पूंजीवादी व्यवस्था में अनाज का बेशी उत्पादन सड़ने के लिए शापग्रस्त है

Posted on Updated on

इतिहास से दो संदर्भों का जिक्र जरूरी है. पहला भारत के एक प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का, जिनका कहना था कि  अगर संपन्न लोग सप्ताह में एक बार व्रत रखें तो लाखों भूखे भारतियों का पेट भर सकता है और दूसरे लेनिन का जो अक्टूबर क्रांति के बाद उन किसानों से मिलते हैं, जिन्हें शिकायत होती है कि उनसे अनाज की जो मात्र उगाही गयी है, वह जायज नहीं है. शास्त्री जिस देश का प्रतिनिधित्व करते है उसके केंद्र में सत्ताधारी वर्ग का लालच है. उनका व्रत एक नौटंकी से बढ़कर नहीं है. दूसरी और जब किसान लेनिन को अपनी शिकायत दर्ज करवाते हैं तो लेनिन का  कहना है कि सचमुच उनका देश विपदा का मारा है. लेकिन फिर भी, वे उन किसानों को एक पत्र लिखकर देते हैं जिसमें उनसे उगाहे गए अनाज में से कुछ मात्रा का वापस होने का वचन होता है. किसानों के साथ अपनी मुलाकात के समापन पर वे उनसे कहते हैं  कि वैसे तो उनकी साझी रसोई का भोजन साधारण किस्म का होता है, लेकिन रसोइये का कहना है कि आज खाना ठीक बना है. इसलिए वे किसानों से आग्रह करते हैं कि वे साझी रसोई से खाना खाकर जाएँ. किसान खाना खाते हैं. किसानों का मत होता है कि जो खाना उन्होंने उस रसोई में खाया, वैसा घटिया खाना उन्हें जिंदगी में कभी नहीं खाया था. खैर, लेनिन भी उस रसोई में भोजन करने के लिए जाते हैं. किसान सोचते हैं कि लेनिन के लिए शायद कोई विशेष भोज की व्यवस्था हो. वे चोरी-चोरी रसोई के सुराखों से लेनिन को खाना खाते हुए देखते हैं. वे हैरान होते हैं कि लेनिन भी उसी घटिया खाने को मजे से खा रहे होते हैं. तब उनका मन पलटता है. वे लेनिन को उनका लिखा हुआ पत्रलौटा देते हैं.

हमारा इस प्रकार का कोई निष्कर्ष नहीं है कि शास्त्री, लेनिन के मुकाबले कम ईमानदार हैं. मगर दोनों के दृष्टिकोण में जो बुनियादी फर्क है वह यह कि एक उस निर्माणाधीन समाजवादी व्यवस्था का सेवक है जिसके हित मेहनतकश अवाम से जुड़े हुए हैं जबकि दूसरा अच्छी तरह से जानता है कि उसके देश का मेहनतकशों से कुछ भी लेनादेना नहीं है. यह देश जिस रास्ते पर चल रहा है वहाँ केवल परजीवी लोगों की कभी न संतुष्ट होनेवाली लालच की भूख है और वह इसी लालच की भूख का प्रतिनिधित्व करता है. दोनों देश युद्ध या युद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहे होते हैं. सोवियत यूनियन के लाल गार्ड अपने ही देश के प्रतिक्रियावादी दस्तों से लड़ रहे होते हैं जबकि भारत और पाकिस्तान के गरीब लोगों का आपसी युद्ध से कोई लेनादेना नहीं है. अलबता वहाँ के शासक वर्ग अपने देशों के बुनियादी मसलों से लोगों का ध्यान बांटने के लिए अवाम पर युद्ध थोपे हुए हैं.

मूख्य मुद्दे की ओर चलें. देश में जारी मौनसून की वजह से देश के कई निचले हिस्सों में बाढ़ का पानी भरने से सरकारी गोदामों और खुल्ले में रखा अनाज भीग कर सड़ने लगा. मीडिया ने जब इसे उजागर किया तो सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने प्रश्न पूछा कि क्यों नहीं इस सड़ते हुए अनाज को गरीबों में मुफ्त बाँट दिया जाता ?

