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पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

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इससे पहले, लिंक जोड़ने के लिए देखें : वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पोंजी स्कीम जैसी है ?

विश्व आर्थिक मंदी ने एक बार फिर सारी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को मार्क्स की ओर मुड़ने के लिए मजबूर कर दिया है.  ‘द्वंदात्मक भौतिकवादी’ भूगोलवेत्ता ‘डेविड  हार्वे’ जो चालीस वर्षों से मार्क्स की पूंजी पढ़ा रहें हैं और जिन्हें पहली बार गंभीरता से लिया जा रहा है, से ‘लॉरी टेलर’ की मुलाकात पर आधारित यह आलेख ‘http://newhumanist.org.uk’ से लिया गया है.

डेविड हार्वे तुरंत अपनी तरंग में आ जाते हैं. “पूंजीवाद” वे रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स ,  लन्दन के हाल में अपने श्रोताओं से कहते हैं, “कभी भी अपने संकटों का समाधान नहीं करता. यह उन्हें केवल एक स्थान से दूसरी स्थान पर ले जाता है. ब्राज़ील से रूस, से अर्जन्टीना, से अमेरिका, से ब्रिटेन, से यूनान”.

जैसे ही वे इन बार-बार आनेवाले संकटों,  और विशेषरूप से, 1970 के बाद से उनकी बारंबारता में नाटकीय बढौतरी के कारकों का विश्लेषण करना शुरू करते हैं, मैं अपनी नज़र, श्रोताओं पर डालता हूँ. मैं अपनी चैयरमेन की सीट से देख सकता हूँ कि व्याख्यान सभागार खचाखच भरा हुआ है. कोई भी कुर्सी खाली नहीं है और लगभग दर्जन एक श्रोता गलियारे में खड़े हुए हैं. रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स [RSA]   के लंच-समय के व्याख्यानों में, अक्सर, अच्छी हाजिरी होती है लेकिन क्या कमरे में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति ने इस बात को तस्लीम कर लिया था कि जो कुछ वे आज इस वक्ता से सुनने जा रहे हैं, वह आज के पूंजीवाद का विश्लेषण है जो मार्क्स से शुरू होकर मार्क्स पर ख़त्म होता है, ऐसा विश्लेषण जोकि कई प्रकार से वैसा ही है, जैसा मैंने ७० और ८० के दशक में सैंकड़ों नीरस सभाओं में कट्टर समाजवादियों से सुना था.

कोई कारण नहीं था कि मैं फिक्रमंद होता. इस पर भी कि हार्वे ने तुरंत मार्क्स के प्रति अपना कर्ज तस्लीम किया और बार-बार वे मार्क्स को उद्घृत करते रहे. फिर भी, तीस मिनट के व्याख्यान में, किसी भी क्षण,  उनके अमीर श्रोताओं में बेचैनी  का कोई चिह्न नहीं था और समापन पर, प्रश्नौतर काल में, केवल एक श्रोता का सुझाव था कि मार्क्स को छोड़कर कुछ भी, हमारे मौजूदा आर्थिक संकट को समझने के लिए, सबसे बढ़िया हो सकता है.

निसंदेह, उस आर्थिक सिद्धांत को, जिसे सोवियत यूनियन के ढह-ढेरी हो जाने पर, भले ही अतार्किक रूप से ही सही, इतिहास में जगह दे दी गयी थी, स्वीकार करने की चाहत के पीछे एक बढ़िया कारण था. बिलकुल सीधी सी बात है कि विश्वभर के अर्थशास्त्रियों की,  इतिहास में अभी-अभी  घटित हुई घटनाओं पर एक भी संतोषजनक व्याख्या देने की पूर्ण असक्षमता. इसी तथ्य को श्रोताओं के सामने सही और साफ-साफ तरीके से प्रस्तुत करने में, हार्वे पूरी तरह से माहिर हैं.

अपनी ताज़ा पुस्तक, ‘पूंजी की पहेली और पूंजीवाद के संकट’ की प्रस्तावना में, वे यह कहानी सुनाते हैं, ” जब प्रतापी महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने नवंबर 2008 में, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के अर्थशास्त्रियों से यह पूछा कि क्यों नहीं वे मौजूदा आर्थिक संकट की आमद को देख पाए ( एक ऐसा सवाल जोकि निसंदेह प्रत्येक व्यक्ति की जबान पर था, लेकिन जिसे कोई सामन्ती शासक ही, इस तरह, हलके अंदाज में पूछ सकता था और उत्तर की अपेक्षा पाल सकता था ) तो अर्थशास्त्रियों के पास, देने के लिए, कोई जवाब तैयार नहीं था. छह महीने के मुख्य नीति निर्धारकों के साथ मिलकर किये गए अध्ययन, जुगाली और गहन विचार-विमर्श  के बाद, ब्रिटिश अकादमी के गलियारे में एकत्रित हुए सभी अर्थशास्त्रियों ने, एक साझे पत्र में, प्रतापी महारानी के सामने स्वीकार किया कि वे ,किसी हद तक, उस दृष्टि को खो चुके हैं जिसे वे ‘प्रणालीबद्ध जोखिम’ के नाम से जाना करते थे.

हार्वे, इस एपिसोड की स्विफटियन विडंबना का रस्सावदान करते हुए कहते हैं, “शिक्षित अर्थशास्त्रियों की अपनी असफलता पर बहानेबाजी करने की नाकाम कोशिश का यह दृश्य है, उस वक्त, जब वे बुरी तरह से डरे हुए सचेत हैं कि उनमें से किसी ने भी कपडे नहीं पहने हुए हैं. परन्तु यह सब उनको (हार्वे को) मार्क्स को जगाने का पूर्ण तरीका मुहैया करवाता है. किंकर्तव्यविमूढ़, वे अर्थशास्त्री, उन छः महीनों के लंबे अन्तराल के बाद, अंत में, यह पहचान गए थे कि उनकी असफलता का वास्तविक रहस्य क्या था.  जर्नलिस्टों और टिपण्णीकर्त्ताओं द्वारा पेश किये गये अधपक्के सिद्धांतों को भूल जाईये.  ताज़ा संकट, हार्वे अपने [RSA] के भावविभोर श्रोताओं से कहते हैं, किसी मानवीय कमजोरी या अप्रयाप्त वित्तीय बन्दोबस्त या किन्सियाई दृष्टि को त्यागने से या अंग्रेजों या अमेरिकियों या यूनानियों की विलक्षण सांस्कृतिक असफलताओं के कारण सिर के बल खड़ा नहीं हुआ है. यह पूंजीवाद की प्रणालीबद्ध असफलता है.  और इस प्रकार की असफलता पर विश्वसनीय लगने वाली केवल एक ही व्याख्या है, जिसे बूढ़े भले मार्क्स में खोजा जा सकता है.

[RSA] द्वारा तैयार की गयी इस कार्टून फिल्म की पार्श्व-ध्वनी, स्वयं हार्वे के उपरोक्त व्याख्यान का ही ऑडियो है.

शेष अगली किश्त [पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’] में

जलवायु संकट के लिए जिम्मेदार स्वयं पूंजीपति और उनकी व्यवस्था है न कि आम लोग

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धरती पर जलवायु संकट मनुष्य के इतिहास का एक अटल परिणाम है. यह सामाजिक और आर्थिक रिश्तों पर निर्भर करता है. पूंजीवादी प्रचार, जलवायु संबंधी समस्या को सामाजिक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य  से अलग करके रखता है. यह इसे राजनीति से ऊपर समझता है. समाज और वर्ग से ऊपर की कोई शै के रूप में इसे पेश करने का इसका उद्देश्य यह होता है कि पूंजीपति वर्ग और पूंजीपति प्रबंध को, इन संकटों को पैदा करने के लिए जिम्मेदार न ठहराया जा सके.

पिछले दिनों ‘कोपनहेगन पृथ्वी सम्मेलन’  जलवायु को प्रदुषण-मुक्त करने के लिए, दुनिया भर के शीर्ष नेताओं का, हमारे समय का, सबसे बड़ा जमावड़ा था. कार्बन उत्सर्जन के सवाल को जोर-शोर से उठाया गया. एक-दूसरे पर दोषारोपण हुआ. दुनिया की तबाही का आतंक उत्पन्न करते हुए, स्वयं के मुनाफों के कारोबार को, मंदी के इस दौर में, कैसे बचाकर रखा जा सकता है, विश्व पूंजीवादी प्रबंध में स्वयं की भूमिका को ज्यादा से ज्यादा किस प्रकार प्रभावशाली बनाया जा सकता है, इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतू, प्रकृति-हितैषी और मानवता के हितैषी होने के अपने मुखौटे पहनकर, सारी दुनिया की बड़ी-बड़ी प्रतिभायों ने, तरह-तरहके घुट्टी-पिलाउ हल पेश किये.

सबसे बढकर, सवाल इस प्रकार पेश किया जा रहा है कि आम लोगों में भय पैदा हो. संसार की तबाही और कई देशों के समुद्र में डूब जाने की भविष्यवाणियां पेश की जा रही हैं. धरती पर बढ़ते हुए तापमान की समस्या के ठोस हल खोजने की अपेक्षा, लोगों को डराने के लिए, इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है जबकि जलवायु के सवाल को सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से अलग करके नहीं समझा जा सकता.

आज की समस्यायों का मुख्य दोषी खुद पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक प्रबंध है. पूंजीवाद के आगमन से पहले की व्यवस्थाओं में मानव प्रकृति के साथ संघर्ष में – उसे बदलते हुए, आप जो कुछ प्राप्त करता था, उसका पैमाना बड़ा सीमित होता था. मानव के प्रकृति के साथ संघर्ष में, प्राकृतिक वातावरण को कोई उल्लेखनीय नुकसान नहीं पहुंचता था. प्रकृति मानव की उपजीविका का सदैव बड़ा स्रोत रही है. आज भी मानव और प्रकृति के संघर्ष में, विरोध और विकास संबंधी नियमानुसार, समस्याओं के हल होते रहते हैं. हमारी धरती और ब्रह्मंड की तबाही की बातें करनेवाले, गैर-वैज्ञानिक और एकतरफा ढंग से सोचते हैं. लेकिन आज का बड़ा सवाल है – पूंजीपतियों की मुनाफे की हवस ने जो हालात हमारी धरती पर पैदा कर दिए हैं उससे आम लोगों की जिंदगी और कठिन होती जा रही. आज पूंजीपतियों ने आम मेहनतकशों और श्रम-जीविओं के शोषण के साथ-साथ, प्रकृति का भी निर्लज्जता की हद तक शोषण किया है. ( इसने प्रकृति के सौन्दर्य को नष्ट करने का गुनाह किया है. नदियों, नालों और समुद्र के पानी को प्रदूषित किया है. परिवहन के साधनों को योजनाबद्ध ढंग से व्यवस्थित करने की बजाय, अपने मुनाफे की अंधी हवस में, प्राईवेट परिवहन के उद्योग (मिसाल के लिए, कार उद्योग ) को प्रोत्साहित करके, हवाओं में प्रदुषण को बेहद मात्रा में बढ़ा दिया है. पूरी की पूरी उत्पादन प्रणाली में – आम आदमी की सेहत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. परमाणु कचरा समुद्र में फैंका जा रहा है. हथियारों का बड़ी मात्रा में उत्पादन करके, मानवता की तबाही के साथ-साथ, प्रकृति की तबाही भी की जा रही है. पहले मुनाफे की हवस के चलते वातावरण खराब किया जाता है, फिर वातावरण को ठीक रखने के नाम पर – अमीर आबादी के चौगिरदे को साफ-सुथरा रखने के नाम पर, मेहनतकश आबादी के बड़े हिस्सों को शहर के बाहर के क्षेत्रों में स्लम्ज़  में धकेल दिया है जो धरती पर नरक के साक्षात नमूने हैं.

पूंजीवाद के अपने जन्म से, मुनाफे की इस बेरहम जंग ने भयानक तबाही मचाई है. मानव द्वारा मानव का शोषण और मानव द्वारा प्रकृति का शोषण , पूंजीवादी प्रबंध में अपने शिखर पर पहुंचा है. इंग्लैण्ड में पूंजीवाद के विकास और बाड़ाबंदियों के निर्धारण के समय किसानों का उजाड़ा, अमेरिका में जंगलों और आदिवासी (रेड इन्डियन) आबादी की तबाही, ( और वर्तमान में, भारत में नक्सलवादियों की समस्या तो एक बहाना है, असल में निशाना तो वह इलाका है जहाँ आदिवासी बसे हुए हैं जिनकी बदकिस्मती यह है कि ये जंगल खनिज और वनसम्पदा से भरपूर  हैं और पूंजीपति और साम्राज्यवादी इस लूट से अपनी नजर हटा पाने में अक्षम हैं ) विश्व के अन्य हिस्सों में जंगलों की बर्बादी के साथ, मुनाफा तो कुछ मुठ्ठीभर पूंजीपतियों ने कमाया, पर मुसीबतें आई आम लोगों के हिस्से में ! मुनाफे की हवस के सामने प्रकृति तो क्या, मानव जिंदगी की सीधी तबाही  भी पूंजीपति वर्ग को विचलित नहीं कर पाती ! अमेरिका में पूंजीवाद के फैलाव के समय,उनके कारनामों का जिक्र करते हुए मार्क्स लिखते हैं,

प्रोटेस्टेंट मत के उन गंभीर साधकों – न्यू इंग्लैण्ड के प्यूरिटनों  – ने १७०३ में अपनी असेंबली के कुछ अध्यादेशों के द्वारा अमरीकी आदिवासियों को मारकर उनकी खोपड़ी की त्वचा लाने या उन्हें जिंदा पकड़ लाने के लिए प्रति आदिवासी ४० पाउंड  पुरस्कार की घोषणा की थी. १७२० में प्रति त्वचा १०० पाउंड पुरस्कार का ऐलान किया गया था. १७४४ में, जब मैस्साचुसेटस-बे  ने एक खास कबीले को विद्रोही घोषित किया, तो निम्नलिखित पुरस्कारों की घोषणा की गयी : १२ वर्ष या उससे अधिक आयु के पुरषों को मार डालने के लिए प्रति त्वचा १०० पाउंड (नई मुद्रा में), पुरषों को पकड़ लाने के लिए प्रति व्यक्ति १०५ पाउंड, स्त्रियों और बच्चों को पकड़ लाने के लिए प्रति व्यक्ति ५५ पाउंड. कुछ दशक और बीत जाने के बाद औपनिवेशिक व्यवस्था ने न्यू इंग्लैण्ड के उपनिवेशों की नींव डालनेवाले इन piligrim fathers [पवित्र हृदय यात्रियों] के वंशजों से बदला लिया, जो इस बीच विद्रोही बन बैठे थे. अंग्रेजों के उकसाने पर और अंग्रेजों के पैसे के एवज में अमरीकी आदिवासी अपने गंडासों से इन लोगों के सिर काटने लगे. ब्रिटिश संसद ने घोषणा की कि विद्रोही अमरीकियों के पीछे कुत्ते छोडकर और आदिवासियों से उनके सिर कटवाकर वह केवल ” भगवान और प्रकृति के दिए हुए साधनों” का ही उपयोग कर रही है.– कार्ल मार्क्स ‘पूंजी’ प्रथम खंड, सफा ७६२, प्रगति प्रकाशन मास्को.

सामर्थ्यशाली “राष्ट्रीयताएं  हर उस बदनामी बारे सनक की हद तक शेखियां बघारा करती  जो उनके लिए पूंजी के एकत्रीकरण का साधन बनती , अगर वह पूंजी एकत्रित करने का ढंग होती” – मार्क्स, कैपिटल जिल्द १, सफा ७१०.

उपरोक्त विवरण से हम साबित करना चाहते हैं – पूंजीपति वर्ग, प्रदुषण संबंधी, सभी लोगों को, व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार ठहराकर, अपने गुनाहों को छिपाने का यत्न करते हैं.

पहले प्रदुषण फैलायो, फिर प्रदुषण हटाने की मुहीम के नेता के रूप में, ऐसी स्कीमें और हल पेश करो कि और मुनाफे कमाए जा सकें – अपने गुनाहों पर पर्दा डाला जा सके. सब कुछ इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि असल गुनाहगार, मुक्तिदाता दिखाई दे.

बात को इस प्रकार पेश किया जा रहा है जैसे कि यह कोई विकसित, विकासशील और गरीब देशों के बीच का झगड़ा हो. इन सभी देशों के पूंजीपति प्रतिनिधि, खुद के अपने मेहनतकशों और श्रम-जीवियों के शोषण से ध्यान हटाने के लिए, स्वयं को, उनके मसीहाओं के रूप में पेश कर रहे हैं.

आज जलवायु या प्रदुषण की समस्या को, विश्व पूंजीवादी प्रबंध के विरुद्ध लड़ाई से अलग करके, हल नहीं किया जा सकता. पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक प्रबंध में मुनाफे का स्रोत श्रमिक से निचोड़ा गया अधिशेष होता है. जब पूंजीपति फैक्ट्री या फार्म में उत्पादन की प्रक्रिया शुरू करवाता है केवल तभी अधिशेष मूल्य पैदा हो सकता है. लेकिन विश्व के तमाम हिस्सों में फैला पूंजीपति वर्ग मंडी और प्रतिस्पर्द्धा जैसे मुख्य कारणों के चलते कुल उत्पादन प्रक्रिया को योजनाबद्ध नहीं कर सकता, भले ही, एक फैक्टरी या फार्म में उत्पादन की प्रक्रिया को अंजाम देते समय पूंजीपति छोटी से छोटी मद को अपनी योजना में शामिल करता है. लेकिन जब बात किसी देश या विश्व के कुल उत्पादन की प्रक्रिया को योजनाबद्ध करने की आती है, तो पूंजीपति ही नहीं बल्कि उनके बुद्धिजीवी भी घबरा जाते हैं क्योंकि इसका अर्थ होता है एक ऐसी प्रणाली की स्थापना जिसमें इस मुठ्ठीभर परजीवी वर्ग के एशो-आराम को खतरा होता है. ये दोहरे मापदंड राजनीतिक तो हो सकते हैं लेकिन वैज्ञानिक नहीं. विज्ञान के नियम किसी वर्ग के हितों की रक्षा की जिद्द पूरी करने हेतू नहीं बदलते.गैर-योजनाबद्ध और अराजक उत्पादन प्रणाली में पर्यावरण और जलवायु संबंधी मुश्किलों पर काबू पाना ना मुम्मकिन है जबकि पूंजीपति और उनके बुद्धिजीवी इसे पूंजीवाद की चौहद्धी के भीतर ही हल करना चाहते हैं.

हम फिर बुद्धिजीवियों से अपील करते हैं कि वे वीरता से सच का साथ दें.  अगर समस्या की गंभीरता को देखते हुए सवाल ठीक ढंग से पेश किया जायेगा तभी उसका सही जवाब मिल सकता है, लेकिन पूंजीपति और उनके बुद्धिजीवी कभी नहीं चाहेंगे कि इसे ठीक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाये. उनके उद्देश्य समस्याओं को सनसनी तरीके से पेश करना और ऐसे अप्रासंगिक सवाल खड़े करना होता है ताकि लोग भी अप्रासंगिक हल ढूंढने की अंध कवायद करते हुए विचारों की भूल-भुलैया में सिर पटकते रहें.विचारधारा के क्षेत्र में फैले प्रदुषण के विरुद्ध लड़े बिना वातावरण संबंधी समस्या समेत, मानवता के सामने दरपेश समस्यायों का हल संभव नहीं.

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चुनाव, राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी

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हमने लिखा था कि वर्तमान संसदीय प्रणाली द्वारा मजदूर वर्ग कभी सत्ता प्राप्त नहीं कर सकता. लेकिन इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि मजदूर वर्ग चुनाव प्रक्रिया में बिलकुल भाग नहीं लेता. एक वोटर के रूप में वह इसमें भाग जरूर लेता है लेकिन प्रभुत्वशाली लोगों में से किसी एक को चुनने के अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं होता.मजदूर वर्ग और पूंजीपति वर्ग के परस्पर विरोध द्वारा एक्यबद्ध और गतिशील वर्तमान वर्गीय समाज जो कि अलग-अलग पड़ावों से गुजरकर वर्तमान पूंजीवादी जनवादी प्रणाली के साथ प्रकट होता है, अपने पूर्व के वर्गीय समाजों की भांति सम्पत्तिहीन – वर्तमान में सर्वहारा वर्ग को – सत्ता में कितनी भागीदारी दे सकता है (या नहीं दे सकता है), की जाँच-पड़ताल हेतू जरूरी है कि हम कुछ अति महत्वपूर्ण तथ्यों और आंकडों पर नजर दौडाएं जो हाल ही में संपन्न हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में सामने आये हैं.  इससे हम यह भी आसानी से समझ सकते है कि किस प्रकार यह चुनाव प्रणाली पूंजी और जनता के बीच चलने वाले विरोध का हल करती है. चुनावों की हकीकत को जानने के लिए और इस पूरी चुनाव प्रक्रिया की सार्थकता संबंधी आम लोगों में जाकर उनके नज़रिए को जानने की कोशिश करें तो इसकी असलियत को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है. हमारी इस रिपोर्ट का आधार पिछले दिनों संपन्न हुई विधान सभा के चुनावों पर अलग-अलग लोगों के विचार और प्रतिक्रियाएं हैं.

1. पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान चाहे वे राजनीतिक दलों के मंच रहे हों या फिर प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के – बहस का स्तर बहुत निम्न दर्जे का रहा है. इनकी बहस में गंभीर किस्म के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सरोकार गायब थे. राजनीतिक दलों में बहुत निम्न स्तर की लांछनबाजी  देखने को मिली. स्वयं बुर्जुआ वर्ग द्वारा स्वीकृत आचार-व्यवहार का पूर्ण अभाव नजर आया. गंभीर सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों की अपेक्षा, जीत-हार संबंधी जोड़-तोड़, धार्मिक और जाति आधारित प्रतिक्रियावादी समीकरणों द्वारा जोड़-घटा के फार्मूलों की खोज और समीक्षा का प्रभुत्व था.

2. अख़बारों और टीवी पर अपने हक़ में प्रचार करवाने हेतू और अपने विरोधी उम्मीदवार के विरुद्ध -समाचार प्रकाशित करवाने हेतू, लाखों और करोडों के सौदे तय हुए. मीडिया की रिपोर्ट अनुसार कई दैनिक अख़बारों ने २५ से ५० लाख तक के सौदे किये.

3. सारी चुनाव प्रक्रिया इतनी महँगी थी कि देश की बहुसंख्यक आबादी अपने आप ही, इस चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने के अधिकार से वंचित हो गयी है.  चुनाव दफ्तर से जारी सूचना में उम्मीदवारों के रोजाना खर्च का ब्योरा प्रकाशित किया गया है. इनकी रिपोर्ट के अनुसार कुछ उम्मीदवारों का दैनिक खर्च दो सौ रूपये से तीन सौ रूपये तक का था. इन वेचारे गरीब उम्मीदवारों में कुछ ऐसे उम्मीदवारों के नाम भी शामिल थे जिनकी चुनाव मुहीम की तामझाम, लाम-लश्कर और खर्चीली चुनाव रैलियों की आभा मध्यकालीन युग के राजाओं-महाराजाओं को भी मात दे दे!  चुनाव कमीशन को भले ही यह सब नज़र न आया हो लेकिन आम लोग पानी की तरह बहाए जानेवाले इस धन और शक्ति के प्रदर्शन के प्रत्यक्ष गवाह हैं.

4. वाम संसदीय पार्टियाँ जो सैद्धान्तिक तौर पर लोगों प्रति प्रतिबद्धता का दावा करती रहती हैं – इस सारे दृश्य के आन्तरिक सच का पर्दाफाश करते हुए, मजदूर और मेहनतकश लोगों की चेतना को उन्नत करने की बजाय, लगभग दूसरी पार्टियों की तरह इस्तेमाल होने वाले हथकंडों की नक़ल करती हुई नज़र आयीं. प्रतिस्पर्धा के इस युग में जिस प्रकार मण्डी में छोटा उत्पादन, बड़े स्तर पर होने वाले उत्पादन के आगे, नहीं टिक सकता, उसी तरह, संसदीय वामपंथी पार्टियाँ भी लगातार हाशिये पर आ रही हैं.

लोग चुनावों में हिस्सा क्यों लेते हैं – किस तरह लेते हैं ?

सैद्धांतिक तौर पर कहा जाता है कि चुनाव द्वारा लोग अपनी सरकार चुनते हैं जिसने आनेवाले पॉँच वर्षों के लिए देश या संबंधित राज्य का प्रबंधन संचालित करना  होता है. सरकार इस समग्र राजतन्त्र जिसमें पुलिस, फौज और न्यायपालिका भी सम्मलित होती है, का एक अहम् हिस्सा होती है.  सभ्यता के इतिहास में राज्य-प्रबंधन के सञ्चालन के लिए बननेवाली सरकारों के रूप सदैव एक जैसे नहीं रहे. आदिम समाज के कबीलाई गणराज्यों से चलकर पूरे मध्य युग में राजशाहियों के अलग-अलग रूपों से गुजरते हुए सरकारों का आधुनिक रूप – जिसे जनता की जनता  द्वारा और जनता  के लिए सरकार का नाम दिया जाता है – आज के विश्व में, सरकार का प्रमुख रूप (मॉडल ) है. राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान इसी रूप अथवा मॉडल से संबंधित तथ्यों ने जिस तस्वीर को उभार कर हमारे सामने पेश किया है, उनका संक्षिप्त परिचय और सार निम्नलिखित है.,

1. सबसे पहले, चुनावों के दौरान सबसे अधिक क्रियाशील हिस्सा – राजनीतिक पार्टियाँ और उनके कार्यकर्त्ताओं की बात करें. बड़ी राजनीतिक पार्टियों की टिकट के लिए दौड़, जहाँ प्रचार माध्यम के लिए बड़ा मसाला तैयार करती रही, वहीँ आम जनता में इस संबंधी चर्चा ने पूरी चुनाव मुहीम को दिलचस्प बनाये रखा. टिकट हासिल करने के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जाते हैं – बड़ी गिनती में टिकटों के चाहवान अपने-अपने हक़ में मुहीम लामबद्ध करते हैं.  लोगों की भीड़ जुटाकर दवाब बनाया जाता है. लेकिन दिलचस्प पहलू यह होता है कि वे कौन लोग होते हैं जो इनकी भीड़ जुटाते हैं? ये वहीँ लोग होते हैं जिनकी बहुसंख्यक गिनती को राजनीतिक पार्टियाँ अपने सक्रीय और जमीन से जुड़े हुए कार्यकर्ता बताती हैं. इन्हीं स्थानीय लोगों में, आर्थिक तौर पर प्रभावशाली और राजनीतिक पृष्ठभूमि के परिवारों से कुछ बेहद महत्त्वाकांक्षी नौजवान, नेतृत्त्व की भूमिका निभाते दीखाई देते हैं. गरीब किसान, मध्यम वर्ग और दलित मजदूर वर्ग से भी कुछ लोग , बेशक दूसरे दर्जे की भूमिका निभाने के लिए ही सही, इनका हिस्सा बनते रहते हैं. लोगों के काम निकलवाने के नाम पर बने ये स्वयंभू लोकसेवक, प्रशासन और आम लोगों में मध्यस्ता करने के साथ-साथ, ज्यादातर पुलिस के मुखबिर और टाउट का धंधा करते हैं. किसानों और मध्यम वर्ग का वह हिस्सा जो  पूंजीवाद के विकास के फलस्वरूप उजड़कर ऐयाश, पाकेटमार, चोर, उचका आदि बन जाता है, जिसे मार्क्स लम्पट सर्वहारा कहते हैं, भी इसी तरह का लोकसेवक होता है. ज्यादातर इस प्रकार के लोकसेवकों को, किसी राजनीतिक दल के बड़े नेता की सरपरस्ती हासिल होती है. अक्सर ये छोटे नेता भी अपने साथ, अपनी हैसियत अनुसार, चापलूसों का एक घेरा बनाकर रखते हैं. अपनी इसी हैसियत का प्रयोग ये लोग अपनी आर्थिक हालत को सुधारने के लिए करते हैं. इसमें मुख्य तौर पर सरकारी ठेके लेने के अलावा, पुलिस और राजनीतिक नेताओं की सरपरस्ती में, कई तरह के अवैध धंधे भी शामिल होते हैं. यहीं स्थानीय नेता, शहरों और गांवों में, अपने सरपरस्त  नेता का गुणगान करते हुए, उनकी साफ़-सुथरी और स्वच्छ छवि के व्याखान करते, उनकी शक्ति और सामर्थ्य की कहानिया सुनाते हुए, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री और पार्टी के बड़े नेताओं के साथ उनकी नजदीकी का विश्वास दिलाते हुए, आम वोटरों को अपने मनपसंद लीडर के हक़ में फुसलाते हुए, कभी नहीं थकते. पहले ये नेता, अपने सरपरस्त बड़े नेता के लिए टिकट हेतू भीड़ जुटाते हैं फिर उनकी इच्छानुसार वोट डलवाते हैं. गरीब जनता को मिलनेवाली सरकारी सहूलतें, मिसाल के लिए, बुढापा पेंशन, पीले कार्ड बनवाना, गरीबी रेखा से नीचे की आबादी को सस्ते रेट का अनाज और मकान  बनवाने के लिए ग्रांट वगैरा, जो आधे-अधूरे तरीके से, केवल मुट्ठीभर लोगों के पास ही पहुंचती हैं – इन्हीं सहूलतों का सेहरा, व्यक्तिगत तौर पर अपने सिर लेते हैं. अपने हक़ में वोट भुगताने के लिए ये नेता जी-जान से कोशिश करते हैं.

2. मजदूरों से निचोड़े गए अधिशेष की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में होनेवाले कुत्ताघसीटी वैसे तो प्रतिदिन चौबीसों घंटे चलती रहती है लेकिन चुनावों के समय इसका नज़ारा बहुत ही दिलचस्प हो जाता है. इन वर्गों से संबंधित लोगों के बयान ही नहीं बदलते, दल भी बदल जाते हैं. आश्चर्य और अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है लेकिन है यह सच कि इन्हीं वर्गों से कुछ लोगों द्वारा एक ही दिन में एक से अधिक दलों में अदला-बदली और आना-जाना होता रहता है  और इस प्रकार अपनी शख्सियत की कायापल्टी करते हुए ये लोग अच्छा खासा मनोरंजक समां भी बांधे रखते हैं.

3. किसी भी चुनाव बूथ पर नजर रखने पर आपको लगेगा कि खाते-पीते घराने के लोग दोपहर से पहले ही अपने मत का प्रयोग कर जाते हैं जबकि सर्वहारा जनता दोपहर बाद आती है. बूथ के आस-पास मौजूद लोगों में चर्चा का  विषय होता है कि मजदूर लोग वोट डालने तब आएंगे जब नकद पैसे वसूल कर लेंगे. इस प्रकार की चर्चा से हम यह गलत निष्कर्ष निकाल लेतें हैं कि केवल मजदूर वर्ग अपना वोट बेचता है लेकिन मध्यम वर्ग नहीं. वह भी प्रभावित होता है, बल्कि ज्यादा प्रभावित होता है. या यूं कहिये कि उसकी प्रभावित होने की औकात ज्यादा है और वह अधिक कीमत लेता है. इस वर्ग का एक हिस्सा राजनीती में इस प्रकार सक्रीय होता है कि वह समाज की बहुसंख्यक  आबादी को प्रभावित करता है और उस बहुसंख्यक आबादी के वोटों को भी वेचने की योग्यता रखता है. मध्यम वर्ग का वोट बेचने का तरीका साधारण न होकर जटिल होता है और जरूरी नहीं होता कि वह मजदूर की भांति मौके पर ही सौदा करे. उसके सौदेवाजी के गुर जटिल और दीर्घकालिक होते हैं. इसी वर्ग ने सरकारी पद,लाइसेंस और ठेके हथियाने होते हैं.इसी वर्ग से उजड़कर लम्पट मजदूर के रूप में प्रकट हुए नए वर्ग  के लोग अपने ही नहीं बल्कि मजदूरों के वोट भी बेच जाते हैं. पूंजीपतियों और धनासेठों से मिलनेवाली सफ़ेद और काले धन की थैलियाँ, बुर्जुआ पार्टियों के लोगों द्वारा, प्राय इन्हीं  लोगों को सौंपी जाती हैं, क्योंकि यही वे लोग होते हैं जो पूंजीपतियों की अपेक्षा मजदूर वर्ग में आसानी से घुल-मिल जाते हैं. उन्हें यह सहूलियत होती है की वे पूंजीपतियों द्वारा लुटाई (???) गई इस धनराशी के एक हिस्से को मजदूरों में बाँट सके लेकिन बड़े हिस्से को स्वयं हड़प कर जाएँ.

4. जहाँ तक मजदूर वर्ग के मतदान करने और वोट बेचने का सवाल है तो जिस प्रकार न चाहते हुए भी वह एक उजरती गुलाम  के रूप में पूंजीपतियों के खेतों और कारखानों में सोलह-सोलह घंटे खटने के लिए विवश होता है – उसे अपनी श्रम-शक्ति को बेचना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार वह मजबूरीवश मतदान करने और वोट बेचने के लिए भी बाध्य होता है. पूंजीपति वर्ग और बुर्जुआ मीडिया के लिए चुनाव भले ही एक जश्न रहा हो लेकिन मजदूर वर्ग से बातचीत करने पर इसकी असलियत कुछ और ही बयान करती नज़र आती है.

5. इस क्रियाशील हिस्से की चर्चा के बाद  लोगों के व्यवहार की चर्चा करें तो जो दृष्टान्त नजर आता है वह एकसार नहीं है. अलग-अलग वर्गों में विभाजित होने के कारण लोग, चुनावों के बारे में एक जैसा दृष्टिकोण नहीं रखते. अमीर लोगों, कारखानेदारों, व्यापारियों, उच्च मध्यम वर्ग,पेशेवर लोग (डॉक्टर वकील आदि) और अमीर किसानों के लिए, सरकार और उसके दरबार में दस्तक देनें का यह एक सुनहरी अवसर होता है. तेजी से अमीर होने की लालसा की पूर्ति हेतू राजतन्त्र और खास करके  नौकरशाही और पुलिसतंत्र के साथ मजबूत गठजोड़ करने के लिए, इस तरह के संपर्क आवश्यक होते हैं. इस कार्य हेतू ये वर्ग चंदे मुहैया करवाते हैं. व्यवहारिक तौर पर ये लोग इस चुनाव प्रक्रिया के साथ पूरी तरह जुड़े होते हैं.

6. देश के उत्पादन के साधनों का मालिक बनी भारत की वर्तमान बुर्जुआ जमात के पास बेचने के लिए वह सबकुछ है जो मजदूरवर्ग ने पैदा किया है. इसी के बदौलत उसकी हैसियत एक अच्छे खरीदार की भी बन जाती है. कहने का अर्थ यह है कि वह बिकता नहीं बल्कि खरीददार होता है. एक वर्ग के रूप में वह अच्छी तरह जानता है कि कौन-कौन से राजनीतिक दल, किस हैसियत और रूप में, किस-किस प्रकार की भूमिका, उसके हितों की रक्षा करने हेतू, निभा सकते हैं. मजदूरों को मजदूरी देते समय कठोर और उग्र स्वभाव का यह पूंजीपति वर्ग इन राजनीतिक दलों को चंदा देते समय एकदम उदार और विनम्र दीखता है.

7. ज्यादातर शहरी और ग्रामीण मजदूर और गरीब किसान और छोटे दुकानदार, जिनकी ज़िन्दगी की खुशहाली के सभी दरवाजे बंद हो चुके हैं, निराशा और बेबसी के शिकार हैं. ये लोग दिल से किसी भी पार्टी या नेता पर विश्वास नहीं करते. ऊपर वर्णित राजनीतिक कार्यकर्त्ता जो अमीर होने की लालसा के चलते, हर प्रकार के नैतिक बंधनों से मुक्त हैं, जब गरीब जनता की बेबसी और मजबूरी को अपने हक़ में भुगतान करवाने में सफल हो जाते हैं, तो यह भ्रम पाल लेते हैं कि गरीब वोटरों को खरीद लिया गया है. हर प्रकार के नशे, पैसा, शराब, धार्मिक और जातीय नेताओं के फरमान और डरावे, इनके आम हथियार हैं.

8. बेहद बुरे, सामाजिक-आर्थिक हालात के प्रतिक्रियास्वरूप कुछ लुम्पन तत्त्व पैदा होते रहते हैं. गरीब आबादी के बीच का लुम्पन हिस्सा, बहुत हद तक और जल्दी ही इन लोगों का दुमछल्ला बन जाता है. पर देखने में आया है कि आम मेहनतकश आबादी का विश्वास यह गँवा चुका है. उत्पादन की क्रिया में जैसे उजरती मजदूर अपनी इच्छा के विपरीत, पूंजीपति की शर्तों पर काम करने के लिए मजबूर है – लगभग उसी तरह अपनी बेबसियों के सदके, यह उनके लिए मतदान करता है.

अपनी प्रसिद्ध रचना ‘परिवार, निजी सम्पति और राज्य की उत्पत्ति’ में फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं,

“इतिहास में अब तक जितने राज्य हुए हैं, उन्में से अधिकतर में नागरिकों को उनकी धन-दौलत के अनुसार कम या ज्यादा अधिकार दिए गए हैं, जिससे यह बात सीधे तौर पर साबित हो जाती है कि राज्य सम्पत्तिवान वर्ग की सम्पत्तिहीन वर्ग से रक्षा करने का एक संगठन है. एथेंस और रोम में ऐसा ही था, जहाँ नागरिकों का संपत्ति अनुसार विभाजन किया जाता था. मध्ययुगीन सामंती राज्य में भी यही हालत थी जहाँ राजनीतिक प्रभाव की मात्रा भू-स्वामित्व के पैमाने से निर्धारित होती थी. आधुनिक प्रातिनिधिक राज्यों में जो मताधिकार-अहर्ता पाई जाती है , उसमें भी यह बात साफ़ दिखाई देती है. तिस पर भी स्वामित्व के भेदों की राजनीतिक मान्यता किसी भी प्रकार अनिवार्य नहीं है : इसके विपरीत, वह राज्य के विकास के निम्न स्तर का द्योतक है. राज्य का सबसे ऊँचा रूप, यानि जनवादी जनतंत्र, जो समाज की आधुनिक परिस्थितियों में अनिवार्यत: आवश्यक बनता जा रहा है और जो राज्य का एकमात्र रूप है जिसमें ही सर्वहारा तथा पूंजीपति वर्ग का अंतिम और निर्णायक संघर्ष लड़ा जा सकता है – यह जनवादी जनतंत्र औपचारिक रूप से स्वामित्व के अंतर का कोई ख्याल नहीं करता. उसमें धन-दौलत अप्रत्यक्ष रूप से, पर और भी ज्यादा कारगर ढंग से, अपना असर डालती है. एक तो सीधे-सीधे राज्य के अधिकारीयों के भ्रष्टाचार के रूप में, जिसका क्लासिकीय उदाहरण अमरीका है. दूसरे, सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज को अपना केंद्र बनाती हुई न केवल यातायात को, बल्कि उत्पादन को भी अपने हाथ में केन्द्रित करती जाती हैं, उतनी ही अधिक आसानी से यह गठबंधन होता जाता है. अमरीका के अलावा नवीनतम फ्रांसीसी जनतंत्र भी उसके ज्वलंत उदाहरण हैं और नेक बुढे स्विटज़रलैंड ने भी इस क्षेत्र में काफी मार्के की कामयाबी हासिल की है. परन्तु सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज के इस बन्धुत्वपूर्ण गठबंधन की स्थापना करने के लिए जनवादी जनतंत्र की आवश्यकता नहीं है. इसका प्रमाण इंग्लैंड के अलावा नवीन जर्मन साम्राज्य भी है, जहाँ कोई नहीं कह सकता कि सार्विक मताधिकार लागू करने से किसका स्थान अधिक ऊँचा हुआ है -बिस्मार्क का या ब्लाइखरोडर का. अंतिम बात यह है कि सम्पत्तिवान वर्ग सार्विक मताधिकार के द्वारा सीधे शासन करता है. जब तक कि उत्पीडित वर्ग – परिणामस्वरूप इस मामले में सर्वहारा वर्ग – इतना परिपक्व नहीं हो जाता कि अपने को स्वतन्त्र  करने के योग्य हो जाये, तब तक उसका अधिकांश भाग वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को ही एकमात्र संभव व्यवस्था समझाता रहेगा और इसलिए वह राजनीतिक रूप से पूंजीपति वर्ग का दुमछल्ला, उसका उग्र वामपक्ष बना रहेगा. लेकिन जैसे-जैसे यह वर्ग परिपक्व होकर स्वयं अपने को मुक्त करने के योग्य बनाता जाता है, वह अपने को खुद अपनी पार्टी के रूप में संगठित करता है, और पूंजीपतियों के नहीं, बल्कि खुद अपने प्रतिनिधि चुनता है. अतएव, सार्विक मताधिकार मजदूर वर्ग की परिपक्वता की कसौटी है. वर्तमान राज्य में वह इससे अधिक कुछ नहीं है और न कभी हो सकता है; परन्तु इतना काफी है. जिस दिन सार्विक मताधिकार का थर्मामीटर यह सूचना देगा कि मजदूरों में उबाल आनेवाला है , उस दिन मजदूर पूंजीपतियों की ही तरह जान जायेंगे कि उन्हें क्या करना है.”

वे आगे लिखते हैं,

“इस संविधान को अपनी नींव बनाकर सभ्यता ने ऐसे-ऐसे काम कर दिखाए हैं, जो पुराने गोत्र-समाज की सामर्थ्य के बिल्कुल बाहर थे.  परंतु ये काम उसने किये मनुष्य की सबसे नीच अंतर्वृत्तियों  और आवेगों को उभारते हुए और उसकी तमाम अन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचाकर विकसित करते हुए. सभ्यता के अस्तित्व के पहले दिन से लेकर आज तक नग्न लोभ ही उसकी मूल प्रेरणा रहा है. धन कमाओ, और धन कमाओ और जितना बन सके उतना कमाओ ! समाज का धन नहीं, एक अकेले क्षुद्र व्यक्ति का धन – बस यही सभ्यता का एकमात्र और निर्णायक उद्देश्य रहा है. यदि इसके साथ ही समाज में विज्ञान का अधिकाधिक विकास होता गया और समय-समय पर कला के सम्पूर्णतम  विकास के युग भी बार-बार आते रहे, तो इसका कारण केवल यह था कि धन बटोरने में आज जो भारी सफलताएँ प्राप्त हुई हैं, वे विज्ञान और कला की इन उपलब्धियों के बिना प्राप्त नहीं की जा सकती थीं.”

“सभ्यता का आधार चूँकि एक वर्ग का दूसरे वर्ग का शोषण है, इसलिए उसका सम्पूर्ण विकास सदा अविरत अंतर्विरोध के अविच्छिन्न क्रम में होता रहा है. उत्पादन में हर प्रगति साथ ही साथ उत्पीडित वर्ग की, यानि समाज के बहुसंख्यक भाग की अवस्था में पश्चादगति भी होती है. एक के लिए जो वरदान है, दूसरे के लिए आवश्यक रूप से अभिशाप बन जाता है. जब भी किसी वर्ग को नयी स्वतंत्रता मिलती है, तो वह दूसरे वर्ग के लिए नए उत्पीडन का कारण बन जाती है… जहाँ बर्बर लोगों में अधिकारों और कर्त्तव्यों के बीच भेद की कोई रेखा नहीं खिंची जा सकती थी, वहां सभ्यता एक वर्ग को लगभग सारे अधिकार देकर और दूसरे वर्ग पर लगभग सारे कर्त्तव्यों का बोझ लादकर अधिकारों और कर्त्तव्यों के भेद एवं विरोध को इतना स्पष्ट कर देती हैं कि मूर्ख से मूर्ख आदमी भी उन्हें समझ सकता है.” (देखें : Origins of the Family, Private Property, and the State का Chapter IX: Barbarism and Civilization

वर्तमान बुर्जुआ लोकतान्त्रिक प्रणाली जो अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों की वर्गीय राज्य व्यवस्थाओं का निषेद्ध करते हुए वर्तमान विश्व मंच पर अंतरराष्ट्रीय पूँजी की चाकरी हेतू प्रकट हुई है, अपने अंतरविरोधों के कारण, जन्म से ही लूली-लंगडी है जिसका निषेध अवश्यम्भावी है क्योंकि अपने पूर्ववर्ती वर्गीय समाजों के विपरीत इसने इस वर्गीय समाज के साथ अपनी कब्र खोदनेवाले उस वर्ग को जन्म दिया है जिसे सर्वहारा या उजरती गुलाम कहते हैं. यहीं वह वर्ग है जिसके पास खोने को कुछ नहीं होता लेकिन पाने के लिए सारा विश्व है. यह सर्वहारा वर्ग ही बुर्जुआ और समाजवादी क्रांतियों की जीत-हार की अमीर विरासत का असली मालिक है. इक्कीसवीं शताब्दी में घटित होने वाली नई समाजवादी क्रांतियों के कार्यभार को संपन्न करवाने हेतू इसने उन बोलेश्विक चरित्र की सच्ची कम्युनिस्ट पार्टियों और नेताओं को भी जन्म देना हैं क्योंकि समाज को आगे की ओर गति देनेवाली क्रांतियाँ स्वयंस्फूर्त ढंग से संम्पन्न नहीं हो सकती. लेकिन चिंता का पहलू यह भी है कि वर्तमान समय का बुद्धिजीवी वर्ग आज के इस युग के क्षुद्र व्यक्ति ‘पूंजीपति’ द्वारा  सर्वहारा की कमाई की निर्मम लूट और इस लूट की भौंडी प्रदर्शनी पर, चुप्पी साधे है जबकि देश और दुनिया के वस्तुपरक हालात, मजदूर वर्ग द्वारा की जानेवाली क्रांतियों के पक्ष में, लगातार विकसित होते जा रहें हैं. भारत के सबसे अधिक विकसित पूंजीवादी राज्यों में से एक हरियाणा के मजदूर प्रतिदिन बारह घंटे से अधिक श्रम करने पर मजबूर हैं क्योंकि सरकार की ओर से निर्धारित की गयी न्यूनतम मजदूरी – 3510  रूपये प्रति महिना, लागू नहीं हो रही.  कोई भी राजनीतिक दल इसके बारे में गंभीर नहीं है. गुडगाँव जैसे शहर में मजदूर असंतोष को लाठियों और गोलियों से दबाया जा रहा है . एक रिपोर्ट अनुसार राज्य की 56  प्रतिशत औरतें और 83  प्रतिशत बच्चे खून की कमी का शिकार हैं. इस प्रकार की स्थिति पर बुद्धिजीवी वर्ग के चुप्पी के इस कष्टदायक और चिंताजनक पहलू पर ब्रटोल्ट ब्रेष्ट के इन शब्दों के साथ इस आलेख को फ़िलहाल यहीं विराम दिया जाता है,

“किस चीज का इंतजार है और कब तक ?
दुनिया को तुम्हारी जरूरत है |”

गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

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एक तरफ तो उत्तर प्रदेश की सरकार ‘सर्वजन हिताय’ होने का दावा करती है लेकिन दूसरी और इस सरकार के गोरखपुर का प्रशासन मजदूरों की बैचैनी का अर्थ उनके माओवादियों से संबंध होने से निकालता है. आज जब दुनिया महामंदी की चपेट में है और वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए लोगों की बचतों को  झोंका जा रहा और पूंजीवाद चाहता है कि कैसे वह इस विश्व महामंदी से निजात पाए, ठीक उसी वक्त,  स्थानीय पेटी-पूंजीपतियों को छोड़ दें तो इस प्रकार की स्थिति में सरकारों का मजदूरवर्ग से इस तरह के निम्न स्तर के हथकंडों का इस्तेमाल करते हुए उलझना स्वयं पूंजीपति वर्ग को भी नापंसंद होगा. पूंजीवाद की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा उपभोग भी होती है ताकि माल मंडियों में बिक जाये. क्या मजदूर वर्ग की जेब में कुछ डाले बिना मार्केट या देश को मंदी से उभारा जा सकता है?

भारत जैसे देश में तुलनात्मक रूप से उत्पादन क्रिया के दौरान मजदूरों पर होनेवाले खर्च में लगातार गिरावट आ रही है अर्थात देश की कुल पैदावार में मजदूरों के हिस्से केवल ६ प्रतिशत ही आता है जबकि उनकी संख्या ८४ करोड़ है. लेकिन खाने-पीने की बुनियादी चीजों के दामों में बढोत्तरी ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. मजदूरों के लिए जीवन-निर्वाह करना भी मुश्किल होता जा रहा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पूंजीपति एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण अनुसार भारत दुनिया के सबसे सस्ती मजदूरी वाले देशों में से एक है. उनके अनुसार यह स्थिति आगामी अठारह-बीस सालों तक बनी रहेगी. उनके अनुसार यहाँ की इस सस्ती श्रम का लाभ विश्व पूंजी को ही होना है.यहीं नहीं वे भारत को एक बड़ी मंडी के रूप में भी देखते हैं जहाँ माल खपाया जा सकता है. चीन के बाद भारत दूसरा देश है जहाँ विकास दर सबसे ऊँची है. लेकिन मजदूरों की मजदूरी में होनेवाली थोडी-बहुत बढोत्तरी बुनियादी वस्तुओं की कीमत के मुकाबले बढ़ने की अपेक्षा कम हों तो कैसे मजदूर अपना जीवन निर्वाह कर पायेगा? क्या  स्वयं पूंजीवादी के तर्कानुसार भी इस प्रकार का रवैया उचित है?

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गोरखपुर : अपने परिवारों समेत धरने पर बैठे महिला एवं पुरुष मजदूर

पूंजी के अपने तर्क अनुसार किसी भी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए जरूरी होता है कि मजदूरी में बढोत्तरी हो ताकि मजदूर ज्यादा वस्तुएं खरीद सकें. लेकिन गोरखपुर जैसे शहर में जहाँ मजदूर अपनी थोडी सी मजदूरी, रोजगार सुरक्षा और यूनियन बनाने के बुनियादी लडाई ही लड़ रहे हैं, उन्हें माओवादी कहना कहाँ तक उचित है? सबसे चिताजनक पहलू यह है की मजदूरों के बीच की हर तरह की बैचैनी का हल निकालने की बजाय उसे माओवादी-आतंकवादी कार्रवाई कहकर कुचलने की कोशिश की जाती है और उनके लीडरों पर झूठे केस बनाए जाते हैं और मजदूर नेताओं को जेलों में डाला जाता है.

उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करते समय देश की कार्यपालिका और न्यापालिका जैसी संस्थाओं का रवैया ज्यादा से ज्यादा मजदूर विरोधी होता गया है. गुडगाँव जैसे औद्योगिक नगर जहाँ एक मजदूर की मौत पर एक लाख मजदूरों की बड़ी संख्या सड़कों पर आ जाती , वहां पर भी मजदूरों को यूनियन तक बनाने की इजाजित नहीं है. रिको ऑटो कंपनी के संचालक मजदूरों के हड़ताल पर जाने और यूनियन बनाने को गैर-कानूनी कार्य कहते हैं. इसे ऐतिहासिक प्रसंग में देखें तो यह सही भी है क्योंकि मजदूरवर्ग की लहर के विपर्य के इस दौर में मजदूरों ने यूनियन बनाने, धरना देने, हड़ताल करने और गेट मीटिंगे औयोजित करने के अधिकारों को खो दिया है. उन्हें आज अपनों संघर्षों द्वारा जीते इन बुनियादी अधिकारों की रक्षा ही सबसे बड़ा कार्यभार लगता है जबकि वर्गों में विभाजित समाज में ये अधिकार भी उसी तरह गतिशील होते हैं जिस तरह समाज. अपने कालजयी संघर्षों द्वारा जीते गए इन अधिकारों को खो देना उन्हें निराश करता ही रहेगा जब तक वे स्वयं को राजनीतिक चेतना से चाकचौबंद नहीं करेंगे और इस वर्ग विभाजित व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन नहीं कर देंगे. गुडगाँव तो औद्योगिक उपक्रमों की हब है. इसके अलावा भारत के कोने-कोने में छोटे बड़े लाखों औद्योगिक उपक्रमों में देश के मजदूर वर्ग की आबादी का ९३ प्रतिशत भाग काम कर रहा है. मजदूरों की इस बड़ी तादाद को असंगठित मजदूर यानिकि वह मजदूर जो किसी मजदूर ट्रेड यूनियन का भाग नहीं है, कहते हैं. देश के इन छोटे और मझौले उपक्रमों में कार्य करनेवाले मजदूरों की बैचैनी ने हड़ताल और धरने  का रूप भी लेना है. पूंजीपतियों की आपसी गलाकाट होड़ के चलते और मंडी के उतार-चढाव और मंदी का ज्यादा असर छोटी पूंजी पर अधिक पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि  मजदूर वर्ग के हितों की अनदेखी करके इन उपक्रमों की रखवाली की जाये. लेकिन प्रशासन और सरकारी नुमाँईन्दो का इन पेटी-बुर्जुआ पूंजीपतियों और उनके गुंडों से साँठगाँठ   चिंता का विषय है. सरकार के लिए सोचने वाली बात यह भी है कि क्या मजदूरों और उनको नेताओं को माओवादी आतंकवादी कहकर झुट्ठे मुकद्दमों में फँसाना खुद पूंजीपति वर्ग या व्यवस्था के लिए ठीक है?

