आग्नेय अक्टूबर

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अक्टूबर क्रांति की ९२वीँ वर्षगांठ पर

बोल्शेविकों ने विद्रोह की ज़ोरदार तैयारियाँ शुरू कीं। लेनिन ने कहा कि दोनों राजधानियों – मास्को और पेत्रोग्राद – में मज़दूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियतों में बहुमत हासिल करने के बाद, बोल्शेविक अपने हाथ में राज्यसत्ता ले सकते हैं, और उन्हें लेना चाहिए। तय किये हुए रास्ते पर नज़र डालते हुए, लेनिन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि `जनता का बहुमत हमारे साथ है।´ अपने लेखों और केन्द्रीय समिति और बोल्शेविक संगठनों के नाम अपने ख़तों में, लेनिन ने विद्रोह की एक विस्तृत योजना बनायी और बतलाया कि फौजी दस्ते, जल-सेना और रेड गार्ड दस्तों को किस तरह इस्तेमाल करना चाहिए, विद्रोह की सफलता निश्चित करने के लिए पेत्रोग्राद के किन मुख्य स्थानों पर कब्ज़ा करना चाहिए, इत्यादि।

7 अक्टूबर को, लेनिन गुप्त रूप से फिनलैण्ड से पेत्रोग्राद आये। 10 अक्टूबर 1917 को, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ऐतिहासिक बैठक हुई जिसमें अगले कुछ दिनों में सशस्त्र विद्रोह आरम्भ करने का फैसला किया गया। पार्टी की केन्द्रीय समिति के ऐतिहासिक प्रस्ताव में, जिसे लेनिन ने लिखा था, कहा गया था :

“केन्द्रीय समिति यह समझती है कि रूसी क्रान्ति की अन्तरराष्ट्रीय परिस्थिति (जर्मन जल-सेना में विद्रोह, जो समूचे यूरोप में विश्व समाजवादी क्रान्ति का चरम प्रदर्शन है, रूस की क्रान्ति का गला घोंटने के उद्देश्य से साम्राज्यवादियों के बीच शान्ति की धमकी), साथ ही सैनिक परिस्थिति (रूसी पूँजीपतियों और केरेन्स्की एण्ड कम्पनी का यह निश्चित फैसला कि पेत्रोग्राद जर्मनों को सौंप दिया जाये) और सोवियतों में सर्वहारा पार्टी का बहुमत हासिल करना, – यह सब और इसके साथ यह कि किसान-विद्रोह हो रहे हैं और आम जनता का विश्वास तेज़ी से पार्टी पर जम रहा है (मास्को के चुनाव), और अन्त में एक दूसरे कार्निलोव काण्ड के लिए जो खुली तैयारी हो रही है (पेत्रोग्राद से फौजें हटाना, मास्को और मिंस्क में हमारी जनता की कार्रवाई वग़ैरह) पर विचार करें और फैसला करें।” (लेनिन, संकलित रचनाएँ, अंग्रेज़ी संस्करण, खण्ड 2, पृष्ठ 135)

केन्द्रीय समिति के दो सदस्य, कामेनेव और ज़िनोवियेव, इस ऐतिहासिक प्रस्ताव के खिलाफ बोले और उन्होंने उसके विरुद्ध वोट दिया। मेंशेविकों की तरह, वे पूँजीवादी संसदीय जनतन्त्र का सपना देखते थे और मज़दूर वर्ग पर यह कहकर कीचड़ उछालते थे कि समाजवादी क्रान्ति करने के लिए वह काफी मज़बूत नहीं है, कि वह सत्ता हाथ में लेने के लिए काफी परिपक्व नहीं है।

हालाँकि इस बैठक में त्रात्स्की ने सीधे इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट नहीं दिया, फिर भी उसने एक संशोधन रखा जिससे विद्रोह की सम्भावना नहीं के बराबर हो जाती और विद्रोह निष्फल हो जाता। उसने प्रस्ताव रखा कि सोवियतों की दूसरी कांग्रेस शुरू होने से पहले विद्रोह शुरू न किया जाये। इस प्रस्ताव का मतलब था – विद्रोह में विलम्ब करना, उसकी तारीख़ ज़ाहिर कर देना और अस्थायी सरकार को आगाह कर देना।

बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति ने विद्रोह का संगठन करने के लिए अपने प्रतिनिधियों को दोन्येत्स प्रदेश, यूराल, हैलसिंगफोर्स, क्रोन्स्तात, दक्षिण-पश्चिमी मोर्चा और दूसरी जगहों पर भेजा। पार्टी ने ख़ासतौर से सूबों में विद्रोह का संचालन करने के लिए कामरेड बोरोशिलोव, मोलोतोव, जरजन्स्की, ओजानिकित्से, किरोव, कगानोविच, कुइवीशेव, फ्रुन्जे, यारोस्लाव्स्की और दूसरे साथियों को मुकर्रर किया। कामरेड ज्दानोव ने यूराल में शंद्रिस्क की फौज में काम जारी रखा। केन्द्रीय समिति के प्रतिनिधियों ने सूबों के बोल्शेविक संगठनों के प्रमुख सदस्यों को विद्रोह की योजना बतायी और पेत्रोग्राद के विद्रोह का समर्थन करने के लिए उन्हें तैयार रहने के लिए बटोरा।

पार्टी की केन्द्रीय समिति के निर्देश से, पेत्रोग्राद-सोवियत की एक क्रान्तिकारी फौजी कमेटी बनायी गयी। यह संस्था विद्रोह का कानूनी तौर पर चलने वाला हेडक्वार्टर बन गयी। उधर क्रान्ति-विरोधी भी जल्दी-जल्दी अपनी शक्ति बटोर रहे थे। फौज के अफसरों ने एक क्रान्ति-विरोधी संगठन बनाया, जिसका नाम अफसरों की सभा था। हर जगह क्रान्ति विरोधियों ने लड़ाकू दस्ते बनाने के लिए हेडक्वार्टर कायम किये। अक्टूबर के अन्त तक, क्रान्ति विरोधियों की कमान में 43 लड़ाकू दस्ते बन गये। सेण्ट जॉर्ज के क्रॉस को मानने वालों के ख़ास दस्ते बनाये गये।

केरेन्स्की की सरकार ने शासन केन्द्र पेत्रोग्राद से मास्को ले जाने के सवाल पर विचार किया। इससे स्पष्ट हो गया कि शहर में विद्रोह रोकने के लिए वह पेत्रोग्राद को जर्मनों के हाथ सौंपने की तैयारी कर रही है। पेत्रोग्राद के मज़दूरों और सैनिकों के विरोध ने अस्थायी सरकार को पेत्रोग्राद में ही रहने पर मजबूर किया।

16 अक्टूबर को, पार्टी की केन्द्रीय समिति की एक विस्तृत बैठक हुई। इस बैठक में विद्रोह का संचालन करने के लिए एक पार्टी केन्द्र चुना गया, जिसके अगुआ कामरेड स्तालिन थे। यह पार्टी केन्द्र पेत्रोग्राद-सोवियत की क्रान्तिकारी फौजी कमेटी का प्रमुख नेतृत्व था और समूचे विद्रोह का अमली संचालन उसके हाथ में था।

केन्द्रीय समिति की बैठक में, समर्पणवादियों – ज़िनोवियेव और कामेनेव ने विद्रोह का फिर विरोध किया। यहाँ मुँह की खाकर, उन्होंने विद्रोह के खिलाफ, पार्टी के खिलाफ खुल्लमखुल्ला अख़बारों में लिखा। 18 अक्टूबर को, मेंशेविक अख़बार नोवाया जीज्न (नव जीवन) ने कामेनेव और ज़िनोवियेव का बयान छापा, जिसमें कहा गया था कि बोल्शेविक विद्रोह की तैयारी कर रहे हैं और वे (कामेनेव और ज़िनोवियेव) समझते हैं कि यह दुस्साहसपूर्ण जुआ खेलना है। इस तरह, कामेनेव और ज़िनोवियेव ने दुश्मन को केन्द्रीय समिति का विद्रोह सम्बन्धी फैसला बता दिया( उन्होंने यह प्रकट कर दिया कि कुछ ही दिनों में विद्रोह शुरू करने की योजना बनायी गयी है। यह ग़द्दारी थी। इस सिलसिले में, लेनिन ने लिखा था : “कामेनेव और ज़िनोवियेव ने सशस्त्र विद्रोह के बारे में अपनी पार्टी की केन्द्रीय समिति का फैसला दग़ाबाज़ी से रोद्जियांको और केरेन्स्की को बतला दिया है।” लेनिन ने केन्द्रीय समिति के सामने ज़िनोवियेव और कामेनेव को पार्टी से निकालने का सवाल रखा।

