उत्पादन के संबंध

मूल्य का नियम 2 जिंसों की जड़पूजा

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संसार में बहुत से लोग हैं जो वास्तव में शक्तिशाली हैं : राष्ट्रपति, सी. ई. ओ. बैंकर , लहरों के नेता…परन्तु एक वस्तु, एक चीज ऐसी है जो इनमें से प्रत्येक से अधिक शक्तिशाली है. वह वस्तु है, दौलत.

दौलत वास्तव में शक्तिशाली है. लोग, समाज और देश इससे हर प्रकार के काम कर सकते हैं. कई लोगों के जीवन को, मकसद के रूप में, दौलत की लालसा जकड़े रखती है और यह आर्थिक बढौतरी की चालक शक्ति होती है. और समस्त समाज में, धन प्रतिष्ठा, हैसियत और सामाजिक शक्ति का प्रतीक है.

धन के बारे में दिलचस्प बात यह है कि यह केवल एक वस्तु है. आजकल तो यह सोने की भांति कोई कीमती चीज भी नहीं है. आजकल तो यह केवल कागज के टुकड़े या कंप्यूटर स्क्रीन पर डिजिट हैं. यही है इसकी शक्ति यद्यपि इसे इच्छा, शस्त्र और शब्दों की जरूरत नहीं है.

क्यों ?

यह अद्भूत परिघटना, जहाँ वस्तुओं की सामाजिक हैसियत होती है और वस्तुएं ऐसे व्यवहार करती हैं जैसे उनकी स्वयं की इच्छा हो, मार्क्स ने इसे ‘जिंसों की जड़पूजा’ शब्द से स्पष्ट करना चाहा.

जब मार्क्स जड़पूजा की बात कर रहे थे, वे चाबुकों, जंजीरों और चमड़े के परिधानों की बात नहीं कर रहे थे. वे उस ढंग के बारे में बात कर रहे थे जिसके द्वारा पूंजीवादी समाज में उत्पादकों के मध्य संबंध वस्तुओं के मध्य संबंधों का रूप ले लेते हैं.

शब्द जड़पूजा मूलरूप से, वस्तुओं को मूर्ति या टोने-टोटके  की भांति जादुई श्रेय देने के कारण धार्मिक कर्मकांडों के वर्णन के लिए प्रयोग किया जाता था. अगर प्राचीन टेस्टामेंट के इज़राईलियों ने फिलिस्तीनियों से युद्ध जीता तो उन्होंने इसका श्रेय अपने साथ चलने वाले ईश्वर और मानव के बीच समझौते की पोत को दिया. अगर वे हार गए तो वे इसपर क्रोधित हो गए. निसंदेह, हकीकत में अपनी स्वयं की कारवाईयों से जीतते या हारते थे. अपनी स्वयं की शक्तियों का श्रेय किसी वस्तु को देना जड़पूजा कहलाता है. धन और जिन्सें, मार्क्स के लिए ऐसी ही थीं. हम सोचते हैं कि उनमें जादुई शक्तियां हैं यद्यपि वास्तव में उनकी शक्तियां हमारे द्वारा, हमारी सृजनात्मक श्रम से आती हैं.

आईए ,थोडा कार्यशाला के अन्दर  देखें. यह कार्य का कोई भी स्थान हो सकता है – किसी पूंजीपति की फैक्टरी, एक किसान कम्यून, एक परिवार का फार्म, कुछ भी. यहाँ श्रमिकों के मध्य संबंध प्रत्यक्ष हैं. मैं एक पूर्जा तैयार करता हूँ और इसे दूसरे व्यक्ति की और बढ़ा देता हूँ. अगर श्रम प्रक्रिया में कोई बदलाव करना होता है तो मैनेजर सभी मजदूरों को इकट्ठा करता है और कहता है, ” अब हम काम को अलग तरह से व्यवस्थित करेंगे. ” चाहे यह जनवादी या वर्गीकृत तरह का संगठन हो, यह संगठन ही होता जो लोगों के बीच में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद होता है.

आओ अब कार्य स्थान से बाहर मंडी में देखें. मंडी में मामला अलग तरह का है. लोगों के मध्य सामाजिक संबंधों  द्वारा प्रत्यक्ष रूप से कार्य का संगठन, श्रम-विभाजन नहीं हो जाता. मंडी में जिन्सें श्रम के उत्पाद के रूप में, अपने मूल्य के साथ अन्य जिंसों से भिड़ती हैं. वस्तुओं के मध्य इन झडपों का असर वापस उत्पादन पर पड़ता है. वहीँ है जो उत्पादकों को उनकी श्रम में बदलाव, ज्यादा या कम उत्पादन, व्यवसाय छोड़ने या इसे बढाने के लिए संकेत भेजती हैं.

कोयला खनिक, बैंकर, कारपेंटर, और रसोइओं का परस्पर सीधा संबंध नहीं होता. इसके विपरीत उनके उत्पाद श्रम, कोयला, ब्रेड , केबिनेट और पास्ता मंडी में मिलते हैं और उनका परस्पर विनिमय हो जाता है. लोगों के बीच भौतिक संबंध जिंसों के बीच सामाजिक संबंध बन जाते हैं. जब हम कोयला, ब्रेड , केबिनेट और पास्ता को देखते हैं, हम उस काम को नहीं देखते जिसने इनकी सृजना की है. हम केवल मूल्य धारण किये हुई जिंसों को एक दूसरे के सम्मुख खड़ी देखते हैं. कोयल के एक ढेर का मूल्य ब्रेड के कई टुकड़ों के बराबर होता है. एक केबिनेट का मूल्य पास्ता की इतनी मात्रा के बराबर.  वस्तु की सामाजिक शक्ति, मूल्य, स्वयं वस्तु का कोई गुण लगता है न कि कामगारों के बीच संबंध का परिणाम.

उपभोग की जानेवाली वस्तुओं के संसार में घूमते हुए हम परमाणुकृत व्यक्ति हैं. जब हम किसी जिन्स को खरीदते हैं, तो हमारा अनुभव केवल खुद के और जिन्स के बीच का होता है. हम इन मिलनियों के पीछे के सामाजिक संबंधों के प्रति अंधे होते हैं. अगर हम चैतन्य रूप से, जिंसों के इस संसार से तालमेल बिठाते सामाजिक संबंधों के नेटवर्क के बारे में जानते हैं, तो भी हमारे पास इन संबंधों को सीधी तरह से अनुभव करने का तरीका नहीं होता …क्योंकि वे प्रत्यक्ष संबंध नहीं है.  इन सामाजिक संबंधों का केवल एकांगी बौद्धिक ज्ञान हमारे पास हो सकता है, न कि प्रत्यक्ष संबंध. प्रत्येक आर्थिक संबंध जिन्स नामक वस्तु की मध्यस्ता से सिरे चढ़ता है.

प्रक्रिया जिसके द्वारा लोगों के मध्य संबंध वस्तुओं के मध्य संबंधों का रूप ले लेते हैं, मार्क्स उसे “निरूपण” कहते हैं. ऐसा क्यों है कि पूंजीवादी समाज में वस्तुओं द्वारा मनुष्य का स्थान ग्रहण करने का आभास होता है. इसे समझने के लिए निरूपण हमारी मदद करता है. निर्जीव वस्तुएं, मूल्य, जो उन्हीं से आया लगता है, से सुसज्जित होकर जीवन धारण कर लेती हैं.

हम कहते है कि पुस्तक २० डॉलर की है और स्वेटर २५ की. परन्तु यह मूल्य स्वयं स्वेटर से नहीं आता. आप स्वेटर फाड़ कर उससे २५ डॉलर नहीं निकाल सकते. ये २५ डॉलर मंडी में स्वेटर और अन्य सभी जिंसों के बीच संबंध की अभिव्यक्ति है. और ये सभी जिन्सें मंडी विनिमय द्वारा संयोजित सामाजिक श्रम प्रक्रिया की महज रूप हैं. यह इसलिए क्योंकि लोग मंडी द्वारा अपनी श्रम का मूल्य हासिल करने के लिए सुनियोजित होते हैं.

यह भ्रम कि मूल्य स्वयं जिन्स से आता है न कि इसके पीछे के सामाजिक संब्न्धों से, यही जड़पूजा है. पूंजीवादी समाज इस प्रकार के भ्रमों से भरा पड़ा है. धन में सोने जैसे गुण होने का आभास है, हालाँकि यह इसलिए है क्योंकि यह ऐसी वस्तु है जिससे अन्य सभी जिंसों के मूल्य की अभिव्यक्ति होती है. ऐसा लगता है कि मुनाफा स्वयं विनिमय से प्रकट हो जाता है, यद्यपि कार्यस्थान पर पूँजी और श्रम के बीच असमान संबंधों द्वारा उत्पादन में,  मुनाफा पैदा होने की व्याख्या प्रस्तुत करने के लिए मार्क्स ने सख्त मेहनत की. लगान जमीन से पैदा होता हुआ लगता है, यद्यपि मार्क्स अटल थे कि यह श्रम के मूल्य का ही विनियोजन है. हम आधुनिक मुख्यधारा के आर्थिक सिद्धांत में इस प्रकार की अंधभक्ति देखते है जैसेकि मूल्य उपभोगता और जिन्स का व्यक्तिगत अनुभव है और कि पूँजी स्वयं मूल्य पैदा करती है.

यद्यपि, जिन्स जड़पूजा का सिद्धांत केवल भ्रम का सिद्धांत नहीं है. या इस तरह नहीं है कि समस्त विश्व भ्रम हो और वास्तविकता कहीं सतह के नीचे विद्यमान, सदैव आँखों से ओझल हो. भ्रम हकीकत है. जिन्स में वास्तव में मूल्य है. धन में वास्तविक सामाजिक शक्ति है ही. वैयक्तिक लोग वास्तव में बलहीन है और भौतिक संरचनाओं में सामाजिक शक्ति है ही. सतह के नीचे जहाँ उत्पादकों में संबंध प्रत्यक्ष हों, ऐसा कोई उत्पादन का संसार हकीकत नहीं है. उत्पादकों के मध्य संबंध केवल परोक्ष है जो जिंसों के रहस्मयी संसार द्वारा सुनियोजित होते हैं.

मार्क्स के मूल्य का सिद्धांत में जिन्स जड़पूजा का सिद्धांत केन्द्रीय है और यह उन बातों में एक है जो मार्क्स को अपने पूर्वाधिकारियों से कठोरता से भिन्न करती हैं. एडम स्मिथ और रिकार्डो, दोनों का मानना था कि मूल्य को श्रम समय द्वारा अभिव्यक्त किया जा सकता है. लेकिन मार्क्स का मूल्य (value ) का सिद्धांत, मूल्य (price ) के सिद्धांत से बढ़कर है. यह उस ढंग का सिद्धांत है जिसमें लोगों के मध्य संबंध भौतिक रूपों का स्थान ले लेते हैं जोकि वापस असर डालते हैं और इन सामाजिक संबंधों को शक्ल देते हैं. श्रम जिंसों में निहित मूल्य का स्थान ले लेती है. धन मूल्य इस मूल्य की सार्वभौमिक अभिव्यक्ति बन जाता है. मकसद के रूप में धन की लालसा, सामाजिक वर्चस्व धारण कर लेती है. उत्पादन के साधन पूँजी बन जाते हैं. सामाजिक मूल्यों के प्रतिनिधियों के रूप में, धन, जिन्स और पूँजी समाज के नियंत्रण से मुक्त, स्वतन्त्र शक्तियां बन जाते हैं. इन शक्तियों के नियम का ही मूल्य का नियम है. एकाधिकार या राज्य द्वारा इन शक्तियों पर कुछ अंकुश के यत्न मूल्य के सामाजिक विरोधों में उलझ कर रह जाते हैं.

मूल्य का नियम 1 परिचय

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मार्क्स की पूंजी पर आधारित इन अंग्रेजी फिल्मों को इस ब्लॉग द्वारा, हिंदी में डब करके प्रस्तुत करने का कार्य जारी है. फिल्मों की स्क्रिप्ट के कुछ अंशों से हमारे मतभेद हैं. पाठकों से अनुरोध है कि वे इन फिल्मों को आलोचनात्मक तरीके से आत्मसात करें. फिर भी इन फिल्मों का सर्वहारा वर्ग के नए जागरण और प्रबोधन के लिए बहुत महत्त्व है जिसके लिए यह ब्लॉग http://kapitalism101.wordpress.com का  बहुत आभारी है.


आर्थिक संकट वैचारिक संकट का भी समय होता है. यह समय होता है जब लोग अपने विश्व दृष्टिकोण का पुनर्मुल्यांकन करना शुरू कर देते हैं. वे अपनी सबसे मूलभूत पूर्वधारनाओं पर सवालिया निशान लगाने लगते हैं. प्रत्येक आर्थिक संकट से मुख्यधारा के आर्थिक चिंतन में पुनर्विचार और पुनर्गठन पैदा हुआ है. मजे की बात यह है कि यह पुनर्विचार सदैव आर्थिक प्रणाली के लिए रेडिकल चुनौती के सन्दर्भ में रहा है.

सीमांत उपयोगिता सिद्धांत , जो अब भी आधुनिक मुख्यधारा के आर्थिक सिद्धांत के लिए आधार मुहैया करता है, १८०० के अंतिम काल की महामंदी पर कार्ल मार्क्स की ‘पूंजीवाद की आलोचना’ द्वारा चुनौती के प्रत्युतर में पैदा हुआ था. १९३० की महामंदी से,उदारवादी अर्थशास्त्र की असफलता ,सफल बोल्शेविक क्रांति और पश्चिम में मजबूत मेहनतकशों की लहरों से चुनौती के रूप में,  कीन्सवाद पैदा हुआ था. १९७० के संकट से, कीन्सवाद की संकट झेलने की असफलताओं और विशाल लोक वामपंथी लहरें जैसे युद्ध विरोधी, नागरिक अधिकार, स्त्री लहरे और मजबूत श्रम की शक्ति, के विरुद्ध हथियार के रूप में नव उदारीकरण पैदा हुआ.

एलन ग्रीनस्पेन :
“याद रखें कि वैचारिकी एक ऐसा प्रत्ययात्मक चौखटा है जिससे लोग हकीकत का सामना करते हैं. प्रत्येक के पास एक है…जीवित रहने के लिए आपको एक वैचारिकी चाहिए. सवाल यह है कि क्या यह सही है या नहीं. और जो मैं आपसे कह रहा हूँ, मुझे एक त्रुटी दिखी है – मैं नहीं जानता कि यह कितनी सही और स्थायी है, परन्तु इस हकीकत ने मुझे बहुत परेशान किया है.”

नव उदारवादी संस्थापना की ओर से अपनी असफलता पर इस तरह की स्वीकृतियों से मौजूदा समय की मुख्यधारा की आर्थिक वैचारिकी पर प्रश्नचिह्न लगता है. लेकिन स्पष्ट नहीं है कि हम इस वैचारिक संकट में इस आर्थिक प्रणाली को योग्य टक्कर देने के सन्दर्भ में प्रवेश कर रहे हैं. सोवियत तरह की केंद्र न्योजित प्रणालियों की असफलता ने पूंजीवाद के विकल्पों पर विचार की लोकप्रिय चेतना को धो डाला है. इस समय कार्ल मार्क्स के विचारों का यह देखने के लिए कि वे पूंजीवाद की आलोचना में क्या सही-सही कहने की कोशिश कर रहे थे, पुनर्मुल्यांकन करना उपयोगी होगा – इसलिए नहीं कि हम लेनिन, स्टालिन, माओ और अन्य जो मार्क्स के विचारों पर दावा करते हैं, के राजनीतिक अनुभवों को दोहराने की इच्छा रखते हैं , पर क्योंकि मार्क्स पूंजीवाद की पूर्ण और प्रणालीबद्ध आलोचना प्रस्तुत करते हैं जोकि आर्थिक चिंतन के इतिहास में पूर्णतया अलग, पूर्णतया अद्वितीय है. इस तरह के रेडिकल विचार हमारी मौजूदा स्थिति और सामाजिक रूपांतरण की संभावनाओं की नयी समझ की खोज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. जीवित रहने के लिए वह समाज खतरनाक है जो विशेषतय संकट के लंबे अन्तराल में प्रवेश करने पर भी आत्मालोचना की क्षमता नहीं रखता.

मार्क्स और सभी प्रसिद्ध बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों में निर्णायक भिन्नता है. सभी बुर्जुआ अर्थशास्त्री संकट को पूंजीवाद के प्राकृतिक संतुलन को खिन करनेवाली कोई बाह्य वस्तु मानते हैं. पूंजीवाद की प्रवृति असमानता, शोषण और संकट यानिकी जब स्पष्ट हो जाता है कि उनके सिद्धांत और असलियत में असंगतता है तो बुर्जुआ अर्थशास्त्री असलियत को उनके मॉडल के विपरीत होने पर दोषी ठहराते हैं. राज्य के दखल, मजदूर लहरें, मानवीय लोभ आदि के रूप में हमलावर बाह्य शक्तियों द्वारा असलियत को विषाक्त किया जाता है. आज हम इसी प्रकार के दक्षिणपंथी लोकप्रिय उत्थान की प्रतिक्रियावादी समझ को देख रहे हैं जोकि विदेशियों, वाम बुद्धिजीवियों, समलिंगियों, गैर ईसाई और काले राष्ट्र अध्यक्षों की आक्रामक घुसपैठ पर समाज की समस्यायों का दोष मढ़ते हैं.

मार्क्स विपरीत पद्वति अपनाते हैं. वे सामाजिक विरोधों को व्यवस्था के भीतर देखते हैं. ये सामाजिक विरोध व्यवस्था में इतने बुनियादी हैं कि ये अपने गुरुत्वीय क्षेत्र में समाज के सभी अंगों को खींच लेते हैं.

बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों ने सदैव मंडी को स्वतंत्रता और समानता का क्षेत्र माना है. तथ्य यह है कि मंडी वाले समाज में इतनी असमानता, संकट और अधूरी स्वतंत्रता है कि इसे सिद्धांत में नहीं बल्कि हकीकत में देखा जा सकता है. आम लोगों की सोच के विपरीत मार्क्स इन सामाजिक बुराईयों के विश्लेषण से शुरुआत करते हुए मंडी के संबंधों की आलोचना की ओर नहीं बढ़ते. मार्क्स इजारेदारी, गरीबी, शोषण और राज्य की हिंसा पर बोलते हुए आगे नहीं बढ़ते. वे उसी मंडी के स्वतन्त्र क्षेत्र से शुरू होते हैं जो  उनके बुर्जुआ आलोचकों को बहुत प्रिय है, और दिखाते हैं कि किस तरह ये सभी सामाजिक विरोध इस मूल उत्पादन संबंध से प्रकट हो जाते हैं. पूंजीवादी उत्पादन का मंडी विनिमय के लिए उत्पादन होने के तथ्य के कारण मार्क्स के लिए यहीं से शुरुआत होती है. आधारभूत उत्पादन का यह रूप कानून जैसे गुण अख्तियार कर लेता है जिसे वे ‘मूल्य का नियम’ से पुकारते हैं.

मंडी में दिलचस्प लगने वाली कौनसी वस्तु मार्क्स को मिली ? यह कोई आपकी इच्छानुसार वस्तुएं खरीदने या बेचने की स्वतंत्रता नहीं थी. तथ्य यह है, कि मंडी समाज के सामाजिक जीवन में भाग लेने के लिए, प्रत्येक को चीजें खरीदनी या बेचनी पड़ती हैं. जीवित रहने के लिए, समाज में भाग लेने के लिए, प्रत्येक को चीजें खरीदने और अपनी श्रम के उत्पाद बेचने के लिए, मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.  यह विलक्षण रूप से,  प्रारंभिक समाजों से जहाँ मेहनतकश अपने श्रम से स्वयं को पालते थे, यानिकी वे अपने उपयोग के लिए श्रम द्वारा वस्तुएं उत्पादित करते थे, से अलग तरह का सामाजिक संगठन है. पूंजीवादी समाज में उत्पादित होनेवाली चीजें स्वयं के लिए नहीं होती. लोग उनका उत्पादन विनिमय के लिए करते हैं. इस लिए सामाजिक श्रम प्रक्रिया, परोक्ष रूप से, विनिमय के द्वारा तालमेल बिठाती है.

मंडी द्वारा परोक्ष रूप से तालमेल बिठाने वाले, निजी उत्पादकों के समाज में लोगों के मध्य सामाजिक संबंध, जिंसों के संबंध, चीजों के मध्य संबंधों का रूप ले लेते हैं. लोगों के बीच संबंध जिन्स मूल्यों में प्रकट होनेवाले मूल्य संबंध बन जाते हैं. आर्थिक रूप से, लोग एक दूसरे से धन और मूल्य द्वारा संबंधित हो जाते हैं. जिन्स संबंधों का यह संसार, व्यक्तियों के नियंत्रण से बाहर  स्वतन्त्र रूप ले लेता है जो प्रतिप्रभाव पैदा करता है और उनके रिश्तों को नियंत्रित करता है. एडम स्मिथ ने इसे ‘मंडी का ओझल हाथ’ कहा.  मार्क्स इसे ‘मूल्य का नियम’ कहते हैं.

मूल्य का नियम क्या है ? ये अव्यक्तिगत, समाज पर अपना असर डालनेवाली अर्थ की अंध शक्तियां हैं. वह समाज अद्वितीय है जहाँ श्रम का प्रमुख रूप मंडी में, विनिमय के लिए उत्पादित होता है. लोगों के बीच के संबंध जिंसों के बीच मूल्य संबंध बन जाते हैं. और ये मूल्य संबंध अव्यक्तिगत शक्तियां बन जाते हैं जिनके समाज के लिए अनचाहे परिणाम होते हैं. उदाहरण के लिए, हमें मिलती है पूँजी.

अपने श्रम के लिए, लोगों ने सदैव, औजारों और अन्य संसाधनों का उपयोग किया है. इन्हें उत्पादन के साधन कहते हैं. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में, ये उत्पादन के साधन पूंजी बन जाते हैं. औजार, मशीन, कच्चा माल और यहाँ तक कि कामगार मूल्य के साथ जिन्स बन जाते हैं. इससे मंडी में उत्पादन के साधनों को खरीदना और इन उत्पादन के साधनों के उत्पादों को मुनाफे के लिए बेचना संभव हो जाता है. दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति उत्पादन में धन निवेश कर सकता है ताकि और अधिक धन कमा सके . मूल्य, उसके खुद में उद्देश्य की तलाश, समाज की प्रधान शक्ति बन जाती है. यही है जो पूंजी है, सामाजिक क़ीमत से उपराम, मूल्य का अपने ही लिए विस्तार. पूंजी एक वर्ग का रूप ले लेती है जो उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है और अन्य लोगों को मुनाफे के लिए उत्पादन करना पड़ता है.

स्वाभाविक रूप से पूंजी की विषमता से आर्थिक और  भूमंडलीय अन्तरिक्ष में, दौलत और कंगाली के ध्रुव खड़े हो जाते हैं. पूंजी स्व-निषेधित भी होती है. हालाँकि यह कामगार पर काबू पानेवाली, एक अव्यक्तिगत शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन मुनाफा पैदा करने के लिए इसे कामगार की आवश्यकता पड़ती है. इसकी जड़ में है सामाजिक विरोध. इस सामाजिक विरोध से, निरंतर अस्थिरता और सामयिक संकट  फूटते रहते है.

बहुत से अन्य और ये सभी रेडिकल अर्थ मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ के भाग हैं.

यह वीडियो सीरिज मार्क्स के ‘मूल्य का नियम’ पर विभिन्न विषयों को शामिल करेगी : उपयोग मूल्य, विनिमय मूल्य और मूल्य में अंतर, पूर्ति, मांग और मूल्य का मूल्य से संबंध, अमूर्त श्रम, शोषण, संकट, सामाजिक आवश्यक श्रम समय और यहाँ तक कि विश्व को बदलने के लिए ‘मूल्य का नियम’ की समझ . उम्मीद की जाती है कि आज रेडिकल लहरों को सही तरह से समझने के महत्व के लिए इनका योगदान होगा क्योंकि उन्हें ऐसे विचार चाहियें  जिनसे वे अपनी मांगे और रणकौशल को स्पष्टता से बयान कर सकें.

मार्क्स के मूल्य के नियम पर आधारित एनिमेटिड हिंदी डब फिल्म : अंतिम किश्त

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इससे पहले : मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

श्रम -शक्ति के उपयोग और विनिमय मूल्य का विरोधाभास पूंजीपतियों और मजदूरों के सामाजिक विरोधाभास में प्रकट होता है. पूंजीपतियों और मजदूरों के विरोधी हित होते हैं. मजदूरों को अपने जीवन निर्वाह के साधनों  : घर, भोजन, kapda आदि की जरूरत होती है. उन्हें उपयोग मूल्य चाहिए. पूंजीपतियों की दिलचस्पी उपयोग मूल्य में नहीं होती. वे विनिमय मूल्य चाहते हैं. मुनाफा अर्जित कर वे पूंजी के आकार को बढ़ाना चाहते हैं. अपनी-अपनी चाहत को पूरा करने के लिए प्रत्येक वर्ग को दूसरे की जरूरत पड़ती है. जीवित रहने के लिए मजदूरों को मजदूरी के लिए बिकना पड़ता है. पूंजीपतियों को मुनाफा कमाने के लिए मजदूर रखने पड़ते हैं. इस सहअस्तित्व के बावजूद, उनके हित पूर्णतया विरोधी हैं. मजदूरी के अधिक भुगतान का मतलब, पूंजीपति के लिए कम मुनाफा. पूंजीपतियों के अधिक मुनाफे का मतलब मजदूरों के लिए अधिक कंगाली.

साफ़ है कि , पूंजीवादी समाज में, पूंजी और श्रम के बीच, सदैव संघर्ष रहा है. चाहे यह संघर्ष, हमारे दिन-प्रतिदिन के कार्य की मात्रा के लिए राजी होने पर हो, या फिर कार्य की अच्छी स्थिति और ज्यादा वेतन के लिए लंबा संघर्ष. लेकिन कार्य स्थान से बाहर भी , पूंजीवाद का वर्ग वैमनष्य सदैव बना रहता है. मेहनतकश वर्ग द्वारा पैदा किये गए मूल्य के मजदूरी, मुनाफे, लगान, ब्याज, टेक्स में वितरण का परिणाम हमारे द्वारा भोगे जाने वाले जीवन स्तर, हमारे रहने के स्थान, हमें मिलने वाले अवसरों की स्थिति और हमारे जीवन स्तर, में देखा जा सकता है. सामाजिक आवश्यकता के लिए उपयोग मूल्य के स्थान पर किसी एक वर्ग के मुनाफे के लिए निर्मित समाज में हमारे जीवन का स्तर पूंजी की जरूरतों के विलोमानुपाती होता है. पिछले ३० वर्षों में, नव उदारीकरण द्वारा पूंजी के स्वतन्त्र प्रवाह के लिए सभी  बंधन तोड़ने के परिणामस्वरूप उपरी पूंजीपति वर्ग के पास धन की अपार मात्रा इकट्ठी हो गयी है, जबकि शेष विश्व के लोगों के जीवन में निरंतर गिरावट आई है.

