भोजन की खोज द्वारा दूसरी प्रकृति का निर्माण

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पिछली बार हमने मानव की जैविक जरूरतों जैसे भोजन, आराम करना आदि के बारे में चर्चा की थी. अब हम इनपर एक-एक करके विस्तार से चर्चा करेंगे. सबसे पहले भोजन की खोज द्वारा दूसरी प्रकृति के निर्माण की चर्चा. कई धार्मिक लोग कहते हैं कि जिसे चोंच मिली है उसे चुगा भी मिलेगा, परमात्मा पत्थरों में भी कीडों को देता है, उबलते पानी में भी जीव मिलेगा. जबकि सभ्यता और सस्कृति का इतिहास इससे उल्ट खून-पसीने से लबरेज है. हमारे बड़े-बूढेरे कंदमूल इकठ्ठा करते थे और शिकार किया करते थे. हाथ में लाठियाँ लिए वे वनों, मैदानों, तपते रेगिस्तानों में घूमते रहते थे. उन्हें खाए जा सकने वाले फलों, सब्जियों और कन्दमूलों की हजारों किस्मों के गुण और लक्षणों का पता था. अब हम उनके नाम और पहचान से अनभिज्ञ हैं. शिकारी अपने शिकार की आदतों के जानकर थे.

२० सदी के एक प्रसिद्द नरविज्ञानी लुई स्विकी अफ्रीकनों की परंपरागत शिकार विधियों का निरक्षण करते हुए इस नतीजे पर पहुंची कि खरगोश को पकड़ना कोई मुश्किल कार्य नहीं है. हमारे यहाँ भी अगर हम खरगोश पकड़ने वालों से बात करें तो  हमें पता चल जाता है कि दिन के समय खरगोश जिस रास्ते से होकर गुजरता है, उसी रास्ते से ही वापस आता है. ख़रगोश और अन्य जंगली जानवरों को जिन्दा रहने के लिए भोजन बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है. उन्हें अपनी उर्जा को बचाकर रखना होता है. निश्चित मार्गो पर चलकर ही वे ऐसा कर सकते हैं. शिकारियों को बस उनके रास्ते में बैठना या जाल अथवा शिकंजा लगाना होता है. लुई स्विकी लिखती हैं कि खरगोश शिकारी को देखते ही दौड़ना शुरू कर देता है. खरगोश की यह खासियत है कि मुड़ते समय वह अपने कानों को पीछे पीठ के साथ सटा लेता है. शिकारी समझ जाते हैं कि यह अब बाएं या दायें मुडेगा. मान लीजिये शिकारी दायीं और भाग रहा है और उसका अनुमान सही रहता है तो शिकार सीधा उसकी झोली में आ गिरेगा. अगर वह बायीं और भी मुडेगा तो वह पास की किसी झाडी में छुपेगा. खरगोश यह जानता है कि उसकी चमडी का रंग उसे छुपाने में मदद करेगा. लेकिन मानव की आँखे तो सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज को देखने के योग्य है. मानव बेशक तेज नहीं दौड़ सकता लेकिन बुद्धिमान होने के कारण उसे जानवरों की आदतों के बारे में पता है. मनुष्य के शरीर का गठन इस प्रकार का है कि शिकार के दौरान वह बाखूबी अपने ज्ञान का उपयोग कर सकता है.

शिकार के समय प्राचीन मानव ही नहीं बल्कि आज के मनुष्य भी बड़ी सहनशीलता का सबूत देते हैं. जैसे पानी में कांटा डालकर लम्बे समय तक मछली के फंसने का इंतजार करना. इसी प्रकार शिकार करते समय वे अपने कुत्तों के पीछे मीलों दूर तक निकल जाते हैं. मैक्सिको के तारामोरा इंडियन हिरणों का तब तक पीछा करते हैं जबतक वे थककर निढाल नहीं हो जाते. वे दो-दो, तीन-तीन दिनतक जानवरों का पीछा करते रहते हैं. रास्ते के हर छोटे टुकड़े पर हिरण मानव को आसानी से पीछे छोड़ देता है. पर मानव उसके पैरों के चिह्नों की खोज जारी रखता है. खोज बताती है कि यह मानव नहीं बल्कि हिरण ही होता है जो मानव से पहले थकता है. अगर शिकारी पशुओं के रास्ते जानता है या उसे विश्वास है कि पशु अपने प्राणों की रक्षा करते हुए वक्र रेखा में दौड़ता जायेगा तो शिकारी अपनी उर्जा और ताकत बचाते हुए सीधा उसके पास , अनुमानित स्थान पर पहुँच जाता है.