किसी प्रकार का आंतंकवाद चाहे वह धार्मिक मूलवादी खेमे की ओर से हो या वामपंथी दुस्साहसवाद के रूप में हो, निंदनीय है. सत्ताधारी वर्ग की दमनकारी नीतियाँ भी हर प्रकार का आतंकवाद पैदा करती हैं. सत्ताधारी वर्ग के राजकीय आतंकवाद  के परिणामस्वरूप धार्मिक मूलवादी आतंकवाद, दक्षिणपंथी आतंकवाद, वामपंथी आतंकवाद आदि, की फसल उगने की उपजाऊ भूमि तैयार होती है.हर किस्म का आतंकवाद मजदूर वर्ग की एकता और सांगठनिक क्षमता को कमजोर करता है… लेकिन गोरखपुर के स्थानीय प्रशासन द्वारा मजदूरों को माओवादियों से जोड़ना चिंता का विषय है. अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक  तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी. जी  पहले यह कह चुके हैं कि गोरखपुर में नक्सली नहीं है.

यूनिसेफ  की रिपोर्ट अनुसार पिछले ४० वर्षों के अन्तराल के बाद ग्लोबल वित्तीय संकट और ईंधन, भोजन और चारे की कीमतों में बढोत्तरी के कारण दक्षिण एशिया भूखमरी की उच्चतम शिखर को छू रहा है. इसमें कोई शक नहीं की उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी सेक्टरों और कृषि में भी बढ़िया विकास करते दिखाई गयी है लेकिन विडम्बना देखीए कि भरपूर अनाज पैदा होने के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा की हालत में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है. यह उपहास नहीं तो और क्या है कि उडीसा जैसे राज्य में अब भी लोग भूख से मर रहे हैं जबकि वेयरहाउस और गोदामों में अनाज सड रहा है?

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गोरखपुर : हड़ताल के दौरान सामूहिक रसोई

यहीं नहीं एम्.एस स्वामीनाथन रीसर्च फ़ाऊँडेशन (MSSRF) और विश्व खाद्य कार्यक्रम  (WFP) द्वारा एक रिपोर्ट तैयार करवाई गयी. इसमें कहा गया कि भोजन में प्रयाप्त पौष्टिक तत्त्वों की कमी के कारण  भारत का हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का शिकार है और ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2001 के अनुसार भारत का क्रमांक 94 है.

लेकिन पूंजीपति वर्ग खुश होता है कि विश्वमंदी  का भारत पर असर नहीं हुआ है. संसेक्स में फिर उछाल देखने को मिल रही है. प्रथम फिस्कल छमाही के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में ऑटो सेक्टर की विक्री में बढोत्तरी १४.५१ प्रतिशत रही है. इस प्रकार की बातें पूंजीपति लोगों और उनकी सरकारों को अच्छी लगती हैं. लेकिन ऑटो सेक्टर की हब रहे गुडगाँव जैसे शहर में पूंजीपतियों के किराये के गुंडों के हाथों होनेवाली मजदूर की मौत के बाद एक लाख मजदूरों का प्रदशर्न उन्हें परेशान कर देता है. तेरह-तेरह वर्षों से कार्यरत पंकज कुमार सिंह जैसे मजदूर अपनी मजदूरी से संतुष्ट नहीं हैं. अपनी जायज मांगों को मनमाने के लिए जब वे यूनियन बनाने की पहलकदमी करते हैं तो मैनेजमेंट स्थानीय प्रशासन और अपने निजी गुंडों की मदद से उन्हें दबाने की कोशिश करती है. पूंजीपतियों की मुनाफा कमाने की हवस मजदूरों को इंसान समझती ही नहीं. उन्हें तो चाहिए इन्सान के रूप में एक ऐसा मशीन का पूर्जा जो मशीन के दूसरे पूर्जों से मिलकर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करे. पूंजीपति यह देख ही नहीं पाते कि मशीन और इन्सान में बुनियादी फर्क है. मशीन अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष पैदा नहीं कर सकती. यह केवल मजदूर की श्रम-शक्ति से ही संभव होता है. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपतियों का मुनाफा, मैनेजमेंट के खर्चे और कार्पोरेट टैक्स जिससे सरकारे चलती हैं, आता है.

गुडगाँव की रिको ऑटो कंपनी के मजदूर की हत्या पर भारत की न्यूज एजेंसी पी.टी.आई . अपनी टिपण्णी में यह बात स्वीकार करती है कि गुडगाँव-मानेसर बेल्ट में मजदूर असंतोष कोई नई बात नहीं है. पहले २००० में मारुती उद्योग की मजदूरों की तीन महीने की हड़ताल और फिर २००५ में होंडा मोटर्स एंड स्कूटर के मजदूरों पर पुलिस द्वारा अधाधुंध लाठीचार्च जिसमें १६७ मजदूरों के घायल हुए थे, को नोट करते हुए पला झाड़ लेती है जैसे यह रूटीन की सामान्यतय घटने वाली बातें हों. लेकिन स्थिति का दूसरा पहलू यह भी है कि २००० और फिर २००५ और अब २००९ में मजदूरों का एकसाथ इतनी बड़ी तादाद में खड़े हो जाना, और फिर इन वर्षों के बीच का अन्तराल इतना बड़ा नहीं है कि इतिहास के लिए यह कोई दूर की बात हो. मजदूर वर्ग के असंतोष और वैचैनी के यहीं वे सिग्नल हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग द्वारा ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग की हमदर्द पार्टियों और बुद्धिजीवियों द्वारा नज़रंदाज किया जाता है. मजदूरों के प्रारंभिक सिग्नल भले ही किसी नज़दीक की क्रांति की और संकेत नहीं करते लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग को इन्हीं सिग्नलों को समझना है और इतिहास में अपने स्थान और जिम्मेदारी का भलीभांति निर्वाह करना है.

गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता
गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता

आज मजदूर वर्ग और क्रांतिकारी खेमा अलगाव और विखराव का शिकार है. लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी चुप्पी साधे हुए है. बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का समर्थन और हमदर्दी हमेशा मजदूरवर्ग से रही है. अपनी उच्चतम बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी बुद्धिजीवी लोग अपने स्वयं के वर्ग की सीमाओं को तोड़कर मजदूरों के साथ खड़े होते रहें है. बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा स्वयं को मजदूर वर्ग से अपने आप को अभेद भी पाता रहा है. लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. क्या भारत का बुद्धिजीवी इतना आत्मसंतुष्ट हो सकता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर हाँ  में है तो उसके बुद्धिजीवी होने पर प्रश्नचिह्न लगता है! लेकिन इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होती और न हो सकती है. समाजवादी खेमे के ढह-ढेरी हो जाने  के बाद हम भी मानते हैं कि समाज को आगे की ओर गति देने वाले आंदोलनों या क्रांतियों की प्रासंगिगता पर प्रश्न चिह्न लगा था और पूंजीवाद के अजर-अमर होने के भ्रम को भी खूब हवा मिली थी. अब स्थिति वैसी भी नहीं है. पूंजीवादी एक के बाद एक नए संकटों में फंसता जा रहा है. बुद्धिजीवियों के स्तर के अनुसार पूंजीवाद में भी ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें एक पल के लिए भी संतुष्ट कर पाए. इस प्रकार की स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रह सकती. यह बुद्धिजीवी वर्ग ही होता है जिसने सबसे पहले अपनी चुप्पी तोड़नी होती है क्योंकि अपनी संवेदनशीलता के कारण वहीँ पहला वर्ग होता है जो सबसे पहले टूटता है.

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गोरखपुर : इस पूरे आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया

देश में चुनाव हों लेकिन बुनियादी मुद्दे गायब हों ! एक ऐसा वक्त जब आम जनता अपने जिंदा रहने की लडाई लड़ रही हो और चुनावों में भाग लेनेवाली पार्टियों की ओर से अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जाना ! इसके अलावा राजनीतिक दलों की बहसों का स्तर इतना निम्न स्तर का कि बुद्धिजीवी तो क्या आम आदमी भी इसका नोटिस लेने से नहीं बच पाया. विचारधारात्मक, सैद्धांतिक और राजनीतिक बहस सिरे से ही गायब थी. सामाजिक बहस में भी मुद्दे गायब थे. केवल जोड़तोड़ या तिकड़म द्वारा किस दल की सरकार बनेगी, जैसी चर्चाओं पर अटकलबाजी होती रही. इस प्रकार की स्थिति पर  देश के बुद्धिजीवी वर्ग का मूक दर्शक बने रहना नागरिक समाज के लिए नुकसानदेय है. इतिहास में उसे अपनी भूमिका और स्थान की पहचान करनी ही होगी.

पूंजीपतियों के गुंडों द्वारा गुडगाँव में मजदूर की हत्या और गोरखपुर के मजदूर और मजदूर नेताओं पर झूठे मुकद्दमे निंदनीय हैं. मजदूर वर्ग के हितों पर इस प्रकार का कुठारघात असहनीय है. पूंजीपति इसके लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने पर तुले हुए हैं. हमारे पडौसी देश नेपाल जहाँ पशुओं की हत्या और अत्याचार पर रोक संबंधी बहस चल रही है और हमारे यहाँ मजदूरों पर इस तरह के जुर्म किये जा रहे हैं. नेपाल जैसे पिछडे देश के साथ तुलना करते समय हमारा सीना गर्व से फूल जाता हैं लेकिन अपने ही देश में पशुओं पर नहीं बल्कि इंसानों और मजदूरों पर होनेवाले जुर्म पर हम मूक बने रहते हैं, क्या इस प्रकार की स्थिति शोभनीय है? बुद्धिजीवी वर्ग को सोचना होगा कि सभ्य समाज को इस वक्त अगर कोई खतरा है तो वह पूंजीपतियों के गुंडों की दहशत और प्रशासनिक मिलीभगत से ही है. उसे अपना प्रतिरोध दर्ज करवाना होगा. यही समय की मांग है.

उपरोक्त पोस्ट पर लगी हुई सभी तस्वीरें नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ से धन्यवाद सहित ली गयी हैं.

गोरखपुर के मजदूर संघर्ष से संबंधित पोस्टें :

अच्छे कारण के लिए खदेड़ा गया-बर्टोल्ट ब्रेष्ट

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खाते पीते घर के बच्चों की तरह

मेरा लालन पालन हुआ

मेरे माँ-बाप ने मेरे गले में

एक कालर बाँधा और

खूब टहल-खिदमत करते हुए

मुझे पाला-पोसा और बड़ा किया

उन्होंने मुझे ऐसी शिक्षा दी ताकि

मैं दूसरों के ऊपर हुकम वा रौब

गालिब कर सकूं

लेकिन मैं जब सयाना हुआ

और अपना अड़ोस-पड़ोस देखा तो

अपने खेमे के लोग मुझे कतई

नहीं भाये

न मुझे हुक्म देना भाता

न अपनी खिदमत

सो अपने खेमे के लोगों से नाता तोड़कर

मैं तुच्छ श्रेणी के लोगों के बीच जा बैठा|

इस प्रकार

उन्होंने एक विश्वासघाती को पाला-पोसा

अपनी सभी चालें उसे सिखाई और

उसने वे सारे भेद दुश्मन को जाकर खोल दिए|

हाँ, मैं उनके भेद खोलकर रख देता हूँ

मैं लोगों के बीच जाकर उनकी

ठगी का पर्दाफाश कर देता हूँ

मैं पहले ही बता आता हूँ

कि आगे क्या होगा, क्योंकि मैं

उनकी योजनाओं की अंदरूनी जानकारी रखता हूँ|

उनके भ्रष्ट पंडितों की संस्कृत

मैं बदल डालता हूँ शब्द-ब-शब्द

आम बोलचाल मैं और वह

दिखने लगती है साफ़-साफ़ गप्प गीता|

इन्साफ के तराजुओं पर

वे कैसे डंडी मारते हैं

यह पोल भी मैं खोल देता हूँ|

और उनके मुखबिर बता आते हैं उन्हें

कि मैं ऐसे मौकों पर बेदखल लोगों के बीच

बैठता हूँ, जब वे बगावत

की योजना बना रहे होते हैं|

उन्होंने मेरे लिए चेतावनी भेजी

और मैंने जो कुछ भी जोड़ा था अपनी मेहनत से

वह छीन लिया

इस पर भी जब मैं बाज न आया

वे मुझे पकड़ने के लिए आये

हालांकि उन्हें मेरे घर पर कुछ भी नहीं मिला

सिवाए उन पर्चों के

जिनमें जनता के खिलाफ

उनकी काली करतूतों का खुलासा था

सो, चटपट उन्होंने मेरे खिलाफ

एक वारंट जारी किया

जिसमें आरोप था कि मैं तुच्छ विचारों का हूँ

यानी तुच्छ लोगों के तुच्छ विचार|

मैं जहां कहीं जाता

धनकुबेरों की आँख का कांटा सिद्ध होता,

लेकिन जो खाली हाथ होते

वे मेरे खिलाफ जारी वारंट पढ़कर

मुझे यह कहते हुए

छुपने की जगह देते कि

” तुम्हें एक अच्छे कारण

के लिए खदेड़ा गया है|”

भगत सिंह, कम्युनिस्ट और गाँधी होने का मतलब

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पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों द्वारा जानबूझकर परंतु कुछ पढ़े-लिखे लोगों द्वारा अनजाने में भावुकतावश यह प्रचारित किया जाता है कि गाँधी और भगत सिंह, दोनों आज़ादी के दीवाने थे. उनका मकसद इस देश को अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति दिलाने तक सीमित था. लेकिन बात एकदम इसके उल्ट है. दोनों में कोई भी भावुक नहीं था. इसमें कोई शक नहीं है कि कांग्रेस की अगुआई में जारी स्वतंत्रता आन्दोलन अन्य आंदोलनों पर वर्चस्व बनाये हुए था. कांग्रेस में गाँधी का तानाशाही प्रभाव भी सर्वविदित है. ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की गहराती अंतरराष्ट्रीय स्थिति से लाभ उठाकर गाँधी और कांग्रेस का मकसद महज  उभरती भारतीय बुर्जुआजी की सेवा करना था. भगत सिंह कांग्रेस की इस स्थिति से भली-भांति परिचित हो गए थे. यही कारण था कि वे केवल २३ वर्ष की अल्पायु भोगने के बावजूद कांग्रेस और गाँधी की विचारधारा के विरोध में  अपने विचारों को इस कद्र विकसित कर पाए. इसी टकराव और द्वंद में भगतसिंह के विचारों की परिपक्वता निहित है. इतना ही नहीं देश में जारी कमजोर समाजवादी विचारधारा के और उनके मतभेद भी सिद्ध होते हैं. १९२० में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन मास्को में हो चुका था. क्या भगतसिंह अपने समय की मुख्यधारा की समाजवादी राजनीती से जुड़ पाए ? अगर ऐसा था तो क्यों उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से खुद को दूर रखा ? क्या कारण था कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपने समय के इन ओजस्वी क्रांतिकारियों को प्रभावित करने में असफल रही? क्या कारण था कि उस समय के बहादुर युवकों ने आंतकवादी और आत्मघाती रास्ते को चुना? अगर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लोग परिपक्व थे तो वे इन युवकों को क्यों नहीं संभाल पाए? क्यों वे इस पार्टी द्वारा जारी अपीलों को ठुकराते रहे ?

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म मास्को से  उधार और आयातित समाजवाद से था. भारत की वस्तुगत स्थिति के आकलन और फिर क्रांति संबंधी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने के कार्यभार को इन्होने लंबे समय तक  हाथ में ही नहीं लिया. जहाँ तक की दूसरे विश्व-युद्घ के शुरू होने पर भी यह पार्टी इस योग्य नहीं थी कि स्तालिन की हिटलर और फासिज्म के विरुद्ध  अंग्रेजों की मदद के आदेश को तत्त्व-रूप से  समझ सके और स्वतन्त्र रूप से इस स्थिति का भारतीय मेहनतकश अवाम के लिए फायदा उठा सके.  बड़े लीडरों को छोड़ दें तो आज भी इन पार्टियों के आम काडर का मार्क्सवाद में हाथ तंग ही है. किसी भी प्रकार का वैचारिक संघर्ष इन्हें आतंकित ही करता रहा है. बल्कि इन्होने अवसरवादी ढंग से मार्क्सवाद को संशोधित करने के रास्ते पर पलायन करना उचित समझा. यह ज़रूरी था कि इस संशोधनवाद के दूसरे सिरे पर दुस्साहसवाद [देखें : नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक] होता !

भगतसिंह अंग्रेजी साम्राज्यवाद और स्थानीय बुर्जुआजी द्वारा भारतीय मजदूर और किसान के शोषण से भली-भांति परिचित हो गए थे. नवयुवकों के नाम पत्र जारी करते हुए और क्रांतिकारी कार्यक्रम का मसौदा तैयार करते हुए उन्होंने लिखा :

“अगर आप मजदूरों और किसानों को आन्दोलन में सक्रीय रूप से खींचने की योजना बनाने जा रहे हो, तो मैं आपसे कहना चाहूँगा कि उन्हें भावुक शब्दाडंबर से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता. वे आपसे पूछेंगे कि तुम्हारी इस क्रांति जिसमें तुम उन्हें कुर्बानी का आह्वान करने जा रहे हो, उन्हें इससे क्या हासिल होगा. लोगों को इससे क्या फर्क पड़ता है कि लोर्ड रीडिंग के स्थान पर सर पुरषोतम दास ठाकुर सरकार का प्रतिनिधि हो? किसानो से इससे क्या फर्क पड़ेगा कि लोर्ड इरविंग के स्थान पर सर तेज बहादुर सपरू आ जाएँ ? राष्ट्रीय भावनायों की अपील उपहास है. आप इसका प्रयोग अपने काम के लिए नहीं कर सकते.”

जब स्तालिन अपने शिष्यों को गाँधी का अनुसरण करने की सिफारिशें कर रहे थे, भगत सिंह गाँधी के झूठे प्रवचनों का पर्दाफाश कर रहे थे :

भगतसिंह गाँधी (तस्वीर) के झूठ्ठे  प्रवचनों का अख़बारों और पर्चों में पर्दाफाश किया करते थे
भगतसिंह गाँधी (तस्वीर) के झूठे प्रवचनों का अख़बारों और पर्चों में पर्दाफाश किया करते थे

“वह (गाँधी) शुरू से ही जानता था कि उसकी लहर का अंत किसी समझौते में हो जायेगा. इस प्रकार की प्रतिबद्धता से हम नफरत करते हैं.”

उन्होंने आगे कांग्रेस के बारे में अपने शंके जाहिर करते हुए लिखा  :

“कांग्रेस का उद्देश्य क्या है? कि वर्तमान लहर किसी समझौते में बदल जाये या पूरी तरह से असफल रहे. मैंने इसे इसलिए कहा है कि वास्तविक क्रांतिकारी शक्तियों को लहर में शामिल होने का आह्वान नहीं किया गया है. इस लहर का संचालन मध्यम वर्ग के दूकानदारों और कुछ पूंजीपतियों के आधार पर किया जा रहा है. ये दोनों वर्ग, और विशेषकर पूंजीपति अपनी जायदाद को दांव पर लगाने का खतरा नहीं सहेड़ सकते. क्रांति की वास्तविक सेनाएं – किसान और मजदूर गांवों और फेक्टरियों में है. लेकिन अपने बुर्जुआ नेता उन्हें शामिल करने का साहस नहीं कर सकते. ये सोये हुए शेर, अगर जाग गए तो वे हमारे लीडरों के मिशन के पूरा होने के बाद भी नहीं रुकेंगे.”

भगत सिंह के इन शब्दों की पुष्टि उस वक्त हो गयी जब बंबई के बुनकरों की कार्रवाई के बाद गाँधी ने  क्रांतिकारी शक्तियों पर अपनी चिंता जाहिर की :

राजनितिक उद्देश्यों के लिए सर्वहारा का प्रयोग खतरनाक हो सकता है.”

हमारे सविधान की प्रस्तावना में जिस समाजवाद का जिक्र किया है, इसके निर्माण के लिए सर्वदलीए कांफ्रेंस बुलाई गयी, जिसमें नेहरू समिति बनाई गयी. जवाहर नेहरू के बारे में वे लिखते हैं :

“समझ नहीं आता कि पंडित जवाहर लाल आदि जोकि समाजवादी विचारों के समर्थक हैं, क्यों इस समिति में शामिल होकर अपना आदर्श बदल सके? क्या वह इन्क़लाब नहीं चाहते? वैसे ही इन्क़लाब – इन्क़लाब चिल्लाते रहते हैं? क्या उन्हे आशा है कि यह सरकार स्वयं ही, जो माँगें प्रस्तुत क़ी गयी हैं उन्हे स्वीकार कर लेगी? (ऐसा सोचना ) जान – बूझकर आँखें मूंदना है..

कांग्रेस, नेहरू और गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत पर वे आगे लिखते हैं :

“नेहरू साहब केवल सरकार को भयभीत करने के लिए ही पूर्ण स्वतंत्रता का शोर मचाते रहते हैं और चाहते अधीन राज ही हैं? असल में यह आशा कि अभी कुछ मिलेगा, अभी कुछ मिलेगा, बहुत बर्बाद करती है | दास , बरकेन हैड क़ी चापलूसी में कितना गिर गया था, यह उसके फ़रीदपुर के संबोधन से ही पता चल सकता है| आज सभी नेता उस राह पर चल पड़े है|
स्वतंत्रता कभी दान में प्राप्त नहीं होगी| लेने से मिलेगी| शक्ति से हासिल क़ी जाती है| जब ताक़त थी तब लॉर्ड रीडिंग गोल मेज कांफ्रेंस के लिए महात्मा गाँधी के पीछे – पीछे फिरता था और अब जब आंदोलन दब गया, तो दास और नेहरू बार बार ज़ोर लगा रहे हैं और किसी ने गोलमेज तो दूर  , ” स्टूल कान्फ्रेंस ” भी न मानी| इसलिए अपना और देश का  समय बर्बाद करने से अच्छा है कि मैदान में आकर देश को स्वतन्त्रता – संघर्ष के लिए तैयार करना चाहिए|  नहीं तो मुँह धोकर सभी तैयार रहें कि आ रहा है –स्वराज्य का पार्सल!”

गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत को वे मजदूरों और किसानों के जुझारू वर्गीय चरित्र को कुंठित करने का फंदा मानते थे ताकि भारतीय पूंजीपतियों के संपत्ति रखने के अधिकार की रक्षा हो सके :

“यह गाँधी के अहिंसा और समझौतावादी सिद्धांत से ही हुआ है कि राष्ट्रीय आन्दोलन की इस लहर में दरार पैदा हो गयी है.”

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन के घोषणा पत्र में वे गाँधी के अहिंसा के सिद्धांत की निरर्थकता को सिद्ध करते हैं क्योंकि वे समझते थे कि मौजूदा राज्य सत्ता का अस्तित्व ही हिंसा के सहारे टिका हुआ है. वे लिखते हैं;

“आज यह फैशन-सा हो गया है कि अहिंसा के बारे में अंधाधुंध और निरर्थक बात की जाये. महात्मा गाँधी महान हैं और हम उनके सम्मान पर कोई भी आंच नहीं ला देना चाहते लेकिन हम दृढ़ता से कहते हैं कि हम उनके देश को स्वतन्त्र कराने के ढंग को पूर्णतया नामंजूर  करते हैं. यदि देश में चलाये जा रहे उनके असहयोग आन्दोलन द्वारा लोक-जाग्रति में उनकी भागीदारी के लिए उन्हें सलाम न करें तो यह हमारे लिए नाशुक्रापन होगा. परंतु हमारे लिए महात्मा असंभावनाओं का दार्शनिक है. अहिंसा भले ही एक नेक आदर्श है लेकिन यह अतीत की चीज है. जिस स्थिति में आज हम हैं, सिर्फ अहिंसा से  आजादी कभी भी प्राप्त नहीं की जा सकती. दुनिया सिरे तक हथियारों से लैस है और (ऐसी) दुनिया पर हम हावी हैं ! अमन की सारी बातें ईमानदार हो सकती हैं लेकिन हम जो गुलाम कौम हैं, हमें ऐसी झूठे सिद्धांतों से नहीं भटकना चाहिए. हम पूछते हैं कि जब दुनिया का वातावरण हिंसा और गरीब की लूट से भरा पड़ा है, तब देश को अहिंसा के रास्ते पर चलाने की क्या तुक है? हम अपने पूरे जोर के साथ कहते हैं कि कौम के नौजवान कच्ची नींद के इन सपनों के बहकावे में नहीं आ सकते.”

कांग्रेस का उद्देश्य भगतसिंह और उनके साथियों से जैसे-तैसे पिंड छुडाना था. कांग्रेस पार्टी का इतिहास लिखने वाले मन्मथनाथ गुप्त अपनी  पुस्तक ‘क्रांति-युग के संस्मरण’ में लिखते हैं :

“जिस समय भगत सिंह तथा उसके साथी फांसीघर में बंद थे उस समय उनकी सज़ा के संबंध में गाँधीजी और वाइसराय के बीच औपचारिक बातें हुई, क्योंकि उन्हें जो फाँसी दी जाने वाली थी उससे देश में बड़ी हलचल मच रही थी| स्वयं कॉंग्रेस वाले भी इस बात के लिए बहुत उत्सुक थे कि इस समय जो सद्‍भाव चारों ओर दिखाई पड़ रहा है, उसका लाभ उठा कर उनकी फाँसी की सज़ा बदलवा दी जाय | किंतु वायसराय ने इस संबंध मे स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहा| हमेशा एक मर्यादा रखकर उन्होंने इस सबंध में बातें की| उन्होंने गाँधी जी से केवल यही कहा कि मैं पंजाब सरकार को इस संबंध में लिखूंगा| इसके अतिरिक्त और कोई वादा उन्होंने नहीं किया| यह ठीक है कि स्वयं उन्हीं को सज़ा रद्द करने का अधिकार था किंतु यह अधिकार राजनैतिक कारणों के लिए उपयोग में लाने योग्य नहीं था| दूसरीओर राजनैतिक कारण ही पंजाब सरकार को इस बात के मानने में बाधक हो रहे थे.”

” कांग्रेस का इतिहास”–पट्टाभिसीतारमैया के हवाले से वे आगे लिखते हैं;

“दरअसल वे बाधक थे भी| चाहे जो हो लार्ड इर्विन इस बारे में कुछ करने में असमर्थ थे| अलबत्ता कराची कॉंग्रेस अधिवेशन हो लेने तक फाँसी रुकवा देने का उन्होंने जिम्मा लिया| मार्च के अंतिम साप्ताह में कराची में कॉंग्रेस अधिवेशन होने वाला था किंतु स्वयं गाँधीजी ने ही निश्चित रूप से वाइसराय से कहा –यदि इन नौजवानो को फाँसी पर लटकाना ही तो कॉंग्रेस अधिवेशन के बाद ऐसा किया जाय, उसके बजाय पहले ही ऐसा करना ठीक होगा| इससे देश को साफ-साफ यह पता चल जाएगा कि वस्तुत: उसकी स्थिति क्या है और लोगों के दिलों में झूठी आशाएं न बँधेगी| कांग्रेस में गाँधी-इर्विन समझौता अपने गुणों के कारण ही पास या रद्द होगा, यह जानते बूझते हुए कि तीन नवजवानों को फाँसी दे दी गयी है| ”

जेल में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और मार्क्सवादी साहित्य के अध्ययन  द्वारा वे वर्ग-संघर्ष की पहचान को और अधिक स्पष्ट रूप से पहचानने में सफल हुए. फाँसी लगने से तीन दिन पूर्व, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव द्वारा फाँसी के बजाय गोली से उड़ाए जाने की मांग करते हुए पंजाब के गवर्नर को लिखे गए पत्र से इसकी पुष्टि होती है :

“यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक कि शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना अधिकार जमाये रखेंगे| चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति , अंग्रेज शासक या सर्वथा भारतीय  ही हों| यदि कुछ भारतीय पूंजीपतियों  द्वारा  ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी इस स्थिति में कोई अन्तर  नहीं पड़ता|”

भगत सिंह व्यक्तिगत हिंसा में विश्वास नहीं रखते थे लेकिन वर्गीय हिंसा को वे अच्छी तरह से पहचानते थे. क्रांतिकारी वर्गों द्वारा प्रतिक्रयावादी वर्गों के खिलाफ हिंसा को वे जायज मानते थे. बेशक भगतसिंह आज की ज़रूरतों के अनुसार सिद्धान्तिक अगुआई नहीं दे सकते लेकिन क्रांतिकारियों के लिए भगत सिंह जैसी स्पिरिट का होना आवश्यक है. भगत सिंह ने अपना अंतिम समय जेल में बिताया. यही वह समय था जब वे मार्क्सवाद को थोडा ही सही लेकिन समझ और आत्मसात कर पाए. जेल से स्मगल किये गए साहित्य का आज भी महत्त्व है. यहीं पर वे व्यक्तिगत हिंसा और वर्गीय हिंसा में फर्क सीखने में कामयाब हुए. पंजाबी के क्रांतिकारी कवि ‘पाश’ के अनुसार  क्रांतिकारियों को यहीं से अपना सफ़र शुरू करना चाहिए;

”भगत सिंह ने पहली बार
पंजाब को
जंगलीपन, पहलवानी व जहालत से
बुद्धिवाद की ओर मोड़ा था
जिस दिन फांसी दी गयी
उसकी कोठरी में लेनिन की किताब मिली
जिसका एक पन्ना मोड़ा गया था
पंजाब की जवानी को
उसके आखिरी दिन से
इस मुड़े पन्ने से बढ़ना है आगे, चलना है आगे”

सन्दर्भ साभार :  शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज : पीडीऍफ़

आज शहीदे-आजम का 102वां जन्मदिन है

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अमर शहीदों का पैगाम, जारी रखना है संग्राम !

भगत सिंह की बात सुनों,

नई क्रांति की राह चलो !

मेहनतकश बहनों और भाईयो,bhagat singh

28 सितंबर को महान शहीदे-आजम का 102वाँ जन्मदिन है. शहीदे-आजम के जन्मदिन पर जरूरत है कि हम महज रस्मी श्रद्धान्जलियों से हटकर अपने महबूब शहीद की याद को सच्चे दिल से ताजा करें. यह ज़रुरत सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे विदेशी गुलामी से देश को आजाद करवाने के लिए भरी जवानी में अपनी जान तक की बाजी लगा गए. भयंकर शोषण उत्पीडन का शिकार मेहनतकश जनता के लिए शहीद भगतसिंह को याद करना आज इससे भी गहरे अर्थ रखता है.

शहीद भगतसिंह के विचारों को दबाने की जितनी साजिशें अंग्रेजों ने की थी, वे आजाद भारत के लुटेरे हुक्मरानों की साजिशों के सामने कुछ भी नहीं है. बेहद घिनोनी साजिशों के तहत शहीदे-आजम भगतसिंह के विचारों को दबाने की कोशिश की गयी. १९४७ के बाद देश की राज्यसत्ता पर काबिज हुए काले अंग्रेजों ने शहीद भगतसिंह की आजादी की लडाई के बारे में इस झूठ का हमेशा प्रचार किया कि वे तो सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे. उनके मुताबिक शहीद भगतसिंह के बुतों पर फूल मालाएं पहनना ही उन्हें श्रद्धांजलि देने का तरीका है. लेकिन यह कड़वी सच्चाई किसी से छुपी नहीं है कि हम आज भी एक बेहद अँधेरे समय में रह रहे हैं. साधारण जनता के लिए इस देश में आज़ादी नाम की कोई चीज नहीं है. शहीद भगतसिंह के सपनों के समाज का निर्माण होना अभी बाकी है.

शहीद भगतसिंह और उनके साथियों ने एक ऐसे समाज के निर्माण का सपना देखा था जहाँ इन्सान के हाथों इन्सान की लूट न हो, जहाँ अमीरी-गरीबी की असामानताएं न हों, जहाँ धर्मों-जातियों-क्षेत्रों के नाम पर झगडे न हों, जहाँ स्त्री-पुरषों में असमानता न हो. वे एक ऐसे समाज के लिए संघर्ष करते रहे जहाँ मेहनतकश जनता रहने-खाने-पहनने सहित शिक्षा-स्वास्थ्य, मनोरंजन, आदि सहूलतें हासिल कर सके. वे हर मेहनतकश व्यक्ति के लिए इन्सान की ज़िन्दगी, मान-सम्मान की ज़िन्दगी चाहते थे.  लेकिन शहीदे-आजम भगत सिंह के प्यारे मेहनतकश लोग आज भी इस आजाद देश में गुलामों की ज़िन्दगी जीनेपर मजबूर कर दिए गए हैं. देश की साधारण जनता की बेहद दर्दनाक परस्थितियाँ शहीद भगतसिंह के सपनों के तार-तार होने की कहानी बयान कर रही हैं.

देश में १८ करोड़ लोग फुटपाथों पर सोते हैं, १८ करोड़ लोग झुगी-झोपडियों में रहते हैं. हर रोज ९ हज़ार बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर रहे हैं. ३५ करोड़ लोगों को भूखे सोना पड़ता है. देश के लगभग ८० करोड़ से भी अधिक औद्योगिक और खेतियर मजदूर और गरीब किसान दिन-रात की कड़ी मेहनत के बावजूद भी भूख और कंगाली से जूझ रहे हैं. करोडों नौजवानों के पास कोई रोजगार नहीं है. आर्थिक तंगियों-परेशानियों से घिरे लोग आत्महत्या कर रहे हैं. कमरतोड़ महँगाई गरीबों के मुहं से रोटी का आखिरी बचा निवाला भी छीनने जा रही है. फल, दूध, दही तो गरीबों की पहुँच से पहले ही बाहर थे – अब आलू, दाल भी खरीद पाना गरीबों के लिए असंभव सा होता जा रहा है.

हमारे इस आजाद भारत में हर सेकंड में एक स्त्री बलात्कार का शिकार होती है. हर वर्ष ५० हज़ार से अधिक बच्चे गायब होते हैं जिनमें से अधिकतर लड़कियां होती हैं. इनमें से अधिकतर लड़कियों को देह व्यापार के धंधे में जबरन धकेल दिया जाता है. इन बच्चों को भीख मांगने पर मजबूर कर दिया जाता है या फिर उनके शरीर के अंग निकालकर बेच दिए जाते हैं.

यह शहीद भगतसिंह के सपनों की आज़ादी नहीं है. यह आज़ादी पूंजीपतियों की आज़ादी है.देश की ऊपर की आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का ८५ प्रतिशत है, वहीँ गरीबी का शिकार देश की निचली ६० प्रतिशत के पास सिर्फ २ प्रतिशत ही है. आज़ादी के ६ दशकों के दौरान २२ पूंजीपति घरानों की संपत्ति में ५०० गुना से भी अधिक बढोत्तरी हुई है. साम्राज्यवादी लूटेरों को भारतीय मेहनतकश जनता को लूटने के लिए बेहिसाब छूटें दी जा रही है. संसद-विधानसभाएँ चोर-गुंडे-बदमाशों-परजीवियों के अड्डे हैं जहाँ पूंजीपतियों द्वारा मेहनतकशों के हो रहे लूट-शोषण को बनाए रखने की स्कीमें बनाई जाती हैं, हक़-अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली जनता के दमन के लिए काले कानून तैयार किये जाते हैं.

यह है वह काली आज़ादी जिसकी जय जयकार करते देश के लूटरे हुकमरान कभी नहीं थकते.

क्रांतिकारी यह बात अच्छी तरह जानते थे कि अंग्रेजों से राज्यसत्ता भारतियों के हाथ आ जाने से ही देश की विशाल जनता की हालत में कोई बदलाव नहीं आने वाला. शहीद भगतसिंह ने कहा था :

हम यह कहना चाहते हैं कि एक जंग लड़ी जा रही है जो तब तक जारी रहेगी जब तक इन्सान के हाथों इन्सान की लूट जारी रहेगी, जब तक कुछ शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता की आमदनी से साधनों पर कब्जा जमाये रखेंगे. यह लूटेरे अंग्रेज हों या भारतीय इससे स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता.

यह थे शहीद-भगतसिंह के जंगे-आजादी के सच्चे मायने जिन्हें दबाये रखने की कोशिशे भारतीय लूटेरे हुकमरानों द्वारा आज तक जारी है. हुकमरानों ने इतिहास की किताबों में शहीद भगतसिंह की आजादी की लड़ाई को हमेशा तोड़-मरोड़कर पेश किया. यही कारण है कि आज पढ़े-लिखे लोग भी भगतसिंह की जंगे-आज़ादी के इन मायनों से अनजान हैं – लेकिन लूटेरे हुकमरान कितनी भी साजिशें क्यों न रचते हों, शहीद भगतसिंह के विचार आज भी जिंदा है. जैसा कि शहीदे-आजम ने कहा था : हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली, ये मुशते खाक है फानी, रहे, रहे, न रहे. समाज के आमूलचूल बदलाव की तड़फ रखने वाले आज भी शहीदे-आजम की क्रांतिकारी सोच से प्रेरणा और मार्गदर्शन ले रहे हैं – शहीदे-आजम आज भी लूट,शोषण, जुल्म, दमन, अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले जिंदादिल इंसानों के दिलों की धड़कन हैं. वे आज भी जलती मशाल की तरह इन्कलाब की राह रोशन कर रहे हैं. लूटेरों के दिलों में आज भी भगतसिंह के विचार खौफ पैदा कर रहे हैं. उनके विचारों को दबाकर रखने की कोशिश के रूप में शहीद भगतसिंह को एक बार नहीं बल्कि अनेकों-अनेक बार फाँसी लगाने की कोशिशें होती आई हैं लेकिन शोषितों-उत्पीडितों के दिलों में वे आज भी लूट,शोषण, जुल्म, दमन, अन्याय, गुलामी से मुक्ति की आशा बनकर अमर हैं. वे आज भी हर मेहनतकश को इन्सान के हाथों इन्सान की लूट रहित नए समाज के निर्माण के महान पथ के राही बनने के लिए ललकार रहे हैं.

आज के अँधेरे समय में शहीद भगतसिंह के विचारों पर अमल करना ही उन्हें एकमात्र सच्ची श्रद्धाजंली हो सकती है. आओ , शहीद भगतसिंह के जन्मदिन पर उनके सपनों के समाज के निर्माण का प्रण लें.

हम सभी सच्चे लोगों को शहीद भगत सिंह के

सपनो के समाज के निर्माण के लिए चल रही जदोजहद में

हमारे हमसफ़र बनने का आह्वान करते हैं !

कारखाना मजदूर यूनियन लुधियाना

संपर्क : शहीद भगत सिंह पुस्तकालय, गली न. ५, लक्ष्मण नगर, ग्यासपुरा, लुधियाना

फ़ोन : 98771-43788 , 98886 -55663

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चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – क्या करें

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इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

पहली बार क्या हुआ ? हुआ यह कि जब तेलंगाना का हथियारबंद संघर्ष हुआ तो, जब तक लडाई वहीँ तेलगाना तक सीमित थी तो ये काफी अच्छी तरह से संघर्ष को संचालित कर रहे थे लेकिन जैसे ही भारत की फौज ने इन पर चढाई की तो इन्हें पीछे भागना पड़ा. जो बुद्धिजीवी थे वे कमजोर साबित  हुए. उन्होंने कहा कि इस तरह की टक्कर का कोई फायदा नहीं है. तब उस तरह के हालात से डरते हुए उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि हथियारबंद संघर्ष का तरीका ठीक नहीं है. अब कोई और तरह के तरीके जैसे संसदवाद आदि आजमाए जाएँ. मतलब कि डर के कारण और हथियारबंद संघर्ष के ताव को न सहते हुए मार्क्सवाद को संशोधित करने के रास्ते चल पड़े. दुनिया भर में कम्युनिस्टों के संशोधनवाद के रास्ते पर चलने से भी पहले, यहाँ तक कि  ख्रुश्चेव से भी पहले भारत की कम्युनिस्ट पार्टी  (वर्तमान में सी.पी.आई.) ने संशोधनवादी रास्ता अपनाया.मार्शल टीटो से भी पहले के ये संशोधनवादी हैं. मार्शल टीटो भी संशोधनवादी हो गए थे. उन्होंने कहा था कि मजदूर वोटों द्वारा सत्ता हासिल कर लेंगे और समाजवाद की स्थापना हो जायेगी. और जब अमृतसर में इनकी कांफ्रेंस हुई, (उस वक्त सी.पी.आई. और सी.पी.एम. इकट्ठी थीं.) उस कांफ्रेंस में इन्होने इस संशोधन का प्रस्ताव रखा और पास किया जिसमें था कि अब वे केवल हथियारबंद इन्कलाब ही नहीं बल्कि कई और तरीकों की आजमाईश करेंगे. उसके बाद इन्होने जो अभ्यास किया है उसमें हथियारों का अभ्यास बिलकुल छोड़ दिया. इसके बाद इन पार्टियों के काडर में से अगर कोई ईमानदार सदस्य इनके लीडरों से पूछता था कि क्लासिकीय मार्क्सवाद तो हथियारों की प्रेक्टिस को नज़रंदाज़ नहीं करता है, तो ये जवाब देते थे कि आप मॉस मोबिलाईजेशन करें हम ऊपर की लीडरशिप से पूछकर बताएँगे. इन्होने क्रांतिकारियों की पार्टी से इसे एक मॉस पार्टी में बदलना शुरू कर दिया. जिसे कहते है कि दुअन्नी-चवन्नी की पार्टी जिसमें कोई भी शामिल हो सकता है. इसके पश्चात सी.पी.आई. और सी.पी.एम. आदि पार्टियों की यही कवायद रही है कि क्रांतिकारी पार्टी कि बजाय एक घोर जनवादी पार्टी , जनवादी भी नहीं, इससे भी आगे – जनवादी भी आगे की और देखते हैं एक बुर्जुआ जनवादी पार्टी बनाई जाये.

अब इनकी सोच क्या है? इनकी सोच है कि भारत एक धर्मों का देश है, धर्मों के और धर्मवालों के साथ मात्थापच्ची न करो, खुद नास्तिक रहो लेकिन धर्मों और धर्म वालों के साथ यूं मिल जाओ जैसे खिचड़ी में घी. कहने का अर्थ है कि किस प्रकार ये लोग विपरीत में बदले हैं. यह कोई सबब से नहीं हुआ कि  ये वामपंथी पार्टियाँ प्रतिक्रियावादी पार्टियों में बदल गयी हैं. इसके लिए ये मार्क्सवाद को संशोधित करके पहले ही रास्ता साफ़ कर चुके थे. ये लोग वैज्ञानिक विचारों से कुछ भी ग्रहण नहीं कर रहे हैं.इस प्रकार ये लोग कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे. संसद में कभी बहुमत में आकर भी नहीं, मतलब की इस पूंजीवादी ढांचे का निर्माण उन्होंने इस प्रकार किया है कि कभी भी मजदूर वर्ग इससे अपने एजेंडा को लागू करने में कामयाब नहीं हो सकता. एक उदाहरण देता हूँ. एक बार चौधरी देवी लाल चीन में गए. उन्हें वहां ट्रेक्टर  बहुत पसंद आये. देवी लाल कानून की अपेक्षा पंचायती ज्यादा थे. अब देखिये अगर पंचायत में आप को अधिकार है कि आपको पॉँच सौ रुपये तक के फैसले करवाने का हक़ है लेकिन आप ने फैसला कर दिया पॉँच हज़ार का तो बड़ी मुश्किल होगी. उन्होंने अफसरों से कहा कि वे इन ट्रेक्टरों को खरीदेंगे. लेकिन अफसरों ने जब देखा कि इस ‘डील’ से उन्हें तो कुछ भी नहीं मिलने वाला है, तो उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि इस देश से तो हम इस तरह की चीज नहीं खरीद सकते हैं. हमारे इस देश के साथ इस तरह के इकरार नहीं हैं. अगर अफसरशाही को इसमें अपने हित दिखाई देते तो वे उसी वक्त बता देते कि फलां-फलां धारा के तहत इन्हें खरीदा जा सकता है. हमारे कानून में बहुत सी एक दूसरे को काटती हुई धाराएँ है. एक से नहीं तो दूसरी से, इधर से नहीं तो कान उधर से पकडा जा सकता है.उस वक्त वैसे भी अफसरशाही किसानों को हिकारत की दृष्टि से देखती थी. इसलिए उसने कह दिया कि इस देश के साथ हमारा कुछ भी साँझा नहीं है. यह ‘डील’ नहीं हो सकती. हमारे कहने का भाव है कि संसद और कोई सोवियत जैसी चीज जिसे मजदूर वर्ग चाहता है उसके और इसके बीच का अंतर बहुत अधिक है.

फिर सवाल पैदा होता है कि मौजूदा हालात के तहत इंकलाबी शक्तियों को क्या करना चाहिए. इंकलाबी शक्तियों को समझना होगा कि जब तक हालात स्पष्ट इंकलाबी नहीं हो जाते तब तक चुनावों के बहिष्कार का मतलब अराजकतावाद होगा. मान लीजिये अगर हम बायकाट का नारा दे देते हैं तो चुनावों का बायकाट तो होगा नहीं, लेकिन हमारा बायकाट ज़रूर हो जायेगा.  जब तक मजदूरों के संगठन और आधार नहीं बन जाते, मजदूरों की लहरों के दौर की शुरुआत नहीं होती तब तक ऐसा सोचना भी गलत है. दूसरी और एक दो आदमी जीतवाकर, उन्हें सूअरबाड़े  में भेजकर और इस व्यवस्था का भंडा-फोड़ जैसी कार्रवाई करके भी मजूदरों और इंकलाबियों को कुछ हासिल नहीं होगा. अब स्थिति वह भी नहीं रही जिसके लिए पहले के दौर के इंकलाबी संसद का प्रचार के प्लेटफार्म के रूप में इस्तेमाल करने की सिफारिश किया करते थे. देश में मज़बूत एक इंकलाबी पार्टी जिसका की लोगों के बीच एक मज़बूत आधार हो, अपने थोड़े से इंकलाबी संसद में भेजकर प्रचार द्वारा लाभ उठा सकती है. लेकिन आज ऐसी स्थिति भी नहीं है. रूस में एक मज़बूत बोलेश्विक पार्टी थी. इसके थोड़े से व्यक्ति ही वहां की ‘दूमा’ के सदस्य थे लेकिन जब किसी मजदूर सदस्य ने बोलना होता था, तो सारे मजदूर अपने-अपने काम छोड़कर रेडियो-सेटों के चारों और इकट्ठे हो जाते थे. और उस वक्त इस तरह के जुर्म यानि कि रेडियो सुनने के अपराध में भी साईबीरिया की जेलों की सजा भुगतनी पड़ती थी. लेकिन मजदूरों के जोश और स्पिरिट में किसी प्रकार की कोई कमजोरी दिखाई नहीं देती थी. आज वैसी स्थिति नहीं है. असेम्बली लाइन को बिखरा दिया गया है. उत्पादन को एक देश के अन्दर के अलग-अलग कारखानों में ही नहीं बल्कि अलग-अलग देशों में और इसे फिर किसी अन्य देश में असेम्बल करने का दौर है. मजदूरों के प्रतिनिधि कारखानों में घुस ही नहीं पाते. अगर चले जाएँ तो उन्हें भी अपने साथ मिला लिया जाता है या ठिकाने लगा दिया जाता है. और इस प्रकार की हल्काबंदी की जाती है कि मजदूर बहुल आबादी को किसी एक सीट में बहुमत जैसी स्थिति में इकठ्ठा ही नहीं होने दिया जाता. सर्वे करवाए जाते हैं, अगर कहीं खतरा दिखाई देता है तो उस सीट का फिर परिसिमिन हो जाता है. उसे रिजर्व कर दिया जाता है या रिजर्वेशन भंग कर दी जाती है. हमारी यह पक्की धारणा है कि इन चुनावों में हमें एक अलग तरह से भाग लेना चाहिए. चुनावों में अपना उम्मीदवार खडा करना अपनी शक्ति जाया करने के सिवा कुछ नहीं है. बल्कि हमें चाहिए कि जब चुनावों के दौरान माहौल पूरी तरह से गर्म हो तो उस वक्त अपनी राजनीतिक सरगर्मियों को और अधिक तीव्र करें. लोगों से मिलकर उनतक अपनी बात पहुंचानी चाहिए. सभी बुर्जुआ और चुनावबाजी वामपंथी पार्टियों का भंडा-फोड़ करना चाहिए. लोगों को बताना चाहिए कि इन चुनावों से कुछ भी फर्क नहीं पड़ने वाला. फर्क तभी पड़ेगा जब सभी मेहनतकश अवाम खड़े होकर सारी ताकत अपने हाथ में लेंगे. लोगों को  बताया जाये कि किन-किन पार्टियों को किन-किन पूंजीपति और व्यावसायिक घरानों से कितना चंदा मिलता है. फिलहाल क्रांतिकारियों को इस तरह के या इससे मिलते-जुलते काम करने चाहिएं.

भारत के गाँव-गाँव तक पैठ कर चुकी बुर्जुआजी

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चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – तीसरी किश्त

इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

जमीनों के आसमान छूते भावः हैं लेकिन उनके लिए कोई फर्क नहीं पड़ता जिन्होंने मजदूरों से अधिशेष लूटा है. वे इसे हर कीमत पर खरीद लेना चाहते हैं. यहाँ तक भी देखने में आया है की वे रास्तों और गलियों को भी अपने खेतों और घरों में मिला लेते हैं जिसके लिए उन्हें कोई दाम नहीं देने पड़ते. अगर कोई विरोध करता है तो गाँव की निम्न बुर्जुआजी भी फ़िलहाल बड़े लोगों के साथ ही खड़ी होती है. इनका नजरिया न केवल पलायनवादी होता जा रहा है बल्कि वे गाँव के धनाढय लोगों के पक्ष में जिरह करते पाए जाते हैं. गली और रास्ता बंद होने की अगर कोई आपत्ति भी दर्ज करवाता है तो अपने बड़े बिरादरों की हिमायत में ये लोग उस व्यक्ति के घर इस तरह का ताँता लगा देते हैं जैसे कोई मईयत पर आता हो. उनके तर्क होते हैं कि भाई, तुम ही क्यों विरोध करते हो. वे कहते हैं कि फलां व्यक्ति भी गली पर कब्जा जमाये बैठा है और फलां भी. यह दरखास्त तुने खिलाफ क्यों दर्ज करवाई है ?

मेरे जैसे लोग उनसे जिरह तो करते है कि भाई सांझी मल्कियत रास्ते और गलियों का बचाना ज़रूरी है. उनसे यह भी कहा जाता है कि गाँव में कब्जों द्वारा से गली और रास्ता हथियाने वाले ये लोग कभी भी कामरेडों के मित्र नहीं रहे. कामरेड उन्हीं परिवारों से आये जो दबे-कुचले लोग थे, अगर किसी एक भी अमीर परिवार से आया है तो बता दो. उन लोगों से कहा जाता है  कि पहले तो यह कब्जों का काम ये भद्र्पुरुष करते थे लेकिन अब यह काम आपने भी ले लिया है ! जहाँ तक जमीन का सवाल है तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान दो मुल्क बन गए और अंग्रेज भी चले गए, ज़मीनें जो जागीरदारों के पास थी उसमें से अधिकतर का बंटवारा भी हो गया लेकिन कभी गलियों और रास्तों के भी बँटवारे हुए हैं?  एक धार्मिक व्यक्ति ने गुरबाणी का सहारा लेकर इन जमीन के भूखे लोगों का पक्ष लिया “जित हाथ जोर हरि देखिये सोई, नानक उसते नीच न कोई”. मतलब यह कि एक भी व्यक्ति तैयार नहीं है इस तरह की बात मानने को. तो यह स्थिति है नयी-नयी निम्न-बुर्जुआ में शामिल हुए इस वर्ग की !

तो यह फर्क है हमारी पंचायत और सोवियतों में. सोवियत कानून बनाती भीं हैं और इसे स्वयं लागू भी करती हैं. यह कोई उपरोक्त व्यक्तियों की तरह निठ्ठले लोगों का अड्डा नहीं है. गप्पबाजी का अड्डा नहीं है. यहाँ तो गप्पबाजी करो, पैसे लो, मज्जे लो, कानून बनाओ, अपने आप अफसरशाही उसे अपने ही ढंग-तरीके से लागू करती रहेगी. इधर जब भी कभी मजदूरों के हाथ में सत्ता आती है वे सोवियतें बनाते हैं, कम्यून बनाते हैं. और अब चीन और रूस में जब उल्ट हुआ है तो इन्होने फिर ‘डूमा’, पार्लियमेंट को लाकर खडा कर दिया. तो संस्थाएं भी उसी प्रकृति की होती हैं जिस प्रकृति या वर्ग की सत्ता होती है. आज मान लीजिये अगर राजाओं की सत्ता आ जाये तो (जो कि संभव नहीं है) तो राजा लोग अपनी एक परिषद् बनायेगे जिसमें वोट का अधिकार केवल सामंतों को ही होगा. इन्हीं लोगों द्वारा आम राय निर्धारित की जायेगी. राजा भी राय देगा लेकिन आम लोगों की कोई राय नहीं होगी. अब इस व्यवस्था में केवल पूंजीपतियों की राय की ही कद्र होती है.