समाज के पास इतना भोजन, घर और तकनीक है कि विश्व की समस्त आबादी थोड़ी सी मेहनत से जीवन की सभी आधारभूत सुख-सुविधाएँ हासिल कर सकती है. और जीवन भर किसी और के लिए कार्य करने की अपेक्षा, यह शायद अधिक संतोषजनक     होगा. परन्तु हमारा समाज ऐसा नहीं है, क्योंकि हमारी श्रम का उद्देश्य समाज के लिए उपयोग मूल्य के स्थान पर पूंजी के लिए मुनाफा पैदा करना है. तकनीक और उत्पादकता में होनेवाली निरंतर क्रांतियों का उद्देश्य कार्य को आसान करना या हमारे जीवन स्तर को ऊँचा उठाना नहीं होता बल्कि और अधिक नियंत्रित श्रम द्वारा और अधिक मुनाफा बटोरना होता है. इस तरह, कार्य स्थान पर श्रम से अधिक मूल्य पैदा करवाने के लिए मशीनों, असेंबली लाईन और कंप्यूटर द्वारा निर्मित अनुशासन का वर्चस्व कायम हो जाता है.

कामगार से कार्य संबंधी ज्ञान छीन लिया जाता है और उसे मशीन में डाल दिया जाता है. कामगार श्रम-प्रक्रिया से नियंत्रण खोने के बाद, मशीन का एक छोटा सा पुर्जा बनकर रह जाता है जिसे आसानी से बदला जा सकता है. एक और विरोधाभास, संकल्पना और कार्यान्वयन के मध्य उभरता है : श्रम-प्रक्रिया का हमारा ज्ञान हमसे छीनकर, मशीन जो हमें नियंत्रित करती है, में डाल दिया जाता है, जो हमारे काम को एक जॉब – ऐसी रूटीन कवायद जिसमें मजदूरी के साधन के अलावा हमारे लिए कोई अर्थ नहीं होता, में न्यून कर देती है. मानव बनाम मशीन के मोहजाल के पीछे यही विरोधाभासी लोकप्रिय संस्कृति है. परन्तु मशीन ने अपने पीछे, हम और हमारी सृजनात्मक क्षमताओं के बीच सामाजिक संबंध को हमसे छीनकर, अलग करके, हमारे कार्य पर काबू पा लिया है.

मशीन के रूप में, निरंतर एकत्रित होती पूंजी के बाद, एक और विरोधाभास आता है, पूंजी के  मृत श्रम, मशीन और कच्चे माल और पूंजी के जीवित श्रम में निवेश. हालाँकि मशीनरी की वृद्धि द्वारा पूंजीपति मजदूरों का ज्यादा शोषण कर सकते हैं, लेकिन मशीन मूल्य पैदा नहीं कर सकती. मशीन और कच्चे माल में ज्यादा से ज्यादा और श्रम में कम से कम पुन:निवेश से समाज के द्रव्यमान के मूल्य में भरमार हो जाती है. यहीं से मार्क्स के संकट के सिद्धांत की शुरुआत होती है. जैसे-जैसे उत्पादन में विस्तार के लिए पुन:निवेश बढ़ता जाता है, यह जीवित श्रम की अपेक्षा मृत श्रम में अधिक होता जाता है. यहीं से भीमकाय संकट की शुरुआत होती है, जिसने पूंजी का उसके सभी रूपों के साथ, अवमूल्यन और विनाश करना होता है.

मार्क्स के पूंजीवादी समाज के विश्लेषण की व्युत्पति , ‘जिन्स के विश्लेषण’ का यही  प्रस्थान बिंदु है. एक जिन्स उत्पादक समाज के सांगठनिक सिद्धांत, मूल्य के इस मूल विचार से, वे जिन्स के उपयोग मूल्य और मूल्य के बीच विरोधाभास को स्थापित करते हैं और कई जिल्दों में इस विरोधाभास से पैदा होनेवाले  वर्गों , समाज , मशीनों और मानव और कार्य की संकल्पना और कार्यान्वयन में विरोधाभासों को प्रकट कर देते हैं. उपयोग और विनिमय में सीधी सी लगने वाली विसंगति वर्ग संघर्ष और संकट का कारक बन जाती है.

इसका यह मतलब नहीं है कि समाज की प्रत्येक समस्या को सीधा मूल्य के नियम से समझा जा सकता है. फिर भी,  सामाजिक धन और शक्ति के उत्पन्न होने और वितरण होने के ढंग को समझे बिना, किस प्रकार हम,असमानता पर बहस को वास्तव में समझ सकते हैं.

मंडी की दमनकारी प्रकृति, जिन्स विनिमय से उत्पन्न गंभीर असमानता और हर कीमत पर पूंजी के एकत्रीकरण की विवशता को समझे बिना, किस प्रकार हम हिंसा को समझ सकते हैं. पूंजीवादी समाज के उत्पादन संबंधों के संगठन के ढंग पर बहस के बिना परिवेशी संकट के समाधान पर बहस कैसे संभव हो सकती है ? वामपंथियों की समस्या यह नहीं कि वहां इतने लोग नहीं हैं कि वे इन मसलों की परवाह करें. समस्या यह है कि ऐसे लोग अधिक् नहीं हैं जिनके पास हमारे समाज के मूल ढांचे की शर्तों के अनुसार इन मसलों पर सोचने की इच्छाशक्ति और सैद्धांतिक औजार हों. इसी कारण आज  मूल्य के नियम को समझना महत्वपूर्ण है. अगर हम समाज के विरोधाभासों पर काबू पाना चाहते हैं, तो हमें समझना होगा कि किस तरह ये विरोधाभास संबंधित हैं और ऐसा करने के लिए हमें जिन्स के विश्लेषण से शुरुआत करनी होगी.

मार्क्स की पूंजी के ‘मूल्य के नियम’ पर आधारित ऐनिमेटिड हिंदी डब फिल्म

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विश्व स्तर पर, 1970 के बाद प्रगतिशिलियों, एन जी ओ, और वामपंथियों के साथ मिलकर संशोधनवाद सर्वहारा वर्ग के आंदोलनों को उत्पादन के स्थान कारखानों और फार्मों से खींचकर, बुर्जुआजी की इच्छानुसार, मंडी में ले गया. मार्क्स की पूंजी पर आधारित यह फिल्म, उनका भंडाफोड़ करती है और संजीदा लोगों को मार्क्सवाद का सही अध्ययन करने के लिए प्रेरित करती है. मूलरूप से फिल्म अंग्रेजी में हैं जिसे हिंदी में डब किया गया है. इसे भारतीय सन्दर्भ में रखने के लिए कुछ तस्वीरों और दृश्य में बदलाव भी किया गया है. http://kapitalism101.wordpress.com/2010/08/20/law-of-value-5-contradiction से विशेष आभार सहित.

मूल्य के नियम_5_विरोधाभास

मूल्य के नियम  में मार्क्स हमेशा विसंगतियों की चर्चा करते हैं. परन्तु ये गोल चकोरों और सैन्य ज्ञान से संबंधित विसंगतियां नहीं होती. ये विसंगतियां पूंजीवादी समाज के सामाजिक संबंधों के अन्दर की विसंगतियां हैं. कुछ लोग इनके लिए शब्द विरोधाभास का प्रयोग करना ज्यादा पसंद करते हैं.

बहुत क्षोभ के साथ हम जानते  हैं कि आधुनिक समाज सामाजिक विसंगतियों से भरा पड़ा है. धन की प्रचुरता के साथ  अत्यधिक गरीबी, अत्याधिक बेरोजगारी के बावजूद  ज्यादा काम, बैंकों द्वारा घरों की कुर्की, नस्ली श्रेष्टता और तनाव, औरतों के खिलाफ हिंसा, श्रम संघर्ष, दूषित वातावरण, पुलिस की बर्बरता, गैंग हिंसा, समूहों की घृणा, जनसँख्या का अत्याधिक उजाड़ा और बहुत से युद्ध.  मार्क्स की दिलचस्पी इन सभी  विसंगतियों में हैं. लेकिन इनमें  से किसी एक  से भी वे अपना विश्लेषण शुरू नहीं करते.

इसके विपरीत वे अपेक्षित साधारण सी लगने वाली चीज – जिन्स से शुरू होते हैं. क्यों ? क्योंकि जिन्स पूंजीवाद के सामाजिक संबंधों की सबसे बुनियादी चीज है. लोगों के परस्पर संबंध जिन्स विनिमय का रूप ले लेते हैं. जिन्स सामाजिक संबंधों की बुनियादी कार्यकर्त्ता है.  इसलिए अगर हम यह जानना चाहते हैं कि कैसे ये सभी सामाजिक विरोधाभास परस्पर संबंधित हैं, हमें जिन्स से शुरुआत करनी होगी.

जैसाकि हमने पहले ही देखा है कि जिन्स में विरोधाभास निहित है. : इसका एक उपयोग मूल्य है और दूसरा मूल्य (जैसाकि हमने देखा है कि मूल्य विनिमय मूल्य के पीछे छुपा होता है इसलिए, पहले हमने कहा था कि विरोधाभास उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य के बीच है, बाद में हमने इसे उपयोग मूल्य और मूल्य में संशोधित कर लिया. ) शुरू में देखने पर यह इतना अधिक विरोधाभासी नहीं लगता. लेकिन जैसे ही हम इसे बारीकी से देखते हैं तो महतवपूर्ण विरोधाभास उभर आते हैं.

ऐसा क्यों होता है कि लोगों को मंडी में अपनी श्रम, धन के बदले बेचना पड़ता है. क्योंकि वे स्वयं अपने जीवन निर्वाह के साधन नहीं जुटा पाते. यही पूंजीवाद का विलक्षण पहलू है. पूर्व में मौजूद उत्पादन की विधियों में लोगों की बहुसंख्या किसी न किसी प्रकार के उत्पादन के साधनों का उपयोग कर सकती थी,  जिनसे वे अपने जीवन निर्वाह के साधन जुटा लेते थे. कई बार लोग आपस में चीजे बदल लेते थे परंतू वे ऐसा अपने ही प्रयोग के लिए अतिरिक्त उत्पादन के द्वारा करते थे. अपने अतिरिक्त उत्पादन की विक्री विशेषरूप से विनिमय के लिए उत्पादन से पूर्णतया भिन्न है.

‘प्रारंभिक एकत्रीकरण नाम की लंबी हिंसात्मक और ऐतिहासिक प्रक्रिया  के द्वारा , उत्पादन के इन साधनों का निजीकरण हो गया और इनपर  पूंजीपति नामक वर्ग के लोगों का कब्ज़ा हो गया. जबकि पहले लोग सीधे अपने उपयोग के लिए श्रम किया करते थे, लेकिन अब उन्हें अपनी रोजी चलने के लिए मंडी में प्रवेश करना पड़ता है.

सो इस तथ्य से कि हम विनिमय के लिए, न कि सीधे उपयोग के लिए उत्पादन करते हैं, संपत्तिशाली और संपत्तिहीन के बीच सामाजिक विरोधाभास का पता चलता है. खुली मंडी में पहले से ही काम पर जबरदस्ती विद्यमान होती है. और इस जबरदस्ती को लागू करने के लिए किसी न किसी प्रकार की हिंसा की आवश्यकता पड़ती हैं, चाहे यह राज्य , निजी सेना या भाड़े के बटमार द्वारा हो. उत्पादन के साधनों का निजीकरण करने के लिए, हिंसा जरूरी थी और संपत्ति के सभी वैधानिक पह्लूयों को लागू करने के लिए जरूरी बनी हुई है.

अपनी जीविका को मंडी से प्राप्त करने के लिए उन्हें कोई अन्य चीज बेचनी पड़ती है. चूँकि उत्पादन के साधन निजी होते हैं, इसलिए उन्हें अपनी श्रम बेचनी पड़ती है. निसंदेह श्रम वास्तव में बेचीं नहीं जा सकती. इसकी जगह हम अपनी श्रम की क्षमता : श्रम-शक्ति बेचते हैं. हम कार्य समय की निश्चित मात्रा बेचते हैं, चाहे इसे घंटों, हफ़्तों या वर्षों में मापा जाये. यही कारण है कि मूल्य श्रम समय की अभिव्यक्ति है.

हमारी स्वयं की सृजनात्मक क्रियाशील क्षमता, वही वस्तु जो हमें इन्सान बनाती है और समाज से जोडती है, श्रम-शक्ति कहलाती है, श्रम-शक्ति जिन्स बन जाती है जिसे हम किसी को बेचते हैं. श्रम-शक्ति का,  अन्य जिन्स की भांति, उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य होता है और आपने अनुमानित किया, इनमें विरोधाभास है. विनिमय मूल्य हमारे कार्य समय के लिए भुगतान की गयी मजदूरी होती है. इसे जीविका पर खर्च द्वारा निर्धारित किया जाता है. यह भोजन, रिहाईश, कपडे, और परिवहन पर खर्च के बराबर होता है. लेकिन हमारी श्रम-शक्ति का उपयोग-मूल्य ऐसा है कि यह मूल्य सृजित कर सकता है. यही श्रम-शक्ति के दो विरोधी पहलू हैं, एक तरफ इस पर मजदूरी खर्च होती है तो दूसरी और यह मूल्य पैदा करता है.

हो सकता है आपको 5 डॉलर प्रति घंटा दिए जा रहे हो और आप 20 डॉलर प्रति घंटा की दर से मूल्य सृजित कर रहे हों. अगर ऐसा है तो आपका शोषण हो रहा है. वास्तव में, आपके शोषण की दर चार सौ प्रतिशत है. श्रम-शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास के कारण ही शोषण संभव होता है.

शोषण पूंजीवाद की पहेली – मुनाफे के अस्तित्व – को स्पष्ट करता है. पूंजीपति दिन की शुरुआत कुछ धन से करते हैं जिसे वे उत्पादन में  निवेश कर देते हैं. दिन की समाप्ति पर उनके पास कुछ जिंसों की मात्राएँ होती हैं जिन्हें वे शुरू में  खर्च किये गए धन से अधिक मूल्य पर बेच देते हैं. ऐसा लग सकता है कि इनका मुनाफा क्रय -विक्रय करने से हुआ है. हालाँकि केवल क्रय-विक्रय करने से भी मुनाफा अर्जित किया जा सकता है. लेकिन केवल क्रय-विक्रय करने से मुनाफा पैदा नहीं होता. क्योंकि खरीदना और बेचना जीरो-राशी खेल है. जब हम जिंसों का विनिमय करते हैं तो हम उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं. इस प्रक्रिया द्वारा समाज की कुल राशी के मूल्य में कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसा संभव हो सकता है कि किसी एक को चुना लग जाये. परन्तु मंडी में, किसी एक व्यक्ति का लाभ दूसरे के लिए हानि होता है. लेकिन जिंसों की खरीदफरोख्त से औसत मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती. परन्तु वास्तविक मुनाफा औसत मूल्य में वृद्धि से ही संभव है. किसी समाज के जीडीपी की कुल राशी के मूल्य में वृद्धि मुनाफे  के इस विस्तार से ही होती है.

ऐसा लगता है कि हम पहेली या किसी विरोधाभास में उलझ गए हों. मंडी में समानता और संतुलन का राज्य चलता है. मंडी में विनिमय द्वारा जिंसो के मूल्य का संरक्षण होता है. किसी एक व्यक्ति का लाभ किसी दूसरे व्यक्ति की हानि से इस प्रकार बराबर हो जाता है कि जिन्स विनिमय से अन्तर्जात संतुलन बना रहता है. परन्तु मुनाफा ऐसी अद्भुत घटना है जो जिंसों की खरीदफरोख्त होने से संभावय लगती है. कहीं न कहीं विषमता से मुनाफा पैदा हो सकता है.लेकिन थोड़े से ज्यादा पैदा होना. यह सब किस प्रकार संभव हो सकता है?

इस पहेली को हल करने के लिए मार्क्स हमें मंडी से आगे उत्पादन के  रहस्यमई क्षेत्र में देखने के लिए कहते हैं. उत्पादन में, जहाँ श्रम के शोषण से मूल्य का विस्तार हो जाता है. शोषण मंडी में विनिमय के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करता क्योंकि यह विनिमय में नहीं होता. श्रम-शक्ति को उसके मूल्य पर खरीदा जाता है. उस श्रम शक्ति के उत्पादों को उनके मूल्य पर बेचा जाता है. इन विनिमयों द्वारा कोई मुनाफा नहीं होता. मंडी से मुनाफा बिलकुल नहीं आता, बल्कि श्रम प्रक्रिया से आता है. श्रम के मूल्य से अधिक और ऊपर किया गया श्रम मुनाफे की मात्रा का निर्धारक है. जबकि मंडी समानता और संतुलन की क्षेत्र बनी रहती है, उत्पादन असमानता और शोषण का क्षेत्र है. और यह विरोधाभास श्रम शक्ति के उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य में विरोधाभास होने से ही संभव है.

अगली किश्त मार्क्स के मूल्य के नियम पर आधारित एनिमेटिड हिंदी डब फिल्म : अंतिम किश्त में समाप्य

उनको डर है कि कहीं उनकी मौत का कारण मिलावटी दूध न हो

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बात एक फिकरे में की जाये तो बुद्धिजीवी मिलावटी दूध पीने से मरेंगे नहीं. वैसे बुद्धिजीवी लफ्ज भी कोई ऐसा लफ्ज नहीं है जो, वर्गों में बँटे समाज में, कोई सेक्युलर सी चीज हो.  अगर हमारे प्रथम वाक्य की सच्चाई पर आपको शक हो रहा है, तो सुनो ! बुद्धिजीवी मरता है परजीवियों की सेवा करते हुए या फिर मेहनतकशों की. मिलावटी चीजे खाने से होनेवाली मृत्यु , मृत्यु होती ही नहीं. होता तो बस इतना है कि लूटेर वर्ग की सेवा में हाजिर बुर्जुआ वर्ग का बुद्धिजीवी जो कई साल पहले मर चुका होता है, कब्र में आराम फरमाता है.

एक बुद्धिजीवी वर्ग है जिसने एक नयी चीज ईजाद कर डाली है. वह बुद्धिजीवी जरा परमहंस टाईप का है जो पूंजीपतियों और मजदूरों के बुद्धिजीवियों से ऊपर होने के कारण ‘मुक्त चिन्तनं’ रुपी ‘दंड प्राणायाम’ द्वारा तंदरूस्त रहता है. बहरहाल अगर ऐसा बुद्धिजीवी है तो इस प्रकार के कठिन ‘योगासन्न’ करनेवाले बुद्धिजीवी की प्रतिरोधक क्षमता के मुकाबले बाबा रामदेव के योगासनं की बिसात ही क्या है ! ‘बढती उम्र के साथ सुरक्षित संभोग’ के नुस्खों-टोटकों की मदद से ‘500 वर्षों तक कैसे जीयें’ – इतना कुछ तो कोई भी ‘योगस्वामी  समझा देगा. मगर हमारे ‘परमहंस टाईप’ और ‘मुक्त चिन्तक’ बुद्धिजीवी ‘मुक्त चिन्तनं’ रुपी ‘दंडप्राणायाम’ द्वारा ‘एक्सरसाईज’ करते हैं, जिससे इन 500 वर्षों के जीवन की सार्थकता खोजने पर ‘चिन्तनं’ से जो ‘सागर मंथन’ होता है, उसके  परिणामस्वरूप ‘अमृतपान’ से, वे अमर हो गए हैं. सो मिलावटी दूध पीकर मरने से तो दूर हैं वे.

बात अगर ‘सागर मंथन’ की चली है तो थोडा इस पर भी. ब्रह्मा की दिति और अदिति पत्नियों से पैदा हुए देव और दानव भाईयों ने ‘पौराणिक काल’ में ‘सागर मंथन’ किया था. शेषनाग की रस्सी बनायीं गयी थी जिसके खतरेवाले – यानिकी मुख की ओर के सिरे पर दानव थे. ‘रक्तबीज’ नामक दानव ‘अमृत’ ले उड़ा था और देवतायों ने उसे काटकाटकर मारना शुरू कर दिया. मगर ‘रक्तबीज’ का रक्त जहाँ-जहाँ गिरता गया, और रक्तबीज पैदा होते गये. मौका देखकर, उस वक्त की सियानिसियास्त ने, रक्तपात बंद करवा दिया था.

भारत में मोटापा परजीवी वर्ग के लिए चिंतनीय है तो अमेरिका में बुर्जुआ वर्ग, हमारी धरती के  मुक्त चिंतकों की मेहनत के सदके, इससे मुक्त हो रहा है. मगर वहाँ का सर्वहारा वर्ग अब भी बहुसंख्यक है. वह जंक फ़ूड’ खाने को अभिशप्त है और  मोटापे का शिकार बनता जा रहा है. खैर, हमारा यहाँ का स्थानीय ‘मुक्त चिन्तक’ स्थानीय बुर्जुआ वर्ग की चेतना में इतना इजाफा तो कर ही देगा कि वे थोडा सा और अधिक सियाने हो जाएँ. सियाने होने की देर है, वे सभी भौतिक पदार्थ जैसे ‘ओरगेनिक फ़ूड’ तो पहले से ही, उनकी सेवा में हाजिर होने के लिए, और  हमारे सर्वहारा वर्ग के हाथों से निकलने के लिए छटपटा रहे हैं ?

उत्पादन प्रक्रिया रूपी वर्तमान ‘सागर मंथन’ के उस सिरे पर जहाँ शेषनाग का सिर है, सर्वहारा लगा हुआ है. उत्पादन रूपी अमृत के बड़े हिस्से का रस्सावदान परजीवी पूंजीपति और उनके चाटुकार कर रहें हैं. मगर मुक्त चिंतको की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वे ‘रक्तबीज’ नहीं है. अलबता इस ब्लॉग की ओर से मुक्त चिंतकों को इस फिकरे के साथ शुभकामनाएं  – “तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हो पचास हजार” ?

तथाकथित मुख्य धारा की संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियों के 99 फीसदी से भी अधिक ‘बुद्धिजीवी’ कम्युनिस्ट काडर ने मार्क्स की पूंजी पढ़ी ही नहीं. और जनाब सोचते हैं कि मजदूर और किसान के शोषण का स्थान मंडी है.

हमारे एक  पुराने कामरेड अनाज मंडी या लेबर चौक में किसानों के लिए अधिक भाव और मजदूरों की मजदूरी में बढौतरी (पूंजीवाद की चौहदी के भीतर की लड़ाई) के लिए कवायद में मशगूल रहते हैं. हालाँकि हमारे विश्लेषण का ऐसा कोई अति वामपंथी ‘वर्ज़न’ नहीं है कि इस प्रकार का कोई संघर्ष न हो. हम तो इतना कहना चाहते हैं कि पूंजीवाद द्वारा विकसित आधुनिक मंडी ऐसा स्थान है जहाँ ‘कमोडिटी’ के रूप में उपलब्ध श्रम-शक्ति और किसानों के अनाज का मूल्याँकन सही और वैज्ञानिक तरीके से होता है. जहाँ धोखाधड़ी की गुंजाईश ‘वर्चुयली’ शून्य होती है. सो इन बुद्धिजीवियों का चिंतन कोई घबराहट पैदा नहीं करता, ‘पूंजी’ लिखने के बाद मार्क्स के लिए विश्व के बुद्धिजीवियों को संबोधित करना कोई बड़ी समस्या नहीं थी. सो उन्होंने कह दिया कि अगर आपमें से कोई भी ईमानदारी से मेरे ‘पूंजी’ लिखने के प्रोजेक्ट पर लगा होता, तो वही नतीजे निकलते जो मेरी पुस्तक में निकले हैं. मगर हमारा यह 99 फीसदी तथाकथित मार्क्सवादी काडर अनुभववादी होने के कारण क्लासिकीय मार्क्सवादी पुस्तकों को ‘आस पडौस’ पर रोब झाड़ने के लिए रखता है. सिद्धांत और अनुभव में क्या फर्क होता है, भाड़ में जाये ये सब !

और अंत में, फ्रेडरिक एंगेल्स के ये शब्द : ” हर चीज तर्क के सिंहांसन के संमुख अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करती है या  अस्तित्व त्याग देती है .

एक दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी ने ली वामपंथियों की क्लास

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लिंक जोड़ने के लिए देखें —  ‘दैनिक जागरण’ में डा. सरोजनी पाण्डेय और डा. भरत झुनझुनवाला द्वारा मार्क्सवाद की कमियों पर व्याख्यान

मार्क्सवाद और देश दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि पूंजीवाद अपने जन्म से ही लंगड़ा-लूला पैदा हुआ है और उसे मेहनतकश अवाम ने न केवल चुनौतीपूर्ण टक्कर ही दी है, बल्कि बीसवीं सदी में बुर्जुआ वर्ग से सत्ता छीनकर सोवियत यूनियन और चीन में महान समाजवादी तजुर्बे भी किये हैं. हालाँकि अपने इन प्रारंभिक तजुर्बों में मेहनतकश वर्ग ,वक्ती तौर पर, हार गया है और सोवियत यूनियन और यहाँ तक की चीन की वर्तमान संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडे तले पूंजीपति वर्ग ने अपनी सत्ता को स्थापित कर लिया है. डॉ. झुनझुनवाला [ देखें — वामपंथ की सैद्धांतिक भूल ] बंगाल में सत्तासीन रही संशोधनवादी पार्टी की हार का ज़िक्र करते हैं और मार्क्सवाद की थ्योरी को त्रुटिपूर्ण होने का फ़तवा सुना देते हैं, बिना यह जाने कि मार्क्सवाद कोई कठमुल्ला उपदेशात्मक शास्त्र नहीं है, बल्कि वर्गीय समाज के संघर्ष में, ऐसा समाज शास्त्र है जो सर्वहारा पक्षावलम्बी है. मार्क्सवाद ने अपने संघर्ष के दौरान न केवल पूंजीपति वर्ग से टक्कर ली है बल्कि लाल झंडे के तले अराजकतावाद, आतंकवाद, अर्थवाद, ट्रेड-यूनियनवाद आदि संशोधनवाद, जो मार्क्सवाद को इतना पतला और कमजोर कर देना चाहता है ताकि यह पूंजीपति वर्ग की सत्ता को चुनौती न देकर उसकी सेवा में हाज़िर हो और अपने संसदमार्गी कृत्यों से मजदूर वर्ग के आक्रोश पर ठन्डे पानी के छींटे मारकर उनकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करता रहे, केखिलाफ भी संघर्ष किया है.

