला गया, के रोशन दिमाग ने १८८३ को हमेशा के लिए काम करना बंद कर दिया. निरंकुश और गणतंत्रीय, दोनों प्रकार की सरकारों ने उन्हें अपने राज्य से खदेड़ा. बुर्जुआजी, चाहे वह अनुदार रही हो चाहे अति जनवादी, मार्क्स के प्रति लान्छनात्मक शब्दों का प्रयोग करने  में आपस में होड़ करती हुई नजर आई. वे इसे इस प्रकार हटा देते थे जैसे यह कोई मकड़ी का जाला हो. पूर्ण लापरवाही के साथ, जब बहुत जरूरी आवश्यकता उन्हें विवश करती, वे तभी जवाब देते. उनकी मृत्यु उनके चहेते करोड़ों क्रांतिकारी मेहनतकश साथियों के लिए एक आघात थी. साईबेरिया से कैलिफोर्निया, यूरोप और अमेरिका के सभी भागों और जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं “मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि  बेशक उनके बहुत से विरोधी रहे हों, लेकिन उनका कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं था.”

related post : मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय

अच्छे कारण के लिए खदेड़ा गया-बर्टोल्ट ब्रेष्ट

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खाते पीते घर के बच्चों की तरह

मेरा लालन पालन हुआ

मेरे माँ-बाप ने मेरे गले में

एक कालर बाँधा और

खूब टहल-खिदमत करते हुए

मुझे पाला-पोसा और बड़ा किया

उन्होंने मुझे ऐसी शिक्षा दी ताकि

मैं दूसरों के ऊपर हुकम वा रौब

गालिब कर सकूं

लेकिन मैं जब सयाना हुआ

और अपना अड़ोस-पड़ोस देखा तो

अपने खेमे के लोग मुझे कतई

नहीं भाये

न मुझे हुक्म देना भाता

न अपनी खिदमत

सो अपने खेमे के लोगों से नाता तोड़कर

मैं तुच्छ श्रेणी के लोगों के बीच जा बैठा|

इस प्रकार

उन्होंने एक विश्वासघाती को पाला-पोसा

अपनी सभी चालें उसे सिखाई और

उसने वे सारे भेद दुश्मन को जाकर खोल दिए|

हाँ, मैं उनके भेद खोलकर रख देता हूँ

मैं लोगों के बीच जाकर उनकी

ठगी का पर्दाफाश कर देता हूँ

मैं पहले ही बता आता हूँ

कि आगे क्या होगा, क्योंकि मैं

उनकी योजनाओं की अंदरूनी जानकारी रखता हूँ|

उनके भ्रष्ट पंडितों की संस्कृत

मैं बदल डालता हूँ शब्द-ब-शब्द

आम बोलचाल मैं और वह

दिखने लगती है साफ़-साफ़ गप्प गीता|

इन्साफ के तराजुओं पर

वे कैसे डंडी मारते हैं

यह पोल भी मैं खोल देता हूँ|

और उनके मुखबिर बता आते हैं उन्हें

कि मैं ऐसे मौकों पर बेदखल लोगों के बीच

बैठता हूँ, जब वे बगावत

की योजना बना रहे होते हैं|

उन्होंने मेरे लिए चेतावनी भेजी

और मैंने जो कुछ भी जोड़ा था अपनी मेहनत से

वह छीन लिया

इस पर भी जब मैं बाज न आया

वे मुझे पकड़ने के लिए आये

हालांकि उन्हें मेरे घर पर कुछ भी नहीं मिला

सिवाए उन पर्चों के

जिनमें जनता के खिलाफ

उनकी काली करतूतों का खुलासा था

सो, चटपट उन्होंने मेरे खिलाफ

एक वारंट जारी किया

जिसमें आरोप था कि मैं तुच्छ विचारों का हूँ

यानी तुच्छ लोगों के तुच्छ विचार|

मैं जहां कहीं जाता

धनकुबेरों की आँख का कांटा सिद्ध होता,

लेकिन जो खाली हाथ होते

वे मेरे खिलाफ जारी वारंट पढ़कर

मुझे यह कहते हुए

छुपने की जगह देते कि

” तुम्हें एक अच्छे कारण

के लिए खदेड़ा गया है|”

भगत सिंह, कम्युनिस्ट और गाँधी होने का मतलब

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पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों द्वारा जानबूझकर परंतु कुछ पढ़े-लिखे लोगों द्वारा अनजाने में भावुकतावश यह प्रचारित किया जाता है कि गाँधी और भगत सिंह, दोनों आज़ादी के दीवाने थे. उनका मकसद इस देश को अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति दिलाने तक सीमित था. लेकिन बात एकदम इसके उल्ट है. दोनों में कोई भी भावुक नहीं था. इसमें कोई शक नहीं है कि कांग्रेस की अगुआई में जारी स्वतंत्रता आन्दोलन अन्य आंदोलनों पर वर्चस्व बनाये हुए था. कांग्रेस में गाँधी का तानाशाही प्रभाव भी सर्वविदित है. ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की गहराती अंतरराष्ट्रीय स्थिति से लाभ उठाकर गाँधी और कांग्रेस का मकसद महज  उभरती भारतीय बुर्जुआजी की सेवा करना था. भगत सिंह कांग्रेस की इस स्थिति से भली-भांति परिचित हो गए थे. यही कारण था कि वे केवल २३ वर्ष की अल्पायु भोगने के बावजूद कांग्रेस और गाँधी की विचारधारा के विरोध में  अपने विचारों को इस कद्र विकसित कर पाए. इसी टकराव और द्वंद में भगतसिंह के विचारों की परिपक्वता निहित है. इतना ही नहीं देश में जारी कमजोर समाजवादी विचारधारा के और उनके मतभेद भी सिद्ध होते हैं. १९२० में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन मास्को में हो चुका था. क्या भगतसिंह अपने समय की मुख्यधारा की समाजवादी राजनीती से जुड़ पाए ? अगर ऐसा था तो क्यों उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से खुद को दूर रखा ? क्या कारण था कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपने समय के इन ओजस्वी क्रांतिकारियों को प्रभावित करने में असफल रही? क्या कारण था कि उस समय के बहादुर युवकों ने आंतकवादी और आत्मघाती रास्ते को चुना? अगर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लोग परिपक्व थे तो वे इन युवकों को क्यों नहीं संभाल पाए? क्यों वे इस पार्टी द्वारा जारी अपीलों को ठुकराते रहे ?

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म मास्को से  उधार और आयातित समाजवाद से था. भारत की वस्तुगत स्थिति के आकलन और फिर क्रांति संबंधी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने के कार्यभार को इन्होने लंबे समय तक  हाथ में ही नहीं लिया. जहाँ तक की दूसरे विश्व-युद्घ के शुरू होने पर भी यह पार्टी इस योग्य नहीं थी कि स्तालिन की हिटलर और फासिज्म के विरुद्ध  अंग्रेजों की मदद के आदेश को तत्त्व-रूप से  समझ सके और स्वतन्त्र रूप से इस स्थिति का भारतीय मेहनतकश अवाम के लिए फायदा उठा सके.  बड़े लीडरों को छोड़ दें तो आज भी इन पार्टियों के आम काडर का मार्क्सवाद में हाथ तंग ही है. किसी भी प्रकार का वैचारिक संघर्ष इन्हें आतंकित ही करता रहा है. बल्कि इन्होने अवसरवादी ढंग से मार्क्सवाद को संशोधित करने के रास्ते पर पलायन करना उचित समझा. यह ज़रूरी था कि इस संशोधनवाद के दूसरे सिरे पर दुस्साहसवाद [देखें : नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक] होता !