दूसरी बात कि अब वोटों को देखो. काफी मजदूर आबादी जो इधर से उधर स्थान बदलती रहती है उसकी वोट बनी हुई ही नहीं है. और जो वोट डाली गयी है उसमें से वर्तमान में सत्ता में आयी कांग्रेस पार्टी को कुल वोट का केवल 12  प्रतिशत ही मिला है. यानी कि वर्तमान सरकार केवल 12  प्रतिशत लोगों की ही नुमाइंदगी करती है बाकी जो 88  प्रतिशत वोट है वह इसके विरोध में है. अगर हम इस आंकडों की बाजीगरी में भी जाएँ तो भी बात कितनी विडम्बनापूर्ण है. इसी भारत को ही दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं ! तो इस स्थिति, इस भ्रम से बाहर निकलने का हम अपने साथियों से आह्वान करते हैं.

(बीच में एक साथी प्रश्न पूछते हैं कि कई देशों में कानून और नीतियाँ बनाने के लिए ‘पब्लिक ओपिनियन’ होता है)

‘पब्लिक ओपिनियन’ भी तो यही है. हमारे संसदमार्गी कामरेडों ने कभी मांग उठाई थी कि अठारह साल के नौजवान को वोट का अधिकार हो. कि नौजवान बहुत ऊर्जावान होता है. कि नौजवान प्रोग्रेसिव होता है.जैसे कि नौजवान यूंही ऊर्जावान और प्रोग्रेसिव हो जाता है ! जैसे कि उसका कोई वर्ग न हो ! जैसे कि वह वर्ग से ऊपर कोई पवित्र शै हो !

(एक और साथी बीच में बोलने लगते हैं कि ‘पब्लिक ओपिनियन’ आप टीवी पर नहीं देखते हो ? उसमें यह तो बताया जाता है कि इतने फीसदी ने पक्ष या विपक्ष में एस.एम.एस भेजा लेकिन यह नहीं बताया जाता कि कुल कितने एस.एम.एस आये.एक और साथी कहते हैं कि कई देशों में जनमत के द्वारा लोग अपने चुनें गए प्रतिनिधियों को वापस बुला सकते हैं.)

यह बात ठीक है कि वे वापस बुला सकते हैं. लेकिन अगर हम वापस बुला भी लेते हैं तो फिर वोट डाली जाएँगी और वोटें तो वैसे ही डाली जाएँगी जैसे पहले डाली गयी थी. मतलब यह है कि इस क्रिया मैं आम लोग कहाँ ठहर पाएंगे. उनका तो कोई अधिकार है ही नहीं. आम लोगों का प्रतिनिधित्व तो फिर भी नगण्य होगा. अब सोवियतों का प्रतिनिधित्व कैसा रहा है. सोवियत क्या थीं? सोवियतें थीं – मजदूरों की सोवियतें, किसानों की सोवियतें, अध्यापकों की सोवियतें, फौजियों की सोवियतें बगैरा-बगैरा. सोवियते थी काम के आधार पर. हमारे क्या हैं जातिगत ? कि इतने फीसदी औरतें ! अब औरतें हमारी पार्लियमेंट में जाते ही औरतें रहती ही नहीं, वे कुलीन औरत में परवर्तित हो जाती है. आत्मा सिंह को ले लो वह इस पार्लियमेंट का एक कुलीन व्यक्ति बन गया है. उसमें ऐसा कुछ नहीं है जो उसके दलित जाति का प्रतिनिधित्व करे. बूटा सिंह को ले लो. उसका लड़का घपले करता पकडा गया और वह झूठ पर झूठ बोले जा रहा है. हमारे यहाँ ये लोग इस प्रकार के बँटवारे करते हैं. कभी भी काम-धंधे के आधार पर बटवारा नहीं होता. कि इतने फीसदी मजदूर आएंगे, इतने फीसदी किसान, इतने फीसदी पूंजीपति. लेकिन सोवियतों में इस तरह का बंटवारा था. अपने यहाँ प्रतिक्रियावादी बाँट करेंगे. जिससे लोग भाई-भाई के दुश्मन हो जाते हैं. वे कह रहें है कि देखिये हरियाणा में इतने फीसदी पंजाबी हैं. तो यह है प्रतिक्रियावादी बंटवारा. यह प्रतिक्रियावादी बंटवारा है क्या ? धर्मों के नाम पर, जाति के नाम पर, गोत्रों के नाम पर – यह पीछे-खींचू बाँट है, प्रतिक्रियावादी बाँट है. जो असली बाँट है वे वर्गों के आधार पर है कि काम के आधार पर बाँट हो. यही समाजवादी बाँट है और वैज्ञानिक बाँट है. कि मजदूर की गिनती आबादी का सतत्तर फीसदी है इसे सतत्तर  फीसदी की ‘रिजर्वेशन’ मिले. अब ये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लोग भी कह रहे हैं कि पंजाबियों का इतने प्रतिशत प्रतिनिधित्व हो. ये भी इतने पीछे-खींचू हो गए हैं.

(एक और साथी प्रश्न करते हैं कि क्या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी यह बात कहती है.)

बिलकुल आज से आठ-दस वर्ष पूर्व इन्होनें अपने प्रोग्रेम में यह तरमीम की है. पहले इनके प्रोग्रेम में था कि यह पार्टी मजदूरों और किसानों की पार्टी है और यह अपना सैद्धांतिक आधार मार्क्सवाद-लेनिनवाद से लेती है. माओवाद से नहीं. अब माओवाद आज के युग का मार्क्सवाद है वैसे ही जैसे लेनिनवाद साम्राज्यवाद के युग का मार्क्सवाद है. मार्क्सवाद आजाद मुकाबले के पूंजीवाद के युग का सिद्धांत है और जैसे ही पूंजीवाद साम्राज्यवाद में बदला तो उस समय का मार्क्सवाद है लेनिनवाद. माओवाद समाजवाद आने के बाद ,उसे साम्यवाद में ले जाने के लिए किन-किन  दांव-पेंचों की ज़रुरत है, किस प्रकार की रणनीति हो, उस समय का मार्क्सवाद है. वे माओवाद को मानते ही नहीं बल्कि वे कहते हैं कि वे मार्क्सवाद, लेनिनवाद, बुद्धवाद, नानकवाद, कबीरवाद आदि उनके प्रेरणास्रोत हैं. मतलब कि ये अपनी विचारधारा को पीछे ले गए हैं. हम समझते हैं कि लेनिन तक भी हम पीछे हैं. अगर आप माओ तक भी नहीं आते तो बहुत पिछड़ जाते हो. पर ये तो मध्ययुग के उस मानवतावाद तक निघार की रसातल में चले गए हैं.

अगली किश्त में समाप्य

इसके बाद : चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – क्या करें

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तथाकथित भारतीय लोकतंत्र

First Arvind Memorial Seminar

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“Labour Laws and New Forms of Working Class Resistance in the Era of Globalisation”

RF_1_Vihaan ki team shradhanjali geet prastut karte huye

25 July, New Delhi. Labour activists, intellectuals and social-political activists have blamed the leadership of traditional trade unions for the defragmentation and weakness of labour movement today and stressed the need to build new revolutionary trade unions and to organise the vast majority of unorganised workers. They were participating in the First Arvind Memorial seminar on “Labour laws and new forms of working class resistance in the era of globalisation” organised here by Rahul Foundation on Friday. It was felt that political, economic and democratic rights of workers are constantly under attack through neo-liberal policies but the working class is unable to organise an effective struggle on economic demands and limited democratic rights.

RF_2_Dr Prabhu Mahapatra ka vaktavya

Editor of progressive journal ‘Ahwan’ and labour activist Abhinav initiated the discussion by saying that the modus-operandi of capital has undergone many basic structural changes and this makes it necessary for the working class to make fundamental changes in its forms of protest and its strategy. Capital has developed new ways and means to appropriate super-profits through automation and other new techniques. Concentration of large number of workers in big factories is being replaced replaced by the dispersion of small numbers of workers in several small factories. Most of these workers are either contract, daily wages, casual workers or work on piece rate. More and more women and children are employed on still lower wages. He said that 93 per cent of the total worker’s population is employed in informal sector and which is not organised in any trade union. Organising this mass is the biggest challenge facing revolutionary forces today. We need to organise this population not only in factories but also by working in the working class neighbourhoods. He said that it will be wrong to think that this vast mass of workers is incapable of organised itself into a strong movement. It may seem a faceless and shapeless mass today but it has revolutionary potential. The mobility forced upon these workers serves to increase their political consciousness. They know that they are not exploited by any one capitalist but by the capitalist class as whole who is supported by the state and all its organs.

Dr. Prabhu Mahapatra of Delhi University while discussing the fragmentation of the working class said that new ways of organising will have to be explored. Discussing the history of the origin of the labour laws he said that through these laws the state tries to present itself as an impartial intermediary between the industrialist and and worker but actually it is on the side of capital. He stressed the need to work with the organised workers along with organising the workers of the unorganised sector.

Prof. Shivmangal Siddhantkar of CPI-ML (New proletarian) said that the working class is demoralised and scattered today but it is preparing to fight again. The need is that the scattered revolutionary forces come to a single platform and provide leadership to the workers’ fight so that the workers can rise above the defeatist mindset prevailing among them.

Sheikh Ansar, from Chhattisgarh Mukti Morcha said that it is very important to work and organise in the residential areas of workers as well as organise them in trade based organisations and trade unions. CMM has been working on this basis for last two decades and today there are three colonies which have been settled by the workers themselves. They have their own hospital and ambulance and schools. The working class can fight only by building its own institutions and parallel forces. He stated that Shankar Guha Niyogi mentioned in his last message that without an All-India revolutionary party, the workers’ struggle cannot move beyond a point.

Satyam of Rahul Foundation said that The boundaries of nation-states are now more open for the movement of capital while the movement of labour now faces even more restrictions and conditions. In the unbridled drive of privatisation education, health and all such things have been declared mere products and given away to market forces, but the government, bureaucracy and judiciary are now playing an even more active role in controlling labour. The present global recession has exposed the incurable structural crisis of capitalism.

The Editor of Punjabi magazine ‘Pratibadhh’, Sukhwinder from Ludhiana said that today the organised force and consciousness of the working class has been fragmented in various ways; the workers themselves have been divided at several levels and pitted against each other. Organised large unions are reduced to representing the economic interests of regular workers with better wages and living conditions and a very small segment of labour aristocracy. Labour laws exist on paper for most of the workers and labour courts have become almost irrelevant. Working class has lost the basic rights of job-security, working hours, minimum wages, overtime, housing which it had won as a result of long struggles, and the conditions for building a movement on these issues have become more difficult today.

RF_3_Sukhvinder ka vaktavya

The editor of the ‘Hamari Soch’ magazine, Subhash Sharma said that the revolutionary leadership cannot create new forms of working class struggle in advance. These new forms would emerge during the course of struggle. He said that the revolutionary forces should also work amongst the the organised workers working in the big factories because the unorganised sector’s worker can become the main force of the struggle but they cannot provide lead it.

Nagendra from Inqulabi Mazdoor Kendra Faridabad, Narendra Kumar from Patna, Kashmir Singh from Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch Sirsa, Dr CD Sharma from Janchetna Manch, Gohana and Alok from Krantikari Yuva Sangathan also participated in the discussion. A researcher at the Institute of Economic Growth, Ms Mayumi Muriyama from Japan also participated in the seminar.

Com. Arvind was remembered and floral tributes were paid at his portrait at the start of the program. President of Rahul Foundation and well-known Hindi poetess Katyayani said Arvind was associated with worker’s newspaper ‘Bigul’ and left intellectual magazine ‘Dayitvabodh’. After being active for over fifteen years in the students and youth movement, he was engaged in organising workers for almost a decade. He played a leading role in several struggles of the workers from Noida and Delhi to Eastern Uttar Pradesh. Even in his last days he was leading a movement of sanitation workers in Gorakhpur. His short but intense life is an eternal source of inspiration for political workers.

For, Secretary

Rahul Foundation

For details, please contact:

Satyam: 9910462009, Abhinav: 9999379381

Email: satyamvarma@gmail.com

प्रथम अरविन्द स्मृति संगोष्ठी कार्यक्रम

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(24 जुलाई, 2009)

विषय

भूमण्डलीकरण के दौर में

श्रम कानून और मज़दूर वर्ग के

प्रतिरोध  के नये रूप

भूमण्डलीकरण पर विमर्श अभी भी अकादमिक जगत में प्रचलित फैशन बना हुआ है। लेकिन साथ ही यह उन लोगों के लिए भी अध्ययन-मनन और विचार-विमर्श का एक केन्द्रीय विषय है, जो व्यापक मेहनतकश जनसमुदाय की मुक्ति से जुड़े प्रश्नों पर जेनुइन सरोकार के साथ सोचते हैं या जो मज़दूर आन्दोलन को नयी ज़मीन पर फिर से खड़ा करने के अनथक प्रयासों में जुटे हुए हैं।

विगत शताब्दी के लगभग अन्तिम दो दशकों के दौरान वित्तीय पूँजी के वैश्विक नियंत्रण एवं वर्चस्व के नये रूपों एवं संरचनाओं के सामने आने के साथ ही पूँजी की कार्यप्रणाली में जो व्यापक और सूक्ष्म बदलाव आये तथा अतिलाभ निचोड़ने की जो नयी प्रविधियां विकसित हुई, कुल मिलाकर इनको ही भूमण्डलीकरण परिघटना का केन्द्रीय संघटक अवयव माना जाता है। यही वह समय था जब विपर्यय और प्रतिक्रिया की लहर विश्वव्यापी बन चुकी थी। बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रान्तियों की पराजय के बाद, पूँजीवाद के पक्षधर सिद्धांतकार और प्रचारक धर्मशास्त्रियों की तरह पूँजीवाद के अमरत्व की घोषणा कर रहे थे। कहने की ज़रूरत नहीं कि विश्वव्यापी मन्दी के वर्तमान दौर ने पूँजीवाद के असाध्य ढाँचागत संकट की गम्भीरता दर्शाकर इस मिथक को ध्वस्त कर दिया है। लेकिन पूँजी का भूमण्डलीय तन्त्र अपने आन्तरिक संकटों से स्वयं ही टूट-बिखरकर किसी नये ढाँचे के लिए जगह नहीं बना देगा। यह अपनी जड़ता की शक्ति के सहारे तबतक चलता रहेगा और अपना आंशिक पुनर्गठन करता रहेगा, जबतक कि श्रम की शक्तियाँ सुनियोजित प्रयासों से इसे तोड़कर नये ढाँचे का निर्माण नहीं करेंगी।

विचारणीय प्रश्न यह है कि छिटपुट मुठभेड़ों, असंगठित- स्वयंस्फूर्त प्रतिरोधों और आत्मरक्षात्मक उपक्रमों के अतिरिक्त मज़दूर वर्ग आज कहीं भी पूँजी के संगठित हमलों एवं दबाव का प्रभावी ढंग से उत्तर नहीं दे पा रहा है। अपने ऐतिहासिक मिशन और दूरगामी राजनीतिक संघर्ष को आगे बढ़ा पाना तो दूर, मज़दूर वर्ग अपने तात्कालिक एवं आंशिक हितों की लड़ाई को, आर्थिक माँगों एवं सीमित जनवादी अधिकारों की लड़ाई को भी प्रभावी ढंग से संगठित नहीं कर पा रहा है। यह एक जलता हुआ सवाल है, जिसके रूबरू हम-आप खड़े हैं!

अक्सर ऐसा होता है कि अतीत के शानदार और सफल संघर्षों से सम्मोहित होकर हम उनका अनुकरण करने लगते हैं। इसके पीछे एक कारण परिवर्तन के लिए हमारी व्यग्रता का होना भी होता है, जबकि ज़रूरत इस बात की होती है कि नये बदलावों का अध्ययन किया जाये और नयी राहों का संधान किया जाये। उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के मज़दूर आन्दोलनों के अनुभवों का अध्ययन-समाहार ज़रूरी है, पर उन्हीं की प्रतिछवि में आज के मज़दूर आन्दोलन को नहीं देखा जा सकता। हमें निरन्तरता और परिवर्तन के द्वन्द्व को सही ढंग से समझना होगा।

इक्कीसवीं सदी में पूँजी की कार्य-प्रणाली वही नहीं है जो बीसवीं शताब्दी में थी और उसमें कई बुनियादी ढाँचागत बदलाव भी आये हैं। इस स्थिति में, ज़ाहिर है कि श्रम के पक्ष को भी प्रतिरोध के तौर-तरीकों और रणनीति में कुछ बुनियादी बदलाव लाने होंगे। स्वचालन और अन्य नयी तकनीकों के सहारे पूँजी ने अतिलाभ निचोड़ने के नये तौर-तरीके विकसित कर लिये हैं। ज्यादातर मामलों में, बड़े-बड़े कारखानों में मज़दूरों की भारी आबादी के संकेन्द्रण का स्थान कई छोटे-छोटे कारखानों में मज़दूरों की छोटी-छोटी आबादियों के बिखराव ने ले लिया है। किसी एक माल के दस हिस्से न सिर्फ एक देश के दस हिस्सों में बल्कि दुनिया के दस देशों में बिखरे संयंत्रों में बनते हैं और फिर ग्यारहवीं जगह आपस में जुड़ते हैं। इसे इन दिनों प्राय: `ग्लोबल असेम्बली लाइन´ या `विखण्डित असेम्बली लाइन´ कहा जाता है। प्राय: इन सभी कारख़ानों में अधिकांश मज़दूर ठेका, दिहाड़ी, कैजुअल होते हैं या पीसरेट पर काम करते हैं। कुशल मज़दूरों की एक बहुत छोटी आबादी ही नियमित की श्रेणी में आती है। कम मज़दूरी देकर स्त्रियों और बच्चों से काम लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इन्हीं नयी चीज़ों को आज श्रम के अनौपचारिकीकरण, परिधिकरण, ठेकाकरण, स्त्रीकरण आदि नामों से जाना जाता है। तात्पर्य यह कि कई तरीकों से मज़दूरों की संगठित शक्ति और चेतना को विखण्डित करने के साथ ही कई स्तरों पर मज़दूरों को आपस में ही बाँट दिया गया है और एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है। संगठित बड़ी ट्रेड यूनियनें ज्यादातर बेहतर वेतन और जीवनस्थितियों वाले नियमित मज़दूरों और कुलीन मज़दूरों की अत्यन्त छोटी-सी आबादी के आर्थिक हितों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं।

भूमण्डलीकरण के दौर ने राष्ट्र-राज्य की भूमिका का भी पुनर्निर्धारण किया है। पूँजी की आवाजाही के लिए राष्ट्र-राज्यों की सीमाएँ ज्यादा से ज्यादा खुल गयी हैं जबकि श्रम की आवाजाही की बंदिशें और शर्तें बढ़ गयी हैं। निजीकरण की अंधाधुंध मुहिम में शिक्षा, स्वास्थ्य आदि – सबकुछ को उत्पाद का दर्जा देकर बाज़ार के हवाले कर दिया गया है, लेकिन श्रम को नियंत्रित करने के मामले में सरकार, नौकरशाही और न्यायपालिका ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने लगी हैं। यूँ तो बुर्जुआ श्रम कानून पहले भी मज़दूरों के आर्थिक हितों और राजनीतिक अधिकारों की सीमित हिफाजित ही कर पाते थे, पर आज श्रम कानूनों और श्रम न्यायालयों का जैसे कोई मतलब ही नहीं रह गया है। लम्बे संघर्षों के बाद रोज़गार-सुरक्षा, काम के घण्टे, न्यूनतम मज़दूरी, ओवरटाइम, आवास आदि से जुड़े जो अधिकार मज़दूर वर्ग ने हासिल किये थे – वे उसके हाथ से छिन चुके हैं और इन मुद्दों पर आन्दोलन संगठित करने की परिस्थितियाँ एकदम वैसी ही नहीं हैं, जैसी आज से सौ या पचास साल पहले थीं।

मज़दूर आन्दोलन से जुड़े इन सभी प्रश्नों और समस्याओं को एक साथ रखने का मतलब यह कतई नहीं है कि हमारा दृष्टिकोण निराशावादी है। बल्कि हम वैज्ञानिक और यथार्थवादी अप्रोच एवं पद्धति अपनाकर सामने उपस्थित समस्याओं का सिद्धांत एवं व्यवहार के धरातल पर हल निकालना चाहते हैं और वर्तमान गतिरोध् को तोड़ने की कोशिशों को गति देना चाहते हैं। यहाँ हमने आज के दौर में मज़दूर आन्दोलन के समक्ष उपस्थित समस्याओं-चुनौतियों के बारे में संक्षिप्त चर्चा की है। प्रस्तावित संगोष्ठी में सिर्फ इन समस्याओं पर ही नहीं, बल्कि मज़दूर आन्दोलन के नये रूपों और नयी रणनीतियों पर भी सहभागियों के साथ मिलबैठकर बात करेंगे |

यह संगोष्ठी हम अपने प्रिय दिवंगत साथी अरविन्द सिंह की स्मृति में आयोजित कर रहे हैं। 24 जुलाई, 2009 साथी अरविन्द की पहली पुण्यतिथि है। गत वर्ष इसी दिन, उनका असामयिक निध्न हो गया था। तब उनकी आयु मात्र 44 वर्ष थी। वाम प्रगतिशील धारा के अधिकांश बुद्धिजीवी, क्रान्तिकारी वामधारा के राजनीतिक कार्यकर्ता और मज़दूर संगठनकर्ता साथी अरविन्द से परिचित हैं। वे मज़दूर अख़बार `बिगुल´ और वाम बौद्धिक पत्रिका `दायित्वबोध´ से जुड़े थे। छात्र-युवा आन्दोलन में लगभग डेढ़ दशक की सक्रियता के बाद वे मज़दूरों को संगठित करने के काम में लगभग एक दशक से लगे हुए थे। दिल्ली और नोएडा से लेकर पूर्वी उत्तरप्रदेश तक कई मज़दूर संघर्षों में वे अग्रणी भूमिका निभा चुके थे। अपने अन्तिम समय में भी वे गोरखपुर में सफाईकर्मियों के आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। उनका छोटा किन्तु सघन जीवन राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। `भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम कानून और मज़दूर वर्ग के प्रतिरोध के नये रूप´ जैसे ज्वलन्त और जीवन्त विषय पर संगोष्ठी का आयोजन ऐसे साथी को याद करने का शायद सबसे सही-सटीक तरीका होगा। हम सभी मज़दूर कार्यकर्ताओं, मज़दूर आन्दोलन से जुड़ाव एवं हमदर्दी रखने वाले बुद्धिजीवियों और नागरिकों को इस संगोष्ठी में भाग लेने के लिए गर्मजोशी एवं हार्दिक आग्रह के साथ आमंत्रित करते हैं। हमें विश्वास है कि आन्दोलन की मौजूदा चुनौतियों पर हम जीवन्त और उपयोगी चर्चा करेंगे।

सधन्यवाद ,

साभिवादन,

कात्यायनी

अध्यक्ष

राहुल फाउण्डेशन

कार्यक्रम

प्रथम सत्र

पूर्वाह्न 11 बजे से 2 बजे तक

भोजनावकाश

अपरांत 2 से 2.30 बजे तक

द्वितीय सत्र

अपरांत 2.30 से सायं 7.30 बजे तक

प्रथम अरविन्द स्मृति संगोष्टी

(24 जुलाई 2009)

comrade-arvind

विषय

भूमण्डलीकरण के दौर में श्रम कानून और मज़दूर

वर्ग के प्रतिरोध के नये रूप

स्थान:

गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान सभागार

दीनदयाल उपाध्याय मार्ग

(निकट आई.टी.ओ.)

नई दिल्ली

संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों से मज़दूर संगठनकर्ताओं, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं, श्रम कानूनों के विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों के भाग लेने की पुष्टि हो चुकी है। आपसे हमारा पुरज़ोर अनुरोध् है कि जल्द से जल्द अपनी भागीदारी की पुष्टि करें और अपने आने की सूचना दें।

गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान सभागार

नई दिल्ली

सुबह 11 बजे से शाम 7.30 बजे तक

आप सादर आमंत्रित हैं!

सम्पर्क:

कात्यायनी (0522-2786782)

सत्यम (099104 62009 / 011-2783 4130)

आयोजक:

राहुल फाउण्डेशन


कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

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कड़ी जोड़ने के लिए देखे :

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

“हमने लिखा
“आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं…..साथ ही हमने जोड़ा था कि “वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.”
किसी प्रकार की गलतफहमी न हो हम साफ़ कर देना चाहते हैं कि;

आज के किसान का चरित्र वह नहीं है जो तब था और वह मजदूर के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति का वाहक था जो नहीं हुई. इसके विपरीत राष्ट्रीय जनतंत्र के कार्यभार ने बुर्जुआ राज्य और बुर्जुआ सरकारों के नेतृत्व में प्रशियाई जुन्कर तरीके से धीमे परन्तु पीडादायक तरीके से संपन्न होना था और वह हुआ भी. इस दौरान किसान उस मेहनतकश के क्रांतिकारी चरित्र को खो बैठा जो कि मजदूर वर्ग की सहायक रिजर्व सेना का होता है. पूँजी का सताया यह  वर्ग यदि क्रांतिकारी दीखता है तो केवल इसलिए क्योंकि मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से अपना दृष्टिकोण त्यागकर यह अपना भविष्य सुरक्षित कर लेना चाहता है. हम इसका स्वागत करते हैं परंतु मजदूरों के हितों को ताक में रखकर इनके बोनुस, लाभकारी मूल्यों की हिफाजत की वकालत हम नहीं करते. हाँ, बुर्जुआ राज्य द्वारा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पूँजी की चाकरी बजाते हुए पुलिस और फौज द्वारा इनके हासिल जनतांत्रिक अधिकारों के हनन की हम भर्त्सना करते हैं बेशक किसी लाल झंडे के नेतृत्व में कामरेडों ने वह कर दिखाया हो जिसे करने में बुर्जुआ दल भी शरमातें हैं.

आज के किसान का चरित्र – हमारी पहुँच – कुछ और स्पष्टता : देखें

हमने बार-बार लिखा है कि सीपीआई, सीपीआई (एम) सीपीआई (एम एल ) संशोधनवादी पार्टियाँ हैं और इनका चरित्र बुर्जुआ पार्टियों से कहीं ज्यादा, कहीं अधिक कुटील है लेकिन इनकी कतारों की बहुसंख्यक  गिनती  और इनके समर्थक बुद्धिजीवियों की बहुसंख्या, अब भी ईमानदार है हालाँकि ,किसी भी वस्तु, घटनावृत  अथवा व्यापार की गतिकी की दशा-दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि वस्तु, घटनावृत  अथवा व्यापार के बुनियादी  मुख्य विरोधी ध्रुवों में प्रधानता किसकी है. इस घटनावृत को ठीक इसी प्रकार समझा जा सकता है जैसे किसी समाज में मेहनतकश अवाम तो बहुसंख्यक हो लेकिन उस समाज की विरोधों की एकता से पैदा होने वाली गतिकी उसके पक्ष के विपरीत अल्पसंख्यक परजीवी वर्गों के पक्ष में हल होती हो.

लेकिन निम्नलिखित रिपोर्ट में वर्णित तथ्य भी गौर करने लायक हैं ;

1990  के दशक में, सी.पी.एम. की चंडीगढ़ में संपन्न हुई पंद्रहवीं कांग्रेस में एक चौकाने वाला तथ्य प्रकाश में आया. पार्टी के आधे से ज्यादा सदस्य गैर-मेहनतकश वर्ग और गैर-किसान वर्ग से आये थे या यूं कहें कि  – मिडल क्लास से. इससे सी.पी.एम. की मेहनतकश वर्गों को जन-आंदोलनों में  न खींच सकने की क्षमता और उसके रेडिकल शिक्षित युवा की और आकर्षण का  पता चलता है. उस समय से जारी इस नुक्स और बेपरवाही के चलते हालत यह हो गयी है कि विद्यार्थियों, युवायों और महिलायों के मोर्चे ही लगभग सभी  पोलित ब्यूरो और संसद  के टॉप नेताओं  की आपूर्ति करते हैं.  नव युवाओं में शायद ही कोई सदस्य हो जो ट्रेड यूनियन, किसान और जन-आन्दोलन से उठकर आया हो. हरकिशन सिंह सुरजीत और ज्योति बसु किसान और श्रमिक वर्ग आंदोलनों से उभरे थे जबकि प्रकाश करात और बुद्धदेव भट्टाचार्य विश्वविद्यालयों  के कुलीन वर्ग से आये हैं. पार्टी में इस मालदार शिक्षित वर्ग की प्रधानता ने पार्टी को ,जिसे कहा जा सकता है कि, “तर्कसंगत सिद्धांतों की राजनीति” में बदल दिया…देखें : A Logical Defeat

कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी कम्युनिस्टों के इस प्रकार अलग-अलग खेमों में बँटे होने से चिंतित हो जाते हैं. हालाँकि कुछ विशेष परस्थितियों में ‘टैक्टिस’ के लिहाज़ से यहाँ तक कि जनतांत्रिक बुर्जुआ दलों तक के साथ सांझे मोर्चे के लिए समझौता करने से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन समझौता आखिर समझौता ही होता है जो कभी भी किसी पक्ष को, एक पल के लिए भी, पीडामुक्त  नहीं करता और उसे दशकों तक निभाना (यहाँ इशारा भारतीय वाम मोर्चा से है) हद दर्जे की निम्न अवसरवादिता नहीं तो और क्या है?

जहाँ तक सैद्धांतिक एकता का प्रश्न है तो मजदूरों के लिए लेनिन के कहे गए इन शब्दों का आज भी उतना ही महत्त्व है,

“मज़दूरों को एकता की ज़रूरत अवश्य है और इस बात को समझना महत्त्वपूर्ण है कि उन्हें छोड़कर और कोई भी उन्हें यह एकता ‘प्रदान’ नहीं कर सकता, कोई भी एकता प्राप्त करने में उनकी सहायता नहीं कर सकता। एकता स्थापित करने का ‘वचन’ नहीं दिया जा सकता – यह झूठा दम्भ होगा, आत्मप्रवंचना होगी (एकता बुद्धिजीवी ग्रुपों के बीच ‘समझौतों’ द्वारा ‘पैदा’ नहीं की जा सकती। ऐसा सोचना गहन रूप से दुखद, भोलापन भरा और अज्ञानता भरा भ्रम है।” “एकता को लड़कर जीतना होगा, और उसे स्वयं मज़दूर ही, वर्गचेतन मज़दूर ही अपने दृढ़, अथक परिश्रम द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। इससे ज्यादा आसान दूसरी चीज़ नहीं हो सकती है कि ‘एकता’ शब्द को गज-गज भर लम्बे अक्षरों में लिखा जाये, उसका वचन दिया जाये और अपने को ‘एकता’ का पक्षधर घोषित किया जाये।”

शब्द कम्युनिस्ट से अभिप्राय सत्तासीन दल के शेयर होल्डर रहे संशोधनवादी वामपंथी धडे और दुस्साहसवादियों से लिया जाता हैं. हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि छिटपुट ही सही परंतु कुछ क्रांतिकारी ग्रुप उपरोक्त दो धाराओं से बिलकुल हटके हैं लेकिन इसका मतलब हरगिज़ नहीं कि  कोई नया मार्क्सवाद ईजाद कर लिया गया है बल्कि आज विपर्य के इस दौर में मार्क्सवाद की हिफाजित तथाकथित मार्क्सवादियों से करने की सख्त ज़रुरत है और इन संशोधनवादी मार्क्सवादियों को नंगा करना क्रांतिकारी ग्रुपों का एक कार्यभार है जबकि दुस्साहसवाद इतना कुटील नहीं, उसे हराया जा सकता है. जहाँ तक सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी के होने न होने का सवाल है, इसके लिए देखें : कहाँ से फूटेंगी उम्मीद की किरणें

हमारे कर्मों का मार्गदर्शक होते हुए मार्क्सवाद निरंतर विकासमान सिद्धांत है जिसे समय-समय पर कर्म-सिद्धांत-कर्म के सूत्र द्वारा एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन माओ आदि मार्क्सवादियों ने विकसित किया है. वैज्ञानिक समाजवाद के प्रथम प्रयोग हार जाने के बाद, नई समाजवादी क्रान्तियों (समाजवादी क्रांतियाँ – क्योंकि 21वीं शताब्दी 20वीं शताब्दी से इसलिए भिन्न है कि दुनिया के लगभग प्रत्येक हिस्से में पूंजीवाद विकसित हो चूका है)  का अगला चक्र शुरू ही होने वाला है.

मार्क्सवाद को असफल नहीं माना जा सकता अलबता मजदूर वर्ग का इस संक्रमण दौर में बुर्जुआओं से हार जाने का अर्थ केवल यही है कि समाजवादी क्रांतियों का प्रथम चक्र पूरा हो गया है और सर्वहारा वर्ग अगले चक्र की तैयारी की  इस प्रचंड झंझावाती समय की पूर्वबेला से पहले सोया हुआ दीखता है लेकिन यह मान लेना कि मजदूरवर्ग नए समाजवादी क्रांतियों के तजुर्बे नहीं करेगा क्योंकि समाजवाद तो फेल हो चुका है , क्रांतिकारियों के लिए भाग्यवादी और पलायनवादी – हाथ पर हाथ रखकर बैठना होगा जबकि इसके विपरीत मजदूर वर्ग बड़ी शिद्दत के साथ समाजवादी क्रांतियों की इस प्रक्रिया को अंजाम देगा – बेशक हजारों-हज़ार क्रांतियाँ फेल हो जाएँ क्योंकि बुर्जुआ वर्ग अपने-आप तो उसे यह मौका देगा नहीं कि आओ मैं तुम्हें सिखाता हूँ कि राज्य का संचालन कैसे किया जाता है ! ऐसे में सर्वहारा के पास हारी हुई क्रांतियों के निष्कर्ष और निष्पत्तियों का समाहार करते हुए और मार्क्सवाद की कसौटी पर इसे आत्मसात करते हुए नए समाजवादी तजुर्बे करने और सीखने के सिवा और कोई चारा नहीं है. इसी प्रक्रिया द्वारा ही मार्क्सवाद एक कट्ठ्मुल्लापन (dogma) होने के विपरीत अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास द्वारा अपने विकास की उच्चतर मंजिल को छूएगा और यह क्रांतियों के पिछले रोल मॉडल रहे फ्रेमवर्कों को तहस नहस कर डालेगा.

सुरेश चिपलूनकर [ Suresh Chiplunkar ] के इन शब्दों “बहरहाल, अकेले प्याज़ के मुद्दे पर जब भाजपा सरकार गिर सकती है तो सभी वस्तुओं के गत 5 साल में तीन गुना महंगे होने पर भी सरकार का न गिरना “आश्चर्यजनक” क्यों नहीं है, यह मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं” का हम स्वागत करते हैं. हमने लिखा था

“वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा.”

पूंजीवादी में महंगाई कोई नया घटनावृत नहीं है. दशकों बीत गए जब मुंबईया फिल्मों में ‘बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी’, लोगों ने सुना और महंगाई की इस परिघटना को पूंजीवाद के एक ज़रूरी लक्षण के रूप में स्वीकार किया. दरअसल, पेट्टी-बुर्जुआ बुर्जुआओँ  का सताया होने के कारण महंगाई -महंगाई चिल्लाने लगता है जबकि वस्तुओं और मजदूरी की दर सरकार द्वारा तय न होकर क्लासिकीय पूंजीवादी व्यवस्था में (इस क्लासिकीय पूंजीवाद के चेहरे को लोक-हितेषी दिखाने हेतू, 1930 की पहली विश्व महामंदी से डरे पूंजीवाद को बचाने के लिए कीन्स समाजवाद से उधार लेकर नुस्खे-टोटके प्रगट हुए थे जिसे बुर्जुआ राज्यों ने नवउदारवादी दौर में फैंक दिया. विडम्बना यह है कि पूंजीवाद कीन्स के नुस्खों-टोटकों की ओर वापस भी नहीं लौट सकता) मार्केट द्वारा मांग और पूर्ति के नियमानुसार निर्धारित होती हैं जिसे पूंजीवाद में निहित कई फैक्टर प्रभावित करते हैं क्योंकि मांग और पूर्ति अपने-आप वस्तुओं और मज़दूरी की दर तय नहीं कर सकती. पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों को भारत जैसे देश में, बेहद सस्ती दरों पर श्रम शक्ति का उपलब्ध होने का कारण, यहाँ की बढ़ी हुई जनसंख्या  में दीखता है जबकि इसका राज प्रधानमंत्री के उस वक्तव्य में निहित है कि यहाँ की 70 प्रतिशत आबादी 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती है. श्रम-शक्ति के पुनरुत्थान के लिए इतना कम खर्च बहुत ही कम देशों में होता है. बहरहाल, कहना इतना ही है कि पूंजीवाद में, श्रम-शक्ति भी अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती है और उसके पुनरुत्थान का खर्च या श्रम-शक्ति का मूल्य उसके पुनरुत्थान पर लगे सामाजिक ज़रूरी श्रम-समय (Socially necessary labor time) के बराबर होता है.

महंगाई से हम न केवल चिंतित हैं बल्कि इसकी सबसे ज्यादा मार सर्वहारा वर्ग पर ही पड़ने के कारण  पीड़ित भी हैं  लेकिन पेट्टी-बुर्जुआ के वर्ग दृष्टिकोण के अनुसार बिलकुल नहीं. चरित्र में भारत जैसी ही पूंजीवादी दृष्टिकोण अनुसार  तेजी से विकास की और अग्रसर विश्व की ब्राजील, अर्जेंटीना, मेक्सिको, चीले, द. अफ्रीका, नाईजिरिया, मिस्त्र, ईरान, तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिप्पीन्स, भारत आदि लगभग दर्ज़न एक अर्थव्यवस्थाओं को, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, दुनिया के सबसे सस्ते मुल्को में शुमार करते हैं क्योंकि पूंजी द्वारा यहाँ  उपलब्ध श्रम-शक्ति का अँध-शोषण, बेहद सस्ती दरों पर किया जाता है. सस्ती श्रम-शक्ति होने के कारण सस्ती जिन्से उपलब्ध करवाना केवल इन्हीं मुल्कों के बस की ही बात है. ये देश दुनिया के विकसित पूंजीवादी देशों के मुकाबले में सस्ती उपभोक्तावादी जिंसों का धडाधड उत्पादन कर रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी पूँजी के इस खेल में देशी पूंजीपति मिलकर सर्वहारा वर्ग का कचूमर निकाले हुए हैं जिसे हम विकास के नाम पर अनदेखा नहीं कर सकते. इस लिहाज से हमारा यह कहना कि भारत मुकाबलतन महंगा देश न होकर एक सस्ता देश है कहाँ गलत है ? क्या इसकी पुष्टि वे नहीं करते जिनके पास डॉलर हैं ? उपरी वर्गों की तो छोडिये मध्यम वर्ग के जीवन स्तर की 1970 की दशा और उसकी वर्तमान उपभोक्तावादी स्थिति की तुलना कीजिए. अब जरा सर्वहारा वर्ग जिसके बारे में प्रधानमंत्री जी बीस रूपए से कम गुजारा करने वाला वर्ग बताते हैं उसके 1970 के जीवन स्तर और आज के जीवन स्तर की तुलना कीजिए. क्या उसने उन चरागाहों को नहीं खो दिया जहाँ वह अपनी भेड़ बकरियां चराकर गुज़र-बसर कर लिया करता था? क्या उसके नीचे से उसकी झोंपडी की ज़मीन नहीं खिसक गयी है?

लेकिन हम सत्तर या उसके पीछे की दलदल में वापस लौटने का भी इरादा नहीं रखते हैं. कुछ महानुभावों की यादों में “अहा ग्राम्य जीवन’ का नोस्टालिजिया हो सकता है वे हमसे उसी नोस्टालिजिया में जीने की स्वतंत्रता की मांग कर सकते हैं जिसका हमें कोई शिकवा नहीं है लेकिन हम भी उनसे, लेनिन की भाषा की मदद लेकर, कहना चाहते हैं कि ऐ महानुभावों ! आप उस दलदल में लौट जाना चाहते हैं, आपको वहाँ लौटने की पूरी स्वतंत्रता और हक़ है लेकिन हम भी स्वतन्त्र हैं कि आप को उस दलदल में छोड़कर आगे बढे, हमें पूरा हक़ है कि, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, इस पूंजीवाद के  दानवी चेहरे से लोक-हितेषी मेक-अप का पर्दाफाश करें क्योंकि पूंजीवाद मेहनतकश अवाम की जीवनचर्या को पहले से कहीं ज्यादा बदतर, पहले से कहीं ज्यादा दुष्कर बनाए जा रहा है. विकास के नाम पर जिसमे पेट्टी-बुर्जुआ अपने दिलो-दिमाग को पूंजीपति टोली के साथ मिलाकर रखता है और विकास-विकास की चिल्ल-पौ मचाता रहता है लेकिन जब पूँजी अपने तर्क द्वारा उसे हजम कर जाती है तो वह चिल्लाने लग जाता है पर  फिर भी वह अपने पेट्टी-बुर्जुआ दृष्टिकोण का त्याग नहीं करता – मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण को नहीं अपनाता, का उपहास उडाने की हमें भी पूरी स्वतंत्रता है. हम सर्वहारा वर्ग से आह्वान करते हैं कि पूंजी के इस दुश्चक्र को तोड़कर ही, वह केवल और केवल समाजवादी क्रांति द्वारा समाज और इतिहास को आगे गति दे सकता है क्योंकि पूंजी अपने ही तर्क द्वारा अप्रासंगिक हो चुकी है , यदि वह प्रासंगिक है तो केवल उसके हरकत में न होने से है.

विज्ञान की प्रत्येक शाखा की अपनी एक अलग शब्दावली होती है. फिजिक्स, कैमिस्ट्री या जीवविज्ञान का अध्ययन करते समय नए विद्यार्थियों को उनके कुछ शब्द सीखने पड़ते हैं. इसी प्रकार राजनीती और समाजशास्त्र के सिद्धांतों के अध्ययन के वक्त सम्बंधित शब्दावली की गैर-मौजूदगी में ये विषय बेहद “बोझिल” और कठिन लगते हैं. सुरेश चिपलूनकर कहते हैं;

“मैं तो एक मूढ़ व्यक्ति हूँ”, न तो मैं बड़ी-बड़ी ना समझ में आने वाली पुस्तकें पढ़ता हूँ, न ही वैसा लिख पाता हूँ… 🙂 । मैंने तो अपनी असफ़लता को भी खुल्लमखुल्ला स्वीकार किया है” और वे मांग करते हैं कि “मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं…।”

विज्ञान की भाषा विज्ञान के युग में वैज्ञानिक न होगी तो कैसी होगी. क्या हम रोजमर्रा की खाने-पीने और अघाने वाली भाषा द्वारा इसका अध्ययन-मनन कर सकते हैं ? यह मेहनत से जी चुराना नहीं तो और क्या है?  यह सब पलायनवाद नहीं तो और क्या है ?

रहा सवाल, मजदूर वर्ग द्वारा इस भारी-भरकम शब्दाबली को सीखने-समझने का तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्स की ‘पूंजी’ छपते ही, जर्मन की मजदूर जमात में लोकप्रिय हो गयी थी. हाँ, प्रोफेसरों को इसे समझने-पढने में जो दिक्कत आती है उसके बारे में हम कुछ कह नहीं सकते. मौजूदा समय  विपर्य का दौर है – मजदूर वर्ग की लहर का  दौर नहीं. बुद्धिजीवी वर्ग के लिए इस तरह के दौर का इतिहास में बड़ा महत्त्व रहा है क्योंकि इस शांति भरे दौर (?) में वह चिन्तन-मनन करने के लिए काफी समय निकाल सकता है. जहाँ तक लहर के दौर का सवाल है तो उस वक्त सर्वहारा वर्ग यह नहीं देखता कि मार्क्स, लेनिन, माओ आदि ने क्या कहा. वह देखता है तो अपने हित ! उस वक्त समस्या होती है तो बुद्धिजीवी वर्ग के लिए. सैद्धांतिक अस्त्र से रहित उसके प्रतिक्रियावादियों के हाथों खेल जाने की पूरी-पूरी संभावना होती है जबकि इसके विपरीत अगर वह सिद्धांत से चाक-चौबंद होता है तो क्रांति और समाज को आगे की ओर गति देने वाली उस वाहक शक्ति को वह, सही दिशा प्रदान कर सकता है और एक नए युग का सूत्रपात करने में अपनी भूमिका निभा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे एक प्रसूति-विशेषज्ञ की भूमिका जनन-पीड़ाओं  को कम करने की होती है.

दूसरा सवाल कि सिद्धांत को  अमल द्वारा कैसे परखा जाये तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्सवाद कोई एकेडमिक चीज तो है नहीं ! इसे परखने की लैब तो यह समाज ही है. इसके लिए बस इतना ही, कि आमलेट खाने के लिए अंडा तो फोड़ना ही होगा.

अंत में एक बार फिर, हम बुद्धिजीवी वर्ग का आह्वान करते हैं कि वह आगे बढे और इस संजीदा बहस को संजीदगी के साथ ही आगे बढाए.

नोट : श्रम-शक्ति अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती तो है लेकिन अन्य जिंसो से इसलिए अलग है कि इसे मनुष्य के शरीर से अलग नहीं किया जा सकता और दूसरी जिंसों के विपरीत यह अकेली ऐसी जिन्स है जो  बेशी मूल्य या अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष (surplus value) पैदा करती है.

सुने : दुनिया के हर सवाल केhttp://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/duniakeharsavaalke.mp3?attredirects=0

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“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

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इस पोस्ट से सम्बंधित प्राप्त टिप्पणियों के पश्चात् यह ज़रूरी हो गया है कि इस विषय पर वाद-विवाद जारी रखा जाये. चूंकि वर्तमान समाज वर्गों में विभाजित है इसलिए समाज में विचारों और दृष्टिकोण की विभिन्नता होना स्वाभाविक और  लाजिम है; कि  विचारों की विभिन्नता और उनके बीच जारी संघर्ष विचारों के विकास की ज़रूरी शर्त है. कला नैतिकता, धर्म, राजनीति, दर्शन आदि ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में मौजूद विचार चेतना के ही रूप हैं. हालाँकि सामाजिक चेतना का कोई भी रूप वस्तुगत यथार्थ से स्वतन्त्र नहीं होता बल्कि मानवी दिमाग अन्दर वस्तुगत यथार्थ का ही प्रतिबिम्बन होता है. सर्वहारा वर्ग के नव पुनर्जागरण और सर्वहारा वर्ग के नवप्रबोधन का यह आधुनिक  दौर समाज, राजनीति और संस्कृति आदि विषयों पर बुद्धिजीवी वर्ग से पहले के मुकाबले में कहीं अधिक संजीदगी की मांग करता है. अफ़सोस तब होता है जब विद्वान् कहलवाने वाले कुछ सज्जन बिना जाँच-परख किए और निम्न दर्जे के फतवे जारी करते हुए अपनी घोर अज्ञानता और असहनशीलता का प्रगटावा करते हुए दिखाई देते हैं.

लोकसभा चुनावों में जीत-हार के विश्लेषण की अपेक्षा पूंजीवादी जनतंत्र के नाम खेले जाने वाले इस खेल में, आम आदमी के साथ होने वाले छल को समझना ज़्यादा ज़रूरी है. आर्थिक असमानता की इस प्रणाली में राजनितिक अधिकारों की असमानता का जो हश्र होता है, वह किसी व्याख्या की मांग नहीं करता. बेहद खर्चीले इन चुनावों में बड़ी-बड़ी पूंजीवादी पार्टियाँ स्टार खिलाडी की हैसियत से सबसे ज्यादा पैसा बहाती हैं. क्षेत्रीय पूंजीपतियों की पार्टियाँ और निम्न बुर्जुआ विचारधारा की छोटी पार्टियाँ भी अपनी क्षमता से अधिक जोर-आजमाईश करती हैं. वामपंथी पार्टियाँ जो देश के कुछ भागों में असरदायक हैं, ने कभी भी मजदूरों और किसानों के संघर्षों को आर्थिक संघर्षों के दायरे से बाहर नहीं आने दिया. राजनीती के क्षेत्र में भी इनकी कार्रवाही सामाजिक-जनवाद यानिकि छोटे-मोटे आर्थिक सुधारों की लडाई तक सिमिट कर रह गयी है. ‘राज्य’ के चरित्र का ठोस विश्लेषण करके, देश में जारी वर्ग संघर्ष में, अलग-अलग वर्गों की पार्टियों का ठोस विश्लेषण करके, समाजवादी क्रांति का कोई प्रोग्राम ड्राफ्ट करना तो इनके एजेंडा पर रह ही नहीं  गया है . पूंजीपति वर्गों द्वारा प्रायोजित किए जाने  वाले  जनतंत्र के इस खेल में, ये भी अपनी किस्मत-आजमाईश के लिए प्रयत्नशील रहते हैं.

वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के इस दौर में आम लोगों की कंगाली और बदहाली में कई गुना बढोत्तरी हो चुकी है.

देश के कई हिस्सों, विशेषतय:  पश्चिमी बंगाल में किसानों में वामपंथ का काफी प्रभाव रहा है. कृषि में पूंजीवादी विकास ने किसानी क्षेत्र में जो आक्रोश पैदा किया है, कभी वामपंथ उस आक्रोश  का प्रतिनिधित्व करता रहा है जबकि अब  इस किसान वर्ग का प्रतिनिधित्व अन्य निम्न-बुर्जुआ हाथों में जाता हुआ साफ दीखाई दे रहा है.

इन चुनावों में 10 हज़ार करोड़ रूपए से अधिक की राशिः के ‘इन्वेस्ट’ (?) होने की रिपोर्टें हैं. पूंजीवादी ढांचे के अर्न्तगत बड़ा उत्पादक निरंतर छोटे उत्पादक को हड़प करता रहता है लेकिन अपनी विशेष आवश्यकताओं के मद्देनज़र बड़े उत्पादक को, किसी हद तक, छोटे उत्पादक की निरंतर आवश्यकता बनी रहती है. इसलिए नष्ट होने के साथ-साथ छोटा उत्पादक नए-नए रूपों में, जन्म भी लेता रहता है. जहाँ तक प्रतिस्पर्द्धा का सम्बन्ध है, छोटा उत्पादक बड़े उत्पादक के मुकाबले टिक नहीं पाता बल्कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बड़े उत्पादक के रहमोकर्म पर आश्रित और श्रापित होता है. राजनीती में यही अमल सीधे-सरल रूप से तो नहीं पर बड़े ही जटिल ढंग से प्रतिबिंबित होता है. लेकिन पूंजीवाद का बुनियादी स्वभाव यहाँ पर भी कायम रहता है. बड़े पूंजीपतियों की पार्टियों के समक्ष छोटे पूंजीपतियों की पार्टियों का जमें रहना, इतना आसान नहीं होता. पूंजीवादी चुनावों में छोटी पूंजीवादी पार्टियों का वही हाल होता है जो पूंजीवादी उत्पादन के क्षेत्र में छोटे उत्पादकों का होता है. इन चुनावों में करोड़पति प्रतिनिधियों की संख्या पहले से कहीं अधिक है और शेष बचे हुए सांसद करोड़पतियों के बफादार सेवादारों की हैसियत से, ससंद में पहुंचे हैं.

जहाँ तक विश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों का सम्बन्ध है, लगभग सभी संसदमार्गी पार्टियों के बीच आम सहमति बन गयी है – यहाँ तक कि वामपंथी पार्टियाँ भी, सैद्धांतिक विरोध के बावजूद, अमल में इन्हें लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. बंगाल की मिसाल तो सामने है ही, केंद्र में भी वामपंथी पार्टियों की हिमायत से चलने वाली पिछली श्री मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा भी यह अमल निर्बाध रूप से जारी रहा. हाँ, अपने-अपने वोट-बैंक के हिसाब-किताब के साथ-साथ, इन सभी पार्टियों के दरमियान, इन नीतियों को लागू करने सम्बन्धी तौर-तरीकों बारे मतभेद रहे हैं.

संसदीय चुनाव, बहुसंख्यक आबादी की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. इस सारे अमल में, आम आदमी की हालत का अंदाजा पाठक स्वयं लगा सकते हैं!  जहाँ तक आम आदमी के स्वयं समझने का सवाल है, वह पहले से कहीं अधिक बेहतर ढंग से समझे हुए है.

जब आम आदमी की बात हो रही हो तो तब हमारे कुछ विद्वान् बुद्धिजीवी सज्जन मेहनतकश वर्ग के बारे में बड़ी ही अजीब किस्म की धारणा पाले बैठे हैं. वे आम लोगों को अनपढ, गंवार या पता नहीं और किन-किन खिताबों से नवाजते हैं. आओ ज़रा हकीकत पर नज़र डालें.