अपने इस आलेख में, डॉ. झुनझुनवाला इस प्रकार के निष्कर्ष निकालते हैं जैसे,  ‘मार्क्सवादी बाजार विरोधी है जबकि बाज़ार सभी को उनकी क्षमतानुसार काम करने के अवसर प्रदान करता है’. बाज़ार का महिमामंडन करते हुए वे लिखते हैं,
“हम देखते हैं कि आर्टिस्ट को पेंटिंग बनाने में ही मजा आता है। पेंटिंग बिक गई, इतनी ही जानकारी उसके लिए पर्याप्त होती है। किसान गेहूं का उत्पादन करके प्रफुल्लित होता है, यद्यपि उसे पता नहीं होता कि रोटी कौन खाएगा। श्रमिक को यदि उसके स्वभाव के अनुकूल काम मिल जाए तो वह सुखी होता है। आर्टिस्ट को हल चलाने में लगा दिया जाए तो वह दुखी होगा और किसान को पेंटिंग करने के लिए ब्रश थमा दी जाए तो वह भी दुखी होगा। विशेष यह कि व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य ढूंढने में बाजार से मदद मिलती है। श्रमिक मन चाहा कार्य पकड़ सकता है। इसलिए मूल रूप से बाजार सुखदायी है।

डॉ. झुनझुनवाला जी, किसान, श्रमिक, और आर्टिस्ट जन्म से पैदा नहीं होते. व्यक्ति का मनपसंद कार्य वह नहीं होता जो वह कर रहा होता है. वर्गीय समाज का विकास इसका मुख्य निर्धारक होता और व्यक्ति की इच्छा गौण. मोटे तौर पर वर्गीय समाज आदिम साम्यवाद से लेकर मालिक-गुलाम, सामंत-किसान और अब पूंजीपति-मजदूर — चार चरणों से होकर गुजरा है . यह सब किसी एक व्यक्ति के चाहने या न चाहने से नहीं हुआ. वर्ग-संघर्ष इसका वस्तुगत चरित्र रहा है.बाजार भी इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया से पैदा हुआ है. चूँकि पूंजीपति वर्ग और  समाज के अस्तित्व के लिए बाज़ार जरूरी है, इसलिए इसका महिमामंडन भी जरूरी है, जोकि आप बाखूबी कर रहे हैं. आपका यह “मूल रूप से बाजार” श्रमिक – जिसके पास अपनी श्रम-शक्ति बेचने के सिवा और कुछ नहीं होता – को नहीं, आपको सुखदायी लगता है।

हमारा यह मानना है कि मार्क्सवाद बाज़ार विरोधी है लेकिन उस प्रकार से नहीं जिस प्रकार डॉ. झुनझुनवाला पेश करते हैं. अपने सारे आलेख में वे ,बड़ी चालाकी के साथ, मार्क्स के मूल्य के श्रम-सिद्धांत का ज़िक्र तक नहीं करते और मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ सिद्ध कर देते हैं. यही वह बाज़ार होता है जहाँ श्रम-शक्ति पण्य (कमोडिटी) के रूप में बिकती है और अपनी विशिष्टता ( श्रम-शक्ति अकेली ऐसी पण्य है जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है) के कारण अतिरिक्त मूल्य पैदा करती है जिसमें से पूंजीपति वर्ग न केवल अपना मुनाफा वसूलता है बल्कि उसकी सेवा में हाज़िर राज्य और उसकी संस्थाओं के खर्च भी निकलते हैं. अपनी विशेष हैसियत के कारण, पूंजीवादी उत्पादन क्रिया से लूटे गये अतिरिक्त मूल्य पर हक़ का पहला दावेदार पूंजीपति वर्ग होता है. यही कारण है कि इस वर्ग की खुशामद द्वारा बुर्जुआ वर्ग का  बुद्धिजीवी (ध्यान रहे बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा संकल्प नहीं है जिसकी अवस्थिति वर्ग-हितों से ऊपर हो ) चंद हड्डियों की अपेक्षा पाले रहता है. ऐसा नहीं है कि एक संशोधनवादी, संसदमार्गी  और मजदूर वर्ग में अर्थवाद द्वारा उसकी राजनीतिक चेतना को कुंठित करनेवाली माकपा ‘स्टाईल मा‌र्क्सवादियों की पार्टी’ की हार से डॉ. झुनझुनवाला को मार्क्सवाद की थ्योरी में त्रुटियाँ दिखाई देने लगी हों और वे बड़ी ईमानदारी से मार्क्सवाद पर चिन्तन-मनन करने लगे हों. कारण उनकी पूंजीवादी वर्ग-स्थिति है और वे माकपा जैसी संशोधनवादी पार्टी की हार से व्याकुल इसलिए हैं कि कहीं मजदूरों की, इन संशोधनवादी पार्टियों के प्रति, आस्था न डगमगा जाये और वे, विकल्प के तौर पर, अपनी सच्ची कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण न कर लें.

मार्क्स ने पूंजीवादी समाज की विशेषताओं में से एक – श्रम के अलगाव का ज़िक्र किया है. अकेला मजदूर वर्ग ही सक्षम है जो पूंजीपति वर्ग से संघर्ष द्वारा – वर्गीय समाज को ख़त्म करने की प्रक्रिया द्वारा – इस मर्ज़ का इलाज करेगा. इसलिए मार्क्सवाद की अवस्थिति वर्तमान और भविष्य में है. लेकिन डॉ. झुनझुनवाला मार्क्स को उस ग्रामीण परिवेश में भेज देते हैं, जहाँ  “गाँव का व्यक्ति किसान के लिए हल बनाता है …वह उसमें अपने प्राण आहूत करता है। उसके सामने ही किसान उसका उपयोग करता है, जिसे देखकर दोनों का मन लहलहाता है।” पता नहीं किस युग में और कैसे किसान जोकि  सामंतो द्वारा शोषित रहा है अपनी उस वक्त की मेहनतकश की स्थिति पर प्रफुल्लित होता रहा है ? ‘अह़ा ग्राम्य जीवन’ का ‘नोस्तालजिया’ मार्क्स का नहीं डॉ. झुनझुनवाला का है जिन्होंने बीते का रुदन करनेवाले कवियों से इसका महिमा मंडन सुन रखा है   वे भूल जाते हैं कि मार्क्स की रचनाओं के तीन स्रोत और तीन अंग उस वक्त के विकसित पूंजीवाद के तीन देशों – दर्शन के लिए जर्मनी, अर्थशास्त्र के लिए इंग्लैण्ड और क्रांतियों व समाजवाद के लिए फ़्रांस – से लिए गए हैं. अब तो सारा विश्व पूंजीवाद के नियमों के अनुसार गतिमान है और कृषि में भी किसान बैलों के पीछे-पीछे हल पकडे नहीं भटकता बल्कि कृषि संबंधी उत्पादन में उसके श्रम की भूमिका गौण हो गयी है और मजदूर वर्ग ही वहाँ उत्पादन क्रिया में मुख्य रूप से सक्रीय है.  कृषि उत्पादन में पूंजीवादी संबंधों की मुकम्मल स्थापना ने छोटे किसानों की तबाही निश्चित कर दी है और वे मजदूर वर्ग की अवस्थिति और दृष्टिकोण अपनाने को बाध्य होते जा रहे हैं. भविष्य में उनका बड़ा हिस्सा मजदूरों द्वारा संपन्न की जानेवाली इक्कीसवीं सदी की नई समाजवादी क्रांतियों के लिए अहम भूमिका अदा करेगा.

डॉ. झुनझुनवाला  लिखते हैं, “एक प्रमुख अखबार ने लिखा है कि वामपंथी विचारधारा तब तक प्रासंगिक रहेगी जब तक देश में गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहेगी। यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित है.”

यह स्थान वामपंथ के लिए सुरक्षित हो सकता है लेकिन एक मार्क्सवादी के लिए नहीं. मार्क्सवाद की विशिष्टता है कि इसने इस वस्तुगत सच्चाई की निशानदेही की है जिसमें, पूंजीवाद ने अपनी विकास प्रक्रिया के दौरान, समाजके एक छोर पर अकूत धन-दौलत और दूसरे सिरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया है. गरीबी,  बीमारी और असमानता जैसी अलामतें इसके जरूरी बाई-प्रोडक्ट हैं. मार्क्सवाद ने एक और कटु सत्य इंगित किया है जो पूंजीपतियों और उनके डॉ झुनझुनवाला जैसे बुद्धिजीविओं को सताता रहता है. पूंजीवाद द्वारा पैदा किये गए कंगाली के इस विशाल समुद्र के सापेक्ष पूंजीपतियों की खुशहाली की चंद मीनारों की औकात अल्पसंख्यक और कमजोर की है जो  कभी भी भरभराकर गिर सकती हैं. मार्क्सवादी विचारधारा की प्रासंगिगता, केवल देश या दुनिया में, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और असमानता रहने तक ही नहीं है बल्कि यह प्रासंगिक रहेगा तब तक, जब तक, वर्गीय समाज का अस्तित्व रहेगा. केवल वर्गविहीन समाज में इसका स्थान म्यूजियम में होगा.

वे अपनी कलम मजदूर वर्ग की तानाशाही पर चलाते हुए मध्यम वर्ग में इस बुर्जुआ लोकतंत्र के भ्रम को स्थापित करने की कोशिश करते हैं. हो सकता है कि पढेलिखे मध्यम वर्ग के एक हिस्से की, इस बुर्जुआ लोकतंत्र में भारी आस्था हो, लेकिन मजदूर वर्ग इस बात को भली-भांति समझता है कि यह लोकतंत्र बुर्जुआ वर्ग का, बुर्जुआ वर्ग के लिए लोकतंत्र है. मजदूर वर्ग के लिए यह तानाशाही ही है. किसी भी वर्गीय समाज में ऐसा लोकतंत्र नहीं हो सकता जो सर्वमान्य हो और न ही सर्वहारा वर्ग, जब वह सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, बुर्जुआ वर्ग और उसके पैरोकारों को लोकतान्त्रिक हक़ देने की छूट दे सकता है, क्योंकि इसका अर्थ होगा – पूंजीवाद की पुनर्स्थापना.

अपने आलेख के अंत में, वे वामपंथ को सैद्धांतिक संजीवनी की घुट्टी पिलाते हुए  और “थ्योरी का  नवीनीकरण” करने की सलाह देते हुए “बाजार का बहिष्कार करने के स्थान पर बाजार पर लगाम लगाने” और ” सरकारी तंत्र के विस्तार के स्थान पर ऐसी पालिसी की मांग” जो  “हल्के सरकारी तंत्र से भारी जनहित हासिल करे” जैसी चलताऊ बातों करके खुश हो लेते हैं, जैसेकि उन्होंने अपने इस आलेख में मार्क्सवाद की ऐसी की तैसी कर दी हो. उनके हलके सरकारी तंत्र और जनतंत्र पर मार्क्सवाद का कहना है कि जब मजदूर वर्ग समाजवाद के संक्रमण काल में बुर्जुआ वर्ग का नामोनिशान मिटा देगा तो उसे किसी भी तरह के -हलके या भारी तंत्र – की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी.

मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय – दूसरी किश्त

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आलेख की प्रथम किश्त के लिए देखें : मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय

नोट : इस आलेख में मार्क्स की रचनाओं संबंधी दिए गए बहुत से नुक्तो से शहीद भगत सिंह विचार मंच असहमत है, लेकिन नेट पर हिंदी भाषा में इस प्रकार की सामग्री का नितांत अभाव खटकता है जिसे दूर किया जाना चाहिए.

मार्क्स और अर्थशास्त्र

पूंजी का प्रथम खंड, पण्य उत्पादन के विचार के विश्लेषण से प्रारंभ होता है. पण्य की परिभाषा है, बाह्य उपयोगी वस्तु जिसे मण्डी में विनिमय के लिए प्रस्तुत किया जाता है. इस प्रकार, पण्य उत्पादन के लिए दो जरूरी शर्ते हैं; मण्डी का अस्तित्व जिसमें विनिमय हो सके और सामाजिक श्रम-विभाजन जिससे भिन्न-भिन्न लोग भिन्न भिन्न उत्पादों का उत्पादन करें क्योंकि इसके बिना विनिमय के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं बचता. मार्क्स कहते हैं की पण्य में दो बातें होती हैं ; उपयोग मूल्य (value) – अन्य शब्दों में उपयोग और विनिमय मूल्य – शुरू में समझने के लिए हम वस्तु की उस कीमत(price) से लेते हैं जिसका हम भुगतान करते हैं. मार्क्स का मानना है कि उपयोग मूल्य को आसानी से समझा जा सकता है परन्तु उनका दृढतापूर्वक आग्रह है कि विनिमय मूल्य एक पेचीदा मसला है और सापेक्ष विनिमय मूल्य व्याख्या की मांग करते हैं. क्यों किसी पण्य की एक निश्चित मात्रा किसी अन्य पण्य की एक निश्चित मात्रा से बदल ली जाती है ? पण्य के उत्पादन के लिए लगने वाले श्रम की शर्त द्वारा वे इसकी व्याख्या करते हैं. यही नहीं वे कहते है कि जरूरी सामाजिक श्रम वह श्रम होती है जिसे किसी अर्थव्यवस्था में किसी उत्पादक कार्य के लिए, श्रमिक वर्ग में मौजूद उत्पादकता और प्रबलता के औसत स्तर तक निचोड़ा जाता है. इस प्रकार, मूल्य के श्रम सिद्धांत का आग्रह है कि किसी पण्य के मूल्य का निर्धारण उस पर लगी सामाजिक जरूरी श्रम की मात्रा के द्वारा होता है. मूल्य के श्रम सिद्धांत की पैरवी के लिए मार्क्स अपने तर्कों को दो चरणों में पेश करते हैं. पहले चरण में उनका तर्क है कि अगर दो वस्तुओं की तुलना की जाती है तो इनको, किसी समान संकेत के दोनों तरफ रखने के अर्थ में, तीसरी वस्तु की आवश्यकता होगी जो मात्रा में इन दोनों वस्तुओं के समान हो ताकि ये दोनों वस्तुएं उस वस्तु से समानयन हो जाएँ. चूँकि अब दोनों वस्तुओं को आपस में बदला जा सकता है इसलिए, मार्क्स कहते हैं, अब जरूरी है कि कोई ऐसे तीसरी वस्तु हो जिसमें इन दोनों वस्तुओं का साझा हो. यही से दूसरे चरण के लिए प्रोत्साहन मिलता है जो कि उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ की खोज है. यह उपयुक्त ‘ तीसरी वस्तु ‘ केवल श्रम ही हो सकती है जिसमें साझा गुण हैं.

मार्क्स कहते हैं कि पूंजीवाद के विशिष्ट गुण हैं जिसमें केवल वस्तुओं का विनिमय ही नहीं होता बल्कि पण्यों की खरीद और उनको अन्य पण्यों जिनमें और अधिक मूल्य हो, में रूपांतरण द्वारा मुनाफा अर्जित करने के उद्देश्य से, धन के रूप में पूंजी को बढ़ाना होता है. मार्क्स का दावा है कि उनसे पहले के किसी भी सिद्धांतकार ने पर्याप्त रूप से, इस बात की व्याख्या नहीं की है कि कैसे पूंजीवाद समुचित रूप में मुनाफा पैदा करता है. मार्क्स इसका हल पूंजीवाद में श्रमिक के शोषण में देखते हैं. उत्पादन की स्थिति पैदा करने के लिए, पूंजीपति पण्य के रूप में श्रमिक की श्रम-शक्ति – उसके एक निश्चित कार्य दिवस के लिए काम करने की क्षमता – को खरीदता है. इस पण्य के मूल्य का निर्धारण भी अन्य पण्यों के मूल्य के निर्धारण की भांति; इसके उत्पादन में खर्च हुई सामाजिक जरूरी श्रम द्वारा होता है. इस केस में एक कार्य दिवस की श्रम-शक्ति का मूल्य उन पण्यों के मूल्य के समान है जो उसे (श्रमिक को) एक दिन के लिए जीवित रखने के लिए पर्याप्त हैं. मान लीजिए कि इन पण्यों के उत्पादन पर चार घंटे खर्च होते हैं तो कार्य दिवस के पहले चार घंटे उस मूल्य को पैदा करने में खर्च किये जायेंगे जिसे श्रमिक को मजदूरी के रूप में भुगतान किया जाता है. इसे जरूरी श्रम कहते हैं. इसके अलावा की जानेवाली श्रम को अतिरिक्त श्रम कहते हैं जो पूंजीपति के लिए अतिरिक्त (बेशी) मूल्य पैदा करती है. मार्क्स के अनुसार यही अतिरिक्त मूल्य पूंजीपति के मुनाफे का स्रोत होता है. मार्क्स के विश्लेषण के अनुसार अकेली श्रम-शक्ति ही ऐसी पण्य है जो अपनी औकात से अधिक मूल्य पैदा कर सकती है. इसी कारण इसे, अस्थिर पूंजी (variable capital ) के नाम से जाना जाता है. अन्य पण्य अपने से निर्मित नई पण्य में अपना मूल्य स्थानातरण कर देती हैं लेकिन कोई नया मूल्य पैदा नहीं कर सकती. उन्हें स्थिर पूंजी (constant capital ) कहा जाता है. मुनाफा जरूरी श्रम से प्राप्त मजदूरी से ऊपर की गयी अतिरिक्त श्रम से आता है. यही है मुनाफे का अतिरिक्त मूल्य सिद्धांत.

इतिहास का सिद्धांत

इस सिद्धांत के बारे में मार्क्स विस्तारपूर्वक ज्यादा नहीं लिखते. इसलिए इसकी विषय-वस्तु को उनकी अलग-अलग रचनाओं – दोनों प्रकार से जहाँ वे भूतकाल  और भविष्य की घटनाओं का सैद्धांतिक विश्लेषण करने की कोशिश करते हैं और दूसरा विशुद्ध सैद्धांतिक प्रकृति का विश्लेषण –  से लेना पड़ता है. १८५९ की राजनीतिक अर्थशास्त्र की भूमिका ने प्रामाणिक ख्याति अर्जित कर ली है. यद्यपि १८४५ में फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर लिखी गई ‘जर्मन वैचारिकी’ एक मजबूत प्रारंभिक स्रोत है जिसमें मार्क्स ऐतिहासिक भौतिकवाद संबंधी दृष्टिकोण के मूल नियमों के बारे में लिखते हैं. पहले हम इन दोनों रचनाओं की संक्षिप्त रूपरेखा खींचेगे, तत्पश्चात उनके अब के सबसे प्रबल पक्षसमर्थक जी. ए. कोहेन की मार्क्स के इतिहास संबंधी सिद्धांत की पुनर्रचना पर निगाह डालेंगे.

जर्मन वैचारिकी

जर्मन वैचारिकी में मार्क्स और एंगेल्स उस वक्त के जर्मनी के दर्शन जिसकी खासियत विचारवाद थी, के विरुद्ध नए भौतिकवादी तरीको को रखते हैं. उनकी शुरुआत, जैसा कि वे कहते हैं, ” असल मनुष्यों”  से होती है  जोकि आवश्यक रूप से उत्पादनशील होते हैं और उनके लिए जरूरी होता है कि वे अपनी भौतिक जरूरतों की पूर्ति हेतू निर्वाह के साधनों का उत्पादन करें. जरूरतों की संतुष्टि से, भौतिक और सामाजिक, दोनों प्रकार की जरूरतें पैदा हो जाती हैं और मानवीय उत्पादक शक्तियों के विकास की दशानुसार नए सामाजिक रूपों का उदय हो जाता है. भौतिक जीवन सामाजिक जीवन को नियत करता है. इसलिए सामाजिक विश्लेषण की प्रथम दिशा भौतिक उत्पादन से सामाजिक रूपों की ओर और तत्पश्चात चेतना के रूपों की ओर है. जैसे-जैसे उत्पादन के भौतिक साधन विकसित होते जाते हैं , वैसे-वैसे ‘सहयोग के ढंग’ या आर्थिक संरचनाओं का  उत्थान और पतन होता रहता है और अंत में जब श्रमिक वर्ग की पीड़ादायक स्थिति और विकल्प के प्रति उनकी जागरूकता, उन्हें क्रांतिकारी बनने के लिए उकसाएगी तो साम्यवाद वास्तविक संभावना बन जायेगा.

1859 प्राक्कथन

‘जर्मन वैचारिकी’ के मसौदे में ऐतिहासिक भौतिकवाद के सभी कुंजीवत तत्व मौजूद हैं, निसंदेह, इसकी शब्दाबली मार्क्स की अधिक विकसित लेखन सामग्री के बराबर नहीं है.  1859 प्राक्कथन में मार्क्स के वक्तव्य ने इसे और अधिक प्रखर रूप में प्रस्तुत किया है. प्राक्कथन में मार्क्स के विचारों की कोहेन की पुनर्रचना की शुरुआत, जैसाकि वे कहते हैं, विकास सिद्धांत जोकि पूर्व अनुमानित है न कि प्राक्कथन में स्पष्ट रूप से वर्णित, से होती है. इस सिद्धांत के अनुसार उत्पादक शक्तियों की अभिरुचि, समय के साथ-साथ, ओर अधिक शक्तिशाली बनने के अर्थ में, विकास की ओर होती है. इसका अर्थ यह नहीं है कि वे सदैव विकसित ही होती रहती हैं, परंतू उनमें इस प्रकार का रुझान होता है. उत्पादक शक्तियां , उत्पादक तरीके से लागू होनेवाले ज्ञान : तकनीक के साथ उत्पादन के साधन हैं. दूसरा सिद्धांत प्रमुखता का सिद्धांत है जिसके दो पहलू हैं. पहला सिद्धांत कहता है कि  उत्पादक शक्तियों के विकास के स्तर द्वारा आर्थिक संरचना की प्रकृति की व्याख्या की जाती है और दूसरे सिद्धांत के अनुसार अधिसंरचना – समाज की राजनीतिक और वैधानिक संस्थाओं – की प्रकृति की व्याख्या आर्थिक संरचना की प्रकृति के द्वारा होती है. समाज की वैचारिकी, जैसे समाज में विद्यमान धार्मिक, कलात्मक, नैतिक और दार्शनिक मतों की प्रकृति की व्याख्या भी समाज की आर्थिक संरचना की शर्तों के अनुसार होती है.

क्रांति और युग परिवर्तन को किसी आर्थिक संरचना द्वारा उसकी उत्पादक शक्तियों के और अधिक विकास की सक्षमता के अभाव के परिणामस्वरूप समझा सकता है. विकास के इस चरण पर उत्पादक शक्तियों के विकास के पैरों में बेड़ियाँ पड़ जाती हैं, और, सिद्धांतानुसार, जैसे ही कोई आर्थिक संरचना विकास में बाधक बन जाती है – विस्फोट हो जाता है – क्रांति घटित हो जाती है और परिणामस्वरूप एक ऐसी आर्थिक संरचना इसका स्थान ग्रहण करती है जो उत्पादक शक्तियों के विकास को आगे बढ़ाये.

सिद्धांत के इस प्रारूप में आकर्षक सादगी और शक्ति है. सुखद लगता है कि मानव उत्पादक शक्ति समय के साथ-साथ विकसित होती रहती है और यह भी सुखद लगता है कि आर्थिक संरचनाओं का अस्तित्व तब तक कायम रहता है जब तक वे उत्पादक शक्तियों को विकसित करती रहती हैं और ऐसा करने के अभाव में उनका प्रतिस्थापन हो जाता है. परंतू उस वक्त गंभीर समस्याएं उभर आती हैं जब हम इन हड्डियों पर और अधिक मांस चढाने की कोशिश करते हैं.

व्यावहारिक व्याख्या

अंग्रेजी भाषीय राजनीतिक दर्शन में कोहेन के काम से पहले ऐतिहासिक भौतिकवाद एक सुसंगत दृष्टिकोण के रूप में नहीं माना जाता था. इस द्वेष को एच. बी. एक्टन के समापन शब्दों – युग का भ्रम ; ” “मार्क्सवाद एक दार्शनिक गड़बड़झाला है” में व्यक्त किया जा सकता है. कोहेन द्वारा विशेष रूप से अपनायी गई एक मुश्किल उत्पादक शक्तियों की प्राथमिकता और मार्क्स द्वारा उत्पादक शक्तियों के विकास के आर्थिक  संरचना की प्राथमिकता के दावों के बीच की विसंगतियां हैं. उदाहरण के लिए ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ में मार्क्स कहते हैं, ” उत्पादन के औजारों की सतत क्रांति किये बिना बुर्जुआजी अपना अस्तित्व कायम नहीं रख सकती”. ऐसा लगता है कि यह आर्थिक संरचना – पूंजीवाद जो कि उत्पादन की शक्तियों का विकास करता है – को कारणात्मक और व्याख्यात्मक प्राथमिकता देता हो. उपरी तौर पर ही सही, लेकिन कोहेन इसे स्वीकार करते हैं जिससे एक विसंगति उत्पन्न हो जाती है. ऐसा लगता है कि आर्थिक संरचना और उत्पादक शक्तियां ; दोनों एक दूसरे पर वर्चस्व बनाये रखती हों. ‘अंतिम तौर पर निर्धारक’ या ‘द्वंदात्मक संबंधों का विचार’ जैसे अस्पष्ट संकल्पों से असंतुष्ट होकर कोहेन चैतन्य रूप से स्पष्टता के मानक और विश्लेषणात्मक दर्शन की शक्ति द्वारा ऐतिहासिक भौतिकवाद की पुनर्रचना का वर्जन देने की कोशिश करते हैं.