ग़द्दारों से चेतावनी पाकर, क्रान्ति के दुश्मन तुरन्त ही, इस बात के उपाय करने लगे कि विद्रोह को रोक दें और क्रान्ति के संचालक दल – बोल्शेविक पार्टी – का नाश कर दें। अस्थायी सरकार ने एक गुप्त बैठक बुलायी, जिसमें बोल्शेविकों का मुकाबला करने के लिए क्या उपाय किये जायें, इसका फैसला हुआ। 19 अक्टूबर को, अस्थायी सरकार ने युद्ध के मोर्चे से जल्दी-जल्दी फौजें पेत्रोग्राद बुलायीं। सड़कों पर भारी पहरा लगा दिया गया। क्रान्ति विरोधी ख़ासतौर से मास्को में भारी फौज इकट्ठा करने में कामयाब हुए। अस्थायी सरकार ने एक योजना बनायी कि सोवियतों की दूसरी कांग्रेस शुरू होने से पहले बोल्शेविक केन्द्रीय समिति के हेडक्वार्टर स्मोल्नी पर हमला किया जाये और उस पर कब्ज़ा कर लिया जाये और बोल्शेविक संचालन-केन्द्र का नाश कर दिया जाये। इसी उद्देश्य से, हुकूमत ने पेत्रोग्राद में वह फौज बुलायी जिसकी वफ़ादारी पर उसे भरोसा था।

लेकिन, अस्थायी सरकार की ज़िन्दगी के दिन और घण्टे भी गिनती के रह गये थे। समाजवादी क्रान्ति की विजय-यात्रा को अब कोई भी नहीं रोक सकता था। 21 अक्टूबर को, बोल्शेविकों ने सभी क्रान्तिकारी फौजी दस्तों के पास क्रान्तिकारी फौजी समिति के कमिसार भेजे। विद्रोह होने से पहले के बचे हुए दिनों में फौजी दस्तों, मिलों और कारख़ानों में कार्रवाई की ज़ोरदार तैयारी की गयी। युद्धपोत अव्रोरा और जारियास्वोबोदी के लिए भी निश्चित निर्देश भेजे गये।

पेत्रोग्राद सोवियत की एक बैठक में, त्रात्स्की ने डींग हाँकने की जीम में दुश्मन को वह तारीख़ बतला दी जब बोल्शेविक सशस्त्र विद्रोह शुरू करने वाले थे। केरेन्स्की सरकार विद्रोह को असफल न कर दे, इसलिए पार्टी की केन्द्रीय समिति ने फैसला किया कि निश्चित किये हुए समय से पहले ही विद्रोह शुरू कर दिया जाये और आखिरी मंज़िल तक ले जाया जाये। उसने विद्रोह की तारीख़ सोवियतों की दूसरी कांग्रेस के शुरू होने से पहले के दिन रखी। 24 अक्टूबर (6 नवम्बर) को सुबह तड़के, केरेन्स्की ने हमला शुरू कर दिया। उसने बोल्शेविक पार्टी के केन्द्रीय पत्र रबोचीपूत (मज़दूर पथ) को बन्द करने का हुक्म दिया और सम्पादकीय दफ़्तर और बोल्शेविकों के छापेख़ाने पर हथियारबन्द गाड़ियाँ भेजीं। लेकिन 10 बजे सबेरे तक, कामरेड स्तालिन के निर्देश पर, रेड गार्डों के दस्तों और क्रान्तिकारी सैनिकों ने हथियारबन्द गाड़ियों को पीछे ठेल दिया और छापेख़ाने और रबोचीपूत के सम्पादकीय दफ़्तरों पर और ज्यादा पहरा बिठा दिया। लगभग 11 बजे सबेरे रबोचीपूत प्रकाशित हुआ, जिसमें अस्थायी सरकार का तख्ता उलट देने के लिए आह्वान था। उसी समय, विद्रोह के पार्टी केन्द्र के निर्देश से क्रान्तिकारी सैनिकों और रेड गार्डों के दस्ते स्मोल्नी की तरफ दौड़ाये गये। विद्रोह शुरू हो गया।

24 अक्टूबर की रात को, लेनिन स्मोल्नी आ पहुँचे और उन्होंने खुद विद्रोह के संचालन का भार सँभाला। उस रातभर फौज के क्रान्तिकारी दस्ते और रेड गार्डों के जत्थे बराबर स्मोल्नी आते रहे। बोल्शेविकों ने शीतप्रासाद घेरने के लिए, जहाँ अस्थायी सरकार ने अपना अड्डा बनाया था, उन्हें राजधानी के केन्द्र की तरफ भेजा। 25 अक्टूबर (7 नवम्बर) को, रेड गार्डों के दस्तों और क्रान्तिकारी सैनिकों ने रेलवे स्टेशनों, डाकख़ानों, तारघरों, मन्त्री-गृहों और राज्य बैंक पर कब्ज़ा कर लिया।