हमारी कार्यपालिका बुर्जुआ वर्ग की सच्ची सेवक है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त सुझाव से भ्रम होता है कि शायद यह संस्था वर्गों की आपसी टक्कर से ऊपर – निष्पक्ष हो. ध्यान रहे सुप्रीम कोर्ट अनाज को तभी गरीबों में मुफ्त बांटने के लिए कहता है जब यह सड़ रहा होता है. सुरक्षित पड़े अनाज पर गरीब लोगों का कोई हक़ नहीं है. खैर, इससे इतना तो हुआ ही है कि पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति बढ़ते हुए आक्रोश पर ठन्डे पानी के छींटे पड़ गए हैं.

जैसा कि अपेक्षित था, कृषि मंत्री शरद पवार ने अपनी चुप्पी को , एक न एक दिन, तोडना ही था. सो उन्होंने कह दिया कि अनाज भले ही सड़ता है तो सड़ जाये लेकिन इसे गरीबों में मुफ्त बाँटना संभव नहीं है. शरद पवार पर पूंजीवादी व्यवस्था की आत्मा मण्डी , जहाँ जिंसों का मूल्य उगाहा जाता है, को बचाने की जिम्मेदारी है. अगर अनाज को मुफ्त में बाँटने की परम्परा शुरू हो गयी तो मण्डी व्यवस्था कमजोर होकर तबाह भी हो सकती है, जोकि पूंजीवादी व्यवस्था की सेहत के लिए दरुस्त नहीं है.

थोडा सा इस व्यवस्था को भी समझा जाये. हमारे देश की खेती का पूंजीवादीकरण हो चुका है. सामंतवादी व्यवस्था जहाँ समाज का एक बड़ा हिस्सा किसानों के रूप में काम करता था, उसे अपने उत्पादन के एक हिस्से को, सामंतों और राज्य-व्यवस्था को, कर के रूप में, देना पड़ता था. बाकी बचे अनाज पर उसका हक़ होता था. अपनी रोटी की आवश्यकता पूरी करने के बाद जो अनाज बचता था, उसे वह मण्डी में बेच देता था. मण्डी में अन्य उत्पादक इसके खरीददार होते थे. जैसा कि हम जानते हैं कि मण्डी में जिंसों के आपसी विनिमय के लिए जरूरी शर्त जिंसों  के उत्पादन पर लगी श्रम-शक्ति की मात्रा का समान होना होता है. यह शर्त सामंतवादी व्यवस्था और पूंजीवादी व्यवस्था में, कमोबेश एक जैसी होती है.

लेकिन सवाल पैदा होता है कि पूंजीवादी व्यवस्था में क्योंकर ऐसा होता है कि एक तरफ भूखमरी और दूसरा तरफ गोदामों में सड़ता हुआ अनाज ? पूंजीवादी व्यवस्था का विश्लेषण करने पर मार्क्स इस नतीजे पर पहुंचे कि उत्पादक मशीनों और मजदूरों की सहायता से उत्पादन करवाते हैं. मशीनें और कच्चा माल उत्पादन प्रक्रिया के दौरान अपने भौतिक गुणों में तबदीली कर लेते हैं, परंतू उनके मूल्य में कोई बढौतरी नहीं होती. इसलिए मार्क्स मशीनों और कच्चे माल को स्थिर पूंजी कहते हैं. उत्पादन प्रक्रिया में उत्पादन से पहले का मूल्य ही नए उत्पाद में हस्तगत हो जाता है. इस क्रिया को अंजाम देने के लिए मनुष्य की श्रम-शक्ति दरकार होती है. इसे भी मण्डी से उन शर्तों पर ख़रीदा जाता जैसे स्थिर पूंजी खरीदी जाती है. अर्थात काम के एक दिन के लिए दरकार श्रम-शक्ति के पुन:उत्पादन पर खर्च हुई जीवनोर्पाजन वस्तुओं के मूल्य के बराबर. उत्पादन के दौरान यह भी नए उत्पाद में हस्तगत हो जाती है. लेकिन नए उत्पाद का मूल्य अपने पर आये सभी खर्चों से अधिक होता है. यह सब श्रम-शक्ति के कारण होता है जो अपने मूल्य से अधिक मूल्य पैदा करने का गुण रखती है. इसलिए इसे परिवर्ती पूंजी कहते हैं. फैक्ट्री की तरह यह नियम पूंजीवादी कृषि उत्पादन  पर भी लागू होता है.

काम के दिन के दौरान वह समय जो मजदूर अपने जीवनोर्पाजन वस्तुओं के मूल्य के बराबर मूल्य पैदा करने के लिए खर्च करता है, उसे जरूरी श्रम-समय कहते है. इसके अतिरिक्त लगे श्रम को बेशी श्रम-समय कहते हैं जिससे बेशी उत्पादन या बेशी मूल्य पैदा होता है.