पढाई या ज्ञान का बुनियादी मकसद, जिन्दा रहने या मानव के विकास के लिए, ज़रूरी वस्तुओं के उत्पादन के ढंग-तरीकों की खोज करना था. आरंभिक काल से, इसी मकसद के लिए, श्रम  को अमल में लाने हेतू, सामूहिक सरगर्मी को अपनाते हुए ही भाषा का जन्म हुआ. श्रम के अमल में आने के कारण, मानव पशु जगत से अलग हुआ और चिंतनशील प्राणी के रूप में, इस ब्रह्माण्ड के रंगमंच पर प्रगट हुआ. मानव चिंतन की पहली आवश्यकता या मानवी चिंतन की उत्पति, जिन्दा रहने के लिए उत्पादन की आवश्यकता से ही पैदा हुई.

आज भी मजदूर जो जटिल मशीनरी की बारीकियों को समझ सकता है, खेत मजदूर या किसान (केवल मेहनतकश) अति आधुनिक बीज तैयार कर सकता है, उसे अनपढ, गंवार कहना, अपनी अज्ञानता की नुमाईश करना नहीं तो और क्या है ?

जिस तरह यूरोप में, प्राचीन सामंतशाही को ख़त्म करने के लिए एक दौर गतिमान हुआ जिसके परिणामस्वरूप पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक दौर भी गतिमान हुआ और जिसका नतीजा बुर्जुआ इन्कलाब हुए और आधुनिक बुर्जुआ जनतंत्रों की स्थापना हुई थी इसी प्रकार भारत में [ देखें : 1857, आरंभिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता PDF File ]भी अपने ढंग की बौद्धिक सरगरमियां चलती रही हैं जिनकी तुलना (हर तुलना लंगडी होती है) कुछ भारतीय विद्वानों ने यूरोप के पुनर्जागरण और प्रबोधन से की है. यहाँ नोट करने वाली बात यह है कि बस्तीवादी घटनावृत ने हमारे देश में उस वक्त जारी इस घटनावृत को, बीच राह में ही कत्ल कर दिया या यूं कहें की उसकी भ्रूण हत्या हो गयी जिसकि परिणति, भारत के यूरोप से अलग किस्म के बौद्धिक अमल से गुजरने में हुई. विशेष ऐतिहासिक परस्थितियों के परिणामस्वरूप, हमारे यहाँ के बुद्धिजीवी, बड़े संभल-संभलकर चलने वाले, अपनी सुख-सुविधाओं के छिनने से डरते हुए, एक विशेष किस्म की सुविधाभोगी मानसिकता से ग्रस्त रहे हैं.

हम ईमानदार और जिंदा-ज़मीर के बुद्धिजीवियों से अपील करते हैं कि इतिहास की इस सच्चाई को समझने और पचाने की कोशिश करें. मजदूर वर्ग और मेहनतकश वर्गों को , राजनितिक तौर पर शिक्षित करने के लिए, आपकी सेवाओ की ज़रुरत है. आज हमारे देश में और विश्व स्तर पर भी, सर्वहारा नवपुनर्जागरण और प्रबोधन के अमल में बुद्धिजीविओं को अपना फ़र्ज़ पहचानना होगा.

सुने : भागो मत दुनिया को बदलोhttp://sites.google.com/site/bigulfebruary2009/Home/bhagomat.duniyakobadlo.mp3?attredirects=0

…शेष अगली किश्त

कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर

… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

में समाप्य

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कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है

कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …

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जिस देश का प्रधानमंत्री स्वयं स्वीकार करे की देश की 7० प्रतिशत जनता 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती हैं वहां सुरेश चिपलूनकर [ कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है ] का यह कहना कि जनता को अपनी गरीबी या महंगाई जैसे मुद्दों से कोई वास्ता नहीं हैं, बात ज़रा गले से उतरी नहीं.

वैसे उन्होंने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि वे भारतीय जनता पार्टी की हार से दुखी हैं, ऐसे में जनता जनार्दन को दोषी करार दे देना ! कहीं उन्हें यह भ्रम तो नहीं कि वे सर्वज्ञाता हैं और जनता बेवकूफ.

वैसे आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं. उस ज़माने में किसान, मजदूर और देहाती का चरित्र मेहनतकश का था और मेहनतकश परजीवी वर्गों को हमेशा बेवकूफ दीखते हैं चाहे वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.

समाज शास्त्र कभी जनता को दोषी नहीं ठहराता अलबता वह सोई हुई हो सकती है, सोना कोई बुरी बात नहीं, किसी को उसे उठाना नहीं आता और वह मनोगत तरीके से दोष जनता पर मढ़ दे ? अगर हम समझतें हैं कि जनता हमारी मनोगत इच्छाओं का ख्याल करे, तो हमारी ओर लाखों नहीं करोडों उँगलियाँ उठ जाएँगी लेकिन अपनी इस मनोगत बीमारी की वजह से हो सकता है हमें एक भी दिखाई न दे.

वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा. और आतंकवाद पर वे चिंतित हैं मगर एकांगी तरीके से, समग्रता से नहीं, उन्हेँ हम दीपायन बोस के आतंकवाद के बारे में विभ्रम और यर्थाथ के अध्ययन की सलाह देंगे और इस पर एक विस्तृत टिपण्णी की अपेक्षा भी करेंगे.

अफलातून जी वास्तव में अफलातून हैं, उसी यूनानी परम्परा के जिसने जेल से भागने से इंकार कर दिया था कि इससे राज्य का पवित्र कानून टूटता है, उसी राज्य का जिसमें गुलाम और मालिक दो वर्ग थे और जहर का प्याला अपने लबों से लगा लिया मगर राज्य के तर्क पर आंच नहीं आने दी. ये बात करेंगे मगर शब्दों के हेरफेर के साथ. अब इन्होनें एक नया शब्द जोड़ बिठा दिया  “संघर्षशील प्रतिपक्ष” ? इसे अगर परिभाषित कर लें तो हम भी कुछ आगे बढ़ें.

वैसे सुरेश जी की एक बात से “लेकिन एकमात्र खुशी इस चुनाव रिजल्ट की यही है कि इन तीनों से पीछा छूटा” हम भी सहमत हैं लेकिन इसके साथ हम ये भी जोड़ देना चाहते हैं कि वामपंथी, समाजवादी, कम्युनिस्ट, जनशक्ति, बहुज़न जैसे शब्दों का प्रयोग करने से आप और हम (अवसरवादी) वे नहीं हो जाते जो इन शब्दों के अर्थ हैं लेकिन आप जैसे विचारवादी या आदर्शवादी लोग जो विचार को प्रथम और पदार्थ को गौण मानते हैं मानेंगे थोड़े ही. कोई लाख सर पटक ले तब भी आप नहीं मानेगे कि मनुष्य को उसके भौतिक हालात ही किसी विचार का कायल बनाते हैं. हाँ अपवाद हो सकतें हैं लेकिन हम वर्ग की बात कर रहें हैं. यहाँ अटल जी, मनमोहन सिंह और बहुतेरे वामपंथी, (एक का ज़िक्र हमने भी किसी अख़बार में पढ़ा कि वे राजस्थान से विधायक हैं परंतु पीले कार्डधारी हैं, खजाने से तनख्वाह नहीं लेते और राशन की दुकान पर उन्हें लाईन में खड़े देखा जा सकता है ), साफ़ और स्वच्छ छवि के हैं.

आप मिलना चाहेंगे उनसे ? मगर क्या फायदा. असल सवाल तो उन दलों का है – उनके चरित्र का है और साथ ही क्या बुर्जुआओं को साफ़ और स्वच्छ छवि के सेवक नहीं चाहिएँ?

एक कन्फ्यूजन हो सकता है कि कहीं हमने कांग्रेस को उस 70 प्रतिशत का सच्चा प्रतिनिधि तो घोषित नहीं कर दिया. बिल्कुल नहीं. बस विकल्पहीनता.

कुछ भविष्यवाणी हो सकती है. 20 प्रतिशत लोगों का लोकतंत्र जिसे हम बुर्जुआ अधिनायकवाद कहते हैं (इसलिए नहीं कि ऐसा हम कहते हैं यह तो हर कोई बगैर सिद्धांत के अपने अनुभव से ही समझता है) और अधिक मज़बूत हुआ है और आने वाले समय में श्रम और पूँजी की झड़पें त्वरित होंगी. इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए.

मार्क्सवाद से तो तथाकथित मार्क्सवादी भी मुनकर हो गएँ हैं आप की तो बात छोड़िए. लेकिन लेनिन द्वारा गद्दार कायुत्सकी के लिए कहे गए शब्द कि बुर्जुआ लोकतंत्र जहाँ पूँजी का राज होता है वहां मजदूर वर्ग संसदीय ढंग से सत्ता हासिल कर लेगा यह कोई लुच्चा और शोहदा ही कह सकता है. और लेनिन के यह शब्द उनकी मृत्यु के बाद चिल्ली और इंडोनेशिया में (केवल इंडोनेशिया में जहाँ कम्युनिस्ट संसदीय ढंग से मज़बूत हो रहे थे, 10 लाख लोगों को यह कहकर कत्ल कर दिया गया कि वे कम्युनिस्ट हैं) सही साबित हुए.

हाँ आप गलती न करें कि हम कोई भारतीय माओवाद या नकसलवाद का नया संस्करण हैं इसके लिए आप हमारा नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1 देखें.

और अब दो टूक बात. बुर्जुआ दलों का तो ऐसा होता ही है लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट दलों का स्वरूप भी संघाधिपत्यवादी रहा है. आप दो लाईनों के बीच लम्बा और सतत संघर्ष चलाए बगैर किसी बोलेश्विक चरित्र की पार्टी के निर्माण की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकते. यह गैर वैज्ञानिक है, गैर मार्क्सवादी है, विचारवादी और आदर्शवादी तरीका है जिसकी परणिति संशोधनवाद और दुस्साहसवाद ही होती है.

शहीद भगत सिंह विचार मंच उन बुद्धिजीवियों से यह स्पष्ट कर देना चाहता है कि भारत की वे पार्टियाँ जिन्हें कम्युनिस्ट पार्टियाँ कहा जाता (और यहाँ तक की विश्व की 99 प्रतिशत कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी) अपने उल्ट में बदल चुकीं हैं. हमें इसका अफ़सोस नहीं करना चाहिए क्योंकि सिद्धांत कहता है कि चीजें देर-सवेर अपने विपरीत में बदल जाती हैं. आज बीते युग की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियों को इकठ्ठा करके भानुमती का कुनबा जोड़ने से कुछ हासिल नहीं होने वाला. आज पार्टी गठन की अपेक्षा पार्टी निर्माण प्रमुख है.

हम उन बुद्धिजीवियों से जो श्रम को धन (यहाँ श्रीमान अफलातून द्वारा प्रस्तुत सुनील जी के उस लेख [ तलाश एक नए मार्क्सवाद की (२) : ले. सुनील ] का जिक्र भी करना ज़रूरी समझेंगे जिसमें उन्होंने बिना पूँजी और मार्क्स पढ़े किसी नए सिद्धांत को लिखने की सलाह दे डाली थी, उसमें उन्होंने मार्क्स  पर आरोप लगाया था कि वे श्रम की बिनाह पर धन के स्रोत में प्रकृति की भूमिका से मुनकर हैं जबकि पूंजी के प्रथम खंड के प्रथम अध्याय में मार्क्स ने उन अर्थशास्त्रियों को गलत ठहराया था जो श्रम को ही एकमात्र धन का स्रोत मानते थे) और ज्ञान का स्रोत मानते हैं, इस लम्बी और पीडादायक प्रक्रिया का हिस्सा बनने का आह्वान करते हैं ताकि वे अपने सर पर ज्ञान के इस क़र्ज़ का कुछ भुगतान करके सर्वहारा की अदालत में अपने कर्मों द्वारा कुछ तो सच्चे हों.
आमीन !

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आज के किसान का चरित्र – हमारी पहुँच – कुछ और स्पष्टता

पाँच क्रान्तिकारी जनसंगठनों का साझा चुनावी भण्डाफोड़ अभियान

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चुनावी राजनीति के मायाजाल से बाहर आओ!


नये मज़दूर इन्कलाब की अलख जगाओ!!

देशभर में लोकसभा चुनाव के लिए जारी धमाचौकड़ी के बीच बिगुल मज़दूर दस्ता, देहाती मज़दूर यूनियन, दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा, और स्‍त्री मुक्ति लीग ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश sajha abhiyanऔर पंजाब के अलग-अलग इलाकों  में चुनावी भण्डाफोड़ अभियान चलाकर लोगों को यह बताया कि वर्तमान संसदीय ढाँचे के भीतर देश की समस्याओं का हल तलाशना एक मृगमरीचिका है। ऊपर से नीचे तक सड़ चुकी इस आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को ध्वस्त कर बराबरी और न्याय पर टिका नया हिन्दुस्तान बनाने के लिए आम अवाम को संगठित करके एक नया इन्कलाब लाना होगा।

दिल्ली, लखनऊ, गोरखपुर, लुधियाना, चण्डीगढ़ आदि शहरों में इन संगठनों के कार्यकर्ताओं ने चुनावी राजनीति का भण्डाफोड़ करते हुए बड़े पैमाने पर पर्चे बाँटे, नुक्कड़ सभाएँ कीं, घर-घर सम्पर्क किया, ट्रेनों-बसों में और बस-रेलवे स्टेशनों पर प्रचार अभियान चलाये और दीवारों पर पोस्टर लगाये। दिल्ली, लखनऊ और गोरखपुर में चुनावी राजनीति की असलियत उजागर करने वाली एक आकर्षक पोस्टर प्रदर्शनी भी जगह-जगह लगायी गयी जिसने बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान खींचा। दिल्ली में रोहिणी इलाके में जागरूक नागरिक मंच ने अपनी दीवाल पत्रिका ‘पहल’ के ज़रिये भी चुनावी राजनीति के भ्रमजाल पर करारी चोट की।

राजधानी दिल्ली में दिल्ली विश्वविद्यालय, करावलनगर, शहीद भगतसिंह कालोनी, प्रकाश विहार, अंकुर एन्क्लेव, शिव विहार, कमल विहार, मुस्तफाबाद, नरेला, राजा विहार, सूरज पार्क, बादली आदि इलाकों  में चलाये गये भण्डाफोड़ अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं ने कहा कि चुनाव में बड़े-बड़े दावे किये जा रहे हैं। इस बार मीडिया में धुआँधार प्रचार अभियान चलाकर लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कोई इसे परिवर्तन की अग्नि बता रहा है तो कोई कह रहा है कि महज़ एक वोट से हम देश की तकदीर बदल सकते हैं। लेकिन असलियत यह है कि हमसे कहा जा रहा है कि हम चुनें लम्पटों, लुटेरों, भ्रष्टाचारियों, व्यभिचारियों के इस या उस गिरोह को, थैलीशाहों के इस या उस टुकड़खोर को, जहरीले साँपों, भेड़ियों और लकड़बग्घों की इस या उस नस्ल को। किसी भी पार्टी के लिए आम जनता की तबाही-बर्बादी कोई मुद्दा नहीं है। बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी, छँटनी, पूँजीपतियों की लूट-खसोट, पुलिसिया अत्याचार, भ्रष्टाचार किसी पार्टी के लिए कोई मुद्दा नहीं है। ग़रीबों के लिए स्वास्थ्य, सबके लिए बराबर और सस्ती शिक्षा, रोज़गार, बिजली, पानी, घर जैसी माँगें इस चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। हमेशा की तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नफरत भरी राजनीति ज़ोर-शोर से जारी है। चुनाव जीतने के लिए जनता का समर्थन नहीं बल्कि जातीय समीकरणों के जोड़-तोड़ भिड़ाये जा रहे हैं।

नुक्कड़ सभाओं में वक्ताओं ने कहा कि असलियत तो पहले भी यही थी मगर इस पर भ्रम के परदे पड़े हुए थे। लेकिन ख़ास तौर पर पिछले 25-30 वर्षों में यह सच्चाई ज़्यादा से ज़्यादा नंगे रूप में उजागर होती गयी है कि यह जनतन्त्र नहीं बल्कि बेहद निरंकुश किस्म का धनतन्त्र है। हमें बस यह चुनने की आज़ादी है कि अगले पाँच वर्षों तक कौन हमारा ख़ून निचोड़े, किसके हाथों से हम दरबदर किये जायें!

लखनऊ में जीपीओ पार्क, हाई कोर्ट, मुंशी पुलिया, पालीटेक्निक चौराहा, चौक, अमीनाबाद आदि इलाकों में भण्डाफोड़ पोस्टर प्रदर्शनी लगायी गयी और पर्चे बाँटे गये। प्रदर्शनी स्थल पर जुटी भीड़ को सम्बोधित करते हुए कार्यकर्ताओं ने कहा कि 1952 में चुनावी ख़र्च महज़ डेढ़ करोड़ रुपये का था जो अब बढ़ते-बढ़ते 13,000 करोड़ तक पहुँच चुका है – और यह तो महज़ घोषित ख़र्च है। पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा किया जाने वाला असली ख़र्च तो इससे कई-कई गुना ज़्यादा है। चुनाव ख़त्म होते ही यह सारा ख़र्च आम ग़रीब जनता से ही वसूला जायेगा।

गोरखपुर में दिशा छात्र संगठन और नौजवान भारत सभा के कार्यकर्ताओं ने बिछिया, रामलीला बाज़ार, सब्ज़ी मण्डी, शाहपुर, धरमपुर, लेबर चौक, इन्दिरा तिराहा आदि पर नुक्कड़ सभाएँ कीं, पोस्टर प्रदर्शनी लगायी और बड़े पैमाने पर पर्चे बाँटे। सभाओं में कहा गया कि भगवाधारी भाजपा हो या तिरंगा उड़ाने वाली कांग्रेस, हरे-नीले-पीले झण्डे वाली तमाम क्षेत्रीय पार्टियाँ हों या लाल झण्डे को बेचकर संसद में सीट ख़रीदने वाले नकली वामपन्थी – लुटेरी आर्थिक नीतियों के सवाल पर सबमें एकता है। यह बात दिनोदिन साफ होती जा रही है कि सरकार चाहे इसकी हो या उसकी – वह शासक वर्गों की मैनेजिंग कमेटी ही होती है। यह जनतन्त्र पूँजीपतियों का अधिनायकतन्त्र ही है। लोगों को अपने तथाकथित “प्रतिनिधियों” का चुनाव बस इसीलिए करना है ताकि वे संसद के सुअरबाड़े में बैठकर जनता को दबाने के नये-नये कानून बनायें, निरर्थक बहसें और जूतम-पैजार करें और देशी-विदेशी धनपतियों की सेवा करते हुए अपने पड़पोतों और पड़पड़पोतों तक के लिए कमाकर धर दें।

पंजाब में लुधियाना, चण्डीगढ़ सहित अनेक स्थानों पर चलाये गये भण्डाफोड़ अभियान में कार्यकर्ताओं ने अपने भाषणों और पर्चों में कहा कि इस बार सभी चुनावी धन्धेबाजोँ का मुख्य मुद्दा है कि प्रधानमन्त्री कौन बने। लेकिन किसी की नीतियों में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। कांग्रेस की अगुवाई वाला यू.पी.ए. गठबन्धन हो, भाजपा की अगुवाई वाला एन.डी.ए. गठबन्धन हो, तीसरा मोर्चा हो या अन्य कोई भी चौथा-पाँचवाँ गठबन्धन या मोर्चा, सभी की नीतियाँ देसी-विदेशी पूँजी के पक्ष में और मेहनतकश जनता के विपक्ष में चलायी जा रही निजीकरण- उदारीकरण की नीतियों से ज़रा भी इधर-उधर नहीं जाती हैं। आज सैकड़ों करोड़पति गुण्डे-अपराधी लोकसभा के चुनाव लड़ रहे हैं। जिस देश की 77 प्रतिशत जनता रोज़ाना महज़ 20 रुपये पर गुज़ारा करती हो वहाँ की जनता को कहा जा रहा है कि वे अपने भाग्य का फैसला करने के लिए करोड़पतियों को चुनें। चुनाव लड़ रहे नेताओं में से 15 प्रतिशत ऐसे हैं जो इस देश के बुर्जुआ कानून के अनुसार भी अपराधी हैं। कहने को तो साधरण ग़रीब आदमी भी चुनाव में हिस्सा ले सकता है, लेकिन हम जानते ही हैं कि चुनाव धन और गुण्डागर्दी के सहारे ही जीते जाते हैं।

उन्होंने कहा कि आज जनता विकल्पहीनता की स्थिति में है और क्रान्ति की शक्तियाँ कमजोर हैं। पर रास्ता एक ही है। इलेक्शन नहीं, इन्कलाब का रास्ता! मेहनतकशों को चुनावी मदारियों से कोई भी आस छोड़कर अपने क्रान्तिकारी संगठन बनाने के लिए आगे आना होगा। इस देश की सूरत बदलने वाले सच्चे क्रान्तिकारी विकल्प का निर्माण चुनावी नौटंकी से नहीं बल्कि जनता के क्रान्तिकारी संघर्षों से ही होगा। जब जनता ख़ुद संगठित हो जायेगी तब वह वास्तव में चुनाव कर सकेगी – वह चुनाव होगा यथास्थिति और क्रान्ति के बीच, लोकतन्त्र के स्वांग और वास्तविक लोकसत्ता के बीच! हमें इसकी तैयारी आज से ही शुरू कर देनी चाहिए।

सभी जगह अभियान टोलियों ने मेहनतकशों, इंसाफपसन्द नागरिकों और नौजवानों का आह्नान किया कि वे नयी सदी की नयी क्रान्ति की कतारों को संगठित करने के लिए आगे आयें। शहीदेआज़म भगतसिंह के सन्देश को सुनें और क्रान्ति का पैग़ाम हर दिल तक ले जाने में जुट जायें। चुनावी मदारियों के मायाजाल से बाहर आयें और जनता की सच्ची लोकसत्ता कायम करने के लिए लम्बी लड़ाई की राह पर डट जायें।

– बिगुल संवाददाता

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-4

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एजेण्डा पर कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की एकता का

सवाल : एक सर्वभारतीय पार्टी के गठन की ओर

नक्सलबाड़ी में सशस्त्र किसान विद्रोह के विस्फोट के तुरन्त बाद पूरे देश में माकपा की पार्टी कतारों में और पार्टी के बाहर के कम्युनिस्ट तत्त्वों के बीच संशोधनवाद के विरुद्ध विद्रोह की लहर दौड़ पड़ी। बंगाल से बाहर, उत्तर प्रदेश, बिहार, आन्ध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, असम, उड़ीसा और त्रिपुरा में पार्टी-कतारों के विद्रोह से अराजकता और विभाजन की स्थिति उत्पन्न होने लगी। भारी संख्या में नये युवा तत्त्व भी इस क्रान्तिकारी लहर की ओर आकृष्ट हुए। पार्टी के भीतर और बाहर, स्वयंस्फूर्त ढंग से क्रान्तिकारी ग्रुप बनने लगे। यदि केवल प. बंगाल का उदाहरण लें तो वहाँ `निशान´, `पदातिक´, `भित्ति´, `सूर्यसेन´, `छात्र फ़ौज´ आदि कई ग्रुप सक्रिय हो गये थे, जिन्होंने संशोधनवाद विरोधी सैद्धान्तिक संघर्ष और क्रान्तिकारी प्रचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1966 से ही सक्रिय `चिन्ता ग्रुप´ और पार्टी के भीतर गठित `अन्तर्पार्टी संशोधनवाद विरोधी कमेटी´ की पहले ही चर्चा की जा चुकी है।

अलग-अलग राज्यों में माकपा के भीतर संशोधनवाद विरोधी संघर्ष को नेतृत्व देने वालों में आन्ध्र प्रदेश के डी.वी. राव और नागी रेड्डी तो राष्ट्रीय स्तर के नेता थे और केन्द्रीय कमेटी के सदस्य भी रह चुके थे। इनके अतिरिक्त बिहार में सत्यनारायण सिंह, उत्तर प्रदेश में शिवकुमार मिश्र, जम्मू-कश्मीर में आर.पी. सर्राफ़ सहित कई राज्य स्तरीय नेतृत्व के लोग भी थे। बंगाल में सुशीतल राय चौधरी और सरोज दत्त राज्य स्तरीय नेता थे, परिमल दास गुप्त और असित सेन प्रसिद्ध ट्रेडयूनियन नेता और सिद्धान्तवेत्ता थे। उपरोक्त राज्यों में तारों का बड़ा हिस्सा विद्रोहियों के साथ था।

14 जून 1967 को कलकत्ता के राममोहन लाइब्रेरी हॉल में नक्सलबाड़ी में किसानों की हत्या और दमन के विरोध में तथा संग्रामी किसानों के समर्थन में कुछ ऐसी मज़दूर यूनियनों के आह्वान पर एक जनसभा हुई, जिनका नेतृत्व माकपा की संशोधनवादी, अर्थवादी नीतियों से असन्तुष्ट था। इसमें एक प्रस्ताव पारित करके `नक्सलबाड़ी और कृषक संग्राम सहायक कमेटी´ की स्थापना की गयी जिसका सचिव प्रसिद्ध ट्रेड यूनियन नेता और माकपा की कलकत्ता ज़िला कमेटी के सदस्य परिमल दासगुप्त को बनाया गया। देश भर के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तत्त्वों से सम्पर्क स्थापित करने का काम सबसे पहले इसी कमेटी के बैनर तले शुरू किया गया।

प. बंगाल राज्य कमेटी के मुखपत्र `देशहितैषी´ का दफ़्तर उस समय क्रान्तिकारी तत्त्वों के नियन्त्रण में आ गया था। उसके सम्पादक मण्डल में सुशीतल रायचौधरी और सरोज दत्त शामिल थे और बहुमत भी उन्हीं के साथ था। 28 जून 1967 को माकपा नेतृत्व ने बलपूर्वक उन सबको निकाल बाहर करके दफ़्तर पर कब्ज़ा किया। इसके एक सप्ताह बाद बांगला साप्ताहिक `देशव्रती´ का प्रकाशन शुरू हुआ जो मार्क्सवादी-लेनिनवादियों का पहला मुखपत्र था। इस समय तक माकपा नेतृत्व देशव्यापी छँटनी मुहिम शुरू कर चुका था। पूरे देश में नक्सलबाड़ी के पक्ष में मुखर एक हज़ार से भी अधिक नेताओं-कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाल बाहर किया गया। अकेले बंगाल में ही निष्कासित लोगों की संख्या चार सौ से अधिक थी। बंगाल के निष्कासित लोगों में चारु मजूमदार, कानू सान्याल, सौरेन बसु, सरोज दत, सुशीतल रायचौधरी, परिमल दासगुप्त, असित सेन, सुनीति कुमार घोष आदि प्रमुख थे। बिहार से सत्यनारायण सिंह, गुरुबख्श सिंह, उत्तर प्रदेश से शिवकुमार मिश्र, महेन्द्र सिंह, श्रीनारायण चतुर्वेदी, आर.एन. उपाध्याय, पंजाब से दया सिंह, जगजीत सिंह सोहल, बलवन्त सिंह आदि कई नेता निष्कासित लोगों में शामिल थे। इसके बाद तो निष्कासन का यह सिलसिला 1969 तक कई किश्तों में लगातार चलता रहा। नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के पक्ष में पीकिंग रेडियो के प्रसारणों ने भी कार्यकर्ताओं को पक्ष चुनने के लिए प्रेरित करने में एक अहम भूमिका निभायी। पाँच जुलाई, 1967 को `पीपुल्स डेली´ (चीनी पार्टी का मुखपत्र) में `भारत में वसन्त का वज्रनाद´ शीर्षक लेख छपा, जिसमें नक्सलबाड़ी का समर्थन करते हुए माकपा के नवसंशोधनवादियों को भी ग़द्दार और भारतीय शासक वर्ग का चाकर घोषित किया गया था। इसके बाद `पीपुल्स डेली´ में कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के पक्ष में कई टिप्पणियाँ छपीं। इनका एक दूरगामी नकारात्मक प्रभाव यह था कि आगे चलकर चारु मजूमदार ने इसका लाभ अपनी लाइन की अन्तरराष्ट्रीय मान्यता के रूप में प्रचार करके उठाया। एक दूसरा नकारात्मक प्रभाव यह था कि चीनी पार्टी की धारणा के हिसाब से, भारतीय कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों ने कार्यक्रम के प्रश्न पर सोच-विचार को एजेण्डे से ही हटा दिया और यह मानकर चलने लगे कि भारत में भी चीन की तरह नवजनवादी क्रान्ति और दीर्घकालिक लोकयुद्ध का रास्ता ही लागू होगा। लेकिन तात्कालिक तौर पर चीन की पार्टी की अवस्थिति ने भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तेज़ करके क्रान्तिकारी पक्ष की मदद की।

11 नवम्बर 1967 को `नक्सलबाड़ी और कृषक संग्राम सहायक कमेटी´ की ओर से अक्टूबर क्रान्ति दिवस मनाने और मार्क्सवादी-लेनिनवादी के प्रचार के लिए कलकत्ता के शहीद मीनार मैदान में एक जनसभा बुलायी गयी जिसमें चारु मजूमदार ने खुले मंच से अपना अन्तिम भाषण दिया। इस सभा में पारित प्रस्ताव में सोवियत संशोधनवाद की भत्र्सना करते हुए चीन की पार्टी का समर्थन किया गया और माकपा को भी एक संशोधनवादी पार्टी बताते हुए उसकी निन्दा की गयी। इसके तुरन्त बाद, पूर्व योजना के अनुसार, सात राज्यों के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी प्रतिनिधियों की एक बैठक हुई जिसमें महत्त्वपूर्ण राजनीतिक-सांगठनिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श के बाद `भा.क.पा. (मा.) के क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी´ (ऑल इण्डिया कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ़ दि रिवोल्यूशनरीज़ ऑफ़ दि सी.पी.आई. (एम.)) का गठन किया गया और उसकी ओर से एक घोषणा जारी की गयी। इस तालमेल कमेटी ने अपने चार मुख्य कार्यभार निर्धारित किये : (1) मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में सभी स्तरों पर जुझारू और क्रान्तिकारी संघर्षों का ख़ासकर नक्सलबाड़ी की तरह किसान-संघर्षों का विकास करना और उनके बीच तालमेल कायम करना, (2) मज़दूर वर्ग और अन्य मेहनतकशों के जुझारू संघर्षों का विकास करना, अर्थवाद से लड़ना और इन संघर्षों को कृषि क्रान्ति की दिशा में मोड़ना, (3) संशोधनवाद और नवसंशोधनवाद के विरुद्ध समझौताहीन सैद्धान्तिक संघर्ष चलाना और माओ त्से-तुङ विचारधारा को, जो वर्तमान युग का मार्क्सवाद- लेनिनवाद है, लोकप्रिय बनाना और इसके आधार पर पार्टी के भीतर के और बाहर के सारे क्रान्तिकारी तत्त्वों को ऐक्यबद्ध करना, और (4) माओ त्से-तुङ विचारधारा की रोशनी में भारतीय परिस्थिति के सुनिश्चित विश्लेषण के आधार पर क्रान्तिकारी कार्यक्रम और रणकौशल तैयार करने की ज़िम्मेदारी लेना।

देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों से सम्पर्क स्थापित करने का काम पहले से ही मुख्यत: सुशीतल रायचौधरी कर रहे थे। उन्हें ही तालमेल कमेटी का सचिव चुना गया और उनके सम्पादन में अंग्रेज़ी मासिक मुखपत्र `लिबरेशन´ निकालने का निर्णय लिया गया। इसका पहला अंक नवम्बर, 1967 में प्रकाशित हुआ।

आन्ध्र प्रदेश में माकपा के शीर्ष नेताओं में से दो – टी. नागी रेड्डी और डी.वी. राव भी माकपा नेतृत्व के संशोधनवाद के विरुद्ध शुरू से ही संघर्षरत थे। उन्होंने नक्सलबाड़ी का पक्ष लिया था। लेकिन उनका विचार था कि माकपा के भीतर जब तक सम्भव हो, रहते हुए संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष चलाया जाना चाहिए ताकि कतारों के बड़े हिस्से को क्रान्तिकारी पक्ष के साथ खड़ा किया जा सके। इस मसले पर चारु मजूमदार के साथ उनका मतभेद था। अप्रैल, 1968 में माकपा का बर्दवान प्लेनम हुआ जो मुख्यत: विचारधारात्मक प्रश्न पर केन्द्रित था। प्लेनम में पारित होने वाले दस्तावेज़ `विचारधारात्मक विचार-विमर्श के लिए´ का मसौदा पहले वितरित हो चुका था और उस पर डी.वी.-नागी ने तीखे मतभेद दर्ज कराये थे। यही दस्तावेज़ प्लेनम में पारित हुआ। इसके अनुसार, सोवियत पार्टी जहाँ दक्षिणपन्थी भटकाव का शिकार थी वहीं चीन की पार्टी “वामपन्थी

” संकीर्णतावादी भटकाव का शिकार थी। इसमें चीनी पार्टी पर माकपा के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप का आरोप भी लगाया था। माकपा के मध्यमार्ग का संशोधनवादी चरित्र अब एकदम नंगा हो चुका था। जम्मू-कश्मीर और आन्ध्र प्रदेश की राज्य कमेटियों ने दस्तावेज़ के मसौदे का विरोध किया। विरोध का एक मुद्दा यह भी था कि दस्तावेज़ में भारत सहित सभी पिछड़े देशों में लोकयुद्ध को संघर्ष के सार्वभौमिक रूप के तौर पर स्वीकार नहीं किया गया है और मुख्य लाइन के तौर पर भूमि क्रान्ति को ख़ारिज कर दिया गया है।

बर्दमान प्लेनम के तुरन्त बाद तालमेल कमेटी ने 14 मई ´68 को हुई अपनी दूसरी बैठक में अपने नाम से `भा.क.पा. (मा.) के अन्दर के´ वाक्यांश को हटाकर अपना नया नाम रखा `कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी´ (ए.आई.सी.सी.सी.आर.) और इसका नेतृत्व चारु मजूमदार को सौंपा गया। दूसरी बैठक के बाद तालमेल कमेटी ने अपनी `दूसरी घोषणा´ जारी की जिसमें कहा गया था कि नवसंशोधनवादी भी डांगेपन्थियों की तरह प्रतिक्रान्तिकारी शिविर में शामिल हो चुके हैं, वे कृषि क्रांति की पीठ में सक्रिय रूप से छुरा भोंक रहे हैं और जो लोग अभी भी माकपा के भीतर अन्तर्पार्टी संघर्ष की सम्भावना देखते हैं वे संशोधनवाद के विरुद्ध लड़नेवालों में भ्रम का बीज बो रहे हैं तथा उनको संगठित और शक्तिशाली होने से रोक रहे हैं। इस अन्तिम वाक्यांश में वस्तुत: डी.वी.-नागी ग्रुप की परोक्ष आलोचना की गयी थी। तालमेल कमेटी की इस दूसरी बैठक में पंजाब के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी भी शामिल हुए थे। बर्दवान प्लेनम के तुरन्त बाद, डी.वी.-नागी के नेतृत्व में माकपा की आन्ध्र कमेटी का बहुसंख्यक हिस्सा विद्रोह करके पार्टी से अलग हो गया। जम्मू-कश्मीर के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी भी पार्टी से बाहर आ गये थे। डीवी.- नागी द्वारा पार्टी के भीतर चलाये गये संघर्ष का नतीजा था कि आन्ध्र में बहुसंख्यक कार्यकर्ता पार्टी से बाहर आ गये थे। डी.वी. राव-नागी रेड्डी-चन्द्रपुल्ला रेड्डी आदि ने `आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी´ (ए.पी.आरसी. सी.) का गठन किया जो ए.आई.सी.सी.सी.आर. से जुड़कर उसकी आन्ध्र राज्य कमेटी के रूप में काम करने लगी। आन्ध्र ग्रुप और चारु मजूमदार के नेतृत्व के बीच शुरू ही से कुछ अहम मतभेद मौजूद थे। चारु मजूमदार के नेतृत्व वाले हिस्से का मानना था कि नागी रेड्डी ग्रुप चीनी पार्टी की लाइन को पूरी तरह से स्वीकार नहीं करता है। इसका एक आधार यह था कि नागी रेड्डी ग्रुप सोवियत संघ को सामाजिक-साम्राज्यवादी न कहकर सिर्फ़ संशोधनवादी कहता था। यह प्रश्न बुनियादी विचारधारात्मक न होकर वस्तुगत आकलन का था, जिसे चीनी पार्टी के कठमुल्लावादी अनुकरण के चलते बुनियादी बना दिया गया। दूसरा अहम मतभेद यह था कि अखिल भारतीय तालमेल कमेटी चुनाव बहिष्कार को एक रणनीतिक प्रश्न मानती थी और उसे क्रान्ति की प्रक्रिया की शुरुआत से अन्त तक लागू करने की बात करती थी जबकि आन्ध्र ग्रुप इसे रणकौशल का प्रश्न मानता था और इस मामले में परिस्थिति-अनुसार निर्णय की बात करता था। इस प्रश्न पर उनकी अवस्थिति क्लासिकीय लेनिनवादी सूत्रीकरण के अनुरूप थी। तालमेल कमेटी नक्सलबाड़ी को माओ विचारधारा का भारत में पहला प्रयोग मानती थी, जबकि आन्ध्र ग्रुप का कहना था कि माओ विचारधारा का पहला प्रयोग तेलंगाना में हुआ था और नक्सलबाड़ी उसी की अगली कड़ी है। तालमेल कमेटी जनसंघर्ष के खुले रूपों, आर्थिक मुद्दों पर संघर्ष और जनसंगठनों की उपेक्षा कर रही थी, जिससे आन्ध्र ग्रुप सहमत नहीं था। तालमेल कमेटी का ज़ोर प्रारिम्भक मंज़िल से ही छापामार संघर्ष संगठित करने पर था, जबकि आन्ध्र ग्रुप का कहना था कि जनान्दोलन की प्रक्रिया में संघर्ष के उच्चतर रूप के तौर पर सशस्त्र संघर्ष शुरू होगा, स्वयंसेवक दस्ते, स्थानीय दस्ते और नियमित छापामार दस्ते अस्तित्व में आयेंगे और आधार-क्षेत्रों का निर्माण होगा। कुछ सशस्त्र दस्तों की कार्रवाई के बजाय उनका ज़ोर क्रान्तिकारी जनप्रदर्शनों, क्रान्तिकारी जनान्दोलनों, क्रान्तिकारी ग्राम सोवियतों की स्थापना और सशस्त्र जनसंघर्षों पर था। इस प्रश्न पर भी संघर्ष मूलत: “वाम” दुस्साहसवाद और जनदिशा के प्रश्न पर था। इन मूल मुद्दों के अतिरिक्त, दोनों पक्षों के बीच जनवादी कार्यक्रम (तालमेल कमेटी `लोक जनवादी क्रान्ति´ शब्दावली का प्रयोग करती थी जबकि आन्ध्र ग्रुप `नव जनवादी क्रान्ति´ शब्दावली का) की कुछ तफ़सीलों, व्याख्याओं और ज़ोर को लेकर था जो हालाँकि गौण था लेकिन यहाँ भी अप्रोच की भिन्नता महत्त्वपूर्ण थी। तालमेल कमेटी चीनी पार्टी के कार्यक्रम का अन्धानुकरण करती थी जबकि आन्ध्र ग्रुप उसकी आम दिशा और फ्रेमवर्क को मानते हुए भी, एक हद तक, भारतीय परिस्थिति की सच्चाइयों को उसमें समाहित करने की कोशिश करता था। तालमेल कमेटी का आन्ध्र ग्रुप पर एक आरोप यह भी था कि वह श्रीकाकुलम सशस्त्र संघर्ष को ज़ोर-शोर से नहीं, बल्कि महज़ रस्मी समर्थन दे रहा है। इस प्रश्न पर आगे चर्चा की जायेगी।

इन मतभेदों के बावजूद, पहली बैठक के बाद आन्ध्र प्रदेश की तालमेल कमेटी अखिल भारतीय तालमेल कमेटी से जुड़ गयी। यह तय किया गया कि प्रयोग करते हुए मतभेद के मसलों पर बहस की प्रक्रिया जारी रहेगी क्योंकि तालमेल कमेटी का उद्देश्य ही यही है। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। 7 फ़रवरी, 1969 को निहायत एकतरफ़ा और मनमाने तरीके से आन्ध्र प्रदेश कमेटी को अखिल भारतीय तालमेल कमेटी से निकाल दिया गया और बातचीत करने के उनके बार-बार के अनुरोध पर कान तक नहीं दिया गया।

तालमेल कमेटी का गठन ही इस उद्देश्य से किया गया था कि माओ विचारधारा पर आम तौर पर सहमत देश भर के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आपस में बहस-मुबाहिसा करके और अपने प्रयोगों के अनुभवों का आदान-प्रदान करते हुए भारतीय क्रान्ति की रणनीति, आम रणकौशल और रास्ते के सवाल पर एक राय बनायें तथा भारतीय परिस्थितियों के अध्ययन के आधार पर कार्यक्रम तैयार करें। पर तालमेल कमेटी शुरुआत करते ही लक्ष्य विमुख हो गयी। नक्सलबाड़ी संघर्ष के नेतृत्व के “वामपन्थी” लाइन के आगे घुटने टेकने के बाद चारु मजूमदार ने इस लाइन को ज़ोर-शोर से पूरे देश के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच बढ़ावा दिया। आम क्रान्तिकारी कतारों में यह धारणा थी कि नक्सलबाड़ी के निर्माता और नेता चारु मजूमदार ही थे और उनकी लाइन को चीनी पार्टी का पूरा समर्थन हासिल है। बंगाल का एक गुट, जिसमें विशेष तौर पर सरोज दत्त, सौरेन बसु, सुनीति कुमार घोष शामिल थे, चारु को भारतीय क्रान्ति का महान नेता सिद्ध करने में जुट गया था। सत्यनारायण सिंह, कानू सान्याल आदि भी बढ़-चढ़कर उनकी प्रशंसा में जुटे थे। `तराई किसान संघर्ष की रिपोर्ट´ में हालाँकि चारु की लाइन के आगे कानू सान्याल आदि की जनदिशा की लाइन का आत्मसमर्पण मुख्य पहलू था, लेकिन उसमें व्यापक जनसंघर्ष के विकास का एक ब्योरा भी था। पर उस रिपोर्ट को तालमेल कमेटी ने देश भर के क्रान्तिकारियों के बीच न तो कभी चर्चा का विषय बनाया, न खुद ही कभी उस पर चर्चा की। इस पूरी स्थिति का लाभ उठाकर चारु मजूमदार तालमेल कमेटी को एक पार्टी की तरह चलाने लगे और स्वयं उसके स्वयंभू एकछत्र नेता जैसा व्यवहार करने लगे। तालमेल कमेटी विभिन्न कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी ग्रुपों के बीच तालमेल करने के बजाय पार्टी की केन्द्रीय कमेटी जैसा आचरण करने लगी। विभिन्न ग्रुपों को अपने मुखपत्र बन्द करने का निर्देश जारी किया जाने लगा। मतभेदों और उठाये जाने वाले सवालों पर स्वस्थ बहस के बजाय, अलग विचार प्रकट करने वाले लोगों व ग्रुपों के खिलाफ़ कुत्सा-प्रचार करके और उन पर तोहमतें लगाकर निकाल बाहर किया जाने लगा। तालमेल कमेटी ने भारतीय परिस्थितियों का अध्ययन-विश्लेषण करके भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम और रणकौशल तय करने के बुनियादी कार्यभार को तो पूरी तरह से तिलांजलि दे दी। यह घोषित कर दिया गया कि भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम, रणकौशल और रास्ता हूबहू चीनी क्रान्ति जैसा होगा। लेकिन नक्सलबाड़ी टाइप किसान संघर्ष और चीनी रास्ते की दुहाई देते हुए चारु मजूमदार व्यवहार में घनघोर आतंकवादी लाइन लागू करने की बात कर रहे थे। मज़दूर वर्ग के नेतृत्व की बात करते हुए भी ट्रेड यूनियन कार्यों व मज़दूर वर्ग के बीच हर प्रकार की जनकार्रवाई को अर्थवाद-सुधारवाद कहकर ख़ारिज किया जा रहा था। पार्टी को “देहात-आधारित पार्टी” होना था। और वहाँ भी, किसी प्रकार की जनकार्रवाई, आर्थिक संघर्ष और खुले राजनीतिक प्रचार से बचते हुए सीधे सशस्त्र दस्तों का निर्माण करके भूस्वामियों के खिलाफ़ `ऐक्शन´ करना था (जल्दी ही चारु ने इसे स्पष्ट करते हुए `ख़ात्मे की लाइन´ यानी वर्ग शत्रुओं की हत्या की लाइन दी जो व्यक्तिगत आतंकवाद का नग्न रूप था)।

आन्ध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम ज़िले के गिरिजन नक्सलबाड़ी की घटना के करीब आठ वर्ष पहले से भूस्वामियों के शोषण-उत्पीड़न और पुलिस उत्पीड़न के विरुद्ध आन्दोलन चला रहे थे। वह इलाका डी.वी. राव.-नागी रेड्डी धड़े के प्रभाव क्षेत्र में नहीं था। कम्युनिस्ट पार्टी के संशोधनवादियों ने इस संघर्ष को आगे विकसित करने की कभी कोई कोशिश नहीं की। नक्सलबाड़ी की ख्याति के बाद श्रीकाकुलम के नेताओं ने तालमेल कमेटी से सम्पर्क स्थापित किया और चारु मजूमदार को अपना नेतृत्व करने के लिए आमन्त्रित किया। जनवरी ´69 में चारु मजूमदार श्रीकाकुलम गये और वहाँ सशस्त्र संग्राम को “वामपन्थी” आतंकवादी लाइन पर आगे बढ़ाने का दिशा-निर्देश दिया। श्रीकाकुलम में जनवरी ´69 से भूस्वामियों के घरों-गोदामों पर छापामार दस्तों के हमलों और सफ़ाये की लाइन की शुरुआत हुई। चूँकि गिरिजनों का आन्दोलन लम्बे समय से जारी था इसलिए शुरुआती सशस्त्र कार्रवाइयों को व्यापक जनसमर्थन भी हासिल हुआ। बाथापुरम्, पद्मपुर, बूड़ीबांका, आकूपल्ली और गरुड़भद्र में छापामार हमलों और भूस्वामियों-सूदख़ोरों की हत्या की घटनाओं को काफ़ी ख्याति मिली। चारु मजूमदार गुट ने इसे लोकयुद्ध का संकेत बताया। चतरहाट-इस्लामपुर की विफलता के बाद, श्रीकाकुलम में पहली बार चारु मजूमदार की आतंकवादी लाइन व्यापक स्तर पर लागू हुई। पुलिस ने घनघोर दमन की कार्रवाई शुरू की। मई 1966 में, संघर्ष के एक मुख्य नेता पंचाद्रि कृष्णमूर्ति, उनकी पत्नी निर्मला और पाँच अन्य छापामार पुलिस मुठभेड़ में मारे गये। तमाम दमन के बावजूद श्रीकाकुलम संघर्ष 1970 तक जारी रहा। मई 1970 में भा.क.पा. (मा-ले) के स्थापना-सम्मेलन के कुछ महीने बाद ही गिरिजनों के लोकप्रिय नेता वेंकटापु सत्यनारायण और आदिमाटला कैलाशम् सहित कई और नेताओं की हत्या हो गयी तथा नागभूषण पटनायक और अप्पाला सूरी गिरफ़्तार हो गये। लगभग नेतृत्वविहीन हो चुका आन्दोलन फिर जल्दी ही बिखर गया। इस तरह एक व्यापक आधार वाले, लम्बे समय से जारी जनसंघर्ष को “आतंकवादी” रास्ते पर विमुख करके पराजय के गर्त में धकेल दिया गया।

जनवरी ´69 में श्रीकाकुलम संघर्ष का नेतृत्व हाथ में आ जाने के बाद, चारु मजूमदार को यह उचित अवसर प्रतीत हुआ कि क्रान्तिकारी जनदिशा की पुरज़ोर वकालत करने वाले डी.वी.-नागी ग्रुप से छुटकारा पा लिया जाये और फिर फ़रवरी ´69 में निहायत नौकरशाहाना तरीके से उन्हें तालमेल कमेटी से निकाल बाहर किया गया। डीवी.- नागी के नेतृत्व में आन्ध्र प्रदेश में माकपा से पार्टी का बहुसंख्यक हिस्सा बाहर आया था। कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी राजनीति का इतना व्यापक जनाधार और कार्यकर्ताओं का आधार देश के किसी राज्य में नहीं था। आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी को निष्कासित करने में चारु को मिली सफलता कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए एक भारी धक्का थी जिसने पार्टी गठन की प्रक्रिया को शुरू होते ही गम्भीर नुकसान पहुँचाया।

तालमेल कमेटी में बहस-मुबाहिसे के जनवादी माहौल का गला घोंट दिये जाने और नौकरशाहाना और संकीर्ण गुटपरस्त कार्यशैली के हावी होने के बाद, बंगाल के और पूरे देश के कई छोटे-छोटे ग्रुप तो उसमें शामिल ही नहीं हुए। कई ग्रुप जो शुरू में इससे सम्बद्ध हुए थे, बाद में अलग हो गये। `चिन्ता´/`दक्षिण देश´ ग्रुप का उल्लेख पहले आ चुका है। नक्सलबाड़ी विद्रोह के पाँच महीने बाद इस ग्रुप ने 24 परगना ज़िले के सोनारपुर में किसान संघर्ष संगठित किया था जिसे जबरदस्त पुलिस दमन का शिकार होना पड़ा था। इसमें ग्रुप के एक संस्थापक नेता चन्द्रशेखर दास की हत्या भी कर दी गयी थी। सोनारपुर के अतिरिक्त 1968-69 के दौरान इस ग्रुप ने हावड़ा, हुगली, मेदिनीपुर, बीरभूम, मालदा और बर्धमान ज़िले के कुछ क्षेत्रों में भी किसानों में काम संगठित किया तथा दक्षिणी कलकता, आसनसोल और दुर्गापुर में औद्योगिक मज़दूरों के बीच ट्रेड यूनियन मोर्चे पर काम किया। दक्षिण देश ग्रुप के लोगों का 1966 के अन्त में ही चारु मजूमदार और दार्जिलिंग के कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों से सम्पर्क हो चुका था। नक्सलबाड़ी के तुरन्त बाद चारु मजूमदार से फिर उनकी बातचीत हुई। तालमेल कमेटी बनने के बाद चारु मजूमदार से कई अहम मतभेदों के बावजूद दक्षिण देश ग्रुप उससे सम्बद्ध हुआ, लेकिन नौकरशाहाना तौर-तरीके के चलते और मतभेदों के सुलझने की प्रक्रिया नहीं चलते देख, जल्दी ही उसे अलग हो जाना पड़ा। दक्षिण देश ग्रुप की राजनीतिक सोच कई मायनों में दकियानूसी और यान्त्रिक थी, लेकिन उन्होंने राजनीति और सांगठनिक कार्यशैली-विषयक कुछ बुनियादी महत्त्व के प्रश्न उठाये। जनसंगठन और पार्टी संगठन के अन्तरसम्बन्ध और छापामार संघर्ष के विकास, चुनाव के इस्तेमाल, वर्गों के रणनीतिक संश्रय के अमली रूप आदि कई प्रश्नों पर वे स्वयं अतिवामपन्थी भटकावों के शिकार थे, लेकिन बिना किसी राजनीतिक कार्य के गुप्त दस्तों के गठन और `ऐक्शन´ को छापामार-युद्ध बताने और सफ़ाये की लाइन को वे “वामपन्थी” दुस्साहसवाद मानते थे तथा साथ ही, चारु की लाइन को स्वयंस्फूर्ततावाद और अराजकतावाद का भी शिकार मानते थे। चीन की पार्टी के प्रति उनका रवैया अनुकरणवादी था और विभिन्न सांगठनिक प्रश्नों पर वे शुद्धतावादी रोमानी नज़रिये के शिकार थे, लेकिन इस प्रश्न को उन्होंने गम्भीरता के साथ रेखांकित किया कि तालमेल कमेटी को भारतीय परिस्थितियों के अध्ययन-विश्लेषण के आधार पर भारतीय क्रान्ति के कार्यक्रम एवं रणकौशल के निर्धारण के अपने लक्ष्य को पूरा करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए जबकि वह उसकी उपेक्षा कर रही है। उनका भी यह मानना था कि नक्सलबाड़ी नहीं बल्कि तेलंगाना भारत में माओ विचारधारा का पहला प्रयोग था और नक्सलबाड़ी उसका जारी रूप है। इन प्रश्नों पर तालमेल कमेटी में जनवादी ढंग से बहस चलाने के बजाय चारु गुट ने उपेक्षा करने, कुत्सा प्रचार करने और लेबल चस्पाँ करने (`देशव्रती´ में लिखकर भी) का काम किया। यही नहीं, तालमेल कमेटी का पार्टी की तरह इस्तेमाल करते हुए और स्वयं पार्टी नेतृत्व जैसा व्यवहार करते हुए चारु गुट ने `दक्षिण देश´ का प्रकाशन-वितरण बन्द करने के लिए भी कहना शुरू कर दिया। इस स्थिति में `दक्षिण देश´ ग्रुप ने तालमेल कमेटी से अपने को अलग कर लिया। लेकिन साथ ही यह निर्णय भी लिया कि ग़लत नीतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए वे एकता कायम करने की कोशिशें जारी रखेंगे। आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी के निष्कासन और दक्षिण देश ग्रुप के अलग होने के बाद, तालमेल कमेटी के कामों की समीक्षा किये बग़ैर और बुनियादी लक्ष्यों को पूरा किये बग़ैर 22 अप्रैल, 1969 को जब अचानक भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना की घोषणा की गयी और एक वर्ष के भीतर पार्टी कांग्रेस का निर्णय लिया गया तो यह दक्षिण देश ग्रुप के लिए आश्चर्य की बात थी। अपने विचारों और मतभेदों को लेकर उसने भा.क.पा. (मा-ले) नेतृत्व को एक पत्र भेजा, जिसका उसने कोई उत्तर नहीं दिया। तब दक्षिण देश ग्रुप ने अलग राह पकड़ी और 20 अक्टूबर 1969 को `माओवादी कम्युनिस्ट केन्द्र´ नाम से एक अलग केन्द्र की स्थापना की।