प्रेद पार्लियामेण्ट भंग कर दी गयी।

बोल्शेविक केन्द्रीय समिति और पेत्रोग्राद सोवियत का हेडक्वार्टर, स्मोल्नी क्रान्ति का हेडक्वार्टर बन गया, जहाँ से लड़ाई के बारे में सभी हुक्म भेजे जाते थे। पेत्रोग्राद के मज़दूरों ने उन दिनों दिखला दिया कि बोल्शेविक पार्टी की देखरेख में उन्होंने कैसी महान शिक्षा पायी है। फौज के क्रान्तिकारी दस्तों ने, जिन्हें बोल्शेविकों के काम ने विद्रोह के लिए तैयार किया था, नपे-तुले ढंग से लड़ाई की आज्ञाओं का पालन किया और वे रेड गार्डों के दस्तों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़े। जल सेना फौज से पीछे न रही। क्रोन्स्तात बोल्शेविक पार्टी का गढ़ था और बहुत दिन पहले ही अस्थायी सरकार का प्रभुत्व मानने से इन्कार कर चुका था। युद्धपोत अव्रोरा ने अपनी तोपें शीतप्रासाद की तरफ मोड़ दीं और, 25 अक्टूबर को, उनकी घन गरजन ने एक नया युग आरम्भ किया, महान समाजवादी क्रान्ति का युग आरम्भ किया।

25 अक्टूबर (7 नवम्बर) को, बोल्शेविकों ने (रूस के नागरिकों के नाम) एक घोषणापत्र निकाला। इसमें कहा गया था कि पूँजीवादी अस्थायी सरकार हटा दी गयी है और राज्यसत्ता सोवियतों के हाथ में आ गयी है।

अस्थायी सरकार ने कैडेटों और लड़ाकू जत्थों की छत्रछाया में शीतप्रासाद में शरण ली थी। 25 अक्टूबर की रात को क्रान्तिकारी मज़दूरों, सैनिकों और जहाज़ियों ने शीतप्रासाद पर हल्ला बोलकर कब्ज़ा कर लिया और अस्थायी सरकार को गिरफ़्तार कर लिया। पेत्रोग्राद में सशस्त्र विद्रोह की विजय हुई।

सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस 25 अक्टूबर (7 नवम्बर) 1917 की शाम को 10 बजकर 45 मिनट पर स्मोल्नी में शुरू हुई, जबकि पेत्रोग्राद का विद्रोह विजय गौरव से दमक रहा था और राजधानी में सत्ता सचमुच पेत्रोग्राद सोवियत के हाथ में आ गयी थी। कांग्रेस में बोल्शेविकों को भारी बहुमत मिला। मेंशेविकों, बुन्दवादियों और दक्षिणपन्थी समाजवादी क्रान्तिकारियों ने देखा कि अब उनके दिन बीत चुके हैं, इसलिए वे कांग्रेस से बाहर चले गये और उन्होंने ऐलान किया कि वे कांग्रेस के काम में हिस्सा लेने से इन्कार करते हैं। सोवियतों की कांग्रेस में उनका एक बयान पढ़ा गया, जिसमें उन्होंने अक्टूबर क्रान्ति को एक `फौजी षड्यन्त्र´ बताया था। कांग्रेस ने मेंशेविकों और समाजवादी क्रान्तिकारियों की निन्दा की और उनके चले जाने पर अफसोस करना तो दूर, उसका स्वागत किया। कांग्रेस ने ऐलान किया कि ग़द्दारों के चले जाने से अब वह मज़दूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सच्ची क्रान्तिकारी कांग्रेस हो गयी है।

कांग्रेस ने ऐलान किया कि सारी सत्ता सोवियतों के हाथ में आ गयी है। सोवियतों की दूसरी कांग्रेस के घोषणापत्रा में कहा गया :

“मज़दूरों, सैनिकों और किसानों के भारी बहुमत का समर्थन पाकर और पेत्रोग्राद में होने वाले मज़दूरों और सैनिकों के सफल विद्रोह का समर्थन पाकर, कांग्रेस अपने हाथ में सत्ता लेती है।”