भगतसिंह अंग्रेजी साम्राज्यवाद और स्थानीय बुर्जुआजी द्वारा भारतीय मजदूर और किसान के शोषण से भली-भांति परिचित हो गए थे. नवयुवकों के नाम पत्र जारी करते हुए और क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा तैयार करते हुए उन्होंने लिखा :

“अगर आप मजदूरों और किसानों को आन्दोलन में सक्रीय रूप से खींचने की योजना बनाने जा रहे हो, तो मैं आपसे कहना चाहूँगा कि उन्हें भावुक शब्दाडंबर से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता. वे आपसे पूछेंगे कि तुम्हारी इस क्रांति जिसमें तुम उन्हें कुर्बानी का आह्वान करने जा रहे हो, उन्हें इससे क्या हासिल होगा. लोगों को इससे क्या फर्क पड़ता है कि लोर्ड रीडिंग के स्थान पर सर पुरषोतम दास ठाकुर सरकार का प्रतिनिधि हो? किसानो से इससे क्या फर्क पड़ेगा कि लोर्ड इरविंग के स्थान पर सर तेज बहादुर सपरू आ जाएँ ? राष्ट्रीय भावनायों की अपील उपहास है. आप इसका प्रयोग अपने काम के लिए नहीं कर सकते.”

जब स्तालिन अपने शिष्यों को गाँधी का अनुसरण करने की सिफारिशें कर रहे थे, भगत सिंह गाँधी के झूठे प्रवचनों का पर्दाफाश कर रहे थे :

भगतसिंह गाँधी (तस्वीर) के झूठ्ठे  प्रवचनों का अख़बारों और पर्चों में पर्दाफाश किया करते थे
भगतसिंह गाँधी (तस्वीर) के झूठे प्रवचनों का अख़बारों और पर्चों में पर्दाफाश किया करते थे

“वह (गाँधी) शुरू से ही जानता था कि उसकी लहर का अंत किसी समझौते में हो जायेगा. इस प्रकार की प्रतिबद्धता से हम नफरत करते हैं.”

उन्होंने आगे कांग्रेस के बारे में अपने शंके जाहिर करते हुए लिखा  :

“कांग्रेस का उद्देश्य क्या है? कि वर्तमान लहर किसी समझौते में बदल जाये या पूरी तरह से असफल रहे. मैंने इसे इसलिए कहा है कि वास्तविक क्रांतिकारी शक्तियों को लहर में शामिल होने का आह्वान नहीं किया गया है. इस लहर का संचालन मध्यम वर्ग के दूकानदारों और कुछ पूंजीपतियों के आधार पर किया जा रहा है. ये दोनों वर्ग, और विशेषकर पूंजीपति अपनी जायदाद को दांव पर लगाने का खतरा नहीं सहेड़ सकते. क्रांति की वास्तविक सेनाएं – किसान और मजदूर गांवों और फेक्टरियों में है. लेकिन अपने बुर्जुआ नेता उन्हें शामिल करने का साहस नहीं कर सकते. ये सोये हुए शेर, अगर जाग गए तो वे हमारे लीडरों के मिशन के पूरा होने के बाद भी नहीं रुकेंगे.”

भगत सिंह के इन शब्दों की पुष्टि उस वक्त हो गयी जब बंबई के बुनकरों की कार्रवाई के बाद गाँधी ने  क्रांतिकारी शक्तियों पर अपनी चिंता जाहिर की :

राजनितिक उद्देश्यों के लिए सर्वहारा का प्रयोग खतरनाक हो सकता है.”

हमारे सविधान की प्रस्तावना में जिस समाजवाद का जिक्र किया है, इसके निर्माण के लिए सर्वदलीए कांफ्रेंस बुलाई गयी, जिसमें नेहरू समिति बनाई गयी. जवाहर नेहरू के बारे में वे लिखते हैं :

“समझ नहीं आता कि पंडित जवाहर लाल आदि जोकि समाजवादी विचारों के समर्थक हैं, क्यों इस समिति में शामिल होकर अपना आदर्श बदल सके? क्या वह इन्क़लाब नहीं चाहते? वैसे ही इन्क़लाब – इन्क़लाब चिल्लाते रहते हैं? क्या उन्हे आशा है कि यह सरकार स्वयं ही, जो माँगें प्रस्तुत क़ी गयी हैं उन्हे स्वीकार कर लेगी? (ऐसा सोचना ) जान – बूझकर आँखें मूंदना है..

कांग्रेस, नेहरू और गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत पर वे आगे लिखते हैं :

“नेहरू साहब केवल सरकार को भयभीत करने के लिए ही पूर्ण स्वतंत्रता का शोर मचाते रहते हैं और चाहते अधीन राज ही हैं? असल में यह आशा कि अभी कुछ मिलेगा, अभी कुछ मिलेगा, बहुत बर्बाद करती है | दास , बरकेन हैड क़ी चापलूसी में कितना गिर गया था, यह उसके फ़रीदपुर के संबोधन से ही पता चल सकता है| आज सभी नेता उस राह पर चल पड़े है|
स्वतंत्रता कभी दान में प्राप्त नहीं होगी| लेने से मिलेगी| शक्ति से हासिल क़ी जाती है| जब ताक़त थी तब लॉर्ड रीडिंग गोल मेज कांफ्रेंस के लिए महात्मा गाँधी के पीछे – पीछे फिरता था और अब जब आंदोलन दब गया, तो दास और नेहरू बार बार ज़ोर लगा रहे हैं और किसी ने गोलमेज तो दूर  , ” स्टूल कान्फ्रेंस ” भी न मानी| इसलिए अपना और देश का  समय बर्बाद करने से अच्छा है कि मैदान में आकर देश को स्वतन्त्रता – संघर्ष के लिए तैयार करना चाहिए|  नहीं तो मुँह धोकर सभी तैयार रहें कि आ रहा है –स्वराज्य का पार्सल!”

गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत को वे मजदूरों और किसानों के जुझारू वर्गीय चरित्र को कुंठित करने का फंदा मानते थे ताकि भारतीय पूंजीपतियों के संपत्ति रखने के अधिकार की रक्षा हो सके :

“यह गाँधी के अहिंसा और समझौतावादी सिद्धांत से ही हुआ है कि राष्ट्रीय आन्दोलन की इस लहर में दरार पैदा हो गयी है.”

