गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

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एक तरफ तो उत्तर प्रदेश की सरकार ‘सर्वजन हिताय’ होने का दावा करती है लेकिन दूसरी और इस सरकार के गोरखपुर का प्रशासन मजदूरों की बैचैनी का अर्थ उनके माओवादियों से संबंध होने से निकालता है. आज जब दुनिया महामंदी की चपेट में है और वित्तीय संस्थाओं को बचाने के लिए लोगों की बचतों को  झोंका जा रहा और पूंजीवाद चाहता है कि कैसे वह इस विश्व महामंदी से निजात पाए, ठीक उसी वक्त,  स्थानीय पेटी-पूंजीपतियों को छोड़ दें तो इस प्रकार की स्थिति में सरकारों का मजदूरवर्ग से इस तरह के निम्न स्तर के हथकंडों का इस्तेमाल करते हुए उलझना स्वयं पूंजीपति वर्ग को भी नापंसंद होगा. पूंजीवाद की अपेक्षा ज्यादा से ज्यादा उपभोग भी होती है ताकि माल मंडियों में बिक जाये. क्या मजदूर वर्ग की जेब में कुछ डाले बिना मार्केट या देश को मंदी से उभारा जा सकता है?

भारत जैसे देश में तुलनात्मक रूप से उत्पादन क्रिया के दौरान मजदूरों पर होनेवाले खर्च में लगातार गिरावट आ रही है अर्थात देश की कुल पैदावार में मजदूरों के हिस्से केवल ६ प्रतिशत ही आता है जबकि उनकी संख्या ८४ करोड़ है. लेकिन खाने-पीने की बुनियादी चीजों के दामों में बढोत्तरी ने सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. मजदूरों के लिए जीवन-निर्वाह करना भी मुश्किल होता जा रहा है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पूंजीपति एजेंसियों द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण अनुसार भारत दुनिया के सबसे सस्ती मजदूरी वाले देशों में से एक है. उनके अनुसार यह स्थिति आगामी अठारह-बीस सालों तक बनी रहेगी. उनके अनुसार यहाँ की इस सस्ती श्रम का लाभ विश्व पूंजी को ही होना है.यहीं नहीं वे भारत को एक बड़ी मंडी के रूप में भी देखते हैं जहाँ माल खपाया जा सकता है. चीन के बाद भारत दूसरा देश है जहाँ विकास दर सबसे ऊँची है. लेकिन मजदूरों की मजदूरी में होनेवाली थोडी-बहुत बढोत्तरी बुनियादी वस्तुओं की कीमत के मुकाबले बढ़ने की अपेक्षा कम हों तो कैसे मजदूर अपना जीवन निर्वाह कर पायेगा? क्या  स्वयं पूंजीवादी के तर्कानुसार भी इस प्रकार का रवैया उचित है?

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गोरखपुर : अपने परिवारों समेत धरने पर बैठे महिला एवं पुरुष मजदूर

पूंजी के अपने तर्क अनुसार किसी भी अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए जरूरी होता है कि मजदूरी में बढोत्तरी हो ताकि मजदूर ज्यादा वस्तुएं खरीद सकें. लेकिन गोरखपुर जैसे शहर में जहाँ मजदूर अपनी थोडी सी मजदूरी, रोजगार सुरक्षा और यूनियन बनाने के बुनियादी लडाई ही लड़ रहे हैं, उन्हें माओवादी कहना कहाँ तक उचित है? सबसे चिताजनक पहलू यह है की मजदूरों के बीच की हर तरह की बैचैनी का हल निकालने की बजाय उसे माओवादी-आतंकवादी कार्रवाई कहकर कुचलने की कोशिश की जाती है और उनके लीडरों पर झूठे केस बनाए जाते हैं और मजदूर नेताओं को जेलों में डाला जाता है.

उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियों को लागू करते समय देश की कार्यपालिका और न्यापालिका जैसी संस्थाओं का रवैया ज्यादा से ज्यादा मजदूर विरोधी होता गया है. गुडगाँव जैसे औद्योगिक नगर जहाँ एक मजदूर की मौत पर एक लाख मजदूरों की बड़ी संख्या सड़कों पर आ जाती , वहां पर भी मजदूरों को यूनियन तक बनाने की इजाजित नहीं है. रिको ऑटो कंपनी के संचालक मजदूरों के हड़ताल पर जाने और यूनियन बनाने को गैर-कानूनी कार्य कहते हैं. इसे ऐतिहासिक प्रसंग में देखें तो यह सही भी है क्योंकि मजदूरवर्ग की लहर के विपर्य के इस दौर में मजदूरों ने यूनियन बनाने, धरना देने, हड़ताल करने और गेट मीटिंगे औयोजित करने के अधिकारों को खो दिया है. उन्हें आज अपनों संघर्षों द्वारा जीते इन बुनियादी अधिकारों की रक्षा ही सबसे बड़ा कार्यभार लगता है जबकि वर्गों में विभाजित समाज में ये अधिकार भी उसी तरह गतिशील होते हैं जिस तरह समाज. अपने कालजयी संघर्षों द्वारा जीते गए इन अधिकारों को खो देना उन्हें निराश करता ही रहेगा जब तक वे स्वयं को राजनीतिक चेतना से चाकचौबंद नहीं करेंगे और इस वर्ग विभाजित व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन नहीं कर देंगे. गुडगाँव तो औद्योगिक उपक्रमों की हब है. इसके अलावा भारत के कोने-कोने में छोटे बड़े लाखों औद्योगिक उपक्रमों में देश के मजदूर वर्ग की आबादी का ९३ प्रतिशत भाग काम कर रहा है. मजदूरों की इस बड़ी तादाद को असंगठित मजदूर यानिकि वह मजदूर जो किसी मजदूर ट्रेड यूनियन का भाग नहीं है, कहते हैं. देश के इन छोटे और मझौले उपक्रमों में कार्य करनेवाले मजदूरों की बैचैनी ने हड़ताल और धरने  का रूप भी लेना है. पूंजीपतियों की आपसी गलाकाट होड़ के चलते और मंडी के उतार-चढाव और मंदी का ज्यादा असर छोटी पूंजी पर अधिक पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि  मजदूर वर्ग के हितों की अनदेखी करके इन उपक्रमों की रखवाली की जाये. लेकिन प्रशासन और सरकारी नुमाँईन्दो का इन पेटी-बुर्जुआ पूंजीपतियों और उनके गुंडों से साँठगाँठ   चिंता का विषय है. सरकार के लिए सोचने वाली बात यह भी है कि क्या मजदूरों और उनको नेताओं को माओवादी आतंकवादी कहकर झुट्ठे मुकद्दमों में फँसाना खुद पूंजीपति वर्ग या व्यवस्था के लिए ठीक है?

किसी प्रकार का आंतंकवाद चाहे वह धार्मिक मूलवादी खेमे की ओर से हो या वामपंथी दुस्साहसवाद के रूप में हो, निंदनीय है. सत्ताधारी वर्ग की दमनकारी नीतियाँ भी हर प्रकार का आतंकवाद पैदा करती हैं. सत्ताधारी वर्ग के राजकीय आतंकवाद  के परिणामस्वरूप धार्मिक मूलवादी आतंकवाद, दक्षिणपंथी आतंकवाद, वामपंथी आतंकवाद आदि, की फसल उगने की उपजाऊ भूमि तैयार होती है.हर किस्म का आतंकवाद मजदूर वर्ग की एकता और सांगठनिक क्षमता को कमजोर करता है… लेकिन गोरखपुर के स्थानीय प्रशासन द्वारा मजदूरों को माओवादियों से जोड़ना चिंता का विषय है. अगर मजदूरों की बुनियादी मांगों से संबंधित लडाई को लांछनात्मक  तरीके से माओवादियों की घुसपैठ से जोड़ा जाता है तो क्या इससे वह ज़मीन तैयार नहीं होती जहाँ नक्सलवाद, माओवाद या और किसी भी प्रकार का वामपंथी या दक्षिणपंथी आतंकवाद न हो? जबकि गोरखपुर के ए .डी. जी  पहले यह कह चुके हैं कि गोरखपुर में नक्सली नहीं है.

यूनिसेफ  की रिपोर्ट अनुसार पिछले ४० वर्षों के अन्तराल के बाद ग्लोबल वित्तीय संकट और ईंधन, भोजन और चारे की कीमतों में बढोत्तरी के कारण दक्षिण एशिया भूखमरी की उच्चतम शिखर को छू रहा है. इसमें कोई शक नहीं की उदारीकरण और भूमण्डलीकरण की नीतियों के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग सभी सेक्टरों और कृषि में भी बढ़िया विकास करते दिखाई गयी है लेकिन विडम्बना देखीए कि भरपूर अनाज पैदा होने के बावजूद भारत की खाद्य सुरक्षा की हालत में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार नहीं हुआ है. यह उपहास नहीं तो और क्या है कि उडीसा जैसे राज्य में अब भी लोग भूख से मर रहे हैं जबकि वेयरहाउस और गोदामों में अनाज सड रहा है?