26 अक्टूबर (8 नवम्बर) 1917 की रात को, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस ने शान्ति सम्बन्धी आज्ञप्ति स्वीकार की। कांग्रेस ने युद्ध करने वाले देशों का आह्वान किया कि कम से कम तीन महीने के लिए सुलह कर लें, जिससे शान्ति की बातचीत की जा सके। कांग्रेस ने एक तरफ तो युद्ध करने वाले देशों की जनता और वहाँ की सरकारों से अपनी बात कही, दूसरी तरफ उसने ‘संसार के तीन प्रमुख राज्यों यानी ब्रिटेन, फ्रांसिस और जर्मनी के वर्ग-चेतन मज़दूरों से’ अपील की। उसने इन मज़दूरों से कहा कि वे ‘शान्ति के उद्देश्य को सफलता की मंज़िल तक ले जाने में और साथ ही सभी तरह की गुलामी और शोषण से मेहनतकश और शोषित जनता की मुक्ति के उद्देश्य को सफलता की मंज़िल तक ले जाने में’ मदद करें। उसी रात को, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस ने भूमि सम्बन्धी आज्ञप्ति स्वीकार की जिसमें कहा गया था : “भूमि पर ज़मींदारों की मिल्कियत बिना मुआवज़े के तुरन्त ख़त्म की जाती है।” खेती के इस कानून का आधार किसानों का एक निर्देश पत्र (नकाज, मैण्डेट) था, जो अलग-अलग जगहों के किसानों के 242 मैण्डेटों को मिलाकर बनाया गया था। इसके अनुसार, ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत हमेशा के लिए ख़त्म कर दी गयी और उसके बदले सार्वजनिक या राज्य की मिल्कियत कायम हुई। ज़मींदारों, ज़ार के परिवार और मठों की ज़मीन बिना पैसा दिये हुए सभी मेहनतकशों को इस्तेमाल के लिए देने का हुक्म हुआ।

इस आज्ञापत्र से, किसानों ने अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति से 15 करोड़ देस्यातिन (40 करोड़ एकड़ से ऊपर) ज़मीन पायी जो पहले ज़मींदारों, पूँजीपतियों, ज़ार के परिवार, मठों और गिरजाघरों के पास थी।

इसके अलावा, किसानों को उस लगान से मुक्त कर दिया गया जो वे ज़मींदारों को देते थे और जो सालाना 50 करोड़ स्वर्ण रूबल होता था।

खनिज पदार्थों के तमाम साधन (तेल, कोयला, धातुएँ, वग़ैरह), जंगल और जलाशय जनता की सम्पत्ति हो गये।

अन्त में, सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस ने पहली सोवियत सरकार बनायी – जनकमिसारों की समिति बनायी जिसमें सभी बोल्शेविक थे। जनकमिसारों की पहली समिति के पहले सभापति लेनिन चुने गये।

इससे सोवियतों की दूसरी ऐतिहासिक कांग्रेस का काम ख़त्म हुआ।

कांग्रेस के प्रतिनिधि इधर-उधर बिखर गये, जिससे कि पेत्रोग्राद में सोवियतों की जीत की ख़बर फैला दें और सोवियतों की सत्ता सारे देश में फैलाने का काम निश्चित करें। हर जगह सोवियतों के हाथ तुरन्त ही सत्ता नहीं आ गयी। जब पेत्रोग्राद में सोवियत सरकार बन चुकी थी, तब मास्को में कई दिन तक डटकर और घनघोर लड़ाई होती रही। सत्ता मास्को-सोवियत के हाथ में न जाये, इसके लिए क्रान्ति-विरोधी मेंशेविक और समाजवादी क्रान्तिकारी पार्टियों ने ग़द्दारों और कैडेटों से मिलकर मज़दूरों और सैनिकों के खिलाफ हथियारबन्द लड़ाई शुरू कर दी। बागि़यों को हराने और मास्को में सोवियतों की सत्ता कायम करने में कई दिन लग गये।

खुद पेत्रोग्राद में और उसके कई ज़िलों में क्रान्ति की जीत के शुरू के दिनों में ही सोवियत सत्ता को ख़त्म करने की क्रान्ति विरोधी कोशिशें की गयीं। 10 नवम्बर 1917 को, केरेन्स्की ने, जो विद्रोह के समय पेत्रोग्राद से उत्तरी मोर्चे को भाग गया था, कई कज्ज़ाक दस्ते इकट्ठा किये और जनरल क्रासनोव की कमान में उन्हें पेत्रोग्राद के खिलाफ भेजा। 11 नवम्बर 1917 को, एक क्रान्ति-विरोधी संगठन ने पेत्रोग्राद में कैडेटों से बग़ावत करायी। इस संगठन के नेता समाजवादी क्रान्तिकारी थे, और उसका नाम रखा था – “पितृभूमि और क्रान्ति के उद्धार की कमेटी”। लेकिन, बिना ज्यादा कठिनाई के बग़ावत दबा दी गयी। एक ही दिन में, 11 नवम्बर की शाम तक, जहाज़ियों और रेड गार्डों के दस्तों ने कैडेट-विद्रोह दबा दिया और 13 नवम्बर को जनरल क्रासनोव पुलकोवो पहाड़ियों के पास हरा दिया गया। लेनिन ने व्यक्तिगत रूप से सोवियत-विरोधी बग़ावत दबाने का संचालन किया, जैसे उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अक्टूबर विद्रोह का संचालन किया था। उनकी अटूट दृढ़ता और विजय में उनके शान्त विश्वास ने जनता को प्रेरित और संगठित किया। दुश्मन कुचल दिया गया। क्रासनोव गिरफ़्तार कर लिया गया और उसने `वचन दिया´ कि सोवियत सत्ता के खिलाफ लड़ाई बन्द कर देगा। और, `वचन देने पर´ वह छोड़ दिया गया। लेकिन जैसाकि आगे मालूम हुआ, जनरल ने अपना वचन तोड़ दिया। जहाँ तक केरेन्स्की का सम्बन्ध था, वह औरत का भेष बनाकर `किसी अज्ञात दिशा में ग़ायब´ हो गया।

