कार्ल मार्क्स

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कार्ल मार्क्स (1818-1883) मार्क्सवाद और प्रबल राजनीतिक विज्ञान के संस्थापक , जिसके विचारों ने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के इतिहास को नये आयाम दिए.

५ मई १८१८ को पश्चिम जर्मनी के ट्रायर में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ. उसके पिता एक कामयाब वकील थे, जिन्हें प्रशिया के कानूनानुसार अपने व्यवसाय को चलाने के लिए यहूदी से ईसाई धर्म अपनाना पड़ा.

सत्रह वर्ष की आयु में कानून की विद्या हासिल करने के लिए मार्क्स बोन विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए. वहाँ उनकी गिनती तेज-तरार विद्यार्थियों में नहीं होती थी. फिक्रमंद पिता ने उनका स्थानांतरण कठोर अनुशासन के लिए विख्यात बर्लिन के विश्वविद्यालय में करवा दिया. अपने अध्ययन के दौरान नौजवान मार्क्स रेडिकल विचारों और दर्शन की ओर झुकते गये. एक बार तो वे ‘यंग हेगल्स’ नामक विद्यार्थियों के एक समूह से जुड़ गये जो हेगल के विचारों को अस्वीकार कर चुके थे.

१९ जून १८४३ को उनका विवाह प्रशिया के नवाब की सुशिक्षित सपुत्री जेनी वोन वेस्टफालें से संपन्न हुआ. शादी के तुरंत बाद सरकार की सेंसरशिप, जिसका रवैया वामपंथी आन्दोलनकारियों के प्रति दिन-प्रतिदिन कठोर से कठोरतम होता जा रहा था, ने उन्हें देश छोड़कर पेरिस जाने के लिए मजबूर कर दिया.

१८४० का पेरिस उस ज़माने के क्रांतिकारियों की सबसे प्रिय कर्मस्थली थी. यहाँ मार्क्स की मुलाकात बहुत से क्रांतिकारियों से हुई जिनमे फ्रेडरिक एंगेल्स आगे चलकर उनके जीवनभर के वैचारिक मित्र बन गये.

१८४४ में एंगेल्स बहुत ही प्रभावशाली पुस्तक ‘Conditions of the WorkingClass in England ‘ लिख चुके थे. इस पुस्तक ने मार्क्स के सर्वहारा वर्ग द्वारा संपन्न किये जानेवाली क्रांति  के विचार को विकसित करने में  मदद की. इसी पुस्तक से प्रेरणा पाकर मार्क्स ने Economic and Philosophic Manuscripts नामक अपनी पहली  पुस्तक की रचना की. पूंजीवाद के अधीन श्रम के अलगाव से मुक्ति के लिए साम्यवाद की जीत की अवश्यम्भाविता के पक्ष में तर्क के कारण इस पुस्तक का एक नैतिक और दार्शनिक महत्व रहा है.

दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है.

मार्क्स की दिलचस्पी इतिहास के विकास और परिवर्तन में भी थी, जो समाज में नैसर्गिक रूप से चलता रहता है. अपने इस विचार को उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी समझ बताया. मार्क्स का विश्वास दिन-प्रतिदिन इस सच्चाई की ओर दृढ होता गया कि सर्वहारा वर्ग की क्रांति न केवल वांछनीय है बल्कि ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण अवश्यंभावी है.

इसी समय मार्क्स और एंगेल्स ने अपना सबसे प्रसिद्ध पंफलेट ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ लिखा.

“कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. वे खुलेंआम एलान करते हैं कि उनके लक्ष्य पूरी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बलपूर्वक उलटने से ही सिद्ध किये जा सकते हैं. कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग को कांपने दो. सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.

दुनिया के मजदूरों, एक हो ! ”

मार्क्स की ज्यादातर रचनाओं के विपरीत मार्क्स की यह कृति संक्षिप्त और प्रासंगिक होने के साथ-साथ अग्निमय और प्रेरणादायक भाषा के प्रयोग द्वारा क्रांति की इच्छा पैदा करने की क्षमता रखती है.

“अभी तक आर्विभूत समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है.” – कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, प्रथम अध्याय.

क्रांतियों, जिन्होंने १८४८ में समस्त यूरोप को अपनी आगोश में ले लिया था, ने मार्क्स को फ़्रांसिसी और बेल्जियन अधिकारिओं की नज़रों में संदिग्ध बना दिया . उन्हें लंदन में शरण लेनी पड़ी और उनका शेष रचनात्मक जीवन वहीँ बीता.

कम्युनिस्ट लहर की इस तरुणावस्था में मार्क्स इसके साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़ते गये. प्रथम कम्युनिस्ट इंटरनेशनल  में अराजकतावादी बकुनिन के विरुद्ध उन्होंने प्रबल और प्रभावशाली तर्क रखे.

एक और प्रबल घटना १८७१ का पेरिस कम्यून की स्थापना थी जिसे सर्वहारा वर्ग दो महीने के संघर्ष के बाद हार गया. मार्क्स ने इसका पुरजोर मूल्यांकन किया और इसे भविष्य की कम्युनिस्ट क्रांतियों के अग्रदूत की उपाधि प्रदान की.

