पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

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इससे पहले, लिंक जोड़ने के लिए देखें : वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पोंजी स्कीम जैसी है ?

विश्व आर्थिक मंदी ने एक बार फिर सारी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को मार्क्स की ओर मुड़ने के लिए मजबूर कर दिया है.  ‘द्वंदात्मक भौतिकवादी’ भूगोलवेत्ता ‘डेविड  हार्वे’ जो चालीस वर्षों से मार्क्स की पूंजी पढ़ा रहें हैं और जिन्हें पहली बार गंभीरता से लिया जा रहा है, से ‘लॉरी टेलर’ की मुलाकात पर आधारित यह आलेख ‘http://newhumanist.org.uk’ से लिया गया है.

डेविड हार्वे तुरंत अपनी तरंग में आ जाते हैं. “पूंजीवाद” वे रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स ,  लन्दन के हाल में अपने श्रोताओं से कहते हैं, “कभी भी अपने संकटों का समाधान नहीं करता. यह उन्हें केवल एक स्थान से दूसरी स्थान पर ले जाता है. ब्राज़ील से रूस, से अर्जन्टीना, से अमेरिका, से ब्रिटेन, से यूनान”.

जैसे ही वे इन बार-बार आनेवाले संकटों,  और विशेषरूप से, 1970 के बाद से उनकी बारंबारता में नाटकीय बढौतरी के कारकों का विश्लेषण करना शुरू करते हैं, मैं अपनी नज़र, श्रोताओं पर डालता हूँ. मैं अपनी चैयरमेन की सीट से देख सकता हूँ कि व्याख्यान सभागार खचाखच भरा हुआ है. कोई भी कुर्सी खाली नहीं है और लगभग दर्जन एक श्रोता गलियारे में खड़े हुए हैं. रॉयल सोसाईटी ऑफ़ आर्ट्स [RSA]   के लंच-समय के व्याख्यानों में, अक्सर, अच्छी हाजिरी होती है लेकिन क्या कमरे में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति ने इस बात को तस्लीम कर लिया था कि जो कुछ वे आज इस वक्ता से सुनने जा रहे हैं, वह आज के पूंजीवाद का विश्लेषण है जो मार्क्स से शुरू होकर मार्क्स पर ख़त्म होता है, ऐसा विश्लेषण जोकि कई प्रकार से वैसा ही है, जैसा मैंने ७० और ८० के दशक में सैंकड़ों नीरस सभाओं में कट्टर समाजवादियों से सुना था.

कोई कारण नहीं था कि मैं फिक्रमंद होता. इस पर भी कि हार्वे ने तुरंत मार्क्स के प्रति अपना कर्ज तस्लीम किया और बार-बार वे मार्क्स को उद्घृत करते रहे. फिर भी, तीस मिनट के व्याख्यान में, किसी भी क्षण,  उनके अमीर श्रोताओं में बेचैनी  का कोई चिह्न नहीं था और समापन पर, प्रश्नौतर काल में, केवल एक श्रोता का सुझाव था कि मार्क्स को छोड़कर कुछ भी, हमारे मौजूदा आर्थिक संकट को समझने के लिए, सबसे बढ़िया हो सकता है.

निसंदेह, उस आर्थिक सिद्धांत को, जिसे सोवियत यूनियन के ढह-ढेरी हो जाने पर, भले ही अतार्किक रूप से ही सही, इतिहास में जगह दे दी गयी थी, स्वीकार करने की चाहत के पीछे एक बढ़िया कारण था. बिलकुल सीधी सी बात है कि विश्वभर के अर्थशास्त्रियों की,  इतिहास में अभी-अभी  घटित हुई घटनाओं पर एक भी संतोषजनक व्याख्या देने की पूर्ण असक्षमता. इसी तथ्य को श्रोताओं के सामने सही और साफ-साफ तरीके से प्रस्तुत करने में, हार्वे पूरी तरह से माहिर हैं.

अपनी ताज़ा पुस्तक, ‘पूंजी की पहेली और पूंजीवाद के संकट’ की प्रस्तावना में, वे यह कहानी सुनाते हैं, ” जब प्रतापी महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने नवंबर 2008 में, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के अर्थशास्त्रियों से यह पूछा कि क्यों नहीं वे मौजूदा आर्थिक संकट की आमद को देख पाए ( एक ऐसा सवाल जोकि निसंदेह प्रत्येक व्यक्ति की जबान पर था, लेकिन जिसे कोई सामन्ती शासक ही, इस तरह, हलके अंदाज में पूछ सकता था और उत्तर की अपेक्षा पाल सकता था ) तो अर्थशास्त्रियों के पास, देने के लिए, कोई जवाब तैयार नहीं था. छह महीने के मुख्य नीति निर्धारकों के साथ मिलकर किये गए अध्ययन, जुगाली और गहन विचार-विमर्श  के बाद, ब्रिटिश अकादमी के गलियारे में एकत्रित हुए सभी अर्थशास्त्रियों ने, एक साझे पत्र में, प्रतापी महारानी के सामने स्वीकार किया कि वे ,किसी हद तक, उस दृष्टि को खो चुके हैं जिसे वे ‘प्रणालीबद्ध जोखिम’ के नाम से जाना करते थे.

