संस्कृति की विभिन्नता और मानव का विकास – दूसरी किश्त

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भोजन पकाने की विधियों में भी नवजाति संस्कृति की विशेषता प्रकट होती है. पहले पंजाब में तंदूर की रोटी ही प्रधान रही है .कई इलाकों में इसे हाथों द्वारा थपथपाकर फैलाया जाता था तो कई इसे किसी और तरह से बनाते थे. लेकिन अब रोटी के बनाने में एक ही तरह का तरीका प्रधान होता जा रहा है. रोटी किस अनाज की बनाई जानी है, इसमें भी विभिन्नता थी. पंजाब में और अमेरिका और लैटिन अमेरिका के देशों में मक्के की रोटी रही है, कई जगह चने की तो कहीं बाजरे की. गेहूं की रोटी तो बस कल ही की घटना है. पहले तो गेहूं की रोटी को पकाया जाता था और सब्जी बनायीं जाती थी लेकिन सिर्फ घर में आये मेहमान के लिए.

यूरोपियन लोग एक-दूसरे से मिलते समय हाथ मिलाते हैं पर जापानी और चीनी और बहुत सारे भारतीय लोग हाथ मिलाना पसंद नहीं करते. हमारे यहाँ आमतौर पर बड़ों के पैर-छूहने की परम्परा रही है. बहुतेरे जापानी और यूरोपियन लोग इस तरह से सोचते थे कि अंजान लोगों से किस प्रकार हाथ मिलाया जा सकता है. पंजाबी औरतें आपस में गले मिलती हैं लेकिन अब यह कम होता जा रहा है. वियनावासी कहता है कि मैं हाथ का चुम्बन लेता हूँ लेकिन हाथ चूमता नहीं जबकि वारसावासी किसी औरत से मिलते समय सचमुच हाथ का चुम्बन लेते हैं. अंग्रेज अपना पत्र ‘डियर’ से शुरू करता है बेशक वह इसे क्रोध में आकर ही लिखे, बेशक उसने पत्र के प्राप्तकर्त्ता पर कोई अभियोग ही लगाना हो ! इसाई गिरजे में प्रवेश करते समय अपना सिर नंगा कर लेते हैं जबकि यहूदी, मुस्लमान और सिक्ख इसे ढक लेते हैं. यूरोपियन लोगों का शोक का रंग काला हैं जबकि चीन और भारत का सफ़ेद. जब चीनी लोग पहलीबार किसी यूरोपवासी या अमेरिकन व्यक्ति को किसी औरत की बाँहों में बाहें डालकर या चूमते हुए देखते हैं तो उन्हें बहुत शर्म महसूस होती है. यूरोप के लोग बच्चों को समझाते हैं कि अगर किसी के घर जाएँ तो जूठन नहीं छोड़नी है लेकिन चीनी अंत में परोसी गयी चीज को छोड़ देते हैं. अगर ऐसा नहीं होता है तो मेजवान उसे भूखा समझेगा.

प्रत्येक राष्ट्र को अपनी संस्कृति साधारण, सहज और एक उसी की ही सही लगती है. लेकिन दूसरे जनगण का व्यवहार अटपटा और चकित करने वाला लगता है. भारतीय हैरान होते हैं कि यूरोपियन औरतें अपने पति को नाम लेकर बुलाती हैं. बुल्गारिया के लोग ‘हाँ’ कहने के लिए अपने सिर को दायें-बाएं घुमाते हैं और ‘नहीं’ के लिए आगे-पीछे. घाना की संपती जाति में दामाद अपनी सास से बात नहीं कर सकता. हमारे यहाँ राजस्थान में भी ऐसा है और सास अपने दामाद से भी पर्दा करती है. एक बार एक स्विस यात्री न्यू चिली में शिकार के बाद पपुया कबीले के मुखिए के साथ भोजन कर रहा था. वह हड्डी पर बचे हुए थोड़े से मांस को मुखिया के लिए छोड़ देता था. इस बचे हुए गोश्त को पूरा खाने के बाद ही वह मुखिया हड्डी फेंकता था. उसके दोस्त ने पूछा कि इसका मतलब क्या है? तो उसने बताया कि अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो मुखिया नाराज होगा. यहीं मित्रता की निशानी है. हमारे लिए यह ऐसा होगा जैसे किसी कुत्ते के साथ व्यवहार किया गया हो.पंजाब में भी मित्रता के लिए एक ऐसा ही मुहावरा है कि उन दोनों की रोटी दांतों तले पिसती है, दोनों की एक ही बुरकी है.

बातचीत करते समय बीच की दूरी कितनी हो, इसपर भी  अलग-अलग राष्ट्रों में अलग-अलग धारणाएं हैं हैं. उत्तरी अमेरिकावासी को यह पसंद नहीं है कि कोई उसके बिलकुल साथ सटकर बातचीत करे. उसके लिए बीच की दूरी कम से कम ७५ सेंटीमीटर होना आवश्यक है जबकि लेटिन अमेरिकावासी के लिए यह दूरी बहुत ज्यादा है.