इस सैद्धांतिक नवाचार की कुंजी व्यावहारिक व्याख्या  ( कई बार इसे परिणामात्मक व्याख्या भी कहा जाता है ) की अवधारणा के आग्रह में है. हर्षपूर्वक, यहाँ से आवश्यक गमन “आर्थिक संरचना उत्पादक शक्तियों का विकास करती ही हैं” की ओर होता है, लेकिन इसे स्वीकार कर लेने के पश्चात, सिद्धांत के अनुसार, प्रश्न उठता हैकि हमारे पास पूंजीवाद क्यों है ? अन्य शब्दों में, अगर पूंजीवाद उत्पादक शक्तियों को विकसित करने में असफल हो जाता है तो यह ओझल हो जायेगा. और हकीकत में, यह ऐतिहासिक भौतिकवाद में खूबसूरती से फिट बैठता है. क्योंकि मार्क्स दावा करते हैं कि जब आर्थिक संरचना उत्पादक शक्तियों को विकसित नहीं करती – जब ये उसके पैरों की बेड़ियाँ बन जाती हैं – इसका क्रांतिकरण हो जाता है और युग बदल जाता है. इस प्रक्रार, “पैरों की बेड़ियों” का विचार व्यावहारिक व्याख्या के विरुद्ध हो जाता है. आवश्यक रूप से, ‘पैरों की बेड़ियाँ’ से अभिप्राय किसी आर्थिक संरचना के क्रियाविहीन होने से हैं.

अब साफ़ है कि इससे ऐतिहासिक भौतिकवाद में सुसंगति आ जाती है. परंतू सवाल पैदा होता है कि क्या यह इसके लिए बहुत बड़ी कीमत नहीं है ? क्या व्यवहारिक व्याख्या सुसंगत प्रणाली का औजार है ? समस्या है कि हम पूछ सकते हैं कि वह कौनसी चीज है जो यह शर्त उत्पन्न करती है कि कोई भी आर्थिक संरचना तब तक जीवित रहेगी जब तक वह उत्पादक शक्तियों को विकसित करती रहेगा ? जॉन एलस्टर इसे सख्ती से कोहेन के विरुद्ध रखते हैं. अगर हम तर्क करें कि इतिहास का मार्गदर्शन करनेवाला कोई कर्ता होता है जिसका उद्देश्य, जहाँ तक संभव हो, उत्पादक शक्तियों को विकसित करना होता है, तब इसका अर्थ होगा कि इस प्रकार का कर्ता सबसे बढ़िया काम करनेवाली आर्थिक संरचना का चुनाव करके इस उद्देश्य की पूर्ति हेतू इतिहास में दखल दे. यदपि मार्क्स इस प्रकार की कोई भी  आधिभौतिक मान्यताएं नहीं देते. कई बार मार्क्स और कई बार कोहेन के बारेमें, इतिहास  में उद्देश्य संबंधी आग्रह के बारेमें, एलस्टर बहुत आलोचनात्मक हैं.

कोहेन इस मुश्किल से भली-भांति अवगत हैं परन्तु जैवविकास में इसके प्रयोग की ऐतिहासिक भौतिकवाद के साथ तुलना करते हुए, वे व्यावहारिक व्याख्या का बचाव करते हैं. समकालीन जीव विज्ञान में यह आम है कि चीते की धारियों और पक्षियों की हड्डियों के खोखलेपन की व्याख्या उनके इन गुणों के आधार पर होती है. यहाँ उद्देश्य स्पष्ट हैं और ये उद्देश्य किसी और के नहीं हैं. इसका स्पष्ट विरोध एक है कि जैवविकास में इन व्यावहारिक व्याख्याओं के लिए हम एक कारणात्मक कहानी – एक ऐसी कहानी जिसमें अवसर विभेद और सर्वोतम का जीवित रहना सम्मलित होते हैं – देते हैं. इस प्रकार, इन व्यावहारिक व्याख्याओं का कारणात्मक फीडबैक लूप द्वारा बचाव किया जाता है जिससे क्रियाविहीन तत्त्व, मुकाबले में मौजूद बेहतर तत्त्वों द्वारा फ़िल्टर कर दिए जाते हैं. पृष्ठभूमि में मौजूद इन विवरणों को कोहेन ‘विवर्धन’ (elaborations ) कहते हैं और व्यावहारिक व्याख्याओं में इस प्रकार के ‘विवर्धन’ की जरूरतों को स्वीकार करते हैं. परंतू वे मानक कारणात्मक व्याख्याओं में भी ‘विवर्धन’ की जरूरत पर बल देते हैं. हम,उदाहरण के लिए, इस प्रकार व्याख्या से संतुष्ट हो जाते हैं कि गुलदस्ता टूट गया क्योंकि इस फर्श पर फैंक दिया गया परंतू बहुत सारी मात्रा में, और सूचना दरकार होती है कि कैसे ये व्याख्याएँ कार्य करती हैं. कोहेन दावा करते हैं कि  व्यावहारिक व्याख्याओं को प्रस्तावित करना न्यायसंगत ठहराया जा सकता है बेशक हम इनके ‘विवर्धन’ से अनजान हों. वास्तव में, जीव विज्ञान में भी, व्यावहारिक व्याख्याओं का कारणात्मक ‘विवर्धन’ विस्तृत रूप से. अभी-अभी प्राप्त हुआ है. डार्विन और लामार्क से पहले, कारणात्मक विवर्धन का अकेला उम्मीदवार ‘ भगवान के उद्देश्य’ से अपील ही था. डार्विन ने एक सुसंगत प्रणाली को रेखांकित किया परन्तु जेनेटिक सिद्धांत के अभाव में, वे इसे विस्तृत विवरण के साथ विस्तार न दे पाए. इस मामले में हमारा ज्ञान भी अभी तक अपूर्ण है. यद्यपि, यह कहना एकदम तर्कसंगत लगता है कि पक्षियों की खोखली हड्डियाँ होती हैं क्योंकि ये उनकी उडान में मददगार होती हैं. कोहेन का पक्ष है कि सबूत में वजन  कि जीव अपने वातावरण के अनुसार अनुकूलित हो जाते हैं, डार्विन के पूर्व के नास्तिक को भी व्यावहारिक व्याख्या के न्यायसंगत दावे की आज्ञा दे देगा. इस प्रकार किसी उम्मीदवार के अभाव में भी, अगर विवेचनात्मक सबूत में वजन हो, व्यावहारिक व्याख्या को प्रस्तावित करने को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है.

इस मोड़ पर, मसले का विभाजन सैद्धांतिक और प्रयोगाश्रित प्रश्नों में हो जाता है. प्रयोगाश्रित प्रश्न है कि क्या हमारे पास इस बात के प्रमाण हैं या नहीं कि समाज के रूप तब तक विद्यमान रहते हैं जब तक वे उत्पादक शक्तियों को विकसित करते रहते हैं और वे उस वक्त असफल हो जाते हैं जब क्रांतियों द्वारा उनका प्रतिस्थापन कर दिया जाता है.मानना पड़ेगा कि प्रयोगाश्रित प्रश्न अपूर्ण है और ऐसा भी दीखता है कि गतिरोध और जहाँ तक कि प्रतिगमन की ऐसी लंबी समयावधियां रही हैं जब क्रियाविहीन आर्थिक संरचनाओं में क्रांतियाँ घटित नहीं हुई हैं.

सैद्धांतिक मसला है कि क्या मार्क्सवादी व्यावहारिक व्याख्याओं को टेक देने के लिए हमारे पास कोई विस्तृत व्याख्या है ? यह स्थिति दुविधाजनक है. पहली अवस्था में यह डार्विन की कहानी और अवसर विभेद और सर्वोतम का जीवित रहना के आग्रह द्वारा दी गई व्याख्या की नक़ल करने की कोशिश है. इस मामले में ‘सर्वोतम’ का अर्थ होगा, उत्पादक शक्तियों को विकसित करने  में ‘ नेतृत्व के लिए सबसे सक्षम’. अवसर विभेद से आशय होगा वे लोग जो अलग-अलग आर्थिक संबंधों के लिए जोर आजमाईश करते हैं. इस प्रकार, अनुभव से नयी आर्थिक संरचनाएं शुरू होती हैं, उत्पादक शक्तियों के विकास द्वारा फलती-फूलती और कायम रहती हैं. चूंकि, इसमें समस्या यह है कि इस प्रकार का विवरण मार्क्स की अपेक्षा से ज्यादा बड़े संयोग के तत्व से परिचय करवाता है.  मार्क्स सोचते थे कि प्रत्येक व्यक्ति इस योग्य हो कि वह अंततोगत्वा कम्युनिज्म के आगमन का पूर्वानुमान लगा सके. डार्विन के सिद्धांत के अंतर्गत लंबी अवधि के पूर्वानुमानों का प्रावधान नहीं है क्योंकि हर चीज विशेष परिस्थितियों के संयोग के अधीन है. जीव विज्ञान के सादृश्य ऐतिहासिक भौतिकवाद के रूप को विकसित करने से संयोग के भारी-भरकम तत्व को उत्तराधिकार में प्राप्त करना होगा. दुविधा यह है कि सिद्धांत को विकसित करने वाला सबसे बढ़िया मॉडल डाँवाडोल सिद्धांत द्वारा पूर्वानुमान लगता है जबकि सिद्धांत का समुचित पक्ष पूर्वानुमान में है. इस प्रकार, विस्तृत व्याख्या पैदा करनेवाले वैकल्पिक साधनों की तलाश की जरूरत पड़ती है या फिर सिद्धांत की पूर्वानुमान की आकांक्षा को त्यागना होता है.

अगली किश्त में समाप्य

आभार सहित http://plato.stanford.edu/entries/marx/ से हिंदी में अनुवादित

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मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय

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प्रारंभिक कार्य

कार्ल मार्क्स को जिस बौद्धिक वातावरण में काम करना पड़ा, उस पर हेगेल के विचारों का वर्चस्व था. हेगेल के विचारों की प्रतिक्रिया में ‘यंग हेगेलियन’ नामक युवकों का समूह हेगेल के विचारों के रुढ़िवादी आशय को नकारता था. इन चिंतकों में से सबसे प्रसिद्ध लुडविग फायरबाख थे, जिन्होंने हेगेल के विचारवाद को रूपांतरित करने की कोशिश की और इस प्रकार हेगेल के धर्म और राज्य के सिद्धांत की आलोचना प्रस्तुत की. १८४० के दशक की शुरुआत में मार्क्स द्वारा लिखित दार्शनिक साहित्य का बड़ा भाग हेगेल, फायरबाख और अन्य ‘यंग हेगेलियन’ के कार्यों के खिलाफ अपनी स्वयं की स्थिति को रखने का रिकार्ड है.

यहूदियों के सवाल पर

इस रचना में मार्क्स अपने और अपने उदारवादी ‘यंग हेगेलियन’ साथियों – विशेषतया, ब्रुनो बायर के बीच की दूरी को स्पष्ट करते हैं. एक नास्तिक के नजरिये से, बायर ने अभी-अभी यहूदियों की स्वतंत्रता के विरुद्ध लिखा था. उनके अनुसार यहूदियों और ईसाईयों, दोनों का धर्म उनकी मुक्ति में सबसे बड़ा बाधक है. प्रत्युत्तर में मार्क्स , ‘राजनीतिक मुक्ति के सवाल की विलक्षणता’ – आवश्यक रूप से उदार अधिकारों और स्वतंत्रता का अनुदान और मानव मुक्ति के बीच फर्क को दिखाते हुए अपने सर्वाधिक तर्कों में एक का इस्तेमाल करते हैं. मार्क्स बायर को उत्तर देते हुए कहते हैं कि धर्म की सतत व्यापकता के तहत भी राजनीतिक स्वतंत्रता पूर्ण रूप से संभव है जिसका समकालीन उदाहरण संयुक्त राज्य प्रदर्शित करते हैं. लेकिन उदारवाद के अनगिनत आलोचकों द्वारा पुन: स्थापित तर्क की गहराई तक जाते हुए मार्क्स का कहना है कि मानव मुक्ति के लिए राजनीतिक मुक्ति न केवल अप्रयाप्त है बल्कि , यह किसी हद तक, उसकी स्वतंत्रता में रूकावट का ही काम करती है. न्याय के उदारवादी अधिकार और विचार इस विचार पर खड़े हैं कि हम में से प्रत्येक अन्य व्यक्तियों से सुरक्षा चाहता है. इस प्रकार, उदारवादी अधिकार अलगाव के अधिकार हैं, जिन्हें इस प्रकार डिज़ाईन किया जाता है कि वे हमें इस प्रकार वर्णित खतरों से संरक्षण प्रदान करें. इस दृष्टिकोण पर आधारित स्वतंत्रता किसी भी प्रकार की दखलंदाजी से स्वतंत्रता है. यह दृष्टिकोण जिस वस्तु को छोड़ देता है, मार्क्स के लिए वही संभावना बन जाती है – तथ्य की इस रौशनी में कि वास्तविक स्वतंत्रता को, सकारात्मक रूप से, हमारे अन्य व्यक्तियों के साथ संबंधों में ढूंढा जाना है. इस मानव समाज में ढूंढा और खोजा जाना है न कि एकांगी रूप में. इस प्रकार, अधिकारों के राज्य की जिद, हमें उत्साहित करती है कि हम उन्हें इस प्रकार देखें कि मानव मुक्ति में निहित वास्तविक मुक्ति की संभावना धुंधली पड़ जाये. अब हमें साफ़ तौर पर समझ आ जाना चाहिए कि मार्क्स राजनीतिक स्वतन्त्र के विरुद्ध नहीं हैं क्योंकि वे समझ रहे होते हैं कि उदारवाद उसके समय की जर्मनी में मौजूद पूर्वाग्रहों और पक्षपात से भरपूर प्रणालियों में एक बड़े सुधार  का ही काम कर रहा होता है. यद्यपि, इस प्रकार के राजनीतिक रूप से स्वतन्त्र उदारवाद को मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता के रास्ते को पार करना होगा. दुर्भाग्य से, मार्क्स यह नहीं बताते कि मानव स्वतंत्रता क्या है लेकिन यह साफ़ है कि इसका गहरा संबंध अलगाव से मुक्त श्रम के विचार से है, जिसका जिक्र हम आगे करेंगे.

A Contribution to the Critique of Hegel’s Philosophy of Right

Introduction

अपनी इस रचना में मार्क्स धर्म को अफीम कहते हैं और इसी रचना में वे अपने धर्म संबंधी विचारों का सविस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं. इस रचना में वे विचार करते हैं कि किस तरह जर्मनी में क्रांति का सवाल हल हो सकता है और सर्वहारा वर्ग द्वारा सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति के लिए अदा की जानेवाली भूमिका से अवगत करवाते हैं.

धर्म के संबंध में, मार्क्स धर्मशास्त्र के विरुद्ध फायरबाख के उस दावे को स्वीकार करते हैं जिसमें उनका कहना है कि मानव ने अपने ही रूप के अनुसार भगवान के रूप को गढ़ा है. फायरबाख की विलक्षण देन इस तर्क में थी कि परमात्मा की पूजा मानव को अपनी स्वयं की शक्तियों से पूरा लाभ उठाने से वंचित कर देती हैं. फायरबाख की इस देन को ज्यादातर स्वीकार करते हुए मार्क्स फायरबाख की इस कमी की और इशारा करते हैं कि वे इस बात को समझने में असमर्थ हैं कि लोग क्यों धार्मिक अलगाव का शिकार हो जाते हैं और किस प्रकार वे इससे पार जा सकते हैं. मार्क्स की व्याख्या है कि धर्म भौतिक संसार में अलगाव का ही परिणाम है और इसे तब तक ख़त्म नहीं किया जा सकता जब तक इस भौतिक संसार में मौजूद अलगाव को समाप्त नहीं किया जाता. संक्षिप्त में उस भौतिक जीवन का वर्णन स्पष्टता से नहीं किया गया है जो इस अलगाव को पैदा करता है. यद्यपि, ऐसा लगता है कि अलगाव के दो पहलू जिम्मेदार हैं. एक तो श्रम का अलगाव है जिसका जिक्र अभी किया जायेगा. दूसरा, मानव जाति की अपने सामुदायिक तत्व के प्रति अभिव्यक्ति. चाहे हम इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार करें या न करें लेकिन मानव जाति समुदाय के रूप में अस्तित्व में होती है और जो मानव जीवन को संभव बनाता है वह है – हम सभी को अपनी आगोश में समेटा हुआ मजबूत सामाजिक और आर्थिक नेटवर्क जिस पर हमारी परस्पर निर्भरता कायम होती है. इस संबंध में, मार्क्स के विचार इस प्रकार दीखते हैं कि हमें अपनी संस्थाओं में सामुदायिक अस्तित्व को स्वीकृति देनी चाहिए. शुरू से ही, धर्म ने अपनी कुटिलता से इस बात को समझ लिया था और उसने एक मिथ्यावादी सामुदायिकता के विचार को पैदा किया जिसमें सभी लोग भगवान की नज़र में समान होते हैं. सुधार उपरांत विखंडन के बाद, जब धर्म समानता के भ्रम को फैलाने के अयोग्य हो जाता है, राज्य इस आवश्यकता की पूर्ति नागरिकों के समुदाय का भ्रम, जिसमें सभी लोग कानून के सम्मुख समान होते हैं, पैदा करके करता है.  परंतू राज्य और धर्म दोनों से उस वक्त पार जाया जा सकेगा जब सामाजिक और आर्थिक समानता का सच्चा समुदाय अस्तित्व में आ जायेगा.

निसंदेह, हमारे सामने यह प्रश्न है कि किस प्रकार इस तरह के समाज का निर्माण संभव हो सकता है. फायरबाख पर अपने तीसरे सिद्धांत की रौशनी में मार्क्स का अध्ययन दिलचस्प होगा जिसमें वे वैकल्पिक सिद्धांत की आलोचना करते हैं. रॉबर्ट ओवेन और अन्य लोगों का बेडौल भौतिकवाद मानता है कि मानव जाति के भाग्य की निर्धारक उसकी भौतिक परिस्थितियां होती हैं और इसलिए, एक मुक्त समाज के लिए यह जरूरी और प्रयाप्त है कि उन भौतिक परिस्थितियों को सही रूप से बदला जाये. लेकिन सवाल पैदा होता है कि कैसे? ओवेन जैसे प्रबुद्ध परोपकारी द्वारा, जो कि अपने चमत्कार से इन भौतिक परिस्थितियों के निर्धारण को तोड़ देगा जो प्रत्येक को जकड़े हुए है ? मार्क्स का  प्रत्युत्तर है कि सर्वहारा अपने स्वयं के रूपांतरण की क्रिया के दौरान ही इसे तोड़ सकेगा. वास्तव में, अगर सर्वहारा लोग स्वयं के लिए क्रांति नहीं करते हैं (निसंदेह, दार्शनिकों के मार्गदर्शन में ) वे इसे हासिल करने के योग्य नहीं हो सकेंगे.

Economic and Philosophical Manuscripts

इस पुस्तक में कई दिलचस्प विषय हैं जिसमें प्रमुख रूप से निजी संम्पत्ति, कम्युनिज्म, धन और हेगेल की आलोचना शामिल है. यद्यपि, इस रचना में श्रम का अलगाव ही केंद्र में है. यहाँ मार्क्स पूंजीवाद में मजदूर की चार तरह के श्रम के अलगाव से पैदा हुई पीड़ा का जिक्र करते हैं. सबसे पहले उत्पाद से पैदा हुई पीड़ा, जिसे उसी वक्त इसके उत्पादक (मजदूर) से छीन लिया जाता है जब यह उत्पादित हो जाता है. दूसरे, उत्पादन क्रिया (काम) से, जिसे सजा के रूप में अनुभव किया जाता है. तीसरे, मानव जाति के चरित्रानुसार, क्योंकि मनुष्य अंधाधुंध उत्पादन करते हैं न कि अपनी सही मानवीय क्षमताओं के अनुसार. अंत में, अन्य मनुष्यों से, जहाँ विनिमय का संबंध परस्पर आवश्यकता को प्रतिस्थापित कर देता है. इन प्रवर्गों का एक दूसरे में गढ़मढ़ होना हमें आश्चर्यचकित नहीं करता क्योंकि इन रचनाओं में हम मार्क्स  की बेमिसाल खोज-प्रणाली संबंधी आकांक्षा से रूबरू होते हैं. आवश्यक रूप से, वे अर्थशास्त्र में प्रवर्गों के हेगेलियन निगमन को लागू करने का प्रयत्न करते हैं. उनकी कोशिश इस तथ्य को प्रदर्शित करने की होती है कि बुर्जुआ अर्थशास्त्र के सभी प्रवर्ग – मजदूरी, लगान, विनिमय,मुनाफा इत्यादि अंतिम रूप में,अलगाव की अवधारणा के विश्लेषण से ही निकलते हैं. परिणामस्वरूप श्रम के अलगाव का प्रत्येक प्रवर्ग अपने पूर्वक प्रवर्ग से ही निगमन करता है. यदपि  मार्क्स श्रम के अलगाव से पैदा हुए इन प्रवर्गों के निगमन के सिवा और अधिक कुछ नहीं कहते. यह बिलकुल संभव है कि अपने लेखन कार्य की क्रिया के दौरान मार्क्स ने अर्थशास्त्र संबंधी मसलों से निपटने के लिए एक अलग तरीके-प्रणाली की जरूरत को महसूस किया हो. तथापि, हमें श्रम के अलगाव के स्वभाव संबंधी एक बेमिसाल पठन सामग्री प्राप्त होती है. अलगाव से मुक्ति का विचार नकारात्मक से निकालना पड़ता है.  अंत में जेम्स मिल पर पठन सामग्री की सहायता से, जिसमें अलगाव से मुक्त श्रम का, संक्षिप्त में उन शर्तों पर, वर्णन किया गया है कि अपनी शक्तियों के सत्यापन के रूप में उत्पादन से उत्पादक की तुरंत तुष्टि के साथ-साथ उत्पादन अन्य लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है जिससे, दोनों पार्टियों के लिए हमारी परस्पर निर्भरता के रूप में, मानवीय सार का सत्यापन हो जाता है. मानव जाति के सार के दोनों पहलू स्पष्ट हो जाते हैं : हमारी निजी मानव शक्तियां और समुदाय के रूप में एक-दूसरे पर निर्भरता.

इसे समझना महत्वपूर्ण होगा कि मार्क्स के लिए अलगाव कोई मनोगत भावना नहीं है. विमुख व्यक्ति विमुख शक्तियों के हाथों की कठपुतली है – यदपि, ये विमुख शक्तियां भी मानव के कर्मों का ही उत्पाद हैं. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में हम ऐसे फैसले लेते हैं जिनके अनचाहे परिणाम निकलते हैं और जो बाद में चलकर, मिश्रित रूप से, बड़े पैमाने की सामाजिक शक्तियां बन जाती हैं जिनके पूर्ण अधोषित परिणाम होते हैं. मार्क्स की नज़र में, पूंजीवाद की संस्थाएं – जो मानव व्यवहार का ही परिणाम हैं -हमारे भविष्य संबंधी व्यवहार को आकार देने के लिए वापस आ जाती हैं और इस प्रकार निर्धारक का कार्य करती हैं. उदाहरण के लिए, जब तक पूंजीपति की इच्छा व्यवसाय में बने रहने की होती है, उसके लिए जरूरी होता है कि वह कानूनी सीमा तक अपने मजदूरों का शोषण करे. बेशक वह अपराध बोध से भी लबरेज़ हो जाये लेकिन पूंजीपति को निर्दयी शोषक के रूप में जीना पड़ता है. इस प्रकार मजदूर को उपलब्ध कार्य में से सबसे बढ़िया का चुनाव करना होता है, इसके अलावा कोई अन्य तर्कसंगत विकल्प नहीं होता. परंतू इस क्रिया को दुहराते समय हम उसी संरचना को सुदृढ़ करते जाते हैं जो हमारा दमन करती है. इस स्थिति से पार जाने की इच्छा और हमारे भाग्य पर सामूहिक नियन्त्रण प्राप्त कर लेना – अभ्यास में चाहे इसका कुछ भी अर्थ हो, मार्क्स के सामाजिक विश्लेषण में निहित आवश्यक तत्वों में से एक है.

‘Theses on Feuerbach’

मार्क्स की सबसे प्रसिद्ध और विस्मरणीय उक्तियों में से एक, “दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है. “, इसी पुस्तक से ली गयी है.  इस पुस्तक में सम्मलित  ग्यारह सिद्धांतों में से अधिकतर का ऊपर पहले ही वर्णन किया जा चुका है. (उदाहरण के लिए धर्म संबंधी सिद्धांतो ४, ६ और ७ और क्रांति संबंधी सिद्धांत ३ का ) इसलिए हम सिद्धांत १ तक सीमित रहेंगे जो की स्पष्ट रूप से दार्शनिक सिद्धांत है.

अपने पहले सिद्धांत में मार्क्स ‘अब तक के आर्विभूत अस्तित्व’ के भौतिकवाद और विचारवाद के प्रति अपनी आपत्ति दर्ज करवाते हैं. विश्व की भौतिक वास्तविकता को समझने में मदद के लिए भौतिकवाद की सराहना की जाती  है लेकिन उस भौतिक संसार को जिसे मानव अपनी सक्रीय भूमिका द्वारा  निर्मित करते हैं और जिसमें हम विचरण करते हैं, की अवहेलना के लिए आलोचना की जाती है. विचारवाद, जहाँ तक हेगेल ने इसे विकसित किया, मनुष्य की सक्रीय मनोगत दखलंदाजी की निशानदेही करता है. परंतू यह इसे केवल चिंतन और विचार तक सीमित कर देता है : विश्व का निर्माण उन प्रवर्गों द्वारा संपन्न होता है जो हम इस पर लागू करते हैं. मार्क्स दोनों परम्पराओं को संयुक्त करके एक दृष्टिकोण को प्रस्तावित करते हैं जिसमें मानव जाति ही, उस विश्व का जिसमें वह जीती  है, का निर्माण या कम से कम रूपांतरण करती है. परंतू यह रूपांतरण चिंतन में घटित न होकर वास्तविक भौतिक क्रिया द्वारा आकार लेता है. परम अवधारानाओं के दखल से नहीं बल्कि मानव के कस्सी-फाबड़े पर खून-पसीना बहाने से. इतिहास का यह भौतिकवादी वर्जन पार निकल जाता है और वर्तमान की सभी दार्शनिक अवधारानाओं को अस्वीकृत कर देता है. आगे चलकर, यही मार्क्स के इतिहास के सिद्धांत का आधार बनता है. जैसाकि मार्क्स १८४४ में लिखित पांडुलिपि में लिखते हैं, ” उद्योग में हम मानव का प्रकृति से वास्तविक रूप से ऐतिहासिक संबंध देखते हैं. यह चिंतन दर्शन के इतिहास पर मनन के साथ-साथ उनके जर्नलिस्ट के रूप में सामाजिक और आर्थिक यथार्थ के अनुभव से पैदा होता है जो मार्क्स द्वारा भविष्य में किये जानेवाले कार्यों के एजेंडा को निर्धारित कर देता है.