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन के घोषणा पत्र में वे गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत की निरर्थकता को सिद्ध करते हैं क्योंकि वे समझते थे कि मौजूदा राज्य सत्ता का अस्तित्व ही हिंसा के सहारे टिका हुआ है. वे लिखते हैं;

“आज यह फैशन-सा हो गया है कि अहिंसा के बारे में अंधाधुंध और निरर्थक बात की जाये. महात्मा गाँधी महान हैं और हम उनके सम्मान पर कोई भी आंच नहीं ला देना चाहते लेकिन हम दृढ़ता से कहते हैं कि हम उनके देश को स्वतन्त्र कराने के ढंग को पूर्णतया नामंजूर  करते हैं. यदि देश में चलाये जा रहे उनके असहयोग आन्दोलन द्वारा लोक-जाग्रति में उनकी भागीदारी के लिए उन्हें सलाम न करें तो यह हमारे लिए नाशुक्रापन होगा. परंतु हमारे लिए महात्मा असंभावनाओं का दार्शनिक है. अहिंसा भले ही एक नेक आदर्श है लेकिन यह अतीत की चीज है. जिस स्थिति में आज हम हैं, सिर्फ अहिंसा से  आजादी कभी भी प्राप्त नहीं की जा सकती. दुनिया सिरे तक हथियारों से लैस है और (ऐसी) दुनिया पर हम हावी हैं ! अमन की सारी बातें ईमानदार हो सकती हैं लेकिन हम जो गुलाम कौम हैं, हमें ऐसी झूठे सिद्धांतों से नहीं भटकना चाहिए. हम पूछते हैं कि जब दुनिया का वातावरण हिंसा और गरीब की लूट से भरा पड़ा है, तब देश को अहिंसा के रास्ते पर चलाने की क्या तुक है? हम अपने पूरे जोर के साथ कहते हैं कि कौम के नौजवान कच्ची नींद के इन सपनों के बहकावे में नहीं आ सकते.”

कांग्रेस का उद्देश्य भगतसिंह और उनके साथियों से जैसे-तैसे पिंड छुडाना था. कांग्रेस पार्टी का इतिहास लिखने वाले मन्मथनाथ गुप्त अपनी  पुस्तक ‘क्रांति-युग के संस्मरण’ में लिखते हैं :

“जिस समय भगत सिंह तथा उसके साथी फांसीघर में बंद थे उस समय उनकी सज़ा के संबंध में गाँधीजी और वाइसराय के बीच औपचारिक बातें हुई, क्योंकि उन्हें जो फाँसी दी जाने वाली थी उससे देश में बड़ी हलचल मच रही थी| स्वयं कॉंग्रेस वाले भी इस बात के लिए बहुत उत्सुक थे कि इस समय जो सद्‍भाव चारों ओर दिखाई पड़ रहा है, उसका लाभ उठा कर उनकी फाँसी की सज़ा बदलवा दी जाय | किंतु वायसराय ने इस संबंध मे स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहा| हमेशा एक मर्यादा रखकर उन्होंने इस सबंध में बातें की| उन्होंने गाँधी जी से केवल यही कहा कि मैं पंजाब सरकार को इस संबंध में लिखूंगा| इसके अतिरिक्त और कोई वादा उन्होंने नहीं किया| यह ठीक है कि स्वयं उन्हीं को सज़ा रद्द करने का अधिकार था किंतु यह अधिकार राजनैतिक कारणों के लिए उपयोग में लाने योग्य नहीं था| दूसरीओर राजनैतिक कारण ही पंजाब सरकार को इस बात के मानने में बाधक हो रहे थे.”

” कांग्रेस का इतिहास”–पट्टाभिसीतारमैया के हवाले से वे आगे लिखते हैं;

“दरअसल वे बाधक थे भी| चाहे जो हो लार्ड इर्विन इस बारे में कुछ करने में असमर्थ थे| अलबत्ता कराची कॉंग्रेस अधिवेशन हो लेने तक फाँसी रुकवा देने का उन्होंने जिम्मा लिया| मार्च के अंतिम साप्ताह में कराची में कॉंग्रेस अधिवेशन होने वाला था किंतु स्वयं गाँधीजी ने ही निश्चित रूप से वाइसराय से कहा –यदि इन नौजवानो को फाँसी पर लटकाना ही तो कॉंग्रेस अधिवेशन के बाद ऐसा किया जाय, उसके बजाय पहले ही ऐसा करना ठीक होगा| इससे देश को साफ-साफ यह पता चल जाएगा कि वस्तुत: उसकी स्थिति क्या है और लोगों के दिलों में झूठी आशाएं न बँधेगी| कांग्रेस में गाँधी-इर्विन समझौता अपने गुणों के कारण ही पास या रद्द होगा, यह जानते बूझते हुए कि तीन नवजवानों को फाँसी दे दी गयी है| ”

जेल में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और मार्क्सवादी साहित्य के अध्ययन  द्वारा वे वर्ग-संघर्ष की पहचान को और अधिक स्पष्ट रूप से पहचानने में सफल हुए. फाँसी लगने से तीन दिन पूर्व, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव द्वारा फाँसी के बजाय गोली से उड़ाए जाने की मांग करते हुए पंजाब के गवर्नर को लिखे गए पत्र से इसकी पुष्टि होती है :

“यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक कि शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना अधिकार जमाये रखेंगे| चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति , अंग्रेज शासक या सर्वथा भारतीय  ही हों| यदि कुछ भारतीय पूंजीपतियों  द्वारा  ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी इस स्थिति में कोई अन्तर  नहीं पड़ता|”

भगत सिंह व्यक्तिगत हिंसा में विश्वास नहीं रखते थे लेकिन वर्गीय हिंसा को वे अच्छी तरह से पहचानते थे. क्रांतिकारी वर्गों द्वारा प्रतिक्रयावादी वर्गों के खिलाफ हिंसा को वे जायज मानते थे. बेशक भगतसिंह आज की ज़रूरतों के अनुसार सिद्धान्तिक अगुआई नहीं दे सकते लेकिन क्रांतिकारियों के लिए भगत सिंह जैसी स्पिरिट का होना आवश्यक है. भगत सिंह ने अपना अंतिम समय जेल में बिताया. यही वह समय था जब वे मार्क्सवाद को थोडा ही सही लेकिन समझ और आत्मसात कर पाए. जेल से स्मगल किये गए साहित्य का आज भी महत्त्व है. यहीं पर वे व्यक्तिगत हिंसा और वर्गीय हिंसा में फर्क सीखने में कामयाब हुए. पंजाबी के क्रांतिकारी कवि ‘पाश’ के अनुसार  क्रांतिकारियों को यहीं से अपना सफ़र शुरू करना चाहिए;

”भगत सिंह ने पहली बार
पंजाब को
जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से
बुद्धिवाद की ओर मोड़ा था
जिस दिन फांसी दी गयी
उसकी कोठरी में लेनिन की किताब मिली
जिसका एक पन्ना मोड़ा गया था
पंजाब की जवानी को
उसके आखिरी दिन से
इस मुड़े पन्ने से बढ़ना है आगे, चलना है आगे”

सन्दर्भ साभार :  शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज : पीडीऍफ़

कला-साहित्य-संस्कृति में “लोकवाद” और “स्वदेशीवाद” का विरोध करो!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

प्रतिक्रिया के इस विश्व-ऐतिहासिक दौर में विश्व-पूँजी की संयुक्त शक्ति ने जनता के जीवन पर जो सर्वतोमुखी हमला बोला है, राजनीति की तरह सांस्कृतिक मोर्चे पर भी उसका प्रतिरोध भविष्य के बजाय अतीत की ज़मीन पर खड़े होकर करने की एक पराजयवादी-पुनरुत्थानवादी और लोकरंजकतावादी प्रवृत्ति मौजूद है। इस प्रवृत्ति के प्रभाव-उच्छेदन के बिना, एक वैज्ञानिक इतिहास-दृष्टि के आधार पर, जनता के सांस्कृतिक आन्दोलन का पुनर्निर्माण नहीं किया जा सकता। विस्तार से बचते हुए, हम अपनी बात यहाँ कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहेंगे।

