जलवायु संकट के लिए जिम्मेदार स्वयं पूंजीपति और उनकी व्यवस्था है न कि आम लोग

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धरती पर जलवायु संकट मनुष्य के इतिहास का एक अटल परिणाम है. यह सामाजिक और आर्थिक रिश्तों पर निर्भर करता है. पूंजीवादी प्रचार, जलवायु संबंधी समस्या को सामाजिक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य  से अलग करके रखता है. यह इसे राजनीति से ऊपर समझता है. समाज और वर्ग से ऊपर की कोई शै के रूप में इसे पेश करने का इसका उद्देश्य यह होता है कि पूंजीपति वर्ग और पूंजीपति प्रबंध को, इन संकटों को पैदा करने के लिए जिम्मेदार न ठहराया जा सके.

पिछले दिनों ‘कोपनहेगन पृथ्वी सम्मेलन’  जलवायु को प्रदुषण-मुक्त करने के लिए, दुनिया भर के शीर्ष नेताओं का, हमारे समय का, सबसे बड़ा जमावड़ा था. कार्बन उत्सर्जन के सवाल को जोर-शोर से उठाया गया. एक-दूसरे पर दोषारोपण हुआ. दुनिया की तबाही का आतंक उत्पन्न करते हुए, स्वयं के मुनाफों के कारोबार को, मंदी के इस दौर में, कैसे बचाकर रखा जा सकता है, विश्व पूंजीवादी प्रबंध में स्वयं की भूमिका को ज्यादा से ज्यादा किस प्रकार प्रभावशाली बनाया जा सकता है, इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतू, प्रकृति-हितैषी और मानवता के हितैषी होने के अपने मुखौटे पहनकर, सारी दुनिया की बड़ी-बड़ी प्रतिभायों ने, तरह-तरहके घुट्टी-पिलाउ हल पेश किये.

सबसे बढकर, सवाल इस प्रकार पेश किया जा रहा है कि आम लोगों में भय पैदा हो. संसार की तबाही और कई देशों के समुद्र में डूब जाने की भविष्यवाणियां पेश की जा रही हैं. धरती पर बढ़ते हुए तापमान की समस्या के ठोस हल खोजने की अपेक्षा, लोगों को डराने के लिए, इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है जबकि जलवायु के सवाल को सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से अलग करके नहीं समझा जा सकता.

आज की समस्यायों का मुख्य दोषी खुद पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक प्रबंध है. पूंजीवाद के आगमन से पहले की व्यवस्थाओं में मानव प्रकृति के साथ संघर्ष में – उसे बदलते हुए, आप जो कुछ प्राप्त करता था, उसका पैमाना बड़ा सीमित होता था. मानव के प्रकृति के साथ संघर्ष में, प्राकृतिक वातावरण को कोई उल्लेखनीय नुकसान नहीं पहुंचता था. प्रकृति मानव की उपजीविका का सदैव बड़ा स्रोत रही है. आज भी मानव और प्रकृति के संघर्ष में, विरोध और विकास संबंधी नियमानुसार, समस्याओं के हल होते रहते हैं. हमारी धरती और ब्रह्मंड की तबाही की बातें करनेवाले, गैर-वैज्ञानिक और एकतरफा ढंग से सोचते हैं. लेकिन आज का बड़ा सवाल है – पूंजीपतियों की मुनाफे की हवस ने जो हालात हमारी धरती पर पैदा कर दिए हैं उससे आम लोगों की जिंदगी और कठिन होती जा रही. आज पूंजीपतियों ने आम मेहनतकशों और श्रम-जीविओं के शोषण के साथ-साथ, प्रकृति का भी निर्लज्जता की हद तक शोषण किया है. ( इसने प्रकृति के सौन्दर्य को नष्ट करने का गुनाह किया है. नदियों, नालों और समुद्र के पानी को प्रदूषित किया है. परिवहन के साधनों को योजनाबद्ध ढंग से व्यवस्थित करने की बजाय, अपने मुनाफे की अंधी हवस में, प्राईवेट परिवहन के उद्योग (मिसाल के लिए, कार उद्योग ) को प्रोत्साहित करके, हवाओं में प्रदुषण को बेहद मात्रा में बढ़ा दिया है. पूरी की पूरी उत्पादन प्रणाली में – आम आदमी की सेहत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. परमाणु कचरा समुद्र में फैंका जा रहा है. हथियारों का बड़ी मात्रा में उत्पादन करके, मानवता की तबाही के साथ-साथ, प्रकृति की तबाही भी की जा रही है. पहले मुनाफे की हवस के चलते वातावरण खराब किया जाता है, फिर वातावरण को ठीक रखने के नाम पर – अमीर आबादी के चौगिरदे को साफ-सुथरा रखने के नाम पर, मेहनतकश आबादी के बड़े हिस्सों को शहर के बाहर के क्षेत्रों में स्लम्ज़  में धकेल दिया है जो धरती पर नरक के साक्षात नमूने हैं.