शिकारी और कंदमूल के संग्रहकर्त्ता उद्यमी और जिज्ञासू लोग थे. पशु-पक्षी और वनस्पतियों के बारे, अपने चौगिरदे और संसारव्यापी  घटनाओं के बारे, हर नई जानकारी उनके ज्ञान और अनुभव को बढाती रही. इस काल के दौरान मानव प्रकृति से उसकी देन लेता रहा और साथ-साथ प्रकृति की नई-नई देनों को लेने की तरकीब सीखता गया. शिकारी और संग्रहकर्त्ता उन हालातों में जीने के अनुकूल सिद्ध हुए. वे पृथ्वी के बड़े भूभाग पर बस गए. ऐसा उस समय से बहुत पहले हुआ जब उनके पूर्वजों ने धरती में पहले बीजों की बुआई की और अपने मित्र और सेवकों की खोज की. पर्वतों के उस पार क्या है? अनजान झील,  बड़ी नदी के उस पार क्या है?  ये सदैव उनकी जिज्ञासा का केंद्र रही हैं. प्राचीन काल से रहस्य मानव को भयभीत ही नहीं करता रहा बल्कि आकर्षित भी करता रहा है. और मानव की ज्ञान की प्यास आज भी शांत नहीं हुई है.

अज्ञात और अनजान खतरों से टक्कर लेने वाले लोग हर युग में पैदा हुए हैं. परंतु इन मतवाले लोगों की खोजों को बढाचढा कर नहीं देखना चाहिए. लोगों को नगरों, पर्वतों, सागरों नदियों से पार लेजाने वाली शक्ति यात्रा का चाव नहीं बल्कि उनकी मजबूरी, उनकी जरूरत थी. यूरोप के निवासी बर्फ नदियों के दक्षिणी किनारे पर रहने वाले पशुओं का शिकार करने के लिए वैसे-वैसे ही पीछे चलते रहे जैसे-जैसे नदिया पीछे उत्तर की ओर खिसकती गयी और जानवर पीछे हटते गए. वे अब उन वनों में नहीं रह सकते थे जहाँ पशु-पक्षियों की संख्या कम हो गयी थी. उदाहरण के लिए सूखे के कारण शिकार की संख्या में कमी हो गयी. अपने इलाके में आहार की पूर्ति कम हो गयी. लोगों का एक दल अलग होकर अपने लिए एक नया आवास ढूँढने के लिए निकल पड़ा. या ऐसा हुआ कि बस्ती में कहीं ओर से कुछ नए लोग आ गए. उन्हें भूख ने अपने इलाके से खदेड़ दिया था. उन्होंने यहाँ इस नए इलाके को अपने लिए ठीक समझा. उनकी संख्या और ताकत यहाँ के मूल निवासियों से अधिक थी. इस स्थिति में  मूल निवासियों के लिए मारे जाने या उस इलाके को  छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं था.