पहले “लोकवाद” के कुछ उदाहरण लें। आज भारत जैसे देशों में जो रुग्ण-निरंकुश किस्म का पूँजीवादीकरण हो रहा है, वह पूँजीवादी रूपान्तरण के क्लासिकी ऐतिहासिक उदाहरणों से सर्वथा भिन्न है। यहाँ कुछ भी सकारात्मक नहीं है। सामन्ती पार्थक्य की जगह पूँजीवादी अलगाव, सामन्ती निरंकुश स्वेच्छाचारी तंत्र की जगह पूँजीवादी सर्वसत्तावाद। एक पुरातन आपदा की जगह एक नूतन विपदा जिसने पुरातन के कई सांस्कृतिक मूल्यों को ज्यों का त्यों अपना लिया है। हमारे कला-साहित्य में अकसर उन चीज़ों के लिए शोकगीत या रुदन के स्वर सुनाई पड़ते हैं, जिन्हें इतिहास की अनिवार्य गति से नष्ट होना ही था। जैसे कविगण कभी-कभी तो उत्पादन और दैनिन्दन इस्तेमाल की उन पुरानी चीज़ों को भी बहुत आह भरते हुए याद करते हैं जो अन्य चीज़ों द्वारा विस्थापित कर दी गई और जिन्हें स्वाभाविक गति से, अतीत की वस्तु बन ही जाना था क्योंकि यही इतिहास का शाश्वत नियम है। लोटा, दातुन और कठही हल के लिए रोने की ज़रूरत नहीं। कठही हल की जगह ट्रैक्टर को आना ही था। मशीनों को हर हाल में मानवविरोधी चित्रित करना भी एक ग़ैर सर्वहारा, बुर्जुआ पर्यावरणवादी नज़रिया है। मशीनें मानवीय कौशल और चिन्तन की महान उपज हैं, दोष मशीनों का नहीं बल्कि उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व की व्यवस्था का है जिनके चलते मशीनें मुनाफे की अन्धी हवस का उपकरण बनकर मनुष्य और प्रकृति को निचोड़कर तबाह कर डालती हैं।

इसी तरह की अतीतगामी दृष्टि वाले रचनाकार अकसर पूँजीवादी अलगाव के मानवद्रोही चरित्र को उजागर करते हुए प्राकृतिक अर्थव्यवस्था वाले प्राक्-पूँजीवादी समाजों की उस रागात्मकता और उन काव्यात्मक सम्बन्धों को महिमामण्डित करने लगते हैं जिन्हें पूँजी की सत्ता ने आने-पाई के ठण्डे पानी में डुबो दिया। प्राक्पूँजीवादी, ग्रामीण समाजों की रागात्मकता का काल्पनिक आदर्शीकरण करने वाले प्राय: उसकी पृष्ठभूमि में मौजूद सामन्ती निरंकुशता तथा स्त्रियों और दलितों के बर्बर दमन की अनजाने ही अनदेखी करने की कोशिश करते हैं और श्रम की संस्कृति के वर्चस्व वाले नये, भावी समाज को नहीं बल्कि अनिवार्यत: नष्ट होने वाले अतीत को अपना प्रेरणा-स्रोत बनाने लगते हैं। इसे किसानी “समाजवादी” यूटोपिया का एक रूप भी कहा जा सकता है।

“लोकवाद” का एक और कूपमण्डूकतापूर्ण संस्करण यह भी है कि कई प्रगतिशील कवि-लेखक गण नागर जीवन की हृदयहीनता, नग्न बुर्जुआ लूट-खसोट, आपाधापी और अलगाव की आलोचना करते हुए आहें भरते हुए गाँवों को याद करते हैं, और वर्ग-निरपेक्ष रूप में शहर की हृदयहीनता और गाँवों के “सामूहिक जीवन” की तुलना करते प्रतीत होते हैं। यह `अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है´ का नया संस्करण है। यह सही है कि पूँजीवादी समाज में गाँव और शहर का अन्तर लगातार बढ़ता जाता है और शहर की समृद्धि गाँवों को लूटकर ही फलती-फूलती है। पर इस तथ्य को वर्ग-निरपेक्ष रूप में नहीं देखा जा सकता। शहरों में भी बहुंसख्यक आबादी निचोड़े जाने वाले सर्वहारा और अर्द्धसर्वहारा की और परेशानहाल निम्न-मध्यवर्ग की ही है। एक छोटी सी आबादी है जो गाँवों को लूटती है और शहर के उजरती गुलामों को भी। जो शहर की भारी मज़दूर और निम्न-मध्यवर्गीय नौकरीपेशा आबादी है वह गाँवों से ही पूँजी की मार से दर-बदर होकर शहर आई है और यह दुरवस्था फिर भी इतिहास की दृष्टि से प्रगतिशील कदम है। जो आबादी गँवई सुस्ती और कूपमण्डूकता के दलदल से बाहर पूँजीवादी जीवन की बर्बर हृदयहीन अफरातफरी के बीचोबीच धकेल दी गई है, वही पूँजी की सत्ता के लिए कब्र खोदने का काम करेगी। ग्रामीण जीवन की शान्ति के लिए बिसूरने वाले सफेदपोश प्रगतिशील प्राय: ग्रामीण कुलीनों (प्राय: सवर्णों) की ही अगली पीढ़ियाँ हैं। यदि वे ग़रीब किसान, खेत मज़दूर या दलित के बेटे होते या स्त्री होते तो उजरती गुलामी का शहरी नर्क भोगते हुए ग्रामीण निरंकुशता, सुस्ती और कूपमण्डूकता के अँधेरे में वापस नहीं जाना चाहते। जाएँगे तो वे भी नहीं जो गाँवों को खूब याद करते हैं। दरअसल यह अपराध-बोध की कुछ वैसी ही रिसती हुई गाँठ है, जैसी गाँठ के चलते, अनिवासी धनिक भारतीय पाश्चात्य समृद्धि की पत्तल चाटते हुए भारत और भारतीय संस्कृति को खूब याद करते हैं और इस नाम पर यहाँ की सबसे प्रतिक्रियावादी शक्तियों और सबसे प्रतिक्रियावादी मूल्यों के पक्ष में जा खड़े होते हैं। प्रगतिशीलता का ठप्पा बरकरार रखने और “नागर-बोध ग्रस्त” होने के आरोप से बचने के लिए बहुतेरे रचनाकार दशकों पुरानी स्मृतियों और चन्द एक दिनों के दौरों और अख़बारी तथ्यों के आधार पर आज के ग्रामीण जीवन के यथार्थ का कलात्मक पुनर्सृजन करने की कोशिश करते हैं जो वास्तविकता से कोसों दूर होता है। ऐसा वे इसलिए भी करते हैं कि स्मृतियों के सहारे गाँव पर लिखना आसान है, पर उन्हीं के शहरों में उजरती गुलामी का जो रौरव नर्क एक समान्तर दुनिया के रूप में मौजूद है, वहाँ के जीवन के रूबरू होने लायक मज़बूती उनके दिल-गुर्दे में कतई नहीं है।