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गोरखपुर : हड़ताल के दौरान सामूहिक रसोई

यहीं नहीं एम्.एस स्वामीनाथन रीसर्च फ़ाऊँडेशन (MSSRF) और विश्व खाद्य कार्यक्रम  (WFP) द्वारा एक रिपोर्ट तैयार करवाई गयी. इसमें कहा गया कि भोजन में प्रयाप्त पौष्टिक तत्त्वों की कमी के कारण  भारत का हर तीसरा व्यक्ति कुपोषण का शिकार है और ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2001 के अनुसार भारत का क्रमांक 94 है.

लेकिन पूंजीपति वर्ग खुश होता है कि विश्वमंदी  का भारत पर असर नहीं हुआ है. संसेक्स में फिर उछाल देखने को मिल रही है. प्रथम फिस्कल छमाही के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में ऑटो सेक्टर की विक्री में बढोत्तरी १४.५१ प्रतिशत रही है. इस प्रकार की बातें पूंजीपति लोगों और उनकी सरकारों को अच्छी लगती हैं. लेकिन ऑटो सेक्टर की हब रहे गुडगाँव जैसे शहर में पूंजीपतियों के किराये के गुंडों के हाथों होनेवाली मजदूर की मौत के बाद एक लाख मजदूरों का प्रदशर्न उन्हें परेशान कर देता है. तेरह-तेरह वर्षों से कार्यरत पंकज कुमार सिंह जैसे मजदूर अपनी मजदूरी से संतुष्ट नहीं हैं. अपनी जायज मांगों को मनमाने के लिए जब वे यूनियन बनाने की पहलकदमी करते हैं तो मैनेजमेंट स्थानीय प्रशासन और अपने निजी गुंडों की मदद से उन्हें दबाने की कोशिश करती है. पूंजीपतियों की मुनाफा कमाने की हवस मजदूरों को इंसान समझती ही नहीं. उन्हें तो चाहिए इन्सान के रूप में एक ऐसा मशीन का पूर्जा जो मशीन के दूसरे पूर्जों से मिलकर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करे. पूंजीपति यह देख ही नहीं पाते कि मशीन और इन्सान में बुनियादी फर्क है. मशीन अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष पैदा नहीं कर सकती. यह केवल मजदूर की श्रम-शक्ति से ही संभव होता है. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपतियों का मुनाफा, मैनेजमेंट के खर्चे और कार्पोरेट टैक्स जिससे सरकारे चलती हैं, आता है.

गुडगाँव की रिको ऑटो कंपनी के मजदूर की हत्या पर भारत की न्यूज एजेंसी पी.टी.आई . अपनी टिपण्णी में यह बात स्वीकार करती है कि गुडगाँव-मानेसर बेल्ट में मजदूर असंतोष कोई नई बात नहीं है. पहले २००० में मारुती उद्योग की मजदूरों की तीन महीने की हड़ताल और फिर २००५ में होंडा मोटर्स एंड स्कूटर के मजदूरों पर पुलिस द्वारा अधाधुंध लाठीचार्च जिसमें १६७ मजदूरों के घायल हुए थे, को नोट करते हुए पला झाड़ लेती है जैसे यह रूटीन की सामान्यतय घटने वाली बातें हों. लेकिन स्थिति का दूसरा पहलू यह भी है कि २००० और फिर २००५ और अब २००९ में मजदूरों का एकसाथ इतनी बड़ी तादाद में खड़े हो जाना, और फिर इन वर्षों के बीच का अन्तराल इतना बड़ा नहीं है कि इतिहास के लिए यह कोई दूर की बात हो. मजदूर वर्ग के असंतोष और वैचैनी के यहीं वे सिग्नल हैं जिन्हें पूंजीपति वर्ग द्वारा ही नहीं बल्कि मजदूर वर्ग की हमदर्द पार्टियों और बुद्धिजीवियों द्वारा नज़रंदाज किया जाता है. मजदूरों के प्रारंभिक सिग्नल भले ही किसी नज़दीक की क्रांति की और संकेत नहीं करते लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग को इन्हीं सिग्नलों को समझना है और इतिहास में अपने स्थान और जिम्मेदारी का भलीभांति निर्वाह करना है.

गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता
गोरखपुर : बिगुल से जुड़े युवा कार्यकर्ता

आज मजदूर वर्ग और क्रांतिकारी खेमा अलगाव और विखराव का शिकार है. लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग भी चुप्पी साधे हुए है. बुद्धिजीवियों के एक हिस्से का समर्थन और हमदर्दी हमेशा मजदूरवर्ग से रही है. अपनी उच्चतम बौद्धिक क्षमताओं के कारण भी बुद्धिजीवी लोग अपने स्वयं के वर्ग की सीमाओं को तोड़कर मजदूरों के साथ खड़े होते रहें है. बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा स्वयं को मजदूर वर्ग से अपने आप को अभेद भी पाता रहा है. लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है. क्या भारत का बुद्धिजीवी इतना आत्मसंतुष्ट हो सकता है? अगर इस प्रश्न का उत्तर हाँ  में है तो उसके बुद्धिजीवी होने पर प्रश्नचिह्न लगता है! लेकिन इस प्रकार की कोई स्थिति नहीं होती और न हो सकती है. समाजवादी खेमे के ढह-ढेरी हो जाने  के बाद हम भी मानते हैं कि समाज को आगे की ओर गति देने वाले आंदोलनों या क्रांतियों की प्रासंगिगता पर प्रश्न चिह्न लगा था और पूंजीवाद के अजर-अमर होने के भ्रम को भी खूब हवा मिली थी. अब स्थिति वैसी भी नहीं है. पूंजीवादी एक के बाद एक नए संकटों में फंसता जा रहा है. बुद्धिजीवियों के स्तर के अनुसार पूंजीवाद में भी ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें एक पल के लिए भी संतुष्ट कर पाए. इस प्रकार की स्थिति लंबे समय तक बनी नहीं रह सकती. यह बुद्धिजीवी वर्ग ही होता है जिसने सबसे पहले अपनी चुप्पी तोड़नी होती है क्योंकि अपनी संवेदनशीलता के कारण वहीँ पहला वर्ग होता है जो सबसे पहले टूटता है.

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गोरखपुर : इस पूरे आंदोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया

देश में चुनाव हों लेकिन बुनियादी मुद्दे गायब हों ! एक ऐसा वक्त जब आम जनता अपने जिंदा रहने की लडाई लड़ रही हो और चुनावों में भाग लेनेवाली पार्टियों की ओर से अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जाना ! इसके अलावा राजनीतिक दलों की बहसों का स्तर इतना निम्न स्तर का कि बुद्धिजीवी तो क्या आम आदमी भी इसका नोटिस लेने से नहीं बच पाया. विचारधारात्मक, सैद्धांतिक और राजनीतिक बहस सिरे से ही गायब थी. सामाजिक बहस में भी मुद्दे गायब थे. केवल जोड़तोड़ या तिकड़म द्वारा किस दल की सरकार बनेगी, जैसी चर्चाओं पर अटकलबाजी होती रही. इस प्रकार की स्थिति पर  देश के बुद्धिजीवी वर्ग का मूक दर्शक बने रहना नागरिक समाज के लिए नुकसानदेय है. इतिहास में उसे अपनी भूमिका और स्थान की पहचान करनी ही होगी.

पूंजीपतियों के गुंडों द्वारा गुडगाँव में मजदूर की हत्या और गोरखपुर के मजदूर और मजदूर नेताओं पर झूठे मुकद्दमे निंदनीय हैं. मजदूर वर्ग के हितों पर इस प्रकार का कुठारघात असहनीय है. पूंजीपति इसके लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने पर तुले हुए हैं. हमारे पडौसी देश नेपाल जहाँ पशुओं की हत्या और अत्याचार पर रोक संबंधी बहस चल रही है और हमारे यहाँ मजदूरों पर इस तरह के जुर्म किये जा रहे हैं. नेपाल जैसे पिछडे देश के साथ तुलना करते समय हमारा सीना गर्व से फूल जाता हैं लेकिन अपने ही देश में पशुओं पर नहीं बल्कि इंसानों और मजदूरों पर होनेवाले जुर्म पर हम मूक बने रहते हैं, क्या इस प्रकार की स्थिति शोभनीय है? बुद्धिजीवी वर्ग को सोचना होगा कि सभ्य समाज को इस वक्त अगर कोई खतरा है तो वह पूंजीपतियों के गुंडों की दहशत और प्रशासनिक मिलीभगत से ही है. उसे अपना प्रतिरोध दर्ज करवाना होगा. यही समय की मांग है.