अमेरिकन इतिहासकार बी. हार्पर ने ऑचएलैउत और मैक्सिकन और उत्तरी ध्रुव पर रहने वाले एक्सिमों लोगों की जीवन पद्धति का तुलनात्मक अध्ययन किया है. तुले सभ्यता के एक्सिमों लोगों ने चार सौ वर्षों के दौरान अलास्का से ग्रीनलैंड तक पांच हजार किलोमीटर की दूरी तय की. प्रति वर्ष साढे बारह किलोमीटर. इसके विपरीत द्वीपों पर बसने वाले लोगों की प्रवास की गति कम थी. इस अंतर के पीछे क्या कारण है? एलैउत  लोग उपजाऊ भूमिपर बसे हुए होने के कारण लम्बे समय तक उसी स्थान पर बसे रहते थे जबकि उस स्थान पर जहाँ ज्यादा भ्रमण प्रकट होता है उस बारे में बी. हार्पर लिखते हैं कि यह निरक्षण नई बस्तियों के बसाए जाने से भी संबंधित हो सकता है. अमेरिकी इंडियनों के बूढेरों ने महाद्वीपों पर भू-स्थल के रास्ते प्रवेश किया. यह एक जीव-जंतु रहित मरूस्थलीय इलाका था. वे इसे जल्दी से जल्दी पार कर देना चाहते थे जबकि इसके विपरीत एलैउत लोगों को रास्ते में समृद्ध समुद्रीय परिवेश मिला. इससे नई दुनिया की ओर प्रस्थान करने की उनकी रफ्तार में कमी आई.

कभी तेज तो कभी धीमे, कभी पैदल तो कभी तैरकर या नावों की मदद से, अपने सफ़र को जारी रखते हुए, मनुष्य दक्षिणी ध्रुव के अलावा संसार के हर भू.भाग पर पहुँच गया. आदिम युग के कंदमूल इकठ्ठा करने वाले और शिकारी लोगों को कई बार लंबे समय तक भूखा रहना पड़ता था. धीरे-धीरे अपने अनुभव के द्वारा मानव ने सीखा कि जो कुछ भी सामने आता है, उसे खाना ठीक नहीं है. बल्कि कुछ विशेष पक्षियों और मछलियों का शिकार ही ठीक है. आज से कई दस हजार वर्षों पहले एशिया और यूरोप के मैदान और कटेशिया और उत्तरी अफ्रीका के निवासियों की उदर-पूर्ति शिकार द्वारा ही होती थी. क्रीमिया के पत्थर युग से पूर्व की अनेक हड्डियों के नमूने प्राप्त हुए हैं. इनकी गिनती से पता चला कि ६८.५ प्रतिशत हड्डियाँ जंगली गधों, घोडों और जैबरे आदि की थीं. सौंची नगर के नज़दीक हुई खुदाई और खोज से पता चलता है कि कई दस हजार वर्षों पूर्व जहाँ बसने वाले लोग विशेषतय बैल का मांस खाते थे जबकि मध्य एशिया के लोगों का  प्रमुख आहार भैंसे का मांस था.

एक लाख वर्ष पूर्व विशेषीकरण और  हथियारों के विकास ने लोगों की शिकार करने की दक्षता के लिए बेहतर उपाय निकालने में मदद की. शिकार करने के कुछ दुखदायी नतीजे भी निकले. प्राचीन गुफाओं के अध्ययन से पता चलता है कि वहां पर रहने वाले जीवों की कई प्रजातियाँ बिलकुल विलुप्त हो गयी क्योंकि अपने पेट की आग भूझाने के लिए मानव इन्हें पूरी तरह से चट कर गए. पुरातत्त्वविदों के अनुसार ५० व्यक्तियों के एक समूह को ६०० ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति के हिसाब से एक वर्ष के लिए ११ टन मांस की जरूरत पड़ती थी. मैन्मथन के शिकार के साथ १०० वर्गकिलोमीटर के क्षेत्र में लगभग डेढ टन मांस ही मिलता था. इसका अर्थ यह हुआ कि बच्चो समेत एक ५० व्यक्तियों के समूह को सात-आठ सौ वर्ग किलोमीटर तक के शेत्र में शिकार करना पड़ता था. इस उदाहरण से स्पष्ट है कि साढे पांच हजार वर्गकिलोमीटर के विशाल भू-भाग पर केवल तीस-पैंतीस हजार लोग ही गुजर-बसर कर सकते थे.

प्रकृति और जीवन प्रशिक्षण का इतिहास –

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