संस्कृति की विभिन्नता और मानव का विकास – अंतिम किश्त

Posted on Updated on

इससे पहले :

प्रत्येक व्यक्ति अपने जनगण के प्रतिनिधि के तौर पर उस जनगण की  लाक्षणिक सांस्कृतिक विशेषताओं का वाहक होता है. जैसे एक व्यक्ति जब किसी अन्य स्थान पर जाता है तो उसने अगर पगडी बांधी हुई है तो वह अपने जनगण का प्रतिनिधित्व ही कर रहा होता है. इस प्रकार की विशेषताएँ जैव या आनुवंशिक या शारीरिक रूप से प्राप्त नहीं होती बल्कि  इन्हे हम अपने माता-पिता या बड़े-बुढेरों से ग्रहण करते हैं. कोई व्यक्ति किस जाति का है यह बात उसके जन या वंश द्वारा और इससे भी बढ़कर उसके पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा द्वारा निर्धारित होती है जिसके दौरान वह व्यक्ति उस नवजाति  जिसमें वह पैदा हुआ है, उस नवजाति के लक्षण जड़ीभूत करता है. अलग-अलग  देशों में लोगों के रीति-रिवाजों , आदतों और आचार-विहार की विलक्षणता असीम प्रतीत होती है और मानव संस्कृति की  भिन्नता की वह अभिव्यक्ति है जो पहली नज़र में ही स्पष्ट नज़र आती है. समस्त विश्व के लिए ऐतिहासिक विकास की एकसमान नियमों की सीमाओं के अन्दर लोगों ने जीवन-पद्धति के सैंकडों-हजारों रूपान्तरों का निर्माण किया है. संसार को प्रवर्तित करते हुए लोग स्वयं खुद को इस संसार के और इन परिवर्तनों को भी अनुकूल ढालते हैं. वे भविष्य की अपनी-अपनी राह तलाशते हैं और राह का निर्माण भी करते हैं. संसार की प्रत्येक जाति, प्रत्येक राष्ट्र एक विशेष जीवन-पद्धति का सुन्दर प्रयोग है, उस जीवन-पद्धति का जो आदतों और प्रथाओं से, नियमों और नैतिकता से, कला और उस सबसे जिसे संस्कृति कहते हैं, से निर्मित होती है. जीवन-पद्धति की नवजाति विशेषता हर जाति के ठोस, ऐतिहासिक व्योरों का प्रमाण है.प्रत्येक जाति की विलक्षणता अपने भूगोलिक प्रवेश और दूसरे जनगण के साथ उत्पादन के माध्यमों के द्वारा अनन्त क्रिया की विशेषता की प्रतिछाया है. उदाहरण के लिए हमारे पहरावे में बाहर से आनेवाले शासक वर्गों का असर रहा है और अब पश्चिम के परिधानों का असर पड़ रहा है. इस प्रभाव के आदान-प्रदान के दौरान इसमें सामंजस्य ही नहीं होता है बल्कि इसमें टकराव भी होता है.

दिक और काल में, पांचों महाद्वीपों में, अनेक शताब्दियों के दौरान मानव जाति का सांस्कृतिक विकास होता आया है. आओ हम अब बारीकी से परखे कि संस्कृति किन-किन कार्यभारों को निभाती आई है. अपनी सारी विविधता के साथ संस्कृति को उन सभी सफल और असफल उत्तरों का कुलयोग माना जा सकता है जो लोगों के सामाजिक अस्तित्व के क्षेत्र में, और अस्तित्व द्वारा पैदा हुई उनकी सामाजिक चेतना के क्षेत्र में, मानव और मानव दलों की जरूरतों के लिए निर्मित होते हैं. संस्कृति के भिन्न-भिन्न प्रकार इन जरूरतों की पूर्ति करते हैं. हमारी वे कौन-कौन सी जरूरते हैं जिनकी पूर्ति संस्कृति द्वारा होती है? सबसे पहली जरूरत है उदर-पूर्ति, पेट भरना, सोना, तंदरूस्त रहना अपने वंश को जारी रखना. ये सभी जरूरतें तो पशुओं की भी हैं परंतु जीवन के लिए जरूरी इन जरूरतों की मानव जब पूर्ति करता है तो उसमें कई विशेषताएं शामिल होती हैं. ये जरूरतें दूसरी प्रकृति अर्थात संस्कृति के द्वारा पूर्ण होती हैं. जैव-जरूरतों की पूर्ति के उपायों में मनुष्य ने गहरे परिवर्तन किये हैं. इनके सिलसलों में कार्ल मार्क्स की एक टिपण्णी बड़ी ध्यान आकर्षित करने योग्य है. वे कहते हैं कि भूख तो भूख है बेशक वह  मांस को पकाकर छूरी-काँटों की मदद से खाकर मिटाई जाती है – यह भूख उस भूख से बिलकुल भिन्न है जिसके लगने पर हाथों, नाखूनों और दांतों द्वारा कच्ची बोटियों को निगला जाता है. दूसरी प्रकृति द्वारा रक्षात्मक कामों की पूर्ति के लिए जीवन-जरूरतों की तुष्टि में ऐसा रुपान्तरण स्पष्ट रूप में प्रकट होता है. यह दूसरी प्रकृति मनुष्य की वर्षा से रक्षा छत द्वारा करती है, उसके शरीर पर चोगा-कुरता आदि पहनाती है और सिर पर पगडी या टोपी. इस सबको आधारभूत जीवन-निर्वाह की संस्कृति कहा जाता है.