पूंजीवाद के अपने जन्म से, मुनाफे की इस बेरहम जंग ने भयानक तबाही मचाई है. मानव द्वारा मानव का शोषण और मानव द्वारा प्रकृति का शोषण , पूंजीवादी प्रबंध में अपने शिखर पर पहुंचा है. इंग्लैण्ड में पूंजीवाद के विकास और बाड़ाबंदियों के निर्धारण के समय किसानों का उजाड़ा, अमेरिका में जंगलों और आदिवासी (रेड इन्डियन) आबादी की तबाही, ( और वर्तमान में, भारत में नक्सलवादियों की समस्या तो एक बहाना है, असल में निशाना तो वह इलाका है जहाँ आदिवासी बसे हुए हैं जिनकी बदकिस्मती यह है कि ये जंगल खनिज और वनसम्पदा से भरपूर  हैं और पूंजीपति और साम्राज्यवादी इस लूट से अपनी नजर हटा पाने में अक्षम हैं ) विश्व के अन्य हिस्सों में जंगलों की बर्बादी के साथ, मुनाफा तो कुछ मुठ्ठीभर पूंजीपतियों ने कमाया, पर मुसीबतें आई आम लोगों के हिस्से में ! मुनाफे की हवस के सामने प्रकृति तो क्या, मानव जिंदगी की सीधी तबाही  भी पूंजीपति वर्ग को विचलित नहीं कर पाती ! अमेरिका में पूंजीवाद के फैलाव के समय,उनके कारनामों का जिक्र करते हुए मार्क्स लिखते हैं,

प्रोटेस्टेंट मत के उन गंभीर साधकों – न्यू इंग्लैण्ड के प्यूरिटनों  – ने १७०३ में अपनी असेंबली के कुछ अध्यादेशों के द्वारा अमरीकी आदिवासियों को मारकर उनकी खोपड़ी की त्वचा लाने या उन्हें जिंदा पकड़ लाने के लिए प्रति आदिवासी ४० पाउंड  पुरस्कार की घोषणा की थी. १७२० में प्रति त्वचा १०० पाउंड पुरस्कार का ऐलान किया गया था. १७४४ में, जब मैस्साचुसेटस-बे  ने एक खास कबीले को विद्रोही घोषित किया, तो निम्नलिखित पुरस्कारों की घोषणा की गयी : १२ वर्ष या उससे अधिक आयु के पुरषों को मार डालने के लिए प्रति त्वचा १०० पाउंड (नई मुद्रा में), पुरषों को पकड़ लाने के लिए प्रति व्यक्ति १०५ पाउंड, स्त्रियों और बच्चों को पकड़ लाने के लिए प्रति व्यक्ति ५५ पाउंड. कुछ दशक और बीत जाने के बाद औपनिवेशिक व्यवस्था ने न्यू इंग्लैण्ड के उपनिवेशों की नींव डालनेवाले इन piligrim fathers [पवित्र हृदय यात्रियों] के वंशजों से बदला लिया, जो इस बीच विद्रोही बन बैठे थे. अंग्रेजों के उकसाने पर और अंग्रेजों के पैसे के एवज में अमरीकी आदिवासी अपने गंडासों से इन लोगों के सिर काटने लगे. ब्रिटिश संसद ने घोषणा की कि विद्रोही अमरीकियों के पीछे कुत्ते छोडकर और आदिवासियों से उनके सिर कटवाकर वह केवल ” भगवान और प्रकृति के दिए हुए साधनों” का ही उपयोग कर रही है.– कार्ल मार्क्स ‘पूंजी’ प्रथम खंड, सफा ७६२, प्रगति प्रकाशन मास्को.