फौज के जनरल हेडक्वार्टर पर, मोगीलेव में प्रधान सेनापति जनरल दुखोनिन ने भी बग़ावत करने की कोशिश की। जब सोवियत सरकार ने उसे हुक्म दिया कि जर्मन कमान से सुलह करने के लिए तुरन्त बातचीत चलाओ, तो उसने इन्कार कर दिया। इस पर, सोवियत सरकार के हुक्म से उसे हटा दिया गया। क्रान्ति विरोधी जनरल हेडक्वार्टर भंग कर दिया गया और खुद दुखोनिन को उसके खिलाफ विद्रोह करने वाले सैनिकों ने मार डाला। पार्टी के भीतर कुछ नामी-गिरामी अवसरवादियों – कामेनेव, ज़िनोवियेव, राइकोव, श्लीयापनीकोव, वग़ैरह – ने भी सोवियत सत्ता के खिलाफ धावा बोला। उन्होंने माँग की कि एक `संयुक्त समाजवादी सरकार´ बनायी जाये, जिसमें मेंशेविक और समाजवादी क्रान्तिकारी भी शामिल किये जायें जिन्हें अक्टूबर क्रान्ति ने अभी-अभी परास्त किया था। 15 नवम्बर 1917 को, बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें इन क्रान्ति-विरोधी पार्टियों के साथ समझौता करना नामंजूर कर दिया गया और कामेनेव तथा ज़िनोवियेव को क्रान्ति का हड़ताल-तोड़क कहा गया।

17 नवम्बर को, पार्टी की नीति से असहमत होते हुए कामेनेव, ज़िनोवियेव, राइकोव और मिल्यूतिन ने ऐलान किया कि वे केन्द्रीय समिति से इस्तीफा देते हैं। उसी दिन, 17 नवम्बर को, नोगिन ने अपनी तरफ से और जनकमिसार समिति के सदस्यों – राइकोव, वी. मिल्यूतिन, तियोदोरोविच, ए. श्लीयापनीकोव, डी. रियाज़ानोव, यूरेनेव और लारिन – की तरफ से ऐलान किया कि वे पार्टी की केन्द्रीय समिति की नीति से असहमत हैं और जनकमिसार समिति से इस्तीफा देते हैं। इन मुट्ठीभर ग़द्दारों के भाग खड़े होने से, अक्टूबर क्रान्ति के दुश्मनों के यहाँ खुशियाँ मनायी जाने लगीं। पूँजीपति और उनके पिट्ठू खुशी से फूलकर कहने लगे कि बोल्शेविज्म ख़त्म हो गया और बोल्शेविक पार्टी जल्द ही समाप्त होने वाली है। लेकिन इन मुट्ठीभर ग़द्दारों की वजह से, पार्टी एक क्षण के लिए भी विचलित न हुई। पार्टी की केन्द्रीय समिति ने घृणा के साथ उन्हें क्रान्ति से भाग खड़े होने वाला और पूँजीपतियों का साझीदार कहकर उनकी निन्दा की और अपने आगे के काम में लग गयी।

जहाँ तक `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों का सवाल था, वे किसान जनता पर अपना असर बनाये रखना चाहते थे। किसानों की हमदर्दी निश्चित रूप से बोल्शेविकों के साथ थी। इसलिए, `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों ने फैसला किया कि बोल्शेविकों से झगड़ा न करें और फिलहाल उनके साथ संयुक्त मोर्चा बनाये रहें। नवम्बर 1917 में, किसान सोवियतों की कांग्रेस हुई। उसने अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति से हासिल हुए सभी लाभ स्वीकार किये और सोवियत सरकार के आज्ञा-पत्रों का समर्थन किया। `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारियों के साथ एक समझौता हुआ और उनमें से कई को जनकमिसार समिति में जगहें दी गयीं (कोलेगायेव, स्प्रिदोनोवा, प्रोश्यान और स्टाइनबर्ग)। लेकिन, यह समझौता ब्रेस्ट-लिटोव्स्क की संधि होने और ग़रीब किसानों की कमेटियाँ बनने तक ही कायम रहा। उसके बाद किसानों में गहरी दरार पड़ी। `वामपन्थी´ समाजवादी क्रान्तिकारी अधिकाधिक कुलक हित ज़ाहिर करने लगे। उन्होंने बोल्शेविकों के खिलाफ बग़ावत की और सोवियत सत्ता ने उन्हें परास्त कर दिया।