संस्कृति का कहीं अधिक महत्वपूर्ण काम कुछ और भी है, वह है इस संसार का कायाकल्प जो मानव की उन जरूरतों का उत्तर प्रस्तुत करता है जो किसी अन्य जीव की नहीं हैं. यह उत्तर सबसे पहले भौतिक संपत्ति और उत्पादन साधनों और औजारों के उत्पादन में प्रकट होते हैं. लोगों का परस्पर मेलजोल जरूरी होता है. इसके अनुरूप ही संस्कृति उनको मेलजोल के ऐसे साधन प्रदान करती है जो केवल मनुष्य को ही प्राप्त हैं. किसी भी समाज का अस्तित्व केवल तभी बना रह सकता है जब उसके सदस्य आचार-विहार और रहन-सहन के निश्चित नियमों का पालन करें. कोई ऐसा समुदाय नहीं है जिसमे उसके जीवन को नियमित करने के मानक न हों. कोई भी ऐसा विकसित समाज नहीं है जिसके पास उसके समाज और उसके आर्थिक आधार और उत्पादन के संचालन की प्रणाली न हो. लोगों के परस्पर संबंधों का नियमन भी संस्कृति करती है. मानव वंश जारी है. मानव जाति के लंबे इतिहास में प्रेम का जो रुपान्तरण हुआ है, यह शायद संस्कृति के विकास की सबसे अधिक ज्वलंत अभिव्यक्ति है. वंश जारी रखने की सहज वृति तो सभी जीवों में है लेकिन मनुष्य में यह एक उदात भावना बन गयी है जिसने आत्मिक भावना से भरपूर मनुष्य में श्रेष्ट, सच्चे मानवी गुणों को उभारा है. मानव वंश का पुनरुत्पादन लोगों की नई पीढियों को शिक्षित करने की जरूरत के साथ गहरे रूप से जुडा हुआ है. यह शिक्षा-दीक्षा और चरित्र-निर्माण किसी भी समाज का सबसे महत्वपूर्ण कार्यभार होता है क्योंकि इसकी बदौलत ही समाज संस्कृति के लगातार विकास के कार्य को जारी रख सकता है. आराम भी मनुष्य की एक बड़ी जरूरत है. अपने मूल में यह जैव जरूरत है लेकिन काफी हद तक इसकी पूर्ति संस्कृति के साधनों से ही होती है. एक और शुद्ध मानवी जरूरत है, जिसे मानव ने लाखों वर्ष पूर्व ग्रहण किया है, वह है संसार का ज्ञान प्राप्त करने और उसकी व्याख्या करने की मनुष्य की भूख. यह कहा जा सकता है कि ज्ञान और विज्ञान और कला की उत्पति का सेहरा इस बात को है कि मानव ने मानव जाति की खोज की, मानवता को जाना, इतिहास में अपने स्थान को समझा. संस्कृति की घटनाये बहुआयामी हैं, मनुष्य के सामने अपने अलग-अलग पहलू उभार सकती है. होमर की प्रस्तुतियां कभी नृत्य की धार्मिक रचनाएँ थीं लेकिन प्राचीन साहित्य का रस लेते हुए हम इसके बारे में नहीं सोचते. विज्ञान आज एक विराट शक्ति है लेकिन किसी ज़माने में यह मनुष्य की व्यवहारिक समस्या को हल नहीं करता था बल्कि यह केवल जादू द्वारा उनका मनोरंजन मात्र करता था.

आनेवाले आलेखों में हम देखेंगे  कि किस प्रकार मानव ने इस संसार को अपने रहने लायक बनाया और संस्कृति के आर्थिक पहलू का विकास किया और किस प्रकार इसने  सबसे पहले जीव की नर्सैगिक जरूरत – उदर पूर्ति की संस्कृति को विकसित किया.

Advertisements

3 thoughts on “संस्कृति की विभिन्नता और मानव का विकास – अंतिम किश्त

    रवि कुमार, रावतभाटा said:
    October 16, 2009 at 11:19 PM

    धन्यवाद…
    एक बढ़िया आलेख श्रृंखला….

    poojithsai said:
    July 6, 2010 at 8:40 PM

    thank you for giving this information

    prahla rai vyas said:
    May 11, 2012 at 7:39 PM

    utpadan ki shaktiya tai karti hai.utpadan ke sadhao pe kabza ki varg koga.sampda ka labh ki vag to mile ye samajik dvand

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s