क्रान्तिकारियों की पश्चिम बंगाल तालमेल कमेटी (डब्ल्यू.बी.सी.सी.आर.) ने भी अखिल भारतीय तालमेल कमेटी के समक्ष राजनीति, संगठन और कार्यप्रणाली-विषयक कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल उठाये और “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन के साथ अपने मतभेद रखे। उसके प्रश्नों और मतभेदों की भी पूरी तरह से अनदेखी की गयी और यह संगठन भी तालमेल कमेटी में शामिल नहीं हुआ।

मतभेद के बुनियादी और अहम मसले उठाने वाले अगले दो व्यक्ति थे परिमल दासगुप्त और असित सेन। परिमल दासगुप्त तालमेल कमेटी के काम के एक-डेढ़ वर्ष बाद ही आनन-फानन में पार्टी-गठन के निर्णय से सहमत नहीं थे। वे लम्बे सैद्धान्तिक संघर्ष और व्यावहारिक कामों के बाद संशोधनवाद और अवसरवाद से मुक्त क्रान्तिकारी पार्टी की स्थापना के पक्षधर थे। यह सही है कि कोई भी क्रान्तिकारी पार्टी भटकावों से अन्तिम मुक्ति की गारण्टी नहीं दे सकती और यह भटकाव पार्टी में सिर उठाते ही रहते हैं जिनके विरुद्ध पार्टी में सतत दो लाइनों का संघर्ष चलाना पड़ता है। लेकिन इस आदर्शवादी विचलन के बावजूद परिमल दासगुप्त की अवस्थिति इस मायने में सही थी कि कार्यक्रम-निर्धारण के लिए भारतीय परिस्थितियों के अध्ययन-विश्लेषण सहित अपने किसी भी लक्ष्य को तालमेल कमेटी ने वास्तव में अर्जित नहीं किया था और कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के बीच वास्तविक राजनीतिक एकता कायम करने के लिए वे बहस और अनुभवों के आदान-प्रदान की ज़िम्मेदारी लगभग पूरी तरह से छोड़ दी गयी थी। इस मतभेद के बाद परिमल दासगुप्त और उनके समर्थकों ने अखिल भारतीय तालमेल कमेटी से अलग होकर एक समान्तर तालमेल कमेटी बनायी (जो कालान्तर में निष्क्रिय हो गयी) जिसने एक दस्तावेज़ निकालकर चारु मजूमदार के साथ अपने मतभेदों का उल्लेख किया। उक्त दस्तावेज़ में कहा गया था कि चारु मजूमदार माओ के रास्ते से भटककर चे ग्वेवारा के निम्न-बुर्जुआ क्रान्तिवादी रास्ते का अनुसरण कर रहे हैं। माओ विचारधारा राजनीति के आधार पर जनगण को संगठित करने की बात करती है जबकि चे ग्वेवारा का रास्ता उसे मुठभेड़ों के ज़रिये संगठित करने का था। दस्तावेज़ के अनुसार, गुप्त दस्तों के ज़रिये छापामार युद्ध को क्रान्तिकारी आन्दोलन का एकमात्र रास्ता बताना, अर्थवाद से बचने के नाम पर ट्रेड यूनियन आन्दोलन का विरोध, देहाती क्षेत्रों में आधार क्षेत्र के निर्माण के नाम पर शहरी मज़दूरों और मध्य वर्ग के आन्दोलनों के प्रति घृणा-भाव, छोटे-छोटे ग्रुपों द्वारा संघर्षों के ज़रिये ही भूमि क्रान्ति को आगे बढ़ाने का प्रयास और वर्ग संगठन और जन संघर्षों के बिना ही क्रान्तिकारी संघर्ष की कोशिशें – चारु की लाइन के ये सभी संघटक अवयव चे ग्वेवारा से उधार लिये गये हैं, यह माओ विचारधारा का विकृतिकरण है और इन रुझानों को ठीक किये बिना बनायी जाने वाली पार्टी कालान्तर में एक आतंकवादी पार्टी बनकर रह जायेगी।

1 मई, 1969 को कलकता के शहीद मीनार मैदान की जिस जनसभा में कानू सान्याल ने भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना की घोषणा की थी उसकी अध्यक्षता असित सेन ने ही की थी, लेकिन कुछ सप्ताह बाद ही नेतृत्व के साथ पहले से ही चले आ रहे अपने गम्भीर मतभेदों के हल नहीं होने के कारण उन्हें अलग हो जाना पड़ा। चारु मजूमदार की लाइन के साथ असित सेन के मतभेद शुरुआती दौर से ही मौजूद थे। चारु मजूमदार का मानना था कि ज़मीन की लड़ाई किसानों को क्रान्तिकारी रास्ते से भटकाकर अर्थवाद और संशोधनवाद के दलदल में धँसा देती है, अत: उन्हें सिर्फ़ राज्यसत्ता पर अधिकार के लिए लड़ना चाहिए। उनका कहना था कि नक्सलबाड़ी में किसान ज़मीन के लिए नहीं बल्कि राज्यसत्ता पर अधिकार के लिए लड़ रहे थे। असित सेन का मानना था कि कोई भी वर्ग पहले अपनी वर्गीय माँग पर ही संगठित होता है, ज़मीन के लिए संघर्ष जनवादी क्रान्ति के लिए किसानों की तैयारी के लिए ज़रूरी पहला कदम होता है। चारु मजूमदार की लाइन के विपरीत असित सेन ट्रेड यूनियनों को मज़दूरों के लिए क्रान्ति का प्राथमिक स्कूल मानते थे और मज़दूर वर्ग के आन्दोलनों और ट्रेड यूनियनों को आवश्यक मानते थे। वे “देहात-आधारित” पार्टी की अवधारणा का विरोध करते थे और पार्टी के मज़दूरवर्गीय हिरावल चरित्र पर बल देते थे। चारु मजूमदार गुट का तर्क था कि भा.क.पा. (मा-ले) विशुद्ध सर्वहारा पार्टी है क्योंकि उसके अधिकांश नेता सशस्त्र संघर्ष के क्षेत्र से आये हैं। असित सेन का तर्क था कि मात्र कुछ कॉमरेडों के सशस्त्र संघर्ष के क्षेत्र से जुड़े होने से पार्टी का निम्न-पूँजीवादी वर्ग-चरित्र बदल नहीं जाता। मुख्य प्रश्न विचारधारा का है और मज़दूर वर्ग से पार्टी कतारों में भरती का है। साथ ही, व्यापक वर्ग संघर्ष की उपेक्षा करके मात्र क्रान्तिकारी राजनीति देने पर भी क्रान्तिकारी सेना का हिरावल नहीं तैयार हो सकता। असित सेन का कहना था कि आर्थिक माँगों की लड़ाई को संशोधनवाद कहकर मज़दूर आन्दोलन से दूर हट जाना मज़दूर वर्ग को संशोधनवाद और हर तरह के प्रतिक्रियावादी विचारधारा के हवाले कर दिये जाने के समान है। व्यक्ति-हत्या या ख़ात्मे की लाइन को उन्होंने नरोदवाद और चे ग्वेवारा के निम्न-पूँजीवादी रोमानी सिद्धान्त का सम्मिश्रण बताया। असित सेन का कहना था कि वर्ग शत्रुओं की हत्या और जायदाद-ज़ब्ती कभी भी वर्ग संघर्ष का मुख्य रूप नहीं हो सकते। साथ ही, जिस प्रकार जनता के स्वत:स्फूर्त सशस्त्र संघर्ष और क्रान्तिकारी राजनीति के नेतृत्व में चलने वाले सशस्त्र संघर्ष में मौलिक अन्तर होता है, उसी प्रकार निम्न-पूँजीवादी क्रान्तिकारी दुस्साहसियों द्वारा प्रारम्भ किये गये सशस्त्र संघर्ष और मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ विचारधारा से लैस मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी के नेतृत्व में चलने वाले वर्ग-संघर्ष में भी मौलिक अन्तर होता है। हरेक बात छापामार संघर्ष के ज़रिये सोच-समझ ली जायेगी, चारु मजूमदार की इस धारणा का खण्डन करते हुए असित सेन ने अपने दस्तावेज़ में लिखा कि यदि सशस्त्र संग्राम करने से अपने आप सही क्रान्तिकारी पार्टी बन जानी होती तो भारत में क्रान्ति कभी की हो गयी होती। उन्होंने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि चारु की लाइन क्रान्तिकारी पार्टी के मुख्य तत्त्व – मज़दूर वर्ग को सशस्त्र संघर्ष से एकदम अलग कर देती है!

यह सही है कि परिमल दासगुप्त और असित सेनगुप्त द्वारा प्रस्तुत चारु मजूमदार की “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन की आलोचना विचारधारात्मक रूप से उतनी सुसंगत और सांगोपांग नहीं थी, जैसी कि डी.वीराव- नागी रेड्डी ग्रुप या आगे चलकर पंजाब क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी (हरभजन सिंह सोही ग्रुप) द्वारा प्रस्तुत आलोचना थी। फिर भी उन्होंने “वामपन्थी” दुस्साहवाद की प्रकृति, वर्ग-चरित्र और मुख्य अभिव्यक्तियों की बुनियादी तौर पर सही शिनाख्त की थी। समस्या यह थी कि एक गहरी विचारधारात्मक समझ और सांगोपांग दृष्टि न होने के कारण उन्होंने सवाल का़फ़ी देर से उठाये और अलग-अलग समयों पर उठाये। जब आन्ध्र कमेटी से मतभेद चला और उन्हें नौकरशाहाना ढंग से निकाल बाहर किया गया, उस समय उन्होंने सही अवस्थिति नहीं ली थी। यही नहीं, स्वयं अलग होने के बाद भी उन्होंने जनदिशा की बुनियादी एकता के बावजूद उनसे (यानी आन्ध्र कमेटी से) तालमेल बनाने की कोशिश नहीं की। अपनी स्वयं की विचारधारात्मक कमज़ोरी और विचलनों के चलते “वामपन्थी” आतंकवादी लाइन का विरोध करने वाले ग्रुप और व्यक्ति आपस के गौण मतभेदों को अतिरिक्त अहमियत देते रहे और इस कारण से भी अतिवामपन्थ और जनदिशा के बीच ध्रुवीकरण की प्रक्रिया प्रभावित हुई। यह भी एक तथ्य है कि संशोधनवादी भटकाव और कतिपय विचारधारात्मक उलझाव परिमल दासगुप्त और असित सेन के चिन्तन में भी मौजूद थे (जैसे परिमल दासगुप्त सोवियत पार्टी को संशोधनवादी तो मानते थे, लेकिन साथ ही उन्होंने “पश्चिमी साम्राज्यवादी दख़लन्दाज़ी के विरोध” के तर्क के आधार पर चेकोस्लोवाकिया पर सोवियत संघ के आक्रमण को उचित ठहराया था), लेकिन वे सुसंगत संशोधनवादी न होकर `जेनुइन´ मार्क्सवादी-लेनिनवादी ही थे। उनके जीवन के उत्तरवर्ती दौर ने इस बात को सही सिद्ध किया। दोनों जीवनपर्यन्त कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धारा से ही जुड़े रहे और 1996 में अपनी मृत्यु से पूर्व असित सेन भा.क.पा. (मा-ले) (जनशक्ति) ग्रुप के साथ जुड़े हुए थे। मूल और मुख्य बात यह है कि यदि ए.आई.सी.सी.सी.आर. सही जनवादी ढंग से तालमेल और राजनीतिक बहस की भूमिका निभाती तो ऐसे योग्य और ईमानदार लोग बहस-मुबाहिसे के दौरान अपने भटकावों से मुक्त होकर क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट आन्दोलन में शानदार भूमिका निभा सकते थे, लेकिन तालमेल कमेटी पर आतंकवादी लाइन के नौकरशाहाना वर्चस्व ने ऐसा होने नहीं दिया। ऐतिहासिक आकलन की दृष्टि से आज मुख्य बात यह है कि कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन को विघटन और तबाही की दिशा में धकेलने में जिस लाइन ने कुंजीभूत भूमिका निभायी, कतिपय कमियों के बावजूद परिमल दासगुप्त और असित सेन जैसे लोगों ने भी उस लाइन की मूल प्रकृति की निशानदेही की और उसकी आलोचना प्रस्तुत की।

ए.आई.सी.सी.सी.आर. के काल में चारु मजूमदार की “वामपन्थी” लाइन की सुसंगत, तार्किक और सांगोपांग समालोचना प्रस्तुत करने वाले और दृढ़ विरोध करने वालों में आन्ध्र प्रदेश क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कमेटी (डी.वीराव- नागी रेड्डी ग्रुप) के बाद दूसरे स्थान पर पंजाब के एक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी धड़े का नाम आता है जिसका नेतृत्व हरभजन सिंह सोही कर रहे थे। 1970 के बाद, भा.क.पा. (मा-ले) काल में एक अलग ग्रुप के तौर पर काम करते हुए कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के इस हिस्से ने जनदिशा को ठोस रूप में सफलतापूर्वक लागू करते हुए पंजाब में “वामपन्थी” आतंकवादी धारा को व्यवहार में भी फ़ैसलाकुन शिकस्त दी। मा.क.पा. की पंजाब इकाई में मतभेद और विवादों की शुरुआत नक्सलबाड़ी विद्रोह के तत्काल बाद हो गयी थी और जल्दी ही माओवादी रुझान वाले कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाल दिया गया। इन क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों ने राज्य स्तर पर एक तालमेल कमेटी गठित की जिसके सचिव दया सिंह थे। दया सिंह सुलझे हुए कम्युनिस्ट थे और “वामपन्थी” लाइन के बारे में उनके भी कुछ `रिजर्वेशंस´ थे। लेकिन कमोबेश 1968 के अन्त से तालमेल कमेटी में हावी “वामपन्थी” लहर का पंजाब में भी भारी प्रभाव था और उदारतावादी प्रवृत्ति के चलते दया सिंह बहुमत के हिसाब से चलने के हामी थे। आतंकवादी लाइन पर पंजाब में सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत 1969 में हुई। कुछ `ऐक्शंस´ के बाद ही पुलिस दमन, गिरफ़्तारियों और फर्जी मुठभेड़ों का धुआँधार सिलसिला शुरू हो गया। मार्च 1970 के अन्त में भा.क.पा. (मा-ले) (तब तक पार्टी की घोषणा हो चुकी थी) की पंजाब राज्य कमेटी के सचिव दया सिंह, रोपड़ ज़िला कमेटी के सचिव बलवन्त सिंह, वयोवृद्ध ग़दरी बाबा और पटियाला के नेता हरिसिंह मृगेन्द्र की पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी। पंजाब में मा-ले आन्दोलन से जुड़ने वाले ग़दर पार्टी के पुराने लोगों में बाबा निरंजन कालसा और बाबा भुजा सिंह भी थे। इनकी भी बाद में पुलिस ने गिरफ़्तारी के बाद फर्जी मुठभेड़ दिखाकर नृशंस हत्या कर दी। “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन पंजाब में पार्टी कांग्रेस के बाद भी कुछ दिनों तक जारी रही। करीब नब्बे के आसपास वर्ग शत्रुओं का सफ़ाया किया गया जिनमें अधिकांश सूदख़ोर थे। पंजाब में देश के अन्य कुछ पिछड़े हिस्सों की तरह ज़मीन और सामन्ती उत्पीड़न का सवाल 1967-70 के दौरान भी नहीं था, लेकिन सूदख़ोरों के खिलाफ़ न केवल ग़रीब बल्कि मँझोले किसानों में भी गहरी नफ़रत थी। पंजाबी समाज में राज्य के विरुद्ध जुझारू वीरतापूर्ण संघर्षों-कुर्बानियों की एक लम्बी परम्परा रही है। कम्युनिस्ट कतारों में विचारधारात्मक समझ के अभाव में इस परम्परा ने “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के लिए खाद-पानी का काम किया। अकेले इस एक राज्य में 1974 तक फर्जी मुठभेड़ों में सौ से कुछ अधिक क्रान्तिकारी मौत के घाट उतारे जा चुके थे और दर्ज़नों क्रान्तिकारी जेलों में लम्बी सज़ाएँ भुगत रहे थे।

पंजाब में राज्य स्तरीय तालमेल कमेटी के गठन के बाद से ही भटिण्डा-फिरोज़पुर कमेटी के लोग सफ़ाये की लाइन, आर्थिक संघर्षों, जन संघर्षों और जन संगठन के निषेध की लाइन और लोक युद्ध के उद्गम और विकास की आतंकवादी समझ का दृढ़तापूर्वक विरोध कर रहे थे। क्रान्तिकारी संघर्षों के असमान विकास और मज़दूर वर्ग के नेतृत्व के प्रश्न पर भी उनकी चारु की लाइन से भिन्न राय थी और जनदिशा के अमल के प्रश्न पर वे अडिग थे। जब भा.क.पा. (मा-ले) के गठन और कांग्रेस की घोषणा हुई तो उन्होंने इस पर भी अपनी अलग राय रखी। कठिन अलगाव झेलकर और “ग़द्दार”, “संशोधनवादी”, “जनता के दुश्मन” आदि “उपाधियाँ” पाकर भी वे अपनी अवस्थिति पर दृढ़ रहे और क्रान्तिकारी आतंकवाद की शक्तिशाली लहर का सामना करते रहे। इसके बावजूद वे औपचारिक तौर पर पहले तालमेल कमेटी, और पार्टी-गठन की घोषणा के बाद भा.क.पा. (मा-ले) का हिस्सा बने रहे। फ़रवरी 1970 में, पार्टी कांग्रेस के ठीक पहले भटिण्डा-फिरोज़पुर कमेटी भा.क.पा. (मा-ले) से अलग हो गयी और `पंजाब कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कमेटी´ (पी.सी.आर.सी.) के नाम से इसने अपना पुनर्गठन किया। आगे चलकर उसने पंजाब में जनदिशा को सफलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से लागू किया और चारुपन्थी धारा को एकदम अलग-थलग और निश्शक्त बना डाला। इसकी चर्चा आलेख में आगे यथास्थान आयेगी।

ए.आई.सी.सी.सी.आर. के पूरे काल में, तालमेल कमेटी द्वारा निर्धारित सभी कार्यभारों को तिलांजलि देते हुए तालमेल कमेटी के स्वरूप को नकारकर उसे एक केन्द्रीकृत पार्टी की तरह इस्तेमाल करते हुए और स्वयं एकछत्र नेता सदृश नौकरशाहाना व्यवहार करते हुए तथा चीन की पार्टी के लेखों एवं प्रसारणों द्वारा मिलने वाली मान्यता एवं नक्सलबाड़ी के घोषित नेता होने की साख का लाभ उठाते हुए चारु मजूमदार ने एक-एक करके अपनी लाइन के विरोधी ग्रुपों और व्यक्तियों को ठिकाने लगाया और तालमेल कमेटी पर अपनी लाइन का वर्चस्व स्थापित होते ही पार्टी-गठन के लिए आगे बढ़ गये। इस प्रक्रिया में उन्हें इस बात से भी मदद मिली कि उनकी लाइन के कई विरोधी स्वयं या तो “वामपन्थी” या दक्षिणपन्थी विचलन के शिकार थे, उनकी (यानी चारु की लाइन के विरोधियों की) लाइन सुसंगत नहीं थी, विरोध के स्वर एकसाथ नहीं बल्कि अलग-अलग उठते रहे तथा जनदिशा के पक्षधर ग्रुपों और लोगों के बीच भी आपस में कई मसलों पर अहम या गौण मतभेद थे। जैसे-जैसे तालमेल कमेटी से विरोध-पक्ष का सफ़ाया होता गया, चारु की लाइन का “वामपन्थी” अवसरवादी चरित्र ज्यादा से ज्यादा नग्न और विकृत रूप में सामने आता चला गया। पहले वे गोलमोल भाषा में जनसंघर्षों की या भूमि क्रान्ति के कार्यक्रम की या मज़दूर वर्ग के संघर्षों की बात करते थे, लेकिन अब उन्होंने हर प्रकार की जनकार्रवाई, खुले काम, आर्थिक संघर्ष और राजनीतिक प्रचार-कार्य को सिरे से ख़ारिज करते हुए यह कहना शुरू किया कि “ख़ात्मे की लड़ाई ही वर्ग संघर्ष का उच्चतर रूप और छापामार संघर्ष का आरम्भ दोनों ही है”, इसी के द्वारा भारी किसान जनसमुदाय जागृत होगा, इसी के द्वारा मुक्तांचल-निर्माण और क्रान्तिकारी सेना-निर्माण की समस्या हल होगी और इसी से प्रेरित प्रचण्ड स्वयंस्फूर्त जन-अभ्युत्थान राज्यसत्ता पर वज्रघात करेगा। पार्टी कांग्रेस से तीन माह पहले छापामार कार्रवाई के बारे में लिखे गये अपने एक लेख में उन्होंने लिखा कि छापामार दस्ते बिल्कुल गुप्त और स्वतन्त्र होंगे, उन पर पार्टी कमेटी का भी नियन्त्रण नहीं होगा, उनको बनाने का तरीका एक-एक व्यक्ति को पकड़कर, उसके कान में फुसफुसाकर किया जायेगा, इसकी भनक पार्टी की राजनीतिक इकाइयों को भी नहीं होगी और इसके लिए निम्न-बुर्जुआ बुद्धिजीवियों को पहल करनी होगी। यही नहीं, लोकयुद्ध की दीर्घकालिक प्रवृत्ति को ठुकराते हुए उन्होंने ख़ात्मे की लाइन से प्रेरित प्रचण्ड देशव्यापी विद्रोह की भी कल्पना की और कांग्रेस के पहले के काल में ही, पार्टी-गठन की घोषणा के बाद, 1969 में सत्तर के दशक को मुक्ति के दशक में बदल देने का नारा दिया।

वस्तुत: यह रणदिवे काल के “वामपन्थी” भटकाव का ही एक अत्याधिक विकृत और भोंड़ा संस्करण था जिसका मार्क्सवाद-लेनिनवाद से और जनवादी क्रान्ति विषयक माओ के विचारों से कुछ भी लेना-देना नहीं था।

सिद्धान्त-निरूपण के साथ ही क्रान्तिकारी आतंकवाद का व्यवहार भी देश के विभिन्न हिस्सों में ज़ोर-शोर से जारी था। देश के विभिन्न हिस्सों में चारु की लाइन से प्रेरित कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी छिटपुट, बिखरे हुए रूप में, दस्ते बनाकर `ऐक्शन´ और ख़ात्मे की लाइन लागू करते थे और कुछेक कार्रवाइयों के बाद ही सबकुछ बिखर जाता था। श्रीकाकुलम के बाद “वाम” दुस्साहसवाद का दूसरा बड़ा प्रयोग बंगाल के मिदनापुर ज़िले के दो थानों डेबरा और गोपीवल्लभपुर में हुआ। उस समय तक तालमेल कमेटी पार्टी-गठन की घोषणा कर चुकी थी। सितम्बर ´69 से यहाँ कार्रवाइयों की शुरुआत नवगठित पार्टी की प. बंगाल-बिहार-उड़ीसा सीमा आंचलिक कमेटी ने की थी जिसके सचिव असीम चटर्जी और मुख्य संगठनकर्ता सन्तोष राणा, मिहिर राणा, गुणधर मुर्मू आदि थे। उल्लेखनीय है कि शुरुआत यहाँ भी व्यापक जन पहलकदमी और जनान्दोलन के रूप में हुई। अत्याचारी ज़मींदारों के खेत काटने के अभियान में 40,000 किसानों ने हिस्सा लिया। गाँवों में किसान कमेटियों ने अपनी सत्ता कायम करके लोक अदालतें लगाकर ज़मींदारों, सूदख़ोरों को दण्डित किया। ज़मींदारों और धनी किसानों के खेतों में काम करने वाले मज़दूरों की मज़दूरी पाँच गुनी कर दी गयी। लेकिन इस शुरुआत के बाद दस्तों की आतंकवादी कार्रवाइयों ने जनान्दोलन को तबाह कर दिया। अप्रैल 1970 तक साठ वर्ग शत्रुओं की हत्या की जा चुकी थी। इस मुहिम को डेबरा और गोपीवल्लभपुर थानों से बाहर खड़गपुर लोकल, सांक्राइल, केशापुर और चाकुलिया में फैलाया गया। लेकिन बढ़ते दमन और गतिरोध के साथ ही नेतृत्व में मतभेद भी पैदा होने लगे और लाइन पर सवाल भी उठने लगे। 1970 के मध्य तक यह आन्दोलन बिखर चुका था।

बिहार के मुजफ़रपुर ज़िले के मुसहरी अंचल के लगभग बारह गाँवों में भी भूमि आन्दोलन की शुरुआत 1969 में जनान्दोलन के रूप में हुई जिसमें लगभग दस हज़ार किसानों ने हिस्सा लिया। शुरुआती दौर के बाद वहाँ भी सफ़ाये की लाइन लागू हुई और फ़रवरी ´70 तक दस वर्ग-शत्रुओं की हत्या कर दी गयी। यहाँ भी डेढ़ वर्ष के भीतर आन्दोलन गतिरोध का शिकार होकर बिखर गया।

उत्तर प्रदेश में लखीमपुर ज़िले के तराई अंचल के पालिया में जनवरी-फ़रवरी 1968 में किसानों का आन्दोलन जन-पहलकदमी और जन-भागीदारी के साथ शुरू हुआ। ग़रीब किसानों और मज़दूरों ने पीलीभीत तराई फार्म और पतियान, घोला, इब्राहीमपुर के फार्मों पर (यह एक दीगर प्रश्न है कि मुद्दा यहाँ ज़मीन का होना चाहिए था या नहीं, क्योंकि ये फार्म पूँजीवादी भूस्वामियों के फार्म थे जो मज़दूरों से काम लेकर मुनाफ़े की खेती करते थे) फार्म मालिकों के गुण्डा गिरोहों से मोर्चा लेकर ज़मीन पर कब्ज़ा किया। फिर “वामपन्थी” लाइन के हावी होने का दौर आया और दमन ने भी ज़ोर पकड़ा। एक वर्ष के भीतर यह आन्दोलन भी बिखर गया।

बावजूद इन विफलताओं के, मुक्ति संघर्ष के निरन्तर अग्रवर्ती विकास के चारु के दावे जारी थे। कारण यह था कि एक जगह “वामपन्थी” लाइन की विफलता सामने आती थी, तब तक दूसरे किसी क्षेत्र में ज़ोर-शोर से इसका अमल शुरू हो चुका होता था। फिर भी 1970 के अन्त तक पूरे देश में मा-ले आन्दोलन की “वाम” आतंकवादी मुहिम पिट चुकी थी और चतुर्दिक व्याप्त गतिरोध एक ओर कतारों में निराशा पैदा कर रहा था, दूसरी ओर नेतृत्व में मतभेद और फूट की ज़मीन तैयार कर रहा था। इसकी चर्चा लेख के अगले हिस्से में पार्टी कांग्रेस के बाद के काल के घटना-प्रवाह के विवरण और समाहार के दौरान की जायेगी। यहाँ पार्टी-कांग्रेस तक का घटनाक्रम संक्षेप में बताकर हमें इस हिस्से का समापन करना होगा। ए.आई.सी.सी.सी.आर. से आन्ध्र प्रदेश कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कमेटी के निष्कासन (7 फ़रवरी ´69) के बाद चारु को लगने लगा था कि “वामपन्थी” लाइन के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हटायी जा चुकी है। अपने पहले के विचार को एकाएक बदलते हुए उन्होंने अचानक यह विचार रखना शुरू किया कि अब सर्वभारतीय पार्टी गठन का उपयुक्त समय आ गया है। तालमेल कमेटी के कामों की कोई भी समीक्षा नहीं हुई। कुछ लोगों ने विरोध किया, फिर सहमत हो गये। परिमल दासगुप्त को निकाले जाने के बाद इस निर्णय का एकमात्र शेष विरोधी भी रास्ते से हट गया। 22 अप्रैल 1969 को तालमेल कमेटी ने अपने को भंग कर भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना की और 1 मई 1969 को कलकता के शहीद मीनार मैदान में आयोजित जनसभा में कानू सान्याल ने इसकी घोषणा की। 27 अप्रैल के अधिवेशन में पार्टी की आरजी (कांग्रेस तक के लिए) नेतृत्वकारी कमेटी के रूप में केन्द्रीय सांगठनिक कमेटी का गठन किया गया जिसके कुल ग्यारह सदस्य थे : चारु मजूमदार, सुशीतल रायचौधरी, सरोज दत्त, कानू सान्याल, सौरेन बसु, शिवकुमार मिश्र, सत्यनारायण सिंह, आर.पी. सर्राफ़, पंचाद्रि कृष्णमूर्ति, चौधरी तेजेश्वर राव और एल. अप्पू। चारु मजूमदार को कमेटी का सचिव चुना गया। एक वर्ष के भीतर पार्टी कांग्रेस बुलाने का निर्णय लिया गया। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने पार्टी-स्थापना का स्वागत किया और उसे मान्यता प्रदान की। पीकिंङ रेडियो से 22 अप्रैल ´69 के प्रस्ताव का, 1 मई की जनसभा में कानू सान्याल के भाषण का और जनसभा में पारित प्रस्तावों का प्रसारण हुआ। इससे कतारों में नवगठित पार्टी की मान्यता बढ़ी और नये उत्साह का संचार हुआ। 1969 के अन्त में एक पार्टी प्रतिनिधिमण्डल ने चीन की गुप्त यात्रा भी की।

अप्रैल 1970 में पार्टी कांग्रेस की तैयारी के लिए केन्द्रीय सांगठनिक कमेटी ने तीन दिनों की बैठक की। बैठक में सत्यनारायण सिंह, शिवकुमार मिश्र और सौरेन बसु को पार्टी कार्यक्रम का मसविदा तैयार करने की तथा सुशीतल रायचौधरी, आर.पी. सर्राफ़ और सरोज दत्त को राजनीतिक प्रस्ताव का मसौदा तैयार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी।

भा.क.पा. (मा-ले) की स्थापना कांग्रेस (जिसे कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास की निरन्तरता की दृष्टि से आठवीं कांग्रेस कहा गया) 15-16 मई 1970 को कलकता में हुई जिसमें प. बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, आन्ध्र, त्रिपुरा, तमिलनाडु, केरल, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसके पूर्व राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे पर उत्तर प्रदेश राज्य सम्मेलन में काफ़ी बहस हुई थी जिसमें छापामार संघर्ष के ही संघर्ष के एकमात्र रूप होने, सफ़ाये की लाइन और चीन की पार्टी के प्रति निष्ठा को क्रान्तिकारियों की एकरूपता की एकमात्र शर्त बनाने का विरोध किया गया था। कांग्रेस में आर.एन. उपाध्याय ने इस बहस की रिपोर्ट रखी। स्पष्ट था कि उ.प्र. में चारु की लाइन के विरोध का पक्ष प्रधान था। लेकिन राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे के पक्ष में सत्यनारायण सिंह के वक्तव्य के बाद उसे पारित कर दिया गया। पार्टी-कार्यक्रम चीन की लोक जनवादी क्रान्ति के कार्यक्रम पर आधारित था। इसमें भारतीय समाज को एक अर्द्धसामन्ती, अर्द्ध-औपनिवेशिक समाज बताते हुए और आज़ादी को नकली आज़ादी बताते हुए अमेरिकी साम्राज्यवाद, सोवियत सामाजिक साम्राज्यवाद, सामन्तवाद और दलाल-नौकरशाह पूँजी को भारतीय जनता के चार मुख्य शत्रु बताया गया था। भारत को अमेरिकी और सोवियत साम्राज्यवाद का (एकसाथ) नवउपनिवेश बताया गया था लेकिन तत्कालीन दौर का मुख्य अन्तरविरोध व्यापक भारतीय जनता और सामन्तवाद के रूप में बताया गया था। यह कार्यक्रम चीन की पार्टी के विश्व परिस्थितियों के आम आकलन को निगमनात्मक तरीके से भारत पर लागू करते हुए तैयार किया गया था और विसंगतियों से भरा हुआ था। इसके पीछे ठोस परिस्थितियों के स्वतन्त्र अध्ययन-विश्लेषण की कोई भूमिका नहीं थी। आगे लेख में नवजनवादी कार्यक्रम की तमाम विसंगतियों-अन्तरविरोधों की चर्चा उस स्थान पर की जायेगी जहाँ मार्क्सवादी-लेनिनवादी शिविर में इस पर सवाल उठने का प्रसंग आयेगा, इसलिए यहाँ हम उसके विस्तार में नहीं जा रहे हैं। राजनीतिक प्रस्ताव भी इसी कार्यक्रम के अनुरूप था। साथ ही, उसमें रणकौशल और रास्ते से जुड़े विविध प्रश्नों पर रखी गयी अवस्थिति में “वाम” अवसरवादी लाइन की पूरी छाया मौजूद थी। रही-सही कोर-कसर चारु मजूमदार ने अपने वक्तव्य से पूरी कर दी जिसमें उन्होंने साफ़-साफ़ शब्दों में पुरज़ोर तरीके से आतंकवादी लाइन की हाँक लगायी थी।

यहाँ यह चर्चा भी ज़रूरी है कि कांग्रेस में सौरेन बसु ने (सरोज दत्त भी उनके साथ थे) चारु मजूमदार के व्यक्तिगत प्राधिकार को औपचारिक तौर पर स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। असीम चटर्जी ने प्रस्ताव के पक्ष में यहाँ तक कह डाला कि केन्द्रीय कमेटी और चारु मजूमदार के बीच विरोध होने पर मैं चारु मजूमदार का साथ दूँगा। कानू सान्याल ने बस इतना कहा कि तराई रिपोर्ट में चारु मजूमदार की भूमिका का और ज्यादा उल्लेख करना ज़रूरी था। सत्यनारायण सिंह ने इसका मुखर विरोध किया। शिवकुमार मिश्र और आर.पी. सर्राफ़ ने भी दबी जुबान से विरोध प्रकट किया। सुशीतल रायचौधरी ने माओ के उद्धरणों की पुस्तक से पार्टी कमेटी को शक्तिशाली बनाने सम्बन्धी सारे उद्धरण पढ़ सुनाये और इस प्रस्ताव को माओ की शिक्षाओं के विपरीत बताया। आम सहमति नहीं बनने के कारण यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका लेकिन बाद के दौर में केन्द्रीय कमेटी में मौजूद चारु समर्थक कॉकस ने वस्तुत: चारु के प्राधिकार वाली स्थिति को ही लागू किया, जिसके आगे केन्द्रीय कमेटी का कोई मतलब ही नहीं रह गया था। यह सर्वथा स्वाभाविक था क्योंकि “वामपन्थी” दुस्साहसवादी विचारधारात्मक-राजनीतिक लाइन केवल और केवल नौकरशाहाना और फरमानशाहाना केन्द्रीयता की सांगठनिक लाइन के माध्यम से ही प्रभावी हो सकती है।

कांग्रेस ने एक बीस-सदस्यीय केन्द्रीय कमेटी का चुनाव किया जिसके सदस्य थे : चारु मजूमदार, सुशीतल रायचौधरी, सरोज दत्त, कानू सान्याल, सौरेन बसु, सुनीति कुमार घोष, असीम चटर्जी (प. बंगाल), सत्यनारायण सिंह, गुरुबख्श सिंह (बिहार), शिवकुमार मिश्र, महेन्द्र सिंह (उत्तर प्रदेश), वेंकटाप्पु सत्यनारायण, आदिमाटला कैलाशम्, नागभूषण पटनायक, अप्पाला सूरी (आन्ध्र प्रदेश), एल. अप्पू, कोदण्डरामन (तमिलनाडु), आम्बाडि (केरल), आर.पी. सर्राप़+ (जम्मू-कश्मीर), और जगजीत सिंह सोहल (पंजाब)। कमेटी के सचिव चारु मजूमदार चुने गये।

आठवीं कांग्रेस में स्वीकृत कार्यक्रम, राजनीतिक प्रस्ताव, राजनीतिक-सांगठनिक रिपोर्ट और चारु मजूमदार के वक्तव्य को यदि एकसाथ रखकर देखा जाये तो यह बात एकदम साफ़ हो जाती है कि कांग्रेस द्वारा स्वीकृत लाइन की विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओ विचारधारा के विपरीत थी। हम यहाँ कार्यक्रम में प्रस्तुत भारतीय समाज के विश्लेषण और चरित्र-निर्धारण का फ़िलहाल उल्लेख नहीं कर रहे हैं। मूल बात विचारधारा की है। यदि कोई क्रान्तिकारी पार्टी जनदिशा और जनवादी केन्द्रीयता की सांगठनिक लाइन को सुसंगत ढंग से लागू करती है तो अनुभवों के समाहार और अन्तर्पार्टी बहस-मुबाहिसे के द्वारा वह क्रान्ति के कार्यक्रम विषयक ग़लती को ठीक भी कर सकती है। लेकिन यदि पार्टी का विचाराधारात्मक आधार ही ग़लत हो तो सही कार्यक्रम भी महज़ काग़ज़ का टुकड़ा बनकर रह जायेगा। भा.क.पा. (मा-ले) का गठन मार्क्सवाद-लेनिनवाद के आधार पर नहीं बल्कि “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के आधार पर हुआ था। आठवीं कांग्रेस ने एक सर्वभारतीय पार्टी-गठन के कार्यभार को कतई पूरा नहीं किया। मूलत: और मुख्यत: क्रान्तिकारी जनदिशा को लागू करने वाले जो मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठन थे (और जो संगठन “वामपन्थी” या दक्षिणपन्थी भटकाव के अपेक्षाकृत कम शिकार थे), वे भा.क.पा. (मा-ले) के बाहर ही रह गये थे। इसलिए, 1970 में गठित भा.क.पा. (मा-ले) के बारे में ज्यादा से ज्यादा इतना ही कहा जा सकता है कि वह गम्भीर “वामपन्थी” अवसरवादी भटकाव से ग्रस्त एक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन था, एक सर्वभारतीय क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी कतई नहीं था।

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-1

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-2

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-3

(अगले अंक में जारी)

नक्सलबाड़ी और उत्तरवर्ती चार दशक-3

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तैयार होती ज़मीन,

वह ऐतिहासिक विस्फोट

और उसके बाद

नवम्बर, 1964 में जब कलकत्ता के त्यागराज हॉल में पार्टी कांग्रेस हो रही थी, उस समय बाहर कुछ लोगों के एक छोटे से ग्रुप ने पर्चे बाँटकर नयी पार्टी के नेतृत्व पर भी मध्यमार्गी और संशोधनवादी भटकाव का शिकार होने का आरोप लगाया। पार्टी कांग्रेस से ज्यादातर प्रतिनिधि निराश और संशयग्रस्त होकर लौटे। 1965 के जनवरी महीने में नवगठित माकपा के महासचिव पी. सुन्दरैया गिरफ़्तार हुए और फिर सरकारी अनुमति से इलाज के लिए सोवियत संघ गये। वहाँ से लौटने के बाद सोवियत नेतृत्व के कई सकारात्मक पहलू गिनाते हुए उन्होंने लिखा कि सोवियत पार्टी की बातों में भी दम है। इधर, महान बहस के दस्तावेज़ निचले स्तर के संगठनकर्ताओं-कार्यकर्ताओं तक भी पहुँचने लगे थे और उन्नत चेतना वाले कार्यकर्ताओं का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा यह समझने लगा था कि संशोधनवाद और मार्क्सवाद के बीच मध्यमार्ग अपनाने की कोई गुंजाइश ही नहीं है और ऐसा करने का एकमात्र मतलब होगा संशोधनवाद के पाले में खड़ा होना। यह समय था जब दक्षिण वियतनाम, फिलीप्पींस और मलाया से लेकर अफ़्रीकी देशों और लातिन अमेरिकी देशों में जारी राष्ट्रीय मुक्ति-युद्धों और नवउपनिवेशवाद-विरोधी सशस्त्र संघर्षों में राष्ट्रीय बुर्जुआ नेतृत्व माओ के दीर्घकालिक लोकयुद्ध की सामरिक रणनीति को लागू कर रहा था और इनमें से अधिकांश संघर्ष विजय की दहलीज़ पर खड़े थे। अफ़्रीकी मुक्ति संघर्ष के अमिल्कर कबराल, क्वामे एन्क्रूमा, जूलियस न्येरेरे जैसे नेता माओ की सामरिक रणनीति के अवदान को घोषित तौर पर स्वीकार कर रहे थे। राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों के साथ मोलतोल करके मदद करने तथा उन्हें शासकों के साथ बातचीत की टेबुल पर बैठकर मोलतोल करने और सुलह-सफाई के ज़रिये सत्ता हासिल करने का सुझाव देने वाले ख्रुश्चेवी संशोधनवादी ज्यादा से ज्यादा बेनकाब होते जा रहे थे। क्यूबाई मिसाइल संकट के समय अमेरिकी धौंस के सामने ख्रुश्चेव के घुटने टेकने के बाद सोवियत शासन के चरित्र के बारे में दुनिया भर की कम्युनिस्ट कतारों के भीतर पहले ही सवाल पैदा हो चुका था। साम्राज्यवादियों के साथ लगातार सुलह-सफाई की उसकी नीति भी उसे शंकाओं के घेरे में खड़ा कर रही थी। 1965 के अन्त में इण्डोनेशिया में कम्युनिस्टों का अभूतपूर्व बर्बर दमन हुआ और इस घटना ने भी भारत के कम्युनिस्ट कतारों के सामने स्पष्ट कर दिया कि यदि कोई पार्टी विशाल जनाधार और कैडर-शक्ति के बावजूद गुप्तता, कैडर-भरती, कार्य संस्कृति के अनुशासन और सामरिक तैयारी के मामले में ढिलाई बरतेगी तो बुर्जुआ राज्यसत्ता बर्बर सैन्यबल से उसे कुचलकर खून के दलदल में धँसा देगी। इस घटना ने भारतीय कम्युनिस्ट कतारों को भी सोवियत और चीनी रास्तों के विचारधारात्मक फ़र्क को समझने में काफ़ी मदद की और वे इसी रोशनी में माकपा के नये नेतृत्व के बारे में भी सोचने लगे। `महान बहस´ के तत्काल बाद चीन में 1964 से `महान समाजवादी शिक्षा आन्दोलन´ की शुरुआत हो चुकी थी। यह आन्दोलन वस्तुत: समाजवादी निर्माण के प्रश्न पर चीनी पार्टी के भीतर संशोधनवाद और क्रान्तिकारी लाइन के बीच के संघर्ष का ही एक रूप था और इस दौरान महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की पूर्वपीठिका तैयार होने लगी थी। इस आन्दोलन से सम्बन्धित चीनी पार्टी के दस्तावेज़ भी माकपा से जुड़े बुद्धिजीवियों और चेतनशील कार्यकर्ताओं तक पहुँच रहे थे और चीज़ों को समझने में सहायक बन रहे थे। सातवीं कांग्रेस में जनान्दोलन की लम्बी-चौड़ी बातों के उलट, कांग्रेस के ठीक बाद कहीं भी भूमि संघर्ष संगठित करने या मज़दूरों की राजनीतिक-आर्थिक माँगों को लेकर जुझारू आन्दोलन संगठित करने की नेतृत्व की ओर से कोई पहल नहीं दीख रही थी। नियमित अनुष्ठान से अलग क्रान्तिकारी राजनीतिक प्रचार एवं शिक्षा की कोई कार्रवाई भी नहीं संगठित की जा रही थी, जो किसी नवगठित पार्टी के लिए आवश्यक कार्यभार होता है। पार्टी-नेतृत्व का मुख्य या लगभग पूरा ज़ोर कांग्रेस-विरोधी व्यापक संयुक्त मोर्चा बनाकर आगामी चुनावों में कांग्रेस का विकल्प प्रस्तुत करने की तैयारी पर था। हालाँकि अपने चुनावी चरित्र पर पर्दा डालने के लिए वह लगातार “जनान्दोलनों को मज़बूत बनाने वाली संक्रमणकालीन सरकारों की स्थापना” (वह “संक्रमणकाल” आज तक जारी है!) की ही बात कह रही थी। 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय भी पार्टी ने बुर्जुआ अन्धराष्ट्रवाद-विरोधी और युद्ध-विरोधी क्रान्तिकारी प्रचार का कोई भी कार्यक्रम हाथ में लेने का साहस नहीं किया। राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय पटल की ये सारी घटनाएँ और विश्व-इतिहास के उस दौर में चतुर्दिक आगे बढ़ते मुक्ति संघर्षों के ज्वार माकपा की कतारों की चेतना का क्रान्तिकारीकरण करने में, उन्हें संशोधनवाद और क्रान्तिकारी मार्क्सवाद के बीच अन्तर करना सिखाने में तथा माकपा नेतृत्व के असली चरित्र को पहचानने में मदद पहुँचा रहे थे। पार्टी नेतृत्व का व्यवहार स्वयं उसके चरित्र को उजागर करता जा रहा था।

नवगठित पार्टी-नेतृत्व के चरित्र पर प्रश्न उठाने वाले कुछ लोगों ने सातवीं कांग्रेस के तत्काल बाद, पार्टी के भीतर गुप्त तरीके से (उनका आकलन था कि नौकरशाह पार्टी नेतृत्व पार्टी के भीतर उन्हें बुनियादी सैद्धान्तिक मुद्दों पर कतई बहस नहीं चलाने देगा और ऐसा करते ही उन्हें उग्रवादी और दुस्साहसवादी बताकर किनारे लगा दिया जायेगा। उनका यह सोचना एकदम ठीक था, तमाम मसलों पर माकपा नेतृत्व के बाद के व्यवहार ने यही सिद्ध किया) सैद्धान्तिकी संघर्ष चलाने के लिए कन्हाई चटर्जी, अमूल्य सेन और चन्द्रशेखर दास की पहल पर, उन्हीं की अगुवाई में एक गुप्त क्रान्तिकारी केन्द्र का गठन किया। इस केन्द्र की ओर से मार्च, 1965 में `चिन्ता´ नामक बुलेटिन का पहला अंक निकला और पार्टी कतारों के बीच (विशेषकर बिहार और बंगाल में) इसे गुप्त रूप से बाँटा गया। ठीक इसी समय, चारू मजूमदार ने भी अपने प्रसिद्ध आठ दस्तावेज़ों की श्रंखला का लेखन प्रारम्भ किया। 28 फ़रवरी, 1965 को इस श्रंखला का पहला दस्तावेज़ `वर्तमान स्थिति में हमारे कर्त्तव्य’ उन्होंने पूरा किया। माकपा के नवसंशोधनवाद के विरुद्ध बिगुल फूँकने वाली ये दो निर्णायक पहलकदमियाँ अलग-अलग, लेकिन एकदम एक ही समय में ली गयीं। इनके अतिरिक्त, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब के कई लोग सातवीं कांग्रेस के बाद से ही पार्टी नेतृत्व को संशोधनवादी रास्ते का राही मानने लगे थे और इस मसले पर सोच-विचार रहे थे कि पार्टी के भीतर संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष चलाने का रास्ता क्या हो सकता है? कुछ लोग (विशेषकर पार्टी बुद्धिजीवी) ऐसे भी थे, जिन्होंने पार्टी को संशोधनवादी मानकर उसकी सदस्यता छोड़ दी थी या सदस्यता के बावजूद निष्क्रिय हो गये थे।

मार्च, 1965 से लेकर 1966 के मध्य तक `चिन्ता´ बुलेटिन के कुल छह अंक निकले। इसके बाद इस क्रान्तिकारी केन्द्र के सूत्रधारों को उग्रवादी और दुस्साहसवादी करार देकर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। निष्कासन के बाद, संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष और भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल से जुड़े विविध प्रश्नों पर बहस को व्यापक आधार पर चलाने के लिए 1966 के मध्य से कन्हाई चटर्जी-अमूल्य सेन के नेतृत्व वाले इस ग्रुप ने `दक्षिण देश´ नाम से एक खुली पत्रिका का नियमित प्रकाशन शुरू किया। चारु मजूमदार अगस्त, 1966 तक अपनी `आठ दस्तावेज़ श्रंखला´ के छ: दस्तावेज़ लिख चुके थे। सातवाँ और आठवाँ दस्तावेज़ उन्होंने क्रमश: 1967 के फ़रवरी और अप्रैल महीने में लिखा, जब नक्सलबाड़ी में किसानों के बड़े-बड़े जुलूस निकलने लगे थे और मई में शुरू होने वाले किसान-विद्रोह की ज़मीन तैयार हो चुकी थी। इन दस्तावेज़ों और `चिन्ता´ के अंकों की विषयवस्तु की चर्चा से पहले नक्सलबाड़ी के बारे में यह जानना ज़रूरी है कि इस विद्रोह की वस्तुगत परिस्थितियाँ किस प्रकार वहाँ मौजूद थीं और नक्सलबाड़ी में किसान संघर्षों और कम्युनिस्ट आन्दोलन की किस प्रकार पहले से ही एक परम्परा रही थी।

दार्जीलिंग ज़िले के सिलीगुड़ी सबडिवीज़न स्थित नक्सलबाड़ी क्षेत्र का ग्रामीण इलाका तराई अंचल है। वहीं से पहाड़ी क्षेत्र शुरू हो जाता है। खेती के अलावा इस इलाके में चाय बाग़ान भी हैं, जो गाँवों से एकदम लगे हुए हैं। इस क्षेत्र के किसानों और बाग़ान मज़दूरों के बीच कम्युनिस्ट पार्टी ने व्यवस्थित ढंग से काम की शुरुआत 1951 में की। दार्जीलिंग ज़िला ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत एक `नॉन-रेग्यूलेटेड एरिया´ था। 1947 के बाद भी वहाँ के माहौल पर इसकी छाप थी। इलाके में चाय बाग़ान मालिक प्लाण्टर-भूस्वामियों और जोतदारों (भूस्वामियों) की निरंकुश सत्ता कायम थी। बाग़ान मज़दूरों की कोई यूनियन नहीं थी और बाग़ान मालिकों का आतंक इतना था कि वे इस दिशा में सोच तक नहीं सकते थे। किसी भी राजनीतिक पार्टी का कार्यकर्ता जोतदारों की मर्ज़ी और इजाज़त के बग़ैर किसानों की झोंपड़ियों तक पहुँच भी नहीं सकता था। इन कठिन परिस्थितियों में पार्टी ने इस क्षेत्र में काम शुरू किया। चारु मजूमदार उस सिलीगुड़ी लोकल कमेटी के नेता थे, जिसके अन्तर्गत नक्सलबाड़ी क्षेत्र आता था।