“लोकवाद” के अन्य कई रूप हैं। जैसे कि संगीत की दुनिया को लें। क्रान्तिकारी संगीत की दुनिया में लोक संगीत से काफी कुछ हूबहू उधार ले लेने – लोकगीतों की पैरोडी करने तक की प्रवृत्ति मौजूद है। लोक गीत-संगीत की परम्परा हमारी अपनी परम्परा है और उससे काफी-कुछ लेना होगा, लेकिन हूबहू नहीं, बल्कि आलोचनात्मक विवेक के साथ छाँट-बीनकर। लोकसंगीत क्रान्तिकारी गण संगीत का समानार्थक नहीं हो सकता। लोकसंगीत का आधार आदिम जनजातीय जीवन की सामूहिकता, प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के किसानी जीवन और दस्तकारी में मौजूद रहा है और कालान्तर में उसका स्थान इतिहास का संग्रहालय ही होगा। उसके कुछ संघटक तत्त्व नये सर्वहारा संगीत में, निरन्तरता के पहलू के रूप में मौजूद रहेंगे। लोकसंगीत सदियों के सांस्कृतिक संस्कारों-आदतों के चलते जनता में लोकप्रिय होता है, लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं कि नई क्रान्तिकारी अन्तर्वस्तु के लिए उसके रूप उपयुक्त होंगे।

नुक्कड़ नाटकों और रंगमंच पर भी लोकरंजकतावाद अनेक रूपों में मौजूद है। प्राय: देखने में यही आता है कि प्रगतिशील नाटककार और नाट्य-निर्देशक भी तर्कबुद्धि, विश्वदृष्टिकोण और आलोचनात्मक विवेक पर बल देने वाले `एपिक थिएटर´ या द्वन्द्वात्मक थिएटर की जगह भावना, अनुभूति और तदनुभूति पर बल देने वाले परम्परागत `ड्रामेटिक थिएटर´ की शैली और तकनीक को ही अपनाते हैं। नुक्कड़ नाटकों में कुछ हद तक पहली धारा की शैली को अपनाया गया है, लेकिन फिर भी दर्शकों को भावनात्मक आवेश से आप्लावित कर देने वाली शैली भी काफी चलन में है, जहाँ विचार पक्ष काफी कमज़ोर पड़ जाता है, जैसाकि प्राय: गुरुशरण सिंह के नाटकों में दिखाई पड़ता है।

“लोकवाद” का ही एक रूप “स्वदेशीवाद” भी है। राजनीति की तरह कला-साहित्य में भी आज यह प्रवृत्ति काफी मज़बूत है। आज आम जनता के जीवन और संस्कृति पर विश्व-पूँजी के चौतरफा हमले का प्रतिकार वामपन्थी धारा का भी एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रवाद की उस ज़मीन पर खड़ा होकर करने की कोशिश कर रहा है, जिस पर खड़े होकर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई लड़ी गई थी। यह अजीब-सी बात है कि कुछ पुराने गाधीवादी, सर्वोदयी, मध्यमार्गी सुधारवादी और एन.जी.ओ. वाले ही नहीं बल्कि क्रान्तिकारी वामपन्थी भी भूमण्डलीकरण के विरुद्ध “स्वदेशी” का झण्डा उठाए हुए हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और उनके सहयोगियों के विरुद्ध गांधीवाद द्वारा सुझाए गए स्वदेशी और स्वराज्य के राष्ट्रवादी नारों को आज का रणनीतिक नारा बनाना नये दौर की लड़ाई को पुराने दौर की लड़ाई के हथियारों से लड़ने की बचकानी कोशिश है। आज जनता की वास्तविक मुक्ति की लड़ाई “स्वदेशी” या किसी अन्य पूँजीवादी राष्ट्रवादी नारे के झण्डे तले लड़ी ही नहीं जा सकती। अपने बीच के तमाम अन्तरविरोधों के बावजूद, आज देश की बड़ी पूंजी और छोटी पूँजी – दोनों की नियति, हित और अस्तित्व साम्राज्यवाद के साथ जुड़ चुके हैं। अपने आपसी अन्तरविरोधों के बावजूद, देश के सभी छोटे-बड़े पूँजीपति साम्राज्यवादी पूँजी के निर्बाध प्रवाह के लिए राष्ट्रीय अर्थतंत्र को पूरी तरह खोल देने के पक्षधर हैं। उनके किसी भी हिस्से का चरित्र राष्ट्रीय या जनपक्षधर नहीं रह गया है। आज का मूल प्रश्न यह नहीं है कि विदेशी शासन और विदेशी पूँजी के वर्चस्व को नष्ट करके देशी उद्योग-धंधों को फलने-फूलने का अवसर दिया जाए। आज का मूल प्रश्न यह है कि पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली, सामाजिक ढाँचा और संस्कृति अब पूरी तरह मानवद्रोही हो चुकी है। इतिहास इन्हें नष्ट करके ही आगे डग भर सकता है। कह सकते हैं कि जो सर्वहारा वर्ग का ऐतिहासिक मिशन था, वह अब फौरी कार्यभार बन चुका है। आज का नया नारा यही हो सकता है – उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले सामाजिक वर्गों के पूर्ण नियंत्रण के लिए संघर्ष! ज़ाहिरा तौर पर, सांस्कृतिक वर्चस्व का संघर्ष भी इसी संघर्ष का अनिवार्य और आधारभूत सहवर्ती होगा। साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी जनमुक्ति क्रान्तियाँ आज इतिहास के एजेण्डे पर हैं। राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के दौर के शौर्यपूर्ण संघर्षों-कुर्बानियों से हम प्रेरणा ले सकते हैं और संघर्ष के रूपों से काफी कुछ सीख सकते हैं, पर उस दौर के रणनीतिक नारे आज के नारे नहीं हो सकते।

इतिहास में यह ग़लती पहले भी होती रही है कि मुक्तिकामी जनता के हरावल, नये संघर्षों को गौरवमण्डित करने के लिए, नई प्रेरणा लेने के लिए अतीत की क्रान्तियों का पुन:स्मरण करने के बजाय उन्हीं की भोंडी नकल करने लग जाते रहे हैं। चाहते थे वे अतीत की क्रान्तियों से क्रान्तिकारी स्पिरिट लेना और हुआ यह कि वे अतीत के शरणागत हो गए, अतीत के नारों से नई लड़ाई लड़ने की कोशिश करने लगे और क्रान्ति की आत्मा के पुनर्जागरण के बजाय उसकी प्रेतात्मा मँडराने लगी। यह स्वाभाविक है कि अतीत के महान संघर्षों से अभिभूत होकर, हम अनजाने ही उनकी नकल करने लग जाते हैं। महान क्रान्तियाँ भावी क्रान्तियों के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करने के बजाय सर्जनात्मक अन्वेषण को जकड़ने वाली बेड़ियों का काम करने लगती हैं और नये का अन्वेषण करने के बजाय हम अतीत से समस्याओं का समाधान माँगने लगते हैं। कार्ल मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी की उदीयमान सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम बसन्त-प्लावन के दौर में कहा था, “उन्नीसवीं शताब्दी की सामाजिक क्रान्ति अतीत से नहीं वरन् भविष्य से ही अपनी प्रेरणा प्राप्त कर सकती है।” सर्वहारा क्रान्ति के नये विश्व ऐतिहासिक चक्र की समारम्भ-बेला में यह महान युक्ति एक बार फिर, नये अर्थ-सन्दर्भो के साथ, प्रासंगिक हो उठी है। जब श्रम और पूँजी की शक्तियाँ आमने-सामने खड़ी हों तो क्रान्तिकारी कला-साहित्य का काम श्रम की संस्कृति को सर्जना का मार्गदर्शक बनाना और श्रम की दुनिया में क्रान्ति की अन्तश्चेतना का पुनर्सृजन करना है। अतीत के शरणागत होने, जिसे इतिहास की नैर्सैगिक गति से नष्ट होना है उसके लिए शोकगीत गाने तथा अतीत से नारे, आदर्श, प्रतिमान और प्रादर्श उधार लेने की प्रवृत्ति से मुक्त होना होगा। जनता के पास संस्कृति के नाम पर जो कुछ भी मौजूद है, उन सबको प्रगतिशील मानने का नज़रिया एक अवैज्ञानिक नज़रिया है। यही “लोकवाद” है जिससे हमें छुटकारा पाना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