शेष अगली कड़ी में : मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय – दूसरी किश्त

आभार सहित http://plato.stanford.edu/entries/marx/ से हिंदी में अनुवादित

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डार्विन के जन्मदिन पर विशेष

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जीव विकास का सिद्धांत – डार्विन और वाद-विवाद

डॉ अमृत

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

डार्विन की उपलब्धियां

डार्विन के आलोचक

नव-डार्विनवाद

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

बीते वर्ष 2009 के 12 फरवरी के दिन, मानव  प्रकृति विज्ञानी चार्ल्स डार्विन का दो सौवां जनमदिन था और संयोगवश 150 साल पहले ही नवम्बर 1859 में ही मनुष्य की वैज्ञानिक समझ का एक  मील पत्थर चार्ल्स डार्विन द्वारा लिखित पुस्तक ‘ जीवों की उत्पत्ति’ छपी थी । इन दोनों ही ऐतिहासिक  दिनों की याद को समर्पित 2009 का वर्ष, डार्विन के सिद्धांत को आम लोगों में प्रचारित करने और इस पर हो रहे हमलों का जवाब देने के लिए पूरी दुनिया में मनाया गया । इन कार्यक्रमों की समाप्ति 12 फरवरी 2010 को होगी । इसके अलावा पिछले कुछ सालों में 12 फरवरी का दिन डार्विन दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है ।

डार्विन के जीवन का संक्षेप ब्यौरा

चार्ल्स डार्विन का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के शहर सर्युस्बरी में हुआ । उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे और दादा इरासमस डार्विन एक प्रकृति दार्शनिक, डॉक्टर और कवि थे । पिता की इच्छा थी कि डार्विन डॉक्टर बनें लेकिन उनकी रूचि प्रकृति विज्ञान में थी । 1828 में पिता ने डार्विन को पादरी बनाने के लिए क्राईस्ट कॉलेज, कैम्ब्रिज में दाखिल करवा दिया  । यहाँ उनका मेल वनस्पति विज्ञान के प्रोफैसर स्टीवन हैन्स्लो से हुआ और वहां काम करने लगे । डार्विन पहले ही लामारक के जीव विकास सम्बन्धी विचारों को पढ़ चुके थे और अब इनकी रूचि और भी बढ़ गयी । इसी दौरान वह प्रकृति का ध्यान से निरीक्षण करने में लग गये और कीड़े मकौड़े तथा पौधे एकत्रित करने में जुट गये । 1831 में उनकी पढाई पूरी हो गयी ।

इंग्लैण्ड में विभिन्न स्थानों पर प्रकृति का निरीक्षण करने के लिए घूमते-घूमते, उनके प्रोफेसर हैन्स्लो ने, उनकी सिफारिश एक सर्वेक्षण करने जा रहे जहाज पर बतौर प्रकृति विज्ञानी कर दी । डार्विन के पिता नें इनकार कर दिया, लेकिन आखिरकार डार्विन ने किसी न किसी तरह उन्हें अपनी यात्रा का खर्च उठाने के लिए मना ही लिया और 27 दिसंबर, 1831 को डार्विन एच. एम. एस. बीगल नामक जहाज पर सफ़र के लिए निकल पड़े । किसे पता था कि यह सफ़र जीव विज्ञान के क्षेत्र में क्रांति लाने वाला है और पृथ्वी पर मौजूद जीवों और पौधों की उत्पत्ति और विभिन्नता के बारे में  मनुष्य की सदियों पुरानी अवधारणाओं को सदा के लिए बदलने वाला है ।

अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन नें तथ्यों का भण्डार इकट्ठा  कर लिया और अक्तूबर 1836 में इंग्लैंड वापिस आने पर अध्ययन में जुट गये । उनके द्वारा पृथ्वी की सरंचना संबंधी लिखे गये लेखों की वजह से , वह अपनी यात्रा से लौटने से पहले ही काफी प्रसिद्ध हो चुके थे । वापसी पर उनके संबंध उस समय के कई बड़े-बड़े विज्ञानियों से बन गये और वे कई साईंस सोसायटियों के मैम्बर चुने गये । अपने सफरनामे के बारे में किताब लिखते वक्त बहुत ज्यादा मेहनत के दबाव के चलते 1838 में वे बीमार हो गये और डॉक्टरों के कहने पर उन्हें लन्दन वापिस अपने पिता के घर जाना पड़ा । पर यहाँ भी उनकी खोजी रूचि कायम रही । वह अपना ज्यादा समय दुधारू पशुओं को पालने वाले किसानों के साथ बातें करते हुए और उनके द्वारा पशुओं की नसल सुधार के कामों का निरीक्षण करते हुए बिताते थे । हृदयस्पंदन और जठरीय रोग के दर्दों की ये बीमारी इसके बाद डार्विन का उम्र भर पीछा करती रही ।

अपने अध्ययन के आरंभिक वर्षों में ही, डार्विन जीव विकास संबंधी अपनी दो महत्त्वपूर्ण अवधारणाओं का विकास कर चुके थे । ये दो अवधारणाएं- ‘ प्राकृतिक चयन’ (Natural Selection) और ‘योग्यतम का बचाव’ (Survival of the fittest) थी । डार्विन की अवधारणाओं ने यह पक्के तौर पर सिद्ध कर देना था कि प्रकृति पल-पल बदलती है । यह अपने आरम्भकाल से एकसमान नहीं रही जैसाकि उस समय की धार्मिक शिक्षाओं में बताया जाता था । डार्विन को पता था कि उसकी खोजों का समाज के कठमुल्लों की तरफ से भयंकर विरोध किया जायेगा । कुछ इस डर की वजह से और कुछ अपनी खोजों को प्रमाणिक तौर पर और मजबूत बनाने के लिए प्रकृति में से तथ्य इकट्ठे करने और अध्ययन करने के कारण डार्विन 1859 तक अपनी इस क्रान्तिकारी खोज को प्रकाशित न कर सके ।

1856 के शुरुआती दिनों में चार्ल्स डार्विन के दोस्त चार्ल्स लिल को एक और विज्ञानी अल्फ्रेड वालेस का पत्र मिला जिस में वालेस ने डार्विन की अवधारणाओं के साथ मिलती जुलती बातें कहीं । इसके बाद लिल ने डार्विन को अपनी खोजों को छपवाने के लिए कहा और उसके कहने पर डार्विन ने, जीवों की प्रजातिओं की उत्पत्ति’ (Origin of Species) से सम्बंधित एक खोज पत्र लिखना शुरू किया । जून, 1858 में डार्विन को वालेस का पत्र मिला जिसमें उसने ‘प्राकृतिक चयन’ की धारणा का  जिक्र किया । 1859 में 1 जुलाई के दिन , डार्विन और वालेस ने इकट्ठे ही अपनी खोजों के बारे में खोज पत्र पढने का निर्णय किया, पर अपने बेटे की मृत्यु की वजह से डार्विन इसमें शामिल न हो सके । आखिरकार नवम्बर में डार्विन की पुस्तक’ जीवों की उत्पत्ति’ (Origin of Species) छप कर लोगों में पहुँच गयी ।

जैसाकि उम्मीद ही थी, किताब की काफी प्रशंसा हुई और कुछ ही दिनों में इसके पहले संस्करण की सारी प्रतियाँ बिक गयीं । वैज्ञानिकों में बहुतों ने डार्विन की उपलब्धियों के साथ सहमती प्रकट की, चाहे कुछ वैज्ञानिकों ने डार्विन की अवधारणाओं का सख्त विरोध भी किया । सबसे ज्यादा भयानक विद्रोह धार्मिक कठमुल्लों और कट्टरपंथियों ने किया और डार्विन के भद्दे कार्टून बना कर बांटे गये । जब डार्विन नें यह रहस्योदघाटन किया कि मनुष्य का विकास बंदरों की एक नसल एप (Ape) से हुआ है तो इसका प्रचंड विरोध हुआ । डार्विन का चेहरा बन्दर के धड़ के ऊपर लगा कर उसकी खिल्ली उड़ाई गयी । लेकिन उनकी खोजों के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कट्टरपंथी चर्च ने अब उसकी खोजों को अपने धार्मिक लबादे में फिट करना शुरू कर दिया ।

अपने खोज कार्य जारी रखते हुए, डार्विन ने इसके बाद ‘मनुष्य की उत्पत्ति’ (Descent of Man) और अन्य कई किताबें लिखीं । 19 अप्रैल, 1882 के दिन 73 वर्ष की उम्र में इस महान विज्ञानी की मृत्यु हो गयी जो अपने पीछे छोड़ गया मानवता को अपनी बेमिसाल उपलब्धियां ।

डार्विन की उपलब्धियां

एच. एम. एस. बीगल के साथ अपने समुद्री सफ़र के दौरान डार्विन ने अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्य इकट्ठे किये । गैलापैगोस टापू पर उनका ध्यान घरेलू चिड़ियों जैसे पक्षियों की एक नस्ल पर गया । इन पक्षियों की शक्ल-सूरत आपस में काफी मिलती जुलती थी और ये पक्षी मुख्य धरती पर पाए जाने वाले इसी किस्म के पक्षियों से भी मिलते जुलते थे । पर टापुओं पर रहने वाले पक्षी कीड़े खाकर गुजारा करते थे जबकि दक्षिण अमेरिका की मुख्य धरती वाले पक्षी पौधों के बीज खाते थे । कीड़े खाने वाले पक्षियों की चोंच बीज खाने वाले पक्षियों से लम्बी थीं । अतः डार्विन ने यह परिणाम निकला कि किसी कारणवश यह पक्षी मुख्य धरती से टापुओं पर आ गए । बदलते हालत में जीवन निर्वाह के लिए उन्हें कीड़ों पर निर्भर होना पड़ा । लेकिन आम तौर पर कीड़े वृक्षों के तनों में गहरे छुपे होते थे, अतः समयानुसार टापुओं पर लम्बी चोंच वाले पक्षी अस्तित्व में आ गए ।

इसी तरह उन्होंने दक्षिणी अमेरिका के तट के साथ साथ एक दक्षिण अमेरिकी जानवर ‘सलौथ’  के अवशेषों का अध्ययन किया । इन आलोप हो चुके जानवरों का आकार हाथी जितना था, परन्तु उस समय के अमेरिकी सलौथों का आकार काफी छोटा था, डार्विन ने अपने अध्ययन से यह परिणाम निकला कि छोटे आकार के सलौथ अलोप हो चुके सलौथों से ही विकसित हुए हैं ।

इस तरह डार्विन ने उस समय तक खोजे गए विभिन्न अवशेषों का अध्ययन किया । उनके समय तक अवशेषों पर खोज करने वाले वैज्ञानिकों को धरती कि सतह पर चट्टानों की अलग अलग परतें मिलीं और प्रत्येक परत में अलग अलग किस्म के जानवरों और पौधों के अवशेष मिले । डार्विन ने अपने अध्ययन से यह जाना कि नीचे की परत से ऊपर की तरफ आते हुए, इन परतों में जानवरों और पौधों के विकास का सिलसिला सीधा-सीधा नजर आ रहा था । उस समय तक यह भी पता लग चुका था कि चट्टानों की एक परत जमने में लाखों साल लग जाते हैं । इससे डार्विन का यह निश्चय पक्का हो गया कि धरती पर जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहा है, और यह बदलता रहा है । डार्विन इस नतीजे पर भी पहुँच गए कि जीवन की उत्पत्ति किसी सरल रूप में हुई और इस सरल रूप से विकसित होते हुए जीवों और पौधों की अलग अलग प्रजातियाँ अस्तित्व में आयीं और इस प्रक्रिया में लाखों वर्ष लगे।  आज वैज्ञानिक यह जान चुके हैं कि धरती की उम्र लगभग 4.5 बिलियन वर्ष है । जीवन के प्रथम प्रारूप 3.5 मिलियन वर्ष पहले अस्तित्व में आये । मनुष्य का जनम कोई एक लाख वर्ष पहले ही हुआ है ।

अपने पुश्तैनी घर में रहते समय डार्विन ने देखा कि किसान ज्यादा दूध देने वाले पशुओं का चयन करके और उनका प्रजनन करवाकर ज्यादा दूध देने वाले पशुओं की गिनती बढ़ा लेते हैं । उन्होंने इसको ‘कृत्रिम चयन’ (Artificial Selection) का नाम दिया । लेकिन उन्होंने इससे आगे चलते हुए अपने पास उपलब्ध अन्य तथ्यों के आधार पर यह सिद्धांत दिया कि प्रकृति में भी इस तरह की ‘प्राकृतिक चयन’ की प्रक्रिया घटित होती है ।

इसको एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है । एक ख़ास किस्म का उड़ने वाला कीड़ा पक्षियों द्वारा खाया जाता है । इस कीड़े की दो किस्में हैं – एक सफ़ेद पंखों वाला जो ज़हरीला नहीं है और दूसरा चमकीले रंगों वाला ज़हरीला कीड़ा । धीरे धीरे पक्षी पंखों के रंग से ज़हरीले कीड़े को पहचानने लगते हैं और उसे खाना बंद कर देते हैं । शुरू में चमकीले पंखों वाले कीड़ों की गिनती काफी थी, लेकिन कुछ ही पीढ़ियों बाद चमकीले रंग वाले कीड़ों की बहुतायत हो जाएगी क्योंकि उनके पास प्रजनन करने के और अपने से आगे नए कीड़े पैदा करने के मौके सफ़ेद पंखों वाले कीड़ों से तुलनात्मक रूप में ज्यादा हैं । इस तरह चमकीले पंखों वाले कीड़े प्राकृतिक चयन के ज़रीये बहुतायत में आ जाते हैं ।

इस तरह डार्विन ने देखा कि प्रकृति में जीव जन्तु बहुत ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं लेकिन प्रत्येक जीव प्रजाति की संख्या को नियंत्रण में रखने के लिए किसी तरह का कोई नियम होना जरूरी है । यहीं से उन्होंने अपने दूसरे, जो कि मुख्य रूप में विवाद का कारण बना, ‘योग्यतम के बचाव’ के सिद्धांत को रूप दिया । उनके मुताबिक वातावरण की परिस्थितियों के अनुसार सबसे योग्य जीव ‘जिंदा रहने के संघर्ष’ में कामयाब हो जाते हैं और प्रजनन कर पाते हैं और बाकी मर जाते हैं । इस तरह जिंदा रहने के लिए लाभकारी गुण चुनिन्दा रूप में अगली पीढ़ियों में चले जाते हैं ।

इन दोनों सिद्धांतों के आधार पर डार्विन नें यह नतीजा निकाला कि लाभकारी लक्षणों और वातावरण के अनुसार ढलने के लिए जीवों में आये बदलाव, जो कि पीढी दर पीढ़ी जीवों में संचारित हो सकते हों, इकट्ठे होते रहते हैं और समय आने पर एक बिलकुल ही नयी प्रजाति के अस्तित्व में आ जाने का कारण बनते हैं ।

डार्विन के सिद्धांतों की अपनी खामियां भी हैं । लेकिन फिर भी डार्विन के सिद्धांत आधुनिक जीव विकास के सिद्धांत की बुनियाद हैं । उनके दिए गए सिद्धांतों के बिना आज भी किसी जीव विकास के सिद्धांत की कल्पना संभव नहीं  । डार्विन की सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण  देन थी, संसार के सदा-सदा स्थिर रहने वाली अवधारणा का सदा सदा के लिए अंत ! यही बात डार्विन के विरोधियों को सबसे ज्यादा चुभती है ।

इन सिद्धांतों के अलावा डार्विन की मानवता को और भी बहुत महत्त्वपूर्ण और क्रांतिकारी देन है । डार्विन के दोस्त, टॉमस हक्सले नें उस समय दिखाया कि शारीरिक रचना के पक्ष से मनुष्य बहुत हद तक ऐप (Ape) के साथ मिलता जुलता है । 1871 में डार्विन नें अपनी पुस्तक ‘मनुष्य का विकास’ प्रकाशित की । इस पुस्तक में उसने मनुष्य की सांस्कृतिक विकास और मनुष्यों में पाए जाने वाली लैंगिक, शारीरिक, और सांस्कृतिक विभिन्नताओं की व्याख्या के लिए ‘लैंगिक चयन’ का सिद्धांत पेश किया । इस पुस्तक में उन्होंने जोर दिया कि सारे मनुष्य एक ही पूर्वज से विकसित हुए हैं और यह विकास अफ्रीका महांद्वीप में हुआ । उस समय अलग-अलग नस्ल के मनुष्यों को अलग अलग प्रजातियाँ मानने और कुछ नस्लों को दूसरी नस्लों से बेहतर मानने और उनके अलग-अलग तौर पर विकसित होने के सिद्धांतों का काफी बोलबाला था, लेकिन डार्विन के द्वारा एक ही पूर्वज से सारे मनुष्यों के विकास के सिद्धांत को पेश करने के बाद बाकी सिद्धांत धीरे धीरे प्रभावहीन हो गए । डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता अब डी.एन. ए. के अध्ययन से भी हो चुकी है ।

डार्विन के आलोचक

जैसे ही डार्विन नें, बाईबल की अवधारणा, कि धरती की उम्र 6000 साल है और संसार की रचना’ परम परमेश्वर प्रभु’ नें 6 दिनों में और सदा सदा के लिए की थी, पर चोट की और इसको अपनी खोजों द्वारा तीतर-बीतर कर दिया; तो धार्मिक कट्टरपंथियों नें उसके खिलाफ जेहाद छेड़ दी । लेकिन अब समय बदल चुका था, अब मध्य युग का सामंती ढांचा नहीं रहा था, अब पूंजीवादी ढांचा अस्तित्व में आ चुका था, और विज्ञान की जरूरत उसके लिए जिंदा रहने की शर्त था, इसलिए थोड़े ही समय में डार्विन के सिद्धांतों को वैज्ञानिकों की तरफ से मान्यता मिल गयी । अब डार्विन के सिद्धांत को पूंजीवादी प्रबंध को सही साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और उसके क्रांतिकारी अंश को को छुपाने की कोशिशें होने लगीं ।

‘अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष’ और ‘ योग्यतम का बचाव’ नामक डार्विन की अवधारणाओं को पूंजीवादी प्रबंध को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा और आज भी इसी प्रकार की दलीलें देने वालों की कमीं नहीं है । लेकिन ये सिद्धांतकार ‘अपने अस्तित्व के लिए सर्वहारा के संघर्ष’ से भी उतना ही डरते हैं जितना जोर ये पूँजीवाद को जायज ठहराने के लिए लगाते हैं । ‘ योग्यतम का बचाव’ के सिद्धांत द्वारा पूंजीवादी शोषकों को जायज ठहराने और अल्पमत द्वारा विशाल बहुमत की लूट को ठीक सिद्ध करने की कोशिशें लगातार होती रही हैं । पर यह राग अलापने वाले जन संघर्ष की जगह शान्तिपूर्ण सुधारों और कानूनी कार्रवाई द्वारा गरीबी ख़त्म करने जैसे भद्दे सिद्धांतों को भी साथ-साथ पेश करते रहते हैं । इन दलीलों के बिना भी देखा जाये तो दूसरे जानवरों और मनुष्यों में बहुत अंतर है । मनुष्य वातावरण के साथ खुद भी बदलता है और उसे भी अपने अनुकूल ढाल लेता है, जबकि यह गुण दूसरे जानवरों में बहुत कम विकसित है । इसके अलावा मनुष्य उत्पादन प्रक्रिया में प्रकृति के साथ संघर्ष करता है और जीवन निर्वाह के लिए औजारों का निर्माण करता है । और चूँकि यह सब सामूहिक रूप में ही संभव है, इसलिए ‘योग्यतम का बचाव’ की अवधारणा मनुष्यों पर लागू ही नहीं होती. और तो और, पूंजीवादी प्रणाली में जब भी इन औजारों की (बहुतायत) हो जाती है तो संकट आ जाता है, फिर बहुतायत होने के बावजूद संघर्ष की अवधारणा की तो इसमें कोई गुन्जाईश ही नहीं रह जाती ।

इससे भी बढ़कर, डार्विन की यह अवधारणा मुख्य तौर पर अलग अलग जीवों की प्रजातियों और किसी जीव प्रजाति की जनसँख्या को कंट्रोल में रखने तक ही सीमित रहती है । पहली सूरत में यह अवधारणा मनुष्यों में आपस में लागू नहीं होती, दूसरी सूरत में , जिन यूरोपीय देशों की जनसँख्या वृद्धि दर शून्य हो चुकी है पूंजीवादी दैत्य वहां भी लोगों को संघर्ष करने के लिए मजबूर कर रहा है । जिन देशों में जनसँख्या बढ़ रही है, वहां डार्विन के योग्यतम के बचाव के सिद्धांत के मुताबिक पूंजीपतियों की संख्या बढ़नी चाहिए, लेकिन हो तो इसके विपरीत रहा है, गरीबों (अयोग्यों) की संख्या बढ़ रही है और पूंजीपतियों की या तो स्थिर है या कम हो रही है ।

चर्च और अन्य धार्मिक कट्टरपंथी, जिनमें सिर्फ इसाई ही नहीं, अन्य सभी धर्मों के पादरी-पुजारी भी शामिल हैं, के विरोध और डार्विन के सिद्धांतों को तोड़-फोड़ कर की गयी व्याख्याओं से भी पूँजीवाद का कुछ नहीं संवर सका । इस सबके बावजूद इस पूंजीवादी प्रबंध को डार्विन के सिद्धांतों और पूरे जीव विकास के सिद्धांत से ही खतरा बना हुआ है । एक बार फिर मध्य-युगीन काले दौर के सिरे से खारिज किये जा चुके गैर-वैज्ञानिक ईश्वरवादी सरंचना के सिद्धांत को नए लबादे में सजा कर लोगों पर थोपा जा रहा है और लोगों में भौतिकवादी वैज्ञानिक नज़रिये की पकड़ को कमजोर करने की कोशिशें हो रहीं हैं । इन सब कोशिशों के पीछे हर तरह के धार्मिक कट्टरपंथी और फासीवादी ताने-बाने से लेकर सरकारों, कोर्पोरेट जगत, और लोक कल्याण प्रपंच रचने वाली संस्थाएं शामिल हैं ।

इस नए प्रचारित किये जा रहे सिद्धांत का नाम है ‘सचेतन सृजन'(Intelligent Design) । इनके ज्यादातर तर्क तो डार्विन के समकालीन विरोधी विलियम पैले (William Paley)  से उधार लिए हुए हैं । इस दलील के अनुसार, जैसेकि किसी जटिल जेब घड़ी या किसी आधुनिक मशीन या कंप्यूटर जैसे यन्त्र बनाने के लिए किसी सचेतन शक्ति यानीकि मानव दिमाग की जरूरत होती है, उसी तरह जैसे किसी बहुत ही जटिल मानव अंग जैसेकि आँख, दिमाग, या अन्य जीव जंतुओं को पैदा करने के लिए या सृजन के लिए भी किसी सचेतन शक्ति की जरूरत है, जोकि इनके अनुसार ईश्वर ही हो सकता है  । यह बिलकुल वैसे ही जैसे कोई कहे कि दूध भी पानी की तरह तरल पदार्थ है इसलिए यह पानी की ही तरह धरती में से नल लगाकर निकाला गया होगा या फिर पानी दूध की तरह किसी गाय-भैंस को दुहने से मिलता होगा । खैर इनके तर्क की थोड़ी और छानबीन करते हैं । घड़ी या मशीन बनाने के लिए बहुत सारे मनुष्यों को इकट्ठे होकर या अलग अलग रहकर औजारों का इस्तेमाल करते हुए और भट्टियों में लोहा पिघलाते हुए श्रम करना पड़ता है, और दूसरी तरफ इनके ईश्वर के औजार और भट्टियाँ कहाँ हैं और वह दिखाई क्यों नहीं देते, तो ये भाग निकलेंगे ।

इसी तर्क को थोडा और आगे लेकर जाइये – घडी, मशीन या कंप्यूटर को बनाने वाला सचेतन मानव  दिमाग बहुत जटिल है, तो इतने जटिल मानव दिमाग को बनाने वाली शक्ति तो और भी जटिल होगी । फिर इस और भी जटिल शक्ति को बनाने के लिए और भी ज्यादा जटिल शक्ति – और इस यह जटिलता का पहाड़ा कभी न ख़त्म होने वाला थोथा तर्क बन जाता है ।

एक और तर्क के अनुसार जीवाणु (Bacteria) को गति प्रदान करने वाले हिस्से फ्लैजिला (Flagella), मनुष्य की प्रतिरक्षा प्रणाली या उसकी आँख जैसे अंग इतने ज्यादा विकसित हैं कि इनके किसी और कम विकसित रूप से विकसित होने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता और अपने कम विकसित रूपों में इनकी कोई उपयोगिता संभव भी नहीं होगी; यह तर्क भी थोथा सिद्ध किया जा चुका है. जैसे कि आँख के विकास की विभिन्न अवस्थाओं के विकसित रूप जैविक संसार में पाए जाते हैं. कीट-पतंगे में आँखों का इस्तेमाल होता है और उससे कम विकसित प्राणियों में भी । इसी तरह गाय-भैंसों की आँखों की बनावट काफी हद तक मनुष्य की आँखों से मेल खाती है, लेकिन उनमें रंग पहचानने की योग्यता नहीं होती, और वे चीज़ों को काले और सफ़ेद रंग की अलग शेड्स में ही देख सकती हैं । लेकिन कोई पागल ही यह कहेगा कि उन्हें आखों का कोई लाभ नहीं या फिर उनकी आँखें बेकार हैं । प्रतिरक्षा प्रणाली भी हर तरह के प्राणी में मौजूद है और फ्लैजिला के विभिन्न स्तरों के विकसित रूप जीवाणु (Bacteria) में पाए जाते हैं । लेकिन जैसेकि प्रत्येक विचारवादी का काम होता है, एक तर्क के प्रमाणित हो जाने के बाद कोई दूसरा कुतर्क ढूँढने की बौद्धिक कसरत में लग जाना । और तो और, इनकी विज्ञान की किताब ‘बाइबल’ में धरती की उम्र 6000 साल बताई गयी है और सृष्टि के सृजन में ईश्वर को 6 दिन लगे. आज के वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर धरती की उम्र 4.5 बिलियन वर्ष या इससे भी ज्यादा आंकी गयी है और जीवन की उत्पत्ति के आरंभिक प्रमाण भी 3.5 बिलियन साल पुराने हैं.

