लक्ष्मी-पूजन करें लेकिन

Posted on Updated on

जब भी हम बाजार से कोई वस्तु खरीदते हैं तो हम उसके भौतिक गुणों की ओर ही देखते हैं. हो सकता है हम उसके गुणों, सुन्दरता आदि की तारीफ भी करें. लेकिन इन वस्तुओं को राजनीतिक अर्थशास्त्र में पण्य या जिंस कहा जाता है. अगर आप भी इनकी पूजा करने की योजना बना रहे हैं तो यह सब करने से पहले अपनी आँखों से उस परदे को हटाने की कोशिश कीजियेगा जिसे “पण्यों की जड़ पूजा’ कहा जाता है.

जिंस रूप का रहस्यमई रूप इस तथ्य के कारण है कि जिंस, जोकि श्रम का उत्पाद होती है अपने उत्पादन की क्रिया में निहित मनुष्य के सामाजिक संबंधों का प्रतिबिम्बन करती है.

उदाहरण के लिए, जिंस के मूल्य का परिमाण मनुष्य के जिस्म की श्रम-शक्ति के खर्च का मापन है. इसके अलावा विभिन्न उत्पादकों के बीच के सामाजिक संबंध उन द्वारा उत्पादित की गयी जिंसों के संबंधों को भी प्रकट करते हैं.

इस प्रकार, जिंस रूप और जिंसों के बीच मूल्य-संबंधों का इस बात से कोई लेनादेना नहीं होता कि उनके भौतिक गुण क्या हैं और वे किन पदार्थों से निर्मित हुए हैं. इसके विपरीत अहमियत इस बात की है कि उनके उत्पादन और विनिमय में सामाजिक संबंधों का रूप कैसा है.

‘पण्यों की जड़ पूजा’ पण्यों को उत्पादित करने वाली श्रम के सामाजिक चरित्र से पैदा होती है. भौतिक वस्तुएं केवल इसलिए पण्य या जिंस बन जाती हैं क्योंकि श्रम उन्हें अलग-अलग स्थान पर और व्यक्तिगत तौर पर उत्पादित करती है. यह विनिमय होने से ही संभव होता है कि श्रम के उत्पाद मूल्यों की एकरूपता या समरूपता प्राप्त करते हैं जो उनके  उपयोगी गुण और भौतिक गुणों से भिन्न होता है. इस प्रकार, मानव द्वारा निर्मित भौतिक वस्तुओं को कृत्रिम रूप से उनका स्वयं का ‘जीवन’  दे दिया जाता है अर्थात ऐसा लगता है कि मूल्य तो वस्तु के भौतिक गुणों में ही छुपा हुआ है न कि उस श्रम शक्ति की इकाईयों में जो इनके उत्पादन के समय खर्च हुई थीं.

पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूर अपनी मजदूरी के अलावा जो अतिरिक्त मूल्य पैदा करता है उसे अधिशेष मूल्य भी कहते हैं. इसी अतिरिक्त मूल्य से पूंजीपति का मुनाफा और अन्य वर्गों की आमदनी आती है. मजदूर को उतनी ही मजदूरी मिलती है जितनी उसके जिन्दा रहने और अपनी नसल के पुनरुत्थान के लिए आवश्यक हो. न कम न ज्यादा. अगर कम मिलेगी तो मजदूर का जीवन और पुनरुत्थान नहीं हो पायेगा. ज्यादा होने पर मजदूर मजदूरी नहीं करेगा. इसी तर्क पर पूंजीवाद कार्यशील होता है. लेकिन मजदूर द्वारा पैदा की गयी अतिरिक्त कीमत की बंदरबांट के लिए परजीवी वर्गों में जो कुत्ता घसीटी होती है, उसकी कामना करना ही लक्ष्मी-पूजन है.

अगर अब भी आप ‘लक्ष्मी पूजन’ या ‘पण्यों की जड़ पूजा’ करेंगे तो हमें आपसे कुछ नहीं कहना है !

सन्दर्भ साभार :   THE FETISHISM OF COMMODITIES AND THE SECRET THEREOF

Advertisements

One thought on “लक्ष्मी-पूजन करें लेकिन

    सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
    दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
    खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
    दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

    सादर

    -समीर लाल ‘समीर’

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s