दलित-प्रश्न पर सही रुख अपनाए बिना सांस्कृतिक मोर्चे पर सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन के कार्यभारों को पूरा कर पाना सम्भव नहीं होगा। दलित-मुक्ति के प्रश्न की उपेक्षा करके सर्वहारा क्रान्ति या जन-मुक्ति की परियोजना के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। सहशताब्दियों से सर्वाधिक व्यवस्थित और सर्वाधिक बर्बर शोषण-दमन के शिकार दलित देश की कुल आबादी में लगभग तीस प्रतिशत हैं और उनमें से 90 प्रतिशत ग्रामीण और शहरी सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा की कतारों में शामिल हैं। यह आबादी यदि सम्पूर्ण जनता की मुक्ति और स्वतंत्रता-समानता की वास्तविक स्थापना की परियोजना के रूप में सर्वहारा समाजवादी क्रान्ति को स्वीकार नहीं करेगी तो उसकी विजय असम्भव है। दूसरी ओर, समाजवादी क्रान्ति परियोजना से जुड़े बिना दलित-मुक्ति का प्रश्न भी असमाधानित ही बना रहेगा (क्योंकि पूँजीवादी दायरे के भीतर सुधार की सम्भावनाएँ अब समाप्तप्राय हैं) तथा समाजवादी क्रान्ति को लगातार चलाए बिना समाज को उस मुकाम तक पहुँचाया ही नहीं जा सकता जब जाति और धर्म के आधार पर किसी भी तरह का अन्तर बचा ही नहीं रह जाएगा।

इस प्रश्न की द्वन्द्वात्मक समझ की कमी के अभाव में अतीत में कम्युनिस्ट आन्दोलन और वाम जनवादी सांस्कृतिक आन्दोलन में वर्ग-अपचयनवाद (class-reductionism) का विचलन गम्भीर रूप में मौजूद था। आज इसी विचलन का दूसरा छोर वर्ग-विसर्जनवाद (class-liquidationism) या वर्ग-निषेधवाद के रूप में मौजूद है जब इस हद तक के फतवे दिए जा रहे हैं कि वर्ग-विश्लेषण की क्लासिकी मार्क्सवादी पद्धति से भारतीय जाति-व्यवस्था का विश्लेषण ही सम्भव नहीं है। दलित मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के “दलितवादी” चिन्तन के प्रति निहायत अनालोचनात्मक, आत्मसमर्पणकारी, समन्वयवादी रवैया अपनाया जा रहा है। यह एक घातक विसर्जनवादी, सुधारवादी प्रवृत्ति है जिसका आज खूब बोलबाला है। आज हिन्दी में जो दलित-लेखन हो रहा है, वह पक्षधर साहित्य है, प्रतिरोध का साहित्य है, रैडिकल आलोचनात्मक यथार्थवादी साहित्य है। लेकिन यह सच है कि यह सम्पूर्ण दलित आबादी के बजाय, मुख्यत: उस मध्यवर्गीय दलित का प्रातिनिधिक स्वर है, जिसका आर्थिक प्रश्न तो एक हद तक हल हो चुका है और अब सामाजिक अपमान व भेदभाव ही जिसके लिए केन्द्रीय प्रश्न है। इसीलिए समकालीन दलित लेखन का तेवर चाहे जितना तीखा हो, वह ठोस विकल्प के रूप में इसी व्यवस्था के भीतर कुछ सुधारों की माँग करता है, दलित-प्रश्न की समूल समाप्ति की कोई परियोजना नहीं प्रस्तुत करता तथा क्रान्ति के नाम से बिदकता है। यह अनायास नहीं कि जिन आन्दोलनों-संघर्षों में दलित आबादी की बहुतायत होती है या जो आन्दोलन गाँवों में दलित उत्पीड़न के ही किसी मुद्दे पर होते हैं उनसे यह दलित `भद्रलोक´ कोसों दूर रहता है। दलित साहित्य चूँकि अम्बेडकरवाद को ही अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त मानता है, अत: दलित अस्मिता की पहचान और उनके प्रतिरोध-आन्दोलन को संगठित करने में डा. अम्बेडकर की ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार करते हुए भी यह ज़रूरी है कि उनके विचारों की विस्तृत, तर्क और तथ्यपूर्ण विवेचना की जाए। प्रश्न यह है कि अम्बेडकर की दार्शनिक विश्वदृष्टि क्या थी? उनके मूलभूत राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचार क्या थे? दलित हितों के अर्जन और हिफाजित के अन्तरिम प्रावधानों और प्रतिरोध आन्दोलन के प्रोग्राम के साथ ही क्या डा. अम्बेडकर के पास दलित-प्रश्न के सम्पूर्ण और अन्तिम समाधान की कोई दूरगामी सांगोपांग परियोजना थी? ब्राह्मणवाद और जाति प्रश्न का `एक्सपोज़र´, विश्लेषण और भर्त्सना ज़रूरी है, लेकिन लगातार, लम्बे समय तक यहीं रुके रहना और इसे ही दलित आन्दोलन का पूरा प्रोग्राम बना देना कहाँ तक उचित है?

हम समझते हैं कि सामाजिक बदलाव एक वैज्ञानिक प्रश्न है और विज्ञान के प्रश्न निस्संकोच, बेलागलपेट बहस की माँग करते हैं। दलित-प्रश्न को लेकर मार्क्सवाद पर अधूरेपन का लेबल मात्र लगाने के बजाय इस पर मुद्देवार, विस्तृत बहस होनी चाहिए, अम्बेडकर के विचारों और दलित आन्दोलन के इतिहास पर भी बहस होनी चाहिए तथा दलित प्रश्न के वर्ग-विश्लेषण के साथ-साथ समकालीन दलित साहित्य को भी विश्लेषण के एजेण्डे पर लाया जाना चाहिए। तर्क-विचारहीन दलित-हित समर्थन का शोरगुल आज दलित प्रश्न पर सही कार्यदिशा अपनाने में गम्भीर विघ्न पैदा कर रहा है।

स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

समाजशास्त्रीय विमर्श की ही भाँति कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी आज बुर्जुआ नारीवाद के विविध नये-नये रूपों और किस्मों का खूब बोलबाला है। नववामपन्थी “मुक्त चिन्तक” स्त्री-प्रश्न पर क्लासिकी मार्क्सवाद के “अधूरेपन” और “यांत्रिकता” को स्वीकारते हुए बुर्जुआ नारीवादियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे हैं।