चारु मजूमदार 1930 के दशक में पाबना (अब बांगलादेश) के एडवर्ड कॉलेज में पढ़ते समय कम्युनिस्ट छात्र-छात्राओं के सम्पर्क में आये और कम्युनिस्ट बने। इण्टरमीडियट की फाइनल की परीक्षा छोड़कर वे जलपाईगुड़ी ज़िले के देवीगंज थाने (अब बांगलादेश) के पचागढ़ में किसानों के बीच काम करने लगे। कम्युनिज्म की प्रारिम्भक शिक्षा उन्हें माधवदत्त से मिली और फिर वे जलपाईगुड़ी के कम्युनिस्ट नेता शचिन दासगुप्त और वीरेन दत्त के सम्पर्क में आये। किसानों के अधियार आन्दोलन में भागीदारी के बाद उन्होंने लालमनिहार जं. (दिनाजपुर ज़िला) से लेकर जलपाईगुड़ी तक के रेल मज़दूरों और दुआर के चाय बाग़ान के मज़दूरों के बीच संगठनकर्त्ता के रूप में काम किया। उत्तर बंगाल के करीब 70 लाख किसानों के प्रसिद्ध तेभागा आन्दोलन (1946-47) में भी वे सक्रिय रहे। उल्लेखनीय है कि तेभागा आन्दोलन का प्रत्यक्ष नेतृत्व जब बर्बर दमन का प्रतिरोध करने के लिए किसानों की सशस्त्र प्रतिरक्षा संगठित करने के बारे में सोच रहा था, उसी समय मुस्लिम लीग सरकार के कोरे आश्वासनों के बाद प्रादेशिक नेतृत्व ने आन्दोलन वापस ले लिया। तब प्रादेशिक नेतृत्व की तीखी आलोचना करने वालों में चारु मजूमदार भी थे। 1947 में देश के विभाजन के बाद चारु मजूमदार का मुख्य कार्यक्षेत्र जब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांगलादेश) में चला गया तो वे जलपाईगुड़ी ज़िले के उस हिस्से में चाय बाग़ान मज़दूरों, रेल मज़दूरों और आदिवासी किसानों के बीच काम करने लगे, जो भारत में आया था। रणदिवे काल की अतिवामपन्थी लाइन और पार्टी के ग़ैरव़कानूनी करार दिये जाने के दौर में चारु जेल में थे। वहीं उन्हें तेलंगाना संघर्ष के दौरान पार्टी में जारी बहस और आन्ध्र दस्तावेज़ के बारे में पता चला। जेल में उन्हें माओ और चीनी पार्टी की लाइन के पक्षधर के रूप में जाना जाता था। तेलंगाना संघर्ष वापस लिये जाने के बाद, मार्च 1952 में चारु जेल से रिहा हुए। अब उनका नया कार्यक्षेत्र दार्जीलिंग ज़िले का सिलीगुड़ी सब-डिवीज़न बना जहाँ की लोकल कमेटी का नेतृत्व चारु मजूमदार ने सम्हाला। 1951 में पार्टी ने नक्सलबाड़ी क्षेत्र के गाँवों के किसानों और चाय बाग़ान मज़दूरों के बीच कामों की शुरुआत की। इसी समय कानू सान्याल ने भी यहाँ पूर्णकालिक संगठनकर्त्ता के रूप में काम करना शुरू किया और जंगल सन्थाल, दम लाल मल्लिक, खोदनलाल मल्लिक आदि स्थानीय कार्यकर्ताओं की एक टीम तैयार हुई।

1951 से लेकर 1954 तक का दौर नक्सलबाड़ी में किसानों और बाग़ान मज़दूरों के संगठित होने का प्रारम्भिक दौर था, लेकिन इलाके में जोतदारों के अत्याचार का इतना अधिक बोलबाला था कि उनके साथ खूनी झड़पों के बिना शुरुआती काम भी असम्भव था। पार्टी संगठनकर्ताओं ने जोतदारों की अवैध वसूलियों और अत्याचारों के विरुद्ध किसानों को संगठित करते हुए निकटवर्ती चाय बाग़ान मज़दूरों को भी उनके पक्ष में संगठित किया। इस तरह, स्थानीय स्तर पर, व्यवहार में मज़दूरों और किसानों का संयुक्त मोर्चा तैयार हुआ और 1955 से 1957 के बीच नक्सलबाड़ी के किसानों-मज़दूरों ने एक साथ मिलकर लगातार संघर्ष चलाये। जोतदारों और बाग़ान मालिकों के निरंकुश अत्याचार के चलते इस इलाके के किसानों और मज़दूरों को शुरू से ही अपने आत्मरक्षार्थ परम्परागत हथियारों की मदद लेनी पड़ी। यह एक महत्त्वपूर्ण कारण था कि नक्सलबाड़ी के किसानों में उस समय से ही कानूनी और शान्तिपूर्ण तरीके के बारे में कोई भ्रम नहीं था। 1955 का चाय बाग़ान मज़दूरों का बोनस आन्दोलन हालाँकि एक आर्थिक संघर्ष था, लेकिन हज़ारों मज़दूरों-किसानों ने इसमें भी अपनी जुझारू एकजुटता और लड़ाकूपन का प्रदर्शन किया और न केवल बाग़ान मालिकों के भाड़े के गुण्डों को बल्कि पुलिस को भी पीछे हटने पर मज़बूर कर दिया। एक मौके पर दस हज़ार हथियारबन्द बाग़ान मज़दूरों और किसानों ने पुलिस बल को निश्शस्त्र होने के लिए मज़बूर कर दिया था। नक्सलबाड़ी में वर्ग-संघर्ष के विकास की दृष्टि से 1955-56 का यह दूसरा दौर विशेष महत्त्व रखता है। 1958-62 के काल को नक्सलबाड़ी में किसानों-मज़दूरों के संघर्ष के विकास का तीसरा दौर कहा जा सकता है। इस दौरान पश्चिम बंगाल किसान सभा ने `बेनामी´ ज़मीन पर किसानों द्वारा फिर से कब्ज़ा का नारा दिया। लेकिन सिलीगुड़ी की सबडिवीज़नल किसान समिति के नक्सलबाड़ी में हुए सम्मेलन ने इस आह्वान को वास्तविक भूमि-सुधार की उद्देश्य-पूर्ति के लिए अधूरा मानते हुए जोतदारों की ज़मीन की कुल उपज ज़ब्त करने का आह्वान किया। सम्मेलन ने किसानों का आह्वान किया कि वे सारी फसल काटकर अपनी जगहों पर रखें, मालिकाना का सबूत पेश करने पर ही किसान समितियाँ जोतदारों को उनका हिस्सा दें और पुलिस एवं जोतदारों से फसल को बचाने के लिए किसान हथियारबन्द हो जायें। इस आन्दोलन के दौरान, सिर्फ़ 1958-59 के वर्ष में दो हज़ार किसान गिरफ़्तार हुए और उन पर सात सौ आपराधिक मुकदमे पुलिस ने दर्ज किये। जोतदारों और पुलिस से किसानों की सशस्त्र झड़पें हुई और जोतदारों के हथियार छीनने की कई घटनाएँ घटीं। किसान 80 फीसदी फसल अपने कब्ज़े में लेने और उसका बड़ा हिस्सा पुलिस द्वारा छीने जाने से बचाने में सफल रहे।

पूरे आन्दोलन के दौरान एक भी नेतृत्वकारी संगठनकर्ता को पुलिस गिरफ़्तार नहीं कर पायी। चारु मजूमदार इस आन्दोलन से सीधे नहीं जुड़े थे। उसके संगठनकर्ता कानू सान्याल, जंगल सन्थाल, कदम मल्लिक आदि थे। चारु मजूमदार की एक नकारात्मक भूमिका यह ज़रूर रही थी कि राज्य किसान सभा के नेताओं के निर्देश पर, संघर्ष के नेताओं और भागीदार किसान कार्यकर्ताओं से सलाह-मशविरा किये बिना ही, उन्होंने संघर्ष वापस लेने की घोषणा कर दी थी। इसके बावजूद, नक्सलबाड़ी के किसान कमोबेश 1962 तक इस संघर्ष की उपलब्धियों की हिफ़ाज़त में सफल रहे।

1962-64 के दौर को नक्सलबाड़ी में किसानों के संघर्ष और उनके बीच पार्टी कार्य के विकास का चौथा दौर माना जा सकता है। 1962 के भारत-चीन सीमा-युद्ध के समय और उसके बाद के वर्षों में घनघोर अन्धराष्ट्रवाद और कम्युनिज्म-विरोध के माहौल में भी नक्सलबाड़ी क्षेत्र के कम्युनिस्ट कार्यकर्ता दृढ़तापूर्वक इस अवस्थिति पर खड़े रहे कि हमलावर चीन नहीं है और यह युद्ध साम्राज्यवादियों की शह और अपनी विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षा से भारतीय शासक वर्ग ने छेड़ा है। किसानों-मज़दूरों में कम्युनिस्टों की साख इतनी मज़बूत थी कि वे दृढ़तापूर्वक उनके साथ खड़े थे। उस समय सही अवस्थिति लेने वाले कम्युनिस्टों की गिरफ़्तारी की जो मुहिम चली थी, उसके तहत अकेले नक्सलबाड़ी में सौ किसान-मज़दूर गिरफ़्तार हुए थे। इन कठिन वर्षों में भी जोतदारों और टी-प्लाण्टरों के हमलों और सत्ता के दमन का मुकाबला करते हुए इस क्षेत्र के किसान-मज़दूर अपनी सांगठनिक ताकत को बनाये रखने में सफ़ल रहे थे। 1964 में दार्जीलिंग ज़िले के मज़दूर, किसान और मध्यवर्गीय कार्यकर्ताओं ने संशोधनवाद के विरुद्ध जमकर संघर्ष किया और डांगेपंथियों  को पूरी तरह से अलगाव में डाल दिया। सिलीगुड़ी सबडिवीज़न के कार्यकर्ता दृढ़तापूर्वक ख्रुश्चेवी संशोधनवाद का विरोध कर रहे थे और चीनी पार्टी के पक्ष का समर्थन कर रहे थे।

नक्सलबाड़ी में जोतदारों-बाग़ान मालिकों के बर्बर दमन की जो विशेष परिस्थितियाँ थीं और वहाँ के किसानों-मज़दूरों के बीच कम्युनिस्ट कतारों के काम और कम्युनिस्ट नेतृत्व में उनके जुझारू संघर्षों का जो डेढ़ दशक लम्बा इतिहास था, उसने नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह और उस पर क्रान्तिकारी कम्युनिज्म के विचारधारात्मक-राजनीतिक वर्चस्व-स्थापना का आधार तैयार किया था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जुझारू संघर्षों का यह सिलसिला ही स्वत: विकसित होकर 1967 में नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के रूप में सामने आया। ऐसा मानना स्वयंस्फूर्ततावादी भटकाव होगा। नक्सलबाड़ी सशस्त्र किसान विद्रोह महज़ एक विद्रोह नहीं था। वह एक क्रान्तिकारी किसान-उभार था, जिसका नेतृत्व क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों के हाथों में था। नक्सलबाड़ी ने संशोधनवाद को सहज वर्ग-प्रवृत्ति से ख़ारिज नहीं किया था, बल्कि उसके पीछे एक सचेतन विचारधारात्मक नेतृत्व की भूमिका थी, चाहे उस नेतृत्व की अपनी सैद्धान्तिक कमज़ोरियाँ-विसंगतियाँ जो भी रही हों। चारु मजूमदार की सकारात्मक और नकारात्मक भूमिका का सवाल इसी मुद्दे की विवेचना से जुड़ा हुआ है।

1964 में माकपा के गठन के बाद, पार्टी कांग्रेस के ठीक पहले पूरे पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारी हुई। अक्टूबर 1964 से लेकर 1965 के पूर्वार्द्ध तक सिलीगुड़ी सबडिवीज़न के लगभग सभी पार्टी कार्यकर्ता गिरफ़्तार किये जा चुके थे। चारु मजूमदार तबतक दिल की बीमारी से ग्रस्त हो चुके थे और बीमारी के कारण ही उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया गया था। बाद में, 1965 के अन्त में उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया। 1964 से जून, 1966 के बीच जेल में रहने के दौरान दार्जीलिंग ज़िले के पार्टी कार्यकर्ताओं ने माकपा नेतृत्व के संशोधनवाद को जानने-समझने का काम किया, उसके विरुद्ध दृढ़तापूर्वक स्टैण्ड लिया और इस नतीजे पर पहुँचे कि चीनी मार्ग ही भारतीय मुक्ति-संघर्ष का भी मार्ग होगा। जेल में बन्दी इन कार्यकर्ताओं ने संशोधनवाद के विरुद्ध अपनी राजनीतिक तैयारी भले की हो, लेकिन माकपा नेतृत्व के विरुद्ध उन्होंने कोई दस्तावेज़ लिखने और उसे कतारों के अन्य हिस्सों तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की। यदि वे जेल से बाहर होते तो ऐसा करते या नहीं करते, यह अटकल की बात है और इतिहास की वस्तुगत सच्चाइयों की जाँच-पड़ताल करते हुए इस अटकल का कोई महत्त्व नहीं है। चारु मजूमदार का यह योगदान असन्धिग्ध है कि उन्होंने आठ दस्तावेज़ लिखकर माकपा के नवसंशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद में एक बुनियादी भूमिका निभायी। हाँ, इस बहुप्रचलित धारणा को ज़रूर संशोधित करने की ज़रूरत है कि ऐसा करने वाले वह अकेले व्यक्ति थे। ठीक उसी समय `चिन्ता ग्रुप´ (आगे चलकर `दक्षिण देश´ ग्रुप) ने भी अपनी बुलेटिन के ज़रिये कलकत्ता में यह काम शुरू कर दिया था और यह बुलेटिन चारु की दस्तावेज़-श्रन्खला की तुलना में पश्चिम बंगाल की कतारों की अपेक्षाकृत बड़ी संख्या तक पहुँच रहा था। आगे चलकर नक्सलबाड़ी किसान-संघर्ष की चमक और उसके निर्माता के रूप में चारु मजूमदार और उनके आठ दस्तावेज़ों की ख्याति के चलते `चिन्ता´ ग्रुप के प्रयास अपने महत्त्व के समुचित मूल्यांकन से काफ़ी हद तक वंचित रह गये। जहाँ तक नक्सलबाड़ी किसान-संघर्ष के निर्माता के रूप में चारु की और उनके आठ दस्तावेजों की भूमिका का प्रश्न है, उसका सही मूल्यांकन उस समय के ठोस तथ्यों की पड़ताल के बाद ही किया जा सकता है। अत: उनकी हम यहाँ संक्षेप में चर्चा करेंगे।

फ़रवरी, से सितम्बर 1965 के बीच चारु मजूमदार ने तत्कालीन राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए और उन परिस्थितियों में कम्युनिस्टों के कार्यभारों का विश्लेषण करते हुए पाँच लेख लिखे : `वर्तमान स्थिति में हमारे कर्त्तव्य´, `संशोधनवाद के खिलाफ़ संघर्ष कर जनता की जनवादी क्रान्ति को सफ़ल बनायें´, `भारत के स्वत:स्फूर्त क्रान्तिकारी सैलाब का स्रोत क्या है´, `आधुनिक संशोधनवाद के खिलाफ़ संघर्ष चलाते जायें´ और `1965 किस सम्भावना का निर्देश दे रहा है।´ इसके बाद वे गिरफ़्तार कर लिये गये। जेल में बीमारी गम्भीर हो जाने के कारण उन्हें कलकत्ता के एक अस्पताल में भर्ती किया गया और वहीं से वे 7 मई 1966 को रिहा कर दिये गये। अगस्त, 1966 में उन्होंने अपना छठवाँ लेख लिखा। प्रसिद्ध `आठ दस्तावेज़ श्रँखला´ के इन छ: लेखों में चारु मजूमदार ने जो स्थापनाएँ दी थीं, संक्षेप में उनका उल्लेख यहाँ ज़रूरी है।

इन दस्तावेज़ों के अनुसार, किसान सभा और ट्रेड यूनियन के ज़रिये आंशिक माँगों पर आन्दोलन चलाते रहने के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलकर राजनीतिक सत्ता के लिए संघर्ष करना होगा। राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा का अर्थ सरकार पर कब्ज़ा करना नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष द्वारा इलाकावार सत्ता-दख़ल करना है। चीन का रास्ता ही भारत की मुक्ति का रास्ता है और सशस्त्र संघर्ष हमारा फ़ौरी कार्यभार है। इसके लिए क्रान्तिकारी कार्यकर्ता तैयार करने होंगे और गुप्त ढाँचा खड़ा करना होगा, फिर गुप्त सशस्त्र दस्ते बनाने होंगे, जोतदारों पर हमले करने होंगे, उनके घरों में आग लगानी होगी, फसल कब्ज़ा करनी होगी और हथियार एकत्र करने होंगे। राजनीतिक प्रचार एवं उद्वेलन की कार्रवाई की पूरी उपेक्षा करते हुए इन लेखों में यह स्थापना दी गयी थी कि `ऐक्शन´ (जोतदारों पर `काम्बैट ग्रुपों´ के सशस्त्र व्यक्तिगत हमलों) के प्रभाव से ही जन-गोलबन्दी की शुरुआत हो जायेगी। यद्यपि इन दस्तावेजों में जन संगठनों और जनान्दोलनों को उसी तरह से सुधारवादी-संशोधनवादी काम नहीं करार दिया गया था, जैसाकि चारु मजूमदार ने कमोबेश 1969 से कहना शुरू कर दिया था, लेकिन सशस्त्र जनसंघर्षों के विकास में जनआन्दोलनों की कोई भूमिका बताने की बजाय सीधे गुप्त सशस्त्र दस्तों के निर्माण और ऐक्शन से ही कार्रवाई की बात की गयी थी, यानी पार्टी के कार्यभारों में जनआन्दोलन संगठित करने की कार्रवाई और राजनीतिक प्रचार की कार्रवाई की सीधे-सीधे उपेक्षा की गयी थी और सीधे छापामार संघर्ष से शुरुआत की बात की गयी थी। दस्तावेज़ों में आर्थिक संघर्षों को ही अर्थवादी करार देते हुए उनकी आलोचना की गयी थी और कहा गया था कि मज़दूरों के आन्दोलनों को समर्थन देते हुए भी पार्टी ट्रेडयूनियन व कानूनी संघर्षों में अपना समय जाया नहीं करेगी। छठे दस्तावेज़ में माकपा को स्पष्ट शब्दों में एक संशोधनवादी पार्टी बताते हुए कतारों से उसके ढाँचे को तोड़कर नेतृत्व के विरुद्ध विद्रोह का आह्वान किया गया था और यह कहा गया था कि माकपा-नेतृत्व जनान्दोलनों को महज़ सरकार बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है और उसके कांग्रेस विरोधी संयुक्त मोर्चे के नारे का एकमात्र अर्थ है बुर्जुआ वर्ग का दुमछल्ला बनना। इसी दस्तावेज़ में यह भी स्पष्ट कहा गया था कि सोवियत पार्टी के संशोधनवाद की मुखालफ़त किये बिना क्रान्तिकारी संघर्ष आगे नहीं बढ़ सकता और आज की दुनिया में माओ ने लेनिन का स्थान ग्रहण कर लिया है, अत: उनका विरोध करने वाले वास्तव में संशोधनवाद के विरोधी नहीं हैं। दरअसल, इसकी पृष्ठभूमि में माकपा की केन्द्रीय कमेटी की हाल ही में हुई वह बैठक थी जिसमें एक प्रस्ताव पारित करके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा भारत सरकार की आलोचना को ग़लत ठहराया गया था और यह भी कहा गया था कि सोवियत नेतृत्व की आलोचना करना अभी उचित नहीं है क्योंकि इससे लोगों के मन में समाजवाद के प्रति भरोसा घट जायेगा। इसके अतिरिक्त इन दस्तावेज़ों में, भारतीय व्यवस्था के संकट, गहराते दमन और बढ़ते जनाक्रोश की चर्चा के साथ ही चीन और पाकिस्तान के खिलाफ़ भारतीय शासक वर्ग द्वारा अन्धराष्ट्रवादी लहर उभाड़ने की कड़ी निन्दा की गयी थी तथा सोवियत संघ के सहयोग से बने सार्वजनिक क्षेत्र को भारतीय एकाधिकारी पूँजीपति वर्ग के हित में खड़ा किया गया उपक्रम बताया गया था।

30 अगस्त ´66 को जारी चारु का छठा दस्तावेज़ `भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का माओवादी केन्द्र´ की ओर से जारी किया गया था। वस्तुत: इस नाम का केवल प्रतीकात्मक महत्त्व था क्योंकि ऐसा कोई केन्द्र उस समय तक अस्तित्व में नहीं आया था और इस दस्तावेज़ का लेखन अकेले चारु ने ही किया था। चारु मजूमदार के पहले लेख से ही दार्जीलिंग की कम्युनिस्ट कतारों के बीच (जो जेल से बाहर थे), बहस की शुरुआत हो चुकी थी। चारु के जेल जाने तक उनके पाँच दस्तावेज़ सीमित लोगों तक ही पहुँच सके थे। मई में जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने चुने हुए पाँच छ: युवा कार्यकर्ताओं को पाँच दस्तावेज़ों में निरूपित लाइन के प्रचार के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भेजा। बुर्जुआ प्रेस में भी इन दस्तावेज़ों की ख़बरें प्रकाशित हुई और इस तथ्य से अन्य इलाके के माकपा कार्यकर्ता और जेल में बन्दी लोग भी परिचित हुए।

अगस्त 1966 तक प्रकाशित छ: दस्तावेज़ों की अन्तर्वस्तु पर यदि ग़ौर करें तो अन्तरराष्ट्रीय संशोधनवाद और माकपा के नवसंशोधनवाद से रैडिकल विच्छेद की इनमें दो टूक शब्दों में चर्चा की गयी थी और माओ विचारधारा को क्रान्तिकारी विचारधारा के रूप में स्थापित किया गया था। यह इनका मुख्य सकारात्मक पहलू था। लेकिन साथ ही, ये दस्तावेज़ भारतीय परिस्थितियों का अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति का कार्यक्रम निर्धारित करने के कार्यभार की जगह उसे तयशुदा मानकर चलते थे और यह विचार रखते थे कि भारतीय क्रान्ति का रास्ता पूरी तरह से चीनी क्रान्ति का रास्ता होगा। पर चीनी क्रान्ति में सशस्त्र छापामार युद्ध का रास्ता क्रान्तिकारी जनदिशा के आधार पर विकसित हुआ था, जबकि चारु मजूमदार जनकार्रवाइयों की उपेक्षा करते हुए शुरू से ही गुप्त सशस्त्र दस्तों के निर्माण और उनके `ऐक्शन´ पर ज़ोर दे रहे थे और इन्हीं के द्वारा जन-गोलबन्दी पर बल दे रहे थे। उनके अनुसार, चूँकि इन कार्रवाइयों को व्यापक जन समुदाय का समर्थन प्राप्त होगा, अत: इन्हें आतंकवाद नहीं कहा जा सकता। यही लाइन आगे चलकर नग्न “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन के रूप में सामने आयी, लेकिन वस्तुत: इस भटकाव के तत्त्व इन छह दस्तावेज़ों में ही स्पष्ट रूप में मौजूद थे।

जेल से दार्जीलिंग के पार्टी कार्यकर्ताओं की रिहाई के बाद, सिलीगुड़ी लोकल कमेटी के नेतृत्वकारी संगठनकर्ताओं के साथ चारु मजूमदार की बातचीत हुई। उनमें इस बात पर आम सहमति बनी कि माकपा के संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष करना होगा, भारत की मुक्ति का रास्ता चीन का रास्ता होगा, भूमि क्रान्ति को सशस्त्र संघर्ष के ज़रिये ही पूरा किया जा सकता है तथा, भूमि क्रान्ति की राजनीति का किसानों-मज़दूरों के बीच प्रचार करना होगा, उन्हें संगठित करना होगा और गुप्त पार्टी संगठन का निर्माण करना होगा। लेकिन कानू सान्याल सहित लोकल कमेटी के पार्टी संगठनकर्ताओं का विचार था कि मज़दूरों और किसानों के जन संगठन और जनान्दोलन अपरिहार्य हैं, राजनीतिक काम सशस्त्र कार्रवाई की तैयारी की अनिवार्य पूर्वशर्त है, `पॉलिटिक्स इन कमाण्ड´ के बिना `ऐक्शन´ का कोई मतलब नहीं है, जन संघर्षों के द्वारा ही संघर्ष के उच्चतर रूप विकसित किये जा सकते हैं और शहरी क्षेत्रों में भी जनसंगठन बनाने होंगे। चारु मजूमदार इस विचार से सहमत नहीं थे। ऐसी स्थिति में यह समझौता हुआ कि सिलीगुड़ी लोकल कमेटी के संगठनकर्ता नक्सलबाड़ी में अपनी लाइन लागू करेंगे और चारु मजूमदार की लाइन को उनके पक्षधर नये कार्यकर्ता नक्सलबाड़ी से सटे पश्चिमी दिनाजपुर ज़िले के चतरहाट-इस्लामपुर इलाके में लागू करेंगे।

चतरहाट-इस्लामपुर में चारु मजूमदार के छ: दस्तावेज़ों के आधार पर काम की शुरुआत हुई। गुप्त दस्तों ने कुछ जोतदारों के घरों को जलाया और कुछ फसल भी रात में काट ली गयी। जनसंगठन बनाने या जनान्दोलन की कोई कोशिश नहीं की गयी। जल्दी ही `कॉम्बैट ग्रुप´ लुम्पन तत्त्वों के जमावड़े बनने लगे। 1967 में, जब नक्सलबाड़ी उभार शिखर पर था, उस समय चतरहाट-इस्लामपुर में जोतदारों ने गुप्त `कॉम्बैट ग्रुपों´ के ज्ञात सदस्यों के घरों पर संगठित होकर हमला किया। पूरी किसान आबादी ने उनका समर्थन किया। ग्रुपों के कार्यकर्ता किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये और ये गुप्त दस्ते जल्दी ही बिखर गये। इस तरह चारु की लाइन का पहला प्रयोग बुरी तरह विफल रहा।

नक्सलबाड़ी में जनदिशा लागू की गयी। ज़िला कमेटी में बहुमत को पक्ष में करने के लिए क्रान्तिकारी पार्टी कार्यकर्ताओं ने माकपा के भीतर विचारधारात्मक संघर्ष चलाने का निर्णय लिया। ज़िला कमेटी के 26 सदस्यों में से 20 ने सिलीगुड़ी लोकल कमेटी की राजनीतिक लाइन को स्वीकार किया और फिर ज़िला कमेटी के भीतर एक गुप्त कमेटी का गठन किया गया। व्यापक प्रचार के बाद, दार्जीलिंग ज़िले के पहाड़ी और मैदानी इलाके के ज्यादातर बाग़ान मज़दूर गुप्त ज़िला कमेटी की राजनीतिक लाइन का समर्थन करने लगे थे। संशोधनवादी यूनियन नेताओं से असन्तुष्ट बाग़ान मज़दूर आर्थिक माँगों को लेकर जुझारू संघर्ष के लिए कमर कसने लगे। 1966 के उत्तरार्द्ध का पूरा समय ऐसा था जब दार्जीलिंग ज़िले में नक्सलबाड़ी किसान उभार की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी। सितम्बर 1966 में चाय उद्योग में हुई नौ दिनों की आम हड़ताल इस दौर की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। जलपाईगुड़ी ज़िले में हड़ताल जब टूटने की ओर अग्रसर थी, उस समय भी दार्जीलिंग में मज़दूर डटे हुए थे। लाल झण्डा यूनियन के मज़दूरों के साथ ही अन्य यूनियनों के मज़दूर और बाग़ानों के असंगठित मज़दूर भी हड़ताल में शामिल हो गये थे। इससे भयभीत संशोधनवादी नेता पूरी कोशिश कर रहे थे कि कोई `सेटलमेण्ट´ हो जाये। दार्जीलिंग में 25,000 से अधिक मज़दूरों ने दमन करने आयी पुलिस का जमकर मुकाबला किया जिसमें पुलिस की गोली से एक मज़दूर शहीद हुआ। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान, खेती-बाड़ी के व्यस्त समय के कामों के बावजूद, नक्सलबाड़ी के किसान दृढ़तापूर्वक हड़ताली मज़दूरों का साथ देते रहे। पुलिस के साथ कई बार उनकी झड़प भी हुई। बिना किसी बुनियादी माँग के पूरा हुए, हड़ताल वापस लेने की वजह से संशोधनवादी मज़दूरों में एकदम अलग-थलग पड़ गये। गुप्त ज़िला कमेटी और लोकल कमेटी के कार्यकर्ताओं ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाया। प्लाण्टेशन यूनियनों की शाखा सम्मेलनों ने भूमि क्रान्ति के कार्यक्रम के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। पर्वतीय क्षेत्र के चाय बाग़ान मज़दूरों के वार्षिक सम्मेलन ने संशोधनवादी नेताओं की कठोर निन्दा करते हुए उन्हें ट्रेड यूनियनों से निकाल बाहर किया। नक्सलबाड़ी के प्लाण्टेशन मज़दूरों के वार्षिक सम्मेलन ने भूमि-संघर्ष शुरू करने के लिए किसानों का आह्वान करते हुए प्रस्ताव पारित किया। इस तरह, चारु मजूमदार की “वाम” संकीर्णतावादी लाइन का विरोध करते हुए नक्सलबाड़ी में और समग्रता में दार्जीलिंग ज़िले में, कानू सान्याल और अन्य पार्टी संगठनकर्ताओं ने जो लाइन लागू की, उसके परिणामस्वरूप इलाके में मज़दूरों और किसानों का जुझारू और मज़बूत संश्रय अस्तित्व में आया, पुरानी ट्रेड यूनियनों और जनसंगठनों पर क्रान्तिकारी लाइन का वर्चस्व स्थापित हुआ और नयी यूनियनों व अन्य जनसंगठनों का निर्माण हुआ। मज़दूर-किसान संश्रय की मज़बूती को इस बात से समझा जा सकता है कि नक्सलबाड़ी उभार के दौरान चाय बाग़ानों के मज़दूरों ने उसके समर्थन में तीन बार आम हड़तालें की थीं।

`आठ दस्तावेज़ श्रँखला´ के सातवें और आठवें दस्तावेज़ – `संशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष कर सशस्त्र पार्टीजन संघर्ष गठित करें´ और `संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष करके ही किसान संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा´ – चारु मजूमदार ने दार्जीलिंग ज़िले में, और विशेषकर सिलीगुड़ी के नक्सलबाड़ी क्षेत्र में मज़दूरों-किसानों के जनान्दोलनों की उपरोक्त घटनाओं के बाद लिखे। सातवाँ दस्तावेज़ फ़रवरी 1967 के आम चुनाव के ठीक पहले और आठवाँ दस्तावेज़ अप्रैल, 1967 में लिखा गया। दार्जीलिंग में विरोधी लाइन के सफल व्यवहार ने चारु मजूमदार को विवश किया कि वे अपने इन दस्तावेज़ों में खुली जनकार्रवाइयों, आर्थिक संघर्षों और राजनीतिक प्रचार की कार्रवाई का महत्त्व स्वीकार करें, लेकिन ये दस्तावेज़ भी अतिवामपन्थी भटकाव से मुक्त नहीं थे। इन दस्तावेज़ों में जनता को संगठित करने के प्रारम्भिक चरण से ही हथियार संग्रह और गुप्त सशस्त्र दस्ते संगठित करने की बात की गयी थी, जनकार्रवाइयों की और जनसंगठन बनाने की कोई स्पष्ट योजना नहीं रखी गयी थी, उन्हें प्रकारान्तर से सशस्त्र कार्रवाइयों की पूरक मात्र का दर्जा दे दिया गया था, क्रान्तिकारी शहरी मध्यवर्ग और मज़दूर वर्ग के समक्ष उनके वर्गीय माँगों पर संघर्ष या साझा संघर्ष का कोई कार्यक्रम नहीं रखा गया था, उनका एकमात्र कार्यभार भूमि संघर्ष का समर्थन करना और उसमें भागीदारी करना बताया गया था, तथा भूमि क्रान्ति के ठोस कार्यक्रम और नारे तय करने की आवश्यकता की जगह बस सशस्त्र दस्तों के द्वारा भूस्वामियों की फसल और ज़मीन पर कब्ज़े की बात की गयी थी। इन दस्तावेज़ों का सकारात्मक पक्ष यह था कि इनमें एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन पर ठोस रूप में ज़ोर दिया गया था तथा माकपा नेतृत्व की वर्ग सहयोगवादी राजनीति और हर प्रकार के संशोधनवाद के विरुद्ध समझौताहीन संघर्ष करते हुए किसान संघर्ष को आगे बढ़ाने की बात की गयी थी। आने वाले समय ने यह सिद्ध किया कि चारु ने जनदिशा पर सफल अमल और उससे निर्मित माहौल के दबाव में बस थोड़े समय के लिए अपने कदम पीछे खींच लिये थे, अन्यथा अपनी लाइन पर वे सर्वथा सुसंगत और दृढ़ थे। नक्सलबाड़ी में जनदिशा का नेतृत्व करने वाले लोगों की विचारधारात्मक कमज़ोरी के कारण जैसे ही आन्दोलन में गतिरोध पैदा हुआ, वैसे ही चारु ने विकल्प के तौर पर अपनी लाइन आगे बढ़ा दी, हर प्रकार के खुले, कानूनी और आर्थिक संघर्ष के रूपों, जनान्दोलनों और जनसंगठनों को संशोधनवाद बताते हुए गुप्त सशस्त्र दस्ते बनाकर वर्ग-शत्रुओं के सफाये को ही छापामार-युद्ध घोषित कर दिया और अत्यन्त भोंड़े विकृत रूप में आतंकवादी लाइन पेश की। लेकिन यह अभी आगे की बात है।

1966 में दार्जीलिंग ज़िले में, विशेषकर नक्सलबाड़ी क्षेत्र में संशोधनवाद के विरुद्ध जो संघर्ष चल रहा था और मज़दूरों-किसानों के जो जुझारू संघर्ष लगातार विकसित हो रहे थे, सिलीगुड़ी लोकल कमेटी का नेता और दार्जीलिंग ज़िला कमेटी का सदस्य होने के नाते इन सबमें नेतृत्वकारी भूमिका चारु मजूमदार की ही मानी जा रही थी। संशोधनवादी, दार्जीलिंग के बाहर की कम्युनिस्ट कतारें और बुर्जुआ दायरे के लोग भी यही समझ रहे थे। चारु मजूमदार और नक्सलबाड़ी के स्थानीय संगठनकर्ताओं के बीच के मतभेद की जानकारी दार्जीलिंग ज़िला कमेटी के भीतर काम कर रही `गुप्त कमेटी´ तक ही सीमित थी। अक्टूबर, 1966 में माकपा राज्य कमेटी और केन्द्रीय कमेटी के कुछ नेतागण चारु मजूमदार को समझाने सिलीगुड़ी आये, पर उन्होंने उनकी बात मानने से इन्कार कर दिया। इसके पहले जुलाई, 1966 में भी बंगाल राज्य कमेटी के सचिव प्रमोद दास गुप्त उन्हें समझाने-बुझाने के लिए सिलीगुड़ी आये थे और विफल लौट गये थे।

नवम्बर, 1966 में दार्जीलिंग ज़िले में एक किसान सम्मेलन हुआ जिसमें यह तय हुआ कि बटाईदार किसान फसल का कोई भी हिस्सा जोतदारों को नहीं देंगे। फ़रवरी, 1967 में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें जंगल सन्थाल और सौरेन बसु को क्रमश: फाँसीदेवा और सिलीगुड़ी से पार्टी का टिकट मिला। इस चुनाव के मसले पर भी दार्जीलिंग के पार्टी कार्यकर्ताओं और कुछ नये कार्यकर्ताओं में मतभेद था। दार्जीलिंग के कार्यकर्ताओं का निर्णय था कि इस चुनाव का इस्तेमाल क्रान्तिकारी राजनीति के प्रचार के लिए किया जाये और ऐसा ही किया गया। इसका पर्याप्त लाभ मिला। चुनाव के ठीक बाद, बटाईदारों ने जोतदारों के विरुद्ध फसल-ज़ब्ती का आन्दोलन शुरू कर दिया। किसानों के कई इलाका सम्मेलन हुए जिनमें जोतदारों के कब्ज़े की ज़मीन ज़ब्त करने का आन्दोलन शुरू करने के लिए प्रस्ताव पारित किये गये। 7 मई 1967 को सिलीगुड़ी सबडिवीजनल किसान सम्मेलन हुआ जिसमें यह निर्णय लिया गया कि किसान जोतदारों की ज़मीन पर कब्ज़ा और किसान समितियों के माध्यम से उनके पुनर्वितरण का काम शुरू कर दें, जोतदारों के प्रतिरोध का मुकाबला करने के लिए हथियारबन्द हो जायें और गाँवों में किसान समितियाँ प्रशासन का काम अपने हाथों में ले लें। इस समय तक पश्चिम बंगाल में ग़ैरकांग्रेसी दलों की संयुक्त मोर्चे की सरकार सत्तारूढ़ हो चुकी थी जिसमें माकपा सबसे बड़ी पार्टनर थी और उसका चरित्र ज्यादा से ज्यादा नंगा होता जा रहा था। 8 मई से नक्सलबाड़ी, खेरीबाड़ी, फाँसीदेवा और सिलीगुड़ी थानों के कई गाँवों से किसान-विद्रोह की शुरुआत हो गयी।

नक्सलबाड़ी किसान-उभार के विस्तार में जाने से पहले यह ज़रूरी है कि प. बंगाल में और देश के अन्य हिस्सों में माकपा के नवसंशोधनवाद के विरुद्ध संघर्ष और विद्रोह की जो प्रक्रिया 1964 से लगातार आगे बढ़ रही थी, उसकी चर्चा के छूटे हुए सिरे को पकड़कर आगे बढ़ायें। ऊपर हमने कन्हाई चटर्जी-अमूल्य सेन के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट ग्रुप की और उसके द्वारा प्रकाशित `चिन्ता´ बुलेटिन के छ: अंकों की चर्चा की है। `चिन्ता´ ने अपने अंकों में प्रकाशित लेखों में भूमि क्रान्ति के प्रश्न को और इसे पूरा करने के लिए सशस्त्र संघर्ष की अपरिहार्यता को, क्रान्ति के दीर्घकालिक लोकयुद्ध के मार्ग के प्रश्न को, भारतीय राष्ट्र के नवऔपनिवेशिक चरित्र के प्रश्न को और संशोधनवाद के विरुद्ध विचारधारात्मक संघर्ष के प्रश्न को व्यवस्थित ढंग से उठाया। कतारों के बीच वितरित होने वाला यह गुप्त प्रकाशन काफ़ी लोकप्रिय हो रहा था और बंगाल में संशोधनवादियों के लिए खासा सिरदर्द पैदा कर रहा था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि माकपा के केन्द्रीय मुखपत्र `पीपुल्स डेमोक्रेसी´ और `स्वाधीनता´ में तथा राज्य कमेटी के मुखपत्र `देशहितैषी´ में `चिन्ता´ के लेखों के विरुद्ध कई लेख प्रकाशित हुए। 1966 के मध्य में `चिन्ता´ से जुड़े या उससे मिलते-जुलते विचार रखने वाले पश्चिम बंगाल के कई क्रान्तिकारी कार्यकर्ताओं को “उग्रवादी” करार देकर संगठन से बाहर कर दिया गया। तब बहस को और व्यापक स्तर पर आम कतारों तक पहुँचाने के लिए कन्हाई चटर्जी-अमूल्य सेन के ग्रुप ने `दक्षिण देश´ नामक खुली पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। 1966 से लेकर अक्टूबर 1969 में `माओवादी कम्युनिस्ट केन्द्र´ के गठन तक `दक्षिण देश´ पत्रिका ने साम्राज्यवाद, नवउपनिवेशवाद, सोवियत सामाजिक साम्राज्यवाद, भारतीय राष्ट्र के चरित्र, भारतीय क्रान्ति की रणनीति और रणकौशल सम्बन्धी समस्याओं, क्रान्तिकारी प्रचार कार्य की जनदिशा, छापामार संघर्ष, संशोधनवाद, अर्थवाद, संसदवाद, स्वत:स्फूर्ततावाद आदि विषयों पर कई महत्त्वपूर्ण लेख छापे। इन लेखों ने माकपा के संशोधनवाद के विरुद्ध कतारों की शिक्षा में विशेष मदद की। साथ ही, इसी पत्रिका के ज़रिये दक्षिण देश ग्रुप ने आगे चलकर ए.आई.सी.सी.सी.आर. पर हावी चारु मजूमदार गुट की लाइन की परोक्ष आलोचना रखते हुए मतभेद के प्रश्नों पर अपनी अवस्थिति भी रखी। इस कालखण्ड की चर्चा लेख में आगे आयेगी। पत्रिका ने इस ग्रुप के आरम्भिक राजनीतिक सुदृढ़ीकरण में काफी सहायता की और इसकी अवस्थिति से सहमत कार्यकर्ताओं को लेकर एक प्रारिम्भक सांगठनिक ढाँचा भी खड़ा हो गया, जिन्हें लेकर मज़दूरों, छात्रों, बुद्धिजीवियों के बीच कामों की शुरुआत हुई। 1966 के अन्त से इस ग्रुप ने 24 परगना ज़िले के सोनारपुर इलाके में किसानों के बीच काम की शुरुआत की जहाँ 1967 के अक्टूबर में, नक्सलबाड़ी विद्रोह के पाँच महीने बाद किसानों का सशस्त्र संघर्ष भड़क उठा जिसे मोर्चा सरकार के बर्बर पुलिस दमन का सामना करना पड़ा।

1966 में ही बंगाल में स्वत:स्फूर्त ढंग से खाद्य आन्दोलन की शुरुआत हुई, जो विशेष रूप से कलकत्ता और निकटवर्ती क्षेत्रों में अधिक तेज़ था। उस समय माकपा के, बंगाल के केन्द्रीय और राज्य स्तरीय नेताओं की पूरी पुरानी पीढ़ी जेल में थी और पार्टी गतिविधियों के संचालन के लिए लगभग सभी युवा और नये चेहरों को लेकर एक नया राज्य स्तरीय नेतृत्व संगठित किया गया था। इस नये नेतृत्व ने खाद्य आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए सभी वाम पार्टियों का एक संयुक्त मोर्चा बनाया। लेकिन इस मोर्चे के नेता स्वयंस्फूर्त आन्दोलन को नेतृत्व देने की बजाय जनता के पीछे-पीछे रेंग रहे थे। जबर्दस्त पुलिस दमन से आन्दोलन तो बिखर गया, लेकिन माकपा के नये राज्यस्तरीय नेतृत्व की युवा पीढ़ी ने इसके समाहार के आधार पर, अन्य वाम दलों को छोड़कर, स्वयं अपने बूते पर इस आन्दोलन को पुनस्संगठित करने और आगे ले जाने की एक योजना बनायी। यह तय किया गया कि आन्दोलन को विस्तारित करके गाँवों तक ले जाया जाये, भूस्वामियों की फसल बलपूर्वक ज़ब्त करने का नारा दिया जाये और प्रभावी प्रतिरोध की तैयारी के लिए ज़रूरी संगठन खड़े किये जायें। इसी समय पुरानी पीढ़ी के नेतागण जेल से छूटकर बाहर आये। शहीद मैदान मीनार में जनता का गर्मजोशी भरा अभिनन्दन स्वीकार करते हुए इन नेताओं ने खाद्य आन्दोलन में जनता की जुझारू भागीदारी की प्रशंसा की और आन्दोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प प्रकट किया। लेकिन मंच से नीचे उतरते ही उन्होंने आगामी फ़रवरी, 1967 में होने वाले चौथे आम चुनाव में संयुक्त मोर्चा बनाकर भागीदारी करने के लिए भाकपा नेताओं के साथ बन्द कमरों में मीटिंगें शुरू दीं। यह कतारों में व्याप्त भावना के एकदम विपरीत था, जो भाकपा को दुश्मन से कम कुछ भी नहीं समझती थीं। खाद्य आन्दोलन के जुझारू तेवर को भूख हड़ताल का नरम रास्ता अपनाकर कुन्द बनाने के भाकपा के प्रयासों का अनुभव अभी ताज़ा ही था। नतीजतन, कतारों ने पुराने नेतृत्व की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी। जो नया युवा नेतृत्व था, उसने देखा कि जेल से लौटने के बाद पुरानी पीढ़ी के नेता `देशहितैषी´ और `नन्दन´ के सम्पादकमण्डल के कामों में कदम-कदम पर हस्तक्षेप कर रहे हैं और रोक लगा रहे हैं जो रैडिकल क्रान्तिकारी लाइन पर प्रचार-कार्य को जारी रखना चाहता था। खाद्य आन्दोलन में भाकपा की भूमिका को उजागर करने के लिए मार्क्सवाद-लेनिनवाद संस्थान की ओर से प्रकाशित पुस्तिका `भूख हड़ताल का दर्शन´ के वितरण को रोक देने का निर्देश जारी किया गया। जेल जाने से पहले मार्क्सवाद-लेनिनवाद संस्थान की शुरुआत का जिस नेतृत्व ने स्वागत किया था और समर्थन दिया था, उसी ने बाहर आने के बाद इसके कामों को तरह-तरह से रोकना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि बुनियादी मार्क्सवाद की विभिन्न स्तरों पर चलने वाली कक्षाएँ भी रोक दी गयीं और कहा गया कि कक्षाओं में केवल पार्टी कार्यक्रम के सूत्रों के औचित्य की ही व्याख्या की जानी चाहिए। खाद्य आन्दोलन को जुझारू ढंग से आगे बढ़ाने की सारी योजनाओं को स्थगित कर दिया गया। यहाँ तक कि जनता की क्रान्तिकारी पहलकदमी को खोलने वाले स्थानीय आंशिक संघर्षों को भी तरह-तरह की तिकड़मों से और नौकरशाहाना तौर-तरीकों से रोका जाने लगा। इन सभी कार्रवाइयों के चलते, माकपा के गठन के समय से ही जारी अन्तर्पार्टी संघर्ष और अधिक गहरा हो गया। भाकपा के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिशें चुनाव के पहले तो परवान नहीं चढ़ सकीं लेकिन चुनाव के बाद भाकपा, कांग्रेस से अलग होकर बनी बांगला कांग्रेस और सभी ग़ैर कांग्रेसी विपक्षी दलों को साथ लेकर माकपा ने संयुक्त मोर्चे की सरकार बनायी जिसमें गृह और पुलिस विभाग के मन्त्री ज्योति बसु बने। माकपा नेतृत्व का एकमात्र तर्क यह था कि मोर्चे की सरकार में पार्टी के शामिल होने से रैडिकल भूमि-सुधारों के लिए संघर्ष सहित वर्ग संघर्ष को गति मिलेगी और पुलिस दमन से जनता का बचाव होगा। लेकिन कतारों के सामने पार्टी नेतृत्व का संशोधनवादी-संसदवादी-अर्थवादी और नौकरशाह-चरित्रा ज्यादा से ज्यादा नंगा होता जा रहा था। नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के फूट पड़ने की घटना और राज्य सरकार द्वारा उसके बर्बर पुलिस दमन ने माकपा नेतृत्व को कतारों के सामने पूरी तरह से नंगा कर दिया था। 1967-68 के दौरान कलकत्ता और कुछ ज़िलों में तो ऐसी स्थिति थी कि यदि नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद गठित `कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी´ (ए.आई.सी.सी.सी.आर.) में चारु की वामपन्थी आतंकवादी लाइन हावी नहीं होती और यदि जनसंगठनों और जनकार्रवाइयों का पूर्ण परित्याग नहीं किया जाता तो मज़दूरों, किसानों, छात्रों, बुद्धिजीवियों के मोर्चे पर कार्यरत कतारों का बहुलांश क्रान्तिकारी धारा के साथ आ खड़ा होता और माकपा के लिए कम से कम प. बंगाल में, अस्तित्व का संकट पैदा हो जाता।

ज्ञातव्य है कि कलकत्ता में 1965 से ही माकपा के भीतर सुशीतल राय चौधरी, सरोज दत्त, परिमल दास गुप्त, असित सेन, प्रमोद सेनगुप्त आदि ने `अन्तर्पार्टी संशोधनवाद विरोधी कमेटी´ बना रखी थी। इस कमेटी से चारु मजूमदार ने 1966 के मध्य में सम्पर्क स्थापित कर लिया था। `पार्टी के भीतर पार्टी बनाने´ का नारा उन दिनों खूब प्रचलित हुआ था और माकपा के भीतर इसी तरह के संशोधनवाद-विरोधी ग्रुप बंगाल के विभिन्न अंचलों के अतिरिक्त आन्ध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में भी अस्तित्व में आ चुके थे। 1966 के अन्त में दार्जीलिंग ज़िले के क्रान्तिकारी धड़े के साथ `दक्षिण देश ग्रुप´ का भी सम्पर्क स्थापित हो चुका था और 1967 के प्रारम्भ में चारु मजूमदार के साथ उनकी लम्बी बातचीत हुई। दक्षिण देश ग्रुप चुनाव में जंगल सन्थाल और सौरेन बसु को प्रत्याशी बनाये जाने के निर्णय से सहमत नहीं था, बावजूद इसके संशोधनवाद-विरोधी संघर्ष को व्यापक बनाने, किसानों के बीच यथाशक्ति काम को मज़बूत बनाने और परस्पर घनिष्ठ सम्पर्क रखने पर दोनों पक्षों में सहमति बनी थी।

8 मई 1967 की सुबह, नक्सलबाड़ी और निकटवर्ती तीन थानों के कुछ गाँवों से एक साथ किसान विद्रोह की शुरुआत हुई। बड़ी संख्या में तीर-धनुष से लैस किसान लाल झण्डा उड़ाते हुए जोतदारों के कब्ज़े की ज़मीनों और फसलों पर कब्ज़ा करने लगे। उनकी बन्दूकें भी ज़ब्त की जाने लगीं। इसी दौरान नक्सलबाड़ी थाने के एक गाँव में घटने वाली एक छोटी-सी घटना ने संघर्ष को नया मोड़ दे दिया। बिगुल नामक एक भूमिहीन किसान को दीवानी अदालत से कुछ ज़मीन पर अधिकार मिला था जिसे स्थानीय जोतदार ईश्वर टिर्की ने मार-पीटकर बेदखल करने की कोशिश की। इस पर स्थानीय किसानों ने एकजुट होकर ईश्वर टिर्की के लठैतों को मार भगाया। ख़बर मिलते ही, हमेशा की तरह 23 मई ´67 को किसानों को सबक सिखाने और जोतदार की मदद करने जब पुलिस पहुँची तो तीर-धनुष से लैस तीन हज़ार किसानों ने उसे घेर लिया। इस झड़प में कई लोग घायल हुए जिनमें पुलिस टुकड़ी के भी तीन आदमी थे। इनमें से इंस्पेक्टर सुनाम वांगदी की दो दिनों बाद अस्पताल में मौत हो गयी। विद्रोही किसानों को कुचलने के लिए उसी दिन, यानी 25 मई को पुलिस की एक बड़ी सशस्त्र टुकड़ी फिर गाँव में पहुँची। उस समय वहाँ किसान विद्रोह के पक्ष में स्त्रियों का एक जुलूस निकल रहा था, जिस पर पुलिस ने अन्धाधुन्ध फायरिंग की। इसमें सात स्त्रियों और दो बच्चों सहित दस लोग शहीद हो गये। इस घटना ने बारूद की ढेरी में पलीता लगाने का काम किया। देखते ही देखते पूरे नक्सलबाड़ी में विद्रोह की आग धधकने लगी। ज़मीन और फसल पर कब्ज़े की मुहिम तेज़ हो गयी। हज़ारों की तादाद में किसान जगह-जगह एकत्र होते थे, जोतदारों की ज़मीन पर झण्डे गाड़ते थे और ज़ालिम जोतदारों के घरों पर भी धावा बोलते थे। नक्सलबाड़ी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। 25 मई हत्याकाण्ड के विरोध में चाय बाग़ान मज़दूरों ने हड़ताल कर दी। सिलीगुड़ी में रेल और बिजली मज़दूरों का एक बड़ा जुलूस निकला। शिक्षक, छात्र और आम मध्यवर्ग के लोग भी सड़क पर उतरे। सत्तारूढ़ माकपाई संशोधनवादियों में बदहवासी का आलम था। राज्य के तत्कालीन भूमि और भू-राजस्व मन्त्री हरे कृष्ण कोनार एक और मन्त्री, भाकपा के विश्वनाथ मुखर्जी को साथ लेकर भागे-भागे सिलीगुड़ी पहुँचे। कोनार अभी हाल ही में वियतनाम से वर्ग संघर्ष के अनुभवों से “लैस” होकर लौटे थे! भूमि-प्रश्न के पुराने विशेषज्ञ थे। नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह की गम्भीर स्थिति से निपटने के लिए उनसे अधिक उपयुक्त व्यक्ति भला और कौन हो सकता था! कोनार सिलीगुड़ी पहुँचकर न तो दार्जीलिंग ज़िला कमेटी के लोगों से और न ही सिलीगुड़ी के किसान संगठनकर्ताओं से मिले। इसकी जगह सुखना फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में शीर्ष पुलिस अधिकारियों के साथ गुप्त बैठक करके वे लौट गये। उधर माकपा के राज्यस्तरीय नेताओं ने सिलीगुड़ी के कई दौरे किये और भूमिगत किसान नेताओं के आत्मसमर्पण की कोशिशें करते रहे। उनका तर्क वही पुराना था कि चूँकि वे अब मन्त्रीमण्डल में हैं, इसलिए आन्दोलन वापस ले लिये जाने पर किसानों की शिकायतें दूर कर दी जायेंगी। लेकिन कार्यकर्ताओं को संशोधनवादी नेतृत्व पर अब रत्ती भर भी भरोसा नहीं रह गया था। ग़ौरतलब है कि माकपा नेताओं ने किसानों की हत्या पर कोई भी शोक नहीं जतलाया। इसके उलट, प्रमोद दासगुप्त ने बयान दिया कि इंस्पेक्टर सुनाम वांगदी की हत्या की प्रतिक्रिया में पुलिस ने उक्त कार्रवाई की थी।