सुन्दरता की अवधारणायें भी भिन्न-भिन्न हैं. कौन सुन्दर है, कौनसा रंग सुन्दर है, लम्बा होना सुन्दर है या फिर ठिगना, इस बारे में भी जनगणों में बहुत अधिक विभिन्नता पाई जाती है. उदाहरण के लिए प्राचीन समरात लोगों को  सिर का प्राकृतिक रूप पसंद नहीं था. वे इसे सुन्दरता के लिहाज से अपनी कल्पना के अनुसार बदलते थे. इनके रहने के स्थानों की खुदाई के दौरान पुरातत्त्वविदों को बड़े हैरान करने वाले खोपड़ियों के आकार बरामद हुए हैं. अपने सिर के आकार में तबदीली करने वाले केवल समरात लोग ही नहीं थे बल्कि पेरू के इंक लोग जिनकी सभ्यता स्पेनियों ने नष्ट कर दी, भी ऐसा करते रहे हैं. वे सिर को दो हिस्सों में बाँट लेते थे. बच्चों के सिर की हड्डियाँ नर्म होती हैं. वे इस पर एक पट्टी बाँध लेते थे. इससे बीच में एक दरार पड़ जाती थी. सुन्दरता की धारणाएं कुछ सामाजिक कारकों से भी जुडी होती हैं. जैसे कि बहुत से जनगणों में लम्बे नाखून इस बात का प्रतीक हैं कि उन्हें धारण करनेवाला व्यक्ति बहुत बड़ा है और वह शारीरिक श्रम से मुक्त है.  पूर्व के कुछ देशों में नाखूनों को खतरनाक आकार तक बढ़ने दिया जाता है और इसे कुलीन वंश के होने का चिह्न समझा जाता है. कभी-कभी लोग नाखूनों पर चाँदी के खोल चढा लेते हैं. कहीं-कहीं लम्बे नाखूनों का मतलब धार्मिक व्यक्ति होने से भी है.

कुछ लोग नत्थ पहनते हैं तो कुछ लोग इसपर बड़े हैरान होते हैं जबकि उनकी स्वयं की औरतें कानों में गहने पहनती हैं. मलाया और मौरी कबीले के लोग अपने बच्चों की नाक को चपटा रखना पसंद करते थे जबकि इसके एकदम विपरीत १६वीं शताब्दी के फ्रांस में बाज जैसी नाक का होना बहुत सुन्दर माना जाता था और वहां की औरतें अपने बच्चों की नाक को खींचती रहती थीं ताकि वह पतली और लंबी हो जाये. कहीं-कहीं लम्बी गर्दन होना सुन्दरता की निशानी माना जाता है. जार्जिया के लोग बच्चों को इस प्रकार सुलाते थे कि उसका सिर पीछे की ओर लटक जाये. इस तरह से वे उसकी गर्दन को लम्बा करते थे. पूर्वी अफ्रीका के लोग औरतों की गर्दनों को लंबा करने के लिए छल्ले डालते जाते हैं. इस प्रकार मानव शरीर को बनावटी आकार देने की बहुत सारी विधियां रही हैं. इसी प्रकार मानव अंगों पर गोदने का रिवाज भी रहा है. कई इलाकों में सीधे आकार की टांगे सुन्दर मानी जाती हैं. घूमंतरू और पशुपालक कबीले के लोगों में वक्राकार टांगे अच्छी और सुन्दर मानी जाती है. इससे चलना और दौड़ना आसान होता है. मरू-भूमि के लोगों की टाँगे सीधी होती हैं जबकि जहाँ बैलों से हल चलाया जाता है, वहां लोगों की टांगे खम्म धारण कर लेती हैं. इसलिए काल्मिक लोग बच्चों के पालने में एक कूपी रख देते थे ताकि टाँगें थोडी सी टेढी हो जाएँ.  प्राचीन युनानवासी सीधी टांगों को ही सुन्दर मानते थे. न्यूजीलैंड के मौरी कबीले के आदिवासी बच्चे के घुटने पर थोड़े-थोड़े समय के बाद चोट मारते रहते थे ताकि उसकी टांगे सीधी रहें. ओशियाना के कुछ कबीलों में दांत तोड़ देने का रिवाज रहा है. वहां टूटे हुए दंत का मुंह सुन्दर माना जाता रहा है. प्राचीन मैक्सिको की माया सभ्यता के लोगों के बारे में एक रुसी लेखक लिखते हैं कि माता अपनी बच्ची को सुन्दर बनाने के लिए माथे और सिर के पीछे एक-एक फटी बांध देती थी ताकि उसका माथा सीधा, चौडा और सपाट हो जाये. इसी प्रकार उसके सामने के बालों की लटों से एक गोली बांध दी जाती थी. इसे लगातार देखने पर उस लड़की की नज़र तिरछी हो जाती थी. इसे सुन्दर समझा जाता था जबकि हमारे यहाँ इसे सुन्दर नहीं नुक्स समझा जाता है. पश्चिमी और दक्षिण एशिया के लोग बड़ी आँखों को सुन्दर मानते हैं.

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