हार्वे, इस एपिसोड की स्विफटियन विडंबना का रस्सावदान करते हुए कहते हैं, “शिक्षित अर्थशास्त्रियों की अपनी असफलता पर बहानेबाजी करने की नाकाम कोशिश का यह दृश्य है, उस वक्त, जब वे बुरी तरह से डरे हुए सचेत हैं कि उनमें से किसी ने भी कपडे नहीं पहने हुए हैं. परन्तु यह सब उनको (हार्वे को) मार्क्स को जगाने का पूर्ण तरीका मुहैया करवाता है. किंकर्तव्यविमूढ़, वे अर्थशास्त्री, उन छः महीनों के लंबे अन्तराल के बाद, अंत में, यह पहचान गए थे कि उनकी असफलता का वास्तविक रहस्य क्या था.  जर्नलिस्टों और टिपण्णीकर्त्ताओं द्वारा पेश किये गये अधपक्के सिद्धांतों को भूल जाईये.  ताज़ा संकट, हार्वे अपने [RSA] के भावविभोर श्रोताओं से कहते हैं, किसी मानवीय कमजोरी या अप्रयाप्त वित्तीय बन्दोबस्त या किन्सियाई दृष्टि को त्यागने से या अंग्रेजों या अमेरिकियों या यूनानियों की विलक्षण सांस्कृतिक असफलताओं के कारण सिर के बल खड़ा नहीं हुआ है. यह पूंजीवाद की प्रणालीबद्ध असफलता है.  और इस प्रकार की असफलता पर विश्वसनीय लगने वाली केवल एक ही व्याख्या है, जिसे बूढ़े भले मार्क्स में खोजा जा सकता है.

[RSA] द्वारा तैयार की गयी इस कार्टून फिल्म की पार्श्व-ध्वनी, स्वयं हार्वे के उपरोक्त व्याख्यान का ही ऑडियो है.

शेष अगली किश्त [पूंजीवादी संकट : ‘अतार्किक प्रणाली की अतार्किक तर्कसंगतता’] में

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2 thoughts on “पूंजीवाद अपनी “अतार्किक प्रणाली” के संकटों का समाधान “अतार्किक तर्कों” द्वारा करता है

    जगसीर said:
    September 2, 2010 at 8:29 AM

    यूट्यूब पर आर.एस.ए द्वारा पेश इस एनिमेटिड फिल्म के पाँच लाख डाउनलोड सचमुच हैरानी भरी ख़ुशी पैदा करते हैं. एक टिप्पणी भी बड़ी जबरदस्त है कि जिन तीन सौ साढ़े तीन सौ लोगों ने इसके विरोध में मतदान किया है, वे जरूर ही किसी पोंज़ी स्कीम के सदस्य होंगे.

    लेकिन प्रगतिशील लोगों को हर्षातिरेक में जाने की जरूरत नहीं है. भले ही पूंजीवाद पोंजी स्कीम की भांति काम करे, लेकिन यह चलता रहेगा क्योंकि उसकी अपनी आन्तरिक गति उसे गतिशील रखेगी. विश्व पूंजीवाद अपने तर्क से गतिशील है जिसमें बीसवीं सदी के छोटे किसान की वर्ग क्रांतिकारी भूमिका अब गौण हो गयी है. उन्हें मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण पर लाना चाहिए. भूमिसुधार, फसलों के समर्थन मूल्य, जैसे उनके मुद्दे छोटे किसान का कुछ नहीं संवारते. इससे केवल बड़े कुलकों को फायदा होता है. लेकिन किसानों से जबरी भूमि अधिग्रहण से जो जबरदस्ती होती है, उससे उनके जनवादी हित्तों पर कुठारघात होता है, जिसका विरोध किया जाना चाहिए. वैसे नहीं जैसे विरोधी बुर्जुआ पार्टियाँ करती हैं. जितना जल्दी छोटा किसान वर्ग मजदूर वर्ग से स्वयं को अभेद कर लेगा उतना जल्दी ही वह इस मानवता विरोधी व्यवस्था कोउखाड़ फैंकने में सक्षम हो जायेगा.

    saathisukhdev said:
    September 2, 2010 at 9:19 AM

    पूजीवाद जुआरी और जुगाड़ी हो चुका है | इसका वह काल बीत चुका है जब यह प्रगतिशील भूमिका में, विज्ञानं, तकनीक और स्वयं मानव के विकास में अहम् भूमिका अदा करता रहा है | पूंजीपतियों द्वारा उनके बैंकों में एकत्रित बेशी मूल्य उन्हें लोगों को पोंजी स्कीमें खिलवाने के लिए मजबूर करता है | यह मानवता को पीड़ा देने के अलावा कुछ दे नहीं सकता |

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