एक गहरे वैचारिक कुचक्र के तहत सर्वहारा क्रान्ति और पार्टी-सिद्धान्त को पुरुष स्वामित्ववाद और स्त्री-उत्पीड़न के तत्त्वों से युक्त बताया जा रहा है और स्त्री-आन्दोलन की स्वायत्तता की वकालत करते हुए आधी आबादी को जन-मुक्ति-संघर्ष की ऐतिहासिक परियोजना से काटकर अलग करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। बुर्जुआ नारीवाद की सभी किस्में उन उच्च-मध्यवर्गीय स्त्रियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिनका `स्वर्ग´ इसी व्यवस्था में सुरक्षित है। वे पुरुष-वर्चस्ववाद का विरोध तो करना चाहती हैं, लेकिन इतिहास और सामाजिक-आर्थिक संरचना में जमी उसकी जड़ों को नहीं देख पातीं क्योंकि इस व्यवस्था के वर्ग-उत्पीड़क चरित्र से उन्हें कोई शिकायत नहीं। एन.जी.ओ. प्रायोजित नारीवादियों का एक हिस्सा स्त्रियों, दलितों, विस्थापितों के उत्पीड़न और पर्यावरण के प्रश्न पर अलग-अलग जनसंघर्षों की हिमायत करता है लेकिन इन सबको एक ही मुक्ति-परियोजना के अभिन्न अंगों के रूप में नहीं देखता और विचारधारा और राजनीति के प्राधिकार को स्वीकार नहीं करता। यह अराजकतावाद और संघाधिपत्यवाद (syndicalism) का ही एक नया रूप है। भारत में तीव्र पूँजीवादीकरण से हुए मध्यवर्ग के विस्तार और बुर्जुआ संस्कृति के आच्छादनकारी प्रभाव ने बुर्जुआ नारीवाद के सामाजिक आधार को व्यापक बनाया है। सर्वहारा क्रान्तियों की विफलता से पैदा हुए परिवेश और बुर्जुआ वैचारिक-सांस्कृतिक प्रचार के प्रभाव में, निम्न-मध्यवर्गीय शिक्षित युवा स्त्रियों का एक बहुत बड़ा रैडिकल हिस्सा भी व्यापक मेहनतकश आबादी और आम मेहनतकश स्त्रियों के संघर्षों से जुड़ने के बजाय फिलहाल बुर्जुआ नारीवादी लहर के साथ बह रहा है। साहित्य-कला-संस्कृति की दुनिया में जारी स्त्री-विमर्श में पुरुष-वर्चस्ववाद के प्रश्न को एक समाज-निरपेक्ष, स्वायत्त प्रश्न के रूप में ही प्रस्तुत किया जा रहा है। स्त्री-मुक्ति के किसी व्यावहारिक सुदीर्घ कार्यक्रम के बिना सिर्फ़ गर्मागर्म लफ्फजी का अविराम सिलसिला जारी है। रचनात्मक लेखन का भी परिदृश्य हूबहू ऐसा ही है।

इस बेहद ज़रूरी और बुनियादी सवाल पर पुरज़ोर हस्तक्षेप की ज़रूरत है। नारीवादी विचारों और नारीवादी रचनाओं की सुव्यवस्थित आलोचना और मीमांसा प्रस्तुत की जानी चाहिए। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि मार्क्सवाद स्त्री-प्रश्न को हल करने का कोई मॉडल या बना-बनाया फार्मूला नहीं प्रस्तुत करता बल्कि स्त्री की पराधीनता के इतिहास और आधारभूत कारणों की पड़ताल करता है तथा वर्गों के उन्मूलन की सुदीर्घ ऐतिहासिक परियोजना के एक अंग के तौर पर स्त्री-उत्पीड़न की समाप्ति की भी तर्कसम्मत सोच उसी प्रकार प्रस्तुत करता है जिस प्रकार मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण-उत्पीड़न के हर रूप के उन्मूलन की भविष्यवाणी करता है। आम स्त्रियों के बीच यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा क्रान्ति की तैयारी के प्रारम्भ-बिन्दु से ही स्त्री-प्रश्न उसके एजेण्डे पर अनिवार्यत: उपस्थित रहेगा, लेकिन स्त्री-पुरुष असमानता के भौतिक-ऐतिहासिक आधारों के नष्ट होने के बाद भी यौन-भेद और पुरुष-वर्चस्व की सहशताब्दियों पुरानी संस्कृति समाज में एक लम्बे समय तक मौजूद रहेगी और सतत् सांस्कृतिक क्रान्तियों की एक लम्बी प्रक्रिया के बाद ही उसका निर्मूलन सम्भव हो सकेगा। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि स्त्री-मुक्ति की तमाम बुर्जुआ नारीवादी अवधारणाएँ इस प्रश्न के सम्पूर्ण हल की कोई दिशा नहीं बतलातीं, क्योंकि वे खुशहाल मध्यवर्गीय स्त्रियों से नीचे की स्त्रियों को सम्बोधित नहीं होतीं। साथ ही, मार्क्सवाद के नाम पर, स्त्री-प्रश्न पर प्रस्तुत की जाने वाली वर्ग-अपचयनवादी अवस्थिति की भी प्रखर आलोचना प्रस्तुत करनी होगी।

भारत में यह नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक अनिवार्यत: आधारभूत कार्यभार है कि व्यापक जनसमुदाय के बीच अन्धविश्वास, धार्मिक कुरीतियों, मध्ययुगीन निरंकुशता, नई बुर्जुआ निरंकुशता और धार्मिक मूलतत्त्ववादी फासीवादी विचारों से निरन्तर सिंचित-पोषित स्त्री-उत्पीड़न और पुरुष-वर्चस्व के तमाम रूपों के विरुद्ध एक रैडिकल सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार आन्दोलन की उद्वेलनकारी लहर पैदा की जाए। इसके बाद ही सामाजिक-राजनीतिक सरगर्मियों में आधी आबादी की पहलकदमी और भागीदारी बढ़ाने के प्रयास सार्थक और प्रभावी हो सकते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि सर्वहारा के राजनीतिक और सांस्कृतिक हरावल अपने निजी आचरण-व्यवहार से यह सिद्ध करें कि वे दोहरे-दुरंगे लोग नहीं, बल्कि स्त्री-मुक्ति के सच्चे-सक्रिय पक्षधर हैं। समाज और व्यावहारिक स्थितियों की दुहाई देकर, निजी और पारिवारिक जीवन में पुरुष-वर्चस्ववादी आचरण करने वाले (जैसे घरेलू गुलामी को प्रश्रय देने वाले, दहेज व जाति-धर्म आधारित विवाहों को स्वीकार करने वाले, स्त्री-विरोधी सामाजिक आचारों को व्यावहारिकता की दुहाई देकर स्वीकारने वाले, अपने परिवार में प्रेम-विवाह जैसी चीज़ों का प्रत्यक्ष-परोक्ष विरोध करने वाले, आदि-आदि) पाखण्डी-कायर-धूर्त मध्यवर्गीय प्रगतिशीलों और संशोधनवादी कम्युनिस्टों ने स्त्री-समुदाय को सर्वहारा क्रान्ति के प्रवाह से काटकर अलग करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। अत: इस प्रश्न पर सांस्कृतिक आन्दोलन की शुरुआत हमें अपने निजी जीवन और आचरण से करनी होगी।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार

कला-साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों का विरोध करो!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