सामर्थ्यशाली “राष्ट्रीयताएं  हर उस बदनामी बारे सनक की हद तक शेखियां बघारा करती  जो उनके लिए पूंजी के एकत्रीकरण का साधन बनती , अगर वह पूंजी एकत्रित करने का ढंग होती” – मार्क्स, कैपिटल जिल्द १, सफा ७१०.

उपरोक्त विवरण से हम साबित करना चाहते हैं – पूंजीपति वर्ग, प्रदुषण संबंधी, सभी लोगों को, व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार ठहराकर, अपने गुनाहों को छिपाने का यत्न करते हैं.

पहले प्रदुषण फैलायो, फिर प्रदुषण हटाने की मुहीम के नेता के रूप में, ऐसी स्कीमें और हल पेश करो कि और मुनाफे कमाए जा सकें – अपने गुनाहों पर पर्दा डाला जा सके. सब कुछ इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि असल गुनाहगार, मुक्तिदाता दिखाई दे.

बात को इस प्रकार पेश किया जा रहा है जैसे कि यह कोई विकसित, विकासशील और गरीब देशों के बीच का झगड़ा हो. इन सभी देशों के पूंजीपति प्रतिनिधि, खुद के अपने मेहनतकशों और श्रम-जीवियों के शोषण से ध्यान हटाने के लिए, स्वयं को, उनके मसीहाओं के रूप में पेश कर रहे हैं.

आज जलवायु या प्रदुषण की समस्या को, विश्व पूंजीवादी प्रबंध के विरुद्ध लड़ाई से अलग करके, हल नहीं किया जा सकता. पूंजीवादी सामाजिक-आर्थिक प्रबंध में मुनाफे का स्रोत श्रमिक से निचोड़ा गया अधिशेष होता है. जब पूंजीपति फैक्ट्री या फार्म में उत्पादन की प्रक्रिया शुरू करवाता है केवल तभी अधिशेष मूल्य पैदा हो सकता है. लेकिन विश्व के तमाम हिस्सों में फैला पूंजीपति वर्ग मंडी और प्रतिस्पर्द्धा जैसे मुख्य कारणों के चलते कुल उत्पादन प्रक्रिया को योजनाबद्ध नहीं कर सकता, भले ही, एक फैक्टरी या फार्म में उत्पादन की प्रक्रिया को अंजाम देते समय पूंजीपति छोटी से छोटी मद को अपनी योजना में शामिल करता है. लेकिन जब बात किसी देश या विश्व के कुल उत्पादन की प्रक्रिया को योजनाबद्ध करने की आती है, तो पूंजीपति ही नहीं बल्कि उनके बुद्धिजीवी भी घबरा जाते हैं क्योंकि इसका अर्थ होता है एक ऐसी प्रणाली की स्थापना जिसमें इस मुठ्ठीभर परजीवी वर्ग के एशो-आराम को खतरा होता है. ये दोहरे मापदंड राजनीतिक तो हो सकते हैं लेकिन वैज्ञानिक नहीं. विज्ञान के नियम किसी वर्ग के हितों की रक्षा की जिद्द पूरी करने हेतू नहीं बदलते.गैर-योजनाबद्ध और अराजक उत्पादन प्रणाली में पर्यावरण और जलवायु संबंधी मुश्किलों पर काबू पाना ना मुम्मकिन है जबकि पूंजीपति और उनके बुद्धिजीवी इसे पूंजीवाद की चौहद्धी के भीतर ही हल करना चाहते हैं.