उपरोक्त पोस्ट पर लगी हुई सभी तस्वीरें नई समाजवादी क्रांति का उद्घोषक ‘बिगुल’ से धन्यवाद सहित ली गयी हैं.

गोरखपुर के मजदूर संघर्ष से संबंधित पोस्टें :

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4 thoughts on “गोरखपुर और गुडगाँव के मजदूरों का दमन और बुद्धिजीवी वर्ग की चुप्पी

    Amritpal said:
    October 22, 2009 at 9:35 PM

    ਜ਼ੁਲਮ ਨਾਲ਼ ਟਕਰਾਇਆਂ ਹੀ, ਤਾਂ ਖ਼ੂਨ ਹੁੰਦਾ ਗਰਮ |
    ਕਬਰ-ਪੁੱਟ ਖੁਦ ਸਾਨੂੰ ਬਣਾਇਆ, ਇਹ ਤੇਰਾ ਕਰਮ |

    ਸੰਗੀਨਾਂ ਨਾਲ਼ ਵਹਿਣ, ਦਰਿਆਵਾਂ ਦੇ ਰੁਕ ਜਾਣਗੇ,
    ਹਰ ਹੰਕਾਰੇ ਹੋਏ ‘ਡਾਇਰ’ ਤਾਈਂ, ਹੁੰਦਾ ਇਹ ਭਰਮ |

    ਲੋਕੀਂ ਪਿਆਸੇ ਪਾਣੀ ਨੂੰ, ਤੂੰ ਨਹਾਉਂਦਾ ਖ਼ੂਨ ਵਿੱਚ,
    ਫ਼ਿਰ ਲੋਕ ਸੇਵਕ ਕਹਾਵੇਂ, ਤੈਨੂੰ ਆਉਂਦੀ ਨਾ ਸ਼ਰਮ |

    ਤੂੰ ਬੈਠ ਟਾਡੇ ਪੋਟੇ ਬਣਾ, ਲੋਕ ਮੋਰਚੇ ਬਣਾਉਣਗੇ,
    ਤੂਫ਼ਾਨਾਂ ਸਾਹਵੇਂ ਨਾ ਟਿਕਣੇ, ਤੇਰੇ ਅਹਿਲ-ਏ-ਹਰਮ |

    ਇਹ ਤਾਂ ਜੋਬਨ ਤੇ ਆਇਆ, ਕੋਈ ਆਸ਼ਿਕਾਂ ਦਾ ਟੋਲਾ
    ਜਿਹਨਾਂ ਦੇਖਣਾ ਕੀ ਹੁੰਦਾ, ਅੱਜ ਵਸਲਾਂ ਦਾ ਚਰਮ |

    ਪਤਝੜਾਂ ਭਾਵੇਂ ਲੱਖ ਫਤਵੇ ਸੁਣਾਏ, ਚੁੱਪ ਹੋ ਜਾਣ ਦੇ
    ਨਗਮੇਂ ਬਹਾਰ ਗਾਈ ਜਾਵੇ, ‘ਅਮਗੀਤ’ ਦੀ ਕਲ਼ਮ |

    …… Dr. Amrit

    Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar responded:
    October 22, 2009 at 10:27 PM

    अमृतपाल जी.

    आपकी इस पंजाबी में लिखी गयी खूबसूरत नज़्म को हमारी और से हिंदी में अनुवाद किया गया है. अगर आपके मूल भावों को दर्शाने में हम असमर्थ रहें हैं तो कृपया जरूर लिखें.

    जुल्म से टकराने से ही, होता है खून गर्म |
    कब्र-खोद हमें बनाया, यही तेरा कर्म |

    संगीनों से बहाव, दरियाओं के रुक जायेंगे |
    हर अहंकारी ‘डायर’ को होता यही भ्रम |

    लोग प्यासे पानी को, तू नहायें खूनसे ,
    फिर लोक सेवक कहलायें, तुझे आये न शर्म |

    तू बैठकर टाडे पोटे बना, लोग मोर्चा बनायेंगे,
    तूफानों के सामने नहीं टिकेंगे तिरे अहिले-हरम |

