जब शहीद सोने जाते हैं — महमूद दरवेश

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महमूद दरवेश की यह कविता शहीदों को संबोधित है परन्तु इसके निशाने पर कवि और बुद्धिजीवी हैं. बुर्जुआ मीडिया और पत्रकारों पर “सनसनीखेज वारदात और कत्लोगारत की बेशी-कीमत” से “ज़बान दबाकर” अपने लिए “धोबीघाट के लिए एक दीवार” और “गाने के लिए एक रात” छोड़ने का कटाक्ष उन्हें उस मुकाम पर ले जाने का द्योतक हैं जहाँ अपराधबोध स्वीकृति “अनजान फाँसी की डोर” को और अधिक मजबूत करने के ही काम आ सकती है.

जब शहीद सोने जाते हैं
तो मैं रुदालियों[1] से उन्हें बचाने के लिए जाग जाता हूँ |
मैं उनसे कहता हूँ : मुझे उम्मीद है तुम बादलों और वृक्षों
मरीचिका और पानी के वतन में उठ बैठोगे |
मैं उन्हें सनसनीखेज वारदात और कत्लोगारत की बेशी-कीमत[2]
से बच निकलने पर बधाई देता हूँ |
मैं समय चुरा लेता हूँ
ताकि वे मुझे समय से बचा सकें |
क्या हम सभी शहीद हैं ?
मैं ज़बान दबाकर कहता हूँ :
धोबीघाट के लिए दीवार छोड़ दो गाने के लिए एक रात छोड़ दो |
मैं तुम्हारें नामों को जहाँ तुम चाहो टांग दूंगा
इसलिए थोडा सुस्ता लो, खट्टे अंगूर की बेल पर सो लो
ताकि तुम्हारे सपनों को मैं,
तुम्हारे पहरेदार की कटार और मसीहाओं के खिलाफ ग्रन्थ के
कथानक से बचा सकूं |
आज रात जब सोने जाओ तुम
उनका गीत बन जाओ जिनका कोई गीत नहीं है |
मेरा तुम्हें कहना है :
तुम उस वतन में जाग जाओगे और सरपट दौड़ती घोड़ी पर सवार हो जाओगे |
मैं ज़बान दबाकर कहता हूँ : दोस्त,
तुम कभी नहीं बनोगे हमारी तरह
किसी अनजान फाँसी की डोर !

1 रुदाली : पेशेवर विलापी
2 बेशी कीमत : मजदूर के जीवन-निर्वाह के लिए जरूरी मानदेय के अतिरिक्त मूल्य, जो पूंजीपति वर्ग के मुनाफे और उसकी व्यवस्था पर खर्च का स्रोत होता है.

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3 thoughts on “जब शहीद सोने जाते हैं — महमूद दरवेश

    रवि कुमार, रावतभाटा said:
    July 25, 2010 at 10:18 AM

    बेहतर प्रस्तुति…

    sunil kumar said:
    July 25, 2010 at 10:20 AM

    सारगर्भित रचना बधाई

    स्वार्थ said:
    July 25, 2010 at 9:19 PM

    अर्थपूर्ण कविता

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