हम फिर बुद्धिजीवियों से अपील करते हैं कि वे वीरता से सच का साथ दें.  अगर समस्या की गंभीरता को देखते हुए सवाल ठीक ढंग से पेश किया जायेगा तभी उसका सही जवाब मिल सकता है, लेकिन पूंजीपति और उनके बुद्धिजीवी कभी नहीं चाहेंगे कि इसे ठीक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जाये. उनके उद्देश्य समस्याओं को सनसनी तरीके से पेश करना और ऐसे अप्रासंगिक सवाल खड़े करना होता है ताकि लोग भी अप्रासंगिक हल ढूंढने की अंध कवायद करते हुए विचारों की भूल-भुलैया में सिर पटकते रहें.विचारधारा के क्षेत्र में फैले प्रदुषण के विरुद्ध लड़े बिना वातावरण संबंधी समस्या समेत, मानवता के सामने दरपेश समस्यायों का हल संभव नहीं.

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4 thoughts on “जलवायु संकट के लिए जिम्मेदार स्वयं पूंजीपति और उनकी व्यवस्था है न कि आम लोग

    3passions said:
    January 18, 2010 at 10:20 PM

    long live revolution,down with imperialism

    harish watts said:
    November 13, 2010 at 9:40 PM

    It is to much extent right that the responsibility of destroying the environment is of the said developed countries. On one hand they are changing the environment to irreversible stage and on the other hand they are blaming the poor countries for this act. But whatever the case may be, it should be remembered by each and everyone that the danger is not to the Earth or not to the environment but the danger is to the mankind. Every one knows that the natural forces destroyed the dianasours completely from the earth and ultimately the Earth came out as the winner.

    जगसीर said:
    November 15, 2010 at 10:41 AM

    Dear Harish,
    It is incorrect to see the environmental degradation in the framework of contradiction between the developed countries and the underdeveloped ones. At any international conference, when the representatives of underdeveloped countries cry over the environmental loss by the developed countries, it must not be assumed that they are honest to the problem. They cry just for increase in the share of surplus value snatched by the imperialist capital for the ruling class in their own countries. It is just a little stubbornness by the junior partner to the senior ones. Whether their share in the loot be increased or decreased depends upon the other many capitalist factors that determine their power of bargaining.

    If this popular argument of the complete destruction of dianasours be assumed to be correct, then one must not forget that man is not dianasour. In fact, the matter has found its supreme search in man who has gained consciousness. And this consciousness is not a free gift from some external power like God. In fact he has gained it in his historical labour process. The process of creating ‘second nature’ ( The other word for it is ‘culture’} by man is dialectical i.e. man did not only develop the second nature but this second nature also developed man. Equating man with dinasours is out of reference and is running away from the gravity of the subject that needs deep attention from the part of the intellectual class of the earth.

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    November 15, 2010 at 8:09 PM

    जगसीर must have added that we have full faith in the wisdom of the general populace. Before the degradation of the earth goes to the irreversible position (in general), it will send the human and nature opposing class of the bourgeoisie to its reserved place i.e. dustbin of history in museum But this work will not happen spontaneously as history is not determined by the economics but by the politics. Here we talk of the politics of the proletarian class.

    It is also correct that the lust for profit by the ruling class has already damaged and has been damaging to that extent that needs serious attention. The hangover of the contradiction between advanced countries and developing ones must be overcome by those who see the situation through the specs of popular media that serves the interest of the greedy class whose lust for accumulation of capital has already made it lunatic.

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