    यह तो यौवन पर आई हुई कोई आशिकों की टोली,
    जिसने देखनी क्या,आज वसल की चरम |

    पतझड़ चाहें लाखों फतवे सुनावे, चुप हो जाने के,
    नगमे-बहार गाती रहे, ‘अमगीत’ की कलम |

    Amritpal said:
    October 23, 2009 at 7:16 PM

    ਟਾਡੇ ਪੋਟੇ – TADA, POTA
    ਜੋਬਨ ਤੇ ਆਇਆ – any word in hindi for matured relationship ?

    deep said:
    October 25, 2009 at 1:11 PM

    ਜੰਗ ਦਾ ਐਲਾਨ…
    ਹੈਂ ਮਜ਼ਲੂਮ..ਗੰਦੇ-ਛੋਟੇ ਲੋਕ..
    ਜਾਨਵਰ…ਪਤਾ ਨਹੀ ਕੀ-੨ ਕਹਿ
    ਕੋਸਦਾ ਏ ਸਾਨੂੰ ਗਾਲਾਂ ਦਿੰਨਾ
    ਕੀ ਏ ਸਾਡਾ ਗੁਨਾਹ….??????
    ਬਸ ਬਹੁਤ ਹੋ ਗਿਆ ਹੁਣ ਨਹੀ
    ਹੁਣ ਤੇਰੀ ਵਾਰੀ ਏ
    ਹੁਣ ਤੈਨੂੰ ਅਹਿਸਾਸ ਹੋਵੇਗਾ
    ਆਮ ਇਨਸਾਨ ਦੀ ਤਾਕਤ ਦਾ
    ਜ਼ਹਿਰ ਉਗਲਦੇ ਜੋ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਖਿਲਾਫ
    ਸੰਭਲ ਜਾਉ…ਹੋ ਰਿਹਾ ਏ ਤਿਆਰ ਹੁਣ
    ਮੁਸ਼ਕਿਆ ਪਸੀਨਾ ਤੇਜ਼ਾਬ ਬਣਨ ਨੂੰ
    ਲੋਹੇ ਵਰਗੇ ਹੱਥ ਕੱਢਦੇ ਨੇ ਸੋਨਾ
    ਬੰਜ਼ਰ ਜ਼ਮੀਨ ਦੀ ਹਿੱਕ ਪਾੜ
    ਢਲ ਰਹੇ ਨੇ ਹਥਿਆਰ ਬਣਨ ਨੂੰ
    ਪਾਟਿਓ ਕੱਪੜਿਆਂ ਪਿੱਛਲੇ ਪਿੰਡੇ ਤੇ
    ਬਹੁਤ ਕਹਿਰ ਕਰ ਲਿਆ ਤੈਂ
    ਹੁਣ ਹਰਕਤ ਹੈ ਚੱਟਾਨ ਬਨਣ ਨੂੰ
    ਬਸ
    ਹੁਣ ਤੇਰੇ ਜ਼ੁਲਮ ਤੇ
    ਮੇਰੇ ਸਬਰ ਦੀ ਅੰਤ ਹੋਵੇਗਾ
    ਟੁੱਟੀ ਹੱਥੀ ਵਾਲੀਆਂ ਦਾਤੀਆਂ
    ਤਿਆਰ ਨੇ ਜ਼ਾਲਮ ਤਲਵਾਰਾਂ ਅੱਗੇ
    ਇੱਕ ਜੰਗ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰਨ ਨੂੰ……
    ………….-deep-

    जंग का ऐलान
    हैं मजलूम..गंदे-छोटे लोग..
    जानवर…पता नहीं क्या-क्या कह
    कोसता है हमें गाली देता
    क्या है हमारा गुनाह….??????
    बस बहुत हुआ अब नहीं
    अब तेरी बारी है
    अब तुझे अहसास होगा
    आम इन्सान की ताकत का
    जहर उगलते जो मजदूरों के खिलाफ
    संभल जाओ… हो रहा है तैयार अब
    बदबूआ पसीना तेजाब बनने को
    लोहे जैसे हाथ निकालते हैं सोना
    बंजर ज़मीन की छाती चीरकर
    ढल रहे हैं हथियार बनने को
    फटे कपडे पिछले तन पर
    बहुत कहर बरपा किया है तूने
    अब हरकत है चटान बनने को
    बस
    अब तेरे जुल्म और
    मेरे सबर का अंत होगा
    टूटे हत्थे वाली हँसियाँ
    तैयार हैं जालिम तलवार आगे
    एक जंग का ऐलान करने को

    ………….-deep-

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