आन्दोलन वापस लिये जाने की सरकारी कोशिशों की विफलता के बाद एक पखवारे का समय भी न बीता था कि राज्य पुलिस और केन्द्र सरकार के अर्द्धसैनिक बलों ने नक्सलबाड़ी में प्रचण्ड दमन चक्र की शुरुआत कर दी। दो हज़ार से भी कुछ अधिक लोग गिरफ़्तार कर लिये गये। फिर भी कानू सान्याल और जंगल सन्थाल सहित कुछ नेतृत्वकारी संगठनकर्ता भूमिगत रहकर संघर्ष को जारी रखने की कोशिश करते रहे। जंगल सन्थाल कुछ महीनों बाद गिरफ़्तार हुए। कानू सान्याल डेढ़ वर्ष बाद गिरफ़्तार किये जा सके। पूरे इलाके में आतंक-राज कायम किये जाने के बावजूद, इस किसान उभार को कुचलने में सरकार को तीन महीने से भी कुछ अधिक समय लग गया।

इस जन-विद्रोह ने नक्सलबाड़ी के किसानों की क्रान्तिकारी पहलकदमी और सर्जनात्मकता को निर्बन्ध कर दिया। `नक्सलबाड़ी कृषक समिति´ द्वारा निर्धारित फ़ौरी कार्यक्रम को लागू करते हुए किसानों ने जोतदारों के कब्ज़े की ज़मीन को अपने कब्ज़े में लेकर किसान समितियों के माध्यम से उसका पुनर्वितरण शुरू कर दिया। भू-स्वामित्व सम्बन्धी पुराने सरकारी काग़ज़ात और क़र्ज़ सम्बन्धी काग़ज़ात को सार्वजनिक सभाओं में जला दिया गया। जोतदारों और सूदखोरों के कर्जों को रद्द कर दिया गया और क़र्ज़ के एवज में गिरवी पड़ी ज़मीनें व अन्य सामान किसानों को वापस कर दिये गये। जोतदारों द्वारा जमा किया गया अनाज और किसानों से ज़ब्त किये गये हल-बैल और अन्य सामान ज़ब्त करके उन्हें किसानों में बाँट दिया गया। ज़ालिम जोतदारों, उनकी मदद करने वाले गुण्डों और सूदखोरों पर किसान समितियों ने खुली अदालतें लगाकर सज़ाएँ सुनायीं और उन्हें तामील किया। कुछ मामलों में मृत्युदण्ड भी दिये गये। बुर्जुआ कोर्ट-कानून-प्रशासन की मान्यता को ख़ारिज करते हुए किसान समितियों ने घोषित किया कि केन्द्रीय और इलाकाई क्रान्तिकारी कमेटियों के निर्णय ही कानून होंगे। गाँवों के आम प्रशासन – चौकीदारी, आपसी विवाद के निपटारे, स्कूलों की व्यवस्था आदि कामों को भी किसान समितियों ने अपने हाथों में लेने की घोषणा कर दी। जोतदारों के प्रतिरोध का किसानों ने हथियारबन्द होकर मुकाबला किया और इन कामों की शुरुआत की। लेकिन यह प्रक्रिया बहुत दिनों तक जारी नहीं रह सकी और बहुत आगे तक नहीं जा सकी। राज्य और केन्द्र के पुलिस बलों ने जब दमन की सुसंगठित मुहिम चलाई और नेतृत्व के ज्यादातर लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया तो संघर्ष धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगा और बिखरने लगा। फिर भी सरकार को स्थिति पर पूरी तरह से नियन्त्रण स्थापित करने में सितम्बर माह तक का समय लग गया।

इस दौरान नक्सलबाड़ी पूरे देश में चर्चा का केन्द्रीय विषय बना रहा। देश के अख़बारों में नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह और उसके नेतृत्व की कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी राजनीति की ख़बरें प्रमुखता के साथ छपती रहीं। कैबिनेट सब-कमेटी ने नक्सलबाड़ी का दौरा किया। बुर्जुआ अर्थशास्त्री, राजनीतिक सिद्धान्तकार, पत्रकार, मार्क्सवादी व बुर्जुआ अकादमीशियन और सरकारी कम्युनिस्ट – सबकी कमोबेश एक ही राय थी कि यदि नक्सलबाड़ी जैसे विस्फोटों से और उनके सम्भावित “भयावह” नतीजों से बचना है तो बुर्जुआ भूमि-सुधारों की गति थोड़ी और तेज़ करनी होगी, भूमि हदबन्दी कानून को कम से कम कुछ हद तक प्रभावी बनाना होगा, किसानों के मालिकाने के सवाल के बुर्जुआ हल की दिशा में कुछ प्रभावी कदम उठाने होंगे और भूमिहीनों में ज़मीन वितरण के कुछ बुर्जुआ सुधारवादी कार्यक्रम सरकारी-ग़ैरसरकारी स्तर पर हाथ में लेने होंगे। यह वह समय था जब भारतीय पूँजीपति वर्ग राष्ट्रीय बाज़ार के दायरे और पहुँच-पकड़ के विस्तार के लिए गाँवों में प्राक्पूँजीवादी सम्बन्धों को बदलने की प्रक्रिया में ऊपर से, और क्रमिक परिवर्तन के “प्रशियाई मार्ग” पर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहा था। देश के कुछ हिस्सों में उभरे कुलकों-फार्मरों की प्रेशर-लॉबियाँ कांग्रेस पर इसके लिए दबाव भी बना रही थीं। इधर साम्राज्यवादी भी सीधे “सहायता” और अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों के ज़रिये भारत सहित तीसरी दुनिया के अधिकांश महत्त्वपूर्ण देशों में गाँवों में पूँजीवादी विकास करके कृषि में पूँजी निवेश का स्कोप बढ़ाना चाह रहे थे और इसलिए “हरित क्रान्ति” मार्का कृषि-नीतियों पर अमल के लिए वे भारत, इण्डोनेशिया, मलयेशिया, फिलिप्पींस, श्रीलंका आदि देशों के बुर्जुआ वर्ग को पूरी मदद देने के लिए तत्पर थे। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में साम्राज्यवादियों और भारतीय पूँजीपति वर्ग के अपने वर्ग-हितों के तकाज़े से, पहले से ही जारी भूमि सम्बन्धों के क्रमिक पूँजीवादी रूपातरण की प्रक्रिया एक नये दौर में प्रवेश कर रही थी। नक्सलबाड़ी किसान-उभार ने इस प्रक्रिया को और तेज़ करने और सुव्यवस्थित ढंग से बुर्जुआ भूमि-सुधार को लागू करने के लिए भारतीय शासक वर्ग पर दबाव बनाया जिसके चलते भारतीय समाज के पूँजीवादी रूपान्तरण की प्रक्रिया तेज़ हो गयी, देश के जिन हिस्सों में अभी भी भूमि सम्बन्धों की प्रकृति मुख्यत: प्राक्पूँजीवादी थी, या जहाँ अभी भी प्राक्पूँजीवादी अवशेष बहुत अधिक थे, या फिर जहाँ एक संक्रमणशील पिछड़ी किसानी अर्थव्यवस्था मौजूद थी, उन सभी हिस्सों में पूँजीवादी संक्रमण की गति तेज़ हो गयी। सत्तर के दशक में ही देश के अधिकांश हिस्से में गाँवों में पूँजीवादी वर्गीय संरचना और पूँजीवादी ध्रुवीकरण की स्थिति एकदम स्पष्ट हो चुकी थी। नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह के तत्काल बाद, जयप्रकाश नारायण ने विनोबा के सर्वोदय, भूदान, ग्रामदान में कूदकर उसमें जान डालने की पूरी कोशिश की। यह अनायास नहीं कि मुशहरी (बिहार) में और देश के अन्य “नक्सल प्रभावित” इलाकों और भूमि-संघर्ष के सम्भावना सम्पन्न क्षेत्रों में ही जयप्रकाश नारायण ने डेरा डालकर ताकत लगाने का काम किया था और वर्ग संघर्ष की आग पर ठण्डे पानी के छींटे डालने का काम किया था। बंगाल में बरगादारों के पंजीकरण के द्वारा ज़मीन के मालिकाने को आंशिक ढंग से और बुर्जुआ रास्ते से हल करके माकपा के नेतृत्व वाली वाम सरकार ने गाँवों में पूँजीवादी विकास की राह बनाने का वही काम किया जो प्रशा के बिस्मार्क ने और ज़ार के मन्त्री स्तालिपिन ने किया था। इससे भूमि संघर्षों का तनाव विघटित हो गया और गाँवों में वर्ग-सम्बन्धों में बदलाव के साथ ही बंगाल के गाँवों में नये पैदा हुए निरंकुश कुलकों में माकपा का नया सामाजिक आधार तैयार हुआ। कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि नक्सलबाड़ी किसान-उभार का एक महत्त्वपूर्ण अनुवर्ती प्रभाव और उपजात (बाई प्रोडक्ट) यह था कि बुर्जुआ भूमि सुधार की गति तेज़ करने के लिए भारतीय शासक वर्ग पर एक दबाव निर्मित हुआ और भारतीय समाज के पूँजीवादीकरण की प्रक्रिया मुकम्मल होने की समयाविध सिकुड़कर थोड़ी और छोटी हो गयी। बहरहाल, नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह का यह लक्ष्य नहीं बल्कि वस्तुगत प्रभाव था। लेकिन इस प्रभाव ने भी वस्तुगत तौर पर समाज-विकास की गति पर प्रगतिशील प्रभाव ही छोड़ा। पूँजीवादी वर्ग-सम्बन्धों के स्पष्ट और तीव्र होने के साथ ही यह समझना और तय कर पाना अधिक आसान हो गया कि भारतीय क्रान्ति की प्रकृति अब राष्ट्रीय जनवादी न होकर समाजवादी ही होगी।

पर जैसाकि ऊपर कहा गया है, उपरोक्त प्रक्रिया नक्सलबाड़ी का उपजात, अनुवर्ती प्रभाव था। यह एक ऐतिहासिक जनविद्रोह का शासक वर्ग की नीतियों पर पड़ने वाला प्रभाव था। देश के एक सुदूर छोटे-से अंचल के जनउभार ने शासक वर्ग को सोचने के लिए विवश ही इसलिए किया कि इसमें निहित क्रान्तिकारी सम्भावनाएँ स्पष्ट थीं। नक्सलबाड़ी किसान-उभार के दमन और बिखराव के बावजूद, पूरे देश के कम्युनिस्ट आन्दोलन पर उसका जो प्रभाव पड़ा, उसने इस बात को और अधिक स्पष्ट कर दिया। नक्सलबाड़ी कोई स्वयंस्फूर्त किसान-विद्रोह नहीं था। उसके पीछे ऐसे उदीयमान कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तत्त्व सक्रिय थे जो संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद करके नयी क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन के लिए संकल्पबद्ध हो चुके थे। इन कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी तत्त्वों को ख्रुश्चेवी संशोधनवाद के विरुद्ध चीन की पार्टी द्वारा चलायी गयी `महान बहस´ से विचारधारात्मक दिशा मिली थी और 1966 से चीन में पार्टी और राज्य के पूँजीवादी पथगामियों के विरुद्ध शुरू हुई `महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति´ ने उन्हें यह राह सुझायी थी कि पार्टी के नेतृत्व पर हावी संशोधनवादियों के विरुद्ध विद्रोह करके नये क्रान्तिकारी केन्द्र की स्थापना ही एकमात्र उचित और सही रास्ता है। अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में जारी विचारधारात्मक बहस में पक्ष न लेने वाले मध्यमार्गियों का संशोधनवादी चरित्र माकपा के गठन और उसके बाद नेतृत्व द्वारा उठाये गये कदमों से काफी हद तक साफ़ हो चुका था। नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के प्रति उनके रुख़ ने उन्हें एकदम नंगा कर दिया। यही कारण था कि नक्सलबाड़ी के तुरन्त बाद, पूरे देश में माकपा के भीतर कतारों में विद्रोह की लहर फैल गयी। पराजय के बावजूद, नक्सलबाड़ी ने ऐतिहासिक मूल्यांकन की दृष्टि से महान उपलब्धि हासिल की। देश के एक गुमनाम से ग्रामीण अंचल ने इतिहास को इस तरह प्रभावित किया कि वह क्रान्तिकारी कम्युनिज्म की धारा का एक प्रतीक और एक प्रस्थान-बिन्दु बन गया। लगभग अठारह वर्षों तक संसदवाद के पंककुण्ड में दबे रहने के बाद तेलंगाना की स्पिरिट और परम्परा फिर से नक्सलबाड़ी में उभर आयी और पूरे देश में फैल गयी। आगे चलकर, विचारधारात्मक कमज़ोरी और उससे पैदा हुए विविध नकारात्मक पक्षों के चलते नक्सलबाड़ी से उत्पन्न हुई राजनीति भारतीय क्रान्ति की नेतृत्वकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन तथा क्रान्ति के अग्रवर्ती विकास के रूप में भले ही आगे न बढ़ सकी हो, नक्सलबाड़ी से पैदा हुई क्रान्तिकारी वाम की धारा आगे चलकर भले ही फूट और विघटन का शिकार हो गयी हो, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में उस समय हावी संसदीय जड़वामनवाद पर नक्सलबाड़ी ने जो निर्णायक प्रभावी चोट की, उसका भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास में हरदम महत्त्व बना रहेगा। नक्सलबाड़ी के कुछ और पहलुओं को समेटते हुए सांगोपांग समाहार से पहले यह ज़रूरी है कि नक्सलबाड़ी किसान-उभार के तुरन्त बाद वाम राजनीति के दायरे के घटना-प्रवाह पर चर्चा कर ली जाये।

जैसाकि चारु मजूमदार ने 11 नवम्बर 1967 को शहीद मीनार मैदान में हुई जनसभा में अपने भाषण में स्वयं स्वीकार किया था, नक्सलबाड़ी के नेता वे नहीं बल्कि कानू सान्याल, जंगल सन्थाल, कदम मल्लिक और खोकन मजूमदार आदि स्थानीय संगठनकर्ता थे। ऊपर यह चर्चा की जा चुकी है कि अपने आठ दस्तावेज़ों की श्रँखला में चारु मजूमदार ने भूमि-क्रान्ति की शुरुआत जनदिशा के बजाय “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के आधार पर करने का जो प्रस्ताव रखा था, उसे ठुकराकर नक्सलबाड़ी का निर्माण हुआ था। नक्सलबाड़ी किसान-उभार वास्तव में क्रान्तिकारी जनदिशा का सत्यापन और “वाम” दुस्साहसवाद का मूर्त नकार था। लेकिन यह कहना ग़लत होगा कि इसमें चारु और उनके आठ दस्तावेज़ों की कोई भूमिका ही नहीं थी, क्योंकि `आठ दस्तावेज़´ के दो पहलू थे। उसका अहम पहलू यह था कि उसने संशोधनवाद और संसदीय जड़वामनवाद पर निर्णायक चोट करते हुए एक सर्वभारतीय क्रान्तिकारी पार्टी के पुनर्निर्माण और पुनर्गठन का स्पष्ट प्रस्ताव एजेण्डे पर उपस्थित किया। उसका नकारात्मक पक्ष यह था कि उसने भारतीय आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक संरचना का अध्ययन करके भारतीय क्रान्ति की रणनीति एवं आम रणकौशल के निर्धारण के बजाय, न केवल चीनी क्रान्ति के कार्यक्रम व मार्ग के अन्धानुकरण का नारा दिया बल्कि सभी प्रकार की जनकार्रवाइयों, जनसंगठनों के महत्त्व को रद्द करते हुए और आर्थिक संघर्षों के साथ ही राजनीतिक शिक्षा एवं प्रचार के महत्त्व को भी नकारते हुए छापामार किसान संघर्ष को सशस्त्र गुप्त दस्तों के `ऐक्शन´ का समानार्थक बनाकर प्रस्तुत किया। नक्सलबाड़ी के नेतृत्व ने इस दूसरे पहलू को ख़ारिज किया, लेकिन पहला पहलू उसका विचारधारात्मक-राजनीतिक आधार बना। कानू सान्याल आदि संगठनकर्ता भी जेल में रहने के दौरान माकपा नेतृत्व के संशोधनवाद के विरुद्ध राजनीतिक तौर पर स्वयं को तैयार कर चुके थे, लेकिन उसके विरुद्ध दस्तावेज़ों की श्रँखला लिखने, उसे कतारों तक ले जाने की कोशिश करने और कानू आदि के जेल से बाहर आने के बाद `आठ दस्तावेज़´ के रूप में माकपा नेतृत्व के विरुद्ध विद्रोह की कार्रवाई का सैद्धान्तिक आधार मुहैया करने का काम तो चारु मजूमदार ने ही किया। यानी एक ओर यदि यह कहना ग़लत है कि नक्सलबाड़ी किसान उभार के नेता और निर्माता चारु थे, वहीं यह तो स्वीकारना ही होगा कि उसका विचारधारात्मक आधार तैयार करने में चारु की बुनियादी रूप से एक अहम भूमिका थी। कहा जा सकता है कि माकपा-राजनीति से निर्णायक विच्छेद करने में चारु की भूमिका निर्णायक थी। चारु नहीं होते तो मुमकिन था कि नक्सलबाड़ी संघर्ष साठ के दशक में उस इलाके में कम्युनिस्ट नेतृत्व में चले बहुतेरे रैडिकल आर्थिक और जनवादी (या संकुचित सीमा वाले राजनीतिक) माँगों पर चलने वाले जन संघर्षों की ही अगली कड़ी बनकर रह जाता। चारु की संशोधनवाद-विरोधी संघर्ष की निर्णायकता के पीछे कहीं एक “वाम” दुस्साहसवादी का निम्न-बुर्जुआ अधैर्य हो सकता है (क्योंकि उनकी “वाम’ दुस्साहसवादी लाइन आद्यन्त सुसंगत थी), लेकिन उस समय तो उस निर्णायकता का सकारात्मक पहलू ही प्रभावी था। कहा जा सकता है कि नक्सलबाड़ी के बाद के दौर में क्रान्तिकारी वाम राजनीति के गतिरोध, पराभव और विघटन के लिए चारु की “वामपन्थी” आतंकवादी लाइन ही ज़िम्मेदार बनी, लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि चारु नहीं होते तो नक्सलबाड़ी किसान-उभार शायद क्रान्तिकारी वाम राजनीति का एक प्रस्थान बिन्दु और प्रतीक-चिन्ह नहीं बन पाता। प्रसिद्ध उक्ति है कि संशोधनवाद करने के पाप का दण्ड मज़दूर आन्दोलन “वामपन्थी” दुस्साहसवाद के रूप में भुगतता है। भारत में भी 18 वर्षों के संशोधनवादी दौर के बाद पेण्डुलम का सिरा दूसरे सिरे तक जाने का अन्देशा था और इतिहास की इस द्वन्द्वात्मक विडम्बना का व्यंग्य शायद यह होना था कि संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद की प्रक्रिया में एक ऐसे व्यक्ति को इतिहास के एक नायक का दर्जा हासिल करना था, जिसकी विचारधारात्मक-राजनीतिक क्षमता नेतृत्वकारी स्तर तक की कदापि नहीं थी और जो अधैर्यशील, आदर्शवादी, भावुक निम्न-बुर्जुआ क्रान्तिकारिता से ग्रस्त था। चारु के समस्त उपलब्ध राजनीतिक लेखन के आधार पर यह कहना ग़लत नहीं होगा।

नक्सलबाड़ी की घटना के क्रान्तिकारी प्रतीक-चिन्ह बनने में जहाँ एक सकारात्मक पक्ष है, वहीं एक नकारात्मक पक्ष भी है। नक्सलबाड़ी किसान-उभार के बाद, पूरे देश की कम्युनिस्ट कतारों में संशोधनवाद के विरुद्ध विद्रोह की एक लहर फैल गयी। पूरे देश में माकपा की क्रान्तिकारी कतारें विद्रोह करने लगीं। अनुभवसंगत धरातल पर माकपा के संशोधनवाद के विरुद्ध जो शंका, अविश्वास और बेचैनी की भावना थी, उसे नक्सलबाड़ी ने विद्रोह की दिशा देकर तरल परिस्थिति को अवक्षेपित कर दिया। देश के विभिन्न राज्यों में क्रान्तिकारी पक्ष के जो नेतृत्वकारी संगठनकर्ता थे, वे तो `महान बहस´, चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति और माकपाई मध्यमार्ग की विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु से कमोबेश वाकिफ थे, लेकिन आम कतारों के लिए संशोधनवाद और क्रान्तिकारी मार्ग के बीच फैसला करने का एकमात्र सीधा-सादा पैमाना बस यह बन गया कि कोई व्यक्ति नक्सलबाड़ी के पक्ष में है या विपक्ष में। इससे कतारों का ध्रुवीकरण तो तेज़ गति से हुआ, लेकिन ऐसे किसी भी विचारधारात्मक संघर्ष की सुदीर्घ प्रक्रिया में कतारों की जो विचारधारात्मक-राजनीतिक शिक्षा होती है और सांगठनिक सुदृढ़ीकरण से पूर्व विचारधारात्मक- राजनीतिक सुदृढ़ीकरण की जो आवश्यक प्रक्रिया होती है, वह नहीं हुई। अपनी विचारधारात्मक-राजनीतिक कमज़ोरी के चलते क्रान्तिकारी नेतृत्व ने इस पर कोई बल भी नहीं दिया। यह भी एक कारण था कि आगे चलकर कतारें आसानी से “वामपन्थी” दुस्साहसवाद की लहर में बह गयीं और अपनी पारी में, “वामपन्थी” दुस्साहसवादी लाइन ने कतारों की विचारधारात्मक-राजनीतिक सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया के आगे बढ़ने की रही-सही सम्भावना का गला भी घोंट दिया। कल्पना करें, यदि 1967 में नक्सलबाड़ी की घटना नहीं घटित हुई होती। तब क्या भारत में मार्क्सवादी-लेनिनवादी धारा पैदा ही नहीं होती? ऐसा नहीं था। आठ दस्तावेज़ों का लेखन, `चिन्ता´ ग्रुप का संशोधनवाद-विरोधी संघर्ष और माकपा के भीतर संशोधनवादी नेतृत्व के विरुद्ध कतारों के असन्तोष और संशोधनवाद- विरोधी धड़ेबन्दियों की विविध रूपों में नक्सलबाड़ी विद्रोह से पहले के दौर में मौजूदगी इस बात का संकेत देती हैं कि उस स्थिति में संशोधनवाद के विरुद्ध लम्बा विचारधारात्मक संघर्ष चलता जो अपनी तार्किक परिणति तक पहुँचकर किसी वैकल्पिक क्रान्तिकारी नेतृत्वकारी केन्द्र को जन्म देता। ग़ौरतलब है कि एशिया, अफ़्रीका और लातिन अमेरिका के बहुतेरे देशों में (और यूरोप-अमेरिका में भी) साठ के दशक में `महान बहस´ और चीन की महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति से विचारधारात्मक मार्गदर्शन प्राप्त करके क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट कतारों ने ख्रुश्चेवी संशोधनवादी नेतृत्व से विद्रोह करके मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टियों एवं संगठनों का गठन किया था। भारत में भी ऐसा ही होता, इसी की सम्भावना अधिक थी और उस स्थिति में लम्बे विचारधारात्मक संघर्ष के दौरान कतारों की राजनीतिक शिक्षा और सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया बेहतर ढंग से चलती। यानी नक्सलबाड़ी ने संशोधनवाद से विच्छेद और ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तीव्र और संक्षिप्त बना दिया, लेकिन इस तीव्रता और संक्षिप्तता ने दो लाइनों के सघन-सुदीर्घ संघर्ष की प्रक्रिया के दौरान होने वाले कतारों के विचारधारात्मक-राजनीतिक सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया पर गम्भीर प्रतिकूल प्रभाव छोड़ा। आज वस्तुगत तौर पर, भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन का जो इतिहास हमारे सामने है, उसमें नक्सलबाड़ी एक मील के पत्थर का स्थान रखता है, लेकिन उसी से जुड़ा हुआ जो अन्तर्निहित दूसरा पहलू है, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। उसकी अनदेखी करके नक्सलबाड़ी की गौरवशाली क्रान्तिकारी परम्परा का पुनरुज्जीवन और विस्तार तो कतई सम्भव नहीं है, भावविन्हल परम्परा-पूजा का अनुष्ठान भले ही सम्पन्न कर लिया जाये।

नक्सलबाड़ी के ऐतिहासिक मूल्यांकन से ही जुड़ा एक और पहलू है, जिस पर यहाँ चर्चा ज़रूरी है क्योंकि चार दशक बाद पश्चदृष्टि से देखने पर चीज़ें आज अधिक साफ़ दीखती हैं। नक्सलबाड़ी उत्तर-औपनिवेशिक काल के एक ऐसे दौर में हुआ, जब पूरा भारत असमान रूप से एक संक्रमण से गुज़रते हुए एक लम्बी संक्रमण-अवधि के कमोबेश मध्यबिन्दु पर खड़ा था। सत्तारूढ़ भारतीय पूँजीपति वर्ग विगत दो दशक से बुर्जुआ सत्ता का सुदृढ़ीकरण करते हुए अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा का लाभ उठाकर तथा आयात-प्रतिस्थापन की नीतियों को लागू करते हुए अपने औद्योगिक-वित्तीय आधार का विस्तार कर रहा था और साथ ही वह गाँवों को पूँजीवादी राष्ट्रीय बाज़ार की चौहद्दी में समेट लेने के लिए भूमि सम्बन्धों को भी, ऊपर से, बुर्जुआ क्रमिक भूमि सुधार की नीतियों को लागू करते हुए, बदलने के लिए चेष्टाशील था। यह प्रक्रिया पूरे देश में असमान रूप से जारी थी। जैसे, जम्मू-कश्मीर में सापेक्षत: सर्वाधिक रैडिकल भूमि-सुधार सबसे पहले हुए। साठ के दशक के मध्य तक स्थिति यह थी कि पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में पूँजीवादी खेती की प्रवृत्ति ज़ोर पकड़ चुकी थी और कुलक वर्ग शक्तिशाली बन चुका था। देश के कई क्षेत्रों में सामन्ती भूस्वामियों की मौजूदगी के साथ ही उन्हीं के बीच से कुछ पूँजीवादी भूस्वामी भी पैदा हो चुके थे और बड़े काश्तकारों के बीच से कुछ कुलक भी पैदा हो चुके थे। कुछ क्षेत्रों में सामन्ती अवशेष ज्यादा थे, कुछ में कम थे, कुछ पिछड़ी हुई किसानी अर्थव्यवस्था की संक्रमणशील अवस्था में थे और कहीं अर्द्धसामन्ती भूमि सम्बन्धों का पहलू ही अभी प्रधान था। बंगाल, बिहार, उड़ीसा जैसे राज्यों में उस समय, या तो अर्द्धसामन्ती भूमि-सम्बन्धों की प्रधानता थी या मज़बूत सामन्ती अवशेष मौजूद थे। बंगाल में जब तक बरगादारों के पंजीकरण के द्वारा मालिकाने का सवाल आंशिक तौर पर हल नहीं हुआ था। जब तक भूमि-सम्बन्धों का अर्द्धसामन्ती स्वरूप मुख्यत: कायम था। नक्सलबाड़ी किसान-उभार ऐसे ही समय में हुआ। पूरे देश के क्रान्तिकारी कतारों को नक्सलबाड़ी टाइप भूमि-संघर्ष विकसित करने का नारा दिया गया। इस नारे की पहली विसंगति तो यही थी कि यह नक्सलबाड़ी की संशोधनवाद- विरोधी विचारधारात्मक विरासत की जगह नक्सलबाड़ी के रास्ते को ही पूरे भारत के लिए सामान्य बनाकर प्रस्तुत कर रहा था और विचारधारा और कार्यक्रम के प्रश्न को परस्पर गड्डमड्ड कर रहा था। उस पर से अतिरिक्त बात यह कि जब यह नारा दिया जा रहा था, उस समय नक्सलबाड़ी का लेबुल लगाकर वस्तुत: “वामपन्थी” आतंकवाद की लाइन बेची जा रही थी। लेकिन हम कहना यह चाहते हैं कि यदि पूरे देश में नक्सलबाड़ी की क्रान्तिकारी जनदिशा वास्तव में लागू भी की जाती तो सफ़ल नहीं होती। देश के जिन हिस्सों में पूँजीवादी भूमि-सम्बन्ध विकसित हो चुके थे और जहाँ संक्रमणशील अवस्था थी, वहाँ न तो चार वर्गों के रणनीतिक संश्रय के आधार पर भूमि-क्रान्ति को लागू कर पाना सम्भव था, न ही छापामार संघर्ष का विकास और आधार-क्षेत्र का निर्माण सम्भव था। पूरे देश की स्थिति उस समय भी ऐसी नहीं रह गयी थी कि देहातों में मुक्त क्षेत्र का निर्माण करके गाँवों से शहरों को घेरते हुए दीर्घकालिक लोकयुद्ध की सामरिक रणनीति को अमल में लाया जा सके। अर्द्धसामन्ती-अर्द्धऔपनिवेशिक चीन से भिन्न उत्तर- औपनिवेशिक दौर के भारत में एक केन्द्रीकृत राज्यसत्ता थी जिसके सामाजिक अवलम्ब व्यापक थे, अधिक विकसित राज्यसत्ता, सैन्यतन्त्र, और संचार-यातायात व्यवस्था थी। यहाँ न तो चीन जैसी स्थिति थी, न ही वियतनाम, कम्बोडिया और सैन्य तानाशाही वाले लातिन अमेरिकी देशों जैसी स्थिति थी। एक समस्या यह भी थी कि चीन की पार्टी के 1963 के विश्व सर्वहारा क्रान्ति की आम दिशा-विषयक दस्तावेज़ में या लिन प्याओ के 1965 के लेख `लोकयुद्ध की विजय अमर रहे´ में तीसरी दुनिया के देशों में लोक जनवादी क्रान्ति का जो आम सूत्रीकरण दिया था, वह एशिया, अफ़्रीका, लातिन अमेरिका के अधिकांश उपनिवेशों और नवउपनिवेशों के लिए तो ठीक था, (और आम तौर पर उस समय सही था) पर उसके फ्रेमवर्क या स्कीम में भारत, मिश्र, इण्डोनेशिया, मलाया, आदि ऐसे नवस्वाधीन देश पूरी तरह से फ़िट नहीं होते थे जहाँ पूँजीवादी संक्रमण की प्रक्रिया जारी थी। चीन की पार्टी द्वारा भारतीय बड़े पूँजीपति वर्ग को दलाल और भारत को नवउपनिवेश मानने का सूत्रीकरण भी सच्चाई से मेल नहीं खाता था। समस्या यह थी कि उत्तर औपनिवेशिक समाजों के परिवर्तनशील यथार्थ की गतिकी को पकड़ने की बजाय उसे औपनिवेशिक दौर की निरन्तरता मानकर चलने की प्रवृत्ति अन्तरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आन्दोलन में हावी रही थी और चीन की पार्टी के भारत-विषयक सूत्रीकरण भी इस दोष से मुक्त नहीं थे। समस्या यह भी थी कि बिस्मार्ककालीन प्रशा, जारकालीन रूस या कमाल अतातुर्ककालीन तुर्की की स्थितियों से अलग एक उत्तरऔपनिवेशिक समाज में सत्तारूढ़ बुर्जुआ वर्ग (जो साम्राज्यवाद का कनिष्ठ साझीदार था लेकिन राज्यसत्ता का स्वामी था और सीमित बुर्जुआ जनवाद को अमल में ला रहा था), पहली बार बुर्जुआ भूमि-सुधार की वैसी ही नीतियाँ लागू कर रहा था, इसलिए इसे पुराने फ्रेमवर्क को तोड़कर ही समझा जा सकता था, जो नहीं हुआ। बहरहाल, मूल प्रसंग पर लौटते हुए, हम कहना यह चाहते हैं कि यदि नक्सलबाड़ी टाइप संघर्ष का मॉडल पूरे देश में वास्तव में लागू करने की कोशिश भी होती, यदि जनदिशा लागू भी होती, तो भी, 1967-70 में पूरे देश में ऐसी परिस्थितियाँ नहीं थीं कि कोई सफलता मिल पाती। ज्यादा से ज्यादा, देश के अर्द्धसामन्ती भूमि-सम्बन्धों वाले इलाकों में, मज़बूत सामन्ती अवशेषों वाले इलाकों में ही ऐसा हो पाता और उसकी तार्किक परिणति महज़ इसी रूप में सामने आती कि बुर्जुआ वर्ग उन क्षेत्रों में बुर्जुआ भूमि सुधारों की गति तेज़ कर देता। यह अनायास नहीं है कि आगे चलकर जिन मा-ले संगठनों ने क्रान्तिकारी जनदिशा के आधार पर लोक जनवादी कार्यक्रम को लागू करने की कोशिश की भी, वे सफल नहीं हो सके और लम्बे गतिरोध की परिणति के तौर पर आज वे संगठन मालिक किसानों के लाभकारी मूल्य और लागत मूल्य की कमी की वर्गीय माँगों को लेकर लड़ने वाले मार्क्सवादी नरोदवादी बन चुके हैं। तात्पर्य यह कि 1967-70 में भी नक्सलबाड़ी पूरे देश के लिए एक सार्विक परिघटना नहीं हो सकता था। यूँ कहें कि, यदि क्रान्तिकारी जनदिशा लागू भी होती तो नक्सलबाड़ी के रास्ते की राष्ट्रव्यापी सफलता 1967 में सन्दिग्ध थी और इसलिए नक्सलबाड़ी भी बहुत दिनों तक टिका नहीं रह पाता। नक्सलबाड़ी के बाद गठित कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों की अखिल भारतीय तालमेल कमेटी यदि अध्ययन और प्रयोग के आधार पर भारतीय क्रान्ति के कार्यक्रम के निर्धारण के अपने काम को पूरा करने में कोताही नहीं बरतती तो क्रान्तिकारी जनसंघर्ष निरन्तरता की प्रक्रिया में ही अपनी कार्यक्रममूलक दिशा बदल लेते। लेकिन उस स्थिति में भी, नक्सलबाड़ी किसान-उभार का ऐतिहासिक विचारधारात्मक महत्त्व संशोधनवाद से निर्णायक विच्छेद के मोड़-बिन्दु के रूप में अक्षुण्ण बना रहता।

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, नक्सलबाड़ी सशस्त्र किसान विद्रोह चारु मजूमदार की “वामपन्थी” अवसरवादी लाइन पर सही क्रान्तिकारी लाइन की विजय पर आधारित था। लेकिन सत्ता के दमन के बाद, संघर्ष जब गतिरोध का शिकार हुआ तो जनदिशा को लागू करने वाले कानू सान्याल आदि नेतृत्व के लोगों ने विचारधारात्मक अपरिपक्वता के चलते स्वयं को विकल्पहीन और किंकर्त्तव्यविमूढ़ अवस्था में पाया। इस स्थिति में चारु मजूमदार ने अपनी आतंकवादी लाइन को फिर आगे बढ़ाया और नक्सलबाड़ी के नेतृत्व ने उसके आगे पूरी तरह से आत्मसमर्पण कर दिया। आर्थिक संघर्षों के महत्त्व को पूरी तरह नकारने वाले चारु मजूमदार का कहना था कि नक्सलबाड़ी में किसान ज़मीन या किसी आर्थिक माँग के लिए नहीं लड़कर राज्यसत्ता के लिए लड़े थे। सितम्बर 1968 में कानू सान्याल ने नक्सलबाड़ी का सार-संकलन करते हुए `तराई क्षेत्र के किसान आन्दोलन पर रिपोर्ट´ नामक जो दस्तावेज़ लिखा, उसमें उन्होंने चारु की इसी स्थापना को दुहराया। पुन: 1974 में अपनी अवस्थिति बदलकर उन्होंने “वामपन्थी” दुस्साहसवाद की आलोचना करते हुए `मोर अबाउट नक्सलबाड़ी´ शीर्षक जो लेख लिखा उसमें यह लिखा कि भूमि क्रान्ति में ज़मीन और राज्यसत्ता के प्रश्न अन्तर्ग्रन्थित होते हैं और नक्सलबाड़ी में भी ऐसा ही था। यह न तो सैद्धान्तिक तौर पर सही है, न ही व्यावहारिक तौर पर ऐसा हुआ था। भूमि क्रान्ति के दौर में किसान ज़मीन के मालिकाने की माँग के लिए अपना संघर्ष शुरू करते हैं। पार्टी इस बात का लगातार प्रचार करती है कि इस प्रश्न को राज्यसत्ता के साथ संघर्ष करके ही हल किया जा सकता है। किसान पार्टी नेतृत्व में जब ज़मीन और फसल पर कब्ज़े की मुहिम चलाते हैं तो उन्हें ज़मींदारों और राज्यसत्ता के दमनतन्त्र का सामना करना पड़ता है, जिसका मुकाबला करने के लिए वे हथियारबन्द होते हैं( स्वयंसेवक दस्ते जनमिलिशिया और छापामार दस्ते बनाते हैं और संघर्ष क्रमश: इलाकावार सत्ता दख़ल की मंज़िल तक विकसित होता है। इस प्रक्रिया में ज़मीन का सवाल आगे बढ़कर राज्यसत्ता का सवाल बन जाता है। नक्सलबाड़ी में भी यही प्रक्रिया जारी थी, जिसे कानू सान्याल ने न तो 1967 में समझा और न ही 1974 में समझा। 1974 में “वामपन्थी” आतंकवाद की आलोचना करते हुए दक्षिणपन्थी अवसरवादी भटकाव के दूसरे छोर पर जा खड़े हुए थे, जिसकी चर्चा इस लेख में आगे की जायेगी। तराई किसान रिपोर्ट में उन्होंने किसान सम्मेलन द्वारा निर्धारित “दस महान कार्यों” को पूरा करने में नेतृत्व देने में निम्न-पूँजीवादी भटकावग्रस्त नेतृत्व की विफलता, नेतृत्व का जनता में भरोसा न होने, एक शक्तिशाली जनाधार के अभाव, एक मज़बूत पार्टी ढाँचे के अभाव, राजनीतिक सत्ता की स्थापना और क्रान्तिकारी भूमि-सुधार के बारे में रूपवादी पहुँच और पुरानी संशोधनवादी सोच के असर तथा सामरिक मामलों की ग़ैरजानकारी को नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह की विफलता के लिए ज़िम्मेदार बताया था। वास्तव में यह एक सतही, रूपवादी और सार-संग्रहवादी समाहार था। सच्चाई यह है कि नक्सलबाड़ी किसान-विद्रोह शुरू होने से पहले नेतृत्व ने दूर की सोचकर कोई व्यवस्थित तैयारी की ही नहीं थी। किसानों की सशस्त्र प्रतिरक्षा आगे किस प्रकार छापामार दस्तों के निर्माण की अवस्था तक विकसित होगी और दमन की स्थिति में अपनी सशस्त्र शक्तियों को अन्य क्षेत्रों में किस प्रकार बिखराया जायेगा, इसकी कोई योजना नहीं थी। निकटवर्ती जंगलों और पर्वतीय क्षेत्रों में पृष्ठभागीय आधार बनाने की कोई योजना नहीं थी। उल्लेखनीय है कि स्थिति को सँभालने के लिए, काफ़ी बाद में, 1968 में मिरिक के पहाड़ी इलाके में एक पृष्ठभागीय क्षेत्र विकसित करने की कोशिश की गयी जो सफल नहीं हुई। इससे भी अहम बात यह थी कि स्थितियाँ तब तक सँभालने लायक रह ही नहीं गयीं थी। और इससे भी अहम बात यह थी कि एक सुसंगठित कम्युनिस्ट पार्टी के अभाव में दीर्घकालिक लोकयुद्ध की परिस्थिति होने पर भी उसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। ऐसी स्थिति में यदि एक योग्य नेतृत्व होता तो कुछ समय तक संघर्ष को स्थगित या विलम्बित करने के लिए रणकौशलात्मक स्तर पर शत्रु से कुछ समझौते की राह भी चुन सकता था, पर बिना जनता के बीच गहन राजनीतिक प्रचार और तैयारी के, यदि यह किया जाता तो निरुत्साह और बिखराव पैदा होना लाज़िमी होता। नक्सलबाड़ी में भी यही स्थिति थी।

इन्हीं परिस्थितियों में नक्सलबाड़ी के नेतृत्व ने चारु की लाइन के आगे पूरी तरह से घुटने टेक दिये। तराई रिपोर्ट में कानू सान्याल ने नक्सलबाड़ी के पूर्व चारु की लाइन और जनदिशा के बीच के संघर्ष और चतरहाट-इस्लामपुर प्रसंग की कोई चर्चा नहीं की है और विशेष तौर पर नक्सलबाड़ी संघर्ष में चारु के योग्य नेतृत्व की भूमिका को रेखांकित किया है। इन तथ्यों का उल्लेख उन्होंने पहली बार 1974 में किया। विचारधारात्मक कमज़ोरी से जन्मी इस अवसरवादी आत्मसमर्पणकारी प्रवृत्ति ने “वामपन्थी” आतंकवाद के हावी होने में निश्चय ही काफ़ी मदद पहुँचायी। बहरहाल, नक्सलबाड़ी का ऐतिहासिक महत्त्व उस घटना की स्थानीयता में निहित नहीं था। मुख्य बात यह थी कि उसने संशोधनवाद से निर्णायक संघर्ष और रैडिकल विच्छेद तथा एक नयी क्रान्तिकारी पार्टी के निर्माण एवं गठन की अनिवार्य आवश्यकता के सन्देश को पूरे देश की कम्युनिस्ट कतारों तक पहुँचा दिया था। कम्युनिस्ट कतारों में एक नये उत्साह और ऊर्जस्विता का संचार हो चुका था। संशोधनवादी बदहवास थे। बुर्जुआ वर्ग इस नयी लहर को गम्भीर चुनौती के रूप में देख रहा था।.…जारी

नए इंकलाब की मशाल जलाओ ! क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का परचम ऊँचा उठाओ !!

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उठो ! जागो !! आगे बढो !!!

आज़ादी मुनाफाखोरों लुटेरों के लिए ! जनतंत्र चोरों-मुफ्तखोरों के लिए !!

एक ही विक्लप — एक ही रास्ता

नए इंकलाब की मशाल जलाओ ! क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का परचम ऊँचा उठाओ !!

इक्कीसवीं सदी तक आते-आते आज़ादी और जनतंत्र के सारे छल-छद्म उजागर हो चुके हैं. पूंजीवादी राज, समाज और संस्कृति के कुरूपतम वीभत्सतम रूप आज हमारे सामने हैं. १५ अगस्त 1947 की जिस आज़ादी को मशहूर शायर फैज़ ने ‘दाग़-दाग़ उजाला’ कहा था, वह आधी सदी बीतते-बीतते भादों की अमावस की कलि रात में तब्दील हो चुकी है. देश जल रहा है.जालिम नीरो की जारज औलादें बांसुरी बजा रही हैं.

इतिहास के इस अभूतपूर्व कठिन दौर में शहीदेआज़म भगत सिंह के शब्दों को दोहराते हुए हम इंसानियत की रूह में हरकत पैदा करने के लिए एक बार फिर क्रांति की स्पिरिट को ताज़ा करने का आह्वान करते है. हम देशी-विदेशी पूंजीपतियों के जालिमाना लूटतंत्र को तबाहो-बर्बाद करके हिंद महासागर में फेंक देने के लिए और उत्पादन, राज-काज और समाज के पूरे तंत्र पर आगे बढ़कर कब्ज़ा करने लेने के लिए मेहनतकश अवाम को आवाज़ देते है और क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा बुलंद करते हैं.

हम मानते हैं की नए सिरे से सब कुछ शुरू करना होगा. मेहनतकश जनता के राज्य और समतामूलक समाज के निर्माण की परियोजनायों को पुनर्जीवित करना होगा. पूरी दुनिया के पैमाने पर, पिछली सदी के आखिरी चौथी हिस्से के दौरान मेहनतकशों के इन्कलाबों का कारवां रुक-सा गया है, और भटका और बिखराव भी है. पूंजीवादी लूट और हुकूमत के तौर-तरीकों में भी अहम् बदलाब आये हैं. उन्हें समझना होगा और नई क्रांतियों की राह निकालनी होगी. यह कठिन हैं. पर असम्भव नहीं. हर नया काम कठिन लगता है. हर नई शुरुआत मज़बूत संकल्पों की मांग करती है. इतिहास के हजारों वर्षों के सफ़र का यह सबक है और पूंजीवादी लूटतंत्र के असाध्य और लाईलाज बिमारियों को देखते हुए यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि पराजय झेलने के बाद क्रांतियाँ फिर से परवान चढेँगी. यह सदी नई, फैसलाकुन क्रांतियों की सदी है.

यह हमारा दृढ विश्वास है और इस विश्वास के पर्याप्त कारण हैं की भारत की मेहनतकश जनता भी इस नए विश्व-एतिहासिक महासमर में पीछे नहीं रहेगी, बल्कि अगली कतारों में रहेगी. 85 फीसदी लोगों के दुखों और बरबादियों के सागर में 15 फीसदी लोगों के समृद्धि के टापू और उन पर खड़ी विलासता की मीनारें हमेशां के लिए कायम नहीं रह सकती. यह तूफ़ान के पहले का सन्नाटा है. इसलिए हुक्मरान बेचैन हैं. तरह-तरह के नए काले कानून बनाकर, पुलिस-फौज को चाक-चौबंद करके वे निश्चिंत हो जाना चाहते हैं, पर हो नहीं पाते. उन्हें लगने लगा है कि आम जनता को बाँटने-बरगलाने के लिए उछाले जाने वाले मुद्दे और छोडे जाने वाले शिगूफे भी बहुत दिनों तक काम नहीं आएंगे. पूंजीवादी जनतंत्र की कलई चारों ओर से उतर रही है. नया रंग-रोगन टिकता नहीं. इसलिए भारत की पूंजीवादी राज्यसत्ता फासिस्ट निरंकुशशाही की ओर खिसकती जा रही है.

इसलिए, क्रांतिकारी लोकस्वराज्य अभियान के ज़रिए हम इतिहास को गढ़ने वाले और अपने बलिष्ट हाथों से समय के प्रवाह को मोड़ देने वाले मेहनतकश अवाम के पराक्रम को ललकार रहे हैं और नई,कठिन और निर्णायक लड़ाई की तैयारी में शामिल होने के लिए उन तमाम लोगों को निमंत्रण दे रहे हैं, जिनकी आत्माएं युवा हैं, जो सच्चे अर्थों में जिन्दा हैं.

बढती लूट, निचुड़ती जनता : तबाही के सागर में ऐयाशी के टापू

इस देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी किसानों, मजदूरों और आम मध्यम वर्ग के लोगों ने, लेकिन छल-कपट से और क्रांतिकारी नेतृत्व की कमजोरियों-गलतियों का लाभ उठाकर देशी पूंजीपति वर्ग के नुमाइंदे उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे ढांचे पर काबिज हो गए.

समाजवाद का नारा लगाते हुए उन्होंने जनता को निचोड़कर पब्लिक सेक्टर में उद्योगों का विशाल ढांचा खड़ा किया, जिनमें मजदूरों को चूसकर अफसरशाही नेताशाही को ऐशो-आराम के सरंजाम मुहैया कराये गए और पूंजी का अम्बार इक्कठा किया गया. साथ ही विदेशी पूंजी को भी लूट की सारी सुविधाएँ मुहैया करी गयी. देशी पूंजीपति लुटेरों के जूनियर पार्टनर के रूप में वे भूतपूर्व सामंती भूस्वामी भी कतार में शामिल हो गए, जो अपने तौर-तरीके बदलकर अब पूंजीवादी भूस्वामी बन चुके थे. इसके साथ ही व्यापारियों, ठेकेदारों, उच्च मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों, अफसरों, नेताओं, दलालों और काले धन वालों की लम्बी-चौडी जमातें भी खूब फलती-फूलती रहीं. सारी संपदा पैदा करने वाली जनता को पूंजीवादी विकास का सिर्फ जूठन ही नसीब हुआ.

“समाजवाद” का गुब्बारा जब फूस हो गया ओर देशी पूंजीवादी ढांचे का चौतरफा संकट लाइलाज हो गया तो अपने लूटतंत्र को चलाने के लिए शासक वर्गों ने ओर उनकी सभी पार्टियों ने, यहाँ तक कि नकली वामपंथियों ने भी, आम सहमती से , बारह वर्षों पहले उदारीकरण ओर निजीकरण का रास्ता पकडा ओर जनता के खून पसीने से खड़े राजकीय उद्योगों को सीधे-सीधे देशी-विदेशी पूंजीपतियों को सौंपना शुरू कर दिया. अर्थतंत्र को साम्राज्यवादियों के लिए पूरी तरह खोल दिया गया. साथ ही, विदेशी कर्जों के सूद के रूप में सालाना देश से बाहर जाने वाले धन में भी कई गुने का इजाफा हो गया.

उदारीकरण के पिछले 17 वर्षों ने “समाजवाद” के मुखौटे को नोचकर पूंजीवादी जनतंत्र के खुनी चहरे को एकदम नंगा कर दिया है. आधी सदी के तथाकथित विकास का कुल बैलेंस शीट यह है कि ऊपर के 22 पूंजीपति घरानों की परिसंपत्तियों में 1951 से 2000 के बीच 500 गुने से अधिक की बढोत्तरी हुई. इन घरानों की परिभाषा में बहुराष्ट्रीय निगम शामिल नहीं है, जिनके शुद्ध मुनाफे में सैंकडों गुना की वृद्धि हुई है. दूसरी ओर, देश में गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों की ओर बेरोजगारों की संख्या में लगातार बढोत्तरी की रफ्तार उदारीकरण के 17 वर्षों ने ओर अधिक तेज़ कर दी है. एशिया विकास बैंक के मुताबिक इस समय हमारे देश की 55 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे रह रही है. छुपी हुई ओर अर्द्ध बेरोजगारी को छोड़ दे, तो भी अर्थशास्त्रियों के अनुसार, बेरोजगारी की कुल संख्या आज 20 से 25 करोड़ के बीच जा पहुंची है.

देश में आज कुल 20 करोड़ मजदूर असंगठित हैं. पुराने श्रम कानूनों को किश्तों में निष्प्रभावी बनाते हुए सरकार देशी-विदेशी पूंजीपतियों के आधुनिक उद्योगों को भी यह छूट दे रही है कि वे ज्यादा से ज्यादा काम दिहाडी ओर ठेका मजदूरों से लें ओर उन्हें चंद टुकडों के लिए बारह-बारह, चौदह-चौदह घंटे काम करने के लिए मजबूर करें. खेत-मजदूरों की स्थिति तो इससे भी बदतर है.

पूंजी की मार से अपनी जगह-ज़मीन से उजड़कर उजरती मजदूरों की कतारों में शामिल होने वाले मध्यम ओर गरीब किसानों की संख्या में विगत बारह वर्षों में करोडों की बढोत्तरी हो गयी है. इन्हीं सत्रह वर्षों के दौरान लाखों छोटे व मझोले दर्जे के उद्योगों की बंदी से और छंटनी से करीब 4 करोड़ मजदूर बेकार हो चुके हैं. विगत आधी सदी के दौरान, बड़े बांधों और बिजली परियोजनायों के निर्माण स्थलों से करोडों लोगों को उजाडा जा चुका है.

देश में कार, मोटरसाइकिल, ए.सी., फ्रिज, टी.वी., वाशिंग मशीन आदि के नए-नए ब्रांडों के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है, पर अनाज के उत्पादन में वृद्धि की रफ्तार तेजी से घटती जा रही है और आम गरीब आदमी के खाने-पीने और इस्तेमाल की अन्य चीजों और दवा-इलाज़ की कीमतों में रिकार्ड तोड़ वृद्धि हो रही है. प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के खर्चों में दस-दस गुने की वृद्धि हो रही है ओर बेटे-बेटी की इंजिनियर-डाक्टर बनाने का सपना तो अब आम मध्य वर्ग का आदमी तक नहीं देख सकता.

1991 से लेकर आज तक सभी सरकारों के प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री ओर भाड़े के अर्थशास्त्री यह कहते आ रहे हैं कि उदारीकरण-निजीकरण ही एकमात्र विक्लप है. वे एक मायने में सही कहते हैं. पूंजीवादी व्यवस्था के सामने आज यही एकमात्र एकमात्र विकल्प है ओर इसके जो विनाशकारी नतीजे सामने हैं, वे स्पष्ट कर देते हैं कि भविष्य क्या होगा ! पूंजीवादी हकूमत को जो करना था, उसने वह किया है. अब इस देश की मेहनतकश जनता को वह करना होगा जो उसे करना चाहिए.

कितना छली संविधान ओर कितना महंगा “जनतंत्र”

आर्थिक ढांचे पर सरसरी नज़र डालने के बाद, आइए राजनितिक ढांचे का भी संक्षेप में जायजा लें.