जिस तरह राजनीति के क्षेत्र में, उसी तरह कला-साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में भी आज वामपन्थ के नाम पर सामाजिक जनवादी/संशोधनवादी प्रवृत्तियों का काफी बोलबाला है। इनके अनेक रूप हैं। सिर्फ कुछ प्रतिनिधि उदाहरणों की ही यहाँ चर्चा की जा सकती है।

अधिकांश कवि-लेखक-आलोचक आज अपने लेखन में यूरो कम्युनिज्म और पश्चिमी नववामपन्थ के नये-पुराने पुरोधाओं से निरे अनालोचनात्मक ढंग से काफी कुछ उधार लेते दीखते हैं। सोवियत संघ और चीन में सर्वहारा क्रान्तियों के बाद, समाजवादी संक्रमण के महान सामाजिक प्रयोगों के दौरान कला-साहित्य-नाटक-सिनेमा-संगीत आदि के क्षेत्र में जो भी सैद्धान्तिक और प्रयोगात्मक काम हुए थे, आम तौर पर उनके प्रति उपेक्षा का रुख दिखाई देता है। हम यह नहीं कहते कि उस दौर में गलतियाँ नहीं हुई, पर महान क्रान्तिकारी परिवर्तनों के दौर के कला-साहित्य का ऐतिहासिक-आलोचनात्मक अध्ययन अकादमिक वामपन्थी “मुक्त-चिन्तन” से उधार लेने के बजाय कहीं अधिक उपयोगी होगा।

नववाम के सुर में सुर मिलाते हुए ज्यादातर कवि-लेखक बुर्जुआ मानवतावादी स्वर में लिख-बोल रहे हें और वर्ग-संघर्ष और सर्वहारा अधिनायकत्व की निरन्तरता के बुनियादी उसूलों पर कायम सर्वहारा मानवतावाद को बिना सांगोपांग तर्क और आलोचना के खारिज करते प्रतीत होते हैं।

यह कला-साहित्य में सामाजिक-जनवादी प्रवृत्तियों के बोलबाले का ही नतीजा है कि न केवल संशोधनवाद और क्रान्तिकारी वामपन्थ की विभाजक रेखा कला-साहित्य में मिट सी गई प्रतीत होती है, बल्कि कल के लोहियावादी, “लघु मानव” वादी परिमलिये आज के स्थापित वामपन्थी समालोचक माने जा रहे हैं। रघुवीर सहाय की शिष्ट-संयमित मध्यवर्गीय असन्तोष की कविता और केदारनाथ सिंह की कुलीन, सजी-सँवरी कविता को आज सुधी आलोचकों का एक संगठित धड़ा वामपन्थी काव्य-धारा के प्रतिमान या प्रातिनिधिक प्रवृत्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है और बहुतेरे नये कवि इन धाराओं को आदर्श मान रहे हैं। रेणु की जनपक्षधरता निस्सन्धिग्ध हो सकती है, लेकिन उनके प्रकृतवादी यथार्थवाद को और उनके लोहियावादी समाजवादी विचारों के निरूपण को प्रेमचन्द की राष्ट्रीय जनवादी धारा का विस्तार घोषित करना सर्वहारा साहित्य की वैचारिक समझ पर सवाल खड़े करता है। यथार्थ-चित्रण के नाम पर निषेधवादी-अनास्थामूलक दृष्टि से जनता के जीवन को प्रस्तुत करने वाले और कहीं-कहीं खिल्ली तक उड़ाने वाले श्रीलाल शुक्ल यदि उच्चासन पर बिठाए जा रहे हैं तो यह वामपन्थी कला-साहित्य की दुनिया में सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों के ज़बर्दस्त प्रभाव का ही द्योतक है।

इधर विस्मृत मार्क्सवादी आलोचकों-लेखकों के पुन:स्मरण का काम खूब हो रहा है। यह ज़रूरी और उपयोगी तभी हो सकता था जब इसे आलोचनात्मक, तर्कसम्मत पुनर्मूल्यांकन की दृष्टि से किया जाता। लेकिन प्राय: ऐसा नहीं हो रहा है और पुरानी पीढ़ी के मार्क्सवादी लेखकों के तमाम विचलनों को भी श्रद्धाभाव से स्वीकारा जा रहा है या फिर उनकी अनदेखी की जा रही है।

साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन के नाम पर एक नई नववामपन्थी प्रवृत्ति सामने आई है जो पुराने सामाजिक जनवादी विचारों को अकादमिक आडम्बरपूर्ण पण्डिताऊपन की चाशनी में लपेटकर परोस रही है और नयेपन के फैशनेबल आग्रहियों के मध्यवर्गीय मन को खूब भा रही है। `सन्धान´ पत्रिका इस धारा की अग्रणी प्रतिनिधि पत्रिका है। कला-साहित्य की क्रान्तिकारी वामपन्थी धारा का एक ज़रूरी कार्यभार है कि वह इस विचार-सरणि का सांगोपांग विश्लेषण प्रस्तुत करे और इनके द्वारा फैलाए जा रहे विभ्रमों के धुएँ-कोहरे को छाँटने का काम करे।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’ , शिशिर-बसंत 2002 से साभार

वामपन्थी” कलावाद-रूपवाद और मध्यवर्गीय लम्पटता का विरोध करो!

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एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार

(सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत के लिए एक प्रस्ताव)

कात्यायनी, सत्यम

यह बिन्दु भी उपरोक्त बिन्दु से जुटा हुआ है। सर्वहारा क्रान्तियों के प्रथम चक्र की पराजय और क्रान्तिकारी वामपन्थी आन्दोलन की विघटन-विफलता के परिणाम जिन रूपों में सामने आए हैं, उनमें से एक यह भी है कि वामपन्थी और जनवादी का लेबल लगाकर घूमने वाले ऐसे “छैलों” की कविता-कहानी-नाटक की दुनिया में भरमार है जो अपने जीवन में तो हर तरह का अवसरवादी कुकर्म करते ही हैं, रचना के धरातल पर भी उनके मूल आग्रह कलावादी होते हैं। ख़ास तौर पर कविता के क्षेत्र में तो रूपवादी “वामपन्थ” का ज़ोर इतना अधिक है कि पुरोगामी और प्रतिगामी की विभाजक रेखा ही वहाँ धूमिल कर दी गई है। इसी तरह कहानी के क्षेत्र में यथार्थवाद के नाम पर प्रकृतवादी आग्रहों के बोलबाले का एक रूप मध्यवर्गीय लम्पटता का घटाटोप भी है। भारतीय जन-जीवन और संस्कृति की तबाही के सबसे नंगे, बर्बर और तेज़ रफ़्तार दौर में फूहड़-कामुक, यौनलोलुप और रुग्ण विवरण “यथार्थ-चित्राण” के नाम पर कहानियों से लेकर आत्मकथाओं के “भोगे हुए यथार्थ” और संस्मरणों के “बनारसी ठाठ” के रूप में खूब प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

इन घटिया प्रवृत्तियों के वास्तविक स्रोत को, इनके वर्ग-चरित्र को सविश्लेषण उजागर करना होगा, सर्वहारा संस्कृति के इन रेशमी रूमालधारियों को, इन भंड़ैतों, छैलों और रागरंग-प्रेमियों को बेनकाब करना होगा और इनके विरुद्ध समझौताविहीन संघर्ष चलाना होगा।

‘सृजन परिप्रेक्ष्य’, शिशिर-बसंत 2002 से साभार