एक और काम, जो यह ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांतकार करते हैं, वह है- वैज्ञानिक सिद्धांतों में किन्हीं छोटी सी त्रुटियों को ढूंढना और फिर उसकी आधार पर पूरे सिद्धांत के ऊपर विवाद खड़ा करना. और इन त्रुटियों को विज्ञान द्वारा दूर कर लेने पर ऐसी ही कोई और तुच्छ कोशिश । यह है नया विज्ञान – जो अपने आप को प्रमाणित करने में असमर्थ है, लेकिन दूसरी सिद्धांतों की छोटी सी त्रुटियों को भी आधार बनाकर हो हल्ला मचाता है । एक और बहुत ही ‘शानदार’ विचार, जो ऐसे विज्ञानी लोग अक्सर प्रचार करते हैं, वो है- साईंस को ईश्वर भरोसे रहने वाली ‘आस्तिक साईंस’ बनाना जिससे कि ये समझते हैं कि विज्ञान को और वैज्ञानिकों को बहुत फायदा मिलेगा और विज्ञान को सही दिशा मिलेगी ।

इस पूरे ‘विज्ञान'(?) को लोगों में प्रचारित करने और लोगों के दिमागों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता का कूड़-कबाड़ा ठूसने के काम को पूरा करने के लिए अमेरिका और इंग्लैंड में शक्तिशाली राजनैतिक लाबी है, और इसमें कोई हैरानी की बात नहीं इस लाबी का मुख्य हिस्सा राजनैतिक हलकों की दक्षिणपंथी फासीवादी धारा है । जैसाकि होता ही है फासीवाद को वित्तीय सहायता की भी कोई कमी नहीं है ।

यह प्रतिक्रियावादी शक्तियां अमेरिकी सरकार पर लगातार यह दबाव बनाती रही हैं कि धार्मिक विश्वास पर आधारित स्कूलों का खर्च सरकार उठाये, इन स्कूलों में मुख्य तौर पर ईसाई मिशनरी स्कूल हैं । अमीर संस्थाओं ने इस प्रचार मुहीम के लिए लाखों-करोड़ों डॉलर खर्चे । अकेली वाल्टन फैमिली फाऊंडेशन नें 2006 में 28 मिलियन डॉलर इस तरह का दबाव बना रहे संगठनों पर खर्च किये । याद रखा जाना चाहिए कि यह फाऊंडेशन वाल-मार्ट के सहारे चलती है, जो कि ट्रेड-यूनियनों के सबसे खूंखार विरोधियों में से जानी जाती है ।

एक और अमेरिकी संस्था, टेम्पलटन फाऊंडेशन नें वर्ष २००६ में ६० मिलियन डॉलर, उन व्यक्तिओं के प्रोजेक्टों के लिए बांटे, जो ‘विज्ञान’ और अध्यात्मवादी विचारों का मेल मिलाप कराने की कोशिशों में जुटे हुए हैं । इन व्यक्तिओं में अमेरिका और इंग्लैंड के अलावा पूरी दुनिया के अध्यापक, विद्यार्थी, पत्रकार, शोध-कर्त्ता और युनिवर्सिटियों के प्रोफैसर, अकादमीशियन शामिल हैं. यू. एस. क्रॉनिकल ऑफ़ हायर एजुकेशन में छपे एक लेख के अनुसार उपरोक्त संस्था नें २५० मिलियन डॉलर से ज्यादा की धनराशी विज्ञान की इस तरह की ‘सेवा’ के लिए खर्ची । यह संस्था खुले-आम पूँजीवाद तथा मुनाफा आधारित उद्यम की हिमायत करती है ।

इस तरह की एक संस्था वार्डी फाऊंडेशन ब्रिटेन में काम करती है । यह संस्था मुख्य तौर पर वार्डी कार बिजनैस के मुनाफे पर चलती है । इसका मुख्य काम भी ईसाई मूल्यों और मान्यताओं का प्रचार करना और स्कूल खोलना है । इस संस्था के स्कूलों में ईश्वरवादी सृजनात्मकता को विज्ञान के तौर पर पढ़ाया जाता है ।

भारत में भी ऐसी संस्थाएं मौजूद हैं. इनमें से एक है- कृष्णा कान्सैंस (चेतना). यह संस्था भी अपने अन्य कामों के साथ-साथ ईश्वरवादी सृजनात्मकता के सिद्धांत का प्रचार करने के लिए जगह जगह व्याख्यानों का आयोजन करती है और पर्चे बांटती है ।

पूंजीवादी प्रतिक्रियावादी शक्तियों के उपाय सिर्फ नए सिद्धांत घड़ने और उनका प्रचार करने तक ही सीमित नहीं हैं, वह पूंजीवादी सत्ता को अपने ‘विज्ञान’ (?) को लोगों पर थोपने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं । स्कूलों में ‘सचेतन सृजनात्मकता’ के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए अमेरिकी अदालत में केस किया गया । सारे पूंजीपति ऐसे सिद्धांतकारों और ऐसे सिद्धांतों के पक्ष में खड़े हैं । मिसिसिपी, उकलहामा और न्यू मैक्सिको की प्रतिनिधि सभाओं में वर्ष 2009 के दौरान डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत को एक ‘विवादग्रस्त सिद्धांत’ का दर्ज़ा देने या फिर दूसरे सिद्धांतों की शिक्षा देने के बिल दाखिल हो चुके हैं । लुसिआना स्टेट की प्रतिनधि सभा तो एक ऐसा ही बिल पास भी कर चुकी है और गवर्नर बॉबी जिंदल ने हस्ताक्षर भी कर दिये हैं ।

इस तरह की ही लड़ाई टेक्सास में चल रही है, जिसके अनुसार कक्षाओं में अध्यापकों को डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत की आलोचना करनी अनिवार्य हो जायेगी । यह सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं, इंग्लैंड में भी ऐसी ही कोशिशें जारी हैं, और यूरोप के कई और देशों में भी बाइबल की उत्पत्ति की धारणा को स्कूलों के सिलेबस में पढ़ाने के उपाए किये जा रहे हैं । भारत में भी वह दिन दूर नहीं, यहाँ भी ज्योतिष को तो पहले ही विज्ञान का दर्ज़ा मिल चुका है ।

और तो और कानास यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर पाल मिरेकी को डार्विन के सिद्धांत की प्रौढ़ता करने की वजह से जान से मारने की धमकियाँ दीं गयीं, उसको बुरी तरह पीटा गया जिस वजह से उन्हें अस्पताल दाखिल करवाना पड़ा । उन्हें  उस पद से हटा दिया गया और उनसे अपराधियों की तरह पूछताछ की गयी ।

आम तौर पर विज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्य या किसी संग्रहालय के निर्माण के लिए कोर्पोरेट जगत चंदा मुहैया करवाता है । लेकिन नवम्बर 2005 में जब ‘अमेरिकन मियुसियम ऑफ नैचुरल हिस्ट्री’ को नए सिरे से बनाने और जीव विकास के सिद्धांत को लोगों में प्रचारित करने की बात हुई तो किसी भी कोर्पोरेट घराने नें चंदा देने की ज़हमत नहीं उठायी और इस संग्रहालय द्वारा लगाई गयी प्रदर्शनी ‘डार्विन’ को मीडिया में कोई कवरेज नहीं दी गयी । लेकिन जब 25 मिलियन डॉलर की लागत से ‘ईश्वरवादी उत्पत्ति’ के संग्रहालय को बनाने की बात चली तो कोर्पोरेट जगत नें दिल खोलकर चंदे मुहैया करवाए । इस संग्रहालय में डायनासोरों को मनुष्यों के साथ रहते हुए दिखाया जा रहा है । इस तरह पढ़ाया जाता है कि भयानक बाढ़ आने से पहले मनुष्य और डायनासोर इकट्ठे धरती पर रहते थे । वैज्ञानिक इस बकवास को कब का रद्द कर चुके हैं । डायनासोर लगभग 63 मिलियन वर्ष पहले धरती से अलोप हो चुके हैं और मनुष्य जैसे पहले प्राणी की उत्पत्ति 4 से 10 मिलियन वर्ष से पुरानी नहीं । यह है वह विज्ञान जिसे पूँजीवाद पढ़ा रहा है और फाईनैंस कर रहा है । जबकि पूंजीवादी टहलुये यह डींग मारते नहीं थकते कि पूँजीवाद के बिना विज्ञान का विकास रुक जाएगा ।

नव-डार्विनवाद

एक और  छुपा हुआ हमला हुआ है डार्विन के सिद्धांत पर । यह छुपा हुआ इस अर्थ में है क्योंकि यह स्वयं को डार्विन के मानने और फैलाने के चोगे में छिपाकर रखता है, इसका नाम है नव-डार्विनवाद । इसीका ही विस्तारित रूप है, आधुनिक जीव विकास का सिद्धांत ।

नव-डार्विनवाद शब्द का प्रयोग सबसे पहले वीज़मैन (Weissman ) नाम के विज्ञानी के सिद्धांत के अनुयायियों के लिए किया गया । उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में १८९५ में वीज़मैन ने यह सिद्ध किया कि वातावरण के प्रभाव अधीन किसी जीव में होनेवाले बदलाव आगमी पीढ़ी के जीवों में संचारित नहीं हो सकते । इसको वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज्म थियूरी’ कहा जाता है । इस सिद्धांत ने मुख्य तौर पर लैमार्क के जीव विकास के सिद्धांत पर चोट की और जीव विज्ञानियों ने लैमार्क के ‘वातावरण के प्रभाव के अधीन आनेवाले बदलाव का कारण जीव विकास होने के सिद्धांत ‘ को पूरी तरह रद्द कर दिया । अपने सिद्धांत को सही सिद्ध करने के लिए वीज़मैन ने कुछ प्रयोग किये जिनमें चूहों की पूँछें काटने वाला प्रयोग सबसे प्रसिद्ध है ।

वीजमैन के इस प्रयोग में, पीढ़ी दर पीढ़ी चूहों की पूँछें काटी गयी, पर हरवार चूहों की अगली पीढ़ी में पूंछ उग आती थी. इससे उसने यह नतीजा निकाला कि शरीर पर पडनेवाले प्रभाव वंशानुगत तौर पर अगली पीढ़ियों में संचारित नहीं होते. सबसे पहले तो इस प्रयोग में बहुत बड़ी खामियां है – जैसेकि जीव विकास प्राकृतिक स्थिति में होता है और उसे बहुत लंबा समय लगता है । दूसरा उस गुण की, जो प्रकृति में संचरण के लिए जीव के लिए लाभदायिक होता है, प्राकृतिक देन होता है । इस प्रयोग को करने से पहले चूहे के लिए पूंछ की उपयोगिता है या नहीं, के बारे में  कुछ भी निर्धारित नहीं किया गया । इसके अलावा नये अध्ययनों और खोजों से यह स्पष्ट हो गया है कि शारीरिक तौर पर पडनेवाले बाहरी प्रभाव, एक जीव से उसकी, जहाँ तक कि कई पीढ़ियों तक भी संचारित हो सकते हैं और इससे विज्ञान की एक पूरी शाखा ‘ऐपीजैनेटिक्स’ अस्तित्व में आ गयी है.

वीज़मैन की ‘जर्म-प्लाज़्म थियूरी’ और डार्विन की ‘प्राकृतिक चुनाव’ को आधार बनाकर ही आधुनिक जीव विकास अस्तित्व में आया । इस सिद्धांत के अनुसार जीवों में आये अलग-अलग बदलावों में कुछ बदलाव, जो जीव के लिए वातावरण में संचरण और अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, प्रकृति द्वारा चुन्न लिए जाते हैं । भाव कि जिस जीव में ये लाभदायिक बदलाव आते हैं, उस जीव को वातावरण में जिंदा रहने का ज्यादा मौका मिलता है और इसलिए उस द्वारा प्रजनन करने के अवसर भी ज्यादा होते हैं और धीरे-धीरे बदलावों वाले जीवों की गिनती मुख्य हो जाती है और समय पाकर और बदलावों के जमा होते जाने के कारण एक नयी प्रजाति अस्तित्व में आ जाती है । यहाँ तक बिलकुल डार्विन के सिद्धांतानुसार है. पर आधुनिक जीव विकास संबंधी सिद्धांतानुसार बदलावों के आने का कारण वातावरण और हालात अनुसार स्वयं को ढलने की जीव की जरूरत नहीं, बल्कि बदलाव जीव के जीनस में संयोगवश होनेवाले  आकस्मिक परिवर्तन हैं । इस प्रकार नव-डार्विनवादी प्राकृतिक परिस्थितियों का जीव पर पड़नेवाले प्रभावों से बिलकुल मुकर जाते हैं ।  यहां से शुरू हुआ यह विचारवादी तर्क बढ़ता हुआ यहाँ तक चला जाता है कि मानव की बनावट और स्वभाव सबकुछ पहले ही निश्चित है और इसे मानव की सामाजिक परिस्थितियों को बदलने से बदला नहीं जा सकता और ऐसा करने के प्रयत्न गैर-वैज्ञानिक और प्रकृति के विरुद्ध हैं और डार्विन विरोधी हैं । नव डार्विनवादी परम्परा में से मुख्य हैं – रिचर्ड डाकिंज़ और स्टीवन पिंकर ।

बीसवीं शताब्दी के पिछले अर्द्ध की महत्त्वपूर्ण खोज पीढ़ी दर पीढ़ी जीवों की बनावट और अन्य लक्षणों संबंधी सूचना संचारित करनेवाला रसायन डी.एन.ए. है. १९५३ में वाटसन और क्रिक ने डी.एन.ए. की बनावट का मॉडल विकसित कर लिया और इसके बाद जीनज़ की खोज हुई. जीन डी.एन.ए. एक विशेष प्रकार से डिज़ाईन किया गया और यह शरीर के किसी एक हिस्से या लक्ष्ण संबंधी सूचना जमा रखता है, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह सूचना संचारित करता है, जैसे आँखों का रंग, आदमी का कद, चमड़ी का रंग, जीव के बालों का रंग आदि. जीन कोशिका के केन्द्रक (नीयूक्लियस) में पड़े रहते हैं और कोशिका की क्रियायों को रेगूलेट करते हैं । इस खोज के पश्चात कुछ विज्ञानियों ने प्रत्येक मानवी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक या सामाजिक, का आधार जीन के रूप में डी.एन.ए. के टुकड़े को बना दिया । जीव विकास होता है तो जीनों में सांयोगिक बदलावों से होता है, कोई मनुष्य अपराध कर लेता है तो उसके जीन में नुक्स है, अगर कोई उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेता है तो उसके जीन बेहतर हैं, अगर कोई आलिशान घर में रहता है, तो उसके जीन ही इतने काबिल हैं, अगर कोई पूंजीपति अमीर बनता जा रहा है और मजदूर दिन प्रतिदिन गरीब तो अमीर पूंजीपति के जीन गरीब मजदूर के जीनों से बेहतर हैं, अगर किसी को क्रोध अधिक आता है तो उसमें क्रोध वाले जीन अधिक हैं इत्यादि ।

रिचर्ड डाकिंज़ ने मानव की संस्कृति और स्वभाव की व्याख्या करने हेतू एक नया सिद्धांत पेश किया, कि हर व्यक्ति में स्वभाव के अलग-अलग लक्षणों के लिए, जैसे क्रोध, लालच, परोपकार, खीझना, हंसमुख होना आदि के लिए जीनज़ की तरह ही ‘मीमज़’ (Memes) होते हैं । चाहे अभी तक इन ‘मीमज़’ का पता-ठिकाना नहीं चला है । उसके अनुसार ‘मीमज़’ ही मानव का स्वभाव और सभ्यता तय करती हैं और इन्हें बाह्य वातावरण और मानव की परिस्थितियों के बदलने से बदला नहीं जा सकता । लेकिन अगर थोडा बारीकी में जाएँ, तो देखेंगे कि हर समाज और मानव समूह की सभ्यता प्रत्येक पीढ़ी के साथ बदलती रहती है, बल्कि एक मनुष्य के स्वभाव और सभ्यता में उसके जीवन काल में परिवर्तन आते रहते हैं । अगर डाकिंज़ के अनुसार चलें तो हर अपराधी की सन्तान अपराधी होगी, शराबी की शराबी, गुस्सैल की सन्तान गुस्सैल, शर्मीले  की संतान शर्मीली और हंसमुख की सन्तान हंसमुख. और इससे भी बढ़कर मानव सारी उम्र एक जैसा ही बना रहेगा । पर हम देखते हैं ऐसा बिलकुल नहीं होता, प्रतिदिन डाकिन्ज़ साहेब का सिद्धांत मानव जीवन द्वारा गलत साबित किया जाता है । असल में इस प्रकार के सिद्धांत सिर्फ इसलिए निर्मित किये जाते हैं ताकि लोगों को मुर्ख बनाया जा सके । दूसरे महारथी स्टीवन पिंकर का ‘विकासवादी मनोविज्ञान’ का वर्णन भी कुछ इसी प्रकार का ही है । बस पिंकर साहेब ‘मीमज़’ के स्थान पर मॉडियूल (Module) शब्द का प्रयोग करते हैं । इनके अनुसार भी मानव स्वभाव को, इसलिए मानव समाज को बदला नहीं जा सकता । इस सिद्धांत को मनोविज्ञानियों द्वारा पूर्णतया रद्द किया जा चूका है । ज्यादातर मनोविज्ञानी यह मानते हैं कि मानव स्वभाव चाहे कुछ हद तक वंशानुगत होता है पर ज्यादातर यह सामाजिक हालात और मानव के छोटी उम्र में पालन-पोषण, माता-पिता का प्यार, सेहत और शिक्षा पर निर्भर करता है ।

इस सोच के कारण, बहुत समय तक यह समझा जाता रहा कि मानव के विकास दौरान सबसे पहले दिमाग का आकार बड़ा हुआ, उसने अपने हाथ का प्रयोग और सीधा खड़ा होना सीखा, इसी कारण से ही वह भाषा का प्रयोग करने लगा और अपने दिमाग द्वारा सोचने से ही वह समूह बनाकर, फिर मानव समाज के रूप में रहने लगा । पर, असल में, जैसाकि एंगेल्ज़ ने अपने आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ में पेश किया था, सबसे पहले मानव के पूर्वज वृक्षों से उतरकर धरती पर चलने लगे जिस दौरान वे सीधा खड़े रहकर चलना सीखे । इस प्रकार अगले पंजे चलने से मुक्त होकर अन्य कार्यों के लिए प्रयुक्त होने लगे, जिस कारण मानव औजारों का प्रयोग करने लगा, जो बाद में भाषा और सामाजिक उत्पादन का कारण बना । इसके साथ ही हाथों का प्रयोग होने के कारण दिमाग का आकार बड़ा होने लगा, जो हाथों के विकास होने से कहीं बाद में जाकर हुआ । इन सच्चाईयों को आधुनिक जीवाश्म विज्ञान ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है ।

इसके बारे में ज्यादा विस्तार से जॉन पिकार्ड के आलेख “एंगेल्ज़ और मानव विकास’ में पढ़ा जा सकता । जीनज़ में आनेवाली तब्दीलियों के जीव विकास में भूमिका के बारे में ब्रिटिश विज्ञानी जे. बी. एस. हालडेल ने भी अपने आलेखों में विस्तार सहित लिखा है ।

हाल्डेल ने १९२९ में जीवन के पहले रूपों की  उत्पत्ति के रहस्यों से आवरण उठाया । हालडेल के समय में ही, एक सोवियत विज्ञानी, अलेग्जान्द्र उपरेन भी उन्हीं नतीजों पर पहुंचा, इसलिए इस थियूरी को उभयनिष्ठ तौर पर उपरेन-हाल्डेल मॉडल कहा जाता है । इन दोनों विज्ञानियों ने अपने खोज कार्यों में द्वंदात्मक भौतिकवाद को लागू करते हुए इस सिद्धांत की खोज की । १९५३ में मिलर और युरे ने प्रयोगशाला में इस थियूरी को सही सिद्ध कर दिया । अब इस सिद्धांत को थोडा सुधार कर के.आर. एन.ए. मॉडल का रूप दे दिया गया है ।

द्वंदात्मक भौतिकवाद और जीव विकास

द्वंदात्मक भौतिकवादी नजरिये के जन्मदाता, मार्क्स और एंगेल्ज़, ने डार्विन की खोजों का पुरजोर समर्थन किया । इसके अलावा इसके अधूरेपन और भविष्य में इसके और विस्तारित होने की पेशनगोई भी की । डार्विन की खोजों ने मार्क्स-एंगेल्ज़ के भौतिकवादी नजरिये को प्रकृति में और स्पष्टता से सिद्ध किया । जनवरी १८६१ में मार्क्स ने एंगेल्ज़ को लिखा, “डार्विन की पुस्तक (जीवों की उत्पति – अनु.) बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और इसने मुझे वर्ग संघर्ष के लिए प्राकृतिक आधार प्रदान किया है । पर इसमें हमें विकास के अपरिपक्व तरीके को भी सहन करना पड़ता है । अपनी सभी सीमाओं के बावजूद, न सिर्फ उदेश्यवाद (Taleology) (हर वस्तु के पीछे कोई न कोई उदेश्य होता है. अनु.) की प्राकृतिक विज्ञान में विद्यमान धारणा पर निर्णायक चोट है, बल्कि अपने तार्किक मतलब की भी अच्छी तरह व्याख्या करती है ।”

‘डियूरिंग विरुद्ध’ पुस्तक में एंगेल्ज़ ने लिखा, ” जीव विकास का सिद्धांत अभी अपने प्रारंभिक चरणों में है और इसमें कोई शक नहीं कि भविष्य की खोजें हमारी अब तक की जीव विकास संबंधी धारणाओं, डार्विन की खोजों समेत, को बदल देंगी ।”

इसी प्रकार एंगेल्ज़ ने ‘डाईलेक्ट्स ऑफ नेचर’ में भी डार्विन के ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ के सिद्धांत का मूल्यांकन कुछ इस प्रकार किया, ” डार्विन से पहले तक, उसके अबतक के पक्के अनुयायी भी प्रकृति में सामंजस्यपूर्ण सहयोग पर जोर देते हैं, कि कैसे पौधे, जीव, जंतुओं को खाद्य-खुराक और आक्सीज़न प्रदान करते हैं और जीव जंतु पौधों को बदले में खाद, अमोनिया और कार्बोनिक एसिड (कार्बन डाईआक्साईड – अनु.) प्रदान करते हैं । जैसे ही डार्विन का सिद्धांत सामने आया, इन्हें हर जगह संघर्ष ही दिखाई देने लगा । दोनों ही नजरिये अपनी-अपनी सीमाओं के अन्दर ठीक हैं, पर दोनों ही एक समान तरह से एकतरफा और तुअस्बग्रस्त हैं । जैसे प्रकृति में निर्जीव वस्तुओं के संबंध अनुरूपता के टकराव दोनों तरह के होते हैं, वैसे ही सजीव वस्तुओं में भी सचेतन और अचेतन सहयोग के साथ-साथ सचेतन और अचेतन संघर्ष भी होता है । इसलिए, प्रकृति के संबंध में, सिर्फ संघर्ष को ही सबकुछ मान लेना ठीक नहीं । बल्कि ऐतिहासिक जीव विकास और जटिलता की पूरी दौलत को एक छोटे से और एकतरफा वाक्यांश ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ में बाँधने की इच्छा करनी बचकाना ही होगी । इसका कुछ भी मतलब नहीं है ।

‘डार्विन का जीवित रहने के लिए संघर्ष’ का सिद्धांत समाज में प्रचलित अवधारणाओं जैसे सबकी सबके खिलाफ जंग, की हौबिस की थियूरी , मुकाबले की बुर्जुआ अर्थशास्त्र की अवधारणा और माल्थस की जनसंख्या संबंधी अवधारणा का प्रकृति विज्ञान में लागू करने का प्रयत्न हैं । जब ऐसा करके सफलता हासिल कर ली गयी है (बेशक इस मूलभूत आधार, माल्थस की थियूरी पर आज तक प्रश्न चिह्न लगा हुआ है), यह आसान हो जाता है कि प्रकृति विज्ञान की अवधारणाओं को समाज के इतिहास पर लागू कर दिया जाये और इसे बिलकुल सीधे-सादे तरीके से कहा जाता है कि इस तरह ये प्रस्तुतियां समाज के चिरस्थायी नियमों के तौर पर सिद्ध की जा चुकी हैं । ” (मार्क्स-एंगेल्ज़,  सम्पूर्ण रचनाएँ, जिल्द  25, पेज, 583-584, अंग्रेजी एडिशन 1987, प्रगति प्रकाशन.)