भारतीय संविधान का निर्माण जिस संविधान सभा ने किया था, उसका चुनाव पूरी जनता ने नहीं बल्कि महज़ 15 फीसदी कुलीन नागरिकों ने किया था. यह संविधान वास्तव में 1935 के ‘गवर्नमेंट आफ़ इंडिया एक्ट’ का ही संशोधित रूप था. यह भारत को ‘संप्रभु जनतांत्रिक गणराज्य’ घोषित करते हुए भी जनता को अति सीमित जनवादी अधिकार देता है और इन्हें भी हड़प लेने के प्रावधान इसके भीतर ही मौजूद हैं. इससे भी बड़ी बात यह है कि ब्रिटिशकालीन न्यायव्यवस्था और पुलिस तंत्र को लगभग ज्यों का त्यों कायम रखने के चलते आम जनता के अति सीमित सवैधानिक अधिकारों का भी कुछ खास मतलब नहीं रह जाता है.

इस सविधान के तहत, अरबों-खरबों के खर्च से जो चुनाव होते है, वे दरअसल जन-प्रतिनिधियों के चुनाव होते ही नहीं. चुनाव सिर्फ इस बात का होता है की अगले पॉँच वर्ष तक सरकार के रूप में “शासक वर्गों की मैनेजिंग कमिटी” का काम किस पार्टी या गठबंधन के लोग संभालेंगे ! अरबों-खरबों के खर्च से होने वाले ये चुनाव अब पॉँच साल के भीतर दो-दो, तीन-तीन बार हो रहे हैं और अपनी व्यवस्था के इस संकट का बोझ भी शासक वर्ग जनता से ही वसूल रहा है.

चुनाव के बाद अब जरा सरकार चलाने के खर्चों पर भी नजर डालें. औसत भारतीय आदमी की दैनिक आय लगभग 29 रुपये 50 पैसे है जबकि देश के राष्ट्र्पति पर रोजाना लगभग 4 लाख 14 हज़ार खर्च होते हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय पर लगभर 2 लाख 38 हज़ार रूपये कह्र्च होते हैं. केन्द्रीय मंत्रिमंडल का दैनिक खर्च लगभग 15 लाख रूपये है. संसद की एक घंटे की कार्रवाई पर लगभग 16 लाख रूपये खर्च होते हैं. इसमें सभी विधानसभाओं के खर्चों, राज्यों के मंत्रिमंडलों के खर्चों, एम.पी.-एम.एल.ए. के वेतन-भत्तों और विधानसभा चुनावों के खर्चों को जोड़ देने पर यह बात सहज ही समझी जा सकती है कि यह “जनतंत्र” कितना खर्चीला और कितना परजीवी है.

वर्ष 1999-2000 के केन्द्रीय बज़ट में विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा पर एक अरब 61 करोड़ रूपये और केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सुरक्षा पर 50 करोड़ 52 लाख रूपये की व्यवस्था की गयी थी. सभी राज्यों के मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर होने वाला खर्च भी इसमें शामिल करने पर इस मद की विशालता का आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है.

यह खर्च तो सिर्फ तथाकथित जनप्रतिनिधियों का है. विराट नौकरशाही तंत्र, पुलिस विभाग, अर्द्धसैनिक बलों और फौजी मशीनरी पर सालाना खरबों रूपए का जो अनुत्पादक खर्च होता है, उसका बोझ भी अपना पेट काटकर जनता ही उठाती है.

जो पूंजीवादी लुटेरों के बफादार कुत्ते हैं, वे भौकने, काटखाने और चौकीदारी करने की पूरी कीमत वसूल करते हैं. और पूंजीपति यह कीमत खुद नहीं देते, बल्कि जनतंत्र ने नाम पर उसी जनता से वसूल करते हैं, जिसकी हड्डियों से वे अपना मुनाफा निचोड़ते हैं.

संसदीय “जनतंत्र” की नंगई एकदम सामने आ जाने ने बाद विभिन्न राज्यों की कांग्रेसी, भाजपाई और नकली वामपंथी सरकारों ने पंचायती राज ने नाम पर सत्ता के विकेंद्रीकरण का नया शोशा उछाला है और पंचायतों को अधिक अधिकारसंपन्न बनाने का दावा किया है. यह वास्तव में गावों के स्तर पर धनी किसानों और पूंजीवादी भूस्वामियों को अधिक अधिकारसंपन्न बनाकर लूट और सत्ता में भागीदारी के लिए उन्हें अधिक अवसर देने का ही उपक्रम है. ऐसा करके, वास्तव में पूंजीवादी व्यवस्था के स्थानीय खंभों को मजबूत बनाया जा रहा है और ऐसा, शीर्ष पर, या पूरे ढांचे में, कोई बदलाव लाये बिना ही किया जा रहा है. आर्थिक शक्ति से वंचित आम लोग पंचायतों में निहित सीमित अधिकारों का भी तब तक इस्तेमाल नहीं कर सकते जब तक कि आर्थिक-सामाजिक ढांचे में बुनियादी बदलाव नहीं किया जाये, या फिर व्यापक जनता की संघर्षशील एकजुटता का बलशाही दबाब नहीं बनाया जाये.

हम क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा क्यों बुलंद करते हैं?

देश के इतिहास के ऐसे मोड़ पर, जब समय के गर्भ में महत्त्वपूर्ण बदलाव के बीज पल रहे हैं, हम पूंजीवादी संसदीय जनतंत्र की खर्चीली धोखाधडी और तथाकथित पंचायती राज के कपटपूर्ण शगूफे को सिरे से खारिज करने के लिए उन सबका आह्वान करते हैं, जो इस व्यवस्था में छले जा रहे हैं, ठगे जा रहे हैं, लूटे जा रहे हैं और आवाज़ उठाने पर कुचले जा रहे हैं. इस व्यवस्था में जिनका कोई भविष्य नहीं है, वे ही नई व्यवस्था बनाने के लिए आगे आएंगे. उन्हें आगे आना ही होगा !

देश के विभिन्न क्रांतिकारी जनसंगठनों द्वारा चलाया जा रहा क्रांतिकारी लोक स्वराज्य अभियान यही सन्देश देश के जन-जन तक ले जाने के काम में जुटा है कि साम्राज्यवाद और पूंजीवाद का एक-एक दिन हमारे लिए भारी है. इसका नाश हमारे अस्तित्व की शर्त है !

इनके विरुद्ध हम क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा क्यों बुलंद करते हैं? क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का मतलब है उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले सामाजिक वर्गों का नियंत्रण, फैसले की पूरी ताकत उन्हीं के हाथों में. इसका सारतत्व है – ‘सारी सत्ता मेहनतकशों को!’, इसका तात्पर्य है – विश्व पूंजीवादी तंत्र से नाभिनालबद्ध देशी पूंजीवादी व्यवस्था को चकनाचूर करके पूरे समाज के आर्थिक आधार और ऊपरी ढांचे का न्याय और समानता के आधार पर पुनर्गठन !

कुछ पूंजीवादी सुधारवादी और कुछ दिग्भ्रमित लोग आज विदेशी लूट और राष्ट्र की नई “गुलामी” के खिलाफ “स्वदेशी” का नारा दे रहे हैं. फासिस्ट संघ परिवार तक ने इसके लिए एक मंच बना रखा है. यह नारा भटकाने वाला है. विदेशी आज देशी लुटेरों से गाँठ जोड़कर ही जनता को लूट रहे हैं. देशी पूंजीपति लूट की बंदरबांट में अपने हिस्से के लिए साम्राज्यवादियों से खींचतान करते हैं और “स्वदेशी” की गुहार लगाते हैं, पर तकनोलाजी और पूंजी के लिए और विश्व बाज़ार में टिके रहने की खातिर वे उनसे गांठ जोड़ने के लिए मजबूर हैं. सवाल देश की गुलामी का नहीं है. मेहनतकश तो हर हाल में पूंजी का उजरती गुलाम है, चाहे वह देशी पूंजी हो या विदेशी. भूमंडलीकरण के दौर में गरीब देशों में पूंजीवादी लूट साम्राज्यवाद से गांठ जोड़कर ही जारी रह सकती है.

सवाल आज विदेशी गुलामी बनाम स्वदेशी का नहीं है, बल्कि सवाल पूरी पूंजीवादी उत्पादन-प्रणाली और पूंजीवादी सामाजिक-राजनितिक- सांस्कृतिक प्रणाली को ही नष्ट करने का है जो अनैतिहासिक और मानवद्रोही हो चुकी है.

इक्कसवीं सदी में इतिहास के एजेंडे पर यही केन्द्रीय मुद्दा है. क्रांतिकारी लोक स्वराज्य का नारा उस पूंजीवादी सत्ता को उखाड़ फैंकने के लिए संघर्ष का नारा है, जिसने देशी पूंजीपतियों की लूट के साथ ही साम्राज्यवादी देशों और उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के लिए देश के दरवाजे खोल दिये हैं.

क्रांतिकारी लोक स्वराज्य अभियान पूंजीवादी जनतंत्र के सभी स्वांगों और छल-छद्मों का भंडाफोड़ करते हुए वर्तमान संसदीय प्रणाली को सिरे से खारिज करने का और सरकारी पंचायती राज की असलियत को समझने का आह्वान करता है.

क्रांतिकारी लोक स्वराज्य अभियान व्यापक परिवर्तन के हर मोर्चे पर सन्नद्ध होने के साथ-साथ गाँव-गाँव में, शहर के मुहल्लों और मजदूर बस्तियों में जनता की वैकल्पिक सत्ता के क्रांतिकारी केन्द्रों के रूप में लोक स्वराज्य पंचायतों के गठन का आह्वान करता है.

हम जानते है, हमारा रास्ता लम्बा है. पर यही एकमात्र विकल्प है. यही इतिहास का रास्ता है. इसलिए हमारा यह संग्रामी संकल्प है कि ” लोक स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम हर कीमत पर उसे लेकर रहेंगे.”

नौजवान भारत सभा की ओर से जारी

यदि आप भी इस मुहीम में शामिल होना चाहते हैं तो इन पतों में से किसी पर भी संपर्क कीजिए :

1. बी- 100, मुकुंद विहार, करावल नगर, दिल्ली-110094, फोन-011-65976788, 099993-79381

2. डॉ. परमिंदर, गाँव- पख्खोवाल, जिला-लुधियाना. फोन 98886-96323

3. शहीद भगत सिंह लाईब्रेरी, गली नंबर-5, लक्ष्मण नगर, ग्यासपुरा, लुधियाना. फोन. 98771-43788

4. नवकाशदीप, गली नंबर-6/ बाईं ओर, डोगर बस्ती, फरीदकोट. फोन-94663-47046

5. गुलशन कुमार, शहीद भगत सिंह लाईब्रेरी, मकान नंबर-112, सैक्टर 22 सी, संगतपुरा मोहला, मण्डी गोबिंदगढ़. फोन-98728-65599

6. अमनदीप, भाईरुपा, बठिंडा. फोन- 97793-68203


BAIL APPLICATION OF GRAZIANO WORKERS REJECTED BY SESSIONS COURT – Anamika

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Bail Application filed on behalf of 63 workers of ‘Graziano Transmissioni’, who were arrested on 22.9.2008, on the charge of murder of Chief Executive Officer of the said company, Lalit Kishore Chaudhary, has been rejected by the Court of Sessions at Noida (Gautam Budhha Nagar), Uttar Pradesh. It is noteworthy that out of these 63 workers only 19 were in fact named in the First Information Report, got lodged by the employers themselves. No arrests however, were made from the spot of incident and the workers were arrested later in the day when they had gone to protest outside the local police station, against collusion of the police with the employers. 137 workers were then arrested by the police, out of which 63 were implicated in murder of CEO and 74 were arrested for apprehension of breach of peace.

In fact a long drawn struggle in the factory between the workers and employers had ultimately resulted in a clash on 22.9.2008, between unarmed workers on one side, and the armed goons and security guards employed by the management, on the other. It was in this clash that the CEO of the Company had sustained injuries, while 34 workers were also badly injured. A furore was created by corporate media and the bosses of industry, after the CEO of Graziano company later succumbed to the fatal injury in his skull. There is no sustainable evidence to support the plea that the said injury was wantonly inflicted by workers. Rather many eye-witnesses have testified  to the fact that the CEO had jumped form the rooftop out of fear after clash erupted between the workers and securitymen. The nature of injuries upon the person of CEO fully corroborate this theory.

Newspapers have quoted the wife of the deceased CEO, Smt. Ratna Chaudhary, a lecturer of Physics, in Kirori Mal College at New Delhi, telling media that the real cause behind the fateful incident, is the rivalry between business groups.

Graziano Transmissioni at Noida, a fully export oriented company, is subsidiary of a Multinational company ‘Graziano International’, based in Italy. The company had started its operations in Noida, UP, in 2003 with a capital of less than 20 crore rupees and in 2008 it had an annual turnover of more than 400 crores. Presently it is subsidiary of ‘Oerlikon’ company of Switzerland. It is a ‘Special Economic Zone’ in Noida, where more than 24 MNCs out of which 22 are Italian and Korean.

Industrial activity in the establishment had continued round the clock, initially in two shifts of 12 hrs each, i.e. 6am to 6 pm and then 6 pm to 6 am. Though working hours were limited to 8 hrs and the workers were paid overtime for additional 4 hrs, but the overtime was made compulsory for workers. No weekly off was being given. Those refusing to comply, were thrown out. The pattern of employment is also unique. Not even a single worker was employed from local region, as in the perception of employers, the local workers having roots in local population are difficult to be controlled, while those from outside can be better controlled. All of the workers employed in Graziano were from Uttarakhand, Bihar, Madhya Pradesh, Haryana etc.

Initially 350 permanent workers were employed as operators cum settlers on machines, with 80 Trainees/apprentices. About 500 work under the Labour contractors mostly for the job of packaging.

The very first dispute arose as the employers used to make deductions from the wages on false pretexts. First protest of workers started on 2nd Dec 2007, on the issue of demand for rise in wages and against deduction of wages by the employers on the fictitious ground that the entry card was not properly punched. Though it used to happen for technical fault in punching system, while subsequent punchings in the day were duly recorded, yet employers in order to harass the workmen used to deduct the wages, on this false pretext. Workers were constrained to take to protest.

Getting wind of workers being organized, striving to form a Trade Union, 3 workers were barred by the employers from entering the premises and one Manoj Kumar was terminated. Management refused to recognize the Union, while labour authorities at Kanpur, UP, under statutory mandate to register the Union, dismissed the application for registration of the Union, thrice, while keeping the fourth one pending, in collusion with employers.

While protesting against the high handedness of employers, 100 more workers were locked out on 4.12.2007, by the employers, by pasting a notice of lockout outside the gate. A settlement took place between the parties on 7.12.2007, but only to be repudiated by the employers later on. Workers’ had to return back to protest.

On 7.12.2007, AITUC, Trade Union Front of Communist Party of India, with whom workers remained affiliated, agreed with the management, on the back of the workers, to restore normalcy inside the factory first and then negotiate further. Workers refused to honour this agreement. Estranged, the leaders of AITUC, abandoned the workers.

In face of the struggle of workers, employers were forced to enter into a written settlement with them, on 24.1.2008, in presence of Deputy Labour Commissioner, Noida, who is the authority competent to ensure conciliation between the parties to an industrial dispute. On behalf of workers, five of their elected representatives participated in negotiations, among them –Rajender, Kailash Joshi, Pankesh Sharma, Ram Charan and Mohinder. Wage revision, on a homogenous pattern, was agreed with increment of Rs. 1200/- in current  year,  Rs. 1000/- in second year and Rs.800/- in third year.

However, immediately after this settlement, in February 2008, the employers brought in 400 workers, under a sham contract under local contractors namely Virendra Bhati, Manish and one Bhardwaj. These contractors with a newly raised force of 400 at their disposal, started to bully the old workers. Since the month of June 2008, these 400 workers were given abode inside the factory premises. The said contractors had also gathered iron rods, sticks and other weapons etc. inside the premises, to terrorize the regular workers and obviously to deal with the agitating workers, if need be. Apart from this a whole battalion of armed goons in the name of ‘security’ was also employed under contractor. It became clear thus, that the employers were planning to throw out the permanent workers and want to substitute them with these contract workers. During this time the government authorities and local administration remained mute spectator and not even slightest heed was paid to the complaints and grievances of the workers.

In order to pick up a dispute and provoke the workers, the employers refused to employ 5 worker Trainees/ apprentices and ousted them from the premises, in May 2008,  on the pretext that they handled the job of ‘settling’ of machine without instructions. It is pointed out that no such written instructions for ‘settling’ job were ever given to any of the workers. The same was part of ordinary job duty. Workers, thus insisted that then onwards instructions for ‘settling’ jobs be issued in writing. Workers also demanded that the 5 ousted workers be taken on job.

Instead of taking the 5 workers on rolls, the employers suspended 27 more workers, to teach them a lesson. Production Manager Amar Singh Baghel, who requested for a sympathetic approach,  was also ousted on the charge of being in collusion with workers.

The employers intentionally put-off the reverse exhaust fans inside the workshop, which resulted in immense increase in indoor temperature. To ensure that no workman even takes a breath during duty hrs, CCTV cameras were installed, and violators were immediately ousted.

Workers protested the aforesaid unfair labour practices and made complaints to concerned authorities but without any result. Authorities acted hand in hand with the employers. Workers also demanded 3 shifts of 8 hrs instead of two of 12 hrs each. But as if everything was falling on deaf ears of employers and competent authorities.

A disturbance started, on 30/31st May, 2008, on instigation by Virender Bhati, the local muscleman of employers, undercover of contractor. A totally false police complaint was made by the employers against the workers for committing affray, and 30 more of them were locked out on this false charge. Workers could be released after depositing personal bonds of Rs.1,00,000/- (One Lakh) each, with the Sub Divisional Magistrate, NOIDA. This amount of surety, is very unusual and extremely excessive amount. This shows the criminal connivance between the employers and the city administration, against the workers.

Instead of paying any heed to the legitimate grievances of workers, and in order to harass and terrorize the workers, 35 more of them were locked out, on 19.6.2008. With this total 97 workers stood ousted, while 192 continued inside out of permanent workers. By this time workers were affiliated with CITU, Trade Union Front of CPI (M) which agreed to the proposal of the employers that first of all normalcy be restored and protest outside the gate be ended, then thereafter a month employers would think to reinstate the workers. Workers refused to agree to this and thus CITU also abandoned the workers. However, protest of workers continued.

In the meanwhile workers affiliated to the HMS, Trade Union front of Rashtriya Lok Dal, with one Virender Sirohi as their leader.

On 1.7.2008, a Meeting between the employers and HMS took place in DLC office, in which Sirohi agreed to normal working on 2,3and 4th of July, 2008. On 2.7.2008, the employers instead of complying with the aforesaid settlement, locked out the remaining 192 workmen also. Workers are constrained to resume protest. Dharna before the office of DLC thus continued for 7 days, 3 days it was before the office of District Magistrate, Noida, a march on-foot from Surajpur Chowk to DM office and finally a dharna on Italian embassy was organized by the workers peacefully, but the entire machine remained totally insensitive towards the cause of the workers.

In the meantime, several times dispute was negotiated at DLC office or the police station, but only to be repudiated by the employers, at thro whims, on one or the other pretext or intrigue.

On 11.7.2008, once again a settlement was arrived at DLC, Office at Noida, in presence of Sub Divisional Magistrate and Circle Officer, Dadri. Pursuant to this settlement and with all bonafide, the workers joined at the factory, on 13.7.2008. Next meeting was then fixed at DLC office, for further conciliation, on 16.7.2008.

Out of the 27 suspended workers, the employers, however reinstated only 12, while simultaneously terminated the services of 15 workers on16.7.2008. This was apparently a device to divide and crush the workers, one by one.

Under pressure of workers, 55 more were notified to be reinstated, but were locked out the very next day on the false pretext of coming late at 9 am instead of 6 am.

Employers then under a pre-plan obtained an injunction in advance, from the Civil Court, Noida, preventing workers from agitating within 300 mtrs of the Factory premises.

When the Labour Commissioner of the State of Uttar Pradesh, came to Ghaziabad from Kanpur. on routine round, workers met him and complained about the partial and callous attitude of DLC, Noida. The Commissioner, entrusted the matter to DLC, Ghaziabad. Another meeting for conciliation between the parties, thus, took place in DLC office, Ghaziabad, on 4.9.2008, but without solution.

Yet another meeting in DLC, Ghaziabad office between employers and HMS, took place. None of the elected representatives of the workmen was present in the meeting. It was agreed by leaders of HMS, that workers would tender apology. DLC, Noida directed the workers to tender apology on or before 22.9.2008.

As workers went to tender apology with employers on 18.9.2008, they were told that they would call the workers on 22.9.2008. DLC refused to take the apology in his office. This all seemed to be part of a pre-plan.

On 22.9.2008, as the workers gathered to tender apology and join their duties, they were told that two workers at a time would be permitted to enter the ‘time office’ to tender apology. Five Italian consultants of the Company were also present inside the premises at that time. Inside the time office, armed security and local goons had already taken their positions. They started to coerce workers to specifically admit in their written apology that they had indulged in sabotage and violence. Some workers, succumbed to immense pressure, and wrote as they were told by the employers, while some refused. Anil Sharma, time officer slapped one of the workmen for refusing to write the apology in the desired format. Scuffle started on this, and the protesting workman was brutally beaten up at the hands of the security personnel and goons.

On hearing commotion, workmen present outside the premises, entered inside. Unable to prevent the workmen, one of the Manager ordered the security and goons present inside the premises, to attack the workmen. They complied, while the securitymen even fired at workmen.  Several workmen, about 34, were injured in the scuffle.

Jagmohan Sharma, Station Officer, Bisrakh Police Station remained present with force but did not intervene on the behest of employers who had conspired to beat up the workmen. Station Officer of police, has since been suspended for dereliction of duty.

People from both sides were then rounded up by the local police, but those on the side of employers were let to go while workers were kept in custody. Other workers who had gone to protest the collusion of police with employers, were also arrested. Later, it transpired that the CEO of the company had also got one head injury, allegedly in the scuffle, which had proved fatal to his life. It also transpired that some of the goons engaged by the employers to deal with the workmen, had double crossed and acting on behest of some rival industrialists, have killed the CEO, taking benefit of the chaos perpetuated by the employers themselves.

However, the employers who were desparate to dismiss the regular workmen, got an opportunity to implicate the workmen in the murder and thereby get rid of them. The local Capitalists, corporate media, bureaucracy all avowed enemies of working class, united to defame the workers and implicate them. 63 workers were then implicated for conspiring and participating in the killing of the CEO while 74 other have been implicated for rioting, affray etc.

Workers staged a sit -in protest at Jantar Mantar at New Delhi, against their victimization, on 2.10.2008. Another protest was organized by the ‘Graziano Workers Solidarity Forum’ – comprising of about 15 different organizations of labour, on 16.10.2008, at Jantar Mantar, New Delhi.

Instead of paying any heed to workers, the Government of Uttar Pradesh, headed by Mayawati, who claims to be a leader of dalits, assured the industrialists that the Noida being an Industrial region, special status be given to Industrialists. It has appointed a special Circle Officer, Industries, to provide security to Industrialists and has raised a special force for that. An additional police circle has also been created. The lbour authorities, including the Labour Commissioner of UP, have been put under the CEO of Noida and Greater Noida. All concerned officers, of police and administration have been transferred from the region, and those of the choice of employers have been posted. A special helpline has been started which would solve the problems of employers within two hours. Bulk arms licences will be given to private security at industries in SEZs.

Union Labour Minister, Oscar Fernandes, who initially made a statement advising the employers to be more sensitive towards the grievances of workers and not to push them so hard that they take to rebellion, was forced to forthwith withdraw his statement and apologise. The Minister has also said that the whole policy of ‘hire and fire’ needs a review. Jansatta of 25.9.2008, has quoted the industrialists, reacting to the statement of the Minister saying that ‘the incompetent politicians should also be killed’. Minister was forced to apologise, but he was quoted to have said that he had not justified the killing of CEO. He has only favoured the poor workers. But if he does not have the right to speak even for that, then in future he would not speak at all.

Serious concern has been expressed by the industry bosses and the politicians upon sharp decline in the strength of ‘organised’ labour force to 6% from 8%, due to slackening of labour laws. It shows how these bosses appreciate the role of trade unions to hold back the working class from real struggles.

This is not the first militant action of working class in the area. Before it the workers have Daewoo, Denso India Ltd, Yamaha Motors and Goenka Power have demonstrated such militancy. The issue of Graziano was blown out of proportion by frightened corporate media and the bosses of industry.

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* The facts in this rreport is based upon an interview of two workers of Graziano Transmissioni, namely Kapil Kumar and Ajay Dwivedi. Kapil belongs to Saharanpur, UP and had joined in 2003 as apprentice, after completing his ITI. He worked 8/9 months under contractor, which was a sham and then was given permanent appointment in 2004. Ajay Dwivedi was employed in 2006.

पूंजीवाद के इतिहास की सबसे बड़ी दूसरी मंदी

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‘लालच जिंदाबाद ! इंक.’ का नया शाहकार !!!

महामंदी-II

निर्देशक : अमेरिकी अर्थव्यवस्था

निर्माता : विश्व पूंजीवाद

—अभिनव

आह्वान– अक्टूबर-दिसम्बर २००८ से साभार

एक बार पुलित्ज़र विजेता रॉबर्ट पेन वोरेन ने कहा था, “अतीत हमेशा वर्तमान को एक झिड़की होता है.” आह्वान के पिछले अंक में अमेरिकी सबप्राइम संकट के बारे में लिखते हुए हमने कहा था कि यह छोटे चक्रीय क्रम में आने वाला कोई छोटा संकट नहीं है बल्कि अन्तिम मर्ज़ से ग्रस्त पूंजीवाद का एक महासंकट है जो आठ दशक के लंबे चक्र  के बाद दोबारा आया है. यह निश्चित तौर पर एक बहस का मुद्दा हो सकता है कि यह साम्राज्यवाद का आखरी संकट है या नहीं . बहुत से  प्रेक्षक कहेंगे कि इस संकट से देर-सबेर विश्व पूंजीवाद उबर जाएगा. लेकिन अंतदृष्टि रखने वाले सभी अर्थशास्त्री और राजनितिक टिप्पणीकार स्पष्ट रूप से बता रहे हैं कि जिन नुस्खों से विश्व पूंजीवाद मौजूदा संकट से उबर सकता है वे इससे भी भयंकर मंदी को कुछ समय बाद प्रस्तुत कर देंगे. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने ८ अक्टूबर के दिन ही दुनिया की चार महत्वपूर्ण आर्थिक शक्तियों ने इस महामंदी के प्रभाव को कुछ समय के लिए टालने की खातिर कुछ कदम उठाये. अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के केंदीय बैंकों ने ऋण दरों को गिरा दिया और कुछ देशों में सरकारों ने ऋणों और बैंकों की देनदारियों का बीमा कर दिया है. ऐसा दो कारणों से किया गया है; पहला, बाज़ार में जारी गिरावट को थामा जा सके; दूसरा, लोगों के बीच भय न फैले. लेकिन इन देशों की सरकारें अच्छी तरह जानती है कि ऐसा करके वे संकट को कुछ समय के लिए हल्का महसूस करा सकते हैं.  इससे संकट वास्तव में कम नहीं होने वाला. बल्कि इससे संकट और भयंकर तरीके से बढ़ सकता है.

हालाँकि हमने पिछले अंक में बताया था कि पूरी विश्व अर्थव्यवस्था डॉट-कॉम क्रैश, स्टॉक मार्केट संकट और सबप्राइम संकट से होते हुए किस तरह इस वैश्विक वित्तीय संकट तक पहुँची है, लेकिन हम एक बार फ़िर पाठकों को इस पूरी प्रक्रिया से अवगत करना चाहेंगे.

आज हम जो परिघटना देख रहे हैं वह दरअसल एक सट्टेबाजी से पैदा हुए वित्तीय बुलबुले का फूटना है. यह बुलबुला बना था अमेरिकी आवास बाज़ार में. कहानी को शुरू से शुरू करने की बजाय हम आवासीय बाज़ार से ही शुरू करेंगे. अमेरिका  में यह मान्यता रही है कि आवास बाज़ार में कभी मंदी नहीं आ सकती क्योंकि घर का स्वामी होना हर अमेरिकी नागरिक के सबसे प्यार से पाले गए सपनों में से एक होता है. इसलिए यह माना जाता है कि घरों की कीमत अमेरिका में कभी घट नहीं सकती है. इसलिए आवास ऋणों का बाज़ार अमेरिका में काफी गर्म रह्ता  है. यह गर्मी खास तौर पर डॉट-कॉम और शेयर बाज़ार बुलबुले के फूटने के बाद और बढ़ी. कारण यह था कि इन संकटों के बाद वित्तीय बाज़ार में जो मंदी आई उससे निपटने के लिए अमेरिकी केंदीय बैंक ने ऋण दरों को बेहद घटा दिया और बाज़ार में तरलता को इंजेक्ट किया. नतीजा यह था  कि तमाम ऋण बैंकों ने बड़े पैमाने पर आवास ऋण देना शुरू किया. आवास ऋणों की मांग एकदम आसमान छूने लगी . यह पूरा काम किस तरह पूरा होता था, इस पर निगाह डाल कर ही मौजूदा संकट की आन्तरिक संरचना को समझा जा सकता है.

दुनिया भर के निवेश बैंक अमेरिकी बैंकों से आवास ऋणों को खरीदते हैं. इसके बाद वे इसे सी.डी.ओ. (कोलैटरल डेट ऑब्लिगेशन) पैकेजों में तोड़ देते हैं.  इसका अर्थ होता है उन आवास ऋणों को खरीदना जिन्हें बैंक पहले ही जारी कर चुके होते हैं. इसके बाद उन्हें छोटे-छोटे वित्तीय पैकेजों में तोडा जाता ही और फ़िर ब्याज दरों, ऋण काल आदि के आधार पर विभिन्न नामों से दुनिया भर के निवेशकों को बेचा जाता है. ये नाम कुछ ऐसे होते हैं–“हाई ग्रेड स्ट्रक्चर्ड एनहैंस्ड लीवरेज फंड” !! ये काफ़ी कुछ म्यूचुअल फंड्स जैसे होते हैं. जब कोई निवेशक सी.डी.ओ खरीदता है तो उसे उस ऋण पर आने वाले ब्याज का लाभांश प्राप्त होता है. केन्द्रीय बैंक निवेश बैंकों को ये ऋण इसलिए बेचते हैं क्योंकि निवेश बैंक उनको एकमुश्त विशालकाय पेशगी देते हैं. एकमुश्त भुगतान केन्द्रीय बैंकों को ऋण देने-लेने में और ज़्यादा सक्षम बना देता है क्योंकि यह उनके पास उपलब्ध तरलता को बढ़ा देता है. नहीं तो आवास ऋण का वापस भुगतान होने में २० से ३० वर्ष का समय लग जाता है. इन  सी.डी.ओ. पैकेजों में दुनिया भर के धनलोलुप सट्टेबाजों से लेकर लोभी बैंकर व लालची दलाल निवेश करते हैं और इसके जोखिम को वे अपने से नीचे छोटे निवेशकों में बाँट देते हैं. नतीजा यह होता है कि भारत के छोटे से कर्मचारी से लेकर लीमैन जैसे विशालकाय निवेश बैंक एक कमज़ोर-ज़र्ज़र वित्तीय जाले का एक  अंग बन जाते हैं. अगर एक जगह से जाला टूटता है तो सभी धड़ाम-धड़ाम गिरना शुरू हो जाते हैं. आवास बाज़ार को वित्तीय निवेशक बैंकों ने इसलिए चुना क्योंकि यहाँ जैसी ब्याज दर उन्हें और किसी भी बाज़ार में नहीं मिल सकती. डॉट-कॉम बुलबुले के फटने के बाद शेयर बाज़ार उतना ललचा देने वाला निवेश विकल्प नहीं रह गया था.

बैंक आवास बाज़ार को एकदम सुरक्षित मानते थे. इसका कारण पहले ही बताया जा चुका है. नतीज़तन, बैंकर यह मानकर चलते थे कि २-३ प्रतिशत से ज्यादा ग्राहक ऐसे नहीं होंगे जो ऋण के ब्याज का भुगतान न कर सकें. इसके अतिरिक्त, भुगतान में असफलता से निपटने के लिए निवेश बैंकों ने इन ऋणों का बीमा ए.आई.जी. बीमा कम्पनी से करवा लिया. बीमा कंपनी ने भी आवास बाज़ार से अत्यधिक विश्वास दिखलाते हुए इन ऋणों का बीमा कर दिया. लेकिन २००५ के अंत में यह विश्वास खोखला साबित होना शुरू हो गया.

जैसे-जैसे सी.डी.ओ. पैकेजों की मांग वित्तीय बाज़ारों में तेज़ी से बढ़ने लगी, वैसे ही विशाल निवेश बैंकों, जैसे लीमैन, ने स्वयं अपनी पूँजी इसमें निवेश करनी शुरू कर दी. इससे एक हाऊसिंग बूम पैदा हुआ. यह पूरा बूम इस आवास बाज़ार में मौजूदा स्थायी तेज़ी की धारणा पर आधारित था. इस बूम का फल चखने के लिए टटपूंजिया निवेशकों से लेकर विशाल बैंकों तक सभी इसमें निवेश करने लगे. इसके कारण दलाली के बदले में केन्द्रीय बैंकों ने और अधिक आवास ऋण देना शुरू कर दिया. इन ऋणों को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए बैंकों ने धीरे-धीरे ऋण देने के मानकों को ढीला करना शुरू कर दिया. यह वित्तीय बाज़ार में “अति-उत्पादन” के संकट से निपटने के लिए उठाया जाने वाला कदम था. वित्तीय संस्थानों को निवेश के लिए नए अवसर और स्थान चाहिए थे और उन स्थानों पर निवेशकों को लुभाने के लिए नए हथकंडे भी अपनाए ही जाने थे. नतीजतन, सबप्राइम लेंडिंग की शुरुआत हुई जिसमें किसी व्यक्ति के ऋण इतिहास पर ध्यान दिए बगैर ऋण देने की शुरुआत की गई. ऋण के भुगतान की असफलता से निपटने के लिए एडजस्टेबल (परिवर्तनीय) ब्याज दरों के सिद्धांत को लागू किया गया. यानि, कुछ ही किश्तों में ऋण के बराबर ब्याज वसूल लेने का हथकंडा. इसके पीछे यह मान्यता काम कर रही थी कि कोई भी ऋण लेने वाला पहली कुछ किस्तें तो देगा ही, उसके बाद ही वह डिफाल्टर बनेगा. नतीज़तन, लोगों ने घर खरीदने के लिए बड़े पैमाने पर ऋण लेना शुरू कर दिया और इससे घरों की मांग बढ़ी,  उनकी कीमतें भी बढ़ी और फ़िर ऋण की मांग और अधिक बढ़ी; इससे घरों की मांग फ़िर से और अधिक बढ़ी, फ़िर ऋण की मांग भी बढ़ी… और नतीजा था, एक विशालकाय वित्तीय बुलबुला. लोगों ने आवास को एक निवेश के रूप में देखना शुरू कर दिया जिसने इस बुलबुले को अन्तिम हदों तक फुला दिया.

२००६ के अंत में इन ऋण दाताओं ने एक ऐसी परिघटना देखनी शुरू की जो उनकी कल्पना से परे थी. लोगों ने ऋण लेकर घरों को खरीदा और पहले ही भुगतान में उन्होंने ऋण वापस करने में अपनी क्षमता जता दी. २००४ से २००६ के बीच ब्याज दरें बढ़ती  गई थीं जिसके कारण परिवर्तनीय दर वाले ऋणों की किश्त भरना ऋण प्राप्त कर्ताओं के बहुत बड़े हिस्से के लिए असंभव हो गया. परिणामत:, फोरक्लोज़र्स, यानि कि ऋण वापस न मिलने की सूरत में नीलामी शुरू हो गई. लेकिन इसके साथ ही आवास बाज़ार में कीमतों में गिरावट शुरू हो गई और घर खरीदने या उसमें निवेश करने में लोगों की दिलचस्पी तेज़ी से घटी. यानि, अब नीलाम होने वाले घरों को खरीदने वाले लोग भी बेहद कम हो गए. लिहाज़ा करोडों-अरबों डालरों का ऋण डिफ़ोल्ट्स के कारण डूबना शुरू हो गया. ज़्यादा से ज़्यादा घर बाज़ार में बिकने के लिए बिछ गए लेकिन खरीददार कोई नहीं था! वाल स्ट्रीट की कम्पनियाँ जो इन आवासीय ऋणों को खरीदकर सी.डी.ओ. पैकेजों में तोड़कर दुनिया भर में बेचकर मुनाफा कमा रही थी, उन्होंने आवासीय ऋणों को निवेश बैंकों आदि से खरीदना बंद कर दिया. नतीज़तन, तमाम निवेश बैंक तबाह होने लगे. इन ऋणों का बीमा करने वाली कंपनी ए.आई .जी. ने कभी नहीं सोचा था कि इतने सारे डिफाल्ट्स होंगे. इतनी बड़ी संख्या में होने वाले दावों को वह पूरा नहीं कर सकती थी. सबसे मज़ेदार यह बात थी कि इन बीमा करारों को भी तोड़कर दुनियाभर के बाज़ारों में बेच दिया गया था जिससे यह पता कर पाना और अधिक मुश्किल हो गया कि बर्बाद होने वाले निवेशकों को मुआवजा देने कि लिए जिम्मेदार कौन है?

आवासीय ऋणों की नीवं पर बना यह वैश्विक बुलबुला अब छोटे-छोटे विस्फोटों के साथ फूटना शुरू हो गया है. नतीजे के तौर पर हम पिछले कुछ महीने में दिवालिया हुए वैश्विक वित्तीय बैंकों पर एक निगाह डाल सकते हैं. अभी हाल ही में बर्बाद हुए विशालकाय बैंक लीमैन की भारतीय शाखा खरीदे जाने के लिए बाज़ार में उपलब्ध है जिसमें करीब एक हज़ार लोग काम करते हैं. भारतीय शेयर बाज़ार इस उथल-पुथल से यह लेख लिखे जाने तक ११,००० (२४ अक्टूबर को ८७०१ पर बंद) के आंकड़े पर आ चुका था. गौरतलब है कि अभी साल भर पहले ही उसके २१,००० के आंकडे को पार करने पर सारे तेजड़िए पागलों की तरह उन्मांद में दलाल स्ट्रीट की सड़कों पर नाच रहे थे. इसका कारण यह है कि वाल स्ट्रीट के बड़े खिलाड़ियों ने भारत में निवेशों की बिकवाली शुरू कर दी है ताकि मोर्टगेज़ बाज़ार में होने वाले अपने नुकसानों की भरपाई कर पाएं. दुनिया भर में हेज फंड्स, पेंशन फंड्स और बीमा कंपनियों नें अपने निवेशकों के करोड़ों डॉलर इस संकट में गवां दिए हैं. भारत के नवधनाढ्यों के लड़के-लड़कियों को भी इस संकट की गर्मी से पसीना आना शुरू हो गया है, जो प्रबंधन और बैंकिंग आदि का कोर्स करके बाहर फुर्र से उड़ जाना चाहते थे. बाहर के बैंकों में पहले ही हजारों रोजगारों की कटौती की जा चुकी है. और यह प्रक्रिया अभी जारी है. तमाम भारतीय धनिकों की संतानों को जो एम्प्लोय्मेंट लेटर मिले थे उन्हें अनिश्चित काल के लिए  रद्द किया जा रहा है. भारतीय आई.टी. कम्पनियाँ जो अमेरिका निवेश बैंकों के लिए काम करती थी, तबाही की कगार पार खड़ी हैं. यही प्रक्रिया पूरी दुनिया में जारी है और अभी यह संकट अपने पूरे आकर में सामने नहीं आया है. सभी राष्ट्राध्यक्ष इस बात को मान रहे हैं कि यह संकट अभी और बढ़ने वाला है. बुश ने स्वयं कहा है कि अमेरिका एक लम्बी और यंत्रणादाई मंदी की और बढ़ रहा है. अभी अमेरिका  सरकार ७०० अरब डॉलर वित्तीय बाज़ार में डाल रही है ताकि सट्टेबाजों को कोई नुकसान न हो और जो वित्तीय बुलबुला बना है वह फूटे नहीं बल्कि और फूले. अगर ऐसे करके कुछ समय के लिए संकट के प्रभाव को टाला जा सके तो बहुत जल्दी ही  यह संकट और विकराल रूप में विश्व पूंजीवाद के सामने होगा.
तमाम संशोधनवादी वामपंथी अर्थशास्त्री पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दायरे में रहते हुए विनियमन को लागू करके इस संकट को दूर करने का कीन्सियाई नुस्खा सूझा रहे हैं. लेकिन वे भूल जाते हैं कि पूँजी की गति को विनियमित करना पूंजीवादी सरकारों के बूते की बात नहीं होती. मुनाफे की हवस में चलने वाली एक अनियंत्रित, अनियोजित और निजीकृत अर्थव्यवस्था में यह हो ही नहीं सकता. बीच-बीच में होने वाले सरकारी किन्सियाई हस्तक्षेप संकट को कुछ समय के लिए टाल सकता है, सिर्फ़ दुबारा और अधिक गति और संवेग के साथ आने के लिए. यह विनियमन एक शेखचिल्ली का सपना है. ऐसा कोई भी विनियमन पूंजीवादी विश्व को इन चक्रीय संकटों से नहीं बचा सकता हैं. इसके सभी तर्कों को यहाँ विस्तार के साथ नहीं बताया जा सकता. हम अपने पाठकों को पिछले अंक में अमेरिकी सबप्राइम संकट पार प्रकाशित लंबे लेख को पढने का सुझाव देंगे. संक्षेप में, यह साम्राज्यवाद के भूमंडलीकरण के दौर का संकट है. भूमंडलीकरण विश्व साम्राज्यवाद की चरम अवस्था है. इसके बाद पूंजीवाद के पास कोई नई शरणस्थली  नहीं है. ऐसे संकट दुनिया भर में मजदूरों और आम जनता में एक भयंकर असंतोष को जन्म दे रहे हैं और आम मेहनतकश जनता इस बात को धीरे-धीरे समझ रही है कि पूंजीवाद इस दुनिया के आम लोगों को अब सिर्फ़ भूख, बेरोज़गारी, कुपोषण और बर्बादी दे सकता है. मानवता को इसके विकल्प के बारे में सोचना होगा, किसी बेहतर संत कल्याणकारी पूंजीवाद के बारे में नहीं.

दो -वर्गों का समाज

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सबसे खुबसूरत है वह समुद्र

जिसे अब तक देखा नही हमने

सबसे खूबसूरत बच्चा

अब तक बड़ा नहीं हुआ

सबसे खुबसूरत हैं वे दिन

जिन्हें अब तक जिया नहीं हमने

सबसे ख़ूबसूरत हैं वे बातें

जो अभी कही जानी है

—नाजिम हिकमत

दो -वर्गों का  समाज

अगर आप किसी आधुनिक समाज शास्त्री से सवाल करें कि वर्ग कितने होते हैं, उनका जवाब होगा छ: , या शायद तीन, या बारह, या कोई अन्य संख्या जो उनकी  कल्पना को भाए. ‘वर्ग’ की बहुत सी परिभाषाएँ दी जाती हैं. वे प्राय नकली और अप्रयाप्त होती हैं.

एक बेहतर सहायक उत्तर

हमरा समाज दो वर्गों में विभाजित है. इसमें एक मेहनतकश वर्ग और दूसरा पूंजीपति वर्ग शामिल है. मेहनतकश वर्ग को अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए काम करना पड़ता है जबकि पूंजीपति वर्ग के जीने के लिए प्रयाप्त धन होता है. अगर आप को आश्चर्य हो कि आप किस वर्ग से सम्बन्ध रखते हैं, अपने आप से एक सवाल करें कि अगर  आप कल से काम करना बंद कर दें तो क्या आप अपने निवेश पर गुज़ारा कर सकते हैं?. पूंजीवादी  वर्ग इस प्रकार आपकी तरह टूट जाए, सवाल ही पैदा नहीं होता . प्रत्येक श्रेणी में कुछ लोग शामिल होते हैं. निसंदेह ज्यादातर लोग मेहनतकश श्रेणी में शामिल हैं और पूजीपति श्रेणी जनसँख्या  का एक छोटा सा ही हिस्सा हैं. लेकिन, पूंजीवाद को समझने के दृष्टिकोण  से वे एक बहुत महतवपूर्ण अंश हैं.

सहायता के लिए इस परिभाषा का क्या महत्व है

केवल दो ही श्रेणीओं के होने के पीछे क्या कारण है ? उत्तर बड़ा सरल है, वह है कि, आपको यह समझना है कि कैसे   पूंजीवाद काम करता है. श्रेणी हमें बताती है कि हम अपनी वर्तमान अवस्था में क्यों हैं. यह हमें समझाती है कि किस प्रकार समाज गुलाम समाज से सामंतवाद को पार करते हुए  पूंजीवाद में विकसित हुआ और बदल गया. विशेष आर्थिक हित के कारण एक वर्ग ने दूसरे वर्ग से समाज के आर्थिक आधार को छीन लिया.

परंतु श्रेणी केवल इतना ही नहीं समझाती कि  इस पूंजीवाद के झंझट में हम कैसे फंस गए बल्कि पूंजीवाद किस प्रकार काम करता है , का विश्लेषण भी करती है. अधिकतर लोगों के जीवन का मुख्य तथ्य है काम— घर में काम ताकि उजरती-गुलाम का गुजरा हो सके या फ़िर जीने के लिए मजदूरी करने का काम. क्यों ? ऐसा हमेशा से नहीं रहा. सामंती युग में भू-दास खेतों पर काम करते हुए , भोजन का उत्पादन करते थे ताकि वे उसे खा सके . इस प्रकार वे अपना समय व्यतीत करते थे. निश्चय ही, अगर उत्पाद  भू-पति को देना पड़ता था, यह परेशानियों का सबब था, फ़िर भी ये परेशानियाँ आधुनिक उजरती गुलाम की परेशानियों से बिल्कुल अलग तरह की थीं.

वर्ग पूंजीवाद की दुर्घतानायों का भी विश्लेषण करता है: युद्ध, जिसे हम इसलिए लड़ते हैं ताकि पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा हो सके. अकाल तभी पड़ता है जब पूंजीपति श्रेणी हमारे खान-पान से मुनाफा नहीं कमा रही होती. काम से हमें दूर रखकर बेरोज़गारी इसलिए पैदा की  जाती है ताकि हम मजदूरों में मुकाबला पैदा करके मजदूरी को कम से कम रखा जा सके, और इस प्रकार और बहुत सी बातें. इस प्रकार अब हमारे पास बचती हैं दो श्रेणियां , चूंकि यही हमें चाहिए यह जानने के लिए कि किस प्रकार हम पूंजीवाद तक पहुच गए और यह पूंजीवाद किस प्रकार विकसित हुआ.

सबसे महत्वपूर्ण कारण कि केवल दो ही श्रेणियां क्यों हैं, का इन दो कारणों से कुछ भी लेना-देना नहीं है. यह एक तथ्य है कि इससे हमें समझ आती है कि किस तरह हम इस पूंजीवाद के झंझट से मुक्त हो सकते हैं. हम, मेहनतकश श्रेणी के लोगों का इसी में हित है कि इस बीमार पूंजीवादी श्रेणी जिसमे हमें बलात रूप से धकेल दिया गया है, से किस तरह मुक्ति पाई जाए.केवल वर्ग-चेतना के कार्य  की पहचान करके ही एक वर्ग-विहीन समाज की स्थापना हो सकती है. एक रास्ता है जिस पर चलकर ऐसा किया जा सकता है और वह रास्ता है वैज्ञानिक समाजवाद का, केवल  इसी रास्ते पर चलकर वर्ग-विहीन समाज जिसे साम्यवाद कहतें हैं, की मंजिल को पाया जा सकता है. एक वर्ग के रूप में संगठित होकर हम समाज बदल सकते हैं. अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमें पूंजीवाद से यूँ ही चिपके रहना होगा.

राजनितिक लोगो का यह दावा की हम वर्ग-विहीन समाज में ही तो रह रहें हैं, निश्चित रूप से गुमराह करने वाला है, काश कि वे इमानदारी से इसे स्वीकार कर पाते. समाज विज्ञानी ग़लत बताते हैं कि पूंजीवाद और वर्गों का अस्तित्व सदैव रहा है और सदैव रहेगा. हमारा यह मानना कि समाज दो वर्गों में विभाजित है पूर्ण रूप से ठीक हैं क्योंकि कोई और नहीं बल्कि यही तरीका हमें समझाता है कि किस प्रकार हम युद्ध, अकाल, गरीबी और बेरोजगारी पर काबू पा सकते हैं. हमें जरूरत है वर्ग-चेतना की और उससे भी बढ़कर इस बात के लिए चेतन होने की कि हम मेहनतकश वर्ग से तालुक रखते हैं और वे पूंजीपति वर्ग से. इसलिए वर्ग दो होते हैं.

योगेन्द्र
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समाज में मोटे तौर पर तीन प्रकार के लोग मिलेंगे: प्रथम जो अपनी बुद्धि के बल पर जीवनयापन करते हैं और बुद्धिबल के सहारे समाज में प्रतिष्ठा भी पा जाते हैं; दूसरे वे हैं जो दैहिक श्रम के भरोसे जीते हैं और समाज उन्हें सम्मान देने की नहीं सोचता; और तीसरे वे हैं जो किस्मत लेकर पैदा होते हैं, जिनके पास संसाधन होते हैं बिना कुछ किये मौज से जीने के लिये । तीनों ही सुख से जीने की तमन्ना लेकर आते हैं, और यह जरूरी नहीं कि वे समष्टि के हित की कामना लिये हों । जो कुछ अलग होते हैं वे तीनों वर्गों में होते हैं और अपवाद होते हैं न कि नियम !

– योगेन्द्र जोशी (indiaversusbharat.wordpress.com; hinditathaakuchhaur.wordpress.com;
jindageebasyaheehai.wordpress.com; vichaarsankalan.wordpress.com)


शहीद भगत सिंह विचार मंच, संतनगर

इस सामाजिक आर्थिक प्रबंध में, मनुष्य की किस्म उसकी सामाजिक भूमिका और रोज़ी-रोटी के लिए उस द्वारा अपनाए जाने वाले ढंगों से निर्धारित होती है. निजी संपत्ति की नींव पर टिके इस प्रबंध में, प्रत्येक आदमी को अपनी भूमिका स्वयं चुनने की स्वतंत्रता नहीं है. जन्मजात किस्मत का धनी कोई पैदा नहीं होता. इस वर्गीय समाज में, उसकी आर्थिक हैसियत ही उसे किस्मत का धनी या बदकिस्मत बनाती है. यह सामाजिक आर्थिक हैसियत किसी मनुष्य की जन्मजात विशेषता के कारण नहीं होती.

कुछ लोग अपनी जीविका के लिए, अपनी श्रम शक्ति बेचते हैं, चाहे वह शारीरिक श्रम हो या मानसिक. दूसरे लोग, पूँजी के मालिक होने की हैसियत से श्रम शक्ति खरीदते हैं और इसी प्रक्रिया द्बारा अपनी पूँजी में वृद्धि करते हैं. इसी आधार पर, मोटे तौर पर समाज में दो तरह के लोग हैं, एक पूँजी के मालिक और, दूसरे श्रम शक्ति बेचकर जिन्दा रहने वाले मजदूर वर्ग के लोग. अपनी वर्गीय स्थिति की बदौलत मजदूर वर्ग, अपनी श्रम शक्ति बेचने की मजबूरी के कारण पूंजीपतियों की बेरहम लूट का शिकार होते हैं.

समाज के अन्य तबके व वर्ग, समाज के इन दो मुख्य वर्गों के बीच इन वर्गों के सहयोगी या विरोधी की भूमिका अदा करते हैं. मानवीय इतिहास की एक विशेष मंजिल पर मानवीय श्रम का शारीरिक और मानसिक श्रम में विभाजन हो गया. शारीरिक श्रम या मानसिक श्रम विशेष इतिहासिक परिस्थितियों की पैदावार है न कि किसी व्यक्ति विशेष या व्यक्तियों के समूह की जन्मजात विशेषता. समाज के विकास की विकसित मंजिल में यह विभाजन भी आलोप हो जाएगा.

एक गैर राजनितिक बुद्धीजीवी, इस सच्चाई से अनजान ख़ुद ही अपने आप को महान और किस्मत का धनी होने के भ्रम में, अपने ही सीमित खोल में बनाये काल्पनिक संसार में संतुष्ट है. जब कभी, वह अपने इस काल्पनिक संसार के भ्रम से मुक्त होकर, खोल के बाहर झांकेगा, तो आवश्य ही इस संसार की क्रूर हकीकतें उसे निष्पक्ष नहीं रहने देंगीं. अगर वह ईमानदार है तो वह सच्चाई, न्याय और गौरव के पक्ष में खड़ा होगा. परन्तु सच्चाई को समझकर भी, यदि वह निष्पक्ष और गैर राजनितिक होने का नाटक करता है तो वह दम्भी है, सच का सामना करने से घबराता है. भविष्य का आजाद मनुष्य, मानवीय इतिहास के इस बेरहम और मुश्किल दौर में, उस द्बारा दिखाई गई कायरता पर अवश्य सवाल उठाएगा.