मार्क्स अपना अधिक से अधिक समय  ब्रिटिश लायब्रेरी में राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए बिताते थे. इसी के परिणामस्वरूप उनकी मास्टरपीस रचना ‘पूँजी’ (दास कैपिटल) का जन्म हुआ. यह पुस्तक पूंजीवादी समाज और अर्थशास्त्र की गतिकी के नियमों का सघन और विस्तृत संकलन हैं.

“पहली दृष्टि में पण्य बहुत मामूली सी और आसानी से समझ में आनेवाली चीज मालूम होता है. किन्तु उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वास्तव में वह एक बहुत अजीब चीज है, जो आधिभौतिक सूक्ष्मताओं और धर्मशास्त्रीय बारीकियों से ओतप्रोत है. जहाँ तक वह उपयोग मूल्य है, वहां तक, चाहे हम उसपर इस दृष्टिकोण से विचार करें कि वह अपने गुणों से मानव आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है” – पूंजी, अध्याय १, प्रथम खंड

अपने निरन्तर विकसित होते हुए मार्क्सवादी दृष्टिकोण अनुसार मार्क्स ने जीवन के हर पहलू पर लिखा.  अक्सर पूंजीपतियों के तलुयाचाट बुद्धिजीवी मार्क्स के “धर्म लोगों के लिए अफीम है” को सन्दर्भ से तोड़कर एक फिकरे के रूप में प्रयोग करते रहे हैं. वर्गीय समाज के अस्तित्व में आने की ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ के अनुसार उत्पादन की प्रक्रिया ने समाज के एक छोर पर मुट्ठीभर अमीर जबकि दूसरे छोरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया. आत्मिक उत्पादन में एक तरफ दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, साहित्य,गीत और संगीत पैदा हुआ तो दूसरी और धर्म. दिखने में धर्म गरीबों को मुफ्त का तोहफा लगता रहा हो लेकिन शोषक वर्ग के सच्चे सेवादार के रूप में इसने गरीब जनता को पैरों के नीचे रौंधने का ही काम किया.

” धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन  परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है.”
— (Contribution to the Critique of Hegel\’s Philosophy of Right)

अपने समय के सर्वाधिक घृणा पाने वाले व्यक्ति कार्ल मार्क्स, जिन पर सबसे अधिक कीचड उछाला गया, के रोशन दिमाग ने १८८३ को हमेशा के लिए काम करना बंद कर दिया. निरंकुश और गणतंत्रीय, दोनों प्रकार की सरकारों ने उन्हें अपने राज्य से खदेड़ा. बुर्जुआजी, चाहे वह अनुदार रही हो चाहे अति जनवादी, मार्क्स के प्रति लान्छनात्मक शब्दों का प्रयोग करने  में आपस में होड़ करती हुई नजर आई. वे इसे इस प्रकार हटा देते थे जैसे यह कोई मकड़ी का जाला हो. पूर्ण लापरवाही के साथ, जब बहुत जरूरी आवश्यकता उन्हें विवश करती, वे तभी जवाब देते. उनकी मृत्यु उनके चहेते करोड़ों क्रांतिकारी मेहनतकश साथियों के लिए एक आघात थी. साईबेरिया से कैलिफोर्निया, यूरोप और अमेरिका के सभी भागों और जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं “मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि  बेशक उनके बहुत से विरोधी रहे हों, लेकिन उनका कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं था.”

related post : मार्क्स की प्रसिद्ध रचनाओं से परिचय

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7 thoughts on “कार्ल मार्क्स

    jai kumar jha said:
    May 5, 2010 at 5:47 AM

    कार्ल मार्क्स की जीवनी पर सार्थक प्रकाश डालती और उस पर विवेचना करती इस प्रस्तुती के लिए आपका धन्यवाद /

    मार्क्स के जीवन और कर्म पर संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण टिप्पणी।

    सुंदर और प्रभावी परिचयवृत…
    पूरी दुनिया को एक नवीन परिवर्तन उर्जा से सरोबार कर देने वाले मार्क्स को सलाम….

    समय said:
    May 5, 2010 at 10:54 PM

    मार्क्स और उनके विचारों पर संक्षिप्त पर समीचीन प्रस्तुति।

    अभी भी हमारे समाज का स्वतस्फ़ूर्त विकास थोपे जाने के कारण इतना नहीं हो पाया है कि मार्क्स के विचारों को आम चेतना द्वारा समझा जा सके।
    भारत में अब थोड़ी-बहुत वैसी ही परिस्थितियां बन रही है, जिन परिस्थितियों ने यूरोप में मार्क्स-एंगेल्स जैसी ऐतिहासिक अनिवार्यताएं पैदा की।
    दुनिया को उनके दृष्टिकोण के बगैर समझा ही नहीं जा सकता, बदलना तो बहुत दूर की बात है। हर भावी परिवर्तन की कल्पना इसी राह से गुजरेगी।

    शुक्रिया।

    pratin trivedi said:
    July 15, 2010 at 10:16 PM

    karl markash ke nakshalvaad per kya veechar the.

    satish said:
    February 10, 2011 at 4:47 PM

    sir mujhe aitihasik bhautiwad aur dawandatmak bhautikwad ke bare me thoda bataye.

    vishal kr. jha said:
    March 31, 2011 at 11:34 PM

    sundar aur sargarvit prastuti……

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