अक्टूबर 1917 से फरवरी 1918 तक, देश के विशाल प्रदेशों में सोवियत क्रान्ति इतनी तेज़ी से फैली कि लेनिन ने उसे सोवियत सत्ता की `विजय-यात्रा´ कहा।

महान अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति विजयी हुई।

रूस में समाजवादी क्रान्ति की इस अपेक्षाकृत आसान विजय के कई कारण थे। नीचे लिखे हुए मुख्य कारण ध्यान देने योग्य हैं :

(1) अक्टूबर क्रान्ति का दुश्मन अपेक्षाकृत ऐसा कमज़ोर, ऐसा असंगठित और राजनीतिक रूप से ऐसा अनुभवहीन था जैसेकि रूसी पूँजीपति। रूसी पूँजीपति आर्थिक रूप से अब भी कमज़ोर थे और पूरी तरह सरकारी ठेकों पर निर्भर थे। उनमें राजनीतिक आत्मनिर्भरता और पहलकदमी इतनी न थी कि परिस्थिति से निकलने का रास्ता ढूँढ़ सकें। मसलन, बड़े पैमाने पर राजनीतिक गुटबन्दी और राजनीतिक दगाबाज़ी में उन्हें फ्रांसीसी पूँजीपतियों का-सा तजुर्बा न था, न अंग्रेज़ पूँजीपतियों की तरह, उन्होंने विशद रूप से सोचे हुए चतुर समझौते करने की शिक्षा पायी थी। हाल ही में, उन्होंने ज़ार से समझौता करने की कोशिश की थी। फरवरी क्रान्ति ने ज़ार का तख्ता उलट दिया था और सत्ता खुद पूँजीपतियों के हाथ में आ गयी थी लेकिन बुनियादी तौर से घृणित ज़ार की नीति पर ही चलने के सिवा उन्हें और कुछ न सूझ पड़ा। ज़ार की तरह, उन्होंने `विजय तक युद्ध करने´ का समर्थन किया, हालाँकि युद्ध चलाना देश की शक्ति से परे था और जनता तथा फौज दोनों युद्ध से बुरी तरह चूर हो चुके थे। ज़ार की तरह, कुल मिलाकर वे भी रियासती ज़मीन बनाये रखने के पक्ष में थे, हालाँकि ज़मीन की कमी और ज़मींदारों के जुवे के बोझ से किसान मर रहे थे। जहाँ तक उनकी मज़दूर नीति का सम्बन्ध था, वे मज़दूर वर्ग से नफरत करने में ज़ार के भी कान काट चुके थे। उन्होंने कारख़ानेदारों के जुवे को बनाये रखने और मज़बूत करने की ही कोशिश नहीं की, बल्कि उन्होंने बड़े पैमाने पर तालाबन्दी करके उसे असहनीय बना दिया।

कोई ताज्जुब नहीं कि जनता ने ज़ार की नीति और पूँजीपतियों की नीति में कोई बुनियादी भेद नहीं देखा, और जो घृणा उसके दिल में ज़ार के लिए थी वही पूँजीपतियों की अस्थायी सरकार के लिए हो गयी।

जब तक समाजवादी क्रान्तिकारी और मेंशेविक पार्टियों का थोड़ा बहुत असर जनता पर था, तब तक पूँजीपति उन्हें पर्दे की तरह इस्तेमाल कर सकते थे और अपनी सत्ता बनाये रख सकते थे। लेकिन, जब मेंशेविकों और समाजवादी क्रान्तिकारियों ने ज़ाहिर कर दिया कि वे साम्राज्यवादी पूँजीपतियों के दलाल हैं और इस तरह जनता में उन्होंने अपना असर खो दिया, तब पूँजीपतियों और उनकी अस्थायी सरकार का कोई मददगार न रहा।