“जीवित रहने के लिए संघर्ष – सबसे बड़ी बात यह है कि इसे पौधों और जनसँख्या की अधिक बढौतरी तक ही सीमित रखा जाये, जोकि पौधों और निम्न जंतुओं के विकास के कुछ चरणों में वास्तव में होता है । परन्तु इन्हें उन परिस्थितियों में, जिसकी जीव-जंतुओं और पौधों को नए वातावरण पर भू-परिस्थितियों वाले नए भूभागों में परवास से बिलकुल अलग रखा जाना चाहिए जिनमें जीवों की प्रजातियाँ बदलती हैं, पुरानी मर जाती हैं और नई विकसित उनका स्थान ग्रहण कर लेती हैं, जनसँख्या में अधिक बढौतरी हुए बिना ही । नए वातावरण में जो जीव स्वयं को ढाल लेते हैं, जीवित रह जाते हैं और लगातार बदलावों से स्वयं को एक नई प्रजाति में विकसित कर लेते हैं पर ज्यादा स्थिर जीव मर जाते हैं और विलुप्त हो जाते हैं, साथ ही मंझोले जीव-रूप भी विलुप्त हो जाते हैं । यह सब कुछ किसी भी माल्थसवाद के बिना संभव है और होता है भी है, और अगर यह लागू भी होता है तो यह उस प्रक्रिया को, ज्यादा से ज्यादा थोडा तेज कर देता है ।”वही पेज, 582-83)

“चलें तर्क करने के लिए ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ नाम के वाक्यांश को मान भी लें । एक जानवर ज्यादा से ज्यादा इकठ्ठा कर सकता है, पर इन्सान तो उत्पादन करता है । वह जीवित रहने के साधन तैयार करता है, ज्यादा विस्तारित शब्दों में, जोकि प्रकृति ने उसके बिना न बनाये होते । यह जानवरों पर लागू होनेवाले नियमों को मानव समाज पर अपरिपक्व तरीके से लागू करना मुश्किल बना देता है । उत्पादन के कारण जल्दी ही ‘जीवित रहने का संघर्ष’ शुरू हो जाता है, पर यह संघर्ष जीवित रहने के साधनों के लिए नहीं, बल्कि मनोरंजन और विकसित होने के साधनों के लिए होता है । यहाँ – क्योंकि विकसित होने के साधन भी सामाजिक तौर पर पैदा होते हैं – जानवरों पर लागू होनेवाले नियम पूरी तरह से  आधारहीन हो जाते हैं । अंत में, पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली में, उत्पादन का स्तर इतना ऊँचा हो जाता है कि समाज जीवित रहने, मनोरंजन और विकसित होने के साधनों का अब और पूरी तरह उपयोग नहीं कर सकता क्योंकि उत्पादन करने वालों के बड़े हिस्से को इन साधनों के उपयोग करने से गैर-कुदरती तरीके से और जबरन हटा दिया जाता है । और इसीलिए संतुलन कायम रखने के लिए एक संकट (आर्थिक संकट – अनु.) प्रत्येक दस वर्षों बाद न सिर्फ जीवित रहने के, मनोरंजन और विकसित होने के साधन, बल्कि उत्पादन शक्तियों के एक बड़े हिस्से का भी विनाश कर देता है । इस प्रकार, यह ‘जीवित रहने के लिए संघर्ष’ कुछ इस तरह का रूप धारण कर लेता है – बुर्जुआ समाज द्वारा पैदा की गई वस्तुएं और उत्पादक शक्तियों की पूंजीवादी प्रणाली के विनाशकारी, विध्वंशकारी प्रभावों से रक्षा करने के लिए, सामाजिक उत्पादन और वितरण का अधिकार, इस कार्य के लिए अयोग्य हो चुकी पूंजीपति जमात के हाथों से छीन लें और इसको उत्पादन करनेवाले जन-समूहों को सौंप दें -और यह है समाजवादी क्रांति ।

“वर्ग संघर्षों के क्रमिक सिलसिले के तौर पर इतिहास का बोध, इनको ‘जीवित रहने के संघर्ष’ के बहुत कम विभेदन वाले चरणों तक सीमित कर देने से विषय-वस्तु और गंभीरता के पक्ष के लिहाज से कहीं अधिक अमीर है ।” (वही, पेज -584 -85 )

“डार्विन को पता नहीं था कि उसने मानवता, विशेषतया अपने देववासियों पर कितना कड़वा व्यंग्य लिख दिया है, जब उसने यह दिखा दिया कि ‘मुक्त प्रतिस्पर्द्धा’ , जीवित रहने के लिए संघर्ष जिसको अर्थशास्त्री सबसे ऊँची ऐतिहासिक उपलब्धि समझते हैं, जानवरों की दुनिया में एक आम स्थिति है । जैसे उत्पादन की क्रिया ने मानव को अन्य जानवरों से जीव-वैज्ञानिक तौर पर विभेदन प्रदान किया, उसी प्रकार सामाजिक पक्ष से भी ; सिर्फ चैतन्य तौर पर सामाजिक उत्पादन के ढांचे, जिसमें उत्पादन और वितरण योजनाबद्ध तरीके से होगा, मानवता को अन्य जानवरों से श्रेष्ठता प्रदान करेगी । इतिहास विकास इस प्रकार को दिन-प्रतिदिन आवश्यक ही नहीं बना रहा, बल्कि अधिकाधिक संभव भी बना रहा है ।” (वही, पेज -331 )

जैसे एंगेल्ज ने ‘ डियूरिंग विरुद्ध’ में यह कहा था कि जीव विकास के सिद्धांत अभी और विकसित होंगे, उसी प्रकार डार्विन को भी अपने सिद्धांत में विद्यमान खामियों का अहसास था ।

जीवाश्म विज्ञान के अनुसार, कैंबरियन युग (६००-७०० मिलियन वर्ष) से पहले की चट्टानों में जीवों के बहुत कम अंश मिलते हैं और वह भी ‘परोकेरीआईक’ नाम के आरंभिक जीव-रूप ही मिलते हैं । पर इससे बिलकुल बाद की चट्टानों में एकदम ही अलग तरह के बहुभांति जीव-रूप मिलते हैं । इनमें वर्तमान में मौजूद जीवों के लगभग बहुत जीव-रूप मिल जाते हैं. इसको ‘कैंबरियन धमाका’ कहा जाता है । यह ध्यान रखना चाहिए कि यह ‘कैंबरियन धमाका’ कोई रातों-रात हो गयी घटना नहीं थी, बल्कि कई मिलियन वर्षों में होनेवाली घटना थी, पर भू-वैज्ञानिक तौर पर देखा जाये तो पृथ्वी की उम्र के मुकाबले यह घटना एक धमाके की तरह ही तेजी से होनेवाली घटना थी । इसके पश्चात् अनेक प्रजातियाँ अस्तित्व में आ गयीं । डार्विन के समय भी इस तथ्य का ज्ञान था । बाद में यह भी सिद्ध हो गया कि समय-समय पर पृथ्वी पर कुछ इस प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं, चाहे ये परिस्थितियाँ कई मिलियन वर्ष लंबी होती हैं, पर फिर भी भू-वैज्ञानिक तौर पर बहुत छोटी होती हैं, जिस दौरान पृथ्वी पर उस वक्त मौजूद बहुत सारी प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं और उनके स्थान पर नई प्रजातियाँ पैदा हो जाती हैं जो समय के साथ धीरे-धीरे विकास करती हैं, विकास के इस चरण में, जब नई प्रजातियों के अस्तित्व में आ जाने के बाद के समय में ‘प्राकृतिक चुनाव’ अहम भूमिका निभाता है । इस तरह जीवों की प्रजातियों के तेजी से विलुप्त होने की अब तक छः घटनाएँ हो चुकी हैं ।

सबसे बड़ी विलुप्त होनेवाली स्थिति २५० मिलियन वर्ष पहले पेकिअन्योक-मीजोयोक युगों के बीच पैदा हुई जब जल और थल दोनों जगहों के ५० फीसदी जंतुओं और रेंगने वाले ८० फीसदी जंतुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो गयीं । इस प्रकार की अंतिम घटना ६३ मिलियन वर्षों पहले हुई जिसके परिणामस्वरूप अन्य अनेक प्रजातियों समेत डाइनासोर भी विलुप्त हो गये । पर ये घटनाये जीव विकास के राह में रूकावट नहीं बनती हैं, बल्कि जीव विकास को नए और उच्च धरातल पर ले जाती हैं । क्योंकि इन घटनाओं से नई प्रजातियाँ अस्तित्व में आती हैं जो पहले वाली प्रजातियों के मुकाबले अधिक विकसित होती हैं ।

‘कैंबरियन धमाके’ की डार्विन अपनी खोजों के आधार पर व्याख्या करने में असफल थे, पर उस समय डार्विन ने यह कहा कि किसी कारण जीवाश्म संबंधी मानव जानकारी अभी अधूरी है और भविष्य में यह जानकारी मुकम्मल हो जाएगी । पर समय के साथ यह पता चला कि जीवाश्म संबंधी जानकारी बिलकुल सही थी और जीवाश्म में अधूरापन इतना भी अधिक नहीं है कि ‘कैंबरियन धमाके’ को सिर्फ जानकारी का अधूरापन कह कर काम चला लिया जाये । इसी प्रकार कई बार प्रजातियों के बीच के रूप भाव ‘लिंक प्रजाति’ भी नहीं मिलती, उन स्थितियों में डार्विन के सिद्धांतों के अनुसार नई प्रजाति की उत्पति की व्याख्या करनी मुश्किल हो जाती है ।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, अमरीका के भू-विज्ञानी स्टीफन जे गोल्ड और नीलज़ ऐलड्रिज़  ने १९७१ में जीव विकास का नया सिद्धांत पेश किया, जो न सिर्फ डार्विन के सिद्धांत के महत्त्व को बनाये रखता है, बल्कि इस और अधिक अमीर बनाते हुए जीव विकास के सिद्धांत को इस काबिल बना देता है, जिससे ‘कैंबरियन धमाका’ और तेजी से प्रजातियों के विलुप्त होने से पैदा होनेवाली घटनाओं की सटीक व्याख्या होती है । इस सिद्धांत का नाम है – ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ .

गोल्ड और ऐलड्रिज़ ने  अपने निबंधों में यह काफी हद तक सिद्ध कर दिया कि जीव विकास की प्रक्रिया हर समय एक ही रफ़्तार से सीधी रेखा में नहीं चलती बल्कि इस प्रक्रिया में धीमें और लटकते हुए अंतरालों में कुछ पड़ाव ऐसे आते हैं जब जीव विकास की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है । इस तीव्र दौर में धीमें विकास के दौरान जमा हुए मात्रात्मक परिवर्तन गुणात्मक परिवर्तनों में बदल जाते हैं । गोल्ड के अनुसार जीव विकास सदैव प्रगतिशील ही नहीं होता, बल्कि कई बार विपर्ययवादी भी होता है, क्योंकि कई जीव जीवित रहने के लिए दूसरे जीवों के परजीवी बन जाते हैं, जैसे की वृक्षों पर लटकती हुई अमरबेल, अलग-अलग परजीवी कीड़े आदि ।

डार्विन इस प्रकार की संभावना से अनजान नहीं थे । ‘जीव की उत्पति’ के पांचवें एडिशन में डार्विन लिखते हैं, “समय के जिन खण्डों में प्रजातियों में परिवर्तन आते हैं, वे प्रजातियों के लगभग स्थिर रहनेवाले समय खण्डों के मुकाबले छोटे होते हैं ।” चार्ल्स डार्विन, जीवों की उत्पति, १८६९ लन्दन, जॉन मरे, पांचवां एडिशन, पेज -५५१)

इस सिद्धांत के प्रस्तुत करने के समय से ही गोल्ड और ऐलड्रिज़ का बाकी बहुत सारे विज्ञानियों द्वारा निरंतर विरोध होता रहा है क्योंकि छलांगों द्वारा जीव विकास का सिद्धांत पूंजीवाद के बंधक चाकर गुलामों को हजम नहीं होते और वे धीमें और लटकते हुए बदलावों के सिद्धांत को ही एकमात्र सही सिद्धांत सिद्ध करने पर तुले रहते हैं । इस विरोधी शिविर में एक बार रिचर्ड डाकिनज़ और जॉन मेरिनार्ड स्मिथ प्रमुख रहे हैं । अपने मृत्यु के वर्ष, २००२ तक, गोल्ड ने अपने सिद्धांत की डटकर हिमायत की और अन्य तरह के शंकों का निवारण किया. चार्ल्स डार्विन के बाद, स्टीफन जे गोल्ड को जीव विकास के क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा नाम माना जाता है ।

गोल्ड के सिद्धांतों की रोशनी में आज, छलांगों द्वारा जीव विकास के सिद्धांत को अधिकाधिक मान्यता मिल रही है और जीव विकास विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे तरीकों की खोज हो रही है जो इस सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं ।

गोल्ड अपनी पुस्तक ‘पांडाज थंब’ में लिखते हैं, ” सोवियत यूनियन में विज्ञानियों को एक अलग तरह की दार्शनिक शिक्षा मिलती है – एंगेल्स द्वारा, हीगेल से लेकर, और विकसित किये गये द्वंदात्मक नियमों की शिक्षा. द्वंदात्मक नियम स्पष्ट तौर पर धीमे-तेज विकास के हामी हैं. वे मात्रा के गुणों में परिवर्तन की बात करते हैं । यह अजीब लग सकता है, पर ये बताते हैं कि किसी प्रणाली में धीरे-धीरे इकठ्ठे होनेवाले परिवर्तन या तो दबाव के परिणामस्वरूप वह प्रणाली ऐसी स्थिति में पहुँच जाती है, जब एकदम छलांग द्वारा परिवर्तन होता है. पानी को गर्म करो, यह उबल जायेगा, मजदूरों को अधिकाधिक दबायो, क्रांति हो जाएगी । ऐलड्रिज़ और मुझे यह जानकर बहुत हैरानी हुई कि बहुत पहले रूसी जीवाश्म विज्ञानी भी हमारी ‘पंक्चूएटिड इकूलेबीरीयम’ मॉडल जैसे जीव विकासी सिद्धांतों की धारणाएं रखते हैं । ”

अपनी पुस्तक ‘डार्विन के बाद अब तक’ में, गोल्ड, एंगेल्स के आलेख ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ का वर्णन करते हुए लिखते हैं, ” असल में, उन्नीसवीं शताब्दी में एक बहुत ही शानदार आलेख प्रकाशित हुआ, जिसके लिखनेवाले के बारे में जानकर, बहुत से पाठक हैरान हो जायेंगे – फ्रेडरिक एंगेल्स । (बेशक यह जानकर, कि एंगेल्स भी प्राकृतिक विज्ञान में गहरी दिलचस्पी रखते थे और वे अपने दर्शन ‘द्वंदात्मक भौतिकवाद’  को एक मजबूत आधार पर निर्मित करते हैं । वे अपनी पुस्तक ‘प्रकृति में द्वंदवाद’ को पूरा न कर सके ) उनकी मृत्यु के बाद, १८९६ में एंगेल्स द्वारा लिखित ‘वानर से मानव तक परिवर्तन में श्रम की भूमिका’ प्रकाशित हुई  पर पश्चिमी विज्ञान पर इसका कोई असर न हुआ ।” क्योंकि उनके  अनुसार पश्चिमी सोच में पक्षपात बहुत गहराई तक पैठ कर चुका था ।

असल में देखा जाये तो डार्विन के सिद्धांतों पर होनेवाले सैद्धांतिक हमले असल में द्वंदात्मक भौतिकवादी दर्शन को नकारने के नाकाम परन्तु योजनाबद्ध प्रयत्न हैं । आज की परिस्थितियों में परजीवी हो चुके पूंजीवाद को सबसे अधिक खतरा मार्क्सवादी भौतिकवादी दर्शन से है क्योंकि यह वह दर्शन है जो समाज को गति में दिखाता है और वर्णन करता है कि प्रत्येक वस्तु गति में है । जैसे जीव विकास एक निरंतर गतिमान क्रिया है, वैसे ही, मानव समाज भी निरंतर गतिमान है । मानव समाज में भी प्राचीन मिट जाता है और नया उसका स्थान ग्रहण कर लेता है । इसी तरह आरंभिक कबीलाई समाजों के स्थान को गुलामदारी प्रबंध ने ग्रहण किया और फिर सामंतवाद और पूंजीवादी प्रबंध । प्रत्येक प्रबंध अपनी उम्र भोगकर इतिहास के रंगमंच से रुखसत हो गया और उसके स्थान को नये प्रबंध ने संभाल लिया । पूंजीवाद के चाकर इस सच्चाई को नकारने के लिए, हर उस सोच, वैज्ञानिक खोज या मानवीय कोशिश को सबसे पहले दबाने की कोशिश करते हैं, अगर ऐसा नहीं होता है, तो उसकी इस तरह से व्याख्या करने की कोशिश करते हैं कि उसके अन्दर का भौतिकवादी तत्त्व ख़त्म हो जाये और वह पूंजीवादी प्रबंध को सदैव से न्यायोचित ऐलान करने लगे ।

उन्नीसवीं शताब्दी में, जब पूंजीवाद के उभार का दौर था, उस वक्त पूंजीवादी चाकरों की कोशिश होती थी कि किसी वैज्ञानिक खोज से होनेवाले फायदा अधिकाधिक उठाया जाये और इस खोज से आम लोगों तक पहुँचने वाली भौतिकवादी चेतना को किसी न किसी तरह से दूर किया जाये । इससे भी अधिक, अगर हो सके तो उन खोजों को पूंजीवादी-चिरस्थायी तौर पर लोगों की नजरों में परिपक्व सिद्धांत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाये । इस प्रकार फासीवाद को जायज ठहराने के लिए पूंजीवादी चाकरों ने विज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया । नस्ल सुधारने को एक विज्ञान का दर्जा दिया गया । इस तथाकथित विज्ञान के आधार पर उन्नीसवीं शताब्दी के पूरार्द्ध में अमरीका में २०,००० लोगों की जबरन नसबंदी कर दी गयी और नाज़ी जर्मनी में ३.७५,००० लोगों को नपुंसक बना दिया गया । इस काम को सिरे चढाने के लिए बाकायदा कानून बनाये गये । अमरीका के लगभग सभी राज्यों में कानून बनाकर नस्ल सुधारने के विभाग तक बनाये गये ।

विज्ञान के नामपर इस प्रकार के मानवता विरोधी कारनामे बाद में भी जारी रहे । बेशक उपरोक्त किस्म के नस्ल सुधार को विज्ञान द्वारा रद्द किया जा चुका है, पर यह अलग-अलग रूपों में सामने आने लगा जैसेकि साईको सर्जरी । इसके अनुसार सामाजिक समस्याओं का इलाज भी दिमाग का आपरेशन करके किया जा सकता है । इस तरह के ही दो तथाकथित विज्ञानी, वर्तमान मार्क और फ्रैंक इरविन ने यह सुझाव भी पेश कर दिया कि शहरों में होनेवाले दंगे भी दिमागी परेशानी के कारण होते हैं और इसका इलाज झुग्गियों में रहनेवाले लोगों के नेताओं के आपरेशन द्वारा हो सकता है और ऐसा किया भी गया । ऐलन वूड्स और टेड ग्रांट के अनुसार – १९७१ में, अमरीका में ऐसे ही लोगों का इलाज करने के लिए उचित ‘बीमारों’ की सूची मांगी गयी । आपरेशन द्वारा इलाज के लिए भेजे गये आदमियों में अप्रैल, १९७१ के कामगारों की हड़ताल के नेताओं में से एक शामिल था । ये हैं पूंजीवादी चाकरों के कारनामे और वैज्ञानिक खोज !

जीव विज्ञान से बाहर दूसरे विज्ञानों में भी यही स्थिति है । क्वांटम भौतिकी के दार्शनिक नतीजे ‘कोपनहेगन व्याख्या’ इसकी ज्वलंत मिसाल है । जैसे-जैसे पूंजीवाद और अधिक परजीवी होता जा रहा है, उतना ही अधिक यह विज्ञान-विरोधी भी होता जा रहा है । पहले तो यह विज्ञान से निकलने वाले भौतिकवादी परिणामों को बिगाड़ता था, पर अब तो यह विज्ञान के विकास में ही रूकावट बनता जा रहा है ।

पूंजीवाद ने पृथ्वी के गर्भ से निकलने वाले जीवाश्मों को पण्य (commodity) बना दिया है । जीवाश्मों की पूरी दुनिया में फैली एक मंडी है । पूरी मानवता की धरोहर, ये जीवाश्म कुछ लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति बनते जा रहे हैं । ऐसा एक उदाहरण एक ४७ मिलियन वर्ष पुराने एक कैमूर के जीवाश्म का है । यह अभी-अभी ‘ढूँढा’ गया । यह जीवाश्म दूध पिलाने वाले ऊपरी श्रेणी के और आरंभिक दूध पिलाने वाले प्राणियों के बीच एक महत्त्वपूर्ण लिंक है । पर यह जीवाश्म १९८३ से लेकर २५ वर्षों तक एक जीवाश्म इकठ्ठे करने के शौक़ीन व्यक्ति की व्यक्तिगत सम्पत्ति बना रहा । इस प्रकार और भी जीवाश्मों को, जो व्यक्तिगत सम्पत्ति हैं, किराए पर खोज-कार्यों के लिए दिया जाता है ।

मेडिकल क्षेत्र के बारे में तो जितना कहा जाये उतना ही कम है । दवा कम्पनियां, उस खोज-कार्य जिसमें से मुनाफे की संभावना कम हो या मुनाफे पर चोट करता हो, पर धेला भी नहीं खर्च करतीं । ऐसे कार्यों के लिए अक्सर लोगों को जेब से खर्च उठाना होता है या फिर सरकारों के सामने नाक रगड़नी पड़ती है । बहुत से ऐसे खोज-कार्य बीच में ही बंद हो जाते हैं या फिर बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं ।

स्टेम सैल रीसर्च का भी इसीलिए विरोध हो रहा है । बेशक यह विरोध नैतिक और धर्म के चोगे के नीचे हो रहा है । इसका विरोध करनेवाले भी वही हैं, जो समलैंगिक और गर्भपात संबंधी कानूनों का विरोध करते हैं । और इन फासीवादी समूहों को आशीर्वाद किसका है, यह भी सबको पता है ।

इसी प्रकार १९९० में शुरू हुई, बैटरी से चलनेवाली बिजली की कार की परियोजना भी तेल कंपनियों, ऑटो कंपनियों और अमरीका सरकार की मिलीभगत से ठप होकर रह गयी है और यह कार कभी भी सड़क पर नहीं उतर सकी । इस बैटरी से चलनेवाले व्हीकल ने जहाँ प्रदुषण को कम करना था, वही तेल की खपत भी कम करनी थी, पर यह सब तेल कम्पनियों को किस तरह बर्दाश्त होता, इसलिए मिलमिलाकर पूरी परियोजना को कोल्ड स्टोर में रख दिया गया ।

इस प्रकार साफ़ है कि लोगों में भौतिकवादी चैतन्य के प्रसार को रोकने के लिए और इसे कुंठित करने के प्रयासों की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में, जीव विकास के सिद्धांत पर, जोकि उतने ही प्रमाणों से सिद्ध हो चुके हैं जितने प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है पृथ्वी प्लेट जैसी नहीं, बल्कि गेंद जैसी, सूर्य पृथ्वी के नहीं, पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और सूर्य और चन्द्र ग्रहण किसी राहू-केतू के कारण नहीं बल्कि सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा के एक रेखा में आ जाने से लगते हैं, विवाद पैदा कर वैज्ञानिक प्राप्तियों और सिद्धांतों के उन क्रांतिकारी अंशों को कमजोर करने की कोशिशे हो रही हैं जो किसी भी वस्तु के चिरस्थाई होने की अवधारणा के परखचे उड़ा देते हैं । इसके साथ ही विज्ञान और दर्शन को मानवता की भलाई के लिए उपयोग के स्थान पर पूंजीवाद की पूरी अधिसंरचना इन्हें मुनाफे की चौहदी में कैद करने और श्रमिक लोगों की अधिकाधिक रत निचोड़ने के साधन मात्र बनाने के लिए दिनरात पंजों के बल खड़ी रहती है । इसलिए वर्तमान समय में, न्याय और समानता पर आधारित शोषण रहित समाज के सृजन का स्वप्न देखनेवाले लोगों के लिए यह जरूरी है कि भौतिकवादी वैज्ञानिक चैतन्य के हक़ में खड़े होने और डार्विन के सिद्धांतों समेत विज्ञान के हर क्षेत्र में हो रहे विचारवादी हमलों का और वैज्ञानिक तथ्यों को विकृत करके पूंजीवाद की सेवा करनेवालों का मुंह-तोड़ जवाब देने के लिए तैयारी करें ।

पंजाबी पत्रिका, नवें समाजवादी इन्कलाब दा बुलारा ‘प्रतिबद्ध’ के जनवरी, २०१० अंक से आभार सहित |

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हैती, भूकंप,तथाकथित ज्योतिष शास्त्र, पूंजीवाद और समाजवाद का परस्पर गहरा संबंध है, भाई !

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पूंजीवादी रूस के शहर नेफ्तेगोर्स्क में 27 मई 1995 के रेक्टर पैमाने 7.6 के भूकम्प ने इसकी कुल आबादी 3500 में से 2000 लोगों की जान ली. इस त्रासदी पर माइक देविड़ो ने अपनी ‘ मास्को डायरी  : रूसी आपदाएं, प्राकृतिक और अप्राकृतिक’ में समाजवादी सोवियत यूनियन के शहर ताशकंद के अप्रैल  26, 1966 के रेक्टर पैमाने 7.5 के भूकंप पर समाजवादी राज्य और उसकी जनता के बारे में लिखा है कि किस प्रकार राज्य और जनता का सैलाब इस शहर के लोगों की मदद के लिए उमड़ पड़ा. अविभाजित सोवियत यूनियन में पूंजीवाद की पुन:स्थापना हो चुकी थी लेकिन समाजवादी भावना का , पूर्ण रूप से, अंत नहीं हुआ था. अपनी यादों को ताज़ा करते हुए वे लिखते हैं,

“भूकम्प जिसने सखालिन द्वीप के शहर नेफ्तेगोर्स्क को गर्क कर दिया है, इससे भी बड़ी त्रासदी का प्रतीक है – उल्ट रूसी इन्कलाब, जिसने रूस और भूतपूर्व सोवियत यूनियन को समतल कर दिया है. प्राकृतिक आपदाएं सामाजिक व्यवस्थाओं की सीमाओं में फर्क करना नहीं जानती. लेकिन सोवियत यूनियन 26 अप्रैल 1966 के भूकम्प जिसने ताशकंद को तबाह कर दिया, पर किस प्रकार कार्यशील होता है और किस प्रकार पूंजीवादी रूस नेफ्तेगोर्स्क के भूकम्प और संभावित दुर्घटनाओं से निपटता है, में अंतर इतना साफ़ है कि वह अपनी कहानी स्वयं बयान करता  है.

