चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – क्या करें

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चुनाव या अन्य इंकलाबी विकल्प – अंतिम किश्त

इस ऑडियो द्वारा शहीद भगत सिंह विचार मंच ने भारत में होने वाले निरर्थक संसदीय ओर अन्य चुनावों के बारे में अपना नजरिया स्पष्ट करने की कोशिश की है. इस ऑडियो का हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है. ऑडियो की हूबहू नक़ल नहीं की गयी है लेकिन उसके मूल तत्त्व को सुरक्षित रखने की कोशिश की गयी है.

कश्मीर

पहली बार क्या हुआ ? हुआ यह कि जब तेलंगाना का हथियारबंद संघर्ष हुआ तो, जब तक लडाई वहीँ तेलगाना तक सीमित थी तो ये काफी अच्छी तरह से संघर्ष को संचालित कर रहे थे लेकिन जैसे ही भारत की फौज ने इन पर चढाई की तो इन्हें पीछे भागना पड़ा. जो बुद्धिजीवी थे वे कमजोर साबित  हुए. उन्होंने कहा कि इस तरह की टक्कर का कोई फायदा नहीं है. तब उस तरह के हालात से डरते हुए उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि हथियारबंद संघर्ष का तरीका ठीक नहीं है. अब कोई और तरह के तरीके जैसे संसदवाद आदि आजमाए जाएँ. मतलब कि डर के कारण और हथियारबंद संघर्ष के ताव को न सहते हुए मार्क्सवाद को संशोधित करने के रास्ते चल पड़े. दुनिया भर में कम्युनिस्टों के संशोधनवाद के रास्ते पर चलने से भी पहले, यहाँ तक कि  ख्रुश्चेव से भी पहले भारत की कम्युनिस्ट पार्टी  (वर्तमान में सी.पी.आई.) ने संशोधनवादी रास्ता अपनाया.मार्शल टीटो से भी पहले के ये संशोधनवादी हैं. मार्शल टीटो भी संशोधनवादी हो गए थे. उन्होंने कहा था कि मजदूर वोटों द्वारा सत्ता हासिल कर लेंगे और समाजवाद की स्थापना हो जायेगी. और जब अमृतसर में इनकी कांफ्रेंस हुई, (उस वक्त सी.पी.आई. और सी.पी.एम. इकट्ठी थीं.) उस कांफ्रेंस में इन्होने इस संशोधन का प्रस्ताव रखा और पास किया जिसमें था कि अब वे केवल हथियारबंद इन्कलाब ही नहीं बल्कि कई और तरीकों की आजमाईश करेंगे. उसके बाद इन्होने जो अभ्यास किया है उसमें हथियारों का अभ्यास बिलकुल छोड़ दिया. इसके बाद इन पार्टियों के काडर में से अगर कोई ईमानदार सदस्य इनके लीडरों से पूछता था कि क्लासिकीय मार्क्सवाद तो हथियारों की प्रेक्टिस को नज़रंदाज़ नहीं करता है, तो ये जवाब देते थे कि आप मॉस मोबिलाईजेशन करें हम ऊपर की लीडरशिप से पूछकर बताएँगे. इन्होने क्रांतिकारियों की पार्टी से इसे एक मॉस पार्टी में बदलना शुरू कर दिया. जिसे कहते है कि दुअन्नी-चवन्नी की पार्टी जिसमें कोई भी शामिल हो सकता है. इसके पश्चात सी.पी.आई. और सी.पी.एम. आदि पार्टियों की यही कवायद रही है कि क्रांतिकारी पार्टी कि बजाय एक घोर जनवादी पार्टी , जनवादी भी नहीं, इससे भी आगे – जनवादी भी आगे की और देखते हैं एक बुर्जुआ जनवादी पार्टी बनाई जाये.

अब इनकी सोच क्या है? इनकी सोच है कि भारत एक धर्मों का देश है, धर्मों के और धर्मवालों के साथ मात्थापच्ची न करो, खुद नास्तिक रहो लेकिन धर्मों और धर्म वालों के साथ यूं मिल जाओ जैसे खिचड़ी में घी. कहने का अर्थ है कि किस प्रकार ये लोग विपरीत में बदले हैं. यह कोई सबब से नहीं हुआ कि  ये वामपंथी पार्टियाँ प्रतिक्रियावादी पार्टियों में बदल गयी हैं. इसके लिए ये मार्क्सवाद को संशोधित करके पहले ही रास्ता साफ़ कर चुके थे. ये लोग वैज्ञानिक विचारों से कुछ भी ग्रहण नहीं कर रहे हैं.इस प्रकार ये लोग कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे. संसद में कभी बहुमत में आकर भी नहीं, मतलब की इस पूंजीवादी ढांचे का निर्माण उन्होंने इस प्रकार किया है कि कभी भी मजदूर वर्ग इससे अपने एजेंडा को लागू करने में कामयाब नहीं हो सकता. एक उदाहरण देता हूँ. एक बार चौधरी देवी लाल चीन में गए. उन्हें वहां ट्रेक्टर  बहुत पसंद आये. देवी लाल कानून की अपेक्षा पंचायती ज्यादा थे. अब देखिये अगर पंचायत में आप को अधिकार है कि आपको पॉँच सौ रुपये तक के फैसले करवाने का हक़ है लेकिन आप ने फैसला कर दिया पॉँच हज़ार का तो बड़ी मुश्किल होगी. उन्होंने अफसरों से कहा कि वे इन ट्रेक्टरों को खरीदेंगे. लेकिन अफसरों ने जब देखा कि इस ‘डील’ से उन्हें तो कुछ भी नहीं मिलने वाला है, तो उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि इस देश से तो हम इस तरह की चीज नहीं खरीद सकते हैं. हमारे इस देश के साथ इस तरह के इकरार नहीं हैं. अगर अफसरशाही को इसमें अपने हित दिखाई देते तो वे उसी वक्त बता देते कि फलां-फलां धारा के तहत इन्हें खरीदा जा सकता है. हमारे कानून में बहुत सी एक दूसरे को काटती हुई धाराएँ है. एक से नहीं तो दूसरी से, इधर से नहीं तो कान उधर से पकडा जा सकता है.उस वक्त वैसे भी अफसरशाही किसानों को हिकारत की दृष्टि से देखती थी. इसलिए उसने कह दिया कि इस देश के साथ हमारा कुछ भी साँझा नहीं है. यह ‘डील’ नहीं हो सकती. हमारे कहने का भाव है कि संसद और कोई सोवियत जैसी चीज जिसे मजदूर वर्ग चाहता है उसके और इसके बीच का अंतर बहुत अधिक है.