(2) अक्टूबर क्रान्ति का नेतृत्व रूस के मज़दूर वर्ग जैसे क्रान्तिकारी वर्ग ने किया। यह ऐसा वर्ग था जो संघर्ष की आँच में तप चुका था, जो थोड़ी ही अवधि में दो क्रान्तियों से गुज़र चुका था और जो तीसरी क्रान्ति के शुरू होने से पहले शान्ति, ज़मीन, स्वाधीनता और समाजवाद के लिए संघर्ष में जनता का नायक माना जा चुका था। अगर क्रान्ति का नेता रूस के मज़दूर वर्ग जैसा न होता, ऐसा नेता जिसने जनता का विश्वास पा लिया था, तो मज़दूरों और किसानों की मैत्री न होती और इस तरह की मैत्री के बिना अक्टूबर क्रान्ति की विजय असम्भव होती।

(3) रूस के मज़दूर वर्ग को क्रान्ति में ग़रीब किसानों जैसा समर्थ साथी मिला, जो किसान जनता का भारी बहुसंख्यक भाग था। जहाँ तक आम मेहनतकश किसानों का सवाल था, क्रान्ति के आठ महीनों का तजुर्बा बेकार नहीं गया। इस तजुर्बे की तुलना `साधारण´ विकास के बीसियों सालों के तजुर्बे से निस्सन्देह की जा सकती है। इन दिनों, उन्हें मौका मिला कि वे अमल में रूस की तमाम पार्टियों को परख लें और अपनी दिलजमई कर लें कि न तो कान्स्टीट्यूशनल डेमोक्रेट और न समाजवादी क्रान्तिकारी या मेंशेविक ही ज़मींदारों से कोई गम्भीर झगड़ा मोल लेंगे, या किसानों के हित के लिए अपना बलिदान करेंगे, कि रूस में एक ही पार्टी है – बोल्शेविक पार्टी – जिसका ज़मींदारों से कोई सम्बन्ध नहीं है और जो उन्हें किसानों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए कुचलने को तैयार है। सर्वहारा और ग़रीब किसानों की मैत्री का यह दृढ़ आधार था। मज़दूर वर्ग और ग़रीब किसानों की इस मैत्री के कायम होने से, मध्यम किसानों की गति निश्चित हो गयी। ये मध्यम किसान बहुत दिन तक ढुलमुल रहे थे और अक्टूबर विद्रोह के शुरू होने से पहले ही पूरी तरह क्रान्ति की तरफ आये थे और उन्होंने ग़रीब किसानों से नाता जोड़ा था।

कहना न होगा कि इस मैत्री के बिना अक्टूबर क्रान्ति विजयी न होती।

(4) मज़दूर वर्ग का नेतृत्व राजनीतिक संघर्षों में तपी और परखी हुई बोल्शेविक पार्टी जैसी पार्टी ने किया था। बोल्शेविक पार्टी इतनी साहसी पार्टी थी कि निर्णायक हमले में जनता का नेतृत्व कर सके। वह इतनी सावधान पार्टी थी कि मंज़िल की तरफ जाने के रास्ते में ढँकी-मुँदी खाई-खन्दकों से बचकर निकल सके। ऐसी ही पार्टी विभिन्न क्रान्तिकारी आन्दोलनों को चतुराई से एक ही सामान्य क्रान्तिकारी धारा में मिला सकती थी। शान्ति के लिए आम जनवादी आन्दोलन, जातीय स्वाधीनता और जातीय समानता के लिए पीड़ित जातियों का आन्दोलन और पूँजीपतियों का तख्ता उलटने के लिए और सर्वहारा अधिनायकत्व कायम करने के लिए सर्वहारा वर्ग का समाजवादी आन्दोलन – इन सबको ऐसी ही पार्टी एक सामान्य क्रान्तिकारी धारा में मिला सकती थी।

इसमें सन्देह नहीं कि इन विभिन्न क्रान्तिकारी धाराओं के एक ही सामान्य शक्तिशाली क्रान्तिकारी धारा में मिलने ने रूस में पूँजीवाद की तकदीर का फैसला कर दिया।

(5) अक्टूबर क्रान्ति ऐसे समय आरम्भ हुई जबकि साम्राज्यवादी युद्ध अभी ज़ोरों पर था, जबकि प्रमुख पूँजीवादी राज्य दो विरोधी खेमों में बँटे हुए थे और जब परस्पर युद्ध में फँसे रहने और एक-दूसरे की जड़ें काटने में लगे रहने से, वे `रूसी मामलों´ में सफलता से दख़ल न दे सकते थे और सक्रिय रूप से अक्टूबर क्रान्ति का विरोध न कर सकते थे। निस्सन्देह, अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति की जीत में इस बात से बहुत मदद मिली।

(`बिगुल´, फरवरी 1998 और मार्च-अप्रैल ´98 में धारावाहिक प्रकाशित)

बुझी नहीं है अक्टूबर क्रांति की मशाल – पीडीऍफ़

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