मैं 1969 में ताशकंद में था. मैंने उज्बेकिस्तान की राजधानी ( 10 लाख की जनसंख्या का शहर) के जिंदा बचे लोगों से, उनके दहशत के न केवल किस्से ही सुने हैं बल्कि मैंने देखा है – ताशकंद को, सभी 15 गणराज्यों द्वारा, पुनर्निर्मित रूप में और पहले से भी अधिक सुन्दर रूप में ! वह भी केवल तीन वर्षों में ! 35 प्रतिशत शहर तबाह हो गया था. 95,000 लोग बेघर हुए, 45 प्रतिशत संयंत्रों को भारी नुकसान पहुंचा. 180 स्कूल, 600 दुकाने ढह-ढेरी हो गईं. भूकम्प के कुछ घंटों बाद ही CPSU   के महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव और प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन ताशकंद आ गए. USSR की सेना द्वारा तुरंत हरकत करने की उसकी प्रकृति ने  ‘महान राष्ट्रीय युद्ध” के दौरान सभी लोगों के हरकत में आने की यादों को ताज़ा कर दिया. प्रत्येक गणराज्य से लोग ताशकंद के लिए उमड़ पड़े. मास्को, लेनिनग्राद, रूस गणराज्य के सभी भागों से, उक्रेन से, अजेबेर्जान से, जोर्जिया, कजाखिस्तान, बेलारूस और बाल्टिक गणराज्यों से निर्माणकर्मी, ताशकंद के लिए रवाना हो गये. इन गणराज्यों ने वहाँ राहत सामग्री, औजार, और अपनी मशीने उतारना शुरू कर दिया. अपनी छुट्टियों का त्याग करते हुए सैनिक और विद्यार्थी उनसे जा जुड़े. ताशकंद के लोगों ने उनका अपने मुक्तिदाताओं के रूप में स्वागत किया. निर्माणकर्मी मेक-शिफ्ट बैरकों में दो से तीन वर्षों तक रहे.

सितंबर तक स्कूल पुन: खुल गये और 20,000 अपार्टमेंटों का निर्माण कर लिया गया – जो पिछले वर्षभर में निर्मित हुए कुल अपार्टमेंटों की संख्या का दोगुना था. लेकिन प्रतीकात्मक रूप से, जो चीज मैंने पाई, वह थी, “ताशकंद के पुन:निर्माण के समय समग्र सोवियत भावना” – प्रत्येक गणराज्य की विशेष भवन निर्माण शैली और कला, इस नए बसे शहर का अंग बन गयी.

और नेफ्तेगोर्स्क ? खो गया है वह महान परिवार जो अपने ही जैसे परिवार के दुःख भरे हालात से विचलित हो गया था ! खो गयी है वह बहन-भाईचारे की भावना जो एक को दूसरे से बाँधे हुए थी ! वर्तमान “स्वतंत्र” गणराज्यों से सांत्वना और टोकन सहायता आई है, पर यह आई है अजनबियों से ! पूंजीवादी रूस ने नेफ्तेगोर्स्क के सभी भूकंपलिख स्टेशनों का “मितव्ययीकरण” कर दिया है.  विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वे चालू हालत में होते, तो तबाही की समय पर चेतावनी मिल सकती थी.

राष्ट्रपति येल्स्तिन इस शहर में अभी तक नहीं आये हैं. भूकंप के कुछ दिनों बाद, प्रधानमंत्री  चेर्नोगिर्दिन ने अपनी छुट्टियाँ समाप्त कीं, लेकिन मास्को जाने के लिए. इतना ही काफी नहीं है कि प्राकृतिक आपदाओं  से निपटने के लिए दृष्टिकोण में इतना बड़ा अंतर है, बल्कि सच्चाई यह है कि अब आपदाएं पूंजीवादी रूस और ‘स्वतंत्र’ गणराज्यों के लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन गयी हैं. भाई-भाई के बीच खून-खराबा, चैचैनया का नागरिक युद्ध, 20 लाख रूसी शरणार्थी जो युद्ध से भाग आये हैं, और उनके साथ केन्द्रीय एशिया और बाल्टिक के “स्वतंत्र” गणराज्यों द्वारा भेदभाव, नागोमों काराबाख में आर्मीनिया युद्ध के शरणार्थी; माल्डोवा – प्रेदानेस्त्रोवा, ओसेतिया इंगुश गणराज्य, अब्कासिया; जोर्जिया – भूतपूर्व सोवियत यूनियन का  कोई भी ऐसा अंग नहीं है , जो सामाजिक तबाही और मानव-त्रासदी से अछूता हो. और इसके साथ ही हमें शामिल करना चाहिए मास्को के नरसंहार को. 1988 के आर्मीनिया के भूकंप से तबाह शहर अब तक  भी पुन: निर्मित नहीं हो सके हैं . ये समाजवाद के अवरोहण से, अपराधी पूंजीवाद के पोषण के लिए, वसूली करने की क्रूरता के साक्षी हैं. आर्मीनिया के येल्स्तिनों ने भाई को भाई से लड़कर मरने के लिए करोड़ों खर्च कर दिए हैं और भूकंप से प्रभावित 2 लाख से अधिक लोग अस्थायी घुरनों में रहने को विवश हैं. ग्रोस्नी और नेफ्तेगोर्स्क, स्तालिनग्राद और ताशकंद में यही फर्क है.

यह फर्क पूंजीवादी रूस और भूतपूर्व सोवियत यूनियन के लोगों का साये की तरह पीछा करता है. पायनियर कैम्प या तो बंद कर दिए गए हैं या फिर उनका व्यवसायीकरण हो गया है. काले सागर के अनापा में छुट्टियाँ बिताने का प्रति माता या पिता और एक बच्चे का 21 दिनों का खर्च 4,500,000 से 5,000,000 रूबल तक है. सोवियत ज़माने में यह खर्च 200 रूबल था जिसका 70 प्रतिशत ट्रेड युनियाने देती थीं. नेफ्तेगोर्स्क के भूकंप ने कड़वाहट में ही बढौतरी की है. तबाही का लगातार भरता हुआ यह वह जाम है जिसे रूस और भूतपूर्व गणराज्यों के लोग पी रहे हैं.”

लेखक के उपरोक्त संस्मरण को प्रकाशित करके हम साबित करना चाहते हैं कि समाजवाद और पूंजीवाद , भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाएं और तथाकथित ज्योतिष अंकविज्ञान आपस में जुड़े हुए हैं, क्योंकि समाजवाद प्राकृतिक आपदाओं से निपटते हुए मानव की जरूरतों और  गौरव की रक्षा करता है. जबकि तथाकथिक ज्योतिष अंकविज्ञान का मकसद पूंजीवाद की तरह ही, मानव द्वारा मानव की मजबूरी और अज्ञानता से लाभ कमाना होता है. पाठकों को भूलना नहीं चाहिए कि जब तक समाजवाद, हमारी पृथ्वी के एक बड़े हिस्से पर, विद्यमान था, तो इसके डर के चलते, पूंजीवाद वह सभी  सहूलियतें  देता रहा जो समाजवाद का अभिन्न अंग होती हैं. और अब उसे इन सहूलियतों जैसे आवास, शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के “मितव्ययीकरण” और निजीकरण को उदारवादी नीतियों के रूप में प्रचारित करके और लागू करके, मुनाफे की हवस की पूर्ति होने पर, मज़ा आता है. उदारीकरण से इनका अर्थ पूंजीपतियों के लिए “उदार” और मेहनतकश जनता के प्रति “क्रूर” होना होता है.

दूर जाने की जरूरत नहीं है. हमारे देश में कुछ वर्ष पूर्व आई  सुनामी और गुजरात के भूकम्प-पीड़ितों  के लिए आई अंतरराष्ट्रीय मदद को पीड़ित लोगों तक पहुँचाने के लिए सक्रिय नौकरशाही द्वारा आपस में बंदरबांट के, हम चश्मदीद गवाह हैं. ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि, पूंजीवादी समाज द्वारा निर्मित मानव और उसके दूसरों के कपड़े तक उतार लेने के संस्कार, उससे उसके इन्सान होने के मायने ही छीन लेते हैं.

एक लंबे समय तक हमारी पृथ्वी के एक बड़े हिस्से पर समाजवाद रहा है. ऐसा नहीं है कि समाजवाद ने भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना न किया हो. पाठकों को इनका अध्ययन करना चाहिए. लेकिन मुख्य मुद्दा पूंजीवादी समाज और समाजवादी समाज के उदेश्य में फर्क का है. एक के केंद्र में व्यक्तिगत मुनाफे की हवस है तो दूसरे के केंद्र में पूरा मानव समाज और उसकी भलाई. मानव के साथ व्यवहार करते समय पूंजीवाद को फ़िक्र होता है कि किस प्रकार उसका शोषण किया जाये. इस उद्देश्य की पूर्ति हेतू वह मनुष्यों को अलग-अलग  स्थानों पर, चालाकी या धूर्तता से, ‘ठिकाने लगाने’  – जहाँ उनका अधिक से अधिक शोषण हो, की फ़िराक में लगा रहता. जबकि समाजवाद में , जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं, मनुष्य नहीं बल्कि वस्तुओं का प्रबन्धन स्थान ले लेता है. इस समाज को इंसानों को ‘ठिकाने लगाने’ का कतई फ़िक्र नहीं होता – इसे फ़िक्र होता है कि किस प्रकार मानव की जरूरतों को केंद्र में रखकर उत्पादन किया जाये और वस्तुओं को जरूरतमंदों तक पहुँचाया जाये. किसी भी रूप में मुनाफा, समाजवादी समाज का उद्देश्य नहीं होता.

वैज्ञानिक विकास और तकनीक के तेज विकास की इस इक्कीसवीं शताब्दी में “हैती के भूकंप” से पैदा हुई प्राकृतिक त्रासदी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

मानव आदिम युग से आधुनिक युग तक, जीवन के संघर्ष में, प्रकृति के साथ अपने द्वंदात्मक रिश्तों की बदौलत, संघर्ष करता हुआ, विकास की मौजूदा मंजिल तक पहुंचा है. विज्ञान और तकनीक के मौजूदा स्तर ने ऐसा भौतिक आधार तैयार कर दिया है, जिसके द्वारा भूख, कंगाली और आवास की समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है. भूचाल और सुनामी जैसे कहर से घटित होनेवाली तबाही पर, बेशक पूरी तरह से नहीं, पर काफी हद तक निपटा जा सकता है. प्राकृतिक विपदाओं की पूर्व-सूचना हासिल करनेवाले अन्वेषण कार्यों को तरजीह देनी चाहिए. भवन-निर्माण और आवासीय घरों के निर्माण की ऐसी तकनीक विकसित करने पर जोर देना चाहिए, जिनसे प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए, कम से कम नुकसान हो.

कौनसी समस्या है जो इस तरह के कार्यों को अंजाम देने में रूकावट बनती है ? दूसरे विश्व-युद्ध के समय ब्रिटिश सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार रहे, प्रसिद्ध विज्ञानी जॉन डेस्मोंड बरनाल ने लिखा है, ” प्रचुरता और अवकाश के एक युग की समूची  संभावनाएं हमारे पास हैं, लेकिन हमारा यथार्थ एक विभाजित विश्व का है, जिसमें इतनी भूखमरी, मूर्खता और क्रूरता है जितनी आज तक कभी नहीं रही.” – विज्ञान की सामाजिक भूमिका, पेज 7. हैती के भूकंप  में लाखों लोगों की मौत, भारी गिनती में बेघर और जख्मी लोगों के दुखों और मुसीबतों ने, सभ्य समाज को हिला कर रख दिया है.

एक ब्लॉगर सज्जन का प्रश्न है कि हैती, भूकंप, ज्योतिषशास्त्र , समाजवाद और पूंजीवाद का आपस में क्या संबंध है ? शायद हमारे यह विद्वान सज्जन, जानबूझ कर, अपनी किसी मजबूरी के चलते, इतने महत्त्वपूर्ण प्रश्न को, मज़ाकिय ढंग से उछाल रहे हैं. आज साधारण लोग भी समझते हैं कि मानव-विश्व के निरंतर विकास के चलते, प्राकृतिक-विश्व से दो-चार होने की मानव-सामर्थ्य में निरंतर बढौतरी हुई है. आदिम युग में मौजूद प्रकृति की ओर से प्रस्तुत लाखों चुनौतियों पर वर्चस्व हासिल कर, समाज के विकास को गति प्रदान की. बड़ी-बड़ी नदियों पर बाँध बनाकर, भयंकर तबाहियों पर काबू पाया जा चुका है. तकनीक के विकास से, पैदावार के क्षेत्र में, असीम बढौतरी हुई है. हर युग में, पैदावार का स्तर और उसके वितरण का तरीका ही, सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संरचना को तय करता है. मानव-समाज, आदिम कबीलाई सामाजिक संरचना से लेकर, गुलामदारी, सामंती और पूंजीवादी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं से भी आगे समाजवाद के प्रारंभिक प्रयोग भी कर चुका है.

प्राकृतिक-विश्व और मानव-विश्व के संबंध सदैव एकसार नहीं रहे हैं. इन संबंधों के विकास ने मानव को, प्रकृति की विध्वंसकारी शक्तियों पर वर्चस्व हासिल करने के योग्य बनाया है. प्रकृति का हिस्सा होते हुए भी, प्रकृति और मानव के संघर्ष में, मानव ने प्रकृति को अपने हित में बदलते हुए, लगातार स्वयं को भी बदला है.

पूर्व पूंजीवादी समाजों में, मानव और प्रकृति के संघर्ष में, प्रकृति से हुई छेड़छाड़, समूचे प्राकृतिक-विश्व को, कोई उल्लेखनीय हानि नहीं पहुंचाती थी. मानव द्वारा प्रकृति के खजानों के उपयोग दौरान होनेवाले नुकसान, प्रकृति द्वारा स्वयं पुन: भरपाई के सामर्थ्य के दायरे का, उल्लंघन नहीं करते थे.

हमारा इस तर्क से कोई मतभेद नहीं है कि भूकम्प और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाएं, पृथ्वी की उत्पति के समय से ही, यानी लाखों-करोड़ों वर्षों से ही, घटित होती आ रही हैं. प्राकृतिक परिघटनाओं के अपने नियम हैं, जिनकी बदौलत पृथ्वी के अंदर और बाहर के वातावरण में घटित होनेवाली हलचल, कई बार भयानक तबाही का सबब बनती है. इस बात से भी सभी सहमत हैं कि जंगलों की तबाही, मशीनरी के अंधाधुंध उपयोग, जंग-युद्धों में उपयोग होनेवाले बारूद और रासायनिक हथियार और परमाणु तजुर्बों से पैदा होनेवाले प्रदुषण से प्रकृति का संतुलन लडखडा रहा है. प्रकृति अपने जख्मों की बहाली के लिए, सचेत मानव प्रयास की मोहताज हो गयी है.

मतभेद इस सच की पेशकारी को लेकर है. बड़ी चालाकी से, तमाम मानव जाति को, इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर, मुजरिम अपने गुनाहों पर पर्दा डाल देता है. कौन है वह मुजरिम, जो इक्कीसवीं शताब्दी के रोशन दिमाग इन्सान को भी, चकमा देने में कामयाब हो जाता है ? इस सवाल के जवाब से पहले, हमारे लिए, अपने वर्तमान और भूतकाल  के संबंधों के बारे में, थोड़ी सी चर्चा जरूरी है.

आज मानव के पास ज्ञान का एक बड़ा खजाना मौजूद है. इसके अलावा, समस्त मानव जाति को खुशहाल और बढ़िया जिंदगी मुहैया करवा सकने के सभी साधन मौजूद हैं. विज्ञान और तकनीक के विकास ने, वह भौतिक आधार तैयार कर दिया है, जिसपर, ऐसा समाज निर्मित होना संभव है, जहाँ भूखमरी और बिमारियों समेत, हर किस्म के अभाव पर वर्चस्व हासिल किया जा सकता है.

अपने आरंभिक दौर में, मानव प्रकृति की शक्तियों के अधीन था.  आदिम समाज मजबूरी का साम्यवाद था. उत्पादक शक्तियों के विकास के एक विशेष पड़ाव पर, मानव समाज वर्गों में – मालिक और गुलामों में विभाजित हो गया. यह सब कैसे हुआ? समाज विकास के किन नियमों ने, उन ऐतिहासिक परिवर्तनों को दिशा और गति दी, यह एक अलग विषय है. मानव-संस्कृतियों के इतिहास में, अलग-अलग भौतिक भूभागों में, वहां के वातावरण और ऐतिहासिक परस्थितियों की विभिन्नताओं के चलते, अपनी-अपनी विशेषताएँ मौजूद थीं, जिनके कारण वे अपनी अलग पहचान रखते हैं. परंतु ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि अपनी सभी विभिन्नताओं के बावजूद, प्रत्येक भूभाग के इतिहास में, कुछ चीजें साझी हैं. मिसाल के लिए, सभी की सभी सभ्यताएं, अपने-अपने विशेष लक्षणों के बावजूद, आदिम समाजवादी समाज, गुलामों-मालिकों के समाज और सामंतवादी सामाजिक-राजनीतिक आर्थिक प्रबंधों के दौर में से गुजरी हैं.

आज का युग, पूंजीवाद का युग है. इंग्लैण्ड के औद्योगिक इन्कलाब और फ़्रांसिसी इन्कलाब से शुरू हुई, आर्थिक और राजनीतिक तब्दीलियों ने, लगभग समस्त दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. पूंजीवाद के आगमन ने, मध्यकालीन जड़ता को तोड़कर, मानव-सभ्यता को बेहद तेजी से, पहले के मुकाबले विकास के बेहद ऊँचे स्तर पर, पहुंचा दिया. मजदूर वर्ग और मेहनतकश लोगों के आधार पर टिका पूंजीवाद, अपने विकास के साथ-साथ, आम लोगों के लिए भारी मुसीबतें साथ ही लेकर आया. अपने चरित्र के चलते ही, पूंजीवादी विकास समस्त संसार में एकसमान नहीं हुआ. असमान विकास इसके तौर-तरीकों में ही निहित है. पूंजीवादी विकास की आन्तरिक विरोधता के कारण, यह निरंतर मंदी के चक्रों की सजा भुगतता आ रहा है. पूंजीवाद का इतिहास, बस्तीवाद, नवबस्तीवाद के दौरों से गुजरता हुआ, आज नव-आर्थिक साम्राज्यवादी दौर से गुजर रहा है. बीसवीं सदी के आरंभ में ही, पूंजीवाद के साम्राज्यवादी पूंजीवाद की मंजिल में पहुँचने के साथ, इसके चरित्र में अधिकतर परजीविपन आ गया है. साम्राज्यवादी पूंजी ने, जहाँ दुनिया भर के कमजोर राष्ट्रों को, अपने कच्चे माल की मंडियां बनाकर लूटा, वहीं अपने-अपने देश के मजदूरों की लूट की दर को भी लगातार बढ़ाना जारी रखा. परिणामस्वरूप यूरोप के देशों और अमेरिका के मजदूर वर्ग ने, पूंजीवाद की बर्बर लूट के विरुद्ध, शानदार संघर्ष किये. दूसरी तरफ, साम्राज्यवादी पूंजी की लूट के शिकार, तीसरी दुनिया के देशों में, लड़े जानेवाले महान राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों ने, दुनिया में बस्तीवाद का निपटारा कर दिया. पूंजीवाद के इतिहास पर नज़र दौड़ाने पर, जो विशेष लक्षण उभरता है, वह है – विकास की विषमता. विश्व स्तर पर पूंजीवाद विरुद्ध, मजदूर वर्ग की विकसित राजनीतिक चेतना, विचारधारा के रूप में, प्रकट हुई. रूस, चीन, क्यूबा, पूर्वी यूरोप और एशिया के कई देशों में समाजवादी इन्कलाब करके, मजदूर वर्ग ने साम्यवादी समाज के निर्माण के पहले तजुर्बे किये.

बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक विश्व रंगमंच पर, पूंजीवादी राजनीतिक आर्थिक संरचनाओं में भी, भारी फर्क नज़र आते हैं. एक तरफ साम्राज्यवादी पूंजीवाद, अपनी क्रूरता और लूट के सर्वोच्च स्वरूप फासीवाद समेत, अपने देश के मजदूरों और मेहनतकशों और तीसरी दुनिया के देशों की कच्चे माल की सीधी लूट के रूप में मौजूद था. दूसरी ओर तीसरी दुनिया के गुलाम देश, राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों के द्वारा, बस्तीवादी गुलामी और अपनी पुरानी सामंती व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे. तीसरी दुनिया के  देशों का आर्थिक-सामाजिक स्तर भी एकसमान नहीं था. अफ्रीका, लातिनी अमरीका, मध्य पूर्व और एशिया के और कई देश, अपने-अपने राजनीतिक-आर्थिक धरातल के अनुसार, अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे. इन नवस्वतन्त्र देशों में क्यूबा, उत्तरी कोरिया, इंडो चीन और चीन जैसे देशों ने, समाजवादी क्रांतियों का रास्ता चुना. तब तक, 1917 का रूसी इन्कलाब, दुनियाभर के मजदूरों के लिए, विचारधारा के क्षेत्र में, उच्च प्रेरणा स्रोत बन चुका था. दुनिया के बड़े हिस्से में, मजदूर और मेहनतकश लोग, हर किस्म की लूट-खसूट ख़त्म करके, कम्युनिस्ट समाज के निर्माण की ओर अग्रसर होने के पहले प्रयोग कर रहे थे. परिणाम स्वरूप, इतिहास ने पहली वार, मजदूर वर्ग की बेमिसाल शक्ति के दर्शन किए.

पूंजीवाद और समाजवाद के संघर्ष के इन पहले प्रयोगों में, मजदूर वर्ग वक्ती तौर पर हार गया है. इन देशों में पूंजीपति वर्ग ने विश्व पूंजीवाद की मदद से, समाजवादी देशों में, पूंजीवाद की पुन:स्थापना कर ली है.

नए आजाद हुए अधिकतर देशों में भी, पूंजीवादी आर्थिक रिश्ते स्थापित हो चुके हैं. आज मोटे तौर पर हमारे देशों में, पूर्व पूंजीवादी आर्थिक-रूपों का निपटारा हो चुका है. राजनीतिक ढांचे के रूप में जहाँ कहीं, पिछड़े सामंती रूप नज़र आ रहे हैं, वहाँ भी आर्थिक-सामाजिक क्षेत्र में, पूंजीवादी रिश्ते अपनी पकड़ बना चुके हैं.

सारांश के तौर पर, अपनी सभी क्षेत्रीय विशेषताओं और विभिन्नताओं के बावजूद, सारा विश्व पूंजीवाद के तर्क अनुसार गतिमान है.

इस व्याख्या की रौशनी में, हम अपने पहले प्रश्न की ओर आते हैं. मानव-विश्व के इतिहास का प्राकृतिक-विश्व पर गहरा असर पड़ता है. आज जलवायु प्रदुषण, ओजोन परत में सुराख़, कार्बन उत्सर्जन, गलेशियारों का पिघलना, वनों की बर्बादी, भूकम्प और सुनामी आदि की चर्चा के समय, विज्ञानी और विद्वान सज्जन, समस्त मानव जाति की गलतियों की ओर  ऊँगली उठाते हैं. इसी मुकाम पर सामाजिक व्यवस्थाओं और प्राकृतिक परिघटनाओं में घटित होनेवाली हलचलों का परस्पर संबंध, महत्त्व ग्रहण करता है. मानव-इतिहास में, पूंजीवादी प्रबंध ही एक ऐसा प्रबंध है, जहाँ पूंजीपति वर्ग की मुनाफे की हवस बेलगाम हो जाती.  इसी मुनाफे की हवस ने, जंगल तबाह कर दिए हैं, पृथ्वी के धरातल तले पानी बेहद घटा दिया है. जंग-युद्धों के लिए और आधुनिक तकनीक के विकास के लिए, विज्ञान का दुरूपयोग किया है. जाने या अनजाने, सारी मानव जाति को, इस तबाही के लिए जिम्मेदार ठहराना, असल मुजरिम को छुपाने या पनाह देने के तुल्य है. यह तरीका पीड़ित मानव-जाति के विरुद्ध, पूंजीपति वर्गों की सेवा करता है.

आज हर क्षेत्र में जो आर्थिक सरगर्मी नजर आ रही है, उसका मुख्य प्रेरणा स्रोत ‘मुनाफा’ है. माल मंडी के लिए उत्पादित होता है, मानव-आवश्यकता के लिए नहीं. परिणाम स्वरूप महंगाई, अन्न का संकट और बेरोजगारी जैसी समस्यायों का हल नज़र नहीं आ रहा.

बेहिसाब उत्पादक क्षमता वाले, भारत जैसे देश की आधी से ज्यादा आबादी, रात को भूखा सोती है.

अति आधुनिक सुविधायों से सुसज्जित हस्पतालों का जाल बिछ जाने के बावजूद, ये सहूलियतें 90 फीसदी जनता की पहुँच से बाहर हैं.

मानव गौरव, पैसे की कमीनी दौड़ तले, कुचला जा रहा है. सभी आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सरगर्मियों का केंद्र मानव न होकर ‘मुनाफा’ हो गया है. यह स्थिति मुठ्ठीभर धन-पशुओं का तुष्टिकरण तो कर सकती है लेकिन करोड़ों मेहनतकश लोगों की जीवन-स्थितियों को बेहतर नहीं बना सकती. मजदूर और मेहनतकश लोगों की मुक्ति और अच्छा भविष्य, इस पूंजीवादी प्रबंध के खात्मे और समाजवादी प्रबंध के निर्माण के संघर्ष से जुड़ा हुआ है. केवल निजी संपत्ति के खात्मेवाले समाजवादी प्रबंध के निर्माण द्वारा ही, सभी लोगों को, अपनी योग्यताओं के सर्वांगीण विकास के लिए, अवसर उपलब्ध हो सकते हैं, जिसके केंद्र में, मुनाफे की हवस में पागल हुए, धन-पशु नहीं, बल्कि आम लोग होंगे. बीसवीं शताब्दी के समाजवादी क्रांतियों के प्रथम चक्र के प्रयोगों ने साबित कर दिया है कि किसी भी अन्य प्रबंध की भांति, पूंजीवादी प्रबंध भी  स्थायी नहीं है. इन इन्कलाबों ने, मजदूर वर्ग की असीम शक्ति और सामर्थ्य को भी इतिहास के रंगमंच पर प्रकट कर दिया है. वक्ती तौर पर, समाजवाद की हार और पूंजीवाद की पुन:स्थापना से, पूंजीवादी शिविर में जो जश्न का माहौल बना हुआ था, उसका भी आर्थिक महामंदी ने निपटारा कर दिया है.

इक्कीसवीं शताब्दी, विश्वभर में, नये समाजवादी इन्कलाबों के अगले चक्र की सदी होगी. जहाँ प्रत्येक मनुष्य के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ, समस्त मानव जाति, प्राकृतिक आपदाओं का मुकाबला करने के लिए, समर्थ होगी.

विशेष आभार : http://www.hartford-hwp.com/archives/63/055.html