इसे एक उदाहरण  से समझा जा सकता है. मान लो एक कार्य दिवस 10 घंटे का है. मजदूर 5 घंटों में अपने जीवित रहने के लिए जरूरी मूल्य को पैदा कर लेता है. अन्य 5 घंटे वह बेशी उत्पादन या बेशी मूल्य पैदा करने के लिए खर्च करता है तो,
शोषण की दर % = अतिरिक्त श्रम / जरूरी श्रम * 100
या 5 / 5 * 100 = 100 %

लेकिन मशीनों की रफ़्तार बढ़ाकर और तकनीक में होनेवाले निरंतर सुधार से मजदूर की उत्पादन क्षमता में इतनी अधिक बढौतरी हो चुकी है कि अपने जीवन निर्वाह के लिए जरूरी मूल्य को वह एक घंटे या इससे भी कम समय में पैदा कर लेता है. अगर वह जरूरी मूल्य को एक घंटे में पैदा करता है तो,

उसके शोषण की दर % = = अतिरिक्त श्रम / जरूरी श्रम * 100
या 9 / 1 * 100 =900 %

हम अपने मूल प्रश्न की ओर लोटते हैं कि अनाज सड़ क्यों रहा है ? क्यों नहीं गरीब इसे खरीद पा रहे ? उत्तर आसान है कि मजदूरों के शोषण की दर में बेशुमार बढौतरी ने उसकी  खरीद शक्ति को सीमित कर दिया है जबकि दूसरी ओर बेशी मूल्य के रूप में पूंजीपति वर्ग के पास बेशुमार दौलत इकठ्ठी हो चुकी है. पूंजीपति तो इतना अधिक अनाज खाने से रहा और मजदूर के पास इसे खरीदने के पैसे नहीं हैं !

सुप्रीम कोर्ट का यह कथन कि सड़ते हुए अनाज को गरीबों में बाँट दिया जाये , सीधा-साधा लगता है. लेकिन ऐसा है नहीं. इसे क्रियांविंत करने का मतलब होगा पूंजीपति वर्ग के पास मौजूद नोटों का मिटटी हो जाना. मण्डी में छाई मंदी का यही कारण होता है – जिसमें बाज़ार में वस्तुओं की भरमार होती है लेकिन कोई खरीदार नहीं होता, क्योंकि मूल्य का बड़ा हिस्सा तो पूंजीपति वर्ग के गल्लों में कैद होता है और मजदूर वर्ग की खरीदने की शक्ति संतृप्त हो चुकी होती है.

पूंजीवाद का इतिहास मण्डी में छाई मंदी से निपटने के लिए बेशी उत्पाद को समुद्र वगैरा में डंप करने के लिए कुख्यात रहा है. भारत में अच्छी मौनसून ने अनाज के और अधिक बेशी उत्पादन की संभावना पैदा की है जिससे अनाज को संभालने के लिए इस व्यवस्था को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता. हो सकता है पूंजीवाद की ‘मैनेजिंग कमेटी’ सरकार को इसे समुद्र में डंप करना पड़ता. बाढ़ ने उसके कार्य को आसान कर दिया था. लेकिन मीडिया की आपसी होड़ के चलते मामला पेचीदा हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि इससे जनता में आक्रोश बढ़ सकता है. सही मौके पर सही बयान दाग कर उसने पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति अपनी सही सदभावाना ही दिखाई है.

सवाल पैदा होता है कि आखिर कब तक इस प्रकार के ठन्डे छींटों की बौछार से जनता के आक्रोश को दबाकर इस व्यवस्था को बचाकर रखा जा सकेगा ? मजदूर वर्ग की न केवल चेतना में बढौतरी हो रही है बल्कि वह नए सिरे से संगठित होकर अपने हितों की दुश्मन, इस पूरी पूंजीवादी व्यवस्था को, इसे इसके अंजाम – इसके लिए इतिहास में सुरक्षित कचरा पेटी – के हवाले करने के लिए चाक-चौबंद हो रहा है.

Advertisements

One thought on “पूंजीवादी व्यवस्था में अनाज का बेशी उत्पादन सड़ने के लिए शापग्रस्त है

    loksangharsha said:
    August 24, 2010 at 5:26 PM

    nice

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s