फिर सवाल पैदा होता है कि मौजूदा हालात के तहत इंकलाबी शक्तियों को क्या करना चाहिए. इंकलाबी शक्तियों को समझना होगा कि जब तक हालात स्पष्ट इंकलाबी नहीं हो जाते तब तक चुनावों के बहिष्कार का मतलब अराजकतावाद होगा. मान लीजिये अगर हम बायकाट का नारा दे देते हैं तो चुनावों का बायकाट तो होगा नहीं, लेकिन हमारा बायकाट ज़रूर हो जायेगा.  जब तक मजदूरों के संगठन और आधार नहीं बन जाते, मजदूरों की लहरों के दौर की शुरुआत नहीं होती तब तक ऐसा सोचना भी गलत है. दूसरी और एक दो आदमी जीतवाकर, उन्हें सूअरबाड़े  में भेजकर और इस व्यवस्था का भंडा-फोड़ जैसी कार्रवाई करके भी मजूदरों और इंकलाबियों को कुछ हासिल नहीं होगा. अब स्थिति वह भी नहीं रही जिसके लिए पहले के दौर के इंकलाबी संसद का प्रचार के प्लेटफार्म के रूप में इस्तेमाल करने की सिफारिश किया करते थे. देश में मज़बूत एक इंकलाबी पार्टी जिसका की लोगों के बीच एक मज़बूत आधार हो, अपने थोड़े से इंकलाबी संसद में भेजकर प्रचार द्वारा लाभ उठा सकती है. लेकिन आज ऐसी स्थिति भी नहीं है. रूस में एक मज़बूत बोलेश्विक पार्टी थी. इसके थोड़े से व्यक्ति ही वहां की ‘दूमा’ के सदस्य थे लेकिन जब किसी मजदूर सदस्य ने बोलना होता था, तो सारे मजदूर अपने-अपने काम छोड़कर रेडियो-सेटों के चारों और इकट्ठे हो जाते थे. और उस वक्त इस तरह के जुर्म यानि कि रेडियो सुनने के अपराध में भी साईबीरिया की जेलों की सजा भुगतनी पड़ती थी. लेकिन मजदूरों के जोश और स्पिरिट में किसी प्रकार की कोई कमजोरी दिखाई नहीं देती थी. आज वैसी स्थिति नहीं है. असेम्बली लाइन को बिखरा दिया गया है. उत्पादन को एक देश के अन्दर के अलग-अलग कारखानों में ही नहीं बल्कि अलग-अलग देशों में और इसे फिर किसी अन्य देश में असेम्बल करने का दौर है. मजदूरों के प्रतिनिधि कारखानों में घुस ही नहीं पाते. अगर चले जाएँ तो उन्हें भी अपने साथ मिला लिया जाता है या ठिकाने लगा दिया जाता है. और इस प्रकार की हल्काबंदी की जाती है कि मजदूर बहुल आबादी को किसी एक सीट में बहुमत जैसी स्थिति में इकठ्ठा ही नहीं होने दिया जाता. सर्वे करवाए जाते हैं, अगर कहीं खतरा दिखाई देता है तो उस सीट का फिर परिसिमिन हो जाता है. उसे रिजर्व कर दिया जाता है या रिजर्वेशन भंग कर दी जाती है. हमारी यह पक्की धारणा है कि इन चुनावों में हमें एक अलग तरह से भाग लेना चाहिए. चुनावों में अपना उम्मीदवार खडा करना अपनी शक्ति जाया करने के सिवा कुछ नहीं है. बल्कि हमें चाहिए कि जब चुनावों के दौरान माहौल पूरी तरह से गर्म हो तो उस वक्त अपनी राजनीतिक सरगर्मियों को और अधिक तीव्र करें. लोगों से मिलकर उनतक अपनी बात पहुंचानी चाहिए. सभी बुर्जुआ और चुनावबाजी वामपंथी पार्टियों का भंडा-फोड़ करना चाहिए. लोगों को बताना चाहिए कि इन चुनावों से कुछ भी फर्क नहीं पड़ने वाला. फर्क तभी पड़ेगा जब सभी मेहनतकश अवाम खड़े होकर सारी ताकत अपने हाथ में लेंगे. लोगों को  बताया जाये कि किन-किन पार्टियों को किन-किन पूंजीपति और व्यावसायिक घरानों से कितना चंदा मिलता है. फिलहाल क्रांतिकारियों को इस तरह के या इससे मिलते-जुलते काम करने चाहिएं.

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